UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 1 बलिदान

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 1 बलिदान (मुंशी प्रेमचन्द) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 1 बलिदान (मुंशी प्रेमचन्द).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name बलिदान (मुंशी प्रेमचन्द)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 1 बलिदान (मुंशी प्रेमचन्द)

प्रश्न 1:
“बलिदान’ कहानी का सारांश (कथावस्तु, विषय-स्तु) अपने शब्दों में लिखिए।
या
प्रेमचन्द द्वारा रचित ‘बलिदान’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रेमचन्द द्वारा रचित प्रस्तुत कहानी ‘बलिदान सामाजिक यथार्थ पर आधारित है। इसका कथानक श्रमिक-सामाजिक वर्ग पर आधारित होने के साथ-साथ कृषक परिवार के सेवा, त्याग और समर्पण की भावना का पोषक है। ‘बलिदान’ कहानी का सारांश निम्नवत् है

मनुष्य की. आर्थिक अवस्था का सबसे अधिक असर उसके नाम पर भी पड़ता है। इसी कारण शक्कर के व्यवसायी हरखचन्द्र कुरमी का जब कारोबार टूट गया तो उसका नाम हरखू हो गया। पहले उसके पास कई हल की खेती होती थी, लेकिन अब उसके पास केवल पाँच बीघा जमीन, दो बैल और एक हल की खेती ही है।

पहले हरखू वर्ष में एक-दो बार ही बीमार पड़ता था, लेकिन बिना दवा खाये एकाध सप्ताह में ठीक हो जाता था। अब वह सत्तर वर्ष का हो चुका था। इस वर्ष बीमार पड़ा तो एक महीने में भी ठीक न हुआ। यद्यपि उसके पुत्र गिरधारी ने आयुर्वेदिक ओषधियों से उसकी चिकित्सा करवायी, लेकिन हरखु ठीक न हुआ। गाँव के एक-दो सम्पन्न लोगों ने उसे अंग्रेजी दवा खाने की सलाह दी, लेकिन अपने जीवन से निराश हरखू ने पाँच महीने तक कष्ट भोगकर शरीर त्याग दिया। गिरधारी ने उसका दाह-संस्कार बड़ी ही शान-शौकत से किया।

हरखू का खेत बहुत ही उपजाऊ था। वह गाँव वालों की निगाह पर चढ़ा हुआ था। वे जमींदार को नजराने के लिए बड़ी रकमों की पेशकश कर रहे थे। इसलिए जमींदार ओंकारनाथ ने गिरधारी को 100 रुपये नजराने के लिए कहा। गिरधारी के लिए ये नजराना देना सम्भव नहीं था। वह बहुत रोया-गिड़गिड़ाया, लेकिन जमींदार ने उसकी एक न सुनी। गिरधारी और उसकी पत्नी सुभागी दोनों ही चिन्तित थे, लेकिन उन्हें कोई उपाय नहीं सूझता था। जिस खेत के बिना वह अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता था, वे ही खेत उसके हाथों से निकले जा रहे थे। वह खेत की मेड़ पर बैठकर घण्टों रोता रहता था। अन्ततः ओंकारनाथ ने कालिकादीन से नजराना लेकर खेत उसको दे दिया। गिरधारी के घर उस दिन चूल्हा नहीं जला।।

सुभागी कालिकादीन की स्त्री से आये दिन बहाना ढूंढ़कर लड़े लेती थी, लेकिन गिरधारी किसी से कुछ नहीं कहता था। तीन-चार महीने बीत गये और बरसात का मौसम आ गया। गाँव के लोग अपने खेतों को जोतने-बोने की बात करते तो गिरधारी की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग जाती थी।

तुलसी बनिया के गिरधारी पर कुछ रुपये बाकी थे। उसने गिरधारी को रुपयों के लिए धमकी दी तो गाँव के ही व्यवहार कुशल मंगलसिंह ने उसके बैलों की जोड़ी औने-पौने दाम लगाकरे 60 रुपये में खरीद ली। जब बैलों को मंगल सिंह ले जा रहा था तो गिरधारी उनके कन्धों पर सिर रखकर खूब रोया। सुभागी भी खूब रोयी। उस रात गिरधारी ने कुछ नहीं खाया और रात को ही कहीं चला गया। गाँव के लोगों ने खूब खोजबीन की, लेकिन उसका पता न चला।।

अगले दिन सुभागी को गिरधारी बैलों की नाँद के पास दिखाई पड़ा। जब वह उसकी ओर चली तो वह पीछे। हटता हुआ अचानक गायब हो गया। दूसरे दिन जब कालिकादीन हल लेकर खेत पर पहुँची तो उसे गिरधारी खेत की मेड़ पर खड़ा दिखाई पड़ा। जब वह गिरधारी की ओर चला तो गिरधारी पीछे हटता हुआ पास के कुएँ में कूद पड़ा।

गिरधारी छ: महीने से गायब है। उसका लड़का ईंट के भट्ठे पर मजदूरी करता है। उसका गाँव में कोई आदर नहीं है। कालिकादीन भी अब गिरधारी के खेतों पर नहीं जाता; क्योंकि अँधेरा होते ही गिरधारी अपने खेतों की मेड़ पर आकर बैठ जाता है और रोता है। गाँव वाले अब उधर से गुजरते नहीं और उसके खेतों का नाम लेते भी डरते हैं।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से ‘बलिदान’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘बलिदान’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
कथानक (कथावस्तु) की दृष्टि से ‘बलिदान’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘बलिदान’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए तथा उसका उद्देश्य लिखिए।
या
‘बलिदान’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘बलिदान’ कहानी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘बलिदान’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘बलिदान’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘बलिदान’ कहानी की संवाद-योजना पर प्रकाश डालिए।
या
वातावरण सृष्टि की दृष्टि से ‘बलिदान’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
बलिदान कहानी प्रेमचन्द की बहुचर्चित कहानियों में से एक है। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने जमींदारों के अन्याय और कृषकों की पीड़ा को सजीव चित्र प्रस्तुत किया है। एक छोटे कलेवर की इस कहानी में सीमित पात्रों एवं घटनाओं के द्वारा उन्होंने तत्कालीन जमींदारी प्रथा का प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है। कहानी के तत्त्वों की दृष्टि से प्रस्तुत कहानी की समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – इस कहानी का शीर्षक आकर्षक, उत्सुकतावर्द्धक एवं स्वाभाविक है। इस कहानी का शीर्षक पाठक को कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। शीर्षक कथानक के अनुरूप है तथा उसके सम्पूर्ण भाव एवं उद्देश्य को स्पष्ट करता है। इस कारण इस कहानी का एर्षक सार्थक एवं उपयुक्त है।
(2) कथानक – प्रेमचन्द जी की इस सामाजिक क ो में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ चित्रण है। कथानक में मौलिकता, रोचकता, स्वाभाविकता, कौतूहलती इत्यादि विशेषताएँ विद्यमान हैं। कथानक सुगठित है। जो कृषक परिवार के सेवा, त्याग और समर्पण की भावना का पोषक है। यह जमींदार, कृषक और श्रमिक के बीच के दारुण सम्बन्धों की महागाथा है। इस कहानी का कथानक (कथावस्तु) एक निश्चित उद्देश्य की दिशा में यथार्थ घटनाओं एवं पात्रों के माध्यम से विकसित होता है। यह कथानक तत्कालीन सामाजिक एवं पारिवारिक व्यवस्था का सजीव चित्रण करता है। कहानी के कथानक में घटना, चरित्र एवं भाव तीनों का श्रेष्ठ समन्वय हुआ है।

प्रेमचन्द द्वारा लिखित ‘बलिदान’ कहानी एक ऐसे कृषक हरखु की कहानी है, जो पूर्णरूपेण गाँव के जमींदार पर आश्रित है और बहुत समय से जमींदार की जमीन जोतता आया है। उसकी मृत्यु हो जाती है। उसका पुत्र गिरधारी उसकी अन्त्येष्टि करता है। अर्थाभाव के कारण गिरधारी जमींदार की 20 वर्षों से जोती गयी जमीन को नजराना देकर नहीं ले पाता है। अशिक्षा, निर्धनता और नियति ने उसको प्रेतात्मा बना दिया अर्थात् उस जमीन के लिए उसने अपना बलिदान कर दिया। गिरधारी का बेटा श्रमिक बनकर अपने परिवार का भरण-पोषण करने लगा। उसकी पत्नी सुभागी अपमान से अपने जीवन के शेष दिनों को बिताने लगी।

इस कहानी का सम्पूर्ण कथानक सामाजिक सई पर आधारित एवं किसान की बेबसी एवं दयनीय स्थिति का सजीव चित्र उद्घाटित करने में सक्षम है। अतः कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से कहानी का कथानक पूर्ण और समीचीन है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण—कहानी में पात्रों के माध्यम से लेखक अपनी बात पाठकों तक पहुँचाता है। कलेवर छोटा होने के कारण प्रस्तुत कहानी में पात्रों की संख्या भी सीमित है। यह कहानी मानव-जीवन को सफल प्रतिबिम्ब है। कहानी के सभी पात्र यथार्थ जगत् से ही सम्बन्धित हैं। गिरधारी और ओंकारनाथ कहानी के प्रमुख पात्र हैं। हरखू, सुभागी एवं अन्य पात्र कहानी के गौणपात्र हैं। इस कहानी का प्रमुख पात्र गिरधारी सीधा- सादा व्यक्ति है। आर्थिक अभाव ने उसे मजबूर कर दिया है, इसलिए उससे कुछ कहते नहीं बनता। वह भयभीत, उदास एवं भाग्यवादी व्यक्ति है। इसके विपरीत जमींदार और गाँव के अन्य लोग चालाक, अपना मतलब निकालने वाले अर्थात् स्वार्थी, अमानवीय, धनलोलुप और अहंकारी हैं। पात्र और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘बलिदान’ एक सफल कहानी है।

(4) संवाद या कथोपकथन-प्रस्तुत कहानी के कथोपकथन संक्षिप्त, स्वाभाविक, सजीव, सरल, मार्मिक, पात्रानुकूल तथा कथा के विकास में सहायक हैं। कहानी के संवाद पात्रों के मनोभावों को सुन्दर चित्रण प्रस्तुत करते हैं। संवाद छोटे-छोटे हैं, सरल हैं, लेकिन उनका पाठक पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कहानी के संवाद समस्या को उभारने वाले, वस्तुस्थिति की व्याख्या करने वाले, पात्रों के मनोभावों को चित्रित करने वाले मौलिक, सजीव, रोचक और कलात्मक हैं। कहानी की संवाद-योजना मार्मिक, गम्भीर और कथानक को गतिशील करने वाली है। इस कहानी के संवादों में नाटकीय चमत्कार भी दर्शनीय है, यथा

गिरधारी ने रोकर कहीं उन्हीं खेतों ही का आसरा है, जोर्तुंगा नहीं तो क्या करूंगा?
ओंकारनाथ-नहीं, जरूर जोतो, खेत तुम्हारे हैं। मैं तुमसे छोड़ने को नहीं कहता हूँ। लेकिन तुम देखते हो जमीन की दर कितनी बढ़ गयी है। तुम 8 रुपये बीघे पर जोतते थे, मुझे 10 रुपये मिल रहे हैं और नजराने के रुपये सो अलग। तुम्हारे साथ रियायत करके, लगान वही रखता हूँ। पर नजराने के रुपये तुम्हें देने पड़ेंगे।

(5) भाषा-शैली – प्रस्तुत कहानी की भाषा सरल, सुबोध और स्वाभाविक है। भाषा पात्रानुकूल तथा प्रवाहपूर्ण है। लोकोक्तियों और मुहावरों ने भाषा में रोचकता ला दी है। प्रेमचन्द ने हिन्दी कथा-साहित्य को जो नया रूप और शिल्प प्रदान किया है, बलिदान’ कहानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

प्रस्तुत कहानी में भाषा एवं शैली का प्रयोग पात्र, विषय और परिस्थिति के अनुकूल हुआ है। कहानी की सफलता में उसकी भाषा का मुख्य स्थान होता है। इस कहानी की भाषा भी सहज, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है तथा उसमें अद्भुत व्यंजना-शक्ति भी प्रस्तुत कहानी में वर्णनात्मकता की प्रधानता है। चित्रात्मक वर्णन भी उपलब्ध है। संवादों की योजना से कथानके में नाटकीयती भी आ गयी है। एक उदाहरण देखिए
बेचारा टूटी खाट पर पड़ा राम-राम जप रहा था। मंगलसिंह ने कहा-बाबा, बिना दवा खाये अच्छे न होगे; कुनैन क्यों नहीं खाते ? हरखू ने उदासीन भाव से कहा तो लेते आना।
अतः भाषा-शैली की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(6) देश-काल या वातावरण – प्रस्तुत कथा की घटना एक निश्चित देश-काल और वातावरण में घटित हुई है। इस देश-काल और वातावरण की निश्चित सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ हैं। कहानी को रोचक, सहज और स्वाभाविक बनाने में देश-काल और वातावरण का निर्वाह सहायक रहा है। जमींदारी प्रथा का यथातथ्य वर्णन करने में सक्षम यह कहानी अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों को पूरा प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें तत्कालीन किसानों की दशा का मार्मिक चित्रण है। प्रेमचन्द इस कार्य में पूर्णतः । सिद्धहस्त हैं; यथा

गिरधारी उदास और निराश होकर घर आया। 100 रुपये का प्रबन्ध करना उसके काबू के बाहर था। सोचने लगा-अगर दोनों बैल बेच हूँ तो खेत ही लेकर क्या करूँगा? घर बेचें तो यहाँ लेने वाला कौन है? और फिर बाप-दादों का नाम डूबता है।

(7) उद्देश्य प्रस्तुत कहानी में प्रेमचन्द ने अपने उद्देश्य को यथार्थवादी दृष्टि से प्रस्तुत किया है। यह कहानी कृषक परिवार के सेवा, त्याग और समर्पण की भावना की पोषक है। इसके माध्यम से लेखक शोषित और शोषक वर्ग की भावना से जनसामान्य को अवगत कराता है। शोषित दिन-रात मेहनत करते हैं परन्तु अपने लिए नहीं शोषक के लिए। अन्त में अपने शरीर को बलिदान भी उसी के लिए कर देते हैं। इस कहानी का मूल उद्देश्य जमींदार, कृषक और श्रमिक तीनों के बीच के दारुण सम्बन्धों को जनसामान्य के सम्मुख स्पष्ट करना है। निष्कर्ष रूप में, कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से ‘बलिदान’ प्रेमचन्द की सफल कहानी है। कहानी में यथार्थवादी चित्रण है। आरम्भ, विकास और अन्त तीनों ही प्रभावशाली हैं। द्वन्द्व का सुन्दर चित्रण व पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। कथा सरल और रोचक है। उदात्त चरित्र और उद्देश्य कहानी की विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 3:
‘बलिदान’ कहानी के प्रमुख पात्र गिरधारी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘बलिदान’ कहानी के आधार पर उसके नायक की चारित्रिक-विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। क्र—प्रेमचन्द द्वारा लिखित ‘बलिदान’ कहानी का प्रमुख पात्र गिरधारी है। उसके पिता हरखू शक्कर के व्यापारी से परिस्थितिवश किसान बन जाते हैं। हरखू दीर्घकाल तक अस्वस्थ रहकर परलोक सिधार जाता है। गिरधारी जमा पूँजी से उसकी अन्त्येष्टि करता है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) सेवा-भावना से युक्त-गिरधारी में सेवा-भावना विद्यमान है। अपने पिता के बीमार होने पर वह उनकी हर प्रकार से तीमारदारी करता है। कभी नीम के सींके पिलाता, कभी गुर्च का सत, कभी गदापूरना की जड़। इन सभी बातों से स्पष्ट होता है कि गिरधारी में सेवा-भावना विद्यमान थी।

(2) आर्थिक अभाव से ग्रस्त—गिरधारी ने समस्त जमा पूँजी से अपने पिता की विधिवत अन्त्येष्टि की थी, इस कारण से उसके सामने पर्याप्त आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया। वह कई लोगों का कर्जदार हो गया और गाँव के लोग उससे कटने लगे।

(3) परिश्रमी और सत्यवादी-बलिदान’ कहानी का प्रमुख पात्र गिरधारी परिश्रमी और सत्यवादी है। उसके परिश्रमी होने का गुणं लेखक के इस कथन से स्पष्ट होता है, “खेत गिरधारी के जीवन के अंश हो गये थे। उनकी एक-एक अंगुल भूमि उसके रक्त से रँगी हुई थी। उनका एक-एक परमाणु उसके पसीने से तर हो गया था।” सत्यवादिता का गुण उसकी इस बात से स्पष्ट झलकता है कि जब वह ओंकारनाथ के पास जाता है तो कहता है-“सरकार मेरे घर में तो इस समय रोटियों का भी ठिकाना नहीं है। इतने रुपये कहाँ से लाऊँगा?’

(4) भाग्यवादी-गिरधारी अपने पिता की अन्त्येष्टि में अपनी सारी जमा पूँजी व्यय कर देता है। इससे उसके सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो जाता है। वह दो समय की रोटी के लिए भी परेशान हो जाता है। जब उसके पड़ोसी उससे कहते हैं कि तुमने अन्त्येष्टि में व्यर्थ पैसा खर्च किया, इतना पैसा खर्च नहीं करना चाहिए था तो वह कहता है-‘मेरे भाग्य में जो लिखा है, वह होगा।”

(5) अन्तर्द्वन्द्व का शिकार-गिरधारी खेत को अपनी माँ समझता है। उससे उसका अमिट लगाव है। उसके जाने का उसे बड़ा दु:ख होता है। जब उसके हाथ से उसकी जमीन खिसक जाती है, तो वह अन्तर्द्वन्द्व का शिकार होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। वह यह नहीं सोच पाती कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं ? इसी मानसिक स्थिति में वह अपने बैल भी बेच देता है। हालात से परेशान होकर वह रज्जू बढ़ई के पास जाता है और कहता है, ”रज्जू, मेरे हल भी बिगड़े हुए हैं, चलो बना दो।”

(6) विनम्र—गिरधारी स्वाभाविक रूप से विनम्र है। विनम्रता का गुण उसकी नस-नस में व्याप्त है। क्रोध , उसको छू तक नहीं गया है। तुलसी बनिया जब क्रोध में उससे तकादा करता है तो वह विनम्रतापूर्वक कहता है_‘साह, जैसे इतने दिनों मानें हो, आज और मान जाओ।कल तुम्हारी एक-एक कौड़ी चुका हूँगा।”

(7) सरल हृदय-गिरधारी सरल हृदय व्यक्ति है। जब मंगल सिंह तुलसी के बारे में उससे कहता है कि यह बड़ा बदमाश है, कहीं नालिश न कर दे तो सरल हृदय गिरधारी मंगल सिंह के बहकावे में आ जाता है। और मंगल को भी अच्छा सौदा बहुते, सस्ते में मिल जाता है।

(8) भावनात्मक-गिरधारी भावनात्मक रूप से अपने पशुओं से भी जुड़ा हुआ है। वह उन्हें अपने से अलग नहीं करना चाहता; क्योंकि वे उसकी खुशहाली के प्रतीक हैं। लेकिन कर्ज चुकाने व आर्थिक अभाव के कारण जब वह उन्हें बेच देता है तो उनके कन्धे पर अपना सिर रखकर फूट-फूटकर रोता है। उपर्युक्त गुणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि ‘बलिदान’ कहानी के प्रमुख पात्र गिरधारी में सत्यता, विनम्रता, सरलहृदयता जैसे गुणों का समावेश है। गिरधारी ‘बलिदान’ कहानी का ऐसा पात्र है, जो तत्कालीन शोषक समाज में शोषित व्यक्ति की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है। समय से हारकर वह कुचक्र का शिकार हो जाता है और प्राणान्त कर लेता है। पूरी कहानी गिरधारी के ही इर्द-गिर्द घूमती रहती है। सम्पूर्ण कहानी में वह जीवित स्थिति में तो व्याप्त है ही, मृत्यु होने के बाद भी छाया हुआ है। इसलिए उसे ही कहानी का नायक मानना समीचीन होगा।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
राहुल सांकृत्यायन की साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ लिखिए।
या
राहुल सांकृत्यायन के जीवन-परिचय एवं प्रमुख कृतियों का उल्लेख करते हुए उनकी भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
राहुल सांकृत्यायन का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
अनेक भाषाओं के ज्ञाता, बौद्ध-साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान्, धुरन्धर घुमक्कड़, महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने हिन्दी भाषा और साहित्य की महान् सेवा की है। इनका सम्पूर्ण जीवन देश-विदेश में भ्रमण करते ही व्यतीत हुआ। इनकी पर्यटन की प्रवृत्ति के मूल में ज्ञान-विज्ञान की इनकी जिज्ञासा ही प्रमुख थी।

जीवन-परिचय – महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का जन्म अपने ननिहाल पन्दहा ग्राम (जिला आजमगढ़) में सन् 1893 ई० में हुआ था। इनके पिता पं० गोवर्धन पाण्डेय कट्टरपन्थी ब्राह्मण थे। ये कनैला नामक ग्राम में निवास करते थे। इनकी माता कुलवन्ती देवी सरल और सात्त्विक विचारों की महिला थीं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा रानी की सराय और निजामाबाद में हुई। राहुल जी के बचपन का नाम ‘केदार’ था। बौद्ध धर्म में आस्था होने के कारण इन्होंने अपना नाम बदलकर बुद्ध के पुत्र के नाम पर राहुल’ रख लिया। ‘संकृति’ इनका गोत्र था, इसीलिए ये राहुल सांकृत्यायन कहलाए। सन् 1907 ई० में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इन्होंने वाराणसी में संस्कृत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। यहीं इन्हें पालि-साहित्य के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ और अपने नाना द्वारा सुनाई गयी कहानियों से यात्रा के प्रति प्रेम अंकुरित हुआ। इस्माइल मेरठी का निम्नलिखित शेर इनके घुमक्कड़ी जीवन के लिए प्रेरक सिद्ध हुआ-

सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िन्दगानी फिर कहाँ।
ज़िन्दगानी गर रही, तो नौजवानी फिर कहाँ ॥

इन्होंने पाँच बार सोवियत संघ, श्रीलंका और तिब्बत की यात्रा की। छ: मास ये यूरोप में रहे। एशिया को तो इन्होंने
न ही डाला था। कोरिया, मंचूरिया, ईरान, अफगानिस्तान, जापान, नेपाल आदि देशों को पर्यटन करने में इन्होंने अपना बहुत-सा समय बिताया। इन्होंने भारत के तो कोने-कोने का भ्रमण किया। बद्रीनाथ, केदारनाथ, कुमाऊँ-गढ़वाल से लेकर कर्नाटक, केरल, कश्मीर, लद्दाख तक भ्रमण किया। राहुल जी मुक्त विचारों के व्यक्ति थे। घुमक्कड़ी ही इनकी पाठशाला थी। यही इनका विश्वविद्यालय था। इन्होंने विश्वविद्यालय की चौखट पर पैर भी नहीं रखा था। भारत का यह पर्यटन-प्रिय साहित्यकार 14 अप्रैल, सन् 1963 ई० को संसार त्यागकर परलोक सिधार गया।

साहित्यिक सेवाएँ – राहुल जी उच्चकोटि के विद्वान् और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने धर्म, दर्शन, पुराण, इतिहास, भाषा एवं यात्रा पर ग्रन्थों की रचनाएँ कीं। हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में इन्होंने ‘अपभ्रंश काव्य-साहित्य’ और ‘दक्षिणी हिन्दी-साहित्य’ आदि श्रेष्ठ रचनाएँ प्रस्तुत की। इनकी रचनाओं में प्राचीनता का पुनरावलोकन, इतिहास का गौरव और तत्सम्बन्धी स्थानीय रंगत विद्यमान है। इनकी साहित्यिक सेवाओं का निरूपण निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता हैनिबन्धकार के रूप में

निबन्धकार के रूप में – राहुल जी ने भाषा और साहित्य से सम्बन्धित निबन्धों की रचना की, जिनमें धर्म, इतिहास, राजनीति और पुरातत्त्व प्रमुख हैं। इन्होंने रूढ़ियों के बन्धन ढीले करने के लिए धर्म, ईश्वर, सदाचार आदि विषयों पर निबन्ध लिखे।

उपन्यासकार के रूप में – राहुल जी ने अपने उपन्यासों में भारत के प्राचीन इतिहास का गौरवशाली रूप प्रस्तुत किया है। इन्होंने ‘सिंह सेनापति’ नामक उपन्यास में राजतन्त्र और गणतन्त्र की तुलना करते हुए गणतन्त्र को श्रेष्ठ सिद्ध किया है।

कहानीकार के रूप में – राहुल जी के कहानी-संग्रहों में ‘वोल्गा से गंगा’ और ‘सतमी के बच्चे श्रेष्ठ संग्रह हैं। ‘वोल्गा से गंगा में इन्होंने पिछले आठ हजार वर्षों के मानव-जीवन का विकास कहानी के रूप में प्रस्तुत किया है।

अन्य विधा-लेखक के रूप में – इनके अतिरिक्त राहुल जी ने जीवनी, संस्मरण और यात्रा-साहित्य की विधाओं पर भी प्रभावशाली रीति से सुन्दर रचनाएँ लिखीं हैं। ‘मेरी जीवन-यात्रा’ नामक इनकी आत्मकथात्मक ग्रन्थ पाँच खण्डों में विभक्त है। ‘बचपन की स्मृतियाँ’, ‘असहयोग के मेरे साथी’ आदि संस्मरणात्मक रचनाओं में इनका व्यक्तित्व उभरा है। इन्हें यात्रा-साहित्य लिखने में सर्वाधिक सफलता मिली है।

कृतियाँ – राहुल जी ने विभिन्न विषयों पर 150 से अधिक ग्रन्थों की रचना की, जिनमें से 129 प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कहानी – संग्रह-वोल्गा से गंगा’, ‘सतमी के बच्चे’, ‘बहुरंगी मधुपुरी’, ‘कनैल की कथा’ आदि।।
(2) उपन्यास – ‘सिंह सेनापति’, ‘जय यौधेय’, ‘विस्मृत यात्री’, ‘सप्तसिन्धु’, ‘जीने के लिए’ और ‘मधुर स्वप्न’।
(3) आत्मकथा – ‘मेरी जीवन-यात्रा।
(4) दर्शन – ‘दर्शन दिग्दर्शन’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘बौद्ध दर्शन’।
(5) विज्ञान – ‘विश्व की रूपरेखा’।
(6) इतिहास – मध्य एशिया का इतिहास’, ‘इस्लाम धर्म की रूपरेखा, “आदि-हिन्दी की कहानियाँ, ‘दक्खिनी हिन्दी काव्यधारा’ आदि। ।
(7) यात्रा-साहित्य – ‘लंका-तिब्बत-यात्रा’, ‘मेरी लद्दाख-यात्रा’, ‘रूस और ईरान में पच्चीस मास’, ‘जापान यात्रा के पन्ने’, ‘घुमक्कड़शास्त्र’।
(8) संस्मरण – ‘बचपन की स्मृतियाँ’, ‘असहयोग के मेरे साथी’, ‘जिनका मैं कृतज्ञ’।।
(9) कोश – ‘शासन शब्दकोश’, ‘राष्ट्रभाषा कोश’, ‘तिब्बती-हिन्दी कोश’।।
(10) देश-दर्शन – ‘सोवियत भूमि’, ‘किन्नर देश’, ‘हिमालय प्रदेश’, ‘जौनसार’, ‘देहरादून’ आदि।
(11) जीवनी साहित्य – सरदार पृथ्वीसिंह’, ‘नये भारत के नये नेता’, ‘वीर चंद्रसिंह गढ़वाली’ आदि।
(12) अनूदित रचनाएँ – ‘विस्मृति के गर्भ से’, ‘सोने की टाल’, ‘सूदखोर की मौत’, ‘शैतान की आँखें आदि।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ
विषय के अनुसार अपनी भाषा-शैली का रूप बदलने वाले राहुल जी,संस्कृत भाषा के प्रकाण्डे पण्डित होने के साथ-साथ अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इनके दार्शनिक ग्रन्थों में संस्कृतनिष्ठ भाषा के दर्शन होते हैं। प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन करते समय इनकी भाषा काव्यमयी और आलंकारिक तथा वर्णनात्मक निबन्धों में व्यावहारिक हो जाती है। इनकी भाषा में कहीं भी बनावटीपन नहीं है तथा शब्द-प्रयोग में स्वच्छन्दता से काम लिया गया है। इन्होंने संस्कृत के क्लिष्ट और समासयुक्त शब्दों का प्रयोग नहीं किया है, इसलिए इनकी भाषा में सरलता का गुण विद्यमान है तथा विचारों और भावों को प्रकट करने की पूर्ण क्षमता है। इन्होंने विदेशी शब्दों को अपनी भाषा की भंगिमा के साथ प्रयोग किया। मुहावरों के प्रयोग से भाषा में ‘शक्तिमत्ता बन पड़ी है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ
राहुल जी की शैली इनके मस्त व्यक्तित्व के अनुरूप है। भाषा के समान ही इनकी शैली भी सरल, सुबोध और प्रभावशाली है, जिसका रूप विषय और परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। इनकी शैली के निम्नलिखित रूप देखने को मिलते हैं

(1) वर्णनात्मक शैली: राहुल जी ने अधिकतर यात्रा-साहित्य की रचना की है; अत: इसमें वर्णनों की प्रधानता है। इस शैली की भाषा में प्रवाह, मधुरता और सरलता है तथा वाक्य छोटे-छोटे हैं।
(2) विवेचनात्मक शैली: राहुल जी के इतिहास, विज्ञान, दर्शन और गम्भीर विषय-सम्बन्धी निबन्धों में विवेचनात्मक शैली के दर्शन होते हैं। इस शैली की भाषा संस्कृतनिष्ठ है तथा इसमें चिन्तन की गहनता और
तार्किकता की प्रधानता है।
(3) व्यंग्यात्मक शैली:  राहुल जी ने अपने निबन्धों में सामाजिक कुरीतियों, पाखण्डों और निरर्थक परम्पराओं पर व्यंग्य प्रहार किये हैं। इनके व्यंग्यों में पैनापन पाया जाता है।
(4) उद्बोधन शैली: राहुल जी के निबन्धों में पाठकों के लिए सन्देश भी हैं। ये अपनी बात को मनवाने के लिए सरल, सुबोध और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करते हैं।
(5) उद्धरण शैली: अपनी बात की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए राहुल जी अनेक विद्वानों और प्राचीन ग्रन्थों के उद्धरण भी देते हैं।
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि राहुल जी की शैली सरल और सुगम है।

साहित्य में स्थान:
भाषा के प्रकाण्ड पण्डित राहुल सांकृत्यायन ने अपने अनुभव पर आधारित विशद लेखन से हिन्दी-साहित्य के विकास में अपूर्व योगदान दिया है। राहुल सांकृत्यायन ने हिन्दी-साहित्य के साथ-साथ इतिहास, भूगोल, दर्शन, राजनीति, समाजशास्त्र, धर्म आदि सभी विषयों पर रचना करके हिन्दी-साहित्य को समृद्ध किया है, जिससे इनकी गणना हिन्दी के प्रमुख समर्थ रचनाकारों में की जाती रहेगी।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न – दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1:
कूप-मंडूकता तेरा सत्यानाश हो। इस देश के बुद्धओं ने उपदेश करना शुरू किया कि समुन्दर के खारे पानी और हिन्दू धर्म में बड़ा बैर है, उसे छूने मात्र से वह नमक की पुतली की तरह गल जायगा। इतना बतला देने पर क्या कहने की आवश्यकता है कि समाज के कल्याण के लिए घुमक्कड़ धर्म कितनी आवश्यक चीज है? जिस जाति या देश ने इस धर्म को अपनाया, वह चारों फलों का भागी हुआ और जिसने उसे दुराया, उसको नरक में भी ठिकाना नहीं। आखिर घुमक्कड़ धर्म को भूलने के कारण ही हम सात शताब्दियों तक धक्का खाते रहे, ऐरे-गैरे जो भी आये, हमें चार लात लगाते गये।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) देश के उपदेशकों ने किनमें बड़ा बैर बताया है?
(iv) घुमक्कड़ धर्म किसलिए आवश्यक है?
(v) घुमक्कड़ धर्म को अपनाने वालों और उसे दुराने वालों के बारे में लेखक ने क्या बताया
उत्तर:
(i) प्रस्तुत ग़द्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित और राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित ‘अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा’ शीर्षक लेख से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
पाठ का नाम – अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा।।
लेखक का नाम – राहुल सांकृत्यायन।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – जिसने घुमक्कड़ी धर्म को त्यागा, वह पतन के गर्त में गिरता गया। सीमित दायरे में संकुचित हो जाने के कारण भारतीयों का विकास न केवल रुक गया, वरन् वह विश्व की तुलना में अत्यधिक पिछड़ भी गया। भ्रमण से जो साहस का गुण विकसित होता है, उसका | उनमें नितान्त अभाव हो गया और यही दोष उनकी पराधीनता का कारण सिद्ध हुआ।
(iii) देश के उपदेशकों ने समुन्दर के खारे पानी और हिन्दू धर्म में बड़ा बैर बताया है।
(iv) समाज के कल्याण के लिए घुमक्कड़ धर्म आवश्यक है।
(v) लेखक ने बताया है कि घुमक्कड़ धर्म को अपनाने वाला चारों फलों का भागी हो जाता है और उसे दुराने वाले को नरक में भी ठिकाना नहीं मिलता।

प्रश्न 2:
यह कोई आकस्मिक बात नहीं थी, समाज अगुओं ने चाहे कितना ही कूपमंडूक बनाना चाहा, लेकिन इस देश में ऐसे माई के लाल जब तब पैदा होते रहे, जिन्होंने कर्म-पथ की ओर संकेत किया। हमारे इतिहास में गुरु नानक का समय दूर का नहीं है, लेकिन अपने समय के वह महान् घुमक्कड़ थे। उन्होंने भारत-भ्रमण को ही पर्याप्त नहीं समझा, ईरान और अरब तक का धावा मारा। घुमक्कड़ी किसी बड़े योग से कम सिद्धिदायिनी नहीं है और निर्भीक तो वह एक नम्बर का बना देती है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) देश के महान लोगों (माई के लाल) ने किस ओर संकेत किया?
(iv) लेखक ने किसे अपने समय के महान घुमक्कड़ बताया है?
(v) लेखक ने घुमक्कड़ी की उपमा किससे दी है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – निश्चित ही घुमक्कड़ी योग-साधना से कम फलदायी नहीं है। जिस प्रकार योग-साधना से व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की सिद्धियाँ; अलौकिक या लोकोत्तर क्षमता या शक्ति; प्राप्त हो जाती हैं, उसी प्रकार पर्यटन से भी। पुन: लेखक का कहना है कि पर्यटनप्रियता व्यक्ति को सिद्धियाँ दे या न दे लेकिन वह व्यक्ति को निडर तो निश्चित ही बना देती है।
(iii) देश के महान लोगों (माई के लाल) ने कर्म-पथ की ओर संकेत किया है।
(iv) लेखक ने गुरुनानक को अपने समय के महान घुमक्कड़ बताया है।
(v) लेखक ने घुमक्कड़ी की उपमा किसी बड़े योग से दी है।

प्रश्न 3:
घुमक्कड़ी से बढ़कर सुख कहाँ मिल सकता है, आखिर चिन्ताहीनता तो सुख का सबसे स्पष्ट रूप है। घुमक्कड़ी में कष्ट भी होते हैं लेकिन उसे उसी तरह समझिए, जैसे भोजन में मिर्च मिर्च में यदि कड़वाहट न हो, तो क्या कोई मिर्च-प्रेमी उसमें हाथ भी लगाएगा? वस्तुत: घुमक्कड़ी में कभी-कभी होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस को और बढ़ा देते हैं उसी तरह जैसे काली पृष्ठभूमि में चित्र अधिक खिल उठता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सुख का सबसे स्पष्टुं रूप क्या है?
(iv) लेखक ने घुमक्कड़ी में मिलने वाले कष्टों को किसके समान बताया है?
(v) घुमक्कड़ी में कभी-कभी होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस को किस तरह और बढ़ा देते हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – राहुल जी कहते हैं कि निश्चिन्त होकर घूमने में जो सुख मिलता है, वह अन्य किसी कार्य में नहीं मिल सकता। चिन्ता से मुक्त व्यक्ति ही घुमक्कड़ी कर सकते हैं और चिन्ताहीन होने में ही सबसे बड़ा सुख है।
(iii) सुख का सबसे स्पष्ट रूप चिन्ताहीनता है।
(iv) लेखक ने घुमक्कड़ी में मिलने वाले कष्टों को भोजन में मिर्च के समान बताया है।
(v) घुमक्कड़ी में कभी-कभी होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस को उसी प्रकार बढ़ा देते हैं जैसे काली पृष्ठभूमि में चित्र अधिक खिल उठता है।

प्रश्न 4:
यदि माता-पिता विरोध करते हैं तो समझना चाहिए कि वह भी प्रह्लाद के माता-पिता के नवीन संस्करण हैं। यदि हितु-बान्धव बाधा उपस्थित करते हैं तो समझना चाहिए कि वे दिवांध हैं। यदि धर्माचार्य कुछ उलटा-सीधा तर्क देते हैं तो समझ लेना चाहिए कि इन्हीं ढोंगियों ने संसार को कभी सरल और सच्चे पथ पर चलने नहीं दिया। यदि राज्य और राजसी नेता अपनी कानूनी रुकावटें डालते हैं तो हजारों बार के तजुर्बा की हुई बात है कि महानदी के वेग की तरह घुमक्कड़ की गति को रोकने वाला दुनिया में कोई पैदा नहीं हुआ। बड़े-बड़े कठोर पहरे वाली राज्य-सीमाओं को घुमक्कड़ों ने आँख में धूल झोंककर पार कर लिया।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) प्रहलाद के माता-पिता के नवीन संस्करण किन्हें समझना चाहिए?
(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने लोगों को क्या सुझाव दिया है?
(v) ‘आँखों में धूल झोंकना’ मुहावरे का क्या अर्थ है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक का कहना है कि यदि घुमक्कड़ी में स्वयं आपके माता-पिता द्वारा विरोध उपस्थित किया जा रहा हो तो आपको इन्हें हिरण्यकश्यप (प्रह्लाद का पिता) का वर्तमान युग में हुआ अवतार समझनी चाहिए.और उनके कथनों की उसी प्रकार से अवहेलना कर देनी चाहिए, जिस प्रकार से प्रह्लाद ने की थी। यदि आपके भाई-बन्धु और तथाकथित हितचिन्तक आपकी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति का विरोध करते हों तो उनकी बातों पर भी उसी प्रकार से ध्यान नहीं देना चाहिए, जिस प्रकार किसी दिवान्ध (जिसे दिन के प्रकाश में दिखाई नहीं पड़ता; लक्षणों से मूर्ख) व्यक्ति की बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता।
(iii) घुमक्कड़ी व्रत ग्रहण करने का विरोध करने वाले माता-पिता को प्रहलाद के माता-पिता के नवीन संस्करण समझना चाहिए।
(iv) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने घुमक्कड़ी को सर्वाधिक महत्त्व देते हुए लोगों को सभी प्रकार के । विरोधों की अवहेलना करने का सुझाव दिया हैं।
(v) ‘आँखों में धूल झोंकना’ मुहावरे का अर्थ है-धोखा देना।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 1
Chapter Name Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence (स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था)
Number of Questions Solved 63
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence (स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों का केंद्र बिंदु क्या था? उन नीतियों के क्या प्रभाव हुए?
उत्तर
भारत में औपनिवेशिक शासकों द्वारा रची गई आर्थिक नीतियों का मूल केंद्र बिंदु भारत का आर्थिक विकास न होकर अपने मूल देश के आर्थिक हितों का संरक्षण और संवर्द्धन था। इन नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था के स्वरूप के मूल रूप को बदल डाला।। संक्षेप में, आर्थिक नीतियों के भारतीय अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े

  1. भारत, इंग्लैण्ड को कच्चे माल की आपूर्ति करने तथा वहाँ के बने तैयार माल का आयात करने वाला देश बनकर रह गया।
  2. राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि की दर धीमी हो गई।
  3. कृषि उत्पादकता में निरंतर कमी हुई।
  4. भारतीय उद्योगों का पतन होता चला गया।
  5. बेरोजगारी का विस्तार हुआ।
  6. साक्षरता दर में आशानुकूल वृद्धि न हो सकी।
  7. पूँजीगत एवं आधारभूत उद्योगों का विस्तार न हो सका।
  8. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव बना रहा।
  9. बार-बार प्राकृतिक आपदाओं और अकाल ने जनसामान्य को बहुत ही निर्धन बना डाला। इसके कारण, उच्च मृत्यु दर का सामना करना पड़ा

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नाम बताइए।
उत्तर
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री थे

  1. दादाभाई नौरोजी,
  2. विलियम डिग्वी,
  3. फिडले शिराज,
  4. डॉ० वी०के०आर०वी० राव,
  5. आर०सी० देसाई।

प्रश्न 3.
औपनिवेशिक शासन काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर
औपनिवेशिक शासन काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

  1. औपनिवेशिक शासन द्वारा लागू की गई भू-व्यवस्था प्रणाली।
  2. किसानों से अधिक लगान संग्रह।
  3.  प्रौद्योगिकी का निम्न स्तर।
  4.  सिंचाई सुविधाओं का अभाव।
  5. उर्वरकों का नगण्य प्रयोग।
  6. आर्थिक एवं सामाजिक पिछड़ापन।

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के समय देश में कार्य कर रहे कुछ आधुनिक उद्योगों के नाम बताइए।
उत्तर
स्वतंत्रता के समय देश में कार्य कर रहे कुछ आधुनिक उद्योगों के नाम इस प्रकार हैं

  1. सूती वस्त्र उद्योग,
  2. पटसन उद्योग,
  3. लोहा और इस्पात उद्योग (TISCO की स्थापना 1907 में हुई),
  4. चीनी उद्योग,
  5. सीमेंट उद्योग,
  6. कागज उद्योग।।

प्रश्न 5.
स्वतंत्रता पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत के व्यवस्थितवि-औद्योगीकरण का दोहरा ध्येय क्या था?
उत्तर
भारत के वि-औद्योगीकरण के पीछे विदेशी शासकों का दोहरा उद्देश्य यह था कि प्रथम, वे भारत को इंग्लैण्ड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बना सकें तथा द्वितीय, वे उन उद्योगों के उत्पादन के लिए भारत को ही एक विशाल बाजार बना सकें। इस प्रकार, वे अपने उद्योगों के विस्तार द्वारा अपने देश (ब्रिटेन) के लिए अधिकतम लाभ सुनिश्चित करना चाहते थे।

प्रश्न 6.
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परम्परागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कारण बताइए।
उत्तर
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परम्परागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। इसके निम्नलिखित कारण थे

  1. अंग्रेजी शासनकाल में राजाओं व नवाबों, जो हस्तकला उद्योगों को संरक्षण प्रदान करते थे, की स्वायत्तता समाप्त होती गई और उनकी आय भी सीमित हो गई।
  2. पाश्चात्य सभ्यता के प्रभावस्वरूप, भारतीयों की रुचियों व फैशन में परिवर्तन होने लगा। इससे माँग | का स्वरूभी बदलने लगा।
  3. अंग्रेजों ने शिल्पकारों पर भयंकर अत्याचार किए।
  4. इंग्लैण्ड में भारत से आयातों पर रोक लगा दी गई।
  5. ब्रिटिश सरकार की आर्थिक व औद्योगिक नीति भारतीय उद्योगों के विपक्ष में थी।
  6. शिल्पकारों के उत्पाद, कारखानों में निर्मित उत्पादों की प्रतियोगिता के समक्ष ठहर नहीं सके।
  7. सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति ने इन उद्योगों को पनपने नहीं दिया।

प्रश्न 7.
भारत में आधारिक संरचना विकास की नीतियों से अंग्रेज अपने क्या उद्देश्य पूरे करना चाहते थे?
उत्तर
औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत देश में रेलों, पत्तनों, जल-परिवहन व डाक-तार आदि का विकास हुआ। इसका उद्देश्य जनसामान्य को अधिक सुविधाएँ प्रदान करना नहीं था। अपितु देश के भीतर प्रशासन व पुलिस व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने एवं देश के कोने-कोने से कच्चा माल एकत्र करके अपने देश में भेजने तथा अपने देश में तैयार माल को भारत में पहुँचाना था।

प्रश्न 8.
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीतियों की कमियों की आलोचनात्मक विवेचना करें।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीति की निम्नलिखित कमियाँ थीं

  1. भारत में एक सृदृढ़ औद्योगिक आधार का विकास न करना।
  2. देश की विश्वप्रसिद्ध शिल्पकलाओं का धीरे-धीरे ह्रास होने देना।
  3. भारत को इंग्लैण्ड में विकसित हो रहे उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बनाना।
  4. इंग्लैण्ड के उद्योगों में बने माल के लिए भारत को ही विशाल बाजार बनाना।
  5. भावी औद्योगीकरण को हतोत्साहित करने हेतु पूँजीगत उद्योगों का विकास न करना।

प्रश्न 9.
औपनिवेशिक काल में भारतीय सैम्पत्ति के निष्कासन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
ब्रिटिश शासकों ने नागरिक प्रशासन तथा सेना के लिए बड़ी संख्या में अंग्रेज अधिकारी भर्ती किए तथा उन्हें भारतीय सहयोगियों की अपेक्षा बहुत अधिक वेतन और भत्ते दिए गए। सभी उच्च पदों पर ब्रिटिश अधिकारी ही नियुक्त किए गएं। असीमित प्रशासनिक शक्ति के कारण वे रिश्वत के रूप में भारी धनराशि लेने लगे। सेवानिवृत्त होने पर उन्हें पेंशन भी मिलती थी। भारत में रह रहे अधिकारी अपनी बचतों, पेंशन व अन्य लाभों के एक बड़े भाग को इंग्लैण्ड भेज देते थे। इन्हें पारिवारिक प्रेषण कहा गया। यह प्रेषण भारतीय सम्पत्ति को इंग्लैण्ड को निष्कासन था। इसके अतिरिक्त स्टर्लिंग ऋणों पर भारी ब्याज देना पड़ता था। इन्हें गृह ज्ञातव्य (home charges) का भुगतान करना पड़ता था। भारत को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के युद्धों का खर्च भी देना पड़ता था। इस प्रकार औपनिवेशिक काल में भारतीय सम्पत्ति का निष्कासन होता रहा।

प्रश्न 10.
जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष कौन-सा माना जाता है?
उत्तर
जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष 1921 माना जाता है।

प्रश्न 11.
औपनिवेशिक काल में भारत की जनांकिकीय स्थिति का एक संख्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करें।
उत्तर
ब्रिटिश भारत की जनसंख्या के विस्तृत ब्यौरे सबसे पहले 1881 की जनगणना के तहत एकत्रित किए गए। बाद में प्रत्येक दस वर्ष बाद जनगणना होती रही। वर्ष 1921 के पूर्व का भारत जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम सौपाने पर था। द्वितीय सोपान को आरम्भ 1921 के बाद माना जाता है। कुल मिलाकर साक्षरता दर तो 16 प्रतिशत से भी कम ही थी। इसमें महिला साक्षरता दर नगण्य, केवल 7 प्रतिशत आँकी गई थी। शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हजार थी। इस काल में औसत जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष थी। देश की अधिकांश जनसंख्या अत्यधिक गरीब थी।

प्रश्न 12.
स्वतंत्रता पूर्व भारत की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
औपनिवेशिक काल में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रकों में लगे कार्यशील श्रमिकों के आनुपातिक विभाजन में कोई परिवर्तन नहीं आया। कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था जिसमें 70-75 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी। विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रकों में क्रमशः 10 प्रतिशत तथा 15 से 20 प्रतिशत जनसमुदाय को रोजगार मिल रहा था। इस काल में क्षेत्रीय विषमताओं में बड़ी विलक्षणती थी। मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ क्षेत्रों में कृषि पर जनसंख्या की निर्भरता कम हो रही थी। विनिर्माण तथा सेवा श्रेत्रकों का महत्त्व बढ़ रहा था वहीं दूसरी ओर पंजाब, राजस्थान एवं उड़ीसा में कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या में बढोत्तरी हो रही थी।

प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित करें।
उत्तर
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आर्थिक चुनौतियाँ इस प्रकार थीं

  1. कृषि क्षेत्र में अत्यधिक श्रम-अधिशेष एवं निम्न उत्पादकता।।
  2. औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ापन।
  3. पुरानी व परम्परागत तकनीक।
  4. विदेशी व्यापार पर इंग्लैण्ड का एकाधिकार।
  5. व्यापक गरीबी।
  6. व्यापक बेरोजगारी।
  7. क्षेत्रीय विषमताएँ।
  8. आधारिक संरचना का अभाव।

प्रश्न 14.
भारत में प्रथम सरकारी जनगणना किस वर्ष में हुई थी?
उत्तर
वर्ष 1881 में।

प्रश्न 15.
स्वतंत्रता के समय भारत के विदेशी व्यापार के परिमाण और दिशा की जानकारी दें।
उत्तर
विदेशी व्यापार का परिमाण द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत के विदेशी व्यापार की मात्रा में कमी हुई। आयातों में कमी होने के मुख्य कारण थे—शत्रु राष्ट्रों के साथ आयातों में कटौती, निर्यातक देशों का युद्ध में संलग्न होना, जहाजी यातायात की तंगी, यातायात भाड़े में वृद्धि और मशीनों के आयातों पर नियंत्रण। महाद्वीपीय देशों को निर्यात बंद हो जाने और जहाजी परिवहन की कमी के कारण ब्रिटेन को होने वाले निर्यातों में भी कमी आई। किंतु बाद के तीन वर्षों में इनमें तेजी से वृद्धि हुई।
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युद्ध के कारण विदेशी व्यापार की संरचना में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। आयात मद में कच्चे माल का हिस्सा बड़ा जबकि निर्मित वस्तुओं का हिस्सा घटा। इसके विपरीत निर्यातों में कच्चे माल का हिस्सा घटा जबकि निर्मित घस्तुओं का भाग बढ़ा। वस्तुओं की दृष्टि से इस अवधि में चाय तथा निर्मित जूट का निर्यात निरंतर बढ़ता रहा जबकि कच्चे जूट व तिलहन का निर्यात युद्ध से पूर्व तो बढ़ा किंतु उसके बाद घटता गया। सूती धागा, चीनी, सीमेंट, माचिस अन्य निर्मित माल तथा अन्य उपभोग वस्तुओं के आयात में निरंतर गिरावट आई जबकि खनिज तेल, रसायन, रंग आदि के आयात बढ़ते गए।

विदेशी व्यापार की दिशा- युद्धकाल में ब्रिटेन के साथ भारत के निर्यात और आयात दोनों प्रकार के व्यापार का प्रतिशत कम हो गया लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के देशों के साथ व्यापार में बहुत वृद्धि हुई। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार में तेजी से वृद्धि हुई। कनाडा के साथ व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। यूरोपीय देशों-फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया आदि के साथ भारत का व्यापार घटता चला गया। जापान के युद्ध में कूद पड़ने के कारण भारत का उसके साथ व्यापार बंद हो गया।

प्रश्न 16.
क्या अंग्रेजों ने भारत में कुछ सकारात्मक योगदान भी दिया था? विवेचना करें।
उत्तर
भारत के आर्थिक विकास में अंग्रेजों का नकारात्मक पक्ष सकारात्मक पक्ष की तुलना में अधिक प्रबल है। यद्यपि अंग्रेजी इतिहासकार भारत के अल्पविकास के लिए अंग्रेजी शासन को उत्तरदायी नहीं मानते। इस बारे में एल०सी०ए० नोल्स (L.C.A. Knowles) का कहना है-“ब्रिटिश शासकों ने तो आर्थिक विकास को प्रोत्साहन दिया, न कि उसमें बाधा डाली। वेरा एन्स्टे (Vera Anstey) का कहना है कि नसंख्या में अत्यधिक वृद्धि और लोगों के दृष्टिकोण के कारण यह देश आर्थिक दृष्टि से अल्पविकसित रह गया। इसके लिए आर्थिक नीतियाँ अधिक जिम्मेदार नहीं हैं। भारतीय  अर्थशास्त्री-दादाभाई नौरोजी, रमेशचन्द्र दत्त, रजनी पाम दत्त, वी०वी० भट्ट आदि इन विचारों का खण्डन करते हैं। यद्यपि, भारत के अल्पविकास के लिए ब्रिटिश शासन ही उत्तरदायी है तथापि ब्रिटिश साम्राज्य का भारत के विकास में सकारात्मक योगदान भी रहा है जो निम्नलिखित है।

  1. ब्रिटिश शासन के अंतर्गत राजनीतिक एवं प्रशासन की दृष्टि से भारत एक इकाई बन गया।
  2. शांति एवं व्यवस्था की दृष्टि से स्थिति में सुधार हुआ।
  3. परिवहन और संचार सुविधाओं में वृद्धि हुई।
  4. नगरीय क्षेत्रों में पाश्चात्य उत्तरदायी विचारों का प्रभाव पड़ा।
    । इसके बावजूद राज्य की शोषणकारी आर्थिक नीति ने विकास के पुराने भौतिक आधार को नष्ट कर दिया. जो आगे चलकर भारत के आर्थिक विकास में बाधक बना।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कब ब्रिटिश शासन की नींव डाली?
(क) सन् 1757 में
(ख) सन् 1857 में
(ग) सन् 1557 में
(घ) सन् 1657 में
उत्तर
(क) सन् 1757 में

प्रश्न 2.
कब तक भारत आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सम्पन्न तथा समृद्ध देश रहा?
(क) 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक
(ख) 18वीं शताब्दी के अंत तक
(ग) 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक
(घ) 19वीं शताब्दी के अंत तक
उत्तर
(ख) 18वीं शताब्दी के अंत तक

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय भारत की आजीविका का मुख्य स्रोत क्या था?
(क) उद्योग
(ख) पशुपालन ।
(ग) कृषि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) कृषि

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व भारत में भू-राजस्व संबंधी कितनी प्रणालियाँ प्रचलित थीं?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार ।
(घ) पाँच
उत्तर
(ख) तीन ।

प्रश्न 5.
भारत में अंग्रेजी शासन कब तक रहा?
(क) सन् 1847 तक
(ख) सन् 1740 तक
(ग) सन् 1950 तक
(घ) सन् 1947 तक
उत्तर
(घ) सन् 1947 तक ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से क्या आशय है?
उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद से आशय एक वर्ष की अवधि में देश की घरेलू सीमा में अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के प्रवाह से है।

प्रश्न 2.
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से क्या आशय है?
उत्तर
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से आशय है—देश में प्रति व्यक्ति द्वारा एक वर्ष में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रवाह। मापने का सूत्र
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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय आय में विभिन्न क्षेत्रों का क्या योगदान था?
उत्तर
वर्ष 1947 में राष्ट्रीय आय में विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिशत योगदान इस प्रकार था
1. प्राथमिक क्षेत्र = 587 प्रतिशत,
2. द्वितीयक क्षेत्र = 14.3 प्रतिशत,
3. तृतीयक क्षेत्र =27 प्रतिशत।

प्रश्न 4.
प्राथमिक क्षेत्र में कौन-कौन-सी आर्थिक क्रियाएँ शामिल की जाती है।
उत्तर
1. कृषि,
2. वानिकी,
3. मत्स्य पालन,
4. खनन।

प्रश्न 5.
‘स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ेपन की स्थिति में थी। इसके पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
1. कृषि पर अत्यधिक निर्भरता एवं कृषि ही आजीविका का मुख्य साधन थी। .
2. कार्यशील जनसंख्या का एक बड़ा भाग कृषि क्षेत्र में कार्यरत था। 

प्रश्न 6.
कृषि के सीमित व्यापारीकरण का क्या कारण था?
उत्तर
कृषि उत्पादन अधिकतर कृषि परिवारों के जीवन निर्वाह के लिए किया जाता था। बाजार में बिक्री के लिए बहुत कम उत्पादन बच पाता था।

प्रश्न 7.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था कैसी अर्थव्यवस्था थी?
उत्तर
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था

  1. एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी;
  2. एक गतिहीन अर्थव्यवस्था थी;
  3. एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था थी।

प्रश्न 8.
प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र क्या हैं?
उत्तर
1. प्राथमिक क्षेत्र—वह क्षेत्र जिसमें प्राकृतिक साधनों का प्रयोग करके वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है।
2. द्वितीयक क्षेत्र-  वह क्षेत्र जिसमें उद्यम एक प्रकार की वस्तु को दूसरे प्रकार में परिवर्तित करते
3. तृतीयक क्षेत्र— वह क्षेत्र जो सेवाओं का उत्पादन करता है।

प्रश्न 9.
व्यावसायिक संरचना से क्या आशय है?
उत्तर
व्यावसायिक संरचना का अर्थ है-कार्यशील जनसंख्या का विभिन्न व्यवसायों में वितरण।

प्रश्न 10.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की व्यावसायिक संरचना क्या थी?
उत्तर
स्वतंत्रता के समय 72.7 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्र में, 10.1 प्रतिशत द्वितीयक क्षेत्र में तथा 17.2 प्रतिशत जनसंख्या तृतीयक क्षेत्र में कार्यरत थी।

प्रश्न 11.
स्वतंत्रता के समय भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के नाम बताइए।
उत्तर
कच्चे उत्पादे; जैसे-रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील और पटसन।

प्रश्न 12.
स्वतंत्रता के समय भारत में आयात की जाने वाली वस्तुओं के नाम बताइए।
उत्तर
सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्रों जैसी अन्तिम उपभोग वस्तुएँ एवं इंग्लैण्ड के कारखानों में बनी हल्की मशीनें।

प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के समय व्यापार संतुलन की क्या स्थिति थी?
उत्तर
व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में था।

प्रश्न 14.
भारत में निर्याताधिक्य का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
देश के आंतरिक बाजारों में अनाज, कपड़ा और मिट्टी के तेल जैसी अनेक वस्तुओं का अभाव हो गया और उनके मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि होने लगी।

प्रश्न 15.
भारत में जनसंख्या की दृष्टि से महान विभाजक वर्ष कौन-सा है?
उत्तर
वर्ष 1921 को जनसंख्या की दृष्टि से महान विभाजक वर्ष माना जाता है।

प्रश्न 16.
स्वतंत्रता के समय विभिन्न सामाजिक अभिसूचकों की क्या स्थिति थी?
उत्तर
साक्षरता दर = 16.7%;
जीवन प्रत्याशा =32.1
वर्ष; मृत्यु दर = 29.4%;
शिशु मृत्यु दर = 218 प्रति हजार;
महिला साक्षरता दर = 7%l गरीबी,
व्यापक बेरोजगारी एवं असमानताएँ उस समय की विशेषताएँ थीं।

प्रश्न 17.

कुटीर उद्योगों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
1. कुटीर उद्याग मुख्यत: कृषि व्यवसाय से संबद्ध होते हैं।
2. इनमें अधिकांश कार्य मानवीय श्रम द्वारा किए जाते हैं।

प्रश्न 18.
ढाका की मलमल को अरब देशों में क्या कहा जाता था?
उत्तर
ढाका की मलमल को अरब देशों में ‘आबेहयात’ कहा जाता था।

प्रश्न 19.
ब्रिटिश काल में भारतीय शिल्प उद्योगों के पतन के दो कारण बताइए।
उत्तर
1. राजदरबारों की समाप्ति होने पर इन उद्योगों को संरक्षण मिलना बंद हो गया।
2. पाश्चात्य प्रभाव के फलस्वरूप रुचि एवं फैशन में परिवर्तन के कारण इनके प्रति जनरुचि कम हो गई।

प्रश्न 20.
भारतीय उद्योगों के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति कैसी थी?
उत्तर
ब्रिटिश सरकार की नीति भारतीय उद्योगों के विकास को अवरुद्ध करने की थी।

प्रश्न 21.
द्वितीय विश्वयुद्ध का भारतीय उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
मुद्रा प्रसार के कारण मूल्यों में तेजी से वृद्धि हुई, सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं का अभाव हो गया और आधारभूत उद्योगों की उपेक्षा हुई।

प्रश्न 22.
रैयतवाड़ी प्रथा के दो दोष बताइए।
उत्तर
1. लगाने का निर्धारण मनमाने एवं पक्षपातपूर्ण ढंग से किया गया।
2. लगान वृद्धि ने भू-सुधार कार्यक्रमों में बाधा डाली। 

प्रश्न 23.
जमींदारी प्रथा के विपक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
1. मध्यस्थों की संख्या में वृद्धि हुई।
2. लगान व शोषण में वृद्धि हुई।

प्रश्न 24.
हिल्टन यंग कमीशन की मुख्य सिफारिशें क्या थीं?
उत्तर
हिल्टन यंग कमीशन की मुख्य सिफारिशें थीं
1. देश में स्वर्ण धातुमान की स्थापना की जाए।
2. रुपए की विनिमय दर 1 शिलिंग 6 पेंस निर्धारित की जाए।

प्रश्न 25.
प्रेसीडेंसी बैंक कौन-कौन से थे? ।
उत्तर
1. बैंक ऑफ बंगाल,
2. बैंक ऑफ मुंबई,
3. बैंक ऑफ मद्रास।

प्रश्न 26.
भारत कब से कब तक ब्रिटिश उपनिवेश रहा?
उत्तर
भारत सन् 1757 से 1947 तक ब्रिटिश उपनिवेश रहा।

प्रश्न 27.
भारत में औपनिवेशिक शोषण के दो रूप बताइए।
उत्तर
1. दोषपूर्ण व्यापारिक नीतियों के फलस्वरूप भारतीय धन का निकास हुआ।
2. ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा भारत से ब्याज, लाभांश और लाभ के छ में धन बाहर ले जाया गया।

प्रश्न 28.
भारत के किस क्षेत्र में रैयतवाड़ी प्रथा लागू की गई?
उत्तर
सर टॉमस मुनरो ने सन् 1792 में मद्रास में रैयतवाड़ी प्रथा प्रारम्भ की। बाद में इसका विस्तार मुंबई एवं उत्तर भारत के ब्रिटिश क्षेत्रों में कर दिया गया।

प्रश्न 29. 
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई थी। दो तर्क दीजिए।
उत्तर
1. देश का आर्थिक ढाँचा अत्यधिक क्षीण था।
2. आधारभूत उद्योगों का विकास नहीं हुआ था।

प्रश्न 30.
भारतीय अर्थव्यवस्था के गतिहीन बने रहने के दो कारण दीजिए।
उत्तर
1. निम्न मजदूरी एवं निम्न क्रय-शक्ति के कारण मजदूरों की दशा अत्यधिक दयनीय थी।
2. ग्रामोद्योग एवं शिल्पकारों के पतन के कारण कृषि पर जनसंख्या का बोझ निरंतर बढ़ता जा रहा था।

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत आर्थिक विकास का स्तर निम्न था।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का मुख्य उद्देश्य इंग्लैण्ड में तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक आधार के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को एक पोषक अर्थव्यवस्था तक ही सीमित रखना था। अत: देश के आर्थिक विकास के स्थान पर वे अपने आर्थिक हितों के संरक्षण एवं संवर्द्धन में ही लगे रहे। भारत इंग्लैण्ड को कच्चे माल की पूर्ति करने तथा वहाँ के बने तैयार माल को आयात करने वाला देश ही बनकर रह गया। एक आकलन के अनुसार, 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत की राष्ट्रीय आय की वार्षिक संवृद्धि दर 2 प्रतिशत से कम रही तथा प्रति व्यक्ति उत्पाद वृद्धि दर मात्र आधा प्रतिशत ही रही।

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में कृषि क्षेत्र की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासनकाल में भारत मूलतः एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था ही बना रहा। देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर ही निर्भर थी किंतु कृषि उत्पादकता में निरंतर कमी होती गई, यह लगभग गतिहीन बनी रही। इस गतिहीनता का प्रमुख कारण दोषपूर्ण भू-व्यवस्था प्रणालियाँ थीं जिनमें मध्यस्थों की संख्या बढ़ती जा रही थी। कृषि लाभ के अधिकांश भाग को जमींदार ही हड़प जाते थे। राजस्व व्यवस्था भी जमींदारों के पक्ष में जाती थी। परम्परागत तकनीकी, सिंचाई-सुविधाओं का अभाव और उर्वरकों के नगण्य प्रयोग के कारण कृषि उत्पादकता के स्तर में वृद्धि न हो सकी। कृषि का व्यवसायीकरण सीमित था और नकदी फसलें ब्रिटेन के कारखानों में उपयोग के लिए भेज दी जाती थीं। स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन ने भी कृषि व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र (द्वितीयक क्षेत्र) की क्या  स्थिति थीं ।
उत्तर
कृषि की भाँति औपनिवेशिक व्यवस्था के अंतर्गत भारत एक सुदृढ़ औद्योगिक आधार का निर्माण नहीं कर पाया। विश्वप्रसिद्ध शिल्पकलाओं का पतन होता रहा और आधुनिक औद्योगिक आधार की नींव नहीं रखी गई। इसके पीछे ब्रिटिश सरकार के दो उद्देश्य थे—

  1. भारत को कच्चे माल का निर्यातक बनाना,
  2. इंग्लैण्ड के निर्मित माल के लिए भारत को एक विशाल बाजार बनने देना। इस दौरान जो भी विनियोग हुआ, वह उपभोक्ता उद्योगों के क्षेत्र में ही हुआ; जैसे—सूती वस्त्र, पटसन आदि। आधारभूत उद्योग के रूप में केवल एक उद्योग “टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी’ की 1907 में स्थापना की गई। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चीनी, कागज व सीमेंट के भी कुछ कारखाने स्थापित किए गए। अत: पूँजीगत उद्योगों का अभाव ही बना रहा। न केवल औद्योगिक क्षेत्र की संवृद्धि दर बहुत कम थी अपितु राष्ट्रीय आय में इनका योगदान भी बहुत कम था। सार्वजनिक क्षेत्र रेल, बंदरगाह, विद्युत व संचार तथा कुछ विभागीय उपक्रमों तक ही सीमित था।

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के समय भारत की व्यावसायिक संरचना किस प्रकार की थी?
उत्तरें
औपनिवेशिक काल में कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था और क्षेत्रीय विषमताओं में निरंतर वृद्धि हो रही थी। मद्रास प्रेसीडेंसी के क्षेत्रों में कृषि पर निर्भर कार्यशील जनसंख्या में कमी आ रही थी तो पंजाब, राजस्थान और उड़ीसा के क्षेत्रों में कृषि में संलग्न श्रमिकों में वृद्धि हो रही थी। 1951 में भारत में व्यावसायिक वितरण निम्नांकित प्रकार था-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence 3
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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता के समय भारत में आधारिक संरचना की क्या स्थिति थी?
उत्तर
औपनिवेशिक शासन के दौरान देश में रेलों, पत्तनों, जल परिवहन व डाकतार आदि का विकास हुआ किंतु इसके पीछे ब्रिटिश प्रशासकों का उद्देश्य जन-साधारण को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना नहीं था बल्कि अपने हितों का संवर्द्धन करना था। सड़कों का निर्माण इसलिए किया गया कि देश के भीतर उनकी सेवाओं के आवागमन में सुविधा हो तथा माल को निकट की मण्डियों तक पहुँचाया जा सके। रेलों के विकास ने कृषि के व्यवसायीकरण को प्रोत्साहित किया, निर्यात व्यापार की माँग में विस्तार हुआ। आंतरिक व्यापार एवं जलमार्गों के विकास पर भी ध्यान दिया गया। डाक सेवाओं का भी विस्तार किया गया। स्वतंत्रता के समय भारत की आधारिक संरचना की स्थिति इस प्रकार थी
रेलवे लाइन की लंबाई = 33,000 मील;
पक्की सड़कों की लंबाई = 97,500 मील;
समुद्री जहाजों का भार = 31 लाख GRT;
बैंकों की कुल शाखाएँ =4115;
विद्युत उत्पादन क्षमता = 23 लाख किलोवाट;
विद्युतीकरण ग्रामों की संख्या = 3,000

प्रश्न 6.
भारत में दि-औद्योगीकरण के क्या परिणाम हुए?
उत्तर
भारत में वि-औद्योगीकरण (उद्योगों के पतन) के निम्नलिखित परिणाम हुए

  1. उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों, शिल्पकारों व अन्य कारीगरों के समक्ष जीवन-यापन की समस्या आरम्भ हो गई। वैकल्पिक रोजगार के अभाव में कृषि ने उन्हें आश्रय दिया। फलतः कृषि पर आश्रित जनसंख्या का अनुपात बढ़ता गया। यह सन् 1861 में 55% से बढ़कर सन् 1911 तक 72% हो गया।
  2. भारत की व्यापारिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन हुए। 18वीं शताब्दी के अंत तक भारत अधिकांशत: तैयार वस्तुएँ बाहर भेजता था। इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप कच्चे माल की माँग बढ़ी जिसकी आपूर्ति भारत जैसे विशाल उपनिवेशों से ही हो सकती थी। दूसरी ओर इंग्लैण्ड के कारखानों में बनी वस्तुओं के लिए भारत में विशाल बाजार उपलब्ध था। अतः भारतीय उद्योगों के पतन के साथ-साथ इंग्लैण्ड में तैयार वस्तुएँ भारत में आने लगीं और इसके बदले यहाँ से कच्चे माल का निर्यात बढ़ता गया।
  3. शिल्पकारों के कृषि के क्षेत्र में आने पर भूमि की माँग बढ़ गई। 19वीं शताब्दी के अकालों केकारण भी कारीगर ग्रामीण उद्योगों में अपनी जीविकोपार्जन करने में असमर्थ हो चले थे। अत: कृषि क्षेत्र में आने वाले बहुत कम व्यक्ति भूमि खरीदकर खेती करने की स्थिति में थे। फलस्वरूप कृषि क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ती गई जो भूमिहीन थे और केवल श्रम द्वारा ही जीविकोपार्जन करना चाहते थे।
  4. शिल्पकारों की आर्थिक स्थिति खराब होती गई।

प्रश्न 7.
देश विभाजन का भारतीय उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, साथ ही वह दो भागों में विभाजित भी हो गया। यद्यपि यह विभाजन राजनीतिक था तथापि आर्थिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण था। भारतीय उद्योगों पर देश विभाजन के निम्नांकित प्रभाव पड़े

  1. भारत को अविभाजित देश के क्षेत्रफल का 77%, जनसंख्या का 82%, औद्योगिक संस्थाओं का 91% और रोजगार प्राप्त श्रमिकों का 93% भाग मिला।
  2. अधिकांश खनिजभण्डार भारत में ही रहे। भारत को अविभाजित भारत के संपूर्ण खनिज साधनों के केवल 3% मूल्य के खनिज पदार्थों की हानि हुई।
  3. देश के दो प्रमुख उद्योगों—सूती वस्त्र और जूट उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसका कारण कच्चे माल का अभाव था। अविभाजित भारत को कच्चे जूट के उत्पादन पर एकाधिकार प्राप्त था,लेकिन विभाजन के परिणामस्वरूप जूट उत्पादन क्षेत्र का 81% भाग पाकिस्तान में चला गया।
  4. पाकिस्तान में चले जाने वाले क्षेत्र में भारतीय उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की पर्याप्त माँग रहती थी। विभाजन के बाद इन वस्तुओं की माँग में कमी आ गई। अत: इन उद्योगों को अपने उत्पादन की खपत के लिए नये बाजारों की खोज करनी पड़ी।
  5. विभाजन के फलस्वरूप भारत से बड़ी मात्रा में योग्य एवं कुशल श्रमिक पाकिस्तान चले गए;फलस्वरूप भारतीय उद्योगों में कुशल श्रमिकों की कमी हो गई।
  6. उद्योगों की विविधता के कारण अधिकांश उद्योगपति भारत आ गए। इससे भारत में औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिला।
  7. विभाजन के पश्चात् देश में अनिश्चित एवं अस्थिर वातावरण उत्पन्न हो गया। भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशियों के विश्वास में कमी आई और देश में विदेशी पूँजी का प्रवाह कम हो गया।
  8. विभाजने के पश्चात् रेलवे की स्थिति भी असंतोषजनक रही। चटगाँव और करांची बंदरगाह विदेशी | हो गए तथा मुंबई और कोलकाता बंदरगाहों पर विशेष भार आ पड़ा। कुल मिलाकर पाकिस्तान कीतुलना में भरत लाभदायक स्थिति में रहा।

प्रश्न 8.
भारत में उपनिवेशी शोषण के परिणाम क्या थे?
उत्तर
उपनिवेशी शोषण के निम्नांकित परिणाम हुए-

  1. भारत मूलत: ‘कृषि-प्रधान देश ही रहा और चाय, कॉफी, मसाले, तिलहन, गन्ना तथा अन्य सामग्रियों और अन्य कच्चे माल के निर्यात द्वारा ग्रेट ब्रिटेन के हितों की रक्षा के लिए भारतीय कृषि वाणिज्यीकृत हो गई।
  2. भारत को अपने औद्योगिक ढाँचे का आधुनिकीकरण नहीं करने दिया गया। इसके हस्तशिल्पों को | नष्ट कर दिया गया तथा वह निर्मित माल का आयातक बन गया।
  3. साम्राज्य अधिमान की भेदमूलक संरक्षण नीति अपनाने का परिणाम यह हुआ कि भारत के ब्रिटिश विनियोक्ताओं के लिए सुरक्षित विश्वस्त क्षेत्र ढूंढने में सहायता मिली।
  4. उपभोक्ता वस्तु उद्योगों-चाय, कॉफी और रबड़ बागान में प्रत्यक्ष ब्रिटिश विनियोग किया गया, लेकिन भारी और आधारभूत उद्योगों के विकास के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया।
  5. प्रबन्ध अभिकरण प्रणाली का स्वरूप शोषणकारी ही रहा।
  6. अंग्रेजों ने गृह ज्ञातव्य (home charges) के रूप में आर्थिक विकास द्वारा भारत का शोषण किया। परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था अल्पविकास की स्थिति में ही रह गई।

प्रश्न 9.
“स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विभिन्न शोषणकारी नीतियों एवं गरीबी और बेरोजगारी के परिणामस्वरूप अर्थचक्र बदलते-बदलते ऐसी स्थिति आ गई कि स्वतंत्रता के समय देश का आर्थिक ढाँचा अत्यधिक क्षीण हो गया था। अक्षम कृषि प्रणाली और दूषित भू-स्वामित्व व्यवस्था के नीचे करोड़ों किसान पिस रहे थे। कृषि मूलतः जीवन निर्वाहपरक ही बनी हुई थी। औद्योगिक क्षेत्र में भी स्थिति संतोषजनक न थी। वास्तव में, ब्रिटिश सरकार की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों ने हमारे देश को मुख्य रूप से प्राथमिक वस्तुओं के उत्पादक के रूप में 
परिवर्तित कर दिया। कुल राष्ट्रीय आय का केवल 17.1% भाग ही खनन उद्योग तथा लघु उद्योगों से प्राप्त होता था। उत्पादक उद्योगों में उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रधानता थी। इन उपभोक्ता वस्तु उद्योगों के वर्ग में भी कृषि क्षेत्र से प्राप्त उत्पादन की प्रक्रिया (process) करने वाले उद्योगों का प्रमुख स्थान था। ये उद्योग तकनीकी दृष्टि से अत्यधिक पिछड़े थे। उत्पादकता का स्तर भी निम्न था। पूँजीगत वस्तुओं, विद्युत उपकरणों तथा रसायन उत्पादनों की मात्रा अत्यधिक नगण्ये थी। वास्तव में, यह ब्रिटेन के हितों के अनुकूल ही था कि भारत औद्योगिक दृष्टि से एक पिछड़ा देश रहा। जो थोड़े-बहुत उद्योग देश में स्थापित थे उनमें विदेशी पूँजी की प्रधानता थी।

दीर्घ उतरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक शोषण के विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अंग्रेज व्यापार करने आए थे किंतु 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल पर आधिपत्य स्थापित कर ब्रिटिश शासन की नींव डाली और सन् 1947 ई० तक भारत पर शासन किया। इस उपनिवेश की शासन व्यवस्था के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का शोषण किया गया। उपनिवेशी शोषण के मुख्य रूप निम्नांकित थे
1. व्यापार नीतियों द्वारा शोषण- ब्रिटिश सरकार ने ऐसी व्यापारिक नीतियों का सहारा लिया कि ब्रिटिश उद्योगों को कच्चे माल की पर्याप्त आपूर्ति की जा सके।
(1) सरकार ने नील-निर्यात को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने किसानों को अपनी भूमि पर नील उगाने 
और बहुत कम मूल्य पर नील के पौधे बेचने को विवश किया।
(2) दस्तकारों को बाजार मूल्य से बहुत कम मूल्य पर सूती वस्त्र व रेशमी वस्त्र बेचने को 
विवश किया गया। इसके अतिरिक्त दस्तकारों को बंधक मजदूरों के रूप में काम करना | पड़ा।
(3) आयात और निर्यात शुल्कों में व्यापक परिवर्तन किए गए; यथा—

(अ) सन् 1700 के बाद छपे हुए कपड़ों का इंग्लैण्ड में आयात बंद कर दिया गया,
(ब) भारतीय वस्तुओं पर भारी सीमा-शुल्क और ब्रिटिश वस्तुओं के भारत में आयात पर बहुत मामूली शुल्क लगाए गए,
(स) भेद-मूलक संरक्षण नीति के अंतर्गत ऐसे उद्योगों को संरक्षण दिया गया जिन्हें 
ग्रेट ब्रिटेन के अलावा अन्य देशों से प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता था।

2. ब्रिटिश पूँजी के निर्यात द्वारा शोषण- भारत में अंग्रेजों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में विनियोग किए गए। जैसे-रेलवे, बंदरगाह, जहाजरानी, विद्युत, जल प्रबंध, सड़क व परिवहन, वाणिज्यिक कृषि, | चाय, कहवा व रबड़, कपास, पटसन, तम्बाकू, चीनी वे कागज, बैंक, बीमा एवं व्यापार, इंजीनियरिंग, रसायन व मशीन-निर्माण। ये सभी विनियोग ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय निगमों तथा अनुषंगी कम्पनियाँ बनाकर किए गए। ये निगम शोषण के प्रमुख उपकरण थे और भारत के ब्याज, लाभांश * और लाभ के रूप में धन बाहर ले जाते थे।

3. प्रबन्ध अभिकरण प्रणाली द्वारा वित्त पूँजी से शोषण- कम्पनियों के प्रबंध का कार्य प्रबंध अभिकर्ताओं को सौपा गया था। ये प्रबंध अभिकर्ता कच्चे माल, भण्डार उपकरण और मशीनों तथा उत्पादन की बिक्री जैसे कुछ कामों पर दलाली पाते थे, कार्यालय भत्ते लेते थे और लाभ का एक अंश प्राप्त करते थे।

4. ब्रिटिश प्रशासन व्यय के भुगतान द्वारा शोषण— ब्रिटिश शासकों ने नागरिक प्रशासन एवं सेना के लिए बहुत अधिक वेतन और भत्तों पर अंग्रेज अधिकारी भर्ती किए। अनेक सुविधाएँ एवं असीमित प्रशासनिक शक्ति के कारण उन्हें बड़ी मात्रा में रिश्वत मिलती थी, सेवानिवृत्त होने पर पेंशन मिलती थी। बचत, पेंशन व अन्य लाभों को वे इंग्लैण्ड अपने घर भेज देते थे। स्टर्लिंग ऋणों पर भारी ब्याज भी इंग्लैण्ड ही जाता था। इस प्रकार हमारे संसाधनों का भारी निकास (drain) हुआ।

प्रश्न 2.
भारतीय शिल्प उद्योगों के पतन के मुख्य कारण बताइए।
उत्तर
18वीं शताब्दी के अंत तक भारत आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सम्पन्न तथा समृद्ध देश था। यहाँ के कृषकों, शिल्पकारों तथा व्यापारियों की कार्यकुशलता विश्वभर में प्रसिद्ध थी। भारतीय औद्योगिक आयोग, 1916 ने लिखा है-“जिस समय आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के उद्गम पश्चिमी यूरोप में असभ्य जातियाँ निवास करती थीं, भारत अपने शासकों के वैभव तथा शिल्पकारों की उच्चकोटि की काना हेतु विख्यात था।” परंतु 19वीं शताब्दी की अनेक घटनाओं ने हमारे उद्योगों व हस्तकलाओं को प्रायः नष्ट कर दिया। डॉ० गाडगिल के अनुसार, 1880 तक भारतीय उद्योगों का पराभव हो चुका था। भारतीय शिल्प उद्योगों के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

1. राजदरबारों की समाप्ति- सामान्यतः राजा, महाराजा और सामंत लोग हस्तकलाओं के पारखी हुआ करते थे। उनके संरक्षण में ही भारतीय उद्योग फले-फूले थे। ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ इनकी स्थिति दयनीय होती गई और हस्तकलाओं का पराभव होने लगा।

2. रुचि व फैशन में परिवर्तन- धीरे-धीरे भारतीय पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होने लगे। उनकी रुचि और फैशन में परिवर्तन के साथ-साथ, इनकी माँग के स्वरूप में भी परिवर्तन होने लगा। इससे स्वदेशी उद्यागों को धक्का लगा।

3. शिल्पकारों पर अत्याचार- ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा नियुक्त ठेकेदार शिल्पकारों पर भयानक अत्याचार करते थे। बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत पर उत्पाद खरीदना सामान्य बात थी। प्रशासन का अधिकार मिलने पर दमन व शोषण की यह प्रक्रिया और तीव्र हो गई। इससे परेशान होकर अनेक शिल्पकारों ने यह कार्य ही छोड़ दिया।

4. इंग्लैण्ड में भारतीय वस्तुओं के आयात पर रोक– भारत से आयात की जाने वाली वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगा दिए गए। ये कर 50 प्रतिशत से 400 प्रतिशत तक थे। रेशमी वस्त्रों का आयात पूर्णतः बंद कर दिया गया।

5. दोषपूर्ण आर्थिक एवं औद्योगिक नीति– ब्रिटिश सरकार ने अपनी आर्थिक और औद्योगिक नीति का निर्माण इस प्रकार किया जिससे भारतीय उद्योगों पर कुठाराघात हो। उदाहरण के लिए मुक्त व्यापार नीति, भारी आयात-निर्यात कर एवं भारी अंतर्राज्यीय करों ने भारतीय उद्योगों को अत्यधिक क्षति पहुँचाई। :

6. पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव- जैसे-जैसे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार होता गया। देश का धनी वर्ग ब्रिटिश प्रशासकों का कृपापात्र बनने के लिए पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने लगा। वह भारतीय माल की अपेक्षा विदेशी माल का उपयोग करने लगा और भारतीय उत्पादों की माँग देश में कम हो गई।

7. विदेशी वस्तुओं से प्रतियोगिता में असफल- इंग्लैण्ड के आधुनिक उद्योगों में प्रयुक्त मशीनों से उत्पन्न माल के समक्ष परम्परागत तकनीक से निर्मित भारतीय माल न ठहर सका। इसका कारण यह था कि मिल में बनी वस्तुएँ सस्ती, गुण में अच्छी और अधिक टिकाऊ थीं।

8. शिल्पकला का ह्रास– विदेशी वस्तुओं के समक्ष प्रतियोगिता में न ठहर पाने के साथ-साथ स्वदेशी वस्तुओं के गुण, स्तर, किस्म और आकर्षण में कमी आने लगी। दुर्भाग्य से इसी समय भारतीय सामंतशाही स्वदेशी वस्तुओं को ही घृणा की दृष्टि से देखने लगी। इसका भारतीय उद्योगों पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

9. सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति- भारत में ब्रिटिश सरकार ने न केवल यहाँ के उद्योगों के प्रति उपेक्षा दिखाई अपितु अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें नष्ट भी किया। देश का कच्चा माल इंग्लैण्ड भेजा जाने लगा और उसी कच्चे माल से निर्मित माल वहाँ से देश में आने लगी। आंतरिक व्यापार को नष्ट करके विदेशी व्यापार में वृद्धि की गई और भारत सरकार भारत की प्रगति के बारे में तटस्थ तथा निष्क्रिय बनी रही। इस प्रकार धीरे-धीरे भारतीय हस्तकलाओं का ह्रास होता गया।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

1. प्रति व्यक्ति आय का निम्न स्तर–स्वतंत्रता के समय देश की प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी। देश में निर्धनता व्यापक रूप में विद्यमान थी। इस समय, अभाव तथा भुखमरी भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा का बयान करती थी।

2. कृषि एक मुख्य व्यवसाय—स्वतंत्रता के समय भारत में कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था थी। यहाँ की लगभग 72.7 प्रतिशत जनसंख्या कृषि-कार्य में लगी हुई थी। विकसित देशों की तुलना में यह प्रतिशत बहुत अधिक था।

3. कृषि, आजीविका का मुख्य स्रोत– स्वतंत्रता के समय कृषि भारत की आजीविका का मुख्य स्रोत थी। 72.7 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी तथा राष्ट्रीय आय में इसका योग आधे से भी अधिक लगभग 56 प्रतिशत था।

4. उत्पादकता का निम्न स्तर– स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि क्षेत्र का उत्पादन उसकी माँग की तुलना में कम था। इसके अतिरिक्त उत्पादकता का स्तर भी निम्न था। यह भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का प्रतीक था। उत्पादन की परम्परागत तकनीक कृषि के विकास में बाधक बनी हुई थी।

5. मध्यस्थों की अधिकता– स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में भू-राजस्व संबंधी तीन प्रणालियाँ
प्रचलित थीं—

  1. जमींदारी प्रथा,
  2. महालवाड़ी प्रथा तथा
  3. रैयतवाड़ी प्रथा। सरकार तथा किसानों के बीच मध्यस्थों की एक बड़ी श्रृंखली थी। ये मध्यस्थ किसानों से बहुत अधिक लगान वसूल करने लगे। मध्यस्थों द्वारा किए जाने वाले इस शोषण ने कृषि उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।

6. कृषि व्यवसायीकरण का अभाव- स्वतंत्रता से पूर्व भातीय कृषि मात्र जीवन-निर्वाह का साधन थी। कृषि का व्यवसायीकरण सीमित था। बाजार में बिक्री के लिए बहुत कम उत्पादन बेच पाता था, सारा का सारा स्व-उपयोग पर ही व्यय हो जाता था।

7. उपभोक्ता उद्योगों का धीमा विकास– भारत में ब्रिटिश पूँजी की सहायता से कुछ उपभोक्ता उद्योगों; (जैसे-कपड़ा, जूट, चीनी, माचिस आदि) की स्थापना एवं विकास किया गया था किंतु इन उद्योगों में किए गए निवेश पर ब्याज तथा प्राप्त लाभांश विदेश भेज दिया जाता था। इसका उपयोग देश के औद्योगिक विकास के लिए नहीं किया गया।

8. आधारभूत उद्योगों का अभाव- स्वतंत्रता के समय देश में पूँजीगत, भारी एवं आधारभूत उद्योगों का अभाव था। केवल एक ही आधारभूत उद्योग था-टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर। देश का औद्योगिक आधार अत्यधिक कमजोर था।

9. कुटीर एवं लघु उद्योगों का हास– ब्रिटिश शासनकाल से पूर्व भारतीय शिल्प उद्योग चरमोत्कर्षपर थे। ढाका की मलमल (आबेहयात) विश्वभर में प्रसिद्ध थी। किंतु ब्रिटिश प्रशासकों की दोषपूर्ण नीति के कारण धीरे-धीरे उनका पतन हो गया। 18. आधारभूत संरचना का अभाव-स्वतंत्रता के

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name कविवर बिहारी
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
बिहारी का जीवन-परिचय लिखिए।
या
बिहारी की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
कविवर बिहारी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – कविवर बिहारी का जन्म संवत् 1660 (सन् 1603 ई०) के लगभग ग्वालियर के निकट वसुआ गोविन्दपुर नामक ग्राम में हुआ था। ये चतुर्वेदी ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम केशवराय था। इनकी युवावस्था ससुराले (मथुरा) में ही बीती थी। अधिक दिन तक ससुराल में रहने के कारण इनका आदर कम हो गया; अतः ये खिन्न होकर जयपुर-नरेश महाराजा जयसिंह के यहाँ चले गये। इस जीवन में इन्हें अनेक कटु अनुभव प्राप्त हुए, जिनके सम्बन्ध में इनकी सतसई में कई दोहे मिलते हैं। कहा जाता है कि उस समय जयसिंह अपनी नवोढ़ा रानी के प्रेम में लीन थे; अत: राजकाज बिल्कुल नहीं देखते थे। इस पर बिहारी ने निम्नलिखित दोहा लिखकर महाराजा के पास भेज दिया

नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काले।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगैं कौन हवाल॥

राजा के हृदय पर इस दोहे ने जादू का-सा असर किया। वे पुन: राजकाज में रुचि लेने लगे। बिहारी बड़े गुणज्ञ थे। उन्हें अनेक विषयों की जानकारी थी। सुह बात उनकी सतसई का अध्ययन करने पर स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाती है। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारी को वैराग्य हो गया और वे दरबार छोड़कर वृन्दावन चले गये। वहाँ पर संवत् 1720 (सन् 1663 ई०) के आस-पास इनकी मृत्यु हो गयी।

ग्रन्थ – बिहारी ने कुल 719 दोहे लिखे हैं, जिन्हें ‘बिहारी सतसई के नाम से संगृहीत किया गया है। इसकी अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। ‘बिहारी-सतसई’ के समान लोकप्रियता रीतिकाल के किसी अन्य ग्रन्थ को प्राप्त न हो सकी।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ
बिहारी रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि थे। इनकी ‘सतसई में नायिका–भेद, नखशिख-वर्णन, विभावों, अनुभावों, संचारी भावों आदि का चित्रण प्रमुख रूप से पाया जाता है, जो रीतिकाल की परम्परा के अनुकूल है। दोहे जैसे छोटे छन्द में बिहारी ने भाव का सागर लहरा दिया है। यह वास्तव में गागर में सागर भरने जैसा कार्य है। इसी विशेषता के कारण उनके दोहों की प्रशंसा करते हुए किसी कवि ने कहा है

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। ।
देखने में छोटे लगैं, घाव करें गम्भीर ॥

सौन्दर्य के चितेरे – बिहारी सौन्दर्य के रससिद्ध कवि थे। इन्होंने बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के सौन्दर्य का सुन्दर चित्रण किया है। नायिका के बाह्य सौन्दर्य का एक चित्र निम्नांकित है

नीको लसत ललाट पर, टीको ज़रित जराय।
छविहिं बढ़ावत रवि मनौ, ससि मंडल में आये।

प्रकृति-चित्रण – बिहारी ने प्रकृति का कहीं-कहीं आलम्बन-रूप में भी चित्रण किया है, जो रीतिकाल के कवियों में कम मिलता है। ठण्डी हवा का यह स्वरूप द्रष्टव्य है

लपटी पुहुप पराग पर, सनी सेंद मकरंद ।
आवति नारि नवोढ़ लौ, सुखद वायु गति मंद।।

प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण तो रीतिकाल की सामान्य विशेषता ही थी। उसके सुन्दर चित्रों की ‘बिहारी-सतसई’ में भरमार है।

भक्ति-भावना – बिहारी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उनका जीवन भगवद्भक्ति में ही बीता। अपने भक्ति सम्बन्धी दोहों में उन्होंने सच्ची और दृढ़ भक्ति पर बल दिया है। उनकी भक्ति सखा-भाव की है। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक मन में कपट है, तब तक भगवान् की प्राप्ति असम्भव है

तौ लौ या मन सदन में, हरि आर्दै केहि बाट।
निपट जटै नैं लौ विकट, खुलै न कपट कपाट॥

मुक्तक कवि के रूप में – मुक्तक काव्य में सफलता पाने के लिए कवि में दो बातों का होना नितान्त आवश्यक होता है (1) भावों को समेटने की शक्ति तथा (2) थोड़े शब्दों में अधिक बात कह सकने की क्षमता। बिहारी में ये दोनों गुण पूर्ण रूप में विद्यमान थे। उन्होंने अपने दोहों में व्यंजना का सहारा लेकर बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहकर चमत्कार कर दिखाया है।

अनुभाव-योजना – अनुभावों की योजना में बिहारी बड़े कुशल हैं। थोड़े-से शब्दों में वे एक पूरा सवाक् चित्र-सा खड़ा कर देते हैं

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात ।
भरे भौन मैं करते हैं, नैननु ही सौं बात ॥

इस दोहे में कवि ने नायक और नायिका का पूरा वार्तालाप आँखों के इशारों में ही करा दिया है।

रस-योजना – यद्यपि बिहारी मुख्यतः श्रृंगारी कवि थे, तथापि इनके दोहों में हास्य, शान्त आदि रसों को भी परिपाक मिलता है। बिहारी को सर्वाधिक सफलता श्रृंगार वर्णन में मिली है। श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का चित्रण करने में इन्होंने ‘अपूर्व कौशल दिखाया है। प्रेमिका के संयोग श्रृंगार का चित्रण कितना मनोहारी है

बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाई॥

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – इनकी भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें कहीं-कहीं बुन्देली, अरबी, फारसी आदि के शब्द भी पाये जाते हैं। मुहावरों के प्रयोग द्वारा भाषा में बहुत प्रवाह आ गया है। बिहारी की भाषा इतनी सुगठित है कि उसका एक शब्द भी अपने स्थान से हटाया नहीं जा सकता।

शैली
– बिहारी की शैली विषय के अनुसार बदलती है। भक्ति एवं नीति के दोहों में प्रसाद गुण की तथा श्रृंगार के दोहों में माधुर्य एवं प्रसाद की प्रधानता है।

अलंकार-विधान – बिहारी ने अलंकारों का अधिकारपूर्वक प्रयोग किया है। असंगति अलंकार का एक उदाहरण द्रष्टव्य है

दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर-चित प्रीति ।
परति गाँठ दुरजन हियै, दई नई यह रीति ॥

साहित्य में स्थान – निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि बिहारी उच्चकोटि के कवि एवं कलाकार थे। असाधारण कल्पना-शक्ति, मानव-प्रकृति के सूक्ष्म ज्ञान तथा कला-निपुणता ने बिहारी के दोहों में अपरिमित रस भर दिया है। इन्हीं गुणों के कारण इन्हें रीतिकालीन कवियों का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

भक्ति एवं शृंगार

प्रश्न 1:
अजौं तरुयौना ही रह्यौ, श्रुति सेवत इक रंग ।
नाक बास बेसरि लह्यौ, बसि मुकतनु के संग ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) बेसर नामक आभूषण कहाँ पहना जाता है?
(iv) वेदों के अध्ययन से श्रेष्ठ किसे बताया गया है?
(v) प्रस्तुत दोहे में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) यह दोहा महाकवि बिहारी की विख्यात कृति ‘सतसई’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भक्ति एवं श्रृंगार’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – भक्ति एवं श्रृंगार।
कवि का नाम – कविवर बिहारी ।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – निरन्तर कानों का सेवन करने पर भी कान का आभूषण, निम्न स्थान पर ही रहा; अर्थात् उसका आज तक उद्धार न हो सका, जबकि नाक के आभूषण ने मोतियों के साथ बसकर, नाक के उच्च स्थान को प्राप्त कर लिया। तात्पर्य यह है कि निरन्तर वेदों की वाणी सुनकर भी एक व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त न कर सका, जब कि निम्न समझे जाने वाले अन्य व्यक्ति ने सत्संगति के माध्यम से उच्चावस्था अथवा मोक्ष को प्राप्त कर लिया।
(iii) बेसर नामक आभूषण कान में पहना जाता है।
(iv) वेदों के अध्ययन से श्रेष्ठ सत्संग को बताया गया है।
(v) प्रस्तुत दोहे में श्लेष अलंकार है।

प्रश्न 2:
बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ ।
सौंह करै, भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाई ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राधिकाजी श्रीकृष्ण की मुरली छिपाकर क्यों रख देती हैं?
(iv) श्रीकृष्ण के मुरली के बारे में पूछने पर राधिकाजी क्या कहती हैं?
(v) ‘बतरस-लालच लाल की’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या – राधिकाजी ने बातों का रस लेने के लालच से लाल ( श्रीकृष्ण) की मुरली कहीं छिपाकर रख दी है। श्रीकृष्ण उनसे पूछते हैं कि क्या मेरी मुरली तुम्हारे पास है? इस पर राधिका शपथ लेने लगती हैं (कि मुरली का मुझे कुछ पता नहीं है), किन्तु भौंहों में मुस्करा देती हैं (जिससे श्रीकृष्ण को उनके पास मुरली होने का सन्देह हो जाता है)। जब श्रीकृष्ण उनसे मुरली देने के लिए कहते हैं तो वे साफ मना कर देती हैं (कि मुरली मेरे पास नहीं है)।
(iii) राधिकाजी वार्तालाप के आनन्द के लोभ से मुरली छिपाकर रख देती हैं।
(iv) श्रीकृष्ण के मुरली के बारे में पूछने पर राधिकाजी शपथ लेने लगती हैं किन्तु भौंहों में मुस्करा देती हैं।
(v) अनुप्रास अलंकार।

प्रश्न 3:
कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात ।
भरे भौन मै करत हैं, नैननु ही सौं बात ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत दोहे के अनुसार नायक-नायिका भरे हुए भवन में किस तरह बातें कर लेते हैं?
(iv) नायक और नायिका के नेत्र मिल जाने पर क्या होता है?
(v) प्रस्तुत दोहे में कौन-सा रस है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – देखो, कैसी चातुरी से ये दोनों परिजनों से भरे हुए भवन में आँखों-ही-आँखों में अपने मतलब की सब बातें कर लेते हैं। नायक कुछ कहता है (रति की प्रार्थना करता है), जिस पर नायिका मना कर देती है। नायक उसकी इस (मना करने की) चेष्टा पर रीझता है, तब नायिका उसकी रीझने की चेष्टा पर बनावटी खीझ प्रकट करती है। फिर दोनों की दृष्टि मिल जाती है और दोनों का चित्त खिल (प्रसन्न हो) उठता है। नायक, नायिका के चटपट खीझ छोड़ देने पर हँस देता है और नायिका उसके हँस देने पर लज्जालु हो जाती है।
(iii) प्रस्तुत दोहे के अनुसार नायक-नायिको भरे हुए भवन में आँखों के इशारों से बातें कर लेते हैं।
(iv) नायक-नायिका के नेत्र मिल जाने पर दोनों के चित्त खिल उठते हैं।
(v) प्रस्तुत दोहे में श्रृंगार रस है।

प्रश्न 4:
अनियारे दीरघ दृगनु, किती न तरुनि समान ।
वह चितवनि औरै कछु, जिहिं बस होत सुजान ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किनकी रीति एक-जैसी नहीं होती?
(iv) चतुर लोग किन पर अनुरक्त होते हैं?
(v) प्रस्तुत दोहा कौन-से रस का उपयुक्त उदाहरण है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – बिहारी कहते हैं कि यद्यपि नुकीली और बड़े नेत्रों वाली अनेक ‘स्त्रियाँ संसार में हैं और उन सभी का नेत्र-सौन्दर्य भी एक-सा प्रतीत होता है, तथापि सौन्दर्य के पारखी अथवा रसिकजन ऐसी सभी दृष्टियों पर अनुरक्त नहीं होते। वे तो उस विशेष प्रकार की दृष्टि के ही वशीभूत होते हैं, जो प्रेमपूर्ण और किसी-किसी की ही होती हैं।
(iii) सभी बड़े नेत्रों वाली स्त्रियों की रीति एक-जैसी नहीं होती।
(iv) जिनमें कुछ विशेष आन्तरिक भाव होता है चतुर लोग उन पर अनुरक्त होते हैं।
(v) प्रस्तुत दोहा श्रृंगार रस का?उपयुक्त उदाहरण है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 8 विविधा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name विविधा (सेनापति, देव, घनानन्द)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 8 विविधा (सेनापति, देव, घनानन्द)

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न 1:
सेनापति का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – रीतिकालीन कवि सेनापति को हिन्दी-काव्य-जगत् में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। अलंकार-विवेचन एवं रस-निरूपण की दृष्टि से इनकी गणना उच्च स्तरीय आचार्य कवियों में होती है। इनका ऋतु-वर्णन’ हिन्दी-साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

कविवर सेनापति के जीवन से सम्बन्धित प्रामाणिक सामग्री का अत्यधिक अभाव है। इनके सम्बन्ध में अब तक जो कुछ भी ज्ञात है वह इनके अपने काव्य-ग्रन्थ ‘कवित्त-रत्नाकर’ के आधार पर ही है, जिसमें अपना परिचय इन्होंने निम्नवत् दिया है

दीक्षित परशुराम दादा हैं विदित नाम,
जिन कीन्हें जज्ञ जाकी बिपुल बड़ाई है।
गंगाधर पिता गंगाधर के समान जाके,
गंगातीर बंसति ‘अनूप’ जिन पाई है।
महा जानमनि, विद्यादान हूँ में चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित ते पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई सीतापति के प्रसाद जाकी,
सबै कवि कान दै सुनत कविताई है।

उपर्युक्त कवित्त से स्पष्ट होता है कि ये अनूपशहर के रहने वाले कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम गंगाधर दीक्षित, पितामह का नाम परशुराम दीक्षित और गुरु का नाम हीरामणि दीक्षित था।

यह सम्भव है कि अनूपशहर उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले में स्थित अनूपशहर नाम का ही स्थान हो। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा कुछ अन्य विद्वामों ने झ्नका जन्म संवत् 1646 वि० (सन् 1589 ई०) माना है। अपनी एकमात्र रचना ‘कवित्त-रत्नाकर’ के आधार पर सेनापति की गणना रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में की जाती है। इस ग्रन्थ की रचना संवत् 1706 वि० (सन् 1649 ई०) के आस-पास की मानी जाती है। इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में प्रामाणिक सामग्री का पूर्णतया अभाव है। इनके काव्य की मूल-प्रवृत्ति के आधार पर इन्हें रीतिकालीन युग का कवि माना जाता है।
हिन्दी-साहित्य में सेनापति की प्रसिद्धि उनके प्रकृति-वर्णन एवं श्लेष के उत्कृष्ट प्रयोगों के कारण है। प्रकृति-चित्रण की दृष्टि से सेनापति अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। इनके जैसी प्रकृति के सूक्ष्म-निरीक्षण का भाव अन्य किसी शृंगारिक एवं भक्त कवि को प्राप्त नहीं था। इनके काव्य में मर्मस्पर्शी भावुकता की अभिव्यक्ति मिलती है।

रचनाएँ – सेनापति की अब तक ‘कवित्त-रत्नाकर’ नामक एक ही प्रमुख कृति प्राप्त हुई है। इनकी एक अन्य कृति ‘काव्य-कल्पद्रुम’ का उल्लेख भी मिलता है, किन्तु यह रचना अप्राप्य है। कुछ विद्वान् इन दोनों कृतियों को एक ही मानते हैं। ‘कवित्त-रत्नाकर’ के कुल 394 छन्द ही उपलब्ध हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

सेनापति विलक्षण प्रतिभा से युक्त कवि थे। इनकी एकमात्र रचना ‘कवित्त-रत्नाकर’ में इनकी काव्य-प्रतिभा का जो स्वरूप प्राप्त होता है, वह इन्हें श्रेष्ठ कवि के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

भावपक्ष की विशेषताएँ

श्रृंगार-वर्णन – सेनापति के काव्य में, श्रृंगार-वर्णन का विशिष्ट स्वरूप प्राप्त होता है। इन्होंने नायिका के. नख-शिख सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है। इनके काव्य में उद्दीपन भाव, वय: सन्धि आदि के मनोहारी चित्रण भी दर्शनीय हैं। इनमें भावुकता एवं चमत्कार का बहुत सुन्दर मिश्रण है।

ऋतु वर्णन – सेनापति को ऋतु वर्णन में अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है। इनके काव्य में ऋतुओं का सहज एवं सजीव चित्रण अपने यथार्थ स्वरूप में अभिव्यक्त हुआ है। प्रत्येक ऋतु के आगमन पर जन-मानस में उत्पन्न होने वाले भावों की भी इन्होंने सहज अभिव्यक्ति दी है। हिन्दी के किसी भी श्रृंगारी एवं भक्त कवि में सेनापति जैसा प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करने वाला कवि नहीं मिलता।

भक्ति-भावना – कवित्त-रत्नाकर’ नामक ग्रन्थ पाँच तरंगों में विभाजित है। इसकी चौथी एवं पाँचवीं तरंग में राम के प्रति उनके भक्तिभाव की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति हुई है।

वीर रस – ‘कवित्त-रत्नाकर’ की चौथी तरंग में रामचरित का वर्णन है, जिसमें कवि ने यत्र-तत्र वीर रस की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति भी की है।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – भाषा पर सेनापति जैसा अधिकार सम्भवतः किसी रीतिकालीन कवि का नहीं है। सेनापति ने अपने काव्य में ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, किन्तु शब्दों के चयन में माधुर्य एवं भाव का ध्यान में रखकर अलंकार, छन्द आदि का ध्यान रखा है। इनका पद-विन्यास भी बहुत ललित है।

छन्द-योजना – सेनापति रीतिकालीन कवि थे। इसीलिए इनके काव्य में छन्दों का सटीक एवं उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है।

अलंकार-योज़ना – सेनापति ने अपने काव्य में श्लेष, यमक, अनुप्रास, उपमा, रूपक आदि अलंकारों का चमत्कारिक प्रयोग किया है; किन्तु इसमें इन्होंने श्लेष अलंकार को प्रधानता दी है। कहीं-कहीं विरामों पर अनुप्रास के निर्वाह और यमक के चमत्कार दर्शनीय हो जाते हैं। ‘कवित-रत्नाकर’ की प्रथम तरंग पूर्णतया श्लेष अलंकार के चमत्कारों से युक्त है। इनके श्लेष-अत्यन्त रोचक एवं चमत्कृत कर देने वाले हैं। श्लेष अलंकार के प्रयोग में इन्हें आचार्य केशवदास के समकक्ष माना जाता है।

साहित्य में स्थान – अपनी एक ही रचना ‘कवित्त-रत्नाकर’ के आधार पर सेनापति की गणना रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में की जाती है। अलंकार-विधान, प्रकृति-चित्रण एवं छन्द-विधान की दृष्टि से इन्हें केशवदास के समकक्ष स्थान प्राप्त है।।

प्रश्न 2:
कविवर देव का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
कविवर ‘देव’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – रीतिकालीन कवियों में महाकवि देवदत्त का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। इनके द्वारा किया गया रीति-विवेचन कई दृष्टियों से विशिष्ट माना जाता है। बाह्याडम्बरों में इनकी किंचित् भी आस्था नहीं थी। ‘भाव-विलास’ नामक ग्रन्थ के आधार पर इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा (उत्तर प्रदेश) जिले में संवत् 1730 वि० (सन् 1673 ई०) में एक सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम बिहारीलाल दूबे था। 94 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु अनुमानतः संवत् 1824 वि० (सन् 1767 ई०) के आस-पास हुई थी।

रचनाएँ – देव प्रमुख रूप से दरबारी कवि थे। ये अपने जीवनकाल में अनेक राजा, रईसों एवं नवाबों के आश्रय में रहे। इनके द्वारा रचित विपुल साहित्य का उल्लेख मिलता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का । इतिहास में इनके उपलब्ध ग्रन्थों की संख्या 23 बतायी है और उनके नामोल्लेख भी किये हैं, जो इस प्रकार हैं

(1) भाव-विलास,
(2) अष्टयाम,
(3) भवानी-विलास,
(4) सुजान-विनोद,
(5) प्रेमतरंग,
(6) राग-रत्नाकर,
(7) कुशल विलास,
(8) देवचरित,
(9) प्रेमचन्द्रिका,
(10) जाति-विलास,
(11) रसविलास,
(12) काव्य-रसायन या शब्द-रसायन,
(13) सुखसागर तरंग,
(14) वृक्ष-विलास,
(15) पावसविलास,
(16) ब्रह्मदर्शन पचीसी,
(17) तत्त्वदर्शन पचीसी,
(18) आत्मदर्शन पचीसी,
(19) जगदर्शन पचीसी,
(20) रसानंद लहरी,
(21) प्रेमदीपिका,
(22) नखशिख,
(23) प्रेमदर्शन।

इनके द्वारा रचित जितने भी ग्रन्थ हैं, वे एक-दूसरे से स्वतन्त्र नहीं हैं। इनके बहुत-सारे पद, जो एक ग्रन्थ में पाये जाते हैं, दूसरे ग्रन्थों में भी देखे जा सकते हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

रीतिकालीन कवियों में देव को इनकी काव्यात्मक अनुभूति की तीव्रता के कारण एक श्रेष्ठ कवि माना जाता है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

भावपक्ष की विशेषताएँ

श्रृंगार भाव – यद्यपि देव ने रीति-निरूपण एवं तत्त्व-चिन्तन सम्बन्धी रचनाएँ भी की हैं, तथापि इनकी रचनाओं में श्रृंगार भाव की प्रधानता रही है। इनके काव्य में राग-पक्ष (प्रेम-पक्ष) निखार के साथ उभरा है। कल्पना की ऊँची उड़ान के कारण इनकी बिम्ब-योजना में रंग, वैभव, सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री आदि का सजीव चित्र प्रस्तुत हुआ है। एक ओर तो यौवन और श्रृंगार इनकी कविता का विषय बना है, तो दूसरी ओर ज्ञान, वैराग्य और वेदान्त। इनमें मौलिकता और कवित्व शक्ति पर्याप्त मात्रा में है।

भावानुभूति की प्रधानता – रीतिकालीन कवियों के शास्त्रीय काव्यों की नीरसता के विपरीत देव के काव्य में भावानुभूति की तीव्रता अत्यन्त प्रभावी रूप से अभिव्यक्त हुई है। रूप, अनुभव, मिलन आदि के बिम्ब भाव-प्रधान एवं मर्मस्पर्शी हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ

अलंकार-योजना – देव के काव्यालंकार सम्बन्धी निरूपण में रीतिकालीन प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। इनके द्वारा प्रयुक्त लक्षणों की सुबोधता, संक्षिप्तता तथा उदाहरणों की तदनुरूपता और सरसता प्रशंसनीय है

दधि घृत मधु पायस तजि वयसु चाम चबात।

इनकी अलंकार-योजना में मौलिक उद्भावना का समावेश मिलता है, किन्तु इसमें यत्र-तत्र अस्पष्टता एवं अव्यवस्था का दोष भी परिलक्षित होता है। इनकी कविता में कहीं-कहीं अनुप्रासों की छटा देखने को मिल जाती है।

छन्द-योजना: देव ने शास्त्रीय रूप से मान्य छन्दों के अतिरिक्त कुछ नवीन छन्दों का भी आविष्कार किया और उन्हें अपनी रचनाओं में प्रयुक्त किया है।

भाषा – देव ने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में की हैं। इनकी भाषा में संस्कृत का पुट भी मिलता है। इनकी नवीन छन्द-योजना एवं भाषा की सशक्तता को निम्नलिखित पंक्तियों में देखा जा सकता है

देव मैं सीस बसायो सनेह कै, भाल मुगम्मद-बिंद के भाख्यौ।
कंचुकि मैं चुपयौ करि चोवा, लगाय लियो डर सों अभिलाख्यौ।

इनकी भाषा में प्रसाद गुण, गाम्भीर्य और मुहावरों के प्रयोग भी देखने को मिलते हैं। भाषा-व्याकरण की दृष्टि से देव की भाषा सदोष है और उसमें पुनरुक्तियाँ भी हैं, किन्तु जहाँ इनकी भाषा सुव्यवस्थित और स्वच्छ है, वहाँ इनकी कविता अत्यन्त सरस और हृदयग्राही बन पड़ी है।

साहित्य में स्थान – रीतिकालीन कवियों में देव को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। भावपक्ष के साथ-साथ कवित्व, छन्द, अलंकार आदि की दृष्टि से भी इनकी काव्यात्मक प्रतिभा को सम्माननीय दृष्टि से देखा जाता है। इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति को काव्यात्मक रूप में सँवारा है। विरह की चरम अवस्था का वर्णन करने में ये अत्यन्त दक्ष थे।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “इनका-सा अर्थ-सौष्ठव और नवोन्मेष बिरले ही कवियों में मिलता है। रीतिकाल के कवियों में ये बड़े ही प्रगल्भ और प्रतिभा-सम्पन्न कवि थे, इसमें सन्देह नहीं। इस काल के बड़े कवियों में इनका विशेष गौरव का स्थान है।”

प्रश्न 3:
घनानन्दका साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
घनानन्द की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
घनानन्द का संक्षिप्त जीवन-परिचय लिखिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – रीतिकालीन कवियों में घनानन्दं को उनके काव्यों की स्वच्छन्दता एवं भावात्मकता की दृष्टि से हिन्दी-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भावनात्मक, लक्षणात्मक, रहस्यात्मक एवं वैयक्तिकता की दृष्टि से इनकी काव्यात्मक प्रतिभा विलक्षण मानी जाती है। रीतिकालीन काव्य में इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनायी है तथा अपने विशिष्ट व्यक्तित्व का परिचय दिया है।
घनानन्द जी का जन्म संवत् 1746 वि० (सन् 1689 ई०) में माना जाता है, लेकिन इनके जीवन से सम्बन्धित प्रामाणिक तथ्य अभी तक उपलब्ध नहीं हो सके हैं। किंवदन्तियों के अनुसार ये जाति के कायस्थ थे और दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह रँगीला के मीर मुंशी थे। वहाँ के दरबारी दाँव-पेचों से सामंजस्य न स्थापित कर पाने के कारण इन्होंने दरबार छोड़ दिया और वृन्दावन में रहने लगे। कुछ विद्वान् इनके दरबार छोड़ने का कारण सुजान नाम की एक नर्तकी को मानते हैं, जिससे ये बहुत अधिक प्रेम करते थे। दरबार से चलते समय इन्होंने सुजान से , भी साथ चलने को कहा, लेकिन वह इनके साथ नहीं आयी। इसी पर इन्हें विराग उत्पन्न हो गया। बहुत-से विद्वान् इस किंवदन्ती से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार सुजान का अर्थ कृष्ण है और इन्होंने कृष्ण-भक्ति में ही अपनी विप्रलम्भ श्रृंगार प्रधान रचनाएँ की हैं। वृन्दावन में आकर ये निम्बार्क सम्प्रदाय के दीक्षित वैष्णव हो गये और वहीं पूर्ण विरक्त भाव से रहने लगे। इनका निधन संवत् 1796 वि० (सन् 1739 ई०) में नादिरशाह की सेना के सिपाहियों द्वारा हाथ काट दिये जाने के कारण हुआ।

रीतिकालीन कवियों में भावप्रवण कवि के रूप में घनानन्द को सम्माननीय दृष्टि से देखा जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें ‘साक्षात रसमूर्ति’ के नाम से सम्बोधित किया है। इन्हें बहुत-से विद्वान् रीतिकालीन रीतिमुक्त धारा का सर्वश्रेष्ठ कवि मानते हैं।

रचनाएँ – घनानन्द जी के
(1) सुजान सागर,
(2) बिरहलीला,
(3) कोकसागर,
(4) रसकेलिवल्ली
और
(5) कृपाकन्द
नाम के ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं। इसके अतिरिक्त इनके कवित्त-सवैया के फुटकर संग्रह 150 से लेकर 425 कवित्तों तक के मिलते हैं। कृष्णभक्ति सम्बन्धी इनको एक वृहदाकार ग्रन्थ छत्रपुर के राज पुस्तकालय में है, जिसमें प्रिया-प्रसाद, ब्रज-व्यवहार, वियोग-बेलि, कृपाकंद-निबन्ध, गिरि-गाथा, भावनाप्रकाश, गोकुलविनोद, धामचमत्कार, कृष्णकौमुदी, नाममाधुरी, वृन्दावन-मुद्रा, प्रेम-पत्रिका, रस-वसन्त इत्यादि अनेक विषय वर्णित हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

रीतिमुक्त धारा के श्रेष्ठ कवि घनानन्द के काव्य की रसानुभूति एवं अभिव्यक्ति को प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से उत्कृष्ट माना जाता है। इनकी काव्यगत विशेषताओं का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है ।

भाव पक्ष की विशेषताएँ
श्रृंगार रस की उत्कृष्टता
– धनानन्द की रचनाओं में श्रृंगार रस की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति हुई है। इसीलिए घनानन्द को ‘प्रेम के कवि’ के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। वियोग श्रृंगार के जो मर्मस्पर्शी भाव इनके काव्य में दृष्टिगोचर होते हैं, उनकी भावानुभूति हृदय को रोमांचित कर देती है। विरह की आभ्यन्तर अनुभूति को इन्होंने बहुत ही हृदयद्रावक वर्णन किया है।

प्रकृति का नैसर्गिक चित्रण – घनानन्द के काव्य में प्रकृति के सुन्दर चित्र प्राप्त होते हैं। इन्होंने प्रकृति का चित्रण अपने काव्य के मुख्य भाव के उद्दीपन रूप में किया है।

कलापक्ष की विशेषताएँ
भाषा – घनानन्द के काव्य की भाषा ब्रजभाषा है। इनकी भाषा में स्वच्छता, सुघड़ता एवं एकरूपता के दर्शन होते हैं। इन्होंने भाषा का प्रयोग अपनी बुद्धि के अनुरूप नहीं, अपितु हृदय के भावों के अनुरूप किया है। इस कारण इनकी भाषा इनके भावों की अभिव्यक्ति करने में पूर्णतया सक्षम रही है। घनानन्द का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा के सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कहना है कि, “इनकी-सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। ……. भाषा मानो इनके हृदय के साथ जुड़कर ऐसी वशवर्तिनी हो गयी थी कि ये उसे अपनी अनूठी भावभंगी के साथ-साथ जिस रूप में चाहते थे, उस रूप में मोड़ सकते थे।” क्योंकि समूचे रीतिकाल में ही मुक्तक शैली की प्रधानता रही, अत: नि:संकोच यह कहा जा सकता है कि घनानन्द जी ने भी अपनी रचनाएँ मुक्तक शैली में ही कीं, किन्तु इनकी कुछ फुटकर रचनाएँ प्रबन्ध शैली में भी मिलती हैं।

छन्द-योजना – घनानन्द ने अपने काव्य में मुख्यत: कवित्त, सवैया एवं घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग किया है। इनकी छन्द-योजना इनके काव्य के मुख्य भाव के अनुरूप है।

अलंकार-योजना – रीतिमुक्त परम्परा के कवि होने के कारण घनानन्द ने अपने काव्य में मात्र पाण्डित्य के प्रदर्शन के लिए बोझिल अलंकारों का प्रयोग नहीं किया है। इन्होंने अपने भावों को व्यक्त करने वाले अलंकारों को प्रयुक्त किया है, जिनकी लाक्षणिकता एवं ध्वन्यात्मकता का भावों के साथ प्रभावपूर्ण समायोजन हुआ है। इन्होंने अपने लाक्षणिक प्रयोगों और अर्थ-शक्ति में पर्याप्त अभिवृद्धि के लिए विरोधाभास, विशेषण-विपर्यय, मानवीकरण, रूपक, रूपकातिशयोक्ति, प्रतीप जैसे अलंकारों के प्रयोग किये हैं।

साहित्य में स्थान – रीतिकालीन युग से सम्बन्धित रीतिमुक्त काव्यधारा के कवियों में घनानन्द को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ये एक सहज और भावुक कवि थे। इन्हें अपने हृदय के भावों का स्पष्टीकरण मात्र ही अभीष्ट था। इनके बारे में नि:संकोच कहा जा सकता है कि, “भक्ति-काल के ब्रजभाषा काव्य में जो स्थान सूरदास का है, रीतिकालं के ब्रजभाषा काव्य में वही स्थान घनानन्द जी का है।’

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

सेनापति

प्रश्न 1:
वृष कौं तरनि तेज सहसौ किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं ।
तचति धरनि जग जरत झरनि सीरी,
छाँह कौं पकरि पंथी-पंछी बिरमत हैं ।।
‘सेनापति’ नैक दुपहरी के ढरते होत,
धमका विषम ज्यौं न पात खरकत हैं ।
मेरे जान पौनौं सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,
घरी एक बैठि कहूँ घामै बितवत हैं ।

(i) उपर्युक्त पंक्तियों के कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) गर्मियों के समय में वृष राशि का सूर्य कैसा प्रतीत हो रहा है?
(iv) भयंकर गर्मी में पथिकों और पक्षियों की क्या हालत हो रही है?
(v) दोपहर के ढलने और वातावरण के शांत होने पर कवि कैसा अनुभव करते हैं?

उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित कविवर सेनापति के पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
कवि का नाम – सेनापति।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – वृष राशि का सूर्य अत्यधिक ताप से युक्त होकर अपनी हजारों किरणों से भयंकर ज्वालाओं का समूह बरसा रहा है। पृथ्वी अत्यधिक तप्त हो उठी है। सारा संसार (आकाश से बरसती) लपटों (आग) से जल रहा है।
(iii) गर्मियों के समय में वृष राशि का सूर्य अत्यधिक तप्त होकर अपनी हजारों किरणों से भयंकर ज्वालाओं का समूह बरसा रहा है।
(iv) भयंकर गर्मी में पथिक और पक्षी छाया हूँढ़कर विश्राम कर रहे हैं।
(v) दोपहर के ढलने और वातावरण के शांत होने पर इतनी अधिक उमस पैदा होती है कि ऐसे में कवि को लगता है कि हवा भी कहीं घड़ी भर के लिए विश्राम कर रही है।

देव

प्रश्न 1:
डार द्रुम पलना बिछौना नवपल्लव के,
सुमन सँगूला सोहै तन’ छबि भारी है ।
पवन झुलावै केकी कीर बहरावै, ‘देव’,
कोकिल हलावै हुलसावे करतारी है ॥
पूरित पराग सौं उतारौ करै राई-लोन,
कंजकली नायिका लतानि सिर सारी है ।
मदन, महीपजू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहिं जगावत गुलाब चटकारी है ।।

(i) उपर्युक्त पंक्तियों के कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने कामदेव का पुत्र किसे बताया है।
(iv) वसंतरूपी शिशु को झूला कौन झुलाता है?
(v) कमल की कलीरूपी नायिका वसंतरूपी नवजात शिशु को दुष्ट नजर से बचाने के लिए क्या करती है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित महाकवि देव के पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
कवि का नाम – देव।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – यह वसन्त एक सलोना-सा बालक है। वृक्षों की हरी-भरी डालियाँ इसको पालना हैं। उनमें निकले नये-नये कोमल पत्ते ही उसका बिछौना हैं। जैसे छोटे बच्चे के लिए बिछौना बिछाया जाता है, उसी प्रकार वसन्तरूपी बालक के लिए वृक्षों के पत्ते ही बिछौना हैं। पुष्पों कारंग-बिरंगा झबला इसके शरीर की शोभा बढ़ा रहा है।
(iii) कवि ने वसंत को कामदेव का पुत्र बताया है।
(iv) वसंतरूपी शिशु को पवन झूला झुलाती है।
(v) कमल की कलीरूपी नायिका लहराती लताओं की झाड़ी अपने सिर पर ओढ़कर इस वसंतरूपी नवजात शिशु को दुष्ट नजर से बचाने के लिए पुष्प-परागरूपी राई और नमक उतारती है।

घनानन्द

अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं ।
तहाँ साँचे चलें तजि ओपुनपौ झझकैं कपटी जे निसाँक नहीं ।
‘घनआनँद’ प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक से दूसरो आँक नहीं।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ कहौ मून लेहु पै देहु छटाँक नहीं ।।

(i) उपर्युक्त पंक्तियों के कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रेम का मार्ग कैसा है और इसमें क्या नहीं होता?
(iv) कैसे व्यक्ति प्रेम-पथ के पथिक नहीं बन सकते?
(v) ‘मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं’ अंश में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत सवैया हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित कविवर घनानन्द के पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
कवि का नाम – घनानन्द।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – रीतिकाल के कवि घनानन्द प्रेम की पीर के अमर गायक थे। वे अपनी प्रेमिका सुजान अथवा श्रीकृष्ण की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि मैंने तुमसे एकनिष्ठ प्रेम किया है। और अपना हृदय तक तुम्हें दे दिया है, पर तुमने न जाने कौन-सी पट्टी पढ़ी है या कौन-सी सीख सीखी है, जो मन भर तो ले लेते हो, पर बदले में छटाँक भर भी नहीं देते हो। तात्पर्य यह है कि हमारा मन तो तुमने ले लिया है, पर अपनी एक झलक तक नहीं दिखाई है।
(iii) प्रेम का मार्ग बहुत ही सीधा-सादा है और इसमें कहीं भी कुटिलता नहीं होती।
(iv) छल-कपट तथा चालाकी दिखाने वाले व्यक्ति प्रेम-पथ के पथिक नहीं बन सकते।
(v) श्लेष अलंकार।

कथा-भारती

प्रश्न 1:
कहानी के तत्त्वों पर प्रकाश डालिए।
या
कहानी में कथोपकथन (संवाद) तत्त्व अथवा वातावरण (देश-काल) तत्त्व को सोदाहरण समझाइट।
उत्तर:
कहानी के तत्त्वों के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ विद्वान् आरम्भ और अन्त तथा प्रभावान्विति को कहानी के तत्त्वों में ही स्वीकार करते हैं किन्तु अधिकांश विद्वानों ने कहानी के निम्नलिखित सात तत्त्व ही स्वीकार किये हैं-

(1) शीर्षक – शीर्षकं कहानी का अनिवार्य अंग है। कहानी के शीर्षक में कुछ विशेषताएँ होती हैं। शीर्षक मुख्य विषय से सम्बन्धित, स्पष्ट, आकर्षक, अर्थपूर्ण, संक्षिप्त तथा नयापन लिये हुए होना चाहिए।

(2) कथानक – कहानी का वर्ण्य-विषय ही उसका कथानक कहलाता है। कथानक अत्यन्त संक्षिप्त, सरल, स्वाभाविक, रोचक, सुगठित एवं प्रभावशाली होना चाहिए। कथानक में पात्रों एवं परिस्थितियों के बीच द्वन्द्व का चित्रण होता है तथा वह लेखक के दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति करता है। कथानक के विकास के चार चरण होते हैं—आरम्भ, मध्य, चरम-सीमा तथा अन्त। कथानक अधिकांशतः चार प्रकार के होते हैं
(i) घटनाप्रधान,
(ii) चरित्रप्रधान,
(iii) भावप्रधान एवं
(iv) वातावरणप्रधान।।

(3) पात्र अथवा चरित्र – चित्रण कथाकार पात्रों के माध्यम से जीवन तथा जगत् के संघर्षों को पाठक के समक्ष उपस्थित करता है। कहानीकार उन्हीं पात्रों को चुनता है, जो कहानी के विकास के लिए अनिवार्य होते हैं। जीवन्त और यथार्थ जीवन से जुड़े पात्र कहानी की श्रेष्ठता के निकट होते हैं। कहानी के पात्र अनेक प्रकार के होते हैं; जैसे – यथार्थवादी, आदर्शवादी, काल्पनिक, मुख्य, गौण, स्थिर, गतिशील, व्यक्ति, वर्ग, ऐतिहासिक आदि।

(4) संवाद अथवा कथोपकथन 
– यह कहानी का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। कथाकार कथोपकथन के माध्यम से कथानक में सजीवता और नाटकीयता लाता है। कथोपकथन के द्वारा पात्रों की भावनाओं, अनुभवों, क्रिया-कलापों एवं उनकी चारित्रिक विशेषताओं का बोध होता है। संवाद संक्षिप्त, तीखे, सार्थक, स्वाभाविक तथा सजीव होने चाहिए। थोड़े में अधिक कहने की क्षमता संवाद का महत्त्वपूर्ण गुण है।

(5) भाषा-शैली-भाषा – शैली को कहानी के गठन में विशिष्ट महत्त्व होता है। कहानी की भाषा में चित्रमयता, प्रवाह, प्रतीकात्मकता तथा बिम्बात्मकता होनी चाहिए। भाषा; पात्र एवं समय के अनुरूप होनी चाहिए। मुहावरों, लोकोक्तियों एवं परिहास का समावेश कहानी की भाषा को सशक्त बनाता है। कहानी की शैली के अन्तर्गत कहानी का शिल्प एवं रचना-विधान आती है। कहानी की रचना के लिए अनेक शैलियाँ प्रचलित हैं, जिनमें कथात्मक, ऐतिहासिक, आत्मचरित, पत्रात्मक, डायरी, नाटकीय आदि प्रमुख हैं।

(6) देश-काल या वातावरण – कहानी में स्वाभाविकता, सजीवता तथा विश्वसनीयता की सृष्टि के लिए वातावरण की योजना की जाती है। वातावरण से अभिप्राय है किसी देश, समाज एवं जाति के आचारविचार, उसकी सभ्यता-संस्कृति तथा राजनीतिक परिस्थितियों का चित्रण। कहानीकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसने जिस काल-विशेष का कथानक प्रस्तुत किया है, उसके अनुरूप ही वह संस्कृति और वातावरण भी अंकित करे।

(7) उद्देश्य – कहानी का कोई – न-कोई उद्देश्य अवश्य होता है। समाज-सुधार, सन्देश, मनोरंजन, भावअभिव्यंजना, सिद्धान्त-प्रतिपादन आदि का प्रस्तुतीकरण कहानी के प्रमुख उद्देश्यों में से है। कहानीकार समसामयिक समस्याओं से प्रभावित होता है। अपने चारों ओर के इन प्रभावों, शाश्वत समस्याओं व समाधान को वह कहानी के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाता है।

प्रश्न 2:
कहानी की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) लिखिए।
उत्तर:
एक अच्छी कहानी में निम्नलिखित विशेषताएँ (लक्षण) होनी आवश्यक हैं
(1) कथानक संक्षिप्त हो।

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