UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name केशवदास
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
केशवदास का जीवन-परिचय दीजिए।
या
केशवदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
केशवदास का जीवन-परिचय लिखते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – आचार्य केशवदास का जन्म ओरछा (बुन्देलखण्ड) में संवत् 1612(सन् 1555 ई०) में हुआ था। ये सनाढ्य ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम पं० काशीनाथ था। आचार्य केशवदास का कुल संस्कृत के पाण्डित्य के लिए प्रसिद्ध था। केशवदास स्वयं कहते हैं कि

भाषा बोलि न जानहीं, जिनके कुल के दास।

ओरछा-नरेश महाराजा इन्द्रजीत सिंह इन्हें अपना गुरु मानते थे और उनके दरबार में इनका बड़ा मान था। महाराजा इन्द्रजीत सिंह ने इनको 21 गाँव दानस्वरूप दिये थे। इनका जीवन राजसी ठाठ-बाट का था। ये स्वभाव से गम्भीर और स्वाभिमानी थे। अपनी प्रशंसा में केशव द्वारा रचित एक पद पर बीरबल ने छह हजार रुपये की हुण्डियाँ न्यौछावर की थीं। एक बार अकबर ने इन्द्रजीत सिंह पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना कर दिया, जिसे केशव ने आगरा जाकर बीरबल की सहायता से माफ करवाया। इससे इनका सम्मान और भी बढ़ गया। संवत् 1662 के लगभग जहाँगीर ने ओरछा का राज्य बीरसिंहदेव को दे दिया। कुछ काल तक नये राजा के दरबार में रहकर बाद में ये गंगाघाट पर जाकर रहने लगे। संवत् 1674(सन् 1617 ई०) के लगभग इनका देहावसाने हुआ।

ग्रन्थ
(क) रीतिग्रन्थ – (1) कविप्रिया, (2) रसिकप्रिया।
(ख) महाकाव्य –  (3) रामचन्द्रिका।
(ग) ऐतिहासिक काव्य – (4) जहाँगीर-जस-चन्द्रिका, (5) रतनबावनी, (6) वीरसिंह देवचरित, (7) नखशिख।
(घ) वैराग्यपरक –  (8) विज्ञान गीता।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

केशव चमत्कारवादी कवि – केशव चमत्कारवादी कवि थे। ये अलंकारों से रहित कविता को कविता मानने को ही तैयार न थे। इन्होंने प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य रचे। ‘रामचन्द्रिका’ में इन्होंने रामचरित का विस्तृत वर्णन किया है, पर चमत्कारप्रियता के कारण वे इसमें उतने सफल नहीं हो पाये। ‘रामचन्द्रिका’ छन्दों का अजायबघर-सा प्रतीत होती है; क्योंकि इन्होंने एक सर्ग में एक छन्द के नियम का पालन न करके एक सर्ग में अनेक छन्दों का प्रयोग किया है, जिससे कथा-प्रवाह बार-बार बाधित हो जाता है। विविध अलंकारों के विधान एवं शब्दों के अप्रचलित अर्थों के प्रयोग के कारण इनकी भाषा बड़ी क्लिष्ट हो गयी है, जिससे इन्हें ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा जाता है ।

विषमय यह गोदावरी अमृतन के फल-देत।

[ यहाँ ‘विष’ का अर्थ ‘जल’ है, जो अत्यधिक अप्रचलित है।]।

प्रकृति-चित्रण – प्रकृति के सौन्दर्य में केशव का मन न रमा। इन्होंने व्यापक भ्रमण द्वारा प्रकृति का निकट से सूक्ष्म परिचय भी प्राप्त नहीं किया था। इसीलिए वे मिथिला (बिहार) के वनों में ‘एला ललित लवंग संग पुंगीफल सोहे’ कहते समय यह भूल जाते हैं कि इलायची, लौंग, सुपारी आदि के वृक्ष समुद्र-तट पर होते हैं । कि बिहार में। इसके अतिरिक्त वे प्रकृति पर उत्प्रेक्षा, सन्देह, रूपक आदि अलंकारों का इतना अधिक आरोप कर देते हैं कि उससे प्रकृति की शोभा का भाव लुप्त होकर कई बार बड़ी नीरसता उत्पन्न हो जाती है; उदाहरणार्थ  वे प्रातःकालीन सूर्य के बिम्ब को कालरूपी कापालिक का खून से भरा खप्पर बताते हैं

कै सोनित कलित-कपाल यह किल कापालिक-काल को।

वस्तुतः उनका हृदय प्रकृति की सुषमा में न रमकर मानव-सौन्दर्य में अधिक रमा है।
संवाद-योजना – केशव की प्रसिद्धि ‘रामचन्द्रिका’ की संवाद-योजना के कारण है। केशव दरबारी कवि थे, इसलिए इन्हें राजनीतिक दावपेंच के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर देने का ढंग खूब आता था। फलतः उनके संवाद बड़े नाटकीय बन पड़े हैं। उनमें वाग्वैदग्ध्य (वाणी की चतुरता) खूब मिलता है। इनमें पात्रों के अनुरूप क्रोध, उत्साह आदि की व्यंजनों भी सुन्दर हुई है। संवादों की भाषा भी अलंकारों के बोझ से रहित सरल और स्वाभाविक है। इसीलिए इनके संवाद बड़े ही हृदयग्राही बन गये हैं। केशव के परशुराम-राम संवाद और अंगद-रावण-संवाद ” जैसे सुन्दर संवाद हिन्दी के अन्य प्रबन्धकाव्यों में नहीं मिलते।

पाण्डित्य-प्रदर्शन – केशव अपने पाण्डित्य की धाक जमाना चाहते थे। संस्कृत काव्य की उक्तियों को उन्होंने अपने काव्य में सँजोया है, किन्तु भाषा की असमर्थता के कारण वे उन्हें स्पष्ट नहीं कर सके।

कवि एवं आचार्य – प्रबन्धकाव्य के अतिरिक्त केशव ने मुक्तककाव्य भी रचा है। ‘कविप्रिया’ में मुख्य रूप से अलंकारों के लक्षण, उदाहरण, काव्यदोष आदि का वर्णन है तथा ‘रसिकप्रिया’ में रस, उसके अंगों (भाव, विभाव, अनुभाव आदि), नायिका-भेद आदि का वर्णन है। इन ग्रन्थों में, केशव का कवि हृदय देखा जा सकता है, जिनके कारण ही केशव को रीतिकालीन काव्य-परम्परा में प्रथम आचार्य का पद प्राप्त हुआ।

रस-योजना – केशवदास ने श्रृंगार, वीर, करुण और शान्त रसों का अधिक प्रयोग किया है। अन्य रस भी यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हो जाते हैं। इनमें भी श्रृंगार रस कवि को अधिक प्रिय हैं। शृंगारपरक अनुभावों का कवि ने सहज, स्वाभाविक और आकर्षक वर्णन किया है। वीर रस भी कवि को प्रिय है। रामचन्द्रिका में ऐसे अनेक ओजपूर्ण प्रसंग देखे जा सकते हैं। कारुणिक प्रसंगों का भी कवि ने बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है। लव की वस्तुत: उनका हृदय प्रकृति की सुषमा में ने रमकर मानव-सौन्दर्य में अधिक रमा है।

संवाद-योजना – केशव की प्रसिद्धि रामचन्द्रिका’ की संवाद-योजना के कारण है। केशव दरबारी कवि थे, इसलिए इन्हें राजनीतिक दावपेंच के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर देने का ढंग खूब आता था। फलतः उनके संवाद बड़े नाटकीय बन पड़े हैं। उनमें वाग्वैदग्ध्य (वाणी की चतुरता) खूब मिलता है। इनमें पात्रों के अनुरूप क्रोध, उत्साह आदि की व्यंजना भी सुन्दर हुई है। संवादों की भाषा भी अलंकारों के बोझ से रहित सरल और स्वाभाविक है। इसीलिए इनके संवाद बड़े ही हृदयग्राही बन गये हैं। केशव के परशुराम-राम संवाद और अंगद-रावण-संवाद जैसे सुन्दर संवाद हिन्दी के अन्य प्रबन्धकाव्यों में नहीं मिलते।

पाण्डित्य-प्रदर्शन – केशव अपने पाण्डित्य की धाक जमाना चाहते थे। संस्कृत काव्य की उक्तियों को उन्होंने अपने काव्य में सँजोया है, किन्तु भाषा की असमर्थता के कारण वे उन्हें स्पष्ट नहीं कर सके।

कविएवं आचार्य – प्रबन्धकाव्य के अतिरिक्त केशव ने मुक्तककाव्य भी रचा है।’कविप्रिया’ में मुख्य रूप से अलंकारों के लक्षण, उदाहरण, काव्यदोष आदि का वर्णन है तथा ‘रसिकप्रिया’ में रस, उसके अंगों (भाव, विभाव, अनुभाव आदि), नायिका-भेद आदि का वर्णन है। इन ग्रन्थों में, केशव का कवि हृदय देखा जा सकता है, जिनके कारण ही केशव को रीतिकालीन काव्य-परम्परा में प्रथम आचार्य का पद प्राप्त हुआ।

रस-योजना – केशवदास ने शृंगार, वीर, करुण और शान्त रसों का अधिक प्रयोग किया है। अन्य रस भी यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हो जाते हैं। इनमें भी शृंगार रस कवि को अधिक प्रिय हैं। शृंगारपरक अनुभावों का कवि ने सहज, स्वाभाविक और आकर्षक वर्णन किया है। वीर रस भी कवि को प्रिय है। रामचन्द्रिका में ऐसे अनेक ओजपूर्ण प्रसंग देखे जा सकते हैं। कारुणिक प्रसंगों का भी कवि ने बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है। लव की मूच्र्छावस्था का समाचार पाकर सीता व्याकुल होकर अचेत हो जाती हैं। उनकी अवस्था को व्यक्त करती हुई कवि की उक्ति है

मनो चित्रे की पुत्तिका, मन क्रम वचन समेत।

इस प्रकार श्रृंगारे, करुण एवं वीर रस के विविध दृश्य केशव ने अंकित किये हैं, परन्तु रस-परिपाक की दृष्टि से केशव को अधिक सफलता नहीं मिली है।

कलापक्ष की विशेषताएँ
केशव काव्यकला के मर्मज्ञ थे, इस कारण उनको कलापक्ष बहुत पुष्ट है। अलंकारवादी आचार्य होने के कारण उन्होंने इस ओर विशेष ध्यान भी दिया है।

भाषा – केशव संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। वे बुन्देलखण्ड के रहने वाले थे, पर उन्होंने अपनी कविताएँ ब्रजभाषा में ही लिखी हैं, जिस पर संस्कृत, बुन्देलखण्डी, अवधी, अरबी-फारसी आदि कितनी ही तत्कालीन प्रचलित भाषाओं का प्रभाव परिलक्षित होता है। ‘रामचन्द्रिका’ की भाषा प्राय: संस्कृत की तत्सम शब्दावली के अत्यधिक प्रयोग से बोझिल है, पर रसिकप्रिया’ की भाषा बड़ी सरल, सरस और सुन्दर है। केशव की भाषा में अभिधा का ही प्राधान्य है। इन्होंने अभिधा के द्वारा ही अपनी कविता में चमत्कार उत्पन्न करने की चेष्टा की है तथा लाक्षणिक प्रयोगों का सहारा कम लिया है। पाण्डित्य-प्रदर्शन की प्रवृत्ति के कारण केशव की भाषा में संस्कृत के ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग मिलता है, जिसे संस्कृत का पण्डित ही समझ सकता है। इनके संवादों की भाषा प्राय: ओजस्विनी और प्रवाहपूर्ण है।

अलंकार-विधान – केशव अलंकारों के विधान में अत्यधिक कुशल थे; क्योंकि वे थे ही अलंकारवादी आचार्य इनके काव्य में काव्यशास्त्र में गिनाये गये लगभग सभी अलंकार मिलते हैं, पर इन्हें चमत्कारप्रधान अलंकार प्रिय थे। एक ही पद में अनेक अलंकारों को भर देना केशवदास के लिए बायें हाथ का खेल था। आलंकारिक सौन्दर्य रामचन्द्रिका’ की प्रमुख विशेषता है। केशवकाव्य में मुख्य रूप से यमक, श्लेष, अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, सन्देह आदि अलंकार तो कदम-कदम पर मिलते हैं। इनके अतिरिक्त परिसंख्या, विरोधाभास, विभावना, अतिशयोक्ति आदि अलंकार भी यत्र-तत्रे भरे पड़े हैं।

छन्द-विधान – पिंगलशास्त्र पर केशव का बड़ा अधिकार था। इस विषय पर उन्होंने ‘रामालंकृत-मंजरी’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की है। वैसे ‘रामचन्द्रिका’ भी पिंगलशास्त्र का ग्रन्थ मालूम पड़ता है; क्योंकि उसमें एकाक्षरी से लेकर अनेकाक्षरी तथा मात्रिक एवं वर्णिक दोनों प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया गया है। इसमें पग-पग पर छन्द-परिवर्तन दिखाई पड़ता है।

साहित्य में स्थान – केशव के काव्य में भावपक्ष अवश्य हीन है, परन्तु उनका कलापक्ष सर्वाधिक पुष्ट है। इनके , किसी प्रशंसक ने तो ‘सूर-सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास’ लिखकर इन्हें हिन्दी कवियों में सूर-तुलसी के बाद तीसरे स्थान का अधिकारी बताया है। इतना न मानें तो भी यह तो नि:संकोच कहा ही जा सकता है कि “केशवदास हिन्दी के समर्थ कवियों में से एक हैं।”

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

स्वयंवर-कथा

प्रश्न 1:
पावक पवन मणिपन्नग पतंग पितृ,
जेते ज्योतिवंत जग ज्योतिषिन गाये हैं ।

असुर प्रसिद्ध सिद्ध तीरथ सहित सिंधु,
केशव चराचर जे वेदन बताये हैं ।।
अजर अमर अज अंगी औ अनंगी सब,
बरणि सुनावै ऐसे कौन गुण पाये हैं ।
सीता के स्वयंवर को रूप अवलोकिबे को,
भूपन को रूप धरि विश्वरूप आये हैं ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सीता-स्वयंवर देखने कौन-कौनं आए हुए हैं?
(iv) ‘पवन’ शब्द का सन्धि-विच्छेद कीजिए।
(v) ‘अजर अमर अज अंगी औ अनंगी सब पद्यांश में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद महाकवि केशवदास द्वारा रचित ‘रामचन्द्रिका’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘स्वयंवर-कथा’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – स्वयंवर-कथा।
कवि का नाम – केशवदास।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – सीता के स्वयंवर का दृश्य देखने के लिए समस्त संसार के सभी
चर-अचर रूपवान राजाओं का आकार धारण करके आये हैं। इन प्राणियों में अग्नि, वायु, मणियों वाले शेष, वासुकि आदि सर्प, पक्षी, पितृगण (मनुष्यों के पितृलोकवासी पितर) आदि जितने भी ज्योतियुक्त प्राणियों का उल्लेख ज्योतिषियों ने किया है; उस स्वयंवर में उपस्थित थे।
(iii) सीता-स्वयंवर देखने के लिए समस्त संसार के सभी चर-अचर रूपवान राजाओं का रूप धारण करके आए हुए हैं।
(iv) ‘पवन’ का सन्धि-विच्छेद है-पो + अन।
(v) अनुप्रास अलंकार।।

विश्वामित्र और जनक की भेंट

प्रश्न 1:
केशव ये मिथिलाधिप हैं जग में जिन कीरतिबेलि बयी है ।
दान-कृपान-विधानन सों सिगरी बसुधा जिन हाथ लयी है ।
अंग छ सातक आठक सों भव तीनिहु लोक में सिद्धि भयी है।
वेदत्रयी अरु राजसिरी परिपूरणता शुभ योगमयी है ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) विश्वामित्र जी राम को किसका परिचय दे रहे हैं?
(iv) जनक जी ने किसके द्वारा सारी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया है?
(v) वेद के कितने अंग होते हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद आचार्य केशवदास के महाकाव्य ‘रामचन्द्रिका’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘विश्वामित्र और जनक की भेंट’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – विश्वामित्र और जनक की भेट।
कवि का नाम – केशवदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – इस पद्यांश में विश्वामित्र जी ने श्रीराम को महाराज जनक का परिचय
देते हुए बताया है कि हे रामचन्द्र! देखो ये मिथिला-नरेश (जनक) हैं, जिन्होंने संसार में अपनी कीर्ति की बेल लगायी है; अर्थात् संसार भर में इनका यश फैला हुआ है, जैसे बेल की सुगन्धि चारों ओर फैलती है, वैसे ही इनका यश भी चारों ओर फैल रहा है।
(iii) विश्वामित्र जी राम को जनक जी का परिचय दे रहे हैं।
(iv) जनक जी ने दानवीरता और युद्धवीरता द्वारा सारी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया है।
(v) वेद के छ: अंग होते हैं।

प्रश्न 2:
प्रथम टंकोर झुकि झारि संसार मद,
चंड कोदंड रह्यौ मंडि नवे खंड को ।।

चालि: अचला अचल घालि दिगपाल बल,
पालि ऋषिराज के बचन परचंड को ।।
सोधु दै ईश को, बोधु जगदीश को,
क्रोध उपजाई भृगुनंद बरिबंड को ।
बाधि वर स्वर्ग को, साधि अपवर्ग, धनु
भंग को शब्द गयो भेदि ब्रह्मड को ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसकी ध्वनि सारे संसार का मद हटाकर नवखण्डों में गूंज उठी?
(iv) धनुष की टंकार ने विष्णु को क्या बोध कराया?
(v) ऋषिराज’ शब्द में कौन-सा समास है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – उस प्रचण्ड धनुष की प्रथम टंकोर (टंकार) ने क्रुद्ध होकर सारे संसार का मद हटा दिया (गर्व चूर कर दिया) और नवों खण्डों में यह ध्वनि पूँज उठी।
(iii) प्रचंड धनुष की टंकार ने क्रुद्ध होकर सारे संसार को मद हटा दिया और नवों खण्डों में यह ध्वनि पूँज उठी।
(iv) धनुष की टंकार ने विष्णु को.यह बोध कराया कि उनकी इच्छा के अनुसार संसार का कार्य हो रहा है।
(v) ऋषिराज’ शब्द में ‘तत्पुरुष समास’ है।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 9
Chapter Name Uses of Statistical Methods
Number of Questions Solved 25
Category UP BoardSolutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

परियोजना निर्माण-एक उदाहरण
प्रश्न 1.
प्राथमिक आँकड़ों का प्रयोग करके किसी एक परियोजना का निर्माण करें। इसमें उपयुक्त सांख्यिकीय विधियों का उपयोग करें।
उत्तर
किसी भी परियोजना के निर्माण के लिए अपनाए जाने वाले विभिन्न चरण निम्नलिखित हैं
1. अध्ययन-क्षेत्र की समस्या को पहचानना तथा उसके उद्देश्य एवं क्षेत्र आदि को ध्यान में रखते हुए 
एक व्यापक एवं स्पष्ट योजना तैयार करना।
2. लक्ष्य समूह का चयन करना।
3. उचित रीति द्वारा आँकड़ों का संकलन करना।
4. संकलित समंकों को विभिन्न समंकों में श्रेणियों में विभाजित करना तथा उपयुक्त सांख्यिकीय 
विधियों द्वारा (साध्य, चित्र, बिन्दुरेखा) समंकों का प्रस्तुतीकरण करना।
5. विभिन्न सांख्यिकीय मापों द्वारा समंकों का विश्लेषण करना तथा प्राप्त परिणामों के आधार पर 
निष्पक्ष एवं उचित निष्कर्ष निकालकर उनकी व्याख्या करना।
6. प्रतिवेदन तैयार करना और आवश्यक सुझाव देना।
7. ग्रंथ सूची देना।

विषय : Close Up टूथपेस्ट के उपभोक्ता जागरूकता को मापना

समस्या- एक टूथपेस्ट कम्पनी अपने टूथपेस्ट °Close Up’ का उत्पादन एवं विपणन करती है। यद्यपि कम्पनी का प्रदर्शन अच्छा है तथापि वह अपनी बिक्री को बढ़ाना चाहती है। इसके लिए वह एक , परियोजना (Project) तैयार करती है ताकि वह टूथपेस्ट के संबंध में उपभोक्ताओं को रुचियों, अच्छे प्रचार के उपायों एवं बिक्री बढ़ाने की विधियों के बारे में योजना बना सके।
उददेश्य – परियोजना में निहित कम्पनी के उददेश्य निम्नांकित हैं

  1. यह पता लगाना कि उपभोक्ता Close Up का उपयोग उसके गुणों के कारण करते हैं अथवा केवल एक दंतमंजन के रूप में।
  2. क्या वे Close Up को खरीदते समय इसकी कीमत, गुण, भार आदि के बारे में अन्य टूथपेस्टों से” तुलना करते हैं।
  3. Close Up के बारे में जानने का उनका स्रोत क्या है? विज्ञापन, टी०वी०, पड़ोस, विक्रेता अथवा कोई अन्य।
  4. उपभोक्ता के माध्यम से उत्पाद की कमियों का पता लगाना।
  5.  उपचार तकनीक के द्वारा बाजार का विस्तार करना। लक्ष्य समूह-समंक संकलन के लिए शहरी एवं ग्रामीण उपभोक्ताओं का संकलन किया गया। अनुपात : 70:30 रखा गया।

समंक संकलन- परियोजना में प्राथमिक समंक एकत्रित किए गए। कुल मिलाकर 500 उपभोक्ताओं का चयन किया गया। इसमें से 350 उपभोक्ता शहरी क्षेत्र से तथा 150 उपभोक्ता ग्रामीण क्षेत्र से लिए गए। उपभोक्ताओं का चयन आयु, आय एवं लिंग के आधार पर किया गया। सभी उपभोक्ताओं को एक प्रश्नावली दी गई। प्रश्नावली का प्रारूप निम्नवत् था-

प्रश्नावली

सामान्य सूचना— यह सूचना नितांत गोपनीय रखी जाएगी।
1. नाम : ….
2. आयु : ….
3.  लिंग : पुरुष … महिला ….
4. पता : ….पिन कोड
5. वैवाहिक स्तर : विवाहित …. अविवाहित …..
6. आयु (वर्षों में) : व्यक्तियों की संख्या

  • 10 वर्ष से कम
  • 10-20
  • 20-30
  • 30-40
  • 40-50
  • 50 से अधिक

7. परिवार में सदस्यों की संख्या

  • 1-2
  •  3-4
  • 5-6
  • 6 से अधिक

8. परिवार में आय अर्जकों की संख्या
9. मासिक पारिवारिक आय (१ में)

  • 10,000 वर्ष से कम
  • 10,000-20,000
  • 20,000–30,000
  • 30,000 से अधिक

10. निवासी ; शहरी ग्रामीण
11. प्रमुख अर्जक सदस्य का मुख्य व्यवसाय

  • नौकरी (सेवा)
  • व्यावसायिक
  •  विनिर्माता
  •  व्यापारी
  • अन्य (कृपया बताएँ)

12. अपने दाँतों की सफाई के लिए आप क्या प्रयोग करते हैं?

  • टूथ पाउडर
  • टूथपेस्ट
  • अन्य (कृपया नाम बताएँ)

13. आपके टूथपेस्ट का ब्राण्ड कौन-सा है?

  • सिबाका
  • बबूल
  • क्लोज अप ।
  • कोलगेट
  • पेप्सोडेण्ट ।
  • प्रोमिस
  • फोरहैन्स |
  • अन्य (कृपया नाम बताएँ)

14. प्रत्येक 100 ग्राम टूथपेस्ट पैक की कीमत
15. क्या आपको यह टूथपेस्ट महँगा लगता है? हाँ ………..! नहीं ………….
16. क्या आप टूथपेस्ट खरीदते समय मानक चिह्न, विनिर्माण तिथि एवं समाप्ति तिथि देखते हैं?
हाँ … नहीं …
17. क्या आप Close Up की गुणवत्ता से संतुष्ट हैं? हाँ—–
नहीं…….
18. संतुष्ट न होने पर क्या आप दुकानदार से शिकायत करते हैं? हाँ …….. नहीं ………….
19. क्या आपकी शिकायत सुनी जाती है?
हाँ ……… नहीं …………..
20. यदि दुकानदार आपकी शिकायत पर ध्यान न दें तो आप क्या करते हैं? 

  • कम्पनी से शिकायत करते हैं।
  • उपभोक्ता अदालत जाते हैं।

21. आपको उत्पाद के बारे में जानकारी कहाँ से प्राप्त हुई? |
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 1

22. आप उत्पाद खरीदने के लिए किस घटक से आकर्षित हुए? |
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 2

23. आप हमारे उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए क्या सुझाव देंगे?
(कृपया एक पंक्ति लिखें)………………………………
आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण- लगभग विभिन्न वर्गों के 800 उपभोक्ताओं को प्रश्नावली भेजी गई जिनमें से केवल 500 प्रश्नावलियाँ प्राप्त हुईं। इनको निम्नांकित प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है–

(i) आयु के आधार पर उपभोक्ताओं का वर्गीकरणवर्ष
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 3
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 4
प्रेक्षण-
सर्वेक्षण किए गए उपभोक्ताओं में सबसे अधिक उपभोक्ता (330) 20-50 आयु वर्ग से 
थे।

(ii) परिवार का आकार–
चयनित 500 उपभोक्ता 100 परिवारों से संबंधित थे। इन परिवारों की 
संख्या आकार के अनुरूप निम्नवत् थी
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 5
प्रेक्षण- सर्वेक्षण किए गए अधिकांश परिवारों (70) में 3-6 सदस्य थे।

(iii) परिवार की मासिक आय प्रस्थिति-
  चयनित परिवारों की मासिक आय प्रस्थिति को अग्रांकित 
तालिका में दिखाया गया है-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 6
(iv) प्रमुख व्यावसायिक प्रस्थिति– व्यावसायिक दृष्टि से चयनित परिवारों की संख्या निम्नवत्  थी
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 7
(v) प्रयोग किए जाने वाले टूथपेस्ट (प्राथमिकता के क्रम से)- सर्वेक्षण में 500 उपभोक्ताओं का चयन किया गया था। प्रयोग किए जाने वाले टूथपेस्ट का प्राथमिकता क्रम निम्नवत् था-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 8
प्रेक्षण- उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि चयनित उपभोक्ताओं में से सबसे अधिक उपभोक्ता (210) क्लोजअप टूथपेस्ट का प्रयोग करते थे किंतु यह भी मात्र 42 प्रतिशत था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह टूथपेस्ट भी बहुत अधिक प्रसिद्ध नहीं था और 58 प्रतिशत उपभोक्ता इसका प्रयोग नहीं करते थे।

(vi) चयन का आधार-
चयनित परिवारों के टूथपेस्ट के चयन का आधार निम्नवत् था-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 9

प्रेक्षण- उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अधिकांश लोगों ने मानक चिह्न (35) तथा उत्पाद की कीमत (20) गुणवत्ता (15) व विक्रयोपरांत सेवा (15) के आधार पर उत्पाद का चयन किया।

(vii) संचार-
साधनों का प्रभाव- विभिन्न संचार-साधनों का चयनित परिवारों पर अग्रवत् प्रभाव 
पड़ा-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 10
प्रेक्षण- उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अधिकांश परिवारों पर (75) टूथपेस्ट के चयन में टेलीविजन व समाचार-पत्रों का प्रभाव पड़ा।
परियोजना रिपोर्ट- यह सर्वेक्षण टूथपेस्ट के प्रयोग के लिए किया गया। अधिकांश लोग शहरी क्षेत्रों से थे। शहरी-ग्रामीण उपभोक्ताओं का अनुपात 70: 30 था। इनमें से अधिकांश 20-25 वर्ष आयु वर्ग के थे। उनके परिवार में औसतन 3 से 6 सदस्य थे। अधिकांश परिवारों की मासिक आय के 10,000 से १ 30,000 तक थी और वे मुख्यत: नौकरीपेशा व व्यापारी वर्ग से थे। सर्वेक्षण में क्लोजअप, कोलगेट व पेप्सोडेण्ट अधिकांश उपभोक्ताओं को पसंद थे। अधिकांश लोग विज्ञापन
से प्रभावित हुए थे तथा टेलीविजन व समाचार-पत्र संचार के मुख्य माध्यम थे।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 11

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name गोस्वामी तुलसीदास
Number of Questions 10
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
तुलसीदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
या
तुलसीदास जी की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
तुलसीदास का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए एवं साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म संवत् 1589 वि० (सन् 1532) भाद्रपद, शुक्ल एकादशी को राजापुर (जिला बाँदा) के सरयूपारीण ब्राह्मण-कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। जन्म के थोड़े दिनों बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया और अभुक्त मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण पिता ने भी इनको त्याग कर दिया। पिता द्वारा त्याग दिये जाने पर वे अनाथ के समान घूमने लगे। इन्होंने कवितावली में स्वयं लिखा है-“बारे तै ललात बिललात द्वार-द्वारे दीन, चाहते हो चारि फल चारि ही चनक को।” इसी दशा में इनकी भेंट रामानन्दीय सम्प्रदाय के साधु नरहरिदास से हुई, जिन्होंने इन्हें साथ लेकर विभिन्न तीर्थों का भ्रमण किया। तुलसीदास जी ने अपने इन्हीं गुरु का स्मरण इस पंक्ति में किया है-‘बन्दी गुरुपद कंज कृपासिन्धु नर-रूप हरि।’ तीर्थाटन से लौटकर काशी में इन्होंने तत्कालीन विख्यात विद्वान् शेषसनातन जी से 15 वर्ष तक वेद, शास्त्र, दर्शन, पुराण आदि का गम्भीर अध्ययन किया। फिर अपने जन्म-स्थान के दीनबन्धु पाठक की पुत्री रत्नावली से विवाह किया। तुलसी अपनी सुन्दर पत्नी पर पूरी तरह आसक्त थे। पत्नी के ही एक व्यंग्य से आहत होकर ये घर-बार छोड़कर काशी में आये और संन्यासी हो गये।

लगभग 20 वर्षों तक इन्होंने समस्त भारत का व्यापक भ्रमण किया, जिससे इन्हें समाज को निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। ये कभी चित्रकूट, कभी अयोध्या और कभी काशी में निवास करते रहे। जीवन का अधिकांश समय इन्होंने काशी में बिताया और यहीं संवत् 1680(सन् 1623 ई०) में असी घाट पर परमधाम को सिधारे। इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रचलित है-

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ॥

कृतियाँ – गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित 37 ग्रन्थ माने जाते हैं, किन्तु प्रामाणिक ग्रन्थ 12 ही मान्य हैं, जिनमें पाँच प्रमुख है – श्रीरामचरितमानस, विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली। अन्य ग्रन्थ हैं—बरवै रामायण, रामलला नहछु, कृष्ण गीतावली, वैराग्य संदीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामाज्ञा प्रश्नावली।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ
युगीन परिस्थिति एवं गोस्वामी जी का योगदान – तुलसीदास जिस काल में उत्पन्न हुए, उस समय हिन्दू-जाति धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक अधोगति को पहुँच चुकी थी। हिन्दुओं का धर्म और आत्म-सम्मान यवनों के अत्याचारों से कुचला जा रहा था। सब ओर निराशा का वातावरण व्याप्त था। ऐसे समय में अवतरित होकर गोस्वामी जी ने जनता के सामने भगवान् राम का लोकरक्षक रूप प्रस्तुत किया, जिन्होंने यवन शासकों से कहीं अधिक शक्तिशाली रावण को केवल वानर-भालुओं के सहारे ही कुलसहित नष्ट कर दिया था।

रामराज्य के रूप में एक आदर्श राज्य की कल्पना – तुलसीदास ने एक आदर्श राज्य की कल्पना रामराज्य के रूप में लोगों के सामने रखी। इस आदर्श राज्य का आधार है-आदर्श परिवार। मनुष्य को चरित्र-निर्माण की शिक्षा परिवार में ही सबसे पहले मिलती है। उन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस के द्वारा व्यक्ति के स्तर से लेकर, समाज और राज्य तक के समस्त अंगों का आदर्श रूप प्रस्तुत किया और इस प्रकार निराश जनसमाज को प्रेरणा देकर रामराज्य के चरम आदर्श तक पहुँचने का मार्ग दिखाया।

लोकभाषा को ग्रहण – तुलसीदास ने पण्डितों की भाषा संस्कृत के स्थान पर जनता की भाषा में अपना ग्रन्थ रची, जिससे राजा से रंक तक सबको अपना जीवन सुधारने का सम्बल (सहारा) प्राप्त हुआ। ‘मानस’ में समस्त वेद, पुराण, शास्त्र एवं काव्यग्रन्थों का निचोड़ सरल-से-सरल रीति से प्रस्तुत किया गया है। धर्म की दृष्टि से यदि यह महान् धर्मग्रन्थ है तो साहित्य की दृष्टि से यह एक अतीव रोचक एवं मनोरंजक कथा भी है। ऐसे अद्भुत ग्रन्थ संसार के साहित्य में विरल ही हैं।

भक्ति-भावना – गोस्वामी तुलसीदास की भक्ति दास्यभाव की थी, जिसमें स्वामी को पूर्ण समर्पित एवं अनन्य भाव से भजा जाता है। तुलसी के राम शक्ति, शील और सौन्दर्य तीनों के चरम उत्कर्ष हैं। तुलसी ने चातक को प्रेम का आदर्श माना है

एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास ॥

समन्वय-भावना – तुलसी द्वारा राम के चरित्र-चित्रण में मानव-जीवन के सभी पक्षों एवं सूक्ष्म-से- सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने भक्ति, ज्ञान और कर्म तीनों में सामंजस्य स्थापित किया। शिव और राम को एक-दूसरे का उपास्य-उपासक बताकर इन्होंने उस काल में बढ़ते हुए शैव-वैष्णव-विद्वेष को समाप्त किया।

तुलसी का वैशिष्ट्य – यद्यपि नम्रतावश तुलसी ने अपने को कवि नहीं माना, पर काव्यशास्त्र के सभी लक्षणों से युक्त इनकी रचनाएँ हिन्दी का गौरव हैं। प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य दोनों की रचना में इन्हें अद्वितीय सफलता मिली है। ‘मानस’ में कथा-संघटन, चरित्र-चित्रण, मार्मिक स्थलों की पहचान, संवादों की सरसता आदि सभी कुछ अद्भुत हैं।

रस-योजना – तुलसी के काव्य में नव-रसों की बड़ी हृदयग्राही योजना मिलती है। श्रृंगार का जैसा मर्यादित वर्णन इन्होंने किया है, वैसा आज तक किसी दूसरे कवि से न बन पड़ा। जनक-वाटिका में राम-सीता का प्रथम मिलन द्रष्टव्य है

अस कहि फिरि चितये तेहि ओरा। सिय-मुख-ससि भये नयन चकोरा ।।
भये बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दृगंचल ॥

स्वामी-सेवक भाव की भक्ति में विनय और दीनता का स्वाभाविक योग रहता है। विनय और दीनता का भाव तुलसी में चरम सीमा तक पहुँच गया है। अत्यन्त दीन भाव से वे राम को विनय से पूर्ण पत्रिका लिखते हैं। वीर रस का उल्लेख भरत के चित्रकूट जाते समय निषादराज के वचन में मिलता है। रौद्र रस का वर्णन कैकेयी-दशरथ-प्रसंग में एवं भरत के चित्रकूट पहुँचने के समाचार पर लक्ष्मण के कोप के रूप में मिलता है। इसके अतिरिक्त ‘कवितावली’ के सुन्दरकाण्ड और युद्धकाण्ड में इसकी प्रभावशाली व्यंजना हुई है।

प्रकृति-वर्णन – अपने काव्य में तुलसी ने प्रकृति के अनेक मनोहारी दृश्य चित्रित किये हैं। इनके काव्य में प्रकृति उद्दीपन, आलम्बन, उपदेशात्मक, आलंकारिक एवं मानवीय रूपों में उपस्थित हुई है। प्रकृति का एक रमणीय चित्र देखिए

बोलत जल कुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा॥

कल्याण-भावना एवं स्वान्तःसुखाय रचना – तुलसीदास ने अपने सुख के लिए काव्य-रचना की है। उन्हें क्योंकि श्रीराम प्रिय थे, इसलिए उन्होंने अपने मन के सुख के लिए राम और उनके चरणों का गुणगान अपने काव्य में किया।

संगीतज्ञता – राग-रागिनियों में गाये जाने योग्य अगणित सरस पदों की रचना करके तुलसी ने अपने उच्चकोटि के संगीतज्ञ होने का प्रमाण भी दे दिया।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – गोस्वामी जी ने अपने समय की प्रचलित दोनों काव्य भाषाओं-अवधी और ब्रज में समान अधिकार से रचना की है। यदि ‘श्रीरामचरितमानस’, ‘रामलला नहछु’, ‘बरवै रामायण’, ‘जानकी मंगल’ और ‘पार्वती मंगल’ में अवधी की अद्भुत मिठास है तो विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ में मॅझी हुई ब्रजभाषा का सौन्दर्य देखते ही बनता है। भाषा शुद्धं, संस्कृतनिष्ठ तथा प्रसंगानुसारिणी है।

संवाद-योजना – गोस्वामी जी ने अपने काव्य को नाटकीयता प्रदान करने के लिए जिन साधनों का उपयोग किया है, उनमें संवाद-योजना सबसे प्रमुख है। अयोध्याकाण्ड संवादों की दृष्टि से विशेष समृद्ध है, जिसमें कैकेयी-मन्थरा-संवाद, कैकेयी-दशरथ-संवाद, राम-कौशल्या-संवाद, राम-सीता-संवाद, राम-लक्ष्मणसंवाद, केवट-राम-संवाद तथा चित्रकूट के मार्ग में ग्रामवधूटियों का संवाद। इन सभी संवादों में विभिन्न परिस्थितियों में पड़े भिन्न-भिन्न पात्रों के मनोभावों के सूक्ष्म उतार-चढ़ाव का बड़ी विदग्धता से चित्रण किया गया है। कैकेयी-मन्थरा-संवाद तो अपनी मनोवैज्ञानिकता के लिए विशेष विख्यात है।

शैली – गोस्वामी जी के समय तक जिन पाँच प्रकार की शैलियों में काव्य-रचना होती थी, वे थीं-
(1) भाटों की कवित्त-सवैया शैली,
(2) रहीम की बरवै शैली,
(3) जायसी की दोहा-चौपाई शैली,
(4) सूर की गेय-पद (गीतिकाव्य) शैली,
(5) वीरगाथाकाल की छप्पय शैली। गोस्वामी जी ने अद्भुत अधिकार से सभी शैलियों में सफल काव्य-रचना की।

रसानुरूप शैली के प्रयोग की दृष्टि से तुलसी अनुपम हैं। रति, करुणा आदि कोमल भावों की व्यंजना में उन्होंने प्रायः समासरहित, मधुर, कोमलकान्त पदावली का व्यवहार किया है, जब कि वीर, रौद्र, वीभत्स आदि रसों के प्रसंग में समासयुक्त एवं कठोर पदावली का प्रयोग किया है। शब्दों की ध्वनिमात्र से तुलसी कठोर-से-कठोर एवं मृदुल-से-मृदुल भावों एवं दृश्यों का साक्षात्कार कराने में बड़े कुशल हैं।

छन्द-प्रयोग – तुलसीदास छन्दशास्त्र के पारंगत विद्वान् थे। उन्होंने विविध छन्दों में काव्य-रचना की है। ‘अयोध्याकाण्ड में गोस्वामी जी ने दोहा, सोरठा, चौपाई और हरिगीतिका छन्दों का प्रयोग किया है। चौपाई छन्द कथा-प्रवाह को बढ़ाते चलने के लिए बहुत उपयोगी होता है। दोहा या सोरठा इस प्रवाह को सुखद विश्राम प्रदान करते हैं। हरिगीतिका छन्द वैविध्य प्रदान करे वातावरण की सृष्टि में सहायक सिद्ध होता है।

अलंकार-विधान – अलंकारों का विधान वस्तुत: रूप, गुण, क्रिया का प्रभाव तीव्र करने के लिए होना चाहिए न कि चमत्कार-प्रदर्शन के लिए। गोस्वामी जी का अलंकार-विधान बड़ा ही सहज और हृदयग्राही बन पड़ा है, जो रूप, गुण व क्रिया का प्रभाव तीव्र करता है। निम्नांकित उद्धरण में अनुप्रास की छटा द्रष्टव्य है

कलिकाल बेहाल किये मनुजा। नहिं मानत कोई अनुजा तनुजा॥

अलंकारों में गोस्वामी जी के सर्वाधिक प्रिय अलंकार हैं-उपमा, उत्प्रेक्षा और रूपक। संस्कृत में कालिदास की उपमाएँ विख्यात हैं। तुलसी अपनी कुछ श्रेष्ठ उपमाओं में कालिदास से भी बाजी मार ले गये हैं

अबला कच भूषण भूरि छुधा। धनहीन दुःखी ममता बहुधा।।

इसके अतिरिक्त इन्होंने सन्देह, प्रतीप, उल्लेख, व्यतिरेक, परिणाम, अन्वय, श्लेष, असंगति, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों के प्रयोग भी किये हैं।

साहित्य में स्थान – इस प्रकार रस, भाषा, छन्द, अलंकार, नाटकीयता, संवाद-कौशल आदि सभी दृष्टियों से तुलसी का काव्य अद्वितीय है। कविता-कामिनी उनको पाकर धन्य हो गयी। हरिऔध जी की निम्नलिखित उक्ति उनके विषय में बिल्कुल सत्य है

“कविता करके तुलसी न लसे। कविता लसी पा तुलसी की कला॥”

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

भरत-महिमा

प्रश्न 1:
भायप भगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख दूषन हरनू ।।
जो किछु कहब थोर सखि सोई । राम बंधु अस काहे न होई ।।
हम सब सानुज भरतहिं देखें । भइन्हें धन्य जुबती जन लेखें ।।
सुनि गुनि देखि दसा पर्छिताहीं । कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ।।
कोउ कह दूषनु रानिहि नहिन । बिधि सबु कीन्ह हमहिं जो दाहिन ।।
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी ।. लघु तिय कुल करतूति मलीनी ।।
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा । कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ।।
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा । जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ।।
तेहि बासर बसि प्रातहीं, चले सुमिरि रघुनाथ ।
राम दूरस की लालसा, भरत सरिस सब साथ ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भरत किसे मनाने के लिए पैदल ही फलाहार करते हुए जा रहे हैं?
(iv) किसके आचरण का वर्णन करने और सुनने से दुःख दूर हो जाते हैं।
(v) भरत को देखकर कैसा आश्चर्य और आनन्द गाँव-गाँव में हो रहा है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्य भक्तप्रवर गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भरत-महिमा’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – भरत-महिमा।
कवि का नाम – तुलसीदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रातःकाल ही रघुनाथ जी का स्मरण करके भरत जी चले। साथ के सभी लोगों को भी भरत जी के समान ही श्रीराम जी के दर्शन की लालसा लगी हुई है। इसीलिए सभी लोग शीघ्रातिशीघ्र श्रीराम के समीप पहुँचना चाहते हैं।
(iii) भरत राम को मनाकर अयोध्या वापस लौटा लाने के लिए पैदल ही फलाहार करते हुए चित्रकूट जा रहे
(iv) भरत के प्रेम, भक्ति भ्रात-स्नेह का सुन्दर वर्णन करने और सुनने से दु:ख दूर हो जाते हैं।
(v) भरत को देखकर ऐसा आश्चर्य गाँव-गाँव में हो रही है मानो मरुभूमि में कल्पतरु उग आया हो।

प्रश्न 2:
तिमिरु तरुन तरनिहिं मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़े छोनी ।।
मसक फूक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमद् भरतहिं पाई ।।

लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ।।
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता । मिलई रचइ परपंचु बिधाता ।।
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ।।
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजियारी ।।
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ।।

सुनि रघुबर बानी बिबुध, देखि भरत पर हेतु।
सकल संराहत राम सो, प्रभु को कृपानिकेतु ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) श्रीराम लक्ष्मण से उनकी और पिता की सौगन्ध खाकर क्या कहते हैं?
(iv) सूर्यवंशरूपी तालाब में हंसरूप में किसने जन्म लिया है?
(v) श्रीराम की वाणी सुनकर तथा भरत जी पर उनका प्रेम देखकर देवतागण उनकी कैसी सराहना करने लगे?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – श्रीराम लक्ष्मण को समझाते हुए कहते हैं कि अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्न के) सूर्य को निगल जाए, आकाश चाहे बादलों में समाकर मिल जाए, गौ के खुर जितने जल में चाहे अगस्त्य जी डूब जाएँ, पृथ्वी चाहे अपमी स्वाभाविक सहनशीलता को छोड़ दे और मच्छर की फेंक से सुमेरु पर्वत उड़ जाए, परन्तु हे भाई! भरत को रोजमर्द कभी नहीं हो सकता।
(iii) गुरु वशिष्ठ के आगमन का समाचार सुनकर श्रीराम उनके दर्शन के लिए वेग के साथ चल पड़े।
(iv) राम का सखा जानकर वशिष्ठ जी ने निषादराज को जबरदस्ती गले से लगा लिया।
(v) श्रीराम की सराहना करते हुए देवतागण कहने लगे कि श्रीरघुनाथ जी का हृदय भक्ति और सुन्दर मंगलों का मूल है।

कवितावली

लंका-दहन

प्रश्न 1:
बालधी बिसाल बिकराल ज्वाल-जाल मानौं,
लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है ।

कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
बीररस बीर तरवारि सी उघारी है ।।
तुलसी सुरेस चाप, कैधौं दामिनी कलाप,
कैंधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है ।
देखे जातुधान जातुधानीः अकुलानी कहैं,
“कानन उजायौ अब नगर प्रजारी है ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसे देखकर लगता है मानो लंका को निगलने के लिए काल ने अपनी जील्ला फैलाई है।
(iv) हनुमान जी के विकराल रूप को देखकर निशाचर और निशाचरियाँ व्याकुल होकर क्या कहती
(v) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस रस में मुखरित हुई हैं।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद कवि शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘कवितावली’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘लंका-दहन’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – लंका-दहन।
कवि का नाम – तुलसीदास।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी की विशाल पूँछ से अग्नि की भयंकर लपटें उठ रही थीं। अग्नि की उन लपटों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो लंका
को निगलने के लिए स्वयं काल अर्थात् मृत्यु के देवता ने अपनी जिह्वा फैला दी हो। ऐसा प्रतीत होता था जैसे आकाश-मार्ग में अनेकानेक पुच्छल तारे भरे हुए हों।
(iii) हनुमान जी की विशाल पूँछ से निकलती हुई भयंकर लपटों को देखकर लगता है मानो लंका को निगलने के लिए काल ने अपनी जिह्वा फैलाई है।
(iv) हनुमान जी के विकराल रूप को देखकर निशाचर और निशाचरियाँ व्याकुल होकर कहती हैं कि इस वानर ने अशोक वाटिका को उजाड़ा था, अब नगर जला रहा है; अब भगवान ही हमारा रक्षक है।
(v) प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘भयानक रस’ में मुखरित हुई हैं।

प्रश्न 2:
लपट कराल ज्वाल-जाल-माल दहूँ दिसि,
अकुलाने पहिचाने कौन काहि रे ?
पानी को ललात, बिललात, जरे’ गात जाते,
परे पाइमाल जात, “भ्रात! तू निबाहि रे” ।।
प्रिया तू पराहि, नाथ नाथ तू पराहि बाप
बाप! तू पराहि, पूत पूत, तू पराहि रे” ।
तुलसी बिलोकि लोग ब्याकुल बिहाल कहैं,
“लेहि दससीस अब बीस चख चाहि रे’ ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किस कारण कोई किसी को नहीं पहचान रहा है?
(iv) चारों ओर भयंकर आग और धुएँ से परेशान लोग रावण से क्या कहते हैं?
(v) ‘पानी को ललात, बिललात, जरे गात जाता’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – लंकानिवासी राजा रावण को कोसते हुए कह रहे हैं कि हे दस मुखों वाले रावण! अब तुम अपने सभी मुखों से लंकानगरी के विनाश का यह स्वाद स्वयं चखकर देखो। इस विनाश को अपनी बीस आँखों से भलीभाँति देखो और अपने मस्तिष्क से विचार करो कि तुम्हारे द्वारा बलपूर्वक किसी दूसरे की स्त्री का हरण करके कितना अनुचित कार्य किया गया है। अब तो तुम्हारी आँखें अवश्य ही खुलं जानी चाहिए, क्योंकि तुमने उसके पक्ष के एक सामान्य से वानर के द्वारा की गयी विनाश-लीला का दृश्य अपनी बीस आँखों से स्वयं देख लिया है।
(iii) दसों दिशाओं में विशाल अग्नि-समूह की भयंकर लपटें तथा धुएँ के कारण कोई किसी को नहीं पहचान रही है।
(iv) चारों ओर आग और धुएँ से परेशान लोग रावण से कहते हैं कि हे रावण! अब अपनी करतूत का फल बीसों आँखों से देख ले।
(v) अनुप्रास अलंकार।

गीतावली

प्रश्न 1:
मेरो सब पुरुषारथ थाको ।
बिपति-बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ?
सुनु सुग्रीव साँचेहूँ मोपर फेर्यो बदन बिधाता ।।
ऐसे समय समर-संकट हौं तज्यो लखन सो भ्राता ।।
गिरि कानन जैहैं साखामृग, हौं पुनि अनुज सँघाती ।
हैहैं कहा बिभीषन की गति, रही सोच भरि छाती ।।
तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु कपि सकल बिकल हिय हारे ।
जामवंत हनुमंत बोलि तब औसर जानि प्रचारे ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किस कारण विलाप करते हुए श्रीराम अपना पुरुषार्थ थका हुआ बताते हैं?
(iv) हनुमान जी को सुषेण वैद्य को लाने की सलाह किसने दी?
(v) ‘बिपति-बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको?” पंक्ति में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर:
(i) यह पद तुलसीदास जी द्वारा विरचित ‘गीतावली’ नामक रचना से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीतावली’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – गीतावली।
कवि का नाम –  तुलसीदास।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – श्रीराम कहते हैं कि मेरे हृदय में यही सोच भरा हुआ है कि विभीषण | की क्या गति होगी? जिस विभीषण को शरण देकर मैंने उसे लंका का राजा बनाने का निश्चय किया था, मेरी वह प्रतिज्ञा कैसे पूरी होगी?
(iii) लक्ष्मण श्रीराम की दायीं भुजा के समान थे किन्तु उनके शक्ति लगने के कारण श्रीराम विलाप करते हुए अपना पुरुषार्थ थका हुआ बताते हैं।
(iv) हनुमान जी को सुषेण वैद्य को लाने की सलाह जामवंत ने दी।
(v) अनुप्रास अलंकार।

दोहावली

प्रश्न 1:
हरो चरहिं तापहिं बरत, फरे पसारहिं हाथ ।
तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पशु-पक्षी कैसे वृक्षों को चरते हैं?
(iv) संसार के लोग कैसा व्यवहार करते हैं?
(v) तुलसीदास ने किसे परमार्थ का साथी बताया है।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘दोहावली’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है। इसके रचयिता भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – दोहावली।
कवि का नाम – तुलसीदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार में सभी मित्र और सम्बन्धी स्वार्थ के कारण ही सम्बन्ध रखते हैं। जिस दिन हम उनके स्वार्थ की पूर्ति में असमर्थ हो जाते हैं, उसी दिन सभी व्यक्ति हमें त्यागने में देर नहीं लगाते। इसी प्रसंग में तुलसीदास ने कहा है कि श्रीराम की भक्ति ही परमार्थ का सबसे बड़ा साधन है और श्रीराम ही बिना किसी स्वार्थ के हमारा हित-साधन करते हैं।
(iii) पशु-पक्षी हरे वृक्षों को चरते हैं।
(iv) संसार के लोग स्वार्थपूर्ण व्यवहार करते हैं।
(v) तुलसीदास जी ने श्रीरघुनाथ जी को एकमात्र परमार्थ का साथी बताया है।

प्रश्न 2:
बरषत हरषत लोग सब, करषत लखै न कोइ ।
तुलसी प्रजा-सुभाग ते, भूप भानु सो होइ ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राजा को किसके समान होना चाहिए?
(iv) सूर्य के द्वारा किसका कर्षण किया जाता है?
(v) ‘भूप भानु सो होइ’ पद्यांश में कौन-सा अलंकार होगा?

उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – प्रायः राजा अपने सुख और वैभव के लिए जनता से कर प्राप्त करते हैं। प्रजा अपने परिश्रम की गाढ़ी कमाई राजा के चरणों में अर्पित कर देती है, किन्तु वही प्रजा सौभाग्यशाली होती है, जिसे सूर्य जैसा राजा मिल जाए। जिस प्रकार सूर्य सौ-गुना जल बरसाने के लिए ही धरती से जल ग्रहण : करता है, उसी प्रकार से प्रजा को और अधिक सुखी करने के लिए ही श्रेष्ठ राजा उससे कर वसूल करता है।
(iii) राजा को सूर्य के समान अर्थात् प्रजापालक होना चाहिए।
(iv) सूर्य द्वारा पृथ्वी से जल का कर्षण किया जाता है।
(v) उपमा अलंकार।

विनय-पत्रिका

प्रश्न 1:
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगी।
श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपा ते संत सुभाव गहौंगो ।
जथालाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो ।
परहित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निबहौंगो ।
परुष बचन अतिदुसह स्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो ।
बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो ।।
परिहरि देहजनित चिंता, दु:ख सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरि भक्ति लहौंगो ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) तुलसीदास जी कैसा स्वभाव ग्रहण करना चाहते हैं?
(iv) तुलसीदास जी कैसे वचन सुनने के बाद भी क्रोध की आग में नहीं जलना चाहते?
(v) ‘संतोष’ शब्द का संधि-विच्छेद कीजिए।
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद भक्त कवि तुलसीदास द्वारा विरचित ‘विनय-पत्रिका’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘विनय-पत्रिका’ शीर्षक से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम –  विनय-पत्रिका।
कवि का नाम – तुलसीदास
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि क्या कभी वह दिन आएगा, जब मैं सन्तों की तरह जीवन जीने लगूंगा? क्या तुलसीदास इस मार्ग पर चलकर कभी अटल भगवद्भक्ति प्राप्त कर सकेंगे; अर्थात् क्या कभी हरि-भक्ति प्राप्ति का मेरा मनोरथ पूरा होगा?
(iii) तुलसीदास जी रघुनाथ जी की कृपा से संत स्वभाव ग्रहण करना चाहते हैं।
(iv) तुलसीदास जी कठोर वचन सुनने के बाद भी क्रोध की आग में नहीं जलना चाहते।
(v) संतोष’ शब्द का संधि-विच्छेद है–सम् + तोष।

प्रश्न 2:
अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।
राम कृपा भवनिसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं ।।

पायो नाम चारु चिंतामनि, उर-कर तें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं ।
परबस जानि हँस्यौ इन इंद्रिन, निज बस है न हँसैहौं ।
मन मधुकर पन करि तुलसी रघुपति पद-कमल बसैहौं ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) तुलसीदास जी अब अपने जीवन को किसमें नष्ट नहीं करना चाहते?
(iv) तुलसीदास रामनामरूपी चिन्तामणि को कहाँ बसाना चाहते हैं?
(v) तुलसीदास का कब तक इन्द्रियों ने उपहास किया?
उत्तर:
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि मैंने अब तक अपनी आयु को व्यर्थ के कार्यों में ही नष्ट किया है, परन्तु अब मैं अपनी आयु को इस प्रकार नष्ट नहीं होने दूंगा। उनके कहने का भाव यह है। कि अब उनके अज्ञानान्धकार की राज्ञि समाप्त हो चुकी है और उन्हें सद्ज्ञान प्राप्त हो चुका है; अत: अब वे मोह-माया में लिप्त होने के स्थान पर ईश्वर की भक्ति में ही अपना समय व्यतीत करेंगे और ईश्वर से साक्षात्कार करेंगे। श्रीराम जी की कृपा से संसार रूपी रात्रि बीत चुकी है; अर्थात् मेरी सांसारिक प्रवृत्तियाँ दूर हो गयी हैं; अतः अब जागने पर अर्थात् विरक्ति उत्पन्न होने पर मैं फिर कभी बिछौना न बिछाऊँगा; अर्थात् सांसारिक मोह-माया में न फैंसँगा।
(iii) तुलसीदास जी अब अपना जीवन विषयवासनाओं में नष्ट नहीं करना चाहते।
(iv) तुलसीदास जी रामनामरूपी चिन्तामणि को अपने हृदय में बसाना चाहते हैं।
(v) तुलसीदास जी का मन जब तक विषयवासनाओं का गुलाम रहा तब तक इन्द्रियों ने उनका उपहास किया।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 4 गोस्वामी तुलसीदास, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

 

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name सूरदास
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न 1.
सूरदास का जीवन-परिचय लिखिए।
या
सूरदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
सूरदास का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – महाकवि सूरदास हिन्दी-साहित्याकाश के सूर्य माने गये हैं। वे ब्रजभाषा के कवियों में बेजोड़ माने जाते हैं। अष्टछाप के कवियों के तो वे सिरमौर थे ही, कृष्णभक्त कवियों में भी उनकी समता का कोई दूसरा कवि दिखाई नहीं पड़ता। इनके जन्मकाल के विषय में मतभेद हैं। भारतीय विद्वानों की यह परम्परा रही है कि वे अपने नाम से नहीं, अपितु अपने काम से अमर होना चाहते हैं। यही कारण रहा है जिसके चलते भारतीय साहित्यकारों के जन्म से जुड़े हुए प्रसंग सदैव विवादास्पद रहे हैं। सूरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी, संवत् 1535( सन् 1478 ई०) को मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता (रेणुका क्षेत्र) ग्राम में हुआ। कुछ विद्वान् इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम में हुआ मानते हैं। ये सारस्वत ब्राह्मण रामदास के पुत्र थे। इनकी माता के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। ये जन्मान्ध थे या बाद में नेत्रहीन हुए, इस सम्बन्ध में भी विवाद हैं। इन्होंने प्रकृति के नाना व्यापारों, मानव-स्वभाव एवं चेष्टाओं आदि का जैसा सूक्ष्म व हृदयग्राही वर्णन किया है, उससे यह जान पड़ता है कि ये बाद में नेत्रहीन हुए।

आरम्भ से ही इनमें भगवद्भक्ति स्फुरित हुई। मथुरा के निकट गऊघाट पर ये भगवान् के विनय के पद गाते हुए निवास करते थे। यहीं इनकी महाप्रभु केल्लभाचार्य से भेंट हुई, जिन्होंने इनके सरस पद सुनकर इन्हें अपना शिष्य बनाया और गोवर्धन पर स्थित श्रीनाथजी के मन्दिर का मुख्य कीर्तनिया नियुक्त किया। यहीं इन्होंने श्रीमद्भागवत् में वर्णित कृष्णचरित्र का ललित पदों में गायन किया। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की भक्ति-सम्प्रदाय ‘पुष्टिमार्ग कहलाता है। एकमात्र भगवान् की कृपा पर ही निर्भरता को सिद्धान्तरूप में गृहीत करने के कारण यह पुष्टि सम्प्रदाय’ कहलाता है। गुरु के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। अन्त समय में इन्होंने अपने दीक्षागुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का स्मरण निम्नलिखित शब्दों में किया

भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो।
श्रीबल्लभ-नखचन्द्र-प्रभा बिनु सब जग माँझ अँधेरो॥

श्री वल्लभाचार्य जी की मृत्यु के उपरान्त उनके पुत्र गोस्वामी बिट्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि एवं गायकों को लेकर अष्टछाप की स्थापना की। सूरदास का इनमें सबसे प्रमुख स्थान था। गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में इनकी मृत्यु संवत् 1640(सन् 1583 ई०) में हुई। कहते हैं कि मृत्यु के समय इन्होंने यह पद गाकर प्राण त्यागे-‘खंजन नैन रूप रस माते।’

कृतियाँ – सूरदास की कीर्ति का मुख्य आधार उनका ‘सूरसागर’ ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त ‘सूरसारावली’ और ‘साहित्य लहरी‘ भी उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं, यद्यपि कतिपय विद्वानों ने इनकी प्रामाणिकता में सन्देह प्रकट किया है। ‘सूरसागर’ में श्रीमद्भागवत’ के दशम स्कन्ध की कृष्णलीलाओं का विविध भाव-भंगिमाओं में गायन किया गया है।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

भगवान् के लोकरंजक रूप का चित्रण – सूरदास ने भगवान् के लोकरंजक (संसार को आनन्दित करने वाले) रूप को लेकर उनकी लीलाओं का गायन किया है। तुलसी के समान उनका उद्देश्य संसार को उपदेश देना नहीं, अपितु उसे कृष्ण की मनोहारिणी लीलाओं के रस में डुबोना था। वल्लभाचार्य जी के शिष्य बनने से पहले। सूर विनय के पद गाया करते थे, जिनमें दास्य भाव की प्रधानता थी। इनमें अपनी दीनता और भगवान् की महत्ता : का वर्णन रहता था ।
(क) मो सम कौन कुटिल खल कामी।
(ख) हरि मैं सब पतितन को राऊ।
किन्तु पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने के उपरान्त सूर ने विनय के पद गाने के स्थान पर कृष्ण की बाल्यावस्था और किशोरावस्था की लीलाओं को बड़ा हृदयहारी गायन किया।

वात्सल्य वर्णन
सूरदास का काव्य-क्षेत्र मुख्य रूप से वात्सल्य और श्रृंगार, इन दो रसों तक ही सिमटकर रह गया। पर इस सीमित क्षेत्र में भी सूरदास की प्रतिभा ने जो कमाल किया, वह बेजोड़ है। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झाँक आये कि काव्यशास्त्र के पंडितों को वात्सल्य को एक स्वतन्त्र रस की मान्यता देनी ही पड़ी।

(1) वात्सल्य का संयोग पक्ष – वात्सल्य रस का जैसा सरस और विशद वर्णन सूर ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। पुत्र को पालने में झुलाना और उसे लोरियाँ गाकर सुलाना मातृजीवन की सहज अभिलाषा होती है। इसके अतिरिक्त बालक की बाह्य चेष्टाओं और क्रियाओं, उनकी मनोवैज्ञानिक चपलताओं का सुन्दर अंकन तथा माता-पिता को उन पर बलिहारी होना आदि के चित्रण द्वारा उन्होंने वात्सल्य के संयोग पक्ष को परिपुष्ट किया है। इसका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

कबहुँ पलक हरि मूंद लेते हैं, कबहुँ अधर फरकावै॥

(2) वात्सल्य का वियोग पक्ष – वात्सल्य के वियोग-पक्ष के अन्तर्गत कृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनके प्रति नन्द-यशोदा के हृदयस्पर्शी उद्गार सूरदास ने बड़ी मार्मिकता से वर्णित किये हैं

तुम तो टेब जानतिहि है हो, तऊ मोहिं कहि आवै ।
प्रात उठत मेरे लाल-लद्वैतहिं, माखन रोटी भावै॥

वात्सल्य में सूर की इस असाधारण और अद्वितीय सफलता के रहस्य का उद्घाटन करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि, “सूर वस्तुत: वय:-प्राप्त शिशु थे। कदाचित् इसी कारण अपनी बन्द आँखों से सूर जो देख और दिखा सके, उसका शतांश भी खुली आँखों वाले न देख सके।”

श्रृंगार वर्णन

वात्सल्य के समान ही श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों पर सूर को समान अधिकार है। इस सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं, “श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का इतना प्रचुर विस्तार और किसी कवि में नहीं मिलता।’ इन दोनों पक्षों का संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

(1) संयोग पक्ष – वृन्दावन में कृष्ण और गोपियों का सम्पूर्ण जीवन क्रीड़ामय है, जो संयोग श्रृंगार के ही अन्तर्गत आता है। इसमें कृष्ण और राधा के अंग-प्रत्यंग की शोभा को अनेकानेक पदों में अत्यन्त चमत्कारपूर्ण वर्णन करने के बाद सूर वृन्दावन की करील-कुंजों, सुन्दर लताओं, हरे-भरे कछारों के बीच खिली हुई चाँदनी और कोकिल-कूजन के उद्दीपक परिवेश में कृष्ण, राधा और गोपिकाओं की विभिन्न क्रीड़ाएँ चित्रित करते हैं। कृष्ण और राधा का परिचय पारस्परिक आकर्षण से आरम्भ होकर संलाप से घनिष्ठ होता है

बूझत स्याम, कौन तू, गौरी ?
कहाँ रहति, काकी तू बेटी, देखी नाहिं कबहुँ ब्रज-खोरी।”
“काहे को हम ब्रज तन आवति? खेलति रहति अपनी पौरी ।
सुनति रहति श्रवनन नँद-ढोंटा, करत रहत माखन दधि चोरी ॥”
“तुम्हरो कहा चोरि हम लैहें? खेलन चल संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि बातन भुरई राधिका भोरी ॥”

(2) वियोग पक्ष – सूर ने जिस कौशल और पूर्णता से संयोग का चित्राधार खड़ा किया है, उससे कहीं अधिक मार्मिकता से वियोग के चित्र भी उकेरे हैं; क्योंकि प्रेम की साधना वस्तुत: विरह की साधना है। सूर ने स्वयं कहा है। कि विरह प्रेम को पुष्ट करता है ”ऊधौ, विरही प्रेम करै”। इस रस के कुछ छींटे द्रष्टव्य हैं.
(i) पिया बिनु नागिनी काली रात।
(ii) उर में माखनचोर गड़े।

इनमें गोपिकाओं के अनन्य (एकनिष्ठ) प्रेम, राधिका की विरह-वेदना के मार्मिक चित्र दिखाई पड़ते हैं। प्रेम की प्रगाढ़ता से ऐसा विरह उत्पन्न होता है, जिसका अनुभव भी कोई संवेदनशील रसमग्न हृदय ही कर सकता है। उपर्युक्त के अतिरिक्त प्रकृति-चित्रण तथा प्रेम की अलौकिकता का चित्रण सूरदास के काव्य की अन्यतम भावपक्षीय विशेषताएँ हैं।

प्रकृति-चित्रण – सूरदास के काव्य में प्रकृति का प्रयोग कहीं पृष्ठभूमि रूप में, कहीं उद्दीपन रूप में और कहीं अलंकारों के रूप में किया गया है। गोपियों के विरह-वर्णन में प्रकृति का प्रयोग सर्वाधिक मात्रा में किया गया है; यथा

कोउ माई बरजो री या चंदहि ।
अति ही क्रोध करत है हम पर, कुमुदिनि कुल अनन्दहि ॥

प्रेम की अलौकिकता – राधा-कृष्ण व गोपी-कृष्ण प्रेम में सूर ने प्रेम की अलौकिकता प्रदर्शित की है। उद्धव गोपियों को निराकार ब्रह्म का सन्देश देते हैं; परन्तु वे किसी भी प्रकार उद्धव के दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होतीं। गोपियाँ अपने तर्को से उद्धव को परास्त कर देती हैं और श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम का परिचय देती हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – सूर का सम्पूर्ण काव्य ब्रजभाषा में है। उनकी भाषा में सरसता, कोमलता और प्रवाहमयता सर्वत्र विद्यमान है। सूर की ब्रजभाषा ब्रज की ठेठ चलती बोली न होकर कुछ साहित्यिकता लिये हुए है, जिसमें दूसरे प्रदेशों के कुछ प्रचलित शब्दों के साथ-साथ अपभ्रंश के शब्द भी मिश्रित हैं। चलती ब्रजभाषा के ‘जाको’, ‘वाको’, ‘तासों जैसे रूपों के समान ही ‘जेहि’, ‘तेहि जैसे पुराने रूपों का प्रयोग भी मिलता है। ‘गोड़’, ‘आपन’, ‘हमार’ आदि पूरबी प्रयोग भी बराबर पाये जाते हैं। कुछ पंजाबी प्रयोग भी मौजूद हैं; जैसे-‘महँगी’ के अर्थ में ‘प्यारी’ शब्द। यद्यपि बहुत कम किन्तु कहीं-कहीं गरीब नवाज जैसे उर्दू शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।

शैली – सूर की शैली गीति-शैली है। ये संगीत के परम मर्मज्ञ थे, इसलिए इनके पद विभिन्न राग-रागिनियों में बँधे हैं। सूर स्वयं महान् गायक थे और गाते-गाते ही पदों की रचना करते चलते थे। फलतः उनके गेय-पदों में असाधारण संगीतात्मकता है, जो उनकी भाषा के माधुर्य के साथ मिलकर हृदय को मोह लेती है।

अलंकार-विधान – सूरदास का अलंकार-विधान अत्यधिक पुष्ट है। उन्होंने श्लेष, यमक, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, अर्थान्तरन्यास, अन्योक्ति आदि नाना अलंकारों का प्रयोग अतीव कुशलता से किया है। उनके काव्य में अलंकार बड़ी सहजता से स्वत: ही आते चले गये हैं, उनके लिए किसी प्रकार का प्रयास नहीं दिखाई पड़ता। लम्बे-लम्बे सांगरूपकों तक का निर्वाह सूर ने जिस कुशलता से किया है, वह विस्मयकारी है

“सूरदास खल कारी कामरी चढे न दूजौ रंग।”

छन्दविधान – सूर ने अपने काव्य में चौपाई, दोहा, रोला, छप्पय, सवैया, घनाक्षरी आदि विविध प्रकार के परम्परागत छन्दों का प्रयोग किया है।
साहित्य में स्थान – सूरदास के कृतित्व और महत्त्व की अनेक प्रशस्तियों से हिन्दी-साहित्य भरा पड़ा है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास ।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास ॥

यदि इसे अतिशयोक्ति भी मानें तो कम-से-कम इतना तो नि:संकोच कहा ही जा सकता है कि तुलसी के समान । व्यापक काव्यक्षेत्र न चुनने पर भी सूर ने अपने सीमित क्षेत्र–वात्सल्य और श्रृंगार का कोई कोना ऐसा न छोड़ा, जो उनके संचरण से अछूता रह गया हो। वे निर्विवाद रूप से वात्सल्य और श्रृंगार रस के सम्राट् हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न – निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

विनय

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै ।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै ।।
कमल-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै ।।
परम गंग कौ छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै ।।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै ।।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सूरदास किसकी भक्ति में परम सुख का अनुभव करते हैं?
(iv) जहाज का पक्षी किसे कहा गया है?
(v) सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति को त्यागकर अन्य देवताओं की भक्ति करने को क्या बताया है?
उत्तर:
(i) यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘विनय’ शीर्षक पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – विनय।
कवि का नाम – सूरदास।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – जहाज पर बैठा हुआ पक्षी बीच समुद्र में दूसरे अच्छे स्थान की खोज में जहाज पर से उड़कर दूर-दूर तक भटकता रहता है, किन्तु उसे सर्वत्र जल-ही-जल दिखाई देता है। उसे कहीं पंजे टिकाने का भी स्थान नहीं मिलता और अन्तत: वह जहाज पर ही लौटकर आ जाता है; क्योंकि वही उसका एकमात्र आश्रय होता है। इसी प्रकार कवि विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना द्वारा मोक्ष को प्राप्त करने में असफल होने पर पुनः श्रीकृष्ण की शरण में ही आ गया है। कवि का कथन है कि संसाररूपी सागर में प्रभु का नाम ही जहाज स्वरूप है।
(iii) सूरदास भगवान कृष्ण की भक्ति में परम सुख का अनुभव करते हैं।
(iv) सूरदास को मन के जहाज का पंक्षी कहा गया है।
(v) सूरदास ने भगवान कृष्ण की भक्ति को त्यागकर अन्य देवताओं की भक्ति करने को मूर्खता बताया है।

वात्सल्य

हरि जू की बाल-छवि कहौं बरनि ।
सकल सुख की सींव, कोटि-मनोज-शोभा-हरनि ।।
भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि ।
रहे बिवरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि ।।
मंजु मेचक मृदुल तनु, अनुहरत भूषन भरनि ।
मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फयौ अद्भुत फरनि ।।
चलत पद-प्रतिबिंब मनि आँगन घुटुरुवनि करनि ।
जलज-संपुट-सुभग-छबि भरि लेति उर जनु धरनि ।।
पुन्य फल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नँद-घरनि ।
सूरे प्रभु की उर बसी किलकनि ललित लरखरनि ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सूरदास ने किनकी शोभा को करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को हरने वाली बताया है?
(iv) नन्द-पत्नी यशोदा पुत्र कृष्ण को देखकर कैसा अनुभव करती हैं?
(v) ‘मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फयौ अद्भुत फरनि।’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) यह पद सूरदास के ‘सूरसागर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘वात्सल्य’ शीर्षक से उधृत है।
अर्थात् निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – वात्सल्य।
कवि का नाम – सूरदास।।

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – सूरदास जी कहते हैं कि मैं कृष्ण की बाल-शोभा का वर्णन करता हूँ। वह शोभा करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को भी हरने वाली (अर्थात् उससे भी बढ़कर) है और समस्त सुखों की सीमा है (अर्थात् सुखों की जो ऊँची-से-ऊँची.कल्पना की जा सकती है, वह उस सौन्दर्य को देखकर प्राप्त होती है)। नन्द-पत्नी यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को देखकर अनुभव करती हैं कि उनके अनन्त पुण्यों के फलस्वरूप ही ऐसा बालक उन्हें मिला है। सूरदास जी कहते हैं कि मेरे हृदय में तो प्रभु की मोहक किलकारियाँ और उनका लड़खड़ाकर चलना बस गया है।
(iii) सूरदास ने श्रीकृष्ण की मनोहारी बाल शोभा को करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को हरने वाली बताया है।
(iv) नन्द-पत्नी यशोदा पुत्र कृष्ण को देखकर अनुभव करती हैं कि उनके अनन्त पुण्यों के फलस्वरूप ही । ऐसा बालक उन्हें मिला है।
(v) उत्प्रेक्षा और अनुप्रास अलंकार।

भ्रमर-गीत

प्रश्न 1:
हमारें हरि हारिल की लकरी ।।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी ।।
जागत-सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्हु-कान्ह जकरी ।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी ।।
सु तौ व्याधि हमकौं ले आए, देखी सुनी ने करी ।
यह तौ सूर तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) गोपियों ने श्रीकृष्ण को किसके समान प्रिय बताया है?
(iv) गोपियाँ दिन-रात जागते-सोते किसकी रट लगाती रहती हैं?
(v) उद्धव की योग-चर्चा गोपिकाओं को किसकी तरह अरुचिकर लगती है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास के ‘सूरसागर’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भ्रमर-गीत’ शीर्षक काव्यांश से लिया गया है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – भ्रमर-गीत।
कवि को नाम – सूरदास।
[संकेत-इसे शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार हारिल पक्षी को वह लकड़ी अत्यधिक प्रिय होती है, जिसे वह दृढ़ता से पकड़े रहता है, उसी प्रकार गोपियों को भी श्रीकृष्ण हारिल की लकड़ी के समान प्रिय हैं। गोपियों रूपी हारिल पक्षियों ने श्रीकृष्णरूपी लकड़ी को अपने तन-मन में बसा रखा है। वे एक क्षण के लिए श्रीकृष्ण को अपने मन से दूर करना नहीं चाहतीं।
(iii) गोपियों ने श्रीकृष्ण को हारिल पक्षी की लकड़ी के समान प्रिय बताया है।
(iv) गोपियाँ दिन-रात जागते-सोते कृष्ण-कृष्ण की रट लगाती रहती हैं।
(v) उद्धव की योग-चर्चा गोपिकाओं को कड़वी ककड़ी की तरह अरुचिकर लगती है।

प्रश्न 2:
कहत कत परदेसी की बात ।
मंदिर अरध अवधि बदि हमसौं, हरि अहार चलि जात ।।
ससि रिपु बरष, सूर रिपु जुग बर, हर-रिपु कीन्हौं घात ।
मघ पंचक लै गयौ साँवरौ, तातै अति अकुलाते ।।
नखत, बेद, ग्रह, जोरि, अर्ध करि, सोइ बनत अब खात ।
सूरदास बस भई बिरह के, कर मी पछितात।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(i) श्रीकृष्ण गोपिकाओं से कितने दिन में लौट आने का वादा करके मथरा गए थे?
(iv) श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों को एक-एक दिन और एक-एकरांत किसके समान प्रतीत होते हैं?
(v) गोपियाँ किस कारण और अधिक व्याकुलता का अनुभव करती हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – श्रीकृष्ण ने हम से वादा किया था कि वे एक पखवाड़े के अन्दर (अर्द्ध मन्दिर) अर्थात् आधे महीने में (15 दिन के अन्दर) ही लौटकर आएँगे। परन्तु हरि अर्थात् सिंह, सिंह अहार = सिंह का भोजन = मांस = एक महीना बीत गया है परन्तु वे नहीं लौटे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वचन देकर उसे निभाया नहीं है, क्योंकि ये परदेसी विश्वास के योग्य नहीं होते। उनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। इसलिए परदेसियों की बात ही हमसे मत करो।।
(iii) श्रीकृष्ण गोपिकाओं से एक पखवाड़ा अर्थात् पन्द्रह दिन में लौट आने का वादा करके गए थे।
(iv) श्रीकृष्ण के वियोग में गोपिकाओं को एक-एक दिन बरसों के समान और एक-एक रात युगों के समान प्रतीत हो रहे हैं।
(v) गोपियाँ अपने चित्त को श्रीकृष्ण के साथ चले जाने के कारण और अधिक व्याकुलता का अनुभव कर रही हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 3 सूरदास, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

 

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ (श्यामसुन्दर दास) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ (श्यामसुन्दर दास).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name भारतीय साहित्य की विशेषताएँ (श्यामसुन्दर दास)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
श्यामसुन्दर दास के जीवन-परिचय एवं प्रमुख कृतियों का उल्लेख करते हुए उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ भी लिखिए।
या
श्यामसुन्दर दास का साहित्यिक परिचय दीजिए।
या
श्यामसुन्दर दास की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
द्विवेदी युग के महान् साहित्यकार एवं हिन्दी को गौरव के शिखर पर प्रतिष्ठित करने वाले बाबू श्यामसुन्दर दास हिन्दी-साहित्य की उन महान् प्रतिभाओं में से हैं, जिन्होंने भावी पीढ़ी को मौलिक साहित्य-लेखन की प्रेरणा प्रदान की। ये ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ के संस्थापक, ‘हिन्दी शब्दसागर के विद्वान् सम्पादक, समर्थ समालोचक, प्रसिद्ध निबन्धकार एवं कुशल अध्यापक थे।
श्यामसुन्दर दास जी का जन्म काशी में एक खत्री परिवार में सन् 1875 ई० में हुआ था। इनके पिताजी का नाम देवीदास खन्ना था। ये बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण करके सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज में अंग्रेजी के अध्यापक और बाद में कालीचरण हाईस्कूल, लखनऊ में प्रधानाध्यापक हो गये। अन्त में ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने और अवकाश ग्रहण करने तक इसी पद पर बने रहे। इनकी साहित्य-सेवाओं से प्रभावित होकर अंग्रेज सरकार ने इन्हें ‘रायबहादुर’ की उपाधि से, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने ‘साहित्य-वाचस्पति की उपाधि से तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने डी० लिट्०’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया। निरन्तर अथक परिश्रम के कारण इनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और सन् 1945 ई० में इनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ: श्यामसुन्दर दास जी हिन्दी साहित्याकाश के ऐसे नक्षत्र हैं जिन्होंने अपने प्रकाश से हिन्दी साहित्य को प्रकाशित कर दिया। आपने ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ के माध्यम से अनेक दुर्लभ और प्राचीन ग्रन्थों की खोज की। महावीरप्रसाद द्विवेदी जी का निम्नांकित कथन इस सत्य की पुष्टि करता हैं

मातृभाषा के प्रचारक विमल बी० ए० पास।
सौम्य-शील-निधान बाबू श्यामसुन्दर दास ॥

श्यामसुन्दर दास जी ने अपने जीवन के पचास वर्षों में अनवरत रूप से हिन्दी की सेवा करते हुए, उसे कोश, इतिहास, काव्यशास्त्र एवं सम्पादित-ग्रन्थों से समृद्ध किया। हिन्दी के समस्त अभावों को दूर करने का व्रत लेने वाले इस महान् साहित्यकार ने अपने कुछ मित्रों के सहयोग से सन् 1893 ई० में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की। इन्होंने विश्वविद्यालय की उच्च कक्षाओं के लिए हिन्दी का पाठ्यक्रम भी निर्धारित किया। इसके साथ-ही-साथ इन्होंने श्रेष्ठ साहित्य का सृजन भी किया। श्यामसुन्दर दास जी ने हिन्दी को सर्वजन सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने के लिए अप्रतिम योगदान दिया। इन्होंने निम्नलिखित रूपों में हिन्दी-साहित्य की स्तुत्य सेवी की

(क) सम्पादक के रूप में।
(ख) साहित्य-इतिहास लेखक के रूप में।
(ग) निबन्धकार के रूप में।
(घ) आलोचक के रूप में।
(ङ) भाषा-वैज्ञानिक के रूप में।
(च) शब्दकोश-निर्माता के रूप में।

कृतियाँ:
श्यामसुन्दर दास जी आजीवन साहित्य-सेवा में संलग्न रहे। इन्होंने अनेक रचना-सुमन समर्पित कर । हिन्दी-साहित्य के भण्डार को भरा। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं

(1) निबन्ध-संग्रह:  ‘हिन्दी का आदिकवि’, ‘नीतिशिक्षा’, ‘गद्य कुसुमावली’ आदि पुस्तकों में इनके विविध विषयों पर आधारित निबन्ध संकलित हैं। कुछ निबन्ध ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका में भी प्रकाशित हुए। ‘साहित्यिक
लेख’ इनके साहित्यिक निबन्धों का संग्रह है।
(2) आलोचना:  ‘साहित्यालोचन’, ‘रूपक-रहस्य’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आदि सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचनाओं की श्रेष्ठ रचनाएँ हैं।
(3) भाषा-विज्ञान: ‘हिन्दी भाषा का विकास’, ‘भाषा-विज्ञान’, ‘हिन्दी भाषा और साहित्य तथा ‘भाषा-रहस्य भाषा-विज्ञान सम्बन्धी इनकी श्रेष्ठ कृतियाँ हैं।
(4) इतिहास: ‘हिन्दी-साहित्य का इतिहास’ एवं ‘कवियों की खोज।
(5) आत्मकथा:  ‘मेरी आत्म-कहानी।
(6) सम्पादित ग्रन्थ:  हिन्दी निबन्धमाला’, ‘रामचरितमानस’, ‘कबीर ग्रन्थावली’, ‘भारतेन्दु नाटकावली’, ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ’, ‘हिन्दी शब्दसागर’, ‘हिन्दी वैज्ञानिक कोश’, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘मनोरंजन पुस्तकमाला’, ‘छत्र प्रकाश’, ‘शकुन्तला नाटक’, ‘इन्द्रावती’, ‘नासिकेतोपाख्यान’, ‘वनिता-विनोद’ आदि।
(7) पाठ्य-पुस्तकें:  ‘भाषा सार-हिन्दी संग्रह’, ‘हिन्दी पत्र-लेखन’, ‘हिन्दी ग्रामर’, ‘हिन्दी कुसुमावली’ आदि। इस प्रकार श्यामसुन्दर दास जी ने साहित्य के परिष्कार हेतु अथक परिश्रम किया और लगभग 100 ग्रन्थों की रचना करके हिन्दी की अपूर्व सेवा की।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ
हिन्दी भाषा को सर्वजन-सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने वाले बाबू श्यामसुन्दर दास ने गम्भीर विषयों पर साहित्य-रचना की है; अत: उनकी भाषा में विषयों के अनुरूप गम्भीरता का होना स्वाभाविक है। इन्होंने संस्कृत की तत्समप्रधान शब्दावली से युक्त परिष्कृत, परिमार्जित, सुगठित एवं प्रवाहमयी भाषा को अपनाया। ये भाषा को सरल और शुद्ध बनाने के पक्षपाती थे। इसलिए इनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है और उर्दू, फारसी के शब्दों का प्रायः अभाव। इन्होने यदि कहीं विदेशी शब्दों का प्रयोग भी किया है तो उसे हिन्दी की। प्रकृति के अनुरूप तद्भव बनाकर। इनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियों के प्रयोग नहीं के बराबर हैं। संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी भाषा में प्रसाद गुण का माधुर्य है। इन्होंने भाषा का व्याकरणसम्मत प्रयोग किया है। इनका वाक्य-विन्यास सरल, संयत और सुगठित है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ
अत्यन्त गम्भीर विषयों को बोधगम्य शैली में प्रस्तुत करने वाले बाबू श्यामसुन्दर दास ने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप विषयों के प्रतिपादन हेतु गम्भीर शैली को अपनाया। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा और शैली के परिमार्जन का कार्य किया तो श्यामसुन्दर दास ने उसे संयत और सुनिश्चित रूप प्रदान किया। इनकी शैली के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं

(1) विवेचनात्मक शैली: श्यामसुन्दर दास जी ने इस शैली का प्रयोग साहित्यिक निबन्धों में किया है। इसमें गम्भीरता तथा तत्सम शब्दावली की प्रचुरता है।
(2) आलोचनात्मक शैली: श्यामसुन्दर दास जी ने इस शैली का प्रयोग अपनी आलोचनात्मक रचनाओं में किया है। तार्किकता एवं गम्भीरता इस शैली की विशेषता है।
(3) गवेषणात्मक शैली: इस शैली में बाबूजी ने खोजपूर्ण, नवीन और गम्भीर निबन्धों की रचना की है। इसमें भाषा संस्कृतप्रधान और वाक्य लम्बे हैं।
(4) भावात्मक शैली: इस शैली में भाव-प्रवणता के साथ-साथ आलंकारिकता एवं कवित्वमयता का गुण भी है।।
(5) व्याख्यात्मक शैली: बाबू श्यामसुन्दर दास ने कठिन विषय को समझाने के लिए व्याख्यात्मक शैली अपनायी है।

साहित्य में स्थान: आधुनिक युग के भाषा और साहित्य के प्रमुख लेखकों में बाबू श्यामसुन्दर दास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने अनुपलब्ध प्राचीन ग्रन्थों का सम्पादन करके तथा हिन्दी-भाषा को विश्वविद्यालय स्तर तक पठनीय बनाकर आधुनिक हिन्दी-साहित्य की अपूर्व सेवा की है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न:
दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए(1)

प्रश्न 1:
साहित्यिक समन्वय से हमारा तात्पर्य साहित्य में प्रदर्शित सुख-दु:ख, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद आदि विरोधी तथा विपरीत भावों के समीकरण तथा एक अलौकिक आनन्द में उनके विलीन होने से है। साहित्य के किसी अंग को लेकर देखिए, सर्वत्र यही समन्वय दिखायी देगा। भारतीय नाटकों में ही सुख और दु:ख के प्रबल घात-प्रतिघात दिखाये गये हैं, पर सबका अवसान आनन्द में ही किया गया है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) साहित्यिक समन्वय से क्या तात्पर्य है?
(iv) प्रस्तुत गद्यांश में भारतीय साहित्य की किस भावना पर गम्भीर विचार हुआ है?
(v) कहाँ पर सुख-दुःख के प्रबल प्रतिघात दिखाए गए हैं?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत गद्यांश हमारी, पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं हिन्दी के प्रसिद्ध निबन्धकार श्यामसुन्दर दास द्वारा लिखित
‘भारतीय साहित्य की विशेषताएँ’ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है। अथवा निम्नवत् लिखिए
पाठ का नाम – भारतीय साहित्य की विशेषताएँ।
लेखक का नाम – श्यामसुन्दर दास।।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: हमारे नाटकों में, कहानियों में और साहित्य की किसी भी विधा में सर्वत्र यही समन्वय पाया जाता है। हमारे नाटकों में सुख और दु:ख के प्रबल घात-प्रतिघात दिखाये जाते हैं, पर सबका अन्त आनन्द में ही किया जाता है; क्योंकि हमारा ध्येय जीवन का आदर्श रूप उपस्थित कर उसे उन्नत बनाना रहा है।
(iii) साहित्यिक समन्वय से हमारा तात्पर्य साहित्य में प्रदर्शित सुख-दु:ख, उत्थान-पतन, हर्ष-विषाद आदि विरोधी तथा विपरीत भावों के समीकरण तथा एक अलौकिक आनन्द में उनके विलीन होने से है।
(iv) प्रस्तुत गद्यांश में भारतीय साहित्य में समन्वय की भावना पर गम्भीरता से विचार हुआ है।
(v) भारतीय नाटकों में सुख-दु:ख के प्रबल प्रतिघात दिखाए गए हैं।

प्रश्न 2:
भारतीय दर्शनों के अनुसार परमात्मा तथा जीवात्मा में कुछ भी अन्तर नहीं, दोनों एक ही हैं, दोनों सत्य हैं, चेतन हैं तथा आनन्दस्वरूप हैं। बंधन मायाजन्य है। माया अज्ञान उत्पन्न करने वाली वस्तु है। जीवात्मा मायाजन्य अज्ञान को दूर कर अपना स्वरूप पहचानता है और आनन्दमय परमात्मा में लीन होता है। आनन्द में विलीन हो जाना ही मानव-जीवन का परम उद्देश्य है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा और परमात्मा के बारे में क्या बताया गया है?
(iv) मानव-जीवन का परम उद्देश्य क्या है?
(v) अज्ञान उत्पन्न करने वाली वस्तु क्या है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश को व्याख्या: जब माया से उत्पन्न अनान दूर हो जाता है तो जीवात्मा अपने स्वरूप को पहचानकर आनन्दमय परमात्मा में लीन हो जाता है। इससे उसके दुःखों का अन्त हो जाता है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जीवात्मा द्वारा अपने स्वरूप को पहचानकर आनन्दमय परमात्मा में लीन हो जाना ही मानव-जीवन का मुख्य उद्देश्य है।
(iii) भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा तथा जीवात्मा में कोई अन्तर नहीं, दोनों एक ही हैं, दोनों सत्य हैं, चेतन हैं तथा आनन्दस्वरूप हैं।
(iv) आनन्द में विलीन हो जाना ही मानव-जीवन का परम उद्देश्य है।
(v) माया अज्ञान उत्पन्न करने वाली वस्तु है।

प्रश्न 3:
भारत की शस्यश्यामला भूमि में जो निसर्ग-सिद्ध सुषमा है, उस पर भारतीय कवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है। यों तो प्रकृति की साधारण वस्तुएँ भी मनुष्यमात्र के लिए आकर्षक होती हैं, परन्तु उसकी सुन्दरतम विभूतियों में मानव-वृत्तियाँ विशेष प्रकार से रमती हैं। अरब के कवि मरुस्थल में बहते हुए किसी साधारण से झरने अथवा ताड़ के लंबे-लंबे पेड़ों में ही सौन्दर्य का अनुभव कर लेते हैं तथा ऊँटों की चाल में ही सुन्दरता की कल्पना कर लेते हैं; परन्तु जिन्होंने भारत की हिमाच्छादित शैलमाला पर संध्या की सुनहली किरणों की सुषमा देखी है; अथवा जिन्हें घनी अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती हुई निर्झरिणी तथा उसकी समीपवर्तिनी लताओं की वसन्तश्री देखने का अवसर मिला है, साथ ही जो यहाँ के विशालकाय हाथियों की मतवाली चाल देख चुके हैं, उन्हें अरब की उपर्युक्त वस्तुओं में सौन्दर्य तो क्या; उलटे नीरसता, शुष्कता और भद्दापन ही मिलेगा।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किस पर भारतीय कृवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है?
(iv) अरब का भौगोलिक सौन्दर्य क्या है?
(v) अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती निर्झरणी कहाँ की भौगोलिक सुन्दरता का बखान करती है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: अरब एवं भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य और दोनों देशों के कवियों की सौन्दर्यानुभूति में पर्याप्त अन्तर है। अरब देश में सौन्दर्य के नाम पर केवल रेगिस्तान, रेगिस्तान में प्रवाहित होते हुए कुछ साधारण से झरने अथवा ताड़ के कुछ लम्बे-लम्बे वृक्ष एवं ऊँटों की चाल ही देखने को मिलती है। यही कारण है कि अरब के कवियों की कल्पना मात्र इतने-से सौन्दर्य तक ही सीमित रह जाती है। इसके विपरीत भारत में प्रकृति के विविध मनोहारी रूपों में अपूर्व सौन्दर्य के दर्शन होते हैं; उदाहरणार्थ-हिमालय की बर्फ से आच्छादित पर्वतश्रेणियाँ, सन्ध्या के समय उन पर्वतश्रेणियों पर पड़ने वाली सूर्य की सुनहली किरणों से उत्पन्न अद्भुत शोभा, सघन आम के बागों की छाया में कल-कल का निनाद करते हुए बहने वाली छोटी-छोटी नदियाँ, इन्हीं के निकट लताओं के पल्लवित एवं पुष्पित होने से उत्पन्न वसन्त की अनुपम छटा तथा भारत के वनों में विचरण करने वाले विशालकाय हाथियों की मतवाली चाल आदि। भारत में इस प्रकार के अनेक रमणीय प्राकृतिक दृश्य देखने को मिलते हैं, जिनके समक्ष अरब के सीमित प्राकृतिक सौन्दर्य में केवल नीरसता, शुष्कता और भद्देपन की ही अनुभूति होती है।
(iii) भारत की शस्यश्यामला भूमि में जो निसर्ग-सिद्धि सुषमा है, उस पर भारतीय कवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है।
(iv) अरब का भौगोलिक सौन्दर्य है-मरुस्थल में बहता कोई साधारण-सा झरना अथवा ताड़ के लम्बे-लम्बे पेड़।
(v) अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती निर्झरणी भारत की भौगोलिक सुन्दरता का बखान करती है।

प्रश्न 4:
प्रकृति के विविध रूपों में विविध भावनाओं के उद्रेक की क्षमता होती है; परन्तु रहस्यवादी कवियों को अधिकतर उसके मधुर स्वरूप से प्रयोजन होता है, क्योंकि भावावेश के लिए प्रकृति के मनोहर रूपों की जितनी उपयोगिता है, उतनी दूसरे रूपों की नहीं होती। यद्यपि इस देश की उत्तरकालीन विचारधारा के कारण हिन्दी में बहुत थोड़े रहस्यवादी कवि हुए हैं, परन्तु कुछ प्रेम-प्रधान कवियों ने भारतीय मनोहर दृश्यों की सहायता से अपनी रहस्यमयी उक्तियों को अत्यधिक सरस तथा हृदयग्राही बना दिया है। यह भी हमारे साहित्य की एक देशगत विशेषता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रेम-प्रधान कवियों ने किनकी सहायता से अपनी रहस्यमयी उक्तियों को अत्यधिक सरस तथा हृदयग्राही बना दिया है?
(iv) प्रकृति के किस स्वरूप से रहस्यवादी कवियों का प्रयोजन होता है?
(v) देश की किस विचारधारा के कारण हिन्दी में बहुत थोड़े रहस्यवादी कवि हुए हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या: श्यामसुन्दर दास जी का कहना है कि व्यक्ति के सम्मुख प्रकृति अपने विभिन्न रूपों में उपस्थित होती है। जिस प्रकार प्रकृति के विभिन्न रूप हैं, उसी प्रकार व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में भी विभिन्न भावनाएँ विद्यमान होती हैं। इनमें से कुछ दमित होती हैं तो कुछ मुक्त। यही कारण है। कि प्रकृति के विभिन्न रूप व्यक्ति के मन में विविध भावनाओं की वृद्धि करते हैं।
(iii) प्रेम-प्रधान कवियों ने भारतीय मनोहर दृश्यों की सहायता से अपनी रहस्यमयी उक्तियों को अत्यधिक सरस तथा हृदयग्राही बना दिया है।
(iv) प्रकृति के मधुर स्वरूप से रहस्यवादी कवियों का प्रयोजन होता है।
(v) देश की उत्तरकालीन विचारधारा के कारण हिन्दी में बहुत थोड़े रहस्यवादी कवि हुए हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ (श्यामसुन्दर दास) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 3 भारतीय साहित्य की विशेषताएँ (श्यामसुन्दर दास), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.