UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा (Budget of Family)

UP Board Solutions for Class 11 Home Science Chapter 21 गृहस्थ परिवार का आय-व्यय लेखा

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 विस्तृत उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारिवारिक आय-व्यय से क्या तात्पर्य है?
उत्तरः
पारिवारिक आवश्यकताओं की सुचारु पूर्ति ही गृह-अर्थव्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मुख्य रूप से दो कारक आवश्यक हैं जिन्हें क्रमश: “पारिवारिक आय’ तथा ‘पारिवारिक व्यय’ कहा जाता है। पारिवारिक आय-व्यय का सन्तुलन ही उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था की मुख्य शर्त है। ‘पारिवारिक आय’ तथा ‘पारिवारिक व्यय’ का अर्थ एवं सामान्य परिचय निम्नवर्णित है –

पारिवारिक आय का अर्थ (Meaning of Family Income) –
गृह – अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक महत्त्व पारिवारिक आय का होता है। पारिवारिक आय से आशय उस धनराशि से है, जो किसी परिवार द्वारा एक निश्चित अवधि में अर्जित की जाती है। आय अर्जित करने के लिए कुछ-न-कुछ प्रयास करने पड़ते हैं। व्यापक अर्थ में पारिवारिक आय में आर्थिक प्रयासों के बदले में मिलने वाली धनराशि के अतिरिक्त उन सुविधाओं को भी सम्मिलित किया जाता है, जो इन प्रयासों के बदले में उपलब्ध होती हैं। उदाहरण के लिए किसी सरकारी कार्यालय में नौकरी करने वाले व्यक्ति को प्रतिमाह एक निश्चित वेतन मिलता है तथा इसके साथ-साथ नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा, आवास सुविधा तथा बच्चों की निःशुल्क शिक्षा की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इस स्थिति में सम्बन्धित व्यक्ति को मिलने वाला वेतन तथा अन्य समस्त सुविधाएँ सम्मिलित रूप से व्यक्ति की आय मानी जाती हैं।

प्रो० ग्रास एवं केण्डाल ने पारिवारिक आय की परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है – “पारिवारिक आय मुद्रा, वस्तुओं, सेवाओं तथा सन्तोष का वह प्रवाह है, जो परिवार के अधिकार में उसकी आवश्यकताओं और इच्छाओं को पूर्ण करने तथा उत्तरदायित्वों के निर्वाह हेतु आता है।”

उपर्युक्त कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि परिवार के मुखिया एवं अन्य सदस्यों द्वारा अर्जित की जाने वाली धनराशि पारिवारिक आय का मुख्य रूप है। यह धनराशि भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयासों द्वारा अर्जित की जा सकती है; जैसे—नौकरी, व्यवसाय, उद्योग-धन्धे, कृषि, पशुपालन आदि। धनराशि के अतिरिक्त परिवार को उपलब्ध होने वाली विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ भी पारिवारिक आय का ही भाग मानी जाती हैं। इस प्रकार की सुविधाएँ अनेक हो सकती हैं; जैसे – फर्नीचरयुक्त निःशुल्क आवास सुविधा, वाहन सम्बन्धी सुविधा, नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा तथा बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा सुविधा।

पारिवारिक व्यय का अर्थ (Meaning of Family Expenses) –
अर्थव्यवस्था के दो मुख्य तत्त्व माने गए हैं-आय तथा व्यय। परिवार के सन्दर्भ में भी आय तथा व्यय का समान रूप से महत्त्व है। आय के रूप में धन अर्जित करने का मुख्य उद्देश्य भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय का अधिकार प्राप्त करना ही है। पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिस धन को व्यय किया जाता है, उसे ही ‘पारिवारिक व्यय’ कहा जाता है।

आय के ही समान व्यय का भी निश्चित लेखा-जोखा रखने के लिए इसे एक निश्चित अवधि के सन्दर्भ में आँका जाता है। सामान्य रूप से, परिवार के लिए मासिक अथवा वार्षिक अवधि में होने वाले व्यय को ही पारिवारिक व्यय के रूप में स्वीकार किया जाता है। व्यय वास्तव में आवश्यकताओं की पूर्ति का एक साधन है। आवश्यकताएँ असंख्य हो सकती हैं, किन्तु सभी आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं है क्योंकि प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति के लिए कम या अधिक मात्रा में धन की आवश्यकता होती है, परन्तु धन एक सीमित साधन है। धन की उपलब्धता आय पर निर्भर करती है; अत: व्यय का निर्धारण आय के सन्दर्भ में ही होता है।

पारिवारिक व्यय को हम इस प्रकार भी परिभाषित कर सकते हैं – “किसी निश्चित अवधि में सम्बन्धित परिवार द्वारा अर्जित आय के उस अंश को पारिवारिक व्यय माना जा सकता है, जो परिवार के सदस्यों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय हुआ है।”

पारिवारिक आवश्यकताएँ अनेक प्रकार की होती हैं; अत: उनकी पूर्ति के लिए किए जाने वाले व्यय को भी भिन्न-भिन्न वर्गों अथवा प्रकारों में बाँटा जा सकता है। पारिवारिक व्यय के मुख्य वर्ग या प्रकार हैं – निश्चित व्यय, अर्द्ध-निश्चित व्यय, अन्य व्यय तथा आकस्मिक व्यय। निश्चित व्यय प्रतिमाह समान रहते हैं; जैसे कि मकान का किराया। अर्द्ध-निश्चित व्यय ऐसे व्ययों को कहा जाता है, जिनमें प्रतिमाह एक निश्चित सीमा तक ही परिवर्तन होता है। जैसे कि परिवार के सदस्यों के वस्त्रों पर होने वाला व्यय। अन्य व्यय की श्रेणी में उन खर्चों को सम्मिलित किया जाता है जो व्यक्ति की आय एवं सुविधा पर निर्भर करते हैं। ये खर्चे अनिवार्य एवं निश्चित नहीं होते।

सुविधा न होने पर इस वर्ग के खर्चों को बिल्कुल घटाया जा सकता है तथा आय के बढ़ जाने तथा सुविधाओं के उपलब्ध हो जाने की स्थिति में जितना चाहे बढ़ाया जा सकता है। मनोरंजन तथा विलासिता सम्बन्धी आवश्यकताओं पर किए जाने वाले व्यय इसी श्रेणी के हैं। आकस्मिक व्यय में उन पारिवारिक खर्चों को सम्मिलित किया जाता है, जिनका कोई पूर्व-ज्ञान नहीं होता। ये खर्चे योजनाबद्ध नहीं हुआ करते। आकस्मिक व्यय साधारण भी हो सकते हैं तथा बहुत अधिक भी, जिससे सम्पूर्ण गृह-अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी निकट सम्बन्धी के विवाह के अवसर पर होने वाला आकस्मिक व्यय, साधारण व्यय कहला सकता है, परन्तु परिवार के किसी सदस्य के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर होने वाला आकस्मिक व्यय बहुत अधिक भी हो सकता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा पारिवारिक व्यय के अर्थ एवं विभिन्न प्रकारों का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य, विशेष रूप से परिवार के मुखिया तथा गृहिणी को इन समस्त पारिवारिक खर्चों के प्रति सचेत रहना चाहिए तथा पर्याप्त सूझ-बूझपूर्वक सभी खर्चों का नियोजन करना चाहिए।

प्रश्न 2.
पारिवारिक बजट का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। पारिवारिक बजट के लाभ एवं उपयोगिता भी स्पष्ट कीजिए।
अथवा
पारिवारिक बजट से क्या तात्पर्य है?
अथवा
परिवार के सफलतापूर्वक संचालन के लिए बजट की क्या उपयोगिता है?
अथवा
पारिवारिक बजट को परिभाषित कीजिए। पारिवारिक बजट के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तरः
परिवार एक ऐसा केन्द्र है, जहाँ जीवनयापन के समस्त उपाय किए जाते हैं। घर पर ही आहार, वस्त्र, मनोरंजन तथा आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सा आदि की व्यवस्था की जाती है। इन समस्त पारिवारिक गतिविधियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। धन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आय की व्यवस्था की जाती है। सामान्य रूप से आय सीमित होती है। इस स्थिति में आय तथा व्यय में सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक होता है। आय तथा व्यय को नियोजित करने के उपाय को ही ‘बजट’ कहा जाता है। गृह-व्यवस्था के लिए ‘पारिवारिक बजट’ का विशेष महत्त्व होता है।

पारिवारिक बजट का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Family Budget) –
पारिवारिक अर्थव्यवस्था के दो मुख्य तत्त्व होते हैं – पारिवारिक आय तथा पारिवारिक व्यय। पारिवारिक अर्थव्यवस्था को सफल बनाने के लिए पारिवारिक आय तथा पारिवारिक व्यय को नियोजित करना आवश्यक होता है। इस नियोजन के लिए पारिवारिक आय तथा व्यय के विवरण को लिखित रूप दिया जाता है। आय-व्यय का यह लिखित रूप ही ‘पारिवारिक बजट’ कहलाता है। पारिवारिक बजट में परिवार की आय को ध्यान में रखते हुए समस्त सम्भावित खर्चों को नियोजित रूप से लिख लिया जाता है। पारिवारिक आय-व्यय का यह विवरण-प्रपत्र एक निश्चित अवधि के लिए होता है। यह अवधि सामान्य रूप से एक माह या एक वर्ष हुआ करती है।

पारिवारिक बजट को इन शब्दों में परिभाषित कर सकते हैं – “पारिवारिक बजट किसी परिवार का निश्चित अवधि में होने वाले आय-व्यय का प्रपत्र होता है।”
पारिवारिक बजट में आगामी माह या आगामी वर्ष में होने वाले आय-व्यय का अनुमानित प्रारूप भी होता है।

पारिवारिक बजट की उपयोगिता (Utility of Family Budget) –
पारिवारिक बजट से परिवार, अर्थशास्त्रियों, राजनीतिज्ञों तथा समाज-सुधारकों सभी को लाभ पहुँचता है। पारिवारिक बजट के लाभों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है –

1. परिवार के लिए बजट का महत्त्व एवं लाभ-परिवार की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक परिवार द्वारा बजट अवश्य बनाना चाहिए। बजट बनाकर व्यय करने से आय तथा व्यय में सन्तुलन बना रहता है। बजट बनाकर विभिन्न आवश्यक वस्तुओं पर होने वाले व्यय को निर्धारित कर सकते हैं। इससे ज्ञात होता रहता है कि किस वस्तु पर होने वाले व्यय को आवश्यकता पड़ने पर घटाया जा सकता है तथा किस प्रकार से सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। यदि बिना बजट के ही व्यय करते रहते हैं तो कुछ अनावश्यक वस्तुओं पर अपेक्षाकृत अधिक व्यय हो सकता है। इससे कुछ अपेक्षाकृत आवश्यक कार्य करने के लिए धन नहीं बच पाता तथा समय आने पर कठिनाई उठानी पड़ती है; अत: बजट बनाकर ही व्यय करना चाहिए। पारिवारिक बजट बनाने तथा उसके अनुसार व्यय करने से परिवार को निम्नलिखित लाभ होते हैं –

  • बजट बनाने से विभिन्न मदों पर किया जाने वाला व्यय इन मदों की आवश्यकता तथा महत्त्व को ध्यान में रखकर हो सकता है।
  • बजट बनाने से योजनाबद्ध कार्य करने की क्षमता का विकास होता है। सामान्य से अलग, विशेष अवसरों पर इस क्षमता से सहायता मिलती है और अपव्यय से बचा जा सकता है।
  • बजट बनाने से गृहिणी भविष्य के लिए कुछ-न-कुछ बचत करने का तरीका निकाल लेती है। वैसे भी योजनाबद्ध कार्य करने से कुछ-न-कुछ बचाया जा सकता है।
  • अपनी आय के अनुसार परिवार की समस्त आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करते हुए बजट के अनुसार व्यय करने से उचित और अनुकूल जीवनयापन का अभ्यास हो जाता है। इस तरह अपव्यय नहीं होता और ऋण लेने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है।।
  • पारिवारिक व्यय का उचित लेखा रखने में भी बजट से सहायता मिलती है तथा हिसाब-किताब की आदत पड़ जाती है।
  • बजट बनाने से फिजूलखर्ची पर आवश्यक तथा निश्चित नियन्त्रण हो जाता है।
  • पारिवारिक बजट बनाकर व्यय करने से परिवार में सुख-शान्ति एवं व्यवस्था बनी रहती है। इससे पारिवारिक समृद्धि में भी वृद्धि होती है।

2. अर्थशास्त्रियों को लाभ – अर्थशास्त्री पारिवारिक बजटों के अध्ययन से किसी समाज या राष्ट्र के जीवन-स्तर के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यदि उनका आर्थिक एवं सामाजिक स्तर गिरता दिखाई देता है तो वे उसे सुधारने के लिए प्रयत्नशील हो सकते हैं। पारिवारिक बजट जनता की आय, मनुष्यों की कर देने की क्षमता तथा सरकार को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कर लगाने के सम्बन्ध में भी ज्ञान देता है। पारिवारिक बजट का अध्ययन महत्त्वपूर्ण आर्थिक नियमों के अनुसन्धान में भी सहायक होता है।

3. राजनीतिज्ञों को लाभ – पारिवारिक बजट समाज का आर्थिक नक्शा प्रदान करता है और इस आर्थिक नक्शे में देश का या समाज का राजनीतिक नक्शा खिंचा मिलता है। जिस प्रकार की लोगों की आर्थिक दशा होगी, उसी के आधार पर वे अपनी राजनीतिक विचारधारा का निर्माण करेंगे। राजनीतिज्ञ इस प्रकार से देश की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में प्रयत्नशील हो सकते हैं। राजनीतिज्ञ जन सामान्य की करदान क्षमता देखकर अपनी नीति निर्धारित करते हैं।

4. समाज-सुधारकों को लाभ – समाज-सुधारक इसके अध्ययन से यह जान सकते हैं कि जनता अपनी आय का सदुपयोग करती है अथवा दुरुपयोग। यदि जनता का धन बुरी आदतों की सन्तुष्टि में अधिक व्यय होता है तो समाज-सुधारक इसके विरुद्ध प्रचार करके जनता की बुरी आदतों पर नियन्त्रण कर सकते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि पारिवारिक बजट समाज के सभी वर्गों के लिए लाभप्रद एवं उपयोगी हो सकता है। इसका समुचित विवेचन परिवार, समाज और देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। गृहिणियों के लिए ‘पारिवारिक बजट’ का सर्वाधिक महत्त्व एवं उपयोग है क्योंकि गृहिणियाँ ही गृह-अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रश्न 3.
पारिवारिक बजट के विषय में ऐंजिल्स द्वारा प्रतिपादित नियम का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तरः
पारिवारिक बजट के विषय में ऐंजिल्स का नियम (Engil’s Rule on Family Budget) –
पारिवारिक बजट अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण विषय है; अत: समय-समय पर विभिन्न समाज-वैज्ञानिकों एवं अर्थशास्त्रियों ने इस विषय में अपने-अपने विचार तथा नियम प्रस्तुत किए हैं। इन विद्वानों में जर्मनी के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ० अर्नेस्ट ऐंजिल्स का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ऐंजिल्स ने समाज के विभिन्न वर्गों से सम्बन्धित परिवारों की गृह-अर्थव्यवस्था का विस्तृत अध्ययन किया तथा 1857 ई० में निष्कर्षस्वरूप एक नियम प्रस्तुत किया, जिसे पारिवारिक बजट सम्बन्धी ‘ऐंजिल्स का नियम’ कहा जाता है।

अर्थशास्त्री ऐंजिल्स ने सामाजिक व्यवस्था को तीन वर्गों अर्थात् उच्च (धनी), मध्यम तथा निम्न वर्ग में विभाजित किया। इस वर्गीकरण का आधार केवल पारिवारिक आय को ही स्वीकार किया गया था। अपने अध्ययनों के आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि पारिवारिक आय के बढ़ने के साथ-साथ परिवार द्वारा भोजन एवं खाद्य-सामग्री पर किए जाने वाले व्ययों का प्रतिशत घटता जाता है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन या विलासिता की मदों पर होने वाले व्ययों का प्रतिशत बढ़ता जाता है। जहाँ तक वस्त्र, गृह, प्रकाश एवं ईंधन जैसी मदों का प्रश्न है, इन पर होने वाले व्ययों का प्रतिशत प्रायः स्थिर ही रहता है। ऐंजिल्स के इन निष्कर्षों को निम्नांकित तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया गया है –
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ऐंजिल्स ने पारिवारिक बजट सम्बन्धी अपने नियम के निष्कर्षों को निम्नांकित रेखाचित्र के माध्यम से भी दर्शाया है –
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ऐंजिल्स ने पारिवारिक बजट के सैद्धान्तिक स्पष्टीकरण के साथ-साथ उसके व्यावहारिक स्वरूप को भी प्रस्तुत किया। उसने समाज के तीनों वर्गों-उच्च, मध्यम और निम्न के प्रतिनिधियों के रूप में डॉक्टर, अध्यापक और श्रमिक को चुना और उनकी तत्कालीन मासिक आय क्रमशः ₹ 3200, ₹ 1600 और ₹ 400 स्वीकार की। आय के इन स्वरूपों को स्वीकार करके ऐंजिल्स ने समाज के मुख्य वर्गों के पारिवारिक बजट के प्रारूप को निम्नांकित तालिका में प्रस्तुत किया –
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ऐंजिल्स के पारिवारिक बजट सम्बन्धी नियम की आलोचना –
एक समय था जब विश्व के सभी देशों में पारिवारिक बजट के विषय में ऐंजिल्स के नियम को विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता था, परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में इस नियम को केवल ऐतिहासिक महत्त्व ही प्राप्त है। अब सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप में इस नियम को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता है। इस नियम की निम्नलिखित आलोचनाएँ प्रस्तुत की गई हैं –

  • भोजन व्यय के सन्दर्भ में-आलोचकों का मत है कि ऐंजिल्स द्वारा अपने बजट में अध्यापक तथा डॉक्टर के भोजन के लिए किए गए धन का प्रावधान बहुत अधिक है।
  • आवास व्यय के सन्दर्भ में-आधुनिक परिस्थितियों में आवास समस्या गम्भीर है। अध्यापक तथा डॉक्टर के लिए निर्धारित किया गया धन कम प्रतीत होता है। आय के 12% भाग को व्यय करके ये वर्ग अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल आवास प्राप्त नहीं कर सकते।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य तथा मनोरंजन व्यय के सन्दर्भ में-ऐंजिल्स ने अपने नियम में मध्यम तथा उच्च वर्ग के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन के मद में जो व्यय का प्रावधान किया है, वह बहुत अधिक प्रतीत होता है।
  • ईंधन, जल तथा प्रकाश के व्यय के सन्दर्भ में ऐंजिल्स ने अपने नियम में स्वीकार किया है कि ईंधन, जल एवं प्रकाश आदि पर होने वाले व्यय का प्रतिशत भाग सदैव स्थिर रहता है। यह मान्यता उचित नहीं है। व्यवहार में देखा गया है कि आय के बढ़ने के साथ-साथ इन मदों पर होने वाले व्यय के प्रतिशत मान में भी कुछ-न-कुछ वृद्धि अवश्य ही होती है।
  • बचत की अवहेलना सम्बन्धी आलोचना-ऐंजिल्स द्वारा प्रतिपादित बजट सम्बन्धी नियम में कहीं भी पारिवारिक बचत का उल्लेख नहीं है। आधुनिक मान्यताओं के अनुसार समाज के प्रत्येक वर्ग के पारिवारिक बजट में अनिवार्य रूप से नियमित बचत का प्रावधान होना चाहिए। एंजिल्स द्वारा पारिवारिक बचत की अवहेलना की कटु आलोचना हुई है।

प्रश्न 4.
ऐंजिल्स के सिद्धान्त के आधार पर एक मध्यम वर्ग के परिवार के बजट की रूपरेखा बनाइए।
अथवा
एक ऐसे परिवार के लिए व्यावहारिक बजट का प्रारूप प्रस्तुत कीजिए, जिसकी मासिक आय ₹ 12000 प्रतिमाह है तथा परिवार में पति-पत्नी के अतिरिक्त दो छोटे बच्चे हैं।
उत्तरः
पारिवारिक बजट का व्यावहारिक प्रारूप (Practical Structure of Family Budget) –
पारिवारिक बजट का सैद्धान्तिक अध्ययन करने के साथ-साथ उसका व्यावहारिक पक्ष जानना भी आवश्यक है। यहाँ एक ऐसे परिवार के पारिवारिक बजट का प्रारूप प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसकी मासिक आय ₹ 12,000 है तथा परिवार में पति-पत्नी के अतिरिक्त दो छोटे बच्चे भी हैं

गृहस्वामी का नाम – सुभाष चन्द्र शर्मा
घर का पता – 2, तिलक रोड, मेरठ।
परिवार की सदस्य संख्या – 4 (पुरुष 1, स्त्री 1, बच्चे 2)
मासिक आय – ₹ 12000
बजट की अवधि – 1-4-2018 से 31-4-2018
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नोट – उपर्युक्त बजट का प्रारूप एक प्रतिदर्श बजट है। इस आधार पर ₹ 15000, ₹ 18000 या ₹ 20,000 आदि आय वाले परिवारों के लिए भी बजट बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त परिवार की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न मदों पर होने वाले व्यय में भी अन्तर किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
मितव्ययिता का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके आवश्यक तत्त्व बताइए।
अथवा
गृहिणी किन-किन उपायों से गृहस्थी के व्यय में मितव्ययिता कर सकती है?
अथवा
टिप्पणी लिखिए-मितव्ययिता।
उत्तरः
मितव्ययिता का अर्थ (Meaning of Economy) –
परिवार व्यय का केन्द्र है। इस कारण से यहाँ प्रतिदिन किसी-न-किसी प्रकार का व्यय करना पड़ता है। परिवार के सदस्य जो कमाते हैं उसके अधिकांश भाग को वे अपनी और अपने आश्रितों की विविध प्रकार की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करने के लिए व्यय करते हैं; किन्तु पैसा खर्च करने वाले के समक्ष यह लक्ष्य आवश्यक रूप से रहता है कि वह धन को किस प्रकार से व्यय करे कि उसकी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए। जो व्यक्ति धन को व्यय करने की उचित रीतियाँ जानते हैं, वे आर्थिक संकट का सामना नहीं करते; किन्तु इसके विपरीत जो धन को व्यय करने के उचित तरीकों से अनभिज्ञ हैं, वे सदैव आर्थिक संकट से ग्रस्त रहते हैं और धनाभाव से पीड़ित रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों को अनेक बार गम्भीर आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ जाता है तथा परिणामस्वरूप घर-परिवार कलह का केन्द्र बन जाता है।

पारिवारिक अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाए रखने तथा पारिवारिक सुख-समृद्धि को बनाए रखने के लिए पारिवारिक व्यय को मितव्ययितापूर्ण बनाना आवश्यक होता है। मितव्ययिता से हमारा अभिप्राय यह है कि कोई व्यक्ति कम खर्च करके भी अधिकतम सन्तोष प्राप्त कर ले। मितव्ययिता का उद्देश्य अपव्यय या फिजूलखर्ची से बचना है। इसका अर्थ कंजूसी करना नहीं है क्योंकि कंजूसी की स्थिति तो दुःख प्रदान करने वाली होती है। किन्तु इसका यह अर्थ अवश्य है कि जिस वस्तु पर 5 रुपये खर्च करने से ही हम सुख-सन्तोष की प्राप्ति कर सकते हैं, उस पर अनावश्यक रूप से 6 रुपये खर्च न करें।

मितव्ययिता के तत्त्व (Elements of Economy) –
मितव्ययितापूर्वक व्यय करने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है –
1. वस्तुएँ खरीदने का उचित स्थानं-आजकल प्रत्येक वस्तु के खरीदने के अनेक स्थान होते हैं और उपभोक्ताओं को इनमें से किसी भी स्थान से इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हो सकती है। कुशल तथा मर्मज्ञ उपभोक्ताओं को यह ज्ञात होता है कि कौन-सी वस्तु किस स्थान से प्राप्त हो सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति का एक निश्चित स्थान होता है और इसकी जानकारी समय तथा धन की बचत कराती है।

2. खरीदारी के सिद्धान्त-पैन्सन नामक अर्थशास्त्री ने धन को व्यय करने के सम्बन्ध में वस्तुओं के मूल्य के सम्बन्ध में कुछ सुझाव दिए हैं। ये सुझाव निम्नलिखित हैं

(i) अपनी आवश्यकताओं का पूर्ण ज्ञान-एक सफल खरीदार को अपनी आवश्यकताओं का पूर्ण ज्ञान अवश्य होना चाहिए। बाजार में पहुँचने पर जो भी वस्तु अच्छी लगे, उसे अपनी आवश्यकता के अभाव में भी खरीद लेना अपव्यय है। आवश्यकता न होने पर सस्ती वस्तु का खरीदना भी महँगा एवं अनुचित ही है क्योंकि वह घर में व्यर्थ पड़ी रहेगी। अत: केवल वे ही वस्तुएँ खरीदी जानी चाहिए, जिनकी हमें आवश्यकता है। ऐसा करने पर कम धन व्यय करके अधिकतम सन्तोष प्राप्त किया जा सकता है।

(ii) आवश्यकताओं की तीव्रता का ज्ञान-खरीदार को यह भी पता होना चाहिए कि उसे किस आवश्यकता की तत्काल पूर्ति करनी है तथा किसकी बाद में पूर्ति की जा सकती है। जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं का उचित रूप से क्रम निर्धारण कर लेते हैं, वे कम खर्च से ही अधिक सन्तोष प्राप्त कर सकते हैं।

(iii) वस्तु के गुणों का ज्ञान-खरीदार को माल के जाँचने की योग्यता भी होनी चाहिए। मोल-भाव तो कर लिया, किन्तु यह न देखा कि वस्तु अच्छी भी है या नहीं, तो खरीदार धोखा खा सकता है। क्योंकि कभी-कभी सस्ती वस्तु बिल्कुल बेकार सिद्ध हो सकती है; अत: वस्तु के गुणों को देखकर ही उसे खरीदना चाहिए।

(iv) सस्ती वस्तुओं के प्राप्ति स्थान का ज्ञान-खरीदार को यह भी पता होना चाहिए कि सस्ती वस्तु किस दुकान से या किस स्थान से प्राप्त हो सकती है। दूर जाने से बचने के लिए कुछ लोग अपने परिचितों की दुकानों से ही सौदा लेते हैं, भले ही वहाँ उनसे कुछ अधिक मूल्य ले लिया जाए। मोल-भाव करके तथा सस्ती वस्तु की प्राप्ति के स्थान का पता लगाने से भी बचत हो जाती है।

(v) मोल-भाव करने की योग्यता-कुशल खरीदार को सौदा करना भी आना चाहिए। कभी-कभी दुकानदार दो रुपये की वस्तु का मूल्य तीन-चार रुपये तक बता देता है और यदि उनसे ठीक प्रकार से मोल-भाव न किया जाए तो खरीदार को पर्याप्त नुकसान हो सकता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि छोटी-छोटी बातों पर दुकानदार से व्यर्थ का विवाद किया जाए। कुछ दुकानें ऐसी भी होती हैं, जहाँ वस्तुओं का गलत मूल्य नहीं बताया जाता और अनुभव से खरीदार यह बात जान सकता है।

3. अपव्यय से बचना-मितव्ययिता के लिए आवश्यक है कि हर प्रकार के अपव्यय या फिजूलखर्ची से बचा जाए। यह फिजूलखर्ची वस्तुओं के क्रय से सम्बन्धित भी हो सकती है तथा वस्तुओं या सुविधाओं के अनावश्यक उपभोग से सम्बन्धित भी। घर पर आवश्यकता न होने पर बिजली, पानी तथा ईंधन का प्रयोग नियन्त्रित करना चाहिए। इससे सम्बन्धित बिल कम आते हैं। इसी प्रकार खाद्य-सामग्री या पकवान उतने ही तैयार करने चाहिए जितने कि खाने के काम आ जाएँ। अधिक बनाने से बाद में वे फेंकने पड़ते हैं तथा उनकी लागत व्यर्थ जाती है।

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प्रश्न 1.
पारिवारिक बजट बनाने के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तरः
पारिवारिक बजट बनाने के उद्देश्य पारिवारिक बजट बनाने के उद्देश्यों को हम निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं –

  • परिवार के सदस्यों की संख्या तथा आमदनी का ज्ञान प्राप्त करना।
  • परिवार के सभी प्रकार के खर्चों का क्रमिक ज्ञान प्राप्त करना।
  • परिवार की आवश्यकताओं और रहन-सहन के स्तर का ध्यान रखना।
  • बजट के खर्चे का इस प्रकार ध्यान रखना आवश्यक है कि आकस्मिक दुर्घटनाओं का सामना आसानी से किया जा सके।
  • गृह-अर्थव्यवस्था में नियमित बचत का प्रावधान रखना।

प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए-पारिवारिक बजट के प्रकार।
उत्तरः
पारिवारिक बजट के प्रकार –
पारिवारिक बजट के तीन तत्त्व होते हैं-आय, व्यय तथा बचत। इन तत्त्वों के आधार पर पारिवारिक बजट के तीन प्रकार निर्धारित किए जाते हैं। प्रथम प्रकार है –

  • सन्तुलित बजट-इस बजट में पारिवारिक आय के बराबर ही पारिवारिक व्यय का प्रावधान होता है। दूसरा प्रकार है।
  • घाटे का बजट-इस बजट में आय की अपेक्षा अधिक व्यय का प्रावधान होता है तथा तीसरा प्रकार है।
  • बचत का बजट-इस बजट में पारिवारिक आय की तुलना में कम व्यय का प्रावधान होता है। गृह-अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में बचत के बजट को सर्वोत्तम बजट माना जाता है।

प्रश्न 3.
पारिवारिक बचत से क्या आशय है? पारिवारिक बचत के मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
बजट में बचत का प्रावधान करना क्यों आवश्यक है?
उत्तरः
पारिवारिक बचत का अर्थ तथा उसके लाभ –
वर्तमान पारिवारिक आय में से परिवार की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय करने के उपरान्त जो धनराशि बच जाती है, उसे ‘पारिवारिक बचत’ कहा जाता है। इस प्रकार से की गई बचत को उचित ढंग से विनियोजित कर देने से अधिक लाभ होता है। यही कारण है कि पारिवारिक बजट तैयार करते समय उसमें अनिवार्य रूप से बचत का प्रावधान रखा जाता है। .
नियमित पारिवारिक बचत से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं –

1. भविष्य की विपत्तियों को सहन करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है – मनुष्य को धन जीवन में बीमारी, बेरोजगारी, व्यापारिक हानि, भूचाल, बाढ़ आदि विपत्तियाँ सहन करने की सामर्थ्य प्रदान करता है। इसीलिए नियमित पारिवारिक बचत को आवश्यक माना जाता है।

2. पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने की योग्यता उत्पन्न होती है – पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने की योग्यता का आधार बचत ही है। मनुष्य को भविष्य में बच्चों की शिक्षा, विवाह तथा सामाजिक रीति-रिवाजों पर धन व्यय करना पड़ता है, जिनमें बचत विशेष रूप से सहायक होती है।

3. वृद्धावस्था के लिए सुरक्षा – बचत द्वारा एकत्र किया हुआ धन वृद्धावस्था में काम आता है, इसलिए बचत करने पर मनुष्य वृद्धावस्था में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है।

4. आश्रितों के पालन-पोषण की व्यवस्था – बचत करते रहने पर मृत्यु के बाद आश्रित परिवार का भरण-पोषण कुछ समय तक ठीक-ठीक होता रहता है, वे एकदम अनाथ होकर भटकते नहीं फिरते हैं।

5. आय वृद्धि – बचत द्वारा आय में वृद्धि होती है। बचाया हुआ धन किसी को उधार देकर या बैंक में जमा करके ब्याज कमाया जा सकता है, जिससे आय और पूँजी बढ़ती है। इसलिए बचत करना सभी प्रकार से लाभकारी है।

6. सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि – नियमित रूप से की गई बचत परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि में सहायक होती है। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं, जब परिवार की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त व्यय करना पड़ता है। यह व्यय पारिवारिक बचत से ही सम्भव हो पाता है।

7. राष्ट्रीय योजनाओं के संचालन में सहायक – नियमित पारिवारिक बचत न केवल परिवार के लिए आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है वरन् यह राष्ट्रीय प्रगति एवं समृद्धि के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। देश के परिवारों द्वारा की गई नियमित अल्प बचतों को राष्ट्रीय बचत योजनाओं में विनियोजित किया जाता है, जिससे सरकार को पर्याप्त धन प्राप्त होता है और उसके द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजनाओं का संचालन किया जाता है।

प्रश्न 4.
स्पष्ट कीजिए कि स्त्री घर पर रहकर भीगृह-अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकती है।
अथवा
गृह-अर्थव्यवस्था में गृहिणी के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
गृह-अर्थव्यवस्था में गृहिणी का योगदान
आधुनिक युग में विभिन्न परिस्थितियों तथा सुविधाओं के कारण नगरों में अनेक स्त्रियाँ घर के कार्यों के अतिरिक्त घर से बाहर भी अनेक प्रकार के कार्य करने लगी हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है, परन्तु कुछ लोग इस बात के विरुद्ध भी हैं। उनका कहना है कि स्त्रियों को घर पर रहकर ही गृह-प्रबन्ध को सुचारु रूप से देखना चाहिए। इस वर्ग के लोगों का विचार है कि उत्तम गृह-प्रबन्ध करके भी स्त्रियाँ पारिवारिक आय को बढ़ाने में सहयोग दे सकती हैं। ऐसी स्थिति में स्त्रियाँ हर वस्तु को सँभालकर व्यय करती हैं तथा किसी वस्तु को नष्ट नहीं होने देतीं।

इसके अतिरिक्त, घर पर रहने वाली स्त्रियाँ घर के सभी कार्य स्वयं कर सकती हैं, जिससे अन्यथा लगाए जाने वाले नौकर या महरी का खर्च बच जाता है। घर से बाहर जाने वाली स्त्रियों को अपने छोटे बच्चों की देखभाल के लिए आया आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है। यदि स्त्री घर पर ही है तो यह खर्च भी बच जाता है। यदि स्त्री स्वयं पढ़ी-लिखी है तो वह अपने छोटे बच्चों को स्वयं ही पढ़ा-लिखा सकती है। इससे बच्चों के ट्यूशन आदि पर होने वाला व्यय बच जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्त्री घर पर रहकर भी अच्छे ढंग से गृह-प्रबन्ध एवं व्यवस्था करके पारिवारिक आय को बढ़ाने में कुछ सीमा तक सहयोग दे सकती है। वैसे आज के युग में पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ नौकरी आदि करके ही पारिवारिक आय को बढ़ाने में सहयोग देना अधिक पसन्द करती हैं।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गृह-अर्थव्यवस्था से क्या आशय है?
उत्तरः
गृह-अर्थव्यवस्था वह व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत घर-परिवार के आय-व्यय को अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर सुनियोजित किया जाता है तथा इस नियोजन के द्वारा परिवार को अधिक-से-अधिक सन्तोष प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 2.
गृह-अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक कारक क्या है?
उत्तरः
गृह-अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक आवश्यक कारक धन अथवा आय है।

प्रश्न 3.
सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान परिवार के किस सदस्य का होता है?
उत्तरः
सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान गृहिणी का होता है।

प्रश्न 4.
उत्तम अथवा सफल गृह-अर्थव्यवस्था की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तरः
उत्तम अथवा सफल गृह-अर्थव्यवस्था की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं –

  1. परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की प्राथमिकता का निर्धारण तथा
  2. नियमित बचत का प्रावधान।

प्रश्न 5.
स्वरोजगार एवं रोजगार में क्या अन्तर है?
उत्तरः
जब कोई व्यक्ति मुक्त रूप से अपनी योग्यता एवं कुशलता के आधार पर धन उपार्जन के उपाय करता है तो उसे स्वरोजगार कहा जाता है, जैसे प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाला चिकित्सक, लेखक, नक्शानवीस, कलाकार, गायक आदि। इससे भिन्न जब कोई व्यक्ति किसी संस्थान, कार्यालय या औद्योगिक व्यावसायिक केन्द्र के लिए निर्धारित वेतन तथा कार्य सम्बन्धी निर्धारित शर्तों पर कार्य करता है तो उसे रोजगार कहते हैं।

प्रश्न 6.
आय-व्यय को सन्तुलित रखने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तरः
आय-व्यय को सन्तुलित रखने के लिए पारिवारिक बजट बनाना चाहिए तथा उसका पालन करना चाहिए।

प्रश्न 7.
पारिवारिक बजट बनाने का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तरः
पारिवारिक बजट बनाने का प्रमुख उद्देश्य गृह-अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाना है।

प्रश्न 8.
परिवार में आय-व्यय का लेखा रखने का लाभ लिखिए।
उत्तरः
परिवार में आय-व्यय का लेखा रखने से परिवार का व्यय नियन्त्रित रहता है तथा गृह-अर्थव्यवस्था नहीं बिगड़ती।

प्रश्न 9.
पारिवारिक बजट की सर्वाधिक उपयोगिता किसके लिए है?
उत्तर
पारिवारिक बजट की सर्वाधिक उपयोगिता गृहिणियों के लिए है।

प्रश्न 10.
पारिवारिक बजट के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तरः
पारिवारिक बजट के मुख्य प्रकार हैं –

  • घाटे का बजट
  • सन्तुलित बजट तथा
  • बचत का बजट।

प्रश्न 11.
किस प्रकार के पारिवारिक बजट को सर्वोत्तम माना जाता है?
उत्तरः
बचत के पारिवारिक बजट को सर्वोत्तम माना जाता है।

प्रश्न 12.
पारिवारिक बजट बनाने में उत्पन्न होने वाली मुख्य बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
पारिवारिक बजट बनाने में उत्पन्न होने वाली मुख्य बाधाएँ हैं –

  • ज्ञान की न्यूनता या अशिक्षा
  • बजट के प्रति उदासीनता तथा
  • विभिन्न सामाजिक प्रचलन एवं प्रथाएँ।

प्रश्न 13.
मितव्ययिता से क्या आशय है?
उत्तरः
मितव्ययिता का अर्थ है अपव्यय से बचना। यह कंजूसी नहीं है।

प्रश्न 14.
पारिवारिक बचत से क्या आशय है?
उत्तरः
वर्तमान पारिवारिक आय में से परिवार की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय करने के उपरान्त जो धनराशि बच जाती है, उसे ‘पारिवारिक बचत’ कहा जाता है।

UP Board Class 11 Home Science Chapter 21 बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

निर्देश : निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए

1. अच्छी अर्थव्यवस्था निर्भर करती है –
(क) कम खर्च अधिक आय पर
(ख) आय के अनुसार बजट बनाकर बचत करते हुए खर्च करने पर
(ग) आय से अधिक खर्च करने पर
(घ) अधिक आय पर।
उत्तरः
(ख) आय के अनुसार बजट बनाकर बचत करते हुए खर्च करने पर।

2. आय का वह भाग, जिसका उपयोग आवश्यकताओं की पूर्ति में होता है, कहलाता है –
(क) आय
(ख) व्यय
(ग) बचत
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तरः
(ख) व्यय।

3. आय का वह भाग, जो वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात् शेष बचता है तथा जिसे –
भविष्य के लिए उत्पादक कार्यों में लगा दिया जाता है, कहलाता है –
(क) नि:संचय
(ख) बचत
(ग) आय
(घ) व्यय।
उत्तरः
(ख) बचत।

4. बचत का मुख्य प्रयोजन है –
(क) भविष्य के आवश्यक एवं आकस्मिक व्यय के लिए
(ख) मनोरंजन के लिए
(ग) विलासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
(घ) सुख प्राप्ति के लिए।
उत्तरः
(क) भविष्य के आवश्यक एवं आकस्मिक व्यय के लिए।

5. बजट का अर्थ है –
(क) खर्चों की सूची
(ख) आय-व्यय का ब्योरा
(ग) खरीदारी
(घ) बचत।
उत्तरः
(ख) आय-व्यय का ब्योरा।

6. बजट उल्लेख करता है –
(क) परिवार की कुल आय का
(ख) परिवार के कुल व्यय का
(ग) परिवार की कुल बचत का
(घ) उपर्युक्त सभी का।
उत्तरः
(घ) उपर्युक्त सभी का।

7. बजट में निम्नलिखित में से किसके लिए व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए –
(क) पुस्तकें
(ख) त्योहार
(ग) बचत
(घ) मनोरंजन।
उत्तरः
(ग) बचत।

8. पारिवारिक बजट अनावश्यक व्यय को –
(क) प्रोत्साहन देता है
(ख) नियन्त्रित करता है
(ग) सहायता प्रदान करता है
(घ) स्वीकृति प्रदान करता है।
उत्तरः
(ख) नियन्त्रित करता है।

9. आय-व्यय में सन्तुलन बनाए रखने के लिए निम्नलिखित बनाना जरूरी है –
(क) समय-सारणी
(ख) बजट
(ग) मीनू
(घ) चार्ट।
उत्तरः
(ख) बजट।

10. आय-व्यय में सन्तुलन हेतु निम्नलिखित में से कौन-सा साधन उपयुक्त होगा –
(क) वार्षिक बजट
(ख) मासिक बजट
(ग) साप्ताहिक बजट
(घ) दैनिक बजट।
उत्तरः
(ख) मासिक बजट।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Name समस्यापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध

भारत में जनसंख्या-वृद्धि की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • जनसंख्या-विस्फोट और निदान
  • जनसंख्या-वृद्धि: कारण और निवारण
  • बढ़ती जनसंख्य: एक गम्भीर समस्या
  • परिवार नियोजन
  • बढ़ती जनसंख्या बनी आर्थिक विकास की समस्या
  • जनसंख्या नियन्त्रण
  • बढ़ती जनसंख्य: रोजगार की समस्या

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आतंकवाद : समस्या एवं समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • आतंकवाद के निराकरण के उपाय
  • आतंकवाद
  • आतंकवाद की विभीषिका
  • भारत में आतंकवाद की समस्या
  • आतंकवाद : एक समस्या
  • आतंकवाद : कारण और निवारण
  • आतंकवाद का समाधान
  • भारत में आतंकवाद के बढ़ते कदम
  • भारत में आतंकवाद की समस्या और समाधान

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पर्यावरण-प्रदूषण : समस्या और समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • पर्यावरण और प्रदूषण
  • पर्यावरण का महत्त्व
  • बढ़ता प्रदूषण और उसके कारण
  • बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण
  • प्रदूषण के दुष्परिणाम
  • पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व
  • असन्तुलित पर्यावरण : प्राकृतिक आपदाओं का कारण
  • विश्व परिदृश्य में पर्यावरण प्रदूषण
  • धरती की रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा
  • पर्यावरण-प्रदूषण : कारण और निवारण
  • पर्यावरण-असन्तुलन

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भारत में बेरोजगारी की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • बेरोजगारी : समस्या और समाधान
  • शिक्षित बेरोजगारों की समस्या
  • बेरोजगारी की विकराल समस्या
  • बेरोजगारी की समस्या
  • बेरोजगारी दूर करने के उपाय
  • बेरोजगारी : एक अभिशाप
  • बढ़ती जनसंख्या : रोजगार की समस्या
  • बेरोजगारी : कारण एवं निवारण

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बेलगाम महँगाई

सम्बद्ध शीर्षक

  • महँगाई की समस्या और उसका समाधान
  • महँगाई : समस्या और समाधान
  • बढ़ती महँगाई : कारण और निदान
  • महँगाई की समस्या
  • महँगाई से परेशान : भारत का इंसान
  • महँगाई की समस्या.: कारण और निवारण

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. महँगाई के कारण
    (क) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि;
    (ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि;
    (ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी;
    (घ) मुद्रा-प्रसार;
    (ङ) प्रशासन में शिथिलता;
    (च) घाटे का बजट,
    (छ) असंगठित उपभोक्ता;
    (ज) धन का असमान वितरण :
  3. महँगाई के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ,
  4. महँगाई को दूर करने के लिए सुझाव,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना-भारत की आर्थिक समस्याओं के अन्तर्गत महँगाई की समस्या एक प्रमुख समस्या है। वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि का क्रम इतना तीव्र है कि जब आप किसी वस्तु को दोबारा खरीदने जाते हैं तो वस्तु का मूल्य पहले से अधिक बढ़ा हुआ होता है। | दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती इस महँगाई की मार का वास्तविक चित्रण प्रसिद्ध हास्य कवि काका हाथरसी की निम्नलिखित पंक्तियों में हुआ है

पाकिट में पीड़ा भरी कौन सुने फरियाद ?
यह महँगाई देखकर वे दिन आते याद॥
वे दिन आते याद, जेब में पैसे रखकर,
सौदा लाते थे बाजार से थैला भरकर॥
धक्का मारा युग ने मुद्रा की क्रेडिट ने,
थैले में रुपये हैं, सौदा है पाकिट में।

महँगाई के कारण-वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि अर्थात् महँगाई के बहुत से कारण हैं। इन कारणों में अधिकांश कारण आर्थिक हैं तथा कुछ कारण ऐसे भी हैं, जो सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था से सम्बन्धित हैं। इन कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है
(क) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि–भारत में जनसंख्या-विस्फोट ने वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाने की दृष्टि से बहुत अधिक सहयोग दिया है। जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उतनी तेजी से वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो रहा है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि हुई है।

(ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि-हमारा देश कृषि प्रधान है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। गत वर्षों से कृषि में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों, उर्वरकों आदि के मूल्यों में बहुत अधिक वृद्धि हुई है; परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश वस्तुओं के मूल्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पदार्थों के मूल्यों से सम्बद्ध होते हैं। इस कारण जब कृषि-मूल्य में वृद्धि हो जाती है तो देश में अधिकांशतः वस्तुओं के मूल्य अवश्यमेव प्रभावित होते हैं।

(ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी-वस्तुओं का मूल्य माँग और पूर्ति पर आधारित होता है। जब बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है तो उनके मूल्य बढ़ जाते हैं। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से भी व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा कर देते हैं, जिसके कारण महँगाई बढ़ जाती है।

(घ) मुद्रा-प्रसार-जैसे-जैसे देश में मुद्रा-प्रसार बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ही महँगाई बढ़ती जाती है। तृतीय पंचवर्षीय योजना के समय से ही हमारे देश में मुद्रा-प्रसार की स्थिति रही है, परिणामतः वस्तुओं के मूल्य बढ़ते ही जा रहे हैं। कभी जो वस्तु एक रुपए में मिला करती थी उसके लिए अब लगभग सौ रुपए तक खर्च करने पड़ जाते हैं।

(ङ) प्रशासन में शिथिलता–सामान्यत: प्रशासन के स्वरूप पर ही देश की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। यदि प्रशासन शिथिल पड़ जाता हैं तो मूल्य बढ़ते जाते हैं, क्योंकि कमजोर शासन व्यापारी वर्ग पूर नियन्त्रण नहीं रख पाता। ऐसी स्थिति में वस्तुओं के मूल्यों में अनियन्त्रित और निरन्तर वृद्धि होती रहती है।

(च) घाटे का बजट-विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु सरकार को बहुत अधिक मात्रा में पूँजी की व्यवस्था करनी पड़ती है। पूँजी की व्यवस्था करने के लिए सरकार अन्य उपायों के अतिरिक्त घाटे की बजट प्रणाली को भी अपनाती है। घाटे की यह पूर्ति नये नोट छापकर की जाती है, परिणामत: देश में मुद्रा की पूर्ति आवश्यकता से अधिक हो जाती है। जब ये नोट बाजार में पहुंचते हैं तो वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि करते हैं।

(छ) असंगठित उपभोक्ता-वस्तुओं का क्रय करने वाला उपभोक्ता वर्ग प्रायः असंगठित होता है, जबकि विक्रेता या व्यापारिक संस्थाएँ अपना संगठन बना लेती हैं। ये संगठन इस बात का निर्णय करते हैं। कि वस्तुओं का मूल्य क्या रखा जाए और उन्हें कितनी मात्रा में बेचा जाए। जब सभी सदस्य इन नीतियों का पालन करते हैं तो वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने लगती है। वस्तुओं के मूल्यों में होने वाली इस वृद्धि से उपभोक्ताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

(ज) धन का असमान वितरण-हमारे देश में धन का असमान वितरण महँगाई का मुख्य कारण है। जिनके पास पर्याप्त धन है, वे लोग अधिक पैसा देकर साधनों और सेवाओं को खरीद लेते हैं। व्यापारी धनवानों की इस प्रत्ति का लाभ उठाते हैं और महँगाई बढ़ती जाती है। वस्तुतः विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विषमताओं एवं समाज में व्याप्त अशान्ति पूर्ण वातावरण का अन्त करने के लिए धन का समान वितरण होना आवश्यक है। कविवरै दिनकर के शब्दों में भी–

शान्ति नहीं तब तक, जब तक
सुख भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो ।
नहीं किसी को कम हो।

(3) महँगाई के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ-महँगाई नागरिकों के लिए अभिशाप स्वरूप है। हमारा देश एक गरीब देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या के आय के साधन सीमित हैं। इस कारण साधारण नागरिक और कमजोर वर्ग के व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। बेरोजगारी इस कठिनाई को और भी अधिक जटिल बना देती है। व्यापारी अपनी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव कर देते हैं। इसके कारण वस्तुओं के मूल्य में अनियन्त्रित वृद्धि हो जाती है। परिणामत: कम आय वाले व्यक्ति बहुत-सी वस्तुओं और सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। महँगाई के बढ़ने से कालाबाजारी को प्रोत्साहन मिलता है। व्यापारी अधिक लाभ कमाने के लिए वस्तुओं को अपने गोदामों में छिपा देते हैं। महँगाई बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाती है।

(4) महँगाई को दूर करने के लिए सुझाव–यदि महँगाई इसी दर से ही बढ़ती रही तो देश के आर्थिक विकास में बहुत-सी बाधाएँ उपस्थित हो जाएँगी। इससे अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ भी जन्म लेंगी; अतः महँगाई के इस दानव को समाप्त करना परम आवश्यक है।

महँगाई को दूर करने के लिए सरकार को समयबद्ध कार्यक्रम बनाने होंगे। किसानों को सस्ते मूल्य पर खाद, बीज और उपकरण आदि उपलब्ध कराने होंगे, जिसमें कृषि उत्पादनों के मूल्य कम हो सकें। मुद्रा-प्रसार को रोकने के लिए घाटे के बजट की व्यवस्था समाप्त करनी होगी अथवा घाटे को पूरा करने के लिए नये नोट छपवाने की प्रणाली को बन्द करना होगा। जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए अनवरत प्रयास करने होंगे। सरकार को इस बात का भी प्रयास करना होगा कि शक्ति और साधन कुछ विशेष लोगों तक सीमित न रह जाएँ और धन का उचित रूप में बँटवारा हो सके। सहकारी वितरण संस्थाएँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इन सभी के लिए प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त और कर्मचारियों को पूरी निष्ठा तथा कर्तव्यपरायणता के साथ कार्य करना होगा।

(5) उपसंहार-महँगाई की वृद्धि के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की जटिलताएँ उत्पन्न हो गयी हैं। घाटे की अर्थव्यवस्था ने इस कठिनाई को और अधिक बढ़ा दिया है। यद्यपि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किये जाने वाले प्रयासों द्वारा महँगाई की इस प्रवृत्ति को रोकने का 3 निरन्तर प्रयास किया जा रहा है, तथापि इस दिशा में अभी तक पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी है।

यदि समय रहते महँगाई के इस दानव को वश में नहीं किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और हमारी प्रगति के समस्त मैसर्ग बन्द हो जाएँगे, भ्रष्टाचार अपनी जड़े जमा लेगा और नैतिक मूल्य पूर्णतया समाप्त हो जाएँगे।

गंगा प्रदूषण

सम्बद्ध शीर्षक

  • जल-प्रदूषण
  • देश की भलाई : गंगा की सफाई

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. गंगा-जल के प्रदूषण के प्रमुख कारण-औद्योगिक कचरा व रसायन तथा मृतक एवं उनकी अस्थियों का विसर्जन,
  3. गंगा प्रदूषण दूर करने के उपाय,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना-देवनदी गंगा ने जहाँ जीवनदायिनी के रूप में भारत को धन-धान्य से सम्पन्न बनाया है। वहीं माता के रूप में इसकी पावन धारा ने देशवासियों के हृदयों में मधुरता तथा सरसता का संचार किया है। गंगा मात्र एक नदी नहीं, वरन् भारतीय जन-मानस के साथ-साथ समूची भारतीयता की आस्था का जीवंत प्रतीक है। हिमालय की गोद में पहाड़ी घाटियों से नीचे कल्लोल करते हुए मैदानों की राहों पर प्रवाहित होने : वाली गंगा पवित्र तो है ही, वह मोक्षदायिनी के रूप में भी भारतीय भावनाओं में समाई है। भारतीय सभ्यतासंस्कृति का विकास गंगा-यमुना जैसी अनेकानेक पवित्र नदियों के आसपास ही हुआ है। गंगा-जल वर्षों तक बोतलों, डिब्बों आदि में बन्द रहने पर भी खराब नहीं होता था। आज वही भारतीयता की मातृवत पूज्या गंगा प्रदूषित होकर गन्दे नाले जैसी बनती जा रही है, जोकि वैज्ञानिक परीक्षणगत एवं अनुभवसिद्ध तथ्य है। गंगा के बारे में कहा गया है:

नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस-धारा,
बहती है क्या कहीं और भी, ऐसी पावन कल-कल धारा।

गंगा-जल के प्रदूषण के प्रमुख कारण–पतितपावनी गंगा के जल के प्रदूषित होने के बुनियादी कारणों में से एक कारण तो यह है कि प्रायः सभी प्रमुख नगर गंगा अथवा अन्य नदियों के तट पर और उसके आस-पास बसे हुए हैं। उन नगरों में आबादी का दबाव बहुत बढ़ गया है। वहाँ से मूल-मूत्र और गन्दे पानी की निकासी की कोई सुचारु व्यवस्था न होने के कारण इधर-उधर बनाये गये छोटे-बड़े सभी गन्दे नालों के माध्यम से बहकर वह गंगा या अन्य नदियों में आ मिलता है। परिणामस्वरूप कभी खराब न होने वाला गंगाजल भी आज बुरी तरह से प्रदूषित होकर रह गया है।

औद्योगिक कचरा व रसायन-वाराणसी, कोलकाता, कानपुर आदि न जाने कितने औद्योगिक नगर गंगा के तट पर ही बसे हैं। यहाँ लगे छोटे-बड़े कारखानों से बहने वाला रासायनिक दृष्टि से प्रदूषित पानी, कचरा आदि भी गन्दे नालों तथा अन्य मार्गों से आकर गंगा में ही विसर्जित होता है। इस प्रकार के तत्त्वों ने जैसे वातावरण को प्रदूषित कर रखा है, वैसे ही गंगाजल को भी बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है।

मृतक एवं उनकी अस्थियों का विसर्जन–वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि सदियों से आध्यात्मिक भावनाओं से अनुप्राणित होकर गंगा की धारा में मृतकों की अस्थियाँ एवं अवशिष्ट राख तो बहाई जही रही है, अनेक लावारिस और बच्चों के शव भी बहा दिये जाते हैं। बाढ़ आदि के समय मरे पशु भी धारा में आ मिलते हैं। इन सबने भी गंगा-जल-प्रदूषण की स्थितियाँ पैदा कर दी हैं। गंगा के प्रवाह स्थल और आसपास से वनों का निरन्तर कटाव, वनस्पतियों, औषधीय तत्त्वों का विनाश भी प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण है। गंगा-जल को प्रदूषित करने में न्यूनाधिक इन सभी का योगदान है।

गंगा प्रदूषण दूर करने के उपाय–विगत वर्षों में गंगा-जल का प्रदूषण समाप्त करने के लिए एक योजना बनाई गई थी। योजना के अन्तर्गत दो कार्य मुख्य रूप से किए जाने का प्रावधान किया गया था। एक तो यह कि जो गन्दे नाले गंगा में आकर गिरते हैं या तो उनकी दिशा मोड़ दी जाए या फिर उनमें जलशोधन करने वाले संयन्त्र लगाकर जल को शुद्ध साफ कर गंगा में गिरने दिया जाए। शोधन से प्राप्त मलबा बड़ी उपयोगी खाद का काम दे सकता है। दूसरा यह कि कल-कारखानों में ऐसे संयन्त्र लगाए जाएँ जो उस जल का शोधन कर सकें तथा शेष कचरे को भूमि के भीतर दफन कर दिया जाए। शायद ऐसा कुछ करने का एक सीमा तक प्रयास भी किया गया, पर काम बहुत आगे नहीं बढ़ सका, जबकि गंगा के साथ जुड़ी. भारतीयता का ध्यान रख इसे पूर्ण करना बहुत आवश्यक है।

आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टि अर्पनाकर तथा अपने ही हित में गंगा-जल में शव बहाना बन्द किया जा सकता है। धारा के निकासंस्थल के आसपास वृक्षों, वनस्पतियों आदि का केटाव कठोरता से प्रतिबंधित कर कटे स्थान पर उनका पुनर्विकास कर पाना आज कोई कठिन बात नहीं रह गई है। अन्य ऐसे कारक तत्त्वों का भी थोड़ा प्रयास करके निराकॅरण किया जा सकता है, जो गंगा-जल को प्रदूषित कर रहे हैं। भारत सरकार भी जल-प्रदूषण की समस्यों के प्रति जागरूक है और इसने सन् 1974 में ‘जल-प्रदूषण निवारण अधिनियम’ भी लागू किया है।

उपसंहार- आध्यात्मिक एवं भौतिक प्रकृति के अद्भुत संगम भारत के भूलोक को गौरव तथा प्रकृति का पुण्य स्थल कहा गया है। इस भारत-भूमि तथा भारतवासियों में नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार करने का श्रेय गंगा नदी को जाता है।

“गंगा आदि नदियों के किनारे भीड़ छवि पाने लगी।
मिलकर जल-ध्वनि में गल-ध्वनि अमृत बरसाने लगी।
– सस्वर इधर श्रुति-मंत्र लहरी, उधरे जल-लहरी कहाँ ।
तिस पर उमंगों की तरंगें, स्वर्ग में भी क्या रहा?”

गंगा को भारत की जीवन-रेखा तथा गंगा की कहानी को भारत की.कहानी माना जाता है। गंगा की महिमा अपार है। अत: गंगा की शुद्धता के लिए प्राथमिकता से प्रयास किये जाने चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi रस

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name रस
Number of Questions 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi रस

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  1. श्रृंगार (संयोग व विप्रलम्भ) रस,
  2. हास्य रस,
  3. करुण रस,
  4. वीर रस,
  5. रौद्र रस,
  6. भयानक रस,
  7. वीभत्स रस,
  8. अद्भुत रस तथा
  9. शान्त रस। कुछ विद्वान् ‘वात्सल्य रस’ और ‘भक्ति रस को भी उपरि-निर्दिष्ट नव रसों की श्रृंखला में ही मानते हैं।


[विशेष—माध्यमिक शिक्षा परिषद्, उ० प्र० द्वारा निर्धारित नवीनतम पाठ्यक्रम में आगे दिये जा रहे पाँच रस ही निर्धारित हैं।]

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उदाहरण 2-

कौन हो तुम वसन्त के दूत
विरस पतझड़ में अति सुकुमार ;

घन तिमिर में चपला की रेख
तपन में शीतल मन्द बयार ।( काव्यांजलि : श्रद्धा-मनु)

स्पष्टीकरण-इस प्रकरण में रति स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव है–श्रद्धा (विषय) और मनु (आश्रय)। उद्दीपन विभाव है-एकान्त प्रदेश, श्रद्धा की कमनीयता, शीतल-मन्द पवन। हृदय में शान्ति का • मिलना अनुभाव है। आश्रय मनु के हर्ष, उत्सुकता आदि भाव संचारी भाव हैं। इस प्रकार अनुभावविभावादि से पुष्ट रति नामक स्थायी भाव संयोग श्रृंगार रस की दशा को प्राप्त हुआ है।।

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उदाहरण 2-

मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले
जाके आये न मधुबन से औ न भेजा सँदेशा।

मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।
जा के मेरी सब दुःख-कथा श्याम को तू सुना दे॥  ( काव्यांजलि : पवन-दूतिका)

स्पष्टीकरण-इस छन्द में विरहिण-राधा की विरह-दशा का वर्णन किया गया है। ‘रति’ स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं—राधा (आश्रय) और श्रीकृष्ण (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं-मेघ जैसी शोभा और कमल जैसे नेत्रों का स्मरणं। श्रीकृष्ण के विरह में रुदन अनुभाव है। स्मृति, आवेग, उन्माद आदि संचारियों से पुष्ट श्रीकृष्ण से मिलने के अभाव में यहाँ वियोग श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

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उदाहरण:2-

बिंध्य के वासी उदासी तपोब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतमतीय तरी तुलसी, सो कथा सुनि भे मुनिबृन्द सुखारे॥

हैहैं सिला सब चंद्रमुखी परसे पदमंजुल-कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायकजू करुना करि कानन को पगु धारे॥ ( हिन्दी : वन पथ पर)

[विशेष—पाठ्यक्रम में संकलित अंश में हास्य रस का उदाहरण दृष्टिगत नहीं होता। अतः 10वीं की पाठ्य-पुस्तक से उदाहरण दिया जा रहा है।

स्पष्टीकरण—इस छन्द में विन्ध्याचल के तपस्वियों की मनोदशा का वर्णन किया गया है। यहाँ ‘हास’ स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं–विन्ध्य के उदास तपस्वी (आश्रय) और राम (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं—गौतम की स्त्री का उद्धार। मुनियों का कथा आदि सुनना अनुभाव हैं। हर्ष, उत्सुकता आदि संचारी भावों से पुष्ट प्रस्तुत छन्द में हास्य रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।

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उदाहरण 2-

क्यों छलक रहा दुःख मेरा
ऊषा की मृदु पलकों में
हाँ! उलझ रहा सुख मेरा
सन्ध्या की घन अलकों में । ( काव्यांजलि : आँसू)

स्पष्टीकरण-प्रस्तुत पद में कवि के अपनी प्रेयसी के विरह में रुदन का वर्णन किया गया है। इसमें कवि के हृदय का ‘शोक’ स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं—प्रेमी, यहाँ पर कवि (आश्रय) तथा प्रियतमा (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं—अन्धकाररूपी केश-पाश तथा सन्ध्या। कवि के हृदय से नि:सृत उद्गार अनुभाव हैं। अश्रुरूपी प्रात:कालीन ओस की बूंदें संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट शोक नामक स्थायी भाव करुण रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

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उदाहरण 2-

साजि चतुरंग सैन अंग, में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ॥( काव्यांजलि : शिवा-शौर्य)

स्पष्टीकरण-प्रस्तुत पद में शिवाजी की चतुरंगिणी सेना के प्रयाण का चित्रण है। इसमें ‘शिवाजी के हृदय का उत्साह’ स्थायी भाव है। ‘युद्ध को जीतने की इच्छा आलम्बन है। ‘नगाड़ों का बजना’ उद्दीपन है। ‘हाथियों के मद का बहना’ अनुभाव है तथा उग्रता’ संचारी भाव है। इन सबसे पुष्ट ‘उत्साह’ नामक स्थायी भाव वीर रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

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उदाहरण 1

मन पछितैहै अवसर बीते ।
दुर्लभ देह पाई हरिपद भजु, करम वचन अरु होते ॥
अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़-त्यागु दुरासा जीते ॥
बुझे न काम अगिनी तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु धी ते ॥

स्पष्टीकरण–यहाँ तुलसी (या पाठक)–आश्रय हैं; संसार की असारता आलम्बन; अपना मनुष्य जन्म व्यर्थ होने की चिन्ता–उद्दीपन; मति-धृति आदि संचारी एवं वैराग्यपरक वचन–अनुभाव हैं। इनसे मिलकर शान्त रस की निष्पत्ति हुई है।

उदाहरण 2

अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।
रामकृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिर न डसैहौं ।

पायो नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥
परबस जानि हँस्यों इन इंद्रिन, निज बस छै न हसैहौं ।
मन-मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद-कमल बसैहौं ॥ ( काव्यांजलिः विनयपत्रिका)

स्पष्टीकरण—प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी की जगत् के प्रति विरक्ति और श्रीराम के प्रति अनुराग मुखर हुआ है। इस पद में संसार से पूर्ण विरक्ति अर्थात् ‘निर्वेद’ नामक स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं—तुलसीदास (अश्रय) तथा श्रीराम की भक्ति (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं-श्रीराम की कृपा, सांसारिक असारता त इन्द्रियों द्वारा उपहास। स्वतन्त्र होना, राम के चरणों में रत होना, सांसारिक विषयों में पुनः निर्लिप्त न होना आदि से सम्बद्ध कथन अनुभाव हैं। निर्वेद, हर्ष, स्मृति आदि संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट ‘निर्वेद’ नामक स्थायी भाव शान्त रस की अवस्था को प्राप्त हुआ है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पद्यांशों में कौन-से रस हैं ? प्रत्येक का स्थायी भाव भी बताइए-
(क) साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
(ख) कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात |
भरे भौन मैं करत हैं, नैननु हीं स बात ।।
(ग) कौन हो तुम वसंत के दूत
‘विरस पतझड़ में अति सुकुमार;
घन तिमिर में चपला की रेख
तपन में शीतल मन्द बयार ?
(घ) आये होंगे यदि भरत कुमति-वश वन में,
तो मैंने यह संकल्प किया है मन में-
उनको इस शर का लक्ष चुनँगा क्षण में,
प्रतिषेध आपका भी न सुनँगा रण में ।
(ङ) सुख भोग खोजने आते सब, आये तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन, तुम आत्मा के, मन के मनोज
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर, चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया, तुमने मानवता का सरोज ।
उत्तर:
(क) इसमें वीर रस है, जिसका स्थायी भाव उत्साह है।
(ख) इसमें संयोग श्रृंगार रस है, जिसका स्थायी भाव रति है।
(ग) इसमें संयोग श्रृंगार रसे है, जिसका स्थायी भाव रति है।
(घ) इसमें वीर रस है, जिसका स्थायी भाव उत्साह है।
(ङ) इसमें शान्त रस है, जिसका स्थायी भाव निर्वेद है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–
(क) अपनी पाठ्य-पुस्तक से करुण रस की दो पंक्तियाँ लिखिए। यह भी स्पष्ट कीजिए कि आप इसे करुण रस की रचना क्यों मानते हैं ?
(ख) हास्य रस की निष्पत्ति कब होती है ? अपनी पाठ्य-पुस्तक से उदाहरण देकर समझाइए।
(ग) अपनी पाठ्य-पुस्तक से वीर रस को बतलाने के लिए किसी पद की दो पंक्तियाँ लिखिए और स्पष्ट कीजिए कि उसे वीर रस की रचना क्यों मानते हैं?
(घ) अपनी पाठ्य-पुस्तक से करुण रस का लक्षण लिखिए और उसका उदाहरण दीजिए।
(ङ) अपनी पाठ्य-पुस्तक से शान्त रस की दो पंक्तियाँ लिखिए और यह भी स्पष्ट कीजिए कि आप इसे शान्त रस की रचना क्यों मानते हैं ?
(च) वीर रस का लक्षण लिखिए और अपनी पाठ्य-पुस्तक के आधार पर उसका उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
(छ) विप्रलम्भ श्रृंगार अथवा शान्त रस का लक्षण लिखिए और एक उदाहरण दीजिए।
(ज) अपनी पाठ्य-पुस्तंक से वीर रस की दो पंक्तियाँ लिखिए। रस के आलम्बन और आश्रय की ओर भी संकेत कीजिए।
(झ) संयोग श्रृंगार अथवा वीर रस का लक्षण लिखिए और एक उदाहरण दीजिए।
(ञ) श्रृंगार और करुण में से किसी एक रस का लक्षण और उदाहरण लिखिए।
(ट) “कृरुण’ अथवा ‘वीर’ रस के लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
[संकेत इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए इन रसों से सम्बन्धित सामग्री का अध्ययन ‘रस’ प्रकरण के अन्तर्गत प्रश्न 2 से करें]

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name वाक्यों में त्रुटि-मार्जन
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi वाक्यों में त्रुटि-मार्जन

नवीनतम पाठ्यक्रम में वाक्यों में त्रुटि-मार्जन अर्थात् वाक्य-संशोधन को सम्मिलित किया गया है। इसमें लिंग, वचन, कारक, काल तथा वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियों के संशोधन कराये जाते हैं। इसके लिए कुल 2 अंक निर्धारित हैं।

वाक्य भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई होती है। यदि वाक्य-रचना निर्दोष हो तो वक्ता/लेखक का आशय श्रोता/पाठक को समझने में कठिनाई नहीं होती। दोषपूर्ण वाक्य से आशय स्पष्ट नहीं हो पाता; अतः वाक्य-रचना का निर्दोष होना अत्यन्त आवश्यक है। वाक्य-रचना में दोष अनेक कारणों से हो सकते हैं। यदि वाक्य में लिंग, वचन, पुरुष, काल, वाच्य, विभक्ति, शब्दक्रम आदि में कोई भी दोषपूर्ण हुआ तो वाक्य सदोष हो जाता है। शुद्ध वाक्य-रचना के लिए व्याकरण-ज्ञान परमावश्यक है। वाक्य-रचना की अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं-

  1. अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  2. पदक्रम सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  3. वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  4. पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  5. पदों की अनुपयुक्तता सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  6. वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ।

(1) अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियाँ
वाक्यों में पदों की एकरूपता (लिंग, वचन, पुरुष आदि) के साथ क्रिया की भी अनुरूपता होनी चाहिए। हिन्दी में पदों की क्रिया के साथ इसी अनुरूपता अर्थात् अन्विति के कुछ विशेष नियम हैं-
(क) कर्ता-क्रिया की अन्विति
(1) विभक्तिरहित कर्ता वाले वाक्य की क्रिया सदा कर्ता के अनुसार होती है। यदि कर्ता के साथ ‘ने’ विभक्ति चिह्न जुड़ा हो तो सकर्मक क्रिया कर्म के लिंग, वचन के अनुसार होती है; जैसे

  • लड़का पुस्तक पढ़ता है। (कर्ता के अनुसार)
  • लड़की पत्र पढ़ती है। (कर्ता के अनुसार)
  • लड़के ने पुस्तक पढ़ी। (कर्म के अनुसार)
  • लड़की ने पत्र पढ़ा। (कर्म के अनुसार)

(2) कर्ता और कर्म दोनों विभक्ति-चिह्नसहित हों तो क्रिया पुंल्लिग एकवचन में होती है; जैसे-

  • प्रधानाचार्य ने अध्यापिका को बुलाया।
  • नेताओं ने किसानों को समझाया।

(3) यदि समान लिंग के विभक्ति-चिह्नरहित अनेक कर्ता पद ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया उसी लिंग की तथा बहुवचन में होती है; जैसे–

  • स्वाति, चित्रा और मधु आएँगी।
  • डेविड, नीरज और असलम खेल रहे हैं।

(4) ‘या’ से जुड़े विभक्तिरंहित कर्ता पदों की क्रिया अन्तिम कर्ता के अनुसार होती है; जैसे-
भाई या बहन आएगी।
(5) विभिन्न लिंगों के अनेक कर्त्ता यदि ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया पुंल्लिग बहुवचन में होती है; जैसे-
गणतन्त्र दिवस की परेड को लाखों बालक, वृद्ध और नारी देख रहे थे।
(6) यदि कर्ता भिन्न-भिन्न पुरुषों के हों तो उनका क्रम होगा—पहले मध्यम पुरुष, फिर अन्य पुरुष और अन्त में उत्तम पुरुष। क्रिया अन्तिम कर्ता के लिंग के अनुसार बहुवचन में होगी; जैसे-

  • तुम, गीता और मैं नाटक देखने चलेंगे।
  • तुम, विकास और मैं टेनिस खेलेंगे।

(7) कर्ता का लिंग अज्ञात हो तो क्रिया पुंल्लिग में होगी; जैसे-

  • देखो, कौन आया है ?
  • तुम्हारा पालन-पोषण कौन करता है ?

(8) आदर देने के लिए एकवचन कर्ता के लिए भी क्रिया बहुवचन में प्रयुक्त होती है; जैसे-

  • मुख्यमन्त्री भाषण दे रहे हैं।
  • महात्मा गाँधी राष्ट्रपिता माने जाते हैं।

(9) सम्बन्ध कारक का लिंग उसके सम्बन्धी के लिंग के अनुसार होता है–यदि ये लोग भिन्न-भिन्न लिंग के हों तथा ‘और’ से जुड़े हों तो संज्ञा-सर्वनाम का लिंग प्रथम सम्बन्धी के अनुसार होगा; जैसे—

  • मेरा बेटा और बेटी दिल्ली गये हैं।
  • मेरे भाई-बहन पढ़ रहे हैं।
  • तुम्हारे भाई और बहन आजकल क्या कर रहे हैं ?

(ख) कर्म और क्रिया की अन्विति
(1) यदि कर्ता ‘को’ प्रत्यय से जुड़ा हो तथा कर्म के स्थान पर कोई क्रियार्थक संज्ञा प्रयुक्त हुई हो तो क्रिया सदैव एकवचन, पुंल्लिग तथा अन्य पुरुष में होगी; जैसे

  • उसे (उसको) पुस्तक पढ़ना नहीं आता।
  • तुम्हें (तुमको) बात करने नहीं आता।

(2) यदि वाक्य में कर्ता ‘ने’ विभक्ति से युक्त हो तथा कर्म की ‘को’ विभक्ति प्रयुक्त नहीं हुई हो तो वाक्य की क्रिया कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार प्रयुक्त होगी; जैसे-

  • श्याम ने पुस्तक पढ़ी।
  • श्यामा ने क्षमा माँगी।

(3) यदि एक ही लिंग और वचन के अनेक अप्रत्यय कर्म एक साथ एक वचन में आयें तो क्रिया एक वचन में होगी; जैसे

  • राघव ने एक घोड़ा और एक ऊँट खरीदा।
  • रमेश ने एक पुस्तक और एक कलम खरीदी।

(4) यदि एक ही लिंग और वचन के अनेक प्राणिवाचक अप्रत्यय कर्म एक साथ प्रयुक्त हों तो क्रिया उसी लिंग में तथा बहुवचन में प्रयुक्त होगी; जैसे-

  • महेश ने गाय और बकरी मोल लीं।
  • लक्ष्मण ने दूध के लिए गाय और भैंस खरीदीं।

(5) यदि वाक्य में भिन्न-भिन्न लिंग के एकाधिक अप्रत्यय कर्म प्रयुक्त हों तथा वे ‘और’ से जुड़े हों तो क्रिया-अन्तिम कर्म के लिंग और वचन के अनुसार प्रयुक्त होगी; जैसे-

  • रमेश ने चावल, दाल और रोटी खायी।
  • सुरेश ने रोटी, दाल और चावल खाया।

(ग) विशेषण और विशेष्य की अन्विति,
(1) विशेषण का लिंग और वचन अपने विशेष्य के अनुसार होता है; जैसे

  • यहाँ उदार और परिश्रमी लोग रहते हैं।
  • गोरे मुखड़े पर काला तिल अच्छा लगता है।

(2) यदि एक से अधिक विशेषण हों, तब भी उपर्युक्त नियम का ही पालन होता है; जैसे| वह गिरती-उठती, ऊँची-ऊँची लहरों को निहारती रही।
(3) अनेक समासरहित विशेष्यों को विशेषण निकटवर्ती विशेष्य के अनुरूप होता है; जैसे-

  • भोले-भाले बालक और बालिकाएँ।
  • भोली-भाली बालिकाएँ और बालक।

(घ) सर्वनाम और संज्ञा की अन्विति
(1) सर्वनाम उसी संज्ञा के लिंग-वचन का अनुसरण करता है, जिसके स्थान पर वह आया है; जैसे-

  • मैंने सुमन को देखा, वह आ रही थी।
  • मैंने विजय को देखा, वह आ रहा था।

(2) आदर के लिए बहुवचन सर्वनाम का प्रयोग होता है; जैसे-

  • दादाजी आये हैं। वे एक महीना रुकेंगे।
  • कंथावाचक व्यास जी आ चुके हैं। अब वे नियमित पन्द्रह दिन तक प्रवचन करेंगे।

(3) वर्ग का प्रतिनिधि अपने लिए ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग करता है; जैसे–

  • शिक्षा मन्त्री ने कहा कि हमें अपने देश से अशिक्षा दूर करनी है।।
  • शिक्षक ने कहा कि हमें अपने देश का गौरव बढ़ाना है।

अन्विति सम्बन्धी अशुद्धियों के उदाहरण

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(2) पदक्रम सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाक्य पदों और पदबन्धों से बनता है। वाक्य के साँचे में पदों का क्या क्रम हो, इसके कुछ निश्चित नियम हैं-
(1) प्रायः कर्तापद वाक्य में सबसे पहले आता है और क्रियापद सबसे अन्त में; जैसे–

  • भिखारी आ रहा है।
  • सूर्योदय हो गया।

(2) सम्बोधन और विस्मयसूचक पद वाक्य के प्रारम्भ में कर्ता से भी पहले आते हैं; जैसे-

  • अरे ! भिखारी आ रहा है।
  • अहा ! सूर्योदयं हो गया।

(3) कर्मपद कर्ता और क्रियापदों के बीच रहता है; जैसे।

  • राजेश पाठ पढ़ाता है।
  • बच्चे ने गीत सुनाया।

(4) सम्बन्धकारक अपने सम्बन्धी शब्द से पूर्व आता है; जैसे-

  • भिखारी के बच्चे ने रहीम का पद सुनाया।
  • वह तुम्हारा नाम पूछ रहा था।

(5) प्रश्नवाचक पद प्रश्न के विषय में पूर्व आता है; जैसे-

  • कौन खड़ा है ? (कर्ता पर प्रश्न)
  • तुम क्या खा रही हो ? (कर्म पर प्रश्न)
  • वह कैसे आया ? (रीति पर प्रश्न)

(6) कर्ता और कर्म को छोड़कर शेष सभी कारक कर्ता-कर्म के बीच आते हैं। एक से अधिक कारक रूप होने पर ये उल्टे क्रम में (पहले अधिकरण) रखे जाते हैं; जैसे-

  • मजदूर खेत में रहट से सिंचाई कर रहे थे।
  • छात्र मैदान में अपने मित्रों के साथ हॉकी खेलने लगे।

(7) पूर्वकालिक क्रिया, मुख्य क्रिया से पहले आती है; जैसे-

  • कल पढ़कर आइए।
  • कल मुँह धोकर आना।।

(8) ‘न’ या ‘नहीं’ का प्रयोग निषेध के अर्थ में हो तो क्रिया से पूर्व और आग्रह के अर्थ में हो तो क्रिया के बाद होता है; जैसे-

  • मैं नहीं जाऊँगा।
  • तुम आओ न।।

(9) पदक्रमों में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वाक्य के विभिन्न पदों में ऐसी तर्कसंगत निकटता होनी चाहिए, जिससे कि वाक्य द्वारा अपेक्षित अर्थ स्पष्ट हो। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वाक्य देखें-

  • फल बच्चे को काटकर खिलाओ।
  • गर्म गाय का दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।

उपर्युक्त दोनों वाक्यों का अर्थ अटपटा और हास्यास्पद है। इन वाक्यों का उचित क्रम होगा

  • बच्चे को फल काटकर खिलाओ।
  • गाय का गर्म दूध स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।

अन्य उदाहरण

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(3) वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वाच्य सम्बन्धी अशुद्धियों से भाषा का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है। इस प्रकार की अशुद्धियों से अर्थ का अनर्थ होने का भय प्रायः कम ही रहता है। इस प्रकार की अशुद्धियों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं–

अशुद्ध वाक्य

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(4) पुनरुक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ

पीछे दिये गये तीन भेदों के अतिरिक्त वाक्य में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी मिलती हैं, जिनके मूल में एक ही घटक को दो भिन्न रीतियों से एक साथ उद्धृत किया गया होता है; जैसे-

(क) मुझे केवल दस रुपये मात्र मिले। (अशुद्ध)
(ख) मुझे केवल दस रुपये मिले। (शुद्ध)
(ग) मुझे दस रुपये मात्र मिले। (शुद्ध)

यहाँ प्रथम वाक्य अशुद्ध है; क्योंकि केवल’ शब्द के अर्थ को दो विभिन्न रीतियों के माध्यम से एक साथ प्रयुक्त कर दिया गया है। ऐसी अशुद्धियों के मूल में पुनरावृत्ति या पुनरुक्ति की भावना रहती है। आगे कुछ उदाहरणों की सहायता से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा रहा है-
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(5) पदों की अनुपयुक्तता सम्बन्धी अशुद्धियाँ

कई बार लिखते समय हम वाक्यों में पदों के अनुपयुक्त रूपों का प्रयोग करके उन्हें अशुद्ध बना देते हैं। इस प्रकार की अशुद्धियों से बचने के लिए व्याकरण का ज्ञान होना अति आवश्यक है। पद-भेदों के अनुसार इस प्रकार की अशुद्धियों के भी अनेक भेद हैं, जिन्हें उदाहरणसहित यहाँ समझाया जा रहा है। दिये गये उदाहरणों में अनुपयुक्त पद को मोटे अक्षरों में अंकित किया गया है और उनके उपयुक्त (शुद्ध) रूप को वाक्य के सम्मुख कोष्ठक में दिया गया है।
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(6) वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ

वर्तनी का शाब्दिक अर्थ है-वर्तन यानि अनुवर्तन करना अर्थात् पीछे-पीछे चलना। लेखन-व्यवस्था में वर्तनी शब्द-स्तर पर शब्द की ध्वनियों का अनुवर्तन करती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शब्द-विशेष के लेखन में शब्द की एक-एक करके आने वाली ध्वनियों के लिए लिपि-चिह्नों के क्या रूप हों और उनका कैसा संयोजन हो यह वर्तनी (वर्ण-संयोजन) का कार्य है।

वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ प्रायः निम्नलिखित कारणों से होती हैं—

(1) असावधानी अथवा शीघ्रता--वर्तनी सम्बन्धी अधिकांश अशुद्धियाँ असावधानी व शीघ्रता के कारण ही होती हैं। बहुत बार अच्छी तरह से ज्ञात शब्द के लिखने में भी अशुद्धि हो जाती है; जैसे-गौण का गौड़, धन का घन, पत्ता का पता आदि। ऐसी भूलों के निवारण के लिए यही सलाह दी जा सकती है कि लेखन-कार्य अत्यधिक सावधानी से करना चाहिए।

(2) उच्चारण-हिन्दी भाषा की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह जैसे बोली जाती है, वैसे ही लिखी जाती है और जैसे लिखी जाती है वैसे ही पढ़ी या बोली भी जाती है। उच्चारण अवयव में दोष, बोलने में अंसावधानी, शुद्ध उच्चारण का ज्ञान न होने आदि कारणों से उच्चारण में अन्तर आ जाता है और इस भूल का निराकरण न होने तक वर्तनी से सम्बन्धित अशुद्धियाँ होती ही रहती हैं।

(3) स्थानिक प्रभाव-भाषा का सौन्दर्य और सौष्ठव उसके गठन और उच्चारण की शुद्धता पर आधारित होता है। शुद्ध उच्चारण से ही भाषा का लिखित रूप (वर्तनी) शुद्ध होता है। अंग्रेजी बोलने वाला कितना ही अभ्यास कर ले, जब भी वह हिन्दी बोलेगा, उसके उच्चारण में अंग्रेजी का पुट जाने-अनजाने आ ही जाएगा। यही स्थिति हिन्दी में भी होती है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, दिल्ली व हरियाणा के निवासी ‘क, ख, ग’ को ‘कै, खै, गै, बोलते हैं, जबकि पूर्वी अंचल में इसका अभ्यास ‘क, खे, ग’ का ही विकसित होता है। स्वाभाविक है कि क्षेत्र-विशेष के उच्चारण का प्रभाव लिखने पर भी पड़ता है; परिणामस्वरूप वर्तनी में भी ऐसी ही भूलें दिखाई देती हैं। हिन्दी भाषा में वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ निम्नलिखित प्रकार की होती हैं-

  • स्वर (मात्रा) सम्बन्धी
  • व्यंजन सम्बन्धी
  • सन्धि सम्बन्धी
  • समास सम्बन्धी
  • विसर्ग सम्बन्धी तथा
  • हलन्त सम्बन्धी

वर्तनी से सम्बन्धित उपर्युक्त समस्त बिन्दुओं पर विवरण देना यहाँ नितान्त अप्रासंगिक है और परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी भी नहीं है। विद्यार्थियों से तो इतनी ही अपेक्षा है कि वे हिन्दी को अधिक-से-अधिक शुद्ध रूप में लिखें। इसके लिए उन्हें अधिकाधिक हिन्दी लिखने का अभ्यास करना चाहिए। हिन्दी की स्तरीय पुस्तकों का अध्ययन इसमें सहायक सिद्ध होगा।

अशुद्धियों के बहु-प्रचलित कुछ उदाहरण

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्य-साहित्य विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name काव्य-साहित्य विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Number of Questions 133
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्य-साहित्य विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

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उपर्युक्त काल-विभाजन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी-साहित्य का इतिहास के आधार पर दिया गया है।
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प्रश्न 4.
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प्रश्न 5.
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प्रश्न 6.
श्रव्य काव्य के कौन-कौन से भेद होते हैं ?
उत्तर:
श्रव्य काव्य के दो भेद होते हैं—

  1. प्रबन्ध काव्य और
  2. मुक्तक काव्य।

प्रश्न 7.
दृश्य काव्य तथा अव्य काव्य का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
दृश्य काव्य का रंगमंच पर अभिनय किया जा सकता है, जब कि श्रव्य काव्य का अभिनय नहीं किया जा सकता। दृश्य काव्य का आनन्द उसे देखकर अथवा सुनकर लिया जा सकता है, जब कि श्रव्ये काव्य का आनन्द केवल सुनकर ही लिया जा सकता है।

प्रश्न 8.

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प्रश्न 9.
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प्रश्न 10.
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प्रश्न 11.
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प्रश्न 12.

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प्रश्न 13.
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कुछ विद्वान् हिन्दी का प्रथम कवि ‘पृथ्वीराज रासो’ के रचयिता चन्दबरदायी को मानते हैं।

प्रश्न 14.
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प्रश्न 15.
आदिकाल (वीरगाथाकाल) के प्रमुख कवियों और उनकी कृतियों के नाम बताइए।
या
आदिकाल की रचना है
या
आदिकाल के रचनाकार हैं।
या
आदिकाल के दो रचनाकारों के नाम लिखिए।

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प्रश्न 16.
वीरगाथाकाल (आदिकाल) की रचनाओं में वर्णित विषय का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
आदिकाल के साहित्य में रणोन्मत्त राजपूत वीरों, रणबाँकुरों, राजपूत महिलाओं, रण-स्थल के रक्तरंजित क्रियाकलापों, गर्जन-तर्जन व हाहाकार का सजीव चित्रण है।

प्रश्न 17.
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प्रश्न 18.
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प्रश्न 19.
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प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्यों के रूप में लिखी गयी हैं।

प्रश्न 20.
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उत्तर:
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प्रश्न 21.
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प्रश्न 22.
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प्रश्न 23.
जैन धर्म के चार रास ग्रन्थों और उनके रचयिताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. देवसेन रचित ‘श्रावकाचार रास’,
  2. मुनि जिनविजय कृत ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’,
  3. जिनधर्मसूरि कृत ‘स्थूलभद्र रास’ तथा
  4. विजयसेन सूरि कृत रेवंतगिरि रास।

प्रश्न 24.
नाथ साहित्य के प्रणेता कौन थे ?
उत्तर:
नाथ साहित्य के प्रणेता गोरखनाथ थे।

प्रश्न 25.
कवियों तथा उनके ग्रन्थों का सही मेल करें-
कवि-दलपति विजय, चन्दबरदाय, नरपति नाल्ह, नल्हसिंह भाट तथा जगनिक।
ग्रन्थ-पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, विजयपाल रासो, आल्ह खण्ड, खुमान रासो।
उत्तर:
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भक्तिकाल

प्रश्न 26.

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प्रश्न 27.
भक्तिकाल की प्रमुख काव्यधाराओं और उनके कवियों के नाम लिखिए।
या
भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं के नाम बताइए।

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प्रश्न 28.
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प्रश्न 29.
भक्तिकाल की निर्गुण तथा सगुण भक्तिधारा का परिचय दीजिए।
या
निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा का परिचय संक्षेप में लिखिए।
या
निर्गुण भक्ति की प्रेमाश्रयी शाखा का संक्षेप में परिचय दीजिए।

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प्रश्न 30.
ज्ञानाश्रयी निर्गुण (सन्त) काव्यधारा की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
या
भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों) का उल्लेख कीजिए।
या
ज्ञानाश्रयी भक्ति-शाखा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

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प्रश्न 31.
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प्रश्न 32.
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प्रश्न 33.
भक्तिकाल की सगुण भक्तिधारा का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर:
सगुण भक्ति में जिन्होंने भगवान् के लोकरंजक रूप को सामने रखा, वे कृष्णोपासक कहलाये तथा जिन्होंने भगवान् के दुष्ट-दलनकारी लोकरक्षक रूप को सामने रखा, वे रामभक्ति शाखा से सम्बद्ध माने गये।

प्रश्न 34.
कृष्ण-काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ बताइट।
या
भक्तिकाल की सगुण कृष्णभक्ति शाखा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  1. श्रीमद्भागवत का आधार लेकर कृष्णलीला-गान।
  2. सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य भाव की उपासना एवं लोकपक्ष की उपेक्षा।
  3. काव्य में श्रृंगार एवं वात्सल्य रसों की प्रधानता; मूल आधार कृष्ण के बाल और किशोर रूप की लीला-वर्णन।
  4. ब्रज भाषा में मुक्तक काव्य-शैली की प्रधानता, जिसमें अद्भुत संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।

प्रश्न 35.
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प्रश्न 36.
कृष्ण-काव्यधारा के प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
या
अष्टछाप के किन्हीं दो कवियों का नाम लिखिए।
उत्तर:

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प्रश्न 37.
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प्रश्न 38.
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प्रश्न 39.
भक्तिकालीन काव्य को ‘हिन्दी कविता का स्वर्ण युग’ क्यों कहा जाता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
हिन्दी साहित्य के विकास में भक्तिकाल के योगदान का उल्लेख कीजिए।
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प्रश्न 40.
भक्तिकाल में भक्तिभावना के कौन-से दो रूप मिलते हैं ?
उत्तर:
निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति।

प्रश्न 41.
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प्रश्न 42.
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प्रश्न 43.
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प्रश्न 44.
भक्तिकाल की चार प्रमुख काव्यकृतियों के नाम लिखिए।
या
भक्ति काव्यधारा की दो पुस्तकों के नाम लिखिए।
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प्रश्न 45.
निर्गुण काव्यधारा की दो शाखाएँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  1. ज्ञानाश्रयी (सन्त) काव्यधारा तथा
  2. प्रेमाश्रयी (सूफी) काव्यधारा।

प्रश्न 46.
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प्रश्न 47.
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प्रश्न 48.
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प्रश्न 49.
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प्रश्न 50.
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प्रश्न 51.
कृष्णभक्ति-शाखा के किन्हीं दो कवियों की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
प्रेमाश्रयी अथवा कृष्णकाव्य की दो प्रमुख काव्य-रचनाओं के नाम बताइए।
या
महाकवि सूरदास की दो रचनाओं के नाम लिखिए।

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प्रश्न 52.
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प्रश्न 53.
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प्रश्न 54.
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प्रश्न 55.
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प्रश्न 56.
उत्तर भारत में भक्ति-भावना को प्रवाहित करने का श्रेय किसको है ?
उत्तर:
स्वामी रामानन्द तथा महाप्रभु वल्लभाचार्य को।

प्रश्न 57.
हिन्दी काव्य के भक्तिकाल की दो प्रमुख धाराओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. निर्गुण काव्यधारा (ज्ञानमार्गी तथा प्रेममार्गी)।
  2. सगुण काव्यधारा (रामभक्ति तथा कृष्णभक्ति)।

प्रश्न 58.
ज्ञानमार्गी शाखा के दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कबीर तथा
  2. नानक

प्रश्न 59.
हिन्दी-साहित्य की भक्तिकालीन ज्ञानाश्रयी शाखा की दो विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

  1. ज्ञानाश्रयी शाखा में निर्गुण ब्रह्म की उपासना हुई तथा
  2. जाति-पाँति, रूढ़ियों और मिथ्याडम्बरों का विरोध हुआ।

प्रश्न 60.
निर्गुण भक्ति की प्रेमाश्रयी शाखा की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. यह फारसी की मसनवी शैली में रचित है तथा
  2. अवधी भाषा में काव्य-रचना हुई।

प्रश्न 61.
भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी शाखा के एक प्रमुख कवि और उसकी एक प्रमुख रचना 
(महाकाव्य) का नाम लिखिए।
या
प्रेमाश्रयी शाखा के किसी एक कवि द्वारा रचित दो ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कवि-मलिक मुहम्मद जायसी और उनकी रचना का नाम है पद्मावत (महाकाव्य) और अखरावट।।

प्रश्न 62.
रामभक्ति शाखा की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. श्रीराम की प्रतिष्ठा पूर्ण ब्रह्म के रूप में हुई है तथा
  2. यह काव्य ब्रज तथा अवधी दोनों ही भाषाओं में रचा गया।

प्रश्न 63.
भक्तिकाल की तीन सामान्य प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. जीव की नश्वरता का समान रूप से वर्णन है।
  2. प्रभु के नाम स्मरण तथा गुरु की महत्ता का वर्णन सभी कवियों ने किया है।
  3. कवियों के नामोल्लेख की प्रवृत्ति रही है।

प्रश्न 64.
तुलसीदास द्वारा विरचित दो प्रसिद्ध काव्यकृतियों के नाम लिखिए जिनमें एक अवधी तथा दूसरी ब्रजभाषा की हो।
उत्तर:

  1. श्रीरामचरितमानस-अवधी भाषा तथा
  2. विनयपत्रिका-ब्रजभाषा।

रीतिकाल

प्रश्न 65.
रीतिकालीन काव्य की प्रमुख विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) लिखिए।
या
रीतिकाल की दो प्रमुख प्रवृत्तियों को उल्लेख कीजिए।

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प्रश्न 66.
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प्रश्न 67.
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प्रश्न 68.
रीतिकाल में कौन-कौन-सी काव्यधाराएँ मिलती हैं ?
या
रीतिकालीन कविता की दोनों प्रमुख धाराओं का नाम बताइए।
उत्तर:

  1. रीतिबद्ध काव्यधारा तथा
  2. रीतिमुक्त काव्यधारा।

प्रश्न 69.
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उत्तर:
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प्रश्न 70.
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उत्तर:
रीतिकाल में वीर रस में रचना करने वाले प्रमुख कवि भूषण’ थे। उनकी प्रमुख रचनाओं के नाम है-‘शिवराज भूषण’, ‘शिवा बावनी’, ‘शिवा शौर्य’, ‘छत्रसाल दशक आदि।

प्रश्न 71.
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प्रश्न 72.
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प्रश्न 73.
रीतिकाल की पाँच प्रमुख काव्यकृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. बिहारी-सतसई,
  2. रसराज (मतिराम),
  3. शिवराजभूषण (भूषण),
  4. भावविलास (देव) तथा
  5. घनानन्द कवित्त।

प्रश्न 74.
रीतिकाल के चार रीतिबद्ध कवियों के नाम लिखिए।
या
रीतिकालीन किसी एक कवि का नाम लिखिए।

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प्रश्न 75.
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प्रश्न 76.
निम्नलिखित कवियों में से रीतिबद्ध तथा रीतिमुक्त कवियों का चुनाव कीजिए
(क) भूषण,
(ख) घनानन्द,
(ग) बिहारी,
(घ) बोधा ठाकुर,
(ङ) आचार्य केशवदास।
उत्तर:

  1. रीतिबद्ध कवि-(ङ) आचार्य केशवदास, (ग) बिहारी, (क) भूषण।
  2. रीतिमुक्त कवि-(ख) घनानन्द तथा (घ) बोधा ठाकुर।

प्रश्न 77.
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प्रश्न 78.
रीतिमुक्त काव्य से आप क्या समझते हैं ? इस काव्यधारा की मुख्य प्रवृत्तियाँ लिखिए।
उत्तर:
रीतिकालीन परम्परा पर आधारित रूढ़ियों एवं साहित्यिक बन्धनों से मुक्त काव्य को रीतिमुक्त काव्य कहा जाता है। इस काव्यधारा की मुख्य प्रवृत्तियाँ हैं—

  1. शास्त्रीय मान्यताओं एवं रूढ़ियों से मुक्त स्वच्छन्द काव्य-रचना,
  2. कल्पना की प्रचुरता एवं सांकेतिकता,
  3. अनुभूति, आवेश आदि को विशेष महत्त्व इत्यादि।

प्रश्न 79.
रीतिकाल के किन्हीं दो आचार्य कवियों के नाम लिखिए। या रीतिकाल के किसी आचार्य कवि की एक रचना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. आचार्य केशव-रामचन्द्रिका तथा
  2. आचार्य चिन्तामणि-रस-विलास।

प्रश्न 80.
रीतिकाल में काव्य-रचना जिन छन्दों में की गयी है उनमें से किन्हीं दो प्रमुख छन्दों के नाम 
लिखिए।
उत्तर:

  1. कवित्त तथा
  2. सवैया।

आधुनिककाल

प्रश्न 81.
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प्रश्न 82.

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प्रश्न 83.
भारतेन्दु युग के दो कवियों के नाम उनकी एक-एक रंचनासहित लिखिए।
या
भारतेन्दु युग के किन्हीं दो कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र–प्रेम माधुरी तथा
  2. श्रीधर पाठक-वनाष्टक।

प्रश्न 84.
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प्रश्न 85.
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प्रश्न 86.
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प्रश्न 87.
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प्रश्न 88.
द्विवेदी युग के दो प्रमुख कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. मैथिलीशरण गुप्त तथा
  2. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।

प्रश्न 89.
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प्रश्न 90.
द्विवेदीयुगीन काव्यधारा के किन्हीं दो कवियों की दो-दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. श्री मैथिलीशरण गुप्त; रचनाएँ-भारत-भारती तथा यशोधरा,
  2. श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’; रचनाएँ-रुक्मिणी परिणय तथा वैदेही वनवास।।

प्रश्न 91.
कविता के आधुनिककाल के तृतीय युग का नाम लिखिए तथा उस युग के एक प्रमुख कवि का नाम लिखिए।
उत्तर:
कविता के आधुनिककाल के तृतीय युग का नाम ‘छायावादी युग’ है तथा इस युग के प्रमुख कवि श्री जयशंकर प्रसाद जी हैं।

प्रश्न 92.
छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताओं (प्रवृत्तियों) का उल्लेख करते हुए किन्हीं दो, 
छायावादी कवियों के नाम लिखिए। या छायावाद की दो प्रमुख प्रवृत्तियों के नाम लिखिए।

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प्रश्न 93.
छायावादी क्रविता के हास के कारण लिखिए।
उत्तर:
विदेशी शासन के दमन के कारण जनसाधारण की निरन्तर बढ़ती पीड़ा छायावाद के ह्रास का मुख्य कारण बनी। इस दमन को देखकर कविगण कल्पना लोक से उबरकरे यथार्थ के कठोर धरातल पर आ गये। पूँजी की वृद्धि तथा दीनता का प्रसार भी छायावाद के ह्रास का कारण बना।

प्रश्न 94.
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प्रश्न 95.
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प्रश्न 96.
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प्रश्न 97.
छायावादी कविता के हास के कारण संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

  1. छायावादी कविता में सूक्ष्म और वायवीय कल्पनाओं की अधिकता थी।
  2. स्थूल जगत की कठोर वास्तविकता से उसका कोई सम्बन्धं नहीं रह गया था।
  3. समाज में पूँजी के विरुद्ध आवाज उठ रही थी, इसलिए अतिशय कल्पना को छोड़ रोटी, कपड़ा और मकान कविता का विषय बनने लगे थे।

प्रश्न 98.
निम्नलिखित कवियों की एक-एक प्रमुख रचना का नाम लिखिए-
या
जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, सुमित्रानन्दन पन्त, रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
उत्तर:

  1. जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, रचना–गंगावतरण।
  2. सुमित्रानन्दन फ्न्त, रचना–चिदम्बरा।।
  3. रामधारी सिंह ‘दिनकर’, रचना-उर्वशी।

प्रश्न 99.
निम्नलिखित कवियों में से किन्हीं दो द्वारा रचित एक-एक महाकाव्य का नाम लिखिए-

  1. चन्दबरदायी,
  2. तुलसीदास,
  3. अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,
  4. रामधारी सिंह ‘दिनकर’।

उत्तर:

  1. पृथ्वीराज रासो,
  2. श्रीरामचरितमानस,
  3. प्रियप्रवास तथा
  4. कुरुक्षेत्र।

प्रश्न 100.
बिहारी, मैथिलीशरण गुप्त, अज्ञेय, रत्नाकर, पन्त, दिनकर में से किन्हीं दो की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
अज्ञेय–आँगन के पार द्वार। जगन्नाथदास रत्नाकर’-उद्धवशतक।

प्रश्न 101.
आधुनिक युग (छायावादी काव्यधारा) के किसी एक महाकाव्य और उसके रचनाकार का नाम लिखिए।
या
‘कामायनी’ महाकाव्य के सर्गों के नाम लिखिए।
उत्तर:
महाकाव्य-कामायनी; रचनाकार–जयशंकर प्रसाद।
‘कामायनी’ महाकाव्य के सर्गों के नाम हैं-

  1. चिन्ता,
  2. आशा,
  3. श्रद्धा,
  4. काम,
  5. वासना,
  6. लज्जा,
  7. कर्म,
  8. ईष्र्या,
  9. इडा,
  10. स्वप्न,
  11. संघर्ष,
  12. निर्वेद,
  13. दर्शन,
  14. रहस्य तथा
  15. आनन्द।।

प्रश्न 102.
प्रगतिवादी काव्य का परिचय दीजिए।
उत्तर:
प्रगतिवादी काव्य का उद्भव छायावादी काव्य की काल्पनिक एवं भावुकतापूर्ण अभिव्यक्ति के विद्रोहस्वरूप हुआ। इस वाद के काव्यों में स्थूल जगत् की वास्तविकता, सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों एवं वर्ग-शोषण के स्वर को अलंकारविहीन तथा सरल रूप में अभिव्यक्ति दी गयी।

प्रश्न 103.
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प्रश्न 104.
प्रगतिवाद के प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
या
प्रगतिवादी काव्यधारा के किन्हीं दो कवियों की एक-एक रचना का उल्लेख कीजिए।

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प्रश्न 105.
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प्रश्न 106.
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प्रश्न 107.
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प्रश्न 108.
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प्रश्न 109.
प्रयोगवादी काव्यधारा का नेतृत्व करने वाले कवि का नामोल्लेख कीजिए और उनके एक 
प्रमुख प्रकाशन का नाम लिखिए।

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प्रश्न 110.
प्रथम तारसप्तक के कवियों के नाम लिखिए। या हिन्दी में प्रयोगवादी काव्यधारा के किन्हीं चार कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, गजानन माधव मुक्तिबोध’, गिरिजाकुमार माथुर, प्रभाकर माचवे, नेमिचन्द्र जैन, भारत भूषण और रोमविलास शर्मा। सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय ने इन सात कवियों की रचनाएँ ‘तारसप्तक’ के नाम से सन् 1943 ई० में प्रकाशित कीं।

प्रश्न 111.
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प्रश्न 112.
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प्रश्न 113.
‘दूसरा सप्तक’ के कवियों के नाम लिखिए। यह कब प्रकाशित हुआ ?
उत्तर:
‘दूसरा सप्तक’ में भवानी प्रसाद मिश्र, शकुन्त माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय तथा धर्मवीर भारती की कविताएँ संकलित थीं। इस सप्तक की रचनाओं में 
आत्मान्वेषण पर बल दिया गया था तथा यह सन् 1951 ई० में प्रकाशित हुआ।

प्रश्न 114.
‘तीसरा सप्तक’ के कवियों के नाम लिखिए। यह कब प्रकाशित हुआ ?
या
तीसरा सप्तक के प्रकाशन-वर्ष का उल्लेख कीजिए। [2012,14]
उत्तर:
‘तीसरा सप्तक’ के अन्तर्गत प्रयागनारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विजयदेव नारायण साही तथा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की रचनाएँ संकलित हैं। इस सप्तक की कविताओं में सौन्दर्यवादी प्रवृत्ति के साथ-साथ युगीन सत्य की भी निश्छल अभिव्यक्ति मिलती है। इसका प्रकाशन सन् 1959 ई० में हुआ।

प्रश्न 115.
‘चौथा सप्तक’ कब प्रकाशित हुआ ? इसके कवियों के नाम लिखिए।
उतर:
सन् 1979 ई० में चौथा सप्तक प्रकाशित हुआ। इसमें अवधेश कुमार, राजकुमार कुम्भज, स्वदेश भारती, नन्दकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्रीराम वर्मा, राजेन्द्र किशोर की रचनाएँ संकलित हैं।

प्रश्न 116.
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प्रश्न 117.
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प्रश्न 118.
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प्रश्न 119.
नयी कविता से आप क्या समझते हैं ? इसके आरम्भ होने का समय लिखिए। ।
उत्तर:
इसका आरम्भ सन् 1954 ई० में जगदीश गुप्त और डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादन में ‘नयी कविता’ के प्रकाशन से हुआ। यह कविता किसी वाद से बँधकर नहीं चलती।

प्रश्न 120.
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प्रश्न 121.
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प्रश्न 122.
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प्रश्न 123.
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प्रश्न 124.
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प्रश्न 125.
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प्रश्न 126.
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प्रश्न 127.
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प्रश्न 128.
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प्रश्न 129.
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प्रश्न 130.
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प्रश्न 131.
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प्रश्न 132.
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प्रश्न 133.
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