UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi परिचयात्मक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name परिचयात्मक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi परिचयात्मक निबन्ध

परिचयात्मक निबन्ध

एक महापुरुष की जीवनी (राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी)

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरा प्रिय राजनेता
  • मेरा आदर्श पुरुष
  • वर्तमान युग में गाँधीवाद की प्रासंगिकता
  • हमारे आदर्श महापुरुष

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. जीवनवृत्त,
  3. गाँधी जी के सिद्धान्त-(अ) अहिंसा (व्यक्तिगत एवं सामाजिक अहिंसा, राजनीति में अहिंसा); (ब) शिक्षा-सम्बन्धी सिद्धान्त,
  4. राष्ट्रभाषा के प्रबल पोषक,
  5. कुटीर उद्योग पर बल,
  6. प्रेरणादायक गुण,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना-मानव-जीवन एक रहस्य है। इसके रहस्य अनेक बार मनुष्य को उस मोड़ पर ला खड़ा करते हैं, जहाँ वह किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में होता है। उसे कुछ सूझता ही नहीं। ऐसी स्थिति में ‘महाजनो येन गताः स पन्था’ के अनुरूप व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। जीवन की ऐसी उलझनों से सुलझने के लिए जिस महापुरुष ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया; उसका नाम है—मोहनदास करमचन्द गाँधी। यही मेरे आदर्श पुरुष हैं। इनके बाह्य व आन्तरिक व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए महाकवि सुमित्रानन्दन पन्त जी लिखते हैं

तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थिशेष ! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवले,
हे चिर पुराण ! हे चिर नवीन !

यद्यपि बाह्य रूप से देखने में गाँधी जी अस्थियों का ढाँचामात्र ही लगते थे, किन्तु उनमें आत्मिक बल अमित था। वस्तुत: राजनीति जैसे स्थूल और भौतिकवादी क्षेत्र में उन्होंने आत्मा की आवाज पर बल दिया, नैतिकता का प्रतिपादन किया तथा साध्य के साथ साधन की शुद्धता को भी आवश्यक ठहराया। विश्व-राजनीति को यह उनका विशिष्ट योगदान था, जिससे प्रेरणा लेकर कई पराधीन देशों में स्वातन्त्र्य-आन्दोलन चलाये गये और स्वतन्त्रता प्राप्त की गयी।

जीवनवृत्त-मोहनदास करमचन्द गाँधी को जन्म 2 अक्टूबर, सन् 1869 ई० को पोरबन्दर (गुजरात) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री करमचन्द गाँधी तथा माँ का नाम श्रीमती पुतलीबाई था। करमचन्द गाँधी पोरबन्दर रियासत के दीवान थे। सात वर्ष की अवस्था में मोहनदास करमचन्द गाँधी एक गुजराती पाठशाला में पढ़ने गये। बाद में अंग्रेजी स्कूल में भर्ती हुए, जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी के साथ-साथ संस्कृत तथा धार्मिक ग्रन्थों का भी अध्ययन किया। इण्ट्रेन्स की परीक्षा पास करने के उपरान्त ये विलायत चले गये।।

भारत लौटने पर गाँधी जी ने पहले राजकोट और फिर बम्बई में वकालत शुरू की। उन्हें सेठ अब्दुल्ला फर्म के एक हिस्सेदार के मुकदमे को लेकर दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ पग-पग पर रंगभेद-नीति के फलस्वरूप भारतीयों का अपमान देखकर तथा स्वयं आप बीते कठोर अनुभवों के आधार पर उन्होंने रंगभेद-नीति को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। प्रिटोरिया में भारतीयों की पहली सभा में गाँधी जी ने भाषण दिया और यहीं से इनके सार्वजनिक जीवन का आरम्भ हुआ। सन् 1896 ई० में गाँधी जी भारत आये और सपरिवार पुन: अफ्रीका लौट गये। लौटने पर उन्हें गोरों का विशेष विरोध सहना पड़ा, परन्तु गाँधी जी ने साहस न छोड़ा और कई आन्दोलनों का संचालन करते रहे। सेवा में उनका अडिग विश्वास था। बोअर-युद्ध (सन् 1899 ई०) तथा जूलू-विद्रोह (सन् 1906 ई०) में स्वयंसेना स्थापित करके उन्होंने पीड़ितों की पर्याप्त सेवा की।

सन् 1914 ई० में वे भारत लौट आये। यहाँ आकर उन्होंने चम्पारन में किसानों पर किये जाने वाले अत्याचारों तथा कारखानों के कर्मचारियों पर मालिकों द्वारा की गयी ज्यादतियों का खुलकर विरोध किया और भारत के सार्वजनिक जीवन में पदार्पण किया। सन् 1924 ई० में वे बेलगाँव में कांग्रेस-अध्यक्ष चुने गये। सन् 1930 ई० में कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव रखा और इस आन्दोलन के समस्त अधिकार गाँधी जी को सौंप दिये। 4 मार्च, सन् 1931 ई० को गाँधी-इरविन समझौता हुआ। दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेन्स में कांग्रेस-प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी इंग्लैण्ड गये और अंग्रेज सरकार से स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि भारत को पूर्ण स्वतन्त्रता न मिली तो कांग्रेस का आन्दोलन भी जारी रहेगा।

अगस्त, सन् 1942 ई० में गाँधी जी ने भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया; जिससे देश में एक महान् आन्दोलन छिड़ा। गाँधी जी तथा अन्य नेता जेल में बन्द कर दिये गये। 1946 ई० के हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष में गाँधी जी ने नोआखाली की पैदल यात्रा की और वहाँ शान्ति स्थापित करने में सफल हुए। 15 अगस्त, सन् 1947 ई० को भारत को स्वतन्त्रता मिली। देश में उत्पन्न अन्य समस्याओं को सुलझाने में गाँधी जी लगे ही थे कि सहसा 30 जनवरी, सन् 1948 ई० को वे शहीदों की परम्परा में चले गये।

गाँधी जी के सिद्धान्त-(अ) अहिंसा-गाँधी जी का सबसे प्रमुख सिद्धान्त था व्यक्तिगत, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में अहिंसा का प्रयोग। अहिंसा आत्मा का बल है। वे अहिंसा का मूल प्रेम में मानते थे। वे लिखते हैं, “पूर्ण अहिंसा समस्त जीवधारियों के प्रति दुर्भावना का पूर्ण अभाव है, इसलिए वह मनुष्य के अलावा दूसरे प्राणियों-यहाँ तक कि विषैले कीड़ों और हिंसक जानवरों का भी आलिंगन करती है।’ उन्होंने बार-बार कहा है कि अहिंसा वीर का धर्म है, कायर का नहीं; क्योंकि हिंसा करने की पूरी सामर्थ्य रखते हुए भी जो हिंसा नहीं करता, वही अहिंसा-धर्म का पालन करने में समर्थ होता है।

(i) व्यक्तिगत एवं सामाजिक अहिंसा-अहिंसा का अर्थ है-प्रेम, दया और क्षमा। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी गाँधी जी ने इस सिद्धान्त को चरितार्थ करके दिखाया। वे जीव मात्र से प्रेम करते थे। दीनों और दलितों के लिए तो उनके प्रेम और करुणा की कोई सीमा ही न थी। वे इसे मानवता के प्रति घोर अपराध मानते थे कि किसी को नीचा या अस्पृश्य समझा जाए; क्योंकि भगवान् की दृष्टि में सारे प्राणी समान हैं। इसीलिए उन्होंने अछूतोद्धार का आन्दोलन चलाया, जिसे उन्होंने हरिजनोद्धार कहा। हिन्दू-समाज के प्रति यह उनकी बहुत बड़ी सेवा थी। उनके आन्दोलन के फलस्वरूप हरिजनों को मन्दिर में प्रवेश का अधिकार मिला।

उनकी दया-भावना ने उन्हें प्राणिमात्र की सेवा के लिए प्रेरित किया। परचुरे शास्त्री भयंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। गाँधी जी ने उन्हें अपने साथ रखा। इतना ही नहीं, उनके घावों को भी वे स्वयं अपने हाथ से साफ करते थे। इससे उनकी परदुःख-कातरता एवं सेवा-भावना का पता चलता है। अपने साथियों का भी गाँधी जी बहुत ध्यान रखते थे। एक अवसर पर एक सज्जन आकर गाँधी जी को कुछ फल दे गये, जिनमें चीकू भी थे। गाँधी जी ने कुछ चीकू अपने एक साथी को देते हुए कहा, “इन्हें महादेव को दे आओ, उसे चीकू बहुत पसन्द हैं।’

अपने शत्रु को क्षमा करने की घटनाएँ तो उनके जीवन में भरी पड़ी हैं। उन्होने अपने आश्रम में साँप, बिच्छू आदि को भी मारना वर्जित कर दिया था। उन्हें पकड़कर दूर छोड़ दिया जाता था। एक बार एक साँप गाँधी जी के कन्धे पर चढ़ गया। उनके साथियों ने उनकी ओढ़ी हुई चादर समेत उसे खींचकर दूर ले जाकर छोड़ दिया। इस प्रकार गाँधी जी ने अपने जीवन में भी अहिंसा को चरितार्थ करके दिखाया।

(ii) राजनीति में अहिंसा-राजनीति के क्षेत्र में अहिंसा के सिद्धान्त का व्यवहार उन्होंने तीन शस्त्रों के रूप में किया–सत्याग्रह, असहयोग और बलिदान। सत्याग्रह का अर्थ है–सत्य के प्रति आग्रह अर्थात् जो आदमी को ठीक लगे, उस पर पूरी शक्ति और निष्ठा से चलना, किसी के दबाव के आगे झुकना नहीं। असहयोग का अर्थ है-बुराई से, अन्याय से, अत्याचार से सहयोग न करना। यदि कोई सताये, अन्याय करे तो किसी भी काम में उसका साथ न देना। बलिदान का आशय है–सच्चाई के लिए, न्याय के लिए, अपने प्राण तक न्योछावर कर देना। इन तीनों हथियारों का प्रयोग गाँधी जी ने पहले दक्षिण अफ्रीका में किया, फिर भारत में।

(ब) शिक्षा-सम्बन्धी सिद्धान्त–शिक्षा से गाँधी जी का तात्पर्य बालक के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास से था। इस सम्बन्ध में वे लिखते हैं, “शिक्षा से तात्पर्य उन समस्त शक्तियों के दोहन से है, जो शिशु एवं मानव के शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा में निहित हैं। साथ ही उनके अनुसार, “कोई भी वह शिक्षा पूर्ण नहीं है, जो लड़के-लड़कियों को आदर्श नागरिक नहीं बनाती।’

गाँधी जी के शिक्षा-सम्बन्धी विचारों का केन्द्रबिन्दु है-व्यवसाय और व्यवसाय से उनका आशय हस्तकला से है। वे लिखते हैं-मैं बालक की शिक्षा का आरम्भ किसी उपयोगी हस्तकला के शिक्षण से करूंगा, जिससे वह आरम्भ से ही अर्जन करने में समर्थ हो सके। इससे एक तो वह शिक्षा का व्यय वहन कर सकेगा और फिर वह अपने भावी जीवन में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर भी हो सकेगा। इस प्रकार शिक्षा बेकारी दूर करने का एक प्रकार से बीमा है। वे विद्यालयों को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे, अर्थात् शिक्षकों की व्यवस्था विद्यालय के उत्पादन से ही हो सके और राज्य सरकार छात्रों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के खरीदने की व्यवस्था करे।।

राष्ट्रभाषा के प्रबल पोषक-गाँधी जी राष्ट्रभाषा के बिना किसी स्वतन्त्र राष्ट्र की कल्पना ही नहीं करते थे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी विदेशी भाषा के माध्यम से बालक की क्षमताओं का पूर्ण विकास सम्भव नहीं। इसी कारण राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया।

कुटीर उद्योगों पर बल–गाँधी जी भारत जैसे विशाल देश की समस्याओं और आवश्यकताओं को बहुत गहराई तक समझते थे। वे जानते थे कि ऐसे देश में जहाँ विशाल जनसंख्या के कारण जनशक्ति की कमी नहीं, आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं सम्पन्नता के लिए कुटीर उद्योग ही सर्वाधिक उपयुक्त साधन हैं। गाँधी जी ने ग्रामों को आर्थिक स्वावलम्बन प्रदान करने के लिए खादी उद्योग को बढ़ावा दिया, चरखे को अपने आर्थिक सिद्धान्तों का केन्द्रबिन्दु बना लिया तथा प्रत्येक गाँधीवादी के लिए प्रतिदिन चरखा चलाना और खादी पहनना अनिवार्य कर दिया।

प्रेरणादायक गुण-गाँधी जी में ऐसे अनेक महान् गुण विद्यमान थे, जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा लेनी चाहिए। उनका पहला गुण था—समय का सदुपयोग। वे अपना एक क्षण भी व्यर्थ न गंवाते थे, यहाँ तक कि दूसरों से बात करते समय भी वे कुछ-न-कुछ काम अवश्य करते रहते थे, चाहे वह आश्रम की सफाई का काम हो या चरखा चलाने का या रोगियों की सेवा-शुश्रूषा का। यही कारण है कि इतनी अधिक व्यस्तता के बावजूद वे अनेक ग्रन्थ और लेखादि लिख सके।

दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण था—दूसरों को उपदेश देने से पहले किसी आदर्श को स्वयं अपने जीवन में क्रियान्वित करना। उदाहरणार्थ-वे अपना सारा काम स्वयं अपने ही हाथों करते थे, यहाँ तक कि अपना मल-मूत्र भी स्वयं साफ करते थे। इसके बाद ही वे आश्रमवासियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते थे।

मितव्ययिता उनका एक अन्य प्रेरक गुण था। वे तुच्छ-से-तुच्छ वस्तु को भी व्यर्थ नहीं समझते थे, अपितु उसका अधिकतम सदुपयोग करने का प्रयास करते थे। इस सम्बन्ध में आश्रमवासियों को भी उनका कठोर आदेश था।

गाँधी जी की सारग्रहिणी प्रवृत्ति भी बड़ी प्रेरणाप्रद थी। वे अपने कटुतम आलोचक और विरोधी की बात भी बड़ी शान्ति से सुनते और अपने कटु विरोधी व्यक्ति की उचित बात को साररूप में ग्रहण कर लेते थे। एक बार कोई अंग्रेज युवक एक लम्बे पत्र में गाँधी जी को सैकड़ों भद्दी-भद्दी गालियाँ लिखकर स्वयं उनके पास पहुँचा और पत्र उन्हें दिया। पत्र पर दृष्टि डालते ही उन्होंने उसका आशय समझ लिया और उसमें लगी आलपिन को अपने पास रखकर पृष्ठों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। युवक ने उनसे इसका कारण पूछा। गाँधी जी ने कहा कि इसमें सार वस्तु केवल इतनी ही थी, जो मैंने ले ली।

उपसंहार–सारांश यह है कि गाँधी जी ने अपने नेतृत्व के गुणों से जनता की असीम श्रद्धा अर्जित की। उन्होंने भारत की जनता में स्वाभिमान और आत्मविश्वास जगाया, उसे अपने अधिकार के लिए लड़ने का मनोबल दिया, देश को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा दी तथा स्वदेशी आन्दोलन द्वारा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के स्वीकरण का मन्त्र दिया। उनके खादी आन्दोलन ने ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा दिया, राष्ट्रभाषा के महत्त्व एवं गौरव के प्रबल समर्थन द्वारा उन्होंने कितने ही हिन्दीतर-भाषियों को हिन्दी सीखने की प्रेरणा दी तथा राष्ट्रभाषा आन्दोलन को देश के कोने-कोने तक पहुँचा दिया। अपने अनेकानेक व्यक्तिगत गुणों के कारण अपने सम्पर्क में आने वालों को उन्होंने अन्दर तक प्रभावित किया और दीन-दु:खियों के सदृश स्वयं भी अधनंगे रहकर तथा निर्धनता और सादगी का जीवन अपनाकर लोगों से ‘महात्मा’ और ‘बापू’ का प्रेममय सम्बोधन पाया। सचमुच वे वर्तमान भारत की एक महान् विभूति थे।

मेरे प्रिय कवि : तुलसीदास [2012, 13, 14, 16, 18]

सम्बद्ध शीर्षक

  • तुलसी का समन्वयवाद
  • हमारे आदर्श कति : तुलसीदास [2012]
  • रामकाव्यधारा के प्रमुख कवि : तुलसीदास
  • लोकनायक तुलसीदास [2011]
  • कविता लसी पा तुलसी की कला [2009]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. तत्कालीन परिस्थितियाँ,
  3. तुलसीकृत रचनाएँ,
  4. ढुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में,
  5. तुलसी के रमि,
  6. तुलसी की निष्काम भक्ति-भावना,
  7. तुलसी की समन्वय-साधना–(क) सगुण-निर्गुण का समन्वय, (ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय, (ग) युगधर्म-समन्वय, (घ) साहित्यिक समन्वय,
  8. तुलसी के दार्शनिक विचार,
  9. उपसंहार।

प्रस्तावना-यद्यपि मैंने बहुत अधिक अध्ययन नहीं किया है, तथापि भक्तिकालीन कवियों में कबीर, सूर, तुलसी और मीरा तथा आधुनिक कवियों में प्रसाद, पन्त और महादेवी के काव्य का रसास्वादन अवश्य किया है। इन सभी कवियों के काव्य का अध्ययन करते समय तुलसी के काव्य की अलौकिकता के समक्ष मैं सदैव नतमस्तक होता रहा हूँ। उनकी भक्ति-भावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य-सौष्ठव ने मुझे स्वाभाविक रूप से आकृष्ट किया है।

तत्कालीन परिस्थितियाँ-तुलसीदास को जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में हुआ था, जब हिन्दू समाज अशक्त होकर विदेशी चंगुल में फंस चुका था। हिन्दू समाज की संस्कृति और सभ्यता प्राय: विनष्ट हो चुकी थी और कहीं कोई पथ-प्रदर्शक नहीं था। इस युग में जहाँ एक ओर मन्दिरों का विध्वंस किया गया, ग्रामों व नगरों का विनाश हुआ, वहीं संस्कारों की भ्रष्टता भी चरम सीमा पर पहुँच गयी। इसके अतिरिक्त तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था। सर्वत्र धार्मिक विषमताओं का ताण्डव हो रहा था और विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग अलापना आरम्भ कर दिया था। ऐसी परिस्थिति में भोली-भाली जनता यह समझने में असमर्थ थी कि वह किस सम्प्रदाय का आश्रय ले। उस समय दिग्भ्रमित जनता को ऐसे नाविक की आवश्यकता थी, जो उसके नैतिक जीवन की नौका की पतवार सँभाल ले।

गोस्वामी तुलसीदास ने अन्धकार के गर्त में डूबी हुई जनता के समक्ष भगवान् राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया और उसमें अपूर्व आशा एवं शक्ति का संचार किया। युगद्रष्टा तुलसी ने अपनी अमर कृति ‘श्रीरामचरितमानस’ द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न मतों, सम्प्रदायों एवं धाराओं में समन्वय स्थापित किया। उन्होंने अपने युग को नवीन दिशा, नयी गति एवं नवीन प्रेरणा दी। उन्होंने सच्चे लोकनायक के समान समाज में व्याप्त वैमनस्य की चौड़ी खाई को पाटने का सफल प्रयत्न किया।

तुलसीकृत रचनाएँ-तुलसीदास जी द्वारा लिखित 12 ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं। ये ग्रन्थ हैं‘श्रीरामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘रामलला नहछु’, ‘पार्वती-मंगल’, ‘जानकी-मंगल’, ‘बरवै रामायण’, ‘वैराग्य संदीपनी’, ‘श्रीकृष्णगीतावली’ तथा ‘रामाज्ञा प्रश्नावली’। तुलसी की ये रचनाएँ विश्व-साहित्य की अनुपम निधि हैं।

तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में-आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन हैलोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके; क्योंकि भारतीय समाज में नाना प्रकार की परस्पर विरोधी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ आचारनिष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं। बुद्धदेव समन्वयकारी थे, ‘गीता’ ने समन्वय की चेष्टा की और तुलसीदास भी समन्वयकारी थे।’

तुलसी के राम—तुलसी उन राम के उपासक थे, जो सच्चिदानन्द परब्रह्म हैं, जिन्होंने भूमि का भार हरण करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था

जब-जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी ॥
तब-तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जने पीरा ॥

तुलसी ने अपने काव्य में सभी देवी-देवताओं की स्तुति की है, लेकिन अन्त में वे यही कहते हैं-

माँगत तुलसीदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥

राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति अपनी चरम-सीमा छूती है और वे कह उठते हैं कि-

करू कहाँ तक राम बड़ाई। राम न सकहिं, राम गुन गाही ।।

तुलसी के समक्ष ऐसे राम का जीवन था, जो मर्यादाशील थे और शक्ति एवं सौन्दर्य के अवतार थे।
तुलसीदास की निष्काम भक्ति-भावना-सच्ची भक्ति वही है, जिसमें लेन-देन का भाव नहीं होता। भक्त के लिए भक्ति का आनन्द ही उसका फल है। तुलसी के अनुसार-

मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुबीर।।
अस बिचारि रघुबंसमनि, हरहु विषम भव भीर ॥

तुलसी की समन्वय-साधना-तुलसी के काव्य की सर्वप्रमुख विशेषता उसमें निहित समन्वय की प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति के कारण ही वे वास्तविक अर्थों में लोकनायक कहलाये। उनके काव्य में समन्वय के निम्नलिखित रूप दृष्टिगत होते हैं

(क) सगुण-निर्गुण का समन्वय-जब ईश्वर के सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों से सम्बन्धित विवाद, दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित था तो तुलसीदास ने कहा
सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ।
(ख) कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय—तुलसी की भक्ति मनुष्य को संसार से विमुख करने अकर्मण्य बनाने वाली नहीं है, उनकी भक्ति तो सत्कर्म की प्रबल प्रेरणा देने वाली है। उन रिद्धान्त है कि राम के समान आचरण करो, रावण के सदृश दुष्कर्म नहीं–

भगतिहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदी। उभय हरहिं भव-संभव खेदा ।।

तुलसी ने ज्ञान और भक्ति के धागे में राम-नाम का मोती पिर दिशा —

हिय निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम ।
मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम ।।

(ग) युगधर्म-समन्वय-भक्ति की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के बाह्य तथा आन्तरिक साधनों की आवश्यकता होती है। ये साधन प्रत्येक युग के अनुसार बदलते रहते हैं और उन्हीं को युगधर्म की संज्ञा दी जाती है। तुलसी ने इनका भी विलक्षण समन्वय प्रस्तुत किया है-

कृतजुग त्रेता द्वापर, पूजा मख अरु जोग।
जो गति होइ सो कलि हरि, नाम ते पावहिं लोग ॥

(घ) साहित्यिक समन्वय साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छन्द, रस एवं अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं, विभिन्न छन्दों में रचनाएँ की जाती थीं। तुलसी ने अपने काव्य में भी संस्कृत, अवधी तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया।

तुलसी के दार्शनिक विचार-तुलसी ने किसी विशेष वाद को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने वैष्णव धर्म को इतना व्यापक रूप प्रदान किया कि उसके अन्तर्गत शैव, शाक्त और पुष्टिमार्गी भी सरलता से समाविष्ट हो गये। वस्तुत: तुलसी भक्त हैं और इसी आधार पर वह अपना व्यवहार निश्चित करते हैं। उनकी भक्ति सेवक-सेव्य भाव की है। वे स्वयं को राम का सेवक मानते हैं और राम को अपना स्वामी।

उपसंहार—तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व तथा व्यक्ति और समाज आदि सभी के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री दी है। तुलसी को आधुनिक दृष्टि ही नहीं, प्रत्येक युग की दृष्टि मूल्यवान् मानेगी; क्योंकि मणि की चमक अन्दर से आती है, बाहर से नहीं। तुलसी के सम्बन्ध में हरिऔध जी के हृदय से स्वत: फूट पड़ी प्रशस्ति अपनी समीचीनता में बेजोड़ है-

बन रामरसायन की रसिका, रसना रसिकों की हुई सुफला।
अवगाहन मानस में करके, मन-मानस का मल सारा टला ॥
बनी पावन भावे की भूमि भली, हुआ भावुक भावुकता का भला ।
कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला ॥

सचमुच कविता से तुलसी नहीं, तुलसी से कविता गौरवान्वित हुई। उनकी समर्थ लेखनी का सम्बल पी वाणी धन्य हो उठी।
तुलसीदास जी के इन्हीं सब गुणों का ध्यान आते ही मन श्रद्धा से परिपूरित हो उन्हें अपना प्रिय कवि मानने को विवश हो जाता है।

मेरे प्रिय साहित्यकार: जयशंकर प्रसाद [2013, 14, 15, 16, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • अपना (मेरा) प्रिय कवि [2012, 13, 14, 17]
  • मेरा प्रिय लेखक [2009, 15]
  • मेरे प्रिय कहानीकार [2013]

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. साहित्यकार का परिचय,
  3. साहित्यकार की साहित्यसम्पदा-(क) काव्य; (ख) नाटक; (ग) उपन्यास; (घ) कहानी; (ङ) निबन्ध,
  4. छायावाद के श्रेष्ठ कवि,
  5. श्रेष्ठ गद्यकार,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-संसार में सबकी अपनी-अपनी रुचि होती है। किसी व्यक्ति की रुचि चित्रकारी में है तो किसी की संगीत में। किसी की रुचि खेलकूद में है तो किसी की साहित्य में। मेरी अपनी रुचि भी साहित्य में रही है। साहित्य प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में इतना अधिक रचा गया है कि उन सबका पारायण तो एक जन्म में सम्भव ही नहीं है। फिर साहित्य में भी अनेक विधाएँ हैं–कविता, उपन्यास, नाटक, कहानी, निबन्ध आदि। अतः मैंने सर्वप्रथम हिन्दी-साहित्य का यथाशक्ति अधिकाधिक अध्ययन करने का निश्चय किया और अब तक जितना अध्ययन हो पाया है, उसके आधार पर मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार हैं-जयशंकर प्रसाद प्रसाद जी केवल कवि ही नहीं, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार और निबन्धकार भी हैं। प्रसाद जी ने हिन्दी-साहित्य में भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प सभी क्षेत्रों में युगान्तरकारी परिवर्तन किये हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा को एक नवीन अभिव्यंजना-शक्ति प्रदान की है। इन सबने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया है और वे मेरे प्रिय साहित्यकार बन गये हैं।

साहित्यकार का परिचय-श्री जयशंकर प्रसाद जी का जन्म सन् 1889 ई० में काशी के प्रसिद्ध हुँघनी-साहु परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री बाबू देवी प्रसाद था। लगभग 11 वर्ष की अवस्था में ही जयशंकर प्रसाद ने काव्य-रचना आरम्भ कर दी थी। सत्रह वर्ष की अवस्था तक इनके ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। इनके पिता, माता व बड़े भाई का देहान्त हो गया और परिवार का समस्त उत्तरदायित्व इनके सुकुमार कन्धों पर आ गया। गुरुतर उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए एवं अनेकानेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने के उपरान्त 15 नवम्बर, 1937 ई० को आपका देहावसान हुआ। 48 वर्ष के छोटे-से जीवन में इन्होंने जो बड़े-बड़े काम किये, उनकी कथा सचमुच अकथनीय है।

साहित्यकार की साहित्य-सम्पदा–प्रसाद जी की रचनाएँ सन् 1907-08 ई० में सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। ये रचनाएँ ब्रजभाषा की पुरानी शैली में थीं, जिनका संग्रह ‘चित्राधार’ में हुआ। सन् 1913 ई० में ये खड़ी बोली में लिखने लगे। प्रसाद जी ने पद्य और गद्य दोनों में साधिकार रचनाएँ कीं। इनका वर्गीकरण इस प्रकार है-

(क) काव्य-कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्त्व, झरना, आँसू, लहर और कामायनी (महाकाव्य)।
(ख) नाटक-इन्होंने कुल मिलाकरे 13 नाटक लिखे। इनके प्रसिद्ध नाटक हैं-चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना और ध्रुवस्वामिनी।
(ग) उपन्यास-कंकाल, तितली और इरावती।
(घ) कहानी–प्रसाद की विविध कहानियों के पाँच संग्रह हैं-छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी और इन्द्रजाल।
(ङ) निबन्ध–प्रसाद जी ने साहित्य के विविध विषयों से सम्बन्धित निबन्ध लिखे, जिनका संग्रह है-काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध।

छायावाद के श्रेष्ठ कवि–छायावाद हिन्दी कविता के क्षेत्र का एक आन्दोलन है जिसकी अवधि सन् 1920-1936 ई० तक मानी जाती है। ‘प्रसाद’ जी छायावाद के जन्मदाता माने जाते हैं। छायावाद एक आदर्शवादी काव्यधारा है, जिसमें वैयक्तिकता, रहस्यात्मकता, प्रेम, सौन्दर्य तथा स्वच्छन्दतावाद की सबल अभिव्यक्ति हुई है। प्रसाद की ‘आँसू’ नाम की कृति के साथ हिन्दी में छायावाद का जन्म हुआ। आँसू का प्रतिपाद्य है–विप्रलम्भ श्रृंगार। प्रियतम के वियोग की पीड़ा वियोग के समय आँसू बनकर वर्षा की भाँति उमड़ पड़ती है

जो घनीभूत पीड़ा थी, स्मृति सी नभ में छायी।
दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी ॥

प्रसाद के काव्य में छायावाद अपने पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देता है; यथा–सौन्दर्य-निरूपण एवं श्रृंगार भावना, प्रकृति-प्रेम, मानवतावाद, प्रेम भावना, आत्माभिव्यक्ति, प्रकृति पर चेतना का आरोप, वेदना और निराशा का स्वर, देश-प्रेम की अभिव्यक्ति, नारी के सौन्दर्य का वर्णन, तत्त्व-चिन्तन, आधुनिक बौद्धिकता, कल्पना का प्राचुर्य तथा रहस्यवाद की मार्मिक अभिव्यक्ति। अन्यत्र इंगित छायावाद की कलागत विशेषताएँ अपने उत्कृष्ट रूप में इनके काव्य में उभरी हुई दिखाई देती हैं।

‘आँसू मानवीय विरह का एक प्रबन्ध काव्य है। इसमें स्मृतिजन्य मनोदशा एवं प्रियतम के अलौकिक रूप-सौन्दर्य का मार्मिक वर्णन किया गया है। ‘लहर’ आत्मपरक प्रगीत मुक्तक है, जिसमें कई प्रकार की कविताओं का संग्रह है। प्रकृति के रमणीय पक्ष को लेकर सुन्दर और मधुर रूपकमय यह गीत ‘सहर’ से संगृहीत है।

बीती विभावरी जाग री ।।
अम्बर-पनघट में डुबो रही ;
तारा-घट ऊषा नागरी ।

‘प्रसाद’ की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचना है-कामायनी महाकाव्य, जिसमें प्रतीकात्मक शैली पर मानव- चेतना के विकास का काव्यमय निरूपण किया गया है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में, “यह काव्य बड़ी विशद कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से पूर्ण है। इसके विचारात्मक आधार के अनुसार श्रद्धा या रागात्मिका वृत्ति ही मनुष्य को इस जीवन में शान्तिमय आनन्द का अनुभव कराती हैं। वही उसे आनन्द-धाम तक पहुँचाती है, जब कि इड़ा या बुद्धि आनन्द से दूर भगाती है।” अन्त में कवि ने इच्छा, कर्म और ज्ञान तीनों के सामंजस्य पर बल दिया है; यथा-

ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी क्यों हो मन की ?
एक दूसरे से मिल न सके, यह विडम्बना जीवन की ।

श्रेष्ठ गद्यकार-गद्यकार प्रसाद की सर्वाधिक ख्याति नाटककार के रूप में है। उन्होंने गुप्तकालीन भारत को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत करके गाँधीवादी अहिंसामूलक देशभक्ति का सन्देश दिया है। साथ ही अपने समय के सामाजिक आन्दोलनों का सफल चित्रण किया है। नारी की स्वतन्त्रता एवं महिमा पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया है। उनके प्रत्येक नाटक का संचालन सूत्र किसी नारी पात्र के ही हाथ में रहता है। उपन्यास और कहानियों में भी सामाजिक भावना का प्राधान्य है। उनमें दाम्पत्य-प्रेम के आदर्श रूप का चित्रण किया गया है। उनके निबन्ध विचारात्मक एवं चिन्तनप्रधान हैं, जिनके माध्यम से प्रसाद ने काव्य और काव्य-रूपों के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किये हैं।

उपसंहार-–पद्य और गद्य की सभी रचनाओं में इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित हिन्दी है। इनकी शैली आलंकारिक एवं साहित्यिक है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनकी गद्य-रचनाओं में भी इनका छायावादी कवि हृदय झाँकता हुआ दिखाई देता है। मानवीय भावों और आदर्शों में उदारवृत्ति का सृजन विश्व-कल्याण के प्रति इनकी विशाल-हृदयता का सूचक है। हिन्दी-साहित्य के लिए प्रसाद जी की यह बहुत बड़ी देन है। ‘प्रसाद’ की रचनाओं में छायावाद पूर्ण प्रौढ़ता, शालीनता, गुरुता और गम्भीरता को प्राप्त दिखाई देता है। अपनी विशिष्ट कल्पना शक्ति, मौलिक अनुभूति एवं नूतन अभिव्यक्ति पद्धति के फलस्वरूप प्रसाद हिन्दी-साहित्य में मूर्धन्य स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। समग्रतः यह कहा जा सकता है कि प्रसाद जी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुत महान् है जिस कारण वे मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार रहे हैं।

मेरा प्रिय वैज्ञानिक : चन्द्रशेखर वेंकटरमन [2016]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. प्रारम्भिक परिचय,
  3. शिक्षा एवं कार्यक्षेत्र,
  4. वैज्ञानिक उपलब्धियाँ व नोबेल पुरस्कार,
  5. अन्य पुरस्कार व सम्मान,
  6. निधन एवं उपसंहार।

प्रस्तावना–भारत सदियों से ऐसे मेहपुरुषों की भूमि रही है, जिनके कार्यों से पूरी मानवता का कल्याण हुआ है। ऐसे महापुरुषों की सूची में केवल समाज-सुधारकों, साहित्यकारों एवं आध्यात्मिक गुरुओं के ही नहीं, बल्कि कई वैज्ञानिकों के भी नाम आते हैं। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ऐसे ही एक महान् भारतीय वैज्ञानिक थे, जिनकी खोजों के फलस्वरूप विश्व को कई प्राकृतिक रहस्यों का पता लगा। ये ही मेरे आदर्श वैज्ञानिक हैं।।

प्रारम्भिक परिचय-चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 7 नवम्बर, 1888 को तमिलनाडु राज्य में तिरुचिरापल्ली नगर के निकट तिरुवनईकवल नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम चन्द्रशेखर अय्यर एवं माता का नाम पार्वती अम्माल था। चूंकि वेंकटरमन के पिता भौतिक विज्ञान एवं गणित के विद्वान् थे तथा विशाखापत्तनम में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त थे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रमन को विज्ञान के प्रति गहरी रुचि एवं अध्ययनशीलता विरासत में मिली। एक वैज्ञानिक होने के बावजूद धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्तित्व उन पर अपनी माँ के स्पष्ट प्रभाव को दर्शाता है, जो संस्कृत की अच्छी जानकार एवं धार्मिक प्रवृत्ति की थीं।

शिक्षा एवं कार्यक्षेत्र–रमन की प्रारम्भिक शिक्षा विशाखापत्तनम में हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए ये चेन्नई चले गए। वहीं उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से 1994 ई० में बी०ए० एवं 1907 ई० में एम०ए० की डिग्रियाँ प्राप्त की। बी०ए० में उन्होंने कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए गोल्ड मेडल प्राप्त किया था तथा एम०ए० प्रथम श्रेणी में अत्युच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए थे। 1907 ई० में ही ये भारतीय वित्त विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर कलकत्ता (कोलकाता) में सहायक महालेखपाल के पद पर नियुक्त हुए। उस समय उनकी आयु मात्र 19वर्ष थी। इतनी कम आयु में इतने उच्च पद पर नियुक्त होने वाले वे पहले भारतीय थे। सरकारी नौकरी के दौरान भी उन्होंने विज्ञान का दामन नहीं छोड़ा और कलकत्ता की भारतीय विज्ञान प्रचारिणी संस्था के संस्थापक डॉ० महेन्द्रलाल सरकार के सुपुत्र वैज्ञानिक डॉ० अमृतलाल सरकार के साथ अपना वैज्ञानिक शोधकार्य करते रहे। 1911 ई० में वे डाक-तार विभाग के अकाउण्टेन्ट जनरल बने। इसी बीच उन्हें भारतीय विज्ञान परिषद् का सदस्य भी बनाया गया। 1917 ई० में विज्ञान को अपना सम्पूर्ण समय देने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्राचार्य पद पर नियुक्त हुए। उस समय प्राचार्य का वह पद पालित पद में रूप में था।

वैज्ञानिक उपलब्धियाँ व नोबेल पुरस्कार-सरकारी नौकरी को छोड़कर भौतिक विज्ञान के प्राचार्य पद पर नियुक्त होने के पीछे उनका उद्देश्य अपने वैज्ञानिक अनुसन्धानों को अधिक समय देना था। इस दौरान उनके शोध-पत्र देश-विदेश की कई वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। अपने शोध और अनुसन्धान को गति प्रदान करने के उद्देश्य से उन्होंने कई विदेश यात्राएँ भी की। 1921 ई० में ऐसी ही एक समुद्र यात्रा के दौरान समुद्र के गहरे नीले पानी ने उनका ध्यान बरबस ही अपनी ओर खींचा। फलस्वरूप उन्होंने पानी, हवा, बर्फ आदि पारदर्शक माध्यमों के अणुओं द्वारा परिक्षिप्त होने वाले प्रकाश का अध्ययन करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने अपने अनुसन्धानों से यह सिद्ध कर दिया कि पदार्थ के भीतर एक विद्युत तरल पदार्थ होता है, जो सदैव गतिमान रहता है। इसी तरल पदार्थ के कारण केवल पारदर्शक द्रवों में ही नहीं, बल्कि बर्फ तथा स्फटिक जैसे पारदर्शक पदार्थों और अपारदर्शी वस्तुओं में भी अणुओं की गति के कारण प्रकाश किरणों का परिक्षेपण हुआ करता है। किरणों के इसी प्रभाव को ‘रमन प्रभाव’ के नाम से जाना जाता है।

इस खोज के फलस्वरूप यह रहस्य खुला कि आकाश नीला क्यों दिखाई पड़ता है, वस्तुएँ विभिन्न रंगों की क्यों दिखती हैं और पानी पर हिमशैल हरे-नीले क्यों दिखते हैं। इसके अतिरिक्त इस खोज के फलस्वरूप विज्ञान जगत् को असंख्य जटिल यौगिकों के अणु विन्यास को सुलझाने से सम्बन्धित अनेक लाभ हुए। इस खोज के महत्त्व को देखते हुए 1930 ई० में रमन को भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। रमन की रुचि संगीत में थी इसलिए कलकत्ता विश्वविद्यालय की नौकरी के दौरान उन्होंने ध्वनि कम्पन एवं शब्द-विज्ञान के क्षेत्र में भी रोचक बातों का पता लगाया था। 1934 ई० में उन्होंने बंगलौर (बंगलुरु) में भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थापना की तथा 1948 से नवस्थापित रमन अनुसन्धान संस्थान, बंगलौर (बंगलुरु) में निदेशक पद पर आजीवन कार्य करते रहे। इस संस्थान में वे अपने जीवन के अन्तिम दिनों तक हीरों तथा अन्य रनों की बनावट के बारे में अनुसन्धान करते रहे।

अन्य पुरस्कार व सम्मान–1930 ई० में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के अतिरिक्त, चन्द्रशेखर वेंकटरमन की उपलब्धियों के लिए देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों एवं सरकारों ने उन्हें कई उपाधियाँ एवं पुरस्कार देकर सम्मनित किया। 1924 ई० में उन्हें रॉयल सोसाइटी का ‘फैलो’ चुना गया, तो 1929 ई० में ‘नाइट’ की पदवी से विभूषित किया गया। सोवियत रूस का श्रेष्ठतम ‘लेनिन शान्ति पुरस्कार’ उन्हें प्रदान किया गया। अंग्रेज सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि प्रदान की। इसके अतिरिक्त इटली की विज्ञान परिषद् ने ‘मेटयूसी पदक’, अमेरिका ने ‘फ्रेंकलिन पदक’ तथा इंग्लैण्ड ने ‘ह्यूजेज पदक’ प्रदान कर रमन को सम्मानित किया। 1954 ई० में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया। यह सम्मान कला, साहित्य और विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए की गई विशिष्ट सेवा और जन-सेवा में उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित करने के लिए प्रदान किया जाता है। विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने जो महान् अनुसन्धान किए थे, उनके लिए वे इसे सम्मान के वास्तविक हकदार थे। उन्होंने ‘रमन प्रभाव’ की खोज 28 फरवरी, 1928 को की थी, इसलिए 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारतीय डाक-तार विभाग ने उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों के महत्त्व को देखते हुए एक डाकटिकट जारी करके श्री रमन को सम्मानित किया।

निधन एवं उपसंहार-चन्द्रशेखर वेंकटरमन वैज्ञानिक एवं शिक्षक ही नहीं, बल्कि एक कुशल वक्ता तथा संगीतप्रेमी भी थे। उन्होंने जीवन भर विज्ञान की सेवा की और रमन अनुसन्धान संस्थान के निदेशक पद पर रहते हुए उनकी मृत्यु 21 नवम्बर, 1970 को 81 वर्ष की अवस्था में हो गई। अपने संस्थान के प्रति उनके अनुराग को देखते हुए उनका दाह-संस्कार संस्थान के प्रांगण में ही किया गया। भारत को वैज्ञनिक अनुसन्धान के क्षेत्र में अग्रसर करने में रमन के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने जो खोजें की थीं, आज उनका विस्तार विज्ञान की अनेक शाखाओं तक हो चुका है। उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व भारतीय युवा वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का बहुमूल्य स्रोत है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi साहित्यिक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name साहित्यिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi साहित्यिक निबन्ध

साहित्यिक निबन्ध

साहित्य समाज का दर्पण है [2011, 14, 16, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • साहित्य और मानव-जीवन 1. साहित्य और समाज
  • साहित्य समाज की अभिव्यक्ति है। [2010, 11, 12, 15, 17]
  • साहित्य और जीवन
  • सामाजिक विकास में साहित्य की उपयोगिता [2017]
  • साहित्य और समाज का घनिष्ठ सम्बन्ध [2017]

प्रमुख विचार-विन्द–

  1. साहित्य क्या है ?
  2. साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ,
  3. समाज क्या है ?
  4. साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध : साहित्य समाज को दर्पण,
  5. साहित्य की रचनाप्रक्रिया,
  6. साहित्य का समाज पर प्रभाव,
  7. उपसंहार

साहित्य क्या है?-‘साहित्य’ शब्द ‘सहित’ से बना है। ‘सहित’ का भाव ही साहित्य कहलाता है। (सहितस्य भावः साहित्यः)। ‘सहित’ के दो अर्थ हैं-साथ एवं हितकारी (स + हित = हितसहित) या कल्याणकारी। यहाँ ‘साथ’ से आशय है-शब्द और अर्थ का साथ अर्थात् सार्थक शब्दों का प्रयोग। सार्थक शब्दों का प्रयोग तो ज्ञान-विज्ञान की सभी शाखाएँ करती हैं। तब फिर साहित्य की अपनी क्या विशेषता है ? वस्तुत: साहित्य का ज्ञान-विज्ञान की समस्त शाखाओं से स्पष्ट अन्तर है–(1) ज्ञान-विज्ञान की शाखाएँ बुद्धिप्रधान या तर्कप्रधान होती हैं जबकि साहित्य हृदयप्रधान। (2) ये शाखाएँ तथ्यात्मक हैं जबकि साहित्य कल्पनात्मक। (3) ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का मुख्य लक्ष्य मानव की भौतिक सुख-समृद्धि एवं सुविधाओं का विधान करना है, पर साहित्य का लक्ष्य तो मानव के अन्त:करण को परिष्कार करते हुए, उसमें सदवृत्तियों का संचार करना है। आनन्द प्रदान कराना यदि साहित्य की सफलता है, तो मानव-मन को उन्नयन उसकी सार्थकता। (4) ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं में कथ्य (विचार-तत्त्व) ही प्रधान होता है, कथन-शैली गौण। वस्तुत: भाषा-शैली कहाँ विचाराभिव्यक्ति की साधनमात्र है। दूसरी ओर साहित्य में कथ्य से अधिक शैली का महत्व है। उदाहरणार्थ-

जल उठा स्नेह दीपक-सा
नवनीत हृदय था मेरा,
अब शेष घूमरेखा से
चित्रित कर रहा अंधेरा

कवि का कहना केवल यह है कि प्रिय के संयोगकाल में जो हृदये हर्षोल्लास से भरा रहता था, वही अब उसके वियोग में गुहरे विषाद में डूब गया है। यह एक साधारण व्यापार है, जिसका अनुभव प्रत्येक प्रेमी-हृदय करता है, किन्तु कवि ने दीपक के रूपक द्वारा इसी साधारण-सी बात को अत्यधिक चमत्कारपूर्ण ढंग से कहा है, जो पाठक के हृदय को कहीं गहरा छू लेता है।

स्पष्ट है कि साहित्य में भाव और भाषा, कथ्य और कथन-शैली (अभिव्यक्ति)-दोनों का समान महत्त्व है। यह अकेली विशेषता ही साहित्य को ज्ञान-विज्ञान की शेष शाखाओं से अलग करने के लिए पर्याप्त है।

साहित्य की कतिपय परिभाषाएँ–प्रेमचन्द जी साहित्य की परिभाषा इन शब्दों में देते हैं, “सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है-एक जिज्ञासा का, दूसरा प्रयोजन का और तीसरा आनन्द का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और आनन्द को सम्बन्ध केवल साहित्य का विषय है। सत्य जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है। इस बात को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर इन शब्दों में कहते हैं, “जिस अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य प्रयोजन के रूप को व्यक्त करना नहीं, अपितु विशुद्ध आनन्द रूप को व्यक्त करना है, उसी को मैं साहित्य कहता हूँ।” प्रसिद्ध अंग्रेज समालोचक दक्विन्सी (De Quincey) के अनुसार साहित्य का दृष्टिकोण उपयोगितावादी न होकर मानवतावादी है। “ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं का लक्ष्य मानव को ज्ञानवर्द्धन करना है, उसे शिक्षा देना है। इसके विपरीत साहित्य मानव का अन्त:विकास करता है, उसे जीवन जीने की कला सिखाता है, चित्तप्रसादन द्वारा उसमें नूतन प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संचार करता है।”

समाज क्या है ?--एक ऐसा मानव-समुदाय, जो किसी निश्चित भू-भाग पर रहता हो, समान परम्पराओं, इतिहास, धर्म एवं संस्कृति से आपस में जुड़ा हो तथा एक भाषा बोलता हो, समाज कहलाता है।

साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध: साहित्य समाज का दर्पण–समाज और साहित्य परस्पर घनिष्ठ रूप से आबद्ध हैं। साहित्य का जन्म वस्तुत: समाज से ही होता है। साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही घटक होता है। वह अपने समाज की परम्पराओं, इतिहास, धर्म, संस्कृति आदि से ही अनुप्राणित होकर साहित्य-रचना करता है और अपनी कृति में इनका चित्रण करता है। इस प्रकार साहित्यकारे अपनी रचना की सामग्री किसी समाज विशेष से ही चुनता है तथा अपने समाज की शाओं-आकांक्षाओं, सुख-दु:खों, संघर्षों, अभावों और उपलब्धियों को वाणी देता है तथा उसका प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। उसकी समर्थ वाणी का सहारा पाकर समाज अपने स्वरूप को पहचानता है और अपने रोग का सही निदान पाकर उसके उपचार को तत्पर होता है। इसी कारण किसी साहित्य विशेष को पढ़कर उस काल के समाज का एक समग्र-चित्र मानसपटल पर अंकित हो सकता है। इसी अर्थ में साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है।

साहित्य की रचना-प्रक्रिया-समर्थ साहित्यकार अपनी अतलस्पर्शिनी प्रतिभा द्वारा सबसे पहले अपने समकालीन सामाजिक जीवन का बारीकी से पर्यवेक्षण करता है, उसकी सफलताओं-असफलताओं, उपलब्धियों-अभावों, क्षमताओं-दुर्बलताओं तथा संगतियों-विसंगतियों की गहराई तक थाह लेता है। इसके पश्चात् विकृतियों और समस्याओं के मूल कारणों का निदान कर अपनी रचना के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन करता है और फिर इस समस्त बिखरी हुई, परस्पर असम्बद्ध एवं अति साधारण-सी दीख पड़ने वाली सामग्री को सुसंयोजित कर उसे अपनी ‘नवनवोन्मेषशालिनी कल्पना के साँचे में ढालकर ऐसा कलात्मक रूप एवं सौष्ठव प्रदान करता है कि सहदय अध्येता रस-विभोर हो नूतन प्रेरणा से अनुप्राणित हो उठता है। कलाकार का वैशिष्ट्य इसी में है कि उसकी रचना की अनुभूति एकाकी होते हुए भी सार्वदेशिक-सार्वकालिक बन जाए तथा अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए चिरन्तन मानव-मूल्यों से मण्डित भी हो। उसकी रचना न केवल अपने युग, अपितु आने वाले युगों के लिए भी नवस्फूर्ति का अजस्र स्रोत बन जाए और अपने देश-काल की उपेक्षा न करते हुए देश-कालातीत होकर मानवमात्र की अक्षय निधि बन जाए। यही कारण है कि महान् साहित्यकार किसी विशेष देश, जाति, धर्म एवं भाषा-शैली के समुदाय में जन्म लेकर भी सारे विश्व का अपना बन जाता है; उदाहरणार्थ-वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसीदास, होमर, शेक्सपियर आदि किसी देश विशेष के नहीं मानवमात्र के अपने हैं, जो युगों से मानव को नवचेतना प्रदान करते आ रहे हैं और करते रहेंगे।

साहित्य का समाज पर प्रभाव-साहित्यकार अपने समकालीन समाज से ही अपनी रचना के लिए आवश्यक सामग्री का चयन करता है; अत: समाज पर साहित्य का प्रभाव भी स्वाभाविक है।

जैसा कि ऊपर संकेतित किया गया है कि महान् साहित्यकार में एक ऐसी नैसर्गिक या ईश्वरदत्त प्रतिभा होती है, एक ऐसी अतलस्पर्शिनी अन्तर्दृष्टि होती है कि वह विभिन्न दृश्यों, घटनाओं, व्यापारों या समस्याओं के मूल तक तत्क्षण पहुँच जाता है, जब कि राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री या अर्थशास्त्री उसका कारण बाहर टटोलते रह जाते हैं। इतना ही नहीं, साहित्यकार रोग का जो निदान करता और उपचार सुझाता है, वही वास्तविक समाधान होता है। इसी कारण प्रेमचन्द जी ने कहा है कि “साहित्य राजनीति के आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है, राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं।’ अंग्रेज कवि शेली ने कवियों को ‘विश्व के अघोषित विधायक’ (un-acknowledgedlegislators of the world) कहा है।

प्राचीन ऋषियों ने कवि को विधाता और द्रष्टा कहा है-‘कविर्मनीषी धाता स्वयम्भूः।’ साहित्यकार कितना बड़ा द्रष्टा होता है, इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। आज से लगभग 70-75 वर्ष पूर्व श्री देवकीनन्दन खत्री ने अपने तिलिस्मी उपन्यास ‘रोहतासमठ’ में यन्त्रमानव (robot) के कार्यों को विस्मयकारी चित्रण किया था। उस समय यह सर्वथा कपोल-कल्पित लगा; क्योंकि उस काल में यन्त्रमानव की बात किसी ने सोची तक न थी, किन्तु आज विज्ञान ने उस दिशा में बहुत प्रगति कर ली है, यह देख श्री खत्री की नवनवोन्मेष-शालिनी प्रतिभा के सम्मुख नतमस्तक होना पड़ता है। इसी प्रकार आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व पुष्पक विमान के विषय में पढ़ना कल्पनामात्र लगता होगा, परन्तु आज उससे कहीं अधिक प्रगति वैमानिकी ने की है।

साहित्य द्वारा सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियों के उल्लेखों से तो विश्व का इतिहास भरा पड़ा है। सम्पूर्ण यूरोप को गम्भीर रूप से आलोड़ित कर डालने वाली फ्रांस की राज्य क्रान्ति (1789 ई०), रूसो की ‘सोसियल कॉन्ट्रेक्ट’ (The Social Contract–सामाजिक-अनुबन्ध) नामक पुस्तक के प्रकाशन का ही परिणाम थी। आधुनिक काल में चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों ने इंग्लैण्ड से कितनी ही घातक सामाजिक एवं शैक्षिक रूढ़ियों का उन्मूलन कराकर नूतन स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात कराया।

आधुनिक युग में प्रेमचन्द के उपन्यासों में कृषकों पर जमींदारों के बर्बर अत्याचारों एवं महाजनों द्वारा उनके क्रूर शोषण के चित्रों ने समाज को जमींदारी-उन्मूलन एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की स्थापना को प्रेरित किया। उधर बंगाल में शरत् चन्द्र ने अपने उपन्यासों में कन्याओं के बाल-विवाह की अमानवीयता एवं विधवा-विवाह-निषेध की नृशंसता को ऐसी सशक्तता से उजागर किया कि अन्तत: बाल-विवाह को कानून द्वारा निषिद्ध घोषित किया गया एवं विधवा-विवाह का प्रचलन हुआ।

उपसंहार-निष्कर्ष यह है कि समाज और साहित्य का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। साहित्य समाज से ही उद्भूत होता है; क्योंकि साहित्यकार किसी समाज विशेष का ही अंग होता है। वह इसी से प्रेरणा ग्रहणकर साहित्य-रचना करता है एवं अपने युग की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता हुआ समकालीन समाज का मार्गदर्शन करता है, किन्तु साहित्यकार की महत्ता इसमें है कि वह अपने युग की उपज होने पर भी उसी से बँधकर नहीं रह जाये, अपितु अपनी रचनाओं से चिरन्तन मानवीय आदर्शों एवं मूल्यों की स्थापना द्वारा देशकालातीत बनकर सम्पूर्ण मानवता को नयी ऊर्जा एवं प्रेरणा से स्पन्दित करे।

इसी कारण साहित्य को विश्व-मानव की सर्वोत्तम उपलब्धि माना गया है, जिसकी समकक्षता संसार की मूल्यवान्-से-मूल्यवान् वस्तु भी नहीं कर सकती; क्योंकि संसार का सारा ज्ञान-विज्ञान मानवता के शरीर का ही पोषण करता है, जब कि एकमात्र साहित्य ही उसकी आत्मा को पोषक है। एक अंग्रेज विद्वान् ने कहा है कि “यदि कभी सम्पूर्ण अंग्रेज जाति नष्ट भी हो जाए, किन्तु केवल शेक्सपियर बचा रहे तो अंग्रेज जाति नष्ट नहीं हुई मानी जाएगी।” ऐसे युगस्रष्टा और युगद्रष्टा कलाकारों के सम्मुख सम्पूर्ण मानवता कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होकर उन्हें अपने हृदय-सिंहासन पर प्रतिष्ठित करती है एवं उनके यश को दिग्दिगन्तव्यापी बना देती है। अपने पार्थिव शरीर से तिरोहित हो जाने पर भी वे अपने यशरूपी शरीर से इस धराधाम पर सदा अजर-अमर बने रहते हैं|

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः ।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयम् ॥

मेरा प्रिय ग्रन्थ: श्रीरामचरितमानस [2015]

सम्बद्ध शीर्षक

  • मेरी प्रिय पुस्तक
  • हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय, अमर साहित्यिक कृति

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व,
  2. श्रीरामचरितमानस की महत्ता,
  3. कथा-संगठन,
  4. चरित्र-चित्रण,
  5. भक्ति-भावना,
  6. भाव-व्यंजना,
  7. भाषा-शैली,
  8. आदर्श की स्थापना,
  9. भारत पर तुलसी का ऋण,
  10. उपसंहार

प्रस्तावना : पुस्तकों का महत्त्व-किसी विद्वान् ने लिखा है कि व्यक्ति को अपने यौवन में ही किसी लेखक या पुस्तक को अपना प्रिय अवश्य बना लेना चाहिए, जिससे वह उससे आजीवन सोत्साह जीने का सम्बल प्राप्त कर सके। पुस्तकों से अच्छा साथी दूसरा नहीं। वे व्यक्ति को सहारा देती हैं, उससे सहारा नहीं माँगतीं। हर समय व्यक्ति के पास उपस्थित रहती हैं, किन्तु अपनी उपस्थिति से उसका ध्यान नहीं बँटातीं। एक सन्मित्र की भाँति सदा परामर्श को तत्पर रहती हैं, फिर भी अपनी राय उस पर नहीं थोपतीं।

पुस्तक की इन्हीं विशेषताओं से प्रभावित होकर मैंने उनमें विशेष रुचि ली और ग्रन्थों का अध्ययन किया, जिसके स्वरूप मैंने अनुभव किया कि गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ एक सर्वांगपूर्ण रन हैं, जो हर दृष्टि से असाधारण है एवं महत्तम मानवीय मूल्यों तथा आदर्शों से स्पन्दित है।।

श्रीरामचरितमानस की महत्ता-वाल्मीकि रामायण के काल से लेकर आज तक समस्त रामकाव्यों की यदि तुलसीकृत ‘श्रीरामचरितमानस’ से तुलना की जाए, तो यह स्पष्टत: दीख पड़ेगा कि आदिकाव्य से उद्भूत रामकाव्य-परम्परा ‘मानस’ में आकर पूर्ण परिणति को प्राप्त हुई है। चाहे वस्तु संघटन कौशल की दृष्टि से देखें, चाहे पात्रों के चरित्र-चित्रण के चरमोत्कर्ष की दृष्टि से और चाहे महाकाव्य एवं नाटकीयता के अद्भुत सामंजस्य द्वारा प्राप्त शैली की विमुग्धकारिणी प्रौढ़ता की दृष्टि से; यह निष्कर्ष तर्कसंगत और साधार प्रतीत होगा, न कि मात्र भावुकताप्रेरित। फलत: क्या आश्चर्य, यदि ‘मानस’ संसार के कला-पारखियों का हृदयहार रहा है, जिसका ज्वलन्त प्रमाण यह है कि किसी भी रामचरित-विषयक काव्य के विश्व की विभिन्न भाषाओं में इतने अनुवाद उपलब्ध नहीं होते, जितने ‘श्रीरामचरितमानस’ के। एक ओर यदि अमेरिकी पादरी ऐटकिन्स ने अपनी आयु के श्रेष्ठ आठ वर्ष लगाकरे मानस का अंग्रेजी में पद्यानुवाद किया (जबकि इससे पूर्व उस भाषा में इसके कई अनुवाद विद्यमान थे), तो दूसरी ओर अनीश्वरवादी रूस के मूर्धन्य विद्वान् प्रोफेसर वरान्नीकोव ने अपने अमूल्य जीवन का एक बड़ा भाग लगाकर तथा द्वितीय विश्वयुद्ध की भीषण परिस्थिति में कजाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में रहकर भी रूसी भाषा में इसका पद्यानुवाद किया। उपर्युक्त मनीषियों के अतिरिक्त गार्सा दे तासी (फ्रेंच); ग्राउज़, ग्रियर्सन, ग्रीव्ज, कारपेण्टर, हिल (आंग्लभाषी विद्वान्) आदि न जाने कितने काव्यमर्मज्ञ तुलसी की प्रतिभा पर मुग्ध हैं।

कथा-संगठन--यदि मानस पर कथावस्तु की दृष्टि से विचार करें तो हम पाएँगे कि इसमें गोस्वामी जी ने पुराने प्रसंगों को नया रूप देकर, कई को अधिक उपयुक्त स्थल पर रखकर, कुछ को संक्षिप्त और कुछ को विस्तृत कर तथा कुछ नये प्रसंगों की उद्भावना कर कथावस्तु को सर्वथा मौलिक बना दिया है। उनके बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड का अधिकांश तो मौलिक है ही, पर अयोध्याकाण्ड में तो उनकी कुशलता देखते ही बनती है। इसके पूर्वार्द्ध के संघर्षमय वातावरण की उन्होंने जिस कलानिपुणता से सृष्टि की है, उस पर उनकी मौलिकता की छाप है और उत्तरार्द्ध का भरत-चरित्र तो उनकी सर्वथा अनूठी रचना है। भरत के माध्यम से उन्होने अपनी भक्ति-भावना को साकार रूप प्रदान किया है। आरम्भ से अन्त तक ‘मानस’ की कथावस्तु में असाधारण प्रवाह है।

चरित्र-चित्रण-श्रीरामचरितमानस में प्रस्तुत चरित्र-चित्रण अपनी मौलिकता में वाल्मीकीय ‘रामायण’ और ‘अध्यात्म’ को बहुत पीछे छोड़ जाता है। सामान्यत: इसके सभी चरित्र नये साँचे में ढलकर नयी गरिमा से मण्डित हुए हैं, पर राम के चरित्र को इस ग्रन्थ में जिन मौलिक उपादानों से गढ़ा गया है, वे सर्वथा अभूतपूर्व हैं। इस ग्रन्थ में पहली बार राम में नरत्व के साथ परब्रह्म का सामंजस्य स्थापित किया गया है। राम में शक्ति, शील तथा सौन्दर्य की पराकाष्ठा दिखाकर राम के शील का जैसा दिव्य-चित्रण किया गया है, वह सर्वथा अभूतपूर्व और अतुलनीय है।

भक्ति-भावना–‘श्रीरामचरितमानस’ में तुलसी की भक्ति सेवक-सेव्य भाव की होते हुए भी परम्परागत भक्ति से भिन्न है। गोस्वामी जी की भक्ति साधन नहीं, स्वयं साध्य है और ज्ञानादि उसके चाकरमात्र हैं। इस ग्रन्थ में गोस्वामी जी ने भरत के रूप में अपनी भक्ति का आदर्श खड़ा किया है और भरत अपनी तन्मयता में राधाभाव के समीप पहुँच जाते हैं; अतः उनके विषय में यह नि:संकोच कहा जा सकता है। कि “माधुर्य भाव की उपासना में जो स्थान राधा का है, दास्य भाव की उपासना में वही स्थान भरत का है।” इस प्रकार तुलसी की भक्ति का स्वरूप सर्वथा मौलिक बन पड़ा है जिसमें छुटपन-बड़प्पन या ऊँच-नीच जैसा कोई भेदभाव नहीं। इस भक्तिरूपी रसायन द्वारा श्रीरामचरितमानस के माध्यम से गोस्वामी जी ने मृतप्रायः हिन्दू जाति को नवजीवन प्रदान किया।

भाव-व्यंजना-गोस्वामी जी रससिद्ध कवीश्वर थे, भाव और भाषा के अप्रतिम सम्राट् थे। उन्होंने ‘मानस’ में शास्त्रोक्त नवं रसों को तो साकार किया ही, अपनी अलौकिक प्रतिभा से भक्ति-रस नामक एक नूतन रस की भी सृष्टि कर डाली। गोस्वामी जी ने रस-परिपाक के अतिरिक्त संचारी भावों एवं अनुभावों की अलग से भी ऐसी कुशल योजना की है कि उनकी काव्य-प्रतिभा पर दंग रह जाना पड़ता है। ‘श्रीरामचरितमानस’ से संचारियों एवं अनुभावों का लिग्वित, योजनाबद्ध समग्र चित्र खड़ा करने का कौशल द्रष्टव्य है-

उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहँ पट कहँ निषंग धनु तीरा।।

भरत के आगमन पर प्रेमजन्य अधीरता एवं हर्षजन्य आवेग के कारण राम जो अति वेगपूर्वक उठते हैं, उससे जहाँ एक ओर उनका भरत के प्रति अनुराग साकार हो उठा है, वहीं उनकी मानव सुलभ अधीरता भी चित्रित हो जाती है।

‘श्रीरामचरितमानस में उपमाओं की सादगी एवं मार्मिकता पर सारा सहदय समाज मुग्ध है। एक उदाहरण पर्याप्त होगा–सम्पूर्ण लंका में एकमात्र विभीषण ही सन्त स्वभाव के थे। शेष सारा समाज दुर्जन और परपीड़क था। ऐसों के बीच में रहकर जीने के लिए विवश विभीषण अपनी दशा का वर्णन करते हुए हनुमान जी से कहते हैं—

सुनह पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्ह महँ जीभ बिचारी॥

अर्थात् हे पवनपुत्र! लंका में मैं वैसा ही विवश जीवन जी रहा हूँ, जैसा बत्तीस दाँतों के बीच में रहकर जीने को विवश बेचारी जीभ न दाँतों का संग छोड़ सकती है, न उनसे निश्चिन्त हो सकती है।
इसी प्रकार काव्य के समस्त अंगों-उपांगों कर ‘श्रीरामचरितमानस’ में चित्रण इसे एक नयी अर्थवत्ता प्रदान करता है।

भाषा-शैली—मानस में महाकवि तुलसी ने संस्कृत की महत्ता एवं एकछत्र साम्राज्य के उस युग में अनगढ़ लोकभाषा को अपनाकर उसे बड़े मनोयोग से सजाया-सँवारा। इस ग्रन्थ में इन्होंने अपनी असामान्य प्रतिभा के बल पर रस को रसात्मकता, अलंकार को अलंकरण तथा छन्द को नयी गति-भंगिमा और संगीतात्मकता प्रदान की तथा हमारे आस-पास के सुपरिचित जीवन से उपमानों का चयनकर उनमें नयी अर्थवत्ता ओर व्यंजकता भर दी। काव्य में नाटकीयता के मणिकांचन योग द्वारा नयी शैली को जन्म दिया, जिसने एक ही ग्रन्थ को श्रव्य-काव्य और दृश्य-काव्य दोनों बना दिया।

आदर्श की स्थापना-मानस की रामकथा—एक आदर्श मानव की, एक आदर्श परिवार की, एक आदर्श एवं पूर्ण जीवन की कथा है। तुलसी ने वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक–प्रत्येक क्षेत्र में जिन आदर्शों की स्थापना की, वे व्यक्ति के इहलौकिक और पारलौकिक-दोनों ही जीवनों को सँवारने वाले हैं। इसी कारण ‘मानस’ पारिवारिक जीवन का महाकाव्य कहलाता है; क्योंकि परिवार ही व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है और पारिवारिक जीवन की सुदृढ़ता शेष समस्त क्षेत्रों को भी सुदृढ़ बनाती है। आदर्श राज्य के रूप में तुलसी के रामराज्य की कल्पना आरम्भ से ही भारतीय जन-मानस को प्रेरणा देती रही है और देती रहेगी।

भारत पर तुलसी का ऋण—इस सम्बन्ध में डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी लिखते हैं कि “अपनी भक्ति के साथ-साथ समाज की रक्षा के लिए उनका अपरिसीम आग्रह था और इसी भक्ति और समाज-रक्षा की चेष्टा के फलस्वरूप ‘श्रीरामचरितमानस’ नामक महाग्रन्थ रचित हुआ, जिसकी पूतधारा ने आज तक उत्तर भारत की हिन्दू जनता के चित्त को सरस और शक्तिमान बनाये रखा है और उसके चरित्र को सामाजिक सद्गुणों के आदर्श की ज्योति से सदा आलोकित कर रखा है।”

उपसंहार-अस्तु, मौलिकता का श्रेष्ठतम सम्बल पाकर ही तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस लोक-मानस बन सका है, यह तुलसी की कवि-प्रतिभा और उनकी जागरूक कलाकारिता का प्रमाण है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में-“तुलसीदास कवि थे, भक्त थे, समाज-सुधारक थे, लोकनायक थे और भविष्य के स्रष्टा थे। इन रूपों में उनका कोई भी रूप किसी से घटकर नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने सब ओर से समता (balance) की रक्षा करते हुए एक अद्वितीय काव्य की सृष्टि की, जो अब तक उत्तर भारत का मार्गदर्शक रहा है और उस दिन भी रहेगा, जिस दिन नवीन भारत का जन्म हो गया होगा।”

तुलसी कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ का मूल्यांकन करते हुए डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल लिखते हैं। कि, “श्रीरामचरितमानस विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी का सबसे अधिक प्रभावशाली ग्रन्थ है।” भारतीय वाङमय के समुद्र से अनेक विचार-मेघ उठे और बरसे। उनके अमृत-तुल्य जल की जिस मात्रा में जनता को आवश्यकता थी, उसे समेटकर मानो गोसाईं जी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ में भर दिया है। जो अन्यत्र था, वह साररूप से यहाँ आ गया है। तुलसी का ‘श्रीरामचरितमानस’ विक्रम की दूसरी सहस्राब्दी के साहित्याकाश का खुला नेत्र है, उसे ही तत्कालीन लोक की दर्शनक्षमता या आँख कह सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सूक्तिपरक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name सूक्तिपरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सूक्तिपरक निबन्ध

सूक्तिपरक निबन्य

जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना [2016]

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना (सुमति से आशय),
  2. कुमति से तात्पर्य,
  3. विपत्ति एवं सम्पत्ति का अर्थ,
  4. सम्पत्ति का साधन : सुमति,
  5. सुमति एवं नैतिकता,
  6. सुमति और एकता,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना ( सुमति से आशय)-बुद्धि के कारण मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। बुद्धि के साथ विवेक केवल मनुष्य में पाया जाता है। विवेक और बुद्धि के समुचित समन्वय को ही सुमति के नाम से जाना जाता है। विवेक के बिना बुद्धि का कोई महत्त्व नहीं है; क्योंकि विवेक ही मनुष्य को उचित-अनुचित को ज्ञान कराता है। मनुष्य को किस परिस्थिति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, यही विवेक कहलाता है। विवेकपूर्वक किया गया कार्य न केवल व्यक्ति विशेष अपितु प्राणिमात्र के लिए कल्याणकारी होता है। बुद्धि विवेकपूर्वक किए जाने वाले कार्य की दशा और दिशा का निर्धारण करके उसे और अधिक कल्याणकारी बनाने में उत्प्रेरक का कार्य करता है। आशय यही है कि सुमति संसार में सुख-समृद्धि लाने का एक अकेला उपाय है। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने ‘श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में कहा है-

जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना।
जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना॥

कुमति से तात्पर्य–विवेक के अभाव में अर्थात् अविवेक से समन्वित बुद्धि बिगडैल हाथी के समान होती है जो केवल तोड़-फोड़, विध्वंस एवं संहार कर सकती है। इसी संहारक बुद्धि को कुमति कहा जाता है। जब मनुष्य अपनी बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों में लगाता है तो उसे बुद्धिमान कहते हैं और कहते हैं कि वह बड़ा सुबुद्धिवाला है। सुबुद्धि या सुमति की बड़ी महिमा है। जब तक मनुष्य में सुमति रहती है, वह अच्छे कार्यों में लगा होता है। कुमति का प्रभाव व्यक्ति पर शीघ्र पड़ता है और उससे उसकी सुमति कुमति में परिवर्तित हो जाती है; अतः मनुष्य निकृष्ट कार्यों को करता है और ये निकृष्ट कार्य ही उसके लिए दु:ख का कारण बन जाते हैं। इसीलिए कहा गया है-

कुमति कुंज तिन जेहि घर व्यापै सुमति सुहागिन जाय विलापै।

विपत्ति एवं सम्पत्ति का अर्थ-किसी कार्य को बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक के कारण मनुष्य बड़ी विपत्ति (मुसीबत) में फँस जाता है। इसके विपरीत सोच-समझकर अर्थात् विवेक या सुमति से कार्य करने पर व्यक्ति के सभी कार्य सिद्ध होते हैं जिससे उसके जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इन्हीं सुख-समृद्धियों को सम्पत्ति कहा जाता है। सम्पत्ति से आशय केवल धन-दौलत से नहीं होता आपति मन का चैन, शान्ति और सन्तोष भी सम्पत्ति के अभिन्न अंग हैं। कबीरदास जी ने तो सन्तोष को सबसे बड़ा धन (सम्पत्ति) कहा है–

गोधन, गजधन, बाजिधन, और रतन-धन खान।
जौ आवै सन्तोष-धन, सब धन धूरि समान॥

सम्पत्ति का साधन: सुमति–संसार में जो व्यक्ति सोच-समझकर अर्थात् विवेक अथवा सुमति से कार्य करता है, उसके पास विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियाँ अपने आप आती हैं। स्पष्ट है कि जहाँ सुमति का साम्राज्य होता है, वहाँ सम्पत्ति स्वयं घर बनाकर रहती है। सुमति के अभाव में मनुष्य सोच-विचारकर कार्य नहीं करता; परिणामस्वरूप उसे अनेक कष्टों को भोगना पड़ता है–

बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय।

गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में कहा है-

जाको विधि दारुन दुख देई, ताकी मति पहलेहि हर लेई।

अर्थात् जिसे ईश्वर घोर कष्ट देना चाहता है, उसकी बुद्धि को वह पहले ही छीन लेता है। जब किसी व्यक्ति की बुद्धि उससे छिन जाती है तो वह कुबुद्धि के प्रभावस्वरूप अनैतिक आचरण करता है, जो उसके लिए महान् दु:ख का कारण बन जाता है। इसलिए इस बात में कोई संशय नहीं रह जाता है कि सुखों की प्राप्ति सुमति से ही सम्भव है।

सुमति हमें मानव-मूल्यों के पालन और संरक्षण की प्रेरणा देती है। प्रेम, मेल-मिलाप, भाईचारा, एकता, परोपकार, दया, करुणा आदि ऐसे ही जीवन-मूल्य हैं, जिन्हें सुमति पोषित करती है। जिस देश में लोग मिल-जुलकर कार्य करते हैं, उस देश में सर्वत्र सुख-समृद्धि फैली होती है। इसलिए हम सुमतिरूपी तलवार से दरिद्रता के बन्धनों को काट सकते हैं। सुमति हमारे कुविचारों पर नियन्त्रण रखती है, जिससे हम कोई अनुचित कार्य नहीं कर पाते। निकृष्ट कार्यों की जड़ कुमति होती है, इसलिए हमें सदैव सुमति से काम करना चाहिए।

सुमति से ही हमें विद्यारूपी धन की प्राप्ति होती है। सुमति हमें ज्ञानार्जन की ओर प्रेरित करती है, इसी की कृपा से हमें ज्ञान प्राप्त होता है। सुमति से रहित मनुष्य अँधेरे कुएँ में पड़े हुए मेंढक के समान होता है, जिसको कुएँ के बाहर के संसार का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होता है। उसका संसार कुएँ की परिधि तक ही सीमित रहता है।
संसार के सभी सुख सुमति से ही प्राप्त होते हैं। परिवार हो या समाज, सुमति के बिना उनमें सुख का संचार हो ही नहीं सकता।
जिस देश और समाज में लोग सुमति से काम करते हैं, वह धन-धान्य एवं अनेक सुख से परिपूर्ण हो जाता है। जिस परिवार में पति और पत्नी सुमति से काम करते हैं, वह परिवार स्वर्ग के तुल्य हो जाता है, किन्तु जिन परिवारों में सुमति का अभाव होता है, उन परिवारों को वातावरण अत्यधिक तनाव एवं क्लेश के कारण नरकतुल्य हो जाता है।

सुमति एवं नैतिकता-यदि हम यह कहें कि सुमति ही शक्ति है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी। जिस देश या जाति में सुमति होती है, वही उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं और उनका यश चारों दिशाओं में फैलता है। सुमति सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी सुमति का आश्रय नहीं छोड़ते हैं, वे ही जीवन में उन्नति के शिखर पर पहुँचते हैं। सत्य बोलना, मीठा बोलना, बड़ों का आदर करना आदि मानवोचित गुण हमें सुमति द्वारा ही प्राप्त होते हैं। जिस व्यक्ति में सुमति का अ गव होता है, उसमें अभिमान, ईष्र्या, द्वेष आदि दोष प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। मनुष्य में सुमति का न होना उस, लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। जहाँ सुमति नहीं होती, वहाँ काम, क्रोध, मद, लोभ आदि का साम्राज्य होता है. सुमति के अभाव में मनुष्य ऐसे-ऐसे कार्य कर डालता है जो उसके एवं समाज दोनों के लिए हानिकार होते हैं। कुमति के कारण लोग परस्पर संघर्ष करते हैं एवं अपने आचरण से दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं। ‘सरों को कष्ट पहुँचाकर कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता; अतः कुमति के कारण दूसरों को पीड़ पहुंकर व्यक्ति स्वयं भी अपार पीड़ा को भोगता है।

सुमति और एकता-सुमति समाज को एकता के सूत्र में बाँधती है। एकता सुख एवं समृद्धि की जननी है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि एकता से समाज में शक्ति का संचार होता है और आपसी फूट तथा भेदभाव उसे छिन्न-भिन्नकर डालते हैं। इसीलिए हमारे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही कहा है ।

घटे न हेल-मेल हा! बढ़े न भिन्नता कभी,
अतयं एक पन्थ के सतर्क पान्थ हों सभी।

उपसंहार-आज कुमति एवं अविवेक के कारण ही सम्पूर्ण संसार विनाश के ज्वालामुखी पर बैठा है। परमाणु अस्त्रों की होड़ ने उसके अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिह्न खड़ा कर दिया है। उसकी कुमति अथवा अविवेक ने ही संसार में आतंकवाद को फैलाकर उसके मन का सुख-चैन एवं शान्ति भंग कर दी है। भ्रष्टाचार जैसे अनैतिक कार्य भी उसकी कुमति का ही परिणाम हैं। सुमति द्वारा ही मनुष्य का कल्याण सम्भव है। हम आज के समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, द्वेष एवं घृणा पर विजय केवल सुमति द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। सुमति ही हमें अनीति, अन्याय एवं अत्याचार से निपटने का उपाय सुझाती है। इसी के द्वारा हम समाज में न्याय एवं नैतिकता की पुनस्र्थापना कर सकते हैं। यदि मनुष्य सुमति का आश्रय ले तो समाज में सत्यम्, शिवम् एवं सुन्दरम् के साम्राज्य की स्थापना होगी, इसमें किसी भी प्रकार को कोई संशय नहीं है।

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत [2014]

सम्बद्ध शीर्षक

  • इच्छा-शक्ति के चमत्कार
  • साहस जहाँ सिद्धि वहाँ [2016]
  • मन ही सफलता की कुंजी है।
  • मन की शक्ति का महत्त्व
  • नर हो न निराश करो मन को [2013]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. मन महाशक्तिवान् है,
  3. मन-विजयी अपने मार्ग पर अडिग रहता है,
  4. सफलता की कुंजी : मन की स्थिरता, धैर्य और सतत कर्म,
  5. मानसिक दुर्बलता का उपचार,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना--मनु महाराज ने कहा है-‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’ अर्थात् मनुष्य का मन ही उसके बन्धन और मोक्ष का कारण है। आशय यह है कि यदि मानव अपने मन को सांसारिक विषय-भोगों में आसक्त रखे तो वह बन्धन में पड़ा रहेगा और आवागमन के चक्र में घूमता रहेगा, किन्तु यदि वह संसार से मुंह फेरकर ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाए तो दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लेगा। इस प्रकार मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके मन में निहित है, शरीर या बाह्य साधनों में नहीं। बाह्य साधन रखते हुए भी यदि आदमी का मन दुर्बल हो जाए तो वह हार जाता है और यदि मन सबल हो तो अल्प साधनों के बल पर भी वह दिग्विजय प्राप्त कर सकता है। वैदिक मन्त्रों में मन की प्रकृति को स्पष्ट किया गया है

यज्जागृतो दूरमुपैति दैवं यत्सुप्तस्य तथैवेति ।
दूरङ्गमं ज्योतिष ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संङ्कल्पमस्तु ।।

अर्थात् जो मन हमारे जागने पर दूर चला जाता है, सोने पर भी कहीं अन्य चला जाता है, जो बहुत दूर जाने की शक्ति रखता है, जो प्रकाशों का भी प्रकाश है, वह मन मेरे लिए कल्याणकारी चिन्तन करें।

शास्त्रकारों ने इन्द्रियों का स्वामी मन को माना है। गीता में मन को चंचल माना गया है। वेद भी कहते हैं कि मन सबसे अधिक शक्तिशाली है, इसकी शक्ति अपरिमित है। मनुष्य शारीरिक दृष्टि से चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, यदि वह मानसिक रूप से क्षीण है तो वह अपने जीवन में प्रगति नहीं कर सकता। कबीर ने कहा है

सुख-दुःख सब कहँ परत हैं, पौरुष तजहुँ न मीत।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ॥

तात्पर्य यह है कि सुख और दुःख सभी पर आते हैं। मनुष्य को कभी भी दुःख से घबराकर पौरुष का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि मन के द्वारा हार स्वीकार किये जाने पर व्यक्ति की हार सुनिश्चित है। इसके विपरीत यदि मनुष्य का मन हार स्वीकार नहीं करता, तो विपरीत परिस्थितियों में भी विजयश्री उसके चरण चूमती है।

मन महाशक्तिवान् है—इतिहास के अनुसार मुहम्मद गोरी के एक सेनापति मुहम्मद-बिनबख्तियार ने सन् 1197 ई० में केवल 2000 सिपाहियों को लेकर बिहार को जीत लिया था और इससे भी कम सिपाहियों को लेकर बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन की राजधानी नदिया (नवद्वीप) पर आक्रमण किया था। बिना लड़े ही लक्ष्मणसेन भाग गया और बंगाल पराजित हो गया। स्पष्ट है कि बिहार और बंगाल के शासक लड़ाई के मैदान में हारने से पहले ही मन से हार चुके थे, इसलिए वे थोड़े-से आक्रमणकारियों का भी सामना न कर सके। इसी प्रकार जब भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कुरुक्षेत्र में कहते हैं

मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् !

अर्थात् हे अर्जुन! मैं इन कौरव-वीरों को पहले ही मार चुका हूँ, तू तो इन्हें मारने का बस निमित्तमात्र हो जा, तो उनका आशय यही है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में उतरने से पहले ही कौरव मन से हार चुके थे, मर चुके थे। उन्हें विश्वास हो गया था कि वे इस धर्मयुद्ध में पाण्डवों से नहीं जीत सकेंगे। बस, वे तो केवल दुर्योधन के हेठ के कारण लड़ रहे थे। इस प्रकार वास्तविक जय-पराजय, सफलता-असफलता तो मन की दृढ़ता या दुर्बलताओं पर निर्भर है, साधनों पर नहीं। यही बात लंका पर श्रीराम की विजय के दृष्टान्त से भी पुष्ट होती है। श्रीराम के पास वैसी सशस्त्र सेना भी न थी, फिर भी लंका जैसे दुर्जेय साम्राज्य को जीतना, रावण जैसे त्रैलोक्यविजयी अपराजेय शत्रु से मोर्चा लेना, दुर्लंघ्य सागर को केवल पैदल चलकर ही पार करना मन में अडिग विश्वास का ही परिणाम था और इसी से सम्पूर्ण राक्षस कुल का विनाश सम्भव हुआ। इससे स्पष्ट है कि महापुरुषों को सफलता साधनों के बल पर नहीं, अपने आत्मबल, अपनी दृढ़चित्तता, अपने अडिग निश्चय के बल पर मिलती है।

मन-विजयी अपने मार्ग पर अडिग रहता है--सर्वोच्च तथा गूढ़ तत्त्व के रूप में मन मनुष्य की उच्चतम श्रेष्ठ शक्तियों पर नियन्त्रण करने वाला होता है और उन शक्तियों को सबसे प्रखर रूप में वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसका मन पूर्णतया नियन्त्रित है। औरंगजेब ने महाराजा जयसिंह को काबुल-विजय के लिए भेजा। बीच में अटक का विकराल महानद रास्ता रोके अड़ा था। सेनापति बोला–“महाराज, अटक अटक रहा है।” जयसिंह ने कहा–

सबै भूमि गोपाल की, या में अटक कहाँ ।
जाके मन में अटक है, सोई अटक रहा ॥

और अपनी घोड़ा उफनते महानद में डाल दिया। उनके साथ ही सारी सेना भी अटक पार कर गयी। दृढ़चित्त महापुरुषों का व्यवहार ऐसा ही असाधारण होती है। उनके सामने कोई भय, कोई विपत्ति, कोई बाधा टिकती ही नहीं। अपने अपराजेय मन के बूते पर वे सब कुछ जीतते चले जाते हैं।

छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा-“शिवा, मैं उदरशूल (पेट के दर्द) से व्याकुल हूँ। यदि शेरनी का दूध मिले तो इसका उपचार हो।” गुरुभक्त शिवा ने एक क्षण की भी हिचकिचाहट दिखाये बिना तत्काल वन को प्रस्थान कर दिया और सिंहनी उनके सामने गाय बनकर चुपचाप खड़ी दूध दुहवाती रही। ऐसी दृढ़चित्तता के सामने पर्वत झुक जाते हैं, नदियाँ पट जाती हैं और समुद्र मार्ग दे देता है। संसार की कोई भी बाधा इसके सामने टिक नहीं पाती, परन्तु ऐसा तभी होता है, जब हम अपनी इन्द्रियोंसहित मन पर भी नियन्त्रण रखें; क्योंकि नियन्त्रण सरल नहीं है। मन के बारे में लिखा है-‘मनः शीघ्रतरं वातात्’ अर्थात् मन की गति हवा से भी अधिक तेज है। यहीं बैठे एक क्षण में ही मन पूरा विश्व घूमने की बात सोच सकता है।

मन की अस्थिरता हार का कारण बनती है और एकाग्रता जीत का। अर्जुन मछली की आँख पर निशाना इसीलिए साध सका; क्योंकि उसका मन एकाग्र था। सावित्री अपने दृढ़ मनोबल के कारण ही अपने मृत पति सत्यवान के प्राण यमराज से छुड़वा सकी।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर एक ऐसे गरीब घर में पैदा हुए थे कि रात में पढ़ने के लिए दीपक में तेल तक नहीं रहता था। फलतः सड़क के किनारे लगी लालटेन की टिमटिमाती धीमी रोशनी के नीचे खड़े होकर रातभर पढ़ते रहते थे। जब नींद जोर मारती तो आँख में सरसों का तेल लगा लेते। बंगाल में एक-से-एक बढ़कर विद्वान् हुए हैं, लेकिन विद्यासागर केवल ईश्वरचन्द्र ही कहलाए।

सफलता की कुंजी: मन की स्थिरता, धैर्य एवं सतत कर्म-वास्तव में मन की स्थिरता ही सफलता की कुंजी है। मन को नियन्त्रित करके ही व्यक्ति प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त करता है। जब तक मन एकाग्र न हो, मनुष्य कोई भी विद्या ग्रहण नहीं कर सकता। मूर्ख कालिदास मन की एकाग्रता के कारण ही संस्कृत जगत् में महाकवि कालिदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘किंग ब्रूस और स्पाइडर’ की छोटी-सी कथा में भी यही सार निहित है कि मन से न हारने वाले, स्थिर, धैर्य और सतत कर्म में निरत व्यक्ति को एक-न-एक दिन सफलता अवश्य ही मिलती है। जीवन में सफलता और असफलताएँ अनेक बार आती हैं। मनुष्य सफलता पर प्रसन्न और असफलता परे दु:खी होता है। असफल होने पर भी हमें अपने मन को नियन्त्रित रखना चाहिए, उसके वशीभूत नहीं होना चाहिए। साहस और उत्साह से मन को पुनः कार्य में लगाकर असफलता को सफलता में बदल देना महानता का लक्षण है।

दृढ़चित्तता की एक प्रमुख विशेषता है—प्रत्येक परिस्थिति में अविचलित रहना। सुख-दु:ख, आशानिराशा, स्तुति-निन्दा, निर्धनता-सम्पन्नता, तत्काल प्राणनाश की आशंका या दीर्घायु कोई भी अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति ऐसे धीर को उसके द्वारा स्वीकृत न्याय-मार्ग से डिगा नहीं सकती-

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वो यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥ ( भर्तृहरि, नीतिशतक)

ऐसे दृढ़चित्त धीर पुरुष जब एक बार किसी काम को शुरू कर देते हैं, फिर चाहे लाखों विघ्न-बाधाएँ आकर बार-बार टकराएँ, वे काम पूरा करके ही दम लेते हैं। गीता में ऐसे धीर पुरुषों को स्थितप्रज्ञ कहा गया है, जो सुख-दुःख और जय-पराजय को समभाव से ग्रहण करते हैं—सुखदुखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ।

मानसिक दुर्बलता का उपचार-मानसिक दुर्बलता को दूर करने के लिए अथवा मन को शक्तिसम्पन्न बनाने के लिए अपने मन में कभी भी निराशावादी विचारों को नहीं आने देना चाहिए। आशावादी व्यक्ति कर्म करते हुए अलभ्य वस्तु को भी पा लेता है और जगत् में प्रसिद्धि भी प्राप्त करता है। मैथिलीशरण गुप्त जी कहते हैं

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रहकर कुछ नाम करो
X               X                    X
समझो न अलभ्य किसी धन को

यदि हम अपने को विश्व में दूसरे से श्रेष्ठ और ऊँचा दिखाना चाहते हैं तो हमें अपने मनोबल को ऊँचा उठाकर अपनी आशा को बलवती बनाये रखना होगा। विद्वानों के अनुसार हर प्रकार की मानसिक दुर्बलता को दूर करने का व्यावहारिक उपचार यह है कि मनुष्य विपरीत दिशा में सोचना शुरू कर दे; उदाहरणार्थ“मेरा व्यक्तित्व अपूर्ण नहीं है। उसमें कोई त्रुटि या कमजोरी है तो मैं उसे दूर करके रहूँगा। मुझे ईश्वर ने अपना ही रूप बनाया है। उसने मुझे पूर्ण मनुष्य बनने की आज्ञा दी है। पूर्ण पुरुष परमात्मा की मैं रचना हूँ, फिर मैं अपूर्ण कैसे हो सकता हूँ? मेरे जीवन की पूर्णता ही सत्य है। बनाने वाले ने मुझे दीन-हीन-दुर्बल बनने के लिए पैदा नहीं किया। इस प्रकार के विचार निरन्तर अपने मन में दुहराते रहने से मनुष्य कर्म से अपने मन को सबल बनाता जाता है।

उपसंहार-सारांश यह है कि मानव-मन अजस्र शक्ति का स्रोत है। मन की इसी शक्ति को पहचानकर ऋग्वेद में कहा गया है–“अहमिन्द्रो न पराजिग्ये’, अर्थात् मैं शक्ति का केन्द्र हूँ और आजीवन पराजित नहीं हो सकता। आवश्यकता है इस शक्ति को पहचानने की। जो पुरुष स्वभाव से ही दृढ़चित्त होते हैं, वे संसार में महान् कार्य करके, इतिहास को नया मोड़ देकर, सदा के लिए अपना नाम अमर कर जाते हैं। ऐसों को ही महापुरुष, महामानव या महात्मा कहा जाता है।

दैव-दैव आलसी पुकारा

सम्बद्ध शीर्षक

  • परिश्रम का महत्त्व
  • करम प्रधान बिस्व करि राखा

प्रमुख विचार-विन्द

  1. प्रस्तावना,
  2. भाग्यवाद : अकर्मण्यता का सूचक,
  3. प्रकृति भी परिश्रम का पाठ पढ़ाती है,
  4. शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम,
  5. भाग्य और पुरुषार्थ,
  6. सफलता का रहस्य : श्रम,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना-जीवन के उत्थान में परिश्रम का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए, ऊँचा उठने के लिए और सुयश प्राप्त करने के लिए श्रम ही आधार है। श्रम से कठिन-से-कठिन कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। जो श्रम करता है, भाग्य भी उसका ही साथ देता है। जो निष्क्रिय रहता है, उसका भाग्य भी विपरीत हो जाता है। श्रम के बल पर लोगों ने उफनती जलधाराओं को रोककर बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण कर दिया। इन्होंने श्रम के बल पर उत्तुंग, अगम्य पर्वत-चोटियों पर अपनी विजय का ध्वज फहरा दिया। श्रम के बल पर मनुष्य चन्द्रमा पर पहुँच गया। श्रम के द्वारा ही मानव समुद्र को लाँघ गया, खाइयों को पाट दिया तथा कोयले की खदानों से बहुमूल्य हीरे खोज निकाले। मानव सभ्यता और उन्नति का एकमात्र आधार श्रम ही है। श्रम के सोपानों का अवलम्ब लेकर मनुष्य अपनी मंजिल पर पहुँच जाता है। अतः परिश्रम ही मानव-जीवन का सच्चा सौन्दर्य है; क्योंकि परिश्रम के द्वारा ही मनुष्य अपने को पूर्ण बना सकता है। परिश्रम ही उसके जीवन में सभाग्य, उत्कर्ष और महानता लाने वाला है। जयशंकर प्रसाद जी ने भी कहा है

जितने कष्ट कण्टकों में है, जिनका जीवन-सुमन खिला,
गौरव-गन्ध उन्हें उतना ही, यत्र तत्र सर्वत्र मिला।

भाग्यवाद : अकर्मण्यता का सूचक-जिन लोगों ने परिश्रम का महत्त्व नहीं समझा; वे अभाव, गरीबी और दरिद्रता का दुःख भोगते रहे। जो लोग मात्र भाग्य को ही विकास का सहारा मानते हैं, वे भ्रम में हैं। आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति सन्त मलूकदास का यह दोहा उधृत करते हैं-

अजगर करे न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कह गये, सबके दाता राम ॥

मेहनत से जी चुराने वाले दास मलूका के स्वर में स्वर मिलाकर भाग्य की दुहाई के गीत गा सकते हैं; लेकिन वे नहीं सोचते कि जो चलता है, वही आगे बढ़ता है और मंजिल को प्राप्त करता है। कहा भी गया है|

उद्यमेन ही सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥

अर्थात् परिश्रम से सभी कार्य सफल होते हैं, केवल कल्पना के महल बनाने से व्यक्ति अपने मनोरथ को पूर्ण नहीं कर सकता। शक्ति और स्फूर्ति से सम्पन्न गुफा में सोया हुआ वनराज शिकार-प्राप्ति के ख्याली पुलाव पकाती रहे तो उसके उदर की अग्नि कभी भी शान्त नहीं हो सकती। सोया पुरुषार्थ फलता नहीं है। ऐसे ही अकर्मण्य व आलसी व्यक्ति के लिए कहा गया है

सकल पदारथ एहि जग माहीं। करमहीन नर पावत नाहीं॥

अर्थात् संसार में सुख के सकल पदार्थ होते हुए भी कर्महीन लोग उसका उपभोग नहीं कर पाते। जो कर्म करता है, फल उसे ही प्राप्त होता है और जीवन भी उसी का जगमगाता है। उसके जीवन उद्यान में ही रंग-बिरंगे सफलता के सुमन खिलते हैं।

परिश्रम से जी चुराना, आलस्य और प्रमोद में जीवन बिताने के समान बड़ा कोई पाप नहीं है। गाँधी जी का कहना है कि जो लोग अपने हिस्से का काम किये बिना ही भोजन पाते हैं, वे चोर हैं। वास्तव में काहिली कायरों और दुर्बल जनों की शरण है। ऐसे आलसी मनुष्य में न तो आत्म-विश्वास ही होता है और न ही अपनी शक्ति पर भरोसा। किसी कार्य को करने में न तो उसे कोई उमंग होती है और न स्फूर्ति। परिणामस्वरूप पग-पग पर असफलता और निराशा के कॉटे उसके पैरों में चुभते हैं।

प्रकृति भी परिश्रम का पाठ पढ़ाती है-प्रकृति के प्रांगण में झाँककर देखें तो चींटियाँ रात-दिन अथक परिश्रम करती हुई नजर आती हैं। पक्षी दाने की खोज में अनन्त आकाश में उड़ते हुए दिखाई देते हैं। हिरन आहार की खोज में वन-उपवन में कुलाँचे भरते रहते हैं। समस्त सृष्टि में श्रम का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। जो लोग श्रम को त्यागकर आलस्य का आश्रय लेते हैं वे जीवन में कभी सफल नहीं होते, क्योंकि ईश्वर भी उनकी सहायता नहीं करता–“God helps those who help themselves.” परिश्रमी व्यक्ति के लिए सफलता व स्वागत के द्वार स्वयमेव खुल जाते हैं-

कर्मवीर के आगे पथ का, हर पत्थर साधक बनता है।
दीवारें भी दिशा बतातीं, जब वह आगे को बढ़ता है।

वस्तुत: परिश्रम द्वारा प्राप्त हुई उपलब्धि से जो मानसिक सन्तोष व आत्मिक तृप्ति प्राप्त होती है वह निष्क्रिय व्यक्ति को कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। प्रकृति ने ही यह विधान बनाया है कि बिना परिश्रम के खाये हुए अन्न का पाचन भी सम्भव नहीं। व्यक्ति को विश्राम का आनन्द भी तभी प्राप्त होता है जब उसने भरपूर श्रम किया हो। वस्तुत: श्रम उन्नति, उत्साह, स्वास्थ्य, सफलता, शान्ति व आनन्द का मूलाधार है।

शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम-परिश्रम चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक दोनों ही श्रेष्ठ । सत्य तो यह है कि मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम कहीं अधिक श्रेयस्कर है। गाँधी जी की मान्यता है। कि स्वस्थ, सुखी और समुन्नत जीवन के लिए शारीरिक श्रम अनिवार्य है। शारीरिक श्रम प्रकृति का नियम है। और इसकी अवहेलना निश्चय ही हमारे जीवन के लिए बहुत ही दुःखदायी सिद्ध होगी। परन्तु यह बड़ी लज्जा और क्षोभ की बात है कि आज मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम को नीची निगाहों से देखा जाता है। लोग अपना काम अपने हाथों से करने में लज्जा का अनुभव करते हैं।

भाग्य और पुरुषार्थ-भाग्य और पुरुषार्थ जीवन के दो पहिये हैं। भाग्यवादी बनकर हाथ पर हाथ रखकर बैठना मौत की निशानी है। परिश्रम के बल पर ही मनुष्य अपने बिगड़े भाग्य को बदल सकता है। परिश्रम ने महा मरुस्थलों को हरे-भरे उद्यानों में बदल दिया तथा मुरझाये जीवन में यौवन का वसन्त खिला दिया। कवि ने इन भावों को कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति दी है

प्रकृति नहीं डरकर झुकती कभी भाग्य के बल से।
सदा हारती वह मनुष्य के उद्यम से श्रम जल से ।

परिश्रम सुमन का सौरभ है, मनुष्य का भाग्य है, जीवन का नवनीत है व देवताओं के वरदान से बढ़कर है। परिश्रम जीवन को नन्दन वन बना देता है। कवि श्रम का यशोगान करता हुआ कहता है

जीवन एक सुमन मानो तो सौरभ उसका श्रम है।
देवों की वरदान शक्ति भी इसके आगे कम है॥

सफलता का रहस्य : श्रम-महापुरुष बनने का प्रथम सोपान परिश्रमशीलता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं सभी कष्ट-सहिष्णुता और श्रम के कारण श्रद्धा, गौरव और यश के पात्र बने। वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास आदि जन्म से महाकवि नहीं थे। उन्हें ठोकरें लगीं, ज्ञान-नेत्र खुले और अनवरत परिश्रम से महाकवि बने। गाँधी जी का सम्मान उनके परिश्रम एवं कष्ट-सहिष्णुता के कारण ही है। इन सबने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण श्रमरत रहकर बिताया। उसी का परिणाम था कि वे सफलता के उच्च शिखर तक पहुँच सके। महान् राजनेताओं, वैज्ञानिकों, कवियों, साहित्यकारों और ऋषि-मुनियों की सफलता का रहस्य एकमात्र परिश्रम ही है।

इतिहास साक्षी है कि भाग्य का आश्रय छोड़कर कर्म में तत्पर होने वाले लोगों ने ही इतिहास का निर्माण किया है, समय पर शासन किया है। कृष्ण यदि भाग्य के सहारे बैठे रहते तो एक ग्वाले का जीवन बिताकर ही काल-कवलित हो गये होते, नादिरशाह ईरान में जीवनपर्यन्त भेड़ों को ही चराता हुआ मर जाता, स्टालिन अपने वंश-परम्परागत व्यवसाय (जूते बनाने) को करता हुआ एक कुशल मोची बनता, खुश्चेव कोयले की खदान का मजदूर ही रह जाता, गोर्की कूड़े-कचरे के ढेर से चीथड़े ही बीनता रहता, बाबर समरकन्द से भागकर हिन्दूकुश की पर्वत-श्रेणियों में ही खो जाता, शेरशाह सूरी बिहार के गाँव में किसी किसान का हलवाहा होता, हैदरअली सेना का एक सामान्य सिपाही ही बना रहता, प्रेमचन्द एक प्राथमिक पाठशाला के अध्यापक के रूप में अज्ञात रह जाते और लाल बहादुर शास्त्री के लिए प्रधानमन्त्री का पद एक सुहावना सपना ही बना रहता। निश्चय ही इन्होंने जो कुछ पाया वह सब कुछ दृढ़ संकल्प शक्ति, साहस, धैर्य, अपने ध्येय में अटल विश्वास और कर्म शौर्य के कारण ही पाया। इनकी सफलता के पीछे किसी भाग्य अथवा संयोग का हाथ न था। दुष्यन्त कुमार ने कहा भी है–

कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख नहीं होता।
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो ॥

ऊपर उल्लिखित पुरुषों ने सम्भवत: ऐसा ही कोई कथन अपने जीवन के प्रेरक के रूप में अपनाया होगा। संस्कृत में भी कहा गया है-

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
दैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति ।।
दैवं विहाय पौरुषमात्मकृत्या
यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ।।

तात्पर्य यह है कि उद्योगी पुरुष वास्तव में पुरुष-सिंह होता है, लक्ष्मी उसी का वरण करती है। ‘भाग्य देगा’ यह कायरों का कथन है। भाग्य को अलग रख कर परिश्रम करना चाहिए। यत्न करने पर भी यदि कुछ प्राप्त नहीं होता, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है ?

उपसंहार–परिश्रमी व्यक्ति राष्ट्र की बहुमूल्य पूँजी है। श्रम वह महान् गुण है, जिससे व्यक्ति को विकास और राष्ट्र की उन्नति होती है। संसार में महान् बनने और अमर होने के लिए परिश्रमशीलता अनिवार्य है। श्रम से अपार आनन्द मिलता है। महात्मा गाँधी ने हमें श्रम की पूजा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा-“श्रम से स्वावलम्बी बनने का सौभाग्य मिलता है। हम अपने देश को श्रम और स्वावलम्बन से ही ऊँचा उठा सकते हैं।” श्रम की अद्भुत शक्ति को देखकर ही नेपोलियन ने कहा था कि, “संसार में असम्भव कोई काम नहीं। असम्भव शब्द को तो केवल मूर्खा के शब्दकोष में ही हूँढ़ा जा सकता है।”

आधुनिक युग विज्ञान का युग है। प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है। भाग्य जैसी काल्पनिक वस्तुओं से अब जनता का विश्वास उठता जा रहा है। वास्तव में भाग्य श्रम से अधिक कुछ भी नहीं। श्रम का ही दूसरा नाम भाग्य है। जीवन में श्रम की महती आवश्यकता है। बिना श्रम के मानव-जाति का कल्याण नहीं, दुःखों से त्राण नहीं और समाज में उसका कहीं भी सम्मान नहीं। हमें सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अपने भाग्य के विधाता हम स्वयं हैं। जब हम कर्म करेंगे तो समय आने पर हमें उसका फल अवश्य ही मिलेगा। उसमें प्रकृति के नियमानुसार कुछ समय लगना स्वाभाविक ही है। कबीरदास ने ठीक ही कहा है-

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींच सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ॥

को न कृसंगति पाई नसाई [2016, 18]

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. कुसंगति का मानव-जीवन पर प्रभाव,
  3. कुसंगति की छूत,
  4. कुसंगी व्यक्ति की समाज में स्थिति,
  5. कुसंगति से हानि,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-“को न कुसंगति पाई नसाई’ का अर्थ है-कुसंगति में पड़कर कौन नष्ट नहीं हो जाता। इसका तात्पर्य बुरे लोगों की संगति में आकर बुरे व्यवहार व आचरण को अनुसरण करने से है। इस प्रकार व्यक्ति जो कुसंगति में आकर बुरा व्यवहार करने लगता है, उसका मानसिक विकास रुक जाता है। तथा कुसंगति के कारण ऐसे मनुष्य का यश, धन, वैभव आदि सभी कुछ नष्ट हो जाता है। समाज में ऐसे कई जीवंत उदाहरण देखे जा सकते हैं। कई कुसंगी मनुष्यों को समय रहते काफी कुछ खोना पड़ता है। कुसंगी व्यक्ति अपने बुरे चरित्र के कारण ही दूसरों को हानि पहुँचाने वाले होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह भी शीघ्र ही बुराइयों से प्रभावित हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है-“मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। उनके अनुसार मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके कुसंगी व्यक्तियों का साथ छोड़ दे। कुसंगी व्यक्तियों के सन्दर्भ में निम्न सूक्ति दी गई है—

हानि कुसंग सुसंगति लाहू, लोकहुँ वेद विदित सब काहू।।
बिनसहू उपजइ ज्ञान जिमि, पाई कुसंग सुसंग॥

कुसंगति का मानव-जीवन पर प्रभाव-कुसंगति का मुख्य रूप एक ही है-दूषित विचारों का संग। मनुष्य के शरीर का संचालन मन-मस्तिष्क के ही सांकेतिक निर्देशों से होता है। जैसा विचार और जैसी भावनाएँ होंगी वैसी ही कर्म प्रेरणा होगी और तीनों के सम्मिलित प्रभाव से व्यक्तित्व विनिर्मित होगा। विचारों का संग दो प्रकार से होता है—पहला साहित्य के अध्ययन से तथा दूसरा व्यक्तियों के सम्पर्क से। संगति दोनों की ही प्रभावकारी होती है। सस्ता साहित्य, सनसनीखेज खबरें और बातें, अश्लील साहित्य तथा गपोड़बाजी, नशेबाजी, जुआरी, सटोरिया, कलही, दुव्यसनी व्यक्ति अपना दुष्प्रभाव अन्य व्यक्तियों पर भी डालते हैं। भली-बुरी दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियाँ प्रोत्साहन से पनपती हैं। प्रोत्साहन और अवसर न मिलने पर मुरझाकरे धीरे-धीरे मृतप्राय अवस्था में जा पहुँचती हैं। कुसंगति दुष्प्रवृत्तियों को बढ़ाती है और सत्प्रवृत्तियाँ उसकी प्रचण्ड आँच से झुलसती जाती हैं। इन प्रवृत्तियों से मानव प्रभावित होता है, क्योंकि दुष्प्रवृत्तियों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर पड़े बिना नहीं रहता। समाज में सदाचारी और दुराचारी दोनों प्रकार के लोग रहते हैं। दोनों ही समाज को प्रभावित करते हैं। समाज में रहने वाले अन्य व्यक्ति किसी सदाचारी व्यक्ति से इतनी जल्दी प्रभावित नहीं होते जितना कि दुराचारी व्यक्ति से प्रभावित होते हैं। भविष्य में जिसका विपरीत प्रभाव उनके क्रियाकलापों को देखने से स्पष्ट होता है।

कुसंगति की छुत-कुसंगति (बुरी संगति) को कीचड़ के समान बताया गया है कि इस कीचड़ से बचकर रहना चाहिए, अन्यथा यह हमारे आचरण को दूषित कर देगा। यदि कोई मनुष्य एक बार बुरी संगत में फँस गया है और कलंकित हो गया तो वह फिर बार-बार कलंकित होने से नहीं डरता और धीरे-धीरे बुरी आदतों का अभ्यस्त हो जाता है। जब बुराई आदत बन जाती है तब वह उससे घृणा भी नहीं करता और न बुरा कहने से चिढ़ता ही है।

कुसंगति में पड़े हुए व्यक्ति का विवेक नष्ट हो जाता है और उसे भले-बुरे की पहचान भी नहीं रह जाती। उसे बुराई ही भलाई दीखने लगती है और वह इतना गिर जाता है कि बुराई की पूजा भक्त की तरह करने लगता है। इसलिए यदि अपने हृदय और आचरण को निष्कलंक और उज्ज्वल बनाये रखना है तो कुसंगति की छूत से बचना चाहिए।

कुसंगी व्यक्ति की समाज में स्थिति–कुसंगी व्यक्ति की समाज में स्थिति घृणापूर्ण होती है। क्योंकि उसके कुमार्ग पर पैर रखते ही उसके शरीर में तेज, बल, बुद्धि लेशमात्र भी नहीं रह जाती है। आत्मबल में कमी आ जाती है; जैसे-सीता जी का अपहरण करने से पहले रावण इधर-उधर देखता रहा और भयग्रस्त होकर कुत्ते की तरह उसने आश्रम में प्रवेश किया। कुसंगी व्यक्ति की बुराइयाँ भयानक बीमारी की तरह होती हैं, जो बहुत कम समय में ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में ले लेती हैं, जिससे कुसंगी व्यक्ति की संगत में आने वाला हर व्यक्ति उसके ही सामान रोगी हो जाता है जो समाज को बहुत बुरी तरह से आहत करते हैं। इससे समाज का भविष्य भी बुराइयों के अँधेरे में डूब जाता है। इसी कारण कुसंगी व्यक्तियों को समाज से बाहर ही रखा जाता है या समाज के लोगों को सूचित कर दिया जाता है कि ऐसे लोगों से दूर रहकर अपना व अपने बच्चों का भविष्य खराब होने से बचाएँ, जिससे आपकी आने वाली पीढ़ियों को भी उसके दुष्परिणामों से सुरक्षित रखा जा सके। इन सब कारणों के कारण कुसंगी व्यक्ति को समाज से मिलने वाली बहुत सी प्रताड़नाओं को झेलना पड़ता है।

कुसंगति से हानि–कुसंगति बहुत ही हानिकारक होती है। यदि किसी व्यक्ति पर कुसंगति का कोई प्रभाव न पड़ रहा हो, फिर भी कुसंगी व्यक्तियों के साथ रहने के कारण उसे बुरा ही समझा जाता है। कोई चोरी न भी करे लेकिन यदि वह चोरों के साथ मिलता-जुलता भी है, तो लोग उसे भी चोर ही कहेंगे। विद्यार्थियों के लिए तो कुसंगति विनाश को जन्म देती है। इसमें पड़कर विद्यार्थी बहुत-सी बुराइयों को ग्रहण कर लेते हैं।

कुसंगति में रहने से कोई भी सुख प्राप्त नहीं होता, बल्कि थोड़ा-बहुत सुख-चैन होता भी है, वह भी नष्ट हो जाता है। अत: कुसंगति समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व को नष्ट करती है, जो भविष्य में उसके लिए हानिप्रद होती है।

उपसंहार-कुसंगति मानव-जीवन के लिए एक अभिशाप है क्योंकि कुसंगति का मानव-जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है और इससे सदैव हानि ही होती है। मनुष्य कितना ही सतर्क और सावधान रहे कुसंगति काजल की कोठरी के समान होती है जिसकी चपेट में व्यक्ति कभी-न-कभी आ ही जाता है, जिससे उसके जीवन का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति को उसके खुद के परिवार के साथ-साथ समाज के अन्य व्यक्ति भी स्वीकार नहीं करते हैं और हर तरफ से सिर्फ प्रताड़नाएँ मिलती हैं। इससे कुसंगी व्यक्ति के मन में सभी के प्रति गलत भावनाएँ घर कर लेती हैं जो दूसरों की हानि देखकर उसे प्रसन्नता प्रदान करती हैं। ऐसे व्यक्ति अपना शरीर त्याग करके भी दूसरों का अहित करने का पाठ पढ़ाते हैं; अतः कुसंगति से दूर ही रहना चाहिए। छात्रों के लिए तो कुसंगति विनाश लेकर आती है। इसमें पड़कर छात्र अनेक व्यसन सीख जाते हैं। कुसंगति के कारण महान-से-महान व्यक्ति भी पतन के गर्त में गिरता चला जाता है। कुसंगति व्यक्ति की बुद्धि को जड़ करती है, उसे पग-पग पर मान-हानि उठानी पड़ती है तथा व्यक्ति स्वार्थी हो जाता है; इसलिए सदैव कुसंगति से बचकर रहना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 13 Public Finance

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 13 Public Finance (राजस्व) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 13 Public Finance (राजस्व).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 13
Chapter Name Public Finance (राजस्व)
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 13 Public Finance (राजस्व)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
राजस्व या लोकवित्त का अर्थ एवं परिभाषाएँ बताइए तथा लोकवित्त का अध्ययन-क्षेत्र स्पष्ट कीजिए। [2006, 08]
उत्तर:
राजस्व या लोकवित्त अर्थशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण विभाग है, जिसका अभिप्राय “सरकारी प्रक्रिया में आयगत व्यय के चारों और जटिल समस्याओं के केन्द्रीकरण से है।” यह अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र की मध्य सीमा पर स्थित अर्थविज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जो राज्यों के वित्तीय पक्ष का विधिवत् अध्ययन करता है।
राजस्व की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

प्रो० डाल्टन के अनुसार, “राजस्व के अन्तर्गत सार्वजनिक सत्ताओं से आय व व्यय एवं उनका एक-दूसरे से समायोजन एवं समन्वय का अध्ययन किया जाता है।”
एडम स्मिथ के अनुसार, “राज्य व्यय तथा आय के सिद्धान्त एवं स्वभाव के अनुसन्धान को राजस्व कहते हैं।”
फिण्डले शिराज के अनुसार, “राजस्व ऐसे सिद्धान्त का अध्ययन है जो कि सार्वजनिक सत्ताओं के व्यय एवं कोषों की प्राप्ति से सम्बन्धित है।”
लुट्ज के अनुसार, “राजस्व उन साधनों की प्राप्ति, संरक्षण और वितरण कर अध्ययन करता है। जो राजकीय या प्रशासन सम्बन्धी कार्यों को चलाने के लिए आवश्यक है।”

राजस्व या लोकवित्त का अध्ययन-क्षेत्र
राज्य द्वारा वित्तीय व्यवस्था से सम्बन्धित जो भी नीतियाँ एवं सिद्धान्त निर्मित किये जाते हैं वे सभी राजस्व की विषय-सामग्री के अन्तर्गत सम्मिलित किये जाते हैं। राजस्व के अन्तर्गत निम्नलिखित बिन्दुओं का अध्ययन किया जाता है

1. सार्वजनिक आय – राजस्व के अन्तर्गत सरकार की आय के विभिन्न स्रोतों, आय के स्रोतों के सिद्धान्तों, आय के साधनों का क्रियान्वयन एवं उनके पड़ने वाले प्रभावों आदि का अध्ययन किया जाता है। संक्षेप में, राजस्व के अन्तर्गत इस बात का अध्ययन किया जाता है कि सरकार की आय के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं? इसमें कर, कर के सिद्धान्त एवं करों के प्रभावों आदि का अध्ययन किया जाता है।

2. सार्वजनिक व्यय – सार्वजनिक व्यय के अन्तर्गत इस बात का अध्ययन किया जाता है कि सरकार द्वारा प्राप्त आय को जनता के कल्याण हेतु किस प्रकार व्यय किया जाए ? व्यय के सिद्धान्त क्या होने चाहिए, सार्वजनिक व्यय का समाज के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा आय व रोजगार पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

3. सार्वजनिक ऋण – जब सरकार की आय, व्यय की अपेक्षा कम होती है तब सार्वजनिक व्ययों की पूर्ति हेतु सरकार को ऋण लेने पड़ते हैं। ये ऋण आन्तरिक एवं बाह्य दोनों साधनों से प्राप्त किये जा सकते हैं। सार्वजनिक ऋण कहाँ से प्राप्त किये जाएँ, ऋण लेने के उद्देश्य, ऋणों को किस प्रकार लौटाना है व ऋणों पर ब्याज की दरें क्या होनी चाहिए आदि बातों का अध्ययन सार्वजनिक ऋण के अन्तर्गत किया जाता है।

4. संघीय वित्त – भारत में संघात्मक वित्तीय प्रणाली को अपनाया गया है अर्थात् केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के बीच आय का बंटवारा किन सिद्धान्तों के आधार पर किया जाए तथा केन्द्र सरकार राज्यों को किस अनुपात में अनुदान आदि का वितरण करे आदि का अध्ययन संघात्मक वित्त-व्यवस्था के अन्तर्गत आता है।

5. वित्तीय प्रशासन – वित्तीय प्रशासन के अन्तर्गत सम्पूर्ण वित्तीय व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। बजट किस प्रकार बनाया जाए, बजट को पारित करना, करों का निर्धारण एवं करों का संग्रह करना, सार्वजनिक व्ययों का संचालन व नियन्त्रण तथा सार्वजनिक व्यय की अंकेक्षण (Audit) वित्तीय प्रशासन में सम्मिलित हैं।

6. राजकोषीय नीति एवं आर्थिक सन्तुलन – राजकोषीय नीति के द्वारा अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थायित्व (Economic Stability) एवं आर्थिक विकास (Economic Development) से सम्बन्धित कार्यक्रम तैयार किया जाता है अर्थात् अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने के लिए देश के तीव्र आर्थिक विकास हेतु कर, आय, व्यय, ऋण एवं घाटे की अर्थव्यवस्था को किस प्रकार क्रियान्वित किया जाये जिससे कि देश में आर्थिक स्थिरता बनी रहे तथा देश का तीव्र गति से आर्थिक विकास हो सके। सुदृढ़ एवं संगठित वित्तीय नीति आर्थिक विकास व आर्थिक स्थिरता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

प्रश्न 2
राजस्व के महत्त्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। [2010]
उत्तर:
वर्तमान समय में प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था में राजस्व की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गयी है और इस महत्त्व में निरन्तर वृद्धि हो रही है। वास्तविकता यह है कि ज्यों-ज्यों सरकार का कार्य-क्षेत्र बढ़ रहा है, राजस्व का महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है।
राजस्व के महत्त्व का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. सरकार के बढ़ते हुए कार्यों की पूर्ति में सहायक – वर्तमान समय में लोकतान्त्रिक सरकार होने के कारण राज्य के कार्यों में तेजी से वृद्धि हुई है। सरकार को विकास सम्बन्धी बहुआयामी और अनेक कार्य सम्पादित करने पड़ते हैं। परिवहन ऊर्जा, स्वास्थ्य, बीमा, बैंकिंग आदि अनेक क्षेत्रों में सरकार के दायित्व दिन-प्रतिदिन बढ़े हैं जिसके कारण सरकार के खर्चे में भी वृद्धि हुई है। इसके लिए सरकार के आय-स्रोतों में वृद्धि करना आवश्यक हो गया है। सार्वजनिक व्यय और आय के बढ़ते क्षेत्र ने राजस्व के महत्त्व को बढ़ा दिया है।

2. आर्थिक नियोजन में महत्त्व – प्रत्येक देश अपने सन्तुलित एवं तीव्र आर्थिक विकास के नियोजन को अपना रहा है। आर्थिक नियोजन की सफलता बहुत कुछ राजस्व की उचित व्यवस्था पर निर्भर है।

3. आय एवं सम्पत्ति के वितरण में विषमताओं को कम करने में सहायक – वर्तमान समय में सामाजिक और आर्थिक समस्याओं में एक महत्त्वपूर्ण समस्या आय और सम्पत्ति के वितरण में विषमता है। इस समस्या के समाधान में राजस्व की विशिष्ट भूमिका है।

4. पुँजी-निर्माण में सहायक –  विकासशील देशों में आर्थिक विकास के क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण समस्या पूँजी-निर्माण की धीमी गति ही रही है। इन देशों में आय और फलस्वरूप बचत का स्तर नीचा रहने के कारण पूँजी-निर्माण धीमी गति से हो पाता है। इस समस्या के समाधान के विभिन्न उपायों में राजस्व उपायों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

5. राष्ट्रीय आय में वृद्धि – विकासशील देशों में राष्ट्रीय आय बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता है। इस दृष्टि से भी राजस्व का विशिष्ट महत्त्व है।

6. मूल्य-स्तर में स्थिरता या आर्थिक स्थिरता – अर्थव्यवस्था स्थायित्व के राजकीय हस्तक्षेप अर्थात् राजस्व-नीति की विशिष्ट भूमिका होती है। करारोपण, लोक-व्यय और लोक-ऋण की नीतियों के मध्य उचित समायोजन करके मूल्य स्तर में स्थिरता या आर्थिक स्थायित्व के उद्देश्य की प्राप्ति की जा सकती है।

7. रोजगार में वृद्धि – प्रत्येक देश में अधिकतम रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य पर जोर दिया जाता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में भी राजस्व क्रियाएँ सहायक होती हैं। इनके द्वारा जब देश में उत्पादन एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तब रोजगार के अवसरों का सृजन होता है।

8. देश के संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग – आर्थिक संसाधनों का विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में उपयोग और इनका सर्वोत्तम प्रयोग सरकार की उचित और प्रभावशाली मौद्रिक एवं राजस्व नीतियों से ही सम्भव है। सरकार अपनी बजट नीति के द्वारा उपभोग, उत्पादन तथा वितरण को वांछित दिशा में प्रवाहित कर सकती है।

9. सरकारी उद्योगों के संचालन में सुविधा – आज प्रत्येक देश में किसी-न-किसी मात्रा में लोक उद्यमों का संचालन किया जा रहा है। इन उद्योगों में विशाल मात्रा में पूँजी का विनियोजन करना पड़ता है। इस पूँजी की व्यवस्था करने तथा सामाजिक हित में हानि पर चलने वाले सरकारी उद्योगों की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति की दृष्टि से राजस्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

10. राजनैतिक क्षेत्र में महत्त्व – राजनैतिक क्षेत्र में भी राजस्व का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। सरकार अपनी राजनीतिक नीतियों को उचित प्रकार से क्रियान्वित तभी कर सकती है, जबकि उसके पास पर्याप्त वित्तीय साधन हों और उन साधनों का प्रयोग करने के लिए उसके पास उचित राजस्व नीति हो।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
सार्वजनिक आय के साधनों को समझाइए।
उत्तर:
सार्वजनिक आय के साधन
सार्वजनिक आय के अनेक साधन हैं, जिन्हें निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 13 Public Finance 1

कर से प्राप्त आय – सरकार को सर्वाधिक आय करों से प्राप्त होती है। सरकार दो प्रकार के कर लगाती है-प्रत्यक्ष कर एवं परोक्ष कर। प्रत्यक्ष करों के अन्तर्गत आयकर, उपहार कर, मनोरंजन कर, मालगुजारी, मृत्यु कर, सम्पत्ति कर तथा परोक्ष कर के अन्तर्गत उत्पादन कर, बिक्री कर, तट कर आदि आते हैं। प्रत्येक देश की सरकार अपनी अधिकांश आय करों से ही प्राप्त करती है।

गैर-कर आय – सरकार को करों के अतिरिक्त अन्य साधनों से भी आय प्राप्त होती है, जिन्हें गैर-कर आय कहते हैं। इस प्रकार की आय निम्नलिखित है

  1. शुल्क – सरकार व्यक्तियों से विभिन्न प्रकार के शुल्क प्राप्त करती है; जैसे-न्यायालय शुल्क, लाइसेन्स शुल्क, अनुज्ञापन बनवाने की फीस आदि।
  2. दरें – स्थानीय सरकारें; जैसे-नगर-निगम, नगर पंचायतें, जिला पंचायत, ग्राम पंचायत आदि अपनी-अपनी सीमाओं के अन्तर्गत बनी अचल सम्पत्ति पर जो कर लगाती हैं, उन्हें दरें कहते हैं। इससे भी सरकार को आय प्राप्त होती है।
  3. दण्ड – सरकारी नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों पर सरकार दण्डं लगाती है, जिससे सरकार को आय प्राप्त होती है।
  4. उपहार – समय-समय पर आवश्यकता पड़ने पर देश की जनता द्वारा सरकार को उपहार प्रदान किये जाते हैं; जैसे – युद्ध के समय युद्ध कोष में दान, राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दान, अकाल पीड़ितों के लिए सहायता, भूकम्प के समय सहायता आदि। इससे भी सरकार को आय प्राप्त होती है।
  5. पत्र-मुद्रा – आजकल प्रायः सभी सरकारों ने पत्र-मुद्रा को अपनाया हुआ है। पत्र-मुद्रा से भी सरकार को आय प्राप्त होती है।
  6. सार्वजनिक सम्पत्ति से आय – देश की विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों; जैसे-वन, खान इत्यादि पर सरकार को स्वामित्व होता है। इस प्रकार की सम्पत्ति को पट्टे पर या किराये पर देकर सरकार आय प्राप्त करती है।
  7.  मूल्य – सरकार कुछ व्यवसायों को संचालित करती है। सरकार अपने उद्योगों में निर्मित वस्तुओं और सेवाओं का विक्रय करके मूल्य प्राप्त करती है; जैसे- रेल, डाक-तार, सरकारी कारखानों में उत्पन्न वस्तुओं से आय प्राप्त होती है।

प्रश्न 2
आर्थिक विकास हेतु साधन जुटाने में राजस्व के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आर्थिक विकास हेतु साधन जुटाने में राजस्व का महत्त्व

आर्थिक विकास हेतु साधन जुटाने में राजस्व के महत्त्व को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. पूँजी निर्माण –  किसी देश के आर्थिक विकास में पूँजी निर्माण का अत्यधिक महत्त्व होता है। अत: राजस्व की कार्यवाहियों का उद्देश्य यह होना चाहिए कि उपभोग व अन्य गैर-विकास कार्यों की ओर से पूँजी निर्माण अर्थात् बचत व विनियोग की ओर साधनों का अन्तरण हो। सरकार पूँजी निर्माण में वृद्धि हेतु निम्नलिखित उपाय अपना सकती है

(अ) प्रत्यक्ष भौतिक नियन्त्रण – प्रत्यक्ष भौतिक नियन्त्रण द्वारा विशिष्ट उपभोग व अनुत्पादक विनियोगों को कम किया जा सकता है।
(ब) वर्तमान करों की दरों में वृद्धि – इस दृष्टि से कर की संरचना इस प्रकार हो सकती है

  •  धनी वर्ग के उन साधनों को जो निष्क्रिय पड़े हों अथवा जिनका राष्ट्र की दृष्टि से लाभप्रद उपयोग न होता हो, आय-कर व सम्पत्ति-कर आदि लगाकर प्राप्त करना।
  •  ऐसी सरकारी वस्तुओं पर कर लगाना जिनकी माँग बेलोच है।
  • कृषक वर्ग की बढ़ती हुई आय पर कर लगाना।

(स) सार्वजनिक उद्योगों से बचत प्राप्त करना – सार्वजनिक उद्योगों को दक्षता व कुशलता से चलाया जाना चाहिए ताकि उनसे अतिरेक प्राप्त किया जा सके और उसका अधिक उत्पादन कार्यों में उपयोग किया जा सके।

(द) सार्वजनिक ऋण – सरकार ऐच्छिक बचतों को ऋण के रूप में प्राप्त कर सकती है। विशेष रूप से विकासशील देशों में लघु बचतों का विशेष महत्त्व होता है। वर्तमान समय में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ; जैसे – विश्व बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ आदि; विकासशील देशों को पर्याप्त ऋण प्रदान करती है।

(य) घाटे का बजट – जब सरकार के व्यय उसकी आय से अधिक हो जाते हैं, तो सरकार घाटे की व्यवस्था अपनाती है। सरकार को इस राशि का उपयोग अत्यधिक सतर्कता के साथ करना चाहिए, ताकि राजनीतिक स्थितियाँ उत्पन्न न हों।

2. उत्पादन के स्वरूप में परिवर्तन करके – सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार करके सरकार ऐसे उद्योगों का विस्तार कर सकती है, जिन्हें वह राष्ट्रीय हित की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण समझती है। इसके अतिरिक्त, लोक वित्त कार्यवाहियों का उद्देश्य निजी निवेश को वांछित दिशाओं की ओर गतिशील करने के लिए भी किया जा सकता है।

3. बेरोजगारी दूर करना – विकासशील देशों में व्यापक बेरोजगारी, अदृश्य बेरोजगारी एवं अर्द्ध-बेरोजगारी पाई जाती है। इसका समाधान दीर्घकालिक विकास नीति द्वारा ही किया जा सकता है। देश में करारोपण, सार्वजनिक व्यय व ऋण सम्बन्धी नीतियों के द्वारा निवेश में वृद्धि करके रोजगार के अवसरों का विस्तार किया जा सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
सार्वजनिक आय-व्यय एवं ऋण से आप क्या समझते हैं ? लिखिए।
उत्तर:

  • सार्वजनिक आय – सरकार को विभिन्न प्रकार के स्रोतों से जो आय प्राप्त होती है वह सार्वजनिक आय कहलाती है। सार्वजनिक आय के अन्तर्गत कर, शुल्क, कीमत, अर्थदण्ड, सार्वजनिक उपक्रमों से प्राप्त आय, सरकारी एवं गैर-सरकारी बचते आदि आते हैं।
  • सार्वजनिक व्यय – सरकार विभिन्न प्रकार के स्रोतों से जो आय प्राप्त करती है, वह जनता के हित में योजनानुसार व्यय करती है, इस व्यय को सार्वजनिक व्यय कहते हैं। सरकार अपनी आय को बजट बनाकर व्यय करती है।
  • सार्वजनिक ऋण – सरकार को अनेक मदों पर व्यय करना पड़ता है। जब सरकार की आय, व्यय से कम होती है तो अतिरिक्त सार्वजनिक व्ययों की पूर्ति हेतु सरकार द्वारा जो ऋण लिये जाते हैं, उन्हें सार्वजनिक ऋण कहते हैं।

प्रश्न 2
लोक-वित्त के विषय-क्षेत्र (विषय-वस्तु) का वर्णन कीजिए। [2007]
या
लोक-वित्त की विषय-वस्तु के चार प्रमुख भागों का वर्णन कीजिए। [2015]
उत्तर:
राज्य द्वारा वित्तीय व्यवस्था से सम्बन्धित जो भी नीतियाँ एवं सिद्धान्त निर्मित किये जाते हैं। वे सभी राजस्व की विषय-सामग्री के अन्तर्गत सम्मिलित किये जाते हैं। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित का अध्ययन किया जाता है

  1.  सार्वजनिक आय,
  2. सार्वजनिक व्यय,
  3.  सार्वजनिक ऋण,
  4. संघीय वित्त,
  5.  वित्तीय प्रशासन,
  6. राजकोषीय नीति एवं आर्थिक सन्तुलन।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
राजस्व की परिभाषा लिखिए। [2009]
उत्तर:
प्रो० डाल्टन के अनुसार, “राजस्व के अन्तर्गत सार्वजनिक सत्ताओं से आय व व्यय एवं उनका एक-दूसरे से समायोजन एवं समन्वय का अध्ययन किया जाता है।”

प्रश्न 2
“राजस्व का सम्बन्ध सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा आय प्राप्त करने व व्यय करने के तरीके से है।” यह परिभाषा किस अर्थशास्त्री की है?
उत्तर:
प्रो० फिण्डले शिराज की।

प्रश्न 3
राज्य व्यय तथा आय के सिद्धान्त एवं स्वभाव के अनुसन्धान को राजस्व कहते हैं। यह परिभाषा किस अर्थशास्त्री की है?
उत्तर:
एडम स्मिथ की।

प्रश्न 4
सार्वजनिक आय के दो साधन बताइए।
उत्तर:
सार्वजनिक आय के दो साधन हैं

  1. कर तथा
  2.  सार्वजनिक सम्पत्ति से आय।

प्रश्न 5
संघीय वित्त क्या है?
उत्तर:
भारत में संघात्मक वित्तीय प्रणाली को अपनाया गया है। केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों के बीच वित्तीय साधनों के विभाजन के सिद्धान्त एवं आधारों से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 6
सार्वजनिक व्यय से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आय को सरकार जनता के हित में विभिन्न योजनान्तर्गत व्यय करती है। यह व्यय सार्वजनिक व्यय कहलाता है।

प्रश्न 7
प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने राजस्व को कैसा विज्ञान माना है?
उत्तर:
व्यय तथा आय के सिद्धान्त एवं स्वभाव का विज्ञान।

प्रश्न 8
राजस्व की विषय-सामग्री के तत्त्वों को बताइए।
उत्त:
राजस्व की विषय-सामग्री के तत्त्व हैं

  1.  सार्वजनिक आय तथा
  2. सार्वजनिक व्यय।

प्रश्न 9
सरकार की आय के दो प्रमुख स्रोत लिखिए।
उत्तर:
सरकार की आय के दो स्रोत हैं

  1.  कर तथा
  2. सरकारी उपक्रमों से प्राप्त आय।

प्रश्न 10
सार्वजनिक ऋण कहाँ से प्राप्त किये जा सकते हैं ?
उत्तर:
सार्वजनिक ऋण आन्तरिक एवं बाह्य दोनों साधनों से प्राप्त किये जा सकते हैं।

प्रश्न 11
वित्तीय प्रशासन में क्या अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
वित्तीय प्रशासन में बजटों के निर्माण व प्रशासन तथा लेखा परीक्षण के कार्यों का अध्ययन किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
राजस्व उन साधनों की प्राप्ति, संरक्षण और वितरण का अध्ययन करता है, जो राजकीय या प्रशासन सम्बन्धी कार्यों को चलाने के लिए आवश्यक होते हैं।” यह परिभाषा है
(क) लुट्ज की।
(ख) प्रो० फिण्डले शिराज की
(ग) प्रो० बेस्टेबल की
(घ) श्रीमती हिक्स की
उत्तर:
(क) लुट्ज की।

प्रश्न 2
राजस्व की विषय-सामग्री में सम्मिलित है
(क) सार्वजनिक आय
(ख) सार्वजनिक व्यय
(ग) सार्वजनिक ऋण
(घ) ये सभी
उत्तर:
(घ) ये सभी

प्रश्न 3
सार्वजनिक आय के साधन हैं
(क) कर
(ख) शुल्क
(ग) उपहार
(घ) ये सभी
उत्तर:
(घ) ये सभी।

प्रश्न 4
लोक वित्त की विषय-वस्तु सम्बन्धित है
(क) सरकार के व्यय से
(ख) सरकार की आय से
(ग) सरकार ने ऋण से
(घ) सरकार के व्यय, आय, ऋण तथा राजकोषीय नीति से
उत्तर:
(घ) सरकार के व्यय, आय, ऋण तथा राजकोषीय नीति से।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 12 Profit

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 12
Chapter Name Profit (लाभ)
Number of Questions Solved 32
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 12 Profit (लाभ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
लाभ क्या है ? सकल लाभ एवं निवल लाभ की व्याख्या कीजिए।
या
लाभ को परिभाषित कीजिए तथा लाभ प्राप्त करने की विशेषताएँ लिखिए। कुल लाभ के विभिन्न अंग (अवयव) क्या हैं ? बताइए।
उत्तर:
लाभ का अर्थ एवं परिभाषाएँ
उत्पादन के पाँच उपादान हैं – भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन और उद्यम। इनमें उद्यम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उद्यमी (साहसी) ही उत्पादन के उपादानों को जुटाता है, उपादानों के स्वामियों को उनके प्रतिफल का भुगतान करता है और उत्पादन सम्बन्धी सभी प्रकार की जोखिम उठाता है। उत्पादन के सभी उपादानों का भुगतान करने के बाद जो कुछ भी शेष बचती है, वही उसको प्रतिफल या लाभ (Profit) होता है। अत: राष्ट्रीय आय का वह अंश, जो उद्यमी को प्राप्त होता है, ‘लाभ’ कहलाता है।

एस० ई० थॉमस के अनुसार, “लाभ उद्यमी का पुरस्कार है।”
प्रो० हेनरी ग्रेसन के अनुसार, “लाभ को नवप्रवर्तन करने का पुरस्कार, जोखिम उठाने का पुरस्कार तथा बाजार से अपूर्ण प्रतियोगिता के कारण उत्पन्न अनिश्चितताओं का परिणाम कहा जा सकता है। इसमें से कोई भी दशा अथवा दशाएँ आर्थिक लाभ को उत्पन्न कर सकती हैं।”
प्रो० वाकर के अनुसार, “लाभ योग्यता को लगान है।” क्लार्क के अनुसार, “लाभ आर्थिक उन्नति का प्रत्यक्ष फल है।’
प्रो० मार्शल के अनुसार, “राष्ट्रीय लाभांश का वह भाग जो उद्यमी को व्यवसाय का जोखिम उठाने के उपलक्ष्य में प्राप्त होता है, लाभ कहलाता है।”

लाभ की विशेषताएँ

  1. लाभ एक अनिश्चित अवशिष्ट है। इसे किसी अनुबन्ध के रूप में निश्चित नहीं किया जा सकता।
  2.  लाभ ऋणात्मक भी हो सकता है। ऋणात्मक लाभ का अर्थ है-उद्यमी को हानि होना।
  3. उत्पत्ति के अन्य साधनों की अपेक्षा लाभ की दर में उतार-चढ़ाव अधिक होता है।

लाभ के प्रकार
लाभ दो प्रकार का होता है
(अ) सकल लाभ या कुल लाभ तथा
(ब) निवल लाभ या शुद्ध लाभ।

(अ) कुल लाभ (Gross Profit) – साधारण बोलचाल की भाषा में जिसे हम लाभ कहते हैं, अर्थशास्त्र में उसे कुल लाभ कहा जाता है। एक उद्यमी को अपने व्यवसाय अथवा फर्म में प्राप्त होने वाली कुल आय (Total Revenue) में से उसके कुल व्यय को घटाकर जो शेष बचता है वह कुल लाभ होता है। अत: कुल लाभ किसी उद्यमी को अपनी कुल आय में से कुल व्यय को घटाने के पश्चात् प्राप्त अतिरेक होता है। कुल लाभ उद्यमी के केवल जोखिम उठाने का प्रतिफल ही नहीं, बल्कि उसमें उसकी अन्य सेवाओं का प्रतिफल भी सम्मिलित रहता है।

कुल आय में से उत्पत्ति के साधनों को दिये जाने वाले प्रतिफल (लगाने, मजदूरी, वेतन तथा ब्याज) तथा घिसावट व्यय को निकालने के पश्चात् जो शेष बचता है, उसे ही कुल लाभ कहते हैं।
कुल लाभ ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है
कुल लाभ = कुल आय – स्पष्ट लागते
(Gross Profit) = (Total Revenue) – (Explicit Costs)
सरल शब्दों में, किसी वस्तु की कुल उत्पत्ति और कुल उत्पादन व्यय में जो अन्तर होता है, वही उद्यमी का ‘कुल लाभ’ कहा जाता है।

कुल लाभ के अंग (अवयव)
कुल लाभ के निम्नलिखित अंग है।

1. उत्पादक के निजी साधनों का पुरस्कार – उद्यमी उत्पादन-कार्य में अपने निजी साधन भी लगाता है जिन्हें अस्पष्ट लागत’ कहते हैं। कुल लाभ में निजी साधनों का पुरस्कार भी सम्मिलित रहता है। अत: शुद्ध लाभ ज्ञात करते समय उत्पादक के कुल लाभ में से निम्नलिखित निजी साधनों के व्यय घटा देने चाहिए

  1. उद्यमी की निजी भूमि का लगान।
  2. साहसी की अपनी पूंजी का ब्याज।
  3. उद्यमी के व्यवस्थापक अथवा निरीक्षक के रूप में पुरस्कार।

2. संरक्षण व्यय – इसके अन्तर्गत दो प्रकार के व्यय शामिल होते हैं।

  • मूल्य ह्रास व्यय – आजकल उत्पादन-कार्य हेतु विशाल मशीनों तथा यन्त्रों का सहारा लिया जाता है। इन मशीनों का धीरे-धीरे ह्रास (टूट-फूट) होता रहता है और निश्चित समय के पश्चात् इन्हें पूर्णतः बदलना पड़ता है। इन कार्यों के लिए उद्यमी को कुछ धनराशि अलग से संचित करनी पड़ती है। इसे ‘ह्रास निधि’ अथवा ‘अनुरक्षण निधि’ कहते हैं। अत: असल लाभ ज्ञात करने के लिए कुल लाभ में से अनुरक्षण निधि में डाले जाने वाले मूल्य के ह्रास प्रभार को घटा दिया जाना चाहिए।
  • बीमा व्यय – उद्यमी चल और अचल सम्पत्ति का आग, वर्षा, भूकम्प, चोरी, दंगे-फसाद आदि के विरुद्ध बीमा कराता है, ताकि उसे इन आपदाओं से हानि न उठानी पड़े। इस कार्य हेतु उद्यमी को प्रतिवर्ष प्रीमियम देना होता है। यह बीमा व्यय भी कुल लाभ में सम्मिलित रहता है। अतः शुद्ध लाभ को ज्ञात करते समय कुल लाभ में से बीमा व्यय को घटा दिया जाना चाहिए।

3. अव्यक्तिगत लाभ – उद्यमी को ऐसे लाभ भी प्राप्त होते हैं जिनका सीधा सम्बन्ध उद्यमी की स्वयं की योग्यता से नहीं होता। इसके अन्तर्गत दो प्रकार के लाभ शामिल होते हैं

  •  एकाधिकारी लाभ – जब उत्पादन के क्षेत्र में एकमात्र उत्पादक होता है तो उसको वस्तु की पूर्ति पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। ऐसी दशा में वह अतिरिक्त आय अर्जित करने में सफल हो जाता है। यह अतिरिक्त आय कुल लाभ में शामिल रहती है। इसे निकालकर शुद्ध लाभ ज्ञात किया जा सकता है।
    UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 12 Profit 1
  •  आकस्मिक लाभ – प्राकृतिक संकट, युद्ध तथा फैशन एवं माँग की दशाओं में अचानक परिवर्तन हो जाने से कभी-कभी उत्पादकों को अप्रत्याशित लाभ होने लगता है। यह लाभ कुल लाभ में शामिल होता है।

4. शुद्ध लाभ – यह उद्यमी की योग्यता, चतुराई, जोखिम उठाने की शक्ति व सौदा करने की क्षमता का पारिश्रमिक है। अतः उद्यमी के पूर्वानुमान, जोखिम वहन करने की शक्ति तथा सौदा करने की शक्ति के फलस्वरूप जो धनराशि उसे प्राप्त होती है, उसे शुद्ध लाभ कहते हैं। यह कुल लाभ’ का ही अंग है। संक्षेप में कुल लाभ पिछले पृष्ठ पर दिखाया गया है।

कुल आगम में से स्पष्ट तथा अस्पष्ट लागतों को घटा देने के पश्चात् जो शेष बचता है, वही ‘शुद्ध लाभ है।

सूत्र रूप में,
शुद्ध लाभ = कुल लाभ-(स्पष्ट लागतें + अस्पष्ट लागते)

परिभाषाएँ – शुद्ध लाभ को विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने निम्नवत् परिभाषित किया है

  1.  जे० के० मेहता के अनुसार, “अनिश्चिता के कारण इस प्रकार प्रावैगिक संसार में उत्पादन कार्यों में चौथी श्रेणी का त्याग उत्पन्न हो जाता है। यह श्रेणी है-जोखिम उठाना अथवा अनिश्चितता वहन करना। लाभ इसी का पुरस्कार होता है।”
  2. थॉमस के अनुसार, “लाभ उद्यमी का पुरस्कार उस जोखिम के लिए है, जिसे वह दूसरों पर नहीं टाल सकता है।”
  3. फिशर के अनुसार, “शुद्ध लाभ सभी जोखिम उठाने का पुरस्कार नहीं, बल्कि अनिश्चितता की जोखिम को उठाने का पुरस्कार है।”

शुद्ध लाभ में निम्नलिखित तत्त्व शामिल होते हैं

  1. जोखिम तथा अनिश्चितता उठाने का पुरस्कार। उत्पादक, उत्पादन की मात्रा का निर्धारण अर्थव्यवस्था की भावी माँग का अनुमान लगाकर करता है। यदि उसका अनुमान सही सिद्ध होता है, तो उसे लाभ होता है अन्यथा हानि। उद्यमी के अतिरिक्त उत्पादन के अन्य साधनों का प्रतिफल तो निश्चित होता है और उन्हें उनके प्रतिफल का भुगतान प्राय: उत्पादन के विक्रय से पूर्व ही कर दिया जाता है। केवल उद्यमी को प्रतिफल ही अनिश्चित रहता है।
  2. सौदा करने की मान्यता का पुरस्कार।
  3. नवप्रवर्तनों (innovations) का पुरस्कार।
  4. बाजार की अपूर्णताओं के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाला पुरस्कार।

प्रश्न 2
लाभ का निर्धारण किस प्रकार होता है ? सचित्र व्याख्या कीजिए।
या
लाभ के माँग व पूर्ति के सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
लाभ का निर्धारण या लाभ का माँग व पूर्ति का सिद्धान्त
आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार लाभ का निर्धारण भी उद्यमियों की माँग एवं पूर्ति के द्वारा किया जा सकता है अर्थात् लाभ का निर्धारण उद्यमियों की माँग एवं पूर्ति की शक्तियों के द्वारा उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर साहसी की माँग और पूर्ति एक-दूसरे के ठीक बराबर होती हैं, यही सन्तुलन बिन्दु होता है। इस सन्तुलन द्वारा जो लाभ की दर निश्चित होती है, इसे लाभ की सन्तुलन दर कहा जा सकता है।

उद्यम की पूर्ति – उद्यम की पूर्ति निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है|

1. देश में औद्योगिक विकास की स्थिति – देश में जितना औद्योगिक विकास होगा, उतनी ही अधिक उद्यमियों की पूर्ति होगी।
2. जनसंख्या का आकार, उसका चरित्र एवं मनोवृत्ति – यदि देश में जनसंख्या अधिक होगी तो उद्यमियों की पूर्ति अधिक होगी। यदि देश के लोगों की मनोवृत्ति जोखिम उठाने की है तब भी उद्यमियों की पूर्ति अधिक होगी।
3. आय का असमान वितरण – यदि राष्ट्रीय लाभांश का वितरण असमान है तब भी देश में उद्यमियों की पूर्ति अधिक होगी।
4. लाभ की आशा – लाभ की आशा उद्यमियों को जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करती है। लाभ की दर जितनी अधिक ऊँची होगी साहसी की पूर्ति उतनी ही अधिक होगी।
5. समाज द्वारा सम्मान – यदि समाज में साहसी के कार्य का सम्मान किया जाता है और उन्हें राष्ट्रीय लाभांश में से अधिक भाग दिया जाता है, तब उद्यमियों की पूर्ति अधिक होगी।
6. उपयुक्त शिक्षा एवं ट्रेनिंग की व्यवस्था – विशेष वर्ग के साहसियों के विकास के लिए उपयुक्त शिक्षा एवं ट्रेनिंग की व्यवस्था भी उद्यमियों की पूर्ति में वृद्धि करती है।

उद्यम की माँग व पूर्ति का सन्तुलन या लाभ का निर्धारण
लाभ का निर्धारण उद्यमियों की माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर उद्यमी की माँग एवं पूर्ति एक-दूसरे के ठीक बराबर होती हैं अर्थात् लाभ की दर उस बिन्दु पर निर्धारित होगी जहाँ पर उद्यमी का सीमान्त आय उत्पादकता वक्र उद्यमी के पूर्ति वक्र को काटता है। यदि किसी समय-विशेष पर उद्यमी की माँग, पूर्ति की अपेक्षा अधिक हो जाती है तो उद्यमियों को अधिक लाभ मिलने लगता है। इसके विपरीत, यदि उद्यमी की पूर्ति उसकी माँग की अपेक्षा अधिक हो जाती है तब लाभ की दर कम हो जाती है। दीर्घकाल में लाभ की दर की प्रवृत्ति सन्तुलन बिन्दु पर रहने की होती है।

दिये गये चित्र में OX-अक्ष पर उद्यमी की माँग एवं पूर्ति तथा OY-अक्ष पर लाभ की दर दिखायी गयी है। चित्र में DD उद्यमी का माँग वक्र तथा SS उद्यमी का पूर्ति वक्र है। मॉग एवं पूर्ति वक्र परस्पर EE बिन्दु पर काटते हैं। E सन्तुलन बिन्दु है तथा N रेखा सामान्य लाभ 6 ME (Normal Proft) को दर्शाती है। OM लाभ की सन्तुलन दर है।
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आलोचनाएँ

  1. उद्यमी की माँग और पूर्ति ब्याज की दर को प्रभावित कर सकती है, किन्तु उन्हें लाभ का निर्धारक नहीं कहा -X जा सकता। लाभ का वास्तविक निर्धारक उद्यमियों के द्वारा उद्यमी की माँग एवं पूर्ति । आकस्मिक जोखिम का सहन किया जाना है।
  2.  इस सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप में प्रयोग करना कठिन है, क्योंकि अन्य साधनों की माँग उद्यमी करता है, किन्तु उद्यमी की माँग कौन करता है ? प्रो० जे० के० मेहता ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि उत्पत्ति के अन्य साधन उद्यमी की माँग करते हैं।

यद्यपि यह सिद्धान्त दोषपूर्ण है, फिर भी सामान्य लाभ के निर्धारण का सबसे अच्छा सिद्धान्त माँग और पूर्ति का सिद्धान्त है। वर्तमान युग में अधिकांश अर्थशास्त्री इस सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
सकल लाभ तथा शुद्ध लाभ में अन्तर बताइए। [2013]
उत्तर:
सकल लाभ एवं शुद्ध लाभ में अन्त
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प्रश्न 2
लाभ का लगान सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर:
लाभ का लगान सिद्धान्त
इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रमुख अमेरिकन अर्थशास्त्री प्रो० वाकर (Walker) ने किया था। इनके अनुसार, लाभ एक प्रकार का लगान है। प्रो० वाकर ने लाभ को योग्यता का लगाने (Rent of Ability) माना है जो साहसियों की योग्यता में भिन्नता होने के कारण उन्हें प्राप्त होता है। योग्यता का लगान (लाभ) अधिसीमान्त और सीमान्त साहसियों की योग्यता के अन्तर के कारण उत्पन्न होता है। जिस प्रकार सीमान्त भूमि पर कोई लगान नहीं होता अर्थात् भूमि लगानरहित होती है, उसी प्रकार सीमान्त साहसी (Marginal Entrepreneur) भी होता है। इस सीमान्त साहसी से अधिक योग्य एवं श्रेष्ठ साहसी अधिसीमान्त साहसी होते हैं। इनकी योग्यता को प्रतिफल सीमान्त साहसी के द्वारा नापा जाता है। सीमान्त साहसी लाभ के रूप में किसी प्रकार का अतिरेक प्राप्त नहीं करता। प्रो० वाकर के शब्दों में, “लाभ योग्यता का लगीन है। जिस प्रकार बिना लगान की भूमि होती है जिसकी उपज केवल मूल्य को पूरा करती है, उसी प्रकार बिना लाभ की फर्म अथवा साहसी होता है जिसकी आय केवल उत्पादन को पूरा करती है। जिस प्रकार एक भूमि के टुकड़े का लगान बिना लगान की भूमि के ऊपर अतिरेक होता है और मूल्य में सम्मिलित नहीं होता, उसी प्रकार किसी फर्म का लाभ बिना मुनाफे की फर्म के ऊपर अतिरेक होता है। अधिक योग्यता वाले व्यवसायी सीमान्त व्यावसायियों के ऊपर लाभ प्राप्त करते हैं।

आलोचनाएँ

  1. यह सिद्धान्त लाभ की प्रकृति को ठीक नहीं बताता। व्यवसाय में अधिक लाभ सदैव साहसी की उत्तम योग्यता के कारण नहीं, बल्कि उद्यमी को आकस्मिक लाभ तथा एकाधिकारी लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं।
  2.  प्रो० मार्शल के अनुसार, लाभ को लगाने की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। लगान सदैव धनात्मक होता है, जिन लाभ ऋणात्मक भी हो सकता है।
  3.  भूमि बिना लगान की हो सकती है, किन्तु साहसी बिना लाभ के नहीं हो सकता; क्योंकि साहसी की पूर्ति तभी होती है जब उसे लाभ मिलता है।
  4. मिश्रित पूँजी वाली कम्पनियों के हिस्सेदारों को बिना किसी विशेष योग्यता के ही लाभ प्राप्त । होता है।

प्रश्न 3
“लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
लाभ के जोखिम सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2014, 16]
उत्तर:
‘लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार है’ इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो० हॉले ने किया था। उनके अनुसार लाभ व्यवसाय में जोखिम के कारण उत्पन्न होता है। प्रत्येक व्यवसाय में जोखिम होता है। जोखिम को उठाने के लिए उत्पत्ति का कोई भी अन्य साधन तैयार नहीं होता है। इसलिए प्रत्येकव्यवसाय में जोखिम उठाने वाला होना चाहिए और जोखिम वहन करने के लिए उचित प्रतिफल मिलना चाहिए। बिना इस प्रतिफल के कोई भी साधन व्यवसाय की जोखिम नहीं उठाएगा। जो साधन जोखिम उठाता है उसे साहसी (Entrepreneur) कहते हैं। साहसी व्यवसाय में जोखिम उठाकर महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

जोखिम उठाने का कार्य लोग पसन्द नहीं करते; क्योंकि भूमि, श्रम, पूँजी एवं प्रबन्ध का पुरस्कार निश्चित होता है, किन्तु साहसी का पुरस्कार अनिश्चित होता है। इस कारण साहसी को उसकी सेवाओं के बदले में प्रतिफल मिलना आवश्यक है। लाभ ही वह प्रतिफल हो सकता है जो साहसी को जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि लाभ जोखिम उठाने का प्रतिफल है। जिस व्यवसाय में जोखिम जितनी अधिक होती है, उतना ही अधिक लाभ उद्यमी को मिलना चाहिए।

आलोचना – यद्यपि सभी अर्थशास्त्री इस बात को स्वीकार करते हैं कि लाभ जोखिम उठाने का प्रतिफल है, फिर भी लाभ के जोखिम सिद्धान्त की आलोचनाएँ की गयी हैं, जो निम्नलिखित हैं

  1. प्रो० नाईट के अनुसार, “सभी प्रकार के जोखिम से लाभ प्राप्त नहीं होता है। कुछ जोखिम का पूर्वानुमान के आधार पर बीमा आदि कराकर जोखिम से बचा जा सकता है। इस कारण इस प्रकार के जोखिम के लिए लाभ प्राप्त नहीं होता है। लाभ केवल अज्ञात जोखिम को सहन करने के कारण ही उत्पन्न होता है।”
  2. प्रो० कारवर का मत है कि, “लाभ इसलिए प्राप्त नहीं होता कि जोखिम उठायी जाती है, बल्कि इसलिए मिलती है कि जोखिम नहीं उठायी जाती। श्रेष्ठ साहसी जोखिम को कम कर देते हैं, इसलिए उन्हें लाभ मिलता है।”

प्रश्न 4
लाभ नवप्रवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
या
लाभ का नवप्रवर्तन सिद्धान्त क्या है ? समझाइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शुम्पीटर का मत है कि लाभ नवप्रवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। शुम्पीटर ने ‘लाभ का नवप्रवर्तन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

प्रो० शुम्पीटर के अनुसार, “लाभ साहसी के कार्य का प्रतिफल है अथवा वह जोखिम, अनिश्चितता तथा नवप्रवर्तन के लिए भुगतान है।”
प्रो० हेनरी ग्रेसन के अनुसार, “लाभ को नवप्रवर्तन करने का पुरस्कार कह सकते हैं।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि एक उद्यमी को लाभ नवप्रवर्तन के कारण प्राप्त होता है। एक उद्यमी का उद्देश्य अधिकतम लाभ अर्जित करना होता है, अत: वह उत्पादन प्रक्रिया में परिवर्तन करता रहता है। उत्पादन प्रक्रिया में परिवर्तन से अभिप्राय उत्पादन कार्य में नयी मशीनों का प्रयोग, उत्पादित वस्तुओं के प्रकार में परिवर्तन, कच्चे माल में परिवर्तन, वस्तु को विक्रय विधि एवं बाजार में परिवर्तन व नये-नये आविष्कार हो सकते हैं; अत: नवप्रवर्तन एकं विस्तृत अवधारणा है।

एक उद्यमी अधिक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से नये-नये आविष्कार एवं नयी-नयी उत्पादन रीतियों का उपयोग करता रहता है, जिसका परिणाम उत्पादन लागत को कम करना तथा लागत और कीमत के अन्तर को बढ़ाना होता है, जिससे लाभ का जन्म होता है। लाभ की भावना से प्रेरित होकर उद्यमी नवप्रवर्तन का उपयोग करता है। इस प्रकार लाभ नवप्रवर्तन को प्रोत्साहित करता है तथा नवप्रवर्तन के कारण ही लाभ अर्जित होता है। अतः लाभ व नवप्रवर्तन में घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। इस प्रकार लाभ नवप्रवर्तन का कारण एवं परिणाम दोनों है।

यदि एक उद्यमी लाभ अर्जित करने के लिए नवप्रवर्तन का उपयोग करता है और वह इस उद्देश्य में सफल हो जाता है, तब अन्य उद्यमी भी लाभ से आकर्षित होकर अपने उत्पादन कार्य में नवप्रवर्तन को उपयोग में लाते हैं। इस प्रकार नवप्रवर्तन के कारण लाभ प्राप्त होता रहता है।

शुम्पीटर का यह मत कि लाभ नवप्रवर्तन के कारण उत्पन्न होता है, सत्य प्रतीत होता है।
आलोचनाएँ – लाभ के नवप्रवर्तन सिद्धान्त की यह कहकर आलोचना की जाती है कि शुम्पीटर के अनुसार लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार नहीं है, लाभ तो नवप्रवर्तन का परिणाम है, उचित प्रतीत नहीं होता; क्योंकि यदि हम ध्यानपूर्वक मनन करें तो पता लगता है कि नवप्रवर्तन भी जोखिम का अभिन्न अंग है। नवप्रवर्तन करने में भी उद्यमी को जोखिम रहती है। अतः लाभ निर्धारण में से जोखिम व अनिश्चितता को निकाल देने के पश्चात् लाभ का सिद्धान्त अधूरा रह जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
लाभ का मजदूरी सिद्धान्त क्या है ?
उत्तर:
प्रो० टॉजिग और डेवनपोर्ट के अनुसार, “साहसी की सेवाएँ भी एक प्रकार का श्रम हैं; अतः साहसी को मजदूरी के रूप में लाभ प्राप्त होता है। अतः लाभ को एक प्रकार की मजदूरी समझना ही अधिक उपयुक्त होगा। प्रो० टॉजिग के अनुसार, “लाभ केवल अवसर के कारण उत्पन्न नहीं होता, बल्कि विशेष योग्यता के प्रयोग का परिणाम होता है जो एक प्रकार का मानसिक श्रम है और वकीलों तथा जजों के श्रम से अधिक भिन्न नहीं है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि लाभ । व्यवसायी के मानसिक श्रम की मजदूरी होती है।

आलोचनाएँ

  1.  यह सिद्धान्त लाभ और मजदूरी के मौलिक अन्तर को नहीं समझ पाया है। साहसी व्यवसाय में जोखिम उठाता है, किन्तु मजदूर को जोखिम नहीं उठानी पड़ती है।
  2. मजदूरी सर्वदा परिश्रम का प्रतिफल है, किन्तु लाभ बिना परिश्रम के भी मिल जाता है।
  3.  प्रो० कार्वर के अनुसार, “लाभ तथा मजदूरी का पृथक् रूप से अध्ययन करना एक वैज्ञानिक आवश्यकता है।”

प्रश्न 2
लाभ के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
लाभ का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त-जिस प्रकार उत्पादन के अन्य साधनों का प्रतिफल उनकी सीमान्त उत्पत्ति के द्वारा निश्चित होता है उसी प्रकार साहस का पुरस्कार (लाभ) भी साहसी की सीमान्त उत्पादन शक्ति के द्वारा निश्चित होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार, साहसी का सीमान्त उत्पादन जितना अधिक होता है उसे उतना ही अधिक लाभ प्राप्त होता है।

आलोचनाएँ

  1. व्यवसायी की सीमान्त उपज का पता लगाना कठिन होता है। एक फर्म में एक ही साहसी होता है; अतः सीमान्त साहसी की सीमान्त उत्पादिता ज्ञात करना असम्भव है।
  2. यह सिद्धान्त साहसी के माँग पक्ष पर ध्यान देता है, पूर्ति पक्ष पर नहीं; अत: यह एकपक्षीय है।
  3. यह सिद्धान्त आकस्मिक लाभ का विश्लेषण नहीं करता जो पूर्णतया संयोग पर निर्भर होता है। साहसी का सीमान्त उत्पादकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

प्रश्न 3
लाभ का समाजवादी सिद्धान्त क्या है ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
लाभ का समाजवादी सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के जन्मदाता कार्ल माक्र्स हैं। उनके अनुसार लाभ इसलिए उत्पन्न होता है कि श्रमिकों को उचित मजदूरी नहीं दी जाती। इस प्रकार लाभ श्रमिकों का शोषण करके अर्जित किया जाता है। लाभ एक प्रकार के साहसी द्वारा श्रमिकों की छीनी हुई मजदूरी है। इस कारण कार्ल मार्क्स ने लाभ को कानूनी डाका (Legalised Robbery) कहा है।

आलोचनाएँ

  1.  आलोचकों का मत है कि लाभ उद्यमी की योग्यता तथा जोखिम सहन करने का प्रतिफल है, न कि श्रमिकों का शोषण। ।
  2. उत्पादन कार्य में श्रम के अतिरिक्त अन्य उपादान; जैसे-भूमि, पूँजी, प्रबन्ध वे साहस भी योगदान करते हैं; अत: लाभ को कानूनी डाका कहना उपयुक्त नहीं है।
  3.  समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी लाभ का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। समाजवादी देशों में लाभ पूर्णतया समाप्त नहीं हो पाया है।

प्रश्न 4
लाभ के प्रावैगिक सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
लाभ का प्रावैगिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त का प्रतिपादन जे० बी० क्लार्क ने किया है। उनके अनुसार, लाभ का एकमात्र कारण समाज का गतिशील परिवर्तन है। यदि समाज गतिशील है। अर्थात् जनसंख्या, पूँजी की मात्रा, रुचि, उत्पत्ति के तरीकों आदि में परिवर्तन होता रहता है तब समाज गतिशील माना जाता है और लाभ केवल गतिशील समाज में ही उत्पन्न होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि लाभ इसलिए प्राप्त होता है, क्योंकि समाज प्रावैगिक अवस्था में है।

आलोचनाएँ

  1.  प्रो० नाइट ने इस सिद्धान्त की आलोचना इन शब्दों में की है-“प्रावैगिक परिवर्तन स्वयं लाभ को उत्पन्न नहीं करते, बल्कि लाभ वास्तविक दशाओं की उन दशाओं से, जिनके अनुसार व्यावसायिक प्रबन्ध किया जा चुका है, भिन्न हो जाने के कारण उत्पन्न होता है।”
  2.  टॉजिग के अनुसार, “पुराने तथा स्थायी व्यवसायों में प्रबन्ध सम्बन्धी दैनिक समस्याओं को सुलझाने के लिए निर्णय-शक्ति और कुशलता की आवश्यकता होती है। आधुनिक प्रगतिशील तथा शीघ्र परिवर्तनीय काल में इन गुणों के लाभपूर्ण उपयोग की अधिक आवश्यकता होती है।
    उपर्युक्त कारणों से यह कहना त्रुटिपूर्ण है कि लाभ का कारण प्रावैगिक अवस्था है।

प्रश्न 5:
‘लाभ अनिश्चितता उठाने का प्रतिफल है।’ समझाइए।
या
लाभ का अनिश्चितता सिद्धान्त क्या है ?
या
लाभ के अनिश्चितता वहन सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [2014]
या
लाभ के अनिश्चितता वहन सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2014, 15, 16]
उत्तर:
लाभ का अनिश्चितता उठाने का सिद्धान्त–इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो० नाइट ने किया है। उनके अनुसार, लाभ जोखिम उठाने का प्रतिफल नहीं, वरन् अनिश्चितता को सहन करने के प्रतिफल के रूप में प्राप्त होता है। प्रो० नाइट के अनुसार, व्यवसाय में कुछ जोखिम ऐसी होती है। जिनका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है तथा बीमा आदि कराकर उन जोखिमों से बचा जा सकता है। इन्हें निश्चित एवं ज्ञात जोखिम कहा जाता है। इन ज्ञात व निश्चित खतरों को उठाने के लिए लाभ प्राप्त नहीं होता है। इसलिए लाभ को जोखिम का प्रतिफल नहीं कहा जा सकता । अन्य दूसरे प्रकार की जोखिम जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता और जिससे बचने के लिए भी कोई प्रबन्ध नहीं किया जा सकता, प्रो० नाइट ने इन्हें अनिश्चितता माना है। इस अनिश्चितता को उठाने के लिए साहसी को लाभ मिलता है। इस प्रकार लाभ अनिश्चितता सहन करने के लिए मिलने वाला पुरस्कार है।

आलोचनाएँ

  1. साहसी का कार्य केवले अनिश्चितता सहन करना ही नहीं, अपितु वह उत्पादन से सम्बन्धित अन्य कार्य; जैसे—प्रबन्ध, मोलभाव आदि भी करता है। अतः लाभ साहसी को इन सेवाओं के बदले में मिलता है।
  2. अनिश्चितता को उत्पत्ति का एक पृथक् साधन नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 6
कुल लाभ में किन भुगतानों को सम्मिलित किया जाता है ?
उत्तर:
कुल लाभ के अन्तर्गत निम्नलिखित भुगतानों को सम्मिलित किया जाता है

  1. साहसी की अपनी भूमि को लगान।
  2. साहसी की पूँजी का ब्याज।
  3.  साहसी की प्रबन्ध तथा निरीक्षण सम्बन्धी सेवाओं की मजदूरी।
  4. साहसी की योग्यता का लगान।

प्रश्न 7
लाभ-निर्धारण के लाभ को लगान सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
इस सिद्धान्त के अनुसार लाभ एक प्रकार का लगान है। वाकर ने लाभ को व्यवसायियों की योग्यता का लगान माना है। जिस प्रकार सीमान्त भूमि अथवा बिना लगान भूमि होती है उसी प्रकार सीमान्त साहसी भी होता है। जिस प्रकार भूमि की उपजाऊ शक्ति में अन्तर होता है उसी प्रकार साहसियों की योग्यता में भी अन्तर पाया जाता है। जिस प्रकार भूमि के लगान का निर्धारण सीमान्त भूमि और अधिसीमान्त भूमि की उपज के अन्तर के द्वारा होता है, उसी प्रकार लाभ का निर्धारण सीमान्त साहसी और अधिसीमान्त साहसी के द्वारा होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
शुद्ध लाभ किसे कहते हैं?
उत्तर:
शुद्ध लाभ वह लाभ होता है जो साहसी को जोखिम उठाने के लिए मिलता है । इसमें कोई अन्य प्रकार का भुगतान सम्मिलित नहीं होता।

प्रश्न 2
लाभ की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
लाभ की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. लाभ ऋणात्मक (Negative) भी हो सकता है।
  2.  लाभ की दर में पर्याप्त उतार-चढ़ाव पाये जाते हैं।
  3.  लाभ पहले से निश्चित नहीं होता। उसके सम्बन्ध में काफी अनिश्चितता पायी जाती है।

प्रश्न 3
‘कुल लाभ’ व ‘शुद्ध लाभ में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
कुल लाभ में उद्यमी के केवल जोखिम उठाने का प्रतिफल ही नहीं, अपितु उसमें उसकी अन्य सेवाओं का प्रतिफल भी सम्मिलित रहता है। जबकि निवल लाभ कुल लाभ का एक छोटा अंश होता है। यह उद्यमी को जोखिम उठाने के लिए मिलता है। इसमें किसी अन्य प्रकार का भुगतान सम्मिलित नहीं होता है।

प्रश्न 4
लाभ के दो प्रकार लिखिए।
उत्तर:
(1) सकल लाभ या कुल लाभ तथा
(2) निवल लाभ या शुद्ध लाभ

प्रश्न 5
सामान्य लाभ क्या है? [2007, 15]
उत्तर:
वितरण की प्रक्रिया में राष्ट्रीय आय का वह भाग जो साहसी को प्राप्त होता है, सामान्य लाभ कहलाता है।

प्रश्न 6
लाभ का जोखिम सिद्धान्त किसका है ? [2006]
उत्तर:
लाभ का जोखिम सिद्धान्त प्रो० हॉले का है।

प्रश्न 7:
लाभ का लगान सिद्धान्त किस अर्थशास्त्री ने प्रतिपादित किया था?
उत्तर:
लाभ का लगान सिद्धान्त प्रो० वाकर ने प्रतिपादित किया था।

प्रश्न 8:
लाभ का मजदूरी सिद्धान्त के प्रतिपादक कौन हैं ?
उत्तर:
प्रो० टॉजिग।

प्रश्न 9
लाभ का अनिश्चितता का सिद्धान्त किसका है ? [2008]
या
लाभ का अनिश्चितता वहन करने सम्बन्धी सिद्धान्त किसने दिया था? [2013, 15, 16]
उत्तर:
प्रो० नाइट ने।

प्रश्न 10
लाभ का गतिशील (प्रावैगिक) सिद्धान्त किस अर्थशास्त्री का है ?
उत्तर:
जे० बी० क्लार्क का।

प्रश्न 11
लाभ किसे प्राप्त होता है? [2014]
उत्तर:
उद्यमी या साहसी को।

प्रश्न 12
लाभ को परिभाषित कीजिए। या लाभ क्या है? [2014]
उत्तर:
प्रो० वाकर के अनुसार, “लाभ योग्यता का लगान है।”

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
लाभ का लगान सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं
(क) प्रो० वाकर
(ख) प्रो० कीन्स
(ग) प्रो० हॉले
(घ) प्रो० टॉजिग
उत्तर:
(क) प्रो० वाकर।

प्रश्न 2
लाभ का मजदूरी सिद्धान्त के समर्थक हैं
(क) प्रो० वाकर
(ख) प्रो० टॉजिग और डेवनपोर्ट
(ग) प्रो० हॉले।
(घ) प्रो० नाइट
उत्तर:
(ख) प्रो० टॉजिग और डेवनपोर्ट।

प्रश्न 3
‘लाभ का जोखिम सिद्धान्त निम्न में से किसके द्वारा प्रतिपादित किया गया ? [2007, 28, 11]
(क) प्रो० हॉले।
(ख) प्रो० वाकर
(ग) प्रो० टॉजिग
(घ) प्रो० नाईट
उत्तर:
(क) प्रो० हॉले।

प्रश्न 4
निम्नलिखित में कौन-सा लाभ सिद्धान्त शुम्पीटर का है ? [2006, 09]
(क) लाभ का लगान सिद्धान्त
(ख) लाभ का नवप्रवर्तन सिद्धान्त
(ग) लाभ का अनिश्चितता सिद्धान्त
(घ) लाभ का जोखिम सिद्धान्त
उत्तर:
(ख) लाभ का नवप्रवर्तन सिद्धान्त।

प्रश्न 5
लाभ का समाजवादी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है
(क) कार्ल मार्क्स ने
(ख) प्रो० टॉजिग ने
(ग) प्रो० नाइट ने
(घ) प्रो० शुम्पीटर ने
उत्तर:
(क) कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से किस लाभ के सिद्धान्त को प्रो० नाइट ने प्रतिपादित किया है ? [2015]
या
नाइट का लाभ का सिद्धान्त कहलाता है [2016]
(क) अनिश्चितता का सिद्धान्त
(ख) समाजवादी सिद्धान्त
(ग) जोखिम का सिद्धान्त
(घ) मजदूरी सिद्धान्त
उत्तर:
(क) अनिश्चितता का सिद्धान्त।

प्रश्न 7
वितरण में उद्यमी को हिस्सा प्राप्त होता है
(क) सबसे बाद में
(ख) सबसे पहले
(ग) बीच में
(घ) कभी नहीं
उत्तर:
(क) सबसे बाद में।

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