UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 10 Juvenile Delinquency

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 10
Chapter Name Juvenile Delinquency (बाल-अपराध)
Number of Questions Solved 46
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 10 Juvenile Delinquency (बाल-अपराध)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
बाल-अपराध से आप क्या समझते हैं ? बाल-अपराध के कारकों को समझाइए। [2009, 10, 11, 13, 16]
या
बाल-अपराध क्या है? इसके प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए। [2015, 16]
या
बाल-अपराध के कारणों की विवेचना कीजिए। [2009, 11, 12, 15, 17]
या
बाल-अपराध के व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2015]
या
बाल-अपराध विखण्डित परिवार की देन है।” भारत के सन्दर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। [2012, 13]
या
भारत में बाल-अपराध में वृद्धि के कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2015]
या
बाल-अपराध के सामाजिक कारण बताइए। [2015, 16]
या
बाल अपराध की समस्या को दूर करने का उपाय बताइए। [2017]
उत्तर:
बाल-अपराध का अर्थ
एक निश्चित आयु के बालक द्वारा समाज में निषिद्ध अथवा कानून विरोधी कार्य करना बालअपराध कहलाता है। बाल-अपराध दो शब्दों का संयोग है–‘बाल + अपराध’। ‘बाल’ का अर्थ है – बालक या किशोर, ‘अपराध’ का अर्थ है-कानून का उल्लंघन। इस प्रकार बाल-अपराध को शाब्दिक अर्थ हुआ किशोर द्वारा किया गया अपराध। भारत में 1960 व 1986 ई० में बाल अधिनियम पारित किये गये। इनके अनुसार 16 वर्ष की आयु के लड़के तथा 18 वर्ष की आयु की लड़की को बालक माना गया।

इस प्रकार भारत में 7 वर्ष से 16 वर्ष की आयु तक के लड़के तथा 7 वर्ष से 18 वर्ष तक की लड़की द्वारा किया गया कानून-विरोधी कार्य बाल-अपराध माना जाता है। इसके पश्चात् 21 वर्ष की आयु तक के अपराधी को किशोर अपराधी कहा जाता है। सदरलैण्ड ने 16 वर्ष से कम आयु के सभी अपराधियों को बाल-अपराधी कहा है। बाल-अपराध के लिए आयु मिस्र, इराक, लेबनान, सीरिया तथा ब्रिटेन में 16 वर्ष है, जब कि ईरान, जॉर्डन, सऊदी अरब, यमन, तुर्किस्तान तथा थाइलैण्ड में यह 18 वर्ष है। जापान में बाल-अपराधी 20 वर्ष से कम आयु का ही माना जाता है। बालक द्वारा की जाने वाली ऐसी उद्दण्डता को, जो समाज-विरोधी या कानून-विरोधी है, बाल-अपराध कहते हैं। बाल-अपराध वर्तमान समय की एक महत्त्वपूर्ण एवं गम्भीर समस्या है। तथा इसकी दर में वृद्धि सामाजिक व पारिवारिक विघटन की सूचक मानी जाती है।

बाल-अपराध की परिभाषा
बाल-अपराध का अर्थ निश्चित आयु से कम आयु के व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अपराध है। जब निश्चित आयु से कर्म के बच्चों या युवकों द्वारा कोई अनुचित व समाज-विरोधी कार्य किया जाता है तो उसे बाल-अपराध कहते हैं। बाल-अपराध को ठीक-ठीक अर्थ समझने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं का अध्ययन करना होगा। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने बाल-अपराध को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

माउरर के अनुसार, “बाल-अपराधी वह व्यक्ति है, जो जान-बूझकर इरादे के साथ तथा समझते हुए उसे समाज की रूढ़ियों की उपेक्षा करता है जिससे उसका सम्बन्ध है। ऐसे व्यक्ति द्वारा किये गये अपराध को बाल-अपराध कहा जाएगा।”

सेथना
के अनुसार, “बाल-अपराध के अन्तर्गत उस तरुण व्यक्ति के गलत कार्य आते हैं जो कि सम्बन्धित स्थान के कानून (जो उस समये लागू हों) के द्वारा निर्दिष्ट आयु-सीमा के अन्दर आता है।”

रॉबिन्सन के अनुसार, “बाल-अपराध के अन्तर्गत आवारागर्दी और भीख माँगना, दुर्व्यवहार, बुरे इरादे से शैतानी करना और उद्दण्डता सम्मिलित किये जाते हैं।”
न्यूमेयर के अनुसार, “बाल-अपराधी एक निश्चित आयु से कम का वह व्यक्ति है जिसने समाज-विरोधी कार्य किया है और जिसका दुर्व्यवहार कानून को तोड़ने वाला है।”

सिरिल बर्ट के अनुसार, “किसी बालक को बाल-अपराधी वास्तव में तभी मानना चाहिए जब उसकी समाज-विरोधी प्रवृत्तियाँ इतना गम्भीर रूप धारण कर लें कि उसके विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही की जाए या वह उस कार्यवाही के योग्य हो जाए।”

हेली
के अनुसार, “एक बालक जो सामाजिक व्यवहार के मान से विचलित हो रहा हो, बालअपराधी कहलाता है।

मेनगोल्ड के अनुसार, “बाल-अपराधी वह अपराधी व्यक्ति है जो आवश्यक रूप से किसी विशेष अपराध करने से अभियुक्त नहीं होता, अपितु उसमें समाज-विरोधी दृष्टिकोण तथा व्यवहार के लक्षणों का विकास हो जाता है, जो यदि नहीं रोके गये तो वे नि:सन्देह ऐसे कार्यों की ओर अग्रसर होंगे जिन्हें लोग सहन नहीं कर सकेंगे।”

वास्तव में, बाल-अपराधी होने का आधार आयु है। बाल-अपराध एक निश्चित आयु के बालक द्वारा किया गया कानून-विरोधी कार्य है। बाल-अपराध में समाज-विरोधी कार्यों को भी सम्मिलित किया जाता है।

अमेरिका की राष्ट्रीय परिवीक्षा समिति (National Probation Association of United States of America) ने बाल-अपराध को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है – बाल-अपराधी वह है जिसने

  1. किसी प्रान्त अथवा इसके किसी क्षेत्र के कानून अथवा मान्यता का उल्लंघन किया हो।
  2. जो सुधार से परे, उद्दण्ड हो और अपने माता-पिता, संरक्षक अथवा कानून अधिकारियों के नियन्त्रण से परे हो।
  3. जिसे स्कूल से अनुपस्थित रहने की आदत पड़ गयी हो।
  4. जो इस प्रकार व्यवहार करता हो जिससे वह जानबूझकर अपनी या अन्य व्यक्तियों की नैतिकता अथवा स्वास्थ्य को हानि पहुँचाए।

बाल-अपराध के लक्षण
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि बाल-अपराध में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं|

  1. राज्य द्वारा निश्चित आयु से कम आयु का व्यक्ति;
  2. व्यवहार की गम्भीरता;
  3. कानून का उल्लंघन;
  4. अनैतिक एवं अशोभनीय व्यवहार;
  5.  जान-बूझकर अनैतिक एवं बुरे व्यक्तियों से सम्पर्क;
  6.  रात्रि को बिना उद्देश्य घूमना;
  7. स्कूल से भागने की आदत;
  8. सार्वजनिक स्थान पर गन्दी, असभ्य व निम्न स्तर की भाषा का आदतन प्रयोग;
  9.  सार्वजनिक स्थानों पर बीड़ी-सिगरेट इत्यादि पीना तथा
  10. विकास का अनुकूल स्तर न होना।

बाल-अपराध के कारण
बाल-अपराध एक गम्भीर सामाजिक समस्या है। प्रत्येक समाज में इसके कारण हूँढ़ने का प्रयास किया जाता है। बाल-अपराधी किसी एक विशिष्ट कारण की देन नहीं है, इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी हैं। सामान्य रूप से बाल-अपराध के निम्नलिखित कारण हैं

(अ) बाल-अपराध के पारिवारिक कारण
बाल-अपराध के लिए परिवार सम्बन्धी कारणों को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। परिवार को बच्चे की प्रथम पाठशाला कहा जाता है, क्योंकि बच्चे को एक अच्छा नागरिक बनाने अथवा उसे बिगाड़ने में पारिवारिक परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। जब परिवार बच्चे को सामाजिकमानसिक सुरक्षा प्रदान करने में असफल हो जाता है और बच्चा स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगता है, तो वह बाल-अपराधी बन जाता है। सामान्यत: निम्नलिखित पारिवारिक परिस्थितियाँ बाल-अपराध के लिए उत्तरदायी हैं1. भग्न परिवार तथा नष्ट परिवार-भग्न परिवार से अर्थ ऐसे परिवारों से है, जो शारीरिक , अथवा मानसिक अथवा दोनों दृष्टियों से टूटे हुए होते हैं। शारीरिक अथवा भौतिक दृष्टि से भग्न परिवारों में माता-पिता में से किसी एक या दोनों के न होने या सौतेली माता के होने से बच्चे उपेक्षित होकर अपराधी बन बैठते हैं। मानसिक दृष्टि से भग्न परिवारों में माता-पिता तथा बच्चे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते, एक-दूसरे का सम्मान नहीं करते तथा बच्चे। स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं और बाल-अपराध की ओर सरलता से आकृष्ट हो जाते हैं। सुधार-गृहों और बाल-न्यायालयों में आने वाले अधिकांश बालक भग्न परिवारों से ही होते है।

2. परिवार का आर्थिक स्तर – परिवार की आर्थिक स्तर नीचा होने तथा अत्यधिक निर्धनता के फलस्वरूप बालक अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए गैर-सामाजिक या गैर-कानूनी कार्यों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यद्यपि परिवार की निर्धनता बाल-अपराध का अनिवार्य कारण नहीं है तथापि इसकी बाल-अपराधों को प्रोत्साहन देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

3. दोषपूर्ण अनुशासन – यदि परिवार का बच्चे पर नियन्त्रण ठीक नहीं है तो भी वह अपराधी प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित हो जाता है। बच्चे पर सन्तुलित वे अनवरत अनुशासन उसे अच्छा नागरिक बनाता है, जब कि दोषपूर्ण अनुशासन उसे बिगाड़ देता है। परिवार में बच्चे के साथ अत्यधिक स्नेह, अत्यधिक तिरस्कार या पक्षपातपूर्ण व्यवहार उन्हें बाल-अपराधी बनाता है।

4. घर का दुषित वातावरण – घर का दूषित वातावरण बच्चे को अपराध की दुनिया में धकेलने में सर्वाधिक उत्तरदायी है। अपराध प्रवृत्ति का पिता, व्यभिचारिणी माँ तथा अनैतिक कार्यों में संलग्न भाई-बहन बच्चे को बाल-अपराधी बना देते हैं।

5. सौतेले माता – पिता का व्यवहार-सौतेले माता-पिता द्वारा यदि बच्चों की उपेक्षा की जाती है, अथवा उनके प्रति गलत व्यवहार किया जाता है तो भी बच्चे अपराधी प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित हो जाते हैं तथा उनका व्यवहार अपराधी बन जाता है।

6. परिवार का वृहत आकार – यदि परिवार का आकार वृहत् है, परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और रहने के लिए पर्याप्त कमरे नहीं हैं तो बच्चों के बाल-अपराधी बनने की सम्भावना अधिक होती है।

7. अशान्त परिवार – यदि परिवार में एकता का अभाव है और लड़ाई-झगड़ों से मानसिक तनाव रहता है, तो वह असुरक्षा व अस्थायित्व की स्थिति बच्चों पर बुरा प्रभाव डालती है और उन्हें बाल-अपराधी बनने में सहायता देती है।

(ब) बाल-अपराध के व्यक्तिगत कारण
पारिवारिक कारणों के साथ-साथ बाल-अपराध के लिए कुछ व्यक्तिगत या शारीस्कि कारण भी उत्तरदायी हैं। इनका सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तित्व से है। लॉम्बोसो, बर्ट, दुहन आदि विद्वानों ने बाल-अपराध में व्यक्तिगत व शारीरिक कारणों को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना है। कुछ प्रमुख व्यक्तिगत व शारीरिक कारण निम्नलिखित हैं

1. शारीरिक असामान्यता – यदि बच्चों का शरीर अस्वस्थ है अथवा इसमें शारीरिक असमानताएँ पायी जाती हैं तो ऐसे बच्चे शारीरिक दृष्टि से स्वयं को दुर्बल अनुभव करते हैं, स्कूल को कार्य ठीक नहीं कर पाते और हीनता की भावना का शिकार होकर बाल-अपराधी बन जाते हैं।

2. शारीरिक दोष – शारीरिक दोष एवं विकृति बच्चों में हीनता की भावना भर देती है और वे अपनी असफलताओं की पूर्ति के लिए अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं। लँगड़े, लूले, हकलाने वाले तथा ऐसे ही अन्य शारीरिक दोषों वाले बच्चों में हीनता की भावना ऐसी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, जो बाल-अपराध के लिए उत्तरदायी हैं।

3. लम्बी बीमारी – अध्ययनों से पता चला है कि लम्बी बीमारी भी बाल-अपराध का एक कारण है। लम्बी बीमारी के कारण बच्चों का स्वास्थ्य सामान्य नहीं रहता, वे अधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं और कई बार बाल-अपराधी बन जाते हैं।

4. अपूर्ण इच्छाएँ – जब बच्चों की मौलिक आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं तो उनमें असन्तुलने , की स्थिति आ जाती है और वे भावात्मक अस्थिरता की स्थिति में अनैतिक कार्यों की ओर अग्रसर हो जाते हैं। जब वे अनैतिक व गैर-सामाजिक ढंग से अपनी इच्छाएँ पूरी करते हैं तो बाल-अपराधी बन जाते हैं।

(स) बाल-अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण
मनोवैज्ञानिक कारण व्यक्तिगत कारणों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। यदि बच्चे का विकास मानसिक रूप से दोषपूर्ण हुआ है तो वह असुरक्षित महसूस करता है और हीन भावना से ग्रसित होकर बाल-अपराधी बन जाता है। बाल-अपराध के प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं

1. मानसिक दुर्बलता – गोडार्ड ने मानसिक दुर्बलता को बाल-अपराध का कारण माना है। यह मानसिक दुर्बलता जन्मजात भी हो सकती है अथवा किसी मानसिक आघात का परिणाम भी हो सकती है। मानसिक रूप से दुर्बल बच्चे ठीक प्रकार से सोच-विचार नहीं कर सकते, शिक्षा को ग्रहण करने में असमर्थ होते हैं और सरलता से बाल-अपराधी बन जाते हैं।

2. संवेगात्मक अस्थिरता – संवेगात्मक अस्थिरता मानसिक संघर्ष का परिणाम है तथा इसे भी – बाल-अपराध का एक मुख्य कारण माना गया है। हीले तथा बूनर ने 105 बाल-अपराधियों में से 15 बाल-अपराधियों में मानसिक अस्थिरता को अपने अध्ययन में प्रमुख रूप से उत्तरदायी बताया है।

3. मन्द बुद्धि वाले बच्चे – यदि बच्चा अपनी आयु के अन्य बच्चों की तुलना में मन्द बुद्धि वाला है तो उसमें हीनता की भावना पैदा हो जाती है। इस हीन भावना के कारण जीवन से निराश होकर वह बाल-अपराधी बन जाता है।

4. अतिवृद्ध बालक – अनेक बच्चे अपनी आयु के सामान्य बच्चों की तुलना में अतिवृद्ध (Over-grown) होते हैं तथा अपनी आयु से बड़े लोगों की संगति में रहते हैं। कई बार बुरी सँगति से वे बाल-अपराधी बन जाते हैं।

(द) बाल-अपराध के सामुदायिक (सामाज़िक) कारण’
सामुदायिक परिस्थितियाँ भी बच्चों के दोषपूर्ण व्यवहार के लिए उत्तरदायी हैं। कुछ प्रमुख सामुदायिक कारण निम्नलिखित हैं

1. बुरा पड़ोस – परिवार के साथ-साथ बच्चे के समाजीकरण पर पड़ोस का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। यदि पझेस अच्छा नहीं है अर्थात् भीड़ वाला या गन्दी बस्तियों का वातावरण है तो इसका प्रभाव बच्चों पर बुरा पड़ता है और ये भी असामाजिक कार्य करने लगते हैं। पड़ोस बालक को अपराध के लिए प्रेरणा देने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

2. स्वस्थ मनोरंजन की कॅमी –  बच्चों के लिए खेल मनोरंजन का महत्त्वपूर्ण साधन है। यदि मनोरंजन के साधनं बच्चों को उपलब्ध नहीं हैं तो वह इस समय का दुरुपयोग करके कुसंगति में पड़ सकता है। गन्दी बस्तियों में खेल-कूद तथा स्वस्थ मनोरंजन के साधनों के अभाव के | कारण ही उनमें बाल-अपराध अधिक पनपते हैं।

3. स्कूल का दूषित वातावरण – यदि स्कूल का वातावरण दूषित है तो बच्चे कक्षाओं में अधिक देर तक नहीं रुक पाते, पढ़ने में उनकी रुचि कम हो जाती है और वे स्कूल से बाहर इधर-उधर बैठकर आवारागर्दी करते रहते हैं। पढ़ाई से पिछड़ जाने के कारण भी बच्चे बाल अपराधी बन जाते हैं।

4. गन्दा व आपत्तिजनक साहित्य – गन्दा व आपत्तिजनक साहित्य भी बच्चों को बिगाड़ने में सहायक होता है। अश्लील व यौन-इच्छा भड़काने वाला साहित्य अथवा अपराध की कथाओं वाले साहित्य का बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वे बाल-अपराधी बन जाते हैं।

5. युद्ध – युद्ध के समय सामाजिक विघटन की परिस्थिति पैदा हो जाती है, जिसके कारण बाल-अपराधों की संख्या भी बढ़ जाती है। युद्धकाल में परिवर्तित परिस्थितियों व कठोर नियन्त्रण से अनेक बच्चे अपनी रुचियों व आदतों का समायोजन नहीं कर पाते जिसके कारण वे बाल-अपराधी बन जाते हैं।

6. नगरीकरण एवं औद्योगीकरण – नगरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण भी समाज में अनेक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। दोनों प्रक्रियाएँ अपराध और बाल-अपराध को प्रोत्साहन देती हैं। नगरों और औद्योगिक केन्द्रों में इसलिए बाल-अपराधियों की संख्या अधिक पायी जाती है।
बाल-अपराध के उपर्युक्त कारण अधिकतर नगरों में पाये जाते हैं। ग्रामीण वातावरण में ये कारण अधिक क्रियाशील नहीं होते हैं। इसलिए बाल-अपराधों की मात्रा ग्रामों की अपेक्षा नगरों में अधिक होती है। यह कथन भारत के लिए ही नहीं, अपितु अनेक अन्य देशों के लिए भी सही है।

प्रश्न 2
बाल-अपराध रोकने के आवश्यक उपाय बताइए। [2009]
या
अपराध व बाल-अपराध में अन्तर बताइए। [2007, 08, 09, 10, 12, 13, 14, 15, 16]
या
बाल-अपराधियों को सुधारने के लिए किये गये उपायों को आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। [2011]
या
भारत में बाल-अपराध निरोध के सन्दर्भ में बने सामाजिक विधानों का उल्लेख कीजिए।
या
भारत में बाल-अपराध के उपचार में हो रहे गैर-सरकारी प्रयत्नों पर प्रकाश डालिए।
या
भारत में बाल-अपराध को रोकने हेतु किये गये उपायों को स्पष्ट करें। [2011, 12]
उत्तर:
बालक राष्ट्र का भविष्य होते हैं। राष्ट्र की प्रगति और विकास की दिशा बच्चों पर ही निर्भर करती है। बच्चों को अपराध करने से रोककर राष्ट्र का भविष्य सुधारा जा सकता है। बालअपराध रूपी विषवृक्ष को तभी समूल नष्ट कर देना चाहिए जब यह अंकुरित हो। बाल-अपराध हमारी गम्भीर सामाजिक समस्या है, जिसका निश्चित समाधान खोजना नितान्त आवश्यक है। बालअपराध का उपचार करने के लिए ऐसे उपाये काम में लाने चाहिए जिससे बाल-अपराध पर प्रभावी रोक लग सके तथा बाल-अपराधी भविष्य में समाज की मुख्य धारा से जुड़कर उसके उपयोगी अंग बन सकें। बाल-अपराध का उपचार निम्नलिखित रूप में किया जाना चाहिए

(क) बाल-अपराध उपचार के सरकारी प्रयास
सरकार ने बाल-अपराध की रोकथाम के लिए अनेक पग उठाये हैं। इनमें से कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

1. बाल अधिनियम, 1960 – भारतीय संसद द्वारा पारित इस अधिनियम में उपेक्षित बालकों व बाल-अपराधियों की सुरक्षा, कल्याण, प्रशिक्षण, शिक्षा के पुनर्वास इत्यादि उपलब्ध कराने की सुविधाओं पर बल दिया गया है। इसमें बालकों की आयु लड़के के लिए 16 वर्ष तथा लड़की के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गयी है। बाल-न्यायालयों की स्थापना इसी अधिनियम के अन्तर्गत की गयी है। इस अधिनियम के अन्तर्गत निम्नलिखित सुधार संस्थाओं की स्थापना की गयी है

  1. आवास अवलोकन गृह – पूछताछ के दौरान बच्चों को इन केन्द्रों में रखा जाता है और इनमें शिक्षा इत्यादि की प्रमुख सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
  2. बालगृह – बालगृहों में उपेक्षित बच्चों को आवास, शिक्षा, चरित्र-निर्माण एवं नैतिक खतरे से सुरक्षा इत्यादि की प्रमुख सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
  3. विशिष्ट स्कूल – इनमें उद्दण्ड बालकों को सुधारने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाता है।
  4.  उत्तम-देखभाल संगठन – इन संगठनों का उद्देश्य बालगृहों या विशिष्ट स्कूलों से बाहर आने वाले बच्चों को सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने में सहायता प्रदान करना है।

2. किशोर न्यायालय – ये न्यायालय साधारण अदालतों से अलग हैं तथा इनकी स्थापना भी बाल अधिनियम, 1960 के अन्तर्गत ही की गयी है। इनमें न्यायाधीश प्रायः महिला होती हैं, जो बाल मनोविज्ञान एवं अन्य सामाजिक विज्ञानों के ज्ञान से परिचित होती हैं। पुलिस सादे कपड़ों में आती है। इन न्यायालयों का उद्देश्य अपराध के कारणों का पता लगाना तथा बालअपराधियों का सुधार करना है। अपराधी पाये जाने पर बच्चों को सुधारगृहों में भेज दिया जाता है।

3. प्रोबेशन – यह किशोर न्यायालय का ही महत्त्वपूर्ण अंग है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत अपराधी बालक को प्रोबेशन अधिकारी के संरक्षण में रखा जाता है। प्रोबेशन के समय तक प्रोबेशन अधिकारी उसकी देख-रेख करता है तथा उसके बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त करता है। यदि प्रोबेशन काल के मध्य उसका ठीक आचरण रहता है, तो न्यायालय की सलाह पर बच्चे को छोड़ दिया जाता है।

4. बोस्टेल स्कूल – यह बाल-अपराधियों के सुधार से सम्बन्धित प्रमुख संस्था है। इंग्लैण्ड में बोर्टल नामक स्थान पर ब्राइस नामक विद्वान् ने 1902 ई० में एक गैर-सरकारी जेलखाना खोला। भारत में सर्वप्रथम तमिलनाडु में 1962 ई० में बोर्टल स्कूल की स्थापना की गयी और बाद में बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व कर्नाटक में भी एक-एक बोटंल स्कूल खोला गया। उत्तर प्रदेश में बरेली में बाल-बन्दीगृह की स्थापना की गयी। 15 से 21 वर्ष के किशोर अपराधियों को इसमें व्यावसायिक व औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाता है तथा बाल-अपराधियों को सुधारने का प्रयास किया जाता है।

5. रिफॉर्मेट्री स्कूल – सन् 1987 में बड़े-बड़े राज्यों तथा केन्द्र-शासित प्रदेशों में इन सुधार स्कूलों की स्थापना की गयी, जिनमें बाल-अपराधियों की उचित देख-रेख की जाती है तथा औद्योगिक प्रशिक्षण देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया जाता है।

6. बाल-बन्दीगृह – इनकी स्थापना सुधारगृहों के सिद्धान्तों के अनुरूप की गयी है। इन्हें किशोर सदन भी कहा जाता है। सर्वप्रथम बाल-बन्दीगृहों की स्थापना बिहार, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में की गयी। उत्तर प्रदेश में 19 वर्ष से कम आयु के बाल-अपराधियों को इन बन्दीगृहों में रखा जाता है। सन्तोषजनक व्यवहार न करने पर उन्हें केन्द्रीय कारागार में भी भेजा जा सकता है।

7. बाल सलाह केन्द्र तथा बाल-क्लब – बाल सलाह केन्द्रों में मनोवैज्ञानिक रूप से बाल अपराध के कारण जानने का प्रयास किया जाता है। अनेक राज्यों में बाल-क्लबों की भी स्थापना की गयी है।

8. भारतीय किशोर न्याय अधिनियम, 1986 – सन् 1986 में पारित इस अधिनियम में बाल-न्यायालयों तथा किशोर कल्याण बोर्ड की स्थापना पर बल दिया गया है। 2 अक्टूबर, 1987 से यह अधिनियम पूरे देश में लागू है। उत्तर प्रदेश में इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रदेश सरकार ने 27 विशेष बाल-न्यायालयों को तोड़कर सभी मण्डल मुख्यालयों पर बालन्यायालयों का गठन किया है। साथ ही 52 जिलों में किशोर कल्याण बोर्डों की स्थापना की | गयी है।

(ख) बाल-अपराध उपचार के गैर-सरकारी सुझाव
गैर-सरकारी क्षेत्र में बाल-अपराध उपचार के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं

1. उचित पारिवारिक वातावरण – परिवार को टूटने से बचाने के लिए उपाय किये जाने चाहिए, जिससे बच्चों को परिवार में सही अनुशासन, स्नेह व सुरक्षा मिल सके। इसके लिए परिवार कल्याण केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए। माता-पिता को बच्चों की इच्छाओं को ध्यान रखना चाहिए और उनकी रुचि सत्संग की ओर लगानी चाहिए।

2. स्कूल – परिवार के बाद बच्चों के आचरण पर स्कूल का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए कि उनमें अनुशासन तथा नैतिक विकास की वृद्धि हो। उनके चतुर्मुखी विकास को सामने रखकर पाठ्यक्रमों में सुधार किया जाना चाहिए। विद्यालय का वातावरण ठीक होना चाहिए और शिक्षकों का शिष्यों के प्रति सन्तुलित व अच्छा व्यवहार होना चाहिए।

3. स्वस्थ मनोरंजन – बाल-अपराध को रोकने के लिए मनोरंजन के साधन बच्चों के लिए उपलब्ध करना आवश्यक है। गन्दी बस्तियों में इनका विशेष अभाव होता है; अतः इनमें सुधार करके सामुदायिक केन्द्र स्थापित किये जाने चाहिए। यदि खाली समय का सदुपयोग किया जाए तो बाल-अपराध की रोकथाम सम्भव है।

4. बाल पुलिस विभाग – सामान्य पुलिस विभाग बाल-अपराध में सहायक नहीं है। अत: किशोर न्यायालयों की सहायता के लिए बाल पुलिस विभाग का गठन किया जाना चाहिए, जो कि उन्हें सुधारने में सहायता दे सके।

5. अश्लील साहित्य पर रोक – अश्लील साहित्य पर कठोरता से प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए, जिससे इसका प्रकाशन व वितरण न हो सके। अपराधी घटनाओं का विवरण देने में भी सतर्कता रखी जानी चाहिए। अपराधियों व डाकुओं इत्यादि को हीरो के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। उनके कारनामे पढ़कर छात्र एवं बालक अपराध में लिप्त हो जाते हैं।

बाल-अपराध तथा अपराध में अन्तर
बाल-अपराध और अपराध के अन्तरों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

क्र०सं० बाल-अपराध अपराध
1. बाल-अपराधं कानून द्वारा निर्धारित 18 वर्ष से कम आयु में किया जाने वाला अपराध हैं। अपराध वयस्क व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला अपराध है। बाल-अपराधी की अपराध है। निर्धारित आयु से अधिक आयु वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कानून का उल्लंघन अपराध कहा जाता है।
2. बाल-अपराध में कुछ ऐसे व्यवहार भी सम्मिलित हैं जो वास्तव में अपराध की श्रेणी में नहीं आते; जैसे-स्कूल से भागना, घर से बिना बताये गायब हो जाना, निरुद्देश्य रात्रि को घूमते रहना इत्यादि। अपराध में केवल उन्हीं कार्यों को सम्मिलित किया जाता है, जो कि निश्चित रूप से गैर-कानूनी माने जाते हैं।
3. बाल-अपराध सामान्यतः कम गम्भीर होते है। अपराध कम गम्भीर से लेकर अत्यधिक गम्भीर हो सकते हैं।
4. बाल-अपराधी अधिकांशतः संवेगता के कारण अपराध करते हैं। अधिकतर अपराधी जान-बूझकर अपराध कारण अपराध करते हैं।
 5. बाल-अपराधी का अपराध करते समय अनिवार्य रूप से आर्थिक लक्ष्य नहीं होता है। अपराधी मुख्यत: आर्थिक लाभ के लिए या अन्य किसी लाभ के लिए अपराध करता है।
6. बाल-अपराधी बनने में मनोवैज्ञानिक व पारिवारिक कारणों को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। अपराधी अधिकतर अपनी इच्छा से अपराधी बनते हैं।
7. बाल-अपराध के लिए विशिष्ट न्यायालयों की स्थापना होती है। न्यायालयों अपराधी के मामले सामान्य न्यायालय ही सुनते हैं।
8. बाल-अपराधी को कठोर दण्ड से बचाने का प्रयास किया जाता है। अपराधी को दण्ड दिलवाने में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाती है।
9. बाल-अपराधी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण तत्त्व बाल-अपराध का अनुपयोगी होना है, क्योंकि बाल-अपराधी किसी आवश्यकता के लिए अपराध नहीं करता, वरन् अधिकांशतः बिना किसी उपयोगी दृष्टिकोण के ही अपराध करता है। अपराधी संस्कृति में इस प्रकार के तत्त्वों का अभाव होता है।
10. बाल-अपराध में सामान्यतः योजना व संगठित संगठन का अभाव पाया जाता है। अधिकतर अपराध योजनाबद्ध व होते हैं। अपराध गिरोह बनाकर किये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
“बाल-अपराध मुख्य रूप से एक नगरीय समस्या है। इसकी विवेचना कीजिए।
उत्तर:
बाल-अपराध : एक नगरीय समस्या–बाल-अपराध सम्बन्धी उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि गाँवों की तुलना में बाल-अपराध नगरों में अधिक होते हैं। नगरीय क्षेत्रों में भी बड़े-बड़े शहरों; जैसे-दिल्ली, चेन्नई, मुम्बई, कोलकाता, चण्डीगढ़, कानपुर आदि; में बाल-अपराध अधिक होते हैं।

नगरों में बाल-अपराध होने के अनेक कारण हैं; जैसे-वहाँ जब माता-पिता दोनों ही काम पर चले जाते हैं तो घर में बच्चों पर नियन्त्रण रखने वाला कोई नहीं होता, अतः वे आवारागर्दी करने लगते हैं। नगरों में वेश्यावृत्ति में सहायता पहुँचाने, भीख माँगने आदि का कार्य भी बच्चों से कराया जाता है। यह कार्य संगठित लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर कराया जाता है, जो नगरीय क्षेत्रों में ही केन्द्रित है। नगरों की भीड़-भाड़युक्त वातावरण, गन्दी बस्तियाँ, अश्लील एवं अपराधी चलचित्र, अति सम्पन्नता के प्रति आक्रोश, बेकारी, नितान्त गरीबी आदि बाल-अपराध को प्रोत्साहित करते हैं।

बाल-अपराधी स्वयं भी यौन सम्बन्धी अपराधों में लिप्त पाये गये हैं, जिनमें लड़कियों की संख्या अधिक है। 86.2 प्रतिशत लड़कियों ने यौन-अपराध किये हैं। यौन-अपराध के लिए नगर ही सुगम तथा सुलभ अवसर प्रदान करते हैं, जहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है तथा सम्पन्नता भी अधिक होती है।

बाल-अपराधों में धार्मिक प्रकृति के अपराध; जैसे-चोरी, सेंधमारी, जेब कतरना आदि होते हैं। इन अपराधों के लिए ग्रामीण इलाकों में अवसर प्राप्त नहीं होते हैं जब कि नगरों की भीड़-भाड़, व्यस्त जीवन तथा पड़ोसियों की एक-दूसरे के प्रति उदासीनता आदि इन अपराधों के लिए खुले अवसर प्रदान करते हैं।

बाल-अपराधी स्वयं अपराध कम करते हैं। वे किसी संगठित अपराधी गिरोह के साथ मिलकर ही अपराध करते हैं। ये गिरोह उन्हें प्रशिक्षण देते हैं एवं संरक्षण प्रदान करते हैं। नगरीय क्षेत्र इन गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान है।
निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि बाल-अपराध मुख्य रूप से एक नगरीय समस्या है।

प्रश्न 2
भारत में किशोर अपराध की समस्या पर एक लेख लिखिए। [2009, 12]
उत्तर:
भारत में किशोर अपराध (Juvenile Delinquency in India) – भारत में बालअपराध की समस्या गम्भीर है। बढ़ती हुई जनसंख्या, नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के कारण बाल-अपराध निरन्तर बढ़ रहे हैं। वर्ष 1988 के सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 24,827 स्थानीय व 25,468 विशेष नियमों के उल्लंघन के दोषी बाल-अपराधी थे। भारत में बाल-अपराध कुल अपराधों को 2% है। भारत में बाल-अपराध की समस्या गाँवों की अपेक्षा नगरों में अधिक है। युवतियों की अपेक्षा युवक बाल-अपराधी अधिक हैं। निम्न जातियों के बच्चों में बाल-अपराध की दर अधिक पायी जाती है।

भारत के महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में बाल-अपराध की समस्या विकट बनी हुई है। इन राज्यों में भारत के कुल 68% बाल-अपराधी पाये जाते हैं। भारत में बाल-अपराधी व्यक्तिगत स्तर पर कानूनों का उल्लंघन कम करते हैं, इस कार्य में उन्हें पूरे समूह अथवा परिवार का सहयोग मिलता है। भारत में बाल-अपराधी सम्पत्ति के विरुद्ध अपराधों में संलिप्त पाये गये हैं। भारत में 50% बाल-अपराधी अनुसूचित जातियों या जनजातियों के होते हैं, क्योंकि इन जातियों में 1951 ई० में बाल अधिनियम पारित किया गया, जिसे 1956 ई० में लागू किया गया। बाद में देश के अन्य राज्यों में भी इसे लागू किया गया। भारत में बाल-अपराध की रोकथाम के लिए किशोर जेल, सुधारवादी सेवाएँ, अवलोकन-गृह, परिवीक्षा-गृह तथा एप्रूव्ड स्कूल आदि व्यवस्थाएँ लागू की गयी हैं।।

प्रश्न 3
‘पक्षपात’ और ‘दोषपूर्ण अनुशासन बाल-अपराध के दो मुख्य पारिवारिक कारण हैं। समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
पक्षपात-परिवार में पक्षपातपूर्ण व्यवहार होने पर भी बच्चों में निराशा और घृणा की भावना जन्म लेती है। यदि परिवार में किसी बच्चे को विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं और अन्य बच्चों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है तो ईर्ष्या एवं द्वेष का वातावरण बनता है। अधिक मार और डॉट खाने वाला बच्चा परिवार के वयोवृद्ध लोगों का सम्मान करना बन्द कर देता है और उन लोगों की इच्छा के विपरीत कार्य करने लगता है। इस प्रकार भेदभावपूर्ण व्यवहार बच्चे में अपराधी मनोवृत्ति को जन्म देता है।

दोषपूर्ण अनुशासन-परिवार में बच्चों पर अधिक नियन्त्रण होने पर वे कठोरता से बचने के लिए भागना चाहते हैं और ज्यों ही उन्हें अवसर मिलता है वे उन कार्यों को करने लगते हैं, जिनके लिए उन्हें मना किया जाता है। कठोर नियन्त्रण से व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास भी रुक जाता है। वह अपनी दबी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी अपराध करता है। इसके विपरीत, बच्चों को अत्यधिक ढील देने एवं अंकुश न रखने पर भी उनमें स्वच्छन्दता की प्रवृत्ति पैदा होती है।

प्रश्न 4
बाल-अपराध निर्धारण करने में आयु की महत्ता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बाल-अपराध का निर्धारण करने में आयु भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। भिन्न-भिन्न देशों में बाल-अपराधियों के लिए अलग-अलग आयु निर्धारित की गयी है। अधिकांश देशों में तथा भारत में भी भारतीय दण्ड संहिता’ (Indian Penal Code) के अनुसार 7 वर्ष से कम की आयु के बालक द्वारा किया गया कानून व समाज-विरोधी कार्य अपराध नहीं माना जाता है, क्योंकि इस समय तक बालक में अच्छे-बुरे के भेद की समझ नहीं होती है। भारत में 1960 व 1986 ई० में बाल-अधिनियम बने। इन अधिनियमों में 16 वर्ष से कम की आयु के लड़के एवं 18 वर्ष से कम की आयु की लड़की को बालक माना गया है। इस आधार पर भारत में 7 वर्ष से अधिक एवं 16 वर्ष से कम उम्र के लड़के एवं 7 वर्ष से अधिक एवं 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की द्वारा किये गये कानून-विरोधी कार्य बाल-अपराध की श्रेणी में आते हैं। इसके बाद 21 वर्ष की आयु तक के अपराधियों को ‘किशोर अपराधी’ एवं इससे अधिक आयु के अपराधियों को अपराधी’ कहा जाता है।

प्रश्न 5
बाल-न्यायालय पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बाल-न्यायालयों में बाल-अपराधियों की सुनवाई अनौपचारिक विधि से की जाती है। इनमें उनके प्रति बदले की भावना नहीं पायी जाती है। इनके द्वारा बच्चे को संरक्षण एवं पुनर्वास की सुविधा प्रदान की जाती है। बाल-न्यायालय में प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट, एक या दो ऑनरेरी लेडी मजिस्ट्रेट, अपराधी बालक, उसके माता-पिता एवं संरक्षक, प्रोबेशन अधिकारी, साधारण पोशाक में पुलिस, कोर्ट का क्लर्क और कभी-कभी वकील उपस्थित रहते हैं। इनकी बैठक रिमाण्ड होम में साधारण तरीके से टेबल-कुर्सी लगाकर की जाती है, जिससे बच्चे को यह महसूस न हो कि वह अपराधी है।

सुनवाई करने वालों और बच्चों के बीच अनौपचारिक बातचीत होती है। बाल-न्यायालय का सारा वातावरण इस प्रकार का होता है कि बच्चे के मस्तिष्क से कोर्ट का आतंक और भय दूर हो जाए। इनन्यायालयों की कार्यवाही को अखबार में नहीं छापा जा सकता तथा साथ ही गोपनीयता भी बरती जाती है। सुनवाई के बाद अपराधी बालकों को चेतावनी देकर, जुर्माना करके या मातापिता से बॉण्ड भरवाकर उन्हें सौंप दिया जाता है, अथवा उन्हें परिवीक्षा पर छोड़ दिया जाता है या किसी सुधार संस्था, मान्यताप्राप्त विद्यालय, परिवीक्षा हॉस्टल आदि में रख दिया जाता है। भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा दिल्ली :आदि राज्यों में बाल-न्यायालय हैं।

प्रश्न 6
बोस्टेल स्कूल पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बोर्टल स्कूल एक ऐसी संस्था है जहाँ किशोर अपराधी को, जिसकी आयु 16 से 21 वर्ष हो, रखा जाता है। उन्हें यहाँ प्रशिक्षण एवं निर्देशन दिये जाते हैं तथा अनुशासन में रखकर उनका सुधार किया जाता है। इस संस्था में उन्हीं अपराधियों को प्रवेश दिया जाता है जिनकी सिफारिश अदालत यो जेल महानिरीक्षक करता है। यहाँ अपराधी को मुक्त वातावरण में रखा जाता है। उसमें शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं चारित्रिक क्षमताओं के साथ-साथ उत्तरदायित्व एवं आत्म-नियन्त्रण की भावना का विकास किया जाता है। उसके लिए जिमनास्टिक, उद्योग-धन्धों के प्रशिक्षण एवं शिक्षा का प्रबन्ध किया जाता है। उसे पत्र लिखने, रिश्तेदारों से मिलने, मनपसन्द प्रशिक्षण पाने, बिना निगरानी के बाहर घूमने, वर्कशॉप व मनोरंजन कक्ष तथा भोजनशाला में काम करने, खेल-कूद प्रतियोगिता में भाग लेने आदि की भी छूट होती है।

प्रश्न 7
‘रिफॉर्मेट्री स्कूल पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
रिफॉर्मेट्री स्कूलों में 16 वर्ष से कम आयु के ऐसे बच्चों को रखा जाता है, जो पहले सजा काट चुके हैं या जिन्होंने गम्भीर अपराध नहीं किये हैं। इस प्रकार के विद्यालयों का उद्देश्य अपराधी बालक का सुधार और पुनर्वास करना है। इन स्कूलों में अपराधियों को शिक्षा एवं साथ ही विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जाता है। उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं को बाजार में बेचकर लाभ को उनके कोष में जमा किया जाता है। इन विद्यालयों में रेडक्रॉस, स्काउटिंग, कृषि, चमड़े का काम, खिलौना, दरी, निवाड़, रस्सी बनाने, बढ़ईगीरी, सिलाई आदि का काम सिखाया जाता है। जिनका काम अच्छा होता है उन्हें वर्ष में 15 दिन तक घर जाने की छुट्टी भी दी जाती है। जबलपुर, हजारीबाग, लखनऊ, बरेली आदि में इस प्रकार के विद्यालय हैं। उत्तर प्रदेश बाल-अधिनियम, 1951 ई० के अधीन उत्तर प्रदेश में कुछ जिलों में एक-एक सुधार अधिकारी को नियुक्त किया गया है, जो बाल-अपराधियों की गोपनीय रिपोर्ट तैयार कर उन्हें सुधारने का प्रयत्न करते हैं।

प्रश्न 8
बाल-अपराध के चार कारण लिखिए। [2010, 13, 15, 16]
या
बाल-अपराध के दो कारण लिखिए। [2007, 17]
उत्तर:
बाल-अपराध के चार कारण निम्नलिखित हैं

1. पारिवारिक कारण – जब परिवार बच्चे को सामाजिक व मानसिक सुरक्षा प्रदान करने में असफल हो जाता है और बच्चा स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगता है, तो वह बाल अपराधी बन जाता है।

2. मनोवैज्ञानिक कारण – यदि बच्चे का विकास मानसिक रूप से दोषपूर्ण हुआ है तो वह स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है और हीन भावना से ग्रसित होकर बाल-अपराधी बन जाता है।

3. अत्यधिक निर्धनता – अत्यधिक निर्धनता के कारण बच्चे को समुचित शिक्षा और मनोरंजन की सुविधाएँ प्राप्त नहीं हो पातीं। सम्पन्न परिवार के बच्चों को देखकर उसमें हीनता; ग्लानि, ईर्ष्या और उद्दण्डता की भावनाएँ साथ-साथ विकसित होने लगती हैं और जब ये भावनाएँ अत्यधिक बलवती हो जाती हैं, तो वह बाल-अपराधी बन जाता है।

4. उद्देश्यहीन शिक्षा व दोषपूर्ण सीख – उद्देश्यहीन शिक्षा के कारण बच्चे अपने आरम्भिक जीवन से ही सुस्त, अनुशासनहीन और उद्दण्ड बनने लगते हैं। शिक्षकों का दुर्व्यवहार उनमें अपराधी मनोवृत्तियाँ उत्पन्न करने लगता है। बच्चे को परिवार या स्कूल में मिलने वाली : दोषपूर्ण सीख के कारण भी उसमें छोटी-छोटी चोरी करने, साथियों को धोखा देने और अकारण मार-पीट करने की आदत पड़ने लगती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
टूटे परिवार बाल-अपराध के लिए कैसे उत्तरदायी होते हैं ?
उत्तर:
परिवार दो प्रकार से टूट सकते हैं
(1) भौतिक रूप से तथा (2) मानसिक रूप से। भौतिक रूप से परिवार के टूटने का अर्थ है – परिवार के सदस्य की मृत्यु हो जाना, लम्बे समय तक अस्पताल, जेल, सेना आदि में रहने अथवा तलाक और पृथक्करण के कारण सदस्यों का परिवार के साथ न रहना। मानसिक रूप से परिवार के टूटने का अर्थ है – सदस्य एक साथ तो रहते हैं, किन्तु उनमें मनमुटाव, मानसिक संघर्ष एवं तनाव पाया जाता है। इन दोनों ही स्थितियों में बच्चों पर परिवार का नियन्त्रण शिथिल हो जाने एवं बच्चों को माता-पिता का प्यार व स्नेह न मिलने के कारण वे अपराध करने लगते हैं।

प्रश्न 2
बाल-अपराधी की ‘मानसिक अयोग्यता उसके अपराधीकरण के लिए कैसे उत्तरदायी
उत्तर:
ऐसा माना जाता है कि बाल-अपराधी मानसिक रूप से पिछड़े होते हैं। डॉ० गोडार्ड ने बताया है कि कमजोर मस्तिष्क अपराध के लिए उत्तरदायी है। हीली और बूनर ने शिकागो के अध्ययन में 63% बाल-अपराधियों को ही स्वस्थ मस्तिष्क का पाया, शेष 37% मानसिक कमजोरी एवं बीमारी आदि से ग्रसित थे। कुमारी इलियट के अध्ययन में 41.5% लड़कियाँ मानसिक रूप से पिछड़ी हुई थीं। कमजोर बुद्धि के बालक अच्छे-बुरे में भेद नहीं कर पाते और वे कुसंगति के कारण अपराध कर बैठते हैं।

प्रश्न 3
क्या ‘बुरे संगी-साथी बाल-अपराध का एक कारण हैं ?
उत्तर:
एक बच्चे को अपराधी बनाने में उसके साथियों का भी पर्याप्त हाथ होता है। एक बच्चा अपराध करने के बाद अपनी साहस भरी कहानी दूसरे बच्चों को सुनाता है तो उनके लिए भी यह प्रेरणा एवं उत्तेजना की बात होती है। अपराधी साथियों के सम्पर्क से ही एक बच्चा धूम्रपान, शराबवृत्ति, चोरी, जुआ आदि सीखता है।

प्रश्न 4
बाल-अपराध को बढ़ाने में गरीबी की क्या भूमिका है ?
उत्तर:
कई अध्ययन इस बात को प्रकट करते हैं कि गरीबी ने बच्चों को अपराधी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। जोन्स के शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि ज्यों-ज्यों आर्थिक स्तर निम्न होगा, त्यों-त्यों बाल-अपराध की दर ऊँची होगी।” गरीबी में परिवार अपनी मूलभूत आवश्यकताएँ, चिकित्सा एवं मनोरंजन की सुविधाएँ नहीं जुटा पाता। ऐसी स्थिति में माता एवं पिता दोनों ही नौकरी करने लगते हैं। माता-पिता के घर से बाहर रहने की अवधि में बच्चे आवारागर्दी करते हैं। न्यूमेयर लिखते हैं, “जब पिता रात में काम करता है और माता दिन में अथवा दोनों रात या दिन में काम करते हैं तो बच्चे प्रायः गलियों में ही आवारागर्दी करते हुए मिलते हैं। बच्चों की आवश्यकताएँ जब परिवार में पूरी नहीं होती हैं तो वे बाहर चोरी करते हैं।

प्रश्न 5
बाल-अपराध के चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
एक निश्चित आयु से कम के बच्चों द्वारा किये जाने वाले कोई भी वे कार्य बालअपराध के अन्तर्गत आते हैं, जो समाज विरोधी होते हैं अथवा जिनसे समूह-कल्याण को हानि पहुँचती है। बाल-अपराध के चार उदाहरण हैं

  1. जेब काटना
  2.  किसी पर साधारण आघात करना,
  3. जुआ खेलना तथा
  4.  चोरी करना।।

प्रश्न 6
भारत में बाल-अपराध के निर्धारण से सम्बन्धित कोई दो मौलिक आधार बताइए।
उत्तर:
भारत में बाल-अपराध के निर्धारण से सम्बन्धित दो मौलिक आधार निम्नवत् हैं

  1. भारत में 7 से 16 वर्ष की आयु तक के अपराधियों को बाल-अपराधी कहा जाता है। इन अपराधियों के लिए एक पृथक् न्याय प्रक्रिया अपनायी जाती है।
  2. बाल-अपराध का तात्पर्य केवल साधारण अपराधी से होता है। यदि 7 वर्ष से 16 वर्ष की आयु तक का कोई बच्चा हत्या, राजद्रोह अथवा अत्यधिक जघन्य अपराध का दोषी हो, तो इस अपराध को बाल-अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता।

प्रश्न 7
रिमाण्ड होम पर लघु टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अपराध करने के पश्चात् जब पुलिस बच्चे को पकड़ लेती है, तो सर्वप्रथम उसे रिमाण्ड होम में रखा जाता है। जेल में रखने से उसका सम्पर्क युवा-अपराधियों से होने पर उसके गम्भीर अपराधी बन जाने की सम्भावना रहती है। जब तक बच्चे की अदालती कार्यवाही चलती है, उसे रिमाण्ड होम में ही रखा जाता है। अनाथ और निराश्रित बच्चे एवं बन्दीगृहों से पृथक् किये गये। अपराधियों को भी ऐसे गृहों में रखा जाता है। यहाँ बच्चों को मनोरंजन, शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। इस समय देश में 160 रिमाण्ड होम कार्य कर रहे हैं।

प्रश्न 8
परिवीक्षा हॉस्टल पर लघु टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
न्यायालय जब किसी बाल-अपराधी को परिवीक्षा पर छोड़ता है और यदि उस बालअपराधी के माता-पिता या संरक्षक नहीं होते हैं तो उसे परिवीक्षा हॉस्टल में रखा जाता है। ऐसे हॉस्टल में रहने वाले व्यक्ति को दिन में नौकरी करने एवं घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता होती है, किन्तु रात्रि को ठीक समय पर वहाँ वापस पहुँचना अनिवार्य होता है। हॉस्टल वार्डन इन लोगों की गतिविधियों की देख-रेख करता है।

प्रश्न 9
बाल-अपराध रोकने के लिए उचित व स्वस्थ पारिवारिक वातावरण की भूमिका बताइए।
उत्तर:
परिवार ही शिशु की प्रथम पाठशाला और लालन-पालन करने वाली नर्सरी होता है और वही उसके समाजीकरण का केन्द्र भी; अत: यह आवश्यक है कि परिवार व्यवस्थित एवं संगठित हो, उनका वातावरण स्वस्थ हो, माता-पिता एवं परिवारजनों को बच्चे के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार हो, ये बच्चे पर उचित नियन्त्रण रखें और उनका समुचित निर्देशन करें। ऐसी स्थिति में ही बच्चे का चरित्र-निर्माण होगा और वह अपराधी कार्यों से दूर रहेगा।

जिवित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
बाल-अपराध के दो प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं ? [2011, 17]
उत्तर:
बाल अपराध के दो प्रमुख कारक परिवार एवं समुदाय हैं।

प्रश्न 2
बाल-अपराध की दो विशेषताएँ लिखिए। [2013]
उत्तर:
बाल अपराध दो विशेषताएँ निम्न हैं|

  1. राज्य द्वारा निश्चित आयु से कम आयु का व्यक्ति।
  2.  अनैतिक एवं अशोभनीय व्यवहार।

प्रश्न 3
भारत में किस आयु-सीमा में बालकों को बाल-अपराधियों की श्रेणी में रखा जाता है?
उत्तर:
भारत में 7 से अधिक एवं 16 वर्ष से कम आयु के लड़कों तथा 7 से अधिक एवं 18 वर्ष से कम आयु की लड़कियों को बाल-अपराधियों की श्रेणी में रखा जाता है।

प्रश्न 4
बाल-न्यायालयों की कार्यवाही कैसे गोपनीय रखी जाती है ?
उत्तर:
बाल-न्यायालयों की कार्यवाही को अखबार में नहीं छापा जा सकता तथा साथ ही गोपनीयता बरती जाती है।

प्रश्न 5
16 वर्ष से अधिक, परन्तु 21 वर्ष से कम आयु के अपराधी को क्या कहते हैं ?
या
किशोर अपराधी की अधिकतम आयु क्या है ?
उत्तर:
16 वर्ष से अधिक, परन्तु 21 वर्ष से कम आयु के अपराधी को किशोर अपराधी कहते है।

प्रश्न 6
अपराध करने के पश्चात् पुलिस बच्चे को पकड़कर सर्वप्रथम कहाँ रखती है ?
उत्तर:
अपराध करने के पश्चात् पुलिस बच्चे को पकड़कर सर्वप्रथम रिमाण्ड होम में रखती है।

प्रश्न 7
बोस्टेल स्कूल में किस आयु-सीमा के किशोर अपराधी को रखा जाता है ?
उत्तर:
बोल स्कूल में 16 से 21 वर्ष की आयु सीमा के किशोर अपराधियों को रखा जाता है।

प्रश्न 8
रिफॉर्मेट्री स्कूल में किन बच्चों को रखा जाता है ?
उत्तर:
इन स्कूलों में 16 वर्ष से कम आयु के ऐसे बच्चों को रखा जाता है, जो पहले सजा काट चुके हैं या जिन्होंने गम्भीर अपराध नहीं किये हैं।

प्रश्न 9
पोषण-गृह तथा सहायक-गृह में किन बच्चों को रखा जाता है ?
उत्तर:
पोषण-गृह तथा सहायक-गृह में 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रखा जाता है, जिनके माता-पिता में विवाह-विच्छेद हो गया हो या जिनकी मृत्यु हो गयी हो।

प्रश्न 10
नगरों की अपेक्षा बाल-अपराध की भीषण समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में क्यों कम है ?
उत्तर:
भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को अपनी परम्पराओं से घनिष्ठ लगाव है। इसी कारण वहाँ बाल-अपराध की समस्या भीषण नहीं है, किन्तु नगरों में संयुक्त परिवार में विघटन तथा औद्योगीकरण के कारण बाल-अपराध ने भीषण रूप धारण कर लिया है।

प्रश्न 11
बाल-अपराध रोकने के लिए मनोवैज्ञानिक क्लीनिक खोलने का सुझाव किसने दिया?
उत्तर:
बाल-अपराध रोकने के लिए मनोवैज्ञानिक क्लीनिक खोलने का सुझाव सिरिल बर्ट ने दिया।

प्रश्न 12
उत्तम-संरक्षण संस्था में किन बच्चों को रखा जाता है ?
उत्तर:
जब बच्चा किसी सुधार संस्था में छः मास तक रहता है और उस अवधि में उसका व्यवहार अच्छा होता है तो ऐसे बच्चों को जेल निरीक्षक उत्तम-संरक्षण संस्था में भेज सकता है।

प्रश्न 13
बाल-अपराधी को दण्ड देने की बजाय सुधारालय क्यों भेजा जाता है ?
उत्तर:
बाल-अपराधी का सुधार सरल एवं सम्भव है, क्योंकि बच्चे के अपरिपक्व मस्तिष्क को किसी भी दिशा में मोड़ना आसान है, जब कि अपराधी में सुधार की सम्भावना कम होती है।

प्रश्न 14
रिफॉर्मेट्री स्कूल अधिनियम कब पारित किया गया ? [2007]
उत्तर:
रिफॉर्मेट्री स्कूल अधिनियम 1897 ई० में पारित किया गया।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निम्नलिखित में से आप किसे बाल-अपराध कहेंगे ?
(क) घर में भाई-बहन को मारना
(ख) माता-पिता की आज्ञा न मानना
(ग) हॉस्टल में साथियों का सामान चुराना
(घ) अपराधियों की संगत में न रहना

प्रश्न 2
बाल-अपराध के लिए कौन-सी परिस्थिति मुख्य रूप से उत्तरदायी है ?
(क) पारिवारिक
(ख) राजनीतिक
(ग) आर्थिक
(घ) व्यक्तिगत

प्रश्न 3
एक पाँच वर्षीय बालक ने अपने चचेरे भाई के पेट में चाकू घोंप दिया है। बालक की यह क्रिया कहलाएगी।
(क) अपराध
(ख) बाल-अपराध
(ग) श्वेतवसन अपराध
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4
किसी बालक के विद्यालय से भागने की क्रिया को कहा जाता है [2011]
(क) बाल-अपराध
(ख) अनुपस्थिति
(ग) भगेड़पन
(घ) आवारागर्दी

प्रश्न 5
इस (अपने) राज्य में पुरुष बाल-अपराधी की अधिकतम मानक आयु है।
(क) 11 वर्ष
(ख) 16 वर्ष
(ग) 18 वर्ष
(घ) 21 वर्ष

प्रश्न 6
बाल-अपराध से सम्बन्धित नहीं है। [2007, 08, 09]
(क) बोर्टल स्कूल
(ख) सुधार-गृह
(ग) कारागार
(घ) प्रमाणित स्कूल

प्रश्न 7
बाल-अपराधियों के लिए कौन-सा उपयुक्त है ?
(क) किशोर न्यायालय
(ख) प्राणदण्ड
(ग) प्रोबेशन व्यवस्था
(घ) प्राचीरविहीन कारागार

प्रश्न 8
निम्नलिखित में से कौन-सा उपचार बाल-अपराधियों के लिए है ?
(क) तरुण शक्ति सेना
(ख) सुधार विद्यालय
(ग) हरिजन सेवा संघ
(घ) प्राचीरविहीन जेल

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से कौन-सा बाल-अपराधियों के लिए नहीं है ?
(क) किशोर सदन, बरेली
(ख) सेवासदन, नासिक
(ग) प्राचीरविहीन जेल
(घ) सुधार विद्यालय

प्रश्न 10
बच्चे अथवा किशोरों के द्वारा किये अपराध के लिए न्यायिक कार्यवाही किस न्यायालय द्वारा की जाती है ?
(क) जिला न्यायालय द्वारा
(ख) किशोर सदन द्वारा
(ग) सुधार-गृह द्वारा
(घ) किशोर न्यायालय द्वारा

प्रश्न 11
बाल-अपराधियों को प्रशिक्षित करके सुधारने का कार्य कहाँ होता है ?
(क) पोषण-गृह में
(ख) सुधार-गृह में
(ग) किशोर सदन में
(घ) रिमाण्ड होम में

प्रश्न 12
भारत में प्रथम बाल न्यायालय की स्थापना हुई [2016]
(क) 1952 में
(ख) 1922 में
(ग) 1953 में
(घ) 1931 में

प्रश्न 13
बाल-अपराध सुधार हेतु कौन-सी संस्था उपयुक्त है? [2016]
(क) आदर्श बन्दी गृह
(ख) प्रतिप्रेषण गृह
(ग) प्राचीन विहीन कारागार
(घ) उद्धार गृह

उत्तर:
1. (ग) हॉस्टल में साथियों का सामान चुराना, 2. (क) पारिवारिक, 3. (घ) इनमें से कोई नहीं, 4. (क) बाल-अपराध, 5. (ख) 16 वर्ष, 6. (ग) कारागार, 7. (क) किशोर न्यायालय, 8. (ख) सुधार विद्यालय, 9. (ग) प्राचीरविहीन जेल, 10. (घ) किशोर न्यायालय द्वारा, 11. (ग) किशोर सदन में, 12. (ख) 1922 में, 13. (घ) उद्धार गृह

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 4
Chapter Name Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा)
Number of Questions Solved 40
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के आरम्भ एवं विकास का सविस्तार वर्णन कीजिए।
या
भारतीय शिक्षा के लिए वुड-डिस्पैच की सिफारिशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ब्रिटिशकालीन शिक्षा का आरम्भ व विकास भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ ब्रिटिश शासन काल में हुआ था। ईसाई मिशनरियों ने देश में आधुनिक शिक्षा की नींव डाली। उन्होंने शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार और प्रसार रखा था, लेकिन ब्रिटिश काल में मैकाले के घोषणा-पत्र के बाद शिक्षा का व्यवस्थित रूप से विकास किया गया। ब्रिटिशकालीन शिक्षा 1947 ई० तक कायम रही। इसे स्वतन्त्रता से पूर्व शिक्षा का काल भी कहे। सकते हैं।
ब्रिटिशकालीन या आधुनिक भारतीय शिक्षा के विकास को निम्नलिखित शीर्षकों में रखा जा सकता
1. ईसाई मिशनरियों द्वारा शिक्षा का प्रसार-भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ ईसाई मिशनरियों द्वारा किया गया। वे समझते थे कि शिक्षा द्वारा लोग ईसाई धर्म को स्वीकार कर लेंगे। इसीलिए वे भारत में शिक्षा प्रचार के कार्य में लग गए। इस क्षेत्र में पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी, डेन एवं अंग्रेज धर्म-प्रचारकों ने प्रमुख कार्य किया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस कार्य में अत्यधिक योगदान दिया। वे भारत में ईसाई प्रचारकों को कम्पनी के कर्मचारियों में धार्मिक भावना बनाए रखने तथा भारतीय लोगों को ईसाई बनाने के लिए भेजते थे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए देश में अनेक स्थानों पर मिशनरी स्कूलों की स्थापना की गई।

2. भारतीय समाज-सुधारकों द्वारा शिक्षा का प्रसार-ईसाई मिशनरियों के साथ-साथ राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राधाकान्त देव आदि समाज-सुधारकों ने शिक्षा के प्रचार और प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इस कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने जनता का सहयोग प्राप्त करके अनेक विद्यालयों की स्थापना की।

3. सन् 1798 का आज्ञा-पत्र-इस आज्ञा–पत्र के अनुसार कम्पनी ने अपने कर्मचारियों तथा सैनिकों को निःशुल्क शिक्षा देने के लिए अनेक विद्यालयों की स्थापना की। कम्पनी ने बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) और बंगाल में अठारहवीं शताब्दी में बहुत-से विद्यालयों की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की देखा-देखी हिन्दू तथा मुसलमानों ने भी अपने विद्यालय खोलने आरम्भ कर दिए।

4. सन 1813 का आज्ञा-पत्र-इस आज्ञा-पत्र ने भारतीय शिक्षा को ठोस और व्यवस्थित रूप प्रदान किया। ब्रिटिश संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि कम्पनी की सरकार भारतवासियों की शिक्षा में रुचि ले और इस कार्य के लिए धन व्यय करे। कम्पनी के संचालकों ने इस प्रस्ताव का बहुत विरोध किया, लेकिन ब्रिटिश संसद ने एक आज्ञा-पत्र पास कर दिया, जिसे सन् 1813 का आज्ञा-पत्र कहा जाता है। इसमें निम्नलिखित बातें थीं—

  • ईसाई पादरियों को भारत में धर्म-प्रचार के लिए छूट दे दी गई।
  • शिक्षा को कम्पनी का उत्तरदायित्व माना गया।
  • भारत में शिक्षा के प्रचार के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपए की धनराशि व्यय करने की अनुमति दे दी गई।

5. सन् 1814 का कम्पनी का आदेश-कम्पनी ने अपने प्रथम आदेश में शिक्षा की उन्नति, देशी , शिक्षा तथा प्राच्य भाषाओं की उन्नति, भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहन व विज्ञान के प्रचार आदि पर ब्र दिया, परन्तु इस आदेश से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।

6. लॉर्ड मैकाले का विवरण-पन्न-सन् 1835 में लॉर्ड मैकाले ने एक विवरण-पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें शिक्षा सम्बन्धी निम्नलिखित सुझाव सम्मिलित थे

  • अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए। ब्रिटिशकालीन शिक्षा का आरम्भ
  • अंग्रेजी पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही विद्वान् माना जाए और साहित्य का अर्थ केवल अंग्रेजी साहित्य होना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को रुझान फारसी और अरबी की अपेक्षा अंग्रेजी पर अधिक हो।
  • अनेक भारतीय भी अंग्रेजी भाषा को ही ज्ञान का भण्डार शिक्षा का प्रसार मान चुके हैं।

7. छनाई का सिद्धान्त-मैकाले के विवरण-पत्र ने शिक्षा के क्षेत्र में एक विवाद खड़ा कर दिया। इसी सन्दर्भ में छनाई का सन् 1814 का कम्पनी का सिद्धान्त सामने आया। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि शिक्षा समाज में आदेश उच्च वर्ग को प्रदान की जाएगी तो वह उच्च वर्ग से निम्न वर्ग में स्वत: चली जाएगी। दूसरे शब्दों में, सरकार का कर्तव्य है कि वह केवल उच्च वर्ग के लिए शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करे, निम्न । वर्ग तो उसके सम्पर्क में आकर स्वयं शिक्षित हो जाएगा। आर्थर मैथ्यू के शब्दों में, “सर्वसाधारण में शिक्षा ऊपर से भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर छन-छन कर पहुँचती थी। बूंद-बूंद करके भारतीय जीवन के हिमालय से लाभदायक शिक्षा नीचे बहे, जिससे वह कुछ समय में चौड़ी और विशाल धारी में परिवर्तित होकर शुष्क मैदानों का सिंचन प्रचार करे।” इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक पाश्चात्यवादी थे।

ईसाई मिशनरियों ने भी इस सिद्धान्त का समर्थन किया। लॉर्ड मैकाले ने भी इस सिद्धान्त का प्रबल समर्थन करते हुए कहा, “हमें इस समय एक ऐसे वर्ग का निर्माण करने की चेष्टा करनी चाहिए जो हमारे और उन लाखों व्यक्तियों के मध्य जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिए का कार्य करे।” इस सिद्धान्त को स्वीकार करके 1844 ई० में लॉर्ड हार्डिज ने घोषणा की कि “अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी। इस घोषणा के बाद शिक्षा की प्रगति तीव्रता से हुई और स्थान-स्थान पर विद्यालयों की स्थापना होने लगी।

8. वुड की घोषणा-पत्र-सन् 1854 में चार्ल्स वुड ने शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा-पत्र बनाया। इस घोषणा-पत्र में शिक्षा सम्बन्धी निम्नलिखित प्रस्ताव रखे गए थे

  • भारतीय शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार होना चाहिए।
  • भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना चाहिए।शिक्षा विभाग में शिक्षा सचिव एवं शिक्षा निरीक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे विभाग का कार्य सुचारु रूप से चल सके।
  • समस्त व्यय बड़े विद्यालयों में ही नहीं खर्च करना चाहिए। भारतीयों को शिक्षा देने से वह अपने अन्य सम्बन्धियों को शिक्षा देने में समर्थ हो सकेंगे।
  • नए विद्यालयों की स्थापना की जाए, जिनमें शिक्षा को माध्यम भी भारतीय भाषाएँ हों।

9. थॉमस और स्टैनले के प्रयास-थॉमस और स्टैनले ने भी भारत में शिक्षा की उन्नति के लिए प्रयास किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप तहसीलों एवं ग्रामों में भी हल्काबन्दी के विद्यालय खोले गए। इसके साथ ही प्राथमिक शिक्षा के लिए प्रत्येक राज्य में विद्यालय स्थापित किए गए। इसके फलस्वरूप सभी प्रान्तों में निम्नलिखित शिक्षा संस्थाएँ हो गयीं

  • राजकीय शिक्षा संस्थाएँ,
  • मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्थाएँ,
  • व्यक्तिगत शिक्षा संस्थाएँ।

10. भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन (1882 ई०)-इस आयोग की नियुक्ति विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा पर विचार करने के लिए की गई थी, लेकिन उसने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुझाव दिए। इस आयोग द्वारा प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक में सरकारी और व्यक्तिगत प्रयासों के मिश्रण
की बात की गई और भारतीयों को शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया गया। इस आयोग ने निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए-

  1. प्राथमिक शिक्षा का विकास करना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान स्थिति बहुत असन्तोषजनक है।
  2. जिला परिषद् एवं नगरपालिका को यह आदेश दिया जाए कि वे विद्यालयों के लिए एक निश्चित. संख्या में धन रखें।
  3. भारतीय भाषा एवं अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों को अन्तर समाप्त किया जाए।
  4. प्राथमिक शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाए।
  5. सरकारी विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। गैर-सरकारी विद्यालयों में प्रबन्धकों की इच्छानुसार धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था की जा सकती है।
  6. स्त्री-शिक्षा की विशेष व्यवस्था की जाए।

11. स्वदेशी आन्दोलन एवं शिक्षा का प्रचार-उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत समाज-सुधारकों का मत था कि भारतीय विद्यालयों में ही भारत के नवयुवकों का चारित्रिक निर्माण हो सकता है। देश में राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीयता लाने पर बल दे रहे थे। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसायटी जैसी संस्थाएँ स्वदेशी भावना का प्रचार एवं प्रसार कर रही थीं; अतः स्वदेशी आन्दोलन के फलस्वरूप अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की गई। इनमें दयानन्द वैदिक कॉलेज, लाहौर; सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज, बनारस; फग्र्युसन कॉलेज, पूना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

12. भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (1904 ई०)-लॉर्ड कर्जन ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के उद्देश्य से 1901 ई० में शिमला में एक शिक्षा सम्मेलन आयोजित करवाया। इस सम्मेलन के निर्णय के अनुसार भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की गई। लॉर्ड कर्जन की नीति थी कि भारत में शिक्षा का अधिक-से-अधिक प्रचार और प्रसार हो। उसने गैर-सरकारी संस्थाओं को अनुदान देने की प्रथा का प्रचलन किया। इसके साथ ही उसने शिक्षा के विभिन्न स्तरों के विकास तथा प्रसार का भी प्रशंसनीय प्रयास किया।

13. राष्ट्रीय शिक्षा का विकास-लॉर्ड कर्जन की उग्र राष्ट्रीयता से सशंकित होकर तथा बंगाल के विभाजन को देखकर अनेक भारतीयों ने राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार और प्रसार में द्रुत गति से कार्य करना आरम्भ कर दिया। बंगाल में गुरुदास बनर्जी की अध्यक्षता में स्थापित समिति में बहुत-से ‘राष्ट्रीय हाईस्कूलों की स्थापना की। इसी समय कलकत्ते (कोलकाता) में नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई। गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शान्ति निकेतन में एक ब्रह्मचर्य आश्रम खोला, जो आज विश्व भारती विश्वविद्यालय का रूप धारण कर चुका है। आर्य समाज ने गुरुकुलों की स्थापना करके प्राचीन वैदिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया।

14. गोपालकृष्ण गोखले का प्रस्ताव-मार्च, 1911 ई० में उदार दल के नेता गोपालकृष्ण गोखले ने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी एक प्रस्ताव रखा, जो अस्वीकृत हो गया। इस प्रस्ताव की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीं–

  • शिक्षा का पुनर्गठन होना चाहिए।
  • प्रत्येक प्रान्त प्राथमिक शिक्षा की एक योजना तैयार करे।
  • प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य एवं नि:शुल्क हो।
  • जिला बोर्ड एवं म्युनिसिपल बोर्डों को शिक्षा सम्बन्धी कार्य अवश्य करना चाहिए।

15. कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग-सन् 1917 ई० में सैडलर की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की गई, जिसका मूल उद्देश्य कलकत्ता विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में अपने सुझाव देना तथा उच्च शिक्षा के सन्दर्भ में कुछ विचार प्रस्तुत करना था। इस आयोग ने देश के सभी विश्वविद्यालयों, माध्यमिक शिक्षा, स्त्री-शिक्षा एवं व्यावसायिक शिक्षा के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। इस आयोग ने अन्त:विश्वविद्यालय परिषद् की स्थापना का भी सुझाव दिया। आज का विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग उसी का विकसित रूप है।

16. हर्टाग समिति-सन् 1927 में श्री फिलिप हर्टाग ने प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में एक कमेटी नियुक्त की, जिसने निम्नलिखित सुझाव दिए-

  1. नए विद्यालयों को खोलने की अपेक्षा पुराने विद्यालयों का ही सुधार किया जाए।
  2. प्राथमिक शिक्षा नि:शुल्क एवं अनिवार्य होनी चाहिए।
  3. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने की आयु 6 से 10 वर्ष निश्चित की गई।
  4. पाठ्यक्रम में सुधार किया जाए।
  5. निरीक्षण कार्य अधिकं कर दिया जाए तथा पढ़ाई का समय भी निश्चित किया जाए।

17. व्यावसायिक शिक्षा तथा वुड-एबट प्रतिवेदन-प्रथम विश्वयुद्ध के अनुभवों ने ब्रिटिश सरकार को इस बात को सोचने के लिए प्रेरित किया कि भारत में औद्योगिक शिक्षा का प्रचार और प्रसार होना चाहिए। इसी के फलस्वरूप सन् 1936-37 में श्री एबट और श्री वुड ने व्यावसायिक शिक्षा की समस्याओं पर विचार किया। इन्होंने भारत में व्यावसायिक शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के सम्बन्ध में व्यापक सुझाव दिए। इन्होंने सामान्य शिक्षा के सन्दर्भ में भी अनेक सुझाव प्रस्तुत किए, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लागू किया गया।

18. बेसिक शिक्षा-या वर्धा योजना महात्मा गाँधी ने 1937 ई० में वर्धा में हुए एक शिक्षा सम्मेलन में बेसिक शिक्षा की एक योजना प्रतिपादित की। इसमें 7 से 10 वर्ष के बालक-बालिकाओं की नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी। बेसिक शिक्षा आज देश की राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा बन गई है। श्री टी० एम० निगम के अनुसार, “बेसिक शिक्षा महात्मा गाँधी द्वारा दिया गया अन्तिम एवं सबसे अधिक मूल्यवान उपहार है। इस शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी आधारभूत शिल्प को केन्द्र मानकर सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान की जाती है।”

19. सार्जेण्ट योजना-सन् 1944 में भारतीय शिक्षा सलाहकार जॉन सार्जेण्ट को भारत में युद्धोत्तर शिक्षा विकास पर एक स्मृति-पत्र तैयार करने का आदेश दिया गया। उन्होंने शिक्षा के विभिन्न स्तर और विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में व्यापक सुझाव दिए, जिनमें से प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे

  1. तीन से छह वर्ष के बालकों के लिए नर्सरी विद्यालयों की स्थापना की जाए और यह शिक्षा निःशुल्क हो।
  2. छह से चौदह वर्ष के बालकों की शिक्षा बेसिक शिक्षा के सिद्धान्तों के आधार पर की जाए।
  3. हाईस्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम को साहित्यिक और औद्योगिक दो भागों में बाँटा जाए।
  4. बी० ए० का पाठ्यक्रम तीन वर्ष का हो।

इस प्रकार स्वतन्त्रता से पूर्व इन सुझावों को लागू करने का प्रयास किया गया, किन्तु ब्रिटिश सरकार के पैर अब भारत की पृथ्वी पर लड़खड़ा रहे थे। भारत-विभाजन सम्बन्धी समस्या के कारण शिक्षा सम्बन्धी सुझावों के प्रति लोगों का ध्यान न रहा और स्वतन्त्रता-प्राप्ति तक शिक्षा के क्षेत्र में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार ने हो सका।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
हमारे देश में आधुनिक शिक्षा के आरम्भ होने में ईसाई मिशनरियों की क्या भूमिका थी?
उत्तर
पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप से अनेक व्यापारिक कम्पनियाँ भारत में व्यापार के लिए आने लगी थीं। इनके साथ-ही-साथ यूरोप की अनेक ईसाई मिशनरियों का भी भारत में आगमन होने लगा। इन ईसाई मिशनरियों का भारत आगमन का मुख्यतया उद्देश्य तो ईसाई धर्म का प्रचार एवं प्रसार करना था परन्तु इस मुख्य उद्देश्य की निश्चित एवं शीघ्र प्राप्ति के लिए इन ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा की व्यवस्था को एक प्रबल साधन के रूप में इस्तेमाल करना प्रारम्भ कर दिया। इन ईसाई मिशनरियों ने भारतीय जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करने के लिए तथा अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए देश के विभिन्न भागों में शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।

इन शिक्षण संस्थाओं में सामान्य शिक्षा के साथ-ही-साथ ईसाई धर्म के प्रचार एवं प्रसार का कार्य भी किया जाने लगा। इन शिक्षण संस्थाओं में मिशनरियों द्वारा शिक्षा के पाश्चात्य प्रारूप को अपनाया गया। इस प्रयास से हमारे देश में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात हुआ। इस तथ्य को ही ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वान ईसाई मिशनरियों को ही भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रवर्तक मानते हैं। स्पष्ट है कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में ईसाई मिशनरियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका तथा उल्लेखनीय योगदान है।

प्रश्न 2
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के सन्दर्भ में लॉर्ड मैकाले के विवरण-पत्र का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
सन् 1835 में लॉर्ड मैकाले ने एक विवरण-पत्र प्रस्तुत किया, इस विवरण-पत्र के माध्यम से मैकाले ने भारतीय शिक्षा में अंग्रेजी की प्राथमिकता प्रदान करने की प्रबल सिफारिश की थी। इस सन्दर्भ में उसने भारतीय भाषाओं और साहित्य को अनुपयोगी तथा निरर्थक बताया। उसका कहना था, एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी को भारत और अरब के सम्पूर्ण साहित्य से कम महत्त्व नहीं है। इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से मैकाले ने भारतीय शिक्षा के लिए निम्नलिखित सिफारिशें या सुझाव प्रस्तुत किये

  1. अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए।
  2. अंग्रेजी पढ़े-लिखे व्यक्ति को विद्वान् माना जाए और साहित्य का अर्थ केवल अंग्रेजी साहित्य ‘ होना चाहिए।
  3. विद्यार्थियों का रुझान फारसी और अरबी की अपेक्षा अंग्रेजी पर अधिक हो।
  4. अनेक भारतीय अंग्रेजी भाषा को ही ज्ञान का भण्डार मान चुके हैं।
  5. मैकाले ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीयों को अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान करके, उन्हें अंग्रेजी का अच्छा विद्वान बनाना सम्भव है; अतः इस दिशा में समुचित प्रयास अवश्य किये जाने चाहिए।
  6. मैकाले ने अंग्रेजों के स्वार्थ को भी विशेष महत्व दिया तथा इस दृष्टिकोण से भी एक तर्क प्रस्तुत किया, “अंग्रेजी की शिक्षा द्वारा इस देश में एवं ऐसे वर्ग का निर्माण किया जा सकता है जो रक्त और रंग से भले ही भारतीय हो परन्तु रुचियों, विचारों, नैतिकता और विद्वता से अंग्रेज होगा।

लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रस्तुत किया गया ‘‘विवरण-पत्र’ तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक द्वारा स्वीकार कर लिया गया तथा सरकार ने 7 मार्च, 1835 में एक विज्ञप्ति जारी करके भारत में अंग्रेजी शिक्षा को लागू कर दिया। इस निर्देश के बाद ब्रिटिशकालीन भारतीय शिक्षा का आगामी स्वरूप निश्चित हो गया। इस तथ्य को टी० एन० सिक्वेस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया था, “इस विज्ञप्ति ने भारत में शिक्षा के इतिहास को एक नया मोड़ दिया। यह उस दिशा के विषयँ में, जो सरकार सार्वजनिक शिक्षा को देना चाहती थी, निश्चित नीति की प्रथम सरकारी घोषणा की थी।

प्रश्न 3
टिप्पणी लिखिए-वुड का घोषणा-पत्र
उत्तर
सन् 1854 में चार्ल्स वुड्ने शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा-पत्र बनाया। इस घोषणा-पत्र में शिक्षा सम्बन्धी निम्नलिखित प्रस्ताव रखे गए थे

  1. भारतीय शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार होना चाहिए।
  2. भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना चाहिए।
  3. शिक्षा विभाग में शिक्षा सचिव एवं शिक्षा-निरीक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे विभाग | का कार्य सुचारु रूप से चल सके।
  4. समस्त व्यय बड़े विद्यालयों में ही नहीं खर्च करना चाहिए। भारतीयों को शिक्षा देने से वह अपनेb अन्य सम्बन्धियों को शिक्षा देने में समर्थ हो सकेंगे।
  5. नए विद्यालयों की स्थापना की जाए, जिनमें शिक्षा का माध्यम भी भारतीय भाषाएँ हों।
  6. “वुड के घोषणा-पत्र में जन-सामान्य की शिक्षा को प्राथमिकता दी गई थी। इस योजना को
    सफल बनाने के लिए इस घोषणा-पत्र में शिक्षा संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए सहायता अनुदान प्रणाली को लागू करने की सिफारिश की गई थी। इस योजना के अन्तर्गत शिक्षा-संस्थाओं के भवन निर्माण के लिए, पुस्तकालयों के लिए, अध्यापकों के वेतन के लिए तथा छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्तियों के लिए अलग-अलग अनुदान की सिफारिश की गई थी।

उपर्युक्त वर्णित्न सिफारिशों के कारण वुड के घोषणा-पत्र को विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कुछ विद्वानों ने तो इसे भारतीय शिक्षा का ‘महाधिकार-पत्र’ (Magnakarta) की संज्ञा दी है।

प्रश्न 4
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में ब्रिटिशकालीन शिक्षा के प्रमुख गुण निम्नलिखित थे

  1. इस शिक्षा के अन्तर्गत भारतीय पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के सम्पर्क में आए और उनका वैज्ञानिक, | राजनीतिक तथा औद्योगिक क्षेत्र में ज्ञान विकसित हुआ।
  2. अंग्रेज भारतीय सभ्यता और संस्कृति से बहुत प्रभावित थे। अत: उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रन्थों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया और उनका अध्ययन किया। इसके फलस्वरूप भारतीयों को भी अपनी | प्राचीन संस्कृति के गौरव का ज्ञान हुआ और उनमें राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ।
  3. इस शिक्षा के अन्तर्गत भारत की प्रान्तीय भाषाओं का समुचित विकास हुआ।
  4. ब्रिटिशकालीन शिक्षा ने भारतीयों के अन्धविश्वास और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  5. अंग्रेजों ने स्त्री-शिक्षा के विकास के लिए काफी प्रयास किए, फलस्वरूप देश में स्त्रियों की दशा | में विशेष सुधार आया।
  6. अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों में राजनीतिक पुनर्जागरण किया, फलस्वरूप भारतीय ब्रिटिश दासता से
    मुक्त होने में सफल हो सके।
  7. ब्रिटिश काल में शिक्षा के प्रचार व प्रसार के अनेकानेक साधनों का भी विकास हुआ।
  8. ब्रिटिश शिक्षा के कारण विश्व की विभिन्न देशों की सभ्यताओं और संस्कृतियों का भारतीयों को
    ज्ञान प्राप्त हुआ।

प्रश्न 5
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के प्रमुख मेषों का विवेचन निम्नलिखित है-

  1. अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया, फलस्वरूप भारतीय भाषाओं का समुचित विकास ने हो सका।
  2. ब्रिटिशकालीन शिक्षा ने भारतीयों को पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रँग दिया। वे अपनी संस्कृति को भूलकर भौतिकता के सागर में डूज़ गए।
  3. इस शिक्षा ने समाज में ‘बाबू वर्ग नामक एक नए वर्ग को जन्म दिया था। इस वर्ग ने ब्रिटिश सरकार को सहयोग देकर राष्ट्रीय हितों पर कुठाराघात किया।
  4. ब्रिटिश शिक्षा ने भारतीयों को अधार्मिक, अनैतिक तथा भौतिकवादी बना दिया तथा उन्हें प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता के महत्त्व का ज्ञान न रहा।
  5. ब्रिटिश शिक्षा ने जनसाधारण की शिक्षा की पूर्ण उपेक्षा की और देश में निरक्षरता का बोलबाला ही रहा।।
  6. ब्रिटिशकालीन शिक्षा भारतीय हितों के प्रतिकूल रही। इस शिक्षा का मूल उद्देश्य भारत में अंग्रेजी शासन को स्थायी और सुदृढ़ बनाना ही था।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित निस्यन्दन सिद्धान्त का सामान्य विवरण संक्षेप में लिखिए।
उत्तर
लॉर्ड मैकाले ने भारत में शिक्षा की व्यवस्था के विषय में एक विवरण-पत्र प्रस्तुत किया था, जिसके आधार पर शिक्षा के क्षेत्र में पूर्व-पश्चिम सम्बन्धी विवाद उठ खड़ा हुआ। इसी सन्दर्भ में मैकाले ने निस्यन्दन सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की मान्यता के अनुसार, यदि समाज के उच्च वर्ग को समुचित शिक्षा प्रदान कर दी जाए तो उस स्थिति में शिक्षा उच्च वर्ग से स्वतः ही निम्न वर्ग तक पहुँच जाएगी। इस तथ्य को आर्थर मैथ्यू ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “सर्वसाधारण में शिक्षा ऊपर से छन-छन कर पहुँचानी थी। बूंद-बूंद करके भारतीय जीवन के हिमालय से लाभदायक शिक्षा नीचे बहे, जिससे वह कुछ समय में चौड़ी और विशाल धारा में परिवर्तित होकर शुष्क मैदानों का सिंचन करे।” मैकाले के निस्यन्दन सिद्धान्त के अनुसार सरकार का दायित्व केवल उच्च वर्ग को शिक्षित करना था तथा निम्न वर्ग स्वत: ही उच्च वर्ग के सम्पर्क में आकर क्रमशः शिक्षित हो जाएगा।

प्रश्न 2
टिप्पणी लिखिए-भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन।
उत्तर
भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन की नियुक्ति विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा पर विचार करने के लिए की गई थी, लेकिन उसने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुझाव दिए। इस आयोग द्वारा प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक में सरकारी और व्यक्तिगत प्रयासों के मिश्रण की बात की गई और भारतीयों को शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया गया। इस आयोग ने निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए.

  1. प्राथमिक शिक्षा का विकास करना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान स्थिति बहुत असन्तोषजनक है।
  2. जिला परिषद् एवं नगरपालिका को यह आदेश दिया दिया जाए कि वे विद्यालयों के लिए एक निश्चित संख्या में धन रखें।।
  3. भारतीय भाषा एवं अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों को अन्तर समाप्त किया जाए।
  4. प्राथमिक शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाए।
  5. सरकारी विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। गैर-सरकारी विद्यालयों में प्रबन्धकों की इच्छानुसार धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था की जा सकती है।
  6. स्त्री-शिक्षा की विशेष व्यवस्था की जाए।

प्रश्न 3
भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लॉर्ड मैकाले का तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर
भारत में आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था स्थापित करने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका लॉर्ड मैकाले की रही है। लॉर्ड मैकाले प्रशंसा एवं निन्दा दोनों के ही पात्र रहे हैं। लॉर्ड मैकाले के प्रशंसक उन्हें आधुनिक भारतीय शिक्षा के पथ-प्रदर्शक स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार मैकाले द्वारा की गई। शिक्षा-व्यवस्था के ही परिणामस्वरूप भारतीय जनता उन्नति एवं प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हुई। इसके विपरीत लॉर्ड मैकाले के चिन्दकों का कहना है कि मैकाले ने अपनी शैक्षिक नीतियों के माध्यम से भारतीय जनता का घोर अहित किया है। मैकाले ने भारतीय जनता को मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। उसके द्वारा की गई अंग्रेजी शिक्षा की व्यवस्था से भारतीय संस्कृति को गहरी ठेस पहुँची। भारतीय भाषाओं का विकास रुक गया तथा एक अलग से ‘बाबू वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न1
भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली को आरम्भ करने के लिए सर्वप्रथम किन संस्थाओं द्वारा सफल प्रयास किए गए?
उत्तर
भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली को आरम्भ करने के लिए सर्वप्रथम ईसाई मिशनरियों द्वारा सफल प्रयास किए गए।

प्रश्न 2
भारत में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात किस शासनकाल में हुआ?
उत्तर
भारत में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात मुख्य रूप से अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ।

प्रश्न 3
ईसाई मिशनरियों के अतिरिक्त किन भारतीय समाज-सुधारकों ने देश में आधुनिक शिक्षा के विकास में योगदान प्रदान किया?
उत्तर
आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, गोपालकृष्ण गोखले, सर सैयद अहमद खाँ आदि समाज-सुधारकों ने उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया।

प्रश्न 4
लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त को किस नाम से जाना जाता
उत्तर
लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त को निस्यन्दन सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 5
‘छनाई के सिद्धान्त का सुझाव किसने दिया था ?
उत्तर
छनाई के सिद्धान्त’ का सुझाव लॉर्ड मैकाले ने दिया था।

प्रश्न 6
आधुनिक भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में लॉर्ड कर्जन के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आधुनिक भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में लॉर्ड कर्जन ने संख्यात्मक एवं गुणात्मक विकास के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए।

प्रश्न 7
1854 की शिक्षा नीति की घोषणा किसने की ?
उत्तर
चार्ल्स वुड ने।

प्रश्न 8
किस अभिलेख को अंग्रेजी शिक्षा का महाधिकार पत्र’ के नाम से जाना जाता है?
उत्तर
‘वुड के घोषणा-पत्र’ को अंग्रेजी शिक्षा का महाधिकार पत्र के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9
शिक्षा में सहायता अनुदान प्रणाली की घोषणा किसने की थी?
उत्तर
शिक्षा में सहायता अनुदान प्रणाली’ की घोषणा चार्ल्स वुड ने सन् 1854 के घोषणा-पत्र में की थी।

प्रश्न 10
भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन का गठन कब तथा किसलिए किया गया था?
उत्तर
भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन का गठन सन् 1882 ई० में किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा-व्यवस्था पर विचार करना था।

प्रश्न 11
स्वदेशी आन्दोलन के अन्तर्गत मुख्य रूप से कौन-कौन-से कॉलेज स्थापित किए गए थे?
उत्तर
स्वदेशी आन्दोलन के अन्तर्गत स्थापित किए गए मुख्य कॉलेज थे—दयानन्द वैदिक कॉलेज-लाहौर, सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज–बनारस, फग्र्युसन कॉलेज-पूना।

प्रश्न 12
कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग किस सन में गठित किया गया तथा इसका अध्यक्ष कौन था?
उत्तर
कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग 1917 ई० में गठित किया गया तथा इसका अध्यक्ष माइकेल सैडलर था।

प्रश्न 13
सार्जेण्टे योजना के अन्तर्गत छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए मुख्य रूप से क्या सुझाव दिया गया था?
उत्तर
सार्जेण्ट योजना के अन्तर्गत सुझाव दिया गया कि 3 से 6 वर्ष के बालकों के लिए नर्सरी विद्यालय स्थापित किए जाएँ तथा यह शिक्षा नि:शुल्क हो।

प्रश्न 14
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. भारत में आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में ईसाई मिशनरियों का कोई योगदान नहीं था।
  2. सन् 1813 के आज्ञा-पत्र में भारत में शिक्षा को कम्पनी का उत्तरदायित्व माना गया।
  3. लॉर्ड मैकाले के अनुसार समाज के उच्च एवं निम्न दोनों ही वर्गों के लिए शिक्षा की समान व्यवस्था की जानी चाहिए।
  4. लॉर्ड कर्जन ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के उद्देश्य से सन् 1901 में शिमला में एक शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया था।
  5. भारत में औद्योगिक शिक्षा की व्यवस्था का सुझाव वुड-एबट प्रतिवेदन में दिया गया था।

उत्तर

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-
प्रश्न 1
भारत में आने वाला प्रथम यूरोपियन था
(क) अंग्रेज
(ख) डच
(ग) पुर्तगाली
(घ) फ्रांसीसी
उत्तर
(ग) पुर्तगाली

प्रश्न 2
वास्कोडिगामा कालीकट के बन्दरगाह पर कब उतरा?
(क) अप्रैल, 1492 ई०
(ख) मई, 1498 ई०
(ग) दिसम्बर, 1599 ई०
(घ) जून, 1613 ई०
उत्तर
(ख) मई, 1498 ई०

प्रश्न 3
यूरोपियनों के आगमन के समय भारत की देशी शिक्षा की क्या दशा थी?
(क) सामान्य
(ख) उच्चतर
(ग) उन्नतशील
(घ) दयनीय
उत्तर
(घ) दयनीय

प्रश्न 4
वारेन हेस्टिग्स ने कलकत्ता दरसा की स्थापना कब की?
(क) 1685 ई०
(ख) 1774 ई०
(ग) 1780 ई०
(घ) 1791 ई०
उत्तर
(ग) 1780 ई०

प्रश्न 5
कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज का संस्थापक कौन था?
(क) वारेन हेस्टिग्स
(ख) लॉर्ड वेलेजली
(ग) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(घ) लॉर्ड डलहौजी
उत्तर
(ख) लॉर्ड वेलेजली

प्रश्न 6
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में शिक्षा प्रसार हेतु कब से अनुदान देना आरम्भ किया?
(क) 1798 ई०
(ख) 1813 ई०
(ग) 1833 ई०
(घ) 1853 ई०
उत्तर
(ख) 1813 ई०

प्रश्न 7
भारत में अंग्रेजी शिक्षा का आरम्भ हुआ था
(क) लॉर्ड कर्जन द्वारा।
(ख) लॉर्ड ऑकलैण्ड द्वारा।
(ग) लॉर्ड मैकाले द्वारा
(घ) विलियम हण्टर द्वारा
उत्तर
(ग) लॉर्ड मैकाले द्वारा

प्रश्न 8
“एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की अलमारी भारत और अरबी के सम्पूर्ण देशी साहित्य के बराबर होगी।” यह कथन किसका है?
क) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(ख) लॉर्ड आर्कलैण्ड
(ग) लॉर्ड मैकाले
(घ) लॉर्ड कर्जन
उत्तर
(ग) लॉर्ड मैकाले

प्रश्न 9
ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा का माध्यम था
(क) हिन्दी,
(ख) अंग्रेजी
(ग) फारसी
(घ) संस्कृत
उत्तर
(ख) अंग्रेजी

प्रश्न 10
चार्ल्स वुड का शिक्षा घोषणा-पत्र कब प्रकाशित हुआ?
(क) 1813 ई०
(ख) 1835 ई०
(ग) 1854 ई०
(घ) 1882 ई०
उत्तर
(ग) 1854 ई०

प्रश्न 11
अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा किसे कहा जाता है?
(क) ऑकलैण्ड का विवरण-पत्रे
(ख) लॉर्ड मैकाले का विवरण-पत्र
(ग) वुड का विवरण-पत्र ।
(घ) हण्टर कमीशन की रिपोर्ट
उत्तर
(ग) वुड का विवरण-पत्र

प्रश्न 12
भारत में आधुनिक विश्वविद्यालय की स्थापना का सुझाव दिया गया था
(क) 1813 के आज्ञा-पत्र द्वारा
(ख) 1833 के आज्ञा-पत्र द्वारा
(ग) 1837 के मैकाले के विवरण-पत्र द्वारा।
(घ) 1854 के वुड के घोषणा-पत्र द्वारा
उत्तर
(घ) 1854 के वुड के घोषणा-पत्र द्वारा

प्रश्न 13
भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम किसने पारित करवाया?
(क) लॉर्ड डलहौजी
(ख) लॉर्ड लिटन
(ग) लॉर्ड रिपन :
(घ) लॉर्ड कर्जन
उत्तर
(घ) लॉर्ड कर्जन

प्रश्न 14
भारत में प्राथमिक शिक्षा के विकास और समस्याओं पर विचार करने वाला पहला आयोग था
(क) सैडलर आयोग।
(ख) हण्टर आयोग
(ग) सार्जेण्ट आयोग ।
(घ) हर्टाग समिति
उत्तर
(ख) हण्टर आयोग

प्रश्न 15
भारत में पहला विश्वविद्यालय कहाँ पर खोला गया था?
(क) कोलकाता
(ख) बनारस
(ग) आगरा
(घ) मुम्बई
उत्तर
(क) कोलकाता

प्रश्न 16
भारत में केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की स्थापना कब हुई?
(क) 1932 ई०
(ख) 1935 ई०
(ग) 1940 ई०
(घ) 1944 ई०
उत्तर
(ख) 1935 ई०

प्रश्न 17
भारतीय स्कूलों के लिए सहायता अनुदान प्रणाली कब प्रारम्भ हुई?
(क) 1814 ई० में
(ख) 1834 ई० में
(ग) 1854 ई० में ।
(घ) 1864 ई० में
उत्तर
(ग) 1854 ई० में

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 19
Chapter Name Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रेरणा का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। प्रेरणा के मुख्य स्रोतों का भी उल्लेख कीजिए।
या
अभिप्रेरणा से आप क्या समझते हैं? [2011, 13, 14]
उत्तर :
प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा
रेरणा या अभिप्रेरणा वह मानसिक क्रिया है, जो किसी प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है। दूसरे शब्दों में, प्रेरणा मानसिक तत्परता की वह स्थिति है, जो व्यक्ति को कार्य में नियोजित करती है और किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर करती है। इस प्रकार मनोवैज्ञानिक अर्थ में प्रेरणा एक प्रकार की आन्तरिक उत्तेजना है,

जिस पर हमारा व्यवहार आधारित रहता है अथवा जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करती है और लक्ष्य प्राप्ति तक चलती रहती है। कोई व्यक्ति कार्य क्यों करता है ? भोजन क्यों करता है ? प्रेम या घृणा क्यों करता है ? आदि प्रश्नों का सम्बन्ध प्रेरणा से है। इस प्रकार प्रेरणा एक प्रकार की आन्तरिक शक्ति है, जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित को बाध्य करती है।

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा की परिभाषा इस प्रकार दी है

1. गिलफोर्ड :
(Guilford) के अनुसार, “प्रेरणा एक कोई भी विशेष आन्तरिक कारक अथवा दशा है, जो क्रिया को प्रारम्भ करने अथवा बनाये रखने को प्रवृत्त होती है।”

2. वुडवर्थ :
(woodworth) के अनुसार, “प्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है, जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चित व्यवहार स्पष्ट करती है।”

3. मैक्डूगल :
मैक्डूगल के अनुसार, “प्रेरणा वे शारीरिक तथा मानसिक दशाएँ हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।”

4. जॉनसन :
जॉनसन के अनुसार, “प्रेरणा सामान्य क्रियाकलापों का प्रभाव है, जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती हैं।”

5. बर्नार्ड :
(Bernard) के अनुसार, “प्रेरणा द्वारा उन विधियों का विकास किया जाता है, जो व्यवहार के पहलुओं को प्रमाणित करती हैं।”

6. थॉमसन :
थॉमसन के अनुसार, “प्रेरणा प्रारम्भ से लेकर अन्त तक मानव व्यवहार के प्रत्येक प्रतिकारक को प्रभावित करती है।”

7.शेफर :
(Shaffar) व अन्य के अनुसार, “प्रेरणा क्रिया की एक ऐसी प्रवृत्ति है जो कि चालक द्वारा उत्पन्न होती है एवं समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

इन परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर निम्नांकित तथ्यों का ज्ञान होता है

  1. प्रेरणा साध्य नहीं साधन है। यह साध्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करती है।
  2. प्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करती है।
  3. प्रेरणा से क्रियाशीलता व्यक्त होती है।
  4. प्रेरणा पर शारीरिक तथा मानसिक और बाह्य एवं आन्तरिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है।
  5. प्रेरणा सीखने का प्रमुख अंग न होकर सहायक अंग है।

प्रेरणा के स्रोत
मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा के निम्नांकित स्रोतों का उल्लेख किया है

1. आवश्यकताएँ :
अपने जीवन को बनाये रखने के लिए मनुष्य की कुर्छ अनिवार्य आवश्यकताएँ होती हैं; जैसे वायु, जल और भोजन आदि। जब मनुष्य की इन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती तो शारीरिक तनाव उत्पन्न हो जाता है और वह उनकी प्राप्ति के लिए किसी-न-किसी रूप में क्रियाशील हो जाता है। उदाहरण के लिए, ज़ब किसी व्यक्ति को प्यास लगती है, तो वह पानी की खोज के लिए तत्पर हो जाता है और जब तक उसे पानी प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक उसका शारीरिक तनाव बना रहता है।

प्राप्त हो जाने पर उसका शारीरिक तनाव भी समाप्त हो जाता है। इस सम्बन्ध में बोरिंग और लैंगफील्ड (Boring and Langfield) ने लिखा है-“आवश्यकता शरीर की अनिवार्यता या अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक अस्थिरता या तनाव उत्पन्न हो जाता है। इस तनाव में ऐसा व्यवहार करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे आवश्यकता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाला तनाव समाप्त हो जाता है।”

2. चालक :
चालक (Driver) की उत्पत्ति आवश्यकताओं के द्वारा होती है। उदाहरण के लिए, पानी व्यक्ति की आवश्यकता है। यह पानी की आवश्यकता ही ‘प्यास चालक को जन्म देती है। इस प्रकार चालक प्राणियों को एक निश्चित प्रकार की क्रियाएँ या व्यवहार के लिए प्रेरित करते हैं।

3. उद्दीपन :
उद्दीपन वे वस्तुएँ हैं, जिनके द्वारा चालकों की सन्तुष्टि होती। है। उदाहरण के लिए, प्यास चालक की सन्तुष्टि पानी के द्वारा होती है। अत: यहाँ पानी उद्दीपन (Incentives) कहलाएगा। इसी प्रकार काम चालक’ का उद्दीपन विपरीत लिंगीय प्राणी होगा। बोरिंग व लैंगफील्ड के अनुसार, “उद्दीप्त को उस वस्तुस्थिति या क्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो व्यवहार को उद्दीप्त और निर्देशित करता है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि आवश्यकता, चालक एवं उद्दीपन का घनिष्ठ सम्बन्ध है। हिलगार्ड (Hilgard) के शब्दों में, “आवश्यकता से चालक का जन्म होता है। चालक बढ़े हुए तनाव की स्थिति है, जो कार्य और आरम्भिक व्यवहार की ओर अग्रसर रहता है। उद्दीपन बाह्य वातावरण की कोई वस्तु होती है, जिससे आवश्यकता की सन्तुष्टि की प्रक्रिया द्वारा चालक की गति मन्द कर देती है।”

4. प्रेरक :
प्रेरक के अन्तर्गत उद्दीपन चालक, आवश्यकता तथा तनाव आदि सभी आ जाते हैं। प्रेरकों (Motives) के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के विभिन्न मत हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक प्रेरकों को जन्मजात शक्तियों मानते हैं तो कुछ इन्हें मुक्ति की शारीरिक या मनोवैज्ञानिक स्थिति मानते हैं। परन्तु अधिकांश मनोवैज्ञानिक प्रेरक को वह शक्ति मानते हैं, जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए उत्तेजित करती है। दूसरे शब्दों में, प्रेरक व्यक्ति के व्यवहार की दिशाओं को निर्धारित करते हैं। विभिन्न विद्वानों ने प्रेरकों की परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में दी है

  • ब्लेयर, जेम्स व शिसन के अनुसार, “प्रेरक हमारी मौलिक आवश्यकता से उत्पन्न होने वाली वे शक्तियाँ हैं, जो व्यवहार को दिशा और प्रयोजन प्रदान करती हैं।”
  • शेफर तथा अन्य के अनुसार, “प्रेरक क्रिया की एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो कि चालक द्वारा उत्पन्न होती है और समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

प्रश्न 2
सीखने में प्रेरणा के स्थान एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए। या प्रेरणा क्या है ? सीखने के लिए प्रेरणा आवश्यक है। इस कथन की पुष्टि कीजिए। [2007, 08]
या
प्रेरणा की उपयुक्त परिभाषा दीजिए। सीखने में प्रेरणा का क्या योगदान है? [2007, 08]
या
प्रेरणा सीखने के लिए अनिवार्य है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2009, 10]
उत्तर :
[संकेत : प्रेरणा की परिभाषा का अध्ययन उपर्युक्त प्रश्न संख्या 1 के उत्तर के अन्तर्गत करें।]

सीखने में प्रेरणा का स्थान (महत्त्व)
सीखने में प्रेरणा का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। बिना प्रेरणा के हम कुछ सीख ही नहीं सकते। थॉमसन के अनुसार, “बालक की मानसिक क्रिया के बिना विद्यालय में सीखना बहुत कम होता है। सर्वश्रेष्ठ सीखना उस समय होता है, जबकि मानसिक क्रिया सर्वाधिक होती है। अधिकतम मानसिक क्रिया प्रबल प्रेरणा के फलस्वरूप होती है।”

डॉ० सीताराम जायसवाल के अनुसार, “व्यक्ति के अन्दर कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जिनके कारण व्यक्ति प्रक्रिया करता है। वातावरण के साथ क्रिया किसी विशेष प्रेरक द्वारा प्रेरित होती है। इसी क्रिया के फलस्वरूप सीखना होता है। इस प्रकार सीखने के लिए अभिप्रेरणा अनिवार्य है।”

वास्तव में सीखने में प्रेरणा की प्रमुख भूमिका रहती है। प्रेरणा सीखने में किस प्रकार सहायक हो सकती है, यह निम्नांकित शीर्षकों से स्पष्ट हो जाएगा

1. ध्यान का केन्द्रीकरण :
सीखने में ध्यान का केन्द्रित होना अत्यन्त आवश्यक है। अध्यापक बालकों को विभिन्न ढंग से प्रेरित करके उन्हें अपने पाठ पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता दे सकता है। इसलिए कैली ने लिखा है कि, “सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा का एक केन्द्रीय स्थान है।”

2. रुचि का विकास :
बालक बिना रुचि के अध्ययन नहीं करते। जब बालक में रुचि जाग्रत हो। जाती है, तो वह किसी विषय या तथ्य को तुरन्त समझ जाता है। ध्यान की एकाग्रता और रुचि में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसी दशा में अध्यापक का कर्तव्य है कि वह प्रेरणा का उचित प्रयोग करके बालकों में अध्ययन के प्रति रुचि जाग्रत करे। थॉमसन के कवि अनुसार, प्रेरणा छात्रों में रुचि जाग्रत करने की कला हैं।”

3. सीखने की इच्छा का विकास :
प्रेरणा से बालकों में सीखने की इच्छा को बलवली बनाया जा सकता है। इसके लिए अध्यापक को छात्रों की समस्या की जानकारी करा देनी चाहिए तथा उनके लक्ष्य का महत्त्व बता देना चाहिए और साथ-ही-साथ उसमें आत्मविश्वास की भावना जाग्रत करनी चाहिए।

4. लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक :
यदि बालकों को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया जाए तो वे अपने कार्य में विशेष लगन और श्रम से जुट जाते हैं। वास्तव में किसी लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रेरणा का विशेष हाथ रहता है। अतः अध्यापक को इस दिशा में विशेष ध्यान देना चाहिए।

5. अच्छी आदतों के विकास में सहायक :
अच्छी आदतें नवीन ज्ञान को विकसित करने में सहायक होती हैं। यदि अध्यापक बालकों को श्रेष्ठ आदतें डालने के लिए प्रेरित करें तो उन्हें अनेक लाभ होंगे। यदि उनमें सीखने तथा पढ़ने की आदतों का निर्माण कर दिया जाए तो स्वयं अध्ययन में ध्यान लगाएँगे।

6. ज्ञान की प्राप्ति में सहायक :
प्रेरणा द्वारा बालकों को अधिक ज्ञानार्जन के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। अध्यापकों को चाहिए कि वह प्रभावशाली शिक्षण विधियों का प्रयोग करके बालकों को तीव्र गति से ज्ञानार्जन के लिए प्रेरित करे। इसके लिए वे प्रतियोगिता का सहारा ले सकते हैं।

7. अभिवृत्ति के विकास में सहायक :
प्रेरणा बालकों में अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक होती है। अध्यापक उचित ढंग से प्रेरित करके बालकों में श्रेष्ठ अभिवृत्तियों का विकास कर सक अभिवृत्तियों का विकास हो जाने से बालक सरलता से कार्य को सीख जाते हैं।

8. सामाजिक गुणों का विकास :
यदि अध्यापक बालकों को सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है तो उनमें सामाजिकता तथा सामुदायिकता का विकास सरलता से किया जा सकता है। विभिन्न सामाजिक प्रेरकों के द्वारा बालकों को सामाजिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

9. चरित्र के निर्माण में सहायक :
शिक्षा की दृष्टि से चरित्र-निर्माण का विशेष महत्त्व है। एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति की संकल्पशक्ति तथा चित्त को एकाग्र करने की शक्ति अत्यन्त दृढ़ होती है।  प्रेरणा द्वारा बालकों में विभिन्न सद्गुण उत्पन्न किये जा सकते हैं तथा उनकी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाया जा सकता है।

10. अनुशासन स्थापना में सहायक :
अनुशासनहीन बालक पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह होते हैं। प्रेरणा के माध्यम से बालकों में अनुशासन की भावना विकसित की जा सकती है। अध्यापक उन्हें सकार्यों के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रेरणा सीखने तथा शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य आधार है।

प्रेरणा का प्रभावशाली प्रयोग करके अध्यापक बालकों को उनके लक्ष्य तक पहुँचा सकता है तथा उनमें सद्गुणों का विकास कर चारित्रिक दृढ़ता उत्पन्न कर सकता है। हैरिस के अनुसार, “प्रेरणा की समस्या शिक्षा मनोविज्ञान और कक्षा-भवन की प्रक्रिया, दोनों के लिए केन्द्रीय महत्त्व की है।”

प्रश्न 3
बालकों को प्रेरित करने की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा में प्रेरणा प्रदान करने की विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
बालक को प्रेरित करने की विधियाँ
सीखने में प्रेरणा का विशेष योगदान रहता है। बालकों को सिखाने में प्रेरणा को एक साधन के रूप में प्रयोग करना प्रत्येक अध्यापक का कर्तव्य है। उसका कर्तव्य है कि बालकों को नवीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए अधिक-से-अधिक प्रेरित करे। यहाँ पर हम कुछ ऐसी विधियों का उल्लेख करेंगे, जिनके द्वारा छात्रों को समुचित तरीके से प्रेरित किया जा सकता है

1. आवश्यकताओं का ज्ञान :
प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के वशीभूत होकर कार्य करता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि बालकों को पाठ्य-सामग्री की आवश्यकता का ज्ञान कराये। वह बताये कि अमुक विषय का अध्ययन किस आवश्यकता की पूर्ति करता है।

2. संवेगात्मक स्थिति का ध्यान :
अध्यापक को बालकों की संवेगात्मक स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि अध्यापक सिखाये जाने वाले विषय का सम्बन्ध बालकों के संवेगों से स्थापित कर देता है। तो उन्हें प्रेरित करने में उसे पूर्ण सफलता मिलेगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तथ्य का प्रतिपादन इस ढंग से किया जाना चाहिए कि बालक उससे घृणी न करके प्रेम करे।

3. रुचि :
प्रेरणा प्रदान करने के लिए पाठक में रुचि उत्पन्न करना अत्यन्त आवश्यक है। रुचि से सम्बन्धित करके यदि पाठ पढ़ाया। जाएगा तो बालकों को इच्छानुसार प्रेरित करने में सुगमता होगी।

4. खेल – विधि का प्रयोग :
छोटे बालक खेल में विशेष रुचि लेते हैं। यदि बालकों को खेल के माध्यम से ज्ञान प्रदान किया जाएगा तो वे अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित होंगे। छोटे-बालकों के यथासम्भव खेल-विधि द्वारा ही ज्ञान प्रदान किया जाए।

5. कक्षा का वातावरण :
कक्षा का वातावरण भी प्रेरणामय होना चाहिए। प्रत्येक कक्षा का वातावरण विषय और शिक्षण के अनुकूल होना चाहिए। यदि विज्ञान-कक्षा विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों तथा यन्त्रों से सुसज्जित है तो छात्र वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सरलता से प्रेरित हो जाएँगे।

6. विद्यालय का वातावरण :
कक्षा के समान सम्पूर्ण विद्यालय का वातावरण भी प्रेरणामय होना चाहिए। विद्यालय में स्थान-स्थान पर विभिन्न विषयों सम्बन्धी सूचनात्मक घट तथा महापुरुषों के चित्र लगे हों, छात्रों को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन की सुविधाएँ प्राप्त हो, विद्यालय में सुन्दर .. पुस्तकालय हो तथा अध्यापक बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते हों और उन्हें हर प्रकार की सूचना देने में आनन्द का अनुभव करते हों, तो ऐसे विद्यालय के छात्र शीघ्रता से प्रेरणा प्राप्त करेंगे।

7. प्रगति का ज्ञान :
जब बालक को यह ज्ञात हो जाता है कि वह अपने कार्य में पर्याप्त प्रगति कर ‘ रहा है तो वह आगे कार्य करने की प्रेरणा ग्रहण करता है। अतः अध्यापक को चाहिए कि वे बालकों को उनकी प्रगति का भी ज्ञान कराते रहें।

8. सफलता :
जब बालक अपने किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है, तो उसे आगे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। फ्रेण्डसन (Frandson) के अनुसार, “सीखने के सफल अनुभव अधिक सीखने की प्रेरणाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी दशा में अध्यापक को अपना शिक्षण इस ढंग से करना चाहिए, जिससे कि बालक अपने कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकें।

9. परिणाम का ज्ञान :
वुडवर्थ (Wood worth) के अनुसार, “प्रेरणा परिणामों की तात्कालिक जानकारी से प्राप्त होती है। अतः अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों को पाठ्य-विषयं की जानकारी भली प्रकार करा दे और शिक्षण प्रारम्भ करने के पूर्व ही उन्हें यह बता दे कि अमुक पाठ्य-विषय के अध्ययन से उन्हें क्या लाभ होगा?

10. विचार गोष्ठी:
विचार गोष्ठियों द्वारा बालकों को प्रभावशाली तरीके से प्रेरित किया जा सकता है। अतः कक्षा में अध्यापक को समय-समय पर विचार गोष्ठियों (Seminars) का आयोजन करना चाहिए।

11. प्रतियोगिता :
बालकों में स्वभावतः प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की भावनाएँ पायी जाती हैं। इस भावना का प्रयोग करके बालकों को प्रभावशाली ढंग से प्रेरित किया जा सकता है। अतः विद्यालय में प्रतिस्पर्धा की क्रियाओं को पर्याप्त संख्या में आयोजित किया जाए, जिससे कि समस्त छात्र किसी-न-किसी रूप में सफलता प्राप्त कर सकें। इन प्रतियोगिताओं में असफल छात्रों को डॉटा-फटकारा भी न जाए; परन्तु प्रतियोगिता को इतना अधिक महत्त्व न दिया जाए कि विद्यालय की सामूहिकता की भावनां नष्ट हो जाएं।

12. सामाजिक तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेना :
बालकों को सामाजिक तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। इन कार्यों में भाग लेने से उनके अहम् की सन्तुष्टि होती है और वे आत्म-सम्मान तथा आत्म-प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए प्रेरित होते हैं।

13. प्रशंसा :
हरलॉक के अनुसार, प्रशंसां एक प्रभावशाली प्रेरक है। अच्छे कार्य की प्रशंसा करके बालकों को प्रेरित किया जा सकता है। अतः अध्यापक को बालकों की समय-समय पर अच्छे कार्यों के लिए प्रशंसा करनी चाहिए।

14. पुरस्कार :
पुरस्कार द्वारा भी बालकों को प्रोत्साहित तथा प्रेरित किया जा सकता है। पुरस्कार पाकर बालक प्रफुल्लित होते हैं और वे कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। पुरस्कार बालकों के मनोबल को भी ऊँचा उठाते हैं। इसमें बालकों में प्रतिस्पर्धा की भावना का भी विकास होता है और वे अधिक लगन तथा उत्साह से कार्य करते हैं। इसके साथ-ही-साथ पुरस्कार बालकों के अहम् की भी सन्तुष्टि करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रेरकों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
विभिन्न विद्वानों ने प्रेरकों का वर्गीकरण निम्नवत् किया है
1. थॉमसन (Thomson) के अनुसार

  • स्वाभाविक प्रेरक तथा
  • कृत्रिम प्रेरक

2. गैरेट के अनुसार

  • जैविक व मनोवैज्ञानिक प्रेरक तथा
  • सामाजिक प्रेरक

3. मैस्लो (Maslow) के अनुसार

  • जन्मजात प्रेरक तथा
  • अर्जित प्रेरका

प्रेरकों के मुख्य प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित हैं

1. जन्मजात प्रेरक :
ये प्रेरक जन्मजात होते हैं। इसके अन्तर्गत भूख, प्यास, सुरक्षा, यौन आदि प्रेरक आते हैं।

2. अर्जित प्रेरक :
ये प्रेरक वातावरण से प्राप्त होते हैं और इनको अर्जित किया जाता है। आदत्, रुचि, सामुदायिकता आदि अर्जित प्रेरकों के स्वरूप हैं।

3. सामाजिक प्रेरक :
इनका व्यक्तियों के व्यवहार पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ये मुख्य रूप से सामाजिक आदर्शो, स्थितियों तथा परम्पराओं के कारण उत्पन्न होते हैं। आत्म-प्रदर्शन, आत्म-सुरक्षा, जिज्ञासा तथा रचनात्मकता सामाजिक प्रेरक हैं।

4. मनोवैज्ञानिक प्रेरक :
इनका जन्म प्रबल मनोवैज्ञानिक दशाओं के कारण होता है। इन प्रेरकों में प्रेम, दुःख, भय, क्रोध तथा आनन्द आते हैं।

5. स्वाभाविक प्रेरक :
स्वाभाविक प्रेरक व्यक्ति के स्वभाव में ही पाये जाते हैं। खेल, सुझाव, अनुकरण, सुख प्राप्ति और प्रतिष्ठा आदि ऐसे ही प्रेरक हैं।

6. कृत्रिम प्रेरक :
कृत्रिम प्रेरक मुख्यतया स्वभाविक प्रेरकों के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। सहयोग, व्यक्तिगत तथा सामूहिक कार्य, पुरस्कार, दण्ड व प्रशंसा आदि इन प्रेरकों के रूप हैं। ये व्यक्ति के कार्य तथा व्यवहार को नियन्त्रित तथा प्रोत्साहित करते हैं।

प्रश्न 2
जन्मजात तथा अर्जित प्रेरकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जन्मजात एवं अर्जित दोनों ही प्रकार के प्रेरक मनुष्य की आन्तरिक स्थिति से सम्बन्ध रखते हुए उसमें ऐसी क्रियाशीलता पैदा करते हैं जो लक्ष्य की प्राप्ति तक चलती रहती है। इस मौलिक समानता के बावजूद इनके मध्य निम्नलिखित अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सकारात्मक प्रेरणा तथा नकारात्मक प्रेरणा से क्या आशय है ?
उत्तर :
प्रेरणा मुख्यतः दो प्रकार की होती है सकारात्मक प्रेरणा तथा नकारात्मक प्रेरणा, इन दोनों प्रकार की प्रेरणाओं का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

1. सकारात्मक प्रेरणा :
इसे आन्तरिक प्रेरणा भी कहते हैं। इस प्रेरणा में व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से करता है।

2. नकारात्मक प्रेरणा :
इसमें व्यक्ति किसी कार्य को स्वयं अपनी इच्छा से न करके अन्य व्यक्तियों की इच्छा या बाह्य प्रभाव के कारण करता है। यह बाह्य प्रेरणा भी कहलाती है। अध्यापक पुरस्कार, प्रशंसा, निन्दा आदि का प्रयोग करके अपने छात्रों को नकारात्मक प्रेरणा प्रदान करता है।

शिक्षक को चाहिए कि वह यथासम्भव सकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करके बालकों को अच्छे कार्यों में लगाये। परन्तु जब सकारात्मक प्रेरणा से प्रयोजन सिद्ध न हो सके, तभी उसे नकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2
प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षण क्या हैं ?
उत्तर :
प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

1. अधिक शक्ति का संचालन :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के शरीर में शक्ति को अधिक संचालन हो जाता है। ऐसे में व्यक्ति के समस्त कार्य भी कर सकता है जो सामान्य दशा में उनके लिए कठिन होते हैं।

2. परिवर्तनशीलता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिए किये  जाने वाले प्रयासों में बार-बार परिवर्तन भी करता है।

3. निरन्तरता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में जब तक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक व्यक्ति निरन्तर प्रयास करता रहता है।

4. लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति को लक्ष्य को प्राप्त करने की व्याकुलता रहती है।

5. लक्ष्य-प्राप्ति :
जब लक्ष्य-प्राप्ति हो जाती है तब व्यक्ति की व्याकुलता समाप्त हो जाती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
किसी कार्य को करने के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक को क्या कहते हैं ?
उत्तर :
किसी कार्य को करने के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक को प्रेरणा कहते हैं।

प्रश्न 2
प्रेरणा के नितान्त अभाव का व्यक्ति के कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
प्रेरणा के नितान्त अभाव में व्यक्ति द्वारा कोई कार्य सम्पन्न हो ही नहीं सकता।

प्रश्न 3
प्रेरणा की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“प्रेरणा वे शारीरिक तथा मानसिक दशाएँ हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।” [मैक्डूगल]

प्रश्न 4
“अभिप्रेरणा किसी कार्य को प्रारम्भ करने, जारी रखने और नियन्त्रित करने की प्रक्रिया है।” यह कथन किसका है? [2007]
उत्तर :
अभिप्रेरणा सम्बन्धी प्रस्तुत कथन गुड (Good) का है।

प्रश्न 5
प्रेरणायुक्त व्यवहार का मुख्य लक्षण क्या होता है?
उत्तर :
प्रेरणायुक्त व्यवहार का मुख्य लक्षण है अतिरिक्त शक्ति का संचालन।

प्रश्न 6
अभिप्रेरणा (प्रेरणा) का कोई एक वर्गीकरण बताइए।
उत्तर :
अभिप्रेरणा के एक वर्गीकरण के अन्तर्गत प्रेरणा को दो वर्गों में बाँटा जाता है

  1. जन्मजात प्रेरक तथा
  2. अर्जित प्रेरक

प्रश्न 7
मुख्य जन्मजात प्रेरक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर :
मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, निद्रा तथा काम।

प्रश्न 8
प्रशंसा एवं निन्दा किस प्रकार के प्रेरक है?
उत्तर :
प्रशंसा एवं निन्दा सामान्य अर्जित प्रेरक हैं।

प्रश्न 9
अभिप्रेरणा का सीखने पर क्या प्रभाव पड़ता है ? [2008]
उत्तर :
अभिप्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया सुचारु तथा अच्छे रूप में सम्पन्न होती है।

प्रग 10
प्रेरणा के प्रारम्भ के लिए कौन उत्तरदायी होता है?
उत्तर :
प्रेरणा के प्रारम्भ के लिए आवश्यकता की अनुभूति उत्तरदायी होती है।

न 11
प्रेरणा की उत्पत्ति का स्वाभाविक कारण क्या है ? [2011]
उत्तर :
प्रेरणा की उत्पत्ति का स्वाभाविक कारण है-आवश्यकताओं को अनुभव करना एवं आदत।

प्रश्न 12
भूख कैसा प्रेरक है? [2015]
उत्तर :
भूख एक प्रमुख जन्मजात प्रेरक है।

प्रश्न 13
“अभिप्रेरणा सीखने के लिए राजमार्ग है।” किसने कहा है? [2011, 13, 14, 16]
उत्तर :
स्किनर (Skinner) ने।

प्रश्न 14
अभिप्रेरणा से क्या आशय है? [2016]
उत्तर :
अभिप्रेरणा वह मानसिक क्रिया है, जो किसी प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है।

प्रश्न 15
निम्नलिखित कथन सत्य हैं
या
असत्य

  1. व्यक्ति के समस्त व्यवहार के पीछे निहित मुख्य कारक प्रेरणा ही है।
  2. प्रेरणाओं के नितान्त अभाव में व्यक्ति पूर्ण रूप से निष्क्रिय हो जाता है।
  3. भूख एवं प्यास मुख्य अर्जित प्रेरक हैं।
  4. शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा का विशेष महत्त्व है।
  5. जीवन में सूफलता प्राप्ति के लिए प्रेरणाओं का विशेष योगदान होता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. संय
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
किसी भी व्यवहार के सम्पन्न होने के लिए अनिवार्य कारक है
(क) चिन्तन
(ख) लाभ प्राप्ति की आशा
(ग) प्रेरणा
(घ) संवेग
उत्तर :
(ग) प्रेरणा

प्रश्न 2
“अभिप्रेरणा एक ऐसी मनोदैहिक प्रक्रिया है, जो किसी आवश्यकता की उपस्थिति में  उत्पन्न होती है। वह ऐसी प्रक्रिया की ओर गतिशील होती है, जो आवश्यकता को सन्तुष्ट करती है। यह परिभाषा किसकी है?
(क) लावेल की
(ख) वुडवर्थ की
(ग) गिलफोर्ड की
(घ) शेफर की
उत्तर :
(क) लावेल की

प्रश्न 3
“प्रेरक कोई एक विशेष आन्तरिक कारक यो दशा है, जिसमें किसी क्रिया को आरम्भ करने और बनाये रखने की प्रवृत्ति होती है।” यह परिभाषा किसने दी है ?
(क) मैक्डूगल ने
(ख) वुडवर्थ ने
(ग) गिलफोर्ड ने।
(घ) हिलगार्ड ने
उत्तर :
(ग) गिलफोर्ड ने

प्रश्न 4
प्रेरणा का स्वाभाविक कारण है [2015]
(क) आदत
(ख) संस्कार
(ग) रुचि
(घ) संवेग
उत्तर :
(घ) संवेग

प्रश्न 5
प्रेरणा की उत्पत्ति को अर्जित कारण है
(क) आत्मरक्षा की भावना
(ख) मूल-प्रवृत्तियाँ
(ग) अचेतन मन
(घ) रुचि
उत्तर :
(घ) रुचि

प्रश्न 6
भूख और प्यास कैसे प्रेरक हैं ? [2013]
(क) व्यक्तिगत
(ख) सामाजिक
(ग) जन्मजात
(घ) अर्जित
उत्तर :
(ग) जन्मजात

प्रश्न 7
प्रेरणा छात्र में रुचि उत्पन्न करने की कला है।” यह किसका मत है ?
(क) गेट्स का
(ख) वुडवर्थ का
(ग) थॉमसने का
(घ) जे० एस० रॉस का
उत्तर :
(ग) थॉमसन का ।

प्रश्न 8
प्रेरणा परिणामों के तत्कालिक ज्ञान से प्राप्त होती है।” यह कथन किसका है?
(क) वुडवर्थ का
(ख) मैक्डूगल को
(ग) हिलगार्ड का
(घ) कोहलर का
उत्तर :
(क) वुडवर्थ को

प्रश्न 9
शिक्षा के प्रति प्रेरित बालक के लक्षण हैं
(क) अनुशासन के प्रति ईमानदार
(ख) अध्ययन में एकाग्रता
(ग) सद्गुणों तथा अच्छी आदतों से युक्त
(घ) ये सभी लक्षण
उत्तर :
(घ) ये सभी लक्षणे

प्रश्न 10
व्यक्ति की जन्मजात प्रेरणा है [2012, 14]
(क) आदत
(ख) मनोरंजन
(ग) भूख
(घ) महत्त्वाकांक्षा का स्तर
उत्तर :
(ग) भूख

प्रश्न 11
गैरेट के अनुसार प्रेरणा के कितने प्रकार हैं? [2016]
(क) 5
(ख) 3
(ग) 8
(घ) 6
उत्तर :
(ख) 3

प्रश्न 12
‘प्यास किस प्रकार का प्रेरक है? [2016]
(क) अजित
(ख) जन्मजात
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) जन्मजात

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 18
Chapter Name Learning Meaning, Process, Laws and Methods
(सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ))
Number of Questions Solved 76
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods (सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। सीखने की विशेषताओं का सामान्य विवरण भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सीखने का अर्थ व परिभाषा जीवन की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए गते अनुभवों की सहायता से व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया को हम सीखना कहते हैं। वास्तव में, ‘सीखना किसी स्थिति के प्रति एक सक्रिय प्रतिक्रिया है। इस प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही व्यक्ति के व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन होते हैं। प्रत्येक प्रतिक्रिया एक अनुभव देती है और यह अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। इस सम्पूर्ण प्रतिक्रिया को ही हम सीखना कहते हैं। सीखने की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं।

1. वुडवर्थ :
(Woodworth) के अनुसार, “नवीन ज्ञान और प्रतिक्रियाओं को करने की प्रक्रिया, सीखने की प्रक्रिया है।”

2. गेट्स :
व अन्य के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।”

3. स्किनर :
(Skinner) के अनुसार, “सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रतिक्रिया

4. क्रॉनबैक :
(Cronback) के अनुसार, “सीखना, अनुभव के फलस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन द्वारा अभिव्यक्त होता है।”

5. कॉलविन :
(Colvin) के अनुसार, “अनुभव के आधार पर हमारे पूर्व-निर्मित व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया ही सीखना है।”

6. गिलफोर्ड :
(Guilford) के अनुसार, “व्यवहार के कारण, व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना

7. जी० डी० बॉज :
(G. D. Boaz) के अनुसार, “सीखना एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति विभिन्न आदतों, ज्ञान एवं दृष्टिकोण सामान्य जीवन की माँगों की पूर्ति के लिए अर्जित करता है।

8. क्रो व क्रो :
(Crow & Crow) के अनुसार, “ज्ञान और अभिवृत्ति की प्राप्ति ही सीखना है।”

9. प्रेसी :
(Pressy) के अनुसार, “सीखना एक अनुभव है, जिसके द्वारा कार्य में परिवर्तन या समायोजन होता है तथा व्यवहार की गयी विधि प्राप्त होती है।”

10. हिलगार्ड :
(Hilgard) के अनुसार, “सीखना एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई प्रक्रिया आरम्भ होती है या सामना की गयी परिस्थिति द्वारा परिवर्तित की जाती है। इसके लिए आवश्यक है कि क्रिया के परिवर्तन की विशेषताओं, मूल-प्रवृत्तियों की प्रक्रिया, परिपक्वता या प्राणी की अस्थायी आवश्यकताओं के आधार पर उस प्रक्रिया को समझाया न जा सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि

  • सीखने का अर्थ व्यवहार में परिवर्तन है।
  • सीखना व्यवहार का संगठन है।
  • सीखना नवीन प्रक्रिया की पुष्टि है।

सीखने की प्रमुख विशेषताएँ
सीखने की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. सीखना परिवर्तन है :
अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर समय व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इसके लाभ उठाकर व्यक्ति अपने सीखने की प्रमुख विशेषताएँ व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है।

2. सीखना खोज करना है :
मर्सेल (Mursell) के अनुसार, “सीखना उसे तथ्य खोजने और जानने का कार्य है, जिसे व्यक्ति खोजना और जानना चाहता है। वास्तव में, सीखना एक प्रकार से खोज करना है। आज मानव ने जो प्रगति की है, उसको मूल आधार इस प्रकार का सीखना ही है।

3. सीखना जीवन-पर्यन्त चलता है :
अनुभव का जीवन में विशेष महत्त्व हैं, और यह जन्म से लेकर मृत्यु तक निरन्तर चलता रहता है। व्यक्ति जीवनभर कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है और यह प्रक्रिया निरन्तर मृत्यु तक चलती ही रहती है।

4.सीखना सक्रिय है :
सीखना बिना सक्रियता के सम्भव नहीं है। बालक सक्रिय होकर ही सीखता है।

5. सीखना विकास है :
सीखना एक विकास है, जिसका कभी अन्त नहीं होता है। प्रत्येक पल व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखती रहता है, जिसके परिणामस्वरूप उसका मानसिक विकास होता रहता है।

6.सीखना अनुभवों का संगठन है :
एक व्यक्ति जैसे-जैसे अपने अनुभवों के आधार पर नवीन बातें सीखता है, वैसे-ही-वैसे वह आवश्यकतानुसार अपने अनुभवों को संगठित करता जाता है।

7. सीखना सार्वभौमिक है :
सीखना एक सार्वभौमिक क्रिया है, जो समस्त प्राणियों में पायी जाती है। विकास की श्रेणियों के आधार पर प्राणियों के सीखने में अन्तर होता है। पशु-पक्षी कम सीखते हैं, क्योंकि उनमें अपने अनुभव से लाभ उठाने की क्षमता कम होती है। सीखने की प्रवृत्ति मनुष्य में सबसे अधिक पायी जाती है।

8. सीखना उद्देश्यपूर्ण है :
सीखना उद्देश्यपूर्ण होता है। बिना उद्देश्य के सीखना सफल नहीं हो सकता। उद्देश्य की प्रबलता ही सीखने की क्रिया तीव्र करती है।

9. सीखना समायोजन है :
सीखकर मनुष्य अपने को वातावरण से समायोजित करता है। इस प्रकार का समायोजन करना ही सीखना है।

प्रश्न 2
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
सीखने को प्रभावित करने वाले कारकों को बताइए। [2016]
उत्तर :
सीखने को प्रभावित करने वाले कारक
सीखने की प्रक्रिया में अनेक बातें सहायक और बाधक होती हैं। यहाँ हम उन कारकों का अध्ययन करेंगे, जिनसे सीखने की क्रिया प्रभावित होती है।

1. वातावरण :
वातावरण प्रमुख कारक है, जो सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यदि कक्षा का वातावरण शोरगुलयुक्त है, तो छात्र अपना ध्यान एकाग्र नहीं कर सकेंगे। परिणामस्वरूप वे ठीक प्रकार से सीख भी नहीं सकेंगे। उसके अतिरिक्त यदि छात्रों के बैठने की व्यवस्था उचित प्रकार से नहीं है, प्रकाश और वायु के आवागमन की भी उचित व्यवस्था नहीं है तो भी छात्र ठीक प्रकार से नहीं सीख सकेंगे। मौसम का प्रभाव भी सीखने पर पड़ता है। अत्यधिक ठण्डक और अत्यधिक गर्मी दोनों ही सीखने में बाधा पहुँचाती हैं।

2. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य :
यदि बालकों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होगा तो वह किसी भी बात को शीघ्रता से सीख जाएगा। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से पिछड़े बालक प्रायः पढ़ने-लिखने में कमजोर रहते हैं और वे बहुत देर से सीख पाते हैं।

3.सीखने का समय :
बालक अधिक समय तक किसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकती, क्योंकि अधिक समय तक ध्यान केन्द्रित करने में उनमें थकावट आ जाती है और उनका ध्यान इधर-उधर भटकने लगता है। दूसरी ओर प्रात:काल छात्र अधिक स्फूर्ति का अनुभव करते हैं। अत: इस समय उन्हें सीखने में सुगमता होती है। दोपहर अथवा शाम को वह इतना अधिक नहीं सीख पाते। इसी प्रकार विद्यालय के प्रथम घण्टे में जो सीखने की गति होती है, वह अन्त के घण्टों में बहुत कम हो जाती है।

4. विषय-सामग्री :
कठिन, नीरस तथा अर्थहीन विषय-सामग्री की अपेक्षा सरल, रोचक तथा अर्थपूर्ण विषय-सामग्री अधिक सुगमता से सीख ली जाती है।

5. सीखने की अवस्था :
प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा छोटे पाक से बालक किसी बात को शीघ्र समझ जाते हैं। भाषा और कला के विषय में यह बात मुख्य रूप से लागू होती है, परन्तु कुछ बातें बालकों की । अपेक्षा प्रौढ़ जल्दी समझते हैं।

6. सीखने की इच्छा :
सीखना बहुत कुछ व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। जिस बात को सीखने की बालकों की प्रबल इच्छा होती है, उसे वे प्रत्येक परिस्थिति में सीख लेते हैं। उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता है। अतः किसी तथ्य को सीखने के लिए छात्रों की इच्छा को उसके अनुकूल बनाना परम आवश्यक है।

7. सीखने की विधियाँ :
सीखने की विधि जितनी ही अधिक सरल, आकर्षक तथा रुचिपूर्ण होगी, उतनी ही सरलता तथा शीघ्रता से बालक सीखेगा।

8. पूर्व अनुभव :
बालक जो कुछ भी सीखता है, वह प्रायः अपने पूर्व अनुभव के आधार पर ही सीखता है। यदि सीखने का सम्बन्ध बालक के पूर्व अनुभव से कर दिया जाए तो वह नवीन बात शीघ्रता तथा सरलता से समझ जाएगा।

9. प्रेरणा :
सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि बालकों को प्रशंसा तथा प्रतियोगिता के आधार पर सिखाया जाए तो वे सुगमता से सीख जाते हैं। सीखने के लिए बालक को प्रेस्ति करना अति आवश्यक है।

10. संवेगात्मक स्थिति :
यदि बालक अत्यधिक क्रोध या भय से ग्रस्त है तो वह ऐसी दशा में कुछ नहीं सीख सकता। संवेगात्मक अस्थिरता सीखने की प्रक्रिया में बाधा डालती है। अत: बालक को संवेगात्मक असन्तुलन या अस्थिरता की दशा में सीखना पूर्णतया असम्भव है।

11. सफलता का ज्ञान :
जब बालक को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसे अपने कार्यों में सफलता मिल रही है तो उसका उत्साह बढ़ जाता है और उसे कार्य को शीघ्र समझे जाता है।

प्रश्न 3
थॉर्नडाइक के सीखने के नियम क्या हैं? पावलोव के प्रयोग द्वारा सम्बन्ध प्रत्यावर्तन, का सिद्धान्त समझाइए। [2007]
या
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। [2007]
या
अधिगम के प्रयास एवं भूल सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2014]
उत्तर :
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना
इस विधि या सिद्धान्त के प्रतिपादक थॉर्नडाइक हैं और मैक्डूगल ने इसका समर्थन किया है।
थॉर्नडाइक के अनुसार जब हम किसी कार्य को सीखते हैं तो हमारे सामने एक विशेष उद्दीपक (Stimulus) होता है। यह उद्दीपक हमें एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया (Response) करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार उद्दीपक और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध की स्थापना हो जाती है। थॉर्नडाइक ने इसे उद्दीपक-क्रिया-सम्बन्ध बताया है।

उनके अनुसार उद्दीपक-प्रतिक्रिया सम्बन्ध के परिणामस्वरूप जब हम भविष्य के उसी उद्दीपक का पुनः अनुभव करते हैं, तब हम उससे सम्बन्धित उस प्रकार की प्रतिक्रिया करते हैं। यही हमारे सीखने का आधार है। थॉर्नडाइक के अनुसार, “सीखना, सम्बन्ध स्थापित करना है। सम्बन्ध स्थापित करने का कार्य मस्तिष्क करता है।

1. थॉर्नडाइक :
थॉर्नडाइक के इस सिद्धान्त का सार यह है कि जब हम किसी नवीन बात को सीखते हैं, तो हम तत्काल ही उसे नहीं सीख पाते, वरन् हमें उस बात को सीखने के लिए अनेक प्रयास करने पड़ते हैं और इन प्रयासों के दौरान हम कई त्रुटियाँ भी कर सकते हैं। धीरे-धीरे हमारी त्रुटियों में कमी होती जाती है और हम तथाकथित बात को सीख जाते हैं। उदाहरण के लिए—जब एक बालक प्रारम्भ में पढ़ना-लिखना सीखता है

तो आरम्भ में तो एक अक्षर भी ठीक प्रकार से नहीं लिख पाता और न ही वह शब्दों का सही उच्चारण ही कर पाता है, लेकिन ज्यों-ज्यों वह प्रयास करता है, उसकी त्रुटियों या भूलों में कमी आती जाती है और अन्ततः वह अक्षरों का लिखना और शब्दों का सही उच्चारण करना सीख जाता है। इस विधि से मनुष्य और पशु ही अधिक सीखते हैं। थॉर्नडाइक, मैक्डूगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने पशुओं पर भी प्रयोग करके इसका सत्यापन किया

2. थॉर्नडाइक का प्रयोग :
थॉर्नडाइक ने प्रयास एवं त्रुटि या भूल एवं प्रयत्न विधि का सत्यापन करने के लिए एक बिल्ली पर प्रयोग किया। उसने एक भूखी बिल्ली को पिंजरे में बन्द कर दिया। इस पिंजरे में एक बटन लगा था जिसके दबाने पर पिंजरे का दरवाजा झटके के साथ खुल जाता था। उसने पिंजरे के बाहर कुछ भोजन रख दिया। भूखी बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक था। अत: भोजन को देखकर बिल्ली में प्रतिक्रिया हुई।

उसने अनेक प्रकार से निकलने का प्रयास किया। अचानक उसका पंजा बटन पर पड़ गया। पिंजरे का दरवाजा झटके के साथ खुल गया और उसने बाहर आकर भोजन चट कर लिया। कुछ काल के बाद जब बिल्ली को पुनः पिंजरे में बन्द किया गया तो वह बिना कोई त्रुटि किये बटन दबाकर दरवाजा खोलने लगी। इस प्रकार उद्दीपक तथा प्रतिक्रिया में सम्बन्ध की स्थापना से बिल्ली ने बटन दबाकर दरवाजा खोलना सीखा।

(संकेत : पावलोव के सम्बन्ध प्रत्यावर्तन के सिद्धान्त को विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 के (ब) में देखें।)

प्रश्न 4
सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने का प्रयोग सहित वर्णन कीजिए और इसकी शैक्षिक उपयोगिता बताइए। [2012, 13]
या
आई० पी०पावलोव द्वारा किये गये प्रयोग को लिखिए और इसकी सहायता से ‘अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त का विवेचन कीजिए। इसकी शैक्षिक उपयोगिता भी लिखिए। [2007, 15]
या
कोहलर द्वारा किये गये किसी एक प्रयोग को लिखिए और इसकी सहायता से अन्तर्दृष्टि से सीखने के सिद्धान्त का विवेचन कीजिए।
या
अन्तर्दृष्टि अधिगम सिद्धान्त के प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए और इसके शैक्षिक निहितार्थ की भी चर्चा कीजिए। [2007]
या
सूझ द्वारा सीखने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए और शिक्षा में इसकी उपयोगिता बताइए। [2011]
या
सूझ द्वारा सीखने का अर्थ किसी प्रयोग की सहायता से स्पष्ट कीजिए और उसके शैक्षिक निहितार्थ बताइए। [2007, 09, 10]
या
अधिगम के सम्बन्ध में प्रत्यावर्तन सिद्धान्त की विवेचना कीजिए तथा इसके शैक्षिक निहितार्थों पर प्रकाश डालिए। [2012]
या
शिक्षा में अनुबन्धित प्रतिक्रिया की क्या उपयोगिता है? [2015]
या
सीखने के सूझ सिद्धान्त को समझाइए। [2009, 13]
या
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए और प्रयास तथा त्रटि के सिद्धान्त से इसका अन्तर बताइए। [2016]
उत्तर :
(अ)
सूझ या अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त
सूझ के सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक गेस्टाल्टवादी (Gestaltist) हैं। उनके अनुसार पशु और मनुष्य ‘सम्बन्ध प्रतिक्रिया’ तथा ‘प्रयास एवं त्रुटि’ से न सीखकर सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) द्वारा सीखते हैं। उनके मतानुसार सर्वप्रथम प्राणी अपने आस-पास की परिस्थिति के विभिन्न क्षेत्रों में पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करता है और सम्पूर्ण परिस्थिति को समझने का प्रयास करता है। तत्पश्चात् उसके अनुसार अपनी प्रतिक्रिया करता है। दूसरे शब्दों में, ‘सुझ’ द्वारा सीखने का तात्पर्य परिस्थिति को पूर्णतया समझकर सीखना है। गुड (Good) के अनुसार, “समझ, यथार्थ स्थिति का आकस्मिक, निश्चित और तत्कालीन ज्ञान है।”

कोहलर का प्रयोग :
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिए कोहलर (Kohler) ने छह वनमानुषों को एक कमरे में बन्द कर दिया। कमरे की छत पर केलों का एक गुच्छा लटका दिया गया तथा कमरे के एक कोने में एक बॉक्स भी रख दिया गया। समस्त वनमानुष केलों को प्राप्त करने के प्रयास करने लगे, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। उनमें से एक वनमानुष इधर-उधर घूमकर बॉक्स के पास पहुँच गया। तत्पश्चात् उसने बॉक्स को पकड़कर खींचा और उसे केलों के नीचे ले जाकर रख दिया तथा बॉक्स के ऊपर खड़े होकर उसने केलों के गुच्छे को उतार कर खा लिया।

इस प्रकार वनमानुष अपनी सूझ के आधार पर सीखते हैं। प्रत्येक कार्य या क्रिया के सीखने में हमें सूझ का प्रयोग करना पड़ता है। विभिन्न समस्याओं का हल भी सूझ के माध्यम से होता है। प्रायः देखा गया है कि किसी ऊँचे स्थान पर रखी मिठाई को बालक वनमानुष की विधि द्वारा ही प्राप्त करते हैं। कोफ्का के अनुसार, “सूझ में व्यक्ति चिन्तन, तर्क तथा कल्पना शक्ति से विशेष काम लेता है, जिस व्यक्ति में जितनी कल्पना-शक्ति होगी, उतनी ही उसमें सूझ होगी।” अल्प स्थान में ही एक इंजीनियर अपनी सूझ से विशाल भवन निर्मित कर देता है।

[संकेत : सीखने के सूझ-सिद्धान्त के शैक्षिक महत्त्व का विवरण अतिलघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 5 में तथा प्रयास तथा त्रुटि के महत्त्व का विवरण भी अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 4 में देखें।]

(ब)
सम्बन्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त
जब स्वाभाविक उत्तेजक या उद्दीपक (Stimulus) को देखकर प्रतिक्रिया होती है, तब वह सहज क्रिया (Reflex Action) कहलाती है, परन्तु जब अस्वाभाविक उत्तेजक के कारण प्रतिक्रिया होती है तो उसे सम्बन्ध सहज क्रिया या सम्बन्ध प्रतिक्रिया कहा जाता है। उदाहरण के लिए, थाली में रखे भोजन को देखकर कुत्ते के मुख से लार टपकना एक प्रकार की सहज क्रिया है, परन्तु जब किसी अन्य अस्वाभाविक उत्तेजक के कारण लार टपकने लगे तो यह सम्बन्ध प्रतिक्रिया है। लैडेल (Ledell) के अनुसार, “सम्बन्ध सहज क्रिया में कार्य के प्रति स्वाभाविक उत्तेजक के स्थान पर एक प्रभावहीन उत्तेजक होता है, जो कि स्वाभाविक उत्तेजक से सम्बन्धित किये जाने के कारण प्रभावपूर्ण हो जाता है।

इस प्रकार सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त में अस्वाभाविक उत्तेजक के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है।

पावलोव का प्रयोग :
पावलोव (Pavlov) रूस का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक था। उसी ने सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस विषय में उसके द्वारा कुत्ते पर किया गया परीक्षण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह हम सब जानते हैं कि भोजन को देखकर कुत्ते की लार टपकने लगती है। पॉवलोव ने भोजन देते समय घण्टी बजवाई। भोजन और घण्टी की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप कुत्ते के मुख से लार टपकने लगी। इसी प्रकार घण्टी के प्रति कुत्ते की प्रतिक्रिया सम्बन्ध सहज क्रिया कहलाई। इसे निम्नलिखित ढंग से समझाया जा सकता है

भोजन (स्वाभाविक उत्तेजक) – प्रतिक्रिया → “लार टपकना”
भोजन (स्वाभाविक उत्तेजक), घण्टी बजाना (अस्वाभाविक उत्तेजक) – प्रतिक्रिया → “लार टपकना”।
कुत्ते के समान ही मनुष्य भी ‘सम्बन्ध प्रतिक्रिया द्वारा सीखता है। उदाहरण के लिए-हम वुडवर्ड (woodword) द्वारा किया गया परीक्षण प्रस्तुत करते हैं। एक वर्ष के बालक को खरगोश दिखाया गया। बालक खरगोश को देखकर प्रसन्न होकर उसे पकड़ने के लिए लपका। जैसे ही वह खरगोश के निकट आया, एक जोरदार धमाका किया गया। परिणामस्वरूप बालक भयभीत होकर पीछे हट गया। इस प्रयोग को अनेक बार दोहराया गया। बाद में बिना धमाके की आवाज के केवल खरगोश को देखकर ही बालक डरने लगा।

सिद्धान्त का महत्त्व शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त के महत्त्व से सम्बन्धित निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं

  1. पावलोव के अनुसार, “विभिन्न प्रकार की आदतें, जो कि प्रशिक्षण, शिक्षा और अनुशासन पर निर्भर प्रतिक्रिया की श्रृंखला मात्र हैं।”
  2. व्यक्ति का प्रत्येक व्यवहार सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त पर आधारित है। हमारी दैनिक आदतें भी इसी सिद्धान्त पर निर्भर करती हैं।
  3. इस सिद्धान्त के आधार पर बालकों में अच्छी आदतों का विकास किया जा सकता है।
  4. यह सिद्धान्त सीखने की स्वाभाविक विधि पर प्रकाश डालता है।
  5. इस सिद्धान्त के द्वारा बालकों को वातावरण के अनुकूल सामंजस्य स्थापित करने की शिक्षा दी जा सकती है।
  6. इस सिद्धान्त की सहायता से बालकों के भय सम्बन्धी रोगों का निदान किया जा सकता है।
  7. इस सिद्धान्त के द्वारा बालकों की संवेगात्मक अस्थिरता दूर की जा सकती है।
  8. यह सिद्धान्त उन बालकों के लिए उपचार प्रस्तुत करता है, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं।
  9. जिन विषयों में चिन्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उनके लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है; जैसे—अक्षर विन्यास, सुलेख आदि।

आलोचना :
अनेक मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इस सिद्धान्त की आलोचना की है

  1. सम्बन्ध प्रतिक्रिया में अस्थायित्व होता है।
  2. इस सिद्धान्त को प्रतिष्ठदन मुख्यतया बालकों और पशुओं पर किये गये प्रयोगों के आधार पर किया गया है। वयस्क व्यक्तियों के सम्बन्ध में यह मौन है।
  3. यह सिद्धान्त यान्त्रिकता पर अधिक बल देता है और व्यक्ति को केवल एक यन्त्र मानकर चलता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने की प्रक्रिया के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सीखने की प्रक्रिया सरल नहीं होती है। इसलिए इसे आसानी से समझना सम्भव नहीं है। विश्लेषण करने पर सीखने की प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्त्व मिलते हैं

1. उत्तेजना-अनुक्रिया :
सीखना अर्जित होता है। इस दृष्टि से व्यक्ति को अपने पर्यावरण में कुछ उत्तेजना अवश्य मिलती है और उसके प्रति अनुक्रिया होती है। इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया में उत्तेजना तथा अनुक्रिया होती है।

2. उद्देश्य और लक्ष्य :
सीखना एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा समाज में सम्मान आदि पाने के उद्देश्य से व्यक्ति सीखता है।

3. अभिप्रेरणा :
सीखना अर्जित अवश्य होता है, परन्तु इसके लिए कुछ-न-कुछ अभिप्रेरण होना। चाहिए। छात्र सीखने के लिए प्रयत्न इसलिए करता है कि उसे परीक्षा पास करने पर नौकरी और सम्मान मिल सकता है।

4. प्रत्यक्षीकरण :
सीखने में प्रत्यक्षीकरण होना आवश्यक है। यदि छात्र को अपने लक्ष्य एवं प्रयत्न के परिणाम स्पष्ट दिखलाई देने लगते हैं तो सीखना सरल और सफल भी होता है और छात्र उसमें लगा रहता है।

5. पुनर्बलन :
पुनर्बलन की क्रिया से व्यक्ति सीखने के लिए बाध्य हो जाता है और उसे बल भी प्राप्त होता है। छात्र को शिक्षक का आदेश, दूसरों की प्रतिस्पर्धा, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि से शक्ति मिलती है।

6. एकीकरण :
सीखने में व्यक्ति को अपने ध्यान को विभिन्न वस्तुओं में एकीकृत करना पड़ता है। और किसी प्रयोजन के साथ उनको ग्रन्थित करना पड़ता है, जिससे सफलता मिलती है।

7. साहचर्य :
सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने पूर्व अनुभव ज्ञान से नये अनुभव ज्ञान का साहचर्य कर लेता है। हरबर्ट ने अपने प्रशिक्षण में इसे अपनाया है।

8. अनुकूलन :
सीखने की प्रक्रिया में अनुकूलन एक आवश्यक तत्त्व होता है। छात्र की प्रकृति का सीखने की सामग्री के साथ अनुकूलन होना चाहिए, अन्यथा सीखना सम्भव नहीं होगा। छात्र की क्षमता सीखने की सामग्री को भी अपने अनुकूल बना लेती है, यदि छात्र प्रयत्न करता है।

9. संपरिवर्तन :
सीखने की प्रक्रिया के फलस्वरूप संपरिवर्तन होता है और मूल व्यवहार शिष्ट एवं परिमार्जित हो जाते हैं।

प्रश्न 2
परिपक्वता तथा सीखने में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर :
हमें बात है कि सीखना, व्यवहारे परिवर्तन या व्यवहार अर्जन की एक प्रक्रिया है। किसी व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तन या तो परिपक्वता के कारण होता है या किसी नयी बात को ग्रहण करने के कारण। परिवर्तन की प्रक्रिया में नयी-नयी क्रियाएँ और व्यवहार प्रदर्शित तथा विकसित होते रहते हैं। परिपक्वता शारीरिक विकास की प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बढ़ती हुई आयु के साथ, शरीर व स्नायुमण्डल का विकास, सीखने की सामर्थ्य को जन्म देता है।

स्पष्टतः सीखने के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है। परिपक्वता की प्रक्रिया सीखने से पूर्व की स्थिति है तथा यह सीखने का आधार है। परिपक्वता के अभाव में किसी क्रिया को सीखना न केवल दुष्कर अपितु असम्भव है। वस्तुतः परिपक्वता किसी व्यवहार को अर्जित करने (सीखने) की एक पूर्व आवश्यकता है।

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मानव के विकास की प्रक्रिया में परिपक्वता और सीखना दोनों की सशक्त भूमिका है। यदि परिपक्वता के अभाव में सीखना सम्भव नहीं है तो सीखने के अभाव में व्यक्ति की परिपक्वता भी निरर्थक है। समुचित परिपक्वता ग्रहण कर यदि कोई मनुष्य व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी व्यवहार या क्रियाएँ सीखता है तो इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझा जाएगा। इस भाँति परिपक्वता और सीखने में गहरा सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से दर्शाया जा सकता है।
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प्रश्न 4
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के नियमों की विवेचना कीजिए। उपयुक्त उदाहों सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
या
थॉर्नडाईक के सीखने के मुख्य नियमों का वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12, 13, 15, 16]
उत्तर :
सीखने के नियमों को सर्वप्रथम व्यवस्थित ढंग से थॉर्नडाइक ने प्रस्तुत किया था, इसीलिए इन्हें थॉर्नडाइक के सीखने के नियमों के रूप में जाना जाता है। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम तीन हैं

  1. सीखने का तत्परता का नियम्
  2. सीखने का अभ्यास का नियम तथा
  3. सीखने का प्रभाव का नियम।

सीखने का तत्परता को नियम
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित तत्परता का नियम बताता है कि जब कोई भी व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तत्पर होता है (अर्थात् तैयार रहता है) तो सीखने की क्रिया सरलता और शीघ्रता से सम्पन्न होती है। व्यक्ति जिसे समय किसी कार्य को सीखने की धुन में रहता है तो वह सीखने में आनन्द का अनुभव करता है। बांलक में किसी नवीन ज्ञानं या क्रिया को सीखने की तत्परता तभी आती है जब उसमें रुचि होती है और उसके अन्दर सीखने के लिए प्रेरणा उत्पन्न कर दी जाए।

अतः शिक्षक को पाठ शुरू करने से पूर्व बालक की रुचि और जिज्ञासा पर ध्यान देना चाहिए तथा उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कुछ विद्यार्थियों की किसी विशेष विषय में रुचि नहीं होती जिसकी वजह से तत्परता के नियम की अवहेलना हो सकती है। तत्परता का नियम कुछ निष्कर्षों को महत्त्व देता हैं। प्रथम, इस नियम के अनुसार सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने की दशा में विद्यार्थी को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता और सीखने की प्रक्रिया सन्तोषजनक रहती है।

द्वितीय, यदि व्यक्ति सीखने के लिए विवश नहीं है और पूर्णरूप से भी तत्पर है तो सीखने में अत्यधिक सन्तुष्टि प्राप्त होगी। तृतीय, सीखने के लिए बलपूर्वक विवश किये जाने पर अरुचि के कारण कार्य असन्तोषजनक होगा। इस भाँति कहा जा सकता है कि “जब कोई बन्धन किसी कार्य को करने के लिए नहीं होता है तो वह प्रक्रिया आनन्द देती है। और जब सीखने की इच्छा नहीं होती तो व्यक्ति सीखने को तैयार नहीं होता तथा उसे बाध्य किया जाता है, तब क्रोध उत्पन्न होता है।”

[संकेत : सीखने के द्वितीय एवं तृतीय नियम का विवरण अगले प्रश्नों (प्रश्न सं० 5 व 6) में देखिए।]

प्रश्न 5
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के ‘अभ्यास के नियम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने का दूसरा मुख्य नियम है-अभ्यास का नियम। इसे उपयोग-अनुपयोग का नियम (Law of Use-Disuse) भी कहते हैं। थॉर्नडाइक का विचार है कि अन्य बातें समान रहने पर सीखने की प्रक्रिया में अभ्यास के द्वारा शक्ति में वृद्धि होती है, जबकि अभ्यास की कमी स्थिति और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध को कमजोर बना देती है।

हमारी बहुत-सी प्रतिक्रियाओं में उपयोग तथा अनुपयोग के नियम साथ-साथ कार्य करते हैं। हम स्वतन्त्र भाव से उन्हीं उपयोगी क्रियाओं को दोहराते हैं जिनसे हमें आनन्द मिलता है तथा उन अनुपयोगी क्रियाओं को नहीं दोहराते जिनसे हमें दुःख होता है।

अभ्यास के नियम से स्पष्ट है कि जिस काम को जितना अधिक दोहराया जाएगा, जितनी ही उसकी पुनरावृत्ति की जाएगी, उतनी ही दृढ़ता से वह हमारे मन में बैठ जाता है और उसके करने में उतनी ही कुशलता आ जाती है। गायन, खेल, कविता, पहाड़े तथा गणित आदि से सम्बन्धित नियम सिखाने के उपरान्त बालकों को उनका अभ्यास अवश्य करा देना चाहिए।

प्रश्न 6
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के प्रभाव के नियम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने का तीसरा मुख्य नियम है 
प्रभाव का नियम (Law of effect)। प्रभाव के नियम को सन्तोष और असन्तोष का नियम भी कह्ते हैं। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित इस नियम में प्रभावे से तात्पर्य ‘परिणाम’ से है। जिन कार्यों का परिणाम व्यक्ति को सन्तोष प्रदान करता है। तथा उसे सुखद अनुभव देता है-उन कार्यों को मनुष्य सरलता से एवं शीघ्र ही सीख जाता है। इसके विपरीत जिन कार्यों का परिणाम असन्तोषजनक तथा दु:खद अनुभव वाला होता है, उन्हें व्यक्ति भुला, देना चाहता है और बार-बार दोहराना नहीं चाहता।

इसी सन्दर्भ में जिस कार्य को करने से व्यक्ति को प्रशंसा एवं पुरस्कार मिले यानि जिस कार्य का अच्छा प्रभाव (परिणाम) निकले, उसे बालक शीघ्रतापूर्वक सीख जाता है। इसी कारण से शिक्षा में दण्ड एवं पुरस्कार को बहुत अधिक महत्त्व है। बुरा कार्य करने पर बालक दण्ड पाता है किन्तु अच्छे कार्य के लिए उसे पुरस्कृत किया जाता है। प्रभाव का नियम विद्यालय तथा परिवार में पर्याप्त रूप से प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 7
सीखने के पठार से आप क्या समझते हैं।
उत्तर :
जब बालक किसी क्रिया को सीखता है तो उसके सीखने की गति सदा एक-सी नहीं रहती, उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। सीखते समय कुछ काल तक तो ऐसा लगता है कि उस क्रिया को सीखने में पर्याप्त प्रगति हो रही है, परन्तु कुछ काल के पश्चात् ऐसा ज्ञान होने लगता है कि मानो सीखने की प्रगति में बाधा आ गयी है। सीखने में इस प्रकार की अवस्था को ही पठार कहते हैं।

दूसरे शब्दों में, सीखने की प्रक्रिया के बीच में प्रगति का रुक जाना पठार कहलाता है। इस प्रकार का अवरोध प्रायः संगीत, चित्रकला, टंकण आदि सीखने में आता है। रॉस (Ross) के अनुसार, “सीखने की प्रक्रिया की एक प्रमुख विशेषता पठार है। पठार उस अवधि की ओर संकेत करते हैं, जब सीखने की प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं होती है।”

प्रश्न 8
सीखने के पठार के उत्पन्न होने के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सीखने में पठारों के आने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं

  1. जब शारीरिक क्षमता कम हो जाती है, तब सीखने में पठार बन जाता है।
  2. जब उत्साह कम हो जाता है, तब उसके सीखने की प्रगति में अवरोध हो जाता है।
  3. जब बालकों का ध्यान इधर-उधर भटकने लगता है, तब पठार बनने लगते हैं।
  4. लगातार कार्य करते रहने से थकान उत्पन्न हो जाती है और पठार बन्ने लगते हैं।
  5. सीखने की विधि में निरन्तर परिवर्तन करते रहने से भी पठार बन जाते हैं।
  6. दूषित वातावरण भी पठारों के बनने का एक प्रमुख कारण है।
  7. जब बालक सम्पूर्ण कार्य पर ध्यान न देकर उसके एक भाग पर ही ध्यान देने लगता है, तब उसके सीखने में पठार आ जाता है।
  8. जब कोई क्रिया आरम्भ में सरल होती है, परन्तु बाद में कठिन तथा जटिल हो जाती है, तब सीखने में पठार आ जाता है।
  9. सीखने की अनुचित विधि भी पठारों का कारण होती है। जब प्रभावहीन विधियों का प्रयोग किया जाता है, तब सीखने में पठार पैदा होने लगते हैं।
  10. जब पुरानी आदतों को नयी आदतों में संघर्ष प्रारम्भ हो जाता है, तब भी सीखने में पठार बन जाते हैं।
  11. रायबर्न (Ryburm) के अनुसार, “प्रत्येक व्यक्ति में अधिकतम कुशलता होती है, जिससे आगे वह अग्रसर नहीं हो सकता। यही शारीरिक सीमा कहलाती है। जब व्यक्ति इस सीमा पर पहुँच जाता है, तब उसके सीखने के पठार बन जाते हैं।”

प्रश्न 9
सीखने के पठार के निराकरण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पठार सीखने वाले व्यक्ति की प्रगति में बाधा डालकर उसके समय को नष्ट करते हैं। ऐसी दशा में उनके निराकरण पर विचार करना अत्यन्त आवश्यक है।

पठारों के निराकरण के लिए। निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

  1. शिक्षक का कर्तव्य है कि जब बालक सीखने में उत्साह को प्रदर्शन न कर रहे हों, तो उन्हें उचित तरीके से सीखने के लिए प्रेरित किया जाए।
  2. पठार का कारण विषय को कठिन व गहन होना भी है। अत: विषय को यथासम्भव सरल बनाकर प्रस्तुत किया जाए।
  3. कार्य को सीखने की उचित विधि अपनायी जाए।
  4. सीखने की क्रिया के बीच में विषयान्तर न किया जाए।
  5. सीखने के लिए उचित वातावरण सृजन किया जाए।
  6. सीखने वाले बालकों के वैयक्तिक भेद या क्षमताओं पर ध्यान दिया जाए तथा उसी के अनुसार उन्हें प्रेरणा तथा विश्राम दिया जाए।
  7. जब एक विधि से बालकों की सीखने की प्रगति रुक जाए तो शिक्षक को उसी के अनुकूल नवीन विधि का प्रयोग करना चाहिए।
  8. किसी प्रबल प्रेरक को अपनाकर भी सीखने के पठार का निराकरण किया जा सकता है। प्रेरण एक ऐसा कारक है जो सीखने को गति प्रदान कर सकता है।

प्रश्न 10
सीखने के अनुकरण के सिद्धान्त का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
1. अनुकरण के सिद्धान्त का तात्पर्य है :
‘अन्य व्यक्तियों के कार्यों को देखकर वैसा ही करके, सीखना।’ दूसरे शब्दों में, हम अनेक बातें अनुकरण के द्वारा सीखते हैं। जब व्यक्ति एक-दूसरे का अनुकरण करके सीखता है तो उसे अनुकरण का सिद्धान्त कहते हैं। बालक अनेक बातें अनुकरण के द्वारा ही सीखता है। बोलना, चलना तथा अनेक बातें अनुकरण के द्वारा ही सीखी जाती हैं।

2. हेगार्टी :
(Hagarty) ने बन्दरों पर प्रयोग करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अनुकरण द्वारी सीखना, प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने की अपेक्षा उच्चकोटि का है, परन्तु थॉर्नडाइक के इस सिद्धान्त की कटु आलोचना की है। उनके अनुसार इसका प्रयोग सभी प्रकार के पशुओं पर नहीं किया जा सकता है।

3. सिद्धान्त का महत्त्व :
शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त का महत्त्व इस प्रकार है।

  • रचनात्मक कार्यों को सीखने के लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
  • बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति तीव्र होती है। अत: अनुकरण द्वारा उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखायी जा सकती हैं।
  • चेतन-मन से किया गया अनुकरण अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक होता है।
  • यह सिद्धान्त बालकों के बौद्धिक विकास में सहायक है।
  • शिक्षकों तथा अभिभावकों के आदर्श चरित्र का अनुकरण करके बालक अपने चरित्र का निर्माण करते हैं।
  • मन्दबुद्धि बालकों की शिक्षा में यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 11
सीखने के ‘अन्तसँझ सिद्धान्त को परिभाषित कीजिए! [2016]
उत्तर :
गैस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, प्राणी अपनी सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) के द्वारा ही सीख पाता है और सूझ के अभाव में वह सीखने में असफल रहता है। उविकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत सूझ निम्न स्तर के प्राणियों से उच्च स्तर के प्राणियों की ओर वृद्धि करती है। चूहे, बिल्ली, कुत्ते की अपेक्षा वनमानुष में तथा इने सबसे ज्यादा मनुष्य में सूझ पायी जाती है। सूझ के कारण ही उच्च स्तर के प्राणी जटिल कार्य करने में समर्थ होते हैं।

गैस्टाल्टवादियों का कहना है कि सीखने की प्रक्रिया प्रयत्न एवं भूल अथवा सम्बद्ध प्रत्यावर्तन के अनुसार न होकर सूझ द्वारा होती है। इस विचारधारा के प्रवर्तके कोहलर (Kohler) तथा कोफ्का (Koffika) थे। सूझ या अन्तर्दृष्टि मनुष्य जैसे विकसित प्राणी का प्रमुख लक्षण है। मानव के निकटवर्ती विकसित प्राणियों तथा वनमानुष और चिम्पैन्जी में भी सूझ की क्षमता निहित होती है। कोहलर तथा कोफ्का के अनुसार हमारा सीखना सूझ के द्वारा होता है और सीखने की लगभग सभी प्रतिक्रियाओं में सूझ की आवश्यकता पड़ती है।

इस सिद्धान्त की प्रमुख विशेषता यह है कि सीखने की प्रत्येक क्रिया का कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य होता है तथा सीखने के समस्त प्रयास लक्ष्य द्वारा निर्देशित होते हैं। लक्ष्य में विविध बाधाएँ उत्पन्न होने पर सूझ की आवश्यकता होती है।प्रत्येक बाधा व्यक्ति को नवीन परिस्थिति से अवगत कराती है और वह उस परिस्थिति के विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करता है उन्हें समझने की कोशिश करता है।

तत्पश्चात् व्यक्ति समूची परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। किसी परिस्थिति विशेष को समझकर उसके अनुसार प्रतिक्रिया करना ही व्यक्ति की सूझ का द्योतक है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति जो व्यवहार सीखता है, उसे सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना (Learning by Insight) कहते हैं।

प्रश्न 12
सीखने की प्रयत्न (प्रयास) एवं भूल (त्रुटि) विधि तथा सूझ विधि के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सीखने की प्रयत्न एवं भूल विधि तथा सूझ विधि का अन्तर निम्नलिखित तालिका में वर्णित हैं।
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखना किसे कहते हैं? [2010, 15]
उत्तर :
व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले ऐच्छिक परिवर्तन को सीखना कह सकते हैं। सीखने की प्रक्रिया को सम्बन्ध नयी क्रियाओं से होता है तथा इस क्रिया द्वारा सीखी गयी बातों का अन्य बातों पर भी प्रभाव पड़ता है। सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में एक प्रकार की परिपक्वता भी आती है। इन्हीं तथ्यों को गिलफोर्ड ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “हम इस शब्द की परिभाषा विस्तृत रूप में यह कहकर कर सकते हैं कि सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप, व्यवहार में कोई भी परिवर्तन है।”

प्रश्न 2
सीखने की प्रक्रिया पर व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य का क्या प्रभाव प्रड़ता है?
उत्तर :
सीखने की तीव्रता व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य अच्छा न होने पर ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक काम नहीं कर पातीं, व्यक्ति रुचि लेकर कार्य नहीं करता और जल्दी ही थक जाता है। जो व्यक्ति देखने, सुनने, बोलने आदि क्रियाओं में निर्बल होते हैं, वे सीखने में पर्याप्त उन्नति नहीं कर पाते। वस्तुतः सीखने की प्रक्रिया का भौतिक और शारीरिक आधार स्नायु संस्थान है।

स्नायु संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क और स्नायु आते हैं जिनके कार्य करने की शक्ति पर सीखने की प्रक्रिया निर्भर करती है। मस्तिष्क और स्नायु की शक्ति, व्यक्ति के स्वास्थ्य पर निर्भर है। स्पष्टतः सीखने की क्रिया शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सीधे रूप में प्रभावित होती है।

प्रश्न 3
सीखने में प्रेरणा का क्या योगदान है? [2007, 08, 09]
उत्तर :
सीखने में प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सीखने में उन्नति लाने की दृष्टि से उसे प्रेरणायुक्त एवं प्रयोजनशील बना देना चाहिए। प्रेरणायुक्त व्यवहार उत्साह के कारण सीखने की प्रक्रिया को तीव्र कर देता है। अतः शीघ्र प्रेरणा से सीखने की गति में तीव्रता आती है। प्रेरणा का सम्बन्ध लक्ष्य या प्रयोजन । से है। यदि सीखने का लक्ष्य अच्छा है तो व्यक्ति उसे शीघ्र सीखने के लिए प्रेरित होता है। अतएव सीखने की प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए उसे उद्देश्यपूर्ण एवं प्रेरणायुक्त कर देना उचित है।

प्रश्न 4
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने की विधि की शैक्षिक उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के सिद्धान्त एवं विधि का विशेष शैक्षिक महत्त्व है। इस विधि के महत्त्व का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

  1. इस सिद्धान्त को अपनाकर बालक को परिश्रमी बनाया जा सकता है।
  2. यह सिद्धान्त बालकों में धैर्य का पाठ पढ़ाता है।
  3. मन्दबुद्धि के बालकों के लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
  4. इस सिद्धान्त के आधार पर बालक जो कुछ भी सीखता है, वह उसके मस्तिष्क में स्थायी हो जाता है।
  5. गणित और विज्ञान जैसे विषयों के लिए इसका प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
  6. इस सिद्धान्त के आधार पर सीखने से बालक विभिन्न समस्याओं का समाधान करना सीखते हैं।

प्रश्न 5
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त के शैक्षिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
शिक्षा में ‘सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त का निम्नलिखित कारणों से विशेष महत्त्व है।

  1. यह सिद्धान्त बालकों की कल्पना-शक्ति और तर्क-शक्ति का विकास करता है।
  2. विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए इस सिद्धान्तं का प्रयोग प्रभावशाली तरीके से किया जा सकता है।
  3.  यह सिद्धान्त बालकों को स्वयं ज्ञान को खोजने के लिए प्रेरित करता है।
  4. गणित के शिक्षण में भी इस सिद्धान्त का प्रयोग विशेष उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
  5. ड्रेवर (Drever) के अनुसार, यह सिद्धान्त बालकों को निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में उचित व्यवहार की चेतना प्रदान करता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने से क्या आशय है?
उत्तर :
व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को सीखना माना जाता है।

प्रश्न 2
सीखने की स्किनर द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रक्रिया है।” [ स्किनर ]

प्रश्न 3
सीखने की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. सीखना व्यवहार में होने वाला परिवर्तन है
  2. सीखने की प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती है
  3. सीखना सक्रिस होता है तथा
  4. सीखना अनुभवों का संगठन है।

प्रश्न 4
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं

  1. वातावरण
  2. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
  3. सीखने की इच्छा तथा
  4. प्रबल प्रेरणा।

प्रश्न 5
सीखने के मुख्य नियम किसने प्रतिपादित किये हैं। [2007]
उत्तर :
सीखने के मुख्य नियम थॉर्नडाइक ने प्रतिपादित किये हैं।

प्रश्न 6
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम कौन-कौन-से है।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम हैं

  1. तत्परता का नियम
  2. अभ्यास का नियम तथा
  3. प्रभाव का नियम

प्रश्न 7
शारीरिक परिपक्वता का क्या अर्थ है?
उत्तर :
शरीर के अंगों को विकसित तथा सुदृढ़ या पुष्ट होना ही शारीरिक परिपक्वता है।

प्रश्न 8
सीखने की प्रक्रिया पर परिपक्वता का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
सीखने की प्रक्रिया के लिए शरीर का परिपक्व होना अति आवश्यक है।

प्रश्न 9
थॉर्नडाइक ने सीखने की किस विधि का समर्थन किया है?
उत्तर :
थॉर्नडाइक ने सीखने का प्रयास एवं त्रुटि विधि’ का समर्थन किया है।

प्रश्न 10
थॉर्नडाइक ने पिंजरे में अपना प्रयोग किस पर किया ? [2007, 11]
उत्तर :
बिल्ली, पर।

प्रश्न 11
सीखने के सूझ अथवा अन्तर्दृष्टि के सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक कौन थे? [2014]
उत्तर :
सीखने के सूझे अथवा अन्तर्दृष्टि के सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक कोहलर थे।

प्रश्न 12
सीखने के सम्बन्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक कौन थे?
उत्तर :
सीखने के सम्बन्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक रूसी विद्वान पावलोव थे।

प्रश्न 13
सामान्य जीवन में व्यक्तियों द्वारा सीखने के लिए किस विधि को सर्वाधिक अपनाया जाता है?
उत्तर :
सामान्य जीवन में व्यक्तियों द्वारा सीखने के लिए अनुकरण विधि’ को सर्वाधिक अपनाया जाता है।

प्रश्न 14
सीखने के पठार से क्या आशय है।
उत्तर :
व्यक्ति के सीखने की दर का स्थिर हो जाना अर्थात् सीखने के दर में वृद्धि न होना ही सीखने का पठार कहलाता है।

प्रश्न 15
सीखने के पठार के निराकरण का सर्वाधिक प्रभावकारी उपाय क्या है?
उत्तर :
सीखने के पठार के निराकरण का सर्वाधिक प्रभावकारी उपाय है-किसी प्रबल प्रेरणा को उत्पन्न करना।

प्रश्न 16
सीखने का मुख्य कारण क्या है? [2015]
उत्तर :
सीखने का मुख्य कारण प्रेरणा है।

प्रश्न 17
“व्यवहार के अर्जन में उन्नति की प्रक्रिया को सीखना कहते हैं।” यह परिभाषा किसने दी है ? [2011]
उत्तर :
प्रस्तुत परिभाषा स्किनर द्वारा प्रतिपादित है।

प्रश्न 18
थॉर्नडाइक ने अधिगम के कितने नियम प्रतिपादित किये हैं। [2014]
उत्तर :
थॉर्नडाइक ने अधिगम के तीन मुख्य नियम प्रतिपादित किये हैं

  1. तत्परता का नियम
  2. अभ्यास का नियम तथा
  3. प्रभाव का नियम

प्रश्न 19
“हम झरके सीखते हैं।” यह किसने कहा है? [2014, 15]
उत्तर :
थॉर्नडाइक ने।

प्रश्न 20
थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम के कितने उपनियम हैं ? [2007]
उत्तर :
थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम के तीन उपनियम हैं

  1. पुनरावृत्ति का नियम
  2. नवीनता का नियम तथा
  3. अनुपयोग का नियम।

प्रश्न21
“व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है।” यह परिभाषा किसने दी है? [2009]
उत्तर :
गिलफोर्ड ने।

प्रश्न 22
सीखने की प्रक्रिया में उस दशा को क्या कहते हैं, जब व्यक्ति की सीखने की दर स्थिर हो जाती है? [2009]
उत्तर :
सीखने का पठार।

प्रश्न 23
अधिगम में चिम्पैंजी पर किसने प्रयोग किया? [2018]
उत्तर :
कोहलर ने।

प्रश्न 24
सीखने का प्रमुख कारक क्या है? [2009, 15]
उत्तर :
सीखने का प्रमुख कारक “अनुकरण” है।

प्रश्न 25
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार प्रमुख शारीरिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. आयु एवं परिपक्वता
  2. लिंग-भेद
  3. स्वास्थ्य तथा
  4. संवेगात्मक स्थिति।

प्रश्न 26
सीखने तथा परिपक्वता में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर :
परिपक्वता सीखने के लिए अनिवार्य शर्त है।

प्रश्न 27
अभिप्रेरणा का सीखने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
अभिप्रेरणा से सीखने की प्रक्रिया सुचारु एवं सरल हो जाती है।

प्रश्न 28
सीखने के तत्परता के नियम से क्या अभिप्राय है? [2008]
उत्तर :
सीखने के तत्परता के नियम के अनुसार कुछ भी सीखने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम मानसिक रूप से तैयार होना अनिवार्य है। इस नियम के अनुसार तैयारी या तत्परता सदैव सीखने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 29
सीखने के लिए मनुष्यों द्वारा सर्वाधिक किस विधि को अपनाया जाता है?
उत्तर :
अनुकरण विधि।

प्रश्न 30
सीखने की कौन-सी विधि ऐसी है, जिसे प्रमुख रूप से केवल मनुष्यों द्वारा ही अपनाया जाता है?
उत्तर :
सूझ अथवा अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने की विधि।

प्रश्न 31
सीखने की कौन-सी विधि ऐसी है जिसे मनुष्य तथा पशु समान रूप से अपनाते हैं?
उत्तर :
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना

प्रश्न 32
सूझ द्वारा सीखने की विधि को दर्शाने के लिए किस मनोवैज्ञानिक ने महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था तथा उसने यह प्रयोग किस पशु पर किया था?
उत्तर :
सूझ द्वारा सीखने की विधि को दर्शाने के लिए कोहलर नामक मनोवैज्ञानिक ने वनमानुष पर महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था।

प्रश्न 33
कोहलर ने अपना प्रयोग किस पर किया?
उत्तर :
कोहलर ने अपना प्रयोग चिम्पैंजी (वनमानुष) पर किया था।

प्रश्न 34
सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने की विधि को सर्वप्रथम किसने दर्शाया था?
उत्तर :
रूस के प्रसिद्ध शरीरशास्त्री पावलोव ने।

प्रश्न 35
पावलोव ने अफ्ना महत्त्वपूर्ण प्रयोग किस पशु पर किया था?
उत्तर :
कुत्ते पर।

प्रश्न 36
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  2. सीखने की प्रक्रिया केवल शैक्षिक-काल में ही होती है।
  3. सीखने की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।
  4. प्रेरणा का सीखने की प्रक्रिया पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  5. परिपक्वता का सीखने की प्रक्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं है।

उत्तर :

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
“सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में कोई परिवर्तन है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) वुडवर्थ ने
(ख) चार्ल्स स्किनर ने
(ग) कॉलविन ने
(घ) गिलफोर्ड ने
उत्तर :
(घ) गिलफोर्ड ने

प्रश्न 2
सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं
(क) कोहलर
(ख) स्किनर
(ग) पावलोव
(घ) थॉर्नडाइक
उत्तर :
(ग) पावलोव

प्रश्न 3
बिल्लियों पर प्रयोग किसने किया ?
(क) थॉर्नडाइक ने
(ख) स्किनर ने।
(ग) कोहलर ने
(घ) टरमन ने
उत्तर :
(क) थॉर्नडाइक ने

प्रश्न 4
नवीन अनुबन्धन सिद्धान्त के प्रवर्तक हैं
(क) पावलोव
(ख) थॉर्नडाइक
(ग) कोहलर
(घ) चाल्र्स स्किनर
उत्तर :
(घ) चार्ल्स स्किनर

प्रश्न 5
प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया ? [2015]
(क) कोहलर ने
|(ख) थॉर्नडाइक ने
(ग) टरमन ने
(घ) स्किनर ने
उत्तर :
(ख) थॉर्नडाइक ने

प्रश्न 6
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना ही
(क) सूझ का सिद्धान्त है
(ख) सम्बन्ध प्रतिक्रिया को सिद्धान्त है
(ग) अनुकरण का सिद्धान्त है
(घ) उद्दीपक प्रतिक्रिया को सिद्धान्त है
उत्तर :
(घ) उद्दीपक प्रतिक्रिया का सिद्धान्त है

प्रश्न 7
अनुकरण का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया ?
(क) बुडवर्थ ने
(ख) हिलगार्ड ने
(ग) स्किनर ने
(घ) कोहलर ने
उत्तर :
(ख) हिलगार्ड ने

प्रश्न 8
‘करके सीखने की क्रिया से सीखने का कौन-सा नियम सर्वाधिक प्रभावी है ? [2007]
(क) तत्परता का नियम
(ख) अभ्यास का नियम
(ग) प्रभाव का नियम
(घ) मनोवृत्त का नियम
उत्तर :
(क) तत्परता का नियम

प्रश्न 9
कोहलर ने सीखने के निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया ? [2007, 09, 11]
(क) प्रयास एवं त्रुटि’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त
(ख) ‘सूझ’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त
(ग) सम्बन्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धान्त
(घ) अनुकरण का सिद्धान्त
उत्तर :
(ख) ‘सूझ’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त

न 10
थॉर्नडाइक के सीखने के नियम हैं
(क) एक
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) चार
उत्तर :
(ख) तीन

प्रश्न 11
“अधिगम जिसमें व्यक्ति किसी समाधान या हल की जाँच करता है कि कहाँ गलतियाँ हैं, उनकी पुनः जाँच कर ठीक करता है और तब तक ठीक करता है जब तक सफल नहीं हो जाता।” यह कथन किसकी विशेषता है? [2015]
(क) प्रयास और त्रुटि द्वारा सीखना
(ख) सूझ द्वारा सीखना
(ग) सम्बन्ध प्रतिक्रिया द्वारा सीखना
(घ) अनुकरण द्वारा सीखना
उत्तर :
(क) प्रयास और त्रुटि द्वारा सीखना

प्रश्न 12
अन्तर्दृष्टि या सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त के जनक हैं [2009, 14]
(क) मैक्डूगल
(ख) कोहलर
(ग) थॉर्नडाइक
(घ)पावलोव
उत्तर :
(ख) कोहलर

प्रश्न 13
सीखने के उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त के जनक हैं [2011]
या
अधिगम के उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैंसीखने के प्रमुख नियमों के प्रतिपादक हैं [2008, 11]
(क) कोहलर
(ख) स्किनर
(ग) थॉर्नडाइक
(घ) पावलोव
उत्तर :
(ग) थॉर्नडाइक

प्रश्न 14
प्रारम्भ में बालक किस प्रकार सीखता है ?
(क) परीक्षण द्वारा
(ख) सूझ द्वारा
(ग) विभेदकरण द्वारा
(घ) प्रयत्न एवं त्रुटि द्वारा
उत्तर :
(धे) प्रयत्न एवं त्रुटि द्वारा

प्रश्न 15
“समस्यात्मक परिस्थिति को समग्र में समझा जाता है और तुरन्त ही हल स्पष्ट रूप से पूर्व-दृष्टि से मन में आ जाता है।” यह कथन किसकी विशेषता है ? [2008]
(क) सूझ द्वारा सीखने की
(ख) प्रयास एवं भूल द्वारा सीखने की
(ग) अनुकरण द्वारा सीखने की
(घ) सम्बन्धीकरण द्वारा सीखने की
उत्तर :
(क) सूझ द्वारा सीखने की।

प्रश्न 16
अधिगम, जो बिना किसी पूर्व-नियोजन के तर्कहीन, यान्त्रिकीय और बिना किसी क्रम के जहाँ हल आकस्मिक होता है, को जाना जाता है [2012]
(क) प्रयास और त्रुटि द्वारा अधिगम
(ख) सूझ द्वारा अधिगम
(ग) सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा अधिगम
(घ) अनुकरण द्वारा अधिगम
उत्तर :
(ख) सूझ द्वारा अधिगम

प्रश्न 17
“प्रगतिशील व्यवहार व्यवस्थापन की प्रक्रिया को अधिगम कहते हैं।” यह कथन किसका है?
(क) थॉर्नडाइक
(ख) स्किनर
(ग) क्रो एवं क्रो
(घ) पारीक
उत्तर :
(ख) स्किनर

प्रश्न 18
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले शारीरिक कारक हैं
(क) आयु एवं परिपक्वता
(ख) लिंग-भेद
(ग) स्वास्थ्य
(घ) ये सभी कारक
उत्तर :
(घ) ये सभी कारक

प्रश्न 19
सीखने के नियम आधारित हैं
(क) उद्दीपक प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
(ख) सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
(ग) सूझ के सिद्धान्त पर
(घ) प्रयास और त्रुटि की विधि पर
उत्तर :
(क) उद्दीपक प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर

प्रश्न 20
सूझ द्वारा समस्या का समाधान प्राप्त होता है [2008]
(क) एकाएक
(ख) समस्या उत्पन्न होने के एक घण्टे बाद
(ग) निद्रा के बाद
(घ) कभी नहीं।
उत्तर :
(क) एकाएक

प्रश्न 21
कोहलर ने अपना मुख्य प्रयोग किस पर किया था?
(क) कुत्ते पर
(ख) बन्दर पर
(ग) चिम्पैंजी पर
(घ) बिल्ली पर
उत्तर :
(ग) चिम्पैंजी पर

प्रश्न 22
किस विधि द्वारा विषय को सीखने में समय की बचत होती है?
(क) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
(ख) सूझ विधि द्वारा।
(ग) सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन विधि द्वारा
(घ) उपर्युक्त सभी विधियों द्वारा
उत्तर :
(ख) सूझ विधि द्वारा

प्रष्टग 23
छोटे बच्चे एवं मन्दबुद्धि बालक मुख्य रूप से किस विधि द्वारा कार्य करना सीखते हैं?
(के) सूझ विधि द्वारा
(ख) सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन विधि द्वारा
(ग) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
(घ) इन सभी विधियों द्वारा
उत्तर :
(ग) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा

प्रश्न 24
सीखने के पठार की दशा में  [2012]
(क) सीखने की गति घट जाती है।
(ख) सीखने की गति बढ़ जाती है।
(ग) सीखने की गति में वृद्धि नहीं होती।
(घ) सब कुछ भूल जाता है।
उत्तर :
(ग) सीखने की गति में वृद्धि नहीं होती।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 17
Chapter Name Independent India
(स्वतन्त्र भारत)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India (स्वतन्त्र भारत)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 15 अगस्त, 1947 ई०
2. 13 अगस्त, 1948 ई०
3. 18 सितम्बर, 1948 ई०
4. 1950 ई०
5. 26 जनवरी, 1950 ई०
6. 1954ई०
7. अगस्त, 1961 ई०
उतर.
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 251 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए-
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 252 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 252 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 252 व 253 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के चार प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उतर.
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के चार प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं

  1. 2012 ई० तक सभी भूमिहीनों को घर और जमीन उपलब्ध कराना।
  2. 3 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण को घटाकर आधा करना।
  3. वर्ष 2009 ई० तक सभी को पीने का पानी उपलब्ध कराना।
  4. 5.8 करोड़ नए रोजगार के अवसर पैदा करना।

प्रश्न 2.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर की भारत के संविधान निर्माण में क्या भूमिका थी?
उतर.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर संविधान निर्माण प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। इन्हें संविधान निर्माता कहा जाता है।

प्रश्न 3.
देशी रियासतों के विषय में सरदार पटेल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्र भारत के प्रथम उपप्रधानमन्त्री सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय’ का गठन किया गया। सरदार पटेल  को इस मन्त्रालय का मन्त्री बनाया गया। सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय का संचालन किया। उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और उनकी मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। 15 अगस्त, 1947 ई० को 562 देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय हो गया। यह पटेल की एकनिष्ठ दृढ़ता का परिचय था कि उन्होंने जूनागढ़, हैदराबाद, और कश्मीर जैसी रियासतों का बुद्धिमता एवं ताकत के बल पर भारत में विलय किया।

प्रश्न 4.
राज्य नीति के पाँच निर्देशक तत्व लिखिए।
उतर.
राज्य नीति के पाँच निर्देशक तत्व निम्नवत हैं

  1.  कल्याणकारी समाज की रचना
  2. जन स्वास्थ्य का उन्नयन
  3. एक ही आचार-संहिता
  4.  बेकारी के अन्त का प्रयास
  5. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा का प्रयत्न

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की चार विशेषताएँ लिखिए।
उतर.
भारतीय संविधान की चार विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. संविधान की प्रस्तावना
  2. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान
  3. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व
  4. नागरिकों के मूल अधिकार

प्रश्न 6.
भारतीय शिक्षा की चार नवीन प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
भारतीय शिक्षा की चार नवीन प्रवृत्तियाँ निम्नवत् हैं

  1. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली 
  2. विज्ञान की शिक्षा पर बल
  3. सैनिक शिक्षा पर बल
  4. भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकीकरण के लिए पाठ्यक्रम का नवीनीकरण

प्रश्न 7.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय की भारत की आर्थिक स्थिति का वर्णन कीजिए।
उतर.
अंग्रेजों के लगभग दो सौ साल के शोषण के बाद 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। इस दौरान भारतीय 
अर्थव्यवस्था निरन्तर उपेक्षा का शिकार रही थी। शताब्दियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण व लूट के कारण स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की आर्थिक स्थिति पहले से ही जर्जर अवस्था में थी, पाकिस्तान के निर्माण के कारण भारत अनेक प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। भारत एक निर्धन देश बन गया और इसकी प्रति व्यक्ति आय विश्व के निम्नतम के समतुल्य हो गई।

प्रश्न 8.
स्वतन्त्र भारत की समस्याओं पर सारगर्भित लेख लिखिए।
उतर.
भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही कठिनाइयों एवं कष्टों का काल भी आरम्भ हो गया था। देश के विभाजन के बाद दंगों, हत्याओं व लूटमार का भयंकर दौर आरम्भ हुआ। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों की संख्या में शरणार्थी, रियासतों के रूप में बिखरा हुआ अज्ञात भारत का ढाँचा, जर्जर अर्थव्यवस्था, अस्थिर राजनीति यह सब स्वतन्त्र भारत को विरासत में मिला। तत्कालीन भारत के महापुरुषों व राजनीति-वेत्ताओं के अथक परिश्रम ने इन सभी समस्याओं से लोहा लिया और उन्हें एक-एक करके सुलझाना आरम्भ किया।

प्रश्न 9.
दसवी पंचवर्षीय योजना के बारे में टिप्पणी कीजिए।
उतर.
दसवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1 अप्रैल, 2002 ई० से 31 मार्च, 2007 ई० था। इसमें आर्थिक विकास का लक्ष्य 80% वार्षिक रखा गया, जबकि वर्तमान में विकास दर 5.5% वार्षिक थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दस सूत्रीय एजेण्डा तैयार किया गया। इस एजेण्डे में अन्य बातों के अतिरिक्त विनिवेशीकरण कर एवं श्रम-सुधार और वित्तीय समझदारी वाली बातों पर विशेष बल दिया। दसवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वाधिक बल कृषि सुधार व वृद्धि दर पर दिया गया। औद्योगिक क्षेत्र के लिए प्रस्तावित औसत दर 8.5% निर्धारित की गई। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए निर्धारित कुल परिव्यय (15,92,300 करोड़ रुपए) में से उद्योग एवं खनिज के लिए 58,939 करोड़ रुपए व्यय करने का प्रावधान था। उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों के लिए औद्योगिक नीति कारगर साबित हुई। प्रसंस्करण उद्योग काफी आगे बढ़ गया।

प्रश्न 10.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर ‘दलीतों के मसीहा’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। आजादी से पूर्व 1942-46 ई० तक डॉ० भीमराव अम्बेडकर वायसराय के एक्जीक्यू काउंसिल के सदस्य रहे। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उनको भारत सरकार का कानून मंत्री बनाया गया। भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने अविस्मरणीय कार्य किया। वे संविधान सभा के सदस्य और संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र पर अनेक पुस्तकों की रचना की। ‘द प्राब्लम ऑफ रुपीज’ तथा ‘रिडल्स ऑन हिन्दुइज्म’ इनके द्वारा रचित महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।

प्रश्न 11.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दो प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल अप्रैल, 1956 ई० से मार्च 1961 ई० तक था। इस योजना में विकास के ऐसे ढाँचे को बढ़ावा दिया गया जिससे देश में समाजवादी स्वरूप के समाज का निर्माण हो सके। इस योजना के दो प्रमुख प्रावधान रोजगार में वृद्धि एवं उद्योगीकरण थे।

प्रश्न 12.
स्वतन्त्र भारत की कोई तीन तात्कालिक समस्याएँ लिखिए?
उतर.
स्वतन्त्र भारत की तीन तात्कालिक समस्याएँ निम्न प्रकार हैं

  1. हिन्दू-मुस्लिम दंगे और विस्थापितों की समस्या
  2. राजनीतिक एकीकरण की समस्या
  3. जर्जर आर्थिक स्थिति

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उतर.

  1. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान ।
  2. सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य |

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान कितने समय में निर्मित किया गया?
उतर.
भारतीय संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
“सुनियोजित अर्थतन्त्र( अर्थव्यवस्था) आधुनिक भारत का आधार है।” टिप्पणी कीजिए।
उतर.
दो सौ वर्षों तक अंग्रेजी शासन के अधीन रहने के बाद 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। उस समय भारत का
अर्थतन्त्र बहुत ही दयनीय स्थिति में था। जहाँ एक ओर कृषि उत्पादन, भारी और आधारभूत उद्योगों तथा शहरीकरण का निम्न स्तर था, वहीं जनसंख्या भी अत्यधिक थी। स्वतन्त्रता के समय हमारी शिक्षा और अर्थव्यवस्था इतनी पिछड़ी स्थिति में थी कि इनका विकास करना अत्यन्त दुष्कर था। परन्तु स्वतन्त्रता अपने साथ आशा की किरण भी लाई।

स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू की आवश्यक प्राथमिकताओं में से पहली प्राथमिकता आर्थिक तंत्र को सुनियोजित ढंग से मजबूत बनाना था। इसके लिए उन्होंने 1950 ई० में राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना कर देश के आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं को आरम्भ किया। उत्पादन की अधिकतम सीमा बढ़ाना, पूर्ण रोजगार प्राप्त करना, आय व सम्पत्ति की असमानताओं को कम करना, तथा सामाजिक न्याय उपलब्ध कराना आदि नीति-निर्माताओं द्वारा पंचवर्षीय योजनाओं को निर्धारित कर आधुनिक भारत का मार्ग प्रशस्त किया। आधुनिक भारत को आधार प्रदान करने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब
तक ग्यारह पंचवर्षीय योजनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं। कुछ प्रमुख पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्य निम्नवत् हैं-

  • प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रही।
  • द्वितीय पंचवर्षीय योजना में औद्योगीकरण पर विशेष बल दिया गया। औद्योगिक उत्पादन में 4.5% वृद्धि हुई तथा लगभग 66 लाख व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त हुआ।
  • चौथी पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना तथा जनसंख्या वृद्धि को रोकना निर्धारित किया।
  • पाँचवी एवं छठी पंचवर्षीय योजना में गरीबी उन्मूलन एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर बल दिया गया।
    सातवीं एवं आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं में क्रमश: ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि एवं आर्थिक ढाँचे को मजबूत बनाए रखने के लिए क्रियान्वित की गई।
  • नवीं व दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं में सर्वाधिक जोर क्रमशः सामाजिक व बुनियादी ढाँचे और सूचना तकनीक के विकास तथा खेती में सुधार व वृद्धि दर पर दिया गया।
  • ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, सिंचाई, जल संसाधनों का विकास एवं दोहन मुख्य लक्ष्य निर्धारित किया। 
  • बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, उद्योग एवं सेवा में वृद्धि दर पर विशेष बल दिया गया है। इस प्रकार उपरोक्त पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा सुनियोजित अर्थतन्त्र आधुनिक भारत की आधार शिला है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का संक्षेप में विश्लेषण कीजिए।
उतर.
भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मूल अधिकार 
वे अधिकार होते हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च कानून में स्थान प्राप्त होता है तथा जिनका उल्लंघन कार्यपालिका तथा विधायिका भी नहीं कर सकती है। मूलतः संविधान द्वारा नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गये, परन्तु 44 वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकारों की श्रेणी से निकाल दिया गया है, अब यह अधिकार एक कानूनी अधिकार रह गया है। भारतीय संविधान में निम्नलिखित छ: मौलिक अधिकारों का समावेश है]

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
  5. संस्कृति और शिक्षा-सम्बन्धी अधिकार ।
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार भारतीय संविधान में उपरोक्त मौलिक अधिकारों का समावेश कर एक प्रगतिशील कदम उठाया गया है। इससे सरकार की

निरकुंशता पर नियन्त्रण किया गया है। जहाँ तक मौलिक अधिकारों पर लगे प्रतिबन्धों या आपातकाल में उनके स्थगन का प्रश्न है, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे प्रतिबन्ध राष्ट्र-हित, सार्वजनिक कल्याण तथा भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप को विकृतियों से बचाने के लिए लगाये गये हैं। परन्तु न्याय पालिका के स्वतन्त्र होने के कारण नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इस पर विश्वास कर सकते हैं।” मौलिक अधिकारों का संविधान में उल्लेख कर देने से उनके महत्व और सम्मान में वृद्धि होती है। इससे उन्हें साधारण कानून से अधिक उच्च स्थान और पवित्रता प्राप्त हो जाती है। इससे वे अनुल्लंघनीय होते हैं। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के लिए उनका पालन आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 3.
“सरदार पटेल भारतीय एकीकरण के स्थापत्यकार थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में लगभग 600 से अधिक देशी रियासतें थीं। स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय कराने की गम्भीर चुनौती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबको भारत संघ में विलय होना आवश्यक था। ये रियासतें सम्पूर्ण भारत के क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और जनसंख्या का 20 प्रतिशत थीं। यद्यपि ये रियासतें अपने आन्तरिक मामलों में स्वतन्त्र थीं, किन्तु वास्तविक रूप में इन सभी रियासतों पर अंग्रेजी शासन का नियन्त्रण स्थापित था। भारतीय देशी रियासतों में राजकीय जागरण 1921 ई० में प्रारम्भ हुआ। सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय बनाया गया। सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया।

सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया। 1926 ई० में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद का जन्म हुआ, जिसका पहला अधिवेशन एलौट के प्रसिद्ध नेता दीवान बहादुर एम० रामचन्द्र राय की अध्यक्षता में 1927 ई० में हुआ। 1934 ई० में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही। 1935 ई० के अधिनियम में देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की बात कही गई। 1936 ई० के बाद देशी रियासतों में जन आन्दोलन तेजी से बढ़ा। कैबिनेट मिशन, एटली की घोषणा और लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना में देशी राजाओं के बारे में विचार रखे गए और प्रायः कहा गया कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद वे स्वतन्त्र होंगे। अपनी इच्छानुसार वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हों अथवा स्वतन्त्र रहें। उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीतिज्ञता और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया। हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी सी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया। हैदराबाद की जनता भी जूनागढ़ के समान ही हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करना चाहती थी, जबकि निजाम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से साँठगाँठ कर एक स्वतन्त्र राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसकी पाकिस्तान से भी गुप्त वार्ताएँ चल रही थीं।

अक्टूबर, 1947 में उसके साथ एक विशेष समझौता किया गया, जिसमें उसे एक वर्ष तक यथावत् स्थिति की बात कही गई, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की सैन्य वृद्धि या बाहरी मदद लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निजाम की कुटिल चालें चलती रहीं। उसने पाकिस्तान से हथियार मँगवाए तथा रजाकारों की मदद से मनमानी करनी चाही। परिणामत: हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर सितम्बर 1948 में निजाम को चेतावनी दी। निजाम के न मानने पर 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद में कार्यवाही की गई और पाँच दिन में न केवल रजाकारों को खदेड़ दिया गया, बल्कि निजाम ने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 18 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। इस प्रकार उपरोक्त विवरण के अनुसार सरदार पटेल ने भारतीय एकीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। मृत्यु उपरान्त उन्हें ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया।

प्रश्न 4.
“भारत का विकास वस्तुतः पंचवर्षीय योजनाओं से प्रारम्भ हुआ था।” टिप्पणी कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त जर्जर थी। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अर्थव्यवस्था की पुननिर्माण प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इस उद्देश्य से विभिन्न नीतियाँ और योजनाएँ बनाई गईं। और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से क्रियान्वित की गई। स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्राथमिकताओं में से पहली प्राथमिकता भारत के आर्थिक ढाँचे को मजबूत करना था। इसके लिए उन्होंने 1950 ई० में राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना की। इस आयोग के अन्तर्गत 16 माह के गहन विचार-विमर्श के पश्चात् देश के आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाकाल का जन्म हुआ। प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारम्भ 1 अप्रैल, 1951 ई० को हुआ। अब तक ग्यारह पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना जारी है जिसका कार्यकाल 2012-2017 है। भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में रखे गए उद्देश्यों को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  • विकास
  • आधुनिकरण
  • आत्मनिर्भरता, तथा
  • सामाजिक न्याय।

पंचवर्षीय योजनाओं की विकास सम्बन्धी उपलब्धियाँ- पंचवर्षीय योजनाओं की विकास उपलब्धि को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है
1. विकास दर- आर्थिक प्रगति का महत्त्वपूर्ण मापदण्ड विकास की दर के लक्ष्य की प्राप्ति है। प्रथम योजना में आर्थिक 
विकास की दर 3.6% थी, जो बढ़कर आठवीं योजना में 6.5% हो गई। नवीं पंचवर्षीय योजना में यह 5.5% रही। दसवीं पंचवर्षीय योजना में विकास दर 9% रही। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में 12% का लक्ष्य रखा गया तथा 12 वीं योजना (2012-2017) में 9 प्रतिशत का लक्ष्य है।

2. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय- योजनाकाल में राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है। भारत में 1950 51 ई० में चालू मूल्यों के आधार पर शुद्ध राष्ट्रीय आय 8,525 करोड़ रुपए थी, जो कि 2001-02 में बढ़कर 19,51,935 करोड़ रु०,2002-03 में 19,95,229 करोड़ रु०, 2009-10 में 51,88,361 करोड़ रु० हो गई, जबकि प्रति व्यक्ति आय 237.5 रु० से बढ़कर 2009-10 में 44,345 रु० हो गई।

3. कृषि उत्पाद- योजनाकाल में कृषि उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। सन् 1950-51 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन मात्र 50.8 मिलियन टन था, जो 2010-11 में बढ़कर 241.56 मिलियन टन हो गई।

4. औद्योगिक उत्पादन- योजनकाल में औद्योगिक उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई। 1950-51 ई० में, 1993-94 ई० की कीमतों पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 7.9 था जो बढ़कर 167 हो गया। दसवीं पंचवर्षीय योजना की समाप्ति पर उद्योग उत्पादन क्षेत्र में 8.75% की वृद्धि हो गई।

5. बचत एवं विनियोग- योजनाकाल में भारत में बचत एवं विनियोग की दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चालू मूल्य पर | सकल राष्ट्रीय आय के प्रतिशत के रूप में 1950-51 ई० में सकल विनियोग और बचत की दरें क्रमशः 10.4% और 9.3% थीं, दसवीं पंचवर्षीय योजना के अन्त में ये क्रमश: 7.8% और 26.62% थीं। निवेश 28.10% रहा।

6. यातायात एवं संचार- यातायात एवं संचार के क्षेत्र में योजनाकाल में उल्लेखनीय प्रगति हुई। रेलवे लाइनों की लम्बाई 53,596 किलोमीटर से बढ़कर 31 मार्च, 2010 को 63,974 किलोमीटर हो गई। सड़कों की लम्बाई 1,57,000 किलोमीटर से बढ़कर 32 लाख किलोमीटर हो गई। हवाई परिवहन, बन्दरगाहों की स्थिति एवं आन्तरिक जलमार्ग का भी विकास किया गया। संचार-व्यवस्था के अन्तर्गत विकास के क्षेत्रों में डाकखानों, टेलीग्राफ, रेडियो-स्टेशन एवं प्रसारण केन्द्रों की संख्या में भी पर्याप्त वृद्धि हुई।

7. शिक्षा- योजनाकाल में शिक्षा का भी व्यापक प्रसार हुआ है। इस अवधि में स्कूलों की संख्या 2,30,683 से बढ़कर  8,21,988 तथा विश्वविद्यालयों और समान संस्थाओं की संख्या 27 से बढ़कर 315 हो गई।

8. विद्युत उत्पादन क्षमता- योजनाकाल में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अगस्त 2004 ई० के आँकड़ोंके अनुसार उत्तर प्रदेश में विद्युत की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत केवल 188 यूनिट है, जो राष्ट्रीय औसत का 50 प्रतिशत है। सन् 2012 ई० की समाप्ति तक नाभकीय विद्युत उत्पादन 10 हजार मेगावाट होने की सम्भावना है।

9. बैंकिग संरचना- प्रथम योजना के आरम्भ  में देश में बैंकिग क्षेत्र अपर्याप्त और असन्तुलित था, परन्तु योजनाकाल में और विशेष रूप से बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् देश की बैंकिग संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। 30 जून, 1969 ई० को व्यापारिक बैंकों की शाखाओं की संख्या 8,262 थी, जो कि 31 मार्च, 2009 ई० में बढ़कर 80,547 हो गई।

10. स्वास्थ्य सुविधाएँ- योजनाकाल में देश में स्वास्थ्य सुविधाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। टी० बी०, कुछ महामारियों आदि के उन्मूलन तथा परिवार कल्याण कार्यक्रमों में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई।

11. आयात एवं निर्यात- केन्द्र सरकार ने 31 अगस्त, 2004 ई० को विदेशी नीति 2004-09 ई० की घोषणा कर दी है। वर्ष 2010-11 ई० में भारत का निर्यात 11,42,649 करोड़ रुपए तथा आयात 16,83,467 करोड़ रुपए रहा।

पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा भारत का आधुनिकीकरण- आधुनिककरण के क्षेत्र में प्रमुख उपलब्धियों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. कृषि का आधुनिकीकरण- भारत एक कृषि प्रधान देश है; अत: कृषि-संरचना में व्यापक सुधार एवं आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। योजनाकाल में भूमिसुधार कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है। रासायनिक खाद व उन्नत बीजों का प्रयोग भी बढ़ा है। कृषि क्षेत्र में आधुनिक कृषि-यन्त्रों एवं उपकरणों को प्रोत्साहन मिला है। इसके अतिरिक्त, सिंचाई सुविधाओं में भी पर्याप्त मात्रा में वृद्धि हुई है। कृषि उपजों की विपणन व्यवस्था तथा कृषि वित्त-व्यवस्था में भी उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।

2. राष्ट्रीय आय की संरचना में परिवर्तन- राष्ट्रीय आय की संरचना में योजनाकाल में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का अनुपात निरन्तर घट रहा है, जबकि द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है।

3. औद्योगिक संरचना में परिवर्तन- योजनाकाल में औद्योगिक संरचना में भी उल्लेखनीय परिवर्तन हुए है। आधारभूत एवं पूँजीगत उद्योगों की स्थापना की गई है, सार्वजनिक उपक्रमों की संख्या में वृद्धि हुई है, उद्योगों का विविधीकरण हुआ है। तथा उत्पादन तकनीक में व्यापक सुधार हुआ है।

4. बैंकिग संरचना में परिवर्तन- योजनाकाल में बैंकिग व्यवस्था को सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विस्तृत किया गया है। ग्रामीण और बैंकरहित क्षेत्रों में बैंकिग सुविधाओं का विस्तार किया गया है, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई है, बैंक साख के वितरण में व्यापक सुधार तथा बैंकिग सुविधाओं में गुणात्मक परिवर्तन किए गए हैं।

  • आत्मनिर्भरता- हमारा देश आर्थिक नियोजन के काल में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ है। पहले जिन वस्तुओं का आयात किया जाता था, आज वे वस्तुएँ हमारे ही देश में निर्मित होने लगी हैं तथा उनका निर्यात भी किया जा रहा है। देश में भारी मशीनें व विद्युत उपकरण आदि भी पर्याप्त मात्रा में तैयार होने लगे हैं। खाद्यान्नों के सम्बन्ध में देश आत्मनिर्भरता प्राप्त कर चुका है। विदेशी सहायता भी पहले की अपेक्षा कम ही ली जा रही है।
  • सामाजिक न्याय- योजनाकाल में सामाजिक न्याय की दृष्टि से मुख्य रूप से दो पहलुओं पर ध्यान दिया गया है- प्रथम, समाज के निर्धन वर्ग के जीवन-स्तर में सुधार किया जाए तथा द्वितीय, धन एवं सम्पत्ति के वितरण में समानता लाई जाए। इस दृष्टि से विभिन्न प्रेरणात्मक एवं संवैधानिक उपाय किए गए हैं, यद्यपि उनसे आशातीत परिणामो की प्राप्ति तो नहीं हो पाई है, परन्तु कुछ सुधार अवश्य हुए हैं।उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत का विकास वास्तविक रूप से पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा आरम्भ हुआ।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उतर.
संविधान एक महत्वपूर्ण प्रलेख है, जिसमें ऐसे नियमों का संग्रह होता है जिसके आधार पर किसी देश का शासन संचालित होता
है। संविधान किसी देश में दीपशिखा का काम करता है, जिसके प्रकाश में देश का शासन संचालित होता है। भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. संविधान की प्रस्तावना-
प्रत्येक देश के संविधान के प्रारम्भ में सामान्यतया एक प्रस्तावना होती है, जिसमें संविधान के 
मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। वास्तव में, प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं होता है। बल्कि इसके द्वारा संविधान के स्वरूप का आभास हो जाता है। वस्तुतः इस प्रस्तावना में भारतीय संविधान का मूल दर्शन निहित है। संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष तथा अखण्डता शब्द जोड़कर इसकी गरिमा को और भी अधिक बढ़ा दिया गया है।

2. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान- भारतीय संविधान अनेक प्रगतिशील देशों कनाडा, फ्रांस, अमेरिका आदि की भाँति एक लिखित संविधान है। इसका निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया था। यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। डॉ० जेनिंग्स के अनुसार, “भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा, विशाल और व्यापक संविधान है।

3. सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य- संविधान की प्रस्तावना में भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न का अर्थ है कि भारत अब बाह्य एवं आन्तरिक क्षेत्र में सभी प्रकार से पूर्ण स्वतन्त्र है। भारतवर्ष में लोकतन्त्रात्मक शासन भी है।

4. संघात्मक संविधान- संविधान द्वारा भारत में संघात्मक शासन की स्थापना की गई है। संविधान के अनुसार, भारत राज्यों का एक संघ है।” अत: इसमें संघात्मक संविधान के सभी तत्व विद्यमान हैं। यद्यपि संविधान का ढाँचा संघात्मक बनाया गया है, परन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है, क्योंकि संविधान में अनेक ऐसे एकात्मक तत्व विद्यमान हैं जो एकात्मक शासन-व्यवस्था में ही पाए जाते हैं।

5. धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना- संविधान की प्रस्तावना में 42 वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया है। धर्मनिरपेक्ष का तात्पर्य है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। जनता के लोग अपना धर्म चुनने या धर्म परिवर्तन करने के लिए स्वतन्त्र होंगे, और किसी भी पूजा-पद्धति को अपना सकेंगे।

6. संसदात्मक शासन-प्रणाली- भारत ने संसदात्मक प्रणाली को अपनाया है। इसमें शासन करने की वास्तविक शक्ति राष्ट्रपति में नहीं अपितु उसके द्वारा नियुक्त मन्त्रिपरिषद् में हित होती है।

7. राज्य के नीति-निदेशक तत्व- ये तत्व सरकार को दिशा-निर्देश देने और उसका मार्गदर्शन करने वाले बिन्दु हैं, जिनका अनुसरण करना प्रजातान्त्रिक सरकारों का दायित्व होता है। ये नीति-निदेशक तत्व आयरलैण्ड के संविधान से ग्रहण किए गए हैं।

8. नागरिकों के मूल अधिकार- भारत के संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों की समुचित रूप से व्यवस्था की गई है। न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय) को इनका संरक्षक बनाया गया है, परन्तु ये अधिकार पूर्णतया असीमित तथा अनियन्त्रित नहीं हैं। संविधान द्वारा नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे, परन्तु 44 वें संविधान संशोधन  द्वारा ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकार की श्रेणी से अलग कर दिया गया है और अब सम्पत्ति का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार रह गया है। इस प्रकार नागरिकों को अब छह मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।

9. मूल कर्तव्यों का वर्णन- मूल कर्तव्यों की धारणा भारत के संविधान में पूर्व सोवियत संघ के संविधान से ली गई है। इनमें नागरिकों से अपील की गई है कि वे संविधान का पालन करें, देश की रक्षा करें, राष्ट्र-सेवा करें, हिंसा से दूर रहें तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें आदि।

10. अस्पृश्यता का अन्त- संविधान के भाग III अनुच्छेद 17 के आधार पर अस्पृश्यता का अन्त कर दिया गया है। अत: अब छुआछूत की दूषित मनोवृत्ति पर आधारित आचरण करने वाला व्यक्ति अपराधी समझा जाएगा और दण्ड का भागीदार होगा। इस प्रकार संविधान ने देश में सामाजिक समानता स्थापित करने का प्रयत्न किया है।

11. महिलाओं को समान अधिकार- भारतीय संविधान ने नारियों को पुरुषों के समान आदर व सम्मान प्रदान किया है। उन्हें वे समस्त अधिकार प्रदान किए गए हैं, जो पुरुषों को प्राप्त हैं। ऊँचे पदों पर काम करने, मतदान करने, स्वयं चुनाव लड़ने आदि कई अधिकार संविधान ने उन्हें प्रदान किए हैं। सार्वभौमिक अथवा वयस्क मताधिकार- भारतीय संविधान के 61 वें संविधान संशोधन के अनुसार 18 वर्ष की आयु प्राप्त नागरिकों को बिना जाति, धर्म, लिंग, वर्ण के भेदभाव के मतदान का अधिकार प्रदान किया गया है। स्वतन्त्र, निष्पक्ष एवं शक्तिसम्पन्न न्यायपालिका- संविधान में एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, जो संविधान के रक्षक के रूप में कार्य करता है। स्वतन्त्र और निष्पक्ष न्याय के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियन्त्रण से मुक्त रखा गया है।

12.संकटकालीन उपबन्ध- भारतीय संविधान में कुछ आपातकालीन नियम भी उल्लिखित हैं, जिनके आधार पर संकटकाल में समस्त शक्तियाँ केन्द्र के पास आ जाती हैं अर्थात् संघीय शासन एकात्मक शासन में परिवर्तित हो जाता है। इससे देश की असामान्य स्थिति पर शीघ्र नियन्त्रण कर लिया जाता है। कठोर एवं लचीले संविधान का सम्मिश्रण- भारतीय संविधान कठोर तथा लचीलेपन का सुन्दर समन्वय है। भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनमें अकेले संसद साधारण कानून की भाँति ही संशोधन कर सकती है तथा कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनमें संशोधन करने के लिए संसद के दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ राज्यों के कम-से-कम आधे विधानमण्डलों की सहमति भी आवश्यक है।

13. विश्व- शान्ति व सार्वभौमिक मैत्री का पोषक- संविधान के 51 वें उपबन्ध के अन्तर्गत यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत विश्व के अन्य राष्ट्रों के साथ सह-अस्तित्व की भावना रखते हुए विश्व-शान्ति और सुरक्षा में सकारात्मक सहयोग देगा।

14.अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की पूरी सुरक्षा- संविधान में अल्पसंख्यकों के हितों तथा जनजातियों और आदिवासियों की उन्नति हेतु भी विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएँ की गई हैं। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों तथा जनजाति के नागरिकों को सेवाओं, विधानसभाओं तथा अन्य क्षेत्रों में विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।

15. कानून का शासन- भारत के संविधान में कानून के शासन की व्यवस्था की गई है। विधि के शासन की अवधारणा ग्रेट ब्रिटेन के संविधान से ली गई है। भारत में कानून के समक्ष सभी नागरिक एकसमान हैं। कानून व दण्ड विधान की पद्धति सभी के लिए एक जैसी है।

16. बहुदलीय संसदीय व्यवस्था- भारत ने द्वि-दलीय पद्धति अथवा एकल-पद्धति को न अपनाकर बहुदलीय पद्धति पर आधारित संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है। बहुदलीय व्यवस्था होने के कारण संसद में समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं तथा जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए अनेक विकल्प भी मिलते हैं।

प्रश्न 6.
देशी रियासतों ( रजवाड़ों ) के एकीकरण में सरदार पटेल की उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।
उतर.
देशी रियासतों का एकीकरण- स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय करने की गम्भीर चुनौती थी। भारत में 600 से अधिक रियासतें विद्यमान थीं। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबका भारत संघ में विलय होना आवश्यक था। देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
1. रियासतों के विलय के लिए मन्त्रालय की स्थापना- सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय बनाया गया। 
सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया। सरदार पटेल बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया।

2. रियासतों को भारत में विलय- उपप्रधानमंत्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी। ये रियासतें भारतीय संघ में विलीन हो गईं। जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय  करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था।

जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया। जूनागढ़ के समान हैदराबाद की जनता भी हैदराबाद रियासत का भारत में विलय कराना चाहती थी। इसके विपरित, हैदराबाद का निजाम हैदराबाद को एक स्वतन्त्र राज्य बनाए रखना चाहता था।

परिणामत: हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर 13 सितम्बर, 1948 ई० को वहाँ पुलिस कार्यवाही के द्वारा हैदराबाद का भारत में विलय करा लिया। कश्मीर के राजा हरिसिंह पहले सम्मिलित होने में हिचकिचाते रहे, लेकिन बाद में पाकिस्तानी आक्रमण से विचलित होकर उन्होंने भी भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। भारतीय सेना ने उन्हें तुरन्त संरक्षण देना स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 7.
स्वतन्त्र भारत की तात्कालिक समस्याओं पर एक विस्तृत लेख लिखिए।
उतर.
भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही कठिनाइयों व कष्टों का काल भी प्रारम्भ हो गया था। देश के विभाजन के बाद दंगों, हत्याओं व लूटमार का भयंकर दौर प्रारम्भ हुआ। तत्कालीन भारत में देशी रियासतों की संख्या 600 से अधिक थी। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों की संख्या में शरणार्थी, रियासतों के रूप में बिखरा हुआ अज्ञात भारत का ढाँचा, जर्जर अर्थव्यवस्था, अस्थिर राजनीति यह सब भारत को विरासत के रूप में मिला। परन्तु तत्कालीन भारत के महापुरूषों व राजनीति-वेत्ताओं के अथक परिश्रम ने इन सभी समस्याओं से लोहा लिया और उन्हें एक-एक करके सुलझाना आरम्भ कर दिया। स्वतन्त्र भारत की प्रमुख तात्कालिक समस्याएँ निम्नवत थीं
(1) राजनीतिक एकीकरण- स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में लगभग 600 से अधिक देशी रियासतें थीं। स्वतन्त्र होने के उपरान्त 
भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय कराने की गम्भीर चुनौती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबको भारत संघ में विलय होना आवश्यक था।। ये रियासतें सम्पूर्ण भारत के क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और जनसंख्या का 20 प्रतिशत थीं। यद्यपि ये रियासतें अपने आन्तरिक मामलों में स्वतन्त्र थीं, किन्तु वास्तविक रूप में इन सभी रियासतों पर अंग्रेजी शासन का नियन्त्रण स्थापित था। भारतीय देशी रियासतों में राजकीय जागरण 1921 ई० में प्रारम्भ हुआ। सरदार पटेल के सुझाव पर एक ‘रियासती मन्त्रालय बनाया गया। सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया।

सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया। 1926 ई० में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद् का जन्म हुआ, जिसका पहला अधिवेशन एलौट के प्रसिद्ध नेता दीवान बहादुर एम० रामचन्द्र राय की अध्यक्षता में 1927 ई० में हुआ। 1934 ई० में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही। 1935 ई० के अधिनियम में देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की बात कही गई। 1936 ई० के बाद देशी रियासतों में जन आन्दोलन तेजी से बढ़ा। कैबिनेट मिशन, एटली की घोषणा और लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना में देशी राजाओं के बारे में विचार रखे गए और प्राय: कहा गया कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद वे स्वतन्त्र होंगे। अपनी इच्छानुसार वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हों अथवा स्वतन्त्र रहें।

उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीतिज्ञता और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया।

हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी सी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया।

हैदराबाद की जनता भी जूनागढ़ के समान ही हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करना चाहती थी, जबकि निजाम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से साँठगाँठ कर एक स्वतन्त्र राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसकी पाकिस्तान से भी गुप्त वार्ताएँ चल रही थीं। अक्टूबर, 1947 में उसके साथ एक विशेष समझौता किया गया, जिसमें उसे एक वर्ष तक यथावत् स्थिति की बात कही गई, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की सैन्य वृद्धि या बाहरी मदद लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निजाम की कुटिल चालें चलती रहीं। उसने पाकिस्तान से हथियार मँगवाए तथा रजाकारों की मदद से मनमानी करनी चाही। परिणामतः हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय

सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर सितम्बर 1948 में निजाम को चेतावनी दी। निजाम के न मानने पर 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद में कार्यवाही की गई और पाँच दिन में न केवल रजाकारों को खदेड़ दिया गया, बल्कि निजाम ने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 18 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। कश्मीर के भारत में विलय पर भी पाकिस्तान से संघर्ष की स्थिति बनी। प्रारम्भ में कश्मीर के राजा हरिसिंह कश्मीर के भारत में सम्मिलित होने में असमंजस की स्थिति में थे। जून, 1947 में माउण्टबेटन कश्मीर गए और उन्होंने वहाँ के महाराजा हरिसिंह से विलय के बारे में शीघ्र आत्मनिर्णय पर जोर दिया और जनमत संग्रह की बात भी कही। महात्मा गाँधी भी महाराजा से मिले, परन्तु अगस्त, 1947 में पाकिस्तानियों ने कबाइलियों के वेश में जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करनी प्रारम्भ की। पाकिस्तान द्वारा आक्रमण किए जाने से विचलित होकर उन्होंने भी भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी।

भारतीय सेना ने उन्हें तुरन्त संरक्षण देना स्वीकार कर लिया। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर को अपने प्रधानमन्त्री मेहरचन्द महाजन को विलय के पत्रों पर हस्ताक्षर करने दिल्ली भेजा। ये पत्र स्वीकृत कर लिए गए, लेकिन इसी बीच 21-22 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान ने पठान कबाइलियों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। 26 अक्टूबर को कश्मीर के महाराजा के कहने पर भारतीय सेनाओं ने 27 अक्टूबर को पाकिस्तान के आक्रमणकारियों को रोका और उन्हें पीछे खदेड़ते हुए जवाबी कार्यवाही की। भारत के प्रधानमन्त्री पं० नेहरू ने पाकिस्तान की इस घुसपैठ के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में अपील की। सुरक्षा परिषद् ने सोच-विचार में लम्बा समय लिया।

13 अगस्त, 1948 को दोनों सेनाओं को युद्धविराम करने, अपनी-अपनी सेनाएँ हटाने और जनमत संग्रह करने को कहा। अभी तक भी कश्मीर की एक तिहाई भूमि पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। अर्द्धशताब्दी से अधिक गुजर जाने के पश्चात् भी कश्मीर को लेकर आज भी दोनों में विवाद बना हुआ है। 1954 ई० तक विदेशी फ्रांसीसी उपनिवेशों पाण्डिचेरी, कराईकल, यमन, माही तथा चन्द्रनगर को भारत संघ में शामिल कर लिया गया। गोवा, दमन व दीव जिन पर पुर्तगालियों का प्रभुत्व था, सैनिक कार्यवाही द्वारा 1961 ई० में भारत संघ में सम्मिलित किए जा सके। दादर व नगर हवेली के दोनों स्थलों को जनता ने 1954 में पुर्तगालियों से स्वतन्त्र कराया, लेकिन ये भारत संघ का अंग न बन सके। 1961 तक यहाँ ‘स्वतन्त्र दादर व नगर हवेली प्रशासन ने कार्यभार सँभाला। 11 अगस्त, 1961 को ये दोनों स्थल भारत के केन्द्रशासित प्रदेश बने।

(2) हिन्दू-मुस्लिम दंगे और विस्थापितों की समस्या- भारत के विभाजन से जनसंख्या में हुई अदला-बदली विश्व इतिहास में एक अनूठी और वीभत्स घटना थी। दुनिया के इतिहास में कभी भी जनसंख्या की इतनी बड़ी अदली-बदली पहले कभी नहीं हुई थी। इससे पूर्व 1923 ई० में लोसान की सन्धि में ग्रीक व टर्की में जनसंख्या में अदला-बदली हुई थी, जो लगभग एक लाख पच्चीस हजार की थी और जिसे बदलने में 18 महीने लगे थे, जबकि भारत-पाकिस्तान में लगभग एक करोड़ बीस लाख जनसंख्या का आवागमन हुआ और यह केवल तीन महीने में किया गया। एक अन्य आँकड़े के अनुसार 49 लाख भारतीय पश्चिमी पाकिस्तान से और 25 लाख पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से उजड़कर भारत आए। स्वभावत: इस जनसंख्या की अदली-बदली में भयंकर रक्तपात, खून-खराबा और साम्प्रदायिक दंगे हुए। सामूहिक हत्याएँ, लूट, अपहरण, बलात्कार की हजारों घटनाएँ हुईं। बंगाल में नोआखाली, यूनाइटेड प्रोविंसेस में गढ़मुक्तेश्वर और पंजाब में लाहौर, रावलपिण्डी, मुल्तान, अमृतसर तथा गुजरात में भयंकर लूटमार हुई, अनेक लोग मारे गए। इसके अतिरिक्त 150 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति की हानि हुई।

3. जर्जर आर्थिक व्यवस्था- अंग्रेजों ने लगभग दो सौ साल बाद अगस्त, 1947 में भारत छोड़ा। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था निरन्तर उपेक्षा की शिकार रही थी। शताब्दियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण व लूट के कारण भारत की आर्थिक व्यवस्था पहले से ही जर्जर अव्यवस्था में थी, पाकिस्तान के निर्माण के कारण भारत अनेक प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। भारत एक निर्धन देश बन गया और इसकी प्रति व्यक्ति आय विश्व के निम्नतम के समतुल्य हो गई। इसे 1948 ई० में 246 रुपए प्रति व्यक्ति माना गया है, जो ब्रिटेन की आय का कुल 10 प्रतिशत और अमेरिका का केवल 5 प्रतिशत थी।। पाकिस्तान के निर्माण से भारत में आर्थिक असन्तुलन उत्पन्न हो गया। भारतीय उद्योग, कृषि व व्यापार इस विभाजन के कारण अत्यधिक प्रभावित हुए। आर्थिक क्षेत्र के असन्तुलित विभाजन के कारण भारत में कच्चे माल की कमी हो गई, जिससे वस्त्र उद्योग ठप्प और अन्न की कमी हो गई।

1947-48 ई० के भारत-पाक संघर्ष ने भारतीय व्यापार को भी बुरी तरह प्रभावित किया। विस्थापितों के आर्थिक झगड़ों ने इसमें और कटुता ला दी। इस काल में उद्योगों के उत्पादन में लगभग 30 प्रतिशत की कमी हो गई। उत्पादन कम होने से बेकारी और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी। भारत की आर्थिक नीति की घोषणा 1948 ई० में की गई थी, इस नीति में कई योजनाएँ रखी गई। श्री जय प्रकाश नारायण द्वारा जनवरी, 1950 ई० में ‘सर्वोदय योजना की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य अहिंसा द्वारा शोषणरहित समाज का निर्माण करना बताया गया। इस योजना आयोग के अध्यक्ष पं० जवाहरलाल नेहरू थे। 1 अप्रैल, 1951 ई० से 31 मार्च 1956 ई० तक के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना बनी। वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना चल रही है, ऐसी 11 योजनाएँ अब तक पूर्ण हो चुकी हैं।

प्रश्न 8.
“सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय गणतन्त्र के सफल निर्माता थे।” इस कथन के आलोक में उनके द्वारा देशी राज्यों के भारतीय राष्ट्र में विलय के प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्र भारत के पहले तीन वर्ष सरदार पटेल उप-प्रधानमन्त्री, गृह मन्त्री, सूचना मन्त्री और राज्य मन्त्री रहे। इस सबसे भी बढ़कर  
उनकी ख्याति भारत के रजवाड़ों को शान्तिपूर्ण तरीके से भारतीय संघ में शामिल करने तथा भारत के राजनीतिक एकीकरण के कारण है। 5 जुलाई, 1947 को सरदार पटेल ने रियासतों के प्रति नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि- “धीरे-धीरे बहुत-सी देशी रियासतों के शासक भोपाल के नवाब से अलग हो गये और इस तरह नवस्थापित रियासती विभाग की योजना को सफलता मिली। भारत के तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया, जो स्वयं में सम्प्रभुता प्राप्त थीं। उनका अलग झंडा और अलग शासक था।

सरदार पटेल ने आज़ादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पी.वी.मेनन के साथ मिलकर कई देशी राज्यों को भारत में मिलाने के लिए कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देशी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन रियासतें- हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष सभी राजवाड़ों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 15 अगस्त, 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष भारतीय रियासतें ‘भारत संघ’ में सम्मिलित हो चुकी थीं, जो भारतीय इतिहास की एक बड़ी उपलब्धि थी। जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और इस प्रकार जूनागढ़ भी भारत में मिला लिया गया।

जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह असीम शक्ति से उन्होंने नवजात गणराज्य की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया। भारत के राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यों और किये गये राजनीतिक योगदान निम्नवत् हैंद्वीपसमूह भारत के साथ मिलाने में भी पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

इस क्षेत्र के लोग देश की मुख्यधारा से कटे हुए थे और उन्हें भारत की आजादी की जानकारी 15 अगस्त, 1947 के कई दिनों बाद मिली। हालांकि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नजदीक नहीं था, लेकिन पटेल को लगता था कि इस पर पाकिस्तान दावा कर सकता है। इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति को टालने के लिए पटेल ने लक्षद्वीप में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भारतीय नौसेना का एक जहाज भेजा। इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तान नौसेना के जहाज लक्षद्वीप के पास मंडराते देखे गए, लेकिन वहाँ भारत का झंडा लहराते देख उन्हें वापिस कराची लौटना पड़ा।

प्रश्न 9.
भारत प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है”इस तथ्य की समीक्षा कीजिए।
उतर.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना से यह बात स्पष्ट रूप से घोषित की गई है कि भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतन्त्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य है। इसका अर्थ यह है कि अब भारत पर्ण रूप से स्वतन्त्र है और वह किसी भी बह्य सत्ता के अधीन नहीं है। सम्पूर्ण भारतीय जनता ही शक्ति का स्रोत है। इसका विवेचन निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है

1. सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न- हमारे संविधान में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि भारत अपने आन्तरिक तथा बाह्य दोनों क्षेत्रों में
पूर्णतया स्वतन्त्र है। वह किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि को मानने के लिए बाध्य नहीं है। भारतीय संविधान में कहीं भी ब्रिटिश शासन का उल्लेख नहीं है। यद्यपि भारत राष्ट्रमण्डल का सदस्य है, किन्तु वह अपनी इच्छानुसार उससे पृथक भी हो सकता है। श्री जी० एन० जोशी के अनुसार, “भारत राष्ट्रमण्डल का सदस्य इसलिए बना है, क्योंकि ऐसा करना उसके हित तथा लाभ में है।

2. लोकतान्त्रिक- भारतीय संविधान के अनुसार भारतीय शासन लोकतन्त्रात्मक है। समस्तमहत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर अन्तिम निर्णय जनता का होगा। शासन की वास्तविक शक्ति जनता में निहित है। भारत की स्वर्गीया प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गाँधी ने पुनः सत्ता में आने के बाद कहा था, “लोकतन्त्र हमारे लिए केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। लोकतन्त्र सिर्फ बहुमत के लिए नहीं सभी के लिए है। आज लोकतन्त्र को बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय से बढ़कर सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय तक ले जाना है।”

3. धर्मनिरपेक्ष- भारत में सभी व्यक्तियों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गयी। राज्य किसी विशेष धर्म का संरक्षण नहीं करता, अपितु उसकी दृष्टि में सभी धर्म समान है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। संविधान संशोधन द्वारा इसे और स्पष्ट कर दिया है।

4. समाजवादी- कांग्रेस का उद्देश्य प्रारम्भ से ही भारत में समाजवाद की स्थापना करना रहा है। उसका उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता पर आधारित समाजवादी समाज की रचना के लिए प्रयत्नशील रहना पड़ा है। संविधान के निर्माताओं का अभिप्राय था कि भारतीय समाज की परम्परागत विषमताओं को दूर करके आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समता के आधार पर एक प्रगतिशील समाज की स्थापना करें। विषमताओं तथा शोषण से मुक्ति का एकमात्र उपाय समाजवादी समाज की स्थापना भी हो सकता है। संविधान में प्रयुक्त समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य का यही अर्थ है। भारतीय संविधान में समाजवाद शब्द के साथ लोकतन्त्रात्मक शब्द को भी रखा गया है। इससे यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान एक लोकतान्त्रिक समाजवाद की परिकल्पना करता है।

(5) गणराज्य- भारतीय राज्य गणराज्य इसलिए है, क्योंकि भारत का प्रावधान वंशानुगत शासन नहीं है, अपितु वह अप्रत्यक्ष | रूप से जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति है। वह जनता के प्रतिनिधि मन्त्रिमण्डल के परामर्श से शासन करता है। जनता के प्रतिनिधियों को समस्त शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।

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