UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi बैंक/विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित ऋण-प्राप्ति हेतु आवेदन-पत्र

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name बैंक/विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित ऋण-प्राप्ति हेतु आवेदन-पत्र
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi बैंक/विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित ऋण-प्राप्ति हेतु आवेदन-पत्र

प्रश्न 1.
ऋण-प्राप्ति हेतु भारतीय स्टेट बैंक के शाखा प्रबन्धक को आवेदन-पत्र लिखिए। [2010]
या
भारतीय स्टेट बैंक के शाखा प्रबन्धक को निजी कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना हेतु ऋण-प्राप्ति के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए।
या
अपना कुटीर उद्योग प्रारम्भ करने हेतु किसी बैंक के प्रबन्धक को ऋण प्रदान करने हेतु एक पत्र लिखिए। [2009, 14, 17]
या
अपने निकटस्थ बैंक के शाखा-प्रबन्धक के नाम एक प्रार्थना-पत्र लिखिए, जिसमें निजी रोजगार के लिए ऋण लेने का निवेदन किया गया हो। [2013,14, 15]
या
इलाहाबाद बैंक के शाखा प्रबन्धक को फसली ऋण योजनान्तर्गत ऋण-प्राप्ति हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2015]
या
अपना कुटीर उद्योग प्रारम्भ करने हेतु किसी बैंक के प्रबन्धक को ऋण प्रदान करने हेतु एक पत्र लिखिए। [2016]
[बैंक के नाम में स्वयं परिवर्तन कर लें।]
उत्तर
सेवा में,
प्रबन्धक, भारतीय स्टेट बैंक, गोलाकुआँ, शोहराबगेट शाखा, मेरठ।
महोदय,
पिछले दिनों माननीय प्रधानमन्त्री महोदय ने प्रधानमन्त्री रोजगार योजना का शुभारम्भ किया था, जिसमें शिक्षित बेरोजगारों को एक लाख रुपए का ऋण देने का प्रावधान है। मैं भी बी० ए० पास एक शिक्षित बेरोजगार युवक हूँ और इस योजना का लाभ उठाकर एक लाख रुपए का ऋण लेकर इससे बॉल पेन बनाने का लघु उद्योग आरम्भ करना चाहता हूँ। इस हेतु आपकी सेवा में अपने विवरणसहित अपनी भावी योजना का संक्षिप्त प्रारूप प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो कि इस प्रकार है-
UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi बैंकविभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित ऋण-प्राप्ति हेतु आवेदन-पत्र img 1
श्रीमान जी से मेरा नम्र निवेदन है कि मेरे इस ऋण आवेदन-पत्र को स्वीकृत करके मुझे ऋण प्रदान कर कृतार्थ करें।
धन्यवाद सहित!
संलग्नक-
(1) आयु प्रमाण-पत्र,
(2) योग्यता प्रमाण-पत्रे,
(3) स्थायी निवास प्रमाण-पत्र,
(4) आय प्रमाण-पत्र।
दिनांक : 18/05/2014

भवदीय
किशनचन्द्र धानुक

प्रश्न 2.
केनरा बैंक के प्रबन्धक को अध्ययनार्थ ऋण-प्राप्ति हेतु एक पत्र लिखिए।
या
भारतीय स्टेट बैंक के शाखा प्रबन्धक को निजी उच्च शिक्षा-अध्ययन (चिकित्सा अथवा इंजीनियरिंग) हेतु शिक्षा ऋण प्राप्ति के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 17]
या
उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु ऋण प्राप्त करने के लिए बैंक मैनेजर को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2018]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान शाखा प्रबन्धक महोदय,
केनरा बैंक, शहर शाखा, वाराणसी।

विषय-अध्ययन के लिए ऋण-प्राप्ति हेतु

महोदय,
मैं, विकास कुमार जैन ने चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से बी० एस-सी० (भौतिकी, रसायन और गणित) परीक्षा प्रथम श्रेणी में 70% अंकों के साथ उत्तीर्ण की है। मैंने एम० बी० ए० (द्वि-वर्षीय पाठ्यक्रम) में प्रवेश लिया है और साथ-साथ प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा के लिए तैयारी भी करना चाहता हूँ। मेरा अध्ययन अबाध चलता रहे, इसके लिए मुझे * 2,00,000.00 की आवश्यकता है। मुझे पता चला है कि आपके बैंक की अनेक ऋण योजनाओं में से एक योजना के अन्तर्गत अध्ययन के लिए भी ऋण प्रदान किया जाता है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपके द्वारा प्रदत्त ऋण की भुगतान-प्रक्रिया अध्ययन पूर्ण होते ही यथाशीघ्र शुरू कर दी जाएगी।

उपर्युक्त उद्देश्य हेतु आपके सक्रिय सहयोग की अपेक्षा है।
धन्यवाद!
दिनांक :………………………….
संलग्नसभी उत्तीर्ण परीक्षाओं की अंक-प्रतियाँ व प्रमाण-पत्र।

भवदीय
विकास कुमार जैन
ठठेरवाड़ी, मेरठ।

प्रश्न 3.
अपने पिता जी की ओर से भारतीय स्टेट बैंक के प्रबन्धक को पत्र लिखकर ट्रैक्टर खरीदने के लिए ऋण स्वीकृत कराने का अनुरोध कीजिए।
उत्तर
सेवा में, 30-6-2017
श्रीमान प्रबन्धक महोदय,
भारतीय स्टेट बैंक, मुख्य शाखा
सोनीपत, हरियाणा।

विषय-ट्रैक्टर खरीदने के लिए ऋण की स्वीकृति हेतु आवेदन

महोदय,
निवेदन है कि मेरे पिता जी एक प्रगतिशील कृषक हैं, जिनके पास खेती योग्य उपजाऊ सत्तर एकड़ भूमि है। इस भूमि पर खेती से उन्हें पर्याप्त आमदनी हो जाती है।

मुझे खण्ड विकास अधिकारी द्वारा विदित हुआ कि आपके बैंक ने किसानों को आसान किश्तों पर ट्रैक्टर खरीदने हेतु ऋण देने के लिए एक योजना प्रारम्भ की है।

अपने पिता की आर्थिक स्थिति की पुष्टि में जमीन के कागजातों तथा मकान की रजिस्ट्री की छाया प्रतियाँ संलग्न कर रहा हूँ जिससे आपको हमारी आर्थिक स्थिति तथा ऋण अदायगी सम्बन्धी अर्हताओं का आकलन करने में कोई कठिनाई न हो।

आपसे निवेदन है कि आप मेरे पिता को इस योजना के अन्तर्गत ट्रैक्टर खरीदने के लिए ऋण की स्वीकृति प्रदान करने का कष्ट करें।
धन्यवाद!

भवदीय
मंगल सेन आर्य
आत्मज श्री बुध सेन आर्य
मकान नं० 646, गाँधी नगर
सोनीपत, हरियाणा।

प्रश्न 4.
यू०पी० ग्रामीण बैंक, इलाहाबाद के शाखा प्रबन्धक को फसल बीमा के अन्तर्गत प्राप्त होने वाली कृषक धनराशि के सम्बन्ध में एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान शाखा प्रबन्धक,
इलाहाबाद बैंक, शहर शाखा, मेरठ।

विषय-फसल बीमा के अन्तर्गत कृषक धनराशि की प्राप्ति हेतु

महोदय,
निवेदन यह है कि प्रार्थी ने आपकी शाखा से अपनी पाँच बीघे धान की फसल का बीमा करवाया था। इसकी पॉलिसी संख्या 126796 तथा बीमा धनराशि 9,000/- है। प्रार्थी की फसल पानी के अभाव (बारिश का अभाव, नहर का सूख जाना व बिजली की किल्लत) के कारण सूख गई, जिसके कारण उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है। फिलहाल प्रार्थी के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है। इस सम्बन्ध में सम्बन्धित अधिकारियों को समय रहते सूचना दी जा चुकी है।

अतः आपसे अनुरोध है कि जल्द-से-जल्द प्रार्थी को उसके फसली बीमे की धनराशि दिलाने की कृपा करें।
धन्यवाद सहित।
दिनांक : …………………………

प्रार्थी
रामदुलारे
गाँव : रोहटा

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 2 Indian Education in Buddhist Period

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 2 Indian Education in Buddhist Period (बौद्ध-काल में भारतीय शिक्षा)are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 2 Indian Education in Buddhist Period (बौद्ध-काल में भारतीय शिक्षा).

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Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 2
Chapter Name Indian Education in Buddhist Period (बौद्ध-काल में भारतीय शिक्षा)
Number of Questions Solved 46
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 2 Indian Education in Buddhist Period (बौद्ध-काल में भारतीय शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्यों एवं आदर्शों का उल्लेख कीजिए।
बौद्ध शिक्षा-प्रणाली के क्या उद्देश्य थे? वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता की विवेचना कीजिए।
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्य
बौद्धकालीन शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-
1. सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास-बौद्धकालीन शिक्षा का बदकालीन शिक्षा के उद्देश्य उद्देश्य व्यक्तित्व के ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक तीनों पक्षों सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास का विकास करना था।
बौद्ध धर्म का प्रचार

2. बौद्ध धर्मक़ा प्रचार–बौद्धकालीन शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र-निर्माण बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार एवं ग्रहण करना था, जिससे कि लोगों में निर्वाण की मात धर्म के प्रति श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था बढ़े।
सामाजिक योग्यता और कुशलता

3. चरित्र-निर्माण सादगीपूर्ण और पवित्र जीवन, ब्रह्मचर्य, का विकास संयम तथा सदाचार द्वारा विद्यार्थियों के चरित्र का निर्माण करना। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय भावना

4. निर्वाण की प्राप्ति-बौद्धकालीन शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य का विकास जीवन के दुःख, कष्ट, रोग वं मृत्यु से मनुष्य को निर्वाण प्राप्त कराना था।

5. सामाजिक योग्यता और कुशलता का विकास–शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान और कौशल का समन्वय इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया गया था। इस काल में धर्म का अर्थ आध्यात्मिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का पालन करने से लिया जाता था और व्यक्ति की शिक्षा उसे यह क्षमता प्रदान करती थी कि वह अपने आपको समाज का एक योग्य सदस्य बनाए।

6. राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय भावना का विकास–बौद्धकालीन शिक्षा का एक उद्देश्य राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय भावना का विकास भी था। इसके लिए बौद्ध भिक्षु अपने देश और विदेश में भ्रमण करते थे और वे अपनी ही वेशभूषा, भाषा व आचार-विचार का प्रयोग करते थे। । उल्लेखनीय है कि बौद्ध शिक्षा प्रणाली के उपर्युक्त वर्णित उद्देश्य वर्तमान में भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए हुए हैं। वर्तमान में शिक्षा को जीवन के मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है, क्योंकि इसी से व्यक्ति का कल्याण सम्भव है।

चरित्र-निर्माण की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नैतिक शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है। भारत जैसे सीमित संसाधन एवं जनसंख्या आधिक्य वाले विकासशील देश में, समाज एवं राष्ट्र की उन्नति हेतु मानव संसाधन विकास में शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, . गरीबी, वर्ग-भेद आदि समस्याओं हेतु शिक्षा का प्रचार अपरिहार्य आवश्यकता है।

बौद्धकालीन शिक्षा के आदर्श
बौद्धकालीन शिक्षा के प्रमुख आदर्श निम्नलिखित थे-

  1. जीवन और शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध था तथा जीवन के आदर्श शिक्षा में भी अपनाए गए थे। इसलिए विद्यार्थियों को सरल, शुद्ध, पवित्र व सात्विक जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
  2. समाज सेवा बौद्ध शिक्षा का दूसँग आदर्श था। उपसम्पदा संस्कार सम्पन्न होने पर विद्यार्थी भिक्षु बन जाता था और वह बौद्ध धर्म एवं मठ की सेवा करता था। भिक्षु का कार्य समाज में भ्रमण करना और धर्म के सिद्धान्तों से जन-साधारण को शिक्षित-दीक्षित करना था।
  3. विश्व कल्याण बौद्ध शिक्षा का तीसरा आदर्श था। धर्म का प्रचार करने वाले भारत से बाहर भी गए और सम्पूर्ण जीवन वे मनुष्यों को जीवन के सत्यों का ज्ञान देते रहे, जिससे सम्पूर्ण विश्व के लोगों का कल्याण हो सके। बौद्ध धर्म में विश्व कल्याण की भावना होने के कारण ही उसका व्यापक प्रचार हुआ।
  4. बौद्धकालीन शिक्षा जनतान्त्रिक आदर्शों पर आधारित थी। इसमें समानता, स्वतन्त्रता और सामाजिक हित की भावना निहित थी। सभी लोग बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा ग्रहण करने और निर्वाण प्राप्त करने के अधिकारी थे।

प्रश्न 2
बौद्धकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ
भारतीय शिक्षा के इतिहास में ईसा से पूर्व छठी शताब्दी में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ परिवर्तन हुए। इस काल, जिसे बौद्धकाल कहा जाता है, की शिक्षा को बौद्धकालीन शिक्षा कहा जाता है। वैदिक धर्म एवं ब्राह्मण-उपनिषद् धर्म के पालन करने वालों में बहुत-से अवगुण, अन्धविश्वास, आडम्बर तथा जातीय । भेदभाव आदि आ गए थे। इस कारण यह आवश्यक था कि समाज के सदस्यों को धर्म के मूल सिद्धान्तों के प्रति प्रबुद्ध किया जाए इसलिए देश में एक नए सम्प्रदाय का उदय हुआ, जिसे महात्मा बुद्ध के अनुयायियों ने, उनके नाम से, जन्म दिया था। यह बौद्ध धर्म के नाम से प्रचलित हुआ। इस धर्म के अभ्युदय, विकास एवं प्रसार के कारण भारतीय शिक्षा का भी विकास हुआ और इसे बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली का नाम दिया गया। बौद्धकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं|

1. समन्वित शिक्षा-धार्मिक परिवर्तन के कारण बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली में आरम्भ में केवल बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाती थी, बाद में सभी धर्मों के मानने वाले शिक्षा लेने लगे,
समन्वित शिक्षा इसलिए बौद्ध और अबौद्ध सभी विषयों की शिक्षा दी गई। केवल चाण्डाल, गम्भीर रोगों से ग्रस्त रोगियों तथा अपराधी व्यक्तियों को शिक्षा लेने का अधिकार नहीं था।

2. धार्मिक संस्कार–बौद्धकालीन शिक्षा का आरम्भ विकास ‘पवज्जा’ या ‘प्रव्रज्या संस्कार से होता था। यह संस्कार 8 वर्ष की जनतान्त्रिक भावना व्यापक शिक्षा, आयु में होता था। इसमें बालक-बालिका अपने माता-पिता के घर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय को छोड़कर व पीले वस्त्र पहनकर गुरु के सामने नतमस्तक होता दृष्टिकोण का विकास था, प्रार्थना करता था और गुरु उसे स्वीकार करता था।

सामान्य शिक्षा, तकनीकी शिक्षा दूसरे संस्कार विद्यार्थी द्वारा तीन प्रण’ करना था, वह ‘समनेर’ और धार्मिक शिक्षा या ‘श्रमण’ कहलाता था। तीन प्रण ये थे—

  1. बुद्धम् शरणम् जनसाधारण की भाषा शिक्षा को गच्छामि।
  2. धम्मं शरणम् गच्छामि।
  3. सधं शरणम् गच्छामि। इसके माध्यम संस्कार के समय विद्यार्थी को निम्नांकित नियमों का पालन करने की शिक्षा का व्यवस्थीकरण प्रतिज्ञा लेनी पड़ती थी
    • किसी जीव की हिंसा मत करो।
    • अशुद्ध आचरण से दूर रहो।
    • असत्य भाषण मत करो।
    • कुसमय भोजन न करो।
    • मादक वस्तुओं का प्रयोग न करो।
    • नृत्य और तमाशों से दूर रहो।
    • बिना दिए हुए किसी की वस्तु को ग्रहणून करो।
    • बहुमूल्य पदार्थ दान में न लो।
    • किसी की निन्दा मत करो।
    • श्रृंगार की वस्तुओं का उपभोग न करो।

तीसरा संस्कार ‘उपसम्पदा’ का था, यह 20 वर्ष की आयु में सम्पन्न होता था। इस संस्कार के बाद शिष्य भिक्षु और शिष्या भिक्षुणी हो जाते थे। इसे संस्कार के होने से शिष्य आजीवन धर्म के लिए कार्य करता था। मठ और विहार के साथ संलग्न शिक्षालयों में ये शिक्षा देते थे।

3. धार्मिक भावना का विकास–बौद्धकालीन शिक्षा का आधार बौद्ध धर्म था। बुद्ध और उनके धर्म तथा संघ की शरण में रहना तथा बौद्ध धर्म के इस नियमों का पालन करना ही शिक्षा था।

4. वैयक्तिक और सामाजिक विकास-बौद्धकालीन शिक्षा आरम्भ में वैयक्तिक रूप से व्यक्ति को धर्म का ज्ञान कराती थी। बाद में उसका लक्ष्य ऐसे व्यक्तित्व एवं चरित्र का विकास करना हो गया जो समाज को आगे ले जा सके।

5. जनतान्त्रिक भावना–शिक्षा के माध्यम से समाज के सभी लोगों में समानता और स्वतन्त्रता की श्रेष्ठ भावना लाने का प्रयत्न किया जाता था ताकि चारों वर्गों के लोग परस्पर मिल-जुलकर जीवन व्यतीत करें।

6. व्यापक शिक्षा–बौद्ध काल में भारतीय संस्कृति का भौतिक पक्ष काफी समृद्ध हो चुका था और इस काल में शिक्षा लौकिक एवं धार्मिक दोनों प्रकार की थी। बालक और बालिका, ज्ञानी और व्यवसायी दोनों शिक्षा प्राप्त करते थे। शासन और जनसाधारणेदोनों के लिए शिक्षा की उत्तम व्यवस्था थी। इस प्रकारे बौद्ध काल में शिक्षा का क्षेत्र व्यापक था।

7. राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास–बौद्ध धर्म में शिक्षा लेकर लोग विदेशों में जाते थे और विदेशों से आए लोगों का स्वागत करते थे। बौद्ध विद्वान् एवं भिक्षु इसे अपना कर्तव्य मानते थे कि वे राष्ट्रीय धर्म, ज्ञान, बुद्धि, सभ्यता आदि को अपने देश में तथा दूसरे देशों में फैलाएँ। इस प्रकार शिक्षा द्वारा लोगों में राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास किया जाता था।

8. सामान्य शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और धार्मिक शिक्षा–बौद्धकालीन शिक्षा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इस काल में लोग शिल्प कौशल या तकनीकी शिक्षा को उतना ही उपयोगी और आवश्यक समझते थे, जितनी दर्शन, धर्म, भाषा आदि की शिक्षा को।

9. जनसाधारण की भाषा शिक्षा का माध्यम-वैदिक शिक्षा के अन्तर्गत शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी। इससे केवल उच्च वर्ग के लोग ही शिक्षा प्राप्त कर सकते थे और इससे जनसाधारण में शिक्षा का प्रचार नहीं होता था। अत: बौद्ध काल में शिक्षा का विकास जनसाधारण की भाषा पालि में किया गया।

10. शिक्षा का व्यवस्थीकरण–बौद्धकालीन शिक्षा व्यवस्थित थी। प्राथमिक शिक्षा पाठशालाओं में और उच्च शिक्षा विश्वविद्यालयों में दी जाती थी। इसके साथ ही माध्यमिक विद्यालयों और तकनीकी शिक्षा संस्थाओं की व्यवस्था भी अवश्य ही रही होगी।

प्रश्न 3
वैदिक और बौद्ध शिक्षा-प्रणालियों की समानताओं और असमानताओं की विवेचना कीजिए।
या वैदिककाल तथा बौद्ध-शिक्षा की समानताओं तथा असमानताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर
प्राचीनकाल में भारत में विकसित होने वाली दो मुख्य शिक्षा प्रणालियों को क्रमशः वैदिक शिक्षा या हिन्दू-ब्राह्मणीय शिक्षा तथा बौद्धकालीन शिक्षा के रूप में जाना जाता है। बौद्धकालीन शिक्षा बौद्ध धर्म एवं दर्शन की सैद्धान्तिक मान्यताओं पर आधारित थी, परन्तु यह भी सत्य है कि बौद्ध धर्म भी एक भारतीय धर्म था तथा बौद्धकालीन शिक्षा भारतीय सामाजिक परिस्थितियों में ही विकसित हुई थी।

इस स्थिति में वैदिक शिक्षा तथा बौद्धकालीन शिक्षा में कुछ समानताएँ होना नितान्त स्वाभाविक ही था, परन्तु वैदिक-धर्म तथा बौद्ध धर्म में कुछ मौलिक तथा सैद्धान्तिक अन्तर भी है। दोनों धर्मों का सामाजिक व्यवस्था स्तरीकरण तथा जीवन के उद्देश्यों आदि के प्रति दृष्टिकोण भिन्न है। इस स्थिति में दोनों धर्मों द्वारा विकसित की गयी शिक्षा-प्रणालियों में कुछ स्पष्ट अन्तर पाया जाता है। इस स्थिति में वैदिक-शिक्षा तथा बौद्धकालीन शिक्षा के तुलनात्मक विवरण को प्रस्तुत करने के लिए इन शिक्षा-प्रणालियों में पायी जाने वाली समानताएँ तथा असमानताएँ अग्रलिखित हैं–

वैदिक तथा बौद्ध शिक्षा की समानताएँ
डॉ० अल्तेकर के अनुसार, “जहाँ तक सामान्य शैक्षिक सिद्धान्त या प्रयोग की बात है, हिन्दुओं और बौद्ध में कोई विशेष अन्तर नहीं था। दोनों प्रणालियों के समान आदर्श थे और दोनों समान विधियों का अनुसरण करती थी। इस स्थिति में इन दोनों शिक्षा-प्रणालियों में विद्यमान समानताओं का विवरण निम्नवर्णित है

  1. दोनों शिक्षा प्रणालियाँ हर प्रकार के बाहरी नियन्त्रण से मुक्त थी अर्थात् वे अपने आप में स्कतन्त्र थी। दोनों शिक्षा व्यवस्थाओं में राज्य अथवा किसी अन्य सत्ता का कोई हस्तक्षेप नहीं था।
  2. दोनों ही शिक्षा-प्रणालियों में शिक्षण की मौखिक विधि को अपनाया गया था।
  3. वैदिक तथा बौद्ध शिक्षा-प्रणालियों में समान रूप में छात्रों को दिनचर्या तथा सामान्य जीवन के | नियमों का पालन करना पड़ता था।
  4. दोनों ही शिक्षा प्रणालियों में अनुशासन की गम्भीर समस्या नहीं थी तथा अनुशासन बनाये रखने | के लिए कठोर या शारीरिक दण्ड का प्रावधान नहीं था।
  5. दोनों शिक्षा-प्रणालियाँ धर्म-प्रधान थीं अर्थात् शिक्षा के क्षेत्र में धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों को समुचित महत्त्व दिया गया था।
  6. दोनों ही शिक्षा-प्रणालियों में शैक्षिक-प्रक्रिया में कुछ संस्कारों को विशेष महत्त्व दिया गया था।
  7. दोनों ही शैक्षिक व्यवस्थाओं में शिक्षा पूर्ण रूप से निःशुल्क थी अर्थात् शिक्षा ग्रहण करने के लिए किसी प्रकार का शुल्क देने का प्रावधान नहीं था।
  8. किसी भी शिक्षा-प्रणाली का मूल्यांकन करते समय गुरु-शिष्य सम्बन्धों को अवश्य ध्यान में रखा जाता है। वैदिक शिक्षा तथा बौद्ध-शिक्षा के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि इन दोनों शिक्षा प्रणालियों में गुरु-शिष्य सम्बन्ध बहुत ही मधुर, स्नेहपूर्ण, पवित्र तथा पारस्परिक व कर्तव्यों पर आधारित थे। यह समानता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
  9. ये दोनों ही शिक्षा-प्रणालियाँ विभिन्न निर्धारित नियमों द्वारा परिचालित होती थीं। शिक्षा प्रारम्भ | करने की आयु शिक्षा की अवधि आदि पूर्ण रूप से नियमित तथा निश्चित थी।
  10. वैदिक शिक्षा तथा बौद्ध शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत शैक्षिक वातावरण सम्बन्धी समानता थी। गुरुकुल तथा बौद्ध मठ सामान्य रूप से गाँव या नगर से कुछ दूर प्राकृतिक रमणीक वातावरण में ही स्थापित किये जाते थे।
  11. वैदिक शिक्षा तथा बौद्ध-शिक्षा में समान रूप से छात्रों द्वारा सादा तथा सरल जीवन व्यतीत किया जाता था तथा सदाचार को विशेष महत्त्व दिया जाता था। व्यवहार में सादा जीवन उच्च-विचार के आदर्श को अपनाया जाता था।

वैदिक तथा बौद्ध शिक्षा की असमानताएँ
वैदिक तथा बौद्ध शिक्षा प्रणालियों में विद्यमान असमानताओं का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है|

  1. वैदिक काल में शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से गुरुकुलों में होती थी, जबकि बौद्धकाल में यह
    व्यवस्था बौद्ध-मठों एवं विहारों में होती थी। वैदिक काल में सामान्य विद्यालय नहीं थे, परन्तु | बौद्धकाल में इस प्रकार के विद्यालय स्थापित हो गये थे।
  2. “वैदिक काल में शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी, जबकि बौद्धकाल में शिक्षा का माध्यम पालि | भाषा तथा कुछ क्षेत्रीय भाषाएँ थीं।।
  3. वैदिक काल में शिक्षा प्रदान करने का कार्य ब्राह्मण करते थे, जबकि बौद्धकाल में ऐसा बन्धन नहीं था। किसी भी जाति का योग्य व्यक्ति शिक्षा प्रदान कर सकता था।
  4. वैदिक काल में शिक्षा का स्वरूप व्यक्तिगत एवं पारिवारिक था, जबकि बौद्धकाल में यह स्वरूप । सामूहिक एवं संस्थागत था।
  5. वैदिक काल में केवल सवर्णो को शिक्षा प्रदान की जाती थी, जबकि बौद्धकाल में किसी प्रकार का जातिगत भेदभाव नहीं था।
  6. वैदिक काल में छात्रों का जीवन अधिक कठोर एवं तपोमय था, जबकि बौद्धकाल में यह कठोरता घट गयी।
  7. वैदिक काल में शिक्षा अनिवार्य रूप से शिक्षके-केन्द्रित थी, जबकि बौद्धकाल में छात्रों को भी कुछ स्वतन्त्रता एवं अधिकार प्राप्त थे।
  8. वैदिक काल में वैदिक धर्म, दर्शन एवं साहित्य की शिक्षा दी जाती थी परन्तु बौद्ध-शिक्षा के अन्तर्गत बौद्ध धर्म एवं दर्शन को शिक्षा के पाठ्यक्रम में अधिक महत्त्व दिया जाता था।
  9.  वैदिककालीन प्रायः सभी शिक्षण-संस्थाओं में एकतन्त्रवादी सत्ता-व्यवस्था का बोलबाला था, परन्तु बौद्धकाल में प्राय: सभी शिक्षण संस्थाओं में जनतान्त्रिक सत्ता-व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बौद्धकालीन शिक्षा में गुरु-शिष्य सम्बन्धों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
डॉ० ए०एस० अल्तेकर ने लिखा है, “गुरु-शिष्य के बीच पिता-पुत्र का सम्बन्ध होता था। वे परस्पर श्रद्धा, विश्वास और स्नेह से बंधे रहते थे।”
गुरु के प्रति, भक्ति और प्रेम व्यापक एवं सर्वमान्य था। गुरु भी शिष्यों को सही मार्ग पर ले जाता था।
1. गुरु का कर्तव्य-गुरु का लक्ष्य हर छात्र को धर्म, नैतिकता, आध्यात्मिकता एवं बौद्धिकता प्रदान करना होता था। इस उत्तरदायित्व को वह भली प्रकार से वहन करता था। गुरु छात्र की सभी आवश्यकताओं को पूरी करता था। शिष्यों को आगे बढ़ाना, उनकी शंकाओं को दूर करना, उनकी रुचि के अनुकूल विषयों का ज्ञान देना, उन्हें जाग्रत एवं जिज्ञासु करना, संघ के जीवन के लिए तैयार करना, नियम न मानने के कारण दण्ड देना, सुधास्ना तथा पुनः सही मार्ग पर छात्रों को लाना गुरु का ही काम था।

गुरु छोटी-छोटी कक्षाओं में शिष्यों को बाँटकर शिक्षा देता था और व्यक्तिगत रूप से उन पर ध्यान रखता था। पढ़ाए गए पाठ की रोज जाँच करता था। पुराने पाठ के याद कर लेने के बाद ही नए पाठ का ज्ञान दिया जाता था। छात्र को उसकी शक्ति एवं क्षमता के अनुरूप शिक्षा दी जाती थी। वार्षिक परीक्षा नहीं होती थी। सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने पर शिक्षा पूरी समझी जाती थी। शिक्षा देने का पूरा भारे गुरु लेता था। गुरु शिष्यों का बौद्धिक, शारीरिक एवं धार्मिक विकास करता था।

2.शिष्य का कर्तव्य-प्रत्येक विद्यार्थी का कर्तव्य था नैतिक एवं ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन बिताना, संघ के नियमों एवं गुरु के आदेशों का पालन करना, गुरु की सेवा में लगे रहना, भोजन एवं आचरण की दृष्टि से शुद्ध-सरल जीवन जीना, स्वाध्याय में लगे रहना, मानवीय गुणों का विकास करना, सत्य का पालन, हिंसा न करना, आमोद-प्रमोद व मनोरंजन से दूर रहना, गुरु के साथ शास्त्रार्थ करना, ज्ञान की खोज में भ्रमण करना, समाज को दीक्षित करने के लिए प्रयत्न करना, समाज सेवा आदि। इस प्रकार, गुरु के आदर्शों, आदेशों और आचरण का अनुसरण करके शिष्य भी सिद्ध हो जाता था और उसे सिद्धि बिहारक’ की उपाधि मिलती थी।
इस काल में गुरु-शिष्य का सम्बन्ध आदर्शमय, त्यागमय एवं कर्त्तव्यमय होता था, परन्तु यह सम्बन्ध शिक्षा काल तक ही सीमित रहता था। निर्धन छात्र गुरु की विशिष्ट सेवा करता था। वह गुरु के दैनिक कार्यों में सुहयोग देता था। बौद्धग्रन्थ महावग्गा में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध में विशद् वर्णन दिया गया है।

प्रश्न 2
बौद्धकालीन शिक्षा के पाठ्यक्रम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा का पाठ्यक्रम प्रारम्भिक, उच्च, औद्योगिक और व्यावसायिक वर्गों में बँटा हुआ था

  1. प्रारम्भिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में साधारण लिखना-पढ़ना, गणित, पंच विद्या (शब्द विद्या, शिल्प विद्या, चिकित्सा विद्या, हेतु विद्या व अध्यात्म विद्या) सम्मिलित थे।
  2. उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक रूप से प्रायः सभी विषय पढ़ाए जाते थे; यथा–धर्म, भाषा, इतिहास, भूगोल, ज्योतिष, राजनीति, न्याय, शिल्प, कला प्रशासन आदि।
  3. औद्योगिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में केवल कला-कौशल और व्यावसायिक शिक्षा में केवल व्यवसाय उद्योग विषय रखे गए थे। इस प्रकार बौद्धकालीन शिक्षा के पाठ्यक्रम में चार बातें प्रमुख थीं
    •  धार्मिक शिक्षा–बौद्ध धर्म के ग्रन्थ-त्रिपिटक-सुत्त पिटक, विनय पिटक व अभिधम्म पिटक का अध्यय
    •  हिन्दू दर्शन–वेद, पुराण, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, सांख्य, योग, न्याय वैशेषिक आदि का अध्ययन।
    • भाषाएँ–पालि, संस्कृत, तिब्बती, चीनी आदि भाषाओं का अध्ययन।
    • विज्ञान व कला-विज्ञान, चिकित्सा, शिल्प, तर्कशास्त्र, विधिशास्त्र तथा कला के विषयों का अध्ययन।

मिलिन्दपन्हो और अन्य बौद्ध ग्रन्थों में आखेट विद्या, धनुर्विद्या, जादू, सैन्य विज्ञान, प्रकृति अध्ययन, लेखा विज्ञान, मुद्रा विज्ञान, शल्यशास्त्र, अस्त्र विज्ञान आदि विषयों का भी उल्लेख मिलता है।

प्रश्न 3
बौद्धकालीन शिक्षा के प्रबन्ध का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा के कई स्तर थे-

  1. प्रारम्भिक शिक्षा,
  2. उच्च शिक्षा,
  3. व्यावसायिक शिक्षा,
  4. ललित कलाओं की शिक्षा। स्त्री-शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था थी। विद्यालय, विश्वविद्यालय तथा शिक्षा केन्द्रों की भी व्यवस्था की गई थी। इसी प्रकार सभी वर्गों तथा जातियों के लिए जनसाधारण शिक्षा का भी प्रबन्ध था।

शिक्षा के लिए आर्थिक व्यवस्था समाज के द्वारा की जाती थी। शासन, नगर श्रेष्ठ (सेठ) व अन्य धनी लोग धन तथा सम्पत्ति देकर शिक्षा की व्यवस्था करते थे, परन्तु शैक्षिक प्रबन्ध में इन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। अधिकांश विद्यार्थी नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। कुछ शिक्षा केन्द्रों में शिक्षा शुल्क भी देना पड़ता था। भोजन और ओवास व्यवस्था छात्रावासों में होती थी।

इस काल में शैक्षिक व्यवस्था मठाधीश या विहार के प्रधान के हाथ में थी। उसी के अधीन सभी भिक्षु. होते थे, जो धार्मिक और लौकिक शिक्षा के लिए उत्तरदायी होते थे। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश देने का, शिक्षा की अघधि, शिक्षा के सत्र, अध्ययन का समय, अवकाश आदि का पूरा अधिकार मठाधीश को होता था।

प्रशासन की व्यवस्था संघ संचालक द्वारा होती थी। उसके सहयोगी अन्य अध्यापक एवं विद्यार्थी भी होते थे। प्रशासन के संचालन में सहायता देने के लिए अनेक समितियाँ भी होती थीं।। शैक्षणिक समिति के कार्य थे—छात्रों का प्रवेश लेना, तत्सम्बन्धी नियम बनाना, पाठ्यक्रम तैयार करना, अध्यापन के लिए अध्यापक नियुक्त करना, परीक्षा लेना, प्रमाण-पत्र देना, पुस्तकालय का संचालन करना, पुस्तकें लिखवाना तथा उन्हें सुरक्षित रखना आदि।

प्रबन्ध समिति का कार्य था–अर्थ भार लेना, विद्यालय भवन बनवाना, विद्यालय की सामग्री की देखभाल करना, छात्रावास का प्रबन्ध करना; भोजन आदि की व्यवस्था करना, नौकरों की नियुक्ति करना, चिकित्सा का प्रबन्ध करना आदि प्रबन्ध समिति के कार्य थे।

प्रश्न 4
बौद्धकालीन शिक्षा में अपनाई जाने वाली मुख्य शिक्षा-विधियों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर
बौद्ध काल में शिक्षण की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित थीं-

  1. शिक्षक द्वारा शिक्षण विधि-प्रतिदिन शिक्षक द्वारा प्रातः 7 बजे से 11 बजे तक और फिर 2 बजे से सायं 5 या 6 बजे तक शिक्षा दी जाती थी। पहले पुराने पाठ का स्मरण कराया जाता था, तत्पश्चात् नया पाठ पढ़ाया जाता था।
  2. प्रवचन या व्याख्यान विधि-शिक्षक अपनी इच्छानुसार विषय के ऊपर प्रवचन या व्याख्यान देता था। शिक्षक शुद्ध उच्चारण और कण्ठस्थलीकरण पर विशेष बल देता था।
  3. वाद-विवाद विधि-शिक्षक सत्यों को प्रमाणित करने के लिए वाद-विवाद और शास्त्रार्थ विधि का प्रयोग करते थे। इस विधि में सिद्धान्त, हेतु, उदाहरण, साम्य, विरोध, प्रत्यक्ष, अनुमान तथा निष्कर्ष या आगम प्रमाणों का प्रयोग किया जाता था।
  4. प्रश्नोत्तर विधि-शिक्षक छात्रों की शंकाओं का समाधान विषयों के स्पष्टीकरण और छात्रों में जिज्ञासा उत्पन्न करने के लिए प्रश्नोत्तर विधि का प्रयोग करते थे।
  5. मॉनीटोरियल विधि-कक्षा के कुशाग्र बुद्धि छात्र द्वारा या उच्च कक्षा के छात्रों द्वारा निम्न कक्षा के छात्रों को पढ़ाने का प्रबन्ध किय्य जाता था।
  6. पुस्तक अध्ययन विधि-सम्यक् ज्ञान पुस्तक में रहता था, अतएव पुस्तक अध्ययन की विधि अपनाई गई थी।
  7. सम्मेलन विधि-पूर्णिमा और प्रतिपदा के दिन संघ के सभी छात्र एवं अध्यापक एक साथ मिलते थे और वहीं ज्ञान-धर्म की चर्चा होती थी।
  8. निदिध्यासन विधि-धर्म एवं अध्यात्म के विषय के लिए यह विधि अपनाई जाती थी। इससे अन्तर्ज्ञान प्राप्त किया जाता था।
  9. देशाटन, भ्रमण और निरीक्षण विधि—छात्र विभिन्न स्थानों में भ्रमण व देशाटन करके ज्ञान प्राप्त करते थे और प्रकृति की विभिन्न वस्तुओं का निरीक्षण करते थे।
  10. व्यावसायिक व प्रयोगात्मक विधि-व्यावसायिक एवं औद्योगिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए छात्र कुशल कारीगरों की देख-रेख में रहता था और दक्षता तथा प्रवीणता का अर्जन करता था। वह स्वयं काम करता था और अन्य लोगों के काम करने के तरीके का अवलोकन भी करता था।

प्रश्न 5
आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए बौद्ध-शिक्षा की देन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आधुनिक भारतीय शिक्षा के लिए बौद्ध-शिक्षा की देन बौद्धकालीन भारतीय शिक्षा की कुछ मौलिक विशेषताएँ थीं, जिनके कारण इस शिक्षा-प्रणाली ने सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा-व्यवस्था पर विशेष प्रभाव डाला। बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली एवं व्यवस्था के कुछ तत्त्व ऐसे थे जिनका अनुकरण आगामी भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में भी किया जाता रहा तथा आज भी हमारी शिक्षा में उन्हें किसी-न-किसी रूप में देखा जा सकता है। इन तत्त्वों को बौद्धकालीन शिक्षा की आधुनिक भारतीय शिक्षा की देन माना जा सकता है। इन तत्त्वों या कारकों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है-

  1. आधुनिक युर्ग में सब कहीं पाये जाने वाले सामान्य विद्यालय मूल रूप से बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली की ही देन है, क्योंकि सर्वप्रथम बौद्धकाल में ही सामान्य विद्यालय स्थापित हुए थे।
  2. वर्तमान समय में सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था है, इसे प्रारम्भ करने का श्रेय भी बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली को ही था।
  3. आधुनिक युग में स्त्री-शिक्षा को विशेष आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। इस अवधारणा को भी सर्वप्रथम बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली में ही प्रस्तुत किया गया था; अतः इसे भी बौद्ध-शिक्षा की ही देन माना जाता है।
  4. आधुनिक युग में छात्रों के सुचारु शारीरिक विकास के लिए विद्यालयों में खेल-कूद तथा शारीरिक व्यायाम की विशेष व्यवस्था की जाती है। इस व्यवस्था को भी सर्वप्रथम बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था में ही लागू किया गया था; अत: इसे उसी की देन माना जाता है।
  5. वर्तमान समय में प्राविधिक तथा विज्ञान सम्बन्धी शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस प्रकार की शिक्षा का प्रचलन भी सर्वप्रथम बौद्धकाल में ही हुआ था; अतः वर्तमान शिक्षा के लिए यह बौद्धकालीन शिक्षा की ही देन माना जा सकता है।
  6. बौद्धकालीन शिक्षा की एक अन्य सराहनीय देन है–शिक्षा के क्षेत्र में व्यावसायिक शिक्षा तथा लाभप्रद विषयों को सम्मिलित करना। आज भी इस वर्ग की शिक्षा को अति आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
  7. आधुनिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में लौकिक तथा सामान्य विषयों के समावेश को विशेष प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रचलन को भी बौद्धकाल में ही प्रारम्भ किया गया था।
  8. बौद्धकालीन शिक्षा की एक देन शिक्षा के क्षेत्र में सामूहिक प्रणाली को अपनाना, शिक्षण के लिए। बहु-शिक्षक व्यवस्था को लागू करना भी है। आज भी इन व्यबस्थाओं को अपनाया जा रहा है।
  9. बौद्धकालीन शिक्षा की एक देन शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न स्तरों की शिक्षा की अवधि को निर्धारित करना भी रही है।
  10. आज प्रत्येक शिक्षण संस्था के सँभी नियम पूर्व-निर्धारित तथा निश्चित होते हैं। शिक्षण संस्थाओं में इस व्यवस्था को प्रारम्भ करने का श्रेय बौद्धकालीन शिक्षा को ही है; अत: इसे भी उसकी देन माना जा सकता है।
  11. आज शिक्षा के क्षेत्र में अवसरों की समानता की अवधारणा को आवश्यक माना जा रहा है। मौलिक रूप से यह अवधारणा बौद्ध शिक्षा की ही देन है।
  12. आज अधिकांश विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने वाले बालक अपने घरों में अपने परिवार के साथ
    ही रहते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इस व्यवस्था को प्रारम्भ करने का श्रेय बौद्ध शिक्षा-प्रणाली को ही | है, अत: इस व्यवस्था को भी बौद्ध शिक्षा की देन ही स्वीकार किया जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बुद्ध के समय में पबज्जा (प्रव्रज्या) संस्कार कैसे मनाया जाता था?
उत्तर
प्रव्रज्या संस्कार’ बौद्ध शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषता थी। यह संस्कार बालक की शिक्षा प्रारम्भ करने के अवसर पर आयोजित किया जाता था। ‘पबज्जा’ का शाब्दिक अर्थ है-‘बाहर जाना। अत: यह संस्कार,बालक द्वारा अपना घर छोड़कर शिक्षा ग्रहण के लिए किसी बौद्ध मठ के लिए गमन करने का द्योतक है। | पबज्जा संस्कार का विवरण ‘विनयपिटक’ में दिया गया है। इसके अनुसार, इस अवसर पर बालक सिर के बाल मुंडवाकर एवं पीले वस्त्र धारण कर मठ के भिक्षुओं के सम्मुख एक श्लोक का तीन बार पाठ करता था। यह श्लोकोथा “बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” इस प्रकार विधिवत् शपथ ग्रहण करने के उपरान्त बालक को प्रधान भिक्षु द्वारा सामान्य उपदेश दिया जाता था, जिसमें उसे मुख्य रूप से दस आदेश दिए जाते थे। उदाहरणत: चोरी न करना, जीवहत्या न करना, असत्य न बोलना अशुद्ध आचरण नहीं करना आदि।

वस्तुतः ये आदेश विद्यार्थियों के लिए आचार-संहिता के समान थे। इस उपदेश के उपरान्त बालक को मठ की सदस्यता प्राप्त हो जाती थी तथा उसे नव-शिष्य, श्रमण या सामनेर कहा जाता था।

प्रश्न 2
बौद्धकालीन शिक्षा में अनुशासन की क्या व्यवस्था थी ?
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा में छात्रों के लिए अनुशासित रहना अति आवश्यक था। प्रत्येक छात्र को विद्यालय के नियमों तथा रहन-सहन एवं खान-पान के नियमों का पालन करना पड़ता था। नियम और अनुशासन भंग तथा दुराचरण पर गुरु विद्यार्थी को दण्ड देता था, विद्यालय से निकाल देता था तथा विद्याध्ययन से कुछ समय के लिए वंचित कर देता था। छात्रों के प्रत्येक अपराध की सूचना गुरु द्वारा संघ को दी जाती थी और संघ की ‘प्रतिभारत’ सभा द्वारा दण्ड दिया जाता था। इसमें विद्यार्थी अपना अपराध सभी के सामने स्वीकार करता था। अनुशासनहीनता बढ़ने पर सभी छात्र दण्ड पाते थे।

प्रश्न 3
बौद्धकाल में स्त्री-शिक्षा की क्या व्यवस्था थी ?
उत्तर
बौद्धकाल में स्त्रियों अर्थात् बालिकाओं को शिक्षा दिए जाने की सुचारु व्यवस्था थी। इसका प्रमाण है कि इस काल में अनेक विदुषी स्त्रियों का उल्लेख हुआ है; जैसे–अनुपमा, सुमेधा, विजयंका तथा शुभा। बौद्धकाल में अनेक स्त्रियों ने बौद्ध-धर्म के प्रचार एवं प्रसार में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। परन्तु यह भी सत्य है कि बौद्धकाल में केवल उच्च वर्ग के परिवारों की स्त्रियाँ ही उत्तम शिक्षा प्राप्त कर पाती थीं। वास्तव में बौद्ध मठों में प्रारम्भ में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध था। अत: बालिकाओं की शिक्षा की कोई सार्वजनिक व्यवस्था नहीं थी।

प्रश्न 4
बौद्धकालीन शिक्षा-व्यवस्था में समाज के किन वर्गों के व्यक्तियों को शिक्षा प्राप्त करने, का अधिकार प्राप्त नहीं था ?
उत्तर
बौद्ध मान्यताओं के अनुसार वर्ण या जातिगत भेदभाव की कोई महत्त्व नहीं था; अतः इस आधार पर समाज के किसी वर्ग को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया गया था। सभी वर्गों एवं जातियों के बालक मठों में एक-साथ शिक्षा प्राप्त केरते थे। परन्तु बौद्धकालीन शैक्षिक नियमों के अनुसार चाण्डालों को शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित स्ख़ा गया था। चाण्डालों के अतिरिक्त अन्य दस आधारों पर भी किसी व्यक्ति को शिक्षा प्राप्ति के अधिकार से वंचित किया जा सकता था। ये आधार थे-

  1. नपुंसक व्यक्ति,
  2. दास अथवा ऋणग्रस्त व्यक्ति,
  3. राजा की नौकरी में संलग्न व्यक्ति,
  4. डाकू व्यक्ति,
  5. कारावास से भागा हुआ व्यक्ति,
  6. अंग-भंग व्यक्ति,
  7. विकृत शरीर वाला व्यक्ति,
  8. राज्य द्वारा दण्डित व्यक्ति,
  9. जिस व्यक्ति को माता-पिता ने शिक्षा प्राप्त करने की आज्ञा न दी हो,
  10. क्षय, कोढ़ तथा खुजली आदि संक्रामक रोगों से पीड़ित व्यक्ति।

प्रश्न 5
बौद्धकालीन शिक्षा के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा के निम्नलिखित मुख्य गुणों का उल्लेख किया जा सकता है

  1. प्राथमिक एवं उच्च स्तर पर सभी प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था होना।
  2. जाति-पाँति के भेदभाव को दूर कर धनी व निर्धन, पुरुष व स्त्री सभी लोगों के लिए शिक्षा का प्रबन्ध होना।
  3. विभिन्न प्रकार के विद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा शिक्षा केन्द्रों की स्थापना होना।
  4. जीवनोपयोगी, ज्ञानात्मक एवं कौशलात्मक विषयों को संगठित करना।
  5. संयम, नियम-पालन, अनुशासन व आदर्शों पर ध्यान देना।
  6. पाठ्य-पुस्तके,रचना, सुरक्षा तथा पुस्तकालयों का विकास करना।
  7. स्त्री शिक्षा, व्यवसायिक, शिल्प एवं ललित कलाओं की शिक्षा का विकास करना।
  8. प्राचीन आधार पर होते हुए भी नवीन शिक्षा की ओर उन्मुख होना।
  9. सामाजिक एवं सामुदायिक जीवन की प्रगति पर बल देना।
  10. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय भावना से छात्रों का नैतिक, धार्मिक, ज्ञानात्मक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास करना।

प्रश्न 6
बौद्धकालीन शिक्षा के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा में निम्नलिखित दोष थे

  1. धार्मिक ज्ञान पर विशेष बल देना।
  2. तकनीकी कौशल के विषयों की शिक्षा का अभाव होना।
  3. सैनिक तथा शारीरिक शिक्षा का अभाव होना।
  4. समाज की ओर ध्यान होते हुए भी निवृत्ति मार्ग का अनुसरण करना।
  5. शिक्षा में शारीरिक श्रम के महत्त्व की उपेक्षा होना।
  6. शिक्षकों तथा छात्रों में अनुशासन-संयम के नियमों में शिथिलता होना।
  7. अनाचार फैलने से स्त्री शिक्षा का विकास अवरुद्ध होना।
  8. लोकतन्त्र के नाम पर स्वेच्छाचारिता का प्रवेश और विकास होना।
  9. जनसाधारणका दृष्टिकोण संकुचित और दूषित हो जाना।
  10. शिक्षा और जीवन दोनों की प्रगति रुक-सी गई।

प्रश्न 7
‘शरणत्रयी’ से आप क्या समझते हैं ?
उतर
बौद्धकालीन शिक्षा की मान्यताओं के अनुसार जब बालक की शिक्षा प्रारम्भ की जाती थी तब बालक बौद्ध मठ की शरण में जाता था। इस अवसर पर बालक को एक श्लोक का उच्चारण करना पड़ता था—“बुद्ध शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि।” इस प्रचलन या परम्परा को ही ‘शरणत्रयी’ के रूप में जाना जाता था।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली के नियमानुसार बालक की शिक्षा आरम्भं करते समय किस संस्कार को आयोजित किया जाता था ?
उत्तर
बालक की शिक्षा को एम्भ करते समय प्रव्रज्या संस्कार आयोजित किया जाता था।

प्रश्न 2
बौद्धकालीन शिक्षा में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा थी ?
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा में पालि भाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाती थी।

प्रश्न 3
बौद्धकाल में मुख्य रूप से शिक्षण की किस प्रणाली को अपनाया जाता था ?
उत्तर
बौद्धकाल में मुख्य रूप से शिक्षण की मौखिक प्रणाली को अपनाया जाता था।

प्रश्न 4
बौद्धकालीन शिक्षा के दो मुख्य स्तर कौन-कौन-से थे ?
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा के दो मुख्य स्तर थे—प्राथमिक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा।

प्रश्न 5
बौद्धकालीन सामान्य शिक्षण संस्थानों को किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर
बौद्धकालीन सामान्य शिक्षण संस्थाओं को बौद्ध मठ के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 6
बौद्धकालीन शिक्षा का परम उद्देश्य क्या स्वीकार किया गया था ?
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा को परम उद्देश्य निर्वाण की प्राप्ति माना गया था।

प्रश्न 7
आलोचकों के अनुसार बौद्धकालीन शिक्षा में जीवन के किस पक्ष को समुचित महत्त्व प्रदान नहीं किया गया था ?
उत्तर
आलोचकों के अनुसार बौद्धकालीन शिक्षा में जीवन के लौकिक पक्ष को समुचित महत्त्व प्रदान नहीं किया गया था।

प्रश्न 8
बौद्धकाल में बालक की शिक्षा के पूर्ण होने के अवसर पर किस संस्कार को सम्पन्न किया जाता था ?
उत्तर
बौद्धकाल में बालक की शिक्षा के पूर्ण होने के अवसर पर उपसम्पदा संस्कार सम्पन्न किया जाता था।

प्रश्न 9
बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली में किस वर्ग के व्यक्तियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था ?
उत्तर
बौद्धकालीन शिक्षा-प्रणाली में चाण्डाल वर्ग के व्यक्तियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था।

प्रश्न 10
बौद्ध काल में स्थापित किन्हीं दो प्रमुख विश्वविद्यालयों के नाम लिखिए।
उत्तर
1. नालन्दा विश्वविद्यालय तथा
2. विक्रमशिला विश्वविद्यालय।

प्रश्न 11
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. बौद्धकालीन शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को आत्मनिर्भर तथा स्वावलम्बी बनाना था।
  2. बौद्ध काल में शिक्षा का माध्यम जनसाधारण की भाषा संस्कृत थी।
  3. बौद्ध काल में शिक्षा के क्षेत्र में शारीरिक विकास तथा सैन्य प्रशिक्षण को विशेष महत्त्व दिया जाता था।
  4. बौद्ध काल में प्राथमिक शिक्षा के मुख्य केन्द्र बौद्ध मठ थे।
  5. बौद्ध काल में शिक्षा का मुख्य स्वरूप लिखित ही था।

उत्तर

  1. असत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक कौम थे ?
(क) महावीर स्वामी
(ख) गौतम बुद्ध
(ग) शंकराचार्य
(घ) अश्वघोष
उत्तर
(ख) गौतम बुद्ध

प्रश्न 2
“बौद्ध शिक्षा प्राचीन हिन्दू या ब्राह्मण शिक्षा-प्रणाली का केवल एक रूप थी।” यह कथन किसका है ?
(क) ए०एस० अल्तेकर
(ख) आर०के० मुकर्जी
(ग) डी०पी० मुकर्जी
(घ) कीथ
उत्तर
(ख)आर०के० मुकर्जी

प्रश्न 3
बौद्ध शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य था
(क) चरित्र-निर्माण
(ख) व्यक्तित्व का विकास
(ग) जीविकोपार्जन
(घ) निर्वाण-प्राप्ति
उत्तर
(घ) निर्वाण-प्राप्ति

प्रश्न 4
बौद्ध शिक्षा का ज्ञान किस लेखक के यात्रा-विवरण से होता है?
(क) सुंमाचीन
(ख) फाह्याने
(ग) ह्वेनसाँग
(घ) इत्सिग
उत्तर
(ग) ह्वेनसाँग

प्रश्न 5
बौद्ध काल में प्राथमिक शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे
(क) देव मन्दिर
(ख) बौद्ध मठ
(ग) बौद्ध विहार
(घ) बौद्ध संघाराम
उत्तर
(ख)बौद्ध मठ

प्रश्न 6
बौद्ध काल में शिक्षा आरम्भ होने की आयु थी
(क) 5 वर्ष
(ख) 7 वर्ष
(ग) 8 वर्ष
(घ) 12 वर्ष
उत्तर
(ग) 8 वर्ष

प्रश्न 7
बौद्ध काल में शिक्षा प्रारम्भ का संस्कार था
(क) उपनयन
(ख) उपसम्पदा
(ग) पबज्जा
(घ) समावर्तन
उत्तर
(ग) पबज्जा

प्रश्न 8
बौद्ध काल में शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा थी? बौद्ध मठों एवं विहारों में शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा थी?
(क) पालि
(ख) प्राकृत
(ग) संस्कृत
(घ) मगधी
उत्तर
(क) पालि

प्रश्न 9
बौद्ध काल में शिक्षा का विश्वप्रसिद्ध केन्द्र था
(क) जौनपुर
(ख) उज्जैन
(ग) नालन्दा
(घ) अमरावती
उत्तर
(ग) नालन्दा

प्रश्न 10
बौद्ध काल के किस ग्रन्थ में उस समय प्रचलित व्यावसायिक शिक्षा के 19 विषयों का उल्लेख मिलता है
(क) बौद्धचरित
(ख) विनयपिटक
(ग) ललितविस्तर
(घ) मिलिन्दपन्हो
उत्तर
(घ) मिलिन्दन्हो

प्रश्न 11
विक्रमशिला विश्वविद्यालेस की स्थापना हुई थी
(क) बौद्ध काल में
(ख) वैदिक काल में
(ग) मुस्लिम काल में
(घ) ब्रिटिश काल में
उत्तर
(क) बौद्ध काल में

प्रश्न 12
नालन्दा विश्वविद्यालय वर्तमान समय में किस नगर के निकट स्थित है?
(क) पटना
(ख) राँची
(ग) आगरा
(घ) कोलकाता
उत्तर
(क) पटना

प्रश्न 13
प्रव्रज्या संस्कार का सम्बन्ध है
(क) वैदिक शिक्षा से
(ख) बौद्ध शिक्षा से.
(ग) मुस्लिम शिक्षा से
(घ) ब्रिटिश शिक्षा से
उत्तर
(ख) बौद्ध शिक्षा से

प्रश्न 14
बौद्रकालीन शिक्षा में किस संस्कार के पश्चात् बालक को ‘श्रमण’ कहा जाता था?
(क) पबज्जा
(ख) उपसम्पदा
(ग) उपनयन
(घ) समावर्तन
उत्तर
(ख) उपसम्पदा

प्रश्न 15
बौद्ध कौल में छात्रों को किस संस्कार के बाद मठों में शिक्षा ग्रहण करने हेतु प्रवेश
दिया जाता था ?
(क) उपनयन
(ख) प्रव्रज्या
(ग) शरणत्रयी
(घ) बिस्मिल्लाह
उत्तर
(ख) प्रव्रज्या

प्रश्न 16
भारत का सर्वप्रथम विश्वविद्यालय कौन-सा था ?
(क) तक्षशिला
(ख) नालन्दा
(ग) वल्लभी –
(घ) विक्रमशिला
उत्तर
(ख) नालन्दा

प्रश्न 17
बौद्ध काल में ‘महोपाध्याय किसे पढाते थे?
(क) सामनेर
(ख) गृहस्थ
(ग) शिक्षक
(घ) धम्म
उत्तर
(घ) धम्म

प्रश्न 18
मठ व्यवस्था महत्त्वपूर्ण तत्त्व था
(क) वैदिक शिक्षा का
(ख) इस्लाम शिक्षा को
(ग) जैन शिक्षा का
(घ) बौद्ध शिक्षा का
उत्तर
(घ) बौद्ध शिक्षा का

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name नियुक्ति आवेदन-पत्र
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र

कुछ महत्त्वपूर्ण बातें

  1. अन्य पत्रों के समान आवेदन तथा प्रार्थना-पत्र में पत्र-लेखक अपना नाम-पतादि प्रारम्भ में नहीं लिखता और न ही प्रारम्भ में दिनांक लिखा जाता है। आवेदक अपना पता पत्र-समाप्ति पर अन्त में हस्ताक्षर के नीचे दायीं ओर लिखता है और बायीं ओर दिनांक लिखा जाता है।
  2. इन पत्रों का प्रारम्भ प्रथम पंक्ति में बायीं ओर कोने में सेवा में’ या ‘प्रति’ लिखने से होता है।
  3. ‘सेवा में लिखकर दूसरी पंक्ति में बायीं ओर से कुछ स्थान छोड़कर उद्दिष्ट अधिकारी का पदनाम और पता लिखा जाता है।
  4. सम्बोधन के रूप में मान्यवर/मान्य महोदय/महोदया लिखना चाहिए।
  5. निवेदन प्रारम्भ करते हुए प्रारम्भिक विनय-वाक्य लिखना चाहिए; जैसे—सादर निवेदन है/सविनय निवेदन है आदि।
  6. आवेदन का सम्पूर्ण कथ्य लिखने के उपरान्त शिष्टाचार के लिए सधन्यवाद लिखना चाहिए।
  7. स्वनिर्देश के रूप में भवदीय/विनीत/प्रार्थी लिखना चाहिए। स्वनिर्देश के नीचे हस्ताक्षर और पूरा पता देना चाहिए।
  8. अन्त में संलग्न प्रपत्रों की सूची देनी चाहिए। आवेदन-पत्र की दो शैलियाँ होती हैं—
    • प्रपत्र शैली तथा
    • पत्र शैली। दोनों ही शैली के उदाहरण यहाँ दिये जा रहे हैं।

प्रश्न 1.
लिपिक पद हेतु हिन्दी में प्रपत्र शैली में एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 11]
या
अपनी शैक्षिक योग्यताओं का उल्लेख करते हुए किसी उद्योग प्रबन्धक को लिपिक के पद पर नियुक्ति हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2018]
या
अपने जनपद के जिलाधिकारी को उनके कार्यालय में रिक्त लिपिक पद पर नियुक्ति पाने के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 13]
या
प्रधानाचार्य/प्रबन्धक महोदय को लिपिक पद पर नियुक्ति हेतु एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 17]
या
स्थानीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में लिपिक के रिक्त पद पर नियुक्ति हेतु विद्यालय के प्रबन्धक महोदय को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2016, 18]
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र img 2

9. शुल्क विवरण-पोस्टल आर्डर संलग्न (संख्या 05921, दिनांक : ………………………………) मैं घोषणा करती हूँ कि आवेदित पद के लिए सभी निर्धारित अर्हताएँ मुझमें हैं। मैंने जो सूचनाएँ इस आवेदन-पत्र में दी हैं, वे सही हैं। यदि इनमें से कोई भी जानकारी गलत पायी जाये तो मेरी उम्मीदवारी निरस्त कर दी जाये।।

10. संलग्नकों की संख्या : तीन भवदीया
दिनांक : 14 मई, 2014 हस्ताक्षर

[ नाम : …………………………….]

प्रश्न 2.
सहायक अध्यापक पद के लिए पत्र शैली में शिक्षा-निदेशक के नाम एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2014]
या
किसी विद्यालय के प्रबन्धक के नाम हिन्दी प्रवक्ता पद हेतु अपनी नियुक्ति के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
या
अपने जनपद के किसी विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य करने के लिए अपना आवेदन-पत्र विद्यालय-प्रबन्धक को प्रस्तुत कीजिए। [2015]
उत्तर
सेवा में,
शिक्षा निदेशक,
लखनऊ।

विषय-सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन-पत्र महोदय,

दिनांक 11 मार्च, 2010 के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित आपके विज्ञापन के उत्तर में मैं हिन्दी में सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन कर रहा हूँ। मेरी शैक्षणिक योग्यताओं एवं अन्य जानकारियों का विवरण इस प्रकार है-
UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र img 3
अन्य गतिविधियाँ-विद्यालय तथा महाविद्यालय स्तर पर हुई वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार विजेता, कुछ एक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के सफल संचालन का अनुभव।
स्थायी पता-15A, सी-ब्लॉक, शास्त्रीनगर, मेरठ।
मेरी अध्यापन में अत्यधिक रुचि है। यदि आपने इस पद का उत्तरदायित्व मुझे सौंपा, तो मैं पूर्ण निष्ठा से उसका निर्वाह करूंगा तथा कभी शिकायत का अवसर नहीं दूंगा।
सेवा का अवसर प्रदान कर कृतार्थ करें।
धन्यवाद! भवदीय
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प्रश्न 3.
बेसिक शिक्षा अधिकारी को प्राइमरी शिक्षक के पद के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। [2010]
या
समाचार-पत्र में दिये गये विज्ञापन के आधार पर सहायक अध्यापक पद पर नियुक्ति हेतु अपने जनपद के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
या
समाचार-पत्र में प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर ग्राम पंचायत अधिकारी पद पर नियुक्ति हेतु अपने जनपद के जिला पंचायत राज अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2014]
या
समाचार-पत्र में प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर लेखपाल पद पर नियुक्ति हेतु अपने जनपद के जिला अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
बेसिक शिक्षा अधिकारी,
मेरठ (उ० प्र०)

विषय-प्राइमरी शिक्षक के पद हेतु आवेदन-पत्र

महोदय,
आपके कार्यालय द्वारा कल दिनांक …………. को दैनिक जागरण’ में प्रकाशित विज्ञापन के प्रत्युत्तर में मैं अपना आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रही हूँ। मुझसे सम्बन्धित विवरण निम्नवत् है-
UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र img 5
शैक्षणिक योग्यताएँ–
(क) 2002 ई० में उ० प्र० वोर्ड से 62% अंक लेकर हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की।
(ख) 2004 ई० में उ० प्र० बोर्ड से 61% अंक लेकर इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की।
(ग) 2006 ई० में दो वर्षीय बी० टी० सी० प्रशिक्षण कोर्स (उ० प्र०) से किया।
अनुभव-सितम्बर, 2006 से अब तक जनता विद्यालय, मेरठ में प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा हूँ।
आशा है कि आप सेवा का अवसर प्रदान कर कृतार्थ करेंगे।
दिनांक :…………………………. भवदीय
रूपेश कुमार
संलग्नक-सभी प्रमाण-पत्रों की सत्यापित प्रतिलिपियाँ व अनुभव प्रमाण की मूल प्रति।।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय)

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 5
Chapter Name Revenue (आय)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सीमान्त आय एवं औसत आय से क्या अभिप्राय है? चित्र और उदाहरण की सहायता से इनमें सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए। [2009]
या
तालिका और रेखाचित्र के माध्यम से सीमान्त आय, कुल आय और औसत आय के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
या
कुल आय, औसत आय और सीमान्त आय को परिभाषित कीजिए। इनमें परस्पर क्या सम्बन्ध पाया जाता है? [2008]
या
सीमान्त एवं औसत आगम में सम्बन्ध बताइए। [2006]
उत्तर:
आय का अर्थ
सामान्य बोलचाल की भाषा में आय (आगम) का अर्थ व्यक्ति विशेष को समस्त साधनों से होने वाली आय से लगाया जाता है। प्रत्येक फर्म या उत्पादक का उद्देश्य वस्तुओं का न्यूनतम लागत पर उत्पादन करके उनकी अधिकतम बिक्री करने का होता है जिसमें वह अधिकतम लाभ अर्जित कर सके। अर्थशास्त्र में आय या आगम शब्द का आशय प्राप्त होने वाले उस धन से होता है जो किसी उत्पादित वस्तु की बिक्री से प्राप्त होता है। अर्थशास्त्र में आय शब्द का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है

  1. कुल आय (Total Revenue),
  2. औसत आय (Average Revenue) तथा
  3.  सीमान्त आय (Marginal Revenue)।

1. कुल आय – किसी उत्पादक या फर्म के द्वारा अपने उत्पादन की एक निश्चित मात्रा को बेचकर जो धनराशि प्राप्त की जाती है, उसे कुल आय कहते हैं।
कुल आय ज्ञात करने के लिए फर्म द्वारा बेची जाने वाली इकाइयाँ तथा प्रति इकाई की कीमत ज्ञात होनी चाहिए। फर्म द्वारा बेची जाने वाली वस्तु की मात्रा को कीमत से गुणा करके कुल आय ज्ञात की जा सकती है।
कुल आय = वस्तु की बेची गयी मात्रा या इकाइयों की संख्या x कीमत उदाहरण के लिए–यदि कोई फर्म र 50 प्रति इकाई की दर से 10 कुर्सियाँ बेचती है तो उसकी कुल आय = 50 x 10 = 500 होगी।

2. औसत आय – औसत आय उत्पादने की निश्चित मात्रा की बिक्री की प्रति इकाई आय है, जिसे बिक्री से प्राप्त कुल आय को वस्तु की बेची गयी कुल मात्रा (इकाइयों) से भाग देकर ज्ञात किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 1
उदाहरण के लिए-10 कुर्सियों की बिक्री से ₹500 की कुल आय प्राप्त होती है, तब
औसत आय = [latex]\frac { 500 }{ 10 }[/latex] = ₹50 प्रति कुर्सी

3. सीमान्त आय – सीमान्त आय अन्तिम इकाई की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय होती है। किसी वस्तु की एक अधिक अथवा एक कम इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि अथवा कमी होती है, वह उस वस्तु की सीमान्त आय कहलाती है। उदाहरण के लिए – 10 कुर्सियों को ₹50 प्रति कुर्सी की दर से बेचने पर कुल आय में ₹500 प्राप्त हुई। यदि उत्पादक एक कुर्सी और बेचना चाहे और वह 11 कुर्सियों को ₹545 में बेच देता है, तब सीमान्त आय ₹545 – 45 हुई। अत:
सीमान्त आय = कीमत x बेची गयी इकाइयों की संख्या – पूर्व की कुल आय।

कुल आय, औसत आय और सीमान्त आय का सम्बन्ध
कुल आय, औसत आय व सीमान्त आय का सम्बन्ध निम्नलिखित तालिका द्वारा दर्शाया गया है –

बिक्री की कुल इकाइयाँ प्रति इकाई कीमत
(₹ में)
कुल आय
(₹ में)
औसत आय
(₹ में)
सीमान्त आय
(₹ में)
1. 17 17 17 = 17
2. 16 32 16 (32-17)=15
3. 15 45 15 (45-32)=13
4. 14 56 14 (56-45)=11
5. 13 65 13 (65-56)= 9
6. 12 72 12 (72-65)= 7
7. 11 77 11 (77-72)= 5
8. 10 80 10 (80-77)= 3

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेची जाती हैं। वैसे-वैसे अतिरिक्त इकाइयों की कीमत कम करनी पड़ती है, क्योंकि तभी ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वस्तुओं की कीमत घट जाने से सीमान्त आय और औसत आय घटती जाती हैं; परन्तु सीमान्त आय औसत आय की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से घटती है। कुल आय में निरन्तर 80वृद्धि होती जाती हैं, परन्तु वृद्धि की दर गति से उत्तरोत्तर कम होती जाती है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
संलग्न चित्र में Ox-अक्ष पर बिक्री की इकाइयाँ तथा OY- अक्ष पर आये दर्शायी गयी है। चित्र में TR कुल आय वक्र, AR औसत आय वक्र तथा MR सीमान्त आय वक्र हैं। चित्र से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेची जाती हैं वैसे-वैसे औसत आय तथा सीमान्त आय घटती जाती हैं। परन्तु औसत आय की अपेक्षा सीमान्त
MR आय अधिक तेजी से घटती है। कुल आय निरन्तर बढ़ रही है, किन्तु वृद्धि की दर उत्तरोत्तर कम होती जा रही है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 2

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
पूर्ण और अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में सीमान्त आय और औसत आय की आकृति को चित्रों की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
या
सीमान्त आय वक्र, औसत आय वक्र को इसके निम्नतम बिन्दु पर नीचे की ओर से ही क्यों काटता है ? चित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार एवं अपूर्ण प्रतियोगी बाजार का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-जिस । बाजार में किसी वस्तु-विशेष के अनेक क्रेता-विक्रेता, उस । वस्तु का क्रय-विक्रय स्वतन्त्रतापूर्वक करते हैं तथा कोई एक क्रेता या विक्रेता वस्तु के मूल्य को प्रभावित नहीं कर सकता, तो ऐसे बाजार को पूर्ण प्रतियोगी बाजार कहते हैं। अपूर्ण । प्रतियोगिता पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार के बीच की है स्थिति है अर्थात् अपूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में कुछ तत्त्व । पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार के तथा कुछ तत्त्व एकाधिकार वाले बाजार के निहित होते हैं। वास्तविक जीवन में ऐसी ही मिश्रित अवस्था पायी जाती है जिसमें किसी वस्तु का मूल्य समान नहीं होता।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 3
किसी फर्म के औसत आय वक्र AR और सीमान्त आय वक्र MR का आकार कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर होता है कि उस फर्म को पूर्ण प्रतियोगिता अथवा अपूर्ण प्रतियागिता में से किस प्रकार के बाजार की दशाओं में अपना माल बेचना पड़ता है। सामान्यतः प्रतियोगिता जितनी तीव्र होगी तथा वस्तु के जितने निकट स्थानापन्न होंगे, उतना ही अधिक लोचदार उस फर्म का औसत आय वक्र होगा।

पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म ‘कीमत ग्रहण करने वाली’ (Price taker) होती है, कीमत-निर्धारण करने वाली (Price maker) नहीं। इस दशा में फर्म को प्रचलित कीमत को स्वीकार करना पड़ता है, क्योंकि वह इस कीमत पर इच्छानुसार माल बेच सकती है। यदि फर्म अपनी कीमत को बढ़ाती है तो वह समस्त ग्राहकों को खो देगी। यदि कीमत कम करती है तो ग्राहकों की भी भरमार हो जाएगी। अत: पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में प्रचलित कीमत ही स्वीकार करनी पड़ती है। यहाँ औसत आये सर्वदा कीमत के बराबर होगी। क्योंकि औसत आय निश्चित है, इसीलिए सीमान्त आय भी निश्चित होगी और वह औसत आय के बराबर होगी। इस प्रकार AR = MR रहती है तथा औसत आय वक्र एक सीधी पड़ी रेखा (Horizontal Straight Line) : होती है। इसका प्रमुख कारण फर्म द्वारा प्रचलित कीमत को स्वीकार करना होता है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में फर्म के औसत व सीमान्त आय वक्रे दोनों ही ऊपर से नीचे की ओर गिरते हैं। स्पष्ट है कि फर्म के उत्पादन के बढ़ने पर औसत आय (AR) और सीमान्त आय (MR) दोनों ही गिरती हैं, किन्तु सीमान्त आय, औसत आय की अपेक्षा तेजी से गिरती है। इसका मुख्य कारण यह है कि अपूर्ण प्रतियोगिता की है – स्थिति में विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में अपेक्षाकृत कम होती है जिसके कारण विक्रेता कीमत को प्रभावित करने की स्थिति में होता है अर्थात् वे कीमत में कमी करके वस्तु की बिक्री की मात्रा को अधिकतम करके अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। इस कारण सीमान्त आय वक्र औसत आय वक्र को इसके न्यूनतम बिन्दु पर नीचे की ओर से ही काटता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 4

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
औसत आय से क्या अभिप्राय है?
या
औसत आय (आगम) का सूत्र लिखिए। [2011, 15]
उत्तर:
औसत आय उत्पादन की निश्चित मात्रा की बिक्री की प्रति इकाई आय है, जिसे बिक्री से प्राप्त कुल आय को वस्तु की बेची गई कुल मात्रा (इकाइयों) से भाग देकर ज्ञात किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 5

प्रश्न 2
सीमान्त आय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सीमान्त आय अन्तिम इकाई की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय होती है। किसी वस्तु की अधिक अथवा एक़ कम इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि अथवा कमी होती है, वह उस वस्तु से प्राप्त होने वाली सीमान्त आय कहलाती हैं।
सीमान्त आय = कीमत x बेची गयी इकाइयों की संख्या – पूर्व की कुल आय।

प्रश्न 3
सीमान्त एवं औसत आगम में सम्बन्ध बताइए। [2006]
या
कुल आय, सीमान्त आय और औसत आय में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
जैसे-जैसे कोई फर्म अतिरिक्त इकाइयों का उत्पादन करती है, कुल आगम में वृद्धि होती जाती है। धीरे-धीरे कुल आगम में वृद्धि की दर में कमी आने लगती है और एक सीमा के बाद इसमें वृद्धि होनी समाप्त हो जाती है। इस बिन्दु पर उत्पादक उत्पादन कार्य समाप्त कर देगा। औसत आय एवं सीमान्त आय में आरम्भ से ही धीरे-धीरे कमी आने लगती है किन्तु सीमान्त आय के घटने की गति औसत आय की तुलना में तीव्र होती है।

प्रश्न 4
निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लिखिए सिदद कीजिए कि जब औसत आगम =

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 6, तो औसत आगम = कीमत।
उत्तर:
कुल आगम = वस्तु की बेची जाने वाली इकाइयाँ x कीमत
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 7
अतः औसत आगम = कीमत
उदाहरण के लिए-10 कुर्सियों की बिक्री से ₹500 की कुल आगम प्राप्त होती है, तब
औसत आगम = [latex]\frac { 500 }{ 10 }[/latex] = ₹50 प्रति
औसत आगम = कीमत
औसत आगम या वस्तु की कीमत एक ही बात है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कुल आय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी उत्पादक या फर्म के द्वारा अपने उत्पादन की एक निश्चित मात्रा को बेचकर जो धनराशि प्राप्त की जाती है उसे कुल आय कहते हैं। कुल आय = वस्तु की बेची गयी मात्रा या इकाइयों की संख्या x कीमत।

प्रश्न 2
यदि किसी वस्तु की 10 इकाइयों से प्राप्त कुल आय ₹ 180 है और 11 इकाइयों से प्राप्त कुल आय ₹ 187 है, तो सीमान्त आय क्या होगी ?
उत्तर:
सीमान्त आय = 187 – 180 = ₹ 7

प्रश्न 3
यदि किसी वस्तु की 1 इकाई का बाजार मूल्य ₹16 है, तो उसकी 25 इकाइयों की कुल आय कितनी होगी ?
उत्तर:
कुल आय = 25 x 16 = ₹ 400.

प्रश्न 4
औसत उत्पादकता क्या है? [2007]
उत्तर:
कुल उत्पादकता को साधन की संख्या से भाग देकर औसत आय प्राप्त कर ली जाती है। Teases

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कुल आय बराबर है
(क) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या x कीमत
(ख) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या + कीमत
(ग) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या – कीमत
(घ) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या + कीमत
उत्तर:
(क) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या x कीमत।

प्रश्न 2
औसत आय बराबर है
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 8
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 9

प्रश्न 3
सीमान्त आय बराबर है
(क) कुल आय x पिछली इकाइयों की आय
(ख) सीमान्त आय + पिछली इकाइयों की आय
(ग) कुल आय – पिछली इकाइयों की आय
(घ) उपर्युक्त (ख) एवं (ग)
उत्तर:
(ग) कुल आय – पिछली इकाइयों की आय।

प्रश्न 4
पूर्ण प्रतियोगिता की अवस्था में फर्म होती है
(क) कीमत ग्रहण करने वाली एवं कीमत-निर्धारित करने वाली
(ख) कीमत ग्रहण करने वाली, कीमत निर्धारित करने वाली नहीं
(ग) कीमत ग्रहण करने वाली नहीं, परन्तु कीमत निर्धारित करने वाली
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) कीमत ग्रहण करने वाली, कीमत निर्धारित करने वाली नहीं।

प्रश्न 5
आगम से तात्पर्य है।
(क) वस्तु की बिक्री से होने वाली आय
(ख) साधनों की बिक्री से होने वाली आय
(ग) सीमान्त आय
(घ) औसत आगम
उत्तर:
(क) वस्तु की बिक्री से होने वाली आय।।

प्रश्न 6
पूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आय रेखा और औसत आय रेखा का स्वरूप होता है
(क) नीचे गिरती हुई
(ख) ऊपर उठती हुई
(ग) बराबर व क्षैतिज
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) बराबर व क्षैतिज।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी) are the part of UP Board Solutions for Class 12 History. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 6
Chapter Name Shivaji (शिवाजी)
Number of Questions Solved 17
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए|
1. 1627 ई०
2.1659 ई०
3.1674ई०
4.1680 ई०
उतर:
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ-संख्या- 118 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर:
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 118 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर:
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 119 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर:
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 119 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मराठों के उदय के चार कारण लिखिए।
उतर:
मराठों के उदय के चार कारण निम्नवत हैं

  • महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति
  • मराठा धर्म सुधारकों का प्रभाव
  • मराठों की सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्षता
  • औरंगजेब की दक्षिण नीति।

प्रश्न 2.
पुरन्दर की सन्धि के बारे में आप क्या जानते हैं?
उतर:
पुरन्दर की सन्धि शिवाजी और मुगलों के मध्य हुई थी। शिवाजी ने इस सन्धि में 35 में से 23 दुर्ग मुगलों को दे दिए। शिवाजी ने मुगलों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया परन्तु अपने स्थान पर अपने पुत्र शम्भाजी को 5000 घुड़सवारों के साथ मुगलों की सेवा में भेज दिया। शिवाजी ने बीजापुर के सुल्तान के विरुद्ध मुगलों को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया। इस सन्धि से मुगलों को बहुत लाभ पहुँचा।

प्रश्न 3.
शिवाजी के राजनैतिक आदर्श क्या थे?
उतर:
हिन्दू-पद-पादशाही, धर्मशास्त्र की पुस्तकें और कोटिल्य का अर्थशास्त्र’ शिवाजी के राजनैतिक आदर्श थे।

प्रश्न 4.
शिवाजी की किन्हीं दो विजयों का वर्णन कीजिए।
उतर:

  1. जावली विजय- सन् 1656 ई० में शिवाजी ने जावली पर विजय प्राप्त की। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव के अधिकार में था। वह शिवाजी के विरुद्ध बीजापुर राज्य से मिला हुआ था। शिवाजी ने चन्द्रराव की हत्या कर किले पर अधिकार कर लिया। इससे उनका राज्य–विस्तार दक्षिण-पश्चिम की ओर सम्भव हो सका।।
  2. कोंकण विजय- जावली की विजय के उपरान्त शिवाजी ने कोंकण की ओर दृष्टिपात किया और उत्तरी कोंकण तथा भिवण्डी के दुर्गों पर अधिकार करके उन्होंने कोंकण में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। उत्तरी कोंकण के पश्चात दक्षिणी कोंकण पर भी उनका अधिकार हो गया जिससे उनका राज्य समुद्री तटों तक विस्तृत हो गया।

प्रश्न 5.
शिवाजी ने अफजल खाँ की हत्या क्यों की?
उतर:
अफजल खाँ शिवाजी को छलपूर्वक परास्त करना चाहता था। शिवाजी अफजल खाँ के मन्तव्य को जान चुका था। जब शिवाजी,

अफजल खाँ के व्यक्तिगत मुलाकात के निमन्त्रण पर उससे मिलने के लिए उनके पास पहुँचा तो उसने आगे बढ़कर शिवाजी का स्वागत किया और शिवाजी को अपनी बाँहों में दबोचकर तलवार से वार किया। शिवाजी ने अफजल खाँ के कुचक्र को समझते
हुए बहुत ही चालाकी और साहसिक ढंग से अफजल खाँ का वध कर दिया।

प्रश्न 6.
शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर आक्रमण क्यों कर दिया?
उतर:
औरंगजेब ने दक्षिण में मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को आदेश दिए। शाइस्ता खाँ ने बीजापुर के साथ मिलकर शिवाजी से पूना, चाकन और कल्याण को छीनने में सफलता प्राप्त की। इन पराजयों से शिवाजी की शक्ति कमजोर पड़ गई। मराठा सेना का उत्साह बढ़ाने के लिए शिवाजी ने एक दिन रात्रि के समय पूना में शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर उसे परास्त कर दिया।

प्रश्न 7.
शिवाजी के अष्टप्रधान के विषय में आप क्या समझते हैं?
उतर:
शिवाजी ने अपनी शासन-व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए आठ मन्त्रियों की एक परिषद् का गठन किया जो ‘अष्टप्रधान’ के नाम से सम्बोधित की जाती थी। केवल सेनापति के अलावा अन्य सभी मन्त्रिगण ब्राह्मण होते थे, जिनकी नियुक्ति सम्राट के द्वारा की जाती थी तथा वे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन मंत्रियों द्वारा कार्य कराने का भार भी सम्राट पर ही था।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगलकाल में मराठों को एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफलता क्यों मिली?
उतर:
मुगलकाल में मराठों को एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफलता मिलने के निम्नलिखित कारण हैं

1. महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति- महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियों ने मराठा शक्ति के उत्कर्ष में उल्लेखनीय सहायता की। महाराष्ट्र का अधिकांश भाग पठारी है। जहाँ जीवन की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता है। इस कारण वहाँ के निवासी परिश्रमी और साहसी होते हैं। वहाँ आक्रमणकारी के लिए बहुत कठिनाइयाँ थीं तथा सेना को लेकर चलना तथा उसके लिए रसद प्राप्त करना कठिन था, जबकि सुरक्षा के लिए वहाँ अनेक सुविधाएँ थीं। स्थान-स्थान पर सरलता से पहाड़ी किले बनाए जा सकते थे, जिनकी सुरक्षा करना सरल था, परन्तु उनको जीतना कठिन था। गुरिल्ला युद्ध-पद्धति अथवा छापामार रणनीति का प्रयोग वहाँ सरलता से सम्भव था। इसके अतिरिक्त भारत के बीच में स्थित होने के कारण वहाँ के निवासियों के लिए उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में अपनी प्रगति करने की सुविधा थी।

2. आर्थिक पृष्ठभूमि- आर्थिक दृष्टि से महाराष्ट्र के निवासियों में आर्थिक असमानताएँ न थी। व्यापारी वर्ग के अतिरिक्त वहाँ धनी वर्ग के व्यक्ति अधिक न थे। इसका कारण था- आर्थिक शोषण करने वाले वर्ग का अभाव। इससे महाराष्ट्र निवासियों का चरित्र दृढ़ बना, वे परिश्रमी और साहसी बने, उनमें समानता की भावना जगी, वे छोटे और बड़े की भावना से रहित हुए तथा वे उस भोग-विलास से दूर ही रहते थे, जिसके कारण उत्तर भारत के समाज का नैतिक पतन हो रहा था।

3. भाषा और साहित्य का योगदान- भाषा की दृष्टि से मराठी भाषा बहुत सरल और व्यावहारिक थी। इस जनसाधारण की भाषा के प्रयोग से महाराष्ट्र के निवासियों में एकता और समानता पनपी। सन्त तुकाराम के पद बिना भेदभाव के गाए जाते थे। इस प्रकार धार्मिक साहित्य ने लोगों के मध्य अप्रत्यक्ष रूप से एकता स्थापित कर दी थी। सर जदुनाथ सरकार के अनसार, शिवाजी द्वारा किए गए राजनीतिक संगठन से पर्व ही महाराष्ट्र में एक भाषा, एक रीति-रिवाज और एक ही प्रकार के समाज का निर्माण हो चुका था।

4. मराठा धर्मसुधारकों का प्रभाव- मराठों में स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना जगाने में महाराष्ट्र के धर्मसुधारकों का महत्वपूर्ण योगदान था। महाराष्ट्र धर्म-सुधार आन्दोलन का एक प्रमुख केन्द्र था। यहाँ संत ज्ञानेश्वर, संत एकनाथ, तुकाराम, संत रामदास और बामन पंडित जैसे विचारक और सुधारक हुए, जिन्होंने मराठों में जागृति ला दी। जनसाधारण की भाषा का सहारा लेकर इन लोगों ने घर-घर में अपनी बात पहुँचाई। शिवाजी के गुरु रामदास समर्थ ने अनेक मठों की स्थापना कर, ‘दसबोध’ नामक ग्रन्थ की रचना की और मठों में नवचेतना का संचार किया।

5. सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्षता- अहमदनगर, गोलकुण्डा व बीजापुर जैसे मुस्लिम राज्यों में लम्बे समय तक उच्च सैनिक व प्रशासनिक पदों पर कार्य करते रहने से मराठा, सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्ष हो गए थे, जिसका उन्हें कालान्तर में काफी लाभ मिला।

6. औरंगजेब की दक्षिण नीति- औरंगजेब ने उत्तर भारत को विजित करने के बाद दक्षिण भारत को विजित करने का निर्णय लिया। इसे देखकर समस्त मराठा शक्ति संगठित हो गई और उन्होंने मुगलों से संघर्ष करने का निर्णय किया। इसका मुख्य कारण उनका दक्षिण में पर्याप्त प्रभावशाली होना था। औरंगजेब का आक्रमण उनके इस प्रभाव को खत्म कर सकता था। यदि वे औरंगजेब की सत्ता को स्वीकार भी करते, तो औरंगजेब की धर्मान्ध नीति के कारण उन्हें वे उच्च पद व सुविधाएँ मिलने की सम्भावना बिलकुल ही नगण्य थी, जो कि उन्हें दक्षिण के दुर्बल व विलासी मुसलमान शासकों से मिल रही थी। यह एक व्यावहारिक कारण था, जिसने शिवाजी के नेतृत्व में मराठों को संगठित होने के लिए प्रेरित किया।

7. मराठों का उच्च चरित्र- मराठों के उच्च चरित्र ने भी उनके उत्कर्ष में सहायता की। उनके अन्दर साहस, एकता, परिश्रम, नैतिकता, राष्ट्र-प्रेम आदि गुण मौजूद थे।

8. भक्ति व धर्म-सुधार आन्दोलन- 15वीं व 16वीं शताब्दी के धर्म व भक्ति आन्दोलनों ने सामाजिक व धार्मिक धार्मिक करके मराठों में जातीय एकता की भावना भर दी, जिसने उन्हें शक्तिशाली बना दिया। इतिहासकार रानाडे के अनुसार महाराष्ट्र की राजनीति में उत्पन्न उथल-पुथल का प्रमुख कारण धार्मिक-आन्दोलन था। इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है कि महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम व रामदास जैसे सन्तों ने मराठों में राष्ट्रीय भावना का संचार कर दिया।

9. दक्षिणी मुसलमानों का पतन- दक्षिण के मुसलमान शासकों का कुछ तो नैतिक पतन हो चुका था। वे शासन की जिम्मेदारी मराठों को सौंपकर भोग-विलास में डूबे रहते थे, जिससे मराठों ने शासन के महत्वपूर्ण पदों को कब्जे में करके सैन्य संचालन व प्रशासन को अपने हाथों में ले लिया था। तत्पश्चात् दिल्ली के मुगल शासकों विशेष रूप से औरंगजेब की दक्षिण नीति के कारण कई दक्षिणी मुसलमान राज्य औरंगजेब के हाथों में चले गए थे। उसने अहमदनगर पर विजय पाने के बाद गोलकुण्डा व बीजापुर को जीतने का प्रयास किया। दक्षिण के मुसलमान शासकों की दुर्बल स्थिति को देखकर मराठों ने कई महत्वपूर्ण दुर्ग अपने हाथों में ले लिए और स्वतंत्र मराठा राज्य के स्वप्न को साकार करने का सफल प्रयास किया।

प्रश्न 2.
शिवाजी की उपलब्धियों का विवरण दीजिए।
उतर:
शिवाजी ने सबसे पहले 1646 ई० में बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया। इस किले में उन्हें भारी खजाना मिला, जिसकी सहायता से शिवाजी ने अपनी सेना में वृद्धि की तथा तोरण के किले से पाँच मील पूर्व में रायगढ़ नामक नया किला बनवाया। इससे शिवाजी की शक्ति में वृद्धि हुई। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने चोकन, कोंडाना, पुरन्दर, सिंहगढ़ आदि किलों पर अधिकार कर लिया। शिवाजी की प्रगति को देखते हुए बीजापुर के सुलतान ने उनके पिता शाहजी भोंसले को 1648 ई० में कैद कर लिया और तभी छोड़ा जब शाहजी के पुत्र शिवाजी तथा व्यंकोजी ने बंगलौर (बंगलुरु) और कोंडाना के किले सुल्तान के आदमियों को वापस कर दिए।

इससे शिवाजी की गतिविधियाँ कुछ समय के लिए रुक गईं। 1656 ई० में शिवाजी की एक महत्वपूर्ण विजय जावली की थी। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव के अधिकार में था और वह शिवाजी के विरुद्ध बीजापुर राज्य से मिला हुआ था। शिवाजी ने चन्द्रराव की हत्या कर दी और किले पर अधिकार कर लिया। इससे उनका राज्य–विस्तार दक्षिण-पश्चिम की ओर सम्भव हो सका। शिवाजी की उपलब्धियों का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है

1. मुगलों के साथ प्रथम मुठभेड़- 1657 ई० में शिवाजी का मुकाबला पहली बार मुगलों से हुआ। दक्षिण के सूबेदार शहजादा औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण किया और बीजापुर ने शिवाजी से सहायता माँगी। यह अनुभव करके कि दक्षिण में मुगलों की बढ़ती हुई शक्ति को रोकना आवश्यक है, शिवाजी ने बीजापुर की सहायता करने के उद्देश्य से मुगलों के दक्षिण-पश्चिम भाग पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। इसी समय शिवाजी ने जुन्नार को लूटा और स्थान-स्थान पर आक्रमण करके मुगलों को तंग किया। परन्तु जब बीजापुर ने मुगलों से संधि कर ली तब शिवाजी ने मुगलों पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। उत्तराधिकार के युद्ध के कारण मुगलों को प्राय: दो वर्ष तक दक्षिण भारत की ओर ध्यान देने का अवकाश न मिल सका।।

2. बीजापुर से संघर्ष- औरंगजेब के उत्तर भारत चले जाने के बाद शिवाजी ने फिर से देश विजय का सिलसिला शुरू कर दिया और इस बार उनका लक्ष्य बीजापुर के प्रदेश थे। उन्होंने पश्चिमी घाट और समुद्र के बीच पड़ने वाले कोंकण क्षेत्र पर जोरदार हमला किया और उसके उत्तरी हिस्से को जीत लिया। उन्होंने कई और पहाड़ी किलों पर भी कब्जा कर लिया, जिससे बीजापुर ने उनके खिलाफ कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। 1659 ई० में बीजापुर ने दस हजार सैनिकों के साथ अफजल खाँ नामक एक प्रमुख बीजापुरी सरदार को शिवाजी के खिलाफ भेजा और उसे निर्देश दिया कि चाहे जिस तरह भी करो पर उसे बंदी बना लो। उन दिनों ऐसे मौकों पर धोखेबाजी खूब चलती थी। अफजल खाँ और शिवाजी पहले भी कई बार धोखेबाजी का सहारा ले चुके थे।

शिवाजी के सैनिक खुली लड़ाई के अभ्यस्त नहीं थे और अफजल खाँ की विशाल सेना देखकर वह ठिठक गए। अफजल खाँ ने शिवाजी को व्यक्तिगत मुलाकात के लिए निमन्त्रण भेजा और यह वादा किया कि वह उसे बीजापुर के सुल्तान से माफी दिलवा देगा। लेकिन शिवाजी को पूरा शक था कि वह अफजल खाँ की चाल थी, इसलिए वे भी पूरी तैयारी के साथ उसके शिविर में आ गए और चालाकी से, लेकिन साथ ही बहुत साहसिक ढंग से, उसे मार डाला। अब उन्होंने अफजल खाँ की नेतृत्वविहीन सेना पर आक्रमण करके उसके पैर उखाड़ दिए और उसके सारे साज-सामान पर, जिसमें तोपखाना भी शामिल था, अधिकार कर लिया। इस विजय से प्रोत्साहित होकर शिवाजी ने दक्षिण कोंकण, पन्हाला और कोल्हापुर जिले में अपनी सेनाएँ भेजकर उन्हें विजित कर लिया।

3. शिवाजी और शाइस्ता खाँ- औरंगजेब ने दक्षिण में मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए 1660 ई० में मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को शिवाजी को समाप्त करने के आदेश दिए। उसने बीजापुर राज्य से मिलकर शिवाजी को समाप्त करने की योजना बनाई और शिवाजी से पूना, चाकन और कल्याण को छीनने में सफलता प्राप्त की। इन पराजयों से शिवाजी की शक्ति कमजोर पड़ी। मराठा सेना का उत्साह बढ़ाने के उद्देश्य से शिवाजी ने एक दु:साहसिक कदम उठाया। 1663 ई० में एक रात्रि में उन्होंने पूना में शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर उसे जख्मी कर दिया एवं उसके एक पुत्र तथा सेनानायक को मार दिया। शाइस्ता खाँ को भागकर अपने प्राणों की सुरक्षा करनी पड़ी। इस पराजय से मुगल प्रतिष्ठा को जहाँ ठेस पहुँची वहीं शिवाजी की प्रतिष्ठा पुन: बढ़ गई तथा मुगलों पर पुनः आक्रमण आरम्भ हो गए।

4. सूरत की प्रथम लूट (1664 ई०)- शाइस्ता खाँ पर विजय से प्रोत्साहित होकर 1664 ई० में शिवाजी ने मुगलों के बन्दरगाह नगर सूरत पर धावा बोल दिया। मुगल बादशाह और उनके सामन्त सूरत से जाने वाले मालवाहक जहाजों में आमतौर से पूँजी निवेश करते थे। शिवाजी के इस आक्रमण से मुगल किलेदार भाग खड़ा हुआ। शिवाजी ने चार दिन तक सूरत को अच्छी तरह लूटा, जिसमें एक करोड़ रुपए से अधिक राशि का माल तथा बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त हुईं।

5. मिर्जा राजा जयसिंह और शिवाजी- शाइस्ता खाँ की विफलता के बाद औरंगजेब ने शिवाजी का दमन करने के लिए आम्बेर के राजा जयसिंह को भेजा। जयसिंह औरंगजेब के सबसे विश्वस्त सलाहकारों में से था। उसे पूरी प्रशासनिक और सैनिक स्वायत्तता प्रदान की गई, जिससे उसे दक्कन में मुगल प्रतिनिधि पर किसी प्रकार निर्भर न रहना पड़े। उसका सीधा सम्बन्ध सम्राट से था। पहले के सेनापतियों की तरह जयसिंह ने मराठों की शक्ति को कम आँकने की भूल नहीं की। जयसिंह ने शिवाजी को अकेला करने के लिए पहले उनके प्रमुख सेनापतियों को प्रलोभन दिया। उसने शिवाजी को कमजोर करने के लिए उनकी पूना की जागीर के आसपास के गाँवों को तहस-नहस कर दिया। यूरोप की व्यापारी कम्पनियों को भी मराठा नौ-सेना की किसी भी कार्यवाही को रोकने के निर्देश दे दिए गए। अन्ततः जयसिंह ने पुरन्दर के दुर्ग की घेराबन्दी (1665 ई०) कर दी और मराठों को झुकना पड़ा। उसके बाद दोनों पक्षों के बीच पुरन्दर की सन्धि हुई।

6. शिवाजी का मुगल दरबार में जाना- पुरन्दर की सन्धि शिवाजी के लिए कष्टदायक थी, तथापि परिस्थिति के अनुसार उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। जयसिंह के अनुरोध पर शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए। आगरा में शिवाजी का यथोचित सम्मान नहीं किया गया और उनसे पंचहजारी मनसबदारों में खड़े होने को कहा गया। शिवाजी के विरोध करने पर औरंगजेब ने उन्हें नजरबन्द कर लिया। औरंगजेब के इरादों को भाँपकर शिवाजी पहरेदारों को धोखा देकर अपने पुत्र के साथ आगरा से निकल गए और सकुशल महाराष्ट्र वापस लौट गए। मराठा इतिहासकारों ने इस घटना को बहुत महत्वपूर्ण माना है। डॉ० सरदेसाई ने तो लिखा है कि “इस घटना से ही मुगल साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो जाता है।” महाराष्ट्र लौटने के पश्चात् शिवाजी कुछ वर्षों तक शान्त रहे। इस बीच उन्होंने औरंगजेब से समझौता भी कर लिया।

 

औरंगजेब ने उन्हें बाबर की जागीर एवं ‘राजा’ की उपाधि दी तथा उनके पुत्र को पाँच हजारी मनसब का पद दिया। शिवाजी का औरंगजेब के साथ यह समझौता एक कूटनीतिक चाल थी। औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा को समाप्त करने के लिए समय चाहता था तो शिवाजी अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए। इस बीच दक्षिण में मुगलों की दुर्बल स्थिति को देखते हुए शिवाजी ने अपने खोए हुए दुर्गों को पुनः वापस प्राप्त करने के लिए प्रयास आरम्भ कर दिया। 1670 ई० से मराठा मुगल सम्बन्ध पुनः कटु हो गए। शहजादा मुअज्जम और दिलेर खाँ के आपसी मनमुटाव का लाभ उठाकर शिवाजी ने मुगलों से अनेक किले वापस छीन लिए। उन्होंने सूरत पर दुबारा आक्रमण कर उसे लूटा और 1670 ई० में वहाँ से चौथ वसूल की। 1670-74 ई० के बीच उन्होंने पुरन्दर, पन्हाला, सतारा एवं अनेक दुर्गों को वापस ले लिया और मुगलों तथा बीजापुर के सुल्तान को परेशान किया।

7. शिवाजी का राज्याभिषेक- 1674 ई० तक शिवाजी की शक्ति और उनका प्रभाव-क्षेत्र अत्यधिक विकसित हो चला था। अतः 15 जून, 1674 में उन्होंने बनारस के विद्वान पण्डित गंगाभट्ट के हाथों अपना राज्याभिषेक करवाया और छत्रपति की उपाधि धारण की तथा भगवा-ध्वज उनका झण्डा बना एवं रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। शिवाजी के राज्याभिषेक को सत्रहवीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना माना गया है, इससे न केवल मराठा नेताओं के ऊपर शिवाजी का वर्चस्व कायम हुआ बल्कि उनका शासक के रूप में पद ऊँचा हुआ और उन्होंने मुगलों के विरोध में हिन्दू राजतन्त्र की खुलकर घोषणा की। समारोह से पहले शिवाजी ने कई महीनों तक मन्दिरों में पूजा की, जिसमें चिपलुण में परसराम मन्दिर और प्रतापगढ़ में भवानी मन्दिर शामिल हैं। अब शिवाजी एक जागीरदार अथवा लुटेरा मात्र नहीं थे, बल्कि मराठा राज्य के संस्थापक बन गए।

शासक के रूप में शिवाजी का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य था- कर्नाटक में अपनी शक्ति का विस्तार करना। उन्होंने बीजापुर के विरुद्ध गोलकुण्डा से सन्धि (1677 ई०) कर ली। बीजापुरी कर्नाटक क्षेत्र को अबुल हसन कुतुबशाह और शिवाजी ने आपस में बाँट लेने का फैसला किया। अबुल हसन ने शिवाजी को एक लाख हून प्रतिवर्ष कर देने एवं एक मराठा प्रतिनिधि को अपने दरबार में रखने एवं सैनिक सहायता देने का भी आश्वासन दिया। इस सन्धि से शिवाजी की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। प्रायः एक वर्ष के समय में ही शिवाजी ने बीजापुर के जिंजी और वैल्लोर पर कब्जा कर लिया। इसके अतिरिक्त तुंगभद्रा से कावेरी नदी के बीच का इलाका भी उन्होंने जीत लिया। इतना ही नहीं उन्होंने इसमें से सन्धि के अनुसार गोलकुण्डा को कोई हिस्सा नहीं दिया तथा पुनः बीजापुर को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास किया।

प्रश्न 3.
शिवाजी की शासन-व्यवस्था निम्नलिखित शीर्षकों के अनुसार समझाइए
(क) केन्द्रीय प्रशासन,
(ख) सैन्य प्रशासन
(ग) भूमि प्रशासन
उतर:
(क) केन्द्रीय प्रशासन
1. राजा- मध्ययुग के अन्य शासकों की भाँति शिवाजी एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न निरकुंश शासक थे। राज्य की सम्पूर्ण शक्तियाँ उनमें केन्द्रित थीं। उनके अधिकार असीमित थे। वहीं राज्य के प्रशासकीय प्रधान, मुख्य न्यायधीश, कानून निर्माता और सेनापति थे। परन्तु शिवाजी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग निरंकुश तानाशाही के लिए नहीं किया बल्कि जनहितार्थ किया। इतिहासकार रानाडे के शब्दों में, “शिवाजी नेपोलियन की भाँति एक महान संगठनकर्ता और असैनिक प्रशासन के निर्माणकर्ता थे।’

2. अष्टप्रधान- शिवाजी की सहायता के लिए आठ मन्त्रियों की एक परिषद् होती थी जो ‘अष्टप्रधान’ के नाम से सम्बोधित की जाती थी। केवल सेनापति के अतिरिक्त अन्य सभी मन्त्रिगण ब्राह्मण होते थे, जिनकी नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी तथा वे सम्राट के प्रति ही उत्तरदायी थे। इन मन्त्रियों से कार्य कराने का भार भी स्वयं सम्राट पर ही था।

शिवाजी ने इन मन्त्रियों को अपने विभागों में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान नहीं की थी वरन् सरलतापूर्वक कार्य विभाजन के लिए इन मन्त्रियों की नियुक्ति की जाती थी, जिनके निरीक्षण एवं निर्देशन का भार शिवाजी पर ही था। आठ में से छह मन्त्रियों को समय पड़ने पर युद्धभूमि में जाना पड़ता था। शिवाजी यद्यपि इन मन्त्रियों से इनके विभागीय कार्यों के लिए परामर्श लेते थे, किन्तु उनको मानने के लिए वे बाध्य नहीं थे वरन् जिस बात को वे उचित समझते थे, वही करते थे। इस प्रकार का निरंकुश शासन तभी तक सफल रह सकता था, जब तक कि राजा योग्य हो। शिवाजी की मन्त्रिपरिषद् में निम्नलिखित पद थे

  • प्रधानमन्त्री एवं पेशवा- मुगल सम्राटों के वजीर के समान शिवाजी के राज्य में पेशवा का स्थान था। वह अन्य सभी विभागों तथा मन्त्रियों पर निगरानी रखता था तथा राजा की अनपुस्थिति में राज्य के कार्यों की देखभाल करता था। राजकीय पत्रों पर राजा की मुहर के नीचे उसकी मुहर होती थी तथा प्रजा की सुख सुविधाओं का ध्यान रखना उसका कर्तव्य था।
  • मजमुआदार अथवा अमात्य- आय तथा व्यय का निरीक्षण करना तथा सम्पूर्ण राज्य की आय का ब्यौरा रखना अमात्य का कार्य होता था।
  • वाकयानवीस अथवा मन्त्री- राजदरबार में घटित होने वाली घटनाओं तथा राजा के कार्यों का ब्यौरा रखना मन्त्री का कार्य था। वह राजा के विरुद्ध रचित षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों का पता लगाता था, उसके खाने-पीने की वस्तओं का निरीक्षण करता था तथा राजमहल का प्रबन्ध करता था।
  • सचिव- सम्राट के पत्र-व्यवहार का निरीक्षण करना सचिव का कार्य था। सचिव महल तथा परगनों के लेखों का निरीक्षण करता था तथा राज्य के पत्रों पर मुहर लगाता था।
  • सुमन्त- बाह्य नीति में राजा को परामर्श देने वाला मन्त्री सुमन्त कहलाता था। अन्य राजाओं के राजदूतों से भेंट करना तथा पड़ोसी राज्यों में घटित होने वाली घटनाओं की सूचना भी उसे रखनी पड़ती थी।
  • सेनापति- सेना का अध्यक्ष सेनापति होता था, जिसका कार्य सैनिकों की भर्ती करना, सैन्य-व्यवस्था करना, सैनिकों को प्रशिक्षण देना तथा सेना में अनुशासन बनाए रखना होता था। युद्धभूमि में भेजने के लिए वह
    सैनिकों का चयन भी करता था।
  • पण्डितराव अथवा दानाध्यक्ष- धार्मिक कार्यों के लिए दान, धार्मिक उत्सवों का प्रबन्ध, ब्राह्मणों को दान देना तथा धर्म विरोधियों को दण्ड देना पण्डितराव अथवा दानाध्यक्ष का कर्तव्य था। वह जन-आचरण निरीक्षण विभाग का प्रधान होता था। धर्म-संस्थाओं तथा साधु-सन्तों को दान देने के विषय में भी वही निर्णय लेता था।
  • न्यायाधीश- दीवानी, फौजदारी तथा सैन्य सम्बन्धी झगड़ों का निर्णय करने के लिए न्यायाधीश सबसे बड़ा अधिकारी होता था। यह न्यायाधीश प्रायः हिन्दू रीति-रिवाजों एवं प्राचीन धर्मशास्त्रों के आधार पर निर्णय करता था।

अष्टप्रधान की स्थापना का निर्णय शिवाजी ने एक समय पर अथवा अपने राज्याभिषेक के समय नहीं किया वरन् इसका विकास क्रमशः हुआ तथा शिवाजी आवश्यकता के अनुसार इन मन्त्रिगणों की संख्या में वृद्धि करते रहे। अन्त में उनकी अष्टप्रधान सभा का पूर्ण विकसित रूप उनके ‘छत्रपति बनने के पश्चात ही दृष्टिगोचर हुआ।

(ख) सैन्य प्रशासन- शिवाजी ने सेना के बल पर ही एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था तथा साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उन्होंने एक सुव्यवस्थित एवं सुदृढ़ सेना का संगठन किया। शिवाजी के पास एक स्थायी सेना थी, जिसमें 10000 पैदल, 30000 से लेकर 45000 तक घुड़सवार, 1160 हाथी, लगभग 3000 ऊँट और 500 तोपें थीं। उनकी मृत्यु के समय उनकी अनुशासित एवं व्यवस्थित सेना की संख्या 1 लाख थी, जिसमें, 20000 मावले पैदल सैनिक, 45000 राज्य के घुड़सवार तथा 60000 सिलहदार थे। उनके पास लगभग 3000 हाथी तथा 32000 घोड़े इसके अतिरिक्त थे।

शिवाजी से पूर्व सैनिक 6 महीने कृषि करते थे तथा 6 महीने सेना में रहते थे परन्तु शिवाजी ने स्थायी सेना की व्यवस्था की तथा विश्रृंखलित मराठों को एकत्रित करके एक राष्ट्रीय सेना का रूप प्रदान किया। जागीरदारी प्रथा को हटाकर उन्होंने सैनिकों को नकद वेतन देने की व्यवस्था की, जिससे सम्राट तथा सेना में प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित हो सका तथा शिवाजी के मराठा सैनिक अपने नेता के इशारे पर प्राण न्योछावर करने को प्रस्तुत रहने लगे। घोड़े दगवाने तथा घुड़सवारों का हुलिया लिखवाने की प्रथा को प्रचलित किया गया। उनकी सेना में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों वर्गों के व्यक्तियों को समान रूप से स्थान प्राप्त था तथा अनेक मुसलमान सैनिकों ने बड़ी स्वामीभक्ति के साथ उत्कृष्ट कार्य किए थे।

1. सेना में अनुशासन की व्यवस्था- शिवाजी ने अपनी सेना में कठोर अनुशासन की व्यवस्था की थी। सेना को उसका पालन करना अनिवार्य था अन्यथा उन्हें कठोर दण्ड के लिए तैयार रहना पड़ता था। इसका प्रभाव सेना पर यह हुआ कि सेना हमेशा अनुशासित रहती थी। वर्षा ऋतु के पश्चात् सैनिक मुगल प्रदेशों पर आक्रमण करके उनसे चौथ व सरदेशमुखी कर वसूलते थे। शिवाजी के आदेशानुसार शत्रु-पक्ष के बच्चों व स्त्रियों पर अत्याचार करने की बिल्कुल मनाही थी। उन्हें सम्मानपूर्वक वापस भेजने की व्यवस्था थी। सैनिक राज्य के कृषक व ब्राह्मणों पर बिलकुल भी अत्याचार नहीं कर सकते थे। लूटे गए माल को सम्पूर्ण रूप से पदाधिकारियों को देने का आदेश था, जिसे शिवाजी के राजकोष में संगृहीत कर दिया जाता था। नियमित वेतन के अलावा सैनिक किसी से भी रिश्वत नहीं ले सकता था अन्यथा कठोर दण्ड मिलता था। शिवाजी अपने नियमों को कठोरतापूर्वक पालन करवाते थे।

2. घुड़सवार सेना- किसी भी राजा की प्रमुख सेना घुड़सवार सेना होती है। यह सेना का प्रमुख अंग होती है। शिवाजी की भी सेना का मुख्य अंग घुड़सवार सेना थी। इसके दो भाग थे- बारगीर व सिलहदार। बारगीर वर्ग के सैनिकों को राज्य की ओर से घोड़े व अस्त्र-शस्त्रों की व्यवस्था थी परन्तु सिलहदारों को अस्त-शस्त्र व घोड़े खरीदने पड़ते थे। इसके लिए उन्हें एक निश्चित धनराशि दी जाती थी। बारगीर मासिक वेतन प्राप्त करते थे। 25 घुड़सवारों पर 1 हवलदार, 5 हवलदारों पर एक जुमलादार तथा 10 जुमलादारों पर एक हजारी होता था, जिसे 1 हजार हून वार्षिक मिलते थे। सर-ए-नौबत या सेनापति घुड़सवारों का प्रधान था।

3. पैदल सेना- सेना की दूसरी प्रमुख शाखा पैदल सेना थी। पैदल सेना का भी विभाजन घुड़सवार सेना के समान था। साधारण सैनिक नायक के अधीन होते थे। 5 नायकों पर 1 हवलदार, 5 हवलदारों पर 1 जुमलादार, 10 जुमलादारों पर 1 हजारी तथा 7 हजारियों पर सर-ए-नौबत अथवा सेनापति होता था। शिवाजी के पास 20,000 मावलों की अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित, अनुशासित एवं सुव्यवस्थित सेना थी।

4. जलसेना- शिवाजी ने एक जलसेना का भी संगठन किया, जिससे जंजीरा के अबीसीनियन सिद्दियों को भी पराजित किया जा सके। सन् 1680 ई० में उन्होंने एक युद्ध में शत्रु पक्ष को बुरी तरह पराजित भी किया था। कोलाबा उनकी जलसेना का प्रमुख अड्डा था, जिसमें शिवाजी की 200 जहाजों की सेना रहती थी। जहाजी बेड़े का संचालन अधिकांशतः मुसलमान पदाधिकारियों के हाथ में था। लेकिन शिवाजी की जलसेना अधिक शक्तिशाली अथवा कुशल नहीं थी। फिर भी शिवाजी के पश्चात भी आंग्रे के अधीन मराठों की जल-सेना 18 वीं शताब्दी तक अंग्रेजों एवं पुर्तगालियों के लिए भय का कारण बनी रही।

5. युद्ध-पद्धति- शिवाजी ने मुगलों से सर्वथा भिन्न युद्ध-पद्धति को अपनाया। मुगल सेनापति तथा अन्य पदाधिकारी अत्यन्त विलासी होते थे। वे युद्धभूमि में भी भारी सामान के साथ चलते थे तथा युद्ध में विजय प्राप्त करने की अपेक्षा उन्हें निजी स्वार्थ का अधिक ध्यान रहता था। इसके विपरीत, मराठा सैनिकों को कष्ट सहन करने की आदत डाली जाती थी। वे टट्टओं पर सवार होकर मुट्ठी भर चने के साथ सरदार की आज्ञा प्राप्त होते ही चल पड़ते थे तथा उनको एकत्रित होने में विलम्ब नहीं लगता था। छोटी-छोटी टुकड़ियाँ होने के कारण उनके सैन्य-संचालन में विशेष असुविधा नहीं होती थी। उनके अस्त्र-शस्त्र भी हल्के होते थे तथा सामान न के बराबर होता था। महाराष्ट्र की प्राकृतिक स्थिति छापामार रण-पद्धति के सर्वथा अनुकूल थी तथा इसी पद्धति के कारण शिवाजी मुगल साम्राज्य के विरुद्ध अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफल हो सके।

6. दुर्गों की व्यवस्था- शिवाजी ने दुर्गों के महत्व पर अत्यधिक बल दिया था। दुर्ग शत्रु आक्रमणकारियों से सुरक्षित रहने के महत्वपूर्ण साधन थे। मराठा सैनिक दुर्गों की रक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा माता के समान उनकी पूजा करते थे। दुर्गों के निकटवर्ती प्रदेशों के निवासियों को संकटकाल में दुर्गों में ही शरण प्राप्त होती थी। शिवाजी के राज्य में 240 दुर्ग थे। उन्होंने कुछ नए दुर्गों का भी निर्माण करवाया तथा प्राचीन दुर्गों का जीर्णोद्वार करवाकर उन्हें सुदृढ़ बनवाया। प्रत्येक महत्वपूर्ण घाटी अथवा पहाड़ी पर उन्होंने सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया, जो मराठा सैनिकों की रक्षा करने के लिए उत्तम शरणस्थल थे।

शिवाजी के राज्य की जीवन-शक्ति यही दुर्ग थे। उन्होंने प्रत्येक दुर्ग की सुरक्षा के लिए तीन पदाधिकारियोंहवलदार, सबनीस तथा सर-ए-नौबत की नियुक्ति की। ये तीनों पदाधिकारी भिन्न-भिन्न जातियों के होते थे, जिससे कि विश्वासघात न कर सकें। दुर्ग की चाबियाँ हवलदार के पास रहती थीं, जो दुर्ग की सेना का प्रधान अधिकारी होता था। शासन तथा मालगुजारी का प्रबन्ध ब्राह्मण सबनीस करता था तथा किलेदार अर्थात् दुर्ग का सर-ए-नौबत खाने-पीने का सामान तथा घोड़ों के लिए दाने आदि की व्यवस्था करता था। ये तीनों पदाधिकारी समान पद के होते थे तथा एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखते थे। दुर्ग में स्थित सेना में जातियों का सम्मिश्रण कर दिया गया था। शिवाजी की दुर्ग व्यवस्था सर्वथा सराहनीय थी तथा पहाड़ियों में छापामार रण-पद्धति की सफलता इसी व्यवस्था पर निर्भर थी।

(ग) भूमि प्रशासन- सेना की ही तरह शिवाजी ने भूमिकर व्यवस्था के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किए। प्रत्येक गाँव का क्षेत्रफल ब्यौरेवार रखा जाता था और प्रत्येक बीघे की उपज का अनुमान लगाया जाता था। उपज का 2/5 भाग राज्य को दिया जाता था। किसानों को बीज और पशुओं की सहायता दी जाती थी जिसका मूल्य सरकार कुछ किश्तों में वसूल कर लेती थी। भूमि कर नकद अथवा जिन्स के रूप में वसूला जाता था।

शिवाजी की लगान व्यवस्था रैयतवाड़ी थी जिसमें राज्य के किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित कर रखा था। शिवाजी नहीं चाहते थे कि जमींदार, देशमुख और देसाई किसानों में हस्तक्षेप करें। हरसम्भव वे लगान अधिकारियों को जागीर के बदले नकद वेतन ही दिया करते थे। वे जब कभी जागीर देते भी थे तो इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि जागीरदार अपनी जागीर में कोई राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित न कर सके।

शिवाजी की आय का मुख्य साधन चौथ था। यह पड़ोसी राज्यों की आय का चौथा भाग होता था जिसे वसूल करने के लिए शिवाजी उन पर आक्रमण करते थे। चौथ हर साल वसूल करते थे। शिवाजी की आय का दूसरा मुख्य साधन सरदेशमुखी थी। यह राज्यों की आय का 1/10 भाग होता था।

प्रश्न 4.
‘शिवाजी में एक सफल सेनानायक एवं प्रशासक के गुण मौजदू थे।” विवेचना कीजिए।
उतर:
शिवाजी एक सफल सेनानायक- शिवाजी को दादा कोणदेव के द्वारा पूर्ण सैनिक शिक्षा प्राप्त हुई थी। वे वीर सैनिक थे तथा भयंकर-से-भयंकर संकट में भी नहीं घबराते थे। आगरा में औरंगजेब के द्वारा बन्दी बनाए जाने पर उनका पलायन उनके साहस एवं धैर्य का अप्रतिम उदाहरण है। वे केवल एक वीर सैनिक ही नहीं वरन् महान सेनापति भी थे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व उनके सैनिकों तथा सम्पर्क में आने वाले अन्य सभी व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। उनके सैनिक और कर्मचारी उनकी पूजा करते थे तथा उनके लिए अपने प्राणों का बलिदान देने को सदैव उत्सुक रहते थे। उन्होंने एक कुशल सेनापति की भाँति महाराष्ट्र में छापामार युद्ध को अपनाया जिसके कारण उनके शत्रु उन पर विजय प्राप्त करने में सदैव असमर्थ रहे। शिवाजी प्रथम भारतीय सम्राट थे जिन्होंने जल सेना के महत्त्व को समझा तथा एक शक्तिशाली जल-बेड़े का निर्माण करवाया।

एक साधारण जागीरदार के पुत्र होते हुए शिवाजी ने विशाल सेना का नेतृत्व करते हुए एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। इस साम्राज्य निर्माण का मुख्य ध्येय हिन्दुओं की रक्षा करना था जो किसी राजनीतिक शक्ति के द्वारा असम्भव थी। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने स्वराज्य का निर्माण किया। शिवाजी ने तोरण वियज के द्वारा 1649 ई० में विजय कार्य आरम्भ किया तथा केवल थोड़े ही वर्षों में बीजापुर, गोलकुण्डा तथा मुगल साम्राज्य के प्रदेशों को विजय करके एक विशाल साम्राज्य निर्मित किया। उनकी मृत्यु के समय उनके पास एक स्वतन्त्र राज्य, एक शक्तिशाली जल-बेड़ा तथा 45,000 घुड़सवारों, 60,000 सिलहदारों तथा 20,000 पैदल सैनिकों की सुव्यवस्थित एवं अनुशासित विशाल सेना थी। उनके राज्य में चोरी-डाके का नामोनिशान नहीं था। भिन्न-भिन्न जातियों में विभाजित मराठा सेना का संगठन करके उन्होंने छत्रपति’ की उपाधि धारण की तथा हिन्दुओं का परित्राण किया।

शिवाजी एक सफल प्रशासक- शिवाजी में अन्य महान विजेताओं के समान कुशल शासन-प्रबन्ध के गुण विद्यमान थे जिनकी उनके आलोचकों तक ने प्रशंसा की है। यद्यपि उन्होंने निरंकुश राज्यतन्त्र-पद्धति को अपनाया किन्तु उनका राज्य प्रजाहित के लिए था। वे प्रजावत्सल सम्राट थे जो निरन्तर कठोर परिश्रम के द्वारा अपनी प्रजा की सुख एवं समृद्धि की वृद्धि के लिए तत्पर रहते थे। उन्होंने अपने राज्य में शांति सुव्यवस्था एवं समृद्धि को जन्म दिया। उनकी केन्द्रीय शासन-व्यवस्था, सैनिक संगठन, नौ-सेना व्यवस्था समय एवं परिस्थिति के सर्वथा अनुकूल थी।

ग्राण्ड डफ ने भी उनके शासन सम्बन्धी गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- “उनका राज्य तथा शासन गरीब प्रजा एवं उसकी उन्नति के लिए था। उन्होंने जागीरदारी प्रथा, वंशानुगत पद आदि दोषपूर्ण व्यवस्थाओं को हटाकर नकद वेतन तथा योग्यता के आधार पर पदों का वितरण की व्यवस्था की। उनकी अष्टप्रधान सभा, सैनिक संगठन, भूमि सुधार उनको एक कुशल शासक सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।” एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है- “जो प्रदेश शिवाजी ने जीता अथवा जो धन एकत्रित किया वह मुगलों के लिए इतना भयावह नहीं था, जितना की शिवाजी का स्वयं का आदर्श, नई विचारधारा और प्रणाली जो उन्होंने चलाई तथा एक नई प्रेरणा उन्होंने मराठा जाति में फेंक दी थी।

प्रश्न 5.
शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन कीजिए।
उतर:
शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन निम्नलिखित है
1. योग्य सेनापति- शिवाजी एक योग्य सेनापति थे। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने गुरिल्ला युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया और सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों का निर्माण कराया।

2. महान् शासक-प्रबन्धक- शिवाजी ने असैनिक और सैनिक दोनों ही प्रकार की शासन-व्यवस्था में महान् शासक प्रबन्धक होने का परिचय दिया। अष्टप्रधान व्यवस्था, उनकी लगान व्यवस्था, देशपाण्डे और देशमुख जैसे पैतृक पदाधिकारियों को बिना हटाए हुए उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त करके किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करना तथा ऐसे शासन की स्थापना करना जो उनकी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चल सके, ऐसी बातें थीं, जो उनके असैनिक शासन की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं। शिवाजी की घुड़सवार सेना और पैदल सैनिकों में पदों का विभाजन, ठीक समय पर वेतन देना, उनको योग्यतानुसार पद देना, गुरिल्ला युद्ध-पद्धति तथा किलों की सुरक्षा का प्रबन्ध आदि उनकी सैनिक व्यवस्था की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। शिवाजी ने एक अच्छी नौसेना के निर्माण का भी प्रयत्न किया था। शिवाजी ने मराठी भाषा को राजभाषा बनाया था और एक राज्य व्यावहारिक संस्कृत कोष का भी निर्माण कराया था। इससे मराठी साहित्य के निर्माण में सहायता मिली थी।

3. हिन्दू राज्य के संस्थापक- शिवाजी ने एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने में सफलता पाई। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू राज्य का निर्माण किया, जबकि मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मराठा राज्य को तो क्या दक्षिण के शिया राज्यों गोलकुण्डा और बीजापुर को भी समाप्त करने पर तुला हुआ था। इसके अतिरिक्त बीजापुर राज्य, पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों का प्रबल विरोध होते हुए भी शिवाजी ने मराठा स्वराज्य की न केवल स्थापना की बल्कि जनता को सुरक्षा और शांति प्रदान की।

4. कुशल और साहसी सैनिक- शिवाजी एक कुशल और साहसी सैनिक थे। अनेक युद्धों में उन्होंने अपने जीवन को संकट में डाला था। अफजल खाँ से भेंट करना, शाइस्ता खाँ पर अचानक उसके शहर और निवास स्थान में प्रवेश करके आक्रमण करना, औरंगजेब से आगरा मिलने जाना उनके जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालने से कभी नहीं झिझके।। राष्ट्र निर्माता- शिवाजी का नवीनतम कार्य हिन्दू-मराठाराष्ट्र का निर्माण करना और उनकी महानतम् देन, उसको स्वतन्त्रता की भावना प्रदान करना था। गुलाम रहकर वे बड़ी-से-बड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार करने के लिए तत्पर न थे। अपने कार्य को उन्होंने बिना किसी विशेष सहायता के आरम्भ किया और यह अनुभव करके कि बढ़ती हुई मुस्लिम शक्ति का विरोध मराठों की एकता के बिना सम्भव नहीं है, उन्होंने मराठों को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया। उन्हें रघुनाथ बल्लाल, समरजी पन्त, तानाजी मालसुरे, सन्ताजी घोरपड़े, खाण्डेराव दाभादे जैसे योग्य मराठा सरदारों का सहयोग मिला।

5. धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति- शिवाजी की धार्मिक प्रवृत्ति एक पहाड़ी झरने की भाँति स्वच्छ जल को अविरल गति से बहाने वाली थी, जिसमें धर्मान्धता की गन्दगी न थी। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और उनके साथ समान व्यवहार किया। धर्म, धार्मिक ग्रन्थ और कहानियाँ उनके प्रेरणा स्त्रोत थे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन धार्मिक आन्दोलनों और सन्तों से वह प्रभावित हुए थे। शिवाजी पहले हिन्दू थे, जिन्होंने मध्य युग की बदलती हुई युद्ध की नैतिकता को समझा। उनके विरोधी इतिहासकार चाहे उन्हें डाकू कहें, चाहे विद्रोही सामन्त और चाहे औरंगजेब ने उनको ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपनी सन्तुष्टि कर ली हो, परन्तु शिवाजी ने हिन्दू युद्ध-नीति की नैतिकता में एक नवीन अध्याय जोड़ा कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है न कि शौर्य के प्रदर्शन के लिए। उनकी धार्मिक सहनशीलता आधुनिक समय के लिए भी उदाहरण स्वरूप है।

शिवाजी नि: सन्देह महान् थे। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “मैं उन्हें हिन्दू जाति द्वारा उत्पन्न किया हुआ अन्तिम महान् क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता मानता हूँ।” वे पुनः लिखते हैं, “शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि हिन्दुत्व का वृक्ष वास्तव में गिरा नहीं है बल्कि वह सदियों की राजनीतिक दासता, शासन से पृथकत्व और कानूनी अत्याचार के बावजूद भी पुनः उठ सकता है, उसमें नए पत्ते और शाखाएँ आ सकती हैं और एक बार फिर आकाश में सिर उठा सकता है। इस प्रकार शिवाजी ने मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर उनमें राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

प्रश्न 6.
शिवाजी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उतर:

शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन निम्नलिखित है
1. योग्य सेनापति- शिवाजी एक योग्य सेनापति थे। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने गुरिल्ला युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया और सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों का निर्माण कराया।

2. महान् शासक-प्रबन्धक- शिवाजी ने असैनिक और सैनिक दोनों ही प्रकार की शासन-व्यवस्था में महान् शासक प्रबन्धक होने का परिचय दिया। अष्टप्रधान व्यवस्था, उनकी लगान व्यवस्था, देशपाण्डे और देशमुख जैसे पैतृक पदाधिकारियों को बिना हटाए हुए उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त करके किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करना तथा ऐसे शासन की स्थापना करना जो उनकी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चल सके, ऐसी बातें थीं, जो उनके असैनिक शासन की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं। शिवाजी की घुड़सवार सेना और पैदल सैनिकों में पदों का विभाजन, ठीक समय पर वेतन देना, उनको योग्यतानुसार पद देना, गुरिल्ला युद्ध-पद्धति तथा किलों की सुरक्षा का प्रबन्ध आदि उनकी सैनिक व्यवस्था की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। शिवाजी ने एक अच्छी नौसेना के निर्माण का भी प्रयत्न किया था। शिवाजी ने मराठी भाषा को राजभाषा बनाया था और एक राज्य व्यावहारिक संस्कृत कोष का भी निर्माण कराया था। इससे मराठी साहित्य के निर्माण में सहायता मिली थी।

3. हिन्दू राज्य के संस्थापक- शिवाजी ने एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने में सफलता पाई। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू राज्य का निर्माण किया, जबकि मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मराठा राज्य को तो क्या दक्षिण के शिया राज्यों गोलकुण्डा और बीजापुर को भी समाप्त करने पर तुला हुआ था। इसके अतिरिक्त बीजापुर राज्य, पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों का प्रबल विरोध होते हुए भी शिवाजी ने मराठा स्वराज्य की न केवल स्थापना की बल्कि जनता को सुरक्षा और शांति प्रदान की।

4. कुशल और साहसी सैनिक- शिवाजी एक कुशल और साहसी सैनिक थे। अनेक युद्धों में उन्होंने अपने जीवन को संकट में डाला था। अफजल खाँ से भेंट करना, शाइस्ता खाँ पर अचानक उसके शहर और निवास स्थान में प्रवेश करके आक्रमण करना, औरंगजेब से आगरा मिलने जाना उनके जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालने से कभी नहीं झिझके।। राष्ट्र निर्माता- शिवाजी का नवीनतम कार्य हिन्दू-मराठाराष्ट्र का निर्माण करना और उनकी महानतम् देन, उसको स्वतन्त्रता की भावना प्रदान करना था। गुलाम रहकर वे बड़ी-से-बड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार करने के लिए तत्पर न थे। अपने कार्य को उन्होंने बिना किसी विशेष सहायता के आरम्भ किया और यह अनुभव करके कि बढ़ती हुई मुस्लिम शक्ति का विरोध मराठों की एकता के बिना सम्भव नहीं है, उन्होंने मराठों को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया। उन्हें रघुनाथ बल्लाल, समरजी पन्त, तानाजी मालसुरे, सन्ताजी घोरपड़े, खाण्डेराव दाभादे जैसे योग्य मराठा सरदारों का सहयोग मिला।

5. धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति- शिवाजी की धार्मिक प्रवृत्ति एक पहाड़ी झरने की भाँति स्वच्छ जल को अविरल गति से बहाने वाली थी, जिसमें धर्मान्धता की गन्दगी न थी। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और उनके साथ समान व्यवहार किया। धर्म, धार्मिक ग्रन्थ और कहानियाँ उनके प्रेरणा स्त्रोत थे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन धार्मिक आन्दोलनों और सन्तों से वह प्रभावित हुए थे। शिवाजी पहले हिन्दू थे, जिन्होंने मध्य युग की बदलती हुई युद्ध की नैतिकता को समझा। उनके विरोधी इतिहासकार चाहे उन्हें डाकू कहें, चाहे विद्रोही सामन्त और चाहे औरंगजेब ने उनको ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपनी सन्तुष्टि कर ली हो, परन्तु शिवाजी ने हिन्दू युद्ध-नीति की नैतिकता में एक नवीन अध्याय जोड़ा कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है न कि शौर्य के प्रदर्शन के लिए। उनकी धार्मिक सहनशीलता आधुनिक समय के लिए भी उदाहरण स्वरूप है।

शिवाजी नि: सन्देह महान् थे। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “मैं उन्हें हिन्दू जाति द्वारा उत्पन्न किया हुआ अन्तिम महान् क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता मानता हूँ।” वे पुनः लिखते हैं, “शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि हिन्दुत्व का वृक्ष वास्तव में गिरा नहीं है बल्कि वह सदियों की राजनीतिक दासता, शासन से पृथकत्व और कानूनी अत्याचार के बावजूद भी पुनः उठ सकता है, उसमें नए पत्ते और शाखाएँ आ सकती हैं और एक बार फिर आकाश में सिर उठा सकता है। इस प्रकार शिवाजी ने मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर उनमें राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

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