UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 16 Status of Women in Indian Society

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 16
Chapter Name Status of Women in Indian Society (भारतीय समाज में स्त्रियों का स्थान)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 16 Status of Women in Indian Society (भारतीय समाज में स्त्रियों का स्थान)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
भारतीय समाज में स्त्रियों की वर्तमान परिस्थिति पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
वर्तमान (स्वतन्त्र) भारत में स्त्रियों की स्थिति में हुए परिवर्तन की विवचेना कीजिए। [2007, 09, 10]
या
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात स्त्रियों ने शिक्षा के क्षेत्र में क्या प्रगति की है?
उत्तर:
भारतीय समाज में स्त्रियों की वर्तमान स्थिति
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद पिछले 61 वर्षों में भारतीय स्त्रियों की स्थिति में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। डॉ० श्रीनिवास के अनुसार, “पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण तथा जातीय गतिशीलता ने स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्नत करने में पर्याप्त योगदान दिया है। वर्तमान में स्त्री-शिक्षा का प्रसार हुआ है। अनेक स्त्रियाँ औद्योगिक संस्थाओं और विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी करने लगी हैं। अब वे आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होती जा रही हैं। उनके पारिवारिक अधिकारों में वृद्धि हुई है। वर्तमान में स्त्रियों की स्थिति में निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आये हैं

1. स्त्री-शिक्षा में प्रगति – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्री-शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है। सन् 1882 में पढ़ी-लिखी स्त्रियों की कुल संख्या मात्र 2,054 थी, जो 1971 ई० में बढ़कर 5 करोड़ 94 लाख तथा 1981 ई० में 7 करोड़ 91.5 लाख से अधिक थी। 2001 ई० में स्त्रियों का साक्षरता प्रतिशत 53.67 तथा 2011 ई० में यह बढ़कर 64.64 हो गया है। स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1964-65 से दसवीं कक्षा तक लड़कियों की शिक्षा नि:शुल्क कर दी है। वर्तमान में शिक्षण से सम्बन्धित ट्रेनिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज आदि में लड़कियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। स्त्री-शिक्षा के व्यापक प्रसार ने स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में समुचित अवसर प्रदान किये हैं, उन्हें रूढ़िवादी विचारों से पर्याप्त सीमा तक मुक्त किया है, पर्दा-प्रथा को कम किया है तथा बाल-विवाह के प्रचलन को घटाने में योगदान दिया है।

2. आर्थिक क्षेत्र में प्रगति – शिक्षा के व्यापक प्रसार, नयी-नयी वस्तुओं के प्रति आकर्षण, उच्च जीवन बिताने की बलवती ईच्छा तथा बढ़ती हुई कीमतों ने अनेक मध्यम व उच्च वर्ग की स्त्रियों को नौकरी यो आर्थिक दृष्टि से कोई-न-कोई काम करने के लिए प्रेरित किया है। अब मध्यम वर्ग की स्त्रियाँ उद्योगों, दफ्तरों, शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, समाज-कल्याण केन्द्रों एवं व्यापारिक संस्थाओं में काम करने लगी हैं। वर्तमान में भारत में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की संख्या 35 लाख से भी अधिक है। 1956 ई० के हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम ने हिन्दू स्त्रियों को पत्नी, बहन एवं माँ के रूप में पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार प्रदान किया है। सरकार ने स्त्रियों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए कई नयी योजनाएँ भी बनायी हैं। परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

3. राजनीतिक चेतना में वृद्धि – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। जहाँ सन् 1937 में महिलाओं के लिए 41 स्थान सुरक्षित थे, वहाँ केवल 10 महिलाओं ने ही चुनाव लड़ा; जब कि 1984 ई० के चुनावों में 65 स्त्रियों ने सांसद के रूप में चुनाव में सफलता प्राप्त की। इसके बाद के लोकसभा चुनावों में स्त्री सांसदों की संख्या कम ही हुई है, परन्तु उनकी राजनीतिक चेतना बढ़ी है। ग्राम पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में स्त्रियों के लिए 33% स्थान आरक्षित किये गये हैं। इसके साथ ही पार्लियामेण्ट और विधानमण्डलों में स्त्री-प्रतिनिधियों की संख्या और विभिन्न गतिविधियों में उनकी सहभागिता, राज्यपाल, मन्त्री, मुख्यमन्त्री और यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री तक के रूप में उनकी भूमिकाओं से स्पष्ट है कि भारत में स्त्रियों में राजनीतिक चेतना दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। भारतीय महिलाओं ने राज्यपालों, कैबिनेट स्तर के मन्त्रियों और राजदूतों के रूप में यश प्राप्त किया है। स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में वृद्धि हुई है और उनकी स्थिति में सुधार हुआ है।

4. सामाजिक जागरूकता में वृद्धि – पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की सामाजिक जागरूकता में अत्यधिक वृद्धि हुई है। अब स्त्रियाँ पर्दा-प्रथा को बेकार समझने लगी हैं। बहुत-सी स्त्रियाँ घर की चहारदीवारी के बाहर खुली हवा में साँस ले रही हैं। वर्तमान में कई स्त्रियों के विचारों के दृष्टिकोणों में इतना परिवर्तन आ चुका है कि अब वे अन्तर्जातीय-विवाह, प्रेम-विवाह और विलम्ब-विवाह को अच्छा समझने लगी हैं। अब वे रूढ़िवादी बन्धनों से मुक्त होने के लिए प्रयत्नशील हैं। आज अनेक स्त्रियाँ महिला संगठनों और क्लबों की सदस्य हैं तथा समाजकल्याण के कार्यों में लगी हुई हैं।

5. विवाह एवं पारिवारिक क्षेत्र में अधिकारों की प्राप्ति – वर्तमान में स्त्रियों के पारिवारिक अधिकारों में वृद्धि हुई है। वर्तमान में स्त्रियाँ संयुक्त परिवार के बन्धनों से मुक्त होकर एकाकी परिवार में रहना चाहती हैं। आज बच्चों की शिक्षा, परिवार के आय के उपयोग, पारिवारिक अनुष्ठानों की व्यवस्था और घर के प्रबन्ध में स्त्रियों की इच्छा को विशेष महत्त्व दिया जाता है। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ने हिन्दू स्त्रियों को अन्तर्जातीय विवाह करने और कष्टमय वैवाहिक जीवन से मुक्ति पाने के लिए तलाक के अधिकार प्रदान किये हैं। बाल-विवाह दिनों-दिन कम होते जा रहे हैं और विधवाओं को भी पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त है। स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय स्त्रियों के शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व पारिवारिक जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है।

भारतीय स्त्रियों में सुधार के कुछ प्रमुख कारक

स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को परिवर्तित करने में निम्नलिखित कारकों का योगदान रहा है

1. संयुक्त परिवारों का विघटन – परम्परागत प्राचीन भारतीय संयुक्त परिवारों में स्त्रियों को पुरुषों के अधीन रहना पड़ता था, उनका कार्य-क्षेत्र घर की चहारदीवारी के अन्दर था, किन्तु नगरीकरण के परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। ग्रामीण परिवार की स्त्रियों के नगरों के सम्पर्क में आने से उनकी स्थिति में काफी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। यह सब नये-नये नगरों के उदय के कारण ही सम्भव हुआ है, क्योंकि रूढ़िवादी व्यक्तियों के बीच में रहकर उनकी स्थिति में सुधार होना सम्भव नहीं था।

2. शिक्षा का विस्तार – वर्ममान में स्त्री-शिक्षा का दिन-प्रतिदिन विस्तार हो रहा है। शिक्षा के प्रसार से स्त्रियाँ रूढ़िवादिता और जातिगत बन्धनों से मुक्त हुई हैं। उनमें त्याग, तर्क और वितर्क के भाव जगे हैं और ज्ञान के द्वार खुले हैं। स्त्रियों के शिक्षित होने से वे अपने आपको आत्मनिर्भर बनाने में सफल सिद्ध हो सकी हैं तथा राजनीतिक जागरूकता भी उनमें आज देखने को मिलती है।

3. अन्तर्जातीय विवाह – वर्तमान में स्कूलों में लड़के-लड़कियों के साथ-साथ पढ़ने तथा दफ्तरों में काम करने से प्रेम-विवाह एवं अन्तर्जातीय विवाह पर्याप्त संख्या में होते दिखाई पड़ रहे हैं। इससे स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हुआ है। अब वे परिवार पर भार नहीं समझी जाती हैं। ऐसे विवाह से बने परिवार में पति-पत्नी में समानता के भाव पाये जाते हैं और स्त्री को पुरुष की दासी नहीं समझा जाता।।

4. औद्योगीकरण – औद्योगीकरण के कारण स्त्रियों की पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता कम हुई है। स्त्रियों ने पुरुषों के समान आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए नौकरी करना आरम्भ किया है। इससे उन्हें आत्म-विकास करने में पर्याप्त सहायता मिली है।

5. सुधार आन्दोलन – 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही कुछ चिन्तनशील व्यक्तियों ने स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के सम्बन्ध में अपना बहुमूल्य योगदान दिया; जैसे – राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि। उन्होंने सती – प्रथा, पर्दा-प्रथा, बहुपत्नी विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध आदि को समाप्त करने के लिए सुधार आन्दोलन किये और इस क्षेत्र में किसी हद तक सफलता भी प्राप्त की। महात्मा गाँधी भी स्त्री-पुरुषों की समानता के समर्थक थे। उन्होंने भी स्त्रियों को राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

6. सरकारी प्रयास – स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार की तरफ से कई अधिनियम भी पास किये गये, जिससे स्त्रियों की स्थिति में अत्यधिक परिवर्तन हुए। इस सम्बन्ध में ‘बालविवाह निरोधक अधिनियम, 1929’, ‘मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939’, ‘दहेज निरोधक अधिनियम, 1961’, ‘हिन्दू विवाह तथा विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1955’ तथा ‘विशेष विवाह अधिनियम, 1954’ आदि महत्त्वपूर्ण अधिनियम हैं।

प्रश्न 2
महिलाओं के उन्नयन (उत्थान) के लिए किये जाने वाले विभिन्न उपाय बताइए। [2013]
या
भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार के उपाय बताइए। [2008, 11]
उत्तर:
नारी-मुक्ति को स्वर सदैव प्रतिध्वनित होता रहा है। भारत के अनेक मनीषियों और समाज-सुधारकों ने नारी को समाज में सम्मानजनक पद दिलाने का भरसक प्रयास किया। राष्ट्र की आधारशिला और पुरुष प्रेरणा-स्रोत नारी को सबल बनाने के लिए अनेक सामाजिक आन्दोलन किये गये। ब्रह्म समाज, आर्य समाज तथा अन्य सुधारवादी सामाजिक आन्दोलनों ने नारी-मुक्ति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये।

बीसवीं शताब्दी में नारी को शोषण और अन्याय से बचाने के लिए अनेक सामाजिक विधान पारित किये गये। आज के दौर में, अनेक महिला संगठनों ने नारी को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान कराने के कई आन्दोलन चला रखे हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने नारी-सुधार के क्षेत्र में श्लाघनीय प्रयास किये। स्वतन्त्रता के पश्चात् नारी की दशा में गुणात्मक सुधार आया और, युगों-युगों से पुरुष के अन्याय की कारा में पिसती नारी को उन्मुक्त वातावरण में साँस लेने का अवसर मिला। भारत में स्त्रियों की सामाजिक परिस्थिति सुधारने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

1. पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव – पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय विद्वानों का ध्यान नारी-शोषण और उनकी दयनीय दशा की ओर आकृष्ट किया। भारतीय समाज एकजुट होकर इस अभिशाप को मिटाने में लग गया। अतः समाज में नारी को सम्मानजनक स्थान मिल गया।

2. स्त्री-शिक्षा-स्त्री – शिक्षा का प्रचलन होने से शिक्षित नारी में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हुई। उसने शोषण, अन्याय और कुरीतियों के पुराने लबादे को उतारकर प्रगतिशीलता का नया कलेवर धारण किया। महिला-जागृति ने नारी को समाज में ऊँची परिस्थिति प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया।

3. महिला संगठन – भारत में नारी की दशा में गुणात्मक सुधार लाने के लिए वुमेन्स इण्डियन एसोसिएशन, कौंसिल ऑफ वुमेन्स, आल इण्डिया वुमेन्स कॉन्फ्रेन्स, विश्वविद्यालय महिला संघ, कस्तूरबा गाँधी राष्ट्रीय स्मारक निधि आदि महिला संगठनों की स्थापना की गयी। इन महिला संगठनों ने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठायी और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिलवाकर उनका उत्थान किया।

4. आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता – शिक्षित नारी ने धीरे-धीरे व्यवसाय, नौकरी, प्रशासन था उद्योगों में भागीदारी प्रारम्भ कर दी। आर्थिक क्षेत्र में निर्भरता ने उन्हें स्वयं वित्तपोषी बना दिया। आजीविका के साधन कमाने पर उनकी पुरुषों पर निर्भरता घट गयी है और समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता गया।

5. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण – विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने औद्योगीकरण और नगरीकरण को बढ़ावा दिया। इन दोनों के कारण समाज में प्रगतिशील विचारों का जन्म हुआ। प्राचीन रूढ़ियाँ समाप्त हो गयीं। स्त्री-शिक्षा, व्यवसाय, प्रेम-विवाह, अन्तर्जातीय विवाह तथा नारी संगठनों ने नारी को पुरुष के समकक्ष ला दिया।

6. यातायात एवं संचार-व्यवस्था – भारत में यातायात और संचार के साधनों का विकास होने पर भारतीय नारी देश तथा विदेश की नारियों के सम्पर्क में आयी। इन साधनों ने उसे महिला आन्दोलनों और उनकी सफलताओं से परिचित कराया। अतः भारतीय नारी भी अपनी मुक्ति तथा अधिकारों की प्राप्ति के लिए जुझारू हो उठी।।

7. अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन – स्व-जाति में विवाह की अनिवार्यता समाप्त करके अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। सहशिक्षा, साथ-साथ नौकरी करना तथा पाश्चात्य शिक्षा के उन्मुक्त विचारों ने नारी में अन्तर्जातीय विवाहों का बीज रोप दिया है। अन्तर्जातीय विवाहों के कारण वर-मूल्य में कमी आ गयी है और नारी की समाज में परिस्थिति ऊँची उठ गयी है।

8. संयुक्त परिवारों का विघटन – संयुक्त परिवार में पुरुषों का स्थान स्त्रियों की अपेक्षा ऊँचा था। संयुक्त परिवारों में विघटन पैदा होने से एकाकी परिवारों का जन्म हो रहा है। एकाकी परिवारों में स्त्री और पुरुष का स्तर एक समान होता है।

9. दहेज-प्रथा का उन्मूलन – दहेज-प्रथा के कारण समाज में नारी का स्थान बहुत नीचा बना हुआ था। सरकार ने 1961 ई० में दहेज निरोधक अधिनियम पारित करके दहेज-प्रथा को उन्मूलन कर दिया। दहेज-प्रथा समाप्त हो जाने से समाज में नारी की परिस्थिति स्वतः ऊँची हो गयी।

10. सुधार आन्दोलन – भारतीय स्त्रियों की दयनीय दशा सुधारने के लिए ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज तथा रामकृष्ण मिशन ने अनेक समाज-सुधार के आन्दोलन चलाये। गाँधी जी ने महिला सुधार के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन चलाया। सुधार आन्दोलनों ने सोयी हुई स्त्री जाति को जगा दिया। उनमें नयी चेतना, जागृति और आत्मविश्वास का सृजन हुआ। समाजने उनके महत्त्व को समझकर उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान प्रदान किया।

11. सामाजिक विधान – भारतीय समाज में नारी को सम्मानजनक स्थान दिलवाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका सामाजिक विधानों ने निभायी है। हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1956; बाल-विवाह निरोधक अधिनियम, 1929; हिन्दू स्त्रियों को सम्पत्ति पर अधिकार अधिनियम, 1937; विशेष विवाह अधिनियम, 1954; हिन्दू विवाह तथा विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1955; हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956; हिन्दू नाबालिग और संरक्षकता का अधिनियम, 1956; हिन्दू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956; स्त्रियों का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1956 तथा दहेज निरोधक अधिनियम, 1961 ने स्त्रियों की दशा में गुणात्मक सुधार किये। स्त्री का शोषण दण्डनीय अपराध बन गया। अतः नारी की समाज में परिस्थिति ऊँची होती चली गयी।

12. विधायी संस्थाओं में महिला आरक्षण – 1990 ई० से भारतीय राजनीति में यह चर्चा है। कि विधायी संस्थाओं (विधानसभाओं और लोकसभा) में एक-तिहाई (33%) स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किये जाने चाहिए। इस सम्बन्ध में महिला आरक्षण का विधेयक प्रस्ताव 1996, 1997 तथा 1998 ई० में लोकसभा में पेश किया जा चुका है, किन्तु वह राजनीतिक दलों के विरोध के कारण अभी पारित नहीं किया जा सका। लेकिन संविधान के 73वें संशोधन (1993 ई०) के द्वारा पंचायती राज में 1/3 सीटों पर महिलाओं के लिए आरक्षण कर दिया गया है। तदानुसार अब वे ग्राम-पंचायत, क्षेत्र-समितियों और जिला पंचायतों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके इस सशक्तिकरण के परिणामस्वरूप उनकी स्थिति में उन्नयन होने की पूरी आशा है।

13. महिला-कल्याण की विभिन्न केन्द्रीय योजनाएँ – 31 जनवरी, 1992 को राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना कर दी गयी है, जो उनके अधिकारों की रक्षा और उनकी उन्नति के लिए प्रयासरत है। इसी प्रकार, उनके रोजगार, स्वरोजगार आदि के प्रोग्राम चल रहे हैं। अन्य योजनाएँ इन्दिरा महिला योजना, बालिका समृद्धि योजना, राष्ट्रीय महिला कोष आदि उनके विकास का प्रयास कर रही हैं।

14. परिवार-कल्याण कार्यक्रम – स्त्रियों की हीन दशा का एक कारण अधिक बच्चे भी थे। परिवार-कल्याण कार्यक्रमों ने परिवार में बच्चों की संख्या सीमित करके स्त्रियों की दशा में गुणात्मक सुधार किया है। परिवार में बच्चों की संख्या कम होने से स्त्री का स्वास्थ्य ठीक हुआ है, घर का स्तर ऊँचा उठा है तथा स्त्री को अन्य स्थानों पर काम करने, आने-जाने तथा राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा है। इस प्रकार परिवार कल्याण कार्यक्रमों ने भी नारी को समाज में ऊँचा स्थान दिलवाने में भरपूर सहयोग दिया है। नारी उत्थान एवं नारी जागृति में शिक्षा और विज्ञान का सहयोग सराहनीय रहा है। समाज में नारी को सम्मानजनक स्थान प्रदान कराने के लिए आवश्यक है-‘नारी स्वयं को सँभाले और अपना महत्त्व समझे।’ मानव के मानस को सरस तथा स्वच्छ बनाने में नारी को जितना योगदान है वह शब्दों से परे है। नारी को समाज में सम्मानजनक स्थान मिले बिना हमारी संस्कृति अधूरी है। नारी, जो समाज के निर्माण में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है, समाज से आस्था और सम्मान की पात्रा है। नारी को सम्मान देकर, आओ! हम सब एक नये और प्रगतिशील समाज का निर्माण करें।

प्रश्न 3
क्या राजनीति और लोक-जीवन में स्त्रियों को प्रवेश वांछनीय है ? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
राजनीति और लोक-जीवन में
स्त्रियों का प्रवेश स्त्रियों की विभिन्न क्षेत्रों में बदली हुई स्थिति को देखकर कुछ व्यक्ति क्षुब्ध हुए हैं तो कुछ ने प्रसन्नता प्रकट की है। इस सन्दर्भ में यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या नारी को लोक-जीवन, सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए अथवा नहीं। दूसरे शब्दों में, लोक-जीवन में उनका प्रवेश वांछनीय है या नहीं? इस बारे में दो मत पाये जाते हैं—एक मत उनके लोक-जीवन में प्रवेश के विपक्ष में है और दूसरा पक्ष में। जो लोग विपक्ष में हैं, उनका कहना है कि

  1. स्त्रियों का कार्य-क्षेत्र घर है, उन्हें पति-सेवा तथा बच्चों के लालन-पालन आदि का कार्य कर अच्छे परिवार के निर्माण में सहयोग देना चाहिए, क्योंकि परिवार ही समाज का आधार है। सार्वजनिक कार्य करने पर घर की उपेक्षा होगी, बच्चों का समुचित पालन-पोषण नहीं होगा, वे अनियन्त्रित एवं आवारा हो जाएँगे और परिवार विघटित हो जाएगा।
  2. राजनीति और लोक-जीवन में प्रवेश करने पर स्त्रियों में यौन स्वच्छन्दता एवं अनैतिकता फैलेगी।
  3. परिवार की धार्मिक क्रियाओं का सम्पादन सुचारु रूप से नहीं हो सकेगा।
  4. स्त्रियाँ कोमल स्वभाव की होने से बाह्य जीवन की कठोरता एवं कठिनाइयों का सफलतापूर्वक मुकाबला नहीं कर सकेंगी।
  5. चूंकि स्त्रियाँ प्रजनन के कार्य से सम्बन्धित हैं, अतः सार्वजनिक जीवन में भाग लेने की उनकी सीमा है।
  6.  स्त्रियों का लोक-जीवन में भाग लेना भारतीय सामाजिक मूल्यों के विपरीत है।
  7. कई व्यक्ति स्त्रियों की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को पुरुषों से कम मानते हैं। अत: उनकी मान्यता है कि स्त्रियाँ उचित निर्णय लेने में असमर्थ होती हैं। इन सभी दलीलों के आधार पर कुछ व्यक्ति स्त्रियों के लोक-जीवन में प्रवेश को अवांछनीय मानते हैं।

दूसरी ओर कई व्यक्ति स्त्रियों के राजनीति और लोक-जीवन में प्रवेश के पक्ष में हैं। उनका मत है कि आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्त्रियों को सौंपे गये दायित्वों का यदि हम मूल्यांकन करें तो पाएँगे कि उन्होंने सराहनीय कार्य किये हैं तथा कई क्षेत्रों में तो वे पुरुषों से बढ़कर योगदान दे पायी हैं। वे इस बात को उचित नहीं मानते हैं कि स्त्रियों के राजनीतिक और लोक-जीवन में प्रवेश करने से परिवार विघटित हो जाएगा। परिवार का संचालन एवं संगठन केवल स्त्री का कार्य ही नहीं है, वरन् स्त्री व पुरुष दोनों का है। रूढ़िवादी सामाजिक मूल्यों को बनाये रखने के लिए स्त्रियों को

राजनीति और लोक-जीवन में प्रवेश की इजाजत न देना भी पिछड़ेपन का सूचक है। यह पुरुषों की स्वार्थी-प्रवृत्ति एवं शोषण की नीति को प्रकट करता है। वर्तमान में प्रजातन्त्रीय विचारों की भी सँग है कि स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त हों। यदि स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण कर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करेंगी तो वे समाज को अनेक कुप्रथाओं, अन्धविश्वासों, आडम्बरों, रूढ़ियों आदि से मुक्त कर सकेंगी और परिवार तथा समाज की सेवा बदलते समय की माँग के अनुरूप कर सकेंगी। राजनीति में आने पर वे अपने अधिकारों की रक्षा अच्छी प्रकार से कर सकेंगी। वास्तव में, नवीन परिस्थितियों को देखते हुए ही स्त्रियों का राजनीतिक और लोक-जीवन में प्रवेश वांछनीय है, किन्तु उन्हें इतना ध्यान रखना चाहिए कि वे इतनी स्वच्छन्द न हो जाएँ कि अपना सन्तुलन खो दें और पथभ्रष्ट हो जाएँ।

प्रश्न 4
हिन्दू एवं मुस्लिम समाज में स्त्रियों की स्थिति पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
हिन्दू एवं मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति की तुलना कीजिए।
उत्तर:
मुस्लिम स्त्रियों में बहुपत्नीत्व, पर्दा-प्रथा, धार्मिक कट्टरता, अशिक्षा एवं स्त्रियों द्वारा वास्तव में तलाक देने सम्बन्धी कई समस्याएँ पायी जाती हैं। हिन्दू और मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति में कुछ समानताएँ पायी जाती हैं; जैसे – पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह एवं बहुपत्नी–प्रथा का प्रचलन दोनों में ही है। किसी क्षेत्र में हिन्दू स्त्री की स्थिति अच्छी है, तो किसी में मुस्लिम स्त्री की। हम यहाँ विभिन्न आधारों पर दोनों की ही स्थिति की तुलना करेंगे

1. पर्दा-प्रथा – दोनों में ही पर्दा-प्रथा पायी जाती है, किन्तु हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों में इसका कठोर रूप पाया जाता है।

2. शिक्षा – मुस्लिम स्त्रियों की तुलना में हिन्दू स्त्रियों में शिक्षा का प्रचलन अधिक है।

3. आर्थिक – राजनीतिक स्थिति –
आर्थिक, राजनीतिक एवं सार्वजनिक क्षेत्र में मुस्लिम स्त्रियों की अपेक्षा हिन्दू स्त्रियाँ अधिक कार्यरत हैं और उनकी स्थिति भी ऊँची है। हिन्दू स्त्रियाँ सामाजिक कल्याण, सार्वजनिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में अधिक भाग लेती हैं।

4. तलाक –
हिन्दू स्त्री को तलाक देने का अधिकार प्राप्त नहीं है, जब कि मुस्लिम स्त्री को है। 1955 ई० के हिन्दू विवाह अधिनियम ने हिन्दू स्त्रियों को भी तलाक का अधिकार दिया है, किन्तु व्यवहार में इसका प्रयोग कम ही होता है।

5. विधवा पुनर्विवाह –
हिन्दू विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था, जब कि मुस्लिम विधवाओं को है। 1856 ई० के हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ने हिन्दू स्त्रियों को भी यह अधिकार दिया है, किन्तु व्यवहार में इसका प्रयोग कम ही होता है।

6. बाल-विवाह – हिन्दुओं में बाल-विवाह का प्रचलन है, मुसलमानों में बाल-विवाह संरक्षकों व माता-पिता की स्वीकृति से ही होते हैं। ऐसे विवाह को लड़की बालिग होने पर चाहे तो मना भी कर सकती है।

7. दहेज – हिन्दुओं में दहेज-प्रथा पायी जाती है, जिसके कारण स्त्रियों की स्थिति निम्न हो जाती है, उन्हें परिवार पर भार और उनका जन्म अपशकुन माना जाता है, जब कि मुसलमानों में ‘मेहर’ की प्रथा है जिसमें वर विवाह के समय वधू को कुछ धन देता है। या देने का वादा करता है। इससे स्त्री की सामाजिक, पारिवारिक व आर्थिक स्थिति ऊँची होती है।

8. सम्पत्ति – सम्पत्ति की दृष्टि से मुस्लिम स्त्रियों को माँ, पुत्री एवं पत्नी के रूप में हिस्सेदार व उत्तराधिकारी बनाया गया है और वह अपनी सम्पत्ति का मनमाना उपयोग कर सकती है, किन्तु सन् 1937 तथा 1956 ई० के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिनियमों से पूर्व हिन्दू स्त्रियों का सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं था। व्यवहार में आज भी उनकी स्थिति पूर्ववत् ही है।

9. बहुपत्नीत्व – मुसलमानों में बहुपत्नीत्व के कारण हिन्दू स्त्री की तुलना में मुस्लिम स्त्री की स्थिति निम्न है। हिन्दुओं में भी बहुपत्नीत्व पाया जाता है, किन्तु यह अधिकांशतः सम्पन्न लोगों तक ही सीमित है।

10. विवाह की स्वीकृति – मुसलमानों में विवाह से पूर्व लड़की से इसकी स्वीकृति ली जाती है, जब कि हिन्दुओं में ऐसा नहीं होता था, यद्यपि अब ऐसा होने लगा है।

11. सार्वजनिक जीवन – हिन्दू स्त्रियों को सार्वजनिक जीवन एवं राजनीति में भाग लेने की स्वीकृति दी गयी है, जब कि मुस्लिम स्त्रियों को इसकी मनाही है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सैद्धान्तिक दृष्टि से मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति हिन्दू स्त्रियों से उच्च है, किन्तु व्यवहार में नहीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
वैदिक काल में स्त्रियों की दशा को वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैदिक काल में स्त्री-पुरुषों की स्थिति में समानता थी। इस काल में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि उस समय लड़के-लड़कियों की शिक्षा साथ-साथ होती थी, सह-शिक्षा को बुरा नहीं समझा जाता था। इस युग में अनेक विदुषी महिलाएँ हुई हैं। इस काल में लड़कियों का विवाह साधारणतः युवावस्था में ही होता था। बाल-विवाह का प्रचलन नहीं था और लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतन्त्रता थी। विधवा अपनी इच्छानुसार पुनर्विवाह कर सकती थी या ‘नियोग’ द्वारा सन्तान उत्पन्न कर सकती थी। धार्मिक कार्यों के सम्पादन में स्त्री-पुरुष के अधिकार समान थे। इस काल में पर्दा-प्रथा नहीं थी और स्त्रियों को सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने का अधिकार प्राप्त था। स्त्रियों की रक्षा करना पुरुषों का सबसे बड़ा धर्म माना जाता था और उनको अपमान करना सबसे बड़ा पाप। इस समय पुत्री के बजाय पुत्र के जन्म को विशेष महत्त्व दिया जाता था, परन्तु ऐसा धार्मिक दायित्वों को पूरा करने की दृष्टि से ही था।

प्रश्न 2
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्रियों में राजनीतिक चेतना में वृद्धि पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। जहाँ सन् 1937 में महिलाओं के लिए 41 स्थान सुरक्षित थे, वहाँ केवल 10 महिलाओं ने ही चुनाव लड़ा। भारत के नवीन संविधान के अनुसार सन् 1950 में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर नागरिक अधिकार प्रदान किये गये। सन् 1952 में 23 स्त्रियाँ लोकसभा के लिए चुनी गयी थीं, जब कि सन् 1984 के चुनावों में 65 स्त्रियों ने सांसद के रूप में चुनाव में सफलता प्राप्त की। इसके बाद के लोकसभा चुनावों में स्त्री सांसदों की संख्या कम ही हुई है, परन्तु उनकी राजनीतिक चेतना अत्यधिक बढ़ी है। ग्राम पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित किये गये हैं।

अब लोकसभा एवं राज्यों के विधानमण्डलों में स्त्रियों के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित किये जाने की दृष्टि से प्रयास किये जा रहे हैं। ग्राम पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में उत्तर प्रदेश में यह आरक्षण मिल भी गया है। ग्राम पंचायतों, पार्लियामेण्ट और विधानमण्डलों में स्त्री प्रतिनिधियों की संख्या और विभिन्न गतिविधियों में उनकी सहभागिता, राज्यपाल, मन्त्री, मुख्यमन्त्री और यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री तक के रूप में उनकी भूमिकाओं से स्पष्ट है कि इस देश में स्त्रियों में राजनीतिक चेतना दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। अब तक हुए विधानमण्डलों एवं संसद के चुनावों से भी ज्ञात होता है कि महिलाओं में अपने वोट का स्वतन्त्र रूप से उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। भारतीय महिलाओं ने राज्यपालों, कैबिनेट स्तर के मन्त्रियों और राजदूतों के रूप में यश प्राप्त किया है। स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में अत्यधिक वृद्धि हुई और उनकी स्थिति में भी पर्याप्त सुधार हुआ है।

प्रश्न 3
भारतीय स्त्री की स्थिति में हुए सुधार के दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारतीय स्त्री की स्थिति में हुए सुधार के दो कारण निम्नवत् हैं

1. शिक्षा का प्रसार – भारत में स्त्रियों की शिक्षा नित नये आयाम स्थापित कर रही है। शिक्षा ने स्त्रियों में जागरूकता पैदा की है। वे अब अपने अधिकारों के प्रति सजग हो गयी हैं। अब वे आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होने की बजाय आत्मनिर्भर होती जा रही हैं। समाज को कोई भी क्षेत्र स्त्रियों के लिए अछूता नहीं रहा है। वे कार्यालयों में, सेना में, पुलिस में, चिकित्सा सेवाओं में अर्थात् हर स्थान पर पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर कार्य कर रही हैं। नि:सन्देह शिक्षा-प्रसार ने स्त्रियों की दशा में बड़ा सुधार किया है।

2. सामाजिक विधान – हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956; स्त्रियों का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1956; हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 आदि सामाजिक विधानों के कारण, भारतीय स्त्री की दशा में बड़ा सुधार आया है। इन अधिनियमों से स्त्रियों को पुरुषों के समान सम्पत्ति के अधिकार मिले हैं, उनकी पारिवारिक स्थिति में सुधार हुआ है, अनैतिक जीवन से मुक्ति प्राप्त हुई है तथा विवाह-विच्छेद एवं विवाह के क्षेत्र में पुरुषों के समान व्यापक अधिकार प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 4
भारत में महिलाओं की निम्न स्थिति के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए। 2016 या हिन्दू स्त्रियों की निम्न स्थिति के चार कारणों को लिखिए। [2014]
उत्तर:
हिन्दू स्त्रियों की निम्न स्थिति के चार कारण निम्नलिखित हैं

1. आर्थिक निर्भरता – स्त्रियों को अपने भरण-पोषण के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था, इसीलिए पति को भर्ता कहा जाता था। स्त्रियों को घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर नौकरी, व्यवसाय या अन्य साधन द्वारा धन कमाने की आज्ञा नहीं थी। आर्थिक निर्भरता के कारण पुरुषों की प्रभुता उन पर हावी थी और उन्हें पुरुषों के अधीन रहना पड़ता था। पुरुषों पर आश्रित होने के कारण ही उनकी समाज में परिस्थिति नीची थी।

2. अशिक्षा  – प्राचीन काल में स्त्री शिक्षा का कम प्रचलन था। अशिक्षा और अज्ञानता के कारण स्त्रियों में अन्धविश्वास, कुरीतियाँ और रूढ़िवादिता का बोलबाला था। अशिक्षित नारी को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं था। वह पति को परमेश्वर मानकर उसका शोषण और अन्याय सहते हुए निम्न स्तर का जीवन-यापन करने के लिए विवश थी।

3. बाल-विवाह – प्राचीन काल में भारत में बाल-विवाहों का प्रचलन था। बाल-विवाहों के कारण बाल-विधुवाओं की संख्या बढ़ गयी। बाल-विधवाओं का जीवन दयनीय था। वे समाज पर भार थीं। बाल-विवाह पद्धति ने नारी की समाज में परिस्थिति नीची बना दी।

4. पुरुष-प्रधान समाज – प्राचीन भारतीय समाज पुरुष-प्रधान था। पुरुष स्त्री को अपने नियन्त्रण में रखने तथा उसे अपने से नीचा समझने की प्रवृत्ति रखता था। पुरुष के इस अहम् भाव ने भी समाज में नारी की परिस्थिति को नीचा बना दिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
मध्यकाल (मुगल शासकों का काल) में स्त्रियों की क्या दशा थी ?
उत्तर:
मुगल शासकों के काल को मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। 11वीं शताब्दी से ही भारतीय समाज पर मुसलमानों का प्रभाव पड़ने लगा था। इस काल में हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के नाम पर स्त्रियों पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये गये, उन्हें अधिकारों से वंचित कर दिया और उन पर कई नियन्त्रण लागू किये गये। इस समय स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं रहा। अब 5 या 6 वर्ष की छोटी-छोटी कन्याओं का भी विवाह किया जाने लगा। इस काल में स्त्रियाँ पूर्णतः परतन्त्र हो चुकी थीं। पारिवारिक, सामाजिक एवं धार्मिक सभी दृष्टि से स्त्री पुरुष पर निर्भर हो गयी थी।

प्रश्न 2
पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को कैसे प्रभावित किया
उत्तर:
भारत में 150 वर्षों तक अंग्रेजों को राज्य रहा। इससे यहाँ के लोग पश्चिम की सभ्यता व संस्कृति के सम्पर्क में आये। पश्चिमी संस्कृति में स्त्री-पुरुषों की समानता, स्वतन्त्रता तथा सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया है। पश्चिम के सम्पर्क का प्रभाव भारतीय स्त्रियों पर भी पड़ा और वे भी अपने जीवन में पश्चिम के मूल्यों, विचारों और विश्वासों को अपनाने लगीं। उन्होंने स्वतन्त्रता, समानता, न्याय और अपने अधिकारों की माँग की जिसके फलस्वरूप उन्हें कई सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सुविधाएँ एवं अधिकार प्राप्त हुए।

प्रश्न 3
शिक्षा के प्रसार से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में क्या परिवर्तन हुए हैं ?
उत्तर:
जब स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार हुआ तो वे जातिगत बन्धनों, रूढ़िवादिता व धर्मान्धता से मुक्त हुईं। जिन सामाजिक कुरीतियों को वे सीने से चिपटाए हुए थीं, उन्हें त्यागा, उनमें तर्क और विवेक जगा और ज्ञान के द्वार खुले। आधुनिक शिक्षा प्राप्त स्त्रियाँ बन्धन से मुक्ति चाहती हैं, पुरुषों की दासता को स्वीकार नहीं करतीं और वे स्वतन्त्रता तथा समानता की पोषक हैं। शिक्षा ने स्त्रियों को अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक बनाया। इस प्रकार शिक्षा का प्रसार भी स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन के लिए मुख्य कारक रहा है।

प्रश्न 4
भारतीय स्त्रियों की सामाजिक जागरूकता में क्या वृद्धि हुई है ?
उत्तर:
पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की सामाजिक जागरूकता में पर्याप्त वृद्धि हुई है। अब स्त्रियाँ पर्दा-प्रथा को बेकार समझने लगी हैं और बहुत-सी स्त्रियाँ घर की चहारदीवारी के बाहर खुली हवा में साँस ले रही हैं। आजकल कई स्त्रियों के विचारों और दृष्टिकोणों में इतना अधिक परिवर्तन आ चुका है कि अब वे अन्तर्जातीय-विवाह, प्रेम-विवाह और विलम्ब-विवाह को अच्छा समझने लगी हैं। जातीय नियमों और रूढ़ियों के प्रति महिलाओं की उदासीनता बराबर बढ़ रही है। अब वे रूढ़िवादी सामाजिक बन्धनों से मुक्त होने के लिए प्रयत्नशील हैं। आज अनेक स्त्रियाँ महिला संगठनों और क्लबों की सदस्य हैं तथा समाजकल्याण के कार्य में भी लगी हुई हैं।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
हिन्दू समाज में स्त्री को पुरुष की अद्भगिनी क्यों कहा गया है ?
उत्तर:
हिन्दू समाज में पुरुष के अभाव में स्त्री को और स्त्री के अभाव में पुरुष को अपूर्ण माना गया है। इसी कारण स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है।

प्रश्न 2
वैदिक काल में स्त्रियों की क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी तथा पुरुषों के समान ही थी।

प्रश्न 3
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में स्त्रियों को किस दृष्टि से देखा गया है ?
उत्तर:
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में स्त्रियों को आदर की दृष्टि से देखा गया है।

प्रश्न 4
पाश्चात्य प्रभाव से स्त्रियों की स्थिति में क्या अन्तर आया ?
उत्तर:
पाश्चात्य प्रभाव से स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया।

प्रश्न 5
संयुक्त परिवार में स्त्रियों की क्या दशा थी ?
उत्तर:
संयुक्त परिवार व्यवस्था स्त्रियों को सम्मान देने के पक्ष में नहीं थी।

प्रश्न 6
क्या हिन्दू स्त्री को सम्पत्ति का अधिकार है ? (हाँ/नहीं) [2010]
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 7
क्या राजा राममोहन राय ने स्त्रियों की दशा में सुधार के लिए प्रयास किये ? (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 8
‘सती प्रथा समाप्त करने के लिए सबसे पहले किसने अथक प्रयास किया ? [2011, 12]
उत्तर:
राजा राममोहन राय ने।

प्रश्न 9
क्या मुस्लिम स्त्री को सम्पत्ति का अधिकार है ? [2009]
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
उस सुधारक का नाम चुनिए जिसने स्त्रियों की स्थिति सुधारने के सक्रिय प्रयत्न किये
(क) जयप्रकाश नारायण
(ख) महात्मा गांधी
(ग) चन्द्रशेखर आजाद
(घ) राजा राममोहन राय

प्रश्न 2
निम्नलिखित में उस व्यक्ति का नाम बताइए जिसने स्त्रियों की स्थिति सुधारने में सक्रिय भाग नहीं लिया
(क) राजा राममोहन राय
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) स्वामी दयानन्द
(घ) गोपालकृष्ण गोखले

प्रश्न 3
निम्नलिखित दशाओं में से कौन-सी दशा स्त्रियों की शोचनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी है?
(क) पश्चिमी शिक्षा
(ख) एक-विवाह का नियम
(ग) औद्योगीकरण व नगरीकरण
(घ) अशिक्षा

प्रश्न 4
भारतीय नारी की स्थिति में सुधार किस उपाय से होगा ? [2013, 15]
(क) बाल-विवाह से
(ख) आश्रम-व्यवस्था से
(ग) पाश्चात्य शिक्षा से
(घ) समानता के अधिकार से

प्रश्न 5
दि पोजिशन ऑफ वुमेन इन हिन्दू सिविलाइजेशन’ पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
(क) पी० एच० प्रभु
(ख) डॉ० नगेन्द्र
(ग) अल्तेकर
(घ) राधाकमल मुखर्जी

प्रश्न 6
मुस्लिम स्त्रियों की निम्न स्थिति हेतु कौन-सा कारक उत्तरदायी है? [2012]
(क) पर्दा प्रथा
(ख) अशिक्षा
(ग) पुरुषों का धार्मिक आधिपत्य
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (घ) राजा राममोहन राय,
2. (घ) गोपालकृष्ण गोखले,
3. (घ) अशिक्षा,
4. (घ) समानता के अधिकार से,
5. (ग) अल्तेकर,
6. (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 4 Field Study

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography (Practical Work)
Chapter Chapter 4
Chapter Name Field Study (क्षेत्रीय अध्ययन)
Number of Questions Solved 1
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 4 Field Study (क्षेत्रीय अध्ययन)

विस्तृत उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
क्षेत्रीय अध्ययन से क्या अभिप्राय है? क्षेत्र का चयन उसके लिए आवश्यक उपकरण तथा क्षेत्रीय आख्या तैयार करने की विधि समझाइए।
उत्तर

क्षेत्रीय अध्ययन का अर्थ
Meaning of Field Study

क्षेत्रीय अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य भूगोल के विद्यार्थियों को किसी क्षेत्र की वास्तविक भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित कराना है। ऐसी बहुत-सी जानकारियाँ हैं जिन्हें पुस्तकों में तो पढ़ लिया जाता है, परन्तु उनके वास्तविक तथा प्राकृतिक स्वरूप के विषय में कोई ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। उदाहरण के लिए, यदि हम मेरठ जनपद के किसी ग्राम का क्षेत्रीय सर्वेक्षण करें तथा उसकी जनसंख्या के आँकड़े, शिक्षा, व्यवसाय तथा यातायात साधनों के आँकड़े स्वयं एकत्र कर अपने अनुभव एवं पर्यवेक्षण के आधार पर इन आंकड़ों का विश्लेषण कर एक रिपोर्ट तैयार करें तो हमें उस ग्राम के विषय में एक अच्छी भौगोलिक जानकारी प्राप्त हो सकती है। इससे अन्य लोग भी लाभान्वित हो सकते हैं। इन एकत्रित किये गये आँकड़ों को सांख्यिकीय आरेखों-रेखाचित्र, दण्डाकृति तथा चक्राकृति आदि के द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं। इन आरेखों के द्वारा हम उस ग्राम की एक भौगोलिक आख्या प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रकार के अध्ययनों को क्षेत्रीय अध्ययन के नाम से पुकारा जाता है।

भौतिक दृष्टिकोण से हमें धरातल पर बहुत-से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, अर्थात् किसी प्रदेश को धरातलीय दृष्टिकोण से पर्वतीय, पठारी एवं मैदानी भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रत्येक भौतिक प्रदेश की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों में अन्तर पाया जाता है। इन प्रदेशों की धरातलीय बनावट, जल-प्रवाह प्रणाली, जलवायु दशाएँ, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति, अधिवास, व्यावसायिक संरचना, कृषि एवं उसके ढंग, सामाजिक रीति-रिवाज आदि तथ्यों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। क्षेत्रीय सर्वेक्षण के द्वारा हम इन प्रदेशों की विभिन्नताओं का अध्ययन कर सकते हैं तथा दो विभिन्न प्रदेशों के मध्य तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर सकते हैं।

इसके दूसरी ओर यदि किसी कस्बे अथवा नगर का अध्ययन किया जाये तो विद्यार्थियों को उनकी अनेक समस्याओं के विषय में जानकारी उपलब्ध हो सकती है। वे उसके प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों से परिचित हो सकेंगे। भूगोल का विद्यार्थी जिस क्षेत्र विशेष में निवास करता है, कम-से-कम उसे उस क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों का ज्ञान भली-भाँति होना चाहिए। प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण तथा इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों के ज्ञान के लिए भौगोलिक पर्यटन अत्यन्त आवश्यक है। इन तथ्यों का अध्ययन एवं जानकारी उस क्षेत्र का भ्रमण करके ही प्राप्त की जा सकती है।

क्षेत्र का चयन
Selection of Field

भौगोलिक अध्ययन बड़े विस्तृत होते हैं। क्षेत्रीय अध्ययन के लिए निम्नलिखित में से किसी भी निकटवर्ती क्षेत्र का चयन किया जा सकता है –

  1. पर्वतीय क्षेत्र
  2. पठारी क्षेत्र
  3. ग्रामीण बस्ती
  4. नगरीय बस्ती
  5. औद्योगिक नगर
  6. धार्मिक केन्द्र
  7. बाजार केन्द्र
  8. डेल्टाई प्रदेश
  9. बहुउद्देशीय योजना
  10. मरुस्थलीय प्रदेश

इस प्रकार किसी भी एक इकाई का चयन क्षेत्रीय अध्ययन के लिए किया जा सकता है।

क्षेत्रीय अध्ययन के लिए आवश्यक उपकरण
Required Apparatus for Field Study

किसी इकाई के क्षेत्रीय अध्ययन के लिए निम्नलिखित उपकरण आवश्यक होते हैं –

  1. अभ्यास-पुस्तिका अथवा नोट बुक
  2. ड्राइंग उपकरण-पेन, पेन्सिल, रबड़, मापक, आलपिन, गोंद, ब्लेड आदि
  3. ड्राइंगशीट, ट्रेसिंग पेपर, ग्राफ पेपर आदि
  4. फीता एवं जरीब
  5. कैमरा एवं दूरबीन
  6. अधिकतम एवं न्यूनतम तापमापी
  7. चुम्बकीय दिक्सूचक-दिशा निर्धारित करने के लिए
  8. ऊँचाई ज्ञात करने का यन्त्र एल्टीमीटर तथा
  9. ठहरने एवं खाने का सामान–टेण्ट, बाल्टी, जग, गिलास आदि।

क्षेत्रीय आख्या तैयार करने की विधि
Method of Preparing the Fields Data

क्षेत्रीय सर्वेक्षण करने के पश्चात् उसकी सारगर्भित रिपोर्ट भी तैयार करनी आवश्यक होती है। यह रिपोर्ट कम-से-कम 10 पृष्ठ की अवश्य ही होनी चाहिए। एकत्रित किये गये आँकड़ों को सारणीबद्ध कर लिया जाता है। सारणीबद्ध किये गये आँकड़ों को विभिन्न विधियों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, अर्थात् इन सूचनाओं को आरेखों, लेखाचित्रों की सहायता से ड्राइंग कागज एवं ग्राफ पर प्रदर्शित करना होता है। रिपोर्ट का विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर दिया जाना चाहिए –

  1. क्षेत्र या प्रदेश की स्थिति, विस्तार एवं सामान्य परिचय।
  2. धरातलीय बनावट एवं जल-प्रवाह प्रणाली।
  3. जलवायु दशाएँ।
  4. प्राकृतिक वनस्पति एवं मिट्टी की संरचना।
  5. पशुपालन एवं कृषि।
  6. यातायात एवं संचार के साधन।
  7. मानव अधिवास।
  8. सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशाएँ।
  9. जनसंख्या एवं उसकी विशेषताएँ, समस्याएँ तथा उनका समाधान।
  10. भावी विकास हेतु सुझाव।

उपर्युक्त शीर्षकों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने के साथ-साथ सारणीबद्ध किये गये आँकड़ों को ड्राइंगशीट पर मानचित्रों, चित्रों तथा आरेखों द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए। क्षेत्र में खींची गयी फोटो को भी साथ में संलग्न करना चाहिए, जिससे रिपोर्ट को सबलता प्राप्त होगी। क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास हेतु कुछ सुझाव देना भी आवश्यक है। इससे अध्ययन रिपोर्ट की उपयोगिता का ज्ञान प्राप्त होता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies (पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies(पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान).

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Subject Pedagogy
Chapter Chapter 11
Chapter Name Environmental Pollution Problems and Remedies
(पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान)
Number of Questions Solved 38
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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies (पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण-प्रदूषण से क्या आशय है? पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारणों तथा नियन्त्रण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
या
पर्यावरण प्रदूषण की क्या अवधारणा है? प्रदूषण को रोकने के लिए उपचारात्मक उपायों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
प्रदूषण रोकने के विभिन्न उपायों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ
पर्यावरण प्रदूषण का सामान्य अर्थ है हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है। जिसका सामान्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर किसी अन्य विषैली गैस या गैसों का अनुपात बढ़ जाए तो यह कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। पर्यावरण के किसी भी भाग के प्रदूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है। यह प्रदूषण जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण तथा मृदा-प्रदूषण के रूप में हो सकता है।

पर्यावरण-प्रदूषण के कारण
आधुनिक विश्व के सम्मुख पर्यावरण-प्रदूषण एक अत्यन्त गम्भीर समस्या है। वायु, जल और भूमि का प्रदूषण जिन कारणों से हुआ है उनका उल्लेख यहाँ संक्षेप में किया जा रहा है-

1. औद्योगीकरण
वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा के विकास एवं अनुसन्धानों के कारण पर्यावरण में प्रदूषण उत्पन्न हुआ है। औद्योगीकरण की प्रवृत्ति के फलस्वरूप जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को समतल किया जा रहा है, नदियों के स्वाभाविक बहाव को मोड़ा जा रहा है, खनिज पदार्थों का अन्धाधुन्ध दोहन हो रहा है, इन सबके फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषित होता है। औद्योगिक चिमनियों में रात-दिन निकलने वाले धुएँ से वायु प्रदूषण हो रहा है, कल-कारखानों से निकलने वाला कचरा और गन्दा पानी नदियों के जल में मिल रहा है. जिसके फलस्वरूप नदियों का जल-प्रदषित होता जा रहा है। इस तरह औद्योगिक विकास से प्रदूषण निरन्तर बढ़ रहा है।

2. वाहित मल
शहरों के मकानों से निकलने वाला मलमूत्र सीवर पाइप के द्वारा नदी, तालाबों और झीलों में डाल दिया जाता है। जो उनके जल को प्रदूषित कर देता है।

3. घरेलू अपमार्जक
घरों, अस्पतालों आदि की सफाई में विभिन्न प्रकार के साबुन, विम, डिटरजेण्ट पाउडर आदि प्रयुक्त होते हैं जो नालियों के द्वारा नदियों, तालाबों और झीलों आदि में मिल जाते हैं। अपमार्जकों के फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन अम्ल उत्पन्न होते हैं और जल को प्रदूषित करते हैं।

4. कूड़े-करकट और मृत जीवों का सड़ना
कूड़े-करकट के ढेर और मृत जीवों से जो दुर्गन्ध उठती है उससे वायु प्रदूषित हो जाती है। लाशों के सड़ने में अमोनिया गैस वायु और जल दोनों को ही प्रदूषित करती है।

5. प्रकृति का अनुचित शोषण
अपने भौतिक विकास हेतु मानव प्रकृति का बेदर्दी से शोषण कर रहा है। वह जंगलों को उजाड़ रहा है, पर्वतों को समतल बना रहा है और खनिज पदार्थों का निरन्तर दोहन कर रहा है, जिसके फलस्वरूप सूखा, बाढ़ और भू-स्खलन की समस्या उत्पन्न हुई है। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई से वातावरण में कार्बन ड्राई-ऑक्साइड की सान्द्रता निरन्तर बढ़ रही है।

6. रासायनिक तत्त्वों का वायुमण्डल में मिश्रण
निरन्तर उत्पन्न होने वाले धुएँ से रासायनिक तत्त्व वायुमण्डल में मिल रहे हैं, कार्बन मोनो-ऑक्साइड निरन्तर मानव को सता रही है और इसके फलस्वरूप दम घुटने लगता है और उल्टी आने लगती है। सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन की वायुमण्डल में अधिक मात्रा होने पर फेफड़ों की बीमारियाँ और आँखों में जलन उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में रासायनिक गैसों की अधिक मात्रा के कारण अम्लीय वर्षा का भय भी बना रहता है।

7. स्वतः चल-निर्वातक
जेट-विमान, ट्रेन, मोटर, ट्रैक्टर, टैम्पों आदि रात-दिन दौड़ते हैं। पेट्रोल, डीजल और मिट्टी के तेल के धुएँ से अनेक प्रकार की गैसें उत्पन्न होती हैं, जो वातावरण में फैलकर वायु को प्रदूषित करती हैं।

8. कीटनाशक पदार्थ
कीटनाशक पदार्थ चूहों, कीड़े-मकोड़ों और जीवाणुओं को मारने के लिए खेतों और उद्यानों के पौधों पर छिड़के जाते हैं। डी०डी०टी०, फिनॉयल, क्लोरीन, पोटैशियम परमैगनेट का प्रभाव हानिकारक होता है। इनके छिड़काव से मछलियाँ मर जाती हैं, भूमि की उर्वरा-शक्ति कम हो जाती है और सूक्ष्म जीव जो पर्यावरण को सन्तुलित रखते हैं, समाप्त हो जाते हैं।

9. रेडियोधर्मी पदार्थ
नाभिकीय अस्त्रों के विस्फोटों के फलस्वरूप जल, थल और वायु सभी में रेडियोधर्मी पदार्थ प्रवेश कर जाते हैं और पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि करते हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय :
पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर समस्या है तथा सम्पूर्ण मानव जगत के लिए चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए मानव-मात्र चिन्तित है। विश्व के प्राय: सभी देशों में पर्यावरण प्रदूषण के नियन्त्रण के लिए अनेक उपाय किये जा रहे हैं। वास्तव में भौतिक प्रगति तथा पर्यावरण-प्रदूषणे दो सहगामी प्रक्रियाएँ हैं। इस स्थिति में यदि कहा जाए कि हम औद्योगिक तथा भौतिक क्षेत्र में अधिक-से-अधिक प्रगति भी करते रहें तथा साथ ही हमारा पर्यावरण भी प्रदूषित न हो, तो यह असम्भव है। हमें पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त नहीं कर सकते, हद-से-हद पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित कर सकते हैं अर्थात् सीमित कर सकते हैं। पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं-

1. औद्योगिक संस्थानों के लिए कठोर निर्देश जारी किये गये हैं कि वे पर्यावरण
प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए हर सम्भव उपाय करें। इसके लिए आवश्यक है कि पर्याप्त ऊँची चिमनियाँ लगाई जाएँ तथा उनमें, उच्च कोटि के छन्ने लगाए जाएँ। औद्योगिक संस्थानों से विसर्जित होने वाले जल को पूर्णरूप से उपचारित करके ही पर्यावरण में छोड़ा जाना चाहिए। यही नहीं ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए जहाँ-जहाँ सम्भव हो ध्वनि अवरोधक लगाये जाने चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के आस-पास अधिक-से-अधिक पेड़ लगाये जाने चाहिए।

2. वाहन भी पर्यावरण
प्रदूषण के मुख्य कारण है। अतः वाहनों द्वारा होने वाले प्रदूषण को भी नियन्त्रित करना आवश्यक है। इसके लिए वाहनों के इंजन की समय-समय पर जाँच करवाई जानी चाहिए। ईंधन में होने वाली मिलावट को भी रोकना चाहिए। कुछ नगरों में CNG चालित वाहनों को इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे भी पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने में योगदान मिलेगा।

3. जन
सामान्य को पर्यावरण के प्रदूषण के प्रति सचेत होना चाहिए तथा जीवन के हर क्षेत्र में प्रदूषण को रोकने के हर सम्भव उपाय किये जाने चाहिए। पर्यावरण-प्रदूषण वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति की समस्या है। अत: इसे नियन्त्रित करने के लिए प्रत्येक व्यक्तिं को जागरूक होना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण के प्रत्येक कारण को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए तथा उसके निवारण का उपाय किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2
जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं ? इसके मुख्य कारणों, हानियों तथा नियन्त्रित करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जल प्रदूषण : पर्यावरण प्रदूषण का एक मुख्य रूप या प्रकार है-जल प्रदूषण। जल के मुख्य स्रोतों में दूषित एवं विषैले तत्त्वों का समावेश होना जल प्रदूषण कहलाती है। यह भी आज के युग की गम्भीर समस्या है। इसका अत्यधिक बुरा प्रभाव मानव-समाज, प्राणि-जगत तथा वनस्पति जगते पर पड़ता है। जल प्रदूषण के कारणों, हानियों तथा इसे नियन्त्रित करने के उपायों का विवरण निम्नवर्णित है।

जल प्रदूषण के कारण
जल प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं:

  1. औद्योगीकरण जल प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी है। चमड़े के कारखाने, चीनी एवं ऐल्कोहॉल के कारखाने कागज की मिलें तथा अन्य अनेकानेक उद्योग नदियों के जल को प्रदूषित करते हैं।
  2. नगरीकरण भी जल प्रदूषण के लिए उत्तरदायी है। नगरों की गन्दगी, मल व औद्योगिक अवशिष्टों। के विषैले तत्त्व भी जल को प्रदूषित करते हैं।
  3. समद्रों में जहाजरानी एवं परमाणु अस्त्रों के परीक्षण से भी जल प्रदषित होता है।
  4. नदियों के प्रति भक्ति-भाव होते हुए भी तमाम गन्दगी; जैसे-अधजले शव और जानवरों के मृत शरीर तथा अस्थि विसर्जन आदि भी नदियों में ही किया जाता है, जो नदियों के जल प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
  5. जल में अनेक रोगों के हानिकारक कीटाणु मिल जाते हैं, जिससे प्रदूषण उत्पन्न हो जाता है।
  6. भू-क्षरण के कारण मिट्टी के साथ रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक पदार्थों के नदियों में पहुँच जाने से नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।
  7. घरों से बहकर निकलने वाला फिनायल, साबुन, सर्फ एवं शैम्पू आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों और झीलों के जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर देता है।
  8. नदियों और झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, मनुष्यों द्वारा स्नान करना व साबुन आदि से गन्दे वस्त्र धोना भी जल प्रदूषण का मुख्य कारण है।

“जल प्रदूषण की हानियाँ
जल प्रदूषण की हानियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

  1. प्रदूषित जल के सेवन से जीवों को अनेक प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है।
  2. जल प्रदूषण से अनेक बीमारियाँ; जैसे-हैजा, पीलिया, पेट में कीड़े, यहाँ तक कि टायफाइड भी प्रदूषित जल के कारण ही होता है। राजस्थान के दक्षिणी भाग के आदिवासी गाँवों में गन्दे तालाबों का पानी पीने से “नारू’ नाम का भयंकर रोग होता है। इन गाँवों के 6 लाख 90 हजार लोगों में से 1 लाख 90 हजार लोगों को यह रोग है।
  3. प्रदूषित जल का प्रभाव जल में रहने वाले जन्तुओं और जलीय पौधों पर भी पड़ रहा है। जल प्रदूषण के कारण मछली और जलीय पौधों में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी हो गयी है। जो व्यक्ति खाद्य-पदार्थ के रूप में मछली आदि का उपयोग करते हैं, उनके स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है।
  4. प्रदूषित जल का प्रभाव कृषि उपजों पर भी पड़ता है। कृषि से उत्पन्न खाद्य-पदार्थों को मानव व पशुओं द्वारा उपयोग में लाया जाता है, जिससे मानव व पशुओं के स्वास्थ्य को हानि होती है।
  5. जल, जन्तुओं के विनाश से पर्यावरण असन्तुलित होकर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव उत्पन्न करता

जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के उपाय
जल की शुद्धता और उपयोगिता बनाए रखने के लिए प्रदूषण को रोकना आवश्यक है। जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखिते, उपाय प्रयोग में लाए जा सकते हैं

  1. नगरों के दूषित जल और मल को नदियों और झीलों के स्वच्छ जल में मिलने से रोका जाए।
  2. कल-कारखानों के दूषित और विषैले जल को नदियों और झीलों के जल में न गिरने दिया जाए।
  3. मल-मूत्र एवं गन्दगीयुक्त जल का उपयोग बायो-गैस बनाने या सिंचाई के लिए करके प्रदूषण को | रोका जा सकता है।
  4. सागरों के जल में आणविक परीक्षण न कराए जाएँ।
  5. नदियों के तटों पर शवों को ठीक से जलाया जाये तथा उनकी राख भूमि में दबा दी जाए।
  6. पशुओं के मृतक शरीर और मानव शवों को स्वच्छ जल में प्रवाहित न करने दिया जाए।
  7. जल प्रदूषण रोकने के लिए नियम बनाए जाएँ तथा उनका कठोरता से पालन किया जाए।
  8. नदियों, कुओं, तालाबों और झीलों के जल को शुद्ध बनाए रखने के लिए प्रभावी उपाय काम में लाए | जाएँ।
  9. जल प्रदूषण के कुप्रभाव तथा उनके रोकने के उपायों की जनसामान्य में प्रचार-प्रसार कराया जाए।
  10. जल उपयोग तथा जल संसाधन संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति बनायी जाए।

प्रश्न 3
भारत में पर्यावरण-प्रदूषण का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। पर्यावरण संरक्षण के सरकारी उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में पर्यावरण-प्रदूषण भारत में पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ रही है। सबसे प्रमुख समस्या जल-प्रदूषण की है। इसके बाद नगरीय क्षेत्रों में वायु और ध्वनि-प्रदूषण की समस्या है। लगभग सभी नदियाँ प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त हैं और देश में उपलब्ध जल का लगभग 70 प्रतिशत भाग प्रदूषित है। लगभग सभी नदियों में कारखानों को गन्दा पानी छोड़ा जाता है साथ ही मल-मूत्र भी मिलता रहता है। दामोदर नदी में दुर्गापुर और आसनसोल में स्थित कारखानों से छोड़े जाने वाले अवशिष्टों और मल आदि के मिलने से फिनोल, सायनाइड, अमोनिया आदि विषैले तत्वों की मात्रा बढ़ गयी है। हुगली नदी का जल और अधिक प्रदूषित है। गंगा जल में स्वयं शुद्ध होते रहने की क्षमता है परन्तु इसका जल भी प्रदूषित हो गया है। कानपुर और वाराणसी में इसका जल बहुत अधिक प्रदूषित है। भारत में वायु-प्रदूषण भी निरन्तर बढ़ रहा है।

भारतीय वायुमण्डल में लगभग 40 लाख टन सल्फर एसिड, 70 लाख टन कार्बन-कण, 10 लाख टन कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड आदि गैसों का सम्मिश्रण है। बड़े नगरों; जैसे-कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई, दिल्ली, कानपुर, अहमदाबाद आदि की वायु बहुत अधिक प्रदूषित है। कोलकाता सबसे अधिक प्रदूषित शहर है। यहाँ की वायु. में सल्फर डाइ-ऑक्साइड और धूल कणों की मात्रा सबसे अधिक है। कोलकाता शहर लगभग 1300 टन प्रदूषक तत्त्व वायुमण्डल में छोड़ता है। भारत में ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ रहा है। बढ़ती हुई जनसंख्या, नगरीकरण की प्रवृत्ति और स्वचालित वाहनों की बाढ़ से ध्वनि प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप लोगों की श्रवण-क्षमता घटती जा रही है, नींद गायब हो रही है और स्नायुविक रोग बढ़ रहे हैं। भारत में मृदा-प्रदूषण, भू-प्रदूषण और भू-स्खलन आदि की समस्याएँ भी हैं। थार का रेगिस्तान देश के अन्दरुनी हिस्सों में बढ़ रहा है, हिमालय वीरान हो रहा है, भूमि की उर्वरा-शक्ति कम हो रही है, जलवायु बदल रही है और सूखा एवं बाढ़ का प्रकोप निरन्तर बढ़ रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के सरकारी उपाय
सन् 1990 के बाद केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने देश में पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक उपाय किये हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं

  1. केन्द्र सरकार ने विशेषज्ञों, विद्वानों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के लिए पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षण और प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की है।
  2. पर्यावरण और वन मन्त्रालय ने पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक अनुसन्धान तथा विकास कार्यक्रम
    चलाये हैं। मई, 2000 तक लगभग 108 परियोजनाओं पर कार्य हो चुका है।
  3. केन्द्र सरकार ने देश के कुछ वनों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया है। इन संरक्षित क्षेत्रों में शिकार खेलना तथा वृक्षों को काटना दण्डनीय अपराध है। उत्तर प्रदेश में दुधवा का वन्य क्षेत्र इसका उदाहरण है।
  4. सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक विकास कार्यक्रम आरम्भ किये हैं, जिनसे पर्यावरण संरक्षण
    को अत्यधिक प्रोत्साहन मिल रहा है।
  5. पर्यावरण निदेशालय ने ‘राष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता, अभियान आरम्भ किया है। इस अभियान में गैर-सरकारी संगठनों, शिक्षण संस्थाओं तथा सरकारी विभागों के प्रस्ताव भी आमन्त्रित किये
    गये हैं।
  6. अप्रैल 1995 से देश के चार महानगरों-कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई और दिल्ली में हरित ईंधन योजना चलाई जा रही है। इसके अन्तर्गत वाहनों में सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है।
  7. गंगा नदी तथा अन्य जलाशयों को गन्दगी से मुक्त रखने के लिए सरकार के निर्देशन में देश भर में 270 योजनाएँ चल रही हैं।
  8. सरकार ने पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देने के लिए इन्दिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार, राष्ट्रीय पर्यावरण फैलोशिप आदि पुरस्कार योजनाएँ लागू की हैं।
  9. सरकार ने केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड तथा राज्य प्रदूषण बोर्ड की स्थापना की है। इन संस्थाओं का प्रमुख कार्य प्रदूषण नियन्त्रण कानूनों को कठोरतापूर्वक लागू करना तथा पर्यावरण सम्बन्धी प्रयासों की समीक्षा करना है।
  10. सरकार ने वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देने के लिए वर्ष 1997-98 से फ्लाई ऐश सुधार योजना लागू की है। इस योजना के अन्तर्गत रिक्त भूमि पर वृक्ष लगाये जाते हैं।
  11. स्वयं सेवी संस्थाएँ तथा राज्य सरकारें पर्यावरण संरक्षण के कार्य में महत्त्वपूर्ण योग दे रही हैं।
  12. वन संरक्षण, वृक्षारोपण, चिपको आन्दोलन, वन महोत्सव आदि कार्यक्रमों से भी पर्यावरण संरक्षण को विशेष प्रोत्साहन मिला है।
  13. उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1997-98 में एक सचल पर्यावरणीय प्रयोगशाला स्थापित की है, जिसका कार्य घटनास्थल पर जाकर पर्यावरण विरोधी कार्यों की जाँच करना है।
  14. जन-जागरण कार्यक्रम के अन्तर्गत जनता को वायु, जल, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषणों से उत्पन्न खतरों से अवगत कराया जा रहा है और उन्हें पर्यावरण-शिक्षा ग्रहण करने की सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण के वर्गीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
अध्ययन की सुविधा तथा प्रभावों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण पर्यावरण को निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया गया है-
1. प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण
पर्यावरण के इस वर्ग के अन्तर्गत हम उन समस्त प्राकृतिक शक्तियों एवं कारकों को सम्मिलित करते हैं जो मनुष्य को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इस स्थिति में पृथ्वी, आकाशवायु, जल, वनस्पति तथा समस्त जीव-जन्तु प्राकृतिक पर्यावरण (Natural Environment) के ही घटक हैं। प्राकृतिक पर्यावरण ही पर्यावरण का मुख्यतम’ घटक है तथा पर्यावरण का यही घटक मानव-जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है। वास्तव में प्राकृतिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है तथा न ही मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण को पूरी तरह से नियन्त्रित कर पाया है। सामान्य रूप से, पर्यावरण के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का ही विस्तृत अध्ययन किया जाता है।

2. सामाजिक पर्यावरण
पर्यावरण का द्वितीय घटक सामाजिक पर्यावरण (Social Environment) कहलाता है। सामाजिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया है। पर्यावरण के इस बटक में सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे को सम्मिलित किया जाता है। इसलिए इसे सामाजिक सम्बन्धों का पर्यावरण भी कहा जाता है। इसके मुख्य अंग हैं–परिवार, आस-पड़ोस, रिश्ते-नाते, खेल के साथी, समूह एवं समुदाय तथा विद्यालय।।

3. सांस्कृतिक पर्यावरण
पर्यावरण का तीसरा मुख्य घटक है–सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment)। सांस्कृतिक पर्यावरण में मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं एवं परिवेश को सम्मिलित किया जाता है। सांस्कृतिक पर्यावरण के दो पक्ष स्वीकार किए गए हैं, जिन्हें क्रमशः भौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण तथा अभौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है। मनुष्य द्वारा विकसित किए गए समस्त भौतिक एवं यान्त्रिक साधन भौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण में तथा इससे भिन्न धर्म, संस्कृति, भाषा, लिपि, रूढ़ियाँ, प्रथाएँ, विश्वास, कानून आदि अभौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण में सम्मिलित माने । जाते हैं।

प्रश्न 2
जल-प्रदूषण का अर्थ एवं मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जल-प्रदूषण का अर्थ
वर्तमान युग में जल-प्रदूषण की समस्या अत्यन्त गम्भीर है और अनेक बीमारियों का कारण प्रदूषित जल’ ही है। जल में दो भाग ऑक्सीजन और एक भाग हाइड्रोजन होता है, इसके साथ उसमें अनेक खनिज तत्त्व, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ और गैसें घुल जाती हैं। यदि जल में घुले हुए पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं अथवा कुछ ऐसे पदार्थ मिल जाते हैं, जो साधारणतया जल में उपस्थित नहीं रहते तो जल प्रदूषित हो जाता है। प्रदूषित जल का उपयोग मानव, जीव-जन्तु, पेड़-पौधों और सभी वनस्पतियों के लिए हानिकारक होता है। जल-प्रदूषण के स्रोत–अनेक प्रकार के पदार्थ जल को प्रदूषित कर देते हैं। यहाँ जल को प्रदूषित करने वाले स्रोतों का उल्लेख संक्षेप में किया जा रहा है

  1. जल-प्रदूषण का प्रमुख स्रोत मल-मूत्र, औद्योगिक बहिस्राव, उर्वरक और कीटनाशक पदार्थ हैं। सीवर पाइप, घरेलू कूड़ा-करकट और कारखानों से निकले हुए अवशिष्टों का जल में विलय होने से जल प्रदूषित हो जाता है।
  2. तेल एवं तैलीय पदार्थ भी जल-प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। जलयानों के अवशिष्ट, तेल के विसर्जन, खनिज तेल के कुओं के रिसाव के फलस्वरूप जल-प्रदूषण में वृद्धि होती है।
  3. जल का तापीय प्रदूषण भी समस्या का एक स्रोत है। विभिन्न कारखानों के संयन्त्रों में प्रयुक्त | रिऐक्टरों के ताप को कम करने हेतु नदी अथवा झील के जल का प्रयोग किया जाता है और तत्पश्चात् जल पुनः नदी अथवा झीलों में छोड़ दिया जाता है। इस गर्म जल के फलस्वरूप तापीय प्रदूषण होता है।
  4. रेडियोधर्मी अवशिष्टों से भी जल-प्रदूषण होता है। नाभिकीय विस्फोटों के फलस्वरूप रेडियोधर्मी विशिष्ट जल और जलाशयों में मिल जाते हैं और ये अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।
  5. मृत जीवों की लाशों को जलाशय में फेंकने के फलस्वरूप जल, दुर्गन्ध एवं प्रदूषणयुक्त हो जाता है।
  6. जल में विभिन्न रोगों के जीवाणुओं का समावेश हो जाने से भी जल प्रदूषित हो जाता है।

प्रश्न 3
जल-प्रदूषण का जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? इसे रोकने के उपायों का भी उल्लेख कीजिए।
या
जल प्रदूषण की समस्या के निवारण हेतु अपनाए जाने वाले उपायों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर
जल-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
जल-प्रदूषण का मानवे, जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ेता है। प्रदूषित जल मानव-स्वास्थ्य हेतु हानिकारक होता है। आंत्रशोध, पेचिस, पीलिया, हैजा, टाइफाइडऔर अपच आदि रोग दूषित जल के फलस्वरूप ही होते हैं। गन्दे जल से नहाने से विभिन्न प्रकार के चर्मरोग हो जाते हैं। दूषित जल का प्रभाव मानव के साथ ही जल-जीवों पर भी पड़ता है। मछलियों, कछुओं, जलीय पक्षियों और जलीय पादपों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। यदि जल में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है और सल्फेट, नाइट्रेट और क्लोराइड आदि की मात्रा बढ़ जाती है तो जलीय जन्तुओं और पादपों के जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

जल-प्रदूषण रोकने के उपाय-जल में शुद्धता की प्रक्रिया प्रकृति ही करती रहती हैं परन्तु फिर भी जल-प्रदूषण को रोकने के उपाय किये जाने चाहिए। कारखानों से निकलने वाले जहरीले अवशिष्ट पदार्थों और गर्म जल को जलाशयों में नहीं फेंका जाना चाहिए। मल-मूत्र आदि को जलाशय में नहीं गिराया जाना चाहिए इन्हें बस्तियों से दूर गड़ों में गिराया जाना चाहिए। कूड़ा-करकट, मरे जानवर और लाश नदी, तालाब अथवा झील में न फेंककर उन्हें जला दिया जाना। चाहिए। पेयजल के स्रोतों को दीवार बनाकर बाह्य गन्दगी से दूर रखना चाहिए। जनसामान्य को । जल-प्रदूषण के कारणों, दुष्प्रभावों और इनके रोकथाम की जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। समय-समय पर नदी, तालाब और कुओं के जल का परीक्षण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4
वायु-प्रदूषण का अर्थ एवं मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अर्थ: मानव और सभी जीवों के लिए स्वच्छ वायु आवश्यक है। वायुमण्डल में विभिन्न गैसें एक निश्चित मात्रा एवं अनुपात में होती हैं। जब किन्हीं कारणों से उनकी मात्रा और अनुपात में परिवर्तन हो जाता है तो वायु प्रदूषित हो जाती है। ‘विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने वायु-प्रदूषण के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा-“वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहाँ वायुमण्डल में दूषित पदार्थों की सान्द्रता मनुष्य और पर्यावरण को हानि पहुँचाने की सीमा तक बढ़ती है। वायु-प्रदूषण के स्रोत–वायु-प्रदूषण मुख्य रूप से मानव की गतिविधियों के फलस्वरूप होता है। औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा ईंधन चालित वाहनों में होने वाली वृद्धि वायु-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।

वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, ओजोन आदि निश्चित मात्रा और अनुपात में हैं। रेलगाड़ी, मोटर, कार, टैक्ट्रर, टैम्पो, जेट विमान और पेट्रोल एवं डीजल से चलने वाली मशीनों और लकड़ी, कोयला, तेल आदि के जलने से निकलने वाले धुएँ से वायु प्रदूषण उत्पन्न होता है। कभी-कभी प्रकृति भी वायु-प्रदूषण का कारण बनती है। ज्वालामुखी विस्फोट, कोहरा, आँधी-तूफान आदि भी वायु प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त वस्तुओं के सड़ने-गलने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध से भी वायु-प्रदूषण में वृद्धि होती है। वनों अर्थात् पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई के कारण भी वायु में गैसों का सन्तुलन बिगड़ रहा है तथा वायु प्रदूषित हो रही है।

प्रश्न 5
वायु-प्रदूषण का जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? इसे रोकने के उपायों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर
वायु-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
वायु प्रदूषण का प्रभाव मानव और अन्य जीवों तथा पेड़-पौधों सभी पर पड़ता है। वायु-प्रदूषण से मानव का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। खाँसी, फेफड़ों का कैंसर, एक्जिमा आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं, रक्तचाप बढ़ जाता है, आँखों के रोग उत्पन्न हो जाते हैं, चर्मरोग और मुँहासे आदि उत्पन्न हो जाते हैं। वायु-प्रदूषण और रासायनिक गैसों से पेड़ों की पत्तियाँ और नसें सूख जाती हैं। भारत में कोयला खानों में मजदूरी करने वाले लोग फुफ्फुस रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। मानव की भाँति ही अन्य जीवों का श्वासतन्त्र और केन्द्रीय-नाड़ी संस्थान वायु-प्रदूषण से प्रभावित होता है।

बादल, वर्षा और तापक्रम पर भी वायु-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है। वाय-प्रदषण रोकने के उपाय-वांय-प्रदषण को रोकने के लिए व्यापक पैमाने पर कार्य किया। जाना चाहिए। कारखानों को आबादी से दूर स्थापित किया जाना चाहिए, उनकी चिमनियों को ऊँचा रखा जानी चाहिए और उनमें विशेष फिल्टर लगाया जाना चाहिए। भोजन पकाने के लिए कोयला, लकड़ी का प्रयोग कम किया जाना चाहिए, धुआँरहित ईंधन का प्रयोग किया जाना चाहिए, स्वचालित वाहनों की धूम्रनलिका में छन्ना लगाना आवश्यक है। अधिक धुआँ देने वाले वाहनों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। गोबर, कूड़ा-करकट को आबादी से दूर किसी गड्ढे में डालकर मिट्टी से ढक दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 6
ध्वनि-प्रदूषण का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
ध्वनि प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? [2013]
उतर
अर्थ: आधुनिक युग में ध्वनि प्रदूषण भी मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। वातावरण में विभिन्न प्रकार के ध्वनि वाले ध्वनि-यन्त्रों से शोर बहुत अधिक बढ़ गया है और यह शोर का बढ़ना ही ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि की तीव्रता के मापन की इकाई डेसीबेल है। सामान्य रूप से 85 डेसीबेल से अधिक ध्वनि का पर्यावरण में व्याप्त होना ध्वनि-प्रदूषण माना जाता है। कारखानों की मशीनों से थोड़े-थोड़े अन्तराल पर बजने वाले सायरन, विमान, रेडियो, लाउडस्पीकर, टै फलस्वरूप जो शोर उत्पन्न होता है, वह ध्वनि-प्रदूषण है।

ध्वनि-प्रदूषण के स्रोत
ध्वनि-प्रदूषण के प्राकृतिक और भौतिक दो तरह के स्रोत हैं। प्राकृतिक स्रोतों के अन्तर्गत बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की कड़क, समुद्र की लहरें, ज्वालामुखी विस्फोट की आवाज और झरनों को पानी गिराना आदि आते हैं। भौतिक स्रोतों के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के सायरन, इंजनों, ट्रकों, मोटरों, वायुयानों, लाउडस्पीकरों और टेपरिकॉर्डर आदि की आवाज आदि आते हैं।

ध्वनि-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
ध्वनि-प्रदूषण का मानव-जीवन और उसके स्वास्थ्य तथा कार्य-क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। विभिन्न परीक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि सामान्यत: शान्त कमरे में 50 डेसीबेल ध्वनि होती है। 100 डेसीबेल ध्वनि असुविधापूर्ण और 120 डेसीबेल से ऊपर कष्टदायक होती है। ध्वनि-प्रदूषण के फलस्वरूप श्रवण-शक्ति का ह्रास होता है, नींद में बाधा उत्पन्न होती है, नाड़ी सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं, मानव की कार्यक्षमता घटती है, जीव-जन्तुओं के हृदय, मस्तिष्क और यकृत को हानि पहुँचती है। ध्वनि-प्रदूषण से रक्त चाप भी बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त अत्यधिक शोर से व्यक्ति के स्वभाव तथा व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

ध्वनि-प्रदूषण को रोकने के उपाय
कोई जाग्रत समाज ही ध्वनि-प्रदूषण को रोक सकता है। इसके हेतु औद्योगिक प्रतिष्ठानों को आबादी से दूर रखा जाना चाहिए और औद्योगिक शोर को कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए। मशीनों का सही रख-रखाव किया जाना चाहिए और अत्यधिक ध्वनि करने वाले कल-कारखानों में कार्य करने वाले श्रमिकों को कर्णबन्धनों को लगाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। लाउडस्पीकरों और ध्वनि विस्तारक बाजों का वाल्यूम कम रखा जाना चाहिए। मोटर, ट्रक, वाहनों में उच्च ध्वनि करने वाले हॉर्न नहीं लगाये जाने चाहिए। विमानों को उतारने और चढ़ाने में कम-से-कम शोर उत्पन्न किया जाना चाहिए और जेट विमानों के निर्गम पाइप ऊपर आकाश की ओर मोड़े जाने चाहिए।

प्रश्न 7
मृदा-प्रदूषण का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
अर्थ: मृदा अथवा मिट्टी में तरह-तरह के लवण, खनिज तत्त्व, कार्बनिक पदार्थ, गैसें और जल निश्चित मात्रा और अनुपात में होते हैं। यदि उनकी मात्रा और अनुपात में परिवर्तन हो जाता है तो उसे मृदा-प्रदूषण कहा जाता है।

मृदा-प्रदूषण के स्रोत
वायु तथा जल के प्रदूषण से मृदा-प्रदूषण होना नितान्त स्वाभाविक है। जब प्रदूषित जल भूमि पर फैलता है तथा प्रदूषित वायु का प्रवाह होता है तो मृदा-प्रदूषण स्वतः ही हो जाता है। इसके अतिरिक्त भी विभिन्न कारणों से मृदा-प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप खाद्य पदार्थों की माँग प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और भूमि की उर्वरता को बढ़ाने के लिए मिट्टी में विभिन्न प्रकार के उर्वरक डाले जाते हैं। अनवरत रासायनिक खादों का प्रयोग मृदा-प्रदूषण की समस्या उत्पन्न कर देता है। इसी तरह फसलों को कीड़ों और र्जीवाणुओं आदि से बचाने के लिए डी०डी०टी०, गैमेक्सीन, एल्ड्रीन और कुछ अन्य कीटनाशकों का अत्यधिक छिड़काव मृदा-प्रदूषण उत्पन्न करता है। कल-कारखानों से निकले हुए विभिन्न प्रकार के रासायनिक तत्त्व भी मृदा-प्रदूषण करते हैं। साथ ही भूमि क्षरण भी मृदा प्रदूषण उत्पन्न करता है।

मृदा-प्रदूषण को जनजीवन पर प्रभाव
मृदा-प्रदूषण का जनजीवन पर अत्यधिक व्यापक प्रभाव पड़ता है। कीटनाशक और कवकनाशक विषैली दवाओं के छिड़काव से शनैः-शनैः भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है और कुछ समय बाद फसलों की वृद्धि रुक जाती है। मानव-मल का खुले भू-भाग पर निष्कासन और निक्षेपण होने से पर्यावरण दूषित हो जाता है। भूमि पर कूड़ा-करकट, सड़ी-गली वस्तुओं और मरे जानवर फेंक देने से मिट्टी दूषित हो जाती है और परिणामस्वरूप अनेक बीमारियाँ फैल जाती हैं। भू-क्षरण भी भू-प्रदूषण की स्थिति उत्पन्न करता है। भू-क्षरण के कारण मिट्टी की उपजाऊ परत जल और हवा आदि के द्वारा बह जाती है और बंजर भूमि शेष रह जाती है। फलस्वरूप खाद्यान्नों का उत्पादन कम होने लगता है।

मृदा-प्रदूषण को रोकने के उपाय
मृदा-प्रदूषण को रोकने के लिए फसलों पर छिड़काव करने वाली कीटनाशक दवाओं को सीमित प्रयोग करना चाहिए। रासायनिक खादों का प्रयोग सीमित मात्रा में ही किया जाना चाहिए। औद्योगिक कचरे और कूड़ा-करकट को आबादी से दूर ले जाकर जमीन के अन्दर । दबा देना चाहिए। कृषि फार्मों में चक्रानुसार विभिन्न फसलों की खेती की जानी चाहिए। भू-क्षरण और मृदा-अपरदन को रोकने के समुचित उपाय किए जाने चाहिए। भू-स्खलन से होने वाले मृदा-क्षरण को कम किया जाना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘पर्यावरण के अर्थ को स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
पर्यावरण का व्युत्पत्ति अर्थ क्या है?
उत्तर
‘पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करने से पूर्व पर्यावरण’ के शाब्दिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है। ‘पर्यावरण’ के व्युत्पत्ति अर्थ को स्पष्ट करते हुए हम कह सकते हैं कि ‘पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात ‘परि’ और ‘आवरण’ के संयोग या मेल से बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर तथा आवरण का अर्थ है—‘घेरा’। इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा। इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि व्यक्ति के चारों ओर जो प्राकृतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, उनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है।

प्रश्न 2
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है। जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण-प्रदूषण हो रहा है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न भाग या पक्ष हैं। इस स्थिति में पर्यावरण के विभिन्न पक्षों के अनुसार ही पर्यावरण प्रदूषण के विभिन्न पक्ष निर्धारित किये गये हैं। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य प्रकार हैं-

  1. वायु-प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण।

प्रश्न 3
पर्यावरण-प्रदूषण को रोकने में ओजोन परत की भूमिका बताइए। [2008, 15]
उत्तर
हमारे वायुमण्डल में ओजोन की परत एक छतरी के रूप में विद्यमान है तथा हमारे वायुमण्डल के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है। यह ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर सीधे आने से रोकती है। इसके साथ-ही-साथ ओजोन गैस अपनी विशिष्ट प्रकृति के कारण हमारे पर्यावरण के विभिन्न प्रदूषकों को नष्ट करने का कार्य भी करती है। अनेक घातक एवं हानिकारक जीवाणुओजोन के प्रभाव से नष्ट होते रहते हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि पर्यावरण-प्रदूषण को रोकने में ओजोन परत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। **

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण का जन-स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप श्वसन तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि प्रदूषण भी तन्त्रिका-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्बन्धी विकारों को जन्म देता है। पर्यावरण-प्रदूषण को व्यक्ति के स्वभाव एवं व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यही नहीं निरन्तर प्रदूषित पर्यावरण में रहने से व्यक्ति की औसत आयु घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न ही रहता है।

प्रश्न 5
व्यक्ति की कार्यक्षमता पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण का व्यक्ति की कार्यक्षमता पर अनिवार्य रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होती है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति ने तो अपने कार्य को ही कुशलतापूर्वक कर सकता है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता ही सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो, तो भी उसकी चुस्ती एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त सिद्ध होता है।

प्रश्न 6
आर्थिक जीवन पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर पर्यावरण-प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में यदि व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण प्रदूषण के कारण व्यक्ति अथवा उसके परिवार के सदस्य रोग ग्रस्त हो जाते हैं। इस स्थिति में रोग के उपचार के लिए भी पर्याप्त धन खर्च करना पड़ जाता है। इससे व्यक्ति एवं परिवार का आर्थिक बजट बिगड़ जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है।

प्रश्न 7
जल प्रदूषण के किन्हीं दो कारकों की व्याख्या कीजिए। [2016]
उत्तर
जल प्रदूषण के दो कारक निम्नलिखित हैं
1. घरों से बहकर निकलने वाला फिनायल, साबुन, सर्फ एवं शैम्पू आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों व झीलों के जल में मिलकर उसे दूषित कर देता है।
2. नदियों व झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, मनुष्यों द्वारा स्नान करना व साबुन से गन्दे वस्त्र धोने से भी जल प्रदूषित होता है।

निश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘पर्यावरण की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर
“पर्यावरण वह सब कुछ है जो किसी जीव अथवा वस्तु को चारों ओर से घेरे होता है और उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।”
-जिसबर्ट

प्रश्न 2
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर
पर्यावरण में किसी भी प्रकार की हानिकारक अशुद्धियों का समावेश होना ही पर्यावरण-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 3
पर्यावरण-प्रदूषण के चार मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. औद्योगीकरण
  2. नगरीकरण
  3. ईंधन से चलने वाले वाहन तथा
  4. वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई।

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूपों या प्रकारों का उल्लेख कीजिए- [2014]
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूप या प्रकार हैं-

  1. वायु-प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण।

प्रश्न 5
साँस की तकलीफ किस प्रकार के प्रदूषण से होती है? [2012, 16]
उत्तर
साँस की तकलीफ मुख्य रूप से वायु-प्रदूषण के कारण होती है।

प्रश्न 6
कारखानों की चिमनियों से धुआँ उगलने पर किस प्रकार का प्रदूषण होता है?
उत्तर
कारखानों की चिमनियों से धुआँ उगलने पर होने वाला प्रदूषण है- वायु-प्रदूषण।

प्रश्न 7
प्रदूषण की समस्या किस शिक्षा के माध्यम से दूर की जा सकती है ? [2014]
उत्तर
प्रदूषण की समस्या पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से दूर की जा सकती है।

प्रश्न 8
आधुनिक वैज्ञानिक युग में विश्व की सबसे गम्भीर समस्या क्या है ? [2011]
उत्तर
आधुनिक वैज्ञानिक युग में विश्व की सबसे गम्भीर समस्या है पर्यावरण प्रदूषण की समस्या।

प्रश्न 9
ध्वनि मापन की इकाई क्या है ?
उत्तर
डेसिबल (db)।

प्रश्न 10
पर्यावरण के किस रूप का निर्माण मनुष्य ने नहीं किया ?
उत्तर
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है।

प्रश्न 11
क्या वर्तमान औद्योगिक प्रगति के युग में पर्यावरण प्रदूषण को पूर्ण रूप से समाप्त करना सम्भव है?
उत्तर
वर्तमान औद्योगिक प्रगति के युग में पर्यावरण-प्रदूषण को केवल नियन्त्रित किया जा सकता है, पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 12
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य-

  1. मनुष्य का अपने पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
  2. व्यक्ति के सामान्य जीवन पर पर्यावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  3. ईंधन से चलने वाले वाहन वायु प्रदूषण में वृद्धि करते हैं।
  4. ध्वनि-प्रदूषण से आशय है पर्यावरण में ध्वनि या शोर का बढ़ जाना।

उत्तर

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1
पर्यावरण का जनजीवन से सम्बन्ध है [2016]
(क) औपचारिक
(ख) घनिष्ठ
(ग) अनावश्यक
(घ) कोई सम्बन्ध नहीं
उत्तर
(ख) घनिष्ठ

प्रश्न 2
विश्व पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है? [2012]
(क) 26 जनवरी को
(ख) 5 जून को
(ग) 4 जुलाई को
(घ) 11 जुलाई को
उत्तर
(ख) 5 जून को

प्रश्न 3
वर्तमान औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्रों की मुख्य समस्या है या आधुनिक वैज्ञानिक युग में विश्व की गम्भीर समस्या है [2008]
(क) निर्धनता की समस्या
(ख) बेरोजगारी की समस्या
(ग) भिक्षावृत्ति की समस्या
(घ) पर्यावरण प्रदूषण की समस्या
उत्तर
(घ) पर्यावरण प्रदूषण की समस्या

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण की दर में होने वाली वृद्धि के लिए जिम्मेदार है
(क) फैशन की होड़
(ख) औद्योगीकरण
(ग) संस्कृतिकरण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) औद्योगीकरण

प्रश्न 5
पर्यावरण-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है
(क) जन-स्वास्थ्य पर।
(ख) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर
(ग) आर्थिक जीवन पर
(घ) इन सभी पर
उत्तर
(घ) इन सभी पर

प्रश्न 6
प्रदूषण की समस्या का मुकाबला करने के लिए जो सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है, वह है [2007, 11]
या
प्रदूषण की समस्या दूर करने के लिए सबसे उपयोगी है। [2016]
(क) सामान्य शिक्षा
(ख) पर्यावरण-शिक्षा
(ग) तकनीकी शिक्षा.
(घ) स्वास्थ्य शिक्षा
उत्तर
(ख) पर्यावरण-शिक्षा

प्रश्न 7
हमारे देश में पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम कब पारित किया गया?
(क) 1966 में
(ख) 1976 में
(ग) 1986 में
(घ) 1996 में
उत्तर
(ग) 1986 में

प्रश्न 8
भारत में पर्यावरण विभाग की स्थापना कब की गई? [2008]
(क) 1 नवम्बर, 1980
(ख) 1 नवम्बर, 1880
(ग) 1 नवम्बर, 1990
(घ) 1 नवम्बर, 1986
उतर
(घ) 1 नवम्बर, 1986

प्रश्न 9
विश्व वन्य जीव कोष की स्थापना हुई [2009]
(क) 1962 ई० में
(ख) 1965 ई० में
(ग) 1972 ई० में
(घ) 1975 ई० में
उत्तर
(क) 1962 ई० में

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 13 Problem of Expansion of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 13
Chapter Name Problem of Expansion of Education
(शिक्षा के प्रसार की समस्या)
Number of Questions Solved 24
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 13 Problem of Expansion of Education (शिक्षा के प्रसार की समस्या)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा के प्रसार के एक महत्त्वपूर्ण उपाय के रूप में दूरगामी शिक्षा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए। साथ ही दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था के उद्देश्य व विशेषताओं का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर :
दूरगामी शिक्षा-शिक्षा के प्रसार का एक उपाय
यह सत्य है कि गत कुछ दशाब्दियों से हमारे देश में शिक्षा के प्रसार की दर सराहनीय रही है, परन्तु आज भी देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग विभिन्न कारणों से शिक्षा प्राप्त करने से वंचित ही है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के प्रसार के लिए विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं। इन प्रयासों में ही एक प्रभावकारी प्रयास है-दूरगामी शिक्षा (Distance Education) की व्यवस्था। दूरगामी शिक्षा के अर्थ, उद्देश्य तथा महत्त्व आदि का सामान्य परिचय निम्नलिखित है।

दूरगामी शिक्षा का अर्थ
सामान्य शिक्षाप्रत्यक्ष-शिक्षा होती है, जिसके अन्तर्गत शिक्षक तथा शिक्षार्थी आमने-सामने बैठकर शिक्षा की प्रक्रिया को सम्पन्न करते हैं। दूरगामी शिक्षा आमने-सामने की प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं है। दूरगामी शिक्षा वह शिक्षा है जिसके अन्तर्गत देश के किसी भी भाग में रहने वाले और किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक शिक्षार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त अवसर प्राप्त हो जाती है। इस शिक्षा-प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के सम्प्रेषण-साधनों का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाता है तथा खुले अधिगम की परिस्थितियों के सृजन को प्राथमिकता दी जाती है।

दूरगामी शिक्षा के अर्थ एवं प्रक्रिया को प्रो० होमबर्ग ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “दूरगामी शिक्षा की प्रक्रिया में छात्रों की शिक्षण संस्थानों में जाकर शिक्षकों के सामने कक्ष में बैठकर व्याख्यान सुनने की आवश्यकता नहीं है और न ही शिक्षण संगठनों की शिक्षा-व्यवस्था के समान नियमित रूप से सम्मिलित होना पड़ता है अपितु दूरगामी शिक्षा में खुले अधिगम को सम्प्रेषण माध्यमों अथवा शिक्षा तकनीकी द्वारा सम्पादित किया जाता है।” शिक्षक का व्याख्यान छात्रों के घरों तक सम्प्रेषण माध्यमों द्वारा पहुँचाया जाता है।

दूरदर्शन की सहायता से शिक्षक ही छात्रों के पास पहुँचकर शिक्षण-प्रदान करता है। इसके अन्तर्गत शिक्षक-शिक्षार्थी के अन्त:क्रिया एकपक्षीय ही होती है। दूरगामी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य खुले अधिगम के लिए परिस्थिति उत्पन्न करना है। इस कथन द्वारा स्पष्ट है कि दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था, शिक्षा ग्रहण करने की एक सुविधाजनक व्यवस्था है तथा निश्चित रूप से शिक्षा के प्रसार में सहायक है। हमारे देश में शिक्षा के प्रसार की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तथा दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को सफल बनाने के लिए सन् 1979 ई० में राष्ट्रीय ओपन स्कूल की स्थापना की गई थी। इससे शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान प्राप्त हुआ है।

दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था के उद्देश्य
विश्व के प्रायः सभी देशों में दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को लागू किया जा रहा है। दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को लागू करने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य समाज के उन व्यक्तियों को शिक्षा ग्रहण करने के अवसर सुलभ करना है जो किन्हीं कारणों से पहले उपयुक्त शिक्षा प्राप्त न कर पाये हों।
  2. उच्च शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराना।
  3. किसी भी व्यवसाय में संलग्न व्यक्तियों को उनकी रुचि तथा आवश्यकता के अनुसार शिक्षा अर्जित करने का अवसर उपलब्ध कराना।
  4. सीखने तथा ज्ञान प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों के ज्ञान में अधिक – से – अधिक विस्तार करना।
  5. किसी भी शिक्षार्थी को उसकी रुचि के अनुरूप नूतन ज्ञान उपलब्ध कराना।
  6. समाज के पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को समाज का उपयोगी एवं योग्य नागरिक बनने में सहायता प्रदान करना।
  7. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था का एक अन्य उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को उन भाषाओं और विषयों में दक्षता प्राप्त करने का अवसर प्रदान करना है, जिनमें नियमित संस्थागत शिक्षा के अन्तर्गत उत्पन्न होने वाली समस्याओं के कारण दक्षता प्राप्त करने का अवसर प्राप्त न हो सकता हो।

दूरगामी शिक्षा की विशेषताएँ
दूरगामी शिक्षा – व्यवस्था के अर्थ एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इस शिक्षा-व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है

  1. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को व्यावहारिक रूप में लागू करने में दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा अन्य जन-संचार माध्यमों को इस्तेमाल करने पर विशेष बल दिया जाता है।
  2. इस शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत सम्प्रेषण के माध्यमों तथा अधिगम की प्रक्रिया में आपसी समन्वय स्थापित करके विभिन्न शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।
  3. इस शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से वांछित अधिगम स्वरूपों के लिए विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं।
  4. इस शिक्षा-व्यवस्था में शैक्षिक नियोजन, मूल्यांकन तथा अधिगम सम्बन्धी परिस्थितियों की व्यवस्था प्रणाली उपागम के आधार पर की जाती है।
  5. इस शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ निर्धारित बहुमाध्यमों की सहायता से शिक्षक ही शिक्षार्थियों से सम्पर्क स्थापित करता है।
  6. इस शैक्षिक व्यवस्था के अन्र्तगत खुले अधिगम की परिस्थितियाँ विकसित की जाती हैं तथा शिक्षार्थियों को स्वतन्त्रतापूर्वक अध्ययन की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है।
  7. इस शैक्षिक व्यवस्था के माध्यम से शिक्षक की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया जाता है।
  8. दूरगामी शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत खुले विद्यालय, खुले विश्वविद्यालय तथा पत्राचार प्रणाली आदि को अपनाया जाता है तथा उन्हें अधिक उपयोगी बनाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
दूरगामी शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
विभिन्न दृष्टिकोणों से दूरगामी शिक्षा को आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दूरगामी शिक्षा निम्नलिखित रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

  1. दूरगामी शिक्षा की समुचित व्यवस्था देश में शिक्षा के अधिक-से-अधिक प्रसार में सहायक सिद्ध हो रही है।
  2. शिक्षा के क्षेत्र में नवीन प्रवर्तनों को प्रयुक्त करने में भी दूरगामी शिक्षा सहायक सिद्ध होती है।
  3. देश की जनसंख्या की वृद्धि तथा शिक्षा के प्रति बढ़ते रुझान के परिणामस्वरूप देश में विद्यमान औपचारिक शिक्षण संस्थाओं ( विद्यालय तथा कॉलेज आदि ) के प्रवेश के इच्छुक छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में छात्रों के प्रवेश की गम्भीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इस समस्या का मुकाबला करने में भी दूरगामी शिक्षा से विश्लेष सहायता प्राप्त हो रही है।
  4. छात्रों में विद्यमान वैयक्तिक भिन्नता से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में भी दूरगामी शिक्षा से विशेष सहायता मिलती है।
  5. दूरगामी शिक्षा का एक मुख्य महत्त्व एवं लाभ उन व्यक्तियों के लिए है जो किसी निजी कार्य या व्यवसाय में संलग्न हैं। दूरगामी शिक्षा की सुविधा उपलब्ध होने पर ऐसे व्यक्ति भी अपनी इच्छानुसार शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। इस व्यवस्था से शिक्षा के प्रसार में भी वृद्धि होती है।
  6. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था उने व्यक्तियों के लिए भी लाभदायक तथा महत्त्वपूर्ण है जो अपनी शैक्षिक योग्यता को बढ़ाने के इच्छुक होते हैं।
  7. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करना विशेष रूप से सरल तथा सुविधाजनक है क्योंकि इस व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षार्थी को उसके अपने स्थान पर ही शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध होते हैं। शिक्षार्थी को आने-जाने तथा यातायात की असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ता।
  8. दूरगामी शिक्षा की सुचारु व्यवस्था से लोगों में विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक योग्यताओं, क्षमताओं तथा गुणों के विकास में विशेष सहायता प्राप्त होती है।
  9. दूरगामी शिक्षा की व्यवस्था सुलभ हो जाने से समाज के अनेक व्यक्तियों को आत्म-विकास के अवसर उपलब्ध हुए हैं।
  10. दूरगामी शिक्षा का एक उल्लेखनीय महत्त्व एवं लाभ यह है कि इस व्यवस्था ने शिक्षा के जनतन्त्रीकरण में विशेष योगदान दिया है अर्थात् इस शिक्षा ने सभी को शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 2
शिक्षा के प्रसार के लिए राज्य द्वारा क्या-क्या प्रयास किये जा रहे हैं?
उत्तर :
देश की बहुपक्षीय प्रगति के लिए शिक्षा का अधिक-से-अधिक प्रसार होना अति आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रख़ते हुए राज्य द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं। कि राज्य द्वारा शिक्षा के महत्त्व एवं आवश्यकता से सम्बन्धित व्यापक प्रचार किया जा रहा है। जन-संचार के सभी माध्यमों द्वारा साक्षरता एवं शिक्षा के महत्त्व का व्यापक प्रचार किया जा रहा है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अलग से ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ की स्थापना की गयी है। शिक्षा के व्यापक प्रसार के लिए भारतीय संविधान में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया।

शिक्षा के प्रसार के लिए राज्य द्वारा ग्रामीण एवं दूर-दराज के क्षेत्रों में शिक्षण-संस्थाएँ स्थापित की जा रही हैं। शिक्षा के प्रति बच्चों को आकृष्ट करने के लिए उन्हें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन एवं सुविधाएँ भी प्रदान की जा रही हैं; जैसे कि दिन का भोजन देना, मुफ्त पुस्तकें एवं वर्दी देना तथा विभिन्न छात्रवृत्तियाँ प्रदान करना। राज्य द्वारा अनुसूचित एवं पिछ्ड़ी जातियों के बालक-बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास किये जा रहे हैं। तकनीकी शिक्षा के प्रसार के क्षेत्र में भी राज्य द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। समय – समय पर राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार द्वारा शिक्षा के प्रसार के लिए व्यापक अभियान चलाये जा रहे है; जैसे कि ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड तथा ‘चलो स्कूल चलें’ आदि।

प्रश्न 3
शैक्षिक स्तर के उन्नयन व सुधार के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? [2007, 08, 10, 11]
उत्तर :
शैक्षिक स्तर के उन्नयन व सुधार के उपाय
भारत में शिक्षा के स्तर; विशेष रूप से प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने व उसमें सुधार लाने के लिए अग्रलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं

  1. पूर्व-प्राथमिक व प्राथमिक कक्षाओं से ही शिक्षा के स्तर में सुधार के प्रयत्न किए जाएँ। अगर इस स्तर पर शिक्षार्थी अनुशासित हो जाए और शिक्षा के महत्व को समझ ले तो अगले स्तरों पर शिक्षा का स्तर अपने आप ही अच्छा हो जाएगा।
  2. शिक्षा की दिशा एवं व्यवस्था पहले से ही निश्चित की जाए।
  3. पाठ्यक्रम सुसंगठित एवं छात्र/छात्राओं के लिए उपयोगी हो।
  4. विद्यालयों में छात्रों की बढ़ती हुई संख्या पर नियन्त्रण रखा जाए तथा आवश्यकतानुसार नए विद्यालय खोले जाएँ।
  5. अध्यापकों को उचित वेतन तथा सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। उनकी सभी उचित माँगों पर सहानुभूति से विचार किया जाना चाहिए।
  6. परीक्षा या मूल्यांकन प्रणाली में सुधार हो। प्रश्न-पत्रों में वस्तुनिष्ठ ढंग के प्रश्न सम्मिलित किए जाएँ, विद्यालय में ही परीक्षा ली जाए तथा शिक्षार्थियों के सामूहिक अभिलेख रखे जाएँ।
  7. पर्याप्त संख्या में निर्देशन एवं परामर्श केन्द्र खोले जाएँ, जहाँ छात्रों की योग्यता एवं अभिरुचि की जाँच हो और तदनुकूल उन्हें शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाए।
  8. समाज के लोगों तथा छात्रों की धारणा शिक्षा के प्रति अच्छी हो।
  9. राज्य एवं समाज के द्वारा शिक्षा के अच्छे अवसर प्रदान किए जाएँ।
  10. समय-समय पर गोष्ठियों, सेमिनार आदि का आयोजन किया जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
शिक्षा के प्रसार से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा के प्रसार से आशय है :
देश के नागरिकों को शिक्षित होना। विकासशील देशों में शिक्षा के प्रसार की प्रक्रिया चल रही है, कहीं तेज तथा कहीं धीमी। केवल साक्षरता ही शिक्षा के प्रसार का मानदण्ड नहीं है। इससे भिन्न यदि हम कहें कि स्नातक स्तर की शिक्षा या इससे भी उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को ही शिक्षित व्यक्ति माना जाये तो यह भी उचित नहीं है। वास्तव में शिक्षित होने का मानदण्ड सापेक्ष है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि जो व्यक्ति अपनी दैनिक जीवन की सामान्य गतिविधियों, व्यावसायिक अपेक्षाओं तथा सम्बन्धित कार्यों को करने की समुचित योग्यता प्राप्त कर लेता है, उसे शिक्षित माना जा सकता है। निःसन्देह शिक्षित होने के लिए साक्षरता एक अनिवार्य शर्त है। हमारे देश में शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करना अभी शेष है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिक्षा के प्रसार की प्रक्रिया चल रही है तथा इसकी दर भी पूर्ण रूप से सन्तोषजनक नहीं है। शिक्षा के प्रसार की गति एवं दर में वृद्धि करना आवश्यक है।

प्रश्न 2
शिक्षा में अपव्यय से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा में अपव्यय शिक्षा में अपव्यय की समस्या को अर्थ यह है कि किसी भी स्तर की शिक्षा को पूर्ण करने से पूर्व ही उसे छोड़ देना। उदाहरण के लिए, प्राथमिक शिक्षा की निर्धारित अवधि 4-5 वर्ष होती है। यदि ऐसे में कोई छात्र कक्षा 2 तक ही शिक्षा ग्रहण करने पर विद्यालय छोड़ दे तो इसे शिक्षा में अपव्यय ही कहा जाएगा। इसी प्रकार स्नातक स्तर की शिक्षा के लिए, तीन वर्ष की अवधि निर्धारित है। यदि कोई छात्र/छात्रा केवल एक या दो वर्ष की शिक्षा ग्रहण करने के बाद कॉलेज को छोड़ दे तो यह भी शिक्षा में अपव्यय ही है।

अपव्यय का तात्पर्य उन छात्रों पर व्यय किए हुए समय, धन एवं शक्ति से है जो किसी स्तर की शिक्षा पूर्ण किए बगैर अपना अध्ययन समाप्त कर देते हैं। शिक्षा में अपव्यय की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप शिक्षा के प्रसार की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमारे देश में शिक्षा के प्रायः सभी स्तरों पर अपव्यय की समस्या देखी जा सकती है। विभिन्न कारणों से अधूरी शिक्षा छोड़ देने की प्रवृत्ति लड़कों की तुलना में लड़कियों में अधिक पायी जाती है। यह प्रवृत्ति नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक पायी जाती है।

प्रश्न 3
शिक्षा के अवरोधन के कारण बताइए।
उत्तर :
शिक्षा के अवरोधन के कारण निम्नलिखित हैं

  1. दोषपूर्ण शिक्षण विधि एवं परीक्षा प्रणाली का होना।
  2. विद्यालयों में छात्रों का नियमित उपस्थित न होना।
  3. कक्षा में संख्या से अधिक छात्रों का होना।
  4. रुचि के अनुरूप विषयों का न होना।
  5. अनुपयुक्त पाठ्यक्रम होना।
  6. विद्यालयी व्यवस्था का ठीक न होना।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
हमारे देश में शिक्षा के प्रसार की दर किस काल में सर्वाधिक हुई है?
उत्तर :
हमारे देश में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त के काल में शिक्षा के प्रसार की दर सर्वाधिक हुई

प्रश्न 2
वर्तमान भारत में शिक्षा-प्रसार का स्वरूप गुणात्मक/परिमाणात्मक है। [2015]
उत्तर :
वर्तमान भारत में शिक्षा-प्रसार का स्वरूप परिमाणात्मक है।

प्रश्न 3
शिक्षा के असन्तोषजनक प्रसार के लिए जिम्मेदार दो मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
शिक्षा के असन्तोषजनक प्रसार के लिए दो मुख्य कारण जिम्मेदार हैं

  1. शिक्षा में अपव्यय तथा
  2. शिक्षा में अवरोधन।

प्रश्न 4
शिक्षा में अपव्यय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
शिक्षा में अपव्यय का तात्पर्य उन छात्रों पर व्यय किए हुए समय, धन एवं शक्ति से है जो किसी स्तर की शिक्षा पूर्ण किये बिना अपना अध्ययन समाप्त कर देते हैं?

प्रश्न 5
शिक्षा में अवरोधन से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा में अवरोधन का अर्थ है-छात्र को शिक्षा के क्षेत्र में नियमित रूप से प्रगति न करना अर्थात् निर्धारित अवधि में किसी कक्षा में परीक्षा पास करके अगली कक्षा में न पहुँच पाना।

प्रश्न 6
प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में प्रमुख बाधा दोषपूर्ण शिक्षा प्रशासन/धन की प्रचुरता है। [2015]
उत्तर :
प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में प्रमुख बाधा दोषपूर्ण शिक्षा-प्रशासन है।

प्रश्न 7
राष्ट्रीय ओपन स्कूल की स्थापना कब की गयी थी? [2009]
उत्तर :
राष्ट्रीय ओपन स्कूल की स्थापना सन् 1979 में की गयी थी।

प्रश्न 8
‘दूरगामी शिक्षा से क्या आशय है?
उत्तर :
दूरगामी शिक्षा वह शिक्षा है जिसके अन्तर्गत देश के किसी भी भाग में रहने वाले और किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक शिक्षार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त अवसर प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 9
शिक्षा के महत्त्व के व्यापक प्रचार के लिए सरकार द्वारा किये गये एक प्रयास का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ की स्थापना।

प्रश्न 10
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस कब मनाया जाता है? [2015, 16]
उत्तर :
भारत में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस 11 नवम्बर को मनाया जाता है।

प्रश्न 11
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन किस आयु-वर्ग के निरक्षरों के लिए चलाया गया? [2016]
उत्तर :
15 से 35 वर्ष के निरक्षरों के लिए।

प्रश्न 12
भारतीय संविधान में शिक्षा के प्रसार के लिए क्या मुख्य प्रावधान किया गया है?
या
भारतीय संविधान की धारा – 45 में शिक्षा सम्बन्धी किस तथ्य का उल्लेख है? [2012, 14]
उत्तर :
भारतीय संविधान में शिक्षा के प्रसार के लिए 6 से 14 वर्ष के बालकों के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 13
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. हमारे देश में निरन्तर शिक्षा का प्रसार हो रहा है।
  2. राज्य सरकार द्वारा बालिका शिक्षा को अधिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
शिक्षा के प्रसार को विशेष महत्त्व दिया गया है-
(क) मध्य काल में
(ख) ब्रिटिश शासनकाल में
(ग) स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त काल में
(घ) प्रत्येक काल में
उत्तर :
(ग) स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त काल में

प्रश्न 2
शिक्षा के क्षेत्र में अपव्यय की समस्या का कारण है
(क) सामान्य निर्धनता
(ख) शीघ्र जीविकोपार्जन की आवश्यकता
(ग) शिक्षा के पाठ्यक्रम का उपयुक्त न होना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3
शिक्षा के प्रसार के लिए ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड आरम्भ हुआ था
(क) सन् 1987-88 में
(ख) सन् 1988-89 में
(ग) सन् 1990-91 में
(घ) सन् 1991-92 में
उत्तर :
(ग) सन् 1990-91 में

प्रश्न 4
भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना हुई (2014)
(क) सन् 1948 में
(ख) सन् 1953 में
(ग) सन् 1966 में
(घ) सन् 1986-88 में
उत्तर :
(घ) सन् 1986-88 में

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अलंकार

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name अलंकार
Number of Questions 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अलंकार

काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को अलंकार कहते हैं-काव्यशोभाकरान् धर्मानलङ्कारान् प्रचक्षते। अलंकार Alankar के दो भेद होते हैं—(क) शब्दालंकार तथा (ख) अर्थालंकार।

जहाँ काव्य की शोभा का कारण शब्द है, वहाँ शब्दालंकार और जहाँ शोभा का कारण उसका अर्थ है, वहाँ अर्थालंकार होता है। जहाँ काव्य में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार एक साथ विद्यमान हो, वहाँ ‘उभयालंकार’ (उभय = दोनों) होता है। | काव्य में स्थान-मनुष्य स्वभाव से ही सौन्दर्य-प्रेमी है। वह अपनी प्रत्येक वस्तु को सुन्दर और सुसज्जित देखना चाहता है। अपनी बात को भी वह इस प्रकार कहना चाहता है कि जिससे सुनने वाले पर स्थायी प्रभाव पड़े। वह अपने विचारों को इस रीति से व्यक्त करना चाहता है कि श्रोता चमत्कृत हो जाए। इसके साधन हैं उपर्युक्त दोनों अलंकार। शब्द और अर्थ द्वारा काव्य की शोभा-वृद्धि करने वाले इन अलंकारों का काव्य में वही स्थान है, जो मनुष्य (विशेष रूप से नारी) शरीर में आभूषणों का।।

शब्दालंकार और अर्थालंकार में अन्तर-शब्दालंकार में यदि काव्य में चमत्कार उत्पन्न करने वाले शब्द-विशेष को बदल दिया जाए तो अलंकार समाप्त हो जाता है, किन्तु अर्थालंकार में यदि काव्य में चमत्कार उत्पन्न करने वाले शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची दूसरा शब्द रख दिया जाए तो भी अलंकार बना रहता है; जैसे-‘कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय’ में कनक शब्द की सार्थक आवृत्ति के कारण यमक अलंकार है। पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘स्वर्ण’ और दूसरे का ‘ धतूरा’ है। यदि ‘कनक’ के स्थान पर उसका कोई पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए तो यह अलंकार समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार अलंकार शब्द-विशेष पर निर्भर होने से यहाँ शब्दालंकार है।

अर्थालंकार में शब्द का नहीं, अर्थ का महत्त्व होता है; जैसे—सुना यह मनु ने मधु गुंजार, मधुकरी का-सा जब सानन्द।

इसमें ‘मधुकरी का-सा’ में उपमा अलंकार है। यदि ‘मधुकरी’ के स्थान पर उसका ‘भ्रमरी’ या अन्य कोई पर्याय रख दिया जाए तो भी यह अलंकार बना रहेगा; क्योंकि यहाँ अलंकार अर्थ पर आश्रित है, शब्द पर नहीं। यही अर्थालंकार की विशेषता है।

प्रश्न 1
शब्दालंकार से आप क्या समझते हैं ? इसके भेदों का उदाहरणसहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
शब्दालंकार और उसके भेद जहाँ काव्य की शोभा का कारण शब्द होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। इसके निम्नलिखित भेद होते हैं-

1. अनुप्रास [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)—बार-बार एक ही वर्ण की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं; जैसे-
तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।( काव्यांजलि: यमुना-छवि) स्पष्टीकरण-यहाँ पर ‘त’ वर्ण की आवृत्ति हुई है। अत: अनुप्रास अलंकार है।
भेद-अनुप्रास के पाँच भेद हैं–(1) छेकानुप्रास, (2) वृत्यनुप्रास, (3) श्रुत्यनुप्रास, (4) लाटानुप्रास और (5) अन्त्यानुप्रास।
(1) छेकानुप्रास–जहाँ एक वर्ण की आवृत्ति एक बार होती है अर्थात् एक वर्ण दो बार आता है, वहाँ छेकानुप्रास होता है; जैसे-इस करुणा-कलित हृदय में, अब विकल रागिनी बजती। (काव्यांजलि: आँसू)
स्पष्टीकरण-उपर्युक्त पंक्ति में ‘क’ की एक बार आवृत्ति हुई है। अत: छेकानुप्रास है।

(2) वृत्यनुप्रास–जहाँ एक अथवा अनेक वर्षों की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है; जैसे-

चारु चन्द्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल थल में ।।

स्पष्टीकरण–यहाँ ‘च’ और ‘ल’ दो से अधिक बार (तीन बार) आया है। अत: वृत्यनुप्रास है।
छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास में अन्तर–एक वर्ण की एक बार आवृत्ति होने पर छेकानुप्रास होता है, जब कि वृत्यनुप्रास में एक अथवा अनेक वर्षों की दो अथवा दो से अधिक बार आवृत्ति होती है; जैसे–‘हे जग- जीवन के कर्णधार!’ में ‘ज’ वर्ण की एक बार आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है और ‘फैल फूले जल में फेनिल’ में ‘फ’ वर्ण की दो बार तथा ‘ल’ वर्ण की तीन बार आवृत्ति होने से वृत्यनुप्रास है।

(3) श्रुत्यनुप्रास-जहाँ कण्ठ, तालु आदि एक ही स्थान से उच्चरित वर्गों की आवृत्ति हो, वहाँ श्रुत्यनुप्रास होता है; जैसे—
रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं । (काव्यांजलि: विनयपत्रिका)
स्पष्टीकरण–इस पंक्ति में ‘स्’ और ‘न्’ जैसे दन्त्य वर्णो (अर्थात् जिह्वा द्वारा दन्तपंक्ति के स्पर्श से उच्चरित वर्षों) की आवृत्ति के कारण श्रुत्यनुप्रास है।
(4) लाटानुप्रास–जहाँ एक ही अर्थ वाले शब्दों की आवृत्ति होती है, किन्तु अन्वय की भिन्नता से अर्थ बदल जाता है, वहाँ लाटानुप्रास होता है; जैसे-

पूत सपूत तो क्यों धन संचै ?
पूत कपूत तो क्यों धन संचै ?

स्पष्टीकरण–यहाँ उन्हीं शब्दों की आवृत्ति होने पर भी पहली पंक्ति के शब्दों का अन्वय ‘सपूत’ के साथ और दूसरी का ‘कपूत के साथ लगता है, जिससे अर्थ बदल जाता है। (पद्य का भाव यह है कि यदि तुम्हारा पुत्र सुपुत्र है तो धन-संचय की आवश्यकता नहीं; क्योंकि वह स्वयं कमाकर धन का ढेर लगा देगा। यदि वह कुपुत्र है तो भी धन-संचय निरर्थक है; क्योंकि वह सारा धन व्यसनों में उड़ा देगा।) इस प्रकार यहाँ लाटानुप्रास है।।
(5) अन्त्यानुप्रास-यह अलंकार केवल तुकान्त छन्दों में ही होता है। जहाँ कविता के पद या अन्तिम चरण में समान वर्ण आने से तुक मिलती है, वहाँ अन्त्यानुप्रास होता है; जैसे-

बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाई।
सौंह करै भौहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ ॥( काव्यांजलि: भक्ति एवं श्रृंगार)

स्पष्टीकरण-यहाँ दोनों पंक्तियों के अन्त में ‘आइ’ की आवृत्ति से अन्त्यानुप्रास है।

2. यमक [2010, 11, 12, 13, 14, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जब कोई शब्द या शब्दांश अनेक बार आता है और प्रत्येक बार भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट करता है, तब यमक अलंकार होता है; जैसे-

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है और दोनों बार उसके भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘धतूरा है और दूसरे का ‘सोना’। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
भेद-यमक अलंकार के दो मुख्य भेद होते हैं—
(1) अभंगपद यमक–जहाँ दो पूर्ण शब्दों की समानता हो। इसमें शब्द पूर्ण होने के कारण दोनों शब्द सार्थक होते हैं; जैसे-‘कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।’
(2) सभंगपद यमक–यहाँ शब्दों को भंग करके (तोड़कर) अक्षर-समूह की समता बनती है। इसमें एक या दोनों अक्षर समूह निरर्थक होते हैं; जैसे-

पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के ।। (काव्यांजलिः छत्रसाल प्रशस्ति)

3. श्लेष [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)–-जब एक ही शब्द बिना आवृत्ति के दो या दो से अधिक अर्थ प्रकट करे, तब श्लेष अलंकार होता है; जैसे-

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गैंभीर।
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘वृषभानुजा’ तथा ‘हलधर’ शब्दों के दो-दो अर्थ हैं-
वृषभानुजा = वृषभानु + जा = वृषभानु की पुत्री (राधा)।
वृषभ + अनुजा = बैल की बहन (गाय)।
हलधर = (1) बलराम, (2) बैल। इस प्रकार यहाँ ‘वृषभानुजा’ में श्लेष अलंकार है।
यमक और श्लेष में अन्तर-जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आकर भिन्न-भिन्न अर्थ देता है तो यमक कहलाता है और जब एक शब्द बिना आवृत्ति के ही कई अर्थ देता है तो श्लेष कहलाता है। यमक में एक शब्द की आवृत्ति होती है और श्लेष में बिना आवृत्ति के ही शब्द एकाधिक अर्थ देता है।

प्रश्न 2
अर्थालंकार किसे कहते हैं ? इसके भेदों का उदाहरणसहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
अर्थालंकार और उसके भेद जहाँ काव्य की शोभा का कारण अर्थ होता है; वहाँ अर्थालंकार होता है। इसके निम्नलिखित भेद होते हैं-

1. उपमा [2010, 11, 12, 13, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)—उपमेय और उपमान के समान धर्मकथन को उपमा अलंकार कहते हैं; जैसे
(1) मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
(2) तापसबाला-सी गंगा कले।
उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं-
(1) उपमेय–जिसके लिए उपमा दी जाती है; जैसे-उपर्युक्त उदाहरणों में मुख, गंगा ।।
(2) उपमान-उपमेय की जिसके साथ तुलना (उपमा) की जाती है; जैसे-चन्द्रमा, तापसबाला।
(3) साधारण धर्म-जिस गुण या विषय में उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है; जैसे–सुन्दर (सुन्दरता), कलता (सुहावनी)।।
(4) वाचक शब्द–जिस शब्द के द्वारा उपमेय और उपमान की समानता व्यक्त की जाती है; जैसे—समान, सी, तुल्य, सदृश, इव, सरिस, जिमि, जैसा आदि।
ये चारों अंग जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ पूर्णोपमालंकार होता है; जैसा उपर्युक्त उदाहरणों में है।
भेद-उपमा अलंकार के चार भेद होते हैं—(क) पूर्णोपमा, (ख) लुप्तोपमा, (ग) रसनोपमा और (घ) मालोपमा।
(क) पूर्णोपमा-[ संकेत-ऊपर बताया जा चुका है।

(ख) लुप्तोपमा–जहाँ उपमा के चारों अंगों (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द) में से किसी एक, दो या तीन अंगों का लोप होता है, वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है। लुप्तोपमा अलंकार निम्नलिखित चार प्रकार का होता है-

  1. धर्म-लुप्तोपमा–जिसमें साधारण धर्म का लोप हो; जैसे-तापसबाला-सी गंगा ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ धर्म-लुप्तोपमा है; क्योंकि यहाँ ‘सुन्दरता रूपी गुण का लोप है।
  2. उपमान-लुप्तोपमा–जिसमें उपमान का लोप हो; जैसे-
    जिहिं तुलना तोहिं दीजिए, सुवरन सौरभ माहिं।।
    कुसुम तिलक चम्पक अहो, हौं नहिं जानौं ताहिं ॥
    सुन्दर वर्ण और सुगन्ध में तेरी तुलना किस पदार्थ से की जाए, उसे मैं नहीं जानता; क्योंकि तिलक, चम्पा आदि पुष्प तेरे समकक्ष नहीं ठहरते।।
    स्पष्टीकरण–यहाँ उपमान लुप्त है; क्योंकि जिससे तुलना की जाए, वह उपमान ज्ञात नहीं है।
  3. उपमेय-लुप्तोपमा–जिसमें उपमेय का लोप हो; जैसे–
    कल्पलता-सी अतिशय कोमल ।।
    स्पष्टीकरण-यहाँ उपमेय-लुप्तोपमा है; क्योंकि कौन है कल्पलता-सी कोमल-यह नहीं बताया गया है।।
  4. वाचक-लुप्तोपमा–जिसमें वाचक शब्द का लोप हो; जैसे-
    नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज-नयन ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ वाचक शब्द ‘समान’ या उसके पर्यायवाची अन्य किसी शब्द का लोप है; अत: इसमें वाचक-लुप्तोपमा अलंकार है।

(ग) रसनोपमा–रसनोपमा अलंकार में उपमेय और उपमान एक-दूसरे से उसी प्रकार जुड़े रहते हैं, जिस प्रकार किसी श्रृंखला की एक कड़ी दूसरी कड़ी से; जैसे-

सगुन ज्ञान सम उद्यम, उद्यम सम फल जान ।
फल समान पुनि दान है, दान सरिस सनमान ॥

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में ‘उद्यम’, ‘फल’, ‘दान’ और ‘सनमान’ उपमेय अपने उपमानों के साथ शृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किये गये हैं; अतः इसमें रसनोपमा अलंकार है।
(घ) मालोपमा–जहाँ उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) का उत्कर्ष दिखाने के लिए अनेक उपमान एकत्र किये जाएँ, वहाँ मालोपमा अलंकार होता है; जैसे-

हिरनी से मीन से, सुखंजन समान चारु ।
अमल कमल-से विलोचन तुम्हारे हैं ।।।

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में आँखों की तुलना अनेक उपमानों (हिरनी से, मीन से, सुखंजन समान, कमल से) की गयी है। अत: यहाँ पर मालोपमा अलंकार है।।

2. रूपक [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]

लक्षण (परिभाषा)–जहाँ उपमेय और उपमान में अभिन्नता प्रकट की जाए, अर्थात् उन्हें एक ही रूप में प्रकट किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-

अरुन सरोरुह कर चरन, दृग-खंजन मुख-चंद।
समै आइ सुंदरि-सरद, काहि न करति अनंद ॥

स्पष्टीकरण-इस उदाहरण में शरद् ऋतु में सुन्दरी को, कमल में हाथ-पैरों का, खंजन में आँखों का और चन्द्रमा में मुख का भेदरहित आरोप होने से रूपक अलंकार है। | भेद-रूपक अलंकार निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है ।
(i) सांगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का सर्वांग आरोप हो, वहाँ ‘सांगरूपक’ होता है; जैसे-

उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुबर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरखे लोचन-भंग ॥

स्पष्टीकरण–यहाँ रघुबर, मंच, संत, लोचन आदि उपमेयों पर बाल सूर्य, उदयगिरि, सरोज, मूंग आदि उपमानों का आरोप किया गया है; अतः यहाँ सांगरूपक है।
(ii) निरंगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप सर्वांग न हो, वहाँ निरंगरूपक होता है; जैसे–
कौन तुम संसृति-जलनिधि तीर, तरंगों से फेंकी मणि एक।
स्पष्टीकरण-इसमें संसृति (संसार) पर जलनिधि (सागर) का आरोप है, लेकिन अंगों का उल्लेख न होने से यह निरंगरूपक है।
(iii) परम्परितरूपक-जहाँ एक रूपक दूसरे रूपक पर अवलम्बित हो, वहाँ परम्परितरूपक होता है; जैसे-
बन्दी पवनकुमार खल-बन-पावक ज्ञान-घन।
स्पष्टीकरण–यहाँ पवनकुमार (उपमेय) पर अग्नि (उपमान) का आरोप इसलिए सम्भव हुआ कि खलों (दुष्टों) को घना वन (जंगल) बताया गया है; अत: एक रूपक (खल-वन) पर दूसरा रूपक (पवनकुमाररूपी पावक) निर्भर होने से यहाँ परम्परितरूपक है।
उपमा और रूपक अलंकार में अन्तर–उपमा में उपमेय और उपमान में समानता स्थापित की जाती है, किन्तु रूपक में दोनों में अभेद स्थापित किया जाता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा के समान है’ में उपमा है, किन्तु ‘मुख चन्द्रमा है’ में रूपक है।

उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार में अन्तर–जहाँ पर उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) में उपमान (उपमेय की जिसके साथ तुलना की जाती है) की सम्भावना प्रकट की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-‘मुख मानो चन्द्रमा है। जहाँ उपमेय और उपमान में ऐसा आरोप हो कि दोनों में किसी प्रकार का भेद ही न रह जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा है।

4. उत्प्रेक्षा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-

सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात ।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ पीताम्बर ओढ़े हुए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) की प्रात:कालीन सूर्य की प्रभा से सुशोभित नीलमणि पर्वत (उपमान) के रूप में सम्भावना किये जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है। ‘मनौ’ यहाँ पर वाचक शब्द है। इस अलंकार में जनु, जनहुँ, मनु, मनहुँ, मानो, इव आदि वाचक शब्द अवश्य आते हैं।
भेद-उत्प्रेक्षा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं
(क) वस्तूत्प्रेक्षा–जब उपमेय (प्रस्तुत वस्तु) में उपमान (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना व्यक्त की जाती है, तब वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

वहीं शुभ्र सरिता के तट पर, कुटिया का कंकाल खड़ा है।
मानो बाँसों में घुन बनकर शत शत हाहाकार खड़ा है।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर घुन (प्रस्तुत वस्तु) में हाहाकार (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना की गयी है। अत: वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।
(ख) हेतूत्प्रेक्षा–जहाँ पर काव्य में अहेतु में हेतु की सम्भावना व्यक्त की जाती है, वहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार होता है–

विनय शुक-नासा का धर ध्यान
बन गये पुष्प पलास अराल।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर ढाक के फूलों का वक्र आकार होना स्वाभाविक है। नायिका की नुकीली नाक की उससे सम्भावना की जाए यह हेतु नहीं है; परन्तु यहाँ उसे हेतु माना गया है, अतएव अहेतु की सम्भावना होने से हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।।

(ग) फलोत्प्रेक्षा–जब अफल में फल की सम्भावना की जाए वहाँ पर फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

नित्य ही नहाती क्षर सिन्धु में कलाधर है
सुन्दरि ! तवानन की समता की इच्छा से ।

यहाँ पर चन्द्रमा का प्रतिदिन क्षीरसागर में स्नान करने का उद्देश्य सुन्दरी के मुख की समता प्राप्त करने में निहित है। वास्तव में ऐसा नहीं है, परन्तु इस प्रकार की सम्भावना की गयी है। अत: यहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।।

5. भ्रान्तिमान [2009, 10, 14, 15, 16, 18] |

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ समानता के कारण भ्रमवश उपमेय में उपमान का निश्चयात्मक ज्ञान हो, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है; जैसे—रस्सी (उपमेय) को साँप (उपमान) समझ लेना।

कपि करि हृदय बिचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब ।।
जानि अशोक अँगार, सीय हरषि उठि कर गहेउ ।

स्पष्टीकरण-यहाँ सीताजी श्रीराम की हीरकजटित अँगूठी को अशोक वृक्ष द्वारा प्रदत्त अंगारा समझकर उठा लेती हैं। अँगूठी (उपमेय) में उन्हें अंगारे (उपमान) का निश्चयात्मक ज्ञान होने से यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार है।

6. सन्देह [2009, 10, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जब किसी वस्तु में उसी के समान दूसरी वस्तु का सन्देह हो जाए और कोई निश्चयात्मक ज्ञान न हो, तब सन्देह अलंकार होता है; जैसे—

परिपूरन सिन्दूर पूर कैधौं मंगल घट।
किधौं सक्र को छत्र मढ्यो मानिक मयूख पट ।।

स्पष्टीकरण-यहाँ लाल वर्ण वाले सूर्य में सिन्दूर भरे हुए घट’ तथा ‘लाल रंग वाले माणिक्य में जड़े हुए छत्र’ का सन्देह होने से सन्देह अलंकार है।
सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर–सन्देह अलंकार में उपमेय में उपमान का सन्देहमात्र होता है, निश्चयात्मक ज्ञान नहीं; जैसे-‘यह रस्सी है या साँप’। इसमें रस्सी (उपमेय) में साँप (उपमान) का सन्देह होता है, निश्चय नहीं; किन्तु भ्रान्तिमान में उपमेय में उपमान का निश्चय हो जाता है; जैसे—रस्सी को साँप समझकर कहना कि ‘यह साँप है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखिए
प्रश्न (क)
मनो चली आँगन कठिन तातें राते पाय ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा

प्रश्न (ख)
मकराकृति गोपाल के, सोहत कुंडल कान ।
धरयो मनौ हिय धर समरु, यौढ़ी लसत निसान ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा।

प्रश्न (ग)
तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये ।
उत्तर
अनुप्रास।

प्रश्न (घ)
उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग ।।
उत्तर
रूपक।

प्रश्न (इ)
घनानंद प्यारे सुजान सुनौ, यहाँ एक से दूसरो ऑक नहीं ।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ कहौ, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं ।।
उत्तर
श्लेष।

प्रश्न (च)
का पूँघट मुख मूंदहु अबला नारि ।
चंद सरग पर सोहत यहि अनुहारि ।।
उत्तर
रूपक।

प्रश्न (छ)
पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के ।।
उत्तर
यमक।

प्रश्न (ज)
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान ।
वह चितवनि औरै कछु, जिहिं बस होत सुजान ।।
उत्तर
अनुप्रास।

प्रश्न (झ)
चरण कमल बंद हरिराई ।।
उत्तर
रूपक।

प्रश्न 2
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(क) उत्प्रेक्षा और उपमा अलंकार में मूलभूत अन्तर बताइए और उत्प्रेक्षा अलंकार का एक उदाहरण अपनी पाठ्य-पुस्तक से लिखिए।
(ख) श्लेष अलंकार का लक्षण लिखकर उदाहरण दीजिए।
(ग) सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकारों में अन्तर स्पष्ट करते हुए उदाहरण दीजिए।
(घ) सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए और दोनों में से किसी एक का उदाहरण लिखिए।
(ङ) उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार में मूलभूत अन्तर स्पष्ट कीजिए और अपनी पाठ्य-पुस्तक से उत्प्रेक्षा अलंकार का एक उदाहरण लिखिए।
(च) रूपक अलंकार के भेद लिखिए और किसी एक भेद का लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
(छ) सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर बताइए। अपनी पाठ्य-पुस्तक से भ्रान्तिमान अलंकार का एक उदाहरण लिखिए।
(ज) ‘यमक’ अथवा ‘श्लेष अलंकार का लक्षण लिखिए और एक उदाहरण दीजिए।
(झ) ‘रूपक’ तथा ‘उपमा अलंकारों में मूलभूत अन्तर बताइए और दोनों में से किसी एक अलंकार का उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
(ञ) ‘उपमा’ अथवा ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार का लक्षण लिखकर एक उदाहरण दीजिए।
(ट) ‘अनुप्रास’ अथवा ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार का लक्षण लिखिए तथा उस अलंकार को एक उदाहरण दीजिए।
(ठ) ‘श्लेष’, ‘उपमा’ तथा ‘सन्देह अलंकारों में से किसी एक अलंकार की परिभाषा देते हुए उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

श्लेष [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)–-जब एक ही शब्द बिना आवृत्ति के दो या दो से अधिक अर्थ प्रकट करे, तब श्लेष अलंकार होता है; जैसे-

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गैंभीर।
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘वृषभानुजा’ तथा ‘हलधर’ शब्दों के दो-दो अर्थ हैं-
वृषभानुजा = वृषभानु + जा = वृषभानु की पुत्री (राधा)।
वृषभ + अनुजा = बैल की बहन (गाय)।
हलधर = (1) बलराम, (2) बैल। इस प्रकार यहाँ ‘वृषभानुजा’ में श्लेष अलंकार है।
यमक और श्लेष में अन्तर-जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आकर भिन्न-भिन्न अर्थ देता है तो यमक कहलाता है और जब एक शब्द बिना आवृत्ति के ही कई अर्थ देता है तो श्लेष कहलाता है। यमक में एक शब्द की आवृत्ति होती है और श्लेष में बिना आवृत्ति के ही शब्द एकाधिक अर्थ देता है।

अर्थालंकार और उसके भेद जहाँ काव्य की शोभा का कारण अर्थ होता है; वहाँ अर्थालंकार होता है। इसके निम्नलिखित भेद होते हैं-

1. उपमा [2010, 11, 12, 13, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)—उपमेय और उपमान के समान धर्मकथन को उपमा अलंकार कहते हैं; जैसे
(1) मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
(2) तापसबाला-सी गंगा कले।
उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं-
(1) उपमेय–जिसके लिए उपमा दी जाती है; जैसे-उपर्युक्त उदाहरणों में मुख, गंगा ।।
(2) उपमान-उपमेय की जिसके साथ तुलना (उपमा) की जाती है; जैसे-चन्द्रमा, तापसबाला।
(3) साधारण धर्म-जिस गुण या विषय में उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है; जैसे–सुन्दर (सुन्दरता), कलता (सुहावनी)।।
(4) वाचक शब्द–जिस शब्द के द्वारा उपमेय और उपमान की समानता व्यक्त की जाती है; जैसे—समान, सी, तुल्य, सदृश, इव, सरिस, जिमि, जैसा आदि।
ये चारों अंग जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ पूर्णोपमालंकार होता है; जैसा उपर्युक्त उदाहरणों में है।
भेद-उपमा अलंकार के चार भेद होते हैं—(क) पूर्णोपमा, (ख) लुप्तोपमा, (ग) रसनोपमा और (घ) मालोपमा।
(क) पूर्णोपमा-[ संकेत-ऊपर बताया जा चुका है।

(ख) लुप्तोपमा–जहाँ उपमा के चारों अंगों (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द) में से किसी एक, दो या तीन अंगों का लोप होता है, वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है। लुप्तोपमा अलंकार निम्नलिखित चार प्रकार का होता है-

  1. धर्म-लुप्तोपमा–जिसमें साधारण धर्म का लोप हो; जैसे-तापसबाला-सी गंगा ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ धर्म-लुप्तोपमा है; क्योंकि यहाँ ‘सुन्दरता रूपी गुण का लोप है।
  2. उपमान-लुप्तोपमा–जिसमें उपमान का लोप हो; जैसे-
    जिहिं तुलना तोहिं दीजिए, सुवरन सौरभ माहिं।।
    कुसुम तिलक चम्पक अहो, हौं नहिं जानौं ताहिं ॥
    सुन्दर वर्ण और सुगन्ध में तेरी तुलना किस पदार्थ से की जाए, उसे मैं नहीं जानता; क्योंकि तिलक, चम्पा आदि पुष्प तेरे समकक्ष नहीं ठहरते।।
    स्पष्टीकरण–यहाँ उपमान लुप्त है; क्योंकि जिससे तुलना की जाए, वह उपमान ज्ञात नहीं है।
  3. उपमेय-लुप्तोपमा–जिसमें उपमेय का लोप हो; जैसे–
    कल्पलता-सी अतिशय कोमल ।।
    स्पष्टीकरण-यहाँ उपमेय-लुप्तोपमा है; क्योंकि कौन है कल्पलता-सी कोमल-यह नहीं बताया गया है।।
  4. वाचक-लुप्तोपमा–जिसमें वाचक शब्द का लोप हो; जैसे-
    नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज-नयन ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ वाचक शब्द ‘समान’ या उसके पर्यायवाची अन्य किसी शब्द का लोप है; अत: इसमें वाचक-लुप्तोपमा अलंकार है।

(ग) रसनोपमा–रसनोपमा अलंकार में उपमेय और उपमान एक-दूसरे से उसी प्रकार जुड़े रहते हैं, जिस प्रकार किसी श्रृंखला की एक कड़ी दूसरी कड़ी से; जैसे-

सगुन ज्ञान सम उद्यम, उद्यम सम फल जान ।
फल समान पुनि दान है, दान सरिस सनमान ॥

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में ‘उद्यम’, ‘फल’, ‘दान’ और ‘सनमान’ उपमेय अपने उपमानों के साथ शृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किये गये हैं; अतः इसमें रसनोपमा अलंकार है।
(घ) मालोपमा–जहाँ उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) का उत्कर्ष दिखाने के लिए अनेक उपमान एकत्र किये जाएँ, वहाँ मालोपमा अलंकार होता है; जैसे-

हिरनी से मीन से, सुखंजन समान चारु ।
अमल कमल-से विलोचन तुम्हारे हैं ।।।

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में आँखों की तुलना अनेक उपमानों (हिरनी से, मीन से, सुखंजन समान, कमल से) की गयी है। अत: यहाँ पर मालोपमा अलंकार है।।

2. रूपक [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]

लक्षण (परिभाषा)–जहाँ उपमेय और उपमान में अभिन्नता प्रकट की जाए, अर्थात् उन्हें एक ही रूप में प्रकट किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-

अरुन सरोरुह कर चरन, दृग-खंजन मुख-चंद।
समै आइ सुंदरि-सरद, काहि न करति अनंद ॥

स्पष्टीकरण-इस उदाहरण में शरद् ऋतु में सुन्दरी को, कमल में हाथ-पैरों का, खंजन में आँखों का और चन्द्रमा में मुख का भेदरहित आरोप होने से रूपक अलंकार है। | भेद-रूपक अलंकार निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है ।
(i) सांगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का सर्वांग आरोप हो, वहाँ ‘सांगरूपक’ होता है; जैसे-

उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुबर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरखे लोचन-भंग ॥

स्पष्टीकरण–यहाँ रघुबर, मंच, संत, लोचन आदि उपमेयों पर बाल सूर्य, उदयगिरि, सरोज, मूंग आदि उपमानों का आरोप किया गया है; अतः यहाँ सांगरूपक है।
(ii) निरंगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप सर्वांग न हो, वहाँ निरंगरूपक होता है; जैसे–
कौन तुम संसृति-जलनिधि तीर, तरंगों से फेंकी मणि एक।
स्पष्टीकरण-इसमें संसृति (संसार) पर जलनिधि (सागर) का आरोप है, लेकिन अंगों का उल्लेख न होने से यह निरंगरूपक है।
(iii) परम्परितरूपक-जहाँ एक रूपक दूसरे रूपक पर अवलम्बित हो, वहाँ परम्परितरूपक होता है; जैसे-
बन्दी पवनकुमार खल-बन-पावक ज्ञान-घन।
स्पष्टीकरण–यहाँ पवनकुमार (उपमेय) पर अग्नि (उपमान) का आरोप इसलिए सम्भव हुआ कि खलों (दुष्टों) को घना वन (जंगल) बताया गया है; अत: एक रूपक (खल-वन) पर दूसरा रूपक (पवनकुमाररूपी पावक) निर्भर होने से यहाँ परम्परितरूपक है।
उपमा और रूपक अलंकार में अन्तर–उपमा में उपमेय और उपमान में समानता स्थापित की जाती है, किन्तु रूपक में दोनों में अभेद स्थापित किया जाता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा के समान है’ में उपमा है, किन्तु ‘मुख चन्द्रमा है’ में रूपक है।

उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार में अन्तर–जहाँ पर उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) में उपमान (उपमेय की जिसके साथ तुलना की जाती है) की सम्भावना प्रकट की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-‘मुख मानो चन्द्रमा है। जहाँ उपमेय और उपमान में ऐसा आरोप हो कि दोनों में किसी प्रकार का भेद ही न रह जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा है।

4. उत्प्रेक्षा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-

सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात ।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ पीताम्बर ओढ़े हुए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) की प्रात:कालीन सूर्य की प्रभा से सुशोभित नीलमणि पर्वत (उपमान) के रूप में सम्भावना किये जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है। ‘मनौ’ यहाँ पर वाचक शब्द है। इस अलंकार में जनु, जनहुँ, मनु, मनहुँ, मानो, इव आदि वाचक शब्द अवश्य आते हैं।
भेद-उत्प्रेक्षा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं
(क) वस्तूत्प्रेक्षा–जब उपमेय (प्रस्तुत वस्तु) में उपमान (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना व्यक्त की जाती है, तब वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

वहीं शुभ्र सरिता के तट पर, कुटिया का कंकाल खड़ा है।
मानो बाँसों में घुन बनकर शत शत हाहाकार खड़ा है।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर घुन (प्रस्तुत वस्तु) में हाहाकार (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना की गयी है। अत: वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।
(ख) हेतूत्प्रेक्षा–जहाँ पर काव्य में अहेतु में हेतु की सम्भावना व्यक्त की जाती है, वहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार होता है–

विनय शुक-नासा का धर ध्यान
बन गये पुष्प पलास अराल।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर ढाक के फूलों का वक्र आकार होना स्वाभाविक है। नायिका की नुकीली नाक की उससे सम्भावना की जाए यह हेतु नहीं है; परन्तु यहाँ उसे हेतु माना गया है, अतएव अहेतु की सम्भावना होने से हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।।

(ग) फलोत्प्रेक्षा–जब अफल में फल की सम्भावना की जाए वहाँ पर फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

नित्य ही नहाती क्षर सिन्धु में कलाधर है
सुन्दरि ! तवानन की समता की इच्छा से ।

यहाँ पर चन्द्रमा का प्रतिदिन क्षीरसागर में स्नान करने का उद्देश्य सुन्दरी के मुख की समता प्राप्त करने में निहित है। वास्तव में ऐसा नहीं है, परन्तु इस प्रकार की सम्भावना की गयी है। अत: यहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।।

5. भ्रान्तिमान [2009, 10, 14, 15, 16, 18] |

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ समानता के कारण भ्रमवश उपमेय में उपमान का निश्चयात्मक ज्ञान हो, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है; जैसे—रस्सी (उपमेय) को साँप (उपमान) समझ लेना।

कपि करि हृदय बिचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब ।।
जानि अशोक अँगार, सीय हरषि उठि कर गहेउ ।

स्पष्टीकरण-यहाँ सीताजी श्रीराम की हीरकजटित अँगूठी को अशोक वृक्ष द्वारा प्रदत्त अंगारा समझकर उठा लेती हैं। अँगूठी (उपमेय) में उन्हें अंगारे (उपमान) का निश्चयात्मक ज्ञान होने से यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार है।

6. सन्देह [2009, 10, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जब किसी वस्तु में उसी के समान दूसरी वस्तु का सन्देह हो जाए और कोई निश्चयात्मक ज्ञान न हो, तब सन्देह अलंकार होता है; जैसे—

परिपूरन सिन्दूर पूर कैधौं मंगल घट।
किधौं सक्र को छत्र मढ्यो मानिक मयूख पट ।।

स्पष्टीकरण-यहाँ लाल वर्ण वाले सूर्य में सिन्दूर भरे हुए घट’ तथा ‘लाल रंग वाले माणिक्य में जड़े हुए छत्र’ का सन्देह होने से सन्देह अलंकार है।
सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर–सन्देह अलंकार में उपमेय में उपमान का सन्देहमात्र होता है, निश्चयात्मक ज्ञान नहीं; जैसे-‘यह रस्सी है या साँप’। इसमें रस्सी (उपमेय) में साँप (उपमान) का सन्देह होता है, निश्चय नहीं; किन्तु भ्रान्तिमान में उपमेय में उपमान का निश्चय हो जाता है; जैसे—रस्सी को साँप समझकर कहना कि ‘यह साँप है।

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