UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 3 Akbar: The Great

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 3
Chapter Name Akbar: The Great (अकबर महान)
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 3 Akbar: The Great (अकबर महान)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 15 अक्टूबर, 1542 ई०
2. 5 नवम्बर, 1556 ई०
3. 14 फरवरी, 1556 ई०
4. 25 अक्टूबर, 1605 ई०
उतर.
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-54 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्यया असत्य बताइए
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 54 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-55 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 55 व 56 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ क्या थीं?
उतर.
अकबर की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ निम्नलिखित थीं|

  1. साम्राज्य के प्रतिद्वन्द्वी
  2. मुगलों का विदेशीपन
  3. सम्बन्धियों का विश्वासघात

प्रश्न 2.
पानीपत के द्वितीय युद्ध के परिणामों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उतर.
पानीपत का द्वितीय युद्ध सन् 1556 ई० में अकबर और हेमू के बीच हुआ। इस युद्ध में अकबर की विजय के साथ भारत में मुगलों की स्थिति सुदृढ़ हो गई तथा हिन्दुस्तान की सत्ता पर अफगानों का अधिकार सदैव के लिए समाप्त हो गया। विजयी सेनाओं ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया गया।

प्रश्न 3.
अकबर के मृत शरीर को कहाँ दफनाया गया था?
उतर.
अकबर के मृत शरीर को आगरा से 5 मील दूर उसी के द्वारा बनवाए गए सिकन्दराके मकबरे में दफनाया गया।

प्रश्न 4.
हल्दी घाटी का युद्ध किस-किस के बीच हुआ और इस युद्ध में कौन विजयी हुआ?
उतर.
हल्दी घाटी का युद्ध मेवाड़ के शासक और राणा उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रतापसिंह तथा अकबर की सेना के मध्य सन् 1576 ई० में हुआ। इस युद्ध में मुगलों की विजय हुई।

प्रश्न 5.
अकबर की सुलह-कुल नीति क्या थी? इसका क्या परिणाम हुआ?
उतर.
अकबर की सुलह-कुल नीति एक धार्मिक उदार नीति थी। जिसके द्वारा अकबर ने भारत में धर्मों एवं सम्प्रदायों में एकता, समन्वय एवं धार्मिक सहिष्णुता को स्थापित किया। इस नीति से मुगल साम्राज्य स्थायित्व एवं दृढ़ता प्राप्त कर सका।

प्रश्न 6.
अकबर की दक्षिण नीति के बारे में आप क्या समझते हैं?
उतर.
अकबर ने अपने साम्राज्य के विस्तार एवं भारत को राजनीतिक इकाई में परिवर्तित करने के उद्देश्य से दक्षिण भारत के राज्यों से युद्ध करने से पूर्व राजदुतों द्वारा आज्ञा-पत्र भेजकर अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा। खान देश के शासक अली खाँ ने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, किन्तु अन्य राज्यों के शासकों ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 7.
अब्दुल फजल द्वारा लिखित दो फारसी ऐतिहासिक ग्रन्थों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
अब्दुल फजल द्वारा लिखित दो फारसी ऐतिहासिक ग्रन्थ ‘अकबरनामा’ एवं ‘आइन-ए-अकबरी’ हैं। इन ग्रंथों में अकबर के राज्यकाल की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन मिलता है। दोनों ग्रंथ अकबर की प्रशंसा से भरे हैं।

प्रश्न 8.
टोडरमल कौन था और वह क्यों प्रसिद्ध था?
उतर.
टोडरमल अकबर का दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष था। कुछ समय तक वह अकबर का वजीर भी रहा। टोडरमल भूमि सुधार एवं राजस्व प्रबंध में किए गए महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न 9.
अकबर के दीन-ए-इलाही’ की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उतर.
अकबर के दीन-ए-इलाही की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. दीन-ए-इलाही के अनुसार ईश्वर एक है और अकबर उसका सबसे बड़ा पुजारी एवं पैगम्बर है।
  2. दीन-ए-इलाही के अनुयायियों को अच्छे कार्य करने और सूर्य व अग्नि के प्रति श्रद्धा रखने के आदेश दिए गए थे।
  3. दीन-ए-इलाही के सदस्य को मांस खाना वर्जित था।
  4. दीन-ए-इलाही में सब धर्मों के अच्छे सिद्धान्त थे और यह दार्शनिकता, प्रकृति-पूजा और योग का सम्मिश्रण था। इसका आधार विचार पूर्ण था और इसमें कोई कट्टरपन देवी-देवता अथवा धर्मगुरु नहीं थे।

प्रश्न 10.
अकबर द्वारा निर्मित दो भवनों के बारे में लिखिए।
उतर.
अकबर द्वारा निर्मित दो भवन निम्नवत हैं
आगरा का किला – अकबर ने लाल पत्थरों से आगरा का भव्य किला बनवाया। इस किले में उसने 50 इमारतें बनवाईं जिसमें जहाँगीरी महल सबसे सुन्दर है। बुलन्ददरवाजा-अकबर ने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में अनेक भवन बनवाए जिनमें बुलन्द दरवाजा विश्वविख्यात है।

प्रश्न 11.
पानीपत के द्वितीय युद्ध के महत्व का वर्णन कीजिए।
उतर.
पानी के द्वितीय युद्ध के परिणामस्वरूप भारत में मुगलों की स्थिति सुदृढ़ हो गई और मुगल वंश 1887 ई० तक भारत में जमा रहा। भारत की सत्ता पर सूर वंश का अधिकार सदा के लिए समाप्त हो गया। विजयी सेना ने दिल्ली और आगरा पर शीघ्र अधिकार कर लिया।

प्रश्न 12.
अकबर की धार्मिक नीति स्पष्ट कीजिए।
उतर.
अकबर ने धर्म-सहिष्णुता की नीति अपनाई। अकबर की महानता उसकी धार्मिक नीति पर आधारित है। उसने तुर्क-अफगान शासकों की धार्मिक विभेद की नीति के स्थान पर उदार नीति अपनाई तथा सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों में एकता और समन्वय स्थापित किया और धार्मिक विद्वेष, वैमनस्य एवं कटुता को समाप्त कर एक संगठित राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया।

प्रश्न 13.
“अकबर एक राष्ट्रीय शासक था।” विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर ने जिन उदार और नवीन सिद्धान्तों को जन्म दिया उनका इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान हैं उसने सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार किया। धर्म, जाति और वंश के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया। अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का प्रयास किया। दूसरी ओर शासन-प्रणाली, न्याय व्यवस्था, मालगुजारी बन्दोबस्त, एक राज्य भाषा, एक मुद्रा व्यवस्था की स्थापना की। इस प्रकार अकबर की नीति, भावना एवं प्रयास उसे राष्ट्रीय शासक के निकट पहुँचाते हैं।

विस्तृत उत्तरीय

प्रश्न 1.
“मुगल साम्राज्य की स्थापना बाबर ने की, परन्तु उसका विकास एवं सुदृढ़ीकरण अकबर ने किया।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उतर.
मुगल साम्राज्य की स्थापना काबुल के शासक एवं अकबर के दादा बाबर ने की। पानीपत तथा खानवा के युद्धों में उसने भारत की दोनों प्रमुख शक्तियों को पराजित करके उनका विनाश करने का प्रयास किया था। किन्तु बाबर द्वारा भारत की विजय केवल एक सैनिक विजय थी; अत: वह स्थायी नहीं हो सकी, इस दृष्टिकोण से बाबर मुगल वंश की स्थापना करने में सर्वथा असफल रहा। वह केवल एक वीर विजेता था, परन्तु शासक के गुणों का उसमें सर्वथा अभाव था। उसने साम्राज्य की विशृंखलता एवं अव्यवस्था को ठीक करने का कोई प्रयास नहीं किया तथा अपने पुत्र हुमायूं के मार्ग में उसने भयंकर काँटे बो दिए, जिनके कारण हुमायूँ को जीवन भर संघर्ष करना पड़ा। हुमायूँ ने 15 वर्ष के निर्वासन के पश्चात जब भारत पर पुनः अधिकार किया तो कुछ समय बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार अकबर को अव्यवस्थित और नाममात्र का राज्य उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ था, जिसे अपने चारित्रिक गुणों से उसने विशाल एवं सुदृढ़ बनाया। उसने सम्पूर्ण भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की। जीवन भर कठोर परिश्रम करके अपने उत्तराधिकारियों के लिए उसने जो राज्य छोड़ा, वह इतना दृढ़ तथा शक्तिशाली था कि भयंकर आघात सहन करके भी लगभग 200 वर्षों तक चलता रहा। मुगल शासकों में ही नहीं सम्पूर्ण मध्ययुग के भारतीय शासकों में अकबर को श्रेष्ठ स्थान किया गया है।

मुगल साम्राज्य को भारत में स्थायित्व के साथ संस्थापित करने का श्रेय निश्चय की अकबर को है। उसने राजस्व और शासन में जिन नवीन तत्त्वों एवं उदार सिद्धान्तों का भारतीय परिवेश के साथ समन्वय किया, वह निश्चय ही अतुलनीय है। उससे पूर्व कोई मुसलमान शासक इतने वृहत् स्तर पर ऐसा नहीं कर सका। उसकी सुलह-कुल की नीति ने उसे एक राष्ट्रीय शासक के निकट ला खड़ा किया। अकबर से पहले शेरशाह ने प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया था परन्तु शेरशाह को थोड़ा समय मिला। शेरशाह के विपरित अकबर को अपनी नीति और प्रभाव को देखने के लिए एक लम्बा समय प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त, वह निश्चय ही शेरशाह की तुलना में अधिक उदार दृढ़, नीतिज्ञ और विशाल दृष्टिकोण वाला सिद्ध हुआ। उसकी उदार एवं व्यावहारिक नीति के कारण उसके वंशों को भिन्न धर्मावलम्बियों पर शासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ।

इसी में अकबर की महानता थी। अकबर की मौलिक योग्यता और सफलताओं की तुलना तत्कालीन यूरोपीय शासकों से करने पर उसकी श्रेष्ठता स्थापित होती है। अकबर के चरित्र और उसके कार्यों के बारे में मतभेद हो सकते हैं। कुछ उसे राष्ट्रीय शासक, श्रेष्ठ व्यवस्थापक एवं प्रबन्धक मानते हैं तो कुछ उसे ऐसा नहीं मानते हैं। वे अकबर की चन्द गलतियों एवं कतिपय बुराइयों की ओर ध्यान खीचते है। तथा इस ओर ध्यान देने में असफल रहते हैं कि अकबर ने ही मध्ययुग में सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार अपनाने की प्राचीन भारतीय शासकों के आदर्श का अनुसरण किया। धर्म, जाति एवं वंश के आधार पर इससे अधिक उन्मीद करना बेईमानी होगी। अकबर की शासन-व्यवस्था ऐसी थी जिसमें उसके सभी नागरिक अपने को एक राज्य का नागरिक मान सकते थे और राज्य से समान सुविधाओं और सुरक्षा की आशा कर सकते थे।

प्रश्न 2.
अकबर की राजपूत नीति की विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर की राजपूत नीति – अकबर एक दूरदर्शी सम्राट था। उसने शीघ्र समझ लिया कि राजपूतों की सहायता के बिना हिन्दुस्तान में मुस्लिम साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता तथा उनके सक्रिय सहयोग के बिना कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक एकता सम्भव नहीं हो सकती। अत: उसने प्रेम, सहानुभूति तथा उदारता से राजपूतों के हृदय को जीतकर उनसे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। इस नीति के परिणामस्वरूप अकबर मुगल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ कर सका। अकबर की उदार राजपूत नीति अपनाने के कारण- अकबर द्वारा राजपूतों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखने के निम्नलिखित कारण थे

(i) व्यक्तिगत कारण – राजनीतिक एवं साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के अतिरिक्त अकबर की राजपूत नीति के व्यक्तिगत कारण भी थे। अकबर ने अनुभव किया था कि उसके बड़े-से-बड़े पदाधिकारी अत्यन्त स्वार्थी हैं तथा वे समय पड़ने पर सदा विद्रोह करने को तत्पर रहते हैं। राज्यारोहण के बाद ही उसने देखा कि उसके सम्बन्धी तथा संरक्षक विश्वसनीय नहीं हैं। उसका भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम, उसका संरक्षक बैरम खाँ, उसकी धाय माँ माहम अनगा तथा उसका (माहम अनगा का) पुत्र आधम खाँ सभी शक्ति हस्तगत करने को इच्छुक थे और उन्हें अकबर की कोई चिन्ता न थी। इसी प्रकार भारतीय मुसलमानों पर भी अकबर विश्वास नहीं कर सकता था।

अतः एक कुशल एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते अकबर इस निर्णय पर पहुँचा कि राजपूत ही सबसे अधिक विश्वस्त एवं वीर जाति है, जो एक बार वचनबद्ध होकर कभी धोखा नहीं देती है और उस पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वीरता में भी राजपूत जाति अद्वितीय थी, जिसका उपयोग अकबर अपने हित के लिए कर सकता था। अत: अन्त में उसने राजपूतों एवं मुगलों की शत्रुता का अन्त करने का निश्चय किया, जो कि उसके पिता एवं पितामह के समय से चली आ रही थी। अकबर का यह विश्वास था कि राजपूतों के सहयोग के बिना न तो कोई सुदृढ़ साम्राज्य भारत में स्थापित किया जा सकता है। और न ही उसे स्थायी बनाया जा सकता है; अतः उसने निश्चय किया कि उसका साम्राज्य हिन्दू एवं मुसलमान दोनों जातियों के सहयोग से तथा दोनों के हित पर आधारित होगा। वह चाहता था कि राजपूत तथा हिन्दू मुगलों को विदेशी न समझकर भारतीय समझे।

इस कारण उसने प्रमुख राजपूत राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों तथा मुगलों के सम्बन्ध दृढ़ हो जाएँ। राजपूतों तथा हिन्दुओं के लिए उसने उच्च से उच्च पदों के द्वार खोल दिए। योग्यता के अनुसार पदों का वितरण किया गया, धर्म अथवा जाति के आधार पर नहीं। हिन्दुओं की प्रतिष्ठा, सम्पत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का भार राज्य ने सँभालने का निश्चय किया तथा हिन्दुओं की पूर्ण सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अकबर ने उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता भी प्रदान की। उसके हरम में उसकी हिन्दू रानियों को अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी तिलक लगाता एवं सूर्य की उपासना करता था। इस प्रकार उसने राजपूतों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करके उनका पूरा सहयोग प्राप्त किया।

(ii) राजनीति तथा साम्राज्यवादी दृष्टिकोण – अकबर एक दूरदर्शी तथा साम्राज्यवादी सम्राट था। वह यह भली प्रकार जानता था कि उसके पूर्व के मुस्लिम सुल्तानों के वंशों का अल्पकालीन होने का एक प्रमुख कारण राजपूतों की शत्रुता थी। वीर राजपूत जाति अभी तक मुसलमानों को अपना शत्रु समझती थी तथा उनको देश के बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील थी। खानवा के युद्ध में राणा साँगा के नेतृत्व में राजपूतों ने एक महान् किन्तु असफल प्रयास इसीलिए किया था। अकबर यह भी जानता था कि राजपूत स्वभाव के सच्चे, ईमानदार एवं स्वामिभक्त होते हैं और उनको मित्र बनाकर भारी लाभ प्राप्त किया जा सकता है, अत: एक कुशल कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर ने राजपूतों को मुगलों का मित्र बनाने में अपने तथा अपने वंश का कल्याण समझा। इसी उद्देश्य को लेकर उसने ‘राजपूत नीति’ को जन्म दिया। किन्तु अकबर की राजपूत नीति का केवल यही एकमात्र कारण नहीं था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। वास्तव में यदि यही एक कारण रहा होता तो अकबर के पाखण्ड का भण्डाफोड़ उसके जीवनकाल में कभी-न-कभी अवश्य हो गया होता और राजपूतों के सहयोग को प्राप्त करने में वह असफल रहता। अकबर यह जानता था कि बलबन, अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक जैसे वीर एवं योग्य सुल्तान भी भारत में स्थायी राज्य स्थापित नहीं कर सके थे। इसका प्रमख कारण राजपत थे, जिनके साथ सल्तानों का व्यवहार हमेशा शत्रतापर्ण रहा था। अतः यदि इन रा मैत्रीपर्ण व्यवहार किया जाए तो इनकी शक्ति का उपयोग मगल साम्राज्य को दृढ़ बनाने के लिए किया जा सकता है। इस
दृष्टिकोण से अकबर ने राजपूतों के प्रति सहृदयता एवं मैत्रीपूर्ण व्यवहार का नीति को जन्म दिया।

राजपूत नीति सम्बन्धी कार्य – अकबर ने राजपूतों से निकट का सम्बन्ध स्थापित करने तथा उन्हें प्रेमपूर्वक तथा सद्भावना सहित अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु जो ढंग अपनाए वे प्रधानतया चार प्रकार के थे
(i) धार्मिक सहिष्णुता की नीति – अकबर ने हिन्दुओं को पूर्णत: धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की, यहाँ तक कि उसके हरम की हिन्दू स्त्रियों को मूर्ति पूजा करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी हिन्दुओं के रीति-रिवाजों को मनाता था। उसने तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर हटा दिया, अत: राजपूत ऐसे सम्राट को सहयोग देने को सहर्ष प्रस्तुत हो गए, जो उनके धर्म तथा गुणों को मान्यता एवं प्रतिष्ठा प्रदान करता था।

(ii) उच्च पदों पर नियुक्ति – अकबर ने उच्च पदों के द्वार सबके लिए खोल दिए। उसने योग्यता के आधार पर, धार्मिक भेदभाव किए बिना, पदों का वितरण किया। उसके नवरत्नों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मावलम्बी सम्मिलित थे। उसने कछवाहा-नरेश बिहारीमल को पंचहजारी मनसबदार बनाया तथा उसके पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को भी सेना एवं प्रशासन सम्बन्धी उच्च पद प्रदान किए। अकबर के अन्य हिन्दू पदाधिकारियों में राजा टोडरमल तथा राजा बीबरल के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। अकबर ने 1582 ई० में राजा टोडरमल को दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष बना दिया। राजा बीरबल को उसने अपने नवरत्नों में स्थान दिया और उन्हें सेनापति का भार सौंपकर अपनी साथ नीति को आगे बढ़ाया। जनता ने बीरबल को विनोदप्रियता का प्रतीक मानकर अकबर-बीरबल सम्बन्धी हजारों-लाखों किंवदन्तियाँ गढ़ लीं। इस प्रकार उसकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई। यही नहीं, अकबर की सेना में भी आधे हिन्दू थे तथा उनमें से अनेक सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। अकबर ने बाद में यह अनुभव किया कि हिन्दुओं एवं राजपूतों पर विश्वास करके उसने कोई भूल नहीं की थी।

(iii) वैवाहिक सम्बन्ध – अकबर ने प्रमुख राजपूत राजवंशों की राजकुमारियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करने में अकबर को सहायता प्राप्त हुई। नार्मन जीग्लर तथा डिक हर्बर्ट आरनॉल्ड कोफ के अनुसार, राजस्थान तथा अन्य स्थानों पर राजपूत सरदारों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को निश्चित रूप प्रदान करने में इन वैवाहिक सम्बन्धों का विशिष्ट योगदान था। डॉ० बेनी प्रसाद के शब्दों में- “इन वैवाहिक सम्बन्धों से भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देश को प्रसिद्ध सम्राटों की एक परम्परा प्राप्त हुई और मुगल साम्राज्य की चारों पीढ़ियों को मध्यकालीन भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों और योग्य राजनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त होती रही।

(iv) अनाक्रमण तथा सामाजिक सुधार – अकबर ने अन्य राज्यों को आत्मसात करने तथा उन पर आक्रमण करने की नीति का परित्याग कर दिया। उसने अपने धन व शक्ति को जनता के कल्याण में लगा दिया। अकबर ने मुस्लिम समाज के साथसाथ हिन्दू समाज के दोषों के निराकरण का भी प्रयास किया, जिससे वह हिन्दुओं के और भी निकट आ गया। उसने अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर देहज प्रथा, सती प्रथा, जाति की जटिलता, बाल-विवाह, शिशु हत्या आदि का विरोध किया तथा इनको सुधारने के लिए नियम भी बनाए। उसने विधवा पुनर्विवाह को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। 1562 ई० के आरम्भ से ही उसने राजाज्ञा देकर युद्धबन्दियों को गुलाम बनाने की प्रथा पर रोक लगा दी। मथुरा के तीर्थयात्रियों पर कर लगाना उसे अनुचित लगा, अतः 1563 ई० में उसने सर्वत्र यात्री-कर समाप्त करने का आदेश दिया। फिर 1564 ई० में उसने जजिया कर को बन्द करवा दिया। इस प्रकार सम्पूर्ण देश के एक विशाल बहुमत की सहानुभूति और शुभकामनाएँ उसे प्राप्त हो गई। अबुल फजल ने लिखा है – “इस प्रकार सम्राट ने लोगों के आचरण को सुधारने का प्रयास किया।

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम – अकबर की राजपूत नीति से मुगल साम्राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई। राज्य का विस्तार हुआ, शासन व्यवस्था सुदृढ़ हुई, व्यापार को प्रोत्साहन मिला और सैनिक सम्मान में वृद्धि हुई। इन सबके परिणामस्वरूप देश समृद्ध हुआ और सम्राट को राष्ट्र के निर्माण में राजपूतों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।

(i) मुगलों की शक्ति में वृद्धि – अकबर की सहिष्णुतापूर्ण नीति मुगल वंश के लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुई। युद्ध कौशल में दक्ष राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध जोड़कर अकबर ने एक बहुत बड़ा लाभ यह उठाया कि अब उसे कुशल सैनिकों की भर्ती के लिए पश्चिमोत्तर प्रान्तों का मुँह नहीं ताकना पड़ता था। इससे मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हो गई तथा अकबर के उत्तराधिकारी जब तक इस सहिष्णतापर्ण नीति का अनसरण करते रहे तब तक मगल चलता रहा। इस नीति का परित्याग करते ही मगल वंश का पतन आरम्भ हो गया।

(ii) सद्भावना की प्राप्ति – अकबर की राजपूत नीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि राजपूत, जो अभी तक मुसलमानों के शत्रु रहे थे तथा जिनसे सभी मुस्लिम सुल्तानों को युद्ध करने पड़ते थे, अब मुगल साम्राज्य के आधार स्तम्भ बन गए। अकबर ने अपनी उदार राजपूत नीति के फलस्वरूप न केवल राजस्थान पर अपना सुदृढ़ अधिकार स्थापित कर लिया, वरन् राजपूतों की सहायता से उसने भारत के विभिन्न मुस्लिम राज्यों तथा पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ राज्यों को पराजित करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

(iii) विद्रोह दमन में सहायता – इतना ही नहीं; विद्रोही राजपूत राज्यों को दबाने में भी उसने मित्र राजपूत राज्यों से पूरी-पूरी सहायता प्राप्त की। पूर्वी और दक्षिणी विजयों में भी अकबर को राजपूतों से पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई।

(iv) राज्य–विस्तार – मेवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के सभी राज्य अकबर के अधीन हो गए। मेड़ता और रणथम्भौर जैसे राज्यों ने भी युद्ध के उपरान्त मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। आमेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर आदि राज्यों ने अकबर से मित्रता कर ली, जिनको देखकर छोटे-छोटे राज्य जैसे प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा, दुर्गापुर आदि बिना युद्ध के ही अकबर के अधीन हो गए। मेवाड़ के महाराणा प्रताप को इन्हीं राजपूतों की सहायता से अकबर ने 1576 ई० में पराजित किया। अन्य छोटे-छोटे राज्यों को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कराने का श्रेय भी मुख्यत: उन्हीं राजपूतों को है, जो अकबर के सेनापति के रूप में कार्य कर रहे थे, अतः यथाशीघ्र सम्पूर्ण उत्तर भारत में अकबर की वीरता की धाक जम गई और दूसरी और उसकी उदारता का भी व्यापक प्रचार हो गया। अकबर ने राजपूतों की सहायता से केवल एक विशाल साम्राज्य ही अर्जित नहीं किया वरन् उसकी सुव्यवस्थित शासनव्यवस्था भी राजपूतों के सहयोग का ही परिणाम थी। उसने हिन्दुओं को योग्यतानुसार उच्च पदों पर आसीन किया तथा उनकी योग्यता का पूरा लाभ उठाया। राजा टोडरमल उसकी भूमि-व्यवस्था के लिए उत्तरदायी थे, जिनके द्वारा शासक तथा शासित दोनों वर्गों को भारी लाभ पहुँचा। इस प्रकार उसका जाज्वल्यमान युग राजपूतों के सहयोग से ही निर्मित हो सका। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के अनुसार- “राजपूतों के माध्यम से उत्तर भारत के लाखों हिन्दू, अकबर के शुभचिन्तक बन गए और उसकी उन्नति तथा सफलता की प्रार्थना करने लगे।

प्रश्न 3.
अकबर की धार्मिक नीति की विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर की धार्मिक नीति- अकबर महान् भारत में ही नहीं, वरन् विश्व के महानतम सम्राटों में प्रमुख स्थान रखता है। उसकी महानता का प्रमुख कारण है उसकी धार्मिक नीति, जिसके द्वारा वह दो परस्पर विरोधी धर्मावलम्बियों में समन्वय स्थापित करने में सफल रहा।

16वीं शताब्दी, जिस शताब्दी में अकबर भारत का शासक था, यूरोप के इतिहास में धर्मान्धता की शताब्दी मानी जाती है। उस समय धर्म के नाम पर अमानुषिक युद्ध एवं लोगों पर अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। ऐसे समय में अकबर ने ‘सुलह-कुल की नीति को अपनाया, जिसके द्वारा एक अपूर्व धार्मिक सहिष्णुता को उसने भारत में स्थापित किया। मुस्लिम साम्राज्य के आरम्भ होने से लेकर अकबर के राज्यारोहण तक भारत में धर्म के नाम पर असंख्य अत्याचार किए गए थे किन्तु प्रकृति से ही सहिष्णु एवं उदार सम्राट अकबर ने शासितों को सुरक्षा एवं धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। उसकी यह उदार नीति विभिन्न परिस्थितियों की उपज थी।

अकबर की धार्मिक सहिष्णुता के तत्त्व – अकबर आरम्भ से ही धर्मान्ध अथवा अनुदार नहीं था। अपने पूर्वजों से उसे धार्मिक सहिष्णुता उत्तराधिकार में मिली थी। तैमूर, बाबर तथा हुमायूँ दिल्ली के अन्य सुल्तानों के समान धर्मान्ध अथवा अत्याचारी नहीं थे। इसके अतिरिक्त अकबर का संरक्षक बैरम खाँ भी उदार स्वभाव का था। 15वीं एवं 16वीं शताब्दी के भक्ति आन्दोलनों का प्रभाव भी अकबर पर पड़ा था। 1581 ई० में इबादतखाने की स्थापना के पश्चात् अकबर हिन्दू, जैन, सिक्ख, पारसी आदि अनेक धर्मावलम्बियों के सम्पर्क में आया, जिससे उसका धार्मिक दृष्टिकोण उदार होता गया तथा अन्त में उसने एक नवीन धर्म की स्थापना भी की, जिसके अनुसरण के लिए किसी भी धर्म का बन्धन आवश्यक नहीं था। अकबर के धार्मिक विचारों में क्रमिक परिवर्तन हुआ।

आरम्भ से वह उतना उदार एवं सहिष्णु नहीं वरन् इस्लाम में उसे पूरी आस्था थी तथा इस्लाम का वह सच्चा अनुयायी था, किन्तु हिन्दुओं के प्रति उसकी उदार नीति ने उसके धार्मिक दृष्टिकोण में धीरे-धीरे परिवर्तन लाना आरम्भ किया। स्मिथ के मत में उसके धार्मिक विचारों के विकास की तीन प्रमुख सीढ़ियाँ है- (i) 1556 से 1575 ई० तक, जिसमें वह इस्लाम का अनुयायी था। (ii) 1575 से 1581 ई० तक, जब उसने इबादतखाने में होने वाले वाद-विवादों को ध्यानपूर्वक सुनकर अन्य धर्मों की ओर आकर्षित होना एवं धर्म के विषय में चिन्तन करना आरम्भ कर दिया था। (iii) 1582 ई० के पश्चात् जब उसने ‘दीन-ए-इलाही’ नामक धर्म की स्थापना की तथा सभी धर्मों को समभाव देखना आरम्भ किया।

अकबर के धार्मिक विचारों में परिवर्तन
(i) 1556 से 1575 ई० तक का काल – आरम्भिक काल में अकबर एक सच्चे मुसलमान की भाँति आचरण करता था। वह रोज नमाज पढ़ता था, मुल्ला तथा मौलवियों का आदर करता था और पीरों की दरगाहों के दर्शनार्थ जाता था। उसने कई मसजिदों का भी निर्माण कराया, वह हिन्दुओं से जजिया कर भी लेता था, इस प्रकार वह सच्चे मुसलमान सम्राट का प्रतिरूप था। तब भी हम उसे कट्टर एवं धर्मान्ध मुसलमान नहीं कर सकते, क्योंकि उसने धार्मिक अत्याचार की नीति को कभी भी नहीं अपनाया। परन्तु 15 मार्च, 1564 ई० से उसने जजिया कर लेना बन्द कर दिया था। वह आरम्भ से ही उदार हृदय था, किन्तु पहले उदार नहीं था जितना कि बाद में हो गया। इस प्रकार अपने जीवन के प्रथम काल में अकबर एक मुसलमान होने के नाते इस्लाम में पूरी आस्था रखने वाला तथा अपने धर्म का सच्चा अनुयायी सम्राट था।

(ii) सन् 1575 से 1581 ई० तक का काल – यह अकबर के जीवन का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण काल था। वास्वत में इसी काल में उसके धार्मिक विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ।
(क) इबादतखाने की स्थापना – अनेक धर्मों से प्रभावित होकर अकबर ने फतेहपुर सीकरी में, 1575 ई० में एक इबादतखाना अथवा पूजागृह निर्मित करवाया जिसमें सभी धर्मों के अनुयायियों को अपने धर्म के विषय में बतलाने तथा अन्य धर्मावलम्बियों से तर्क करने की स्वतन्त्रता थी। आरम्भ में इस इबादतखाने में केवल मुसलमानों को ही भाग लेने का अधिकार था किन्तु उनकी कट्टरता, धर्मान्धता तथा असहिष्णुता से अकबर असन्तुष्ट हो उठा और सभी धर्मों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने की उसकी जिज्ञासा प्रबल हो उठी। इसी समय मुसलमान मौलवियों के दो वर्ग हो गए। एक दल का नेता मखदूम-उल-मुल्क अब्दुल्ला सुल्तानपुरी था तथा दूसरे का शेख अब्दुल नबी था। इसमें परस्पर ईष्र्या, द्वेष होने के कारण संघर्ष आरम्भ हो गया, जिससे अकबर की इस्लाम के प्रति श्रद्धा कम होने लगी और उसने हिन्दू, जैन, सिक्ख, ईसाई तथा पारसी सभी मतावलम्बियों के लिए इबादतखाने के द्वार खोल दिया। सम्राट स्वयं इबादतखाने में होने वाले वाद-विवाद में भाग लेता था। पारसी एवं पुर्तगाली पादरियों से वह काफी प्रभावित हुआ था। एक पारसी पादरी दस्तूर मेहर जी राना ने सम्राट को यह सिखाया कि दरबार में सदैव अग्नि जलती रहनी चाहिए। उसी के प्रभाव से उसने सूर्य की उपासना भी करनी आरम्भ कर दी।

(ख) एक नए धर्म का विचार – निरन्तर धार्मिक चिन्तन एवं मनन के उपरान्त सम्राट इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सभी धर्मों के मूल तत्त्व समान हैं तथा धर्म के नाम पर झगड़े एवं युद्ध करना व्यर्थ है। उसने यह सोचना आरम्भ किया कि वह एक ऐसा धर्म चलाएगा जिसे संसार के सभी धर्मों के अनुयायी अपना सकें तथा जो सब धर्मों का सार हो। धर्माचार्य बनने के लिए प्रथम कदम सम्राट ने 22 जून, 1579 ई० में उठाया, जब मुहम्मद साहब के जन्मदिन पर उसने स्वयं खुतबा पढ़ा। यद्यपि यह खुतबा पढ़ने का अधिकार केवल मुहम्मद साहब एवं उनके खलीफाओं को ही था। अकबर ने खुतबे के अन्त में ‘अल्ला हो अकबर’ शब्द का उच्चारण किया, जिसका अर्थ है कि अल्लाह सबसे बड़ा है और इस प्रकार उसने अपनी धार्मिक नीति को प्रचलित रखा।

दीन-ए-इलाही – अकबर ने गम्भीर धार्मिक चिन्तन के उपरान्त ‘दीन-ए-इलाही’ का निर्माण किया तथा 1581 ई० में उसने इस धर्म की घोषणा कर दी। इस धर्म के सिद्धान्त सरल थे तथा प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छा से इसका सदस्य बन सकता था। अकबर ने किसी भी व्यक्ति को इस धर्म के अनुसरण के लिए बाध्य नहीं किया और इसलिए उसके प्रमुख दरबारियों में से बहुत ही कम व्यक्तियों ने उसके इस धर्म को अंगीकार किया तथा अकबर की मृत्यु के साथ ही उसका धर्म ‘दीन-एइलाही’ भी लगभग समाप्त हो गया। इस धर्म का अन्तिम अनुयायी शाहजहाँ का पुत्र दारा शिकोह था, जिसके साथ ही दीन-ए-इलाही का पूर्णतया अन्त हो गया। अकबर के काल में केवल 18 व्यक्ति ही इसके सदस्य थे। राजा मानसिंह, भगवानदास, टोडरमल आदि कोई भी इसका सदस्य नहीं था। हिन्दुओं में केवल बीरबल दीन-ए-इलाही के अनुयायी थे। शेख मुबारक, अबुल फजल, फैजी, अजीज कोका आदि इसके महत्वपूर्ण सदस्य थे।

दीन-ए-इलाही के प्रमुख सिद्धान्त – दीन-ए-इलाही के सिद्धान्त अत्यन्त सरल थे
(अ) इसका प्रथम सिद्धान्त यह था कि ईश्वर एक है और अकबर उसका सबसे बड़ा पुजारी एवं पैगम्बर है।
(ब) दीन-ए-इलाही के अनुयायी को सूर्य तथा अग्नि की पूजा करनी पड़ती थी।
(स) इसके सदस्य को अपने जन्म दिन पर दावत देनी पड़ती थी।
(द) जो दावत मनुष्य के मरने के बाद उसके परिजनों को देनी पड़ती है, वह मनुष्य को अपने जीवनकाल में ही देनी पड़ती थी।
(य) प्रत्येक सदस्य के लिए मांस-भक्षण निषिद्ध था।
(र) परस्पर मिलने पर वे ‘अल्ला हो अकबर’ तथा ‘जल्ले-जलाल हू’ कहकर अभिवादन करते थे।
(ल) निम्न श्रेणियों के व्यक्तियों के साथ उन्हें भोजन करने का निषेध था।
(व) उन्हें सम्राट को सजदा करना पड़ता था।
(श) दीन-ए-इलाही के अनुयायी चार श्रेणियों में विभक्त थे- प्रथम, जो अपनी सम्पत्ति सम्राट पर न्योछावर करने को प्रस्तुत रहते थे, द्वितीय, जो सम्पत्ति तथा जीवन समर्पित करने को उद्यत रहते थे, तृतीय, जो सम्राट के लिए सम्पत्ति, जीवन एवं सम्मान का बलिदान कर सकते थे तथा चतुर्थ जो सम्पत्ति, जीवन, सम्मान एवं धर्म समर्पित करने के लिए उद्यत रहते थे।
(ष) रविवार के दिन सम्राट धर्म की दीक्षा देता था तथा नए व्यक्तियों के धर्म परिवर्तन के लिए भी यही दिन निश्चित था।

प्रश्न 4.
अकबर की सुलह-कुल नीति की विवेचना कीजिए।
उतर.
अकबर ने जिन उदार और नवीन सिद्धान्तों को जन्म दिया उनका इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान हैं उसने सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार किया। धर्म, जाति और वंश के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया। अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का प्रयास किया। दूसरी ओर शासन-प्रणाली, न्याय व्यवस्था, मालगुजारी बन्दोबस्त, एक राज्य भाषा, एक मुद्रा व्यवस्था की स्थापना की। इस प्रकार अकबर की नीति, भावना एवं प्रयास उसे राष्ट्रीय शासक के निकट पहुँचाते हैं।

प्रश्न 5.
‘दीन-ए-इलाही’ अकबर की बुद्धिमत्ता का नहीं, बल्कि उसकी मूर्खता का प्रतीक था। इस कथ के आलोक में अकबर की धार्मिक नीति की समीक्षा कीजिए।
उतर.
दीन-ए-इलाही के बारे में डॉ० श्रीराम शर्मा ने लिखा है “दीन-ए-इलाही को एक धर्म का स्तर देना कोरी अतिशयोक्ति है। यह सम्राट के राष्ट्रीय आदर्शवाद का ज्वलन्त उदाहरण है। इसका कोई धर्म-ग्रन्थ, पुरोहित, संस्कार वास्तविक रूप से कोई धार्मिक विश्वास नहीं थे। इसे धर्म न कहकर एक संस्था अथवा परिपाटी कहना अधिक उपयुक्त होगा जो किसी धार्मिक आन्दोलन के विपरित एक स्वतन्त्र विचारधारा के निकट है।” स्मिथ ने दीन-ए-इलाही को अकबर की बुद्धिमता का नहीं, अपितु उसकी मूर्खता का प्रतीक बताया है। लेकिन इस सम्बन्ध में डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव का मत है कि दीन-ए-इलाही इस उच्च उद्देश्य से प्रेरित होकर चलाया गया था कि इससे देश की विभिन्न जातियाँ एकाकार होकर राष्ट्र का रूप धारण कर लेंगी।

अकबर उत्तरी-भारत में राजनीतिक प्रशासकीय, आर्थिक और कुछ हद तक सांस्कृतिक एकता स्थापित करने में सफल हुआ। अकबर की इस सहनशीलता की नीति की बदायूँनी और जेसुइट पादरियों ने बड़ी आलोचना की है तथा बदायूँनी ने यह आरोप लगाया कि अकबर ने इस्लाम के साथ अन्याय किया। लेकिन उसकी इस आलोचना को सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था और उस जैसे धर्मान्ध मुल्ला की दृष्टि में वह अक्षम्य अपराध था कि इस्लाम को प्रमुखता की स्थिति से गिराकर उसे अन्य धर्मों के साथ समानता की स्थिति पर ले जाया जाये। जेसुइट पादरी भी जो बादशाह को ईसाई बना देने की आशा में थे किन्तु अन्त में निराश हो गये तो अकबर की आलोचना करना इनके लिए स्वाभाविक ही नहीं अवश्यम्भावी भी था।

प्रश्न 6.
“अकबर एक राष्ट्रीय शासक था।” इस कथन के आलोक में उसकी उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।
उतर.
अकबर ने अपने शासन के दौरान ऐसे कार्य किये जिसके आधार पर उसे एक राष्ट्रीय शासक कहा गया है। राष्ट्रीय शासक वह कहलाता है जिसके शासन में उसकी सम्पूर्ण प्रजा के साथ शासन के सभी क्षेत्रों में समान व्यवहार किया जाये और राज्य की ओर से व्यक्ति-व्यक्ति में धर्म, जाति और वंश के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाये। शासक अपनी प्रजा को पुत्रवत् समझे और राष्ट्र की सारी जनता सम्राट को अपना शासक माने। अकबर ऐसा ही सम्राट था। इस दिशा में राजनीतिक एकता स्थापित करना अकबर का प्रथम कदम था। दूसरा उसने पूरे देश में एक जैसी शासन-प्रणाली, न्याय व्यवस्था तथा मालगुजारी बन्दोबस्त, एक राज्य भाषा, एक मुद्रा व्यवस्था की स्थापना की। अकबर का लक्ष्य सम्पूर्ण भारत को एक राज्य और एक शासन के अन्तर्गत संगठित करने का था।

जिस समय अकबर गद्दी पर बैठा उस समय भारत की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्थिति अशांत थी। केन्द्रीय सत्ता का नामोनिशान नहीं था। स्थानीय तत्त्व ही राजनीति और प्रशासन में अधिक प्रभावशाली थे। प्रशासनिक व्यवस्था ठप्प पड चकी थी। सामाजिक एवं आर्थिक विभेद चरम सीमा पर पहुँच चुके थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में अकबर ने साहस नहीं खोया। उसने भारत को ही अपना देश समझा और इसके विकास के लिए अनवरत प्रयास किये। उसके ये कार्य उसे एक राष्ट्रीय शासक बनाते हैं। इस संदर्भ की पुष्टि अकबर के निम्नलिखित कार्यों से की जा सकती है

(i) राजनीतिक एकीकरण – अकबर का सबसे पहला उद्देश्य भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बाँधकर भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना जगाना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अकबर ने साम्राज्यवादी नीति अपनाई और पानीपत से लेकर असीरगढ़ के युद्ध तथा सम्पूर्ण उत्तर-पूर्वी भारत और दक्षिण के एक बड़े भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसने राजपूतों और अफगानों की शक्ति को भी नतमस्तक कर दिया। इसके लिए उसने सैनिक शक्ति के अतिरिक्त कूटनीति का भी सहारा लिया। उसके प्रयासों से लगभग सम्पूर्ण भारत एक केन्द्रीय सत्ता के अधीन आ गया तथा मुगल सैनिक आक्रमणकारी से भारतीय राजवंशी बन गए।

(ii) प्रशासनिक एकीकरण – अकबर ने न सिर्फ सम्पूर्ण भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की, बल्कि उसने पूरे साम्राज्य के लिए समान प्रशासनिक व्यवस्था भी स्थापित की। उसके प्रशासन का उद्देश्य राजनीति को धर्म से अलग कर साम्राज्य में रहने वाले सभी लोगों का कल्याण करना एवं उन्हें न्याय तथा समान अवसर प्रदान करना था। इसलिए, उसने तुर्क अफगानयुगीन धार्मिक कट्टरता की नीति त्याग दी और अपने प्रबलतम राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों- राजपूतों को भी प्रशासन और सेना में प्रमुखता दी। राजनीतिक एकता बिना प्रशासनिक एकता के अधूरी रहती। इसलिए, उसने पूरे साम्राज्य में एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। यह उसकी एक महान् उपलब्धि थी।

(iii) धार्मिक एकीकरण – राष्ट्रीय एकता स्थापित करने की दिशा में अकबर का साहसिक और मौलिक कार्य धार्मिक क्षेत्र में था। तुर्क-अफगान शासकों के समय में धर्म एवं राजनीति का अटूट सम्बन्ध था। अकबर इस बात को अच्छी तरह समझता था कि इस्लाम धर्म का सहारा लेकर सम्पूर्ण भारत पर शासन नहीं किया जा सकता। इसलिए, उसने राजनीति और धर्म को पृथक् कर दिया। बलात् धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया बन्द कर दी गई। हिन्दुओं पर से जजिया और तीर्थयात्रा कर हटा लिए गए। उन्हें मंदिरों के निर्माण और मरम्मत की सुविधा एवं आवश्यक सहायता भी प्रदान की गई। अन्य धर्मावलंबियों-सिक्खों, पारसियों, ईसाइयों, मुसलमानों को भी धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गई। इस प्रकार अकबर ने धार्मिक विद्वेष, वैमनस्य एवं कटुता की भावना को समाप्त कर आपसी सद्भाव, सहयोग, एकता एवं धर्म-सहिष्णुता की भावना जगाई और एक संगठित राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया।

(iv) सामाजिक एकता के लिए प्रयास – अकबर का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य था सामाजिक एकता स्थापित करने का प्रयास। उसने समाज के दो बहुसंख्यक वर्गों- हिन्दू और मुसलमानों के उत्थान के लिए समान रूप से प्रयास किए। उसने हिन्दू समाज में प्रचलित सती प्रथा एवं बाल-विवाह को प्रतिबन्धित करने की कोशिश की। इसी प्रकार मुसलमानों के दाढ़ी रखने, गो-मांस भक्षण, शराबखोरी, रमजान का व्रत रखने एवं हज की यात्रा समाप्त करने का प्रयास किया। वह इस्लाम धर्म को मानते हुए भी हिन्दुओं के पर्वो एवं त्योहारों- दशहरा, दीपावली, रक्षाबन्धन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि को पूरी श्रद्धा और उत्साह से मनाता था। अकबर की सुलह-कुल की नीति ने आपसी विभेद को मिटाने एवं एक सुसंगठित राज्य, समाज और राष्ट्र के निर्माण में अमूल्य योगदान दिया।

(v) सांस्कृतिक एकता की दिशा में योगदान – सांस्कृतिक उत्थान के क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य किए। उसने फारसी के साथ-साथ संस्कृत भाषा और साहित्य के विकास पर भी पूरा ध्यान दिया। उसने महाभारत, गीता, रामायण, बाइबिल, कुरान, अथर्ववेद, पंचतन्त्र इत्यादि का फारसी में अनुवाद करवाया। कुछ फारसी ग्रन्थों का संस्कृत में भी अनुवाद किया गया। अकबर ने अपने दरबार में अनेक कलाकारों, कवियों, चित्रकारों, संगीतकारों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन दिया। भवन निर्माण के क्षेत्र में भी उसकी महान् उपलब्धियाँ हैं। उसने ऐसे भवनों का निर्माण करवाया जिनमें हिन्दू और इस्लामी शैलियों का मिश्रण स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। अकबर के प्रयासों से भारत की विभिन्न कला-पद्धतियों का समन्वय एवं विकास हो सका। ईरानी, इस्लामी और हिन्दू कला एक-दूसरे के निकट आ सकीं।

(vi) आर्थिक एकता – अकबर ने व्यवसाय और व्यापार को नियन्त्रित कर देश की आर्थिक समृद्धि का मार्ग भी खोला। अनेक प्रकार की दस्तकारियों को देश में प्रोत्साहन मिला जिसके फलस्वरूप देश विकास एवं समृद्धि की चरम सीमा पर पहुंचकर विदेशी यात्रियों और दूतों की आँखों में चकाचौंध पैदा करने लगा। इस प्रकार सभी इतिहासकारों यह स्वीकार करते हैं कि अकबर का उद्देश्य भारत की एकता, उसकी उन्नति और उसके सभी निवासियों की समान प्रगति तथा उन्हें सुविधाएँ प्रदान करना था। इस दृष्टि से प्रायः सभी इतिहासकार उसे राष्ट्रीय शासक स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 7.
अकबर की राजपूत नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए एवं मुगल साम्राज्य पर इसके प्रभावों का परीक्षण कीजिए।
उतर.
अकबर की राजपूत नीति – अकबर एक दूरदर्शी सम्राट था। उसने शीघ्र समझ लिया कि राजपूतों की सहायता के बिना हिन्दुस्तान में मुस्लिम साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता तथा उनके सक्रिय सहयोग के बिना कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक एकता सम्भव नहीं हो सकती। अत: उसने प्रेम, सहानुभूति तथा उदारता से राजपूतों के हृदय को जीतकर उनसे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। इस नीति के परिणामस्वरूप अकबर मुगल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ कर सका। अकबर की उदार राजपूत नीति अपनाने के कारण- अकबर द्वारा राजपूतों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखने के निम्नलिखित कारण थे

(i) व्यक्तिगत कारण – राजनीतिक एवं साम्राज्यवादी दृष्टिकोण के अतिरिक्त अकबर की राजपूत नीति के व्यक्तिगत कारण भी थे। अकबर ने अनुभव किया था कि उसके बड़े-से-बड़े पदाधिकारी अत्यन्त स्वार्थी हैं तथा वे समय पड़ने पर सदा विद्रोह करने को तत्पर रहते हैं। राज्यारोहण के बाद ही उसने देखा कि उसके सम्बन्धी तथा संरक्षक विश्वसनीय नहीं हैं। उसका भाई मिर्जा मुहम्मद हकीम, उसका संरक्षक बैरम खाँ, उसकी धाय माँ माहम अनगा तथा उसका (माहम अनगा का) पुत्र आधम खाँ सभी शक्ति हस्तगत करने को इच्छुक थे और उन्हें अकबर की कोई चिन्ता न थी। इसी प्रकार भारतीय मुसलमानों पर भी अकबर विश्वास नहीं कर सकता था।

अतः एक कुशल एवं दूरदर्शी राजनीतिज्ञ होने के नाते अकबर इस निर्णय पर पहुँचा कि राजपूत ही सबसे अधिक विश्वस्त एवं वीर जाति है, जो एक बार वचनबद्ध होकर कभी धोखा नहीं देती है और उस पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वीरता में भी राजपूत जाति अद्वितीय थी, जिसका उपयोग अकबर अपने हित के लिए कर सकता था। अत: अन्त में उसने राजपूतों एवं मुगलों की शत्रुता का अन्त करने का निश्चय किया, जो कि उसके पिता एवं पितामह के समय से चली आ रही थी। अकबर का यह विश्वास था कि राजपूतों के सहयोग के बिना न तो कोई सुदृढ़ साम्राज्य भारत में स्थापित किया जा सकता है। और न ही उसे स्थायी बनाया जा सकता है; अतः उसने निश्चय किया कि उसका साम्राज्य हिन्दू एवं मुसलमान दोनों जातियों के सहयोग से तथा दोनों के हित पर आधारित होगा। वह चाहता था कि राजपूत तथा हिन्दू मुगलों को विदेशी न समझकर भारतीय समझे।

इस कारण उसने प्रमुख राजपूत राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों तथा मुगलों के सम्बन्ध दृढ़ हो जाएँ। राजपूतों तथा हिन्दुओं के लिए उसने उच्च से उच्च पदों के द्वार खोल दिए। योग्यता के अनुसार पदों का वितरण किया गया, धर्म अथवा जाति के आधार पर नहीं। हिन्दुओं की प्रतिष्ठा, सम्पत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का भार राज्य ने सँभालने का निश्चय किया तथा हिन्दुओं की पूर्ण सहानुभूति प्राप्त करने के लिए अकबर ने उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता भी प्रदान की। उसके हरम में उसकी हिन्दू रानियों को अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी तिलक लगाता एवं सूर्य की उपासना करता था। इस प्रकार उसने राजपूतों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करके उनका पूरा सहयोग प्राप्त किया।

(ii) राजनीति तथा साम्राज्यवादी दृष्टिकोण – अकबर एक दूरदर्शी तथा साम्राज्यवादी सम्राट था। वह यह भली प्रकार जानता था कि उसके पूर्व के मुस्लिम सुल्तानों के वंशों का अल्पकालीन होने का एक प्रमुख कारण राजपूतों की शत्रुता थी। वीर राजपूत जाति अभी तक मुसलमानों को अपना शत्रु समझती थी तथा उनको देश के बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील थी। खानवा के युद्ध में राणा साँगा के नेतृत्व में राजपूतों ने एक महान् किन्तु असफल प्रयास इसीलिए किया था। अकबर यह भी जानता था कि राजपूत स्वभाव के सच्चे, ईमानदार एवं स्वामिभक्त होते हैं और उनको मित्र बनाकर भारी लाभ प्राप्त किया जा सकता है, अत: एक कुशल कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर ने राजपूतों को मुगलों का मित्र बनाने में अपने तथा अपने वंश का कल्याण समझा। इसी उद्देश्य को लेकर उसने ‘राजपूत नीति’ को जन्म दिया। किन्तु अकबर की राजपूत नीति का केवल यही एकमात्र कारण नहीं था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। वास्तव में यदि यही एक कारण रहा होता तो अकबर के पाखण्ड का भण्डाफोड़ उसके जीवनकाल में कभी-न-कभी अवश्य हो गया होता और राजपूतों के सहयोग को प्राप्त करने में वह असफल रहता। अकबर यह जानता था कि बलबन, अलाउद्दीन खिलजी तथा मुहम्मद तुगलक जैसे वीर एवं योग्य सुल्तान भी भारत में स्थायी राज्य स्थापित नहीं कर सके थे। इसका प्रमख कारण राजपत थे, जिनके साथ सल्तानों का व्यवहार हमेशा शत्रतापर्ण रहा था। अतः यदि इन रा मैत्रीपर्ण व्यवहार किया जाए तो इनकी शक्ति का उपयोग मगल साम्राज्य को दृढ़ बनाने के लिए किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से अकबर ने राजपूतों के प्रति सहृदयता एवं मैत्रीपूर्ण व्यवहार का नीति को जन्म दिया।

राजपूत नीति सम्बन्धी कार्य – अकबर ने राजपूतों से निकट का सम्बन्ध स्थापित करने तथा उन्हें प्रेमपूर्वक तथा सद्भावना सहित अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु जो ढंग अपनाए वे प्रधानतया चार प्रकार के थे
(i) धार्मिक सहिष्णुता की नीति – अकबर ने हिन्दुओं को पूर्णत: धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की, यहाँ तक कि उसके हरम की हिन्दू स्त्रियों को मूर्ति पूजा करने की पूरी स्वतन्त्रता थी। अकबर स्वयं भी कभी-कभी हिन्दुओं के रीति-रिवाजों को मनाता था। उसने तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर हटा दिया, अत: राजपूत ऐसे सम्राट को सहयोग देने को सहर्ष प्रस्तुत हो गए, जो उनके धर्म तथा गुणों को मान्यता एवं प्रतिष्ठा प्रदान करता था।

(ii) उच्च पदों पर नियुक्ति – अकबर ने उच्च पदों के द्वार सबके लिए खोल दिए। उसने योग्यता के आधार पर, धार्मिक भेदभाव किए बिना, पदों का वितरण किया। उसके नवरत्नों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धर्मावलम्बी सम्मिलित थे। उसने कछवाहा-नरेश बिहारीमल को पंचहजारी मनसबदार बनाया तथा उसके पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को भी सेना एवं प्रशासन सम्बन्धी उच्च पद प्रदान किए। अकबर के अन्य हिन्दू पदाधिकारियों में राजा टोडरमल तथा राजा बीबरल के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। अकबर ने 1582 ई० में राजा टोडरमल को दीवान-ए-अशरफ अर्थात भू-विभाग का अध्यक्ष बना दिया। राजा बीरबल को उसने अपने नवरत्नों में स्थान दिया और उन्हें सेनापति का भार सौंपकर अपनी साथ नीति को आगे बढ़ाया। जनता ने बीरबल को विनोदप्रियता का प्रतीक मानकर अकबर-बीरबल सम्बन्धी हजारों-लाखों किंवदन्तियाँ गढ़ लीं। इस प्रकार उसकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई। यही नहीं, अकबर की सेना में भी आधे हिन्दू थे तथा उनमें से अनेक सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। अकबर ने बाद में यह अनुभव किया कि हिन्दुओं एवं राजपूतों पर विश्वास करके उसने कोई भूल नहीं की थी।

(iii) वैवाहिक सम्बन्ध – अकबर ने प्रमुख राजपूत राजवंशों की राजकुमारियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए, जिससे राजपूतों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करने में अकबर को सहायता प्राप्त हुई। नार्मन जीग्लर तथा डिक हर्बर्ट आरनॉल्ड कोफ के अनुसार, राजस्थान तथा अन्य स्थानों पर राजपूत सरदारों के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को निश्चित रूप प्रदान करने में इन वैवाहिक सम्बन्धों का विशिष्ट योगदान था। डॉ० बेनी प्रसाद के शब्दों में- “इन वैवाहिक सम्बन्धों से भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देश को प्रसिद्ध सम्राटों की एक परम्परा प्राप्त हुई और मुगल साम्राज्य की चारों पीढ़ियों को मध्यकालीन भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों और योग्य राजनीतिज्ञों की सेवाएँ प्राप्त होती रही।

(iv) अनाक्रमण तथा सामाजिक सुधार – अकबर ने अन्य राज्यों को आत्मसात करने तथा उन पर आक्रमण करने की नीति का परित्याग कर दिया। उसने अपने धन व शक्ति को जनता के कल्याण में लगा दिया। अकबर ने मुस्लिम समाज के साथसाथ हिन्दू समाज के दोषों के निराकरण का भी प्रयास किया, जिससे वह हिन्दुओं के और भी निकट आ गया। उसने अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर देहज प्रथा, सती प्रथा, जाति की जटिलता, बाल-विवाह, शिशु हत्या आदि का विरोध किया तथा इनको सुधारने के लिए नियम भी बनाए। उसने विधवा पुनर्विवाह को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। 1562 ई० के आरम्भ से ही उसने राजाज्ञा देकर युद्धबन्दियों को गुलाम बनाने की प्रथा पर रोक लगा दी। मथुरा के तीर्थयात्रियों पर कर लगाना उसे अनुचित लगा, अतः 1563 ई० में उसने सर्वत्र यात्री-कर समाप्त करने का आदेश दिया। फिर 1564 ई० में उसने जजिया कर को बन्द करवा दिया। इस प्रकार सम्पूर्ण देश के एक विशाल बहुमत की सहानुभूति और शुभकामनाएँ उसे प्राप्त हो गई। अबुल फजल ने लिखा है – “इस प्रकार सम्राट ने लोगों के आचरण को सुधारने का प्रयास किया।

अकबर की राजपूत नीति के परिणाम – अकबर की राजपूत नीति से मुगल साम्राज्य की बहुमुखी उन्नति हुई। राज्य का विस्तार हुआ, शासन व्यवस्था सुदृढ़ हुई, व्यापार को प्रोत्साहन मिला और सैनिक सम्मान में वृद्धि हुई। इन सबके परिणामस्वरूप देश समृद्ध हुआ और सम्राट को राष्ट्र के निर्माण में राजपूतों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ।

(i) मुगलों की शक्ति में वृद्धि – अकबर की सहिष्णुतापूर्ण नीति मुगल वंश के लिए अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुई। युद्ध कौशल में दक्ष राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध जोड़कर अकबर ने एक बहुत बड़ा लाभ यह उठाया कि अब उसे कुशल सैनिकों की भर्ती के लिए पश्चिमोत्तर प्रान्तों का मुँह नहीं ताकना पड़ता था। इससे मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हो गई तथा अकबर के उत्तराधिकारी जब तक इस सहिष्णतापर्ण नीति का अनसरण करते रहे तब तक मगल चलता रहा। इस नीति का परित्याग करते ही मगल वंश का पतन आरम्भ हो गया।

(ii) सद्भावना की प्राप्ति – अकबर की राजपूत नीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि राजपूत, जो अभी तक मुसलमानों के शत्रु रहे थे तथा जिनसे सभी मुस्लिम सुल्तानों को युद्ध करने पड़ते थे, अब मुगल साम्राज्य के आधार स्तम्भ बन गए। अकबर ने अपनी उदार राजपूत नीति के फलस्वरूप न केवल राजस्थान पर अपना सुदृढ़ अधिकार स्थापित कर लिया, वरन् राजपूतों की सहायता से उसने भारत के विभिन्न मुस्लिम राज्यों तथा पश्चिमोत्तर सीमा के कुछ राज्यों को पराजित करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

(iii) विद्रोह दमन में सहायता – इतना ही नहीं; विद्रोही राजपूत राज्यों को दबाने में भी उसने मित्र राजपूत राज्यों से पूरी-पूरी सहायता प्राप्त की। पूर्वी और दक्षिणी विजयों में भी अकबर को राजपूतों से पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई।

(iv) राज्य–विस्तार – मेवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के सभी राज्य अकबर के अधीन हो गए। मेड़ता और रणथम्भौर जैसे राज्यों ने भी युद्ध के उपरान्त मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। आमेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर आदि राज्यों ने अकबर से मित्रता कर ली, जिनको देखकर छोटे-छोटे राज्य जैसे प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा, दुर्गापुर आदि बिना युद्ध के ही अकबर के अधीन हो गए। मेवाड़ के महाराणा प्रताप को इन्हीं राजपूतों की सहायता से अकबर ने 1576 ई० में पराजित किया। अन्य छोटे-छोटे राज्यों को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कराने का श्रेय भी मुख्यत: उन्हीं राजपूतों को है, जो अकबर के सेनापति के रूप में कार्य कर रहे थे, अतः यथाशीघ्र सम्पूर्ण उत्तर भारत में अकबर की वीरता की धाक जम गई और दूसरी और उसकी उदारता का भी व्यापक प्रचार हो गया। अकबर ने राजपूतों की सहायता से केवल एक विशाल साम्राज्य ही अर्जित नहीं किया वरन् उसकी सुव्यवस्थित शासनव्यवस्था भी राजपूतों के सहयोग का ही परिणाम थी। उसने हिन्दुओं को योग्यतानुसार उच्च पदों पर आसीन किया तथा उनकी योग्यता का पूरा लाभ उठाया। राजा टोडरमल उसकी भूमि-व्यवस्था के लिए उत्तरदायी थे, जिनके द्वारा शासक तथा शासित दोनों वर्गों को भारी लाभ पहुँचा। इस प्रकार उसका जाज्वल्यमान युग राजपूतों के सहयोग से ही निर्मित हो सका। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के अनुसार- “राजपूतों के माध्यम से उत्तर भारत के लाखों हिन्दू, अकबर के शुभचिन्तक बन गए और उसकी उन्नति तथा सफलता की प्रार्थना करने लगे।

प्रश्न 8.
अकबर के चारित्रिक गुणों पर प्रकाश डालिए।
उतर.
अकबर ने विभिन्न कार्यक्षेत्रों में अपनी योग्यता एवं प्रतिभा का परिचय दिया। वह एक वीर सैनिक, महान सेनापति, बुद्धिमान शासन-प्रबन्धक, उदार शासक तथा उचित निर्णायक था। वह मनुष्यों का जन्मजात नेता था और इतिहास के शक्तिशाली सम्राटों में गणना किए जाने की क्षमता रखता था। अकबर के व्यक्तित्व एवं चरित्र के विषय में उसके समकालीन इतिहासकारों ने प्रकाश डालने का प्रयास किया है। उसके पुत्र जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ में उसके व्यक्तित्व को बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित किया है। जहाँगीर लिखता है कि वह वास्तव में बादशाह था। संक्षेप में अकबर के व्यक्तित्व एवं चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(i) स्वभाव और रुचियाँ – अकबर विनोदी स्वभाव का था और सदा प्रसन्नचित रहता था। मधुर वचन बोलना उसका स्वभाव था और अहंकार एवं दम्भ से उसे घृणा थी। बच्चों से उसे असीम स्नेह था। उसका क्रोध भी अत्यन्त भयंकर था और क्रोध में वह निर्दयतापूर्ण कार्य भी कर देता था, जैसे आधम खाँ को उसने किले की दीवार पर से दो बार गिराने की आज्ञा दी थी, किन्तु साधारणत: उसका स्वभाव दयालु था तथा उसका क्रोध भी शीघ्र ही शान्त हो जाता था। वह अपने सद्व्यवहार के कारण अपने अमीरों, दरबारियों तथा प्रजाजनों में अत्यन्त लोकप्रिय था।। सम्राट को आखेट में विशेष अभिरुचि थी। वह जंगल में भयंकर-से-भयंकर शेर, चीते तथा हाथी का शिकार करता था। हाथियों के युद्ध तथा पोलो खेलने का उसे अत्यधिक शौक था। अकबर साहसी, धैर्यवान, कठोर परिश्रमी तथा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। पराजित शत्रु के प्रति वह मानवोचित उदार व्यवहार करने में विश्वास रखता था, किन्तु विरोधियों के प्रति वह उतना ही कठोर भी हो जाता था और उन्हें कभी क्षमा नहीं करता था।

(ii) मानसिक गुण – अकबर यद्यपि स्वयं विद्वान नहीं था (सम्भवतः वह निरक्षर था), तथापि उसका व्यवहारिक ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। उसकी व्यवहारिक बुद्धि का लोहा सभी लोग मानते थे। अकबर साहित्य का बड़ा प्रेमी था तथा दूर-दूर के देशों के विद्वान उसके दरबार में आश्रय प्राप्त करते थे। उसके नवरत्नों में अधिकतर विद्वान व्यक्ति ही सम्मिलित थे। अकबर ने एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण करवाया था, जिसमें लगभग 24,000 हस्तलिखित पुस्तकें संगृहीत थीं। तर्क करने में वह इतना कुशल था कि उसको तर्क करते देखकर कोई उसके निरक्षर होने पर विश्वास ही नहीं कर सकता था।

(iii) कला प्रेमी – अकबर को केवल साहित्य से ही नहीं, वरन् ललित कलाओं से भी यथेष्ट अनुराग था। सु-लेखन कला, संगीतकला, भवननिर्माण कला, चित्रकला सभी को उसने राजाश्रय प्रदान किया था और उच्चकोटि के कलाकारों को सम्मानित किया था। वह कलपुर्जा का विशेषज्ञ भी था तथा उसने एक ऐसे यन्त्र का निर्माण किया था, जिससे 17 तोप के गोलों को एक साथ दागा जा सकता था।

(iv) धार्मिक उदारता – अकबर के चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसकी धार्मिक उदारता एवं सहिष्णुता थी। उसने सभी धर्मों के साथ दया, सहानुभूति एवं समानता का व्यवहार किया। वह निष्ठावान तथा ईश्वर में विश्वास रखने वाला व्यक्ति था, किन्तु उसके धार्मिक विचार संकीर्ण न होकर व्यापक थे, जिनका अन्तिम परिणाम दीन-ए-इलाही’ के रूप में प्रस्फुटित हुआ था।

(v) साहित्य का संरक्षक – अकबर गुणग्राही सम्राट था। वह विद्यानुरागी और साहित्य-प्रेमी बादशाह था। उसने विद्वानों, कवियों, लेखकों और साहित्यकारों को उदारता से आश्रय प्रदान किया। इस राज्याश्रय के परिणामस्वरूप अकबर के शासनकाल में उत्कृष्ट ग्रन्थों की रचना हई। इनमें ऐतिहासिक ग्रन्थ, अनवाद के ग्रन्थ और काव्य-ग्रन्थ है। ऐतिहासिक ग्रन्थों में मुल्ला दाउद की तारीख-ए-अल्फी’, बदायूँनी का मुन्तखब-उत-तवारीख’, निजामुद्दीन अहमद का तबकात-एअकबरी’ तथा शेख अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ और ‘आइने-अकबरी’ प्रमुख हैं। उसके काल में संस्कृत, तुर्की, अरबी में लिखे कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद भी किया गया। अकबर के दरबार के ही गिजाली, फैजी, मुहम्मद हुसैन नजीरी, सैयद जमालुद्दीन उर्फी और अब्दुर्रहीम खानखाना ने अनेक काव्य-ग्रन्थों की रचना की।

(vi) शारीरिक गठन, वेशभूषा एवं खानपान – अकबर मझले कद का व्यक्ति था और उसका रंग गेहुंआ था। ऊँचा ललाट, लम्बी भुजाएँ, विशाल वक्षस्थल, सीधी नाक के बाईं ओर सौभाग्य का चिह्न (मस्सा), चमकीले नेत्र, सुदृढ़ तथा निरोग शरीर आदि लक्षण उसे एक सम्राट बना देने के लिए पर्याप्त थे। उसके अंग-प्रत्यंग से उसका महान व्यक्तित्व झलकता था। वह केवल मूंछे रखता था तथा दाढ़ी उसने मुंडवा दी थी। उसकी आवाज तेज और कड़कती हुई थी। वह कठोर परिश्रमी था। एक बार वह एक रात और एक दिन में आगरा से अजमेर तक 240 मील घोड़े पर सवार होकर चला गया था। घड़सवारी का उसे विशेष शौक था। वह बहमल्य वस्त्र धारण करता था और जरी के काम के सन्दर रेशमी वस्त्र तथा रत्नाभूषणों से सुसज्जित पगड़ी पहनता था। अकबर फलों का बहुत शौकीन था। उसने अपनी हिन्दू रानियों का दिल न दुखाने के लिए गो-मांस खाना बन्द कर दिया था, परन्तु सप्ताह में दो बार वह मांस-भक्षण करता था। युवावस्था में वह मद्यपान भी करता था किन्तु बाद में उसने इसका परित्याग कर दिया था। वह पीने के लिए गंगाजल का प्रयोग करता था।

(vii) हँसमुख एवं प्रसन्नचित्त सम्राट – स्वस्थ मनोरंजन अकबर को प्रिय था। फतेहपुर सीकरी में अनेक ऐसे स्थल निर्मित किए गए थे, जहाँ चिन्ताओं से मुक्त होकर सम्राट आमोद-प्रमोद में समय व्यतीत करता था।

(viii) प्रजावत्सल सम्राट- अकबर एक प्रजावत्सल सम्राट था। यद्यपि वह निरंकुशता में विश्वास रखता था तथापि उसकी निरंकुशता प्रजाहित पर आधारित थी, स्वेच्छाचारिता पर नहीं। वह दिन-रात प्रजा के हित के कार्यों में व्यस्त रहता था तथा उसके काल में उसकी प्रजा सुखी व समृद्ध थी। वह न्यायप्रिय था और न्याय के समय सबको समान समझता था। योग्यता तथा प्रतिभा का वह आदर करता था तथा उच्च पदों पर वह योग्य व्यक्तियों को ही नियक्त करता था। सारांश यह है कि अकबर बहुमुखी प्रतिभा वाला सम्राट था। वह कठोर परिश्रमी, उत्साही, धैर्यवान, साहसी, सहिष्णु, उदार, प्रजावत्सल, साहित्य एवं कला का पारखी, राजनीतिज्ञ, गुणग्राही, जिज्ञासु तथा दयावान सम्राट था। उसका स्वभाव नम्र एवं शिष्ट, उसकी बुद्धि कुशाग्र, स्मरण शक्ति विलक्षण तथा उसके आदर्श ऊँचे थे। इन्हीं कारणों से भारत के इतिहास में उसे अत्यन्त उच्च स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 9.
अकबर मुगल शासकों में सर्वश्रेष्ठ भारतीय शासक था’ इस कथन के आलोक में अकबर का मूल्याकंन कीजिए।
उतर.
अकबर मुगल शासकों में सर्वश्रेष्ठ, भारतीय शासकों में महान् और विश्व के शासकों में एक श्रेष्ठ और सम्मानित पद का अधिकारी है। लेनपूल ने उसे भारत के बादशाहों में सर्वश्रेष्ठ बादशाह’ तथा उसके युग को ‘मुगल साम्राज्य का स्वर्णकाल कहा। इतिहासकार स्मिथ जो कई दृष्टिकोणों से अकबर की आलोचना करता है, इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि वह मनुष्यों का जन्मजात बादशाह था।’ इतिहास के सर्वशक्तिशाली बादशाहों में से एक होने का उसका न्यायपूर्ण अधिकार है।

अकबर का व्यक्तित्व सुन्दर और प्रभावशाली था। वह एक आज्ञाकारी पुत्र, प्रिय पति और आदरणीय पिता था। वह अबुल फजल की मृत्यु पर बहुत रोया था और दो दिन तक उसने भोजन ग्रहण नहीं किया था। वह शिक्षित न था, परन्तु उसने विद्वानों को सम्मान और आश्रय दिया। उसने एक पुस्तकालय बनाया, जिसमें 24,000 ग्रन्थ थे। उसे खेलकूद और शिकार का शौक था। कठोर परिश्रम करने तथा कठिनाइयों को बर्दाश्त करना उसका स्वभाव था। उसमें साहस और धैर्य कूट-कूटकर भरा हुआ था। वह धार्मिक दृष्टि से अपने युग का प्रवर्तक था। अकबर भी शराब, अफीम आदि मादक द्रव्यों का सेवन करता था परन्तु वह उनका आदी न था। अकबर ने तत्कालीन अन्य शासकों की भाँति बहुत विवाह किए थे। उसके हरम में करीब 5000 स्त्रियाँ थीं और उनमें उसकी रखैलों की संख्या भी बहुत रही होगी परन्तु जैसा कि प्रति सप्ताह मीना बाजार लगाकर सुन्दर स्त्रियों को खोजना और बीकानेर के पृथ्वीराज राठौर की पत्नी के शील पर आक्रमण करने की चेष्टा आदि किंवदन्तियाँ ठीक प्रतीत नहीं होती।

अकबर एक कुशल और प्रतिभाशाली सेनापति था। उसने सेनापति के रूप में अनेक सैनिक अभियानों में सफलता प्राप्त की। गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए वह जिस तीव्र गति से गया था, वह एक ऐतिहासिक सैनिक अभियान माना गया है। उसके समय में मुगलई सेना अजेय बन गई। संगठन और युद्ध नीति दोनों ही इसके लिए उत्तरदायी थीं और अकबर का इसमें बहुत बड़ा हाथ था। एक शासन-प्रबन्धक की दृष्टि से अकबर में मौलिकता एवं व्यवहारिकता दोनों ही थीं। अकबर के शासन की एक मुख्य विशेषता यह थी कि उसने साम्राज्य के शासन-सूत्र को एक धागे में पिरो दिया था, जिससे मुगल साम्राज्य राजनीतिक स्थायित्व प्राप्त कर सका। एक शासक और राजनीतिज्ञ की दृष्टि से अकबर की धार्मिक उदारता की नीति और राजपूत नीति अद्वितीय थी।

निश्चय ही अकबर ने भारत की सांस्कृतिक एकता की उन्नति के लिए प्रयत्न किए। फारसी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया और विभिन्न भाषाओं के श्रेष्ठ ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया। इसी प्रकार अकबर ललित कलाओं की विभिन्न पद्धतियों में समन्वय स्थापित करने में सफल हुआ। चित्रकला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में इस समय किए गए नवीन प्रयोगों ने भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया।

अकबर ने अनेक सामाजिक कुरीतियों के निराकरण के प्रयास किए। दास प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह, वृद्ध विवाह आदि को रोकने का प्रयत्न किया। अकबर ने जिन उदार और नवीन सिद्धान्तों को जन्म दिया वे इतिहास में दर्ज करने योग्य हैं। उसने हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का प्रयत्न किया। यद्यपि वह इस दिशा में अधिक सफल नहीं हो सका, परन्तु वह पहला मुस्लिम शासक था जिसने इस आवश्यकता को समझा और उसके लिए ठोस कदम उठाए। उसकी राजपूत एवं धार्मिक नीति हमारे कथन की पुष्टि करती हैं। उसकी न्यायिक प्रणाली भी इस सन्दर्भ में विचारणीय है। अकबर की नीति, भावना और प्रयत्न उसे एक राष्ट्रीय शासक के निकट ला खड़ा करते हैं।

इस प्रकार अकबर का चरित्र उदार और प्रभावशाली था। एक व्यक्ति, एक विजेता, एक शासक, एक राजनीतिज्ञ और एक बादशाह की दृष्टि से उसका जीवन सफल और प्रेरणा प्रदान करने वाला था। इसी कारण अकबर को ‘महान’ की पदवी से विभूषित किया गया है। डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव का मानना है कि “अकबर मध्ययुगीन भारत का सबसे महान् सम्राट था और वास्तव में इस देश के सम्पूर्ण इतिहास में सर्वश्रेष्ठ शासकों में से एक था।”

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 10 Environmental Psychology

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 10
Chapter Name Environmental Psychology
(पर्यावणीय मनोविज्ञान)
Number of Questions Solved 62
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 10 Environmental Psychology (पर्यावणीय मनोविज्ञान)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरणीय मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
पर्यावरणीय मनोविज्ञान की विशेषताएँ लिखिए।(2015)
उत्तर

भूमिका
(Introduction) 

पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Evironmental Psychology) मनोविज्ञान की नवीनतम शांखा है। इसका विकास बीसवीं सदी के सातवें दशक उत्तरार्द्ध और आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में हुआ। इसकी पृष्ठभूमि में विश्व के जागरूक वैज्ञानिकों एवं सामाजिक चिन्तकों की पर्यावरण-प्रदूषण से उत्पन्न मानव अस्तित्व के संकट के प्रति बढ़ती हुई जागरूकता भी। इस संकट से उबरने के उपायों की खोज ने पर्यावरणीय मनोविज्ञान के विकास को गति प्रदान की है। पर्यावरणीय संकट एक वस्तुस्थिति है। जिसने इस पृथ्वी पर जीवन समर्थक शक्तियों का तीव्र ह्रास कर दिया है, जिससे मानव-जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। इसलिए पर्यावरणीय मनोविज्ञान का महत्त्व स्वयं सिद्ध हो गया है।

पर्यावरणीय मनोविज्ञान : अर्थ एवं परिभाषा
(Environmental Psychology: Meaning and Definition)

‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ यदि हम देखें तो यह दो शब्दों से मिलकर बना है-‘पर्यावरण एवं ‘मनोविज्ञान’। पर्यावरण से अर्थ उस सब-कुछ से है जो मनुष्य को चारों ओर से घेरे हुए है और मनुष्य के तन-मन एवं व्यवहार को प्रभावित करता है। पर्यावरण’ की शब्दोत्पत्ति ही परि’ (चारों ओर से) + ‘आवरण’ (घेरे हुए होना) है। इस दृष्टि से ‘पर्यावरण’ एक व्यापक शब्द है। मनुष्य के कुल पर्यावरण में प्राकृतिक (Natural) तथा सामाजिक-सांस्कृतिक (Socio-cultural) दोनों ही भाग सम्मिलित हैं। प्राकृतिक पर्यावरण जल, वायु, तापमान, भूमि की बनावट तथा भूगर्भीय संरचना एवं प्रक्रियाएँ और सम्पदाएँ अर्थात् वे सभी प्राकृतिक बल सम्मिलित हैं जो अभी तक मनुष्य के संकल्प और नियन्त्रण से बाहर हैं। जो कुछ मानव द्वारा निर्मित, संचालित और नियन्त्रित है, वह उसका सामाजिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण है। ”

मनुष्य स्वयं प्रकृति का एक अंश है। वह जल, वायु, आकाश, अग्नि तथा पृथ्वी; अर्थात् पंचतत्त्वों का एक पुतला है; अतः इसका प्राकृतिक पर्यावरण से प्रभावित होना स्वाभाविक है, किन्तु वह प्रकृति के हाथ में नि:सहाय और निष्क्रिय खिलौना नहीं है। उसने अपने जागरूक प्रयासों से प्राकृतिक बाधाओं पर विजय पाने और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से अपने लिए सुख-सुविधा के साधनों के विकास का प्रयास किया है। मानव-सभ्यता की कहानी का अधिकांश तथ्य मनुष्य की प्रकृति पर विजय है, लेकिन इस सभ्यता के विकास ने विपरीत परिणाम भी दिये हैं। भौतिक सुख की चाह ने प्राकृतिक सन्तुलन में व्यवधान पहुँचाया है और पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। वास्तव में, मानव अपने कुल पर्यावरण की उपज है। वह उसका भाग भी है। यदि उसके व्यवहार ने पर्यावरण सन्तुलन को बिगाड़ा है। तो उसका व्यवहार ही पर्यावरण सन्तुलन को पुनस्र्थापित करने में सक्षम हो सकता है।

मनोविज्ञान मनुष्य की अन्तश्चेतना का व्यवस्थित अध्ययन है। यह मनुष्य के मानसिक जगत् की प्रक्रियाओं का व्यवस्थित अध्ययन है। मनुष्य का अस्तित्व वस्तुतः भावात्मक प्रवाह है। यह प्रवाह त्रिआयामी है—ज्ञानात्मक (Cognitive), भावात्मक (Affective) एवं क्रियात्मक (Conative or Psychomotor activity)। पर्यावरण के किसी भी अंश के प्रति वह अपनी प्रतिक्रिया इन तीनों ही रूपों में अभिव्यक्त करता है। इसी भाँति, उसके प्राकृतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण का प्रत्येक संघटक उसके ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक व्यवहार को प्रभावित करता है।

अँधेरे में आँखों की पुतली फैल जाती है तो प्रकाश में सिकुड़ जाती है, शाकाहारी समाज में पला व्यक्ति मांस की दुकान के पास से गुजरने-मात्र से वितृष्णा अनुभव करता है, उसे मितली आने लगती है, जबकि मांसाहारी परिवेश में पले व्यक्ति के मुँह में मांसाहारी भोजन को देखकर लार आ सकती है। | स्पष्ट है कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही पर्यावरण मनुष्य के मानसिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। मनोविज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जो मनुष्य के मानसिक व्यवहार के रहस्य के पर्दो को उठाने का प्रयास करती है। | इस भाँति पर्यावरणीय मनोविज्ञान को हम मनुष्य के मानसिक व्यवहार तथा पर्यावरण के बीच अन्तर्सम्बन्ध के अध्ययन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।

विभिन्न विद्वानों ने पर्यावरणीय मनोविज्ञाम् की परिभाषा निम्नलिखित रूप से की है ।

(1) प्रोशैन्सकी, लिट्रेलसन तथा रिवलिन के अनुसार, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान वह है जो पर्यावरणीय मनोवैज्ञानिक करते हैं।’यह परिभाषा सरल तो है, किन्तु पर्यावरणीय मनोविज्ञान की विषय-वस्तु को स्पष्ट नहीं करती और इसका एक अस्पष्ट अर्थ दान करती है।

(2) हेमस्ट्रा तथा मैकफारलिंग का कथन है, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो मानव-व्यवहार तथा भौतिक वातावरण के परस्पर सम्बन्धों का अध्ययन करती है।”

इन विद्वानों के दृष्टिकोण के अनुसार पर्यावरणीय मनोविज्ञान का अर्थ सीमित हो जाता है, क्योंकि ये मनुष्य के पर्यावरण के केवल प्राकृतिक पक्ष तथा मानव-व्यवहार के पारस्परिक सम्बन्ध तक ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र को सीमित कर देते हैं।

(3) फिशर के अनुसार, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान व्यवहार तथा प्राकृतिक एवं निर्मित पर्यावरण के बीच अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन करता है। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि मानवीय व्यवहार तथा प्राकृतिक एवं मानव निर्मित पर्यावरण के पारस्परिक प्रभावित होने के व्यवस्थित अध्ययन को पर्यावरणीय मनोविज्ञान कहा जाता है।

(4) कैटर तथा क्रेक पर्यावरणीय मनोविज्ञान की सही परिभाषा करते हुए लिखते हैं, पर्यावरणीय मनोविज्ञान विज्ञान का वह क्षेत्र है जो मानवीय अनुभवों और क्रियाओं तथा सामाजिक एवं भौतिकी पर्यावरण के प्रासंगिक पक्षों में होने वाले व्यवहारों तथा अन्तक्रियाओं का संयोजने और विश्लेषण करता है। स्पष्ट है कि इन विद्वानों के अनुसार मनुष्य के कुल पर्यावरण एवं मानवीय व्यवहार के बीच अन्तर्सम्बन्धों का आनुभविक अध्ययन ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान है।

पर्यावरणीय मनोविज्ञान की विशेषताएँ
(Salient Features of Environmental Psychology)

वास्तव में, किसी भी विषय का अनूठापन उसके दृष्टिकोण में निहित होता है। यही उसे अन्य विषयों से अलग करता है। पर्यावरणीय मनोविज्ञान का दृष्टिकोण अथवा उसकी रुचि मानव-व्यवहार और उसके कुल पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों को जानने में है। यही चयनशील रुचि उसे अन्य विज्ञानों से पृथक् करती है और उसकी निजी विशेषताओं को जन्म देती है। पर्यावरणीय मनोविज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

(1) मनुष्य का पर्यावरणीय व्यवहार इकाई रूप है- पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनुष्य के पर्यावरणीय व्यवहार को एक इकाई के रूप में मानकर अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए यह किसी नगरवासी के पर्यावरणीय व्यवहार में केवल उद्दीपक और अनुक्रिया को ही स्पष्ट नहीं करेगा, बल्कि उस व्यक्ति के सौन्दर्यबोध की अनुभूति को भी इस स्पष्टीकरण में सम्मिलित करेगा। वह जानने का प्रयास करेगा कि उस व्यक्ति ने उस विशिष्ट उद्दीपक को पर्यावरणीय दृष्टि से क्या अर्थ प्रदान किया है? उसके पिछले अनुभव क्या रहे हैं? उस स्थिति के पर्यावरण में उसने किन विशेषताओं  पर विशेष रूप से ध्यान दिया है-आदि।

(2) व्यवस्था उपागम- मनोविज्ञान की इस शाखा की मान्यता है कि कोई पर्यावरणीय व्यवहार एक समग्र सैटिंग (Setting) या मंच के रूप में होता है। मान लीजिए हम किसी सहभोज में आमन्त्रित हैं। वहाँ पण्डाल में भोजन की मेजें सजी हैं और काफी भीड़-भाड़े है। वहाँ की सजावट, रोशनी की व्यवस्था सभी कुछ हमें प्रभावित करेगा। हम पाएँगे कि भीड़-भाड़ के बावजूद भी व्यक्ति अपनी प्लेट में रुचि के अनुकूल खाने की सामग्री लेकर अलग-अलग छोटे-छोटे समूहों में बँट जाते हैं।

वे भोजन करते समय भी परस्पर परिचय, अभिवादन, संवाद और अन्तक्रिया करते हैं। उसे पूरी सैटिंग से उनका व्यवहार प्रभावित होता है। सहभोज में एक व्यक्ति का व्यवहार इस पूरी पर्यावरणीय सैटिंग से पृथक् करके नहीं समझा जा सकता। इसे ही तकनीकी भाषा में व्यवस्था उपागम’ (System Approach) कहा गया है, जिसमें व्यवहार-स्थल की प्रत्येक इकाई को ध्यान में रखकर किसी एक इकाई के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।

(3) अन्तःअनुशासित दृष्टिकण- स्वभावतः ही , पर्यावरणीय मनोविज्ञान अन्री:अनुशासित (Inter-disciplinary) होता है। इसमें संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, प्रेरक, उद्दीपक व अनुक्रिया सदृश मनोविज्ञान के संप्रत्ययों का प्रयोग होता है। इतना ही नहीं वरन् इसमें समाजशास्त्र के सामाजिक सम्बन्ध, सामाजिक क्रिया, अन्तक्रिया, भीड़-व्यंत्रहार जैसे—सम्प्रत्ययों का भी प्रयोग होता है। मानवशास्त्र के सांस्कृतिक सम्प्रत्ययों; जैसे—प्रथा व रूढ़ि आदि का भी इसमें सहयोग लिया जाता है। कारण स्पष्ट है कि मानव का पर्यावरणीय व्यवहार अपने समग्र पर्यावरण से प्रभावित होता है, न कि केवल उसके प्राकृतिक पक्ष से। उदाहरण के तौर पर बुजुर्ग और सम्मानित व्यक्तियों की उपस्थिति में किसी भी व्यक्ति का व्यवहार वैसा नहीं होता है जैसा कि वह अपने हम उम्र साथियों के बीच होने पर करता है। इसी भाँति भीड़ में सामूहिक उत्तेजना और निजी उत्तरदायित्व की भावना की अनुपस्थिति व्यक्ति के व्यवहार को असामान्य बना देती है। वह ऐसा व्यवहार कर बैठता है जैसा अकेला होने पर वह शायद कभी न करता। अतः पर्यावरणीय व्यवहार का अध्ययन अन्त:अनुशासनिक दृष्टिकोण के प्रयोग को अनिवार्य बना देता है।

(4) समस्या समाधान हेतु रचनात्मक उपाय– पर्यावरणीय मनोविज्ञान का व्यावहारिक पक्ष उतना ही महत्त्व रखता है जितना कि सैद्धान्तिक पक्ष; क्योंकि पर्यावरणीय मनोविज्ञान का मूल उद्देश्य पर्यावरणीय व्यवहार से उत्पन्न समस्याओं का निदान अथवा समाधान होता है। उससे आशा की जाती है कि वह पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक उपाय सुझाएगा।

(5) सामाजिक- मनोवैज्ञानिक तत्त्वों का प्रभाव पर्यावरणीय मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान के बीच न सिर्फ समानता है अपितु घनिष्ठ सम्बन्ध भी है। मनुष्य का पर्यावरणीय व्यवहार उसके सामाजिक-मनोवैज्ञानिक तत्त्वों से अत्यधिक प्रभावित होता है और उन्हीं के वशीभूत होकर व्यक्ति एक ही पर्यावरणीय उद्दीपक के प्रति विभिन्न अनुक्रियाएँ करता है। उदाहरणार्थ-सूअर पालने वाले व्यक्तियों के लिए गन्दगी का पर्यावरण सहयोगी हो सकता है, किन्तु अन्य व्यक्तियों के लिए वह स्थिति असहनीय हो सकती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान के बीच परस्पर आदान-प्रदान का सम्बन्ध है।

(6) पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक संश्लेषणात्मक विज्ञान है- पद्धतिशास्त्र की दृष्टि से पर्यावरणीय मनोविज्ञान’को एक संश्लेषणात्मक विज्ञान (Synthetic Science) कहा जा सकता है। इसकी पद्धतिशास्त्रीय के उपागम संकलक (Electic) होता है। वह किसी एक कारक को निर्णायक की भूमिका प्रदान नहीं कर सकता, वह वह तो अनेक विज्ञानों के निष्कर्षों का लाभ उठाता है। इसी प्रकार वह विभिन्न अनुसन्धान पद्धतियों का प्रयोग करता है। उसका दृष्टिकोण है कि विभिन्न स्रोतों से विचार और जानकारी आने दो, उनका संचालन करो और फिर व्यवस्थित रूप से पर्यावरणीय संश्लेषण प्रस्तुत करो।

प्रश्न 2
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के स्वरूप तथा उसकी प्रकृति का विवेचन कीजिए।
उत्तर
ज्ञान की प्रत्येक शाखा के सम्बन्ध में यह एक जिज्ञासा सदा से ही उभरी है कि उसका यथार्थ स्वरूप या प्रकृति क्या है? उसे विज्ञान की श्रेणी में रखा जाये अथवा कला की श्रेणी में? वैज्ञानिक निष्कर्ष जबकि कला में व्यवहार या निषपत्ति का पक्ष प्रबल होता है। दूसरे शब्दों में, विज्ञान में सैद्धान्तिक पक्ष और कला में व्यावहारिक पक्ष शक्तिशाली होता है। अब हम बारी-बारी से पर्यावरणीय मनोविज्ञान के वैज्ञानिक एवं कलात्मक स्वरूपों का अध्ययन करेंगे।

पर्यावरणीय मनोविज्ञान का स्वरूप 

पर्यावरणीय मनोविज्ञान के स्वरूप की विवेचना हमें दो प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है—एक, क्या यह विज्ञान की आदर्श कसौटी पर एक विज्ञान कहा जा सकता है? और दूसरे, यदि यह विज्ञान है तो उसे किस प्रकार का विज्ञान कहा जाये अर्थात् विज्ञान के रूप में उसकी पृथक पहचान बनाने वाली विशेषताएँ कौन-सी हैं? दोनों प्रश्नों का संक्षिप्त विवेचन अग्रलिखित रूप में किया जा रहा है

(I) पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक विज्ञान है।
यह तो सर्वविदित है कि विज्ञान अन्तर्वस्तु या विषय-वस्तु में नहीं होता, वह तो किसी भी विषय-वस्तु के अध्ययन करने के तरीकों में निहित होता है। यही कारण है कि भूगर्भशास्त्र, खगोलशास्त्र, मनोविज्ञान, जीवविश्न, भौतिक विज्ञान आदि अलग-अलग विषयों का अध्ययन करते हुए भी विज्ञान कहलाते हैं; क्योंकि उनके अध्ययन की पद्धति समान है और उनके अध्ययनों से प्राप्त निष्कर्षों की गुणात्मकता भी समान हैं वैज्ञानिक पद्धति तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण, विश्लेषण, निर्वजन और सामान्यीकरण पर आधारित है। यह तथ्यात्मक अध्ययन है, व्यवस्थित अध्ययन है।

अत: विज्ञान के निष्कर्ष सामान्य, निश्चित, कार्य-कारण सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाले तथा भविष्यकथन करने वाले होते हैं। विज्ञान किसी भी प्रघटना के सम्बन्ध में तीन प्रश्नों का उत्तर खोजना है-क्या है? कैसे है? और क्यों है? इन प्रश्नों के उत्तर के रूप में उपलब्ध ज्ञान को व्यवहार में लागू करके कैसे मानव-व्यवहार, व्यक्तित्व और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है-यह विज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है। इसी कारण इसे व्यावहारिक विज्ञान (Applied Science) कहते हैं। भौतिकशास्त्र विशुद्ध विज्ञान है तो इलेक्ट्रिक इन्जीनियरिंग या इलेक्ट्रॉनिक्स उसका व्यावहारिक विज्ञान है।

उपर्युक्त पृष्ठभूमि में पर्यावरणीय मनोविज्ञान को यदि परखा जाये तो निश्चित ही उसे हम विज्ञान की श्रेणी में रखेंगे। इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

(1) अन्तर्सम्बन्धों का यथार्थवादी अध्ययन- पर्यावरणीय मनोविज्ञान; पर्यावरण और मनुष्य के व्यवहार के बीच अन्तर्सम्बन्धों का यथार्थवादी अध्ययन है। यह इस अन्तर्सम्बन्ध कि ‘क्या है?’-को तथ्यात्मक विवेचन है। यह तथ्यों के अवलोकन, वर्गीकरण, विश्लेषण और सामान्यीकरण पर आधारित है।

(2) कार्य-कारेण की व्याख्या- यह विज्ञान पर्यावरण और मनुष्य के व्यवहार के बीच अन्तक्रिया की कार्य-कारण व्याख्या प्रस्तुत करता है। उदाहरणार्थ-यह व्यक्ति-व्यक्ति के बीच दूरी (Personal space) जैसे सूक्ष्म पर्यावरणीय प्रघटना का भी अध्ययन करता है। चारों ओर भीड़ से घिरे नेता या अभिनेता की व्यवहार बिल्कुल अलग होता है। हम अपने बड़ों या सम्मानित व्यक्तियों से कुछ दूरी से बात करते हैं; जबकि बच्चा हमारे समीपतम आ सकता है और वह हमें अच्छा लगेगा, बुरा महसूस नहीं होगा। इस प्रकार से एक ही मेज पर खाने वाले दो व्यक्तियों के बीच अचेतन रूप से मेज के ‘स्पेस’ (Space) का बँटवारा हो जाता है। कोई भी उन अचेतन सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करता क्योकि वह अशिष्टता या आक्रामकता ही मानी जाएगी।

(3) एक सामाजिक विज्ञान- पर्यावरणीय मनोविज्ञान ऐसे निष्कर्षों पर पहुँचने का प्रयास करता है जिन पर स्थान या समय की सीमा लागू नहीं होती अर्थात् वे सामान्य रूप से हर जगह घटित होते हैं। इतना अवश्य ही कहा जा सकता है कि वे उतने सामान्य ठोस और भविष्यवाणी योग्य नहीं होते जितने कि प्राकृतिक विज्ञानों के निष्कर्ष। कारण स्पष्ट है-उनके अध्ययन-विषय चेतन, संकल्पशील और प्रतिक्रियाशील मनुष्य हैं, वे कोई निर्जीव प्राकृतिक घटनाएँ नहीं हैं। अत: पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक विज्ञान नहीं।

(4) प्रयोगशालीय पद्धति का प्रयोग- पर्यावरणीय मनोविज्ञान नियन्त्रित अवस्था में प्रयोगशालीय पद्धति का भी प्रयोग करता है। उदाहरणार्थ-सघनता (Density) तथा व्यवहार के परस्पर सम्बन्धों को जानने के लिए अनुसन्धानकर्ताओं ने प्रयोगशालाओं में अनेक अध्ययन किये हैं। और पाया है कि उच्च सघनता का; व्यवहार तथा संवेगों पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार तापमान और मनुष्य की कार्यक्षमता के बीच सम्बन्ध का भी प्रयोगशाला में अध्ययन किया गया है। कई शताब्दियों पूर्व अरस्तू ने कहा था कि ठण्डी जलवायु में रहने वाले लोग ज्यादा परिश्रमी, कर्मठ और जोखिम उठाने वाले होते हैं। इसी भाँति, यह भी पाया गया है कि दुर्गन्धमय वायु प्रदूषण न सिर्फ अन्य लोगों के प्रति आकर्षण को कम कर देता है वरन् छायांकन तथा चित्रकारी के प्रति अनुकूलन अभिवृत्ति को भी कम कर देता है।

(5) आदर्शात्मक पक्ष– पर्यावरणीय मनोविज्ञान का आदर्शात्मक पक्ष (Normative Aspect) भी है। इसके अध्ययनों से उन कसौटियों के निर्धारण में सहायता मिलती है जो मनुष्य के स्वास्थ्य, व्यवहार और समायोजन के लिए आदर्श पर्यावरण का निर्धारण करने में सक्षम हैं। जैसे—चिकित्सा विज्ञान स्वस्थ मर्नुष्य के आदर्श तापमान का निर्धारण 98.4°F के रूप में करता हैं। इस आदर्श से कम या ज्यादा तापमान होना अस्वस्थता का सूचक है। इसी प्रकार वह मनुष्य के व्यवहार की दृष्टि से पर्यावरणीय दशाओं में आदर्श स्वरूप का निर्धारण करने की चेष्टा करता है।

(6) व्यावहारिक विज्ञान- पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक व्यावहारिक विज्ञान (Applied science) भी है। इसका मूल उद्देश्य उन उपायों, साधनों एवं पद्धतियों का सुझाना है जिनके द्वारा पर्यावरण संरक्षण तथा पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का समाधान किया जा सके। इसका प्रमुख लक्ष्य मनुष्य को विशुद्ध बनाकर उसके वैयक्तिक और सामाजिक जीवन का क्रमागत उन्नयन है।

(7) बहु- आयामी एवं अन्तः अनुशासनिक मनोविज्ञान-जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है; एक बात पुनः ध्यान दिलाने योग्य है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान बहुआयामी और अन्त:अनुशासनिक मनोविज्ञान है। यह मनुष्य के प्राकृतिक, वैयक्तिक तथा सामाजिक पहलुओं का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से अध्ययन करता है।

(8) संकलक एवं संश्लेषणात्मक विज्ञान– अन्त में, यह भी उल्लेखनीय है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान संकलक (Electic) तथा संश्लेषणात्मक (Synthetic) विज्ञान है जो अनेक विज्ञान के विशिष्ट क्षेत्रों से तथ्य लेकर मनुष्य और उसके पर्यावरण के सम्बन्ध में व्यवस्थित ज्ञान प्रस्तुत करता है।
 इस तरह से पर्यावरण मनोविज्ञान सामान्य, कार्य-कारण का सम्बन्ध स्थापित करने वाला, सामाजिक, प्रयोगशालीय, आदर्शात्मक, व्यावहारिक, अन्तर्विज्ञानी, बहुआयामी तथा संश्लेषणात्मक विज्ञान है।

(II) पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक कला है।

किसी भी विज्ञान का स्वरूप निर्धारण करते समय कभी-कभी यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि वह विज्ञान है या कला अथवा दोनों ही है? पर्यावरणीय मनोविज्ञान के सम्बन्ध में इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि कला क्या है? कला के अर्थ को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है। मोटे तौर पर कला के अर्थ के सम्बन्ध में तीन प्रकार के मत पाये जाते हैं

(1) कला सृजनात्मक क्रिया के रूप में- कला में कल्पना का तत्त्व होता है जिसके द्वारा चित्रकार, संगीतकार, मूर्तिकार, नर्तक अथवा स्थापत्य कलाविद् अपने-अपने क्षेत्रों में सौन्दर्यमयी निष्पत्ति करते हैं।

(2) कला मनुष्य और समाज की स्थिति का यथार्थवादी प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण है- कुछ विद्वानों के अनुसार, कला समाज का दर्पण है। कलाकार जो कुछ भी मनुष्य या समाज के व्यवहार में देखता है और उससे स्पन्दित या उद्वेलित होता है, उसी को अपनी लेखनी, तूलिका, छेनी-हथौड़े या रेखांकन द्वारा विभिन्न माध्यमों से अभिव्यक्त करता है। यही कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति सिर्फ सौन्दर्यमूलक ही नहीं होती बल्कि वह वितृष्णा, वीभत्सता या कुरूप घटनाओं का भी चित्रण करता है। इस दृष्टि से कला वैयक्तिक और सामाजिक यथार्थ की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।

(3) कला आनन्दमूलक क्रिया के रूप में- आदर्शवादी विद्वान कला को उस क्रिया के रूप में परिभाषित करते हैं जो मनुष्य के हृदय में आनन्द की तरंगें उत्पन्न करती है। कला वह जो आनन्द लाये। आनन्द आत्मा का लक्षण है। इस दृष्टि से कला आध्यात्मिक साधन है। भारत में परम्परागत कला, चाहे वह किसी भी रूप में रही हो, ईश्वर की लीलाओं की अभिव्यक्ति है या ईश्वर के प्रति कलाकार के समर्पण को ही अभिप्रकाशित करती है। कला मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार करने में सहायता देती है। कलाकार कला के माध्यम से ‘स्व’ (Self) की उपलब्धि करता है।

वास्तव में, कला की उपर्युक्त परिभाषाओं से कला के कुछ सामान्य तत्त्व प्रकट होते हैं जिनके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि कोई मानवीय व्यवहार या क्रिया कला है या नहीं। कला के ये सामान्य तत्त्व अग्रलिखित हैं|

(1) कला वस्तुत: कला है, विचार नहीं। यह निष्पादन में निहित है। कला के शास्त्रीय स्वरूप का समीक्षक, आलोचक या विद्वान् वैज्ञानिक तो हो सकता है किन्तु यदि वह स्व का निष्पादन नहीं कर सकता तो वह कलाकार नहीं कहा जा सकता।

(2) कला भी व्यवस्थित क्रिया है। एक वैज्ञानिक जब अपने निष्कर्षों को शब्दों व रेखाचित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। तब उसकी निजी शैली और अभिव्यक्ति की क्षमता अलग ही प्रकट होती है, तब वह वैज्ञानिक साहित्य या साहित्यकार बन जाता है। अव्यवस्थित क्रिया कभी कला नहीं हो सकती। प्रत्येक कला का अपना वैज्ञानिक पक्ष भी है।

(3) प्रत्येक कला में कल्पना और सृजन के तत्त्व होते हैं। वे प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। यहाँ भी यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो विज्ञान में भी कल्पना और सृजन के तत्त्व मौजूद होते है।। विज्ञान का प्रारम्भ ही कल्पना से है; अतः पूर्वानुमान को परिकल्पना (Hypothesis) कहा जाता है। जेम्स वाट का यह अनुमान कि भाप में शक्ति है; प्रमाणित होने पर ऊर्जा के महान् स्रोत का सृजन हो गया।

इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि विज्ञान और कला के बीच रेखा बड़ी धुंधली-सी है। वह केवल अध्ययन-विश्लेषण के लिए बनायी गयी है। विज्ञान में सैद्धान्तिक या वैचारिक पक्ष प्रबल है, जबकि कला में क्रियात्मक, व्यावहारिक या निष्पादन सम्बन्धी पक्ष प्रबल है। वस्तुत: प्रत्येक कला का वैज्ञानिक पक्ष होता है और प्रत्येक विज्ञान का कलात्मक पहलु।

उपर्युक्त कसौटी के आधार पर निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पर्यावरणीय मनोविज्ञान एक विज्ञान है,कला नहीं, किन्तु इसका कलात्मक अथवा व्यावहारिक पक्ष भी अत्यन्त प्रबल है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य के पर्यावरण का संवर्द्धन एवं संशोधन करना है ताकि मनुष्य का सौन्दर्य-बोध बढ़े।और उसका जीवन आनन्दमय हो सके। इस दृष्टि से पर्यावरण मनोविज्ञान एक विज्ञान भी है और एक कला भी।

प्रश्न 3
पर्यावरषा-प्रदूषण से क्या आशय है? पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूप कौन-कौन-से हैं?
पर्यावरण-प्रदूषण के प्रमुख सामान्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
पर्यावरणीय प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? (2010)

पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ 

पर्यावरण- प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है कि जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाये तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। पर्यावरण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाएगा।

पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूप

पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य रूप या भाग निम्नलिखित हैं

  1. वायु-प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण।।
    (नोट-पर्यावरण-प्रदूषण के प्रकारों का विस्तृत विवरण लघु उत्तरीय प्रश्नों के अन्तर्गत वर्णित हैं।)

पर्यावरण- प्रदूषण के प्रमुख सामान्य कारण पर्यावरण-प्रदूषण अपने आप में एक बहुपक्षीय तथा व्यापक समस्या है तथा इस समस्या की निरन्तर वृद्धि हो रही है। पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण अनेक हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषण के लिए भिन्न-भिन्न कारण जिम्मेदार हैं, परन्तु यदि पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य तथा सामान्य कारणों का उल्लेख करना हो तो अग्रलिखित कारण ही उल्लेखनीय हैं|

(1) जल-मल का दोषपूर्ण विसर्जन- पर्यावरण-प्रदूषण का सबसे प्रबल कारण आवासीय क्षेत्रों में जल-मल का दोषपूर्ण विसर्जन है। खुले शौचालयों से उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध वायु-प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान देती है। वाहित मल से जल के विभिन्न स्रोत प्रदूषित होते हैं। घरों में इस्तेमाल होने वाला जल भी विभिन्न घरेलू क्रियाकलापों से अत्यधिक प्रदूषित हो जाता है तथा नाले-नालियों के माध्यम से होता हुआ जल के मुख्य स्रोतों में मिल जाती है तथा उन्हें प्रदूषित कर देता है।

(2) घरों से विसर्जित अवशिष्ट पदार्थ- सभी घरों में अनेक ऐसे पदार्थ इस्तेमाल होते हैं जो पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि करने वाले होते हैं। उदाहरण के लिए घरों में इस्तेमाल होने वाले फिनायल, मच्छर मारने वाले घोल, डिटर्जेन्ट, शैम्पू, साबुन तथा अनेक कीटनाशक ओषधियाँ घरों से विसर्जित होकर जल, वायु तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं।

(3) निरन्तर बढ़ने वाला औद्योगीकरण- पर्यावरण प्रदूषण का एक सामान्य तथा मुख्य कारण है—निरन्तर बढ़ने वाला औद्योगीकरण। औद्योगिक संस्थानों से जहाँ एक ओर वायु-प्रदूषण होता है, वहीं दूसरी ओर उनमें इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री के अवशेष आदि वायु, जल तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक संस्थानों में चलने वाली मशीनों, सायरनों तथा अन्य कारकों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

(4) दहन तथा उसमें उत्पन्न होने वाला धुआँ– आज सभी क्षेत्रों में दहन की दर में वृद्धि हुई है। घर के रसोईघर से लेकर भिन्न-भिन्न प्रकार के वाहनों तथा औद्योगिक संस्थानों में सभी कार्य दहन द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। विभिन्न प्रकार के ईंधनों के दहन से अनेक विषैली गैसे, धुआँ तथा कार्बन के सूक्ष्म कण पर्यावरण में निरन्तर व्याप्त होते रहते हैं। ये सभी कारक वायु प्रदूषण को अत्यधिक बढ़ाते हैं। |

(5) कीटनाशक दवाओं के प्रयोग में वृद्धि– विभिन्न कारणों से आज कृषि एवं उद्यान-क्षेत्र में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग निरन्तर बढ़ रहा है। इन कीटनाशक दवाओं द्वारा पर्यावरण-प्रदूषण में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। इससे वायु, जल तथा मिट्टी तीनों ही प्रदूषित हो रहे हैं।

(6) जल-स्रोतों में कूड़ा-करकट तथा मृत शरीर बहाना- नगरीय एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के कूड़े के विसर्जन की समस्या निरन्तर बढ़ रही है। इस स्थिति में कूड़े-करकट तथा प्राणियों के मृत शरीरों को जल-स्रोतों में बहा दिया जाता है। इस प्रचलन के कारण जल-प्रदूषण में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस प्रकार से प्रदूषित होने वाला जल क्रमशः वायु तथा मिट्टी को भी प्रदूषित करता है।

(7) वनों की अधिक कटाई- पर्यावरण प्रदूषण का एक मुख्य कारण वनों की अन्धाधुन्ध कटाई भी है। वृक्ष वायु को शुद्ध करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। जब वृक्ष कम होने लगते हैं तो वायु-प्रदूषण की देर में भी वृद्धि होती है।

(8) रेडियोधर्मी पदार्थ- रेडियोधर्मी पदार्थों द्वारा भी पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। विभिन्न आणविक परीक्षणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों ने पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत अधिक वृद्धि की है। इस कारण से होने वाला पर्यावरण प्रदूषण अति गम्भीर होता है तथा इसका प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यों, अन्य प्राणियों तथा सम्पूर्ण वनस्पति-जगत पर भी पड़ता है।

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण की रोकथाम कैसे करेंगे?
उत्तर

पर्यावरणीय प्रदूषण की रोकथाम

प्रदूषण की समस्या पर विचार करने से यह स्पष्ट हो गया है कि यह एक गम्भीर समस्या है तथा इसके विकराल रूप धारण करने से मानव-मात्र तो क्या, पूरी सृष्टि के अस्तित्व को खतरा हो सकता है। इस स्थिति में बढ़ते हुए पर्यावरणीय-प्रदूषण को नियन्त्रित करना नितान्त आवश्यक है। यह सत्य है।

कि प्रदूषण का मुख्यतम स्रोत औद्योगिक संस्थान हैं, परन्तु औद्योगीकरण के क्षेत्र में हम इतना आगे बढ़ चुके हैं कि उससे पीछे कदम रखना अब सम्भव नहीं। अतः पर्यावरण के प्रदूषण को रोकने के लिए हम औद्योगिक प्रगति को नहीं रोक सकते, बल्कि कुछ अन्य उपाय करके ही प्रदूषण को नियन्त्रित करना होगा। विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को कम करने के कुछ मुख्य उपायों का संक्षिप्त परिचय अग्रवर्णित है

(1) वायु-प्रदूषण पर नियन्त्रणवायु- प्रदूषण के मुख्य स्रोत औद्योगिक संस्थान, सड़कों पर चलने वाले वाहन तथा गन्दगी हैं। अतः वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए इन्हीं स्रोतों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए अंति आवश्यक है कि औद्योगिक संस्थानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ कों नियन्त्रित किया जाए। इसके लिए दो उपाय अवश्य किये जाने चाहिए। प्रथम यह कि चिमनियाँ बहुत ऊंची होनी चाहिए ताकि उनसे निकलने वाली दूषित गैसें काफी ऊँचाई पर वायुमण्डल में मिलें और पृथ्वी पर इनका अधिक प्रभाव न पड़े। दूसरा उपाय यह किया जाना चाहिए कि औद्योगिक संस्थानों की चिमनियों में बहुत उत्तम प्रकार के छन्ने लगाये जाने चाहिए।

इन छन्नों द्वारा व्यर्थ गैसों में से सभी प्रकार के कण छनकर भीतर ही रह जाएँगे, केवल गर्म हवा एवं कुछ गैसे ही वायुमण्डल में निष्कासित हो पाएँगी, इससे प्रदूषण नियन्त्रित होगा। इसके अतिरिक्त औद्योगिक संस्थानों के अन्दर श्रमिकों को स्थानीय प्रदूषण से बचाने के लिए सभी सम्भव उपाय किये जाने चाहिए। इसके लिए संवातन की सुव्यवस्था होनी चाहिए तथा ऑक्सीजन की कृत्रिम व्यवस्था भी अवश्य होनी चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के विकेन्द्रीकरण से भी वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित किया जा सकता है। औद्योगिक संस्थानों के अतिरिक्त वायु-प्रदूषण के मुख्य स्रोत वाहन हैं; इसके लिए भी कुछ कारगर उपाय करने होंगे। सर्वप्रथम यह अनिवार्य है कि सड़क पर चलने वाला प्रत्येक वाहन बिल्कुल ठीक होना चाहिए।

उसका कार्बोरेटर तथा धुआँ निकालने वाला भाग बिल्कुल ठीक होना चाहिए; इस स्थिति में कम धुआँ तथा कार्बन मोनोऑक्साइड निकलते हैं। इसके अतिरिक्त जहाँ तक सम्भव हो सके सड़कों पर यातायात नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि चलते हुए वाहन की अपेक्षा स्टार्ट स्थिति में रुके हुए वाहन पर्यावरण का अधिक प्रदूषण करते हैं। वाहनों के धुआँ निकालने वाले पाइप के मुंह पर भी फिल्टर लगाये जाने चाहिए। पेट्रोल एवं डीजल में मिलावट को रोककर भी प्रदूषण को कम किया जा सकता है। रेलगाङ्गियों का विद्युतीकरण करके भी काफी हद तक वायु प्रदूषण को नियन्त्रित किया जा सकता है।

(2) जल-प्रदूषण पर नियन्त्रण– वायु प्रदूषण के ही समान जल-प्रदूषणों के भी मुख्य स्रोत औद्योगिक संस्थान ही हैं। जल-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए भी औद्योगिक संस्थानों की गतिविधियों को नियन्त्रित करना होगा। औद्योगिक संस्थानों में ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि कम-से-कम व्यर्थ पदार्थ बाहर निकालें तथा निकलने वाले व्यर्थ पदार्थों एवं जल को उपचारित करके ही निकाला जाए। इसके अतिरिक्त नगरीय कूड़े-करकट को भी जैसे-तैसे नष्ट कर देना चाहिए तथा जल-स्रोतों में मिलने से रोकना चाहिए। जहाँ तक घरेलू जल-मल का प्रश्न है, इसकी भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। इससे गैस एवं खाद बनाने की अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए।

(3) ध्वनि-प्रदूषण पर नियन्त्रण- ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए भी विशेष उपाय किये जाने चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो वाहनों के हॉर्न अनावश्यक रूप से न बजाये जाएँ। कल-कारखानों में जहाँ-जहाँ सम्भव हो मशीनों में साइलेन्सर लगाये जाएँ। सार्वजनिक रूप से लाउडस्पीकरों आदि के इस्तेमाल को नियन्त्रित किया जाना चाहिए। घरों में भी रेडियो, टी० वी० आदि की ध्वनि को नियन्त्रित रखा जाना चाहिए। औद्योगिक संस्थानों में छुट्टी आदि के लिए बजने वाले उच्च ध्वनि के सायरन न लगाए जाएँ। इन उपायों एवं सावधानियों को अपनाकर काफी हद तक ध्वनि प्रदूषण से बचा जा सकता है।

प्रश्न 5
‘भू-भागिता से आप क्या समझते हैं। भू-भागिता के प्रमुख प्रकारों के बारे में समझाइए। (2017, 18)
उत्तर
पर्यावरणीय मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से पर्यावरण का एक रूप अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण 
भी है। पर्यावरण के इस रूप का सम्बन्ध जनसंख्या से है। जब हम अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण की बात करते हैं तब इसके मुख्य कारकों का विश्लेषण करते हैं। ये कारक हैं—वैयक्तिक स्थान, भू-भागिता, जनसंख्या घनत्व तथा भीड़। अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण के एक महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में भू-भागिता का व्यवस्थित अध्ययन आल्टमैन ने किया है। भू-भागिता : का सम्बन्ध सम्बन्धित भू-भांग के स्वामित्व या अधिकार से है। भू-भाग अपने आप में अदृश्य नहीं होता बल्कि इसकी कुछ स्पष्ट रूप से निर्धारित सीमाएँ होती हैं। हम स्वाभाविक रूप से ही अपने आस-पास के क्षेत्र तथा अधिकार वाले भाग को अपना समझते हैं। हम सभी अपने घर को अपना भू-भाग मानते हैं।

घर के अतिरिक्त कुछ व्यक्तियों के लिए बाग-बगीचे तथा खेत-खलियान भी निजी भू-भाग के रूप में हाते हैं। भू-भागिता एक ऐसा कारक है कि कोई भी व्यक्ति अपनी भू-भागिता में अर्थात् अपने क्षेत्र में किसी अन्य व्यक्ति के बलपूर्वक प्रवेश या अतिक्रमण को कदापि सहन नहीं करता। भू-भागिता के साथ निजीत्व का भाव जुड़ा हुआ है। व्यक्ति अपनी भू-भागिता को अपने नियन्त्रण में ही रखता है। व्यक्ति के लिए घर के अतिरिक्त कुछ अन्य भू-भागिता भी महत्त्वपूर्ण है, भले ही उनके स्वरूप एवं नियन्त्रण में कुछ अन्ता है। आलमैन ने भू-भागिता के तीन वर्ग या प्रकार निर्धारित किए हैं जिन्हें उसने क्रमशः प्राथमिक भू-भाग, गौण भू-भाग तथा सार्वजनिक भू-भाग के रूप में वर्णित किया है। इन तीनों प्रकार के भू-भागों को सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) प्राथमिक भू-भाग- व्यक्ति के लिए सबसे अधिक आवश्यक एवं उपयोगी भू-भाग को आल्टमैन ने प्राथमिक भू-भाग के रूप में वर्णित किया है। प्राथमिक भू-भाग उस भू-भाग को कहा जाता है, जिसका उपयोग कोई व्यक्ति या समूह पूर्ण स्वतन्त्र रूप से करता है। घर इस वर्ग के भू-भाग को सबसे मुख्य उदाहरण है। घर के अतिरिक्त यदि व्यक्ति के अधिकार में कोई दुकान, कार्यशाला या बगीचा आदि है, तो उसे भी प्राथमिक भू-भाग की ही श्रेणी में रखा जायेगा। प्राथमिक भू-भाग के किसी अन्य व्यक्ति को प्रवेश का अधिकार नहीं होता तथा सामान्य रूप से इसे सहन भी नहीं किया जाता। किसी व्यक्ति के प्राथमिक भू-भाग में यदि कोई अन्य व्यक्ति बलपूर्वक प्रवेश करता है तो व्यक्ति उसका विरोध करता है। उसे क्रोध भी आता है तथा यह दुःख की बात होती है।

(2) गौण भू-भाग- गौण भू-भाग उस भू-भाग को कहा गया है, जिसका स्वामित्व स्पष्ट रूप से निश्चित नहीं होता। इस वर्ग के भू-भाग को कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि अनेक व्यक्ति उपयोग में लाते हैं। विद्यालय का कक्ष इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। कक्षा के अनेक छात्र होते हैं और वे किसी भी सीट पर बैठ सकते हैं तथा कमरे का उपयोग सम्मिलित रूप से करते हैं। व्यक्ति के जीवन में गौण भू-भाग का महत्त्व प्राथमिक भू-भाग की तुलना में कम होता है।

(3) सार्वजनिक भू-भाग- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है-भू-भाग का यह रूप किसी एक व्यक्ति का स्वामित्व नहीं होता। सार्वजनिक भू-भाग पर जन-साधारण का समान अधिकार होता है। इसे भू-भाग पर निजी स्वामित्व का प्रश्न ही नहीं उठता। सार्वजनिक भू-भाग के मुख्य उदाहरण हैं-पार्क, रेलवे प्लेटफॉर्म, हर प्रकार के प्रतीक्षालय तथा वाचनालय आदि। इन भू-भागों में किसी व्यक्ति का कोई स्थान आरक्षित नहीं होता। उदाहरण के लिए, पार्क में किसी भी बेंच पर कोई भी व्यक्ति बैठ सकता है। सार्वजनिक भू-भाग में किसी स्थान पर कोई व्यक्ति अपनी दावेदारी नहीं कर सकता। कानून भी इसके लिए अनुमति नहीं देता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरणीय मनोविज्ञान का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
अध्ययन की सरलता की दृष्टि से पर्यावरणीय मनोविज्ञान को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है|
(1) प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Positive Environmental Psychology)- यह पर्यावरणीय मनोविज्ञान की वह शाखा है जो मनुष्य के प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण तथा व्यक्ति के व्यवहार के मध्य अन्तर्सम्बन्ध और अन्तक्रिया का कार्य-कारण सम्बन्धी अध्ययन करती है। इस अध्ययन के आधार पर कुछ सामान्य निष्कर्षों और नियमों की स्थापना की जाती है। सामान्य नियमों की स्थापना से पूर्व निष्कर्षों की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की जाँच की जाती है।

(2) निदानात्मक पर्यावरणीय मनोविज्ञान (Diagnostic Environmental Psychology)– यह पर्यावरणीय मनोविज्ञान की वह शाखा है जो पर्यावरण प्रदूषण के लक्षणों, कारणों और परिणामों का अध्ययन करती है। इसमें ज़ल, वायु, तापमान, ध्वनि एवं मृदा के प्रदूषण का समग्रवादी अध्ययन किया जाता है। प्रदूषण के लक्षणों और कारणों की खोज की जाती है। इससे उत्पन्न परिणामों को चिह्नित किया जाता है। समाधान की दिशाओं का निरूपण भी होता है।

(3) व्यावहारिक पर्यावरणीये, मनोविज्ञान (Applied Environmental Psychology)यह पर्यावरणीय मनोविज्ञान की वह शेखा है जो उन उपायों और साधनों की खोज करती है जिनके द्वारा पर्यावरण का संवर्द्धन और संरक्षण किया जाता है। यह उपर्युक्त दोनों शाखाओं के निष्कर्षों को व्यवहार में लाने योग्य बनाकर मनुष्य के पर्यावरण को सन्तुलित बनाना चाहती है। इसका उद्देश्य मानव और समाज के जीवन को कल्याणमय बनाना है।इस प्रकार पर्यावरणीय मनोविज्ञान का दृष्टिकोण समग्रवादी है। वह पर्यावरण और मानव व्यवहार के बीच अन्तक्रिया का प्रत्यक्षवादी, निदानात्मक और व्यावहारिक विज्ञान है।

प्रश्न 2
वर्तमान सन्दर्भ में मानव-व्यवहार एवं पर्यावरण के मध्य सम्बन्ध बताइए। (2012)
उत्तर
मनुष्य को प्रत्येक व्यवहार अनिवार्य रूप से पर्यावरण में ही होता है। मानव-व्यवहार तथा पर्यावरण में घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध पारम्परिक है। मानव-व्यवहार से पर्यावरण पर अनेक प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं। मनुष्यों के व्यवहार एवं क्रियाकलापों ने पर्यावरण के सन्तुलन को बिगाड़ा है। तथा प्रदूषित किया है। इस प्रकार से सन्तुलित एवं प्रदूषित पर्यावरण अब मनुष्य के व्यवहार एवं जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रहा है। वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण एवं ध्वनि-प्रदूषण तो प्रत्यक्ष रूप से मनुष्यों के व्यवहार एवं जीवन पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि मानव-व्यवहार तथा पर्यावरण में अन्योन्याश्रितता का सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
जल प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर

जेल-प्रदूषण

“जल ही जीवन है।” यह पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं के लिए अति आवश्यक है। जल का मुख्य स्रोत जमीन के अन्दर नीचे की तरफ एकत्रित जल है, इसके अतिरिक्त यह नदियों, नहरों, झीलों, समुद्रों आदि से भी अप्त होता है। प्रकृति में मुख्यतया जल, वर्षा से प्राप्त होता है जो ऊपर लिखे स्रोतों में बहकर आता है। जल बहकर आता है तो अपने साथ बहुत-सारे दूषित पदार्थ भी बहा लाता है, जिनसे जल प्रदूषित हो जाता है।

जल-प्रदूषण के मुख्य कारकों में वाहित मल (Sewage), घरेलू अपमार्जक (Detergents), धूल, गन्दगी, उद्योग-धन्धों से निकले रसायन एवं उनके व्यर्थ पदार्थ, अम्ल, क्षार, तैलीय पदार्थ, लेड (Lead), मरकरी, क्लोरीनेटेड हाइड्रोकार्बन्स, अकार्बनिक पदार्थ, फिनोलिक यौगिकी, भारी धातु, सायनाइड आदि होते हैं। इनमें से कुछ चीजें बहुत अधिक विषैली होती हैं। इसी प्रकार डी० डी० टी०, कीटाणुनाशक रसायन (Pesticides), अपतृणनाशी रसायन (Weedcides) भी जल प्रदूषित करते हैं, जिनका उपयोग हम विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकोड़ों आदि को नष्ट करने में करते हैं। यह सब हानिकारक पदार्थ, खाद्य-श्रृंखला के द्वारा मनुष्यों के शरीर में एकत्रित होते रहते हैं और विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं; जैसे-स्नायु रोग, कैन्सर, टाइफॉइड, पेचिश आदि।।

प्रश्न 4
मृदा-प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर
मृदा-प्रदूषण– मिट्टी, पेड़-पौधों के लिए बहुत आवश्यक है, और पेड़-पौधे, जीव-जन्तुओं के लिए बहुत आवश्यक हैं, अत; हम कह सकते हैं कि मिट्टी सभी जीवों के लिए आवश्य है। मिट्टी में बहुत-सारे अनावश्यक पदार्थ, कूड़ा-कचरा, मल-मूत्र, अपमार्जक, धूल, गर्द, रेत, औद्योगिक रसायन, अम्ल, क्षार, तैलीय पदार्थ, कीटाणुनाशक एवं अपतृणनाशी रसायन, रासायनिक उर्वरक, डी० डी० टी० आदि विभिन्न कार्यों में उपयोगिता के कारण मृदा में एकत्रित होते रहते हैं और मृदा का प्राकृतिक सन्तुलन बिगाड़ते रहते हैं तथा पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। इनमें से कुछ पदार्थ जीवों के लिए विषैले होते हैं। ये हानिकारक पदार्थ खाद्य श्रृंखला द्वारा जीव-जन्तुओं और मनुष्य के शरीर में हानिकारक प्रभाव डालते हैं एवं मृदा प्रदूषण करते हैं।

प्रश्न 5
वायु-प्रदूषण से क्या आशय है? ।
या
वायु-प्रदूषण क्या होता है? उदाहरण द्वारा समझाइए। । (2013)
उत्तर
वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक निश्चित अनुपात में पायी जाती हैं एवं वातावरण में सन्तुलन बनाये रखती हैं। इसमें मुख्य रूप से नोइट्रोजन, ऑक्सीजन, ऑर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, नियॉन, हीलियम, हाइड्रोजन, ओजोन आदि गैसें प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त इसमें जलवाष्प, छोटे-छोटे ठोस कण, जीवाणु आदि भी होते हैं। जीव श्वसन में ऑक्सीजन लेते हैं और वातावरण में कार्बन डाई-ऑक्साइड बाहर निकालते हैं लेकिन पेड़-पौधे प्रकाश-संश्लेषण में वातावरण से कार्बन डाइ-ऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं। इससे वातावरण में ऑक्सीजन और कार्बन डाइ-ऑक्साइड का सन्तुलन बना रहता है। जब वातावरण में किसी भी बाह्य कारक के कारण (गैसों, ठोस, कणों या वाष्पकणों के कारण) या उपस्थित गैसों के अनुपात में घटत या बढ़त के कारण असन्तुलन उत्पन्न होता है तो इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 6
वायु-प्रदूषण का मानव-जीवन एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
या
वायु-प्रदूषण हमें किस प्रकार से हानि पहुँचाता है?
या
वायु-प्रदूषण के दुष्परिणामों की व्याख्या कीजिए। (2018)
उत्तर
‘वायु-प्रदूषण’ शब्द मस्तिष्क में आते ही प्रायः दुर्गन्धमय और विभिन्न गैसों से युक्त तथा धुएँ से आच्छादित वायुमण्डल का दृश्य उपस्थित हो जाता है। वस्तुतः अनेक रासायनिक पदार्थ और गैस वायु-प्रदूषण को अत्यन्त खतरनाक बना रहे हैं। उद्योगों से नि:सृत व्यर्थ पदार्थ गैसों के सन्तुलन को बिगाड़ रहे हैं। उदाहरणार्थ-कपड़ा, शराब, दवाई, कागज, सीमेण्ट, चमड़ा, रँगाई, तेलशोधक कारखाने, रासायनिक उर्वरक के कारखाने आदि ऐसे उद्योग-धन्धे हैं जो वायु-प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं।

स्वचालित वाहन भी 60% वायु-प्रदूषण के लिए उत्तरदायी हैं। इनके धुएँ में गैसे, कार्बन-कण, हाइड्रोकार्बन, ऑक्साइड आदि पदार्थ होते हैं। पेड़-पौधों की कीट-पतंगों से रक्षा और बीमारियों की रोकथाम के लिए डी० डी० टी० आदि का छिड़काव भी वायु को प्रदूषित कर देता है। स्प्रे-पेण्टिग और धातु उद्योग भी इसे प्रभावित करते हैं। वायु-प्रदूषण के मानव-व्यवहार पर प्रभावों को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है

(1) शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव वायु- प्रदूषण से आँख और नाक से पानी बहने लगता है। इसके कारण दमा-श्वास और फेफड़ों का कैन्सर जैसे रोग हो जाते हैं। स्वचालित वाहनों से निकले धुएँ और धूल से श्वसन सम्बन्धी रोग उत्पन्न हो जाते हैं जिनमें खाँसी और गले की खराश मुख्य हैं। कैडमियम, मरकरी, डी० डी० टी० पदार्थ भी खाद्य श्रृंखला या अन्य विधियों द्वारा मानव के शरीर में पहुँचकर हृदय रोग, कैंसर, स्नायु रोग, रक्तचाप, तन्त्रिका-तन्त्र के भयंकर रोग पैदा कर देते हैं।

(2) मनोरोगों में वृद्धि- शारीरिक रोगों के अतिरिक्त वायु-प्रदूषण मानसिक व्याधियों में वृद्धि का भी एक प्रमुख कारण है। कार्बन मोनो-ऑक्साइड, जो वायु-प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी कारक है, इससे सिरदर्द, मिर्गी, थकान तथा स्मृति ह्रास पैदा होते हैं। राटन तथा फ्रे ने अपने अध्ययनों में पाया कि वायु-प्रदूषण की अधिकता में मनोरोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है।

(3) कार्य-निष्पादन क्षमता में ह्रास- वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों से सिद्ध किया है कि जैसे-जैसे वायु में कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है, वैसे-ही-वैसे कार्य निष्पादन की क्षमता में ह्रास होता है। चूहों पर किये गये प्रयोगों के निष्कर्ष इस बात की पुष्टि करते हैं। ग्लीनर तथा अन्य वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि वायु-प्रदूषण, वाहन चालक की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। और इससे दुर्घटनाएँ बढ़ने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।

(4) सौन्दर्यबोधक संवेगों में हास- राटन, याशिकावा तथा अन्य ने अपने अध्ययनों से सिद्ध किया है कि दुर्गन्धमय वायु-प्रदूषण छायांकन तथा चित्रकारी आदि से सम्बन्धित अभिवृत्ति को कम कर देता है। केवल इतना ही नहीं अपितु इससे अन्य लोगों के प्रति आकर्षण भी कम हो जाता है और मनुष्य की सौन्दर्यबोधक संवेदनशीलता में ह्रास आता है।

(5) बाह्य वातावरण में आयोजित सामाजिक कार्य- कलापों में कमी–प्रदूषित वायु के कारण खुले में आयोजित होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों को कम करना पड़ता है, क्योंकि उनके कारण अधिक लोग एक ही स्थान पर वायु प्रदूषण के शिकार हो जाते हैं।

प्रश्न 7
ध्वनि-प्रदूषण से क्या आशय है? ।
या
ध्वनि-प्रदूषण के लिए उत्तरदायी कारणों का विश्लेषण कीजिए। (2016)
उत्तर
वातावरण में विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न अप्रिय एवं अनचाही आवाज, जिसका हमारे ऊपर बुरा या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शोर या ध्वनि कहलाता है। यह अगर अप्रिय, असहनीय और कर्कश होता है तो वातावरण को प्रदूषित करता है और शोर या ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि-प्रदूषण मुख्यतया बड़े शहरों या औद्योगिक दृष्टि से विकसित क्षेत्र, रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप, हवाई अड्डों, भीड़-भाड़ वाले स्थानों, सभास्थलों, सिनेमाघरों, फैक्ट्री या कल-कारखानों के आस-पास ज्यादा होता है। इसके अलावा रेडियो, ट्रांजिस्टर, टी० वी०, लाउडस्पीकर, सायरन, स्वचालित वाहन (बस, ट्रक, हवाई जहाज आदि) भी ध्वनि प्रदूषण करते हैं।

ध्वनि-प्रदूषण से सुनने की क्षमता में कमी आती है, अर्थात् बहरापन होता है, मोटापा बढ़ता है, गुस्सा ज्यादा आता है, सहनशक्ति कम होती है, तन्त्रिका-तन्त्र सम्बन्धी सभी रोग होते हैं, नींद न आना, अल्सर, सिरदर्द, हृदय रोग, रक्तचाप सम्बन्धी रोग, घबराहट आदि होती है।

ध्वनि-प्रदूषण से हमारी एकाग्रता प्रभावित होती है। इसीलिए अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्कूल एवं कॉलेजों के पास यह चेतावनी लिखी होती है कि “यहाँ हॉर्न का प्रयोग वर्जित है”, “ध्वनि मुक्त क्षेत्र (Silence Zone) आदि।

प्रश्न 8
ध्वनि प्रदूषण का मानव-जीवन एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2014)
उत्तर
शोध कार्यों से पता चलता है कि ध्वनि प्रदूषण का मानव-व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रभात का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है–

(1) स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव- अत्यधिक शोर का व्यक्ति के स्नायुमण्डल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे उसकी श्रवण-शक्ति कमजोर होती है, बहरापन बढ़ता है।

(2) आक्रामकता और चिड़चिड़ेपन में वृद्धि- ब्लम तथा एजरीन नामक वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों से प्रदर्शित किया है कि अति तीव्र शोर से मनुष्य शारीरिक रूप से उद्वेलित और उत्तेजित हो जाता है, परिणामस्वरूप उसमें आक्रामकता और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।

(3) अनुक्रियात्मकता का ह्रास- कुछ विद्वानों का कहना है कि मनुष्य में अपने उद्दीपकों के साथ अनुकूलन की स्वाभाविक क्षमता होती है। इसे अभ्यस्त होना (Habituation) कहा जाता है, किन्तु ग्लास तथा अन्य ने अपने प्रयोगों में पाया कि अनुकूलन की प्रक्रिया में मनुष्य की मानसिक ऊर्जा व्यय होती है। शनैः-शनैः वह पर्यावरणीय अपेक्षाओं और कुण्ठाओं के प्रति सकारात्मक अनुक्रिया करने में अक्षम हो जाते हैं।

(4) परार्धमूलक क्रियाओं में अरुचि- मैथ्यूज तथा कैनन ने अपने अध्ययन से यह भी प्रदर्शित किया कि शान्त वातावरण में व्यक्ति दूसरों की सहायता करने के प्रति अधिक सक्रिय थे, जब कि शोरगुल के वातावरण में उन्होंने दूसरों की सहायता या सेवा-कार्य में कोई रुचि प्रदर्शित नहीं की।

(5) गर्भ-स्थिति पर कुप्रभाव-ध्वनि- प्रदूषण का गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ता है और प्रसव पीड़ादायक हो जाता है। |

(6) मानसिक प्रक्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव- ध्वनि-प्रदूषण का मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इसमें रक्तचाप (Blood pressure) बढ़ जाता है तथा अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ अधिक सक्रिय हो जाती हैं। स्पष्टतः इनका मानसिक प्रक्रियाओं पर बुरा असर पड़ेगा ही, पाचक रसों का स्राव भी कम होगा जिससे अल्सर व दमा जैसे रोगों की सम्भावना बढ़ेगी। इतना ही नहीं, इससे मनुष्य की एकाग्रता भी भंग हो जाती है जिससे अध्ययन और मनन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 9
ताप-प्रदूषण का व्यक्ति के जीवन एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2014)
या
मानव-व्यवहार पर ताप-प्रदूषण के प्रभावों की व्याख्या कीजिए। 
(2017)
उत्तर
कारखानों और स्वचालित वाहनों से निकलती गैसें व धुआँ, आणविक विस्फोटों, ओजोन के विक्षेपण तथा वनों की कमी और जुनसंख्या विस्फोट ने तापमान में निरन्तर वृद्धि की है। गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है। इसी को ताप-प्रदूषण कहा जाता है। यदि यह प्रदूषण बढ़ता गया तो पृथ्वी ग्रह मनुष्य के रहने योग्य नहीं बचेगा मानव-व्यवहार पर ताप-प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते है

(1) बौद्धिक प्रखरता पर प्रभाव- तापमान वृद्धि बौद्धिक प्रखरता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। ताप प्रदूषण में आदमी सुस्त, थका हुआ और निष्क्रिय महसूस करने लगता है, जबकि कम तापमान व्यक्ति की कुशलता में वृद्धि करता है। |

(2) गर्म-जलवायु और आक्रामक-व्यवहार– गोरान्सन तथा किंग ने अपने अनुसन्धान में पाया कि अधिकांशतः व्यावहारिक विकार गर्मी के महीनों में ज्यादा देखने को मिलते हैं। फ्रांस के सामाजिक चिन्तक दुर्णीम ने कुछ देशों के अपराधों के आँकड़ों का अध्ययन करके यह पाया कि गर्मियों में मानव शरीर के प्रति अपराध ज्यादा होते हैं; जैसे—मारपीट, हत्या, बलात्कार आदि; जबकि जाड़ों में सम्पत्ति के प्रति अपराध; जैसे-चोरी, डकैती आदि अधिक होते हैं। ग्रिफिट तथा वीच ने कमरों के तापमान में वृद्धि करके देखा कि अधिक गर्मी में रहने वाले व्यक्ति ठण्डे कमरों में रहने वाले व्यक्तियों से अधिक आक्रामक थे।

(3) चन्द्रमा की चक्रीय क्रिया का मानव- व्यवहार पर प्रभाव-यह सर्वविदित है कि समुद्र में ज्वार-भाटा चन्द्रमा, की चक्रीय क्रिया अर्थात् क्रमागत घटने-बढ़ने से आते हैं। मानव-शरीर में भी जल-विद्यमान है। वह भी चन्द्रमा के चक्रीय प्रभाव से वंचित नहीं हैं। प्राचीनकाल से ही यौन-वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन से सिद्ध किया है कि चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं का मनुष्य; विशेषकर महिलाओं की यौन-इच्छाओं, यौन-उत्तेजनाओं तथा यौन-व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है।

(4) तापमान एवं शारीरिक स्वास्थ्य- बढ़ता हुआ तापमान मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इससे अधिक चर्म रोग उत्पन्न हो जाते हैं। बहुत ठण्ड में अत्यधिक शीतप्रधान क्षेत्रों में भी मनुष्य की त्वचा विदीर्ण एवं मस्सों वाली हो जाती है।

(5) तापमान वृद्धि के सामाजिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव– तापमान वृद्धि के कुछ अप्रत्यक्ष कुप्रभाव जानने में आये हैं। इससे फसलों और पौधों को नुकसान होता है, भूमि में जल-स्तर नीचे चला जाता है, पेयजल का संकट उत्पन्न हो जाता है और समूचा सामाजिक जीवन ही अस्त-व्यस्त हो जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न1
पर्यावरण के सन्दर्भ में वैयक्तिक स्थान (Personal Space) के अर्थ को स्पष्ट कीजिए। (2014)
या
अन्त:वैयक्तिक वातावरण से आप क्या समझते हैं? (2018)
उत्तर
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में पर्यावरण तथा मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता हैं। पर्यावरण से आशय प्रायः प्राकृतिक पर्यावरण ही माना जाता है, परन्तु यथार्थ में अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण का प्रत्यय भी महत्त्वपूर्ण है। अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण में सर्वाधिक महत्त्व वैयक्तिक स्थान (Personal space) का है।

व्यक्ति के आस-पास के अदृश्य सीमा वाले उस स्थान को वैयक्तिक स्थान कहा जाता है जो सम्बन्धित व्यक्ति के ‘स्व’ के भाग के रूप में स्वीकार किया जाता है। मानव-स्वभाव के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने ‘स्व’ के भाग या क्षेत्र में किसी अन्य वैयक्तिक के प्रवेश को अतिक्रमण मानता है तथा इसका विरोध करता है।

एक उल्लेखनीय मनोवैज्ञानिक हल ने। व्यक्तिक स्थान की चार सीमाएँ या भाग निर्धारित किये हैं। ये भाग या सीमाएँ हैं-अन्तरंग दूरी, वैयक्तिक दूरी, सामाजिक दूरी तथा सार्वजनिक दूरी। वैयक्तिक स्थान को यह मान्यता जहाँ एक ओर . व्यक्तियों के मध्य महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाती है वहीं विभिन्न समूहों में भी इस अवधारणाा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

प्रश्न 2
पर्यावरण-प्रदूषण का जम-स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण- प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। जैसे-जैसे पर्यावरण का अधिक प्रदूषण होने लगता है, वैसे-वैसे प्रदूषण जनित रोगों की दर एवं गम्भीरता में वृद्धि होने लगती है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु-प्रदूषणेंके परिणामस्वरूप श्वसन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूपाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि-प्रदूषण भी तन्त्रिका-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्झन्धी विकारों को जन्म देता है। इसके साथ-ही-साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारगत सामान्यता को भी ध्वनि-प्रदूषण विकृत कर देता है। अन्य प्रकार के प्रदूषण भी जन-सामान्य को विभिन्न सामान्य एवं गम्भीर रोगों का शिकार बनाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण प्रदूषण अनिवार्य रूप से जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदूषित पर्यावरण में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आयु भी घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न रहता है।

प्रश्न 3
पर्यावरण-प्रदूषण का व्यक्ति की कार्यक्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
व्यक्ति एवं समाज की प्रगति में सम्बन्धित व्यक्तियों की कार्यक्षमता का विशेष महत्त्व होता है। यदि व्यक्ति की कार्य-क्षमता सामान्य या सामान्य से अधिक हो तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा समृद्ध बन सकता है। जहाँ तक पर्यावरण-प्रदूषण का प्रश्न है, इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की कार्यक्षमता अनिवार्य रूप से आती है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति ने तो अपने कार्य को कुशलतापूर्वक ही कर सकता है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता ही सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो तो भी उसकी चुस्ती एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त सिद्ध होता है।

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण का आर्थिक-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? ।
उत्तर
व्यक्,समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भी पर्यावरण-प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में, यदि व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है। इसके साथ-ही-साथ भी सत्य है कि यदि व्यक्ति अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य प्रदूषण का शिकार होकर किन्हीं साधारण या गम्भीर रोगों से ग्रस्त रहता है तो उसके उपचार पर भी पर्याप्त व्यय करना पड़ सकता है। इससे भी व्यक्ति एवं परिवार का आर्थिक बजट बिगड़ जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में कुप्रभावित होती है। इस कारक के प्रबल तथा विस्तृत हो जाने से समाज एवं राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है।

प्रश्न5
फ्र्यावरणीय-प्रदूषण के कारण मानव-व्यवहार पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव लिखिए।
उत्तर
पर्यावरणीय-प्रदूषण के कारण मानव-व्यवहार पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है।
  2. पर्यावरण प्रदूषण के कारण व्यक्ति के व्यवहार में चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता आ सकती है
  3. पर्यावरण-प्रदूषण के कारण व्यक्तियों में पारस्परिक आकर्षण एवं सामाजिकता का व्यवहार क्षीण पड़ सकता है।
  4. पर्यावरण-प्रदूषण के कारण व्यक्ति के व्यवहार में त्रुटियाँ अधिक होती हैं।

प्रश्न 6
ध्वनि-प्रदूषण से होने वाले किन्हीं दो दुष्प्रभावों के बारे में लिखिए। | (2014)
उत्तर
ध्वनि-प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार दोनों पर पड़ता है। ध्वनि-प्रदूषण के कारण बहरापन, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप तथा पाचन-तन्त्र सम्बन्धी रोग हो 
सकते हैं। ये रोग साधारण से लेकर अति गम्भौर तक हो सकते हैं। ध्वनि-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्तिः के स्वभाव में चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता में वृद्धि हो सकती है। इसके अतिरिक्त इस स्थिति में व्यक्ति अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने में कठिनाई अनुभव करता है। उसकी कार्यक्षमता भी कुछ घट जाती है।

प्रश्न 7
ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर
ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  1. कल-कारखानों तथा औद्योगिक संस्थानों को आवासीय क्षेत्रों से दूर स्थापित करना चाहिए।
  2. आवासीय क्षेत्रों में उच्च ध्वनि वाले लाउडस्पीकरों पर कड़ा प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  3. वाहनों की ध्वनि नियन्त्रित करने के समस्त तकनीकी उपाय करने चाहिए। ऊँची ध्वनि वाले हॉर्न नहीं लगाये जाने चाहिए।
  4. औद्योगिक शोर को प्रतिबन्धित करने के लिए यथास्थान अधिक-से-अधिक साइलेंसर लगाये जाने चाहिए।
  5. जहाँ तक सम्भव हो, मकानों को अधिक-से-अधिक ध्वनि अवरोधक बनाया जाना चाहिए।

प्रश्न 8
टिप्पणी लिखिए-पर्यावरण के सन्दर्भ में ‘जनसंख्या घनत्व। (2018)
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के अन्तर्गत पर्यावरण के सन्दर्भ में जनसंख्या-घनत्व (Density of Population) का भी अध्ययन किया जाता है। जनसंख्या के अधिक घनत्व से व्यक्तियों को । अन्त:क्रिया की विवशता का सामना करना पड़ता है। जनसंख्या के घनत्व का व्यक्ति के व्यवहार पर अनेक प्रकार से प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या घनत्व का आशये किसी क्षेत्र में जनसंख्या की सघनता से है। जनसंख्या की सधनता का सम्बन्ध सामाजिक व्याधि, अपराध दर तथा सामाजिक विघटन आदि से है। कुछ अध्ययनों में देखा गया है कि जनसंख्या के उच्च सघनता का व्यक्ति के व्यवहार तथा सवेगों पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या की सघनता का एक रूप भीड़ (crowd) भी है। भीड़ में व्यक्ति का सामान्य व्यवहार बदल जाता है। वास्तव में भीड़ में घनत्व अधिक होता है तथा सामान्य नियन्त्रण की कमी होती है; अतः व्यक्ति का व्यवहार बिगड़ जाता है।

प्रश्न 9
भीड़ का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर
जब हम अन्तर्वैयक्तिक पर्यावरण की बात करते हैं तब जनसंख्या सम्बन्धी एक मुख्य कारक के रूप में भीड़ की चर्चा होती है। भीड़ से आशय है-अत्यधिक जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्र। भीड़ का यह एक साधारण अर्थ है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भीड़ को स्थानीय, सामाजिक तथा वैयक्तिक कारणों से उत्पन्न एक प्रेरणात्मक अवस्था माना जाता है। पर्यावरण सम्बन्धी अन्य कारकों के ही समान भीड़ भी व्यक्ति के व्यवहार तथा जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित करती है।

भीड़ के प्रभाव से ऋणात्मक मनोभाव तथा प्रतिबल उत्पन्न होते हैं। इन प्रभावों के परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने सामान्य क्रियाकलापों को सुचारु रूप से करने में कुछ कठिनाइयाँ या असुविधा महसूस करता है। भीड़ से प्रभावित व्यक्ति अर्थात् भीड़ का हिस्सा बने व्यक्ति का निजीत्व भी बाधित होने लगता है। भीड़ से व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य एवं सामान्य व्यवहार भी प्रभावित होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I. निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए

1. पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की……………….शाखा है।।
2. पर्यावरण के प्रति …………के परिणामस्वरूप ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान का विकास | हुआ है।
3. पर्यावरण एवं मानव व्यवहार के मध्य सम्बन्धों एवं प्रभावों का अध्ययन ……….. मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया
जाता है (2011)
4. पर्यावरणीय मनोविज्ञान का सम्बन्ध मनोविज्ञान के …………….पक्ष से है।
5. मनुष्य के प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण तथा व्यक्ति व्यवहार के मध्य अन्तर्सम्बन्ध का कार्य-कारण सम्बन्धी अध्ययन करने वाली पर्यावरणीय मनोविज्ञान की शाखा को …………….. कहते हैं।
6. पर्यावरण प्रदूषण के लक्षणों, कारणों एवं परिणामों का अध्ययन करने वाली पर्यावरणीय 
मनोविज्ञान की शाखा को ……………. कहते हैं।
7. पर्यावरण के संवर्द्धन एवं संरक्षण के उपायों का अध्ययन करने वाली पर्यावरणीय मनोविज्ञान 
की शाखा को……….. कहते हैं। 8. पर्यावरणीय सूचनाएँ मनुष्य तथा ………… के बीच सन्तुलन स्थापित करने में सहायक होती हैं।
9. पर्यावरण के किसी एक या अधिक पक्षों के दूषित हो जाने को………… कहते हैं।
10. आधुनिक नगरीय-औद्योगिक समाज की मुख्य समस्या …………. है।
11. पर्यावरण प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव………….पर पड़ता है।
12. कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ से होने वाली प्रदूषण ……………….कहलाता है।
13. वायु-प्रदूषण द्वारा मानव शरीर के अंगों में ……………….. सर्वाधिक प्रभावित होते हैं (2017)
14. श्वाससम्बन्धी बीमारी ………………प्रदूषण से होती है। 
(2009)
15. पर्यावरण में शोर या ध्वनि का बढ़ जाना……………..कहलाता है। 
(2018)
16. “ध्वनि प्रदूषण प्रश्नावली का प्रयोग” …………सम्बन्धी प्रदत्तों के संग्रह के लिए किया | जाता है।
17. गन्दे नालों का पानी नदियों में छोड़ने से……….होता है।
18. पर्यावरण में तापमान में होने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में……………
 बढ़ती है।
19. यदि पर्यावरण में दुर्गन्ध बढ़ जाती है तो उस स्थिति में ………………. नहीं हो पाते।
20. दुर्गन्धयुक्त पर्यावरण में व्यक्तियों का पारस्परिक आकर्षण……………है।
21. मनुष्य द्वारा पर्यावरण में किया जा रहा कृत्रिम बदलाव मनुष्य के लिए …………….सिद्ध हो 
रहा है।
22. एक निश्चित भू-भाग में रहने वाले लोगों की संख्या को ……..कहते हैं। (2014)
23. भीड़ में घनत्व ……………एवं नियन्त्रण की ………………… होती है। (2012, 15)
24. आल्टमैन की भूभागिता के प्रकार के अनुसार प्रतीक्षालय एक भू भाग है। (2008)
25. व्यक्ति के चारों ओर की अदृश्य सीमा का वह भाग, जिसे वह अपना मानता है,………….कहलाता है। 
(2018)
उत्तर
1. नवीनतम
2. जागरूकता
3. पर्यावरणीय
4. व्यावहारिक
5. प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
6. निदान्त्यक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
7. व्यावहारिक पर्यावरणीय प्रदूषण
8. पर्यावरण
9. पर्यावरण प्रदूषण
10. पर्यावरण-प्रदूषण
11. जन-स्वास्थ्य
12. वायु-प्रदूषण
13. फेफड़े
14. वायु
15. ध्वनि-प्रदूषण
16. ध्वनि-प्रदूषण
17. जल-प्रदूषण
18. आक्रामकता
19. मनोरंजक कार्यक्रम
20. घट जाता
21. हानिकारक
22. जनसंख्या का घनत्व
23. अधिक, कमी
24. सार्वजनिक
25. वैयक्तिक स्थान।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित-उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए-

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान का विकास कब हुआ?
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान का विकास बीसवीं सदी के सातवें दशक के उत्तरार्द्ध और आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में हुआ है।

प्रश्न 2.
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि क्या थी?
उत्तर
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान के विकास की पृष्ठभूमि में विश्व के जागरूक वैज्ञानिकों एवं सामाजिक चिन्तकों की पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न मानव अस्तित्व के संकट के प्रति बढ़ती हुई जागरूकता थी।

प्रश्न 3.
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर
मनुष्य के मानसिक व्यवहार तथा पर्यावरण के बीच पाये जाने वाले अन्तर्सम्बन्ध का व्यवस्थित अध्ययन ही पर्यावरणीय मनोविज्ञान है।

प्रश्न 4.
‘पर्यावरणीय मनोविज्ञान की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर
हेमस्ट्रा तथा मैफ्फारलिंग के अनुसार, “पर्यावरणीय मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक वह शाखा है जो मानव-व्यवहार तथा भौतिक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करती है।”

प्रश्न 5.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के मुख्य भागों या प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के तीन भाग या प्रकार हैं

  1. प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
  2. निदानात्मक, पर्यावरणीय मनोविज्ञान तथा
  3. व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान।

प्रश्न 6.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान को किस श्रेणी में रखा जाता है?
उत्तर
पर्यावरणीय मनोविज्ञान को व्यावहारिक महत्त्व का विज्ञान माना जाता है।

प्रश्न 7.
आधुनिक युग में किस कारण से पर्यावरणीय मनोविज्ञान का महत्त्व बढ़ गया है?
उत्तर
आधुनिक युग में पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि तथा पर्यावरण-सन्तुलन के बिगड़ने के कारण पर्यावरणीय मनोविज्ञान का महत्त्व बढ़ गया है।

प्रश्न 8.
पर्यावरण-प्रदूषण से क्या आशय है? ।
उत्तर
प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपाते इस रूप में बदलने लगता है, जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसे पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है।

प्रश्न 9.
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य प्रकार हैं

  1. वायु प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण। 

प्रश्न 10.
जल-प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर
जल के मुख्य स्रोतों में दूषितं एवं विषैले तत्त्वों का समावेश होना जल-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 11.
जल-प्रदूषण के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं-घरेलू वाहित मल, वर्षा का जल, औद्योगिक संस्थानों द्वारा विसर्जित पदार्थ तथा शव विसर्जन।

प्रश्न 12.
ध्वनि-प्रदूषण से क्या आशय है।
उत्तर
पर्यावरण में अनावश्यक शोर या ध्वनि का व्याप्त होनी ही ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 13.
ध्वनि-प्रदूषण का स्वास्थ्य फर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ध्वनि-प्रेदूषण का व्यक्ति के स्नायुमण्डल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, श्रवण-शक्ति कमजोर हो जाती है तथा बहरापन होने की आशंका बढ़ती है।

प्रश्न 14.
ध्वनि-प्रदूषण का व्यक्ति के व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ध्वनि-प्रदूषण से व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ती है तथा चिड़चिड़ापन झलकने लगता है।

प्रश्न 15.
यदि पर्यावरण का तापक्रम सामान्य से अधिक हो जाता है तो व्यक्ति के व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण का तापक्रम सामान्य से अधिक होने की दशा में व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ने लगती है।

प्रश्न 16.
यदि वातावरण में दुर्गन्ध व्याप्त हो तो उसका हमारे जीवन पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उत्तर
दुर्गन्धयुक्त वातावरण में हम मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर पाते तथा इस वातावरण में व्यक्तियों का पारस्परिक आकर्षण भी घटने लगता है।

प्रश्न 17
व्यक्ति की क्षमताओं पर वायु-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
वायु प्रदूषण का व्यक्ति की ध्यान-केन्द्रण-क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसके हस्तकौशल में कमी आती है तथा प्रतिक्रिया-काल बढ़ जाता है।

प्रश्न 18.
किन परिस्थितियों में नामकीय प्रदूषण उत्पन्न होता है? (2018)
उत्तर
परमाणु परीक्षणों तथा आणविक ऊर्जा के इस्तेमाल से नाभिकीय प्रदूषण उत्पन्न होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रेश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान विज्ञान का वह क्षेत्र है जो मानवीय अनुभवों और क्रियाओं तथा सामाजिक एवं भौतिक अनुभवों के प्रासंगिक पक्षों में होने वाले व्यवहारों तथा अन्तक्रियाओं का संयोजन और विश्लेषण करता है।”-प्रस्तुत परिभाषा प्रतिपादित है
(क) कैटर तथा क्रेक द्वारा
(ख) हेमस्ट्रा तथा मैक्फारलिंग द्वारा
(ग) मन द्वारा
(घ) विलियम जेम्स द्वारा।
उत्तर
(क) कैटर तथा क्रेक द्वारा

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान की उस शाखा को क्या कहा जाता है जिसके अन्तर्गत मानवीय-व्यवहार तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है?
(क) सामान्य मनोविज्ञान
(ख) विकासात्मक मनोविज्ञान
(ग) पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(घ) व्यावहारिक मनोविज्ञान
उत्तर
(ग) पर्यावरणीय मनोविज्ञान

प्रश्न 3.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के भाग हैं
(क) प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ख) निदानात्मक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ग) व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 4.
पर्यावरणीय मनोविज्ञान के उस भाग को क्या कहते हैं, जिसके अन्तर्गत पर्यावरण के संवर्द्धन और संरक्षण उपायों को खोजा जाता है ?
(क) निदानात्मक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ख) प्रत्यक्षवादी पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(ग) व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान
(घ) इन में से कोई नहीं
उत्तर
(ग) व्यावहारिक पर्यावरणीय मनोविज्ञान

प्रश्न 5.
पर्यावरण-दिवस मनाया जाता है (2011).
(क) 5 जून को
(ख)15 जून को
(ग) 25 जून को
(घ) 30 जून को
उत्तर
(क) 5 जून को

प्रश्न 6.
आधुनिक औद्योगिक नगरीय समाज की मुख्यतम समस्या है
(क) निर्धनता
(ख) निरक्षरता
(ग) बेरोजगारी
(घ) पर्यावरण-प्रदूषण
उत्तर
(घ) पर्यावरण-प्रदूषण

प्रश्न 7.
कौन-सा कथन पर्यावरणीयं मनोविज्ञान से सम्बन्धित है?
(क) यह मनोविज्ञान की एक आँखा है।
(ख) इसके अन्तर्गत पर्यावरण तथा मानवीय व्यवहार के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन किया 
जाता है।
(ग) इसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्य
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी तथ्य

प्रश्न 8.
पर्यावरण-प्रदूषण के प्रकार हैं|
(क) वायु-प्रदूषण
(ख) जल-प्रदूषण
(ग) ध्वनि-प्रदूषण
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन प्रदूषण से सम्बन्धित नहीं है। (2016)
(क) पेड़ों की कटाई
(ख) लाउडस्पीकर का प्रयोग
(ग) जैविक खाद का प्रयोग।
(घ) औद्योगिक अपशिष्ट
उत्तर
(ग) जैविक खाद का प्रयोग।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन पर्यावरण प्रदूषण से सम्बन्धित है (2013)
(क) वृक्षारोपण
(ख) जैविक खाद
(ग) धुआँरहित वाहन
(घ) औद्योगिक अपशिष्ट
उत्तर
(घ) औद्योगिक अपशिष्ट

प्रश्न 11.
पर्यावरणीय प्रदूषण के स्रोत होते हैं (2018)
(क) दो।
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) चार से अधिक
उत्तर
(ग) चार

प्रश्न 12.
वायु-प्रदूषण से सबसे पहले प्रभावित होता है
(क) फेफड़ा ।
(ख) पेट ।
(ग) सिर ।
(घ) यकृत
उत्तर
(क) फेफड़ा

प्रश्न 13.
मानवीय जीवन के किन पक्षों पर वायु-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है?
(क) हस्त कौशल पर ।
(ख) प्रतिक्रिया काल पर
(ग) ध्यान की एकाग्रता पर
(घ) इन सभी पक्षों पर
उत्तर
(घ) इन सभी पक्षों पर

प्रश्न 14.
मानवीय व्यवहार पर ध्वनि-प्रदूषण के प्रभाव हैं
(क) ध्यान का विचलित होना
(ख) व्यवहार में अनुक्रियात्मकता घटना
(ग) व्यवहार में चिड़चिड़ापन तथा आक्रामकता बढ़ जाना
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव

प्रश्न 15.
वायु-प्रदूषण के कारण उत्पन्न हो सकता है (2014)
(क) अस्थमा
(ख) उच्च रक्त चाप
(ग) पीलिया
(घ) मधुमेह
उत्तर
(ख) उच्च रक्त चाप

प्रश्न 16.
पीलिया रोग किससे उत्पन्न होता है?
(क) जल-प्रदूषण से
(ख) वायु-प्रदूषण से |
(ग) ध्वनि-प्रदूषण से
(घ) मृदा-प्रदूषण से
उत्तर
(क) जल-प्रदूषण से

प्रश्न 17.
जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है
(क) वायु प्रदूषण
(ख) जल-प्रदूषण
(ग) ध्वनि-प्रदूषण
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 18.
पर्यावरण में दुर्गन्ध अधिक होने की स्थिति में
(क) व्यक्ति का अन्य व्यक्तियों के प्रति आकर्षण घटता है .
(ख) फोटोग्राफी एवं चित्रकारी के प्रति अनुकूल अभिवृत्ति घटती है।
(ग) मनोरंजक कार्यक्रमज़हीं हो पाते।
(घ) उपर्युक्त सभी परिवर्तन देखे जा सकते हैं।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी परिवर्तन देखे जा सकते हैं।

प्रश्न 19.
पर्यावरण के तापमान के सामान्य से अधिक हो जाने की स्थिति में
(क) व्यक्ति के व्यवहार में आक्रामकता की वृद्धि होती है।
(ख) व्यवहार सम्बन्धी विकारों में वृद्धि होती है।
(ग) बौद्धिक प्रखरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं।
उत्तर
(घ) उपर्युक्त सभी प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं।

प्रश्न 20.
आल्टमैन के अनुसार भू-भागिता के प्रमुख प्रकार हैं (2017)
(क) दो ।
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) छः
उत्तर
(ख)
तीन

प्रश्न 21.
निम्नलिखित में कौन प्राथमिक भू-भाग नहीं है?
(क) दुकान
(ख) पुस्तकालय
(ग) खेत
(घ) घर
उत्तर
(ख) पुस्तकालय

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 14 Problem of Educational Standard

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 14
Chapter Name Problem of Educational Standard
(शैक्षिक स्तर की समस्या)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 14 Problem of Educational Standard (शैक्षिक स्तर की समस्या)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैक्षिक स्तर से आप क्या समझते हैं। भारत में शैक्षिक स्तर के निम्न होने के कारण तथा इस समस्या के समाधान के उपायों का उल्लेख कीजिए।
या
शैक्षिक स्तर से आप क्या समझते हैं? भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शैक्षिक स्तर के ह्रास के कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2016]
या
ऐसा कहा जाता है कि “भारत में शैक्षिक स्तर लगातार गिरता जा रहा है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? सविस्तार लिखिए। [2014]
या
शैक्षिक स्तर के पतन के क्या कारण हैं ? शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए सुझाव दीजिए। [2007, 11]
या
शैक्षिक स्तर से आप क्या समझते हैं ? भारत में शिक्षा के स्तर में गिरावट के कारण बताइए। [2008, 10]
या
भारत में शैक्षिक स्तर के निम्न होने के मुख्य कारण क्या हैं? [2007, 08, 11]
उत्तर :
शैक्षिक स्तर का अर्थ
मनोवैज्ञानिक रूप से एक अवस्था विशेष के बालकों के लिए पाठ्यक्रम निर्धारित करने को शैक्षिक स्तर कहा जाता है। यह ध्यान रखा जाता है कि बालक उसका ज्ञान इस प्रकार प्राप्त कर लें कि उस स्तर की सैद्धान्तिक और प्रयोगात्मक दोनों परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सकें और प्राप्त किये हुए ज्ञान का अपने जीवन में प्रयोग कर सकें। समय-समय पर किये गये सर्वेक्षण एवं परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ है कि हमारे देश में शैक्षिक स्तर सामान्य से निम्न है। नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण तथा दूर-दराज के क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं को शैक्षिक स्तर पर्याप्त निम्न है। शैक्षिक स्तर को निम्न होना अपने आप में एक गम्भीर समस्या है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में अपव्यय तथा अवरोधन की समस्या भी प्रबल है।

शैक्षिक स्तर के निम्न होने के कारण
वर्तमान में प्रतिवर्ष अनुत्तीर्ण छात्रों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। सन् 1992 की बोर्ड की हाईस्कूल परीक्षा में मात्र 13 प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हो सके। इसके साथ ही उत्तीर्ण छात्रों में प्राप्त किये हुए ज्ञान को व्यवहार में प्रयोग करने की क्षमता भी घटती जाती है। यह शैक्षिक स्तर की एक महत्वपूर्ण समस्या है। शैक्षिक स्तर गिरने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं।

1. शिक्षण पद्धति तथा शिक्षकों की अयोग्यता :
आज की दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति और शिक्षकों की अयोग्यता के कारण ही शिक्षा का स्तर बहुत गिर गया है।

2. कम वेतन एवं सुविधाएँ :
शैक्षिक स्तर गिरने का एक मुख्य कारण यह है कि अध्यापकों को वेतन बहुत कम मिलता है और उन्हें सुविधाएँ भी कम मिलती हैं। आर्थिक संकट के कारण वे ट्यूशन करते हैं और अपनी कक्षाओं में अध्ययन के प्रति उदासीन रहते हैं।

3. शिक्षा संगठन दोषपूर्ण :
दोषपूर्ण शिक्षा संगठन के कारण भी शैक्षिक स्तर को ऊँचा नहीं उठाया जा सकता है। कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि शिक्षक न तो ठीक से अनुशासन रख पाता है और न सभी छात्रों से व्यक्तिगत सम्पर्क ही रख पाता है। परिणामस्वरूप शिक्षक अध्ययन कार्य को एक भार समझ लेता है और शिक्षा के स्तर पर कोई ध्यान नहीं देता।

4. प्रबन्ध समितियों का अनुचित हस्तक्षेप :
प्रबन्ध समितियाँ शिक्षा संस्थाओं के कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप व अध्यापकों का शोषण करती हैं, जिससे शिक्षक सदा मानसिक अशान्ति से ग्रस्त रहने हैं और पूरी कर्तव्यपरायणता से कार्य नहीं करते।

5. पाठ्यक्रम निर्धारण में शिक्षकों की उपेक्षा :
पाठ्यक्रम का निर्धारण करते समय शिक्षकों की पूर्णरूप से उपेक्षा की जाती है। पाठ्यक्रम का निर्धारण वे व्यक्ति करते हैं, जो शिक्षा के सिद्धान्तों एवं शिक्षण पद्धति तथा शिक्षकों की शिक्षण प्रणालियों से अनभिज्ञ होते हैं। कभी-कभी पाठ्यक्रम इतना अयोग्यता विस्तृत बना दिया जाता है कि शिक्षक किसी-न-किसी प्रकार पाठ्यक्रम को पूरा कर पाते हैं परन्तु शिक्षा के स्तर पर ध्यान नहीं दे पाते।

6. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली :
वर्तमान परीक्षा प्रणाली भी हस्तक्षेप अत्यन्त दोषपूर्ण है। अध्यापकों को इतनी अधिक संख्या में उत्तर-पुस्तिकाएँ जाँचने को दी जाती हैं कि छात्रों के कार्य का सही की उपेक्षा तरीके से मूल्यांकन नहीं हो पाता है।

7. परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग :
शिक्षकों की उदासीनता और विद्यालयी वातावरण के कारण सत्र के प्रारम्भ में छात्र पढ़ाई में बिल्कुल ध्यान नहीं देते और परीक्षा के समय के अनुचित साधनों का प्रयोग करके उत्तीर्ण होने की चेष्टा करते हैं। परीक्षा में नकल करने की प्रवृत्ति ने शिक्षा के स्तर को अत्यधिक गिरा दिया है।

8. अनुशासनहीनता :
आजकल छात्रों में अनुशासनहीनता भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हड़ताल व विद्यालय की तालाबन्दी एक आम बात हो गयी है। इस कारण छात्र अपना ध्यान अध्ययन कार्य पर केन्द्रित नहीं कर पाते हैं।

9. समाज का दूषित वातावरण :
आज के समाज में व्याप्त दलबन्दी, जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि ने विद्यालय के वार्तावरण को भी दूषित कर दिया है, जिसका कुप्रभाव छात्रों के अध्ययन पर पड़ता हैं।

10. विद्यालयों में शैक्षिक सुविधाओं का अभाव :
बहुत – से विद्यालयों में भवनों तथा शैक्षिक सामग्री का अभाव पाया जाता है, परिणामस्वरूप अध्यापन कार्य सुचारु रूप से नहीं चल पाता है।

11. राजनीतिक गतिविधियाँ :
विभिन्न राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों के लिए शिक्षण-संस्थाओं में भी विभिन्न प्रकार की राजनीतिक गतिविधियाँ सक्रिय रखते हैं। छात्र-संघ के चुनावों के अवसर पर ये गतिविधियाँ अधिक बढ़ जाती हैं। इन परिस्थितियों में छात्रों की शिक्षा सुचारु रूप से नहीं चल पाती तथा शैक्षिक स्तर निम्न हो जाता है।

समस्याओं का समाधान
शैक्षिक स्तर के निम्न होने की समस्या का समाधान करने और शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए सरकार को निम्नलिखित उपाय करने चाहिए

  1. पूर्व : प्राथमिक और प्राथमिक कक्षाओं से ही शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया जाए।
  2. शिक्षा के संगठन और प्रशासन को चुस्त और व्यवस्थित किया जाए।
  3. विद्यालयों में प्रबन्धकों का अनुचित हस्तक्षेप बन्द किया जाए और शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए।
  4. शिक्षकों को समय पर उचित वेतन दिया जाए और अन्य आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।
  5. पाठ्यक्रम को वैज्ञानिक और व्यवस्थित रूप दिया जाए।
  6. शिक्षकों की ट्युशनबाजी की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए।
  7. विद्यार्थी को प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही कक्षा में प्रवेश दिया जाए।
  8. पाठ्यक्रम सम्बन्धी गैस पेपर्स व कुंजियों आदि पर रोक लगाई जाए।
  9. छात्रों के हित के लिए निर्देश एवं परामर्श केन्द्रों की स्थापना की जाए।
  10. परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में शैक्षिक स्तर के निम्ने होने के मुख्य कारण क्या हैं? [2007, 08, 11]
या
आप कैसे कह सकते हैं कि भारत में शिक्षा के स्तर में गिरावट है? यदि हाँ तो उसके कारणों का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर :
वर्तमान समय में विभिन्न स्तर के विद्यालयों में शिक्षा का स्तर निरन्तर गिर रहा है। आज कोई भी छात्र ज्ञान प्राप्ति करने के लिए नहीं बल्कि डिग्री प्राप्त करने के लिए पढ़ रहा है। आज ज्ञान-प्राप्त के प्रति कोई भी ईमानदार नहीं है। कम-से-कम श्रम द्वारा परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही अभीष्ट है। इस स्थिति में हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है। शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। शिक्षा के स्तर में गिरावट के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं।

  1. समाज व समुदाय का दूषित वातावरण; जैसे–दलबन्दी, सम्प्रदायवाद, जातिवाद आदि। हमें यह सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि विद्यालय वृहत् सामाजिक व्यवस्था के अंग हैं। यदि समाज का वातावरण ही ठीक नहीं है तो विद्यालय इससे अधिक देर तक बचे नहीं रह सकते हैं।
  2. विद्यालयों में छात्रों की भीड़ अत्यधिक बढ़ती जा रही है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी यह निम्न शैक्षिक स्तर हेतु एक प्रमुख कारण है।
  3. आज विद्यालयों में वांछित सुविधाओं एवं साधनों का पर्याप्त अभाव हो चुका है। प्रयोगात्मक विषयों में प्रयोगशाला सम्बन्धी सुविधाओं का नितान्त अभाव ही है। यह भी शैक्षिक स्तर के निम्न होने का एक कारण है।
  4. छात्रों की हड़तालों व गुटबन्दी तथा राजनीतिज्ञों के हस्तक्षेप के कारण भी पढ़ने-पढ़ाने में बाधा उत्पन्न होती है तथा शैक्षिक स्तर निम्न हो जाता है।
  5. शिक्षा के प्रति छात्रों में अनुचित धारणाओं का निरन्तर विकास हो रहा है। इससे भी शैक्षिक स्तर निम्न हो रहा है।
  6. मूल्यांकन प्रणाली दोषपूर्ण है।
  7. परीक्षा में बढ़ती हुई नकल की प्रवृत्ति भी इसका एक प्रमुख कारण है।
  8. अध्यापकों का शोषण एवं सही निर्देशन का अभाव, शैक्षिक स्तर के उन्नयन के मार्ग में एक अन्य बाधा है।

प्रश्न 2
शैक्षिक स्तर के उन्नयत व सुधार के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? [2007, 08, 10, 11]
उत्तर :
भारत में शिक्षा के स्तर विशेष रूप से प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने व उसमें सुधार लाने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं

  1. पूर्व : प्राथमिक व प्राथमिक कक्षाओं से ही शिक्षा के स्तर में सुधार के प्रयत्न किए जाएँ। अगर इस स्तर पर शिक्षार्थी अनुशासित हो जाए और शिक्षा के महत्त्व को समझ ले तो अगले स्तरों पर शिक्षा का स्तर अपने आप ही अच्छा हो जाएगा।
  2. शिक्षा की दिशा एवं व्यवस्था पहले से ही निश्चित की जाए।
  3. पाठ्यक्रम सुसंगठित एवं छात्र/छात्राओं के लिए उपयोगी हो।
  4. विद्यालयों में छात्रों की बढ़ती हुई संख्या पर नियन्त्रण रखा जाए तथा आवश्यकतानुसार नए विद्यालय खोले जाएँ।
  5. अध्यापकों को उचित वेतन तथा सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। उनकी सभी उचित माँगों पर सहानुभूति से विचार किया जाना चाहिए।
  6. परीक्षा या मूल्यांकन प्रणाली में सुधार हो। प्रश्न-पत्रों में वस्तुनिष्ठ ढंग के प्रश्न सम्मिलित किए जाएँ, विद्यालय में ही परीक्षा ली जाएं तथा शिक्षार्थियों के सामूहिक अभिलेख रखे जाएँ।
  7. पर्याप्त संख्या में निर्देशन एवं परामर्श केन्द्र खोले जाएँ, जहाँ छात्रों की योग्यता एवं अभिरुचि की जाँच हो और तदनुकूल उन्हें शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाए।
  8. समाज के लोगों तथा छात्रों की धारणा शिक्षा के प्रति अच्छी हो।
  9. राज्य एवं समाज के द्वारा शिक्षा के अच्छे अवसर प्रदान किए जाएँ।
  10. समय-समय पर गोष्ठियों, सेमिनार आदि का आयोजन किया जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
आपके विचारानुसार शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाना क्यों आवश्यक है?
उत्तर :
विभिन्न कारणों से हमारे देश में शिक्षा का स्तर सामान्य से निम्न है; अतः शिक्षा के स्तर को , ऊँचा उठाना अति आवश्यक है। वास्तव में देश की प्रगति एवं व्यक्तिगत कुशलता में वृद्धि करने के लिए शिक्षा के सामान्य स्तर को उन्नत करना अनिवार्य है। शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाकर ही देश के शोध एवं अनुसन्धान कार्यों को सफल बनाया जा सकता है। शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाकरे ही औद्योगिक एवं व्यावसायिक क्षेत्र में योग्य एवं कुशल व्यक्ति एवं कार्यकर्ता उपलब्ध कराये जा सकते हैं। वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग में हर प्रकार की प्रगति एवं सफलता के लिए शिक्षा के सामान्य स्तर को ऊँचा उठाना अति आवश्यक है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
राष्ट्र की प्रगति के उद्देश्य से शिक्षा का सामान्य स्तर कैसा होना चाहिए?
उत्तर :
राष्ट्र की प्रगति के उद्देश्य से शिक्षा का सामान्य स्तर ऊँचा होना चाहिए।

प्रश्न 2
शैक्षिक स्तर के निम्न होने के चार मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. शिक्षा-संगठन का दोषपूर्ण होना
  2. दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली
  3. अनुशासनहीनता तथा
  4. विद्यालयों में शैक्षिक सुविधाओं का अभाव।

प्रश्न 3
हमारे देश में किस स्तर की शिक्षा को अनिवार्य एवं निःशुल्क बनाने का संकल्प लिया गया है ?
उत्तर :
हमारे देश में प्राथमिक स्तर की शिक्षा को अनिवार्य एवं नि:शुल्क बनाने का संकल्प लिया गया है।

प्रश्न 4
शिक्षा के स्तर से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा के स्तर को साधारण अर्थ यह है कि सामान्य छात्र जिस कक्षा या स्तर के हों, उनके ज्ञान का स्तर लगभग वही होना चाहिए जो निर्धारित शैक्षिक पाठ्यचर्या के अनुकूल हो।

प्रश्न 5
देश एवं समाज की प्रगति के उद्देश्य से शिक्षा का सामान्य स्तर कैसा होना चाहिए ?
उत्तर :
देश एवं समाज की प्रगति के उद्देश्य से शिक्षा का सामान्य स्तर सामान्य या सामान्य से ऊँचा होना चाहिए।

प्रश्न 6
शैक्षिक स्तर को उन्नत बनाने के लिए प्रत्येक जिले में कौन-से विद्यालय स्थापित किये गये हैं?
उत्तर :
शैक्षिक स्तर को उन्नत बनाने के लिए प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय स्थापित किये गये हैं।

प्रश्न 7
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर सामान्य से उच्च है।
  2. शिक्षा के स्तर के निम्न होने का एक मुख्य कारण अनुसेनहीनता भी है।

उत्तर :

  1. असत्य
  2. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए 

प्रश्न 1
हमारे देश में शिक्षा का स्तर है
(क) सामान्य
(ख) सामान्य से उच्च
(ग) सामान्य से निम्न
(घ) अस्पष्ट
उत्तर :
(ग) सामान्य से निम्न

प्रश्न 2
भारत सरकार ने किस प्रकार की शिक्षा को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया है ?
(क) प्राथमिक शिक्षा
(ख) तकनीकी शिक्षा
(ग) प्रौढ़ शिक्षा
(घ) कम्प्यूटर शिक्षा
उत्तर :
(क) प्राथमिक शिक्षा

प्रश्न 3
निम्न शैक्षिक स्तर के लिए जिम्मेदार कारण हैं
(क) दोषपूर्ण अनुशासन व्यवस्था
(ख) शैक्षिक सुविधाओं की कमी
(ग) मूल्यांकन प्रणाली का दोषपूर्ण होना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4
शैक्षिक स्तर के निम्न होने के कारण हैं
(क) प्रत्येक कक्षा में छात्रों की संख्या का अधिक होना
(ख) अनुशासन व्यवस्था का दोषपूर्ण होना
(ग) मूल्यांकन प्रणाली का दोषपूर्ण होना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5
शैक्षिक स्तर के उन्नयन व सुधार के उपाय हैं
(क) अनुशासन व्यवस्था को सुचारु बनाना
(ख) पाठ्यक्रम को उपयोगी एवं व्यावहारिक बनाना
(ग) अध्यापकों द्वारा अधिक शैक्षिक प्रयास करना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 2 Representation of Relief on Maps

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 2 Representation of Relief on Maps (मानचित्रों पर उच्चावच का प्रदर्शन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 2 Representation of Relief on Maps (मानचित्रों पर उच्चावच का प्रदर्शन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography (Practical Work)
Chapter Chapter 2
Chapter Name Representation of Relief on Maps (मानचित्रों पर उच्चावच का प्रदर्शन)
Number of Questions Solved 14
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 2 Representation of Relief on Maps (मानचित्रों पर उच्चावच का प्रदर्शन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उच्चावच प्रदर्शन की विभिन्न विधियों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर
धरातल सभी स्थानों पर एक-समान नहीं है। कहीं पर पर्वत, कहीं पर पठार तथा कहीं पर मैदान दिखाई पड़ते हैं। यदि धरातल ग्लोब पर सर्वत्र एक-समान होता तो उसे मानचित्र पर आसानी से प्रदर्शित किया जा सकता था, परन्तु धरातल के उच्चावचों से बहुत-सी विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। मानचित्र में उच्चावचों का चित्रण बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है जिससे सामान्य व्यक्ति भी पृथ्वी की। स्थलाकृतियों अथवा उसकी ऊँचाई-निचाई का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। मानचित्र पर पर्वत, घाटियाँ, दरें आदि के प्रदर्शन से क्षेत्र-विशेष की जानकारी सुगम हो जाती है।

धरातलीय विषमता को मानचित्र पर प्रदर्शित करना मानचित्र चित्रण की एक प्रमुख समस्या है। ऊपरी धरातल को प्रदर्शित करने के लिए स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Maps) उपयोग में लाये जाते हैं। इन स्थलाकृतिक मानचित्रों में धरातल की ऊँचाई-निचाई प्रदर्शित की जाती है। इस प्रकार उच्चावचों के प्रदर्शन में अनके विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं। समय-समय पर इन विधियों की स्पष्टता का ध्यान रखकर इनमें बहुत से परिवर्तन किये जा रहे हैं। मानचित्रों पर उच्चावच प्रदर्शन के लिए कभी-कभी अनेक विधियों का मिश्रण भी प्रयुक्त कर लिया जाता है, क्योंकि कई विधियों के मिश्रण मिलकर मानचित्र की स्पष्टता में वृद्धि कर देते हैं। इस प्रकार मानचित्रों में उच्चावच प्रदर्शन के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है –
(1) चित्र विधि द्वारा प्रदर्शन (Pictorial Methods),
(2) गणितीय विधियाँ (Mathematical Methods) तथा
(3) मिश्रित विधियाँ (Mixed Methods)।

(1) चित्र विधि द्वारा प्रदर्शन (Pictorial Methods) – चित्र विधियों द्वारा उच्चावच के स्वरूपों का ज्ञान भर हो पाता है। इनके द्वारा उस स्थल-विशेष की ऊँचाई-निचाई एवं ढाल की सामान्य जानकारी प्राप्त हो जाती है। इन विधियों का मुख्य उद्देश्य धरातलीय स्वरूपों को अधिकाधिक दृष्टिगत बनाना है, परन्तु इन विधियों के द्वारा उस क्षेत्र की वास्तविक ऊँचाई का ज्ञान नहीं हो पाता है। चित्र विधि द्वारा प्रदर्शन की निम्नलिखित प्रविधियाँ प्रमुख हैं –

(i) हैच्यूर या रेखीय छाया (Hachures) – इस विधि का आविष्कार सेना सम्बन्धी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु मेजर लेहमान द्वारा किया गया था। हैच्यूर वे रेखाएँ होती हैं जो अधिक से कम ढाल की ओर ऊँचाई दिखाने के लिए बनायी जाती हैं। तेज ढाल पर हैच्यूर रेखाएँ सघन बनायी जाती हैं, जबकि मन्द ढाल पर दूर-दूर या छिटकी हुई बनायी जाती हैं। ढाल जितना अधिक होगा, हैच्यूर रेखाएँ उतनी ही पास-पास होंगी। यदि भूपृष्ठ. के ढाल का कोण 45° से अधिक होगा तो वह स्थान पूर्णतया काला कर दिया जाता है। हैच्यूर रेखाएँ ढाल की दिशा में खींची जाती हैं। अतः ये रेखाएँ.समोच्च रेखाओं पर समकोण बनाती हैं। इन रेखाओं को देखकर एक सामान्य व्यक्ति भी स्थलाकृतियों की स्थिति एवं ढाल का ज्ञान आसानी से कर सकता है।
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इन रेखाओं के कई दोष भी हैं; जैसे- समुद्र-तल से ऊँचाई ठीक-ठीक ज्ञात नहीं हो सकती है। दूसरे, ये रेखाएँ काले रंग से बनायी जाती हैं जिसके फलस्वरूप अन्य विवरण प्रदर्शित करना कठिन होता है। इसी कारण इन रेखाओं को भूरे रंग की विभिन्न आभाओं द्वारा दिखाया जाने लगा है। तीसरे लघु मापक मानचित्रों में हैच्यूर रेखाएँ बनाना अधिक कठिन होता है।

(ii) पर्वतीय छायाकरण विधि (Hili Shading Methods) – पर्वतीय छायाकरण विधि में ढाल जितना अधिक होगा, उतनी ही गहरी छाया होगी। जो भाग छाया में पड़ते हैं, उन्हें रंगों द्वारा हल्का या गाढ़ा रंग दिया जाता है। प्रकाशीय स्थिति के अनुसार इस विधि को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है –

(अ) ऊर्ध्वाधर प्रकाश विधि (Vertical Illumination) – इस विधि में ढाल जितना खड़ा होगा, छाया भी उतनी ही सघन होगी। पर्वत-शिखर, पठार, घाटियाँ एवं मैदान प्रकाश में रहते हैं; अतः इन्हें खाली छोड़ दिया जाता है। पहाड़ों के ढाल छाया में रहते हैं; अतः इन्हें काले रंग से ढाल की तीव्रता के अनुसार अधिक गहरे अथवा हल्की छाया में दिखाया जाता है।
(ब) तिर्यक प्रकाश विधि (Oblique Illumination)-इस स्थिति में प्रकाश उत्तरी-पश्चिमी सिरे से आता हुआ मान लिया जाता है। इसके प्रभाव से पूर्वी तथा दक्षिणी-पूर्वी ढाल छाया में रहते हैं तथा इन्हें ढाल की तीव्रता के अनुसार गहरा रँगा जाता है। पश्चिमी तथा उत्तरी-पश्चिमी सिरे प्रकाश में रहने के कारण इन्हें खाली छोड़ दिया जाता है।
इस विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि हैच्यूर रेखाओं की भाँति इसमें ऊँचाई का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता है।

(2) गणितीय विधियाँ (Mathematical Methods) – ये विधियाँ गणित के नियमों पर आधारित हैं। नवीन तकनीकी विकास के साथ-साथ पश्चिमी यूरोप एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में समुद्र-तल को आधार मानकर विभिन्न स्थलाकृतियों की ऊँचाइयाँ निश्चित की जाती हैं। फ्रांस में 18वीं शताब्दी में कैसिनी प्रथम के संरक्षण में यह प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से प्रारम्भ हुई। वर्तमान समय में सर्वेक्षण द्वारा विभिन्न धरातलीय ऊँचाइयों को मानचित्र में अंकित किया जाता है। प्रमुख गणितीय विधियाँ निम्नवत् हैं –

(i) स्थानांकित ऊँचाइयाँ (Spot-heights) – जब विभिन्न स्थानों की ऊँचाई प्रकट की जाती है, तो इस विधि का प्रयोग किया जाता है। यह विधि सर्वेक्षण पर आधारित है। विभिन्न बिन्दुओं के निकट ही उनकी ऊँचाइयाँ अंकित कर दी जाती हैं। प्रायः बिन्दु पर्वत-शिखरों पर अंकित किये जाते हैं, अतएव घाटी वाले भागों की ऊँचाई ज्ञात करना कठिन हो जाता है। शिखर वाले भाग पर एक छोटे त्रिभुज का निर्माण कर उस स्थान की ऊँचाई लिख दी जाती है। यह विधि अधिक सन्तोषजनक नहीं है।

(ii) तल-चिह्न विधि (Bench-mark Method) – औसत समुद्र-तल से ऊँचाई ज्ञात कर जब किसी दीवार या स्तम्भ पर एक धातु की प्लेट या पट्ट लगाकर उस पर ऊँचाई अंकित कर दी जाती है तो इसे तल-चिह्न विधि कहते हैं। धातु की प्लेट के नीचे तीर लगा रहता है तथा तीर के नुकीले भाग के ऊपर उस स्थान की ऊँचाई अंकित कर दी जाती है। इस प्रकार तल-चिह्न किसी धरातलीय बिन्दु की ऊँचाई न बताकर दीवार आदि की ऊँचाई बताता है, जब कि स्थानांकित ऊँचाई में धरातल के उस भाग की ऊँचाई – अंकित रहती है, जहाँ वह बिन्दु अंकित है। तल-चिह्न बताने के लिए मानचित्र में B.M. शब्द का प्रयोग किया जाता है। रेलवे स्टेशन पर भी स्टेशन के नाम के नीचे तल-चिह्न की ऊँचाई मीटर में अंकित रहती है।

(iii) त्रिकोणमितीय अवस्थान विधि (Trig-point Method) – त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण करते समय क्षेत्र में दूर-दूर कुछ प्रारम्भिक स्टेशन स्थापित किये जाते हैं। ऐसे बिन्दुओं या स्टेशनों की समुद्र-तल से औसत ऊँचाई ज्ञात कर एक छोटी त्रिभुज में यह ऊँचाई लिख दी जाती है। ये स्टेशन प्रायः कई किमी दूर होते हैं और इनकी स्थिति निश्चित करते समय भू-वक्रता पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।

(iv) समोच्च रेखा विधि (Contour Line Method) – समोच्च रेखाएँ वे रेखाएँ होती हैं जो मानचित्र पर स्थित समुद्र-तल से समान ऊँचाई मिलाने वाले भागों (बिन्दुओं) से होकर खींची जाती हैं। सामान्यतया पूर्व निश्चित तल समुद्र-तल ही माना जाता है। आवश्यकता पड़ने पर किसी अन्य तल को भी इसके स्थान पर सन्दर्भ तल माना जा सकता है। ऐसे तल को मिलाने वाली रेखा को ही आधार तलरेखा (Datum Plane) कहते हैं। प्रायः सभी देशों में औसत समुद्र-तल एक निश्चित स्थान की निश्चित समय पर अंकित समुद्र-तल की स्थिति बताने वाली सतह या रेखा होती है। भारत में यह रेखा चेन्नई में ज्वार के समय की औसत ऊँचाई वाली सतह या रेखा होती है। मानचित्र पर समोच्च रेखाओं के एक कोने में उसकी ऊँचाई अंकित कर दी जाती है।
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समोच्च रेखाओं की विशेषताएँ
Characteristics of Contour Lines

समोच्च रेखाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. समोच्च रेखाएँ समान ऊँचाई वाले स्थानों को प्रदर्शित करने वाली रेखाएँ होती हैं, अर्थात् एक रेखा के सहारे-सहारे सर्वत्र एक-सी ऊँचाई होती है।
  2. जब ये रेखाएँ पास-पास होती हैं तो इनसे तीव्र ढाल एवं दूर-दूर होने पर मन्द ढाल का पता चलता है। इसी कारण पर्वतीय क्षेत्रों में समोच्च रेखाएँ जटिल तथा मैदानी क्षेत्रों में सरल होती हैं। सीधे खड़े ढाल (90°) पर समोच्च रेखाएँ एक-दूसरे से मिल जाती हैं।
  3. कमल के असमतल होने के कारण समोच्च, रेखाएँ वक्राकार होती हैं।
  4. शकाल के भौतिक स्वरूपों का आकार स्थान-स्थान पर परिवर्तनशील है। अत: इनकी सोच विशेष प्रकार की होंगी। ऐसे स्थल स्वरूपों को देखकर आसानी से धरातल की वास्तविक आकृतियों को समझा जा सकता है।
  5. मानचित्रों में समोच्च रेखाओं को भूरे रंग से प्रदर्शित किया जाता है।
  6. अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं की भाँति समोच्च रेखाएँ भी धरातलीय सन्दर्भ में काल्पनिक हैं, परन्तु भू-सर्वेक्षण द्वारा मानचित्र पर इन्हें निश्चित धरातलीय बिन्दुओं द्वारा खींचा जाता है। इसी कारण मानचित्रों में ये रेखाएँ बास्तविक लेती हैं।
  7. जल-प्रवाह प्रणाली, ढाल के अनुरूप होती है तथा समोच्च रेखाएँ ढाल के अनुप्रस्थ दिशा में खींची जाती हैं। अतः संमोच्च रेखाएँ सरिता एवं अन्य प्रवाह प्रणालियों को उनकी घाटी के आकार के अनुसार उन्हें काटती हुई खींची जाती हैं।
  8. समोच्च रेखा मानचित्र के किसी भाग के अनुप्रस्थ काट (Cross section) द्वारा धरातल का पार्श्व चित्र खींचा जा सकता है। ऐसे मानचित्रों की सहायता से अन्तर्दृश्यता (Intervisibility) ज्ञात की जा सकती है।
  9. किसी भी मानचित्र में समोच्च रेखाएँ न तो एक-दूसरे को काटती हैं एवं न ही बीच में समाप्त हो सकती हैं। ये रेखाएँ या तो एक भाग से प्रारम्भ होकर दूसरे भाग तक जाएँगी अथवा मानचित्र में ही पूर्ण आकृति बनाती हुई आपस में मिल जाएँगी।
  10. किसी मानचित्र में समोच्च अन्तर घटाकर उसमें अधिक धरातलीय लक्षण अंकित किये जा सकते हैं।
  11. आधुनिक स्थलाकृतिक एवं अन्य दीर्घकालीन मानचित्रों में समोच्च रेखाओं के साथ-साथ स्थानांकित ऊँचाई, तलचिह्न अथवा पर्वतीय छायाकरण का प्रयोग कर मानचित्र को और अधिक स्पष्ट एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
  12. भू-आकृतियों को प्रदर्शित करने वाली सभी विधियों में समोच्च रेखा विधि आज भी सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रचलित विधि है जिसके द्वारा किसी भी प्रकार के भू-स्वरूप को सही-सही चित्रित किया जा सकता है।
  13. समोच्च रेखाओं द्वारा समतल प्रदेशों का स्वरूप, दो समोच्च रेखाओं के बीच के ढाल की प्रकृति एवं ढाल की दिशा का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता है। इसी प्रकार मानचित्र में किसी भी बिन्दु की सही-सही ऊँचाई का ज्ञान नहीं हो पाता है।

समोच्च रेखा मानचित्र के इन दोषों को दूर करने के लिए धरातल के विभिन्न पहलुओं को और अधिक स्पष्ट करने के लिए एक से अधिक विधियों का प्रयोग उसी मानचित्र में किया जाता है। इस विधि को मिश्रित अथवा संयुक्त विधि के नाम से पुकारा जाता है।

(3) मिश्रित विधियाँ (Mixed Methods) – वर्तमान समय में अधिकांश नवीन मानचित्रों में भू-आकृतियों को और अधिक स्पष्ट चित्रित करने के लिए एक ही विधि का प्रयोग नही किया जाता है। किसी एक विधि जैसे समोच्च रेखा, रंग, विधि आदि को आधार मानकर अन्य विधियों को प्रमुख भू-आकृतियों को स्पष्ट करने तथा छोटे-छोटे धरातलीय लक्षणों को समझाने हेतु उसे मानचित्र में अंकित किया जाता है। स्थलाकृतिक मानचित्र के नवीन रंगीन संस्करणों में समोच्च रेखाओं के साथ-साथ प्लास्टिक आभा, स्थानांकित ऊँचाइयाँ, तलचिह्न, हैच्यूर आदि विधियों का भी अंकन किया जाता है। इससे भू-आकृतिक लक्षण और अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। इसी कारण ऐसे मानचित्र मात्रा-प्रधान एवं गुण-प्रधान दोनों ही विधियों को मिला-जुला स्वरूप है। सभी प्रकार की महत्त्वपूर्ण मानचित्रावलियों या भित्ति मानचित्रों में भी संयुक्त विधियों का खुलकर प्रयोग किया जाता है। प्रमुख मिश्रित विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. समोच्च रेखा एवं पहाड़ी छायाकरण अथवा प्लास्टिक छाया विधि;
  2. समोच्च रेखा एवं रंग विधि;
  3. समोच्च रेखा एवं स्थानांकित ऊँचाई, तलचिह्न एवं छाया विधि;
  4. समोच्च रेखा एवं हैच्यूर या खण्ड रेखाएँ;
  5. पहाड़ी छायाकरण एवं रंग आभा विधि;
  6. हैच्यूर, स्थानांकित ऊँचाई, तलचिह्न एवं आभा विधि;
  7. हैच्यूर एवं भू-आकृति विधि;
  8. भू-आकृति एवं स्थानांकित ऊँचाई तथा तलचिह्न आदि।

प्रश्न 2
समोच्च रेखाओं द्वारा निम्नलिखित भू-आकृतियों का प्रदर्शन उनकी पाश्र्वाकृतियों सहित प्रदर्शित कीजिए –
(1) मन्द ढाल, (2) तीव्र ढाल, (3) नतोदर ढाल, (4) उन्नतोदर ढाल, (5) सम ढाल, (6) विषम ढाल, (7) सीढ़ीनुमा ढाल, (8) खड़ा ढाल या भृगु, (9) शंक्वाकार पहाड़ी, (10) काठी एवं दर्रा, (11) जलप्रपात (झरना) तथा नदी सोपान, (12) खड्ड, गॉर्ज एवं केनियन, (13) गोखुरनुमा झील, (14) ‘यू-आकार की घाटी, (15) ‘वी’ -आकार की घाटी, (16) ज्वालामुखी शंकु।
उत्तर
(1) मन्द ढाल (Gentle Slope) – जो प्रदेश प्रायः समतल होते हैं तथा जिनकी औसत प्रवणता 1/10 या उससे कम होती है, वहाँ समोच्च रेखा एक-दूसरे से काफी दूरी पर खींची हुई होती है, वहाँ मन्द ढाल होता है। दूसरे शब्दों में, यहाँ धरातल पर चढ़ाई नाममात्र को ही होती है।।
(2) तीव्र ढाल (Steep Slope) – जिन प्रदेशों में ढाल की तीव्रता अथवा प्रवणता 1/10 से अधिक होती है अर्थात् ढाल का कोण 6° से अधिक होता है, उसे तीव्र ढाल के नाम से पुकारा जाता है। इस स्थलाकृति की समोच्च रेखाएँ पास-पास होती हैं। यहाँ पर ढलान प्रपाती होता है, अर्थात् थोड़ी दूर चलने पर अधिक चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।

(3) नतोदर ढाल (Concave Slope) – इसे अवतल ढाल के नाम से भी पुकारते हैं। इस ढाल में समोच्च रेखाएँ पहले ऊँचाई पर पास-पास तथा आगे चलकर समोच्च रेखाएँ दूर-दूर स्थित होती हैं। इस ढाल को नतोदर ढाल कहते हैं। इसमें समोच्च रेखाएँ उन्नतोदर ढाल के विपरीत अवस्था में होती हैं।
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(4) उन्नतोदर ढाल (Convex Slope) – जब ढाल का क्रम नतोदर ढाल के विपरीत होता है, अर्थात् पहले समोच्च रेखाओं की स्थिति ऊँचाई पर दूर-दूर तथा आगे चलकर समोच्च रेखाएँ पास-पास अपनी स्थिति रखती हैं तो ऐसे ढाल को उन्नतोदर या उत्तल ढाल कहते हैं।
(5) सम ढाल (Even or Uniform Slope) – सम ढाल में समोच्च रेखाएँ समान दूरी पर स्थित होती हैं। इसमें ढाल प्राय: एक-सा रहता है।
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(6) विषम ढाल (Uneven Slope) – विषम ढाल में ढाल की स्थिति धीमी या तेज कोई भी हो सकती है। इसमें समोच्च रेखाओं का क्रम असमान रहता है। इस ढाल में एक साथ तेज एवं धीमा दोनों ही ढाल बिना किसी क्रम में प्रदर्शित किये जा सकते हैं।
(7) सीढ़ीनुमा ढाल (Terraced Slope) – इस प्रकार के ढाल में समोच्च रेखाएँ पहले पास-पास तथा फिर दूर-दूर होती हैं। यह क्रम कई बार दोहराया जाता है तथा सीढ़ीदार ढाल निर्मित हो जाता है। नदी एवं हिमानी की घाटियों में प्रायः ऐसे ही ढाल दिखाई पड़ते हैं।
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(8) खड़ा ढाल या भृगु (Vertical Slope or Cliff) – इसे लम्बवत् ढाल भी कहा जा सकता है। भृगु ढाल एकदम प्रपाती होता है। यह पूर्णतया एक दीवार की भाँति होता है। इसमें समोच्च रेखाएँ एक स्थान पर एक-दूसरी से मिल जाती हैं। कभी-कभी कई समोच्च रेखाएँ आपस में मिल जाती हैं। प्राकृतिक रूप से ऐसी प्रवणता वाले ढाल कम ही देखने को मिलते हैं। समोच्च रेखाओं के एक-दूसरे से छू जाने पर भृगु की रचना होती है।

(9) शंक्वाकार पहाड़ी (Conical Hill) – समुद्र तल से 900 मीटर से कम ऊँचे त्रिकोणात्मक स्थल खण्ड को पहाड़ी कहा जाता है। पहाड़ी के लिए खींची गयी समोच्च रेखाएँ सदैव बन्द होती हैं। यदि पहाड़ी शंक्वाकार होती है तो इसमें समोच्च रेखाएँ सदैव गोलाकार होती हैं तथा समान दूरी पर खींची जाती। हैं। शंक्वाकार पहाड़ी का ढाल सभी दिशाओं में प्राय: समान होता है। अतः समोच्च रेखाएँ भी समदूरस्थ होंगी। पहाड़ी की ऊँचाई चूंकि निरन्तर बढ़ती जाती है। अत: समोच्च रेखाओं का नामांकन करते समय केन्द्र की ओर ऊँचाई सदैव अधिक नामांकित की जाती है। पहाड़ी के सबसे ऊँचे भाग को चोटी या शिखर (Summit) कहते हैं, जिसे मध्य में बिन्दु अथवा त्रिकोण बनाकर अंकित कर दिया जाता है।
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(10) काठी एवं दर्रा (Saddle and Pass) – दो पर्वत-शिखरों के मध्य ऐसी स्थलाकृति को दर्रा कहते हैं, जो यातायात हेतु मार्ग का काम देता है। इसमें दोनों पर्वत-शिखरों की समोच्च रेखाएँ स्वतन्त्र एवं बन्द होती हैं तथा बीच का मार्ग सँकरा होता है। उच्च पर्वतीय प्रदेशों में इन दरों को देखा जा सकता है। इस प्रकार दर्रा दो पर्वत-शिखरों के मध्य निचला तुंग मार्ग होता है।
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काठी भी दरें से मिलता-जुलता भू-स्वरूप है, परन्तु काठी की चौड़ाई अधिक होती है तथा तुलनात्मक ऊँचाई कम होती है। दरें की अपेक्षा काठी का क्षेत्र दुर्गम नहीं होता है।

(11) जलप्रपात या झरना तथा द्रुत प्रवाह (Water Fall and Rapids) – नदी की लम्बवत् घाटी में ढाल सम्बन्धी कई अनियमितताएँ पायी जाती हैं। जलप्रपात भी एक ऐसी ही भू-रचना है। नदियों के प्रवाह मार्ग में कभी-कभी आकस्मिक रूप से खड़ा ढाल उपस्थित हो जाता है तो नदी का जल ऊँचाई से गिरने लगता है। इस स्थलाकृति को प्रदर्शित करने के लिए कई समोच्च रेखाएँ आपस में मिला दी जाती हैं। जिससे इनके आपस में मिलने से उस स्थान पर ढाल बहुत अधिक तीव्र हो जाता है तथा नदी का जल ऊँचाई से तीव्र गति के साथ नीचे की ओर गिरने लगता है, जिसे जलप्रपात या झरने के नाम से पुकारा जाता है। पर जब नदी का जल अनेक स्थानों पर ऊँचाई से निचाई की ओर गिरता है तो द्रुत प्रवाहों का निर्माण होता है।
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(12) खड्डू (गॉर्ज) या केनियन (Gorge or Canyon) – उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ पर नदियों का प्रवाह अत्यधिक तीव्र होता है, वहाँ कठोर चट्टानों के कारण विखण्डन की क्रिया बहुत ही कम होती है। अत: नदी की धारा अपने तलीय भाग को गहरा काटती है। इस प्रकार सँकरी परन्तु गहरी घाटी का विकास होता है। इसे संकुचित घाटी (खड्डु) या गॉर्ज अथवा केनियन कहते हैं। कई बार ऊपरी सतह से घाटी की तली दिखाई नहीं पड़ती है। इस प्रकार की घाटी के दोनों पाश्र्वो का ढाल एकदम खड़ा प्रदर्शित किया जाता है, जिसके लिए समोच्च रेखाओं का पारस्परिक अन्तर बहुत कम रखा जाता है, अर्थात् समोच्च रेखाएँ एकदम निकट आ जाती हैं।
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(13) गोखुरनुमा या छाड़न झील (Ox Bow Lake) – इस प्रकार की झीलों का निर्माण नदी के प्रवाह मार्ग में मैदानी भागों में निर्मित होता है। अत्यधिक समतल भागों में नदी घुमावदार मार्गों से प्रवाहित होने लगती है। बाढ़ के समय बहाव की तीव्रता के कारण जब नदी नये मार्ग का अनुसरण करती है, तब इस घुमाव के मुहाने पर मिट्टी जमा हो जाती है। इनके उत्तरोत्तर विकास में गोखुरनुमा या छाड़न झील का विकास होता है। नदी एवं झील का तल प्रायः एक-समान होता है। अतः नदी की धारा और झील को घेरने वाली समोच्च रेखाओं की ऊँचाई एक-सी रहती है। ऐसी झील की आकृति धनुषाकार अथवा अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में निर्मित हो जाती है।

(14) ‘यू’ -आकार की घाटी (‘U’ Shaped Valley) – इन घाटियों का निर्माण हिमानियों द्वारा होता है। इस घाटी का तल कुछ चौड़ा और सपाट होता है तथा किनारे को ढाल खड़ा होता है जिससे इस घाटी की आकृति अंग्रेजी भाषा के अक्षर ‘U’ की भाँति हो जाती है। इस घाटी की समोच्च रेखाएँ तल के समीप पास-पास एवं समानान्तर होती हैं। पाश्र्वो का ढाल उत्तल होता है।
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‘यू’ -आकार की सहायक घाटियों को लटकती घाटी (Hanging Valley) कहते हैं, जो मुख्य नदी की घाटी में अन्य दिशा से आकर मिलती हैं। ‘यू’ आकार की घाटी के समान होने के कारण इनकी समोच्च रेखाओं का प्रदर्शन भी प्रधान घाटी की ही भाँति होता है।

(15) ‘वी’ -आकार की घाटी (‘V’ Shaped Valley) – नदी अपनी युवावस्था में लम्बी एवं सँकरी घाटी का निर्माण करती है जिसका आकार अंग्रेजी के अक्षर ‘V’ की भाँति हो जाता है। इसे घाटी की समोच्च रेखाएँ सदैव अंग्रेजी के अक्षर की भाँति मुड़ी रहती हैं। इस प्रकार की घाटी में, घाटी रेखा से भूमि दोनों ओर धीरे-धीरे ऊँची होती चली जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में इस प्रकार की घाटियाँ अधिक देखी जा सकती हैं।

(16) ज्वालामुखी शंकु (Volcanic Cone) – ज्वालामुखी के चारों ओर लावा आदि के एकत्रण से शंक्वाकार आकृति का निर्माण हो जाता है। इसका ऊपरी मुंह प्याले की भाँति हो जाता है, जिसे क्रेटर (Crater) कहते हैं। इसे काल्डेरा (Caldera) भी कहते हैं। शान्त ज्वालामुखी शंकु के विवर में जल भर जाने से कभी-कभी झील का भी निर्माण हो जाता है। कभी-कभी इसी ज्वालामुखी क्षेत्र में इसके सहायक शंकु का भी विकास हो जाता है। इसकी समोच्च रेखाएँ गोलाकार होती हैं जो ऊपर की ओर बढ़ती जाती हैं, परन्तु शंकु के समीप पुनः कम हो जाती हैं।
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मौखिक परिक्षा: सम्भावित प्रश्न

प्रश्न 1
उच्चावच का क्या अर्थ है?
उत्तर
वे धरातलीय स्थलाकृतियाँ जिनकी रचना ऊँचाई एवं ढाल के द्वारा प्रदर्शित की जाती है, उच्चावच कहलाती हैं।

प्रश्न 2
उच्चावच प्रदर्शन की कौन-कौन-सी प्रमुख विधियाँ हैं?
उत्तर
उच्चावच प्रदर्शन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. चित्र विधि द्वारा प्रदर्शन (Pictorial Methods)
  2. गणितीय विधियाँ (Mathematical Methods) तथा
  3. मिश्रित या संयुक्त विधियाँ (MixedorComposite Methods)।

प्रश्न 3
हैच्यूर किसे कहते हैं?
उत्तर
हैच्यूर वे छोटी-छोटी रेखाएँ हैं जो अधिक से कम ढाल की ओर ऊँचाई दिखाने के लिए खींची जाती हैं।

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प्रश्न 4
पर्वतीय छायाकरण विधि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
उच्चावच प्रदर्शन की यह चित्रीय विधि है। इसकी रचना प्रकाश को आधार मानकर की जाती है।

प्रश्न 5
स्थानांकित ऊँचाई विधि क्या होती है?
उत्तर
यह विधि किसी स्थान की धरातल पर अंकित ऊँचाई को प्रकट करती है। मानचित्र में उस स्थान की ऊँचाई मीटर अथवा फीट में नापी जाती है।

प्रश्न 6
निर्देश चिह्न (Bench Mark) किसे कहा जाता है?
उत्तर
सर्वेक्षण में समुद्र-तल से विभिन्न स्थानों की ऊँचाई को अंकित किया जाता है। इसके समीप में निर्देश चिह्न बना दिया जाता है। इस संकेत के द्वारा उस स्थान की ऊँचाई का ज्ञान हो जाता है अथवा इस स्थान के सन्दर्भ में अन्य स्थानों की अपेक्षाकृत ऊँचाई का पता चल जाता है, जिसे निर्देश चिह्न का नाम दिया गया है।

प्रश्न 7
समोच्च रेखा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
मानचित्र में समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाकर प्रदर्शित की जाने वाली रेखा को समोच्च रेखा कहते हैं।

प्रश्न 8
किन्हीं चार मिश्रित विधियों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. समोच्च रेखा एवं रंग विधि
  2. समोच्च रेखा, स्थानांकित ऊँचाई, तल-चिह्न तथा छाया विधि
  3. समोच्च रेखा एवं हैच्यूर या खण्ड रेखा विधि तथा
  4. समोच्च रेखा एवं पहाड़ी छायाकरण विधि। प्रश्न

प्रश्न 9
प्रवणता (Gradient) क्या होती है?
उत्तर
धरातलीय दूरी एवं लम्बवत् दूरी में जो अनुपात होता है, उसे प्रवणता कहते हैं।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 2 Representation of Relief on Maps

प्रश्न 10
समोच्च रेखा अन्तराल निकालने का क्या सूत्र है?
उत्तर
समोच्च रेखा अन्तराल =
UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 2 Representation of Relief on Maps 12

प्रश्न 11
‘यू’-आकार की घाटी तथा ‘वी’ -आकार की घाटी में अन्तर बताइए।
उत्तर
‘यू’-आकार की घाटी हिमानी द्वारा निर्मित होती है। इसका प्रवाह मार्ग चौड़ा तथा चौरस होता है। आकार में यह अंग्रेजी के अक्षर ‘यू’ (U) जैसी होती है।
परन्तु ‘वीं-आकार की घाटी नदियों द्वारा निर्मित होती है जो नदियों द्वारा अपने दोनों किनारे काटने के कारण ये किनारे आधार तल पर मिल जाते हैं तथा उसका आकार अंग्रेजी के अक्षर ‘वी’ (v) जैसा हो जाता है। इसे ‘वी’-आकार की घाटी कहा जाता है।

प्रश्न 12
जल विभाजक (Water Divider) किसे कहते हैं?
उत्तर
दो जलधाराओं को पृथक् करने वाले स्थलखण्ड को जल-विभाजक कहते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 11 White Collar Crime

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 11 White Collar Crime (श्वेतवसन अपराध) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 11 White Collar Crime (श्वेतवसन अपराध).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 11
Chapter Name White Collar Crime (श्वेतवसन अपराध)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 11 White Collar Crime (श्वेतवसन अपराध)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
भारत में श्वेतवसन अपराध पर एक लेख लिखिए। [2011, 12]
या
श्वेतवसन अपराध से आप क्या समझते हैं ? इसके कारणों का वर्णन कीजिए। [2009, 11, 16]
या
श्वेतवसन अपराध क्या है ? श्वेतवसन अपराध के कुछ उदाहरण दीजिए। [2011]
या
याश्वेतवसन अपराध से आप क्या समझते हैं ? भारत में श्वेतवसन अपराध के उत्तरदायी कारकों को समझाइए। [2012, 14, 15]
या
श्वेतवसन अपराध से आप क्या समझते हैं ? भारतीय समाज में यह किन-किन रूपों में प्रचलित है? [2009]
या
भ्रष्टाचार श्वेतवसन अपराध का स्रोत है।” स्पष्ट कीजिए। [2016]
या
श्वेतवसन अपराध किसे कहते हैं ? किन-किन क्षेत्रों को यह अधिक प्रभावित करता है ? [2010]
या
श्वेतवसन अपराध की विशेषताएँ बताइए। [2016]
या
भारत में श्वेतवसन अपराध की समस्याओं पर प्रकाश डालिए। [2008]
या
श्वेतवसन अपराध को परिभाषित करते हुए भारत में श्वेतवसन अपराध पर निबन्ध लिखिए। [2012, 14]
या
श्वेतवसन (सफेदपोश) अपराध का क्या अर्थ है? भारत में इसके लिए उत्तरदायी मुख्य कारकों की विवेचना कीजिए। [2015]
या
श्वेतवसन अपराध के कारणों की विवेचना कीजिए। [2017]
या
श्वेतवसन (सफेदपोश) अपराध की प्रकृति को व्यक्त कीजिए और इसके प्रमुख स्वरूपों का विवेचन कीजिए। [2016]
उत्तर:
श्वेतवसन अपराध वह अपराध होता है जो उच्च वर्ग के व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, क्योंकि इन व्यक्तियों के पास धन की कोई कमी नहीं होती; अतः ये व्यक्ति अपराध करके धन की आड़ में बच निकलते हैं। अधिकांशतः बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों, राजनेताओं तथा पुलिस का इन्हें सहयोग भी मिलता रहता है। बड़े-बड़े उद्योगपति, उच्च राजकीय पदाधिकारी, वकील तथा डॉक्टर इस श्रेणी में आते हैं।

श्वेतवसन अपराध का अर्थ तथा परिभाषा

श्वेतवसन अपराध प्रतिष्ठित एवं उच्च सामाजिक पद वाले व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला अपराध है। इस संकल्पना का प्रयोग सर्वप्रथम सदरलैण्ड द्वारा किया गया। प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है

  • सदरलैण्ड के अनुसार, “प्रतिष्ठित एवं उच्च सामाजिक पद के व्यक्ति के द्वारा अपने व्यवसाय के समय में किया गया अपराध ही श्वेतवसन अपराध है।”
  • हारटुंग के अनुसार, “श्वेतवसन अपराध वह अपराध है जो समाज के उच्च आर्थिक वर्ग से सम्बन्धित होता है और साधारणतया शिक्षित व्यक्ति द्वारा किया जाता है।”
  • क्लीनार्ड के अनुसार, “श्वेतवसन अपराध प्राथमिक रूप से उस कानून का उल्लंघन है, जो व्यवसायी, पेशेवर लोग और राजनीतिज्ञों आदि जैसे समूहों द्वारा अपने व्यवसाय के सम्बन्ध में किया जाता है।”
  • टैफ्ट के अनुसार, “श्वेतवसन अपराध का तात्पर्य उन सभी संगठित अपराधों से है, जो कानून भंग करने वाले विशेषज्ञ व्यक्ति अथवा समूह द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किये जाते

श्वेतवसन अपराध के लक्षण (विशेषताएँ)
सदरलैण्ड ने श्वेतवसन अपराध की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है

  1. श्वेतवसन अपराध उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त सामाजिक-आर्थिक वर्ग के व्यक्तियों के द्वारा किया गया अपराध है।
  2.  श्वेतवसन अपराध में कानून का उल्लंघन बड़ी चतुरता के साथ किया जाता है।
  3. श्वेतवसन अपराधी अपनी प्रतिष्ठा के कारण कानूनी दण्ड से बच जाता है तथा उसकी प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आती।
  4.  श्वेतवसन अपराध जनता के विश्वास की आड़ में किये जाते हैं। अतः यह विश्वासघात पर आधारित अपराध है। निर्धन किसानों का साहूकार लोग इसी प्रकार शोषण करते हैं।
  5.  अप्रत्यक्ष रूप से किये जाने के कारण श्वेतवसन अपराध का जनता द्वारा विरोध नहीं किया जाता है।
  6.  श्वेतवसन अपराध धनी वर्ग, उच्च सामाजिक व राजनीतिक पद प्राप्त व्यक्ति द्वारा ही सम्भव है।
  7.  श्वेतवसन अपराध समाज के लिए अधिक अहितकारी होते हैं।
  8.  श्वेतवसन अपराधियों का सरकार और शासन के संचालन में भी हाथ रहता है, जिसके कारण उन्हें पकड़ना तथा सजा दिलवाना सम्भव नहीं होता।
  9. श्वेतवसन अपराध आर्थिक क्षेत्र में अधिक होते हैं, जिनका उद्देश्य धन एकत्र करके विलासी जीवन बिताना होता है।
  10.  श्वेतवसन अपराध सामान्य समाज और उपसमूहों में पाये जाते हैं।
  11. यह अपराध नेताओं, चिकित्सकों, न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, व्यापारियों तथा इन्जीनियरों द्वारा अधिक किया जाता है।
  12. श्वेतवसन अपराध सोच-समझकर यत्नपूर्वक किये जाते हैं। अतः इनका पता लगाना कठिन होता है।

श्वेतवसन अपराध के विभिन्न स्वरूप
समाज में आज श्वेतवसन अपराध के निम्नलिखित स्वरूप देखने को मिल रहे हैं

1. व्यापारिक क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध – आज व्यापारिक जगत् में श्वेतवसन अपराध का बोलबाला है। लुभावने तथा झूठे विज्ञापन, पेटेण्ट, ट्रेडमार्क और कॉपीराइट का उल्लंघन, आर्थिक ठगी, सेल्स-टैक्स तथा आयकर की चोरी व श्रमिकों के साथ विश्वासघात व्यापारिक क्षेत्र में पनपने वाले श्वेतवसन अपराध हैं। भारत में व्यापारिक क्षेत्र में श्वेत अपराधों का बोलबाला है। शेयर निर्गत करने वाली कम्पनियाँ अपने शेयरों का मूल्य बढ़वाकर इसी प्रकार के अपराध में संलिप्त रहती हैं।

2. प्रशासनिक क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध – प्रशासनिक क्षेत्र में सर्वाधिक श्वेतवसन अपराध होते हैं। उच्च अधिकार प्राप्त प्रशासनिक अधिकारी घूस लेकर, उपहार ग्रहण करके, ठेका छोड़कर, ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कराकर, लाइसेन्स तथा परमिट देकर श्वेतवसन अपराधों में लिप्त रहते हैं। उत्तर प्रदेश में जनवरी 1987 ई० में आई० ए० एस० अधिकारियों के घरों पर लगे सी० बी० आई० के छापे इसका प्रत्यक्ष प्रेमोर्ण हैं। भारत में गैस एजेन्सी देने, शराब के ठेके छोड़ने, परम्परागत पत्र बनाने तथा निर्यात लाइसेन्स देने में अधिकारी भारी सुविधा शुल्क लेकर श्वेतवसन अपराध करते हैं।

3. न्याय के क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध – आज श्वेतवसन अपराध से न्यायिक क्षेत्र भी अछूता नहीं रह गया है। वकील, न्यायाधीश तथा एटार्नी न्याय-क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध करते हैं। झूठी गवाही, दुर्घटना करने वाले दोषी व्यक्तियों का बचाव व हत्या करने वालों को जमानत देकर न्यायाधीश श्वेतवसन अपराध को क्रियात्मक रूप देते हैं। अनेक प्रभावशाली व्यक्ति धन देकर मुकदमों का निर्णय अपने पक्ष में करा लेते हैं। वर्तमान समय में भारत में न्याय के क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध का बोलबाला बढ़ गया है।

4. चिकित्सा के क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध – श्वेतवसन अपराध से चिकित्सा जैसा पवित्र व्यवसाय भी वंचित नहीं है। डॉक्टर का प्रतिष्ठापूर्ण व्यवसाय रोगियों को नवजीवन प्रदान करने वाला माना जाता है। डॉक्टर द्वारा झूठा प्रमाण-पत्र, झूठी पोस्टमार्टम की रिपोर्ट, भ्रूणहत्या तथा उल्टे-सीधे ऑपरेशन करके फीस वसूलने के कार्य भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध हैं।

5. शिक्षा के क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध – भारत में शिक्षा जैसा आदर्श क्षेत्र भी श्वेतवसन अपराध से नहीं बचा है। झूठी डिग्रियाँ, डॉक्टर की उपाधियाँ, उत्तर-पुस्तिकाओं में अंकों की हेरा-फेरी, परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कराना, फेल छात्रों को उत्तीर्ण करना तथा परीक्षा भवन में ठेके पर नकल कराना आदि शिक्षा के क्षेत्र में श्वेतवसन अपराध हैं।

श्वेतवसन अपराध के कारण
श्वेतवसन अपराध को जन्म देने वाले किसी एक कारण की ओर ही संकेत नहीं किया जा सकता, श्वेतवसन अपराध को अनेक कारण प्रोत्साहित करते हैं। श्वेतवसन अपराध के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. अत्यधिक वर्ग चेतना – सदरलैण्ड के अनुसार, अत्यधिक वर्ग चेतना और सामाजिक स्थिति के बारे में जागरूकता सफेदपोश अपराध का मुख्य कारण है। पहले से ही उच्च वर्ग के व्यक्ति अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए अपने व्यवसाय की आड़ में अधिकाधिक धनोपार्जन करने के लिए प्रेरित होते हैं।

2. सामाजिक विभेदीकरण व आर्थिक असमानता – टैफ्ट तथा हारटुंग जैसे विद्वानों के अनुसार, श्वेतवसन अपराध सामाजिक विभेदीकरण वाले समाजों में ही अधिकतर होते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक असमानता वाले समाजों में उच्च वर्ग के साथ-साथ मध्य स्तरीय व्यक्ति भी श्वेतवसन अपराध द्वारा लोगों को ठगने लगते हैं। जालसाजी, झूठा विज्ञापन, धोखाधड़ी, चोर-बाजारी आदि अपराध ऐसे समाजों में इसीलिए अधिक पनपते हैं।

3. पूँजीवादी व्यवस्था –  पूँजीवादी व्यवस्था भी श्वेतवसन अपराध को बढ़ावा देती है। सदरलैण्ड के अनुसार, पूँजीवादी समाजों में सम्पत्ति इने-गिने व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित होती है। धनी व पूँजीपति वर्ग धन के लालच में समाज, श्रम व सम्पत्ति का शोषण करता है। इस प्रकार चोर-बाजारी तथा अवैधानिक रूप से वस्तुओं का निर्माण पूँजीवादी व्यवस्था में श्वेतवसन
अपराध के ही उदाहरण हैं।

4. भौतिकवादी मनोवृत्तियाँ – आज तकनीकी के साथ-साथ व्यक्ति का जीवन उत्तरोत्तर विलासिता की ओर बढ़ता जा रहा है। भौतिकवादी मनोवृत्तियों के कारण धन का महत्त्व निरन्तर बढ़ गया है, क्योंकि धन ही प्रतिष्ठा, मर्यादा व शक्ति का स्रोत बन गया है। अतः . समृद्ध वर्ग श्वेतवसन अपराध करके भौतिक सुख-समृद्धि और विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत ‘, करना चाहता है।

5. राजनीतिक कारण – बहुत-से देशों में राजनीतिक भ्रष्टाचार भी श्वेतवसन अपराध का एक : कारण है। राजनीतिक नेता व सरकारी क्षेत्र के प्रतिनिधि व मन्त्री पूँजीपतियों व अन्तर्राष्ट्रीय – अपराधियों के साथ गठबन्धन करके श्वेतवसन अपराध को बढ़ावा देते हैं। अनेक राजनेता, मन्त्रीगण एवं जन-प्रतिनिधि अपने स्वार्थ के लिए चोरों, डाकुओं, तस्करों आदि का सहारा – लेते हैं। इनका सम्बन्ध पूँजीपतियों एवं अपराधी गिरोहों से होता है। पकड़े जाने पर राजनेता -अपराधियों को छुड़ाने में उनकी सहायता करते हैं। भारत में सांसदों की खरीद, यूरिया घोटाला, रंगीन टी० वी० घोटाला, हवाला काण्ड, चारा काण्ड, दवाई काण्ड, जमीन घोटाला राजनीतिक क्षेत्र के ऐसे ही श्वेतवसन अपराध हैं। अस्थिर राजनीतिक व्यवस्था वाले समाजों में अर्थव्यवस्था बड़ी ढीली हो जाती है, जो कि श्वेतवसन अपराधों को प्रोत्साहन देती है। भारत में श्वेतवसन अपराध का एक प्रमुख कारण यही है।

6. कानूनों के प्रति अनभिज्ञता व कानूनी निष्क्रियता – साधारण जनता कानूनों के प्रति अनभिज्ञ होती है, जिसका लाभ पूँजीपति तथा अन्य वर्ग व पदों पर आसीन व्यक्ति उठाते हैं। वे कानून से अनभिज्ञ व्यक्तियों का सरलता से शोषण कर लेते हैं। साथ ही कई समाजों में बाजार-वाणिज्य व उद्योग नियन्त्रण सम्बन्धी कानून इतने दोषपूर्ण व निष्क्रिय होते हैं कि बड़े-बड़े अपराधियों को पकड़े जाने का भय नहीं रहता। ये कानून श्वेतवसन अपराधियों को दण्डमुक्त रखने में सहायता देते हैं और इस प्रकार ऐसे अपराधों को बढ़ावा देते हैं।

7. सामाजिक मूल्य व संस्कृति – अनेक विद्वानों (जैसे–क्लीनार्ड) का मत है कि श्वेतवसन अपराधी का सम्बन्ध सामाजिक मूल्यों व संस्कृति से भी होता है। प्रत्येक समाज में कुछ ऐसे मूल्य व परम्पराएँ होती हैं जो व्यक्तियों को अपनी सत्ता व स्थिति कायम रखने के लिए प्रेरित करती हैं, जिनके कारण उच्च पदों के व्यक्ति गलत हथकण्डे अपनाकर तथा लोगों का शोषण करके अपने को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करने का प्रयास करते हैं।

8. नैतिकता का अभाव – सामाजिक व धार्मिक जीवन में नैतिकता का अभाव भी श्वेतवसन अपराध का एक कारण है। आज धार्मिक विश्वासों व नैतिक नियमों के कारण उच्च स्थिति, वाले व्यक्ति उन कार्यों को करना भी बुरा नहीं समझते जिनका सम्बन्ध भ्रष्टाचार व बेईमानी से है। अतः व्यक्ति अपने-अपने पदों का दुरुपयोग करके श्वेतवसन अपराध करने लगते हैं।

9. गोपनीय प्रकृति – अधिकतर श्वेतवसन अपराध की प्रकृति गोपनीय होती है तथा एक सीमा तक करने पर ऐसे अपराध जनसाधारण के सामने आते ही नहीं हैं। गुप्त कार्य-प्रणाली के कारण बड़े-बड़े अधिकारी व कर्मचारी, व्यापारी वर्ग तथा पूँजीपति श्वेतवसन अपराध करते हैं और पकड़े जाने पर भी उनके विरुद्ध कोई सबूत नहीं मिलता है।

10: सामाजिक विघटन – सामाजिक विघटन भी श्वेतवसन अपराध को जन्म देता है। इसीलिए संक्रमण काल से गुजरने वाले समाजों में श्वेतवसन अपराध भी अधिक होते हैं। टूटे हुए सामाजिक ढाँचे का सबसे अधिक लाभ बड़े-बड़े व्यापारियों को ही मिलता है, जो चोरबाजारी, धोखाधड़ी, गबन, घूसखोरी व कालाबाजारी करके पैसा कमाने लगते हैं।

भ्रष्टाचार श्वेतवसन अपराध का स्रोत – वर्तमान समय में श्वेतवसन अपराध की वृद्धि का मुख्य कारण भ्रष्टाचार में वृद्धि के साथ-साथ व्यक्तियों में अलगाव की मनोवृत्ति प्रबल होने लगती है तथा स्वयं को अधिक असहाय, कमजोर तथा सार्वजनिक जीवन से कटा हुआ अनुभव करने लगते हैं।

भ्रष्टाचार के कारण आज हमारे देश में राजनीति को राष्ट्रसेवा या समाज सेवा के स्थान पर एक व्यवसाय के रूप में माना जाने लगा है। भ्रष्टाचार के कारण ही अधिकांश नेता बहुत अधिक धन खर्च करके चुनाव जीव जाते हैं और सत्ता प्राप्त करने के बाद हर प्रकार की अपराधिक एवं समाज विरोधी गतिविधियों से अधिक-से-अधिक धन कमाने में लिप्त हो जाते हैं। अतः कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार श्वेतवसन अपराध का स्रोत है।

प्रश्न 2
भारत में श्वेतवसन अपराधों में वृद्धि के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
भारत में श्वेतवसन अपराधों में वृद्धि के कारण
भारत में श्वेतवसन अपराध आज चरम सीमा पर है, परन्तु दुर्भाग्यवश इस क्षेत्र में अधिक अध्ययन नहीं किये गये हैं। हम अनेक प्रकार के श्वेतवसन अपराध अपने समाज में देख सकते हैं। उदाहरणार्थ-बड़े-बड़े व्यापारियों द्वारा टैक्स की चोरी करना, वस्तुओं में मिलावट करना, चोरबाजारी करना, अवैध व्यापार करना, प्रशासनिक अधिकारियों में फैला हुआ भ्रष्टाचार, न्यायालयों, सरकारी दफ्तरों, पुलिस विभाग, चिकित्सा विभाग, परिवहन व संचार आदि कोई भी विभाग श्वेतवसन अपराध के प्रभाव से अछूता नहीं है।

आज श्वेतवसन अपराधी भारतीय समाज को जितना खोखला कर रहे हैं तथा हानि पहुँचा रहे हैं उतनी हानि अन्य अपराधों से नहीं हो रही है।
विश्व के अन्य राष्ट्रों के समान भारत में भी श्वेतवसन अपराध निरन्तर बढ़ रहे हैं। यहाँ श्वेतवसन अपराधों में सतत वृद्धि होने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. अशिक्षा – भारत के अधिकांश व्यक्ति अशिक्षित हैं। अशिक्षा के कारण वे कानूनों से अनभिज्ञ हैं। इस कारण श्वेतवसन अपराधी साधारण लोगों को धोखा देकर उनसे धन हड़प लेते हैं तथा अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं।

2. भ्रष्टाचार – भारत में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। भारत के किसी भी सरकारी विभाग में तब तक कार्य नहीं होता है जब तक उन्हें रिश्वत नहीं मिल जाती है। अतः भारत की ग्रामीण साधारण जनता का कार्यालयों में कोई भी कार्य नहीं हो पाता है, वे कार्यालयों के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में श्वेतवसन अपराधी ग्रामीण साधारण जनता को कार्य कराने का लालच देकर उनसे रुपये हड़प लेते हैं तथा श्वेतवसन अपराध में लिप्त रहते हैं।

3. बेरोजगारी – भारत में बेरोजगारी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। भारत का बेरोजगार नवयुवक रोजगार की खोज में जब सड़कों पर घूमता है तब श्वेतवसन अपराधी उन्हें नौकरी का लालच देकर उनसे धन ऐंठ लेते हैं। अनेक धोखेबाज अधिकारी खाड़ी देशों में नौकरी दिलवाने के नाम पर धन वसूल कर साफ बच जाते हैं।

4. नैतिक मूल्यों का ह्रास – भारत में आज सामाजिक व धार्मिक जीवन में नैतिकता का अभाव होता जा रहा है, जिसके अभाव में श्वेतवसन अपराध बढ़ता जा रहा है। आज नैतिक मूल्यों में ह्रास के कारण उच्च स्थिति वाले व्यक्ति उन कार्यों को करना भी बुरी नहीं समझते जिनका सम्बन्ध भ्रष्टाचार व बेईमानी से है। अत: व्यक्ति अपने-अपने पदों का दुरुपयोग करके श्वेतवसन अपराध करने लगते हैं।

5. राजनीतिक कारण – भारत में राजनीतिक भ्रष्टाचार भी श्वेतवसन अपराध का कारण है। राजनीतिक नेता व सरकारी क्षेत्र के प्रतिनिधि व मन्त्री पूँजीपतियों व अन्तर्राष्ट्रीय अपराधियों के सौथ गठबन्धन करके श्वेतवसन अपराध को बढ़ा रहे हैं। भारत की भ्रष्ट राजनीति श्वेतवसन अपराध को बढ़ावा देने में सक्षम है। संचारमन्त्री सुखराम, मुख्यमन्त्री जयललिता, कैप्टन सतीश शर्मा व श्रीमती शीला कौल ने अपने पदों का दुरुपयोग कर श्वेतवसन अपराध को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्री पी० वी० नरसिंम्हा राव का नाम भी इन्हीं अपराधों के लिए खूब उछलता रहा है। चन्द्रास्वामी इस क्षेत्र के प्रमुख सूत्राधार होने के कारण जेल की सजा भी काट चुके हैं। भारत में राजनीतिक अस्थिरता के कारण भी समाज में श्वेतवसन अपराध बढ़ते जा रहे हैं। चुनाव के बाद सत्ता में आने के लिए विधायकों की खरीद तथा सांसदों की सौदेबाजी श्वेतवसन अपराध का मूल है।

6. भौतिकवादी मनोवृत्तियाँ – आज भारत के व्यक्तियों में भौतिकवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिसके कारण उनके लिए धन का महत्त्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है। आज उनके लिए धन ही प्रतिष्ठा, मान-मर्यादा व शक्ति का स्रोत बन गया है। अतः आज़ श्वेतवसनधारी येन-केनप्रकारेण धन प्राप्त करके समाज में अपनी झूठी शान व प्रतिष्ठा को दिखाकर भौतिक सुख और ऐशो-आराम का जीवन व्यतीत करना चाहता है, जिसके कारण श्वेतवसन अपराधों में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।

7. अत्यधिक वर्ग चेतना – भारत के श्वेतवसन अपराध करने वाले व्यक्तियों में अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अत्यधिक वर्ग चेतना होती है। श्वेतवसन अपराध का यह भी एक कारण है कि श्वेतवसन वर्ग के व्यक्ति अपनी स्थिति को सक्रिय और समृद्ध बनाये रखने के लिए अपने व्यवसाय की आड़ में अधिकाधिक धनोपार्जन करते रहते हैं।

8. सामाजिक विभेदीकरण व आर्थिक असमानता – सामाजिक व आर्थिक असमानता भी श्वेतवसन अपराध वृद्धि का एक कारण है। भारत में आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से अधिकांश व्यक्ति पिछड़ी व दयनीय स्थिति में हैं, जब कि कुछ लोग ही सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं। सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति व कुछ मध्यमवर्गीय व्यक्ति भी उनके साथ लगकर श्वेतवसन अपराध द्वारा लोगों को ठगने में लगे रहते हैं। वे अनेक प्रकार की जालसाजी, गलत विज्ञापन, फरेब, चोर-बाजारी आदि के कार्यों में लगे रहते हैं तथा समाज में श्वेतवसन अपराध करते हैं।

9. कानून के प्रति अनभिज्ञता व कानूनी निष्क्रियता – भारत में अधिकांश साधारण जनता कानूनों के प्रति अनभिज्ञ है, जिसका लाभ पूँजीपति तथा अन्य वर्ग व पदों पर आसीन सफेदपोश व्यक्ति उठाते हैं। वे कानून से अनभिज्ञ व्यक्तियों का सरलता से शोषण कर लेते हैं। भारत में कानूनों को शान्तिपूर्वक लागू नहीं किया जाता है। अतः श्वेतवसन धारण करने वाले व्यक्ति कर चोरी व अन्य भ्रष्टाचार का कार्य खुले रूप से करते रहते हैं; क्योंकि उन्हें यह मालूम है कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है और यदि वे कहीं पर कानून की पकड़ में आ भी जाते हैं तो रिश्वत व शक्ति का उपयोग करके सरलतापूर्वक बच निकलते हैं। इस कारण भी भारत में श्वेतवसन अपराध तेजी के साथ बढ़ रहा है।

10. गोपनीय प्रकृति – अधिकतर श्वेतवसन अपराध की प्रकृति गोपनीय होती है, क्योंकि अधिकतर अपराध जनसाधारण के सामने आते ही नहीं हैं। गुप्त कार्य-प्रणाली के कारण बड़े-बड़े अधिकारी व कर्मचारी, व्यापारी वर्ग तथा पूँजीपति श्वेतवसन अपराध करते हैं और पकड़े जाने पर उनके विरुद्ध किसी प्रकार का प्रमाण नहीं मिल पाता है, जिससे वे दण्ड के चंगुल से बच जाते हैं। इसीलिए भारत में श्वेतवसन अपराध बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 3
उपयुक्त उदाहरण देते हुए ‘अपराध और ‘श्वेतवसन अपराध की अवधारणाओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2007]
उत्तर:
श्वेतवसन अपराध तथा अपराध के बीच का अन्तर मुख्यतया दृष्टिकोण का अन्तर है, ज़िसे निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है

1. अपराधी वर्ग – साधारण अपराध का सम्बन्ध किसी वर्ग-विशेष से नहीं होता। उदाहरण के लिए, हत्या तथा बलात्कार का अपराध सभी वर्गों के व्यक्ति करते हैं। परन्तु श्वेतवसन अपराध सम्भ्रान्त तथा प्रतिष्ठित पद पर आसीन वर्ग के व्यक्तियों द्वारा ही किये जाते हैं।

2. अपराध का कारण – अपराध का कारण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक आदि कोई भी हो सकता है। दूसरी ओर श्वेतवसन अपराध मुख्यतः आर्थिक प्रकृति के होते हैं। सम्भ्रान्त वर्ग के व्यक्ति श्वेतवसन अपराध अधिक-से-अधिक धन संचय करने के लिए करते हैं।

3. जनता का दृष्टिकोण – जनता का दृष्टिकोण दोनों अपराधों के प्रति अलग है। चोरी, डकैती, राहजनी, हत्या अथवा बलात्कार जैसे अपराध के दोषी को लोग तिरस्कार करते हैं तथा उसके प्रति घृणा व आक्रोश का भाव रखते हैं। दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति जालसाजी, रिश्वतखोरी अथवा झूठे विज्ञापन देकर कोई लाभ प्राप्त कर रहा हो तो उसका कोई तिरस्कार नहीं करता। यह कहना गलत नहीं होगा कि श्वेतवसन अपराध से व्यक्ति की प्रतिष्ठा को कोई धक्का नहीं पहुंचता।।

4. अपराध की प्रकृति – अपराध की तुलना में श्वेतवसन अपराध की प्रकृति अप्रत्यक्ष होती है। उदाहरण के लिए, किसी महिला का बलात्कार कर देना जघन्य अपराध माना जाता है, लेकिन बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ जब नियोजित तरीके से हत्या करवाते हैं तब इसे श्वेतवसन अपराध कहा जाता है। अपराध की तुलना में श्वेतवसन अपराध गोपनीय तथा अमूर्त होते हैं। ये अपराध जनसाधारण की निगाह से छिपाकर किये जाते हैं। इनकी गोपनीयता भंग होने पर ही, ये अपराध बन जाते हैं।

5. दण्ड – किसी अपराध के लिए अपराधी को दण्ड देना राज्य के लिए सरल होता है, लेकिन श्वेतवसन अपराध को प्रमाणित कर सकना बहुत कठिन होता है। श्वेतवसन अपराध से सम्बन्धित लोग अपनी प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति के बल पर अपने विरुद्ध साक्ष्य को तोड़ मोड़ देते हैं। उनको दण्डित करना प्रायः असम्भव होता है।

प्रश्न 4
“भ्रष्टाचार एक सार्वभौमिक बुराई है।” इसे हम अपने देश से कैसे मिटा सकते हैं? [2016]
उत्तर:
भ्रष्टाचार का अर्थ
भ्रष्टाचार का अभिप्राय उन सभी अवैध गतिविधियों से है जिससे निजी स्वार्थ के लिए धनोपार्जन व शक्तियों का दुरुपयोग कर बेइमानी की जाए। रिश्वत लेना, धन उगाही, धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग धन के लिए बल का प्रयोग, काला धन व अन्य सभी प्रकार के कृत्य जिससे अवैध रूप से लाभ उठाया जा रहा हो, वे सभी भ्रष्टाचार हैं। सरकारी विभागों या निजी क्षेत्रों द्वारा अनैतिक व्यवहार, लाभ के लिए सत्ता का दुरुपैयोग, इत्यादि सभी गतिविधियाँ भ्रष्टाचार के कुछ रूप हैं। आम जनता के अधिकारों को अनदेख कर सरकारी कर्तव्य को पूर्ण न कर धोखाधड़ी करना भ्रष्टाचार ही है। सरकारी व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर अपने या किसी और के हित को सर्वोपरि रखना भी भ्रष्टाचार है।

भ्रष्टाचार एवं घूसखोरी कोई नई अवधारणा नहीं है। सदियों पूर्व हिन्दू विधि के प्रवर्तक महर्षि मनु ने ‘मनु संहिता’ में तत्कालीन समाज में व्याप्त घूसखोरी का स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया है। अन्य अनेक ग्रन्थों तथा यात्रा वृत्तान्तों में भी भ्रष्टाचार का उल्लेख देखा जा सकता है।
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य, 350-275 ई.पू.) ने ‘अर्थशास्त्र में लिखा है कि जिस प्रकार तालाब में तैरती मछली कब पानी गटक जाती है कोई देख नहीं सकता, उसी प्रकार नौकरशाही में अधिकारी वर्ग कब भ्रष्ट आचरण करे यहें पता लगाना मुश्किल है।”
भारत में भ्रष्टाचार की जड़े अत्यन्त गरी हो चुकी हैं। मर्यादाएँ धीरे-धीरे नष्ट हो रही हैं। नैतिक मूल्यों के पतन के कारण सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार दीमक की तरह व्याप्त होकर व्यवस्था को खोखला. किए जा रहा है।

भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी वह है जब अधिकार सम्पन्न व्यक्ति अपने पद/प्रभाव का उपयोग अनुचित लाभ प्राप्ति हेतु स्वार्थपूर्ण तरीके से करता है। भारत में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार प्रत्येक क्षेत्र-सामाजिक, वैधानिक, आर्थिक, राजनीतिक, राजनयिक, प्रशासनिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। भ्रष्टाचार सभी प्रकार के अपराधों में वृद्धि करने के लिए जिम्मेदार है।

भारत में भ्रष्टाचार मूलतः°1950 के दशक की एक अनहोनी शुरुआत है। 1957 के मूंदड़ा कांड को भारतीय गणतंत्र का पहला घोटाला माना जाता है, जिसमें राजनीतिक और किसी पूंजीपति के बीच अपवित्र गठजोड़ बना था। इसका भंडाफोड़ फिरोज गांधी ने किया था। लम्बी बहस के बाद त्किालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को इस्तीफा दिलाकर सारा मामला रफा-दफा दिया गया। पंडित नेहरू के समय में ऐसे करीब चार मामले प्रकाश में आए। 1949 में 216 करोड़ रुपए का जीप घोटाला ऐसा पहला मामला था, जिसमें ब्रिटेन स्थित तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्ण मेनन का नाम उछला था। दूसरा मामला 1956 का सिराजुद्दीन प्रकरण था, जिसमें नेहरू मंत्रिमण्डल के खान एवं ऊर्जा मंत्री के.डी. मालवीय पर गम्भीर आरोप लगे थे। तीसरा प्रकरण जहाजरानी उद्योगपति धरमतेजा का था जिन्हें 1960 में पंडित नेहरू ने बिना किसी जाँच पड़ताल के १ 20 करोड़ का ऋण दिलवाया था। इस प्रकार यह सिलसिला बोफोर्स एवं टूजी घोटाले तक चलता गया। अतः ‘भ्रष्टाचार एक सार्वभौमिक बुराई है।”

भ्रष्टाचार के कारणों को आर्थिक, सामाजिक, वैधानिक, न्यायिक और राजनीतिक श्रेणियों में भी रखा जा सकता है। आर्थिक कारणों में उच्च जीवन शैली की आकांक्षा मुद्रा प्रसार, लाइसेंसिंग प्राणाली तथा ज्यादा लाभ लेने की प्रवृत्ति है। सामाजिक कारणों में जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण, ईमानदारी की कमी, सामाजिक मूल्यों में गिरावट, अशिक्षा, सामंती प्रवृत्तियाँ, शोषणवादी सामाजिक संरचना आदि हैं। वैधानिक कारणों में अपर्याप्त कानून पालन कराने में ढील आदि हैं। न्यायिक कारणों में महंगी न्याय व्यवस्था, विलम्ब न्याय न्यायिक उदासीनता, न्यायाधीशों की प्रतिबद्धता की कमी तथा तकनीकी कारणों से अपराधियों का छूट जाना है। राजनीतिक कारणों में राजनीतिक संरक्षण, अप्रभावी राजनीतिक नेतृत्व राजनीतिक तटस्थता, राजनीतिक अनैतिकता, राजनीति एवं अपराधियों की सांठ-गांठ आदि हैं।

भ्रष्टाचार को रोकने के उपाय
देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए अनेक आयोग बने। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा श्री कस्तूरीरंगा संथानम (1895-1980) की अध्यक्षता में एक भ्रष्टाचार निरोधक समिति का गठन 1962 में किया गया था। इस समिति ने निम्नलिखित उपाय सुझाए थे।

  1.  सतर्कता अधिकारियों को भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करने की स्वतंत्रता देना। जाँच प्रक्रिया में राजनीतिक एवं प्रशासनिक दखल को नियंत्रित करना आवश्यक है।
  2. सतर्कता अधिकारियों को कुशल कार्य के लिए प्रोन्नति का आश्वासन देना।।
  3. उच्च अधिकारियों के मामलों की जाँच-पड़ताल के लिए सतर्कता अधिकारियों को उनके मूल कैडर में वापस भेजने से सुरक्षा का आश्वासन देना।
  4.  केन्द्रीय सतर्कता आयोग में केन्द्रीय लोक सेवाओं और तकनीकी सेवाओं को प्रतिनिधित्व देना।
  5.  सतर्कता विभाग के अराजपत्रित कर्मचारियों को विभाग के नियमों और कार्यप्रणाली के विषय में गहन प्रशिक्षण देना, क्योंकि सतर्कता के 80 प्रतिशत मामलों की छानबीन निचले स्तर पर ही होती है।

इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही केन्द्रीय सरकार और अन्य कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों को देखने के लिए 1964 में केन्द्रीय सतर्कता आयोग (CvC-Central Vigilance Commission) की स्थापना की गई थी। केन्द्र सरकार ने निम्नलिखित चार विभागों की स्थापना भ्रष्टाचार विरोधी उपायों के अन्तर्गत की है।

  1.  कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग में प्रशासनिक सतर्कता विभाग
  2.  केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI- Central Buearnu of Investigation)
  3. राष्ट्रीकृत बैंकों/सार्वजनिक उपक्रमों/मंत्रालयों/विभागों में घरेलू सतर्कता इकाइयाँ और
  4.  केन्द्रीय सतर्कता आयोग।

केन्द्रीय सतर्कता आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं।

  1.  किसी भी लोकसेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर उसकी जाँच-पड़ताल करना।
  2.  भ्रष्टाचार में लिप्त आरोपी व्यक्ति के विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाही के प्रकार के विषय मेंअनुशासनात्मक अधिकारी को परामर्श देना।
  3. नियमित मामला पंजीकृत करने के लिए सी.बी.आई. को निर्देशित करना और मंत्रालयों या विभागों या बैंकों या सार्वजनिक उपक्रमों में सतर्कता और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यों का निरीक्षण और उन पर रोक लगाना। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 इस दिशा में एक कारगर कदम है।

भ्रष्टाचार से निपटने के उपाय

  1. लोगों को विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सब्सिडी और सरकारी अमूदानों के बारे में उनके हक की पूरी जानकारी दी जाए। सूचना का अधिकार ईमानदारी से लागू हो।
  2. नीतियों और फाइलों में किए गए विभिन्न निर्णयों को पारदर्शी बनाया जाए। हर आवेदक को जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसका आवेदन-पत्र कहाँ रुका पंड़ा है।
  3. विलम्ब ही भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत है। प्रत्येक विभागीय अध्यक्ष या प्रत्येक कार्यालय के प्रमुख को किसी आवेदन या फाइल पर निर्णय करने के लिए समयावधि निर्धारित कर देनी चाहिए, जिससे कि किसी भी स्तर पर कार्यवाही में देरी न हो। अगर फाइलों पर कार्यवाही में देरी होती है तो उसके लिए जो कारण हो वह ऐसा हो, जिससे प्रमुख या अध्यक्ष संतुष्ट हो। फाइलों पर कार्यवाही में देर इसलिए न की जाए ताकि लाभार्थी उस पर कार्यवाही तेज करवाने के लिए रकम देने के लिए हाजिर हो।
  4.  जब कभी भी पता चले कि कोई कर्मचारी भ्रष्ट तरीके अपना रहा है, तो उसे तुरन्त निलम्बित . कर देना चाहिए। मुकदमा और विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही साथ-साथ शुरू कर दी जाए और जल्द-से-जल्द पूरी की जाए।
  5. जिन भ्रष्ट व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी या अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाती है, उनकी सम्पत्तियों को सील कर दिया जाना चाहिए और उनके दोषी साबित होने पर सरकार को उन सम्पत्तियों को जब्त कर लेना चाहिए।
  6.  अधिकारी ऐसे होने चाहिए जो केवल प्रतिभावान और योग्य ही न हों, अपितु ईमानदार और साहसी भी हों।
  7.  लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, लेकिन उन्हें अपने नजदीकी अधिकारियों को लाभ पहुँचाने के लिए नियमों की अवहेलना करते हुए तबादलों और पदोन्नतियों जैसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  8.  विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों का चयन करते समय यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वे ईमानदार हों और उस कार्य के लिए योग्य हों, जो उन्हें सौंपा जा रहा है।
  9.  देश ने पंचायत राज और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया है। इसीलिए सत्ता का यथासम्भव विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए और पंचायतों को अधिकतम अधिकार दिए जाने चाहिए।
  10.  नियमों को सरल बनाना चाहिए। अनेक कानून ऐसे हैं जिन्हें जनसाधारण समझ नहीं पाता। अनावश्यक कानून खत्म कर दिए जाने चाहिए। कानून और नियमों का यथासंभव सरलीकरण किया जाना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
पूँजीवादी वर्ग संरचना श्वेतवसन अपराध का प्रमुख कारण है। समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
सदरलैण्ड ने अपने अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि जिस समाज के लोगों में वर्ग-चेतना एवं सामाजिक स्थिति के प्रति जागरूकता पायी जाती है, वहाँ लोग अधिकाधिक अपने व्यवसाय के द्वारा धनोपार्जन में लगे होते हैं, जिससे वे अपनी सामाजिक स्थिति एवं प्रतिष्ठा को बनाये रख सकें। पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति एवं उद्योगपति श्रमिक वर्ग का शोषण करते हैं और अधिकाधिक धन कमाते हैं। ये वैध और अवैध तरीकों से अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाये रखना चाहते हैं। उच्च वर्ग निम्न वर्ग को प्रतियोगिता में परास्त करना चाहता है। दोनों ही वर्ग आर्थिक प्रतिस्पर्धा में अनैतिक साधनों, झूठे विज्ञापनों, घूस, चोरबाजारी, जालसाजी आदि का सहारा लेते हैं। इस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्था में पायी जाने वाली वर्ग-प्रतिस्पर्धा भी श्वेतवसन अपराध को बढ़ावा देती है। सदरलैण्ड कहते हैं कि “यही कारण है कि अमेरिका में श्वेतवसन अपराध अधिक होते हैं।”

प्रश्न 2
श्वेतवसन अपराध के जालसाजी एवं रिश्वत के स्वरूपों का वर्णन कीजिए। या श्वेतवसन अपराध के किन्हीं दो स्वरूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1. जालसाजी – सदरलैण्ड ने इसे श्वेतवसन अपराध में प्रमुख माना है। बैंकों में चेक पर दूसरों के गलत हस्ताक्षर करके रुपये ले लेना, बीमा कम्पनियों से गलत क्लेम द्वारा रुपया लेना, नकली दस्तावेज बनाकर रुपये कमाना, जाली खाते तैयार करना, जाली पासपोर्ट तैयार करना, नकली दवाइयाँ बनाना, जाली फर्मों के नाम परमिट एवं कोटा आवण्टित करवाना, अनाथालयों, मन्दिरों एवं मठों के निर्माण के नाम पर चन्दा एकत्रित करना, बाढ़-पीड़ितों के लिए सहायता प्राप्त करना और उसका दुरुपयोग करना आदि जालसाजी एवं फरेब के ही उदाहरण हैं।
2. रिश्वत – वर्तमान में सभी सरकारी विभागों में रिश्वत का बोलबाला है। पटवारी, ट्रैफिक ‘इन्स्पेक्टर, ओवरसियर, इन्जीनियर, डॉक्टर, पुलिस अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, रेलवे कर्मचारी, – कर विभाग के कर्मचारियों आदि के द्वारा रिश्वत ली जाती है। कई बार रिश्वत पैसों के रूप में न दी जाकर वस्तुओं के रूप में भी दी जाती है, जिसे ‘भेट’ कहकर पुकारा जाता है।

प्रश्न 3
समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता की श्वेतवसन अपराध को बढ़ाने में क्या भूमिका है ?
उत्तर:
औद्योगीकरण एवं मशीनीकरण ने समाज में आर्थिक विषमता पैदा की है। एक तरफ उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण रखने वाले पूँजीपति हैं, तो दूसरी तरफ श्रम बेचकर जीवन-यापन करने वाले गरीब श्रमिक और इन दोनों के बीच में है – मध्यम वर्ग। उच्च वर्ग वाले अन्य वर्ग के लोगों को आगे बढ़ने से रोकते हैं, क्योंकि इसमें उनका आर्थिक हित छिपा हुआ है। ऐसा करने के लिए वे मनमाने एवं कानून-विरोधी तरीके अपनाते हैं। सदरलैण्ड का मत है कि ये लोग इतने सक्षम होते हैं कि दण्ड से बच जाते हैं। टैफ्ट तथा हारटुंगे का मत है कि जिन समाजों में आर्थिक एवं सामाजिक भिन्नता अधिक होती है वहाँ मध्यम वर्ग द्वारा श्वेतवसन अपराध अधिक किये जाते हैं। लोग समाज के आर्थिक हितों को ध्यान में नहीं रखते और स्वार्थसिद्धि के लिए जालसाजी, झूठी विज्ञापनबाजी, फरेब, चोरबाजारी आदि के द्वारा उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयत्न करते है।

प्रश्न 4
क्या श्वेतवसन अपराध का सम्बन्ध सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों से भी है ?
उत्तर:
जॉर्ज कैटोन तथा क्लीनार्ड आदि की मान्यता है कि श्वेतवसन अपराध का सम्बन्ध सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों से भी है। प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य-व्यवस्था को बनाये रखना चाहता है और उसमें परिवर्तन नहीं चाहता। लोग सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि के भय से परम्परागत मूल्यों को बनाये रखने के लिए गलत तरीकों का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, दहेज देना परम्परागत सामाजिक मूल्यों की दृष्टि से अच्छा माना गया है, इसे जुटाने के लिए व्यक्ति गलत साधनों द्वारा धन कमाता है और अपनी प्रतिष्ठा को बनाये रखता है। इसी प्रकार से भारत में धर्म का अधिक महत्त्व है। पूँजीपति लोग एक तरफ कालाबाजारी एवं मुनाफाखोरी के द्वारा धन कमाते हैं और दूसरी तरफ दान देकर एवं मन्दिर बनाकर समाज में प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर लेते हैं। धर्मभीरु लोग ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करना चाहते।

प्रश्न 5
श्वेतवसन अपराध से उत्पन्न प्रमुख सामाजिक दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए, जो सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी हैं।
या
श्वेतवसन अपरांधों के दुष्परिणामों की विवेचना कीजिए। [2009]
उत्तर:
सदरलैण्ड कहते हैं कि श्वेतवसन अपराध के कारण आर्थिक हानि की तुलना में समाज को सामाजिक हानि अधिक होती है और सामाजिक विघटन को बढ़ावा मिलता है। श्वेतवसन अपराध से उत्पन्न प्रमुख सामाजिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं, जो सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी हैं

  1. समाज में अनैतिकता, विश्वासहीनता एवं भ्रष्टाचार में वृद्धि होती है।
  2.  समाज में नियमहीनता बढ़ती है और प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक नियमों एवं आदर्शों की मनमाने ढंग से व्याख्या करता है और अपने पक्ष की पुष्टि के लिए उल्टे-सीधे तर्क भी प्रस्तुत करता है।
  3. श्वेतवसन अपराध समाज में असन्तोष को बढ़ावा देता है। फलस्वरूप लोग अनुशासनहीन एवं संघर्षशील हो जाते हैं।
  4. श्वेतवसन अपराध के कारण लोगों में मानसिक असन्तोष, निराशा एवं तनाव पैदा होते हैं।
  5.  लोगों में कर्त्तव्यहीनता एवं दायित्वहीनता की भावना में वृद्धि होती है।
  6. चूँकि श्वेतवसन अपराधी कानून को तोड़-मरोड़ कर अपने पक्ष में प्रस्तुत करने में समर्थ होते हैं; अतः उन्हें दण्ड नहीं भुगतना पड़ता। फलस्वरूप दण्ड, कानून एवं न्याय से लोगों को विश्वास उठ जाता है और कानूनी अव्यवस्था फैलती है।
  7. श्वेतवसन अपराध के कारण सामाजिक असुरक्षा पनपती है। जब समाज के नेता एवं संरक्षक ‘ कहे जाने वाले व्यक्ति ही अपराधी कार्यों में लगे होते हैं तो अन्य लोगों में असुरक्षा के भाव
    पैदा होते हैं।
  8. श्वेतवसन अपराध के कारण अर्थव्यवस्था विघटित हो जाती है। बेईमान एवं अपराधी लोग सुखी एवं समृद्ध जीवन व्यतीत करते हैं, जब कि ईमानदार व्यक्तियों का भरण-पोषण भी कठिन होता है। ऐसे अपराधी सारे देश को आर्थिक हानि पहुँचाते हैं और देश की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो जाती है।
  9. श्वेतवसन अपराध के कारण नयी पीढ़ी में अपराध की ओर झुकाव बढ़ता है।
  10. श्वेतवसन अपराध के कारण समाज व्यवस्था, सुरक्षा, प्रगति एवं विकास खतरे में पड़ जाते
  11.  श्वेतवसन अपराध सामाजिक संस्थाओं के मूलभूत मूल्यों पर आक्रमण है। स्पष्ट है कि श्वेतवसन अपराध सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 6
बाल-अपराध व श्वेतवसन अपराध में अन्तर बताइए।
उत्तर:
बाल-अपराध व श्वेतवसन अपराध में अन्तर नीचे दी गयी तालिका में स्पष्ट किया गया है।

क्र०सं० बाल-अपराध श्वेतवसन अपराध
1. बाल-अपराधं कानून द्वारा निर्धारित 18 वर्ष से कम आयु में किया जाने वाला अपराध हैं। श्वेतवसन अपराध उच्च वर्ग अथवा प्रतिष्ठित पद पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किये जाते हैं।
2. बाल-अपराध में कुछ ऐसे व्यवहार भी सम्मिलित हैं जो वास्तव में अपराध की श्रेणी में नहीं आते; जैसे-स्कूल से भागना, घर से बिना बताये गायब हो जाना, निरुद्देश्य रात्रि को घूमते रहना इत्यादि। श्वेतवसन अपराधों में करों की चोरी, रिश्वत, पदों का दुरुपयोग करके आर्थिक लाभ कमाना, नियोजित रूप से हत्या कराना आदि अपराध आते हैं।
3. बाल-अपराध सामान्यतः कम गम्भीर होते है। श्वेतवसन अपराधों की प्रकृति अप्रत्यक्ष, गोपनीय, परन्तु आर्थिक दृष्टि से गम्भीर होती है।
4. बाल-अपराधी अधिकांशतः संवेगता के कारण अपराध करते हैं। श्वेतवसन अपराध नियोजित और सामूहिक होते हैं।
5. बाल-अपराधी का अपराध करते समय अनिवार्य रूप से आर्थिक लक्ष्य नहीं होता है। श्वेतवसन अपराध मुख्यतः आर्थिक प्रकृति के ही होते हैं। सम्भ्रान्त वर्ग के व्यक्ति श्वेतवसन अपराध इसलिए करते हैं जिससे वे अधिक से-अधिक धन का संचय करके भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त कर सकें।
6. बाल-अपराधी बनने में मनोवैज्ञानिक व पारिवारिक कारणों को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। श्वेतवसन अपराधों का कारण समृद्धता तथा भौतिक सुख प्रा करना होता है।
7. बाल-अपराध के लिए विशिष्ट न्यायालयों की स्थापना होती है। श्वेतवसन अपराध के मामले सामान्य अदालतों और कभी-कभी विशेष अदालतों में सुने जाते हैं।
8. बाल-अपराधी को कठोर दण्ड से बचाने का प्रयास किया जाता है। श्वेतवसन अपराध से सम्बन्धित लोग अपनी प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति की सहायता से न तो अपने विरुद्ध गवाहियाँ होने देते हैं और न ही कोई ऐसा ठोस प्रमाण छोड़ते हैं जिसके आधार पर उन्हें दण्डित किया जा सके।

प्रश्न 7
अपराध तथा श्वेतवसन अपराध में अन्तर बताइए। [2007, 11, 16]
या
‘सफेदपोश अपराध व अपराध में चार अन्तर बताइए। [2016]
उत्तर:
अपराध, अपराध ही है चाहे वह निम्न वर्ग के लोगों द्वारा किया जाए अथवा समाज के प्रतिष्ठित एवं उच्च वर्ग के लोगों द्वारा। फिर भी सामान्य अपराध और श्वेतवसने अपराध की प्रकृति, मनोवृत्ति एवं आधारों में अन्तर पाया जाता है। यह अन्तर निम्नलिखित है

  1. अपराध का सम्बन्ध समाज के सभी वर्गों से है, जब कि श्वेतवसन अपराध का केवल समाज के उच्च वर्ग से है।।
  2. श्वेतवसन अपराध आर्थिक प्रकृति के होते हैं, जब कि सामान्य अपराध आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं मानसिक किसी भी कारण से किये जा सकते हैं।
  3. श्वेतवसन अपराध में व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस नहीं पहुँचती है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष रूप से उसमें सम्मिलित नहीं होता है, जब कि अपराध में व्यक्ति को हीन एवं घृणा की दृष्टि से । देखा जाता है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष रूप से अपराध में सम्मिलित होता है।
  4. अपराध की अपेक्षा श्वेतवसन अपराध योजनाबद्ध रूप से किये जाते हैं।
  5. अपराध की तुलना में श्वेतवसन अपराध अधिक गोपनीय ढंग से किये जाते हैं।
  6.  श्वेतवसन अपराध आधुनिक औद्योगिक एवं नगरीकृत समाजों की विशेषता है, जब कि अपराध आदिम और आधुनिक सभी समाजों में किये जाते हैं।
  7.  सामान्यत: अपराध में अपराधी को दण्ड मिलता है, किन्तु श्वेतवसन अपराध में अपराधी अपनी आर्थिक स्थिति एवं जटिल कानूनी प्रक्रिया के कारण दण्ड से बच जाता है।
  8. श्वेतवसन अपराध व्यक्ति अपने व्यवसाय के दौरान करता है, जब कि अपराध व्यवसाय से बाहर भी।
  9. अपराध के प्रति जनता की सामूहिक प्रतिक्रिया पायी जाती है, जब कि श्वेतवसन अपराध के प्रति नहीं।

प्रश्न 8
श्वेतवसन अपराध और सामाजिक विघटन के सम्बन्ध की विवेचना कीजिए.
उत्तर:
सदरलैण्ड श्वेतवसन अपराध एवं सामाजिक विघटन के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बताते हैं। उनकी मान्यता है कि श्वेतवसन अपराध के कारण आर्थिक हानि की तुलना में समाज को सामाजिक हानि अधिक होती है और सामाजिक विघटन को बढ़ावा मिलता है। श्वेतवसन अपराध से उत्पन्न प्रमुख सामाजिक दुष्परिणाम निम्न प्रकार हैं, जो सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी हैं

  1.  समाज में अनैतिकता, विश्वासहीनता एवं भ्रष्टाचार में वृद्धि होती है।
  2.  समाज में नियमहीनता बढ़ती है और प्रत्येक व्यक्ति नियमों एवं आदर्शों की मनमाने ढंग से व्याख्या करता है और अपने पक्ष की पुष्टि के लिए उल्टे-सीधे तर्क भी प्रस्तुत करता है।
  3.  श्वेतवसन अपराध के कारण मानसिक असन्तोष, निराशा एवं तनाव पैदा होते हैं। लोगों में कर्तव्यहीनता एवं दाविहीनता की भावना में वृद्धि होती है।
  4.  श्वेतवसन अपराध समाज में असन्तोष को बढ़ावा देने के साथ-साथ लोगों में अनुशासनहीनता को बढ़ाता है। उनमें कानून एवं न्याय के प्रति कम विश्वास रह जाता है। इससे कानूनी अव्यवस्था फैलती है।
  5. श्वेतवसन अपराध के कारण सामाजिक असुरक्षा पनपती है। जब समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति तथा संरक्षक कहे जाने वाले लोग अपराधी कार्यों में लिप्त होते हैं तो अन्य लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा होती है।
  6. श्वेतवसन अपराध के कारण अर्थव्यवस्था विघटित हो जाती है। बेईमान एवं अपराधी लोग सुखी एवं समृद्ध जीवन व्यतीत करते हैं, जब कि ईमानदार व्यक्तियों के लिए भरण-पोषण भी कठिन होता है।
  7.  श्वेतवसन अपराध के कारण नयी पीढ़ी में अपराध की ओर झुकाव बढ़ता है। समाज व्यवस्था, सुरक्षा, प्रगति एवं विकास खतरे में पड़ जाते हैं। श्वेतवसन अपराध सामाजिक संस्थाओं के मूलभूत मूल्यों पर आक्रमण है। उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि श्वेतवसन अपराध सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
भौतिकवादी मनोवृत्ति श्वेतवसन अपराध का एक प्रभावी कारण है। कैसे ?
उत्तर:
वर्तमान समय में लोगों में भौतिकवादी मनोवृत्ति बढ़ी है। प्रत्येक व्यक्ति येन-केनप्रकारेण धन कमाकर अधिकाधिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना चाहती है। आज व्यक्ति का मूल्यांकन भी इसी आधार पर किया जाता है कि उसके पास कितनी सम्पत्ति है? प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य शारीरिक एवं इन्द्रिय सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना ही रह गया है, जिन्हें जुटाने के लिए समाज-विरोधी विधियों तक का भी सहारा लिया जाता है।

प्रश्न 2
वर्तमान समय में श्वेतवसन अपराध ने संगठित रूप धारण कर लिया है। समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में अपराध से सम्बन्धित अनेक संगठन पाये जाते हैं, जिनमें कई राजनेता, व्यापारी, उच्चाधिकारी एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति हँसे होते हैं। एक अकेला व्यक्ति जब इनके जाल में फंस जाता है तो वह निरुपाय होता है और इनके विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता। जब सभी उच्च अधिकारी घूस लेते हों, तो ईमानदार व्यक्ति उनमें टिक नहीं सकता। जब भी बेईमान व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही की जाती है, तो श्वेतवसन अपराधी लोग संगठित होकर उसका विरोध करते हैं। इस प्रकार के कार्यों से श्वेतवसन अपराधियों को और अधिक अपराध करने का प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 3
पद का दुरुपयोग श्वेतवसन अपराध का एक कारण है। समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
कई राजकीय एवं गैर-राजकीय अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करते हैं। वे पैसा लेकर सरकार के गुप्त भेदों को बता देते हैं या रिश्वत देने वाले के पक्ष में निर्णय कर देते हैं। चुनाव के समय भ्रष्ट तरीके अपनाना, इच्छानुसार लोगों को कोटा या परमिट वितरित करना, झूठे प्रमाण-पत्र देना, किसी पद पर नियुक्ति करवाना आदि श्वेतवसन अपराध के ही उदाहरण हैं।

प्रश्न 4
श्वेतवसन अपराध को रोकने के कोई चार उपाय बताइए।
उत्तर:
अब तक श्वेतवसने अपराधों की रोकथाम के लिए कानूनी एवं अन्य प्रकार के प्रयत्न नहीं हुए हैं। इन अपराधों से उत्पन्न दोषों की गम्भीरता को देखते हुए इनके निराकरण के लिए। निम्नलिखित उपाय अपनाये जाने चाहिए

  1. राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के अपराधों की छानबीन के लिए जाँच आयोग की स्थापना की। जानी चाहिए।
  2. संरकार द्वारा भ्रष्टाचार निरोध समिति की स्थापना की जाए।
  3.  इस प्रकार की समितियों से सम्बन्धित कर्मचारियों एवं अधिकारियों को जनता अपना सहयोग एवं समर्थन दे और वे श्वेतवसन अपराधियों के काले कारनामे सरकार के समक्ष लाएँ।
  4. सरकार द्वारा शक्तिशाली गुप्तचर विभाग की स्थापना की जाए।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
सदरलैण्ड ने श्वेतवसन अपराध की क्या परिभाषा दी है ?
उत्तर:
सदरलैण्ड के अनुसार, “श्वेतवसन अपराध उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्ग के व्यक्ति द्वारा अपने पेशे या धंन्धे के क्रिया-कलापों के दौरान अपराधिक कानून का उल्लंघन है।”

प्रश्न 2
श्वेतवसन अपराध की अवधारणा किसने दी ? [2011, 12, 13]
या
श्वेतवसन अपराध की अवधारणा किस समाजशास्त्री से सम्बन्धित है ? [2007]
या
श्वेतवसन अपराध के प्रणेता कौन हैं? [2013]
उत्तर:
श्वेतवसन अपराध की अवधारणा सदरलैण्ड ने दी।

प्रश्न 3
“श्वेतवसन अपराध आधुनिक संस्कृति की उपज है।” सत्य/असत्य [2013]
उत्तर:
सत्य।

प्रश्न 4
सदरलैण्ड द्वारा व्यक्त अपराध को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
श्वेतवसन अपराध।

प्रश्न 5
श्वेतवसन अपराध किस प्रकार के व्यक्तियों द्वारा किये जाते हैं ?
उत्तर:
इस प्रकार के अपराध मुख्यतः चिकित्सकों, कानूनवेत्ताओं, शिक्षा-अधिकारियों, व्यापारियों, संसद सदस्यों, राजनेताओं एवं उद्योगपतियों द्वारा किये जाते हैं।

प्रश्न 6
श्वेतवसन अपराधों का पता लगाना क्यों कठिन है ?
उत्तर:
श्वेतवसन अपराध परोक्ष रूप से बुद्धिमानीपूर्वक किये जाते हैं। अत: इनका पता लगाना कठिन होता है।

प्रश्न 7
क्राइम एण्ड बिज़नेस कृति किसकी है?
उत्तर:
‘क्राइम एण्ड बिज़नेसं’ कृति सदरलैण्ड की है।

प्रश्न 8
श्वेतवसन अपराध के दो उदाहरण दीजिए। (2013)
उत्तर:
वकीलों द्वारा झूठी गवाही दिलवाना तथा पैसों के लालच हेतु डॉक्टरों द्वारा ऑपरेशन करना, श्वेतवसन अपराध के उदाहरण हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
‘श्वेलवसन अपराध की अवधारणा किसने दी है? [2014, 15, 16]
(क) सदरलैण्ड ने
(ख) सोरोकिन ने
(ग) टैफ्ट ने
(घ) सेथना ने

प्रश्न 2
श्वेतवसन अपराध का कारण है
(क) जातिवाद
(ख) संयुक्त परिवार का विघटन
(ग) भौतिकवादी मनोवृत्ति
(घ) निरक्षरता

प्रश्न 3
हाइट कॉलर क्रिमिनैलिटी’ शोध लेख किसने प्रकाशित किया ? [2015]
या
सफेदपोश अपराध की अवधारणा किसने दी है?
(क) टैफ्ट ने
(ख) मार्शल क्लीनार्ड ने
(ग) सदरलैण्ड ने
(घ) फ्रेंक हारटुंग ने

प्रश्न 4
सदरलैण्ड किस पुस्तक के लेखक हैं ?
(क) प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी
(ख) फॉकवेज
(ग) पर्सनल डिसऑर्गेनाइजेशन
(घ) कल्चरल सोशियोलॉजी

उत्तर:
1. (क) सदरलैण्ड ने,
2. (ग) भौतिकवादी मनोवृत्ति,
3. (ग) सदरलैण्ड ने,
4. (क) प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी।

 

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