UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय)

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 5
Chapter Name Revenue (आय)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सीमान्त आय एवं औसत आय से क्या अभिप्राय है? चित्र और उदाहरण की सहायता से इनमें सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए। [2009]
या
तालिका और रेखाचित्र के माध्यम से सीमान्त आय, कुल आय और औसत आय के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
या
कुल आय, औसत आय और सीमान्त आय को परिभाषित कीजिए। इनमें परस्पर क्या सम्बन्ध पाया जाता है? [2008]
या
सीमान्त एवं औसत आगम में सम्बन्ध बताइए। [2006]
उत्तर:
आय का अर्थ
सामान्य बोलचाल की भाषा में आय (आगम) का अर्थ व्यक्ति विशेष को समस्त साधनों से होने वाली आय से लगाया जाता है। प्रत्येक फर्म या उत्पादक का उद्देश्य वस्तुओं का न्यूनतम लागत पर उत्पादन करके उनकी अधिकतम बिक्री करने का होता है जिसमें वह अधिकतम लाभ अर्जित कर सके। अर्थशास्त्र में आय या आगम शब्द का आशय प्राप्त होने वाले उस धन से होता है जो किसी उत्पादित वस्तु की बिक्री से प्राप्त होता है। अर्थशास्त्र में आय शब्द का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है

  1. कुल आय (Total Revenue),
  2. औसत आय (Average Revenue) तथा
  3.  सीमान्त आय (Marginal Revenue)।

1. कुल आय – किसी उत्पादक या फर्म के द्वारा अपने उत्पादन की एक निश्चित मात्रा को बेचकर जो धनराशि प्राप्त की जाती है, उसे कुल आय कहते हैं।
कुल आय ज्ञात करने के लिए फर्म द्वारा बेची जाने वाली इकाइयाँ तथा प्रति इकाई की कीमत ज्ञात होनी चाहिए। फर्म द्वारा बेची जाने वाली वस्तु की मात्रा को कीमत से गुणा करके कुल आय ज्ञात की जा सकती है।
कुल आय = वस्तु की बेची गयी मात्रा या इकाइयों की संख्या x कीमत उदाहरण के लिए–यदि कोई फर्म र 50 प्रति इकाई की दर से 10 कुर्सियाँ बेचती है तो उसकी कुल आय = 50 x 10 = 500 होगी।

2. औसत आय – औसत आय उत्पादने की निश्चित मात्रा की बिक्री की प्रति इकाई आय है, जिसे बिक्री से प्राप्त कुल आय को वस्तु की बेची गयी कुल मात्रा (इकाइयों) से भाग देकर ज्ञात किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 1
उदाहरण के लिए-10 कुर्सियों की बिक्री से ₹500 की कुल आय प्राप्त होती है, तब
औसत आय = [latex]\frac { 500 }{ 10 }[/latex] = ₹50 प्रति कुर्सी

3. सीमान्त आय – सीमान्त आय अन्तिम इकाई की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय होती है। किसी वस्तु की एक अधिक अथवा एक कम इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि अथवा कमी होती है, वह उस वस्तु की सीमान्त आय कहलाती है। उदाहरण के लिए – 10 कुर्सियों को ₹50 प्रति कुर्सी की दर से बेचने पर कुल आय में ₹500 प्राप्त हुई। यदि उत्पादक एक कुर्सी और बेचना चाहे और वह 11 कुर्सियों को ₹545 में बेच देता है, तब सीमान्त आय ₹545 – 45 हुई। अत:
सीमान्त आय = कीमत x बेची गयी इकाइयों की संख्या – पूर्व की कुल आय।

कुल आय, औसत आय और सीमान्त आय का सम्बन्ध
कुल आय, औसत आय व सीमान्त आय का सम्बन्ध निम्नलिखित तालिका द्वारा दर्शाया गया है –

बिक्री की कुल इकाइयाँ प्रति इकाई कीमत
(₹ में)
कुल आय
(₹ में)
औसत आय
(₹ में)
सीमान्त आय
(₹ में)
1. 17 17 17 = 17
2. 16 32 16 (32-17)=15
3. 15 45 15 (45-32)=13
4. 14 56 14 (56-45)=11
5. 13 65 13 (65-56)= 9
6. 12 72 12 (72-65)= 7
7. 11 77 11 (77-72)= 5
8. 10 80 10 (80-77)= 3

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेची जाती हैं। वैसे-वैसे अतिरिक्त इकाइयों की कीमत कम करनी पड़ती है, क्योंकि तभी ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वस्तुओं की कीमत घट जाने से सीमान्त आय और औसत आय घटती जाती हैं; परन्तु सीमान्त आय औसत आय की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से घटती है। कुल आय में निरन्तर 80वृद्धि होती जाती हैं, परन्तु वृद्धि की दर गति से उत्तरोत्तर कम होती जाती है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
संलग्न चित्र में Ox-अक्ष पर बिक्री की इकाइयाँ तथा OY- अक्ष पर आये दर्शायी गयी है। चित्र में TR कुल आय वक्र, AR औसत आय वक्र तथा MR सीमान्त आय वक्र हैं। चित्र से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेची जाती हैं वैसे-वैसे औसत आय तथा सीमान्त आय घटती जाती हैं। परन्तु औसत आय की अपेक्षा सीमान्त
MR आय अधिक तेजी से घटती है। कुल आय निरन्तर बढ़ रही है, किन्तु वृद्धि की दर उत्तरोत्तर कम होती जा रही है।
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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
पूर्ण और अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में सीमान्त आय और औसत आय की आकृति को चित्रों की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
या
सीमान्त आय वक्र, औसत आय वक्र को इसके निम्नतम बिन्दु पर नीचे की ओर से ही क्यों काटता है ? चित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार एवं अपूर्ण प्रतियोगी बाजार का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-जिस । बाजार में किसी वस्तु-विशेष के अनेक क्रेता-विक्रेता, उस । वस्तु का क्रय-विक्रय स्वतन्त्रतापूर्वक करते हैं तथा कोई एक क्रेता या विक्रेता वस्तु के मूल्य को प्रभावित नहीं कर सकता, तो ऐसे बाजार को पूर्ण प्रतियोगी बाजार कहते हैं। अपूर्ण । प्रतियोगिता पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार के बीच की है स्थिति है अर्थात् अपूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में कुछ तत्त्व । पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार के तथा कुछ तत्त्व एकाधिकार वाले बाजार के निहित होते हैं। वास्तविक जीवन में ऐसी ही मिश्रित अवस्था पायी जाती है जिसमें किसी वस्तु का मूल्य समान नहीं होता।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 3
किसी फर्म के औसत आय वक्र AR और सीमान्त आय वक्र MR का आकार कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर होता है कि उस फर्म को पूर्ण प्रतियोगिता अथवा अपूर्ण प्रतियागिता में से किस प्रकार के बाजार की दशाओं में अपना माल बेचना पड़ता है। सामान्यतः प्रतियोगिता जितनी तीव्र होगी तथा वस्तु के जितने निकट स्थानापन्न होंगे, उतना ही अधिक लोचदार उस फर्म का औसत आय वक्र होगा।

पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म ‘कीमत ग्रहण करने वाली’ (Price taker) होती है, कीमत-निर्धारण करने वाली (Price maker) नहीं। इस दशा में फर्म को प्रचलित कीमत को स्वीकार करना पड़ता है, क्योंकि वह इस कीमत पर इच्छानुसार माल बेच सकती है। यदि फर्म अपनी कीमत को बढ़ाती है तो वह समस्त ग्राहकों को खो देगी। यदि कीमत कम करती है तो ग्राहकों की भी भरमार हो जाएगी। अत: पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में प्रचलित कीमत ही स्वीकार करनी पड़ती है। यहाँ औसत आये सर्वदा कीमत के बराबर होगी। क्योंकि औसत आय निश्चित है, इसीलिए सीमान्त आय भी निश्चित होगी और वह औसत आय के बराबर होगी। इस प्रकार AR = MR रहती है तथा औसत आय वक्र एक सीधी पड़ी रेखा (Horizontal Straight Line) : होती है। इसका प्रमुख कारण फर्म द्वारा प्रचलित कीमत को स्वीकार करना होता है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में फर्म के औसत व सीमान्त आय वक्रे दोनों ही ऊपर से नीचे की ओर गिरते हैं। स्पष्ट है कि फर्म के उत्पादन के बढ़ने पर औसत आय (AR) और सीमान्त आय (MR) दोनों ही गिरती हैं, किन्तु सीमान्त आय, औसत आय की अपेक्षा तेजी से गिरती है। इसका मुख्य कारण यह है कि अपूर्ण प्रतियोगिता की है – स्थिति में विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में अपेक्षाकृत कम होती है जिसके कारण विक्रेता कीमत को प्रभावित करने की स्थिति में होता है अर्थात् वे कीमत में कमी करके वस्तु की बिक्री की मात्रा को अधिकतम करके अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। इस कारण सीमान्त आय वक्र औसत आय वक्र को इसके न्यूनतम बिन्दु पर नीचे की ओर से ही काटता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 4

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
औसत आय से क्या अभिप्राय है?
या
औसत आय (आगम) का सूत्र लिखिए। [2011, 15]
उत्तर:
औसत आय उत्पादन की निश्चित मात्रा की बिक्री की प्रति इकाई आय है, जिसे बिक्री से प्राप्त कुल आय को वस्तु की बेची गई कुल मात्रा (इकाइयों) से भाग देकर ज्ञात किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 5

प्रश्न 2
सीमान्त आय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सीमान्त आय अन्तिम इकाई की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय होती है। किसी वस्तु की अधिक अथवा एक़ कम इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि अथवा कमी होती है, वह उस वस्तु से प्राप्त होने वाली सीमान्त आय कहलाती हैं।
सीमान्त आय = कीमत x बेची गयी इकाइयों की संख्या – पूर्व की कुल आय।

प्रश्न 3
सीमान्त एवं औसत आगम में सम्बन्ध बताइए। [2006]
या
कुल आय, सीमान्त आय और औसत आय में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
जैसे-जैसे कोई फर्म अतिरिक्त इकाइयों का उत्पादन करती है, कुल आगम में वृद्धि होती जाती है। धीरे-धीरे कुल आगम में वृद्धि की दर में कमी आने लगती है और एक सीमा के बाद इसमें वृद्धि होनी समाप्त हो जाती है। इस बिन्दु पर उत्पादक उत्पादन कार्य समाप्त कर देगा। औसत आय एवं सीमान्त आय में आरम्भ से ही धीरे-धीरे कमी आने लगती है किन्तु सीमान्त आय के घटने की गति औसत आय की तुलना में तीव्र होती है।

प्रश्न 4
निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लिखिए सिदद कीजिए कि जब औसत आगम =

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 6, तो औसत आगम = कीमत।
उत्तर:
कुल आगम = वस्तु की बेची जाने वाली इकाइयाँ x कीमत
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 7
अतः औसत आगम = कीमत
उदाहरण के लिए-10 कुर्सियों की बिक्री से ₹500 की कुल आगम प्राप्त होती है, तब
औसत आगम = [latex]\frac { 500 }{ 10 }[/latex] = ₹50 प्रति
औसत आगम = कीमत
औसत आगम या वस्तु की कीमत एक ही बात है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कुल आय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी उत्पादक या फर्म के द्वारा अपने उत्पादन की एक निश्चित मात्रा को बेचकर जो धनराशि प्राप्त की जाती है उसे कुल आय कहते हैं। कुल आय = वस्तु की बेची गयी मात्रा या इकाइयों की संख्या x कीमत।

प्रश्न 2
यदि किसी वस्तु की 10 इकाइयों से प्राप्त कुल आय ₹ 180 है और 11 इकाइयों से प्राप्त कुल आय ₹ 187 है, तो सीमान्त आय क्या होगी ?
उत्तर:
सीमान्त आय = 187 – 180 = ₹ 7

प्रश्न 3
यदि किसी वस्तु की 1 इकाई का बाजार मूल्य ₹16 है, तो उसकी 25 इकाइयों की कुल आय कितनी होगी ?
उत्तर:
कुल आय = 25 x 16 = ₹ 400.

प्रश्न 4
औसत उत्पादकता क्या है? [2007]
उत्तर:
कुल उत्पादकता को साधन की संख्या से भाग देकर औसत आय प्राप्त कर ली जाती है। Teases

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कुल आय बराबर है
(क) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या x कीमत
(ख) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या + कीमत
(ग) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या – कीमत
(घ) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या + कीमत
उत्तर:
(क) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या x कीमत।

प्रश्न 2
औसत आय बराबर है
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 8
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 9

प्रश्न 3
सीमान्त आय बराबर है
(क) कुल आय x पिछली इकाइयों की आय
(ख) सीमान्त आय + पिछली इकाइयों की आय
(ग) कुल आय – पिछली इकाइयों की आय
(घ) उपर्युक्त (ख) एवं (ग)
उत्तर:
(ग) कुल आय – पिछली इकाइयों की आय।

प्रश्न 4
पूर्ण प्रतियोगिता की अवस्था में फर्म होती है
(क) कीमत ग्रहण करने वाली एवं कीमत-निर्धारित करने वाली
(ख) कीमत ग्रहण करने वाली, कीमत निर्धारित करने वाली नहीं
(ग) कीमत ग्रहण करने वाली नहीं, परन्तु कीमत निर्धारित करने वाली
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) कीमत ग्रहण करने वाली, कीमत निर्धारित करने वाली नहीं।

प्रश्न 5
आगम से तात्पर्य है।
(क) वस्तु की बिक्री से होने वाली आय
(ख) साधनों की बिक्री से होने वाली आय
(ग) सीमान्त आय
(घ) औसत आगम
उत्तर:
(क) वस्तु की बिक्री से होने वाली आय।।

प्रश्न 6
पूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आय रेखा और औसत आय रेखा का स्वरूप होता है
(क) नीचे गिरती हुई
(ख) ऊपर उठती हुई
(ग) बराबर व क्षैतिज
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) बराबर व क्षैतिज।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी) are the part of UP Board Solutions for Class 12 History. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 6
Chapter Name Shivaji (शिवाजी)
Number of Questions Solved 17
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए|
1. 1627 ई०
2.1659 ई०
3.1674ई०
4.1680 ई०
उतर:
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ-संख्या- 118 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर:
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 118 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर:
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 119 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर:
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 119 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मराठों के उदय के चार कारण लिखिए।
उतर:
मराठों के उदय के चार कारण निम्नवत हैं

  • महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति
  • मराठा धर्म सुधारकों का प्रभाव
  • मराठों की सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्षता
  • औरंगजेब की दक्षिण नीति।

प्रश्न 2.
पुरन्दर की सन्धि के बारे में आप क्या जानते हैं?
उतर:
पुरन्दर की सन्धि शिवाजी और मुगलों के मध्य हुई थी। शिवाजी ने इस सन्धि में 35 में से 23 दुर्ग मुगलों को दे दिए। शिवाजी ने मुगलों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया परन्तु अपने स्थान पर अपने पुत्र शम्भाजी को 5000 घुड़सवारों के साथ मुगलों की सेवा में भेज दिया। शिवाजी ने बीजापुर के सुल्तान के विरुद्ध मुगलों को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया। इस सन्धि से मुगलों को बहुत लाभ पहुँचा।

प्रश्न 3.
शिवाजी के राजनैतिक आदर्श क्या थे?
उतर:
हिन्दू-पद-पादशाही, धर्मशास्त्र की पुस्तकें और कोटिल्य का अर्थशास्त्र’ शिवाजी के राजनैतिक आदर्श थे।

प्रश्न 4.
शिवाजी की किन्हीं दो विजयों का वर्णन कीजिए।
उतर:

  1. जावली विजय- सन् 1656 ई० में शिवाजी ने जावली पर विजय प्राप्त की। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव के अधिकार में था। वह शिवाजी के विरुद्ध बीजापुर राज्य से मिला हुआ था। शिवाजी ने चन्द्रराव की हत्या कर किले पर अधिकार कर लिया। इससे उनका राज्य–विस्तार दक्षिण-पश्चिम की ओर सम्भव हो सका।।
  2. कोंकण विजय- जावली की विजय के उपरान्त शिवाजी ने कोंकण की ओर दृष्टिपात किया और उत्तरी कोंकण तथा भिवण्डी के दुर्गों पर अधिकार करके उन्होंने कोंकण में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। उत्तरी कोंकण के पश्चात दक्षिणी कोंकण पर भी उनका अधिकार हो गया जिससे उनका राज्य समुद्री तटों तक विस्तृत हो गया।

प्रश्न 5.
शिवाजी ने अफजल खाँ की हत्या क्यों की?
उतर:
अफजल खाँ शिवाजी को छलपूर्वक परास्त करना चाहता था। शिवाजी अफजल खाँ के मन्तव्य को जान चुका था। जब शिवाजी,

अफजल खाँ के व्यक्तिगत मुलाकात के निमन्त्रण पर उससे मिलने के लिए उनके पास पहुँचा तो उसने आगे बढ़कर शिवाजी का स्वागत किया और शिवाजी को अपनी बाँहों में दबोचकर तलवार से वार किया। शिवाजी ने अफजल खाँ के कुचक्र को समझते
हुए बहुत ही चालाकी और साहसिक ढंग से अफजल खाँ का वध कर दिया।

प्रश्न 6.
शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर आक्रमण क्यों कर दिया?
उतर:
औरंगजेब ने दक्षिण में मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को आदेश दिए। शाइस्ता खाँ ने बीजापुर के साथ मिलकर शिवाजी से पूना, चाकन और कल्याण को छीनने में सफलता प्राप्त की। इन पराजयों से शिवाजी की शक्ति कमजोर पड़ गई। मराठा सेना का उत्साह बढ़ाने के लिए शिवाजी ने एक दिन रात्रि के समय पूना में शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर उसे परास्त कर दिया।

प्रश्न 7.
शिवाजी के अष्टप्रधान के विषय में आप क्या समझते हैं?
उतर:
शिवाजी ने अपनी शासन-व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए आठ मन्त्रियों की एक परिषद् का गठन किया जो ‘अष्टप्रधान’ के नाम से सम्बोधित की जाती थी। केवल सेनापति के अलावा अन्य सभी मन्त्रिगण ब्राह्मण होते थे, जिनकी नियुक्ति सम्राट के द्वारा की जाती थी तथा वे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन मंत्रियों द्वारा कार्य कराने का भार भी सम्राट पर ही था।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगलकाल में मराठों को एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफलता क्यों मिली?
उतर:
मुगलकाल में मराठों को एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफलता मिलने के निम्नलिखित कारण हैं

1. महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति- महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियों ने मराठा शक्ति के उत्कर्ष में उल्लेखनीय सहायता की। महाराष्ट्र का अधिकांश भाग पठारी है। जहाँ जीवन की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता है। इस कारण वहाँ के निवासी परिश्रमी और साहसी होते हैं। वहाँ आक्रमणकारी के लिए बहुत कठिनाइयाँ थीं तथा सेना को लेकर चलना तथा उसके लिए रसद प्राप्त करना कठिन था, जबकि सुरक्षा के लिए वहाँ अनेक सुविधाएँ थीं। स्थान-स्थान पर सरलता से पहाड़ी किले बनाए जा सकते थे, जिनकी सुरक्षा करना सरल था, परन्तु उनको जीतना कठिन था। गुरिल्ला युद्ध-पद्धति अथवा छापामार रणनीति का प्रयोग वहाँ सरलता से सम्भव था। इसके अतिरिक्त भारत के बीच में स्थित होने के कारण वहाँ के निवासियों के लिए उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में अपनी प्रगति करने की सुविधा थी।

2. आर्थिक पृष्ठभूमि- आर्थिक दृष्टि से महाराष्ट्र के निवासियों में आर्थिक असमानताएँ न थी। व्यापारी वर्ग के अतिरिक्त वहाँ धनी वर्ग के व्यक्ति अधिक न थे। इसका कारण था- आर्थिक शोषण करने वाले वर्ग का अभाव। इससे महाराष्ट्र निवासियों का चरित्र दृढ़ बना, वे परिश्रमी और साहसी बने, उनमें समानता की भावना जगी, वे छोटे और बड़े की भावना से रहित हुए तथा वे उस भोग-विलास से दूर ही रहते थे, जिसके कारण उत्तर भारत के समाज का नैतिक पतन हो रहा था।

3. भाषा और साहित्य का योगदान- भाषा की दृष्टि से मराठी भाषा बहुत सरल और व्यावहारिक थी। इस जनसाधारण की भाषा के प्रयोग से महाराष्ट्र के निवासियों में एकता और समानता पनपी। सन्त तुकाराम के पद बिना भेदभाव के गाए जाते थे। इस प्रकार धार्मिक साहित्य ने लोगों के मध्य अप्रत्यक्ष रूप से एकता स्थापित कर दी थी। सर जदुनाथ सरकार के अनसार, शिवाजी द्वारा किए गए राजनीतिक संगठन से पर्व ही महाराष्ट्र में एक भाषा, एक रीति-रिवाज और एक ही प्रकार के समाज का निर्माण हो चुका था।

4. मराठा धर्मसुधारकों का प्रभाव- मराठों में स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना जगाने में महाराष्ट्र के धर्मसुधारकों का महत्वपूर्ण योगदान था। महाराष्ट्र धर्म-सुधार आन्दोलन का एक प्रमुख केन्द्र था। यहाँ संत ज्ञानेश्वर, संत एकनाथ, तुकाराम, संत रामदास और बामन पंडित जैसे विचारक और सुधारक हुए, जिन्होंने मराठों में जागृति ला दी। जनसाधारण की भाषा का सहारा लेकर इन लोगों ने घर-घर में अपनी बात पहुँचाई। शिवाजी के गुरु रामदास समर्थ ने अनेक मठों की स्थापना कर, ‘दसबोध’ नामक ग्रन्थ की रचना की और मठों में नवचेतना का संचार किया।

5. सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्षता- अहमदनगर, गोलकुण्डा व बीजापुर जैसे मुस्लिम राज्यों में लम्बे समय तक उच्च सैनिक व प्रशासनिक पदों पर कार्य करते रहने से मराठा, सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्ष हो गए थे, जिसका उन्हें कालान्तर में काफी लाभ मिला।

6. औरंगजेब की दक्षिण नीति- औरंगजेब ने उत्तर भारत को विजित करने के बाद दक्षिण भारत को विजित करने का निर्णय लिया। इसे देखकर समस्त मराठा शक्ति संगठित हो गई और उन्होंने मुगलों से संघर्ष करने का निर्णय किया। इसका मुख्य कारण उनका दक्षिण में पर्याप्त प्रभावशाली होना था। औरंगजेब का आक्रमण उनके इस प्रभाव को खत्म कर सकता था। यदि वे औरंगजेब की सत्ता को स्वीकार भी करते, तो औरंगजेब की धर्मान्ध नीति के कारण उन्हें वे उच्च पद व सुविधाएँ मिलने की सम्भावना बिलकुल ही नगण्य थी, जो कि उन्हें दक्षिण के दुर्बल व विलासी मुसलमान शासकों से मिल रही थी। यह एक व्यावहारिक कारण था, जिसने शिवाजी के नेतृत्व में मराठों को संगठित होने के लिए प्रेरित किया।

7. मराठों का उच्च चरित्र- मराठों के उच्च चरित्र ने भी उनके उत्कर्ष में सहायता की। उनके अन्दर साहस, एकता, परिश्रम, नैतिकता, राष्ट्र-प्रेम आदि गुण मौजूद थे।

8. भक्ति व धर्म-सुधार आन्दोलन- 15वीं व 16वीं शताब्दी के धर्म व भक्ति आन्दोलनों ने सामाजिक व धार्मिक धार्मिक करके मराठों में जातीय एकता की भावना भर दी, जिसने उन्हें शक्तिशाली बना दिया। इतिहासकार रानाडे के अनुसार महाराष्ट्र की राजनीति में उत्पन्न उथल-पुथल का प्रमुख कारण धार्मिक-आन्दोलन था। इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है कि महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम व रामदास जैसे सन्तों ने मराठों में राष्ट्रीय भावना का संचार कर दिया।

9. दक्षिणी मुसलमानों का पतन- दक्षिण के मुसलमान शासकों का कुछ तो नैतिक पतन हो चुका था। वे शासन की जिम्मेदारी मराठों को सौंपकर भोग-विलास में डूबे रहते थे, जिससे मराठों ने शासन के महत्वपूर्ण पदों को कब्जे में करके सैन्य संचालन व प्रशासन को अपने हाथों में ले लिया था। तत्पश्चात् दिल्ली के मुगल शासकों विशेष रूप से औरंगजेब की दक्षिण नीति के कारण कई दक्षिणी मुसलमान राज्य औरंगजेब के हाथों में चले गए थे। उसने अहमदनगर पर विजय पाने के बाद गोलकुण्डा व बीजापुर को जीतने का प्रयास किया। दक्षिण के मुसलमान शासकों की दुर्बल स्थिति को देखकर मराठों ने कई महत्वपूर्ण दुर्ग अपने हाथों में ले लिए और स्वतंत्र मराठा राज्य के स्वप्न को साकार करने का सफल प्रयास किया।

प्रश्न 2.
शिवाजी की उपलब्धियों का विवरण दीजिए।
उतर:
शिवाजी ने सबसे पहले 1646 ई० में बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया। इस किले में उन्हें भारी खजाना मिला, जिसकी सहायता से शिवाजी ने अपनी सेना में वृद्धि की तथा तोरण के किले से पाँच मील पूर्व में रायगढ़ नामक नया किला बनवाया। इससे शिवाजी की शक्ति में वृद्धि हुई। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने चोकन, कोंडाना, पुरन्दर, सिंहगढ़ आदि किलों पर अधिकार कर लिया। शिवाजी की प्रगति को देखते हुए बीजापुर के सुलतान ने उनके पिता शाहजी भोंसले को 1648 ई० में कैद कर लिया और तभी छोड़ा जब शाहजी के पुत्र शिवाजी तथा व्यंकोजी ने बंगलौर (बंगलुरु) और कोंडाना के किले सुल्तान के आदमियों को वापस कर दिए।

इससे शिवाजी की गतिविधियाँ कुछ समय के लिए रुक गईं। 1656 ई० में शिवाजी की एक महत्वपूर्ण विजय जावली की थी। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव के अधिकार में था और वह शिवाजी के विरुद्ध बीजापुर राज्य से मिला हुआ था। शिवाजी ने चन्द्रराव की हत्या कर दी और किले पर अधिकार कर लिया। इससे उनका राज्य–विस्तार दक्षिण-पश्चिम की ओर सम्भव हो सका। शिवाजी की उपलब्धियों का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है

1. मुगलों के साथ प्रथम मुठभेड़- 1657 ई० में शिवाजी का मुकाबला पहली बार मुगलों से हुआ। दक्षिण के सूबेदार शहजादा औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण किया और बीजापुर ने शिवाजी से सहायता माँगी। यह अनुभव करके कि दक्षिण में मुगलों की बढ़ती हुई शक्ति को रोकना आवश्यक है, शिवाजी ने बीजापुर की सहायता करने के उद्देश्य से मुगलों के दक्षिण-पश्चिम भाग पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। इसी समय शिवाजी ने जुन्नार को लूटा और स्थान-स्थान पर आक्रमण करके मुगलों को तंग किया। परन्तु जब बीजापुर ने मुगलों से संधि कर ली तब शिवाजी ने मुगलों पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। उत्तराधिकार के युद्ध के कारण मुगलों को प्राय: दो वर्ष तक दक्षिण भारत की ओर ध्यान देने का अवकाश न मिल सका।।

2. बीजापुर से संघर्ष- औरंगजेब के उत्तर भारत चले जाने के बाद शिवाजी ने फिर से देश विजय का सिलसिला शुरू कर दिया और इस बार उनका लक्ष्य बीजापुर के प्रदेश थे। उन्होंने पश्चिमी घाट और समुद्र के बीच पड़ने वाले कोंकण क्षेत्र पर जोरदार हमला किया और उसके उत्तरी हिस्से को जीत लिया। उन्होंने कई और पहाड़ी किलों पर भी कब्जा कर लिया, जिससे बीजापुर ने उनके खिलाफ कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। 1659 ई० में बीजापुर ने दस हजार सैनिकों के साथ अफजल खाँ नामक एक प्रमुख बीजापुरी सरदार को शिवाजी के खिलाफ भेजा और उसे निर्देश दिया कि चाहे जिस तरह भी करो पर उसे बंदी बना लो। उन दिनों ऐसे मौकों पर धोखेबाजी खूब चलती थी। अफजल खाँ और शिवाजी पहले भी कई बार धोखेबाजी का सहारा ले चुके थे।

शिवाजी के सैनिक खुली लड़ाई के अभ्यस्त नहीं थे और अफजल खाँ की विशाल सेना देखकर वह ठिठक गए। अफजल खाँ ने शिवाजी को व्यक्तिगत मुलाकात के लिए निमन्त्रण भेजा और यह वादा किया कि वह उसे बीजापुर के सुल्तान से माफी दिलवा देगा। लेकिन शिवाजी को पूरा शक था कि वह अफजल खाँ की चाल थी, इसलिए वे भी पूरी तैयारी के साथ उसके शिविर में आ गए और चालाकी से, लेकिन साथ ही बहुत साहसिक ढंग से, उसे मार डाला। अब उन्होंने अफजल खाँ की नेतृत्वविहीन सेना पर आक्रमण करके उसके पैर उखाड़ दिए और उसके सारे साज-सामान पर, जिसमें तोपखाना भी शामिल था, अधिकार कर लिया। इस विजय से प्रोत्साहित होकर शिवाजी ने दक्षिण कोंकण, पन्हाला और कोल्हापुर जिले में अपनी सेनाएँ भेजकर उन्हें विजित कर लिया।

3. शिवाजी और शाइस्ता खाँ- औरंगजेब ने दक्षिण में मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए 1660 ई० में मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को शिवाजी को समाप्त करने के आदेश दिए। उसने बीजापुर राज्य से मिलकर शिवाजी को समाप्त करने की योजना बनाई और शिवाजी से पूना, चाकन और कल्याण को छीनने में सफलता प्राप्त की। इन पराजयों से शिवाजी की शक्ति कमजोर पड़ी। मराठा सेना का उत्साह बढ़ाने के उद्देश्य से शिवाजी ने एक दु:साहसिक कदम उठाया। 1663 ई० में एक रात्रि में उन्होंने पूना में शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर उसे जख्मी कर दिया एवं उसके एक पुत्र तथा सेनानायक को मार दिया। शाइस्ता खाँ को भागकर अपने प्राणों की सुरक्षा करनी पड़ी। इस पराजय से मुगल प्रतिष्ठा को जहाँ ठेस पहुँची वहीं शिवाजी की प्रतिष्ठा पुन: बढ़ गई तथा मुगलों पर पुनः आक्रमण आरम्भ हो गए।

4. सूरत की प्रथम लूट (1664 ई०)- शाइस्ता खाँ पर विजय से प्रोत्साहित होकर 1664 ई० में शिवाजी ने मुगलों के बन्दरगाह नगर सूरत पर धावा बोल दिया। मुगल बादशाह और उनके सामन्त सूरत से जाने वाले मालवाहक जहाजों में आमतौर से पूँजी निवेश करते थे। शिवाजी के इस आक्रमण से मुगल किलेदार भाग खड़ा हुआ। शिवाजी ने चार दिन तक सूरत को अच्छी तरह लूटा, जिसमें एक करोड़ रुपए से अधिक राशि का माल तथा बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त हुईं।

5. मिर्जा राजा जयसिंह और शिवाजी- शाइस्ता खाँ की विफलता के बाद औरंगजेब ने शिवाजी का दमन करने के लिए आम्बेर के राजा जयसिंह को भेजा। जयसिंह औरंगजेब के सबसे विश्वस्त सलाहकारों में से था। उसे पूरी प्रशासनिक और सैनिक स्वायत्तता प्रदान की गई, जिससे उसे दक्कन में मुगल प्रतिनिधि पर किसी प्रकार निर्भर न रहना पड़े। उसका सीधा सम्बन्ध सम्राट से था। पहले के सेनापतियों की तरह जयसिंह ने मराठों की शक्ति को कम आँकने की भूल नहीं की। जयसिंह ने शिवाजी को अकेला करने के लिए पहले उनके प्रमुख सेनापतियों को प्रलोभन दिया। उसने शिवाजी को कमजोर करने के लिए उनकी पूना की जागीर के आसपास के गाँवों को तहस-नहस कर दिया। यूरोप की व्यापारी कम्पनियों को भी मराठा नौ-सेना की किसी भी कार्यवाही को रोकने के निर्देश दे दिए गए। अन्ततः जयसिंह ने पुरन्दर के दुर्ग की घेराबन्दी (1665 ई०) कर दी और मराठों को झुकना पड़ा। उसके बाद दोनों पक्षों के बीच पुरन्दर की सन्धि हुई।

6. शिवाजी का मुगल दरबार में जाना- पुरन्दर की सन्धि शिवाजी के लिए कष्टदायक थी, तथापि परिस्थिति के अनुसार उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। जयसिंह के अनुरोध पर शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए। आगरा में शिवाजी का यथोचित सम्मान नहीं किया गया और उनसे पंचहजारी मनसबदारों में खड़े होने को कहा गया। शिवाजी के विरोध करने पर औरंगजेब ने उन्हें नजरबन्द कर लिया। औरंगजेब के इरादों को भाँपकर शिवाजी पहरेदारों को धोखा देकर अपने पुत्र के साथ आगरा से निकल गए और सकुशल महाराष्ट्र वापस लौट गए। मराठा इतिहासकारों ने इस घटना को बहुत महत्वपूर्ण माना है। डॉ० सरदेसाई ने तो लिखा है कि “इस घटना से ही मुगल साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो जाता है।” महाराष्ट्र लौटने के पश्चात् शिवाजी कुछ वर्षों तक शान्त रहे। इस बीच उन्होंने औरंगजेब से समझौता भी कर लिया।

 

औरंगजेब ने उन्हें बाबर की जागीर एवं ‘राजा’ की उपाधि दी तथा उनके पुत्र को पाँच हजारी मनसब का पद दिया। शिवाजी का औरंगजेब के साथ यह समझौता एक कूटनीतिक चाल थी। औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा को समाप्त करने के लिए समय चाहता था तो शिवाजी अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए। इस बीच दक्षिण में मुगलों की दुर्बल स्थिति को देखते हुए शिवाजी ने अपने खोए हुए दुर्गों को पुनः वापस प्राप्त करने के लिए प्रयास आरम्भ कर दिया। 1670 ई० से मराठा मुगल सम्बन्ध पुनः कटु हो गए। शहजादा मुअज्जम और दिलेर खाँ के आपसी मनमुटाव का लाभ उठाकर शिवाजी ने मुगलों से अनेक किले वापस छीन लिए। उन्होंने सूरत पर दुबारा आक्रमण कर उसे लूटा और 1670 ई० में वहाँ से चौथ वसूल की। 1670-74 ई० के बीच उन्होंने पुरन्दर, पन्हाला, सतारा एवं अनेक दुर्गों को वापस ले लिया और मुगलों तथा बीजापुर के सुल्तान को परेशान किया।

7. शिवाजी का राज्याभिषेक- 1674 ई० तक शिवाजी की शक्ति और उनका प्रभाव-क्षेत्र अत्यधिक विकसित हो चला था। अतः 15 जून, 1674 में उन्होंने बनारस के विद्वान पण्डित गंगाभट्ट के हाथों अपना राज्याभिषेक करवाया और छत्रपति की उपाधि धारण की तथा भगवा-ध्वज उनका झण्डा बना एवं रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। शिवाजी के राज्याभिषेक को सत्रहवीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना माना गया है, इससे न केवल मराठा नेताओं के ऊपर शिवाजी का वर्चस्व कायम हुआ बल्कि उनका शासक के रूप में पद ऊँचा हुआ और उन्होंने मुगलों के विरोध में हिन्दू राजतन्त्र की खुलकर घोषणा की। समारोह से पहले शिवाजी ने कई महीनों तक मन्दिरों में पूजा की, जिसमें चिपलुण में परसराम मन्दिर और प्रतापगढ़ में भवानी मन्दिर शामिल हैं। अब शिवाजी एक जागीरदार अथवा लुटेरा मात्र नहीं थे, बल्कि मराठा राज्य के संस्थापक बन गए।

शासक के रूप में शिवाजी का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य था- कर्नाटक में अपनी शक्ति का विस्तार करना। उन्होंने बीजापुर के विरुद्ध गोलकुण्डा से सन्धि (1677 ई०) कर ली। बीजापुरी कर्नाटक क्षेत्र को अबुल हसन कुतुबशाह और शिवाजी ने आपस में बाँट लेने का फैसला किया। अबुल हसन ने शिवाजी को एक लाख हून प्रतिवर्ष कर देने एवं एक मराठा प्रतिनिधि को अपने दरबार में रखने एवं सैनिक सहायता देने का भी आश्वासन दिया। इस सन्धि से शिवाजी की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। प्रायः एक वर्ष के समय में ही शिवाजी ने बीजापुर के जिंजी और वैल्लोर पर कब्जा कर लिया। इसके अतिरिक्त तुंगभद्रा से कावेरी नदी के बीच का इलाका भी उन्होंने जीत लिया। इतना ही नहीं उन्होंने इसमें से सन्धि के अनुसार गोलकुण्डा को कोई हिस्सा नहीं दिया तथा पुनः बीजापुर को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास किया।

प्रश्न 3.
शिवाजी की शासन-व्यवस्था निम्नलिखित शीर्षकों के अनुसार समझाइए
(क) केन्द्रीय प्रशासन,
(ख) सैन्य प्रशासन
(ग) भूमि प्रशासन
उतर:
(क) केन्द्रीय प्रशासन
1. राजा- मध्ययुग के अन्य शासकों की भाँति शिवाजी एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न निरकुंश शासक थे। राज्य की सम्पूर्ण शक्तियाँ उनमें केन्द्रित थीं। उनके अधिकार असीमित थे। वहीं राज्य के प्रशासकीय प्रधान, मुख्य न्यायधीश, कानून निर्माता और सेनापति थे। परन्तु शिवाजी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग निरंकुश तानाशाही के लिए नहीं किया बल्कि जनहितार्थ किया। इतिहासकार रानाडे के शब्दों में, “शिवाजी नेपोलियन की भाँति एक महान संगठनकर्ता और असैनिक प्रशासन के निर्माणकर्ता थे।’

2. अष्टप्रधान- शिवाजी की सहायता के लिए आठ मन्त्रियों की एक परिषद् होती थी जो ‘अष्टप्रधान’ के नाम से सम्बोधित की जाती थी। केवल सेनापति के अतिरिक्त अन्य सभी मन्त्रिगण ब्राह्मण होते थे, जिनकी नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी तथा वे सम्राट के प्रति ही उत्तरदायी थे। इन मन्त्रियों से कार्य कराने का भार भी स्वयं सम्राट पर ही था।

शिवाजी ने इन मन्त्रियों को अपने विभागों में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान नहीं की थी वरन् सरलतापूर्वक कार्य विभाजन के लिए इन मन्त्रियों की नियुक्ति की जाती थी, जिनके निरीक्षण एवं निर्देशन का भार शिवाजी पर ही था। आठ में से छह मन्त्रियों को समय पड़ने पर युद्धभूमि में जाना पड़ता था। शिवाजी यद्यपि इन मन्त्रियों से इनके विभागीय कार्यों के लिए परामर्श लेते थे, किन्तु उनको मानने के लिए वे बाध्य नहीं थे वरन् जिस बात को वे उचित समझते थे, वही करते थे। इस प्रकार का निरंकुश शासन तभी तक सफल रह सकता था, जब तक कि राजा योग्य हो। शिवाजी की मन्त्रिपरिषद् में निम्नलिखित पद थे

  • प्रधानमन्त्री एवं पेशवा- मुगल सम्राटों के वजीर के समान शिवाजी के राज्य में पेशवा का स्थान था। वह अन्य सभी विभागों तथा मन्त्रियों पर निगरानी रखता था तथा राजा की अनपुस्थिति में राज्य के कार्यों की देखभाल करता था। राजकीय पत्रों पर राजा की मुहर के नीचे उसकी मुहर होती थी तथा प्रजा की सुख सुविधाओं का ध्यान रखना उसका कर्तव्य था।
  • मजमुआदार अथवा अमात्य- आय तथा व्यय का निरीक्षण करना तथा सम्पूर्ण राज्य की आय का ब्यौरा रखना अमात्य का कार्य होता था।
  • वाकयानवीस अथवा मन्त्री- राजदरबार में घटित होने वाली घटनाओं तथा राजा के कार्यों का ब्यौरा रखना मन्त्री का कार्य था। वह राजा के विरुद्ध रचित षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों का पता लगाता था, उसके खाने-पीने की वस्तओं का निरीक्षण करता था तथा राजमहल का प्रबन्ध करता था।
  • सचिव- सम्राट के पत्र-व्यवहार का निरीक्षण करना सचिव का कार्य था। सचिव महल तथा परगनों के लेखों का निरीक्षण करता था तथा राज्य के पत्रों पर मुहर लगाता था।
  • सुमन्त- बाह्य नीति में राजा को परामर्श देने वाला मन्त्री सुमन्त कहलाता था। अन्य राजाओं के राजदूतों से भेंट करना तथा पड़ोसी राज्यों में घटित होने वाली घटनाओं की सूचना भी उसे रखनी पड़ती थी।
  • सेनापति- सेना का अध्यक्ष सेनापति होता था, जिसका कार्य सैनिकों की भर्ती करना, सैन्य-व्यवस्था करना, सैनिकों को प्रशिक्षण देना तथा सेना में अनुशासन बनाए रखना होता था। युद्धभूमि में भेजने के लिए वह
    सैनिकों का चयन भी करता था।
  • पण्डितराव अथवा दानाध्यक्ष- धार्मिक कार्यों के लिए दान, धार्मिक उत्सवों का प्रबन्ध, ब्राह्मणों को दान देना तथा धर्म विरोधियों को दण्ड देना पण्डितराव अथवा दानाध्यक्ष का कर्तव्य था। वह जन-आचरण निरीक्षण विभाग का प्रधान होता था। धर्म-संस्थाओं तथा साधु-सन्तों को दान देने के विषय में भी वही निर्णय लेता था।
  • न्यायाधीश- दीवानी, फौजदारी तथा सैन्य सम्बन्धी झगड़ों का निर्णय करने के लिए न्यायाधीश सबसे बड़ा अधिकारी होता था। यह न्यायाधीश प्रायः हिन्दू रीति-रिवाजों एवं प्राचीन धर्मशास्त्रों के आधार पर निर्णय करता था।

अष्टप्रधान की स्थापना का निर्णय शिवाजी ने एक समय पर अथवा अपने राज्याभिषेक के समय नहीं किया वरन् इसका विकास क्रमशः हुआ तथा शिवाजी आवश्यकता के अनुसार इन मन्त्रिगणों की संख्या में वृद्धि करते रहे। अन्त में उनकी अष्टप्रधान सभा का पूर्ण विकसित रूप उनके ‘छत्रपति बनने के पश्चात ही दृष्टिगोचर हुआ।

(ख) सैन्य प्रशासन- शिवाजी ने सेना के बल पर ही एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था तथा साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उन्होंने एक सुव्यवस्थित एवं सुदृढ़ सेना का संगठन किया। शिवाजी के पास एक स्थायी सेना थी, जिसमें 10000 पैदल, 30000 से लेकर 45000 तक घुड़सवार, 1160 हाथी, लगभग 3000 ऊँट और 500 तोपें थीं। उनकी मृत्यु के समय उनकी अनुशासित एवं व्यवस्थित सेना की संख्या 1 लाख थी, जिसमें, 20000 मावले पैदल सैनिक, 45000 राज्य के घुड़सवार तथा 60000 सिलहदार थे। उनके पास लगभग 3000 हाथी तथा 32000 घोड़े इसके अतिरिक्त थे।

शिवाजी से पूर्व सैनिक 6 महीने कृषि करते थे तथा 6 महीने सेना में रहते थे परन्तु शिवाजी ने स्थायी सेना की व्यवस्था की तथा विश्रृंखलित मराठों को एकत्रित करके एक राष्ट्रीय सेना का रूप प्रदान किया। जागीरदारी प्रथा को हटाकर उन्होंने सैनिकों को नकद वेतन देने की व्यवस्था की, जिससे सम्राट तथा सेना में प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित हो सका तथा शिवाजी के मराठा सैनिक अपने नेता के इशारे पर प्राण न्योछावर करने को प्रस्तुत रहने लगे। घोड़े दगवाने तथा घुड़सवारों का हुलिया लिखवाने की प्रथा को प्रचलित किया गया। उनकी सेना में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों वर्गों के व्यक्तियों को समान रूप से स्थान प्राप्त था तथा अनेक मुसलमान सैनिकों ने बड़ी स्वामीभक्ति के साथ उत्कृष्ट कार्य किए थे।

1. सेना में अनुशासन की व्यवस्था- शिवाजी ने अपनी सेना में कठोर अनुशासन की व्यवस्था की थी। सेना को उसका पालन करना अनिवार्य था अन्यथा उन्हें कठोर दण्ड के लिए तैयार रहना पड़ता था। इसका प्रभाव सेना पर यह हुआ कि सेना हमेशा अनुशासित रहती थी। वर्षा ऋतु के पश्चात् सैनिक मुगल प्रदेशों पर आक्रमण करके उनसे चौथ व सरदेशमुखी कर वसूलते थे। शिवाजी के आदेशानुसार शत्रु-पक्ष के बच्चों व स्त्रियों पर अत्याचार करने की बिल्कुल मनाही थी। उन्हें सम्मानपूर्वक वापस भेजने की व्यवस्था थी। सैनिक राज्य के कृषक व ब्राह्मणों पर बिलकुल भी अत्याचार नहीं कर सकते थे। लूटे गए माल को सम्पूर्ण रूप से पदाधिकारियों को देने का आदेश था, जिसे शिवाजी के राजकोष में संगृहीत कर दिया जाता था। नियमित वेतन के अलावा सैनिक किसी से भी रिश्वत नहीं ले सकता था अन्यथा कठोर दण्ड मिलता था। शिवाजी अपने नियमों को कठोरतापूर्वक पालन करवाते थे।

2. घुड़सवार सेना- किसी भी राजा की प्रमुख सेना घुड़सवार सेना होती है। यह सेना का प्रमुख अंग होती है। शिवाजी की भी सेना का मुख्य अंग घुड़सवार सेना थी। इसके दो भाग थे- बारगीर व सिलहदार। बारगीर वर्ग के सैनिकों को राज्य की ओर से घोड़े व अस्त्र-शस्त्रों की व्यवस्था थी परन्तु सिलहदारों को अस्त-शस्त्र व घोड़े खरीदने पड़ते थे। इसके लिए उन्हें एक निश्चित धनराशि दी जाती थी। बारगीर मासिक वेतन प्राप्त करते थे। 25 घुड़सवारों पर 1 हवलदार, 5 हवलदारों पर एक जुमलादार तथा 10 जुमलादारों पर एक हजारी होता था, जिसे 1 हजार हून वार्षिक मिलते थे। सर-ए-नौबत या सेनापति घुड़सवारों का प्रधान था।

3. पैदल सेना- सेना की दूसरी प्रमुख शाखा पैदल सेना थी। पैदल सेना का भी विभाजन घुड़सवार सेना के समान था। साधारण सैनिक नायक के अधीन होते थे। 5 नायकों पर 1 हवलदार, 5 हवलदारों पर 1 जुमलादार, 10 जुमलादारों पर 1 हजारी तथा 7 हजारियों पर सर-ए-नौबत अथवा सेनापति होता था। शिवाजी के पास 20,000 मावलों की अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित, अनुशासित एवं सुव्यवस्थित सेना थी।

4. जलसेना- शिवाजी ने एक जलसेना का भी संगठन किया, जिससे जंजीरा के अबीसीनियन सिद्दियों को भी पराजित किया जा सके। सन् 1680 ई० में उन्होंने एक युद्ध में शत्रु पक्ष को बुरी तरह पराजित भी किया था। कोलाबा उनकी जलसेना का प्रमुख अड्डा था, जिसमें शिवाजी की 200 जहाजों की सेना रहती थी। जहाजी बेड़े का संचालन अधिकांशतः मुसलमान पदाधिकारियों के हाथ में था। लेकिन शिवाजी की जलसेना अधिक शक्तिशाली अथवा कुशल नहीं थी। फिर भी शिवाजी के पश्चात भी आंग्रे के अधीन मराठों की जल-सेना 18 वीं शताब्दी तक अंग्रेजों एवं पुर्तगालियों के लिए भय का कारण बनी रही।

5. युद्ध-पद्धति- शिवाजी ने मुगलों से सर्वथा भिन्न युद्ध-पद्धति को अपनाया। मुगल सेनापति तथा अन्य पदाधिकारी अत्यन्त विलासी होते थे। वे युद्धभूमि में भी भारी सामान के साथ चलते थे तथा युद्ध में विजय प्राप्त करने की अपेक्षा उन्हें निजी स्वार्थ का अधिक ध्यान रहता था। इसके विपरीत, मराठा सैनिकों को कष्ट सहन करने की आदत डाली जाती थी। वे टट्टओं पर सवार होकर मुट्ठी भर चने के साथ सरदार की आज्ञा प्राप्त होते ही चल पड़ते थे तथा उनको एकत्रित होने में विलम्ब नहीं लगता था। छोटी-छोटी टुकड़ियाँ होने के कारण उनके सैन्य-संचालन में विशेष असुविधा नहीं होती थी। उनके अस्त्र-शस्त्र भी हल्के होते थे तथा सामान न के बराबर होता था। महाराष्ट्र की प्राकृतिक स्थिति छापामार रण-पद्धति के सर्वथा अनुकूल थी तथा इसी पद्धति के कारण शिवाजी मुगल साम्राज्य के विरुद्ध अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफल हो सके।

6. दुर्गों की व्यवस्था- शिवाजी ने दुर्गों के महत्व पर अत्यधिक बल दिया था। दुर्ग शत्रु आक्रमणकारियों से सुरक्षित रहने के महत्वपूर्ण साधन थे। मराठा सैनिक दुर्गों की रक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा माता के समान उनकी पूजा करते थे। दुर्गों के निकटवर्ती प्रदेशों के निवासियों को संकटकाल में दुर्गों में ही शरण प्राप्त होती थी। शिवाजी के राज्य में 240 दुर्ग थे। उन्होंने कुछ नए दुर्गों का भी निर्माण करवाया तथा प्राचीन दुर्गों का जीर्णोद्वार करवाकर उन्हें सुदृढ़ बनवाया। प्रत्येक महत्वपूर्ण घाटी अथवा पहाड़ी पर उन्होंने सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया, जो मराठा सैनिकों की रक्षा करने के लिए उत्तम शरणस्थल थे।

शिवाजी के राज्य की जीवन-शक्ति यही दुर्ग थे। उन्होंने प्रत्येक दुर्ग की सुरक्षा के लिए तीन पदाधिकारियोंहवलदार, सबनीस तथा सर-ए-नौबत की नियुक्ति की। ये तीनों पदाधिकारी भिन्न-भिन्न जातियों के होते थे, जिससे कि विश्वासघात न कर सकें। दुर्ग की चाबियाँ हवलदार के पास रहती थीं, जो दुर्ग की सेना का प्रधान अधिकारी होता था। शासन तथा मालगुजारी का प्रबन्ध ब्राह्मण सबनीस करता था तथा किलेदार अर्थात् दुर्ग का सर-ए-नौबत खाने-पीने का सामान तथा घोड़ों के लिए दाने आदि की व्यवस्था करता था। ये तीनों पदाधिकारी समान पद के होते थे तथा एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखते थे। दुर्ग में स्थित सेना में जातियों का सम्मिश्रण कर दिया गया था। शिवाजी की दुर्ग व्यवस्था सर्वथा सराहनीय थी तथा पहाड़ियों में छापामार रण-पद्धति की सफलता इसी व्यवस्था पर निर्भर थी।

(ग) भूमि प्रशासन- सेना की ही तरह शिवाजी ने भूमिकर व्यवस्था के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किए। प्रत्येक गाँव का क्षेत्रफल ब्यौरेवार रखा जाता था और प्रत्येक बीघे की उपज का अनुमान लगाया जाता था। उपज का 2/5 भाग राज्य को दिया जाता था। किसानों को बीज और पशुओं की सहायता दी जाती थी जिसका मूल्य सरकार कुछ किश्तों में वसूल कर लेती थी। भूमि कर नकद अथवा जिन्स के रूप में वसूला जाता था।

शिवाजी की लगान व्यवस्था रैयतवाड़ी थी जिसमें राज्य के किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित कर रखा था। शिवाजी नहीं चाहते थे कि जमींदार, देशमुख और देसाई किसानों में हस्तक्षेप करें। हरसम्भव वे लगान अधिकारियों को जागीर के बदले नकद वेतन ही दिया करते थे। वे जब कभी जागीर देते भी थे तो इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि जागीरदार अपनी जागीर में कोई राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित न कर सके।

शिवाजी की आय का मुख्य साधन चौथ था। यह पड़ोसी राज्यों की आय का चौथा भाग होता था जिसे वसूल करने के लिए शिवाजी उन पर आक्रमण करते थे। चौथ हर साल वसूल करते थे। शिवाजी की आय का दूसरा मुख्य साधन सरदेशमुखी थी। यह राज्यों की आय का 1/10 भाग होता था।

प्रश्न 4.
‘शिवाजी में एक सफल सेनानायक एवं प्रशासक के गुण मौजदू थे।” विवेचना कीजिए।
उतर:
शिवाजी एक सफल सेनानायक- शिवाजी को दादा कोणदेव के द्वारा पूर्ण सैनिक शिक्षा प्राप्त हुई थी। वे वीर सैनिक थे तथा भयंकर-से-भयंकर संकट में भी नहीं घबराते थे। आगरा में औरंगजेब के द्वारा बन्दी बनाए जाने पर उनका पलायन उनके साहस एवं धैर्य का अप्रतिम उदाहरण है। वे केवल एक वीर सैनिक ही नहीं वरन् महान सेनापति भी थे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व उनके सैनिकों तथा सम्पर्क में आने वाले अन्य सभी व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। उनके सैनिक और कर्मचारी उनकी पूजा करते थे तथा उनके लिए अपने प्राणों का बलिदान देने को सदैव उत्सुक रहते थे। उन्होंने एक कुशल सेनापति की भाँति महाराष्ट्र में छापामार युद्ध को अपनाया जिसके कारण उनके शत्रु उन पर विजय प्राप्त करने में सदैव असमर्थ रहे। शिवाजी प्रथम भारतीय सम्राट थे जिन्होंने जल सेना के महत्त्व को समझा तथा एक शक्तिशाली जल-बेड़े का निर्माण करवाया।

एक साधारण जागीरदार के पुत्र होते हुए शिवाजी ने विशाल सेना का नेतृत्व करते हुए एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। इस साम्राज्य निर्माण का मुख्य ध्येय हिन्दुओं की रक्षा करना था जो किसी राजनीतिक शक्ति के द्वारा असम्भव थी। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने स्वराज्य का निर्माण किया। शिवाजी ने तोरण वियज के द्वारा 1649 ई० में विजय कार्य आरम्भ किया तथा केवल थोड़े ही वर्षों में बीजापुर, गोलकुण्डा तथा मुगल साम्राज्य के प्रदेशों को विजय करके एक विशाल साम्राज्य निर्मित किया। उनकी मृत्यु के समय उनके पास एक स्वतन्त्र राज्य, एक शक्तिशाली जल-बेड़ा तथा 45,000 घुड़सवारों, 60,000 सिलहदारों तथा 20,000 पैदल सैनिकों की सुव्यवस्थित एवं अनुशासित विशाल सेना थी। उनके राज्य में चोरी-डाके का नामोनिशान नहीं था। भिन्न-भिन्न जातियों में विभाजित मराठा सेना का संगठन करके उन्होंने छत्रपति’ की उपाधि धारण की तथा हिन्दुओं का परित्राण किया।

शिवाजी एक सफल प्रशासक- शिवाजी में अन्य महान विजेताओं के समान कुशल शासन-प्रबन्ध के गुण विद्यमान थे जिनकी उनके आलोचकों तक ने प्रशंसा की है। यद्यपि उन्होंने निरंकुश राज्यतन्त्र-पद्धति को अपनाया किन्तु उनका राज्य प्रजाहित के लिए था। वे प्रजावत्सल सम्राट थे जो निरन्तर कठोर परिश्रम के द्वारा अपनी प्रजा की सुख एवं समृद्धि की वृद्धि के लिए तत्पर रहते थे। उन्होंने अपने राज्य में शांति सुव्यवस्था एवं समृद्धि को जन्म दिया। उनकी केन्द्रीय शासन-व्यवस्था, सैनिक संगठन, नौ-सेना व्यवस्था समय एवं परिस्थिति के सर्वथा अनुकूल थी।

ग्राण्ड डफ ने भी उनके शासन सम्बन्धी गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- “उनका राज्य तथा शासन गरीब प्रजा एवं उसकी उन्नति के लिए था। उन्होंने जागीरदारी प्रथा, वंशानुगत पद आदि दोषपूर्ण व्यवस्थाओं को हटाकर नकद वेतन तथा योग्यता के आधार पर पदों का वितरण की व्यवस्था की। उनकी अष्टप्रधान सभा, सैनिक संगठन, भूमि सुधार उनको एक कुशल शासक सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।” एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है- “जो प्रदेश शिवाजी ने जीता अथवा जो धन एकत्रित किया वह मुगलों के लिए इतना भयावह नहीं था, जितना की शिवाजी का स्वयं का आदर्श, नई विचारधारा और प्रणाली जो उन्होंने चलाई तथा एक नई प्रेरणा उन्होंने मराठा जाति में फेंक दी थी।

प्रश्न 5.
शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन कीजिए।
उतर:
शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन निम्नलिखित है
1. योग्य सेनापति- शिवाजी एक योग्य सेनापति थे। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने गुरिल्ला युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया और सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों का निर्माण कराया।

2. महान् शासक-प्रबन्धक- शिवाजी ने असैनिक और सैनिक दोनों ही प्रकार की शासन-व्यवस्था में महान् शासक प्रबन्धक होने का परिचय दिया। अष्टप्रधान व्यवस्था, उनकी लगान व्यवस्था, देशपाण्डे और देशमुख जैसे पैतृक पदाधिकारियों को बिना हटाए हुए उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त करके किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करना तथा ऐसे शासन की स्थापना करना जो उनकी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चल सके, ऐसी बातें थीं, जो उनके असैनिक शासन की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं। शिवाजी की घुड़सवार सेना और पैदल सैनिकों में पदों का विभाजन, ठीक समय पर वेतन देना, उनको योग्यतानुसार पद देना, गुरिल्ला युद्ध-पद्धति तथा किलों की सुरक्षा का प्रबन्ध आदि उनकी सैनिक व्यवस्था की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। शिवाजी ने एक अच्छी नौसेना के निर्माण का भी प्रयत्न किया था। शिवाजी ने मराठी भाषा को राजभाषा बनाया था और एक राज्य व्यावहारिक संस्कृत कोष का भी निर्माण कराया था। इससे मराठी साहित्य के निर्माण में सहायता मिली थी।

3. हिन्दू राज्य के संस्थापक- शिवाजी ने एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने में सफलता पाई। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू राज्य का निर्माण किया, जबकि मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मराठा राज्य को तो क्या दक्षिण के शिया राज्यों गोलकुण्डा और बीजापुर को भी समाप्त करने पर तुला हुआ था। इसके अतिरिक्त बीजापुर राज्य, पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों का प्रबल विरोध होते हुए भी शिवाजी ने मराठा स्वराज्य की न केवल स्थापना की बल्कि जनता को सुरक्षा और शांति प्रदान की।

4. कुशल और साहसी सैनिक- शिवाजी एक कुशल और साहसी सैनिक थे। अनेक युद्धों में उन्होंने अपने जीवन को संकट में डाला था। अफजल खाँ से भेंट करना, शाइस्ता खाँ पर अचानक उसके शहर और निवास स्थान में प्रवेश करके आक्रमण करना, औरंगजेब से आगरा मिलने जाना उनके जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालने से कभी नहीं झिझके।। राष्ट्र निर्माता- शिवाजी का नवीनतम कार्य हिन्दू-मराठाराष्ट्र का निर्माण करना और उनकी महानतम् देन, उसको स्वतन्त्रता की भावना प्रदान करना था। गुलाम रहकर वे बड़ी-से-बड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार करने के लिए तत्पर न थे। अपने कार्य को उन्होंने बिना किसी विशेष सहायता के आरम्भ किया और यह अनुभव करके कि बढ़ती हुई मुस्लिम शक्ति का विरोध मराठों की एकता के बिना सम्भव नहीं है, उन्होंने मराठों को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया। उन्हें रघुनाथ बल्लाल, समरजी पन्त, तानाजी मालसुरे, सन्ताजी घोरपड़े, खाण्डेराव दाभादे जैसे योग्य मराठा सरदारों का सहयोग मिला।

5. धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति- शिवाजी की धार्मिक प्रवृत्ति एक पहाड़ी झरने की भाँति स्वच्छ जल को अविरल गति से बहाने वाली थी, जिसमें धर्मान्धता की गन्दगी न थी। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और उनके साथ समान व्यवहार किया। धर्म, धार्मिक ग्रन्थ और कहानियाँ उनके प्रेरणा स्त्रोत थे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन धार्मिक आन्दोलनों और सन्तों से वह प्रभावित हुए थे। शिवाजी पहले हिन्दू थे, जिन्होंने मध्य युग की बदलती हुई युद्ध की नैतिकता को समझा। उनके विरोधी इतिहासकार चाहे उन्हें डाकू कहें, चाहे विद्रोही सामन्त और चाहे औरंगजेब ने उनको ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपनी सन्तुष्टि कर ली हो, परन्तु शिवाजी ने हिन्दू युद्ध-नीति की नैतिकता में एक नवीन अध्याय जोड़ा कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है न कि शौर्य के प्रदर्शन के लिए। उनकी धार्मिक सहनशीलता आधुनिक समय के लिए भी उदाहरण स्वरूप है।

शिवाजी नि: सन्देह महान् थे। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “मैं उन्हें हिन्दू जाति द्वारा उत्पन्न किया हुआ अन्तिम महान् क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता मानता हूँ।” वे पुनः लिखते हैं, “शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि हिन्दुत्व का वृक्ष वास्तव में गिरा नहीं है बल्कि वह सदियों की राजनीतिक दासता, शासन से पृथकत्व और कानूनी अत्याचार के बावजूद भी पुनः उठ सकता है, उसमें नए पत्ते और शाखाएँ आ सकती हैं और एक बार फिर आकाश में सिर उठा सकता है। इस प्रकार शिवाजी ने मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर उनमें राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

प्रश्न 6.
शिवाजी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उतर:

शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन निम्नलिखित है
1. योग्य सेनापति- शिवाजी एक योग्य सेनापति थे। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने गुरिल्ला युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया और सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों का निर्माण कराया।

2. महान् शासक-प्रबन्धक- शिवाजी ने असैनिक और सैनिक दोनों ही प्रकार की शासन-व्यवस्था में महान् शासक प्रबन्धक होने का परिचय दिया। अष्टप्रधान व्यवस्था, उनकी लगान व्यवस्था, देशपाण्डे और देशमुख जैसे पैतृक पदाधिकारियों को बिना हटाए हुए उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त करके किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करना तथा ऐसे शासन की स्थापना करना जो उनकी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चल सके, ऐसी बातें थीं, जो उनके असैनिक शासन की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं। शिवाजी की घुड़सवार सेना और पैदल सैनिकों में पदों का विभाजन, ठीक समय पर वेतन देना, उनको योग्यतानुसार पद देना, गुरिल्ला युद्ध-पद्धति तथा किलों की सुरक्षा का प्रबन्ध आदि उनकी सैनिक व्यवस्था की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। शिवाजी ने एक अच्छी नौसेना के निर्माण का भी प्रयत्न किया था। शिवाजी ने मराठी भाषा को राजभाषा बनाया था और एक राज्य व्यावहारिक संस्कृत कोष का भी निर्माण कराया था। इससे मराठी साहित्य के निर्माण में सहायता मिली थी।

3. हिन्दू राज्य के संस्थापक- शिवाजी ने एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने में सफलता पाई। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू राज्य का निर्माण किया, जबकि मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मराठा राज्य को तो क्या दक्षिण के शिया राज्यों गोलकुण्डा और बीजापुर को भी समाप्त करने पर तुला हुआ था। इसके अतिरिक्त बीजापुर राज्य, पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों का प्रबल विरोध होते हुए भी शिवाजी ने मराठा स्वराज्य की न केवल स्थापना की बल्कि जनता को सुरक्षा और शांति प्रदान की।

4. कुशल और साहसी सैनिक- शिवाजी एक कुशल और साहसी सैनिक थे। अनेक युद्धों में उन्होंने अपने जीवन को संकट में डाला था। अफजल खाँ से भेंट करना, शाइस्ता खाँ पर अचानक उसके शहर और निवास स्थान में प्रवेश करके आक्रमण करना, औरंगजेब से आगरा मिलने जाना उनके जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालने से कभी नहीं झिझके।। राष्ट्र निर्माता- शिवाजी का नवीनतम कार्य हिन्दू-मराठाराष्ट्र का निर्माण करना और उनकी महानतम् देन, उसको स्वतन्त्रता की भावना प्रदान करना था। गुलाम रहकर वे बड़ी-से-बड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार करने के लिए तत्पर न थे। अपने कार्य को उन्होंने बिना किसी विशेष सहायता के आरम्भ किया और यह अनुभव करके कि बढ़ती हुई मुस्लिम शक्ति का विरोध मराठों की एकता के बिना सम्भव नहीं है, उन्होंने मराठों को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया। उन्हें रघुनाथ बल्लाल, समरजी पन्त, तानाजी मालसुरे, सन्ताजी घोरपड़े, खाण्डेराव दाभादे जैसे योग्य मराठा सरदारों का सहयोग मिला।

5. धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति- शिवाजी की धार्मिक प्रवृत्ति एक पहाड़ी झरने की भाँति स्वच्छ जल को अविरल गति से बहाने वाली थी, जिसमें धर्मान्धता की गन्दगी न थी। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और उनके साथ समान व्यवहार किया। धर्म, धार्मिक ग्रन्थ और कहानियाँ उनके प्रेरणा स्त्रोत थे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन धार्मिक आन्दोलनों और सन्तों से वह प्रभावित हुए थे। शिवाजी पहले हिन्दू थे, जिन्होंने मध्य युग की बदलती हुई युद्ध की नैतिकता को समझा। उनके विरोधी इतिहासकार चाहे उन्हें डाकू कहें, चाहे विद्रोही सामन्त और चाहे औरंगजेब ने उनको ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपनी सन्तुष्टि कर ली हो, परन्तु शिवाजी ने हिन्दू युद्ध-नीति की नैतिकता में एक नवीन अध्याय जोड़ा कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है न कि शौर्य के प्रदर्शन के लिए। उनकी धार्मिक सहनशीलता आधुनिक समय के लिए भी उदाहरण स्वरूप है।

शिवाजी नि: सन्देह महान् थे। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “मैं उन्हें हिन्दू जाति द्वारा उत्पन्न किया हुआ अन्तिम महान् क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता मानता हूँ।” वे पुनः लिखते हैं, “शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि हिन्दुत्व का वृक्ष वास्तव में गिरा नहीं है बल्कि वह सदियों की राजनीतिक दासता, शासन से पृथकत्व और कानूनी अत्याचार के बावजूद भी पुनः उठ सकता है, उसमें नए पत्ते और शाखाएँ आ सकती हैं और एक बार फिर आकाश में सिर उठा सकता है। इस प्रकार शिवाजी ने मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर उनमें राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 20
Chapter Name Interest, Attention and Education
(रुचि, अवधान तथा शिक्षा)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। बालकों में रुचि उत्पन्न करने के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
रुचि क्या है? विषय-वस्तु में रुचि पैदा करने के लिए अध्यापक को कौन-से उपाय करने चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
या
रुचि से आप क्या समझते हैं? सीखने में रुचि के महत्त्व की विवेचना कीजिए। [2015]
या
रुचि के स्वरूप पर प्रकाश डालिए। किसी पाठ को पढ़ाते समय अध्यापक अपने छात्रों पर किस प्रकार रुचि उत्पन्न कर सकता है? [2009, 11]
या
वे कौन-से कारक हैं जो रुचियों के निर्माण को आगे बढ़ाते हैं? [2015]
या
रुचिसे आप क्या समझते हैं?”रुचि सीखने की वह दशा है जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए आवश्यक है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2008, 11, 13]
या
रुचि क्या है? क्या यह जन्मजात अथवा अर्जित होती है? अधिगम में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए। [2016]
या
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। छात्रों में रुचि उत्पन्न करने की विधियों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :
रुचि का अर्थ एवं परिभाषा
रुचि अवधान का अन्तरंग प्रेरक है। रॉस (Ross) के अनुसार, रुचि का अर्थ है-लगाव अर्थात् जिस वस्तु के प्रति हमारा लगाव होता है, उसमें हमारी रुचि होती है। एक किशोर का लगाव पाठ्य-पुस्तकों की अपेक्षा उपन्यास में अधिक होता है। इस प्रकार यह लगाव ही रुचि है। रुचि में अन्तर करने की भावना होती है। हम किसी वस्तु में इस कारण रुचि रखते हैं, क्योंकि उसे अन्य वस्तुओं से अधिक महत्त्वपूर्ण समझते हैं।

रुचि की कुछ परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है

  1. क्रो व क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहा जाता है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”
  2. डॉ० एस० एम० माथुर के अनुसार, “रुचि को प्रेरक शक्ति कहा जाता है, जो हमारे ध्यान को एक व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की तरफ उन्मुख करती है या इसे प्रभावपूर्ण कहा जा सकता है, जो स्वयं ही अपनी सक्रियता से उत्तेजित होती है।”
  3. भाटिया के अनुसार, “रुचि का अर्थ है-अन्तर करना। हम वस्तुओं में इस कारण रुचि रखते हैं, क्योंकि हमारे लिए उनमें और दूसरी वस्तुओं में अन्तर होता है, क्योंकि उनका हमसे सम्बन्ध होता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा रुचि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। रुचियों के दो प्रकार या वर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश :

  • जन्मजात रुचियाँ तथा
  • अर्जित रुचियाँ कहते हैं।

[संकेत : रुचियों के प्रकार के विस्तृत विवरण हेतु लघु उत्तरीय प्रश्न 1 का उत्तर देखें।]

बालकों में रुचि उत्पन्न करने के उपाय
निम्नांकित उपायों या विधियों द्वारा बालकों में पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सकती है

  1. छोटे बालक सबसे अधिक रुचि अपने आप में लेते हैं। अत: किसी नीरस विषय को बालकों के अपने मन से सम्बन्धित करके पढ़ाया जाए।
  2. छोटे बालकों की रुचि मूल-प्रवृत्तियों पर आधारित होती है। अतः अध्यापक को चाहिए कि पढ़ाते समय मूल-प्रवृत्यात्मक रुचियों को सुविधानुसार पाठ से सम्बन्धित करें।
  3. आयु के विकास के साथ-साथ बालकों की रुचियों में भी परिवर्तन होता है। अतः इस बात को ध्यान में रखकर ही पाठ्य विकास का आयोजन किया जाए।
  4. रुचि का आधार जिज्ञासा प्रवृत्ति है। अतः विषय के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करना आवश्यक है।
  5. रुचि के अनुसार विषय में परिवर्तन भी किया जाना चाहिए।
  6. पाठ पढ़ाते समय बालकों को उसका उद्देश्य भी बता दिया जाए, क्योंकि बालक किसी कार्य में । तभी रुचि लेते हैं, जब उन्हें उद्देश्य को पता चल जाता है।
  7. पाठ्य वस्तु का सम्बन्ध यथासम्भव जीवन की आवश्यकताओं से किया जाए।
  8. किसी पाठ का अध्ययन करते समय प्रभावशाली स्थूल दृश्य-श्रव्य साधनों या सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिए।
  9. बालक रचनात्मक कार्यों में विशेष रुचि लेते हैं। अत: पाठ का यथासम्भव सम्बन्ध रचनात्मक कार्यों में किया जाए।
  10. लगातार मौखिक शिक्षण बालकों में नीरसती उत्पन्न कर देता है। अतः बीच में उन्हें प्रयोग व निरीक्षण आदि के अवसर दिये जाएँ।
  11. प्राथमिक स्तर पर खेल विधि का प्रयोग उचित है।
  12. नवीन ज्ञान का सम्बन्ध पूर्व ज्ञान से करना परम आवश्यक है, क्योंकि छात्र उसे वस्तु में ही विशेष रुचि लेते हैं, जिनका उन्हें पहले से ही ज्ञान होता है।
  13. पढ़ाते समय किसी तथ्य की आवश्यकता से अधिक पुनरावृत्ति न की जाए, क्योंकि अधिक पुनरावृत्ति से नीरसता उत्पन्न होती है।
  14. पाठ्य विषयं को रोचक व प्रभावशाली बनाने में पर्यटन का सहारा लेना अधिक उपयोगी है। अतः अध्यापक को समय-समय पर शैक्षिक भ्रमण यात्राओं का आयोजन करना चाहिए।

शिक्षा या सीखने (अधिगम) में रुचि का महत्त्व
वास्तव में अध्यापक के लिए आवश्यक है कि वे विद्यार्थी में शिक्षा के प्रति रुचि जाग्रत करें और स्वयं भी शिक्षण-कार्य में रुचि लें, क्योंकि “रुचि सीखने की वह दशा है जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए आवश्यक है।” शिक्षा के क्षेत्र में रुचि का अत्यधिक महत्त्व एवं आवश्यकता है। रुचि के नितान्त अभाव में शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल ही नहीं सकती।

इनके विपरीत यह भी सत्य है कि यदि किसी विषय के प्रति रुचि जाग्रत हो जाए तो उस दशा में शिक्षा की प्रक्रिया सरल, उत्तम तथा शीघ्र सम्पन्न होने लगती है। रुचि से जिज्ञासा उत्पन्न होती है तथा जिज्ञासा से ज्ञान प्राप्ति के हर सम्भव प्रयास किये जाते हैं तथा परिणामस्वरूप ज्ञान प्राप्त भी कर लिया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा के लिए रुचि आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 2
अवधान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। अवधान की विशेषताओं का भी विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अवधान का अर्थ एवं परिभाषा
‘अवधान’ वह मानसिक क्रिया है, जिसमें हमारी चेतना किसी वस्तु या पदार्थ पर केन्द्रित होती है। उदाहरण के लिए, हम किसी पार्क में बैठे एक गुलाब के फूले को देख रहे हैं। यद्यपि पार्क में स्त्री, पुरुष, बच्चे, फव्वारे भी हमारी कुछ-न-कुछ चेतना में हैं, परन्तु हमने अपने चेतना को केन्द्रित केवल गुलाब के फूल पर ही कर रखा है। इस प्रकार सेञ्चेतना का किसी वस्तु-विशेष पर केन्द्रित करना ही अवधान क्रहलाता है।

अवधान की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं

  1. डूमवाइल के अनुसार, “अन्य वस्तुओं की अपेक्षा एक ही वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण ही अवधान है।”
  2. रॉस के अनुसार, “अवधान विचार की वस्तु को मन के समक्ष स्पष्ट रूप से प्रकट करने की प्रक्रिया है।”
  3. वेलेण्टाइन के अनुसार, “अवधान मस्तिष्क की शक्ति नहीं है, वरन् सम्पूर्ण रूप से मस्तिष्क की क्रिया या अभिव्यक्ति है।’
  4. बी० एन० झा के अनुसार, “किसी विचार या संस्कार को चेतना में स्थिर करने की प्रक्रिया को अवधान कहते हैं।”
  5. मन के अनुसार, “हम चाहे जिस दृष्टिकोण से विचार करें, अन्तिम निष्कर्ष में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।”
  6. मैक्डूगल के अनुसार, “ज्ञानात्मक प्रक्रिया पर पड़े प्रभाव की दृष्टि से विचार करने पर अवधान एक चेष्टा या प्रयास भर है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि जब चेतना के समक्ष आने वाले पदार्थों में एकता स्थापित करने की चेष्टा की जाती है तो उस मानसिक प्रक्रिया को अवधान कहा जाता है।

अवधान की विशेषताएँ
अवधान की ‘निम्नांकित विशेषताएँ पायी जाती हैं

1. एकाग्रता :
अवधान किसी वस्तु पर चेतना को एकाग्र करना है। अतः अवधान के लिए चित्त की एकाग्रता परम आवश्यक है।

2. मानसिक क्रियाशीलता :
अवधान की एक प्रमुख विशेषता क्रियाशीलता है। बिना मानसिक क्रियाशीलता के हम किसी वस्तु पर अवधान नहीं लगा सकते। उदाहरण के लिए, यदि हमें गुलाब के फूल पर अवैधान केन्द्रित करना है, तो इसके लिए मन को क्रियाशील बनाना होगा।

3. चयनात्मकता :
जिस वस्तु पर हम अवधान केन्द्रित करते हैं, उसका चयन अनेक वस्तुओं में से होता है। किसी बगीचे के अनेक फूलों में से किसी एक विशेष फूल पर हमारा अवधान केन्द्रित होता है।

4. प्रयोजनशीलता :
हम उन वस्तुओं पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, जिनमें हमारा किसी-न-किसी प्रकार का प्रयोजन होता है। बालक का ध्यान रसगुल्ले पर क्यों एकदम चला जाता है, क्योंकि वह उसे खाने में अच्छा लगता है।

5. परिवर्तनशीलता :
अवधान अस्थिर तथा चंचल प्रकृति का होता है। कठिनता से ही एक वस्तु पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं, परन्तु प्रयास द्वारा अवधान केन्द्रित करने की शक्ति को बढ़ाया जा सकता है।

6. संकीर्ण या संकुचित प्रसार :
अवधान का विस्तार संकीर्ण या सन्तुलित होता है। हमारा अवधान विभिन्न पहलुओं में से किसी एक वस्तु पर ही केन्द्रित होता है। कुछ देर बाद हमारा अवधान दूसरी वस्तु पर केन्द्रित हो जाता है।

7. सजीवता :
अवधान चेतना के कारण प्रतिपादित होता है। अत: वह सजीव है। हम जिस वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उसका अस्तित्व हमारी चेतना में होता है।

8. तत्परता :
वुडवर्थ (wood worth) के अनुसार, “अवधान की आवश्यक क्रिया तत्परता है।” अवधान की दशा में हमारा शरीर एक प्रकार की तत्परता की दशा में होता है।

9. गति-समायोजन :
अवधान में गतियों का समायोजन होता है, अर्थात् जब हम किसी वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उस समय हमारी ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के संचालन का समायोजन उस प्रक्रिया की प्रकृति के अनुसार हो जाता है। भाषण सुनते समय श्रोता के आँख, कान, गर्दन तथा बैठने की स्थिति नेता या भाषणकर्ता की ओर समायोजन कर लेती हैं।

प्रश्न 3
अवधान में सहायक दशाओं का वर्णन कीजिए।
या
अवधान केन्द्रित करने में सहायक बाह्य तथा आन्तरिक दशाओं का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अवधान की दशाएँ।
अवधान का केन्द्रीकरण किस प्रकार होता है ? अथवा वे कौन-कौन-सी दशाएँ हैं, जो अवधान केन्द्रित करने में सहायक होती हैं ? इन प्रश्नों के लिए हमें उन दशाओं का अध्ययन करना होगा, जो कि अवधान केन्द्रित करने में सहायक होती हैं। ये दशाएँ दो वर्गों में विभक्त की जा सकती हैं-बाह्य दशाएँ तथा आन्तरिक दशाएँ।

अवधान केन्द्रित करने की बाह्य दशाएँ
अवधान केन्द्रित करने की बाह्य दशाएँ निम्नलिखित हैं अवधान केन्द्रित करने में सहायक बाह्य दशाओं के अन्तर्गत जिन कारकों को सम्मिलित किया जाता है, उनका सम्बन्ध मुख्य रूप से बाह्य विषय-वस्तु से होता है। इस वर्ग की दशाओं यो कारकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है।

1. स्वरूप :
अधान का केन्द्रीकरण उद्दीपन की प्रकृति या स्वरूप पर निर्भर करता है। छोटे बालक चटकीले रंग की वस्तुओं की ओर आकर्षित हो जाते हैं। जिन पुस्तकों में रंगीन चित्र होते हैं, उनमें बालक का ध्यान अधिक लगती है।

2. आकार :
अधिक या बड़े आकार की वस्तु की ओर हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर किसी मुख्य समाचार को मोटे-मोटे अक्षरों में इस कारण ही छापा जाता है। बड़े-बड़े विज्ञापन के पोस्टर भी इसके उदाहरण हैं।

3. गति :
स्थिर वस्तु की अपेक्षा गतिशीलं या चलती वस्तु की ओर, अवधान केन्द्रित करने हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। बैठे हुए मनुष्य की ओर हमारा ध्यान की बाह्य दशाएँ। नहीं जाती, परन्तु सड़क पर दौड़ता मनुष्य हमारा ध्यान आकर्षित कर लेता है।

4. विषमता :
विषमता के कारण भी हमारा ध्यान आकर्षित होता है। एक गोरे परिवार के व्यक्तियों में यदि कोई काला व्यक्ति है तो उसकी ओर विषमता के कारण हमारा ध्यान अवश्य जाता है।

5. नवीनता :
किसी नवीन या विचित्र वस्तु की ओर हमारा ध्यान तत्काल जाता है। यदि कोई अध्यापक प्रतिदिन कोट-पैंट में विद्यालय आते हैं। और किसी दिन वे धोती-कुर्ता पहनकर आ जाते हैं तो समस्त छात्रों का ध्यान । उनकी ओर आकर्षित हो जाता है।

6. अवधि :
जिस वस्तु पर जितना देखने का अवसर मिलती है, उतना ही उस पर हमारा ध्यान केन्द्रित होता है। इसी कारण भूगोल के शिक्षण में । मानचित्र बार-बार दिखाये जाते हैं।

7. परिवर्तन :
कक्षा में यदि शान्त वातावरण है, परन्तु सहसा किसी कोने से शोर होने लगता है, तो तुरन्त ही हमारा ध्यान उस ओर चला जाता है। इस प्रकार उद्दीपन में जब भी परिवर्तन होता हैं, तो उस परिवर्तन की ओर हमारा ध्यान तुरन्त चला जाता है।

8. प्रकार या रूप :
हमारा ध्यान आकर्षक, सुन्दर तथा सुडौल वस्तुओं की ओर शीघ्र जाता है और उन्हें बार-बार देखने की इच्छा होती है।

9. स्थिति :
उद्दीपन या वस्तु की स्थिति के समान हमारे अवधान की अवस्था होती है। प्रतिदिन हम सड़क पर वृक्षों के नीचे से गुजरते हैं, किन्तु हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित नहीं होता है। परन्तु यदि किसी दिन उनमें से किसी वृक्ष को गिरा हुआ देखते हैं, तो हमारा ध्यान उसकी ओर तुरन्त चला जाता है।

10. तीव्रता :
शक्तिशाली और तीव्र उद्दीपन हमारा ध्यान अधिक आकर्षित करते हैं। मन्द ध्वनि की अपेक्षा तीव्र ध्वनि की ओर हमारा ध्यानं शीघ्र जाता है।

11. पुनरावृत्ति :
जिस बात को बार-बार दोहराया जाता है, उस ओर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से चला जाता है। इसी कारण किसी पाठ के तत्त्वों को बार-बार दोहराया जाता है।

12. रहस्यमयता :
रहस्यपूर्ण बातों की ओर हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। दो व्यक्तियों में यदि कोई सामान्य बात हो रही हो तो उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता, परन्तु जब वे कानाफूसी करने लगते हैं तो तुरन्त ही हम उनकी ओर देखने लगते हैं।

अवधान केन्द्रित करने की आन्तरिक दशाएँ

अवधान की वे दशाएँ जो व्यक्ति में विद्यमान होती हैं, आन्तरिक दशाएँ कहलाती हैं। इन दशाओं का विवरण इस प्रकार है
1. अभिवृत्ति :
जिन वस्तुओं में हमारी अभिवृत्ति होती है, प्राय: उन वस्तुओं में हमारा ध्यान अधिक केन्द्रित होता है।

2. रुचि :
रुचि का ध्यान से घनिष्ठ सम्बन्ध है। हम उन्हीं वस्तुओं की ओर ध्यान देते हैं, जिनमें हमारी रुचि होती है। अरुचिकर वस्तुओं की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है।

3. मूल-प्रवृत्तियाँ :
ध्यान को केन्द्रित करने में मूल-प्रवृत्तियों का भी योग रहता है। रोमांटिक उपन्यास तथा कहानियों में किशोर-किशोरियों मूल-प्रवृत्तियों का ध्यान सामान्य पुस्तकों की अपेक्षा अधिक लगता है। साबुन, पाउडर, तेल आदि के विज्ञापनों पर स्त्रियों के चित्र इसी उद्देश्य से लगाये जाते हैं।

4. पूर्व अनुभव :
ध्यान के केन्द्रीकरण का एक अन्य कारण हमारे पूर्व अनुभव भी होते हैं। पूर्व अनुभव के आधार पर ही हम अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं।

5. मस्तिष्क :
जो विचार हमारे मस्तिष्क पर जिस समय छाया रहता है, उस समय उससे सम्बन्धित बात पर ही हम ध्यान देते हैं। उदाहरण के लिए, हमारे मस्तिष्क में किसी रोजगार का विचार है तो अखबार में हमारा सर्वप्रथम ध्यान रोजगार के विज्ञापनों पर ही जाएगा।

6. जानकारी या ज्ञान :
जिस विषय की हमें विशद जानकारी होती है, उस विषय पर हमारा ध्यान सरलता से केन्द्रित हो जाता है। जब बालक गणित के प्रश्न ठीक प्रकार से समझ जाता है तो वह उन पर अपना ध्यान सरलता से केन्द्रित कर लेता है।

7. आवश्यकता :
जो वस्तु हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है, उसकी ओर हमारा ध्यान स्वतः हीं चला जाता है। भूख के समय हमारा ध्यान भोजन की ओर तुरन्त चला जाता है।

8. जिज्ञासा :
जिज्ञासा अवधान को केन्द्रित करने में विशेष योग देती है। जिस वस्तु में हमारी जिज्ञासा होती है, उस पर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से केन्द्रित हो जाता है।

9. लक्ष्य :
जब व्यक्ति को अपना लक्ष्य ज्ञात हो जाता है तो उस पर उसका ध्यान केन्द्रित हो जाता है। परीक्षा के दिनों में छात्रों का अध्ययन पर इस कारण ही केन्द्रित हो जाता है।

10. आदत :
आदत के कारण भी ध्यान केन्द्रित होता है, जो व्यक्ति किसी कारखाने के पास रहता है, उसे कारखाने के शोरगुल में भी ध्यान केन्द्रित करने की आदत पड़ जाती है। जो बालक शाम के पाँच बजे खेलने के अभ्यस्त हैं, तो प्रतिदिन पाँच बजे उनका ध्यान खेल की ओर चला जाता है।

प्रश्न 4
कक्षा में बालकों के अवधान को केन्द्रित करने के मुख्य उपायों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बालकों का अवधान केन्द्रित करने के उपाय
शिक्षण को उत्तम एवं प्रभावकारी बनाने के लिए बालकों के अवधान को पाठ्य विषय पर केन्द्रित होना आवश्यक माना जाता है। कक्षा में बालकों को अवधान केन्द्रित करने के लिए निम्नांकित उपाय काम में लाये जा सकते हैं

1. शान्त वातावरण :
ध्यान की एकाग्रता के लिए शान्त वातावरण का होना अत्यन्त आवश्यक है। शोरगुल बालकों के ध्यान को विचलित कर देता है। अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि वह कक्षा में सदा शान्ति बनाये रखने का प्रयत्न करें।

2. विषय के प्रति रुचि जाग्रत करना :
यह बात सर्वमान्य है। कि जिस विषय में बालक की रुचि होती है, उसे वह कम समय में और कुशलता से सीख लेता है। अतः रुचि उत्पन्न करना अध्यापक का एक आवश्यक कार्य हो जाता है। वास्तव में विषय में रुचि उत्पन्न हो जाने पर छात्रों के ध्यान के भटकने को प्रश्न ही नहीं उठता।

3. बालकों की रुचियों का ध्यान :
विषय के प्रति रुचि जाग्रत करने के साथ-साथ अध्यापक को बालकों की रुचियों का भी ध्यान अतः शिक्षण के समय बालकों की रुचियों का ध्यान रखा जाए।

4. जिज्ञासा प्रवृत्ति का उपयोग :
बालकों का ध्यान पाठ पर केन्द्रित करने के लिए उनमें जिज्ञासा जाग्रत करना भी अत्यन्त आवश्यक है।

5. विषय में परिवर्तन :
ध्यान स्वभाव से चंचल होता है। अतः बालक अधिक काल तक किसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकते। अत: एक विषय को अधिक समय तक न पढ़ाकर किसी दूसरे विषय का शिक्षण प्रारम्भ करना चाहिए।

6. सहायक सामग्री का प्रयोग :
सहायक सामग्री बालक के ध्यान को विषय पर केन्द्रित करने में विशेष योग देती है। ऐसी दशा में यथासम्भव सहायक सामग्री का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

7. उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग :
व्याख्यान विधि जैसी परम्परागत शिक्षण विधियाँ छात्रों का ध्यान अधिक देर तक विषय पर केन्द्रित नहीं रख पातीं। अतः बालक को ध्यान आकर्षित करने के लिए। अध्यापक को चाहिए कि वह खेल विधि, निरीक्षण विधि तथा प्रयोगात्मक विधि आदि का उपयोग भी करें।

8. पूर्व ज्ञान का नवीन ज्ञान से सम्बन्ध :
बालकों के पूर्व ज्ञान से नवीन ज्ञान को सम्बन्धित करना आवश्यक है। जब नवीन ज्ञान पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित हो जाता है तो बालक का ध्यान सरलता से केन्द्रित हो। जाता है।

9. उचित वातावरण :
अनुचित वातावरण बालकों के ध्यान की एकाग्रता में सहायक नहीं होता है। यदि प्रकाश का अभाव है, बैठने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है तथा आसपास बदबू आती है तो छात्रों को। अपना ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई होगी। अत: कक्षा के वातावरण को अनुकूल बनाना चाहिए।

10. बालक का स्वास्थ्य :
कमजोर बालक, जिसके सिर में दर्द रहता है, जिनकी आँखें कमजोर हैं। तथा जो कम सुनते हैं, वे पाठ पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं। अतः बालक के स्वास्थ्य के विषय में अध्यापक को अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।

11. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार :
अध्यापक को बालकों के ध्यान को विषय के प्रति आकर्षित करने के लिए उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। कठोर व्यवहार से बालक ध्यान को एकाग्र नहीं कर पाते हैं।

12. पर्याप्त विश्राम :
थकान ध्यान को विचलित करने में सहायक होती है। अत: प्रधानाचार्य को कर्तव्य है कि वह विद्यालय की समय-सारणी का निर्माण इस ढंग से करे कि बालकों को पर्याप्त विश्राम मिल सके तथा उन्हें कम-से-कम थकान का अनुभव हो।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रुचि के प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2007]
या
मानवीय रुचियों का स्पष्ट वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
रुचि मुख्यतः दो प्रकार की होती है

  1. जन्मजात एवं
  2. अर्जित।

1. जन्मजात रुचि :
जन्मजात रुचि, मूल-प्रवृत्तियों (Instincts) पर आधारित होती है और मनुष्य के स्वभाव तथा प्रकृति में निहित होती है। इनका स्रोत व्यक्ति के अन्दर जन्म से ही विद्यमान होता है। भोजन में हमारी रुचि भूख की जन्मजात प्रवृत्ति के कारण है। काम-वासना में रुचि होने के कारण हमारा ध्यान विपरीत लिंग की ओर आकृष्ट होता है। चिड़िया दाना खाने, गाय तथा भैंस हरा चारा खाने तथा हिंसक पशु मांस खाने में रुचि रखते हैं। यह जन्मजात क्रियाओं के कारण।

2. अर्जित रुचि :
अर्जित करने का अर्थ है उपार्जित करना (अर्थात् कमाना)। अर्जित रुचियों को व्यक्ति अपने वातावरण से अर्जित करता है। इनका निर्माण मनुष्य के अनुभव के आधार पर होता है। मनुष्य के मन की भावनाएँ तथा आदतें इनकी आधारशिला हैं। अतः भावनाओं तथा आदतों में परिवर्तन के साथ ही इनमें परिवर्तन आता रहता है। अपने हित या लाभ की परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की रुचियाँ बढ़ जाती हैं। किसी वस्तु या प्राणी के प्रति आकर्षण के कारण उसके प्रति हमारी रुचि पैदा हो जाती है। एक फोटोग्राफर को अच्छे कैमरे में रुचि होती है तथा बच्चों की रुचि नये-नये खिलौनों में।

प्रश्न 2
अवधान के मुख्य प्रकार कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर :
अवधान के मुख्य प्रकारों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

1. ऐच्छिक अवधान :
जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु या उद्दीपन पर अपनी समस्त चेतना को केन्द्रित कर देता है तो इस अवस्था को ऐच्छिक अवधान कहते हैं। इस प्रकार के अवधान में हमें किसी वस्तु या विचार पर ध्यान लगाने के लिए अपनी संकल्प-शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। सामान्य शब्दों में हम कहते हैं कि पूर्ण प्रयास करने पर ही ऐच्छिक अवधाने को लगाया जा सकता है। इस प्रकार के अवधान को सक्रिय अवधान भी कहते हैं।

2. अनैच्छिक अवधान :
जब किसी वस्तु या विचार पर हम बिना किसी प्रयत्न के अवधान लगाते हैं तो इस प्रकार के अवधान को अनैच्छिक अवधान कहते हैं। अनैच्छिक अवधान के लिए हमें अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग नहीं करना पड़ता। इस प्रकार के अवधान को निष्क्रिय अवधान भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, किसी जोर की आवाज पर, तीव्र प्रकाश पर तथा मधुर संगीत पर हमारा ध्यान अपने आप चला जाता है।

प्रश्न 3
अवधान और रुचि के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों में अवधान और रुचि के विषय में परस्पर मतभेद है। रुचि और अवधान के परस्पर सम्बन्ध में तीन मत प्रचलित हैं

1. अवधान रुचि पर आधारित है :
इस मत के प्रतिपादकों का कहना है कि व्यक्ति उन्हीं बातों पर ध्यान देता है, जिनमें उसकी रुचि होती है। दूसरे शब्दों में, अवधान रुचि पर आधारित है। जिसे वस्तु में हमारी रुचि नहीं होगी, उस पर हमारी चेतना केन्द्रित नहीं होगी।

2.रुचि अवधान पर आधारित है-कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि रुचि का आधार ध्यान है। जब हम किसी वस्तु पर ध्यान देंगे ही नहीं तो हमारी उस वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न होगी ही नहीं। रुचि की। जागृति तभी होती है, जब हम किसी वस्तु पर ध्यान देते हैं।

3. समन्वयवादी मत :
यह मत उक्त दोनों मतों का समन्वय करता है। इस मत के समर्थकों के अनुसार अवधान और रुचि दोनों ही एक-दूसरे पर आधारित हैं। रॉस (Ross) के अनुसार, “अवधान तथा रुचि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि रुचि के कारण कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान देता है तो अवधान के कारण उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाएगी।” मैक्डूगल ने भी लिखा है, “रुचि गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्ति की रुचियों के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य है कि व्यक्ति की कुछ रुचियाँ जन्मजात होती हैं, परन्तु रुचियों का समुचित विकास जीवन में धीरे-धीरे तथा क्रमिक रूप से होता है। शिशु की रुचियों का आधार उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, अर्थात् शैशवावस्था में रुचियों का विकास ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित होता है। बाल्यावस्था में बालक की सक्रियता बढ़ जाती है; अतः इस अवस्था में उसकी रुचियों का विकास क्रियात्मक खेलों के माध्यम से होता है।

बाल्यावस्था के उपरान्त किशोरावस्था में व्यक्ति की रुचियों का विकास कल्पनाओं, संवेगों तथा जिज्ञासा के माध्यम से होता है। इसके उपरान्त प्रौढ़ावस्था में व्यक्ति की नयी रुचियाँ प्रायः उत्पन्न नहीं होती। इस अवस्था में व्यक्ति की रुचियाँ स्थायी रूप ग्रहण करती हैं।

प्रश्न 2
रुचि और योग्यता का घनिष्ठ सम्बन्ध है।” इस कथन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
हम जानते हैं कि रुचि एक शक्ति है जो व्यक्ति को किसी विषय, वस्तु या कार्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रेरित करती है। रुचि से लगन उत्पन्न होती है तथा व्यक्ति की शक्तियाँ अभीष्ट दिशा या कार्य में केन्द्रित हो जाती हैं। रुचि की इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए ही कहा जाता है कि रुचि और योग्यता को घनिष्ठ सम्बन्ध है।

वास्तव में रुचि की दशा में व्यक्ति अधिक ध्यानपूर्वक, लगन से तथा अपनी समस्त शक्तियों को जुटा कर कार्य करता है। इस स्थिति में योग्यता को विकास होना स्वाभाविक ही हो जाती है। यही कारण है कि हम कह सकते हैं कि रुचि और योग्यता का घनिष्ठ सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
अनभिप्रेत अवधान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
अनभिप्रेत अवधान एक विशेष प्रकार का अवधान है जिसमें व्यक्ति को विशिष्ट प्रयास की जरूरत होती है। यह अवधान ऐच्छिक होकर भी ऐच्छिक अवधान से भिन्न होता है। अनभिप्रेत अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति किसी उत्तेजना या वस्तु पर अपनी इच्छा तथा रुचि के विरुद्ध जाकर ध्यान केन्द्रित करता है, लेकिन ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति उस उत्तेजना या वस्तु की ओर अपनी इच्छा और रुचि के अनुकूल ध्यान केन्द्रित करने को प्रयास करता है।

उदाहरणार्थ :
माना एक कवि अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुकूल काव्य-रचना में लगा है। उसी समय उसे किसी बीमार आदमी के लिए जरूरी तौर पर दवा लेने जाना पड़े। कविता से हटकर उसका जो ध्यान दवाइयों की दुकान पर केन्द्रित होगा; उसे अनभिप्रेत अवधान कहेंगे।

प्रश्न 4
व्यक्ति के अवधान का आदत से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर :
व्यक्ति के अवधान में आदत का विशेष योगदान होता है। आदत को अवधान की सबसे अधिक अनुकूल या सहायक दशा माना गया है। व्यक्ति की जब जिस वस्तु की आदत होती है, उससे सम्बन्धित पदार्थ की ओर एक निर्धारित समय पर उसका अवधान अवश्य केन्द्रित हो जाता है। उदाहरण के लिए–यदि किसी व्यक्ति की दोपहर बाद तीन बजे चाय पीने की आदत हो तो निश्चित समय पर उसका ध्यान चाय की ओर केन्द्रित हो जाएगा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
“रुचि को वह प्रेरक शक्ति कहा जाता है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है।”-रुचि की यह परिभाषाकिसके द्वारा प्रतिपादित है?
उत्तर :
रुचि की प्रस्तुत परिभाषा क्रो तथा क्रो द्वारा प्रतिपादित है।

प्रश्न 2
ध्यान या अवधान का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
ध्यान या अवधान वह मानसिक क्रिया है, जिसमें हमारी चेतना किसी व्यक्ति, विषय या वस्तु पर केन्द्रित होती है।

प्रश्न 3
अवधान की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान की प्रक्रिया की मुख्य विशेषताएँ हैं

  1. एकाग्रता
  2. मानसिक क्रियाशीलता
  3. चयनात्मकता तथा
  4. प्रयोजनशीलता

प्रश्न 4
कोई ऐसा कथन लिखिए जिससे अवधान एवं रुचि के सम्बन्ध को जाना जा सके।
उत्तर :
“अवधान तथा रुचि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि रुचि के कारण कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान देता है तो अवधान के कारण उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाएगी।” [रॉस]

प्रश्न 5
“रुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक प्रवृत्ति है।” यह किसका कथन है ? [2007, 10]
उत्तर :
प्रस्तुत कथन जेम्स ड्रेवर का है।

प्रश्न 6
रुचियों के मुख्य वर्ग या प्रकार कौन-कौन से हैं? [2007, 2016]
या
रुचि के कितने प्रकार हैं?
उत्तर :
रुचियों के मुख्य वर्ग या प्रकार दो हैं

  1. जन्मजात रुचियाँ तथा
  2. अर्जित रुचियाँ

प्रश्न 7
रुचि क्या है? [2013]
उत्तर :
रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।

प्रश्न 8
अवधान के मुख्य दो प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान के मुख्य दो प्रकार हैं

(1) ऐच्छिक अवधान तथा
(2) अनैच्छिक अवधान।

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. अवधान अपने आप में एक चयनात्मक प्रक्रिया है।
  2. प्रबल उत्तेजनाओं के प्रति व्यक्ति का अवधान केन्द्रित नहीं हो पाता।
  3. अवधान तथा रुचि का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता।
  4. रुचि गुप्त. अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।
  5. अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए शान्त तथा अनुकूल वातावरण आवश्यक होता है।
  6. रुचिकर विषय-वस्तुओं के प्रति अवधान शीघ्र केन्द्रित हो जाता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य
  6. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
“किसी दूसरी वस्तु की अपेक्षा एक वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण अवधान है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) जे० एस० रॉस ने
(ख) मैक्डूगल ने
(ग) डम्बिल ने
(घ) वुडवर्थ ने
उत्तर :
(ग) डम्बिल ने

प्रश्न 2
“किसी भी दृष्टिकोण से देखा जाए, अन्तिम विश्लेषण में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।” यह किसका कथन है ?
(क) मन का
(ख) जंग का
(ग) डम्बिल का
(घ) मैक्डूगल का
उत्तर :
(क) मन का

प्रश्न 3
“अवधान गतिशील होता है, क्योंकि वह अन्वेषणात्मक है।” यह कथन है
(क) वुडवर्थ का
(ख) मैक्डूगल का
(ग) हिलेगार्ड का
(घ) डम्बिल को
उत्तर :
(क) वुडवर्थ का

प्रश्न 4
रुचि एक
(क) अर्जित शक्ति है
(ख) प्रेरक शक्ति है
(ग) नैसर्गिक शक्ति है
(घ) बौद्धिक शक्ति है
उत्तर :
(ख) प्रेरक शक्ति है

प्रश्न 5
रुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार है।” यह कथन है
(क) मैक्डूगल का
(ख) वुडवर्थ को
(ग) डेवर का
(घ) गेट्स का
उत्तर :
(ग) ड्रेवर का

प्रश्न 6
“रुचिं गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।” यह मत किसका है ?
(क) को तथा क्रो का
(ख) स्किनर का
(ग) वुडवर्थ को
(घ) मैक्डूगल का
उत्तर :
(घ) मैक्डूगल का

प्रश्न 7
विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से लाने की प्रक्रिया है
(क) रुचि
(ख) कल्पना
(ग) अवधान
(घ) संवेदन
उत्तर :
(ग) अवधान

प्रश्न 8
पाठ को रुचिकर बनाने के लिए क्या आवश्यक है। [2012]
(क) शांतिपूर्ण वातावरण हो
(ख) पाठ के क्रियात्मक पद पर ध्यान दिया जाए
(ग) उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाए
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 9
अवधान तथा रुचि के आपसी सम्बन्ध के विषय में सत्य है
(क) रुचि ध्यान पर आधारित होती है
(ख) ध्यान रुचि पर आधारित होता है
(ग) रुचि तथा ध्यान परस्पर फूक होते हैं
(घ) ये सभी कथन सत्य हैं
उत्तर :
(ग) रुचि तथा ध्यान परस्पर पूरक होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 25
Chapter Name Major Ports of India (भारत के प्रमुख पत्तने बन्दरगाह)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India (भारत के प्रमुख पत्तने बन्दरगाह)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के किन्हीं दो प्रमुख बन्दरगाहों की स्थिति एवं महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या
निम्नलिखित बन्दरगाहों के विकास हेतु उत्तरदायी भौगोलिक कारकों का विश्लेषण कीजिए –
(1) कॉदला, (2) पाराद्वीप, (3) कोचीन, (4) कोलकाता, (5) विशाखापट्टनम् एवं (6) मुम्बई।
या
मुम्बई पत्तन का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए।
(क) स्थिति एवं पृष्ठ प्रदेश (ख) निर्यात एवं आयात। [2016]
या
भारत के पूर्वी समुद्री तट पर स्थित दो प्रमुख पत्तनों (बन्दरगाहों) का भौगोलिक वर्णन कीजिए। टिप्प्णी लिखिए। काँदला बन्दरगाह की स्थिति एवं महत्त्व
या
पूर्वी भारत के किन्हीं दो मुख्य बन्दरगाहों की स्थिति एवं महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या
पश्चिमी भारत के किन्हीं दो समुद्र पत्तनों की स्थिति एवं महत्त्व की समीक्षा कीजिए। (2016)
या
भारत के पाराद्वीप बन्दरगाह की स्थिति एवं महत्त्व बताइए।
या
विशाखापट्टनम् पत्तन (बन्दरगाह) का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(अ) स्थिति, (ब) पृष्ठ प्रदेश (पश्च भूमि), (स) आयात एवं निर्यात। [2008]
या
भारत के पूर्वी तट के किन्हीं दो बन्दरगाहों के नाम लिखिए एवं इन्हें रेखा-मानचित्र पर प्रदर्शित कीजिए। [2014]
उत्तर

(1) काँदला Kandla

काँदला भारत का एक महत्त्वपूर्ण आधुनिक पत्तन है। कराँची पत्तन के पाकिस्तान के आधिपत्य में चले जाने के उपरान्त पश्चिमी तट पर काँदला पत्तन का विकास किया गया, जिससे यह गुजरात के उत्तरी भाग, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली एवं जम्मू-कश्मीर राज्यों के लिए मुख्य द्वार का काम कर सके तथा मुम्बई पत्तन के व्यापारिक भार को घटाया जा सके। इस कृत्रिम पत्तन के विकास के लिए सरकार ने करोड़ों रुपये का व्यय किया है। इसका विकास मुम्बई के सहायक पत्तन के रूप में किया गया है। इस पत्तन के विकास में निम्नलिखित भौगोलिक कारकों ने अपना प्रभाव डाला है –
(1) स्थिति – यह पत्तन एक सामुद्रिक कटाव पर स्थित है जो भुज से 48 किमी दूर एवं कच्छ की खाड़ी के पूर्वी सिरे पर स्थित है। इसमें जल की औसत गहराई 9 मीटर है, जहाँ जलयान सुविधा से ठहर सकते हैं। भारत सरकार ने सन् 1965 से इसे मुक्त व्यापार क्षेत्र घोषित कर दिया है अर्थात् यहाँ पर विदेशी आयातित माल पर कोई कर नहीं देना पड़ता है। इसी कारण इस पत्तन का विकास तीव्र गति से हुआ है।

(2) पोताश्रय – इस पत्तन का पोताश्रय प्राकृतिक एवं सुरक्षित है। यहाँ पर 4 डॉक्स इतने गहरे एवं बड़े हैं जिनमें किसी भी आकार के9 मीटर गहरी तली वाले जलयान खड़े हो सकते हैं। इस पत्तन को सभी आधुनिक आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयी हैं। यहाँ पर गोदामों की भी अच्छी व्यवस्था है। काँदला पत्तन पर 4 बड़े शेड हैं जिनमें माल सुरक्षित रखा जा सकता है। यहाँ एक खनिज तेल का गोदाम भी है।

(3) आधुनिक संचार सुविधाएँ – इस पत्तन पर 1,600 किमी दूरी तक के समाचार प्राप्त करने और भेजने वाला संचार यन्त्र तथा 48 किमी तक की सूचना देने वाला राडार यन्त्र भी लगाया गया है। एक तैरते हुए डॉक और ज्वार-भाटा के समय प्रयुक्त होने के लिए डॉक भी बनाये गये हैं। यह पत्तन अपने पृष्ठ प्रदेश से रेल एवं सड़क मार्गों से जुड़ा है। यह पत्तन यूरोपीय तथा अन्य पश्चिमी देशों के सबसे निकट पड़ता है।

(4) पृष्ठ प्रदेश – कॉंदला पत्तन का पृष्ठ प्रदेश बहुत ही विशाल है। इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली एवं पश्चिमी मध्य प्रदेश के कुछ भाग सम्मिलित हैं। इसको पृष्ठ प्रदेश मछली, सीमेण्ट बनाने का कच्चा माल, जिप्सम, लिग्नाइट, नमक, बॉक्साइट, अभ्रक, मैंगनीज आदि पदार्थों में काफी धनी है। यहाँ सूती एवं ऊनी वस्त्र, सीमेण्ट, दवाई, घड़ी आदि बनाने के अरब सागरेअनेक उद्योग भी विकसित हुए हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 25 Major Ports of India 1

(5) आयात एवं निर्यात – इस पत्तन की स्थिति पत्तन द्वारा लोहे-इस्पात का सामान, मशीन, पेट्रोल, गन्धक, रॉक फॉस्फेट, पोटाश, रासायनिक उर्वरक, उत्तम किस्म की कपास, रसायन, खाद्यान्न आदि वस्तुओं का आयात किया जाता हैं।
यहाँ से लकड़ियाँ, अभ्रक, लोहा, चमड़ा, खालें, ऊन, सेलखड़ी, अनाज, कपड़ा, नमक, सीमेण्ट, हड्डी का चूरा, मैंगनीज, चीनी, इन्जीनियरिंग का सामान आदि वस्तुओं का निर्यात किया जाता है।
इस पत्तन की समृद्धि के लिए इसे मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) घोषित किया गया है। यहाँ आयात किये जाने वाले माल पर कोई कर नहीं देना पड़ता। इस पत्तन द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 165 लाख टन को व्यापार (आयात 91% तथा निर्यात 9%) किया जाता है।

(2) पारादीप Paradweep

पाराद्वीप पत्तन भारत के पूर्वी तट पर ओडिशा राज्य में कोलकाता एवं विशाखापट्टनम् बन्दरगाहों के मध्य स्थित है। इसके द्वारा सभी मौसमों में व्यापार किया जाता है। यहाँ 60,000 टन क्षमता के जलयान आसानी से ठहर सकते हैं। इस पत्तन के 6 वर्ग किमी क्षेत्र में भवन आदि का निर्माण किया गया है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र पहले दलदली था जिसे सुखाकर लेंगून हारबेर, जलयानों के मुड़ने के लिए स्थान, खनिज तथा अन्य सामानों के लिए दो बर्थ, लैगून तक पहुँचने के लिए एक जलधारा तथा माल लादने के लिए एक जैटी का निर्माण किया गया है। जलतोड़ दीवार सागर की ओर से लैगून हारबर में आने वाले जलयानों को संरक्षण प्रदान करती है। इस द्वार से होकर जलयान जलधारा में जा पाते हैं। इसके विकास में निम्नलिखित भौगोलिक कारकों ने अपना योगदान दिया है –
(1) स्थिति – इस पत्तन का विकास उत्कल तट पर कटक से 96 किमी दूर बंगाल की खाड़ी में किया गया है। यह कोलकाता एवं विशाखापट्टनम् पत्तनों के मध्य केन्द्रीय स्थिति रखता है।

(2) पोताश्रय – इसका पोताश्रय लैगून सदृश है, जो चारों ओर से जलतोड़ दीवारों से घिरा हुआ है। यहाँ प्रथम चरण में एक समय में दो जलयान ठहर सकते हैं, परन्तु बाद में अधिक जलयानों को ठहराने की सुविधा के लिए बर्थ क्षेत्र को विस्तृत किये जाने का कार्य विचाराधीन है।

(3) संचार सुविधाएँ – इसका पृष्ठ प्रदेश सड़क एवं रेलमार्गों द्वारा इस पत्तन से जुड़ा हुआ है। पाराद्वीप पत्तन को एक ओर तोमका तथा दूसरी ओर दैतारी लोहे की खानों से जोड़ने के लिए 145 किमी लम्बा राजमार्ग बनाया गया है। इस मार्ग को क्योंझर जिले से लेकर बिहार की सीमा पर स्थित भारत की सबसे बड़ी लोहे की खानों—जादा एवं नारबिल–तक बढ़ाये जाने का प्रस्ताव विचाराधीन है।

(4) पृष्ठ प्रदेश – इस पत्तन का पृष्ठ प्रदेश ओडिशा, उत्तरी आन्ध्र प्रदेश, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ राज्यों पर विस्तृत है। यहाँ मैंगनीज, लोहा, अभ्रक, बॉक्साइट, कोयला, ग्रेफाइट आदि खनिज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ इमारती लकड़ी भी उपलब्ध है। इस पृष्ठ प्रदेश में लोहा-इस्पात, भारी मशीनें, विद्युत-यन्त्र एवं उपकरण, रासायनिक उर्वरक, सीमेण्ट, कागज आदि उद्योग विकसित हुए हैं।

(5) आयात एवं निर्यात – इस पत्तन के प्रमुख आयात रासायनिक उर्वरक, गन्धक, पोटाश आदि हैं, जबकि यहाँ से लोहा, मैंगनीज, लोहे एवं इस्पात का सामान, इमारती लकड़ी, मछलियाँ, क्रोमाइट आदि वस्तुओं का विदेशों को निर्यात किया जाता है।
सन् 1966 के बाद से इस पत्तन को भारत के 19 बड़े पत्तनों में सम्मिलित कर लिया गया है। इस पत्तन में प्रतिवर्ष 121 जलयान आते हैं तथा 22 लाख टन वस्तुओं का व्यापार किया जाता है, जिसमें
आयात 4 लाख टन एवं निर्यात 18 लाख टन का है। इस पत्तन का विकास देश के निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए किया गया है।

(3) कोचीन (कोच्चि) Kochin

कोचीन पत्तन, भारत के पश्चिमी तट अर्थात् मालाबार तट पर केरल राज्य में स्थित है। यह एक प्राकृतिक पत्तन है जो समुद्र के समानान्तर एक विशाल अनूप के सहारे स्थित है। यह सुदूर-पूर्व, ऑस्ट्रेलिया एवं यूरोप को जाने वाले जलमार्गों के मध्य पड़ता है। इस पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – यह केरल राज्य में मुम्बई महानगर से दक्षिण में 928 किमी की दूरी पर पश्चिमी तट पर स्थित है। यह एक विशाल पेरियार लैगून के मुहाने पर अपनी स्थिति रखता है।
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(2) पोताश्रय – इसका पोताश्रय काफी विकसित है। पोताश्रय से सम्बन्धित जलधारा 140 मीटर चौड़ी तथा 7 किमी लम्बी है। यहाँ पर बड़े-बड़े जलयान सुरक्षित खड़े रह सकते हैं। पूर्वी एवं पश्चिमी देशों के मध्य यह एक कड़ी का कार्य करता है।

(3) यातायात के साधन – इसका पृष्ठ प्रदेश राजमार्गों एवं रेलों द्वारा जुड़ा है। दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर यह एक प्रमुख पत्तन है जो मुम्बई के भार को कम करता है।

(4) पृष्ठ प्रदेश – कोचीन पत्तन का पृष्ठ प्रदेश पश्चिमी घाट के दक्षिणी भाग, नीलगिरि, इलायची की पहाड़ियों, केरल, कर्नाटक और दक्षिणी तमिलनाडु पर विस्तृत हैं। दक्षिणी भारत के शेष भागों में यह रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा है। इसके पृष्ठ प्रदेश में चाय, कहवा, चावल, नारियल, रबड़, काजू, गर्म मसाले एवं रबड़ का अधिक उत्पादन किया जाता है। इसके अतिरिक्त मछलियाँ एवं अन्य सामुद्रिक जीव, इलायची एवं नारियल से बने सामान; जैसे-तेल, चटाई, रस्सी आदि; का भी उत्पादन किया जाता है, परन्तु वृहत् उद्योगों को इसके पृष्ठ प्रदेश में अभाव पाया जाता है। अत: लघु एवं कुटीर वस्तुओं का उत्पादन ही अधिक किया जाता है तथा इन्हीं वस्तुओं का व्यापार किया जाता है।

(5) आयात एवं निर्यात – इस पत्तन के प्रमुख आयात कपास, रासायनिक उर्वरक, पेट्रोल, बॉक्साइट, जस्ता, लोहा एवं इस्पात का सामान, कोयला, वस्त्र आदि वस्तुएँ हैं।
प्रमुख निर्यातक वस्तुओं में नारियल की जटाएँ, रस्से, सूत, चटाइयाँ, खोपरा, गिरि, नारियल का तेल, चाय, कहवा, रबड़, काजू, गर्म मसाले, इलायची, मछलियाँ आदि हैं।

दक्षिणी भारत में कोचीन एक औद्योगिक नगर के रूप में विकसित हुआ है। जलयान निर्माण उद्योग यहाँ का प्रमुख उद्योग है। इसके अतिरिक्त पेट्रोलियम शोधन उद्योग भी विकसित हुआ है। अन्य उद्योगों में विद्युत उपकरण, रासायनिक उर्वरक आदि प्रमुख हैं। इस पत्तन का सामरिक महत्त्व बहुत अधिक है। यह ऑस्ट्रेलिया एवं पूर्वी एशियाई देशों के लिए समुद्री पत्तने की सुविधा प्रदान करता है। यहाँ प्रतिवर्ष 918 जलयाने आते हैं। व्यापार की मात्रा 55 लाख टन हैं, जिसमें आयात 42 लाख टन तथा निर्यात मात्रा 13 लाख टन है।

(4) कोलकाता Kolkata

कोलकाता भारत का ही नहीं अपितु एशिया महाद्वीप का एक प्रमुख पत्तन है। वास्तव में यह गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी का पूर्वी सामुद्रिक द्वार है। निम्नलिखित भौगोलिक कारकों ने इस पत्तन के विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है –
(1) स्थिति – कोलकाता पत्तन हुगली नदी के बायें किनारे पर बंगाल की खाड़ी से 144 किमी की दूरी पर उत्तर दिशा की ओर स्थित है।

(2) पोताश्रय – कोलकाता पत्तन हुगली नदी द्वारा समुद्र से जुड़ा है। हुगली नदी के तट पर उत्तर में श्रीरामपुर से लेकर दक्षिण में बज बज तक यह पत्तन विस्तृत है। इससे 64 किमी दूर खाड़ी में डायमण्ड एवं खिदिरपुर पोताश्रय बनाये गये हैं। जहाँ जल की पर्याप्त गहराई के कारण 9,000 टन से भी अधिक भार के जलयान आसानी से पहुँच सकते हैं, तथा वहाँ ठहरकर ज्वार की प्रतीक्षा करते हैं। ज्वार के समय ये जलयान खिदिरपुर तक जाते हैं। इस प्रकार जलयानों को समुद्रतटे से कोलकाता पत्तन तक पहुँचने के लिए 8 घण्टे का समय लग जाता है। यहाँ पर अनेक जैटी, गोदाम, व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र स्थित हैं।
(3) कोलकाता पत्तन के विकास के कारण –

    1. इसका पृष्ठ प्रदेश सघन जनसंख्या रखने वाला है।
    2. इसका पृष्ठ प्रदेश आर्थिक विकास में बहुत ही धनी है, जहाँ जूट, चावल, चाय तथा गन्ने का अधिक उत्पादन किया जाता है।
    3. इसके समीप ही कोयला, लौह-अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक, चूना-पत्थर आदि खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में निकाले जाते हैं।
    4. इसके पृष्ठ प्रदेश में सभी प्रकार के आवागमन के साधन विकसित हैं।
    5. इसका पृष्ठ प्रदेश लोहा-इस्पात, इंजीनियरिंग, भारी विद्युत संयन्त्र, सीमेण्ट, कागज, जूट, सूती वस्त्र आदि उद्योगों में विकसित है।
    6. समीप में स्थित दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देश भारतीय माल के अच्छे ग्राहक हैं, जो बाजार की सुविधा उपलब्ध कराते हैं।
    7. कोयले से प्राप्त ताप-विद्युत तथा जल-विद्युत शक्ति पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
    8. कोलकाता भारत का प्रमुख शैक्षिक, व्यावसायिक एवं व्यापारिक केन्द्र है।
    9. कोलकाता के समीपवर्ती प्रदेश में सघन जनसंख्या के कारण सस्ते श्रमिक काफी संख्या में उपलब्ध हो जाते हैं।
    10. हुगली नदी इस पत्तन को परिवहन की सुविधा के साथ-साथ स्वच्छ जल की सुविधा प्रदान करती है।

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(4) पृष्ठ प्रदेश – इसके पृष्ठ प्रदेश में असोम, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ राज्य सम्मिलित हैं। यह देश के सभी भागों से पूर्वी, उत्तरी-पूर्वी, मध्य और पूर्वी-सीमान्त रेलमार्गों, राष्ट्रीय राजमार्गों, नदी मार्गों और नहरों द्वारा जुड़ा है। अतः सम्पूर्ण क्षेत्र का उत्पादन आसानी से कोलकाता तक लाया जा सकता है तथा विदेशों से प्राप्त माल को देश के भिन्न-भिन्न भागों में आसानी से पहुंचाया जा सकता है।

(5) व्यापार – कोलकाता देश का दूसरा बड़ा पत्तन है। यहाँ से अधिकांशतः भारी पदार्थों का व्यापार किया जाता है। इस पत्तन पर यात्री जलयान बहुत ही कम आते हैं। यहाँ से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुएँ-जूट एवं जूट का सामान, चाय, चीनी, लोहा एवं इस्पात का सामान, तिलहन, चमड़ा, अभ्रक, मैंगनीज आदि हैं। इस पत्तन द्वारा आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में कपास, सूती, ऊनी एवं रेशमी वस्त्र, कृत्रिम रेशम, रासायनिक पदार्थ, कागज, लुग्दी, पेट्रोल, काँच का सामान, रबड़, मशीनें, दवाइयाँ तथा मोटरकार आदि वस्तुएँ सम्मिलित हैं।

इस पत्तन के विकास के कारण ही इस पृष्ठ प्रदेश में अनेक उद्योग-धन्धे स्थापित हो गये हैं। सूती वस्त्र एवं कागज इसी प्रकार के उद्योग हैं। दोनों ही उद्योग आयातित कच्चे माल पर निर्भर करते हैं। जूट उद्योग के विकास में कोलकाता पत्तन का विशेष महत्त्व है। मशीनों के आयात की सुविधा ने इस पत्तन के पृष्ठ प्रदेश में प्रथम इस्पात कारखाना जमशेदपुर में स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। दुर्गापुर, हीरापुर, बर्नपुर तथा कुल्टी के इस्पात कारखाने इसी पत्तन की देन हैं। चमड़ा, दियासलाई, रेशमी वस्त्र, मोटरकार आदि अन्य प्रमुख उद्योग भी यहाँ स्थापित हैं।

(6) कोलकाता पत्तन के भावी विकास की प्रवृत्तियाँ – इस पत्तन पर व्यापारिक दबाव बढ़ जाने के कारण कोलकाता महानगर के दक्षिण में हुगली नदी के नीचे की ओर 90 किमी की दूरी पर हल्दिया पोताश्रय एवं पत्तन का विकास किया गया है। बड़े-बड़े जलयान जो कोलकाता तक नहीं पहुँच पाते, यहाँ पर आसानी से लंगर डाल सकते हैं। यहाँ कोलकाता पत्तन के लिए अनेक आवश्यक वस्तुएँ आयात की जा सकेंगी। हल्दिया पत्तन पर सन् 1981 से माल उतारने-लादने की आधुनिक तकनीक का उपयोग शुरू कर दिया गया है। इस प्रकार हल्दिया, कोलकाता के सहायक पत्तन के रूप में विकसित किया गया है। कोलकाता से प्रतिवर्ष 42 लाख टन तथा हल्दिया से 87 लाख टन माल का व्यापार किया जाता है, जिसमें 80% आयातित एवं 20% निर्यातित माल होता है।

(5) विशाखापट्टनम्
Vishakhapattanam

विशाखापट्टनम् पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – यह पत्तन भारत के पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी में कोरोमण्डल तट पर कोलकाता से 800 किमी दक्षिण तथा चेन्नई से 425 किमी उत्तर में आन्ध्र प्रदेश राज्य में स्थित है। यह पत्तन पूर्ण रूप से एक सुरक्षित, प्राकृतिक एवं सबसे गहरा पत्तने है।

(2) पोताश्रय – इसका पोताश्रय काफी गहरा एवं सुरक्षित है। यहाँ जल की गहराई 9 मीटर से कम नहीं है। इस पत्तन पर 4 मुख्य बर्थ हैं जिनमें से प्रत्येक 152 मीटर लम्बा है तथा इनमें सभी आधुनिक सुविधाएँ विकसित की गयी हैं। इनमें से दो बर्थ विशेष रूप से लोहे एवं मैंगनीज के व्यापार के लिए सुरक्षित हैं। इनसे प्रतिदिन लगभग 3,000 मीट्रिक टन माल का व्यापार होता है। लगभग 61 मीटर लम्बी बर्थ पेट्रोल के व्यापार के लिए सुरक्षित है। इसके पोताश्रय में काफी बड़े जलयान भी आकर लंगर डाल सकते हैं।
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(3) आवागमन के साधन – विशाखापट्टनम् पत्तन का पृष्ठ प्रदेश दक्षिणी-पूर्वी एवं दक्षिणी-मध्य रेलमार्गों द्वारा जुड़ा है। इसके पृष्ठ प्रदेश से कोलकाता की अपेक्षा यंहाँ पहुँचने में कम समय लगता है तथा व्यय भी। कम करना पड़ता है। यहाँ पर जलयान निर्माण, लोहा-इस्पात, रासायनिक उर्वरक तथा तेलशोधन के कारखाने भी स्थापित किये गये हैं।

(4) पृष्ठ प्रदेश – विशाखापट्टनम् को पृष्ठ प्रदेश आन्ध्र प्रदेश के अधिकतर भाग, ओडिशा, पूर्वी मध्य प्रदेश एवं तमिलनाडु राज्यों पर विस्तृत है। इन राज्यों के व्यापार के लिए यही पत्तन उत्तम एवं सुविधाजनक है। इसका पृष्ठ प्रदेश कृषि पदार्थों की अपेक्षा खनिज पदार्थों में अधिक धनी है। यहाँ कोयला, लौह-अयस्क तथा मैंगनीज के भारी भण्डार हैं। चावल, मूंगफली, नारियल, चमड़ा एवं खाले भी यहाँ के प्रमुख उत्पाद हैं।

(5) व्यापार – इस पत्तन द्वारा सूती वस्त्र, लोहा-इस्पात का सामान, मशीनें, पेट्रोल एवं रासायनिक पदार्थ प्रमुख रूप से आयात किये जाते हैं।
जापान को लौह-अयस्क निर्यात करने में इस पत्तन की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। अन्य वस्तुओं में कोयला, लकड़ियाँ, चमड़ा, खालें, मूंगफली, मैंगनीज, लोहा, हरड़, बहेड़ा, लाख, खली आदि का निर्यात किया जाता है। आयातक वस्तुओं में वस्त्र, पेट्रोलियम उत्पाद, सीमेण्ट, मशीनें, कोयला, लोहा, रासायनिक पदार्थ, अखबारी कागज एवं खनिज तेल प्रमुख हैं। विशाखापट्टनम् पत्तन में प्रति वर्ष 563 जलयान आते हैं, जिनके द्वारा 148 लाख टन माल का व्यापार किया जाता है।

(6) मुम्बई Mumbai

यह भारत का ही नहीं अपितु विश्व का एक प्रमुख पत्तन है। देश का 20% से भी अधिक व्यापार मुम्बई पत्तन द्वारा किया जाता है। इस पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – मुम्बई पत्तन सालसट द्वीप पर लगभग 200 वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है। यह भारत के पश्चिमी तट पर एक प्राकृतिक कटान में स्थित है, जहाँ मानसून काल के तूफानों से जलयान सुरक्षित खड़े रह सकते हैं। यह पत्तन यूरोप, पूर्वी एशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के मार्ग में पड़ता है। पत्तन के निकट 11 मीटर गहराई होने से जलयान समुद्रतट तक आकर ठहर जाते हैं। यहाँ पर एक खाड़ी बन गयी। है जो 23 किमी लम्बी एवं 10 किमी चौड़ी है। स्वेज नहर को पार कर आने वाले सभी प्रकार के जलयान यहाँ पर आसानी से ठहर सकते हैं। इस प्रकार पश्चिम से पूर्व को जोड़ने में इस पत्तन की भूमिका बड़ी ही। महत्त्वपूर्ण है।

(2) संचार सुविधाएँ – मुम्बई को यद्यपि पश्चिमी घाट ने देश के भीतरी भागों से अलग-थलग कर दिया है, परन्तु थालघाट एवं भोरघाट दरों ने इसे सड़क एवं रेलमार्गों द्वारा उत्तरी-दक्षिणी एवं मध्य-पूर्वी भारत से जोड़ दिया है। मुम्बई अन्तर्राष्ट्रीय वायु सेवाओं का भी प्रमुख केन्द्र है।

(3) पोताश्रय – जिस स्थान पर मुम्बई पत्तन का निर्माण किया गया है, वहाँ जल की गहराई 11 मीटर है। इतनी गहराई में वे सभी जलयान आकर ठहर सकते हैं जो स्वेज नहर से होकर निकल सकते हैं, क्योंकि स्वेज नहर की गहराई भी लगभग इतनी ही है।

मुम्बई पत्तन के तीन मुख्य डॉक्स हैं-प्रिंस डॉक में 12, विक्टोरिया डॉक में 13 और एलेक्जेण्ड्रा डॉक में 17 बर्थ हैं। यहाँ पर 2 शुष्क डॉक भी बनाये गये हैं। इनके अतिरिक्त कुछ उप-पत्तनों का भी विकास किया गया है जिनमें नावों से आने वाला सामान एवं यात्री उतरते-चढ़ते हैं। तटीय व्यापार की दृष्टि से इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस पत्तन के निकट ही पेट्रोलियम के गोदाम भी बनाये गये हैं। एक नया गोदाम बचूर द्वीप के समीप में भी निर्मित किया गया है। विशाल गोदामों का होना मुम्बई पत्तन की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ अनाज एवं कपास रखने के गोदाम भी बनाये गये हैं। जिनमें 178 अग्नि-सुरक्षित कमरे हैं। इन गोदामों में अग्निसुरक्षा, आवागमन, अस्पताल, जलपान-गृह आदि की भी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
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(4) पृष्ठ प्रदेश – मुम्बई पत्तन का पृष्ठ प्रदेश बड़ा ही विशाल है जो दक्षिण में तमिलनाडु के पश्चिमी भाग से लेकर उत्तर में कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों तक फैला है। इसका पृष्ठ प्रदेश कृषि उत्पादन में बड़ा ही धनी है।
इस पत्तन के विकास के लिए सन् 1969 में मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट प्राधिकरण बनाया गया, जिससे इसके विकास की विभिन्न योजनाएँ बनायी गयी हैं। कुल मिलाकर 55 घाटों का निर्माण किया गया है जहाँ पर एक साथ कई जलयानों से माल लादा एवं उतारा जा सकता है। प्रारम्भ में इसकी व्यापार क्षमता 150 लाख मीट्रिक टन थी जिसे बढ़ाकर 300 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया है।

(5) व्यापार (महत्त्व) – व्यापार की दृष्टि से इस पत्तन को भारत में प्रथम स्थान है। देश के पेट्रोलियम व्यापार का 45%, सामान्य व्यापार को 44%, खाद्यान्न व्यापार का 30% तथा यात्रियों को लाने-ले-जाने का अधिकांश कार्य इसी पत्तन द्वारा किया जाता है। इस पत्तन द्वारा अलसी, मूंगफली, चमड़े का सामान, तिलहन, लकड़ी, ऊन, ऊनी एवं सूती वस्त्र, चमड़ा, मैंगनीज, अभ्रक, इंजीनियरिंग का सामान, लकड़ी, चाँदी आदि वस्तुएँ विदेशों को निर्यात की जाती हैं।

पेट्रोलियम का आयात इसी पत्तन द्वारा सबसे अधिक किया जाता है। बॉम्बे-हाई (Bombay-High) में तेल के भारी उत्पादन से इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है। यहाँ पर विदेशों से सूती, ऊनी एवं रेशमी वस्त्र, मशीनें, नमक, कोयला, कागज, रंग-रोगन, फल, रासायनिक पदार्थ, मिट्टी का तेल एवं लोहे का सामान, उत्तम किस्म की कपास, रासायनिक उर्वरक आदि वस्तुओं का आयात किया जाता है।

इस पत्तन के कारण ही इसके पृष्ठ प्रदेश में सूती वस्त्र उद्योग का विकास सम्भव हो सका है। दो पेट्रोल-शोधनशालाएँ ट्राम्बे में आयातित पेट्रोल के कारण स्थापित की जा सकी हैं। इसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरक, इन्जीनियरिंग, ऊनी वस्त्र, चमड़ा, दवाइयाँ, सीमेण्ट, मोटर, सिनेमा आदि उद्योग भी काफी विकसित हैं। इस पत्तन पर 3,557 जलयानों का आवागमन प्रतिवर्ष होता है जिनके द्वारा 286 लाख टन सामान का व्यापार किया जाता है जिसमें 134 लाख टन का आयात तथा 152 लाख टन का निर्यात किया जाता है। भविष्य में इसकी व्यापार क्षमता और भी अधिक बढ़ जाने की सम्भावना है, क्योंकि इसके निकट ही न्हावाशेवा नाम का एक नया पत्तन र 985 करोड़ की लागत से विकसित किया गया है।
मुम्बई पत्तन के विकास के कारण –

  1. अन्य भारतीय पत्तनों की अपेक्षा यूरोप के अधिक निकट स्थिति।
  2. स्वेज नहर मार्ग तथा उत्तमाशा-अन्तरीप मार्ग पर केन्द्रीय स्थिति रखना।
  3. प्राकृतिक एवं विस्तृत पोताश्रय।
  4. पत्तन का वर्ष भर आवागमन के लिए खुले रहना।
  5. अपने पृष्ठ प्रदेश से रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा होना।
  6. इसके पृष्ठ प्रदेश का कपास, गेहूँ, गन्ना, मूंगफली जैसी फसलों के उत्पादन में विशेष स्थान।
  7. पश्चिमी घाट की प्राकृतिक स्थिति का जल-विद्युत शक्ति के विकास के लिए अनुकूल होना।
  8. समीप में तारापुर अणु शक्ति-गृह का स्थापित किया जाना।
  9. इसके पृष्ठ प्रदेश में सघन जनसंख्या का निवास होना।

(7) चेन्नई Chennai

पूर्वी तट पर यह भारत का मुख्य कृत्रिम पत्तन है। इसे सुरक्षित बनाने के लिए तट से 3.5 किमी की दूरी पर 90 मीटर गहरे सागर की नींव पर दो चौड़ी सीमेण्ट व कंकरीट की दीवारें बनाकर 80 हेक्टेयर से अधिक सागर जल को सुरक्षित बन्दरगाह क्षेत्र की भाँति विकसित किया गया है। इस पत्तन का मुख्य द्वार 120 मीटर लम्बा है। यहाँ जल की गहराई 10 मीटर रहती है, किन्तु ज्वार आने पर यह 12 मीटर तक हो जाती है। इस सुरक्षित पोताश्रय में वर्षा और तूफान के समय 16 जहाज सरलता से खड़े रहते हैं। बड़े जहाज भी साधारणतया 10 मीटर गहरे भागों तक आते हैं, किन्तु अक्टूबर-नवम्बर में जब कभी बंगाल की खाड़ी में तूफान आते हैं तो इनके द्वारा समुद्र का जल लहर के रूप में ऊपर उठ जाता है। और हानि की सम्भावना रहती है। अब इससे बचाव के लिए दीवारों को ऊँचा एवं अधिक सक्षम अनाया गया है। कुल व्यापार की दृष्टि से अब यह मुम्बई के पश्चात् सबसे व्यस्त बन्दरगाह हो गया है।
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चेन्नई का पृष्ठ प्रदेश दक्षिण के प्रायद्वीप के पूर्वी और दक्षिणी राज्यों तक विस्तृत है। इसमें दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, सम्पूर्ण तमिलनाडु और कर्नाटक का पूर्वी भाग सम्मिलित होता है, किन्तु मुम्बई और कोलकाता की भाँति न तो यह इतना उपजाऊ और समृद्ध है और न ही इतना घना बसा है। तमिलनाडु का पृष्ठ प्रदेशे सड़कों और रेलमार्गों द्वारा अन्य राज्यों से जुड़ा है और यह स्वयं एक औद्योगिक नगर है जहाँ सूती वस्त्रे, सीमेण्ट, सिगरेट, रेशमी वस्त्र, चमड़ा आदि उद्योग स्थापित हैं। इसका पृष्ठ प्रदेश भी अब सुविकसित है।

चेन्नई पत्तन से विदेशों को सूती और रेशमी कपड़े, चाय, नारियल, कहवा, हड्डी की खाद, तम्बाकू, मैंगनीज, विविध समुद्री उत्पाद, इन्जीनियरी सामान, संरक्षित खाद्य पदार्थ, मोटर, अन्य वाहन, प्याज, आलू, खली, मसाले आदि वस्तुएँ निर्यात की जाती हैं। आयात व्यापार में कोयला, कोक, खाद्यान्न, मोटरें, रंग, पेट्रोलियम, कागज, दवाइयाँ, धातुएँ, मशीनें, रासायनिक पदार्थ व उर्वरक मुख्य हैं। सभी बन्दरगाहों से जितना माल लादा या प्राप्त किया जाता है, उसका लगभग 20 प्रतिशत माल इस बन्दरगाह द्वारा प्राप्त किया या लादा जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत का रेखा मानचित्र खींचकर उस पर पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट की स्थिति अंकित कीजिए।
या
भारत का रेखा मानचित्र बनाइए तथा उसमें कॉदला पत्तन (बन्दरगाह) को दिखाइए।
या
मुम्बई बन्दरगाह को एक रेखा मानचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए। [2014]
या
कोलकाता बन्दरगाह को एक रेखा मानचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए। [2014, 15]
उत्तर
इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का अध्ययन करें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उस पत्तन का नाम बताइए जिसकी स्थापना कोलकाता के सहायक पत्तन के रूप में की गयी है?
उत्तर
हल्दिया।

प्रश्न 2
उस पत्तन का नाम बताइए जिसका विकास मुम्बई पत्तन पर दबाव को कम करने के लिए किया गया।
उत्तर
न्हावाशेवा।

प्रश्न 3
उस पत्तन का नाम बताइए जो पश्चिमी तट से लौह धातु का निर्यात करता है।
उत्तर
मार्मागोआ।

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प्रश्न 4
पाराद्वीप पत्तन किसलिए प्रसिद्ध है?
उत्तर
पाराद्वीप पत्तन इसलिए प्रसिद्ध है कि इस पत्तन से मुख्यत: जापान को लौह धातु का निर्यात किया जाता है।

प्रश्न 5
काँदला बन्दरगाह के दो व्यापारिक महत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. काँदला पत्तन पर आयात किये जाने वाले माल पर कोई कर नहीं देना पड़ता।
  2. अन्य पत्तनों की भाँति यहाँ विदेशों से लाकर भरे जाने वाले छोटे और पुन: तैयार किये जाने वाले माल व मशीन पर चुंगी नहीं लगती।

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प्रश्न 6
भारत के पश्चिमी तट के दो प्राकृतिक बन्दरगाहों के नाम लिखिए। [2007, 09, 16]
उत्तर

  1. मुम्बई तथा
  2. कोच्चि (कोचीन)।

प्रश्न 7
भारत के पूर्वी तट के दो प्राकृतिक बन्दरगाहों के नाम लिखिए। [2007, 10]
उत्तर

  1. विशाखापट्टनम तथा
  2. कोलकाता।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित शहरों में कौन बन्दरगाह नहीं है?
(क) नागपुर
(ख) मुम्बई
(ग) कोलकाता
(घ) विशाखापट्टनम्
उत्तर
(क) नागपुर।

प्रश्न 2
निम्नलिखित पत्तनों (बन्दरगाहों) में से कौन भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2008, 2014]
(क) तूतीकोरिन
(ख) काँदला
(ग) मार्मागोआ
(घ) कोच्चि
उत्तर
(क) तूतीकोरिन।

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से कौन-सा बन्दरगाह भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2011]
(क) कॉदला
(ख) कोचीन
(ग) मंगलौर
(घ) चेन्नई
उत्तर
(घ) चेन्नई।

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से कौन-सा बन्दरगाह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है? [2013, 14]
(क) पाराद्वीप
(ख) कोच्चि
(ग) तूतीकोरिन
(घ) हल्दिया
उत्तर
(ख) कोच्चि

प्रश्न 5
निम्नलिखित बन्दरगाहों में से कौन-सा भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है?
(क) पाराद्वीप
(ख) हल्दिया
(ग) विशाखापट्टनम्
(घ) मार्मागोआ
उत्तर
(घ) मार्मागोआ।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है? [2007]
(क) गुजरात-मंगलौर
(ख) तमिलनाडु-तूतीकोरिन
(ग) महाराष्ट्र-पाराद्वीप
(घ) कर्नाटक-कॉदला
उत्तर
(ख) तमिलनाडु-तूतीकोरिन।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन-सा पत्तन भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2010]
(क) मुम्बई
(ख) मंगलौर
(ग) कोच्चि
(घ) पाराद्वीप
उत्तर
(घ) पाराद्वीप।

प्रश्न 8
पाराद्वीप समुद्री पत्तन स्थित है – [2010]
(क) गुजरात में
(ख) कर्नाटक में
(ग) ओडिशा में
(घ) तमिलनाडु में
उत्तर
(ग) ओडिशा में।

प्रश्न 9
न्हावाशेवा उपग्रह पत्तन है – [2010]
(क) चेन्नई का
(ख) कोलकाता का
(ग) मुम्बई का
(घ) कोच्चि का
उत्तर
(ग) मुम्बई का।

प्रश्न 10
भारत का सबसे बड़ा नगर है – [2010]
(क) दिल्ली
(ख) मुम्बई
(ग) कोलकाता
(घ) चेन्नई
उत्तर
(ख) मुम्बई।

प्रश्न 11
निम्नलिखित में से कौन-सा बन्दरगाह भारत के पूर्वी तट पर स्थित है? [2015]
(क) कोचीन
(ख) मंगलौर
(ग) विशाखापट्टनम्
(घ) मुम्बई
उत्तर
(ग) विशाखापट्टनम्।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 17
Chapter Name Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व)
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती राज से आप क्या समझते हैं ? ग्रामीण पुनर्निर्माण में पंचायतों के कार्यों एवं महत्त्व को बताइए। [2010, 11, 15]
या
ग्रामीण समाज (समुदाय) पर पंचायत के प्रभाव का वर्णन कीजिए। [2014, 15]
या
ग्रामीण समुदाय के विकास में पंचायतों का महत्त्व बताइए। [2008, 09, 13]
या
ग्रामीण विकास में ग्राम पंचायतों के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2007, 09]
या
ग्रामीण पुनर्निर्माण में पंचायती राज की भूमिका का वर्णन कीजिए। [2016]
या
ग्रामीण क्षेत्र में पंचायती राज-व्यवस्था का क्या महत्त्व है? [2014]
या
ग्रामीण आर्थिक विकास में ग्राम पंचायतों के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2007, 09]
या
ग्राम पंचायत के चार प्रमुख कार्य बताइए। [2009]
या
ग्राम पंचायतों के दो दायित्व बताइए। [2009, 12, 13]
या
पंचायती राज से आप क्या समझते हैं? ग्राम पंचायतों के महत्त्व पर अपने विचार लिखिए। [2008, 11]
या
ग्राम पंचायत का महत्त्व लिखिए। [2013, 15]
या
ग्राम पंचायत के सन्दर्भ में ग्रामीण समुदाय के बदलते स्वरूप की विवेचना कीजिए। [2013]
उत्तर:
भारत गाँवों में बसता है। गाँव भारत गणराज्य की आत्मा हैं। ग्रामीण अंचलों का विकास करके ही भारत का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए ‘पंचायती राज’ की व्यवस्था की गयी है। पंचायती राज का लक्ष्य लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण तथा राष्ट्र के विकास में जनसामान्य की भागीदारी सुनिश्चित करना है। पंचायती राज का मुख्य आधार व्यवस्था में जनसामान्य की भागीदारी है। पंचायत भारतीय लोकतन्त्र की नींव का पत्थर है, जिस पर राष्ट्र का भव्य और टिकाऊ भवन खड़ा हो सकता है।

ग्राम पंचायतों का अस्तित्व बहुत पुराना है। ये प्राचीन काल से भारतीय सामाजिक संगठन का एक सबल आधार रही हैं। ब्रिटिश शासकों ने भी पंचायती राज के महत्त्व को समझते हुए देश में स्थानीय स्वशासन सम्बन्धी अधिनियम पारित करके पंचायतों के संगठन में योग दिया। भारत के सर्वांगीण विकास के लिए संविधान में पंचायतों के गठन का प्रावधान रखा गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 में लिखा है, “राज्य ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ व अधिकार प्रदान करेगा जो स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश सरकार ने 1947 ई० में उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम’ पारित करके पंचायती राज की पक्की नींव रखी। 1994 ई० में इसके अधिनियम सं० 9 में संशोधन करके इसे और अधिक प्रभावशाली बना दिया। | 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के द्वारा ‘पंचायती राज-व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। यह संशोधन अधिनियम 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसके अनुसार ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष कर दिया गया और यह भी प्रावधान किया गया कि ग्राम पंचायत के कार्यकाल समापन होने के 6 माह के भीतर पुन: चुनाव करा दिये जाएंगे।

पंचायती राज की दृष्टि से ‘त्रि-स्तरीय ढाँचे’ (Three-tier System) की व्यवस्था की गयी है। ये तीन स्तर हैं-ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, विकास-खण्ड स्तर पर खण्ड समिति या क्षेत्र समिति या पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद्। यह भी प्रावधान किया गया है कि जिन राज्यों या संघीय राज्य क्षेत्रों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वे स्वयं निर्णय कर सकेंगे कि उनके क्षेत्र में मध्यवर्ती स्तर पर अर्थात् खण्ड समिति रखी जाए या नहीं। इस प्रकार ग्राम पुनर्निर्माण की प्रभावी व्यवस्था लागू की गयी है। इनका उद्देश्य गाँवों का चहुंमुखी विकास करना है।

ग्राम पंचायत के कार्य

ग्राम पंचायत के एमए कार्य निम्नलिखित हैं

  1. ग्रामीण क्षेत्रा में प्रकास के लिए योजनाएँ बनाना तथा उन्हें क्रियान्वित करना।
  2. सहकारी समितियों के माध्यम व का विकास करना।
  3. किसानों के लिए अच्छे बीज की व्यवस्था करना।
  4.  पुस्तकालय एवं वाचनालय का प्रबन्ध करना।
  5. ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन की व्यवस्था करना।
  6.  गलियों में खडूंजे लगवाना।
  7. सार्वजनिक चरागाहों की व्यवस्था एवं देखभाल करना।
  8.  गाँव में जन्म एवं मृत्यु का लेखा-जोखा रखना।
  9. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना।
  10.  गाँव में मेलों, हाटों तथा बाजारों की व्यवस्था करना।
  11.  कुओं व तालाबों की मरम्मत करवाना तथा पेयजल की व्यवस्था करना।
  12. पंचायती भवनों की सुरक्षा करना तथा सार्वजनिक स्थानों से अनधिकृत कब्जे हटाना।
  13. कृषि तथा कुटीर उद्योगों के विकास की व्यवस्था करना।
  14. मृत पशुओं की खाल निकालने तथा सुखाने के लिए स्थान निर्धारित करना।
  15. गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत की रक्षा करना।
  16. गरीबी हटाने के लिए कार्यक्रम चलाना।
  17.  प्रारम्भिक तथा माध्यमिक विद्यालय संचालित करना।
  18. प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा की उन्नति पर बल देना।
  19.  ग्रामीण हस्त शिल्प के विकास तथा शिल्पियों की उन्नति की योजनाएँ बनाना।
  20.  ग्रामीण आवासों की व्यवस्था करना।
  21.  ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास की योजनाएँ बनाना।
  22. ग्राम स्तर पर महिला प्रसूति-गृह एवं बाल विकास के कार्यक्रम लागू कराना।
  23.  वृद्धावस्था तथा विधवा पेन्शन योजनाओं में सहायता करना।
  24.  विकलांगों के हित के लिए तथा सामाजिक-कल्याण के कार्यक्रम चलाना।
  25. अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करना।
  26. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारु रूप देना।
  27.  परिवार-कल्याण कार्यक्रमों को लागू करना।
  28. खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कराना तथा ग्रामीण क्लबों की स्थापना और उनका प्रबन्ध करना।
  29. सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ बनाना और उन्हें लागू कराना।
  30.  कृषि तथा कुटीर उद्योग-धन्धों की उन्नति के प्रयास करना।

ग्रामीण पुनर्निर्माण में ग्राम पंचायतों का महत्त्व

ग्रामीण पुनर्निर्माण की दृष्टि से पंचायतों का निम्नलिखित महत्त्व है

1. सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने में सहायक – ग्रामीण समाज में सार्वजनिक कल्याण-कार्यों को करने में पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवश्यक सुविधाएँ (जैसे – स्वच्छ पानी, पक्के कुओं व गन्दगी फैलने से रोकने में) उपलब्ध कराने में पंचायतें सहायक हैं।

2. रोगों की चिकित्सा में सहायक – सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ संक्रामक बीमारियों की रोकथाम की दृष्टि से भी पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं। स्थानीय
संगठन होने के कारण रोगों की रोकथाम पंचायतों द्वारा सरलता से हो जाती है।

3. यातायात के विकास में सहायक – ग्रामीण पुनर्निर्माण के लिए गाँवों में यातायात के साधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पंचायतें सड़कों की मरम्मत करके, नयी सड़कें बनवाकर तथा प्रकाश का प्रबन्ध करके इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं।

4. मनोरंजन के साधनों का प्रबन्ध – ग्रामीण जीवन में मनोरंजन के साधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पंचायतें मेलों, प्रदर्शनियों व खेल-कूदों की व्यवस्था करके तथा सामुदायिक स्तर पर टेलीविजन इत्यादि का प्रबन्ध करके मनोरंजन में सहायता प्रदान करती हैं।

5. प्राकृतिक प्रकोपों के समय सहायता प्रदान करना – ग्राम पंचायतें प्राकृतिक प्रकोपों के समय सहायता प्रदान करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन विपत्तियों के समय ग्रामवासियों को सुरक्षा प्रदान करने, उनकी आर्थिक सहायता करने तथा उनका मनोबल ऊँचा बनाये रखने में पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं।

6. उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता करना – ग्राम पंचायतें कृषि उत्पादन में तो सहायता करती ही हैं, साथ ही छोटे-छोटे उद्योग स्थापित करने में भी सहायता प्रदान करती हैं। पंचायतें लघु व कुटीर उद्योगों की जानकारी ग्रामवासियों को उपलब्ध कराकर उन्हें स्थापित करने की प्रेरणा देती हैं।

7. कृषि उत्पादन में सहायता देना – ग्राम पंचायतें सुधरे हुए बीज, खाद व कीटनाशक औषधियाँ उपलब्ध कराने के साथ-साथ सिंचाई की सुविधाएँ प्रदान करके कृषि की उन्नति में सहायता देती हैं।

8. पशुओं की नस्ल में सुधार – पंचायतें पशुओं की नस्ल सुधारने में भी सहायता प्रदान करती हैं। नये गर्भाधान केन्द्र स्थापित करके तथा पशु चिकित्सा की सुविधाएँ उपलब्ध करके पंचायतें इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

9. सहकारिता को प्रोत्साहन – ग्रामीण पुनर्निर्माण में सहकारिता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस कार्य में भी पंचायतें ग्रामवासियों की सहायता करती हैं तथा उन्हें सहकारिता में सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

10. शिक्षा के विकास में सहायता – पंचायतें शिक्षा प्रसार का महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए स्कूल खोलने के अतिरिक्त पंचायतें प्रौढ़ शिक्षा में भी सहायक हैं।

11. समाज-कल्याण कार्यों में सहायता – पंचायतें अनेक प्रकार के समाज कल्याण कार्यों को भी करती हैं। पंचायतें सामाजिक कुरीतियों (जैसे – बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा, अस्पृश्यता, विधवा पुनर्विवाह आदि पर रोक इत्यादि) के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। साथ ही मातृत्व व बालकल्याण सुविधाएँ भी उपलब्ध कराती हैं।

12. लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण में सहायक – पंचायतें लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। ग्रामवासियों में राजनीतिक चेतना व सहभागिता को बढ़ाने, देश की समस्याओं के प्रति उन्हें सचेत करने तथा नागरिकता की शिक्षा प्रदान करके पंचायतें इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर सकती हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण एवं सर्वांगीण विकास के क्षेत्र में पंचायत राज नींव का पत्थर सिद्ध हुआ है। ग्राम पंचायतों ने ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त युगों-युगों की गन्दगी, अशिक्षा, अज्ञानता और अन्धकार को दूर करके एक नया ग्रामीण परिवेश तैयार किया है, लेकिन चुनाव-प्रणाली पर आधारित इस पंचायत व्यवस्था के लागू होने से गाँवों में गुटबन्दी भी बढ़ी है। चुनावी रंजिश के कारण हत्याएँ भी हुई हैं। फिर भी, यह कहा जा सकता है कि जनसहभागिता और स्वशासन पर आधारित ये ग्राम पंचायतें दीर्घकालीन दृष्टि से ग्रामों के पुनर्निर्माण और उनकी समृद्धि की सशक्त एजेन्सी सिद्ध होंगी।

प्रश्न 2
ग्रामीण समुदाय के विकास में क्षेत्र पंचायतों पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायत एवं जिला पंचायत के मध्य का स्तर है जिसका गठन प्रत्येक खण्ड (ब्लॉक) के स्तर पर किया जाता है। ग्रामों के विकास में क्षेत्र पंचायत की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह विभिन्न ग्राम पंचायतों में समन्वय तथा सामंजस्य को बनाए रखने का प्रभावी माध्यम है। क्षेत्र पंचायत का गठन ब्लॉक प्रमुख, खण्ड की समस्त ग्राम पंचायतों के प्रधानों, मतदाताओं द्वारा प्रत्येक ग्रामसभा से निश्चित संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधियों, क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित लोकसभा, राज्य विधानसभा तथा विधानपरिषद् के सदस्यों के सम्मिलित स्वरूप के आधार पर होता है। क्षेत्र पंचायत में भी ग्राम पंचायत की भाँति अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% तथा एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किये गये हैं। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों में आरक्षण उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है।।

क्षेत्र पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक

  1. व्यक्ति का नाम क्षेत्र पंचायत की प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में हो।
  2. व्यक्ति विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  3. उसकी आयु इक्कीस वर्ष हो।
  4.  वह किसी लाभ के सरकारी पद पर न हो। क्षेत्र पंचायत का मुख्य निष्पादक (प्रशासक) खण्ड विकास अधिकारी (Block Development Officer) होता है।

खण्ड विकास अधिकारी एक प्रकार से पंचायत समिति के कर्मचारियों की टीम का कप्तान (Captain) होता है।
क्षेत्र पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष की अवधि तक होता है। राज्य सरकार पाँच वर्ष की अवधि से पहले भी क्षेत्र पंचायत को विघटित कर सकती है। प्रमुख, उप-प्रमुख अथवा क्षेत्र-पंचायत का कोई भी सदस्य पाँच वर्ष की अवधि से पूर्व भी त्याग-पत्र देकर अपना पद त्याग सकता है।

कार्य एवं महत्त्व-क्षेत्र पंचायत पंचायती राज व्यवस्था की धुरी है। इसके कार्यों को दो प्रमुख वर्गों में विभक्त किया जाता है। पहली श्रेणी में वे कार्य सम्मिलित किये जाते हैं; जिनका सम्बन्ध नागरिक सुविधाओं को प्रदान करने से है तथा दूसरी श्रेणी में विकास कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। क्षेत्र पंचायत द्वारा नागरिक सुविधाएँ प्रदान करने हेतु किये जाने वाले कार्यों में क्षेत्र में

  1. सड़कों का निर्माण एवं उनकी देख-रेख, मरम्मत आदि कार्य करना,
  2.  पीने के जल की उचित व्यवस्था करना,
  3. प्राथमिक पाठशालाएँ खोलना,
  4. प्रौढशिक्षा केन्द्रों तथा वयस्क साक्षरता केन्द्रों की व्यवस्था करना,
  5. चिकित्सालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, औषध केन्द्र इत्यादि की व्यवस्था करना,
  6. प्रसूति केन्द्रों की स्थापना करना,
  7.  नालियों तथा पानी के निकास की व्यवस्था करना,
  8. शारीरिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलाप को प्रोत्साहन देना,
  9. युवक-संघों, महिला-मण्डलों तथा किसान-गोष्ठियों की स्थापना करना तथा
  10. ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों की स्थापना करना तथा उनको लोकप्रिय बनाना प्रमुख हैं।

क्षेत्र पंचायत के विकास कार्यक्रमों में जिन कार्यों को मुख्य रूप से सम्मिलित किया जाता है। उनमें

  1.  ग्रामवासियों के लिए उन्नत, संकर तथा नवीनतम बीजों की उपलब्धि तथा वितरण की व्यवस्था करना,
  2.  सामुदायिक विकास से सम्बन्धित सभी कार्य करना,
  3. बंजर, परती, रेतीली, पथरीली आदि भूमि का कटाव रोकने की व्यवस्था करना,
  4.  उन्नत किस्म की खाद तथा उर्वरकों को प्राप्त करके उनका उचित वितरण करना,
  5. कृषि हेतु ऋण की व्यवस्था करना,
  6. वृक्षारोपण करना तथा ग्रामीण क्षेत्र में वनों का विकास करना,
  7. सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध करना तथा उसके लिए कुओं का जीर्णोद्वार कराना,
  8. नये कुएँ तैयार कराना व तालाबों को साफ कराना,
  9.  सिंचाई में लघु साधनों की व्यवस्था करना,
  10. पशुओं, भेड़ों, मुर्गी आदि की नवीन नस्लों का प्रसार करना, पशुओं के रोगों का उपचार, टीकाकरण, बन्ध्याकरण आदि करना,
  11. दुग्ध व्यवसाय का प्रबन्ध करना,
  12.  सहकारी समितियों की स्थापना करना,
  13.  घरेलू उद्योग-धन्धों का विकास करना,
  14. अधिक उत्पादन के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना एवं व्यवस्था करना तथा
  15.  अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के लाभ के लिए सरकार द्वारा सहायता प्राप्त छात्रावासों की व्यवस्था करना आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार क्षेत्र पंचायत अपने क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का निष्पादन करती है। उसकी बजट अनुमोदन के लिए जिला पंचायत (जिला परिषद्) को भेजा जाता है। क्षेत्र पंचायत के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह जिला पंचायत द्वारा बताये गये परिवर्तनों को स्वीकार ही करे। क्षेत्र पंचायत इस मामले में पूर्ण स्वतन्त्र होती है।

क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायत के सहयोग एवं सहायता से अपने कार्यों का निष्पादन करती है। अपने कार्यों के समुचित सम्पादन के लिए क्षेत्र पंचायत कुछ समितियों की स्थापना करती है। जिसमें प्रमुख समितियाँ चार होती हैं; जैसे

  1. कार्य समिति,
  2. वित्त एवं विकास समिति,
  3.  शिक्षा समिति तथा
  4.  समता समिति।।

आय के स्रोत कम होने के कारण क्षेत्र पंचायत अपने कार्यों को भी ठीक प्रकार से पूरा नहीं कर पाती है। क्षेत्र पंचायतों को अपने दायित्वों के निर्वाह हेतु अपने आय के क्षेत्रों का दोहन करम होगा, जिससे उसे सौंपे गये कार्य पूर्ण हो सकें।

प्रश्न 3
ग्रामीण समुदाय के विकास में जिला पंचायतों के योगदान पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जिस प्रकार नगर का प्रबन्ध करने के लिए नगर-निगम, नगरपालिका परिषदें एवं नगर पंचायतें होती हैं, ठीक उसी प्रकार जिले के ग्रामीण क्षेत्र का प्रबन्ध करने के लिए जिला पंचायतें होती हैं। जिस प्रकार नगर में, एक नगरपालिका परिषद् सम्पूर्ण नगर की व्यवस्था रखती है, उसी प्रकार एक जिला पंचायत एक जिले के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्रों का प्रबन्ध करती है। प्रत्येक राज्य में जिला पंचायत का गठन निम्न स्तरीय पंचायतों पर नियन्त्रण रखने तथा उनके कार्यों में समन्वय करने के लिए किया जाता है।

प्रत्येक जिला पंचायत का एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष होता है। इनका निर्वाचन जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा अपने में से ही किया जाता है, जो गुप्त मतदान के द्वारा होता है। इन दोनों पदाधिकारियों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, परन्तु इस अवधि से पूर्व भी इन्हें अविश्वास प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है। राज्य सरकार भी इन्हें पदच्युत कर सकती है। अध्यक्ष बनने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति उसी जिले में रहता हो, उसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो तथा उसका नाम उस क्षेत्र की मतदाता सूची में हो। जिला पंचायत में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के अतिरिक्त और भी अनेक स्थायी एवं वैतनिक पदाधिकारी होते हैं। इन सभी अधिकारियों को जिला पंचायत के अध्यक्ष की देखरेख में ही कार्य करना पड़ता है। जिला पंचायत अपने कार्यों का समुचित ढंग से संचालन करने के लिए अनेक समितियों का निर्माण करती है।

प्रत्येक जिला पंचायत में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। तथा आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, जिला पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होता है जो अनुपात इन जातियों एवं जनजातियों की जनसंख्या का जिला पंचायत क्षेत्र की समस्त जनसंख्या में होता है। पिछड़े वर्गों के लिए सुनिश्चित आरक्षण, कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होता है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की स्त्रियों के लिए आरक्षित होते हैं जिनकी संख्या 5 से कम नहीं होती है।

कार्य एवं महत्त्व – ‘पंचायत विधि अधिनियम, 1994 ई० में जिला पंचायत के कार्यों की विस्तृत सूची समाहित है। जिला पंचायत के कार्यों में

  1. पंचायत समितियों के बजट का नियमों के अनुसार निरीक्षण करना,
  2. राज्य सरकार द्वारा जिलों को दिये गये तत्कालीन अनुदान को पंचायत समिति में वितरित करना,
  3.  पंचायत समिति द्वारा तैयार की गयी योजनाओं तथा पंचायत के पंचायत समिति के कार्यों में समन्वय रखना,
  4.  राज्य सरकार को पंचायतों के कार्यों की सूचना देना,
  5. जिले से पंचायतों और संचालन समितियों के सभी सरपंचों, प्रधानों व अन्य सदस्यों की गोष्ठियाँ आयोजित करना,
  6. राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से निर्दिष्ट की गयी किसी वैधानिक या कार्य निष्पादन सम्बन्धी आदेश को कार्यान्वित करना तथा
  7. जिले से सम्बन्धित कृषि व उत्पादन कार्यक्रमों को योजनाबद्ध ढंग से पूरा करना प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जिला पंचायतें ग्रामीणों के कल्याण से सम्बन्धित कार्य भी करती हैं। इन कार्यों में
  8. अस्पताल खोलना,
  9. खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकना,
  10. सड़क, पुल, तालाब एवं नाले आदि बनवाना,
  11. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना,
  12. नदी व नालों पर पुल बनवाना एवं रोशनी का प्रबन्ध करना,
  13. कृषि प्रसार के कार्य करना,
  14. पेय जल की व्यवस्था करना,
  15. पशुपालन तथा दुग्ध उद्योग सम्बन्धी कार्य करना,
  16. समाज-कल्याण के कार्यों को करना,
  17. जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा की व्यवस्था करना,
  18.  पंचायती राज संस्थाओं के कार्यों की देखभाल करना आदि सम्मिलित हैं।

जिला पंचायतों को मेलों, प्रदर्शनियों, पुलों, घाटों आदि के अतिरिक्त निजी सम्पत्ति से भी आर प्राप्त होती है। जिला पंचायत सरकार से ऋण तथा अनुदान भी प्राप्त करती है। वस्तुतः जिला पंचायतों के कार्य नियन्त्रण सम्बन्धी अथवा समन्वयमूलक प्रकृति के होने के कारण इनकी आय के सम्बन्ध में कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गयी है। इनकी आय के प्रमुख स्रोत राज्य सरकार से प्राप्त होने वाली धनराशियाँ तथा पंचायत समितियों से प्राप्त होने वाले अंशदान आदि होते हैं।

प्रश्न 4
भारतीय ग्राम पंचायत के दोषों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर:
भारतीय ग्राम पंचायत के दोष । भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात् ग्रामीण विकास तथा प्रगति के लिए ग्राम पंचायतों के महत्त्व को सर्व-सम्मति से स्वीकार किया गया तथा देशभर में ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई। इन पंचायतों को विभिन्न प्रकार के अधिकार तथा कर्त्तव्य सौंपे गए। परन्तु पिर भी ग्राम पंचायतों को आशा से काफी कम सफलता मिली है। कुछ क्षेत्रों में तो ग्राम पंचायतें पूर्णरूप से असफल रही हैं। अब प्रश्न उठता है कि सरकार द्वारा स्थापित तथा जनता के हित के लिए कार्य करने वाली इन संस्थाओं (पंचायतों) को अपने कार्य में सफलता क्यों नहीं मिली। भारतीय ग्राम पंचायतों की असफलता के मुख्य दोष (कारण) निम्नलिखित हैं

1. सामान्य निर्धनता – भारतीय ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आम व्यक्ति को अपने जीविकोपार्जन की ही चिन्ता लगी रहती है। ऐसी स्थिति में योग्य व्यक्ति पंचायत के कार्यों को करने से कतराते हैं। पंचायत के कार्य करने से कोई आर्थिक लाभ तो होता नहीं। अतः वे इसे केवल समय की बरबादी मानते हैं। योग्य व्यक्तियों के अभाव में अयोग्य व्यक्ति
की पंचायत का कार्य संभालते हैं। अयोग्य पदाधिकारियों के कारण पंचायत की सफलता सदैव ही सन्दिग्ध रहती है।

2. परस्पर पार्टीबाजी और गुटबन्दी – पंचायतों के निर्वाचन के समय गाँव में परस्पर गुटबन्दी और पार्टीबाजी से काम लिया जाता है। गाँव, जो कि इन दोषों से बचे हुए थे, पंचायतों के कारण गुटबन्दी और पार्टीबाजी के शिकार हो गए हैं। हारा हुआ समूह जीते हुए संमूह को कोई काम नहीं करने देता; यहाँ तक कि रचनात्मक कार्यों में भी उसका सहयोग नहीं मिल पाता है।

3. बिरादरीवाद – अनेक पंचायतें भाई-भतीजावाद तथा पक्षपात का अड्डा बन गई है। पंचायती चुनाव ने जातिवाद को और अधिक विकसित कर दिया है। जातिवाद व बिरादरीवाद के कारण
पंचायतें अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाती हैं।

4. अशिक्षा – पंचायत के अधिकांश सदस्य एवं पंच ज्यादा शिक्षित नहीं होते; अतः वे अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से नहीं निभा पाते। पंचायतों पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रामीण जनता पंचायतों के प्रति अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के विषय में जागरूक नहीं है। तथा इसे अपनी संस्था न मानकर एक सरकारी संगठन मात्र मानती है।

5. घमण्ड – प्रायः गाँवों की पंचायतों के सरपंच घमण्डी होते हैं। वे अपने को एक शासक के रूप में समझते हैं और अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हैं। वे गाँव वालों को विकास कार्यों
में सम्मिलित ही नहीं करते और गुटबन्दी को बढ़ावा भी देते हैं।

6. राजनीतिक हस्तक्षेप – ग्रामीण समाज में ग्राम पंचायत का काफी महत्त्व होता है, अतः विभिन्न राजनीतिक दल ग्राम पंचायत को अपने स्वार्थ पूर्ति का साधन बनाना चाहते हैं। इस स्थिति में पंचायत के विभिन्न पदाधिकारियों को गुमराह किया जाता है तथा अपने निहित स्वार्थों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। ऐसी स्थिति में पंचायत अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति से चूक जाती है तथा असफल हो जाती है।

7. पेशेवर नेता – योग्य एवं इज्जतदार व्यक्ति की उदासीनता के कारण कुछ अवसरवादी लोग लाभ उठाते हैं। प्रत्येक गाँव में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साधारण भाषा में पेशेवर नेता कहा जा सकता है। ये पेशेवर नेता ही ग्राम पंचायत के सभी पद प्राप्त कर लेते हैं तथा अपनी नेतागीरी को अधिक महत्त्व देते हैं। इन्हें समाज कल्याण एवं सुधार से कोई सरोकार नहीं होता ” है। ऐसी स्थिति में पंचायत का असफल होना स्वाभाविक ही है।

8. चुनावों में प्रभावशाली लोगों का दबाव – आज भी गाँव में सामन्तशाही और जमींदारी प्रथा के अंश पाए जाते हैं। ऐसे प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण ग्रामीण सच्चे प्रतिनिधि नहीं
चुन पाते तथा इनका नेतृत्व पेशेवर लोगों के हाथ में चला जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
भारत में ग्राम पंचायतों के सफलतापूर्वक कार्य-संचालन में क्या बाधाएँ हैं ?
या
पंचायतों की असफलता के कारण बताइए। [2008, 12]
उत्तर:
भारत में अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जो ग्राम पंचायतों के सफलतापूर्वक कार्य-संचालन में बाधक रही हैं। उनमें से प्रमुख निम्नवत् हैं

  1. अशिक्षा – अधिकांश ग्रामीण अशिक्षित हैं; अतः वे ग्राम पंचायतों के महत्त्व को नहीं समझ पाते और पंचायत द्वारा किये जाने वाले विकास कार्यों में आवश्यक सहयोग नहीं दे पाते।
  2. अधिकारियों में परस्पर तनाव – पंचायतों से सम्बद्ध सरकारी एवं गैर-सरकारी सदस्यों में तनावपूर्ण सम्बन्धों के कारण पंचायतें ठीक से कार्य नहीं कर पातीं।
  3.  वित्त का अभाव – धन के अभाव के कारण पंचायतें विकास-कार्य करने में असफल रही
  4. जातिवाद – जातिवाद के कारण पंचायतें जातियों का अखाड़ा बन गयीं और निर्माण कार्य ठीक से नहीं कर पायीं।
  5. दलबन्दी ग्रामों में पायी जाने वाली दलबन्दी के कारण लोगों ने अपने – अपने दलीय हितों की पूर्ति पर ही अधिक जोर दिया है, परिणामस्वरूप ग्रामीण विकास का लक्ष्य पूरा नहीं हो
    सका है।
  6. योग्य कर्मचारियों का अभाव – पंचायतों से सम्बन्धित योग्य और ध्येयनिष्ठ कर्मचारियों का अभाव भी पंचायती राज संस्थाओं के कार्य-संचालन में बाधक रहा है।
  7.  ग्राम सभा का कमजोर होना – पंचायती राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्राम सभा को शक्तिशाली बनाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसकी वर्ष में एक या दो बैठकों की व्यवस्था मात्र से विभिन्न विकास कार्यक्रमों के प्रति जनता में रुचि और जनसहयोग के लिए तत्परता उत्पन्न नहीं की जा सकती। परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण पुनर्निर्माण सम्बन्धी योजनाओं में आशा के
    अनुरूप जनसहयोग प्राप्त नहीं हो सका।।
  8.  कार्यकर्ताओं में समन्वय का अभाव – विकास-खण्ड स्तर पर विभिन्न कार्यकर्ताओं में जिस प्रकार समन्वय की व्यवस्था की गयी है, उस प्रकार की व्यवस्था जिला स्तर के कार्यकर्ताओं में नहीं की गयी है। परिणाम यह हुआ है कि ग्रामों में परिवर्तन लाने और विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम सफल नहीं हो सके।
  9. योग्य नेतृत्व का अभाव – गाँवों में योग्य नेतृत्व का अभाव है।

पेशेवर नेता सार्वजनिक हित के बजाय अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगे रहते हैं तथा वे पंचायत के धन का दुरुपयोग करते वास्तव में, ग्राम पंचायतों को अनेक लक्ष्यों से दूर ले जाने में अनेक कारण उत्तरदायी रहे हैं। गाँवों के चहुंमुखी विकास के लिए इस संस्था का सक्रिय होना आवश्यक है। गाँवों को सुखी और सम्पन्न जीवन दिलाने के लिए ग्राम पंचायतों में आ गये दोषों का निराकरण आवश्यक है, अन्यथा न तो गाँधी जी का रामराज्य का सपना पूरा होगा और न यहाँ स्वराज सफल हो सकेगा।

प्रश्न 2
ग्राम पंचायतों के कार्यों में सुधार हेतु अपने सुझाव दीजिए।
उत्तर:
समय-समय पर पंचायतों को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार अनेक कदम उठाती रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस द्वारा 1954 ई० में पंचायतों को प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिये गये थे, जिनकी प्रासंगिकता आज भी है

  1.  अधिक-से-अधिक व्यक्तियों से सहयोग प्राप्त करने के लिए पंचायती राज के प्रति जागरूकता में वृद्धि की जाए।
  2. सर्वमान्य ग्रामीण नेतृत्व का विकास किया जाए।
  3. निर्विरोध नेताओं के चुनाव को प्रोत्साहन दिया जाए।
  4. चुनाव पद्धति गुप्त बनायी जाए।
  5. पंचायतों के कार्यों की देख-रेख के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाने चाहिए।
  6. ग्राम स्तर पर सभी कार्यों को ग्राम पंचायतों को सौंपा जाए।
  7. पंचायतों को राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त सहायता मिलनी चाहिए।
  8. ग्रामवासियों में आर्थिक असमानताएँ कम की जाएँ।
  9.  राजनीतिक दलों को पंचायत के कार्यों से अलग रखा जाए।
  10. न्याय पंचायत के कार्य ग्राम पंचायत से अलग नहीं होने चाहिए।

उपर्युक्त सुझावों के अतिरिक्त पंचायतों को कुछ अन्य सुझावों द्वारा भी अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। जिनका विवरण निम्नवत् है

  1. पंचायतों को अधिक लोकतान्त्रिक एवं लोकप्रिय बनाया जाए।
  2.  पंचायतों की आय के साधन बढ़ाये जाएँ। सरकार द्वारा अनुदान की राशि बढ़ायी जाए।
  3. जनता में पंचायत के कार्यों के प्रति जागरूकता विकसित की जाए।
  4. पंचायत अधिकारियों को उपयुक्त प्रशिक्षण दिया जाए।
  5. सहकारी समितियों और पंचायतों में सहयोग बढ़ाया जाए।
  6. चुनाव लड़ने वालों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित की जाए।
  7. पंचायतों के चुनाव निश्चित अवधि में कराये जाएँ।
  8.  पंचायतों की देख-रेख के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाएँ।
  9. पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की जाए तथा उनका कार्य-क्षेत्र विस्तृत किया जाए।
  10. कुशल लोगों को पंचायतों का नेतृत्व अपने हाथों में लेने के लिए तथा निर्विरोध चुनाव के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  11.  सहकारी समितियों, क्षेत्र समितियों तथा विकास खण्डों के कार्य-कलापों में समन्वय उत्पन्न किया जाए।
  12. समयसमय पर सरकारी अधिकारियों द्वारा गाँवों में जाकर ग्राम पंचायत के प्रधानों के साथ गोष्ठी की जाए तथा उन्हें सुझाव दिये जाएँ।
  13. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार करके सुशिक्षित व्यक्तियों की ग्राम पंचायतों में भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  14.  ग्रामीण जनसामान्य की अभिरुचि तथा आस्था ग्राम पंचायतों तथा उनकी कार्यप्रणाली के प्रति जगायी जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती व्यवस्था के चार उद्देश्य बताइए। [2008, 09, 10, 12, 13, 15, 16]
उत्तर:
पंचायती व्यवस्था के चार उद्देश्य निम्नवत् हैं

  1. स्थानीय निवासियों को स्वशासन का अवसर प्रदान करना – किसी गाँव या कस्बे तथा नगरों की समस्याओं का सबसे अच्छा ज्ञान उसी गाँव या कस्बे के निवासियों को होता है। इसलिए पंचायती व्यवस्था की गयी जिससे प्रत्येक गाँव या कस्बे तथा नगर की अपनी एक छोटी-सी सरकार हो जिसका संचालन स्थानीय जनता स्वयं करे।
  2. लोकतन्त्र प्रणाली का प्रशिक्षण – स्थानीय स्वशासन लोगों को प्रशासन में प्रभावी भागीदारी करने तथा लोकतान्त्रिक जीवन-पद्धति अपनाने का आधारभूत प्रशिक्षण देता है।
  3.  प्रशासन को उत्तरदायी बनाना – स्थानीय निवासियों की भागीदारी से प्रशासन उस क्षेत्र की आवश्यकताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी हो जाता है।
  4. स्थानीय स्तर पर तीव्र विकास – पंचायत व्यवस्था में प्रत्येक जिला कई प्रखण्डों में और प्रत्येक प्रखण्ड कई गाँवों में विभाजित किया गया है। इस प्रकार तीनों स्तरों पर विकास-कार्य साथ-साथ चलते हैं और उनके स्थानीय निवासियों की भागीदारी होने के कारण विकास-कार्य तेजी से होता है।

प्रश्न 2
पंचायतों को प्रभावशाली (सफल) बनाने के किन्हीं दो सुझावों को लिखिए। या पंचायतों के प्रभावी नियन्त्रण हेतु कोई दो सुझाव दीजिए। (2014)
उत्तर:
पंचायतों को सफल बनाने हेतु दो सुझाव निम्नलिखित हैं

  1.  पंचायती राज संस्थाओं को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इनसे सम्बद्ध सरकारी अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों के बीच सन्देह और अविश्वास को दूर किया जाए और सम्बन्धों में सुधार लाया जाए। दोनों को ही एक-दूसरे के कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से रोका जाना अच्छे सम्बन्ध बनाने की दृष्टि से आवश्यक है।
  2.  ऐसे व्यक्तियों का चयन किया जाए जो पंचायती राज-व्यवस्था के मूल लक्ष्यों को समझते हों और उसके प्रति पूरी तरह समर्पित हों। ऐसी दशा में उनमें कार्य के प्रति उदासीनता नहीं
    पायी जाएगी। अत: आवश्यकता कुशल और कार्य के प्रति निष्ठावान व्यक्तियों के चयन की है।

प्रश्न 3
पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए किन योग्यताओं की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक होंगी

  1. नागरिक ने 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो।
  2. वह व्यक्ति प्रवृत्त विधि के अधीन राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचित होने की योग्यता (आयु के अतिरिक्त योग्यताएँ) रखता हो।
  3. यदि वह सम्बन्धित राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित विधि के अधीन पंचायत को सदस्य निर्वाचित होने के योग्य हो।

प्रश्न 4
पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकाल के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। इसके पूर्व भी उनका विघटन किया जा सकता है। यदि उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसा उपबन्ध हो। किसी पंचायत के गठन के लिए चुनाव

  1.  पाँच वर्ष की अवधि के पूर्व और
  2. विघटन की तिथि से 6 माह की अवधि समाप्त होने के पूर्व करा लिया जाएगा।

प्रश्न 5
उत्तर प्रदेश की त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में ‘पंचायत विधि अधिनियम, 1994′ पारित करके पंचायत राज-व्यवस्था का नया रूप दिया गया है। इसके अनुसार त्रि-स्तरीय व्यवस्था की गयी है-जिला स्तर पर जिला पंचायत, खण्ड स्तर पर क्षेत्र पंचायत तथा ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत। इन तीनों स्तरों पर पंचायत राज संस्थाओं के कार्यों को पूर्ण करने के लिए अनेक स्थायी समितियों का गठन किया गया है तथा ग्राम पंचायत के कार्यों को नये सिरे से निर्धारित किया गया है। इस नयी व्यवस्था की सर्वप्रमुख विशेषता पंचायत राज की सभी संस्थाओं में कमजोर वर्गों के लिए स्थान आरक्षित करना तथा उनमें महिलाओं की सहभागिता को बढ़ाना है।

प्रश्न 6
तीन-स्तरीय वाली पंचायती राज की योजना किसके द्वारा और किस उद्देश्य से प्रस्तुत की गयी थी ?
उत्तर:
सन् 1952 में ग्रामों के सर्वांगीण विकास हेतु सामुदायिक विकास कार्यक्रम और 1953 ई० में राष्ट्रीय विस्तार सेवा योजना प्रारम्भ की गयी। इस कार्यक्रम को जनता का कार्यक्रम बनाने और आवश्यक जन-सहयोग प्राप्त करने हेतु बेलवन्तराय मेहता कमेटी ने सन् 1957 में प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में पंचायती राज की योजना प्रस्तुत की, जिसे साधारणतया लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण कहा जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत तीन-स्तरीय व्यवस्था (Three-tier System) की स्थापना का सुझाव दिया गया। इसके अन्तर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 7
73वें संवैधानिक संशोधन के विषय में बताइए।
उत्तर:
73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग ( भाग 9) तथा एक नयी अनुसूची (ग्यारहवीं) जोड़ी गयी है और पंचायत राज-व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण किया गया है।

प्रश्न 8
त्रिस्तरीय पंचायती राज ढाँचे से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भारत में पंचायती राज की दृष्टि से त्रिस्तरीय ढाँचे की व्यवस्था की गई है। ये तीन स्तर है – ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर), खण्ड समिति या क्षेत्र समिति या पंचायत समिति (विकासखण्ड स्तर पर) तथा जिला परिषद् (जिला स्तर पर)।

प्रश्न 9
ग्राम पंचायत के गठन के बारे में बताइए।
उत्तर:
प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रधान तथा 9 से लेकर 15 तक सदस्य होंगे। सदस्यों की संख्या के सम्बन्ध में निम्नवत् व्यवस्था है| ग्राम की जनसंख्या एक हजार होने पर ग्राम पंचायत में 9 सदस्य; एक हजार से अधिक, किन्तु दो हजार से कम होने पर 11 सदस्य; किन्तु तीन हजार से कम होने पर 13 सदस्य; तीन हजार से अधिक हों तो 15 सदस्य होते हैं।

प्रश्न 10
ग्राम सभा के द्वारा सम्पादित किये जाने वाले चार कार्य बताइए।
उत्तर:
ग्राम सभा निम्नलिखित चार कार्यों का सम्पादन करती है

  1.  सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए स्वैच्छिक श्रम और अंशदान जुटाना।
  2.  ग्राम से सम्बन्धित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हिताधिकारी की पहचान।
  3.  ग्राम से सम्बन्धित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता पहुँचाना।
  4. ग्राम में समाज के सभी वर्गों के बीच एकता और समन्वये में अभिवृद्धि।

प्रश्न 11
ग्राम पंचायतों के चार अधिकार बताइए।
उत्तर:
ग्राम पंचायतें अपने कार्यों को विधिवत् कर सकें, इसके लिए इन्हें कुछ अधिकार दिये गये हैं। जिनमें से चार निम्नलिखित हैं ।

  1.  अपने क्षेत्र के तालाब, कुएँ तथा जमीन पर पंचायत का अधिकार होता है और पंचायत के द्वारा इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जाते हैं। ग्राम पंचायत के द्वारा सार्वजनिक स्थानों के उपयोग के सम्बन्ध में नियमों का निर्माण किया जा सकता है।
  2. पंचायत द्वारा निजी कुओं और स्थानों के मालिकों को उनकी सफाई, मरम्मत आदि के आदेश दिये जा सकते हैं।
  3.  प्राथमिक पाठशालाओं पर इसका नियन्त्रण होता है।
  4. अपने क्षेत्र के किसी भी पदाधिकारी के कार्य की जाँच करने तथा उसके सम्बन्ध में शासन को रिपोर्ट देने का पंचायत को अधिकार होता है।

प्रश्न 12
ग्राम पंचायतों का अर्थ व इनके कार्य बताइए।
उत्तर:
ग्राम सभा की कार्यकारिणी को ग्राम पंचायत कहते हैं। इसको चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों में से होता है। ग्राम सभा के प्रधान और उपप्रधान (ग्राम पंचायत के सदस्यों द्वारा चुना गया) ही ग्राम पंचायत के प्रधान तथा उपप्रधान होते हैं। प्रधान पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है। ग्राम पंचायत के कार्यों में कृषि व ग्राम विकास, प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूल की व्यवस्था, नलकूपों एवं हैण्डपम्पों का संचालन, अखाड़ा, व्यायामशाला, स्वास्थ्य उपकेन्द्रों, पशु सेवा केन्द्र आदि की। व्यवस्था करना तथा पेंशन के लिए लाभार्थियों का चयन तथा छात्रवृत्तियों को स्वीकृत करने एवं उन्हें बाँटना प्रमुख हैं।

प्रश्न 13
ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए क्या आरक्षण-व्यवस्था है ?
उत्तर:
ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित होंगे। ग्राम पंचायत के कुल पदों में से एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए जो आरक्षित पद हैं, उनमें भी कम-से-कम एक-तिहाई पद इन जातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। आरक्षण की उपर्युक्त समस्त व्यवस्था ग्राम पंचायत के प्रधान पद पर भी लागू की गयी है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए ग्राम पंचायतों के प्रधान के पद उतनी संख्या में आरक्षित होंगे, जो अनुपात समस्त राज्य की जनसंख्या में इन वर्गों का है।

प्रश्न 14
न्याय पंचायत का गठन किस प्रकार से किया जाता है ? [2008, 09, 11]
उत्तर:
ग्रामीणों को सस्ता और शीघ्र न्याय देने के लिए न्याय पंचायतों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। साधारणतया एक न्याय पंचायत की स्थापना 10 से 12 तक ग्राम पंचायतों के ऊपर की जाती है। एक न्याय पंचायत के कम-से-कम 10 तथा अधिक-से-अधिक 25 पंच होते हैं। इन पंचों को राज्य द्वारा निर्धारित अधिकारी, साधारणतया जिलाधीश द्वारा उस प्रखण्ड की ग्राम पंचायतों के सदस्यों में से मनोनीत किया जाता है। इस प्रकार जितने भी पंच मनोनीत होते हैं, वे अपने में से ही एक को सरपंच तथा एक को सहायक सरपंच के रूप में निर्वाचित कर लेते हैं।

प्रश्न 15
ग्राम की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर:
ग्राम की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. साफ एवं स्वच्छ वातावरण।
  2. सादा एवं सरल जीवन।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत किन स्तरों पर पंचायती राज-व्यवस्था स्थापित की गयी ?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत तीन-स्तरीय व्यवस्था की गयी। इसके अन्तर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 2
पंचायती राज योजना को प्रारम्भ करने वाले प्रथम दो प्रदेश कौन-से थे ?
उत्तर:
पंचायती राज योजना को प्रारम्भ करने वाले प्रथम दो प्रदेश थे-राजस्थान तथा आन्ध्र प्रदेश।

प्रश्न 3
पंचायती राज-व्यवस्था की तीन सीढियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:
पंचायती राज-व्यवस्था की तीन सीढ़ियाँ हैं-ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद् या जिला पंचायत।

प्रश्न 4
पंचायती राज योजना का उद्घाटन कब, कहाँ और किसके द्वारा किया गया था ?
उत्तर:
पंचायती राज योजना का उद्घाटन 2 अक्टूबर, 1959 को प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान राज्य के नागौर जिले में किया गया था।

प्रश्न 5
संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत स्थान सुरक्षित किये गये हैं ? [2011]
उत्तर:
संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान सुरक्षित किये गये हैं।

प्रश्न 6
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज-व्यवस्था किस आधार पर की गयी है ?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था उत्तर प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम, 1994 के आधार पर की गयी है।

प्रश्न 7
भारत में पंचायतों की प्राचीनता के प्रमाण किन ग्रन्थों में मिलते हैं ?
उत्तर:
भारत में पंचायतों की प्राचीनता के प्रमाण ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा जातक ग्रन्थों में मिलते है।

प्रश्न 8
स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में गाँव पंचायतों के लिए सर्वप्रथम कानून बनाने वाला राज्य कौन-सा था ?
है।
स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में गाँव पंचायतों के लिए सर्वप्रथम कानून बनाने वाला राज्य उत्तरप्रदेश था।

प्रश्न 9
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान में 73वाँ संशोधन किस सन में पारित हुआ ?
उत्तर:
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान में 73वाँ संशोधन सन् 1993 ई० में पारित हुआ।

प्रश्न 10
गाँव सभा की कार्यकारिणी को क्या कहते हैं ? [2011]
उत्तर:
गाँव सभा की कार्यकारिणी को गाँव पंचायत कहते हैं।

प्रश्न 11
गाँव सभा की एक वर्ष में कितनी बैठकें होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
गाँव सभा की एक वर्ष में दो बैठकें होना अनिवार्य है।

प्रश्न 12
ग्राम पंचायत का अध्यक्ष कौन होता है ? [2007, 15]
उत्तर:
ग्राम पंचायत का अध्यक्ष प्रधान होता है।

प्रश्न 13:
ग्राम पंचायत की एक वर्ष में कितनी बैठकें होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
ग्राम पंचायत की साधारणतया प्रत्येक माह में कम-से-कम एक बैठक होगी, लेकिन विशेष परिस्थितियों में किन्हीं भी दो बैठकों के बीच दो माह से अधिक का अन्तर नहीं होगा।

प्रश्न 14
पंचायती राज-व्यवस्था में न्याय देने का कार्य कौन-सी संस्था करती है ?
उत्तर:
पंचायती राज व्यवस्था में न्याय देने का कार्य पंचायती अदालत (न्याय पंचायत) करती है।

प्रश्न 15
भारत एक नगर प्रधान देश है। सही-गलत [2016]
उत्तर:
गलत।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान (तिहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1993 कब से प्रभावी हुआ ?
(क) 14 जनवरी, 1993
(ख) 24 जनवरी, 1993
(ग) 14 अप्रैल, 1993
(घ) 24 अप्रैल, 1993

प्रश्न 2
उत्तर प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम’ किस सन में पारित हुआ ? [2007]
(क) 2000 ई० में
(ख) 1998 ई० में
(ग) 1995 ई० में
(घ) 1994 ई० में

प्रश्न 3
एक गाँव के सभी वयस्क व्यक्ति निम्नलिखित में से किसके सदस्य होते हैं ?
(क) गाँव सभा के
(ख) गाँव पंचायत के
(ग) पंचायत के
(घ) न्याय पंचायत के

प्रश्न 4
न्याय पंचायत, फौजदारी मुकदमों में अधिकतम दण्ड कितना दे सकती है ?
(क) दो सौ पचास रुपये
(ख) पाँच सौ रुपये
(ग) सौ रुपये
(घ) पचास रुपये

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से कौन-सा कारक पंचायत राज की असफलता से सम्बन्धित है ? [2009]
(क) प्रभावशाली नेतृत्व का अभाव
(ख) अशिक्षा
(ग) जातिवाद एवं गुटबन्दी
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (घ) 24 अप्रैल, 1993,
2. (घ) 1994 ई० में,
3. (क) गाँव सभा के,
4. (क) दो सौ पचास रुपये,
5. (घ) ये सभी।

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