UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 17
Chapter Name Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व)
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 17 Importance of Gram, Kshetra and Zila Panchayats in Rural Community (ग्रामीण समुदाय में ग्राम, क्षेत्र व जिला पंचायतों का महत्त्व)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती राज से आप क्या समझते हैं ? ग्रामीण पुनर्निर्माण में पंचायतों के कार्यों एवं महत्त्व को बताइए। [2010, 11, 15]
या
ग्रामीण समाज (समुदाय) पर पंचायत के प्रभाव का वर्णन कीजिए। [2014, 15]
या
ग्रामीण समुदाय के विकास में पंचायतों का महत्त्व बताइए। [2008, 09, 13]
या
ग्रामीण विकास में ग्राम पंचायतों के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2007, 09]
या
ग्रामीण पुनर्निर्माण में पंचायती राज की भूमिका का वर्णन कीजिए। [2016]
या
ग्रामीण क्षेत्र में पंचायती राज-व्यवस्था का क्या महत्त्व है? [2014]
या
ग्रामीण आर्थिक विकास में ग्राम पंचायतों के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2007, 09]
या
ग्राम पंचायत के चार प्रमुख कार्य बताइए। [2009]
या
ग्राम पंचायतों के दो दायित्व बताइए। [2009, 12, 13]
या
पंचायती राज से आप क्या समझते हैं? ग्राम पंचायतों के महत्त्व पर अपने विचार लिखिए। [2008, 11]
या
ग्राम पंचायत का महत्त्व लिखिए। [2013, 15]
या
ग्राम पंचायत के सन्दर्भ में ग्रामीण समुदाय के बदलते स्वरूप की विवेचना कीजिए। [2013]
उत्तर:
भारत गाँवों में बसता है। गाँव भारत गणराज्य की आत्मा हैं। ग्रामीण अंचलों का विकास करके ही भारत का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए ‘पंचायती राज’ की व्यवस्था की गयी है। पंचायती राज का लक्ष्य लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण तथा राष्ट्र के विकास में जनसामान्य की भागीदारी सुनिश्चित करना है। पंचायती राज का मुख्य आधार व्यवस्था में जनसामान्य की भागीदारी है। पंचायत भारतीय लोकतन्त्र की नींव का पत्थर है, जिस पर राष्ट्र का भव्य और टिकाऊ भवन खड़ा हो सकता है।

ग्राम पंचायतों का अस्तित्व बहुत पुराना है। ये प्राचीन काल से भारतीय सामाजिक संगठन का एक सबल आधार रही हैं। ब्रिटिश शासकों ने भी पंचायती राज के महत्त्व को समझते हुए देश में स्थानीय स्वशासन सम्बन्धी अधिनियम पारित करके पंचायतों के संगठन में योग दिया। भारत के सर्वांगीण विकास के लिए संविधान में पंचायतों के गठन का प्रावधान रखा गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 में लिखा है, “राज्य ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ व अधिकार प्रदान करेगा जो स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर सकें।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश सरकार ने 1947 ई० में उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम’ पारित करके पंचायती राज की पक्की नींव रखी। 1994 ई० में इसके अधिनियम सं० 9 में संशोधन करके इसे और अधिक प्रभावशाली बना दिया। | 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के द्वारा ‘पंचायती राज-व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। यह संशोधन अधिनियम 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसके अनुसार ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष कर दिया गया और यह भी प्रावधान किया गया कि ग्राम पंचायत के कार्यकाल समापन होने के 6 माह के भीतर पुन: चुनाव करा दिये जाएंगे।

पंचायती राज की दृष्टि से ‘त्रि-स्तरीय ढाँचे’ (Three-tier System) की व्यवस्था की गयी है। ये तीन स्तर हैं-ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, विकास-खण्ड स्तर पर खण्ड समिति या क्षेत्र समिति या पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद्। यह भी प्रावधान किया गया है कि जिन राज्यों या संघीय राज्य क्षेत्रों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वे स्वयं निर्णय कर सकेंगे कि उनके क्षेत्र में मध्यवर्ती स्तर पर अर्थात् खण्ड समिति रखी जाए या नहीं। इस प्रकार ग्राम पुनर्निर्माण की प्रभावी व्यवस्था लागू की गयी है। इनका उद्देश्य गाँवों का चहुंमुखी विकास करना है।

ग्राम पंचायत के कार्य

ग्राम पंचायत के एमए कार्य निम्नलिखित हैं

  1. ग्रामीण क्षेत्रा में प्रकास के लिए योजनाएँ बनाना तथा उन्हें क्रियान्वित करना।
  2. सहकारी समितियों के माध्यम व का विकास करना।
  3. किसानों के लिए अच्छे बीज की व्यवस्था करना।
  4.  पुस्तकालय एवं वाचनालय का प्रबन्ध करना।
  5. ग्रामीण क्षेत्रों में मनोरंजन की व्यवस्था करना।
  6.  गलियों में खडूंजे लगवाना।
  7. सार्वजनिक चरागाहों की व्यवस्था एवं देखभाल करना।
  8.  गाँव में जन्म एवं मृत्यु का लेखा-जोखा रखना।
  9. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना।
  10.  गाँव में मेलों, हाटों तथा बाजारों की व्यवस्था करना।
  11.  कुओं व तालाबों की मरम्मत करवाना तथा पेयजल की व्यवस्था करना।
  12. पंचायती भवनों की सुरक्षा करना तथा सार्वजनिक स्थानों से अनधिकृत कब्जे हटाना।
  13. कृषि तथा कुटीर उद्योगों के विकास की व्यवस्था करना।
  14. मृत पशुओं की खाल निकालने तथा सुखाने के लिए स्थान निर्धारित करना।
  15. गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत की रक्षा करना।
  16. गरीबी हटाने के लिए कार्यक्रम चलाना।
  17.  प्रारम्भिक तथा माध्यमिक विद्यालय संचालित करना।
  18. प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा की उन्नति पर बल देना।
  19.  ग्रामीण हस्त शिल्प के विकास तथा शिल्पियों की उन्नति की योजनाएँ बनाना।
  20.  ग्रामीण आवासों की व्यवस्था करना।
  21.  ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास की योजनाएँ बनाना।
  22. ग्राम स्तर पर महिला प्रसूति-गृह एवं बाल विकास के कार्यक्रम लागू कराना।
  23.  वृद्धावस्था तथा विधवा पेन्शन योजनाओं में सहायता करना।
  24.  विकलांगों के हित के लिए तथा सामाजिक-कल्याण के कार्यक्रम चलाना।
  25. अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करना।
  26. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारु रूप देना।
  27.  परिवार-कल्याण कार्यक्रमों को लागू करना।
  28. खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कराना तथा ग्रामीण क्लबों की स्थापना और उनका प्रबन्ध करना।
  29. सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ बनाना और उन्हें लागू कराना।
  30.  कृषि तथा कुटीर उद्योग-धन्धों की उन्नति के प्रयास करना।

ग्रामीण पुनर्निर्माण में ग्राम पंचायतों का महत्त्व

ग्रामीण पुनर्निर्माण की दृष्टि से पंचायतों का निम्नलिखित महत्त्व है

1. सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने में सहायक – ग्रामीण समाज में सार्वजनिक कल्याण-कार्यों को करने में पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवश्यक सुविधाएँ (जैसे – स्वच्छ पानी, पक्के कुओं व गन्दगी फैलने से रोकने में) उपलब्ध कराने में पंचायतें सहायक हैं।

2. रोगों की चिकित्सा में सहायक – सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ संक्रामक बीमारियों की रोकथाम की दृष्टि से भी पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं। स्थानीय
संगठन होने के कारण रोगों की रोकथाम पंचायतों द्वारा सरलता से हो जाती है।

3. यातायात के विकास में सहायक – ग्रामीण पुनर्निर्माण के लिए गाँवों में यातायात के साधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पंचायतें सड़कों की मरम्मत करके, नयी सड़कें बनवाकर तथा प्रकाश का प्रबन्ध करके इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं।

4. मनोरंजन के साधनों का प्रबन्ध – ग्रामीण जीवन में मनोरंजन के साधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पंचायतें मेलों, प्रदर्शनियों व खेल-कूदों की व्यवस्था करके तथा सामुदायिक स्तर पर टेलीविजन इत्यादि का प्रबन्ध करके मनोरंजन में सहायता प्रदान करती हैं।

5. प्राकृतिक प्रकोपों के समय सहायता प्रदान करना – ग्राम पंचायतें प्राकृतिक प्रकोपों के समय सहायता प्रदान करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन विपत्तियों के समय ग्रामवासियों को सुरक्षा प्रदान करने, उनकी आर्थिक सहायता करने तथा उनका मनोबल ऊँचा बनाये रखने में पंचायतें महत्त्वपूर्ण हैं।

6. उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता करना – ग्राम पंचायतें कृषि उत्पादन में तो सहायता करती ही हैं, साथ ही छोटे-छोटे उद्योग स्थापित करने में भी सहायता प्रदान करती हैं। पंचायतें लघु व कुटीर उद्योगों की जानकारी ग्रामवासियों को उपलब्ध कराकर उन्हें स्थापित करने की प्रेरणा देती हैं।

7. कृषि उत्पादन में सहायता देना – ग्राम पंचायतें सुधरे हुए बीज, खाद व कीटनाशक औषधियाँ उपलब्ध कराने के साथ-साथ सिंचाई की सुविधाएँ प्रदान करके कृषि की उन्नति में सहायता देती हैं।

8. पशुओं की नस्ल में सुधार – पंचायतें पशुओं की नस्ल सुधारने में भी सहायता प्रदान करती हैं। नये गर्भाधान केन्द्र स्थापित करके तथा पशु चिकित्सा की सुविधाएँ उपलब्ध करके पंचायतें इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

9. सहकारिता को प्रोत्साहन – ग्रामीण पुनर्निर्माण में सहकारिता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस कार्य में भी पंचायतें ग्रामवासियों की सहायता करती हैं तथा उन्हें सहकारिता में सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

10. शिक्षा के विकास में सहायता – पंचायतें शिक्षा प्रसार का महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। प्राइमरी शिक्षा के लिए स्कूल खोलने के अतिरिक्त पंचायतें प्रौढ़ शिक्षा में भी सहायक हैं।

11. समाज-कल्याण कार्यों में सहायता – पंचायतें अनेक प्रकार के समाज कल्याण कार्यों को भी करती हैं। पंचायतें सामाजिक कुरीतियों (जैसे – बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा, अस्पृश्यता, विधवा पुनर्विवाह आदि पर रोक इत्यादि) के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। साथ ही मातृत्व व बालकल्याण सुविधाएँ भी उपलब्ध कराती हैं।

12. लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण में सहायक – पंचायतें लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। ग्रामवासियों में राजनीतिक चेतना व सहभागिता को बढ़ाने, देश की समस्याओं के प्रति उन्हें सचेत करने तथा नागरिकता की शिक्षा प्रदान करके पंचायतें इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर सकती हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण एवं सर्वांगीण विकास के क्षेत्र में पंचायत राज नींव का पत्थर सिद्ध हुआ है। ग्राम पंचायतों ने ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त युगों-युगों की गन्दगी, अशिक्षा, अज्ञानता और अन्धकार को दूर करके एक नया ग्रामीण परिवेश तैयार किया है, लेकिन चुनाव-प्रणाली पर आधारित इस पंचायत व्यवस्था के लागू होने से गाँवों में गुटबन्दी भी बढ़ी है। चुनावी रंजिश के कारण हत्याएँ भी हुई हैं। फिर भी, यह कहा जा सकता है कि जनसहभागिता और स्वशासन पर आधारित ये ग्राम पंचायतें दीर्घकालीन दृष्टि से ग्रामों के पुनर्निर्माण और उनकी समृद्धि की सशक्त एजेन्सी सिद्ध होंगी।

प्रश्न 2
ग्रामीण समुदाय के विकास में क्षेत्र पंचायतों पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायत एवं जिला पंचायत के मध्य का स्तर है जिसका गठन प्रत्येक खण्ड (ब्लॉक) के स्तर पर किया जाता है। ग्रामों के विकास में क्षेत्र पंचायत की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह विभिन्न ग्राम पंचायतों में समन्वय तथा सामंजस्य को बनाए रखने का प्रभावी माध्यम है। क्षेत्र पंचायत का गठन ब्लॉक प्रमुख, खण्ड की समस्त ग्राम पंचायतों के प्रधानों, मतदाताओं द्वारा प्रत्येक ग्रामसभा से निश्चित संख्या में निर्वाचित प्रतिनिधियों, क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित लोकसभा, राज्य विधानसभा तथा विधानपरिषद् के सदस्यों के सम्मिलित स्वरूप के आधार पर होता है। क्षेत्र पंचायत में भी ग्राम पंचायत की भाँति अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% तथा एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किये गये हैं। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों में आरक्षण उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है।।

क्षेत्र पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक

  1. व्यक्ति का नाम क्षेत्र पंचायत की प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में हो।
  2. व्यक्ति विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  3. उसकी आयु इक्कीस वर्ष हो।
  4.  वह किसी लाभ के सरकारी पद पर न हो। क्षेत्र पंचायत का मुख्य निष्पादक (प्रशासक) खण्ड विकास अधिकारी (Block Development Officer) होता है।

खण्ड विकास अधिकारी एक प्रकार से पंचायत समिति के कर्मचारियों की टीम का कप्तान (Captain) होता है।
क्षेत्र पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष की अवधि तक होता है। राज्य सरकार पाँच वर्ष की अवधि से पहले भी क्षेत्र पंचायत को विघटित कर सकती है। प्रमुख, उप-प्रमुख अथवा क्षेत्र-पंचायत का कोई भी सदस्य पाँच वर्ष की अवधि से पूर्व भी त्याग-पत्र देकर अपना पद त्याग सकता है।

कार्य एवं महत्त्व-क्षेत्र पंचायत पंचायती राज व्यवस्था की धुरी है। इसके कार्यों को दो प्रमुख वर्गों में विभक्त किया जाता है। पहली श्रेणी में वे कार्य सम्मिलित किये जाते हैं; जिनका सम्बन्ध नागरिक सुविधाओं को प्रदान करने से है तथा दूसरी श्रेणी में विकास कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। क्षेत्र पंचायत द्वारा नागरिक सुविधाएँ प्रदान करने हेतु किये जाने वाले कार्यों में क्षेत्र में

  1. सड़कों का निर्माण एवं उनकी देख-रेख, मरम्मत आदि कार्य करना,
  2.  पीने के जल की उचित व्यवस्था करना,
  3. प्राथमिक पाठशालाएँ खोलना,
  4. प्रौढशिक्षा केन्द्रों तथा वयस्क साक्षरता केन्द्रों की व्यवस्था करना,
  5. चिकित्सालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, औषध केन्द्र इत्यादि की व्यवस्था करना,
  6. प्रसूति केन्द्रों की स्थापना करना,
  7.  नालियों तथा पानी के निकास की व्यवस्था करना,
  8. शारीरिक तथा सांस्कृतिक क्रिया-कलाप को प्रोत्साहन देना,
  9. युवक-संघों, महिला-मण्डलों तथा किसान-गोष्ठियों की स्थापना करना तथा
  10. ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों की स्थापना करना तथा उनको लोकप्रिय बनाना प्रमुख हैं।

क्षेत्र पंचायत के विकास कार्यक्रमों में जिन कार्यों को मुख्य रूप से सम्मिलित किया जाता है। उनमें

  1.  ग्रामवासियों के लिए उन्नत, संकर तथा नवीनतम बीजों की उपलब्धि तथा वितरण की व्यवस्था करना,
  2.  सामुदायिक विकास से सम्बन्धित सभी कार्य करना,
  3. बंजर, परती, रेतीली, पथरीली आदि भूमि का कटाव रोकने की व्यवस्था करना,
  4.  उन्नत किस्म की खाद तथा उर्वरकों को प्राप्त करके उनका उचित वितरण करना,
  5. कृषि हेतु ऋण की व्यवस्था करना,
  6. वृक्षारोपण करना तथा ग्रामीण क्षेत्र में वनों का विकास करना,
  7. सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध करना तथा उसके लिए कुओं का जीर्णोद्वार कराना,
  8. नये कुएँ तैयार कराना व तालाबों को साफ कराना,
  9.  सिंचाई में लघु साधनों की व्यवस्था करना,
  10. पशुओं, भेड़ों, मुर्गी आदि की नवीन नस्लों का प्रसार करना, पशुओं के रोगों का उपचार, टीकाकरण, बन्ध्याकरण आदि करना,
  11. दुग्ध व्यवसाय का प्रबन्ध करना,
  12.  सहकारी समितियों की स्थापना करना,
  13.  घरेलू उद्योग-धन्धों का विकास करना,
  14. अधिक उत्पादन के लिए प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना एवं व्यवस्था करना तथा
  15.  अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों के लाभ के लिए सरकार द्वारा सहायता प्राप्त छात्रावासों की व्यवस्था करना आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार क्षेत्र पंचायत अपने क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का निष्पादन करती है। उसकी बजट अनुमोदन के लिए जिला पंचायत (जिला परिषद्) को भेजा जाता है। क्षेत्र पंचायत के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह जिला पंचायत द्वारा बताये गये परिवर्तनों को स्वीकार ही करे। क्षेत्र पंचायत इस मामले में पूर्ण स्वतन्त्र होती है।

क्षेत्र पंचायत ग्राम पंचायत के सहयोग एवं सहायता से अपने कार्यों का निष्पादन करती है। अपने कार्यों के समुचित सम्पादन के लिए क्षेत्र पंचायत कुछ समितियों की स्थापना करती है। जिसमें प्रमुख समितियाँ चार होती हैं; जैसे

  1. कार्य समिति,
  2. वित्त एवं विकास समिति,
  3.  शिक्षा समिति तथा
  4.  समता समिति।।

आय के स्रोत कम होने के कारण क्षेत्र पंचायत अपने कार्यों को भी ठीक प्रकार से पूरा नहीं कर पाती है। क्षेत्र पंचायतों को अपने दायित्वों के निर्वाह हेतु अपने आय के क्षेत्रों का दोहन करम होगा, जिससे उसे सौंपे गये कार्य पूर्ण हो सकें।

प्रश्न 3
ग्रामीण समुदाय के विकास में जिला पंचायतों के योगदान पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जिस प्रकार नगर का प्रबन्ध करने के लिए नगर-निगम, नगरपालिका परिषदें एवं नगर पंचायतें होती हैं, ठीक उसी प्रकार जिले के ग्रामीण क्षेत्र का प्रबन्ध करने के लिए जिला पंचायतें होती हैं। जिस प्रकार नगर में, एक नगरपालिका परिषद् सम्पूर्ण नगर की व्यवस्था रखती है, उसी प्रकार एक जिला पंचायत एक जिले के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्रों का प्रबन्ध करती है। प्रत्येक राज्य में जिला पंचायत का गठन निम्न स्तरीय पंचायतों पर नियन्त्रण रखने तथा उनके कार्यों में समन्वय करने के लिए किया जाता है।

प्रत्येक जिला पंचायत का एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष होता है। इनका निर्वाचन जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा अपने में से ही किया जाता है, जो गुप्त मतदान के द्वारा होता है। इन दोनों पदाधिकारियों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, परन्तु इस अवधि से पूर्व भी इन्हें अविश्वास प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है। राज्य सरकार भी इन्हें पदच्युत कर सकती है। अध्यक्ष बनने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति उसी जिले में रहता हो, उसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो तथा उसका नाम उस क्षेत्र की मतदाता सूची में हो। जिला पंचायत में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के अतिरिक्त और भी अनेक स्थायी एवं वैतनिक पदाधिकारी होते हैं। इन सभी अधिकारियों को जिला पंचायत के अध्यक्ष की देखरेख में ही कार्य करना पड़ता है। जिला पंचायत अपने कार्यों का समुचित ढंग से संचालन करने के लिए अनेक समितियों का निर्माण करती है।

प्रत्येक जिला पंचायत में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। तथा आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, जिला पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होता है जो अनुपात इन जातियों एवं जनजातियों की जनसंख्या का जिला पंचायत क्षेत्र की समस्त जनसंख्या में होता है। पिछड़े वर्गों के लिए सुनिश्चित आरक्षण, कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होता है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की स्त्रियों के लिए आरक्षित होते हैं जिनकी संख्या 5 से कम नहीं होती है।

कार्य एवं महत्त्व – ‘पंचायत विधि अधिनियम, 1994 ई० में जिला पंचायत के कार्यों की विस्तृत सूची समाहित है। जिला पंचायत के कार्यों में

  1. पंचायत समितियों के बजट का नियमों के अनुसार निरीक्षण करना,
  2. राज्य सरकार द्वारा जिलों को दिये गये तत्कालीन अनुदान को पंचायत समिति में वितरित करना,
  3.  पंचायत समिति द्वारा तैयार की गयी योजनाओं तथा पंचायत के पंचायत समिति के कार्यों में समन्वय रखना,
  4.  राज्य सरकार को पंचायतों के कार्यों की सूचना देना,
  5. जिले से पंचायतों और संचालन समितियों के सभी सरपंचों, प्रधानों व अन्य सदस्यों की गोष्ठियाँ आयोजित करना,
  6. राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से निर्दिष्ट की गयी किसी वैधानिक या कार्य निष्पादन सम्बन्धी आदेश को कार्यान्वित करना तथा
  7. जिले से सम्बन्धित कृषि व उत्पादन कार्यक्रमों को योजनाबद्ध ढंग से पूरा करना प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त जिला पंचायतें ग्रामीणों के कल्याण से सम्बन्धित कार्य भी करती हैं। इन कार्यों में
  8. अस्पताल खोलना,
  9. खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकना,
  10. सड़क, पुल, तालाब एवं नाले आदि बनवाना,
  11. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना,
  12. नदी व नालों पर पुल बनवाना एवं रोशनी का प्रबन्ध करना,
  13. कृषि प्रसार के कार्य करना,
  14. पेय जल की व्यवस्था करना,
  15. पशुपालन तथा दुग्ध उद्योग सम्बन्धी कार्य करना,
  16. समाज-कल्याण के कार्यों को करना,
  17. जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा की व्यवस्था करना,
  18.  पंचायती राज संस्थाओं के कार्यों की देखभाल करना आदि सम्मिलित हैं।

जिला पंचायतों को मेलों, प्रदर्शनियों, पुलों, घाटों आदि के अतिरिक्त निजी सम्पत्ति से भी आर प्राप्त होती है। जिला पंचायत सरकार से ऋण तथा अनुदान भी प्राप्त करती है। वस्तुतः जिला पंचायतों के कार्य नियन्त्रण सम्बन्धी अथवा समन्वयमूलक प्रकृति के होने के कारण इनकी आय के सम्बन्ध में कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गयी है। इनकी आय के प्रमुख स्रोत राज्य सरकार से प्राप्त होने वाली धनराशियाँ तथा पंचायत समितियों से प्राप्त होने वाले अंशदान आदि होते हैं।

प्रश्न 4
भारतीय ग्राम पंचायत के दोषों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर:
भारतीय ग्राम पंचायत के दोष । भारत के स्वतन्त्र होने के पश्चात् ग्रामीण विकास तथा प्रगति के लिए ग्राम पंचायतों के महत्त्व को सर्व-सम्मति से स्वीकार किया गया तथा देशभर में ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई। इन पंचायतों को विभिन्न प्रकार के अधिकार तथा कर्त्तव्य सौंपे गए। परन्तु पिर भी ग्राम पंचायतों को आशा से काफी कम सफलता मिली है। कुछ क्षेत्रों में तो ग्राम पंचायतें पूर्णरूप से असफल रही हैं। अब प्रश्न उठता है कि सरकार द्वारा स्थापित तथा जनता के हित के लिए कार्य करने वाली इन संस्थाओं (पंचायतों) को अपने कार्य में सफलता क्यों नहीं मिली। भारतीय ग्राम पंचायतों की असफलता के मुख्य दोष (कारण) निम्नलिखित हैं

1. सामान्य निर्धनता – भारतीय ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आम व्यक्ति को अपने जीविकोपार्जन की ही चिन्ता लगी रहती है। ऐसी स्थिति में योग्य व्यक्ति पंचायत के कार्यों को करने से कतराते हैं। पंचायत के कार्य करने से कोई आर्थिक लाभ तो होता नहीं। अतः वे इसे केवल समय की बरबादी मानते हैं। योग्य व्यक्तियों के अभाव में अयोग्य व्यक्ति
की पंचायत का कार्य संभालते हैं। अयोग्य पदाधिकारियों के कारण पंचायत की सफलता सदैव ही सन्दिग्ध रहती है।

2. परस्पर पार्टीबाजी और गुटबन्दी – पंचायतों के निर्वाचन के समय गाँव में परस्पर गुटबन्दी और पार्टीबाजी से काम लिया जाता है। गाँव, जो कि इन दोषों से बचे हुए थे, पंचायतों के कारण गुटबन्दी और पार्टीबाजी के शिकार हो गए हैं। हारा हुआ समूह जीते हुए संमूह को कोई काम नहीं करने देता; यहाँ तक कि रचनात्मक कार्यों में भी उसका सहयोग नहीं मिल पाता है।

3. बिरादरीवाद – अनेक पंचायतें भाई-भतीजावाद तथा पक्षपात का अड्डा बन गई है। पंचायती चुनाव ने जातिवाद को और अधिक विकसित कर दिया है। जातिवाद व बिरादरीवाद के कारण
पंचायतें अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाती हैं।

4. अशिक्षा – पंचायत के अधिकांश सदस्य एवं पंच ज्यादा शिक्षित नहीं होते; अतः वे अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से नहीं निभा पाते। पंचायतों पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रामीण जनता पंचायतों के प्रति अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के विषय में जागरूक नहीं है। तथा इसे अपनी संस्था न मानकर एक सरकारी संगठन मात्र मानती है।

5. घमण्ड – प्रायः गाँवों की पंचायतों के सरपंच घमण्डी होते हैं। वे अपने को एक शासक के रूप में समझते हैं और अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हैं। वे गाँव वालों को विकास कार्यों
में सम्मिलित ही नहीं करते और गुटबन्दी को बढ़ावा भी देते हैं।

6. राजनीतिक हस्तक्षेप – ग्रामीण समाज में ग्राम पंचायत का काफी महत्त्व होता है, अतः विभिन्न राजनीतिक दल ग्राम पंचायत को अपने स्वार्थ पूर्ति का साधन बनाना चाहते हैं। इस स्थिति में पंचायत के विभिन्न पदाधिकारियों को गुमराह किया जाता है तथा अपने निहित स्वार्थों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। ऐसी स्थिति में पंचायत अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति से चूक जाती है तथा असफल हो जाती है।

7. पेशेवर नेता – योग्य एवं इज्जतदार व्यक्ति की उदासीनता के कारण कुछ अवसरवादी लोग लाभ उठाते हैं। प्रत्येक गाँव में कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साधारण भाषा में पेशेवर नेता कहा जा सकता है। ये पेशेवर नेता ही ग्राम पंचायत के सभी पद प्राप्त कर लेते हैं तथा अपनी नेतागीरी को अधिक महत्त्व देते हैं। इन्हें समाज कल्याण एवं सुधार से कोई सरोकार नहीं होता ” है। ऐसी स्थिति में पंचायत का असफल होना स्वाभाविक ही है।

8. चुनावों में प्रभावशाली लोगों का दबाव – आज भी गाँव में सामन्तशाही और जमींदारी प्रथा के अंश पाए जाते हैं। ऐसे प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण ग्रामीण सच्चे प्रतिनिधि नहीं
चुन पाते तथा इनका नेतृत्व पेशेवर लोगों के हाथ में चला जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
भारत में ग्राम पंचायतों के सफलतापूर्वक कार्य-संचालन में क्या बाधाएँ हैं ?
या
पंचायतों की असफलता के कारण बताइए। [2008, 12]
उत्तर:
भारत में अनेक ऐसी समस्याएँ हैं जो ग्राम पंचायतों के सफलतापूर्वक कार्य-संचालन में बाधक रही हैं। उनमें से प्रमुख निम्नवत् हैं

  1. अशिक्षा – अधिकांश ग्रामीण अशिक्षित हैं; अतः वे ग्राम पंचायतों के महत्त्व को नहीं समझ पाते और पंचायत द्वारा किये जाने वाले विकास कार्यों में आवश्यक सहयोग नहीं दे पाते।
  2. अधिकारियों में परस्पर तनाव – पंचायतों से सम्बद्ध सरकारी एवं गैर-सरकारी सदस्यों में तनावपूर्ण सम्बन्धों के कारण पंचायतें ठीक से कार्य नहीं कर पातीं।
  3.  वित्त का अभाव – धन के अभाव के कारण पंचायतें विकास-कार्य करने में असफल रही
  4. जातिवाद – जातिवाद के कारण पंचायतें जातियों का अखाड़ा बन गयीं और निर्माण कार्य ठीक से नहीं कर पायीं।
  5. दलबन्दी ग्रामों में पायी जाने वाली दलबन्दी के कारण लोगों ने अपने – अपने दलीय हितों की पूर्ति पर ही अधिक जोर दिया है, परिणामस्वरूप ग्रामीण विकास का लक्ष्य पूरा नहीं हो
    सका है।
  6. योग्य कर्मचारियों का अभाव – पंचायतों से सम्बन्धित योग्य और ध्येयनिष्ठ कर्मचारियों का अभाव भी पंचायती राज संस्थाओं के कार्य-संचालन में बाधक रहा है।
  7.  ग्राम सभा का कमजोर होना – पंचायती राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्राम सभा को शक्तिशाली बनाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसकी वर्ष में एक या दो बैठकों की व्यवस्था मात्र से विभिन्न विकास कार्यक्रमों के प्रति जनता में रुचि और जनसहयोग के लिए तत्परता उत्पन्न नहीं की जा सकती। परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण पुनर्निर्माण सम्बन्धी योजनाओं में आशा के
    अनुरूप जनसहयोग प्राप्त नहीं हो सका।।
  8.  कार्यकर्ताओं में समन्वय का अभाव – विकास-खण्ड स्तर पर विभिन्न कार्यकर्ताओं में जिस प्रकार समन्वय की व्यवस्था की गयी है, उस प्रकार की व्यवस्था जिला स्तर के कार्यकर्ताओं में नहीं की गयी है। परिणाम यह हुआ है कि ग्रामों में परिवर्तन लाने और विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम सफल नहीं हो सके।
  9. योग्य नेतृत्व का अभाव – गाँवों में योग्य नेतृत्व का अभाव है।

पेशेवर नेता सार्वजनिक हित के बजाय अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगे रहते हैं तथा वे पंचायत के धन का दुरुपयोग करते वास्तव में, ग्राम पंचायतों को अनेक लक्ष्यों से दूर ले जाने में अनेक कारण उत्तरदायी रहे हैं। गाँवों के चहुंमुखी विकास के लिए इस संस्था का सक्रिय होना आवश्यक है। गाँवों को सुखी और सम्पन्न जीवन दिलाने के लिए ग्राम पंचायतों में आ गये दोषों का निराकरण आवश्यक है, अन्यथा न तो गाँधी जी का रामराज्य का सपना पूरा होगा और न यहाँ स्वराज सफल हो सकेगा।

प्रश्न 2
ग्राम पंचायतों के कार्यों में सुधार हेतु अपने सुझाव दीजिए।
उत्तर:
समय-समय पर पंचायतों को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार अनेक कदम उठाती रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस द्वारा 1954 ई० में पंचायतों को प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिये गये थे, जिनकी प्रासंगिकता आज भी है

  1.  अधिक-से-अधिक व्यक्तियों से सहयोग प्राप्त करने के लिए पंचायती राज के प्रति जागरूकता में वृद्धि की जाए।
  2. सर्वमान्य ग्रामीण नेतृत्व का विकास किया जाए।
  3. निर्विरोध नेताओं के चुनाव को प्रोत्साहन दिया जाए।
  4. चुनाव पद्धति गुप्त बनायी जाए।
  5. पंचायतों के कार्यों की देख-रेख के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाने चाहिए।
  6. ग्राम स्तर पर सभी कार्यों को ग्राम पंचायतों को सौंपा जाए।
  7. पंचायतों को राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त सहायता मिलनी चाहिए।
  8. ग्रामवासियों में आर्थिक असमानताएँ कम की जाएँ।
  9.  राजनीतिक दलों को पंचायत के कार्यों से अलग रखा जाए।
  10. न्याय पंचायत के कार्य ग्राम पंचायत से अलग नहीं होने चाहिए।

उपर्युक्त सुझावों के अतिरिक्त पंचायतों को कुछ अन्य सुझावों द्वारा भी अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। जिनका विवरण निम्नवत् है

  1. पंचायतों को अधिक लोकतान्त्रिक एवं लोकप्रिय बनाया जाए।
  2.  पंचायतों की आय के साधन बढ़ाये जाएँ। सरकार द्वारा अनुदान की राशि बढ़ायी जाए।
  3. जनता में पंचायत के कार्यों के प्रति जागरूकता विकसित की जाए।
  4. पंचायत अधिकारियों को उपयुक्त प्रशिक्षण दिया जाए।
  5. सहकारी समितियों और पंचायतों में सहयोग बढ़ाया जाए।
  6. चुनाव लड़ने वालों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित की जाए।
  7. पंचायतों के चुनाव निश्चित अवधि में कराये जाएँ।
  8.  पंचायतों की देख-रेख के लिए निरीक्षक नियुक्त किये जाएँ।
  9. पंचायतों के अधिकारों में वृद्धि की जाए तथा उनका कार्य-क्षेत्र विस्तृत किया जाए।
  10. कुशल लोगों को पंचायतों का नेतृत्व अपने हाथों में लेने के लिए तथा निर्विरोध चुनाव के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  11.  सहकारी समितियों, क्षेत्र समितियों तथा विकास खण्डों के कार्य-कलापों में समन्वय उत्पन्न किया जाए।
  12. समयसमय पर सरकारी अधिकारियों द्वारा गाँवों में जाकर ग्राम पंचायत के प्रधानों के साथ गोष्ठी की जाए तथा उन्हें सुझाव दिये जाएँ।
  13. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार करके सुशिक्षित व्यक्तियों की ग्राम पंचायतों में भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  14.  ग्रामीण जनसामान्य की अभिरुचि तथा आस्था ग्राम पंचायतों तथा उनकी कार्यप्रणाली के प्रति जगायी जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती व्यवस्था के चार उद्देश्य बताइए। [2008, 09, 10, 12, 13, 15, 16]
उत्तर:
पंचायती व्यवस्था के चार उद्देश्य निम्नवत् हैं

  1. स्थानीय निवासियों को स्वशासन का अवसर प्रदान करना – किसी गाँव या कस्बे तथा नगरों की समस्याओं का सबसे अच्छा ज्ञान उसी गाँव या कस्बे के निवासियों को होता है। इसलिए पंचायती व्यवस्था की गयी जिससे प्रत्येक गाँव या कस्बे तथा नगर की अपनी एक छोटी-सी सरकार हो जिसका संचालन स्थानीय जनता स्वयं करे।
  2. लोकतन्त्र प्रणाली का प्रशिक्षण – स्थानीय स्वशासन लोगों को प्रशासन में प्रभावी भागीदारी करने तथा लोकतान्त्रिक जीवन-पद्धति अपनाने का आधारभूत प्रशिक्षण देता है।
  3.  प्रशासन को उत्तरदायी बनाना – स्थानीय निवासियों की भागीदारी से प्रशासन उस क्षेत्र की आवश्यकताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी हो जाता है।
  4. स्थानीय स्तर पर तीव्र विकास – पंचायत व्यवस्था में प्रत्येक जिला कई प्रखण्डों में और प्रत्येक प्रखण्ड कई गाँवों में विभाजित किया गया है। इस प्रकार तीनों स्तरों पर विकास-कार्य साथ-साथ चलते हैं और उनके स्थानीय निवासियों की भागीदारी होने के कारण विकास-कार्य तेजी से होता है।

प्रश्न 2
पंचायतों को प्रभावशाली (सफल) बनाने के किन्हीं दो सुझावों को लिखिए। या पंचायतों के प्रभावी नियन्त्रण हेतु कोई दो सुझाव दीजिए। (2014)
उत्तर:
पंचायतों को सफल बनाने हेतु दो सुझाव निम्नलिखित हैं

  1.  पंचायती राज संस्थाओं को सफल बनाने हेतु यह आवश्यक है कि इनसे सम्बद्ध सरकारी अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों के बीच सन्देह और अविश्वास को दूर किया जाए और सम्बन्धों में सुधार लाया जाए। दोनों को ही एक-दूसरे के कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से रोका जाना अच्छे सम्बन्ध बनाने की दृष्टि से आवश्यक है।
  2.  ऐसे व्यक्तियों का चयन किया जाए जो पंचायती राज-व्यवस्था के मूल लक्ष्यों को समझते हों और उसके प्रति पूरी तरह समर्पित हों। ऐसी दशा में उनमें कार्य के प्रति उदासीनता नहीं
    पायी जाएगी। अत: आवश्यकता कुशल और कार्य के प्रति निष्ठावान व्यक्तियों के चयन की है।

प्रश्न 3
पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए किन योग्यताओं की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक होंगी

  1. नागरिक ने 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो।
  2. वह व्यक्ति प्रवृत्त विधि के अधीन राज्य विधानमण्डल के लिए निर्वाचित होने की योग्यता (आयु के अतिरिक्त योग्यताएँ) रखता हो।
  3. यदि वह सम्बन्धित राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित विधि के अधीन पंचायत को सदस्य निर्वाचित होने के योग्य हो।

प्रश्न 4
पंचायती राज संस्थाओं के कार्यकाल के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। इसके पूर्व भी उनका विघटन किया जा सकता है। यदि उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसा उपबन्ध हो। किसी पंचायत के गठन के लिए चुनाव

  1.  पाँच वर्ष की अवधि के पूर्व और
  2. विघटन की तिथि से 6 माह की अवधि समाप्त होने के पूर्व करा लिया जाएगा।

प्रश्न 5
उत्तर प्रदेश की त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में ‘पंचायत विधि अधिनियम, 1994′ पारित करके पंचायत राज-व्यवस्था का नया रूप दिया गया है। इसके अनुसार त्रि-स्तरीय व्यवस्था की गयी है-जिला स्तर पर जिला पंचायत, खण्ड स्तर पर क्षेत्र पंचायत तथा ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत। इन तीनों स्तरों पर पंचायत राज संस्थाओं के कार्यों को पूर्ण करने के लिए अनेक स्थायी समितियों का गठन किया गया है तथा ग्राम पंचायत के कार्यों को नये सिरे से निर्धारित किया गया है। इस नयी व्यवस्था की सर्वप्रमुख विशेषता पंचायत राज की सभी संस्थाओं में कमजोर वर्गों के लिए स्थान आरक्षित करना तथा उनमें महिलाओं की सहभागिता को बढ़ाना है।

प्रश्न 6
तीन-स्तरीय वाली पंचायती राज की योजना किसके द्वारा और किस उद्देश्य से प्रस्तुत की गयी थी ?
उत्तर:
सन् 1952 में ग्रामों के सर्वांगीण विकास हेतु सामुदायिक विकास कार्यक्रम और 1953 ई० में राष्ट्रीय विस्तार सेवा योजना प्रारम्भ की गयी। इस कार्यक्रम को जनता का कार्यक्रम बनाने और आवश्यक जन-सहयोग प्राप्त करने हेतु बेलवन्तराय मेहता कमेटी ने सन् 1957 में प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में पंचायती राज की योजना प्रस्तुत की, जिसे साधारणतया लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण कहा जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत तीन-स्तरीय व्यवस्था (Three-tier System) की स्थापना का सुझाव दिया गया। इसके अन्तर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 7
73वें संवैधानिक संशोधन के विषय में बताइए।
उत्तर:
73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग ( भाग 9) तथा एक नयी अनुसूची (ग्यारहवीं) जोड़ी गयी है और पंचायत राज-व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण किया गया है।

प्रश्न 8
त्रिस्तरीय पंचायती राज ढाँचे से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भारत में पंचायती राज की दृष्टि से त्रिस्तरीय ढाँचे की व्यवस्था की गई है। ये तीन स्तर है – ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर), खण्ड समिति या क्षेत्र समिति या पंचायत समिति (विकासखण्ड स्तर पर) तथा जिला परिषद् (जिला स्तर पर)।

प्रश्न 9
ग्राम पंचायत के गठन के बारे में बताइए।
उत्तर:
प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रधान तथा 9 से लेकर 15 तक सदस्य होंगे। सदस्यों की संख्या के सम्बन्ध में निम्नवत् व्यवस्था है| ग्राम की जनसंख्या एक हजार होने पर ग्राम पंचायत में 9 सदस्य; एक हजार से अधिक, किन्तु दो हजार से कम होने पर 11 सदस्य; किन्तु तीन हजार से कम होने पर 13 सदस्य; तीन हजार से अधिक हों तो 15 सदस्य होते हैं।

प्रश्न 10
ग्राम सभा के द्वारा सम्पादित किये जाने वाले चार कार्य बताइए।
उत्तर:
ग्राम सभा निम्नलिखित चार कार्यों का सम्पादन करती है

  1.  सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए स्वैच्छिक श्रम और अंशदान जुटाना।
  2.  ग्राम से सम्बन्धित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हिताधिकारी की पहचान।
  3.  ग्राम से सम्बन्धित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता पहुँचाना।
  4. ग्राम में समाज के सभी वर्गों के बीच एकता और समन्वये में अभिवृद्धि।

प्रश्न 11
ग्राम पंचायतों के चार अधिकार बताइए।
उत्तर:
ग्राम पंचायतें अपने कार्यों को विधिवत् कर सकें, इसके लिए इन्हें कुछ अधिकार दिये गये हैं। जिनमें से चार निम्नलिखित हैं ।

  1.  अपने क्षेत्र के तालाब, कुएँ तथा जमीन पर पंचायत का अधिकार होता है और पंचायत के द्वारा इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जाते हैं। ग्राम पंचायत के द्वारा सार्वजनिक स्थानों के उपयोग के सम्बन्ध में नियमों का निर्माण किया जा सकता है।
  2. पंचायत द्वारा निजी कुओं और स्थानों के मालिकों को उनकी सफाई, मरम्मत आदि के आदेश दिये जा सकते हैं।
  3.  प्राथमिक पाठशालाओं पर इसका नियन्त्रण होता है।
  4. अपने क्षेत्र के किसी भी पदाधिकारी के कार्य की जाँच करने तथा उसके सम्बन्ध में शासन को रिपोर्ट देने का पंचायत को अधिकार होता है।

प्रश्न 12
ग्राम पंचायतों का अर्थ व इनके कार्य बताइए।
उत्तर:
ग्राम सभा की कार्यकारिणी को ग्राम पंचायत कहते हैं। इसको चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों में से होता है। ग्राम सभा के प्रधान और उपप्रधान (ग्राम पंचायत के सदस्यों द्वारा चुना गया) ही ग्राम पंचायत के प्रधान तथा उपप्रधान होते हैं। प्रधान पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है। ग्राम पंचायत के कार्यों में कृषि व ग्राम विकास, प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूल की व्यवस्था, नलकूपों एवं हैण्डपम्पों का संचालन, अखाड़ा, व्यायामशाला, स्वास्थ्य उपकेन्द्रों, पशु सेवा केन्द्र आदि की। व्यवस्था करना तथा पेंशन के लिए लाभार्थियों का चयन तथा छात्रवृत्तियों को स्वीकृत करने एवं उन्हें बाँटना प्रमुख हैं।

प्रश्न 13
ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए क्या आरक्षण-व्यवस्था है ?
उत्तर:
ग्राम पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित होंगे। ग्राम पंचायत के कुल पदों में से एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए जो आरक्षित पद हैं, उनमें भी कम-से-कम एक-तिहाई पद इन जातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। आरक्षण की उपर्युक्त समस्त व्यवस्था ग्राम पंचायत के प्रधान पद पर भी लागू की गयी है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए ग्राम पंचायतों के प्रधान के पद उतनी संख्या में आरक्षित होंगे, जो अनुपात समस्त राज्य की जनसंख्या में इन वर्गों का है।

प्रश्न 14
न्याय पंचायत का गठन किस प्रकार से किया जाता है ? [2008, 09, 11]
उत्तर:
ग्रामीणों को सस्ता और शीघ्र न्याय देने के लिए न्याय पंचायतों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। साधारणतया एक न्याय पंचायत की स्थापना 10 से 12 तक ग्राम पंचायतों के ऊपर की जाती है। एक न्याय पंचायत के कम-से-कम 10 तथा अधिक-से-अधिक 25 पंच होते हैं। इन पंचों को राज्य द्वारा निर्धारित अधिकारी, साधारणतया जिलाधीश द्वारा उस प्रखण्ड की ग्राम पंचायतों के सदस्यों में से मनोनीत किया जाता है। इस प्रकार जितने भी पंच मनोनीत होते हैं, वे अपने में से ही एक को सरपंच तथा एक को सहायक सरपंच के रूप में निर्वाचित कर लेते हैं।

प्रश्न 15
ग्राम की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर:
ग्राम की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. साफ एवं स्वच्छ वातावरण।
  2. सादा एवं सरल जीवन।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत किन स्तरों पर पंचायती राज-व्यवस्था स्थापित की गयी ?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के अन्तर्गत तीन-स्तरीय व्यवस्था की गयी। इसके अन्तर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति एवं जिला स्तर पर जिला परिषद् की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 2
पंचायती राज योजना को प्रारम्भ करने वाले प्रथम दो प्रदेश कौन-से थे ?
उत्तर:
पंचायती राज योजना को प्रारम्भ करने वाले प्रथम दो प्रदेश थे-राजस्थान तथा आन्ध्र प्रदेश।

प्रश्न 3
पंचायती राज-व्यवस्था की तीन सीढियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर:
पंचायती राज-व्यवस्था की तीन सीढ़ियाँ हैं-ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खण्ड स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद् या जिला पंचायत।

प्रश्न 4
पंचायती राज योजना का उद्घाटन कब, कहाँ और किसके द्वारा किया गया था ?
उत्तर:
पंचायती राज योजना का उद्घाटन 2 अक्टूबर, 1959 को प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान राज्य के नागौर जिले में किया गया था।

प्रश्न 5
संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत स्थान सुरक्षित किये गये हैं ? [2011]
उत्तर:
संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान सुरक्षित किये गये हैं।

प्रश्न 6
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज-व्यवस्था किस आधार पर की गयी है ?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था उत्तर प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम, 1994 के आधार पर की गयी है।

प्रश्न 7
भारत में पंचायतों की प्राचीनता के प्रमाण किन ग्रन्थों में मिलते हैं ?
उत्तर:
भारत में पंचायतों की प्राचीनता के प्रमाण ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा जातक ग्रन्थों में मिलते है।

प्रश्न 8
स्वतन्त्रता के पश्चात भारत में गाँव पंचायतों के लिए सर्वप्रथम कानून बनाने वाला राज्य कौन-सा था ?
है।
स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में गाँव पंचायतों के लिए सर्वप्रथम कानून बनाने वाला राज्य उत्तरप्रदेश था।

प्रश्न 9
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान में 73वाँ संशोधन किस सन में पारित हुआ ?
उत्तर:
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान में 73वाँ संशोधन सन् 1993 ई० में पारित हुआ।

प्रश्न 10
गाँव सभा की कार्यकारिणी को क्या कहते हैं ? [2011]
उत्तर:
गाँव सभा की कार्यकारिणी को गाँव पंचायत कहते हैं।

प्रश्न 11
गाँव सभा की एक वर्ष में कितनी बैठकें होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
गाँव सभा की एक वर्ष में दो बैठकें होना अनिवार्य है।

प्रश्न 12
ग्राम पंचायत का अध्यक्ष कौन होता है ? [2007, 15]
उत्तर:
ग्राम पंचायत का अध्यक्ष प्रधान होता है।

प्रश्न 13:
ग्राम पंचायत की एक वर्ष में कितनी बैठकें होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
ग्राम पंचायत की साधारणतया प्रत्येक माह में कम-से-कम एक बैठक होगी, लेकिन विशेष परिस्थितियों में किन्हीं भी दो बैठकों के बीच दो माह से अधिक का अन्तर नहीं होगा।

प्रश्न 14
पंचायती राज-व्यवस्था में न्याय देने का कार्य कौन-सी संस्था करती है ?
उत्तर:
पंचायती राज व्यवस्था में न्याय देने का कार्य पंचायती अदालत (न्याय पंचायत) करती है।

प्रश्न 15
भारत एक नगर प्रधान देश है। सही-गलत [2016]
उत्तर:
गलत।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
पंचायती राज से सम्बन्धित संविधान (तिहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1993 कब से प्रभावी हुआ ?
(क) 14 जनवरी, 1993
(ख) 24 जनवरी, 1993
(ग) 14 अप्रैल, 1993
(घ) 24 अप्रैल, 1993

प्रश्न 2
उत्तर प्रदेश पंचायत विधि अधिनियम’ किस सन में पारित हुआ ? [2007]
(क) 2000 ई० में
(ख) 1998 ई० में
(ग) 1995 ई० में
(घ) 1994 ई० में

प्रश्न 3
एक गाँव के सभी वयस्क व्यक्ति निम्नलिखित में से किसके सदस्य होते हैं ?
(क) गाँव सभा के
(ख) गाँव पंचायत के
(ग) पंचायत के
(घ) न्याय पंचायत के

प्रश्न 4
न्याय पंचायत, फौजदारी मुकदमों में अधिकतम दण्ड कितना दे सकती है ?
(क) दो सौ पचास रुपये
(ख) पाँच सौ रुपये
(ग) सौ रुपये
(घ) पचास रुपये

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से कौन-सा कारक पंचायत राज की असफलता से सम्बन्धित है ? [2009]
(क) प्रभावशाली नेतृत्व का अभाव
(ख) अशिक्षा
(ग) जातिवाद एवं गुटबन्दी
(घ) ये सभी

उत्तर:
1. (घ) 24 अप्रैल, 1993,
2. (घ) 1994 ई० में,
3. (क) गाँव सभा के,
4. (क) दो सौ पचास रुपये,
5. (घ) ये सभी।

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