UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 7 निन्दा रस

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name  निन्दा रस
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi गद्य Chapter 7 निन्दा रस

निन्दा रस – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2017, 16, 14, 13, 12, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में पाठ्य-पुस्तक में संकलित पाठों में से लेखकों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछा जाता है। इस प्रश्न में किन्हीं 4 लेखकों के नाम दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक लेखक के बारे में लिखना होगा। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन-परिचय तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ
मध्य प्रदेश में इटारसी के निकट जमानी नामक स्थान पर हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त, 1924 को हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा मध्य प्रदेश में हुई। नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. करने के बाद उन्होंने कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य किया, लेकिन साहित्य सृजन में बाधा का अनुभव करने पर इन्होंने नौकरी छोड़कर स्वतन्त्र लेखन प्रारम्भ किया। इन्होंने प्रकाशक एवं सम्पादक के तौर पर जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका का स्वयं सम्पादन और प्रकाशन किया, जो बाद में आर्थिक कारणों से बन्द हो गई। हरिशंकर परसाई जी ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘धर्मयुग’ तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते रहे। 10 अगस्त, 1995 को इस यशस्वी साहित्यकार का देहावसान हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ
व्यंग्य प्रधान निबन्धों के लिए प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले परसाई जी की दृष्टि लेखन में बड़ी राम के साथ उतरती थी। उनके हृदय में साहित्य सेवा के प्रति कृतज्ञ भाग विद्यमान था। साहित्य-सेवा के लिए परसाई जी ने नौकरी को भी त्याग दिया। काफी समय तक आर्थिक विषमताओं को झेलते हुए भी ये ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन एवं सम्पादन करते रहे। पाठकों के लिए हरिशंकर परसाई एक जाने-माने और लोकप्रिय लेखक हैं।

कृतियाँ
परसाई जी ने अनेक विषयों पर रचनाएँ लिखीं। इनकी रचनाएँ देश की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। परसाई जी ने अपनी कहानियों, उपन्यासों तथा निबन्धों से व्यक्ति और समाज की कमजोरियों, विसंगतियों और आडम्बरपूर्व जीवन पर गहरी चोट की है। परसाई जी की रचनाओं का उल्लेख निम्न प्रकार से किया जा सकता है

  1. कहानी संग्रह हँसते हैं, रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे।।
  2. उपन्यास रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज।
  3. निबन्ध संग्रह तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमान की परत, पगडण्डियों का जमाना, सदाचार की ताबीज, शिकायत मुझे भी है और अन्त में।

भाषा-शैली
परसाई जी ने क्लिष्ट व गम्भीर भाषा की अपेक्षा व्यावहारिक अर्थात् सामान्य बोलचाल की भाषा को अपनाया, जिसके कारण इनकी भाषा में सहजता, सरलता व प्रवाहमयता का गुण दिखाई देता है। इन्होंने अपनी रचनाओं में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया है, जिससे रचना में रोचकता का पुट आ गया है। इस रोचकता को बनाने के लिए परसाई जी ने उर्दू, व अंग्रेजी भाषा के शब्दों तथा कहावतों एवं मुहावरों को बेहद सहजता के साथ प्रयोग किया है, जिसने इनके कथ्य की प्रभावशीलता को दोगुना कर दिया है। इन्होंने अपनी रचनाओं में मुख्यतः व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया और उसके माध्यम से समाज की विभिन्न कुरीतियों पर करारे व्यंग्य किए।

हिन्दी साहित्य में स्थान
हरिशंकर परसाई जी हिन्दी साहित्य के एक प्रतिष्ठित व्यंग्य लेखक थे। मौलिक एवं अर्थपूर्ण व्यंग्यों की रचना में परसाई जी सिद्धहस्त थे। हास्य एवं व्यंग्य प्रधान निबन्धों की रचना करके इन्होंने हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट अभाव की पूर्ति की। इनके व्यंग्यों में समाज एवं व्यक्ति की कमजोरियों पर तीखा प्रहार मिलता है। आधुनिक युग के व्यंग्यकारों में उनका नाम सदैव स्मरणीय रहेगा।

निन्दा रस – पाठ का सार

परीक्षा में पाठ का सार’ से सम्बन्धित कोई प्रश्न नहीं पूछा जाता है। यह केवल विद्यार्थियों को पाठ समझाने के उद्देश्य से दिया गया हैं।

प्रस्तुत निबन्ध ‘निन्दा रस’ में लेखक ने निन्दा करने वाले व्यक्तियों के स्वभाव व प्रकृति का उल्लेख किया है। वह कहता है कि अनेक व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति ईष्र्या भाव से निन्दा करते रहते हैं। कुछ व्यक्ति अपने स्वभाववश, तो कुछ अकारण ही निन्दा करने में रस लेते हैं। इसके अलावा, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के लिए दूसरों की निन्दा में निर्लिप्त भाव से मग्न रहते हैं। कुछ मिशनरी निन्दक होते हैं, तो कुछ अन्य भावों से प्रेरित होकर निन्दा-कार्य में रत रहते हैं।

ईष्र्या भाव से निन्दा अर्थात् प्राणघाती स्नेह
निबन्धकार परसाई जी का कहना है कि कुछ निन्दक ईष्र्या-द्वेष की भावना रखते हुए निन्दा करते हैं और जब उन्हें मौका मिलता है, तब वे ऊपरी तौर पर स्नेह दिखाते हुए अन् पृतराष्ट्र की भाँति प्राणघाती स्नेह दर्शाते हैं। ऐसे निन्दकों से अत्यधिक सतर्क हने की आवश्यकता है और जब भी उनसे मिलें, तो संवेदनाओं को हृदय से निकालकर केवल पुतले रूपी शरीर से ही मिलना चाहिए।

अकारण झूठ बोलने व निन्दा करने की प्रवृत्ति
लेखक का मानना है कि कुछ व्यक्तियों का ऐसा स्वभाव होता है कि वे अकारण ही अपने स्वभाव या प्रकृति के कारण निन्दा करने में रस या आनन्द की अनुभूति करते हैं। ऐसे निन्दक व्यक्ति समाज के लिए अधिक घातक नहीं होते। ये केवल अपना मनोरंजन करते हैं और निन्दा करके सन्तोष प्राप्त करते हैं। मिशनरी निन्दकों का उल्लेख करते हुए लेखक कहता है कि कुछ लोगों का किसी से कोई बैर या द्वेष नहीं होता। वे किसी का बुरा नहीं सोचते, लेकिन 24 घण्टे पवित्र भाव से लोगों की निन्दा करने में लगे रहते हैं। वे अत्यन्त निर्लिप्त, निष्पक्ष भाव से निन्दा करते हैं। ऐसे लोगों के लिए निन्दा टॉनिक की तरह काम करती है।

निन्दा : कुछ लोगों की पूँजी
लेखक का मानना है कि निन्दा करने वाले लोगों में हीनता की भावना होती है। वे हीन भावना का शिकार होते हैं। अपनी हीनता को छिपाने के लिए ही वे दूसरों की निन्दा करते हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण उनमें अकर्मण्यता रच-बस जाती है। इतना ही नहीं, कुछ लोग तो निन्दा को अपनी पूँजी समझने लगते हैं, जैसे एक व्यापारी अपनी पूंजी के प्रति अत्यधिक मोह रखता है और उससे लाभ प्राप्ति की उम्मीद भी करता है। उन्हें लगता है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की निन्दा करके उसे पदच्युत कर उस स्थान पर स्वयं स्थापित हुआ जा सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में गद्य भाग से दो गद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

प्रश्न 1.
ऐसे मौके पर हम अक्सर अपने पुतले को अँकवार में दे देते हैं। ‘क’ से क्या मैं गले मिला? क्या मुझे उसने समेटकर कलेजे से लगा लिया? हरगिज नहीं। मैंने अपना पुतला ही उसे दिया। पुतला इसलिए उसकी भुजाओं में सौंप दिया कि मुझे मालूम था कि मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हैं। पिछली रात को एक मित्र ने बताया कि ‘क’ अपनी ससुराल आया है और ‘ग’ के साथ बैठकर शाम को दो-तीन घण्टे तुम्हारी निन्दा करता रहा। इस सूचना के बाद जब आज सबेरे वह मेरे गले लगा तो मैंने शरीर से अपने मन को चुपचाप खिसका दिया और नि:स्नेह, कैंटीली देह उसकी बाहों में छोड़ दी। भावना के अगर काँटे होते, तो उसे मालूम होता है कि वह नागफनी को कलेजे से चिपटाए है। छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है? इसके लेखक का नाम भी लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश ‘निन्दा रस’ पाठ से लिया गया है, इसके लेखक का नाम ‘हरिशंकर परसाई है।

(ii) ईष्र्या-द्वेष की भावनाओं से युक्त मित्र से कैसे गले मिलना चाहिए।
उत्तर:
ईष्र्या-द्वेष की भानवाओं से युक्त मित्र यदि गले मिले तो उससे संवेदना शून्य भावहीन होकर ही गले मिलना चाहिए, क्योंकि गले मिलने के लिए जिन भावनाओं और संवेदनाओं की आवश्यकता होती है वे भावनाएँ ईष्र्या-द्वेष की भावनाओं में दब जाती हैं। अतः ऐसे मित्रों से सावधान रहना चाहिए।

(iii) लेखक अपने मित्र ‘क’ से किस प्रकार गले मिला?
उत्तर:
जब लेखक को अपने किसी अन्य भित्र से यह ज्ञात होता है कि मित्र ‘क’ किसी ‘ग’ नाम के व्यक्ति के साथ बैठकर उसकी निन्दा करता है, तब लेखक उससे भावहीन व संवेदनाहीन होकर ही गले मिलता है।

(iv) “छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए” से लेखक का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लेखक कहता है कि जिस प्रकार धृतराष्ट्र ने ईष्र्या-द्वेष के कारण भीम के पुतले को भीम समझकर नष्ट कर दिया था, उसी प्रकार धृतराष्ट्र के समान छली एवं कपटी व्यक्ति तुमसे गले मिले तो भावनाओं से शून्य रहित होकर पुतले के समान ही गले लगाना चाहिए।

(v) ‘छल’ एवं ‘देह’ शब्दों के पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर:
छल कपट, धोखा देह- शरीर, गति।।

प्रश्न 2.
कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं। वे आदतन, प्रकृति के वशीभूत झूठ बोलते हैं। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रयोजन झूठ ही निकलता है। मेरे एक रिश्तेदार ऐसे हैं। वे अगर बम्बई (मुम्बई) जा रहे हैं और उनसे पूछे, तो वह कहेंगे, “कलकत्ता (कोलकाता) जा रहा हूँ।” ठीक बात उनके मुँह से निकल ही नहीं सकती। ‘क’ भी बड़ा निर्दोष, सहज-स्वाभाविक मिथ्यावादी है। अद्भुत है मेरा यह मित्र। उसके पास दोषों का ‘केटलॉग’ है। मैंने सोचा कि जब वह हर परिचित की निन्दा कर रहा है, तो क्यों न मैं लगे हाथ विरोधियों की गत, इसके हाथों करा लें। मैं अपने विरोधियों का नाम लेता गया और वह उन्हें निन्दा की तलवार से काटता चला। जैसे लकड़ी चीरने की आरा मशीन के नीचे मजदूर लकड़ी का लट्ठा खिसकाता जाता है और वह चिरता जाता है, वैसे ही मैंने विरोधियों के नाम एक-एक कर खिसकाए और वह उन्हें काटता गया। कैसा आनन्द था। दुश्मनों को रण-क्षेत्र में एक के बाद एक कटकर गिरते हुए देखकर योद्धा को ऐसा ही सुख होता होगा।

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) निर्दोष मिथ्यावादी लोग कौन होते हैं?
उत्तर:
जिन लोगों को बिना किसी प्रयोजन तथा बिना किसी प्रयास के झूठ बोलने की। आदत होती है, उन्हें लेखक ने निर्दोष मिथ्यावादी बताया है। ऐसे लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि बिना किसी कारण के उनके मुंह से झूठ स्वतः ही निकल जाता

(ii) लेखक अपने मित्र ‘क’ की तुलना किससे करता है?
उत्तर:
लेखक अपने मित्र ‘क’ की तुलना अपने एक ऐसे रिश्तेदार से करते हैं, जो कभी भी सत्य नहीं बोलता है, यदि उस रिश्तेदार से एक सामान्य सा प्रश्न किया जाए कि तुम कहाँ जा रहे हो, तो वह कभी भी सही स्थान का नाम नहीं बताता, क्योंकि उसे झूठ बोलने की स्वभावगत आदत है।

(iii) लेखक का निन्दक मित्र उसके विरोधियों की निन्दा किस प्रकार करता है?
उत्तर:
जिस प्रकार कोई मजदूर लकड़ी काटने वाली आरा मशीन के सामने लट्ठा खिसकाता जाता है और मशीन लकड़ी को चीरती जाती हैं, ठीक उसी प्रकार * लेखक का निन्दक मित्र उसके विरोधियों को अपनी निन्दा रूपी मशीन से काटता चला जाता है।

(iv) लेखक अपने विरोधियों की निन्दा सुनकर किस प्रकार आनन्दित होता है?
उत्तर:
लेखक अपने विरोधियों की निन्दा सुनकर उसी प्रकार आनन्दित होता है, जिस प्रकार रणभूमि में योद्धा को अपने दुश्मनों को एक के बाद एक कटा हुआ देखकर आत्म-सन्तोष एवं आनन्द मिलता है।

(v) स्वाभाविक’ एवं ‘निर्दोष’ शब्दों में क्रमशः प्रत्यय एवं उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
स्वाभाविक – इक (प्रत्यय)
निर्दोष – निर (उपसर्ग)।

प्रश्न 3.
मेरे मन में गत रात्रि के उस निन्दक मित्र के प्रति मैल नहीं रहा। दोनों एक हो गए। भेद तो रात्रि के अन्धकार में ही मिटता है, दिन के उजाले में भेद स्पष्ट हो जाते हैं। निन्दा का ऐसा ही भेद-नाशक अँधेरा होता है। तीन-चार घण्टे बाद, जब वह विदा हुआ, तो हम लोगों के मन में बड़ी शान्ति और तुष्टि थी। निन्दा की ऐसी ही महिमा है। दो-चार निन्दकों को एक जगह बैठकर निन्दा में निमग्न देखिए और तुलना कीजिए उन दो-चार ईश्वर- भक्तों से जो रामधुन लगा रहे हैं। निन्दकों की-सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता भक्तों में दुर्लभ है। इसलिए सन्तों ने निन्दकों को ‘आँगन कुटी छवाय’ पास रखने की सलाह दी है।

दिए गए गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) अपने निन्दक मित्र के प्रति लेखक का व्यवहार किस प्रकार परिवर्तित हो गया?
उत्तर:
जब तक लेखक का निन्दक मित्र अपने परिचितों की निन्दा करता रहता है तब तक लेखक को उसका व्यवहार अच्छा नहीं लगता, किन्तु जैसे ही वह लेखक के विरोधियों को निन्दा रूपी मशीन से काटना प्रारम्भ करता है, तो लेखक को बहुत ही आग-सन्तोष प्राप्त होता है और उसका व्यवहार अपने मित्र के प्रति परिवर्तित हो गया अर्थात् विनम्र हो गया।

(ii) निन्दक प्रशंसक लोगों के मन को शान्ति एवं सन्तुष्टि कब प्राप्त होती है?
उत्तर:
निन्दा की वैचारिक समानता के कारण निन्दक प्रशंसक लोगों के मन शान्त एवं तृप्त हो जाते हैं तथा एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए जब वे एक दूसरे से विदा होते हैं, तो उनके मन को बड़ी शान्ति एवं सन्तुष्टि प्राप्त होती है।

(iii) निन्दा कर्म में डूबे निन्दकों की तुलना लेखक ने किससे की है और क्यों?
उत्तर:
निन्दा कर्म में हुये निन्दकों की तुलना लेखक ने ईश्वर भक्ति में बैठे उपासकों से की हैं, क्योंकि जिस तल्लीनता के साथ निन्दक अपना निन्दा कर्म करते हैं, वैसी तल्लीनता ईश्वर भक्ति में लीन भक्तों में भी नहीं पाई जा सकती है।

(iv) लेखक के अनुसार सन्तों ने निन्दक को अपने साथ रखने के लिए क्यों कहा है?
उत्तर:
निन्दकों की निन्दा कर्म में तल्लीनता, एकाग्रता और परस्पर शुद्ध स्नेह भाव से डूबे होने के स्वभाव के कारण ही सन्तों ने निन्दक को अपने साथ रखने के लिए कहा है।

(v) ‘आत्मीयता’ तथा ‘निमग्न’ शब्दों में क्रमशः प्रत्यय एवं उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
आत्मीयता-ईय, ता (प्रत्यय), निमग्न–नि (उपसर्ग)

प्रश्न 4.
कुछ ‘मिशनरी’ निन्दक मैंने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते। पर चौबीसों घण्टे वे निन्दा कर्म में बहुत पवित्र भाव से लगे रहते हैं। उनकी नितान्त निर्लिप्तता, निष्पक्षता इसी से मालूम होती है कि वे प्रसंग आने पर अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस आनन्द से अन्य लोग दुश्मन की। निन्दा इनके लिए ‘टॉनिक’ होती है। ट्रेड यूनियन के इस जमाने में निन्दकों के संघ बन गए हैं। संघ के सदस्य जहाँ-तहाँ से खबरें लाते हैं और अपने संघ के प्रधान को सौंपते हैं। यह कच्चा माल हुआ, अब प्रधान उनका पक्का माल बनाएगा और सब सदस्यों को ‘बहुजन हिताय’ मुफ्त बाँटने के लिए दे देगा। यह फुरसत का काम है, इसलिए जिनके पास कुछ और करने को नहीं होता, वे इसे बड़ी खूबी से करते है?

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) लेखक मिशनरी निन्दक किसे कहता है?
उत्तर:
जो निन्दक केवल निन्दा कर्म को ही धर्म समझते हैं लेखक ने उन्हें मिशनरी निन्दक कहा है। ऐसे निन्दकों में किसी के प्रति कोई मनमुटाव अथवा शत्रुता का भाव नहीं होता। ये पूरे शुद्ध भाव से दूसरों की निन्दा करने के कर्म में लगे रहते हैं।

(ii) लेखक के अनुसार निन्दक लोगों की निष्पक्षता का प्रमाण क्या है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार निन्दक लोगों की निष्पक्षता का प्रमाण यह है कि वे अपने पिता की निन्दा भी उसी शुद्ध भाव के साथ करते हैं, जिस शुद्ध भाव से अपने दुश्मन की करते हैं, क्योंकि निन्दा कर्म के आगे वे किसी को बाधक नहीं बनने देना चाहते हैं।

(iii) संघ के सदस्य किस कार्य को पूरी लगन एवं निष्ठा के साथ करते हैं?
उत्तर:
लेखक के अनुसार निन्दकों ने अपने निन्दा के कारोबार को बढ़ाने के लिए संघ निर्मित कर लिए हैं। संघ के सदस्य इधर-उधर से निन्दा की खबरें लाकर संघ के प्रमुख को सौंपने का कार्य पूरी लगन एवं निष्ठा के साथ करते हैं।

(iv) वर्तमान समय में निन्दा का कार्य कौन व्यक्ति बड़ी कुशलता से सम्पन्न कर सकता है?
उत्तर:
निन्दा करने एवं सुनने के लिए व्यक्ति के पास फुरसत होनी चाहिए। वर्तमान समय में निन्दा का कार्य कर्महीन व्यक्ति ही कुशलता से कर सकते हैं, क्योंकि इस पवित्र कार्य को करने में वे निपुण होते हैं।

(v) ‘कच्चा’ एवं ‘दुश्मन’ शब्द के विलोम शब्द लिखिए।
उत्तर:
शब्द विलोम शब्द
कच्चा – पक्का दुश्मन – दोस्त।

प्रश्न 5.
ईष्र्या द्वेष से प्रेरित निन्दा भी होती है, लेकिन इसमें वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निन्दा करने में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुःखी होता है। ईष्र्या-द्वेष से चौबीसों घण्टे जलता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शान्ति अनुभव करता है। ऐसा निन्दक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईष्र्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करने वाले को कोई दण्ड देने की जरूरत नहीं है। वह निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए?

उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) लेखक के अनुसार निन्दा कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
लेखक के अनुसार निन्दा दो प्रकार की होती है, एक निन्दा ईष्र्या-द्वेष से प्रेरित होकर की जाती है तथा दूसरी निन्दा मिशनरी भाव से की हाती हैं। इसमें निन्दक उसी भाव से निन्दा करता है, जैसे मिशनरी अपने धर्म का प्रचार करते हैं।

(ii) ईष्र्या-द्वेष से निन्दा करने वाले निन्दक की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
ईष्र्या-द्वेष से की गई निन्दा में निन्दक बड़ा दुःखी रहता है क्योंकि वह चौबीसों घण्टे ईष्र्या से जलता रहता है। वह दूसरे के सफलता पी चाँद को देखकर अपनी असफलता से दुःखी होकर श्वान की तरह सारी रात भौकता रहता है। इस प्रकार ईष्र्या-द्वेष से निन्दा करने वाले निन्दक की स्थिति बड़ी दयनीय होती है।

(iii) लेखक के अनुसार ईष्र्या-द्वेष से प्रेरित होकर निन्दा करने वाले व्यक्ति किस प्रकार स्वयं को दण्डित करते हैं?
उत्तर:
ईष्र्या-क्षेत्र से प्रेरित होकर निन्दा करने वाले व्यक्ति ईष्र्या की जलन में सारी रात जलते रहते हैं। अतः लेखक के अनुसार ईष्र्या-वेष से निन्दा करने वाले निन्दक स्वयं को दण्डित करते रहते हैं।

(iv) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने किस शैली का प्रयोग किया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने व्यंग्यात्मक एवं विवेचनात्मक शैली का प्रयोग करते हुए लोगों की निन्दा करने की प्रवृत्ति पर कटाक्ष करके उसे विभिन्न उदाहरणों के द्वारा स्पष्ट किया है।

(v) ‘दयनीय’ और ‘दण्डित’ शब्दों में क्रमशः प्रत्यय छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
‘दयनीय’-अनीय (प्रत्यय), दण्डित-इत (प्रत्यय)

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi राजनीतिक निबन्ध

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1. भारत में लोकतन्त्र का भविष्य
अन्य शीर्षक भारतीय लोकतन्त्र एवं राजनीति
संकेत बिन्दु प्रजातन्त्र का अर्थ, भारत में प्रजातन्त्र का गठन, प्रजातन्त्र के प्रकार, सरकार के अंग, प्रजातन्त्र के लाभ, प्रजातन्त्र से हानियां, उपसंहार।

प्रजातन्त्र का अर्थ ‘प्रजातन्त्र’ शब्द ग्रीक भाषा से अवतरित अंग्रेजी शब्द ‘Democracy’ का हिन्दी रूपान्तर है, जिसका अर्थ होता है-प्रजा अर्थात् जनता द्वारा परिचालित शासन व्यवस्था। वैसे तो प्रजातन्त्र की कई परिभाषाएँ अब तक दी गई है, किन्तु उनमें अब्राहम लिंकन द्वारा दी गई परिभाषा सर्वाधिक मान्य एवं प्रचलित है। उनके अनुसार, “प्रजातन्त्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन है।”

इस तह, प्रजातन्त्र में जनता में ही प्रशासन की सम्पूर्ण शक्ति विद्यमान होती है, उसकी सहमति से ही शासन होता है एवं उसकी प्रगति ही शासन का एकमात्र लक्ष्य होता है। हालाँकि सभ्यता की शुरूआत में शासन व्यवस्था के रूप में राजतन्त्र की ही प्रमुखता थी, किन्तु इस शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह थी कि प्रायः इसमें आम जनता को अपनी बात रखने का अधिकार नहीं होता था।

भारत में प्रजातन्त्र का गठन आज प्रजातन्त्र एक शक्तिशाली प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में उभर चुका है और भारत विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश के रूप में जाना जाता है। यदि हम भारतीय इतिहास पर नजर डालें, तो तीसरी शताब्दी में भारत के सोलह जनपदों में वैशाली एक ऐसा जनपद था, जहाँ गणतान्त्रिक शासन व्यवस्था विद्यमान थी, किन्तु आधुनिक प्रजातन्त्र की उत्पत्ति का स्थल यूरोप को ही माना जा सकता है, क्योकि इसकी नींव मध्यकाल की बारहवीं एवं तेरहवीं शताब्दी के बीच विभिन्न यूरोपीय देशों में राजतन्त्र के विरोध के साथ पड़ी। यूरोप में पुनर्जागरण एवं धर्म सुधार आन्दोलनों ने प्रजातन्त्रात्मक सिद्धान्तों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन आन्दोलनों ने व्यक्ति की धार्मिक स्वतन्त्रता पर बल दिया तथा राजा की शक्ति को सीमित करने के प्रयत्न किए।

प्रजातन्त्र के प्रकार सामान्यतः प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था दो प्रकार की मानी जाती है-प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र एवं अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र। वह शासन व्यवस्था जिसमें देश के समस्त नागरिक प्रत्यक्ष रूप से राज्य कार्य में भाग लेते हैं, प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र कहा जाता है। अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि शासन चलाते हैं।

व्यवस्था के दृष्टिकोण से प्रजातन्त्र के दो रूप होते हैं—संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक। संसदात्मक व्यवस्था में जनता एक निश्चित अवधि के लिए संसद सदस्यों का निर्वाचन करती हैं। संसद द्वारा मन्त्रिमण्डल का निर्माण होता है। मन्त्रिमण्डल संसद के प्रति एवं संसद सदस्य जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। संसदात्मक प्रजातन्त्र में राष्ट्रपति यद्यपि सर्वोच्च पद पर आसीन होता है, किन्तु वह नाममात्र का शासक होता है। भारत में शासन प्रणाली की संसदात्मक व्यवस्था है। अध्यक्षात्मक प्रजातन्त्र प्रणाली में राष्ट्रपति सर्वाधिक शक्तिशाली होता है। अमेरिका जैसे देशों में ऐसी ही प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था है।

सरकार के अंग प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में सरकार के तीन अंग होते हैं—विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका। विधायिका का कार्य कानून का निर्माण करना, कार्यपालिका का कार्य उन कानूनों का सही ढंग से क्रियान्वयन करना एवं न्यायपालिका का कार्य कानून का उल्लंघन करने वाले लोगों को दण्डित करना है। इस प्रकार सरकार के तीनों अंग प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था को सशक्त बनाते हैं।

प्रजातन्त्र के लाभ प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था के अनेक लाभ हैं। प्रजातान्त्रिक शासन में राज्य की अपेक्षा व्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाता है। राज्य व्यक्ति के विकास के लिए पूर्ण अवसर प्रदान कराता है। जिस तरह व्यक्ति और समाज को अलग करके दोनों के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती, ठीक उसी प्रकार प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में प्रजा और सरकार को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

प्रजातन्त्र से हानियाँ प्रजातन्त्र के कई लाभ हैं, तो कई हानियां भी हैं। प्रजातन्त्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि जनता शिक्षित हो एवं अपना हित समझती हो। जनता के अशिक्षित होने की स्थिति में स्वार्थी लोग धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के आधार पर लोगों को भ्रमित कर सत्ता में आ जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता है कि धनी एवं भ्रष्टाचारी लोग गरीब जनता को धन का प्रलोभन देकर या अपने प्रभाव से सत्ता पाने में कामयाब रहते हैं। प्रौद्योगिकी में विकास के बाद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आम चुनाव में शामिल करने से यद्यपि चुनाव में होने वाले भ्रष्टाचार में कमी हुई है, किन्तु यदि जनता समझदार न हो तो अभी भी भ्रष्ट उम्मीदवार को निर्वाचित होने से नहीं रोका जा सकता। प्रजातन्त्र के बारे में मुहम्मद इकबाल ने लिखा है

जम्हूरियत वह तर्ज-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बन्दों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।”

अर्थात् प्रजातन्त्र ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें बहुमत के आधार पर जन-प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता हैं न कि उम्मीदवारों की योग्यता के आधार पर। इस तरह यदि जनता शिक्षित एवं समझदार न हो तो इस बात की सम्भावना है कि वह ऐसे आदमी को बहुमत दे, जो योग्य न हो। प्रजातन्त्र की एक और कमी यह है कि जनता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से शासन नहीं करती, बल्कि शासन के लिए प्रतिनिधि चुनती हैं। चुने गए प्रतिनिधि के जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने की स्थिति में, देश एवं समाज का कभी भला नहीं हो सकता। इसलिए राजनीतिशास्त्र के विद्वान् प्लेटो ने प्रजातन्त्र को मुख का शासन कहा है। प्रजातन्त्र का एक और दोष यह है कि न्यायपालिका सरकार का मुख्य अंग होने के बावजूद समय पर न्याय नहीं कर पाती, क्योंकि न्यायपालिका पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार नहीं होता।

उपसंहार निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि यदि जनता अशिक्षित हो या अधिक समझदार न हो तब प्रजातन्त्र की कमियाँ अधिक बढ़ सकती हैं, किन्तु यदि जनता शिक्षित एवं समझदार हो तो इसे सर्वोत्तम शासन व्यवस्था कहा जा सकता है, क्योंकि इस प्रणाली में ही जनता को अपनी बात कहने का पूर्ण अधिकार होता है। निश्चय ही आज कहा जा सकता है कि भारतवर्ष में प्रजातन्त्र का भविष्य दीर्घकालिक एवं सुखद है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 8 सुभाषित रत्नानि

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name सुभाषित रत्नानि
Number of Questions Solved 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 8 सुभाषित रत्नानि

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

श्लोक 1
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्या हि मधुरं काव्यं तस्मादपि सुभाषितम्।। (2013, 11)
सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘सुभाषितरत्नानि’ नामक पाठ’ से उदधृत है।
अनुवाद सभी भाषाओं में देववाणी (संस्कृत) सर्वाधिक प्रधान, मधुर और दिव्य है। निश्चय ही उसका काव्य (साहित्य) मधुर है तथा उससे (काव्य से) भी अधिक मधुर उसके सुभाषित (सुन्दर वचन या सूक्तियाँ) हैं।

श्लोक 2
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।। (2018, 11, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद सुख चाहने वाले (सुखार्थी) को विद्या कहाँ तथा विद्या चाहने वाले (विद्यार्थी) को सुख कहाँ! सुख की इच्छा रखने वाले को विद्या पाने की चाह त्याग देनी चाहिए और विद्या की इच्छा रखने वाले को सुख त्याग देना चाहिए।

श्लोक 3
जल-बिन्दु-निपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।। (2010)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद बूंद-बूंद अल गिरने से क्रमशः घड़ा भर जाता है। यही सभी विद्याओं, धर्म तथा धन का हेतु (कारण) है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि विद्या, धर्म एवं धन की प्राप्ति के लिए उद्यम के साथ-साथ धैर्य का होना भी आवश्यक है, क्योंकि इन तीनों का संचय धीरे-धीरे ही होता है।

श्लोक 4
काव्य-शास्त्र-विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।। (2017, 10)
सन्दर्म पूर्ववत्।
अनुवाद बुद्धिमान लोगों का समय काव्य एवं शास्त्रों (की चर्चा) के आनन्द में व्यतीत होता है तथा मूर्ख लोगों का समय बुरी आदतों में, सोने में एवं झगड़ा झंझट में व्यतीत होता है।

श्लोक 5
न चौरहार्यं न च राजहार्य
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्द्धत एवं नित्यं ।
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्। (2018, 16, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद विद्यारूपी धन सभी धनों में प्रधान है। इसे न तो चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई बाँट सकता है और न तो यह बोझ ही बनता है। यहाँ कहने का तात्पर्य है कि अन्य सम्पदाओं की भाँति विद्यारूपी धन घटने वाला नहीं है। यह धन खर्च किए जाने पर और भी बढ़ता जाता है।
विशेष-

  1.  शास्त्र में अन्यत्र भी विद्या को श्रेष्ठ सिद्ध करते हुए कहा गया
    है-‘स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।’
  2.  इस दोहे में भी विद्या को इस प्रकार महिमामण्डित किया गया है।
    ‘सरस्वती के भण्डार की बड़ी अपूरब बात।।
    ज्यों खर्च त्यों-त्यों बढे, बिन खर्चे घट जात।।”

श्लोक 6
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्ष प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्।। (2018, 17, 14, 12, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद पीछे कार्य को नष्ट करने वाले तथा सम्मुख प्रिय (मीठा) बोलने वाले मित्र का उसी प्रकार त्याग कर देना चाहिए, जिस प्रकार मुख पर दूध लगे विष से भरे घड़े को छोड़ दिया जाता है।

श्लोक 7
उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तुमेति च।।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।। (2017, 11, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद महान् पुरुष सम्पत्ति (सुख) एवं विपत्ति (दुःख) में उसी प्रकार एक समान रहते हैं, जिस प्रकार सूर्य उदित होने के समय भी लाल रहता है और अस्त होने के समय भी। यह कहने का तात्पर्य यह है कि महान् अर्थात् ज्ञानी पुरुष को सुख-दुःख प्रभावित नहीं करते। न तो वह सुख में अत्यन्त आनन्दित ही होता है और न दुःख में हतोत्साहित

श्लोक 8
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खुलस्य साधोः विपरीतुमेत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।। (2016, 14, 13, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत् ।
अनुवाद दुष्ट व्यक्ति की विद्या वाद-विवाद (तर्क-वितर्क) के लिए, सम्पत्ति घमण्ड के लिए एवं शक्ति दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए होती है। इसके विपरीत सज्जन व्यक्ति की विद्या ज्ञान के लिए, सम्पत्ति दान के लिए एवं शक्ति रक्षा के लिए होती है।

श्लोक 9
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ।। (2018, 14, 12, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद बिना सोचे-विचारे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। अज्ञान परम आपत्तियों (घोर संकट) का स्थान (आश्रय) है। सोच-विचारकर कार्य करने वाले व्यक्ति का गुणों की लोभी अर्थात् गुणों पर रीझने वाली सम्पत्तियाँ (लक्ष्मी) स्वयं वरण करती हैं। यहाँ कहने का अर्थ यह है कि ठीक प्रकार से विचार कर किया गया कार्य ही सफलीभूत होता है, अति शीघ्रता से बिना विचारे किए गए कार्य का परिणाम सर्वदा अहितकर ही होता है।

श्लोक 10
वज्रादपि कठोराणि मृदृनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को न विज्ञातुमर्हति।। (2017, 12, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद असाधारण पुरुषों अर्थात् महापुरुषों के वज्र से भी कठोर तथा पुष्प से भी कोमल चित्त (हृदय) को भला कौन जान सकता है?

श्लोक 11
प्रीणाति यः सुचरितैः पितरं स पुत्रो
यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते।। (2017, 13, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद अपने अच्छे आचरण (कर्म) से पिता को प्रसन्न रखने वाला पुत्र, (सदा) पति का हित (अर्थात् भला चाहने वाली पत्नी तथा आपत्ति (दुःख) एवं सुख में एक जैसा व्यवहार करने वाला मित्र, इस संसार में इन तीनों की प्राप्ति पुण्यशाली व्यक्ति को ही होती है।

श्लोक 12
कामान् दुग्धे विप्रकर्षत्यलक्ष्मी
कीर्ति सूते दुष्कृतं या हिनस्ति।
शुद्धां शान्तां मातरं मङ्गलानां
धेनुं धीराः सूनृतां वाचमाहुः ।। (2011)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद धैर्यवानों (ज्ञानियों) ने सत्य एवं प्रिय (सुभाषित) वाणी को शुद्ध, शान्त एवं मंगलों की मातारूपी गाय की संज्ञा दी है, जो इच्छाओं को दुहती अर्थात् पूर्ण करती है, दरिद्रता को हरती है, कीर्ति अर्थात् यश को जन्म देती। है एवं पाप का नाश करती हैं। इस प्रकार यहाँ सत्य और प्रिय (मधुर) वाणी को मानव की सिद्धियों को पूर्ण करने वाली बताया गया है।

श्लोक 13
व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतुः
न खलु बहिरुपाधी प्रीतयः संश्रयन्ते।
विकसति हि पतङ्गस्योदये पुण्डरीकं
द्रवति च हिमरश्मावुद्गतेः चन्द्रकान्तः।। (2012)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद पदार्थों को मिलाने वाला कोई आन्तरिक कारण ही होता है। निश्चय ही प्रीति | (प्रेम) बाह्य कारणों पर निर्भर नहीं करती; जैसे-कमल सूर्य के उदय होने पर ही खिलता है। और चन्द्रकान्त-मणि चन्द्रमा के उदय होने पर ही द्रवित होती हैं।

श्लोक 14
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा ।
न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।। (2016, 13, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद नीति में दक्ष लोग निन्दा करें या स्तुति; चाहे लक्ष्मी आए या स्व-इच्छा से चली जाए; मृत्यु आज ही आए या फिर युगों के पश्चात्, धैर्यवान पुरुष न्याय-पथ से थोड़ा भी विचलित नहीं होते। | इस प्रकार यहाँ यह बताया गया है कि धीरज धारण करने वाले लोग कर्म-पथ पर अडिग होकर चलते रहते हैं जब तक उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।

श्लोक 15
ऋषयो राक्षसीमाहुः वाचमुन्मत्तदृप्तयोः।
सा योनिः सर्ववैराणां सा हि लोकस्य निऋतिः।। (2014, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद ऋषियों ने उन्मत्त तथा अहंकारी लोगों की वाणी को राक्षसी वाणी कहा है, जो | सभी प्रकार के बैरों को जन्म देने वाली एवं संसार की विपत्ति का कारण होती है।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) में से चार अति लघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

प्रश्न 1.
विद्याप्राप्यर्थं विद्यार्थी किं त्यजेत्? अथवा विद्यार्थी किं त्यजेत? (2017, 14, 13, 11)
उत्तर:
विद्याप्राप्यर्थं विद्यार्थी सुखं त्यजेत्।।

प्रश्न 2.
धीमतां कालः कथं गच्छति? (2015, 12, 11, 10)
उत्तर:
धीमता कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति।।

प्रश्न 3.
मूर्खाणां कालः कथं गच्छति? (2018, 17, 12)
उत्तर:
मूर्खाणां कालः व्यसनेन, निद्रया कलहेन वा गच्छति।

प्रश्न 4.
सर्वधनप्रधानं किं धनम् अस्ति?
उत्तर:
सर्वधनप्रधानं विद्याधनम् अस्ति।।

प्रश्न 5.
खलस्य विद्या किमर्थं भवति? (2016)
उत्तर:
खलस्य विद्या विवादाय भवति।

प्रश्न 6.
लोकोत्तराणां चेतांसि कीदृशानि भवन्ति? (2017, 19)
उत्तर:
लोकोत्तराणां चेतांसि वज्रादपि कठोराणि कुसुमादपि च कोमलानि भवन्ति।

प्रश्न 7. पुण्डरीकं कदा विकसति (2018, 14, 10)
उत्तर:
पुण्डरीकं सूर्य उदिते विकसति।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 7 महर्षिर्दयानन्दः

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name महर्षिर्दयानन्दः
Number of Questions Solved 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 7 महर्षिर्दयानन्दः

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

गद्यांश 1
सौराष्ट्रप्रान्ते टङ्कारानाम्नि ग्रामे श्रीकर्षणतिवारीनाम्नो धनाढ्यस्य
औदीच्यविप्रवंशीयस्य धर्मपत्नी शिवस्य पार्वतीव भाद्रमासे नवम्यां तिथौ गुरुवासरे
मूलनक्षत्रे एकाशीत्युत्तराष्टादशशततमे (1881) वैक्रमाब्दे पुत्ररत्नमजनयत्।।
जन्मतः दशमे दिने ‘शिवं भजेदयम्’ इति बुद्धया पिता स्वसुतस्य मूलशङ्कर इति
नाम अकरोत् अष्टमे वर्षे चास्योपनयनमकरोत्। त्रयोदशवर्ष प्राप्तवतेऽस्मै
मूलशङ्कराय पिता शिवरात्रिव्रतमाचरितुम् अकथयत्। पितुराज्ञानुसार मूलशङ्करः
सर्वमपि व्रतविधानमकरोत्। रात्रौ शिवालये स्वपित्रा समं सर्वान् निद्रितान् विलोक्य
स्वयं जागरितोऽतिष्ठत् शिवलिङ्गस्य चोपरि मूषिकमेकमितस्ततः विचरन्तं दृष्ट्वा
शहितमानसः सत्यं शिवं सुन्दरं लोकशङ्करं शङ्करं साक्षात्कर्तुं हृदि निश्चितवान्
ततः प्रभृत्येव शिवरात्रेः उत्सवः ‘ऋषिबोधोत्सवः’ इति नाम्ना
श्रीमद्दयानन्दानुयायिनाम् आर्यसमाजिनां मध्ये प्रसिद्धोऽभूत्।

सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महर्षिर्दयानन्दः’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद सौराष्ट्र प्रान्त के टंकारा नामक ग्राम में उत्तरी ब्राह्मणवंश के श्रीकर्षण तिवारी नामक धनी सेठ की पत्नी ने, ‘भगवान शिव की पत्नी पार्वती की भौति विक्रम सम्वत् 1881 के भाद्रपद मास की नवमी तिथि, गुरुवार को मूल नक्षत्र में पुत्ररत्न को जन्म दिया।

‘यह भगवान शिव को भजे’ ऐसा विचार कर पिता ने जन्म के दसवें दिन अपने पुत्र का नाम ‘मूलशंकर’ रखा तथा आठवें वर्ष में इनका यज्ञोपवीत संस्कार किया। तेरह वर्ष पूर्ण होने पर मूलशंकर को पिता ने शिवरात्रि का व्रत रखने के लिए कहा। पिता की आज्ञा के अनुसार मूलशंकर ने व्रत के समस्त विधान पूर्ण किए।

रात्रि में शिवालय में अपने पिता संग सबको सोया देख ये स्वयं जागे बैठे रहे तथा शिवलिंग पर एक चूहे को इधर-उधर घूमता देख इनका मन सशंकित हो उठा। (इन्होंने) सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् लोक मंगलकारी भगवान शंकर का साक्षात्कार करने का हृदय में निश्चय किया। तभी से लेकर श्रीमान दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाजियों में शिवरात्रि का उत्सव ‘ऋषिबौधोत्सव’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

विशेष महर्षि दयानन्द को ज्ञान प्राप्त होने को ‘ऋषिबोधोत्सव’ नाम से जाना जाता है।

गद्यांश 2
यदा अयं षोडशवर्षदेशीयः आसीत् तदास्य कनीयसी भगिनी विधूचिकया पञ्चत्वं गता। वर्षत्रयानन्तरमस्य पितृव्योऽपि दिवङ्गतः। द्वयोरनयः मृत्युं दृष्ट्वा आसीदस्य मनसि कथमुहं कथंवायं लोकः मृत्युभयात् मुक्तः स्यादिति चिन्तयतः एवास्य हदि सहसैव वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः। एकस्मिन् दिवसे अस्तङ्गते भगवति भास्वति मूलशङ्करः गृहमत्यजत्। (2017)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद जब ये लगभग सोलह वर्ष के थे, तब इनकी छोटी बहन की मृत्यु हैजे से हो गई। तीन वर्षों के उपरान्त इनके चाचा भी स्वर्ग सिधार गए। इन दोनों की मृत्यु देख इनके मन में (प्रश्न) उठा कि मृत्यु के भय से कैसे मुझे और कैसे इस जग को मुक्ति मिल सकती है? ऐसा विचार करते हुए इनके हृदय में सहसा वैराग्य का दीपक जल उठा। एक दिन भगवान सूर्य के अस्त होने के उपरान्त मूलशंकर ने घर त्याग दिया।

गद्यांश 3
सप्तदशवर्षाणि यावत् अमरत्वप्राप्त्युपायं चिन्तयन् मूलशङ्करः आमाद् ग्राम, नगरानगरं, वनाद् वनं, पर्वतात् पर्वतमभ्रमत् परं नाविन्दतातितरां तृप्तिम् । अनेकेभ्यो विद्वद्भ्यः व्याकरण-वेदान्तादीनि शास्त्राणि योगविद्याश्च अशिक्षत्। नर्मदातटे च पूर्णानन्दसरस्वतीनाम्नः संन्यासिनः सकाशात् संन्यासं गृहीतवान् ‘दयानन्दसरस्वती’ इति नाम च अङ्गीकृतवान्। (2016, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद मूलशंकर सत्रह वर्ष तक अमरता प्राप्ति के उपाय पर विचार करते हुए गाँव-गाँव, शहर-शहर, वन-वन, पर्वत-पर्वत घूमते रहे, किन्तु सन्तुष्टि नहीं पा सके। अनेक विद्वानों से व्याकरण, वेदान्त आदि शास्त्र तथा योग विद्या सीखी। इन्होंने नर्मदा नदी के तट पर ‘पूर्णानन्द सरस्वती’ नाम के संन्यासी से संन्यास ग्रहण कर ‘दयानन्द सरस्वती’ नाम अंगीकार किया।

गद्यांश 4
गुरुः विरजानन्दोऽपि कुशाग्रबुद्धिमिमं दयानन्दं त्रीणि वर्षाणि यावत् पाणिनेः
अष्टाध्यायींमन्यानि च शास्त्राणि अध्यापयामास। समाप्तविद्यः दयानन्दः परमया
श्रद्धया गुरुमवदत्-भगवन् ! अहम् अकिञ्चनतया तनुमनोभ्यां समं केवलं
लवङ्गजातमेव समानीतवानस्मि। अनुगृहणातु भवान् अङ्गीकृत्य मदीयामिमां गुरुदक्षिणाम्। (2018, 16, 14, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद गुरु विरजानन्द ने भी इस कुशाग्र बुद्धि वाले दयानन्द को तीन वर्षों तक पाणिनी की अष्टाध्यायी एवं अन्य शास्त्रों का अध्ययन कराया। विद्यार्जन पूर्ण कर दयानन्द ने अपने परम श्रद्धेय गुरु से कहा, “भगवन्! मैं दरिद्र होने के कारण आपके लिए तन-मन से मात्र कुछ लौंग लाया हूँ। आप मेरी इस गुरुदक्षिणा को स्वीकार कर मुझे अनुगृहीत कृतज्ञ करें।”

गद्यांश 5
प्रीतः गुरुस्तमभाषत-सौम्य! विदितवेदितव्योऽसि, नास्ति किमपि अविदितं
तव। अद्यत्वेऽस्माकं देशः अज्ञानान्धकारे निमग्नो वर्तते, नार्यः अनाद्रियन्ते,
शूद्राश्च तिरस्क्रियन्ते, अज्ञानिनः पाखण्डनश्च पूज्यन्ते। वेदसूर्योदयमन्तरा
अज्ञानान्धकारं न गमिष्यति। स्वस्त्यस्तु ते, उन्नमय पतितान् , समुद्धर
स्त्रीजाति, खण्डये पाखण्डम्, इत्येव मेऽभिलाष इयमेव च मे गुरुदक्षिणा। (2016, 12)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद गुरु ने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा, “सौम्य! तुम जानने योग्य सभी बातें जान चुके हो, अब तुम्हें कुछ भी अज्ञात नहीं। इन दिनों हमारा राष्ट्र अज्ञानरूपी अन्धकार में डूबा हुआ है। आज यहाँ नारियों का अनादर किया जाता है, शूद्र तिरस्कृत किए जाते हैं और अज्ञानी व पाखण्डी पूजे जाते हैं। अज्ञानरूपी अन्धकार बिना वेदरूपी सूर्य के उदित हुए दूर नहीं होगा। तुम्हारा कल्याण हो, पतितों को ऊँचा उठाओ, स्त्री-जाति का उद्धार करो, पाखण्ड का नाश करो, यह मेरी अभिलाषा है और यही मैरी गुरुदक्षिणा है।”

गद्यांश 6
गुरुणा एवम् आज्ञप्तः महर्षिर्दयानन्दः एतद्देशवासिनो जनान् उद्धत कर्मक्षेत्रेऽवतरत्। सर्वप्रथमं हरिद्वारे कुम्भपर्वणि भागीरथीतटे पाखण्डखण्डिनी पताकामस्थापयत्। ततश्च हिमाद्रि गत्वा त्रीणि वर्षाणि तपः अतप्यत्। तदनन्तरमयं प्रतिपादितवान् ऋग्यजुसामाथवणो वेदाः नित्या ईश्वर काश्च, ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य-शूद्राणां गुण-कर्मस्वभावैः विभागः न तु जन्मना, चत्वारः एव आश्रमाः, ईश्वरः एकः एव, ब्रह्म-पितृ-देवातिथि-बलि-वैश्वदेवाः पञ्च महायज्ञा नित्यं करणीमाः। ‘स्त्रीशूद्री वेदं नाधीयाताम् अस्य वाक्यस्य असारतां प्रतिपाद्य सर्वेषां वेदाध्ययनाधिकार व्यवस्थापयत्। एवमयं पाखण्डोन्मूलनाय वैदिक धर्मसंस्थापनाय च सर्वत्र भ्रमति स्म। एवमार्यज्ञानमहादीपो देवो दयानन्दः यावज्जीवनं देशजायुद्धाराय प्रयतमानः तदर्थ स्वजीवनमपि दत्तवान् मुक्तिञ्चाध्यगच्छत् एवमस्य महर्षेः जीवनं नूनमनुकरणीयमस्ति। (2017)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद गुरु से इस प्रकार आज्ञा प्राप्त करकें महर्षि दयानन्द इस देश के निवासी मनुष्यों के उद्धार के लिए कर्मक्षेत्र में कूद पड़े। सर्वप्रथम हरिद्वार में कुम्भपर्व पर गंगा के किनारे पाखण्ड का नाश करने वाली पताका (ध्वजा) को स्थापित किया। उसके बाद हिमालय पर्वत पर जाकर तीन वर्ष तक तप किया। इसके बाद उन्होंने प्रतिपादित किया कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद नित्य हैं और ईश्वर द्वारा रचित हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का विभाजन गुण, कर्म और प्रकृति के अनुरूप है, न कि जन्म से।

आश्रम चार ही हैं। ईश्वर एक ही है। ब्रह्म, पितृ, देव, अतिथि तथा अलिवैश्वदेव में पाँच महायज्ञ प्रतिदिन हीं करने चाहिए। “स्त्री और शूद्र को वेद नहीं पढ़ने चाहिए”-इस वाक्य की सारहीनता का प्रतिपादन करके सभी के लिए वेद को पढ़ने के अधिकार की व्यवस्था की। इस तरह ये पाखण्ड की समाप्ति के लिए और वैदिक धर्म की स्थापना के लिए सब जगह घूमते रहे। इस प्रकार आर्य-शान के महान् दीप देव दयानन्द ने सम्पूर्ण जीवन देश और जाति के उद्धार के लिए अर्पित कर दिया और मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार इन महर्षि का जीवन निश्चित रूप से अनुकरणीय है।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) में से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

प्रश्न 1.
महर्षेः दयानन्दस्य पितुः नाम किम् आसीत्? (2014)
उत्तर:
महर्षेः दयानन्दस्य पितुः नाम श्रीकर्षणतिवारी आसीत्।

प्रश्न 2.
महर्षेः दयानन्दस्य जन्मः कस्मिन् स्थाने/ग्रामे अभवत्। (2018, 17, 14, 10)
अथवा
महर्षेः दयानन्दस्य जन्मभूमिः कुत्र आसीत्
अथवा
मूलशङ्करस्य जन्म कुत्र अभवत्? (2018, 14)
उत्तर:
महर्षेः दयानन्दस्य जन्म सौराष्ट्रप्रान्ते टङ्कारानाम्नि ग्रामे अभवत्।

प्रश्न 3.
महर्षेः दयानन्दस्य बाल्यकालिकं किं नाम आसीत्?
उत्तर:
महर्षेः दयानन्दस्य बाल्यकालिकं मूलशङ्करः इति नाम आसीत्।।

प्रश्न 4.
दयानन्दस्य भगिनी कथं पञ्चत्वं गता? (2017, 14)
उत्तर:
दयानन्दस्य भगिनी विषूचिकया पञ्चत्वं गता।

प्रश्न 5.
मूलशङ्करस्य हृदये वैराग्यं कथम् उत्पन्नम्। (2012)
उत्तर:
स्वभगिन्याः पितृव्यस्य च मृत्युं दृष्ट्वा मूलशङ्करस्य हृदये वैराग्यप्रदीप: प्रज्वलितः।

प्रश्न 6.
महर्षेः दयानन्दस्य गुरुः कः आसीत्? (2017, 16, 15, 13, 10)
अथवा
विरजानन्दः कस्य गुरुः आसीत्? (2015, 10)
उत्तर:
विरजानन्दः महर्षेः दयानन्दस्य गुरुः आसीत्!

प्रश्न 7.
दयानन्दः किमर्थं सर्वत्र भ्रमति स्म? (2018)
उत्तर:
दयानन्दः अमरत्व प्राप्त्युपायं चिन्तपन् सर्वत्र भ्रमति स्म।

प्रश्न 8.
दयानन्दः विद्याध्ययनार्थं कुत्र गत? (2018)
उत्तर:
दयानन्दः विद्याध्ययनार्थं मथुरानगरं गतः

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 5 गीत / श्रद्धा-मनु

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name गीत / श्रद्धा-मनु
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 5 गीत / श्रद्धा-मनु

गीत / श्रद्धा-मनु – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता हैं। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
छायावाद के प्रवर्तक एवं उन्नायक महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के अत्यन्त प्रतिष्ठित सँघनी साहू के वैश्य परिवार में 1890 ई. में हुआ था। माता-पिता एवं बसे भाई के देहावसान के कारण अल्पायु में ही प्रसाद जी को व्यवसाय एवं परिवार के समस्त उत्तर:दायित्वों को वहन करना पड़ा। घर पर ही अंग्रेजी, हिन्दी, बांग्ला, उर्दू, फारसी, संस्कृत आदि भाषाओं का गहन अध्ययन किया। अपने पैतृक कार्य को करते हुए इन्होंने अपने भीतर काव्य प्रेरणा को जीवित रखा। अत्यधिक विषम परिस्थितियों को जीवटता के साथ झेलते हुए यह युगसष्टा साहित्यकार हिन्दी के मन्दिर में अपूर्व रचना-सुमन अर्पित करता हुआ 14 नवम्बर, 1937 निष्प्राण हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ
जयशंकर प्रसाद के काव्य में प्रेम और सौन्दर्य प्रमुख विषय रहा है, साथ ही उनका दृष्टिकोण मानवतावादी है। प्रसाद जी सर्वतोमुखी प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे। प्रसाद जी ने कुल 67 रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।

कृतियाँ
इनकी प्रमुख काव्य कृतियों में चित्राधार, प्रेमपथिक, कानन कुसुम, झरना, आँसू, लहर, कामायनी आदि शामिल हैं।
चार प्रबन्धात्मक कविताएँ शेरसिंह का शस्त्र समर्पण, पेशोला की प्रतिध्वनि, प्रलय की छाया तथा अशोक की चिन्ता अत्यन्त चर्चित रहीं।
नाटक चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, धुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ, राज्यश्री, अजातशत्रु, प्रायश्चित आदि।
उपन्यास कंकाल, तितली एवं इरावती (अपूर्ण रचना)
कहानी संग्रह प्रतिध्वनि, छाया, आकाशदीप, आँधी आदि।
निबन्ध संग्रह काव्य और कला

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. सौन्दर्य एवं प्रेम के कवि प्रसाद जी के काव्य में श्रृंगार रस के संयोग एवं विप्रलम्भ, दोनों पक्षों का सफल चित्रण हुआ है। इनके नारी सौन्दर्य के चित्र स्थूलता से मुक्त आन्तरिक सौन्दर्य को प्रतिबिम्बित करते हैं
    “हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
    एक लम्बी काया उन्मुक्ता”
  2. दार्शनिकता उपनिषदों के दार्शनिक ज्ञान के साथ बौद्ध दर्शन का समन्वित रूप भी इनके साहित्य में मिलता है।
  3. रस योजना इनका मन संयोग श्रृंगार के साथ साथ विप्रलम्भ श्रृंगार के चित्रण में भी खूब रमा है। इनके वियोग वर्णन में एक अवर्णनीय रिक्तता एवं अवसाद ने उमड़कर सारे परिवेश को आप्लावित कर लिया है। इनके काव्यों में शान्त एवं करुण रस का सुन्दर चित्रण हुआ है तथा कहीं कहीं वीर रस का भी वर्णन मिलता है।
  4. प्रकृति चित्रण इन्होंने प्रकृति के विविध रूपों का अत्यधिक हदयग्राही चित्रण किया है। इनके यहाँ प्रकृति के रम्य चित्रों के साथ-साथ प्रलय का भीषण चित्र भी मिलता है। इनके काव्यों में प्रकृति के उद्दीपनरूप आदि के चित्र प्रचुर मात्रा में हैं।
  5. मानव की अन्तःप्रकृति का चित्रण इनके काव्य में मानव मनोविज्ञान का विशेष स्थान है। मानवीय मनोवृत्तियों को उन्नत रूप देने वाली उदात्त भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं। इसी से रहस्यवाद का परिचय मिलता है। ये अपनी रचनाओं में शक्ति-संचय की प्रेरणा देते हैं।
  6. नारी की महत्ता प्रसाद जी ने नारी को दया, माया, ममता, त्याग, बलिदान, सेवा, समर्पण आदि से युक्त बताकर उसे साकार श्रद्धा का रूप प्रदान किया है। उन्होंने ”नारी! तुम केवल श्रद्धा हो” कहकर नारी को सम्मानित किया है।

कला पक्ष

  1. भाषा प्रसाद जी की प्रारम्भिक रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं, परन्तु शीघ्र ही वे खड़ी बोली के क्षेत्र में आ गए। उनकी खड़ी बोली उत्तर:ोत्तर परिष्कृत, संस्कृतनिष्ठ एवं साहित्यिक सौन्दर्य से युक्त होती गई। अद्वितीय शब्द चयन किया गया है, जिसमें अर्थ की गम्भीरता परिलक्षित होती है। इन्होंने भावानुकूल चित्रोपम शब्दों का प्रयोग किया। लाक्षणिकता एवं प्रतीकात्मकता से युक्त प्रसाद जी की भाषा में अद्भुत नाद-सौन्दर्य एवं ध्वन्यात्मकता के गुण विद्यमान हैं। इन्होंने चित्रात्मक भाषा में संगीतमय चित्र अंकित किए।
  2. शैली प्रबन्धकाव्य (कामायनी) एवं मुक्तक (लहर, झरना आदि) दोनों रूपों में प्रसाद जी का समान अधिकार था। इनकी रचना ‘कामायनी’ एक कालज कृति है, जिसमें छायावादी प्रवृत्तियों एवं विशेषताओं का समावेश हुआ है।
  3. अलंकार एवं छन्द सादृश्यमूलक अर्थालंकारों में इनकी वृत्ति अधिक भी है। इन्होंने नवीन उपमानों का प्रयोग करके उन्हें नई भंगिमा प्रदान की। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि के साथ मानवीकरण, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विशेषण-विपर्याय जैसे आधुनिक अलंकारों का भी सुन्दर उपयोग किया।

विविध छन्दों का प्रयोग तथा नवीन छन्दों की उदभावना इनकी रचनाओं में द्रष्टव्य है। आरम्भिक रचनाएँ घनाक्षरी छन्द में हैं। इन्होंने अतुकान्त छन्दों का प्रयोग अवैक किया है। ‘आँसू’ काव्य ‘सखी’ नामक मात्रिक छन्द में लिखा। इन्होंने ता.क, पादाकुलक, रूपमाला, सार, रोला आदि छन्दों का भी प्रयोग किया। इन्होंने अंग्रजी के सॉनेट तथा बांग्ला के त्रिपदी एवं पयार जैसे छन्दों का भी सफल प्रयोग किया। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रसाद जी में भावना, विचार एवं शैली तीनों की प्रौढ़ता मिलती है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
प्रसाद जी भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से हिन्दी के युग-प्रवर्तक कवि के रूप में जाने जाते हैं। भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प आदि सभी क्षेत्रों में प्रसाद जी ने युगान्तकारी परिवर्तन किए हैं। डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने हिन्दी साहित्य में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए लिखा है-“वे छायावादी काव्य के जनक और पोषक होने के साथ ही, आधुनिक काव्यधारा को गौरवमय प्रतिनिधित्व करते हैं।”

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

गीत

प्रश्न 1.
बीती विभावरी जाग री। अम्बर-पनघट में डुबो रही—
तारा-घट ऊषा नागरी। खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा, लो यह लतिका भी भर लाई—
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी। अधरों में राग अमन्द पिए,
अलकों में मलयज बन्द किए—
तू अब तक सोई है आली! आँखों में भरे विहाग री।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के कवि व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश छायावादी कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित गीत ‘बीती विभावरी जाग री’ से उधृत किया गया है।

(ii) “अम्बर-पनघट में इबो रही, तारा-घट ऊषा-नागरी।” इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से नायिका की सखी उसे सुबह होने के विषय में बताते हुए कहती है कि ऊषा रूपी नायिका आकाश रूपी पनघट में तारे रूपी घड़े को डुबो रही है अर्थात् रात्रि का समय समाप्त हो गया है और सुबह हो गई है, लेकिन वह अभी तक सोई हुई है।

(iii) प्रभात का वर्णन करने के लिए कवि ने किन-किन उपादानों का प्रयोग किया हैं?
उत्तर:
प्रभात का वर्णन करने के लिए कवि ने आकाश में तारों के छिपने, सुबह-सुबह पक्षियों के चहचहाने, पेड़-पौधों पर उगे नए पत्तों के हिलने, समस्त कलियों के पुष्पों में परिवर्तित होकर पराग से युक्त होने आदि उपादानों का प्रयोग किया है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश के कथ्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में सुबह होने के पश्चात् भी नायिका के सोने के कारण उसकी सखी उसे जगाने के लिए आकाश में तारों के छिपने, पक्षियों के चहचहाने आदि घटनाओं का वर्णन करते हुए उसे जगाने का प्रयास करती है। वह उसे बताना चाहता है कि सर्वत्र प्रकाश होने के कारण सभी अपने कार्यों में संलग्न हो गए हैं, किन्तु वह अभी भी सोई हुई हैं।

(v) प्रस्तुत गद्यांश में मानवीकरण अलंकार की योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मानवीकरण अलंकार में प्राकृतिक उपादानों के क्रियाकलापों का वर्णन मानवीय क्रियाकलापों के रूप में किया जाता है। प्रस्तुत पद्यांश में सुबह का नायिका के रूप में वर्णन, पत्तों का आँचल डोलना, लताओं का गागर भरकर लाना आदि पद्यांश में मानवीकरण अलंकार के प्रयोग पर प्रकाश डालते हैं।

श्रद्धा-मनु

प्रश्न 2.
और देखा वह सुन्दर दृश्य नयन का इन्द्रजाल अभिराम।
कुसुम-वैभव में लता समान चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार एक लम्बी काया, उन्मुक्त।
मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।
मसृण गान्धार देश के, नील रोम वाले मेषों के चर्म,
ढक रहे थे उसका वपु कान्त बन रहा था वह कोमल वर्म।
नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,
खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघ-वन बीच गुलाबी रंग।
आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम-बीच जब घिरते हों घन श्याम;
अरुण रवि मण्डल उनको भेद दिखाई देता हो छविधाम!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) “हृदय की अनुकृति बाह्य उदार” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति से कवि का आशय यह है कि श्रद्धा आन्तरिक रूप से जितनी उदार, भावुक, कोमल हृदय की थी, उसका बाह्य रूप भी वैसा ही था। वह अपने आन्तरिक गुण से जिस प्रकार सबको मोहित कर लेती थी. उसी । प्रकार उसका रूप सौन्दर्य भी सभी को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम था।

(ii) कवि द्वारा किए गए श्रद्धा के रूप सौन्दर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कवि श्रद्धा के रूप सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसके नयन अत्यधिक आकर्षक थे, वह स्वयं लता के समान सुन्दर एवं शीतल थे, घने केशों के मध्य उसका मुख चन्द्रमा के समान प्रतीत होता था, उसके तन की सुगन्ध बसन्ती बयार की तरह हृदय को शीतलता प्रदान कर रही थी। अपने कोमल हृदय के समान उसका बाह्य रूप भी अत्यन्त सुन्दर था।

(iii) कवि ने पद्यांश में घनश्याम शब्द को दो बार प्रयोग किया है, उनका अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि ने उपरोक्त पद्यांश में ‘चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम’ तथा ‘बीच जब घिरते हों घनश्याम्’ के रूप में दो बार घनश्याम शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु दोनों बार उसके अर्थ भिन्न-भिन्न हैं। पहले घनश्याम का अर्थ बादल तथा दूसरे घनश्याम का अर्थ शाम के समय का बादल हैं।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका के मुख की तुलना किस-किस-से की गई है?
उत्तर:
पद्यांश में नायिका के मुख की तुलना दो मिन्न स्थानों पर दो भिन्न उपमानों से की गई है। पहले स्थान पर ‘चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम’ में नायिका की तुलना बादलों के बीच दिखने वाले चाँद से की गई है। वहीं दूसरे स्थान पर ‘अरुण रवि मण्डल उनको भेद दिखाई देता हो छविधाम’ में शाम के समय आकाश में छाए बादलों के बीच दिखाई देने वाले सूर्य से की गई है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अनुप्रास, उपमा, रूपकातिशयोक्ति व उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग किया है। ‘चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम’ में रूपक अलंकार, ‘सुशोभित हो सौरभ संयुक्त’ में अनुप्रास अलंकार,, ‘खिला हो ज्यों बिजली का फूल’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

प्रश्न 3.
यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न भूत-हित-रत किसका यह दान!
इधर कोई है अभी सजीव, हुआ ऐसा मन में अनुमान। तपस्वी!
क्यों इतने हो क्लान्त, वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश बताओ यह कैसा उद्वेग?
दुःख की पिछली रजनी बीत विकसता सुख का नवल प्रभात;
एक परदा यह झीना नील छिपाए है जिसमें सुख गात।
जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत् की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान कभी मत इसको जाओ भूला”

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि श्रद्धा एवं मनु के कथनों के माध्यम से जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करते हुए निरन्तर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। कवि कहना चाहता है कि जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ आएँगी, लेकिन हमें निराश होकर आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

(ii) श्रद्धा मनु के पास पहुँचने का क्या कारण बताती हैं?
उत्तर:
श्रद्धा भनु को बताती है कि विराट हिमालय के इस वीरान क्षेत्र में जब उसे जीव-जन्तुओं के लिए अपने भोजन में से निकालकर अलग रखे गए भोजन के अंश दिखाई दिए, तो उसे उस प्रदेश में किसी व्यक्ति के रहने की अनुभूति हुई और इसी वजह से वह मनु के पास पहुँची।।

(iii) “दुःख की पिछली रजनी बीत, विकसता सुख का नवल प्रभात” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि जिस प्रकार रात्रि के पश्चात् सूर्योदय होता है और सम्पूर्ण जगत् प्रकाशमय हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में व्याप्त दुःखों के पश्चात् सुख का सर्य भी उदित होता हैं।

(iv) श्रद्धा मनु को किस प्रकार प्रेरित करती है?
उत्तर:
जीवन से हताश एवं निराश मनु को प्रेरित करते हुए श्रद्धा उसे जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए समझाते हुए कहती है कि जिस दुःख से परेशान होकर तुमने उसे अभिशाप मान लिया है वह एक वरदान है, जो तुम्हें सदा सुख को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता रहता

(v) ‘रजनी’ व ‘प्रभात’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द पर्यायवाची शब्द
रजनी रात, निशा
प्रभात सुबह, सवेरा

प्रश्न 4.
समर्पण लो सेवा का सार सजल संसृति का यह पतवार;
आज से यह जीवन उत्सर्ग इसी पद तल में विगत विकार।
बनो संसृति के मूल रहस्य तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;
विश्व भर सौरभ से भर जाए सुमन के खेलो सुन्दर खेल।
और यह क्या तुम सुनते नहीं विधाता का मंगल वरदान
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो’ विश्व में गूंज रहा, जय गान।
डरो मत अरे अमृत सन्तान अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;
पूर्ण आकर्षण जीवन केन्द्र खिंची आवेगी सकल समृद्धि!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) श्रद्धा मनु के समक्ष अपनी कौन-सी इच्छा व्यक्त करती हैं?
उत्तर:
श्रद्धा मनु के समक्ष स्वयं को उसकी जीवन संगिनी के रूप में स्वीकार कर लेने की इच्छा व्यक्त करती हैं। वह उससे कहती हैं कि मनु के द्वारा उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेने से वे दोनों इस सृष्टि अर्थात् मानव जाति की सेवा कर सकेंगे।

(ii) “बनो संसृति के मूल रहस्य” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से श्रद्धा मनु से स्वयं को पनी के रूप में स्वीकार कर इस निर्जन संसार में मानव की उत्पत्ति का मूलाधार बनने का आग्रह करती है। उसका आशय यह है कि उन दोनों के मिलन से ही इस जगत् में मनुष्य जाति की उत्पत्ति सम्भव होगी।

(iii) “शक्तिशाली हो विजयी बनो” पंक्ति के माध्यम से श्रद्धा मनु से क्या कहना चाहती है?
उत्तर:
”शक्तिशाली हो विजयी बनो” पंक्ति के माध्यम से श्रद्धा मनु की एकान्त में जीवनयापन करने की इच्छा एवं निराश व हताश मनःस्थिति में परिवर्तन करके उसे अकर्मण्यता को त्यागकर कर्तव्यशील बनकर विश्व को विजय करने की प्रेरणा देना चाहती हैं।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने प्रबन्धात्मक शैली का प्रयोग किया है। कति ने काव्य रचना के लिए तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली का प्रयोग किया है, जो भावों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतःसक्षम है। भाषा सहज, सरल एवं प्रभावगयी है।

(v) ‘विगत’ व ‘आकर्षण’ शब्दों के विलोमार्थी शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द विलोमार्थक शब्द
विगत आगत
आकर्षण विकर्षण

प्रश्न 5.
विधाता की कल्याणी सृष्टि सफल हो इस भूतल पर पूर्ण;
पटें सागर, बिखरे ग्रह-पुंज और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।
उन्हें चिनगारी सदृश सदर्प कुचलती रहे खड़ी सानन्द;
आज से मानवता की कीर्ति अनिल, भू, जल में रहे न बन्द।
जलधि के फूटें कितने उत्स द्वीप, कच्छप डूबें-उतराय;
किन्तु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति अभ्युदय का कर रही उपाय।
शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) श्रद्धा मनु को स्वयं वरण करने हेतु क्या कहकर प्रेरित करती हैं?
उत्तर:
श्रद्धा मनु से कहती हैं कि यदि वह उसका वरण कर लेता है, तो वह संसार के सम्पूर्ण जीव-जन्तुओं के लिए मानव-सृष्टि कल्याणकारी होगी। मानव समस्त प्राकृतिक आपदाओं; जैसे-ज्वालामुखी विस्फोट, उफनते सागरों आदि पर विजय पाकर समस्त जीवों की रक्षा करेगा, इसलिए उसे उसका वरण कर लेना चाहिए।

(ii) श्रद्धा जल-प्लावन की घटना का उल्लेख क्यों करती हैं?
उत्तर:
श्रद्धा जल-प्लावन की घटना का उल्लेख मनु को यह समझाने के लिए करती है। कि इस प्रलयकारी घटना के पश्चात् भी मानवता की रक्षा एवं उत्थान हेतु नव प्रयास जारी रहे। अतः मनु को स्वयं को निरुपाय न मानकर समस्या के समाधान पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

(iii) श्रद्धा विद्युतकणों के माध्यम से क्या कहना चाहती है?
उत्तर:
श्रद्धा विद्युत कणों के माध्यम से यह कहना चाहती है कि जिस प्रकार ये अलग-अलग होने पर शक्तिहीन होते हैं, किन्तु एकत्रित होते ही शक्ति का स्रोत बन जाते हैं, उसी प्रकार मानव भी जब अपनी शक्ति को पहचानकर एकत्रित कर लेता है तो वह विश्व-विजेता बन जाता है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
अलंकार किसी भी काव्य रचना के सौन्दर्य में वृद्धि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रस्तुत पद्यांश में भी कवि ने विभिन्न अलंकारों का प्रयोग किया है। ‘सदृश सदर्प’ में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार तथा विद्युतकणों का उदाहरण देने के कारण दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।

(v) अभ्युदय’ व ‘निरुपाय’ में से उपसर्ग व मूल शब्द अलग-अलग कीजिए।
उत्तर:

शब्द उपसर्ग मूलशब्द
अभ्युदय अभि उदय
निरुपाय निर् उपाय

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