UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विविध निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 9
Chapter Name विविध निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi विविध निबन्ध

1. जो चढ़ गए राष्ट्रवेदी पर (2018)

“जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।’

मैथिलीशरण गुप्त की इन काव्य पंक्तियों का अर्थ यह है कि देश-प्रेम के अभाव में मनुष्य जीवित प्राणी नहीं, बल्कि पत्थर के ही समान कहा जाएगा। हम जिस देश या समाज में जन्म लेते हैं, उसकी उन्नति में समुचित सहयोग देना हमारा परम कर्तव्य बनता है। स्वदेश के प्रति यही कर्तव्य-भावना, इसके प्रति प्रेम अर्थात् स्वदेश-प्रेम ही देशभक्ति का मूल स्रोत है।

कोई भी देश सांधारण एवं निष्प्राण भूमि का केवल ऐसा टुकड़ा नहीं होता, जिसे मानचित्र द्वारा दर्शाया जाता है। देश का निर्माण उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों एवं उनके सांस्कृतिक पहलुओं से होता है। लोग अपनी पृथक सांस्कृतिक पहचान एवं अपने जीवन-मूल्यों को बनाए रखने के लिए ही अपने देश की सीमाओं से बँधकर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि देश-प्रेम की भावना देश की उन्नति का परिचायक होती है।

स्वदेश प्रेमः एक उच्च भावना वास्तव में देश-प्रेम की भावना मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भावना है। इसके सामने किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्त्व नहीं होता। यह एक ऐसा पवित्र व सात्विक भाव है, जो मनुष्य को निरन्तर त्याग की प्रेरणा देता है, इसलिए कहा गया है-“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। मानव की हार्दिक अभिलाषा रहती है कि जिस देश में उसका जन्म हुआ, जहाँ के अन्न-जल से उसके शरीर का पोषण हुआ एवं जहाँ के लोगों ने उसे अपना प्रेम एवं सहयोग देकर उसके व्यक्तित्व को निखारा, उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन वह सदा करता रहे। यही कारण है। कि मनुष्य जहाँ रहता है, अनेक कठिनाइयों के बावजूद उसके प्रति उसका मोह कभी खत्म नहीं होता, जैसा कि कवि रामनरेश त्रिपाठी ने अपनी कविता में कहा है।

“विषुवत् रेखा का वासी जो जीता है नित हाँफ-हाँफ कर,
रखता है अनुराग अलौकिक वह भी अपनी मातृभूमि पर।
हिमवासी जो हिम में, तम में जी लेता है काँप-काँपकर,
वह भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर।”

स्वदेश प्रेम की अभिव्यक्ति के प्रकार स्वदेश प्रेम यद्यपि मन की एक भावना है तथापि इसकी अभिव्यक्ति हमारे क्रिया-कलापों से हो जाती है। देश प्रेम से | ओत-प्रोत व्यक्ति सदा अपने देश के प्रति कर्तव्यों के पालन हेतु न केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसके लिए अपने प्राण न्यौछावर करने से भी पीछे | नहीं हटता। सच्चा देशभक्त आवश्यकता पड़ने पर अपना तन, मन, धन सब कुछ देश को समर्पित कर देता है।

यह स्मरण रहे कि स्वदेश प्रेम को किसी विशेष क्षेत्र एवं सीमा में नहीं बघा जासकता। हमारे जिस कार्य से देश की उन्नति हो, वही स्वदेश प्रेम की सीमा में आता है। अपने प्रजातन्त्रात्मक देश में, हम अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए ईमानदार एवं देशभक्त जनप्रतिनिधि का चयन कर देश को जाति, सम्प्रदाय तथा प्रान्तीयता की राजनीति से मुक्त कर इसके विकास में सहयोग कर सकते हैं। जाति प्रथा, दहेज प्रथा, अन्धविश्वास, आढ़त इत्यादि कुरीतियाँ देश के विकास में बाधक है। हम इन्हें दूर करने में अपना योगदान कर देश सेवा का फल प्राप्त कर सकते है। अशिक्षा, निर्धनता, बेरोजगारी, व्याभिचार एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेकर हम अपने देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकते हैं। हम समय पर टैक्स का भुगतान कर देश की प्रगति में सहायक हो सकते हैं। इस तरह किसान, मजदूर, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, चिकित्सक, सैनिक और अन्य सभी पेशेवर लोगों के साथ-साथ देश के हर नागरिक द्वारा अपने कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना भी देशभक्ति ही है।

उपसंहार नागरिकों में स्वदेश प्रेम का अभाव राष्ट्रीय एकता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में कार्य करता है, जबकि राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था और घाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए, तो हमारी पारस्परिक फूट को देखकर अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता परम आवश्यक है और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना तब ही सम्भव है, जब हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।

2. यदि मैं रक्षा मंत्री होता (2018)
भूमिका एवं रक्षामन्त्री बनने की प्रबुद्ध इच्छा का कारण सेना राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा दिवस का पावन पर्व और मैं सेना मुख्यालय पर तिरंगा फहराने के बाद देश के जवानों को सम्बोधित करते हुए भाषण दे रहा था। इस भाषण में देश की रक्षा के लिए मेरे द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन तो था ही, साथ ही आने वाले वर्षों में मेरे द्वारा किए जाने वाले सम्भावित कार्यों का भी वर्णन था। मैं अभी भाषण दे ही रहा था कि अचानक मेरी नींद खुल गई और मैंने अपने आपको बिस्तर पर पाया। मैं वास्तव में रक्षा मन्त्री होने का खूबसूरत सपना देख रहा था।

रक्षा मन्त्री के रूप में प्राथमिकताएँ भारत के रक्षा मन्त्री के रूप में मेरी निम्नलिखित प्राथमिकताएँ होंगी।

1. सेना का उचित प्रसार देश के रक्षामन्त्री के रूप में सबसे पहले मैं भारत में सेना के उचित प्रसार पर ध्यान देता। किसी भी देश की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितने सुरक्षित, सजग एवं सतर्क प्रहरी हैं। समय के अनुसार विज्ञान एवं रक्षा मन्त्री के रूप में प्राथमिकता प्रौद्योगिकी में परिवर्तन को देखते हुए भारतीय सेना प्रणाली में भी इनको प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है। मैं सेना द्वारा सुरक्षा बढ़ाने के लिए विज्ञान की शिक्षा कार्यानुभव एवं व्यावसायिक शिक्षा पर बल देता।।

2. आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए प्रयास एक देश तब ही प्रगति की राह पर अग्रसर रह सकता है, जब उसके नागरिक अपने देश में सुरक्षित हों। असुरक्षा की भावना न केवल नागरिकों का जीना दूभर कर देती हैं, बल्कि इससे देश की शान्ति एवं सुव्यवस्था के साथ-साथ इसकी प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज भारत निःसन्देह बहुत तेज़ी से प्रगति कर रहा है, किन्तु इसकी आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष ऐसी चुनौतियाँ हैं, जो इसकी शान्ति एवं सुव्यवस्था पर प्रश्न-चिह्न लगा रही हैं। साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, भाषावाद, नक्सलवाद इत्यादि भारत को आन्तरिक, बाह्य सुरक्षा के समक्ष ऐसी ही कुछ खतरनाक चुनौतियाँ हैं। मैं इन समस्याओं का समाधान कर आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने का प्रयास करता।

3. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने का प्रयास भारत में कई धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं, जिनके रहन-सहन एवं आस्था में अन्तर तो है ही साथ ही, उनकी भाषाएँ भी अलग-अलग हैं। इन सबके बावजूद पूरे भारतवर्ष के लोग भारतीयता की जिस भावना से ओत-प्रोत रहते हैं, उसे राष्ट्रीय एकता का विश्वभर में सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। यदि हम भारतवासी किसी कारणवश छिन्न-भिन्न हो गए तो अन्य देश हमारी स्वतन्त्रता को हड़पने का प्रयास करेंगे, इसलिए मैं भारत की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता’ को महत्त्व देते हुए भारत की राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने का प्रयास करता।

4. सामाजिक समस्याओं का समाधान धार्मिक कट्टरता, जातिप्रथा, अन्धविश्वास, नारी-शोषण, सामाजिक शोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, गरीबी इत्यादि हमारी प्रमुख सामाजिक समस्याएँ हैं। ऐसा नहीं है कि ये सभी सामाजिक समस्याएँ हमेशा से हमारे समाज में विद्यमान रही हैं। कुछ समस्याओं की जड़ धार्मिक कुरीतियाँ हैं, तो कुछ ऐसी समस्याएँ भी हैं, जिन्होंने सदियों की गुलामी के बाद समाज में अपनी जड़ें स्थापित कर ली, जबकि कुछ समस्याओं के मूल में दूसरी पुरानी समस्याएँ रही हैं। देश एवं समाज की वास्तविक प्रगति के लिए इन समस्याओं का शीघ्र समाधान आवश्यक है। एक रक्षा मन्त्री के रूप में मैं रक्षा सेनाओं की समस्याओं का समाधान करने के लिए व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रोजगारोन्मुखी NCC, शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर देश के युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करता।

5. रक्षा नीति में सुधार अन्तर्राष्ट्रिीय राजनीति के क्षेत्र में किसी भी देश की स्थिति तब ही सुदृढ़ हो सकती है, जब उसकी रक्षा नीति सही हो। भारत एक शान्तिप्रिय देश है। दुनिया भर में शान्ति को बढ़ावा देने एवं परस्पर सहयोग के लिए मैं भारतीय विदेश नीति में सुधार करता। राष्ट्रीय सीमा सुरक्षा बलों का विकास करता तथा मैं सम्पूण सेना के अंगों को प्रशिक्षित एवं अत्याधुनिक निक हथियारों, वायुयानों, रडारों एवं अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों से सुसज्जित कर देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करता।

उपसंहार इस तरह स्पष्ट है कि यदि मैं भारत का रक्षा मन्त्री होता तो देश एवं देश की जनता को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शैक्षिक सुरक्षा के स्तर पर सुदृढ़ कर भारत को पूर्णतः विकसित ही नहीं, खुशहाल शान्तिप्रिय एवं सुरक्षित देश बनाने का सपना साकार करता।

3. जीवन में खेल की उपयोगिता (2018)
प्रस्तावना सभी प्राणियों में मानव का मस्तिष्क सर्वाधिक विकसित है। अपने मस्तिष्क के बल पर मानव ने पूरी दुनिया पर अधिकार पा लिया है और दिनों-दिन प्रगति के पथ पर अग्रसर है, किन्तु मानव का मस्तिष्क तभी स्वस्थ रह सकता है, जब उसका शरीर तन्दुरुस्त रहे। इसलिए कहा गया है-‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है और खेल व्यायाम का एक ऐसा रूप है जिसमें व्यक्ति को शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक विकास भी होता है।

शरीर और मस्तिष्क का पारस्परिक सम्बन्ध इस प्रकार मस्तिष्क के शरीर से और शरीर के मस्तिष्क से पारस्परिक सम्बन्ध को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि खेल-कूद व्यक्ति के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक है। जॉर्ज बर्नाड शॉ का कहना है-“हमें खेलना बन्द नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम बूढ़े इसलिए होते हैं कि हम खेलना बन्द कर देते हैं।”

जीवन में खेल कूद के लाभ स्वास्थ्य की दृष्टि से खेल कूद के कई लाभ हैं-इससे शरीर की मांसपेशियाँ एवं हड्डियाँ मज़बूत रहती हैं, रक्त का संचार सुचारु रूप से होता है। पाचन क्रिया सुदृढ़ रहती है, शरीर को अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है और फेफड़े भी मज़बूत रहते हैं। खेलकूद के दौरान शारीरिक अंगों के सक्रिय रहने के कारण शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। इस तरह, खेल मनुष्य के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक हैं। खेल केवल मनुष्य के शारीरिक ही नहीं, मानसिक विकास के लिए भी आवश्यक है। इससे मनुष्य में मानसिक तनावों को झेलने की क्षमता में वृद्धि होती है। खेल-कूद की इसी महत्ता को स्वीकारते हुए ‘स्वामी विवेकानन्द’ ने कहा था-“यदि तुम गीता के मर्म को समझनी चाहते हो, तो खेल के मैदान में जाकर फुटबॉल खेलो।” कहने का तात्पर्य यह है कि खेल-कूद द्वारा शरीर को स्वस्थ करके ही मानसिक प्रगति हासिल की जा सकती हैं।

शिक्षा एवं रोजगार मे खेल-कूद की उपयोगिता शिक्षा एवं रोज़गार की दृष्टि से भी खेल-कूद अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होंगे खराब’ जैसी कहावत अब बीते दिनों की बात हो गई है। खेल अब व्यक्ति के कैरियर को नई ऊंचाइयों दे रहे हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर आए दिन होने वाली तरह-तरह की खेल स्पर्धाओं के कारण खेल, खिलाड़ी और इससे जुड़े लोगों को पैसा, वैभव और पद हर प्रकार के लाभ प्राप्त हो रहे हैं। खेल-कूद के व्यवसायीकरण के कारण यह क्षेत्र रोज़गार का एक अच्छा माध्यम बन गया है। खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य, राष्ट्रीय एवं अन्तरष्ट्रिीय स्तर के खिलाड़ियों को निजी एवं बैंक, रेलवे जैसी सरकारी कम्पनियाँ ऊँचे वेतन वाले पदों पर नियुक्त करती हैं।

जब खेल-कूद के महत्त्व की बात आती है तो लोग कहते हैं, कि क्रिकेट, बैडमिण्टन, हॉकी, फुटबॉल जैसे मैदान में खेले जाने वाले खेल ही हमारे लिए मानसिक एवं शारीरिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तथा शतरंज, कैरम, लुडो जैसे घर के अन्दर खेले जाने वाले खेलों से सिर्फ हमारा मनोरंजन होता है, इसलिए ये खेल समय की बर्बादी हैं, किन्तु ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।

खेल-कूद जीवन का अभिन्न अंग जीवन में जिस तरह शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, उसी तरह मनोरंजन के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता। काम की थकान के बाद हमारे मस्तिष्क को मनोरंजन की आवश्यकता होती है। नियमित दिनचर्या में यदि खेल-कूद का समावेश कर लिया जाए, तो व्यक्ति के जीवन में उल्लास-ही-उल्लास छा जाता है। अवकाश के समय घर के अन्दर खेले जाने वाले खेलों से न केवल स्वस्थ मनोरंजन होता है, बल्कि ये आपसी मेल-जोल को बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं। खेल कोई भी हो यदि व्यक्ति पेशेवर खिलाड़ी नहीं है, तो उसके लिए इस बात का ध्यान रखना अनिवार्य हो जाता है कि खेल को खेल के समय ही खेला जाए, काम के समय नहीं।।

उपसंहार भारत के ये महान् खिलाड़ी देश की नई पौध को खेल-कूद की ओर आकर्षित कर रहे हैं। क्रिकेट की दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेन्दुलकर के कीर्तिमानों को तोड़ने वाला विश्व में कोई खिलाड़ी नहीं। उन्हें वर्ष 2014 में भारत का सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रल’ से भी सम्मानित किया गया है। इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मनुष्य के सर्वांगीण एवं सन्तुलित विकास के लिए खेल कूद को जीवन में पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए। अल्बर्ट आइंस्टाइन का कहना था-“खेल सबसे उच्चकोटि को अनुसन्धान है।”

4. ग्राम्य जीवन का आनन्द/ग्रामीण जीवन (2018)
प्रस्तावना यद्यपि आज भारत विकाशील देशों की श्रेणी में खड़ा हुआ है। फिर भी आज शहरों की अपेक्षा भारत वर्ष में गाँवों की संख्या अधिक है। एक सर्वे के अनुसार भारत वर्ष की कुल जनसंख्या का 75% भाग ग्रामीण परिवेश में ही निवास करता है। गाँवों का जीवन शान्त, हरियाली एवं प्रदूषण मुक्त होता है। गाँवों के खेतों की सुन्दरता और हरियाली बरबस ही मन को हर लेती है।

गाँव की शिक्षा व्यवस्था भारतवर्ष के अधिकांश गाँवों में मूलभूत सुविधाओं की प्रायः कमी पाई जाती है। आज भी इस आधुनिक युग में गाँव का जीवन शहरों से बहुत अलग है। गाँव में पूर्ण रूप से शिक्षा की सुविधाएँ आज भी उपलब्ध नहीं हो पाई हैं। आज भी ज्यादातर गाँवों में मात्र प्राइमरी स्कूलों की सुविधा है और कुछ बड़े गाँवों में मात्र हाई स्कूल की सुविधा है। कॉलेज या उच्च शिक्षा के लिए आज भी गाँव के बच्चों को बड़े शहरों में जाना पड़ता है। ऐसे में जिन लोगों के घर अपने बच्चों को शहर भेजने के लिए पैसे नहीं होते हैं, वह उनकी शिक्षा वहीं रोक देते हैं। इस प्रकार ज्यादातर लोग गाँव में अशिक्षित रह जाते हैं।

ग्रामीण आवासीय व्यवस्था भारतवर्ष में आज भी अधिकांश जनसंख्या कच्चे घास फूस के मकानों अथवा झोपड़ियों में निवास करती है। पहले भारत के सभी गाँव में बाँस और भूसे से बने छप्पर हुआ करते थे और घर भी, मिट्टी के बने होते थे, परन्तु अब प्रधानमंत्री आवास योजना की मदद से गाँव में गरीब लोगों को मुफ्त में पक्के घर मिल रहे हैं।

ग्रामीण लोगों का मुख्य व्यवसाय लगभग सभी गाँवों के लोग खेती-किसानी करते हैं और अपने घरों में मुर्गियाँ, गाय-भैंस, बैल और बकरियाँ पालते हैं। साथ ही गाँव के लोग शहरी लोगों की तरह सब्जी मण्डी से सब्जियाँ खरीदने नहीं जाते हैं। हर कोई अपने खेतों और बगीचों में सब्जियाँ लगाते हैं और खुद के घर की सब्जियाँ खाते हैं। गांव के लोगों का मुख्य कार्य खेती होता है। आज भी शहरों में जिस अनाज को लोग खाते हैं, वह गांव के खेतों से ही आता है।

गाँवों में परिवहन की सुविधाएँ आज भी इस 21 वीं सदी में कई ऐसे गाँव हैं, जहाँ तक पहुँचने के लिए अच्छी सड़क तक नहीं है। हालाँकि प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना के अनुसार ज्यादातर गाँव को अब पक्की सड़कों से जोड़ा जा चुका है, परन्तु फिर भी कुछ ऐसे गाँव हैं, जहाँ पर सड़क न होने के कारण वहाँ जाना तक बहुत मुश्किल होता है। उन जगहों पर सड़क न होने के कारण बारिश के महीने में सड़कों व गड्ढों में पानी भर जाता है व कीचड़ को जाती है, जिसके कारण आना-जाना मुश्किल हो जाता है।

शहर के मुकाबले गाँव में बहुत कम लोग रहते हैं। गाँव में लोगों के घर के आस पास बहुत खुली जगह होती है और हर किसी व्यक्ति के पास मोटरसाइकिल या कार नहीं होती है। गाँव में ज्यादातर लोगों के पास वाहन के रूप में बैलगाड़ी होती है। परन्तु कुछ गाँव में अभी भी लोगों के पास मोटर गाड़ी की सुविधाएँ हैं।

गाँव की स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएँ अब गाँव के पास भी सरकार की ओर से प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र जगह-जगह खोले जा चुके हैं, जिससे गाँव के लोगों को भी चिकित्सा के क्षेत्र में सुविधाएँ मिल रही हैं। इमरजेंसी के समय के लिए सरकार ने अब ज्यादातर प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में मुफ्त 108 एम्बुलेंस सर्विस प्रदान की है, जो बहुत मददगार साबित हुई हैं। गाँव में साप्ताहिक छोटे बाजार लगते हैं, जहाँ लोग कपड़े, खाने का समान, बिजली का सामान और अन्य जरूरी समान खरीदने जाते हैं। अगर उन्हें कुछ बड़ी चीजें खरीदनी होती हैं, तो वे पास के शहर चले जाते हैं।

गाँव का वातावरण गांव में मौसम बहुत ही सुहाना और वातावरण बहुत स्वच्छ होता है। आज शहरी इलाकों में प्रदूषण के कारण साँस लेना तक मुश्किल हो गया है। परन्तु गाँव में ऐसा नहीं है। गाँव में कम वाहन चलने के कारण प्रदूषण ना के बराबर होता है, इसलिए वहाँ वातावरण भी स्वच्छ होता है।

ग्रामीण लोगों की जीवन शैली जिन क्षेत्रों में कुछ प्राकृतिक कारणों से खेती-किसानी सही प्रकार से नहीं हो पा रही हैं, उन क्षेत्रों के गांव में ज्यादातर लोग गरीबी रेखा (BPL – Below poverty line) के नीचे होते हैं। उनके पास खेत न होने या खेतों में पानी की सुविधा सही प्रकार से ना हो पाने के कारण उनके पास एक वक्त का खाना खाने के लिए भी अनाज नहीं होता है। ज्यादातर राज्यों की सरकार के द्वारा इन गरीबी रेखा के लोगों के लिए जन धन योजना’ बैंक अकाउण्ट प्रदान किया जाता है और साथ ही परिवार के अनुसार 2 किलो वाला चावल प्रदान किया जा रहा है और साथ ही प्रधानमन्त्री उज्ज्वला योजना के अनुसार, घर पर गैस कनेक्शन दिए जा रहे हैं।

ग्रामीण परिवेश में प्रकाश की व्यवस्था पहले कुछ वर्ष गाँव का जीवन रात होते ही अंधकार में डूब जाता था, क्योंकि ज्यादातर गाँव में बिजली की सुविधा नहीं थी। आज लगभग ज्यादातर गांव में बिजली की सुविधा पहुँच चुकी है। अब गांव के बच्चे भी मेहनत कर रहे हैं और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सफलताएँ प्राप्त कर रहे हैं।

गाँव के पारम्परिक त्योहार और संस्कृति आज भले ही शहरी क्षेत्रों में लोग भारत की संस्कृति और परम्परा को काफी हद तक भुला चुके हैं, लेकिन आज भी ग्रामीण लोगों के दिल में हमारे देश की परम्परा और संस्कृति कूट-कूटकर भरी हुई हैं। गाँव के त्योहारों में शहरों के जितनी आतिशबाजी और रोशनी तो नहीं होती है, परन्तु उनमें सभी लोग नियम से और मिल-जुल कर त्योहार का आनन्द उठाते हैं।

उपसंहार संक्षेप में कहें तो ग्रामीण परिवेश में ही आनन्द की अनुभूति होती है, क्योंकि जहां शहरी व्यक्ति स्वार्थी हो गए हैं, वहाँ वे स्वयं के लिए ही केन्द्रित हो गए हैं, जबकि गांवों के लोग मिलनसार, परस्पर सहयोगी तथा खुश दिखाई देते हैं। सरकार की पहल पर आज गाँवों के जीवन में शहरी जीवन की तरह की आमूलचूल परिवर्तन होता जा रहा है। फिर भी आज जिन गाँवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है, उनमें कम-से-कम मूलभूत सुविधाएँ तो अवश्य ही होनी चाहिए, ताकि ग्रामीण जीवन तथा गाँवों के लोगों का जीवन और अधिक सरल हो सके।

5. रोग वद्धि कारण एवं निवारण/स्वास्थ्य/आरोग्य (2018)
प्रस्तावना हम सब ने स्वास्थ्य से सम्बन्धित अनेक कहावतें तथा श्लोगन सुन रखे हैं; जैसे-जान है तो जहान है। एक तन्तुरूस्ती हजार नियामत तथा संस्कृत भाषा में भी कालिदास द्वारा उक्त शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम् यह बिल्कुल सत्य है कि, ” स्वास्थ्य ही धन है। क्योंकि, हमारा शरीर ही हमारी सभी अच्छी और बुरी सभी तरह की परिस्थितियों में हमारे साथ रहता है। इस संसार में कोई भी हमारे बुरे समय में मदद नहीं कर सकता है। इसलिए, यदि हमारा स्वास्थ्य ठीक है, तो हम अपने जीवन में कितनी भी बुरी परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ नहीं है, तो वह अवश्य ही जीवन का आनन्द लेने के स्थान पर जीवन में स्वास्थ्य सम्बन्धी या अन्य परेशानियों से पीड़ित ही होगा।

स्वास्थ्य से तात्पर्य स्वस्थ शरीर से तात्पर्य है कि मानव या किसी भी प्राणी की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को उसके द्वारा सुचारु रूप से उपयोग करना। यदि चर ऐसा नहीं कर पा रहा है तो निश्चित है कि वह किसी-न-किसी शारीरिक अथवा मानसिक रोग से ग्रस्त है। आए दिन नई-नई बीमारियां सामने आती रहती हैं; जैसे बुखार, चेचक, हैजा, कैन्सर, एड्स नजला, जुकाम, जोड़ों का दर्द, अल्जाइमर सियाटिका, अल्सर दाद, खाज, खुजली, मधुमेह, हृदय रोग एवं विभिन्न पातक रोग आदि में से संसार का हर व्यक्ति किसी-न-किसी छोटी-बड़ी बीमारी से अवश्य ही रोग प्रस्त होता है। कुछ रोगों का तो हमें सामान्य रूप से ही पता चल जाता है, परन्तु कुछ रोगों की जाँच के लिए हमें चिकित्सीय उपकरणों /मशीनों आदि की सुविधाएँ लेनी पड़ती है।

रोग वृद्धि के कारण किसी भी रोग की वृद्धि का प्रमुख कारण है, हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आना। दूसरा प्रमुख मूल कारण है, विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के स्तर में वृद्धि होना, जिसके कारण कुछ रोग तो मनुष्य के खान-पान तथा पेय जल की अशुद्धता से फैलते हैं तथा कुछ रोग वायु की अशुद्धता अर्थात् ऑक्सीजन की कमी तथा विभिन्न जहरीली गैसों के वातावरण में वृद्धि के कारण फैलते हैं। कुछ रोगों की वृद्धि का कारण मानव की अज्ञानता है, तो कुछ रोगों की वृद्धि का कारण मनुष्य की लापरवाही भी होती है।

रोग वृद्धि के दुष्परिणाम सर्वप्रथम तो रोग ग्रस्त व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। उसका न तो खान-पान में हो मन लगता है और न ही किसी भी अन्य कार्यों में, वह घर के किसी अन्य सदस्य पर निर्भर रहने लगता है, क्योंकि वह स्वयं के कार्यों को भी ठीक से करने में असमर्थ हो जाता है।

संसार का कोई भी शारीरिक और आन्तरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति जीवनभर में बहुत-सी चुनौतियों का सामना करता है, यहाँ तक कि उसे अपनी नियमित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी और पर निर्भर रहना पड़ता है। यह स्थिति उस व्यक्ति के लिए बहुत शर्मनाक होती है, जो इन सब का सामना करता है। इसलिए, अन्त में सभी प्रकार से खुश रहने के लिए और अपने सभी कार्यों को स्वयं करने के लिए अपने स्वास्थ्य को बनाए रखना अच्छा होता है। यह सत्य है कि धन और स्वास्थ्य एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए हमें धन की आवश्यकता होती है और धन कमाने के लिए अच्छे स्वास्थ्य की, लेकिन यह भी सत्य है, कि हमारा अच्छा स्वास्थ्य हर समय हमारी मदद करता है और हमें केवल धन कमाने के स्थान पर अपने जीवन में कुछ बेहतर करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है।

स्वास्थ्य प्राप्ति एवं रोग निवारण के उपाय आजकल अच्छा स्वास्थ्य भगवान के दिए हुए एक वरदान की तरह है। यह बिल्कुल वास्तविक तथ्य है, कि स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है। अच्छा स्वास्थ्य एक व्यक्ति के लिए जीवनभर में कमाई जाने वाली सबसे कीमती आय होती है। यदि कोई अपना स्वास्थ्य खोता है, तो वह जीवन के सभी आकर्षण को खो देता है। अच्छा धन, अच्छे स्वास्थ्य का प्रयोग करके कभी भी कमाया जा सकता है, हालाँकि एक बार अच्छा स्वास्थ्य खो देने पर इसे दोबारा किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमें नियमित शारीरिक व्यायाम, योग, ध्यान, सन्तुलित भोजन, अच्छे विचार, स्वच्छता, व्यक्तिगत स्वच्छता, नियमित चिकित्सकीय जाँच, पर्याप्त मात्रा में सोना और आराम करना आदि की आवश्यकता होती है। यदि कोई स्वस्थ है, तो उसे अपने स्वास्थ्य के लिए दवा खरीदने या डॉक्टरों से मिलने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इतना ही नहीं अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करना स्वच्छता का मुख्य घटक है। इसलिए माननीय प्रधानमन्त्री महोदय जी द्वारा स्वच्छता अभियान/आन्दोलन सम्बन्धी विभिन्न योजनाओं को लागू किया गया तथा उन्हें बढ़ावा दिया गया है।

उपसंहार हमारे ग्रन्थों में स्वास्थ्य का मूल मन्त्र बताते हुए कहा गया है कि जल्दी सोना, सुबह जल्दी उठना व्यक्ति को सर्वप्रथम स्वस्थ बनाता है, उसे | धनवान बनाता है तथा इतना ही नहीं, उसे बुद्धिमान भी बनाता है। अतः हमें अपने आस-पास की साफ-सफाई के साथ-साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी उपरोक्त मन्त्र के अनुसार अपनी दिनचर्या में बदलाव लाना चाहिए, तभी हम स्वस्थ, समृद्ध तथा खुशहाल जीवन जी सकते हैं।

6. मेरा प्रिय खेल-हॉकी (2018)
प्रस्तावना संसार का कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हैं जिसे कोई न कोई खेल । प्रिय न हो। सभी को कोई-न-कोई खेल अपनी रुचि के अनुरूप अवश्य ही प्रिय होता है। किसी को शारीरिक, तो किसी को मानसिक विकास को प्रबल करने वाले खेल प्रिय होते हैं। मुझे हॉकी का खेल अतिप्रिय है, क्योंकि हॉकी खेल के कारण ही हमारा भारत देश प्रसिद्ध है। यह हमारा राष्ट्रीय खेल भी है।

हॉकी खेल का इतिहास भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी विश्व के लोकप्रिय खेलों में से एक हैं। इसकी शुरूआत कब हुई? यह तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता, किन्तु ऐतिहासिक साक्ष्यों से सैकड़ों वर्ष पहले भी इस प्रकार का खेल होने के प्रमाण मिलते हैं। आधुनिक हॉकी खेलों का जन्मदाता इंग्लैण्ड को माना जाता है। भारत में भी आधुनिक हॉकी की शुरूआत का श्रेय अंग्रेज़ों को ही जाता है।

हॉकी के अन्तर्राष्ट्रीय मैचों की शुरूआत 19वीं शताब्दी में हुई थी। इसके बाद 20वीं शताब्दी में वर्ष 1924 में अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी संघ की स्थापना पेरिस में हुई। विश्व के सबसे बड़े अन्तर्राष्ट्रीय खेल आयोजन ‘ओलम्पिक’ के साथ-साथ ‘राष्ट्रमण्डल खेल’ एवं ‘एशियाई खेलों में भी हॉकी को शामिल किया जाता है। वर्ष 1971 में पुरुषों के हॉकी विश्वकप की एवं वर्ष 1971 में महिलाओं के हॉकी विश्वकप की शुरूआत हुई। न्यूनतम निर्धारित समय में परिणाम देने में सक्षम होना इस खेल की प्रमुख विशेषता है।

हॉकी खेल का स्वरूप हॉकी मैदान में खेला जाने वाला खेल है। बर्फीले क्षेत्रों में बर्फ के मैदान पर खेली जानी वाली आइस हॉकी भारत में लोकप्रियता अर्जित नहीं कर सकी है। दो दलों के बीच खेले जाने वाले खेल हॉकी में दोनों दलों के 11-11 खिलाड़ी भाग लेते हैं। आजकल हॉको के मैदान में कृत्रिम घास का प्रयोग भी किया जाने लगा है। इस खेल में दोनों टीमें स्टिक को सहायता से रबड़ या कठोर प्लास्टिक की गेंद को विरोधी टीम के नेट या गोल में डालने का प्रयास करती हैं। यदि विरोधी टीम के नेट में गेंद चली जाती है, तो उसे एक गोल कहा जाता हैं। जो टीम विपक्षी टीम के विरुद्ध अधिक गोल बनाती है, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। मैच में विभिन्न प्रकार के निर्णय एवं खेल पर नियन्त्रण के लिए रेफरी को तैनात किया जाता है। मैच बराबर रहने की दशा में परिणाम निकालने के लिए विशेष व्यवस्था भी होती है।

भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा राष्ट्रीय खेल हॉकी की बात आते ही तत्काल मेजर ध्यानचन्द का स्मरण हो आता है, जिन्होंने अपने करिश्माई प्रदर्शन से पूरी दुनिया को अचम्भित कर खेलों के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवा लिया। हॉकी के मैदान पर जब वह खेलने उतरते थे, तो विरोधी टीम को हारने में देर नहीं लगती थी। उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे किसी भी कोण से गोल कर सकते थे। यही कारण है कि सेण्टर फॉरवर्ड के रूप में उनकी तेज़ी और जबरदस्त फु को देखते हुए उनके जीवनकाल में ही उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा था। उन्होंने इस खेल को नवीन ऊँचाइयाँ दीं।

भारतीय हॉकी का स्वर्णिम इतिहास मेजर ध्यानचन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। वे बचपन में अपने मित्रों के साथ पेड़ की डाली की स्टिक और कपड़ों की गेंद बनाकर हॉकी खेला करते थे। 23 वर्ष की उम्र में ध्यानचन्द वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक में पहली बार भाग ले रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य चुने गए थे। उनके प्रदर्शन के दम पर भारतीय हॉकी टीम ने तीन बार; वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक, वर्ष 1932 के लॉस एंजिल्स ओलम्पिक एवं वर्ष 1936 के बर्लिन ओलम्पिक में स्वर्ण पदक प्राप्त कर राष्ट्र को गौरवान्वित किया था। यह भारतीय हॉकी को उनका अविस्मरणीय योगदान है।

ध्यानचन्द की उपलब्धियों को देखते हुए ही उन्हें विभिन्न पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया। वर्ष 1956 में 51 वर्ष की आयु में जब वे भारतीय सेना के मेजर पद से सेवानिवृत्त हुए, तो उसी वर्ष भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया। उनके जन्मदिन 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाने को घोषणा की गई। मेजर ध्यानचन्द के अतिरिक्त धनराज पिल्ले, दिलीप टिकी, अजीतपाल सिंह, असलम शेर खान, परगट सिंह इत्यादि भारत के अन्य प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी रहे है।

भारतीय हॉकी का विकास एवं शानदार प्रदर्शन देश में राष्ट्रीय खेल हॉकी को विकास करने के लिए वर्ष 1925 में ग्वालियर में अखिल भारतीय हॉकी संघ की स्थापना की गई थी। यदि ओलम्पिक खेलों में भारतीय टीमों के प्रदर्शन की बात की जाए, तो वर्ष 2014 तक देश को कुल 24 पदक प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 11 पदक अकेले भारतीय हॉकी टीम ने ही हासिल किए हैं। हॉकी में प्राप्त 11 पदकों में से 8 स्वर्ण, 1 रजत एवं 2 काँस्य पदक शामिल हैं। वर्ष 1928 से लेकर वर्ष 1956 तक लगातार छ: बार भारत ने ओलम्पिक खेलों में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतने में सफलता पाई। इसके अतिरिक्त, भारत ने वर्ष 1964 एवं 1980 में भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया। हॉकी के विश्वकप में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलम्पिक जैसा नहीं रहा है। वर्ष 1971 में हुए पहले हॉकी विश्वकप में भारत तीसरे स्थान पर, जबकि वर्ष 1973 में हुए दूसरे विश्वकप में दूसरे स्थान पर रहा। वर्ष 1975 में हुए तीसरे हॉकी विश्वकप में भारतीय खिलाड़ियों ने शीर्ष स्थान प्राप्त कर इतिहास रच दिया।

उपसंहार इधर विगत तीन चार दशकों से भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रदर्शन भी अच्छा होने लगा है। इसने राष्ट्रमण्डल खेल, 2002 और एशियन गेम्स, 1982 में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया है। इसके अलावा एशियन गेम्स, 1998 और राष्ट्रमण्डल खेल, 2006 में यह टीम उपविजेता घोषित हुई। इतना ही नहीं वर्ष 1986 एवं 2006 में हुए एशियन गेम्स में कांस्य पदक हासिल करने के पश्चात् इसने वर्ष 2014 का एशियन गेम्स हॉकी काँस्य पदक भी अपनी झोली में डाला। इस प्रकार भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ-साथ भारतीय महिला हॉकी टीम ने भी अन्तरष्ट्रिीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान कायम करने में सफलता पाई है। आशा है आने वाले वर्षों में ये दोनों टीमें नए-नए कीर्तिमान गढ़कर भारत को गौरवान्वित करने में पूर्ण सहयोग देगी

7. व्यायाम और योगासन का महत्त्व (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, स्वस्थ शरीर की आवश्यकता, स्वस्थ रहने में योग की भूमिका, व्यायाम और योग के लाभ, उपसंहार।।

भूमिका प्रकृति ने संसार के सभी जीव-जन्तुओं को पनपने एवं बढ़ने के अवसर प्रदान किए हैं। सभी प्राणियों में श्रेष्ठ होने के कारण मानव ने अनुकूल-प्रतिकूल, सभी परिस्थितियों में अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग कर स्वयं को स्वस्थ बनाए रखने में सफलता हासिल की है। विश्व की सभी सभ्यता-संस्कृतियों में न सिर्फ स्वास्थ्य रक्षा को प्रश्रय दिया गया है, अपितु स्वस्थ रहने की तरह-तरह की विधियों का शास्त्रगत बखान भी किया गया हैं।

भगवान बुद्ध ने कहा था-“हमारा कर्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मन को सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएंगे।

आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में इनसान को फुर्सत के दो पल भी नसीब नहीं हैं। घर से दफ्तर, दफ्तर से घर, तो कभी घर ही दफ़्तर बन जाता है यानी इनसान के काम की कोई सीमा नहीं है। वह हमेशा खुद को व्यस्त रखता है। इस व्यस्तता वे कारण आज मानव शरीर तनाव, थकान, बीमारी इत्यादि का घर बनता जा रहा है। आज उसने हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ तो अर्जित कर ली हैं, किन्तु उसके सामने शारीरिक एवं मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने की चुनौती आ खड़ी हुई है।

स्वस्थ शरीर की आवश्यकता यद्यपि चिकित्सा एवं आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में मानव ने अनेक प्रकार की बीमारियों पर विजय हासिल की है, किन्तु इससे इसे पर्याप्त मानसिक शान्ति भी मिल गई हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। तो क्या मनुष्य अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहा है? यह ठीक है कि काम ज़रूरी है, लेकिन काम के साथ साथ स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जाए, तो यह सोने-पे-सुहागा वाली बात ही होगी। महात्मा गांधी ने कहा भी हैं-

“स्वास्थ्य ही असली धन है, सोना और चाँदी नहीं।”

सचमुच यदि व्यक्ति स्वस्थ न रहे तो उसके लिए दुनिया की हर खुर्श निरर्थक होती है। रुपये के ढेर पर बैठकर आदमी को तब ही आनन्द मिल सकते है, जब वह शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। स्वास्थ्य की परिभाषा के अन्तर्गत केवरु शारीरिक रूप से स्वस्थ होना ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी शामिल हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ हो, किन्तु मानसिक परेशानियों से जुड़ रहा हो, तो भी उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। उसी व्यक्ति को स्वस्थ कहा जा सकता है, जो शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ हो। साइरस ने ठीक ही कहा है कि “अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ, जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।”

स्वस्थ रहने में योग की भूमिका योग प्राचीन समय से ही प्रारतीय संस्कृति का अंग रहा हैं। हमारे पूर्वजों ने बहुत समय पहले ही इसका आविष्कार कर लिया था और इसके महत्व को पहचान लिया था। इसीलिए योग पद्ध। सदियों बाद भी जीवित है। योग प्रत्येक दृष्टिकोण से लाभदायक हैं। योग करने 3 व्यक्ति का शरीर सुगठित तथा सुडौल बनता है।

वह क्रियाशील बना रहता है। योग से न केवल तन की थकान दूर होती है, बल्कि मन की थकान भी दूर हो जाती है। योग करने वाला व्यक्ति अपने अंग प्रत्यंग में एक नए उत्साह एवं स्फूर्ति का अनुभव करता है। योग करने से शरीर के प्रत्येक अंग में रक्त का संचार सुचारु रूप से होता रहत हैं तथा शरीर रोगमुक्त रहता है। योग से पाचन-तन्त्र भी ठीक रहता है। ध्यान रहे कि पाचन-तन्त्र के अनियमित होने पर ही अधिकांश बीमारियाँ जन्म लेती हैं।

यह आश्चर्यजनक तथ्य है, परन्तु उतना ही सत्य भी है कि नियमित रूप से योग करने से शरीर स्वस्थ तो रहता ही है, साथ ही यदि कई रोग है तो योग के द्वारा उसका उपचार भी किया जा सकता है। कुछ रोगों में दो दवा से अधिक लाभ योग करने से होता हैं।
इसीलिए कहा गया है-

“आसनं विजितं येनल जितं तेन जगत्र्यम्
अनेन विधिनायु तः प्राणायाम सदा कुरू

अर्थात् जिसने आसन को जीत लिया है, उसने तीनों लोकों को जीत लिया। इसीलिए विधि-विधान से प्राणायाम और योग का अभ्यास करना चाहिए।

व्यायाम और योग के लाभ मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही योग का विकास किया गया था। यह हमारे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। इसका उद्देश्य शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। यह मन को शान्त एवं स्थिर रखता है, तनाव को दूर कर सोचने की क्षमता, आत्मविश्वास तथा एकाग्रता को बढ़ाता है। यह विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है, जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त के प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन तन्त्र को मज़बूत बनाता है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों यथा- अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को अधिक ऊर्जावान बनाता है। हमारे शास्त्र में कहा भी गया है-“व्यायामान्पुष्ट गात्राणि” अर्थात् व्यायाम से शरीर मजबूत होता हैं।

व्यायाम से होने वाले मानसिक स्वास्थ्य के लाभ पर गौर करें, तो पता चलता है। कि यह मन को शान्त एवं स्थिर रखता है, तनाव को दूर कर सोचने की क्षमता, अमविश्वास तथा एकाग्रता को बढ़ाता है। विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिा व्यायाम विशेष रूप से लाभदायक है, क्योकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ती है, जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है। कलियुगी भीम की उपाधि से विभूप्ति विश्वप्रसिद्ध पहलवान राममूर्ति कहते हैं-“मैंने व्यायाम के बल पर अपने दमे तग शरीर की कमजोरी को दूर किया तथा विश्व के मशहूर पहलवानों में अपनी गिनती राई, ये है व्यायाम की महत्ता।

उपहार वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण में इसकी सार्थकता पर भी बढ़ गई हैं। योगाभ्यास की जटिलताओं को देखते हुए इसे अनुभवी योग प्रशिक्षक की देखरेख में ही करना चाहिए अन्यथा इससे लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकी है। एक महत्त्वपूर्ण बात और कुछ लोग इसे धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं और लोगों के मन में साम्प्रदायिकता की भावना फैलाने की कोशिश करते हैं, जोकि सर्वथा अनुचित हैं। अतः हमें इसकी महत्ता समझते हुए, इसके कल्याणकारी स्वरूप को अपनाने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

8. यदि मैं प्रधानाचार्य होता (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, प्रधानाचार्य बनने पर किए जाने वाले कार्य, विद्यार्थियों का सर्वागीण विकस, विद्यालय को बेहतर बनाने का प्रयास, उपसंहार।

भूमिका विद्यलय एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है, जहाँ से शिक्षा प्राप्त करके विद्यार्थी अफार, प्रशासनिक अधिकारी, नेता, मन्त्री, राज्यपाल, राष्ट्रपति आदि बनाते हैं। विद्यार्थियों के जीवन के निर्माण के लिए अच्छे अध्यापक की आवश्यकता होती है तथा उन्हें व्यास्थित तथा उत्तम वातावरण देना प्रधानाचार्य की दायित्व होता है। प्रत्येक विद्यार्थी अपने जीवन में निम्न कल्पनाएँ करता है; जैसे—डॉक्टर बनना, इंजीनियर बनना, IAS ऑफिसर बनना इत्यादि। उसी प्रकार मेरी कल्पना भी एक प्रधानाचार्य बनने की है।

प्रधानाचार्य बनने र किए जाने वाले कार्य अपने कार्यकाल में मैं विद्यालय की व्यवस्था को आकर्षक बनाने का प्रयास करूंगा। प्रधानाचार्य बनने पर मैं सर्वप्रथम विद्यालय के भवनों की रफाई का निरीक्षण करके दिशा-निर्देश जारी करूंगा। विद्यालय के पुस्तकालय को समृद्धशाली बनाऊँगा।

पुस्तकालय में ज्ञान-विज्ञन के सभी प्रकार के साधनों को उपलब्ध कराने का प्रयास करूंगा। मैं विद्यार्थियों के प्रत्येक क्षेत्र में विकास करने का प्रयास करूंगा। मैं विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई, खेलकुद तथा सांस्कृतिक सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति करूंगा।।

विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास अपने विद्यालय में विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करने के लिए हर सम्भव प्रयास करूंगा। अनेक विषयों पर वाद-विवाद, संगीत, चित्रकला आदि की प्रतियोगिताएँ आयोजित करवाऊँगा तथा इन सभी से सम्बन्धित राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों को भाग लेने के लिए प्रेरित करूंगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए कुशल अध्यापकों को नियुक्त करूंगा जिससे हमारा विद्यालय पढ़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी आगे बढ़ सके।

विद्यालय को बेहतर बनाने का प्रयास विद्यालय का स्तर ऊपर उठाने के लिए मैं कम्प्यूटर प्रणाली लागू करूंगा जिससे प्रत्येक विद्यार्थी तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ सके। मैं प्रत्येक कक्षा को शैक्षिक भ्रमण पर ले जाऊँगा साथ ही शारीरिक शिक्षा के अध्यापक से मिलकर एक परामर्श समिति बनाऊँगा तथा तद्नुरूप खेलकूद और व्यायाम आदि की व्यवस्था करवाऊंगा।

विद्यार्थियों में नियम पालन, संयम, विनय, कर्तव्यनिष्ठा आदि सद्गुणों के विकास के लिए सदैव प्रयत्नशील रहूंगा तथा मैं स्वयं ही अनुकरणीय आचरण करते हुए अध्यापकों एवं विद्यार्थियों के बीच में प्रस्तुत रहूंगा।

उपसंहार मेधावी गरीब छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें आर्थिक, पुस्तकीय, शत्रवृत्ति के रूप में सहायता प्रदान करने का प्रयास करूंगा। विद्यालय में प्रयोगशाला के स्वरूप में भी सुधार करवाऊँगा, जिससे विद्यार्थियों की विज्ञान के प्रति अधिक रुचि जागृत होगी तथा विद्यार्थी विज्ञान के प्रति हीन-भावना का अनुभव नहीं करेंगे। कर्मचारियों और अध्यापकों को अच्छे कार्य हेतु पारितोषिक प्रदान करते हुए विद्यार्थियों को भी पुरस्कार प्रदान करूंगा। इस प्रकार प्रधानाचार्य बनकर में अपने सभी कर्तव्यों का उचित प्रकार से निर्वाह करूंगा।

9. आज का आदर्श नेता (2017, 16)
संकेत विन्द भूमिका, अरविंद केजरीवाल का समाज सेवा के लिए प्रेरित होना, भ्रष्टाचार का विरोध, ‘आम आदमी पाटी’ की धारणा, उपसंहार।।

भूमिका लोकतन्त्र में आम आदमी होने के मायने क्या होते हैं, ‘आम’ होने के बावजूद वह कितना खास होता है, इसकी एक मिसाल कायम की है अरविन्द केजरीवाल ने इसलिए अरविन्द केजरीवाल को आज का आदर्श नेता माना जाता है। दो साल पहले तक अरविन्द केजरीवाल एक आम भारतीय थे, परन्तु आज वही ‘आम आदमी’ लाखों लोगों की आवाज है। एक आम आदमी से दिल्ली के मुख्यमन्त्री तक का सफर तय करने वाले अरविन्द केजरीवाल का महज दो वर्ष में भारतीय राजनीति में एक अहम जगह बना लेना एक साधारण राजनीतिक घटना नहीं है वरन् भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय जुड़ने के समान है, जिसे किसी भी हाल में अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अरविन्द केजरीवाल का समाज सेवा के लिए प्रेरित होना सरकारी नौकरी करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने सरकारी तन्त्र में फैले हुए भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को करीब से महसूस किया, जिससे उन्हें समाज-सेवा के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली। वर्ष 2000 में अरविन्द केजरीवाल ने अपने सहयोगी मनीष सिसोदिया के साथ | मिलकर ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना था।

वर्ष 2005 में केजरीवाल ने ‘कबीर’ नाम से एक नए एन जी ओ की स्थापना की, जो मूल रूप से परिवर्तन’ का ही बदला हुआ रूप था। इनके कामकाज का मुख्य तरीका आर टी आई के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कार्य करना था। उल्लेखनीय है कि सूचना का अधिकार’ को कानूनी रूप देने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा एक देशव्यापी आन्दोलन चलाया गया था, जिसमें अरुणा राय, शेखर सिंह, प्रशान्त भूषण आदि सहित केजरीवाल ने भी अपना सक्रिय योगदान दिया था। इन सबके सम्मिलित प्रयासों से ही भारत के नागरिकों को वर्ष 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ मिल पाया था।

अपने गाँधीवादी तरीकों के कारण गाँधीवादी नेता के रूप में पहचाने जाने वाले केजरीवाल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके आदर्श महात्मा गांधी नहीं बल्कि मदर टेरेसा हैं। वह वर्ष 1990 में मदर टेरेसा से मिले भी थे। उनसे मिलने के बाद ही उनके मन में समाज-सेवा के प्रति रुचि जागी। अपना पूरा समय समाज-सेवा को देने के उद्देश्य से केजरीवाल ने फरवरी, 2006 में आयकर विभाग के संयुक्त आयुक्त पद से इस्तीफा दे दिया। इसी वर्ष इन्हें परिवर्तन’ और ‘कबीर’ के द्वारा समाज-सुधार के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाएं देने के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिसम्बर 2006 में इन्होंने मनीष सिसोदिया, अभिनन्दन शेखरी, प्रशान्त भूषण और किरण बेदी के साथ मिलकर पब्लिक कॉज़ रिसर्च फाउण्डेशन’ की स्थापना की, जिसके लिए इन्होंने मैग्सेसे पुरस्कार में मिली धनराशि दान कर दी।

भ्रष्टाचार का विरोघ वर्ष 2010 में अरविंद केजरीवाल ने उस वर्ष हुए। दिल्ली राष्ट्रमण्डल खेलों में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार की आशंका जताई। केजरीवाल ने यह अनुभव किया कि केबोर’ और ‘परिवर्तन’ जैसे गैर सरकारी संगठनों की सफलता की अपनी सीमाएँ हैं। इसलिए इन्होंने दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने वर्ष 2011 में जनलोकपाल बिल को माँग कर रहे और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले अन्ना हजारे का भी समर्थन किया। इस दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

वर्ष 2012 तक केजरीवाल अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए गए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का प्रमुख चेहरा बन चुके थे। बाद में, केन्द्र सरकार ने आन्दोलन से प्रभावित होते हुए जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार किया, लेकिन केजरीवाल सहित अन्य कार्यकर्ता ‘कमजोर’ लोकपाल बिल से खुश नहीं हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में आने का फैसला किया और नवम्बर 2012 में उन्होंने औपचारिक रूप से ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) की स्थापना की। केजरीवाल ने न केवल राजनीति में प्रवेश किया बल्कि वर्ष 2018 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

‘आम आदमी पार्टी की धारणा ‘आम आदमी पार्टी ने अपने नाम से ही दिल्ली की आम जनता को आकर्षित किया। भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से उपजी यह पाटी आम आदमी को सीधे-सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दों जैसे-भ्रष्टाचार, महँगाई, सुरक्षा आदि पर खड़ी हुई थी, जिसमें युवाओं ने भरपूर समर्थन दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि दिसम्बर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनावों में उतरी। दिल्ली के ये चुनाव निकट भविष्य में एक बड़े बदलाव की आहट थे।

एक साल के राजनीतिक अनुभव वाली नई पार्टी ने दिल्ली में 15 वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस को महज 8 सीटों पर सीमित कर दिया। यहाँ तक की केजरीवाल ने नई दिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हुए तीन बार दिल्ली की मुख्यमन्त्री रहीं शीला दीक्षित को उन्हीं की सीट ‘नई दिल्ली से उनको भारी अन्तर से पराजित किया। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 31 सीटों के बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन 28 सीटों के साथ आप भी अधिक पीछे नहीं थीं। अंततः आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के सहयोग से गठबन्धन की सरकार बनाई। इस दौरान आपने अपने वादों के अनुरूप थोड़े-बहुत काम अवश्य किए, लेकिन दिल्ली की जनता को तब बड़ा झटका लगा जब केवल 49 दिन के बाद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमन्त्री पद से यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सत्ताधारी पार्टी से सहयोग नहीं कर रही हैं और इसीलिए उनकी पार्टी जन लोकपाल बिल पारित नहीं करा सकी।

इसके बाद उनकी लोकप्रियता में बहुत कमी आ गई। दिल्ली की जनता ने उन्हें उनके वादों के आधार पर वोट दिया था, लेकिन उनके इस्तीफे से लोगों में यह सन्देश गया कि वह अपने वादों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। आप ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भी पूरे देश में 400 सीटों पर चुनाव लड़ा पर वहाँ भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यह वक्त पार्टी नेता अरविन्द केजरीवाल के लिए काफी मुश्किल था। उनकी पार्टी का भविष्य दाँव पर था, लेकिन कहते हैं न कि इनसान की परीक्षा कठिन समय में ही होती है। उन्होंने साहस बनाए रखा और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी नया उत्साह भरा। अपनी कमियों को पहचानते हुए गलतियों के लिए जनता से माफी माँगी। भ्रष्टाचार मुक्त शासन का सपना देखने वाली जनता पर इसका असर हुआ और फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में वह ऐतिहासिक जीत आप की झोली में आई, जिसकी खुद आप नेताओं को भी उम्मीद नहीं थी।

उपसंहार इन चुनावों में आप पार्टी को 70 में से 67 सीटें मिली जबकि राष्ट्रपति शासन लगने से पूर्व हुए चुनावों में पार्टी को बहुमत भी नहीं मिला था। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा महज 3 सीटों पर सिमट गई तो सबसे अधिक अनुभवी पार्टी कांग्रेस को पूरी दिल्ली में एक भी सोट नसीब नहीं हुई। यह पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी को 54% वोट मिले हों और वह 95% से ज्यादा सीटों पर जीती हो। अरविन्द केजरीवाल न केवल जनता का भरोसा जीता बल्कि बड़ी राजनीतिक पार्टियों को भी आईना दिखा दिया। इस प्रकार आज अरविन्द केजरीवाल सभी के लिए आदर्श नेता बन गए हैं।

10. डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (2016)
संकेत विन्दु भूमिका, विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियाँ, डॉ. कलाम को सम्मानित किए गए सम्मान, राष्ट्रपति के रूप में, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, उपसंहार।

भूमिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, जिनका पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम हैं, का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य में स्थित रामेश्वरम् के धनुषकोडी नामक स्थान में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। वे अपने पिता के साथ मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते हुए रास्ते में पड़ने वाले शिव मन्दिर में भी माथा नवाते। इसी गंगा-जमुनी संस्कृति के बीच कलाम ने धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने एवं घर के खर्चे में योगदान के लिए अखबार बेचने पड़ते थे।

इसी तरह, संघर्ष करते हुए प्रारम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राथमिक स्कूल से प्राप्त करने के बाद उन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ज हाईस्कूल से मैट्रिकलेशन किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए तिरुचिरापल्ली चले गए। वहाँ के सेंट जोसेफ कॉलेज से उन्होंने बीएससी की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1957 में एम आई टी से वैमानिकी इंजीनियरी में डिप्लोमा प्राप्त किया। अन्तिम वर्ष में उन्हें एक परियोजना दी गई, जिसमें उन्हें 30 दिनों के अन्दर विमान का एक डिज़ाइन तैयार करना था, अन्यथा उनकी छात्रवृत्ति रुक जाती। कलाम ने इसे निर्धारित अवधि में पूरा किया।

उन्होंने तमिल पत्रिका ‘आनन्द विकटन’ में अपना विमान स्वयं बनाएँ’ शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसे प्रथम स्थान मिला। बीएससी के बाद वर्ष 1958 में उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की।

विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियाँ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. कलाम ने हावरक्राफ्ट परियोजना एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। इसके बाद वर्ष 1962 में वे भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन में आए, जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ रहकर उन्होंने थुम्बा में रॉकट इंजीनियरी डिविजन की स्थापना की। उनको उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें ‘नासा’ में प्रशिक्षण हेतु भेजा गया।

नासा से लौटने के पश्चात् वर्ष 1963 में उनके निर्देशन में भारत का पहला रॉकेट ‘नाइक अपाची’ छोड़ा गया। 20 नवम्बर, 1967 को ‘रोहिणी-75’ रॉकिट का सफल प्रक्षेपण उन्हीं के निर्देशन में हुआ। परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 के निर्माण में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी प्रक्षेपण यान से जुलाई, 1980 में रोहिणी उपग्रह का अन्तरिक्ष में सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया। वर्ष 1982 में वे भारतीय रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन में वापस निदेशक के तौर पर आए तथा अपना सारा ध्यान गाइडेड मिसाइल के विकास पर केन्द्रित किया। अग्नि मिसाइल एवं पृथ्वी मिसाइल के सफल परीक्षण का श्रेय भी काफी हद तक उन्हीं को जाता हैं।

जुलाई, 1992 में वे भारतीय रक्षा मन्त्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए। उनकी देख-रेख में भारत ने 11 मई, 1998 को पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ। वैज्ञानिक के रूप में कार्य करने के दौरान अलग-अलग प्रणालियों को एकीकृत रूप देना उनकी विशेषता थी। उन्होंने अन्तरिक्ष एवं सामरिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर नए उपकरणों का निर्माण भी किया।

डॉ. कलाम को सम्मानित किए गए सम्मान डॉ. कलाम की उपलब्धियों को देखते हुए वर्ष 1981 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया, इसके बाद वर्ष 1990 में उन्हें पद्म विभूषण’ भी प्रदान किया गया

उन्हें विश्वभर के 30 से अधिक विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित किया। वर्ष 1997 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रल’ से सम्मानित किया। उन्हें एस्ट्रोनॉटिकल सोसायटी ऑफ़ इण्डिया का आर्यभट्ट पुरस्कार तथा राष्ट्रीय एकता के लिए इन्दिरा गाँधी पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। वे ऐसे तीसरे राष्ट्रपति हैं, जिन्हें यह सम्मान राष्ट्रपति बनने से पूर्व ही प्राप्त हुआ है। अन्य दो राष्ट्रपति हैं—सर्वपल्ली राधाकृष्णन एवं डॉक्टर जाकिर हुसैन।

राष्ट्रपति के रूप में वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन सरकार ने डॉक्टर कलाम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी उनका समर्थन किया और 18 जुलाई, 2002 को उन्हें 90% बहुमत द्वारा भारत का राष्ट्रपति चुना गया।

इस तरह उन्होंने 25 जुलाई, को ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया। उन्होंने इस पद को 25 जुलाई, 2007 तक सुशोभित किया। वे राष्ट्रपति भवन को सुशोभित करने वाले प्रथम वैज्ञानिक हैं, साथ ही वे प्रथम ऐसे राष्ट्रपति भी हैं, जो अविवाहित रहे। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने कई देशों का दौरा किया एवं भारत का शान्ति का सन्देश दुनियाभर को दिया। इस दौरान उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया एवं अपने व्याख्यानों द्वारा देश के नौजवानों का मार्गदर्शन करने एवं उन्हें प्रेरित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी सीमित संसाधनों एवं कठिनाइयों के होते हुए भी उन्होंने भारत को अन्तरिक्ष अनुसन्धान एवं प्रक्षेपास्त्रों के क्षेत्र में एक ऊँचाई प्रदान की। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने तमिल भाषा में अनेक कविताओं की रचना भी की है, जिनका अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में हो चुका है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने कई प्रेरणास्पद पुस्तकों की भी रचना की है। भारत 2020 : नईं सहस्राब्दि के लिए एक दृष्टि’, ‘इग्नाइटेड माइण्ड्स : अनलीशिंग द पावर विदिन इण्डिया’, ‘इण्डिया मोइ ड्रीम’, ‘विंग्स ऑफ फायर’, ‘माइ जन’, ‘महाशक्ति भारत’, ‘अदम्य साहस’, ‘छुआ आसमान’, ‘भारत की आवाज’, ‘टर्निग प्वाइण्ट’ आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ उनकी आत्मकथा है, जिसे उन्होंने भारतीय युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले अन्दाज में लिखा है।

उनकी पुस्तकों का कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनका मानना है कि भारत तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ जाने के कारण ही अपेक्षित उन्नति शिखर पर नहीं पहुँच पाया है, इसलिए अपनी पुस्तक “भारत 2020 : नई सहस्राब्दि  के लिए एक दृष्टि’ के द्वारा उन्होंने भारत के विकास स्तर को वर्ष 2020 तक विज्ञान के क्षेत्र में अत्याधुनिक करने के लिए देशवासियों को एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान |किया। यही कारण है कि वे देश को नई पीढ़ी के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं।

उपसंहार 80 वर्ष से अधिक आयु के होने के बावजूद वे समाज सेवा एवं अन्य कार्यों में खुद को व्यस्त रखते थे। शिक्षकों के प्रति डॉ. कलाम के हृदय में बहुत सम्मान था।

राष्ट्रपति के पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् वे देशभर में अनेक शिक्षण संस्थानों में ज्ञान बाँटते रहे, यहाँ तक कि 27, जुलाई, 2015 की शाम को भी उन्होंने अपनी अन्तिम साँस शिलांग में इण्डियन इंस्टीटयट ऑफ मैनेजमेण्ट के विद्यार्थियों से बात करते ली अर्थात् अन्तिम साँस में भी वह शिक्षक के रूप में रहे। वे भारत के सर्वधर्मसद्भावना के साक्षात् प्रतीक हैं। वे कुरान एवं भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते थे।

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भारतवासी उनके जीवन एवं उनके कार्यों से प्रेरणा प्रहण कर वर्ष 2020 तक भारत को सम्पन्न देशों की श्रेणी में ला खड़ा करने के उनके सपने को साकार करेंगे। उनके द्वारा कही निम्न पंक्तियों सभी को प्रेरणा देती

“सपने वह नहीं होते जो आप नींद में देखते हैं।
सपने तो वह हैं जो आपको सोने नहीं देते।”

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 1 प्रेम माधुरी / यमुना-छवि

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name प्रेम माधुरी / यमुना-छवि
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 1 प्रेम माधुरी / यमुना-छवि

प्रेम माधुरी / यमुना-छवि – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 14, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
आधुनिक युग के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 1850 ई. में काशी के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। काशी के प्रसिद्ध सेठ अमीचन्द के वंशज भारतेन्दु के पिता का नाम बाबू गोपालचन्द्र था, जो ‘गिरिधरदास’ के नाम से कविता लिखते थे। घरेलू परिस्थितियों एवं समस्याओं के कारण भारतेन्दु की शिक्षा व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाई। इन्होंने घर पर ही स्वाध्याय द्वारा हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी आदि भाषाओं की शिक्षा ग्रहण की। इन्होंने कविताएँ लिखने के साथ-साथ कवि-वचन सुधा (1884 बनारस) नामक पत्रिका का प्रकाशन भी आरम्भ किया। बाद में, हरिश्चन्द्र मैग्जीन (1883 बनारस) तथा ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ का भी सफल सम्पादन किया। ये साहित्य के क्षेत्र में कवि, नाटककार, इतिहासकार, समालोचक, पत्र-सम्पादक आदि थे, तो समाज एवं राजनीति के क्षेत्र में एक राष्ट्रनेता एवं सच्चे पथ-प्रदर्शक थे। जब राजा शिवप्रसाद को अपनी चाटुकारिता के बदले विदेशी सरकार द्वारा सितारे-हिन्द की पदवी दी गई, तो देश के सुप्रसिद्ध विद्वज्जनों ने इन्हें 1880 ई. में ‘भारतेन्दु’ विशेषण से विभूषित किया। क्षय रोग से ग्रस्त होने के कारण अल्पायु में ही 1885 ई. में भारत को यह इन्दु (चन्द्रमा) अस्त हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ
गयकार के रूप में भारतेन्दु जी को हिन्दी गद्य का जनक माना जाता है। इन्होंने साहित्य को सर्वांगपूर्ण बनाया। काव्य के क्षेत्र में इनकी कृतियों को इनके युग का दर्पण माना जाता है। इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।

काव्य कृतियाँ
प्रेम मापुरी, प्रेम तरंग, प्रेम सरोवर, प्रेम मालिका, प्रेम प्रलाप, तन्मय लीला, कृष्ण चरित, दान-लीला, भारत वीरत्व, विजयिनी, विजय पताका आदि रचनाओं के अतिरिक्त उर्दू का स्यापा, नए जमाने की मुकरी आदि भी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।

अन्य कृतियाँ
नाटक ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति’, ‘सत्य हरिश्चन्द्र’, ‘श्रीचन्द्रावली’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘नीलदेवी’ और ‘अँधेर नगरी’ आदि नाटकों की रचना भारतेन्दु जी ने की। उपन्यास ‘पूर्ण प्रकाश’ और ‘चन्द्रप्रभा’।

इतिहास और पुरातत्त्व सम्बन्धी कृतियाँ
‘कश्मीर कुसुम’, ‘महाराष्ट्र देश का इतिहास’, ‘रामायण का समय’, ‘अग्रवालों की उत्पत्ति’, ‘बूंदी का राजवंश’ और ‘चरितावली’। देश-प्रेम सम्बन्धी रचनाएँ । ‘भारतवीरत्व, ‘विजय-वल्लरी’, ‘विजयिनी’ एवं ‘विजय-पताका’ प्रमुख हैं।

देश-प्रेम सम्बन्धी रचनाएँ
‘भारत-वीरत्व, ‘विजय-वल्लरी’, ‘विजयिनी’ एवं ‘विजय-पताका’ प्रमुख हैं।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. समाज सुधारक भारतेन्दु जी ने काव्य क्षेत्र को आधुनिक विषयों से सम्पन्न किया और रीति की बँधी-बँधाई परिपाटी से कविता को मुक्त कर आधुनिक युग का द्वार खोल दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कवि होने के साथ-साथ समाज सुधारक एवं प्रचारक भी थे। उन्होंने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य भी किए।
  2. राष्ट्रप्रेम की भावना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी सजग राजनीतिक चेतना के फलस्वरूप विदेशी शासन के अत्याचारों से पीड़ित भारतीय जनता में देशभक्ति की भावना एवं राष्ट्रीयता का भाव जगाने का प्रयास किया। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा किए गए शोषण के विरुद्ध जनता को सचेत करने का भी प्रयास किया।
  3. सामाजिक दुर्दशा का निरूपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने समाज में व्याप्त रूढियों एवं कुप्रथाओं का डटकर विरोध किया। भारतेन्दु जी ने नारी शिक्षा का समर्थन किया तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। वे सती प्रथा, छुआछूत आदि के विरोधी थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक पाखण्ड आदि का निरूपण निःसंकोच किया।
  4. भक्ति भावना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग को मानने वाले थे। उनकी कविता में सच्ची भक्ति-भावना के दर्शन होते हैं। ईश्वर के प्रति दृढ विश्वास को व्यक्त करते हुए भारतेन्दु जी अपनी दीनता का उल्लेख करते हैं
    उधारौ दीन बन्धु महाराज
    जैसे हैं जैसे तुमरे ही नहीं और सौं काज।।।
  5. प्रकृति चित्रण प्रकृति चित्रण करने में भारतेन्दु जी को अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे मान-प्रकृति के शिल्पी थे। यद्यपि भारतेन्दु जी ने वसंत, वर्षा आदि ऋतुओं का मनोहारी चित्रण अपने काव्य में किया है। दूसरी ओर उन्होंने गंगा-यमुना, चाँदनी का सुन्दर चित्रण भी अपने काव्य में किया है।

कला पक्ष

  1. भाषा भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी गद्य के प्रवर्तक थे, जिन्होंने खड़ी बोली को आधार बनाया, लेकिन पद्य के सम्बन्ध में ये शिष्ट, सरल एवं माधुर्य से परिपूर्ण ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते रहे। इसी क्रम में इन्होंने ब्रजभाषा के परिमार्जन का कार्य किया। कुछ अप्रचलित शब्दों को बाहर करने के अतिरिक्त भाषा के रूविमुक्त रूप को अपनाया। भाषा के निखार के लिए लोकोक्तियों एवं मुहावरों को भी अपनाया। भारतेन्दु ने पद्य की कुछ रचनाएँ खड़ी बोली में भी की।
  2. शैली भारतेन्दु जी की शैली इनके भावों के अनुकूल है। इन्होंने इसमें नवीन प्रयोग करके अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। इन्होंने अपने काव्य में चार प्रकार की शैलियों को अपनाया
    • भावात्मक शैली प्रेम एवं भक्ति के पदों में
    • रीतिकालीन अलंकार शैली श्रृंगार के पदों में
    • उद्बोधन शैली देश-प्रेम की कविताओं में
    • व्यंग्यात्मक शैली समाज सुधार सम्बन्धी कविताओं में इन सभी रचनाओं में इन्होंने काव्य-स्वरूप के अन्तर्गत मुक्तक शैली का प्रयोग किया।
  3. छन्द एवं अलंकार भारतेन्दु जी के काव्य में अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। इन्होंने अपने काव्य में अलंकारों को साधन के रूप में ही अपनाया है, साध्य-रूप में नहीं। भारतेन्दु जी ने मुख्यतः अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा एवं सन्देह अलंकारों को अपने काव्य में अधिक महत्व दिया। कवित्त, सवैया, लावनी, चौपाई, दोहा, छप्पय, गजल, कुण्डलिया आदि छन्दों का प्रयोग इनकी रचनाओं में मिलता है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
भारतेन्दु जी में वह प्रतिभा थी, जिसके बल पर ये अपने युग को सच्चा एवं सफल नेतृत्व प्रदान कर सका इनकी काव्य कृतियों को इनके युग का दर्पण कहा जाता है। भारतेन्दु जी की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनके समकालीन युग को हिन्दी साहित्य में ‘भारतेन्दु युग’ के नाम से जाना जाता है।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्म भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

प्रेम-माधुरी

प्रश्न 1.
रोकहिं जो तौ अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।
जौ कहैं जाहु न तो प्रभुता जौ कछू न कहैं तो सनेह नसाइए।।
जो ‘हरिचन्द’ कहूँ तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यों पतिआइए।
तासों पयान समै तुम्हरे हम का कहैं आपै हमें समुझाइए।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के कवि व शीर्षक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक युग के प्रवर्तक कवि व नाटककार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित कविता ‘प्रेम-माधुरी’ से उधृत है।

(ii) पद्यांश में नायिका की किस मनोदशा का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
पद्यांश में नायिका की असमंजस एवं दुविधापूर्ण मानसिक स्थिति का वर्णन किया गया है। नायिका का पति परदेश जा रहा है और वह इस असमंजस की स्थिति में है कि किस प्रकार विदेश जाते हुए अपने पति को अपने मनोभावों से अवगत कराए।

(iii) नायिका द्वारा जगत् की किस रीति का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
नायिका जाते हुए किसी को पीछे से टोकने से सम्बन्धित जगत् की रीति का उल्लेख करती है। नायिका कहती है कि यदि वह अपने प्रियतम को पीछे से टोकती हैं, तो लोगों के अनुसार यात्रा को जाते समय किसी को टोकना अशुभ होता है। अतः वह किस प्रकार अपने प्रियतम को अपनी बात बताए।

(iv) जौ कहूँ जाहु न तो प्रभुता जौ कुछ न कहें तो सनेह नसाइट।’ पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति में नायिका की दुविधापूर्ण स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि वह सोचती है, यदि वह अपने प्रियतम से विदेश में जाने के लिए कहती है तो वह उन्हें आदेश देने के समान होगा और यदि वह उनसे कुछ नहीं कहती तो उसका प्रेम नष्ट होगा।

(v) पद्यांश की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत् पद्यांश में कवि ने नायिका की दुविधापूर्ण मानसिक रिथति को व्यक्त करने के लिए ब्रज भाषा का प्रयोग किया है, जो अत्यन्त प्रभावशाली है। कवि ने मुक्तक शैली का प्रयोग करते हुए सम्पूर्ण कथा अभिव्यक्त की है।

प्रश्न 2.
आजु लौं जौ न मिले तो कहा हम तो तुम्हरे सब भाँति कहावें।
मेरौ उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावै।।
जो ‘हरिचन्द भई सो भई अब प्रान चले चहूँ तासों सुनावें।।
प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा के समै सब कण्ठ लगावें।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका की किस दशा की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर:
नायिका नायक से अत्यधिक प्रेम करती है। वह उसे बिछुड़ने के कारण अत्यधिक दु:खी है तथा उससे मिलने के लिए लालायित है। नायिका की इसे विरह अवस्था की अभिव्यक्ति ही काव्यांश में हुई है।

(ii) नायिका अपनी विरह अवस्था के लिए किसे उत्तर:दायी मानती है?
उत्तर:
नायिका का मानना है कि नायक से न मिल पाने अर्थात् उससे (नायक) विरह के लिए उसका भाग्य ही उत्तर:दायी है। वह कहती है कि सभी अपने भाग्य के अनुसार फल पाते हैं और उसके भाग्य में नायक से विरह लिखा है, इसलिए वह इस दशा से पीड़ित हैं।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने अपनी कौन-सी इच्छा प्रकट की है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में नायिका-नायक के विरह में तड़प रही है। उसकी उत्कंठ इच्छा है कि नायक उससे मिलने के लिए आए। नायिका अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहती है कि उसके प्राण अब उसके तन से निकलने वाले हैं। अतः नायक को नायिका से मिलने के लिए आनी चाहिए और उसे गले लगाना चाहिए।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका ने जगत की किस रीति का उल्लेख किया हैं?
उत्तर:
नायिका का मानना है कि जगत् की यह रीति (नियम) रही है कि जो व्यक्ति जा रहा होता है, उसे गले लगाकर अन्तिम विदाई दी जाती है। अतः नायक को आकर इस रीति का पालन करना चाहिए।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में प्रयुक्त रस को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने वियोग श्रृंगार रस का प्रयोग किया है। इस पद्यांश में कवि ने नायक से नायिका के न मिल पाने के कारण उसकी विरहावस्था का वर्णन किया है। अतः इसमें वियोग श्रृंगार रस हैं। अतः नायक को आकर इस . रीत का पालन करना चाहिए।

यमुना-छवि

प्रश्न 3.
तरनि-तनूजा तट तमाले तरुवर बहु छाए।
झुके कुल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए।
किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सबै निज-निज सोभा।
कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।।
मनु आतप वारन तीर कौं सिमिटि सबै छाये रहत।
कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत ।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक व कवि का नाम बताइए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी में संकलित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित कविता ‘यमुना छवि’ से उद्धृत है।।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसका वर्णन किया हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने यमुना नदी के किनारे छाए हुए तमाल के वृक्षों का वर्णन किया है। जिन्हें देखकर कवि के मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न छायाचित्र निर्मित होते हैं।

(iii) यमुना नदी के किनारे खड़े वृक्षों को देखकर कवि को क्या प्रतीत होता है?
उत्तर:
नदी के किनारे खड़े वृक्षों को देखकर कवि को ऐसा प्रतीत होता है जैसे तेमाल के वृक्ष यमुना नदी को स्पर्श करना चाहते हों या फिर वे झुककर नदी के पानी में अपना प्रतिबिम्ब देखना चाहते हों। कभी-कभी कवि को ऐसा लगता है मानो वे नदी के तट को धूप से बचाने के लिए उसे छाया प्रदान कर रहे हों या वे तट पर, कृष्ण को नमन करने एवं उनकी सेवा करने के लिए झुके हुए हौं।’

(iv) प्रस्तुत पद्यांश के अलंकार सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अलंकारों का अत्यन्त सुन्दर प्रयोग किया है, जिसने काव्य की शोभा बढ़ा दी हैं। ‘तरनि तनूजा तट तमाल’, में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार, ‘सब निज-निज सोभा’, में निज-निज की पुनरावृत्ति के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार व ‘मनु आतप वारन तीर कौं’ में उत्प्रेक्षा अलंकार हैं तथा सम्पूर्ण पद्यांश में मानवीकरण अलंकार विद्यमान हैं।

(v) ‘तरनि-तनूजा’ व ‘तट’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची, बताइए।
उत्तर:

शब्द पर्यायवाची शब्द
तरनि-तनूजा यमुना, कालिन्दी
तट तीर

प्रश्न 4.
कबहुँ होत सत चन्द कबहुँ प्रगटत दुरि भाजत।।
पवन गवन बस बिम्ब रूप जल में बहु साजते।।
मनु ससि भरि अनुराग जमुन जल लोटत डोलै।
कै तरंग की डोर हिंडोरनि करत कलोलें।।
कै बालगुड़ी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती।
कै अवगाहत डोलत कोऊ ब्रजरमनी जल आवती।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।
(i) कवि को यमुना नदी के जल पर पड़े चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर क्या अनुभूति होती है?
उत्तर:
कवि जब यमुना नदी के जल पर चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखता है तो कभी उसे लहरों पर सौ-सौ चन्द्रमा दिखाई देते हैं, कभी वह उसे दूर जाकर अदृश्य होता हुआ अनुभूत होता है। कभी वह उसे जल में झूला झूलते हुए प्रतीत होता है तो कभी उसे उसमें बच्चे द्वारा उड़ाई गई पतंग की अनुभूति होती है।

(ii) “के बालगुड़ी नभ में उड़ी सोहत इत उत धावती।” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि यमुना के जल पर चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को देखकर कल्पना करते हुए कहता है कि यमुना की लहरों पर चन्द्रमा का हिलता हुआ प्रतिबिम्ब ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो किसी बच्चे की पतंग आकाश में हवा के जोर से इधर-उधर हिल रही हो।।

(iii) पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।
उत्तर: पद्यांश में कवि भारतेन्दु ने यमुना के जल पर पड़ने वाले चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का वर्णन किया है। चन्द्रमा का यह रूप कवि को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, जिसे देखकर कवि के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की कल्पनाएँ प्रकट हो रही हैं।

(iv) पद्यांश के शिल्प पक्ष पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने ब्रजभाषा का प्रयोग करते हुए मुक्तक शैली में काव्य रचना की है। जल पर पड़ने वाली चन्द्रमा की छाया का वर्णन करते हुए पद्यांश में श्रृंगार रस की प्रधानता विद्यमान है। ‘मनु ससि भरि अनुराग’ में उत्प्रेक्षा अलंकार व ‘सोहत इत उत धावती’ में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है। माधुर्य गुण व लक्षणा शब्दशक्ति भी काव्य में विद्यमान है।

(v) ‘ससि’ व ‘नभ’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द

पर्यायवाची शब्द

ससि

राकैश, चन्द्रमा

नभ

आकाश, गगन

प्रश्न 5.
मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल।
कै तारागन ठगन लुकत प्रगटत ससि अबिकल।।
कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत।।
तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत।।’
कै बहुत रजत चकई चलत के फुहार जल उच्छत।
कै निसिपति मल्ल अनेक बिधि उठि बैठत कसरत करत।।
कुजत कहुँ कलहंस कहूँ मज्जत पारावत।
कहुँ कारण्डव उड़त कहूँ जल कुक्कुट धावत।।
चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगावत।
सुक पिक जल कहुँ पियत कहूँ भ्रमरावलि गावत।।
कहूँ तट पर नाचत मोर बहु रोर बिबिध पच्छी करत।
जल पान नहान करि सुख भरे तट सोभा सब जिय धरत।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दिखने व छिपने की तुलना कवि किससे करता है?
उत्तर:
यमुना के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दिखने व छिपने की तुलना कवि माह के दोनों पक्षों कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष से करता है। कवि कहता है कि जब चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है तो ऐसा लगता है, मानो शुक्ल पक्ष के कारण चारों ओर उजाला हो गया। हो और छिपने पर ऐसा लगता है, मानो कृष्ण पक्ष के कारण चारों ओर अँधेरा हो गया हो।

(ii) “कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत।।” प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि प्रत्येक लहर के साथ चन्द्रमा की छवि दिखने के कारण कहता है कि उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो चाँद यमुना में उठने वाली प्रत्येक लहर से मिलने के लिए उतने ही रूप धारण करके उनके पीछे उत्साहित होकर दौड़ता रहता है।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने पक्षियों की शोभा का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि पक्षियों की शोभा का वर्णन करते हुए कहता है कि यमुना के जल में विभिन्न पदी; राजहंस, कबूतर, जल मुर्गियों, चकवा-चकी, बगुले, सोते, कोयल, मोर, भंवरे आदि इधर-उधर विहार कर रहे हैं। कोई स्नान कर रहा है, कोई गीत गा रहा है। और कोई नृत्य कर रहे हैं। इस प्रकार, कवि ने पक्षियों के विभिन्न यिा -कलापों का वर्णन किया है।

(iv) पद्यांश की अलंकार योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पशि में अलंकारों का प्रयोग उसके शिल्प एवं भाव पक्ष में सौन्दर्य उत्पन्न कर देता है। पाश में ‘जात, जमुन जल’ व ‘कुजत कई कलहंस कहूँ’ में क्रमशः ‘ज’ व ‘क’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार, ‘तितनो ही धरि रूप मिलन हित तास धावत’ में मानवीकरण, ‘मनु जुग पच्छ प्रतछ’ में उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग कवि ने किया है।

(v) ‘कालिन्दी’ व ‘सुक’ शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर:

शब्द

पर्यायवाची शब्द
कालिन्दी

यमुना, सूर्यसुता

सुक

 तोता, सुगा

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत
Number of Questions Solved 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की किसी एक घटना का उल्लेख कीजिए जो आपको अच्छी लगी हो। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का सारांश लिखिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु/कथानक अपने शब्दों में ‘ लिखिए। (2018, 16)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए। अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए। (2017, 16)
अथवा
सत्य की जीत खण्डकाव्य की किसी प्रमुख घटना का परिचय दीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक/कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2018, 14, 13, 12, 11, 10)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु के आधार पर सिद्ध कीजिए कि जीत वहाँ होती है, जहाँ सत्य, धर्म और न्याय होता है।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा महाभारत के द्रौपदी के चीर-हरण की संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। सिद्ध कीजिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए। (2014, 13, 12)
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा ‘महाभारत’ के द्रौपदी चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघु काव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। दुर्योधन पाण्डवों को यूतक्रीड़ा (जुआ) के लिए आमन्त्रित करता है और छल-प्रपंच से उनका सब कुछ छीन लेता है। युधिष्ठिर जुए में स्वयं को हार जाते हैं। अन्त में वह द्रौपदी को भी दांव पर लगा देते हैं और हार आते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं।

दुःशासन द्रौपदी के केश खींचते हुए उसे सभा में लाता है। द्रौपदी के लिए यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सभा में प्रश्न उठाती है कि जो व्यक्ति स्वयं को हार गया है, उसे अपनी पत्नी को दाँव पर लगाने का क्या अधिकार है?

अतः मैं कौरवों द्वारा विजित नहीं हैं। दुःशासन उसका चीर-हरण करना चाहता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है।

अरे-ओ! दु:शासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान
कराऊँगी मैं इसका बोध।।”

तब भयभीत दुःशासन दुर्योधन के आदेश पर भी उसके चीर-हरण का साहस नहीं कर पाता। दुर्योधन का छोटा भाई विकर्ण द्रौपदी का पक्ष लेता है। उसके समर्थन से अन्य सभासद भी दुर्योधन और दुःशासन की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि आज पाण्डवों के प्रति होते हुए अन्याय को नहीं रोका गया, तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। अन्ततः धृतराष्ट्र पाण्डवों के राज्य को लौटाकर उन्हें मुक्त करने की घोषणा करते हैं। इस खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी के चीर हरण की घटना में श्रीकृष्ण द्वारा चीर बढ़ाए जाने की अलौकिकता को प्रस्तुत नहीं किया हैं। द्रौपदी का पक्ष सत्य, न्याय का पक्ष है। तात्पर्य यह है कि जिसके पास सत्य और न्याय का बल हो, असत्यरूपी दुःशासन उसका चीर-हरण नहीं कर सकता।

द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी और युग के अनुकूल सृजित किया है और नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दोहराया है। इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त लघु रखी गई है। कथा का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया गया हैं। इस प्रकार ‘सत्य की जीत को एक सफल ‘खण्ड काव्य’ कहना सर्वथा उचित होगा।

प्रश्न 2.
खण्डकाव्य की विशेषताओं के आधार पर सत्य जीत खण्डकाव्य की समीक्षा कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की सामान्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018, 17)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2017)
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भावात्मक एवं कलात्मक विशेषताओं का विवरण इस प्रकार है। भावपक्षीय विशेषताएँ ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भावपक्षीय विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

  1. आधुनिक युग आधुनिक युग ‘नारी-जागरण’ का युग है। द्रौपदी के माध्यम से इस काव्य में पग-पग पर आज की जागृत नारी ही बोल रही है। यद्यपि इस खण्डकाव्य की कथा महाभारत की चीर-हरण घटना पर आधारित है, किन्तु कवि ने उसमें वर्तमान नारी की दशा को आरोपित किया है। साथ ही कुछ मौलिक परिवर्तन भी किए हैं। कवि का विचार है कि शक्ति का उपयोग युद्ध के लिए नहीं, अपितु शान्ति एवं विकास कार्यों के लिए होना चाहिए। जीवन में सत्य, न्याय, प्रेम, करुणा, क्षमा, सहानुभूति, सेवा आदि मूल्यों का विकास आवश्यक है।
  2. उदात्त आदर्शों का स्वर सम्पूर्ण भावात्मक क्षेत्रों से भारतीय नारियों के प्रति श्रद्धा, विनाशकारी आचरण एवं शस्त्रों के अंगीकरण का विरोध, प्रजातान्त्रिक आदशों तथा सत्य के आत्मबल की शक्ति का स्वर मुखरित होता है। इस खण्डकाव्य में द्रौपदी के चीर-हरण को प्रसंग बनाकर उदात्त आदशों की भावधारा प्रवाहित की गई है।
  3. रस योजना प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर एवं रौद्र रस की प्रधानता है। ओज गुण की प्रधानता भी दिखाई देती है। इस खण्डकाव्य का विषय एवं भाव नारी के शक्ति-रूप को चित्रित करना है। अत: उसके अनुरूप वीर एवं रौद्र रस की योजना की गई है।

कलापक्षीय विशेषताएँ ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कलापक्षीय विशेषताएँ निम्न प्रकार है।

1. भाषा-शैली प्रस्तुत खण्डकाव्य न घटना प्रधान है, न भाव प्रधान। यह एक विचारशील रचना है। इस कारण कवि ने इसे अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रसादगुण सम्पन्न खड़ी बोली हिन्दी में लिखा है। इसकी भाषा में न तो अलंकारों की प्रधानता है और न ही कृत्रिमता की।

सह सका भरी सभा के बीच नहीं वह अपना यों अपमान।
देख नर पर नारी का वार एकदम गरज उठी अभिमान।।”

इस काव्य की भाषा बड़ी ओजपूर्ण है। द्रौपदी इसकी प्रमुख स्त्री पात्र है। वह सिंहनी सी निक, दुर्गा सी तेजस्विनी और दीपशिखा सी आलोकमयी है। दूसरी ओर पुरुष पात्रों में दुःशासन प्रमुख है, उसमें पौरुष का अहं है और भौतिक शक्ति का दम्भ भी। अतः दोनों पात्रों के व्यक्तित्व एवं विचारों के अनुरूप ही इस काव्य की भाषा को अत्यन्त वेगपूर्ण एवं ओजस्वी रूप प्रदान किया गया है।

2. संवाद योजना एवं नाटकीयता ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने कथोपकथनों द्वारा कथा को प्रस्तुत किया है। इसके संवाद सशक्त, पात्रानुकूल तथा कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं। कवि के इस प्रयास से काव्य में नाटकीयता का समावेश हो गया है, जिस कारण सत्य की जीत’ काव्य अधिक आकर्षक बन गया है| “द्रौपदी बढ़-चढ़ कर मत बोल, कहा उसने तत्क्षण तत्काल। पीट मत री नारी का ढोल, उगल मत व्यर्थ अग्नि की ज्वाल।।”

3. अलंकार योजना प्रस्तुत खण्डकाव्य में उत्प्रेक्षा, उपमा एवं रूपक अलंकारों का प्रयोग किया गया है। अनुभावों की चित्रोपमता की सजीव योजना की गई है—

और वह मुख! प्रज्वलित प्रचण्ड
अग्नि को खण्ड, स्फुलिंग का कोष।”

इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त लघु रखी गई है। कथा का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया गया है। द्रौपदी का चरित्र आदर्शमय है। इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ को एक सफल खण्डकाव्य कहना सर्वथा उपयुक्त हैं।

4. उद्देश्य प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय दिखाना है। इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य मानवीय सद्गुणों एवं उदात्त भावनाओं को चित्रित करके समाज में इनकी स्थापना करना और समाज के उत्थान में नर-नारी का समान रूप से सहयोग देना है।

प्रश्न 3.
“सत्य की जीत आधुनिक युग की नारी-जागरण की झलक है।” इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के शीर्षक (नामकरण) की सार्थकता (आशय) पर प्रकाश डालिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में निहित सन्देश (उददेश्य) को स्पष्ट कीजिए। (2014, 13, 12, 10)
उत्तर:

‘सत्य की जीत’ शीर्षक की सार्थकता

श्री द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी द्वारा रचित ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में द्रौपदी चीर-हरण के प्रसंग का वर्णन किया गया है, किन्तु यह सर्वथा नवीन है। अत्याचारों को द्रौपदी चुपचाप स्वीकार नहीं करती वरन् पूर्ण आत्मबल से उसके विरुद्ध संघर्ष करती है। चीर-हरण के समय वह दुर्गा का रूप धारण कर लेती है, जिससे दु:शासन सहम जाता है। सभी कौरव द्रौपदी के सत्य बल, तेज और सतीत्व के आगे कान्तिहीन हो जाते हैं। अन्ततः जीत उसी की होती है और पूरी राजसभा उसके पक्ष में हो जाती है। इस खण्डकाव्य के माध्यम से कवि का उद्देश्य सत्य को असत्य पर विजय प्राप्त करते हुए दिखाना है। खण्डकाव्य का मुख्य आध्यात्मिक भाव सत्य की असत्य पर विजय है। अतः खण्डकाव्य का शीर्षक सर्वथा उपयुक्त है।

‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का उद्देश्य

प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय दिखाना है। इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य मानवीय सद्गुणों एवं उदात्त भावनाओं को चित्रित करके समाज में इनकी स्थापना करना है और समाज के उत्थान में नर-नारी का समान रूप से सहयोग देना है। इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विचारों का प्रतिपादन हुआ है।

1. नैतिक मूल्यों की स्थापना ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने दुःशासन और दुर्योधन के छल-कपट, दम्भ, ईष्र्या, अनाचार, शस्त्र बल आदि की पराजय दिखाकर उन पर सत्य, न्याय, प्रेम, मैत्री, करुणा, श्रद्धा आदि मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा की है। कवि का विचार है कि मानव को भौतिकवाद के गर्त से नैतिक मूल्यों की स्थापना करके ही निकाला जा सकता है।

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत”

2. नारी की प्रतिष्ठा प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी को कोमलता व श्रृंगार की मूर्ति के रूप में नहीं वरन् दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। कवि ने द्रौपदी को उस नारी के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपने सतीत्व और मर्यादा की रक्षा के लिए चण्डी और दुर्गा बन जाती है। यही कारण है। कि भारत में नारी की शक्ति को दुर्गा के रूप में स्वीकार किया गया है। द्रौपदी दु:शासन से स्पष्ट कह देती है कि नारी का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है, वह पुरुष की सम्पत्ति या भोग्या नहीं हैं। समय पड़ने पर वह कठोरता का वरण भी कर सकती है।

3. स्वार्थ एवं ईष्र्या का विनाश आज को मनुष्य स्वार्थी होता जा रहा है। स्वार्थ भावना ही संघर्ष को जन्म देती है। इनके वश में होकर व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। इसे कवि ने द्रौपदी चीर-हरण की घटना के माध्यम से दर्शाया है। दुर्योधन पाण्ड्वों से ईष्र्या रखता है तथा उन्हें छूतक्रीड़ा (जुआ) में छल से पराजित कर देता है और उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है। वह द्रौपदी को निर्वस्त्र करके उसे अपमानित करना चाहता है। कवि स्वार्थ और ईष्र्या को पतन का कारण मानता है। कवि इस खण्डकाव्य के माध्यम से यह सन्देश देता है कि स्वार्थपरता, बैर-भाय, ईष्र्या-द्वेष आदि को हमें समाप्त कर देना चाहिए और उसके स्थान पर मैत्री, सत्य, प्रेम, त्याग, परोपकार, सेवा-भावना आदि का प्रसार करना चाहिए।

4, प्रजातान्त्रिक भावना का प्रतिपादन प्रस्तुत खण्डकाव्य का सन्देश यह भी है कि हम प्रजातान्त्रिक भावनाओं का आदर करें। कवि ने निरंकुशता का खण्डन करके प्रजातन्त्र की उपयोगिता का प्रतिपादन किया है। निरंकुशता पर प्रजातन्त्र एक अंकुश है। राजसभा में द्रौपदी के प्रश्न पर जहाँ दुर्योधन, दुःशासन और कर्ण अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं, वहीं धृतराष्ट्र अपना निर्णय देते समय जनभावनाओं को पूर्ण ध्यान में रखते हैं।

5. विश्वबन्धुत्व का सन्देश ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने यह सन्देश दिया है कि सहयोग और सह-अस्तित्व से ही विश्व का कल्याण होगा।

जिएँ हम और जिएँ सब लोग।”

इससे सत्य, अहिंसा, न्याय, मैत्री, करुणा आदि को बल मिलेगा और समस्त संसार एक कुटुम्ब की भाँति प्रतीत होने लगेगा।

6. निरंकुशवाद के दोषों का प्रकाशन रचनाकार ने स्वीकार किया है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, तो वह अनैतिक कार्य करने में कोई संकोच नहीं करती। ऐसे राज्य में विवेक कुण्ठित हो जाता है। भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी दुर्योधन की सत्ता की निरंकुशता के आगे हतप्रभ है।

इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ एक विचार प्रधान खण्डकाव्य है। इसमें शाश्वत भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा की गई है और स्वार्थ एवं ईष्र्या के समापन की कामना भी। कवि पाठकों को सदाचारपूर्ण जीवन की प्रेरणा देना चाहता है। वह उन्नत मानवीय जीवन का सन्देश देता है।

प्रश्न 4.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए। (2015)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के संवाद को अपने शब्दों में लिखिए। (2011)
उत्तर:
कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी कृत ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक ‘महाभारत’ के ‘सभा पर्व’ से लिया गया हैं। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में इस प्रकार है-दुर्योधन पाण्डवों को छूतक्रीड़ा का निमन्त्रण देता है। पाण्डवे उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं और जुआ खेलते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं। अन्त में युधिष्ठिर द्रौपदी को भी दाँव पर लगा देते हैं और हार जाते हैं। प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ दुर्योधन द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित करना चाहता है। अतः वह दुःशासन को भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करने का आदेश देता है। इस घटना को भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र एवं विदुर जैसे ज्ञानीजन भी मूकदर्शक बने देखते रहते हैं। केश पकड़कर द्रौपदी को सभा में लाया जाता है। इस अपमान से क्षुब्ध होकर वह एक सिंहनी के समान गर्जना करती हुई दु:शासन को ललकारती है। सभी सभासद उसकी ललकार सुनकर स्तब्ध रह जाते हैं। द्रौपदी कहती है-

अरे-ओ! दुःशासन निर्लज! देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं इसका बोध।”

द्रौपदी द्वारा नारी जाति पर पुरुषों के अत्याचार का विरोध किया जाता है। दुःशासन नारी को अबला, तुच्छ, महत्त्वहन एवं पुरुष की आश्रिता बताता है, परन्तु द्रौपदी उसे नारी-क्रोध से दूर रहने को कहती है। द्रौपदी कहती है कि संसार के कल्याण के लिए नारी को महत्त्व दिया जाना आवश्यक है।

द्रौपदी और दु:शासन दोनों धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य पर तर्क-वितर्क करते हैं। द्रौपदी उपस्थित सभासदों से तथा नीतिज्ञ, विद्वान् और प्रतापी व्यक्तियों से पूछती है कि जुए में हारे हुए युधिष्ठिर को मुझे दांव पर लगा देने का अधिकार कैसे हो सकता है? यदि युधिष्ठिर को उसे दांव पर लगाने का अधिकार नहीं है, तो उसे विजित कैसे माना गया और उसे भरी सभा में अपमानित करने का किसी को क्या अधिकार है? द्रौपदी के इस कथन के प्रति सभी संभाजन अपनी सहमति व्यक्त करते हैं। भीष्म पितामह इसका निर्णय युधिष्ठिर पर छोड़ते हैं। द्रौपदी भीष्म पितामह के वचन सुनकर कहती है कि दुर्योधन ने छल-प्रपंच करके सरल हदय वाले युधिष्ठिर को अपने जाल में फंसा लिया हैं। अत: धर्म एवं नीति के ज्ञाता स्वयं निर्णय लें कि उन्हें छल-कपट एवं असत्य की विजय स्वीकार है। अथवा धर्म, सत्य एवं सरलता की। द्रौपदी की बात सुनकर दुःशासन कहता है कि कौरवों को अपने शस्त्र बल पर भरोसा है न कि शास्त्र बल पर। कर्ण, शनि और दुर्योधन, दुःशासन के इस कथन का पूर्ण समर्थन करते हैं।

सभा में उपस्थित एक सभासद विकर्ण को यह बात बुरी लगती है। वह कहता है। कि यदि शास्त्र बल से शस्त्र बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण है, तो मानवता का विकास सम्भव नहीं है, क्योंकि शस्त्र बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह कहता है कि सभी विद्वान् एवं धर्मशास्त्रों के ज्ञाताओं को द्रौपदी के कथन का उत्तर अवश्य देना चाहिए, नहीं तो बड़ा अनर्थ होगा। विकर्ण द्रौपदी को विजित . नहीं मानता। विकर्ण की घोषणा सुनकर सभी सभासद दुर्योधन, दु:शासन आदि की निन्दा करने लगते हैं, परन्तु कर्ण उत्तेजित होकर कौरवों का पूर्ण समर्थन करता है। और द्रौपदी को निर्वस्त्र करने के लिए दु:शासन को आज्ञा देता है।

सभी स्तब्ध रह जाती है। पांचों पाण्डव अपने वस्त्र-अलंकार उतार देते हैं। दुःशासन अट्टहास करता है और द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी गरज उठती है और अपने पूर्ण बल के साथ उसे रोककर कहती है कि वह किसी भी तरह विजित नहीं है तथा दुःशासन उसके प्राण रहते उसका चीर-हरण नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दुःशासन द्रौपदी के वस्त्रों की ओर पुनः हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी दुर्गा का रूप धारण कर लेती हैं, जिसे देखकर दुःशासन सहम जाता है तथा अपने आपको चीर-हरण में असमर्थ अनुभव करता है।

द्रौपदी दुःशासन को चीर-हरण के लिए ललकारती है, परन्तु वह दुर्योधन की चेतावनी पर भी द्रौपदी के रौद्र रूप से आतंकित बना रहता है। सभी कौरव द्रौपदी के सत्य बल, तेज और सतीत्व के आगे कान्तिहीन हो जाते हैं। कौरवों को अनीति की राह पर चलता देखकर सभी सभासद उनकी निन्दा करने लगते हैं। राजमदान्ध दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण आदि को द्रौपदी फिर ललकारती हुई घोषणा करती है-

“और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे जितना लग जाय।।”

सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को नहीं रोका गया तो प्रलय हो जाएगा। अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और सभा को शान्त करते हैं। वे अपने पुत्र दुर्योधन की भूल को स्वीकार करते हैं। धृतराष्ट्र पाण्डवों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने सत्य, धर्म एवं न्याय का मार्ग नहीं छोड़ा। वे दुर्योधन को आदेश देते हैं कि पाण्डवों का राज्य लौटा दिया जाए तथा उन्हें मुक्त कर दिया जाए। वे भरी सभा में ‘जियो और जीने दो’ की नीति की घोषणा करते हैं-

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जिएँ हम और जिएँ सब लोग।” धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किए गए। दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं। पाण्डवों के गौरवपूर्ण व सुखद भविष्य की कामना करते हुए कहते हैं-

“जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर गीत।।”

इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। कवि ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी और युगानुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने का अपना संकल्प दोहराया है।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2018, 17)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी का चरित्रांकन कीजिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर उसकी नायिका के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि “नारी अबला नहीं शक्ति स्वरूप है।” (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर किसी स्त्री पात्र का चरित्रांकन कीजिए। (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2013, 12, 11, 10)
अथवा
“सत्य की जीत में द्रौपदी के चरित्र में वर्तमान युग के नारी जागरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए। (2013)
उत्तर:
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी कृत खण्डकाव्य ‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी है। कवि ने उसे महाभारत की द्रौपदी के समान सुकुमार, निरीह रूप में प्रस्तुत न करके आत्मसम्मान से युक्त, ओजस्वी, सशक्त एवं वाक्पटु वीरांगना के रूप में चित्रित किया है। द्रौपदी की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

1. स्वाभिमानिनी द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपमान सहन नहीं कर सकती। वह अपना अपमान नारी जाति का अपमान समझती हैं। वह नारी के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाली किसी भी बात को स्वीकार नहीं कर सकती। ‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी ‘महाभारत’ की द्रौपदी से बिल्कुल अलग है। वह असहाय और अबला नहीं है। वह अन्याय और अधर्मी पुरुषों से संघर्ष करने वाली हैं।
2. निर्भीक एवं साहसी द्रौपदी निर्भीक एवं साहसी है। दुःशासन द्रौपदी के बाल खींचकर भरी सभा में ले आता है और उसे अपमानित करना चाहता है। तब द्रौपदी बड़े साहस एवं निर्भीकता के साथ दुःशासन को निर्लज्ज और पापी कहकर पुकारती है।
3. विवेकशील द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँखें बन्द करके चलने वाली नारी नहीं है वरन् विवेक से काम लेने वाली हैं। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जो व्यक्ति स्वयं को हार गया हो, उसे अपनी पत्नी को दाँव पर लगाने का अधिकार ही नहीं है। अत: वह कौरवों द्वारा विजित नहीं हैं।
4. सत्यनिष्ठ एवं न्यायप्रिय द्रौपदी सत्यनिष्ठ है, साथ ही न्यायप्रिय भी है। वह अपने प्राण देकर भी सत्य और न्याय का पालन करना चाहती है। जब दुःशासन द्रौपदी के सत्य एवं शील का हरण करना चाहता है, तब वह उसे ललकारती हुई कहती है-

न्याय में रहा मुझे विश्वास,
सत्य में शक्ति अनन्त महान्।
मानती आई हूँ मैं सतत्,
सत्य ही है ईश्वर, भगवान।”

5. वीरांगना द्रौपदी विवश होकर पुरुष को क्षमा कर देने वाली असहाय और अबला नारी नहीं है। वह चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध वीरांगना है-

“अरे ओ! दु:शासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान,
कराऊँगी मैं उसका बोध।”

6. नारी जाति का आदर्श द्रौपदी सम्पूर्ण नारी जाति के लिए एक आदर्श है। दुःशासन नारी को वासना एवं भोग की वस्तु कहता है, तो वह बताती है कि नारी वह शक्ति है, जो विशाल चट्टान को भी हिला देती है। पापियों के नाश के लिए वह भैरवी भी बन सकती है। वह कहती है-

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ,
बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व,
तभी होगा यह पूरा सर्ग।”

सार रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानिनी, आत्मगौरव सम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 6.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य/नाटक के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर युधिष्ठिर की चारित्रिक विशेषताओं को लिखिए। (2016)
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक रूप में युधिष्ठिर के चरित्र को स्थापित किया गया है। द्रौपदी एवं धृतराष्ट्र के कथनों के माध्यम से युधिष्ठिर का चरित्र प्रकट हुआ है। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र महान् गुणों से परिपूर्ण है।
उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. सरल-हृदयी व्यक्तित्व युधिष्ठिर का व्यक्तित्व सरल हृदयी है तथा अपने समान ही सभी अन्य व्यक्तियों को भी सरल हृदयी समझते हैं। इसी गुण के कारण वे दुर्योधन और शकुनि के कपट रूपी माया जाल में फंस जाते हैं और इसका दुष्परिणाम भोगने के लिए विवश हो जाते हैं।

2. धीर-गम्भीर युधिष्ठिर ने अपने जीवन काल में अत्यधिक कष्ट भोगे थे, परन्तु उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं हुआ। दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीर-हरण व उसका अपमान किए जाने के पश्चात् भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी कायरता या दुर्बलता नहीं थी, अपितु उनकी धीरता व गम्भीरता का गुण था।।

3. अदूरदर्शी युधिष्ठिर सैद्धान्तिक रूप से अत्यधिक कुशल थे, परन्तु व्यावहारिक रूप से कुशलता का अभाव अवश्य है। वे गुणवान तो हैं, परन्तु द्रौपदी को दांव पर लगाने जैसा मूर्खतापूर्ण कार्य कर बैठते हैं। परिणामस्वरूप इस फर्म का दूरगामी परिणाम उनकी दृष्टि से ओझल हो जाता है और चीर-हरण जैसे कुकृत्य को जन्म देता है। इस प्रकार युधिष्ठिर अदूरदर्शी कहे जाते हैं।

4. विश्व-कल्याण के अग्रदूत युधिष्ठिर का व्यक्तित्व विश्व-कल्याण के प्रवर्तक के रूप में देखा गया है। इस गुण के सन्दर्भ में धृतराष्ट्र भी कहते हैं कि

“तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।”

अर्थात् धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर के साथ सम्पूर्ण विश्व को माना है, क्योंकि उनका उद्देश्य विश्व-कल्याण मात्र है।
5. सत्य और धर्म के अवतार युधिष्ठिर को सत्य और धर्म का अवतार माना गया है। इनकी सत्य और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा है। युधिष्ठिर के इसी गुण पर मुग्ध होकर धृतराष्ट्र ने कहा कि हे युधिष्ठिर! तुम श्रेष्ठ व धर्मपरायण हो और इन्हीं गुणों को आधार बनाकर बिना किसी भय के अपना राज्य संभालो और राज करो।

निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र व नायक हैं, जिनमें विश्व कल्याण, सत्य, धर्म, धीर, शान्त व सरल हृदयी व्यक्तित्व का समावेश है।

प्रश्न 7.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन का चरित्रांकन कीजिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन के चरित्र पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुःशासन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दुःशासन एक प्रमुख पात्र है। यह दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. अहंकारी एवं बुद्धिहीन दुःशासन अत्यन्त अहंकारी एवं बुद्धिहीन है। उसे अपने बल पर अत्यन्त घमण्ड हैं। वह बुद्धिहीन भी है, विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ एवं महत्त्वपूर्ण मानता है। वह पशुबल में विश्वास करता है। वह भरी सभा में पाण्डवों का अपमान करता है। सत्य, प्रेम, अहिंसा की अपेक्षा वह पाश्विक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है।
2. नारी के प्रति उपेक्षा भाव द्रौपदी के साथ हुए तर्क वितर्क से दुःशासन का नारी के प्रति रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। वह नारी को भोग्या और पुरुष की दासी मानता है। वह नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाता है। उसके अनुसार पुरुष ने ही विश्व का विकास किया है। नारी की दुर्बलता का उपहास उसने इन शब्दों में किया है

“कहाँ नारी ने ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम।
जानती है वह केवल पुरुष-भुजाओं में करना विश्राम।”

3. शस्त्र-बल विश्वासी दुःशासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्मशास्त्र और धर्मज्ञों में विश्वास नहीं है। वह शस्त्र के समक्ष शास्त्र की अवहेलना करता है। शास्त्रज्ञाताओं को वह दुर्बल मानता हैं।
4. दुराचारी दुःशासन हमारे सम्मुख एक दुराचारी व्यथित के रूप में आता हैं। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने अभद्र व्यवहार करने में भी संकोच नहीं करता। द्रौपदी को सम्बोधित करते हुए दुःशासन कहता है

“विश्व की बात द्रौपदी छोड़,
शक्ति इन हाथों की ही तोल।
खींचता हूँ मैं तेरा वस्त्र,
पीट मत न्याय धर्म का ढोल।”

5. सत्य एवं सतीत्व से पराजित दुःशासन के चीर-हरण से असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि हमेशा सत्य की ही जीत होती है। वह जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता हैं।

दु:शासन के चरित्र की दुर्बलताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ. ओंकारप्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं, “लोकतन्त्रीय चेतना के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दु:शासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाए हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में
दुःशासन उन्हीं का प्रतीक है।

प्रश्न 8.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्रों का संक्षेप में परिचय दीजिए। (2016)
उत्तर:
इस खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र द्रौपदी और दुःशासन हैं। अन्य पात्रों में युधिष्ठिर, दुर्योधन, विकर्ण, विदुर और धृतराष्ट्र उल्लेखनीय हैं। जिनका संक्षेप में परिचय निम्नलिखित है।

  1.  दुःशासन दुःशासन, दुर्योधन का छोटा भाई व धृतराष्ट्र का पुत्र है। यह अहंकारी एवं बुद्धिहीन हैं। सत्य, प्रेम, अहिंसा के स्थान पर वह पाश्विक शक्तियों को महत्त्व देता है। दु:शासन का नारी के प्रति उपेक्षित भाव है। वह दुराचारी व शस्त्र-बल विश्वासी है। वह शस्त्र के समक्ष शास्त्र की अवहेलना करता है तथा शास्त्रज्ञाताओं को दुर्बल मानता है।
  2. द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका द्रौपदी स्वाभिमानी, ओजस्वी, सशक्त एवं वाक्पटु वीरांगना के रूप में मुखरित हुई है। द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, सत्यनिष्ठ प्रिय, विवेकशील, निर्भक एव साहसी तथा न्याय की पक्षधर, सती साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।
  3. दुर्योधन दुर्योधन, धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र है। इस खण्डकाव्य में दुर्योधन को भी दुःशासन के समान ही असत्य, अन्याय और अनैतिकता को समर्थक माना गया है। वह भी शस्त्रबल का पुजारी है। ईष्र्यालु प्रवृत्ति के कारण ही वह पाण्डवों की समृद्धि और मान-सम्मान से जलता रहा और इसी कारण उसने छल-कपट करके पाण्डवों के राज्य हड़प लिए। सत्ता लोलुपता दुर्योधन के चरित्र की महत्त्वपूर्ण विशेषता है।।
  4. युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर हैं। वह सरल हदयी व्यक्तित्व के हैं। धीर, गम्भीर, अदूरदर्शी, विश्व-कल्याण के अग्रदूत व सत्य और धर्म के अवतार आदि गुणों का समन्वय युधिष्ठिर के चरित्र में है। कवि ने युधिष्ठिर को आदर्श राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया है।
  5. पृतराष्ट्र इस खण्डकाव्य के आधार पर धृतराष्ट्र उदारता और विवेकपूर्णता के गुण से अभिभूत हैं। खण्डकाव्य के अन्तिम अंश में धृतराष्ट्र का उल्लेख हुआ है। वे दोनों पक्षों (पाण्डवों और कौरवों) के समल तक को सुनते हैं और सत्य को सत्य तथा असत्य को असत्य घोषित कर उचित न्याय की प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं।
  6. विकर्ण एवं विदुर विकर्ण और विदुर दोनों अस्त्र शस्त्र शक्ति के घोर विरोधी हैं। वे शान्तिप्रिय हैं तथा शस्त्र-बल पर स्थापित शान्ति को प्रान्ति मानते हैं। दोनों पात्र कौरव-कुल के होने के पश्चात् भी द्रौपदी के समर्थन में हैं। ये दोनों पात्र न्यायप्रिय, स्पष्टवादी और निर्भीक हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 5 कर्मनाशा की हार

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name कर्मनाशा की हार
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 5 कर्मनाशा की हार

कर्मनाशा की हार – पाठ का सारांश/कथावस्तु

(2018, 16, 14, 12)

भैरो पाण्डे एवं उनका भाई कुलदीप
कर्मनाशा नदी के किनारे नई डीह नामक एक गाँव है, जिसमें पैरों से अपाहिज मैरो पाण्डे नामक एक पण्डित रहता है। उनका छोटा भाई कुलदीप जब दो वर्ष का था, भी उन दोनों के माता पिता की मृत्यु हो गई। मैरों पाण्डे ने ही छोटे भाई कुलदीप का पालन-पोषण अपने पुत्र की तरह किया। कुलदीप अब 16 वर्ष का युवक हो गया है। भैरो पाण्डे का अपना पुश्तैनी मकान, जिसमें से हुए मैरों पाण्डे सूत कातकर जनेऊ धनाते, जजमानी चलाते हैं। इसके अतिरिक्त कथा बाँचते और अपना एवं अपने भाई का भरण-पोषण करते हैं।

कुलदीप एवं विधवा फुलमत के बीच प्रेम
एक दिन चाँदनी रात में मल्लाह परिवार की विधवा फुलमत मैरो पाण्डे के यहाँ अपनी बाल्टी माँगने आती है। बाल्टी देते समय कुलदीप फुलमत से टकरा जाता है। फुलमत मुस्कुराती है और कुलदीप उसकी और मुग्ध दृष्टि से देखता है। इसके बाद दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं।

भैरो पाण्डे के गुस्सा करने पर कुलदीप का घर से चले जाना
एक दिन चाँदनी रात में कर्मनाशा के तट पर कुलदीप एवं फुलमत मिलते हैं। पहले से ही दोनों पर नजर रख रहे मैरो पाण्डे को कुलदीप पर इतना क्रोध आता है कि वह उसके गाल पर थप्पड़ जड़ देता है। इस घटना के बाद कुलदीप घर से भाग जाता है और बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिलता।

कर्मनाशा नदी में बाढ़ का आना
कुलदीप को घर से भागे 4-5 महीने बीत चुके हैं। कर्मनाशा नदी में बाढ़ आती हैं, जिससे होने वाली तबाही की आशंका से सभी भयभीत हैं। गाँव वालों में यह अन्धविश्वास प्रचलित है कि कर्मनाशा जब उमड़ती है, तो मानव-बलि अवश्य लेती हैं। फुलमत द्वारा बच्चे को जन्म देने की खबर गाँव में फैल जाती है और गाँव वाले कर्मनाशा की बाढ़ का कारण फुलमत को ही समझने लगते हैं। उसके बच्चे को उसका पाप समझते हैं। उनकी धारणा है कि पुलमत की बलि पाकर कर्मनाशा शान्त हो जाएगी।

भैरो पाण्डे का अन्तर्द्वन्द्व
जब यह सूचना मैरी पाण्डे को मिलती है तो पहले वे सोचते हैं कि चलो अच्छा ही है। परिवार के लिए कलंक बनाने वाली अपने आप ही रास्ते से हट जाएगी, लेकिन फिर उन्हें यह व्यवहार क्रूर, अमानवीय लगने लगता है और उनके मन में भावनाओं का संघर्ष होने लगता है। अन्त में सत्य एवं मानवीय भावनाओं की विजय होती है और वे फुलमत एवं उसके बच्चे को बचाने चल पड़ते हैं।

भैरो पाण्डे का अडिग एवं निर्भीक व्यक्तित्व
कर्मनाशा नदी के तट पर गांववासियों से घिरी फुलमत के पास पहुँचकर मैरो पाण्डे निर्भीक स्वर में कहते हैं कि उसने कोई पाप नहीं किया है। वह उनके छोटे भाई की पत्नी हैं, उनकी बहू है और उसका बच्य। उसके छोटे भाई का बना है। मुखिया इसे भी पाप कहकर इसका दण्ड भोगने की बात कर है, तब मैरी पाण्डे कठोर स्वर में कहता है। कि यदि वे एक-एक के पापों को गिनाने लगे, तो वहीं से सभी लोगों को कर्मनाशा की धारा में जाना पड़ेगा। सहमे हुए स्त ववाशी मैरों पाई के चट्टान की तरह अडिग व्यक्तित्व को देखते रह जाते हैं। कर्मनाशा की लहरें इस सूखी जड़ से टकराकर पछाड़ खा रही थीं, पराजित हो रही थीं। ‘कर्मनाशा की हार’ वस्तुतः रूकियों की हार है।

‘कर्मनाशा की हार’ कहानी की समीक्षा

(2018, 14, 13, 12, 10)

‘कर्मनाशा की हार’ शिवप्रसाद सिंह द्वारा रचित एक चरित्र प्रधान सामाजिक कहानी है। उन्होंने इस कहानी के माध्यम से समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास का विरोध किया है। प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार है

कथानक
‘कनाशा की हार’ एक चरित्र प्रधान कहानी है। इसमें मैरो पाण्डे के व्यक्तित्व के माध्यम से बहानीकार ने प्रगतिशील सामाजिक दृष्टिकोण का समर्थन किया है। कहानी में कहीं भी दिखावा नहीं है। इसमें कहानीकार ने जीवन के छोटे-छोटे क्षणों को पिरोया है। लेखक ने कहानी के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि समाज का शक्तिशाली वर्ग समाज का ठेकेदार बना हुआ है। वह कुछ भी कर सकता है, जबकि कमजोर वर्ग यदि उन्हीं कार्यो को करता है, तो उन्हें दण्डित किया जाता है। इस कहानी में एक ब्राह्मण युवक कुलदीप अपने घर के समीप रहने वाली मल्लाह परिवार की विधवा फुलमत से प्रेम करने लगता है|

परिवार के सदस्य उसे स्वीकार नहीं करते तथा अपने बड़े भाई मैरों पाण्डे की डॉट से घबराकर कुलदीप घर छोड़कर भाग जाता है। फुलमत एक बच्चे को जन्म देती है। तभी र्मनाशा नदी में बाढ़ आ जाती है, जिसे लोग फुलमत के पाप का परिणाम मानकर उसे और उसके बच्चे को नदी में फेंककर बलि देना चाहते हैं, जिससे नदी में आई बाढ़ समाप्त हो। इसका विरोध करते हुए प्रगतिशील मैरी पाण्डे उसे अपनी कुलवधू के रूप में स्वीकार करके गाँव वालों का मुँह बन्द कर देते हैं।

पात्र और चरित्र-चित्रण
प्रस्तुत कहानी में मुख्य पात्र भैरो पाण्डे हैं। मैरो पाण्डे को ही कहानी का नायक भी कहा जा सकता है। इनका चरि-चित्रण बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से हुआ है। प्रारम्भ में वे लोक-लाज से आतंकित हैं, लेकिन शीघ्र ही उनमें मानवतावादी दृष्टिकोण प्रस्फुटित होता है। वे कायरता छोड़कर उदारता का परिचय देते हैं और मानवता की रक्षा के लिए पूरे समाज से ड़ि जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य उल्लेखनीय पात्रों में कुलदीप एवं फुलमत हैं।

कुलदीप में किसी सीमा तक मर्यादा का बोध भी है, जिसके कारण वह चुपचाप घर छोड़कर चला जाता है, जबकि फुलमत अपने प्रेम की निशानी अपने बच्चे को जन्म देकर अपनी पवित्र भावना को दर्शाती है। मुखिया ग्रामीण समाज का प्रतिनिधि तथा अन्धदियों का समर्थक चरित्र है। वह ईष्र्यालु एवं क्रूर है। इस प्रकार, चरित्र चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

कथोपकथन या संवाद
इस कहानी की संवाद योजना में नाटकीयता के साथ-साथ सजीवता तथा स्वाभाविकता के गुण भी मौजूद हैं। संवाद, पात्रों के चरि-उद्घाटन में सहायक हुए हैं, जिससे पात्रों की मनोवृत्तियों का उद्घाटन हुआ है। वे संक्षिप्त, रोचक, गतिशील, सरस और पात्रानुकूल हैं।

देशकाल और वातावरण
‘कर्मनाशा की हार’ एक आँचलिक कहानी है। इस कहानी में स्वाभाविकता लाने के उद्देश्य से वातावरण की सृष्टि की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। एक कुशल शिल्पी की तरह कथाकार नै देशकाल और वातावरण का चित्रण किया है। इसके अन्तर्गत सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों का चित्रण हुआ है। लेखक ने कर्मनाशा की बाढ़ का चित्र ऐसा खींचा है, जैसे पाठक किनारे पर खडा होकर बाढ़ का भीषण ढूश्य देख रहा हो |

भाषा-शैली
भाषा में ग्रामीण शब्दावली मानुष, डीह, तिताई, दस, बिटवा, चौरा आदि का प्रयोग किया गया है। साथ ही मुहावरे तथा लोकोक्तियों का भी प्रयोग करके कथा के वातावरण को सजीव बनाया गया है, जैसे-दाल में काला होना, पेट में जैसे-हौसला, सैलाब आदि के साथ-साथ दोहरे प्रयोग वाले शब्द; जैसे-लोग-बाग, उठल्ले-निठल्ले आदि के कारण भाषा में और अधिक सजीवता आ गई है।

इस कहानी में शिल्पगत विशेषताओं व अधिक फ्लैशबैक की पद्धति का प्रयोग करके लेखक ने घटनाओं की तारतम्यता को कुशलता से जोड़ा है। कहानी की शैली की एक और विशेषता है सजीव चित्रण और सटीक उपमाएँ। कहानीकार में बाढ़ की विभीषिका का बड़ा ही जीवन्त तथा रोमांचक चित्रण किया है।

उद्देश्य
उपेक्षिता के प्रति सहानुभूति एवं संवेदना व्यक्त करना तथा उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देना इस कहानी का एक मुख्य उद्देश्य है। इसमें शोषित वर्ग की आवाज को बुलन्द किया गया है। यह कहानी प्रगतिशीलता एवं मानवतावाद का समर्थन करती है। इसमें अन्धविश्वासों को खण्डित किया गया हैं तथा वैययिक व सामाजिक सभी प्रकार के स्तरों पर होने वाले शोषण का विरोध किया गया है।

शीर्षक
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक कथावस्तु को पूर्णतः सफल बनाने का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें प्रतीकात्मक भाव स्वतः ही देखने को मिलता है। ‘कर्मनाशा नदी’ को इस कहानी में अन्धकार निरर्थक तथा रूदि के प्रतीक के रूप में चित्रित कर कहानीकार ने अपनी लेखनी का सफल सामंजस्य किया है। अन्त में कर्मनाशा नदी को नरबलि का न मिलना उसकी हार तथा मानवता की विजय को प्रदर्शित करता है। अतः ‘कर्मनाशा की हार’ शीर्षक सरल, संक्षिप्त, नवीन व कौतूहलवक है, जो कहानी की कथावस्तु के अनुरूप सटीक व अत्यन्त सार्थक बन पड़ा है।

भैरो पाण्डे का चरित्र-चित्रण

(2018, 17, 16, 14, 13, 12, 11, 10, 07)

शिवप्रसाद सिंह द्वारा रचित कहानी ‘कर्मनाशा की हार के मुख्य पात्र भैरो पाण्डे का प्रगतिशील एवं निर्भीक चरित्र रूढ़िवादी समाज को फटकारते हुए सत्य को स्वीकार करने की भावना को बल प्रदान करता है। मैरों पाण्डे के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं-

कर्तव्यनिष्ठा एवं आदर्शवादिता
भैरो पाण्डे पुरानी पीढ़ी के आदर्शवादी व्यक्ति हैं, जो अपने भाई को पुत्र की भाँति पालते हैं तथा पंगु होते हुए भी स्वयं परिश्रम करके अपने भाई की देखभाल में कोई कमी नहीं होने देते।

विचारशीलता
भैरो पाण्ड़े एक सच्चरित्र, गम्भीर एवं विचारशील व्यक्तित्व से सम्पन्न हैं। वे गाँव के सभी लोगों की वास्तविकता से परिचित हैं, लेकिन किसी के राज़ को कभी उजागर नहीं करते हैं। वे तथ्यों का बौद्धिक एवं तार्किक विश्लेषण करते हैं।

भ्रातृत्व-प्रेम
मैंरों पाण्डे को अपने छोटे भाई से अत्यधिक प्रेम है। उन्होंने पुत्र के समान अपने भाई का पालन-पोषण किया है। इसीलिए कुलदीप के घर से भाग जाने पर पाण्डे दुःख के सागर में डूबने-उतरने लगता है|

मर्यादावादी और मानवतावादी
प्रारम्भ में भैरो पाण्डे अपनी मर्यादावादी भावनाओं के कारण फुलमत को अपने परिवार का सदस्य नहीं बना पाते हैं, लेकिन मानवतावादी भावना से प्रेरित होकर वे फुलमत एवं उसके बच्चे की कर्मनाशा नदी में बलि देने का कड़ा विरोध करते है तथा उसे अपने परिवार का सदस्य स्वीकार करते हैं।

प्रगतिशीलता
मैरो पाण्ड़े के विचार अत्यन्त प्रगतिशील हैं। वे अन्धविश्वासों का खण्डन एवं रूढ़िवादिता का विरोध करने को तत्पर रहते हैं। ये कर्मनाशा की बाढ़ को रोकने के लिए निर्दोष प्राणियों की बलि दिए जाने सम्बन्धी अन्धविश्वास का विरोध करते हैं। वे बौद्धिक एवं तार्किक दृष्टिकोण से बाढ़ रोकने के लिए बाँध बनाने का उपाय सुझाते हैं।

निर्भीकता एवं साहसीपन
मैरो पाण्ड़े के व्यक्तित्व में निर्भीकता एवं साहसीपन के गुण निहित (समाए) हैं। वह मुखिया सहित गाँव के सभी लोगों के सामने अत्यन्त ही निडरता के साथ कर्मनाशा को मानव बल दिए जाने का विरोध करता है। यह साहस से कहते हैं कि यदि लोगों के पापों का हिसाब देने लगें तो यहाँ उपस्थित सभी लोगों को कर्मनाशा की धारा में समाना होगा। उनकी निभव।। एवं साहस देखकर सभी लोग स्तब्ध रह जाते हैं। इस प्रकार, मैरो पाण्ड़े मानवतावादी भावना के बल पर सामाजिक रूदियों का निडरता के साथ विरोध करते हैं तथा कर्माशा की लहरों को पराजित होने के लिए विवश कर देते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 4 बहादुर

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Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name बहादुर
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 4 बहादुर

बहादुर – पाठ का सारांश/कथावस्तु

(2018, 16)

‘दिलबहादुर’ से ‘बहादुर’ बनने की प्रक्रिया ‘दिलबहादुर लगभग 12-13 वर्ष का एक पहाड़ी नेपाली लड़का है, जिसके पिता की युद्ध में मृत्यु हो चुकी है और उसकी माँ बहुत गुस्सैल स्वभाव की है। माँ की पिटाई की वजह से वह घर से भाग कर एक मध्यम वर्गीय परिवार में नौकर बन जाता है, जहाँ गृहस्वामिनी निर्मला बड़ी उदारता के साथ उसके नाम से ‘दिल’ शब्द हटाकर उसे सिर्फ बहादुर पुकारती है। अब स्वतन्त्र ‘दिलबहादुर’ नौकर ‘ बहादुर’ बन गया।

परिश्रमी एवं हँसमुख बहादुर
बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है, जो अपनी मेहनत से पूरे घर को न केवल साफ़ सुथरा रखता है, बल्कि घर के सभी सदस्यों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उसके आने से परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आरामतलबी एवं कम्पोर या आलसी बन गए हैं। इतना काम करने के बावजूद वह हमेशा हंसत। रहता है। सना और हंसाना मानो उसकी आदत बन गई थी। वह रात में सोते समय कोई-न-कोई गीत अवश्य गुनगुनाता है।

किशोर की बदतमीजी
निर्मला का बड़ा लड़का किशोर एक बिगड़ा हुआ लड़का था, जो शान-शौकत तथा रोय से रहना पसन्द करता था। उसने अपने सारे काम बहादुर को सौंप दिए। यदि बहादुर उसके काम में थोड़ी-सी भी लापरवाही करता, तो वह बहादुर को गालियाँ देता। छोटी-छोटी गलती पर वह बहादुर को पीटता भी था। बहादुर पिटाई खाकर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो जाता और कुछ देर बाद घर के कामों में पूर्ववत् जुट जाता।

एक दिन किशोर ने बहादुर को ‘सुअर का बच्चा’ कह दिया, जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँची और उसने किशोर का काम करने से मना कर दिया। उसने लेखक के पूछने पर रोते हुए कहा कि-”बाबूजी, मैया ने मेरे मरे बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?” इतना कहकर वह रो पड़ा।

निर्मला के रिश्तेदार द्वारा चोरी का आरोप लगाना
धीरे-धीरे निर्मला के व्यवहार में भी अन्तर आने लगा और अब उसने बहादुर के लिए रोटियाँ सेंकनी बन्द कर दीं। वह भी बहादुर पर हाथ उठाने लगी। मारपीट एवं गालियों के कारण बहादुर से गलतियाँ एवं भूलें अधिक होने लगीं। एक दिन निर्मला के घर उसके रिश्तेदार अपने परिवार के साथ आए। चाय-नाश्ते के बाद बातचीत के दौरान अचानक रिश्तेदार की पत्नी ने अपने ग्यारह रुपये घर में खो जाने की बात कही। सभी ने बहादुर पर ही शक किया। बहादुर के लगातार मना करने के बावजूद उसे डराया, धमकाया एवं पीटा गया, चूंकि बहादुर पर लगा यह आरोप झूठा था, इसलिए वह लगातार इससे इनकार करता रहा। अन्त में लेखक ने भी उसे पीटा।

बहादुर के प्रति घरवालों का कटुतापूर्ण व्यवहार
इस घटना के बाद से घर के सभी सदस्य बहादुर को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे और उसे कुत्ते की तरह दुत्कारने लगे। बहादुर भी बहुत ही खिन्न रहने लगा। अब उसके अन्दर परिवार के लोगों के प्रति अपनापन नहीं रहा। अन्दर से वह बड़ी बेचैनी एवं बन्धन महसूस करता था।

बहादुर का घर से भाग जाना
एक दिन उसके हाथ से सिल छूटकर गिर गई और उसके दो टुकड़े हो गए। पिटाई के डर तथा लोगों के क्रूर एवं असभ्य व्यवहार से तंग आकर वह अपना सारा सामान घर में ही छोड़कर कहीं चला गया। वह अपना भी कोई सामान लेकर नहीं गया। निर्मला, उसके पति एवं किशोर को उसकी ईमानदारी पर विश्वास हो गया था। वे जानते थे कि रिश्तेदार के रुपये उसने नहीं चुराए थे। सभी बहादुर पर स्वयं द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए पश्चाताप करने लगे।

‘बहादुर’ कहानी की समीक्षा

(2018, 17, 16, 14, 13, 11, 10)

श्री अमरकान्त द्वारा रचित ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर आधारित है। इसमें एक बेसहारा पहाडी लड़के की मार्मिक कथा का वर्णन है। कहानी के तत्वों के आधार पर प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार हैं-

कथानक
इस कहानी की कथावस्तु में मध्यम वर्गीय परिवार की साधारण सी लगने वाली कई बातों के माध्यम से मानवीय करुणा को प्रदर्शित किया गया है। आरम्भ से अन्त तक यह कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। सहजता, रोचकता, संक्षिप्तता कहानी की विशेषता है तथा यह एक यथार्थवादी कहानी भी है।

बहादुर एक बेसहारा पहाड़ी नेपाली लड़का है। उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है और उसकी माँ उसे हमेशा मारती रहती हैं, जिससे तंग आकर वह घर से भाग जाता है और एक मध्यम वर्गीय परिवार में घरेलू नौकर के रूप में नौकरी करने लगता है। वह हँसमुख, ईमानदार और परिश्रमी लड़का है। निर्मला, जो गृहस्वामिनी है, बहादुर का पूरा ध्यान रखती हैं। निर्मला का बड़ा लड़का किशोर बहादुर पर पूरी तरह आश्रित है। इसके बावजूद वह ज़रा-जरा सी बात पर बहादुर को गालियाँ देता है तथा पीटता है। कुछ दिन बाद निर्मला का व्यवहार भी बहादुर के प्रति बदल जाता है। एक दिन किशोर ने बहादुर के पिता को सम्बोधित कर गाली दे दी, जो बहादुर को बहुत बुरी लगी और उस दिन उसने न तो कोई काम किया और न ही खाना खाया। एक दिन निर्मला के घर कुछ रिश्तेदार आए, उन्होंने बहादुर पर ग्यारह रुपये चोरी करने का आरोप लगाया तथा इसी के लिए निर्मला के पति ने बहादुर की पिटाई कर दी। इस घटना से बहादुर बहुत आहत हो गया और वह चुपचाप घर छोड़कर चला गया। उसके जाने के बाद घर वालों को उसकी कमी महसूस हुई और बाद में सभी लोग पश्चाताप करने लगे। इस प्रकार यह कहानी एक अल्पवयस्क नौकर के मनोविज्ञान को भी प्रकट करती है।

पात्र और चरित्र-चित्रण
प्रस्तुत कहानी का सर्वाधिक प्रमुख पात्र एवं नायक बहादुर है, जिस पर पूरा कथानक टिका हुआ है। इस चरित्र के महत्व का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस चरित्र के आधार पर ही कहानी का शीर्षक रखी गया है। उसके स्वभाव में कुछ ऐसी सरसता, भोलापन, करुणा एवं वेदना है, जिसके कारण उसे नज़रअन्दाज़ करना असम्भव है। अन्य पात्रों में निर्मला जो पर की स्वामिनी है, निर्मला का पति व निर्मला का पुत्र किशोर जोकि बिगड़ा हुआ | नवयुवक है तथा नौकर को हीन दृष्टि से देखता है।

कथोपकथन या संवाद
इस कहानी के संवाद अत्यन्त सरल, संक्षिप्त, स्वाभाविक, स्पष्ट, रोचक, सार्थक तथा गतिशील हैं। ये पात्रों के अनुकूल तथा सटीक हैं। संवाद संक्षिप्त तथा स्वाभाविक कथोपकथन पर आधारित हैं।

देशकाल और वातावरण
कहानी में देशकाल और वातावरण का भी ध्यान रखा गया है। कहानी में निम्न तथा मध्यम वर्गीय परिवार के लिए सजीव तथा स्वाभाविक वातावरण का चित्रण किया गया है। नौकर पर रोब जमाना, उससे जी तोड़ काम कराना, उसे बात-बात पर बार-बार पीटना, गाली देना आदि घटनाओं ने पारिवारिक वातावरण को मार्मिक बना दिया है।

भाषा-शैली
प्रस्तुत कहानी में अमरकान्त नै सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है तथा चित्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया गया है। भाषा कथा के अनुरूप है, जिसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी लिए गए हैं, जैसे-शरारत, ओहदा, किस्सा, ज़रा आदि उर्दू शब्द है। लोकोक्तियों तथा मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है; जैसे–माथा ठनकना, नौ दो ग्यारह होना, पंच बराबर होना आदि। इसके अतिरिक्त इसमें वर्णनात्मक, काव्यात्मक और आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।

उद्देश्य
यह कहानी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के मनोविज्ञान के वास्तविक चित्र को प्रदर्शित करती है। इस कहानी के माध्यम से वर्ग भेद मिटाने को प्रोत्साहन दिया गया है, जो मानवीय सहानुभूति के आधार पर ही मिट सकता है।

शीर्षक
कहानी का ‘बहादुर’ शीर्षक आकर्षक व मुख्य पात्राधारित है। अमरकान्त जी की कहानी के शीर्थक व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित हैं। सम्पूर्ण कहानी की कथावस्तु घटनाएँ ‘बहादुर’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ‘बहादुर’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त सरल, संक्षिप्त एवं रोचक है, जो पाठक के मन में कौतूहलता उत्पन्न करता है। अतः शीर्षक की दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी सफल व सार्थक है।

‘बहादुर’ का चरित्र-चित्रण

(2017, 16, 14, 13, 11, 10)

अमरकान्त द्वारा लिखित कहानी ‘बहादुर’ में मुख्य रूप से चार पात्र हैं-लेखक या निर्मला का पति, निर्मला, पुत्र किशोर तथा पहाड़ी नौकर दिलबहादुर, जिसे निर्मला ने केवल बहादुर नाम दे दिया था और यही बहादुर कहानी का नायक हैं। बहादुर के चरित्र की अनेक विशेषताएँ हैं, जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर देखा जा सकता है-

छल-कपट रहित भोला बालक
12-13 वर्ष का नेपाली बालक बहादुर बहुत ही भोला है और छल-कपट से कोसों दूर है। उसमें न तो किसी प्रकार की कृत्रिमता या बनावटीपन है और न ही किसी बात को छिपाने की कला। वह किसी भी बात का बिलकुल सच एवं स्पष्ट उत्तर देता है।

परिश्रमी
बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है। वह घर के सभी सदस्यों के अधिश कार्यों को करता है और उन्हें करते हुए न कोई आलस्य दिखाता है और न कोई अनमनापन। वह बड़े ही प्यार एवं जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करता है।

हँसमुख एवं मृदुभाषी
बहादुर हर समय हँसते रहने वाला लड़का है। वह किसी भी बात कहकर अपनी नैसर्गिक, स्वाभाविक हँसी जरूर हँसता है, जो सामने देखने सुनने वालों के हृदय को । झंकृत कर देती हैं। वह सभी लोगों के प्रश्नों का उत्तर बड़े ही मीठे स्वर में हँसकर देता है।

ईमानदार एवं सच्चा हृदय
गरीब होने के बावजूद भी बहादुर अत्यधिक ईमानदार बालक है, जिसे बेईमानी हूँ तक नहीं पाई है। उसके मन में कोई लालच नहीं है। घर में कहीं गिरे या पड़े पैसों को वह निर्मला के हाथों में रख देता है। वह घर छोड़कर जाते समय भी अपना सामान तक नहीं ले जाती हैं।

सहनशील एवं स्वाभिमानी
बहादुर बड़ा ही सहनशील बालक है। वह घर के सारे काम करने के बावजूद निर्मला की झाँट खाता रहता है। किशोर द्वारा भी कई बार बदतमीज़ियाँ की जाती हैं, जिन्हें वह थोड़ी देर में ही भूल जाता है और अपने काम में पूर्ववत् लग जाता है। एक बार किशोर द्वारा उसके पिता से सम्बन्धित गाली देने पर उसका स्वाभिमान जाग जाता है। वह किशोर का काम करने से इनकार कर देता है।

मातृ-पितृभक्त बालक
बहादुर का हृदय मातृभक्ति एवं पितृभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हैं। माँ द्वारा पीटे जाने के कारण घर से भागा बहादुर माँ के पास जाना नहीं चाहता, लेकिन मात-पिता के प्रति अपने फर्ज को वह अच्छी तरह समझता है।। इसीलिए वह अपने कमाए पैसों को माँ को ही देना चाहता है। अपने पिता के प्रति प्रेम ने ही उसे किशोर का काम करने से मना करने हेतु प्रेरित किया।

व्यवहार कुशल
बहादुर बहुत व्यवहार कुशल बालक हैं। इसी व्यवहार कुशलता के कारण वह घर के सभी सदस्यों को अत्यधिक प्रभावित कर देता है। मोहल्ले के बच्चों को भी वह अपने गाने सुनाकर मोहित कर लेता है।

स्नेही बालक
वह निर्मला के अन्दर अपनी माँ की छवि देखता है। वह स्नेह का भूखा है। जब निर्मला उसका ध्यान रखती है, तो वह भी बीमार निर्मला का बहुत ध्यान रखता हैं। उसे निर्मला के स्वास्थ्य की बहुत चिन्ता है। इस प्रकार, बहादुर पाठकों के हृदय-पटल पर अपना अमिट चित्र अंकित कर देता है। पाठक उसे लम्बे समय तक याद रखते हैं।

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