UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 13 Primary Occupation: Agriculture

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 13
Chapter Name Primary Occupation: Agriculture (प्राथमिक व्यवसाय : कृषि)
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 13 Primary Occupation: Agriculture (प्राथमिक व्यवसाय : कृषि)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
कृषि के वर्गीकरण के आधार बताइए तथा उनमें से किसी एक प्रकार के वर्गीकरण का वर्णन कीजिए।
या
कृषि के मुख्य प्रकारों का विवरण दीजिए। इनमें से किन्हीं दो प्रकारों की विशेषताएँ समझाइए।
या
ट्रक फार्मिंग (फलों एवं सब्जियों की कृषि) की विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2008]
उत्तर

कृषि का वर्गीकरण या प्रकार
Types or Classification of Agriculture

विश्व के प्रायः सभी देशों में कृषि व्यवसाय प्रचलित है, किन्तु कृषि के स्वरूप, पद्धति तथा प्रकार में बहुत भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। वास्तव में किसी भी क्षेत्र की कृषि पर वहाँ की भौतिक तथा सांस्कृतिक दशाओं का प्रभाव पड़ता है। कृषि पर धरातलीय रचना, जलवायु, मिट्टी, भू-स्वामित्व, भूमि के आकार, कृषि विधियों आदि का प्रभाव भी पड़ता है। कुछ देशों में केवल खाद्यान्न उगाये जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में पशुपालन की प्रधानता होती है। अन्य देशों में कृषि तथा पशुपालन दोनों ही विकसित होते हैं। वास्तव में, कृषि के वर्गीकरण के अनेक आधार हैं –

(A) जल की उपलब्धता के आधार पर Based on Availability of Water
(1) तर कृषि (Wet Cultivation) – इस प्रकार की कृषि प्रायः कांप मिट्टियों के उन प्रदेशों में की जाती है जहाँ वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है। भारत में दक्षिणी बंगाल, मध्य और पूर्वी हिमालय प्रदेश व मालाबार तट में इस प्रकार की कृषि की जाती है। उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के देशों फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैण्ड आदि देशों में इस प्रकार की कृषि की जाती है। उत्तरी-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, इण्डोनेशिया, श्रीलंका व मलेशिया आदि देशों में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

(2) आर्द्र कृषि (Humid Farming) – इसके अन्तर्गत विश्व की कृषि योग्य भूमि का सर्वाधिक भाग वह आता है जहाँ वर्षा 100 से 200 सेमी होती है तथा उपजाऊ काँप अथवा काली मिट्टी पायी जाती है। इस प्रकार की कृषि यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका व एशिया के विस्तृत भागों में की जाती है।

(3) सिंचित कृषि (Irrigation Farming) – इस प्रकार की कृषि विश्व के मानसूनी अथवा अर्द्ध- शुष्क प्रदेशों में की जाती है। जहाँ वर्षा की मात्रा और समय अनिश्चित होता है, वर्षा कम अथवा मौसम विशेष में ही वर्षा होती है, ऐसे क्षेत्रों में वर्षा की कमी की पूर्ति सिंचाई के द्वारा की जाती है। इस प्रकार की कृषि भारत, मध्य एशिया, मिस्र, इराक, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका की कैलीफोर्निया की महान घाटी, ऑस्ट्रेलिया और मैक्सिको में की जाती है। सिंचाई के द्वारा कपास, गेहूं, चावल, गन्ना आदि फसलें उत्पन्न की जाती हैं।

(4) शुष्क कृषि (Dry Farming) – विश्व के उन प्रदेशों में जहाँ वर्षा 50 सेमी से भी कम होती है। तथा सिंचाई के लिए पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध नहीं होता, वहाँ शुष्क कृषि की जाती है। इस प्रकार की कृषि के अन्तर्गत भूमि की गहरी जुताई कर दी जाती है जिससे वर्षा का जल जो भी गिरे उसमें समा जाए और इसी जल के आधार पर कृषि की फसल उत्पन्न की जाती है। इस प्रकार की कृषि में मोटा अनाज, राई, चारी तथा गेहूं उत्पन्न किये जाते हैं। इस प्रकार की कृषि के मुख्य क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट बेसिन, कोलम्बिया की घाटी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, पश्चिमी एशिया और भारत के पश्चिमी राज्य हैं।

(B) भूमि की उपलब्धता के आधार पर Based on Availability of Land
(1) गहन अथवा सघन कृषि (Intensive Cultivation) – जिन देशों में जनसंख्या घनी होती है, किन्तु कृषि के लिए भूमि कम उपलब्ध होती है अथवा भूमि का अभाव होता है, वहाँ इस प्रकार की कृषि की जाती है। एक ही भूमि पर कई फसलें उत्पन्न की जाती हैं। उत्तम बीजों व खाद आदि का अधिकतम उपयोग कर अधिक मात्रा में उपज प्राप्त की जाती है। इस प्रकार की कृषि चीन, भारत, इराक, ईरान, ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, बेल्जियम देशों में की जाती है।

(2) विस्तृत कृषि (Extensive Farming) – इस तकनीक के अन्तर्गत नयी दुनिया एवं ऑस्ट्रेलिया में विशाल खेतों पर पूर्णतः यन्त्रीकृत खेती की जाती है। यहाँ के खेत हजारों हेक्टेयर में फैले होते हैं।

(C) श्रमिकों की उपलब्धता, पूँजी-व्यवस्था तथा भूमि के प्रकार के आधार पर Based on Availability of Labour, Capital and Types of Land
(1) प्राचीन भरण-पोषण वाली कृषि अथवा जीवन निर्वाहक कृषि – यह कृषि उष्णाई कटिबन्धीय प्रदेशों में की जाती है। अमेजन नदी की घाटी, सहारा के दक्षिण, मध्य, पश्चिमी एवं पूर्वी अफ्रीकी देशों, दक्षिण-पूर्वी एशिया के भारत, चीन आदि देशों में इस प्रकार की कृषि की जाती है। इस कृषि के निम्नलिखित दो रूप पाये जाते हैं –
(अ) स्थानान्तरण कृषि (Shifting Agriculture) या झूमिंग कृषि (Jhuming Agriculture)।
(ब) स्थायी कृषि (Permanent Agriculture)।

( अ ) स्थानान्तरण कृषि – इस कृषि के अन्तर्गत कृषक अपने आवास एवं कृषि-क्षेत्र परिवर्तित करते रहते हैं। इसके बहुत से नाम प्रचलित हैं; जैसे- भारत में झूम कृषि; मलेशिया एवं इण्डोनेशिया में लदाँग; श्रीलंका में चेना; जायरे में मिल्पा आदि। इस कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. सर्वप्रथम वनों के किसी भाग को काटकर या जलाकर साफ कर लिया जाता है तथा इस पर कृषि की जाती है। परन्तु जब इस मिट्टी की उर्वरा शक्ति समाप्त हो जाती है, तो दो-तीन वर्ष बाद इस भूमि को परती छोड़कर नये स्थान पर वनों को साफ कर कृषि की जाती है तथा कुछ वर्षों बाद इस क्षेत्र को भी छोड़ दिया जाता है तथा नये स्थान पर कृषि की जाने लगती है।
  2. इस प्रकार की कृषि में मोटे अनाज; जैसे- मक्का, ज्वार-बाजरा, जिमीकन्द एवं रतालू उत्पन्न किये जाते हैं।
  3. इसके अन्तर्गत कृषि खाद्यान्न का उत्पादन कम किया जाता है।
  4. इस कृषि पद्धति में यन्त्रों एवं उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती, केवल परम्परागत छोटे-छोटे उपकरण ही काम में लाये जाते हैं।

भारत में यह कृषि असम, नागालैण्ड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र, पश्चिमी घाट तथा राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में की जाती है। अधिकांशत: यह कृषि आदिवासियों द्वारा की जाती है।

(ब) स्थायी कृषि – इस प्रकार की कृषि प्रमुख रूप से उष्णाई प्रदेशों की निम्न भूमियों में, अर्द्ध उष्ण और शीतोष्ण कटिबन्धीय पठारों पर तथा उष्ण कटिबन्धीय पहाड़ी भागों में की जाती है। इसकी अनेक विशेषताएँ भी स्थानान्तरण कृषि के समान ही होती हैं, परन्तु इसमें कृषि का स्थान नहीं बदलता है। स्थानान्तरण कृषि पद्धति से ही इसका विकास हुआ है। जिन क्षेत्रों में कृषि के लिए अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ पायी जाती हैं, वहाँ स्थानान्तरण कृषि स्थायी कृषि में परिवर्तित हो गयी है।

(2) बागाती कृषि – बहुत-से देशों में कृषि उत्पादन बागानों के रूप में किया जाता है। इनमें बड़ी-बड़ी कृषि उपजे बागानों में उत्पन्न की जाती हैं। उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों की यह महत्त्वपूर्ण कृषि पद्धति है। इसके अग्रलिखित तीन प्रमुख क्षेत्र हैं –

  1. दक्षिण अमेरिका
  2. अफ्रीका तथा
  3. दक्षिणी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया।

बागाती कृषि में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

  1. यह कृषि फार्मों अथवा बागानों में की जाती है। अधिकांश बागानों पर विदेशी कम्पनियों का आधिपत्य रहा है।
  2. इसके अन्तर्गत विशिष्ट उपजों का ही उत्पादन किया जाता है; जैसे- केला, रबड़, कहवा, चाय, कोको आदि।
  3. इन कृषि के उत्पादों का उपयोग समशीतोष्ण कटिबन्धीय देशों के निवासियों द्वारा किया जाता है।
  4. बागानों में ही कार्यालय, माल तैयार करने, सुखाने तथा श्रमिकों के निवास आदि होते हैं।
  5. यहाँ पर अधिकांश तकनीकी एवं वैज्ञानिक पद्धतियाँ समशीतोष्ण देशों से आयात की गयी हैं।
  6. प्रारम्भ में यूरोपवासियों द्वारा प्रायः सभी महाद्वीपों में इस कृषि को आरम्भ किया गया था। मलेशिया में रबड़ के बागान अंग्रेजों ने, ब्राजील में कॉफी के बागान पुर्तगालियों ने तथा मध्य अमेरिकी देशों में केले की कृषि स्पेनवासियों ने आरम्भ की थी।
  7. इनके उत्पादों का उपभोग समशीतोष्ण कटिबन्धीय देशों द्वारा किया जाता है। इसलिए इनके अधिकांश उत्पाद निर्यात कर दिये जाते हैं। इसी कारण इनके बागान तटीय क्षेत्रों अथवा पत्तनों के पृष्ठ प्रदेश में स्थापित किये जाते हैं।

(3) गहन भरण-पोषण कृषि – यह कृषि उन देशों में विकसित हुई है जहाँ उपजाऊ भूमि की कमी तथा जनाधिक्य पाया जाता है। अधिकांशत: मानसूनी देशों में यह कृषि की जाती है। इस प्रकार की कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. इस कृषि में खाद्यान्नों का महत्त्व अधिक होता है।
  2. इस प्रकार की कृषि पद्धति में कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है, परन्तु पशुपालन का स्थान गौण होता है।
  3. इस प्रकार की कृषि में मानवीय एवं पशु श्रम का महत्त्व अधिक होता है, जबकि पूँजी एवं मशीनों का महत्त्व कम होता है।
  4. इस प्रकार की कृषि में फसल-चक्र की गहनता रहती है।
  5. ऐसी कृषि पद्धति में जोतों का आकार छोटा होता है जिस कारण यन्त्रों एवं उपकरणों का प्रयोग करना कठिन होता है।
  6. कृषकों की दशा दयनीय होती है तथा उत्पादों को स्थानीय केन्द्रों में विक्रय कर दिया जाता है। गहन भरण-पोषण कृषि को दो भागों में बाँटा जा सकता है –
    1. चावल-प्रधान कृषि तथा
    2. गेहूँ-प्रधान कृषि।

(4) भूमध्यसागरीय कृषि – इस प्रकार की कृषि का विस्तार भूमध्यसागरीय जलवायु प्रदेशों में हुआ है। यहाँ पर शीतकाल में वर्षा होती है तथा ग्रीष्मकाल शुष्क रहता है। यह इस जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता है। इसी कारण यहाँ निम्नलिखित दो प्रकार की फसलें उत्पन्न होती हैं

  1. शीतकाल की फसलें – शीतकाल में वर्षा के कारण यहाँ गेहूँ, आलू, प्याज, टमाटर तथा सेम की फसलें उत्पन्न की जाती हैं।
  2. ग्रीष्मकाल की फसलें – ग्रीष्मकाल में यह प्रदेश शुष्क रहता है। इसी कारण यहाँ ऐसी फसलें उत्पन्न की जाती हैं, जिन्हें वर्षा की कम आवश्यकता होती है। अंगूर, जैतून, अंजीर, चीकू, सेब, नाशपाती तथा सब्जियाँ ग्रीष्मकाल की प्रमुख फसलें हैं। दक्षिणी स्पेन, फ्रांस, इटली, ग्रीक, पश्चिमी तुर्की, संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलीफोर्निया राज्य आदि इस कृषि के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

(5) व्यापारिक अन्नोत्पादक कृषि – व्यापार के उद्देश्य से कम जनसंख्या वाले देशों में यह कृषि की जाती है। रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अर्जेण्टाइना, ऑस्ट्रेलिया आदि देश इसी कृषि के अन्तर्गत सम्मिलित किये जा सकते हैं। गेहूँ, जौ, जई, राई, कपास, चुकन्दर आदि यहाँ की मुख्य फसलें हैं। इस कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. इस कृषि में मशीनी उपकरणों का महत्त्व अधिक है।
  2. यहाँ पर कृषि जोतें बड़े आकार की होती हैं।
  3. ऐसी कृषि में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग अधिक किया जाता है।
  4. गेहूँ इस कृषि की प्रमुख उपज है।
  5. यहाँ एक ही फसल में विशेषीकरण पाया जाता है।
  6. यहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक होता है।
  7. इस कृषि-क्षेत्र में एकाकी बस्तियाँ पायी जाती हैं, जिन्हें ‘फार्म स्टड’ कहा जाता है।
  8. इस प्रकार की कृषि मशीनों द्वारा की जा रही है।

(6) मिश्रित कृषि या व्यापारिक कृषि – मिश्रित कृषि के अन्तर्गत कृषि कार्यों के साथ-साथ पशुपालन व्यवसाय भी किया जाता है। यहाँ पर कुछ फसलों का उत्पादन मानव के लिए तथा कुछ का उत्पादन पशुओं के लिए किया जाता है। इन प्रदेशों में चौपाये-भेड़, बकरियाँ, गायें आदि भी पाले जाते हैं। अधिक जनसंख्या वाले प्रदेशों में यह कृषि की जाती है।

(7) फलों एवं सब्जियों की कृषि – प्रायः बड़े नगरीय केन्द्रों में फलों एवं सब्जियों की अत्यधिक माँग रहती है; अत: नगरीय केन्द्रों के समीपवर्ती कृषि प्रदेशों में फल एवं सब्जियों का उत्पादन भारी मात्रा में किया जाता है। बाजार केन्द्र की समीपता एवं परिवहन संसाधनों की सुविधाओं के आधार पर इस कृषि का विकास हुआ है। संयुक्त राज्य की कैलीफोर्निया घाटी एवं फ्लोरिडा, अन्धमहासागर के तटीय क्षेत्र तथा पश्चिमी यूरोप के औद्योगिक देशों में यह कृषि की जाती है। इस कृषि में तीव्रगामी परिवहन साधनों की अधिक आवश्यकता होती है।

(8) शुष्क कृषि – विश्व के उन प्रदेशों में जहाँ वर्षा की मात्रा 50 सेमी से कम रहती है तथा सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ शुष्क कृषि की जाती है। इन प्रदेशों में कृषि-योग्य भूमि की गहरी जुताई की जाती है, जिससे वर्षा का जल उसमें अधिक समा सके। इसके अन्तर्गत मोटे अनाज, राई, चारे की फसलें तथा गेहूं आदि का उत्पादन किया जाता है। इस कृषि के प्रमुख क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का ग्रेट बेसिन, दक्षिणी अमेरिका में कोलम्बिया नदी की घाटी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, पश्चिमी एशिया तथा भारत के पश्चिमी राज्य हैं।

(9) सहकारी कृषि – सहकारी कृषि उन क्षेत्रों में पनपी जहाँ साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव पड़ा। इसमें छोटे-छोटे भू-स्वामियों को सामूहिक खेती करने हेतु प्रेरित किया गया। सभी कृषक अपने-अपने खेत मिलाकर एक बड़ा कृषि फार्म बना लेते हैं तथा सभी भू-स्वामी पूर्ण लगन एवं क्षमता से कार्य करते हैं तथा उत्पादन को अपनी भूमि के अनुसार बाँट लेते हैं। रूस में सहकारी कृषि का विकास 1928 ई० के बाद किया गया था। भारतवर्ष में भी सहकारी कृषि को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस कृषि के निम्नलिखित दो लाभ होते हैं –

  1. छोटे-छोटे खेतों के परस्पर मिल जाने से बड़े खेतों पर मशीनी उपकरणों का प्रयोग आसानी से किया जा सकता है।
  2. पारस्परिक सहयोग के कारण श्रम समस्या का निदान हो जाता है। रूस, चीन एवं क्यूबा में इसी पद्धति से कृषि की जा रही है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
निर्वाहक कृषि की विशेषताएँ बताइए।
या
निर्वाहक कृषि की विशेषताएँ तथा विश्व में इसका वितरण स्पष्ट कीजिए। [2016]
उत्तर
गहन निर्वाहक कृषि यह विकासशील कृषि का प्रतिरूप है। इसमें पुरातन साधनों के साथ ही नवीन कृषि साधनों का भी उपयोग आरम्भ हो जाता है। इस प्रकार की कृषि विशेषत: मानसून एशिया के सघन आबाद देशों (चीन, जापान, कोरिया, भारत, बांग्लादेश, बर्मा (म्यांमार)], पाकिस्तान, वियतनाम, थाईलैण्ड, फिलीपीन्स तथा जावा में प्रचलित है। इस कृषि की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. खेत छोटे आकार के होते हैं।
  2. मानवे श्रम तथा साधारण उपकरणों का प्रयोग होता है।
  3. खेत जोतने व अन्य कृषि कार्यों में बैल व भैंसे को अधिक प्रयोग होता है।
  4. मिट्टी को उर्वर बनाए रखने के लिए पशुओं के गोबर तथा मानव मल-मूत्र की खाद, खली व हरी खाद तथा कुछ रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है।
  5. फसलों के हेर-फेर द्वारा भूमि की उर्वरता कायम रखी जाती है।
  6. सिंचाई के साधनों का भी प्रयोग होता है।
  7. द्विफसली (double cropping) तथा अन्तर्फसली (intercropping) विधियों द्वारा भूमि से। अधिकाधिक फसलों का लाभ प्राप्त होता है।
  8. पहाड़ों पर भी सोपान बनाकर खेती होती है।
  9. अन्न व साग-सब्जियों पर उत्पादन अधिक होता है, क्योंकि सघन जनसंख्या का पोषण आवश्यक है। व्यापारिक फसलें (जूट, कपास, तिलहन, पेय फसलें आदि) केवल स्थानीय उपभोग के लिए उगायी जाती हैं।
  10. पशुपालन भी निर्वाहक स्तर पर कृषि के सहयोग के लिए किया जाता है। चीन में सूअर व मुर्गी अधिक पाले जाते हैं।
  11. सघन कृषि में भूमि से अधिकतम उपजे (yield) प्राप्त की जाती हैं।

प्रश्न 2
व्यापारिक अन्नोत्पादक कृषि के प्रमुख क्षेत्र एवं विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
व्यापारिक अन्नोत्पादक कृषि मुख्यत: विकसित देशों में की जाती है। रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अर्जेण्टीना, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में इस प्रकार की कृषि की प्रधानता है। व्यापारिक अन्नोत्पादक कृषि की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. यह कृषि बड़े-बड़े कृषि फार्मों पर नवीन वैज्ञानिक मशीनी उपकरणों द्वारा की जाती है।
  2. ऐसी कृषि में रासायनिक उर्वरकों का अधिक प्रयोग किया जाता है।
  3. ऐसी कृषि में फसलों का विशेषीकरण पाया जाता है, गेहूँ इस कृषि की प्रमुख फसल है।
  4. इस कृषि में प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक होता है।
  5. ऐसे कृषि क्षेत्र में एकाकी बस्तियाँ पायी जाती हैं, जिन्हें ‘फार्मस्टड’ कहा जाता है।

प्रश्न 3
ट्रक फार्मिंग (फलों एवं सब्जियों की कृषि) की विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2008]
उत्तर
फल एवं सब्जियों की व्यापारिक कृषि ट्रक फार्मिंग के नाम से जानी जाती है। इस प्रकार की कृषि की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. इस प्रकार की बागवानी में एक विशेष सब्जी की फसल अपेक्षाकृत अधिक दूर स्थित बाजार के लिए पैदा की जाती है।
  2. ट्रक (Truck) शब्द का अर्थ मोटर ट्रक से नहीं बल्कि यह फ्रेंच भाषा के शब्द ‘Troquer’ से लिया ग़या है जिसका अर्थ होता है माल का हेर-फेर करना।
  3. बागवानी द्वारा उगाई गयी सब्जी प्रायः दलालों के द्वारा बेची जाती है।
  4. इस कृषि के लिए भूमि एवं मजदूर सस्ते होते हैं और यन्त्रीकरण द्वारा खेती की जाती है।
  5. इस कृषि की लागत कम आती है परन्तु दलालों एवं यातायात व्यय अधिक होने के कारण खर्च बढ़ जाता है; फलतः शुद्ध आय कम हो जाती है।

प्रश्न 4
बागाती कृषि का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 में (c) के अन्तर्गत शीर्षक (2) देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बागाती कृषि के चार उत्पादों के नाम लिखिए। (2014, 15)
उत्तर

  1. नारियल
  2. चाय
  3. रबड़
  4. कहवा

प्रश्न 2
झुम कृषि भारत के किस भाग में प्रचलित है? [2009]
उत्तर
झूम कृषि भारत में असम, नागालैण्ड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिमी घाट तथा राजस्थान के दक्षिण-पश्चिम में प्रचलित है।

प्रश्न 3
मिश्रित कृषि का क्या महत्त्व है? [2009]
उत्तर
मिश्रित कृषि के अन्तर्गत कृषि कार्य के अतिरिक्त कृषिक खाली समय में पशुपालन, मत्स्य पालन तथा बागवानी आदि प्राथमिक कार्य करते हैं जिससे कृषकों की आय में वृद्धि होती है और आर्थिक विकास को गति मिलती है।

प्रश्न 4
बागाती कृषि की दो विशेषताएँ बताइए। [2009, 10, 12, 13]
उत्तर
बागोती कृषि की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. इसके अन्तर्गत विशिष्ट उपजों का ही उत्पादन किया जाता है; जैसे- केला, नारियल, रबड़, कहवा, चाय, कोको फल आदि।
  2. यह कृषि बागानों में की जाती है तथा इसमें उच्च तकनीक, मशीनों एवं पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 5
बागाती कृषि के तीन मुख्य क्षेत्र बताइए। उक्ट बागाती कृषि के तीन मुख्य क्षेत्र हैं –

  1. दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया,
  2. दक्षिण अमेरिका,
  3. अफ्रीका।

प्रश्न 6
बागाती कृषि से आप क्या समझते हैं? [2007, 08, 16]
या
विश्व की दो बागाती फसलों के नाम बताइए। [2011]
या
बागाती कृषि के किन्हीं चार उत्पादों के नाम बताइए। (2015)
उत्तर
बागाती कृषि एक ऐसी पद्धति है जो बड़े-बड़े फार्मों पर की जाती है। इसमें किसी एक विशिष्ट उपज का उत्पादन कारखाना स्तर पर किया जाता है; जैसे- चाय, कहवा, कोको, नारियल आदि।

प्रश्न 7
झूम-कृषि की कोई दो विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए। [2009, 12, 13, 14]
उतर

  1. झूम-कृषि स्थानान्तरणशील खेती है, जिसमें वनों को आग लगाकर साफ कर लिया जाता है तथा फसलें प्राप्त की जाती हैं। दो-तीन वर्ष खेती करने के बाद उस भूमि को परती छोड़ दिया जाता है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह कृषि प्रचलित है।
  2. इस प्रकार की कृषि में मोटे अनाज; जैसे- मक्का, ज्वार-बाजरा, जिमीकन्द एवं रतालू उत्पन्न किये जाते हैं।

प्रश्न 8
किन्हीं दो प्रमुख व्यापारिक फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. कपास तथा
  2. चुकन्दर।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
सघन जनसंख्या, किन्तु कम भूमि वाले भागों में की जाने वाली कृषि है।
(क) सघन
(ख) विस्तृत
(ग) बागाती
(घ) शुष्क
उत्तर
(क) सघन।

प्रश्न 2
कहवा किस कृषि की उपज है?
(क) स्थानान्तरण
(ख) बागाती
(ग) व्यापारिक अन्न उत्पादक
(घ) मिश्रित
उत्तर
(ख) बागाती।

प्रश्न 3
विस्तृत व्यापारिक अन्न कृषि निम्नलिखित में से किस एक की विशेषता है?
(क) पश्चिमी यूरोप
(ख) वृहद् झील प्रदेश
(ग) मानसून प्रदेश
(घ) भूमध्यसागरीय प्रदेश
उत्तर
(ख) वृहद् झील प्रदेश।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 13 Primary Occupation: Agriculture

प्रश्न 4
विश्व में बागाती कृषि का सर्वाधिक विकास कहाँ हुआ है?
(क) मध्य अमेरिका में
(ख) अमेजन बेसिन में
(ग) कांगो बेसिन में
(घ) दक्षिणी-पूर्वी एशिया में
उत्तर
(घ) दक्षिणी-पूर्वी एशिया में।

प्रश्न 5
व्यापारिक पशुपालन एवं मक्का उत्पादन भली-भाँति समायोजित है।
(क) ऑस्ट्रेलिया में
(ख) पोलैण्ड में।
(ग) चीन में।
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका में
उत्तर
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका में

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 Major Manufacturing Industries

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 Major Manufacturing Industries (प्रमुख विनिर्माणी उद्योग) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 Major Manufacturing Industries (प्रमुख विनिर्माणी उद्योग).

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Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 15
Chapter Name Major Manufacturing Industries (प्रमुख विनिर्माणी उद्योग)
Number of Questions Solved 42
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 Major Manufacturing Industries (प्रमुख विनिर्माणी उद्योग)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व के लौह-अयस्क उत्पादक क्षेत्रों का वितरण तथा उसके अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वर्णन कीजिए। [2015]
या
लोहा तथा इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए तथा विश्व में इस उद्योग के प्रमुख क्षेत्रों या केन्द्रों का उल्लेख कीजिए [2007, 11, 12, 16]
या
संयुक्त राज्य अमेरिका या जर्मनी के लोहा तथा इस्पात उद्योग का वर्णन कीजिए।
या
चीन के लोहा-इस्पात उद्योग का वर्णन कीजिए।
या
विश्व के किन्हीं दो देशों में लौह-अयस्क के वितरण एवं उत्पादन का वर्णन कीजिए। [2008]
या
लोहा एवं इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2012, 16]
या
संयुक्त राज्य अमेरिका में लौह-इस्पात उद्योग के विकास के प्रमुख कारकों का विवेचन कीजिए तथा इस उद्योग के प्रमुख क्षेत्रों एवं केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2014]
या
विश्व में लौह-अयस्क का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए
(क) उत्पादक क्षेत्र
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार। [2014]
उत्तर

लोहा एवं इस्पात का महत्त्व Importance of Iron and Steel

वर्तमान में यान्त्रिक एवं औद्योगिक सभ्यता का आधार लोहा एवं इस्पात माना जाता है, क्योंकि अन्य उद्योगों के लिए लोहा-इस्पात कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। मानव-जाति की वर्तमान एवं भावी समृद्धि लोहे एवं इस्पात के उत्पादन पर निर्भर करती है। विश्व में जितनी भी धातुओं का उत्पादन किया जाता है, उसमें लगभग 90% भाग लोहे का ही होता है। वर्तमान अन्तरिक्ष युग में कुछ हल्की धातुओं (ऐलुमिनियम) का प्रयोग अधिक किया जाने लगा है, परन्तु लोहे की कठोरता, प्रबलता, स्थायित्व, लचीलेपन एवं सस्तेपन आदि गुणों के कारण अन्य धातुएँ इसका स्थान नहीं ले सकी हैं। इसके उपर्युक्त विशेष गुणों के कारण ही इसे विभिन्न रूपों में ढाला जा सकता है।

लोहा-इस्पात उद्योग की अवस्थिति के लिए उत्तरदायी कारक – लोहा-इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए निम्नलिखित कारकों का योगदान सर्वोपरि रहती है –

  1. भूमि का विस्तृत क्षेत्र;
  2. कच्चे माल की उपलब्धि –
    1. स्वच्छ जल
    2. तप्त वायु
    3. कोक योग्य कोयला
    4. लौह-अयस्क
    5. चूना-पत्थर
    6. स्क्रैप एवं
    7. मिश्र धातुएँ;
  3. बाजार की सुविधा;
  4. परिवहन के विकसित साधन;
  5. पर्याप्त मात्रा में पूँजी की उपलब्धता;
  6. मानवीय श्रम की पर्याप्तता;
  7. सरकारी नीतियाँ एवं प्रोत्साहन;
  8. सस्ता और कुशल श्रम;
  9. पर्याप्त मशीनें तथा उपकरण;
  10. शक्ति के सुलभ साधन।

विश्व में लौह-इस्पात उद्योग का वितरण एवं उत्पादन
Distribution and Production of Iron-Steel in the World

विश्व के अग्रणी लोहा-इस्पात उत्पादक देश क्रमश: जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, यूक्रेन, जर्मनी, भारत, इटली, कनाडा, ब्रिटेन, बेल्जियम तथा स्पेन हैं।

(अ) संयुक्त राज्य अमेरिका का लोहा-इस्पात उद्योग
Iron-Steel Industry of U.S.A.

विश्व के लौह-इस्पात उत्पादक देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका तीसरा स्थान रखता है। यहाँ लोहा-इस्पात उत्पादन के छः क्षेत्र मुख्य स्थान रखते हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है –

(1) पिट्सबर्ग-यंग्सटाउन क्षेत्र – इस प्रदेश में संयुक्त राज्य का लगभग एक-तिहाई इस्पात का उत्पादन किया जाता है। इसमें इस्पात उत्पादन के निम्नलिखित तीन उप-क्षेत्र हैं –

  1. पिट्सबर्ग क्षेत्र – यहाँ ओहियो, माननघेला एवं अलेघनी नदियों की घाटियों में इस्पात उद्योग के कारखाने स्थापित हुए हैं। इस्पात-निर्माण के सभी केन्द्र पिट्सबर्ग से 65 किमी के भीतर स्थित हैं।
  2. यंग्सटाउन क्षेत्र – यंग्सटाउन से 50 किमी की दूरी पर शेनांगो एवं माहोनिंग नदियों की घाटियों में इस्पात के कारखाने विकसित हुए हैं।
  3. जोन्सटाउन क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार कोनेमाघ नदी की घाटी में हुआ है। प्रमुख इस्पात केन्द्र पिट्सबर्ग, यंग्सटाउन, ह्वीलिंग, हंटिंगटन, पोसमाउथ, जोन्सटाउन आदि हैं।

(2) शिकागो – गैरी क्षेत्र – संयुक्त राज्य में इस क्षेत्र का लोहा-इस्पात उत्पादन में प्रथम स्थान है, जहाँ देश का 35% इस्पात निर्मित किया जाता है। इस क्षेत्र में लौह-अयस्क, कोयला स्थानीय, कुछ लौह-अयस्क झील परिवहन द्वारा आयात, मिशीगन राज्य से चूना-पत्थर, स्वच्छ जल की प्राप्ति, बाजार की समीपता आदि भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। प्रमुख इस्पात केन्द्र शिकागो, गैरी, इण्डियाना हार्वर, मिलवाकी एवं सेण्ट-लुईस हैं।

(3) झीलतटीय क्षेत्र – झीलों के तटीय भागों में सबसे बड़ी सुविधा लौह-अयस्क की प्राप्ति का होना है। इस क्षेत्र के इस्पात केन्द्र आयातित कोयले पर निर्भर करते हैं। प्रमुख इस्पात केन्द्रों में बफैलो, क्लीवलैण्ड, डेट्रायट, डुलूथ, ईरी, टोलेडो एवं लॉरेन आदि प्रमुख हैं। डेट्रायट संयुक्त राज्य के दो बड़े केन्द्रों में से एक है।

(4) मध्य अटलांटिक तटीय क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार न्यू इंग्लैण्ड राज्यों से वर्जीनिया राज्य तक विस्तृत है। बेथलेहम, स्पैरोजप्वाइण्ट, मोरिसविले मुकडेन, ईस्टर्न एवं फिलिप्सबर्ग प्रमुख इस्पात-निर्माण के केन्द्र हैं। इस क्षेत्र को सबसे बड़ी सुविधा विदेशों से लौह-अयस्क आयात करने की है, जो कनाडा, वेनेजुएला, ब्राजील, पीरू, चिली, अल्जीरिया एवं दक्षिणी-अफ्रीकी देशों से आयात किया जाता है। इस क्षेत्र में स्थित स्पैरोजप्वाइण्ट विश्व का सबसे बड़ा इस्पात-निर्माण केन्द्र है। तटीय स्थिति होने के कारण इस क्षेत्र के भावी विकास की अधिक सम्भावनाएँ हैं।

(5) दक्षिणी क्षेत्र – इस क्षेत्र में बर्मिंघम सबसे बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। यहाँ पर कोयला, लौह-अयस्क एवं चूना-पत्थर स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं। टेक्सास राज्य में हाउस्टन, फ्लोरेंस, शाण्यनुगा एवं डेंगरफील्ड अन्य मुख्य इस्पात केन्द्र हैं। इस क्षेत्र में कच्चे माल तथा स्थानीय बाजार की पर्याप्त सुविधाएँ हैं।

(6) पश्चिमी क्षेत्र – संयुक्त राज्य के पश्चिम में प्रशान्त तट के सहारे-सहारे इस्पात केन्द्र विकसित हुए हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख केन्द्र प्यूबलो, डेनेवर, प्रोवो, जेनेवा, टेकोमा, सेनफ्रांसिस्को, लॉस-एंजिल्स एवं फोटाना हैं।

(ब) जापान का लोहा-इस्पात उद्योग
Iron-Steel Industry of Japan

विश्व के लोहा – इस्पात देशों में जापान की अब द्वितीय स्थान है, जिसने बिना लौह-अयस्क के अपने उत्पादन में वृद्धि कर ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों को भी पीछे छोड़ दिया है। जापान में लौह-अयस्क एवं कोयला, दोनों ही कच्चे पदार्थों की कमी आरम्भ से ही रही है; अत: शक्ति के लिए जल-विद्युत का उपयोग किया जाता है। यहाँ पर कोकिंग कोयला संयुक्त सज्य अमेरिका, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया से आयात किया जाता है। लौह-अयस्क भारत, मलेशिया, फिलीपीन्स, वेनेजुएला, पीरू तथा ब्राजील से आयात की जाती है तथा स्क्रैप संयुक्त राज्य से मँगाई जाती है। कच्चे माल को आयात करने की सुविधा के कारण जापान में इस्पात केन्द्रों की स्थापना सागरतटीय क्षेत्रों में की गयी है। जापान के लोहा-इस्पात उद्योग में निम्नलिखित प्रदेश प्रमुख स्थान रखते हैं –

  1. मौजी प्रदेश – इस प्रदेश में जापान का तीन-चौथाई इस्पात का उत्पादन किया जाता है। आयातित कच्चे माल पर यहाँ इस्पात उद्योग का विकास किया गया है। उत्तरी क्यूशू में मौजी एक प्रमुख औद्योगिक प्रदेश है। यहाँ पर यावाता, तोबाता, मौजी, फुकुओका, कोकुरा, ओगुता, शिमोनोसेकी एवं नागासाकी प्रमुख इस्पात उत्पादक केन्द्र हैं।
  2. कैमेशी प्रदेश – होशू द्वीप के पूर्वी भाग में इस्पात प्रदेश की स्थाफ्ना हुई है। इस प्रदेश को कुछ लौह-अयस्क स्थानीय रूप से कुंजी एवं सेण्डाई की खानों से प्राप्त हो जाती है। आन्तरिक सागर के पूर्वी सिरे पर कोबे एवं ओसाका इस्पात केन्द्र स्थित हैं। होंशू द्वीप के पूर्वी भाग में टोकियो एवं याकोहामा महत्त्वपूर्ण इस्पात केन्द्र हैं। अन्य केन्द्रों में हिरोहिता, चिबा, अमागासाकी, सकाई, वाकायामा, कावासाकी एवं मित्सुके प्रमुख हैं।
  3. मुरारां प्रदेश – इस प्रदेश का विस्तार होकैडो द्वीप में है। यहाँ पर कुछ कच्चा माल स्थानीय रूप से उपलब्ध हो जाता है। कुछ लोहा स्थानीय रूप से मुरारां की खानों से तथा लौह-अयस्क इशीकारी की खानों से प्राप्त होती है। वैनिशी, सपारो, मुरारां एवं हैकोडेट प्रमुख इस्पात उत्पादक केन्द्र हैं।

जापान में क्यूशू द्वीप पर स्थित मौजी प्रदेश में देश का 75% इस्पात-निर्माण किया जाता है। इस्पात-निर्माण में वृद्धि के कारण यहाँ इन्जीनियरिंग, यन्त्र-निर्माण, जलपोत-निर्माण आदि उद्योगों को विकास हुआ है। इसी कारण जापान एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा औद्योगिक देश बन गया है।

(स) जर्मनी का लोहा-इस्पात उद्योग
Iron-Steel Industry of Germany

विश्व में जर्मनी का लोहा-इस्पात उत्पादन में छठा स्थान है। इस देश में लोहा-इस्पात उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र प्रमुख स्थान रखते हैं –
(1) र प्रदेश – जर्मनी के लौह-इस्पात उद्योग का सबसे सघन संकेन्द्रण रूर क्षेत्र में हुआ है। रूर नदी-बेसिन के नाम पर इस प्रदेश का नामकरण हुआ है। यह नदी राइन नदी में आकर मिलती है। रूर क्षेत्र यूरोप महाद्वीप का सबसे बड़ा लौह-इस्पात उत्पादक क्षेत्र है। इसे निम्नलिखिते भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  • रूर बेसिन में सर्वोत्तम प्रकार के एन्थ्रासाइट एवं कोकिंग कोयले के भण्डार हैं। यहाँ एमेस्चेर घाटी में भी कोयला मिलता है।
  • लौह – अयस्क स्थानीय रूप से सीज घाटी, साल्जगिटर एवं दक्षिणी भाग में बवेरिया से प्राप्त हो जाती है। शेष अयस्क अन्य यूरोपीय देशों से आयात की जाती है। फ्रांस के लॉरेन प्रदेश, लक्जमबर्ग, स्वीडन,तथा स्पेन से उच्च-कोटि का कच्चा लोहा आयात किया जाता है।
  • चूना – पत्थर रूर की दक्षिणी पहाड़ियों से प्राप्त हो जाता है।
  • रूर, राईन, लिप्पे नदियाँ, एम्स-डोर्टमण्ड कैनाल एवं अन्य बहुत-सी नहरें इस क्षेत्र को स्वच्छ जल की आपूर्ति करती हैं। नदियाँ सस्ते जल-परिवहन की सुविधा भी प्रदान करती हैं।
  • जर्मनी में परिवहन साधनों-सड़कों एवं रेलमार्गों-का जाल-सा बिछा हुआ है। जल-यातायात की सुविधा इस क्षेत्र को आसानी से प्राप्त है।
  • इस प्रदेश में जलमार्गों द्वारा लौह-अयस्क कनाडा, वेनेजुएला, ब्राजील, पीरू, गिनी एवं सियरालियोन से भी आयात की जाती है।

जर्मनी को 90% इस्पात-उत्पादन रूर क्षेत्र से प्राप्त होता है। इस प्रदेश के प्रमुख केन्द्र ऐसेन, डार्टमण्ड, ओवर हॉसेन, डूसेलडर्फ, बोचम, ग्लेसेनकिरचेन, डुइसबर्ग आदि हैं।

(2) साइलेशिया प्रदेश – जर्मनी के पूर्व में इस क्षेत्र की स्थिति है। इस प्रदेश में कोयला पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। यहाँ लौह-अयस्क विदेशों से भी आयात किया जाता है। प्रमुख केन्द्रों में लिपजग, चिमनीज एवं ड्रेस्डन मुख्य हैं।

(3) दक्षिणी राइन प्रदेश – राइन प्रदेश में दोनों ही कच्चे माल-लौह-अयस्क एवं कोयला-विदेशों से आयात किये जाते हैं। यहाँ पर हल्के मशीनरी उपकरण एवं कृषि-यन्त्र बनाये जाते हैं। क्रेफील्ड, हनोवर, फ्रेंकफर्ट, ब्रीमेन, साल्जगिटर, स्टटगार्ट, शाफिन, लुडविग आदि महत्त्वपूर्ण इस्पात केन्द्र हैं।

(द) चीनं का लोहा-इस्पात उद्योग
Iron-Steel Industry of China

चीन में सन् 1949 में साम्यवादी सरकार की स्थापना के बाद से निर्माण उद्योगों के लिए विकास के पर्याप्त प्रयास किये गये हैं। पिछले 40 वर्षों से चीन ने इस्पात-निर्माण में तीव्र प्रगति की है। सन् 1953 में चीन का इस्पात उत्पादन बहुत कम था, परन्तु सन् 1980 तक यह ब्रिटेन एवं जर्मनी की समता करने लगा था। वर्तमान समय में चीन का विश्व इस्पात उत्पादन में प्रथम स्थान है। चीन में लौह-इस्पात उद्योग के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  • यहाँ उच्च-कोटि को कोकिंग कोयला मिलता है, जिसके विशाल भण्डार मंचूरिया, शेन्सी, शांसी, होनान एवं शाण्टंग प्रायद्वीप में स्थापित हैं।
  • चीन में लौह-अयस्क के अधिकांश भण्डार मंचूरिया में मिलते हैं, परन्तु शांसी, शाटुंग एवं यांगटिसीक्यांग की निम्न घाटी में भी लौह-अयस्क मिलती है।
  • दक्षिणी चीन में लौह-मिश्र धातुएँ प्राप्त होती हैं।

चीन में इस्पात उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र प्रमुख हैं –

  1. मंचूरिया क्षेत्र – चीन का यह प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है, जहाँ देश का लगभग 40% इस्पात तैयार किया जाता है। प्रमुख केन्द्र आनशॉन, फुशुन, पेन्चिहू एवं मुकडेन हैं।
  2. यांगटिसीक्यांग घाटी क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार मध्य चीन में है। इस घाटी का प्रमुख इस्पात केन्द्र वुहान है। अन्य केन्द्रों में मानशॉन, हुआंगशिन, शंघाई, हैंकाऊ एवं तापेह प्रमुख हैं।
  3. उत्तरी क्षेत्र – इसे शांसी क्षेत्र के नाम से भी पुकारा जाता है। पाओटोव प्रमुख इस्पात उत्पादक केन्द्र है। यांगचुआन, टिएंटसिन, अनशॉन, बीजिंग, सिंहचिंगशॉन, ताइयुआन अन्य प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं।
  4. अन्य छिटपुट केन्द्र – चीन में इस्पात उत्पादन के अन्य छिटपुट केन्द्र केण्टन, चुंगकिंग, शंघाई, पेनकी, चिचिआंग, सिंगटाओ, हुआंगसी, चिनलिंग, चेन एवं होपे हैं।

चीन में अधिकांश इस्पात केन्द्र कोयला क्षेत्रों में या उनके निकट स्थापित किये गये हैं। यहाँ का वार्षिक इस्पात उत्पादन 475 लाख मीटरी टन है।
विश्व के अन्य इस्पात उत्पादक देशों में स्वीडन, फ्रांस, इटली, भारत, नीदरलैण्ड, पोलैण्ड, कनाडा, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया आदि मुख्य हैं।

(य) ग्रेट ब्रिटेन का लोहा-इस्पात उद्योग
Iron-Steel Industry of U.K.

लोहा-इस्पात उद्योग का सूत्रपात सबसे पहले अट्ठारहर्वी शताब्दी में ग्रेट ब्रिटेन में ही हुआ था। अब लोहा-इस्पात उद्योग में ग्रेट ब्रिटेन का विश्व में तेरहवाँ स्थान हो गया है। इस देश में कोयला पर्याप्त मात्रा में निकाला जाता है, परन्तु लौह-अयस्क का अभाव है, जिसकी पूर्ति अल्जीरिया, स्पेन, स्वीडन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात कर की जाती है। यहाँ लोहा-इस्पात उद्योग के केन्द्र तटीय भागों में स्थापित किये गये हैं, जहाँ कोयले की खाने समीप हैं तथा लौह-अयस्क आयात करने की सुविधा रहती है। यह देश विश्व का 3 प्रतिशत लोहा एवं इस्पात तैयार करता है। यहाँ लोह्म-इस्पात के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

(1) दक्षिणी वेल्स प्रदेश – यह ब्रिटेन का सबसे बड़ा लोहा-इस्पात उत्पादक क्षेत्र है जहाँ देश का लगभग 25% इस्पात तैयार किया जाता है। यहाँ कोयला स्थानीय खानों से तथा लौह-अयस्क स्पेन व अल्जीरिया से आयात की जाती है। इस क्षेत्र में टिन-प्लेट, इस्पात की चादरें, रेल-इंजिन, पटरियाँ तथा जलयान बनाये जाते हैं। यहाँ के मुख्य लोहा-इस्पात केन्द्र टैलबोट, न्यूपोर्ट, वेल्स, स्वाँसी, कार्डिफ, बारो आदि हैं।

(2) उत्तर-पूर्वी तटीय प्रदेश – यह ग्रेट ब्रिटेन का दूसरा प्रमुख लोहा-इस्पात उत्पादक प्रदेश है। इस क्षेत्र को नार्थम्बरलैण्ड तथा डरहम क्षेत्रों से कोकिंग कोयला प्राप्त हो जाता है तथा स्थानीय क्लीवलैण्ड की खानों से लौह-अयस्क की प्राप्ति होती है। यहाँ लोहे के शहतीर, जलयान, गर्डर, पुल, पटरियाँ तथा छड़ें बनाई जाती हैं। इस प्रदेश के प्रधान केन्द्र न्यूकैसिल, सुन्दरलैण्ड, डार्लिंगटन, डरहम, हार्टलपुल, साउथशील्ड, स्टॉकटन तथा मिडिल्सबरो आदि हैं।

(3) दक्षिणी यार्कशायर प्रदेश – इस क्षेत्र का लोहा-इस्पात के उत्पादन में ग्रेट ब्रिटेन में तीसरा स्थान है। यहाँ स्थानीय रूप से लौह-अयस्क कुछ मात्रा में प्राप्त होती है, परन्तु यह पर्याप्त नहीं है; अतः इस प्रदेश को लौह-अयस्क स्वीडन से आयात करनी पड़ती है। यहाँ शक्ति हेतु लकड़ी का कोयला प्रयोग में लाया जाता है तथा तीव्र प्रवाह वाली नदियों से जलशक्ति भी प्राप्त की जाती है। यह प्रदेश विश्व भर में लोहा-इस्पात उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ देश का लगभग 12% इस्पात तैयार किया जाता है। इसके प्रधान केन्द्र लीड्स, चैस्टरफील्ड, डॉनकास्टर, शैफील्ड, नाटिंघम तथा राथरडम आदि हैं।

(4) ब्लैक कण्ट्री प्रदेश – यह क्षेत्र स्टेफर्डशायर तथा उत्तरी वारविकशायर तक फैला हुआ है। यहाँ कच्चे माल की आपूर्ति स्थानीय है। इस प्रदेश में हल्की तथा मूल्यवान वस्तुएँ; जैसे—सुइयाँ, कीलें, जंजीरें, मशीनों के पुर्जे, सैन्य अस्त्र-शस्त्र, बन्दूकें, पिस्तौल आदि बनाई जाती हैं। इस क्षेत्र का प्रमुख केन्द्र बर्मिंघम है। अन्य केन्द्रों में डेडले, रेडिस, कवेण्ट्री आदि मुख्य हैं।

(5) उत्तर-पश्चिमी तटीय प्रदेश – यह क्षेत्र ग्रेट ब्रिटेन के उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित है। यहाँ लौह-अयस्क पर्याप्त मात्रा में निकाली जाती है। कोयले की आपूर्ति डरहम तथा यार्कशायर की खानों से मँगाकर की जाती है। इस क्षेत्र में रेल की पटरियाँ तथा जलयान बनाये जाते हैं। यहाँ के प्रमुख लोहा-इस्पात केन्द्र डाइडहैण्ड तथा बर्मिंघम हैं।

(6) स्कॉटलैण्ड मध्य घाटी प्रदेश (क्लाइड नदी की घाटी) – यह प्रदेश स्कॉटलैण्ड में क्लाइड नदी की घाटी में फैला हुआ है। लौह-अयस्क यहाँ पर्याप्त मात्रा में निकाली जाती है, जब कि कोयला लेनार्क क्षेत्र से मँगाया जाता है। यहाँ जलयान, गर्डर विशेष रूप से बनाये जाते हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख केन्द्र ग्लासगो, हैमिल्टन, मदरसविले, कोटब्रिज, कैरेन, जोन्सटाउन आदि हैं।
ग्रेट ब्रिटेन से भारी मात्रा में लोहा-इस्पात एवं उससे निर्मित वस्तुओं का निर्यात किया जाता है। अत: इसकी गणना विश्व के प्रमुख लोहा-इस्पात निर्यातक देशों में की जाती है। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से उत्पादन में उत्तरोत्तर कमी आने से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी निर्यात मात्रा घटती जा रही है।

लौह-इस्पात का विश्व-व्यापार
World-Trade of Iron-Steel

इस्पात का अधिकांश व्यापार स्थानीय होता है। विश्व के सभी इस्पात उत्पादक देश इस्पात उत्पादन में वृद्धि हेतु प्रयासरत हैं। जापान तथा पश्चिमी यूरोपीय देशों से इस्पात निर्यात किया जाता है। प्रमुख आयातक एवं निर्यातक देश निम्नलिखित हैं –

  • इस्पात निर्यातक देश – रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, चेक और स्लोवाकिया मुख्य हैं।
  • इस्पात आयातक देश – अधिकांश इस्पात आयातक देश विकासशील हैं, जिनमें दक्षिणी एशियाई, अफ्रीकी एवं लैटिन अमेरिकी देश हैं। भारत इस्पात का आयात रूस, जापान, जर्मनी एवं ब्रिटेन से करता है।

प्रश्न 2
विश्व में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना सोदाहरण कीजिए। [2007]
या
सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करते हुए जापान में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2008, 13]
या
सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयुक्त स्थानीयकरण के भौगोलिक कारकों की समीक्षा करते हुए इस उद्योग का विश्व में वितरण समझाइए। [2009, 10]
या
जापान के सूती वस्त्र उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) उपर्युक्त भौगोलिक परिस्थितियाँ,
(ख) प्रमुख उत्पादन क्षेत्र। [2014]
या
ग्रेट ब्रिटेन में वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों का उल्लेख कीजिए तथा इसके प्रमुख उत्पादन केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2013, 15]
या
सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीकरण के कारकों की विवेचना कीजिए एवं विश्व में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए। [2013, 14]
या
संयुक्त राज्य अमेरिका में सूती वस्त्रोद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(अ) स्थानीयकरण के कारक
(ब) उद्योग के प्रमुख क्षेत्र
(स) निर्माण।
उत्तर

सूती वस्त्र उद्योग Cotton Textile Industry

वस्त्र मानव की तीन प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। वस्त्रों का उपयोग तन ढकने के लिए प्राचीन काल से होता आया है। यह तन ढकने की आवश्यकता से लेकर अब तन सजाने की वस्तु बन गया है। गर्म जलवायु के देशों में सूती वस्त्रों का प्रचलन सर्वाधिक है। वर्तमान समय में सूती वस्त्र निर्माण का कार्य एक सुविकसित उद्योग का रूप ग्रहण कर चुका है। सूती वस्त्रों का निर्माण हाथ व मशीनों दोनों से होता है। अब इस उद्योग में स्वचालित तथा सुधरी हुई मशीनों का उपयोग होने लगा है।

सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारक – सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण को निम्नलिखित कारकों ने प्रभावित किया है।

(1) जलवायु – सूती वस्त्र उद्योग उन्हीं देशों में स्थापित किया जाता है, जहाँ धागा बनाने के लिए नमें जलवायु मिलती है, क्योंकि शुष्क जलवायु में धागा बार-बार टूटता रहता है। अब तो कृत्रिम आर्द्रता उत्पन्न कर कहीं भी बाजार के निकट सूती कपड़े के कारखाने खोले जा सकते हैं।

(2) कच्चा माल – सूती कपड़ा बनाने के लिए कपास की आवश्यकता होती है। कपास को गाँठ में बाँधकर कम खर्चे और आसानी के साथ दूर क्षेत्रों को भेजा जा सकता है; अत: आज के सूती कपड़े बनाने वाले प्रमुख देश जापान, इंग्लैण्ड, जर्मनी इसके उदाहरण हैं।

(3) पर्याप्त मात्रा में मीठे जल की आवश्यकता – यह सूती कपड़े के लिए बहुत महत्त्व रखती है। सूत की धुलाई, रँगाई और अन्य कई प्रकार के कार्यों के लिए शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। इसी कारण नदियों या झीलों के किनारे सूती व्यवसाय के केन्द्र स्थापित किये गये हैं। इंग्लैण्ड में ब्लैकबर्न, बर्नले, लीड्स और लिवरपूल तक नहर के किनारे-किनारे सूती कपड़े के कारखाने पाये जाते हैं। संयुक्त राज्य में भी न्यू-इंग्लैण्ड राज्य में नदियों के किनारे-किनारे सूती वस्त्र के अधिक कारखाने स्थापित किये गये हैं।

(4) श्रम – सूती वस्त्र उद्योग कुशल कारीगरों की उपलब्धता पर भी निर्भर करता है। लंकाशायरे और मैनचेस्टर में इस उद्योग के केन्द्रित होने का प्रधान कारण यही है कि वहाँ पहले ऊनी कपड़ा बनाने वाले कुशल कारीगर पाये जाते थे। इसी प्रकार जापान में भी सूती वस्त्र उद्योग को रेशमी कपड़ा बुनने वालों से काफी सहायता मिली है। भारत के मुम्बई और अहमदाबाद केन्द्रों में अधिकांश जुलाहों के कारण उद्योगों का विकास हुआ है।

(5) शक्ति के साधन – जहाँ पर्याप्त मात्रा में सस्ती एवं निरन्तर विद्युत शक्ति प्राप्त हो जाती है, वहीं इसका तेजी से विकास होता है। इटली, जापान, कोरिया व चीन में भी विद्युत ऊर्जा की निरन्तर
आपूर्ति एवं घरेलू व निर्यात हेतु माँग के अनुसार ही वस्त्र उद्योग का पूर्वी भाग में सबसे अधिक विकास होता रहा है।

(6) यातायात के साधन एवं बाजार – तैयार माल को खपत के केन्द्रों तक पहुँचाने के लिए सस्ते और उत्तमपरिवहन के साधनों की आवश्यकता पड़ती है। उपनिवेश काल में निर्मित वस्त्र ब्रिटेन से हजारों मील दूर अफ्रीका में भारत भेजे जाते थे। आज तो जिन देशों के पास अपना कच्चा माल एवं स्वयं को

बाजार है, वहीं यह उद्योग तेजी से विकसित होने लगा है; अत: बाजार की निकटता उद्योग के विकास का आधार बनता जा रहा है। अब भी विद्युत-प्राप्ति की अधिकांश देशों में राष्ट्रीय ग्रिड व्यवस्था होने एवं कारखानों का अपना आपातकालीन ताप-विद्युत सेट होने से बाजार की माँग का महत्त्व और भी बढ़ गया है।

विश्व में सूती वस्त्र उद्योग का वितरण
Distribution of Cotton Textile Industry in the World

सूती धागा उत्पादन की दृष्टि से विश्व के अग्रणी देश क्रमशः चीन (35%), संयुक्त राज्य अमेरिकी (13%), भारत (12%), पाकिस्तान (10%), तुर्की (3%), ब्राजील (3%), इटली (2%), दक्षिण कोरिया (1.5%) आदि हैं।
सूती वस्त्र के उत्पादन की दृष्टि से विश्व के अग्रणी देश क्रमश: चीन (48.6%), भारत (28.3%), संयुक्त राज्य अमेरिका (5.3%), इटली (2.1%), ब्राजील (1.9%), रूस (2.9%), जापान (0.9%), फ्रांस (1.5%), स्पेन (1.0%) आदि हैं।

(अ) संयुक्त राज्य अमेरिका का सूती वस्त्र उद्योग
Cotton Textile Industry of U.S.A.

मिलों द्वारा निर्मित सूती वस्त्रों के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका का तीसरा तथा सूती धागा उत्पादन में दूसरा स्थान है। यहाँ सूत कातने एवं वस्त्र बुनने का व्यवसाय पूर्वी भागों में अप्लेशियन पर्वतीय क्षेत्र के पूर्वी राज्यों में होता है, जहाँ इस उद्योग के लिए सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। सर्वप्रथम सूती वस्त्र उद्योग का विकास न्यू-इंग्लैण्ड राज्यों में हुआ था, परन्तु बाद में दक्षिणी राज्यों (अप्लेशियन पर्वतीय) में इसका सर्वाधिक विकास हुआ है। अतः उत्तरी-पूर्वी संयुक्त राज्य से इसके दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों की ओर इस उद्योग का खिसकाव हुआ है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के कारक
Localisation Factors of Cotton Textile Industry in U.S.A.

संयुक्त राज्य अमेरिका में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीकरण के लिए निम्नलिखित भौगोलिक कारक उत्तरदायी रहे हैं-

  1. अनुकूलतम नम जलवायु।
  2. उत्तम कोटि की लम्बे और मुलायम रेशे की कपास की स्थानीय उपलब्धता।
  3. शक्ति के संसाधनों की प्रचुरता।
  4. सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की उपलब्धता।
  5. स्वच्छ जल की आपूर्ति।
  6. सुगम एवं सस्ते परिवहन के साधन।
  7. भारी खपत एवं विदेशी माँग।
  8. पूँजी की सुलभता।
  9. सरकारी उदारीकरण की नीति।
  10. मशीनों एवं उपकरणों की सुलभता।
  11. तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास।
  12. गुणवत्ता में सतत सुधार।
  13. अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अग्रणी।

उद्योग के प्रमुख क्षेत्र Main Areas of Industry

संयुक्त राज्य में वस्त्र उद्योग संयुक्त रूप से विकसित हुआ है, अर्थात् कताई, बुनाई एवं छपाई आदि कार्य एक साथ ही किये जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में सूती वस्त्र उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र प्रमुख हैं –

(1) न्यू-इंग्लैण्ड क्षेत्र – न्यू-इंग्लैण्ड में सूती वस्त्र निर्माणक केन्द्र रोड्स द्वीप, कनेक्टीकट, मैसाचुसेट्स एवं हैम्पशायर में हैं। प्रथम सूती मिल की स्थापना सन् 1790 में रोड्स द्वीप के पॉर्टकट नामक स्थान पर की गयी थी। इसके बाद अन्य नगरों में सूती मिलें स्थापित की गयीं, जिनमें फाल-रिवर, न्यूब्रेडफोर्ड, लॉवेल, प्रॉविडेन्स, लारेंस एवं मानचेस्टर महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं। अन्य केन्द्रों में बोस्टन, वॉरसेस्टर, विवरले, पिचबर्ग, होलीओक, नार्थ-एडेम्स, बूनसॉ केट, ट्राउनटन आदि प्रमुख हैं।

न्यू-इंग्लैण्ड राज्यों की वस्त्र-निर्माण में सन् 1920 तक प्रधानता रही, परन्तु इसके बाद इन राज्यों का महत्त्व घटता गया, क्योंकि दक्षिणी राज्यों का उत्पादन बढ़ता गया तथा वर्तमान में यह क्षेत्र देश का केवल 20% ही सूती वस्त्रों का उत्पादन करता है। यह क्षेत्र महीन वस्त्रों के लिए विश्वप्रसिद्ध है।

(2) मध्य अटलाण्टिक क्षेत्र – पेसिलवानिया के पूर्वी भाग में न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी, फिलाडेल्फिया, मेरीलैण्ड एवं वर्जीनिया राज्यों में इस क्षेत्र का विस्तार है। इस क्षेत्र को जलविद्युत शक्ति, बाजार, पर्याप्त श्रमिक, आर्द्र जलवायु, रेल यातायात, मशीनी उपकरणों की उपलब्धि आदि सुविधाएँ प्राप्त हैं। फिलाडेल्फिया इस क्षेत्र का सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा केन्द्र है। विलमिंगटन, जर्मन-टाउन, जर्सी-सिटी, हैरिसबर्ग, पेटरसन, विल्कीज बारे, स्क्राटन, टेंटन एवं बाल्टीमोर अन्य प्रमुख केन्द्र हैं। इन केन्द्रों में रेडीमेड वस्त्र तैयार किये जाते हैं। रिचमण्ड, नॉरफोक, लिचबर्ग, रैले, ग्रीन्सबरो, डेनविले, चार्ल्सटन आदि वर्जीनिया राज्य के प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

(3) दक्षिणी अप्लेशियन क्षेत्र – यह संयुक्त राज्य का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक प्रदेश है। उत्तरी एवं दक्षिणी केरोलिना, जॉर्जिया एवं टेनेसी आदि राज्य इसके अन्तर्गत सम्मिलित हैं। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का अधिक विकास सन् 1880 के बाद हुआ है।

इस प्रदेश में सूती वस्त्र की मिलें पर्वतीय प्रदेश में विस्तृत हैं। अधिकांश मिलों का संकेन्द्रण प्रपात- रेखा के सहारे-सहारे जलविद्युत उत्पादक केन्द्रों के निकट हुआ है। चारलोटे, कोलम्बिया, आगस्टा एवं एटलाण्टा प्रमुख वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। ग्रीन्सबरो, स्पार्टनबर्ग, ग्रीनविले, मेकन, कोलम्बस, मोण्टगोमरी, नोक्सविले एवं चट्टानुगा अन्य प्रमुख वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। संयुक्त राज्य के 90 से 95% तकुवे एवं 80% सूती वस्त्रों का निर्माण इन्हीं दक्षिणी राज्यों में किया जाता है।

निर्यात – ब्राजील संयुक्त राज्य अमेरिका में बने सूती वस्त्रों का सबसे बड़ा ग्राहक है। इसके अतिरिक्त मैक्सिको, ग्वाटेमाला, निकारागुआ, जमैका, हवाना, क्यूबा, वेनेजुएला, कोलम्बियां, इक्वेडोर, अर्जेण्टाइना, चिली, बोलिविया, यूरोप आदि देशों को भी सूती वस्त्रों का निर्यात किया जाता है।

(ब) जापान का सूती वस्त्र उद्योग
Cotton Textile Industry of Japan

सूती वस्त्र उत्पादन में जापान का स्थान विश्व में तो नगण्य है, परन्तु एशिया महाद्वीप में चीन, भारत एवं कोरिया के बाद चौथा स्थान है। जापान विदेशों से कपास का आयात कर, उसका वस्त्र तैयार कर अन्य देशों को निर्यात कर देता है।

जापान में सूती वस्त्रों की पहली मिल 1868 ई० में स्थापित की गयी थी। प्रथम विश्वयुद्ध तक इस उद्योग की प्रगति बहुत ही मन्द रही। परन्तु प्रथम युद्ध-काल में जापान के इस उद्योग ने तीव्र गति से उन्नति की तथा जापान में बने वस्त्र चीन, भारत एवं अफ्रीकी देशों में पहुँच गये थे। इस प्रकार प्रगति करते-करते 1933 ई० तक जापान विश्व का प्रथम सूती वस्त्र निर्यातक देश बन गया था, परन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के वस्त्र उद्योग को भारी हानि उठानी पड़ी, क्योंकि इस महायुद्ध में जापान की लगभग 80% सूत कातने वाली मिलें परमाणु बम के प्रहार से नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थी। सन् 1946 तक जापान के इस उद्योग की दशा बड़ी ही शोचनीय थी। जापान ने अपने इस उद्योग का पुनर्निर्माण किया तथा आठ वर्षों के अन्तराल में ही अपनी मिलों को आधुनिक मशीनों से सुसज्जित कर लिया था। इस प्रकार 1954 ई० में जापान पुनः विश्व का सबसे बड़ा सूती वस्त्र निर्यातक देश बन गया था तथा आज तक उस स्थिति को बनाये हुए है। वर्तमान समय में उसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में चीन, संयुक्त राज्य, ब्रिटेन एवं भारतीय वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

जापान के औद्योगिक विकास में वस्त्र-निर्माण उद्योग का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि इसके विकास द्वारा ही जापान अपने देश को पिछड़ी दशा से आधुनिकतम औद्योगिक एवं तकनीकी ज्ञान को चरमोत्कर्ष अवस्था तक पहुँचा सका है। वर्तमान समय में जापान अपने सूती वस्त्र उत्पादन का लगभग एक-तिहाई भाग विदेशों को निर्यात कर देता है।

जापान में सूती वस्त्र उद्योग के विकास के कारक
Developing Factors of Cotton Textile Industry in Japan

  1. बड़ी संख्या में सस्ते श्रमिकों की प्राप्ति-जिनमें स्त्रियाँ एवं बच्चे श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। जापानी श्रमिक दो पारियों में काम करते हैं। जापान की अधिकांश जनसंख्या तटीय भागों में ही निवास करती है।
  2. कपास के रूप में कच्चा माल चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, मिस्र, सूडान एवं मैक्सिको आदि देशों से आयात किया जाता है।
  3. जापान का अधिकांश धरातल ऊबड़-खाबड़ एवं पर्वतीय है, जिससे नदियाँ प्राकृतिक जल-प्रपातों का निर्माण करती हैं तथा बड़े पैमाने पर जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है। सूती वस्त्र मिलों में जल-विद्युत शक्ति का ही उपयोग किया जाता है।
  4. तटीय भागों में प्राकृतिक पत्तनों का विकास जिससे कपास को आयात करने एवं तैयार वस्त्रों को विदेशों में निर्यात करने की सुविधा रहती है।
  5. जापान के वस्त्र उद्योग में देश में ही बनी आधुनिक मशीनें तथा प्रबन्ध में उच्च क्षमता रखी जाती है। मशीनों के घिसते ही तुरन्त नयी मशीनें बदल दी जाती हैं।
  6. यहाँ स्वचालित करघों का उपयोग किया जाता है तथा छोटे रेशे की कपास को कातने की उपयुक्त मशीनों का आविष्कार कर लिया गया है, जिससे उत्पादन प्रति श्रमिक पाँच गुना हो गया है।
  7. जापान की शीतोष्ण जलवायु आर्द्रता-प्रधान है, जिसमें निर्मित सूती धागा नहीं टूटता।
  8. सूती वस्त्र उद्योग का जापानी अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान होने के कारण इस उद्योग को सरकारी प्रोत्साहन मिलता है।
  9. वस्त्र उद्योग के लिए स्थानीय बाजार एवं निर्यात व्यापार के लिए अफ्रीकी एवं एशियाई देशों बल्कि यहाँ तक कि यूरोपीय, दक्षिणी अमेरिकी एवं ऑस्ट्रेलियाई देशों के बाजार उपलब्ध हैं।

जापान के प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक प्रदेश
Main Cotton Textile Producing States of Japan
जापान के प्रमुख वस्त्रोत्पादक प्रदेश निम्नलिखित हैं –

  1. किन्की प्रदेश – इस प्रदेश में सबसे अधिक सूती वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है। यहाँ जापान का एक-तिहाई सूती वस्त्र तैयार किया जाता है। ओसाका एवं कोबे इस प्रदेश के प्रमुख केन्द्र हैं। ओसाका जापान का मानचेस्टर कहलाता है। अन्य केन्द्रों में किशीवादा प्रमुख है।
  2. क्वाण्टो प्रदेश – जापान में स्थित क्वाण्टो का मैदान प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक प्रदेश है। इस प्रदेश में टोकियो एवं याकोहामा महत्त्वपूर्ण सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  3. नगोया प्रदेश – इस प्रदेश में नगोया नगर के समीपवर्ती भागों में स्थित छोटे-छोटे नगरीय केन्द्रों में सूती वस्त्र की मिलें स्थापित की गयी हैं। मिनोओबारी की खाड़ी के तटीय भागों में भी सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र विकसित हुए हैं। अन्य प्रमुख केन्द्रों में योकोच्ची, हामामात्सू तथ तयोर्हशी आदि महत्त्वपूर्ण हैं।

इस प्रकार जापान ग्राहकों की रुचि का ख्याल कर उनकी माँग के अनुसार सस्ते कपड़े के उत्पादन का प्रयास करता है, जिससे उसे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत, हांगकांग, चीन, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों से प्रतिस्पर्धा लेने में सुगमता रह सके।

(स) रूस का सूती वस्त्र उद्योग
Cotton Textile Industry of Russia

मिलों द्वारा सूती वस्त्र उत्पादन में रूस का विश्व में चौथा स्थान है। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं –

  1. यहाँ कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में कजाकिस्तान तथा जॉर्जिया से प्राप्त होता है, जो पूर्ववर्ती सोवियत संघ के राज्य थे।
  2. यहाँ पर कोयले की विशाल संचित मात्रा है। इसके साथ ही पर्याप्त जल-विद्युत शक्ति का भी, उत्पादन किया जाता है।
  3. रूस में काकेशिया, मध्य एशिया एवं यूरोपीय रूस में सघन जनसंख्या निवास करती है; अतः यहाँ बाजार की पर्याप्त सुविधा रहती है।
  4. सघन जनसंख्या के प्रदेशों से दक्ष एवं पर्याप्त संख्या में श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।
  5. रूस में रेलमार्गों का पर्याप्त विकास किया गया है जिनमें ट्रांस-साइबेरियन रेलवे, ट्रांस- काकेशियन रेलवे, ट्रांस-कैस्पियन रेलवे, यूक्रेन-मास्को-लेनिनग्राद रेलवे, यूराल रेलवे एवं अन्य छोटेछोटे रेलमार्गों के विकसित हो जाने के फलस्वरूप कच्चे माल के क्षेत्रों, उत्पादन क्षेत्रों एवं बाजार क्षेत्रों के मध्य सम्बन्ध स्थापित हो गये हैं।
  6. सूती वस्त्र उद्योग के लिए मशीनों एवं उपकरणों का निर्माण मास्को-तुला एवं यूक्रेन आदि क्षेत्रों में किया जाता है।
  7. रूस में विज्ञान एवं तकनीकी की पर्याप्त प्रगति होने के कारण बहुत से केन्द्रों में नयी सूती मिलों की स्थापना की गयी है।

रूस में सूती वस्त्र उत्पादक क्षेत्र
Cotton Textile Producing Areas in Russia

  1. मास्को-इवानोवो प्रदेश – इस प्रदेश में सूती वस्त्र उद्योग का विकास 18वीं शताब्दी के अन्त में किया गया था। कपास ट्रांस-काकेशिया एवं मध्य एशिया से प्राप्त होती है। सोवियत क्रान्ति (1917) के बाद से यह प्रदेश कच्चे माल (कपास) के उत्पादन में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो गया है। इवानोवो को रूस का मानचेस्टर कहा जाता है। इसके चारों ओर सूती वस्त्र उत्पादक मिलों के नगरीय केन्द्रों का एक घेरा-सा विकसित हो गया है। यारोस्लाव, कोस्त्रोमोव, किनेशमा, शुया, कैमरोव, ओरेखोवो-जुयेवो, मास्को, नोगिन्स्क, पॉवलोवस्की-पोसाद, येगोरयेवस्क, सेरपुखोवु, ग्लुखोवो प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  2. लेनिनग्राड प्रदेश – इस प्रदेश में लेनिनग्राड, नार्वा, तल्लिन तथा बाल्टिक राज्यों में रीगा एवं कौनास प्रमुख वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  3. कालिनिन प्रदेश – मास्को के पश्चिम में इस प्रदेश में कालिनिन, विशनीय, वोलोस्चेक एवं यार्तसेवो प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  4. यूक्रेन प्रदेश – इस प्रदेश में सूत कातने एवं वस्त्र बुनने की मशीनों का निर्माण खेरसन में होता है। खारकोव एवं कीव प्रमुख वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  5. वोल्गा बेसिन – वोल्गा नदी की घाटी में चेवोकसरी, कणीशिन एवं ताम्बोव प्रमुख सूती वस्त्रोत्पादक केन्द्र हैं।
  6. यूराल प्रदेश – यूराल प्रदेश के पूर्व में स्थित चिल्याबिन्स्क प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र
  7. ट्रांस-काकेशिया प्रदेश – गोर्की इस प्रदेश का सबसे बड़ा वस्त्रोत्पादक केन्द्र है। बाकू, किरिवबाद, कुताइसी, तिब्लिसी, लेनिनांकन प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  8. मध्य एशिया – यहाँ पर ताशकन्द, फरगना, बुखारा, लेनिनवाद, फुन्जे, अशखाबाद एवं दुशाम्बे प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।
  9. साइबेरिया – ओमस्क, नोवासिबिस्र्क, बरनोल, ब्रियस्क, कैमरोवकान्स्क, लेनिनस्ककुजनेत्स्क, अल्मा-अत्ता एवं कुस्तनाय प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

रूस केवल अपनी वस्त्र आवश्यकताओं की ही पूर्ति करता है, परन्तु यदि उत्पादन में इसी गति से वृद्धि होती रही तो रूस भविष्य में विश्व का प्रमुख सूती वस्त्र निर्यातक देश बन जाएगा।

(द) ग्रेट ब्रिटेन का सूती वस्त्र उद्योग
Cotton Textile Industry of U.K.

ग्रेट ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात सूती वस्त्र उद्योग से ही हुआ है। 19 वीं शताब्दी में इसने औद्योगिक क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन किया, किन्तु आज ब्रिटेन की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गयी है। सूती वस्त्र के निर्माण में एक समय यह शिखर पर था, परन्तु वर्तमान में यह देश विश्वका केवल 0.45% (27.5 करोड़ वर्ग मी) मिश्रित सूती वस्त्र तैयार करता है। इसे सूती वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में सदैव संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान एवं भारत से प्रतिस्पर्धा लेनी पड़ती है। इस व्यवसाय ने यहाँ की जनसंख्या को आजीविका तथा देश को सुदृढ़ आर्थिक आधार प्रदान किया, इसलिए “सूती वस्त्र उद्योग को ग्रेट ब्रिटेन की रोटी” कहा जाता था।

ग्रेट ब्रिटेन में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारण – यह आश्चर्य की बात है कि ग्रेट ब्रिटेन में कपास पैदा नहीं होती है फिर भी यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का पर्याप्त विकास हुआ है। ग्रेट ब्रिटेन में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं –

  1. समुद्री आर्द्र जलवायु
  2. पर्याप्त कोयला
  3. नदियों में स्वच्छ जल
  4. कुशल श्रमिक
  5. मशीनों की उपलब्धता
  6. रासायनिक पदार्थ
  7. आयात-निर्यात के लिए पत्तनों का विकास
  8. विस्तृत बाजारों की उपलब्धता
  9. सस्ते जल यातायात की सुविधा तथा
  10. तत्कालीन समय में सर्वाधिक उन्नतिशील तकनीकी स्तर।

विश्व स्तर पर सूती वस्त्र उद्योग को आधुनिक मिल प्रणाली पर विकसित करने का श्रेय ब्रिटेन को ही है। सूती वस्त्र उद्योग का सबसे अधिक विकास लंकाशायर क्षेत्र में हुआ है। सूती वस्त्र उद्योग में मानचेस्टर यहाँ का विश्व-प्रसिद्ध सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र है।

यहाँ के मुख्य सूती वस्त्र उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं –
(1) लंकाशायर क्षेत्र – लंकाशायर क्षेत्र ग्रेट ब्रिटेन की महत्त्वपूर्ण तथा सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक क्षेत्र है। इस क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग के लिए नम जलवायु, पर्याप्त कोयला, आयातित कपास, पर्याप्त शक्ति के साधन, नदियों का स्वच्छ जल, पर्याप्त नवीन मशीनें, लंकाशायर का पत्तन, समीप में चैशायर से रासायनिक पदार्थों की उपलब्धता, विस्तृत भूमि, कुशल एवं सस्ते श्रमिक तथा पर्याप्त विदेशी माँग जैसी भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मानचेस्टर इस क्षेत्र का विश्व-प्रसिद्ध सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र है। इस क्षेत्र के अन्य सूती वस्त्र बनाने वाले केन्द्र प्रेस्टन, कालने, मेकलेराफील्ड, एकरिंगटन, डार्विन, नेलसन, बोल्टन, रोशडेल, स्टॉकपोर्ट, ब्लेकबर्न, ओल्डहम, बर्नले, बरी, नाटिंघम तथा लीसेस्टर आदि हैं। यहाँ रँग्राई का कार्य बिंगान, विडनेस व सैण्ट-हैलेन्स में किया जाता है।

(2) ग्लासगो क्षेत्र – इस क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग का विकास क्लाइड नदी की घाटी में विकसित हुआ है। यहाँ की नम समुद्री जलवायु, पर्याप्त शक्ति के साधन एवं सुलभ जल-यातायात ने इस उद्योग के विकास में विशेष योगदान दिया है। यहाँ सूत बनाने का कार्य बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है। इस क्षेत्र में सूती वस्त्र बनाने के प्रमुख केन्द्र ग्लासगो, ब्रेडफोर्ड तथा पैसले हैं। पैसले सूती धागा बनाने का भी प्रमुख केन्द्र है, जब कि ग्लासगो मलमल बनाने के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(3) भावी सम्भावनाएँ – प्रथम विश्व युद्ध के आरम्भ तक ब्रिटेन को संसार के सूती वस्त्र उत्पादक देशों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, परन्तु उसके बाद सूती वस्त्र के उत्पादन में जापान, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जर्मनी और फ्रांस इससे आगे बढ़ गये। भारत, जापान, चीन आदि देशों से कड़े मुकाबले के कारण अब ब्रिटेन का सूती वस्त्र उत्पादन बहुत घट गया है। इस उद्योग के पुनर्विकास की सम्भावनाएँ भी नहीं हैं, क्योंकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था अब व्यापारोन्मुख हो गयी है जिसमें वेस्त्र उद्योग जैसे उपभोक्ता उद्योग के लिए कोई स्थान नहीं है। वैसे भी भारत, चीन तथा जापान के सस्ते वस्त्रों के सामने ब्रिटिश उत्पादों का महत्त्व नहीं रह गया है।

प्रश्न 3
ग्रेट ब्रिटेन में ऊनी वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के कारणों की समीक्षा कीजिए तथा इस.उद्योग के केन्द्रों का विवरण दीजिए।
उत्तर

ग्रेट ब्रिटेन का ऊनी वस्त्र उद्योग
Woollen Textile Industry of U.K.

ग्रेट ब्रिटेन:ऊनी वस्त्र उत्पादन में विश्व भर में प्रसिद्ध है। यहाँ के बने ऊनी वस्त्र विश्व के सभी देशों में पसन्द किये जाते हैं। ऊनी वस्त्रों के उत्पादन में ग्रेट ब्रिटेन का विश्व में तीसरा स्थान है। ब्रिटेन के औद्योगीकरण के साथ-साथ 17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस उद्योग को भी श्रीगणेश हो गया था, परन्तु वास्तविक विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ। यहाँ ऊनी वस्त्रं उद्योग घरेलू एवं कुटीर दोनों ही रूपों में किया जाता है। विश्व के अन्य देशों में ऊनी वस्त्रों का उत्पादन बढ़ जाने से इस उद्योग का ब्रिटेन में ह्रास हुआ है। ब्रिटेन में इस उद्योग को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. कच्चा माल – ग्रेट ब्रिटेन में पिनाईन पर्वत के समीपवर्ती भागों में चरागाहों के विकास के कारण भेड़पालन व्यवसाय अधिक किया जाता है, जिनसे पर्याप्त ऊन प्राप्त हो जाती है। कुछ कच्चा माल ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड एवं अर्जेण्टाइना आदि देशों से भी आयात किया जाता है।
  2. समशीतोष्ण आर्द्र जलवायु – ब्रिटेन की जलवायु शीतल एवं आर्द्रता-प्रधान है। यह जलवायु इस उद्योग के लिए अधिक उपयुक्त है।
  3. कुशल श्रमिकों की प्राप्ति – ऊनी वस्त्र उद्योग ब्रिटेन का अति प्राचीन व्यवसाय है; अतः यहाँ कुशल एवं सस्ते श्रमिक पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हो जाते हैं। सूती वस्त्र उद्योग भी इस उद्योग को श्रम की पूर्ति कराने में सहायक है।
  4. शक्ति-संसाधनों की उपलब्धि – ब्रिटेन में इस उद्योग के लिए शक्ति संसाधनों में पर्याप्त जल-विद्युत शक्ति एवं कोयला उपलब्ध है। यार्कशायर क्षेत्र में पर्याप्त कोयला उपलब्ध हो जाता है, जहाँ ऊनी वस्त्र उद्योग के महत्त्वपूर्ण केन्द्र विकसित हुए हैं।
  5. स्वच्छ जल की आपूर्ति – ब्रिटेन में पिनाइन पर्वत-श्रेणी से प्रवाहित होने वाली नदियों काल्डेर, कोलने एवं आयर से चूनारहित स्वच्छ जल प्राप्त हो जाता है, जिससे ऊन धोने में सुविधा रहती है।
  6. मशीन एवं उपकरणों की सुविधा – ब्रिटेन में लोहा-इस्पात पूर्व से ही प्रगति के पथ पर अग्रसर है; अतः नवीन मशीनें एवं उपकरण सुविधा से उपलब्ध हो जाते हैं। लीड्स में इस उद्योग से सम्बन्धित मशीनों एवं उपकरणों का पर्याप्त मात्रा में उत्पादन किया जाता है।
  7. पर्याप्त पूँजी की सुलभता – ब्रिटेन के पूंजीपतियों ने ऊनी वस्त्र उद्योग की स्थापना में बहुत सहयोग दिया है, क्योंकि सूती वस्त्र उद्योग का उन्हें पर्याप्त अनुभव है। इसके अतिरिक्त सरकारी प्रोत्साहन भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
  8. परिवहन के विकसित साधन – ब्रिटेन की द्वीपीय स्थिति होने के कारण तटीय भागों में प्राकृतिक पत्तनों का पर्याप्त विकास हुआ है, जिससे ऊनी वस्त्रों को निर्यात करने की जल-यातायात की पर्याप्त सुविधा रहती है। देश के भीतरी भागों में रेल एवं सड़क परिवहन का पर्याप्त विकास किया गया है।
  9. पर्याप्त विदेशी माँग – यूरोप महाद्वीप के शीत-प्रधान देशों में ग्रेट ब्रिटेन में निर्मित ऊनी वस्त्रों की क्र्याप्त माँग रहती है। निकटवर्ती भागों में खपत क्षेत्र स्थित होने के कारण ब्रिटेन का यह उद्योग अधिक विकसित हुआ है।

ग्रेट ब्रिटेन में ऊनी वस्त्र उद्योग के क्षेत्र (केन्द्र)
Woollen Textile Producing Areas in U.K.

ऊनी स्त्रों के उत्पादन की दृष्टि से ग्रेट ब्रिटेन का विश्व में तीसरा स्थान है। पिनाइन पर्वत श्रेणी के पूर्वी क्षेत्रों में नदियों की घाटियों में इस उद्योग का विकास अधिक हुआ है। यहाँ प्रतिवर्ष 200 लाख वर्ग मीटर ऊनी वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है। निम्नलिखित क्षेत्र ऊनी वस्त्रों के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं –

(1) वेस्ट राइडिंग क्षेत्र – इस क्षेत्र में ग्रेट ब्रिटेन का तीन-चौथाई से भी अधिक ऊनी व्रस्त्रों का उत्पादन किया जाता है। यार्कशायर प्रदेश में इस उद्योग का विकास अधिक हुआ है। यहाँ कोलने एवं आयर नदियों की घाटियों में ऊनी वस्त्र उत्पादक केन्द्र विकसित हुए हैं। ब्रेडफोर्ड, हैलीफैक्स, बेकफील्ड, हङ्सफील्ड, ड्यूसबरी एवं बाटले प्रमुख ऊनी वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

(2) स्कॉटलैण्ड ट्वीड घाटी क्षेत्र – ग्रेट ब्रिटेन में यह दूसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र स्कॉटलैण्ड में ट्वीड नदी की मध्य घाटी में विस्तृत है। यहाँ भेड़ अधिक पाली जाती हैं; अत: पर्याप्त कच्ची ऊन उपलब्ध हो जाती है। कोयला एवं स्वच्छ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाता है। इस क्षेत्र में उत्तम किस्म का ट्वीड बनाया जाता है। वारविक, सेलकिर्क एवं गेलेशील्ड प्रमुख ऊनी वस्त्र उत्पादकः केन्द्र हैं।

(3) कॉट्सबोल्ड क्षेत्र – इंग्लैण्ड के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में एवन नदी की घाटी में कॉट्सबोल्ड तीसरा महत्त्वपूर्ण ऊनी वस्त्र उत्पादक क्षेत्र है। यहाँ सर्ज एवं कॉट्सवूल का उत्तम कोटि का ऊनी कपड़ा तैयार किया जाता है। स्ट्राउड, ट्राउब्रिज, ब्रेडफोर्ड-ऑन-एवन एवं फ्रोम प्रमुख ऊनी वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। स्ट्राउड सर्ज बनाने के लिए विश्वविख्यात केन्द्र है।

प्रश्न 4
कागज उद्योग के स्थानीयकरण एवं विकास के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए। इस उद्योग में प्रसिद्ध प्रमुख देशों के नाम बताइए। [2010]
या
कागज उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए- [2008, 14]
(अ) स्थानीयकरण के कारण,
(ब) विश्व में इस उद्योग के प्रमुख देश।
या
कागज उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा विश्व में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
टिप्पणी लिखिए-विश्व में कागज उद्योग। (2014, 16)
उत्तर
कागज उद्योग वन उत्पादों पर आधारित सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग है। यदि यह कहा जाए कि वर्तमान सभ्यता कागज की ही देन है तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। आज विश्व के जिस देश में जितने अधिक कागज का उपभोग किया जाता है, वह उतना ही सभ्य एवं उन्नत कहलाता है।

कागज उद्योग के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ
Necessary Geographical Conditions for Paper Industry

कागज उद्योग का स्थानीयकरण निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है –

  1. कच्चे माल की प्राप्ति – कागज उद्योग के लिए कच्चा माल लुग्दी है। कोमल लकड़ी के वन-क्षेत्रों में पर्याप्त लुग्दी उपलब्ध हो सकती है; अतः इन्हीं क्षेत्रों में कागज उद्योग स्थापित किया जा सकता है। वर्तमान समय में भी 80 से 85% कागज का निर्माण लकड़ी की लुग्दी से ही किया जाता है।
  2. कोमल लकड़ी के वनों का होना – कोमल लकड़ी से ही अच्छी लुग्दी प्राप्त हो सकती है। यही कारण है कि कागज उद्योग की स्थापना शीत एवं शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों के समीपवर्ती क्षेत्रों में हुई है। स्पूस, हेमलॉक, फर एवं चीड़ की कोमल लकड़ी इसके लिए उपयुक्त रहती है।
  3. स्वच्छ जल की उपलब्धि – कागज उद्योग के लिए प्रचुर मात्रा में स्वच्छ जल आवश्यक होता है, जिससे लुग्दी एवं लकड़ी के रेशों को साफ किया जाता है।
  4. जल-विद्युत शक्ति का विकास – कागज उद्योग के लिए अधिक शक्ति की आवश्यकता पड़ती है; अतः नदी-घाटियों के समीपवर्ती भागों में इस उद्योग की स्थापना से सस्ती जल-शक्ति पर्थीप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाती है।
  5. सहायक उद्योगों का विकास – इस उद्योग के लिए अनेक रासायनिक पदार्थ; जैसे-कास्टिक सोडा, सोडा ऐश, क्लोरीन, हड्डी का चूरा, चीनी-मिट्टी आदि की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए इन सहायक उद्योगों का विकास कागज उद्योग के समीपवर्ती भागों में ही किया जाना चाहिए, जिससे कागज की उत्पादन लागत सस्ती पड़ती है।
  6. कुशल श्रमिकों की उपलब्धि – कागज उद्योग के लिए पर्याप्त संख्या में कुशल श्रमिकों की सुविधा होनी चाहिए जो सघन जनसंख्या के क्षेत्रों में सुगमता से उपलब्ध हो सकते हैं।
  7. परिवहन के साधनों का विकास – कागज उद्योग के लिए आन्तरिक एवं बाह्य परिवहन के साधनों की आवश्यकता पड़ती है, जिससे माल को लाने एवं ले जाने में सुविधा रह सके।
  8. बाजार की सुविधा – कागज उद्योग के निकटवर्ती क्षेत्रों में सघन जनसंख्या का होना अति आवश्यक है, जिससे तैयार माल की खपत होती रहे। इसके साथ ही इसे विदेशों को निर्यात करने की भी पर्याप्त सुविधाएँ होनी चाहिए।

विश्व में कागज के प्रमुख उत्पादक देश
Main Paper Producing Countries in the World

विश्व में कागज का उत्पादन करने वाले देशों में कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, रूस एवं जापान प्रमुख हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है –
(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का 28.4% कागज का उत्पादन करता है तथा विश्व में प्रथम स्थान पर है। यहाँ 80% कागज रासायनिक लुग्दी से तैयार किया जाता है। इस लुग्दी से उत्तम किस्म का कागज बनाया जाता है। अधिकांश कांगज की मिलें न्यू इंग्लैण्ड, वाशिंगटन एवं ओरेगन राज्यों में स्थित हैं जहाँ कोमल लकड़ी के क्षेत्र विस्तृत हैं। न्यू इंग्लैण्ड राज्य में ही 47 कागज की मिलें हैं। संयुक्त राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग में पर्याप्त जल-विद्युत का उत्पादन कर लिया जाता है। मेसाचुसेट्स, न्यूयॉर्क, विस्कांसिन, मिशीगन, ओहियो तथा पेंसिलवानिया कागज उत्पादन के अन्य। महत्त्वपूर्ण राज्य हैं।

(2) जापान – जापान विश्व का तीसरा बड़ा कागज उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 9.8% कागज का उत्पादन होता है। जापान के होकेडो द्वीप में शंकुल वन पाये जाते हैं जहाँ सुगी, हिकोरी, फर, स्पूस आदि नुकीली पत्ती वाले वन प्रमुख हैं जिनसे लुग्दी तैयार की जाती है। होंशू द्वीप के भीतरी पहाड़ी भागों से भी लुग्दी बनाने के लिए कोमल लकड़ी मिल जाती है। टोकियो-याकोहामा औद्योगिक प्रदेश में शिजूओका एवं शिमिजू; क्यूशू द्वीप में टोकाई औद्योगिक क्षेत्र तथा पूर्वी क्षेत्र में सुरुगाबान क्षेत्र में कागज का उत्पादन सन् 1880 से किया जा रहा है।

(3) कनाडा – कनाडा विश्व का 6.5% कागज उत्पादन करके चौथे स्थान पर है। कनाडा में कोणधारी वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं जिनसे कोमल लकड़ी की प्राप्ति होती है। इन वृक्षों से यान्त्रिक लुग्दी तैयार की जाती है। महान् झीलों का स्वच्छ जल इस उद्योग के लिए उपलब्ध है। इनसे प्रवाहित होने वाली नदियों पर बॉध बनाकर पर्याप्त जलविद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है। ब्रिटिश कोलम्बिया, कनाडियन शील्ड एवं न्यूफाउण्डलैण्ड कागज उद्योग के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, ब्रिटेन एवं पाकिस्तान यहाँ के कागज के प्रमुख ग्राहक हैं।

(4) ब्रिटेन – ब्रिटेन में कागज उद्योग के लिए नार्वे, स्वीडन, कनाडा एवं बाल्टिक सागरतटीय देशों से लुग्दी का आयात किया जाता है। इस देश को कागज उद्योग के लिए नदियों से स्वच्छ जल की पूर्ति, जल-विद्युत शक्ति, पश्चिमी यूरोपीय देशों के उपभोक्ता बाजार की निकटता तथा द्वीपीय स्थिति होने के कारण पत्तनों द्वारा लुग्दी आयात तथा तैयार माल के निर्यात जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कागज. उद्योग के केन्द्रों में केण्ट, रॉशडेल एवं हैम्पशायर प्रमुख हैं।

(5) यूरोपीय देश – यूरोप महाद्वीप में नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, ऑस्ट्रिया तथा जर्मनी में कागज का उत्पादन किया जाता है। अखबारी कागज का उत्पादन सबसे अधिक नार्वे में ओस्लो, फियॉर्ड एवं सक्रान्टन के तटीय भागों में किया जाता है। रूस के यूराल एवं साइबेरिया क्षेत्र कागज उद्योग के प्रमुख क्षेत्र हैं, क्योंकि यहाँ साइबेरिया के कोणधारी वन क्षेत्रों से लुग्दी के लिए कोमल लकड़ी उपलब्ध हो जाती है।

(6) भारत – भारत में बॉस, सवाई घास, रद्दी कागज, चिथड़े तथा चीड़ आदि वृक्षों से कागज बनाया जाता है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा, कर्नाटक, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश प्रमुख कागज-उत्पादक राज्य हैं। यहाँ स्थानीय मॉग से बहुत कम उत्पादन होने के कारण विदेशों से कागज आयात करना पड़ता है। उच्चकोटि का कागज कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान एवं यूरोपीय देशों से आयात किया जाता है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार-निर्यातक देश – कनाडा, नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, जर्मनी, जापान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका।
आयातक देश – भारत, दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश, दक्षिणी अमेरिकी तथा दक्षिणी-पूर्वी यूरोपीय देश।

प्रश्न 5
चीनी उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करते हुए इसके विश्व-वितरण (प्रमुख क्षेत्रों) का वर्णन कीजिए।
या
विश्व में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के लिए उपयुक्त भौगोलिक कारकों का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (2007)
या
चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों का विश्लेषण कीजिए। इसमें विश्व-वितरण एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का उल्लेख कीजिए। (2009, 10)
उत्तर
विश्व में चीनी मानव को शक्ति एवं ऊर्जा प्रदान करने वाला महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वर्तमान समय में यह खाद्य-पदार्थों में आवश्यक हो गयी है। चीनी उद्योग उन्हीं देशों में पनप सका है जहाँ इसके लिए कच्चा माल–गन्ना अथवा चुकन्दर-पर्याप्त मात्रा में उगाया जाता है। उष्ण एवं उपोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में चीनी गन्ने से प्राप्त की जाती है, जब कि शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में चुकन्दर से चीनी का निर्माण किया जाता है। यह उद्योग पूर्णत: कृषि उत्पादन पर निर्भर करता है।

चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के कारण
Reasons for Localisation of Sugar Industry

चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाएँ आवश्यक होती हैं –

  1. कच्चे माल की उपलब्धि – चीनी उद्योग का विकास उन्हीं देशों में अधिक हुआ है जहाँ इसके लिए कच्चे माल के रूप में पर्याप्त गन्ना अथवा चुकन्दर का उत्पादन किया जाता है। भारत, क्यूबा, ब्राजील एवं फिलीपीन्स इसके प्रमुख उत्पादक देश हैं जो गन्ने से चीनी का उत्पादन करते हैं।
  2. सस्ते श्रमिकों की प्राप्ति – चीनी उद्योग के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। अधिकांश गन्ना उत्पादक देशों में सघन जनसंख्या निवास करती है; अत: पर्याप्त एवं कुशल श्रमिक सुगमता से उपलब्ध हो जाते हैं।
  3. परिवहन के साधनों का विस्तार – इस उद्योग के लिए रेल परिवहन उपयुक्त एवं सस्ता पड़ता है। सड़क परिवहन भी आवश्यक है। इसी कारण गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में ही अधिकांश गन्ना-मिलें लगाई गयी हैं।
  4. शक्ति के संसाधन – चीनी उद्योग का विकास उन्हीं क्षेत्रों में होता है, जहाँ पर इस उद्योग के लिए पर्याप्त शक्ति के स्रोत (जैसे-कोयला, जल-विद्युत शक्ति, लकड़ी आदि) उपलब्ध होते हैं।
  5. बाजार की समीपता – जिन प्रदेशों में सघन जनसंख्या निवास करती है, वहीं इस उद्योग का विकास अधिक हुआ है। अन्य देशों की माँग भी इस उद्योग को प्रभावित करती है।
  6. सहायक उद्योगों का विकास – चीनी उद्योग के साथ-साथ सहायक उद्योग (जैसे- गत्ता, कृत्रिम रबड़, एल्कोहॉल, कागज आदि) का विकास किया जाना नितान्त आवश्यक है। इससे चीनी उद्योग के व्यर्थ पदार्थों का उपयोग इन उद्योगों में ही हो जाता है। इससे चीनी का उत्पादन व्यय भी कम हो जाता है।
  7. सरकारी प्रोत्साहन – इस उद्योग के लिए सरकारी प्रोत्साहन, संरक्षण, पर्याप्त पूँजी व्यवस्था, वित्तीय सहायता, निर्यात की सुविधाएँ भी मिलना अति आवश्यक हैं।
  8. मशीनों तथा उपकरणों की आवश्यकता – चीनी उद्योग के लिए पर्याप्त मात्रा में मशीनों तथा उपकरणों की आवश्यकता होती है। चीनी बनाने का कार्य भारी मशीनों द्वारा ही सम्पन्न किया जाता है। जिन देशों में मशीनें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाती हैं, वहाँ चीनी उद्योग सुविधापूर्वक स्थापित हो। जाता है।
  9. पर्याप्त पूँजी – चीनी उद्योग स्थापित करने में पर्याप्त पूँजी की व्यवस्था करनी पड़ती है। पूँजी, पूँजीपतियों द्वारा लगाई जाती है अथवा वित्तीय संस्थानों द्वारा उपलब्ध कराई जाती है। जिन राष्ट्रों में पूँजी पर्याप्त मात्रा में सुलभ हो जाती है, वहाँ चीनी उद्योग का स्थानीयकरण हो जाता है।
  10. अन्य सुविधाएँ – रासायनिक पदार्थों की उपलब्धता, ईंधन, स्वच्छ जल, परिवहन तन्त्र की सुव्यवस्था आदि अन्य कारक भी चीनी उद्योग के स्थानीयकरण में पर्याप्त सहयोग प्रदान करते हैं।

विश्व में गन्ने की चीनी के उत्पादक देश
Countries Producing Sugar from Sugarcane in the World

विश्व में चीनी का उत्पादन व्यावसायिक दृष्टिकोण से गन्ने एवं चुकन्दर से किया जाता है। विगत वर्षों में चीनी के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई है। विश्व में गन्ने द्वारा चीनी उत्पादन करने वाले देशों में ब्राजील, भारत, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, क्यूबा, थाईलैण्ड, मैक्सिको आदि प्रमुख हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है –
(1) ब्राजील – गन्ने द्वारा चीनी उत्पादन में ब्राजील का विश्व में प्रथम स्थान है, जहाँ विश्व का 24% गन्ना पैदा होता है। उत्तर-पूर्वी समुद्रतटीय प्रदेश एवं दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र चीनी के प्रमुख उत्पादक हैं। इस देश की जलवायु गन्ना-उत्पादन के लिए ही अनुकूल है। यहाँ विश्व की 15.2% चीनी का उत्पादन होता है।
(2) भारत – भारत का चीनी उत्पादन में विश्व में द्वितीय स्थान है। यहाँ पर गन्ने से गुड़ भी बड़ी मात्रा में बनाया जाता है। चीनी उत्पादक प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडु हैं। भारत विश्व की लगभग 14% चीनी पैदा करता है।
(3) क्यूबा – चीनी के उत्पादन में क्यूबा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ विश्व का 6.8% से अधिक गन्ने का उत्पादन किया जाता है। गन्ने का उत्पादन बड़े-बड़े फार्मों पर यान्त्रिक ढंग से किया जाता है; अत: चीनी मिलें कृषि-फार्मों के समीप ही स्थापित की गयी हैं।
(4) अन्य उत्पादक देश – चीनी के अन्य उत्पादक देशों में ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, चीन, पाकिस्तान, कोलम्बिया, फिलीपीन्स, दक्षिणी अफ्रीका, अर्जेण्टीना, थाईलैण्ड, हवाई द्वीप, पीरू, मॉरीशस, इण्डोनेशिया एवं वेनेजुएला प्रमुख हैं।

विश्व में चुकन्दर की चीनी के उत्पादक देश
Countries Producing Sugar from Sugarbeets in the World

विश्व में चीनी उत्पादन का दूसरा महत्त्वपूर्ण स्रोत चुकन्दर है। उन्नीसवीं शताब्दी में जब यूरोपीय देशों के सामने चीनी की समस्या आयी तो उन्हें चुकन्दर का आश्रय लेना पड़ा, क्योंकि इन देशों में गन्ना उत्पादन के लिए भौगोलिक दशाएँ अनुकूल नहीं थीं। विश्व में चीनी की कुल मात्रा के उत्पादन के दृष्टिकोण से चुकन्दर से निर्मित चीनी का स्थान लगभग आधा है। चुकन्दर की चीनी के उत्पादन में ‘निम्नलिखित देश प्रमुख स्थान रखते हैं –

  1. रूस – संयुक्त देशों का राष्ट्रकुल विश्व की सर्वाधिक चुकन्दर उत्पन्न करता है तथा यहाँ इससे विश्व की 30% चीनी उत्पन्न की जाती है। प्रमुख उत्पादक क्षेत्र यूक्रेन, पश्चिमी साइबेरिया, कजाकिस्तान खिरगीज एंवं ट्रांस काकेशिया हैं।
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका – चुकन्दर से बनी चीनी उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका का विश्व में दूसरी स्थान है। यहाँ चुकन्दर एवं गन्ना दोनों ही उत्पन्न किये जाते हैं। इसके उपरान्त भी इसे विदेशों से चीनी आयात करनी पड़ती है। चुकन्दर की चीनी के उत्पादक क्षेत्रों में कोलोरेडो; पश्चिम में कन्सास से उत्तर में कनाडा की सीमा तक तथा पश्चिम में वाशिंगटन राज्य मुख्य हैं।
  3. चीन – चीन में चुकन्दर से चीनी के उत्पादक क्षेत्रों में शांसी-शेन्सी का मैदान, जेचवान बेसिन, ह्वांग्हो, यांगटिसीक्यांग एवं सीक्यांग नदियों के बेसिन प्रमुख हैं। चीन को चुकन्दर क़ी चीनी उत्पादन में तीसरा स्थान है।
  4. जर्मनी – चुकन्दर से निर्मित चीनी उत्पादन में जर्मनी का विश्व में चौथा स्थान है। प्रमुख रूप से इसका उत्पादन पश्चिमी जर्मनी में किया जाता है।
  5. अन्य उत्पादक देश – चुकन्दर निर्मित चीनी के अन्य उत्पादक देशों में फ्रांस, इटली. पोलैण्ड, स्पेन, नीदरलैण्डे, रोमानिया, यूगोस्लाविया, ग्रेट ब्रिटेन, हंगरी आदि हैं।

यूरोपीय देशों के अतिरिक्त अर्जेण्टाइना, तुर्की एवं जापान में भी चुकन्दर की चीनी का उत्पादन किया जाता है।

चीनी का विश्व व्यापार
World Trade of Sugar

गन्ने से निर्मित चीनी का विश्व व्यापार लगभग 300 लाख मी टन वार्षिक होता है। विश्व की कुल चीनी का 50% विकासशील देश, 30% विकसित देश तथा 20% भाग कम्युनिस्ट देश उत्पादन करते हैं, जब कि निर्यात मात्रा में 75% भाग विकासशील देशों द्वारा किया जाता है।
गन्ने की चीनी के निर्यातक देशों में ब्राजील, क्यूबा, भारत, फिलीपीन्स, हवाई द्वीप, प्यूर्टोरिको, ऑस्ट्रेलिया, ताईवाने, मॉरीशस एवं मैक्सिको हैं; जबकि आयातक देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, कनाडा, फ्रांस एवं स्विट्जरलैण्ड प्रमुख हैं। पाकिस्तान, मिस्र, ईरान आदि देश अपनी आवश्यकता के अनुसार चीनी का उत्पादन कर लेते हैं। इस प्रकार गन्ने से बनी चीनी का व्यापार चुकन्दर से बनी चीनी से अधिक होता है।

प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व चुकन्दर से निर्मित चीनी के निर्यातक देश जर्मनी, हंगरी एवं नीदरलैण्ड थे तथा आयातक देश ग्रेट ब्रिटेन था, परन्तु गन्ने की चीनी के विश्व व्यापार में आ जाने के कारण अब चुकन्दर की चीनी का व्यापार कम हो गया है, क्योंकि गन्ने की चीनी इससे सस्ती पड़ती है। वर्तमान समय में अधिकांश चुकन्दर की चीनी उत्पादक देश अपने उपभोग के लिए ही चीनी का उत्पादन करते हैं, परन्तु अधिकांश यूरोपीय देश एवं संयुक्त राज्य अमेरिका गन्ने द्वारा निर्मित चीनी का आयात करते हैं। चेक एवं स्लोवाकिया, हंगरी, पोलैण्ड एवं नीदरलैण्ड चुकन्दर से बनी चीनी का निर्यात करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान एवं ब्रिटेन इसके प्रमुख आयातक देश हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जापान में सूती वस्त्रोद्योग स्थानीयकरण के दो प्रमुख कारण बताइए। उत्तर जापान में सूती वस्त्रोद्योग स्थानीयकरण के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. कच्चे माल की सुलभता – कपास के रूप में कच्चा माल चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, मिस्र, सूडान, मैक्सिको आदि देशों से आसानी से प्राप्त हो जाता है।
  2. बड़ी संख्या में सस्ते श्रमिकों की प्राप्ति – इन उद्योगों में कार्य करने के लिए जापान में बड़ी संख्या में सस्ते श्रमिक, जिनमें स्त्रियों व बच्चों की संख्या अधिक रहती है, आसानी से मिल जाते हैं। जापानी श्रमिक दो पारियों में कार्य करते हैं।

प्रश्न 2
कनाडा में कागज उद्योग क्यों विकसित है?
उत्तर
कागज उद्योग की स्थापना के लिए कोमल लकड़ी के वनों का होना आवश्यक है जिनसे लुग्दी बनायी जाती है। इसके अतिरिक्त, स्वच्छ जल, जल-विद्युत शक्ति, रासायनिक पदार्थों की प्राप्ति, परिवहन के साधनों, कुशल श्रमिकों तथा बाजार का होना आवश्यक है। ये सभी आवश्यक भौगोलिक सुविधाएँ कनाडा में उपलब्ध हैं। कनाडा में कोणधारीवृक्ष बहुतायत में मिलते हैं। इनसे यान्त्रिक लुग्दी तैयार की जाती है। यहाँ महान् झीलों का स्वच्छ जल भी उपलब्ध है। नदियों पर बाँध बनाकंरपर्याप्त जल- विद्युत शक्ति भी उत्पन्न की जाती है। इसीलिए ब्रिटिश कोलम्बिया, कनाडियन शील्ड तथा न्यूफाउण्डलैण्ड में कागज उद्योग विकसित हो गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, ब्रिटेन तथा पाकिस्तान कागजं के प्रमुख ग्राहक हैं।

प्रश्न 3
संयुक्त राज्य अमेरिका के महान झील क्षेत्र के उद्योगों के विकास में उस क्षेत्र में प्राप्त खनिजों का योगदान समझाइए।
उत्तर
संयुक्त राज्य अमेरिका के महान झीलों के क्षेत्र में अनेक उद्योगों का विकास हुआ है जिससे यहाँ एक महान औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो गया है। यहाँ अनेक खनिज आधारित उद्योग स्थापित हैं, जिनमें, लोहा-इस्पात उद्योग सबसे महत्त्वपूर्ण आधारभूत उद्योग है। इसी के आधार पर यहाँ भारी इन्जीनियरिंग उद्योग, मोटर उद्योग आदि भी विकसित हो गये हैं। इस औद्योगिक विकास की आधारशिला यहाँ प्राप्त होने वाली लौह धातु है, जो मेसाबी, वरमीलियन, कुयुना, गोजेबिक, मिनोमिनी, मारक्वेंट आदि लौह श्रेणियों के रूप में उपस्थित है। इसके अतिरिक्त निकट ही कोयला भी प्राप्त होता है। इन दो खनिजों के आधार पर ही झील क्षेत्र के औद्योगिक प्रदेश का विकास हुआ है।

प्रश्न 4
सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख चार कारक बताइए।
उत्तर
सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख चार कारक निम्नवत् हैं –

  1. कच्चे माल की सुलभता – सूती वस्त्र के लिए कंपास कच्चा माल है। यह एक हल्का पदार्थ है, जिसका परिवहन सरलता से सम्भव है।
  2. आर्द्र जलवायु – सूती धागा व कपड़ा बनाने के लिए आर्द्र समुद्री जलवायु उपयुक्त रहती है। शुष्क जैलवायु में धागा टूटता है।
  3. पर्याप्त जल की प्राप्ति – सूत की धुलाई, रँगाई, कपड़े की छपाई आदि में स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। प्रायः नदियों व झीलों के किनारे सूती वस्त्र उद्योग स्थापित होते हैं।
  4. शक्ति के साधन – कारखानों को चलाने के लिए कोयला अथवा. सस्ती जल-विद्युत आवश्यक है।

प्रश्न 5
संयुक्त राज्य अमेरिका में लौह-अयस्क उत्पादन के दो प्रमुख क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। (2013)
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत (अ) शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संयुक्त राज्य अमेरिका के किस क्षेत्र में सर्वाधिक लोहा-इस्पात तैयार किया जाता है?
उत्तर
संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो-गैरी क्षेत्र में सर्वाधिक (देश का 35%) लोहा-इस्पात तैयार किया जाता है।

प्रश्न 2
जापान के किन क्षेत्रों में लोहा-इस्पात उद्योग विकसित है? [2010]
या
जापान के लोहा है। इस्पात उद्योग के दो केन्द्रों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर
जापान में तीन प्रमुः क्षेओं में लोहा-इस्पात उद्योग विकसित हैं-

  1. क्यूशू द्वीप पर मौजी क्षेत्र
  2. होंशू द्वीप के पूर्वी भाग में कैमेशी क्षेत्र तथा
  3. होकैडो द्वीप पर मुरारा क्षेत्र।

प्रश्न 3.
जर्मनी में लोहा-इस्पात उद्योग किस क्षेत्र में सर्वाधिक विकसित है?
उत्तर
जर्मनी में लोहा-इस्पात उद्योग ‘रूर बेसिन’ में सर्वाधिक विकसित है।

प्रश्न 4
चीन में लोहा-इस्पात उद्योग सर्वाधिक कहाँ विकसित है?
उत्तर
चीन में लोहा-इस्पात उद्योग मंचूरिया क्षेत्र में सर्वाधिक विकसित है।

प्रश्न 5
विश्व के चार अग्रणी लोहा-इस्पात उत्पादक देशों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. जापान
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका
  3. चीन तथा
  4. रूसा

प्रश्न 6
विश्व में सूती वस्त्र उद्योग के चार अग्रणी देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. चीन
  2. भारत
  3. संयुक्त राज्य अमेरिकां तथा
  4. इटली।

प्रश्न 7
किस नगर को जापान का मानचेस्टर’ कहा जाता है?
उत्तर
ओसाका नगर को ‘जापान का मानचेस्टर’ कहा जाता है।

प्रश्न 8
ग्रेट ब्रिटेन का कौन-सा नगर सूती वस्त्र उद्योग के लिए विख्यात है?
उत्तर
ग्रेट ब्रिटेन में मानचेस्टर नगर सूती वस्त्र उद्योग के लिए विख्यात है।

प्रश्न 9
कागज के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के निर्यातक देशों के नाम बताइए।
उत्तर
कागज के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के निर्यातक देश हैं-

  • कनाडा
  • नार्वे
  • स्वीडन
  • फिनलैण्ड
  • जर्मनी
  • जापान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 10.
जापान सूती वस्त्र उद्योग के लिए कपास कहाँ से आयात करता है?
उत्तर
जापान सूती वस्त्र उद्योग के लिए कपास प्राय: अमेरिका, पाकिस्तान, चीन, पूर्वी अफ्रीका व भारत से आयात करता है।

प्रश्न 11
कृत्रिम रेशम कैसे तैयार की जाती है?
उत्तर
कृत्रिम रेशम अधिकतर स्पूस एवं पाइन लकड़ी से प्राप्त किये गये सेल्यूलोज लकड़ी की लुग्दी और कारखानों की बनी हुई रद्दी कपास से तैयार की जाती है।

प्रश्न 12
कागज का सर्वप्रथम आविष्कार कहाँ हुआ?
उत्तर कागज का सर्वप्रथम आविष्कार 105 ई० में चीन के साइलुन नामक शिल्पी ने फटे-पुराने चीथड़ों से किया।

प्रश्न 13
ऊनी वस्त्रोद्योग में अग्रणी उत्पादक देशों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
ऊनी वस्त्रोद्योग में चीन, इटली, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, यूक्रेन आदि अग्रणी देश हैं।

प्रश्न 14
कागज उद्योग में महत्त्वपूर्ण देशों के नाम बताइए।
उत्तर
कागज उद्योग में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जापान, कनाडा, जर्मनी, फिनलैण्डे, स्वीडन, फ्रांस, इटली, ब्रिटेन तथा कोरिया महत्त्वपूर्ण देश हैं।

प्रश्न 15
चीनी उद्योग में उल्लेखनीय देशों के नाम बताइए।
उत्तर
चीनी उद्योग में ब्राजील, भारत, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैण्ड, मैक्सिको, फ्रांस, जर्मनी, क्यूबा, पाकिस्तान, तुर्की तथा दक्षिण अफ्रीका उल्लेखनीय देश हैं।

प्रश्न 16
जापान में लौह-इस्पात केन्द्रों की स्थापना सागरतटीय क्षेत्रों में क्यों की गयी है?
उत्तर
जापान को लगभग पूरा लौह-अयस्क आयात करना पड़ता है। कच्चे माल को आयात करने की सुविधा के कारण जापान में लौह-इस्पात केन्द्रों की स्थापना सागरतटीय क्षेत्रों में की गयी है।

प्रश्न 17
मंचूरिया क्षेत्र चीन में लौह-इस्पात का प्रमुख उत्पादक केन्द्र क्यों है?
उत्तर
मंचूरिया में उच्चकोटि के कोकिंग कोयले के विशाल भण्डार हैं तथा लौह-अयस्क के अधिकांश भण्डार भी यहीं हैं।

प्रश्न 18
सूती व्यवसाय के केन्द्र बहुधा नदियों और झीलों के किनारे ही क्यों स्थापित किये गये हैं?
उत्तर
सूत की धुलाई, रँगाई और अन्य कई प्रकार के कार्यों के लिए शुद्ध एवं मीठे जल की आवश्यकता पड़ती है। इसी कारण नदियों या झीलों के किनारे सूती व्यवसाय के केन्द्र स्थापित किये गये हैं।

प्रश्न 19
संयुक्त राज्य अमेरिका के किसी एक सूती वस्त्र उत्पादन क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
न्यू इंग्लैण्ड क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादन क्षेत्र है। इस क्षेत्र में रोड्स द्वीप, कनेक्टीकट, मैसाचुसेट्स एवं हैम्पशायर केन्द्र हैं।

प्रश्न 20
नेपानगर का औद्योगिक महत्त्व बताइए। [2007]
उत्तर
नेपानगर कागज उद्योग के लिए विख्यात है।

प्रश्न 21
विश्व के लौह-अयस्क उत्पादन के दो क्षेत्रों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर

  1. रूर बेसिन तथा
  2. मंचूरिया।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
सूती वस्त्र उद्योग के लिए उपयोगी है –
(क) शुष्क जलवायु
(ख) नर्म जलवायु
(ग) (के) और (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) नम जलवायु।

प्रश्न 2
रेशम प्राप्त किया जाता है –
(क) पेड़ों से
(ख) फलों से
(ग) रेशम के कीड़ों से
(घ) इनमें से किसी से नहीं
उत्तर
(ग) रेशम के कीड़ों से।

प्रश्न 3
कागज-लुग्दी उत्पादन में प्रथम स्थान है –
(क) जापान का
(ख) नार्वे का
(ग) कनाडा का
(घ) फ्रांस का
उत्तर
(ग) कनाडा का।

प्रश्न 4
जापान का मानचेस्टर है –
(क) टोकियो
(ख) ओसाका
(ग) नागासाकी
(घ) हिरोशिमा
उत्तर
(ख) ओसाका।

प्रश्न 5
चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है –
(क) भारत
(ख) क्यूबा
(ग) ब्राजील
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर
(ग) ब्राजील।

प्रश्न 6
जापान के सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारक महत्त्वपूर्ण नहीं है?
(क) अनुकूलं जलवायु
(ख) शक्ति संसाधन
(ग) कच्चे माल की उपलब्धता
(घ) उच्च प्रौद्योगिकी
उत्तर
(ग) कच्चे माल की उपलब्धता।

प्रश्न 7
जापान में लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारक महत्त्वपूर्ण नहीं है?
(क) पूर्वारम्भ
(ख) राजकीय प्रोत्साहन
(ग) स्थानीय खनिज सम्पदा
(घ) सामुद्रिक स्थिति
उत्तर
(ग) स्थानीय खनिज सम्पदाँ।

प्रश्न 8
संयुक्त राज्य अमेरिका के सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारक महत्त्वपूर्ण नहीं है?
(क) यू० एस० ए० की कमास मेखला
(ख) अफ्रीका से गुलामों की प्राप्ति
(ग) चीन की विशाल जनसंख्या
(घ) सस्ती जल-शक्ति की आपूर्ति
उत्तर
(क) यू० एस० ए० की कपास मेखला।

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से कौन-सा नगर लौह तथा इस्पात उद्योग के लिए प्रसिद्ध है? [2007]
(क) राउरकेला
(ख) सूरत
(ग) कोलकाता,
(घ) अहमदाबाद
उत्तर
(क) राउरकेला।

प्रश्न 10
निम्नलिखित में से कौन-सा स्थान सूती वस्त्र उद्योग के लिए प्रसिद्ध है? [2008, 15]
(क) बीजिंग।
(ख) मानचेस्टर
(ग) पिट्सबर्ग
(घ) किम्बलें
उत्तर
(ख) मानचेस्टर

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 15 Major Manufacturing Industries

प्रश्न 11
नेपानगर प्रसिद्ध है – [2012]
(क) अखबारी कागज़ के लिए
(ख) देशज उद्योग के लिए
(ग) सीमेण्ट उद्योग के लिए
(घ) चीनी उद्योग के लिए
उत्तर
(क) अखबारी कागज के लिए।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 8 Rural Settlements

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 8
Chapter Name Rural Settlements (ग्रामीण अधिवास)
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 8 Rural Settlements (ग्रामीण अधिवास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
ग्रामीण अधिवास की मुख्य विशेषताएँ बताइए तथा उसके मुख्य प्रकारों का वर्णन कीजिए।
या
अधिवास को परिभाषित कीजिए। [2015]
या
ग्रामीण अधिवासों के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 13, 14]
उत्तर

अधिवास का अर्थ Meaning of Settlement

अधिवास से तात्पर्य घरों के समूह से है जहाँ मानव निवास करता है। घर मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। अधिवास में सभी प्रकार के मकान या भवन सम्मिलित होते हैं, जो मनुष्य के विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। इनमें रिहायशी मकान, कार्यालय, दुकानें, गोदाम, मनोरंजन-गृह आदि सभी सम्मिलित होते हैं।

सांस्कृतिक भू-दृश्यों में मानव अधिवास सबसे प्रमुख है, जो मानव की एक आधारभूत आवश्यकता है। इसके अन्तर्गत सभी प्रकार के मानवीय आश्रयों को सम्मिलित किया जाता है। ये अधिवास प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-ग्रामीण एवं नगरीय। ग्रामीण अधिवास धरातल पर प्राथमिक इकाई है। इन अधिवासों का मुख्य आधार कृषि अर्थात् प्राथमिक व्यवसाय होते हैं। जिन अधिवासों में कृषक लोग निवास करते हैं तथा कृषि एवं पशुपालन द्वारा आजीविका अर्जित करते हैं, उन्हें ग्रामीण अधिवास कहते हैं।” ग्रामीण अधिवासों का आकार छोटा होता है तथा ये प्राकृतिक पर्यावरण की देन होते हैं।

ग्रामीण अधिवास की प्रमुख विशेषताएँ
Main Characteristics of Rural Settlement

ग्रामीण अधिवास की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं –
1. भारतीय गाँव बड़े पुराने हैं। ये भारतीय संस्कृति के मूल आधार माने जाते हैं। महात्मा गांधी के शब्दों में, “यदि गाँव की प्राचीन सभ्यता नष्ट हो गयी तो देश भी अन्ततः नष्ट हो जाएगा। इनका मुख्य उद्यम खेती, पशुपालन एवं अनेक प्रकार के शिल्प-प्रधान कुटीर उद्योग हैं।
2. गाँवों के निर्माण में स्थानीय रूप से मिलने वाली सामग्री का ही उपयोग किया जाता है। ये प्राय: मिट्टी, ईंटों, लकड़ी, बाँस, चूना और घास-फस के बने होते हैं। पत्थर के गाँव भी अनेक क्षेत्रों में मिलते हैं।
3. भारतीय गाँव प्रायः चारों ओर के वृक्षों के कुंजों से घिरे होते हैं। समुद्रतटीय क्षेत्रों में घरों के निकट नारियल, सुपारी, केले और फलों के वृक्ष तथा अन्यत्र पीपल, नीम, शीशम आदि के वृक्ष मिलते हैं।

4. सार्वजनिक उपयोग के लिए कुएँ, तालाब, मन्दिर, सराय या पंचायतघर होता है, जहाँ गाँव से सम्बन्धित कार्यों पर निर्णय लिया जाता है।

5. भारतीय गाँवों में जाति – प्रथा एवं श्रम-विभाजन में स्पष्ट सम्बन्ध दिखाई पड़ता है। वैश्य, ब्राह्मण, नाई, धोबी, कुम्हार, लुहार, जुलाहे एवं शूद्र जाति के लोग सभी अपना कार्य करते हैं तथा उनकी बस्तियाँ अलग-अलग भागों में स्थापित की जाती हैं।

6. गाँव किसी सुनिश्चित योजना के अनुसार नहीं बनाये जाते। इसीलिए इनकी गलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी। और बसावट अत्यन्त अव्यवस्थित होती है। गाँव के बाहर ही कूड़े के ढेर दिखाई पड़ते हैं तथा शौचालयों का अभाव होता है। गाँव के मध्यवर्ती भाग में प्राय: उच्च कुल वाले मनुष्यों के घर बने रहते थे। वैसे सम्पूर्ण गाँव में पारस्परिक सहयोग, भाईचारा एवं दुःख-सुख में आपस में सहायता की विशेषता पायी जाती है। यहाँ कट्टर जातिवाद या सम्प्रदायवाद को पूर्णत: अभाव पाया जाता है।

7. कृषकों के घरों के आँगन में ही या उससे संलग्न भाग में पशुओं के लिए बाड़ा, चारा, औजार आदि रखने का स्थान होता है। दीवारों पर गोबर के कण्डे आदि सूखने को लगा दिये जाते हैं।

8. गाँव में ही प्रायः सभी आवश्यकता की वस्तुएँ महाजनों, छोटे फुटकर व्यापारियों द्वारा उपलब्ध करा दी जाती हैं; अत: गाँव अधिकांशत: स्वावलम्बी होते हैं। केवल नमक, कपड़ा, दियासलाई, कैरोसीन, सीमेण्ट आदि के लिए निकटवर्ती मण्डियों/बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है।

9. गाँव के अधिकांश निवासी निरक्षर, अज्ञानी एवं रूढ़िवादी होते हैं, जो नयी उत्पादन प्रणाली को बिना सन्तुष्ट हुए एकदम ही नहीं अपना लेते। प्रायः सभी परम्परा से एक ही प्रकार के कार्यों में लगे रहते हैं।

10. अब भारतीय गाँवों में तेजी से परिवर्तन आ रहा है। शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ नयी तकनीक, नये धन्धे एवं व्यावसायिक उत्पादन की मनोवृत्ति बढ़ने लगी है। अब गाँवों में भी 40 से 50 प्रतिशत घर सीमेण्ट, चूना-पत्थर व नयी तकनीक से आकर्षक ढंग से बनाये जाते हैं। यहाँ से घी, दूध, सब्जी, शिल्प की वस्तुएँ नगरों को भेजी जाती हैं एवं गाँवों से रोजगार हेतु नगरों की ओर पलायन में भी तेजी से वृद्धि होती जा रही है।

मानवीय अधिवास का वर्गीकरण
Classification of Human Settlement

मानवीय अधिवासों का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार से किया जाता है, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं –

1. स्थिति के अनुसार – स्थिति के अनुसार मानवीय बस्तियाँ, मैदानी, पठारी, पर्वतीय, झीलतटीय, समुद्रतटीय, नदीतटीय, वन प्रदेशीय, मरुस्थलीय आदि होती हैं।
2. घरों के बीच की दूरी के अनुसार – घरों के बीच की दूरियों के अनुसार एकाकी, बिखरी हुई या सघन बस्तियाँ होती हैं।
3. समय के अनुसार – समय के विचार से अस्थायी, मौसमी एवं स्थायी बस्तियाँ होती हैं।

4. व्यवसाय के अनुसार – बस्तियों में निवास करने वाले व्यक्तियों के विभिन्न व्यवसायों के आधार पर बस्तियाँ कृषि तथा पशुचारण से सम्बन्धित ग्रामीण बस्तियाँ कहलाती हैं। निर्माण-उद्योग, परिवहन तथा व्यापार से सम्बन्धित बस्तियों को नगरीय बस्तियों के नाम से पुकारा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन तथा ऑस्ट्रेलिया आदि की ग्रामीण बस्तियों के निवासी कृषि एवं व्यापार आदि कार्य एक-साथ करते हैं, ऐसी ग्रामीण बस्तियों को ग्रागर केन्द्र’ (शहरी-ग्रामीण केन्द्र) (Rural-Urban) का नाम दिया गया है।

5. कार्यों के अनुसार – कार्यों के अनुसार कृषि, गाँव, पशुचारक झोंपड़ियाँ, मछुआरों के गाँव आदि ग्रामीण बस्तियाँ होती हैं, जबकि नगरीय बस्तियाँ निर्माण-औद्योगिक, व्यापारिक-प्रशासनिक आदि कार्य करने वाली होती हैं।

6. आकार के अनुसार – आकार के आधार पर छोटी-से-छोटी बस्ती एक घर की होती है। कृषकों के खेतों से अलग बसे घरों को कृषक-गृह या होमस्टेड (Homestead) या फार्मस्टेड (Farmstead) कहते हैं। आठ-दस परिवारों के घर रखने वाली बस्ती को पुरवा, नंगला, माजरा या पल्ली कहते हैं। पशुचारक या वनवासी लोगों की अस्थायी बस्ती डेरे’ कहलाती है। इनसे बड़ी बस्ती गाँव होती है। गाँव से बड़ी बस्ती कस्बा तथा नगर होते हैं। नगर भी जनसंख्या के आकार के आधार पर विभिन्न प्रकार के होते हैं।

7. आकृति के अनुसार – रेखीय, वृत्ताकार, अरीय, त्रिभुजाकार, ब्लॉक, तीर, तारा, मधुछत्ता, सीढ़ी, पंखा एवं तटीय प्रतिरूप, आकृति के अनुसार बस्तियों के मुख्य प्रकार होते हैं।

8. अवस्था के अनुसार – ये बस्तियों के विकास की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं तथा उनके आकार एवं कार्यों में परिवर्तन होते रहते हैं। ग्रिफिथ टेलर के अनुसार बस्तियों की, विशेष रूप से नगरीय बस्तियों की, 7 अवस्थाएँ होती हैं-

  1. पूर्व-शैशवावस्था
  2. शैशवावस्था
  3. बाल्यावस्था
  4. किशोरावस्था
  5. प्रौढ़ावस्था
  6. उत्तर-प्रौढ़ावस्था एवं
  7. वृद्धावस्था।

अधिवासों के प्रकार
Types of Settlement

मानवीय अधिवास चार प्रकार के होते हैं। इन प्रकारों को किसी बस्ती में मकानों या आश्रयों या झोंपड़ियों आदि की पारस्परिक दूरी के आधार पर निश्चित किया जाता है –
1. प्रकीर्ण अधिवास Dispersed Settlement
प्रकीर्ण अधिवास को एकाकी अधिवास भी कहते हैं। ऐसे अधिवासों का विकास कृषि-क्षेत्रों या प्राथमिक व्यवसाय वाले भागों में हुआ है। ये अधिवास पगडण्डियों या रास्तों द्वारा अलग-अलग बिखरे हुए होने के कारण, एक-दूसरे से तथा खेतों से जुड़े होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रकीर्ण अधिवास अधिक पाये जाते हैं, जिन्हें ‘कृषक-गृह’ (Farmstead) कहते हैं। इसी प्रकार के अधिवास कनाडा, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड में भी विकसित हुए हैं। इन अधिवासों की स्थापना प्राचीन काल में शिकारी, मछुआरों, पशुपालकों ने अपने कार्य-क्षेत्र के निकट की थी। यूरोप में खेतों का उत्पादन बढ़ाने तथा नगरों के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से ऐसे अधिवासों की स्थापना की गयी है। प्रकीर्ण अधिवास अधिकांशतः कृषि-प्रधान देशों में पाये जाते हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों, शुष्क प्रदेशों तथा दलदली भूमि वाले क्षेत्रों में भी प्रकीर्ण अधिवास ही निर्मित किये जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत होने के कारण ढालू सतहों पर प्रकीर्ण घर या आवास अधिक बनाये जाते हैं। पशुपालकों के घर भी पशुओं के बाड़ों के निकट ही स्थापित किये जाते हैं।

2. सघन अधिवास Compact Settlement
जिन अधिवासों में बस्ती के मकान या झोंपड़ियाँ एक-दूसरे के साथ-साथ सटी हुई होती हैं, उन्हें सघन या एकत्रित अधिवास कहते हैं। कुछ विद्वान् इन्हें संकेन्द्रित या पुंजित अधिवास के नाम से भी पुकारते हैं। इस प्रकार के अधिवासों के घर एक-दूसरे से सटकर बने होने के कारण एक ही सामाजिक इकाई का अंग प्रतीत होते हैं। इन अधिवासों के मध्य सँकरी एवं तंग गलियाँ होती हैं। संयुक्त बस्तियों की गलियाँ एवं सड़कें शरीर की रक्तवाहिनी धमनियों के समान बस्ती में फैली होती हैं। ये गलियाँ अधिवासों के केन्द्र या चौराहे से सम्बन्धित होती हैं तथा चारों ओर फैली रहती हैं। सामूहिक अधिवास किसी जलाशय या तालाब के आस-पास बनाये जाते हैं।

इन अधिवासों के निर्माण में स्थानीय रूप से उपलब्ध भवन-निर्माण सामग्री; जैसे-ईंट, गारा, फूस, पत्थर तथा लकड़ियों आदि का प्रयोग किया जाता है। भारतीय ग्रामों में सामूहिक अधिवास ही अधिक पाये जाते हैं। सामूहिक अधिवास अनियोजित ढंग से अकुशल कारीगरों एवं श्रमिकों द्वारा बिना किसी योजना के बनाये जाते हैं, परन्तु ये आवास स्थायी तथा स्वावलम्बी होते हैं। इस प्रकार सघन आवासों से निर्मित बस्तियों के 2 से 4 तक पुरवे या नगले या पल्ली भी हो सकते हैं। भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत सामूहिक अधिवास ही रहे हैं। मिस्र, चीन, अरब तथा भारत में विकसित प्राचीन सभ्यता के कारण इन देशों में सघन अधिवास ही देखने को मिलते हैं। वर्तमान समय में कृषि-कार्यों के सम्पादन, पेयजल की सुविधा तथा अन्य सामाजिक सुविधाओं की प्राप्ति के कारण सामूहिक अधिवास स्थापित किये जाते हैं। नगला या पुरवा भी सामूहिक अधिवास का एक अनुपम उदाहरण है।

3. संयुक्त अधिवास Composite Settlement
संयुक्त अधिवास से तात्पर्य ऐसे अधिवासों से है जहाँ दो अधिवास एक साथ जुड़ जाते हैं तथा देखने पर एक ही अधिवास के अंग प्रतीत होते हैं। भारत में ऐसे अनेक अधिवासों के उदाहरण हैं; जैसे- मेरठ में मीतली-गोरीपुर, बागपत में महाबतपुर-बावली तथा मुजफ्फरनगर में जीराबाद-छरौली आदि।

4. अपखण्डित अधिवास Fragmented Settlement
ये ऐसे अधिवास होते हैं जिनका अलग-अलग निवासगृह एक ही बस्ती के अन्दर एक-दूसरे के निकट बसे हुए होते हैं। भारत में पश्चिम बंगाल राज्य में इसी प्रकार के अधिवास पाये जाते हैं। इनके निवासगृह एक-दूसरे से अलग होते हुए भी, सब गृह मिलकर एक सामूहिक अधिवास की रचना करते हैं। बंगाल डेल्टा के समस्त गृहों में पारस्परिक सम्बन्ध होता है। उत्तर प्रदेश राज्य की दून घाटी में भी इसी प्रकार के अधिवास देखे जा सकते हैं।

प्रश्न 2
ग्रामीण अधिवासों के प्रमुख प्रतिरूपों का विवरण दीजिए। [2007, 09, 10, 12, 14]
या
ग्रामीण अधिवासों के प्रारूपों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर
ग्रामीण अधिवासों के प्रतिरूप Pattern of Rural Settlement
प्रतिरूप से तात्पर्य बस्ती के बसाव की आकृति अथवा बाह्य विस्तार से है। अधिवासों के प्रतिरूप बस्तियों की आकृति के अनुसार होते हैं। इनको मकानों एवं मार्गों की स्थिति के क्रम और व्यवस्था के आधार पर निश्चित किया जाता है। ग्रामीण बस्तियों के मुख्य प्रतिरूप निम्नलिखित हैं –
1. रेखीय प्रतिरूप (Linear Pattern) – किसी सड़क या नदी या नहर के किनारे-किनारे बसे मकानों की बस्तियाँ रेखीय प्रतिरूप को प्रदर्शित करती हैं। इसे रिबन प्रतिरूप या डोरी प्रतिरूप भी कहा जाता है।
2. चौक-पट्टी प्रतिरूप (Checker-board Pattern) – मैदानी भागों में जो गाँव दो मार्गों के मिलन बिन्दु या क्रॉस पर बसने प्रारम्भ होते हैं, उन गाँवों की गलियाँ मार्गों के साथ मेल खाती हुई आयताकार प्रतिरूप में बनने लगती हैं, जो परस्पर लम्बवत् होती हैं। ऐसी ग्रामीण बस्तियाँ चौक-पट्टी प्रतिरूप में विकसित होती हैं।

3. अरीय प्रतिरूप (Radial Pattern) – भारतीय गाँवों का यह एक प्रमुख प्रतिरूप है। इस प्रतिरूप में गाँव में कई ओर से मार्ग आकर मिलते हैं या उस गाँव से बाहर अन्य गाँवों के लिए कई दिशाओं को मार्ग जाते हैं। गाँव में जो चौराहा होता है, वहाँ विकसित त्रिज्याकार मार्गों पर घर बसे हुए होते हैं। चीन, भारत तथा पाकिस्तान में गाँवों की लगभग 35% संख्या इस प्रकार के अरीय प्रतिरूप ग्रामों की होती है। भारत के तमिलनाडु राज्य में यही प्रतिरूप बस्तियों का अधिक दिखाई पड़ता है।

4. त्रिभुजाकार प्रतिरूप (Triangular Pattern) – इस प्रकार के गाँव उन स्थानों पर होते हैं, जहाँ कोई नहर या सड़क, दूसरी नहर या सड़क से जाकर मिले, परन्तु एक-दूसरे को पार न कर सके। ऐसे गाँवों को नहर के या सड़क के पार जाकर बसने के बजाय एक ओर फैलते रहने की सुविधा होती है। नहरों या सड़कों के द्वारा त्रिभुज की दो भुजाएँ बन जाती हैं तथा त्रिभुज के आधार की ओर खुली भूमि में बस्ती फैलती जाती है, जिसे त्रिभुजाकार प्रतिरूप कहा जाता है।

5. वृत्ताकार प्रतिरूप (Circular Pattern) – इस प्रकार के गाँव किसी वृत्ताकार झील के किनारे-किनारे बसे होते हैं। इनमें मकान एक-दूसरे से सटे होते हैं। किसी केन्द्रीय मुख्य आवास के चारों ओर या किसी प्रमुख वृक्ष अथवा तालाब के चारों ओर बसा गाँव भी वृत्ताकार होता है। ऐसी बस्तियों के निम्नलिखित दो भेद होते हैं –

  1. नाभिक बस्ती, जिसके केन्द्र में मुख्य आवास होता है।
  2. नीहारिकीय बस्ती, जिसके केन्द्र में कोई तालाब या पंचायती चबूतरा या वट वृक्ष आदि होता। है, जहाँ गाँव के लोग आकर किसी मेले, उत्सव, सभा आदि के लिए एकत्र होते हैं।

6. तीर प्रतिरूप (Arrow Pattern) – इस प्रकार के गाँव किसी अन्तरीप के सिरे पर या नुकीले मोड़ पर बसे होते हैं। इनके अग्रभाग में मकानों की संख्या कम और पृष्ठ भाग में बढ़ती जाती है। दक्षिणी भारत के तटीय भागों में ऐसी बस्तियाँ अधिक देखने को मिलती हैं।
7. तारा प्रतिरूप (Star Pattern) – इस प्रकार के गाँव आरम्भ में अरीय अर्थात् त्रिज्या प्रतिरूप होते हैं तथा बाद में बाहर की ओर जाने वाली सड़कों पर मकान बसते चले जाते हैं। त्रिज्या के बाहर की ओर जाने वाले मार्गों पर आगे को फैलते मकान बनने के बाद बस्ती तारा प्रतिरूप में बदल जाती है।

8. अनियमित या अनाकार प्रतिरूप (Irregular or Amorphous Pattern) – ये इस प्रकार की बस्तियाँ हैं जो किन्हीं मार्गों के निर्माण से पूर्व ही बस गयी थीं। यहाँ पर सभी मकान अपनी सुविधानुसार बस गये थे। बाद में गलियों और मार्गों के बनने पर गाँव की आकृति अनियमित रूप से निर्मित हो गयी। दक्षिणी चीन, भारत एवं पाकिस्तान में इसी प्रकार की बस्तियाँ अधिक विकसित मिलती हैं।

9. शू-स्ट्रिग प्रतिरूप (Shoe-String Pattern) – यह बस्ती किसी नदी के प्राकृतिक पुल के बाँध पर या समुद्रतटीय कूट पर बसी हुई होती है। इनमें कूट शिखर पर बनी हुई सड़क के किसी ओर मकान बसे होते हैं। जापान में बाढ़ के मैदानों में ऊँचे उठे हुए भागों में इसी प्रतिरूप की बस्तियाँ विकसित मिलती हैं।

10. पंखा प्रतिरूप (Fan Pattern) – इस प्रतिरूप की बस्तियाँ नदियों के डेल्टाओं में मिलती हैं। महानदी,गोवरी एवं कृष्णा नदियों के डेल्टाओं में इसी प्रकार की बस्तियाँ विकसित हैं। हिमालय के पर्वतपदीय प्रदेशों में भी जहाँ-जहाँ जलोढ़ पंख हैं, वहाँ बसी बस्तियों की आकृतियाँ इसी प्रतिरूप में विकसित हैं।

11. सीढी प्रतिरूप (Terrace Pattern) – इस प्रकार के गाँव पर्वतीय ढालों पर बसे होते हैं। इनमें मकान सटे हुए अथवा दूर-दूर दोनों ही प्रकार से बने हैं जो ढाल के अनुसार विभिन्न ऊँचाइयों पर निर्मित हुए हैं। इनमें मकानों की पंक्तियाँ सीढ़ीनुमा होती हैं, क्योंकि ये मकान कई स्तर के होते हैं। हिमालय, आल्प्स, रॉकी, एण्डीज आदि पर्वतीय क्षेत्रों में इसी प्रकार के मकान बने होते हैं।

12. चौकोर प्रतिरूप (Block Pattern) – इस प्रकार की बस्तियों के प्रतिरूप मरुस्थलों या अर्द्ध-मरुस्थलों में मिलते हैं। इनमें मकान बहुत, ऊँचे-ऊँचे होते हैं। कहीं-कहीं गाँव के बाहर चहारदीवारी भी होती है। इन मकानों की ऊँचाई का प्रमुख कारण यह है कि उन्हें रेत के तूफानों, चोरों या डाकुओं एवं शत्रुओं से सुरक्षित रखा जा सकता है।

13. मधुछत्ता प्रतिरूप (Bee-hive Pattern) – दक्षिणी अफ्रीका के जुलू आदिवासी गुम्बदनुमा झोंपड़ियों के गाँव बनाते हैं। भारत में टोडा आदिवासी जनजातियों के लोग गुम्बदनुमा गाँव बनाते हैं। आन्ध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में मछुआरे भी ऐसी ही बस्तियाँ बनाते हैं।

14. अर्द्ध-वृत्ताकार प्रतिरूप (Semi-circular Pattern) – मकड़ी-जाल तथा टेढ़ा-मेढ़ा आदि प्रतिरूप की ग्रामीण बस्तियाँ बहुत-से प्रदेशों में मिलती हैं।
15. अन्य प्रतिरूप (Other Patterns) – नदियों के तटों पर बसी हुई बस्तियाँ प्रायः अर्द्धवृत्ताकार प्रतिरूप में विकसित होती हैं। भारत में गंगा, यमुना, गोमती, घाघरा, कोसी, सोन आदि नदियों के तटों पर बसे गाँव इसी प्रतिरूप में निर्मित हुए हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मानव अधिवास के प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2008, 10]
उत्तर
मानव अधिवासों को दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जाता है- ग्रामीण तथा नगरीय। ग्रामीण अधिवास वे हैं जिनकी अधिकांश जनसंख्या कृषि या इससे सम्बन्धित प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न रहती है। ग्रामीण अधिवास स्थानीय रूप से उपलब्ध निर्माण सामग्री से बनाये जाते हैं। इन अधिवासों के मकान कच्चे तथा पक्के दो प्रकार के होते हैं। ग्रामीण अधिवासों में प्रायः एक मंजिले मकान होते हैं। ये अधिवास एकाकी, सघन या विकीर्ण (बिखरे हुए) हो सकते हैं।
नगरीय अधिवासों की अधिकांश जनसंख्या कृष्येतर कार्यों (द्वितीयक तथा तृतीयक व्यवसायों) में संलग्न रहती है।
ये अधिवास सघन होते हैं। इनके मकान प्राय: बहुमंजिले होते हैं। इन अधिवासों के अनेक प्रतिरूप विकसित होते हैं।

प्रश्न 2
ग्रामीण तथा नगरीय अधिवासों में अन्तर का प्रमुख आधार क्या है? [2007, 08]
या
ग्रामीण एवं नगरीय अधिवासों में विभेद कीजिए। [2011, 12, 13, 15, 16]
उत्तर
ग्रामीण एवं नगरीय अधिवासों में अन्तर का प्रमुख आधार जनसंख्या की सघनता तथा व्यवसाय है। ग्रामीण अधिवास छोटे आकार (कम जनसंख्या) के होते हैं, जब कि नगरीय अधिवासों में सघन आबादी पायी जाती है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण अधिवासों की अधिकांश आबादी कृषि तथा इससे सम्बन्धित व्यवसायों (जैसे- पशुपालन आदि प्राथमिक व्यवसाय) में संलग्न रहती है, जब कि नगरीय अधिवासों की आबादी गैर-कृषि कार्यों (जैसे-उद्योग, व्यापार, सेवा-कार्य आदि) में संलग्न रहती है।

प्रश्न 3
ग्रामीण अधिवासों के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2014, 16]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत ‘अधिवासों के प्रकार’ शीर्षक देखें।

प्रश्न 4
भारत के ग्रामीण अधिवासों की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। [2014, 15]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत ग्रामीण अधिवास की प्रमुख विशेषताएँ’ शीर्षक देखें।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 8 Rural Settlements

प्रश्न 5
ग्रामीण बस्तियों के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 11]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 के अन्तर्गत ग्रामीण अधिवासों के प्रतिरूप’ शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
ग्रामीण अधिवास से आप क्या समझते हैं? [2009]
उत्तर
ग्रामीण अधिवास से तात्पर्य उस अधिवास से है, जिनके अधिकांश निवासी अपने जीवनयापन के लिए भूमि के दोहन (कृषि एवं पशुपालन) पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 2
वृत्तीय प्रतिरूप से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
किसी पहाड़ी या झील के चारों ओर बसी हुई बस्तियाँ वृत्ताकार रूप में बसी होती हैं; जैसे- कुमाऊँ क्षेत्र में नैनी झील के चारों ओर बसा हुआ पहाड़ी शहर नैनीताल।

प्रश्न 3
अधिवास के दो प्रमुख प्रकार बताइए। [2009, 14]
उत्तर
अधिवास के दो प्रमुख प्रकार हैं-

  1. ग्रामीण तथा
  2. नगरीकरण।

प्रश्न 4
अधिवास को परिभाषित कीजिए। [2015, 16]
उत्तर
मनुष्य की तीन प्राथमिक आवश्यकताएँ भोजन, वस्त्र तथा मकान हैं। मकानों के समूह को बस्तियों अथवा अधिवास कहा जाता है। अधिवास मनुष्य के सांस्कृतिक वातावरण के अभिन्न अंग हैं। जिनका निर्माण मनुष्य अपने प्राकृतिक वातावरण के अनुसार करता है। बूंश के अनुसार, ‘मानवीय अधिवास पृथ्वी के धरातल पर होने वाली मानवीय क्रियाओं व रचनाओं में सबसे अधिक स्पष्ट, महत्त्वपूर्ण तथा ठोस रचना है।”

मानव अधिवास का अर्थ मकानों का समूह है। इसके अन्तर्गत मनुष्य के निवास-गृह, मकान, आश्रय, भवन आदि सभी प्रकार के आश्रय सम्मिलित हैं। इनमें झोंपड़ी या छप्पर से लेकर, मिट्टी, लकड़ी, ईंट आदि के बने घर तथा सीमेण्ट, कंक्रीट, पत्थर, लोहे आदि से निर्मित भव्य इमारत, अट्टालिका अथवा किला सभी सम्मिलित किए जाते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
जहाँ चारों ओर से अनेक मार्ग आकर मिलते हों तो इनके सहारे बसे बस्ती के प्रारूप को कहते हैं –
(क) त्रिभुजाकार प्रतिरूप
(ख) पंखा प्रतिरूप
(ग) सोपान प्रतिरूप
(घ) अरीय प्रतिरूप
उत्तर
(घ) अरीय प्रतिरूप।

प्रश्न 2
हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में किस प्रकार के अधिवास विकसित हुए हैं?
(क) सीढ़ी प्रतिरूप
(ख) रेखीय प्रतिरूप
(ग) पंखां प्रतिरूप
(घ) तीर प्रतिरूपे
उत्तर
(क) सीढ़ी प्रतिरूप।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 8 Rural Settlements

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से कौन ग्रामीण अधिवास का प्रतिरूप है?
(क) संहत
(ख) अर्द्ध-संहत
(ग) प्रकीर्ण
(घ) रेखीय
उत्तर
(घ) रेखीय।

प्रश्न 4
किसी झील के चारों ओर बसा गाँव किस प्रतिरूप में आयेगा?
(क) अरीय
(ख) नीहारिकीय
(ग) नाभिक
(घ) तारा
उत्तर
(ख) नीहारिकीय।

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UP Board Solutions for Class 12 English Translation Chapter 3 Parts of Speech

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject English Translation
Chapter Name Parts of Speech
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 English Translation Chapter 3 Parts of Speech

Exercise 1

  1. I hope to pass in the examination this year.
  2. Nobody would like to die.
  3. This is not the time to play cards.
  4. Smt Indira Gandhi was fit to be praised.
  5. I compelled him to sleep.
  6. He repented going to cinema.
  7. These shops are to be let.
  8. His desire is to be a minister.
  9. He gave me a novel to read.
  10. He went to Delhi to see the Red Fort,
  11. Does to seem to be a wise man?
  12. He went to the station to see off his guests.
  13. I am too careful to be deceived.
  14. He will go to the market to buy fruits.
  15. To deceive anybody is sin.

Exercise 2

  1. Keep your expenses within your income.
  2. A bad servant quarrels with his master.
  3. The teacher will come before 8.
  4. Lend me your chemistry book for ten days.
  5. Who is sleeping on the roof?
  6. I had met the prime minister one month ago.
  7. The lion was killed by the hunter.
  8. The chief guest distributed sweets among all the boys.
  9. Can you jump over this wall ?
  10. Our examination starts on 15th April.
  11. The police was running after the thief.
  12. My friend was sitting beside me.
  13. My father lives in Kolkata.
  14. Why did you awake at midnight?
  15. These books were torn by the monkeys.
  16. India became free in 1947.
  17. The bridge over the canal is very weak.
  18. I have been teaching in this school for 18 years.
  19. By whom was this slate broken ?
  20. How many monkeys jumped on the roof?

Exercise 3

  1. Sita was kidnapped by Ravana.
  2. We hear with our ears.
  3. You cannot see without spectacles.
  4. The terrorists came here by car.
  5. I save money by travelling in the bus.
  6. I have sent all the invitations by post.
  7. This song has been sung by Lata Mangeshkar.
  8. The hunter killed many birds with his gun.
  9. We can kill a snake with a stick.
  10. My father goes to his office by car.
  11. I saw lunar eclipse by telescope.
  12. I was taught by Mr. Sharma.
  13. I went to Vaishno Devi on foot.
  14. He goes to his school on his scooter.
  15. I prefer to go by sea.

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UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 8 Application of Integrals

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 8 Application of Integrals (समाकलनों के अनुप्रयोग) are part of UP Board Solutions for Class 12 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 8 Application of Integrals (समाकलनों के अनुप्रयोग)

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Maths
Chapter Chapter 8
Chapter Name Application of Integrals
Exercise Ex 8.1, Ex 8.2
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 8 Application of Integrals

प्रश्नावली 8.1

प्रश्न 1.
वक्र y² = x, रेखाओं x = 1,y = 4 एवं x-अक्ष से धिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
अभीष्ट क्षेत्रफल
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प्रश्न 2.
प्रथम चतुर्थांश में वक्र y² = 9x, x = 2 x = 4 एवं x-अक्ष से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
अभीष्ट क्षेत्रफल
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प्रश्न 3.
प्रथम चतुर्थांश में x² = 4y, y = 2 y = 4 एवं y-अक्ष से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया हुआ वक्र x² = 4y, y-अक्ष के प्रति सममित है। तथा हमें प्रथम चतुर्थांश में क्षेत्रफल ज्ञात करना
∴ अभीष्ट क्षेत्रफल = क्षेत्रफल ABCDA
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प्रश्न 4
दीर्घवृत्त [latex ]\frac { { x }^{ 2 } }{ 16 } +\frac { { y }^{ 2 } }{ 9 } =1[/latex] से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
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प्रश्न 5.
दीर्घवृत्त [latex ]\frac { { x }^{ 2 } }{ 4 } +\frac { { y }^{ 2 } }{ 9 } =1[/latex] से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, दीर्घवृत्त का समीकरण
[latex ]\frac { { x }^{ 2 } }{ 4 } +\frac { { y }^{ 2 } }{ 9 } =1[/latex]
∵9 > 4
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प्रश्न 6.
प्रथम चतुर्थांश में वृत्त x² + y² = 4, रेखा x = √3 y एवं x-अक्ष द्वारा घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिए गए वृत्त का समीकरण x² + y² = 4 है जिसका केन्द्र (0, 0) और त्रिज्या 2 के समान
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प्रश्न 7.
छेदक रेखा [latex ]x=\frac { a }{ \sqrt { 2 } } [/latex] द्वारा वृत्त x² + y² = a² के छोटे भाग का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए
हल-
अभीष्ट क्षेत्रफल = 2 (क्षेत्रफल MAPM)
(क्योंकि वृत्त x-अक्ष के प्रति सममित है)
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प्रश्न 8.
यदि वक्र x = y² एवं रेखा x = 4 से घिरा हुआ क्षेत्रफल रेखा x = a द्वारा दो बराबर भागों में विभाजित होता है। तो a का मान ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया गया वक्र
x = y² …(1)
एवं रेखा x = 4 ..(2)
(1) एक परवलय है जिसको शीर्ष (0, 0) है तथा (2) एक रेखा है जो कि y-अक्ष के समान्तर है तथा इससे 4 इकाई दूरी पर है। माना रेखा x = a, क्षेत्रफल को दो बराबर भागों में विभाजित करती है। इसलिए कुल क्षेत्रफल
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प्रश्न 9.
परवलय y = x² एवं y = |x| से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया हुआ परवलय
y = x² y-अक्ष के प्रति सममित है।
परवलय y = x² व y = x के प्रतिच्छेद बिन्दु के लिए।
y = x² में y = x रखने पर,
⇒x = x²
⇒x(x – 1) = 0
⇒x = 0, x = 1
पुन: चूँकि y = |x| ∴y = x, – x y = 1, -1
अत: अभीष्ट प्रतिच्छेद बिन्दु (-1, 1), (0, 0) व (1, 1)
इसलिए अभीष्ट क्षेत्रफल = 2 [क्षेत्रफल ∆APO – क्षेत्रफल ∆OAP]
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प्रश्न 10.
वक्र x² = 4y एवं रेखा x = 4y – 2 से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया गया वक्र x² = 4y ….(1)
तथा दी गई रेखा x = 4y – 2 …(2)
(1) और (2) को हल करने पर,
(4y – 2)² = 4y
या 16y² – 16y + 4 – 4y = 0
या 16y² – 20y + 4 = 0
या 4y² – 5y + 1 = 0
या (y – 1)(4y – 1) = 0
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प्रश्न 11.
वक्र y² = 4 एवं रेखा x = 3 से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया गया वक्र y² = 4x, एक परवलय का समीकरण है। जिसका शीर्ष (0, 0) है और OX इसका अक्ष है जिसके सापेक्ष परवलय सममित है तथा रेखा का समीकरण x = 3 है।
y² = 4x …(1)
में x = 3 रखने पर,
y² = 4 x 3 = 12
⇒ y = √12
∴अभीष्ट क्षेत्रफल = क्षेत्र OPQ का. क्षेत्रफल
= 2 x OLQ का क्षेत्रफल
(केवल प्रथम चतुर्थांश में छायांकित क्षेत्र)
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अत: अभीष्ट क्षेत्रफल 8√3 वर्ग इकाई है।

प्रश्न 12.
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हल-
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प्रश्न 13.
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हल-
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प्रश्नावली 8.2

प्रश्न 1.
परवलय x² = 4y और वृत्त 4x² + 4y² = 9 के मध्यवर्ती क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिए गए वृत्त का समीकरण 4x² + 4y² = 9 तथा परवलय का समीकरण x² = 4y है।
परवलय x² = 4y का शीर्ष (0, 0) है और OY सममित रेखा है।
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प्रश्न 2.
दो वृत्तों x² + y² = 1 एवं (x – 1)² + y =1 से आबद्ध क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिए हुए वृत्तों के समीकरण हैं– x² + y² = 1 …(1)
(x – 1)² + y = 1 …(2)
समीकरण (1) ऐसा वृत्त है जिसका केन्द्र मूल बिन्दु O पर है। और जिसकी त्रिज्या 1 इकाई है। समीकरण (2) एक ऐसा वृत्त है।
जिसका केन्द्र C(1, 0) है और जिसकी त्रिज्या 1 इकाई है।
समीकरण (1) और (2) को हल करने पर,
(x – 1)² + y² = x² + y²
या x² – 2x + 1 + y² = x² + y²
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प्रश्न 3.
वक्रों y = x² + 2, y = x, x = 0 एवं x = 3 से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल-
दिए गये वक्रों के समीकरण y = x² + 2 …(1)
y = x …(2)
x = 0 …(3)
x = 3 …(4)
अभीष्ट क्षेत्रफल = छायांकित क्षेत्रफल
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प्रश्न 4.
समाकलन का उपयोग करते हुए एक ऐसे त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए जिसके शीर्ष (-1, 0), (1, 3) एवं (3, 2) हैं।
हल-
माना दिए हुए तीन बिन्दु A(-1, 0), B (1, 3) तथा C (3, 2) हैं।
हम जानते हैं कि, बिन्दु (x1, y1), (x2, y2) को मिलाने वाली रेखा की समीकरण
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समीकरण (4) में ∆ ABL, समलम्ब BCML तथा ∆ ACM के क्षेत्रफलों के मान रखने पर, ∆ABC का क्षेत्रफल = 3 + 5 – 4 = 4 वर्ग इकाई

प्रश्न 5.
समाकलन का उपयोग करते हुए एक ऐसे त्रिकोणीय क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए जिसकी भुजाओं के समीकरण y = 2x + 1,y = 3x + 1 एवं = 4 हैं।
हल-
भुजाओं के समीकरण
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y = 2x + 1 ..(1)
y = 3x + 1 ..(2)
x = 4 ..(3)
(1) और (2) को हल करने पर,
2x + 1 = 3x + 1 ⇒ x = 0 ∴ y = 1
∴(1) और (2) का प्रतिच्छेद बिन्दु (0, 1) है।
(1) और (3) को हल करने पर,
y = 8 + 1 = 9
∴(1) और (3) का प्रतिच्छेद बिन्दु (4, 9) है।
(2) और (3) को हल करने पर, y = 12 + 1 = 13; x = 4
∴(2) और (3) का प्रतिच्छेद बिन्दु (4, 13) है।
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प्रश्न 6.
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हल-
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प्रश्न 7.
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हल-
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