UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सन्धि-प्रकरण

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name सन्धि-प्रकरण
Number of Questions 65
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सन्धि-प्रकरण

सन्धि -प्रकरण

नवीनतम पाठ्यक्रम में स्वर सन्धि के दीर्घ, गुण, यण तथा अयादि भेद, ही निर्धारित हैं। इससे सामान्यतया बहुविकल्पीय प्रश्न ही पूछे जाते हैं। इसके लिए कुल 3 अंक निर्धारित हैं।
सन्धि–सन्धि का अर्थ है ‘मेल’ या ‘जोड़। जब दो शब्द पास-पास आते हैं तो पहले शब्द का अन्तिम वर्ण और दूसरे शब्द का आरम्भिक वर्ण कुछ नियमों के अनुसार आपस में मिलकर एक हो जाते हैं। दो वर्गों के इस एकीकरण को ही ‘सन्धि’ कहते हैं। उदाहरणार्थ-देव + आलये = देवालय। यहाँ ‘देव’ (द् + ए + व् + अ) शब्द का अन्तिम ‘अ’ और ‘आलय’ शब्द का प्रारम्भिक ‘आ’ मिलकर ‘आ’ बन गये।
प्रकार–सन्धियाँ तीन प्रकार की होती हैं—(अ) स्वर सन्धि, (ब) व्यञ्जन सन्धि और (स) विसर्ग सन्धि।

स्वर सन्धि

स्वर के साथ स्वर के मेल को स्वर सन्धि कहते हैं। उपर्युक्त ‘देवालय’ स्वर सन्धि का ही उदाहरण है। कुछ स्वर सन्धियाँ (पाठ्यक्रम में निर्धारित) नीचे दी जा रही हैं-
(1) दीर्घ सन्धि
सूत्र-अकः सवर्णे दीर्घः।
नियम-जब अ, इ, उ, ऋ, लू ( ह्रस्व या दीर्घ) के बाद समान स्वर (अ, इ, उ, ऋ, –ह्रस्व या दीर्घ) आता है तो दोनों के स्थान पर आ, ई, ऊ, ऋ, ऋ( लू नहीं )( दीर्घस्वर ) हो जाता है; जैसे–
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[विशेष-‘ऋ’ और ‘लू’ सवर्ण संज्ञक हैं, अत: समान स्वर माने जाते हैं। ‘ऋ’ और ‘लू’ में किसी भी स्वर के पूर्व या पश्चात् होने पर सन्धि होने पर दोनों के स्थान पर ‘ऋ’ ही होता है; क्योंकि संस्कृत में दीर्घ ‘लु’ (लू) नहीं होता है। ]

(2) गुण सन्धि
सूत्र-आद्गुणः।
नियम-यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद इ-ई, उ-ऊ, ऋ, लू आएँ तो दोनों के स्थान पर क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’, ‘अर्’ तथा ‘अल्’ हो जाता है; जैसे-
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(3) यण् सन्धि
सूत्र-इको यणचि।
नियम-यदि इ, उ, ऋ, लू (ह्रस्व या दीर्घ) के बाद कोई असमान स्वर आता है तो इ-ई, उ-ऊ, ऋ-ऋ, लू के स्थान पर क्रमशः य, व, र, ल्हो जाता है; अर्थात् इ-ई का य्, उ-ऊ का व्,ऋ-ऋ कार्, लू का लु हो जाता है; जैसे–
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(4) अयादि सन्धि
सूत्र–एचोऽयवायावः।
नियम-जब एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के आगे कोई स्वर आये तो इन ए, ओ, ऐ, औ के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय् और आव् हो जाता है; जैसे-
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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न निम्नलिखित के सही विकल्प चुनकर उत्तर पुस्तिका में लिखिए-

(1) ‘देवालयः’शब्द का सन्धि-विच्छेद है [2012, 17
(क) देवा + लयः
(ख) देवि + आलयः
(ग) देव + आलयः
(घ) दे + वालयः

(2) गिरीशः’ शब्द का सन्धि-विच्छेद है
(क) गिरी + शः
(ख) गि + रीशः
(ग) गिरि + ईशः
(घ) गिरी + ईश:

(3) ‘साधूवाच’ शब्द का सन्धि-विच्छेद है
(क) साधू + वाच
(ख) साधु + उवाच
(ग) साधू + उवाच
(घ) सा + धूवाच

(4) परमेश्वरः’ शब्द को सन्धि-विच्छेद है
(क) पर + मेश्वरः
(ख) परमेश + वरः
(ग) परम + ईश्वरः
(घ) परमे + श्वरः

(5) ‘महर्षिः’ शब्द का सन्धि-विच्छेद है [2010, 13, 14, 16]
(क) मह + र्षिः
(ख) म + हर्षिः
(ग) महा + ऋषिः
(घ) महा + रिषिः।

(6) ‘मध्वरिः’शब्द का सन्धि विच्छेद है– [2010, 13, 18]
(क) मधु + अरिः
(ख) मधु + वरिः
(ग) म + ध्वरिः
(घ) मध्व + रिः

(7) ‘स्वागतम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2011,14,17]
(क) स्वा + गतम्
(ख) स्वागत + म्
(ग) सु + आगतम्
(घ) स्वाग + तम्।

(8) ‘प्रत्युत्तर’ का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) प्रत्यु + त्तर
(ख) प्रति + उत्तर
(ग) प्र + त्युत्तर
(घ) प्रती + उत्तर

(9) ‘पवनम्’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) पव + नम्
(ख) पवन् +अम्।
(ग) पो + अनम्।
(घ) पवन + म्।

(10) ‘नयनम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2010, 13, 18]
(क) ने + अनम्
(ख) नये + नम्।
(ग) नै + अनम्
(घ) नयन + म्।

(11) ‘पुस्तकालय:’ का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) पुस्त + कालय:
(ख) पुस्तका + लय:
(ग) पुस्तक + आलय:
(घ) पुस्तक + लय:

(12) ‘रमेश:’ का सन्धि-विच्छेद है- [2011, 14, 16]
(क) रम + एशः।
(ख) रम + इशः
(ग) रमा + एशः।
(घ) रमा + ईशः।

(13) ‘इत्यादि’ का सन्धि-विच्छेद है– [2014, 16, 18]
(क) इति + आदि
(ख) इत्य + आदी
(ग) इत + आदि
(घ) इती + आदि।

(14) नदीशः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) नदि + ईशः
(ख) नदी + शः
(ग) नदी + ईशः
(घ) ना + दोशः

(15) ‘यद्यपि’ का सन्धि-विच्छेद है [2014]
(क) यद्य + अपि
(ख) य + द्यपि
(ग) यद्या + अपि
(घ) यदि + अपि

(16) ‘सूर्योदय:’ का सन्धि-विच्छेद है [2011, 15, 17]
(क) सूर्य + उदयः.
(ख) सूयों + दयः
(ग) सूर + ओदय:
(घ) सूर + उदय:

(17) ‘कवीश्वरः’का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) कवि + ईश्वरः
(ख) कवि + श्वरः
(ग) कवि + इश्वरः
(घ) कवी + ईश्वरः

(18) ‘उपेन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) उपे + इन्द्रः
(ख) उप + ईन्द्रः
(ग) उप + इन्द्रः
(घ) उपा + इन्द्रः

(19) विद्यार्थी’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) विद्य + अर्थी
(ख) विद्या + अर्थी
(ग) विद्य + आर्थी
(घ) विदि + आर्थी।

(20) ‘देवर्षिः’का सन्धि-विच्छेद है
(क) देवः + ऋषि
(ख) देवा + ऋषि:
(ग) देव + ऋषिः
(घ) देव + अर्षि:

(21) ‘परमार्थः’ का सन्धि-विच्छेद है [2016, 18]
(क) परम + अर्थः
(ख) पर + मर्थः
(ग) पर + मार्थः
(घ) परमा + अर्थ:

(22) ‘महोत्सवः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012, 15, 17]
(क) महो + उत्सवः
(ख) महा + उत्सर्वः
(ग) मह + ओत्सवः
(घ) महोत + सवः

(23) ‘भवनम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2012, 15, 17, 18]
(क) भव + नम्।
(ख) भव् + अनम्।
(ग) भो + अनम्
(घ) भ + वनम्

(24) ‘रवीन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है [2016]
(क) रवी + इन्द्रः
(ख) रवि + ईन्द्रः
(ग) रवि + इन्द्रः
(घ) रवी + ईन्द्रः

(25) ‘मुरारिः’ को सन्धि-विच्छेद है
(क) मुर + अरिः
(ख) मुरा + अरिः
(ग) मुर + आरिः
(घ) मु + रारि:

(26) ‘अन्विति’ का सन्धि-विच्छेद है–
(क) अन्वि + ति
(ख) अनु + इति
(ग) अन्वि + इति.
(घ) अन् + इति

(27) ‘भू’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) भू + उर्ध्व
(ख) भु + ऊर्ध्व
(ग) भू + ऊर्ध्व
(घ) भू + र्ध्व

(28) ‘अम्बूर्मिः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) अम्बू + उर्मिः
(ख) अम्बु + उर्मि:
(ग) अम्बू + ऊर्मि
(घ) अम्बु + ऊर्मिः

(29) ‘रामाशीषः’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) रामः + आशीषः
(ख) रामाः + शीषः
(ग) रामाः + आशीषः
(घ) रामाश् + ईष:

(30) ‘क्षीरनिधाविव’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) क्षीरनिधा + विव
(ख) क्षीरनिध + आविव
(ग) क्षीरनिधौ + इव
(घ) क्षीरनिध् + आविव

(31) ‘देशाभिमान’ को सन्धि-विच्छेद है [2012]
(क) देशा + भिमान
(ख) देश + अभिमान
(ग) देशा + अभिमान
(घ) देश + भिमान

(32) ‘सतीशः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012]
(क) सत + ईशः
(ख) सत् + ईशः
(ग) सति + इशः
(घ) सती + ईशः

(33) ‘सुखार्थिनः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012]
(क) सुख + अर्थिनः
(ख) सुखा + अर्थिनः
(ग) सुख + आर्थिन:
(घ) सुखार् + थिन:

(34) ‘सुरेन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है [2012, 16]
(क) सुरा + इन्द्रः
(ख) सुर + एन्द्रः
(ग) सुरे + न्द्रः
(घ) सुर + इन्द्रः

(35) ‘उपोषति’ का सन्धि-विच्छेद है– [2013)
(क) उप + ओषति
(ख) उपो + षति
(ग) उ + पोषति
(घ) उपोष + ति

(36) ‘सज्जनः’ का सन्धि-विच्छेद है– [2013]
(क) सद् + जनः
(ख) सत् + जनः
(ग) सद् + अजन:
(घ) सतो + जनः

(37) ‘रामस्तरति’ का सन्धि-विच्छेद है [2013]
(क) राम + तरति
(ख) रामः + तरति
(ग) राम + स्तरति
(घ) राम + रति

(38) ‘भावुकः’ का सन्धि-विच्छेद है [2013, 15]
(क) भौ + उकः
(ख) भाऊ + अक:
(ग) भौ + उक:
(घ) भाव + उक:

(39) ‘मधुराक्षरम्’ का सन्धि-विच्छेद है [2014]
(क) मधुरा + क्षरम्
(ख) मधुर + आक्षरम्
(ग) मधुर + अक्षरम
(घ) मधु + राक्षरम्

(40) ‘अन्वर्थः’ का सन्धि-विच्छेद है [2014]
(क) अ + न्वर्थः
(ख) अन्व + वर्थ:
(ग) अनु + अर्थः
(घ) अनु + वर्थः

(41) ‘शायकः’ को सन्धि-विच्छेद है [2014, 16, 17]
(क) शाय + यक:
(ख) शायि + अर्कः
(ग) शै + अकः
(घ) शाय् + अकः

(42) ‘जयति’ का सन्धि-विच्छेद है- [2014, 15] (ग) जे + अति
(क) जा + यति
(ख) जो + अति
(ग) जे + अति
(घ) जय + ति

(43) ‘कमलोदयः’ का सन्धि-विच्छेद है– [2014]
(क) कमलो + दयः
(ख) कमल + ओदयः
(ग) कमल + उदयः
(घ) कम + लोदय:

(44) ‘शुक्लाम्बरम्’ का सन्धि-विच्छेद है (2015)
(क) शु + क्लाम्बरम्।
(ख) शुक्ला + अम्बरम्
(ग) शुक्ल + अम्बरम्।
(घ) शुक्ल + आम्बरम्

(45) ‘महीशः’ का सन्धि-विच्छेद है [2015]
(क) महा + ईशः
(ख) मही + शः
(ग) महे + ईशः
(घ) मही + ईश

(46) ‘पवनः’ का सन्धि-विच्छेद है [2016]
(क) पो + नः
(ख) पव + नः
(ग) पो + अनः
(घ) पू + वनः

(47) ‘वसन्तोत्सव’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016, 18]
(क) वसन्ते + तत्सवः
(ख) वसन्तो + उत्सव
(ग) वसन्त + उत्सवः
(घ) वसं + तोत्सवः

(48) ‘तथैव’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) तथ + एव
(ख) तथा + वेव
(ग) तथा + एव
(घ) तथै + एव

(49) ‘अखिलेशः’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) अखिल + एशः
(ख) अखिल + ईशः
(ग) अखिला + ईशः
(घ) अखल + ईशः

(50) ‘कदापि’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) कद + अपि
(ख) कत् + अपि
(ग) कत + अपि
(घ) कदा + अपि

(51) ‘रामायण’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) रामा + अयण
(ख) राम + आयण
(ग) राम + अयण
(घ) रा + मायण

(52) ‘लाकारः’ का सन्धि-विच्छेद है- [2016]
(क) ला + कारः
(ख) + अकार:
(ग) ला + आकार:
(घ) लृ + आकार:

(53) ‘पद्मेशः’ का सन्धि-विच्छेद है– [2016)
(क) पद्मा + ईशः
(ख) पद्म + एशः
(ग) पद्मा + इशः
(घ) पद + मेशः

(54) ‘वागीशः’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017)
(क) वाग् + ईशः
(ख) वाक् + ईश:
(ग) वागी + शः
(घ) वा + गीशः

(55) ‘तल्लीन’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017)
(क) तद् + लीनः
(ख) त + लीन:
(ग) तदली + नः
(घ) तदी + लीन:

(56) ‘रामेश:’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017, 18)
(क) राम् + ईशः
(ख) राम + एशः
(ग) राम + ईश:
(घ) राम + इशः

(57) ‘प्रगल्भापकारः’ का सन्धि-विच्छेद है- (2017)
(क) प्रगल्भ + उपकारः
(ख) प्रगल्भा + पकारः
(ग) प्रगल्भ + अपकारः
(घ) प्रगल्भ् + अपकारः

(58) ‘रामावतारः’ का सन्धि-विच्छेद है (2017)
(क) रामा + वतार
(ख) रामाव + तारः
(ग) राम + अवतार:
(घ) रम + वतार:

(59) ‘पद्माशयः’ का सन्धि-विच्छेद है– (2017)
(क) पद्म + आश्रयः
(ख) पद्मा + अश्रयः
(ग) पद्मा + श्रयः
(घ) पद्मा + आश्रयः

(60) शैलजेशः’ का सन्धि-विच्छेद है— (2017)
(क) शैलज + एशः
(ख) शैलजा + ईशः
(ग) शैल + जैश
(घ) शैलजा + इशः

(61) ‘प्रभृत्येव’ का सन्धि-विच्छेद है (2017)
(क) प्रभृती + एव
(ख) प्रभृति + एव
(ग) प्रभृ + त्येव
(घ) प्रभृति + इव

(62) ‘ग्रामोदय’ का सन्धि-विच्छेद है (2018)
(क) ग्राम + ओदयः
(ख) ग्रामो + दयः
(ग) ग्राम + उदयः
(घ) ग्रा + मोदयः

(63) देवेन्द्रः’ का सन्धि-विच्छेद है (2018)
(क) देव + इन्द्रः
(ख) देवे + इन्द्रः
(ग) दे + वेन्द्रः
(घ) देव + इन्द्रः

(64) ‘प्रत्यर्पण’ को सन्धि-विच्छेद है (2018)
(क) प्रति + अर्पण
(ख) प्रती + पर्ण
(ग) प्र + अतिपर्ण
(घ) प्रत्य + पर्ण

(65) कलाविव’ का सन्धि-विच्छेद है
(क) कला + विवे
(ख) कल् + अविवे
(ग) कलौ + इव
(घ) कलो + ईव

उत्तर
(1) ग, (2) ग, (3) ख, (4) ग, (5) ग, (6) क, (7) ग, (8) ख, (9) ग, (10) क, (11) ग, (12) घ, (13) क, (14) ग, (15) घ, (16) क, (17) के, (18) ग, (19) ख, (20) ग, (21) के, (22) खे, (23) ग, (24) ग, (25) क, (26) ख, (27) ग, (28) घ, (29) क, (30) ग, (31) ख, (32) घ, (33) क, (34) घ, (35) के, (36) ख, (37) ख, (38) क, (39) ग, (40) ग, (41) ग, (42) ग, (43) ग, (44) ग, (45) क, (46) ग, (47) ग, (48) ग, (49) ख, (50) घ, (51) ग, (52) घ, (53) क, (54) क, (55) क, (56) ग, (57) ग, (58) ग, (59) क, (60) के, (61) ख, (62) ग, (63) क, (64) क, (65) ग।।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 17
Chapter Name International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार)
Number of Questions Solved 11
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade (अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व के प्रमुख निर्यात एवं आयात व्यापार का वर्णन कीजिए।
उत्तर
एक देश का अन्य देशों से किया जाने वाला आयात एवं निर्यात (व्यापार) विश्व व्यापार या विदेशी व्यापार अथवा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहलाता है।

विश्व : निर्यात व्यापार (World : Export Trade)

पिछले 25-30 वर्षों में ऐंग्लो-अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोपीय देश विश्व का दो-तिहाई व्यापार करते थे, परन्तु अनेक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक संघ एवं सन्धियाँ बन जाने के कारण व्यापार के इस प्रारूप में अन्तर आ गया है। इसके अतिरिक्त शेष व्यापार एशियाई देशों-जापान एवं भारतद्वारा किया जाता है। रूस, कनाडा एवं पूर्वी यूरोपीय देशों के व्यापार में भी वृद्धि हुई है। अफ्रीकी देश, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड भी अन्तर्राष्ट्रीय मानचित्र पर व्यापारिक दृष्टिकोण से उभरने लगे हैं, परन्तु विश्व व्यापार में अभी भी यूरोपीय एवं अमेरिकी देशों का ही प्रभुत्व है।
विश्व निर्यात व्यापार की संरचना निम्नलिखित है-

  1. प्रमुखतया विकासशील देशों से खाद्यान्न, पेय-पदार्थ, कृषिगत अन्य उपजें, खनिज एवं धात्विक अयस्क, तम्बाकू, चाय, कहवा, चमड़ा और खालें आदि पदार्थ विकसित देशों को भेजे जाते हैं। प्रमुख निर्यातक देशों में इण्डोनेशिया, श्रीलंका, भारत, पाकिस्तान, संयुक्त अरब गणराज्य, मॉरीशस, घाना, कोलम्बिया, इक्वेडोर आदि प्रमुख हैं।
  2. मिलों एवं कारखानों में निर्मित विभिन्न वस्तुएँ- भारी मशीनें, इन्जीनियरिंग का सामान, सीमेण्ट, कागज, रसायन, रेशमी-ऊनी वस्त्र, मोटरगाड़ियाँ एवं धातुएँ-टिन, ताँबा, सीसा, जस्ता आदि विकसित देशों- संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली एवं जापान आदि-से मध्य-पूर्वी एवं एशियाई देशों, दक्षिणी अमेरिकी एवं अफ्रीकी देशों को निर्यात किये जाते हैं।
  3. वर्तमान समय में परम्परागत वस्तुओं के निर्यात की अपेक्ष कच्चा माल, निर्मित पदार्थ, मशीनें, पेट्रोलियम पदार्थों आदि का व्यापार अधिक होने लगा है।
  4. विश्व के निर्यात व्यापार की दिशा में भी अब परिवर्तन आ गया है। अनेक विकसित देश अब विश्व के विभिन्न देशों से विकासशील देशों की अपेक्षा अधिक निर्यात करने लगे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय निर्यात व्यापार की संरचना एवं उसकी दिशा
Structure and Direction of International Export Trade

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade 2

विश्व : आयात व्यापार (World : Import Trade)

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयात व्यापार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. वर्तमान समय में विश्व के सभी देशों के आयात में विनिर्मित माल, यन्त्र एवं उपकरण तथा मशीनों का भाग अधिक होता है। कनाडा, क्यूबा, मैक्सिको, कोलम्बिया, पीरू, नार्वे आदि देशों का आयात इसी प्रकार का है।
  2. विश्व में अधिकांश देश औद्योगीकरण में स्वावलम्बी बनने के लिए अधिकाधिक आधारभूत खनिजों एवं यान्त्रिक उपकरणों तथा पूँजीगत सामान का आयात अधिक करते हैं।
  3. जनाधिक्य वाले देशों एवं विकसित देशों में खाद्यान्नों के आयात में वृद्धि हो रही है।
  4. ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी सदृश देशों में कच्चे माल के आयात में वृद्धि हो रही है।
  5. ब्रिटेन तथा पश्चिमी यूरोपीय देश-फ्रांस एवं जर्मनी आदि-महत्त्वपूर्ण आयातक देश हैं। इन देशों के आयात यूरोपीय तथा दक्षिणी अमेरिकी देशों से पूर्ण होते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय आयात व्यापार की संरचना एवं उसकी दिशा
Structure and Direction of International Import Trade

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade 3
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade 4
व्यापार के दृष्टिकोण से विश्व के देशों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. वे देश जहाँ आयात एवं निर्यात व्यापार प्रायः बराबर होता है। ऐसे देशों में कम्पूचिया, सूडान, फिनलैण्ड एवं उरुग्वे आदि हैं। इन देशों से प्राथमिक वस्तुओं (कृषि, पशु एवं वन) से सम्बन्धित वस्तुओं का निर्यात तथा अन्य निर्मित वस्तुओं का आयात किया जाता है।
  2. वे देश जहाँ निर्यात, आयात की अपेक्षा अधिक होता है, वहाँ इनका व्यापार अधिक अनुकूल रहता है। वेनेजुएला, अर्जेण्टीना, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, इण्डोनेशिया, चेक एवं स्लोवाकिया, कनाडा, संयुक्त राज्य, सऊदी अरब, इराक, ईरान, रूस, फ्रांस, मलेशिया आदि देशों से विशिष्ट वस्तुओं, अर्थात् रबड़, खनिज तेल, चाय, निर्मित पदार्थ आदि का निर्यात होता है।
  3. वे देश जहाँ आयात, निर्यात की अपेक्षा अधिक होता है, वहाँ इन देशों का व्यापार अधिक प्रतिकूल रहता है। ब्रिटेन, भारत, जापान, इटली, नार्वे तथा अधिकांश यूरोपीय देश इसी श्रेणी में आते हैं। इन देशों द्वारा खाद्यान्न, अन्य कच्चे माल तथा मशीनी उपकरणों का आयात किया जाता है।

प्रश्न 2
चाय तथा खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वर्णन कीजिए।
या
खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वर्णन कीजिए। (2014)
या
टिप्पणी लिखिए-खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।
उत्तर

चाय का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार
(International Trade of Tea)

चाय एक महत्त्वपूर्ण पेय पदार्थ है। इसका उत्पादने उष्ण व उपोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में ही किया जाता है, जबकि इसकी माँग संसार के अधिकांश देशों में रहती है। संसार के विकसित राष्ट्रों में चाय का उत्पादन बिल्कुल नहीं होता, परन्तु उनकी ऊँची क्रयशक्ति तथा अधिक खपत के कारण वे राष्ट्र चाय के प्रमुख आयातक बन गए हैं।

चाय के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की विशेषताएँ
(Characteristics of International Trade of Tea)
चाय के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. चाय का 90% उत्पादन उष्णार्द्र जलवायु के देशों में किया जाता है, जबकि उसका.90% उपभोग
    शीतप्रधान जलवायु के देश करते हैं।
  2. चाय की अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी बहुत महत्त्वपूर्ण है।
  3. संसार में लगभग 26 लाख टन चाय का उत्पादन होता है जिसमें से लगभग 47% (12.2 लाख टन) विश्व व्यापार में प्रयुक्त होगी। अत: चाय का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार विकासशील देशों की निर्यात आय की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है।
  4. यूरोपीय साझा बाजार के सभी देशों का मुख्य आयात चाय ही होती है।
  5. चाय के कुल निर्यात का लगभग 13.3% भारत, 12.2% श्रीलंका, 12% चीन, 11% कीनिया (अफ्रीका), 5% इण्डोनेशिया और 3.8% अर्जेण्टीना द्वारा किया जाता है।
  6. कुल चाय आयात का 70% भाग ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, पाकिस्तान, इराक, ईरान एवं मिस्र द्वारा किया जाता है तथा 5% जापान, 3% पोलैण्ड तथा 3% सऊदी अरब द्वारा किया जाता है।
  7. चाय विकासशील एवं खेतिहर देशों की आय का मुख्य स्रोत बनी हुई है। इसे निर्यात कर ये देश ‘पर्याप्त विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं।
  8. भारत और श्रीलंका के निर्यात व्यापार में चाय महत्त्वपूर्ण स्थान रहती है।
  9. चाय की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत में ग्रेट ब्रिटेन का स्थान सर्वप्रथम है, अतः यह चाय का सबसे बड़ा ग्राहक है।
  10. विश्व के कुल चाय व्यापार में भारत का योगदान लगभग 13% है।
  11. चाय के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत के प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी श्रीलंका, इण्डोनेशिया, कीनिया तथा चीन हैं।

खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार
(International Trade of Mineral Oil)

आधुनिक युग में खनिज तेल एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन है। अत: इसके संचित भण्डार एवं उत्पादन क्षेत्रों पर आर्थिक या राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दाँव-पेंच चलते रहते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु है। विश्व में ऐसे गिने-चुने देश हैं जो खनिज तेल के उत्पादन में स्वावलम्बी हैं और निर्यात करने की स्थिति में भी हैं। ऊर्जा संकट को ध्यान में रखते हुए खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है।

खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की विशेषताएँ
(Characteristics of International Trade of Mineral Oil)
खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. खनिज तेल का निर्यात करने वाले देश बहुत कम हैं, जबकि इसके आयातक देशों की सूची बहुत लम्बी है।
  2. खनिज तेल का शोधन करने पर इससे अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। इन पदार्थों पर बहुत-से महत्त्वपूर्ण उद्योग-धन्धे आधारित होते हैं, अतः सभी देश आवश्यकतानुसार खनिज तेल के आयात पर बल देते हैं।
  3. खनिज तेल उत्पादकः खाड़ी देशों में कृषि, उद्योग तथा व्यापार पिछड़ी हुई दशा में हैं, अत: ये खनिज तेल का निर्यात कर अपनी अन्य आवश्यकता की वस्तुएँ आयात करने में सक्षम हो पाए हैं।
  4. सभी औद्योगिक राष्ट्र खनिज तेल का भारी मात्रा में आयात करते हैं।
  5. खनिज तेल को यदि भूमि से न निकाला जाए तो वह स्वत: ही स्थानान्तरित हो जाता है; अतः खनिज तेल उत्पादक देश इसके निर्यात द्वारा ही उत्पादन कर पाते हैं।
  6. विकसित होते हुए परिवहन साधनों ने खनिज तेल के उपभोग को कई गुना बढ़ा दिया है; अत: सभी राष्ट्र खनिज तेल के आयात में वृद्धि कर रहे हैं।
  7. विश्व में प्रतिवर्ष कुल लगभग 3 अरब टन खनिज तेल का उत्पादन होता है जिसके लगभग एक-तिहाई भाग (103 करोड़ टन) का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार होता है। तेल के बड़े आयातकों में संयुक्त राज्य अमेरिका (विश्व का 17%), जापान (14%) और पश्चिमी यूरोपीय देश (30%) हैं।
  8. खनिज तेल के बड़े निर्यातकों में सऊदी अरब (18%), रूस (16%), मैक्सिको (6%), इराक (6%), ईरान (5.5.%), नाइजीरिया (5.2%), संयुक्त अरब अमीरात (52%), वेनेजुएला (4%), लीबिया (3.8%) और इण्डोनेशिया (3.7%) प्रमुख हैं।
  9. संयुक्त राज्य अमेरिका खनिज तेल का संसार सबसे अधिक उपभोग करने वाला देश है। 46 करोड़ टन घरेलू उत्पादन के अतिरिक्त यह प्रतिवर्ष लगभग 18 करोड़ टन तेल का आयात करता है। रूस अपने 31.5 करोड़ टन उत्पादन में से लगभग 8 करोड़ टन खनिज तेल का निर्यात कर देता है। जापान एक महान औद्योगिक देश होने के कारण संसार का दूसरा बड़ा तेल आयातक देश बन गया है।
  10. पश्चिमी यूरोप में केवल ब्रिटेन के अतिरिक्त सभी देशों का घरेलू उत्पादन न होने के कारण तथा इन विकसित राष्ट्रों में पेट्रोलियम की अधिक माँग होने के कारण खाड़ी देशों से खनिज तेल का बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है।

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से किसी एक के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का विवरण दीजिए –
(1) गेहूँ
(2) चावल
(3) लौह-अयस्क
(4) कोयला।
उत्तर

(1) गेहूँ का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

गेहूँ विश्व का सबसे अधिक बोया जाने वाला खाद्यान्न है। विश्व की अधिकांश सभ्य जातियाँ खाद्यान्नों में गेहूँ पर ही आश्रित हैं। इसका उत्पादन क्षेत्र इतना विस्तृत है कि विश्व के अनेक जलवायु प्रदेशों में यह उगाया जाता है तथा वर्ष भर इसकी खेती कहीं-न-कहीं होती रहती है। इसके उपरान्त भी अनेक देशों में गेहूं का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाता है, फलतः वे अपनी माँग की आपूर्ति के लिए अन्य देशों पर निर्भर करत हैं। इस तथ्य का लाभ उठाने के लिए संसार के कम जनसंख्या वाले और विस्तृत कृषि-भूमि वाले देश मशीनों से गेहूं की विस्तृत खेती करते हैं, जैसे-कनाड़ा, अर्जेण्टीना, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका।

इन देशों द्वारा अपनी आवश्यकता से इतना अधिक गेहूं उत्पन्न किया जाता है कि उसे निर्यात करना भी कभी-कभी उनके लिए समस्या हो जाती है। इन देशों में बड़े-बड़े फार्मों में बड़े पैमाने पर खेती किए जाने के कारण गेहूं की उत्पादन लागत भी कम आती है। इसी कारण विश्व व्यापार में इनकी वे देश प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते जहाँ गेहूं की सघन कृषि करने में अपेक्षाकृत लागत अधिक आती है।

विश्व के प्रायः अधिक जनसंख्या वाले देश अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए गेहूं का आयात करते हैं। विश्व के कुल निर्यात का लगभग 84% भाग संयक्त राज्य अमेरिका, कनाड़ा, अर्जेण्टीना, पश्चिमी एशियाई ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस एवं जर्मनी का है। इनके अतिरिक्त रूस, हंगरी, रूमानिया, इटली, टर्की आदि भी गेहूँ के निर्यातक देश हैं। भारत भी अपने समीपवर्ती देशों को गेहूं का निर्यात करने लगा है। गेहूं के आयातक देशों में चीन, यूरोपीय देश, ब्राजील, जापान, मिस्र, अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश, ब्रिटेन आदि प्रमुख हैं।

(2) चावल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

चावल संसार की आधी से अधिक जनसंख्या का मुख्य भोजन है। वस्तुतः शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों के निवासियों के लिए गेहूँ जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों के निवासियों के लिए-चावल आवश्यक है। व्यापारिक दृष्टि से चावल, गेहूं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

संसार के कुल चावल उत्पादन का केवल 10% भाग ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रयुक्त होता हैं, क्योंकि अधिकांश बड़े चावल उत्पादक देश ही अत्यधिक जनसंख्या वाले देश होने के कारण चावल के बड़े उपभोक्ता भी हैं। विश्व का कुल चावल उत्पादन लगभग 61 करोड़ मीट्रिक टन है जिसमें से केवल 2.5 करोड़ टन चावल का ही विश्व व्यापार किया जाता है। थाईलैण्ड, म्यांमार, ताइवान, पाकिस्तान, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, मिस्र, ब्राजील, जापान, कम्बोडिया, वियतनाम और स्पेन संसार के प्रमुख चावल निर्यातक देश हैं। ये देश चावल के बड़े उत्पादक नहीं हैं। अपनी माँग से अधिक चावल उत्पादन के कारण ही ये चावल के निर्यातक बने हुए हैं। आवश्यकता से कम उत्पादन होने के कारण बांग्लादेश, इण्डोनेशिया, खाड़ी के देश, जापान, रूस, श्रीलंका, मलेशिया, अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका आदि देश चावल का आयात करते हैं।

(3) लौह-अयस्क का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

लौह-अयस्क लोहा व इस्पात उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। इस्पात उद्योग का विकास करने के लिए संभी राष्ट्र यथाशक्ति प्रयत्नशील हैं क्योंकि यह सभी मशीनों, परिवहन उपकरणों, इंजीनियरी उद्योगों का आधार होता है। इसीलिए इसे ‘आधुनिक सभ्यता का जनक’ कहा जाता है। यह भारी और कम मूल्य वाला खनिज पदार्थ है, अत: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में इसका महत्त्व कम है। इसी कारण इसका व्यापार सामान्यतः पड़ोसी देशों के बीच ही किया जाता है।

संसार के कुल 99.44 करोड़ टन लौह-अयस्क उत्पादन को लगीग एक-तिहाई अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रयुक्त किया जाता है। संसार के बड़े लौह-अयस्क निर्यातक देश ब्राजील (24%), ऑस्ट्रेलिया (19%), रूस (16%), कनाड़ा (12%), भारत (7%), स्वीडन (4.4%), लाइबेरिया (3.5%) एवं वेनेजुएला (3.3%) हैं। लौह-अयस्क के बड़े आयातक देशों में जापान (विश्व का लगभग एक-तिहाई), जर्मनी (15%), संयुक्त राज्य (6.4%), इटली (4.5%), फ्रांस (4%), चीन (3.9%) एवं बेल्जियम (3.9%) प्रमुख हैं।

ब्राजील में उत्पादित लौह-अयस्क के प्रमुख ग्राहक संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान हैं। ऑस्ट्रेलिया और भारत का अधिकांश लौह-अयस्क जापान को निर्यात किया जाता है। अफ्रीका के लौह-अयस्क उत्पादक देश और वेनेजुएला मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका को लौह-अयस्क निर्यात करते हैं। कनाडा से लौह-अयस्क का निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों के लोहा-इस्पात उत्पादक देशों को किया जाता है।

(4) कोयले का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

कोयला आज भी महत्त्वपूर्ण ऊर्जा का स्रोत है और अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करता है। भारी होने के कारण इसका व्यापार अधिकतर जलमार्गो (नाव्य नहरों, नाव्य नदियों और महासागरीय मार्गों) द्वारा किया जाता है। इसका व्यापार अधिकतर निकटस्थं देशों के साथ किया जाता है। क्योंकि लम्बी दूरियों तक़ इसका परिवहन करने पर यह महँगा हो जाता है। वस्तुत: विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 10% (45.6 करोड़ टन) कोयला ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में व्यापारिक दृष्टिकोण से प्रयुक्त किया जाता है।

यूरोप के देश अधिकतर आपस में ही जलमार्गों द्वारा इसका व्यापार कर लेते हैं। और साथ-ही-साथ वापसी में वही जलयान लौह-अयस्क को ढोते हैं। इसीलिए कोयले और लौह-अयस्क की खानों के निकट ही लोहा-उत्पादक केन्द्र स्थापित किए गए हैं। पोलैण्ड से नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, आस्ट्रिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और इटली को कोयला निर्यात किया जाता है। संसार के बड़े कोयला निर्यातक देश ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, पोलैण्ड, यूक्रेन, भारत, दक्षिणी अफ्रीका आदि हैं। जापान संसार का सबसे बड़ा कोयला आयातक देश है। (विशेषतः कोकिंग कोयले का)। जापान आज निकटता के आधार पर ही चीन के कोयला क्षेत्रों का विकास अपने आयात के लिए कर रहा है। संसार के बड़े कोयला आयातक देश जापान, फ्रांस कनाडा, बेल्जियम, इटली, डेनमार्क, स्पेन, नार्वे, स्वीडन, अर्जेण्टीना आदि हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के दोष बताइए।
उत्तर
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा बहुधा किसी देश के क्षयशील खनिज संसाधन शीघ्र ही समाप्त हो जाते हैं। उन संसाधनों की पूर्ति सम्भव नहीं होती।
  2. कभी-कभी विदेशी व्यापार से देशवासियों को हानिकारक मादक वस्तुओं के उपयोग का अतिशय अभ्यास हो जाता है, उदाहरणार्थ-चीनवासियों को मदिरा तथा अफीम की लत पड़ गई थी।
  3. प्रत्येक देश में कुछ विशेष वस्तुओं के उत्पादन का विशेषीकरण होता है तथा अन्य क्षेत्र अविकसित रह जाते हैं। इस प्रकार देश का एकपक्षीय विकास ही होता है, जो इस देश की अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होता है।
  4. देशी बाजारों में विदेशी माल आने पर देश के उद्योग-धन्धे प्रायः चौपट हो जाते हैं तथा पनप नहीं पाते। स्वतन्त्रता के पूर्व भारत के बाजारों में विदेशी वस्त्रों के कारण स्वदेशी वस्त्र व्यवसाय ठप हो गया था।
  5. जो देश अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विदेशी व्यापार (आयात) पर निर्भर करते हैं, युद्धकाल या अन्य किसी संकट काल में व्यापार बन्द होने पर उसका आर्थिक ढाँचा अस्त-व्यस्त हो जाता है।
  6. विदेशी व्यापार से उपजे आर्थिक तथा औद्योगिक असन्तुलन का प्रभाव एक ही देश पर सीमित नहीं रहता, अन्य सम्बन्धित देश भी उसके शिकार होते हैं।

प्रश्न 2
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के गुण बताइए।
उत्तर
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. खाद्य संकट के समय विदेशों से अन्न के आयात से देश की भुखमरी से रक्षा होती है। इस प्रकार देशवासियों के स्वास्थ्य एवं जीवन की रक्षा होती है।
  2. प्रायः देशों में उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन होता है जिनके लिए परिस्थितियाँ अनुकूलतम होती हैं। इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से प्रादेशिक श्रम-विभाजन का विकास होता है।
  3. जिन वस्तुओं का देश में उत्पादन नहीं होता, आयात द्वारा उपभोक्ताओं को वे सहज उपलब्ध हो जाती हैं।
  4. यदि किसी देश में किसी उद्योग के लिए कच्चा माल उपलब्ध नहीं है, किन्तु अन्य सभी सुविधाएँ प्राप्त हैं तो कच्चे माल के आयात द्वारा उस उद्योग का विकास सम्भव है। जिन देशों के पास कच्चा माल अधिक है, किन्तु अन्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं, तो वे कच्चे माल का निर्यात करके बदले में आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कर सकते हैं।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से देशों के मध्य व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। अतएव वे उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता के प्रति सतर्क रहते हैं तथा मूल्य भी कम रखने की चेष्टा करते हैं।

प्रश्न 3
राष्ट्रमण्डल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
राष्ट्रमण्डल (Commonwealth Nation) सदस्य संख्या (53) तथा क्षेत्रीय व्यापार की दृष्टि से यह व्यापार संगठन संयुक्त राष्ट्र के बाद सबसे बड़ा है, किन्तु यह प्रभावी संगठन नहीं है। इसके सदस्य वे सभी देश हैं जो कभी ब्रिटेन के नियन्त्रण में थे। भारत, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैपड, श्रीलंका, मलेशिया, घाना, नाइजीरिया, साइप्रस, सियरालिओन, तंजानिया, जमैका, ट्रिनिडाड, तोबेगो, युगाण्डा, जंजीबार, केन्या, सिंगापुर व बांग्लादेश इसके सदस्य हैं। ब्रिटेन की रंगभेद नीति के कारण दक्षिणी अफ्रीका, रोडेशिया, जाम्बिया तथा 1971 ई० में पाकिस्तान इससे अलग हो गए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर
कोई भी देश अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं की पूर्ति स्वयं नहीं कर सकता; अतः उसे अन्य देशों से व्यापार द्वारा अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ मँगानी पड़ती हैं। इसे ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं।

प्रश्न 2
भारत के विदेशी व्यापार की दो नवीन प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
नब्बे के दशक से लागू आर्थिक उदारवादी नीति के कारण हमारे विश्व के सभी देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई है। विश्व-व्यापारीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण भारत के निर्यात व्यापार में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन आए हैं।

प्रश्न 3
भारत की दो निर्यातक वस्तुओं का वर्णन कीजिए। [2010, 12, 13, 15]
उत्तर

  1. चाय – भारत चाय का प्रमुख निर्यातक देश है। ब्रिटेन भारतीय चाय का मुख्य ग्राहक है। इसके अतिरिक्त कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरान, संयुक्त अरब गणराज्य, रूस, जर्मनी तथा सूडान आदि देश प्रमुख ग्राहक हैं।
  2. सूती वस्त्र – भारत सूती-वस्त्र, विशेष रूप से सिले-सिलाए परिधानों के निर्यात में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह निर्यात मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, मलेशिया, सूडान, म्यांमार, अदन, अफगानिस्तान आदि देशों को किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
यूरोपीय संघ का मुख्यालय है।
(क) जेनेवा
(ख) न्यूयॉर्क
(ग) ब्रुसेल्स
(घ) ओस्लो
उत्तर
(ग) ब्रुसेल्स।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 17 International Trade

प्रश्न 2
आसियान का सदस्य नहीं है।
(क) ब्राजील
(ख) सिंगापुर
(ग) थाईलैण्ड
(घ) मलेशिया
उत्तर
(क) ब्राजील

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो
Number of Questions 120
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

[ ध्यान दें: नीचे दिये गये बहुविकल्पीय प्रश्नों के विकल्पों में सामान्य से अधिक काले छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।]
उचित विकल्प का चयन करें-

(1) ‘झरना’ काव्य-ग्रन्थ के रचयिता हैं [2010, 13]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त
(ग) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(घ) महादेवी वर्मा

(2) ‘श्रीकृष्णगीतावली’, ‘विनयपत्रिका’ और ‘कवितावली’ के रचयिता हैं- [2015]
(क) तुलसीदास
(ख) सूरदास
(ग) भूषण
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(3) ‘द्वापर’ के रचयिता हैं-
(क) महादेवी वर्मा
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(4) कौन-सी रचना भूषण की नहीं है ? [2013]
(क) शिवी बावनी
(ख) छत्रसाल दशक
(ग) शिवराज भूषण
(घ) रामचन्द्रिका

(5) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है-
(क) युगाधार
(ख) युगान्त
(ग) लोकायतन
(घ) वीणा

(6) अज्ञेय की रचना नहीं है–
(क) हरी घास पर क्षण भर
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) आँगन के पार-द्वार
(घ) दूध-बताशी

(7) कौन-सी रचना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की नहीं है ?
(क) प्रेम-फुलवारी
(ख) प्रेम-प्रलाप
(ग) प्रिय-प्रवास
(घ) प्रेम-सरोवर

(8) कौन-सी रचना महादेवी वर्मा की नहीं है ?
(क) सान्ध्यगीत
(ख) यामा
(ग) उर्वशी
(घ) नीरजा

(9) कौन-सी रचना सूरदास की नहीं है ?
(क) सूरसागर
(ख) सबद
(ग) सूरसारावली
(घ) साहित्य-लहरी

(10) कौन-सी रचना मैथिलीशरण गुप्त की नहीं है ?
(क) यशोधरा
(ख) पंचवटी
(ग) रसकलश
(घ) भारत-भारती

(11) धर्मवीर भारती ने लिखा है–
(क) अणिमा
(ख) अपरा
(ग) अन्धा-युग
(घ) अर्चना

(12) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है–
(क) परिमल
(ख) पल्लव
(ग) रश्मिबन्ध
(घ) स्वर्णधूलि

(13) ‘बहुत रात गये’ किस कवि का संकलन है ?
(क) नरेन्द्र शर्मा
(ख) भवानी प्रसाद मिश्र
(ग) गजानन माधव मुक्तिबोध’
(घ) गिरिजाकुमार माथुर

(14) ‘साहित्य-लहरी’ के रचनाकार हैं [2011]
(क) तुलसीदास
(ख) कबीरदास
(ग) सूरदास
(घ) मीरा

(15) कला और बूढ़ा चाँद’ के रचनाकार हैं-
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(16) ‘रस-विलास’ के रचनाकार हैं
(क) बिहारी
(ख) पद्माकर
(ग) आचार्य चिन्तामणि
(घ) सेनापति

(17) ‘पार्वतीमंगल’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) सूर
(ख) भूषण
(ग) तुलसी
(घ) रत्नाकर

(18) भूषण की रचना है
(क) रामचन्द्रिका
(ख) शिवा शौर्य
(ग) गीतावली
(घ) प्रेम सरोवर

(19) ‘कुरुक्षेत्र’ के रचयिता हैं
(क) अज्ञेय
(ख) प्रसाद
(ग) दिनकर
(घ) रत्नाकर

(20) मैथिलीशरण गुप्त की रचना है-
(क) सिद्धराज
(ख) नीरजा
(ग) उर्वशी
(घ) पारिजात

(21) ‘आँगन के पार द्वार’ के रचयिता हैं [2018]
(क) प्रसाद
(ख) रत्नाकर
(ग) अज्ञेय
(घ) दिनकर

(22) ‘अज्ञेय’ को ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ [2016]
(क) कितनी नावों में कितनी बार’ पर
(ख) ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ पर
(ग) ‘आँगन के पार द्वार पर।
(घ) ऐसा कोई घर आपने देखा है पर

(23) सुमित्रानन्दन पन्त को ज्ञानपीठ पुरस्कार उनकी रचना पर मिला था- [2015, 18]
(क) लोकायतन
(ख) युगान्त
(ग) कला और बूढ़ा चाँद
(घ) चिदम्बरा

(24) ‘भारत-भारती’ के कवि हैं [2012, 14]
(क) रामधारीसिंह ‘दिनकर’
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) महादेवी वर्मा

(25) महाकवि भूषण की वीर रस प्रधान रचना है [2011]
(क) चिदम्बरा
(ख) दीपशिखा
(ग) शिवा बावनी
(घ) कीर्तिलता

(26) ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता हैं [2012, 14]
(क) तुलसीदास
(ख) केशवदास
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) जयशंकर प्रसाद

(27) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना है– [2010]
(क) दोहावली
(ख) झरना
(ग) जूही की कली
(घ) पल्लव

(28) ‘उद्धवशतक’ के कवि का नाम है– [2011]
(क) सूरदास
(ख) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ग) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(29) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचना है [2012]
(क) उर्वशी
(ख) गुंजन
(ग) आँगन के पार द्वार
(घ) झरना

(30) ‘ग्राम्या’ के रचयिता हैं
(क) स० ही० वा० अज्ञेय
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(31) महादेवी वर्मा की रचना है [2010]
(क) रसवन्ती
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) भस्मांकुर
(घ) यामा

(32) ‘यामा’ रचना है [2010, 16]
(क) “अज्ञेय’ की
(ख) ‘दिनकर’ की
(ग) महादेवी वर्मा की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(33) ‘श्रावकाचार’ के रचयिता हैं
(क) देवसेन
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) विजयसेनसूरि
(घ) जिनधर्मसूरि

(34) निम्नलिखित में कौन-सी अज्ञेय की रचना नहीं है ?
(क) पूर्वा,
(ख) बावरा अहेरी
(ग) शैवाल
(घ) पल्लव

(35) ‘तुलसीदास’ के रचयिता हैं-
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) गोस्वामी तुलसीदास
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’

(36) ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ के कवि का नाम है–
(क) दलपत विजय
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) देवसेन
(घ) कुक्कुरिया

(37) ‘भक्तमाल’ के रचयिता हैं
(क) कुम्भनदास
(ख) नाभादास
(ग) नन्ददास
(घ) सुन्दरदास

(38) ‘कितनी नावों में कितनी बार’ रचना के कवि हैं [2015]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) स० ही० वा० ‘अज्ञेय’
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) धर्मवीर भारती

(39) निम्नलिखित में कौन-सा कवि राष्ट्रीय काव्यधारा का नहीं है ?
(क) दिनकर
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) अज्ञेय

(40) जयशंकर प्रसाद की रचना है-
(क) युगवाणी
(ख) अनामिका
(ग) लहर
(घ) साकेत

(41) निम्नलिखित में कौन प्रगतिवादी कवि नहीं हैं ?
(क) नागार्जुन
(ख) त्रिलोचन
(ग) केदारनाथ अग्रवाल
(घ) नेमिचन्द जैन

(42) ‘जयन्द्र प्रकाश’ किसकी रचना है ?
(क) दरबरदायी
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) भट्ट केदार
(घ) विद्यापति

(43) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ रीतिकाल का है ?
(क) साकेत
(ख) उद्धवशतक
(ग) रामचरितमानस
(घ) बिहारी सतसई

(44) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ भक्तिकाल का है ?
(क) पृथ्वीराज रासो
(ख) साकेत
(ग) कामायनी
(घ) विनयपत्रिका

(45) ‘आँसू’ की रचना किस कवि ने की ? (2010, 16)
(क) बिहारी
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) अज्ञेय

(46) निम्नलिखित में से रीतिकालीन कवि कौन-सा है ? [2016]
(क) मीराबाई
(ख) रसखान
(ग) घनानन्द
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(47) प्रयोगवाद के प्रवर्तक हैं [2012, 14]
(क) निराला
(ख) अज्ञेय
(ग) जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(48) निम्नलिखित में से कौन-सी भूषण की रचना नहीं है ? [2009]
(क) शिवा-बावनी
(ख) छत्रशाल दशक
(ग) शिवराज भूषण
(घ) रामचन्द्रिका

(49) निम्नलिखित में से किस कवि को राष्ट्र कवि को सम्मान प्राप्त हुआ ? [2009]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(50) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि रामभक्ति शाखा से सम्बन्धित नहीं है? [2009]
(क) तुलसीदास
(ख) नन्ददास
(ग) अग्रदास
(घ) नाभादास

(51) सही ( सुमेलित ) कीजिए [2010]
(क) भारत-भारती – महाकाव्य
(ख) प्रणभंग – चरितकाव्य
(ग) गीतिका – वीर काव्य
(घ) रश्मिरथी – खण्डकाव्य

(52) कबीर के दोहों को नाम से जाना जाता है [2012]
(क) दूहा
(ख) सबद
(ग) साखी
(घ) पद

(53) नवधा भक्ति के प्रकार हैं [2012]
(क) एक
(ख) तीन
(ग) आठ
(घ) नौ

(54) ‘साकेत’ की नायिका है [2012]
(क) यशोधरा
(ख) उर्मिला
(ग) राधा
(घ) द्रौपदी

(55) ‘दिनकर’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है
(क) ‘कुरुक्षेत्र’ पर
(ख) रश्मिरथी’ पर
(ग) ‘उर्वशी’ पर
(घ) ‘हुंकार’ पर

(56) ‘कामायनी’ में श्रद्धा सर्ग’ किस सर्ग के बाद है? [2012]
(क) आशा सर्ग
(ख) चिन्ता सर्ग
(ग) काम सर्ग
(घ) लज्जा सर्ग

(57) ‘संसद से सड़क तक’ किस कवि की रचना है ? [2012, 15]
(क) “मुक्तिबोध’
(ख) ‘नागार्जुन’
(ग) ‘धूमिल’
(घ) “अज्ञेय’

(58) निम्नलिखित में से किस काव्य-कृति पर ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला है ? [2012]
(क) चिदम्बरा
(ख) कितनी नावों में कितनी बार
(ग) उर्वशी
(घ) प्रियप्रवास

(59) ‘दोहाकोश’ के रचनाकार हैं [2014]
(क) शबरपा
(ख) लुइपा
(ग) सरहपा
(घ) कण्हपा

(60) रामधारीसिंह ‘दिनकर’ की रचना नहीं है [2016]
(क) रश्मिरथी
(ख) चक्रवाल
(ग) परशुराम की प्रतीक्षा
(घ) सुनहले शैवाल

(61) तुलसीदास की रचना नहीं है [2014]
(क) रामलला नहछु
(ख) पार्वती मंगल
(ग) कवितावली
(घ) रामचन्द्रिका

(62) ‘खालिक बारी’ के रचयिता हैं (2015, 16)
(क) कुशलनाथ
(ख) भट्ट केदार
(ग) मलिक मुहम्मद जायसी
(घ) अमीर खुसरो

(63) ‘नौका-विहार’ कविता अवतरित है [2015]
(क) ‘गुंजन’ से
(ख) वीणा’ से
(ग) “पल्लव’ से
(घ) युगान्त’ से

(64) ‘क्या भूलें क्या याद करू’ रचना की विधा है [2015]
(क) जीवनी
(ख) यात्रा वृत्तान्त
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण

(65) चन्दबरदाई की रचना है [2015]
(क) पृथ्वीराजरासो
(ख) खुमाणरासो
(ग) राउल वेल
(घ) जय मंयक जस चन्द्रिका

(66) अष्टछाप के कवि नहीं हैं [2015]
(क) सूरदास
(ख) कुम्भनदास
(ग) तुलसीदास
(घ) कृष्णदास

(67) रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि नहीं हैं [2015]
(क) जसवंत सिंह
(ख) याकूब खाँ
(ग) दलपति राय वंशीधर
(घ) घनानन्द

(68) ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष हैं [2015, 16]
(क) 1943 ई०
(ख) 1951 ई०
(ग) 1959 ई०
(घ) 1976 ई०

(69) ‘विद्यापति’ कवि हैं [2015]
(क) भक्तिकाल के
(ख) रीतिकाल के
(ग) आदिकाल के
(घ) आधुनिक काल के

(70) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की रचना है [2015]
(क) साकेत
(ख) पल्लव
(ग) प्रियप्रवास
(घ) गीत

(71) छायावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं [2015]
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(72) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्रदान किया गया (2015)
(क) कुरुक्षेत्र पर
(ख) उर्वशी पर
(ग) रेणुका पर
(घ) हुँकार पर

(73) हिन्दी प्रदीप के सम्पादक हैं [2016]
(क) प्रताप नारायण मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(74) ‘रामभक्ति शाखा’ के कवि नहीं हैं [2016]
(क) तुलसीदास
(ख) अग्र दास
(ग) नन्ददास
(घ) नाभादास

(75) बिहारी सतसई’ में दोहों की संख्या है– [2016]
(क) 719
(ख) 713
(ग) 719
(घ) 724

(76) ‘गंगावतरण’ काव्यकृति के रचयिता हैं [2016]
(क) अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’
(ख) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(77) कबीर के गुरु का नाम था [2016]
(क) वल्लभाचार्य
(ख) नरहरिदास
(ग) रामानन्द
(घ) रामकृष्ण परमहंस

(78) ‘सूरसागर’ के वय॑विषय का आधार है [2016]
(क) श्रीमद्भागवत
(ख) विष्णुपुराण
(ग) केनोपनिषद्
(घ) मनुस्मृति

(79) विद्यापति के पदों में कहीं-कहीं पुट है [2016]
(क) श्रृंगार का
(ख) भक्ति का
(ग) नीति का
(घ) प्रशास्त का

(80) ‘हरिवंशपुराण’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) देवसेन
(ख) विमलदेव सूरि
(ग) पुष्पदन्त
(घ) स्वयंभू

(81) वीरगाथाकाल की विशेषता है [2017]
(क) नारी का रूप-सौन्दर्य चित्रण
(ख) प्रकृति-चित्रण
(ग) युद्धों का सजीव चित्रण
(घ) मुक्तक काव्य-रचना

(82) अज्ञेय जी को निम्नलिखित में से किस वाद का प्रतीक माना जाता है?
(क) छायावाद
(ख) प्रगतिवाद
(ग) हालावाद
(घ) प्रयोगवाद

(83) निम्नलिखित में से रीतिबद्ध धारा के कवि कौन नहीं हैं? [2017]
(क) चिन्तामणि
(ख) मतिराम
(ग) द्विजदेव
(घ) पद्माकर

(84) हिन्दी साहित्य के आदिकाल के लिए ‘सिद्ध सापन्तकाल’ नाम दिया है [2017]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ग) रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(85) हिन्दी साहित्य के किस काल को स्वर्ण युग कहा जाता है? [2017]
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(86) ‘पारिजात’ किस कवि के गीतों का संकलन है? [2017]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(87) ‘अज्ञेय’ द्वारा सम्पादित सप्तकों की संख्या है [2017]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार

(88) किस कवि को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ नहीं मिला? [2017]
(क) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त को
(ग) जयशंकर प्रसाद को
(घ) महादेवी वर्मा को

(89) ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना हुई थी [2017]
(क) सन् 1935 में
(ख) सन् 1936 में
(ग) सन् 1938 में
(घ) सन् 1943 में

(90) मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कृति है [2017]
(क) प्रदक्षिणा’
(ख) “दानलीला’
(ग) “रसकलश’
(घ) “अतिमा

(91) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है [2017]
(क) पल्लव
(ख) स्वर्णधूलि
(ग) ग्रंथि
(घ) रसवन्ती

(92) अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ की रचना है– [2017]
(क) रसकलश
(ख) युगान्तर
(ग) ग्राम्य
(घ) हुंकार

(93) ‘प्रसाद’ की निम्न कृतियों में से एक कृति के नायक मनु हैं। वह कृति है
(क) प्रेम पथिक
(ख) झरना
(ग) कामायनी
(घ) कानन-कुसुम

(94) निम्न में से कौन मैथिलीशरण गुप्त की एक अनूदित रचना है [2017]
(क) मेघनाद वध
(ख) यशोधरा
(ग) प्रदक्षिणा
(घ) सिद्धराज

(95) कवि ‘हरिऔध’ का रस है [2017]
(क) करुण
(ख) श्रृंगार
(ग) भक्ति
(घ) वीर

(96) चित्राधार’ काव्य की भाषा है
(क) अवधी
(ख) ब्रज
(ग) कन्नौजी भोजपुरी
(घ) भोजपुरी

(97) कवि पन्त समाजवाद की ओर उन्मुख हुए [2017]
(क) ग्राम्या में
(ख) स्वर्णधूलि में
(ग) चिदम्बरा में
(घ) ग्रन्थि में

(98) ‘दिनकर’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। [2017]
(क) वर्ष 1970 में
(ख) वर्ष 1971 में
(ग) वर्ष 1972 में
(घ) वर्ष 1974 में

(99) निम्नलिखित में कौन प्रेमश्रयी शाखा के कवि नहीं हैं? [2017]
(क) जायसी
(ख) सूरदास
(ग) मंझन
(घ) कुतुबन

(100) कौन-सी रचना ‘अज्ञेय’ की नहीं है? [2017]
(क) बावरा अटेरी
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) इत्यलप्
(घ) रेणूका

(101) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ग्रन्थ है [2017]
(क) हुँकार
(ख) धूप के धान
(ग) कालजयी
(घ) चित्राधार

(102) ‘कामायनी’ में सर्गों की संख्या है [2017]
(क) बारह
(ख) चौदह
(ग) पन्द्रह
(घ) सत्रह

(103) जयशंकर प्रसादकृत ‘कामायनी’ किस प्रकार का काव्य है? [2018]
(क) खण्डकाव्य
(ख) महाकाव्य
(ग) मुक्तक काव्य
(घ) इनमें से कोई नहीं

(104) पन्त जी की किस रचना पर ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है? [2018]
(क) लोकायतन
(ख) पल्लव
(ग) चिदम्बरा
(घ) वीणा

(105) ‘आँगन के पार-द्वार’ रचना है [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद की
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) अज्ञेय की
(घ) सुमित्रानन्दन पंत की

(106) हिन्दी साहित्य के आदिकाल के लिए चारण काल नाम दिया है [2018]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ग) रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(107) ‘लहर’ के रचनाकार है [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) गिरिजा कुमार माथुर
(ग) हरिवंशराय बच्चन
(घ) सुमित्रानन्दन पंत

(108) निम्नलिखित में नई कविता’ के कवि हैं [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ग) जगन्नाथदास रत्नाकार
(घ) सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(109) हिन्दी साहित्य के किस काल को ‘पूर्व-मध्य काल कहा जाता है?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(110) ‘कामायनी’ रचना है (2018)
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” की।
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) जयशंकर प्रसाद की
(घ) मोहन अवस्थी की

(111) हिन्दी साहित्य के ‘आदिकाल’ के लिए बीज वपन’ नाम दिया है (2018)
(क) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ख) रामकुमार वर्मा ने
(ग) आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(112) कितनी नावों में कितनी बार’ काव्यकृति है (2018)
(क) सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की
(ख) हरिवंशराय बच्चन’ की
(ग) गिरिजा कुमार माथुर की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(113) कविता में चार चाँद लगाने वाली शक्ति है
(क) अभिधा
(ख) लक्षणा
(ग) व्यंजना
(घ) तात्पर्या

(114) ‘खुमान रासो’ के रचयिता हैं
(क) नरपति नाल्ह
(ख) दलपति विजय
(ग) चन्दबरदाई
(घ) जगनिक

(115) ‘रसिकप्रिया’ रचना है-
(क) मतिराम की
(ख) केशवदास की
(ग) नरपति नाल्ह की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(116) अग्रदास किस काव्यधारा के कवि हैं?
(क) कृष्ण काव्यधारा के
(ख) सूफी काव्यधारा के
(ग) वीर काव्यधारा के
(घ) राम काव्यधारा के

(117) पपीहों की वह पीन पुकार’ किसकी पंक्ति है?
(क) भारतेन्दु की
(ख) जयशंकर प्रसाद की
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त की
(घ) महादेवी की

(118) ‘प्रिय प्रवास’ काव्यकृति का मुख्य रस है
(क) संयोग श्रृंगार
(ख) करुण
(ग) वियोग श्रृंगार
(घ) शान्त

(119) ‘धर्म के प्रति अनास्था’ तथा ‘शोषक-वर्ग के प्रति घृणा’ प्रमुख विशेषता है
(क) “छायावाद’ की
(ख)’प्रगतिवाद’ की
(ग) ‘प्रयोगवाद’ की
(घ) “नयी कविता’ की

(120) ‘महाभारत’ के ‘शान्तिपर्व’ के कथानक पर आधारित ‘दिनकर’ की काव्यकृति है-
(क) रेणुका
(ख) ‘कुरुक्षेत्र
(ग) “सामधेनी
(घ) “हारे को हरिनाम

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 12
Chapter Name Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय)
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
दुग्ध उद्योग के अनुकूल भौगोलिक सुविधाओं का वर्णन कीजिए। यह उद्योग विश्व में कहाँ-कहाँ होता है?
या
संसार में डेयरी उद्योग के प्रमुख देशों का उल्लेख कीजिए।
या
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग के विकसित होने के उत्तरदायी कारकों की समीक्षा कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए-न्यूजीलैण्ड का डेयरी उद्योग।
या
टिप्पणी लिखिएडेनमार्क का डेयरी उद्योग।
या
डेनमार्क में दुग्ध-व्यवसाय की समीक्षा उपयुक्त भौगोलिक दशाओं तथा उत्पादन के परिप्रेक्ष्य में कीजिए।
उत्तर

दुग्ध व्यवसाय Dairying

दुग्ध व्यवसाय पालतू पशुओं पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण उद्योग है। दूध की गणना सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार के रूप में की जाती है। दूध का उपयोग मक्खन, घी, पनीर आदि बनाने में किया जाता है। दूध को सुखाकर उससे दुग्ध-चूर्ण भी बनाया जाता है। शाकाहारी लोगों के भोजन का यह मुख्य एवं आवश्यक अंग है। जिन देशों के निवासी मांसाहारी नहीं होते, वे अपने आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति दूध एवं उससे निर्मित पदार्थों से करते हैं। शीत भण्डारण व्यवस्था प्रारम्भ हो जाने के बाद इस उद्योग ने बहुत प्रगति की है। अब यह व्यवसाय उपभोक्ता केन्द्रों से दूरवर्ती स्थानों पर भी किया जाने लगा है। दूध मुख्य रूप से भेड़, बकरी, गाय तथा भैंसों से प्राप्त किया जाता है। दूध को गाढ़ा करके जमाकर या सुखाकर डिब्बों में बन्द कर विदेशों को भी निर्यात किया जाता है। इसे डेयरी उद्योग के नाम से पुकारा जाता है।

दुग्ध उद्योग के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ
Favourable Geographical Conditions for Dairying

दुग्ध उद्योग केवल उन्हीं देशों में किया जाता है, जहाँ इस उद्योग के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ उपलब्ध हैं। इस उद्योग के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाएँ होनी चाहिए –
(1) समशीतोष्ण जलवायु – दुग्ध उद्योग के लिए शीतशीतोष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। यह उद्योग शीतकाल में 10° से 17°सेग्रे ताप वाले प्रदेशों या आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में अधिक विकसित होता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. आर्द्र जलवायु में पशु अधिक हृष्ट-पुष्ट रहते हैं।
  2. यह जलवायु मुलायम एवं हरी घास को उपजाने में सहायक होती है।
  3. इस जलवायु में दूध तथा उससे निर्मित पदार्थ बहुत समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं, क्योंकि शीतशीतोष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु इन्हें खराब होने से बचाती है।
  4. समुद्री नम जलवायु पशुओं की वृद्धि एवं विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है, क्योंकि ऐसी जलवायु में पशु वर्ष भर खुले मैदानों एवं चरागाहों में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते रहते हैं तथा उनके रख-रखाव पर अधिक व्यय नहीं करना पड़ता।

(2) उत्तम नस्ल के पशु – दुग्ध उद्योग पालतू पशुओं पर आधारित है। पशु जितनी अच्छी नस्ल के एवं दुधारू होंगे, दुग्ध उद्योग उतनी ही तीव्रगति से विकसित होगा। भारत में कम दूध देने वाले पशुओं के कारण ही दुग्ध उद्योग अभी तक बहुत अच्छी दशा में विकसित नहीं हो पाया है, जबकि डेनमार्क एवं न्यूजीलैण्ड में दुधारू गायों के कारण यह उद्योग बहुत अधिक विकसित हुआ है। इन देशों में एक गाय प्रतिदिन 40 से 50 लीटर दूध दे देती है।

(3) उत्तम चरागाह – हरी घास पशुओं का प्रिय खाद्य पदार्थ है। पशु चरागाहों में स्वच्छन्द रूप से घास चरते एवं विचरण करते रहते हैं। यही कारण है कि जिन देशों में उत्तम तथा विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं, वहाँ दुग्ध उद्योग बहुत उन्नत दशा में है। डेनमार्क, नार्वे, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड आदि देश इसके उत्तम उदाहरण हैं।

(4) पौष्टिक चारा – हरी घास के अतिरिक्त पशुओं को हरा चारा (गाजर, शलजम, चुकन्दर), भूसा, खली आदि पौष्टिक तत्त्व भी पर्याप्त मात्रा में मिलने चाहिए। पशुओं से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए उन्हें जौ, जई तथा मक्का आदि खाद्य पदार्थ खिलाये जाते हैं। पौष्टिक चारा खाकर पशु अधिक दूध देने लग जाते हैं। भारत में पौष्टिक चारे के अभाव के कारण चौपाये कम दूध देते हैं।

(5) खपत – दूध एवं दूध से बने पदार्थों की माँग अर्थात् खपत, दूध उत्पादक क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में ही होनी चाहिए जिससे यथाशीघ्र दुग्ध पदार्थों को बाजारों में भेजा जा सके। डेनमार्क, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं न्यूजीलैण्ड में दुग्ध उद्योग की उन्नति का यह महत्त्वपूर्ण कारण है।

(6) आवागमन के सुलभ साधन – दूध एवं दूध से बने पदार्थों को उत्पादन केन्द्रों से उनके बाजार एवं खपत केन्द्रों तक भेजने के लिए सस्ते, द्रुतगामी एवं सुलभ परिवहन के साधन होने चाहिए। जिन देशों में यह सुविधा उपलब्ध है, वहाँ दुग्ध उद्योग उन्नत दशा में है। विदेशों को दूध से बने पदार्थ । निर्यात करने के लिए जल यातायात सुलभ होना चाहिए; क्योंकि यह अन्य साधनों से सस्ता एवं सुगम रहता है।

(7) शीत भण्डारों की व्यवस्था – दूध एवं दूध से बने पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए देश में ही पर्याप्त शीत भण्डारों की व्यवस्था होनी चाहिए। डेनमार्क में शीत भण्डारों की पर्याप्त व्यवस्था की गयी है।

(8) स्वच्छ पेयजल की उपलब्धि – पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में पीने तथा उनसे सम्बन्धित अन्य कार्यों के लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। यह जल नदियों एवं झीलों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है; अत: दुग्ध व्यवसाय के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धि का होना अत्यावश्यक है।

(9) सहायक उद्योगों की स्थापना – दुग्ध उद्योग उन क्षेत्रों में शीघ्रता से विकसित हो जाता है, जहाँ पशुओं पर आधारित मांस, चमड़ा, खाद, घी, मक्खन एवं पनीर बनाने के उद्योग केन्द्रित हो जाते हैं। सहायक उद्योगों के विकसित होने पर दुग्ध पदार्थों की लागत व्यय घट जाती है। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा डेनमार्क में सहायक उद्योगों की स्थापना के कारण डेयरी उद्योग का तीव्रगामी विकास हुआ है।

विश्व के प्रमुख दुग्ध उत्पादक देश
Main Milk Producing Countries in the World

दुग्ध उत्पादन एवं उसके उपभोग में भारी विषमता पायी जाती है। इसका उत्पादन विरल आबाद क्षेत्रों में एवं उपभोग सघन आबाद क्षेत्रों में अधिक होता है। मोटे तौर पर सम्पूर्ण विश्व के दुग्ध उत्पाद का 34.5% यूरोप से, 30% एंग्लो-अमेरिका से, 20% CIS देशों से, 12.8% एशियाई देशों से, 3.7% ओशेनिया व 2.1% अफ्रीका से प्राप्त होता है।

(1) भारत – 1966 के बाद से भारत दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लि० प्रयास कर रहा था परन्तु इस देश को सफलता 1970 में लागू श्वेत क्रान्ति के बाद मिली। वर्तमान समय में यह विश्व का प्रथम दुग्ध उत्पादक देश है। भारत में गुजरात एवं उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्य हैं। सार्वजनिक एवं सहकारी क्षेत्र में यह व्यवसाय निरन्तर उन्नति कर रहा है।

(2) संयुक्त राज्य अमेरिका – यहाँ विश्व का 15% दूध, 8% मक्खन एवं 18% से अधिक पनीर उत्पादन किया जाता है। देश में 2.5 करोड़ से अधिक गाय हैं। विस्कांसिन, मिनीसोटा, न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क, पेन्सिलवेनिया, ओहियो, मिशिगन, मैरीलैण्डे तथा डेलावेयर राज्यों में दुग्ध उत्पादन विशेष विकसित है। यहाँ विस्तृत चरागाह, खाद्यान्नों को चारे के रूप में उपयोग, उत्तम पशु नस्लों का विकास, उत्तम वैज्ञानिक साधन एवं प्राविधिकी का प्रयोग, दुग्ध पदार्थों के निर्यात की सुविधाएँ आदि सुलभ होने के कारण दुग्ध व्यवसाय उन्नत है। यहाँ कुल दूध का 45% ताजे दूध, 35% मक्खन, 6% पनीर, 5% पाउडर, 6% संघनित (Condensed) रूप एवं आइसक्रीम बनाने में तथा शेष 3% पशुओं को पिलाने में प्रयुक्त होता है।

(3) पूर्व सोवियत संघ – यहाँ विश्व का 20% से अधिक दुग्ध, 18% से अधिक मक्खन एवं 13% से अधिक पनीर उत्पादन होता है। विशाल दुग्ध संयन्त्रों में क्रीम, दही, मक्खन, पनीर, गाढ़ा दूध एवं पाउडर दूध बनाये जाते हैं। यूक्रेन, अजरबैजान, जार्जिकया, एस्टोनिया आदि देशों में दुग्ध व्यवसाय विशेषत: प्रचलित है। पुगाचेव तथा कुइबी शेव में दुग्ध पाउडर बनाने के संयन्त्र स्थापित हैं।

(4) फ्रांस – यहाँ विश्व का 5% दूध तथा मक्खन एवं 10% पनीर उत्पादन होता है। औद्योगिक व सघन आबाद देश होने के कारण यहाँ दूध की बहुत माँग रहती है। शीतोष्ण जलवायु गो-पालन के लिए उपयुक्त है।
(5) जर्मनी – इस औद्योगिक, सघन आबाद देश में भी दूध की भारी माँग रहती है। वैज्ञानिक ढंग से गो-पालन करने से अधिक मात्रा में दूध उत्पादन होता है। यहाँ समस्त विश्व का लगभग 6% दूध प्राप्त होता है।
(6) पोलैण्ड – शीतोष्ण जलवायु तथा स्टेपी घास के प्रदेश होने के कारण यह देश गौ-पालन में यूरोप में तृतीय तथा दूध उत्पादन में (विश्व का 2.5% दूध) विश्व का दसवाँ देश है।

(7) हॉलैण्ड – प्राचीन काल से ही यहाँ रेतीली व दलदली पोल्डर भूमि में चरागाहों की प्रचुरता के कारण दुग्ध व्यवसाय विकसित है। इस देश का ‘एडाम पनीर’ विश्व विख्यात है। यहाँ विश्व का 2% दूध उत्पादन होता है। रॉटरडम के उत्तर में गोदा स्थान पर पनीर व्यवसाय उन्नत है। मक्खन, पनीर व संघनित दूध देश के प्रमुख निर्यात हैं।

(8) डेनमार्क – यूरोपीय देशों में डेनमार्क का दुग्ध व्यवसाय विख्यात है। यहाँ पदार्थों की मात्रा के बजाय गुण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ डेयरी व्यवसाय सहकारिता पर आधारित है। अनुर्वर भूमि होने के कारण यहाँ कृषि अविकसित है, खनिज संसाधनों का भी अभाव है; अतएव देश की अर्थव्यवस्था में दुग्ध व्यवसाय का विशेष महत्त्व है। मक्खन व पनीर के निर्यात से राष्ट्रीय आय का बड़ा भोग प्राप्त होता है। कुल दूध उत्पादन का 88% मक्खन तथा 10% पनीर बनाने व शेष की घरेलू खपत है।”
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग की उन्नति के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  1. डेनमार्क की समशीतोष्ण जलवायु दुग्ध उद्योग एवं पशुधन विकास के लिए बहुत श्रेष्ठ एवं अनुकूल है। ऐसी जलवायु में दूध एवं उससे निर्मित पदार्थ शीघ्र खराब नहीं होते।
  2. डेनमार्क में हरी घास के विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं, क्योकि डेनमार्क का पहाड़ी-पठारी धरातल घास उत्पादन के अधिक अनुकूल है तथा वहाँ घास उगाने की पूर्ण व्यवस्था कर ली गयी है।
  3. यहाँ पर छोटे-छोटे खेत कृषि-कार्य के लिए अनुपयुक्त हैं; अतः उन पर चारे वाली फसलें ही अधिक उगायी जाती हैं। इस प्रकार पशुओं को पौष्टिक चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाता है।
  4. डेनमार्क में उत्तम नस्ल की अधिक दूध देने वाली गायें पाली जाती हैं। एक गाय औसतन एक दिन में 40-50 लिटर दूध देती है। इन गायों का दूध मशीनों से दूहा जाता है।
  5. डेनमार्क में दुग्ध उद्योग का 90% कार्य 9 हजार सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है; अतः यहाँ उत्पादन की श्रेष्ठता पर विशेष ध्यान रखा जाता है।।
  6. डेनमार्क में दुग्ध उत्पादित मक्खन एवं पनीर की माँग विदेशों में बहुत अधिक रहती है, जिससे इस उद्योग को बहुत प्रोत्साहन मिला है।
  7. यहाँ का लगभग 80% दूध मक्खन बनाने में तथा 10% दूध पनीर में प्रयुक्त किया जाता है।

(9) ऑस्ट्रेलिया – ऑस्ट्रेलिया में विक्टोरिया व न्यू साउथ वेल्स प्रान्तों में व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक विधियों द्वारा गौ-पालन किया जाता है। यहाँ विस्तृत पशु फार्म, उत्तम नस्लें, प्रशीतन सुविधाओं तथा विस्तृत कृषि द्वारा चारा उगाने की व्यवस्था है। इसी कारण दुग्ध पदार्थों के निर्यात में ऑस्ट्रेलिया को विश्व में चतुर्थ स्थान प्राप्त है।

(10) न्यूजीलैण्ड – न्यूजीलैण्ड में दूध व्यवसाय का विकास उत्तरी द्वीप के आर्द्र भागों में हुआ है। टारानाकी मैदान, जिसबोर्न तथा ऑकलैण्ड क्षेत्र में, विशेष रूप से दुग्ध व्यवसाय विकसित है। इस द्वीपीय देश की आर्द्र शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, उत्तम नस्लों की गाय, विरल जनसंख्या, ब्रिटिश पूँजी तथा संरक्षण का लाभ प्राप्त होने के कारण यह व्यवसाय उन्नत हो गया है। दुग्ध पदार्थों के निर्यात से राष्ट्रीय आय की प्राप्ति होती है।

(11) दक्षिणी अमेरिका के देशों में प्रतिवर्ष 2 करोड़ 46 लाख मीट्रिक टन दूध उत्पादन होता है। महाद्वीप के कुल उत्पादन का 35% ब्राजील में तथा 30% के लगभग अर्जेण्टाइना में होता है। अधिक जनसंख्या के कारण ब्राजील में स्थानीय उपभोग अधिक होता है। अर्जेण्टाइना विश्व में दुग्ध पदार्थों के व्यापार में प्रमुख देश है। यहाँ पम्पा के समशीतोष्ण धारा के प्रदेशों में बड़े-बड़े पशु फार्मों पर व्यवस्थित ढंग से पशुपालन किया जाता है।
अन्य देशों में चीन, टर्की, मलेशिया, मैक्सिको, युगाण्डा, केन्या, तन्जानिया आदि में दुग्ध व्यवसाय विकसित किया जा रहा है।

प्रश्न 2
विश्व में मांस व्यवसाय के लिए आवश्यक दशाओं तथा उत्पादक देशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

गोमांस Beef

विश्व में कुल मांस का 47% गाय व बछड़ों से प्राप्त होता है। गोमांस उत्पादन के लिए वे सभी भौगोलिक दशाएँ उपयुक्त होती हैं जो दुग्ध व्यवसाय के लिए आवश्यक हैं; संयुक्त राज्य, पूर्व सोवियत संघ, अर्जेण्टाइना, ब्राजील, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया एवं पश्चिमी जर्मनी प्रमुख गोमांस उत्पादक देश हैं।

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – यहाँ विश्व का 20.7% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है। गो-पालन का पूर्वारम्भ यहाँ देश के उत्तरी-पूर्वी (न्यू-इंग्लैण्ड) राज्यों में किया गया, जो क्रमशः पश्चिमी मैदान की ओर स्थानान्तरित हुआ। मक्का की पेटी एवं टैक्सास राज्य में मांस वाले मवेशियों की संख्या अधिक है। शिकागो विश्व की सबसे बड़ी मांस की मी हाँ प्रति घण्टे 2,500 पशु वध की व्यवस्था है। ओमाहा, कन्सास फ्टिी, साउथ सेन्टपॉल, डेनवर आदिनमर गोमांस के प्रमुख केन्द्र हैं।

(2) ब्राजील – गौमांस उत्पादन में ब्राज़ील विश्व में द्वितीय स्थान पर है, यद्यपि कुल मांस उत्पादन में कालस्थान है।हाँ विश्व का लगभग 12.2% गोमांस प्राप्त होता है। देश के दक्षिणी भाग, ब्राजीलिया पठारावे, तटीय-भाग मुख्य पशुपालक प्रदेश हैं। रायोग्रान्डे में पैकिंग संयन्त्र स्थापित हैं तथा अधिकांश निर्यात अहीसे होता है।

(3) चीन – यहाँ विश्व को 11.4% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है। अधिकांश उत्पादन यहाँ स्थानीय उपभोग के लिए होता है।
(4) भारत – विश्व के गोमांस उत्पादकों में भारत चौथे स्थान पर है। यद्यपि भारत में गायों की संख्या अधिक है तथापि धार्मिक कारणों से यहाँ विश्व का लगभग 4.6% गोमांस ही उत्पादित होता है।

(5) अर्जेण्टाइना – मांस उत्पादन में विश्व का पाँचवाँ गोमांस उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 4.6% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है जो देश के कुल मांस का 80% है। यहाँ मांस वाले मवेशी अधिक संख्या में पाले जाते हैं। अधिक मांस प्रदान करने वाली उत्तम नस्लों को प्राथमिकता दी जाती है। चाको व पम्पा प्रदेश की शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, अल्प जनसंख्या, अल्फाल्फा चारे का उत्पादन आदि उत्तम भौगोलिक सुविधाएँ ही मांस उत्पादन के लिए प्रेरक हैं। यह देश संसार के कुल मांस का 30% निर्यात व्यापार करता है। ब्यूनस आयर्स तथा रोजारियो मांस की प्रमुख मण्डियाँ हैं।

(6) ऑस्ट्रेलिया – यह गोमांस उत्पादन में विश्व में सातवें स्थान पर है। यहाँ विश्व का % गोमांस उत्पादन होता है। क्वीन्सलैण्ड राज्य के पूर्वी तटीय भाग, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया एवं पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में विस्तृत पशु फार्म पाये जाते हैं। एक फार्म में प्राय: 50 हजार पशु रखे जाते हैं। विन्ढम तथा टाउन्स विले प्रमुख गोमांस की मण्डियाँ हैं। जनसंख्या अल्प होने के कारण मांस के निर्यात व्यापार में ऑस्ट्रेलिया का विशेष योगदान है।

(7) CIS देश – यहाँ विश्व का 4% गोमांस उत्पादन होता है। यूरोपीय रूस में क्रास्नोदर, विन्नित्सा, ब्रियांस्क, लेनिनग्राड, मास्को आदि एवं एशिया में कारागण्डा, अल्माटुआटा, दुशानबे, फुन्जे, खाबरोव्स्क, अशखाबाद, इर्कुट्स्क, ओमस्क, पेट्रोपावलोव्स्क, सेमि-पलातिंस्क, ओर्क, स्वर्डलोव्स्क, लेनिनाबाद, बाकू आदि प्रमुख गोमांस केन्द्र हैं। यहाँ मांस हिमीकरण (freezing), डिब्बाबन्दी (canning), तथा पैकिंग के संयन्त्र स्थित हैं।

(8) फ्रांस – यहाँ विश्व का लगभग 3% गोमांस प्राप्त होता है।
(9) जर्मनी – यहाँ विश्व का 2.5% गोमांस प्राप्त होता है।
(10) न्यूजीलैण्ड – यहाँ गो-पालन मांस के उद्देश्य से अधिक किया जाता है। उत्तरी द्वीप की जलवायु गायों के लिए उपयुक्त है। ऑकलैण्ड एवं वेलिंगटन मांस की प्रमुख मण्डियाँ व पत्तन हैं।
अन्य उत्पादकों में कनाडा, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान आदि हैं।

विश्व व्यापार World Trade
गोमांस के निर्यातक देशों में अर्जेण्टाइना प्रथम है। न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, डेनम, संयुक्त राज्य अन्य निर्यातक देश हैं। यूरोपीय देश मांस के प्रमुख आयातक हैं। जर्मनी, फ्रांस, इटली व ब्रिटेन प्रमुख आयातक हैं।

सूअर का मांस Pork

विश्व के कुल मांस उत्पादन में लगभग 44% सूअर का मांस ही है। धार्मिक कारणों से मुस्लिम देशों को छोड़कर विश्व में सर्वत्र सूअर पालन होता है। प्रायः सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में सूअर पालन अधिक प्रचलित है, क्योंकि इसकी प्रजनन शक्ति तीव्र होती है, यह सड़े-गले फेंके गये भोजन, विष्ठा, मलआदि से पेट भर लेता है। डेयरी व्यवसाय वाले क्षेत्रों में मक्खन-रहित दूध तथा मक्का खिलाकर व्यवस्थित रूप से सूअर पालन किया जाता है।
सूअर पालन के क्षेत्र – विश्व के प्रमुख सूअरपालक देश चीन, सोवियत रूस, संयुक्त राज्य, यूरोपीय देश एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील तथा अर्जेण्टाइना हैं।

  1. चीन – विश्व में सूअर मांस उत्पादकों में चीन का प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व का लगभग 47% सूअर मांस उत्पादन होता है। देश का 80% मांस सूअर से ही प्राप्त होता है। चीन के सभी प्रान्तों में सूअर पालन होता है, किन्तु अनाहवेई, क्वांगतुंग, जेचवान तथा होपे प्रान्तों में विशेष रूप से सूअर पाले जाते हैं। प्राय: प्रत्येक कृषक परिवार अपनी खाद्य आवश्यकता की पूर्ति के लिए सूअर पालता है।
  2. संयुक्त राज्य – मक्का की पेटी के क्षेत्र में सूअरपालन अधिक किया जाता है। ओहियो का सिनसिनाती नगर सूअर मांस की विश्व प्रसिद्ध मण्डी है। आयोवा, इलीनोयस, कन्सास, नेब्रास्का व इण्डियाना राज्य भी सूअर मांस उत्पादन में उल्लेखनीय हैं। मांस पैकिंग के प्रमुख केन्द्र सिनसिनाती, शिकागो, सेंट लुई, कन्सास सिटी, ओकलाहीमा तथा मिलबँकी हैं। यहाँ से चर्बी (lard) का भी निर्यात किया जाता है। लार्ड हॉग केन्द्र से संयुक्त राज्य का 30% तथा विश्व का 9.5% सूअर मांस प्राप्त होता है।
  3. रूस – यह विश्व का द्वितीय सूअर मांस उत्पादक देश है। यहाँ से विश्व का 14% सूअर मांस प्राप्त होता है जो देश के कुल मांस उत्पादन का 40% है। यूरोपीय रूस में सूअर पालन अधिक प्रचलित है।

यूरोपीय देशों में जर्मनी, ब्रिटेन, पोलैण्ड, फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन व यूगोस्लाविया आदि देश सूअर पालन में उल्लेखनीय हैं। जर्मनी के दक्षिणी-पश्चिमी वन प्रदेशों में, यूगोस्लाविया के ओक तथा बीच के वनों में, बाल्टिक तटवर्ती जौ उत्पादक क्षेत्रों में, दक्षिणी-पश्चिमी फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, दक्षिणी इंग्लैण्ड तथा वेल्स में सूअर मांस उत्पादन होता है।
अन्य उत्पादकों में ब्राजील, मैक्सिको, दक्षिणी अफ्रीका, अर्जेण्टाइना, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड हैं। भारत में भी सूअर पालन किया जाता है।

विश्व व्यापार World Trade
सूअर-मांस के मुख्य निर्यातक देश संयुक्त राज्य, जर्मनी, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना व ऑस्ट्रेलिया हैं। आयातक देशों में ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम व अन्य यूरोपियन देश हैं। सूअर के बालों के निर्यात में चीन तथा पूर्व सोवियत संघ महत्त्वपूर्ण देश हैं।

भेड़ व बकरी का मांस Mutton

भेड़ तथा बकरीपालन के तीन उद्देश्य होते हैं-

  1. दूध
  2. ऊन तथा
  3. मांस प्राप्ति।

बकरी से दूध व मांस तथा भेड़ से मांस व ऊन प्राप्त होती है। विभिन्न उद्देश्यों के लिए भिन्न किस्म की भेड़े पाली जाती हैं। 90% मांस (Mutton) भेड़ से प्राप्त होता है। भेड़पालन का कार्य मुख्य रूप से विश्व के शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क मरुस्थलीय पठार एवं पर्वतीय भागों में किया जाता है। प्रायः विरल जनसंख्या तथा विस्तृत क्षेत्रफल वाले देशों में भेड़पालन किया जाता है। भेड़ का मांस गोमांस तथा सूअर के मांस की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण होता है।

संसार में मांस उत्पादन के क्षेत्र
Production Areas of Mutton in World

मांस तथा ऊन वाली भेड़े पृथक् नस्लों की होती हैं, किन्तु अब दोगली नस्लें विकसित की गयी हैं। जिनसे ऊन व मांस दोनों ही प्राप्त होते हैं। मटन उत्पादक देशों में न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेण्टाइना, संयुक्त राज्य, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, दक्षिणी अफ्रीका संघ तथा उरुग्वे प्रमुख हैं। भेड़पालन विरल आबाद क्षेत्रों में प्रचलित है, क्योंकि-

  1. भेड़ शुष्क, अनुर्वर, असमतल तथा बीहड़ क्षेत्रों में भी रह सकती है।
  2. अत्यन्त छोटी व कठोर घास पर भी यह गुजर कर लेती है।
  3. ये तीव्र पहाड़ी ढालों पर भी चर सकती हैं। भेड़ के अतिरिक्त केवल बकरी ही ऐसे क्षेत्रों में चर सकती है।
  4. भेड़ के लिए प्राकृतिक चारा ही पर्याप्त होता है। इसे अन्न नहीं खिलाना पड़ता।
  5. इसे चराने में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता नहीं है।
  6. फाकलैण्ड, आइसलैण्ड, पैटेगोनिया और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में कृषि या अन्य व्यवसाय पनप नहीं सके, भेड़पालन ही आजीविका को मुख्य साधन है।

CIS देश – यूरोपीय भाग में काकेशियाई प्रदेश तथा एशियाई भाग में रूसी तुर्किस्तान में दोगली नस्लों द्वारा मांस तथा ऊन प्राप्त किया जाता है। कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किरगिजस्तान, जार्जिया, अजरबैजान एवं साइबेरिया के दक्षिणी भाग तथा यूराल प्रदेश भेड़पालन के मुख्य क्षेत्र हैं।

  1. चीन – यहाँ विश्व का 56% भेड़-मांस प्राप्त किया जाता है। चीनी-तुर्किस्तान, भीतरी मंगोलिया, मंचूरिया तथा युन्नान के पठार पर भेड़पालन अधिक किया जाता है।
  2. ऑस्ट्रेलिया – यहाँ विश्व की सर्वाधिक भेड़े पाली जाती हैं, किन्तु यहाँ भेड़पालन का मुख्य उद्देश्य ऊन प्राप्ति है। अतः यहाँ मांस उत्पादन कम होता है। फिर भी यहाँ विश्व का लगभग 9% भेड़-मांस उत्पन्न किया जाता है जो यहाँ के कुल मांस उत्पादन का 21% है। यहाँ पश्चिमी अर्द्ध-मरुस्थल एवं ग्रेट डिवाइडिंग रेंज के पर्वतीय भाग पर पशुपालन किया जाता है।
  3. न्यूजीलैण्ड – यह छोटा सा द्वीपीय देश संसार में मटन उत्पादन में तृतीय स्थान पर है। यहाँ विश्व का 7% से अधिक मटन उत्पन्न होता है, जो इस देश के कुल मांस उत्पादन को 53% है। यह विश्व के प्रमुख मटन निर्यातक देशों में से है। दक्षिणी द्वीप के केन्टरबरी मैदान में उत्तम चरागाहों में मटने वाली एवं उत्तरी द्वीप के दक्षिणी भाग में भी ऊन वाली भेड़े पाली जाती हैं।
  4. संयुक्त राज्य – यहाँ विश्व का लगभग 2% भेड़ मांस प्राप्त किया जाता है। यहाँ पश्चिमी पर्वतीय तथा पठारी भागों पर भेड़े चराई जाती हैं। टैक्सास राज्य का एडवर्ड पठार भी भेड़ चारण के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। संयुक्त राज्य में भेड़पालन मुख्यतः ऊन प्राप्ति के लिए होता है। यहाँ भेड़ों को मक्का, जौ, विशिष्ट घासे खिलाकर हृष्ट-पुष्ट किया जाता है। भेड़ मांस उत्पादन में इलिनोयस, ओहियो, इण्डियाना, आयोवा, टैक्सास, कैलीफोर्निया तथा कोलोरेडो राज्य महत्त्वपूर्ण हैं।

अन्य उत्पादकों में अर्जेण्टाइना, दक्षिणी अफ्रीका, भारत, बोलीविया, मैक्सिको, पीरू, टर्की, पाकिस्तान, ईरान आदि हैं। यूरोपीय देशों में, ग्रीस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल व रोमानिया मुख्य भेड़पालक देश हैं।
विश्व व्यापार World Trade
मटन के निर्यातक देशों में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना, दक्षिणी अफ्रीका व संयुक्त राज्य हैं। आयातक देशों में फ्रांस व ब्रिटेन आदि यूरोपीय देश प्रमुख हैं।

प्रश्न 3
विश्व में ऊन व्यवसाय का वर्णन कीजिए।
या
ऑस्ट्रेलिया के भेड़-पालन का वर्णन कीजिए। [2007, 13]
उत्तर
ऊन – पशुओं से अनेक प्रकार के रेशेदार पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनमें ऊन सबसे महत्त्वपूर्ण है। ऊन से वस्त्र, कम्बल, कालीन, गलीचे, शाल-दुशाले, नमदे आदि बनाये जाते हैं। ऊन प्रदान करने वाले पशुओं में भेड़, बकरी, ऊँट, याक, अल्पाका, लामा तथा विकुना आदि हैं। संसार की 90% से अधिक ऊन भेड़ से ही प्राप्त होती है।

भेड़पालन का कार्य अनेक प्रकार की जलवायु में किया जाता है। उत्तम ऊन वाली भेड़ों के लिए चूना पत्थरयुक्त भूमि तथा शुष्क उपोष्ण अथवा शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। इनके लिए 10°C शीतकालीन तापमान, 20°C से 40°C ग्रीष्मकालीन तापमान, 50 से 75 सेमी वर्षा उपयुक्त रहती है। 25 सेमी से कम वर्षा होने पर घास सूख जाती है तथा 75 सेमी से अधिक वर्षा होने पर भेड़ को खुरपका नामक रोग लग जाता है। उत्तम ऊन इंग्लिश, मेरिनो एवं दोगली नस्ल की भेड़ों से प्राप्त होती है।

ऊन के उत्पादक क्षेत्र
Production Areas of Wool

विश्व के समस्त ऊन उत्पादन का 30% अकेले ऑस्ट्रेलिया से प्राप्त होता है। अन्य प्रमुख ऊन उत्पादक देश चीन, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना, ब्रिटेन, यूक्रेन, रूस, दक्षिणी अफ्रीका, उरुग्वे, तुर्की, भारत आदि हैं।

विश्व में ऊन का वार्षिक उत्पादन
Annual Production of Wool in the World

दक्षिणी गोलार्द्ध के देश संसार का लगभग 2/3 ऊन उत्पादन करते हैं। यहाँ शीतोष्ण व शुष्क पठारी भागों की जलवायु भेड़पालन के लिए उपयुक्त है। यहाँ विस्तृत चरागाह एवं विरल जनसंख्या के कारण कृषि या अन्य व्यवसायों की अपेक्षा पशुचारण विकसित है। इन देशों में यूरोपीय उपनिवेशकों द्वारा वैज्ञानिक तथा प्राविधिक ज्ञान एवं पूँजी की सहायता से व्यवस्थित सबसे अधिक पशुचारण का विकास हुआ है।

(1) ऑस्ट्रेलिया – यहाँ विस्तृत फार्मों पर भेड़पालन किया जाता है। भेड़ों की सुरक्षा के लिए फार्मों पर लोहे के तार तथा जालियाँ लगाई जाती हैं। यहाँ अधिकांश भेड़े ग्रेट डिवाइडिंग रेन्ज के पश्चिम की ओर एक अर्द्ध-चन्द्राकार क्षेत्र में केन्द्रित हैं। यहाँ अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ऊन उद्योग पर्याप्त विकसित है। ऑस्ट्रेलिया में अधिकांश भेड़े उत्तम ऊन-प्राप्ति के उद्देश्य से पाली जाती हैं। न्यूसाउथ वेल्स, विक्टोरिया तथा क्वीन्सलैण्ड राज्यों में भेड़पालन अधिक होता है। ऊन उत्पादन के मुख्य केन्द्र सिडनी, मेलबोर्न, जीलॉग, एलबरी, ब्रिस्बेन आदि हैं। समस्त उत्पादन का 85% ऊन निर्यात कर दिया जाता है, जिसका आधा भाग ब्रिटेन आयात करता है।

(2) न्यूजीलैण्ड – यहाँ विश्व की 16.4% ऊन प्राप्त होती है। दक्षिणी द्वीप के केन्टरबरी मैदान तथा दक्षिणी आल्प्स के पूर्वी ढलानों पर भेड़े चराई जाती हैं। विरल जनसंख्या, शीतोष्ण जलवायु एवं विषम धरातल के कारण यहाँ पशुचारण व्यवसाय समुन्नत है। यहाँ अंग्रेज रोमनीमार्श तथा लीसेस्टर नस्लें लाये थे। तदुपरान्त मेरिनो व इंग्लिश नस्लों के मिश्रण से दोगली नस्लें विकसित की गयीं। अधिकांश ऊन ब्रिटेन को निर्यात होती है।

(3) चीन – यहं विश्व का तीसरा बड़ा ऊन उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का लगभग 11.2% ऊन प्राप्त किया जाता है। सीक्यांग, आन्तरिक मंगोलिया, मंचूरिया, शांतुंग एवं युन्नान प्रान्तों में भेड़पालन अधिक किया जाता है।

(4) यूनाइटेड किंगडम – यहाँ भेड़पालन तथा ऊन उत्पादन बहुत प्राचीन समय से प्रचलित रहा है। पिनाइन प्रदेश, वेल्स पर्वत, दक्षिणी-पूर्वी इंग्लैण्ड के खड़िया (Chalk) तथा चूना-पत्थर (Limestone) के प्रदेश एवं स्कॉटिश उच्च प्रदेश पर भेड़पालन किया जाता है। यहाँ की इंग्लिश नस्लों की भेड़े विश्वविख्यात हैं। यहाँ विश्व की 2.5% ऊन प्राप्त होती है।

(5) अर्जेण्टाइना – यह विश्व का पाँचवाँ प्रमुख ऊन उत्पादक देश है। यहाँ विश्व की 2.3% ऊन प्राप्त होती है। पैटेगोनिया के पठारी भाग भेड़पालन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र हैं।

(6) दक्षिणी अफ्रीकां – यहाँ विश्व की लगभग 4% ऊन प्राप्त होती है। यहाँ मेरिनो जाति की उत्तम भेड़े पाली जाती हैं। ड्रेकन्सबर्ग पर्वतों की तलहटी तथा कास के शुष्क पठारी भागों में भेड़पालन किया जाता है। केप प्रान्त, ट्रांसवाल, ऑरेन्ज फ्री-स्टेट आदि राज्यों में ऊन उत्पादन किया जाता है। केपटाउन, डरबन तथा पोर्ट एलिजाबेथ पत्तनों से ऊन निर्यात की जाती है।

(7) तुर्की – यहाँ विश्व की 1.3% ऊन प्राप्त होती है। यहाँ भी उत्तम किस्म की मेरिनो भेड़े पाली जाती हैं। एशिया माइनर के पठारी भाग भेड़ चराने के लिए उत्तम हैं।

प्रश्न 4
मत्स्याखेट के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए तथा विश्व में मछली पकड़ने वाले प्रमुख क्षेत्र भी बताइए। [2007]
या
उत्तरी गोलार्द्ध के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का विवरण लिखिए।
या
विश्व में मत्स्य उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(i) दो प्रमुख मत्स्य उद्योग क्षेत्र,
(ii) उत्पादन,
(iii) व्यापार। [2010]
या
उत्तरी प्रशान्त महासागर के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का विवरण लिखिए। [2008]
या
विश्व के मत्स्य संसाधनों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) अनुकूल दशाएँ
(ख) विश्व के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।
उत्तर

मत्स्याखेट के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ
Favourable Geographical Conditions for Fishing

मछली-व्यवसाय के लिए निम्नलिखित भौगोलिक (दशाएँ) सुविधाएँ आवश्यक होती हैं –

  1. समशीतोष्ण जलवायु – समशीतोष्ण जल मछलियों का प्रमुख निवास स्थान है तथा इस जल- राशि की मछलियाँ अधिक पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होती हैं। पश्चिमी यूरोपीय तट इसका मुख्य उदाहरण है।
  2. सागर का उथला होना – महाद्वीपीय मग्न तट पर, जिनकी गहराई 180 मीटर तक होती है, मछलियों की उत्पत्ति के सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र होते हैं। विश्व में ऐसे सागर तटों पर सबसे अधिक मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।
  3. ताजे जल की प्राप्ति – जिन भागों में नदियाँ सागरों से मिलती हैं, वहाँ सदैव ताजे जल का स्रोत बना रहता है। इस क्षेत्र के जल में फॉस्फेट तथा नाइट्रोजन की काफी मात्रा मिली रहती है। ये क्षेत्र मछलियों के अण्डे देने के प्रमुख क्षेत्र होते हैं; अतः यहाँ पर मछलियों को पकड़ना बड़ा ही सुविधाजनक होता है।
  4. खाद्य सामग्री की उपलब्धि – ‘प्लैंकटन’ (Plankton) एक प्रकार की काई है, जो मछली का प्रिय भोजन होता है। छिछले सागरीय जल में जहाँ सूर्य की किरणें नीचे तल तक (180 मीटर की गहराई तक) पहुँच जाती हैं, वहाँ प्लैंकटने भारी मात्रा में उत्पन्न होती है। यह नदियों के मुहानों पर अधिक मिलती है। अत: इन भागों में मछलियों को अधिक पकड़ा जाता है।
  5. सूर्य के प्रकाश की प्राप्ति – सूर्य का प्रकाश जल में 180 मीटर की गहराई तक ही पहुँच पाता है; अत: इस भाग में ‘प्लैंकटन’ की उत्पत्ति पर्याप्त मात्रा में होती है। यही कारण है कि छिछले सागर तटों पर मछलियाँ अधिक पकड़ी जाती हैं।
  6. गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं का मिलन-स्थल – गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं के मिलन-स्थल मछली पकड़ने के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन गये हैं। इनके मिलन से मछलियों के भोज्य पदार्थ-‘प्लैंकटन’- की पर्याप्त मात्रा में उत्पत्ति होती है। उदाहरणार्थ-जापान के तट पर क्यूरोसिवो की गर्म एवं क्यूराइल की ठण्डी जलधाराओं के मिलने से कोहरे की उत्पत्ति होती है। इस वातावरण में मछलियाँ पर्याप्त विकसित होती हैं तथा ये क्षेत्र मछलियों के अक्षय भण्डार बन गये हैं।
  7. कटे-फटे तट का होना – व्यापारिक रूप से बड़े-बड़े स्टीमर तथा जलयानों को ठहराने के लिए कटे-फटे तटों पर सुरक्षित पोताश्रयों एवं प्राकृतिक पत्तनों का निर्माण बड़ा ही सुविधाजनक रहता है। सुरक्षित एवं प्राकृतिक पत्तनों का विकास ऐसे ही भागों में किया जा सकता है। अतः इन भागों में सुविधापूर्वक मछलियों को एकत्रित किया जा सकता है।
  8. कुशल एवं साहसिक नाविक कला का विकास – मछलियों को पकड़ने के लिए कुशल एवं साहसिक नाविकों एवं मछुआरों का होना अति आवश्यक है जो जोखिम उठाकर भी दूरवर्ती भागों से मछलियाँ पकड़ सकें। जापानी नाविक बड़े ही साहसी होते हैं, जो दूरवर्ती भागों में जाकर गहरे सागरों से भी मछलियाँ पकड़ लेते हैं।
  9. स्थानीय एवं विदेशी माँग – मछलियाँ पकड़ने वाले क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में पर्याप्त खपत क्षेत्रों का होना अति आवश्यक है, क्योंकि मछली शीघ्र खराब होने वाली वस्तु है; अत: स्थानीय माँग का बने रहना मछली व्यवसाय को प्रोत्साहन देती रहता है।
  10. नवीन वैज्ञानिक विधियों एवं उपकरणों का विकास – मछलियों को भारी मात्रा में पकड़ने के लिए आधुनिक नवीन विधियों-नावें, स्टीमर, ट्रालर, ड्रिफ्टर्स एवं जाल आदि–की सहायता से पकड़ा जाना चाहिए। इन उपकरणों के न होने से दूरवर्ती एवं गहरे सागरों से मछलियाँ पकड़ना सम्भव नहीं हो पाता।

इनके अतिरिक्त शीत-भण्डारण व्यवस्था, तीव्र परिवहन साधनों की सुलभता, सहायक उद्योगों का विकास, मछली खाने में धार्मिक बाधाओं को न होना आदि तथ्य मछली व्यवसाय को सुचारु रूप से गति प्रदान करने के लिए अति आवश्यक होते हैं।

विश्व के प्रधान मछली उत्पादक क्षेत्र
Main Fishing Areas of the World

व्यापार के लिए अधिकांश मछलियाँ शीतोष्ण कटिबन्धीय सागरों से पकड़ी जाती हैं। औद्योगिक क्रान्ति से प्रभावित देशों ने मत्स्य-व्यवसाय में विशेष प्रगति की है, परन्तु भौगोलिक सुविधाओं के कारण यह व्यवसाय कुछ सीमित क्षेत्रों में ही पनप सका है। विश्व के मछली उत्पादन का 88% भाग सागरों से प्राप्त होता है जो व्यापारिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है।

विश्व में 25,000 से 30,000 तक मछली की किस्में पायी जाती हैं, जिनमें सालमन, सारडाइन, कॉड, हैडाक, मैकेरैल, बोनिटो, कटल फिश, विलिण्डसटर, टूना, यलोटेल, सोलब्रीम, ह्वेल आदि मुख्य हैं। कुल मछली उत्पादन का 73% भाग (24° उत्तरी अक्षांश से 664° उत्तरी अक्षांश तक) उच्च कटिबन्धीय क्षेत्रों से प्राप्त होता है। मध्य अक्षांशों में 20° से 40° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलाद्ध में मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। कुल मछली उत्पादन का 12% भाग आन्तरिक महाद्वीपीय भागों से प्राप्त होता है। मछली उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र मुख्य स्थान रखते हैं –

(1) उत्तरी-पूर्वी एशियाई देश – उत्तरी-पूर्वी प्रशान्त महासागर का तटीय क्षेत्र विश्व के मछली उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है, जहाँ विश्व की 34% मछली का उत्पादन किया जाता है। इस प्रदेश का विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण में दक्षिणी चीन तक विस्तृत है। इसके अन्तर्गत जापान, चीन, कोरिया, पूर्वी सोवियत संघ एवं सखालीन द्वीप के क्षेत्र सम्मिलित हैं। सालमन, सारडाइने, टूना, बोनिटो, मैकेरैल, कॉड तथा सील पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं।

जापान प्रतिवर्ष लगभग 60 लाख टन मछली पकड़ता है जो विश्व उत्पादन का लगभग 20% भाग है। जापान की 10% जनसंख्या इसी व्यवसाय में लगी हुई है। यहाँ से विदेशों को मछलियाँ निर्यात की जाती हैं। जापान के उत्तरी क्षेत्र में हेल मछली पकड़ी जाती है। यहाँ मछलियों को सुखाने, तेल निकालने एवं खाद बनाने के अनेक कारखाने हैं। जापान के बाद चीन, दक्षिणी कोरिया एवं ताईवान मछली पकड़ने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस प्रदेश को मत्स्याखेट के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. क्यूरोसिवो एवं क्यूराइल की गर्म व ठण्डी जलधाराओं का मिलन-स्थल,
  2. प्रारम्भ से कुशल एवं विकसित नाविक कला,
  3. अधिकांश नदियों का पूर्वी ढालों पर गिरना, जिससे भारी मात्रा में प्लैंकटने की उत्पत्ति होती है,
  4. समशीतोष्ण जलवायु,
  5. औद्योगीकरण के साथ-साथ मछली की माँग में वृद्धि, तथा
  6. तकनीकी एवं परिवहन के विकसित साधन।।

जापान का मत्स्य उत्पादन – उत्तर-पूर्वी एशिया के तटीय या उत्तर-पूर्वी प्रशान्त क्षेत्र में जापान मत्स्य उत्पादन की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ विश्व की लगभग 13% मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। जापान में मछुआरों की बस्तियाँ कटी-फटी, समुद्री तट रेखा के किनारे-किनारे बसी हुई हैं। क्यूराइले की ठण्डी व क्यूरोसिवो की गर्म जलधारा जापान के पश्चिमी तट पर मिलती है तथा मत्स्य विकास में सहायक हुई है। जापान में मत्स्य उद्योग के विकास हेतु निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

  1. जापान एक द्वीपीय देश है तथा चारों तरफ से जल से घिरा है, जिसमें बहुतायत में मछलियाँ पनपती हैं।
  2. जापान की तट रेखा कटी-फटी है।
  3. जापान में कृषि-योग्य भूमि का अभाव है; अतः जापानियों को प्रमुख भोजन मछली है।
  4. जापान में स्वचालित नौकाएँ हैं तथा तकनीकी विकास भी अधिक है जिस कारण मछली की माँग अधिक रहती है।
  5. विस्तृत स्थानीय बाजार की सुविधा उपलब्ध है।
  6. जापान में मत्स्य उद्यम को सरकारी सहयोग व संरक्षण प्राप्त है।
  7. यहाँ की जलवायु शीतोष्ण है; अत: मछलियाँ शीघ्र नष्ट नहीं होती हैं तथा भण्डारण की भी पर्याप्त सुविधा है।

(2) उत्तरी-पश्चिमी यूरोपीय देश – यह विश्व का महत्त्वपूर्ण मत्स्य संग्रहण क्षेत्र है, जो पुर्तगाल से लेकर श्वेत सागर तक विस्तृत है। यह क्षेत्र विश्व की 25% मछली उत्पन्न करता है। यहाँ पर मछली पकड़ने के अनेक चबूतरे (Banks) स्थापित हुए हैं। इनमें उत्तरी सागर का डॉगर बैंक, बिस्के की खाड़ी, बाल्टिक सागर, बैरेण्ट सागर, इंग्लिश चैनल आदि महत्त्वपूर्ण हैं। ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, आइसलैण्ड, डेनमार्क, हॉलैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस आदि प्रमुख मछली-उत्पादक देश हैं।

यहाँ का वार्षिक उत्पादन 80 लाख मीट्रिक टन है। हैरिंग, कॉड, हेक, स्कैट, प्रॉन, टूना, मैकेरैल, हेलीबुट, सालमन, सारडाइन आदि पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं। इस प्रदेश में ब्रिटेन एवं नार्वे मुख्य मत्स्य उत्पादक देश हैं। विश्व की 66% कॉड मछलियाँ इसी क्षेत्र से पकड़ी जाती हैं। प्रमुख देशों का उत्पादन इस प्रकार है-ब्रिटेन- 23%, नार्वे-22%, स्पेन-11%, आइसलैण्ड-8%, जर्मनी–7%, फ्रांस-6%, पुर्तगाल-6%, नीदरलैण्ड–5%, डेनमार्क-4% एवं स्वीडन–4%। मछली पकड़ने के लिए इन क्षेत्रों को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. उथला सागरीय क्षेत्र होने के कारण मछली पकड़ने के सागरीय चबूतरों (Sea banks) की अधिकता है।
  2. औद्योगिक क्षेत्रों में सघन जनसंख्या होने के कारण मछली की माँग अधिक रहती है।
  3. मछली का उपभोग खाद्यान्नों के विकल्प के रूप में किया जाता है।
  4. सागरीय तट कटा-फटा है।
  5. उत्तरी अटलाण्टिक उष्ण जलधारा का इस प्रदेश के ठण्डे जल से मिलना।
  6. पूर्व से ही सागरीय सम्पर्क के कारण कुशल एवं साहसी नाविक।
  7. मछलियों के लिए भोजन के रूप में पर्याप्त ‘प्लैंकटन की उत्पत्ति।
  8. शीत भण्डार-गृहों का विकास।
  9. मछली पर आधारित सहायक उद्योगों का विकास; जैसे–नार्वे में विश्व को 50% ह्वेल मछली का तेल निकाला जाता है।

(3) उत्तरी-पूर्वी अमेरिकी तटीय क्षेत्र – मछली पकड़ने वाला यह क्षेत्र कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट के सहारे-सहारे न्यूफाउण्डलैण्ड से संयुक्त राज्य के कैरोलिना राज्य तक, विस्तृत है। इस प्रदेश का महाद्वीपीय मग्न-तट काफी विस्तृत एवं चौड़ा है, जहाँ मछली पकड़ने के अनेक बैंक स्थित हैं। ग्राण्ड बैंक इस प्रदेश का मुख्य मछली संग्रहण केन्द्र है। इसका क्षेत्रफल 92,000 वर्ग किमी है। सालमन, कॉड, हैरिंग, मैकेरैल, लोबस्टर, आयस्टर, सारडाइन पकड़ी जाने वाली प्रमुख मछलियाँ हैं। कनाडा से डिब्बों में बन्द कर सालमन मछली का निर्यात किया जाता है। कॉड से तेल निकाला जाता है। न्यूफाउण्डलैण्ड में लोगों का यह मुख्य व्यवसाय है। सैण्टजॉन यहाँ को मछली पकड़ने का सबसे बड़ा केन्द्र है। इस प्रदेश को मछली पकड़ने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. कनाडा के अधिकांश भूभाग का पठारी होना।
  2. औद्योगीकरण के कारण मछली की बढ़ती हुई माँग।
  3. विकसित उच्च तकनीकी।
  4. ठण्डी लैब्रेडोर एवं गर्म गल्फस्ट्रीम जलधाराओं का मिलने।
  5. सागरीय तट का कटा-फटा होना।
  6. गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं के मिलने से प्लैंकटन की उत्पत्ति।
  7. मछलियों पर आधारित सहायक उद्योगों का विकास।

(4) उत्तरी-पश्चिमी अमेरिकी तटीय क्षेत्र – यह क्षेत्र उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पश्चिमी तटीय क्षेत्र में प्रशान्त तट के सहारे-सहारे विस्तृत है। इस क्षेत्र का विस्तार बेरिंग जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण में संयुक्त राज्य के कैलीफोर्निया तट तक है। इस प्रदेश में अलास्का, ब्रिटिश-कोलम्बिया, वाशिंगटन तथा कैलीफोर्निया तट मुख्य हैं। सालमन, हैरिंग, पिलकार्ड, कॉड, हैलीबुट पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं। फ्रेजर एवं कोलम्बिया नदियों के मुहानों पर सर्वाधिक मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। सिएटल तथा प्रिंस-रूपर्ट मछली उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। इस प्रदेश को सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। यहाँ मछलियों को सुखाकर डिब्बों में बन्द कर विदेशों को निर्यात किया जाता है।

इन प्रदेशों के अतिरिक्त मध्य अक्षांशों में दक्षिणी-उत्तरी अमेरिकी देश, भूमध्यसागरीय देश, ताईवान एवं चीन तटीय क्षेत्र एवं उत्तरी कैलीफोर्निया प्रदेश; उच्च अक्षांशों में केरेबियन सागरीय प्रदेश, चिली को तटवर्ती प्रदेश, मध्य अफ्रीका के तटवर्ती प्रदेश एवं दक्षिणी भारत और पूर्वी द्वीप समूह प्रमुख हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – मछली शीघ्र खराब होने वाली वस्तु है; अतः इसकी स्थानीय खपत अधिक है। आधुनिक युग में शीतगृहों तथा वैज्ञानिक विधियों की खोज ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की वस्तु बना दिया है।
निर्यातक देश – न्यूफाउण्डलैण्ड, कनाडा, जापान, नार्वे, चिली, कोरिया, आइसलैण्ड, डेनमार्क आदि।
आयातक देश – ब्रिटेन, सं० रा० अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, चीन, पुर्तगाल आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
न्यूजीलैण्ड के डेयरी उद्योग पर एक टिप्पणी लिखिए।
उतर
आधुनिक युग में दुग्ध उद्योग के क्षेत्र में इस देश ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। यहाँ की शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, पहाड़ी भूमि, उत्तम नस्ल के दुधारू पशु, वैज्ञानिक प्रगति तथा विदेशी मॉग ने दुग्ध उद्योग के विकास में बहुत योगदान दिया है। यहाँ दुग्ध उद्योग तरांकी के मैदान, थेम्स, ओटागो के पठार तथा ऑकलैण्ड प्रायद्वीप में फैला हुआ है। डेनमार्क के बाद मक्खन और पनीर बनाने में इसका विश्व में दूसरा स्थान है। न्यूजीलैण्ड से भारी मात्रा में मक्खन, पनीर तथा दुग्ध चूर्ण को विदेशों को निर्यात किया जाता है। दुग्ध उत्पादों का निर्यात न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है। ग्लैक्सो मार्का दूध पाउडर न्यूजीलैण्ड का ही उत्पाद है।

प्रश्न 2
विश्व के किन्हीं दो प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 15]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 4 के अन्तर्गत देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व के पालतू पशुओं को कितने वर्गों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर
विश्व के पालतू पशुओं को निम्नलिखित दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. चौपाये – पालतू गाय, भैंस, बकरी, सूअर आदि जो मनुष्य के भोजन के साधन हैं।
  2. लद्दू – घोड़ा, खच्चर, बैल, गधे, रेण्डियर, याक, लामा, ऊँट, हाथी जो मनुष्य की सवारी और बोझा लादने के काम आते हैं।

प्रश्न 2
दुग्ध उत्पादन के लिए आवश्यक सहायक तत्त्व बताइए।
उत्तर
दुग्ध उद्योग के लिए शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, पहाड़ी भूमि, उत्तम नस्ल के दुधारू पशु, वैज्ञानिक प्रगति तथा विदेशी मॉग आवश्यक तत्त्व हैं।

प्रश्न 3
डेनमार्क में एक गाय औसतन प्रतिदिन कितना दूध देती है?
उत्तर
डेनमार्क में एक गाय औसतन 40-50 किग्रा दूध प्रतिदिन देती है।

प्रश्न 4
विश्व में मांस-प्राप्ति के लिए किन पशुओं को पाला जाता है?
उतर
विश्व में मांस-प्राप्ति के लिए मुख्यतः गाय, बछड़े, सूअर, भैंस, भेड़, बकरी को पाला जात है।

प्रश्न 5
कोई एक कारण बताइए कि आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में डेयरी उद्योग क्यों पनपता है?
उत्तर
आर्द्र जलवायु में पशु अधिक हृष्ट-पुष्ट रहते हैं तथा यह जलवायु मुलायम व हरी घास को उपजाने में सहायक होती है। इसलिए आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में डेयरी उद्योग पनपता है।

प्रश्न 6
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग की उन्नति के दो कारण बताइए।

  1. डेनमार्क की समशीतोष्ण जलवायुदुग्ध उद्योग एवं पशुधन विकास के लिए श्रेष्ठ व अनुकूल है।
  2. डेनमार्क में हरी घास के विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं।

प्रश्न 7
विश्व के प्रमुख सूअरपालक देशों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के प्रमुख सूअरपालक देश चीन, रूस, संयुक्त राज्य, यूरोपीय देश एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील तथा अर्जेण्टाइना हैं।

प्रश्न 8
भेड तथा बकरीपालन के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर
भेड़ तथा बकरीपालन के तीन उद्देश्य हैं- दूध, ऊन तथा मांस-प्राप्ति।

प्रश्न 9
विश्व के दो प्रमुख ऊन उत्पादक देशों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के दो प्रमुख ऊन उत्पादक देश हैं-ऑस्ट्रेलिया तथा चीन।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
विश्व का सर्वोत्तम मक्खन उत्पादक देश है –
(क) ऑस्ट्रेलिया
(ख) न्यूजीलैण्ड
(ग) नीदरलैण्ड
(घ) डेनमार्क
उत्तर
(घ) डेनमार्क।

प्रश्न 2
ग्लैक्सो मार्क दूध-पाउडर उत्पाद है –
(क) ऑस्ट्रेलिया का
(ख) न्यूजीलैण्ड का
(ग) डेनमार्क का
(घ) नीदरलैण्ड का
उत्तर
(ख) न्यूजीलैण्ड का।

प्रश्न 3
विश्व में दुग्ध उत्पादन में कौन-सा देश प्रथम स्थान रखता है?
(क) भारत
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) कनाडा
(घ) डेनमार्क
उत्तर
(क) भारत।

प्रश्न 4
निम्नांकित देशों में से किसका पनीर उत्पादन में प्रथम स्थान है?
(क) डेनमार्क
(ख) न्यूजीलैण्ड
(ग) कनाडा
(घ) सं० रा० अमेरिका
उत्तर
(घ) सं० रा० अमेरिका।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations

प्रश्न 5
विश्व में मांस की सबसे बड़ी मण्डी कौन-सी है? [2008]
(क) सिडनी
(ख) ओटावा
(ग) शिकागो
(घ) मास्को
उत्तर
(ग) शिकागो।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेकार्थी शब्द

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name अनेकार्थी शब्द
Number of Questions 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेकार्थी शब्द

अनेकार्थी शब्द

नवीनतम पाठ्यक्रम में अनेकार्थी शब्दों को भी सम्मिलित किया गया है, जिसके लिए 2 अंक निर्धारित हैं। प्रत्येक भाषा में ऐसे बहुत-से शब्द होते हैं, जो एकाधिक अर्थों का बोध कराते हैं। प्रसंग के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थलों पर इनके भिन्न-भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। भाषा को समझने और समझाने में इस प्रकार के शब्दों को ज्ञान बहुत उपयोगी होता है। इस प्रकार के शब्दों को ‘अनेकार्थी’ शब्द कहते हैं। हिन्दी भाषा में भी इस प्रकार के अनेकानेक शब्द हैं। अध्ययन में सुगमता की दृष्टि से हिन्दी भाषा के ऐसे कुछ एक शब्द और उनके एकाधिक अर्थ दिये जा रहे हैं। छात्रों को इन्हें याद कर लेने का प्रयास करना चाहिए।

बहुविकल्पीय प्रश्न

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (क) निम्नलिखित प्रश्नों के सही विकल्प चुनकर उत्तर लिखिए-

(1) ‘गो’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) गाय,
(ख) किरण
(ग) पृथ्वी
(घ) हाथी

(2) ‘वर्ण’ शब्द का अर्थ नहीं है–
(क) अक्षर
(ख) रंग
(ग) काला

(3) ‘कर’ शब्द के अन्य अर्थ हैं-
(क) सोना
(ख) हाथ
(ग) घोड़ा
(घ) किरण
(ङ) चन्द्रमा
(च) सँड़

(4) ‘अंक’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) गोद
(ख) संख्या
(ग) नाटक का एक अंश
(घ) अन्य

(5) ‘हार’ शब्द के सही अर्थों को चुनकर लिखिए
(क) गले का आभूषण
(ख) पराजय
(ग) घबराना
(घ) दु:ख

(6) द्विज का अर्थ है
(क) ब्राह्मण
(ख) पशु
(ग) सिंह
(घ) क्षत्रिय

(7) ‘अम्बर’ शब्द का कौन-सा अर्थ नहीं है ?
(क) आकाश
(ख) वस्त्र
(ग) आम
(घ) केसर

(8) ‘अकाल’ शब्द का अर्थ नहीं है
(क) दुर्भिक्ष
(ख) मृत्यु
(ग) कमी
(घ) असमय

(9) ‘तारा’ शब्द का अर्थ है–
(क) नक्षत्र
(ख) चन्द्र
(ग) लेखनी
(घ) रश्मि

(10) ‘उदधि’ शब्द का कौन-सा अर्थ सही नहीं है?
(क) उत्तम दधि
(ख) समुद्र
(ग) सागर
(घ) जलधि

(11) ‘करि’ शब्द के सही अर्थों को चुनकर लिखिए
(क) हाथी
(ख) सँड़ वाला
(ग) करने वाला
(घ) चोर

(12) ‘अमृत’ शब्द का अर्थ नहीं है
(क) अमर होना
(ख) जल
(ग) दूध; अन्न
(घ) स्वर्ग

(13) ‘ईश्वर’ का अर्थ है|
(क) राजा
(ख) प्रेम
(ग) ईर्ष्या
(घ) जलन

(14) ‘बाण’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) तीर
(ख) आदत
(ग) महाकवि बाण
(घ) चतुर

उत्तर-1. (घ), 2. (ग), 3. (ख), (घ), (च), 4. (घ), 5. (क), (ख), 6. (क), 7. (ग), 8. (ग), 9. (क), 10. (क), 11. (ख), 12. (ख), 13. (ख), 14, (ख)

प्रश्न (ख)
निम्नलिखित में से किन्हीं दो के दो-दो अर्थ लिखिए-
(क) अक्षत
(ख) हार
(ग) द्विज
(घ) काल
उत्तर-
(क) अक्षत                  अखण्डित, क्षतहीन।
(ख) हार                     गले का आभूषण, पराजय।
(ग) द्विज                     ब्राह्मण, दाँत।।
(घ) काल                    समय, मृत्यु।

प्रश्न (ग)
निम्नलिखित शब्दों में से कोई एक शब्द चुनिए और उसके एकाधिक अर्थ लिखिए-
(क) अम्बर
(ख) पत्र
(ग) वर
उत्तर
(क) अम्बर                    आकाश, वस्त्र, केसर।
(ख) पत्र पत्ता,                 चिट्ठी, पंख।।
(ग) वर                           दूल्हा, श्रेष्ठ, वरदान।

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