UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो
Number of Questions 120
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

[ ध्यान दें: नीचे दिये गये बहुविकल्पीय प्रश्नों के विकल्पों में सामान्य से अधिक काले छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।]
उचित विकल्प का चयन करें-

(1) ‘झरना’ काव्य-ग्रन्थ के रचयिता हैं [2010, 13]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त
(ग) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(घ) महादेवी वर्मा

(2) ‘श्रीकृष्णगीतावली’, ‘विनयपत्रिका’ और ‘कवितावली’ के रचयिता हैं- [2015]
(क) तुलसीदास
(ख) सूरदास
(ग) भूषण
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(3) ‘द्वापर’ के रचयिता हैं-
(क) महादेवी वर्मा
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(4) कौन-सी रचना भूषण की नहीं है ? [2013]
(क) शिवी बावनी
(ख) छत्रसाल दशक
(ग) शिवराज भूषण
(घ) रामचन्द्रिका

(5) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है-
(क) युगाधार
(ख) युगान्त
(ग) लोकायतन
(घ) वीणा

(6) अज्ञेय की रचना नहीं है–
(क) हरी घास पर क्षण भर
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) आँगन के पार-द्वार
(घ) दूध-बताशी

(7) कौन-सी रचना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की नहीं है ?
(क) प्रेम-फुलवारी
(ख) प्रेम-प्रलाप
(ग) प्रिय-प्रवास
(घ) प्रेम-सरोवर

(8) कौन-सी रचना महादेवी वर्मा की नहीं है ?
(क) सान्ध्यगीत
(ख) यामा
(ग) उर्वशी
(घ) नीरजा

(9) कौन-सी रचना सूरदास की नहीं है ?
(क) सूरसागर
(ख) सबद
(ग) सूरसारावली
(घ) साहित्य-लहरी

(10) कौन-सी रचना मैथिलीशरण गुप्त की नहीं है ?
(क) यशोधरा
(ख) पंचवटी
(ग) रसकलश
(घ) भारत-भारती

(11) धर्मवीर भारती ने लिखा है–
(क) अणिमा
(ख) अपरा
(ग) अन्धा-युग
(घ) अर्चना

(12) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है–
(क) परिमल
(ख) पल्लव
(ग) रश्मिबन्ध
(घ) स्वर्णधूलि

(13) ‘बहुत रात गये’ किस कवि का संकलन है ?
(क) नरेन्द्र शर्मा
(ख) भवानी प्रसाद मिश्र
(ग) गजानन माधव मुक्तिबोध’
(घ) गिरिजाकुमार माथुर

(14) ‘साहित्य-लहरी’ के रचनाकार हैं [2011]
(क) तुलसीदास
(ख) कबीरदास
(ग) सूरदास
(घ) मीरा

(15) कला और बूढ़ा चाँद’ के रचनाकार हैं-
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(16) ‘रस-विलास’ के रचनाकार हैं
(क) बिहारी
(ख) पद्माकर
(ग) आचार्य चिन्तामणि
(घ) सेनापति

(17) ‘पार्वतीमंगल’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) सूर
(ख) भूषण
(ग) तुलसी
(घ) रत्नाकर

(18) भूषण की रचना है
(क) रामचन्द्रिका
(ख) शिवा शौर्य
(ग) गीतावली
(घ) प्रेम सरोवर

(19) ‘कुरुक्षेत्र’ के रचयिता हैं
(क) अज्ञेय
(ख) प्रसाद
(ग) दिनकर
(घ) रत्नाकर

(20) मैथिलीशरण गुप्त की रचना है-
(क) सिद्धराज
(ख) नीरजा
(ग) उर्वशी
(घ) पारिजात

(21) ‘आँगन के पार द्वार’ के रचयिता हैं [2018]
(क) प्रसाद
(ख) रत्नाकर
(ग) अज्ञेय
(घ) दिनकर

(22) ‘अज्ञेय’ को ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ [2016]
(क) कितनी नावों में कितनी बार’ पर
(ख) ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ पर
(ग) ‘आँगन के पार द्वार पर।
(घ) ऐसा कोई घर आपने देखा है पर

(23) सुमित्रानन्दन पन्त को ज्ञानपीठ पुरस्कार उनकी रचना पर मिला था- [2015, 18]
(क) लोकायतन
(ख) युगान्त
(ग) कला और बूढ़ा चाँद
(घ) चिदम्बरा

(24) ‘भारत-भारती’ के कवि हैं [2012, 14]
(क) रामधारीसिंह ‘दिनकर’
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) महादेवी वर्मा

(25) महाकवि भूषण की वीर रस प्रधान रचना है [2011]
(क) चिदम्बरा
(ख) दीपशिखा
(ग) शिवा बावनी
(घ) कीर्तिलता

(26) ‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता हैं [2012, 14]
(क) तुलसीदास
(ख) केशवदास
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) जयशंकर प्रसाद

(27) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना है– [2010]
(क) दोहावली
(ख) झरना
(ग) जूही की कली
(घ) पल्लव

(28) ‘उद्धवशतक’ के कवि का नाम है– [2011]
(क) सूरदास
(ख) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ग) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(29) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचना है [2012]
(क) उर्वशी
(ख) गुंजन
(ग) आँगन के पार द्वार
(घ) झरना

(30) ‘ग्राम्या’ के रचयिता हैं
(क) स० ही० वा० अज्ञेय
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(31) महादेवी वर्मा की रचना है [2010]
(क) रसवन्ती
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) भस्मांकुर
(घ) यामा

(32) ‘यामा’ रचना है [2010, 16]
(क) “अज्ञेय’ की
(ख) ‘दिनकर’ की
(ग) महादेवी वर्मा की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(33) ‘श्रावकाचार’ के रचयिता हैं
(क) देवसेन
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) विजयसेनसूरि
(घ) जिनधर्मसूरि

(34) निम्नलिखित में कौन-सी अज्ञेय की रचना नहीं है ?
(क) पूर्वा,
(ख) बावरा अहेरी
(ग) शैवाल
(घ) पल्लव

(35) ‘तुलसीदास’ के रचयिता हैं-
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) गोस्वामी तुलसीदास
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’

(36) ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ के कवि का नाम है–
(क) दलपत विजय
(ख) मुनि जिनविजय
(ग) देवसेन
(घ) कुक्कुरिया

(37) ‘भक्तमाल’ के रचयिता हैं
(क) कुम्भनदास
(ख) नाभादास
(ग) नन्ददास
(घ) सुन्दरदास

(38) ‘कितनी नावों में कितनी बार’ रचना के कवि हैं [2015]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) स० ही० वा० ‘अज्ञेय’
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) धर्मवीर भारती

(39) निम्नलिखित में कौन-सा कवि राष्ट्रीय काव्यधारा का नहीं है ?
(क) दिनकर
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) अज्ञेय

(40) जयशंकर प्रसाद की रचना है-
(क) युगवाणी
(ख) अनामिका
(ग) लहर
(घ) साकेत

(41) निम्नलिखित में कौन प्रगतिवादी कवि नहीं हैं ?
(क) नागार्जुन
(ख) त्रिलोचन
(ग) केदारनाथ अग्रवाल
(घ) नेमिचन्द जैन

(42) ‘जयन्द्र प्रकाश’ किसकी रचना है ?
(क) दरबरदायी
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) भट्ट केदार
(घ) विद्यापति

(43) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ रीतिकाल का है ?
(क) साकेत
(ख) उद्धवशतक
(ग) रामचरितमानस
(घ) बिहारी सतसई

(44) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ भक्तिकाल का है ?
(क) पृथ्वीराज रासो
(ख) साकेत
(ग) कामायनी
(घ) विनयपत्रिका

(45) ‘आँसू’ की रचना किस कवि ने की ? (2010, 16)
(क) बिहारी
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) अज्ञेय

(46) निम्नलिखित में से रीतिकालीन कवि कौन-सा है ? [2016]
(क) मीराबाई
(ख) रसखान
(ग) घनानन्द
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(47) प्रयोगवाद के प्रवर्तक हैं [2012, 14]
(क) निराला
(ख) अज्ञेय
(ग) जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(48) निम्नलिखित में से कौन-सी भूषण की रचना नहीं है ? [2009]
(क) शिवा-बावनी
(ख) छत्रशाल दशक
(ग) शिवराज भूषण
(घ) रामचन्द्रिका

(49) निम्नलिखित में से किस कवि को राष्ट्र कवि को सम्मान प्राप्त हुआ ? [2009]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(50) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि रामभक्ति शाखा से सम्बन्धित नहीं है? [2009]
(क) तुलसीदास
(ख) नन्ददास
(ग) अग्रदास
(घ) नाभादास

(51) सही ( सुमेलित ) कीजिए [2010]
(क) भारत-भारती – महाकाव्य
(ख) प्रणभंग – चरितकाव्य
(ग) गीतिका – वीर काव्य
(घ) रश्मिरथी – खण्डकाव्य

(52) कबीर के दोहों को नाम से जाना जाता है [2012]
(क) दूहा
(ख) सबद
(ग) साखी
(घ) पद

(53) नवधा भक्ति के प्रकार हैं [2012]
(क) एक
(ख) तीन
(ग) आठ
(घ) नौ

(54) ‘साकेत’ की नायिका है [2012]
(क) यशोधरा
(ख) उर्मिला
(ग) राधा
(घ) द्रौपदी

(55) ‘दिनकर’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है
(क) ‘कुरुक्षेत्र’ पर
(ख) रश्मिरथी’ पर
(ग) ‘उर्वशी’ पर
(घ) ‘हुंकार’ पर

(56) ‘कामायनी’ में श्रद्धा सर्ग’ किस सर्ग के बाद है? [2012]
(क) आशा सर्ग
(ख) चिन्ता सर्ग
(ग) काम सर्ग
(घ) लज्जा सर्ग

(57) ‘संसद से सड़क तक’ किस कवि की रचना है ? [2012, 15]
(क) “मुक्तिबोध’
(ख) ‘नागार्जुन’
(ग) ‘धूमिल’
(घ) “अज्ञेय’

(58) निम्नलिखित में से किस काव्य-कृति पर ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला है ? [2012]
(क) चिदम्बरा
(ख) कितनी नावों में कितनी बार
(ग) उर्वशी
(घ) प्रियप्रवास

(59) ‘दोहाकोश’ के रचनाकार हैं [2014]
(क) शबरपा
(ख) लुइपा
(ग) सरहपा
(घ) कण्हपा

(60) रामधारीसिंह ‘दिनकर’ की रचना नहीं है [2016]
(क) रश्मिरथी
(ख) चक्रवाल
(ग) परशुराम की प्रतीक्षा
(घ) सुनहले शैवाल

(61) तुलसीदास की रचना नहीं है [2014]
(क) रामलला नहछु
(ख) पार्वती मंगल
(ग) कवितावली
(घ) रामचन्द्रिका

(62) ‘खालिक बारी’ के रचयिता हैं (2015, 16)
(क) कुशलनाथ
(ख) भट्ट केदार
(ग) मलिक मुहम्मद जायसी
(घ) अमीर खुसरो

(63) ‘नौका-विहार’ कविता अवतरित है [2015]
(क) ‘गुंजन’ से
(ख) वीणा’ से
(ग) “पल्लव’ से
(घ) युगान्त’ से

(64) ‘क्या भूलें क्या याद करू’ रचना की विधा है [2015]
(क) जीवनी
(ख) यात्रा वृत्तान्त
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण

(65) चन्दबरदाई की रचना है [2015]
(क) पृथ्वीराजरासो
(ख) खुमाणरासो
(ग) राउल वेल
(घ) जय मंयक जस चन्द्रिका

(66) अष्टछाप के कवि नहीं हैं [2015]
(क) सूरदास
(ख) कुम्भनदास
(ग) तुलसीदास
(घ) कृष्णदास

(67) रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि नहीं हैं [2015]
(क) जसवंत सिंह
(ख) याकूब खाँ
(ग) दलपति राय वंशीधर
(घ) घनानन्द

(68) ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन वर्ष हैं [2015, 16]
(क) 1943 ई०
(ख) 1951 ई०
(ग) 1959 ई०
(घ) 1976 ई०

(69) ‘विद्यापति’ कवि हैं [2015]
(क) भक्तिकाल के
(ख) रीतिकाल के
(ग) आदिकाल के
(घ) आधुनिक काल के

(70) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की रचना है [2015]
(क) साकेत
(ख) पल्लव
(ग) प्रियप्रवास
(घ) गीत

(71) छायावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं [2015]
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) महादेवी वर्मा

(72) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्रदान किया गया (2015)
(क) कुरुक्षेत्र पर
(ख) उर्वशी पर
(ग) रेणुका पर
(घ) हुँकार पर

(73) हिन्दी प्रदीप के सम्पादक हैं [2016]
(क) प्रताप नारायण मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(74) ‘रामभक्ति शाखा’ के कवि नहीं हैं [2016]
(क) तुलसीदास
(ख) अग्र दास
(ग) नन्ददास
(घ) नाभादास

(75) बिहारी सतसई’ में दोहों की संख्या है– [2016]
(क) 719
(ख) 713
(ग) 719
(घ) 724

(76) ‘गंगावतरण’ काव्यकृति के रचयिता हैं [2016]
(क) अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’
(ख) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(77) कबीर के गुरु का नाम था [2016]
(क) वल्लभाचार्य
(ख) नरहरिदास
(ग) रामानन्द
(घ) रामकृष्ण परमहंस

(78) ‘सूरसागर’ के वय॑विषय का आधार है [2016]
(क) श्रीमद्भागवत
(ख) विष्णुपुराण
(ग) केनोपनिषद्
(घ) मनुस्मृति

(79) विद्यापति के पदों में कहीं-कहीं पुट है [2016]
(क) श्रृंगार का
(ख) भक्ति का
(ग) नीति का
(घ) प्रशास्त का

(80) ‘हरिवंशपुराण’ के रचनाकार हैं [2016]
(क) देवसेन
(ख) विमलदेव सूरि
(ग) पुष्पदन्त
(घ) स्वयंभू

(81) वीरगाथाकाल की विशेषता है [2017]
(क) नारी का रूप-सौन्दर्य चित्रण
(ख) प्रकृति-चित्रण
(ग) युद्धों का सजीव चित्रण
(घ) मुक्तक काव्य-रचना

(82) अज्ञेय जी को निम्नलिखित में से किस वाद का प्रतीक माना जाता है?
(क) छायावाद
(ख) प्रगतिवाद
(ग) हालावाद
(घ) प्रयोगवाद

(83) निम्नलिखित में से रीतिबद्ध धारा के कवि कौन नहीं हैं? [2017]
(क) चिन्तामणि
(ख) मतिराम
(ग) द्विजदेव
(घ) पद्माकर

(84) हिन्दी साहित्य के आदिकाल के लिए ‘सिद्ध सापन्तकाल’ नाम दिया है [2017]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ग) रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(85) हिन्दी साहित्य के किस काल को स्वर्ण युग कहा जाता है? [2017]
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(86) ‘पारिजात’ किस कवि के गीतों का संकलन है? [2017]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(87) ‘अज्ञेय’ द्वारा सम्पादित सप्तकों की संख्या है [2017]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार

(88) किस कवि को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ नहीं मिला? [2017]
(क) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त को
(ग) जयशंकर प्रसाद को
(घ) महादेवी वर्मा को

(89) ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना हुई थी [2017]
(क) सन् 1935 में
(ख) सन् 1936 में
(ग) सन् 1938 में
(घ) सन् 1943 में

(90) मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कृति है [2017]
(क) प्रदक्षिणा’
(ख) “दानलीला’
(ग) “रसकलश’
(घ) “अतिमा

(91) सुमित्रानन्दन पन्त की रचना नहीं है [2017]
(क) पल्लव
(ख) स्वर्णधूलि
(ग) ग्रंथि
(घ) रसवन्ती

(92) अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ की रचना है– [2017]
(क) रसकलश
(ख) युगान्तर
(ग) ग्राम्य
(घ) हुंकार

(93) ‘प्रसाद’ की निम्न कृतियों में से एक कृति के नायक मनु हैं। वह कृति है
(क) प्रेम पथिक
(ख) झरना
(ग) कामायनी
(घ) कानन-कुसुम

(94) निम्न में से कौन मैथिलीशरण गुप्त की एक अनूदित रचना है [2017]
(क) मेघनाद वध
(ख) यशोधरा
(ग) प्रदक्षिणा
(घ) सिद्धराज

(95) कवि ‘हरिऔध’ का रस है [2017]
(क) करुण
(ख) श्रृंगार
(ग) भक्ति
(घ) वीर

(96) चित्राधार’ काव्य की भाषा है
(क) अवधी
(ख) ब्रज
(ग) कन्नौजी भोजपुरी
(घ) भोजपुरी

(97) कवि पन्त समाजवाद की ओर उन्मुख हुए [2017]
(क) ग्राम्या में
(ख) स्वर्णधूलि में
(ग) चिदम्बरा में
(घ) ग्रन्थि में

(98) ‘दिनकर’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। [2017]
(क) वर्ष 1970 में
(ख) वर्ष 1971 में
(ग) वर्ष 1972 में
(घ) वर्ष 1974 में

(99) निम्नलिखित में कौन प्रेमश्रयी शाखा के कवि नहीं हैं? [2017]
(क) जायसी
(ख) सूरदास
(ग) मंझन
(घ) कुतुबन

(100) कौन-सी रचना ‘अज्ञेय’ की नहीं है? [2017]
(क) बावरा अटेरी
(ख) सुनहले शैवाल
(ग) इत्यलप्
(घ) रेणूका

(101) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ग्रन्थ है [2017]
(क) हुँकार
(ख) धूप के धान
(ग) कालजयी
(घ) चित्राधार

(102) ‘कामायनी’ में सर्गों की संख्या है [2017]
(क) बारह
(ख) चौदह
(ग) पन्द्रह
(घ) सत्रह

(103) जयशंकर प्रसादकृत ‘कामायनी’ किस प्रकार का काव्य है? [2018]
(क) खण्डकाव्य
(ख) महाकाव्य
(ग) मुक्तक काव्य
(घ) इनमें से कोई नहीं

(104) पन्त जी की किस रचना पर ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है? [2018]
(क) लोकायतन
(ख) पल्लव
(ग) चिदम्बरा
(घ) वीणा

(105) ‘आँगन के पार-द्वार’ रचना है [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद की
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) अज्ञेय की
(घ) सुमित्रानन्दन पंत की

(106) हिन्दी साहित्य के आदिकाल के लिए चारण काल नाम दिया है [2018]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ग) रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(107) ‘लहर’ के रचनाकार है [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) गिरिजा कुमार माथुर
(ग) हरिवंशराय बच्चन
(घ) सुमित्रानन्दन पंत

(108) निम्नलिखित में नई कविता’ के कवि हैं [2018]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(ग) जगन्नाथदास रत्नाकार
(घ) सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(109) हिन्दी साहित्य के किस काल को ‘पूर्व-मध्य काल कहा जाता है?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(110) ‘कामायनी’ रचना है (2018)
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” की।
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) जयशंकर प्रसाद की
(घ) मोहन अवस्थी की

(111) हिन्दी साहित्य के ‘आदिकाल’ के लिए बीज वपन’ नाम दिया है (2018)
(क) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ख) रामकुमार वर्मा ने
(ग) आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने
(घ) डॉ० नगेन्द्र ने

(112) कितनी नावों में कितनी बार’ काव्यकृति है (2018)
(क) सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की
(ख) हरिवंशराय बच्चन’ की
(ग) गिरिजा कुमार माथुर की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(113) कविता में चार चाँद लगाने वाली शक्ति है
(क) अभिधा
(ख) लक्षणा
(ग) व्यंजना
(घ) तात्पर्या

(114) ‘खुमान रासो’ के रचयिता हैं
(क) नरपति नाल्ह
(ख) दलपति विजय
(ग) चन्दबरदाई
(घ) जगनिक

(115) ‘रसिकप्रिया’ रचना है-
(क) मतिराम की
(ख) केशवदास की
(ग) नरपति नाल्ह की
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त की

(116) अग्रदास किस काव्यधारा के कवि हैं?
(क) कृष्ण काव्यधारा के
(ख) सूफी काव्यधारा के
(ग) वीर काव्यधारा के
(घ) राम काव्यधारा के

(117) पपीहों की वह पीन पुकार’ किसकी पंक्ति है?
(क) भारतेन्दु की
(ख) जयशंकर प्रसाद की
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त की
(घ) महादेवी की

(118) ‘प्रिय प्रवास’ काव्यकृति का मुख्य रस है
(क) संयोग श्रृंगार
(ख) करुण
(ग) वियोग श्रृंगार
(घ) शान्त

(119) ‘धर्म के प्रति अनास्था’ तथा ‘शोषक-वर्ग के प्रति घृणा’ प्रमुख विशेषता है
(क) “छायावाद’ की
(ख)’प्रगतिवाद’ की
(ग) ‘प्रयोगवाद’ की
(घ) “नयी कविता’ की

(120) ‘महाभारत’ के ‘शान्तिपर्व’ के कथानक पर आधारित ‘दिनकर’ की काव्यकृति है-
(क) रेणुका
(ख) ‘कुरुक्षेत्र
(ग) “सामधेनी
(घ) “हारे को हरिनाम

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 12
Chapter Name Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय)
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations (अर्थव्यवस्था के क्षेत्र : प्राथमिक व्यवसाय)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
दुग्ध उद्योग के अनुकूल भौगोलिक सुविधाओं का वर्णन कीजिए। यह उद्योग विश्व में कहाँ-कहाँ होता है?
या
संसार में डेयरी उद्योग के प्रमुख देशों का उल्लेख कीजिए।
या
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग के विकसित होने के उत्तरदायी कारकों की समीक्षा कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए-न्यूजीलैण्ड का डेयरी उद्योग।
या
टिप्पणी लिखिएडेनमार्क का डेयरी उद्योग।
या
डेनमार्क में दुग्ध-व्यवसाय की समीक्षा उपयुक्त भौगोलिक दशाओं तथा उत्पादन के परिप्रेक्ष्य में कीजिए।
उत्तर

दुग्ध व्यवसाय Dairying

दुग्ध व्यवसाय पालतू पशुओं पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण उद्योग है। दूध की गणना सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार के रूप में की जाती है। दूध का उपयोग मक्खन, घी, पनीर आदि बनाने में किया जाता है। दूध को सुखाकर उससे दुग्ध-चूर्ण भी बनाया जाता है। शाकाहारी लोगों के भोजन का यह मुख्य एवं आवश्यक अंग है। जिन देशों के निवासी मांसाहारी नहीं होते, वे अपने आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति दूध एवं उससे निर्मित पदार्थों से करते हैं। शीत भण्डारण व्यवस्था प्रारम्भ हो जाने के बाद इस उद्योग ने बहुत प्रगति की है। अब यह व्यवसाय उपभोक्ता केन्द्रों से दूरवर्ती स्थानों पर भी किया जाने लगा है। दूध मुख्य रूप से भेड़, बकरी, गाय तथा भैंसों से प्राप्त किया जाता है। दूध को गाढ़ा करके जमाकर या सुखाकर डिब्बों में बन्द कर विदेशों को भी निर्यात किया जाता है। इसे डेयरी उद्योग के नाम से पुकारा जाता है।

दुग्ध उद्योग के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ
Favourable Geographical Conditions for Dairying

दुग्ध उद्योग केवल उन्हीं देशों में किया जाता है, जहाँ इस उद्योग के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ उपलब्ध हैं। इस उद्योग के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाएँ होनी चाहिए –
(1) समशीतोष्ण जलवायु – दुग्ध उद्योग के लिए शीतशीतोष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। यह उद्योग शीतकाल में 10° से 17°सेग्रे ताप वाले प्रदेशों या आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में अधिक विकसित होता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. आर्द्र जलवायु में पशु अधिक हृष्ट-पुष्ट रहते हैं।
  2. यह जलवायु मुलायम एवं हरी घास को उपजाने में सहायक होती है।
  3. इस जलवायु में दूध तथा उससे निर्मित पदार्थ बहुत समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं, क्योंकि शीतशीतोष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु इन्हें खराब होने से बचाती है।
  4. समुद्री नम जलवायु पशुओं की वृद्धि एवं विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है, क्योंकि ऐसी जलवायु में पशु वर्ष भर खुले मैदानों एवं चरागाहों में स्वच्छन्द रूप से विचरण करते रहते हैं तथा उनके रख-रखाव पर अधिक व्यय नहीं करना पड़ता।

(2) उत्तम नस्ल के पशु – दुग्ध उद्योग पालतू पशुओं पर आधारित है। पशु जितनी अच्छी नस्ल के एवं दुधारू होंगे, दुग्ध उद्योग उतनी ही तीव्रगति से विकसित होगा। भारत में कम दूध देने वाले पशुओं के कारण ही दुग्ध उद्योग अभी तक बहुत अच्छी दशा में विकसित नहीं हो पाया है, जबकि डेनमार्क एवं न्यूजीलैण्ड में दुधारू गायों के कारण यह उद्योग बहुत अधिक विकसित हुआ है। इन देशों में एक गाय प्रतिदिन 40 से 50 लीटर दूध दे देती है।

(3) उत्तम चरागाह – हरी घास पशुओं का प्रिय खाद्य पदार्थ है। पशु चरागाहों में स्वच्छन्द रूप से घास चरते एवं विचरण करते रहते हैं। यही कारण है कि जिन देशों में उत्तम तथा विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं, वहाँ दुग्ध उद्योग बहुत उन्नत दशा में है। डेनमार्क, नार्वे, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड आदि देश इसके उत्तम उदाहरण हैं।

(4) पौष्टिक चारा – हरी घास के अतिरिक्त पशुओं को हरा चारा (गाजर, शलजम, चुकन्दर), भूसा, खली आदि पौष्टिक तत्त्व भी पर्याप्त मात्रा में मिलने चाहिए। पशुओं से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए उन्हें जौ, जई तथा मक्का आदि खाद्य पदार्थ खिलाये जाते हैं। पौष्टिक चारा खाकर पशु अधिक दूध देने लग जाते हैं। भारत में पौष्टिक चारे के अभाव के कारण चौपाये कम दूध देते हैं।

(5) खपत – दूध एवं दूध से बने पदार्थों की माँग अर्थात् खपत, दूध उत्पादक क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में ही होनी चाहिए जिससे यथाशीघ्र दुग्ध पदार्थों को बाजारों में भेजा जा सके। डेनमार्क, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं न्यूजीलैण्ड में दुग्ध उद्योग की उन्नति का यह महत्त्वपूर्ण कारण है।

(6) आवागमन के सुलभ साधन – दूध एवं दूध से बने पदार्थों को उत्पादन केन्द्रों से उनके बाजार एवं खपत केन्द्रों तक भेजने के लिए सस्ते, द्रुतगामी एवं सुलभ परिवहन के साधन होने चाहिए। जिन देशों में यह सुविधा उपलब्ध है, वहाँ दुग्ध उद्योग उन्नत दशा में है। विदेशों को दूध से बने पदार्थ । निर्यात करने के लिए जल यातायात सुलभ होना चाहिए; क्योंकि यह अन्य साधनों से सस्ता एवं सुगम रहता है।

(7) शीत भण्डारों की व्यवस्था – दूध एवं दूध से बने पदार्थों को अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए देश में ही पर्याप्त शीत भण्डारों की व्यवस्था होनी चाहिए। डेनमार्क में शीत भण्डारों की पर्याप्त व्यवस्था की गयी है।

(8) स्वच्छ पेयजल की उपलब्धि – पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में पीने तथा उनसे सम्बन्धित अन्य कार्यों के लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। यह जल नदियों एवं झीलों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है; अत: दुग्ध व्यवसाय के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धि का होना अत्यावश्यक है।

(9) सहायक उद्योगों की स्थापना – दुग्ध उद्योग उन क्षेत्रों में शीघ्रता से विकसित हो जाता है, जहाँ पशुओं पर आधारित मांस, चमड़ा, खाद, घी, मक्खन एवं पनीर बनाने के उद्योग केन्द्रित हो जाते हैं। सहायक उद्योगों के विकसित होने पर दुग्ध पदार्थों की लागत व्यय घट जाती है। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा डेनमार्क में सहायक उद्योगों की स्थापना के कारण डेयरी उद्योग का तीव्रगामी विकास हुआ है।

विश्व के प्रमुख दुग्ध उत्पादक देश
Main Milk Producing Countries in the World

दुग्ध उत्पादन एवं उसके उपभोग में भारी विषमता पायी जाती है। इसका उत्पादन विरल आबाद क्षेत्रों में एवं उपभोग सघन आबाद क्षेत्रों में अधिक होता है। मोटे तौर पर सम्पूर्ण विश्व के दुग्ध उत्पाद का 34.5% यूरोप से, 30% एंग्लो-अमेरिका से, 20% CIS देशों से, 12.8% एशियाई देशों से, 3.7% ओशेनिया व 2.1% अफ्रीका से प्राप्त होता है।

(1) भारत – 1966 के बाद से भारत दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लि० प्रयास कर रहा था परन्तु इस देश को सफलता 1970 में लागू श्वेत क्रान्ति के बाद मिली। वर्तमान समय में यह विश्व का प्रथम दुग्ध उत्पादक देश है। भारत में गुजरात एवं उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्य हैं। सार्वजनिक एवं सहकारी क्षेत्र में यह व्यवसाय निरन्तर उन्नति कर रहा है।

(2) संयुक्त राज्य अमेरिका – यहाँ विश्व का 15% दूध, 8% मक्खन एवं 18% से अधिक पनीर उत्पादन किया जाता है। देश में 2.5 करोड़ से अधिक गाय हैं। विस्कांसिन, मिनीसोटा, न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क, पेन्सिलवेनिया, ओहियो, मिशिगन, मैरीलैण्डे तथा डेलावेयर राज्यों में दुग्ध उत्पादन विशेष विकसित है। यहाँ विस्तृत चरागाह, खाद्यान्नों को चारे के रूप में उपयोग, उत्तम पशु नस्लों का विकास, उत्तम वैज्ञानिक साधन एवं प्राविधिकी का प्रयोग, दुग्ध पदार्थों के निर्यात की सुविधाएँ आदि सुलभ होने के कारण दुग्ध व्यवसाय उन्नत है। यहाँ कुल दूध का 45% ताजे दूध, 35% मक्खन, 6% पनीर, 5% पाउडर, 6% संघनित (Condensed) रूप एवं आइसक्रीम बनाने में तथा शेष 3% पशुओं को पिलाने में प्रयुक्त होता है।

(3) पूर्व सोवियत संघ – यहाँ विश्व का 20% से अधिक दुग्ध, 18% से अधिक मक्खन एवं 13% से अधिक पनीर उत्पादन होता है। विशाल दुग्ध संयन्त्रों में क्रीम, दही, मक्खन, पनीर, गाढ़ा दूध एवं पाउडर दूध बनाये जाते हैं। यूक्रेन, अजरबैजान, जार्जिकया, एस्टोनिया आदि देशों में दुग्ध व्यवसाय विशेषत: प्रचलित है। पुगाचेव तथा कुइबी शेव में दुग्ध पाउडर बनाने के संयन्त्र स्थापित हैं।

(4) फ्रांस – यहाँ विश्व का 5% दूध तथा मक्खन एवं 10% पनीर उत्पादन होता है। औद्योगिक व सघन आबाद देश होने के कारण यहाँ दूध की बहुत माँग रहती है। शीतोष्ण जलवायु गो-पालन के लिए उपयुक्त है।
(5) जर्मनी – इस औद्योगिक, सघन आबाद देश में भी दूध की भारी माँग रहती है। वैज्ञानिक ढंग से गो-पालन करने से अधिक मात्रा में दूध उत्पादन होता है। यहाँ समस्त विश्व का लगभग 6% दूध प्राप्त होता है।
(6) पोलैण्ड – शीतोष्ण जलवायु तथा स्टेपी घास के प्रदेश होने के कारण यह देश गौ-पालन में यूरोप में तृतीय तथा दूध उत्पादन में (विश्व का 2.5% दूध) विश्व का दसवाँ देश है।

(7) हॉलैण्ड – प्राचीन काल से ही यहाँ रेतीली व दलदली पोल्डर भूमि में चरागाहों की प्रचुरता के कारण दुग्ध व्यवसाय विकसित है। इस देश का ‘एडाम पनीर’ विश्व विख्यात है। यहाँ विश्व का 2% दूध उत्पादन होता है। रॉटरडम के उत्तर में गोदा स्थान पर पनीर व्यवसाय उन्नत है। मक्खन, पनीर व संघनित दूध देश के प्रमुख निर्यात हैं।

(8) डेनमार्क – यूरोपीय देशों में डेनमार्क का दुग्ध व्यवसाय विख्यात है। यहाँ पदार्थों की मात्रा के बजाय गुण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यहाँ डेयरी व्यवसाय सहकारिता पर आधारित है। अनुर्वर भूमि होने के कारण यहाँ कृषि अविकसित है, खनिज संसाधनों का भी अभाव है; अतएव देश की अर्थव्यवस्था में दुग्ध व्यवसाय का विशेष महत्त्व है। मक्खन व पनीर के निर्यात से राष्ट्रीय आय का बड़ा भोग प्राप्त होता है। कुल दूध उत्पादन का 88% मक्खन तथा 10% पनीर बनाने व शेष की घरेलू खपत है।”
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग की उन्नति के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  1. डेनमार्क की समशीतोष्ण जलवायु दुग्ध उद्योग एवं पशुधन विकास के लिए बहुत श्रेष्ठ एवं अनुकूल है। ऐसी जलवायु में दूध एवं उससे निर्मित पदार्थ शीघ्र खराब नहीं होते।
  2. डेनमार्क में हरी घास के विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं, क्योकि डेनमार्क का पहाड़ी-पठारी धरातल घास उत्पादन के अधिक अनुकूल है तथा वहाँ घास उगाने की पूर्ण व्यवस्था कर ली गयी है।
  3. यहाँ पर छोटे-छोटे खेत कृषि-कार्य के लिए अनुपयुक्त हैं; अतः उन पर चारे वाली फसलें ही अधिक उगायी जाती हैं। इस प्रकार पशुओं को पौष्टिक चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाता है।
  4. डेनमार्क में उत्तम नस्ल की अधिक दूध देने वाली गायें पाली जाती हैं। एक गाय औसतन एक दिन में 40-50 लिटर दूध देती है। इन गायों का दूध मशीनों से दूहा जाता है।
  5. डेनमार्क में दुग्ध उद्योग का 90% कार्य 9 हजार सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है; अतः यहाँ उत्पादन की श्रेष्ठता पर विशेष ध्यान रखा जाता है।।
  6. डेनमार्क में दुग्ध उत्पादित मक्खन एवं पनीर की माँग विदेशों में बहुत अधिक रहती है, जिससे इस उद्योग को बहुत प्रोत्साहन मिला है।
  7. यहाँ का लगभग 80% दूध मक्खन बनाने में तथा 10% दूध पनीर में प्रयुक्त किया जाता है।

(9) ऑस्ट्रेलिया – ऑस्ट्रेलिया में विक्टोरिया व न्यू साउथ वेल्स प्रान्तों में व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक विधियों द्वारा गौ-पालन किया जाता है। यहाँ विस्तृत पशु फार्म, उत्तम नस्लें, प्रशीतन सुविधाओं तथा विस्तृत कृषि द्वारा चारा उगाने की व्यवस्था है। इसी कारण दुग्ध पदार्थों के निर्यात में ऑस्ट्रेलिया को विश्व में चतुर्थ स्थान प्राप्त है।

(10) न्यूजीलैण्ड – न्यूजीलैण्ड में दूध व्यवसाय का विकास उत्तरी द्वीप के आर्द्र भागों में हुआ है। टारानाकी मैदान, जिसबोर्न तथा ऑकलैण्ड क्षेत्र में, विशेष रूप से दुग्ध व्यवसाय विकसित है। इस द्वीपीय देश की आर्द्र शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, उत्तम नस्लों की गाय, विरल जनसंख्या, ब्रिटिश पूँजी तथा संरक्षण का लाभ प्राप्त होने के कारण यह व्यवसाय उन्नत हो गया है। दुग्ध पदार्थों के निर्यात से राष्ट्रीय आय की प्राप्ति होती है।

(11) दक्षिणी अमेरिका के देशों में प्रतिवर्ष 2 करोड़ 46 लाख मीट्रिक टन दूध उत्पादन होता है। महाद्वीप के कुल उत्पादन का 35% ब्राजील में तथा 30% के लगभग अर्जेण्टाइना में होता है। अधिक जनसंख्या के कारण ब्राजील में स्थानीय उपभोग अधिक होता है। अर्जेण्टाइना विश्व में दुग्ध पदार्थों के व्यापार में प्रमुख देश है। यहाँ पम्पा के समशीतोष्ण धारा के प्रदेशों में बड़े-बड़े पशु फार्मों पर व्यवस्थित ढंग से पशुपालन किया जाता है।
अन्य देशों में चीन, टर्की, मलेशिया, मैक्सिको, युगाण्डा, केन्या, तन्जानिया आदि में दुग्ध व्यवसाय विकसित किया जा रहा है।

प्रश्न 2
विश्व में मांस व्यवसाय के लिए आवश्यक दशाओं तथा उत्पादक देशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

गोमांस Beef

विश्व में कुल मांस का 47% गाय व बछड़ों से प्राप्त होता है। गोमांस उत्पादन के लिए वे सभी भौगोलिक दशाएँ उपयुक्त होती हैं जो दुग्ध व्यवसाय के लिए आवश्यक हैं; संयुक्त राज्य, पूर्व सोवियत संघ, अर्जेण्टाइना, ब्राजील, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया एवं पश्चिमी जर्मनी प्रमुख गोमांस उत्पादक देश हैं।

(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – यहाँ विश्व का 20.7% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है। गो-पालन का पूर्वारम्भ यहाँ देश के उत्तरी-पूर्वी (न्यू-इंग्लैण्ड) राज्यों में किया गया, जो क्रमशः पश्चिमी मैदान की ओर स्थानान्तरित हुआ। मक्का की पेटी एवं टैक्सास राज्य में मांस वाले मवेशियों की संख्या अधिक है। शिकागो विश्व की सबसे बड़ी मांस की मी हाँ प्रति घण्टे 2,500 पशु वध की व्यवस्था है। ओमाहा, कन्सास फ्टिी, साउथ सेन्टपॉल, डेनवर आदिनमर गोमांस के प्रमुख केन्द्र हैं।

(2) ब्राजील – गौमांस उत्पादन में ब्राज़ील विश्व में द्वितीय स्थान पर है, यद्यपि कुल मांस उत्पादन में कालस्थान है।हाँ विश्व का लगभग 12.2% गोमांस प्राप्त होता है। देश के दक्षिणी भाग, ब्राजीलिया पठारावे, तटीय-भाग मुख्य पशुपालक प्रदेश हैं। रायोग्रान्डे में पैकिंग संयन्त्र स्थापित हैं तथा अधिकांश निर्यात अहीसे होता है।

(3) चीन – यहाँ विश्व को 11.4% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है। अधिकांश उत्पादन यहाँ स्थानीय उपभोग के लिए होता है।
(4) भारत – विश्व के गोमांस उत्पादकों में भारत चौथे स्थान पर है। यद्यपि भारत में गायों की संख्या अधिक है तथापि धार्मिक कारणों से यहाँ विश्व का लगभग 4.6% गोमांस ही उत्पादित होता है।

(5) अर्जेण्टाइना – मांस उत्पादन में विश्व का पाँचवाँ गोमांस उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 4.6% से अधिक गोमांस उत्पादन होता है जो देश के कुल मांस का 80% है। यहाँ मांस वाले मवेशी अधिक संख्या में पाले जाते हैं। अधिक मांस प्रदान करने वाली उत्तम नस्लों को प्राथमिकता दी जाती है। चाको व पम्पा प्रदेश की शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, अल्प जनसंख्या, अल्फाल्फा चारे का उत्पादन आदि उत्तम भौगोलिक सुविधाएँ ही मांस उत्पादन के लिए प्रेरक हैं। यह देश संसार के कुल मांस का 30% निर्यात व्यापार करता है। ब्यूनस आयर्स तथा रोजारियो मांस की प्रमुख मण्डियाँ हैं।

(6) ऑस्ट्रेलिया – यह गोमांस उत्पादन में विश्व में सातवें स्थान पर है। यहाँ विश्व का % गोमांस उत्पादन होता है। क्वीन्सलैण्ड राज्य के पूर्वी तटीय भाग, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया एवं पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में विस्तृत पशु फार्म पाये जाते हैं। एक फार्म में प्राय: 50 हजार पशु रखे जाते हैं। विन्ढम तथा टाउन्स विले प्रमुख गोमांस की मण्डियाँ हैं। जनसंख्या अल्प होने के कारण मांस के निर्यात व्यापार में ऑस्ट्रेलिया का विशेष योगदान है।

(7) CIS देश – यहाँ विश्व का 4% गोमांस उत्पादन होता है। यूरोपीय रूस में क्रास्नोदर, विन्नित्सा, ब्रियांस्क, लेनिनग्राड, मास्को आदि एवं एशिया में कारागण्डा, अल्माटुआटा, दुशानबे, फुन्जे, खाबरोव्स्क, अशखाबाद, इर्कुट्स्क, ओमस्क, पेट्रोपावलोव्स्क, सेमि-पलातिंस्क, ओर्क, स्वर्डलोव्स्क, लेनिनाबाद, बाकू आदि प्रमुख गोमांस केन्द्र हैं। यहाँ मांस हिमीकरण (freezing), डिब्बाबन्दी (canning), तथा पैकिंग के संयन्त्र स्थित हैं।

(8) फ्रांस – यहाँ विश्व का लगभग 3% गोमांस प्राप्त होता है।
(9) जर्मनी – यहाँ विश्व का 2.5% गोमांस प्राप्त होता है।
(10) न्यूजीलैण्ड – यहाँ गो-पालन मांस के उद्देश्य से अधिक किया जाता है। उत्तरी द्वीप की जलवायु गायों के लिए उपयुक्त है। ऑकलैण्ड एवं वेलिंगटन मांस की प्रमुख मण्डियाँ व पत्तन हैं।
अन्य उत्पादकों में कनाडा, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान आदि हैं।

विश्व व्यापार World Trade
गोमांस के निर्यातक देशों में अर्जेण्टाइना प्रथम है। न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, डेनम, संयुक्त राज्य अन्य निर्यातक देश हैं। यूरोपीय देश मांस के प्रमुख आयातक हैं। जर्मनी, फ्रांस, इटली व ब्रिटेन प्रमुख आयातक हैं।

सूअर का मांस Pork

विश्व के कुल मांस उत्पादन में लगभग 44% सूअर का मांस ही है। धार्मिक कारणों से मुस्लिम देशों को छोड़कर विश्व में सर्वत्र सूअर पालन होता है। प्रायः सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में सूअर पालन अधिक प्रचलित है, क्योंकि इसकी प्रजनन शक्ति तीव्र होती है, यह सड़े-गले फेंके गये भोजन, विष्ठा, मलआदि से पेट भर लेता है। डेयरी व्यवसाय वाले क्षेत्रों में मक्खन-रहित दूध तथा मक्का खिलाकर व्यवस्थित रूप से सूअर पालन किया जाता है।
सूअर पालन के क्षेत्र – विश्व के प्रमुख सूअरपालक देश चीन, सोवियत रूस, संयुक्त राज्य, यूरोपीय देश एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील तथा अर्जेण्टाइना हैं।

  1. चीन – विश्व में सूअर मांस उत्पादकों में चीन का प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व का लगभग 47% सूअर मांस उत्पादन होता है। देश का 80% मांस सूअर से ही प्राप्त होता है। चीन के सभी प्रान्तों में सूअर पालन होता है, किन्तु अनाहवेई, क्वांगतुंग, जेचवान तथा होपे प्रान्तों में विशेष रूप से सूअर पाले जाते हैं। प्राय: प्रत्येक कृषक परिवार अपनी खाद्य आवश्यकता की पूर्ति के लिए सूअर पालता है।
  2. संयुक्त राज्य – मक्का की पेटी के क्षेत्र में सूअरपालन अधिक किया जाता है। ओहियो का सिनसिनाती नगर सूअर मांस की विश्व प्रसिद्ध मण्डी है। आयोवा, इलीनोयस, कन्सास, नेब्रास्का व इण्डियाना राज्य भी सूअर मांस उत्पादन में उल्लेखनीय हैं। मांस पैकिंग के प्रमुख केन्द्र सिनसिनाती, शिकागो, सेंट लुई, कन्सास सिटी, ओकलाहीमा तथा मिलबँकी हैं। यहाँ से चर्बी (lard) का भी निर्यात किया जाता है। लार्ड हॉग केन्द्र से संयुक्त राज्य का 30% तथा विश्व का 9.5% सूअर मांस प्राप्त होता है।
  3. रूस – यह विश्व का द्वितीय सूअर मांस उत्पादक देश है। यहाँ से विश्व का 14% सूअर मांस प्राप्त होता है जो देश के कुल मांस उत्पादन का 40% है। यूरोपीय रूस में सूअर पालन अधिक प्रचलित है।

यूरोपीय देशों में जर्मनी, ब्रिटेन, पोलैण्ड, फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन व यूगोस्लाविया आदि देश सूअर पालन में उल्लेखनीय हैं। जर्मनी के दक्षिणी-पश्चिमी वन प्रदेशों में, यूगोस्लाविया के ओक तथा बीच के वनों में, बाल्टिक तटवर्ती जौ उत्पादक क्षेत्रों में, दक्षिणी-पश्चिमी फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, दक्षिणी इंग्लैण्ड तथा वेल्स में सूअर मांस उत्पादन होता है।
अन्य उत्पादकों में ब्राजील, मैक्सिको, दक्षिणी अफ्रीका, अर्जेण्टाइना, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड हैं। भारत में भी सूअर पालन किया जाता है।

विश्व व्यापार World Trade
सूअर-मांस के मुख्य निर्यातक देश संयुक्त राज्य, जर्मनी, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना व ऑस्ट्रेलिया हैं। आयातक देशों में ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम व अन्य यूरोपियन देश हैं। सूअर के बालों के निर्यात में चीन तथा पूर्व सोवियत संघ महत्त्वपूर्ण देश हैं।

भेड़ व बकरी का मांस Mutton

भेड़ तथा बकरीपालन के तीन उद्देश्य होते हैं-

  1. दूध
  2. ऊन तथा
  3. मांस प्राप्ति।

बकरी से दूध व मांस तथा भेड़ से मांस व ऊन प्राप्त होती है। विभिन्न उद्देश्यों के लिए भिन्न किस्म की भेड़े पाली जाती हैं। 90% मांस (Mutton) भेड़ से प्राप्त होता है। भेड़पालन का कार्य मुख्य रूप से विश्व के शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क मरुस्थलीय पठार एवं पर्वतीय भागों में किया जाता है। प्रायः विरल जनसंख्या तथा विस्तृत क्षेत्रफल वाले देशों में भेड़पालन किया जाता है। भेड़ का मांस गोमांस तथा सूअर के मांस की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण होता है।

संसार में मांस उत्पादन के क्षेत्र
Production Areas of Mutton in World

मांस तथा ऊन वाली भेड़े पृथक् नस्लों की होती हैं, किन्तु अब दोगली नस्लें विकसित की गयी हैं। जिनसे ऊन व मांस दोनों ही प्राप्त होते हैं। मटन उत्पादक देशों में न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेण्टाइना, संयुक्त राज्य, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, दक्षिणी अफ्रीका संघ तथा उरुग्वे प्रमुख हैं। भेड़पालन विरल आबाद क्षेत्रों में प्रचलित है, क्योंकि-

  1. भेड़ शुष्क, अनुर्वर, असमतल तथा बीहड़ क्षेत्रों में भी रह सकती है।
  2. अत्यन्त छोटी व कठोर घास पर भी यह गुजर कर लेती है।
  3. ये तीव्र पहाड़ी ढालों पर भी चर सकती हैं। भेड़ के अतिरिक्त केवल बकरी ही ऐसे क्षेत्रों में चर सकती है।
  4. भेड़ के लिए प्राकृतिक चारा ही पर्याप्त होता है। इसे अन्न नहीं खिलाना पड़ता।
  5. इसे चराने में अधिक श्रमिकों की आवश्यकता नहीं है।
  6. फाकलैण्ड, आइसलैण्ड, पैटेगोनिया और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में कृषि या अन्य व्यवसाय पनप नहीं सके, भेड़पालन ही आजीविका को मुख्य साधन है।

CIS देश – यूरोपीय भाग में काकेशियाई प्रदेश तथा एशियाई भाग में रूसी तुर्किस्तान में दोगली नस्लों द्वारा मांस तथा ऊन प्राप्त किया जाता है। कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किरगिजस्तान, जार्जिया, अजरबैजान एवं साइबेरिया के दक्षिणी भाग तथा यूराल प्रदेश भेड़पालन के मुख्य क्षेत्र हैं।

  1. चीन – यहाँ विश्व का 56% भेड़-मांस प्राप्त किया जाता है। चीनी-तुर्किस्तान, भीतरी मंगोलिया, मंचूरिया तथा युन्नान के पठार पर भेड़पालन अधिक किया जाता है।
  2. ऑस्ट्रेलिया – यहाँ विश्व की सर्वाधिक भेड़े पाली जाती हैं, किन्तु यहाँ भेड़पालन का मुख्य उद्देश्य ऊन प्राप्ति है। अतः यहाँ मांस उत्पादन कम होता है। फिर भी यहाँ विश्व का लगभग 9% भेड़-मांस उत्पन्न किया जाता है जो यहाँ के कुल मांस उत्पादन का 21% है। यहाँ पश्चिमी अर्द्ध-मरुस्थल एवं ग्रेट डिवाइडिंग रेंज के पर्वतीय भाग पर पशुपालन किया जाता है।
  3. न्यूजीलैण्ड – यह छोटा सा द्वीपीय देश संसार में मटन उत्पादन में तृतीय स्थान पर है। यहाँ विश्व का 7% से अधिक मटन उत्पन्न होता है, जो इस देश के कुल मांस उत्पादन को 53% है। यह विश्व के प्रमुख मटन निर्यातक देशों में से है। दक्षिणी द्वीप के केन्टरबरी मैदान में उत्तम चरागाहों में मटने वाली एवं उत्तरी द्वीप के दक्षिणी भाग में भी ऊन वाली भेड़े पाली जाती हैं।
  4. संयुक्त राज्य – यहाँ विश्व का लगभग 2% भेड़ मांस प्राप्त किया जाता है। यहाँ पश्चिमी पर्वतीय तथा पठारी भागों पर भेड़े चराई जाती हैं। टैक्सास राज्य का एडवर्ड पठार भी भेड़ चारण के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। संयुक्त राज्य में भेड़पालन मुख्यतः ऊन प्राप्ति के लिए होता है। यहाँ भेड़ों को मक्का, जौ, विशिष्ट घासे खिलाकर हृष्ट-पुष्ट किया जाता है। भेड़ मांस उत्पादन में इलिनोयस, ओहियो, इण्डियाना, आयोवा, टैक्सास, कैलीफोर्निया तथा कोलोरेडो राज्य महत्त्वपूर्ण हैं।

अन्य उत्पादकों में अर्जेण्टाइना, दक्षिणी अफ्रीका, भारत, बोलीविया, मैक्सिको, पीरू, टर्की, पाकिस्तान, ईरान आदि हैं। यूरोपीय देशों में, ग्रीस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल व रोमानिया मुख्य भेड़पालक देश हैं।
विश्व व्यापार World Trade
मटन के निर्यातक देशों में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना, दक्षिणी अफ्रीका व संयुक्त राज्य हैं। आयातक देशों में फ्रांस व ब्रिटेन आदि यूरोपीय देश प्रमुख हैं।

प्रश्न 3
विश्व में ऊन व्यवसाय का वर्णन कीजिए।
या
ऑस्ट्रेलिया के भेड़-पालन का वर्णन कीजिए। [2007, 13]
उत्तर
ऊन – पशुओं से अनेक प्रकार के रेशेदार पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनमें ऊन सबसे महत्त्वपूर्ण है। ऊन से वस्त्र, कम्बल, कालीन, गलीचे, शाल-दुशाले, नमदे आदि बनाये जाते हैं। ऊन प्रदान करने वाले पशुओं में भेड़, बकरी, ऊँट, याक, अल्पाका, लामा तथा विकुना आदि हैं। संसार की 90% से अधिक ऊन भेड़ से ही प्राप्त होती है।

भेड़पालन का कार्य अनेक प्रकार की जलवायु में किया जाता है। उत्तम ऊन वाली भेड़ों के लिए चूना पत्थरयुक्त भूमि तथा शुष्क उपोष्ण अथवा शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है। इनके लिए 10°C शीतकालीन तापमान, 20°C से 40°C ग्रीष्मकालीन तापमान, 50 से 75 सेमी वर्षा उपयुक्त रहती है। 25 सेमी से कम वर्षा होने पर घास सूख जाती है तथा 75 सेमी से अधिक वर्षा होने पर भेड़ को खुरपका नामक रोग लग जाता है। उत्तम ऊन इंग्लिश, मेरिनो एवं दोगली नस्ल की भेड़ों से प्राप्त होती है।

ऊन के उत्पादक क्षेत्र
Production Areas of Wool

विश्व के समस्त ऊन उत्पादन का 30% अकेले ऑस्ट्रेलिया से प्राप्त होता है। अन्य प्रमुख ऊन उत्पादक देश चीन, न्यूजीलैण्ड, अर्जेण्टाइना, ब्रिटेन, यूक्रेन, रूस, दक्षिणी अफ्रीका, उरुग्वे, तुर्की, भारत आदि हैं।

विश्व में ऊन का वार्षिक उत्पादन
Annual Production of Wool in the World

दक्षिणी गोलार्द्ध के देश संसार का लगभग 2/3 ऊन उत्पादन करते हैं। यहाँ शीतोष्ण व शुष्क पठारी भागों की जलवायु भेड़पालन के लिए उपयुक्त है। यहाँ विस्तृत चरागाह एवं विरल जनसंख्या के कारण कृषि या अन्य व्यवसायों की अपेक्षा पशुचारण विकसित है। इन देशों में यूरोपीय उपनिवेशकों द्वारा वैज्ञानिक तथा प्राविधिक ज्ञान एवं पूँजी की सहायता से व्यवस्थित सबसे अधिक पशुचारण का विकास हुआ है।

(1) ऑस्ट्रेलिया – यहाँ विस्तृत फार्मों पर भेड़पालन किया जाता है। भेड़ों की सुरक्षा के लिए फार्मों पर लोहे के तार तथा जालियाँ लगाई जाती हैं। यहाँ अधिकांश भेड़े ग्रेट डिवाइडिंग रेन्ज के पश्चिम की ओर एक अर्द्ध-चन्द्राकार क्षेत्र में केन्द्रित हैं। यहाँ अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ऊन उद्योग पर्याप्त विकसित है। ऑस्ट्रेलिया में अधिकांश भेड़े उत्तम ऊन-प्राप्ति के उद्देश्य से पाली जाती हैं। न्यूसाउथ वेल्स, विक्टोरिया तथा क्वीन्सलैण्ड राज्यों में भेड़पालन अधिक होता है। ऊन उत्पादन के मुख्य केन्द्र सिडनी, मेलबोर्न, जीलॉग, एलबरी, ब्रिस्बेन आदि हैं। समस्त उत्पादन का 85% ऊन निर्यात कर दिया जाता है, जिसका आधा भाग ब्रिटेन आयात करता है।

(2) न्यूजीलैण्ड – यहाँ विश्व की 16.4% ऊन प्राप्त होती है। दक्षिणी द्वीप के केन्टरबरी मैदान तथा दक्षिणी आल्प्स के पूर्वी ढलानों पर भेड़े चराई जाती हैं। विरल जनसंख्या, शीतोष्ण जलवायु एवं विषम धरातल के कारण यहाँ पशुचारण व्यवसाय समुन्नत है। यहाँ अंग्रेज रोमनीमार्श तथा लीसेस्टर नस्लें लाये थे। तदुपरान्त मेरिनो व इंग्लिश नस्लों के मिश्रण से दोगली नस्लें विकसित की गयीं। अधिकांश ऊन ब्रिटेन को निर्यात होती है।

(3) चीन – यहं विश्व का तीसरा बड़ा ऊन उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का लगभग 11.2% ऊन प्राप्त किया जाता है। सीक्यांग, आन्तरिक मंगोलिया, मंचूरिया, शांतुंग एवं युन्नान प्रान्तों में भेड़पालन अधिक किया जाता है।

(4) यूनाइटेड किंगडम – यहाँ भेड़पालन तथा ऊन उत्पादन बहुत प्राचीन समय से प्रचलित रहा है। पिनाइन प्रदेश, वेल्स पर्वत, दक्षिणी-पूर्वी इंग्लैण्ड के खड़िया (Chalk) तथा चूना-पत्थर (Limestone) के प्रदेश एवं स्कॉटिश उच्च प्रदेश पर भेड़पालन किया जाता है। यहाँ की इंग्लिश नस्लों की भेड़े विश्वविख्यात हैं। यहाँ विश्व की 2.5% ऊन प्राप्त होती है।

(5) अर्जेण्टाइना – यह विश्व का पाँचवाँ प्रमुख ऊन उत्पादक देश है। यहाँ विश्व की 2.3% ऊन प्राप्त होती है। पैटेगोनिया के पठारी भाग भेड़पालन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र हैं।

(6) दक्षिणी अफ्रीकां – यहाँ विश्व की लगभग 4% ऊन प्राप्त होती है। यहाँ मेरिनो जाति की उत्तम भेड़े पाली जाती हैं। ड्रेकन्सबर्ग पर्वतों की तलहटी तथा कास के शुष्क पठारी भागों में भेड़पालन किया जाता है। केप प्रान्त, ट्रांसवाल, ऑरेन्ज फ्री-स्टेट आदि राज्यों में ऊन उत्पादन किया जाता है। केपटाउन, डरबन तथा पोर्ट एलिजाबेथ पत्तनों से ऊन निर्यात की जाती है।

(7) तुर्की – यहाँ विश्व की 1.3% ऊन प्राप्त होती है। यहाँ भी उत्तम किस्म की मेरिनो भेड़े पाली जाती हैं। एशिया माइनर के पठारी भाग भेड़ चराने के लिए उत्तम हैं।

प्रश्न 4
मत्स्याखेट के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए तथा विश्व में मछली पकड़ने वाले प्रमुख क्षेत्र भी बताइए। [2007]
या
उत्तरी गोलार्द्ध के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का विवरण लिखिए।
या
विश्व में मत्स्य उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(i) दो प्रमुख मत्स्य उद्योग क्षेत्र,
(ii) उत्पादन,
(iii) व्यापार। [2010]
या
उत्तरी प्रशान्त महासागर के प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का विवरण लिखिए। [2008]
या
विश्व के मत्स्य संसाधनों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) अनुकूल दशाएँ
(ख) विश्व के प्रमुख मत्स्य क्षेत्र
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।
उत्तर

मत्स्याखेट के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ
Favourable Geographical Conditions for Fishing

मछली-व्यवसाय के लिए निम्नलिखित भौगोलिक (दशाएँ) सुविधाएँ आवश्यक होती हैं –

  1. समशीतोष्ण जलवायु – समशीतोष्ण जल मछलियों का प्रमुख निवास स्थान है तथा इस जल- राशि की मछलियाँ अधिक पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होती हैं। पश्चिमी यूरोपीय तट इसका मुख्य उदाहरण है।
  2. सागर का उथला होना – महाद्वीपीय मग्न तट पर, जिनकी गहराई 180 मीटर तक होती है, मछलियों की उत्पत्ति के सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र होते हैं। विश्व में ऐसे सागर तटों पर सबसे अधिक मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।
  3. ताजे जल की प्राप्ति – जिन भागों में नदियाँ सागरों से मिलती हैं, वहाँ सदैव ताजे जल का स्रोत बना रहता है। इस क्षेत्र के जल में फॉस्फेट तथा नाइट्रोजन की काफी मात्रा मिली रहती है। ये क्षेत्र मछलियों के अण्डे देने के प्रमुख क्षेत्र होते हैं; अतः यहाँ पर मछलियों को पकड़ना बड़ा ही सुविधाजनक होता है।
  4. खाद्य सामग्री की उपलब्धि – ‘प्लैंकटन’ (Plankton) एक प्रकार की काई है, जो मछली का प्रिय भोजन होता है। छिछले सागरीय जल में जहाँ सूर्य की किरणें नीचे तल तक (180 मीटर की गहराई तक) पहुँच जाती हैं, वहाँ प्लैंकटने भारी मात्रा में उत्पन्न होती है। यह नदियों के मुहानों पर अधिक मिलती है। अत: इन भागों में मछलियों को अधिक पकड़ा जाता है।
  5. सूर्य के प्रकाश की प्राप्ति – सूर्य का प्रकाश जल में 180 मीटर की गहराई तक ही पहुँच पाता है; अत: इस भाग में ‘प्लैंकटन’ की उत्पत्ति पर्याप्त मात्रा में होती है। यही कारण है कि छिछले सागर तटों पर मछलियाँ अधिक पकड़ी जाती हैं।
  6. गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं का मिलन-स्थल – गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं के मिलन-स्थल मछली पकड़ने के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन गये हैं। इनके मिलन से मछलियों के भोज्य पदार्थ-‘प्लैंकटन’- की पर्याप्त मात्रा में उत्पत्ति होती है। उदाहरणार्थ-जापान के तट पर क्यूरोसिवो की गर्म एवं क्यूराइल की ठण्डी जलधाराओं के मिलने से कोहरे की उत्पत्ति होती है। इस वातावरण में मछलियाँ पर्याप्त विकसित होती हैं तथा ये क्षेत्र मछलियों के अक्षय भण्डार बन गये हैं।
  7. कटे-फटे तट का होना – व्यापारिक रूप से बड़े-बड़े स्टीमर तथा जलयानों को ठहराने के लिए कटे-फटे तटों पर सुरक्षित पोताश्रयों एवं प्राकृतिक पत्तनों का निर्माण बड़ा ही सुविधाजनक रहता है। सुरक्षित एवं प्राकृतिक पत्तनों का विकास ऐसे ही भागों में किया जा सकता है। अतः इन भागों में सुविधापूर्वक मछलियों को एकत्रित किया जा सकता है।
  8. कुशल एवं साहसिक नाविक कला का विकास – मछलियों को पकड़ने के लिए कुशल एवं साहसिक नाविकों एवं मछुआरों का होना अति आवश्यक है जो जोखिम उठाकर भी दूरवर्ती भागों से मछलियाँ पकड़ सकें। जापानी नाविक बड़े ही साहसी होते हैं, जो दूरवर्ती भागों में जाकर गहरे सागरों से भी मछलियाँ पकड़ लेते हैं।
  9. स्थानीय एवं विदेशी माँग – मछलियाँ पकड़ने वाले क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में पर्याप्त खपत क्षेत्रों का होना अति आवश्यक है, क्योंकि मछली शीघ्र खराब होने वाली वस्तु है; अत: स्थानीय माँग का बने रहना मछली व्यवसाय को प्रोत्साहन देती रहता है।
  10. नवीन वैज्ञानिक विधियों एवं उपकरणों का विकास – मछलियों को भारी मात्रा में पकड़ने के लिए आधुनिक नवीन विधियों-नावें, स्टीमर, ट्रालर, ड्रिफ्टर्स एवं जाल आदि–की सहायता से पकड़ा जाना चाहिए। इन उपकरणों के न होने से दूरवर्ती एवं गहरे सागरों से मछलियाँ पकड़ना सम्भव नहीं हो पाता।

इनके अतिरिक्त शीत-भण्डारण व्यवस्था, तीव्र परिवहन साधनों की सुलभता, सहायक उद्योगों का विकास, मछली खाने में धार्मिक बाधाओं को न होना आदि तथ्य मछली व्यवसाय को सुचारु रूप से गति प्रदान करने के लिए अति आवश्यक होते हैं।

विश्व के प्रधान मछली उत्पादक क्षेत्र
Main Fishing Areas of the World

व्यापार के लिए अधिकांश मछलियाँ शीतोष्ण कटिबन्धीय सागरों से पकड़ी जाती हैं। औद्योगिक क्रान्ति से प्रभावित देशों ने मत्स्य-व्यवसाय में विशेष प्रगति की है, परन्तु भौगोलिक सुविधाओं के कारण यह व्यवसाय कुछ सीमित क्षेत्रों में ही पनप सका है। विश्व के मछली उत्पादन का 88% भाग सागरों से प्राप्त होता है जो व्यापारिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है।

विश्व में 25,000 से 30,000 तक मछली की किस्में पायी जाती हैं, जिनमें सालमन, सारडाइन, कॉड, हैडाक, मैकेरैल, बोनिटो, कटल फिश, विलिण्डसटर, टूना, यलोटेल, सोलब्रीम, ह्वेल आदि मुख्य हैं। कुल मछली उत्पादन का 73% भाग (24° उत्तरी अक्षांश से 664° उत्तरी अक्षांश तक) उच्च कटिबन्धीय क्षेत्रों से प्राप्त होता है। मध्य अक्षांशों में 20° से 40° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलाद्ध में मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। कुल मछली उत्पादन का 12% भाग आन्तरिक महाद्वीपीय भागों से प्राप्त होता है। मछली उत्पादन के निम्नलिखित क्षेत्र मुख्य स्थान रखते हैं –

(1) उत्तरी-पूर्वी एशियाई देश – उत्तरी-पूर्वी प्रशान्त महासागर का तटीय क्षेत्र विश्व के मछली उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है, जहाँ विश्व की 34% मछली का उत्पादन किया जाता है। इस प्रदेश का विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण में दक्षिणी चीन तक विस्तृत है। इसके अन्तर्गत जापान, चीन, कोरिया, पूर्वी सोवियत संघ एवं सखालीन द्वीप के क्षेत्र सम्मिलित हैं। सालमन, सारडाइने, टूना, बोनिटो, मैकेरैल, कॉड तथा सील पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं।

जापान प्रतिवर्ष लगभग 60 लाख टन मछली पकड़ता है जो विश्व उत्पादन का लगभग 20% भाग है। जापान की 10% जनसंख्या इसी व्यवसाय में लगी हुई है। यहाँ से विदेशों को मछलियाँ निर्यात की जाती हैं। जापान के उत्तरी क्षेत्र में हेल मछली पकड़ी जाती है। यहाँ मछलियों को सुखाने, तेल निकालने एवं खाद बनाने के अनेक कारखाने हैं। जापान के बाद चीन, दक्षिणी कोरिया एवं ताईवान मछली पकड़ने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस प्रदेश को मत्स्याखेट के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. क्यूरोसिवो एवं क्यूराइल की गर्म व ठण्डी जलधाराओं का मिलन-स्थल,
  2. प्रारम्भ से कुशल एवं विकसित नाविक कला,
  3. अधिकांश नदियों का पूर्वी ढालों पर गिरना, जिससे भारी मात्रा में प्लैंकटने की उत्पत्ति होती है,
  4. समशीतोष्ण जलवायु,
  5. औद्योगीकरण के साथ-साथ मछली की माँग में वृद्धि, तथा
  6. तकनीकी एवं परिवहन के विकसित साधन।।

जापान का मत्स्य उत्पादन – उत्तर-पूर्वी एशिया के तटीय या उत्तर-पूर्वी प्रशान्त क्षेत्र में जापान मत्स्य उत्पादन की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ विश्व की लगभग 13% मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। जापान में मछुआरों की बस्तियाँ कटी-फटी, समुद्री तट रेखा के किनारे-किनारे बसी हुई हैं। क्यूराइले की ठण्डी व क्यूरोसिवो की गर्म जलधारा जापान के पश्चिमी तट पर मिलती है तथा मत्स्य विकास में सहायक हुई है। जापान में मत्स्य उद्योग के विकास हेतु निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

  1. जापान एक द्वीपीय देश है तथा चारों तरफ से जल से घिरा है, जिसमें बहुतायत में मछलियाँ पनपती हैं।
  2. जापान की तट रेखा कटी-फटी है।
  3. जापान में कृषि-योग्य भूमि का अभाव है; अतः जापानियों को प्रमुख भोजन मछली है।
  4. जापान में स्वचालित नौकाएँ हैं तथा तकनीकी विकास भी अधिक है जिस कारण मछली की माँग अधिक रहती है।
  5. विस्तृत स्थानीय बाजार की सुविधा उपलब्ध है।
  6. जापान में मत्स्य उद्यम को सरकारी सहयोग व संरक्षण प्राप्त है।
  7. यहाँ की जलवायु शीतोष्ण है; अत: मछलियाँ शीघ्र नष्ट नहीं होती हैं तथा भण्डारण की भी पर्याप्त सुविधा है।

(2) उत्तरी-पश्चिमी यूरोपीय देश – यह विश्व का महत्त्वपूर्ण मत्स्य संग्रहण क्षेत्र है, जो पुर्तगाल से लेकर श्वेत सागर तक विस्तृत है। यह क्षेत्र विश्व की 25% मछली उत्पन्न करता है। यहाँ पर मछली पकड़ने के अनेक चबूतरे (Banks) स्थापित हुए हैं। इनमें उत्तरी सागर का डॉगर बैंक, बिस्के की खाड़ी, बाल्टिक सागर, बैरेण्ट सागर, इंग्लिश चैनल आदि महत्त्वपूर्ण हैं। ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, आइसलैण्ड, डेनमार्क, हॉलैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस आदि प्रमुख मछली-उत्पादक देश हैं।

यहाँ का वार्षिक उत्पादन 80 लाख मीट्रिक टन है। हैरिंग, कॉड, हेक, स्कैट, प्रॉन, टूना, मैकेरैल, हेलीबुट, सालमन, सारडाइन आदि पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं। इस प्रदेश में ब्रिटेन एवं नार्वे मुख्य मत्स्य उत्पादक देश हैं। विश्व की 66% कॉड मछलियाँ इसी क्षेत्र से पकड़ी जाती हैं। प्रमुख देशों का उत्पादन इस प्रकार है-ब्रिटेन- 23%, नार्वे-22%, स्पेन-11%, आइसलैण्ड-8%, जर्मनी–7%, फ्रांस-6%, पुर्तगाल-6%, नीदरलैण्ड–5%, डेनमार्क-4% एवं स्वीडन–4%। मछली पकड़ने के लिए इन क्षेत्रों को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. उथला सागरीय क्षेत्र होने के कारण मछली पकड़ने के सागरीय चबूतरों (Sea banks) की अधिकता है।
  2. औद्योगिक क्षेत्रों में सघन जनसंख्या होने के कारण मछली की माँग अधिक रहती है।
  3. मछली का उपभोग खाद्यान्नों के विकल्प के रूप में किया जाता है।
  4. सागरीय तट कटा-फटा है।
  5. उत्तरी अटलाण्टिक उष्ण जलधारा का इस प्रदेश के ठण्डे जल से मिलना।
  6. पूर्व से ही सागरीय सम्पर्क के कारण कुशल एवं साहसी नाविक।
  7. मछलियों के लिए भोजन के रूप में पर्याप्त ‘प्लैंकटन की उत्पत्ति।
  8. शीत भण्डार-गृहों का विकास।
  9. मछली पर आधारित सहायक उद्योगों का विकास; जैसे–नार्वे में विश्व को 50% ह्वेल मछली का तेल निकाला जाता है।

(3) उत्तरी-पूर्वी अमेरिकी तटीय क्षेत्र – मछली पकड़ने वाला यह क्षेत्र कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट के सहारे-सहारे न्यूफाउण्डलैण्ड से संयुक्त राज्य के कैरोलिना राज्य तक, विस्तृत है। इस प्रदेश का महाद्वीपीय मग्न-तट काफी विस्तृत एवं चौड़ा है, जहाँ मछली पकड़ने के अनेक बैंक स्थित हैं। ग्राण्ड बैंक इस प्रदेश का मुख्य मछली संग्रहण केन्द्र है। इसका क्षेत्रफल 92,000 वर्ग किमी है। सालमन, कॉड, हैरिंग, मैकेरैल, लोबस्टर, आयस्टर, सारडाइन पकड़ी जाने वाली प्रमुख मछलियाँ हैं। कनाडा से डिब्बों में बन्द कर सालमन मछली का निर्यात किया जाता है। कॉड से तेल निकाला जाता है। न्यूफाउण्डलैण्ड में लोगों का यह मुख्य व्यवसाय है। सैण्टजॉन यहाँ को मछली पकड़ने का सबसे बड़ा केन्द्र है। इस प्रदेश को मछली पकड़ने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. कनाडा के अधिकांश भूभाग का पठारी होना।
  2. औद्योगीकरण के कारण मछली की बढ़ती हुई माँग।
  3. विकसित उच्च तकनीकी।
  4. ठण्डी लैब्रेडोर एवं गर्म गल्फस्ट्रीम जलधाराओं का मिलने।
  5. सागरीय तट का कटा-फटा होना।
  6. गर्म एवं ठण्डी जलधाराओं के मिलने से प्लैंकटन की उत्पत्ति।
  7. मछलियों पर आधारित सहायक उद्योगों का विकास।

(4) उत्तरी-पश्चिमी अमेरिकी तटीय क्षेत्र – यह क्षेत्र उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पश्चिमी तटीय क्षेत्र में प्रशान्त तट के सहारे-सहारे विस्तृत है। इस क्षेत्र का विस्तार बेरिंग जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण में संयुक्त राज्य के कैलीफोर्निया तट तक है। इस प्रदेश में अलास्का, ब्रिटिश-कोलम्बिया, वाशिंगटन तथा कैलीफोर्निया तट मुख्य हैं। सालमन, हैरिंग, पिलकार्ड, कॉड, हैलीबुट पकड़ी जाने वाली मुख्य मछलियाँ हैं। फ्रेजर एवं कोलम्बिया नदियों के मुहानों पर सर्वाधिक मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। सिएटल तथा प्रिंस-रूपर्ट मछली उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। इस प्रदेश को सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। यहाँ मछलियों को सुखाकर डिब्बों में बन्द कर विदेशों को निर्यात किया जाता है।

इन प्रदेशों के अतिरिक्त मध्य अक्षांशों में दक्षिणी-उत्तरी अमेरिकी देश, भूमध्यसागरीय देश, ताईवान एवं चीन तटीय क्षेत्र एवं उत्तरी कैलीफोर्निया प्रदेश; उच्च अक्षांशों में केरेबियन सागरीय प्रदेश, चिली को तटवर्ती प्रदेश, मध्य अफ्रीका के तटवर्ती प्रदेश एवं दक्षिणी भारत और पूर्वी द्वीप समूह प्रमुख हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – मछली शीघ्र खराब होने वाली वस्तु है; अतः इसकी स्थानीय खपत अधिक है। आधुनिक युग में शीतगृहों तथा वैज्ञानिक विधियों की खोज ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की वस्तु बना दिया है।
निर्यातक देश – न्यूफाउण्डलैण्ड, कनाडा, जापान, नार्वे, चिली, कोरिया, आइसलैण्ड, डेनमार्क आदि।
आयातक देश – ब्रिटेन, सं० रा० अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, चीन, पुर्तगाल आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
न्यूजीलैण्ड के डेयरी उद्योग पर एक टिप्पणी लिखिए।
उतर
आधुनिक युग में दुग्ध उद्योग के क्षेत्र में इस देश ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। यहाँ की शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, पहाड़ी भूमि, उत्तम नस्ल के दुधारू पशु, वैज्ञानिक प्रगति तथा विदेशी मॉग ने दुग्ध उद्योग के विकास में बहुत योगदान दिया है। यहाँ दुग्ध उद्योग तरांकी के मैदान, थेम्स, ओटागो के पठार तथा ऑकलैण्ड प्रायद्वीप में फैला हुआ है। डेनमार्क के बाद मक्खन और पनीर बनाने में इसका विश्व में दूसरा स्थान है। न्यूजीलैण्ड से भारी मात्रा में मक्खन, पनीर तथा दुग्ध चूर्ण को विदेशों को निर्यात किया जाता है। दुग्ध उत्पादों का निर्यात न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है। ग्लैक्सो मार्का दूध पाउडर न्यूजीलैण्ड का ही उत्पाद है।

प्रश्न 2
विश्व के किन्हीं दो प्रमुख मत्स्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 15]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 4 के अन्तर्गत देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व के पालतू पशुओं को कितने वर्गों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर
विश्व के पालतू पशुओं को निम्नलिखित दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. चौपाये – पालतू गाय, भैंस, बकरी, सूअर आदि जो मनुष्य के भोजन के साधन हैं।
  2. लद्दू – घोड़ा, खच्चर, बैल, गधे, रेण्डियर, याक, लामा, ऊँट, हाथी जो मनुष्य की सवारी और बोझा लादने के काम आते हैं।

प्रश्न 2
दुग्ध उत्पादन के लिए आवश्यक सहायक तत्त्व बताइए।
उत्तर
दुग्ध उद्योग के लिए शीतोष्ण जलवायु, विस्तृत चरागाह, पहाड़ी भूमि, उत्तम नस्ल के दुधारू पशु, वैज्ञानिक प्रगति तथा विदेशी मॉग आवश्यक तत्त्व हैं।

प्रश्न 3
डेनमार्क में एक गाय औसतन प्रतिदिन कितना दूध देती है?
उत्तर
डेनमार्क में एक गाय औसतन 40-50 किग्रा दूध प्रतिदिन देती है।

प्रश्न 4
विश्व में मांस-प्राप्ति के लिए किन पशुओं को पाला जाता है?
उतर
विश्व में मांस-प्राप्ति के लिए मुख्यतः गाय, बछड़े, सूअर, भैंस, भेड़, बकरी को पाला जात है।

प्रश्न 5
कोई एक कारण बताइए कि आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में डेयरी उद्योग क्यों पनपता है?
उत्तर
आर्द्र जलवायु में पशु अधिक हृष्ट-पुष्ट रहते हैं तथा यह जलवायु मुलायम व हरी घास को उपजाने में सहायक होती है। इसलिए आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में डेयरी उद्योग पनपता है।

प्रश्न 6
डेनमार्क में दुग्ध उद्योग की उन्नति के दो कारण बताइए।

  1. डेनमार्क की समशीतोष्ण जलवायुदुग्ध उद्योग एवं पशुधन विकास के लिए श्रेष्ठ व अनुकूल है।
  2. डेनमार्क में हरी घास के विस्तृत चरागाह पाये जाते हैं।

प्रश्न 7
विश्व के प्रमुख सूअरपालक देशों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के प्रमुख सूअरपालक देश चीन, रूस, संयुक्त राज्य, यूरोपीय देश एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील तथा अर्जेण्टाइना हैं।

प्रश्न 8
भेड तथा बकरीपालन के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर
भेड़ तथा बकरीपालन के तीन उद्देश्य हैं- दूध, ऊन तथा मांस-प्राप्ति।

प्रश्न 9
विश्व के दो प्रमुख ऊन उत्पादक देशों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विश्व के दो प्रमुख ऊन उत्पादक देश हैं-ऑस्ट्रेलिया तथा चीन।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
विश्व का सर्वोत्तम मक्खन उत्पादक देश है –
(क) ऑस्ट्रेलिया
(ख) न्यूजीलैण्ड
(ग) नीदरलैण्ड
(घ) डेनमार्क
उत्तर
(घ) डेनमार्क।

प्रश्न 2
ग्लैक्सो मार्क दूध-पाउडर उत्पाद है –
(क) ऑस्ट्रेलिया का
(ख) न्यूजीलैण्ड का
(ग) डेनमार्क का
(घ) नीदरलैण्ड का
उत्तर
(ख) न्यूजीलैण्ड का।

प्रश्न 3
विश्व में दुग्ध उत्पादन में कौन-सा देश प्रथम स्थान रखता है?
(क) भारत
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) कनाडा
(घ) डेनमार्क
उत्तर
(क) भारत।

प्रश्न 4
निम्नांकित देशों में से किसका पनीर उत्पादन में प्रथम स्थान है?
(क) डेनमार्क
(ख) न्यूजीलैण्ड
(ग) कनाडा
(घ) सं० रा० अमेरिका
उत्तर
(घ) सं० रा० अमेरिका।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 12 Sectors of Economy : Primary Occupations

प्रश्न 5
विश्व में मांस की सबसे बड़ी मण्डी कौन-सी है? [2008]
(क) सिडनी
(ख) ओटावा
(ग) शिकागो
(घ) मास्को
उत्तर
(ग) शिकागो।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेकार्थी शब्द

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name अनेकार्थी शब्द
Number of Questions 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेकार्थी शब्द

अनेकार्थी शब्द

नवीनतम पाठ्यक्रम में अनेकार्थी शब्दों को भी सम्मिलित किया गया है, जिसके लिए 2 अंक निर्धारित हैं। प्रत्येक भाषा में ऐसे बहुत-से शब्द होते हैं, जो एकाधिक अर्थों का बोध कराते हैं। प्रसंग के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थलों पर इनके भिन्न-भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। भाषा को समझने और समझाने में इस प्रकार के शब्दों को ज्ञान बहुत उपयोगी होता है। इस प्रकार के शब्दों को ‘अनेकार्थी’ शब्द कहते हैं। हिन्दी भाषा में भी इस प्रकार के अनेकानेक शब्द हैं। अध्ययन में सुगमता की दृष्टि से हिन्दी भाषा के ऐसे कुछ एक शब्द और उनके एकाधिक अर्थ दिये जा रहे हैं। छात्रों को इन्हें याद कर लेने का प्रयास करना चाहिए।

बहुविकल्पीय प्रश्न

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (क) निम्नलिखित प्रश्नों के सही विकल्प चुनकर उत्तर लिखिए-

(1) ‘गो’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) गाय,
(ख) किरण
(ग) पृथ्वी
(घ) हाथी

(2) ‘वर्ण’ शब्द का अर्थ नहीं है–
(क) अक्षर
(ख) रंग
(ग) काला

(3) ‘कर’ शब्द के अन्य अर्थ हैं-
(क) सोना
(ख) हाथ
(ग) घोड़ा
(घ) किरण
(ङ) चन्द्रमा
(च) सँड़

(4) ‘अंक’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) गोद
(ख) संख्या
(ग) नाटक का एक अंश
(घ) अन्य

(5) ‘हार’ शब्द के सही अर्थों को चुनकर लिखिए
(क) गले का आभूषण
(ख) पराजय
(ग) घबराना
(घ) दु:ख

(6) द्विज का अर्थ है
(क) ब्राह्मण
(ख) पशु
(ग) सिंह
(घ) क्षत्रिय

(7) ‘अम्बर’ शब्द का कौन-सा अर्थ नहीं है ?
(क) आकाश
(ख) वस्त्र
(ग) आम
(घ) केसर

(8) ‘अकाल’ शब्द का अर्थ नहीं है
(क) दुर्भिक्ष
(ख) मृत्यु
(ग) कमी
(घ) असमय

(9) ‘तारा’ शब्द का अर्थ है–
(क) नक्षत्र
(ख) चन्द्र
(ग) लेखनी
(घ) रश्मि

(10) ‘उदधि’ शब्द का कौन-सा अर्थ सही नहीं है?
(क) उत्तम दधि
(ख) समुद्र
(ग) सागर
(घ) जलधि

(11) ‘करि’ शब्द के सही अर्थों को चुनकर लिखिए
(क) हाथी
(ख) सँड़ वाला
(ग) करने वाला
(घ) चोर

(12) ‘अमृत’ शब्द का अर्थ नहीं है
(क) अमर होना
(ख) जल
(ग) दूध; अन्न
(घ) स्वर्ग

(13) ‘ईश्वर’ का अर्थ है|
(क) राजा
(ख) प्रेम
(ग) ईर्ष्या
(घ) जलन

(14) ‘बाण’ शब्द का अर्थ नहीं है-
(क) तीर
(ख) आदत
(ग) महाकवि बाण
(घ) चतुर

उत्तर-1. (घ), 2. (ग), 3. (ख), (घ), (च), 4. (घ), 5. (क), (ख), 6. (क), 7. (ग), 8. (ग), 9. (क), 10. (क), 11. (ख), 12. (ख), 13. (ख), 14, (ख)

प्रश्न (ख)
निम्नलिखित में से किन्हीं दो के दो-दो अर्थ लिखिए-
(क) अक्षत
(ख) हार
(ग) द्विज
(घ) काल
उत्तर-
(क) अक्षत                  अखण्डित, क्षतहीन।
(ख) हार                     गले का आभूषण, पराजय।
(ग) द्विज                     ब्राह्मण, दाँत।।
(घ) काल                    समय, मृत्यु।

प्रश्न (ग)
निम्नलिखित शब्दों में से कोई एक शब्द चुनिए और उसके एकाधिक अर्थ लिखिए-
(क) अम्बर
(ख) पत्र
(ग) वर
उत्तर
(क) अम्बर                    आकाश, वस्त्र, केसर।
(ख) पत्र पत्ता,                 चिट्ठी, पंख।।
(ग) वर                           दूल्हा, श्रेष्ठ, वरदान।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन).

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 10
Chapter Name Resources (संसाधन)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसाधन से आपका क्या अभिप्राय है? संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए। [2009]
या
विभिन्न प्रकार के संसाधनों का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए–संसाधनों के प्रकार। [2010]
या
संसाधनों के वर्गीकरण के आधारों को बताइए। [2012]
उत्तर

संसाधन का अर्थ
Meaning of Resources

संसाधनों का अध्ययन आर्थिक भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। किसी देश या प्रदेश में स्थित संसाधन आर्थिक विकास को आधार एवं गति प्रदान करते हैं। संसाधन आधुनिक धात्विक सभ्यता में। आधार-स्तम्भ माने जाते हैं। मानव अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोगी संसाधनों का शोषण कर अपना जीवन-यापन करता है तथा उनसे अधिकाधिक उपयोगिता प्राप्त करने का भरसक प्रयास करता है। ‘संसाधन’ शब्द के अर्थ को निम्नलिखित रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है –

  1. जिस पर कोई सहायता, पोषण तथा आपूर्ति के लिए आश्रित हो;
  2. दिये गये साधनों के प्राप्त करने के ढंग एवं
  3. अनुकूल परिस्थितियों से लाभ उठाने की क्षमता।

स्पष्ट है कि कोई भी वह वस्तु जो मानव की कठिनाइयों को दूर करने में समर्थ हो अथवा वह उसे आवश्यकताओं की पूर्ति करके सन्तुष्ट करती हो अथवा किसी प्रकार की उपयोगिता प्रदान करती हो, संसाधन कहलाती है। यह वस्तु प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक या मानवीय किसी भी प्रकार की हो सकती है, परन्तु यहाँ संसाधनों से आशय प्राकृतिक संसाधनों से ही लगाया जाता है। भूगोलवेत्ताओं की कथन है। कि संसाधनों से अभिप्राय, उन सभी भौतिक तत्त्वों तथा मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित पर्यावरण से समझा जाता है जो भूतल से लगभग 20 किमी ऊपर तथा 7 किमी धरातल के नीचे तक पाये जाते हैं। स्थलाकृति, मिट्टी, जलवायु, वनस्पति, वन्य प्राणी, जलराशियाँ, खनिज पदार्थ आदि सभी को प्राकृतिक संसाधनों के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है, परन्तु ये सभी अवयव तब तक संसाधन नहीं बन सकते जब तक मानव अपने तकनीकी ज्ञान के आधार पर इन्हें अपने लिए उपयोगी नहीं बना लेता। अत: कोई भी वह पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मानव की कुछ उपयोगिता करता हो, संसाधन कहलाता है।

कोई भी पदार्थ संसाधन तभी कहा जा सकता है जब वह मानव को किसी भी प्रकार की उपयोगिता प्रदान करता हो। इस तथ्य को दृष्टिगत करते हुए प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता ई०डब्ल्यू० जिम्मरमैन (E.W. zimmermann) ने कहा है, “मानव के विभिन्न उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा किसी कठिनाई का निवारण करने वाले या निवारण में योग देने वाले स्रोत को संसाधन कहा जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि संसाधन होते नहीं, बल्कि उन्हें बनाया जाता है। जिस देश या समाज में जितना अधिक तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास होगा, वहाँ संसाधनों का विकास भी उतना ही अधिक होगा। अतः संसाधन मानव से सम्बन्धित क्रियाओं में उपयोगी होते हैं।

संसाधनों का वर्गीकरण
Classification of Resources
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources 1
मानवीय संसाधन – मानवीय शक्ति किसी भी देश के लिए बहुत ही आवश्यक साधन है। उसके द्वारा ही प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सम्भव होता है; अत: मानव संसाधन के विकास में मानव ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। मानवीय संसाधनों के तीन मुख्य पक्ष निम्नवत् हैं –

  1. जनसंख्या – इसमें न केवल मानवं की संख्या वरन् उसकी शारीरिक शक्ति, मानसिक क्षमता, स्वास्थ्य, वितरण, जनघनत्व, वृद्धि दर, स्त्री-पुरुष अनुपात, आयु-वर्ग, शिक्षा आदि भी सम्मिलित किये जाते हैं।
  2. जनता का सामाजिक संगठन – इस पक्ष के द्वारा संसाधन उपयोग प्रभावित होता है तथा समाज के सब वर्गों को उसकी उपलब्धता एवं उपयोग की सीमा निर्धारित होती है। ये प्रादेशिक आर्थिक उन्नति के लिए बनाये गये सामाजिक राजनीतिक संगठन होते हैं; जैसे- पूँजीवादी व्यवस्था, समाजवादी व्यवस्था और साम्यवादी व्यवस्था।
  3. संस्कृति की अवस्था – किसी प्रदेश में तकनीकी एवं विज्ञान का जो स्तर होता है उससे उस प्रदेश की संस्कृति की अवस्था निर्धारित होती है। आज संसार के विकसित और विकासशील राष्ट्रों में यही अन्तर चल रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों को मुख्यत: निम्नलिखित दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1) भौतिक संसाधन (Physical Resources) – भौतिक संसाधनों के अन्तर्गत चट्टानें, धरातल, मिट्टी, खनिज सम्पदा व जलीय तत्त्वों आदि को सम्मिलित किया जाता है। ये सभी पदार्थ मानव को प्रकृति की ओर से नि:शुल्क उपहार के रूप में प्राप्त हुए हैं। इन पर सभी व्यक्तियों का समान अधिकार है, परन्तु विश्व के उन भागों में जहाँ मानव ने अत्यधिक तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वहाँ इन संसाधनों का अधिक उपयोग किया जा सका है। इसके विपरीत जिन प्रदेशों से प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य स्थापित नहीं किया गया है, वहाँ पर इनका उपयोग नहीं किया जा सका है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका महाद्वीप में प्राकृतिक संसाधनों के पर्याप्त भण्डार भरे पड़े हैं, परन्तु तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण इनका उपयोग एवं उपभोग नहीं किया जा सका है।

इन संसाधनों के अन्तर्गत खनिज पदार्थ, जल, भूमि, वन, वायु, मिट्टी, धरातल आदि का स्थान मुख्य है। इनमें से कुछ संसाधन तो ऐसे हैं जो प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध होते हैं, जिन्हें सर्वत्र सुलभ संसाधन कहते हैं; जैसे-वायु एवं धरातल। कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जो कम ही स्थानों पर उपलब्ध होते हैं, अर्थात् धरातल पर समान रूप से विकसित नहीं हैं; जैसे-लौह-अयस्क, ताँबा, अभ्रक, मैंगनीज
आदि खनिज तथा कोयला एवं पेट्रोलियम आदि शक्ति संसाधन। इस प्रकार धरातल पर संसाधनों का वितरण समान नहीं है।

(2) जैविक संसाधन (Biotic Resources) – जैविक संसाधन मानव की आर्थिक क्रियाओं को लम्बे समय तक प्रभावित करते हैं। इन संसाधनों में कमी अथवा वृद्धि हो सकती है। वनस्पति की उत्पत्ति तथा पशुपालन जैविक संसाधनों के अन्तर्गत आते हैं। इन संसाधनों पर मानवीय क्रियाकलापों का प्रभाव तो पड़ता है, परन्तु इनके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। वनों के शोषण पर वर्षा तथा तापमान के प्रभाव के कारण प्राकृतिक वनस्पति स्वत: ही उग आती है। जैविक संसाधन गतिशील होते हैं। इन संसाधनों का उपयोग करने पर इनका कुछ भाग शेष रह जाता है, जिससे वे पुन: अपना रूप धारण कर लेते हैं। मत्स्य उत्पादक क्षेत्रों से सभी मछलियों को पकड़ने के उपरान्त भी वहाँ मछलियों की उत्पत्ति धीरे-धीरे होती रहती है। विश्व में जैविक संसाधनों के वितरण में भी भिन्नता पायी जाती है। शीत कटिबन्धीय प्रदेशों में पायी जाने वाली प्राकृतिक वनस्पति तथा मरुस्थलीय वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। इन संसाधनों में कठोरता कम होती है। कभी-कभी जैविक संसाधनों का पूर्णतः उपयोग कर लेने पर इनकी मात्रा समाप्त हो जाती है।

उपयोगिता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
Classification of Resources on the Basis of Utility

उपयोगिता के आधार पर संसाधनों को निम्नलिखित दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1) क्षयी संसाधन – वे संसाधन जिनका उपयोग मानव की इच्छा-शक्ति पर निर्भर रहता है, क्षयी संसाधन होते हैं। कभी-कभी अधिकतम उपयोग करने से यह संसाधन समाप्त भी हो जाते हैं। इन्हें निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. नव्यकरणीय संसाधन – ग्लोब पर कुछ संसाधन ऐसी प्रकृति के पाये जाते हैं कि उनका अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। ऐसा मानव के तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करता है। ये संसाधन पुनः विकसित हो जाते हैं अथवा उनका नवीनीकरण करने के उपरान्त उन्हें उपयोग में लाया जा सकता है। जलवायु, सौर ऊर्जा, जल विद्युत शक्ति आदि इसी प्रकार के संसाधंन हैं।
  2. अनव्यकरणीय संसाधन – इस प्रकार के संसाधन एक बार उपयोग करने के उपरान्त सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अथवा वे नष्ट हो जाते हैं। कोयला, खनिज तेल, अनेक प्रकार के धात्विक खनिज आदि इन संसाधनों के प्रमुख उदाहरण हैं।

(2) अक्षयी संसाधन – ये कभी समाप्त न होने वाले संसाधन हैं। इन्हें बार-बार उपयोग किया जाता रहता है। एक बार उपयोग करने के बाद वे स्वयं विकसित हो जाते हैं तथा उनका पुन: उपयोग कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है, परन्तु इनका पुनः उत्पादन रासायनिक एवं भौतिक उपकरणों की सहायता से किया जा सकता है। वनस्पति, मिट्टी, जल, वायु, सौर ऊर्जा, वन्य प्राणी, मानवआदि कभी न समाप्त होने वाले संसाधनों की श्रेणी में आते हैं। इस प्रकार ये संसाधन मानव उपभोग के लिए असीम एवं चिरस्थायी संसाधन हैं।

प्रश्न 2
संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।
या
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।
या
‘संसाधन संरक्षण से आप क्या समझते हैं?’ इसके लिए उपयुक्त उपाय समझाइए। (2011)
उत्तर

संसाधनों के संरक्षण का अर्थ एवं आवश्यकता
Meaning and Need of Conservation of Resources

धरातल पर संसाधन सीमित ही उपलब्ध हैं; अतः उनका अधिकतम एवं सुरक्षित उपयोग ही ‘संसाधन संरक्षण’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, “प्राकृतिक संसाधनों का कम-से-कम मात्रा में अधिकतम उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है।” संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता 20वीं शताब्दी की देन है, क्योंकि इस सदी में संसाधनों का बड़ी निर्ममता से उपयोग किया गया है। विज्ञान एवं तकनीकी विकास के साथ-साथ संसाधनों का दोहन तीव्र गति से किया गया है जिस कारण उनमें से कुछ संसाधन समाप्ति की,ओर अग्रसर हुए हैं। अत: संसाधनों को सुरक्षित बनाये रखने के लिए संसाधनों के संरक्षण की भावना बलवती हुई है। पिछली दो शताब्दियों से विश्व पटल पर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, जिसके अग्रलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं –

  1. कुछ देशों में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि का होना।
  2. तकनीकी एवं औद्योगिक क्रान्ति के कारण औद्योगिक उत्पादों में तीव्र वृद्धि का होना।
  3. मानव का जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण पनपना।

उपर्युक्त कारणों के फलस्वरूप संसाधनों का बड़े ही अविवेकपूर्ण ढंग से दोहन किया गया है। इसी कारण बहुत से जैविक एवं अजैविक संसाधनों को तीव्र गति से ह्रास होता जा रहा है अथवा वे पूर्ण । रूप से विनष्ट हो गये हैं। इसके फलस्वरूप इस तथ्य को बल मिलने लगा है कि संसाधनों का अधिकतम उपयोग मानवहित में नहीं हो सकेगा। अत: संसाधनों का मितव्ययिता के साथ सदुपयोग किया जाए तथा जो संसाधन अल्पमात्रा में शेष रह गये हैं, उनका संरक्षण अवश्य ही किया जाए जिससे भावी जनसंख्या को भी ये संसाधन मिल सकें। इस सम्बन्ध में सिरीयसी वाण्ट्रप ने कहा है कि “संसाधनों का उपयोग कब, किस प्रकार होगा, इसका विश्लेषण करते हुए उपयोग को समय के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।’

वर्तमान समय में विश्व की जनसंख्या में द्रुत गति से वृद्धि होती जा रही है जिससे उसकी संसाधनों की आवश्यकता में भी वृद्धि हुई है तथा संसाधनों का अविवेकपूर्ण ढंग से विनाश किया जाने लगा है। इस पर तत्काल रोक लगाना आवश्यक है, अन्यथा ये संसाधन किसी भी समय समाप्त हो सकते हैं। इस प्रकार जनसंख्या की अपरिमित वृद्धि, उत्पादन प्रक्रिया में तकनीकी विकास से क्रान्ति आने तथा मानव का जीवन-स्तर उच्च होने से संसाधनों में कमी आयी है। इससे मानवीय क्रियाकलापों एवं प्रकृति में असन्तुलन होने लगा है। अतः मानवीय क्रियाकलापों एवं उपभोग के मध्य अनुकूलन एवं सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए जो संसाधनों के संरक्षण का मूल उद्देश्य है।

संसाधन संरक्षण के उपाय
Remedies of Conservation of Resources

  1. किसी भी राष्ट्र के कुल संसाधनों की संख्या, मात्रा, प्रकार, गुण एवं उपलब्धि के विषय में पूर्ण जानकारी होना अति आवश्यक है, जिससे आवश्यकतानुसार उनका व्यावहारिक उपयोग किया जा सके।
  2. संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सम्भाव्यता के आधार पर ही उनका उपयोग निर्धारित किया जाना चाहिए।
  3. जो संसाधन शीघ्र समाप्त होने वाले हैं, उनका उपयोग अधिकतम उपयोगिता प्रदान करने वाले कार्यों में ही किया जाना चाहिए।
  4. संसाधनों की वृद्धि एवं गुणवत्ता बनाये रखने के लिए उनकी विशेषताओं को वैज्ञानिक-तकनीकी ज्ञान के सहारे विकसित किया जाना चाहिए।
  5. जो संसाधन अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं, उनका उपयोग अधिकतम मात्रा में करना चाहिए।
  6. संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए उनके सही विकल्पों को खोज लिया जाना चाहिए, जिससे अधिक समय तक उनकी उपलब्धता बनी रह सके।
  7. संसाधनों के उपयोग की ऐसी पद्धतियाँ एवं प्रणालियाँ विकसित की जानी चाहिए कि राष्ट्र सदैव के लिए आत्मनिर्भर बना रह सके।
  8. राष्ट्र के संसाधनों का सर्वेक्षण करा लिया जाना चाहिए जिससे उनके उपभोग की मात्रा सुनिश्चित की जा सके।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से निष्कर्ष निकलता है कि देश के प्रत्येक नागरिक को वहाँ उपलब्ध संसाधनों को अमूल्य निधि समझना चाहिए। इन संसाधनों का भविष्य के लिए संरक्षण करना अति
आवश्यक है, जिससे कि वर्तमान एवं भावी सन्तति उनसे लाभान्वित हो सके तथा धीरे-धीरे अधिकतम उपयोगिता प्राप्त होती रहे।

प्रश्न 3
विश्व में लकड़ी काटने का उद्योग (Lumbering) किन भौगोलिक परिस्थितियों पर आधारित है? लकड़ी काटने एवं चीरने वाले प्रमुख देशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

लकड़ी काटने Lumbering

वन- व्यवसाय का महत्त्वपूर्ण उपयोग लकड़ी काटने एवं चीरने का है। लकड़ी काटना एवं उनकी चिराई एक प्राथमिक व्यवसाय है। वनों से कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार की लकड़ी काटी जाती है, जिसका उपयोग निम्नवत् किया जाता है –

  1. ईंधन में 40 प्रतिशत।
  2. इमारती कार्यों में- भवन-निर्माण, पुल निर्माण, नावें, रेल के डिब्बे एवं स्लीपर, मोटर, टूक, फर्नीचर तथा पैकिंग आदि कार्यों में 40 प्रतिशत।
  3. निर्माण उद्योगों में- कागज की लुग्दी, दियासलाई, कृत्रिम रेशम आदि में-10 प्रतिशत।
  4. अन्य फुटकर कार्य- बल्लियों, सीढ़ियों, खानों आदि में-10 प्रतिशत।
    जेड० एस० हॉक ने विश्व में प्राप्त लकड़ी को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है –

    • शीत कटिबन्धीय वनों (कोणधारी) से (कोमल लकड़ी)-35 प्रतिशत;
    • शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों से (मिश्रित लकड़ी)-49 प्रतिशत एवं
    • उष्ण कटिबन्धीय वनों से (कठोर लकड़ी)-16 प्रतिशत।

लकड़ी काटने के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियाँ
Necessary Geographical Conditions for Lumbering

  1. उत्तम लकड़ी की प्राप्ति – लकड़ी काटने एवं चीरने के लिए काफी मात्रा में कठोर एवं कोमल लकड़ी के वन होने चाहिए। कठोर लकड़ी में महोगनी, सीडार एवं टीक तथा कोमल लकड़ी में देवदार, कैल, फर, चीड़ एवं यूकेलिप्टस प्रमुख हैं।
  2. सस्ते एवं कुशल श्रमिक – वृक्षों को सघन वनों से काटने के लिए काफी संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की उपलब्धता अति आवश्यक है। साइबेरिया एवं कनाडा में टैगा वनों की कटाई के लिए सस्ते एवं पर्याप्त श्रमिक मिल जाते हैं जो ग्रीष्म ऋतु में कृषि-कार्य करते हैं एवं शीत ऋतु में हिम अधिक पड़ने के कारण वनों को काटने का कार्य करते हैं।
  3. यातायात एवं परिवहन साधनों की सुलभता – लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठों को बहाकर ले जाने के लिए जल-परिवहन सबसे सस्ता साधन है तथा अन्य साधनों में रेल, मोटर आदि का होना अति आवश्यक है। म्यांमार एवं थाईलैण्ड में यह कार्य हाथियों द्वारा किया जाता है।
  4. जल-विद्युत शक्ति का विकास – कारखानों को चलाने के लिए जल-विद्युत शक्ति सबसे सस्ती पड़ती है। इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए नदियों के मार्ग में कृत्रिम जल-प्रपात या बाँध बनाये जा सकते हैं।
  5. बाजार की समीपता-वनों के समीपवर्ती प्रदेशों में लकड़ी का उपभोग करने के लिए कागज़ मिल, दियासलाई, पैकिंग, कृत्रिम रेशम आदि उद्योगों की स्थापना की जानी अति आवश्यक है।
  6. सघन वनों का न होना- वने सघन नहीं होने चाहिए, अन्यथा लकड़ी काटना बड़ा ही कठिन हो जाता है। विरल वनों से लकड़ी सावधानीपूर्वक काटी जा सकती है।

सम्पूर्ण विश्व में 425 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल पर वन फैले हैं, जिसमें से लगभग आधे भाग पर उष्ण कटिबन्धीय कठोर, मिश्रित एवं अवर्गीकृत वनों का विस्तार है। शंकुधारी या टैगो वनस्पति का विस्तार 136 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर है, जब कि शीतोष्ण कटिबन्धीय कठोर लकड़ी के वनों का विस्तार केवल 66 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है। विश्व में लकड़ी का उत्पादन करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका औद्योगिक लकड़ी का 76% भाग पूरा करता है।

लकड़ी का उत्पादन करने वाले प्रमुख देश
Main Wood Producing Countries

समशीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में लकड़ी काटने एवं चीरने का व्यवसाय प्रमुख है। इन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अलास्का, रूस, नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, जापान, चीन, म्यांमार एवं भारत आदि देश मुख्य हैं।
(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – इस देश का लकड़ी काटने एवं चीरने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ पर लगभग एक-तिहाई भूमि पर वन-सम्पदा फैली है जिनमें से दो-तिहाई क्षेत्रफल व्यापारिक लकड़ियों का है। इस देश में कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। पाइन, डगलस, फर, येलोपाइन, स्पूस आदि वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं जिनसे लुग्दी, कागज, गत्ता, बिरोजा, तारपीन का तेल एवं अखबारी कागज बनाये जाते हैं। अमेरिका में उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, महान् झील क्षेत्र, अप्लेशियन पर्वतीय क्षेत्र, मध्यवर्ती क्षेत्र, रॉकी पर्वतीय क्षेत्र एवं पश्चिमी तटीय क्षेत्र लकड़ी काटने एवं चीरने में मुख्य स्थान रखते हैं।

(2) कनाडा – इस देश के 45% भाग पर वन-सम्पदा फैली है। यहाँ कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। ब्रिटिश कोलम्बिया, उत्तरी प्रेयरी प्रान्त, ओण्टेरियो, क्यूबेक एवं न्यू ब्रिन्सविक मुख्य लकड़ी उत्पादक क्षेत्र हैं। कुल वन क्षेत्रों का 51% भाग व्यापारिक है। यहाँ 65% कोमल, 24% मिश्रित एवं 11% कठोर लकड़ी के वन हैं। इस देश में 150 से भी अधिक किस्मों की लकड़ी पायी जाती है जिनमें नुकीली पत्ती वाले वृक्ष 47 प्रकार के हैं। स्यूस, बालसम, पाइन, डगलस, फर, हेमलॉक, सीडार, मैपिल, बीच, रेड पाइन आदि मुख्य वृक्ष हैं। इनसे लकड़ी चीरने, कागज एवं लुग्दी बनाने, फर्नीचर, वस्त्रों के कृत्रिम धागे एवं प्लास्टिक बनायी जाती है। वन उत्पादन का 95% भाग लट्ठों, लुग्दी एवं ईंधन का होता है। कुल उत्पादन का 10% भाग निर्यात कर दिया जाता है। लकड़ी का कुल उत्पादन 402 लाख घन मीटर है। जिसमें 9 लाख घन मीटर कठोर एवं 393 लाख घन मीटर कोमल लकड़ी है।।

(3) रूस – रूस में 91 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर वन-सम्पदा का विस्तार है। यहाँ पर शंकुल वृक्षों की अधिकता है जिनमें स्पूस, एल्डर, विलो, लिंडन, हार्डब्रीम, फर, लार्च, सीडार एवं पाइन मुख्य हैं। इनकी लकड़ी कागज एवं लुग्दी बनाने के काम आती है। शंकुल वनों का विस्तार 60° उत्तरी अक्षांश से टुण्ड्रा प्रदेश तक है। यह वन क्षेत्र बाल्टिक सागर से पूर्व में ओखोटस्क सागर तक विस्तृत है। ओनेगा, लेनिनग्राड, मरमास्क, मेजेनई, गरका एवं आरकेंजल लकड़ी की चिराई के प्रमुख केन्द्र हैं। रूस के समस्त वन भाग का 80% एशियाई रूस में है। साइबेरिया के इस वन प्रदेश की सबसे बड़ी सुविधा ट्रांस-साइबेरियन रेलवे है। विश्व लकड़ी भण्डार का 21% भाग साइबेरिया से प्राप्त होता है।

(4) यूरोपीय देश – यूरोप महाद्वीप का एक-तिहाई भाग वनों से आच्छादित है, जहाँ विश्व की 10% लकड़ी प्राप्त होती है। इनमें कोमल लकड़ी की अधिकता है। इसका विस्तार 50° से 70° उत्तरी अक्षांशों तक है, जो नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड होती हुई उत्तरी रूस तक चली गयी है। लकड़ी में निम्नलिखित देश प्रमुख उत्पादक हैं –

  1. नार्वे – इस देश के 25% भाग पर वन फैले हैं। उत्तरी एवं दक्षिणी तट को छोड़कर शेष पर्वतीय ढालों एवं नदी घाटियों में वनों का विस्तार पाया जाता है। यहाँ पर पाये जाने वाले प्रमुख वृक्षों में फर 50%, चीड़ 34% तथा शेष पर बीच एवं ओक आदि के वृक्ष हैं। यहाँ अखबारी कागज, सैलूलोज, गत्ता, दियासलाई तथा उत्तम किस्म का कागज बनाया जाता है।
  2. स्वीडन – यहाँ 60% भाग पर वन-सम्पदा फैली है। उत्तर एवं मध्य में कोमल तथा दक्षिण में कठोर लकड़ी के वनों की अधिकता है। यहाँ पर पाइन, स्पूस, फर आदि वृक्षों की प्रधानता है। इस देश में कागज, लुग्दी, प्लाईवुड एवं दियासलाई बनायी जाती है। निर्यात व्यापार में भी इन्हीं वृक्षों की लकड़ियों की अधिकता है।
  3. फिनलैण्ड – फिनलैण्ड के 70% भाग पर वन-सम्पदा का विस्तार है। यहाँ स्पूस, पाइन एवं फर वृक्षों की अधिकता है। यहाँ के निर्यात में 88% भाग वन वस्तुओं का है। चीरी हुई लकड़ी की वस्तुएँ, प्लाईवुड, अखबारी कागज तथा लकड़ी का रेशा यहाँ भी मुख्य उत्पादक वस्तुएँ हैं। तटीय भाग में लकड़ी चीरने के केन्द्र स्थापित हुए हैं।

मध्य यूरोपीय देशों में फ्रांस–22%, जर्मनी-21%, स्विट्जरलैण्ड-25% तथा जर्मनी में 27% भाग पर वन फैले हैं, परन्तु सभी देशों में लकड़ी का अभाव पाया जाता है। इन देशों में केवल अपने उपभोग के लिए ही लकड़ी का उत्पादन किया जाता है।

(5) एशियाई देश – एशिया महाद्वीप में जापान, चीन, म्यांमार एवं भारत प्रमुख लकड़ी उत्पादक देश हैं, जिनका विवरण निम्नवत् है –

  1. जापान – इस देश के लगभग 50% भाग पर वन फैले हैं। मध्य होकेड़ो एवं हाँशू के भीतरी पर्वतीय क्षेत्रों में इनका विस्तार है। फर, स्पूस, हिकोरी, सुगी-नुकीली पत्ती वाले; मैपिल, बूना, पॉपलर, ओक-चौड़ी पत्ती के वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं। शंकुल वनों का विस्तार 60,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर है। इन वृक्षों को चीरकर विभिन्न वस्तुएँ तथा कागज उद्योग के लिए लुग्दी बनायी जाती है।
  2. चीन – चीन में केवल 40% भाग पर ही वन छाये हुए हैं। जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण कृषि के विकास के लिए भारी पैमाने पर वनों का विनाश किया गया है। केवल पश्चिमी एवं दक्षिणी पहाड़ी भागों पर ही वन मिलते हैं। फर, स्थूस, हेमलॉक, ओक, चेस्टनट आदि मुख्य वृक्ष हैं।
  3. म्यांमार – यहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में सदापर्णी एवं 100 से 200 सेमी वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन मिलते हैं। इरावदी नदी के बेसिन में विश्वविख्यात सागौन के वृक्ष पाये जाते हैं। यहाँ से लकड़ी काटकर हाथियों द्वारा ढोयी जाती है। रंगून नगर से सागौन की लकड़ी विदेशों को निर्यात की जाती है।
  4. भारत – भारत में 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में, प्रमुख रूप से असम के पहाड़ी ढालों एवं पश्चिमी घाट पर, सदापर्णी वन मिलते हैं। 100 से 200 सेमी वर्षा वाले भागों में मानसूनी वन मिलते हैं जिनकी लकड़ी फर्नीचर एवं इमारती कार्यों में प्रयुक्त की जाती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं छोटा-नागपुर का पठार इन लकड़ियों के लिए प्रसिद्ध हैं। रेल विभाग द्वारा यहीं से लकड़ी डिब्बों एवं स्लीपरों के लिए मँगायी जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों से ईंधन की लकड़ी प्राप्त होती है। यहीं से कुछ कोमल प्रकार की लकड़ी कागज एवं दियासलाई बनाने में प्रयुक्त की जाती है।

(6) ऑस्ट्रेलिया – इस महाद्वीप के केवल 4% भाग पर वन मिलते हैं। वनों का 50% भाग शीतोष्ण कटिबन्धीय है। कॉरीगम वृक्ष मुख्य है जो 50 मीटर से 90 मीटर तक ऊँचा होता है। दक्षिणी-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया द्वीप में वन अधिक मिलते हैं। आर्द्र भागों में यूकेलिप्टस के वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं।

न्यूजीलैण्ड द्वीप का 20% भाग वनों से आच्छादित है। यहाँ के प्रमुख वृक्ष कॉरीगम, पाइन, टोटोरा, तवा एवं बीच हैं।
उपर्युक्त आधार पर विश्व में लकड़ी की कटाई एवं चिराई का कार्य निम्नलिखित प्रदेशों में उल्लेखनीय है –

  1. मानसूनी प्रदेशों के पतझड़ वाले वनों में साल, सागौन, शीशम, साखू आदि सुन्दर एवं टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष भारी संख्या में पाये जाते हैं।
  2. सामान्य गर्मी वाले समशीतोष्ण प्रदेशों में यूकेलिप्टस, ओक आदि दीमकों से नष्ट न होने वाले वृक्ष मिलते हैं।
  3. सामान्य शीत वाले समशीतोष्ण प्रदेशों में टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष-मैपिल, बर्च, बीच, बलूत, पोपलर आदि वृक्षों की अधिकता होती है।
  4. शंकुल वनों में कागज की लुग्दी, कागज, दियासलाई, तारपीन का तेल आदि के लिए उपयुक्त चीड़, देवदार, स्पूस, फर आदि कोमल लकड़ी के वृक्ष बहुतायत में पाये जाते हैं।
  5. भूमध्यरेखीय वनों में जहाँ सघनता कम है एवं नदियाँ उपलब्ध हैं, वहाँ महोगनी, एबोनी, रोजवुड, ग्रीनवुड, हार्डवुड, रबड़ आदि की मजबूत एवं टिकाऊ लकड़ियों के वृक्ष मिलते हैं।

यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में वन क्षेत्रफल उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा न केवल कम है, बल्कि ये क्षेत्र विश्व के औद्योगिक क्षेत्रों एवं बाजारों से दूर पड़ते हैं। अत: इन प्रदेशों की लकड़ियाँ बिना काटे ही रह जाती हैं। इसीलिए आर्थिक दृष्टिकोण से इन वनों की लकड़ी महत्त्व नहीं रखती।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
क्षयी और अक्षयी संसाधन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
पृथ्वी से प्राप्त विभिन्न प्रकार की धातुएँ खनिज क्षयी संसाधनों की श्रेणी में आती हैं। वास्तव में खनिज भण्डार इतनी तेजी से घट रहे हैं कि भविष्य में उनके अभाव से एक विकट समस्या उत्पन्न हो जाएगी। अतः ऐसे खनिज पदार्थ जो धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, उन्हें क्षयी संसाधन कहा जाता है। इसके विपरीत वे पदार्थ जो बहुत अधिक समय तक रहेंगे; जैसे-सौर ऊर्जा, वायु, जल, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव आदि को अक्षयी संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 2
नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय संसाधनों के बारे में आप क्या जानते हैं?
या
नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय संसाधनों के बीच विभेद कीजिए। [2011, 13, 16]
उत्तर
ऐसे संसाधन जो एक बार प्रयोग करने के पश्चात् फिर प्रयोग किये जा सकें, नव्यकरणीय संसाधन कहे जाते हैं; जैसे-जल, पवन, सूर्य-ऊर्जा आदि ऐसे संसाधन हैं जो सतत उपयोग करने पर फिर उत्पन्न होते रहते हैं; परन्तु कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जिसका एक बार उपयोग करने पर फिर उन्हें प्रयोग में नहीं लाया जा सकता; जैसे-कोयला। ऐसे संसाधनों को अनव्यकरणीय संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 3
संसाधनों के ‘संरक्षण’ पर टिप्पणी लिखिए। [2010]
उत्तर
संसाधनों के संरक्षण से अभिप्राय यह है कि जिन पदार्थों व वस्तुओं के प्रयोग के विषय में मानव को ज्ञान है, उनसे वह अधिकाधिक उपयोगिता हासिल करे। इस दिशा में संसाधनों का ऐसा प्रबन्ध किया जाए, जिससे वे अधिक लम्बे समय तक अधिकाधिक मनुष्यों की अधिकतम आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। एली के अनुसार, “संरक्षण वर्तमान पीढ़ी या भावी पीढ़ी के लिए त्याग है।” डॉ० मैकनाल के अनुसार, “संरक्षण का आशय किसी संसाधन का ऐसा उपयोग है जिससे मनुष्य जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम रीति से हो सके।” संरक्षण का महत्त्व निम्नलिखित रूप से स्पष्ट होता है –

  1. बचत की भावना का विकास होता है।
  2. संरक्षण से बरबादी या दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
  3. विवेकपूर्ण उपयोग भविष्य के लिए संसाधनों में बचत को प्रोत्साहित करता है।
  4. भविष्य में संसाधनों के नष्ट होने पर गहरा संकट केवल संरक्षण द्वारा ही दूर किया जा सकता है।
  5. पारिस्थितिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए भी संरक्षण आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसाधन से क्या तात्पर्य है? (2007)
या
संसाधन को परिभाषित कीजिए। [2012, 16]
उत्तर
कोई भी वह पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मानव की कुछ उपयोगिता करता हो, संसाधन कहलाता है।

प्रश्न 2
प्राकृतिक संसाधन किन्हें कहते हैं? [2007, 08, 10, 11, 16]
या
प्राकृतिक संसाधन को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए। [2014, 16]
उत्तर
वे संसाधन जो प्रकृति द्वारा मनुष्य को नि:शुल्क प्रदान किये जाते हैं और जो मानव के लिए उपयोगी होते हैं, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं; जैसे-वायु, जल, सौर ऊर्जा, खनिज, जीव-जन्तु आदि।

प्रश्न 3
क्या मानव स्वयं भी एक संसाधन है?
उत्तर
वास्तव में मानव स्वयं में एक बहुत बड़ा संसाधन है, जो प्रकृति की विभिन्न वस्तुओं को अपने ज्ञान और क्षमता के द्वारा उपयोगी बनाता है।

प्रश्न 4
विश्व के कुछ प्रमुख संसाधनों के नाम बताइए।
उत्तर
विश्व के कुछ प्रमुख संसाधन हैं- मानव, कोयला, खनिज तेल, जल, खनिज, पशु-सम्पदा, मत्स्य आदि।

प्रश्न 5
वर्तमान काल में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत क्या है?
उत्तर
वर्तमान काल में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत ‘खनिज तेल है, क्योंकि ऊर्जा के अतिरिक्त खनिज तेल से 8,000 अन्य प्रकार की उपवस्तुएँ भी प्राप्त की जाती हैं।

प्रश्न 6
संसार के चार प्रमुख मछली उत्पादक देशों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. चीन,
  2. जापान,
  3. भारत तथा
  4. संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 7
दो नव्यकरणीय संसाधनों का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर

  1. जल तथा
  2. पवन-दो नव्यकरणीय संसाधन हैं। ये संसाधन निरन्तर बने रहते हैं। अथवी चक्रीय स्वरूप में प्राप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 8
लकड़ी उत्पादन के चार प्रमुख देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
लकड़ी उत्पादन के चार प्रमुख देश हैं-संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, रूस व नावें।

प्रश्न 9
एशिया में लकड़ी उत्पादन वाले चार देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
एशिया में लकड़ी उत्पादन वाले चार देश हैं-जापान, चीन, म्यांमार तथा भारत।

प्रश्न 10
मानव संसाधन किसी भी देश के लिए आवश्यक साधन क्यों है?
उत्तर
मानवीय शक्ति द्वारा ही प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सम्भव होता है; अत: मानव संसाधन किसी भी देश के लिए एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रश्न 11
मुख्य भौतिक संसाधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
मुख्य भौतिक संसाधन हैं-खनिज पदार्थ, जल, भूमि, वन, वायु, मिट्टी, धरातल आदि।

प्रश्न 12
चार अक्षयी संसाधनों का नामोल्लेख कीजिए। [2007, 08]
उत्तर
चार अक्षयी संसाधन हैं-मिट्टी, जल, वायु तथा सौर ऊर्जा।

प्रश्न 13
विश्व में लकड़ी का उत्पादन करने वाले उस देश के नाम का उल्लेख कीजिए जो औद्योगिक लकड़ी का 76% भाग पूरा करता है।
उत्तर
संयुक्त राज्य अमेरिका।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
“मनुष्य का ज्ञान ही सबसे बड़ा संसाधन है।” यह कथन है –
(क) मैकनाल का
(ख) जिम्मरमैन का
(ग) कु० सैम्पुल का
(घ) डॉ० डेविस का
उत्तर
(ख) जिम्मरमैन का।

प्रश्न 2
निम्न में से कौन जैविक संसाधन है? [2011, 12, 15, 16]
(क) मिट्टी
(ख) जस्ता
(ग) वनस्पति
(घ) वायु
उत्तर
(ग) वनस्पति।

प्रश्न 3
वायु, जल, सौर ऊर्जा, भूमि व धरातल, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति, खनिज पदार्थ एवं जीव-जन्तु हैं –
(क) मानवीय संसाधन
(ख) प्राकृतिक संसाधन
(ग) (क) व (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) प्राकृतिक संसाधन।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources

प्रश्न 4
विश्व के कुल मछली उत्पादन का सागरों से प्राप्त होने वाला भाग है –
(क) 70 प्रतिशत
(ख) 90 प्रतिशत
(ग) 88 प्रतिशत
(घ) 84 प्रतिशत
उत्तर
(ग) 88 प्रतिशत।

प्रश्न 5
ऊर्जा के निम्नलिखित स्रोतों में से कौन-सा स्रोत नवीकरणीय नहीं है?
(क) ज्वार ऊर्जा
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) जल-विद्युत
(घ) ताप-विद्युत
उत्तर
(घ) ताप-विद्युत।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा का नव्यकरणीय स्रोत नहीं है ? (2009)
(क) भू-ताप
(ख) वायु
(ग) जल
(घ) खनिज तेल
उत्तर
(घ) खनिज तेल।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन अक्षय संसाधन है? (2014)
(क) कोयला
(ख) लौह-अयस्क
(ग) सौर ऊर्जा
(घ) मैंगनीज
उत्तर
(क) सौर ऊर्जा।

प्रश्न 8
निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है? (2014)
(क) ज्वारीय ऊर्जा
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) ताप विद्युत
(घ) जल-विद्युत
उत्तर
(क) तापविद्युत।

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से कौन-सा नव्यकरणीय संसाधन है? (2015)
(क) पेट्रोलियम
(ख) लौह-अयस्क
(ग) जल
(घ) कोयला
उत्तर
(ग) जल

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी)
Number of Questions 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी)

प्रश्न 1.
सूत-पुत्र’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2016,17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथा-सार संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
उत्तर
[ संकेत-नाटक के सारांश के लिए आगे दिये प्रश्न 2, 3, 4, 5 के उत्तरों को एक साथ क्रम से संक्षेप में लिखें।]
या
‘सूत-पुत्र’ में कर्ण के जीवन से सम्बन्धित मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
[ संकेत–प्रश्न संख्या 2, 3, 4, 5 से चार मार्मिक प्रसंगों को लेकर संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें।]

प्रश्न 2.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के प्रथम अंक की कथा को संक्षेप में लिखिए। [2009,11,12,13,15]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक अंक की कथा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
‘सूत-पुत्र’ नाटक के लेखक डॉ० गंगासहाय प्रेमी हैं। इस नाटक के कथासूत्र ‘महाभारत से लिये गये हैं। परशुराम जी उत्तराखण्ड के आश्रम में निवास करते हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि वह केवल ब्राह्मणों को ही धनुष चलाना सिखाएँगे, क्षत्रियों को नहीं। ‘कर्ण’ एक महान् धनुर्धर बनना चाहते हैं; अतः वे स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम जी से धनुर्विद्या सीखने लगते हैं। एक दिन परशुराम जी, कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सोये हुए होते हैं कि एक कीड़ा कर्ण की जंघा को काटने लगता है, जिससे रक्तस्राव होने लगता है। रक्तस्त्राव होने पर भी ‘कर्ण’ दर्द सहन कर जाते हैं। कर्ण की सहनशीलता को देखकर परशुराम जी को उसके क्षत्रिय होने का सन्देह होता है। पूछने पर कर्ण उन्हें सत्य बता देते हैं। परशुराम जी क्रुद्ध होकर शाप देते हैं कि अन्त समय में तुम हमारे द्वारा सिखाई गयी विद्या को भूल जाओगे। कर्ण वहाँ से वापस चले
आते हैं।

प्रश्न 3.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार संक्षेप में लिखिए।[2012, 16, 17]
या
द्रौपदी स्वयंवर की कथा ‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर लिखिए। [2013]
या
द्रौपदी स्वयंवर का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2013,17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर ‘द्रौपदी-स्वयंवर’ का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के दूसरे अंक में द्रौपदी के विवाह का वर्णन है। पांचाल-नरेश द्रुपद के यहाँ उनकी अद्वितीया सुन्दरी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होता है। स्वयंवर की शर्त के अनुसार प्रतिभागी को खौलते तेल की कड़ाही में ऊपर लगे खम्बे पर एक घूमते चक्र में बंधी मछली की आँख बेधनी थी। अनेक राजकुमार इसमें असफल हो जाते हैं। कर्ण अपनी विद्या पर विश्वास कर मछली की आँख बेधने आते हैं, लेकिन अपने परिचय से राजा द्रुपद को सन्तुष्ट नहीं कर पाते और द्रुपद उन्हें प्रतियोगिता के लिए अयोग्य घोषित कर देते हैं।

कर्ण के तेजस्वी रूप तथा विद्रोही स्वभाव से प्रसन्न होकर दुर्योधन ने उसे अपने राज्य के एक प्रदेश ‘अंग देश’ का राजा घोषित कर दिया, किन्तु ऐसा करके भी दुर्योधन, कर्ण की पात्रता और क्षत्रियत्व को पुष्ट नहीं कर पाता। यह प्रसंग ही दुर्योधन व कर्ण की मित्रता का सेतु सिद्ध होता है। ब्राह्मण वेश में अर्जुन और भीम सभा-मण्डप में आते हैं। अर्जुन मछली की आँख बेधकर द्रौपदी से विवाह कर लेते हैं। अर्जुन तथा भीम को दुर्योधन पहचान लेता है। दुर्योधन द्रौपदी को बलपूर्वक छीनने के लिए कर्ण से कहता है, परन्तु कर्ण इस अनैतिक कार्य के लिए तैयार नहीं होते। दुर्योधन अर्जुन से संघर्ष करता है, परन्तु घायल होकर वापस आ जाता है और कर्ण को बताता है कि ब्राह्मण वेशधारी और कोई नहीं अर्जुन और भीम ही हैं। इस बात में भी कोई सन्देह नहीं रह जाता है कि पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाकर मार डालने की उसकी योजना असफल हो गयी है। कर्ण पाण्डवों को बड़ा भाग्यशाली बताता है।

प्रश्न 4.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 13, 14, 15]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक में कर्ण-इन्द्र अथवा कर्ण-कुन्ती संवाद का सारांश लिखिए। [2010]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के तीसरे अंक में कर्ण के तपोस्थान का वर्णन है। कर्ण सूर्य भगवान् की उपासना करते हैं। सूर्य भगवान् साक्षात् दर्शन देकर उसे कवच तथा कुण्डल देते हैं और उनके जन्म का सारा रहस्य उन्हें बताते हैं। साथ ही आशीर्कद देते हैं कि जब तक ये कवच-कुण्डल तुम्हारे शरीर पर रहेंगे, तब तक तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं होगा। सूर्य भगवान् कर्ण को आगामी भारी संकटों से सचेत करते हैं और कहते हैं कि इन्द्र तुमसे इन कवच और कुण्डल की माँग करेंगे। कर्ण के पिछले जीवन की कथा भी सूर्य भगवान् उन्हें बता देते हैं, लेकिन माता का नाम नहीं बताते। कुछ समय बाद इन्द्र; अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण वेश में आकर दानवीर कर्ण से कवच व कुण्डल का दान ले लेते हैं। कर्ण की दानशीलता से प्रसन्न होकर वे उन्हें एक अमोघ शक्ति प्रदान करते हैं, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। इन्द्र कर्ण को यह रहस्य भी बता देते हैं कि कुन्ती से, सूर्य के द्वारा, कुमारी अवस्था में उनका जन्म हुआ है। इस जानकारी के कुछ समय बाद कुन्ती कर्ण के आश्रम में आती है और कर्ण को बताती है कि वे उनके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वह कर्ण से रणभूमि में पाण्डवों को न मारने का वचन चाहती है; परन्तु कर्ण ऐसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं। वे कुन्ती को आश्वासन देते हैं कि वे अर्जुन के अतिरिक्त अन्य किसी पाण्डव को नहीं मारेंगे। कुन्ती कर्ण को आशीर्वाद देकर चली जाती है। नाटक का तीसरा अंक यहीं समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
‘सूत-पुत्र के चतुर्थ अंक के कर्ण और अर्जुन के संवाद के आधार पर सिद्ध कीजिए कि कर्ण युद्धवीर होने के साथ-साथ दानवीर भी था।
या
‘सूत-पुत्र’ के सर्वाधिक रोचक और प्रेरणास्पद कथांश को लिखिए।
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के चतुर्थ अंक की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 14, 16, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के अंतिम अंक का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2016, 17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के चतुर्थ अंक में वर्णित श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद के माध्यम से दानवीर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2010]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक के चौथे (अन्तिम) अंक में अर्जुन तथा कर्ण के युद्ध का वर्णन है। यह अंक नाटक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और प्रभावित करने वाला अंक है। इसमें नाटक के नायक कर्ण की दानवीरता, बाहुबल और दृढ़प्रतिज्ञता जैसे गुणों का उद्घाटन हुआ है। कर्ण और अर्जुन का युद्ध होता है। कर्ण अपने बाणों के प्रहार से अर्जुन के रथ को युद्ध-क्षेत्र में पीछे हटा देते हैं। कृष्ण कर्ण की प्रशंसा करते हैं, जो अर्जुन को अच्छी नहीं लगती। कृष्ण अर्जुन को बताते हैं। कि तुम्हारी पताका पर ‘महावीर’, रथ के पहियों पर ‘शेषनाग और तीनों लोकों का भार लिये मैं रथ पर स्वयं प्रस्तुत हूँ, फिर भी कर्ण ने रथ को पीछे हटा दिया, निश्चय ही वह प्रशंसा का पात्र है। युद्धस्थल में कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फँस जाता है। अर्जुन निहत्थे कर्ण को बाण-वर्षा करके घायल कर देते हैं। कर्ण मर्मान्तक रूप से घायल हो गिर पड़ते हैं और सन्ध्या हो जाने के कारण युद्ध बन्द हो जाता है। श्रीकृष्ण कर्ण की दानवीरता एवं प्रतिज्ञा-पालन की प्रशंसा करते हैं। कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन घायल कर्ण के पास सोने का दान माँगने जाते हैं। कर्ण अपने सोने का दाँत तोड़कर देता है, परन्तु रक्त लगा होने के कारण अशुद्ध बताकर कृष्ण उन्हें लेना स्वीकार नहीं करते। तब रक्त लगे दाँतों की शुद्धि के लिए कर्ण बाण मारकर धरती से जल निकालता है और दाँतों को धोकर ब्राह्मण वेषधारी कृष्ण को दे देता है। अब श्रीकृष्ण और अर्जुन वास्तविक रूप में प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण से लिपट जाते हैं और अर्जुन कर्ण के चरण पकड़ लेते हैं। यहीं पर ‘सूत-पुत्र नाटक की कथा का मार्मिक व अविस्मरणीय अन्त होता है।

प्रश्न 6.
सूत-पुत्र नाटक के आधार पर कर्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या
‘सूत-पुत्र’ के प्रमुख पात्र (नायक) कर्ण का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2010, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2016]
या
‘सूत-पुत्र’ के प्रमुख पात्र कर्ण के जीवन से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ? नाटक के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। [2009]
या
“कर्ण वीर एवं दानी दोनों था।” सिद्ध कीजिए। [2009]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी के सूत-पुत्र’ नाटक का नायक कर्ण है। कर्ण के महान् चरित्र को प्रस्तुत कर उसकी महानता का सन्देश देना ही नाटककार का अभीष्ट है। कर्ण का जन्म कुन्ती द्वारा कौमार्य अवस्था में किये गये सूर्यदेव के आह्वान का परिणाम था। लोकलाज के भय से उसने कर्ण को एक घड़े में रखकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। वहीं से कर्ण सूत-पत्नी राधा को मिला तथा राधा ने ही उसका पालन-पोषण किया। राधा द्वारा पालन-पोषण किये जाने के कारण कर्ण ‘राधेय’ या ‘सूत-पुत्र’ कहलाया। असवर्ण परिवार में पालन-पोषण होने के कारण उसे पग-पग पर अपमान सहना पड़ा। अन्यायी और दुराचारी दुर्योधन की मित्रता भी उसकी असफलता का कारण बनी; क्योंकि मित्रता निभाने के लिए उसे अन्याय में भी उसका साथ देना पड़ा और अन्याय की अन्त में पराजय होती है तथा अन्यायी का साथ देने वाला भी बच नहीं पाता। कर्ण वीर, साहसी, दानवीर, क्षमाशील, उदार, बलशाली तथा सुन्दर था। यह सब होते हुए भी पग-पग पर अपमानित होने के कारण वह आजीवन तिल-तिल कर जलता रहा। उसका जीवन फूलों की शय्या नहीं, वरन् काँटों का बिछौना ही रहा।

कर्ण का चरित्र-चित्रण

कर्ण के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ थीं–
(1) सुन्दर आकर्षक युवक-नाटककार ने कर्ण के रूप के विषय में लिखा है-“कर्ण तीसपैंतीस वर्ष का हृष्ट-पुष्ट सुदर्शन युवा है। उसका शरीर लम्बा-छरहरा किन्तु भरा हुआ, रंग उज्ज्वल, गोरा, नाक ऊँची, नुकीली और आँखें बड़ी-बड़ी हैं।” इस प्रकार कर्ण एक सुन्दर आकर्षक युवक है।
(2) तेजस्वी तथा प्रतिभाशाली–कर्ण का व्यक्तित्व प्रतिभाशाली है। वह अपने पिता सूर्य के समान तेजस्वी है। कर्ण ऐसा पहला व्यक्ति है, जिसके तेजस्वी रूप से दुर्योधन जैसा अभिमानी व्यक्ति भी प्रभावित हुआ। द्रौपदी-स्वयंवर में कर्ण को पहली बार देखकर ही दुर्योधन उससे प्रभावित होता है और अपना मित्र बनाने के लिए वह उसे अंगदेश का अधिपति बना देता है।
(3) सच्चा गुरुभक्त-कर्ण गुरुभक्त शिष्य है। गुरु परशुराम उसकी जंघा पर सिर रखकर सोते हैं, तभी एक कीड़ा उसकी जंघा को काटने लगता है। कीड़े के काटने पर उसकी जंघा से रक्तस्राव होता रहा, परन्तु कष्ट सहकर भी वह गुरु-निद्रा भंग नहीं होने देता। गुरु उसे शाप देते हैं, परन्तु वह किसी से कभी भी उनकी निन्दा नहीं सुन सकता- ‘मेरे गुरु की निन्दा में आपने अब यदि एक भी शब्द कहा तो यह स्वयंवर-मण्डप युद्धस्थल में बदल जाएगा।” गुरु में कर्ण की अटूट श्रद्धा और भक्ति है। कर्ण की गुरु-भक्ति की प्रशंसा स्वयं गुरु परशुराम भी करते हैं-”विद्याभ्यास के प्रति तुम्हारी तन्मयता से मैं सदा प्रभावित रहा हूँ। मेरे लिए तुम प्राण भी दे सकते हो।”
(4) धनुर्विद्या में प्रवीण-कर्ण ने धनुष चलाने की शिक्षा परशुराम जी से प्राप्त की। कर्ण अपने समय का सर्वश्रेष्ठ बाण चलाने वाला है। अनुपम धनुर्धारी अर्जुन भी उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होता। साधारण योद्धाओं से युद्ध करना तो कर्ण अपनी शान के विरुद्ध समझता है।।
(5) नारी के प्रति श्रद्धाभाव-कर्ण के प्रति सबसे बड़ा अन्याय स्वयं नारीस्वरूपा उसकी माँ ने किया है, परन्तु फिर भी वह नारी के प्रति श्रद्धाभाव रखता है-“नारी विधाता का वरदान है। नारी सभ्यता, संस्कृति की प्रेरणा है। नारी का अपहरण कभी भी सह्य नहीं हो सकता।”
(6) दानवीर-कर्ण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी दानवीरता है। उसके सामने से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। अपनी रक्षा के अमोघ साधन कवच और कुण्डल भी वह इन्द्र के माँगने पर दान कर देता है। इस सम्बन्ध में अपने पिता सूर्य की सलाह भी वह नहीं मानता। वह इन्द्र से कहता है“मुझे जितना कष्ट हो रहा है, उससे कई गुना सुख भी मिल रहा है।”
(7) विश्वासपात्र मित्र-वह एक सच्चा मित्र है। दुर्योधन कर्ण को अपना मित्र बनाता है और कर्ण जीवन भर उसकी मित्रता का निर्वाह करता है। कुन्ती के कहने पर भी वह दुर्योधन से मित्रता के बन्धनों को तोड़कर विश्वासघाती नहीं बनना चाहता।
(8) प्रबल नैतिकता–कर्ण उच्च कोटि के संस्कारों से युक्त है, अत: वह नैतिकता को अपने जीवन में विशेष महत्त्व प्रदान करता है। द्रौपदी के अपहरण की बात पर वह दुर्योधन से कहता है-“दूसरे अनुचित करते हैं इसलिए हम भी अनुचित करें, यह नीति नहीं है। किसी की पत्नी का अपहरण परम्परा से निन्दनीय है।’

कुन्ती ने जब कर्ण से उसके जन्म की वास्तविकता बतायी और उसे अपने भाइयों के पास आ जाने के लिए कहा, तब भी कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। कर्ण का यह कार्य नैतिकता से परिपूर्ण है। किसी व्यक्ति को आश्वासन देकर बीच में छोड़ना नैतिकता नहीं है। यदि भीष्म पितामह और कर्ण के व्यवहार को इस कसौटी पर परखें तो कर्ण को ही उत्तम कहना पड़ेगा। भीष्म पितामह जहाँ परिस्थितियाँ न बदलने पर भी बदल गये वहाँ कर्ण परिस्थितियाँ बदलने पर भी नहीं बदला। कुन्ती ने कर्ण को ममता में फाँसने के साथ-साथ राज्य प्राप्ति का लालच भी दिया था, पर कर्ण सभी आकर्षणों से अप्रभावित रहा। जब कुन्ती ने बार-बार मातृत्व की दुहाई दी तो उसने युद्धस्थल में अर्जुन के अतिरिक्त अन्य किसी भी पाण्डव का वध न करने की शपथ ली।

जन्म एवं पालन-पोषण सम्बन्धी अपवाद के कारण कर्ण को चाहे जो कह लिया जाए, वैसे उसके चरित्र में कहीं भी कोई भी कालिमा नहीं है। कर्ण स्वनिर्मित व्यक्ति था। उसने किसी को न कभी धोखा दिया और न अकारण किसी से बैर-विरोध मोल लिया। ‘महाभारत के सभी पात्रों पर कुछ-न-कुछ लांछन लगा हुआ है, पर कर्ण इस दृष्टि से सभी प्रकार से उज्ज्वल है। उसने जीवन में केवल एक बार झूठ बोला और वह भी धनुर्विद्या सीखने के लिए। किसी को धोखा देने अथवा हानि पहुँचाने वाले असत्य भाषण से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।

इन सबके अतिरिक्त कर्ण सच्चा मित्र, अद्वितीय दानी, निर्भीक, दृढ़प्रतिज्ञ तथा महान् योद्धा है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कर्ण उदात्त स्वभाव वाला धीर-वीर नायक है।

प्रश्न 7.
‘सूत-पुत्र के आधार पर श्रीकृष्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2014, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2010, 15, 16]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014]
उत्तर

श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण

डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक संस्कृत के महाकाव्य ‘महाभारत’ पर आधारित है। यद्यपि इस नाटक का कथानके पूर्ण रूप से कर्ण को केन्द्रबिन्दु मानकर ही अग्रसर होता है, परन्तु श्रीकृष्ण भी एक प्रभावशाली पात्र के रूप में उपस्थित हुए हैं।
प्रस्तुत नाटक में श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नवत् प्रस्तुत किया गया है-

(1) वीरता के प्रशंसक-यद्यपि श्रीकृष्ण अर्जुन के मित्र हैं और उसके सारथी भी, परन्तु वे कर्ण की वीरता एवं शक्ति के प्रशंसक हैं। उन्हें इस बात पर प्रसन्नता होती है कि कर्ण सभी प्रकार से सुरक्षित अर्जुन के रथ को पीछे हटा देता है। वे कहते हैं—“धन्य हो कर्ण ! तुम्हारे समान धनुर्धर सम्भवतः पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।”
(2) कुशल राजनीतिज्ञ-कर्ण के पास, सूर्य के द्वारा दिये गये कवच-कुण्डलों को इन्द्र को दान कर देने पर, इन्द्र से प्राप्त एक अमोघ शक्ति थी जिसे कर्ण अर्जुन के वध के लिए सुरक्षित रखना चाहता है; परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण की उस शक्ति का प्रयोग घटोत्कच पर करा देते हैं। यह श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता एवं कुशल राजनीति का ही परिणाम था।
(3) कुशल-वक्ता-श्रीकृष्ण कुशल वक्ता के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण नहीं चलाना चाहता था। श्रीकृष्ण उसके भावों को उत्तेजित करते हैं और इस तरह बात करते हैं कि अर्जुन को धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए विवश होना पड़ता है।
(4) अवसर को न चूकने वाले–कर्ण के ऊपर बाण छोड़ने के लिए वे अर्जुन से कहते हैं”अगर तुम इस अवस्था में कर्ण पर बाण नहीं चलाओगे तो दूसरी अवस्था में वह तुम्हें बाण चलाने नहीं देगा।” वे अर्जुन से कहते हैं—“यही समय है, जब तुम कर्ण को अपने बाणों का लक्ष्य बनाकर सदा के लिए युद्ध-भूमि में सुला सकते हो। ………… शीघ्रता करो ! अवसर का लाभ उठाओ।”
(5) महाज्ञानी–श्रीकृष्ण ज्ञानी पुरुष के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। वे अर्जुन से कहते हैं-“मृत्यु को देखकर बड़े-बड़े योद्धा, तपस्वी और ज्ञानी तक व्याकुल हो उठते हैं।” वे अर्जुन को समझाते हैं—‘‘शरीर के साथ आत्मा का बन्धन बहुत दृढ़ होता है। इस प्रकार उनके ज्ञान और विद्वत्ता का स्पष्ट आभास मिलता है।
(6) पश्चात्ताप की भावना-श्रीकृष्ण को इस बात का पश्चात्ताप है कि कर्ण का वध न्यायोचित ढंग से नहीं हुआ। वे मानते हैं-”हमने अपनी विजय-प्राप्ति के स्वार्थवश कर्ण के साथ जो कुछ अन्याय किया है, हम इस प्रकार यश दिलाकर उसे भी थोड़ा हल्का कर सकेंगे।”

अस्तु; श्रीकृष्ण रंगमंच पर यद्यपि कुछ देर के लिए नाटक के अन्त में ही आते हैं, तथापि इतने से ही उनके व्यक्तित्व की झलक स्पष्ट रूप से मिल जाती है।

प्रश्न 8.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर दुर्योधन की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक संस्कृत के महाकाव्य ‘महाभारत पर आधारित है। यद्यपि इस नाटक का कथानक पूर्ण रूप से कर्ण को केन्द्र-बिन्दु मानकर ही अग्रसर होता है। परन्तु नाटक में दुर्योधन भी एक प्रभावशाली पात्र के रूप में उपस्थित हुए हैं, जो राजनीति के गुणोंसाम, दाम, दण्ड, भेद का खुलकर प्रयोग करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अन्त तक प्रयासरत रहते हैं। उनके चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सच्चा मित्र-दुर्योधन एक सच्चा मित्र है। वह कर्ण को अपना मित्र बनाता है। आजीवन मित्रता का निर्वाह करता है। मित्र होने के कारण कर्ण की हर सम्भव मदद करने को तत्पर रहता है।
(2) गुणों का पारखी—दुर्योधन गुणों का भी पारखी है। द्रौपदी के स्वयंवर में जब सूत-पुत्र होने के कारण कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने के अयोग्य घोषित करते हुए अपमानित किया गया तो दुर्योधन ने कर्ण में वीरता, धीरता, ओज आदि गुणों को देखते हुए तुरन्त उसको अंगदेश का राजा बनाकर अपना मित्र बना लिया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दुर्योधन गुणों का पारखी ही नहीं बल्कि दूरदर्शी भी था।
(3) उचित-अनुचित का विचार न करने वाला–जब ब्राह्मण वेषधारी अर्जुन द्रौपदी को स्वयंवर से जीतकर ले जा रहा था तो दुर्योधन ने कर्ण को अर्जुन से द्रौपदी को छीनने के लिए उकसाया, किन्तु कर्ण ने उसकी यह अनुचित बात नहीं मानी। इस प्रकार दुर्योधन उचित-अनुचित का विचार न करने वाला, घोर स्वार्थी एवं दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति था।
(4) ईष्र्यालु व्यक्ति–दुर्योधन वीर है लेकिन उसके अन्दर ईर्ष्या का अवगुण भी है। वह भीम से प्रबल ईष्र्या करता है।
(5) अनीतिज्ञ–दुर्योधन अनीतिज्ञ व्यक्ति है। यह नहीं है कि वह नीति को जानता नहीं है, लेकिन स्वार्थवश वह अनीति का कार्य करने के लिए भी उद्यत रहता है। नीति सम्बन्धी तथ्यों को वह नहीं मानता है। और द्रौपदी का अपहरण कर लेना चाहता है।
(6) वीर और महत्त्वाकांक्षी—दुर्योधन वीर और महत्त्वाकांक्षी तो है, परन्तु विचारवान नहीं है। कर्ण के रथ का सारथी शल्य को बनाते समय वह उसकी प्रकृति के सम्बन्ध में नहीं सोचता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि नाटककार ने दुर्योधन के रूप में ऐसे व्यक्तियों की ओर इंगित किया है जो समाज और राष्ट्र से ऊपर अपने हित को ही सर्वोपरि मानते हैं। ऐसे व्यक्ति नेता हों। अथवा अधिकारी सर्वथा समाज द्वारा त्याज्य हैं, जो किंचित भी राष्ट्र को कदापि हित नहीं कर सकते।

प्रश्न 9.
सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2009, 10, 12, 13, 15, 16]
उत्तर
कुन्ती का चरित्र-चित्रण डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक की प्रमुख नारी-पात्र है कुन्ती। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) मातृ-भावना—-कुन्ती का हृदय मातृ-भावना से परिपूर्ण है। युद्ध का निश्चय सुनते ही वह अपने पुत्रों के कल्याण के लिए व्याकुल हो उठती है। यद्यपि उसने कर्ण का परित्याग कर दिया था और किसी के सामने भी उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार नहीं किया था; किन्तु अपने मातृत्व के बल पर ही वह उसके पास जाती है और कहती है–”तुम मेरी पहली सन्तान हो कर्ण ! मैंने लोकापवाद के भय से ही तुम्हारा । त्याग किया था।”

(2) कुशल नीतिज्ञ-कुन्ती अपने पुत्रों की विजय और कुशल-क्षेम के लिए अपने त्यक्त-पुत्र कर्ण (जिसे असवर्ण घोषित कर दिया गया था) को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। जब कर्ण यह कहता है कि पाण्डव यदि मुझे सार्वजनिक रूप में अपना भाई स्वीकार करें तब ही उनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य हो सकता है, तो कुन्ती तत्काल ही कह देती है-“कर्ण तुम्हारे पाँचों अनुज सार्वजनिक रूप से तुम्हें अपना अग्रज स्वीकार करने को प्रस्तुत हैं।” जब कि पाण्डवों को उस समय तक यह भी नहीं मालूम हो पाया था कि कर्ण हमारे बड़े भाई हैं। कुन्ती उसे राज्य एवं द्रौपदी के पाने का भी लालच दिखाती है, जो स्वयंवर के समय उसे असवर्ण कहकर अस्वीकार कर चुकी थी। इस प्रकार उसमें राजनीतिक कुशलता भी पूर्ण रूप से विद्यमान थी।

(3) स्पष्टवादिता–स्पष्टवादिता कुन्ती के चरित्र का सबसे बड़ा गुण है। वह माता होकर भी अपने पुत्र कर्ण के सामने अपने कौमार्य में उसे जन्म देने के प्रसंग और उसे अपना पुत्र होने की बात कहते नहीं हिचकती। कर्ण द्वारा यह पूछे जाने पर कि तुमने किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सूर्यदेव से सम्पर्क स्थापित किया, वह कहती है-”पुत्र! तुम्हारी माता के मन में वासना का भाव बिल्कुल नहीं था।”जब कर्ण उससे यह पूछता है कि विवाह के बाद तुमने देव-आह्वान मन्त्र का क्यों उपयोग किया; तब कुन्ती अपने पति की शापजन्य असमर्थता का उल्लेख करती है और बताती है कि वे-पाण्डु तथा धृतराष्ट्र-भी अपने पिताओं की सन्तान नहीं, मात्र माताओं की सन्तान हैं।”

(4) वाक्पटु-कुन्ती बातचीत में भी बहुत कुशल है। वह अपनी बातें इतनी कुशलता से कहती है कि कर्ण एक नारी, एक माँ की विवशता को समझकर उसकी भूलों पर ध्यान न दे तथा उसकी बात मान ले। वह कर्ण की बातों में निहित भावों को समझ जाती है और उनका तत्काल तर्कपूर्ण उत्तर देती है। वह कर्ण को पहले पुत्र और बाद में कर्ण कहकर अपने मनोभावों को प्रदर्शित कर देती है और इस प्रकार अपनी वाक्पटुता का परिचय देती है। वह कहती है-”चलती हूँ पुत्र ! नहीं, नहीं, कर्ण ! मुझे तुम्हारे आगे याचना करके भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।”

(5) सूक्ष्म दृष्टि–कुन्ती में प्रत्येक विषय को परखने और तदनुकूल कार्य करने की सूक्ष्म दृष्टि थी। कर्ण जब उससे कहता है कि तुम यह कैसे जानती हो कि मैं तुम्हारा वही पुत्र हूँ जिसको तुमने गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया था; तब कुन्ती उससे कहती है-”क्या तुम्हारे पैरों की अँगुलियाँ मेरे पैरों की अँगुलियों से मिलती-जुलती नहीं हैं।”

इस प्रकार नाटककार ने थोड़े ही विवरण में कुन्ती के चरित्र को कुशलता से दर्शाया है। नाटककार ने विभिन्न स्थलों पर कुन्ती के कथनों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि एक माता द्वारा पुत्रों के कल्याण की कामना करना उसका स्वार्थ नहीं, वरन् उसकी सहज प्रकृति का परिचायक है।

प्रश्न 10.
परशुराम का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 13]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर ‘परशुराम’ का चरित्रांकन कीजिए| [2015, 16]
या
‘सूत-पुत्र के आधार पर परशुराम की चारित्रिक विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर
परशुराम का चरित्र-चित्रण डॉ० गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक में परशुराम को ब्राह्मणत्व एवं क्षत्रियत्व के गुणों से समन्वित महान् तेजस्वी और दुर्धर्ष योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। परशुराम कर्ण के गुरु हैं। इनके पिता का नाम जमदग्नि है। परशुराम अपने समय के धनुर्विद्या के अद्वितीय ज्ञाता थे। नाटक के अनुसार इनकी चारित्रिक विशेषताओं का विवेचन निम्नवत् है

(1) ओजयुक्त व्यक्तित्व–परशुराम का व्यक्तित्व ओजयुक्त है। नाटककार ने उनके व्यक्तित्व का चित्रण इस प्रकार किया है-”परशुराम की अवस्था दो सौ वर्ष के लगभग है। वे हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले सुदृढ़ व्यक्ति हैं। चेहरे पर सफेद, लम्बी-घनी दाढ़ी और शीश पर लम्बी-लम्बी श्वेत जटाएँ हैं।”
(2) महान् धनुर्धर-परशुराम अद्वितीय धनुर्धारी हैं। सुदूर प्रदेशों से ब्राह्मण बालक इनके पास हिमालय की घाटी में स्थित आश्रम में शस्त्र-विद्या ग्रहण करने आते हैं। इनके द्वारा दीक्षित शिष्यों को उस समय अद्वितीय माना जाता था। भीष्म पितामह भी इन्हीं के प्रिय शिष्यों में से एक थे।
(3) मानव-स्वभाव के पारखी-परशुराम मानव-स्वभाव के अचूक पारखी हैं। वे कर्ण के क्षत्रियोचित व्यवहार से जान जाते हैं कि यह ब्राह्मण न होकर क्षत्रिय-पुत्र है। वे उससे निस्संकोच कहते हैं-”तुम क्षत्रिय हो कर्ण! तुम्हारे माता-पिता दोनों ही क्षत्रिय रहे हैं।”
(4) आदर्श गुरु-परशुराम एक आदर्श गुरु हैं। वे शिष्यों को पुत्रवत् स्नेह करते हैं और उनके कष्ट-निवारण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। कर्ण की जंघा में कीड़ा काट लेता है और मांस में प्रविष्ट हो जाता है, जिससे रक्त की धारा प्रवाहित होने लगती है। इससे परशुराम का हृदय द्रवित हो उठता है। वे तुरन्त उसके घाव पर नखरचनी का प्रयोग करते हैं और कर्ण को सान्त्वना देते हैं। यह घटना गुरु परशुराम के सहृदय होने को प्रमाणित करती है।
(5) श्रेष्ठ ब्राह्मण-परशुराम एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। वे विद्यादान को ब्राह्मण का सर्वप्रमुख कार्य मानते हैं। जो ब्राह्मण धनलोलुप हैं, परशुराम की दृष्टि में वे नीच तथा पतित हैं, इसीलिए वे द्रोणाचार्य को निम्नकोटि का ब्राह्मण मानते हैं और कहते हैं—”द्रोणाचार्य तो पतित ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय का गुरु हो सकता है, सेवक अथवा वृत्तिभोगी नहीं।”
(6) उदारमना–परशुराम सहृदय तथा उदारमना हैं। वे अपने कर्तव्यपालन में वज्र के समान कठोर हैं, लेकिन दूसरों की दयनीय दशा को देखकर द्रवीभूत भी हो जाते हैं। ब्राह्मण का छद्म रूप धारण करने के कारण वे कर्ण को शाप दे देते हैं, लेकिन जब कर्ण की शोचनीय तथा दु:ख-भरी दशा का अवलोकन करते हैं तो वे उसके प्रति सहृदय हो जाते हैं। वे कहते हैं—“जिस माता से तुम्हें ममता और वात्सल्य मिलना चाहिए था, उससे तुमने कठोर निर्मम निर्वासन पाया।जिस गुरु से तुम्हें वरदान मिलना चाहिए था, उसी ने तुम्हें शाप दिया।” उनके इस कथन से उनके उदारमना होने की पुष्टि होती है।
(7) कर्तव्यनिष्ठ–परशुराम एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। कर्तव्यपालन में वे बड़ी-से-बड़ी बाधाओं को सहर्ष स्वीकार करने को उद्यत रहते हैं। उनकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित होकर कर्ण उनसे कहता है-“आपके हृदय में कोई कठोरता अथवा निर्ममता नहीं रही है। आपने जिसे कर्तव्य समझा है, जीवन भर उसी का पालन निष्ठापूर्वक किया है।”
(8) महाक्रोधी—यद्यपि परशुराम जी में अनेक गुण हैं, तथापि क्रोध पर अभी उन्होंने पूर्णतया विजय नहीं पायी है। क्रोध में आकर वे अपने महान् त्यागी शिष्य कर्ण को भी जब शाप दे देते हैं तो संवेदनशील पाठक का हृदय हाहाकार कर उठता है। वह मानव मन के इस विकराल विकार को, ऋषियों तक को अपना शिकार बनाते देखता है।।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि परशुराम तपोनिष्ठ तेजस्वी ब्राह्मण हैं। वे एक आदर्श शिक्षक तथा उदार हृदय के स्वामी हैं। उनमें ब्राह्मणत्व तथा क्षत्रियत्व दोनों के गुणों का अद्भुत समन्वय है।

प्रश्न 11.
सूत-पुत्र’ नाटक के नायक कर्ण के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कर्ण की व्यथा-कथा का सारांश लिखिए। [2016]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक कर्ण का मानसिक अन्तर्द्वन्द्व कई स्थानों पर उसके संवादों के माध्यम से प्रकट होता है। प्रथम चरण में वह अपने गुरु परशुराम के सामने इस द्वन्द्व को प्रकट करता है। वह जानना चाहता है कि क्या उसकी अयोग्यता मात्र इसलिए है कि वह किसी विशेष जाति से सम्बन्धित है। दूसरी बार द्रौपदी स्वयंवर में वह द्रुपद-नरेश से इस प्रश्न का उत्तर चाहता है। वह उनसे पूछता है कि जब स्वयंवर में योग्यता का निर्धारण धनुर्विद्या की कसौटी पर किया जाना है तो कुल-शील, जाति अथवा वर्ण सम्बन्धी प्रतिबन्धों का क्या औचित्य है ? उसका यही अन्तर्द्वन्द्व इन्द्र, सूर्य एवं कुन्ती के समक्ष भी प्रकट होता है। वह सामाजिक मान्यताओं एवं व्यवस्थाओं की विसंगतियों के उत्तर चाहता है। वह प्रत्येक को अपनी विचारात्मक तर्कशक्ति के आधार पर इन विसंगतियों के प्रति सहमत कर लेता है, किन्तु उसे क्षोभ इस बात का है कि सभी अपनी विवशता प्रकट करते हुए इस लक्ष्मण-रेखा.का अतिक्रमण करने से डरते हैं। कर्ण की व्यथा प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के अन्तर्मन को गहराई से झकझोर देती है। नाटककार ने कर्ण के अन्तर्मन में उत्पन्न इन प्रश्नों के माध्यम से वर्तमान समय के जाति-वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी रूढ़ियों से ग्रस्त भारतीय समाज के विचारों पर चोट की है। कर्ण के प्रति हुए अन्याय की मूल समस्या अनेक महापुरुषों द्वारा प्रयास किये जाने के बाद भी हमारे देश में आज तक समाधान नहीं पा सकी है।।

प्रश्न 12.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थल पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक में कर्ण की जीवन-लीला का अन्त; इस नाटक का सर्वाधिक मार्मिक स्थल है। कर्ण युद्धभूमि में आहत होकर मरणासन्न अवस्था में पड़ा है। शरीर के छिन्न-भिन्न होने से वह अत्यन्त पीड़ा का अनुभव कर रहा है। इसी समय कृष्ण उसकी दानवीरता एवं साहस की परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। वे उससे ब्राह्मण-वेश में जाकर सुवर्ण को दान माँगते हैं। युद्ध-भूमि में कर्ण के पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। वह उनसे अपने दो सोने के दाँत उखाड़ लेने का निवेदन करता है। कृष्ण के ऐसा करने से मना कर देने पर वह उनसे पत्थर देने का आग्रह करता है, जिससे वह अपने दाँत तोड़कर उन्हें दान दे सके। कृष्ण जब इससे भी मना कर देते हैं, तब वह घायलावस्था में घिसटते हुए पत्थर उठाती है। और अपने दाँत तोड़कर उन्हें देता है। कृष्ण उन रक्तरंजित दाँतों को अपवित्र बताकर दान लेने से मना कर देते हैं। इस पर वह बड़ी कठिनाई से अपनी धनुष उठाता है और धरती पर बाण का प्रहार करके जल की धारा प्रवाहित करता है तथा उस जलधारा में अपने टूटे हुए दाँत धोकर कृष्ण को देता है। प्रसन्न होकर कृष्ण उसके सामने अपने रूप को प्रकट करके उसे साधुवाद देते हैं।

नाटककार ने कर्ण के अन्तिम समय में कृष्ण द्वारा ली गयी इस परीक्षा का चित्रण करके कर्ण के चरित्र को महान् दानी के रूप में प्रतिष्ठित किया है। कृष्ण ने स्वयं अपनी परीक्षा का उद्देश्य भी यही बताया है।

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