UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 10
Chapter Name Resources (संसाधन)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसाधन से आपका क्या अभिप्राय है? संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए। [2009]
या
विभिन्न प्रकार के संसाधनों का वर्णन कीजिए।
या
टिप्पणी लिखिए–संसाधनों के प्रकार। [2010]
या
संसाधनों के वर्गीकरण के आधारों को बताइए। [2012]
उत्तर

संसाधन का अर्थ
Meaning of Resources

संसाधनों का अध्ययन आर्थिक भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। किसी देश या प्रदेश में स्थित संसाधन आर्थिक विकास को आधार एवं गति प्रदान करते हैं। संसाधन आधुनिक धात्विक सभ्यता में। आधार-स्तम्भ माने जाते हैं। मानव अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उपयोगी संसाधनों का शोषण कर अपना जीवन-यापन करता है तथा उनसे अधिकाधिक उपयोगिता प्राप्त करने का भरसक प्रयास करता है। ‘संसाधन’ शब्द के अर्थ को निम्नलिखित रूपों में प्रस्तुत किया जा सकता है –

  1. जिस पर कोई सहायता, पोषण तथा आपूर्ति के लिए आश्रित हो;
  2. दिये गये साधनों के प्राप्त करने के ढंग एवं
  3. अनुकूल परिस्थितियों से लाभ उठाने की क्षमता।

स्पष्ट है कि कोई भी वह वस्तु जो मानव की कठिनाइयों को दूर करने में समर्थ हो अथवा वह उसे आवश्यकताओं की पूर्ति करके सन्तुष्ट करती हो अथवा किसी प्रकार की उपयोगिता प्रदान करती हो, संसाधन कहलाती है। यह वस्तु प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक या मानवीय किसी भी प्रकार की हो सकती है, परन्तु यहाँ संसाधनों से आशय प्राकृतिक संसाधनों से ही लगाया जाता है। भूगोलवेत्ताओं की कथन है। कि संसाधनों से अभिप्राय, उन सभी भौतिक तत्त्वों तथा मानवीय क्रियाओं से सम्बन्धित पर्यावरण से समझा जाता है जो भूतल से लगभग 20 किमी ऊपर तथा 7 किमी धरातल के नीचे तक पाये जाते हैं। स्थलाकृति, मिट्टी, जलवायु, वनस्पति, वन्य प्राणी, जलराशियाँ, खनिज पदार्थ आदि सभी को प्राकृतिक संसाधनों के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है, परन्तु ये सभी अवयव तब तक संसाधन नहीं बन सकते जब तक मानव अपने तकनीकी ज्ञान के आधार पर इन्हें अपने लिए उपयोगी नहीं बना लेता। अत: कोई भी वह पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मानव की कुछ उपयोगिता करता हो, संसाधन कहलाता है।

कोई भी पदार्थ संसाधन तभी कहा जा सकता है जब वह मानव को किसी भी प्रकार की उपयोगिता प्रदान करता हो। इस तथ्य को दृष्टिगत करते हुए प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता ई०डब्ल्यू० जिम्मरमैन (E.W. zimmermann) ने कहा है, “मानव के विभिन्न उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा किसी कठिनाई का निवारण करने वाले या निवारण में योग देने वाले स्रोत को संसाधन कहा जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि संसाधन होते नहीं, बल्कि उन्हें बनाया जाता है। जिस देश या समाज में जितना अधिक तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास होगा, वहाँ संसाधनों का विकास भी उतना ही अधिक होगा। अतः संसाधन मानव से सम्बन्धित क्रियाओं में उपयोगी होते हैं।

संसाधनों का वर्गीकरण
Classification of Resources
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources 1
मानवीय संसाधन – मानवीय शक्ति किसी भी देश के लिए बहुत ही आवश्यक साधन है। उसके द्वारा ही प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सम्भव होता है; अत: मानव संसाधन के विकास में मानव ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। मानवीय संसाधनों के तीन मुख्य पक्ष निम्नवत् हैं –

  1. जनसंख्या – इसमें न केवल मानवं की संख्या वरन् उसकी शारीरिक शक्ति, मानसिक क्षमता, स्वास्थ्य, वितरण, जनघनत्व, वृद्धि दर, स्त्री-पुरुष अनुपात, आयु-वर्ग, शिक्षा आदि भी सम्मिलित किये जाते हैं।
  2. जनता का सामाजिक संगठन – इस पक्ष के द्वारा संसाधन उपयोग प्रभावित होता है तथा समाज के सब वर्गों को उसकी उपलब्धता एवं उपयोग की सीमा निर्धारित होती है। ये प्रादेशिक आर्थिक उन्नति के लिए बनाये गये सामाजिक राजनीतिक संगठन होते हैं; जैसे- पूँजीवादी व्यवस्था, समाजवादी व्यवस्था और साम्यवादी व्यवस्था।
  3. संस्कृति की अवस्था – किसी प्रदेश में तकनीकी एवं विज्ञान का जो स्तर होता है उससे उस प्रदेश की संस्कृति की अवस्था निर्धारित होती है। आज संसार के विकसित और विकासशील राष्ट्रों में यही अन्तर चल रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों को मुख्यत: निम्नलिखित दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1) भौतिक संसाधन (Physical Resources) – भौतिक संसाधनों के अन्तर्गत चट्टानें, धरातल, मिट्टी, खनिज सम्पदा व जलीय तत्त्वों आदि को सम्मिलित किया जाता है। ये सभी पदार्थ मानव को प्रकृति की ओर से नि:शुल्क उपहार के रूप में प्राप्त हुए हैं। इन पर सभी व्यक्तियों का समान अधिकार है, परन्तु विश्व के उन भागों में जहाँ मानव ने अत्यधिक तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वहाँ इन संसाधनों का अधिक उपयोग किया जा सका है। इसके विपरीत जिन प्रदेशों से प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य स्थापित नहीं किया गया है, वहाँ पर इनका उपयोग नहीं किया जा सका है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका महाद्वीप में प्राकृतिक संसाधनों के पर्याप्त भण्डार भरे पड़े हैं, परन्तु तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण इनका उपयोग एवं उपभोग नहीं किया जा सका है।

इन संसाधनों के अन्तर्गत खनिज पदार्थ, जल, भूमि, वन, वायु, मिट्टी, धरातल आदि का स्थान मुख्य है। इनमें से कुछ संसाधन तो ऐसे हैं जो प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध होते हैं, जिन्हें सर्वत्र सुलभ संसाधन कहते हैं; जैसे-वायु एवं धरातल। कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जो कम ही स्थानों पर उपलब्ध होते हैं, अर्थात् धरातल पर समान रूप से विकसित नहीं हैं; जैसे-लौह-अयस्क, ताँबा, अभ्रक, मैंगनीज
आदि खनिज तथा कोयला एवं पेट्रोलियम आदि शक्ति संसाधन। इस प्रकार धरातल पर संसाधनों का वितरण समान नहीं है।

(2) जैविक संसाधन (Biotic Resources) – जैविक संसाधन मानव की आर्थिक क्रियाओं को लम्बे समय तक प्रभावित करते हैं। इन संसाधनों में कमी अथवा वृद्धि हो सकती है। वनस्पति की उत्पत्ति तथा पशुपालन जैविक संसाधनों के अन्तर्गत आते हैं। इन संसाधनों पर मानवीय क्रियाकलापों का प्रभाव तो पड़ता है, परन्तु इनके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। वनों के शोषण पर वर्षा तथा तापमान के प्रभाव के कारण प्राकृतिक वनस्पति स्वत: ही उग आती है। जैविक संसाधन गतिशील होते हैं। इन संसाधनों का उपयोग करने पर इनका कुछ भाग शेष रह जाता है, जिससे वे पुन: अपना रूप धारण कर लेते हैं। मत्स्य उत्पादक क्षेत्रों से सभी मछलियों को पकड़ने के उपरान्त भी वहाँ मछलियों की उत्पत्ति धीरे-धीरे होती रहती है। विश्व में जैविक संसाधनों के वितरण में भी भिन्नता पायी जाती है। शीत कटिबन्धीय प्रदेशों में पायी जाने वाली प्राकृतिक वनस्पति तथा मरुस्थलीय वनस्पति में अन्तर पाया जाता है। इन संसाधनों में कठोरता कम होती है। कभी-कभी जैविक संसाधनों का पूर्णतः उपयोग कर लेने पर इनकी मात्रा समाप्त हो जाती है।

उपयोगिता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण
Classification of Resources on the Basis of Utility

उपयोगिता के आधार पर संसाधनों को निम्नलिखित दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(1) क्षयी संसाधन – वे संसाधन जिनका उपयोग मानव की इच्छा-शक्ति पर निर्भर रहता है, क्षयी संसाधन होते हैं। कभी-कभी अधिकतम उपयोग करने से यह संसाधन समाप्त भी हो जाते हैं। इन्हें निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. नव्यकरणीय संसाधन – ग्लोब पर कुछ संसाधन ऐसी प्रकृति के पाये जाते हैं कि उनका अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। ऐसा मानव के तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करता है। ये संसाधन पुनः विकसित हो जाते हैं अथवा उनका नवीनीकरण करने के उपरान्त उन्हें उपयोग में लाया जा सकता है। जलवायु, सौर ऊर्जा, जल विद्युत शक्ति आदि इसी प्रकार के संसाधंन हैं।
  2. अनव्यकरणीय संसाधन – इस प्रकार के संसाधन एक बार उपयोग करने के उपरान्त सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अथवा वे नष्ट हो जाते हैं। कोयला, खनिज तेल, अनेक प्रकार के धात्विक खनिज आदि इन संसाधनों के प्रमुख उदाहरण हैं।

(2) अक्षयी संसाधन – ये कभी समाप्त न होने वाले संसाधन हैं। इन्हें बार-बार उपयोग किया जाता रहता है। एक बार उपयोग करने के बाद वे स्वयं विकसित हो जाते हैं तथा उनका पुन: उपयोग कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है, परन्तु इनका पुनः उत्पादन रासायनिक एवं भौतिक उपकरणों की सहायता से किया जा सकता है। वनस्पति, मिट्टी, जल, वायु, सौर ऊर्जा, वन्य प्राणी, मानवआदि कभी न समाप्त होने वाले संसाधनों की श्रेणी में आते हैं। इस प्रकार ये संसाधन मानव उपभोग के लिए असीम एवं चिरस्थायी संसाधन हैं।

प्रश्न 2
संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।
या
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।
या
‘संसाधन संरक्षण से आप क्या समझते हैं?’ इसके लिए उपयुक्त उपाय समझाइए। (2011)
उत्तर

संसाधनों के संरक्षण का अर्थ एवं आवश्यकता
Meaning and Need of Conservation of Resources

धरातल पर संसाधन सीमित ही उपलब्ध हैं; अतः उनका अधिकतम एवं सुरक्षित उपयोग ही ‘संसाधन संरक्षण’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, “प्राकृतिक संसाधनों का कम-से-कम मात्रा में अधिकतम उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है।” संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता 20वीं शताब्दी की देन है, क्योंकि इस सदी में संसाधनों का बड़ी निर्ममता से उपयोग किया गया है। विज्ञान एवं तकनीकी विकास के साथ-साथ संसाधनों का दोहन तीव्र गति से किया गया है जिस कारण उनमें से कुछ संसाधन समाप्ति की,ओर अग्रसर हुए हैं। अत: संसाधनों को सुरक्षित बनाये रखने के लिए संसाधनों के संरक्षण की भावना बलवती हुई है। पिछली दो शताब्दियों से विश्व पटल पर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, जिसके अग्रलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं –

  1. कुछ देशों में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि का होना।
  2. तकनीकी एवं औद्योगिक क्रान्ति के कारण औद्योगिक उत्पादों में तीव्र वृद्धि का होना।
  3. मानव का जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण पनपना।

उपर्युक्त कारणों के फलस्वरूप संसाधनों का बड़े ही अविवेकपूर्ण ढंग से दोहन किया गया है। इसी कारण बहुत से जैविक एवं अजैविक संसाधनों को तीव्र गति से ह्रास होता जा रहा है अथवा वे पूर्ण । रूप से विनष्ट हो गये हैं। इसके फलस्वरूप इस तथ्य को बल मिलने लगा है कि संसाधनों का अधिकतम उपयोग मानवहित में नहीं हो सकेगा। अत: संसाधनों का मितव्ययिता के साथ सदुपयोग किया जाए तथा जो संसाधन अल्पमात्रा में शेष रह गये हैं, उनका संरक्षण अवश्य ही किया जाए जिससे भावी जनसंख्या को भी ये संसाधन मिल सकें। इस सम्बन्ध में सिरीयसी वाण्ट्रप ने कहा है कि “संसाधनों का उपयोग कब, किस प्रकार होगा, इसका विश्लेषण करते हुए उपयोग को समय के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।’

वर्तमान समय में विश्व की जनसंख्या में द्रुत गति से वृद्धि होती जा रही है जिससे उसकी संसाधनों की आवश्यकता में भी वृद्धि हुई है तथा संसाधनों का अविवेकपूर्ण ढंग से विनाश किया जाने लगा है। इस पर तत्काल रोक लगाना आवश्यक है, अन्यथा ये संसाधन किसी भी समय समाप्त हो सकते हैं। इस प्रकार जनसंख्या की अपरिमित वृद्धि, उत्पादन प्रक्रिया में तकनीकी विकास से क्रान्ति आने तथा मानव का जीवन-स्तर उच्च होने से संसाधनों में कमी आयी है। इससे मानवीय क्रियाकलापों एवं प्रकृति में असन्तुलन होने लगा है। अतः मानवीय क्रियाकलापों एवं उपभोग के मध्य अनुकूलन एवं सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए जो संसाधनों के संरक्षण का मूल उद्देश्य है।

संसाधन संरक्षण के उपाय
Remedies of Conservation of Resources

  1. किसी भी राष्ट्र के कुल संसाधनों की संख्या, मात्रा, प्रकार, गुण एवं उपलब्धि के विषय में पूर्ण जानकारी होना अति आवश्यक है, जिससे आवश्यकतानुसार उनका व्यावहारिक उपयोग किया जा सके।
  2. संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सम्भाव्यता के आधार पर ही उनका उपयोग निर्धारित किया जाना चाहिए।
  3. जो संसाधन शीघ्र समाप्त होने वाले हैं, उनका उपयोग अधिकतम उपयोगिता प्रदान करने वाले कार्यों में ही किया जाना चाहिए।
  4. संसाधनों की वृद्धि एवं गुणवत्ता बनाये रखने के लिए उनकी विशेषताओं को वैज्ञानिक-तकनीकी ज्ञान के सहारे विकसित किया जाना चाहिए।
  5. जो संसाधन अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं, उनका उपयोग अधिकतम मात्रा में करना चाहिए।
  6. संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए उनके सही विकल्पों को खोज लिया जाना चाहिए, जिससे अधिक समय तक उनकी उपलब्धता बनी रह सके।
  7. संसाधनों के उपयोग की ऐसी पद्धतियाँ एवं प्रणालियाँ विकसित की जानी चाहिए कि राष्ट्र सदैव के लिए आत्मनिर्भर बना रह सके।
  8. राष्ट्र के संसाधनों का सर्वेक्षण करा लिया जाना चाहिए जिससे उनके उपभोग की मात्रा सुनिश्चित की जा सके।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से निष्कर्ष निकलता है कि देश के प्रत्येक नागरिक को वहाँ उपलब्ध संसाधनों को अमूल्य निधि समझना चाहिए। इन संसाधनों का भविष्य के लिए संरक्षण करना अति
आवश्यक है, जिससे कि वर्तमान एवं भावी सन्तति उनसे लाभान्वित हो सके तथा धीरे-धीरे अधिकतम उपयोगिता प्राप्त होती रहे।

प्रश्न 3
विश्व में लकड़ी काटने का उद्योग (Lumbering) किन भौगोलिक परिस्थितियों पर आधारित है? लकड़ी काटने एवं चीरने वाले प्रमुख देशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

लकड़ी काटने Lumbering

वन- व्यवसाय का महत्त्वपूर्ण उपयोग लकड़ी काटने एवं चीरने का है। लकड़ी काटना एवं उनकी चिराई एक प्राथमिक व्यवसाय है। वनों से कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार की लकड़ी काटी जाती है, जिसका उपयोग निम्नवत् किया जाता है –

  1. ईंधन में 40 प्रतिशत।
  2. इमारती कार्यों में- भवन-निर्माण, पुल निर्माण, नावें, रेल के डिब्बे एवं स्लीपर, मोटर, टूक, फर्नीचर तथा पैकिंग आदि कार्यों में 40 प्रतिशत।
  3. निर्माण उद्योगों में- कागज की लुग्दी, दियासलाई, कृत्रिम रेशम आदि में-10 प्रतिशत।
  4. अन्य फुटकर कार्य- बल्लियों, सीढ़ियों, खानों आदि में-10 प्रतिशत।
    जेड० एस० हॉक ने विश्व में प्राप्त लकड़ी को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है –

    • शीत कटिबन्धीय वनों (कोणधारी) से (कोमल लकड़ी)-35 प्रतिशत;
    • शीतोष्ण कटिबन्धीय वनों से (मिश्रित लकड़ी)-49 प्रतिशत एवं
    • उष्ण कटिबन्धीय वनों से (कठोर लकड़ी)-16 प्रतिशत।

लकड़ी काटने के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियाँ
Necessary Geographical Conditions for Lumbering

  1. उत्तम लकड़ी की प्राप्ति – लकड़ी काटने एवं चीरने के लिए काफी मात्रा में कठोर एवं कोमल लकड़ी के वन होने चाहिए। कठोर लकड़ी में महोगनी, सीडार एवं टीक तथा कोमल लकड़ी में देवदार, कैल, फर, चीड़ एवं यूकेलिप्टस प्रमुख हैं।
  2. सस्ते एवं कुशल श्रमिक – वृक्षों को सघन वनों से काटने के लिए काफी संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की उपलब्धता अति आवश्यक है। साइबेरिया एवं कनाडा में टैगा वनों की कटाई के लिए सस्ते एवं पर्याप्त श्रमिक मिल जाते हैं जो ग्रीष्म ऋतु में कृषि-कार्य करते हैं एवं शीत ऋतु में हिम अधिक पड़ने के कारण वनों को काटने का कार्य करते हैं।
  3. यातायात एवं परिवहन साधनों की सुलभता – लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठों को बहाकर ले जाने के लिए जल-परिवहन सबसे सस्ता साधन है तथा अन्य साधनों में रेल, मोटर आदि का होना अति आवश्यक है। म्यांमार एवं थाईलैण्ड में यह कार्य हाथियों द्वारा किया जाता है।
  4. जल-विद्युत शक्ति का विकास – कारखानों को चलाने के लिए जल-विद्युत शक्ति सबसे सस्ती पड़ती है। इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए नदियों के मार्ग में कृत्रिम जल-प्रपात या बाँध बनाये जा सकते हैं।
  5. बाजार की समीपता-वनों के समीपवर्ती प्रदेशों में लकड़ी का उपभोग करने के लिए कागज़ मिल, दियासलाई, पैकिंग, कृत्रिम रेशम आदि उद्योगों की स्थापना की जानी अति आवश्यक है।
  6. सघन वनों का न होना- वने सघन नहीं होने चाहिए, अन्यथा लकड़ी काटना बड़ा ही कठिन हो जाता है। विरल वनों से लकड़ी सावधानीपूर्वक काटी जा सकती है।

सम्पूर्ण विश्व में 425 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल पर वन फैले हैं, जिसमें से लगभग आधे भाग पर उष्ण कटिबन्धीय कठोर, मिश्रित एवं अवर्गीकृत वनों का विस्तार है। शंकुधारी या टैगो वनस्पति का विस्तार 136 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर है, जब कि शीतोष्ण कटिबन्धीय कठोर लकड़ी के वनों का विस्तार केवल 66 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर है। विश्व में लकड़ी का उत्पादन करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका औद्योगिक लकड़ी का 76% भाग पूरा करता है।

लकड़ी का उत्पादन करने वाले प्रमुख देश
Main Wood Producing Countries

समशीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में लकड़ी काटने एवं चीरने का व्यवसाय प्रमुख है। इन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, अलास्का, रूस, नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, जापान, चीन, म्यांमार एवं भारत आदि देश मुख्य हैं।
(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – इस देश का लकड़ी काटने एवं चीरने में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ पर लगभग एक-तिहाई भूमि पर वन-सम्पदा फैली है जिनमें से दो-तिहाई क्षेत्रफल व्यापारिक लकड़ियों का है। इस देश में कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। पाइन, डगलस, फर, येलोपाइन, स्पूस आदि वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं जिनसे लुग्दी, कागज, गत्ता, बिरोजा, तारपीन का तेल एवं अखबारी कागज बनाये जाते हैं। अमेरिका में उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र, महान् झील क्षेत्र, अप्लेशियन पर्वतीय क्षेत्र, मध्यवर्ती क्षेत्र, रॉकी पर्वतीय क्षेत्र एवं पश्चिमी तटीय क्षेत्र लकड़ी काटने एवं चीरने में मुख्य स्थान रखते हैं।

(2) कनाडा – इस देश के 45% भाग पर वन-सम्पदा फैली है। यहाँ कोमल लकड़ी के वनों का विस्तार अधिक है। ब्रिटिश कोलम्बिया, उत्तरी प्रेयरी प्रान्त, ओण्टेरियो, क्यूबेक एवं न्यू ब्रिन्सविक मुख्य लकड़ी उत्पादक क्षेत्र हैं। कुल वन क्षेत्रों का 51% भाग व्यापारिक है। यहाँ 65% कोमल, 24% मिश्रित एवं 11% कठोर लकड़ी के वन हैं। इस देश में 150 से भी अधिक किस्मों की लकड़ी पायी जाती है जिनमें नुकीली पत्ती वाले वृक्ष 47 प्रकार के हैं। स्यूस, बालसम, पाइन, डगलस, फर, हेमलॉक, सीडार, मैपिल, बीच, रेड पाइन आदि मुख्य वृक्ष हैं। इनसे लकड़ी चीरने, कागज एवं लुग्दी बनाने, फर्नीचर, वस्त्रों के कृत्रिम धागे एवं प्लास्टिक बनायी जाती है। वन उत्पादन का 95% भाग लट्ठों, लुग्दी एवं ईंधन का होता है। कुल उत्पादन का 10% भाग निर्यात कर दिया जाता है। लकड़ी का कुल उत्पादन 402 लाख घन मीटर है। जिसमें 9 लाख घन मीटर कठोर एवं 393 लाख घन मीटर कोमल लकड़ी है।।

(3) रूस – रूस में 91 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर वन-सम्पदा का विस्तार है। यहाँ पर शंकुल वृक्षों की अधिकता है जिनमें स्पूस, एल्डर, विलो, लिंडन, हार्डब्रीम, फर, लार्च, सीडार एवं पाइन मुख्य हैं। इनकी लकड़ी कागज एवं लुग्दी बनाने के काम आती है। शंकुल वनों का विस्तार 60° उत्तरी अक्षांश से टुण्ड्रा प्रदेश तक है। यह वन क्षेत्र बाल्टिक सागर से पूर्व में ओखोटस्क सागर तक विस्तृत है। ओनेगा, लेनिनग्राड, मरमास्क, मेजेनई, गरका एवं आरकेंजल लकड़ी की चिराई के प्रमुख केन्द्र हैं। रूस के समस्त वन भाग का 80% एशियाई रूस में है। साइबेरिया के इस वन प्रदेश की सबसे बड़ी सुविधा ट्रांस-साइबेरियन रेलवे है। विश्व लकड़ी भण्डार का 21% भाग साइबेरिया से प्राप्त होता है।

(4) यूरोपीय देश – यूरोप महाद्वीप का एक-तिहाई भाग वनों से आच्छादित है, जहाँ विश्व की 10% लकड़ी प्राप्त होती है। इनमें कोमल लकड़ी की अधिकता है। इसका विस्तार 50° से 70° उत्तरी अक्षांशों तक है, जो नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड होती हुई उत्तरी रूस तक चली गयी है। लकड़ी में निम्नलिखित देश प्रमुख उत्पादक हैं –

  1. नार्वे – इस देश के 25% भाग पर वन फैले हैं। उत्तरी एवं दक्षिणी तट को छोड़कर शेष पर्वतीय ढालों एवं नदी घाटियों में वनों का विस्तार पाया जाता है। यहाँ पर पाये जाने वाले प्रमुख वृक्षों में फर 50%, चीड़ 34% तथा शेष पर बीच एवं ओक आदि के वृक्ष हैं। यहाँ अखबारी कागज, सैलूलोज, गत्ता, दियासलाई तथा उत्तम किस्म का कागज बनाया जाता है।
  2. स्वीडन – यहाँ 60% भाग पर वन-सम्पदा फैली है। उत्तर एवं मध्य में कोमल तथा दक्षिण में कठोर लकड़ी के वनों की अधिकता है। यहाँ पर पाइन, स्पूस, फर आदि वृक्षों की प्रधानता है। इस देश में कागज, लुग्दी, प्लाईवुड एवं दियासलाई बनायी जाती है। निर्यात व्यापार में भी इन्हीं वृक्षों की लकड़ियों की अधिकता है।
  3. फिनलैण्ड – फिनलैण्ड के 70% भाग पर वन-सम्पदा का विस्तार है। यहाँ स्पूस, पाइन एवं फर वृक्षों की अधिकता है। यहाँ के निर्यात में 88% भाग वन वस्तुओं का है। चीरी हुई लकड़ी की वस्तुएँ, प्लाईवुड, अखबारी कागज तथा लकड़ी का रेशा यहाँ भी मुख्य उत्पादक वस्तुएँ हैं। तटीय भाग में लकड़ी चीरने के केन्द्र स्थापित हुए हैं।

मध्य यूरोपीय देशों में फ्रांस–22%, जर्मनी-21%, स्विट्जरलैण्ड-25% तथा जर्मनी में 27% भाग पर वन फैले हैं, परन्तु सभी देशों में लकड़ी का अभाव पाया जाता है। इन देशों में केवल अपने उपभोग के लिए ही लकड़ी का उत्पादन किया जाता है।

(5) एशियाई देश – एशिया महाद्वीप में जापान, चीन, म्यांमार एवं भारत प्रमुख लकड़ी उत्पादक देश हैं, जिनका विवरण निम्नवत् है –

  1. जापान – इस देश के लगभग 50% भाग पर वन फैले हैं। मध्य होकेड़ो एवं हाँशू के भीतरी पर्वतीय क्षेत्रों में इनका विस्तार है। फर, स्पूस, हिकोरी, सुगी-नुकीली पत्ती वाले; मैपिल, बूना, पॉपलर, ओक-चौड़ी पत्ती के वृक्ष महत्त्वपूर्ण हैं। शंकुल वनों का विस्तार 60,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर है। इन वृक्षों को चीरकर विभिन्न वस्तुएँ तथा कागज उद्योग के लिए लुग्दी बनायी जाती है।
  2. चीन – चीन में केवल 40% भाग पर ही वन छाये हुए हैं। जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण कृषि के विकास के लिए भारी पैमाने पर वनों का विनाश किया गया है। केवल पश्चिमी एवं दक्षिणी पहाड़ी भागों पर ही वन मिलते हैं। फर, स्थूस, हेमलॉक, ओक, चेस्टनट आदि मुख्य वृक्ष हैं।
  3. म्यांमार – यहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में सदापर्णी एवं 100 से 200 सेमी वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन मिलते हैं। इरावदी नदी के बेसिन में विश्वविख्यात सागौन के वृक्ष पाये जाते हैं। यहाँ से लकड़ी काटकर हाथियों द्वारा ढोयी जाती है। रंगून नगर से सागौन की लकड़ी विदेशों को निर्यात की जाती है।
  4. भारत – भारत में 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भागों में, प्रमुख रूप से असम के पहाड़ी ढालों एवं पश्चिमी घाट पर, सदापर्णी वन मिलते हैं। 100 से 200 सेमी वर्षा वाले भागों में मानसूनी वन मिलते हैं जिनकी लकड़ी फर्नीचर एवं इमारती कार्यों में प्रयुक्त की जाती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं छोटा-नागपुर का पठार इन लकड़ियों के लिए प्रसिद्ध हैं। रेल विभाग द्वारा यहीं से लकड़ी डिब्बों एवं स्लीपरों के लिए मँगायी जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों से ईंधन की लकड़ी प्राप्त होती है। यहीं से कुछ कोमल प्रकार की लकड़ी कागज एवं दियासलाई बनाने में प्रयुक्त की जाती है।

(6) ऑस्ट्रेलिया – इस महाद्वीप के केवल 4% भाग पर वन मिलते हैं। वनों का 50% भाग शीतोष्ण कटिबन्धीय है। कॉरीगम वृक्ष मुख्य है जो 50 मीटर से 90 मीटर तक ऊँचा होता है। दक्षिणी-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया द्वीप में वन अधिक मिलते हैं। आर्द्र भागों में यूकेलिप्टस के वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं।

न्यूजीलैण्ड द्वीप का 20% भाग वनों से आच्छादित है। यहाँ के प्रमुख वृक्ष कॉरीगम, पाइन, टोटोरा, तवा एवं बीच हैं।
उपर्युक्त आधार पर विश्व में लकड़ी की कटाई एवं चिराई का कार्य निम्नलिखित प्रदेशों में उल्लेखनीय है –

  1. मानसूनी प्रदेशों के पतझड़ वाले वनों में साल, सागौन, शीशम, साखू आदि सुन्दर एवं टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष भारी संख्या में पाये जाते हैं।
  2. सामान्य गर्मी वाले समशीतोष्ण प्रदेशों में यूकेलिप्टस, ओक आदि दीमकों से नष्ट न होने वाले वृक्ष मिलते हैं।
  3. सामान्य शीत वाले समशीतोष्ण प्रदेशों में टिकाऊ लकड़ी के वृक्ष-मैपिल, बर्च, बीच, बलूत, पोपलर आदि वृक्षों की अधिकता होती है।
  4. शंकुल वनों में कागज की लुग्दी, कागज, दियासलाई, तारपीन का तेल आदि के लिए उपयुक्त चीड़, देवदार, स्पूस, फर आदि कोमल लकड़ी के वृक्ष बहुतायत में पाये जाते हैं।
  5. भूमध्यरेखीय वनों में जहाँ सघनता कम है एवं नदियाँ उपलब्ध हैं, वहाँ महोगनी, एबोनी, रोजवुड, ग्रीनवुड, हार्डवुड, रबड़ आदि की मजबूत एवं टिकाऊ लकड़ियों के वृक्ष मिलते हैं।

यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में वन क्षेत्रफल उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा न केवल कम है, बल्कि ये क्षेत्र विश्व के औद्योगिक क्षेत्रों एवं बाजारों से दूर पड़ते हैं। अत: इन प्रदेशों की लकड़ियाँ बिना काटे ही रह जाती हैं। इसीलिए आर्थिक दृष्टिकोण से इन वनों की लकड़ी महत्त्व नहीं रखती।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
क्षयी और अक्षयी संसाधन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
पृथ्वी से प्राप्त विभिन्न प्रकार की धातुएँ खनिज क्षयी संसाधनों की श्रेणी में आती हैं। वास्तव में खनिज भण्डार इतनी तेजी से घट रहे हैं कि भविष्य में उनके अभाव से एक विकट समस्या उत्पन्न हो जाएगी। अतः ऐसे खनिज पदार्थ जो धीरे-धीरे कम हो रहे हैं, उन्हें क्षयी संसाधन कहा जाता है। इसके विपरीत वे पदार्थ जो बहुत अधिक समय तक रहेंगे; जैसे-सौर ऊर्जा, वायु, जल, वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मानव आदि को अक्षयी संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 2
नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय संसाधनों के बारे में आप क्या जानते हैं?
या
नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय संसाधनों के बीच विभेद कीजिए। [2011, 13, 16]
उत्तर
ऐसे संसाधन जो एक बार प्रयोग करने के पश्चात् फिर प्रयोग किये जा सकें, नव्यकरणीय संसाधन कहे जाते हैं; जैसे-जल, पवन, सूर्य-ऊर्जा आदि ऐसे संसाधन हैं जो सतत उपयोग करने पर फिर उत्पन्न होते रहते हैं; परन्तु कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जिसका एक बार उपयोग करने पर फिर उन्हें प्रयोग में नहीं लाया जा सकता; जैसे-कोयला। ऐसे संसाधनों को अनव्यकरणीय संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 3
संसाधनों के ‘संरक्षण’ पर टिप्पणी लिखिए। [2010]
उत्तर
संसाधनों के संरक्षण से अभिप्राय यह है कि जिन पदार्थों व वस्तुओं के प्रयोग के विषय में मानव को ज्ञान है, उनसे वह अधिकाधिक उपयोगिता हासिल करे। इस दिशा में संसाधनों का ऐसा प्रबन्ध किया जाए, जिससे वे अधिक लम्बे समय तक अधिकाधिक मनुष्यों की अधिकतम आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। एली के अनुसार, “संरक्षण वर्तमान पीढ़ी या भावी पीढ़ी के लिए त्याग है।” डॉ० मैकनाल के अनुसार, “संरक्षण का आशय किसी संसाधन का ऐसा उपयोग है जिससे मनुष्य जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम रीति से हो सके।” संरक्षण का महत्त्व निम्नलिखित रूप से स्पष्ट होता है –

  1. बचत की भावना का विकास होता है।
  2. संरक्षण से बरबादी या दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
  3. विवेकपूर्ण उपयोग भविष्य के लिए संसाधनों में बचत को प्रोत्साहित करता है।
  4. भविष्य में संसाधनों के नष्ट होने पर गहरा संकट केवल संरक्षण द्वारा ही दूर किया जा सकता है।
  5. पारिस्थितिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए भी संरक्षण आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसाधन से क्या तात्पर्य है? (2007)
या
संसाधन को परिभाषित कीजिए। [2012, 16]
उत्तर
कोई भी वह पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मानव की कुछ उपयोगिता करता हो, संसाधन कहलाता है।

प्रश्न 2
प्राकृतिक संसाधन किन्हें कहते हैं? [2007, 08, 10, 11, 16]
या
प्राकृतिक संसाधन को उदाहरण सहित परिभाषित कीजिए। [2014, 16]
उत्तर
वे संसाधन जो प्रकृति द्वारा मनुष्य को नि:शुल्क प्रदान किये जाते हैं और जो मानव के लिए उपयोगी होते हैं, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं; जैसे-वायु, जल, सौर ऊर्जा, खनिज, जीव-जन्तु आदि।

प्रश्न 3
क्या मानव स्वयं भी एक संसाधन है?
उत्तर
वास्तव में मानव स्वयं में एक बहुत बड़ा संसाधन है, जो प्रकृति की विभिन्न वस्तुओं को अपने ज्ञान और क्षमता के द्वारा उपयोगी बनाता है।

प्रश्न 4
विश्व के कुछ प्रमुख संसाधनों के नाम बताइए।
उत्तर
विश्व के कुछ प्रमुख संसाधन हैं- मानव, कोयला, खनिज तेल, जल, खनिज, पशु-सम्पदा, मत्स्य आदि।

प्रश्न 5
वर्तमान काल में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत क्या है?
उत्तर
वर्तमान काल में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्रोत ‘खनिज तेल है, क्योंकि ऊर्जा के अतिरिक्त खनिज तेल से 8,000 अन्य प्रकार की उपवस्तुएँ भी प्राप्त की जाती हैं।

प्रश्न 6
संसार के चार प्रमुख मछली उत्पादक देशों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. चीन,
  2. जापान,
  3. भारत तथा
  4. संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 7
दो नव्यकरणीय संसाधनों का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर

  1. जल तथा
  2. पवन-दो नव्यकरणीय संसाधन हैं। ये संसाधन निरन्तर बने रहते हैं। अथवी चक्रीय स्वरूप में प्राप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 8
लकड़ी उत्पादन के चार प्रमुख देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
लकड़ी उत्पादन के चार प्रमुख देश हैं-संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, रूस व नावें।

प्रश्न 9
एशिया में लकड़ी उत्पादन वाले चार देशों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
एशिया में लकड़ी उत्पादन वाले चार देश हैं-जापान, चीन, म्यांमार तथा भारत।

प्रश्न 10
मानव संसाधन किसी भी देश के लिए आवश्यक साधन क्यों है?
उत्तर
मानवीय शक्ति द्वारा ही प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सम्भव होता है; अत: मानव संसाधन किसी भी देश के लिए एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रश्न 11
मुख्य भौतिक संसाधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
मुख्य भौतिक संसाधन हैं-खनिज पदार्थ, जल, भूमि, वन, वायु, मिट्टी, धरातल आदि।

प्रश्न 12
चार अक्षयी संसाधनों का नामोल्लेख कीजिए। [2007, 08]
उत्तर
चार अक्षयी संसाधन हैं-मिट्टी, जल, वायु तथा सौर ऊर्जा।

प्रश्न 13
विश्व में लकड़ी का उत्पादन करने वाले उस देश के नाम का उल्लेख कीजिए जो औद्योगिक लकड़ी का 76% भाग पूरा करता है।
उत्तर
संयुक्त राज्य अमेरिका।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
“मनुष्य का ज्ञान ही सबसे बड़ा संसाधन है।” यह कथन है –
(क) मैकनाल का
(ख) जिम्मरमैन का
(ग) कु० सैम्पुल का
(घ) डॉ० डेविस का
उत्तर
(ख) जिम्मरमैन का।

प्रश्न 2
निम्न में से कौन जैविक संसाधन है? [2011, 12, 15, 16]
(क) मिट्टी
(ख) जस्ता
(ग) वनस्पति
(घ) वायु
उत्तर
(ग) वनस्पति।

प्रश्न 3
वायु, जल, सौर ऊर्जा, भूमि व धरातल, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति, खनिज पदार्थ एवं जीव-जन्तु हैं –
(क) मानवीय संसाधन
(ख) प्राकृतिक संसाधन
(ग) (क) व (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) प्राकृतिक संसाधन।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources

प्रश्न 4
विश्व के कुल मछली उत्पादन का सागरों से प्राप्त होने वाला भाग है –
(क) 70 प्रतिशत
(ख) 90 प्रतिशत
(ग) 88 प्रतिशत
(घ) 84 प्रतिशत
उत्तर
(ग) 88 प्रतिशत।

प्रश्न 5
ऊर्जा के निम्नलिखित स्रोतों में से कौन-सा स्रोत नवीकरणीय नहीं है?
(क) ज्वार ऊर्जा
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) जल-विद्युत
(घ) ताप-विद्युत
उत्तर
(घ) ताप-विद्युत।

प्रश्न 6
निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा का नव्यकरणीय स्रोत नहीं है ? (2009)
(क) भू-ताप
(ख) वायु
(ग) जल
(घ) खनिज तेल
उत्तर
(घ) खनिज तेल।

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन अक्षय संसाधन है? (2014)
(क) कोयला
(ख) लौह-अयस्क
(ग) सौर ऊर्जा
(घ) मैंगनीज
उत्तर
(क) सौर ऊर्जा।

प्रश्न 8
निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है? (2014)
(क) ज्वारीय ऊर्जा
(ख) सौर ऊर्जा
(ग) ताप विद्युत
(घ) जल-विद्युत
उत्तर
(क) तापविद्युत।

प्रश्न 9
निम्नलिखित में से कौन-सा नव्यकरणीय संसाधन है? (2015)
(क) पेट्रोलियम
(ख) लौह-अयस्क
(ग) जल
(घ) कोयला
उत्तर
(ग) जल

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 10 Resources (संसाधन), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी)
Number of Questions 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी)

प्रश्न 1.
सूत-पुत्र’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए। [2016,17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथा-सार संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
उत्तर
[ संकेत-नाटक के सारांश के लिए आगे दिये प्रश्न 2, 3, 4, 5 के उत्तरों को एक साथ क्रम से संक्षेप में लिखें।]
या
‘सूत-पुत्र’ में कर्ण के जीवन से सम्बन्धित मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख कीजिए।
[ संकेत–प्रश्न संख्या 2, 3, 4, 5 से चार मार्मिक प्रसंगों को लेकर संक्षेप में अपने शब्दों में लिखें।]

प्रश्न 2.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के प्रथम अंक की कथा को संक्षेप में लिखिए। [2009,11,12,13,15]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक अंक की कथा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
‘सूत-पुत्र’ नाटक के लेखक डॉ० गंगासहाय प्रेमी हैं। इस नाटक के कथासूत्र ‘महाभारत से लिये गये हैं। परशुराम जी उत्तराखण्ड के आश्रम में निवास करते हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि वह केवल ब्राह्मणों को ही धनुष चलाना सिखाएँगे, क्षत्रियों को नहीं। ‘कर्ण’ एक महान् धनुर्धर बनना चाहते हैं; अतः वे स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम जी से धनुर्विद्या सीखने लगते हैं। एक दिन परशुराम जी, कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सोये हुए होते हैं कि एक कीड़ा कर्ण की जंघा को काटने लगता है, जिससे रक्तस्राव होने लगता है। रक्तस्त्राव होने पर भी ‘कर्ण’ दर्द सहन कर जाते हैं। कर्ण की सहनशीलता को देखकर परशुराम जी को उसके क्षत्रिय होने का सन्देह होता है। पूछने पर कर्ण उन्हें सत्य बता देते हैं। परशुराम जी क्रुद्ध होकर शाप देते हैं कि अन्त समय में तुम हमारे द्वारा सिखाई गयी विद्या को भूल जाओगे। कर्ण वहाँ से वापस चले
आते हैं।

प्रश्न 3.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार संक्षेप में लिखिए।[2012, 16, 17]
या
द्रौपदी स्वयंवर की कथा ‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर लिखिए। [2013]
या
द्रौपदी स्वयंवर का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2013,17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर ‘द्रौपदी-स्वयंवर’ का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के दूसरे अंक में द्रौपदी के विवाह का वर्णन है। पांचाल-नरेश द्रुपद के यहाँ उनकी अद्वितीया सुन्दरी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होता है। स्वयंवर की शर्त के अनुसार प्रतिभागी को खौलते तेल की कड़ाही में ऊपर लगे खम्बे पर एक घूमते चक्र में बंधी मछली की आँख बेधनी थी। अनेक राजकुमार इसमें असफल हो जाते हैं। कर्ण अपनी विद्या पर विश्वास कर मछली की आँख बेधने आते हैं, लेकिन अपने परिचय से राजा द्रुपद को सन्तुष्ट नहीं कर पाते और द्रुपद उन्हें प्रतियोगिता के लिए अयोग्य घोषित कर देते हैं।

कर्ण के तेजस्वी रूप तथा विद्रोही स्वभाव से प्रसन्न होकर दुर्योधन ने उसे अपने राज्य के एक प्रदेश ‘अंग देश’ का राजा घोषित कर दिया, किन्तु ऐसा करके भी दुर्योधन, कर्ण की पात्रता और क्षत्रियत्व को पुष्ट नहीं कर पाता। यह प्रसंग ही दुर्योधन व कर्ण की मित्रता का सेतु सिद्ध होता है। ब्राह्मण वेश में अर्जुन और भीम सभा-मण्डप में आते हैं। अर्जुन मछली की आँख बेधकर द्रौपदी से विवाह कर लेते हैं। अर्जुन तथा भीम को दुर्योधन पहचान लेता है। दुर्योधन द्रौपदी को बलपूर्वक छीनने के लिए कर्ण से कहता है, परन्तु कर्ण इस अनैतिक कार्य के लिए तैयार नहीं होते। दुर्योधन अर्जुन से संघर्ष करता है, परन्तु घायल होकर वापस आ जाता है और कर्ण को बताता है कि ब्राह्मण वेशधारी और कोई नहीं अर्जुन और भीम ही हैं। इस बात में भी कोई सन्देह नहीं रह जाता है कि पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाकर मार डालने की उसकी योजना असफल हो गयी है। कर्ण पाण्डवों को बड़ा भाग्यशाली बताता है।

प्रश्न 4.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए। [2011, 13, 14, 15]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक में कर्ण-इन्द्र अथवा कर्ण-कुन्ती संवाद का सारांश लिखिए। [2010]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के तीसरे अंक में कर्ण के तपोस्थान का वर्णन है। कर्ण सूर्य भगवान् की उपासना करते हैं। सूर्य भगवान् साक्षात् दर्शन देकर उसे कवच तथा कुण्डल देते हैं और उनके जन्म का सारा रहस्य उन्हें बताते हैं। साथ ही आशीर्कद देते हैं कि जब तक ये कवच-कुण्डल तुम्हारे शरीर पर रहेंगे, तब तक तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं होगा। सूर्य भगवान् कर्ण को आगामी भारी संकटों से सचेत करते हैं और कहते हैं कि इन्द्र तुमसे इन कवच और कुण्डल की माँग करेंगे। कर्ण के पिछले जीवन की कथा भी सूर्य भगवान् उन्हें बता देते हैं, लेकिन माता का नाम नहीं बताते। कुछ समय बाद इन्द्र; अर्जुन की रक्षा के लिए ब्राह्मण वेश में आकर दानवीर कर्ण से कवच व कुण्डल का दान ले लेते हैं। कर्ण की दानशीलता से प्रसन्न होकर वे उन्हें एक अमोघ शक्ति प्रदान करते हैं, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। इन्द्र कर्ण को यह रहस्य भी बता देते हैं कि कुन्ती से, सूर्य के द्वारा, कुमारी अवस्था में उनका जन्म हुआ है। इस जानकारी के कुछ समय बाद कुन्ती कर्ण के आश्रम में आती है और कर्ण को बताती है कि वे उनके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वह कर्ण से रणभूमि में पाण्डवों को न मारने का वचन चाहती है; परन्तु कर्ण ऐसा करने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं। वे कुन्ती को आश्वासन देते हैं कि वे अर्जुन के अतिरिक्त अन्य किसी पाण्डव को नहीं मारेंगे। कुन्ती कर्ण को आशीर्वाद देकर चली जाती है। नाटक का तीसरा अंक यहीं समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
‘सूत-पुत्र के चतुर्थ अंक के कर्ण और अर्जुन के संवाद के आधार पर सिद्ध कीजिए कि कर्ण युद्धवीर होने के साथ-साथ दानवीर भी था।
या
‘सूत-पुत्र’ के सर्वाधिक रोचक और प्रेरणास्पद कथांश को लिखिए।
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के चतुर्थ अंक की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 14, 16, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के अंतिम अंक का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2016, 17]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के चतुर्थ अंक में वर्णित श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद के माध्यम से दानवीर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2010]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक के चौथे (अन्तिम) अंक में अर्जुन तथा कर्ण के युद्ध का वर्णन है। यह अंक नाटक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और प्रभावित करने वाला अंक है। इसमें नाटक के नायक कर्ण की दानवीरता, बाहुबल और दृढ़प्रतिज्ञता जैसे गुणों का उद्घाटन हुआ है। कर्ण और अर्जुन का युद्ध होता है। कर्ण अपने बाणों के प्रहार से अर्जुन के रथ को युद्ध-क्षेत्र में पीछे हटा देते हैं। कृष्ण कर्ण की प्रशंसा करते हैं, जो अर्जुन को अच्छी नहीं लगती। कृष्ण अर्जुन को बताते हैं। कि तुम्हारी पताका पर ‘महावीर’, रथ के पहियों पर ‘शेषनाग और तीनों लोकों का भार लिये मैं रथ पर स्वयं प्रस्तुत हूँ, फिर भी कर्ण ने रथ को पीछे हटा दिया, निश्चय ही वह प्रशंसा का पात्र है। युद्धस्थल में कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फँस जाता है। अर्जुन निहत्थे कर्ण को बाण-वर्षा करके घायल कर देते हैं। कर्ण मर्मान्तक रूप से घायल हो गिर पड़ते हैं और सन्ध्या हो जाने के कारण युद्ध बन्द हो जाता है। श्रीकृष्ण कर्ण की दानवीरता एवं प्रतिज्ञा-पालन की प्रशंसा करते हैं। कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन घायल कर्ण के पास सोने का दान माँगने जाते हैं। कर्ण अपने सोने का दाँत तोड़कर देता है, परन्तु रक्त लगा होने के कारण अशुद्ध बताकर कृष्ण उन्हें लेना स्वीकार नहीं करते। तब रक्त लगे दाँतों की शुद्धि के लिए कर्ण बाण मारकर धरती से जल निकालता है और दाँतों को धोकर ब्राह्मण वेषधारी कृष्ण को दे देता है। अब श्रीकृष्ण और अर्जुन वास्तविक रूप में प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण से लिपट जाते हैं और अर्जुन कर्ण के चरण पकड़ लेते हैं। यहीं पर ‘सूत-पुत्र नाटक की कथा का मार्मिक व अविस्मरणीय अन्त होता है।

प्रश्न 6.
सूत-पुत्र नाटक के आधार पर कर्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या
‘सूत-पुत्र’ के प्रमुख पात्र (नायक) कर्ण का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2010, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2016]
या
‘सूत-पुत्र’ के प्रमुख पात्र कर्ण के जीवन से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ? नाटक के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। [2009]
या
“कर्ण वीर एवं दानी दोनों था।” सिद्ध कीजिए। [2009]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी के सूत-पुत्र’ नाटक का नायक कर्ण है। कर्ण के महान् चरित्र को प्रस्तुत कर उसकी महानता का सन्देश देना ही नाटककार का अभीष्ट है। कर्ण का जन्म कुन्ती द्वारा कौमार्य अवस्था में किये गये सूर्यदेव के आह्वान का परिणाम था। लोकलाज के भय से उसने कर्ण को एक घड़े में रखकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। वहीं से कर्ण सूत-पत्नी राधा को मिला तथा राधा ने ही उसका पालन-पोषण किया। राधा द्वारा पालन-पोषण किये जाने के कारण कर्ण ‘राधेय’ या ‘सूत-पुत्र’ कहलाया। असवर्ण परिवार में पालन-पोषण होने के कारण उसे पग-पग पर अपमान सहना पड़ा। अन्यायी और दुराचारी दुर्योधन की मित्रता भी उसकी असफलता का कारण बनी; क्योंकि मित्रता निभाने के लिए उसे अन्याय में भी उसका साथ देना पड़ा और अन्याय की अन्त में पराजय होती है तथा अन्यायी का साथ देने वाला भी बच नहीं पाता। कर्ण वीर, साहसी, दानवीर, क्षमाशील, उदार, बलशाली तथा सुन्दर था। यह सब होते हुए भी पग-पग पर अपमानित होने के कारण वह आजीवन तिल-तिल कर जलता रहा। उसका जीवन फूलों की शय्या नहीं, वरन् काँटों का बिछौना ही रहा।

कर्ण का चरित्र-चित्रण

कर्ण के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ थीं–
(1) सुन्दर आकर्षक युवक-नाटककार ने कर्ण के रूप के विषय में लिखा है-“कर्ण तीसपैंतीस वर्ष का हृष्ट-पुष्ट सुदर्शन युवा है। उसका शरीर लम्बा-छरहरा किन्तु भरा हुआ, रंग उज्ज्वल, गोरा, नाक ऊँची, नुकीली और आँखें बड़ी-बड़ी हैं।” इस प्रकार कर्ण एक सुन्दर आकर्षक युवक है।
(2) तेजस्वी तथा प्रतिभाशाली–कर्ण का व्यक्तित्व प्रतिभाशाली है। वह अपने पिता सूर्य के समान तेजस्वी है। कर्ण ऐसा पहला व्यक्ति है, जिसके तेजस्वी रूप से दुर्योधन जैसा अभिमानी व्यक्ति भी प्रभावित हुआ। द्रौपदी-स्वयंवर में कर्ण को पहली बार देखकर ही दुर्योधन उससे प्रभावित होता है और अपना मित्र बनाने के लिए वह उसे अंगदेश का अधिपति बना देता है।
(3) सच्चा गुरुभक्त-कर्ण गुरुभक्त शिष्य है। गुरु परशुराम उसकी जंघा पर सिर रखकर सोते हैं, तभी एक कीड़ा उसकी जंघा को काटने लगता है। कीड़े के काटने पर उसकी जंघा से रक्तस्राव होता रहा, परन्तु कष्ट सहकर भी वह गुरु-निद्रा भंग नहीं होने देता। गुरु उसे शाप देते हैं, परन्तु वह किसी से कभी भी उनकी निन्दा नहीं सुन सकता- ‘मेरे गुरु की निन्दा में आपने अब यदि एक भी शब्द कहा तो यह स्वयंवर-मण्डप युद्धस्थल में बदल जाएगा।” गुरु में कर्ण की अटूट श्रद्धा और भक्ति है। कर्ण की गुरु-भक्ति की प्रशंसा स्वयं गुरु परशुराम भी करते हैं-”विद्याभ्यास के प्रति तुम्हारी तन्मयता से मैं सदा प्रभावित रहा हूँ। मेरे लिए तुम प्राण भी दे सकते हो।”
(4) धनुर्विद्या में प्रवीण-कर्ण ने धनुष चलाने की शिक्षा परशुराम जी से प्राप्त की। कर्ण अपने समय का सर्वश्रेष्ठ बाण चलाने वाला है। अनुपम धनुर्धारी अर्जुन भी उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होता। साधारण योद्धाओं से युद्ध करना तो कर्ण अपनी शान के विरुद्ध समझता है।।
(5) नारी के प्रति श्रद्धाभाव-कर्ण के प्रति सबसे बड़ा अन्याय स्वयं नारीस्वरूपा उसकी माँ ने किया है, परन्तु फिर भी वह नारी के प्रति श्रद्धाभाव रखता है-“नारी विधाता का वरदान है। नारी सभ्यता, संस्कृति की प्रेरणा है। नारी का अपहरण कभी भी सह्य नहीं हो सकता।”
(6) दानवीर-कर्ण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी दानवीरता है। उसके सामने से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। अपनी रक्षा के अमोघ साधन कवच और कुण्डल भी वह इन्द्र के माँगने पर दान कर देता है। इस सम्बन्ध में अपने पिता सूर्य की सलाह भी वह नहीं मानता। वह इन्द्र से कहता है“मुझे जितना कष्ट हो रहा है, उससे कई गुना सुख भी मिल रहा है।”
(7) विश्वासपात्र मित्र-वह एक सच्चा मित्र है। दुर्योधन कर्ण को अपना मित्र बनाता है और कर्ण जीवन भर उसकी मित्रता का निर्वाह करता है। कुन्ती के कहने पर भी वह दुर्योधन से मित्रता के बन्धनों को तोड़कर विश्वासघाती नहीं बनना चाहता।
(8) प्रबल नैतिकता–कर्ण उच्च कोटि के संस्कारों से युक्त है, अत: वह नैतिकता को अपने जीवन में विशेष महत्त्व प्रदान करता है। द्रौपदी के अपहरण की बात पर वह दुर्योधन से कहता है-“दूसरे अनुचित करते हैं इसलिए हम भी अनुचित करें, यह नीति नहीं है। किसी की पत्नी का अपहरण परम्परा से निन्दनीय है।’

कुन्ती ने जब कर्ण से उसके जन्म की वास्तविकता बतायी और उसे अपने भाइयों के पास आ जाने के लिए कहा, तब भी कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। कर्ण का यह कार्य नैतिकता से परिपूर्ण है। किसी व्यक्ति को आश्वासन देकर बीच में छोड़ना नैतिकता नहीं है। यदि भीष्म पितामह और कर्ण के व्यवहार को इस कसौटी पर परखें तो कर्ण को ही उत्तम कहना पड़ेगा। भीष्म पितामह जहाँ परिस्थितियाँ न बदलने पर भी बदल गये वहाँ कर्ण परिस्थितियाँ बदलने पर भी नहीं बदला। कुन्ती ने कर्ण को ममता में फाँसने के साथ-साथ राज्य प्राप्ति का लालच भी दिया था, पर कर्ण सभी आकर्षणों से अप्रभावित रहा। जब कुन्ती ने बार-बार मातृत्व की दुहाई दी तो उसने युद्धस्थल में अर्जुन के अतिरिक्त अन्य किसी भी पाण्डव का वध न करने की शपथ ली।

जन्म एवं पालन-पोषण सम्बन्धी अपवाद के कारण कर्ण को चाहे जो कह लिया जाए, वैसे उसके चरित्र में कहीं भी कोई भी कालिमा नहीं है। कर्ण स्वनिर्मित व्यक्ति था। उसने किसी को न कभी धोखा दिया और न अकारण किसी से बैर-विरोध मोल लिया। ‘महाभारत के सभी पात्रों पर कुछ-न-कुछ लांछन लगा हुआ है, पर कर्ण इस दृष्टि से सभी प्रकार से उज्ज्वल है। उसने जीवन में केवल एक बार झूठ बोला और वह भी धनुर्विद्या सीखने के लिए। किसी को धोखा देने अथवा हानि पहुँचाने वाले असत्य भाषण से इसकी तुलना नहीं की जा सकती।

इन सबके अतिरिक्त कर्ण सच्चा मित्र, अद्वितीय दानी, निर्भीक, दृढ़प्रतिज्ञ तथा महान् योद्धा है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कर्ण उदात्त स्वभाव वाला धीर-वीर नायक है।

प्रश्न 7.
‘सूत-पुत्र के आधार पर श्रीकृष्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2014, 18]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2010, 15, 16]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2014]
उत्तर

श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण

डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक संस्कृत के महाकाव्य ‘महाभारत’ पर आधारित है। यद्यपि इस नाटक का कथानके पूर्ण रूप से कर्ण को केन्द्रबिन्दु मानकर ही अग्रसर होता है, परन्तु श्रीकृष्ण भी एक प्रभावशाली पात्र के रूप में उपस्थित हुए हैं।
प्रस्तुत नाटक में श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नवत् प्रस्तुत किया गया है-

(1) वीरता के प्रशंसक-यद्यपि श्रीकृष्ण अर्जुन के मित्र हैं और उसके सारथी भी, परन्तु वे कर्ण की वीरता एवं शक्ति के प्रशंसक हैं। उन्हें इस बात पर प्रसन्नता होती है कि कर्ण सभी प्रकार से सुरक्षित अर्जुन के रथ को पीछे हटा देता है। वे कहते हैं—“धन्य हो कर्ण ! तुम्हारे समान धनुर्धर सम्भवतः पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।”
(2) कुशल राजनीतिज्ञ-कर्ण के पास, सूर्य के द्वारा दिये गये कवच-कुण्डलों को इन्द्र को दान कर देने पर, इन्द्र से प्राप्त एक अमोघ शक्ति थी जिसे कर्ण अर्जुन के वध के लिए सुरक्षित रखना चाहता है; परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण की उस शक्ति का प्रयोग घटोत्कच पर करा देते हैं। यह श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता एवं कुशल राजनीति का ही परिणाम था।
(3) कुशल-वक्ता-श्रीकृष्ण कुशल वक्ता के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण नहीं चलाना चाहता था। श्रीकृष्ण उसके भावों को उत्तेजित करते हैं और इस तरह बात करते हैं कि अर्जुन को धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए विवश होना पड़ता है।
(4) अवसर को न चूकने वाले–कर्ण के ऊपर बाण छोड़ने के लिए वे अर्जुन से कहते हैं”अगर तुम इस अवस्था में कर्ण पर बाण नहीं चलाओगे तो दूसरी अवस्था में वह तुम्हें बाण चलाने नहीं देगा।” वे अर्जुन से कहते हैं—“यही समय है, जब तुम कर्ण को अपने बाणों का लक्ष्य बनाकर सदा के लिए युद्ध-भूमि में सुला सकते हो। ………… शीघ्रता करो ! अवसर का लाभ उठाओ।”
(5) महाज्ञानी–श्रीकृष्ण ज्ञानी पुरुष के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। वे अर्जुन से कहते हैं-“मृत्यु को देखकर बड़े-बड़े योद्धा, तपस्वी और ज्ञानी तक व्याकुल हो उठते हैं।” वे अर्जुन को समझाते हैं—‘‘शरीर के साथ आत्मा का बन्धन बहुत दृढ़ होता है। इस प्रकार उनके ज्ञान और विद्वत्ता का स्पष्ट आभास मिलता है।
(6) पश्चात्ताप की भावना-श्रीकृष्ण को इस बात का पश्चात्ताप है कि कर्ण का वध न्यायोचित ढंग से नहीं हुआ। वे मानते हैं-”हमने अपनी विजय-प्राप्ति के स्वार्थवश कर्ण के साथ जो कुछ अन्याय किया है, हम इस प्रकार यश दिलाकर उसे भी थोड़ा हल्का कर सकेंगे।”

अस्तु; श्रीकृष्ण रंगमंच पर यद्यपि कुछ देर के लिए नाटक के अन्त में ही आते हैं, तथापि इतने से ही उनके व्यक्तित्व की झलक स्पष्ट रूप से मिल जाती है।

प्रश्न 8.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर दुर्योधन की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक संस्कृत के महाकाव्य ‘महाभारत पर आधारित है। यद्यपि इस नाटक का कथानक पूर्ण रूप से कर्ण को केन्द्र-बिन्दु मानकर ही अग्रसर होता है। परन्तु नाटक में दुर्योधन भी एक प्रभावशाली पात्र के रूप में उपस्थित हुए हैं, जो राजनीति के गुणोंसाम, दाम, दण्ड, भेद का खुलकर प्रयोग करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अन्त तक प्रयासरत रहते हैं। उनके चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सच्चा मित्र-दुर्योधन एक सच्चा मित्र है। वह कर्ण को अपना मित्र बनाता है। आजीवन मित्रता का निर्वाह करता है। मित्र होने के कारण कर्ण की हर सम्भव मदद करने को तत्पर रहता है।
(2) गुणों का पारखी—दुर्योधन गुणों का भी पारखी है। द्रौपदी के स्वयंवर में जब सूत-पुत्र होने के कारण कर्ण को स्वयंवर में भाग लेने के अयोग्य घोषित करते हुए अपमानित किया गया तो दुर्योधन ने कर्ण में वीरता, धीरता, ओज आदि गुणों को देखते हुए तुरन्त उसको अंगदेश का राजा बनाकर अपना मित्र बना लिया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दुर्योधन गुणों का पारखी ही नहीं बल्कि दूरदर्शी भी था।
(3) उचित-अनुचित का विचार न करने वाला–जब ब्राह्मण वेषधारी अर्जुन द्रौपदी को स्वयंवर से जीतकर ले जा रहा था तो दुर्योधन ने कर्ण को अर्जुन से द्रौपदी को छीनने के लिए उकसाया, किन्तु कर्ण ने उसकी यह अनुचित बात नहीं मानी। इस प्रकार दुर्योधन उचित-अनुचित का विचार न करने वाला, घोर स्वार्थी एवं दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति था।
(4) ईष्र्यालु व्यक्ति–दुर्योधन वीर है लेकिन उसके अन्दर ईर्ष्या का अवगुण भी है। वह भीम से प्रबल ईष्र्या करता है।
(5) अनीतिज्ञ–दुर्योधन अनीतिज्ञ व्यक्ति है। यह नहीं है कि वह नीति को जानता नहीं है, लेकिन स्वार्थवश वह अनीति का कार्य करने के लिए भी उद्यत रहता है। नीति सम्बन्धी तथ्यों को वह नहीं मानता है। और द्रौपदी का अपहरण कर लेना चाहता है।
(6) वीर और महत्त्वाकांक्षी—दुर्योधन वीर और महत्त्वाकांक्षी तो है, परन्तु विचारवान नहीं है। कर्ण के रथ का सारथी शल्य को बनाते समय वह उसकी प्रकृति के सम्बन्ध में नहीं सोचता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि नाटककार ने दुर्योधन के रूप में ऐसे व्यक्तियों की ओर इंगित किया है जो समाज और राष्ट्र से ऊपर अपने हित को ही सर्वोपरि मानते हैं। ऐसे व्यक्ति नेता हों। अथवा अधिकारी सर्वथा समाज द्वारा त्याज्य हैं, जो किंचित भी राष्ट्र को कदापि हित नहीं कर सकते।

प्रश्न 9.
सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए। [2009, 10, 12, 13, 15, 16]
उत्तर
कुन्ती का चरित्र-चित्रण डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक की प्रमुख नारी-पात्र है कुन्ती। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) मातृ-भावना—-कुन्ती का हृदय मातृ-भावना से परिपूर्ण है। युद्ध का निश्चय सुनते ही वह अपने पुत्रों के कल्याण के लिए व्याकुल हो उठती है। यद्यपि उसने कर्ण का परित्याग कर दिया था और किसी के सामने भी उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार नहीं किया था; किन्तु अपने मातृत्व के बल पर ही वह उसके पास जाती है और कहती है–”तुम मेरी पहली सन्तान हो कर्ण ! मैंने लोकापवाद के भय से ही तुम्हारा । त्याग किया था।”

(2) कुशल नीतिज्ञ-कुन्ती अपने पुत्रों की विजय और कुशल-क्षेम के लिए अपने त्यक्त-पुत्र कर्ण (जिसे असवर्ण घोषित कर दिया गया था) को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। जब कर्ण यह कहता है कि पाण्डव यदि मुझे सार्वजनिक रूप में अपना भाई स्वीकार करें तब ही उनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य हो सकता है, तो कुन्ती तत्काल ही कह देती है-“कर्ण तुम्हारे पाँचों अनुज सार्वजनिक रूप से तुम्हें अपना अग्रज स्वीकार करने को प्रस्तुत हैं।” जब कि पाण्डवों को उस समय तक यह भी नहीं मालूम हो पाया था कि कर्ण हमारे बड़े भाई हैं। कुन्ती उसे राज्य एवं द्रौपदी के पाने का भी लालच दिखाती है, जो स्वयंवर के समय उसे असवर्ण कहकर अस्वीकार कर चुकी थी। इस प्रकार उसमें राजनीतिक कुशलता भी पूर्ण रूप से विद्यमान थी।

(3) स्पष्टवादिता–स्पष्टवादिता कुन्ती के चरित्र का सबसे बड़ा गुण है। वह माता होकर भी अपने पुत्र कर्ण के सामने अपने कौमार्य में उसे जन्म देने के प्रसंग और उसे अपना पुत्र होने की बात कहते नहीं हिचकती। कर्ण द्वारा यह पूछे जाने पर कि तुमने किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सूर्यदेव से सम्पर्क स्थापित किया, वह कहती है-”पुत्र! तुम्हारी माता के मन में वासना का भाव बिल्कुल नहीं था।”जब कर्ण उससे यह पूछता है कि विवाह के बाद तुमने देव-आह्वान मन्त्र का क्यों उपयोग किया; तब कुन्ती अपने पति की शापजन्य असमर्थता का उल्लेख करती है और बताती है कि वे-पाण्डु तथा धृतराष्ट्र-भी अपने पिताओं की सन्तान नहीं, मात्र माताओं की सन्तान हैं।”

(4) वाक्पटु-कुन्ती बातचीत में भी बहुत कुशल है। वह अपनी बातें इतनी कुशलता से कहती है कि कर्ण एक नारी, एक माँ की विवशता को समझकर उसकी भूलों पर ध्यान न दे तथा उसकी बात मान ले। वह कर्ण की बातों में निहित भावों को समझ जाती है और उनका तत्काल तर्कपूर्ण उत्तर देती है। वह कर्ण को पहले पुत्र और बाद में कर्ण कहकर अपने मनोभावों को प्रदर्शित कर देती है और इस प्रकार अपनी वाक्पटुता का परिचय देती है। वह कहती है-”चलती हूँ पुत्र ! नहीं, नहीं, कर्ण ! मुझे तुम्हारे आगे याचना करके भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है।”

(5) सूक्ष्म दृष्टि–कुन्ती में प्रत्येक विषय को परखने और तदनुकूल कार्य करने की सूक्ष्म दृष्टि थी। कर्ण जब उससे कहता है कि तुम यह कैसे जानती हो कि मैं तुम्हारा वही पुत्र हूँ जिसको तुमने गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया था; तब कुन्ती उससे कहती है-”क्या तुम्हारे पैरों की अँगुलियाँ मेरे पैरों की अँगुलियों से मिलती-जुलती नहीं हैं।”

इस प्रकार नाटककार ने थोड़े ही विवरण में कुन्ती के चरित्र को कुशलता से दर्शाया है। नाटककार ने विभिन्न स्थलों पर कुन्ती के कथनों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि एक माता द्वारा पुत्रों के कल्याण की कामना करना उसका स्वार्थ नहीं, वरन् उसकी सहज प्रकृति का परिचायक है।

प्रश्न 10.
परशुराम का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 13]
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर ‘परशुराम’ का चरित्रांकन कीजिए| [2015, 16]
या
‘सूत-पुत्र के आधार पर परशुराम की चारित्रिक विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर
परशुराम का चरित्र-चित्रण डॉ० गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक में परशुराम को ब्राह्मणत्व एवं क्षत्रियत्व के गुणों से समन्वित महान् तेजस्वी और दुर्धर्ष योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है। परशुराम कर्ण के गुरु हैं। इनके पिता का नाम जमदग्नि है। परशुराम अपने समय के धनुर्विद्या के अद्वितीय ज्ञाता थे। नाटक के अनुसार इनकी चारित्रिक विशेषताओं का विवेचन निम्नवत् है

(1) ओजयुक्त व्यक्तित्व–परशुराम का व्यक्तित्व ओजयुक्त है। नाटककार ने उनके व्यक्तित्व का चित्रण इस प्रकार किया है-”परशुराम की अवस्था दो सौ वर्ष के लगभग है। वे हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले सुदृढ़ व्यक्ति हैं। चेहरे पर सफेद, लम्बी-घनी दाढ़ी और शीश पर लम्बी-लम्बी श्वेत जटाएँ हैं।”
(2) महान् धनुर्धर-परशुराम अद्वितीय धनुर्धारी हैं। सुदूर प्रदेशों से ब्राह्मण बालक इनके पास हिमालय की घाटी में स्थित आश्रम में शस्त्र-विद्या ग्रहण करने आते हैं। इनके द्वारा दीक्षित शिष्यों को उस समय अद्वितीय माना जाता था। भीष्म पितामह भी इन्हीं के प्रिय शिष्यों में से एक थे।
(3) मानव-स्वभाव के पारखी-परशुराम मानव-स्वभाव के अचूक पारखी हैं। वे कर्ण के क्षत्रियोचित व्यवहार से जान जाते हैं कि यह ब्राह्मण न होकर क्षत्रिय-पुत्र है। वे उससे निस्संकोच कहते हैं-”तुम क्षत्रिय हो कर्ण! तुम्हारे माता-पिता दोनों ही क्षत्रिय रहे हैं।”
(4) आदर्श गुरु-परशुराम एक आदर्श गुरु हैं। वे शिष्यों को पुत्रवत् स्नेह करते हैं और उनके कष्ट-निवारण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। कर्ण की जंघा में कीड़ा काट लेता है और मांस में प्रविष्ट हो जाता है, जिससे रक्त की धारा प्रवाहित होने लगती है। इससे परशुराम का हृदय द्रवित हो उठता है। वे तुरन्त उसके घाव पर नखरचनी का प्रयोग करते हैं और कर्ण को सान्त्वना देते हैं। यह घटना गुरु परशुराम के सहृदय होने को प्रमाणित करती है।
(5) श्रेष्ठ ब्राह्मण-परशुराम एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। वे विद्यादान को ब्राह्मण का सर्वप्रमुख कार्य मानते हैं। जो ब्राह्मण धनलोलुप हैं, परशुराम की दृष्टि में वे नीच तथा पतित हैं, इसीलिए वे द्रोणाचार्य को निम्नकोटि का ब्राह्मण मानते हैं और कहते हैं—”द्रोणाचार्य तो पतित ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय का गुरु हो सकता है, सेवक अथवा वृत्तिभोगी नहीं।”
(6) उदारमना–परशुराम सहृदय तथा उदारमना हैं। वे अपने कर्तव्यपालन में वज्र के समान कठोर हैं, लेकिन दूसरों की दयनीय दशा को देखकर द्रवीभूत भी हो जाते हैं। ब्राह्मण का छद्म रूप धारण करने के कारण वे कर्ण को शाप दे देते हैं, लेकिन जब कर्ण की शोचनीय तथा दु:ख-भरी दशा का अवलोकन करते हैं तो वे उसके प्रति सहृदय हो जाते हैं। वे कहते हैं—“जिस माता से तुम्हें ममता और वात्सल्य मिलना चाहिए था, उससे तुमने कठोर निर्मम निर्वासन पाया।जिस गुरु से तुम्हें वरदान मिलना चाहिए था, उसी ने तुम्हें शाप दिया।” उनके इस कथन से उनके उदारमना होने की पुष्टि होती है।
(7) कर्तव्यनिष्ठ–परशुराम एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। कर्तव्यपालन में वे बड़ी-से-बड़ी बाधाओं को सहर्ष स्वीकार करने को उद्यत रहते हैं। उनकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित होकर कर्ण उनसे कहता है-“आपके हृदय में कोई कठोरता अथवा निर्ममता नहीं रही है। आपने जिसे कर्तव्य समझा है, जीवन भर उसी का पालन निष्ठापूर्वक किया है।”
(8) महाक्रोधी—यद्यपि परशुराम जी में अनेक गुण हैं, तथापि क्रोध पर अभी उन्होंने पूर्णतया विजय नहीं पायी है। क्रोध में आकर वे अपने महान् त्यागी शिष्य कर्ण को भी जब शाप दे देते हैं तो संवेदनशील पाठक का हृदय हाहाकार कर उठता है। वह मानव मन के इस विकराल विकार को, ऋषियों तक को अपना शिकार बनाते देखता है।।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि परशुराम तपोनिष्ठ तेजस्वी ब्राह्मण हैं। वे एक आदर्श शिक्षक तथा उदार हृदय के स्वामी हैं। उनमें ब्राह्मणत्व तथा क्षत्रियत्व दोनों के गुणों का अद्भुत समन्वय है।

प्रश्न 11.
सूत-पुत्र’ नाटक के नायक कर्ण के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कर्ण की व्यथा-कथा का सारांश लिखिए। [2016]
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक कर्ण का मानसिक अन्तर्द्वन्द्व कई स्थानों पर उसके संवादों के माध्यम से प्रकट होता है। प्रथम चरण में वह अपने गुरु परशुराम के सामने इस द्वन्द्व को प्रकट करता है। वह जानना चाहता है कि क्या उसकी अयोग्यता मात्र इसलिए है कि वह किसी विशेष जाति से सम्बन्धित है। दूसरी बार द्रौपदी स्वयंवर में वह द्रुपद-नरेश से इस प्रश्न का उत्तर चाहता है। वह उनसे पूछता है कि जब स्वयंवर में योग्यता का निर्धारण धनुर्विद्या की कसौटी पर किया जाना है तो कुल-शील, जाति अथवा वर्ण सम्बन्धी प्रतिबन्धों का क्या औचित्य है ? उसका यही अन्तर्द्वन्द्व इन्द्र, सूर्य एवं कुन्ती के समक्ष भी प्रकट होता है। वह सामाजिक मान्यताओं एवं व्यवस्थाओं की विसंगतियों के उत्तर चाहता है। वह प्रत्येक को अपनी विचारात्मक तर्कशक्ति के आधार पर इन विसंगतियों के प्रति सहमत कर लेता है, किन्तु उसे क्षोभ इस बात का है कि सभी अपनी विवशता प्रकट करते हुए इस लक्ष्मण-रेखा.का अतिक्रमण करने से डरते हैं। कर्ण की व्यथा प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के अन्तर्मन को गहराई से झकझोर देती है। नाटककार ने कर्ण के अन्तर्मन में उत्पन्न इन प्रश्नों के माध्यम से वर्तमान समय के जाति-वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी रूढ़ियों से ग्रस्त भारतीय समाज के विचारों पर चोट की है। कर्ण के प्रति हुए अन्याय की मूल समस्या अनेक महापुरुषों द्वारा प्रयास किये जाने के बाद भी हमारे देश में आज तक समाधान नहीं पा सकी है।।

प्रश्न 12.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थल पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
डॉ० गंगासहाय प्रेमी कृत ‘सूत-पुत्र’ नाटक में कर्ण की जीवन-लीला का अन्त; इस नाटक का सर्वाधिक मार्मिक स्थल है। कर्ण युद्धभूमि में आहत होकर मरणासन्न अवस्था में पड़ा है। शरीर के छिन्न-भिन्न होने से वह अत्यन्त पीड़ा का अनुभव कर रहा है। इसी समय कृष्ण उसकी दानवीरता एवं साहस की परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। वे उससे ब्राह्मण-वेश में जाकर सुवर्ण को दान माँगते हैं। युद्ध-भूमि में कर्ण के पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। वह उनसे अपने दो सोने के दाँत उखाड़ लेने का निवेदन करता है। कृष्ण के ऐसा करने से मना कर देने पर वह उनसे पत्थर देने का आग्रह करता है, जिससे वह अपने दाँत तोड़कर उन्हें दान दे सके। कृष्ण जब इससे भी मना कर देते हैं, तब वह घायलावस्था में घिसटते हुए पत्थर उठाती है। और अपने दाँत तोड़कर उन्हें देता है। कृष्ण उन रक्तरंजित दाँतों को अपवित्र बताकर दान लेने से मना कर देते हैं। इस पर वह बड़ी कठिनाई से अपनी धनुष उठाता है और धरती पर बाण का प्रहार करके जल की धारा प्रवाहित करता है तथा उस जलधारा में अपने टूटे हुए दाँत धोकर कृष्ण को देता है। प्रसन्न होकर कृष्ण उसके सामने अपने रूप को प्रकट करके उसे साधुवाद देते हैं।

नाटककार ने कर्ण के अन्तिम समय में कृष्ण द्वारा ली गयी इस परीक्षा का चित्रण करके कर्ण के चरित्र को महान् दानी के रूप में प्रतिष्ठित किया है। कृष्ण ने स्वयं अपनी परीक्षा का उद्देश्य भी यही बताया है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र (डॉ० गंगासहाय प्रेमी), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र)

प्रश्न 1.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) को संक्षेप में लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथा का सार अपनी भाषा में प्रस्तुत कीजिए। [2010, 11, 13, 14, 16]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रथम अंक को कथासार अपने शब्दों में लिखिए। [2012, 13, 16]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए। [2009, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के अन्तिम (तृतीय) अंक की घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए। [2009, 14, 16, 17]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक अंक के कथानक पर प्रकाश डालिए। [2010]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु संक्षेप में इस प्रकार लिखिए कि उसमें निहित राष्ट्रीय एकता का भाव स्पष्ट हो। ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के अन्तिम अंक का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। [2015]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के तीसरे अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए। [2015, 16, 18]
उत्तर
श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथा ऐतिहासिक है। कथा में प्रथम शती ईसा पूर्व के भारतवर्ष की सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक झाँकी प्रस्तुत की गयी है। कहानी में शुंग वंश के अन्तिम सेनापति विक्रमादित्य, मालवा के जननायक ‘विषमशील’ के त्याग और शौर्य की गाथा वर्णित है। विषमशील ही ‘विक्रमादित्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

प्रथम अंक-नाटक के प्रथम अंक में पहली घटना विदिशा में घटित होती है। विक्रममित्र स्वयं को सेनापति सम्बोधित कराते हैं, महाराज नहीं। विक्रममित्र के सफल शासन में प्रजा सुखी है। बौद्धों के पाखण्ड को समाप्त करके ब्राह्मण धर्म की स्थापना की गयी है। सेनापति विक्रममित्र ने वासन्ती नामक एक युवती का उद्धार किया है। उसके पिता वासन्ती को किसी यवन को सौंपना चाहते थे। वासन्ती, एकमोर नामक युवक से प्रेम करती है। इसी समय कवि और योद्धा कालिदास प्रवेश करते हैं। कालिदास; विक्रममित्र को आजन्म ब्रह्मचारी रहने के कारण भीष्म पितामह’ कहते हैं। विक्रममित्र इस समय सतासी वर्ष के हैं। इसी समय साकेत के एक यवन-श्रेष्ठी की कन्या कौमुदी का सेनापति देवभूति द्वारा अपहरण करने की सूचना विक्रममित्र को मिलती है। देवभूति कन्या का अपहरण कर उसे काशी ले जाते हैं। विक्रममित्र कालिदास को काशी पर आक्रमण करने की आज्ञा देते हैं।

द्वितीय अंक-नाटक के दूसरे अंक में दो घटनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। प्रथम में तक्षशिला के राजा अन्तिलिक का मन्त्री ‘हलोदर’ विक्रममित्र से अपने राज्य के दूत के रूप में मिलता है। हलोदर भारतीय संस्कृति में आस्था रखता है तथा सीमा विवाद को वार्ता के द्वारा सुलझाना चाहता है। वार्ता सफल रहती है। तथा हलोदर विक्रममित्र को अपने राजा की ओर से रत्नजड़ित स्वर्ण गरुड़ध्वज भेटस्वरूप देता है।
विक्रममित्र के आदेशानुसार कालिदास काशी पर आक्रमण करते हैं तथा अपने ज्ञान और विद्वत्ता से काशी के दरबार में बौद्ध आचार्यों को प्रभावित कर देते हैं। वे कौमुदी का अपहरण करने वाले देवभूति तथा काशी नरेश को बन्दी बनाकर विदिशा ले जाते हैं। नाटक के इसी भाग में वासन्ती काशी विजयी ‘कालिदास का स्वागत उनके गले में पुष्पमाला डालकर करती है।

तृतीय अंक-नाटक के तृतीय तथा अन्तिम अंक की कथा ‘अवन्ति’ में प्रस्तुत की गयी है। विषमशील के नेतृत्व में अनेक वीरों ने मालवा को शकों से मुक्त कराया। विषमशील के शौर्य के कारण अनेक राजा उसके समर्थक हो जाते हैं। अवन्ति में महाकाल का एक मन्दिर है, इस पर गरुड़ध्वज फहराता रहता है। मन्दिर का पुजारी मलयवती और वासन्ती को बताता है कि युद्ध की सभी योजनाएँ इसी मन्दिर में बनती हैं। इसी समय विषमशील युद्ध जीतकर आते हैं तथा काशिराज अपनी पुत्री वासन्ती का विवाह कालिदास के साथ विक्रममित्र की आज्ञा लेकर कर देते हैं। इसी अंक में विषमशील का राज्याभिषेक होता है। तथा कालिदास को मन्त्री-पद पर नियुक्त किया जाता है। राजमाता जैन आचार्यों को क्षमादान देती हैं। कालिदास की मन्त्रणा से विषमशील का नाम उसके पिता महेन्द्रादित्य तथा विक्रममित्र के आधार पर विक्रमादित्य रखा जाता है। विक्रममित्र संन्यासी बन जाते हैं तथा कालिदास अपने राजा विक्रमादित्य के नाम पर उसी दिन से विक्रम संवत् का प्रवर्तन करते हैं। नाटक की कथा यहीं समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक का नायक कौन है ? उसकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011, 12]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 11, 14, 15, 16]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पात्र के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
या
विक्रममित्र की चारित्रिक विशेषताओं का उदघाटन कीजिए। [2010, 11, 14, 16]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 14, 16]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक पुरुष-पात्र की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2013, 14,17]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र के शौर्य एवं त्याग का वर्णन कीजिए। [2013]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर ‘विक्रममित्र’ की चारित्रिक विशेषताएँ उद्घाटित कीजिए। [2015]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के विक्रममित्र का चरित्रांकन कीजिए। [2016]
उत्तर

विक्रममित्र का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में विषमशील तथा विक्रममित्र दो प्रमुख पात्र हैं। नाटक के नायक विक्रममित्र हैं, जो नाटक के आरम्भ से अन्त तक की सभी घटनाओं के साथ जुड़े रहते हैं। यह कहा जा सकता है कि सारे कथानक के मेरुदण्ड विक्रममित्र ही हैं, जिन्होंने मूल कथा को सबसे अधिक प्रभावित किया है। विक्रममित्र, पुष्यमित्र शुंग के वंश के अन्तिम शासक हैं। वे ब्रह्मचारी, सदाचारी, वीर, कुशल राजनीतिज्ञ तथा प्रजावत्सल हैं। वह शासन का संचालन कुशलता से करते हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) सज्जन महापुरुष–विक्रममित्र सज्जन महापुरुष हैं। वे स्वयं को ‘महाराज’ कहलवाना पसन्द नहीं करते, अत: लोग उन्हें ‘सेनापति’ कहते हैं। नारियों के प्रति सम्मान का भाव सदा उनके मन में रहता है।
(2) अनुशासनप्रिय-विक्रममित्र अनुशासनप्रिय हैं तथा कठोर अनुशासन का पालन करने और कराने के पक्षधर हैं। सेनापति के स्थान पर ‘महाराज’ कहे जाने पर सेवक को डर लगता है कि कहीं सेनापति उसे दण्ड न दे दें। विक्रममित्र के शासन में अनुशासन भंग करना और मर्यादा का उल्लंघन करना अक्षम्य अपराध है।
(3) प्रजा के सेवक-विक्रममित्र अपनी प्रजा को अपनी सन्तान की भाँति स्नेह करते हैं। वे अत्याचारी नहीं हैं। उनका मत है-”सेनापति धर्म और जाति का सबसे बड़ा सेवक है।”
(4) भागवत धर्म के रक्षक-विक्रममित्र भारतवर्ष में मिटती हुई वैदिक संस्कृति तथा ब्राह्मण धर्म के रक्षक हैं। वे भागवत धर्म और उसकी प्रतिष्ठा के लिए आजीवन संघर्ष करते हैं। उनका सेवक कालिदास काशी में बौद्धों को निरुत्तर कर देता है।
(5) संगठित राष्ट्र-निर्माता—उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। विक्रममित्र ने उन्हें इकट्ठा करने का सफल प्रयास किया। विक्रममित्र का मत है—“देश का गौरव, इसके सुख और शान्ति की रक्षा मेरा धर्म है।” वे कालिदास का विवाह काशी-नरेश की पुत्री से कराते हैं। विक्रममित्र के संन्यास के समय तक मगध, साकेत तथा अवन्ति को मिलाकर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना हो चुकी होती है।
(6) निष्काम कर्मवीर विक्रममित्र राजा होते हुए भी महाराजा कहलाना पसन्द नहीं करते। वे स्वयं को प्रजा का सेवक ही मानते हैं। विषमशील के योग्य हो जाने पर उसे शासक बनाकर स्वयं संन्यासी हो जाते हैं। कालिदास का उन्हें ‘भीष्म पितामह’ कहना सटीक सम्बोधन है।
(7) नीतिप्रिय–आचार्य विक्रममित्र नीति के अनुसार चलने वाले जननायक हैं। कुमार विषमशील की सफलता का एकमात्र कारण सेनापति विक्रममित्र की नीतियाँ ही हैं। वह नागसेन और पुष्कर से कहते हैं- ‘तुम जानते हो विक्रममित्र के शासन में अनीति चाहे कितनी छोटी क्यों न हो, छिपी नहीं रह सकती है।”
(8) शरणागतवत्सल-विक्रममित्र अपनी शरण में आये हुए की रक्षा करते हैं। चंचु और कालकाचार्य को क्षमा-दान देना उनकी शरणागतवत्सलता के प्रमाण हैं।
(9) निरभिमानी-विक्रममित्र शासक होते हुए भी अभिमान से कोसों दूर रहते हैं। वे हलोदर से कहते हैं-“मैं लज्जा और संकोच से मरने लगता हूँ; राजदूत! जब इस युग का सारा श्रेय मुझे दिया जाता है।”

इस प्रकार विक्रममित्र न्यायप्रिय, प्रजावत्सल, वीर शासक तथा निष्काम महामानव हैं।

प्रश्न 3
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर (नायिका) वासन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 12, 13, 14, 16, 18]
या
‘गरुड़ध्वज’ के प्रमुख नारी-पात्र (नायिका) के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए। [2010, 12, 13, 14]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक नारी पात्र की चरित्रगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2013]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख स्त्री-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2015]
उत्तर

वासन्ती का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की नायिका वासन्ती है। वासन्ती काशिराज की इकलौती पुत्री है। बौद्ध धर्म के अनुयायी होने के कारण वे वासन्ती का विवाह किसी राजकुल में नहीं कर पाते, अत: अपनी युवा पुत्री का विवाह शाकल के 50 वर्षीय यवन राजकुमार से निश्चित करते हैं, किन्तु इसी बीच विक्रममित्र के प्रयास से यह विवाह बीच में रोक दिया जाता है और वासन्ती को राजमहल में सुरक्षित पहुँचा दिया जाता है। बाद में वह कालिदास की प्रेयसी के रूप में हमारे सम्मुख आती है। वासन्ती के चरित्र में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं–

(1) अनुपम सुन्दरी-वासन्ती रूप और गुण दोनों में अद्वितीय है। उसका सौन्दर्य कालिदास जैसे संयमी पुरुष को भी आकर्षित कर लेता है। उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए कुमार विषमशील कालिदास से कहते हैं और तुम्हारी वासन्ती–रूप और गुण का इतना अद्भुत मिश्रण …………..” पता नहीं, कितने कुण्ड इस पर्वतीय स्रोत के सामने फीके पड़ेंगे।”
(2) उदारता और प्रेमभावना से परिपूर्ण-वासन्ती विश्व के समस्त प्राणियों के लिए अपने हृदय में उदार भावना रखती है। उसमें बड़े-छोटे, अपने-पराये सभी के लिए एक समान प्रेमभाव ही भरा हुआ है।
(3) धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त-पिता के बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण कोई भी राज-परिवार वासन्ती से विवाह-सम्बन्ध के लिए तैयार नहीं होता। अन्त में उसके पिता काशिराज उसे 50 वर्षीय यवन राजकुमार को सौंप देने का निश्चय कर लेते हैं, जब कि वासन्ती उससे विवाह नहीं करना चाहती। इस प्रकार वासन्ती तत्कालीन समाज में व्याप्त धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त है।
(4) आत्मग्लानि से विक्षुब्ध–वासन्ती आत्मग्लानि से विक्षुब्ध होकर अपने जीवन से छुटकारा पाना चाहती है और अपनी जीवन-लीला समाप्त करने का प्रयास करती है, परन्तु विक्रममित्र उसको ऐसा करने से रोक लेते हैं। वह असहाय होकर कहती है-”वह महापुरुष कौन होगा, जो स्वेच्छा से आग के साथ विनोद करेगा।”
(5) स्वाभिमानिनी-वासन्ती धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त होने पर भी अपना स्वाभिमान नहीं खोती। वह किसी ऐसे राजकुमार से विवाह-बन्धन में नहीं बँधना चाहती, जो विक्रममित्र के दबाव के कारण ऐसा करने के लिए विवश हो।।
(6) सहदय और विनोदप्रिय-वासन्ती विक्षुब्ध और निराश होने पर भी सहृदय और विनोदप्रिय दृष्टिगोचर होती है। वह कालिदास के काव्य-रस का पूरा आनन्द लेती है।।
(7) आदर्श प्रेमिका–वासन्ती एक सहृदया, सुन्दर, आदर्श प्रेमिका है। वह निष्कलंक और पवित्र है। सार रूप में यह कहा जा सकता है कि वासन्ती एक आदर्श नारी-पात्र है और इस नाटक की नायिका है।

प्रश्न 4
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर नायिका ‘मलयवती’ का चरित्रांकन कीजिए। [2016]
उत्तर
मलयवती का चरित्र-चित्रण मलयवती; श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नारी-पात्रों में एक प्रमुख पात्र है। सम्पूर्ण नाटक में अनेक स्थलों पर उसका चरित्र पाठकों को आकर्षित करता है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

(1) अपूर्व सुन्दरी–मलयवती का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। वह मलय देश की राजकुमारी है। और अपूर्व सुन्दरी है। विदिशा के राजप्रासाद के उपवन में उसके रूप-सौन्दर्य को देखकर कुमार विषमशील भी उस पर मुग्ध हो जाते हैं।
(2) ललित कलाओं में रुचि-मलयवती की ललित-कलाओं में विशेष रुचि है। ललित कलाओं में दक्ष होने के उद्देश्य से ही वह विदिशा जाती है और वहाँ मलय देश की चित्रकला, संगीतकला आदि भी सीखती है।
(3) विनोदप्रिय–राजकुमारी मलयवती प्रसन्नचित्त और विनोदी स्वभाव की है। वासन्ती उसकी प्रिय सखी है और वह उसके साथ खुलकर हास-परिहास करती है। जब राजभृत्य उसे बताता है कि महाकवि कह रहे थे कि मलयवती और वासन्ती दोनों को ही राजकुमारी के स्थान पर राजकुमार होना चाहिए था तो मलयवती कहती है—“क्यों महाकवि को यह सूझी है? इस पृथ्वी की सभी कुमारियाँ कुमार हो जाएँ, तब तो अच्छी रही। कह देना महाकवि से इस तरह की उलट-फेर में कुमारों को कुमारियाँ होना होगा और महाकवि भी कहीं उस चक्र में न आ जाएँ।”
(4) आदर्श प्रेमिका–मलयवती के हृदय में कुमार विषमशील के प्रति प्रेम का भाव जाग्रत हो जाता है। वह विषमशील का मन से वरण कर लेने के उपरान्त, एकनिष्ठ भाव से केवल उन्हीं का चिन्तन करती है। वह स्वप्न में भी किसी अन्य की कल्पना करना नहीं चाहती। उसका प्रेम सच्चा है और उसे अपने प्रेम पर पूर्ण विश्वास है। अन्ततः प्रेम की विजय होती है और कुमार विषमशील के साथ उसका विवाह हो जाता है।

इस प्रकार मलयवती का चरित्र एवं व्यक्तित्व अनुपम है। वह एक आदर्श राजकुमारी की छवि प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 5
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर कालिदास का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 16, 18]
उत्तर
‘गरुड़ध्वज’ के पुरुष पात्रों में कालिदास भी एक प्रमुख पात्र हैं। विक्रममित्र शुंगवंशीय शासक एवं वीर सेनापति के रूप में प्रमुख पात्र है। इसके पश्चात् द्वितीय एवं तृतीय क्रम पर क्रमशः विषमशील, कालिदास का ही नाम आता है। विषमशील और विक्रममित्र तो प्रबुद्ध, शासक, सेनापति और शूरवीर पुरुष है। कालिदास शकारि विक्रमादित्य के दरबारी रत्नों में एक मुख्य रत्न माने जाते थे। ये एक विद्वान् कवि थे और वीर सैनिक भी थे; अतः वे विषमशील तथा विक्रममित्र से भी कुछ अधिक गुणों के स्वामी हैं। उनकी चरित्र की कुछ प्रमुख विशेषताएँ अग्रवत् हैं-

(1) वीरता–कालिदास एक वीर पुरुष हैं। जब देवभूति कौमुदी का अपहरण कर लेता है तो कालिदास उसे काशी में घेर कर पकड़ लाते हैं। उसकी इसी वीरता पर मुग्ध होकर काशी की राजकुमारी वासन्ती उससे प्रेम करने लगती है और काशिराज भी प्रसन्न होकर उन दोनों के विवाह की स्वीकृति देते हैं।
(2) सच्चा-मित्र-कालीदास विषमशील का मित्र है, इसीलिए विषमशील के साथ उसका हासपरिहास चलता रहता है। वह मलयवती के बारे में राजकुमार विषमशील से चुटकी लेता हुआ कहता है
किस तरह भूल गये विदिशा के प्रासाद का वह उपवन …………”। घूम-घाम कर मलयवती को आँखों से पी जाना चाहते थे।’
(3) सच्चा-प्रेमी और कवि-वह वासन्ती का सच्चा प्रेमी है। वासन्ती को भी उस पर पूरा विश्वास है। वह वासन्ती के बारे में कहता है-“मैं सब कुछ जानता हूँ। उन्होंने तो उस यवन को देखा भी नहीं, फिर उसकी पवित्रता में शंका उत्पन्न करना तो पार्वती की पवित्रता में शंका उत्पन्न करना होगा। इसके अतिरिक्त वे एक महाकवि भी हैं। जैसा कि मलयवती ने कहा भी है-“क्यों महाकवि को यह क्या सूझी है ?”

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कालिदास ‘गरुड़ध्वज’ के अन्य पुरुष-पात्रों की अपेक्षा विलक्षण हैं। वे वीर, सच्चे मित्र, सच्चे प्रेमी और महाकवि भी हैं। वे शासक भी हैं और शासित भी; वे वीर हैं, न्यायप्रिय हैं, कठोर हैं और कोमल भी हैं।

प्रश्न 6
‘गरुडध्वज’ के आधार पर विषमशील का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 15]
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विषमशील के शौर्य एवं त्याग का वर्णन कीजिए। [2013]
उत्तर
कुमार विषमशील ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के दूसरे प्रमुख पात्र हैं। ये धीरोदात्त स्वभाव के उच्च कुलीन श्रेष्ठ पुरुष हैं। आदि से अन्त तक इनके चरित्र का क्रमिक विकास होता है। इनके चरित्र में अग्रलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं-

(1) उदार और गुणग्राही–कुमार विषमशील मालवा के गर्दभिल्लवंशी महाराज महेन्द्रादित्य के वीर सुपुत्र हैं अपने महान् कुल के अनुरूप ही उनमें उदारता और गुणग्राहकता विद्यमान है। कवि कालिदास की विद्वत्ता, वीरता आदि गुणों को देखकर वे उनके गुणों पर ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनसे अलग होना नहीं चाहते।
(2) महान् वीर-वीरता कुमार विषमशील के चरित्र की महती विशेषता है। अपनी वीरता के कारण वह शकारि क्षत्रियों को पराजित कर भारी विजय प्राप्त करते हैं। कुमार की वीरता और योग्यता को देखकर ही आचार्य विक्रममित्र उसे सम्राट् बनाकर निश्चिन्त हो जाते हैं।
(3) सच्चा-प्रेमी–कुमार विषमशील एक भावुक व्यक्ति है। उसके हृदय में दया, प्रेम, उत्साह आदि मानवीय भावनाएँ पर्याप्त मात्रा में पायी जाती हैं। स्वभाव से धीर होते हुए भी कुमारी मलयवती को देखकर उनके हृदय में प्रेम अंकुरित हो जाता है।
(4) विवेकशीलकुमार विषमशील एक विवेकशील व्यक्ति के रूप में चित्रित हुए हैं। वे भली-भाँति समझते हैं कि किस प्रकार, किस अवसर पर अथवा किस स्थान पर किस प्रकार की बात करनी चाहिए। कालिदास के साथ उसका व्यवहार मित्रों जैसा होता है, हास और उपहास भी होता है किन्तु सेनापति विक्रममित्र के सामने वे सर्वत्र संयत और शिष्ट-आचरण करते हैं। वासन्ती और मलयवती के साथ बातें करते समय वह भावुक हो उठते हैं। किसी काम को करने से पूर्व वह विवेक से काम लेते हैं तथा उसके दूरगामी परिणाम को सोचते हैं। जब सेनापति विक्रममित्र साकेत और पाटलिपुत्र का राज्य भी उसे सौंपते हैं। तो वह बहुत विवेक से काम लेता है। अवन्ति में रहकर सुदूर पूर्व के इन राज्यों की व्यवस्था करना कोई सरल काम नहीं था। इसलिए वह विक्रममित्र से निवेदन करता है
“आचार्य! अभी कुछ दिन आप महात्मा काशिराज के साथ उधर की व्यवस्था करें। मैं चाहता हूँ, मेरे सिर पर किसी मनस्वी ब्राह्मण की छाया रहे और फिर मैं यह देख भी नहीं सकता कि जिस क्षेत्र में प्राय: डेढ़ सौ वर्षों से आपके पूर्व-पुरुषों का अनुशासन रहा, वह अकस्मात् इस प्रकार मिट जाये।”
(5) कृतज्ञता कुमार विषमशील दूसरे के किये हुए उपकार से अपने को उपकृत मानता है। कालिदास के उपकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वह कहता है–
“और वह राज्य मुझे देकर मुझ पर, मेरे मन, मेरे प्राण पर राज्य करने की युक्ति निकाल ली। ……. मैं सुखी हूँ …….. तुम्हारा अधिकार मेरे मन पर सदैव बना रहे:…..: महाकाल से मेरी यही कामना है।’
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कुमार विषमशील का चरित्र एक सुयोग्य राजकुमार का चरित्र है। वह स्वभाव से उदार, गुणग्राही तथा भावुक व्यक्ति है। उसमें वीरता, विवेकशीलता आदि कुछ ऐसे गुण हैं। जिनके आधार पर उसमें एक श्रेष्ठ शासक बनने की क्षमता सिद्ध हो जाती है। उसका चरित्र स्वाभाविक तथा मानवीय है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability (सांतत्य तथा अवकलनीयता) are part of UP Board Solutions for Class 12 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability (सांतत्य तथा अवकलनीयता)

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Maths
Chapter Chapter 5
Chapter Name Continuity and Differentiability
Exercise Ex 5.1, Ex 5.2, Ex 5.3, Ex 5.4, Ex 5.5, Ex 5.6, Ex 5.7, Ex 5.8
Number of Questions Solved 121
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability

प्रश्नावली 5.1

प्रश्न 1.
सिद्ध कीजिए कि फलन f(x) = 5x – 3, x = 0, x = – 3 तथा x = 5 पर संतत है।
हल-
यहाँ, f(x) = 5x – 3
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 1
(iii) उपरोक्त की भाँति स्वयं हल कीजिए।
नोट-चूँकि दिया गया फलन f(x) = 5x – 3 बहुपद है।
∴ यह ∀ x ∈ R के लिए संतत है।

प्रश्न 2.
x = 3 पर फलन f(x) = 2x² – 1 के सातत्य की जाँच कीजिए।
हल-
यहाँ, f(x) = 2x -1
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 2
अतः x = 3 पर f संतत है।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
निम्नलिखित फलनों के सांतत्य की जाँच कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 3
हल-
(a) f(x) = x – 5
∵ (x – 5) एक बहुपद है।
अत: प्रत्येक बिन्दु x∈R पर f संतत है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 4
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 5

प्रश्न 4.
सिद्ध कीजिए कि फलन f(x) = xn, x = n पर संतत है, जहाँ n एक धन पूर्णाक है।
हल-
दिया है- f(x) = xn एक बहुपदीय फलन है।
संतत है, यदि x ∈ R तथा x ∈ N
यहाँ x = n एक पूर्णांक है।
अत: f(x) = xn संतत फलन है।

प्रश्न 5.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 6
हल-
x = 0 तथा x = 2 पर फलन एक बहुपद है।
अतः x = 0 तथा x = 2 पर फलन सतत है।
x = 1 पर, f(x) = x, x<1 के लिए, f(x) = 5, x>1 के लिए
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 7

प्रश्न 6.
f के सभी असातत्य बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जबकि f निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 8
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 9

प्रश्न 7.
f के सभी असातत्य बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जबकि f निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 10
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 11
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 12
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 13

UP Board Solutions

प्रश्न 8.
f के सभी असातत्य बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए जबकि f निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 14
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 15

प्रश्न 9.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 16
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 17
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 18

प्रश्न 10.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 19
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 20

प्रश्न 11.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 21
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 22

प्रश्न 12.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 23
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 24

प्रश्न 13.
क्या
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 25
द्वारा परिभाषित फलन, एक संतत फलन है?
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 26

प्रश्न 14.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 27
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 28
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 29

प्रश्न 15.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 30
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 31
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 32

प्रश्न 16.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 33
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 34
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 35
UP Board Solutions

प्रश्न 17.
a और b के उन मानों को ज्ञात कीजिए जिनके लिए
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 36
द्वारा परिभाषित फलन x = 3 पर संतत है।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 37
स्वेच्छा से b के मान के लिए a का मान ज्ञात किया जा सकता हैं।

प्रश्न 18.
λ के किस मान के लिए।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 38
यदि x = 0 द्वारा परिभाषित फलन x = 0 पर संतत है। x = 1 पर इसके सातत्य पर विचार कीजिए।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 39

प्रश्न 19.
दर्शाइए कि g(x) = x – [x] द्वारा परिभाषित फलन समस्त पूर्णाक बिन्दुओं पर असंतत है। यहाँ [x] उस महत्तम पूर्णांक निरूपित करता है, जो x के बराबर अथवी x से कम है।
हल-
x = c पूर्णांक पर, g(x) = x – [x]
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 40
अतः x = c पूर्णाक पर, f संतत नहीं है।

प्रश्न 20.
क्या f(x) = x² – sin x + 5 द्वारा परिभाषित फलन x = π पर संतत है?
हल-
माना
f(x) = x² – sin x + 5
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 41

प्रश्न 21.
निम्नलिखित फलनों के सांतत्य पर विचार कीजिए
(a) f(x) = sin x + cos x
(b) f(x) = sin x – cos x
(c) f(x) = sin x.cos x
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 42
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 43
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 44
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 45

प्रश्न 22.
cosine, cosecant, secant और cotangent फलनों के सातत्य पर विचार कीजिए।
हल-
(a) माना f(x) = cos x
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 46
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 47

प्रश्न 23.
f के सभी असातत्यता के बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए, जहाँ
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 48
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 49

प्रश्न 24.
निम्न प्रकार से परिभाषित फलन की सातत्यता की जाँच x = 0 पर कीजिए
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 50
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 51UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 52

प्रश्न 25.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 53
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 54

प्रश्न 26.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 55
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 56

प्रश्न 27.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 57
द्वारा परिभाषित फलन x = 2 पर।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 58
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 59

प्रश्न 28.
k का मान ज्ञात कीजिए यदि फलन
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 60
द्वारा परिभाषित फलन x = π पर सतत् है।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 61

प्रश्न 29.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 62
द्वारा परिभाषित फलने x = 5 पर।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 63

प्रश्न 30.
a तथा b के मानों को ज्ञात कीजिए ताकि
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 64
द्वारा परिभाषित फलन एक संतत फलन हो।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 65
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 66

प्रश्न 31.
दर्शाइए कि f(x) = cos x² द्वारा परिभाषित फलन एक संतत फलन है।
हल-
ज्ञात है- f(x) = cos x²
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 67
f(c) = cos c²
अत: f(x) = cos x² एक संतत फलन है। इति सिद्धम्

UP Board Solutions

प्रश्न 32.
दर्शाइए कि f(x) =| cos x| द्वारा परिभाषित फलन एक संतत फलन है।
हल-
ज्ञात है- f(x) = | cos x|
माना x = c ∈ R पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 68
f(c) = | cos c|
अतः x = c ∈ R पर F एक संतत फलन है।। इति सिद्धम्

प्रश्न 33.
जाँचिए कि क्या sin|x| एक संतत फलन है।
हल-
माना f(x) = sin | x|
x = c ∈ R पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 69
f(c) = sin|c|
अतः x = c ∈ R पर f एक संतते फलन है।।

प्रश्न 34.
f(x) = |x|-|x + 1| द्वारा परिभाषित फलन f के सभी असातत्यता के बिन्दुओं को ज्ञात कीजिए।
हल-
ज्ञात है- f(x) = |x|-|x +1|
f(x) = – x -[-(x + 1)] जब x< – 1]
= -x + x + 1 = 1
f(x) = – x – (x + 1), [जब – 1≤ x < 0]
= – x – x – 1
= – 2x – 1
f(x) = x – (x + 1), जब x≥ 0
= x – x – 1 = -1
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 70
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 71

प्रश्नावली 5.2

प्रश्न 1 से 8 में x के सापेक्ष निम्नलिखित फलनों का अवकलन कीजिए

प्रश्न 1.
sin(x²+5)
हल-
माना y = sin(x²+5)
x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 72
= cos (x² + 5) (2x + 0)
= 2x cos (x² + 5)

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
cos (sin x)
हल-
माना y = cos (sin x)
माना sin x = t
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर, [latex ]\frac { dt }{ dx }=cosx[/latex]
∴ y = cos t से,
दोनों पक्षों का t के सापेक्ष अवकलन करने
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 73
= – sin t cos x = -sin (sin x)cos x

प्रश्न 3.
sin (ax+b)
हल-
माना y = sin (ax + b)
ax+ b = t रखने पर, y = sin t
दोनों पक्षों का है के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 74

UP Board Solutions

प्रश्न 4.
sec (tan√x)
हल-
माना y = sec (tan (√x))
x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 75

प्रश्न 5.
[latex s=2]\frac { sin(ax+b) }{ cos(cx+d) }[/latex]
हल-
माना [latex s=2]y=\frac { sin(ax+b) }{ cos(cx+d) }[/latex] …(1)
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 76

प्रश्न 6.
cos x3.sin2 x5
हल-
माना y = cos x3.sin2 x5
समी० (1) का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 77

प्रश्न 7.
[latex s=2]2\sqrt { cot\left( { x }^{ 2 } \right) } [/latex]
हल-
माना [latex s=2]2\sqrt { cot\left( { x }^{ 2 } \right) } [/latex]
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 78
प्रश्न 8.
cos(√x)
हल-
माना y = cos(√x) ….(1)
समी० (1) का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 79

प्रश्न 9.
सिद्ध कीजिए कि फलन f(x) =|x – 1|, x ∈ R, x = 1 पर अवकलित नहीं है।
हल-
दिया है- f (x) = |x – 1| x∈R
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 80
R.H.D. ≠ L.H.D.
अत: x = 1 पर f अवकलनीय नहीं है। इति सिद्धम्

प्रश्न 10.
सिद्ध कीजिए कि महत्तम पूर्णाक फलन f(x) = [x],0 < x < 3, x = 1 तथा x = 2 पर अवकलित नहीं है।
हल-
ज्ञात है, f(x) = [x]
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 81

प्रश्नावली 5.3

निम्नलिखित प्रश्नों में [latex ]\frac { dy }{ dx }[/latex] ज्ञात कीजिए

प्रश्न 1
2x + 3y = sinx
हल-
ज्ञात है, 2x + 3y = sin x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 82

प्रश्न 2
2x + 3y = siny
हल-
दिया है- 2x + 3y = siny
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 83

प्रश्न 3
ax + by² = cosy
हल-
ज्ञात है- ax + by² = cosy
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 84

प्रश्न 4
xy + y² = tan x + y
हल-
दिया है xy + y² = tan x + y
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 85
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 86

प्रश्न 5
x² + xy + y² = 100
हल-
दिया है x² + xy + y² = 100
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 87

प्रश्न 6
x3 + x²y + xy² + y3 = 81
हल-
दिया है x3 + x²y + xy² + y3 = 81
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 88

प्रश्न 7
sin² y + cos xy = k
हल-
दिया है sin² y + cos xy = k
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 89UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 90

प्रश्न 8
sin² x + cos² y = 1
हल-
दिया है sin² x + cos² y = 1
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 91

प्रश्न 9.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 92
हल-
दिया है-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 93

प्रश्न 10.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 94
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 95

प्रश्न 11.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 96
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 97

प्रश्न 12.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 98
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 99

प्रश्न 13.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 100
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 101
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 102

प्रश्न 14.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 103
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 104

प्रश्न 15.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 105
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 106

प्रश्नावली 5.4

निम्नलिखित का x के सापेक्ष अवकलन कीजिए

प्रश्न 1
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 107
हल-
माना
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 107
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 108

UP Board Solutions

प्रश्न 2
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 109
हल-
माना
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 109
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 110

प्रश्न 3
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 111
हल-
माना
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 111
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 112

प्रश्न 4
sin(tan-1 ex)
हल-
माना sin(tan-1 ex)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 113

प्रश्न 5
log(cos ex)
हल-
माना log(cos ex)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 114

प्रश्न 6
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 115
हल-
माना
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 115
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 116

प्रश्न 7
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 117
हल-
माना
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 117
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 118

प्रश्न 8
log(log x), x>1
हल-
माना log(log x), x>1
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 119

प्रश्न 9
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 120
हल-
माना
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 120
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 121

प्रश्न 10
cos(log x + ex)
हल-
माना cos(log x + ex)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 122

प्रश्नावली 5.5

प्रश्न 1 से 11 तक के प्रश्नों में प्रदत्त फलनों का x के सापेक्ष अवकलन कीजिए

UP Board Solutions

प्रश्न 1.
cos x.cos 2x.cos 3x
हल-
माना y = cos x. cos 2x. cos 3x …(1)
दोनों पक्षों को लघुगणक लेने पर,
logy = log (cos x. cos2x. cos 3x)
= log cos x + log cos 2 x + log cos 3x
[∵ log m.n = log m + log n]
दोनों पक्षों में x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 123

प्रश्न 2.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 124
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 125
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 126

प्रश्न 3.
(log x)cos x
हल-
माना y = (log x)cos x
दोनों पक्षों का लघुगणक लेने पर,
log y = log (log x)cos x = cos x log (log x), [∵log mn = n log m]
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 127

प्रश्न 4.
xx – 2sin x
हल-
माना y = xx – 2sin x
पुनः माना u = xx, v = 2sin x
y = u – v
u = xx
से दोनों पक्षों को लघुगणक लेने पर, log u = log xx = x log x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 128

प्रश्न 5.
(x + 3)2 .(x + 4)3 .(x + 5)4
हल-
माना y = (x + 3)2 .(x + 4)3 .(x + 5)4
दोनों पक्षों का लघुगणक लेने पर,
log y = log [(x + 3)2 .(x + 4)3 (x + 5)4]
= log (x + 3)2 + log (x + 4)3 + log (x + 5)4
[∵ log mn = log m + log n]
= 2 log (x + 3) + 3 log (x + 4) + 4 log (x + 5)
[∵ log mn = n log m]
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 129

प्रश्न 6.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 130
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 131
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 132
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 133

प्रश्न 7.
(log x)x + xlog x
हल-
माना y = (log x)x + xlog x
पुनः माना y = u + v
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 134
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 135

प्रश्न 8.
(sin x)x + sin-1√x
हल-
माना y = (sin x)x + sin-1√x
पुनः माना y = u + v
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 136
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 137

प्रश्न 9.
xsin x + (sin x)cos x
हल-
माना xsin x + (sin x)cos x
पुनः माना y = u + v
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 139UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 138
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 139

UP Board Solutions

प्रश्न 10.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 140
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 141
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 142
प्रश्न 11.
(x cos x)x + (xsin x)1/x
हल-
माना y = (x cos x)x + (x sin x)1/x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 143
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 144

UP Board Solutions

प्रश्न 12.
xy + yx = 1
हल-
दिया है, ∵ xy + yx = 1
माना u = xy, v = yx ∵ u + v = 1
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 145
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 146

प्रश्न 13.
yx = xy
हल-
दिया है, yx = xy
दोनों पक्षों का लघुगणक लेने पर, log yx = log xy
x log y = y log x
दोनों पक्षों में x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 147

प्रश्न 14.
(cos x)y = (cos y)x
हल-
दिया है, (cos x)y = (cos y)x
दोनों पक्षों का लघुगणक लेने पर,
log (cos x)y = log (cos y)x या y log cos x = x log cos y
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 148

प्रश्न 15.
xy = e(x-y)
हल-
दिया है, xy = e(x-y)
दोनों पक्षों को लघुगणक लेने पर,
log (xy) = log e(x-y)
या log x + log y = (x – y) loge e [∵ log xy = log x + log y]
या log x + log y = x – y [∵ loge = 1]
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 149

प्रश्न 16.
f(x) = (1 + x) (1 + x2) (1 + x4) (1 + x8) द्वारा प्रदत्त फलन का अवकलज ज्ञात कीजिए और इस प्रकार f'(1) ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, f(x) = (1 + x) (1 + x2) (1 + x4) (1 + x8)
दोनों पक्षों का लघुगणक लेने पर,
log f (x) = log [(1 + x) (1 + x2) (1 + x4) (1 + x8)]
या log f(x) = log (1 + x) + log (1 + x2) + log (1 + x4) + log (1 + x8)
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 150

प्रश्न 17.
(x² – 5x + 8) (x3 + 7x + 9) का अवकलन निम्नलिखित तीन प्रकार से कीजिए
(i) गुणनफल नियम का प्रयोग करके
(ii) गुणनफल के विस्तारण द्वारा एक एकल बहुपद प्राप्त करके
(iii) लघुगणकीय अवकलन द्वारा
यह भी सत्यापित कीजिए कि इस प्रकार प्राप्त तीनों उत्तर समान हैं।
हल-
(i) गुणनफल नियम के प्रयोग द्वारा ।
माना y = (x2 – 5x + 8). (x3 + 7x + 9)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 151
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 152
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 153

UP Board Solutions

प्रश्न 18.
यदि u, v और w, x के फलन हैं तो दो विधियों अर्थात् प्रथम गुणनफल नियम की पुनरावृत्ति द्वारा, द्वितीय-लघुगणकीय अवकलन द्वारा दर्शाइए कि ।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 154
हल-
(i) माना y = u . v . w = u. (v. w)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 155

प्रश्नावली 5.6

यदि प्रश्न संख्या 1 से 10 तक में तथाy के लिए समीकरणों द्वारा, एक-दूसरे से प्राचलिक रूप में सम्बन्धित हों तो प्राचलों का विलोपन किए बिना [latex ]\frac { dy }{ dx }[/latex] ज्ञात कीजिए।

प्रश्न 1.
x = 2at2, y = at4
हल-
दिया है, x = 2at2 तथा y = at4
दोनों पक्षों का है के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 156

प्रश्न 2.
x = a cos θ, y = b cos θ
हल-
दिया है : x = a cos θ तथा y = b cos θ
दोनों पक्षों का θ के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 157

प्रश्न 3.
x = sin t, y = cos 2t
हल-
दिया है, x = sin t तथा y = cos 2t
दोनों पक्षों का है के सापेक्ष अवकलन करने पर,
[latex ]\frac { dx }{ dt }=cost[/latex]
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 158

प्रश्न 4.
x = 4t, [latex ]y=\frac { 4 }{ t }[/latex]
हल-
दिया है, x = 4t तथा [latex ]y=\frac { 4 }{ t }[/latex]
दोनों पक्षों का है के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 159

प्रश्न 5.
x = cos θ – cos 2θ, y = sin θ – sin 2θ
हल-
दिया है, x = cosθ – cos 2θ तथा y = sin θ – sin 2θ
x = cos θ – cos 2θ
दोनों पक्षों का θ के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 160

प्रश्न 6.
x = a(θ – sinθ), y = a(1 + cosθ)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 161

प्रश्न 7
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 162
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 163
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 164
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 165
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 166

प्रश्न 8
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 167
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 168

UP Board Solutions

प्रश्न 9.
x = a sec θ, y = b tan θ
हल-
दिया है, x = a sec θ तथा y = b tan θ
दोनों पक्षों का θ के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 169

प्रश्न 10.
x = a (cos θ + θ sin θ), y = a(sin θ – θcos θ)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 170

प्रश्न 11.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 171
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 172

प्रश्नावली 5.7

प्रश्न संख्या 1 से 10 तक में दिए फलनों के द्वितीय कोटि के अवकलज ज्ञात कीजिए

प्रश्न 1.
x² + 3x + 2
हल-
माना y = x² + 3x + 2
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर, [latex s=2]\frac { dy }{ dx }=2x+3[/latex]
दोनों पक्षों का पुन: x में सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 173

प्रश्न 2.
x20
हल-
माना y = x20
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 174

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
x cos x
हल-
माना y = x cos x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 175
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 176

प्रश्न 4.
log x
हल-
माना y = log x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 177
दोनों पक्षों को पुन: x के सापेक्ष अवकलन करने पर,

प्रश्न 5.
x3 log x
हल-
माना y = x3 log x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 178
= 2x + 3x + 6x log x
= 5x + 6x log x
= x (5 + 6 log x)

प्रश्न 6.
ex sin 5x
हल-
माना y = ex sin 5x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 179
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 180

प्रश्न 7.
e6x cos 3x
हल-
माना y = e6x cos 3x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 181

प्रश्न 8.
tan-1x
हल-
माना y = tan-1x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 182

UP Board Solutions

प्रश्न 9.
log (log x)
हल-
माना y = log (log x)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 183

प्रश्न 10.
sin (log x)
हल-
माना y = sin (log x)
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 184

प्रश्न 11.
यदि y = 5 cos x – 3 sin x है तो सिद्ध कीजिए कि
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 185
हल-
दिया है, y = 5 cos x – 3 sin x
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 186

प्रश्न 12.
यदि y = cos-1 x है तो [latex s=2]\frac { { d }^{ 2 }y }{ { dx }^{ 2 } } [/latex] को केवल y के पदों में ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, y = cos-1 x
⇒ x = cos y
दोनों पक्षों का x के सापेक्ष अवकलन करने पर,
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 187

प्रश्न 13.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 188
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 189

प्रश्न 14.
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 190
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 191
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 192

प्रश्न 15
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 193
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 194

प्रश्न 16
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 195
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 196

प्रश्न 17
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 197
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 198
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 199

प्रश्नावली 5.8

प्रश्न 1.
फलन f(x) = x² + 2x – 8, x∈[-4,2] के लिए रोले के प्रमेय को सत्यापित कीजिए।
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 200

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
जाँच कीजिए कि रोले का प्रमेय निम्नलिखित फलनों में से किन-किन पर लागू होता है? इन उदाहरणों से क्या आप रोले के प्रमेय के विलोम के बारे में कुछ कह सकते हैं?
(i) f(x) = [x] के लिए x∈[5,9]
(ii) f(x) = [x] के लिए x∈[-2,2]
(ii) f(x) = x² – 1 के लिए x∈[1,2]
हल-
(i) f(x) = [x] के लिए x∈[5, 9]
f(x) = [x], बिन्दु x = 6, 7, 8 पर न तो संतत है तथा न ही अवकलनीय है।
∴ यहाँ रोले प्रमेय लागू नहीं है।
(ii) f(x) = [x], x∈[-2, 2]
f(x) = [x], बिन्दु x = -1, 0, 1 पर न तो संतत है तथा न ही अवकलनीय है।
∴ यहाँ रोले प्रमेय लागू नहीं है।
(iii) f(x) = (x² – 1), x∈[1, 2] के लिए
f(1) = 1 – 1 = 0,
f(2) = 2² – 1 = 4 – 1 = 3
f(1) ≠ f(2)
चूँकि f, [1, 2] में संतत है तथा फलन (1, 2) अवकलनीय भी है परन्तु f(1) ≠ f(2).
∴ यहाँ रोले प्रमेय लागू नहीं है।

प्रश्न 3.
यदि f :[-5, 5]→ R एक संतत फलन है और यदि f ‘ (x) किसी भी बिन्दु पर शून्य नहीं होता है तो सिद्ध कीजिए कि f(- 5) ≠ f(5).
हल-
दिया है, f:[-5, 5]→ R
f संतत है तथा अवकलनीय है लेकिन f” (x) ≠ 0
अन्तराल (-5, 5) में रोले प्रमेय के लिए आवश्यक है
(i) [a, b] में f संतत है।
(ii) (a, b) में f अवकलित होता है।
(iii) f(a) = f(b)
f ‘(c) = 0 c ∈(a, b)
f ‘(c) ≠ 0
⇒ f(a) ≠ f(b)
f(- 5) ≠ f(5) इति सिद्धम्

प्रश्न 4.
माध्यमान प्रमेय सत्यापित कीजिए, यदि अन्तराल [a, b] में f(x) = x² – 4x – 3, जहाँ a = 1 और  b = 4 है।
हल-
दिया है, (x) = x² – 4x – 3,[1,4] अन्तराल के लिए f एक बहुपदीय व्यंजक है। यह 1,4 में संतत तथा (1, 4) में अवकलनीय दोनों है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 201

प्रश्न 5.
माध्यमान प्रमेय सत्यापित कीजिए, यदि अन्तराल [a, b] में f(x) = x³ – 5x² – 3x, जहाँ a = 1 और b = 3 है। f ‘(c) = 0 के लिए c∈(1, 3) को ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, f(x) = x³ – 5x² – 3x
[1, 3] में f संतत है और (1, 3) में अवकलनीय है क्योकि यह बहुपदीय है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 202
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 203

प्रश्न 6.
प्रश्न संख्या 2 में उपर्युक्त दिए तीनों फलनों के लिए माध्यमान प्रमेय की अनुपयोगिता की जाँच कीजिए।
हल-
(i) f(x) = [x],
x∈[5,9]
दिये हुए अन्तराल (5, 9) में f(x) = [x] बिन्दु x = 6, 7, 8 पर न तो संतत है तथा न ही अवकलनीय है।
माध्यमान प्रमेय लागू नहीं है।
(ii)
f(x) =[x], x ∈[-2, 2 ]
दिये हुए अन्तराल [-2, 2] में f बिन्दु x = -1, 0, 1 पर न तो संतत है तथा न ही अवकलनीय है।
माध्यमान प्रमेय लागू नहीं है।
(iii) f(x) = x² – 1, x ∈[1, 2]
यह एक बहुपदीय फलन है। यह अन्तराल [1,2] में संतत है तथा (1, 2) में अवकलनीय है।
UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability image 204

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability (सांतत्य तथा अवकलनीयता) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Maths Chapter 5 Continuity and Differentiability (सांतत्य तथा अवकलनीयता), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources (खनिज एवं ऊर्जा के संसाधन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources (खनिज एवं ऊर्जा के संसाधन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 11
Chapter Name Minerals and Energy Resources (खनिज एवं ऊर्जा के संसाधन)
Number of Questions Solved 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources (खनिज एवं ऊर्जा के संसाधन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
लौह-अयस्क के प्रकार बताइए तथा विश्व में लोहे के उत्पादक देशों का वर्णन कीजिए।
या
विश्व के लौह-अयस्क के वितरण का भौगोलिक विवरण दीजिए।
या
लौह एवं इस्पात उद्योग के स्थानीकरण के कारकों की विवेचना कीजिए एवं विश्व में इस उद्योग के प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तर
लौह-अयस्क विश्व में प्राप्त होने वाले सभी खनिज पदार्थों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह वर्तमान वैज्ञानिक एवं औद्योगिक विकास की धुरी है। सूई से लेकर विशालकाये इंजन, जलपोत तथा बड़े-बड़े संयन्त्रों में लोहे का प्रयोग होता है। इसी कारण आधुनिक युग ‘लोहा-इस्पात युग’ के नाम से पुकारा जाता है। लोहा आधारभूत खनिज है। इसका उपयोग यन्त्रों, मशीनों, अनेक कल-पुर्जा, परिवहन साधनों एवं उपकरणों, रेल की पटरियों एवं बिजली के खम्भों, संचार के साधनों, कारखानों एवं मिलों के ढाँचों, पुलों, वायुयानों, जलयानों आदि के निर्माण में किया जाता है। सुरक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्र, टैंक, तोप, गोले, पनडुब्बी, रॉकेट आदि के निर्माण में इसका प्रयोग किया जाता है।

वर्तमान समय में किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास के स्तर को नापने का श्रेय इस्पात उत्पादन को ही दिया जाता है। जिस देश में जितना अधिक लोहे एवं इस्पात का उत्पादन होता है, उसे उतना ही उन्नत माना जाता है। विश्व में अन्य धातुओं की अपेक्षा लोहे के भण्डार सबसे अधिक हैं। सभी धातुओं में लोहा सबसे सस्ता है। इसके प्रमुख गुण इसकी कठोरता, दृढ़ता, लचीलापन एवं स्थायित्व हैं। लौह-अयस्क में अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं; अत: कच्ची धातु को भट्टियों में गलाकर शुद्ध एवं परिष्कृत किया जाता है। इसे कच्चा लोहा कहा जाता है। कच्चे लोहे में मैंगनीज, चूना, टंगस्टन आदि मिलाकर इसे कठोर अर्थात् इस्पात का निर्माण किया जाता है।

लौह-अयस्क के प्रकार
Types of Iron-ore

लोहे की कच्ची धातु निम्नलिखित चार प्रकार की होती है –

  1. हेमेटाइट – यह लाल एवं भूरे अथवा कत्थई रंग की धातु है। इसमें लोहांश की मात्रा 60 से 70% तक होती है। आग्नेय एवं रूपान्तरित शैलों से इस प्रकार की धातु प्राप्त होती है। विश्व में सबसे अधिक यही अयस्क प्राप्त होती है। यह धातु सर्वोत्तम मानी जाती है, क्योंकि यह आसानी से साफ हो जाती है। इसमें लोहे एवं ऑक्सीजन का मिश्रण होता है।
  2. मैगनेटाइट – हरी या भूरी झलक लिये काले रंग की इस धातु में लोहांश की मात्रा 72.4% तक होती है। इसमें गन्धक, फॉस्फोरस, टाइटेनियम आदि तत्त्व मिले होते हैं जिससे इसकी उपयोगिता सीमित हो जाती है। इसमें चुम्बकीय गुण होता है। उत्तरी स्वीडन में इस प्रकार का लोहा मिलता है।
  3. लिमोनाइट – पीलापन लिये भूरे रंग की यह धातु लोहांश की मात्रा 30% से 60% रखती है। परतदार चट्टानों में इसके जमाव पाये जाते हैं। यह लोहे, ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन का मिश्रण होती है। लोहांश की कमी के कारण विश्व में इस धातु का खनन कम ही किया जाता है।
  4. सिडेराइट – इस लौह-अयस्क में कार्बन का मिश्रण होता है जिससे इसका रंग राख के समान हो जाता है। इस अयस्क में लोहांश की मात्रा 10% से 48% तक होती है। इसमें अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं।

विश्व में लोहे के प्रमुख उत्पादक देश
Main Iron Producing Countries in the World

लौह-अयस्क उत्पादक प्रमुख देशों का विवरण निम्नलिखित है –
(1) CIS देश ( पूर्व सोवियत संघ ) – 1970 ई० से ही यह विश्व की अग्रणी इस्पात उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 20% से अधिक इस्पात तैयार होता है। इस्पात उत्पादन निम्नलिखित क्षेत्रों में अधिक विकसित है –

(i) यूक्रेन अथवा डोनबास क्षेत्र – यहाँ रूस का 1/2 ढला हुआ लोहा व इस्पात तैयार किया जाता है। डोनेज बेसिन की खदानों से कोयला तथा क्रिवोईराग व क्रीमिया में स्थित किर्क की खानों से लौह-धातु एवं नीपर नदी से विद्युत शक्ति तथा स्वच्छ जल की प्राप्ति होती है। इसी क्षेत्र में विश्व के विशालतम मैंगनीज भण्डार हैं। इस क्षेत्र में लौह-इस्पात उद्योग का विशेषीकरण पाया जाता है। कृषि उपकरण– रोस्टोव व ओडेसा में; इन्जीनियरिंग वस्तुएँ-नीप्रोपेट्रोवस्क, कीव, खारकोव तथा स्टालिनो में; मोटर वाहन-वोरोशिलोवग्राड में; इस्पात की विभिन्न वस्तुएँ–क्रिवोईराग व स्टालिनग्राड में तैयार होती हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण इस्पात केन्द्र किर्क जैपीरोझी व टोगनरॉग हैं।

(ii) मॉस्को-टुला क्षेत्र – यह क्षेत्र सोवियत रूस का प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है। यहाँ टुला की खदानों में घटिया कोयला, कुर्क से लौह धातु तथा वोल्गा नदी से सस्ते जल परिवहन की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इस क्षेत्र में इस्पात उद्योग का विशेषीकरण हो गया है। मॉस्को, टुला व गोर्की में-कृषि उपकरण, मोटरवाहन व ट्रैक्टर बनाये जाते हैं। कालूगा में कृषि उपकरण व ट्रैक्टर तथा किलोमना में-रेल के डिब्बे व इंजन बनाये जाते हैं। टुला लोहे-इस्पात का एक विशाल केन्द्र है। इसे ‘रूस का बर्मिंघम’ कहते हैं। लिपेस्क, लेनिनग्राड, गोर्की आदि अन्य महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं।

(iii) यूराल क्षेत्र – यह रूस का प्राचीन औद्योगिक व सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ ओर्क, मैग्नीटोगोर्क व जलाटूस्ट की खदानों से कोयला, साइबेरिया के कारागाण्डा व कुजबास क्षेत्रों की खदानों से लौह धातु, बाकू क्षेत्र से पेट्रोलियम एवं नदियों से जल-विद्युत प्राप्त होती है। यहाँ रेल के वैगन तथा अस्त्र-शस्त्र बनाये जाते हैं। चिल्याबिंस्क, स्वर्डलोवस्क, उस्र्क, बेलोरेस्क, निझनीतागिल व मैग्नीटोमेस्र्क महत्त्वपूर्ण इस्पात केन्द्र हैं।

(iv) कुजवास क्षेत्र – पश्चिमी साइबेरिया के कुजनेत्स्क बेसिन में यह क्षेत्र स्थित है। यहाँ प्राचीन काल से ही कुशल लुहार कारीगरों की बस्तियों की स्थापना के कारण यह क्षेत्र ‘कुजनेत्स्क’ (लुहारों की नगरी) कहलाता है। यहाँ पर्याप्त कोयला, गोरनाया शोरिया से लौह धातू व निकट ही मैंगनीज प्राप्त होता है। साइबेरिया के औद्योगिक क्षेत्रों के कारण बाजार की सुविधा भी प्राप्त है। नोवोकुजनेत्स्क, नोवोसिबिस्र्क, कामेन, टोमस्क आदि प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं। यहाँ यन्त्र तथा भारी मशीनरी निर्मित होते हैं।

(v) अन्य क्षेत्र – सोवियत संघ में वोल्गा क्षेत्र, काकेशस क्षेत्र, बैकाल क्षेत्र, सुदूर पूर्व आदि क्षेत्रों में भी लोहा-इस्पात उद्योग विकसित हुआ है।

(2) चीन – आधुनिक स्तर पर लोहा-इस्पात उद्योग का विकास यहीं सन् 1950 के पश्चात् आरम्भ हुआ। यहाँ तीन क्षेत्रों में इस्पात उद्योग विकसित है- दक्षिणी मंचूरिया, उत्तरी चीन तथा यांग्टीसी की निम्न घाटी। वुहान, फुकिंग, पाओतो, आनशान आदि प्रमुख केन्द्र हैं। अब यह विश्व का वृहत्तम इस्पात उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 17% इस्पात बनता है।

(3) जापान – यह एशिया का महान् औद्योगिक देश है। लोहा-इस्पात उद्योग में यह विश्व में द्वितीय स्थान पर है। यहाँ विश्व का 16% इस्पात तैयार किया जाता है। यहाँ लौह धातु व कोयले की बहुत कमी है। यहाँ चीन, भारत व मलेशिया से लौह धातु, ऑस्ट्रेलिया व संयुक्त राज्य से कोयला तथा विदेशों से धातु शोधक पदार्थ आयात करने पड़ते हैं। यहाँ समुद्री परिवहन तथा सघनी आबादी एवं औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त माँग तथा प्रचुर श्रमिकों की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पर्वतीय देश होने के कारण तीव्रगामी नदियों से जल विद्युत एवं स्वच्छ जल प्राप्त होता है।

(4) संयुक्त राज्य अमेरिका – यह विश्व का तीसरा वृहत्तम लोहा-इस्पात उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 13% से अधिक इस्पात निर्मित होता है। यहाँ इस्पात उद्योग निम्नलिखित क्षेत्रों में अधिक विकसित है –
(i) उत्तरी अप्लेशियन क्षेत्र – यह संयुक्त राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण इस्पात उत्पादक क्षेत्र है। इसका विस्तारै ओहियो नदी-घाटी में है। यहाँ देश का 1/3 इस्पात तैयार किया जाता है। इस क्षेत्र को सुपीरियर झील क्षेत्र से लौह धातु तथा सस्ता जल परिवहन-अप्लेशियन क्षेत्र से कोयला तथा निकट ही चूना-पत्थर प्राप्त होता है। पूर्वी संयुक्त राज्य की सघन औद्योगिक जनसंख्या के कारण लोहा-इस्पात की माँग भी अधिक है। इस प्रदेश में लोहा-इस्पात उद्योग का विकास दो केन्द्रों पर अधिक हुआ है –

  1. पिट्सबर्ग क्षेत्र – यह विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक केन्द्र है। इस क्षेत्र के कारखाने ओहियो, अलघनी व मोनानधेला नदियों की घाटियों में स्थित हैं।
  2. यंग्सटाउन क्षेत्र – इस क्षेत्र के कारखाने महोनिंग व शैननगो नदियों की घाटियों में स्थित हैं। उत्तरी अप्लेशियन क्षेत्र के प्रमुख इस्पात केन्द्र पिट्सबर्ग, कारनेगी, एशलैण्ड, मिडिलटन, आयरटन, शैरोन पोर्ट्समाउथ व जॉन्सटन आदि हैं।

(ii) महान झील क्षेत्र – यह क्षेत्र सुपीरियर, मिशिगन व ईरी झीलों के मध्य स्थित है। यहाँ देश का 45% इस्पात तैयार किया जाता है। यहाँ इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण की निम्नलिखित सुविधाएँ प्राप्त हैं –

  1. सस्ते जल परिवहन द्वारा अप्लेशियन क्षेत्र से कोयला व झील क्षेत्र से लौह धातु आयात की जाती है।
  2. मिशिगन राज्य में चूना-पत्थर प्राप्त होता है।
  3. रेतीली अनुर्वर भूमि के कारण यहाँ कृषि अविकसित है किन्तु समतल व सस्ती भूमि कारखानों की स्थापना के लिए प्राप्त है।
  4. इस क्षेत्र में सघन औद्योगिक आबादी के कारण प्रचुर श्रमिक प्राप्त होते हैं।
  5. स्थानीय माँग व पूँजी भी उपलब्ध है। इस क्षेत्र को तीन उपक्षेत्रों में बाँटा जा सकता है –
    1. ईरी क्षेत्र – बफैलो से टोलैडो व डेट्रॉयड तक विस्तृत इस क्षेत्र में ईरी, बफैलो, डेट्रॉयड, लॉरेन, वारेन, टोलेडो, क्लीवलैण्ड आदि प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं। यहाँ इन्जीनियरिंग उद्योगों में इस्पांत की अधिक खपत होती है। यहाँ सुपीरियर झील क्षेत्र से लोहा व उत्तरी अप्लेशियन से कोयला प्राप्त होता है।
    2. मिशिगन क्षेत्र – यहाँ स्थानीय रूप से उत्तम लोहा व चूना तथा अप्लेशियन से कोयला प्राप्त होता है। शिकागो, गैरी, सेण्ट लुई व मिलावॉकी प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं।
    3. सुपीरियर झील क्षेत्र – मैसाबी श्रेणी से प्रचुर मात्रा में उत्तम लोहा, अप्लेशियन से कोयला तथा सस्ते जल परिवहन की सुविधाओं के कारण यहाँ इस्पात उद्योग विकसित है। डुलुथ व सुपीरियर प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं।

(iii) मध्य अटलांटिक क्षेत्र – यह क्षेत्र मैसाबुलेट्स से मैरीलैण्ड राज्य तक विस्तृत है। अधिकांश लौह धातु ब्राजील, स्पेन, वेनेजुएला व कनाडा से तथा कोयला अप्लेशियन क्षेत्र से मँगाया जाता है। चूना-पत्थर स्थानीय रूप से उपलब्ध होता है। तटीय स्थिति एवं समुद्री व्यापार की सुविधा के करण यहाँ इस्पात उद्योग विशेषतः विकसित हुआ है। वाशिंगटन से बोस्टन तक बाल्टीमोर, ट्रेन्टन, मॉरिसविले, स्पैरोपॉइन्ट, बेथलेहम, स्टीलटन, फिलोडेलफिया, वोरसेस्टर, वाटरबरी आदि अनेक इस्पात केन्द्र स्थापित हैं।

(iv) अलबामा क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार अलबामा राज्य में है। यहाँ कम्बरलैण्ड तथा दक्षिणी अलघनी पठार के भागों से बिटुमिनस कोयले के विशाल भण्डार पाये जाते हैं। लोहा व चूना भी निकट ही मिलते हैं। श्रमिक, भी यहाँ प्रचुर व सस्ते हैं। प्रमुख इस्पात केन्द्र बर्मिंघम, फ्लोरेन्स, शाटानुगा तथा वर्जीनिया हैं। बर्मिंघम “दक्षिण का पिट्सबर्ग” कहलाता है।

(v) पश्चिमी क्षेत्र – इस क्षेत्र में इस्पात उद्योग का विकास समिरिक दृष्टि से किया गया है। कोलोरेडो राज्य में– प्युबलो, ऊटाह में-जेनेवा तथा प्रशान्त तट पर– सानफ्रांसिस्को, लॉस एंजिल्स आदि प्रमुख केन्द्र हैं।

संयुक्त राज्य में इस्पात उद्योग का अत्यधिक विशेषीकरण हुआ है- जलयान निर्माण-न्यूयॉर्क, फिलाडेलफिया, बाल्टीमोर, न्यूपोर्ट तथा विलिंगटन में; मोटर गाड़ियाँ तथा वाहन-क्लीवलैण्ड, फिलाडेलफिया, डेट्रॉयड, इण्डियानापोलिस, कोनर्सविले, न्यूयॉर्क, टोलैडो तथा बफेलो में; रेल के इंजन एवं विद्युत मशीनरी-न्यूयॉर्क, फिलाडेलफिया, पिट्सबर्ग, शिकागो तथा मिलावॉकी में; कृषि उपकरण– शिकागो, इलिनोयस व मिनियापोलिस में तथा कपड़ा बुनने की मशीनरी– बोस्टन, वोरसेस्टर तथा फिलाडेलफिया में विकसित हैं।

(5) जर्मनी – इसका विश्व में लोहा-इस्पात उद्योग में छठा स्थान है। यहाँ लौह धातु, कोयला, उन्नत वैज्ञानिक, प्राविधिकी, औद्योगिक विकास के कारण लोहा-इस्पात की माँग, श्रमिक, परिवहन आदि की सुविधाएँ प्राप्त हैं। यहाँ लोहा-इस्पात निम्नलिखित क्षेत्रों में विकसित है

  1. रूर क्षेत्र – राइन नदी की निचली घाटी में स्थित इस क्षेत्र का विस्तार ड्यूसबर्ग से डार्टमण्ड तक है। यहाँ वेस्टफालिया क्षेत्र से उत्तम कोकिंग कोयला, रूर क्षेत्र के दक्षिण में सीजरलैण्ड, लानडिल, बेजिल्सबर्ग आदि से लौह धातु प्राप्त होती है। यहाँ उत्तम व सस्ते जलमार्गों द्वारा स्वीडन, लक्जमबर्ग, स्पेन तथा फ्रांस के लॉरेन क्षेत्र से लोहा आयात करने की सुविधाएँ प्राप्त हैं। बोखम, आकेन, एसेन, गैल्सन, किरचेन, ड्यूसबर्ग, डुसेलडोर्फ, सोलिंजन, मह्महीम डार्टमण्ड आदि प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं।
  2. साइलीशिया क्षेत्र – देश के पूर्वी भाग में इस क्षेत्र का विस्तार है। यहाँ कच्ची धातु आयात होती है, किन्तु कोयला पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। ड्रेस्डन, लिपजिग, चिमनीज आदि प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं।

(6) ग्रेट ब्रिटेन – लोहा-इस्पात उत्पादन में ब्रिटेन यूरोप महाद्वीप में चतुर्थ तथा विश्व में आठवें स्थान पर है। 1750 ई० तक यहाँ विश्व का 70% इस्पात उत्पादन होता था। अब यहाँ विश्व का केवल 3% इस्पात उत्पन्न किया जाता है। यहाँ लौह धातु सीमित मात्रा में उपलब्ध है; अतः इसे स्वीडन, स्पेन, अल्जीरिया, कनाडा आदि देशों से लौह धातु आयात करनी पड़ती है। अधिकांश कोयला क्षेत्रों में स्थित पत्तन ही इस्पात के प्रमुख केन्द्र हैं, क्योंकि विदेशी व्यापार की सुविधा उन्हें प्राप्त है।

(7) पोलैण्ड – अपर साइलीशिया कोयला क्षेत्र में इस्पात उद्योग विशेष विकसित है। यहाँ लौह धातु रूस, चेक एवं स्लोवाकिया तथा स्वीडन से आयात की जाती है। प्रमुख इस्पात केन्द्र-कैटोवाइस तथा बिटम हैं।
(8) बेल्जियम – ईसा के आरम्भ से ही यहाँ लीज नगर इस्पात बनाने के लिए विख्यात रहा है। यहाँ कोयला पर्याप्त मात्रा में प्राप्त है। लौह धातु फ्रांस, लक्जमबर्ग व स्वीडन से प्राप्त की जाती है। देश के प्रमुख इस्पात केन्द्र लीज, नामूर शालेराय, मोंज तथा वरवियर्स हैं।

(9) इटली – कोयले के अभाव तथा लोहे की कमी के बावजूद इस देश ने इस्पात उद्योग में भारी प्रगति की है। यहाँ जलविद्युत शक्ति का उपयोग अधिक किया जाता है। जर्मनी से कोकिंग कोयलां व स्वीडन से लौह धातु आयात की जाती है। स्क्रैप लोहे का भी प्रयोग होता है। औद्योगिक देश होने के कारण इस्पात की स्थानीय खपत अधिक है। प्रमुख इस्पात केन्द्र-जेनेवा, मिलान, ट्रिएस्ट, टर्की, लोम्बार्डी, लिगुरिया आदि हैं।

(10) भारत – एशियाई देशों में चीन व जापान के पश्चात् भारत तीसरा प्रमुख इस्पात उत्पादक देश है। यहाँ झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में यह उद्योग विकसित है; क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों में भारत का अधिकांश कोयला, लौह धातु, चूना व डोलोमाइट, धातुः शोधक पदार्थ व मैंगनीज तथा सिलिकन आदि प्राप्त होते हैं। प्रमुख इस्पात केन्द्र-जमशेदपुर, कुल्टी, हीरापुर, भद्रावती, भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर, बोकारो, सेलम, विशाखापट्टनम आदि हैं।
(11) कनाडा – यहाँ पर्याप्त कोयला, लौह धातु व जल प्राप्ति के कारण तीन प्रमुख क्षेत्रों में इस्पात उद्योग विकसित हुआ है-

  1. ओटेरिया झील के पश्चिमी भाग
  2. साल्टमेरी क्षेत्र व
  3. नोवास्कोशिया क्षेत्र। देश के प्रमुख इस्पात केन्द्र हैमिल्टन, पोर्ट कोलबोर्न, बेलैन्ड, साल्ट सिटी, सेण्टमैरी व सिडन हैं।

(12) ऑस्ट्रेलिया – आयरन नॉब के क्षेत्र में उत्तम लौह धातु परिवहन की सुविधाएँ, अधिक जनसंख्या के कारण श्रमिकों की सुविधाएँ प्राप्त हैं। कोयला व चूना-पत्थर आयात कर लिया जाता है। यहाँ के प्रमुख इस्पात केन्द्र-न्यूकैसिल, लिथगो, पोर्टकैम्बला, बाइला, क्वीनाना हैं।

(13) दक्षिणी अफ्रीका गणतन्त्र – यहाँ लोहा वे कोयला पर्याप्त मात्रा में मिलता है किन्तु स्थानीय माँग अधिक नहीं है। ट्रांसवाल में प्रिटोरिया वे वैरीनीसींग तथा नैटाल में न्यूकैसिल प्रमुख इस्पात केन्द्र हैं।
(14) ब्राजील – दक्षिणी अमेरिकी देशों में ब्राजील में लोहा-इस्पात उद्योग सर्वाधिक विकसित हुआ है। सबसे बड़ा इस्पात केन्द्र पराइबो नदी-घाटी में वोल्टा रेडोण्डा स्थान पर है। लघु इस्पात केन्द्र मिनासगिरेस तथा साओपॉलो राज्यों में स्थित हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार International Trade
आधारभूत उद्योग होने के कारण लौह-इस्पात का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार काफी महत्त्वपूर्ण है। तैयार माल के प्रमुख निर्यातक देश जापान, पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य व इटली हैं।
अफ्रीकी, पश्चिमी व दक्षिणी-पूर्वी एशियाई व दक्षिणी अमेरिकी देश प्रमुख आयातक हैं।

प्रश्न 2
विश्व में कोयले के उत्पादन, वितरण तथा आर्थिक महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए।
या
विश्व में कोयला संसाधनों का वर्णन कीजिए तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के तीन प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्रों का विवरण दीजिए। [2011]
या
संसार में कोयले के प्रमुख उत्पादक देशों के नाम बताइए तथा किसी एक देश में उसके वितरण एवं उत्पादन का वर्णन कीजिए। [2009, 10]
या
विश्व के किन्हीं दो देशों में कोयले के उत्पादन व वितरण का वर्णन कीजिए। [2008]
या
विश्व में कोयले का वितरण एवं उत्पादन का वर्णन कीजिए। [2013, 14, 15]
या
विश्व के प्रमुख कोयला उत्पादक देशों का विवरण दीजिए। [2011]
उत्तर

कोयले का महत्त्व Importance of Coal

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में विश्व की औद्योगिक शक्ति का 90% भाग कोयले पर आधारित था। द्वितीय महायुद्ध से पूर्व विश्व की समस्त यान्त्रिक शक्ति का दो-तिहाई भाग कोयले से प्राप्त होता था। कोयले को ही आधार बनाकर ब्रिटेन ने उन्नीसवीं शताब्दी में औद्योगिक प्रमुखता प्राप्त की थी। कोयले का ही उपयोग कर बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत संघ ने औद्योगिक एवं व्यापारिक प्रमुखता प्राप्त की है। चीन एवं भारत की औद्योगिक प्रगति का आधार भी कोयला ही रहा है। वर्तमान समय में भी विश्व की 40% शक्ति कोयले से ही प्राप्त होती है, जब कि अब जेल-विद्युत के उपयोग पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जलविद्युत एवं अणु शक्ति के प्रयोग से कोयले का उपभोग वर्तमान समय में कम होता जा रहा है, फिर भी दो उद्योग ऐसे हैं जिनमें कोयला ही प्रधान है-

  1. लोहा एवं इस्पात तथा
  2. ताप-विद्युत उत्पादन में।

अतः ऐसी आशा की जाती है कि भविष्य में भी लम्बे समय तक कोयले द्वारा ही शक्ति प्राप्त की जाती रहेगी।

कोयले की उत्पत्ति Origin of Coal

कोयला, भूपटल की अवसादी शैलों से प्राप्त होता है। इसमें कुछ गैसें; जैसे-ऑक्सीजन, हाइड्रोजन एवं नाइट्रोजन तथा कुछ अन्य पदार्थ भी मिले होते हैं। प्राचीन युग में भूतल के विभिन्न भागों में दलदली वन छाये हुए थे जो भूगर्भीय हलचलों के कारण भूमि के नीचे दब गये। दबाव की प्रक्रिया के कारण यह दलदली वनस्पति कालान्तर में कोयले में परिणत हो गयी। करोड़ों वर्षों बाद बहुत-से क्षेत्रों में भूपटल में उत्थानिक क्रियाएँ होने के कारण कोयले की परतें ऊपरी सतह पर आ गयीं। इस प्रकार भूगर्भ में कोयला-निर्माण की प्रक्रिया के दो काल हैं –

  1. कार्बोनीफेरस युग एवं
  2. टर्शियरी युग।

विश्व में तीन-चौथाई से भी अधिक कोयला कार्बोनीफेरस युग का है। भारत में लगभग 98% कोयला गोण्डवाना युग (कार्बोनीफेरस युग का समकालीन) का मिलता है।

कोयले के प्रकार Types of Coal

कोयले में कार्बन की मात्रा तथा उसकी ऊर्जा-क्षमता के आधार पर उसे निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है –
(1) एन्थ्रासाइट (Anthracite) – यह कोयला सर्वोत्तम, अति कठोर, चमकदार, स्वच्छ एवं रवेदार होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 90 से 95% तक होती है। वाष्प की मात्रा बहुत ही कम होती है; अतः जलने पर धुआँ नहीं के बराबर देता है तथा ताप बहुत अधिक देता है। विश्व में एन्थ्रासाइट के भण्डारे कुछ सीमित क्षेत्रों में हैं जिनमें संयुक्त राज्य का पेंसिलवानिया, ग्रेट ब्रिटेन का दक्षिण वेल्स क्षेत्र, रूस, जर्मनी, बेल्जियम तथा चीन प्रमुख हैं।

(2) बिटुमिनस (Biturminus) – इस कोयले में कार्बन की मात्रा 70 से 90% तक होती है। इसका रंग काला, चमकदार एवं हाथ काला करने वाला होता है। इसमें वाष्पशील तत्त्वों की मात्रा अधिक होती है; अतः जलने पर धुआँ देता है। कोलतार निकलने के कारण इसे बिटुमिनस कहा जाता है। विश्व में इस कोयले के भण्डार संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन, चीन, पोलैण्ड आदि देशों में पाये जाते हैं।

(3) लिग्नाइट (Ligmite) – इसे भूरा कोयला भी कहते हैं जिसमें कार्बन की मात्रा 45 से 70% तक होती है। यह जलने में अपेक्षाकृत अधिक धुआँ छोड़ता है तथा इसमें राख भी अधिक होती है। यह नवीन युग का कोयला है जिसमें वनस्पति अंशों की प्रधानता होती है। इसका उपयोग स्टीम बनाने तथा ताप-विद्युत के उत्पादन में किया जाता है। रूस तथा जर्मनी में इसके विशाल भण्डार हैं। चेकोस्लोवाकिया, हंगरी एवं भारत में भी लिग्नाइट की खाने पायी जाती हैं।

(4) पीट (Peat) – मौलिक वनस्पति से थोड़ा भिन्न यह कोयला सबसे नवीन युग का है। इसमें कार्बन की मात्रा 35 से 45% तक होती है। यह प्रायः लकड़ी की भाँति ही जलता है तथा जलने में बहुत अधिक धुआँ देता है। इसका अधिकांश उपयोग घरों में जलाने के लिए किया जाता है। इससे ताप-विद्युत अधिक बनायी जाती है। इसके अधिकांश भण्डार रूस, नार्वे, स्वीडन, पोलैण्ड, जर्मनी आदि देशों में हैं।

विश्व में कोयले की संचित राशि – विश्व में कोयले के संचित भण्डार रूस, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन तथा अन्य यूरोपीय देशों में हैं। भारत, कनाडा, दक्षिणी अफ्रीका तथा ऑस्ट्रेलिया में अपनी आवश्यकता के लिए पर्याप्त कोयले के भण्डार सुरक्षित हैं।

कोयले का विश्व वितरण
World Distribution of Coal

विश्व के प्रमुख कोयला उत्पादक देश निम्नलिखित हैं –
(1) संयुक्त राज्य अमेरिका – विश्व में कोयले की संचित राशि के दृष्टिकोण से संयुक्त राज्य अमेरिका, क्षीसरा स्थान रखता है, परन्तु वार्षिक उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। यहाँ विश्व का 28.5% कोयले का उत्पादन किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में कोयले के प्रमुख भण्डार अप्लेशियन के पश्चिम एवं झीलों के दक्षिण में स्थित हैं, जो औद्योगिक निर्माण केन्द्रों के समीप पड़ते हैं। इन्हीं के समीपवर्ती क्षेत्रों में संयुक्त राज्य अमेरिका की 70% जनसंख्या निवास करती है। कोयला उत्पादन के मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

  1. अप्लेशियन कोयला क्षेत्र – संयुक्त राज्य अमेरिका का यह प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र है। इस कोयला क्षेत्र के तीन उपक्षेत्र हैं, जो निम्नानुसार हैं –
    1. उत्तरी अप्लेशियन कोयला क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार पेंसिलवेनिया राज्य में है। यहाँ एन्थ्रासाइट और बिटुमिनस प्रकार का कोयला प्राप्त होता है।
    2. मध्य अप्लेशियन कोयला क्षेत्र – उत्तरी अप्लेशियन कोयला क्षेत्र के 800 किलोमीटर दक्षिण में यह कोयला क्षेत्र पश्चिमी वर्जीनिया राज्य में स्थित है। इस राज्य में 75 प्रतिशत धरातल के नीचे कोयले की परतें पायी जाती हैं।
    3. दक्षिणी अप्लेशियन कोयला क्षेत्र अथवा अलबामा क्षेत्र – अलबामा राज्य में बर्मिंघम के निकट कोयले की खाने हैं। यहाँ प्रत्येक वर्ष लगभग 270 लाख टन कोयला निकाला जाता है।
  2. अन्तर्रदेशीय कोयला क्षेत्र – संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य भाग में मिसौरी और मिसीसिपी नदियों की घाटी में कोयले के प्रचुर भण्डार हैं। कन्सास, मिसौरी, इण्डियाना, इलिनायस राज्यों में कोयले की खाने हैं।
  3. उत्तरी मैदान का कोयला क्षेत्र – कनाडा की सीमा के निकट कोयला निकाला जाता है।
  4. रॉकी पर्वत कोयला क्षेत्र – रॉकी पर्वत के पूर्वी ढालों पर कोयले की खानें स्थित हैं।
  5. खाड़ी तटीय कोयला क्षेत्र – दक्षिणी अलबामा से टेक्सास राज्य तक खाड़ी तट के सहारे लिग्नाइट किस्म का कोयला निकाला जाता है।
  6. प्रशान्त तटीय कोयला क्षेत्र – लिग्नाइट किस्म का कोयला वाशिंगटन राज्य में निकाला जाता है।

(2) भारत – एशिया महाद्वीप के कोयला भण्डारों में भारत का दूसरा स्थान है। यहाँ अधिकांश कोयला बिटुमिनस प्रकार का है। भूगर्भवेत्ताओं के एक अनुमानानुसार भारत में 600 मीटर की गहराई तक कोयले की संचित राशि लगभग 17,633 करोड़ मीटरी टन है, जब कि सामान्यतया 13,800 करोड़ मीटरी टन के भण्डार अनुमानित किये गये हैं। विश्व में भारत का कोयला उत्पादन में चौथा स्थान है। यहाँ विश्व का 8% से अधिक कोयला उत्पादन होता है। यहाँ निम्नलिखित दो कोयला पेटियाँ हैं –

  1. गोण्डवाना कोयला क्षेत्र – इस क्षेत्र में भारत के बिटुमिनस कोयले के 98.5% भण्डार हैं, जो बिहार, प० बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश की नदियों के बेसिनों में स्थित हैं।
  2. टर्शियरी कोयला क्षेत्र – असम, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर एवं तमिलनाडु में लिग्नाइट कोयला निकाला जाता है, जो कुल उत्पादन का 1.5% भाग है।

(3) चीन – चीन में कोयले के विशाल भण्डार विद्यमान हैं तथा उसका विश्व कोयला-उत्पादन में तीसरा स्थान है। यहाँ 27.5% कोयले का उत्पादन किया जाता है। चीन में 30 से भी अधिक स्थानों से कोयला निकाला जाता है। ह्वांगहो तथा यांगटिसीक्यांग नदियों के बेसिन मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं। प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं –

  1. शांसी क्षेत्र या लोयस उच्च प्रदेश
  2. शैन्सी क्षेत्र
  3. जेचवान बेसिन
  4. कांसू क्षेत्र
  5. मंचूरिया को आन्हेई प्रान्त
  6. शाटुंग प्रायद्वीपीय क्षेत्र
  7. होनान प्रान्त एवं
  8. होपे क्षेत्र।

(4) रूस – इस देश के कोयला भण्डारों का लगभग 90% भाग एशियाई रूस में स्थित है। वर्तमान समय में यूरोपीय रूस तथा मध्य एशिया की खाने उत्पादन में मुख्य स्थान रखती हैं। विश्व के कोयला उत्पादन में इसका छठा स्थान है तथा यहाँ विश्व का 4.4% कोयले का उत्पादन होता है। यहाँ लगमा 80 स्थानों से कोयले का खनन किया जाता है, परन्तु निम्नलिखित क्षेत्र उत्पादन में प्रमुख स्थान रखते हैं –

  1. डोनबास
  2. कुजबास
  3. यूराल
  4. मास्को-तुला
  5. इटस्क या बैकाल झील
  6. बुर्रिस्क
  7. कारागण्डा
  8. मध्य एशिया या फरगना बेसिन
  9. बुरेइन्स्क या आमूर बेसिन
  10. कान्स्क
  11. पैचोरा
  12. टुंगस्का या टुंगस
  13. नीना या याकूतिया
  14. कोलिमा एवं
  15. काकेशस।

(5) जर्मनी – जर्मनी के पूर्व में कोयले के भण्डार सेक्सोनी, रूर एवं सार की खानों में हैं, जहाँ बिटुमिनस कोयला निकाला जाता है। यहाँ की प्रमुख खाने हल्ले, मेगडेनबर्ग तथा लिपजिग की निम्न भूमि में स्थित हैं। साइलेशिया क्षेत्र से भी कोयला प्राप्त किया जाता है। इस क्षेत्र में 20 करोड़ टन वार्षिक से भी अधिक कोयला उत्पन्न किया जाता है।

(6) ग्रेट ब्रिटेन – ब्रिटेन में उन्नीसवीं शताब्दी का औद्योगिक आधार कोयला ही था। यहाँ पर उत्तम किस्म का बिटुमिनस कोयला निकाला जाता है। औद्योगिक केन्द्र भी कोयला क्षेत्रों के निकट स्थापित हुए हैं। उदाहरण के लिए, लंकाशायर क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग, यार्कशायर में ऊनी वस्त्रे तथा डर्बीशायर में लौह-इस्पात उद्योग। ब्रिटेन में कोयला उत्पादन के क्षेत्र प्रमुख हैं –

  1. लंकाशीयर
  2. यार्कशायर
  3. डर्बीशायर
  4. नार्थम्बरलैण्ड
  5. डरहम
  6. मिडलैण्ड्स
  7. उत्तरी वेल्स
  8. दक्षिणी वेल्स
  9. ब्रिस्टल
  10. कम्बरलैण्ड
  11. कैंट एवं
  12. स्कॉटलैण्ड की घाटी।

किन्तु अब ग्रेट ब्रिटेन का विश्व के कोयला उत्पादकों में बारहवाँ स्थान है। यहाँ विश्व का 1.1% कोयले का उत्पादन होता है।

(7) अन्य यूरोपीय देश – यूरोप महाद्वीप में कोयला उत्पादक अन्य देश निम्नलिखित हैं –

  1. चेक एवं स्लोवाकिया (पिलजेन तथा दक्षिणी साइलेशिया)
  2. बुल्गारिया
  3. यूगोस्लाविया
  4. हंगरी
  5. रोमानिया एवं
  6. उत्तरी स्पेन।

(8) अन्य देश – अन्य उत्पादक देशों में जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका संघ, रोडेशिया, नाइजीरिया तथा अल्जीरिया प्रमुख हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – अधिक भारी होने के कारण विश्व के कुल कोयला उत्पादन का 10% भाग ही व्यापार में प्रयुक्त किया जाता है।
निर्यातक देश – संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, पोलैण्ड एवं ऑस्ट्रेलिया।
आयातक देश – जापान, कनाडा, डेनमार्क, इटली, नीदरलैण्ड्स, फ्रांस, स्पेन, नार्वे, बेल्जियम, भारत एवं अर्जेण्टाइना।

कोयले का संरक्षण
Conservation of Coal

वर्तमान समय में कोयला महत्त्वपूर्ण शक्ति या ऊर्जा का स्रोत है। यह खनिज शक्ति स्रोत क्षयी संसाधन है। यदि वर्तमान क्षमता से कोयले का उपयोग होता रहा तो सभी कोयले के क्षेत्र 200 वर्षों में समाप्त हो जाएँगे और विश्व के समक्ष एक जटिल समस्या उत्पन्न हो जाएगी, जब कि वास्तविक स्थिति यह है कि कोयले का उत्पादन प्रतिवर्ष 7.5 से 10% बढ़ रहा है।

अत: यह आवश्यक है कि कोयला उत्पादन, उपयोग एवं संरक्षण के लिए एक सन्तुलन स्थापित किया जाए और उसकी सुरक्षा की जाए। औद्योगिक प्रगति को निरन्तर बनाये रखने के लिए खनन विधियों में निरन्तर सुधार, कोयले की खानों में लगी आग पर नियन्त्रण, घटिया किस्म के कोयले की अधिकतम धातु-शोषण एवं अन्य उद्योगों में उपयोग, कोयले के स्थानापन्न के रूप में जल-विद्युत, आणविक ऊर्जा और सौर आदि के उपयोग को बढ़ावा देने के प्रयास तेजी से क्रियान्वित किये जाने चाहिए।

प्रश्न 3
विश्व में खनिज तेल उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों की विवेचना कीजिए। उसके महत्त्व तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को भी बताइए। (2007, 10)
या
दक्षिणी-पश्चिमी एशिया में खनिज तेल के वितरण एवं उत्पादन का वर्णन कीजिए। [2008, 09, 16]
या
एशिया में पेट्रोलियम के वितरण, उत्पादन एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का वर्णन कीजिए। [2008]
या
विश्व में खनिज तेल के वितरण एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2009]
या
खनिज तेल के उत्पादन, वितरण तथा विश्व व्यापार की विवेचना कीजिए। [2014]
या
विश्व में पेट्रोलियम के वितरण एवं उत्पादन का विवरण दीजिए। [2011, 12, 13, 14, 16]
उत्तर

खनिज तेल का महत्त्व Importance of Mineral Oil

ऊर्जा के संसाधनों में खनिज तेल का महत्त्व सर्वाधिक व्यापक है। कोयले की अपेक्षा इसमें ताप-शक्ति कई गुना अधिक होती है। युद्ध काल में खनिज तेल का महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। खनिज तेल का उपयोग निम्नलिखित कार्यों में किया जाता है –

  1. खनिज तेल ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  2. कारखानों एवं मिलों में इंजनों को चलाने के लिए, भट्टियों को ताप-शक्ति देने के लिए तथा ताप-विद्युत के उत्पादन में खनिज तेल प्रयोग किया जाता है।
  3. मोटरगाड़ियों, रेलगाड़ियों, जलयानों एवं वायुयानों को चलाने के लिए खनिज तेल शक्तिसंसाधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  4. तेज गति से चलने वाली मशीनों के पुर्षों की ग्रीसिंग करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
  5. कुछ रासायनिक उद्योगों में खनिज तेल कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इससे निम्नलिखित प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है –
    1. कृत्रिम रबड़-टायर, ट्यूब, बैल्ट आदि
    2. अनेक प्रकार के कृत्रिम रेशों का निर्माण
    3. कृषि के लिए रासायनिक उर्वरकों का निर्माण
    4. विभिन्न प्रकार के अन्य चिकने तेलों का निर्माण तथा
    5. ओषधियों का निर्माण।

विश्व में खनिज तेल की संचित मात्रा एवं उत्पादन
Reserve Quantity and Production of Mineral Oil in the World

1. संचित मात्रा – विश्व में खनिज तेल के ज्ञात भण्डार सर्वाधिक फारस की खाड़ी के समीपवर्ती अर्थात् पश्चिमी एशियाई देशों में हैं, जिसे ‘मध्य-पूर्व’ (Middle-East) के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ विश्व की 60% खनिज तेल की संचित राशि है। इसके समीप में ही रूस के तेल-भण्डार स्थित हैं। इस प्रकार कैस्पियन सागर, काला सागर, लाल सागर एवं फारस की खाड़ी से घिरा यह क्षेत्र विश्व के खनिज तेल भण्डार का सबसे प्रमुख क्षेत्र है। अन्य बड़े भण्डारों में संयुक्त राज्य, कैरेबियन सागरीय प्रदेश तथा उत्तरी अफ्रीका के अल्जीरिया एवं लीबिया देश हैं। इण्डोनेशिया, चीन, भारत, जापान, म्यांमार तथा ऑस्ट्रेलिया में भी तेल के छोटे-छोटे भण्डार विस्तृत हैं।

2. वार्षिक उत्पादन – विश्व के पेट्रोलियम उत्पादकों में सऊदी अरब, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ईरान, चीन, मैक्सिको, वेनेजुएला, नावें, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कनाडा आदि क्रमशः स्थान रखते हैं। तेल के प्रमुख उत्पादक देशों का विवरण निम्नलिखित है –

मध्य-पूर्व एशिया के देश
Mid-East Asian Countries

खनिज तेल के उत्पादन ने फारस की खाड़ी के मरुस्थली एवं निर्धन देशों को सुखी एवं धनी बना दिया है। कुवैत का 100%, सऊदी अरब का 99%, ईरान का 85% तथा इराक का 90% निर्यात; खनिज तेल एवं उससे निर्मित पदार्थों पर आधारित है तथा अर्थव्यवस्था को प्रमुख आधार है। प्रमुख उत्पादक देश निम्नलिखित हैं –

(1) सऊदी अरब – खनिज तेल के ज्ञात भण्डारों में सऊदी अरब का विश्व में दूसरा स्थान है। तथा उत्पादन में प्रथम स्थान है। यहाँ विश्व का 13.28% पेट्रोलियम उत्पादन होता है। प्रमुख तेल-क्षेत्रों में धहरान, दम्माम, अबक्वैक, आइनेदार, कातिफ एवं घवर हैं, जो 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत हैं। यहाँ का तेल रासतनूरा शोधनशाला में साफ किया जाता है तथा वहाँ से 1,700 किमी लम्बी पाइप लाइन द्वारा भूमध्यसागरीय तट पर स्थित लेबनान के पत्तन सिदोन को भेज दिया जाता है। तेल का उत्पादन अरब-अमेरिकन कम्पनियाँ करती हैं।

(2) ईरान-मध्य – पूर्व का सर्वप्रथम तेल-क्षेत्र 1904 ई० में ईरान में खोजा गया था। यह क्षेत्र फारस की खाड़ी के उत्तर में 600 किमी की दूरी पर स्थित है। सर्वप्रथम 1908 ई० में एंग्लो-ईरानियन कम्पनी ने तेल उत्पादन का कार्य आरम्भ किया था। मस्जिदे-सुलेमान तेल उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र है। अन्य क्षेत्रों में नफ्तेशाह, कर्मनशाह, लाली, गाचसरन, कुम, हफ्तकेल, आगाजरी, नफ्दसफीद एवं खानकिन मुख्य हैं। अबादान एवं कर्मनशाह यहाँ की प्रमुख शोधनशालाएँ हैं। अबादान में विश्व की सबसे बड़ी शोधनाला है। ईरान विश्व का चौथा बड़ा तेल उत्पादक देश है। यहाँ विश्व का 4.77% पेट्रोलियम उत्पादन होता है।

(3) इराक – इराक के प्रमुख तेल-क्षेत्र उत्तरी भाग में 112 किमी लम्बी पेटी में किरकुक तथा मोसुल के समीपवर्ती भागों-किरकुक, नफ्तखान, बुटमाह, बसरा, जुबैर एवं रूमाइला- में हैं। यहाँ के तेल को पाइप लाइन द्वारा त्रिपोली (लेबनान) एवं बनियास (सीरिया) को भेजा जाता है। दक्षिण में जुबैर क्षेत्र से पाइप लाइन द्वारा तेल फारस की खाड़ी पर स्थित फाओ पत्तन को भेज दिया जाता है जहाँ से तेल का विदेशों को निर्यात किया जाता है। यहाँ विश्व का 3.75% पेट्रोलियम उत्पादन होता है।

(4) संयुक्त अरब अमीरात – इस तटीय पेटी में तेल का वार्षिक उत्पादन लगभग 10 करोड़ मीटरी टन है जो विश्व के उत्पादन का 3.32% है।
(5) कुवैत – कुवैत एक छोटा-सा देश है, परन्तु यहाँ विश्व का तीसरा प्रमुख तेल भण्डार है। यहाँ विश्व का 2.96% पेट्रोलियम उत्पादन होता है। यहाँ से तेल का उत्पादन सन् 1946 से प्रारम्भ किया गया था। प्रमुख उत्पादक क्षेत्र बुरघान, अलअहमदी, सर्विया तथा गिनागिश हैं। अलअहमदी में तेल-शोधनशाला स्थापित की गयी है। कुवैत पत्तन से तेल का निर्यात किया जाता है।

(6) ओमान – ओमान में ट्रशियल का वार्षिक उत्पादन लगभग 3 करोड़ मीटरी टन तथा न्यूट्रल जोन का वार्षिक उत्पादन 25 करोड़ मीटरी टन है।
(7) बहरीन दीप – यहाँ तेल का उत्पादन 1934 ई० से प्रारम्भ किया गया था तथा इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 1 करोड़ मीटरी टन है।
(8) कतर – यहाँ पर तेल का उत्पादन 1948 ई० से प्रारम्भ किया गया था। इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 1 करोड़ मीटरी टन है।
(9) संयुक्त अरब गणराज्य (मिस्र) – मिस्र में लाल सागर तटीय पेटी में हुरघदा एवं रास-गरीब प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। इनका वार्षिक उत्पादन 4.6 करोड़ मीटरी टन है। तेल का शोधन स्वेज पत्तन की शोधनशाला में किया जाता है।

रूस Russia

रूस विश्व का दूसरा प्रमुख तेल उत्पादक देश है। यहाँ 30 करोड़ मीटरी टन वार्षिक उत्पादन होता है, जो विश्व के कुल उत्पादन का 12.65% है। रूस में अवसादी शैलों का विस्तार काकेशस प्रदेश से आर्कटिक सागर तक है। यहाँ पर प्रमुख तेल-क्षेत्र निम्नलिखित हैं –
1. वोल्गा-यूराल क्षेत्र – सन् 1950 के बाद से इस क्षेत्र का तेल उत्पादन में प्रथम स्थान है। रूस के तेल उत्पादन का 75% इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है। मास्को के पूर्व में इस तेल-क्षेत्र का विस्तार वोल्गा नदी एवं यूराल पर्वत के मध्य में है। इस क्षेत्र को द्वितीय बाकू के नाम से पुकारा जाता है। पर्म, उफा तथा कुईबाईशेव इस क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक केन्द्र हैं। देश के अधिकांश क्षेत्र को तेल की आपूर्ति इसी क्षेत्र से की जाती है। यहाँ से 3,700 किमी लम्बी पाइप लाइन इटस्क को तेल ले जाती है जो विश्व की सबसे लम्बी पाइप लाइन है।

2. बाकू क्षेत्र – इसे काकेशस तेल-क्षेत्र भी कहते हैं। बाकू, माकचकाला, ग्रोझनी, माइकोप, रकूशा एवं कौसाहागिल प्रमुख तेल उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ से पाइप लाइन द्वारा तेल बातूम, तुआपसे, त्रुदोक्या. एवं ओर्क शोधनकेन्द्रों को भेजा जाता है। सन् 1950 से पहले इसका उत्पादन में प्रथम स्थान था जो इस समय द्वितीय स्थान पर आ गया है।

3. अन्य क्षेत्र – अन्य मुख्य क्षेत्र इस प्रकार हैं-

  1. ऐम्बा क्षेत्र
  2. पश्चिमी तुर्कमान क्षेत्र (नेबितदाग, कुमदाग, चेलेकिन आदि)
  3. मैंगिशलाक प्रायद्वीप
  4. बोरिस्लाव
  5. सखालीन द्वीप
  6. पेचोरा क्षेत्र
  7. फरगना घाटी क्षेत्र एवं
  8. पश्चिमी साइबेरिया में ओबे और यनीसी नदियों के बेसिन (भण्डारों का निर्धारण अभी तक नहीं हो पाया है)।

रूस अपनी आवश्यकता को पूरा करने के बाद पूर्वी यूरोप के मित्रराष्ट्रों को खनिज तेल निर्यात कर रहा है। वार्षिक उत्पादन के विचार से इसका विश्व में तीसरा स्थान है।

संयुक्त राज्य अमेरिका
United State of America

खनिज तेल के उत्पादन में संयुक्त राज्य का विश्व में तीसरा स्थान है। यहाँ तेल का वार्षिक उत्पादन लगभग 32 करोड़ मीटरी टन है जो विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 10.74% है। तेल के उत्पादन में अग्रलिखित क्षेत्र मुख्य स्थान रखते हैं –

  1. टेक्सास क्षेत्र – इसके अन्तर्गत टेक्सास, दे०-१० अरकन्सास एवं प० लुजियानी राज्य सम्मिलित हैं। टेक्सास एवं मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र, दोनों मिलकर संयुक्त राज्य का 60% खनिज तेल उत्पन्न करते हैं।
  2. गल्फतटीय क्षेत्र – इस क्षेत्र में लुजियाना, मिसीसिपी, टेक्सास, अलबामा तथा फ्लोरिडा राज्यों के भाग सम्मिलित हैं। तेल के उत्पादन में यह दूसरा स्थान रखता है।
  3. कैलीफोर्निया क्षेत्र – यह तेल के उत्पादन का तीसरा प्रमुख क्षेत्र है। हंटिंगटने-बीच, लौंग-बीच, सान्ताफे-स्प्रिंग्स प्रमुख उत्पादक केन्द्र हैं।
  4. मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार पश्चिमी टेक्सास, ओक्लोहामा एवं द०-पू० कन्सास राज्यों में है।
  5. इण्डियाना तेल-क्षेत्र – दक्षिणी इलीनॉयस एवं दक्षिणी इण्डियाना राज्यों में विस्तृत यह तेल क्षेत्र संयुक्त राज्य का 5% तेल उत्पन्न करता है।
  6. रॉकी तेल-क्षेत्र – यहाँ पर केवल 3% खनिज तेल का उत्पादन होता है। यह औद्योगिक केन्द्रों से दूर पड़ने के कारण विकसित नहीं हो पाया है। भविष्य में यहाँ तेल के बड़े भण्डार मिलने की सम्भावना व्यक्त की गयी है।
  7. अप्लेशियन तेल-क्षेत्र – प्रारम्भ में इसी तेल-क्षेत्र का विकास किया गया था। अधिक शोषण कर लिये जाने के कारण इसका तेल समाप्ति की ओर अग्रसर है। यहाँ केवल 1% तेल का उत्पादन ही होता है।

अन्य देशों में खनिज तेल का उत्पादन
Production of Mineral Oil in Other Countries

इण्डोनेशिया – इण्डोनेशिया के प्रमुख उत्पादक सुमात्रा, बोर्नियो, जावा एवं सारावक द्वीप हैं। कुछ तेल सेलेबीज द्वीप से भी निकाला जाता है। इसकी विशेष सुविधा यह है कि यह दक्षिण-पूर्वी एशिया के सघन जनसंख्या वाले देशों-भारत, जापान, बांग्लादेश आदि के समीप स्थित है, जहाँ तेल की माँग अधिक है।
चीन – विश्व के तेल उत्पादन में चीन का पाँचवाँ स्थान है, जहाँ विश्व का 4.56% तेल उत्पन्न किया जाता है। चीन में तेल के प्रमुख भण्डार निम्नलिखित हैं –

  1. कान्सू
  2. जंगेरिया
  3. जेचवान बेसिन
  4. सैदाम बेसिन
  5. यूमेन
  6. औंसी तथा
  7. कारामाई।

भारत – भारत के खनिज तेल-क्षेत्रों का विवरण निम्नलिखित है –
(अ) असम में लखीमपुर क्षेत्र

  1. डिगबोई (माकूम क्षेत्र)
  2. नांहर-कटिया
  3. रीजन-मोरेन
  4. बप्पापयॉग एवं
  5. हस्सापाँग क्षेत्र।

(ब) असम में सुरमा घाटी क्षेत्र

  1. बदरपुर
  2. मसीमपुर एवं
  3. पथरिया क्षेत्र।

(स) गुजरात

  1. खम्भात की खाड़ी में लुनेज क्षेत्र,
  2. अंकलेश्वर क्षेत्र एवं
  3. कलोल क्षेत्र।

(द) बॉम्बे हाई तेल-क्षेत्र (अरब सागर में)।
(य) तमिलनाडु के समीप पुदुचेरी तेल-क्षेत्र।
(र) पंजाब का ज्वालामुखी-क्षेत्र।

भारत में भू – वैज्ञानिकों द्वारा नये तेल-क्षेत्रों की खोज का कार्य किया जा रहा है। विशेष रूप से कच्छ के प्रायद्वीपीय क्षेत्र, कोरोमण्डल, पश्चिम बंगाल एवं नदियों की घाटियों में तेल मिलने की सम्भावनाएँ व्यक्त की गयी हैं।
म्यांमार – इस देश में इरावदी नदी की घाटी में तेल के भण्डार पाये जाते हैं। पेनांगयांग, सिंगू, येनांगयात एवं अक्याब प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

खनिज तेल का विश्व-व्यापार
World Trade of Mineral Oil

खनिज तेल का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि इसका उत्पादन कुछ सीमित देशों द्वारा किया जाता है, जब कि उपभोग लगभग सभी देशों द्वारा किया जाता है।
आयातक देश – तेल के प्रमुख आयातक विकसित देशों में सं० रा० अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैण्ड, ऑस्ट्रिया, इटली, चीन, जापान, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, कोरिया, वियतनाम, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी एवं मध्य अफ्रीकी देश प्रमुख हैं।
निर्यातक देश – तेल के प्रमुख निर्यातक देश सऊदी अरब, रूस, ईरान, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, ओमान, वेनेजुएला, कोलम्बिया, लीबिया, अफ्रीका एवं इण्डोनेशिया हैं।
प० यूरोप में ब्रिटेन, नीदरलैण्ड आदि देश कच्चे तेल का आयात कर और उसे अपनी शोधनशालाओं में साफ कर पेट्रोलियम पदार्थ विदेशों को निर्यात करते हैं।

प्रश्न 4
जल-विद्युत शक्ति के उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का वर्णन कीजिए तथा विश्व में इसके उत्पादन पर प्रकाश डालिए।
या
विश्व के किसी एक प्रमुख देश में जल-विद्युत के महत्त्व और उत्पादन का वर्णन कीजिए।
उत्तर

जल-विद्युत का महत्त्व
Importance of Hydro-electricity

जल-विद्युत शक्ति को ऊर्जा का अक्षय स्रोत माना जाता है। जब तक धरातल पर नदियाँ प्रवाहित होती रहेंगी, तब तक अनवरत गति से जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन होता रहेगा। वास्तव में वर्तमान समय में जल-विद्युत शक्ति किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास एवं प्रगति का द्योतक है। अन्य शक्ति के संसाधनों की अपेक्षा यह शक्ति अधिक सस्ती एवं सुगम पड़ती है, क्योंकि इसके उत्पादन के लिए एक ही बार व्यय करना पड़ता है। इसके बाद अनवरत गति से उत्पादन प्राप्त होता रहता है। इसे दूरवर्ती उपभोक्ता केन्द्रों तक तारों की सहायता से सुगमतापूर्वक भेजा जा सकता है।

जल-विद्युत शक्ति उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ
Necessary Geographical Conditions for Producing Hydro-electricity

(अ) भौतिक दशाएँ Physical Conditions

  1. जलप्रपातयुक्त धरातलीय बनावट – प्राकृतिक जलप्रपात, कृत्रिम प्रपातों की अपेक्षा जल-शक्ति के लिए उत्पादन के अधिक अनुकूल होते हैं। इसकी सहायता से बहता हुआ जल ऊँचाई से गिरक़र अपने धक्के से टरबाइन को घुमाता रहता है। अतः प्रपातों की ऊँचाई जितनी अधिक होगी, उतनी ही अधिक मात्रा में शक्ति का उत्पादन सम्भव होगा।
  2. अत्यधिक वर्षा का होना – नदियों के उद्गम क्षेत्रों में भारी वर्षा होनी अति आवश्यक है, जिससे नदियों में पर्याप्त मात्रा में जल सतत रूप से प्रवाहित होता रहे।
  3. जल की समान मात्रा का प्रवाहित होना – नदियों में प्रवाहित जल की मात्रा एकसमान रहनी चाहिए। जल को नियन्त्रित करने के लिए मार्गों में जलाशयों एवं बाँधों का निर्माण किया जाना अत्यावश्यक है।
  4. ढाल की तीव्रता – तीव्र ढाल की स्थिति में नदियों की घाटियों में कई स्थानों पर प्रपातों की सहायता से जल-विद्युत शक्ति को उत्पादन सुगमता से कर लिया जाता है।
  5. शीतोष्ण जलवायु – जल-विद्युत उत्पादन क्षेत्रों का तापमान शीत ऋतु में भी हिमांक से ऊपर रहना चाहिए, जिससे नदियों का जल हिम में परिणत न हो सके। इसी कारण इसके लिए शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त रहती है।
  6. जलधाराओं के मार्ग में झीलों की उपस्थिति – यदि बहते हुए जल के मार्ग में हिमानियों द्वारा निर्मित झीलें पड़ जाएँ तो वे बहुत ही उपयुक्त रहती हैं। इन झीलों द्वारा तलछट (अवसाद) को रोक लिया जाता है, जिससे जल स्वच्छ हो जाता है।
  7. अन्य शक्ति संसाधनों का अभाव – यदि किसी प्रदेश में शक्ति के अन्य संसाधन; जैसे- कोयला, खनिज तेल, गैस आदि न हों तो जल-विद्युत शक्ति के विकास की अधिक सम्भावनाएँ रहती हैं। एवं इसके उत्पादन का भी सतत प्रयत्न किया जाता है।

(ब) आर्थिक दशाएँ Economic Conditions

  1. उपभोक्ता क्षेत्रों की समीपता – जल-शक्ति उत्पादक केन्द्रों के समीप ही विद्युत की माँग के क्षेत्र होने चाहिए। इसके लिए सघन जनसंख्या, उद्योग-धन्धे एवं व्यापारिक केन्द्र अधिक उपयुक्त रहते हैं। जल विद्युत शक्ति 400-500 किमी से अधिक दूरी पर नहीं भेजी जा सकती, क्योंकि इससे अधिक दूरी पर विद्युत का ह्रास तीव्रता से होना आरम्भ हो जाता है।
  2. पर्याप्त पूँजी की उपलब्धि – जल-विद्युत शक्ति के उत्पादन में बहुत अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है, क्योंकि नदियों पर बाँध बनाने, जलाशयों का निर्माण करने, शक्ति-गृहों का निर्माण करने, खम्भे, तार, टरबाईन, जेनरेटर, इन्जीनियर आदि की आवश्यकता होती है। इसके लिए सार्वजनिक पूँजी लगाई जा सकती है, क्योंकि इसमें निजी पूँजी व्यय करना असम्भव है।।
  3. आवागमन के साधनों का विकास – विद्युत-शक्ति के उत्पादन के लिए बाँधों, जलाशयों, शक्ति-गृहों, खम्भे, तार आदि को ढोने के लिए तीव्र आवागमन के साधनों की अधिक आवश्यकता पड़ती है; अतः इन साधनों का विकास किया जाना अति आवश्यक है।
  4. तकनीकी ज्ञान – जल-शक्ति उत्पादन के लिए मशीनरी, तकनीशियन एवं इन्जीनियर आदि आवश्यक होते हैं; अतः आधुनिक तकनीकी विकसित होनी चाहिए।

विश्व में जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन
Production of Hydro-electricity in the World

विभिन्न देशों में जल-विद्युत उत्पादन की क्षमता अलग-अलग पायी जाती है, परन्तु इसके उत्पादन की क्षमता सबसे अधिक अफ्रीका महाद्वीप में निहित है, जब कि यहाँ पर उत्पादन बहुत ही कम होता है। जल-शक्ति का सबसे अधिक उत्पादन कनाडा में किया जाता है। द्वितीय स्थान संयुक्त राज्य का है। मानसूनी देशों में भी जल-शक्ति उत्पादन के अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ पायी जाती हैं। आर्थिक विकास के साथ-साथ जल-विद्युत शक्ति का विकास भी विकसित देशों में अधिक हुआ है। वर्तमान । समय में विश्व में 2077 अरब किलोवाट घण्टा जलविद्युत शक्ति का उत्पादन किया जा रहा है। निम्नलिखित देशों का जल-विद्युत शक्ति उत्पादन में प्रमुख स्थान है-

कनाडा – जल-विद्युत शक्ति के उत्पादन में विश्व में कनाडा का प्रथम स्थान है। यहाँ जलविद्युत शक्ति उत्पादन की सभी आदर्श भौगोलिक सुविधाएँ विद्यमान हैं। पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्र इस शक्ति के उत्पादन में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। न्याग्रा प्रपात (संयुक्त राज्य व कनाडा के साझे में), ओण्टेरियो, क्यूबेक एवं ब्रिटिश कोलम्बिया क्षेत्र प्रमुख जल-शक्ति उत्पादक हैं।

रूस – यहाँ विश्व की जलविद्युत शक्ति उत्पादन का 6% भाग विद्यमान है तथा विश्वें में पाँचवाँ स्थान रखता है। यहाँ दक्षिणी सीमा के सहारे-सहारे मध्य एशिया से सुदूरपूर्व तक पर्वत-श्रेणियाँ फैली हैं, जो जल-विद्युत उत्पादन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ जल-शक्ति के निम्नलिखित केन्द्र प्रमुख हैं –

  1. सिम्ल्यान्सकाया
  2. म्यूमुश
  3. नीपर प्रोजेक्ट
  4. बर्खने-स्विर (लेनिनग्राड)
  5. मिंगेचौर (अजरबेजान)
  6. कामा
  7. कारगेव (नीपर नदी पर)
  8. गोर्की (वोल्गा नदी पर)
  9. नेर्वा
  10. क्यूबीशेव
  11. वोल्गाग्राद (वोल्गा नदी पर)
  12. बोत्कन्स्क (कामा नदी पर)
  13. क्रास्नोयार्क (यनीसी नदी पर) एवं
  14. ब्रास्क प्रोजेक्ट (विश्व का सबसे बड़ा विद्युत केन्द्र)।

संयुक्त देशों के राष्ट्रकुल की नदियों – नीपर, नीस्टर, डॉन, वोल्गा, दिवना, नीमेन, इर्टिश, ओबे, यनीसी, अंगारा आदि पर जलविद्युत उत्पादन केन्द्रों की स्थापना की गयी है। यहाँ पर जल-विद्युत उत्पादन का 85% भाग साइबेरियाई नदियों पर स्थित विद्युत-गृहों से प्राप्त होता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका – विश्व की जल-शक्ति उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका का दूसरा स्थान है। संयुक्त राज्य अमेरिका में जल-विद्युत का विकास सर्वप्रथम न्यू-इंग्लैण्ड राज्य में किया गया था। इसके बाद 1960 ई० से अन्य राज्यों में विकास किया गया। यहाँ प्रमुख जल-विद्युत उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

  1. न्याग्रा प्रपात – जिस पर कई विद्युत शक्ति-गृहों की स्थापना की गयी है।
  2. मिनियापोलिस में सेंट अन्थोनी प्रपात।।
  3. अप्लेशियन प्रदेश – पेंसिलवानिया से अलबामा तक। यहाँ प्रपात-रेखा पर बहुत से जलविद्युत उत्पादक केन्द्र स्थापित किये गये हैं–कोलम्बिया, रैले, रिचमण्ड, हार्टफोर्ड, लावेल, मानचेस्टर, फॉलॅरिवर, लारेंस, ट्रेण्टन, वाशिंगटन, बाल्टीमोर, फिलाडेल्फिया, पेटरसन आदि।
  4. टेनेसी घाटी – नोरिस, बाट्सबरी, कोल्टर, शोल, चिकमंगा, ह्वीलर, विल्सन बाँध आदि।
  5. कोलम्बिया नदी बेसिन – यहाँ पर लगभग 200 विद्युत उत्पादक केन्द्र स्थापित किये गये हैं, जिनमें ग्राण्ड कूली बाँध, चीफ जोजेफ, केकनेरी, डलेस, जोहनडे एवं बोनविले बाँध मुख्य हैं।
  6. हूवर बाँध योजना – (कोलोरेडो नदी पर)।
  7. मिसौरी घाटी परियोजना – यह योजना टेनेसी घाटी योजना की अपेक्षा 6 गुने क्षेत्र को विद्युत आपूर्ति करती है।
  8. शास्ता बाँध (सेक्रोमेण्टो नदी पर)।
  9. सैन-ज्वाकिन बाँध (कैलीफोर्निया)।

यूरोपीय देश – पश्चिमी यूरोपीय देश विश्व की 27% जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन करते हैं। प्रमुख उत्पादक देशों का विवरण निम्नलिखित है –

  1. इटली – आल्प्स पर्वत के दक्षिणी ढालों तथा एपीनाइन पर्वत के ढालों पर प्रवाहित नदियों से। विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है।
  2. फ्रांस – आल्प्स पर्वत की रोन घाटी में मध्य पठारी भाग तथा पिरेनीज पर्वत-श्रेणी की घाटी में जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाता है।
  3. स्विट्जरलैण्ड – यहाँ कोयले एवं खनिज तेल की कमी है। इसीलिए यहाँ आल्प्स पर्वत से प्रवाहित नदियों से जल-विद्युत का उत्पादन किया जाता है।
  4. जर्मनी – जर्मनी ने अपनी जल-विद्युत उत्पादन क्षमता का पूर्ण विकास कर लिया है तथा यहाँ 19 अरब किलोवाट विद्युत का उत्पादन किया जाता है।
  5. नार्वे तथा स्वीडन – इन दोनों देशों में जल-विद्युत शक्ति का भरपूर विकास किया गया है। यहाँ कोयला, खंनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस आदि शक्ति-संसाधनों का पूर्ण अभाव है। विश्व में प्रति । व्यक्ति विद्युत-शक्ति नार्वे में सबसे अधिक उपलब्ध है, जहाँ 99% जनसंख्या को यह शक्ति प्राप्त हो। गयी है। यहाँ पर इस शक्ति पर आधारित रासायनिक उद्योग, कृत्रिम नाइट्रोजन; स्वीडन में लोहा-इस्पात आदि उद्योगों का विकास कर लिया गया है।

एशियाई देश – एशिया महाद्वीप में जल-विद्युत शक्ति के प्रमुख उत्पादक देश निम्नलिखित हैं –
(i) जापान – एशिया की जल-शक्ति उत्पादन में जापान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जापान में। 1,500 जलविद्युत उत्पादक केन्द्र हैं, जिनमें से 1,000 होशू द्वीप में विकसित हैं। अन्य शक्ति संसाधनों के अभाव के फलस्वरूप जापान ने जल-विद्युत शक्ति का विकास ऊर्जा के वैकल्पिक संसाधन के रूप में किया है। ऊबड़-खाबड़ पठारी धरातल एवं सदावाहिनी सरिताओं के कारण जल-शक्ति के उत्पादन को बल मिला है। जापान ने अपनी सम्भावित जल-शक्ति का पूर्ण विकास कर लिया है, परन्तु माँग के अनुसार पूर्ति नहीं हो पाती; अतः ताप विद्युत भी उत्पन्न की जाती है।

(ii) चीन – जल-विद्युत शक्ति उत्पादन में चीन विश्व में चौथे स्थान पर है। चीन में 20% विद्युत शक्ति जल से तथा 80% कोयले से उत्पन्न की जाती है। ह्वांग्हो, यांगटिसीक्यांग, सीक्यांग तथा उनकी सहायक नदियों पर जल-विद्युत केन्द्रों की स्थापना की गयी है। जलविद्युत शक्ति उत्पादन में चीन के निम्नलिखित केन्द्र मुख्य हैं –

  1. उत्तरी चीन में सुंगारी नदी पर फैंगमैन केन्द्र
  2. ह्वांगहो नदी पर सानमेन बाँध
  3. ल्यूकिया बाँध
  4. बीजिंग के निकट मुंगतिंग नदी पर कुऑतिंग विद्युत-गृह
  5. जेचवान प्रान्त में शिल्सेतान केन्द्र
  6. दक्षिणी चीन में ल्यूची नदी पर शांग्यू विद्युत केन्द्र
  7. सिनांन बाँध
  8. आह्नवे बाँध एवं
  9. सीक्यांग बाँध।

(iii) भारत – भारत में जल-शक्ति के विशाल भण्डार हैं, परन्तु अभी तक उनका पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। सन् 1950 के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से बहुत-सी बहुउद्देशीय नदी-घाटी परियोजनाओं का विकास किया गया है। एशिया महाद्वीप में जल-विद्युत का सर्वप्रथम उत्पादन भारत में कर्नाटक राज्य के शिवसमुद्रम् नामक स्थान पर 1902 ई० में आरम्भ किया गया था। कोयना, शिवसमुद्रम्, पायकारा, मैटूर, पापनाशम, पेरियार, पल्लीवासल, निजाम सागर, नागार्जुन सागर, हीराकुड, दामोदर घाटी, कोसी व शारदा योजना, माताटीला, रिहन्द, रामगंगा योजना, चम्बल योजना, भाखड़ा-नॉगल योजना आदि प्रमुख बहुध्येयी नदी-घाटी योजनाएँ हैं। जल-विद्युत शक्ति की बढ़ती हुई माँग को देखते हुए भारत सरकार इसके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए निजी क्षेत्रों के सहयोग पर भी विचार कर रही है। यहाँ विश्व की 3.1% जल-विद्युत शक्ति उत्पन्न की जाती है।

अफ्रीकी देश – अधिकांश अफ्रीकी देश विषुवतरेखीय जलवायु प्रदेश में स्थित हैं तथा इन देशों की धरातलीय रचना भी जलविद्युत उत्पादन के अनुकूल है। इस प्रकार अफ्रीका महाद्वीप में जल-विद्युत शक्ति की सम्भावनाएँ विश्व में सर्वाधिक हैं, परन्तु आर्थिक एवं तकनीकी पिछड़ेपन के कारण इसे शक्ति का विकास नहीं हो पाया है। यहाँ सम्भावित जल-शक्ति का केवल 0.3% भाग का ही विकास हो सका है, परन्तु अब कुछ देशों ने आयातित तकनीकी द्वारा जल-विद्युत शक्ति का उत्पादन आरम्भ किया है, जिनमें मिस्र, दक्षिणी रोडेशिया, जायरे, जाम्बिया आदि देश प्रमुख हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
खनिज तेल के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर एक टिप्पणी लिखिए। [2009]
उत्तर
खनिज तेल का भौगोलिक वितरण असमान होने के कारण विश्व के अनेक देशों; जैसे-पश्चिमी यूरोपीय देश, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि में पेट्रोलियम की बहुत कमी है। अतएव पेट्रोलियम को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार बहुत महत्त्वपूर्ण है, किन्तु इस व्यापार का स्वरूप निश्चित नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका, जो पेट्रोल का एक बड़ा निर्यातक देश है, समीपस्थ देश जैसे वेनेजुएला और कोलम्बिया से तथा दूरस्थ देशों जैसे मध्य-पूर्व, नीदरलैण्ड और इण्डोनेशिया से कच्चा तेल और परिष्कृत तेल आयात भी करता है।

यूरोपीय देश अधिकांश तेल मध्य-पूर्व तथा उत्तरी अफ्रीका से आयात करते हैं। ब्रिटेन और नीदरलैण्ड जैसे देशों के पास अपनी माँग के अनुरूप पर्याप्त तेल नहीं है; अतः वे कच्चा तेल आयात कर परिष्कृत पदार्थों का निर्यात करते हैं। एशिया में भारत, जापान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कोरिया, वियतनाम, श्रीलंका आदि देश भी तेल का आयात करते हैं। इसी प्रकार दक्षिणी तथा मध्य अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड भी तेल के आयातक देश हैं।
प्रमुख तेल निर्यातक देश हैं-

  1. मध्य-पूर्व के देश; जैसे-सऊदी अरब, कुवैत, ईरान, इराक, कतर, बहरीन, ओमान आदि,
  2. कैरेबियन देश; जैसे-वेनेजुएला, कोलम्बिया आदि,
  3. अफ्रीकी देश; जैसे-लीबिया, अल्जीरिया, नाइजीरिया तथा
  4. इण्डोनेशिया।

प्रश्न 2
किन्हीं दो गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का उल्लेख कीजिए
उत्तर
दो गैर-परम्परागत ऊर्जा के स्रोत अग्रलिखित हैं –

  1. पवन ऊर्जा – तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में पवन ऊर्जा विकसित की गयी है।
  2. लहरी ऊर्जा – समुद्री लहरों से ऊर्जा प्राप्त करने का संयन्त्र केरल में तिरुवनन्तपुरम के निकट विजिंगम स्थान पर लगाया गया है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
कोयला किससे प्राप्त होता हैं?
उत्तर
कोयला भूपटल की अवसादी शैलों से प्राप्त होता है।

प्रश्न 2
विश्व में खनिज तेल का सर्वाधिक भण्डार कहाँ पाया जाता है?
उत्तर
विश्व में खनिज तेल के ज्ञात भण्डार सर्वाधिक फारस की खाड़ी के समीपवर्ती अर्थात् पश्चिमी एशियाई देशों में हैं।

प्रश्न 3
भारत में खनिज तेल के प्राप्ति-स्थान लिखिए।
उत्तर
भारत में खनिज तेल के प्राप्ति-स्थान हैं-असम के लखीमपुर एवं सुरमा घाटी क्षेत्र, गुजरात के खम्भात, अंकलेश्वर एवं कलौल क्षेत्र, बॉम्बे हाई तथा तमिलनाडु के कावेरी बेसिन तथा अपतटीय क्षेत्र।

प्रश्न 4
विश्व में खनिज तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश कौन है? [2011]
उत्तर
विश्व में खनिज तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश सऊदी अरब है।

प्रश्न 5
विश्व में कोयले के चार प्रमुख उत्पादक देशों के नाम लिखिए। [2013, 14]
उत्तर

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका
  2. चीन
  3. ऑस्ट्रेलिया तथा
  4. भारत।

प्रश्न 6
लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीकरण की चार आवश्यक दशाओं का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तर

  1. कच्चे माल अर्थात् लौह-अयस्क की सुविधा
  2. शक्ति संसाधनों की उपलब्धता
  3. उपभोक्ता बाजार की समीपता
  4. परिवहन साधनों की सुलभता।

प्रश्न 7
एशिया के दो प्रमुख खनिज तेल उत्पादन देशों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. सऊदी अरब तथा
  2. कुवैत।

प्रश्ना 8
विश्व में सर्वाधिक सम्भाव्य जल-शक्ति किस महाद्वीप पर पायी जाती है?
उत्तर
विश्व में सर्वाधिक सम्भाव्य जल-शक्ति (41%) अफ्रीका महाद्वीप पर मिलती है।

प्रश्न 9
विश्व में सर्वाधिक विकसित जल-शक्ति किस महाद्वीप पर पायी जाती है?
उतर
विश्व में सबसे अधिक विकसित जल-शक्ति (40% से अधिक) उत्तरी अमेरिका महाद्वीप पर पायी जाती है।

प्रश्न 10
विश्व के चार अग्रणी जल-विद्युत उत्पादक देशों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. कनाडा
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका
  3. ब्राजील तथा
  4. चीन।

प्रश्न 11
संयुक्त राज्य अमेरिका के किसी एक खनिज तेल-क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर
टेक्सास क्षेत्र अमेरिका का प्रमुख खनिज तेल-क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत टेक्सास, दक्षिण-पूर्वी अरकन्सास एवं प० लुशियाना राज्य सम्मिलित हैं। ।

प्रश्न 12
शक्ति के प्रमुख संसाधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
शक्ति के प्रमुख संसाधन कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, जल-शक्ति तथा आणविक शक्ति हैं।

प्रश्न 13
कोयले की अपेक्षा पेट्रोलियम का महत्त्व अधिक क्यों है?
उत्तर
आधुनिक युग में कोयले की अपेक्षा पेट्रोलियम का अधिक महत्त्व है, क्योंकि यह केवल शक्ति का साधन ही नहीं, अपितु अनेक पेट्रो-रसायन उद्योगों के लिए कच्चा माल भी है।

प्रश्न 14
विश्व में जल-विद्युत शक्ति का महत्त्व क्यों बढ़ रहा है?
उत्तर
जल-विद्युत शक्ति ऊर्जा का अक्षय स्रोत है, जब कि कोयला तथा पेट्रोलियम क्षयशील संसाधन हैं। अत: विश्व में जल-विद्युत शक्ति का महत्त्व बढ़ रहा है।

प्रश्न 15
जल-विद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जलविद्युत उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं –

  • जल-प्रपात
  • अधिक वर्षा
  • सदावाहिनी नदियाँ तथा ढाल की तीव्रता।

प्रश्न 16
उन दो उद्योगों के नाम बताइए जिनमें कोयला प्रधान भूमिका निभाता है?
उत्तर
लोहा व इस्पात तथा ताप विद्युत उत्पादन।

प्रश्न 17
भारत में कोयला प्रमुख रूप से किस क्षेत्र में पाया जाता है?
उत्तर
भारत में कोयला प्रमुख रूप से गोंडवाना क्षेत्र में पाया जाता है जहाँ भारत के बिटुमिनसे कोयले के 98.5% भण्डार हैं।

प्रश्न 18
विश्व के खनिज तेल उत्पादक दो क्षेत्रों के नाम बताइए। [2007, 11, 15, 16]
उत्तर

  1. दम्माम क्षेत्र (सऊदी अरब) तथा
  2. बाकू क्षेत्र (रूस)।

प्रश्न 19
संयुक्त राज्य अमेरिका के दो प्रमुख कोयला उत्पादक प्रदेशों के नाम लिखिए। [2008]
उत्तर

  1. अप्लेशियन कोयला क्षेत्र तथा
  2. अन्तर्रदेशीय कोयला क्षेत्र।

प्रश्न 20
इटाबिरा की खान किस देश में स्थित है और क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर
इटाबिरा की खान ब्राजील में स्थित है। यह लौह-अयस्क के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 21
भारत में लोहे के चार उत्पादक क्षेत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. छत्तीसगढ़-बस्तर, दुर्ग।
  2. ओडिशा-क्योंझर, सुन्दरगढ़।
  3. झारखण्ड-सिंहभूम।
  4. कर्नाटक-बिलारी।

प्रश्न 22
विश्व के चार अग्रणी लौह-अयस्क उत्पादक देशों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर

  1. ब्राजील
  2. चीन
  3. ऑस्ट्रेलिया तथा
  4. भारत।

प्रश्न 23
दक्षिण अमेरिका के चार लौह-अयस्क उत्पादक देशों के नाम लिखिए ।
उत्तर
दक्षिणी अमेरिका के चार लौह-अयस्क उत्पादक देश हैं- ब्राजील, वेनेजुएला, चिली तथा पीरू।

प्रश्न 24
यूरोप के प्रमुख लौह-अयस्क उत्पादक देशों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
यूरोप के प्रमुख लौह-अयस्क उत्पादक देश हैं- स्वीडन, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन तथा रूस।

प्रश्न 25
संयुक्त राज्य अमेरिका के दो प्रमुख लौह-अयस्क उत्पादक क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. सुपीरियर झील क्षेत्र तथा
  2. अप्लेशियन क्षेत्र।

प्रश्न 26
विश्व के लौह-अयस्क उत्पादन के क्षेत्रों के नाम लिखिए। [2013, 14]
उत्तर

  1. सुपीरियर झील क्षेत्र (संयुक्त राज्य अमेरिका) तथा
  2. यूक्रेन अथवा डोनबास क्षेत्र (रूस)।

प्रश्न 27
दक्षिण-पश्चिम एशिया के किन्हीं चार खनिज तेल उत्पादक देशों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर

  1. ईरान
  2. इराक
  3. कुवैत तथा
  4. कतर।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
कोयला पाया जाता है –
(क) अवसादी शैलों में
(ख) रूपान्तरित शैलों में
(ग) आग्नेय शैलों में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) अवसादी शैलों में।

प्रश्न 2
पेट्रोलियम पाया जाता है –
(क) आग्नेय शैलों में
(ख) अवसादी शैलों में
(ग) कायान्तरित शैलों में
(घ) इन सभी में
उत्तर
(ख) अवसादी शैलों में।

प्रश्न 3
पेट्रोलियम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है – [2009]
या
विश्व में निम्नांकित देशों में कौन-सा खनिज तेल का सर्वाधिक उत्पादन करता है? [2015]
(क) रूस
(ख) चीन
(ग) सऊदी अरब
(घ) सं० रा० अमेरिका
उत्तर
(ग) सऊदी अरब।

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से कौन-सा देश खनिज तेल का सर्वाधिक आयातक है? [2010]
(क) इराक
(ख) पेरू
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) कुवैत
उत्तर
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से कौन-सा देश खनिज तेल का निर्यातक नहीं है? [2007]
(क) वेनेजुएला
(ख) कुवैत
(ग) इराक
(घ) इंग्लैण्ड
उत्तर
(घ) इंग्लैण्ड।

प्रश्न 6
मेसाबी, बरमीलियन, कुयुना, मारक्वेट, गोजेबिक तथा मिनोमिनी लौह श्रेणियाँ स्थित हैं –
(क) कनाडा में
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका में
(ग) मैक्सिको में
(घ) यूक्रेन में
उत्तर
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका में।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से कौन-सा देश लौह-अयस्क का भारी आयातक है?
(क) जापान
(ख) ब्राजील
(ग) भारत
(घ) दक्षिणी अफ्रीका संघ
उत्तर
(क) जापान।

प्रश्न 8
झारखण्ड का कोडरमा क्षेत्र प्रसिद्ध है – (2017)
(क) बॉक्साइट के लिए
(ख) अभ्रक के लिए
(ग) ताँबे के लिए।
(घ) मैंगनीज के लिए
उत्तर
(ख) अभ्रक के लिए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources (खनिज एवं ऊर्जा के संसाधन) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 11 Minerals and Energy Resources (खनिज एवं ऊर्जा के संसाधन), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.