UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions (विलयन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions (विलयन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 2
Chapter Name Solutions
Number of Questions Solved 99
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions (विलयन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यदि 22 g बेन्जीन में 122 g कार्बन टेट्राक्लोराइड घुली हो तो बेन्जीन एवं कार्बन टेट्राक्लोराइड के द्रव्यमान प्रतिशत की गणना कीजिए।
हल
विलयन को द्रव्यमान = बेंजीन का द्रव्यमान + कार्बन टेट्राक्लोराइड का द्रव्यमान
= 22 g +122 g = 144 g
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प्रश्न 2.
एक विलयन में बेंजीन का 30 द्रव्यमान % कार्बन टेट्राक्लोराइड में घुला हो तो बेन्जीन के मोल अंश की गणना कीजिए।
हल
कार्बन टेट्राक्लोराइड में 30 द्रव्यमान % बेन्जीन का तात्पर्य है,
बेन्जीन का विलयन में द्रव्यमान = 30 g
CCl4 का विलयन में द्रव्यमान = 70 g
बेन्जीन (C6H6) का मोलर द्रव्यमान = 6 x 12 + 6 x 1 = 78 g mol-1
कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) का मोलर द्रव्यमान = 12 + 4 x 35.5 = 154 g mol-1
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित प्रत्येक विलयन की मोलरता की गणना कीजिए –

  1. 30g, Co(NO3)2 .6H2O 4.3 लीटर विलयन में घुला हुआ हो
  2. 30 mL 0.5 M-H2SO4 को 500 mL तनु करने पर।

हल
1. Co(NO3)2.6H2O का आण्विक द्रव्यमान
= 58.7 + 2(14 + 48) + 6 x 18 g mol-1 = 310.7 g mol-1
Co(NO3)2.6H2O के मोलों की संख्या = [latex]\frac { 30g }{ { 310.7gmol }^{ -1 } } [/latex] = 0.0966
विलयन का आयतन = 4.3 L
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[latex s=2]\frac { 0.0966mol }{ 4.3L }[/latex] = 0.022 M

2. 1000 mL 0.5M H2SO4 में H2SO4 = 0.5 mol
∴ 30 mL 0.5 M H2SO4 में H2SO4 = [latex]\frac { 0.5 }{ 1000 } [/latex] x 30 mol = 0.015 mol
विलयन का आयतन = 500 mL = 0.5 L
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प्रश्न 4.
यूरिया (NH2CONH2) के 0.25 मोलर, 2.5 kg जलीय विलयन को बनने के लिए आवश्यक यूरिया के द्रव्यमान की गणना कीजिए।
हल
यूरिया के 0.25 मोलर जलीय विलयन से तात्पर्य है –
यूरिया के मोल = 0.25
जल का द्रव्यमान = 1 Kg = 1000 g
यूरिया (NH2CONH2) का मोलर द्रव्यमान
= 14 + 2 + 12 + 16 + 14 + 2 = 60 g mol-1
अतः यूरिया के 0.25 mol = 0.25 mol x 60 g mol-1 = 15 g
विलयन को कुल द्रव्यमान = 1000 + 15 = 1015 g= 1.015 kg
अब, 1.015 kg विलयन में यूरिया = 15 g
अत: 2.5 kg विलयन में आवश्यक यूरिया = [latex]\frac { 15g }{ 1.015kg }[/latex] x 2.5 kg = 37 g

प्रश्न 5.
20% (w/w) जलीय KI का घनत्व 1.202 g mL-1 हो तो KI विलयन की

  1. मोललता
  2. मोलरता
  3. मोल-अंश की गणना कीजिए।

हल
20% (द्रव्यमान/द्रव्यमान) जलीय KI विलयन का अभिप्राय है कि KI का द्रव्यमान = 20 g
विलयन में जल को द्रव्यमान = 100 g
जल का द्रव्यमान = 100 – 20 = 80 g= 0.080 kg
1. विलयन की मोललता की गणना
KI का मोलर द्रव्यमान = 39 +127 = 166 g mol-1
KI के मोलों की संख्या = [latex]\frac { 20g }{ { 166gmol }^{ -1 } }[/latex] = 0.120
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2. विलयन की मोलरता की गणना
विलयन का घनत्व = 1.202 g mL-1
100 g विलयन का आयतन = [latex]\frac { 100g }{ { 1.202gmL }^{ -1 } }[/latex] = 83.2 mL = 0.0832 L
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= [latex]\frac { 0.120mol }{ 0.0832L } [/latex] = 1.44 M

3.
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प्रश्न 6.
सड़े हुए अण्डे जैसी गन्ध वाली विषैली गैस H2S गुणात्मक विश्लेषण में उपयोग की जाती है। यदि H2S गैस की जल में STP पर विलेयता 0.195 m हो तो हेनरी स्थिरांक की गणना
कीजिए।
हल
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प्रश्न 7.
298 K पर CO2 गैस की जल में विलेयता के लिए हेनरी स्थिरांक का मान 1.67 x 108 Pa है। 500 mL सोडा जल 2.5 atm दाब पर बन्द किया गया। 298 K ताप पर घुली हुई CO2 की मात्रा की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 8.
350 K पर शुद्ध द्रवों A एवं B के वाष्पदाब क्रमशः 450 एवं 750 mm Hg हैं। यदि कुल वाष्प दाब 600 mm Hg हो तो द्रव मिश्रण का संघटन ज्ञात कीजिए। साथ ही वाष्प प्रावस्था का संघटन भी ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 9.
298 K पर शुद्ध जल का वाष्प दाब 23.8 mm Hg है। 850 g जल में 50 g यूरिया (NH2CONH2) घोला जाता है। इस विलयन के लिए जल के वाष्प दाब एवं इसके आपेक्षिक अवनमन का परिकलन कीजिए।
हल
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प्रश्न 10.
750 mm Hg दाब पर जल का क्वथनांक 99.63°c है। 500 g जल में कितना सुक्रोस मिलाया जाए कि इसका 100°C पर क्वथन हो जाए?
हल
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प्रश्न 11.
ऐस्कॉर्बिक अम्ल (विटामिन C, C6H8O6) के उस द्रव्यमान का परिकलन कीजिए जिसे 75 g ऐसीटिक अम्ल में घोलने पर उसके हिमांक में 1.5°C की कमी हो जाए।
Kf = 3.9K kg mol-1
हल
हिमांक में अवनमन (∆Tf) = 1.5°
विलायक (CH3COOH) का द्रव्यमान, w1 = 75 g
विलायक (CH3COOH) का मोलर द्रव्यमान,
M1 = 60 g mol-1
विलेय (C6H8O6) का मोलर द्रव्यमान,
M2 = 176 g mol-1
Kf = 3.9 Kkg mol-1
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प्रश्न 12.
1,85,000 मोलर द्रव्यमान वाले एक बहुलक के 1.0 g को 37°C पर 450 mL जल में घोलने से उत्पन्न विलयन के परासरण दाब का पास्कल में परिकलन कीजिए।
हल
परासरण दाब π = CRT = [latex s=2]\frac { { w }_{ 2 }\times R\times T }{ { M }_{ 2 }\times V } [/latex]
बहुलक को द्रव्यमान w2 = 1.0 g
बहुलक का मोलर द्रव्यमान (M2) = 185000 g mol-1
विलयन का आयतन (V) = 450 mL = 0.45 L
ताप (T)= 37 +273 = 310 K
विलयन स्थिरांक (R) = 8.314 × 103 Pa LK-1 mol-1
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= 30.96 Pa

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
विलयन को परिभाषित कीजिए। कितने प्रकार के विभिन्न विलयन सम्भव हैं? प्रत्येक प्रकार के विलयन के सम्बन्ध में एक उदाहरण देकर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर
विलयन (Solution) – विलयन दो या दो से अधिक अवयवों का समांगी मिश्रण (homogeneous mixture) होता है जिसका संघटन निश्चित परिसीमाओं के अन्तर्गत ही परिवर्तित हो सकता है।

यहाँ समांगी मिश्रण से तात्पर्य यह है कि मिश्रण में सभी स्थानों पर इसका संघटन व गुण समान होते हैं। विलयन को बनाने वाले पदार्थ विलयन के अवयव कहलाते हैं। किसी विलयन में उपस्थित अवयवों की कुल संख्या के आधार पर इन्हें द्विअंगी विलयन (दो अवयव), त्रिअंगी विलयन (तीन अवयव), चतुरंगी विलयन (चार अवयव) आदि कहा जाता है।

द्विअंगी विलयन के अवयवों को सामान्यत: विलेय तथा विलायक कहा जाता है। सामान्यतः जो अवयव अधिक मात्रा में उपस्थित होता है, वह विलायक कहलाता है, जबकि कम मात्रा में उपस्थित अन्य अवयव विलेय कहलाता है। विलायक विलयन की भौतिक अवस्था निर्धारित करता है जिसमें विलयन विद्यमान होता है। दूसरे शब्दों में विलेय वह पदार्थ है जो घुलता है तथा विलायक वह पदार्थ है जिसमें यह विलेय (UPBoardSolutions.com) घुलता है। उदाहरणार्थ– यदि चीनी के कुछ क्रिस्टलों को जल से भरे बीकर में डाला जाता है तो ये जल में घुलकर विलयन बना लेते हैं। इस स्थिति में चीनी विलेय तथा जल विलायक है। विलयन में कणों का आण्विक आकार लगभग 1000 pm होता है तथा इसके विभिन्न अवयवों को किसी भी भौतिक विधि जैसे फिल्टरीकरण, निथारन, अभिकेन्द्रीकरण आदि के द्वारा पृथक्कृत नहीं किया जा सकता है।

विलयन के प्रकार (Types of solution) – विलेय तथा विलायक की भौतिक अवस्था के आधार पर विलयनों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
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उपर्युक्त नौ प्रकार के विलयनों में से तीन विलयन- द्रव में ठोस, द्रव में गैस तथा द्रव में द्रव अतिसामान्य विलयन हैं। इन तीनों प्रकार के विलयनों में द्रव विलायक के रूप में होता है। वे विलयन जिनमें जल विलायक के रूप में होता है, जलीय विलयन (aqueous solution) कहलाते हैं, (UPBoardSolutions.com) जबकि जिन विलयनों में जल विलायक के रूप में नहीं होता अजलीय विलयन (non-aqueous solution) कहलाते हैं। सामान्य अजलीय विलायकों के उदाहरण हैं- ईथर, बेन्जीन, कार्बन टेट्राक्लोराइड आदि।
विलयन के प्रकारों की व्याख्या निम्नलिखित है –

(1) गैसीय विलयन (Gaseous solutions) – सभी गैसें तथा वाष्प समांगी मिश्रण बनाती हैं तथा इसीलिए इन्हें विलयन कहा जाता है। ये विलयन स्वत: तथा तीव्रता से बनते हैं। वायु गैसीय विलयन का एक सामान्य उदाहरण है।

(2) द्रव विलयन (Liquid solutions) – ये विलयन ठोसों अथवा गैसों को द्रवों में मिश्रित करने पर अथवा दो द्रवों को मिश्रित करने पर बनते हैं। कुछ ठोस पदार्थ भी मिश्रित करने पर द्रव विलयन बनाते हैं। उदाहरणार्थ- साधारण ताप पर सोडियम तथा पोटैशियम धातुओं की सममोलर मात्राएँ मिश्रित करने पर द्रव विलयन प्राप्त होता है। जल में पर्याप्त मात्रा में विलेय ऑक्सीजन तालाबों, नदियों तथा समुद्र में जलीय जीवों की प्राण-रक्षा करती है।
इन विलयनों में द्रव में द्रव विलयन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। गैसों के समान द्रव मिश्रित किए जाने पर समांगी मिश्रण नहीं बनाते हैं। इनकी विलेयताओं के आधार पर इन मिश्रणों को तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है –

  1. जब दोनों अवयव पूर्णतया मिश्रणीय हों (When both components are completely miscible) – इस स्थिति में दोनों द्रव समान प्रवृत्ति के होते हैं अर्थात् या तो ये दोनों ध्रुवी (जैसे-एथिल ऐल्कोहॉल तथा जल) होते हैं या अध्रुवी (जैसे—बेन्जीन तथा हेक्सेन) होते हैं।
  2. जब दोनों अवयव लगभग मिश्रणीय हों (When both components are almost miscible) – यहाँ एक द्रव ध्रुवी तथा दूसरा अध्रुवी प्रकृति का होता है; जैसे-बेन्जीन तथा जल, तेल तथा जल आदि।
  3. जब दोनों अवयव आंशिक मिश्रणीय हों (When both components are partially miscible) – यदि द्रव A में अन्तरअणुक आकर्षण A-A, द्रव B में अन्तरअणुक आकर्षण B-B से भिन्न हो, परन्तु A-B आकर्षण माध्यमिक कोटि का हो, तब दोनों द्रव परस्पर सीमित मिश्रणीय होते हैं। उदाहरणार्थ-ईथर तथा जल आंशिक रूप से मिश्रित होते हैं।

(3) ठोस विलयन (Solid solutions) – ठोसों के मिश्रणों की स्थिति में ये विलयन अत्यन्त सामान्य होते हैं। उदाहरणार्थ- गोल्ड तथा कॉपर ठोस विलयन बनाते हैं; क्योंकि गोल्ड परमाणु कॉपर क्रिस्टल में कॉपर परमाणुओं को प्रतिस्थापित कर देते हैं तथा इसी प्रकार कॉपर परमाणु (UPBoardSolutions.com) गोल्ड क्रिस्टलों में गोल्ड परमाणुओं को प्रतिस्थापित कर सकते हैं। दो अथवा दो से अधिक धातुओं की मिश्रधातुएँ ठोस विलयन होती हैं।
ठोस विलयनों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. प्रतिस्थापनीय ठोस विलयन (Substitutional solid solutions) – इन विलयनों में एक पदार्थ के परमाणु, अणु अथवा आयन क्रिस्टल जालक में अन्य पदार्थ के कणों का स्थान ले लेते हैं। पीतल, कॉपर तथा जिंक प्रतिस्थापनीय ठोस विलयनों के सामान्य उदाहरण हैं।
  2. अन्तराकाशी ठोस विलयन (Interstitial solid solutions) – इन विलयनों में एक प्रकार के परमाणु अन्य पदार्थ के परमाणुओं के जालक में विद्यमान रिक्तिकाओं अथवा अन्तराकाशों के स्थान को ग्रहण कर लेते हैं। अन्तराकाशी ठोस विलयन का एक सामान्य उदाहरण टंगस्टन-कार्बाइड (WC) है।

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प्रश्न 2.
एक ऐसे ठोस विलयन का उदाहरण दीजिए जिसमें विलेय कोई गैस हो।
उत्तर
चूँकि एक पदार्थ के कण दूसरे पदार्थ के कणों की तुलना में बहुत छोटे हैं, अतः छोटे कण बड़े कणों के अन्तराकाशी स्थलों में व्यवस्थित हो जायेंगे। अतः ठोस विलयन अन्तराकाशी ठोस विलयन (interstitial solid solution) प्रकार का होगा।

प्रश्न 3.
निम्न पदों को परिभाषित कीजिए –

  1. मोल-अंश (2018)
  2. मोललता
  3. मोलरता
  4. द्रव्यमान प्रतिशत।

या
किसी जलीय विलयन की सान्द्रता व्यक्त करने की किन्हीं चार विधियों का उल्लेख कीजिए। प्रत्येक का एक उदाहरण भी दीजिए। (2018)
उत्तर
1. मोल-अंश (Mole-Fraction) – विलयन में उपस्थित किसी एक घटक या अवयव के मोलों की संख्या तथा विलेय एवं विलायक के कुल मोलों की संख्या के अनुपात को उस अवयव का मोल-अंश कहते हैं। इसे x से व्यक्त करते हैं।
माना एक विलयन में विलेय के nA मोल तथा विलायक के nB मोल उपस्थित हैं, तब
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अतः यदि किसी द्विअंगी विलयन के एक अवयव के मोल-अंश ज्ञात हों तो दूसरे अवयव के मोल-अंश ज्ञात किए जा सकते हैं। उदाहरणार्थ-द्विअंगी विलयन के लिए मोल-अंश xA, xB से निम्नलिखित प्रकार सम्बन्धित है –
xA = 1 – xB
या  xB = 1 – xA
मोल- अंश विलयन के ताप पर निर्भर नहीं करते हैं।

2. मोललता (Molality) – किसी विलयन के 1 kg विलायक में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या विलयन की मोललता कहलाती है। इसे m से व्यक्त किया जाता है। गणितीय रूप में,
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अत: मोललता की इकाई मोल प्रति किग्रा (mol kg-1) होती है।
यदि विलेय के nB मोल विलायक के W ग्राम में घुले हों, तब
मोललता = [latex]\frac { { n }_{ B } }{ W }[/latex] x 1000

3. मोलरता (Molarity) – एक लीटर (1 क्यूबिक डेसीमीटर) विलयन में घुले हुए विलेय के मोलों की संख्या को उस विलयन की मोलरता (M) कहते हैं।
अत: वह विलयन जिसमें विलेय के एक ग्राम- मोल विलयन के एक लीटर में उपस्थित हों, 1 M विलयन कहलाता है। उदाहरणार्थ– 1M-Na2CO3 (मोलर द्रव्यमान = 106) विलयन के प्रति लीटर में 106 g विलेय उपस्थित होता है।
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अतः मोलरता की इकाई मोल प्रति लीटर (mol L-1) या मोल प्रति घन डेसीमीटर (mol dm-3) होती हैं। प्रतीक M को mol L-1 अथवा mol dm-3 के लिए प्रयोग किया जाता है तथा यह मोलरता व्यक्त करता है।
यदि विलेय के nB मोल विलयन के V mL आयतन में उपस्थित हों, तब
मोलरता (M) = [latex]\frac { { n }_{ B } }{ V }[/latex] x 1000
विलेय के मोल निम्नलिखित प्रकार ज्ञात किए जा सकते हैं –
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मोलरता सान्द्रता व्यक्त करने की एक साधारण माप है जिसे प्रयोगशाला में सामान्यतया प्रयोग किया जाता है। यद्यपि इसमें एक कमी है, यह ताप के साथ परिवर्तित हो जाती है क्योंकि ताप के साथ द्रव का प्रसार अथवा संकुचन हो जाता है।

(iv) द्रव्यमान प्रतिशत (Mass Percentage) – किसी विलयन में किसी अवयव का द्रव्यमान प्रतिशत विलयन के प्रति 100 g में उस अवयव का द्रव्यमान होता है। उदाहरणार्थ– यदि विलयन में अवयव A का द्रव्यमान WA तथा अवयव B को द्रव्यमान WB हो तो
A का द्रव्यमान प्रतिशत = [latex]\frac { { W }_{ A } }{ { W }_{ A }+{ W }_{ B } } [/latex] × 100
इसे w/w से व्यक्त किया जाता है। उदाहरणार्थ- 10% (w/w) सोडियम क्लोराइड विलयन का अर्थ है। कि 10 g सोडियम क्लोराइड 90 g जल में उपस्थित है तथा विलयन का कुल द्रव्यमान 100 g है अथवा 10 g सोडियम क्लोराइड 100 g विलयन में उपस्थित है।

प्रश्न 4.
प्रयोगशाला कार्य के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला सान्द्र नाइट्रिक अम्ल द्रव्यमान की दृष्टि से नाइट्रिक अम्ल का 68% जलीय विलयन है। यदि इस विलयन का घनत्व 1.504 g mL-1 हो तो अम्ल के इस नमूने की मोलरता क्या होगी?
हल
द्रव्यमानानुसार 68% HNO3 का तात्पर्य है कि 100 g विलयन में 68 g HNO3 उपस्थित होगा।
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प्रश्न 5.
ग्लूकोस का एक जलीय विलयन 10% (w/w) है। विलयन की मोललता तथा विलयन में प्रत्येक घटक का मोल-अंश क्या है? यदि विलयन का घनत्व 1.2 g mL-1 हो तो विलयन की मोलरता क्या होगी?
हल
10%(w/w) ग्लूकोस विलयन का तात्पर्य है कि 100 g ग्लूकोस विलयन में 10 g ग्लूकोस उपस्थित होगा।
जल का द्रव्यमान = 100 – 10 = 90 g= 0.090 kg
10 g ग्लूकोस = [latex]\frac { 10 }{ 180 } [/latex] mol = 0.0555 mol,
90 g H2O = [latex]\frac { 90 }{ 18 } [/latex] = 5 mol
मोललता (m)= [latex]\frac { 0.0555 }{ 0.090 } [/latex] = 0.617 m
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प्रश्न 6.
यदि 1 g मिश्रण में Na2CO3 एवं NaHCO3 के मोलों की संख्या समान हो तो इस मिश्रण से पूर्णतः क्रिया करने के लिए 0.1 M HCl के कितने mL की आवश्यकता होगी?
हल
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प्रश्न 7.
द्रव्यमान की दृष्टि से 25% विलयन के 300 g एवं 40% के 400 g को आपस में मिलाने पर प्राप्त मिश्रण का द्रव्यमान प्रतिशत सान्द्रण निकालिए।
हल
25% विलयन का तात्पर्य है कि 25 g विलेय 100 g विलयन में उपस्थित है तथा 40% विलयन का तात्पर्य है कि 40 g विलेय 100 g विलयन में उपस्थित है।
300 g विलयन में विलेय = [latex s=2]\frac { 25\times 300 }{ 100 } [/latex] = 75 g
400 g विलयन में विलेय = [latex s=2]\frac { 40\times 400 }{ 100 } [/latex] = 160 g
∴ विलेय का कुल द्रव्यमान = 75 + 160 = 235 g
∴ मिश्रण में विलेय का द्रव्यमान प्रतिशत = [latex s=2]\frac { 235\times 100 }{ 700 } [/latex] = 33.57 %

प्रश्न 8.
222.6 g, एथिलीन ग्लाइकॉल, C2H4(OH)2 तथा 200 g जल को मिलाकर प्रतिहिम मिश्रण बनाया गया। विलयन की मोललता की गणना कीजिए। यदि विलयन का घनत्व 1.072 g mL-1 हो तो विलयन की मोलरता निकालिए।
हल
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प्रश्न 9.
एक पेय जल का नमूना क्लोरोफॉर्म (CHCl3) से कैंसरजन्य समझे जाने की सीमा तक बहुत अधिक संदूषित है। इसमें संदूषण की सीमा 15 ppm (द्रव्यमान में) है –
(i) इसे द्रव्यमान प्रतिशत में व्यक्त कीजिए।
(ii) जल के नमूने में क्लोरोफॉर्म की मोललता ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 10.
ऐल्कोहॉल एवं जल के एक विलयन में आण्विक अन्योन्यक्रिया की क्या भूमिका है?
उत्तर
ऐल्कोहॉल एवं जल के विलयन में ऐल्कोहॉल तथा जल के अणु अन्तराआण्विक H- बन्ध बनाते हैं। लेकिन यह H2O-H2O तथा ऐल्कोहॉल-ऐल्कोहॉल H-बन्ध से दुर्बल होते हैं। इससे अणुओं की वाष्प अवस्था में जाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। अत: यह विलयन राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 11.
ताप बढ़ाने पर गैसों की द्रवों में विलेयता में हमेशा कमी आने की प्रवृत्ति क्यों होती है?
उत्तर
गैस + विलायक [latex]\leftrightarrows [/latex] विलयन + ऊष्मा
गैस का द्रव में घुलना एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है। ताप बढ़ाने पर साम्य बायीं ओर विस्थापित होता है और विलयन से गैस मुक्त होती है।

प्रश्न 12.
हेनरी का नियम तथा इसके कुछ महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग लिखिए।
उत्तर
हेनरी का नियम (Henry’s Law) – सर्वप्रथम गैस की विलायक में विलेयता तथा दाब के मध्य मात्रात्मक सम्बन्ध हेनरी ने दिया। इसे हेनरी का नियम कहते हैं। इसके अनुसार, ‘‘स्थिर ताप पर विलायक के प्रति एकांक आयतन में घुला गैस का द्रव्यमान विलयन के साथ साम्यावस्था में गैस के दाब के समानुपाती होता है।’

डाल्टन, जो हेनरी के समकालीन थे, ने भी स्वतन्त्र रूप से निष्कर्ष निकाला कि किसी द्रवीय विलयन में गैस की विलेयता गैस के आंशिक दाब पर निर्भर करती है। (UPBoardSolutions.com) यदि हम विलयन में गैस के मोल-अंश को उसकी विलेयता का माप मानें तो यह कहा जा सकता है कि किसी विलयन में गैस का मोल-अंश उस विलयन के ऊपर उपस्थित गैस के आंशिक दाब के समानुपाती होता है।
अत: विकल्पतः हेनरी नियम को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –
“किसी गैस का वाष्प-अवस्था में आंशिक दाब (p), उस विलयन में गैस के मोल-अंश (x) के समानुपाती होता है।”
p α x
p= KH . x
यहाँ KH हेनरी स्थिरांक है। जब एक से अधिक गैसों के मिश्रण को विलायक के सम्पर्क में लाया जाता है, तब प्रत्येक गैसीय अवयव अपने आंशिक दाब के समानुपात में घुलता है। इसीलिए हेनरी नियम अन्य गैसों की उपस्थिति से स्वतन्त्र होकर प्रत्येक गैस पर लागू किया जाता है।

हेनरी नियम के अनुप्रयोग (Applications of Henry’s Law) – हेनरी नियम के उद्योगों में अनेक अनुप्रयोग हैं एवं यह कुछ जैविक घटनाओं को समझने में सहायक होता है। इसके कुछ महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं –

(1) सोडा-जल एवं शीतल पेयों में CO2 की विलेयता बढ़ाने के लिए बोतल को अधिक दाब पर बन्द किया जाता है।

(2) गहरे समुद्र में श्वास लेते हुए गोताखोरों को अधिक दाब पर गैसों को अधिक घुलनशीलता का सामना करना पड़ सकता है। अधिक बाहरी दाब के कारण श्वास के साथ ली गई वायुमण्डलीय गैसों की विलेयता रुधिर में अधिक हो जाती है। जब गोताखोर सतह की ओर आते हैं, बाहरी दाब धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसके कारण घुली हुई गैसें बाहर निकलती हैं, इससे रुधिर में नाइट्रोजन के (UPBoardSolutions.com) बुलबुले बन जाते हैं। यह केशिकाओं में अवरोध उत्पन्न कर देता है और एक चिकित्सीय अवस्था उत्पन्न कर देता है। जिसे बेंड्स (Bends) कहते हैं, यह अत्यधिक पीड़ादायक एवं जानलेवा होता है। बेंड्स से तथा नाइट्रोजन की रुधिर में अधिक मात्रा के जहरीले प्रभाव से बचने के लिए, गोताखोरों द्वारा श्वास लेने के लिए उपयोग किए जाने वाले टैंकों में हीलियम मिलाकर तनु की गई वायु को भरा जाता है (इस वायु को संघटन इस प्रकार होता है-11.7% हीलियम, 56.2% नाइट्रोजन तथा 32.1% ऑक्सीजन)।

(3) अधिक ऊँचाई वाली जगहों पर ऑक्सीजन का आंशिक दाब सतही स्थानों से कम होता है, अत: इन जगहों पर रहने वाले लोगों एवं आरोहकों के रुधिर और ऊतकों में ऑक्सीजन की सान्द्रता निम्न हो जाती है। इसके कारण आरोहक कमजोर हो जाते हैं और स्पष्टतया सोच नहीं पाते। इन लक्षणों को एनॉक्सिया कहते हैं।

प्रश्न 13.
6.56 x 10-3 g एथेन युक्त एक संतृप्त विलयन में एथेन का आंशिक दाब 1 bar है। यदि विलयन में 5.00 x 10-2 g एथेन हो तो गैस का आंशिक दाब क्या होगा?
हल
m = KH x p
प्रथम मामले में, 6.56 x 10-2 g = KH x 1 bar
KH = 6.56 x 10-2 g bar-1
द्वितीय मामले में, 5.00 x 10-2 g = (6.56 x 10-2 g bar-1) x p
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प्रश्न 14.
राउल्ट के नियम से धनात्मक एवं ऋणात्मक विचलन का क्या अर्थ है तथा Δमिश्रण H का चिह्न इन विचलनों से कैसे सम्बन्धित है?
उत्तर
जब कोई विलयन सभी सान्द्रताओं पर राउल्ट के नियम का पालन नहीं करता तो वह अनादर्श विलयन (non-ideal solution) कहलाता है। इस प्रकार के विलयनों का वाष्प दाब राउल्ट के नियम द्वारा निर्धारित किए गए वाष्प दाब से या तो अधिक होता है या कम। यदि यह अधिक होता है तो यह विलयन राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन (positive deviation) प्रदर्शित करता है और यदि यह कम होता है तो यह ऋणात्मक विचलन (negative deviation) प्रदर्शित करता है।

(i) राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन प्रदर्शित करने वाले अनादर्श विलयन (Non-ideal solutions showing positive deviation from Raoult’s law) – दो अवयवों A तथा B वाले एक द्विअंगी विलयन पर विचार करते हैं। यदि विलयन में A-B अन्योन्यक्रियाएँ A-A तथा B-B अन्योन्यक्रियाओं की तुलना में दुर्बल होती हैं अर्थात् विलेय-विलायक अणुओं के मध्य अन्तराआण्विक आकर्षण बल विलेय-विलेय और विलायक-विलायक अणुओं की तुलना में दुर्बल होते हैं, तब इस प्रकार के विलयनों में से A अथवा B के (UPBoardSolutions.com) अणु शुद्ध अवयव की तुलना में सरलता से पलायन कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप विलयन के प्रत्येक अवयव का वाष्प दाब राउल्ट नियम के आधार पर अपेक्षित वाष्प दाब से अधिक होता है। इस प्रकार कुल वाष्प दाब भी अधिक होता है। विलयन का यह व्यवहार राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन के रूप में जाना जाता है।
गणितीय रूप से इसे इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –
PA > PºA xA तथा PB > PºBxB

इसी प्रकार कुल वाष्प दाब, p = pA + pB सदैव (pºAxA + pºBxB) से अधिक होता है।
इस प्रकार के विलयनों में, Δमिश्रण H शून्य नहीं होता, अपितु धनात्मक होता है क्योकि A-A अथवा B-B आकर्षण बलों के विरुद्ध ऊष्मा की आवश्यकता होती है। अत: घुलनशीलता ऊष्माशोषी प्रक्रिया होती है।

(ii) राउल्ट नियम से ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करने वाले अनादर्श विलयन (Non-ideal solutions showing negative deviation from Raoult’s law) – इस प्रकार के विलयनों में A-A व B-B के बीच अन्तराआण्विक आकर्षण बल A-B की तुलना में दुर्बल होता है, अत: इस प्रकार के विलयनों में A तथा B अणुओं की पलायन प्रवृत्ति शुद्ध अवयव की तुलना में कम होती है, परिणामस्वरूप विलयन के प्रत्येक अवयव का वाष्प दाब राउल्ट नियम के आधार पर अपेक्षित वाष्प दाब से कम होता है। इसी प्रकार कुल वाष्प दाब भी कम होता है। गणितीय रूप में,
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इस प्रकार के विलयनों में Δमिश्रण H शून्य नहीं होता, अपितु ऋणात्मक होता है क्योंकि आकर्षण बलों में वृद्धि से ऊर्जा उत्सर्जित होती है। अत: घुलनशीलता ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया होती है।

प्रश्न 15.
विलायक के सामान्य क्वथनांक पर एक अवाष्पशील विलेय के 2% जलीय विलयन का 1.004 bar वाष्प दाब है। विलेय का मोलर द्रव्यमान क्या है?
हल
क्वथनांक पर शुद्ध जल का वाष्प दाब (p°) = 1 atm = 1.013 bar
विलयन का वाष्प दाब (ps) = 1.004 bar

विलेय का द्रव्यमान (w2) = 2 g
विलयन का द्रव्यमान = 100 g
विलयन का द्रव्यमान = 98 g
तनु विलयनों के लिए राउल्ट के नियमानुसार,
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प्रश्न 16.
हेप्टेन एवं ऑक्टेन एक आदर्श विलयन बनाते हैं। 373 K पर दोनों द्रव घटकों के वाष्प दाब क्रमशः 105.2 k Pa तथा 46.8 k Pa हैं। 26.0 g हेप्टेन एवं 35.0 g ऑक्टेन के मिश्रण का वाष्प दाब क्या होगा?
हल
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प्रश्न 17.
300 K पर जल का वाष्प दाब 12.3 k Pa है। इसमें बने अवाष्पशील विलेय के एक मोलल विलयन का वाष्प दाब ज्ञात कीजिए।
हल
एक मोलल विलयन का तात्पर्य है कि 1 kg विलायक (जल) में विलेय का 1 mol उपस्थित है।
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प्रश्न 18.
114 g ऑक्टेन में किसी अवाष्पशील विलेय (मोलर द्रव्यमान 40 gmol-1) की कितनी मात्रा घोली जाए कि ऑक्टेन का वाष्प दाब घट कर मूल वाष्प दाब का 80% रह जाए?
हल
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प्रश्न 19.
एक विलयन जिसे एक अवाष्पशील ठोस के 30 g को 90 g जल में विलीन करके बनाया गया है। उसका 298 K पर वाष्प दाब 2.8 k Pa है। विलयन में 18 g जल और मिलाया जाता है जिससे नया वाष्प दाब 298 K पर 2.9 k Pa हो जाता है। निम्नलिखित की गणना कीजिए-
(i) विलेय का मोलर द्रव्यमान
(ii) 298 K पर जल का वाष्प दाब।
हल
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प्रश्न 20.
शक्कर के 5% (द्रव्यमान) जलीय विलयन का हिमांक 271 K है। यदि शुद्ध जल को हिमांक 273.15 K है तो ग्लूकोस के 5% जलीय विलयन के हिमांक की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 21.
दो तत्व A एवं B मिलकर AB2 एवं AB4 सूत्र वाले दो यौगिक बनाते हैं। 20 g बेन्जीन में घोलने पर 1g AB2 हिमांक को 2.3 K अवनमित करता है, जबकि 1.0 g AB4 से 1.3 K का अवनमन होता है। बेन्जीन के लिए मोलर अवनमन स्थिरांक 5.1 K kg mol-1 है। A एवं B के परमाण्वीय द्रव्यमान की गणना कीजिए।
हल
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प्रश्न 22.
300 K पर 36 g प्रति लीटर सान्द्रता वाले ग्लूकोस के विलयन का परासरण दाब 4.98 bar है। यदि इसी ताप पर विलयन का परासरण दाब 1.52 bar हो तो उसकी सान्द्रता क्या होगी?
हल
प्रश्नानुसार, परासरण दाब = 4.98 bar, w = 36 g, V = 1 L (I मामले में)
परासरण दाब = 1.52 bar (II मामले में)
I के लिए, πV = [latex]\frac { w }{ M }[/latex] RT
4.98 × 1 = [latex]\frac { 36 }{ 180 }[/latex] × R × T
II के लिए, 1.52 = c x R x T(c = [latex s=2]\frac { w }{ M\times V } [/latex])
समीकरण (i) तथा (ii) को हल करने पर, c= 0.061 mol L-1

प्रश्न 23.
निम्नलिखित युग्मों में उपस्थित सबसे महत्त्वपूर्ण अन्तरआण्विक आकर्षण बलों का सुझाव दीजिए –

  1. n-हेक्सेन व n-ऑक्टेन
  2. I2 तथा CCl4
  3. NaClO4 तथा H2O
  4. मेथेनॉल तथा ऐसीटोन
  5. ऐसीटोनाइट्राइल (CH3CN) तथा ऐसीटोन (C3H6O)।

उत्तर

  1. लण्डन परिक्षेपण बल,
  2. लण्डन परिक्षेपण बल,
  3. आयन-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाएँ,
  4. द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्य क्रियाएँ
  5. द्विध्रुव–द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाएँ।

प्रश्न 24.
विलेय-विलायक आकर्षण के आधार पर निम्नलिखित को n-ऑक्टेन में विलेयता के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
KCl, CH3OH, CH3CN, साइक्लोहेक्सेन।
उत्तर
KCl < CH3OH < CH3CN < साइक्लोहेक्सेन
KCl आयनिक यौगिक,है। अत: यह अध्रुवीय विलायक में नहीं घुलता, अत: यह 2-ऑक्टेन में सबसे कम विलेय है। साइक्लोहेक्सेन अध्रुवीय होने के (UPBoardSolutions.com) कारण n-ऑक्टेन में आसानी से विलेय होती है। CH3CN, CH3OH की तुलना में कम ध्रुवीय है, अत: इसकी विलेयता CH3OH से अधिक होती है।

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प्रश्न 25.
पहचानिए कि निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-से जल में अत्यधिक विलेय, आंशिक रूप से विलेय तथा अविलेय हैं –

  1. फीनॉल
  2. टॉलूईन
  3. फॉर्मिक अम्ल
  4. एथिलीन ग्लाइकॉल
  5. क्लोरोफॉर्म
  6. पेन्टेनॉल।

उत्तर

  1. आंशिक विलेय,
  2. अविलेय,
  3. अत्यधिक विलेय,
  4. अत्यधिक विलेय,
  5. अविलेय,
  6. आंशिक विलेय।

प्रश्न 26.
यदि किसी झील के जल का घनत्व 1.25 g mL-1 है तथा उसमें 92 g Na+ आयन प्रति किलो जल में उपस्थित हैं तो झील में Na+ आयन की मोललता ज्ञात कीजिए।
हल
विलेय का भार = 92 g, विलायक का भार = 1000 g
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प्रश्न 27.
अगर CuS का विलेयता गुणनफल 6 x 10-16 है तो जलीय विलयन में उसकी अधिकतम मोलरता ज्ञात कीजिए।
हल
जलीय विलयन में CuS की अधिकतम मोलरता = mol L-1 में CuS की विलेयता यदि mol L-1 में Cus की विलेयता s है तो
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प्रश्न 28.
जब 6.5 g ऐस्पिरीन (C9H8O4) को 450 g ऐसीटोनाइट्राइल (CH3CN) में घोला जाए तो ऐस्पिरीन का ऐसीटोनाइट्राइल में भार प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 29.
नैलॉन (C19H21NO3) जो कि मॉर्फीन जैसी होती है, का उपयोग स्वापक उपभोक्ताओं द्वारा स्वापक छोड़ने से उत्पन्न लक्षणों को दूर करने में किया जाता है। सामान्यतया नैलॉन की 1.5 mg खुराक दी जाती है। उपर्युक्त खुराक के लिए 1.5 x 10-3 m जलीय विलयन का कितना द्रव्यमान आवश्यक होगा?
हल
विलेय का भार = 1.5 mg= 0.0015 g,
विलेय का अणुभार = 311,
विलायक को भार = w
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विलायक का भार = 3.2154 g,
विलयन का भार = 3.2154 + 0.0015 = 3.2159 g

प्रश्न 30.
बेन्जोइक अम्ल का मेथेनॉल में 0.15 m विलयन बनाने के लिए आवश्यक मात्रा की गणना कीजिए।
हल
V = 250 ml, m = 0.15 m, विलेय का अणुभार = 122, विलेय की मात्रा = ?
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प्रश्न 31.
ऐसीटिक अम्ल, ट्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल एवं ट्राइफ्लुओरो ऐसीटिक अम्ल की समान मात्रा से जल के हिमांक में अवनमन इनके उपर्युक्त दिए गए क्रम में बढ़ता है। संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
हिमांक में अवनमन निम्न क्रम में होता है –
ऐसीटिक अम्ल < ट्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल < ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल

फ्लोरीन अधिक ऋणविद्युती होने के कारण उच्चतम इलेक्ट्रॉन निष्कासन प्रेरणिक प्रभाव रखती है। अतः ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल प्रबल अम्ल है जबकि ऐसीटिक अम्ल दुर्बलतम अम्ल है।। अतः ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल अत्यधिक आयनित होकर अधिक आयन उत्पन्न (UPBoardSolutions.com) करता है जबकि ऐसीटिक अम्ल सबसे कम आयन उत्पन्न करता है। अधिक आर्यन उत्पन्न करने के कारण ट्राइफ्लुओरोऐसीटिक अम्ल हिमांक में अधिक अवनमन करता है एवं ऐसीटिक अम्ल सबसे कम।

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प्रश्न 32.
CH3 – CH2 – CHCl – COOH के 10 g को 250 g जल में मिलाने से होने वाले हिमांक का अवनमन परिकलित कीजिए। (Ka = 1.4 × 10-3, Kf = 186 K kg mol-1)
हल
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प्रश्न 33.
CH2FCOOH के 19.5 g को 500 g H2O में घोलने पर जल के हिमांक में 10°C का अवनमन देखा गया। फ्लुओरोऐसीटिक अम्ल का वान्ट हॉफ गुणक तथा वियोजन स्थिरांक परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 34.
293 K पर जल का वाष्प दाब 17.535 mm Hg है। यदि 25 g ग्लूकोस को 450 g जल में घोलें तो 293 K पर जल का वाष्प दाब परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 35.
298 K पर मेथेन की बेन्जीन में मोललता का हेनरी स्थिरांक 4.27 x 105 mm Hg है। 298 K तथा 760 mm Hg दाब पर मेथेन की बेन्जीन में विलेयता परिकलित कीजिए।
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 47

प्रश्न 36.
100 g द्रव A (मोलर द्रव्यमान 140 g mol-1) को 1000 g द्रव B (मोलर द्रव्यमान 180 g mol-1) में घोला गया। शुद्ध द्रव B का वाष्प दाब 500 Torr पाया गया। शुद्ध द्रव A का वाष्प दाब तथा विलयन में उसका वाष्प दाब परिकलित कीजिए यदि विलयन का कुल वाष्प दाब 475 Torr हो।
हल
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प्रश्न 37.
328 K पर शुद्ध ऐसीटोन एवं क्लोरोफॉर्म के वाष्प दाब क्रमशः 741.8 mm Hg तथा 632.8 mm Hg हैं। यह मानते हुए कि संघटन के सम्पूर्ण परास में ये आदर्श विलयन बनाते हैं, Pकल , Pक्लोरोफॉर्म तथा Pएसीटोन  को xएसीटोन  के फलन के रूप में आलेखित कीजिए। मिश्रण के विभिन्न संघटनों के प्रेक्षित प्रायोगिक आँकड़े अग्रलिखित हैं –
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उपर्युक्त आँकड़ों को भी उसी ग्राफ में आलेखित कीजिए और इंगित कीजिए कि क्या इसमें आदर्श विलयन से धनात्मक अथवा ऋणात्मक विचलन है?
हल
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उपर्युक्त आँकड़ों के आधार पर ग्राफ की प्रकृति निम्नलिखित है –

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 51

चूंकि Pकल का ग्राफ नीचे की ओर झुका है, अत: विलयन राउल्ट के नियम से ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित कर रहा है।

प्रश्न 38.
संघटनों के सम्पूर्ण परास में बेन्जीन तथा टॉलूईन आदर्श विलयन बनाते हैं। 300 K पर शुद्ध बेन्जीन तथा टॉलूईन का वाष्प दाब क्रमशः 50.71 mm Hg तथा 32.06 mm Hg है। यदि 80 g बेन्जीन को 100 g टॉलूईन में मिलाया जाए तो वाष्प अवस्था में उपस्थित बेन्जीन के मोल-अंश परिकलित कीजिए।
हल
द्रव अवस्था में nB = [latex]\frac { 80 }{ 78 } [/latex] = 1.026, nT = [latex]\frac { 100 }{ 92 } [/latex] = 1.087
XB = 0.486, XT = 0.514
PB = 50.71 x 0.486 = 24.65
pT = 32.06 x 0.514 = 16.48
बेंजीन का वाष्प अवस्था में मोल प्रभाज = [latex]\frac { 24.65 }{ 24.65+16.48 } [/latex] = 0.60

प्रश्न 39.
वायु अनेक गैसों का मिश्रण है। 298 K पर आयतन में मुख्य घटक ऑक्सीजन और नाइट्रोजन लगभग 20% एवं 79% के अनुपात में हैं। 10 वायुमण्डल दाब पर जल वायु के साथ साम्य में है। 298 K पर यदि ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन के हेनरी स्थिरांक क्रमशः 3.30 x 107 mm तथा 6.51 x 107 mm हैं तो जल में इन गैसों का संघटन ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 40.
यदि जल का परासरण दाब 27°C पर 0.75 वायुमण्डल हो तो 2.5 लीटर जल में घुले CaCl2 (i = 2.47) की मात्रा परिकलित कीजिए।
हल
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प्रश्न 41.
2 लीटर जल में 25°C पर K2 SO4 के 25 mg को घोलने पर बनने वाले विलयन का परासरण दाब, यह मानते हुए ज्ञात कीजिए कि K2 SO4 पूर्णतः वियोजित हो गया है।
हल
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
1 मोलल जलीय विलयन में विलेय का मोल प्रभाज है – (2017)
(1) 1
(ii) 1.8
(iii) 18
(iv) 0.018
उत्तर
(iv) 0.018

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प्रश्न 2.
शुद्ध जल की मोलरता होती है – (2014, 16, 17)
(i) 55.56
(ii) 5.556
(iii) 0.18
(iv) 0.018
उत्तर
(i) 55.56

प्रश्न 3.
0.2 M H ,SO, विलयन की सान्द्रता ग्राम प्रति लीटर में होगी – (2017)
(i) 21.4
(ii) 39.2
(iii) 9.8
(iv) 19.6
उत्तर
(iv) 19.6

प्रश्न 4.
किसका वाष्प दाब न्यूनतम होगा? (2017)
(i) 0.1 M BaCl2 विलयन
(ii) 0.1 M फिनॉल विलयन
(iii) 0.1 M सुक्रोज विलयन
(iv) 0.1 M सोडियम क्लोराइड विलयन
उत्तर
(i) 0.1 M BaCl2 विलयन

प्रश्न 5.
दो द्रवों Pएवं ९ के वाष्पदाब क्रमशः 80 मिमी एवं 60 मिमी हैं। P के 3 मोल तथा Q के 2 मोल मिलाने पर प्राप्त विलयन का कुल वाष्पदाब होगा – (2014)
(i) 140 मिमी
(ii) 20 मिमी
(iii) 68 मिमी
(iv) 72 मिमी
उत्तर
(iv) 72 मिमी

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा अणुसंख्य गुणधर्म है? (2015)
(i) श्यानता।
(ii) परासरण दाब
(iii) प्रकाशिक घूर्णन
(iv) पृष्ठ तनाव
उत्तर
(ii) परासरण दाब

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से विलयन का कौन-सा भौतिक गुण अणुओं की संख्या पर निर्भर नहीं करता? (2018)
(i) वाह्य सह अवनमन
(ii) हिमांक अवनमन
(iii) पृष्ठ तनाव
(iv) परासरण दाब
उत्तर
(iii) पृष्ठ तनाव

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प्रश्न 8.
निम्न में किसके जलीय विलयन का क्वथनांक सर्वाधिक होगा? (2017)
(i) 1% ग्लूकोस
(ii) 1% NaCl
(iii) 1% CaCl2
(iv) 1% सुक्रोस
उत्तर
(iii) 1% CaCl2

प्रश्न 9.
निम्न के 0.1 M जलीय मोलल विलयन में न्यूनतम हिमांक किसका है? (2009)
(i) पोटैशियम सल्फेट
(ii) सोडियम क्लोराइड
(iii) यूरिया
(iv) ग्लूकोस
उत्तर
(i) पोटैशियम सल्फेट

प्रश्न 10.
12.0 ग्राम यूरिया को 1 लीटर जल में घोला गया तथा 68.4 ग्राम सुक्रोज को 1 लीटर जल में घोला गया। यूरिया विलयन के वाष्पदाब का आपेक्षिक अवनमन होगा – (2012)
(i) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा अधिक
(ii) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा कम
(iii) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा दोगुना
(iv) सुक्रोज विलयन के बराबर
उत्तर
(i) सुक्रोज विलयन की अपेक्षा अधिक।

प्रश्न 11.
किस सूत्र द्वारा मोलल उन्नयन स्थिरांक (KA) की गणना की जा सकती है? (2017)
(i) [latex s=2]\frac { { m\times T }_{ b }\times W }{ 1000\times w } [/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { { 1000\times \triangle T }_{ b }\times w }{ W } [/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { 1000w }{ { m\times \triangle T }_{ b }\times W } [/latex]
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i)
[latex s=2]\frac { { m\times T }_{ b }\times W }{ 1000\times w } [/latex]

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से किसका परासरण दाब सबसे कम होता है ? (2010, 16)
(i) पोटैशियम क्लोराइड विलयन
(ii) स्वर्ण विलयन
(iii) मैग्नीशियम क्लोराइड विलयन
(iv) ऐलुमिनियम फॉस्फेट विलयन
उत्तर
(ii) स्वर्ण विलयन

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प्रश्न 13.
किसी विलयन का परासरण दाब किस सम्बन्ध द्वारा प्रदर्शित किया जाता है? (2013)
(i) p = [latex s=2]\frac { RT }{ C } [/latex]
(ii) p = [latex s=2]\frac { CT }{ R } [/latex]
(ii) p = [latex s=2]\frac { RC }{ T } [/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { p }{ C } [/latex] = RT
उत्तर
(iv) [latex s=2]\frac { p }{ C } [/latex] = RT

प्रश्न 14.
निम्नलिखित विलयनों में सर्वाधिक परासरण दाब किसका है? (2014)
(i) 1 M KCl
(ii) 1 M (NH4)3PO4
(iii) 1 M BaCl2
(iv) 1 M C6H12O6
उत्तर
(ii) 1 M (NH4)3PO4

प्रश्न 15.
समान ताप पर किन विलयनों के युग्म समपरासरी हैं? (2012)
(i) 0.1 M NaCl तथा 0.1 M Na2SO4
(ii) 0.1 M यूरिया तथा 0.1 M NaCl
(iii) 0.1 M यूरिया तथा 0.2 M MgCl2
(iv) 0.1 M Ca(NO3)2 तथा 0.1 M Na2SO4
उत्तर
(iv) 0.1 M Ca(NO3)2 तथा 0.1 M Na2SO4

प्रश्न 16.
गन्ने की शक्कर (अणुभार 342) का 5% विलयन, पदार्थ x के 1% विलयन से समपरासरी है। पदार्थx का अणुभार है – (2013)
(i) 68.4
(ii) 171.2
(iii) 136.2
(iv) 34.2
उत्तर
(i) 68.4

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी विलयन में विलेय तथा विलायक क्या होते हैं?
उत्तर
विलयन का वह अवयव जो द्रव्यमानानुसार अधिक मात्रा में उपस्थित होता है, विलायक कहलाता है जबकि दूसरा अवयव जो कम मात्रा में उपस्थित होता है, विलेय कहलाता है।

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प्रश्न 2.
0.25 N ऑक्सैलिक अम्ल विलयन की मोलरता ज्ञात कीजिए।
[C = 12, O = 16, H = 1] (2009)
हल
ऑक्सैलिक अम्ल (COOH)2 का तुल्यांकी भार = 63
तथा अणुभार = 126
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 55

प्रश्न 3.
किसी पदार्थ का 1 मोल 500 मिली जल में घोला गया। विलयन की मोलरता की गणना कीजिए। (2017)
हल
मोलरता = [latex s=2]\frac { 1\times 1000 }{ 500 } [/latex] = 2 M

प्रश्न 4.
100 ग्राम विलायक में विलेय का [latex]\frac { 1 }{ 10 } [/latex] मोल घुला है। विलयन की मोललता ज्ञात कीजिए। (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 56

प्रश्न 5.
H2SO4 का एक नमूना 94% (w/v) है और इसका घनत्व 1.84 ग्राम/मिली है। इस विलयन की मोललता ज्ञात कीजिए। [H = 1, 0 = 16, S = 32] (2017)
हल
100 मिली में H2SO4 का भार = 94 ग्राम
100 मिली नमूने का भार = आयतन x घनत्व = 100 x 1.84 = 184 ग्राम
नमूने में विलायक की मात्रा = 184 – 94 = 90 ग्राम = 0.09 किग्रा
तथा H2SO4 का अणु भार = 2 x 1 + 32 + 4 x 16 = 98
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 57

प्रश्न 6.
14.625 ग्राम सोडियम क्लोराइड को 250 ग्राम जल में विलेय किया गया। प्राप्त विलयन की मोललता की गणना कीजिए। [Na = 23, cl = 35.5] (2013)
हल
सोडियम क्लोराइड के ग्राम-अणुओं की संख्या
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 58

प्रश्न 7.
एक विलयन में 40 ग्राम NaOH को 500 mL जल में घोला गया है। इसकी मोलरता एवं नॉर्मलता की गणना कीजिए। (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 59
NaOH विलयन की नॉर्मलता एवं मोलरता समान होगी क्योंकि इसका तुल्यांकी भार एवं अणुभार समान हैं।

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प्रश्न 8.
राउल्ट का वाष्प दाब अवनमन नियम लिखिए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए। (2009, 11, 16)
उत्तर
राउल्ट के नियम के अनुसार, “किसी विलयन के वाष्प-दाब का आपेक्षिक अवनमन विलेय पदार्थ के मोल प्रभाज के बराबर होता है।”
[latex s=2]\frac { { p-p }_{ s } }{ p } =\frac { { n }_{ 1 } }{ { n }_{ 1 }+{ n }_{ 2 } }[/latex]
जहाँ, P तथा Ps क्रमशः विलायक तथा विलयन के वाष्प दाब हैं और n1 तथा n2 क्रमशः विलेय तथा विलायक के ग्राम-अणुओं की संख्या है।सीमाएँ–

  1. राउल्ट का नियम तनु विलयनों पर लागू होता है। सान्द्र विलयन राउल्ट के नियम से विचलन प्रदर्शित करते हैं।
  2. यह नियम केवल अवाष्पशील पदार्थों के (UPBoardSolutions.com) विलयनों पर लागू होता है।
  3. वैद्युत-अपघट्यों के विलयनों पर राउल्ट का नियम लागू नहीं होता है।
  4. जो पदार्थ विलयनों में संगुणित हो जाते हैं, उन पदार्थों के विलयन भी राउल्ट के नियम का पालन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
साधारणतया किसी विलायक में विलेय को घोलने पर उसका क्वथनांक बढ़ जाता है। क्यों ? उचित कारण दीजिए। (2011)
उत्तर
किसी विलायक में कोई अवाष्पशील पदार्थ घोलने पर विलयन का वाष्पदाब कम हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विलयन का क्वथनांक बढ़ जाता है।

प्रश्न 10.
एक अवाष्पशील विलेय को किसी विलायक में मिलाने से उसका वाष्प दाब कम क्यों हो जाता है ? (2012)
उत्तर
किसी द्रव में उपस्थित अणु प्रत्येक दिशा में गतिशील रहते हैं। सतह के अणुओं की गतिज ऊर्जा अन्य अणुओं की अपेक्षा अधिक होती है; अतः ये अणु द्रव की सतह से वाष्प के रूप में पृथक् हो जाते हैं। अणुओं की यह प्रवृत्ति निर्गामी प्रवृत्ति कहलाती है। वाष्प के ये अणु सतह पर दाब डालते हैं, जिसको वाष्प दाब कहते हैं। किसी द्रव या विलायक में अवाष्पशील पदार्थ मिलाने पर द्रव के अणुओं की यह निर्गामी (UPBoardSolutions.com) प्रवृत्ति घट जाती है; क्योंकि विलेय पदार्थ द्रव के अणुओं पर एक प्रकार का अवरोध उत्पन्न करता है; अत: द्रव का वाष्प दाब घट जाता है; इसलिए विलयन का वाष्प दाब विलायक के वाष्प दाब से सदा कम रहता है।

प्रश्न 11.
दो द्रवों A तथा B के वाष्प दाब क्रमशः 80 mm तथा 60 mm हैं। A के 3 मोल तथा B के 2 मोल मिलाने पर प्राप्त विलयन का कुल वाष्प दाब क्या होगा? (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 60

प्रश्न 12.
ग्राम-अणुक उन्नयन स्थिरांक तथा ग्राम अणुक अवनमन स्थिरांक को परिभाषित कीजिए। (2016)
उत्तर
ग्राम-अणुक उन्नयन स्थिरांक – किसी विलायक के 100 ग्रामों में किसी अवाष्पशील विलेय या वैद्युत-अन अपघट्य के एक ग्राम-अणु घोलने पर उसके क्वथनांक में जो उन्नयन होता है, वह उस विलायक का ग्राम-अणुक उन्नयन स्थिरांक कहलाता है। इसको K या K100 से व्यक्त करते हैं।
ग्राम-अणुक अवनमन स्थिरांक – किसी अवाष्पशील वैद्युत-अपघटय के 1 ग्राम-अणु (मोल) को 100 ग्राम विलायक में घोलने पर विलायक के हिमांक में जो अवनमन होता है, उसे विलायक का ग्राम-अणु अवनमन स्थिरांक कहते हैं।

प्रश्न 13.
12 ग्राम ग्लूकोज को 100 ग्राम जल में घोलने पर विलयन का क्वथनांक 100.34°Cपाया गया। ग्लूकोज के मोलल उन्नयन स्थिरांक की गणना कीजिए।
[C = 12, O = 16, H = 1] (2015, 16)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 61

प्रश्न 14.
6 ग्राम यूरिया को 200 ग्राम जल में घोलने पर प्राप्त विलयन का क्वथनांक 0.28°C है। इसी विलयन का हिमांक क्या होगा? जल का मोलल उन्नयन स्थिरांक एवं मोलल अवनमन स्थिरांक के मान क्रमशः 0.52°C मोलल-1 तथा 1.86 °C मोलल-1 हैं।
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 62

प्रश्न 15.
वाण्ट-हॉफ गुणांक क्या है? 0.1 मोलल Ca(NO3)2 के विलयन के क्वथनांक की गणना कीजिए। जल के लिए kb = 0.52 K kg mol-1 (2015)
हल
वाण्ट-हॉफ गुणांक- वाण्ट-हॉफ गुणांक किसी पदार्थ के अणुसंख्य गुणधर्मों के प्रेक्षित तथा परिकलित या आपेक्षित मानों का अनुपात होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 63

प्रश्न 16.
परासरण क्या है ? परासरण दाब के लिए व्यंजक लिखिए। (2012, 14)
उत्तर
विलायक के अणुओं का अर्द्धपरासरण झिल्ली में होकर शुद्ध विलायक से विलयन की ओर या तनु विलयन से सीन्द्र विलयन की ओर स्वत: प्रवाह परासरण कहलाता है। परासरण दाब के लिए व्यंजक PV = nRT
जहाँ P = विलयन का परासरण दाब (वायुमण्डल में)
V = विलयन का आयतन (लीटर में)
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 64
T = परमताप और R = विलयन स्थिरांक = 0.082 लीटर-वायु /डिग्री/मोल

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प्रश्न 17.
परासरण तथा विसरण क्रिया में विभेद कीजिए। (2010)
उत्तर
परासरण क्रिया तथा विसरण क्रिया में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 65

प्रश्न 18.
समपरासरी विलयन किसे कहते हैं? (2009)
उत्तर
ऐसे विलयन, जिनके परासरण दाब समान ताप पर समान हों, समपरासरी विलयन कहलाते हैं। दो समपरासरी विलयनों को अर्द्ध-पारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक् करने पर परासरण नहीं होता है।

प्रश्न 19.
0.1 M ग्लूकोस तथा 0.1 M सोडियम क्लोराइड विलयन में किसका परासरण दाब अधिक होगा और क्यों? कारण सहित लिखिए। (2016)
उत्तर
इनमें 0.1 M सोडियम क्लोराइड का जलीय विलयन अधिक परासरण दाब प्रदर्शित करेगा; क्योंकि यह आयनन पर Na+ तथा Cl– दो आयन देता है, जबकि ग्लूकोस का आयनन नहीं होता है। परासरण दाब अणुसंख्य गुणधर्म का उदाहरण है। अणुसंख्य गुणधर्म आयनों की संख्या पर निर्भर करते हैं। अणुसंख्य गुणधर्म ० अणुओं की संख्या (इन गुणों में आयन अणुओं के समान व्यवहार करते हैं)।

प्रश्न 20.
27°C पर डेसी मोलर यूरिया विलयन का परासरण दाब ज्ञात कीजिए।
R = 0.082 ली०वायु०/डिग्री-मोल  (2017)
हल
दिया गया है, T = 27 + 273 = 300 K, [latex]\frac { n }{ v }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 10 }[/latex], P= ?, R= 0.0821
PV = n RT
P = [latex]\frac { n }{ v }[/latex] RT
P = [latex]\frac { 1 }{ 10 }[/latex] × 0.0821 × 300 = 0.0821×30 = 0.821 × 3
= 2.463 वायुमण्डल

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
72 ग्राम जल और 92 ग्राम एथिल ऐल्कोहॉल के मिश्रण में दोनों का मोल-प्रभाज ज्ञात कीजिए। (2011)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 66

प्रश्न 2.
36 ग्राम जल और 46 ग्राम एथिल ऐल्कोहॉल मिश्रण में दोनों का मोल प्रभाज ज्ञात कीजिए। (2015)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 67
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प्रश्न 3.
यूरिया का एक विलयन भारानुसार 6°० है। विलयन में यूरिया तथा जल का मोल प्रभाज ज्ञात कीजिए। (यूरिया का अणुभार = 60) (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 68

प्रश्न 4.
एक सल्फ्यूरिक अम्ल विलयन की मोललता की गणना कीजिए जिसमें जल का मोल प्रभाज 0.85 है। (2015)
हल
जल का मोल प्रभाज = 0.85
H2SO4 का मोल प्रभाजे = 1 – 0.85 = 0.15
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 69
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 70

प्रश्न 5.
बेन्जीन के एक विलयन में I2 घुली है। विलयन में I2 का मोल प्रभाज 0.25 है। विलयन की मोललता ज्ञात कीजिए। (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 71

प्रश्न 6.
शुद्ध बेन्जीन का किसी ताप पर वाष्पदाब 640 mm Hg है। एक अवाष्पशील विद्युत अपघटय ठोस जिसका भार 2.75 ग्राम है, 39 ग्राम बेन्जीन में डाला गया। विलयन का वाष्पदाब 600 mm Hg है। ठोस पदार्थ का अणुभार ज्ञात कीजिए। (2017)
हल
P0 = 640 mm Hg, Ps = 600 mm Hg, w = 2.75 ग्राम, w = 39 gram, m = ?
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 72
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प्रश्न 7.
जब एक अवाष्पशील पदार्थ का 1.5 ग्राम 60 ग्राम जल में घोला जाता है तो उसका हिमांक 0.136°C कम हो जाता है। पदार्थ के अणुभार की गणना कीजिए। (जल का मोलल अवनमन स्थिरांक = 1.86°C) (2017)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 74

प्रश्न 8.
चीनी का जल में बना एक 5% (भारानुसार) विलयन का हिमांक 271 K है। ग्लूकोस के जल में बने 5% विलयन के हिमांक की गणना कीजिए, यदि शुद्ध जल का हिमांक 273.15 K है। (2015)
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 2 Solutions image 75

प्रश्न 9.
27°C पर 2% यूरिया विलयन का परासरण दाब ज्ञात कीजिए।(विलयन स्थिरांक= 0.082 ली-वायु/डिग्री/मोल) (2016)
हल
प्रश्नानुसार, R= 0.082, T = 27 + 273 = 300 K
यूरिया का अणुभार = 60
∴ 2 ग्राम यूरिया विलयन का आयतन = 100 मिली
∴ 60 ग्राम (1 मोल) यूरिया विलयन का आयतन = [latex]\frac { 100 }{ 2 }[/latex] x 60 = 3000 मिली
= 3 लीटर
सूत्रानुसार, परासरण दाब (P) = [latex]\frac { RT }{ V }[/latex] = [latex]\frac { 0.0822\times 300 }{ 3 } [/latex] = 8.2 वायुमण्डल

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक ठोस की किसी द्रव में विलेयता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
एक ठोस की किसी द्रव में विलेयता मुख्य रूप से निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
1. विलेय तथा विलायक की प्रकृति – सामान्यतः एक ठोस रासायनिक रूप से समान द्रव में घुलता है। इसे इस प्रकार कह सकते हैं कि समान-समान को घोलता है (like dissolves like)। इससे स्पष्ट है कि NaCl जैसे आयनिक (ध्रुवीय) यौगिक जल जैसे ध्रुवीय विलायकों में घुल जाते हैं (UPBoardSolutions.com) जबकि बेंजीन, ईथर आदि अध्रुवीय विलायकों में बहुत कम विलेय या लगभग अविलेय होते हैं। इसी प्रकार नैफ्थलीन, एन्थ्रासीन आदि अध्रुवीय (सहसंयोजक) यौगिक बेंजीन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, ईथर आदि अध्रुवीय (सहसंयोजक) विलायकों में आसानी से घुल जाते हैं जबकि ये जल जैसे ध्रुवीय विलायकों में बहुत कम घुलते हैं।

यही कारण है कि साधारण नमक (सोडियम क्लोराइड) चीनी की तुलना में जल में अधिक विलेय होता है। उनकी जल में विलेयताएँ क्रमश: 5.3 मोल प्रति लीटर तथा 3.8 मोल प्रति लीटर हैं।

2. ताप– किसी विलायक में एक ठोस की विलेयता पर ताप का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि घुलन प्रक्रिया ऊष्माक्षेपी (exothermic) है अथवा ऊष्माशोषी (endothermic)। इसे आसानी से लाशातेलिए सिद्धान्त (Le-Chatelier’s principle) के आधार पर निम्न प्रकार से समझा जा सकता है –

(i) जब कोई पदार्थ ऊष्मा अवशोषण के साथ घुलता है तो ताप में वृद्धि करने पर उसकी विलेयता में सतत् वृद्धि होती है। माना कि एक पदार्थ AB जल में निम्न साम्य स्थापित करता है –
AB(s) + aq [latex]\leftrightarrows [/latex] AB (aq) + ऊष्मा
ला-शातेलिए सिद्धान्त के अनुसार, ताप में वृद्धि करने पर साम्य दाईं ओर विस्थापित हो जाता है। और इस प्रकार ताप में वृद्धि करने पर पदार्थ की विलेयता में वृद्धि हो जाती है।
NaNO3 KNO3 NaCl, KCl आदि ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।

(ii) जब कोई पदार्थ ऊष्मा उत्सर्जन के साथ घुलित होता है तो ताप में वृद्धि होने पर उसकी विलेयता निरन्तर घटती है। माना कि एक पदार्थ AB जल में निम्न साम्य स्थापित करता है –
AB(s) + aq [latex]\leftrightarrows [/latex] AB (aq) – ऊष्मा
ला-शातेलिए सिद्धान्त के अनुसार, ताप में वृद्धि करने पर साम्य को उस दिशा में विस्थापित होना चाहिए जिस दिशा में यह उत्पन्न ऊष्मा के प्रभाव को समाप्त कर सके। स्पष्ट है कि ताप में वृद्धि करने पर साम्य बायीं ओर विस्थापित होगा और पदार्थ की विलेयता कम हो जाएगी। सीरियम सल्फेट, लीथियम कार्बोनेट, सोडियम काबॉनेट मोनोहाइड्रेट ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।

उपरोक्त पदार्थों (जिनकी विलेयता ताप वृद्धि के साथ निरन्तर घटती या बढ़ती है) के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार के पदार्थ भी ज्ञात हैं। इनकी विलेयता ताप वृद्धि के साथ निरन्तर घटती या बढ़ती नहीं है। ये पदार्थ एक निश्चित ताप पर अपने एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। यह तापे संक्रमण ताप (transition temperature) कहलाता है। रूपों में यह परिवर्तन एक बहुरूपी रूप से दूसरे बहुरूपी रूप में (अमोनियम नाइट्रेट का से 8 रूप में) अथवा एक जलयोजित रूप से दूसरे जलयोजित रूप में (CaCl2.6H2O → CaCl2 . 4H2O) अथवा जलयोजित रूप से अनार्द्र रूप में (Na2SO4 . 10H2O → Na2SO4) हो सकता है। रूपों में इस प्रकार के परिवर्तन के कारण ही सोडियम सल्फेट की विलेयता पहले 32.4°C तक बढ़ती है और उसके पश्चात् घटने लगती है।

Na2SO4. 10H2O [latex]\overset { { >32.4 }^{ 0 }C }{ \underset { { <32.4 }^{ 0 }C }{ \leftrightarrows } } [/latex] Na2SO4

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution (विकास) are part of UP Board Solutions for Class 12 Biology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution (विकास).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Evolution
Number of Questions Solved 52
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution (विकास)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
डार्विन के चयन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में जीवाणुओं में देखे गए प्रतिजैविक प्रतिरोध का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर
रोगजनक जीवाणुओं के विरुद्ध प्रतिजैविक अत्यन्त प्रभावी होते हैं किन्तु किसी नये प्रतिजैविक के विकास के 2 – 3 वर्ष पश्चात् नये प्रतिजैविक प्रतिरोधी, समष्टि में प्रकट हो जाते हैं। कभी-कभी एक जीवाणुवीय समष्टि में एक अथवा कुछ ऐसे जीवाणु उत्परिवर्तन युक्त होते हैं जो उन्हें प्रतिजैविक के लिए प्रतिरोधी बनाते हैं। इस प्रकार के प्रतिरोधी जीवाणु तेजी से गुणन व उत्तरजीविता करने लगते हैं। शीघ्र ही प्रतिरोधिता प्रदान करने वाले जीन दूर-दूर तक फैल जाते हैं व सम्पूर्ण जीवाणु समष्टि प्रतिरोधी बन जाते हैं। कुछ अस्पतालों में प्रतिजैविक प्रतिरोधी पनपते रहते हैं क्योंकि वहाँ प्रतिजैविकों का अत्यधिक प्रयोग होता है।

प्रश्न 2.
समाचार-पत्रों और लोकप्रिय वैज्ञानिक लेखों से विकास सम्बन्धी नए जीवाश्मों और मतभेदों की जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर
जीवाश्म (fossils) चट्टानों से प्राप्त आदिकालीन जीवधारियों के अवशेष या चिह्न होते हैं। जीवाश्मों के अध्ययन को जीवाश्म विज्ञान (Palaeontolgy) कहते हैं अर्थात् जीवाश्म विज्ञान में लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व के जीवधारियों के अवशेषों का अध्ययन करते हैं। जीवाश्म वैज्ञानिकों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किस काल में किस प्रकार के जीवधारी पृथ्वी पर उपस्थित थे। चट्टानों और पृथ्वी की पर्ती में दबे जीवाश्मों को खोदकर निकाला जाता है। इन चिह्नों या अवशेषों से जीवधारी की संरचना की परिकल्पना की जाती है।

चट्टानों की आयु ज्ञात करके जीवाश्मों की अनुमानित आयु भी ज्ञात कर ली जाती है। अतः वैज्ञानिक जीवाश्मों को जैव विकास के सशक्त प्रमाण मानते हैं। जीवाश्मों के सबसे परिचित उदाहरणे आर्किओप्टेरिक्स तथा डायनोसोर हैं। डायनोसोर विशालकाये सरीसृप थे। मीसोजोइक युग में इनका पृथ्वी पर साम्राज्य स्थापित था। इस युग को सरीसृपों का स्वर्ण युग (golden age of reptiles) कहा जाता है।

भिन्न आयु की चट्टानों से भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवधारियों के जीवाश्म पाए गए हैं, जो कि सम्भवत: उस चट्टान के निर्माण के दौरान उनमें दब गए। वे विलुप्त जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर जीवन को स्वरूप बदलता रहा है। इथोपिया तथा तंजानिया से कुछ मानव जैसी अस्थियों के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। मानव पूर्वजों के जीवाश्मों से मानव विकास का इतिहास ज्ञात हुआ है।

प्रश्न 3.
प्रजाति की स्पष्ट परिभाषा देने का प्रयास कीजिए।
उत्तर
प्रजाति आकारिकी रूप से प्रथम व प्रजनन रूप से विलगित व्यष्टियों की एक या ज्यादा प्राकृतिक समष्टि होती है जो एक-दूसरे से अत्यधिक मिलती-जुलती है तथा आपस में एक-दूसरे के बीच स्वतंत्र रूप से प्रजनन करते हैं।

प्रश्न 4.
मानव विकास के विभिन्न घटकों का पता कीजिए (संकेत-मस्तिष्क साइज और कार्य, कंकाले संरचना, भोजन में पसंदगी आदि)।
उत्तर
लगभग 16 मिलियन वर्ष पूर्व ड्रायोपिथिकस (Dryopithecus) तथा रामापिथिकस (Ramapithecus) प्राइमेट्स विद्यमान थे। इनके शरीर पर भरपूर बाल थे तथा ये गोरिल्ला एवं चिम्पैंजी जैसे चलते थे। इनमें ड्रायोपिथिकस वनमानुष (ape) जैसे और रामापिथिकस मनुष्यों जैसे थे। इथोपिया तथा तंजानिया में अनेक मानवी विशेषताओं को प्रदर्शित करते जीवाश्म प्राप्त हुए। इससे यह स्पष्ट होता है कि 3-4 मिलियन वर्ष पूर्व मानव जैसे वानर गण (प्राइमेट्स) पूर्वी अफ्रीका में विचरण करते थे। ये लगभग 4 फुट लम्बे थे और सीधे खड़े होकर चलते थे। लगभग 2 मिलियन वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलोपिथेसिन (Australopithecines) अर्थात् आदि मानव सम्भवतः पूर्वी अफ्रीका के घास स्थलों में विचरण करता था। होमो हैबिलिस (Homo habilis) को प्रथम मानव जैसे प्राणी के रूप में जाना जाता है। होमो इरेक्टस (Homo erectus) के जीवाश्म लगभग 1.5 मिलियन वर्ष पूर्व के हैं। इसके अन्तर्गत जावा मानव, पेकिंग मानव, एटलांटिक मानवे आते हैं। प्लीस्टोसीन युग के अन्तिम काल में होमो सेपियन्स (वास्तविक मानव) ने होमो इरेक्टस का स्थान ले लिया। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से निएण्डरथल मानव, क्रोमैगनॉन मानव एवं वर्तमान मानवे आते हैं।

मानव विकास के विभिन्न घटक
विकास के अन्तर्गत उपार्जित निम्नलिखित विशिष्ट घटकों (लक्षणों) के कारण मानव का विकास हुआ –

1. द्विपाद चलन (Bipedal locomotion) – मानव पिछली टाँगों की सहायता से चलता है। अग्रपाद (भुजाएँ) अन्य कार्यों के उपयोग में आती हैं। पश्चपाद लम्बे और मजबूत होते हैं।
2. सीधी मुद्रा (Erect posture) – इसके लिए निम्नलिखित परिवर्तन हुए हैं –

  1. टाँगें लम्बी होती हैं। धड़ छोटा और वक्ष चौड़ा होता है।
  2. कशेरुक दण्ड में लम्बर कशेरुकाओं की संख्या 4-5 होती है। त्रिक कशेरुकाएँ समेकित होती हैं।
  3. कशेरुक दण्ड में कटि आधान (lumbar curve) होता है।
  4. श्रोणि मेखला चिलमचीनुमा (basin shaped) होती है।
  5. खोपड़ी कशेरुक दण्ड पर सीधी-सधी होती है महारन्ध्र नीचे की ओर होता है।

3. चेहरा (Face) – मानव का चेहरा उभर कर सीधा रहता है। इसे ऑर्थोग्नेथस (orthognathous) कहते हैं। मानव में भौंह के उभार हल्के होते हैं।
4. दाँत (Teeth) – सर्वाहारी होने के कारण अविशिष्टीकृत होते हैं। इनकी संख्या 32 होती है। मानव पहले शाकाहारी था, बाद में सर्वाहारी हो गया।
5. वस्तुओं को पकड़ने की क्षमता (Grasping ability) – मानव के हाथ वस्तुओं को पकड़ने के लिए रूपान्तरित हो गए हैं। अँगूठा सम्मुख (opposable) हो जाने के कारण वस्तुओं को पकड़ने व उठाने की क्षमता का विकास हुआ।
6. मस्तिष्क व कपाल क्षमता (Brain & Cranial Capacity) – प्रमस्तिष्क तथा अनुमस्तिष्क (cerebrum & cerebellum) सुविकसित होता है। कपाल क्षमता लगभग 1450 cc होती है। शरीर के भार वे मस्तिष्क के भार का अनुपात सबसे अधिक होता है। मस्तिष्क के विकास होने के कारण मानव का बौद्धिक विकास (intelligence) चरम सीमा पर पहुँच गया है। इसमें अक्षरबद्ध वाणी, भावनाओं की अभिव्यक्ति, चिन्तन, नियोजन एवं तर्क संगतता की अपूर्ण क्षमता होती है।
7. द्विनेत्री दृष्टि (Binocular vision) – द्विपादगमन के फलस्वरूप इसमें द्विनेत्री (binocular) तथा त्रिविमदर्शी (stereoscopic) दृष्टि पायी जाती है।
8. जनन क्षमता (Breeding capacity) में कमी, शरीर पर बालों की कमी, घ्राण शक्ति (Olfactory sense) में कमी, श्रवण शक्ति (hearing) में कमी आदि अन्य विकासीय लक्षण हैं।

प्रश्न 5.
इंटरनेट (अंतरजाल तन्त्र) या लोकप्रिय विज्ञान लेखों से पता कीजिए कि क्या मानवेत्तर किसी प्राणी में आत्म संचेतना थी?
उत्तर
प्रकृति उपयुक्तता को चुनती है। तथाकथित उपयुक्तता प्राणी की विशिष्टताओं पर आधारित होती है जो वंशानुगत होती है। अत: चयनित होने तथा विकास हेतु निश्चित ही एक आनुवंशिक आधार होना चाहिए। इसका तात्पर्य है कि वे जीवधारी (प्राणी) प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहने से बेहतर अनुकूलित होते हैं। अनुकूलन क्षमता वंशानुगत होती है। अनुकूलन के लिए प्राणियों की आत्म संचेतना महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। अनुकूलनशीलता एवं प्राकृतिक चयन को अन्तिम परिणाम उपयुक्तता है। जीववैज्ञानिकों के अनुसार अनेक प्राणियों में मानवेत्तर आत्म संचेतना (self-consciousness) पायी जाती है।

प्रश्न 6.
इंटरनेट (अन्तरजाल-तन्त्र) संसाधनों का उपयोग करते हुए आज के 10 जानवरों और उनके विलुप्त जोड़ीदारों की सूची बनाएँ (दोनों के नाम दें)।
उत्तर
आधुनिक एवं विलुप्त जोड़ीदार प्राणी
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-1

प्रश्न 7.
विविध जन्तुओं और पौधों के चित्र बनाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-2
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-3

प्रश्न 8.
अनुकूलनी विकिरण के एक उदाहरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अनुकूलनी विकिरण (Adaptive Radiation) – एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिन्दु से प्रारम्भ होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूलनी विकिरण (adaptive radiation) कहते हैं। जैसे-ऑस्ट्रेलियाई मार्क्सपियल (शिशुधानी प्राणी) विकिरण।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 7 Evolution img-4
अधिकांश मार्क्सपियल एकसमान पूर्वज से विकसित हुए। सभी मार्क्सपियल ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में विकसित हुए हैं। जब एक से अधिक अनुकूली विकिरण एक अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र में (विभिन्न आवासों में) प्रकट होते हैं तो इसे अभिसारी विकास (convergent evolution) कहते हैं।

प्रश्न 9.
क्या हम मानव विकास को अनुकूलनी विकिरण कह सकते हैं?
उत्तर
नहीं, मानव विकास को अनुकूलनी विकिरण नहीं कह सकते क्योंकि होमो सेपियन्स की जनक जातियाँ प्रगामी विकास द्वारा एच हेबिलस-एच इरेक्टस (वंशज) से विकसित हुईं।

प्रश्न 10.
विभिन्न संसाधनों जैसे-विद्यालय का पुस्तकालय या इंटरनेट (अन्तर जाल तन्त्र) तथा अध्यापक से चर्चा के बाद किसी जानवर जैसे कि घोड़े के विकासीय चरणों को खोजें।
उत्तर
घोड़े का उद्भव लगभग 60 करोड़ वर्ष पहले, पूर्वी उत्तरी अमेरिका में इओसीन (eocene) युग में हुआ था। इसके विकास की विभिन्न अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं –
1. इओहिप्पस (Eohippus) – इसका उद्भव इओसीन युग में हुआ था। इस युग का घोड़ा, लोमड़ी जैसा व 30 सेमी ऊँचा था। इसका सिर व गर्दन अत्यन्त छोटे थे। यह पत्तियाँ, घास आदि खाता था। इसका अग्रपाद चार क्रियात्मक अंगुली युक्त था किन्तु पश्चपाद में सिर्फ तीन अंगुलियाँ थीं।

2. मीसोहिप्पस (Mesohippus) – यह ओलिगोसीन युग का घोड़ा था। इसका आकार भेड़ जैसा था व इसके अग्र तथा पश्चपाद तीन-तीन अंगुली युक्त थे। मध्य वाली अंगुली अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ी थी जो संभवत: शरीर का बोझ वहन करती थी।

3. मेरीचिप्पस (Merrichippus) – यह मायोसिन युग का घोड़ा था। यह वर्तमान के टट्टू जितना ऊँचा था व दोनों टाँगें तीन-तीन अंगुलियाँ युक्त थीं। इनकी सिर्फ मध्य वाली अंगुली ही पृथ्वी | तक पहुँच पाती थी व यह तेज दौड़ सकता था। 4. प्लायोहिप्पस (Pliohippus)-यह प्लायोसिन युग का घोड़ा था। यह एक अंगुली वाला घोड़ा था।

5. इक्वस (Equus) – यह प्लास्टोसिन युग का घोड़ा है। इसकी ऊँचाई 1.50 मीटर थी।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
लुई पाश्चर के हंस ग्रीवा फ्लास्क (स्वान नेक फ्लास्क) प्रयोग से सिद्ध होता है – (2017)
(क) जीवात जीवोत्पत्ति
(ख) अजीवात जीवोत्पत्ति
(ग) आकस्मिक उत्पत्ति
(घ) विशिष्ट सृजन
उत्तर
(क) जीवात जीवोत्पत्ति

प्रश्न 2.
‘पुनरावृत्ति सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाले वैज्ञानिक का नाम है – (2014, 17, 18)
(क) डार्विन
(ख) माल्थस
(ग) वीजमान
(घ) हीकल
उत्तर
(घ) हीकल

प्रश्न 3.
पुनरावर्तन के सिद्धान्त के अनुसार – (2016)
(क) प्रत्येक जन्तु का प्रारम्भ एक अण्डे से होता है।
(ख) सन्तान जनकों के समान होती है
(ग) जीवन वृत्त में जाति वृत्त प्रतिबिम्बित होता है।
(घ) शरीर के क्षत भागों का पुनरुद्भवन होता है।
उत्तर
(ग) जीवन वृत्त में जाति वृत्त प्रतिबिम्बित होता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से किसका सिद्धान्त जीवन की उत्पत्ति से सम्बन्धित नहीं है? (2016)
(क) स्टेनले मिलर
(ख) ए०आई० ओपेरिन
(ग) जे०बी०एस० हैल्डेन
(घ) माल्थस
उत्तर
(घ) माल्थस

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन सरीसृपों एवं पक्षियों को जोड़ने वाली कड़ी माना जाता है? (2014, 15)
(क) डिप्नोई
(ख) आर्किओप्टेरिक्स
(ग) स्फीनोडॉन
(घ) कीवी
उत्तर
(ख) आर्किओप्टेरिक्स

प्रश्न 6.
चिड़ियों के पंख तथा घोड़े की अगली टाँगें दर्शाती हैं – (2017)
(क) समरूपता
(ख) समजातता
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) कोई नहीं
उत्तर
(ख) समजातता

प्रश्न 7.
आकस्मिक आनुवंशिक परिवर्तन को कहते हैं – (2017)
(क) उत्परिवर्तन
(ख) समसूत्री विभाजन
(ग) अर्धसूत्री विभाजन
(घ) पुनर्सम्मिश्रण
उत्तर
(क) उत्परिवर्तन

प्रश्न 8.
विकास का उत्परिवर्तनवाद निम्नलिखित में से किसने प्रतिपादित किया था? (2016)
(क) चार्ल्स डार्विन
(ख) ए०आर० वैलेस
(ग) ह्यूगो डी ब्रीज
(घ) हक्सले
उत्तर
(ग) ह्यूगो डी ब्रीज

प्रश्न 9.
जैव विकास में उत्परिवर्तन का महत्त्व है – (2017)
(क) जननात्मक विलगन
(ख) आनुवंशिकी पुनर्संयोजन
(ग) आनुवंशिक विभिन्नताएँ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) आनुवंशिक विभिन्नताएँ।

प्रश्न 10.
डार्विन फिंचेज उदाहरण हैं – (2017)
(क) अनुकूली विकिरण का
(ख) जेनेटिक ड्रिफ्ट का
(ग) अनुकूली अभिसरण का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) अनुकूली विकिरण का

प्रश्न 11.
निम्नलिखित किस सिद्धान्त को डार्विन ने प्रतिपादित नहीं किया था? (2018)
(क) पैंजेनेसिस
(ख) प्राकृतिक चयन
(ग) जनन प्रबल की निरन्तरता
(घ) लैंगिक चयन
उत्तर
(ग) जनन प्रबल की निरन्तरता

प्रश्न 12.
आधुनिक गानव का निकट सम्बन्धी है – (2017)
(क) गोरिल्ला
(ख) गिबन
(ग) ओरंग-उटान
(घ) चिम्पैंजी
उत्तर
(घ) चिम्पैंजी

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन वास्तविक मानव है? (2015)
(क) निएण्डरथल मानव
(ख) होमो इरेक्टस
(ग) होमो हेबिलिस
(घ) शिवापिथिकस
उत्तर
(क) निएण्डरथल मानव

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयोजक कड़ी से आप क्या समझते हैं। उस जीवाश्म जन्तु का नाम बताइए जो प्रमाणित | करता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ है। (2013)
या
आर्किओप्टेरिक्स किन वर्गों की संयोजी कड़ी है? (2013, 16)
उत्तर
जन्तु जगत में कुछ जीव ऐसे हैं जिनके लक्षण दो समीप वर्गों के लक्षणों से मिलते हैं। इनमें से एक वर्ग के जन्तु कम विकसित तथा दूसरे वर्ग के जन्तु अधिक विकसित होते हैं। ऐसे जन्तुओं को संयोजी कड़ियाँ (Connecting links) कहा जाता है।
उदाहरण – आर्किओप्टेरिक्स जो पक्षी तथा सरीसृप वर्ग के बीच की कड़ी है।

प्रश्न 2.
पेरीपैटस किन दो संघों के बीच की कड़ी है? (2012)
उत्तर
पेरीपैटस (Peripatus) को संघ आर्थोपोडा तथा एनेलिडा के बीच की कड़ी माना जाता है, क्योंकि इसमें इन दोनों ही संघों के लक्षण पाये जाते हैं।

प्रश्न 3.
एनेलिडा एवं आर्थोपोडा संघ तथा सरीसृप एवं पक्षी वर्ग को जोड़ने वाली कड़ियों के नाम लिखिए। (2015)
उत्तर
एनेलिडा एवं आर्थोपोडा संघ को जोड़ने वाली कड़ी-पेरीपैटस
सरीसृप एवं पक्षी वर्ग को जोड़ने वाली कड़ी-आर्किओप्टेरिक्स।

प्रश्न 4.
अवशेषी अंग से आप क्या समझते हैं? मनुष्य में पाये जाने वाले एक अवशेषी अंग का नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
वे अंग जो हमारे पूर्वजों में क्रियाशील थे किन्तु उनका उपयोग न होने के कारण वे धीरे-धीरे । लुप्त हो गये और केवल अवशेष के रूप में पाये जाते हैं, अवशेषी अंग कहलाते हैं; जैसे- कृमिरूप परिशेषिका, पूँछ कशेरुका आदि।

प्रश्न 5.
पैन्जेनेसिस का सिद्धान्त तथा पुनरावृत्ति का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया? (2018)
उत्तर
पैन्जेनिसस का सिद्धान्त डार्विन ने तथा पुनरावृत्ति का सिद्धान्त हीकल ने प्रतिपादित किया।

प्रश्न 6.
पूर्वजता या प्रत्यावर्तन को उदाहरण सहित समझाइए। (2017, 18)
उत्तर
किसी जीव या जीवों के समूह में किसी ऐसे लक्षण का आकस्मिक आना जो सामान्य रूप से उस जाति में नहीं पाया जाता परन्तु पहले किसी पूर्वज में पाया जाता था पूर्वजता या प्रत्यावर्तन कहलाता है। जैसे कभी-कभी बच्चे में जन्म के समय एक छोटी पूँछ का पाया जाना।

प्रश्न 7.
“योग्यतम की अतिजीविता’ की परिकल्पना किसने प्रस्तुत की थी? (2017)
उत्तर
हरबर्ट स्पेन्सर ने योग्यतम की अतिजीविता का सिद्धान्त सामाजिक विकास के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया तथा डार्विन ने इसे जैव विकास के प्राकृतिक चयन के सम्बन्ध में समझाया।

प्रश्न 8.
डार्विन के जैव विकास के सिद्धांत में सबसे बड़ी कमी किस चीज की जानकारी न होनी थी? (2014)
उत्तर
डार्विन के जैव विकास के सिद्धांत में सबसे बड़ी कमी आनुवंशिकता की जानकारी न होनी थी।

प्रश्न 9.
जीवन संघर्ष से आप क्या समझते हैं? यह सिद्धान्त किस वैज्ञानिक ने प्रस्तावित किया? (2015)
उत्तर
प्रत्येक जीव को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरे जीवों से संघर्ष करना पड़ता है। इसे ही जीवन संघर्ष कहते हैं। प्रत्येक जीव के लिए यह भ्रूणावस्था से प्रारम्भ होकर जीवनपर्यन्त चलता रहता है। यह सिद्धान्त डार्विन ने प्रस्तावित किया था।

प्रश्न 10.
रोमर के मतानुसार आधुनिक मानव की विभिन्न प्रजातियों के नाम लिखिए।
उत्तर
ए0एस0 रोमर (A.S. Romer) ने मानव प्रजातियों को निम्न चार प्रमुख समूहों में बाँटा है –

  1. कोकोसॉयड (Caucasoid) – इनके बाल धुंघराले, नाक पतली तथा त्वचा सफेद होती है। ये यूरोप, दक्षिणी-पश्चिमी एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में विकसित हुए।
  2. नीग्रॉयड (Negroid) – इनके बाल ऊनी व कुण्डलित, चौड़ी नाक तथा काली त्वचा थी। ये अफ्रीका, पेसिफिक द्वीप, कांगो, अण्डमान, मलाया, न्यूगिनी एवं फिलीपिन्स द्वीपों पर पाए जाते हैं।
  3. मोन्गोलॉयड (Mongoloid) – इनके बाल सीधे, नाक बीच की तथा त्वचा पीली, भूरी होती है। इसमें चीनी, जापानी, मंगोल, एस्किमो तथा रेड इंडियन मिलते हैं।
  4. ऑस्ट्रेलॉयड (Australoid) – इनके बाल धुंघराले, नाक बीच की तथा त्वचा भूरी होती है। ऑस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के बुशमैन, भारत के भील तथा श्रीलंका के वेढ़ा आदि इस प्रकार के मानव हैं।

प्रश्न 11.
वर्तमान मानव का वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
होमो सेपियन्स सेपियन्स (Homo sapiens sapiens)।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ओपैरिन की परिकल्पना पर टिप्पणी लिखिए। (2014)
या
जीवन की उत्पत्ति का रासायनिक मत बताइए। (2015)
उत्तर
आदि पृथ्वी पर रासायनिक उविकास के फलस्वरूप “जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विस्तृत और सर्वमान्य परिकल्पना रूसी जीव-रसायनशास्त्री ए०आई० ओपैरिन (A.I. Oparin) ने सन् 1924 में भौतिकवाद या पदार्थवाद (Materialistic Theory) के नाम से प्रस्तुत की। ओपैरिन की यह परिकल्पना 1936 में उनकी पुस्तक “The Origin of Life” में छपी। ऐसी ही परिकल्पना अंग्रेज, वैज्ञानिक हैल्डेन (Haldane) ने, जो 1961 में भारतीय नागरिक बन गए थे, सन् 1929 में प्रस्तुत की। इस परिकल्पना के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति और फिर इस पर जीवन की उत्पत्ति की पूरी प्रक्रिया को हम संक्षेप में आठ चरणों (steps) में बाँट सकते हैं –

  1. पहला चरण – परमाणु प्रावस्था
  2. दूसरा चरण – अणुओं एवं सरल अकार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति
  3. तीसरा चरण – कार्बनिक यौगिकों की उत्पत्ति एवं उविकास
  4. चौथा चरण – कोलॉइड्स, कोएसरवेट्स, वैयक्तिकता तथा रासायनिक स्वाधीनता
  5. पाँचवाँ चरण – स्व: उत्प्रेरक तन्त्रों, जीन्स, वायरसों तथा प्रारम्भिक जीवों की उत्पत्ति
  6. छठाँ चरण – प्रारम्भिक पूर्व केन्द्रकीय कोशिकाओं की उत्पत्ति
  7. सातवाँ चरण – स्व: पोषण की उत्पत्ति
  8. आठवाँ चरण – सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं अर्थात् प्रोटिस्टा की उत्पत्ति

प्रश्न 2.
मिलर के प्रयोग का वर्णन कीजिए तथा नामांकित चित्र बनाइए। (2013, 16)
या
मिलर के चिनगारी विमुक्ति उपकरण का नामांकित चित्र बनाइए। (2017)
उत्तर
स्टेनले मिलर का प्रयोग (Stanley Miller’s Experiment) – शिकागो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हेरोल्ड यूरे (Harold Urey) तथा स्टेनले मिलर (Stanley Miller) ने सन् 1953 में जीवन की उत्पत्ति के सन्दर्भ में प्रयोग किये। उन्होंने आदि पृथ्वी पर पाये जाने वाले आदि वातावरण की परिस्थिति को प्रयोगशाला में उत्पन्न किया तथा जीवन की उत्पत्ति की प्रयोगशाला में जाँच की। मिलर ने एक बड़े फ्लास्क में मेथेन, अमोनिया तथा हाइड्रोजन गैस 2 : 1 : 2 के अनुपात में ली।

गैसीय मिश्रण को टंगस्टन के इलेक्ट्रोड द्वारा गर्म किया गया। दूसरे फ्लास्क में जल को उबालकर जल वाष्प (water vapor-H,0) बनायी जिसे एक मुड़ी हुई काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क में प्रवाहित किया। इसके उपरान्त दोनों के मिलने से बने मिश्रण को कण्डेन्सर द्वारा ठण्डा किया गया। ठण्डा मिश्रण एक U नली में एकत्रित किया गया जो गन्दे लाल रंग का द्रव था। इस प्रकार पूरे सप्ताह तक यह प्रयोग किया गया। प्रयोग द्वारा प्राप्त तरल द्रव का रासायनिक परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इसमें ग्लाइसीन (glycine); ऐलेनिन (alanine) नामक अमीनो अम्ल तथा अन्य जटिल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हो गया था (चित्र)।
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इसी प्रकार अनेक वैज्ञानिकों; जैसे- सिडनी फॉक्स (Sydney Fox), केल्विन (Calvin) तथा मैल्विन (Melvin) आदि ने प्रयोगों द्वारा अनेक अमीनो अम्ल तथा जटिल यौगिकों का संश्लेषण किया। इन्हें अनुरूपण प्रयोग (simulation experiments) कहा जाता है।

प्रश्न 3.
उत्परिवर्तन क्या है ? जैव विकास में इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए। (2010)
या
‘उत्परिवर्तन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2011)
या
उत्परिवर्तन की परिभाषा तथा कारण लिखिए। (2012)
या
उत्परिवर्तनवाद की व्याख्या कीजिए। (2011)
या
उत्परिवर्तन की परिभाषा दीजिए। उत्परिवर्तनवाद किस वैज्ञानिक ने दिया? (2013, 14)
उत्तर
उत्परिवर्तन
ह्यूगो डी ब्रीज (Hugo de Vries, 1848 – 1935), हॉलैण्ड के एक प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री ने सांध्य प्रिमरोज (evening primrose) अर्थात् ऑइनोथेरा लैमार्किआना (Oenothera lamarckigna) नामक पौधे की दो स्पष्ट किस्में देखीं, जिनमें तने की लम्बाई, पत्तियों की आकृति, पुष्पों की आकृति एवं रंग में स्पष्ट भिन्नताएँ थीं। इन्होंने यह भी देखा कि अन्य पीढ़ियों में कुछ अन्य प्रकार की वंशागत विभिन्नताएँ भी उत्पन्न हुईं। डी ब्रीज ने इस पौधे की शुद्ध नस्ल की इस प्रकार की सात जातियाँ प्राप्त कीं। उन्होंने इन्हें प्राथमिक जातियाँ (primary species) कहा। जातीय लक्षणों में होने वाले इन आकस्मिक (sudden) वंशागत परिवर्तनों को डी ब्रीज ने उत्परिवर्तन (mutation) कहा और सन् 1901 में उन्होंने इस सम्बन्ध में एक उत्परिवर्तन सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

उन्होंने बताया कि नयी जीव जातियों का विकास लक्षणों में छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा न होकर एक ही बार में स्पष्ट एवं वंशागत आकस्मिक परिवर्तनों अर्थात् उत्परिवर्तनों के द्वारा होता है। उन्होंने यह भी बताया कि जाति का प्रथम सदस्य, जिसमें उत्परिवर्तन होता है, उत्परिवर्तक (mutant) है और यह शुद्ध नस्ल (pure breed) का होता है। उत्परिवर्तन की यह प्राकृतिक प्रवृत्ति (inherent tendency) लगभग सभी जीव-जातियों में पायी जाती है। उत्परिवर्तन अनिश्चित (indeterminate) होते हैं तथा लाभदायक अथवा हानिकारक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। ये किसी एक अंग विशेष अथवा एक से अधिक अंगों में साथ-साथ हो सकते हैं।

एक जाति के विभिन्न सदस्यों में अलग-अलग प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं। इस प्रकार एक जनक अथवा पूर्वज जाति से अनेक मिलती-जुलती नयी जातियों की उत्पत्ति सम्भव है। ये उत्परिवर्तन जननद्रव्य (germplasm) में होते हैं तथा इनसे उत्पन्न भिन्नताएँ वंशागत होती हैं।

मॉर्गन (T.H. Morgan, 1909) ने डी ब्रीज के विचारों से असहमति व्यक्त करते हुए ड्रोसोफिला (Drosophila) नामक फल मक्खी (fruit fly) पर आधारित अपने अध्ययन के आधार पर उत्परिवर्तनों को आकस्मिक रूप से होने वाले परिवर्तन बताया जो जीन या गुणसूत्रों में होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केवल जननिक उत्परिवर्तन ही वंशागत होते हैं। ये प्रभावी एवं अप्रभावी दोनों प्रकार के हो सकते हैं। प्रभावी उत्परिवर्तन शीघ्र ही अभिव्यक्त हो जाते हैं, जबकि अप्रभावी उत्परिवर्तन कई पीढ़ियों बाद भी प्रकट हो सकते हैं। घातक उत्परिवर्तन प्राय: अप्रभावी होते हैं। उत्परिवर्तन की दर विकिरण (radiation), रासायनिक उत्परिवर्तकों (chemical mutagens) तथा वातावरणीय दशाओं आदि कारकों पर निर्भर करती है। उत्परिवर्तन शरीर के लगभग सभी लक्षणों को प्रभावित कर सकते हैं।

उत्परिवर्तन एवं जैव विकास
उत्परिवर्तन जैव विकास-क्रिया को सीधे ही प्रभावित करते हैं। इसे निम्नलिखित तथ्यों द्वारा भली प्रकार समझा जा सकता है –

  1. उत्परिवर्तन बहुत ही अल्प समय में हो जाते हैं अत: जैव विकास की क्रिया में अत्यधिक महत्त्व रखते हैं।
  2. संयोजी कड़ियों की उपस्थिति को उत्परिवर्तन सिद्धान्त द्वारा सहज ही समझा जा सकता है।
  3. डॉबजैन्स्की (Dobzhansky) के अनुसार जीव को वातावरण के प्रति अनुकूल बनाने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक चयन (natural selection) द्वारा शीघ्र जीनिक संरचना में संकलित हो जाते हैं। इस प्रकार उत्परिवर्तनों का जैव विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है।

प्रश्न 4.
क्या सभी प्रकार के उत्परिवर्तन जीवों के लिए हानिकारक होते हैं? अगर नहीं तो क्यों?
उत्तर
सभी प्रकार के उत्परिवर्तन जीवों के लिए हानिकारक नहीं होते हैं क्योंकि कुछ उत्परिवर्तन तो संरचनात्मक होते हैं जिनके प्रभाव जीव के शरीर पर स्पष्ट दिखाई देते हैं; जैसे- हमारे बालों, त्वचा, नेत्रों आदि का काला या भूरा होना। इसके अतिरिक्त कुछ जीन उत्परिवर्तन के बाद जीव को (विशेषकर जीवाणुओं को) पूरकपोषी (auxotrophic) बना देते हैं। कुछ जीनी उत्परिवर्तन ही प्राण घातक (lethal) या प्रतिबन्धित प्राण घातक (conditional lethal) होते हैं।

प्रश्न 5.
जननिक/वंशागत एवं उपार्जित विभिन्नताओं/लक्षणों में अन्तर बताइए। (2009)
या
वंशागत तथा उपार्जित लक्षणों में अन्तर बताइए तथा प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए। (2014, 16)
या
वंशागत तथा उपार्जित लक्षणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
जननिक/वंशागत तथा उपार्जित विभिन्नताओं/लक्षणों में अन्तर
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प्रश्न 6.
अनुकूली विकिरण क्या है? इसके किन्हीं तीन कारणों का उल्लेख कीजिए। (2017)
उत्तर
अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) – एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम एक बिन्दु से प्रारम्भ होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होने को अनुकूली विकिरण कहते हैं। उदाहरण-गैलापैगोस द्वीप समूह पर डार्विन की फिंचे पक्षियों का अनुकूली विकिरण तथा ऑस्ट्रेलिया में शिशुधानी जन्तुओं में अनुकूली विकिरण।। अनुकूली विकिरण के लिए उत्तरदायी तीन प्रमुख कारण निम्न हैं –

  1. प्रकृति में एक जीव-जाति की उत्पत्ति एक बार तथा एक क्षेत्र में होती है।
  2. किसी जाति की आबादी बढ़ने पर इसके सदस्य उत्पत्ति क्षेत्र के चारों ओर फैल जाते हैं।
  3. एक ही जाति के जीवों में अलग-अलग वातावरण के अनुरूप परिवर्तन होने से नई प्रजातियाँ बनती हैं।

प्रश्न 7.
डार्विन के प्राकृतिक वरणवाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012, 15)
उत्तर
जैव विकास को समझाने के लिए डार्विन ने प्राकृतिक वरणवाद या प्राकृतिक चयनवाद प्रस्तुत किया। इसके अनुसार प्रत्येक जीव में सन्तान उत्पत्ति की प्रचुर क्षमता पाई जाती है। इनमें से अधिकांश जीव वृद्धि करके अपनी जनसंख्या बढ़ाते हैं। इस बढ़ी हुई जनसंख्या के कारण समान जाति या भिन्न-भिन्न जाति के जीवों के बीच अस्तित्व के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। ये संघर्ष प्रायः समान आवश्यकताओं के लिए होता है। संघर्ष में वे जीव ही जीतते हैं जिनमें सामान्य जीवों से हटकर कुछ अलग विभिन्नताएँ (variations) पाई जाती हैं। ये विभिन्नताएँ आनुवंशिक होती हैं और प्रकृति द्वारा जीवों में उत्पन्न की जाती हैं। इस प्रकार विभिन्नताओं से युक्त जीव ही आने वाली पीढ़ियों में जीवित रहते हैं। ये जीव वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को सहने में समर्थ होते हैं।

प्रश्न 8.
लैमार्क के मूल आधार क्या थे? (2013)
उत्तर
लैमार्क के मूल आधार निम्नलिखित हैं –

  1. जीव के आन्तरिक बल में जीवों के आकार को बढ़ाने की प्रवृत्ति होती है जिसका अर्थ यह है कि जीवों के पूरे शरीर तथा उनके विभिन्न अंगों में बढ़ने की प्रवृत्ति होती है।
  2. जीवों की लगातार नयी जरूरतों के अनुसार नये अंगों तथा शरीर के दूसरे भागों का विकास होता है।
  3. किसी अंग का विकास तथा उसके कार्य करने की क्षमता उसके उपयोग तथा अनुपयोग पर निर्भर करती है। लगातार उपयोग से अंग धीरे-धीरे मजबूत हो जाते हैं तथा पूर्णतः विकसित हो जाते हैं। जबकि उनके अनुपयोग से इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है। इससे इन अंगों का धीरे-धीरे अपह्रास (degeneration) हो जाता है और अन्त में ये लुप्त हो जाते हैं।
  4. इस प्रकार जीवनकाल में आये परिवर्तनों को जीव उपार्जित (acquire) कर लेता है और उसे आनुवंशिकी (heredity) द्वारा अपनी संतानों में पहुँचा देता है।

प्रश्न 9.
अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिद्धान्त क्या है? इस सिद्धान्त को किस वैज्ञानिक ने प्रतिपादित किया था? (2011)
उत्तर
अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिद्धान्त
फ्रांस के प्रसिद्ध जीवशास्त्री जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क (Jean Baptiste de Lamarck, 1744 – 1829) ने जैव विकास क्रिया को समझाने के लिए सर्वप्रथम उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिद्धान्त प्रस्तुत किया, जो उनकी पुस्तक फिलोसफी जुलोजिक (Philosophic Zoologique) में सन् 1809 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग के प्रभाव का सिद्धान्त भी दिया। उनके विचार लैमार्कवाद के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके अनुसार, वातावरण के प्रभाव से अंगों में आकार वृद्धि की प्रवृत्ति होने के कारण तथा शरीर के कुछ अंगों का प्रयोग अधिक व कुछ का कम होने के कारण अधिक उपयोग में आने वाले अंग अधिक विकस्ति हो जाते हैं, जबकि कम उपयोग में आने वाले अंग कम विकसित हो पाते हैं।

कुछ अंगों को लगातार अनुपयोग होने के कारण उनका ह्रास (degeneration) भी होता है और ये अवशेषी अंगों (vestigial organs) के रूप में शेष रह जाते हैं या फिर लुप्त हो जाते हैं। जीवों के जीवनकाल में या तो वातावरण के सीधे प्रभाव से या फिर अंगों के अधिक अथवा कम उपयोग के कारण जो शारीरिक परिवर्तन होते हैं, वे उपार्जित लक्षण (acquired characters) कहलाते हैं। ये लक्षण वंशागत होते हैं तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आने वाली सन्तानों में पहुँचते रहते हैं। इस प्रकार हजारों वर्ष पश्चात् । सन्तानें अपने पूर्वजों से पर्याप्त भिन्न होकर नयी-नयी जातियों का रूप ले लेती हैं।

प्रश्न 10.
लैमार्कवाद के अनुसार आधुनिक सर्प पैर रहित तथा बत्तख के पैर जालयुक्त होते हैं। समझाइए। (2017)
उत्तर
लैमार्क के अनुसार सर्प झाड़ियों तथा बिलों में रहता है तथा जमीन पर रेंगकर चलता है जिसके कारण उसके पैर इस्तेमाल नहीं होते थे तथा बिल में घुसने में भी बाधा उत्पन्न करते थे इसलिए इनके पैर धीरे-धीरे लुप्त होते चले गये जबकि अन्य सरीसृपों मे पैर उपस्थित होते हैं।

लैमार्क का मानना था कि बत्तख प्रारम्भ में स्थलीय थे जो खाने की खोज में पानी में जाया करते थे। पानी में चलने के लिए उन्हें अपने पंजे फैलाने पड़ते थे। इसके परिणामस्वरूप उनके पंजों के आधार पर त्वचा लगातार खिंचती गयी और पेशीय चलन से पंजों में रुधिर का बहाव बढ़ गया। अतः त्वचा ने अंगुलियों के बीच में पाद जाल का रूप ले लिया।

प्रश्न 11.
भौमिक समय सारणी क्या है? कौन-सा महाकल्प सरीसृप युग कहलाता है और क्यों? (2017)
उत्तर
पृथ्वी का आवरण बनने से लेकर पृथ्वी के इतिहास के सम्पूर्ण समय का मापक्रम भौमिक समय सारणी (geological time scale) कहलाता है।
मीसोजोइक महाकल्प को सरीसृप का युग कहा जाता है क्योंकि इस महाकल्प में पूरी पृथ्वी पर विशालकाय सरीसृपों जैसे डायनोसोर का आधिपत्य था।

प्रश्न 12.
मानव एवं कपि में समानताएँ और असमानताएँ बताइए। (2014)
या
मानव और कपि में चार अन्तर बताइए। (2009,12,17)
उत्तर
कपि और मानव में समानताएँ
कपि तथा मानव का विकास समान पूर्वजों से हुआ है। दोनों के लक्षणों में अनेक समानताएँ मिलती हैं: जैसे-वक्ष भाग का चौड़ा होना, अँगुलियों में नाखूनों का होना, मस्तिष्क एवं कपालगुहा का चौड़ा होना, सिर बड़ा, गर्दन व पाद अपेक्षाकृत लम्बे, पूँछ को अभाव, प्रत्येक भौंह के नीचे हड्डी का उभार,पोषण शाकाहारी, कभी-कभी मांसाहारी, पति-पत्नी के रूप में गृहस्थ जीवन की भावना का विकास आदि।
कपि और मानव में अन्तर
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव विकास सिद्धान्त के समर्थन में उपस्थित विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख कीजिए। (2009, 12)
या
जैव विकास के पक्ष में दिये जाने वाले किन्हीं तीन प्रमाणों की व्याख्या उदाहरण सहित कीजिए (2011)
या
समजातता की परिभाषा दीजिए। यह किस प्रकार समवृत्तिता से भिन्न है? इनका जैव विकास में क्या महत्त्व है?
या
जैव विकास के पक्ष में दिये जाने वाले विभिन्न प्रमाणों का उल्लेख कीजिए। तुलनात्मक शरीर रचना से सम्बन्धित प्रमाणों की व्याख्या कीजिए। (2014, 16)
या
जैव विकास की मौलिक परिकल्पना क्या है? इसे प्रमाणित करने के लिए किन्हीं चार प्रमाणों के नाम लिखिए। (2014, 16)
या
समजात एवं समरूप अंगों की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। (2015)
या
“व्यक्तिवृत्त में जातिवृत्त पुनरावृत्ति” की व्याख्या कीजिए। (2017)
या
आर्कियोप्टेरिक्सका विकास किस कल्प एवं युग में हुआ था? इसके सरीसृप वर्ग तथा पक्षी वर्ग का एक-एक लक्षण लिखिए। (2017)
या
समजात अंग और समरूप अंग का एक-एक उदाहरण देते हुए अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2017)
या
समजात एवं समरूप अंगों में दो अन्तर लिखिए तथा प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए। (2017)
या
जैव विकास के पक्ष में तुलनात्मक आकारिकी एवं तुलनात्मक भौणिकी का वर्णन साक्ष्य या प्रमाण के साथ कीजिए। (2015, 17)
उत्तर
जैव विकास की मौलिक परिकल्पना
“परिवर्तन के साथ अवतरण (Descent with change or modification)” जैव विकास की मौलिक परिकल्पना है। “विकास या उद्विकास (evolution)” शब्द का साहित्यिक अर्थ है-“सिमटी वस्तु का खुलकर या फैलकर समय-समय पर हुए परिवर्तनों को प्रदर्शित करना (e, out + volvere, to roll = unrolling or unfolding to reveal modifications)”, a mai fos साइकिल, मोटर, रेल, जहाज आदि के प्रथम नमूने घटिया और कम लाभदायक थे। यदि हम इन पब के आविष्कारों के बाद के इनके विकास-इतिहासों को पढ़े तो हमें पता लग जाएगा कि लोगो ने समय-समय पर इनमें क्या-क्या क्रमिक सुधार किए जिससे वर्तमान नमूनों का विकास हुआ। ठीक इसी प्रकार, जैव विकास का भी संक्षेप में मतलब यही है कि प्रत्येक जीव-जाति के लक्षणों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी, प्राकृतिक आवश्यकताओं के अनुसार, कुछ परिवर्तन होते रहते हैं जो हजारों-लाखों वर्षों में इस जाति से नई, अधिक सुसंगठित एवं जटिल जातियों के विकास का कारण बनते हैं।

अत: जैव-विकास परिकल्पना के अनुसार, प्रत्येक वर्तमान जीव-जाति का विकास किसी-न-किसी, अपेक्षाकृत निम्न कोटि की, भूतकालीन (पूर्वज) जाति से हुआ है। इस प्रकार, प्रारम्भिक, निम्न कोटि के सरल जीवों से, क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवं जटिल जीवों की उत्पत्ति को ही जैव विकास कहते हैं। अत: जीवन की उत्पत्ति के ओपैरिनवाद (Oparin theory) के अनुसार बने, प्रारम्भिक, कोशिकारूपी सरल आदिजीवों से, एक ओर जटिल एककोशिकीय जीवों का विकास हुआ तथा दूसरी ओर इनमें से कुछ ने समूहों में एकत्र होकर प्रारम्भिक बहुकोशिकीय जीवों की उत्पत्ति की। फिर प्रारम्भिक बहुकोशिकीय जीवों की कोशिकाओं के बीच धीरे-धीरे कार्यों का बँटवारा, अर्थात् श्रम विभाजन (division of labour) हो जाने से, इनमें कोशिकीय विभेदीकरण (cell differentiation) हुआ। इस प्रकार, शनैः शनैः शरीर के अधिकाधिक सुचारू संघटन के कारण नई-नई उच्चतर श्रेणियों की जीव-जातियों का विकास होता गया।

जैव विकास के प्रमाण
वर्तमान युग में जीवों की उत्पत्ति प्राचीन काल के सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों के फलस्वरूप हुई। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए कुछ ठोस प्रमाण इस प्रकार हैं –

  1. संयोजी कड़ियों से प्रमाण (evidences from connecting link)।
  2. तुलनात्मक आकारिकी से प्रमाण (evidences from comparative morphology)
    • समजात अंगों से प्रमाण (evidences from homologous organs)।
    • समवृत्ति अंगों से प्रमाण (evidences from analogous organs)।
  3. अवशेषी अंगों से प्रमाण (evidences from vestigial organs)।
  4. वर्गीकरण से प्रमाण (evidences from classification)।
  5. भ्रूण विज्ञान से प्रमाण (evidences from embryology)।
  6. शरीर क्रिया-विज्ञान से प्रमाण (evidences from physiology)।
  7. प्राणियों के भौगोलिक वितरण तथा पृथक्करण से प्रमाण (evidences from geographical distribution and isolation of animals)
  8. आनुवंशिकी से प्रमाण (evidences from genetics)।
  9. पूर्वजता (atavism or reversion)।
  10. जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण (evidences from palaeontology)।

संयोजक कड़ियाँ तथा उनसे जैव विकास के प्रमाण
कुछ जीव जातियों में दो समीप के वर्गों के लक्षण पाये जाते हैं। इनमें कम विकसित जातियों के साथ ही उच्च श्रेणी की अधिक विकसित जातियों के लक्षण मिश्रित रूप से पाये जाते हैं। ये संयोजक कड़ियाँ या संयोजक जातियाँ (connecting links or connecting species) कहलाती हैं तथा ये जैव विकास के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। संयोजक जातियों के कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण इस प्रकार हैं –
(i) विषाणु (Virus) – इसे सजीव तथा निर्जीव के बीच की कड़ी माना जाता है।

(ii) युग्लीना (Euglena) – प्रोटोजोआ संघ का यह एक एककोशिकीय क्लोरोफिलयुक्त सदस्य है। सामान्य जन्तुसम भोजन प्राप्त करने तथा गति (movement) के कारण यह जन्तुओं से तथा क्लोरोफिल (chlorophyll) की उपस्थिति के कारण पादपों से समानता रखता है। इस प्रकार यह जन्तुओं एवं पादपों के मध्य संयोजक कड़ी के रूप में पहचाना जाता है।

(iii) प्रोटेरोस्पंजिया (Proterospongia) – प्रोटोजोआ संघ का यह एक निवही (colonial) जन्तु है। यह स्पंज (sponge) के समान कीप कोशिकाओं अथवा कोएनोसाइट्स (collared cells or choanocytes) का बना होता है। इस प्रकार यह प्रोटोजोआ एवं स्पंज के बीच की संयोजक कड़ी है।

(iv) निओपिलाइना (Neopling) – संघ मॉलस्का (mollusca) के इस जन्तु में कवच व मैण्टल (shell and mantle) पाये जाते हैं तथा इसके अधरतल पर चपटा व मांसल पाद (foot) भी होता है। प्रशान्त महासागर से प्राप्त इस जन्तु में खण्डयुक्त शरीर (segmented body), क्लोम (gills) तथा ट्रोकोफोर (trochophore) जैसी भ्रूण प्रावस्था आदि संघ ऐनेलिडा (annelida) के समान लक्षण भी पाये जाते हैं। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि संघ मॉलस्का का विकास संघ ऐनेलिडा के सदस्यों से हुआ है।

(v) पेरीपेंटस (Peripatus) – संघ आर्थोपोडा (arthropoda) का यह एक सुंडी के समान (caterpillar like) जन्तु है, जिसमें समखण्डीय जोड़ीदार पाद, सिर पर एण्टिनी तथा संयुक्त नेत्र होते हैं। दूसरी ओर इसमें संघ ऐनेलिडा के समान काइटिनरहित क्यूटिकल तथा उत्सर्गिकाएँ (nephridia) पायी जाती हैं। इस प्रकार यह ऐनेलिडा से आर्थोपोडा के विकास को प्रमाणित करता है।

(vi) आर्किओप्टेरिक्स (Archaeopteryx) – इसका उद्भव मीसोजोइक महाकल्प के जुरैसिक . कल्प में हुआ था। इस पक्षी के जीवाश्म (fossils) लगभग 15 करोड़ वर्ष प्राचीन जुरैसिक (Jurassic) चट्टानों से प्राप्त हुए हैं। इसमें सरीसृपों (reptilia) के समान लम्बी पूँछ, चोंच में दाँत तथा अग्रपाद पंजे (claws) युक्त थे। पक्षियों के समान उड़ने के लिए इस जन्तु में विकसित पंख भी थे। इस प्रकार यह सरीसृपों एवं पक्षियों के बीच की संयोजक कड़ी है।

(vii) प्रोटोथेरिया समूह के जन्तु (Animals of Prototheria Group) – ऑस्ट्रेलिया में पाये जाने वाले कुछ वर्ग स्तनधारी (mammalia) के जन्तु हैं। इनकी तीन श्रेणियाँ एकिडना (echidna); जैसे- टैकीग्लॉसस (Tachyglossus), जैग्लॉसस (Jaglossus) तथा ऑॉर्नथोरिन्कस (Ornithorthynchus) हैं। इनमें एक ओर तो स्तनधारियों के समान शरीर पर बाल व दुग्ध ग्रन्थियाँ होती हैं तथा दूसरी ओर सरीसृपों के समान इनमें कर्ण पल्लवों का अनुपस्थित होना, क्लोएका (Cloaca) का पाया जाना, मादाओं का अण्डे देना आदि लक्षण पाये जाते हैं। इस प्रकार इन्हें सरीसृपों एवं स्तनधारियों के बीच की संयोजक कड़ी माना गया है।

जैव विकास के तुलनात्मक आकारिकी से प्रमाण
जन्तुओं की तुलनात्मक आकारिकी (comparative morphology) के अध्ययन से ज्ञात होता है कि एक ही उत्पत्ति के अंग भिन्न-भिन्न जन्तुओं में आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के हो जाते हैं, जबकि अनेक जन्तुओं में एक कार्य को करने के लिए विकसित विभिन्न प्रकार की उत्पत्ति के अंगों में समरूपता होती है। इनको क्रमशः समजातता (homology) तथा समरूपता (analogy) कहते हैं।

समजातता एवं समजात अंग
सर रिचर्ड ओवन (Sir Richard Ovan-1843) ने समजातता की परिभाषा दी थी। जब अंगों की मूल रचना (basic structure) तथा उद्भव (origin) समान होते हैं, परन्तु इनके कार्यों में समानता होना आवश्यक नहीं होता तो यह समजातता (homology) कहलाती है अर्थात् समान उद्भव एवं मूल रचना वाले अंग जो भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए अनुकूलित होते हैं, समजात अंग (homologous organs) कहे जाते हैं; जैसे-पक्षियों के पंख, सील (seal) के फ्लिपर (flipper), चमगादड़ का पैटेजियम (patagium), ह्वेल व पेंग्विन के चप्पू (paddle), घोड़े के अग्रपाद, मनुष्य के हाथ इत्यादि। विभिन्न प्राणियों में उपलब्ध समजातता यह स्पष्ट करती है कि इनका विकास समान पूर्वजों से ही हुआ है। अतः समजातता अपसारी जैव विकास (divergent organic evolution) का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
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समरूपता एवं समरूप अंग
ऐसे अंग जो समान कार्य के लिए अनुकूलित (adapted) हो जाने के फलस्वरूप एक जैसे दिखायी देते हैं, लेकिन मूल रचना एवं उत्पत्ति में भिन्न होते हैं, समरूप अंग (analogous organs) कहलाते हैं। इस स्थिति को समरूपता या समवृत्तिता (analogy) कहते हैं। कीट-पतंगों के पंख, पक्षियों एवं चमगादड़ के पंखों के समान दिखायी पड़ते हैं तथा उड़ने का कार्य करते हैं, परन्तु अकशेरुकीय होने के कारण कीटों के पंखों में कंकाल नहीं पाया जाता, जबकि चमगादड़ व पक्षी कशेरुकीय होते हैं और इनमें अस्थियों-उपास्थियों का कंकाल पाया जाता है। इस प्रकार मौलिक रचना में दोनों प्रकार के पंख एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

समरूपता से अभिसारी जैव विकास (convergent organic evolution) के प्रमाण प्राप्त होते हैं।
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जैव विकास के तुलनात्मक भौणिकी से प्रमाण
यदि हम विभिन्न जन्तुओं की भ्रूणीय अवस्थाओं का अध्ययन करें तो हमें यह पता चलता है कि विभिन्न जन्तुओं के भ्रूण में उनकी प्रौढ़ अवस्थाओं से ज्यादा समानताएँ होती हैं। इस तथ्य से प्रभावित होकर वैज्ञानिक अर्नस्ट हीकल (Ernst Haeckel: 1834-1919) ने एक नियम बनाया जिसे उन्होंने पुनरावृत्ति सिद्धांत (recapitulation theory) या बायोजेनेटिक नियम (biogenetic law) कहा जिसके अनुसार, प्रत्येक जीव का व्यक्तिवृत्त उसके जातिवृत्त की पुनरावृत्ति करता है (ontogeny repeats phylogeny)। व्यक्तिवृत्त (ontogeny) एक जीव का जीवन काल है जो अण्डाणु से शुरू होता है तथा जातिवृत्त (phylogeny) जीवों के परिपक्व या वयस्क पूर्वजों को वह क्रम है जो उस जीव समूह के जैव विकास के दौरान बने होंगे। इससे तात्पर्य यह है कि प्रत्येक जीव अपनी भौणिक अवस्था में अपने पूर्वजों के इतिहास को प्रदर्शित करता है अर्थात् पुनरावृत्ति सिद्धांत के अनुसार उच्च कोटि या जाति के जन्तुओं की भौणिक अवस्था उनके पूर्वजों की वयस्क अवस्था से मिलती है।
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सभी बहुकोशिकीय जीवों में लैंगिक जनन के समय अण्डाणु तथा शुक्राणु के संयोजन से युग्मनज (zygote) बनता है जिसमें विदलन (Cleavage) के फलस्वरूप, मोरूला, ब्लास्टुला, गेस्ट्रला अवस्थाएँ पायी जाती हैं जिससे आगे चलकर भ्रूण का विकास होता है। यदि हम विभिन्न कशेरुकियों के भ्रूण को पास-पास रखकर अध्ययन करें तो उसमें बहुत-सी समानताएँ दिखाई देती हैं; जैसे- क्लोम तथा क्लोम दरारें, नोटोकॉर्ड, दो वेश्मी हृदय तथा पूँछ। इस अध्ययन से यह प्रमाणित हो । जाता है कि सभी कशेरुकियों का विकास मछलियों के समान किसी निम्न श्रेणी के जन्तु से हुआ है। इसलिये वान बियर (Von Baer, 1792 – 1876) ने इससे पहले भ्रूणीय परिवर्धन के चार मूल सिद्धान्त दिये जो निम्नलिखित हैं –

  1. सामान्य लक्षण (general characters) विशिष्ट लक्षणों (special characters) से पहले बनते हैं।
  2. ज्यादा सामान्य लक्षणों से कम सामान्य लक्षण तथा फिर विशिष्ट लक्षण विकसित होते हैं।
  3. परिवर्धन के समय भ्रूण धीरे-धीरे दूसरे जीवों के भ्रूण से अलग होता जाता है।
  4. किसी जन्तु की प्रारम्भिक भ्रूण अवस्था दूसरे कम विकसित जन्तु के भ्रूण से ज्यादा मिलती है। न कि उसके वयस्क से।

प्रश्न 2.
जैव विकास के पक्ष में जीवाश्म विज्ञान के प्रमाण पर टिप्पणी लिखिए। (2016, 18)
उत्तर
जैव विकास के जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण
(Gr. Palaeos = ancient, onta – existing things and logous = science) जीवाश्म (fossil) का अध्ययन जीवाश्म विज्ञान (Palaeontology) कहलाता है। जीवाश्म का अर्थ उन जीवों के बचे हुए अंश से है जो अब से पहले लाखों-करोड़ों वर्षों पूर्व जीवित रहे होंगे। जीवाश्म लैटिन शब्द फॉसिलिस (fossilis) से बना है जिसका मतलब है खोदना (dug up)। यह जीव विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है जो जीव विज्ञान (Biology) और भूविज्ञान (Geology) को जोड़ती है।

जीवाश्म का बनना
1. अश्मीभूत जीवाश्म (Petrified Fossils) – जीवाश्म मुख्यत: अवसादी शैल (sedimentary rocks) में पाये जाते हैं जो समुद्र या झीलों के तल पर रेत के जमा हो जाने से बनते हैं। मरे हुए जीवों का पूरा शरीर रेत से ढक जाता है तथा धीरे-धीरे यह ठोस पत्थर में परिवर्तित हो जाता है। इसी प्रकार मृत जीवों के विभिन्न भागों का एक स्पष्ट अक्स (चित्र) पत्थर पर बन जाता है इस क्रिया को अश्मीभवन (petrifaction) कहते हैं तथा इस प्रकार बने जीवाश्मों को अश्मीभूत जीवाश्म (perified fossils) कहते हैं।

2. साँचा जीवाश्म (Mould Fossils) – उन जीवाश्मों में जिनमें शरीर का कोई भाग शेष नहीं | रहता केवल शरीर का साँचा मात्र रह जाता है, इसे साँचा जीवाश्म (mould fossils) कहते हैं।

3. अपरिवर्तित जीवाश्म (Unaltered Fossils) – जब जीवधारी का पूरा शरीर बर्फ में भली प्रकार से सुरक्षित रहकर सम्पूर्ण जीवाश्म बनाता है तब इन्हें अपरिवर्तित जीवाश्म (unaltered fossils) कहते हैं।

4. ठप्पा जीवाश्म (Print Fossils) – कभी-कभी मरने के बाद सड़ने से पहले जीव चट्टानों पर अपना ठप्पा बना जाते हैं, ऐसे जीवाश्म को ठप्पा जीवाश्म (print fossils) कहते हैं।

जीवाश्म का महत्त्व
जीवाश्म के अध्ययन से जीवों की उपस्थिति का पता चलता है। जीवाश्म यह भी दर्शाते हैं कि विभिन्न पौधों एवं जन्तुओं में जैविक विकास किस तरह हुआ। निम्न तथ्यों से इसका पता चलता है –

  1. विभिन्न भूवैज्ञानिक स्तरों से प्राप्त जीवाश्म विभिन्न वंशों के होते हैं।
  2. सबसे नीचे पाये जाने वाले भूवैज्ञानिक स्तरों में सबसे सरल जीव होते थे, उससे ऊपर पाये जाने वाले स्तरों में क्रमशः जटिल जीवों के जीवाश्म पाये जाते हैं। इससे पता चलता है कि जन्तुओं का विकास निम्न प्रकार से हुआ –
    एककोशिकीय प्रोटोजोआ → बहुकोशिकीय जन्तु → अकशेरुक जन्तु → कशेरुक जन्तु।
  3. विभिन्न स्तरों से प्राप्त जीवाश्मों से पता चलता है कि विभिन्न वर्गों के जीवों के बीच की संयोजी कड़ी भी थी जो जैव विकास की जटिल गुत्थी को सुलझाने में सहायक है।
  4. जीवाश्मों के अध्ययन से किसी एक जन्तु की वंशावली (pedigree) का क्रम पता चलता है।
  5. जीवाश्मों के आधार पर भूवैज्ञानिकों ने भूवैज्ञानिक समय सारणी बनायी जिसके आधार पर यह कह सकते हैं कि पौधों में पुष्पधारी पौधे (angiosperms) तथा जन्तुओं में स्तनधारी (mammals) सबसे आधुनिक एवं विकसित हैं।

प्रश्न 3.
जैव विकास से आप क्या समझते हैं? डार्विन के जैव विकास के सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। (2015)
या
‘योग्यतम की अतिजीविता का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया था? इस सिद्धान्त को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर
जैव विकास
प्रारम्भिक निम्न कोटि के सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवं जटिल जीवों की उत्पत्ति को जैव विकास कहते हैं।

डार्विनवाद
यह डार्विन की ही विचारधारा थी कि प्रकृति जन्तु और पौधों का इस प्रकार चयन करती है कि वह जीव जो उस वातावरण में रहने के लिये सबसे अधिक अनुकूलित होते हैं संरक्षित हो जाते हैं और वह जीव जो कम अनुकूलित होते हैं नष्ट हो जाते हैं। प्राकृतिक चयनवाद को समझाने के लिये डार्विन ने अपने विचारों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया –

1. संख्या में तेजी से बढ़ जाने की प्रवृत्ति
प्रत्येक जीव की यह प्रवृत्ति होती है कि वह अपनी संख्या में अधिक से अधिक वृद्धि करे लेकिन उससे उत्पन्न सभी संतानें जीवित नहीं रह पातीं क्योंकि उनकी उत्पत्ति की संख्या ज्यामितीय अनुपात में होती है जबकि रहने और खाने की जगह स्थिर होती है। इसलिये यदि सबसे धीमी गति से प्रजनन करने वाले जीव पर भी प्राकृतिक अंकुश न लगे तो वह पूरी पृथ्वी के भोजन व स्थान को समाप्त कर देगा। इसके लिये उन्होंने सबसे मन्द गति से प्रजनन करने वाले हाथी का उदाहरण लिया, जो लगभग 100 वर्षों तक जीवित रहता है। एक जोड़ा हाथी 30 वर्ष की उम्र में प्रजनन करना शुरू करता है तथा 90 वर्ष तक करता रहता है। इस बीच यह औसतन 6 बच्चों की उत्पत्ति करता है।

उन्होंने हिसाब लगाया कि यदि हाथी की सभी संतानें जीवित रहें तो एक जोड़ा हाथी 740-750 सालों में लगभग 19 मिलियन हाथी पृथ्वी पर पैदा कर देगा। इसी प्रकार यदि एक जोड़ी मक्खी अप्रैल में प्रजनन करना शुरू करती है और उसका प्रत्येक अण्डा जीवित रहे तथा उससे निकली मक्खी पुन: प्रजनन करती रहे तो अगस्त के अन्त तक 191×1018 मक्खियाँ पैदा हो जायेंगी। इसी प्रकार मादा टोड एक बार में 12,000 अण्डे देती है। और यदि वे सब जीवित रहें तो यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि पृथ्वी पर कितने टोड हो जायेंगे। इसी प्रकार एक कवक 65 करोड़ बीजाणु (spores) तथा एक समुद्री सीप 60 लाख अण्डे प्रतिवर्ष देती है।

2. सीमान्त कारक
हमारी पृथ्वी हाथियों से क्यों नहीं रोधी हुई है, हमारे खेत टोड से क्यों नहीं ढके हुए हैं, हमारे तालाब आयस्टर से क्यों नहीं भरे हुए हैं? क्योंकि प्रत्येक जाति को रोकने के लिये कुछ बाधक कारक होते हैं। जिससे उसकी संख्या सीमित हो जाती है। कुछ महत्त्वपूर्ण सीमान्त कारक इस प्रकार से हैं –

  1. सीमित भोज्य सामग्री (Limited Food) – जनसंख्या भोज्य सामग्री की कमी के कारण सीमित हो जाती है। डार्विन इस बात में माल्थस (Malthus) के सिद्धान्त से सहमत थे जिनके अनुसार जनसंख्या ज्यामितीय अनुपात में बढ़ती है और भोज्य सामग्री बहुत धीमी गति से।
  2. परभक्षी जन्तु (Predatory Animals) – परभक्षी जन्तु जनसंख्या पर अंकुश लगाते हैं; जैसे- अफ्रीका के जंगलों से यदि शेर को खत्म कर दिया जाये तो जेब्रा की जनसंख्या उस समय तक इतनी बढ़ जायेगी जब तक कि सीमित भोज्य सामग्री व रोग उनके लिये बाधक न बन जाये।
  3. रोग (Disease) – रोग तीसरा सीमान्त कारक है। जब भी जनसंख्या की अति हो जाती है तो कोई न कोई महामारी इस पर रोक लगा देती है।
  4. स्थान (Space) – स्थान की कमी के कारण भी जनसंख्या की अनियमित वृद्धि रुक जाती है। क्योंकि इसकी वजह से भुखमरी, महामारी हो जाती है तथा प्रजनन भी सीमित हो जाता है।
  5. प्राकृतिक विपदाएँ (Natural Calamities) – जन्तु के अचेत वातावरण में कोई भी बदलाव बाधक बन जाता है; जैसे- सूखा, बाढ़, तूफान, अत्यधिक गर्मी व ठण्ड आदि।

3. जीवन के लिये संघर्ष
यह देखा गया है कि प्रत्येक प्रजाति की प्रत्येक पीढ़ी में अधिक से अधिक व्यष्टि (individuals) उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है जो उपरोक्त दिये गये सीमान्त कारकों से सीमित हो जाती है- जैसे खाना, साथी, स्थान आदि के लिये होड़ (competition), परभक्षी जन्तु, रोग तथा प्राकृतिक विपदाएँ। इस प्रक्रिया को डार्विन ने जीवन के लिये संघर्ष (struggle for existence) कहा। यही संघर्ष निर्णय करता है कि कौन-सी व्यष्टि सफल होगी और कौन-सी नहीं।

जीवन के लिये संघर्ष तीन तरह से हो सकते हैं –
(i) सजातीय संघर्ष (Intraspecific Struggle) – अपने ही तरह की अर्थात् एक ही जाति के सदस्यों में आपस में होने वाले संघर्षों को सजातीय संघर्ष (intraspecific struggle) कहते हैं। जंगल में एक ही पेड़ के नीचे उगे उसी जाति के छोटे-छोटे पौधे इसका अच्छा उदाहरण हैं, उन पौधों में से कुछ मिट्टी तथा नमी की कमी से मर जाते हैं तथा बचे हुए पौधों में से कुछ लम्बे होकर अविकसित छोटे पौधों की हवा व रोशनी रोक देते हैं जिसके कारण छोटे पौधे खत्म हो जाते हैं। इस प्रकार उस क्षेत्र में पेड़ों की संख्या लगातार गिरती रहती है तथा कुछ ही पौधे परिपक्व हो पाते हैं।

(ii) अन्तरजातीय संघर्ष (Interspecific Struggle) – प्रकृति में सबसे अधिक संघर्ष अन्तरजातीय होता है अर्थात् एक साथ रहने वाली विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष। एक जाति दूसरे जाति का भोजन बन जाती है। मनुष्य इस प्रकार के संघर्ष में सबसे अग्रणी है। जो जीव इस संघर्ष में खत्म हो जाते हैं वे अपने इस नुकसान को या तो पूरा करते हैं या खत्म हो जाते हैं।

(iii) वातावरणीय संघर्ष (Environmental Struggle) – सभी जातियाँ प्रतिकूल वातावरण; जैसे- अत्यधिक सर्दी व गर्मी, बाढ़, सूखा, तूफान आदि से अपने आपको बचाने के लिये लगातार संघर्ष करती रहती हैं।

4. विभिन्नताएँ
यह बात सर्वविदित है कि दो जीव कभी भी एक से नहीं हो सकते। एक ही माता-पिता की दो संतानें भी कभी एक-सी नहीं होतीं, इसी को विभिन्नताएँ (variations) कहते हैं। विभिन्नताएँ जैव विकास की एक मूल आवश्यकता तथा प्रगामी कारक हैं क्योंकि बिना विभिन्नताओं के जैव विकास नामुमकिन है। विभिन्नताएँ दो प्रकार की होती हैं-एक तो वह जो पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत हो जाती हैं तथा दूसरी वह जो केवल उस जीव के जीवन काल में ही होती हैं लेकिन वंशागत नहीं होतीं।

5. योग्यतम की उत्तरजीविता
हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert Spencer) ने योग्यतम की उत्तरजीविता का सिद्धान्त सामाजिक विकास के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। डार्विन इससे अत्यधिक प्रभावित हुए तथा उन्होंने इसे जैव विकास के प्राकृतिक चयन के सम्बन्ध में समझाया। डार्विन के अनुसार जीवन के संघर्ष में वही जीव सफल होते हैं जो वातावरण के अनुरूप अनुकूलित हो जाते हैं। यह अधिक सफल जीवन व्यतीत करते हैं, इनकी जनन क्षमता भी अधिक होती है तथा यह स्वस्थ संतानों को उत्पन्न करते हैं, जिससे उत्तम लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत हो जाते हैं और इस प्रकार उत्पन्न संताने वातावरण के प्रति अधिक अनुकूल होती हैं। इसके साथ ही वातावरण के प्रतिकूल प्राणी नष्ट हो जाते हैं इसी को डार्विन ने प्राकृतिक वरण या चयन (natural selection) कहा।

डार्विन ने प्राकृतिक वरण द्वारा योग्यतम की उत्तरजीविता को लैमार्क के जिराफ द्वारा समझाया। जिराफ की गर्दन तथा पैरों की लम्बाई में अत्यधिक विभिन्नताएँ होती हैं। घास के मैदानों की कमी के कारण इन्हें ऊँचे पेड़ों की पत्तियों पर निर्भर होना पड़ा जिसके फलस्वरूप वह जिराफ जिनमें लम्बी गर्दन व टाँगें थीं, वह छोटी गर्दन व टाँगों वाले जिराफ से ज्यादा अनुकूलित पाये गये। लंबी गर्दन वाले जिराफ को उत्तरजीविता का अधिक अवसर मिला तथा वह संख्या में बढ़ने लगे तथा छोटी गर्दन वाले जिराफ लुप्त हो गये।

6. नयी जाति की उत्पत्ति
वातावरण निरन्तर परिवर्तित होता रहता है जिससे जीवों में उनके अनुकूल रहने के लिए विभिन्नताएँ आ जाती हैं। यह विभिन्नताएँ पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों में इकट्ठा होती रहती हैं। धीरे-धीरे वह अपने पूर्वजों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि वैज्ञानिक उन्हें नई जाति (species) का स्थान दे देते हैं। इसी के आधार पर डार्विन ने जाति के उद्भव का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

प्रश्न 4.
नवडार्विनवाद से आप क्या समझते हैं? इसकी आधुनिक स्थिति की विवेचना कीजिए। (2011,15)
या
जन्तुओं में मुख्य विकासीय प्रवृत्तियों का निरूपण कीजिए। (2011)
या
जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। (2014, 15)
या
नवडार्विनवाद पर एक टिप्पणी लिखिए। (2014, 16)
उत्तर
नवडार्विनवाद/जैव विकास का आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धांत
वर्ष 1930 तथा 1945 के मध्य आधुनिक खोजों के आधार पर डार्विनवाद में कुछ परिवर्तन सम्मिलित किये गये तथा प्राकृतिक चयनवाद को पुनः मान्यता प्राप्त कराने वालों में वीजमान (Weismann), हैल्डेन (Haldane), जूलियन हक्सले (Julian Huxley), गोल्डस्मिट (Goldschmidt) तथा डॉबजैन्स्की (Dobzhansky) आदि हैं।

डॉडसन (Dodson) के अनुसार, जैव विकास का आधुनिक संश्लेषित मत (moderm synthetic theory of evolution) ही वास्तव में नवडार्विनवाद है। नवडार्विनवाद के अनुसार नयी जातियों की उत्पत्ति निम्नांकित पदों के आधार पर होती है –

  1. विभिन्नताएँ (Variations) – ये जीन विनिमय (crossing over) के कारण, माता-पिता के गुणसूत्रों के लैंगिक जनन में सम्मिलित होने के कारण उत्पन्न होती हैं। केवल ऐसी विभिन्नताएँ जो लाभदायक हों तथा जिनकी वंशागति हो, जैव विकास में सहायक रहती हैं।
  2. उत्परिवर्तन (Mutations) – जीन्स के स्तर पर होने वाले आकस्मिक परिवर्तन जो प्रायः आनुवंशिक होते हैं, उत्परिवर्तन कहलाते हैं।
  3. प्राकृतिक चयन (Natural selection) – बदलती हुई परिस्थितियों में जिन जीवों में लाभदायक विभिन्नताएँ एवं उत्परिवर्तन हो जाते हैं, वे जीव जीवन संघर्ष में अधिक सफल रहते हैं। ये सदैव वातावरण के अनुकूल बने रहते हैं।
  4. लैंगिक पृथक्करण (Sexual Isolation) – क्रियात्मक एवं भौगोलिक कारकों; जैसे- मरुस्थल, पर्वत, समुद्र, नदियों आदि के प्रभाव में प्रायः जीवों के अन्तराजनन में बाधा पहुँचती है।

इस प्रकार जीनी विभिन्नताओं द्वारा जीवों में परिवर्तन (variations) आते हैं। प्राकृतिक वरण (natural selection) तथा जनन पृथक्करण जीवों को अनुकूलित दिशा में ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त तीन सहायक प्रक्रियाएँ-प्रवास (migration), संकरण (hybridization) तथा अवसर (chance) जैव विकास को आगे बढ़ाने, उसका मार्ग तथा दिशा बदलने में सहायक होती हैं। वर्ष 1905 में मेंडलवाद की पुनखज होने तथा जैव विकास में डॉबजैन्स्की (Dobzhansky, 1937) द्वारा आनुवंशिकी को जातियों की उत्पत्ति में महत्व देने पर जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त की नींव पड़ी। ऐसा डार्विनवाद व मंडलवाद के नियमों को जीव-जातियों की समष्टियों (आबादियों) पर एक साथ लागू करने पर सम्भव हुआ। इसे पहले नवडार्विनवाद (neodarwinism) कहा गया।

इस प्रकार “जैव विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त’ की नींव डॉबजैन्स्की (Dobahansky, 1937) की पुस्तक, “आनुवंशिकी तथा जातियों की उत्पत्ति’ (Genetics and the Origin of Species) से पड़ी। यह नाम जूलियन हक्सले (Julian Huxley, 1942) ने दिया। इस सिद्धान्त के विकास में मुलर (Muller, 1949), फिशर (Fisher, 1958), हैल्डेन (Haldane, 1932), राइट (Wright, 1968), मेयर (Mayer, 1963, 1970), स्टेबिन्स (Stebbins, 1966-1976) आदि वैज्ञानिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इस सिद्धान्त में जैव विकास की क्रिया-विधि को जीव-जातियों की समष्टियों की आनुवंशिकी के सन्दर्भ में समझाया गया है। इसके अनुसार, किसी जीव जाति की विभिन्न क्षेत्रों की समष्टियों में उपस्थित आनुवंशिक अर्थात् जीनी विभिन्नताओं पर प्राकृतिक चयन तथा जननिक पृथक्करण (reproductive isolations) कम करके समष्टियों को नयी-नयी अनुकूलन योग्य दिशाओं की ओर मोड़ते रहते हैं जिससे नयी जातियों का विकास सम्भव होता है।

लघु उविकास तथा वृहत् उदविकास
जैव विकास को लघु उविकास तथा वृहत् उविकास में बाँटा गया है। लघु उविकास में जीव जातियों की प्रत्येक समष्टि में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते रहने वाले आनुवंशिक (genetic) परिवर्तनों का आंकलन होता है, जबकि वृहत् उविकास में विस्तृत स्तर पर जीवों में नयी-नयी संरचनाओं के विकास, विकासीय प्रवृत्तियों (evolutionary trends), अनुकूलन योग्य प्रसारणों (adaptive radiations), विभिन्न जीव जातियों के मध्य विकासीय सम्बन्धों (phylogenetic relationships) तथा जीव जातियों की विलुप्ति का अध्ययन किया जाता है।

समष्टि या जनसंख्या के प्रत्येक सदस्य में विभिन्न आनुवंशिक लक्षणों के विभिन्न जीनरूप होते हैं। इसके सभी आनुवंशिक लक्षणों के जीनरूपों को सामूहिक रूप में इसका जीन समूह या जीन प्ररूप (genome) कहते हैं। विभिन्न सदस्यों के बीच दृश्यरूप लक्षणों की विभिन्नताओं से स्पष्ट होता है कि इतनी ही विभिन्नताएँ इनके जीन प्ररूपों में भी होनी आवश्यक हैं। इस प्रकार एक समष्टि के सभी सदस्यों में उपस्थित सम्पूर्ण युग्मविकल्पी जीन्स (allelic genes) को मिलाकर समष्टि की जीनराशि (gene pool) कहते हैं। यद्यपि समष्टि के प्रत्येक लक्षण के दो ही युग्मविकल्पी जीन्स होते हैं, परन्तु सामान्यतः उत्परिवर्तनों (mutations) के होते रहने के कारण पूरी समष्टि में प्रत्येक जीन के कई युग्मविकल्पी (allelomorphic) स्वरूप भी हो सकते हैं। इसे जीन की बहुरूपता कहते हैं। इस जीनी बहुरूपता (polymorphism) में प्रत्येक स्वरूप की बारम्बारता अर्थात् आवृत्ति को युग्मविकल्पी
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आवृत्ति (allelic frequency) कहते हैं जो महत्त्वपूर्ण है। ऐसी जीन्स की विभिन्नताएँ तथा आवृत्तियों में इस प्रकार की विभिन्नताएँ भिन्न-भिन्न स्थानों की समष्टियों के मध्य लघु उविकासीय अपसारिता (micro evolutionary divergence) को प्रदर्शित करती हैं।

हार्डी एवं वीनबर्ग (Hardy and weinberg, 1908) ने स्पष्ट किया कि जिन समष्टियो में आनुवंशिक परिवर्तन नहीं होते, उनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी युग्मविकल्पी जीन्स और जीनरूपों की आवृत्तियों (frequencies) में एक सन्तुलन बना रहता है, क्योंकि प्रबल जीन अप्रबल जीन को समष्टि की जीनराशि से हटा नहीं सकते। इसे हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन (Hardy-Weinberg equilibrium) कहते हैं।

यह वास्तव में मंडल के प्रथम पृथक्करण अर्थात् युग्मकों की शुद्धता के नियम (law of segregation or purity of gametes) का ही तार्किक निष्कर्ष (logical consequence) है। इसे हार्डी-वीनबर्ग ने गणितीय समीकरणों द्वारा समझाया जिन्हें सम्मिलित रूप से हार्डी-वीनबर्ग का नियम (Hardy-Weinberg rule) कहते हैं। इस नियम में पूर्वानुमान किया जाता है कि समष्टि बड़ी है। इसमें युग्मकों का संयुग्मन (union of gametes) अनियमित तथा संयोगिक (random ) होता है अर्थात् विकास को प्रेरित करने वाली कोई प्रक्रिया समष्टि (आबादी) को प्रभावित नहीं करती है।

विकास के कारण
ऐसी प्रक्रियाएँ जिनके द्वारा किसी समष्टि में हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन (Hardy-Weinberg equilibrium) समाप्त होता है, विकास का कारण होती हैं तथा समष्टि में विकास की दिशा भी निर्धारित करती हैं। इन्हें विकासीय अभिकर्मक कहते हैं। विकास के आधुनिक संश्लेषणात्मक सिद्धान्त को प्रमुखत: निम्नलिखित विकासीय अभिकर्मकों के आधार पर स्पष्ट किया गया है –
1. उत्परिवर्तन एवं विभिन्नताएँ (Mutations and variations) – जीन्स के रासायनिक संयोजन में परिवर्तनों के कारण होने वाले ये उत्परिवर्तन प्रायः अप्रभावी होते हैं अन्यथा हानिकारक। सामान्यतः इनके घटित होने की दर भी बहुत कम होती है। इस प्रकार लाखों युग्मनजों (zygotes) में से किसी में ही उत्परिवर्तित जीन होता है। कुछ भी हो विकास के लिए आनुवंशिक परिवर्तन स्थापित करने में उत्परिवर्तनों तथा अन्य विभिन्नताओं का काफी महत्त्व होता है, क्योंकि विकासीय प्रक्रिया बहुत लम्बा समय लेती है।

2. देशान्तरण एवं जननिक पृथक्करण (Migration and Genetic Isolation) – अनेक जीव – जातियों में इनकी विभिन्न समष्टियों के बीच इनके सदस्यों का आवागमन होता रहता है। इसे देशान्तरण कहते हैं। इसी प्रकार जब कोई दो समष्टियाँ किसी भौगोलिक अवरोध के कारण अलग-अलग हो गयी हैं और पास-पास आने पर आपस में जनन कर सकती हैं, किन्तु यदि इनमें प्रजनन नहीं हो सकता तो इनको भिन्न-भिन्न जाति मान लिया जाता है। किसी समष्टि में अन्य समष्टियों से आये हुए सदस्य अर्थात् आप्रवासी (immigrants) किसी समष्टि को छोड़कर अन्य समष्टियों में चले जाने वाले सदस्य अर्थात् उत्प्रवासी (emigrants) समागम करके समष्टियों की जीनराशि में नवीन जीन्स ला सकते हैं, हटा सकते हैं अथवा युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियों को बदल सकते हैं।

3. जीनी अपवहन (Genetic Drift) – विभिन्न सदस्यों की प्रजनन दर की विभिन्नता के कारण, जीव जातियों की छोटी-छोटी समष्टियों पर हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन लागू नहीं होता है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सभी युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियों को समान रूप से प्रसारण होते रहना प्रायः असम्भव होता है। यह जीनी अपवहन है जिसमें कभी-कभी हानिकारक युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्ति इतनी बढ़ जाती है कि समष्टि के कई सदस्य समाप्त ही हो जाते हैं। इस प्रकार समष्टि और छोटी हो जाती है और इसमें आनुवंशिक विभिन्नताएँ भी बहुत कम रह जाती हैं। कभी-कभी महामारियों (epidemics), परभक्षण (predation) आदि के कारण भी छोटी समष्टियों में जीनी अपवहन हो सकता है।

4. असंयोगिक समागम (Non-Random Mating) – पेड़-पौधों की अनेक जातियों में स्वपरागण (self-pollination) द्वारा प्रजनन होना, मानवों की कुछ जनसंख्याओं में सजातीय विवाह आदि प्रकार के जनन के कारण समयुग्मजी (homozygous) जीनरूपों की संख्या बढ़ती जाती है तथा हार्डी-वीनबर्ग सन्तुलन भी नहीं रहता है।

5. जीवन संघर्ष तथा प्राकृतिक चयन (Struggle for Existance and Natural Selection) – किसी भी समष्टि में प्रत्येक जीव जीवित रहने के लिए भोजन, सुरक्षित स्थान, प्रजनन के लिए साथी की खोज आदि के लिए संघर्षरत रहता है। इसी में से अधिकतम अनुकूलित भिन्नता वाले जीव के चयन को डार्विन (Darwin) ने प्राकृतिक चयन अथवा योग्यतम की उत्तरजीविता (survival of fittest) बताया। इस प्रकार, प्राकृतिक चयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके कारण जीवों की समष्टियों में जीनरूपों तथा युग्मविकल्पी जीन्स, दोनों की ही आवृत्तियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते रहते हैं। इस प्रक्रिया में जिस सदस्य के कुल आनुवंशिक लक्षण अथवा जीन प्ररूप (genome) इसे तात्कालिक वातावरणीय दशाओं में, अनुकूलन (adaptation) की अधिक क्षमता प्रदान करते हैं, वह अन्य सदस्यों की तुलना में सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करता है। इससे स्पष्ट है कि प्राकृतिक चयन के कारण, समष्टियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अधिक लाभदायक लक्षणों के जीनरूपों एवं युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियाँ । अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं तथा कम लाभदायक लक्षणों के जीनरूपों और युग्मविकल्पी जीन्स की आवृत्तियाँ कम होती जाती हैं।

उपर्युक्त सभी प्रक्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव से जीव जातियों की प्राकृतिक समष्टियों की जीनराशि में धीरे-धीरे जो परिवर्तन होते हैं, अति महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हीं से प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया समष्टि की अनुकूलन योग्य (adaptive) विकासीय दिशा (evolutionary direction) का मार्ग प्रशस्त करती है।

प्रश्न 5.
लैमार्कवाद व डार्विनवाद की तुलना रेखाचित्रों सहित कीजिए। (2017)
उत्तर
लैमार्कवाद वे डार्विनवाद की तुलना
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प्रश्न 6.
किस कल्प में तथा किन निकटतम पूवर्षों से आधुनिक मानव का विकास हुआ? (2016)
उत्तर
लगभग 40 मिलियन वर्ष पूर्व ड्रायोपिथिकस तथा 14 मिलियन वर्ष पूर्व रामापिथिकस नामक नरवानर विद्यमान थे। इन लोगों के शरीर बालों से भरपूर थे तथा ये गोरिल्ला एवं चिम्पैंजी जैसे चलते थे। रामापिथिकस मनुष्यों जैसे थे जबकि ड्रायोपिथिकस वनमानुष (ऐप) जैसे थे। इथोपिया तथा तंजानिया में कुछ जीवाश्म (फोसिल) अस्थियाँ मानवों जैसी प्राप्त हुई हैं। ये जीवाश्म मानवीय विशिष्टताएँ दर्शाते हैं जो इस विश्वास को आगे बढ़ाती हैं कि 3 – 4 मिलियन वर्ष पूर्व मानव जैसे नर वानर गण (प्राइमेट्स) पूर्वी-अफ्रीका में विचरण करते रहे थे।

लगभग 5 मिलियन वर्ष पूर्व ओस्ट्रालोपिथेसिन (आदिमानव) सम्भवतः पूर्वी अफ्रीका के घास स्थलों में रहता था। होमो इरैक्टस संभवतः मांस खाता था। निएण्डरथल मानव, 100,000 से 40,000 वर्ष पूर्व लगभग पूर्वी एवं मध्य एशियाई देशों में रहते थे। वे अपने शरीर की रक्षा के लिए खालों का इस्तेमाल करते थे और अपने मृतकों को जमीन में गाड़ते थे। होमो सेपियंस अफ्रीका में विकसित हुआ और धीरे-धीरे महाद्वीपों से पार पहुँचा तथा विभिन्न महाद्वीपों में फैला, इसके बाद वह भिन्न जातियों में विकसित हुआ। 75,000 से 10,000 वर्ष के दौरान हिमयुग में यह आधुनिक युगीन मानव पैदा हुआ। मानव द्वारा प्रागैतिहासिक गुफा-चित्रों की रचना लगभग 18,000 वर्ष पूर्व हुई। कृषि कार्य लगभग 10,000 वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ और मानव बस्तियाँ बनना शुरू हुईं। बाकी जो कुछ हुआ वह मानव इतिहास या वृद्धि का भाग और सभ्यता की प्रगति का हिस्सा है।

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 6 Molecular Basis of Inheritance

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 6
Chapter Name Molecular Basis of Inheritance
Number of Questions Solved 37
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 6 Molecular Basis of Inheritance (वंशागति का आणविक आधार)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्न को नाइट्रोजनीकृत क्षार व न्यूक्लिओटाइड के रूप में वर्गीकृत कीजिए-एडेनीन, साइटीडीन, थाइमीन, ग्वानोसीन, यूरेसील व साइटोसीन।
उत्तर
नाइट्रोजनीकृत क्षार – एडेनीन, थाइमीन, यूरेसील, साइटोसीन।
न्यूक्लिओटाइड – साइटीडीन, ग्वानोसीन।

प्रश्न 2.
यदि एक द्विरज्जुक DNA में 20 प्रतिशत साइटोसीन है तो DNA में मिलने वाले एडेनीन के प्रतिशत की गणना कीजिए।
उत्तर
चारग्राफ के नियमानुसार द्विरज्जुक DNA में →A + G = T + C = 1 होता है। अर्थात् एडेनीन = थाइमीन,
ग्वानिन = साइटोसीन
चूँकि साइटोसीन की दी गई मात्रा 20% है तो ग्वानिन भी 20% होगा।
ग्वानिन + साइटोसीन = 20 + 20 = 40%
A + G = 100 – 40%
A + G = 60%
चूँकि A = G होता है; अत: एडेनीन की मात्रा = 60/2 = 30% होगी।

प्रश्न 3.
यदि डी०एन०ए० के एकरज्जुक के अनुक्रम निम्नवत् लिखे हैं –
5′ – ATGCATGCATGCATGCATGCATGCATGC – 3′
तो पूरक रज्जुक के अनुक्रम को 5 → 3 दिशा में लिखिए।
उत्तर
डी०एन०ए० द्विकुण्डली संरचना होती है अर्थात् यह दो पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं (polynucleotide chains) से बना होता है। दोनों श्रृंखलाएँ प्रतिसमानान्तर ध्रुवणता रखती हैं। इसका तात्पर्य है यदि एक श्रृंखला की ध्रुवणता 5 से 3′ की ओर हो तो दूसरे की ध्रुवणता 3 से 5′ की तरफ होगी।

दोनों श्रृंखलाओं के नाइट्रोजनी क्षार परस्पर हाइड्रोजन बन्ध (bonds) द्वारा जुड़े रहते हैं। ऐडेनीन दो हाइड्रोजन बन्ध द्वारा थाइमीन (A = T) से और साइटोसीन तीन हाइड्रोजन बन्ध द्वारा ग्वानीन (C ≡ G) से जुड़े होते हैं। इसके फलस्वरूप प्यूरीन (purine) के विपरीत दिशा में पिरिमिडीन (pyrimidine) होता है। इससे डी०एन०ए० द्विकुण्डली के दोनों पॉलिन्यूक्लियोटाइड के मध्य समान दूरी बनी रहती है। अतः डी०एन०ए० के पूरक रज्जुक (श्रृंखला) में नाइट्रोजनीकृत क्षार का अनुक्रम निम्नवत् होगा –
5′ – ATGCATGCATGCATGCATGCATGCATGC-3′
3′ – TACGTACGTACGTACGTACGTACGTACG-5′

प्रश्न 4.
यदि अनुलेखन इकाई में कूट लेखन रज्जुक के अनुक्रम को निम्नवत् लिखा गया है –
5′ – ATGCATGCATGCATGCATGCATGCATGC – 3′
तो दूत-आर०एन०ए० के अनुक्रम को लिखिए।
उत्तर
आर०एन०ए० का निर्माण डी०एन०ए० से होता है। आर०एन०ए० सामान्यतया एकरज्जुकी संरचना (single strand structure) होती है। इसमें थाइमीन नाइट्रोजनीकृत क्षार के स्थान पर यूरेसिल (uracil) पाया जाता है। डी०एन०ए० का एकरज्जुक (अनुलेखन इकाई) से आनुवंशिक सूचनाओं का दूत-आर०एन०ए० (m-R.N.A.) में प्रतिलिपिकरण करने की प्रक्रिया अनुलेखन (transcription) कहलाती है।
यदि कूटलेखन रज्जुक (coding strand) के अनुक्रम निम्नवत् हैं –
5′ – ATGCATGCATGCATGCATGCATGCATGC – 3’।
तो दूत-आर०एन०ए० (m-R.N.A.) के अनुक्रम निम्नवत् होंगे –
5′ – AUGCAUGCAUGCAUGCAUGCAUGCAUGC – 3′

प्रश्न 5.
DNA ढिकुंडली की कौन-सी विशेषता ने वाटसन व क्रिक को DNA प्रतिकृति के सेमी कंजर्वेटिव रूप को कल्पित करने में सहयोग किया? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर
वाटसन व क्रिक ने DNA का द्विकुंडली मॉडल दिया था। इस मॉडल की मुख्य विशेषता पॉलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखलाओं के बीच युग्मन का होना था। पॉलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखलाओं में क्षार युग्मन ही एक ऐसी विशेषता थी जिसने वाटसन व क्रिक को DNA प्रतिकृति के सेमी कंजर्वेटिव रूप को कल्पित करने में सहयोग किया था। क्षार-युग्मन के इसी गुण के आधार पर श्रृंखलाएँ एक-दूसरे की पूरक बनती हैं अर्थात् एक DNA रज्जुक में क्षार अनुक्रम पता होने पर दूसरे रज्जुक के क्षार युग्मन को ज्ञात किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त DNA का प्रत्येक रज्जुक, नये DNA रज्जुक के संश्लेषण हेतु साँचे का कार्य करता है। इस साँचे से बना द्विकुंडलित DNA अपने जनक DNA के समरूप होता है। DNA प्रतिकृतिकरण की सेमी कंजर्वेटिव पद्धति में DNA के दोनों रज्जुक पृथक् होकर नये रज्जुक के संश्लेषण हेतु साँचे के समान कार्य करते हैं। DNA प्रतिकृति में एक जनक रज्जुक व एक नया रज्जुक होता है।

प्रश्न 6.
टेम्पलेट (डी०एन०ए० या आर०एन०ए०) की रासायनिक प्रकृति व इससे (डी०एन०ए० या आर०एन०ए०) संश्लेषित न्यूक्लीक अम्लों की प्रकृति के आधार पर न्यूक्लीक अम्ल पॉलिमरेज के विभिन्न प्रकार की सूची बनाइए।
उत्तर
न्यूक्लीक अम्ल पॉलिमरेज निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –
1. डी०एन०ए० पॉलिमरेज (D.N.A. polymerase) एन्जाइम प्रतिकृति (replication) के लिए आवश्यक है। यह डी०एन०ए० टेम्पलेट का उपयोग डि-ऑक्सीन्यूक्लियोटाइड के बहुलकन (polymerisation) को प्रेरित करने के लिए करता है। डी०एन०ए० अणुओं की दोनों श्रृंखलाएँ एकसाथ पृथक् नहीं होतीं। डी०एन०ए० द्विकुण्डली प्रतिकृति हेतु छोटे-छोटे भागों में खुलती है। इसके फलस्वरूप बनने वाले खण्ड परस्पर डी०एन०ए० लाइगेज (D.N.A. ligase) एन्जाइम द्वारा जुड़ जाते हैं। डी०एन०ए० पॉलिमरेज स्वयं प्रतिकृति प्रक्रम का प्रारम्भ नहीं कर सकते। यह कुछ निश्चित स्थल पर संवाहक (vector) की सहायता से होती है।

2. आर०एन०ए० पॉलिमरेज (R.N.A. polymerase) – यह डी०एन०ए० पर निर्भर आर०एन०ए० पॉलिमरेज (D.N.A. dependent R.N.A. polymerase) होता है। यह D.N.A. को सभी प्रकार के आर०एन०ए० के अनुलेखन (transcription) के लिए उत्प्रेरित करता है। आर०एन०ए० पॉलिमरेजे अस्थायी रूप से प्रारम्भन कारक या समापन कारक से जुड़कर अनुलेखन का प्रारम्भ या समापन करता है। केन्द्रक में डी०एन०ए० पर निर्भर आर०एन०ए० पॉलिमरेज के अतिरिक्त निम्नलिखित तीन प्रकार के आर०एन०ए० पॉलिमरेज मिलते हैं –

  1. आर०एन०ए० पॉलिमरेज I – यह राइबोसोमल आर०एन०ए० (r-R.N.A.) को अनुलेखित (transcribes) करता है।
  2. आर०एन०ए० पॉलिमरेज III – यह ट्रान्सफर आर०एन०ए० (t-R.N.A.) तथा छोटे केन्द्रकीय आर०एन०ए० के अनुलेखन के लिए उत्तरदायी होता है।
  3. आर०एन०ए० पॉलिमरेज II – यह सन्देशवाहक आर०एन०ए० (m-R.N.A.) के पूर्ववर्ती विषमांगी केन्द्रकीय आर०एन०ए० (heterogenous nuclear R.N.A.-hnR.N.A.) का अनुलेखन करता है।

प्रश्न 7.
DNA आनुवंशिक पदार्थ है, इसे सिद्ध करने हेतु अपने प्रयोग के दौरान हर्णे व चेज ने DNA व प्रोटीन के बीच कैसे अंतर स्थापित किया?
उत्तर
हशें वे चेज ने DNA को आनुवंशिक पदार्थ सिद्ध करने हेतु P32 व P32 आइसोटॉप्स युक्त माध्यम, में ई० कोलाई जीवाणु का संवर्द्धन कराया। कुछ समय वृद्धि करने के पश्चात् जीवाणु को जीवाणुभोजी द्वारा संक्रमित कराया गया। संक्रमण के पश्चात् देखा गया कि जीवाणुभोजी का प्रोटीन आवरण S35 रेडियोधर्मी युक्त हो गया था जबकि इसके DNA में सल्फर नहीं होता। इसके विपरीत जीवाणुभोजी का DNA P32 रेडियोधर्मी आइसोटॉप्स की उपस्थिति दिखा रहा था, क्योंकि DNA में
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फॉस्फोरस होता है। प्रोटीन आवरण में P32 अनुपस्थित था। P32 रेडियोधर्मी युक्त जीवाणुभोजी द्वारा ऐसे जीवाणु को संक्रमित कराया गया जिसमें रेडियोधर्मी तत्त्व नहीं थे। संक्रमण के पश्चात् देखा गया कि समस्त जीवाणु रेडियोधर्मी हो गये थे। अधिकांश रेडियोधर्मी आइसोटॉप्स जीवाणुभोजी की अगली पीढ़ी में भी स्थानांतरित हो गये थे।

रेडियोधर्मी तत्त्व रहित जीवाणुओं में S32 युक्त जीवाणुभोजी द्वारा संक्रमण कराने पर तथा जीवाणुभोजी पृथक् करने पर देखा गया कि जीवाणुओं में रेडियोधर्मी तत्त्व मौजूद नहीं थे बल्कि ये जीवाणुभोजी के प्रोटीन आवरण में ही रह गये थे। उपरोक्त प्रयोग सिद्ध करता है कि जीवाणुभोजी का DNA ही वह पदार्थ है जो नये जीवाणुभोजी उत्पन्न करता है व संक्रमण में भाग लेता है। यह सिद्ध हो गया कि DNA आनुवंशिक पदार्थ है, प्रोटीन नहीं। इसके अतिरिक्त DNA फॉस्फोरस युक्त होता है जबकि प्रोटीन में फॉस्फोरस नहीं होता है। DNA सल्फर रहित होता है, जबकि प्रोटीन, सल्फर युक्त होता है।

प्रश्न 8.
निम्न के बीच अंतर बताइए –
(क) पुनरावृत्ति DNA एवं अनुषंगी DNA
(ख) mRNA और tRNA
(ग) टेम्पलेट रज्जु और कोडिंग रज्जु
उत्तर
(क) पुनरावृत्ति DNA एवं अनुषंगी DNA में अंतर
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(ख) एमआरएनए और टीआरएनए में अंतर
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(ग) टेम्पलेट रज्जु और कोडिंग रज्जु में अंतर
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प्रश्न 9.
स्थानान्तरण के दौरान राइबोसोम की दो मुख्य भूमिकाओं की सूची बनाइए।
उत्तर
स्थानान्तरण (Translation) – इस प्रक्रिया में ऐमीनो अम्लों के बहुलकन (polymerisation) से पॉलिपेप्टाइड का निर्माण होता है। ऐमीनो अम्लों के क्रम व अनुक्रम सन्देशवाहक आर०एन०ए० में पाए जाने वाले क्षारों के अनुक्रम पर निर्भर करते हैं। ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्ध (peptide bonds) द्वारा जुड़े रहते हैं। स्थानान्तरण प्रक्रिया पूर्ण होने पर पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला राइबोसोम से पृथक् हो जाती है।
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स्थानान्तरण में राइबोसोम की भूमिका
1. राइबोसोम का छोटा सबयूनिट m-R.N.A. के प्रथम कोडॉन (AUG) के साथ बन्धित होकर समारम्भ कॉम्प्लैक्स (initiation complex) ऐमीनो ऐसिल t-R.N.A. बनाता है जिसकी पहचान प्रारम्भक t-R.N.A. द्वारा की जाती है। ऐमीनो अम्ल t-R.N.A. से जुड़कर एक जटिल रचना बनाते हैं जो आगे चलकर t-R.N.A. के प्रति प्रकूट (anticodon) से पूरक क्षार युग्म बनाकर m-R.N.A. के उचित आनुवंशिक कोडॉन से जुड़ जाती है।

2. राइबोसोम के बड़े सबयूनिट पर t-R.N.A. अणुओं के जुड़ने के लिए दो खाँच होती हैं, इन्हें P-site या दाता स्थल और A-site या ग्राही स्थल कहते हैं। P-site (दाता-स्थल) पर पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला को धारण करने वाला t-R.N.A. जुड़ता है। A-site (ग्राही स्थल) पर ऐमीनो ऐसिल t-R.N.A. जुड़ता है। बड़े सबयूनिट के पेप्टाइड सिन्थेटेज (peptide synthetase) एन्जाइम पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला के ऐमीनो अम्ल के -COOH तथा ऐमीनो ऐसिल t-R.N.A. के ऐमीनो अम्ल के – NH, के मध्य पेप्टाइड बन्ध बनाता है।

प्रश्न 10.
उस संवर्धन में जहाँ ई० कोलाई वृद्धि कर रहा हो लैक्टोस डालने पर लैक-ओपेरॉन उत्प्रेरित होता है, तब कभी संवर्धन में लैक्टोस डालने पर लैक-ओपेरॉन कार्य करना क्यों बन्द कर देता है?
उत्तर
ओपेरॉन संकल्पना
मनुष्य की आँत में पाए जाने वाले जीवाणु ई० कोलाई सामान्यतया लैक्टोस के अपचय से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। जैकब एवं मोनोड (Jacob & Monod, 1961) ने पता लगाया कि इसके D.N.A. में तीन जीन का एक समूह लैक्टोस का अपचय करने वाले तीन एन्जाइम्स के संश्लेषण से सम्बन्धित होता है। पोषण माध्यम में लैक्टोस होता है तो ये जीन सक्रिय होते हैं। पोषण माध्यम में लैक्टोस के अभाव में ये निष्क्रिय रहते हैं। जैकब एवं मोनोड ने इस जीन की सक्रियता के नियमन के लिए ओपेरॉन संकल्पना (operon concept) प्रस्तुत की।

ओपेरॉन संकल्पना के अनुसार जीन की सक्रियता का नियमन अनुलेखन स्तर पर प्रेरण या दमन (induction or repression) द्वारा होता है। लैक्टोस का अपचय करने वाले एन्जाइम्स β –गैलेक्टोसाइडेज (β-galactosidase), गैलेक्टोस परमीएज (galactose permease) तथा थायोगैलेक्टोसाइडेज ट्रान्सऐसीटिलेज (thiogalactosidase transacetylase) हैं। इनके संरचनात्मक जीन्स (structural genes) को क्रमशः सिस्ट्रॉन-z, सिस्ट्रॉन-y तथा सिस्ट्रॉन-a द्वारा प्रदर्शित करते हैं। ये एक-दूसरे के निकट स्थित होते हैं। इनमें परस्पर समन्वय होता है।

तीन जीन इनको कन्ट्रोल करते हैं, इन्हें रेगुलेटर जीन (regulator gene), प्रोमोटर जीन (promoter gene) तथा ओपरेटर जीन (operator gene) कहते हैं। किसी उपापचयी तन्त्र में एन्जाइम्स को कोड करने वाले जीन सामान्यतया समूह (cluster) के रूप में गुणसूत्र पर स्थित होती हैं। ये एक कार्यक जटिल (functional complex) बनाती हैं। इस पूरे तन्त्र को लैक ओपेरॉन कहते हैं। इसमें संरचनात्मक जीन (structural genes), प्रोमोटर जीन (promoter gene), ओपरेटर जीन (operator gene) तथा रेगुलेटर जीन (regulater gene) आदि मिलती हैं।

लैक ओपेरॉन = रेगुलेटर जीन + प्रोमोटर जीन + ओपेरेटर जीन + संरचनात्मक जीन लैक ओपेरॉन का प्रकार्य
(A) लैक्टोस की अनुपस्थिति में (In absence of Lactose) – लैक्टोस प्रेरक की अनुपस्थिति में
रेगुलेटर जीन एक लैक निरोधक या दमनकारी प्रोटीन बनाता है। यह ओपरेटर जीन से बन्धित होकर इसके अनुलेखन को रोकता है। इसके फलस्वरूप संरचनात्मक जीन m-R.N.A.
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 6 Molecular Basis of Inheritance img-6
का संश्लेषण नहीं कर पाते और प्रोटीन संश्लेषण रुक जाता है। यह दमनकर (repression) का उदाहरण है।

(B) लैक्टोस की उपस्थिति में (In presence of Lactose) – माध्यम में लैक्टोस प्रेरक के उपस्थित होने पर प्रोमोटर कोशिका में प्रवेश करके रेगुलेटर जीन से उत्पन्न दमनकर से बन्धित होकर जटिल यौगिक बनाता है। इसके कारण दमनकर ओपरेटर से बन्धित नहीं हो पाता। और ओपरेटर स्वतन्त्र रहता है। यह R.N.A.-पॉलिमरेज को प्रोमोटर जीन के समारम्भन स्थल से बन्धित होने के लिए प्रेरित करता है जिसके फलस्वरूप पॉलिसिस्ट्रोनिक लैक m-R.N.A. का अनुलेखन होता है। यह लैक्टोस अपचय के लिए आवश्यक तीनों एन्जाइम्स को कोडित करता है। इस क्रिया को एन्जाइम उत्प्रेरण कहते हैं। यह उत्प्रेरण या प्रेरण (induction) का उदाहरण है। इसमें लैक्टोस उत्प्रेरक का कार्य करता है।

(C) सहदमनकर (Co-repressor) – कभी-कभी मेटाबोलाइट (लैक्टोस) से बन्धित होने पर निरोधक या दमनकर की संरचना में परिवर्तन हो जाता है। यह ओपरेटर से बन्धित होकर इसके अनुलेखन (transcription) को रोकता है। इसमें मेटाबोलाइट (लैक्टोस) को सहदमनकर कहते हैं, क्योंकि यह ओपरेटर स्थल (operator site) को निष्क्रिय करने के लिए दमनकर को सक्रिय करता है।

प्रश्न 11.
निम्न के कार्यों का वर्णन (एक अथवा दो पंक्तियों में) कीजिए –

  1. उन्नायक (प्रोमोटर)
  2. अन्तरण आर०एन०ए० (t-RNA)
  3. एक्जॉन (Exons)

उत्तर

  1. प्रोमोटर – DNA का यह अनुक्रम जीन अनुलेखन इकाई बनाता है तथा अनुलेखन इकाई में स्थित टेम्पलेट व कूटलेखन रज्जुक का निर्धारण करता है।
  2. tRNA – tRNA प्रोटीन संश्लेषण के दौरान अमीनो अम्लों को कोशिकाद्रव्य से राइबोसोम तक स्थानान्तरित करता है।
  3. एक्जॉन (Exon) – एक्जॉन में नाइट्रोजनी क्षारकों का अनुक्रम होता है तथा ये mRNA के संश्लेषण में सहायता करते हैं।

प्रश्न 12.
मानव जीनोम परियोजना को महापरियोजना क्यों कहा जाता है?
उत्तर
मानव जीनोम परियोजना एक अत्यन्त व्यापक स्तर की योजना है जिसके अन्तर्गत मनुष्य के जीनोम में उपस्थित समस्त जीनों की पहचान की जाती है। मानव जीनोम में 3 x 109 क्षार युग्म हैं तथा प्रति क्षार पहचानने के लिए तीन अमेरिकी डॉलर का खर्च आता है। इस प्रकार संपूर्ण योजना पर लगभग 9 मिलियन डॉलर का खर्च आएगा। ज्ञात अनुक्रमों का संग्रह करने के लिए 1000 पृष्ठों की लगभग 3300 पुस्तकों की आवश्यकता होगी, यदि प्रत्येक पृष्ठ पर 10000 शब्द लिखे जायें। इस योजना को पूरी होने में 13 वर्ष का समय अनुमानित किया गया है।

अनेक देशों के हजारों वैज्ञानिक एक साथ इस पर कार्य करते हैं तो इसकी प्रथम प्रक्रिया पूर्ण होने में 10 वर्ष का समय लगता है। इतने स्तर के आँकड़ों के संग्रह, समापन व विश्लेषण के लिए उच्च कोटि के सांख्यिकीय साधनों की आवश्यकता होगी। अतः अपने इस वृहद् स्तर के कारण यह योजना, महापरियोजना कहलाती है।

प्रश्न 13.
डी०एन०ए० अंगुलिछापी क्या है? इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए। (2014, 15, 16, 17, 18)
उत्तर
डी०एन०ए० अंगुलिछापी
डी०एन०ए० फिंगर प्रिन्टिंग तकनीक (अंगुलिछापी) को सर्वप्रथम एलेक जेफ्रे (Alec Jaffreys) ने इंग्लैण्ड में विकसित किया था। इसकी सहायता से विभिन्न व्यक्तियों अथवा जीवधारियों के मूल आनुवंशिक पदार्थ (D.N.A.) में भिन्नताओं को देखा जा सकता है। जैसा कि ज्ञात है कि जीवधारी की प्रजाति के सभी सदस्यों के डी०एन०ए० प्रारूप भिन्न होते हैं। यही कारण है कि समरूपी जुड़वाँ (identical twins) को छोड़कर किसी भी व्यक्ति का फिंगर प्रिन्ट एक-दूसरे से मेल नहीं करता। प्रत्येक जीवधारी की सभी कोशिकाओं में एक जैसा डी०एन०ए० पाया जाता है। डी०एन०ए० के कारण एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से भिन्न होता है। डी०एन०ए० के फिंगर प्रिन्टिग द्वारा डी०एन०ए० में स्थित उन क्षेत्रों की पहचान की जाती है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में किसी भी मात्रा में भिन्नता दर्शाते हैं।

डी०एन०ए० के इन्हीं क्षेत्रों के कारण शरीर में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। इन विभिन्नता दर्शाने वाले सैटेलाइट डी०एन०ए० (Satellite D.N.A.) को प्रोब (परीक्षण करने वाली सलाई) की भाँति प्रयोग करते हैं। इसमें काफी बहुरूपता होती है। एक्स-रे फिल्म पर एक पट्टिकाओं (bands) के क्रम के रूप में प्राप्त करके उनकी स्थिति, विशिष्टता और पहचान कर सकते हैं। किसी एक व्यक्ति के डी०एन०ए० के क्रम पट्टियों के रूप में अनिवार्य रूप से विशिष्ट होते हैं। समरूप जुड़वाँ के डी०एन०ए० पूर्णरूपेण समरूप हो सकते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 6 Molecular Basis of Inheritance img-7

इन पट्टियों का परिचित्र इलेक्ट्रोफोरेसिस तथा एक रेडियोऐक्टिव पदार्थ की सहायता से प्राप्त किया जाती है। विद्युत क्षेत्र की उपस्थिति में क्षारों की मात्रा विलोमानुपाती ढंग से दूरियाँ तय करती है जो कि बैण्ड्स या पट्टिकाओं के रूप में दृष्टिगोचर होती है।

डी०एन०ए० फिंगर प्रिन्ट विभिन्न ऊतकों (खून, बाल पुटक, त्वचा, अस्थि, लार, शुक्राणु आदि) से प्राप्त किए जा सकते हैं। डी०एन०ए० फिंगर प्रिन्ट का उपयोग अपराध मामलों जैसे-खूनी, बलात्कारी को पहचानने के लिए, पितृत्व के झगड़ों में पारिवारिक सम्बन्धों को ज्ञात करने आदि में किया जाता है।

प्रश्न 14.
निम्न का संक्षिप्त वर्णन कीजिए

  1. अनुलेखन, (2015)
  2. बहुरूपता,
  3. स्थानांतरण,
  4. जैव सूचना विज्ञान

उत्तर
1. अनुलेखन (Transcription) – DNA के रज्जुक में कूट के रूप में निहित आनुवंशिक सूचनाओं का mRNA में प्रतिलिपिकरण, अनुलेखन कहलाता है। इस प्रक्रिया के लिए RNA पॉलीमरेज नामक एंजाइम सहायक होता है। सर्वप्रथम DNA के न्यूक्लिओटाइड्स बनते हैं। तत्पश्चात् DNA रज्जुक अलग होकर साँचे के समान कार्य करने लगते हैं जिसके अनुसार नयी श्रृंखला में क्षारक क्रम व्यवस्थित होते हैं व H-बंधों द्वारा आपस में जुड़ जाते हैं।

2. बहुरूपता (Polymorphism) – जीन जनसंख्या में आनुवंशिक उत्परिवर्तनों का, उच्च आवृत्ति में होना, बहुरूपता कहलाता है। ऐसे उत्परिवर्तन DNA अनुक्रमों के परिवर्तित होने के कारण उत्पन्न होते हैं तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होकर एकत्रित होते हैं तथा बहुरूपता का कारण बनते हैं। बहुरूपता अनेक प्रकार की होती है तथा इसमें एक ही न्यूक्लिओटाइड में अथवा वृहद स्तर पर परिवर्तन होते हैं।

3. स्थानान्तरण (Translation) – mRNA न्यूक्लिओटाइड की श्रृंखलाओं का अमीनो अम्ल की | पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओं में परिवर्तित होना, स्थानान्तरण कहलाता है। यह प्रक्रिया राइबोसोम पर, प्रोटीन संश्लेषण के दौरान होती है। इसमें सर्वप्रथम एंजाइम व ATP द्वारा अमीनो अम्ल का सक्रियकरण होता है। सक्रिय अमीनो अम्ल tRNA पर स्थानांतरित होते हैं वे संश्लेषण प्रारंभ हो जाता है। तत्पश्चात् पॉलीपेप्टाइड अनुक्रम निर्धारित होते हैं। tRNA अणुओं के मध्य उपस्थित पेप्टाइड स्थल द्वारा पेप्टाइड बंध निर्मित होते हैं।

4. जैव सूचना विज्ञान (Bioinformatics) – जीव विज्ञान का वह क्षेत्र जिसके अंतर्गत जीवों के जीनोम संबंधी आँकड़ों का संग्रह, विश्लेषण किया जाता है, जैव सूचना विज्ञान कहलाता है। इसमें मानव जीनोम के मानचित्र बनाये जाते हैं वे DNA के अनुक्रमों को पंक्तिबद्ध किया जाता है। इसका उपयोग कृषि सुधार, ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण सुधार, स्वास्थ्य सुरक्षा आदि में किया जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध उपस्थित है – (2017)
(क) एडीपी में ।
(ख) एटीपी में
(ग) सी०एएमपी में
(घ) इनमें से किसी में नहीं
उत्तर
(घ) इनमें से किसी में नहीं

प्रश्न 2.
हरगोविन्द खुराना जाने जाते हैं – (2015, 17)
(क) प्रोटीन संश्लेषण के लिए
(ख) RNA संरचना की खोज के लिए
(ग) DNA संरचना की खोज के लिए
(घ) DNA लाइगेज एन्जाइम की खोज के लिए
उत्तर
(क) प्रोटीन संश्लेषण के लिए

प्रश्न 3.
डी०एन०ए० और आर०एन०ए० में समानता है – (2017)
(क) दोनों न्यूक्लियोटाइड्स की पॉलीमर श्रृंखला है।
(ख) दोनों में एक समान शर्करा पायी जाती है।
(ग) दोनों एक समान पाइरीमिडाइन्स से युक्त होते हैं।
(घ) दोनों इकहरी पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं के रूप में होते हैं।
उत्तर
(क) दोनों न्यूक्लियोटाइड्स की पॉलीमर श्रृंखला है।

प्रश्न 4.
संदेशवाहक आर०एन०ए० का निर्माण होता है – (2017)
(क) केन्द्रक में
(ख) राइबोसोम में
(ग) गॉल्जीकाय में
(घ) एण्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम में
उत्तर
(क) केन्द्रक में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आनुवंशिकता के गुणसूत्रीय सिद्धान्त को किसने प्रतिपादित किया? (2009)
उत्तर
सट्टन तथा बोवेरी (Sutton & Boveri, 1902) ने।

प्रश्न 2.
जीन की परिभाषा दीजिए। ये कहाँ पाये जाते हैं? (2014)
उत्तर
एक जीव के किसी भी लक्षण को निर्धारित करने वाले मेंडेलियन कारक को जीन कहते हैं। ये आनुवंशिक पदार्थ की एक प्रकार्यक इकाई होती है। जीन गुणसूत्र पर उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 3.
अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखकर रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए। (2014)
डी०एन०ए० →…… → प्रोटीन्स” अणुजैविकी का केन्द्रीय सिद्धान्त है।
उत्तर
“डी०एन०ए० → आर०एन०ए० → प्रोटीन्स” अणुजैविकी का केन्द्रीय सिद्धान्त है।

प्रश्न 4.
न्यूक्लियोसाइड्स तथा न्यूक्लियोटाइड्स में अन्तर बताइए। (2010, 14)
उत्तर

  1. एक न्यूक्लियोटाइड न्यूक्लिक अम्ल की एक पूर्ण इकाई है, जबकि न्यूक्लियोसाइड में एक फॉस्फेट मूलक (PO4) की कमी होती है।
  2. स्वभाव में न्यूक्लियोसाइड्स क्षारकीय होते हैं जबकि न्यूक्लियोटाइड्स अम्लीय होते हैं।

प्रश्न 5.
न्यूक्लिओटाइड्स में पायी जाने वाली दो शर्कराओं के नाम सूत्र सहित लिखिए। (2010, 11)
उत्तर

  1. राइबोज शर्करा – C5H10O5 तथा
  2. डीऑक्सीराइबोज शर्करा – C5H10O4

प्रश्न 6.
न्यूक्लिओटाइड्स में पाये जाने वाले प्यूरीन के नाम लिखिए।
उत्तर
एडीनीन (adenine) तथा ग्वानीन (guanine)।

प्रश्न 7.
आर०एन०ए० तथा डी०एन०ए० का पूरा नाम लिखिए। (2015)
उत्तर
आर०एन०ए० = राइबो न्यूक्लिक ऐसिड
डी०एन०ए० = डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड

प्रश्न 8.
प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक डी०एन०ए० में अन्तर बताइए। (2012)
उत्तर
प्रोकैरियोटिक DNA के साथ प्रोटीन जुड़े नहीं रहते जबकि यूकैरियोटिक DNA के साथ हिस्टोन प्रोटीन जुड़े रहते हैं।

प्रश्न 9.
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में कौन-से दो प्रकार के डी०एन०ए० पाये जाते हैं?
उत्तर
B – DNA तथा Z – DNA

प्रश्न 10.
Z – DNA क्या है? इसके प्रत्येक कुण्डल में कितने न्यूक्लिओटाइड्स होते हैं?
उत्तर
उच्च लवणता की स्थिति में B – DNA परिवर्तित होकर Z – DNA बनाता है। इसमें कुण्डलन वामावर्त होता है। कुण्डल का व्यास 18 Å तथा प्रत्येक कुण्डल में 12 जोड़ी न्यूक्लिओटाइड्स होते हैं।

प्रश्न 11.
डी०एन०ए० अणु का द्विकुण्डलित मॉडल किसने और कब प्रतिपादित किया? (2011)
उत्तर
डी०एन०ए० अणु का द्विकुण्डलित मॉडल 1953 ई० में वाटसन, क्रिक, विलकिन्स व फैंकलिन (J.D. Watson, F.H.C. Crick, M.H.F. Wilkins and R. Franklin) नामक वैज्ञानिकों ने प्रतिपादित किया। इनके इस कार्य के लिए इन्हें सन् 1962 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

प्रश्न 12.
पारक्रमण (transduction) क्या है? (2014)
उत्तर
पारक्रमण वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत वायरस (विषाणु) के द्वारा DNA का स्थानान्तरण एक जीवाणु से दूसरे जीवाणु में किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डीऑक्सीराइबोज शर्करा क्या है? इस शर्करा की अणु संरचना बनाइए। (2012, 14)
उत्तर
डीऑक्सीराइबोज शर्करा (deoxyribose sugar) DNA में पाई जाती है। यह पाँच कार्बन युक्त (5C) होती है। इसका पाँचवाँ कार्बन परमाणु वलय से बाहर होता है। शर्करा का पहला कार्बन परमाणु हमेशा नाइट्रोजन क्षारक के साथ ग्लाइकोसिडिक बन्ध (glycosidic bond) द्वारा जुड़ा रहता है जबकि तीसरा तथा पाँचवाँ कार्बन परमाणु हमेशा फॉस्फेट अणु के साथ जुड़ता है। दो शर्करा अणु एक-दूसरे के साथ तीसरे कार्बन (3C) तथा पाँचवें कार्बन (5C) के साथ एक फॉस्फेट अणु फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (phosphodiester bond) द्वारा जुड़े रहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 6 Molecular Basis of Inheritance img-8

प्रश्न 2.
DNA अणु की संरचना में चारगैफ के नियमों की महत्ता को स्पष्ट कीजिए। (2012)
उत्तर
चारगैफ (Chargaff) ने विभिन्न जीवों के DNA का अध्ययन किया और बताया कि

  1. सभी DNA अणुओं में प्यूरीन क्षारक की मात्रा पिरीमिडीन क्षारक के बराबर होती है। अतः
    [latex s=2]\frac { adenine+guanine }{ purine } =\frac { thymine+cytosine }{ pyrimidine } [/latex]
  2. भिन्न-भिन्न जातियों के जीवों के DNA में एडीनीन + थाइमीन तथा ग्वानीन + साइटोसीन का अनुपात
    (A + T : G + C) भिन्न-भिन्न होता है परन्तु एक ही जातियों के जीवों में यह समान होता है।
  3. एक ही जीव-जाति के सदस्यों में पाये जाने वाले DNA के कुल अणुओं में क्षारकों की संख्या समान होती है।

उपर्युक्त विचारों को “चारगैफ नियम” (Chargaff’s rule) के रूप में जाना जाता है।
वाटसन एवं क्रिक (Watson and Crick) ने भी DNA का मॉडल प्रस्तुत करने के लिये चारगैफ के नियमों की सहायता ली।

प्रश्न 3.
डी०एन०ए० तथा आर०एन०ए० में अन्तर लिखिए। (2009, 10, 11, 12, 13, 14, 16, 17)
उत्तर
डी०एन०ए० तथा आर०एन०ए० में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 6 Molecular Basis of Inheritance img-9

प्रश्न 4.
RNA कितने प्रकार के होते हैं? इनके कार्य बताइए। (2013, 16)
या
राइबोसोमल आर०एन०ए० पर टिप्पणी लिखिए। (2010)
या
प्रोटीन संश्लेषण में भाग लेने वाले विभिन्न प्रकार के RNA अणुओं का वर्णन कीजिए। (2012)
या
विभिन्न प्रकार के आर०एन०ए० का नाम लिखिए। (2014)
उत्तर
आर०एन०ए० के प्रकार
RNA अधिक अणुभार वाली पॉलीन्यूक्लियोटाइड से मिलकर बना है। यह DNA से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें डी-ऑक्सीराइबोज शर्करा के स्थान पर राइबोज शर्करा होती है और नाइट्रोजन बेस थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है। प्रत्येक कोशिका में RNA निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं –

1. सन्देशवाहक आर0एन0ए0 (mRNA) – इनका निर्माण केन्द्रक में उपस्थित DNA पर ट्रांसक्रिप्शन की क्रिया द्वारा होता है। ये कोशिका की कुल RNA का 3 – 5% होते हैं और इनका आणविक-भार 500,000 से 2,000,000 होता है। केन्द्रक में DNA साँचे पर इनका निर्माण होता है। सन् 1961 में फ्रैंसिस जैकब (Francis Jacob) तथा जैक्यू मोनाड (Jacques Monod) ने इन्हें सन्देशवाहक RNA अणुओं का नाम दिया।
कार्य – सन्देशवाहक RNA अणु केन्द्रक से बाहर कोशिकाद्रव्य में आ जाता है। यहाँ यह केन्द्रक से आदेश लेकर राइबोसोम पर विभिन्न प्रकार के प्रोटीन बनाता है।

2. राइबोसोमल आर0एन0ए0 (rRNA) – ये RNA के संरचनात्मक (structural) अणु होते हैं। यह कोशिका की कुल RNA का 80% होता है। rRNA केन्द्रक में DNA से उत्पन्न होता है। तीनों प्रकार के RNA में यह सर्वाधिक समय तक क्रियाशील रहता है। प्रत्येक राइबोसोम का लगभग 65% भाग rRNA का तथा शेष 35% भाग प्रोटीन का होता है।
कार्य – rRNA राइबोसोम्स की रचना में भाग लेते हैं। यह प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करता है।

3. स्थानान्तरण आर0एन0ए0 (tRNA or sRNA) – यह कोशिका की कुल आर०एन०ए० का 15-18% होता है। यह कोशिकाद्रव्य में पाया जाता है। ये सबसे छोटे व घुलनशील अणु होते हैं; अतः इन्हें विलेय RNA अणु (soluble RNA molecules) भी कहते हैं। इनको निर्माण केन्द्रक में DNA के साँचे (DNA template) पर होता है।
कार्य – ये विभिन्न प्रकार के अमीनो अम्लों को राइबोसोम्स पर लाते हैं, जहाँ प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

प्रश्न 5.
आनुवंशिक कूट या जेनेटिक कोड्स क्या हैं? आनुवंशिक कोड में पाये जाने वाले एक समारम्भ व एक समापन कोडॉन को स्पष्ट कीजिए। (2009, 10, 12, 16)
या
आनुवंशिक कूट क्या है? इसकी कोई चार विशेषताएँ लिखिए। (2015, 17)
या
समारंभन कोडॉन एवं समापन कोडॉन से आप क्या समझते हैं? (2017)
उत्तर
आनुवंशिक कूट या जेनेटिक कोड
डी०एन०ए० (DNA) आनुवंशिक सूचनाओं या सन्देशों के टेप की भाँति है जिसमें नाइट्रोजन क्षारकों के अनुक्रमांक के रूप में आनुवंशिक सन्देश होते हैं। प्रोटीन में प्रायः विभिन्न प्रकार के 20 अमीनो अम्ल होते हैं परन्तु न्यूक्लिक अम्ल में केवल चार ही क्षारक होते हैं। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि प्रोटीन भाषा की वर्णमाला में 20 अमीनो अम्ल रूपी अक्षर (alphabets) होते हैं। इसी प्रकार न्यूक्लिक अम्लों की भाषा की वर्णमाला में चार क्षारक रूपी अक्षर होते हैं क्योंकि आनुवंशिक सूचना m-RNA से होकर प्रोटीन तक पहुँचती है, अतः RNA की भाषा का प्रोटीन की भाषा में अनुवाद करने के लिए एक शब्दकोष को तैयार करना आनुवंशिक कूट (genetic code) की समस्या थी।

एक चार अक्षरों की भाषा और दूसरी 20 अक्षरों की भाषा होने के कारण यह सम्भव नहीं है कि RNA भाषा का एक अक्षर अर्थात् एक क्षारक प्रोटीन भाषा के एक अक्षर अथवा एक अमीनो अम्ल के समतुल्य हो सके। इस प्रकार आनुवंशिक संकेत पद्धति में कुल 43 =4 x 4 x 4 = 64 कोडॉन होते हैं।

इस सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये परन्तु क्रिक (EH.C. Crick) द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त ही सर्वाधिक मान्य है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक अमीनो अम्ल के लिए तीन नाइट्रोजन क्षारकों का एक अनुक्रम या त्रिक् कोड (triplet code) होता है; अतः आनुवंशिक कूट या जेनेटिक कोड डी०एन०ए० अणुओं में स्थित नाइट्रोजन क्षारकों का वह अनुक्रम है जिसमें प्रोटीन अणुओं के संश्लेषण के लिए सन्देश निहित रहते हैं।

कोडॉन (Codon) – न्यूक्लियोटाइड्स के उस समूह को जिसमें किसी एक अमीनो अम्ल के लिए सन्देश या कोड हो, कोडॉन (codon) कहते हैं; जैसे-AUG समारम्भ कोडॉन है।
एण्टीकोडॉन (Anticodon) – t-RNA में उपस्थित उस तीन क्षारक समूह को जो m-RNA में उपस्थित कोडॉन का पूरक हो, एण्टीकोडॉन (anticodon) कहते हैं।

त्रिक कोड (Triplet code) – गैमो (Gamow, 1954) ने तीन अक्षरीय कोड की सम्भावना प्रकट की। DNA व RNA में कुल चार न्यूक्लियोटाइड्स होते हैं और लगभग 20 अमीनो अम्लों के विन्यास का कोड (code) इनके विन्यास पर आधारित होता है। अगर यह मान लिया जाये कि प्रत्येक कोड केवल एक न्यूक्लिओटाइड का बना होता है तो इससे कुल चार कोड बनेंगे जो केवल 4 अमीनो अम्लों के विन्यास को नियन्त्रित कर सकते हैं। अगर प्रत्येक कोड को दो न्यूक्लियोटाइड्स का बना हुआ माना जाये तो (4 x 4) केवल 16 कोड्स बनेंगे। ये भी 20 अमीनो अम्लों के लिए पर्याप्त नहीं हैं। तीन न्यूक्लियोटाइड्स के बने कोड से (4 x 4 x 4 = 64) 64 कोड शब्द बनते हैं। ये बीस अमीनो अम्लों के लिए आवश्यकता से अधिक हो जाते हैं; अतः गैमो की तीन अक्षरीय कोड की सम्भावना सही है।

श्रृंखला का समारम्भ एवं समापन करने वाले कोडॉन
सिस्ट्रोन के प्रथम कोडॉन को समारम्भ कोडॉन (initiation codon) कहते हैं। यह पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के कोडित होने के सन्देश को प्रारम्भ करता है। अधिकतर श्रृंखलाओं में AUG समारम्भ कोडॉन होता है। यह मेथिओनिन (methionine) नामक अमीनो अम्ल को कोडित करता है। इसी प्रकार सिस्ट्रोन का अन्तिम कोडॉन पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का समापन करता है। इसे समापन कोडॉन (termination codon) कहते हैं। समापन कोडॉन तीन होते हैं-UAA, UGA तथा UAG। प्रारम्भ में जब इनके कार्य का ज्ञान नहीं था तो ये निरर्थक कोडॉन (nonsense codon) कहलाते थे।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डी०एन०ए० की आणविक संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए तथा डी०एन०ए० के द्विगुणन में इसका महत्त्व समझाइए। (2009,12)
या
डी०एन०ए० की संरचना के वाटसन एवं क्रिक मॉडल को उपयुक्त चित्र बनाकर समझाइए। (2014, 16)
या
न्यूक्लिक अम्ल की परिभाषा लिखिए। वाटसन एवं क्रिक द्वारा प्रतिपादित डी०एन०ए० मॉडल की संरचना का वर्णन कीजिए। (2014)
या
वाटसन एवं क्रिक द्वारा प्रस्तुत डी०एन०ए० की रासायनिक संरचना का वर्णन कीजिए तथा इसकी आनुवंशिक पदार्थ के रूप में मान्यता का उल्लेख कीजिए। (2015, 17)
उत्तर
न्यूक्लिक अम्ल
सर्वप्रथम आल्टमान (1889) ने केन्द्रकीय पदार्थ को निकालकर इसमें से प्रोटीन्स को पृथक् किया तथा शेष फॉस्फोरस युक्त पदार्थ को अम्लीय होने के कारण न्यूक्लिक अम्ल कहा। ये दो प्रकार के होते हैं-DNA व RNA

डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल (DNA) तथा इसकी संरचना
एक डी०एन०ए० (डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल) अणु एक बहुलक (polymer) है जो आनुवंशिक लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरित करता है; अतः इसे आनुवंशिक अणु (molecule of heredity) भी कहते हैं। डी०एन०ए० (DNA = deoxyribo nucleic acid) की खोज फ्रीडरिक मीशर (Friedrich Miescher, 1869) ने की थी। सबसे पहले विलकिन्स तथा फ्रैंकलिन (Wilkins and Franklin, 1952) ने बताया कि डी०एन०ए० एक कुण्डलित (helical) संरचना होती है। 1953 ई० में वाटसन तथा क्रिक (Watson and Crick) ने डी०एन०ए० संरचना का द्विकुण्डलित मॉडल (Double Helix Model) प्रस्तुत किया।

यह दो लम्बी श्रृंखलाओं के बने दो। कुण्डल (helices) होते हैं जो आधारभूत रूप में विशेष इकाइयों जिन्हें न्यूक्लियोटाइड्स (nucleotides) कहा जाता है, से बने होते हैं। इस प्रकार, एक अणु में सहस्रों से लेकर लाखों तक न्यूक्लियोटाइड्स होते हैं अर्थात् ये श्रृंखलाएँ पॉलीन्यूक्लियोटाइड (polynucleotide) श्रृंखलाएँ होती हैं। इस प्रकार, डी०एन०ए० की संरचना अनेक बहुलकों (polymers) की श्रृंखलाओं (chains) के दोहरे होने से बनती है। ये श्रृंखलाएँ काफी लम्बी तथा अणु अत्यधिक बड़े होते हैं। प्रत्येक श्रृंखला का प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड एक विशिष्ट तथा जटिल संरचना है। यह स्वयं तीन प्रकार के अणुओं या मूलकों (radicals) से मिलकर बना होता है, जिनमें

1. एक पेन्टोज शर्करा (pentose sugar), डीऑक्सीराइबोज (deoxyribose) प्रकार की अर्थात् | यह एक पाँच कार्बन वाली शर्करा होती है।
2. एक फॉस्फेट (phosphate) मूलक जो एक अणु फॉस्फोरिक अम्ल (phosphoric acid = H3PO4) से बनता है।
3. एक नाइट्रोजन क्षारक (nitrogen base) जो दो प्रकार के तथा कुल चार क्षारकों में से एक होता है। ये इस प्रकार हैं –
(क) प्यूरीन (purine) प्रकार के जिनमें 2-N रिंग होती है; ये हैं – एडीनीन (adenine) व ग्वानीन (guanine) तथा
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(ख) पिरामिडीन (pyrimidine) प्रकार के जिनमें नाइट्रोजन की एकल रिंग होती है; उदाहरण हैं – साइटोसीन (cytosine) तथा थाइमीन (thymine) क्षारक।

DNA के एक अणु में डीऑक्सीराइबोज शर्करा (deoxyribose sugar) का एक अणु क्षारक (base) के एक अणु से जुड़ा रहता है। इस यौगिक को डीऑक्सीराइबोसाइड (deoxyriboside) कहते हैं। यह एक न्यूक्लिओसाइड (nucleoside) है। अब यह न्यूक्लिओसाइड एक फॉस्फोरिक अम्ल (HI PO4) से मिलकर डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिओटाइड (deoxyribo nucleotide) बनाता है। न्यूक्लिओटाइड के एक अणु में क्षारक का अणु सदैव शर्करा के अणु से जुड़ता है। इसी तरह फॉस्फोरिक अम्ल का एक अणु भी शर्करा के एक अणु से जुड़ा रहता है।

चार विभिन्न नाइट्रोजन बेस होने के कारण डी०एन०ए० (DNA) के अणु में चार प्रकार के न्यूक्लिओसाइड व चार न्यूक्लिओटाइड होते हैं। एक डी०एन०ए० अणु में दो लम्बी श्रृंखलाएँ होती हैं जिनमें क्षारक (base) का अणु अक्ष (axis) की ओर होता है। दोनों श्रृंखलाओं के क्षारकों के अणु एक-दूसरे से हाइड्रोजन बन्ध (H-bonds) से जुड़कर क्षारक का एक जोड़ा बना लेते हैं। इन हाइड्रोजन बन्धों के मध्य 2.83 – 2.90 A का स्थान होता है। इन बन्धों से न्यूक्लिओटाइड्स की दो श्रृंखलाएँ बँधी होती हैं।

ये दोनों शृंखलाएँ एक-दूसरे की परिपूरक (complementary) होती हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से उल्टी दिशा में (antiparallel) होती हैं अर्थात् एक श्रृंखला में फॉस्फोडाइएस्टर लिंकेज (phosphodiester linkage) 3’→ 5′ एक दिशा में तथा दूसरी श्रृंखला में 5’→ 3′ उल्टी दिशा में होते हैं। इस प्रकार डी०एन०ए० एक सीढ़ी की तरह लगता है। DNA का व्यास (diameter) 20 Å होता है।

डी०एन०ए० का द्विकुण्डल प्रतिरूप
सन् 1953 में वाटसन, क्रिक, विलकिन्स व फ्रैंकलिन (J.D. Watson, EH.C. Crick, M.H.E Wilkins and R. Franklin) नामक वैज्ञानिकों ने एक्स-रे विश्लेषण (X-ray diffraction studies) द्वारा डी०एन०ए० (DNA) का द्विकुण्डल प्रतिरूप (double helical model) प्रस्तुत किया जिस पर उन्हें सन् 1962 में नोबेल पुरस्कार मिला। इस मॉडल के अनुसार डी०एन०ए० (DNA) अणु पॉलीन्यूक्लियोटाइट्स के दो स्टैण्ड्स (strands) का बना होता है। दोनों स्टैण्ड्स एक ही केन्द्रीय अक्ष पर कुण्डलित रहते हैं और अक्ष के चारों ओर एक द्विचक्राकार (double helical) संरचना बना लेते हैं। प्रत्येक चक्राकार संरचना में न्यूक्लिओटाइड्स के 10 युगल (ten pairs) होते हैं और एक चक्र से दूसरे चक्र की दूरी 34 में होती है अर्थात् एक न्यूक्लिओटाइड का दूसरे न्यूक्लिओटाइड से अन्तर 3.4 Å होता है। Φ × 174 कॉलीफेज (coliphage) तथा 513 ई० कोलाई फेज (E. coti phase) नामक वाइरस (virus) में अपवाद स्वरूप डी०एन०ए० (DNA) में पॉली डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिओटाइड की एक श्रृंखला (single strand) ही होती है।

प्रत्येक क्षारक युग्म में प्यूरीन प्रकार का क्षारक एडिनीन (adenine) हमेशा पिरीमिडीन प्रकार के क्षारक थाइमीन (thymine) से तथा ग्वानीन (guanine) प्रकार का प्यूरीन क्षारक हमेशा पिरीमिडीन प्रकार के साइटोसीन (cytosine) क्षारक के साथ ही जुड़कर पगदण्ड का एक भाग बनाता है। इसमें अन्य किसी भी प्रकार का युग्म सम्भव नहीं है। इस प्रकार, यदि एक श्रृंखला में T-C-G-A-T-C-G आदि हैं तो दूसरी श्रृंखला में T के सामने A, c के सामने G, G के सामने C तथा A के सामने T आदि ही होंगे। इस प्रकार
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पगदण्ड में न्यूक्लियोटाइड के क्षारक हाइड्रोजन बन्धों (H-bonds) के द्वारा जुड़े होते हैं। इसमें एडिनीन, थाइमीन के साथ दो साइटोसीन, ग्वानीन के साथ तीन बन्धों से बन्धनयुक्त होता है। क्षारकों का निश्चित क्रम डी०एन०ए० की रासायनिक शब्दावली बनाता है जिससे आनुवंशिक लक्षणों की स्थापना होती है।
[संकेत–डी०एन०ए० की संरचना का महत्त्व विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 2 के उत्तर में देखिए।]

प्रश्न 2.
डी०एन०ए० द्विगुणन (replication of DNA) के प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए। DNA के महत्त्वपूर्ण कार्य क्या हैं?
या
डी०एन०ए० के द्विगुणन (प्रतिकृतियन) का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (2015, 16)
या
डी०एन०ए० की अर्धसंरक्षी द्विगुणन विधि का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
डी०एन०ए० का द्विगुणन
वाटसन एवं क्रिक (Watson and Crick) ने बताया कि डी०एन०ए० (DNA) एक द्विकुण्डलिनी संरचना है, जो दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से मिलकर बना है। ये श्रृंखलाएँ प्रतिसप्तान्तर (antiparallel) तथा एक-दूसरे की पूरक (complementary) होती हैं। डी०एन०ए० अणु का द्विगुणन अर्द्धसंरक्षी (semiconservative) होता है। इसका तात्पर्य यह है कि नये बने DNA अणु में एक सूत्र (strand) पैतृक होगा तथा दूसरा सूत्र नवनिर्मित होगा। सन् 1958 में मैथ्यू मेसेल्सन । (Matthew Meselson) तथा फ्रैंकलिन स्टाहल (Franklin Stahl) ने एश्केरीशिया कोलाई (Eischerichia coli = E. coli) नामक जीवाणु के डी०एन०ए० अणु पर ऐसे द्विगुणन की पुष्टि की। डी०एन०ए० के द्विगुणन को हम निम्नलिखित प्रमुख चरणों में बाँट सकते हैं –

1. डी0एन0ए0 अणुओं के पराकुण्डलों का अकुण्डलन एवं पुनर्कुण्डलन (Decoiling and Recoiling of Supercoils of DNA Molecules) – डी०एन०ए० अणुओं के पराकुण्डलन एवं अकुण्डलन का नियमन कुछ विशेष एन्जाइम करते हैं, जिन्हें टोपोआइसोमेरेज (topoisomerase) कहते हैं। द्विगुणन के लिए ये एन्जाइम धीरे-धीरे डी०एन०ए० अणु के छोटे-छोटे स्थानीय खण्डों में इसका पराकुण्डलन समाप्त करके द्विकुण्डलिनी (duplex) को खोलते रहते हैं और द्विगुणन के बाद सन्तति अणुओं का पुनर्कुण्डलन भी करते रहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-टोपोआइसोमेरेज-1 (topoisomerase-I) तथा टोपोआइसोमेरेज-II (topoisomerase-II)।

टोपोआइसोमेरेज-I DNA की द्विकुण्डलिनी के एक सूत्र में कटाव (nick) पैदा करता है, जबकि टोपोआइसोमेरेज-II DNA द्विकुण्डलिनी के दोनों सूत्रों में कटाव उत्पन्न करता है। इसे डी०एन०ए० गाइरेज (DNA gyrase) भी कहते हैं। इन कटावों के बनने से ही स्थानीय अकुण्डलन से शेष द्विकुण्डलिनी में होने वाला घूर्णन (rotation) समाप्त । होता है।

2. द्विकुण्डलिनी का खुलना (Unwinding of Double Helix) – डी०एन०ए० अणु का द्विगुणन कुछ निर्दिष्ट स्थानों पर ही होता है, जिन्हें द्विगुणन मूल (replication origins) कहते हैं। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में DNA अपेक्षाकृत लम्बे, रेखीय वे एक से लेकर कई युग्मों (pairs) में होते हैं। प्रत्येक अणु के द्विगुणन के लिए इसमें अनेक द्विगुणन मूल होते हैं। इन द्विगुणन मूल पर कुछ विशेष प्रकार की मूल-बन्धिनी प्रोटीन्स (origin-binding proteins) द्विकुण्डलिनी से जुड़ जाती हैं। यहीं पर विभिन्न प्रकार के प्रोटीन्स व एन्जाइम्स एकत्र होकर द्विगुणन में विविध भूमिकाएँ निभाते हैं।

ई० कोलाई (E. coli) में इन मूल-बन्धिनी प्रोटीन्स को ‘ori C’ का नाम दिया गया है। ये प्रोटीन्स ए०टी०पी० की सहायता से द्विगुणन मूलों के समाक्षारों के युग्मों से H-बन्धों (H-bonds) को हटा देती हैं। द्विगुणने मूल H-बन्धों (H-bonds) के टूटते ही दोहरा हैलिक्स खुल जाता है, इसे डी०एन०ए० अणु का द्रवण (melting) कहते हैं। दोनों कुण्डल के अलग होने से ‘Y’ आकार की चिमटी के समान द्विशाखी, द्विगुणन काँटे (replication fork) जैसी संरचना बन जाती है। प्रत्येक द्विशाख पर एक सूत्र से डी०एन०ए० हेलिकेज (DNA helicase) नामक एन्जाइम का एक बड़ा अणु लिपट जाता है। यह एन्जाइम डी०एन०ए० के सूत्रों को धीरे-धीरे खोलने अर्थात् द्रवण का कार्य करता है।

3. न्यूक्लियोटाइड्स का सक्रियकरण (Activation of Nucleotides) – न्यूक्लियोसाइड एन्जाइम फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) तथा ए०टी०पी० की उपस्थिति में सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को फॉस्फोरिलेशन कहते हैं।

4. आर0एन0ए0 प्रवेशक का निर्माण (Formation of RNA Prirmers) – द्विगुणन शाखाओं के बनते ही प्रत्येक द्विशाख पर अलग हुए प्रत्येक DNA सूत्र पर राइबोन्यूक्लियोटाइड (ribonucleotide) अणुओं की एक छोटी अनुपूरक (complementary) श्रृंखला (RNA का छोटा अणु) बन जाती है। इन RNA अणुओं को प्रवेशक (primer) कहते हैं, क्योंकि इन्हीं के 3′ छोरों पर डीऑक्सीराइबो न्यूक्लियोटाइड अणुओं को जोड़कर DNA की एक नयी श्रृंखला का संश्लेषण किया जाता है। आर०एन०ए० प्राइमर का संश्लेषण प्राइमेज (primase) एन्जाइम  या RNA पॉलीमेरेज (RNA polymerase) की सहायता से होता है।

5. डी0एन0ए0श्रृंखला का निर्माण तथा दीर्धीकरण (Formation and Elongation of DNA Chain) – एन्जाइम डी०एन०ए० पॉलीमेरेज-III (DNA polymerase-III) RNA प्राइमर में 5’→3′ दिशा में नये क्षारकों को जोड़ता है। इन क्षारकों का क्रम DNA टेम्पलेट के अनुसार होता है। डी०एन०ए० अणु के दो सूत्र प्रतिसमान्तर होते हैं अर्थात् एक की दिशा 5’→3′ तथा दूसरे की 3′ → 5′ होती है।

एन्जाइम डी०एन०ए० पॉलीमरेज III क्षारकों को केवल 5′ – 3′ दिशा में ही जोड़ सकता है; अत: 3′ – 5′ दिशा वाले DNA टेम्पलेट पर नई DNA श्रृंखला का सतत् निर्माण (continuous synthesis) होता है। ऐसे सूत्र को अगुआ सूत्र या अग्रक रज्जुक (leading strand) कहते हैं। इसके विपरीत जिस नई DNA श्रृंखला का निर्माण 3’→ 5′ दिशा में होता है अर्थात् 5’→3′ दिशा वाले पैतृक सूत्र पर यह असतत् होता है। इस प्रकार यह निर्माण छोटे-छोटे खण्डों के रूप में होता है, ये खण्ड ओकाजाकी खण्ड (Okajaki fragments) कहलाते हैं। इस प्रकार, खण्डों के रूप में हुए निर्माण के कारण इस नये सूत्र को पश्चगामी रज्जुक या पिछुआ सूत्र (lagging strand) कहते हैं। पिछुआ सूत्र के पृथक्-पृथक् टुकड़ों में बनने की प्रक्रिया की खोज रोजी ओकाजाकी (Reiji Okajaki 1968) ने की थी ।
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6. आर0एन0ए0 प्रवेशक का हटना (Removal of RNA Primer) – DNA श्रृंखला की लम्बाई बढ़ने के बाद आर०एन०ए०प्रवेशक (RNA primer) श्रृंखला से हट जाता है। आर०एन०ए० प्रवेशक के हटने से उत्पन्न रिक्त स्थान को भरने में डी०एन०ए०पॉलीमेरेज-1 (DNA polymerase-I) सहायता करता है। जब DNA का निर्माण पूरा हो जाता है तो एन्जाइम DNA हेलिकेज की क्रिया रुक जाती है।

डी०एन०ए० का महत्त्व तथा कार्य
न्यूक्लिक अम्लों को जीवन को चलाये रखने का प्रमुख आधार माना जाता है। ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी लक्षणों के प्रकटन से लेकर उन लक्षणों के अन्तर्गत विभिन्न क्रियाओं को उनके निर्दिष्ट तक उचित विधि द्वारा, उचित स्वरूप में तथा नियमित एवं नियन्त्रित अनुक्रियाओं के द्वारा, पहुँचाने का कार्य करते हैं। इस प्रकार –

  1. डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल (DNA) आनुवंशिक सूचनाओं के वाहक का कार्य करता है। तथा सभी आनुवंशिक लक्षणों को पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी में पहुँचाता है।
  2. DNA के द्वारा निर्मित राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA) विभिन्न अमीनो अम्लों से DNA द्वारा निर्देशित प्रोटीन का संश्लेषण करते हैं जो विभिन्न प्रकार की क्रियाओं-अनुक्रियाओं को होने देने में एन्जाइम्स (enzymes) के रूप में सहायक होती हैं।
  3. DNA के भाग या उसके द्वारा निर्मित कुछ न्यूक्लियोटाइड हॉर्मोन्स (hormones), सह-एन्जाइमों (co-enzymes) आदि के रूप में कार्य करते हैं।
  4. जिस मास्टर योजना (master plan) के अन्तर्गत जन्म से मृत्यु तक किसी जीव में कोशिकाएँ बनती हैं और कार्य करती हैं, उसकी मूल रूपरेखा (original blue print) डी०एन०ए० के रूप में होती है।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism (गतिमान आवेश और चुम्बकत्व) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism (गतिमान आवेश और चुम्बकत्व).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 4
Chapter Name Moving Charges and Magnetism (गतिमान आवेश और चुम्बकत्व)
Number of Questions Solved 88
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism (गतिमान आवेश और चुम्बकत्व)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तार की एक वृत्ताकार कुंडली में 100 फेरे हैं, प्रत्येक की त्रिज्या 8.0 cm है और इनमें 0.40A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है ?
हल-
दिया है,
कुण्डली में तार के फेरों की संख्या n = 100
प्रत्येक फेरे की त्रिज्या r = 8.0 सेमी = 8.0 x 10-2 मीटर
कुण्डली में प्रवाहित धारा I = 0.40 ऐम्पियर
कुण्डली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण B = ?
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प्रश्न 2.
एक लम्बे, सीधे तार में 35 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। तार से 20 cm दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण क्या है?
हल-
एक लम्बी धारावाही सीधी तार के कारण r दूरी पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र,
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प्रश्न 3.
क्षैतिज तल में रखे एक लम्बे सीधे तार में 50A विद्युत धारा उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के पूर्व में 2.5 m दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र B का परिमाण और उसकी दिशा ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है,
धारा की प्रबलता I = 50 ऐम्पियर
दिए गए बिन्दु की तार से लम्बवत् दूरी r = 2.5 मीटर
बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र B का परिमाण व दिशा = ?
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प्रश्न 4.
व्योमस्थ खिंचे क्षैतिज बिजली के तार में 90 A विद्युत धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है। तार के 1.5 m नीचे विद्युत धारा के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण और दिशा क्या है?
हल-
तार में धारा i = 90 A (पूर्व से पश्चिम), तार से दूरी = 1.5 m
तार के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q4
चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा क्षैतिजत: उत्तर से दक्षिण की ओर होगी।

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प्रश्न 5.
एक तार जिसमें 8 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, 0.15 T के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में, क्षेत्र से 30° का कोण बनाते हुए रखा है। इसकी एकांक लम्बाई पर लगने वाले बल का परिमाण और इसकी दिशा क्या है?
हल-
चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र से θ कोण पर रखे L लम्बाई के धारावाही चालक तार पर लगने वाले बल का परिमाण
F = ILB sin θ (जहाँ I = तार में प्रवाहित धारा)
तार की एकांक लम्बाई ([latex s=2]\frac { F }{ L }[/latex]) = IB sin θ
यहाँ I = 8A; B = 0.15 T तथा θ = 30°
([latex s=2]\frac { F }{ L }[/latex]) = 8 x 0.15 x sin 30° न्यूटन/मीटर
= 8 x 0.15 x ([latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]) न्यूटन/मीटर
= 0.60 न्यूटन/मीटर

प्रश्न 6.
एक 3.0 cm लम्बा तार जिसमें 10 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, एक परिनालिका के भीतर उसके अक्ष के लम्बवत् रखा है। परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र का मानं 0.27 T है। तार पर लगने वाला चुम्बकीय बल क्या है?
हल-
परिनालिका के अन्दर उसकी (UPBoardSolutions.com) अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र B = 0.27 T (जिसकी दिशा अक्ष के अनुदिश ही होती है)। धारावाही तार अक्ष के लम्बवत् है,
अतः θ = 90°; तार की लम्बाई L = 3.0 सेमी = 3.0 x 10-2 मी; तार में धारा I = 10 A; अतः तार पर लगने वाला चुम्बकीय बल
F = ILB sin θ न्यूटन
= 10 x (3.0 x 10-2) (0.27) x sin 90° न्यूटन
= 81 x 10-2 x 1 न्यूटन
= 8.1 x 10-2 न्यूटन

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प्रश्न 7.
एक-दूसरे से 4.0 cm की दूरी पर रखे दो लम्बे, सीधे, समान्तर तारों A एवं B से क्रमशः 8.0 A एवं 5.0 A की विद्युत धाराएँ एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। तार A के 10 cm खण्ड पर बल का आकलन कीजिए।
हल-
परस्पर समान्तर दो लम्बे सीधे धारावाही तारों के बीच प्रत्येक तार की एकांक लम्बाई पर कार्य करने वाला पारस्परिक बल
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प्रश्न 8.
पास-पास फेरों वाली एक परिनालिका 80 cm लम्बी है और इसमें 5 परतें हैं जिनमें से प्रत्येक में 400 फेरे हैं। परिनालिका का व्यास 1.8 cm है। यदि इसमें 8.0 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है तो परिनालिका के भीतर केन्द्र के पास चुम्बकीय क्षेत्र B का परिमाण परिकलित कीजिए।
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प्रश्न 9.
एक वर्गाकार कुंडली जिसकी प्रत्येक भुजा 10 cm है, में 20 फेरे हैं और उसमें 12 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। कुंडली ऊर्ध्वाधरतः लटकी हुई है और इसके तल पर खींचा गया अभिलम्ब 0.80 T के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से 30° का एक कोण बनाता है। कुंडली पर लगने वाले बल-युग्म आघूर्ण का परिमाण क्या है?
हल-
बल-युग्म के आघूर्ण का परिमाण τ = NIAB sin θ
यहाँ फेरों की संख्या N = 20; वर्गाकार कुण्डली के तल को क्षेत्रफल
A = भुजा2 = (0.10 मी)2 = 0.01 मी
कुण्डली में धारा I = 12 A; चुम्बकीय क्षेत्र B = 0.80 T तथा θ = 30°
τ = 20 x 12 x 0.01 x 0.80 x sin 30° न्यूटन मीटर
= 240 x 0.008 x ([latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]) न्यूटन मीटर
= 0.960 न्यूटन मीटर।

प्रश्न 10.
दो चल कुंडली गैल्वेनोमीटर मीटरों MI एवं M, के विवरण नीचे दिए गए हैं।
R1 = 10 Ω, N1 = 30, A1 = 3.6 x 10-3 m2, B1 = 0.25 T
R2 = 14 Ω, N2 = 42, A2 = 1.8 x 10-3 m2, B2 = 0.50 T
(दोनों मीटरों के लिए स्प्रिंग नियतांक समान है)।
(a) M2 एवं M1 की धारा-सुग्राहिताओं,
(b) M2 एवं M1 की वोल्टता-सुग्राहिताओं का अनुपात ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 11.
एक प्रकोष्ठ में 6.5 G (1G = 10-4 T) का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र बनाए रखा गया है। इस चुम्बकीय क्षेत्र में एक इलेक्ट्रॉन 4.8 x 106 ms-1 के वेग से क्षेत्र के लम्बवत् भेजा गया है। व्याख्या कीजिए कि इस इलेक्ट्रॉन का पथ वृत्ताकार क्यों होगा? वृत्ताकार कक्षा की त्रिज्या ज्ञात कीजिए। (e = 1.6 x 1019 C, me = 9.1 x 10-31 kg)
हल-
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क्योंकि चुम्बकीय क्षेत्र में लम्बवत् प्रवेश करने वाले इलेक्ट्रॉन पर चुम्बकीय बल सदैव इसके वेग के लम्बवत् रहने के कारण इलेक्ट्रॉन का पथ वृत्ताकार हो जाता है।

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प्रश्न 12.
प्रश्न 11 में, वृत्ताकार कक्षा में इलेक्ट्रॉन की परिक्रमण आवृत्ति प्राप्त कीजिए। क्या यह उत्तर इलेक्ट्रॉन के वेग पर निर्भर करता है? व्याख्या कीजिए।
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प्रश्न 13.
(a) 30 फेरों वाली एक वृत्ताकार कुंडली जिसकी त्रिज्या 8.0 cm है और जिसमें 6.0 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, 1.0 T के एकसमान क्षैतिज चुम्बकीय क्षेत्र में ऊर्ध्वाधरतः लटकी है। क्षेत्र रेखाएँ कुंडली के अभिलम्ब से 60° का कोण बनाती हैं। कुंडली को घूमने से रोकने के लिए जो प्रति आघूर्ण लगाया जाना चाहिए उसके परिमाण परिकलित कीजिए।
(b) यदि (a) में बतायी गई वृत्ताकार कुंडली को उसी क्षेत्रफल की अनियमित आकृति की समतलीय कुंडली से प्रतिस्थापित कर दिया जाए (शेष सभी विवरण अपरिवर्तित रहें) तो क्या आपका उत्तर परिवर्तित हो जाएगा?
हल-
(a) कुंडली में फेरे N = 30, त्रिज्या r = 8.0 x 10-2 m, i = 6.0 A
चुम्बकीय क्षेत्र B = 1.0 T, θ = 60°
कुंडली पर चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल-युग्म का आघूर्ण
τ = NiAB sin 60° = Ni (πr²) B sin 60°
= 30 x 6.0 x (314 x 64.0 x 10-4) x 1.0 x [latex s=2]\frac { \surd 3 }{ 2 }[/latex] = 3.13 N-m
स्पष्ट है कि कुंडली को घूमने से रोकने के लिए 3.13 N-m का बल-आघूर्ण विपरीत दिशा में लगाना होगा।
(b) नहीं, उत्तर में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसका कारण यह है कि बल-आघूर्ण (τ = NiAB sin θ) कुंडली के क्षेत्रफल A पर निर्भर करता है न कि उसके आकार पर।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 14.
दो समकेन्द्रिक वृत्ताकार कुंडलियाँ x और Y जिनकी त्रिज्याएँ क्रमशः 16 cm एवं 10 cm हैं, उत्तर-दक्षिण दिशा में समान ऊध्र्वाधर तल में अवस्थित हैं। कुंडली X में 20 फेरे हैं और इसमें 16 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है, कुंडली Y में 25 फेरे हैं और इसमें 18 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। पश्चिम की ओर मुख करके खड़ा एक प्रेक्षक देखता है कि X में धारा प्रवाह वामावर्त है जबकि में दक्षिणावर्त है। कुंडलियों के केन्द्र पर, उनमें प्रवाहित विद्युत धाराओं के कारण उत्पन्न कुल चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण एवं दिशा ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 15.
10 cm लम्बाई और 10-3 m2 अनुप्रस्थ काट के एक क्षेत्र में 100 G (1G = 10-4) का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र चाहिए। जिस तार से परिनालिका का निर्माण करना है उसमें अधिकतम 15 A विद्युत धारा प्रवाहित हो सकती है और क्रोड पर अधिकतम 1000 फेरे प्रति मीटर लपेटे जा सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए परिनालिका के निर्माण का विवरण सुझाइए। यह मान लीजिए कि क्रोड लौह-चुम्बकीय नहीं है।
हल-
माना परिनालिका की एकांक लम्बाई में फेरों की संख्या n तथा उसमें प्रवाहित धारा 1 है तब उसकी अक्ष पर केन्द्रीय भाग में
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q15
दी गई परिनालिका के लिए ni = नियतांक
इस प्रतिबन्ध में दो चर राशियाँ हैं; अत: हम किसी एक राशि को दी गई सीमाओं के अनुरूप स्वेच्छ मान देकर दूसरी राशि का चुनाव कर सकते हैं।
इससे स्पष्ट है कि अभीष्ट परिनालिका के बहुत से भिन्न-भिन्न विवरण सम्भव हैं।
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हम जानते हैं कि परिनालिका की अक्ष पर उसके केन्द्रीय भाग में चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एकसमान होता है। अतः दिया गया स्थान (UPBoardSolutions.com) (10 cm लम्बा व 10-3 m2 अनुप्रस्थ क्षेत्रफल वाला) परिनालिका की अक्ष के अनुदिश तथा केन्द्रीय भाग में होना चाहिए।
अत: परिनालिका की लम्बाई लगभग 50 cm से 100 cm के बीच (10 cm से काफी अधिक) होनी चाहिए तथा परिनालिका का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल 10-3 m2 से अधिक होना चाहिए।
माना परिनालिका की त्रिज्या r है, तब
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अतः हम परिनालिका की त्रिज्या 2 cm से अधिक (माना 3 cm) ले सकते हैं।
अतः परिनालिका का विवरण निम्नलिखित है :
लम्बाई l = 50 cm लगभग, फेरों की संख्या N = nl = 800 x 0.5 = 400 लगभग
त्रिज्या r = 3 cm लगभग, धारा i = 10 A

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प्रश्न 16.
I धारावाही, N फेरों और R त्रिज्या वाली वृत्ताकार कुंडली के लिए, इसके अक्ष पर, केन्द्र से x दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र के लिए निम्नलिखित व्यंजक है-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q16
(a) स्पष्ट कीजिए, इससे कुंडली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र के लिए सुपरिचित परिणाम कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
(b) बराबर त्रिज्या R एवं फेरों की संख्या N, वाली दो वृत्ताकार कुंडलियाँ एक-दूसरे से R दूरी पर एक-दूसरे के समान्तर, अक्ष मिलाकर रखी गई हैं। दोनों में (UPBoardSolutions.com) समान विद्युत धारा एक ही दिशा में प्रवाहित हो रही है। दर्शाइए कि कुण्डलियों के अक्ष के लगभग मध्यबिन्दु पर क्षेत्र, एक बहुत छोटी दूरी के लिए जो कि Rसे कम है, एकसमान है और इस क्षेत्र का लगभग मान निम्नलिखित है-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q16.1
[बहुत छोटे से क्षेत्र पर एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करने के लिए बनायी गई ऊपर वर्णित व्यवस्था हेल्महोल्ट्ज कुण्डलियों के नाम से जानी जाती है।]
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प्रश्न 17.
एक टोरॉइड के (अलौह चुम्बकीय) क्रोड की आन्तरिक त्रिज्या 25 cm और बाह्य त्रिज्या 26 cm है। इसके ऊपर किसी तार के 3500 फेरे लपेटे गए हैं। यदि तार में प्रवाहित विद्युत धारा 11 A हो तो चुम्बकीय क्षेत्र को मान क्या होगा?
(i) टोरॉइड के बाहर,
(ii) टोरॉइड के क्रोड में,
(iii) टोरॉइड द्वारा घिरी हुई खाली जगह में।
हल-
दिया है, आन्तरिक त्रज्या r1 = 0.25 m, बाह्य त्रिज्या r2 = 0.26 m
फेरों की संख्या N = 3500, धारा i = 11 A
(i) टोरॉइड के बाहर चुम्बकीय क्षेत्र B = 0
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q17
(iii) टोरॉइड द्वारा घेरे गए रिक्त स्थान में चुम्बकीय क्षेत्र B = 0

प्रश्न 18.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(a) किसी प्रकोष्ठ में एक ऐसा चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया गया है जिसका परिमाण तो एक बिन्दु पर बदलता है, पर दिशा निश्चित है। (पूर्व से पश्चिम)। इस प्रकोष्ठ में एक आवेशित कण प्रवेश करता है और अविचलित एक सरल रेखा में अचर वेग से चलता रहता है। आप कण के प्रारम्भिक वेग के बारे में क्या कह सकते हैं?

(b) एक आवेशित कण, एक ऐसे शक्तिशाली असमान चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है। जिसको परिमाण एवं दिशा दोनों एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर बदलते जाते हैं, एक जटिल पथ पर चलते हुए इसके बाहर आ जाता है। यदि यह मान लें कि चुम्बकीय क्षेत्र में इसका किसी भी दूसरे कण से कोई संघट्ट नहीं होता तो क्या इसकी अन्तिम चाल, प्रारम्भिक चाल के बराबर होगी?

(c) पश्चिम से पूर्व की ओर चलता हुआ एक इलेक्ट्रॉन एक ऐसे प्रकोष्ठ में प्रवेश करता है। जिसमें उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर एकसमान एक विद्युत क्षेत्र है। वह दिशा बताइए जिसमें एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया जाए ताकि इलेक्ट्रॉन को अपने सरल रेखीय पथ से विचलित होने से रोका जा सके।
हल-
(a) आवेशितं कण अविचलित सरल रेखीय गति करता है, इसका यह अर्थ है कि कण पर चुम्बकीय क्षेत्र के कारण कोई बल नहीं लगा है। इससे प्रदर्शित होता है कि (UPBoardSolutions.com) कण का प्रारम्भिक वेग या तो चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में है अथवा उसके विपरीत है।

(b) हाँ, कण की अन्तिम चाल उसकी प्रारम्भिक चाल के बराबर होगी। इसका. कारण यह है कि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण गतिमान आवेश पर कार्यरत बल सदैव कण के वेग के लम्बवत् दिशा में लगता है जो केवल गति की दिशा को बदल सकता है परन्तु कण की चाल को नहीं।

(c) विद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन पर दक्षिण से उत्तर की ओर विद्युत बल F, कार्य करेगा, जिसके कारण इलेक्ट्रॉन उत्तर दिशा की ओर विक्षेपित होने की प्रवृत्ति रखेगा। इलेक्ट्रॉन बिना विचलित हुए सरल रेखीय गति करे इसके लिए आवश्यक है कि चुम्बकीय क्षेत्र ऐसी दिशा में लगाया जाए कि चुम्बकीय (UPBoardSolutions.com) क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन पर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर चुम्बकीय बल कार्य करे। इसके लिए फ्लेमिंग के बाएँ हाथ के नियम से चुम्बकीय क्षेत्र ऊर्ध्वाधरत: नीचे की ओर लगाना चाहिए।

प्रश्न 19.
ऊष्मित कैथोड से उत्सर्जित और 2.0 kV के विभवान्तर पर त्वरित एक इलेक्ट्रॉन 0.15 T के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है। इलेक्ट्रॉन का गमन पथ ज्ञात कीजिए यदि चुम्बकीय क्षेत्र
(a) प्रारम्भिक वेग के लम्बवत है,
(b) प्रारम्भिक वेग की दिशा से 30° का कोण बनाता है।
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प्रश्न 20.
प्रश्न 16 में वर्णित हेल्महोल्ट्ज कुंडलियों का उपयोग करके किसी लघुक्षेत्र में 0.75 T का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया है। इसी क्षेत्र में कोई एकसमान स्थिरविद्युत क्षेत्र कुंडलियों के उभयनिष्ठ अक्ष के लम्बवत लगाया जाता है। (एक ही प्रकार के) आवेशित कणों का 15 kV विभवान्तर पर (UPBoardSolutions.com) त्वरित एक संकीर्ण किरण पुंज इस क्षेत्र में दोनों कुण्डलियों के अक्ष तथा स्थिरविद्युत क्षेत्र की लम्बवत दिशा के अनुदिश प्रवेश करता है। यदि यह किरण पुंज 9.0 x 10-5 Vm-1, स्थिरविद्युत क्षेत्र में अविक्षेपित रहता है तो यह अनुमान लगाइए कि किरण पुंज में कौन-से कण हैं। यह स्पष्ट कीजिए कि यह उत्तर
एकमात्र उत्तर क्यों नहीं है?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q20
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प्रश्न 21.
एक सीधी, क्षैतिज चालक छड़ जिसकी लम्बाई 0.45 cm एवं द्रव्यमान 60 g है। इसके सिरों पर जुड़े दो ऊर्ध्वाधर तारों पर लटकी हुई है। तारों से होकर छड़ में 5.0 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है।
(a) चालक के लम्बवत कितना चुम्बकीय क्षेत्र लगाया जाए कि तारों में तनाव शून्य हो जाए।
(b) चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा यथावत रखते हुए यदि विद्युत धारा की दिशा उत्क्रमित कर दी जाए तो तारों में कुल आवेश कितना होगा? (तारों के द्रव्यमान की उपेक्षा कीजिए। (g = 9.8 ms-2)
हल-
छड़ की लम्बाई l = 0.45 m व द्रव्यमान m = 0.06 kg, तार में धारा i = 5.0 A
(a) तारों में तनाव शून्य करने के लिए आवश्यक है कि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण छड़ पर बल उसके भार के बराबर वे विपरीत हो।
अतः ilB sin 90° = mg
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q20
(b) यदि धारा की दिशा बदल दी जाए तो चुम्बकीय बल तथा छड़ का भार दोनों एक ही दिशा में हो जाएँगे।
इस स्थिति में, तारों का तनाव = mg + IlB sin 90°
= 2mg (∵ प्रथम दशा से, IlB sin 90° = mg)
= 2 x 0.06 x 9.8 = 1.176 = 1.18 N

प्रश्न 22.
एक स्वचालित वाहन की बैटरी से इसकी चालने मोटर को जोड़ने वाले तारों में 300 A विद्युत धारा (अल्प काल के लिए) प्रवाहित होती है। तारों के बीच प्रति एकांके लम्बाई पर कितना बल लगता है यदि इनकी लम्बाई 70 cm एवं बीच की दूरी 1.5 cm हो। यह बल आकर्षण बल है या प्रतिकर्षण बल ?
हल-
दिया है, तारों में धारा i1 = i2 = 300 A, बीच की दूरी r = 1.5 x 10-2 m
तारों की लम्बाई = 70 cm
तारों के बीच एकांक लम्बाई पर बल
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चूँकि तारों में धारा विपरीत दिशा में प्रवाहित होती है; अत: यह बल प्रतिकर्षण का होगा।

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प्रश्न 23.
1.5 T का एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र, 10.0 cm त्रिज्या के बेलनाकार क्षेत्र में विद्यमान है। इसकी दिशा अक्ष के समान्तर पूर्व से पश्चिम की ओर है। एक तार जिसमें 7.0 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। इस क्षेत्र में होकर उत्तर से दक्षिण की ओर गुजरती है। तार पर लगने वाले बल का परिमाण और दिशा क्या है, यदि
(a) तार अक्ष को काटता हो।
(b) तार N-S दिशा से घुमाकर उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम दिशा में कर दिया जाए,
(c) N-S दिशा में रखते हुए ही तार को अक्ष से 6.0 cm नीचे उतार दिया जाए।
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प्रश्न 24.
धनात्मक z-दिशा में 3000 G की एक एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र लगाया गया है। एक आयताकार लूप जिसकी भुजाएँ 10 cm एवं 5 cm और जिसमें 12 A धारा प्रवाहित हो रही है, इस क्षेत्र में रखा है। चित्र 4.7 में दिखायी गई लूप की विभिन्न स्थितियों में इस पर लगने वाला बल-युग्म आघूर्ण क्या है? हर स्थिति में बल क्या है? स्थायी सन्तुलन वाली स्थिति कौन-सी है?
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हल-
दिया है, B = 3000 G = 0.3 T, a = 0.1 m, b = 0.05 m, i = 12 A
कुंडली का क्षेत्रफल A = ab = 0.1 m x 0.05 m = 5 x 10-3 m
(a), (b), (c), (d) प्रत्येक दशा में कुंडली के तल पर अभिलम्ब, चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् है; अतः प्रत्येक दशा में
बल-युग्म का आघूर्ण τ = iAB sin 90° = 12 x 5 x 10-3 x 0.3 = 1.8 x 10-2 N-m
प्रत्येक दशा में बल शून्य है, क्योंकि एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखे धारालूप पर बल-युग्म कार्य करता है परन्तु बल नहीं।
(a) τ = 1.8 x 10-2 N-m ऋण y-अक्ष की दिशा में तथा बल शून्य है।
(b) τ = 1.8 x 10-2 N-m ऋण y-अक्ष की दिशा में तथा बल शून्य है।
(c) τ = 1.8 x 10-2 N-m ऋण x-अक्ष की दिशा में तथा बल शून्य है।
(d) τ = 1.8 x 10-2 N-m तथा बल शून्य है।
(e) तथा (f) दोनों स्थितियों में कुंडली के तल पर अभिलम्ब चुम्बकीय क्षेत्र के अनुदिश है; अत:
t = iAB sin 0° = 0
अत: इन दोनों दशाओं में बल-आघूर्ण व बल दोनों शून्य हैं। यह स्थितियाँ सन्तुलन की स्थायी अवस्था में दर्शाती हैं।

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प्रश्न 25.
एक वृत्ताकार कुंडली जिसमें 20 फेरे हैं और जिसकी त्रिज्या 10 cm है, एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखी है जिसका परिमाण 0.10 है और जो कुंडली के तल के लम्बवत है। यदि कुंडली में 5.0 A विद्युत धारा प्रवाहित हो रही हो तो,
(a) कुंडली पर लगने वाला कुल बल-युग्म आघूर्ण क्या है?
(b) कुंडली पर लगने वाला कुल परिणामी बल क्या है?
(c) चुम्बकीय क्षेत्र के कारण कुंडली के प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला कुलै’औसत बल क्या है?
(कुंडली 10-5 m2 अनुप्रस्थ क्षेत्र वाले ताँबे के तार से बनी है, और ताँबे में मुक्त इलेक्ट्रॉन घनत्व 1029 m-3 दिया गया है।)
हल-
फेरे N = 20, i = 5.0 A, r = 0.10 m, B = 0.10 T
इलेक्ट्रॉन घनत्व n = 1029 m-3,
तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A = 10-5 m2
(a) कुंडली का तल चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् है; अत: कुंडली के तल पर अभिलम्ब व चुम्बकीय क्षेत्र के बीच का कोण शून्य है (θ = 0°)
बल-आघूर्ण τ = NiLAB sin 0° = 0
(b) कुंडली पर नेट बल भी शून्य है।
(c) यदि इलेक्ट्रॉनों का अपवाह वेग vd है तो
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प्रश्न 26.
एक परिनालिका जो 60 cm लम्बी है, जिसकी त्रिज्या 4.0 cm है और जिसमें 300 फेरों वाली 3 परतें लपेटी गई हैं। इसके भीतर एक 2.0 cm लम्बा, 2.5 g द्रव्यमान का तार इसके (केन्द्र के निकट) अक्ष के लम्बवत रखा है। तार एवं परिनालिका का अक्ष दोनों क्षैतिज तल में हैं। तार को परिनालिका के समान्तर दो वाही संयोजकों द्वारा एक बाह्य बैटरी से जोड़ा गया है जो इसमें 6.0 A विद्युत धारा प्रदान करती है। किस मान की विद्युत धारा (परिवहन की उचित दिशा के साथ) इस परिनालिका के फेरों में प्रवाहित होने पर तारे का भार संभाल सकेगी? (g = 9.8 ms-2)
हल-
परिनालिका की लम्बाई l = 0.6 m, त्रिज्या = 4.0 cm, फेरे N = 300 x 3
तार की लम्बाई L = 20 x 10-2 m, द्रव्यमान m = 25 x 10-3 kg, धारा I = 6.0 A
माना परिनालिका में प्रवाहित धारा = i
तब परिनालिका के अक्ष पर केन्द्रीय भाग में चुम्बकीय क्षेत्र
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प्रश्न 27.
किसी गैल्वेनोमीटर की कुंडली का प्रतिरोध 12 Ω है। 4 mA की विद्युत धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्णस्केल विक्षेप दर्शाता है। आप इस गैल्वेनोमीटर को 0 से 18 V परास वाले वोल्टमीटर में कैसे रूपान्तरित करेंगे ?
हल-
दिया है, G = 12 Ω, ig = 4 mA = 4 x 10-3 A
0 से V (V = 18 V) वोल्ट परास के वोल्टमीटर में बदलने के लिए गैल्वेनोमीटर के श्रेणीक्रम में एक उच्च प्रतिरोध R जोड़ना होगा, जहाँ
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q27
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q27.1
अत: गैल्वेनोमीटर के श्रेणीक्रम में 4488 Ω का प्रतिरोध जोड़ना होगा।

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प्रश्न 28.
किसी गैल्वेनोमीटर की कुंडली का प्रतिरोध 15 Ω है। 4 mA की विद्युत धारा प्रवाहित होने पर यह पूर्णस्केल विक्षेप दर्शाता है। आप इस गैल्वेनोमीटर को 0 से 6 A परास वाले अमीटर में कैसे रूपान्तरित करेंगे?
हल-
दिया है, G = 15 Ω, ig = 4 mA = 4.0 x 10-3 A, i = 6 A
गैल्वेनोमीटर को 0-1 ऐम्पियर धारा परास वाले अमीटर में बदलने के लिए इसके पाश्र्वक्रम में एक सूक्ष्म प्रतिरोध S (शण्ट) जोड़ना होगा, जहाँ
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अत: इसके समान्तर क्रम में 10 mΩ का प्रतिरोध जोड़ना होगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गतिशील आवेश उत्पन्न करता है- (2013)
(i) केवल वैद्युत क्षेत्र
(ii) केवल चुम्बकीय क्षेत्र
(iii) वैद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र दोनों
(iv) वैद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र में से कोई नहीं
उत्तर-
(iii) वैद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र दोनों

प्रश्न 2.
एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जा सकता है- (2015)
(i) केवल गतिमान आवेश द्वारा
(ii) केवल बदलते वैद्युत क्षेत्र द्वारा
(iii) (i) तथा (ii) दोनों के द्वारा
(iv) इनमें से किसी के द्वारा नहीं
उत्तर-
(iii) (i) तथा (ii) दोनों के द्वारा

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प्रश्न 3.
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का मात्रक होता है- (2011)
या
चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक होता है- (2015, 16)
(i) वेबर x मीटर2
(ii) वेबर/मीटर2
(iii) वेबर
(iv) वेबर/मीटर
उत्तर-
(i) वेबर/मीटर2

प्रश्न 4.
[latex s=2]\left( { \mu }_{ 0 }{ \varepsilon }_{ 0 } \right) ^{ \frac { -1 }{ 2 } }[/latex] का मान है- (2011, 14, 16, 18)
(i) 3 x 108 सेमी/सेकण्ड
(ii) 3 x 1010 सेमी/सेकण्ड
(iii) 3 x 109 सेमी/सेकण्ड
(iv) 3 x 108 किमी/सेकण्ड
उत्तर-
(ii) 3 x 1010 सेमी/सेकण्ड

प्रश्न 5.
एक इलेक्ट्रॉन तथा एक प्रोटॉन जिनकी गतिज ऊर्जाएँ समान हैं, एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् प्रक्षेपित किए जाते हैं। पथ की त्रिज्या होगी- (2013)
(i) प्रोटॉन के लिए अधिक
(ii) इलेक्ट्रॉन के लिए अधिक
(iii) दोनों के पथ समान वक्रीय होंगे।
(iv) दोनों पथ सरल रेखीय होंगे
उत्तर-
(i) प्रोटॉन के लिए अधिक (∵ त्रिज्या ∝ द्रव्यमान)

प्रश्न 6.
एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B में बल रेखाओं के समान्तर एक इलेक्ट्रॉन जिसका आवेश e है, वेग v से चलता है। इलेक्ट्रॉन पर लगने वाला बल है- (2011, 14)
(i) evB
(ii) शून्य
(iii) [latex s=2]\frac { ev }{ B }[/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { Bv }{ e }[/latex]
उत्तर-
(ii) शून्य

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प्रश्न 7.
m द्रव्यमान का कण जिस पर आवेश q है एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B के लम्बवत् वेग v से प्रविष्ट होता है। इसके पथ की त्रिज्या होगी- (2014)
(i) [latex s=2]\frac { m }{ qB }[/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { m }{ qvB }[/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { 2m }{ qB }[/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { mv }{ qB }[/latex]
उत्तर-
(iv) [latex s=2]\frac { mv }{ qB }[/latex]

प्रश्न 8.
एक प्रोटॉन व एक α-कण समान वेग से एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में लम्बवत् प्रवेश करते हैं। यदि उनके परिक्रमण काल क्रमशः T1 व T2 हों तब (2012)
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प्रश्न 9.
किसी समान चुम्बकीय क्षेत्र में एक इलेक्ट्रॉन क्षेत्र के लम्बवत दिशा में प्रवेश करता है। इलेक्ट्रॉन का पथ होगा (2013, 15, 17)
(i) परवलयाकार
(ii) दीर्घवृत्ताकार
(iii) वृत्ताकार
(iv) सरल रैखिक
उत्तर-
(iii) वृत्ताकार

प्रश्न 10.
यदि आवेशित कण का वेग दोगुना तथा चुम्बकीय क्षेत्र का मान आधा कर दिया जाए, तो आवेश के मार्ग (पथ की त्रिज्या हो जाएगी) (2014)
(i) 8 गुनी
(ii) 4 गुनी
(iii) 3 गुनी
(iv) 2 गुनी
उत्तर-
(ii) 4 गुनी

प्रश्न 11.
एक हीलियम नाभिक 0.8 मीटर त्रिज्या के वृत्त में प्रति सेकण्ड एक चक्कर लगाता है। वृत्त के केन्द्र पर उत्पन्न चुकीय क्षेत्र होगा (2015)
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प्रश्न 12.
एक वृत्ताकार छल्ले का क्षेत्रफल 1.0 सेमी है तथा इसमें 10.0 ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है। 0.1 टेस्ला तीव्रता का चुम्बकीय क्षेत्र छल्ले के तल के लम्बवत लगाया जाता है। चुम्बकीय क्षेत्र के कारण छल्ले पर लगने वाला बल-आघूर्ण होगा (2015)
(i) शून्य
(ii) 10-4 न्यूटन-मी
(iii) 10-2 न्यूटन-मी
(iv) 1.0 न्यूटन-मी
उत्तर-
(iv) 1.0 न्यूटन-मी

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प्रश्न 14.
एक वृत्ताकार लूप का पृष्ठ क्षेत्रफल A तथा इसमें प्रवाहित धारा I है। चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B लूप के तल के लम्बवत है। चुम्बकीय क्षेत्र के कारण लूप में लगने वाला बल आघूर्ण (2017)
(i) BIA
(ii) 2BIA
(iii) [latex s=2]\sigma [/latex] BIA
(iv) शून्य
उत्तर-
(i) BIA

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लॉरेन्ज बल क्या है? (2009, 18)
या
एक इलेक्ट्रॉन (आवेश e) + X अक्ष की दिशा में v चाल से, समरूप चुम्बकीय क्षेत्र B जो Y अक्ष की दिशा में है, प्रवेश करता है। इलेक्ट्रॉन पर कार्य करने वाले बल का सूत्र एवं दिशा ज्ञात कीजिए। (2015)
उत्तर-
चुम्बकीय क्षेत्र में गतिमान आवेश (इलेक्ट्रॉन) पर लगने वाले चुम्बकीय बल को लॉरेन्ज बल कहते हैं। यदि q आवेश v वेग से चुम्बकीय क्षेत्र [latex s=2]\vec { B }[/latex] की दिशा से θ कोण पर गति करे, तो उस पर कार्य करने वाला लॉरेन्ज बल F = qvB sin θ। बल की दिशा [latex s=2]\vec { v }[/latex] तथा [latex s=2]\vec { B }[/latex] दोनों के लम्बवत् होती है।

प्रश्न 2.
q आवेश वाला कोई कण वेग v से एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B के समान्तर दिशा में गति कर रहा है। इस कण पर लगने वाले बल का मान कितना होगा? (2016)
उत्तर-
F = qvB sin θ = qvB sin 0° = 0 अर्थात् शून्य।

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प्रश्न 3.
q आवेश का एक आवेशित कण, [latex s=2]\vec { v }[/latex] वेग से चलता हुआ एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B में, क्षेत्र की दिशा से 30° का कोण बनाता हुआ प्रवेश करता है। आवेश पर लगने वाले बल का परिमाण क्या होगा? (2015)
उत्तर-
F = qvB sin θ = qvB sin 30°
F = [latex s=2]\frac { qvB }{ 2 }[/latex] [∵ sin 30° = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]]

प्रश्न 4.
एक इलेक्ट्रॉन 0.1 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में लम्बवत् 105 मीटर/सेकण्ड की चाल से प्रवेश करता है। इलेक्ट्रॉन पर लॉरेन्ज बल का मान ज्ञात कीजिए। (2017)
हल-
दिया है, B = 0.1 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर, v = 105 मी/सेकण्ड
लॉरेन्ज बल (F) = qvB = 1.6 x 10-19 x 105 x 0.1 = 1.6 x 10-15 न्यूटन

प्रश्न 5.
एक सीधे लम्बे तार से 2.0 सेमी दूरी पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता 10-6 टेस्ला है। तार में वैद्युत धारा ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 6.
साइक्लोट्रॉन किस सिद्धान्त पर कार्य करता है? (2015)
उत्तर-
साइक्लोट्रॉन के कार्य करने का सिद्धान्त यह है कि डीज के बीच लगने वाले प्रत्यावर्ती विभवान्तर की रेडियो आवृत्ति, डीज के भीतर आवेशित कण के परिक्रमण की आवृत्ति के बराबर होनी चाहिए।

प्रश्न 7.
[latex s=2]{ \mu }_{ 0 }{ \varepsilon }_{ 0 }[/latex] का मान ज्ञात कीजिए। संकेतों के सामान्य अर्थ हैं। (2017, 18)
हल-
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प्रश्न 8.
[latex s=2]{ \mu }_{ 0 }{ \varepsilon }_{ 0 }[/latex] का विमीय सूत्र लिखिए। (2017)
उत्तर-
[L-2T2]

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प्रश्न 9.
दिखाइए कि निर्वात में प्रकाश की चात [latex s=2]c=\frac { 1 }{ \sqrt { { \mu }_{ 0 }{ \varepsilon }_{ 0 } } }[/latex] होती है। (2015)
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प्रश्न 10.
किसी 20 सेमी त्रिज्या के वृत्ताकार लूप में 4 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। लूप के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कीजिए। (2012, 13)
हल-
वृत्ताकार धारावाही लूप के केन्द्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism VSAQ 10.1

प्रश्न 11.
2.0 मिमी व्यास के ताँबे के तार में 10 ऐम्पियर की धारा है। इस धारा के कारण अधिकतम चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का परिमाप ज्ञात कीजिए। (2017)
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प्रश्न 12.
ऐम्पियर का परिपथीय नियम लिखिए। (2014, 15, 17, 18)
उत्तर-
“किसी बन्द वक्र के परित: चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का रेखा-समाकलन (line-integral) उस बन्द वक्र द्वारा घिरे क्षेत्रफल में से गुजरने वाली कुल वैद्युत धारा का µ0 गुना होता है, जहाँ µ0 निर्वात् की निरपेक्ष चुम्बकशीलता है।” अर्थात्
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जिसमें I पथ द्वारा घिरी नेट धारा है तथा C बन्द पथ की सीमा है।

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प्रश्न 13.
एक ऐम्पियर की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
“1 ऐम्पियर वह वैद्युत धारा है जो कि निर्वात् अथवा वायु में 1 मीटर दूर रखे दो समान्तर तारों में प्रवाहित होने पर उसकी प्रति मीटर लम्बाई पर 2 x 10-7 न्यूटन का बल आरोपित करती है।”

प्रश्न 14.
लम्बी धारावाही परिनालिका के भीतरी अक्ष पर स्थित बिन्दु पर चुम्बकीय बल क्षेत्र का सूत्र लिखिए। (2011, 12)
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प्रश्न 15.
किसी धारा लूप का क्षेत्रफल 0.25 मी2 है तथा उसमें प्रवाहित धारा 0.5 ऐम्पियर है। इस लूप का चुम्बकीय आघूर्ण क्या होगा? (2017)
हल-
दिया है, A = 0.25 मीटर2, I = 0.5 ऐम्पियर
चुम्बकीय आघूर्ण (M) = IA = 0.5 x 0.25 = 0.125 ऐम्पियर-मी

प्रश्न 16.
एक ऋजु रेखीय चालक में धारा से उत्पन्न चुम्बकीय बल रेखाओं की प्रकृति क्या होगी? (2009)
उत्तर-
वृत्ताकार।

प्रश्न 17.
दो समान्तर धारावाही ऋजुरेखीय तारों के बीच लगने वाले बल का सूत्र लिखिए। (2016)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q17
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism Q19

प्रश्न 18.
किसी धारावाही अल्पांश dl से r दूरी पर चुम्बकीय क्षेत्र के लिए बायो-सेवर्ट नियम को सदिश रूप में लिखिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism VSAQ 18
प्रश्न 19.
चल-कुण्डल धारामापी की सुग्राहिता से क्या तात्पर्य है? (2014)
उत्तर-
यदि किसी धारामापी में थोड़ी-सी धारा प्रवाहित करने से ही पर्याप्त विक्षेप आ जाए तो धारामापी को सुग्राही कहते हैं। कुण्डली में एकांक धारा प्रवाहित करने पर उसमें उत्पन्न विक्षेप को धारामापी की सुग्राहिता कहते हैं।

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प्रश्न 20.
एक धारामापी को वोल्टमीटर में कैसे बदलते हैं? (2014)
उत्तर-
श्रेणीक्रम में उच्च प्रतिरोध जोड़ने पर धारामापी वोल्टमीटर में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 21.
किसी चल कुण्डली धारामापी का ऐमीटर और वोल्टमीटर में कैसे रूपान्तरण किया जाता (2015)
उत्तर-

  1. धारामापी की कुण्डली के समान्तर में लघु प्रतिरोध (शन्ट) लगा देते हैं, जिसका मान ऐमीटर की परास पर निर्भर करता है। इस प्रकार चल कुण्डली धारामापी का ऐमीटर में रूपान्तरण हो जाता है।
  2. श्रेणीक्रम में उच्च प्रतिरोध जोड़ने पर धारामापी वोल्टमीटर में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 22.
99 ओम प्रतिरोध के चल कुण्डली धारामापी में मुख्य धारा का 10% भेजने के लिए आवश्यक शन्ट के प्रतिरोध का मान ज्ञात कीजिए। (2016)
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प्रश्न 23.
चुम्बकीय आघूर्ण की परिभाषा दीजिए। (2017, 18)
हल-
किसी चुम्बकीय द्विध्रुव का चुम्बकीय आघूर्ण वह बल आघूर्ण है जो इस द्विध्रुव को एकांक व एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् रखने पर द्विध्रुव पर लगता है।

प्रश्न 24.
चुम्बकीय बल रेखाओं एवं वैद्युत बल रेखाओं में अन्तर लिखिए। (2017)
हल-

  1. चुम्बकीय बल रेखाएँ बन्द वक्र में होती हैं जबकि वैद्युत बल रेखाएँ बन्द वक्र में नहीं होती हैं। इसका मुख्य कारण चुम्बकीय ध्रुव का विलगित नहीं होना है जबकि धनावेश एवं ऋणावेश विलगित अवस्था में प्राप्त किए जा सकते हैं।
  2. चुम्बकीय बल रेखाओं का किसी चुम्बकीय पदार्थ से किसी भी कोण पर निर्गमन अथवा आगमन सम्भव होता है। जबकि वैद्युत बल रेखाओं को किसी चालक पदार्थ से लम्बवत् निर्गमन अथवा आगमन होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
m द्रव्यमान का इलेक्ट्रॉन (आवेश q), एकसमान वैद्युत क्षेत्र E में विरामावस्था से त्वरित होता है। सिद्ध कीजिए कि x-दूरी तय करने में इलेक्ट्रॉन द्वारा अर्जित वेग [latex s=2]\sqrt { \frac { 2qEx }{ m } }[/latex] होगा। (2013)
उत्तर-
माना द्रव्यमान m तथा धन आवेश q का एक कण एकसमान वैद्युत क्षेत्र [latex s=2]\vec { E }[/latex] में बिन्दु A पर विराम अवस्था में स्थित है (चित्र 4.8)। वैद्युत क्षेत्र द्वारा आवेशित कण पर आरोपित बल,
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प्रश्न 2.
समान गतिज ऊर्जा वाले दो आवेशित कण समरूप चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत प्रवेश करते हैं। यदि उनके द्रव्यमानों का अनुपात 4 : 1 तथा आवेशों का अनुपात 2 : 1 हो तो उनके वृत्तीय पथों की त्रिज्याएँ किस अनुपात में होंगी? (2014)
हल-
यहाँ दोनों कणों की गतिज ऊर्जाएँ समान हैं अर्थात् K1 = K2 = K तथा चुम्बकीय क्षेत्र भी समान हैं।
माना पहले कण का द्रव्यमान व आवेश क्रमशः m1 तथा q1 एवं द्वितीय कण का द्रव्यमान व आवेश क्रमश: m2 तथा q2 हैं।
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प्रश्न 3.
एक इलेक्ट्रॉन-धारा में इलेक्ट्रॉन का वेग 2.0 x 107 मीटर/सेकण्ड है। इलेक्ट्रॉन 1.6 x 103 वोल्ट/मीटर के स्थिर वैद्युत क्षेत्र के लम्बवत दिशा में 10 सेमी चलने में 3.4 मिमी विक्षेपित हो जाता है। इलेक्ट्रॉन के विशिष्ट आवेश की गणना कीजिए। (2013)
हल-
यदि कोई इलेक्ट्रॉन E तीव्रता के वैद्युत क्षेत्र में v वेग से लम्बवत् प्रवेश करके इस क्षेत्र में x दूरी तय करने पर y दूरी ऊर्ध्वाधरतः विक्षेपित हो जाए, तो
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प्रश्न 4.
एक प्रोटॉन, एक ड्यूट्रॉन तथा एक α-कण समान विभवान्तर से त्वरित होकर एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् प्रवेश करते हैं।
(i) इनकी गतिज ऊर्जाओं की तुलना कीजिए।
(ii) यदि प्रोटॉन के वृत्ताकार मार्ग की त्रिज्या 10 सेमी हो, तो ड्यूट्रॉन तथा a कण के मार्गों की त्रिज्याएँ क्या होंगी? (2017)
हल-
(i) V वोल्ट विभवान्तर से त्वरित q कूलॉम आवेश की गतिज ऊर्जा
K = qV जूल।
प्रोटॉन की गतिज ऊर्जा Kp = eV (∵ आवेश q = e)
ड्यूट्रॉन की गतिज ऊर्जा Kd = ev (∵ q = e)
α-कण की गतिज ऊर्जा Kα = 2eV (∵ q = 2e)
Kp : Kd : Kα = 1 : 1 : 2
(ii) चुम्बकीय क्षेत्र B में v चाल से गतिमान आवेशित कण (द्रव्यमान m, आवेश q) के वृत्ताकार पथ की त्रिज्या r के लिए।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism SAQ 4.1

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प्रश्न 5.
एक वृत्ताकार धारावाही कुण्डली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र का व्यंजक निगमित कीजिए। (2017, 18)
या
बायो-सेवर्ट का नियम समझाइए। इस नियम का उपयोग करके एक वृत्ताकार धारावाही कुण्डली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र के व्यंजक का निगमन कीजिए। (2014, 16)
उत्तर-
बायो-सेवर्ट का नियम- [संकेत-दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर पढ़िए।]
वृत्ताकार धारावाही कुण्डली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र- माना एक तार को मोड़कर r मीटर त्रिज्या की वृत्ताकार कुण्डली बनाई गयी है। माना कुण्डली में i ऐम्पियर की (UPBoardSolutions.com) धारा प्रवाहित हो रही है। कुण्डली के केन्द्र O पर चुम्बकीय क्षेत्र ज्ञात करने के लिए मान लेते हैं कि कुण्डली की परिधि अनेक अल्पांशों से मिलकर बनी है। इनमें से एक अल्पांश की लम्बाई ∆l है। बायो-सेवर्ट नियम के अनुसार अल्पांश ∆l के कारण O पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism SAQ 5.1

प्रश्न 6.
0.5 एंगस्ट्रॉम त्रिज्या के वृत्त में एक इलेक्ट्रॉन 3 x 105 चक्कर/सेकण्ड की दर से घूमता है। वृत्त के केन्द्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए। (2017)
हल-
वृत्ताकार मार्ग की त्रिज्या (r) = 0.5 Å = 0.5 x 10-10 मी
इलेक्ट्रॉन की चाल (v) = 3 x 105 चक्कर/से
आवेश (q) = e = 1.6 x 10-19 कूलॉम
इलेक्ट्रॉन की वृत्तीय पथ पर गति के कारण केन्द्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र
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प्रश्न 7.
2 x 10-10 मी त्रिज्या के वृत्ताकार मार्ग पर एक इलेक्ट्रॉन 3 x 10-6 मी/से की एक समान चाल से चक्कर लगा रहा है। वृत्ताकार मार्ग के केन्द्र पर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कीजिए।
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प्रश्न 8.
किसी 10-5 टेस्ला के एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में 10 eV ऊर्जा का एक इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार मार्ग पर परिक्रमा कर रहा है। वृत्ताकार मार्ग की त्रिज्या ज्ञात कीजिए। (2017)
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प्रश्न 9.
दो लम्बे समान्तर तारों में हैं i तथा 2i धाराएँ समान दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। यदि तारों के बीच की लम्बवत दूरी 2a हो तब तारों के बीच मध्य बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र का मान व दिशा ज्ञात कीजिए। (2014)
हल-
ऐम्पियर की धारा के कारण बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र
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परिणामी क्षेत्र कागज के तल के लम्बवत् ऊपर की ओर होगा।

प्रश्न 10.
2.0 मीटर लम्बी परिनालिका में 1000 फेरे हैं। इसमें 10 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। इसके केन्द्र में उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का मान ज्ञात कीजिए। (2015)
हल-
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प्रश्न 11.
दो लम्बे सीधे तार, जिनमें प्रत्येक में 5.0 ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है, एक-दूसरे के समान्तर 2.5 सेमी की दूरी पर रखे हैं। तारों की 10.0 सेमी लम्बाई पर लगने वाला बल ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 12.
एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में एक धारावाही आयताकार कुण्डली लटकायी गई है। इस पर लगने वाले बल युग्म के आघूर्ण का व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2017)
हल-
एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित धारा-लूप (अथवा कुण्डली अथवा परिनालिका) को व्यवहार ठीक वैसा ही होता है जैसा दण्ड-चुम्बक का। हमने यह पढ़ा है कि चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित धारा-लूप पर एक बल-युग्म लगता है जो कि लूप को ऐसी स्थिति में घुमाने की प्रवृत्ति रखता है जिसमें कि लूप की अक्ष चुम्बकीय क्षेत्र के समान्तर हो जाये। ठीक इसी प्रकार, चुम्बकीय क्षेत्र में लटकाया गया दण्ड-चुम्बक भी घूम (UPBoardSolutions.com) कर ऐसी स्थिति में ठहरता है जिसमें कि चुम्बक की अक्ष चुम्बकीय क्षेत्र के समान्तर हो जाती है। स्पष्ट है कि चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित दण्ड-चुम्बक पर भी एक बल-युग्म लगता है जो कि चुम्बक की अक्ष को क्षेत्र के समान्तर करने की प्रवृत्ति रखता है। चुम्बक के परमाणवीय मॉडल के अनुसार, चुम्बक का प्रत्येक परमाणु एक नन्हा धारा-लूप होता है तथा ये सभी धारा-लूप एक ही दिशा में संरेखित होते हैं चुम्बकीय क्षेत्र में इन नन्हें धारा-लूपों पर लगने वाले बल-युग्मों का योग ही चुम्बक पर लगने वाला बल-युग्म होता है (चित्र 4.12)।
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हम जानते हैं कि चुम्बकीय क्षेत्र [latex s=2]\vec { B }[/latex] में, क्षेत्र की दिशा से θ कोण पर स्थित धारा-लूप पर लगने वाले बल-युग्म का आघूर्ण
= (iA) B sin θ
जहाँ A धारा-लूप को क्षेत्रफल है। यदि दण्ड-चुम्बक में N धारा-लूप हों, तब पूरे चुम्बक पर लगने वाले बल-युग्म का आघूर्ण
T = (NiA) B sin θ …..(1)
चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित दण्ड-चुम्बक, धारा-लूप अथवा धारावाही कुण्डली का व्यवहार वैद्युत क्षेत्र में स्थित वैद्युत द्विध्रुव के व्यवहार के सदृश है। यही कारण है कि दण्ड-चुम्बक, धारा-लूप, धारावाही कुण्डली, इत्यादि ‘चुम्बकीय द्विध्रुव’ (magnetic dipole) कहलाते हैं। हम जानते हैं कि वैद्युत क्षेत्र [latex s=2]\vec { E }[/latex] में क्षेत्र की दिशा से कोण पर स्थित वैद्युत द्विध्रुव पर एक बल-युग्म लगता है, जिसका आघूर्ण निम्नलिखित समीकरण के अनुसार होता है-
t = pE sin θ …..(2)
जहाँ, p वैद्युत द्विध्रुव का आघूर्ण है। समीकरण (1) व (2) की तुलना से यह स्पष्ट है कि राशि NiA, वैद्युत द्विध्रुव के आघूर्ण p के समतुल्य है। इसे चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण’ अथवा दण्ड-चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण’ (magnetic moment) M कहते हैं, अर्थात्
M= NiA
चुम्बकीय आघूर्ण एक सदिश राशि है। यह चुम्बकीय अक्ष के अनुदिश दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की । ओर दिष्ट होता है।
अब, समीकरण (1) से, दण्ड-चुम्बक पर लगने वाले बल-युग्म का आघूर्ण
t = MB sin θ

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प्रश्न 13.
चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा दीजिए। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित चुम्बकीय द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा का व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2017)
या
चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा लिखिए। (2018)
उत्तर-
चुम्बकीय द्विध्रुव की ध्रुव सामर्थ्य तथा चुम्बक की प्रभावी लम्बाई के गुणनफल की चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण कहते हैं। इसे ‘M’ से प्रकट करते हैं।
जब किसी चुम्बकीय द्विध्रुव को एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखते हैं तो इस पर एक बल-युग्म का आघूर्ण कार्य करता है जो कि चुम्बकीय द्विध्रुव को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में संरेखित करने का प्रयत्न करता है। अत: चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से घुमाने – में कार्य करना पड़ता है। यह कार्य ही चुम्बकीय द्विध्रुव में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।
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माना एक चुम्बकीय द्विध्रुव जिसका चुम्बकीय द्विध्रुव-आघूर्ण M है। एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र की दिशा से से कोण बनाते हुए स्थित है अत: चुम्बकीय द्विध्रुव पर कार्यरत बल-युग्म का आघूर्ण
τ = MB sin θ
चुम्बकीय द्विध्रुव को इस स्थिति से अत्यन्त सूक्ष्म कोण dθ घुमाने में किया गया कार्य
dW = tdθ = MB sin θ dθ
इसी प्रकार चुम्बकीय द्विध्रुवे को चुम्बकीय क्षेत्र में अभिविन्यास θ1 से अभिविन्यास θ2 तक घुमाने में किया गया कार्य
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प्रश्न 14.
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन 5.0 x 10-11 मी त्रिज्या की कक्षा में 2 x 106 मी/से की चाल से गति कर रहा है। परमाणु का चुम्बकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए। (2017)
या
एक परमाणु में इलेक्ट्रॉन 0.50 Å त्रिज्या की कक्षा में 4 x 1015 चक्कर/से से घूम रहा है। परमाणु के चुम्बकीय आघूर्ण का मान ज्ञात कीजिए। (2018)
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प्रश्न 15.
एक धारामापी की कुण्डली का प्रतिरोध 100 ओम है। 5.0 मिली ऐम्पियर धारा से इसमें पूर्ण स्केल विक्षेपण प्राप्त होता है। इसे 0 से 10 ऐम्पियर परास के अमीटर में कैसे परिवर्तित करेंगे? (2014)
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साइक्लोट्रॉन के सिद्धान्त एवं कार्य विधि का संक्षिप्त विवरण दीजिए। साइक्लोट्रॉन की सीमाओं का उल्लेख कीजिए। (2017)
हल-
सिद्धान्त- चुम्बकीय क्षेत्र में परिक्रमण करने वाले आवेशित कणों की परिक्रमण आवृत्ति कण की ऊर्जा पर निर्भर नहीं करती है। अत: क्रॉसित (परस्पर लम्बवत्) वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्रों का उपयोग कर आवेशित कण को चुम्बकीय क्षेत्र की सहायता से बार-बार एक ही वैद्युत क्षेत्र से गुजारकर उसको उच्च ऊर्जा तक त्वरित किया जा सकता है।

कार्य-विधि- माना m द्रव्यमान तथा +q आवेश का एक आयन, आयन-स्रोत से उस क्षण निर्गत होता है जबकि D2 ऋण विभव पर है। यह आयनन डीज के बीच के अन्तराल में विद्यमान वैद्युत क्षेत्र के द्वारा D2 की ओर को त्वरित होकर D2 में वेग v (माना) से प्रवेश कर जाता है। डीज के भीतर प्रवेश करते ही यह आयन डीज की धात्विक दीवारों द्वारा वैद्युत क्षेत्र से परिरक्षित कर दिया जाता है। अब डीज के तल के लम्बवत् चुम्बकीय क्षेत्र के कारण आयन नियत चाल v से त्रिज्या r के वृत्ताकार पथ पर चलने लगता है। आयन की वृत्तीय गति के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल, उस पर कार्यरत चुम्बकीय बल से प्राप्त होता है। अतः अभिकेन्द्र बल = चुम्बकीय बल।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism LAQ 1
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism
साइक्लोट्रॉन की सीमाएँ-
(i) साइक्लोट्रॉन द्वारा अनावेशित कण जैसे- न्यूट्रॉन (जो कि नाभिकीय क्रियाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रक्षेप्य कण है) को त्वरित नहीं किया जा सकता है।
(ii) साइक्लोट्रॉन द्वारा इलेक्ट्रॉनों को त्वरित नहीं किया जा सकता है क्योंकि इनका द्रव्यमान बहुत कम होता है, अतः सूक्ष्म गतिज ऊर्जा ग्रहण कर ही ये बहुत उच्च वेग से गति करने लगते हैं।
(iii) साइक्लोट्रॉन द्वारा आवेशित कणों को इतने उच्च वेग तक त्वरित नहीं किया जा सकता है कि उनका वेग प्रकाश के वेग के तुल्य हो जाए क्योंकि इतने उच्च (UPBoardSolutions.com) वेग पर आवेशित कणों का द्रव्यमान नियत न रहकर वेग के साथ परिवर्तित होता हैं। यदि आवेशित कण का विराम द्रव्यमान m0 हो तथा v वेग से गति करते समय कण का वेग m हो, तब
[latex s=2]m=\frac { { m }_{ 0 } }{ \sqrt { 1-\frac { { v }^{ 2 } }{ { c }^{ 2 } } } }[/latex]
जहाँ, c निर्वात् में प्रकाश की चाल है।

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प्रश्न 2.
धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता से सम्बन्धित बायो-सेवर्ट नियम की व्याख्या कीजिए। बायो-सेवर्ट नियम की समीकरण से निर्वात की चुम्बकशीलता का मात्रक एवं विमीय समीकरण निकालिए। (2017)
या
बायो-सेवर्ट नियम को शब्दों तथा सूत्र में लिखिए। (2011)
या
बायो-सेवर्ट नियम का उल्लेख कीजिए। (2013, 17, 18)
या
किसी धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के सम्बन्ध में बायो-सेवर्ट के नियम का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर-
बायो-सेवर्ट का नियम (Biot-Savart Law)- सन् 1820 में बायो तथा सेवर्ट ने धारावाही चालकों द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का अध्ययन करने के लिए अनेक प्रयोग किये। इन प्रयोगों के आधार पर उन्होंने बताया कि किसी धारावाही चालक के एक अल्पांश ∆l के द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र में किसी बिन्दु P पर क्षेत्र का मान ∆B निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है-
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism LAQ 2.1UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism

प्रश्न 3.
ऐम्पियर के परिपथीय नियम का उपयोग करके एक अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र का सूत्र स्थापित कीजिए। (2014)
या
ऐम्पियर के परिपथीय नियम का उपयोग करके अनन्त लम्बाई के सीधे धारावाही तार के निकट किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 4.
ऐम्पियर के परिपथीय नियम की सहायता से धारावाही परिनालिका के अन्दर उसकी अक्ष पर चुम्बकीय क्षेत्र के सूत्र की स्थापना कीजिए। (2015)
उत्तर-
माना एक लम्बी परिनालिका की प्रति मीटर लम्बाई में तार के n फेरे हैं तथा इसमें i ऐम्पियर की धारा बह रही है। माना एक आयताकार बन्द पथ a b c d है जिसकी भुजा a b परिनालिका की अक्ष के समान्तर है तथा भुजाएँ। c तथा a d बहुत लम्बी हैं जिससे कि यह माना जा सके कि (UPBoardSolutions.com) भुजा c d परिनालिका से बहुत दूर है तथा इस भुजा पर परिनालिका के कारण चुम्बकीय क्षेत्र नगण्य है। जब परिनालिका लम्बी है। तथा आयताकार बन्द पथ परिनालिका के किसी भी किनारे के बहुत समीप नहीं है, तो क्षेत्र b c तथा a d भुजाओं के लम्बवत् हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism LAQ 4UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 4 Moving Charges and Magnetism LAQ 4.2

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प्रश्न 5.
दो समान्तर धारावाही चालकों के बीच लगने वाले बल [latex s=2]\frac { F }{ l } =\frac { { \mu }_{ 0 } }{ 2\Pi } =\frac { { i }_{ 1 }{ i }_{ 2 } }{ r }[/latex] न्यूटन/मीटर के लिए सूत्र व्युत्पन्न कीजिए। उपर्युक्त सूत्र के आधार पर धारा के एक ऐम्पियर की परिभाषा दीजिए। (2017)
या
दो समान्तर धारावाही चालकों के बीच क़ार्य करने वाले बल का सूत्र ज्ञात कीजिए। (2012, 17, 18)
या
दो समान्तर धारावाही चालकों के बीच लगने वाले बल के लिए सूत्र स्थापित कीजिए। इसके आधार पर वैद्युत धारा के मात्रक ऐम्पियर की परिभाषा दीजिए। (2013)
या
L मीटर लम्बाई के दो समान्तर तारों, जिनके मध्य की दूरी r मीटर है तथा जिनमें i1 और i2 ऐम्पियर की विद्युत धाराएँ प्रवाहित हैं, के मध्य प्रति एकांक लम्बाई पर बल का सूत्र [latex s=2]\frac { F }{ L } =\frac { { \mu }_{ 0 } }{ 2\Pi } =\frac { { i }_{ 1 }{ i }_{ 2 } }{ r }[/latex] व्युत्पादित कीजिए। इस सूत्र से ऐम्पियर की परिभाषा दीजिए। (2015)
उत्तर-
धारावाही चालक के चारों ओर एक चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है तथा चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित धारावाही चालक पर एक बल कार्य करता है। अत: यदि एक धारावाही चालक के निकट कोई दूसरा धारावाही चालक रखा जाये तो यह चालक पहले चालक द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के (UPBoardSolutions.com) कारण एक बल का अनुभव करेगा। इसी प्रकार पहला धारावाही चालक दूसरे धारावाही चालक द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र के कारण एक बल अनुभव करेगा। स्पष्ट है कि पास-पास रखे दो धारावाही चालक चुम्बकीय क्षेत्र की पारस्परिक क्रिया के कारण एक-दूसरे पर बल लगाते हैं।

पारस्परिक बल का परिमाण एवं प्रकृति- माना दो लम्बे ऋजुरेखीय तार P९ तथा RS वायु या निर्वात् में एक-दूसरे के समीप परस्पर समान्तर रखे हैं। इनके बीच की दूरी r है (चित्र 4.20)। माना PQ एवं RS में प्रवाहित धाराएँ क्रमशः i1 एवं i2 हैं। PQ में प्रवाहित धारा । के कारण चालक RS के किसी भी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र
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इसकी दिशा भी फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम अथवा दायें हाथ की हथेली के नियम नं० 2 से निर्धारित की जाएगी। यदि धारा i2 उसी दिशा में है जिसमें i1 है तो PQ पर लगने वाला बल चालक RS की ओर दिष्ट होगा। [चित्र 4.20 (a)] और यदि यह विपरीत दिशा में है तो यह RS से दूर (UPBoardSolutions.com) दिष्ट होगा [चित्र 4.20 (b)]। अतः उपर्युक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि यदि दो समान्तर तारों में धाराएँ एक ही दिशा में हैं तो वे एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं और यदि धाराएँ विपरीत दिशा में हैं तो तार एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

प्रश्न 6.
आवश्यक सिद्धान्त देते हुए चल कुण्डली गैल्वेनोमीटर की संरचना तथा कार्यविधि का वर्णन कीजिए। (2014)
या
चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए। इसकी सुग्राहिता किस प्रकार बढ़ायी जा सकती है? (2017)
या
निम्नलिखित चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त लिखिए एवं उसकी धारा सुग्राहिता का व्यंजक ज्ञात कीजिए। (2018)
उत्तर-
चल कुण्डली गैल्वेनोमीटर- ये निम्न दो प्रकार के होते हैं
1. निलम्बित कुण्डली धारामापी- यह वैद्युत-धारा के संसूचन (detection) तथा मापन (measurement) के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला उपकरण है। इसकी क्रिया चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही कुण्डली पर कार्यरत् बलाघूर्ण पर आधारित है।
संरचना- इसमें एक आयताकोर कुण्डली होती है जोकि ताँबे के पतले पृथक्कृत (insulated) तार के ऐलुमीनियम के फ्रेम के ऊपर लपेटकर बनायी जाती है (चित्र 4.21)।

इस कुण्डली को एक पतली फॉस्फर-ब्रॉन्ज मरोड़ टोपी (phosphor-bronze) की पत्ती (strip) से एक स्थायी घोड़ा-नाल चुम्बक (horse-shoe magnet) NS के बेलनाकार ध्रुव-खण्डों फॉस्फर-ब्रॉन्ज (pole-pieces) के बीच लटकाया जाता है। पत्ती को ऊपरी सिरा एक मरोड़ टोपी (torsion head) से जुड़ा होता है। कुण्डली का निचला सिरा एक अत्यन्त पतले की कुण्डली का फ्रेम फॉस्फर-ब्रॉन्ज के तार के ढीले-वेष्ठित स्प्रिंग (loosely-wound spring) से जुड़ा होता है। कुण्डली के भीतर एक नर्म लोहे की क्रोड C सममित तथा बिना कुण्डली को स्पर्श किए रखी जाती है। क्रोड बल-रेखाओं को संकेन्द्रित कर देती है तथा इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) ध्रुव-खण्डों के स्प्रिंग छ। बीच चुम्बकीय क्षेत्र ‘प्रबल हो जाता है। निलम्बन पत्ती (suspension strip) के। निचले भाग पर एक छोटा दर्पण (mirror) M लगा होता है, जो पत्ती के साथ-साथ घूमती है तथा जिसका विक्षेप एक लैम्प तथा पैमाने (lamp and scale arrangement) की सहायता से पढ़ा जा सकता है। सम्पूर्ण प्रबन्ध को एक धात्विक बक्से में बन्द रखा जाता है (चित्र 4.21 में प्रदर्शित नहीं) जिसके सामने की ओर काँच की एक खिड़की तथा आधार पर समतलकारी पेंच (levelling screws) लगे होते हैं।

धारा जिसको मापने करना हो, एक टर्मिनल (terminal) T1 से प्रवेश करती है तथा निलम्बन, कुण्डली व स्प्रिंग से होकर दूसरे टर्मिनल T2 से निर्गत होती है। स्थायी चुम्बक के ध्रुव खण्ड बेलनाकार रखे जाते हैं ताकि कुण्डली की प्रत्येक स्थिति में चुम्बकीय क्षेत्र त्रिज्य (radial) रहे अर्थात् कुण्डली का तल प्रत्येक स्थिति में बल-रेखाओं के समान्तर रहे।
सिद्धान्त- जब कुण्डली में धारा 1 प्रवाहित की जाती है तो कुण्डली पर लगने वाला बल-आघूर्ण
T= N i AB sin 90° = NiBA

यहाँ θ कुण्डली के तल पर लम्ब की दिशा तथा चुम्बकीय क्षेत्र [latex s=2]\vec { B }[/latex] की दिशा के बीच कोण है। A कुण्डली का क्षेत्रफल तथा N कुण्डली में फेरों की संख्या है।
धारामापी में चुम्बकीय क्षेत्र [latex s=2]\vec { B }[/latex] को, ध्रुवखण्डों N व S को बेलनाकार बनाकर तृथा कुण्डली के भीतर नर्म लोहे की बेलनाकार क्रोड रखकर “त्रिज्य’ (radial) बनाया जाता है। इस दिशा में कुण्डली के तल पर अभिलम्ब चुम्बकीय क्षेत्र B से सदैव समकोण पर होगा (चित्र 4.21) अर्थात् θ = 90° होगा। अत: कुण्डली पर कार्यरत् बलाघूर्ण
t = Ni B A sinθ [θ= 90°]
= NiB A

यदि निलम्बन पत्ती की मरोड़ दृढ़ता (torsional rigidity) c हो तथा निलम्बन पत्ती में ऐंठन Φ हो, तो प्रत्यानयन बल-युग्म = cΦ होगा।
साम्यावस्था के लिये,
विक्षेपक बल-युग्म आघूर्ण = प्रत्यानयन बल-युग्म का आघूर्ण
N i A B = cΦ
i = [latex s=2]\frac { c }{ NAB }[/latex] Φ = kΦ
जहाँ, k = c/NAB उपकरण का (UPBoardSolutions.com) नियतांक है। जिसे धारा परिवर्तन गुणांक (current reduction factor) भी कहते हैं। अतः धारामापी में प्रवाहित धारा, उत्पन्न विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है।
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2. कीलकित-कुण्डली अथवा वेस्टन धारामापी- यह भी चल कुण्डली धारामापी है। यह निलम्बित-कुण्डली धारामापी की अपेक्षा कुछ कम सुग्राही होता है परन्तु अधिक सुविधाजनक है। इसमें ताँबे के महीन पृथक्कृत तार की, ऐलुमीनियम के फ्रेम पर लिपटी कुण्डली एक स्थायी तथा शक्तिशाली नाल-चुम्बक के ध्रुव-खण्डों के बीच दो चूलों (pivots) पर झूलती है (चित्र 4.22)। कुण्डलियों के दोनों सिरों पर चूलों के पास दो क्रोड स्प्रिंग लगे रहते हैं जो कुण्डली के घूमने पर ऐंठन बल-युग्म उत्पन्न करते हैं तथा कुण्डली को दो कुण्डली स्प्रिंग : सम्बन्धक-पेचों T1 व T2 से जोड़ते हैं। कुण्डली का विक्षेप पढ़ने के लिए कुण्डली के साथ एक ऐलुमीनियम का (UPBoardSolutions.com) लम्बा संकेतक लगा रहता है जो एक वृत्ताकार पैमाने पर घूमता है। पैमाने पर बराबर दूरियों पर चिह्न लगे रहते हैं तथा शून्यांक चिह्न बीच में होता है। अतः धारामापी के सम्बन्धक-पेचों पर धन व ऋण के चिह्न नहीं बने होते। चुम्बकीय क्षेत्र को त्रिज्य बनाने के लिए इससे भी ध्रुव-खण्ड अवतलाकार कटे होते हैं तथा कुण्डली के अन्दर मुलायम लोहे की क्रोड लगी होती है। इसका सिद्धान्त के कार्यविधि चल-कुण्डली धारामापी के समान ही है। इसकी सहायता से 10-6 ऐम्पियर तक की वैद्युत धारा नापी जा सकती है। धारामापी की सुग्राहिता N, A तथा B का मान बढ़ाकर तथा c का मान कम करके बढ़ाई जा सकती है।
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प्रश्न 7.
किसी धारामापी को अमीटर में कैसे परिवर्तित करेंगे? उपयुक्त परिपथ द्वारा स्पष्ट कीजिए। (2014, 18)
उत्तर-
धारामापी का अमीटर में रूपान्तरण- अमीटर वह यन्त्र है जो वैद्युत परिपथ में धारा की प्रबलता सीधे ऐम्पियर में नापने के काम आता है। मिलीऐम्पियर की कोटि की धारा नापने वाले यन्त्र को मिलीअमीटर कहते हैं।

अमीटर मूलतः धारामापी ही होता है जिसे परिपथ के श्रेणीक्रम में डाल देते हैं ताकि नापी जाने वाली सम्पूर्ण धारा इसमें से होकर जाये। तब अमीटर में उत्पन्न विक्षेप अमीटर से होकर जाने वाली धारा की माप देगा (Φ ∝ i)। परन्तु चूँकि अमीटर की अपनी कुण्डली का भी कुछ प्रतिरोध होता है (UPBoardSolutions.com) अतः इसे परिपथ के श्रेणीक्रम में जोड़ने पर परिपथ का प्रतिरोध बढ़ जायेगा जिससे परिपथ में धारा घट जायेगी। अतः अमीटर द्वारा पढ़ा गया धारा का मान, उस धारा के मान से कम होगा जिसे नापना था। अत: यह आवश्यक है कि अमीटर का अपना प्रतिरोध, जितना हो सके कम होना चाहिए ताकि इसे परिपथ में डालने पर नापी जाने वाली धारा का मान न बदले।
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स्पष्ट है इस त्रुटि को पूर्णतः दूर करने के लिए RA का मान शून्य होना चाहिए अर्थात् एक आदर्श अमीटर का अपना प्रतिरोध शून्य होना चाहिए परन्तु शून्य प्रतिरोध का (UPBoardSolutions.com) अमीटर प्राप्त नहीं किया जा सकता। अतः व्यवहार में, एक अच्छे अमीटर का अपनी प्रतिरोध परिपथ में उपस्थित अन्य प्रतिरोधों की तुलना में बहुत कम होना चाहिए अर्थात्
RA << R1 + R2
तब i का मान लगभग i के ही बराबर होगा।

साधारणतः कीलकित (pivoted type) चल-कुण्डली धारामापी को। ही अमीटर के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसके लिए इसकी कुण्डली के समान्तर क्रम में एक छोटा प्रतिरोध डाल देते हैं जिसे ‘शन्ट’ (shunt) कहते हैं (चित्र 4.24)। इस प्रबन्ध का संयुक्त प्रतिरोध धारामापी की (UPBoardSolutions.com) कुण्डली तथा शन्ट दोनों के अलग-अलग प्रतिरोधों से कम होता है। अतः जब इसे किसी परिपथ में डालते हैं तो अमीटर यह परिपथ की धारा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं करता। इस प्रकार । चित्र 4.24 यह प्रबन्ध एक अच्छे अमीटर का कार्य करता है।
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धारामापी में शन्ट लगाने का एक अन्य लाभ भी है। यदि शन्ट न हो तब परिपथ की पूरी धारा कुण्डली में से होकर जायेगी। इस दशा में धारामापी द्वारा अधिक-से-अधिक उतनी धारा नापी जा सकती है जिससे कि कुण्डली में पूरे पैमाने का विक्षेप (full-scale deflection) हो जाये। शन्ट के होने पर, परिपथ की धारा का केवल एक छोटा भाग ही कुण्डली से होकर जाता है, अधिकांश भाग शन्ट से होकर निकल जाता है। चूंकि कुण्डली का विक्षेप कुण्डली में को जाने वाली धारा के अनुक्रमानुपाती होता है, अत: कुण्डली का विक्षेप (UPBoardSolutions.com) काफी कम हो जाता है। अतः अब परिपथ में पहले से कहीं अधिक धारा होने पर कुण्डली में पूरे पैमाने का विक्षेप होता है। इस प्रकार, शन्टयुक्त धारामापी (अमीटर) कहीं अधिक मान की धारा को नाप सकता है। दूसरे शब्दों में, शन्ट लगाने से मापन की परास (range) बढ़ जाती है। (यद्यपि सुग्राहिता घट जाती है)। वास्तव में शन्ट के प्रतिरोध का मान इसी से निर्धारित किया जाता है कि अमीटर किस परास को बनाना है।

माना कि परिपथ की धारा i है, धारामापी की कुण्डली का प्रतिरोध G तथा शन्ट का प्रतिरोध S है। माना। कि धारा का ig भाग कुण्डली G में तथा शेष भाग (i – ig) शन्ट S में होकर जाता है। चूंकि G व S समान्तर, में हैं, अतः उनके सिरों के बीच एक ही विभवान्तर होगा।
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यदि कुण्डली में धारा ig, के द्वारा पूरे पैमाने का विक्षेप हो तो परिपथ में धारा i होने पर पूरे पैमाने का विक्षेप होगा। अतः स्पष्ट है कि धारामापी के समान्तर में उपरोक्त मान का शन्ट लगाने पर धारामापी, ऐम्पियर की परास का अमीटर होगा। एक दिये गये धारामापी के लिए ig का मान प्रयोग द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity (विद्युत धारा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity (विद्युत धारा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 3
Chapter Name Current Electricity (विद्युत धारा)
Number of Questions Solved 118
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity (विद्युत धारा)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसी कार की संचायक बैटरी का विद्युत वाहक बल 12 V है। यदि बैटरी को आन्तरिक प्रतिरोध 0.4 Ω हो तो बैटरी से ली जाने वाली अधिकतम धारा का मान क्या है?
हल-
E वैद्युत वाहक बल वाली बैटरी से ली जाने वाली धारा,
I = [latex s=2]\frac { E }{ R+r }[/latex]
जिसमें R बाह्य प्रतिरोध तथा r आन्तरिक प्रतिरोध है।
अधिकतम धारा के लिए बाह्य प्रतिरोध, R = 0
धारा, I = [latex s=2]\frac { E }{ r }[/latex] = [latex s=2]\frac { 12 }{ 0.4 }[/latex] = 30 A

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प्रश्न 2.
10 V विद्युत वाहक बल वाली बैटरी जिसका आन्तरिक प्रतिरोध 3 Ω है, किसी प्रतिरोधक से संयोजित है। यदि परिपथ में धारा का मान 0.5 A हो तो प्रतिरोधक का प्रतिरोध क्या है? जब परिपथ बन्द है तो सेल की टर्मिनल वोल्टता क्या होगी?
हल-
दिया है, बैटरी का वैद्युत वाहक बल E = 10 वोल्ट
बैटरी का आन्तरिक प्रतिरोध = 3 ओम
| परिपथ में धारा I = 0.5 ऐम्पियर
प्रतिरोधक का प्रतिरोध R = ?
बन्द परिपथ में बैटरी की टर्मिनल वोल्टता V= ?
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प्रश्न 3.
(a) 1 Ω, 2 Ω और 3 Ω के तीन प्रतिरोधक श्रेणी में संयोजित हैं। प्रतिरोधकों के संयोजन का कुल प्रतिरोध क्या है?
(b) यदि प्रतिरोधकों का संयोजन किसी 12 V की बैटरी जिसका आन्तरिक प्रतिरोध नगण्य है से सम्बद्ध है तो प्रत्येक प्रतिरोधक के सिरों पर वोल्टता पात ज्ञात कीजिए।
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हल-
दिया है, R1 = 1 Ω; R2 = 2 Ω; R3 = 3 Ω
(a) यदि श्रेणी संयोजन में तुल्य प्रतिरोध R हो, तो
R = R1 + R2 + R3 = 1 + 2 + 3 = 6 ओम
(b) दिया है, बैटरी का वै० वा० बल E = 12 वोल्ट
बैटरी का आन्तरिक प्रतिरोध r = 0
तथा बाह्य प्रतिरोध R = 6 ओम
यदि संयोजन द्वारा परिपथ में प्रवाहित धारा i हो, तो
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प्रश्न 4.
(a) 2 Ω, 4 Ω और 5 Ω के तीन प्रतिरोधक पार्श्व में संयोजित हैं। संयोजन का कुल प्रतिरोध क्या होगा ?
(b) यदि संयोजन को 20 V के विद्युत वाहक बल की बैटरी जिसका आन्तरिक प्रतिरोध नगण्य है, से सम्बद्ध किया जाता है तो प्रत्येक प्रतिरोधक से प्रवाहित होने वाली धारा तथा बैटरी से ली गई कुल धारा का मान ज्ञात कीजिए।
हल-
(a) समान्तरक्रम में तुल्य प्रतिरोध Rp के लिए
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प्रश्न 5.
कमरे के ताप (27.0°C) पर किसी तापन-अवयव का प्रतिरोध 100 Ω है। यदि तापन-अवयव का प्रतिरोध 117 Ω हो तो अवयव का ताप क्या होगा? प्रतिरोधक के पदार्थ का ताप-गुणांक 1.70 x 10-4°C-1 है।
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प्रश्न 6.
15 मीटर लम्बे एवं 6.0 x 10-7 m2 अनुप्रस्थ काट वाले तार से उपेक्षणीय धारा प्रवाहित की गई है और इसका प्रतिरोध 5.0 Ω मापा गया है। प्रायोगिक ताप पर तार के पदार्थ की प्रतिरोधकता क्या होगी?
हल-
दिया है, तार की लम्बाई l = 15 मीटर
तार की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A = 6.0 x 10-7 मीटर
तथा तार का प्रतिरोध R = 5.0 ओम
तार के पदार्थ की प्रतिरोधकता ρ = ?
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प्रश्न 7.
सिल्वर के किसी तार का 27.5°C प प्रतिरोध 2.1 Ω और 100°C पर प्रतिरोध 2.7 Ω है। सिल्वर का प्रतिरोधकता ताप-गुणांक ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 8.
नाइक्रोम का एक तापन-अवयव 230 V की सप्लाई से संयोजित है और 3.2 A की प्रारम्भिक धारा लेता है जो कुछ सेकेण्ड में 2.8 A पर स्थायी हो जाती है। यदि कमरे का ताप 27.0°C है तो तापन-अवयव का स्थायी ताप क्या होगा? दिए गए ताप-परिसर में नाइक्रोम का औसत प्रतिरोध का ताप-गुणांक 1.70 x 10-4°C-1 है।
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प्रश्न 9.
चित्र 3.2 में दर्शाए नेटवर्क की प्रत्येक शाखा में प्रवाहित धारा ज्ञात कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q9.1

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प्रश्न 10.
(a) किसी मीटर-सेतु में जब प्रतिरोधक S = 12.5 Ω हो तो सन्तुलन बिन्दु, सिरे A से 39.5 cm की लम्बाई पर प्राप्त होता है। R का प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। व्हीटस्टोन सेतु या मीटर सेतु में प्रतिरोधकों के संयोजन के लिए मोटी कॉपर की पत्तियाँ क्यों प्रयोग में लाते हैं ?
(b) R तथा S को अन्तर्बदल करने पर उपर्युक्त सेतु का सन्तुलन बिन्दु ज्ञात कीजिए।
(c) यदि सेतु के सन्तुलन की अवस्था में गैल्वेनोमीटर और सेल का अन्तर्बदल कर दिया जाए तब क्या गैल्वेनोमीटर कोई धारा दर्शाएगा?
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q10.1
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity
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प्रश्न 11.
8 V विद्युत वाहक बल की एक संचायक बैटरी जिसका आन्तरिक प्रतिरोध 0.5 Ω है, को श्रेणीक्रम में 15.5 Ω के प्रतिरोधक का उपयोग करके 120 V के D.C. स्रोत द्वारा चार्ज किया जाता है। चार्ज होते समय बैटरी की टर्मिनल वोल्टता क्या है? चार्जकारी परिपथ में प्रतिरोधक को श्रेणीक्रम में सम्बद्ध करने का क्या उद्देश्य है?
हल-
जब बैटरी को 120 V की D.C. सप्लाई से आवेशित किया जाता है, तो बैटरी में सामान्य अवस्था की अपेक्षा धारा विपरीत दिशा में होगी। अतः बैटरी की टर्मिनल वोल्टता,
V = E + Ir
यहाँ विद्युत वाहक बल, E = 8 V, आन्तरिक प्रतिरोध r = 0.5 Ω
परिपथ में धारा,
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q11
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity
श्रेणी-प्रतिरोध बाह्य D.C. सप्लाई से ली गई धारा को सीमित करता है। बाह्य प्रतिरोध की अनुपस्थिति में संचायक बैटरी द्वारा अनुमेय सुरक्षित धारा के मान से अधिक धारा प्रवाहित हो सकती है।

प्रश्न 12.
किसी पोटेशियोमीटर व्यवस्था में, 1.25 V विद्युत वाहक बल से एक सेल का सन्तुलन बिन्दु तार के 35.0 cm लम्बाई पर प्राप्त होता है। यदि इस सेल को किसी अन्य सेल द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाए तो सन्तुलन बिन्दु 63.0 cm पर स्थानान्तरित हो जाता है। दूसरे सेल का विद्युत वाहक बल क्या है ?
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प्रश्न 13.
किसी ताँबे के चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों का संख्या घनत्व 8.5 x 1028 m3 आकलित किया गया है। 3 m लम्बे तार के एक सिरे से दूसरे सिरे तक अपवाह करने में इलेक्ट्रॉन कितना समय लेता है? तार की अनुप्रस्थ-काट 2.0 x 10-6 m2 है और इसमें 3.0 A धारा प्रवाहित हो रही है।
हल-
दिया है, इलेक्ट्रॉन का संख्या घनत्व n = 8.5 x 1028 m3
तार की लम्बाई l = 3 m
तार के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल A = 20 x 10-6 m2
तार में धारा i = 3.0 A
इलेक्ट्रॉन का आवेश e = 1.6 x 10-19 C
माना तार के एक (UPBoardSolutions.com) सिरे से दूसरे सिरे तक प्रवाहित होने में इलेक्ट्रॉन द्वारा लिया गया समय t है, तब सूत्र
i = neAvd से,
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q13.1

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 14.
पृथ्वी के पृष्ठ पर ऋणात्मक पृष्ठ-आवेश घनत्व 10-9 C cm-2 है। वायुमण्डल के ऊपरी भाग और पृथ्वी के पृष्ठ के बीच 400 kV विभवान्तर (नीचे के वायुमण्डल की कम चालकता के कारण) के परिणामतः समूची पृथ्वी पर केवल 1800 A की धारा है। यदि वायुमण्डलीय विद्युत क्षेत्र बनाए (UPBoardSolutions.com) रखने हेतु कोई प्रक्रिया न हो तो पृथ्वी के पृष्ठ को उदासीन करने हेतु (लगभग) कितना समय लगेगा? (व्यावहारिक रूप में यह कभी नहीं होता है। क्योंकि विद्युत आवेशों की पुनः पूर्ति की एक प्रक्रिया है यथा पृथ्वी के विभिन्न भागों में लगातार तड़ित झंझा एवं तड़ित का होना)। (पृथ्वी की त्रिज्या = 6.37 x 106 m);
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प्रश्न 15.
(a) छह लेड एसिड संचायक सेलों, जिनमें प्रत्येक का विद्युत वाहक बल 2Vतथा आन्तरिक प्रतिरोध 0.015 Ω है, के संयोजन से एक बैटरी बनाई जाती है। इस बैटरी का उपयोग 8.5 Ω प्रतिरोधक जो इसके साथ श्रेणी सम्बद्ध है, में धारा की आपूर्ति के लिए किया जाता है। बैटरी से कितनी (UPBoardSolutions.com) धारा ली गई है एवं इसकी टर्मिनल वोल्टता क्या है?
(b) एक लम्बे समय तक उपयोग में लाए गए संचायक सेल का विद्युत वाहक बल 1.9 V और विशाल आन्तरिक प्रतिरोध 380 Ω है। सेल से कितनी अधिकतम धारा ली जा सकती है? क्या सेल से प्राप्त यह धारा किसी कार की प्रवर्तक-मोटर को स्टार्ट करने में सक्षम होगी?
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q15.1

प्रश्न 16.
दो समान लम्बाई की तारों में एक ऐलुमिनियम का और दूसरा कॉपर को बना है। इनके प्रतिरोध समान हैं। दोनों तारों में से कौन-सा हल्का है? अतः समझाइए कि ऊपर से जाने वाली बिजली केबिलों में ऐलुमिनियम के तारों को क्यों पसन्द किया जाता है? (ρal = 2.63 x 10-8 Ωm, ρcu = 1.72 x 10-8 Ωm, Al का आपेक्षिक घनत्व = 2.7, कॉपर का आपेक्षिक घनत्व = 8.9)
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स्पष्ट है कि ऐलुमिनियम के तार का द्रव्यमान, कॉपर के तार के द्रव्यमान का आधा है अर्थात् ऐलुमिनियम का तार हल्का है। यही कारण है कि ऊपर से जाने वाले बिजली (UPBoardSolutions.com) के केबिलों में ऐलुमिनियम के तारों का प्रयोग किया जाता है। यदि कॉपर के तारों का प्रयोग किया जाए तो खम्भे और अधिक मजबूत बनाने होंगे।

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प्रश्न 17.
मिश्रधातु मैंगनिन के बने प्रतिरोधक पर लिए गए निम्नलिखित प्रेक्षणों से आप क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?
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हल-
दी गई सारणी के प्रत्येक प्रेक्षण से स्पष्ट है कि
[latex s=2]\frac { V }{ i }[/latex] = 19.7 Ω
इससे स्पष्ट है कि मैंगनिन का प्रतिरोधक लगभग पूरे वोल्टेज परिसर में ओम के नियम का पालन करता है, अर्थात् मैंगनिन की प्रतिरोधकता पर ताप का बहुत कम प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

  1. किसी असमान अनुप्रस्थ काट वाले धात्विक चालक से एकसमान धारा प्रवाहित होती है। निम्नलिखित में से चालक में कौन-सी अचर रहती है-धारा, धारा घनत्व, विद्युत क्षेत्र, अपवाह चाल।
  2. क्या सभी परिपथीय अवयवों के लिए ओम का नियम सार्वत्रिक रूप से लागू होता है? यदि नहीं, तो उन अवयवों के उदाहरण दीजिए जो ओम के नियम का पालन नहीं करते।
  3. किसी निम्न वोल्टता संभरण जिससे उच्च धारा देनी होती है, का आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम होना चाहिए, क्यों?
  4. किसी उच्च विभव (H.T.) संभरण, मान लीजिए 6 kV को आन्तरिक प्रतिरोध अत्यधिक होना चाहिए, क्यों?

हल-

  1. केवल धारा अचर रहती है, जैसा कि दिया गया है। अन्य राशियाँ अनुप्रस्थ क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती हैं।
  2. नहीं, ओम का नियम सभी परिपथीय अवयवों पर लागू नहीं होता। निर्वात् नलिकाएँ, (डायोड वाल्व, ट्रायोड वाल्व) अर्द्धचालक युक्तियाँ (सन्धि डायोड तथा ट्रांजिस्टर) इसी प्रकार की युक्तियाँ हैं।
  3. किसी संभरण से प्राप्त महत्तम धारा
    imax = [latex s=2]\frac { E }{ r }[/latex]
    वि० वा० बल कम है; अतः पर्याप्त धारा प्राप्त करने के लिए आन्तरिक प्रतिरोध का कम होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त आन्तरिक प्रतिरोध के अधिक होने से सेल द्वारा दी गई ऊर्जा का अधिकांश भाग सेल के भीतर ही व्यय हो जाता है।
  4. यदि आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम है तो किसी कारणवश लघुपथित होने की दशा में संभरण से अति उच्च धारा प्रवाहित होगी और संभरण के क्षतिग्रस्त होने की संभावना उत्पन्न हो जाएगी।

प्रश्न 19.
सही विकल्प छाँटिए-

  1. धातुओं की मिश्रधातुओं की प्रतिरोधकता प्रायः उनकी अवयव धातुओं की अपेक्षा (अधिक/कम) होती है?
  2. आमतौर पर मिश्रधातुओं के प्रतिरोध का ताप-गुणांक, शुद्ध धातुओं के प्रतिरोध के ताप-गुणांक से बहुत (कम/अधिक) होता है।
  3. मिश्रधातु मैंगनिन की प्रतिरोधकता ताप में वृद्धि के साथ लगभग (स्वतन्त्र है/तेजी से बढ़ती है)।
  4. किसी प्रारूपी विद्युतरोधी (उदाहरणार्थ, अम्बर) की प्रतिरोधकता किसी धातु की प्रतिरोधकता की तुलना में (1022 /1023) कोटि के गुणक से बड़ी होती है?

उत्तर-

  1. अधिक।
  2. कम।
  3. स्वतन्त्र है।
  4. 1022

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प्रश्न 20.
(a) आपको Rप्रतिरोध वाले n प्रतिरोधक दिए गए हैं। (i) अधिकतम, (ii) न्यूनतम प्रभावी प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए आप इन्हें किस प्रकार संयोजित करेंगे? अधिकतम और न्यूनतम प्रतिरोधों का अनुपात क्या होगा?
(b) यदि 1 Ω, 2 Ω, 3 Ω के तीन प्रतिरोध दिए गए हों तो उनको आप किस प्रकार संयोजित करेंगे कि प्राप्त तुल्य प्रतिरोध हों:
(i) [latex s=2]\frac { 11 }{ 3 }[/latex] Ω
(ii) [latex s=2]\frac { 11 }{ 5 }[/latex] Ω
(iii) 6 Ω
(iv) [latex s=2]\frac { 6 }{ 11 }[/latex] Ω
(c) चित्र 3.7 में दिखाए गए नेटवर्को का तुल्य प्रतिरोध प्राप्त कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q20.3

प्रश्न 21.
किसी 0.5 Ω आन्तरिक प्रतिरोध वाले 12 V के एक संभरण (Supply) से चित्र 3.10 में दर्शाए गए अनन्त नेटवर्क द्वारा ली गई धारा का मान ज्ञात कीजिए। प्रत्येक प्रतिरोध का मान 1 Ω है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q21.1
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

प्रश्न 22.
चित्र 3.12 में एक पोटेशियोमीटर दर्शाया गया है। जिसमें एक 2.0 V और आन्तरिक प्रतिरोध 0.40 Ω का कोई सेल, पोटेशियोमीटर के प्रतिरोधक तार AB पर वोल्टता पात बनाए A रखता है। कोई मानक सेल जो 1.02 V का अचर विद्युत वाहक बल बनाए रखता है (कुछ mA की बहुत सामान्य धाराओं के लिए) तार की 67.3 cm लम्बाई पर सन्तुलन बिन्दु देता है। मानक सेल से अति न्यून धारा लेना सुनिश्चित करने के लिए । इसके साथ परिपथ में श्रेणी 600 kΩ का एक अति उच्च प्रतिरोध इसके साथ सम्बद्ध किया जाता है, जिसे सन्तुलन बिन्दु प्राप्त होने के निकट लघुपथित (shorted) कर दिया जाता है। इसके बाद मानक सेल को किसी अज्ञात विद्युत वाहक बल E के सेल से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है जिससे सन्तुलन बिन्द तार की 82.3 cm लम्बाई पर प्राप्त होता है।
(a) E का मान क्या है?
(b) 600 kΩ के उच्च प्रतिरोध का क्या प्रयोजन है?
(c) क्या इस उच्च प्रतिरोध से सन्तुलन बिन्दु प्रभावित होता है?
(d) क्या परिचालक सेल के आन्तरिक प्रतिरोध से सन्तुलन बिन्दु प्रभावित होता है?
(e) उपर्युक्त स्थिति में यदि पोटेशियोमीटर के परिचालक सेल का विद्युत वाहक बल 2.0 V के स्थान पर 1.0 V हो तो क्या यह विधि फिर भी सफल रहेगी?
(f) क्या यह परिपथ कुछ mV की कोटि के अत्यल्प विद्युत वाहक बलों (जैसे कि किसी प्रारूपी तापविद्युत युग्म का विद्युत वाहक बल) के निर्धारण में सफल होगी? यदि नहीं, तो आप इसमें किस प्रकार संशोधन करेंगे?
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हल-
(a) विभवमापी के तार की समान विभव प्रवणता के लिए, दो सेलों के वै० वा० बलों की तुलना करने का सूत्र निम्न है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity Q21.1
(b) उच्च प्रतिरोध का प्रयोजन धारामापी में धारा को कम करना है जबकि जौकी संतुलन बिन्दु से दूर है। इससे प्रमाणिक सेल नुकसान (damage) से बचा रहता है।
(c) संतुलन बिन्दु उच्च प्रतिरोध से प्रभावित नहीं होता है, क्योंकि संतुलन की स्थिति में सेल के द्वितीयक परिपथ में धारा नहीं बहती।
(d) परिचालक सेल के आन्तरिक प्रतिरोध से संतुलन बिन्दु प्रभावित नहीं होता क्योंकि हमने तार पर विभव प्रवणता पहले से ही नियत रख दी है।
(e) नहीं, क्योंकि विभवमापी के कार्य करने के लिए परिचालक सेल का वै० वी० बल, द्वितीयक परिपथ के सेल के वै० वा० बल (E) से अधिक होना चाहिए।
(f) क्योकि संतुलन बिन्दु सिरे A के निकट होगा तथा मापन में त्रुटि बहुत अधिक होगी। इसके लिए परिचालक सेल के श्रेणीक्रम में एक परिवर्ती प्रतिरोध (R) जोड़ते हैं तथा इसका मान इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि तार AB के सिरों के बीच विभवपात द्वितीयक सेल के वै० वा० बल से (UPBoardSolutions.com) थोड़ा ही अधिक हो ताकि संतुलन बिन्दु अधिक लम्बाई पर प्राप्त हो, इससे मापन में त्रुटि कम होगी तथा मापने की यथार्थता बढ़ेगी।

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प्रश्न 23.
चित्र 3.13 दो प्रतिरोधों की तुलना के लिए विभवमापी परिपथ दर्शाता है। मानक प्रतिरोधक R = 10.0 Ω के साथ सन्तुलन बिन्दु 58.3 cm पर तथा अज्ञात प्रतिरोध X के साथ 68.5 cm पर प्राप्त होता है। X का मान ज्ञात कीजिए। यदि आप दिए गए सेल E से सन्तुलन बिन्दु प्राप्त करने में असफल रहते हैं तो आप क्या करेंगे?
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हल-
कुँजियों K1 तथा K2 को क्रमशः बन्द करके विभवमापी के तार पर सन्तुलन बिन्दु प्राप्त करने पर यदि संगत सन्तुलन लम्बाई क्रमशः l1 तथा l2 हो, तो R के सिरों का विभवान्तर = Kl1 = RI
तथा X के सिरों का विभवान्तर = Kl2 = XI
जहाँ I = विभवमापी के तार में धारा
तथा K = इसकी विभव प्रवणता
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यदि सन्तुलन बिन्दु प्राप्त नहीं होता है तो इसका अर्थ है कि R या X के सिरों के बीच विभवान्तर विभवमापी के तार AB के सिरों के बीच विभवान्तर से अधिक है। ऐसी स्थिति में बाह्य परिपथ में धारा का मान कम करने के लिए श्रेणीक्रम में एक उचित प्रतिरोध जोड़ना होगा जो बिन्दु C व D के बीच जोड़ा जाएगा।

प्रश्न 24.
चित्र 3.14 में किसी 1.5 V के सेल का आन्तरिक प्रतिरोध मापने के लिए एक 2.0 V को पोटेशियोमीटर दर्शाया गया है। खुले परिपथ में सेल का सन्तुलन बिन्दु 76.3 cm (UPBoardSolutions.com) पर मिलता है। सेल के बाह्य परिपथ में 9.5 Ω रतिरोध का एक प्रतिरोधक संयोजित करने पर सन्तुलन बिन्दु पोटेंशियोमीटर के तार की 64.8 cm लम्बाई पर पहुँच जाता है। सेल के आन्तरिक प्रतिरोध का मान ज्ञात कीजिए।
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हल-
यहाँ वैद्युत वाहक बल E = 1.5 वोल्ट जिसके संगत (जब सेल खुले परिपथ में है) विभवमापी के तार की संगत सन्तुलन लम्बाई l1 = 76.3 सेमी। सेल के साथ बाह्य प्रतिरोध R = 9.5 Ω संयोजित करने पर (अर्थात् जब सेल बन्द परिपथ में है) तो सेल के टर्मिनल विभवान्तर V के संगत लम्बाई l2 = 64.8 सेमी।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी चालक में 3.2 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। प्रति सेकण्ड प्रवाहित इलेक्ट्रॉनों की संख्या होगी। (2015)
(i) 2 x 1019
(ii) 3 x 1020
(iii) 5.2 x 1019
(iv) 9 x 1020
उत्तर-
(i) 2 x 1019

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प्रश्न 2.
वैद्युत धारा घनत्व j तथा अपवाह वेग vd में सम्बन्ध है। (2015)
(i) j = nevd
(ii) j = [latex]\frac { ne }{ { v }_{ d } }[/latex]
(iii) j = [latex]\frac { { v }_{ d }e }{ n }[/latex]
(iv) j = [latex]{ v }_{ d }^{ 2 }[/latex]
उत्तर-
(i) j = nevd

प्रश्न 3.
प्रतिरोध की विमा है।
(i) [ML2T-2A-2]
(ii) [M2L3T-2A-2]
(iii) [ML2T-3A-2]
(iv) [ML3T-3A-3]
उत्तर-
(iii) [ML2T-3A-2]

प्रश्न 4.
40 W तथा 60 w के दो बल्ब 220 V लाइन से जोड़े जाते हैं, उनके प्रतिरोधों में अनुपात होगा
(i) 4 : 3
(ii) 3 : 4
(iii) 2 : 3
(iv) 3 : 2
उत्तर-
(iv) 3 : 2

प्रश्न 5.
एक ताँबे के तार को खींचकर 1% लम्बाई में वृद्धि कर दी जाए, तो प्रतिरोध में प्रतिशत परिवर्तन होगा (2009, 12)
(i) 4% वृद्धि
(ii) 2% वृद्धि
(iii) 1% वृद्धि
(iv) 2% कमी
उत्तर-
(ii) 2% वृद्धि

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प्रश्न 6.
50 Ω प्रतिरोध के धात्विक तार को खींचकर उसकी लम्बाई दो गुनी कर देते हैं। उसका नया प्रतिरोध है- (2016)
(i) 25 Ω
(ii) 50 Ω
(iii) 100 Ω
(iv) 200 Ω
उत्तर-
(iv) 200 Ω

प्रश्न 7.
एक 100 वाट-220 वोल्ट का बल्ब 110 वोल्ट की सप्लाई से जुड़ा है। बल्ब में व्यय होने वाली शक्ति होगी। (2017)
(i) 100 वाट
(ii) 50 वाट
(iii) 25 वाट
(iv) 2 वाट
उत्तर-
(iii) 25 वाट

प्रश्न 8.
2 ऐम्पियर की वैद्युत धारा चित्र 3.15 में प्रदर्शित परिपथ में प्रवाहित हो रही है। विभवान्तर (VB – VD) है। (2013)
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(i) 12 वोल्ट
(ii) 6 वोल्ट
(ii) 4 वोल्ट
(iv) 0 वोल्ट
उत्तर-
(iv) 0 वोल्ट

प्रश्न 9.
समान्तर क्रम में जुड़े 10 ओम के दो प्रतिरोधों की तुल्य प्रतिरोध है। (2014)
(i) 20 ओम
(ii) 10 ओम
(iii) 15 ओम
(iv) 5 ओम
उत्तर-
(iv) 5 ओम

प्रश्न 10.
दो प्रतिरोध R तथा 2R एक विद्युत परिपथ में समान्तर क्रम में जुड़े हैं। R तथा 2R में उत्पन्न ऊष्मीय ऊर्जा का अनुपात होगा (2015)
(i) 1 : 2
(ii) 2 : 1
(iii) 1 : 4
(iv) 4 : 1
उत्तर-
(ii) 2 : 1

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प्रश्न 11.
एक चालक तार का प्रतिरोध R ओम है। इसको n बराबर भागों में बाँटकर उनको समान्तर क्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध होगा
(i) [latex s=2]\frac { R }{ { n }^{ 2 } }[/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { { n }^{ 2 } }{ R }[/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { n }{ R }[/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { R }{ n }[/latex]
उत्तर-
(i) [latex s=2]\frac { R }{ { n }^{ 2 } }[/latex]

प्रश्न 12.
एक प्राथमिक सेल का वि० वा० बल 2.4 V है। इस सेल को जब लघुपथित कर देते हैं तो 4.0 A की वैद्युत धारा प्राप्त होती है। सेल को आन्तरिक प्रतिरोध है। (2014)
(i) 6.0 Ω
(ii) 1.2 Ω
(iii) 4.0 Ω
(iv) 0.6 Ω
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प्रश्न 13.
एक बैटरी जिसका वि० वा० बल 5 वोल्ट है तथा आन्तरिक प्रतिरोध 2.0 ओम है, एक बाहरी प्रतिरोध से जुड़ी है। यदि परिपथ में धारा 0.4 ऐम्पियर हो, तो बैटरी की टर्मिनल वोल्टता है। (2010, 12)
(i) 5 वोल्ट
(ii) 5.8 वोल्ट
(iii) 4.6 वोल्ट
(iv) 4.2 वोल्ट
उत्तर-
(iv) 4.2 वोल्ट

प्रश्न 14.
किरचॉफ का धारा का नियम किसके संरक्षण के परिणामस्वरूप है?
(i) ऊर्जा
(ii) संवेग
(iii) आवेश
(iv) द्रव्यमान
उत्तर-
(iii) आवेश

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प्रश्न 15.
5 मीटर लम्बे तथा 5 2 प्रतिरोध वाले विभवमापी के तार में 2 mA की धारा प्रवाहित हो रही है। विभवमापी की विभव-प्रवणता है। (2010)
(i) 2.0 x 10-3 वोल्ट/मीटर
(ii) 2.5 x 10-3 वोल्ट/मीटर
(iii) 1.6 x 10-3 वोल्ट/मीटर
(iv) 2.3 x 10-3 वोल्ट/मीटर
उत्तर-
(i) 2.0 x 10-3 वोल्ट/मीटर

प्रश्न 16.
विभवमापी के प्रयोग में दो सेलों के विद्युत वाहक बल E1 तथा E2 हैं। इन्हें श्रेणीक्रम में जोड़कर विभवमापी के तार पर अविक्षेप बिन्दु 58 सेमी पर प्राप्त होता है। जब E2 विद्युत वाहक बल वाली सेल की ध्रुवता उलट दी जाती है तब अविक्षेप बिन्दु 29 सेमी पर प्राप्त होता है। [latex s=2]\frac { { E }_{ 1 } }{ { E }_{ 2 } }[/latex] का अनुपात है (2014)
(i) 3 : 1
(ii) 2 : 1
(iii) 1 : 3
(iv) 1 : 2
उत्तर-
(ii) 2 : 1

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी चालक के भीतर वैद्युत-क्षेत्र [latex]\vec { E }[/latex] तथा धारा घनत्व [latex]\vec { J }[/latex] में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
[latex]\vec { E }[/latex] = p [latex]\vec { J }[/latex], जहाँ p चालक के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध है।

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प्रश्न 2.
समीकरण [latex]\vec { E }[/latex] = p [latex]\vec { J }[/latex] में p को मात्रक लिखिए। (2009)
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प्रश्न 3.
किन्हीं दो गुणों से एक चालक और एक अर्द्धचालक का भेद बताइए। (2009)
उत्तर-

  1. चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत अधिक होती है, जबकि अंर्द्धचालक में मुक्त इलेक्ट्रॉन चालकों से कम होते हैं।
  2. चालकों का ताप बढ़ाने पर उनका प्रतिरोध बढ़ता है, जबकि अर्द्धचालकों का ताप बढ़ाने से उनका प्रतिरोध घटता है।

प्रश्न 4.
विशिष्ट चालकत्व (specific conductance) की परिभाषा दीजिए। इसकी इकाई भी लिखिए।
या
विशिष्ट चालकता के लिए सूत्र एवं मात्रक लिखिए। (2012, 18)
या
किसी चालक पदार्थ की विशिष्ट चालकता क्या है? विशिष्ट चालकता का अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में मात्रक दीजिए। (2014)
उत्तर-
किसी चालक के पदार्थ के विशिष्ट प्रतिरोध (UPBoardSolutions.com) के व्युत्क्रम को उस पदार्थ की विशिष्ट चालकता (specific conductance) कहते हैं।
इसे ‘[latex s=2]\sigma[/latex]’ से प्रदर्शित करते हैं। अर्थात् [latex s=2]\sigma =\frac { 1 }{ \rho }[/latex] इसकी इकाई म्हो-मीटर-1 होती है।

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प्रश्न 5.
धारा-घनत्व, विशिष्ट चालकता तथा विद्युत-क्षेत्र के बीच परस्पर सम्बन्ध लिखिए तथा इससे विशिष्ट चालकता का मात्रक निकालिए। (2009, 11, 12)
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प्रश्न 6.
मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह वेग तथा वैद्युत धारा घनत्व में सम्बन्ध लिखिए। प्रयुक्त संकेतों के अर्थ बताइए। (2015)
हल-
धारा घनत्व (j) = nevd
जहाँ, n= मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या
e = इलेक्ट्रॉन का आवेश
vd = इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग

प्रश्न 7.
ताँबे के एक तार, जिसकी अनुप्रस्थ काट 2 x 10-6 मी2 है; में 3.2 ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही है। तार में प्रवाहित धारा-घनत्व का मान ज्ञात कीजिए। (2011, 14)
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प्रश्न 8.
धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह वेग एवं भ्रांतिकाल में सम्बन्ध लिखिए। प्रयुक्त संकेतों के अर्थ बताइए। (2016)
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प्रश्न 9.
एक इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार कक्षा में 6 x 106 चक्कर प्रति सेकण्ड की दर से घूम रहा है। लूप में तुल्य प्रवाहित धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2016)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 9

प्रश्न 10.
0.5 मिमी त्रिज्या के एक तार में 0.5 ऐम्पियर की धारा बह रही है। यदि तार में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4 x 1028 प्रति मी3 हो, तो उनके अनुगमन वेग की गणना कीजिए। (2017)
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प्रश्न 11.
अनओमीय परिपथ से आप क्या समझते हैं? इसका एक उदाहरण दीजिए। (2009)
या
अनओमीय चालक किसे कहते हैं?
या
गत्यात्मक प्रतिरोध का अर्थ क्या है? (2010)
उत्तर-
वे परिपथ (अर्थात् चालक) जिनमें ओम के नियम का पालन नहीं होता है; अर्थात् जिनके सिरों पर आरोपित विभवान्तर V तथा संगत धारा i का अनुपात नियत नहीं रहता है, अनओमीय परिपथ (चालक) कहलाते हैं। ऐसे परिपथों के लिए V तथा i के अनुपात के नियत न रहने का अर्थ है कि (UPBoardSolutions.com) इनका वैद्युत प्रतिरोध परिवर्तनीय होता है। अतः इनके प्रतिरोध को गत्यात्मक प्रतिरोध (dynamic resistance) भी कहते हैं। अनओमीय परिपथ के किसी खण्ड के विभवान्तर में अल्पांश परिवर्तन ΔV तथा उसके संगत धारा में परिवर्तन Δi का अनुपात गत्यात्मक प्रतिरोध के बराबर होता है; अर्थात् गत्यात्मक प्रतिरोध = [latex s=2]\frac { \triangle V }{ \triangle i }[/latex]
उदाहरण- बल्ब को तन्तु तथा डायोड बल्ब।

प्रश्न 12.
एक तार का प्रतिरोध 10 ओम है। इसे दोगुनी लम्बाई तक खींचा जाता है। इसका नया प्रतिरोध क्या होगा?
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 12

प्रश्न 13.
कार्बन प्रतिरोधक के सिरों पर 50 वोल्ट विभवान्तर लगाया जाता है। प्रतिरोधक पर प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वलयों के रंग क्रमशः लाल, पीला एवं नारंगी हैं। प्रतिरोधक में धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 13

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प्रश्न 14.
विशिष्ट प्रतिरोध का मात्रक एवं विमाएँ लिखिए। (2010, 11, 12, 15)
उत्तर-
मात्रक-ओम-मीटर या ओम-सेमी
विमा सूत्र- [ML3T-3A-2]

प्रश्न 15.
पूर्ण प्रज्वलन स्थिति में 100 वाट, 200 वोल्ट के विद्युत बल्ब का प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2013)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 15

प्रश्न 16.
एक प्लैटिनम प्रतिरोध तापमापी का प्रतिरोध 0°C ताप पर 3.0 ओम तथा 1000°C पर 3.75 ओम है। किसी अज्ञात ताप पर इसका प्रतिरोध 3.15 ओम है। अज्ञात ताप का मान ज्ञात कीजिए। (2015)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

प्रश्न 17.
1000 W – 250 V के हीटर के तार का प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2015)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 17

प्रश्न 18.
एक चालक में 50 वोल्ट पर 2 मिली-ऐम्पियर तथा 60 वोल्ट पर 3 मिली-ऐम्पियर धारा बहती है। चालक ओमीय है या अन-ओमीय इसे गणना द्वारा स्पष्ट कीजिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

प्रश्न 19.
ऐसे दो पदार्थों के नाम लिखिए जिनकी प्रतिरोधकता ताप बढ़ाने पर घटती है।
उत्तर-
अर्द्धचालक- जर्मेनियम तथा सिलिकॉन।

प्रश्न 20.
किसी धातु के प्रतिरोध पर ताष को क्या प्रभाव पड़ता है? (2015)
उत्तर-
ताप के बढ़ने से किसी धातु के प्रतिरोध का मान बढ़ता है अर्थात् धातु के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध अथवा पदार्थ की प्रतिरोधकता बढ़ जाती है। दूसरे शब्दों में, ताप के बढ़ने पर धातु की वैद्युत चालकता कम हो जाती है।

प्रश्न 21.
ताप बढाने से किसी चालक के प्रतिरोध में वृद्धि को दर्शाने वाला सूत्र लिखिए। (2015)
उत्तर-
जैसे-जैसे तार का ताप बढ़ता है इसके मुक्त इलेक्ट्रॉनों की वर्ग-माध्य-मूल चाल Vrms बढ़ती है। अतः चालक का प्रतिरोध
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 21

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प्रश्न 22.
1 किलोवाट के विद्युत बल्ब में 1 मिनट में कितनी ऊर्जा व्यय होगी? (2015)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 22
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 22.1

प्रश्न 23.
60 वाट, 30 वोल्ट के बल्ब को 90 वोल्ट सप्लाई पर जलाने के लिए श्रेणीक्रम में जुड़े प्रतिरोध का मान ज्ञात कीजिए। (2014)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

प्रश्न 24.
दिये गये परिपथ में A और B के बीच तुल्य प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 24
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

प्रश्न 25.
10 Ω प्रतिरोध के तार को 5 बराबर भागों में काट कर उनको समान्तर क्रम में जोड़ा गया है। इस संयोजन का परिणामी प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2014)
हल-
10 Ω के प्रतिरोध को 5 बराबर भागों में बाँटने पर प्रत्येक प्रतिरोध का मान = [latex s=2]\frac { 10 }{ 5 }[/latex] = 2 Ω
माना समान्तर क्रम में जोड़ने पर इनका तुल्य प्रतिरोध R है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 25

प्रश्न 26.
सेल के आन्तरिक प्रतिरोध से आप क्या समझते हैं? (2015, 16, 18)
उत्तर-
जब किसी सेल की प्लेटों को तार द्वारा जोड़ देते हैं तो तार में वैद्युत धारा सेल की धन-प्लेट से ऋण-प्लेट की ओर तथा सेल के भीतर उसके घोल में ऋण-प्लेट से (UPBoardSolutions.com) धन-प्लेट की ओर बहती है। इस प्रकार, सेल की दोनों प्लेटों के बीच सेल के भीतर वैद्युत धारा के प्रवाह में घोल द्वारा उत्पन्न अवरोध को सेल का ‘आन्तरिक प्रतिरोध’ कहते हैं।

प्रश्न 27.
सेल का आन्तरिक प्रतिरोध किन-किन बातों पर निर्भर करता है? (2018)
उत्तर-
सेल का आन्तरिक प्रतिरोध निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है-

  • सेल के इलेक्ट्रोडों के बीच की दूरी पर- यह दूरी के अनुक्रमानुपाती होता है।
  • वैद्युत-अपघट्य के घोल में इलेक्ट्रोडों के डूबे हुए भागों के क्षेत्रफल पर- यह क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
  • वैद्युत-अपघट्य की प्रकृति तथा सान्द्रता पर- विभिन्न वैद्युत-अपघट्यों के लिए आन्तरिक प्रतिरोध भिन्न होता है तथा यह वैद्युत अपघट्य के घोल की सान्द्रता के भी अनुक्रमानुपाती होता है।

प्रश्न 28.
सेल के विद्युत वाहक बल एवं टर्मिनल विभवान्तर में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2012, 13, 15)
उत्तर-
एकांक आवेश को पूरे परिपथ में सेल सहित प्रवाहित करने में सेल द्वारा दी गयी ऊर्जा को सेल का ‘विद्युत वाहक बल’ कहते हैं, जबकि किसी परिपथ (UPBoardSolutions.com) के दो बिन्दुओं के बीच एकांक आवेश को प्रवाहित करने में किए गए कार्य को उन बिन्दुओं के बीच ‘टर्मिनल विभवान्तर’ कहते हैं।

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प्रश्न 29.
3.2 वोल्ट की एक बैटरी 1.5 ओम प्रतिरोध में 2 ऐम्पियर की धारा भेज रही है। बैटरी का आन्तरिक प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2013)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity VSAQ 29

प्रश्न 30.
किसी वैद्युत परिपथ में 2 ऐम्पियर की धारा 5 मिनट तक प्रवाहित करने पर सेल द्वारा 1200 जूल कार्य किया जाता है। सेल के विद्युत वाहक बल की गणना कीजिए। (2012)
हल-
परिपथ में प्रवाहित वैद्युत आवेश
q = it = 2 x 5 x 60 = 600 कूलॉम
विद्युत वाहक बल = [latex s=2]\frac { 1200 }{ 600 }[/latex] = 2 वोल्ट

प्रश्न 31.
एक सेल से 0.5 ऐम्पियर धारा लेने पर उसका विभवान्तर 1.8 वोल्ट तथा 1.0 ऐम्पियर धारा लेने पर 1.6 वोल्ट हो जाता है। सेल का आन्तरिक प्रतिरोध तथा विद्युत वाहक बल ज्ञात कीजिए। (2015, 16)
हल-
दिया है, (i) जब = 0.5 ऐम्पियर तब
V = 1.8 वोल्ट तथा
(ii) जब
i = 1.0 ऐम्पियर तब
V = 1.6 वोल्ट
V = E – ir …..(1)
प्रथम स्थिति में समी० (1) से,
1.8 = E – (0.5) ….. (2)
द्वितीय स्थिति में समी० (1) से
1.6 = E – (1.0) r …..(3)
समी० (2) व (3) को हल करने पर,
सेल का आन्तरिक प्रतिरोध r = 0.4 Ω विद्युत वाहक बल
E = 2.0 वोल्ट

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प्रश्न 32.
मिश्रितक्रम में सेलों के संयोजन में अधिकतम धारा की क्या शर्त है? (2013)
उत्तर-
बैटरी का कुल आन्तरिक प्रतिरोध = बाह्य परिपथ का प्रतिरोध।

प्रश्न 33.
निम्न चित्र में धारा का मान ज्ञात कीजिए- (2017)
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हल-
बिन्दु P पर धारा i1 = बिन्दु P की ओर आने वाली धाराओं का योग – बिन्दु P से दूर जाने वाली धाराओं का योग
i1 = 2 + 2 – 1 = 3 A
बिन्दु Q पर धारा i2 = i1 – 1 A = 3 – 1 = 2 A
बिन्दु R पर धारा i2 + 1 A = i + 1.2 A
i = (2 + 1 – 1.2) A = 1.8 A

प्रश्न 34.
किरचॉफ का पहला नियम तथा दूसरा नियम किस भौतिक राशि के संरक्षण पर आधारित है?
उत्तर-
किरचॉफ का पहला नियम आवेश के संरक्षण पर तथा दूसरा नियम ऊर्जा के संरक्षण पर आधारित है।

प्रश्न 35.
व्हीटस्टोन सेतु की सर्वाधिक सुग्राही होने की शर्त क्या है?
उत्तर-
व्हीटस्टोन सेतु के चारों प्रतिरोध जब एक ही कोटि (order) के होते हैं तो यह सर्वाधिक सुग्राही होता है।

प्रश्न 36.
व्हीटस्टोन सेतु में यदि सेल तथा धारामापी की स्थिति को आपस में बदल दिया जाए तो सन्तुलन की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्यों? (2009, 14)
उत्तर-
कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका कारण यह है कि सेल तथा धारामापी व्हीटस्टोन सेतु के विकर्णो के सिरों के बीच जुड़े होते हैं। किसी भी एक विकर्ण के सिरों के बीच सेल जोड़ने पर दूसरे विकर्ण के सिरे समविभव पर होने से सेतु सन्तुलित रहता है।

प्रश्न 37.
यदि संलग्न चित्र 3.19 में दिखाया गया व्हीटस्टोन परिपथ सन्तुलित हो, तो अज्ञात प्रतिरोध x का मान बताइए। (2011)
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प्रश्न 38.
विभवमापी द्वारा मापे गये सेल का वि० वा० बल यथार्थ क्यों होता है ? (2009, 16)
उत्तर-
क्योंकि विभवमापी से पाठ्यांक तब लिया जाता है जब परिपथ में परिणामी धारा शून्य होती है। अर्थात् सेल खुले परिपथ में होती है।

प्रश्न 39.
विभवमापी की सुग्राहिता से क्या तात्पर्य है? इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है? (2012, 16)
उत्तर-
विभवमापी की सुग्राहिता का अर्थ है कि जौकी को शून्य विक्षेप स्थिति से थोड़ा-सा खिसकाने पर धारामापी में बहुत अधिक विक्षेप उत्पन्न हो जाये। विभवमापी की सुग्राहिता विभव-प्रवणता के व्युत्क्रमानुपाती होती है। परन्तु विभव-प्रवणता K = [latex s=2]\frac { V }{ L }[/latex] (जहाँ V = विभवमापी के तार के सिरों का विभवान्तर), (UPBoardSolutions.com) अत: K ∝ [latex s=2]\frac { 1 }{ L }[/latex] अर्थात् विभवमापी के तार की लम्बाई L बढ़ाने से K का मान कम हो जाएगा; अर्थात् सुग्राहिता बढ़ जाएगी। इस प्रकार विभवमापी की सुग्राहिता में वृद्धि तार की लम्बाई में वृद्धि करके की जा सकती है।

प्रश्न 40.
किसी विभवमापी में 1.0182 वोल्ट विवा०बल के सेल के लिए सन्तुलन बिन्दु 339.4 सेमी लम्बाई पर प्राप्त होता है। विभवमापी की विभव प्रवणता ज्ञात कीजिए। (2016)
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धारा-घनत्व j से आप क्या समझते हैं? इसका मात्रक M.K.S.A. पद्धति में लिखिए तथा विमा सूत्र बताइए। यह सदिश राशि है या अदिश?
या
धारा-घनत्व की परिभाषा दीजिए तथा इसका मात्रक भी लिखिए।
या
धारा घनत्व (j) की परिभाषा लिखिए। (2013)
उत्तर-
धारा-घनत्व (Current Density)- किसी चालक में किसी बिन्दु पर प्रति एकांक क्षेत्रफल से अभिलम्बवत् गुजरने वाली धारा को उस बिन्दु पर ‘धारा-घनत्व’ कहते हैं। इसे j से प्रदर्शित करते हैं। यदि किसी चालक में प्रवाहित धारा , चालक के अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A पर एकसमान रूप से वितरित हो, तब उस क्षेत्रफल के किसी बिन्दु पर धारा-घनत्व j = [latex s=2]\frac { i }{ A }[/latex]
M.K.S.A. पद्धति में इसका मात्रक ऐम्पियर प्रति मीटर तथा विमा [AL-2] है। धारा-घनत्व, चालक के भीतर किसी बिन्दु का एक लाक्षणिक गुण है (न कि सम्पूर्ण चालक का) तथा यह एक सदिश राशि है। किसी बिन्दु पर धारा-घनत्व की दिशा उस बिन्दु पर धनावेश के चलने की दिशा होती है।

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प्रश्न 2.
किसी धारावाही चालक में धारा घनत्व J, अनुगमन वेग vd, प्रति एकांक आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा मूल आवेश में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2017)
या
मुक्त इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग समझाइए। अनुगमन वेग व धारा-घनत्व के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2016)
या
किसी चालक में प्रवाहित धारा तथा इसमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह (अनुगमन) वेग में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2013, 18)
या
मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह वेग के लिए विद्युत धारा के पद में व्यंजक व्युत्पन्न कीजिए। (2017)
उत्तर-
मुक्त इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग- [संकेत- दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 1 के उत्तर में पढ़िए।]
धारा तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध- माना किसी धातु में किसी स्थान से t सेकण्ड में मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा ले जाया जाने वाला कुल आवेश q है, तब धातु में वैद्युत धारा
i = [latex s=2]\frac { q }{ t }[/latex] …(1)
माना तार के अनुप्रस्थ परिच्छेद का क्षेत्रफल A है तथा उसके प्रति एकांक आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या n व इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग vd है, तब
एक सेकण्ड में तार के क्षेत्रफल में से गुजरने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या = nAvd
t सेकण्ड में तार के क्षेत्रफल में से गुजरने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या = nAvd x t
तथा t सेकण्ड में तार के क्षेत्रफल में से गुजरने वाले आवेश की मात्रा
q = nAvd x t x e (जहाँ, e = इलेक्ट्रॉन का आवेश है)
q का मान समीकरण (1) में रखने पर। i = neAvd …(2)
यह वैद्युत धारा तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध है।
धारा-घनत्व तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध- हम जानते हैं कि
धारा-घनत्व j = [latex s=2]\frac { i }{ A }[/latex]
समीकरण (2) से हो का मान रखने पर
j = nevd
यह धारा-घनत्व तथा अनुगमन वेग के बीच सम्बन्ध है।

प्रश्न 3.
एक तार के अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल 1 x 10-7 मीटर तथा तार में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2 x 1028 प्रति मीटर है। तार में 3.2 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। ज्ञात कीजिए-
(i) तार में धारा-घनत्व,
(ii) तार में इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग। (2010)
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प्रश्न 4.
L लम्बाई के एक चालक को E विद्युत वाहक बल की सेल से जोड़ा जाता है। यदि इस चालक के स्थान पर समान पदार्थ व समान मोटाई के किसी अन्य चालक जिसकी लम्बाई 3L हो, सेल से जोड़ दिया जाए तब अनुगमन वेग पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (2014).
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प्रश्न 5.
धातुओं में इलेक्ट्रॉनों के अनियमित (मुक्त) वेग और उनके अनुगमन वेग में क्या अन्तर है? (2014)
उत्तर-
धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन बन्द बर्तन में भरी गैस के अणुओं की तरह व्यवहार करते हैं तथा धातु के भीतर स्थित धन आयनों के बीच खाली स्थान में उच्च (UPBoardSolutions.com) वेग (105 मी/से) से अनियमित गति करते हैं, यह मुक्त इलेक्ट्रॉनों का वेग है। धातु के सिरों के बीच विभवान्तर होने पर मुक्त इलेक्ट्रॉन अपनी अनियमित गति के होते हुए भी एक निश्चित सूक्ष्म वेग (=10-4 मी/से) से उच्च विभव वाले सिरे की ओर खिसकते हैं, यह अनुगमन वेग है।

प्रश्न 6.
सिद्ध कीजिए कि [latex s=2]\hat { j } =\sigma \vec { E }[/latex] है, जहाँ E चालक का वैद्युत क्षेत्र, [latex s=2]\hat { j } [/latex] धारा घनत्व तथा विशिष्ट चालकता है। (2014)
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प्रश्न 7.
ताँबे में मुक्त इलेक्ट्रॉनों का संख्या घनत्व 8.5 x 1028 /मीटर3 है। 0.2 मीटर लम्बाई तथा 1 मिमी2 परिच्छेद क्षेत्रफल के ताँबे के तार से होकर प्रवाहित धारों का मान ज्ञात कीजिए, जबकि 4 वोल्ट की एक बैटरी जुड़ी है। तार में इलेक्ट्रॉनों की गतिशीलता 4.5 x 10-6 मी2/वोल्ट सेकण्ड है। (2015)
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प्रश्न 8.
एक तार में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2 x 1028 प्रति मी है। तार का अपवाह (अनुगमन) वेग 1.0 सेमी/सेकण्ड है। तार में धारा घनत्व की गणना कीजिए। (2013)
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प्रश्न 9.
एक चालक में 6.4 ऐम्पियर वैद्युत धारा प्रवाहित होती है। यदि चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या 8 x 1024 प्रति मीटर हो तो उनका अनुगमन वेग ज्ञात कीजिए। (2014)
हल-
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प्रश्न 10.
विशिष्ट प्रतिरोध की परिभाषा दीजिए तथा मात्रक बताइए। विशिष्ट प्रतिरोध तथा विशिष्ट वैद्युत-चालकता में क्या सम्बन्ध है? या विशिष्ट प्रतिरोध की परिभाषा लिखिए। (2014, 15)
उत्तर-
विशिष्ट प्रतिरोध- ‘‘किसी धारावाही चालक के अन्दर किसी बिन्दु पर वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता E तथा उस बिन्दु पर धारा-घनत्व ) के अनुपात को चालक का विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं।”
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प्रश्न 11.
किसी धातु के 20 सेमी लम्बे तार को खींच कर इसकी लम्बाई 25% बढ़ा दी जाती है। नये तार के प्रतिरोध में प्रतिशत वृद्धि की गणना कीजिए। (2009)
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प्रश्न 12.
चित्र 3.20 में किसी चालक में बहने वाली धारा I तथा उसके सिरों पर लगाए गए विभवान्तर V को ग्राफ द्वारा प्रदर्शित किया I (ऐम्पियर) गया है। चालक का प्रतिरोध, कोण θ के व्यंजक में कितना होगा? (2015)
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प्रश्न 13.
एक बल्ब पर 100 वाट तथा 220 वोल्ट अंकित है। जब बल्ब जल रहा हो, तब उसका प्रतिरोध एवं उसमें प्रवाहित धारा की गणना कीजिए। (2015)
हल-
यदि बल्ब का प्रतिरोध R ओम तथा वह V वोल्ट पर जलता है, तब उसमें क्षय वैद्युत शक्ति (वाट में)
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प्रश्न 14.
8 ओम के मोटे तार को खींचकर इसकी लम्बाई दोगुनी कर दी जाती है। तार के नये प्रतिरोध की गणना कीजिए। (2015, 16)
हल-
दिया है, तार का प्रतिरोध (R) = 8 ओम
तार की लम्बाई में वृद्धि (n) = 2
माना तार का नया प्रतिरोध = R’
तब, R’ = n²R = (2)² x 8 = 4 x 8 = 32 ओम

प्रश्न 15.
दिये गये तीन प्रतिरोधों में प्रत्येक का प्रतिरोध 42है तथा प्रत्येक को अधिकतम 64वाट तक की विद्युत शक्ति दी जा सकती है। पूरा परिपथ अधिकतम कितनी शक्ति ले सकता है ? (2012)
हल-
तार में व्यय वैद्युत-शक्ति P = i²R
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प्रश्न 16.
एक कार्बन प्रतिरोधक की तीन पट्टियों (बैण्ड) के वर्ण कोड़ क्रमशः नीला, काला तथा पीला हैं। यदि इनके सिरों के बीच 30 वोल्ट का विभवान्तर लगाया जाए तब इसमें प्रवाहित धारा क्या है? (2014)
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प्रश्न 17.
तीन प्रतिरोध तार हैं। प्रत्येक का प्रतिरोध 4 ओम है। इनके सम्भावित संयोजनों को प्रदर्शित कीजिए तथा प्रत्येक संयोजन में तुल्य प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2016)
हल-
चित्र 3.22 (a) से,
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प्रश्न 18.
एक R ओम प्रतिरोध के तार को खींचकर तीन गुनी लम्बाई की जाती है। इस खींचे तार को । तीन बराबर लम्बाई के तारों में काट कर उन्हें समान्तर क्रम में जोड़ दिया जाता है। इस संयोजन का कुल प्रतिरोध क्या होगा? (2014)
हल-
माना तार की प्रारम्भिक लम्बाई l है तथा खींचने के पश्चात् l’ है। तार का प्रारम्भिक अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है तथा खींचने के पश्चात् A’ है। तार का प्रारम्भिक आयतन Al (UPBoardSolutions.com) तथा खींचने के पश्चात् A’l’ होगा। परन्तु खींचने पर तार का आयतन नहीं बदलेगा; अत:
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प्रश्न 19.
सेल के विद्युत वाहक बल से क्या तात्पर्य है ? किसी वोल्टमीटर से सेल का वि० वा० बल सही-सही क्यों नहीं नापा जा सकता है ?
या
किसी सेल के विद्युत वाहक बल से क्या तात्पर्य है? (2014)
उत्तर-
सेल का विद्युत वाहक बल- एकांक आवेश को पूरे परिपथ (सेल सहित) में प्रवाहित करने में सेल द्वारा दी गयी ऊर्जा को सेल का ‘विद्युत वाहक बल’ (electromotive force) कहते हैं। यदि किसी परिपथ में q आवेश प्रवाहित करने पर सेल को W कार्य करना पड़े (ऊर्जा देनी पड़े) तो सेल का वि० वा० बल [latex s=2]\frac { W }{ q }[/latex] यदि W जूल में तथा q कूलॉम में हों तो E का मान वोल्ट (UPBoardSolutions.com) में प्राप्त होता है। यदि किसी परिपथ में 1 कूलॉम आवेश प्रवाहित करने पर सेल द्वारा दी गयी ऊर्जा 1 जूल हो, तो सेल का वि० वा० बल 1 वोल्ट होता है। वि० वा० बल प्रत्येक सेले का एक लाक्षणिक गुण होता है। सेल के विद्युत वाहक बल का सही मापन करने के लिए, इसको मापने के लिए प्रयुक्त यन्त्र का प्रतिरोध अनन्त होना चाहिए। परन्तु वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनन्त नहीं होता है। इसलिए इससे विद्युत वाहक बल का सही-सही मापन नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 20.
किसी सेल के टर्मिनल विभवान्तर, वि० वा० बल तथा आन्तरिक प्रतिरोध में सम्बन्ध स्थापित कीजिए तथा दिखाइए कि टर्मिनल विभवान्तर, सेल से ली गयी धारा पर निर्भर करता है। (2009, 16)
या
किसी सेल के विद्युत वाहक बल तथा इसके सिरों के बीच विभवान्तर (टर्मिनल विभवान्तर) में सम्बन्ध का सूत्र स्थापित कीजिए। (2013)
उत्तर-
माना E विद्युत वाहक बल तथा आन्तरिक प्रतिरोध वाली एक, सेल को चित्र 3.23 की भाँति एक कुंजी. K द्वारा किसी बाह्य परिपथ में जोड़ दिया गया है, जिसका प्रतिरोध R है। कुंजी को बन्द करने पर परिपथ में एक नियत धारा । प्रवाहित होने लगती है जिसका मान परिपथ के श्रेणीक्रम में जुड़े अमीटर की सहायता से पढ़ा जाता है।

माना धारा i परिपथ में t समय के लिए प्रवाहित की जाती है। अत: परिपथ में प्रवाहित आवेश q = धारा x समय = i x है, सेल सहित पूरे परिपथ में इस आवेश को प्रवाहित कराने में सेल द्वारा किया गया कार्य (अर्थात् सेल द्वारा दी गयी ऊर्जा) w हो, तो यह ऊर्जा सेल सहित पूरे परिपथ में निम्नलिखित दो भागों में प्रयुक्त होती है-

ऊर्जा का एक भाग वाडा ; प्रतिरोध R में आवेश १ को प्रवाहित कराने में तथा शेष दूसरा भाग Wआन्तरिक, सेल के आन्तरिक प्रतिरोध r (अर्थात् वैद्युत-अपघट्य) में आवेश q को प्रवाहित कराने में व्यय होता है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity SAQ 20
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity SAQ 22
यही टर्मिनल विभवान्तर तथा सेल के आन्तरिक प्रतिरोध के बीच सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध से स्पष्ट है कि जब किसी सेल से वैद्युत धारा ली जा रही होती है; अर्थात् (UPBoardSolutions.com) सेल बन्द परिपथ में होती है तो उसका टर्मिनल विभवान्तर V उसके विद्युत वाहक बल E से कम होता है। ऐसा सेल के आन्तरिक प्रतिरोध में विभव पतन ir के कारण होता है। परन्तु जब सेल को धारा दी जा रही होती है तो उपर्युक्त सूत्र (2) निम्न प्रकार व्यक्त किया जाता है- V = E + ir

प्रश्न 21.
60 ओम के बाह्य प्रतिरोध को बैटरी के टर्मिनलों से जोड़ने पर 0.3 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित होती है तथा प्रतिरोध घटाकर 30 ओम कर देने पर धारा का मान 0.5 ऐम्पियर हो जाता है। बैटरी के वि० वा० बल और आन्तरिक प्रतिरोध की गणना कीजिए। (2014)
हल-
माना बैटरी का विद्युत वाहक बल E तथा आन्तरिक प्रतिरोध है। इससे जुड़े बाह्य प्रतिरोध R में
वैद्युत धारा
i = [latex s=2]\frac { E }{ R+r }[/latex]
⇒ E = i (R + r)
प्रथमं स्थिति में, E = 0.3 (60 + r) …..(1)
द्वितीय स्थिति में, E = 0.5 (30 + r) ……..(2)
समी० (1) व (2) से,
0.3 (60 + r) = 0.5 (30 + r)
18 + 0.3r = 15 + 0.5r
0.2 r = 3 ⇒ r = 15 Ω
विद्युत वाहक बल E = 0.3 (60 + 15) = 0.3 x 75 = 22.5 वोल्ट

प्रश्न 22.
खुले परिपथ में एक सेल की प्लेटों के बीच विभवान्तर 1.5 वोल्ट है। इस सेल को 10 ओम के प्रतिरोध से जोड़ने पर इसकी प्लेटों के बीच विभवान्तर 1.2 वोल्ट हो जाता है। वैद्युत परिपथ बनाकर सेल का आन्तरिक प्रतिरोध एवं 10 ओम के प्रतिरोध में प्रवाहित होने वाली , धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2015, 16)
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity SAQ 22.1

प्रश्न 23.
किसी बैटरी के सिरों पर उच्च प्रतिरोध के वोल्टमीटर को जोड़ने पर पाठ्यांक 15 वोल्ट मिलता है। बैटरी के सिरों को एमीटर से जोड़ने पर एमीटर 1.5 ऐम्पियर और वोल्टमीटर 9 वोल्ट पढ़ता है। बैटरी के आन्तरिक प्रतिरोध तथा एमीटर एवं संयोजक तारों के प्रतिरोध की गणना कीजिए। (2015)
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प्रश्न 24.
किसी सेल से 0.6 ऐम्पियर धारा लेने पर उसकी टर्मिनल वोल्टता 1.6 वोल्ट हो जाती है तथा 0.8 ऐम्पियर धारा लेने पर टर्मिनल वोल्टता 1.3 वोल्ट हो जाती है। सेल का वैद्युत वाहक बल तथा आन्तरिक प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2017)
हल-
दिया है, I1 = 0.6 ऐम्पियर, V1 = 1.6 वोल्ट
I2 = 0.8 ऐम्पियर, V2 = 1.3 वोल्ट
सेल के सिरों पर विभवान्तर V = E – Ir
पहली स्थिति में, 1.6 = E – 0.6 x r …….(1)
दूसरी स्थिति में, 1.3 = E – 0.8 x r ……..(2)
समीकरण (1) व (2) को हल करने पर,
सेल का वैद्युत वाहक बल E = 2.5 वोल्ट
तथा सेल का आन्तरिक प्रतिरोध r = 1.5 ओम

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प्रश्न 25.
आपको एक 6 वोल्ट विद्युत वाहक बल तथा 1 ओम आन्तरिक प्रतिरोध की सेल के साथ दो बाह्य प्रतिरोध R1 = 2 ओम व R2 = 3 ओम दिए जाते हैं। परिपथमें धारा क्या होगी, जब
(i) R1 व R2 श्रेणीक्रम में जोड़े जाएँ?
(ii) R1 व R2 समान्तर क्रम में जोड़े जाएँ। (2014)
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प्रश्न 26.
एक 3 वोल्ट विद्युत वाहक बल की सेल 4 ओम प्रतिरोध वाले विभवमापी तार AC के मध्य जुड़ी है। 2 ओम प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवान्तर ज्ञात कीजिए, यदि सम्पर्क बिन्दु B विभवमापी तार के ठीक मध्य में हो। (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity SAQ 26
हल-
E = iR – ir [जहाँ r = 0]
E = iR [जहाँ R = 4 Ω]
i = [latex s=2]\frac { 3 }{ 4 }[/latex] ऐम्पियर
2 Ω प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवान्तर
V = iR = [latex s=2]\frac { 3 }{ 4 }[/latex] x 2 = 1.5 वोल्ट

प्रश्न 27.
निम्नचित्र में प्रदर्शित परिपथ में प्रतिरोध R है। A व B के बीच तुल्य प्रतिरोधज्ञात कीजिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity SAQ 27
हल-
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प्रश्न में दिए गए चित्र 3.26 में दिए गए प्रतिरोधों को चित्र 3.27 की भाँति व्यवस्थित कर सकते हैं। इस प्रकार यह परिपथ एक सन्तुलित व्हीटस्टोन सेतु के तुल्य है। यदि A व B के बीच सेल जोड़ दी जाए तो भुजा CD में कोई धारा नहीं बहेगी। अत: C व D के बीच जुड़ा प्रतिरोध प्रभावहीन है।
ADB में जुड़े प्रतिरोधों का परिणामी प्रतिरोध
R1 = R + R = 2R Ω
तथा ACB में जुड़े प्रतिरोधों का परिणामी प्रतिरोध
R2 = R + R = 2R Ω
भुजा ADB तथा ACB में जुड़े प्रतिरोध R1 व R2 परस्पर समान्तर क्रम में हैं।
अतः A व B के बीच तुल्य प्रतिरोध
[latex s=2]R=\frac { 2R\times 2R }{ 2R+2R } =R\Omega[/latex]

प्रश्न 28.
चित्र में दर्शाए गए 75 Ω के प्रतिरोध में प्रवाहित धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity SAQ 28UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अनुगमन वेग से आप क्या समझते हैं? इलेक्ट्रॉन अनुगमन वेग के सिद्धान्त द्वारा ओम के नियम का निगमन कीजिए। (2011, 12, 17, 18)
या
किसी चालक के विभवान्तर तथा मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह (अनुगमन) वेग के बीच का सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2012)
या
किसी चालक के बीच विभवान्तर तथा मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अनुगमन वेग के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2013)
या
मुक्त इलेक्ट्रॉनों के ‘अपवाह वेग से आप क्या समझते हैं? मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह वेग के आधार पर ओम के नियम की व्याख्या कीजिए। (2014, 18)
या
अनुगमन वेग की परिभाषा दीजिए। (2014)
या
मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अनुगमन वेग से आप क्या समझते हैं? (2015)
या
किसी धातु में मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह वेग से क्या तात्पर्य है? मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अपवाह वेग के आधार पर ओम का नियम व्युत्पन्न कीजिए। (2017, 18)
उत्तर-
अनुगमन वेग (अपवाह वेग)- किसी धातु के तार के सिरों को बैटरी से जोड़ देने पर तार के सिरों के बीच एक विभवान्तर स्थापित हो जाता है। इस विभवान्तर अथवा वैद्युत-क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन एक वैद्युत बल का अनुभव करते हैं जो इलेक्ट्रॉनों को त्वरण प्रदान करता है। परन्तु इस त्वरण से इलेक्ट्रॉनों की चाल लगातार बढ़ती नहीं जाती, बल्कि धातु के धन आयनों से टकराकर ये इलेक्ट्रॉन बैटरी से प्राप्त ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) को खोते रहते हैं। स्पष्ट है कि बैटरी का विभवान्तर इलेक्ट्रॉनों को त्वरित गति प्रदान नहीं कर पाता बल्कि तार की लम्बाई के अनुदिश एक लघु नियत वेग ही दे पाता है जो इलेक्ट्रॉनों की अनियमित गति पर आरोपित हो जाता है। इलेक्ट्रॉनों के इस लघु नियत वेग को ही ‘अनुगमन वेग’ (drift velocity) कहते हैं। इसे 04 से प्रदर्शित करते हैं।

ओम के नियम का निगमन- माना एक धातु के तार की लम्बाई l तथा अनुप्रस्थ परिच्छेद का क्षेत्रफल A है। जब इसके सिरों के बीच विभवान्तर V लगाया जाता है, तो इसमें वैद्युत धारा i प्रवाहित होने लगती है। यदि तार के प्रति एकांक आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या (मुक्त इलेक्ट्रॉन-घनत्व) n हो तथा इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग vd हो, तब
i = neAvd …(1)
जहाँ, e इलेक्ट्रॉन का आवेश है। तार के प्रत्येक बिन्दु पर वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता E = [latex s=2]\frac { V }{ l }[/latex]
इस क्षेत्र द्वारा प्रत्येक मुक्त इलेक्ट्रॉन पर आरोपित बल F = eE = [latex s=2]\frac { eV }{ l }[/latex]
यदि इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान m हो, तो इस बल के कारण इलेक्ट्रॉन में उत्पन्न त्वरण
a = [latex s=2]\frac { F }{ m }[/latex] = [latex s=2]\frac { eV }{ ml }[/latex] …(2)

तार के भीतर मुक्त इलेक्ट्रॉन धातु के धन आयनों से बारम्बार टकराते रहते हैं। किसी धन आयन से टकराने के पश्चात् इलेक्ट्रॉन का वेग वैद्युत-क्षेत्र E की विपरीत दिशा में बढ़ने लगता है। यदि किसी इलेक्ट्रॉन की, धन आयनों से हुई दो क्रमागत टक्करों के बीच का समयान्तराल t है, (UPBoardSolutions.com) तो इलेक्ट्रॉन के वेग में aτ वृद्धि होगी। यदि किसी क्षण वैद्युत-क्षेत्र की अनुपस्थिति में किसी इलेक्ट्रॉन का ऊष्मीय वेग u1 है, तब वैद्युत-क्षेत्र में की उपस्थिति में उसका वेग बढ़कर u1 + aτ1 हो जाएगा; जहाँ τ1 उस इलेक्ट्रॉन का दो क्रमागत टक्करों के बीच का समयान्तराल है। इसी प्रकार, अन्य इलेक्ट्रॉनों के वेग (u2 + aτ2), (u3 + aτ3) होंगे। सभी n इलेक्ट्रॉनों का औसत वेग ही मुक्त इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग vd है। इस प्रकार
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity LAQ 1.1
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प्रश्न 2.
हाइड्रोजन परमाणु में 1 इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर 7.0 x 10-11 मीटर त्रिज्या की कक्षा में 4.4 x 106 मी/से की चाल से चक्कर लगाता है। कक्षा में इसके समतुल्य वैद्युत धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2011)
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प्रश्न 3.
60 W.220 V तथा 100 W.220 V के दो बल्ब श्रेणीक्रम में जोड़कर 220 वोल्ट मेन्स से सम्बन्धित किये गये हैं। उनमें प्रवाहित होने वाली धाराओं की गणना कीजिए। यदि बल्ब समान्तर क्रम में जोड़े जाये तब धाराएँ कितनी होंगी? (2011, 17)
हल-
श्रेणीक्रम में जुड़े बल्बों में समान धारा प्रवाहित होगी।
60 वोट के बल्ब का प्रतिरोध
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity LAQ 3.1

प्रश्न 4.
दिये गये चित्र 3.29 में दिखाए गए परिपथ में लगी बैटरी का विद्युत वाहक बल 12 वोल्ट तथा आन्तरिक प्रतिरोध नगण्य है। अमीटर A के पाठ्यांक की गणना कीजिए। जबकि, कुँजी k
(i) खुली हो, (ii) बन्द हो। (2015)
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प्रश्न 5.
वैद्युत परिपथ के लिए किरचॉफ के नियमों का व्याख्या सहित वर्णन कीजिए।
या
वैद्युत परिपथ के लिए किरचॉफ के नियमों का उल्लेख कीजिए और उनको परिपथ बनाकर समझाइए। (2012, 18)
या
वैद्युत परिपथ सम्बन्धी किरचॉफ के दोनों नियम समुचित परिपथ आरेख बनाकर समझाइए। (2014)
या
वैद्युत परिपथ सम्बन्धी किरचॉफ के नियम लिखिए। (2015, 17)
या
किरचॉफ का धारा नियम लिखिए तथा धारा के लिए चिह्न परिपाटी भी बताइए। (2018)
उत्तर-
किरचॉफ के नियम (Kirchhoff’s Laws)-
प्रथम नियम- किसी वैद्युत परिपथ की किसी भी सन्धि पर मिलने वाली धाराओं का बीजगणितीय योग (algebraic sum) शून्य होता है;
अर्थात् [latex]\sum { i }[/latex] = 0
माना कि चालक जिनमें धाराएँ i1, i2, i3, i4 व i5 बह रही हैं, सन्धि O पर मिलते हैं। चिह्न परिपाटी के अनुसार सन्धि की ओर आने वाली धारा धनात्मक है। अतः i1 वे i2 धनात्मक तथा i3, i4 व i5 ऋणात्मक हैं। किरचॉफ के नियम के अनुसार,
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i1 + i2 – i3 – i4 – i5 = 0
या i1 + i2 = i3 + i4 + i5
स्पष्ट है कि परिपथ के किसी बिन्दु पर आने वाली धाराओं का योग वहाँ से जाने वाली धाराओं के योग के बराबर होता है। यह नियम आवेश के संरक्षण को व्यक्त करता है।

द्वितीय नियम- किसी वैद्युत परिपथ में प्रत्येक बन्दपाश के विभिन्न भागों में प्रवाहित होने वाली धाराओं एवं संगत प्रतिरोधों के गुणनफलों का बीजगणितीय योग उस पाश में लगने वाले समस्त वि० वा० बलों के बीजगणितीय योग के बराबर होता है।
अर्थात् [latex]\sum { iR }[/latex] = [latex]\sum { E }[/latex]
इस नियम को लगाते समय धारा की दिशा में चलने पर धारा व इसके संगत प्रतिरोध का गुणनफल धनात्मक लेते हैं तथा सेल के वैद्युत-अपघट्य में ऋण इलेक्ट्रोड से धन इलेक्ट्रोड की ओर चलने पर वि० वा० बल धनात्मक लेते हैं। चित्र 3.32 में दिखाये गये वैद्युत परिपथ में दो बन्दपाश (1) व (2) हैं। इस नियम के अनुसार बन्दपाश (1) के लिए
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i1R1 – i2R2 = E1 – E2
तथा बन्दपाश (2) के लिए ।
i2R2 + (i1 + i2) R3 = E2
इन समीकरणों को हल करके i1 व i2 के मान ज्ञात किये जा सकते हैं। यह नियम ऊर्जा के संरक्षण को व्यक्त करता है।

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प्रश्न 6.
वैद्युत परिपथ के लिए, किरचॉफ के नियमों का उल्लेख कीजिए तथा उनकी सहायता से किसी व्हीटस्टोन सेतु के सन्तुलित होने का सूत्र [latex]\frac { P }{ Q }[/latex] = [latex s=2]\frac { R }{ S }[/latex] व्युत्पादित कीजिए, जहाँ संकेतों को सामान्य अर्थ है। (2014)
या
व्हीटस्टोन सेतु का परिपथ चित्र खींचकर उसकी साम्यावस्था का प्रतिबन्ध निकालिए। (2009, 14, 17)
या
व्हीटस्टोन ब्रिज का सिद्धान्त क्या है? (2014)
या
व्हीटस्टोन सेतु की संतुलन अवस्था में उसकी भुजाओं के प्रतिरोध में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2017)
या
व्हीटस्टोन सेतु का परिपथ आरेख खींचिए तथा संतुलन के प्रतिबन्ध का व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2017)
या
व्हीटस्टोन ब्रिज सिद्धान्त की संतुलन गति को लिखिए। (2018)
उत्तर-
किरचॉफ के नियमों के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 5 का उत्तर देखिए।
व्हीटस्टोन सेतु का सिद्धान्त- चित्र 3.33 में व्हीटस्टोन सेतु व्यवस्था दिखायी गयी है। जब व्हीटस्टोन सेतु में चतुर्भुज रूप में जुड़े प्रतिरोधों के मान इस प्रकार समायोजित किये जाएँ कि सेल की कुंजी K1 तथा धारामापी की कुंजी K2 दोनों बन्द करने पर धारामापी में कोई विक्षेप न आये तो इस दशा में सेतु सन्तुलित (balanced) कहा जाता है।
“सेतु की सन्तुलन अवस्था में सेतु (चतुर्भुज) की किन्हीं दो संलग्न भुजाओं में लगे प्रतिरोधों का अंनुपात शेष दो संलग्न भुजाओं में लगे प्रतिरोधों के अनुपात के बराबर होता है।”
अर्थात् [latex]\frac { P }{ Q }[/latex] = [latex s=2]\frac { R }{ S }[/latex]
किरचॉफ के नियमों का उपयोग करके उपर्युक्त सम्बन्ध का निगमन-
चित्र 3.33 में बन्दपाश ABDA में किरचॉफ का द्वितीय नियम लगाने पर
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प्रश्न 7.
विभवमापी का सिद्धान्त चित्र खींचकर समझाइए। यह वोल्टमीटर से श्रेष्ठ क्यों है? (2017, 18)
या
हम सेल का विद्युत वाहक बल नापने के लिए वोल्टमीटर की अपेक्षा विभवमापी को वरीयता क्यों देते हैं। (2014)
या
विभवमापी का सिद्धान्त समझाइए। इसकी सुग्राहिता किस प्रकार बढ़ाई जा सकती है? (2015, 18)
या
विभवमापी में प्रयोग किए जाने वाले तार के विशेष गुण लिखिए।
उत्तर-
विभवमापी- यह किसी सेल का विद्युत वाहक बल अथवा किसी वैद्युत परिपथ के दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर नापने का यथार्थ उपकरण है।
विभवमापी का सिद्धान्त- इसमें मुख्यत: एक लम्बा व एकसमान व्यास की धातु का प्रतिरोध-तार AB होता है। इसका एक सिरा A एक संचायक-बैटरी के धन-ध्रुव से (UPBoardSolutions.com) जुड़ा होता है। बैटरी का ऋण-ध्रुव एक कुंजी (K) तथा एक धारा नियन्त्रक (Rh) के द्वारा सार के दूसरे सिरे B से जोड़ दिया जाता है। धारा नियन्त्रक के द्वारा तार AB में धारा को घटाया अथवा बढ़ाया जा सकता है।

E एक सेल है जिसका विद्युत वाहक बल नापना है। इसका धन-ध्रुव तार के A सिरे से जुड़ा होता है। तथा ऋण-ध्रुव एक धारामापी G के द्वारा जौकी J से जुड़ा होता है जो तार पर खिसकाकर कहीं भी स्पर्श करायी जा सकती है।
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बैटरी से वैद्युत धारा तार के सिरे A से सिरे B की ओर को बहती है। अत: A से B की ओर तार के प्रत्येक बिन्दु पर वैद्युत-विभव गिरता जाता है। तार की प्रति एकांक लम्बाई में विभव-पतन को विभव-प्रवणता कहते हैं तथा इसे K से प्रदर्शित करते हैं।

माना जौकी को J1 पर स्पर्श कराते हैं, जबकि A और J1 के बीच विभवान्तर, सेल E के वि० वा० बल से कम है। चूंकि बिन्दु A का विभव J1 से। ऊँचा है; अत: बैटरी B1 की धारा AE J1 मार्ग से धारामापी में प्रवाहित होगी। परन्तु सेल E का धन-ध्रुव, बिन्दु A से जुड़ा है; अतः सेल की धारा AJ1E मार्ग से धारामापी में प्रवाहित होगी। स्पष्ट है। कि ये दोनों धाराएँ परस्पर विपरीत दिशाओं में हैं। परन्तु चूँकि सेल का वि० वा० बल (UPBoardSolutions.com) बैटरी के कारण उत्पन्न A व J1 के बीच विभवान्तर से अधिक है; अत: सेल की धारा की प्रधानता होगी। इस प्रकार AJ1E की दिशा में प्रवाहित एक परिणामी धारा के – कारण धारामापी की सूई एक ओर विक्षेपित हो जाएगी।

इसके विपरीत यदि जौकी को J2 पर स्पर्श कराते हैं, जबकि A व J2 के बीच विभवान्तर, सेल E के वि० वा० बल से अधिक हो, तो बैटरी B1 की धारा की प्रधानता होगी। इस दशा में धारामापी में एक परिणामी धारा AEJ2 दिशा में प्रवाहित होगी और धारामापी की सूई पहले से विपरीत दिशा में विक्षेपित हो जाएगी।

स्पष्ट है कि जौकी की दोनों स्थितियों J1 व J2 के मध्य में J एक ऐसा बिन्दु होगा, जहाँ पर जौकी को स्पर्श कराने पर धारामापी में कोई विक्षेप नहीं होगा। यह शून्य विक्षेप की स्थिति होगी और ऐसी स्थिति में A व J के मध्य विभवान्तर, सेल के वि० वा० बल के बराबर होगा।
माना तार में बहने वाली धारा का मान i है तथा तार की 1 सेमी लम्बाई का प्रतिरोध p है, तब
विभव-प्रवणता K = ip
यदि तार के भाग AJ की लम्बाई l सेमी हो तथा बिन्दु A व J के बीच विभवान्तर V हो, तो
V = Kl
शून्य विक्षेप स्थिति में, विभवान्तर V सेल के विद्युत वाहक बल E के बराबर होता है। अतः
E = Kl
विभवमापी की सुग्राहिता बढ़ाने के लिए विभवमापी के तार की लम्बाई बढ़ा दी जाती है जिस कारण विभव-प्रवणता कम हो जाती है और शून्य विक्षेप की स्थिति की दूरी (l) अधिक लम्बाई पर आती है।
विभवमापी में प्रयोग होने वाले तार के विशेष गुण

  1. तार का व्यास सर्वत्र समान होना चाहिए।
  2. तार के पदार्थ का प्रतिरोध ताप-गुणांक अधिक होना चाहिए।
  3. तार के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कम होना चाहिए।

वोल्टमीटर की तुलना में विभवमापी की श्रेष्ठता

  1. जब हम सेल का वि० वा० बल विभवमापी से नापते हैं तो शून्य-विक्षेप स्थिति में सेल के परिपथ में कोई धारा प्रवाहित नहीं होती; अर्थात् सेल खुले परिपथ पर होती है। अतः इस स्थिति में सेल के वि० वा० बल का वास्तविक मान प्राप्त होता है। इस प्रकार विभवमापी अनन्त प्रतिरोध के आदर्श वोल्टमीटर के समतुल्य है।
  2. वोल्टमीटर द्वारा वि० वा० बल (UPBoardSolutions.com) नापने के लिए वोल्टमीटर में विक्षेप पढ़ना पड़ता है। विक्षेप के पढ़ने में त्रुटि रह सकती है। इसके विपरीत विभवमापी द्वारा वि० वी० बल अविक्षेप (null) विधि से नापा जाता है। इसमें तार पर शून्य-विक्षेप स्थिति को पढ़ना होता है। शून्य-विक्षेप स्थिति में पढ़ने में अधिक-से-अधिक 1 मिमी की त्रुटि हो सकती है, जो नगण्य है।

प्रश्न 8.
एक विभवमापी की संरचना तथा कार्यविधि का वर्णन कीजिए। इसके द्वारा सेल का विद्युत वाहक बल कैसे ज्ञात किया जाता है? (2011)
या
विभवमापी का सिद्धान्त समझाइए। विभवमापी से किसी सेल का आन्तरिक प्रतिरोध ज्ञात करने के लिए परिपथ आरेख खींचिए तथा प्रयुक्त सूत्र को प्राप्त कीजिए। (2013, 15)
या
विभवमापी का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। इसकी सहायता से किसी सेल का आन्तरिक प्रतिरोध कैसे ज्ञात करते हैं? (2015)
उत्तर-
विभवमापी की संरचना- विभवमापी में मुख्यतः एक उच्च विशिष्ट प्रतिरोध व निम्न प्रतिरोध ताप गुणांक की मिश्रधातु (जैसे- कॉन्सटेन्टन, मैंगनिन आदि) का 4 से 12 मीटर तक लम्बा एक समान व्यास का तार होता है। इस तार को एक-एक मीटर के समान्तर टुकड़ों के रूप में चित्र 3.35 की भाँति एक लकड़ी के तख्ते पर बिछा देते हैं। तार के ये सभी टुकड़े ताँबे की मोटी पत्तियों के द्वारा श्रेणीक्रम में ज़ोड़ (UPBoardSolutions.com) दिये जाते हैं। इस सम्पूर्ण तार के प्रारम्भ होने वाले सिरे और अन्तिम सिरे पर क्रमशः संयोजक पेंच A और B लगा देते हैं। तारों की लम्बाई के समान्तर एक मीटर पैमाना M लगा रहता है, जिससे जौकी J की स्थिति पढ़ ली जाती है।
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कार्यविधि अथवा कार्य सिद्धान्त- उपरोक्त दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 7 में पढ़िए।
विभवमापी द्वारा किसी सेल का आन्तरिक प्रतिरोध ज्ञात करना- इसके लिए विभवमापी के तार AB के सिरों के बीच एक संचायक सेल B1 धारा नियन्त्रक Rh व कुंजी K1 चित्र 3.36 के अनुसार जोड़ देते हैं। सेल B1 का धन-ध्रुव तार के सिरे A से जोड़ा जाता है। अब जिस सेल को आन्तरिक प्रतिरोध ज्ञात करना होता है, उसके धन सिरे को बिन्दु A से तथा ऋण सिरे को एक शण्टयुक्त धारामापी G द्वारा जौकी J (UPBoardSolutions.com) से जोड़ देते हैं। इस सेल के समान्तरक्रम में चित्र 3.36 के अनुसार एक प्रतिरोध बॉक्स व कुंजी K2 डाल देते हैं। सर्वप्रथम कुंजी K2 से प्लग को निकालकर सेल E को खुले परिपथ में रखा जाता है। अब कुंजी K1 का प्लग लगाकर सेल E के लिए शून्य विक्षेप स्थिति ज्ञात कर लेते हैं। मान लीजिए कि इस स्थिति में सिरे A से दूरी l1 सेमी है। चूंकि खुले परिपथ पर सेल की प्लेटों के बीच विभवान्तर V इसके विद्युत वाहक ब्रल E के बराबर है, अतः
E = Kl1 …..(1)

जहाँ K तार AB की विभव-प्रवणता है। अब प्रतिरोध बॉक्स में से कोई उचित प्रतिरोध R निकालकर कुंजी K2 को बन्द कर देते हैं। इस दशा में प्रतिरोध R के सिरों के बीच लगने वाले विभवान्तर V के लिए तार AB पर शून्य विक्षेप स्थिति ज्ञात करे लेते हैं। माना इस स्थिति की बिन्दु A से दूरी l2 सेमी है, तब
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इस सूत्र (5) से r के मान का परिकलन किया जा सकता है। l1 व l2 के अनेक प्रेक्षण लेते हैं और प्रत्येक प्रेक्षण से सेल के आन्तरिक प्रतिरोध को परिकलन करके औसत मान ज्ञात कर लेते हैं।

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प्रश्न 9.
विभवमापी की संरचना तथा कार्यविधि का वर्णन कीजिए। इसके द्वारा दो सेलों के वि० वाहक बल की तुलना कैसे की जाती है। परिपथं आरेख बनाकर समझाइए। (2015)
उत्तर-
विभवमापी की संरचना- उपरोक्त दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 8 में पढ़िए।
विभवमापी की कार्यविधि- उपरोक्त दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 7 में पढ़िए।
विभवमापी द्वारा दो सेलों के वि0 वा बल की तुलना- पहले विभवमापी के तार के सिरों A व B के बीच एक संचायक सेल अथवा बैटरी B1, धारी-नियन्त्रक Rh तथा एक (UPBoardSolutions.com) कुंजी K1 जोड़ देते हैं। (चित्र 3.36)। B1 का धन-ध्रुव तार के A सिरे से जोड़ा जाता है। अब जिन दो सेलों E1 व E2 के विद्युत वाहक बलों की तुलना करनी है, उनके धन-ध्रुवों कों A से जोड़ देते हैं तथा ऋण-ध्रुवों को एक द्वि-मार्गी (two-way) कुंजीk, के द्वारा एक शन्टयुक्त धारामापी G से जोड़कर जौकी J से जोड़ देते हैं। पहले कुंजी K1 को लगाकर तार AB के सिरों के बीच विभवन्तर स्थापित करते हैं। अब पहले सेल” E1 को कुंजी K2 के द्वारा परिपथ में डालते हैं और जौकी के द्वारा शून्य-विक्षेप स्थिति ज्ञात कर लेते हैं। मान लो तार पर शून्य-विक्षेप स्थिति की बिन्दु A से दूरी l1 सेमी है। तब
E = Kl1
जहाँ K तार पर विभव-प्रवणता है। इसी प्रकार दूसरे सेल E2 को कुंजी K2 के द्वारा परिपथ में डालकर पुनः शून्य-विक्षेप स्थिति ज्ञात कर लेते हैं। मान लो इस स्थिति की बिन्दु A से दूरी l2 सेमी है।
तब
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 3 Current Electricity LAQ 9
यदि इनमें एक सेल प्रमाणिक सेल हो, जिसका विद्युत वाहक बल ज्ञात होता है तो दूसरी सेल का विद्युत वाहक बल ज्ञात किया जा सकता है। विभवमापी में शून्य-विक्षेप की स्थिति में, सेल E, अथवा E, में कोई धारा नहीं बहती अर्थात् सेल खुले। परिपथ में होती है। अतः विभवमापी से सेल का यथार्थ विद्युत वाहक बल प्राप्त होता है।

प्रश्न 10.
चित्र 3.37 में AB एक 15 ओम प्रतिरोध का 1 मीटर लम्बा, समरूप तार है। शेष आँकडे चित्र में प्रदर्शित हैं। ज्ञात कीजिए-
(i) तार AB में विभव-प्रवणता तथा
(ii) अविक्षेप स्थिति में तार AO की लम्बाई। (2011, 14)
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हल-
(i) चित्र 3.37 में विभवमापी के तार से जुड़े मुख्य परिपथ का कुल प्रतिरोध = 10 Ω + 15 Ω = 25 Ω
तथा परिपथ में जुड़े सेल का वि० वा० बल E = 2 वोल्ट; अतः इस तार में प्रवाहित धारा,
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