UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter (चुम्बकत्व एवं द्रव्य) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter (चुम्बकत्व एवं द्रव्य).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 5
Chapter Name Magnetism and Matter (चुम्बकत्व एवं द्रव्य)
Number of Questions Solved 72
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter (चुम्बकत्व एवं द्रव्य)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भू-चुम्बकत्व सम्बन्धी निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

  1. एक सदिश को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन राशियों की आवश्यकता होती है। उन तीन स्वतन्त्र राशियों के नाम लिखिए जो परम्परागत रूप से पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होती हैं।
  2. दक्षिण भारत में किसी स्थान पर नति कोण का मान लगभग 18° है। ब्रिटेन में आप इससे अधिक नति कोण की अपेक्षा करेंगे या कम की?
  3. यदि आप ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर में (UPBoardSolutions.com) भू-चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं का नक्शा बनाएँ तो ये रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर जाएँगी या इससे बाहर आएँगी?
  4. एक चुम्बकीय सुई जो ऊर्ध्वाधर तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, यदि भू-चुम्बकीय उत्तर या दक्षिण ध्रुव पर रखी हो तो यह किस दिशा में संकेत करेगी?
  5. यह माना जाता है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक चुम्बकीय द्विध्रुव के क्षेत्र जैसा है। जो पृथ्वी के केन्द्र पर रखा है और जिसका द्विध्रुव आघूर्ण 8 x 1022 JT-1 है। कोई ढंग सुझाइए जिससे इस संख्या के परिमाण की कोटि जाँची जा सके।
  6. भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि मुख्य N-S चुम्बकीय ध्रुवों के अतिरिक्त, पृथ्वी की सतह पर कई अन्य स्थानीय ध्रुव भी हैं, जो विभिन्न दिशाओं में विन्यस्त हैं। ऐसा होना कैसे सम्भव है?

उत्तर-

  1. पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होने वाली तीन राशियाँ निम्नलिखित
    • नति कोण अथवा नमन कोण δ (Angle of Dip or Angle of Magnetic Inclination)
    • दिकुपात का कोण θ (Angle of Declination)
    • पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का क्षैतिज अवयव BH (Horizontal Component of Earth’s Magnetic Field)
  2. जी हाँ, चूँकि ब्रिटेन, दक्षिण भारत की तुलना में पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के अधिक समीप है; अतः यहाँ नति कोण अधिक होगा। वास्तव में ब्रिटेन (UPBoardSolutions.com) में नति कोण लगभग 70° है।
  3. ऑस्ट्रेलिया, पृथ्वी के दक्षिण गोलार्द्ध में स्थित है। चूंकि पृथ्वी के दक्षिण ध्रुव से चुम्बकीय-क्षेत्र रेखाएँ बाहर निकलती हैं; अतः ये पृथ्वी से बाहर निकलती प्रतीत होंगी।
  4. चूँकि ध्रुवों पर पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र ऊर्ध्वाधर होता है; अतः ध्रुवों पर लटकी चुम्बकीय सुई (जो ऊर्ध्वाधर तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है) ऊर्ध्वाधर दिशा की ओर इंगित करेगी।
  5. यदि हम मान लें कि पृथ्वी के केन्द्र पर M चुम्बकीय-आघूर्ण का चुम्बकीय द्विध्रुव रखा है तो पृथ्वी के चुम्बकीय निरक्ष पर स्थित बिन्दुओं की इस द्विध्रुव के केन्द्र से दूरी पृथ्वी की त्रिज्या के बराबर होगी।
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    स्पष्ट है कि पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण का यह मान 8 x 1022 JT-1 के अत्यन्त निकट है। इस प्रकार पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण के परिमाण की कोटि की जाँच की जा सकती है।
  6. यद्यपि पृथ्वी का सम्पूर्ण चुम्बकीय-क्षेत्र, एकल चुम्बकीय द्विध्रुव के कारण माना जाता है अपितु स्थानीय स्तर पर चुम्बकित पदार्थों के भण्डार अन्य चुम्बकीय ध्रुवों का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

  1. एक जगह से दूसरी जगह जाने पर पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र बदलता है। क्या यह समय के साथ भी बदलता है? यदि हाँ, तो कितने समय अन्तराल पर इसमें पर्याप्त परिवर्तन होते हैं?
  2. पृथ्वी के क्रोड में लोहा है, यह ज्ञात है। फिर भी भूगर्भशास्त्री इसको पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का स्रोत नहीं मानते। क्यों?
  3. पृथ्वी के क्रोड के बाहरी चालक भाग में प्रवाहित होने वाली आवेश धाराएँ भू-चुम्बकीय क्षेत्र के लिए उत्तरदायी समझी जाती हैं। इन धाराओं को बनाए रखने वाली बैटरी (ऊर्जा स्रोत) क्या हो सकती है?
  4. अपने 4-5 अरब वर्षों के इतिहास में पृथ्वी अपने चुम्बकीय-क्षेत्र की दिशा कई बार उलट चुकी होगी। भूगर्भशास्त्री, इतने सुदूर अतीत के पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र के बारे में कैसे जान पाते हैं?
  5. बहुत अधिक दूरियों पर (30,000 km से अधिक) पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र अपनी द्विध्रुवीय आकृति से काफी भिन्न हो जाता है। कौन-से कारक इस विकृति के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं?
  6. अन्तरातारकीय अन्तरिक्ष में 10-12 T की कोटि का बहुत ही क्षीण चुम्बकीय-क्षेत्र होता है। क्या इस क्षीण चुम्बकीय-क्षेत्र के भी कुछ प्रभावी परिणाम हो सकते हैं। समझाइए। [टिप्पणी : प्रश्न 5.2 का उद्देश्य मुख्यतः आपकी जिज्ञासा जगाना है। उपरोक्त कई प्रश्नों के उत्तर या तो काम चलाऊ हैं या अज्ञात हैं। जितना सम्भव हो सका, प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर पुस्तक के अन्त में दिए गए हैं। विस्तृत उत्तरों के लिए आपको भू-चुम्बकत्व पर कोई अच्छी पाठ्यपुस्तक देखनी होगी।]

उत्तर-

    1. यद्यपि यह सत्य है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ बदलता है, परन्तु चुम्बकीय-क्षेत्र में प्रेक्षण योग्य परिवर्तन के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। इसमें सैकड़ों वर्ष का समय भी लग सकता है।
    2. यह सुज्ञात तथ्य है कि पृथ्वी के क्रोड में पिघला हुआ लोहा है परन्तु इसका ताप लोहे के क्यूरी ताप से कहीं अधिक है। इतने उच्च ताप पर यह (लौह चुम्बकीय नहीं हो सकता) कोई चुम्बकीय-क्षेत्र उत्पन्न नहीं कर सकता।
    3. यह माना जाता है कि पृथ्वी के गर्भ में उपस्थित रेडियोएक्टिव पदार्थों के विघटन से प्राप्त ऊर्जा ही आवेश धाराओं की ऊर्जा का स्रोत है।
    4. प्रारम्भ में पृथ्वी के गर्भ में अनेक पिघली हुई चट्टानें थीं जो समय के साथ धीरे-धीरे ठोस होती चली गईं। इन चट्टानों में मौजूद लौह-चुम्बकीय पदार्थ उस समय के पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र के अनुरूप संरेखित हो गए। इस प्रकार भूतकाल का पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र इन (UPBoardSolutions.com) चट्टानों में चुम्बकत्व एवं द्रव्य 185 चुम्बकीय पदार्थों के अनुरूपण में अभिलेखित है। इन चट्टानों का भूचुम्बकीय अध्ययन उस समय के पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का ज्ञान प्रदान करता है।
    5. पृथ्वी के आयनमण्डल में अनेक आवेशित कण विद्यमान रहते हैं जिनकी गति एक अलग चुम्बकीय-क्षेत्र उत्पन्न करती है। यही चुम्बकीय-क्षेत्र, पृथ्वी तल से अधिक दूरी पर पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र को विकृत कर देता है। आयनों के कारण उत्पन्न चुम्बकीय-क्षेत्र सौर पवन पर निर्भर करता है।
      UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter Q2
      इससे स्पष्ट है कि अत्यन्त क्षीण चुम्बकीय-क्षेत्र में गतिमान आवेशित कण अति विशाल त्रिज्या का मार्ग अपनाती है जो कि थोड़ी दूरी में लगभग सरल रेखीय प्रतीत होता है; अतः छोटी दूरियों के लिए सूक्ष्म चुम्बकीय-क्षेत्र अप्रभावी प्रतीत होते हैं परन्तु बड़ी दूरियों में ये प्रभावी विक्षेपण उत्पन्न करते हैं।

प्रश्न 3.
एक छोटा छड़ चुम्बक जो एकसमान बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र 0.25 T के साथ 30° का कोण बनाता है, पर 4.5 x 10-2 J का बल आघूर्ण लगता है। चुम्बक के चुम्बकीय-आघूर्ण का परिमाण क्या है?
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प्रश्न 4.
चुम्बकीय-आघूर्ण M = 0.32 JT-1 वाला एक छोटा छड़ चुम्बक, 0.15 T के एकसमान बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र में रखा है। यदि यह छड़ क्षेत्र के तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र हो तो क्षेत्र के किस विन्यास में यह
(i) स्थायी सन्तुलन और
(ii) अस्थायी सन्तुलन में होगा? प्रत्येक स्थिति में चुम्बक की स्थितिज ऊर्जा का मान बताइए।
हल-
दिया है, चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण M = 0.32 जूल/टेस्ला
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B = 0.15 टेस्ला
(i) चुम्बकीय क्षेत्र में छड़ चुम्बक के स्थायी सन्तुलन के लिए [latex s=2]\vec { M }[/latex] तथा [latex s=2]\vec { B }[/latex] एक ही दिशा में होने चाहिए,
अर्थात् θ = 0 इस स्थिति में चुम्बक की स्थितिज ऊर्जा
U = [latex s=2]\vec { M }[/latex].[latex s=2]\vec { B }[/latex]
= – MB cos θ
= – 0.32 x 0.15 x cos 0
= – 0.32 x 0.15 x 1
= – 0.048 जूल

(ii) चुम्बकीय क्षेत्र में छड़ चुम्बक के अस्थायी सन्तुलन के लिए [latex s=2]\vec { M }[/latex] तथा [latex s=2]\vec { B }[/latex] परस्पर विपरीत दिशा में होने चाहिए, अर्थात् θ = 180°
U = [latex s=2]\vec { M }[/latex] . [latex s=2]\vec { B }[/latex]
= – MB cos θ
= – MB cos 180
= – 0.32 x 0.15 x (-1)
= +0.048 जूल

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प्रश्न 5.
एक परिनालिका में पास-पास लपेटे गए 800 फेरे हैं तथा इसकी अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 25 x 10-4 m2 है और इसमें 3.0 A धारा प्रवाहित हो रही है। समझाइए कि किस अर्थ में यह परिनालिका एक छड़ चुम्बक की तरह व्यवहार करती है। इसके साथ जुड़ा हुआ चुम्बकीय-आघूर्ण कितना है?
हल-
चुम्बकीय आघूर्ण M = NiA
M = 800 x 3.0 ऐम्पियर x 2.5 x 10-4 मी2
= 0.600 ऐम्पियर-मीटर
चूँकि परिनालिका को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में (UPBoardSolutions.com) लटकाने पर दण्ड-चुम्बक के समान ही इस पर भी एक बल-युग्म कार्य करता है, अत: यह दण्ड-चुम्बक के समान व्यवहार करती है।

प्रश्न 6.
यदि प्रश्न 5 में बताई गई परिनालिका ऊर्ध्वाधर दिशा के परितः घूमने के लिए स्वतन्त्र हो और इस पर क्षैतिज दिशा में एक 0.25 T का एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र लगाया जाए, तो इस परिनालिका पर लगने वाले बल आघूर्ण का परिमाण उस समय क्या होगा, जब इसकी अक्ष आरोपित क्षेत्र की दिशा से 30° का कोण बना रही हो?
हल-
बल-आघूर्ण τ = MB sin θ
τ = (0.600) x (0.25) (sin 30°)
= (0.6 x 0.25 x 0.5) न्यूटन मीटर
= 7.5 x 10-2 न्यूटन-मीटर

प्रश्न 7.
एक छड़ चुम्बक जिसका चुम्बकीय-आघूर्ण 15 JT-1 है, 0.22 T के एक एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र के अनुदिश रखा है।
(a) एक बाह्य बल आघूर्ण कितना कार्य करेगा यदि यह चुम्बक को चुम्बकीय-क्षेत्र के
(i) लम्बवत
(ii) विपरीत दिशा में संरेखित करने के लिए घुमा दे।
(b) स्थिति
(i) एवं
(ii) में चुम्बक पर कितना बल आघूर्ण होता है।
हल-
दिया है, चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण M = 1.5 जूल/टेस्ला
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B = 0.22 टेस्ला
θ1 = 0
(a) (i) चुम्बक को चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् लाने के लिए
θ2 = 90°
अतः कृत कार्य W= MB [cos θ1 – cos θ2]
= 1.5 x 0.22 x [cos 0 – cos 90°]
= 1.5 x 0.22 x [1 – 0]
= 0.33 जूल

(i) चुम्बक को चुम्बकीय क्षेत्र की विपरीत दिशा में लाने के लिए
θ2 = 180°
अतः कृत कार्य W = MB [cos θ1 – cos θ2]
= 1.5 x 0.22 x [cos 0 – cos 180°]
= 1.5 x 0.22 x [1 – (-1)]
= 0.66 जूल

(b) (i) जब θ2 = 90° तब चुम्बक पर बल-आघूर्ण
t = MB sinθ
= 1.5 x 0.22 x sin 90
= 1.5 x 0.22 x 1
= 0.33 न्यूटन-मीटर

(ii) जब θ2 = 180° तब चुम्बक पर बल-आघूर्ण
t = MB sinθ
= 1.5 x 0.22 x sin 180°
= 1.5 x 0.22 x 0
= 0

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प्रश्न 8.
एक परिनालिका जिसमें पास-पास 2000 फेरे लपेटे गए हैं तथा जिसके अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 1.6 x 10-4 m है और जिसमें 4.0 A की धारा प्रवाहित हो रही है, इसके केन्द्र से इस प्रकार लटकाई गई है कि यह एक क्षैतिज तल में घूम सके।
(a) परिनालिका के चुम्बकीय-आघूर्ण का मान क्या है?
(b) परिनालिका पर लगने वाला बल एवं बल आघूर्ण क्या है, यदि इस पर, इसकी अक्ष से 30° का कोण बनाता हुआ 7.5 x 10-2 T का एकसमान क्षैतिज चुम्बकीय-क्षेत्र लगाया जाए?
हल-
यहाँ N = 2000, A = 1.6 x 10-4 m, i = 4.0 A
(a) परिनालिका का चुम्बकीय आघूर्ण, M = NiA = 2000 x 4.0 x 1.6 x 10-4 = 1.28 ऐम्पियर-मीटर
(b) धारावाही परिनालिका (अथवा चुम्बकीय द्विध्रुव) पर एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में नेट बल सदैव शून्य होगा।
परिनालिका पर बल-आघूर्ण, τ = MB sin θ.
यहाँ B = 7.5 x 10-2 T, θ = 30°
τ = 1.28 x 7.5 x 10-2 x sin 30° = 1.28 x 7.5 x 10-2 x 0.5 = 48 x 10-2 न्यूटन-मीटर

प्रश्न 9.
एक वृत्ताकार कुंडली जिसमें 16 फेरे हैं, जिसकी त्रिज्या 10 सेमी है और जिसमें 0.75 A धारा प्रवाहित हो रही है, इस प्रकार रखी है कि इसका तल, 5.0 x 10-2 T परिमाण वाले बाह्य क्षेत्र के लम्बवत है। कुंडली, चुम्बकीय-क्षेत्र के लम्बवत और इसके अपने तल में स्थित एक अक्ष के चारों तरफ घूमने के लिए स्वतन्त्र है। यदि कुंडली को जरा-सा घुमाकर छोड़ दिया जाए तो यह अपनी स्थायी सन्तुलनावस्था के इधर-उधर 2.0 s-1 की आवृत्ति से दोलन करती है। कुंडली का अपने घूर्णन अक्ष के परितः जड़त्व-आघूर्ण क्या है?
हल-
दिया है, कुण्डली की त्रिज्या r = 10 सेमी = 0.1 मीटर
कुण्डली में तार के फेरों की संख्या N = 16
कुण्डली में प्रवाहित धारा I = 0.75 ऐम्पियर
चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B = 5.0 x 10-2 टेस्ला
कुण्डली की दोलन आवृत्ति f = 2.0 प्रति सेकण्ड
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प्रश्न 10.
एक चुम्बकीय सुई चुम्बकीय याम्योत्तर के समान्तर एक ऊध्र्वाधर तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है। इसका उत्तरी ध्रुव क्षैतिज से 22° के कोण पर नीचे की ओर झुका है। इसे स्थान पर चुम्बकीय-क्षेत्र के क्षैतिज अवयव का मान 0.35 G है। इस स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का परिमाण ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter Q10
प्रश्न 11.
दक्षिण अफ्रीका में किसी स्थान पर एक चुम्बकीय सुई भौगोलिक उत्तर से 12° पश्चिम की ओर संकेत करती है। चुम्बकीय याम्योत्तर में संरेखित नति-वृत्त की चुम्बकीय सुई का उत्तरी ध्रुव क्षैतिज से 60° उत्तर की ओर संकेत करता है। पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का क्षैतिज अवयव मापने पर 0.16 G पाया जाता है। इस स्थान पर पृथ्वी के क्षेत्र का परिमाण और दिशा बताइए।
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प्रश्न 12.
किसी छोटे छड़ चुम्बक का चुम्बकीय-आघूर्ण 0.48 JT-1 है। चुम्बक के केन्द्र से 10 cm की दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर इसके चुम्बकीय-क्षेत्र का परिमाण एवं दिशा बताइए यदि यह बिन्दु
(i) चुम्बक के अक्ष पर स्थित हो,
(ii) चुम्बक के अभिलम्ब समद्विभाजक पर स्थित हो।
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प्रश्न 13.
क्षैतिज तल में रखे एक छोटे छड़ चुम्बक का अक्ष, चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण दिशा के अनुदिश है। सन्तुलन बिन्दु चुम्बक के अक्ष पर, इसके केन्द्र से 14 सेमी दूर स्थित है। इस स्थान पर पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र 0.36 G एवं नति कोण शून्य है। चुम्बक के अभिलम्ब समद्विभाजक पर इसके केन्द्र से उतनी ही दूर (14 सेमी) स्थित किसी बिन्दु पर परिणामी चुम्बकीय-क्षेत्र क्या होगा ?
हल-
दिया है, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र B = 0.36 गौस = 0.36 x 10-4 टेस्ला
θ = 0
चुम्बक की अक्ष पर उदासीन बिन्दु की दूरी r = 14 सेमी = 0.14 मीटर
यदि अक्षीय बिन्दु पर चुम्बक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता B1 हो, तो
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter Q13.1
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प्रश्न 14.
यदि प्रश्न 13 में वर्णित चुम्बक को 180° से घुमा दिया जाए तो सन्तुलन बिन्दुओं की नई स्थिति क्या होगी?
हल-
चुम्बक को 180° घुमाने पर चुम्बक का उत्तरी ध्रुव भौगोलिक उत्तर की ओर हो जाएगा, अत: अब उदासीन बिन्दु चुम्बक की विषुवत् रेखा पर प्राप्त होगा।
यदि उदासीन बिन्दु की चुम्बके से दूरी r हो, तो
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प्रश्न 15.
एक छोटा छड़ चुम्बक जिसका चुम्बकीय-आघूर्ण 5.25 x 10-2 JT-1 है, इस प्रकार रखा है कि इसका अक्ष पृथ्वी के क्षेत्र की दिशा के लम्बवत है। चुम्बक के केन्द्र से कितनी दूरी पर, परिणामी क्षेत्र पृथ्वी के क्षेत्र की दिशा से 45° का कोण बनाएगा, यदि हम
(a) अभिलम्ब समद्विभाजक पर देखें,
(b) अक्ष पर देखें। इस स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का परिमाण 0.42 G है। प्रयुक्त दूरियों की तुलना में चुम्बक की लम्बाई की उपेक्षा कर सकते हैं।
हल-
दिया है,
m = 5.25 x 10-2 JT-1, Be = 0.42 G = 0.42 x 10-4 T
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 5 Magnetism and Matter Q15
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 16.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

  1. ठण्डा करने पर किसी अनुचुम्बकीय पदार्थ का नमूना अधिक चुम्बकन क्यों प्रदर्शित करता हैं? (एक ही चुम्बककारी क्षेत्र के लिए)
  2. अनुचुम्बकत्व के विपरीत, प्रतिचुम्बकत्व पर ताप का प्रभाव लगभग नहीं होता। क्यों ?
  3. यदि एक टोरॉइड में बिस्मथ का क्रोड लगाया जाए तो इसके अन्दर चुम्बकीय-क्षेत्र उस स्थिति की तुलना में (किंचित) कम होगा या (किंचित) ज्यादा होगा, जबकि क्रोड खाली हो?
  4. क्या किसी लौह चुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकशीलता चुम्बकीय-क्षेत्र पर निर्भर करती है? यदि हाँ, तो उच्च चुम्बकीय-क्षेत्रों के लिए इसका मान कम होगा या अधिक?
  5. किसी लौह चुम्बक की सतह के प्रत्येक बिन्द पर चुम्बकीय-क्षेत्र रेखाएँ सदैव लम्बवत होती हैं (यह तथ्य उन स्थिरविद्युत क्षेत्र रेखाओं के सदृश है जो कि चालक की सतह के प्रत्येक बिन्दु पर लम्बवत होती हैं। क्यों?
  6. क्या किसी अनुचुम्बकीय नमूने का अधिकतम सम्भव चुम्बकन, लौह चुम्बक के चुम्बकन के परिमाण की कोटि का होगा?

उत्तर-

  1. ताप के घटने पर पदार्थ के परमाण्वीय चुम्बकों का ऊष्मीय विक्षोभ कम हो जाता है जिसके कारण इन चुम्बकों के बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र की दिशा में संरेखित होने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
  2. प्रतिचुम्बकीय पदार्थ के परमाणु ऊष्मीय विक्षोभ के कारण, भले ही किसी भी स्थिति में हों, उनमें बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र के कारण, प्रेरित चुम्बकीय आघूर्ण सदैव ही बाह्य क्षेत्र के विपरीत दिशा में प्रेरित होता है। इस प्रकार प्रतिचुम्बकत्व पर ताप का कोई प्रभाव नहीं होता।
  3. चूँकि बिस्मथ एक प्रतिचुम्बकीय पदार्थ है; अतः चुम्बकीय-क्षेत्र अपेक्षाकृत कुछ कम हो जाएगा।
  4. लौह चुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकशीलता बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र पर निर्भर करती है तथा तीव्र चुम्बकीय-क्षेत्र के लिए इसका मान कम होता है।
  5. जब दो माध्यम किसी स्थान (UPBoardSolutions.com) पर मिलते हैं जिनमें से एक के लिए µ >> 1 हो तो इनके सीमा पृष्ठ पर क्षेत्र रेखाएँ लम्बवत् हो जाती हैं।
  6. हाँ, किसी अनुचुम्बकीय पदार्थ का अधिकतम सम्भव चुम्बकत्व, लौह चुम्बकीय पदार्थ के चुम्बकन के परिमाण की कोटि को हो सकता है। परन्तु किसी अनुचुम्बकीय पदार्थ को इस कोटि तक चुम्बकित करने के लिए अति उच्च चुम्बकीय-क्षेत्र की आवश्यकता होती है जिसे प्राप्त करना व्यवहार में सम्भव नहीं है।

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प्रश्न 17.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

  1. लौह चुम्बकीय पदार्थ के चुम्बकन वक्र की अनुत्क्रमणीयता, डोमेनों के आधार पर गुणात्मक दृष्टिकोण से समझाइए।
  2. नर्म लोहे के एक टुकड़े के शैथिल्य लूप का क्षेत्रफल, कार्बन-स्टील के टुकड़े के शैथिल्य लूप के क्षेत्रफल से कम होता है। यदि पदार्थ को बार-बार चुम्बकन चक्र से गुजारा जाए तो कौन-सा टुकड़ा अधिक ऊष्मा ऊर्जा का क्षय करेगा?
  3. लौह चुम्बक जैसा शैथिल्य लूप प्रदर्शित करने वाली कोई प्रणाली स्मृति संग्रहण की युक्ति है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
  4. कैसेट के चुम्बकीय फीतों पर परत चढ़ाने के लिए या आधुनिक कम्प्यूटर में स्मृति संग्रहण के लिए, किस तरह के लौह चुम्बकीय पदार्थों का इस्तेमाल होता है?
  5. किसी स्थान को चुम्बकीय-क्षेत्र से परिरक्षित करना है। कोई विधि सुझाइए।

उत्तर-

  1. जब बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र को शून्य कर दिया जाता है तो भी लौह चुम्बकीय पदार्थ के डोमेन अपनी प्रारम्भिक स्थिति में नहीं लौट पाते अपितु उनमें कुछ चुम्बकन शेष रह जाता है। यही कारण है कि लौह चुम्बकीय पदार्थों का चुम्बकन वक्र अनुत्क्रमणीय होता है।
  2. किसी पदार्थ के शैथिल्य लूप का क्षेत्रफल एक पूर्ण चुम्बकन चक्र में होने वाली ऊर्जा हानि को प्रदर्शित करता है। यह ऊर्जा हानि ही पदार्थ में ऊष्मा के रूप में उत्पन्न होती है। चूंकि कार्बन-स्टील के शैथिल्य लूप को क्षेत्रफल अधिक है; अतः इसमें अधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी अर्थात् कार्बन-स्टील का टुकड़ा अधिक ऊष्मा क्षय करेगा।
  3. किसी लौह-चुम्बकीय पदार्थ का (UPBoardSolutions.com) चुम्बकन उस पर लगाए गए बाह्य चुम्बकीय-क्षेत्र के चक्रों की संख्या पर निर्भर करता है। इस प्रकार किसी लौह चुम्बकीय पदार्थ का चुम्बकन उस पर लगाए गए चुम्बकन चक्र की सूचना दे सकता है। इस प्रकार चुम्बकन चक्र की स्मृति, चुम्बकित पदार्थ के नमूने में एकत्र हो जाती है।
  4. इस कार्य के लिए सिरेमिक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।
  5. किसी स्थान को चुम्बकीय-क्षेत्र से परिरक्षित करने के लिए उस स्थान को नर्म लोहे के रिंग से घेर देना चाहिए। इससे चुम्बकीय-क्षेत्र रेखाएँ, नर्म लोहे के रिंग से होकर गुजर जाती हैं तथा रिंग के भीतर प्रवेश नहीं कर पातीं।

प्रश्न 18.
एक लम्बे, सीधे, क्षैतिज केबल में 2.5 A धारा, 10° दक्षिण-पश्चिम से 10° उत्तर-पूर्व की ओर प्रवाहित हो रही है। इस स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर भौगोलिक याम्योत्तर के 10° पश्चिम में है। यहाँ पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र 0.33 G एवं नति कोण शून्य है। उदासीन बिन्दुओं की रेखा निर्धारित कीजिए। (केबल की मोटाई की उपेक्षा कर सकते हैं।) (उदासीन बिन्दुओं पर, धारावाही केबल द्वारा चुम्बकीय-क्षेत्र, पृथ्वी के क्षैतिज घटक के चुम्बकीय-क्षेत्र के समान एवं विपरीत दिशा में होता है।)
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प्रश्न 19.
किसी स्थान पर एक टेलीफोन केबल में चार लम्बे, सीधे, क्षैतिज तार हैं जिनमें से प्रत्येक में 1.0 A की धारा पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित हो रही है। इस स्थान पर पृथ्वी का चुम्बकीय-क्षेत्र 0.39 G एवं नति कोण 35° है। दिक्पात कोण लगभग शून्य है। केबल के 4.0 cm नीचे और 4.0 cm ऊपर परिणामी चुम्बकीय-क्षेत्रों के मान क्या होंगे?
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प्रश्न 20.
एक चुम्बकीय सुई जो क्षैतिज तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, 30 फेरों एवं 12 cm त्रिज्या वाली एक कुंडली के केन्द्र पर रखी है। कुंडली एक ऊर्ध्वाधर तल में है और चुम्बकीय याम्योत्तर से 45° का कोण बनाती है। जब कुंडली में 0.35 A धारा प्रवाहित होती है, चुम्बकीय सुई पश्चिम से पूर्व की ओर संकेत करती है।
(a) इस स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र के दौतिज अवयव का मान ज्ञात कीजिए।
(b) कुंडली में धारा की दिशा उलट दी जाती है और इसको अपनी ऊध्र्वाधर अक्ष पर वामावर्त दिशा में (ऊपर से देखने पर) 90° के कोण पर घुमा दिया जाता है। चुम्बकीय सुई किस दिशा में ठहरेगी? इस स्थान पर चुम्बकीय दिक्पात शून्य लीजिए।
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(b) चित्र (b) से स्पष्ट है कि इस बार नेट चुम्बकीय-क्षेत्र पूर्व से पश्चिम की ओर होगा; अत: चुम्बकीय सुई पूर्व से पश्चिम की ओर संकेत करेगी।

प्रश्न 21.
एक चुम्बकीय द्विध्रुव दो चुम्बकीय-क्षेत्रों के प्रभाव में है। ये क्षेत्र एक-दूसरे से 60° का कोण बनाते हैं और उनमें से एक क्षेत्र का परिमाण 12 x 10-2 T है। यदि द्विध्रुव स्थायी सन्तुलन में इस क्षेत्र से 15° का कोण बनाए, तो दूसरे क्षेत्र का परिमाण क्या होगा ?
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प्रश्न 22.
एक समोर्जी 18 keV वाले इलेक्ट्रॉनों के किरण पुंज पर जो शुरू में क्षैतिज दिशा में गतिमान है, 0.04 G का एक क्षैतिज चुम्बकीय-क्षेत्र, जो किरण पुंज की प्रारम्भिक दिशा के लम्बवत है, लगाया गया है। आकलन कीजिए 30 सेमी की क्षैतिज दूरी चलने में किरण पुंज कितनी दूरी ऊपर या नीचे विस्थापित होगा ? (me = 911 x 10-31 kg, e = 160 x 10-19 C)।
[नोट: इस प्रश्न में आँकड़े इस प्रकार चुने गए हैं कि उत्तर से आपको यह अनुमान हो कि TV सेट में इलेक्ट्रॉन गन से पर्दे तक इलेक्ट्रॉन किरण पुंज की गति भू-चुम्बकीय-क्षेत्र से किस प्रकार प्रभावित होती है।]
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प्रश्न 23.
अनुचुम्बकीय लवण के एक नमूने में 2.0 x 1024 परमाणु द्विध्रुव हैं जिनमें से प्रत्येक का द्विध्रुव आघूर्ण 1.5 x 10-23 JT-1 है। इस नमूने को 0.64 T के एक एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र में रखा गया है और 4.2 K ताप तक ठण्डा किया गया। इसमें 15% चुम्बकीय संतृप्तता आ गई। यदि इस नमूने को 0.98 T के चुम्बकीय-क्षेत्र में 2.8 K ताप पर रखा हो तो इसका कुल द्विध्रुव आघूर्ण कितना होगा? (यह मान सकते हैं कि क्यूरी नियम लागू होता है।)
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प्रश्न 24.
एक रोलैंड रिंग की औसत त्रिज्या 15 सेमी है और इसमें 800 आपेक्षिक चुम्बकशीलता के लौह चुम्बकीय क्रोड पर 3500 फेरे लिपटे हुए हैं। 1.2 A की चुम्बककारी धारा के कारण इसके क्रोड में कितना चुम्बकीय-क्षेत्र ([latex s=2]\vec { B }[/latex]) होगा ?
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण का मात्रक है- (2011, 12)
(i) न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर
(ii) ऐम्पियर-मीटर
(iii) वेबर/मीटर2
(iv) हेनरी
उत्तर-
(ii) ऐम्पियर-मीटर

प्रश्न 2.
एक वृत्तीय धारा लूप का चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण M है। यदि धारा लूप की त्रिज्या आधी कर दी जाए तब चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण होगा (2014)
(i) M
(ii) [latex s=2]\frac { M }{ 2 }[/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { M }{ 4 }[/latex]
(iv) 4M
उत्तर-
(i) [latex s=2]\frac { M }{ 2 }[/latex]

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प्रश्न 3.
l मीटर लम्बाई के एक चालक तार को वृत्ताकार लूप में मोड़ा जाता है तथा ऐम्पियर की धारा प्रवाहित की जाती है। लूप का चुम्बकीय आघूर्ण होगा- (2010, 11)
(i) il²/4π
(ii) il²/2π
(iii) πil²
(iv) il
उत्तर-
(i) il²/4π

प्रश्न 4.
पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवों पर नति(नमन) कोण का मान है- (2012, 18)
(i) 45°
(ii) 30°
(iii) शून्य
(iv) 90°
उत्तर-
(iv) 90°

प्रश्न 5.
चुम्बकीय याम्योत्तर तथा भौगोलिक याम्योत्तर के बीच के कोण को कहते हैं- (2013)
(i) नति कोण
(ii) दिक्पात कोण
(iii) ध्रुवण कोण
(iv) क्रान्तिक कोण
उत्तर-
(ii) दिक्पात कोण

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प्रश्न 6.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर घटक बराबर हैं। उस स्थान पर नति कोण का मान होगा- (2009, 11, 12, 17)
(i) 0°
(ii) 45°
(iii) 60°
(iv) 90°
उत्तर-
(ii) 45°
[संकेत- tan θ = V/H = H/H = 1 = tan 45° ⇒ θ = 45°]

प्रश्न 7.
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक शून्य होता है- (2010)
(i) चुम्बकीय ध्रुवों पर
(ii) भौगोलिक ध्रुवों पर
(iii) प्रत्येक स्थान पर
(iv) चुम्बकीय निरक्ष पर
उत्तर-
(i) चुम्बकीय ध्रुवों पर

प्रश्न 8.
पृथ्वी तल के किसी निश्चित स्थान पर, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर घटक, क्षैतिज घटक का √3 गुना है। इस स्थान पर नति कोण है- (2015)
(i) 0°
(ii) 30°
(iii) 45°
(iv) 60°
उत्तर-
(iv) 60°

प्रश्न 9.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकत्व का क्षैतिज घटक H = 0.3 x 10-4 वेबर/मी2 तथा नमन कोण 30° है। सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र का मान होगा| (2017)
(i) 0.46 x 10-4 वेबर/मी2
(ii) 0.26 x 10-4 वेबर/मी2
(iii) 4.6 x 10-6 वेबर/मी2
(iv) 3.4 x 10-5 वेबर/मी2
उत्तर-
(iv) 3.4 x 10-5 वेबर/मी2

प्रश्न 10.
चुम्बकीय क्षेत्र B के लम्बवत् v वेग से चलने वाले आवेश q पर लगने वाले बल F का मान है-
(i) F = qvB
(ii) F = [latex s=2]\frac { qv }{ B }[/latex]
(iii) F = [latex s=2]\frac { qB }{ v }[/latex]
(iv) F = [latex s=2]\frac { Bv }{ q }[/latex]
उत्तर-
(i) F = qvB

प्रश्न 11.
चुम्बकीय प्रवृत्ति का मान कम परन्तु धनात्मक होता है- (2012)
(i) अनुचुम्बकीय पदार्थों के लिए।
(ii) लौहचुम्बकीय पदार्थों के लिए
(iii) प्रतिचुम्बकीय पदार्थों के लिए
(iv) उपरोक्त सभी पदार्थों के लिए
उत्तर-
(i) अनुचुम्बकीय पदार्थों के लिए

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प्रश्न 12.
अनुचुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकशीलता का मान होता है- (2012)
(i) 0
(ii) > 1
(iii) < 1
(iv) 1
उत्तर-
(ii) > 1

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अनुदैर्ध्य स्थिति में किसी छोटे चुम्बक के कारण चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (चुम्बकीय बल क्षेत्र) को सूत्र लिखिए। प्रयुक्त संकेतों का अर्थ भी लिखिए। यो चुम्बकीय द्विध्रुव के कारण अक्षीय स्थिति में किसी बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक लिखिए। (2013)
उत्तर-
अनुदैर्ध्य स्थिति (End-on Position)- M चुम्बकीय बल- आघूर्ण के किसी छोटे दण्ड चुम्बक की अक्षीय रेखा पर इसके मध्य बिन्दु O से r दूरी पर निर्वात् अथवा (UPBoardSolutions.com) वायु में बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र [latex s=2]\vec { B }[/latex] का परिमाण
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जहाँ, µ0 निर्वात् की चुम्बकशीलता = 4π x 10-7 न्यूटन/ऐम्पियर2 है। चुम्बकीय क्षेत्र B की दिशा अक्ष के समान्तर दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती है।

प्रश्न 2.
परमाणु में परिक्रमण करने वाले इलेक्ट्रॉन के लिए चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण का सूत्र लिखिए। प्रयुक्त संकेतों के अर्थ बताइए। (2016)
उत्तर-
M = NiA
जहाँ, N = फेरों की संख्या, i = कक्षा के किसी बिन्दु से 1 सेकण्ड में गुजरने वाला आवेश तथा A = लूप के परिच्छेद का क्षेत्रफल

प्रश्न 3.
एक चुम्बक के अक्षीय स्थिति में 10 सेमी दूरी पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता 2.0 x 10-4 टेस्ला है। चुम्बक का चुम्बकीय आघूर्ण तथा उसके निरक्षीय स्थिति में 20 सेमी की दूरी पर चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता की गणना कीजिए। (2015)
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प्रश्न 4.
3.5 सेमी त्रिज्या की वृत्ताकार कुण्डली में 10.0 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। इसका चुम्बकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए। (2013)
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प्रश्न 5.
चुम्बकीय याम्योत्तर की परिभाषा लिखिए। (2012,14)
उत्तर-
किसी स्थान पर अपने गुरुत्व केन्द्र से स्वतन्त्रतापूर्वक लटकायी गयी चुम्बक के चुम्बकीय अक्ष से गुजरने वाले ऊर्ध्वाधर तल को चुम्बकीय याम्योत्तर कहते हैं।

प्रश्न 6.
नति कोण से आप क्या समझते हैं? (2016)
उत्तर-
नति कोण वह कोण है, जो चुम्बकीय याम्योत्तर में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र Be की दिशा तथा क्षैतिज दिशा के बीच बनता है।

प्रश्न 7.
दिक्पात कोण से क्या तात्पर्य है? (2017)
उत्तर-
पृथ्वी की सतह पर किसी स्थान पर भौगोलिक याग्योत्तर तथा चुम्बकीय याम्योत्तर के बीच बने न्यूनकोण को उस स्थान के लिए दिक्पात कोण कहते हैं। इसे ‘α’ से प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव पर नमन कोण का मान क्या होता है?
उत्तर-
नति कोण को अधिकतम मान 90° है जो पृथ्वी के उत्तरी व दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुवों पर होता है।

प्रश्न 9.
किन दो स्थानों पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक शून्य होता है ? (2012)
उत्तर-
पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव पर। चूँकि इन स्थानों पर नति कोण θ = 90°
अतः H = Be cos θ = Be cos 90° = Be x 0 = 0

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प्रश्न 10.
किसी स्थान पर नति कोण, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक तथा ऊर्ध्व घटक के बीच सम्बन्ध लिखिए। (2010, 12)
या
भू-चुम्बकत्व के अवयवों का आपस में सम्बन्ध लिखिए। (2017)
उत्तर-
tan θ = V/H (जहाँ θ = नति कोण, V = Be sin θ (ऊर्ध्व घटक), H = Be cos θ (क्षैतिज घटक) जहाँ, Be = पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र]

प्रश्न 11.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर घटक प्रत्येक 0.5 गौस के बराबर हैं। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की सम्पूर्ण तीव्रता का मान ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 12.
एक स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर घटक 0.2√3 x 10-4 टेस्ला है। यदि उस स्थान पर नति कोण 30° हो तो चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक के मान की गणना कीजिए। (2014)

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प्रश्न 13.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक का मान ऊर्ध्व घटक के मान का √3 गुना है। उस स्थान पर नमन कोण का मान क्या होगा ? (2011, 14)
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प्रश्न 14.
एक स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक 0.3 गौस तथा नति कोण 60° है। उस स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की सम्पूर्ण तीव्रता ज्ञात कीजिए। (2013, 16)
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प्रश्न 15.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर घटक प्रत्येक 0.35 गौस के बराबर हैं। उस स्थान पर नमन कोण का मान ज्ञात कीजिए। (2015, 16)
हल-
tan θ = [latex s=2]\frac { V }{ H }[/latex] = 1 [V = H = 0.35]
नति कोण θ = 45°

प्रश्न 16.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर घटक समान हैं। उस स्थान पर नमन कोण का मान ज्ञात कीजिए। (2015, 16)
हल-
tan θ = [latex s=2]\frac { V }{ H }[/latex] = [latex s=2]\frac { H }{ H }[/latex] = 1 [∵ V = H]
tan θ = tan 45° ⇒ θ = 45°
अतः नमन कोण 45° होगा।

प्रश्न 17.
यदि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षैतिज घटक H तथा नमन कोण θ है, तो सम्पूर्ण क्षेत्र की तीव्रता कितनी होगी? (2016)
उत्तर-
दिया है, पृथ्वी का चुम्बकीय घटक H तथा नमन कोण θ है,
H = Be cos θ
सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता Be = H/cos θ

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प्रश्न 18.
यदि पृथ्वी के किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के ऊर्ध्वाधर घटक का मान क्षैतिज घटक के मान का √3 गुना हो तो उस स्थान पर नति कोण का मान क्या होगा? (2017)
हल-
माना उर्ध्वघटक V = B sin θ
क्षैतिज घटक H = B cos θ
V = H tan θ प्रश्नानुसार, V√3 = H
अतः V = V√3 tan θ
tan θ = [latex s=2]\frac { 1 }{ \surd 3 }[/latex] = tan 30°
θ = 30°
अतः नति कोण θ = 30°

प्रश्न 19.
किन्हीं दो प्रतिचुम्बकत्व वाले पदार्थों के नाम लिखिए। (2011)
उत्तर-
बिस्मथ तथा ऐण्टीमनी।

प्रश्न 20.
एक अनुचुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय सुग्राहिता (ψ) का मान 10-4 है। पदार्थ के सापेक्ष चुम्बकशीलता (µr) का मान ज्ञात कीजिए। (2014)
हल-
µr = 1 + ψ = 1 + 10-4 = 1 + 0.0001 = 1.0001

प्रश्न 21.
निम्नलिखित पदार्थों में से प्रतिचुम्बकीय तथा अनुचुम्बकीय पदार्थों को चुनिए-ताँबा, सोडियम, प्लैटिनम तथा चाँदी। (2017)
उत्तर-
प्रतिचुम्बकीय – ताँबा, चाँदी
अनुचुम्बकीय – सोडियम, प्लैटिनम

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प्रश्न 22.
प्रति तथा अनुचुम्बकीय पदार्थों में मुख्य अन्तर लिखिए। (2017, 18)
उत्तर-
ऐसे पदार्थ जो तीव्र प्रबलता के चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर क्षेत्र की विपरीत दिशा में आंशिक रूप से चुम्बकित होते हैं, प्रति चुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। जैसे—सोना, चाँदी, हीरा, नमक, जल, वायु आदि। ऐसे पदार्थ जो प्रबल तीव्रता के चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की दिशा में आंशिक रूप (UPBoardSolutions.com) से चुम्बकित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। जैसे-ऐलुमिनियम, प्लैटिनम, सोडियम, कॉपर क्लोराइड, ऑक्सीजन आदि।

प्रश्न 23.
किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर प्रतिचुम्बकीय पदार्थों का व्यवहार अनुचुम्बकीय पदार्थों से किस प्रकार भिन्न होता है? (2017)
उत्तर-
प्रतिचुम्बकीय पदार्थों की छड़ों को शक्तिशाली चुम्बक के ध्रुवों के बीच स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाने पर इनकी अक्ष (लम्बाई) चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत् दिशा में हो जाती है। जबकि अनुचुम्बकीय पदार्थों की छड़ों को शक्तिशाली चुम्बक के ध्रुवों के बीच स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाने पर इनकी अक्ष (लम्बाई) चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में हो जाती है।

प्रश्न 24.
विद्युत चुम्बक किसी स्थायी चुम्बक से किस प्रकार भिन्न होता है? (2017)
उत्तर-
वैद्युत चुम्बक बनाने के लिए नर्म लोहे की एक सीधी छड़ अथवा घोड़े की नाल के आकार की छड़ पर किसी चालक पदार्थ के वैद्युतरोधी तार लपेटकर तार में धारा प्रवाहित की जाती है। धारा प्रवाहित करने पर परिनालिका के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित हो जाता है तथा छड़ के अन्दर उपस्थित (UPBoardSolutions.com) डोमेनों के घूर्णन द्वारा वह पूर्णत: चुम्बकित हो जाती है। वैद्युत चुम्बकों का उपयोग वैद्युत घण्टी, ट्रांसफॉर्मर, वैद्युतमोटर, डायनमो आदि में किया जाता है जबकि स्थायी चुम्बक बनाने के लिए स्टील का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि स्टील की धारणशीलता नर्म लोहे से कम होती है परन्तु इसकी निग्राहिता नर्म लोहे की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। स्टील का एक बार चुम्बकन हो जाने पर सरलता से विचुम्बकन नहीं होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चुम्बकीय द्विध्रुव-आघूर्ण की परिभाषा लिखिए। चुम्बकीय द्विध्रुव-आघूर्ण सदिश राशि है। अथवा अदिश राशि? इसका मात्रक भी लिखिए। (2010, 17)
या
चुम्बकीय आघूर्ण की परिभाषा एवं मात्रक लिखिए। (2012, 18)
या
चुम्बकीय द्विध्रुव-आघूर्ण का सूत्र तथा इसका S.I. मात्रक लिखिए। (2014)
या
चुम्बकीय द्विध्रुव-आघूर्ण की परिभाषा लिखिए। समांग चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित चुम्बकीय द्विध्रुव पर लगने वाले बल के आघूर्ण का सूत्र प्राप्त कीजिए। (2015)
उत्तर-
माना चुम्बकीय द्विध्रुव एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र की दिशा से θ कोण बनाते हुए रखा गया है। अत: द्विध्रुव पर लगने वाले बल-युग्म का आघूर्ण,
τ = MB sin θ.
यदि θ = 90° तो sin θ = 1, तब चुम्बकीय द्विध्रुव पर लगने वाला बल-आघूर्ण अधिकतम होगा, अर्थात्
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अत: किसी चुम्बकीय द्विधुव( अथवा धारा लूप) का चुम्बकीय आघूर्ण वह बल-आघूर्ण है जो इस द्विध्रुव को एकसमान एकांक चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् रखने पर द्विध्रुव पर लगता है। (UPBoardSolutions.com)
चुम्बकीय द्विध्रुव-आधूर्ण एक सदिश राशि है तथा इसकी दिशा द्विध्रुव के अक्ष के अनुदिश होती है। धारा लूप में चुम्बकीय-आघूर्ण की दिशा दायें हाथ के नियम द्वारा ज्ञात की जाती है। इस नियम के अनुसार, यदि हम अपने दायें हाथ के पंजे को पूरा फैलाकर अँगुलियों को लूप के चारों ओर धारा की दिशा में मोड़े तो अँगूठा चुम्बकीय-आघूर्ण की दिशा की ओर होगा।
मात्रक एवं विमाएँ
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प्रश्न 2.
एक परमाणु के नाभिक के परितः एक इलेक्ट्रॉन 0.5 Å त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर 5.0 x 1015 चक्कर/से की आवृत्ति से घूम रहा है। परमाणु का चुम्बकीय-आघूर्ण ज्ञात कीजिए। (2012, 18)
हल-
कक्षा में चक्कर काटता इलेक्ट्रॉन एक धारा-लूप के तुल्य है, जिसमें धारा का मान।
i = कक्षा के किसी बिन्दु से 1 सेकण्ड में गुजरने वाला आवेश
= इलेक्ट्रॉन-आवेण x 1 सेकण्ड में चक्करों की संख्या
= (1.6 x 10-19 कूलॉम) x (5.0 x 1015 सेकण्ड-1)
= 8 x 10-4 ऐम्पियर
तुल्य धारा-लूप का चुम्बकीय आघूर्ण M = Ni A
जहाँ, N फेरों की संख्या है तथा A लूप का परिच्छेद-क्षेत्रफल है। यहाँ N = 1; i = 8 x 10-4 ऐम्पियर
तथा A = πr² = π (0.5 x 10-10 मीटर)2
M = 1 x (8 x 10-4) x 3.14 x (0.5 x 10-10)2 = 6.28 x 10-24 ऐम्पियर-मीटर

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प्रश्न 3.
100 फेरों वाली तथा 15 सेमी x 10 सेमी क्षेत्रफल की एक कुण्डली B = 1.0 वेबर/मी2 के चुम्बकीय क्षेत्र में रखी गई है। कुण्डली में धारा 0.2 ऐम्पियर है तथा कुण्डली का तलं चुम्बकीय क्षेत्र के समान्तर है। कुण्डली पर लगते हुए बल आघूर्ण की गणना कीजिए। (2010)
हल-
τ = NiAB sinθ = 100 x 0.2 (15 x 10 x 10-4) x 1.0 sin 90° = 0.3 न्यूटन-मीटर।

प्रश्न 4.
एक लम्बे सीधे तार में 5 ऐम्पियर की वैद्युत धारा प्रवाहित होती है। एक इलेक्ट्रॉन तार से 10 सेमी दूरी पर हवा में 1 x 106 मी/सेकण्ड से धारा की दिशा के समान्तर गति कर रहा है। इलेक्ट्रॉन पर बल की गणना कीजिए। (2016)
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प्रश्न 5.
एक हाईड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन 0.53 Å त्रिज्या की एक कक्षा में 2.3 x 106 मी/सेकण्ड के वेग से घूम रहा है। परिक्रमण करने वाले इलेक्ट्रॉन के चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए। (2016)
हल-
दिया है, इलेक्ट्रॉन की त्रिज्या r = 0.53 Å = 0.53 x 10-10 मीटर = 5.3 x 10-11 मीटर
तथा वेग, v = 2.3 x 106 मीटर/सेकण्ड
परिक्रमण करने वाले इलेक्ट्रॉन का चुम्बकीय आघूर्ण,
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प्रश्न 6.
एक परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर 6.6 x 104 मी/से के वेग से 0.7 A त्रिज्या की कक्षा में घूम रहा है। इसके तुल्य वैद्युत धारा तथा इसके तुल्य चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए। (2014)
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प्रश्न 7.
किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज व ऊर्ध्व घटक बराबर हैं। यदि क्षैतिज घटक का मान 0.3 x 10-4 वेबर/मीटर2 हो तब उस स्थान पर सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता कितनी होगी ? (2012)
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प्रश्न 8.
चुम्बकत्व के परमाणवीय मॉडल की व्याख्या कीजिए। (2010, 18)
उत्तर-
चुम्बकत्व का परमाणवीय मॉडल- प्रत्येक पदार्थ असंख्य परमाणुओं से मिलकर बना है। प्रत्येक परमाणु के केन्द्र पर एक धनावेशित नाभिक होता है जिसके चारों ओर विभिन्न कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं। ये इलेक्ट्रॉन कक्षीय परिक्रमण के अतिरिक्त अपनी धुरी पर भी घूमते रहते हैं। इसे (UPBoardSolutions.com) ‘चक्रण (spin) कहते हैं। चूंकि प्रत्येक इलेक्ट्रॉन आवेशित होता है; अतः कक्षीय अथवा चक्रण गति करता हुआ इलेक्ट्रॉन एक धारावाही लूप या चुम्बकीय द्विध्रुव की भाँति व्यवहार करता है। इसी कारण परमाणु में चुम्बकीय आघूर्ण उत्पन्न होता है। परमाणु में चुम्बकीय आघूर्ण का अधिकांश भाग (90%) इलेक्ट्रॉनों के ‘चक्रण के कारण होता है; कक्षीय परिक्रमण के कारण आघूर्ण बहुत कम (10%) होता है।
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प्रश्न 9.
चुम्बकशीलता, चुम्बकीय प्रवृत्ति तथा आपेक्षिक चुम्बकशीलता से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के चुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति ताप पर निर्भर नहीं करती है? (2013)
उत्तर-
चुम्बकशीलता µ (Magnetic Permeability)- जब किसी चुम्बकीय पदार्थ को किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखते हैं तो वह पदार्थ चुम्बकित हो जाता है तथा उस पदार्थ में से, वायु के सापेक्ष, अधिक बल-रेखाएँ गुजरती हैं। इससे स्पष्ट है कि बल-रेखाएँ वायु की अपेक्षा चुम्बकीय पदार्थ में से अधिक (UPBoardSolutions.com) सुगमता से गुजरती हैं। इसे हम इस प्रकार भी व्यक्त कर सकते हैं कि वायु की अपेक्षा लोहे में अधिक ‘चुम्बकशीलता’ है। किसी चुम्बकीय पदार्थ में उत्पन्न चुम्बकीय प्रेरण [latex s=2]\vec { B }[/latex] तथा [latex s=2]\vec { H }[/latex] चुम्बकीय क्षेत्र में के अनुपात को पदार्थ की चुम्बकशीलता कहते हैं, अर्थात्।
µ = [latex s=2]\frac { \vec { B } }{ \vec { H } }[/latex]
संख्यात्मक रूप से µ = B/H
इसका S.I. मात्रक वेबर/(ऐम्पियर-मीटर) अथवा न्यूटन/ऐम्पियर2 है।

आपेक्षिक चुम्बकशीलता µr (Relative Magnetic Permeability)- किसी चुम्बकीय पदार्थ की आपेक्षिक चुम्बकशीलता, पदार्थ की चुम्बकशीलता µ0 तथा निर्वात् (वायु) की चुम्बकशीलता 40 के अनुपात को कहते हैं, अर्थात्
µr = [latex s=2]\frac { \mu }{ { \mu }_{ 0 } }[/latex]
यह विमाहीन राशि है तथा निर्वात् के लिए इसका मान 1 है।

चुम्बकीय प्रवृत्ति χm (Magnetic Susceptibility)- किसी पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति उस पदार्थ के चुम्बकत्व धारण करने की क्षमता से नापी जाती है अर्थात् कोई पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र में कितनी सरलता से चुम्बकित होता है। किसी चुम्बकीय पदार्थ में उत्पन्न हुई चुम्बकीय तीव्रता (I) तथा उसे उत्पन्न करने वाले चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता (H) के अनुपात को उस पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं, अर्थात्
χm = [latex s=2]\frac { I }{ H }[/latex]
यह एक शुद्ध संख्या है, (I तथा H दोनों के मात्रक एक ही हैं) तथा निर्वात् के लिए इसका मान शून्य न शून्य है (क्योंकि निर्वात् में चुम्बकेन नहीं हो सकता)। अतः इसका कोई मात्रक नहीं होता है। प्रतिचुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति ताप पर निर्भर नहीं करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दिकपात कोण, नमन कोण तथा पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक की व्याख्या कीजिए। (2017)
या
उपयुक्त आरेख बनाकर किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के क्षैतिज घटक, ऊर्ध्व-घटक एवं नति कोण में सम्बन्ध ज्ञात कीजिए। दिकपात कोण क्या होता है? (2012)
या
नति कोण तथा पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक से क्या तात्पर्य है ? इनके मध्य सम्बन्ध प्राप्त कीजिए। (2012)
या
भू-चुम्बकत्व के चुम्बकीय अवयव क्या हैं? उपयुक्त आरेख की सहायता से उनकी व्याख्या कीजिए। (2017)
या
भू-चुम्बकीय क्षेत्र के विभिन्न अवयव क्या हैं? उनके बीच के सम्बन्ध का सूत्र स्थापित कीजिए। (2017, 18)
उत्तर-
पृथ्वी के भू-चुम्बकत्व के प्रमाण-

  • स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाये गये चुम्बक का सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरना,
  • पृथ्वी में गाड़ने पर लोहे के टुकड़े को कुछ समय बाद चुम्बक बनना तथा
  • उदासीन बिन्दुओं का मिलना।

चुम्बकत्व के मौलिक तत्त्व- पृथ्वी भी एक चुम्बक की भॉति व्यवहार करती है। पृथ्वी के इस गुण को भू-चुम्बकत्व कहते हैं। किसी स्थान पर पृथ्वी के भू-चुम्बकत्व का अध्ययन करने के लिए जिन राशियों की आवश्यकता होती है, वे भू-चुम्बकत्व के अवयव कहलाती हैं। भू-चुम्बकत्व के निम्नलिखित तीन अवयव हैं-
1. दिक्पात कोण (Angle of Declination)- किसी स्थान पर अपने गुरुत्व-केन्द्र से स्वतन्त्रतापूर्वक लटकी चुम्बकीय सूई के अक्ष से गुजरने वाले ऊर्ध्वाधर तल को ‘चुम्बकीय याम्योत्तर’ कहते हैं। इसी प्रकार किसी स्थान पर पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने वाली रेखा में से गुजरने वाले ऊर्ध्वाधर तल को ‘भौगोलिक याम्योत्तर’ कहते हैं। पृथ्वी तल के किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर एवं भौगोलिक याम्योत्तर के बीच बने न्यून
कोण को दिक्पात कोण’ कहते हैं।

2. नति कोण अथवा नमन कोण (Angle of Dip)- यदि किसी चुम्बकीय सूई को उसके गुरुत्व केन्द्र से स्वतन्त्रतापूर्वक इस प्रकार लटकाया जाए कि सूई ऊर्ध्वाधर तल में घूम सके तो चुम्बकीय याम्योत्तर में स्थिर होने पर सूई क्षैतिज दिशा से कुछ झुक जाती है। इस अवस्था में सूई का चुम्बकीय अक्ष, चुम्बकीय याम्योत्तर में क्षैतिज दिशा के साथ जो कोण बनाता है, उसे ‘नति कोण’ कहते हैं। चूँकि (UPBoardSolutions.com) सूई का चुम्बकीय अक्ष पृथ्वी के H चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा प्रदर्शित करता है; अत: नति कोण वह नति कोण कोण है, जो चुम्बकीय याम्योत्तर में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र Be की दिशा तथा क्षैतिज दिशा के बीच बनता है। नति कोण का मान पृथ्वी की चुम्बकीय निरक्ष पर 0° तथा पृथ्वी के चित्र 5.10 चुम्बकीय ध्रुवों पर 90° होता है। उत्तरी गोलार्द्ध में नति सूई का उत्तरी सिरा और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी सिरा नीचे की ओर झुकता है।
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3. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (Horizontal Component of Earth’s Magnetic Field)- किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर में कार्य करने वाले पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र Be का जो घटक क्षैतिज दिशा में कार्य करता है, उसे पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (H) कहते हैं। दिक्पात कोण. (α), नति कोण (θ) तथा चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक (H) में भौगोलिक उत्तर (UPBoardSolutions.com) सम्बन्ध-चुम्बकीय निरक्ष को छोड़कर, हर स्थान पर चुम्बकीय सूई क्षैतिज से कुछ झुककर रुकती है। अतः चुम्बकीय उत्तर + किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर में कार्य करने वाले। चुम्बकीय क्षेत्र B को, क्षैतिज तथा ऊर्ध्वाधर घटकों में योम्योत्तर वियोजित किया जा सकता है।

ये घटक क्रमशः H तथा V से प्रकट किये जाते हैं। याम्योत्तर इन दोनों में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को क्षैतिज घटक H अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए इसको भू-चुम्बकत्व के मौलिक तत्त्वों में सम्मिलित क्रिया गया है।
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NS एक स्वतन्त्रतापूर्वक लटकी चुम्बकीय सूई है। इसके अक्ष में से होकर गुजरने वाला ऊर्ध्वाधर तल OPQR चुम्बकीय याम्योत्तर है। तल OLMR वहाँ पर भौगोलिक याम्योत्तर है। इन तलों के बीच का कोण θ दिक्पात कोण है, जबकि सूई का अक्ष OQ तथा क्षैतिज दिशा OP के (UPBoardSolutions.com) बीच का कोण ‘θ’ नति कोण है।
चुम्बकीय सूई का अक्ष OQ पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र Be की दिशा को प्रदर्शित करता है। चुम्बकीय क्षेत्र Be को क्षैतिज तथा ऊध्र्वाधर घटकों (H वे V) में वियोजित करने पर पृथ्वी के क्षेत्र का क्षैतिज घटक H = Be cos θ
पृथ्वी के क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर घटक V = Be sin θ
अत: समी० (1) व (2) का वर्ग करके जोड़ने पर,
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यदि किसी स्थान पर α और θ ज्ञात हों तो पृथ्वी के क्षेत्र Be की दिशा पूर्णतया निर्धारित की जा सकती है तथा यदि H और θ ज्ञात हों तो Be का परिमाण ज्ञात किया जा सकता है। इस प्रकार α, θ तथा H किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का पूर्ण ज्ञान कराते हैं। इसी कारण इन्हें भू-चुम्बकीय अवयव कहते हैं। यही इनका महत्त्व है।

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प्रश्न 2.
चुम्बकत्व के परमाणवीय मॉडल के आधार पर लौहचुम्बकत्व की व्याख्या कीजिए। (2012)
या
डोमेन सिद्धान्त के आधार पर लौहचुम्बकत्व की व्याख्या कीजिए। (2013, 17)
या
अनुचुम्बकीय तथा प्रतिचुम्बकीय पदार्थों के परमाणुओं में क्या अन्तर होता है? (2014, 18)
या
अनुचुम्बकीय तथा प्रतिचुम्बकीय पदार्थों में क्या अन्तर होता है? परमाणु मॉडल के आधार पर समझाइए। (2015)
या
पदार्थों का उनके चुम्बकीय व्यवहार के आधार पर वर्गीकरण कीजिए। प्रत्येक वर्ग की प्रमुख विशेषताओं की व्याख्या कीजिए। (2016)
या
चुम्बकत्व के परमाणवीय मॉडल के आधार पर प्रतिचुम्बकत्व की व्याख्या कीजिए। (2018)
या
प्रतिचुम्बकीय तथा अनुचुम्बकीय पदार्थों में परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण क्रमशः शून्य एवं अशून्य होता है, क्यों? (2018)
उत्तर-
सन् 1846 में फैराडे ने देखा कि सभी पदार्थों में चुम्बकत्व के गुण पाए जाते हैं। उसने अनेक पदार्थों को चुम्बकीय क्षेत्र में रखकर उनके चुम्बकीय व्यवहारों का अध्ययन किया तथा इस आधार पर पदार्थों को निम्न तीन वर्गों में विभाजित किया-
1. प्रतिचुम्बकीय पदार्थ (Diamagnetic Substances)- कुछ पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की विपरीत दिशा में क्षीण चुम्बकत्व प्राप्त कर लेते हैं। इन्हें प्रतिचुम्बकीय पदार्थ कहते हैं। तथा इनके इस गुण को ‘प्रतिचुम्बकत्व’ कहते हैं। बिस्मथ, ऐण्टीमनी, सोना, पानी, ऐल्कोहॉल, जस्ता, ताँबा, चाँदी, हीरा, नमक, पारा इत्यादि प्रतिचुम्बकीय पदार्थ हैं।

प्रतिचुम्बकत्व की व्याख्या- प्रतिचुम्बकत्व का गुण प्रायः उन पदार्थों के अणुओं अथवा परमाणुओं में पाया जाता है जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या सम (even) होती है तथा दो-दो इलेक्ट्रॉन मिलकर युग्म बना लेते हैं। प्रत्येक युग्म में एक इलेक्ट्रॉन का चक्रण दूसरे इलेक्ट्रॉन के चक्रण की विपरीत दिशा में होता है, जिससे ये एक-दूसरे के चुम्बकीय आघूर्ण को निरस्त कर देते हैं।

अतः प्रतिचुम्बकीय पदार्थ के परमाणु का नेट चुम्बकीय आघूर्ण शून्य होता है। जब ऐसे पदार्थ को किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है तो युग्म के एक इलेक्ट्रॉन का (UPBoardSolutions.com) चक्रण धीमा तथा दूसरे का त्वरित हो जाता है। अब युग्म के इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के चुम्बकीय प्रभाव को निरस्त नहीं कर पाते और परमाणु में चुम्बकीय आघूर्ण प्रेरित हो जाता है, जिसकी दिशा बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के विपरीत होती है; अर्थात् पदार्थ बाह्य क्षेत्र की विपरीत दिशा में चुम्बकित हो जाता है। ताप के बदलने पर इन पदार्थों के प्रतिचुम्बकत्व गुण पर कोई प्रभाव नहीं होता।

2. अनुचुम्बकीय पदार्थ (Paramagnetic Substances)- कुछ पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की दिशा में क्षीण चुम्बकत्व प्राप्त कर लेते हैं, इन्हें अनुचुम्बकीय पदार्थ कहते हैं तथा इनके इस गुण को ‘अनुचुम्बकत्व’ कहते हैं। प्लैटिनम, ऐल्युमीनियम, सोडियम, क्रोमियम, मैंगनीज, कॉपर सल्फेट इत्यादि अनुचुम्बकीय पदार्थ हैं।

अनुचुम्बकत्व की व्याख्या- अनुचुम्बकत्व का गुण उन पदार्थों में पाया जाता है जिनके परमाणुओं या अणुओं में कुछ ऐसे आधिक्य इलेक्ट्रॉन होते हैं जिनका चक्रण एक ही दिशा में होता है। अत: प्रत्येक परमाणु में स्थायी चुम्बकीय आघूर्ण होता है और वह एक सूक्ष्म दण्ड चुम्बक की भाँति व्यवहार करता है, जिसे ‘परमाणवीय चुम्बक’ कहते हैं। परन्तु किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में ये पदार्थ (UPBoardSolutions.com) कोई चुम्बकीय प्रभाव नहीं दिखाते। इसका कारण परमाणवीय चुम्बकों का अनियमित रूप से अभिविन्यासित (randomly oriented) होना है [चित्र 5.12 (a)]। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर प्रत्येक परमाणवीय चुम्बक पर एक बल-आघूर्ण कार्य करता है। जिससे ये क्षेत्र की दिशा में संरेखित हो जाते हैं। इस प्रकार पूरा पदार्थ क्षेत्र की दिशा में चुम्बकीय आधूर्ण प्राप्त कर लेता है; अर्थात् क्षेत्र की दिशा में चुम्बकित हो जाता है [चित्र 5.12 (b)]
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ऊष्मीय विक्षोभ के कारण चुम्बकीय संरेखण कम होता है, जिससे अनुचुम्बकीय पदार्थों में चुम्बकन बहुत कम हो पाता है। बाह्य क्षेत्र की तीव्रता बढ़ाने पर अथवा ताप घटाने पर चुम्बकन बढ़ जाता है।

3. लौहचुम्बकीय पदार्थ (Ferromagnetic Substances)- कुछ पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की दिशा में प्रबल रूप से चुम्बकित हो जाते हैं, इन्हें लौहचुम्बकीय पदार्थ कहते हैं। | लोहा, कोबाल्ट, निकिल तथा मैग्नेटाइट (Fe3O4) इत्यादि लौहचुम्बकीय पदार्थ हैं।

लौहचुम्बकत्व की व्याख्या (डोमेन सिद्धान्त)- अनुचुम्बकत्व तथा लौहचुम्बकत्व में केवल तीव्रता का अन्तर होता है। वास्तव में लौहचुम्बकीय पदार्थ ऐसे अनुचुम्बकीय पदार्थ हैं, जिनका चुम्बकीय क्षेत्र में चुम्बकन अत्यन्त तीव्र होता है। लौहचुम्बकीय पदार्थों का भी प्रत्येक परमाणु एक चुम्बक होता है और यह एक स्थायी चुम्बकीय आघूर्ण रखता है परन्तु लौहचुम्बकीय पदार्थों के परमाणुओं की कुछ (UPBoardSolutions.com) अन्योन्य क्रियाओं के कारण पदार्थों के भीतर परमाणुओं के असंख्य अतिसूक्ष्म आकार के प्रभावी क्षेत्र बन जाते हैं, जिन्हें डोमेन कहते हैं। प्रत्येक डोमेन में 1017 से 1021 तक परमाणु होते हैं, जिनकी चुम्बकीय अक्षं एक ही दिशा में संरेखित होती हैं (परन्तु पास वाले डोमेनों के परमाणुओं से भिन्न दिशा में)। इस प्रकार चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी प्रत्येक डोमेन चुम्बकीय संतृप्तता की स्थिति में होता है। परन्तु परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण शून्य ही रहता है [चित्र 5.13 (a)]।
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लौहचुम्बकीय पदार्थों को किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर पदार्थ का परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण निम्नलिखित दो प्रकार से बढ़ सकता है-

1. डोमेन की परिसीमाओं के विस्थापन द्वारा– बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में संरेखित डोमेनों के आकार में वृद्धि होती है, जबकि अन्य दिशाओं में अभिविन्यस्त डोमेनों के आकार छोटे हो जाते हैं (चित्र 5.13 (b))
जब बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र दुर्बल हो जाता है तो लौहचुम्बकीय पदार्थों का चुम्बकन प्राय: डोमेनों की परिसीमाओं के विस्थापन द्वारा होता है। इस स्थिति में चुम्बकन की क्रिया उत्क्रमणीय होती है; अर्थात् चुम्बकीय क्षेत्र हटा लेने पर डोमेन अपनी पूर्वावस्था में वापस आ जाते हैं। अतः पदार्थ पूर्णत: विचुम्बकित हो जाता है।

2. डोमेनों के घूर्णन द्वारा- डोमेन इस प्रकार घूम जाते हैं कि इनके चुम्बकीय आघूर्ण बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में हो जाते हैं जिससे प्रबल चुम्बकत्व प्राप्त हो जाता है (चित्र 5.13 (c))

बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र के दुर्बल होने पर इन पदार्थों में चुम्बकन डोमेनों की परिसीमाओं के विस्थापन द्वारा होता है। परन्तु प्रबल बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में इन पदार्थों का (UPBoardSolutions.com) चुम्बकन डोमेनों के घूर्णन द्वारा होता है। बाह्य क्षेत्र यदि क्षीण है, तो उसे हटा लेने पर डोमेन अपनी मूल स्थितियों में आ जाते हैं और पदार्थ का चुम्बकत्व समाप्त हो जाता है। यदि बाह्य क्षेत्र तीव्र है तो चुम्बकीय-क्षेत्र को हटा लेने पर पदार्थ पूर्णतः विचुम्बकित नहीं होता, बल्कि उसमें कुछ-न-कुछ चुम्बकत्व शेष रह जाता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation (वंशागति और विविधता के सिद्धान्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Biology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation (वंशागति और विविधता के सिद्धान्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Principles of Inheritance and Variation
Number of Questions Solved 48
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation (वंशागति और विविधता के सिद्धान्त)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेंडल द्वारा प्रयोगों के लिए मटर के पौधे को चुनने से क्या लाभ हुए?
उत्तर
मंडल द्वारा प्रयोगों के लिए मटर के पौधे को चुनने से निम्नलिखित लाभ हुए –

  1. यह एकवर्षीय पौधा है वे इसे आसानी से बगीचे में उगाया जा सकता था
  2. इसमें विभिन्न लक्षणों के वैकल्पिक रूप (alternate forms)देखने को मिले
  3. इसके स्व-परागित (self pollinated) होने के कारण कोई भी अवांछित जटिलता नहीं आ पायी
  4. नर व मादा एक ही पौधे में मिल गए
  5. यह पौधा आनुवंशिक रूप से शुद्ध था व पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसके पौधे शुद्ध बने रहे
  6. इस पौधे की एक ही पीढ़ी में अनेक बीज उत्पन्न होते हैं अतः निष्कर्ष निकालने में आसानी रही।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में विभेद कीजिए
(क) प्रभाविता और अप्रभाविता
(ख) समयुग्मजी और विषमयुग्मजी (2015)
(ग) एक संकर और द्विसंकर
उत्तर
(क) प्रभाविता और अप्रभाविता में अन्तर
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(ख) समयुग्मजी और विषमयुग्मजी में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-2

(ग) एक संकर और द्विसंकर में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-3

प्रश्न 3.
कोई द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी (heterozygous) है, कितने प्रकार के युग्मकों का उत्पादन सम्भव है?
उत्तर
जब कोई द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी है अर्थात् किसी त्रिसंकर (tri-hybrid) में तुलनात्मक लक्षणों के तीन जोड़े जीन (कारक) होते हैं। प्रत्येक जोड़े लक्षण का विसंयोजन दूसरे जोड़े से स्वतन्त्र होता है तो द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी होगा। जैसे लम्बे, पीले तथा गोल बीज वाले शुद्ध जनकों का संकरण, नाटे, हरे और झुरींदार बीज वाले पौधों से कराने पर F1 पीढ़ी में प्राप्त संकर लम्बे, गोल और पीले बीज वाले पौधों की विषमयुग्मजी जीन संरचना Tt Rr Yy होती है। इससे आठ प्रकार के युग्मक TRY, TRy, TrY, Try, tRY, tRy, trY, try बनते हैं। अर्थात् F1 पीढ़ी के सदस्यों के जीन युग्मक निर्माण के समय स्वतन्त्र होकर नए-नए संयोग बनाते हैं।

प्रश्न 4.
एक संकर क्रॉस का प्रयोग करते हुए, प्रभाविता नियम की व्याख्या कीजिए। (2017)
उत्तर
एक ही लक्षण के लिए विपर्यासी पौधे के मध्य संकरण एक संकर क्रॉस कहलाता है, जैसे मटर के लम्बे (T) व बौने (t) पौधे के मध्य कराया गया संकरण। F1 पीढ़ी में सभी पौधे लम्बे किन्तु विषमयुग्मजी (Tt) होते हैं। F1 पीढ़ी में लम्बेपन के लिए उत्तरदायी कारक T, बौनेपन के कारक है पर प्रभावी होता है। कारक अप्रभावी होता है अत: F1 पीढ़ी में उपस्थित होते हुए भी स्वयं को प्रकट नहीं कर पाता है। सभी F1 पौधे लम्बे होते हैं। अत: एक लक्षण को नियन्त्रित करने वाले कारक युग्म में जब एक कारक दूसरे कारक पर प्रभावी होता है, तो इसे प्रभाविता का नियम कहते हैं।
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प्रश्न 5.
परीक्षार्थ संकरण की परिभाषा लिखिए व चित्र बनाइए।
उत्तर
F1 जीव तथा समयुग्मजी अप्रभावी (homozygous recessive) लक्षण वाले जीव के मध्य कराया गया संकरण, परीक्षार्थ संकरण (test cross) कहलाता है। इसे निम्नानुसार दर्शाया जा सकता है –
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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-6

प्रश्न 6.
एक ही जीन स्थल वाले समयुग्मजी मादा और विषमयुग्मजी नर के संकरण से प्राप्त प्रथम संतति पीढ़ी के फीनोटाइप वितरण का पुनेट वर्ग बनाकर प्रदर्शन कीजिए।
उत्तर
गुणसूत्रों पर विभिन्न लक्षणों वाले जीन एक निश्चित स्थल (locus) पर स्थित होते हैं। एक ही जीन स्थल वाले समयुग्मजी मादा जैसे- शुद्ध नाटे पौधे और विषमयुग्मजी नर जैसे- संकर लम्बे पौधों के मध्य संकरण कराने पर प्राप्त प्रथम पुत्रीय संतति सदस्यों में 50% प्रभावी लक्षण वाले विषमयुग्मजी और 50% समयुग्मजी प्रभावी लक्षण वाले होते हैं; जैसे –
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प्रश्न 7.
पीले बीज वाले लम्बे पौधे (YyTt) का संकरण हरे बीज वाले लम्बे (yyTt) पौधे से कराने पर निम्न में से किस प्रकार के फीनोटाइप संतति की आशा की जा सकती है?

  1. लम्बे हरे
  2. बौने हरे

उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-8

  1. लम्बे हरे के फीनोटाइप संतति 6 हैं।
  2. बौने हरे के फीनोटाइप संतति 2 हैं।

प्रश्न 8.
दो विषमयुग्मजी जनकों का क्रॉस है और १ किया गया। मान लीजिए दो स्थल (loci) सहलग्न हैं तो द्विसंकर क्रॉस में F1 पीढ़ी के फीनोटाइप के लक्षणों का वितरण क्या होगा?
उत्तर
एक ही गुणसूत्र पर उपस्थित जीन्स के एकसाथ वंशागत होने को जीन सहलग्नता (gene linkage) या सहलग्न जीन (linked genes) कहते हैं। सहलग्न जीन्स द्वारा नियन्त्रित होने वाले लक्षणों को सहलग्न लक्षण (linked characters) कहते हैं। जीन सहलग्नता (gene linkage) के अध्ययन के लिए मॉर्गन ने ड्रोसोफिला (Drosophila) पर अनेक प्रयोग किए। ये मेण्डेल द्वारा किए गए द्विसंकर संकरण के समान थे। मॉर्गन ने पीले शरीर और श्वेत नेत्रों वाली मादा मक्खियों का संकरण भूरे शरीर और लाल नेत्रों वाली मक्खियों के साथ किया। इनसे प्राप्त प्रथम पुत्रीय संतति (F1 पीढ़ी) के सदस्यों में परस्पर क्रॉस कराने पर उन्होंने पाया कि ये दो जोड़ी जीन एक-दूसरे से स्वतन्त्र रूप से पृथक् नहीं हुए और F2पीढ़ी का अनुपात मेण्डेल के नियमानुसार प्राप्त अनुपात 9:3:3:1 से काफी भिन्न प्राप्त होता है (यह अनुपात दो जीन्स के स्वतन्त्र कार्य करने पर अपेक्षित था)। यह सहलग्नता के कारण होता है।

प्रश्न 9.
आनुवंशिकी में टी०एच० मॉर्गन के योगदान का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर
आनुवंशिकी में टी०एच० मॉर्गन के योगदान निम्नवत् हैं –

  1. मॉर्गन ने ड्रोसोफिला पर अपने प्रयोग द्वारा सिद्ध किया कि जीन, गुणसूत्र पर स्थित होते हैं।
  2. मॉर्गन ने क्रिस-क्रॉस वंशागति की खोज की।
  3. मॉर्गन व उनके साथियों ने गुणसूत्र पर स्थित जीन्स युग्मों के बीच पुनर्योजन की आवृत्ति को जीन्स के बीच की दूरी मानकर, आनुवंशिक मानचित्र की रचना की जो गुणसूत्रों पर जीन्स की स्थिति को दर्शाता है।
  4. मॉर्गन ने जीन्स के उत्परिवर्तन की खोज की।
  5. मॉर्गन ने विनिमय, सहलग्नता की खोज की।
  6. उन्होंने सहलग्नता के गुणसूत्रीय सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  7. मॉर्गन ने अजनकीय जीन संयोजनों को पुनर्योजन (recombination) का नाम दिया था।

प्रश्न 10.
वंशावली विश्लेषण क्या है? यह विश्लेषण किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर
वंशावली विश्लेषण
मानव एक सामाजिक प्राणी है। मानव पर भी आनुवंशिकी के नियम अन्य प्राणियों की भाँति लागू होते। हैं और इन्हीं के अनुसार आनुवंशिक लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होते हैं। प्राकृतिक तथ्यों को जानने के लिए वैज्ञानिकों को जीव-जन्तुओं पर अनेक प्रायोगिक परीक्षण करने पड़ते हैं। मानव पर प्रयोगशाला में ऐसे परीक्षण नहीं किए जा सकते। अतः मानव आनुवंशिकी के अधिकांश तथ्य जन समुदायों के अध्ययन एवं अन्य जीवों की आनुवंशिकी पर आधारित हैं। मानव के आनुवंशिक लक्षणों या विशेषकों का पता लगाने के लिए सर फ्रांसिस गैल्टन (Sir Francis Galton) ने दो विधियाँ बताईं –

  • कुछ विशेष आनुवंशिक लक्षणों को प्रदर्शित करने वाले मानव कुटुम्बों की वंशावलियों (Pedigrees or Genealogies) का अध्ययन।
  • यमजों (twins) के अध्ययन से आनुवंशिक एवं उपार्जित लक्षणों में भेद स्थापित करना।

हार्डी एवं वीनबर्ग (Hardy and Weinberg) ने पूरे-पूरे जन समुदायों में आनुवंशिक लक्षणों का निर्धारण करने की विधि का अध्ययन किया।

मानव आनुवंशिकी में वंशावली अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण उपकरण होता है जिसका उपयोग विशेष लक्षण, असामान्यता (abnormality) या रोग का पता लगाने में किया जाता है। वंशावली विश्लेषण में प्रयुक्त कुछ महत्त्वपूर्ण मानक प्रतीकों (symbols) को अग्रांकित चित्र में दिखाया गया है –
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-9

प्रश्न 11.
मानव में लिंग निर्धारण कैसे होता है? (2010, 12, 13, 14, 15, 16, 17)
उत्तर
लैंगिक जनन करने वाले जीव दो प्रकार के होते हैं- द्विलिंगी या उभयलिंगी (bisexual or hermaphrodite) तथा एकलिंगी (unisexual)। एकलिंगी जीवों में नर तथा मादा जनन अंग (reproductive organs) अलग-अलग जन्तुओं में होते हैं। नर तथा मादा की शारीरिक संरचना में अन्तर भी होता है। इसे लिंग भेद (sexual dimorphism) कहते हैं।
एकलिंगी जीवों की लिंग भेद प्रक्रिया के सम्बन्ध में मैकक्लंग (Mc Clung, 1902) ने लिंग निर्धारण का गुणसूत्रवाद (chromosomal theory of sex determination) प्रतिपादित किया था। इसके अनुसार लिंग का निर्धारण गुणसूत्रों पर निर्भर करता है तथा इनकी वंशागति मेण्डेल के नियमों के अनुसार होती है।

लिंग निर्धारण का गुणसूत्र सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार, प्राणियों (मानव) में दो प्रकार के गुणसूत्र पाए जाते हैं –
(i) समजात गुणसूत्र (autosomes) तथा
(ii) लैंगिक गुणसूत्र या एलोसोम (sex chromosomes or allosomes)।
सभी जीवों में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है जिसे 2 x (द्विगुणित) से प्रदर्शित करते हैं। इनमें से दो गुणसूत्र लैंगिक गुणसूत्र (sex chromosome) होते हैं।

लैंगिक गुणसूत्र दो प्रकार के होते हैं- X तथा Y। स्त्रियों में दोनों लैंगिक गुणसूत्र (XX) समान होते हैं। तथा पुरुष में लिंग गुणसूत्र असमान (XY) होते हैं। युग्मक में केवल एक ही लैंगिक गुणसूत्र होता है। लैंगिक गुणसूत्रों की भिन्नता ही लिंग निर्धारित करती है। लैंगिक गुणसूत्रों के अनुसार लिंग निर्धारण निम्नलिखित प्रकार से होता है –

लिंग निर्धारण की XY विधि (The XY-method of sex determination) – इस विधि में स्त्री के दोनों लैंगिक गुणसूत्र XX होते हैं तथा पुरुष में एक लैंगिक गुणसूत्र X एवं दूसरा Y होता है। स्त्री में अण्डजनन द्वारा बने सभी अण्डाणुओं में दैहिक गुणसूत्रों का एक अगुणित सैट तथा एक x लैंगिक गुणसूत्र होता है (A + x)। इस प्रकार सभी अण्डाणु जीन संरचना (A + x) में समान होते हैं। अत: स्त्री को समयुग्मकी लिंग (homogametic sex) कहते हैं। इसके विपरीत पुरुष में शुक्राणुजनन से बने 50% शुक्राणुओं में दैहिक गुणसूत्रों का एक अगुणित सैट तथा X गुणसूत्र व कुछ शुक्राणुओं में दैहिक गुणसूत्रों का एक अगुणित सैट तथा Y गुणसूत्र (A + X or A+Y) होता है।

इस प्रकार दो प्रकार के शुक्राणुओं का निर्माण होता है। 50% शुक्राणु A + X तथा 50% शुक्राणु A +Y गुणसूत्रों वाले होते हैं। अतः पुरुष को विषमयुग्मकी लिंग (heterogametic sex) कहते हैं। निषेचन के समय यदि A + Y शुक्राणु का समेकन अण्डाणु के साथ होता है, तब नर सन्तान (पुत्र) उत्पन्न होती है। यदि अण्डाणु का समेकन A+ X शुक्राणु के साथ होता है, तब मादा सन्तान (पुत्री) उत्पन्न होती है। यह केवल संयोग है कि कौन-से शुक्राणु का समेकन अण्डाणु के साथ होता है। इसी के आधार पर सन्तान का लिंग निर्धारण होता है।
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प्रश्न 12.
शिशु का रुधिर वर्ग O है। पिता का रुधिर वर्ग A और माता का B है। जनकों के जीनोटाइप मालूम कीजिए और अन्य संतति में प्रत्याशित जीनोटाइप की जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर
रुधिर वर्गों की वंशागति (Inheritance of Blood Groups) मेण्डेल के नियमों के अनुसार होती है। इसकी वंशागति दो या अधिक तुलनात्मक लक्षणों वाले जीन्स (genes) अर्थात् ऐलील्स (alleles) पर निर्भर करती है।
रुधिर वर्गों को स्थापित करने वाले प्रतिजन (antigens) की उपस्थिति या अनुपस्थिति तीन जीन्स के कारण होती है। प्रतिजन A के लिए जीन Ia, प्रतिजन ‘B’ के लिए जीन ।b तथा दोनों प्रतिजन के अभाव के लिए जीन I° उत्तरदायी होते हैं। एक मनुष्य में इनमें से कोई एक या दो प्रकार के जीन्स गुणसूत्र जोड़े पर एक निश्चित स्थल (loci) पर स्थित होते हैं। जीन Ia तथा Ib क्रमशः I° पर प्रभावी होते हैं, जबकि जीना Ia तथा Ib में प्रभाविता का अभाव होता है अर्थात् ये सहप्रभावी (codominant) होते हैं। विभिन्न रुधिर वर्ग के व्यक्तियों के रुधिर वर्ग की जीनी संरचना निम्नांकित तालिका के अनुसार हो। सकती है –
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उदाहरण – A तथा B रुधिर वर्ग वाले माता-पिता की सम्भावित सन्तानों के रुधिर वर्गों का जीनोटाइप (genotype) निम्नानुसार होगा –
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‘O’ रुधिर वर्ग वाले शिशु के माता-पिता का जीनोटाइप Ia Io तथा Ib Io है। ‘AB’ रुधिर वर्ग वाले का जीनोटाइप Ia Ib, A रुधिर वर्ग वाले का Ia Io ‘B’ रुधिर वर्ग वाले का Ib Io और ‘O’ रुधिर वर्ग वाले का जीनोटाइप I° I° होगा।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए
(अ) सह-प्रभाविता
(ब) अपूर्ण प्रभाविता। (2012, 16, 17)
उत्तर
(अ) सह-प्रभाविता – जब किसी कारक या जीन के युग्मविकल्पी में कोई भी कारक प्रभावी या अप्रभावी न होकर, मिश्रित रूप से प्रभाव डालते हैं, तो इसे सहप्रभाविता (co-dominance) कहते हैं। इसके फलस्वरूप F1 पीढ़ी दोनों जनकों की मध्यवर्ती होती है।
उदाहरण – मनुष्य में तीन प्रकार के रुधिर वर्ग होते हैं-A, B, 0, जिनका निर्धारण विभिन्न प्रकार की लाल रुधिराणु कोशिकाएँ करती हैं। इन रुधिर वर्गों का नियन्त्रण ‘I’ जीन करता है जिसके तीन युग्मविकल्पी होते हैं- IA व Ib साथ-साथ उपस्थित होने पर सहप्रभावी होते हैं व AB रुधिर वर्ग बनाते हैं।

(ब) अपूर्ण प्रभाविता – विपर्यासी लक्षणों के युग्म में, एक लक्षण दूसरे पर अपूर्ण रूप से प्रभावी होता है। यह घटना अपूर्ण प्रभाविता कहलाती है।
उदाहरण – मिराबिलिस जलापा या गुल गुलाबाँस के पौधे में लाल पुष्प व सफेद पुष्प युक्त पौधों के मध्य संकरण कराने पर, F1 पीढ़ी में सभी फूल लाल मा सफेद न होकर, गुलाबी रंग के होते हैं। F2 पीढ़ी में 1 लाल, 2 गुलाबी व 1 सफेद पुष्प (1 : 2 : 1) युक्त पौधे प्राप्त होते हैं।
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प्रश्न 14.
बिन्दु उत्परिवर्तन क्या है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर
DNA के किसी एक क्षार युग्म (base pair) या न्यूक्लिओटाइड क्रम में होने वाला परिवर्तन, बिन्दु उत्परिवर्तन कहलाता है। उदाहरण – हँसियाकार कोशिका अरक्तता (sickle cell anaemia)।

प्रश्न 15.
वंशागति के क्रोमोसोमवाद को किसने प्रस्तावित किया?
उत्तर
सटन व बोवेरी (Sutton and Boveri) ने।

प्रश्न 16.
किन्हीं दो अलिंगसूत्री आनुवंशिक विकारों का उनके लक्षणों सहित उल्लेख कीजिए।
उत्तर
शरीर में होने वाली उपापचय क्रियाओं के प्रत्येक चरण पर एन्जाइम नियन्त्रण रखते हैं। पूर्ण प्रक्रिया में कहीं भी एक एन्जाइम के बदल जाने या एन्जाइम का निर्माण न होने की दशा में कोई-न-कोई व्यतिक्रम (disorder) उत्पन्न हो जाता है। बीडल तथा टॉटम (George Beadle and E. L. Tatum, 1941) के एक जीन एक एन्जाइम परिकल्पना’ (one gene one enzyme concept) के पश्चात् यह निश्चित हो गया कि अनेक रोग जीनी व्यतिक्रम (genetic disorder) के कारण होते हैं। मानव में होने वाले ऐसे कुछ रोग निम्नलिखित हैं –

1. दात्र कोशिका अरक्तता (Sickle cell anaemia) – यह मनुष्य में एक अप्रभावी जीन से होने वाला रोग है। जब अप्रभावी जीन समयुग्मकी (Hb Hb) अवस्था में होती है, तब सामान्य हीमोग्लोबिन के स्थान पर असामान्य हीमोग्लोबिन का निर्माण होने लगता है। अप्रभावी जीन के कारण हीमोग्लोबिन की बीटा शृंखला ( 3-chain) में छठे स्थान पर ग्लूटैमिक अम्ल (glutamic acid) का स्थान वैलीन (valine) ऐमीनो अम्ल ले लेता है।

असामान्य हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन का वहन नहीं कर सकता तथा लाल रुधिराणु हँसिए के आकार के (sickle shaped) हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों में घातक रक्ताल्पता (anaemia) हो जाती है। जिससे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। विषमयुग्मकी व्यक्ति सामान्य होते हैं, किन्तु ऑक्सीजन का आंशिक दाब कम होने पर इनके लाल रुधिराणु हँसिए के आकार के हो जाते हैं। HbA जीन सामान्य हीमोग्लोबिन के लिए है तथा HbS जीन दात्र कोशिका हीमोग्लोबिन के लिए है।
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2. फिनाइलकीटोन्यूरिया (Phenylketonuria) – यह रोग एक अप्रभावी जीन के कारण होता है। इस लक्षण का अध्ययन सर्वप्रथम सर आर्चीबाल्ड गैरड (Sir Archibald Gariod) ने किया था।

फिनाइलएलैनीन (phenylalanine) ऐमीनो अम्ल का उपयोग अनेक उपापचयी पथ (metabolic pathways) में होता है। प्रत्येक पथ में अनेक एन्जाइमें भाग लेते हैं। किसी भी एक एन्जाइम का निर्माण न होने से वह पथ पूर्ण नहीं हो पाता जिससे रोग उत्पन्न हो जाता है। एक अप्रभावी जीन के कारण फिनाइलएलैनीन से टायरोसीन (tyrosine) के निर्माण के लिए आवश्यक एन्जाइम का निर्माण नहीं हो पाता, इस कारण रुधिर में फिनाइलएलैनीन की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है तथा इसका स्रावण मूत्र में भी होने लगता है। इस अवस्था को फिनाइलकीटोन्यूरिया (phenylketonuria) या PKU कहते हैं। ऐसे बालकों में मस्तिष्क अल्पविकसित रह जाता है। I.Q. का स्तर सामान्यतः 20 से कम रहता है।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
‘आनुवंशिकी का जनक किसे कहा जाता है? (2015)
(क) ह्यूगो डी ब्रीज
(ख) कार्ल कोरेन्स
(ग) ग्रेगर जे० मेंडल
(घ) एरिक वॉन सरमेक
उत्तर
(ग) ग्रेगर जे० मेंडल

प्रश्न 2.
वंशागति (आनुवंशिक) इकाई है (2014, 15)
(क) गुणसूत्र
(ख) जीन प्रारूप
(ग) गॉल्जीकाय
(घ) जीन
उत्तर
(घ) जीन

प्रश्न 3.
मेंडल के एक गुण प्रसंकरण में कौन-सी पीढ़ी हमेशा विषमयुग्मजी होती है? (2016)
(क) प्रथम सन्तानीय पीढ़ी
(ख) द्वितीय सन्तानीय पीढ़ी
(ग) तृतीय सन्तानीय पीढ़ी
(घ) जनक पीढ़ी
उत्तर
(क) प्रथम सन्तानीय पीढ़ी

प्रश्न 4.
यदि एक विषमयुग्मजी लम्बे पौधे का एक समयुग्मजी बौने पौधे के साथ क्रॉस कराया जाये तो बौने पौधों का प्रतिशत होगा (2015)
(क) 50%
(ख) 25%
(ग) 75%
(घ) 100%
उत्तर
(क) 50%

प्रश्न 5.
गुलाबी फुल वाले गुलाबाँस में स्वनिषेचन से प्राप्त प्ररूपी अनुपात होगा- (2018)
(क) 1: 2:1
(ख) 3 : 1
(ग) 1: 1:1 : 1
(घ) 2:1
उत्तर
(क) 1 : 2 : 1

प्रश्न 6.
प्रथम सन्तानीय पीढ़ी की सन्तान का दोनों जनक में से किसी एक के साथ किया गया प्रसंकरण है (2017)
(क) जाँच प्रसंकरण (टेस्ट क्रॉस)
(ख) संकरे पूर्वज प्रसंकरण (बैक क्रॉस)
(ग) अन्योन्यता प्रसंकरण (रेसीप्रोकल क्रॉस)
(घ) एक गुण प्रसंकरण (मोनोहाइब्रिड क्रॉस)
उत्तर
(ख) संकर पूर्वज प्रसंकरण (बैक क्रॉस)

प्रश्न 7.
एण्टीबॉडीज हैं। (2014)
(क) लिपिड
(ख) खनिज
(ग) प्रोटीन्स
(घ) शर्करा
उत्तर
(ग) प्रोटीन्स

प्रश्न 8.
निम्न में से कौन-सा रक्त समूह सार्विक दाता कहलाता है? (2017)
(क) A
(ख) O
(ग) B
(घ) AB
उत्तर
(ख) O

प्रश्न 9.
रुधिर वर्ग ‘O’ वाली स्त्री ‘AB’ रुधिर वर्ग वाले पुरुष से शादी करती है। उनके पुत्र का रुधिर वर्ग कौन-सा हो सकता है? (2011, 16)
(क) A रुधिर वर्ग
(ख) ‘B’ रुधिर वर्ग
(ग) A या ‘B’ रुधिर वर्ग
(घ) AB’ रुधिर वर्ग
उत्तर
(ग) A या ‘B’ रुधिर वर्ग

प्रश्न 10.
रुधिर वर्ग ‘A’ वाले लड़के को निम्न में से किस रुधिर समूह का रक्त आधान किया जा सकता है? (2010)
(क) केवल ‘O’
(ख) केवल AB’
(ग) ‘A’ तथा ‘O’
(घ) ‘A’ तथा ‘B’
उत्तर
(ग) ‘A’ तथा ‘O’

प्रश्न 11.
सन्तान को पिता से कितने जीन्स प्राप्त होते हैं? (2017)
(क) 25%
(ख) 50%
(ग) 75%
(घ) 25% से 50%
उत्तर
(ख) 50%

प्रश्न 12.
‘मंगोली जड़ता’ किसके कारण होती है? (2014, 16)
(क) लिंग गुणसूत्रों की एकलसूत्रता
(ख) 21वीं जोड़ी के अलिंगसूत्रों की एकलसूत्रता
(ग) लिंग गुणसूत्रों की एकाधिसूत्रता
(घ) 21वीं जोड़ी के अलिंगसूत्रों की एकाधिसूत्रता
उत्तर
(घ) 21वीं जोड़ी के अलिंगसूत्रों की एकाधिसूत्रता

प्रश्न 13.
टरनर सिण्ड्रोम के लिए निम्नलिखित में से कौन सही है? (2016)
(क) AAXO
(ख) AAXYY
(ग) AAXXY
(घ) AAXXX
उत्तर
(क) AAXO

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वंशागति या आनुवंशिकता तथा आनुवंशिकी में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर
आनुवंशिक लक्षणों के जनकों से सन्तति में पहुँचने को आनुवंशिकता कहते हैं। विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत आनुवंशिक लक्षणों एवं उनकी वंशागति का अध्ययन किया जाता है, आनुवंशिकी कहलाता है।

प्रश्न 2.
मेंडल ने अपने प्रयोग के लिए कितने लक्षणों का चुनाव किया? किन्हीं चार लक्षणों के नाम लिखिए।
(2015, 17)
उत्तर
मंडल ने अपने प्रयोग के लिए सात जोड़ी विपर्यासी लक्षणों का चुनाव किया। उदाहरणार्थ –

  1. पुष्पों का रंग-बैंगनी तथा सफेद
  2. बीज का रंग-हरा तथा पीला।
  3. पौधे की लम्बाई-लम्बा तथा बौना।
  4. बीज का आकार–गोल एवं झुर्रादार बीज।

प्रश्न 3.
संकर-पूर्वज संकरण (back cross) तथा परीक्षण संकरण (test cross) में अन्तर बताइए।
(2014, 15, 17, 18)
उत्तर
जब किसी संकर को किसी भी जनक से संकरण कराया जाता है तो इसे संकर-पूर्वज संकरण कहते हैं जबकि प्रथम पीढ़ी (F1) जीव एवं समयुग्मकी अप्रभावी लक्षण वाले जीव के मध्य कराये गये संकरण को परीक्षण संकरण कहते हैं।

प्रश्न 4.
सर्वग्राही तथा सर्वदायी रक्त समूह कौन हैं? इनके नाम लिखिए। (2014)
या
किस रुधिर वर्ग का मनुष्य सर्वग्राही होता है? (2010)
उत्तर
‘AB’ रक्त समूह का मनुष्य सर्वग्राही तथा ‘O’ रक्त समूह को मनुष्य सर्वदायी होता है।

प्रश्न 5.
रुधिर वर्ग ‘O’ वाला एक पुरुष रुधिर वर्ग ‘AB’ वाली एक स्त्री से शादी करता है। उनकी संतानों का रुधिर वर्ग क्या होगा? (2017)
उत्तर
यदि पुरुष व स्त्री के रुधिर वर्ग क्रमशः ‘O’ और ‘AB’ हैं तो इनकी संतानों में केवल A अथवा ‘B’ रुधिर वर्ग की सम्भावना होती है।
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प्रश्न 6.
विभिन्नता से आप क्या समझते हैं? कोई दो प्रकार की विभिन्नताएँ बताइए। (2015, 18)
उत्तर
एक ही माता-पिता की विभिन्न संतानों में अंतर पाये जाते हैं। इस प्रकार जीवधारियों के बीच में पाये जाने वाले अंतरों को विभिन्नताएँ कहते हैं। विभिन्नता के दो मुख्य प्रकार निम्नवत् हैं –

  1. दैहिक विभिन्नताएँ
  2. जननिक विभिन्नताएँ

प्रश्न 7.
आनुवंशिक रोग क्या है? मनुष्य में इस रोग के दो उदाहरण लिखिए। (2015)
उत्तर
वे रोग जो किसी संतान को अपने माता-पिता से आनुवंशिक रूप से प्राप्त होते हैं, आनुवंशिक रोग कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-वर्णान्धता तथा हीमोफीलिया।

प्रश्न 8.
लिंग सहलग्न लक्षण को परिभाषित कीजिए। मनुष्य में लिंग सहलग्न वंशागति के द्वारा उत्पन्न दो व्याधियों के नाम लिखिए। (2014,17)
उत्तर
प्राणियों में कुछ आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति लिंग से सम्बन्धित होती है। इनका सम्बन्ध लिंग गुणसूत्रों से होने के कारण इन्हें लिंग सहलग्न लक्षण कहते हैं; जैसे-मनुष्य में वर्णान्धता, हीमोफीलिया आदि।

प्रश्न 9.
हीमोफीलिया को ब्लीडर रोग क्यों कहते हैं? (2017)
उत्तर
क्योंकि इस रोग में चोट लग जाने या कट जाने पर रक्त का थक्का नहीं बनता जिसके कारण रक्त लगातार बहता रहता है।

प्रश्न 10.
ओटोसोमल ट्राइसोमी के दो उदाहरण दीजिए तथा इनमें गुणसूत्रों की संख्या एवं अन्य अपसामान्यताएँ बताइए। (2009, 16)
या
मानव में गुणसूत्रीय व्यतिक्रम से उत्पन्न होने वाले दो रोगों के नाम तथा उनके गुणसूत्र विन्यास लिखिए। (2014)
उत्तर

  1. 21वें ओटोसोमल गुणसूत्र की ट्राइसोमी के कारण मंगोलिज्म या डाउन्स सिण्ड्रोम विकसित होता है। इनमें गुणसूत्रों की कुल संख्या 47 होती है।
  2. 18वें ओटोसोमल गुणसूत्र की ट्राइसोमी के कारण एडवर्ड्स सिण्ड्रोम विकसित होता है। इनमें गुणसूत्रों की कुल संख्या 47 होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में अन्तर बताइए –
(क) जीन प्रारूप एवं लक्षण प्रारूप (2015, 2017)
(ख) प्रभावी कारक एवं अप्रभावी कारक (2015, 17)
उत्तर
(क) जीन प्रारूप एवं लक्षण प्रारूप में अन्तर जीन प्रारूप
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(ख) प्रभावी और अप्रभावी कारक में अन्तर
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प्रश्न 2.
पक्षियों में लिंग निर्धारण किस प्रकार होता है? (2017)
उत्तर
पक्षियों में लिंग निर्धारण
ZW – ZZ गुणसूत्रों द्वारा लिंग निर्धारण (Sex Determination by ZW-ZZ Chromosomes) – यह क्रियाविधि कुछ कीटों (तितली और मॉथ) और कुछ कशेरुकियों (मछलियों, सरीसृपों व पक्षियों) में पायी जाती है। नर में दो समरूपी लिंग गुणसूत्र (hormomorphic sex chromosomes) होते हैं। जिन्हें ZZ से निरूपित किया जाता है। इनसे समयुग्मक (homogametes) उत्पन्न होते हैं। इसके विपरीत मादा में दो विषमरूपी लिंग गुणसूत्र (heteromorphic sex chromosomes) पाये जाते हैं। जिन्हें ZW से प्रदर्शित किया जाता है। इनसे विषमयुग्मक (heterogametes) उत्पन्न होते हैं। इसलिए मादा दो प्रकार के अण्डाणु उत्पन्न करती है जिनमें Z या W गुणसूत्र होते हैं। नर में शुक्राणु समान प्रकार के होते हैं।

अतः इन जीवों में लिंग निर्धारण मादा के W गुणसूत्र द्वारा होता है। जब नर का शुक्राणु मादा के z युग्मक से संलयन करता है तो ZZ युग्मनज बनता है जिससे नर संतति उत्पन्न होती है। यदि शुक्राणु मादा के w युग्मक से संलयन करता है तो ZW युग्मनज (zygote) बनता है जो मादा का विकास करता है। इस प्रकार की संतति में 1:1 अनुपात उत्पन्न होने की सम्भावना होती है।

प्रश्न 3.
कोई भी बच्चा वर्णान्ध नहीं पैदा हुआ जबकि उनके पिता वर्णान्ध थे। कारण सहित समझाइए। (2013)
उत्तर
जब एक वर्णान्ध पुरुष का विवाह एक सामान्य स्त्री से किया जाता है तो इन दोनों से उत्पन्न होने वाली सभी पुत्रियाँ वाहक होंगी इनमें वर्णान्धता के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं जबकि सभी पुत्र सामान्य होंगे। इसे निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है –
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प्रश्न 4.
हीमोफीलिया से ग्रसित एक पुरुष का विवाह एक सामान्य स्त्री से किया गया। उनकी संतानों में इस रोग की वंशागति को रेखाचित्र की सहायता से समझाइए। (2015)
उत्तर
यदि हीमोफीलिया से ग्रसित एक पुरुष किसी सामान्य स्त्री से विवाह करता है तो उनके सभी पुत्र सामान्य तथा सभी पुत्रियाँ रोग की वाहक होंगी।
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Daughters = All carriers
Sons = All normal

प्रश्न 5.
क्लाइनेफेल्टर्स सिण्ड्रोम किसे कहते हैं? यह कैसे बनते हैं? ऐसे मनुष्यों जिनमें यह उपस्थित है, के लक्षण लिखिए। (2015, 17)
या
लिंग गुणसूत्रीय ट्राइसोमी पर टिप्पणी लिखिए। (2016)
उत्तर
क्लाइनेफेल्टर्स सिण्ड्रोम – यह सिण्ड्रोम लिंग गुणसूत्रों की ट्राइसोमी के कारण होता है। इनमें XXY लिंग गुणसूत्र होते हैं। अत: इनमें 47 (44 + XXY) गुणसूत्र होते हैं। इनमें पुरुष व स्त्रियों के लक्षणों का मिश्रण पाया जाता है। Y-गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण इनका शरीर लम्बा व सामान्य पुरुषों जैसा होता है लेकिन अतिरिक्त x गुणसूत्र के कारण इनके वृषण तथा अन्य जननांग व जनन ग्रन्थियाँ अल्प-विकसित होती हैं। इसे हाइपोगोनेडिज्म (hypogonedism) कहते हैं। इनमें शुक्राणुओं का निर्माण नहीं होता अतः ये नर बंध्य (male sterile) होते हैं। स्त्रियों के समान इनके चेहरे और शरीर पर बाल कम होते हैं और स्त्रियों के समान स्तन भी विकसित हो जाते हैं। इसे गाइनोकोमेस्टिया (gynaecomastia) कहते हैं।

अमेरिकी वैज्ञानिक एच०एफ० क्लाइनेफेल्टर (H.E Klinefelter) ने सन् 1942 में इस प्रकार के असामान्य पुरुषों का वर्णन किया। लगभग 500 पुरुषों में से एक में क्लाइनेफेल्टर्स सिण्ड्रोम पाया जाता है।

ये असामान्य पुरुष असामान्य अण्डों (XX eggs) व सामान्य शुक्राणुओं (Y sperms) से या सामान्य अण्डों (X eggs) व असामान्य शुक्राणुओं (XY sperms) में निषेचन के फलस्वरूप बनते हैं। ये असामान्य अण्डे या शुक्राणु ४ गुणसूत्रों के अवियोजन (non-disjunction) से बनते हैं।

ऐसे क्लाइनेफेल्टर्स सिण्ड्रोम भी होते हैं जिनमें लिंग गुणसूत्रXYY या XXX या तीन से अधिक XXXY, XXXXY, XXXXXY होते हैं। XYY सिण्ड्रोम वाले पुरुष लम्बे, मूर्ख, कामुक और गुस्सैल एवं उग्र स्वभाव के अतिनर (supermales) होते हैं। इसके विपरीत XXX या XXXX वाली अतिमादाएँ (superfemale or metafemales) मूर्ख और बाँझ होती हैं। दो या दो से अधिक X-गुणसूत्र वाले सभी नर नपुंसक होते हैं।

प्रश्न 6.
डाउन सिण्ड्रोम किसे कहते हैं? इसके कारण एवं लक्षण बताइए। (2010)
या
‘मंगोलियन जड़ता क्या है? इसके दो प्रमुख लक्षण लिखिए। (2015)
या
डाउन्स सिण्ड्रोम के बारे में समझाइए। (2017)
उत्तर
डाउन सिण्ड्रोम
यह रोग गुणसूत्रों में संख्या की अनियमितता के कारण होने वाले परिवर्तनों से होता है। मनुष्य में कभी-कभी गुणसूत्रों (chromosomes) की संख्या 46 के स्थान पर 47 हो जाती है। यह अतिरिक्त गुणसूत्र 21वें समजात जोड़े में तीसरा बढ़ जाने के कारण होता है। इसे डाउन संलक्षण (Down’s syndrome) भी कहते हैं। यह अतिरिक्त गुणसूत्र बच्चे की बुद्धि के सामान्य विकास को रोक देता है। संख्या में अधिक गुणसूत्र का कारण प्रायः अण्ड कोशिका (egg cell) के निर्माण में होने वाली गड़बड़ी के कारण हो सकता है।

47 गुणसूत्रों वाली ऐसी सन्तान का मस्तिष्क अविकसित होता है; सिर गोल, होंठ नीचे की ओर को लटका रहता है, माथा अनावश्यक रूप से चौड़ा होता है; त्वचा खुरदरी होती है; आँखें तिरछी तथा पलकें वलित (folded) होती हैं और मुँह हर समय खुला रहता है। ये मन्द बुद्धि होते हैं। इनके जननांग तो सामान्य होते हैं किन्तु पुरुष नपुंसक होते हैं। इस आनुवंशिक रोग को मंगोलिक बेवकूफी या मंगोलियन जड़ता (Mangolian idiocy) भी कहते हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेंडल के नियमों की व्याख्या कीजिए। (2013)
या
मेंडलवाद पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए। (2014)
या
मेंडल के द्विगुण संकरण प्रयोग का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। (2013)
या
मेंडल के स्वतन्त्र अपव्यूहन के नियम को समझाइए। (2016, 17)
या
मेंडल का लक्षणों के पृथक्करण का नियम क्या है? इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम क्यों कहते हैं?
(2010, 17)
या
मेंडल के पृथक्करण के नियम का उपयुक्त रेखाचित्रों की सहायता से वर्णन कीजिए। (2018)
उत्तर
मेंडल के वंशागति के नियम
मेंडल ने अपने एकसंकर संकरण (monohybrid cross) तथा द्विसंकर संकरण (dihybrid cross) के पश्चात् जो निष्कर्ष निकाले उन्हें मेंडल के आनुवंशिकता के नियम कहते हैं। इनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है –
1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance) – “जब एक जोड़ा विपर्यासी लक्षणों को धारण करने वाले दो शुद्ध जनकों में परस्पर संकरण कराया जाता है तो उनकी संतानों में विरोधी में से केवल एक प्रभावी लक्षण परिलक्षित होता है और दूसरा अप्रभावी लक्षण व्यक्त नहीं हो पाता।”

उदाहरण – मटर के पौधे में ऊँचाई के गुण के दो विपर्यासी लक्षण लम्बापन (tallness) और बौनापन (dwarfness) पर विचार किया जाये तो शुद्ध लम्बे पौधों में लम्बाई के समयुग्मजी कारकों का जोड़ा होगा। लम्बे पौधों का जीनोटाइप TT होगा। इसी प्रकार शुद्ध बौने पौधों का जीनोटाइप tt होगा। जब लम्बे (TT) और बौने (tt) पौधों के बीच संकरण कराया जायेगा तो F1 पीढ़ी के सभी पौधों में जीनोटाइप (Tt) होगा अर्थात् एक कारक लम्बाई का (T) और दूसरा बौनेपन का (t) होगा। चूंकि T और t में से T प्रभावी है; अत: F1 पीढ़ी के सभी पौधे लम्बे होंगे।
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प्रभाविता के नियम के अनुसार निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं –

  1. लक्षणों का नियन्त्रण, नियन्त्रण इकाइयों द्वारा होता है जिन्हें कारक कहते हैं।
  2. कारक जोड़ों में पाये जाते हैं।
  3. असमान कारकों वाले जोड़े में एक सदस्य प्रभावी (dominant) होता है और दूसरा अप्रभावी (recessive) होता है।

2. कारकों के पृथक्करण या युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation or Law of Purity of Gametes) – लक्षण कारकों के प्रत्येक सजातीय जोड़े के दोनों कारक युग्मक बनाते समय पृथक् हो जाते हैं और इनमें से केवल एक सदस्य कारक ही किसी एक युग्मक में पहुँचता है।

जब परस्पर विरोधी शुद्ध आनुवंशिक लक्षणों वाले पौधों के बीच संकरण कराया जाता है, प्रथम पीढ़ी (F1) में केवल प्रभावी लक्षण ही प्रकट होते हैं परन्तु दूसरी पीढ़ी (F2) की संतानों में इन विपरीत लक्षणों का एक निश्चित अनुपात में पृथक्करण (segregation) हो जाता है। अतः इसे पृथक्करण का नियम (law of segregation) कहते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रथम पीढ़ी में साथ-साथ रहने के बावजूद भी गुणों का आपस में मिश्रण नहीं होता। युग्मक-निर्माण के समय ये गुण पृथक् हो जाते हैं और युग्मकों की शुद्धता बनी रहती है। इसीलिए, इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम (law of purity of gametes) भी कहते हैं।

उदाहरण – जब मटर के एक पौधे का जिसमें लाल पुष्प (red flower) होते हैं, सफेद पुष्प (white flower) से संकरण कराया जाता है तो F1 पीढ़ी में केवल लाल पुष्प वाले पौधे उत्पन्न होते हैं। अब यदि F1 पीढ़ी के पौधों में स्व-परागण (self-pollination) कराया जाता है। तो F2 पीढ़ी के पौधे दोनों प्रकार (लाल व सफेद पुष्प वाले) के उत्पन्न होते हैं। लाल एवं सफेद पुष्प वाले पौधों के बीच 3:1 को अनुपात पाया जाता है। लाल पुष्प वाले पौधे संख्या में 1/3 शुद्ध (pure) और 2/3 अशुद्ध या संकर (hybrid) होते हैं। अगली तीसरी पीढ़ी F3 में इनमें से एक-तिहाई अर्थात् 1/3 में केवल लाल पुष्प बनते हैं, शेष दो-तिहाई अर्थात् 2/3 लाल पुष्पों से अगली पीढ़ी में पुन: लाल व सफेद पुष्प बनते हैं।

जब लाल पुष्प वाले शुद्ध पौधे जिसके कारक RR हैं, का परागण सफेद पुष्प वाले पौधे जिसके कारक rr हैं, से कराया जाता है तब इनके युग्मक (gametes) R तथा r आपस में संयोजन करके F1 पीढ़ी के सभी लाल पुष्पों का निर्माण करते हैं क्योंकि कारक R लाल रंग की। अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक होता है। F1 पीढ़ी के सभी पौधों में R कारक उपस्थित होता है। और इसके प्रभावी होने के कारण कारक r अपनी अभिव्यक्ति प्रदर्शित नहीं कर पाता। अतः R प्रभावी तथा r अप्रभावी कारक है।

F1 पीढ़ी में प्राप्त चारों पौधे लाले पुष्प वाले होते हैं। जब F1 पीढ़ी के इन सभी पौधों में स्व-परागण कराया जाता है तो F2 पीढ़ी में रंग के अनुसार दो प्रकार के पौधे उत्पन्न होते हैं। अर्थात् लाल पुष्प वाले एवं सफेद पुष्प वाले पौधों के बीच क्रमशः 3 : 1 का अनुपात होता है। परन्तु कारक सिद्धांत के अनुसार दो पौधे शुद्ध (एक लाल पुष्प वाला तथा एक सफेद पुष्प वाला) जिसमें से एक में RR कारक तथा दूसरे में rr कारक होते हैं जो दोनों ही जनक लक्षणों के शुद्ध रूप होते हैं।

शेष दो पौधे मिश्रित लक्षण वाले अर्थात् Rr कारक वाले होते हैं। यद्यपि इसमें R के प्रभावी होने के कारण लक्षण प्रारूप (phenotype) लाल पुष्प वाले पौधे ही होते हैं। जब RR पौधे में स्व-परागण कराया जाता है तो अगली संतति में इससे लाल पुष्प वाले शुद्ध पौधे उत्पन्न होंगे। इसी प्रकार rr पौधे में स्व-परागण कराया जाए तो इसकी अगली पीढ़ी में सफेद पुष्प वाले शुद्ध पौधे प्राप्त होते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर F2 पीढ़ी में 3 लाल पुष्प वाले तथा 1 सफेद पुष्प वाला पौधा उत्पन्न होता है। इन प्रयोगों में मेंडल ने पाया कि कारक प्रभावी (dominant) या अप्रभावी (recessive) होते हैं परन्तु यह परिवर्तित नहीं होते हैं लेकिन समय आने पर अप्रभावी कारक पृथक् होकर अपनी अभिव्यक्ति दर्शाते हैं।

मेंडल के उपरोक्त पृथक्करण नियम (segregation law) को पुन्नेट वर्ग या चैकर बोर्ड (Punne’s square or Checker board) द्वारा नीचे प्रदर्शित किया गया है –
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-22
पृथक्करण के नियम के आधार पर मंडल ने भविष्यवाणी की थी कि लाल पुष्प वाले पौधों में एक-तिहाई ऐसे होंगे जो F3 पीढ़ी में केवल लाल पुष्प वाली संतति उत्पन्न करेंगे तथा दो-तिहाई ऐसे होंगे जिनकी संतति मिश्रित होगी, जिसमें लाल एवं सफेद पुष्प वाले पौधे 3 : 1 के अनुपात में होंगे। वास्तविक प्रयोगों से प्राप्त आँकड़े “लक्षणों के पृथक्करण’ (segregation of characters) के सैद्धान्तिक आधार पर अनुमानित परिणामों के पूर्णतः अनुरूप हैं।

3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment = Law of Free Recombination)-मेंडल ने अपने कुछ प्रयोगों में दो विपर्यासी लक्षणों को ध्यान में रखकर पर-परागण (cross pollination) अर्थात् संकरण कराया जिसे द्विगुण संकरण (dihybrid cross) कहते हैं। इस नियम के अनुसार जब दो जोड़ी विपर्यासी लक्षणों वाले पौधों के बीच संकरण कराया जाता है तो इन लक्षणों का पृथक्करण स्वतंत्र रूप से होता है अर्थात् एक लक्षण की वंशागति दूसरे को प्रभावित नहीं करती है।”

उदाहरण – मेंडल ने मटर के दो विपर्यासी लक्षण, बीजों के आकार तथा इनके रंग का चयन किया। मंडल ने अपने प्रयोग में गोल (round) तथा पीले (yellow) बीज वाले पौधों का संकरण (cross), झुर्रादार (wrinkled) तथा हरे (green) बीज वाले पौधों से कराया। पर-परागण द्वारा प्राप्त F1 पीढ़ी में उत्पन्न पौधों से प्राप्त सभी बीज गोल तथा पीले रंग के पाए गए क्योंकि गोल आकृति एवं पीला रंग, झुरींदार आकृति एवं हरे रंग पर प्रभावी थे। झुरींदार आकृति एवं हरा रंग अप्रभावी होने के कारण छिपे रहते हैं।

जब F1 पीढ़ी के पौधों में स्व-परागण (self-pollination) कराया जाता है तो F2 पीढ़ी में निम्न चार प्रकार के बीज उत्पन्न करने वाले पौधे बनते हैं –

  • गोल तथा पीले (Round and yellow)
  • झुरींदार तथा पीले (Wrinkled and yellow)
  • गोल तथा हरे (Round and green)
  • झुरींदार तथा हरे (Wrinkled and green)

जब जनक पीढ़ी में गोल व पीले (round and yellow) बीज वाले पौधों तथा झुरींदार व हरे (wrinkled and green) बीज वाले पौधों के बीच संकरण कराया जाता है तो जनक पीढ़ी के कारक RRYY गोल तथा पीले (round and yellow) के लिए तथा ryy झुरींदार तथा हरे (wrinkled and green) के लिए अपने युग्मक (gametes) Ry तथा ry बनाते हैं। ये युग्मक प्रथम पीढ़ी (F1) में सभी गोल तथा पीले बीज वाले पौधे उत्पन्न करते हैं क्योंकि इसमें RY कारक है जो गोल तथा पीले गुण के लिए प्रभावी (dominant) है।

F1 पीढ़ी के पौधों में स्व-परागण (self-pollination) कराने पर उससे चार प्रकार के बीज बनते हैं–हरे व झुरींदार, हरे व गोल, गोल व पीले तथा पीले व झुरींदार। इससे यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि आनुवंशिक लक्षण स्वतंत्र होते हैं। चूंकि पीला रंग सदा गोल बीजों के साथ ही नहीं वरन् झुर्रादार बीजों के साथ भी आता है अथवा हरा रंग सदा झुरींदार बीजों के साथ ही नहीं वरन् गोल बीजों के साथ भी आता है।

F1 पीढ़ी के सभी पौधों में युग्मक बनने पर चार प्रकार के युग्मक क्रमशः RY, Ry, rY तथा ry बनते हैं। जब ये युग्मक दूसरे पौधों के इसी प्रकार के युग्मकों से मिलते हैं तो निम्न प्रकार के परिणाम प्राप्त होते हैं –
लक्षण प्रारूपी अनुपात (Phenotype Ratio)

  • 9 पौधे गोल व पीले बीज वाले
  • 3 पौधे गोल व हरे बीज वाले
  • 3 पौधे झुर्रादार व पीले बीज वाले तथा
  • 1 पौधा झुरींदार व हरे बीज वाला

उपरोक्त चारों प्रकार के पौधों के लक्षण प्रारूप को 9:3:3:1 के अनुपात द्वारा भी प्रदर्शित किया जा सकता है जबकि कारक (factor) के आधार पर जीनप्रारूपी अनुपात (genotypic ratio) निम्न प्रकार होता है –
1. गोल तथा पीले बीज वाले पौधे (Round and Yellow Seeded Plants) – जो संख्या में 9 होते हैं, केवल RY के प्रभावी (dominant) होने के आधार पर होते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं –

  • 4 पौधे RY ry कारक वाले
  • 2 पौधे RY Ry कारक वाले
  • 2 पौधे RY rY कारक वाले
  • 1 पौधा RY RY कारक वाला

इस प्रकार 9 पीले व गोल बीज वाले पौधे कारकों के आधार पर 2: 2:2: 2:1 का अनुपात रखते हैं।

2. पीले तथा झूदार बीज वाले पौधे (Yellow and Wrinkled Seeded Plants) – जो संख्या में 3 होते हैं, केवल rY के प्रभावी (dominant) होने के आधार पर होते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं –

  • 2 पौधे ry rY कारक (factor) वाले
  • 1 पौधा rY ry कारक वाला

इस प्रकार 3 झुरौंदार पीले बीजों वाले पौधे कारकों के आधार पर 2:1 का अनुपात रखते हैं।

3. गोल तथा हरे बीज वाले पौधे (Round and Green Seeded Plants) – Ry कारकों के प्रभावी (dominant) होने के आधार पर होते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं –

  • 2 पौधे Ry ry कारक (factor) वाले
  • 1 पौधा Ry Ry कारक वाला

इस प्रकार 3 गोल तथा हरे बीज वाले पौधे कारकों के आधार पर 2:1 का अनुपात रखते हैं।

4. झुर्सदार तथा हरे बीज वाला पौधा (Wrinkled and Green Seeded Plants) – केवल एक ही बनता है। इसमें ryry कारक होते हैं। यदि लक्षणों के दोनों युग्म एक-दूसरे से स्वतंत्र रहकर व्यवहार करें तो भी उनसे उपरोक्त परिणामों की अपेक्षा होगी। यदि अलग-अलग लक्षण 3:1 के अनुपात में विसंयोजित होते हैं तो प्रायिकता का सिद्धांत (theory of probability) लागू होगा। इस सिद्धांत के अनुसार दो या दो
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से अधिक स्वतंत्र लक्षणों के एक साथ पाये जाने की सम्भावना उनके अलग-अलग पाये जाने की सम्भावनाओं का गुणनफल होगा। ऊपर वर्णित किये गये चारों संयोजनों (combinations) या लक्षण प्रारूपों (phenotype) के पाये जाने की सम्भावनाओं की गणना इस आधार पर की जा सकती हैं कि प्रत्येक लक्षण के लिए संतति का 3/4 भाग प्रभावी और 1/4 भाग अप्रभावी होता है।

प्रश्न 2.
गुणात्मक विकल्पी (बहु-विकल्पी) से आप क्या समझते हैं? मानव में रुधिर वर्गों के प्रकार एवं उनकी वंशागति का वर्णन कीजिए। (2015, 17)
या
एबीओ रुधिर वर्ग की विस्तृत विवेचना कीजिए तथा उनकी वंशागति समझाइए। (2017)
उत्तर
बहु-विकल्पी (गुणात्मक विकल्पी)
बहु-विकल्पी तीन, चार अथवा अधिक युग्मविकल्पियों का वह सेट (set) है जो सामान्य जीन में उत्परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और सजातीय गुणसूत्रों (homologous chromosomes) में उसी बिन्दु पथ (loci) पर स्थित रहते हैं। वास्तव में बहु-विकल्पी एक सामान्य जीन की विभिन्न अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरण – मानव में रुधिर वर्ग (Blood Groups in Man)-मनुष्यों में रुधिर वर्गों की वंशागति बहु-विकल्पता का उदाहरण है। मनुष्य की आबादी में चार प्रकार के रुधिर वर्ग (blood group) A, B, AB तथा 0 पाए जाते हैं। इनकी खोज कार्ल लैण्डस्टीनर (Karl Landsteiner, 1902) ने की थी। रुधिर वर्गों का वर्गीकरण RBCs की कोशिका कला पर स्थित विशेष प्रोटीन पदार्थ या ग्लाइकोप्रोटीन (glycoproteins) पर निर्धारित होता है। इनको एन्टीजन अथवा एग्लूटीनोजन (Antigen or agglutinogens) कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-A तथा B.

  1. A रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों में होता है – प्रतिजन A (Antigen A)
  2. B रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों में होता है – प्रतिजन B (Antigen B)।
  3. AB रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों में होता है – प्रतिजन A तथा प्रतिजन B (Antigen A and Antigen B)।
  4. O रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों में कोई प्रतिजन (Antigen) नहीं होता है।

मनुष्यों के रुधिर प्लाज्मा में इन प्रतिजनों के प्रति विशिष्ट प्रोटीन्स पाए जाते हैं। इन्हें प्रतिरक्षी (antibodies) या एग्लूटीनिन्स (aglutinins) कहते हैं। ये भी दो प्रकार के होते हैं। इन्हें Anti-A या a तथा Anti-B या b द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

  1. A रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों के प्लाज्मा में होती है-प्रतिरक्षी B या b
  2. B रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों के प्लाज्मा में होती है-प्रतिरक्षी A या a
  3. AB रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों के प्लाज्मा में कोई प्रतिरक्षी नहीं होता है।
  4. 0 रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों के प्लाज्मा में A तथा B दोनों प्रतिरक्षी होते हैं।

निम्नांकित तालिका में मनुष्य के विभिन्न रुधिर वर्गों तथा उनमें पाए जाने वाले प्रतिरक्षी और प्रतिजनों को प्रदर्शित किया गया है –
तालिका : रुधिर वर्ग तथा उसमें पाये जाने वाले प्रतिजन व प्रतिरक्षी
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ABO रुधिर वर्गों की वंशागति (Inheritance of ABO Blood Groups) – बर्नस्टीन (Bernstein, 1924-1925) ने ABO रुधिर वर्गों की वंशागति का पता लगाया। इसके अनुसार –

  1. O रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों की जीनी संरचना – l°l°
  2. A रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों की जीनी संरचना – LA lo या LA LA
  3. B रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों की जीनी संरचना – LB lo या LB LB
  4. AB रुधिर वर्ग वाले व्यक्तियों की जीनी संरचना – LA LB

इसका अभिप्राय है कि ABO रुधिर वर्गों की वंशागति के लिए लोकस (locus) पर दो अन्य एलील A व B भी पाए जाते हैं। इनको बहु-विकल्पी एलील्स (multiple alleles) कहते हैं। इन्हें l°, LA तथा LB द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इनमें से एलील A तथा एलील B, l° के प्रति प्रभावी (dominant) हैं। किंतु LA और LB ऐलील सह-प्रभावी (co-dominant) हैं अर्थात् एक साथ होने पर दोनों ही स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं।

  1. एलील A या LA की उपस्थिति में A प्रतिजन बनता है।
  2. एलील B या LB की उपस्थिति में B प्रतिजन बनता है।
  3. एलील A तथा एलील B (LA LB) की उपस्थिति में दोनों, प्रतिजन A तथा प्रतिजन B बनते हैं।
  4. केवल एलील l° की उपस्थिति या LA व LB की अनुपस्थिति में कोई प्रतिजन नहीं बनता है।

ABO रुधिर वर्गों की वंशागति का चित्रात्मक निरूपण निम्न प्रकार किया जा सकता है –
1. रुधिर वर्ग A के लिए समयुग्मजी पुरुष द्वारा 0 रुधिर वर्ग वाली स्त्री (अथवा इसके विपरीत) से विवाह करने पर इनकी संतानों में A रुधिर वर्ग होगा।
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2. रुधिर वर्ग B के लिए समयुग्मजी पुरुष द्वारा 0 रुधिर वर्ग की स्त्री (या इसके विपरीत) से विवाह करने पर इनकी सभी संतानों में B रुधिर वर्ग होगा।
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3. A रुधिर वर्ग के लिए समयुग्मजी पुरुष द्वारा B रुधिर वर्ग की समयुग्मजी स्त्री से विवाह करने पर संतानें AB रुधिर वर्ग वाली होंगी।
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4. AB रुधिर वर्ग वाले पुरुष द्वारा AB रुधिर वर्ग वाली स्त्री से विवाह करने पर 25% संतानें A रुधिर वर्ग की, 50% AB रुधिर वर्ग की तथा 25% संतानें B रुधिर वर्ग की होंगी।
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5. विषमयुग्मजी A तथा B रुधिर वर्ग वाले स्त्री-पुरुषों से उत्पन्न संतानों में चारों प्रकार की संतानें 1:1:1:1 के अनुपात में उत्पन्न होने की सम्भावना है।
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6. अगर स्त्री व पुरुष के रुधिर वर्ग क्रमश: AB तथा ० हैं तो इनकी संतानों में केवल A अथवा B रुधिर वर्ग की सम्भावना होती है।
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प्रश्न 3.
लिंग सहलग्न लक्षण से आप क्या समझते हैं? मनुष्य में किन्हीं दो लिंग सहलग्न लक्षणों की वंशागति का वर्णन रेखाचित्रों की सहायता से कीजिए। (2011, 12, 13, 14, 15, 18)
या
लिंग सहलग्न वंशागति क्या है ? मनुष्य में लिंग सहलग्न लक्षणों की वंशागति का रेखाचित्रों की सहायता से वर्णन कीजिए। (2010, 14, 17, 18)
या
मनुष्य में लिंग सहलग्न वंशागति का उदाहरण सहित विस्तृत वर्णन कीजिए। (2010)
या
लिंग सहलग्न लक्षणों पर टिप्पणी लिखिए। (2013, 16)
या
वर्णान्धता क्या है? मनुष्य में वर्णान्धता की वंशागति का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (2015)
या
लिंग-सहलग्न लक्षण (विशेषक) किसे कहते हैं? लिंग प्रभावित और लिंग-सीमित लक्षणों में उदाहरणों सहित अन्तर बताइए। मनुष्य में किसी एक लिंग-सहलग्न लक्षण की वंशागति का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर
लिंग सहलग्न लक्षण तथा इनकी वंशागति
प्राय: लिंग गुणसूत्रों पर लक्षणों के जो जीन्स होते हैं उनका सम्बन्ध लैंगिक गुणों (sexual characters) से होता है। ये जीन्स ही जन्तु में लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) के लिए जिम्मेदार (responsible) होते हैं, फिर भी जन्तुओं का यह गुण अत्यन्त जटिल तथा व्यापक होता है। और इसे निर्मित करने के लिए अनेक ऑटोसोमल जीन्स (autosomal genes) भी प्रभावी होते हैं। दूसरी ओर लिंग गुणसूत्रों पर कुछ जीन्स लैंगिक लक्षणों के अतिरिक्त अन्य लक्षणों वाले अर्थात् कायिक या दैहिक (somatic) लक्षणों वाले भी होते हैं। ये लिंग सहलग्न जीन्स (sex linked genes) कहलाते हैं, जो लिंग सहलग्न लक्षण (sex linked characters) उत्पन्न करते हैं। इनकी वंशागति लिंग सहलग्न वंशागति (sex linked inheritance) अथवा लिंग सहलग्नता (sex linkage) कहलाती है। मनुष्य में इस प्रकार के लगभग 120 लक्षणों की वंशागति पायी गयी है।

मनुष्य में लिंग निर्धारित करने वाले गुणसूत्र X तथा Y गुणसूत्र कहलाते हैं। यद्यपि इनकी संरचना में भिन्नता दिखायी देती है, फिर भी वर्तमान जानकारी के अनुसार इन गुणसूत्रों में कुछ भाग समजात (homologous) होता है जो अर्द्धसूत्री विभाजन के समय सूत्रयुग्मन (synapsis) करते हैं, अन्यथा शेष भाग असमजात (non-homologous) होता है। उपर्युक्त आधार पर लिंग सहलग्न लक्षण तीन प्रकार के हो सकते हैं –

1. X-सहलग्न लक्षण (X-Linked Characters) – x-गुणसूत्रों के असमजात खण्डों पर इनके लक्षणों के जीन्स स्थित होते हैं। Y-गुणसूत्र पर इनका युग्म विकल्पी (allele) नहीं होता है। वंशागति में ये लक्षण पुत्रों को केवल माता से तथा पुत्रियों को माता व पिता दोनों से प्राप्त हो। सकते हैं। इन्हें डाइण्डुिक (diandric) लिंग सहलग्न लक्षण कहा जाता है; जैसे—वर्णान्धता (colour blindness), रतौंधी (night blindness) तथा हीमोफीलिया (haemophilia)।

2. Y-सहलग्न लक्षण (Y-Linked Characters) – इसके जीन्स Y-गुणसूत्रों के असमजात खण्डों पर स्थित होते हैं। इस प्रकार सहयोगी X-गुणसूत्रों पर इनके एलील्स (alleles) नहीं पाये जाते; अतः प्रत्येक सन्तति में पिता से केवल पुत्रों तक ही जाते हैं। इन्हें होलेण्डुिक लिंग सहलग्न गुण (holandric sex linked characters) भी कहते हैं तथा इनकी वंशागति को होलैण्डूिक वंशागति (holandric inheritance) कहा जाता है। उदाहरणार्थ- कर्णपल्लवों की हाइपरट्राइकोसिस (hypertrichosis of ears)

3. XY-सहलग्न लक्षण (XY-Linked Characters) – इनके जीन्स एलील्स के रूप में X एवं Y गुणसूत्रों के समजात खण्डों पर स्थित होते हैं; अतः इनकी वंशागति पुत्रों एवं पुत्रियों में सामान्य ऑटोसोमल लक्षणों (autosomal characters) की भाँति होती है। इन्हें अपूर्ण लिंग सहलग्न लक्षण (incomplete sex linked characters) भी कहा जाता है।

लिंग-प्रभावित लक्षण
मानव के कुछ ऐसे लक्षण भी होते हैं जिनके जीन तो ऑटोसोम्स पर होते हैं, परन्तु विकास व्यक्ति के लिंग से प्रभावित होता है। दूसरे शब्दों में, पुरुष और स्त्री में जीनरूप (genotype) समान होते हुए भी दृश्यरूप (phenotype) भिन्न होता है।

मानवों में गंजापन (baldness) काफी होता है। यह विकिरण (radiation) तथा थाइरॉइड ग्रन्थि की अनियमितताओं के कारण भी हो सकता है और आनुवंशिक भी। आनुवंशिक गंजापन एक ऑटोसोमल ऐलीली जीन जोड़ी (B, b) पर निर्भर करता है। समयुग्मजी अर्थात् होमोजाइगस प्रबल जीनरूप (BB) हो तो गंजापन पुरुषों और स्त्रियों दोनों में विकसित होता है, लेकिन विषमयुग्मजी अर्थात् हिटरोजाइगस जीनरूप (Bb) होने पर यह स्त्रियों में नहीं केवल पुरुषों में विकसित होता है, क्योंकि इस जीनरूप में इसके विकास के लिए नर हॉर्मोन्स का होना आवश्यक होता है। समयुग्मजी अर्थात् होमोजाइगस सुप्त जीनरूप (bb) में गंजापन नहीं होता।

लिंग-सीमित लक्षण
ऐसे आनुवंशिक लक्षणों के जीन भी ऑटोसोम्स में होते हैं। इनकी वंशागति सामान्य मेंडेलियन पद्धति के अनुसार होती है, लेकिन इनका विकास पीढ़ी-दर-पीढ़ी केवल एक ही लिंग के सदस्यों में होता है। गाय, भैंस आदि में दुग्ध का स्रावण, भेड़ों की कुछ जातियों में केवल नर में सींगों का विकास, मानव में दाढ़ी-मूंछ आदि लक्षण ऐसे ही होते हैं।
प्रायः दो प्रकार के लिंग सहलग्न रोगों का अध्ययन भली-भाँति हुआ है तथा इनकी वंशागति इस प्रकार से होती है –

उदाहरण – (i) वर्णान्धता की वंशागति (Inheritance of Colour Blindness)-वर्णान्धता से पीड़ित व्यक्ति प्रायः लाल वे हरे रंग में अन्तर नहीं कर पाते; अत: इस रोग को लाल-हरा अन्धापन (red-green blindness) भी कहा जाता है। प्रोटॉन दोष अथवा डाल्टॉनिज्म (proton defect or daltonism) इस रोग के अन्य नाम हैं। इस रोग के कारण चित्रकार, पेण्टर, वाहन चालक आदि अत्यधिक कठिनाई का अनुभव करते हैं। इस रोग का जीन अप्रभावी (recessive) होता है तथा लिंग गुणसूत्रों में से X-गुणसूत्र पर स्थित होता है। Y-गुणसूत्र पर इसका एलील नहीं पाया जाता। एक वर्णान्ध पुरुष और एक सामान्य स्त्री की सभी सन्ताने सामान्य होती हैं, परन्तु पुत्रियों में एक X-गुणसूत्र पर पिता का वर्णान्धता का अप्रभावी जीन पहुँचता है;

अतः ये इस जीन के वाहक (carrier) का कार्य करती हैं। एक सामान्य पुरुष तथा एक वाहक स्त्री की सन्तानों में केवल लड़कों में वर्णान्धता विकसित होती है तथा एक x-गुणसूत्र पर वर्णान्धता का जीन होने पर भी लड़कियों में यह रोग नहीं होता, परन्तु ये वाहक का कार्य करती हैं। एक अन्य स्थिति में यदि एक वाहक स्त्री एक वर्णान्ध पुरुष के साथ सहवास करती है तो होने वाली सन्तानों में आधे पुत्र वर्णान्ध व आधे सामान्य होंगे तथा आधी पुत्रियाँ वर्णान्ध व आधी पुत्रियाँ वाहक होंगी। इस प्रकार निम्नांकित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं –
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  1. स्त्रियाँ तभी वर्णान्ध होती हैं, जबकि स्वर्णान्धता के जीन दोनों (XX) गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं। क्योंकि वर्णान्धता का जीन अप्रभावी होता है और सामान्य स्थिति में X-गुणसूत्र पर इसका प्रभावी रोग को रोकने वाला जीन होता है।
  2. केवल एक ‘x’ गुणसूत्र पर वर्णान्धता का जीन स्थित होने पर स्त्री केवल वाहक का कार्य करती है।
  3. पुरुष में ‘x’ गुणसूत्र केवल एक ही होता है; अतः उस पर वर्णान्धता का जीन होने पर वह वर्णान्ध होता है।
  4. स्त्रियों में यह रोग लगभग 1-2% ही होता है।

उदाहरण – (ii) हीमोफीलिया की वंशागत (Inheritance of Haemophilia) – हीमोफीलिया (haemophilia) एक लिंग सहलग्न रोग है। इसके लक्षण ४ लिंग क्रोमोसोम में सहलग्न होते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहते हैं। हीमोफीलिया रोग प्रायः पुरुषों में होता है परन्तु स्त्रियों द्वारा पुत्रों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाया जाता रहता है। इस रोग के रोगी को चोट लगने पर रुधिर का थक्का नहीं बनता, रुधिर निरन्तर बहता रहता है जिससे अधिक रुधिर बहने से रोगी की मृत्यु होने की सम्भावना रहती है।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 5 Principles of Inheritance and Variation img-32
हीमोफीलिया के जीन्स रखने वाली स्त्री या वाहक (carrier) जब एक सामान्य पुरुष (normal man) से विवाह करती है तो उनकी सन्तानों में पुत्रियाँ सामान्य अथवा हीमोफीलिया की वाहक होंगी। इनमें यह रोग स्पष्ट नहीं होता क्योंकि हीमोफीलिया के जीन्स अप्रभावी होते हैं, किन्तु पुत्र (सभी पुत्र नहीं) में हीमोफीलिया रोग के लक्षण हो सकते हैं। पुत्र वाहक नहीं हो सकते हैं।

दोनों जीन्स हीमोफीलिया के होने पर स्त्री प्रायः जीवित नहीं रह सकती फिर भी उससे सम्भावित सन्तानों में लड़के सभी हीमोफीलिक होंगे किन्तु सभी लड़कियाँ वाहक होती हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 4 Reproductive Health

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Reproductive Health
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 4 Reproductive Health (जनन स्वास्थ्य)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समाज में जनन स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर
समाज में जनन स्वास्थ्य का अर्थ स्वस्थ जनन अंगों व उनकी सामान्य कार्यप्रणाली से है। अतः जनन स्वास्थ्य का मतलब ऐसे समाज से है जिसके व्यक्तियों के जननअंग शारीरिक व क्रियात्मक रूप से पूर्णरूपेण स्वस्थ हों। लोगों को यौन शिक्षा के द्वारा उचित जानकारी मिलती है जिससे समाज में यौन सम्बन्धों के प्रति फैली कुरीतियाँ व भ्रांतियाँ खत्म होती हैं। जनन स्वास्थ्य के अन्तर्गत लोगों को विभिन्न प्रकार के यौन-संचारित रोगों, परिवार नियोजन के उपायों, छोटे परिवार के लाभ, सुरक्षित यौन सम्बन्ध आदि के प्रति जागरूक किया जाता है। गर्भावस्था के दौरान माता की देखभाल, प्रसवोत्तर माती व शिशु की देखभाल, शिशु के लिए स्तनपान का महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण जानकारियों के आधार पर स्वस्थ व जागरूक परिवार बनेंगे। विद्यालय व शिक्षण संस्थानों में प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य तथा यौन शिक्षा से आने वाली पीढ़ी सुलझी विचारधारा वाली होगी जिससे हमारा समाज व देश सशक्त होगा।

प्रश्न 2.
जनन स्वास्थ्य के उन पहलुओं को सुझाएँ जिन पर आज के परिदृश्य में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
उत्तर
जनन स्वास्थ्य के प्रमुख पहलू जिन पर आज के परिदृश्य में विशेष ध्यान देने की जरूरत है, इस प्रकार हैं –

  1. सुरक्षित व संतोषजनक जननिक स्वास्थ्य।
  2. जनता को जनन सम्बन्धी पहलुओं के प्रति जागरूक करना।
  3. विद्यालयों में यौन-शिक्षा प्रदान करना।
  4. लोगों को यौन संचारित रोगों, किशोरावस्था सम्बन्धी बदलावों व समस्याओं के बारे में जानकारी देना।
  5. जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणामों से अवगत कराना।
  6. गर्भपात, गर्भ निरोधक, आर्तव चक्र, बाँझपन सम्बन्धी समस्याएँ।
  7. मादा भ्रूण हत्या के लिए उल्वबेधन का दुरुपयोग आदि।

प्रश्न 3.
क्या विद्यालयों में यौन शिक्षा आवश्यक है? यदि हाँ, तो क्यों?
उत्तर
विद्यालयों में यौन शिक्षा अति आवश्यक है क्योंकि इससे छात्रों को किशोरावस्था सम्बन्धी परिवर्तनों व समस्याओं के निदान की सही जानकारी मिलेगी। यौन शिक्षा से उन्हें यौन सम्बन्ध के प्रति भ्रांतियाँ व मिथ्य धारणाओं को खत्म करने में सहायता मिलेगी; इसके साथ-साथ उन्हें सुरक्षित यौन सम्बन्ध, गर्भ निरोधकों का प्रयोग, यौन संचारित रोगों, उनसे बचाव व निदान की जानकारी प्राप्त होगी। इसके परिणामस्वरूप आने वाली पीढ़ी भावनात्मक व मानसिक रूप से समृद्ध होगी।

प्रश्न 4.
क्या आप मानते हैं कि पिछले 50 वर्षों के दौरान हमारे देश के जनन स्वास्थ्य में सुधार हुआ है? यदि हाँ, तो इस प्रकार के सुधार वाले कुछ क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
पिछले 50 वर्षों के दौरान निश्चित ही हमारे देश के जनन स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। इस प्रकार के सुधार वाले कुछ क्षेत्र निम्न हैं –

  1. शिशु व मातृ मृत्यु दर घटी है।
  2. यौन संचारित रोगों की शीघ्र पहचान व उनका समुचित उपचार।
  3. बन्ध्य दम्पतियों को विभिन्न तकनीकियों द्वारा संतान लाभ।
  4. बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ व जीवन स्तर।
  5. विभिन्न प्रकार के गर्भ निरोधकों की खोज व उपलब्धता।
  6. चिकित्सीय सहायता युक्त सुरक्षित प्रसव।
  7. लघु परिवारों के लिए प्राथमिकता।
  8. यौन सम्बन्धी मुद्दों पर बढ़ती हुई जागरूकता।
  9. बढ़ती जनसंख्या के नियन्त्रण हेतु प्रयासरत सरकार व आम जनता।

प्रश्न 5.
जनसंख्या विस्फोट के कौन-से कारण हैं?
उत्तर
जनसंख्या विस्फोट
विश्व की आबादी 2 व्यक्ति प्रति सेकण्ड या 2,00,000 व्यक्ति प्रतिदिन या 60 लाख व्यक्ति प्रतिमाह या लगभग 7 करोड़ प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है। आबादी में इस तीव्रगति से वृद्धि को जनसंख्या विस्फोट कहते हैं। यह मृत्युदर में कमी और जन्मदर में वांछित कमी न आने के कारण होता है।

जनसंख्या में वृद्धि एवं इसके कारण
किसी भी क्षेत्र में एक निश्चित समय में बढ़ी हुई आबादी या जनसंख्या को जनसंख्या वृद्धि कहते हैं। जनसंख्या वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं –

  1. स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण शिशु मृत्युदर (Infant Mortality Rate-IMR) एवं मातृ मृत्युदर (Matermal Mortality Rate-MMR) में कमी आई है।
  2. जनन योग्य व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि का होना।
  3. अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं के कारण जीवन स्तर में सुधार होना।
  4. अशिक्षा के कारण व्यक्तियों को परिवार नियोजन के साधनों का ज्ञान न होना और परिवार नियोजन के तरीकों को पूर्ण रूप से न अपनाया जाना।
  5. वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति के कारण खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि।
  6. सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों द्वारा अनेक महामारियों का समूल रूप से निवारण होना।
  7. निम्न सामाजिक स्तर के कारण अधिकांश निर्धन व्यक्ति यह विश्वास करता है कि जितने अधिक बच्चे होंगे, वे काम करके अधिक धनोपार्जन करेंगे।
  8. सामाजिक रीति-रिवाजों के कारण पुत्र प्राप्ति की चाह में दम्पति सन्तान उत्पन्न करते रहते हैं।

प्रश्न 6.
क्या गर्भ निरोधकों का उपयोग न्यायोचित है? कारण बताएँ।
उत्तर
विश्व की बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के गर्भ-निरोधकों का प्रयोग किया जाता है। कंडोम जैसे गर्भ निरोधक से न सिर्फ सगर्भता से बचा जा सकता है बल्कि यह अनेक यौन संचारित रोगों व संक्रमणों से भी बचाव करता है। गर्भ निरोधक के प्रयोग द्वारा किसी भी प्रकार के अवांछनीय परिणाम से बचा जा सकता है या उसे रोका जा सकता है। विश्व के अधिकांश दम्पति गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करते हैं। गर्भनिरोधकों के इन सभी महत्त्वों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इनका उपयोग न्यायोचित है।

प्रश्न 7.
जनन ग्रन्थि को हटाना गर्भ निरोधकों का विकल्प नहीं माना जा सकता है, क्यों?
उत्तर
गर्भ निरोधक के अन्तर्गत वे सभी युक्तियाँ आती हैं जिनके द्वारा अवांछनीय गर्भ को रोका जा सकता है। गर्भ निरोधक पूर्ण रूप से ऐच्छिक व उत्क्रमणीय होते हैं, व्यक्ति अपनी इच्छानुसार इनका प्रयोग बन्द करके, गर्भधारण कर सकता है। इसके विपरीत जनन ग्रन्थि को हटाने पर शुक्राणु व अण्डाणुओं का निर्माण स्थायी रूप से खत्म हो जाता है अर्थात् ये उत्क्रमणीय नहीं होते हैं। एक बार जनन ग्रन्थि के हटाने पर पुनः गर्भधारण करना असंभव होता है।

प्रश्न 8.
उल्वबेधन एक घातक लिंग निर्धारण (जाँच) प्रक्रिया है, जो हमारे देश में निषेधित है। क्या यह आवश्यक होना चाहिए? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
उल्वबेधन एक ऐसी तकनीक है जिसके अन्तर्गत माता के गर्भ में से एम्नियोटिक द्रव (amniotic fluid) का कुछ भाग सीरिंज द्वारा बाहर निकाला जाता है। इस द्रव में फीट्स की कोशिकाएँ होती हैं जिसके गुणसूत्रों का विश्लेषण करके भ्रूण की लिंग जाँच, आनुवांशिक संरचना, आनुवांशिक विकार व उपापचयी विकारों का पता लगाया जा सकता है। अत: इस जाँच प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य होने वाली संतान में किसी भी संभावित विकलांगता अथवा विकार का पता लगाना है जिससे माता को गर्भपात कराने का आधार मिल सके।

किन्तु आजकल इस तकनीक का दुरुपयोग भ्रूण लिंग ज्ञात करके, मादा भ्रूण हत्या के लिए हो रहा है। इसके फलस्वरूप हमारे देश का लिंगानुपात असंतुलित होता जा रहा है। मादा भ्रूण के सामान्य होने पर भी गर्भपात कर दिया जाता है क्योंकि अभी भी हमारे समाज में पुत्र जन्म को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसा गर्भपात एक बच्चे की हत्या के समतुल्य है, अतः उल्वबेधन पर कानूनी प्रतिबन्ध लगाना अति आवश्यक है।

प्रश्न 9.
बन्ध्य दम्पतियों को संतान पाने हेतु सहायता देने वाली कुछ विधियाँ बताइए।
उत्तर
बन्ध्य दम्पतियों को संतान प्राप्ति हेतु सहायता देने के लिए निम्न विधियाँ हैं –
1. परखनली शिशु (Test Tube Baby) – इसके अन्तर्गत शुक्राणु व अण्डाणुओं को इन विट्रो निषेचन कराया जाता है। तत्पश्चात् भ्रूण को सामान्य स्त्री के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। स्त्री के गर्भ में गर्भकाल की अवधि पूर्ण होने पर सामान्य रूप से शिशु का जन्म होता है।

2. युग्मक अन्तः फैलोपियन स्थानान्तरण (Gamete Intra- Fallopian Transfer) – इस विधि का प्रयोग उन महिलाओं पर किया जाता है, जो लम्बे समय से बन्ध्य हैं। इसके अन्तर्गत लेप्रोस्कोप की सहायता से फैलोपियन नलिका के एम्पुला में शुक्राणु व अण्डाणुओं का निषेचन कराया जाता है।

3. अन्तःकोशिकाद्रव्यीय शुक्राणु बेधन (Intra-Cytoplasmic Sperm Injection) – इसके अन्तर्गत शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में सम्बन्धित माध्यम में रखकर प्रत्यक्ष ही अण्डाणु में बेध दिया जाता है। तत्पश्चात् भ्रूण या युग्मनज को स्त्री के गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है।

4. कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Inseminaion) – इसका प्रयोग उन पुरुषों पर किया जाता है। जिनमें शुक्राणुओं की कमी होती है। इस विधि मे पुरुष के वीर्य को एकत्रित करके स्त्री की योनि में स्थापित कर दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त निसंतान दम्पति, अनाथ व आश्रयहीन बच्चों को कानूनी रूप से गोद ले सकते हैं।

प्रश्न 10.
किसी व्यक्ति को यौन संचारित रोगों के सम्पर्क में आने से बचने के लिए कौन-से उपाय अपनाने चाहिए?
उत्तर
यौन संचारित रोग यौन सम्बन्धों के द्वारा संचारित व अति संक्रामक होते हैं। इन रोगों से बचने के लिए निम्न उपाय अपनाने चाहिए –

  1. सहवास के दौरान कंडोम का प्रयोग करें।
  2. समलैंगिकता से दूर रहें।
  3. परगामी व्यक्ति से यौन सम्बन्ध न बनायें।
  4. वेश्यावृत्ति से दूर रहें।
  5. किसी भी प्रकार की यौन समस्या होने पर कुशल चिकित्सक से परामर्श लें।
  6. अनजान व्यक्ति से यौन सम्बन्ध न बनाये।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित वाक्य सही हैं या गलत, व्याख्या सहित बताएँ –

  1. गर्भपात स्वतः भी हो सकता है। (सही/गलत)
  2. बन्ध्यता को जीवनक्षम संतति न पैदा कर पाने की अयोग्यता के रूप में परिभाषित किया गया है और यह सदैव स्त्री की असामान्यताओं/दोषों के कारण होती है। (सही/गलत)
  3. एक प्राकृतिक गर्भ निरोधक उपाय के रूप में शिशु को पूर्ण रूप से स्तनपान कराना सहायक होता है। (सही/गलत)
  4. लोगों के जनन स्वास्थ्य के सुधार हेतु यौन सम्बन्धित पहलुओं के बारे में जागरूकता पैदा करना एक प्रभावी उपाय है। (सही/गलत)

उत्तर

  1. गलत। सामान्य परिस्थितियों में गर्भपात स्वत: नहीं होता है। गर्भपात का अर्थ है स्वेच्छा से या किसी दुर्घटनावश गर्भ का नष्ट होना।
  2. गलत। बन्ध्यता स्त्री या पुरुष दोनों के दोषों या विकारों के कारण होती है।
  3. सही। प्रसव के उपरान्त शिशु को भरपूर स्तनपान कराने से अण्डोत्सर्ग नहीं होता है। अत: आर्तव चक्र के प्रारम्भ न होने से गर्भ ठहरने की संभावना भी नहीं रहती है। किन्तु यह प्रसव के पश्चात् 4-6 महीने तक ही प्रभावी होता है।
  4. सही। जनन स्वास्थ्य के लिए लोगों को यौन सम्बन्धी समस्याओं, भ्रान्तियों व अवधारणाओं के बारे में सही जानकारी देना जरूरी है। सुरक्षित यौन सम्बन्ध, गर्भ निरोधन, यौन रोगों से बचाव आदि महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ, लोगों को जनन स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाती हैं।

प्रश्न 12.
निम्न कथनों को सही कीजिए –

  1. गर्भ निरोध के शल्य क्रियात्मक उपाय युग्मक बनने को रोकते हैं।
  2. सभी प्रकार के यौन संचारित रोग पूरी तरह से उपचार योग्य हैं।
  3. ग्रामीण महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक के रूप में गोलियाँ (पिल्स) बहुत अधिक लोकप्रिय हैं।
  4. ई० टी० तकनीकों में भ्रूण को सदैव गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है।

उत्तर

  1. गर्भ निरोध के शल्य क्रियात्मक उपाय युग्मक परिवहन अथवा युग्मक संचार को रोकते हैं।
  2. जेनिटल हर्षीज, HIV संक्रमण, यकृत शोथ-B के अतिरिक्त शेष सभी प्रकार के यौन संचारित रोग पूरी तरह से उपचार के योग्य हैं, यदि इन्हें सही समय पर पहचान कर इलाज कराया जाये।
  3. गर्भ निरोधक गोलियाँ (पिल्स) सभी महिलाओं के बीच लोकप्रिय हैं।
  4. ई० टी० तकनीक में भ्रूण को हमेशा गर्भाशय में स्थानान्तरित किया जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
ऐम्नियोटिक द्रव की कोशिकाओं में निम्न में से किसकी उपस्थिति से भ्रूणीय शिशु का लिंग निर्धारण होता है?
(क) बार पिण्ड
(ख) लिंग-गुणसूत्र
(ग) काइऐज्मेटा
(घ) प्रतिजन
उत्तर
(क) बार पिण्ड

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विश्व जनसंख्या दिवस कब मनाया जाता है?
उत्तर
11 जुलाई को।

प्रश्न 2.
गर्भ निरोधक गोलियों में कौन-सा पदार्थ होता है?
उत्तर
प्रोजेस्टेरॉन तथा एस्ट्रोजेन्स।

प्रश्न 3.
कॉपर-टी का प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर
युग्मकों के निषेचन को रोकना।

प्रश्न 4.
IUCD का पूरा नाम बताइए।
उत्तर
इन्ट्रा यूटेराइन कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस।

प्रश्न 5.
सरोगेट मदर किसे कहते हैं?
उत्तर
वह परिचारक माँ जिसके गर्भ में वास्तविक माँ का अण्डाणु पलता है, सरोगेट मदर कहलाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए।
(क) सगर्भता का चिकित्सीय समापन
(ख) सरोगेट माँ
उत्तर
(क) सगर्भता का चिकित्सीय समापन
गर्भावस्था पूर्ण होने से पहले जानबूझ कर या स्वैच्छिक रूप से गर्भ के समापन को प्रेरित गर्भपात या चिकित्सीय सगर्भता समापन (मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेन्सी, MTP) कहते हैं। पूरी दुनिया में हर साल लगभग 45 से 50 मिलियन (4.5-5 करोड़) चिकित्सीय सगर्भता समापन कराए जाते हैं जो कि संसार भर की कुल सगर्भताओं का 1/5 भाग है। निश्चित रूप से यद्यपि जनसंख्या को घटाने में MTP की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसका उद्देश्य जनसंख्या घटाना नहीं है तथापि MTP में भावनात्मक, नैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक पहलुओं से जुड़े होने के कारण बहुत से देशों में यह बहस जारी है कि चिकित्सीय सगर्भता समापन को स्वीकृत या कानूनी बनाया जाना चाहिए या नहीं।

भारत सरकार ने इसके दुरुपयोग को रोकने की शर्तों के साथ 1971 ई० में चिकित्सीय सगर्भता समापन को कानूनी स्वीकृति प्रदान कर दी है। इस प्रकार के प्रतिबन्ध अंधाधुंध और गैरकानूनी मादा भ्रूण हत्या तथा भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए, जो अभी भी भारत देश में बहुत ज्यादा हो रहा है।

चिकित्सीय सगर्भता समापन क्यों? निश्चित तौर पर इसका उत्तर अनचाही सगर्भताओं से मुक्ति पाना है। फिर चाहे वे लापरवाही से किए गए असुरक्षित यौन सम्बन्धों का परिणाम हों या मैथुन के समय गर्भ निरोधक उपायों के असफल रहने या बलात्कार जैसी घटनाओं के कारण हों। इसके साथ ही चिकित्सीय सगर्भता समापन की अनिवार्यता कुछ विशेष मामलों में भी होती है जहाँ सगर्भता बने रहने की स्थिति में माँ अथवा भ्रूण अथवा दोनों के लिए हानिकारक अथवा घातक हो सकती है।

सगर्भता की पहली तिमाही में अर्थात् सगर्भता के 12 सप्ताह तक की अवधि में कराया जाने वाला चिकित्सीय सगर्भता समापन अपेक्षाकृत काफी सुरक्षित माना जाता है। इसके बाद द्वितीय तिमाही में गर्भपात बहुत ही संकटपूर्ण एवं घातक होता है। इस बारे में एक सबसे अधिक परेशान करने वाली यह बात देखने में आई है कि अधिकतर MTP गैर कानूनी रूप से, अकुशल नीम-हकीमों से कराए जाते हैं। जो कि न केवल असुरक्षित होते हैं, बल्कि जानलेवा भी सिद्ध हो सकते हैं। दूसरी खतरनाक प्रवृत्ति शिशु के लिंग निर्धारण के लिए उल्ववेधन का दुरुपयोग (यह प्रवृत्ति शहरी क्षेत्रों में अधिक) होता है।

बहुधा ऐसा देखा गया है कि यह पता चलने पर कि भ्रूण मादा है, MTP कराया जाता है, जो पूरी तरह गैर-कानूनी है। इस प्रकार के व्यवहार से बचना चाहिए, क्योंकि यह युवा माँ और भ्रूण दोनों के लिए खतरनाक है। असुरक्षित मैथुन से बचाव के लिए प्रभावशाली परामर्श सेवाओं को देने तथा गैर-कानूनी रूप से कराए गए गर्भपातों में जान की जोखिम के बारे में बताए जाने के साथ-साथ अधिक-से-अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि उपर्युक्त प्रवृत्तियों को रोका जा सके।

(ख) सरोगेट माँ
कुछ विरल परिस्थितियों में इन विट्रो निषेचित अण्डाणुओं को परिपक्व होने के लिए सरोगेट माँ का उपयोग किया जाता है। कुछ स्त्रियों में अण्डाणु का निषेचन तो सामान्य रूप से होता है किन्तु कुछ विकारों के कारण भ्रूण का परिवर्धन नहीं हो पाता है। ऐसी परिस्थितियों में स्त्री के अण्डाणु व उसके पति के शुक्राणु का कृत्रिम निषेचन कराया जाता है तथा भ्रूण को 32-कोशिकीय अवस्था में किसी अन्य इच्छुक स्त्री के गर्भाशय में रोपित कर दिया जाता है। यह स्त्री सरोगेट माँ कहलाती है तथा भ्रूण के पूर्ण विकसित होने पर शिशु को जन्म देती है। मनुष्य के साथ पशुओं में भी इस प्रक्रिया द्वारा शिशु उत्पत्ति करायी जा रही है। मनुष्य की तुलना में पशुओं के भ्रूण का स्थानान्तरण अधिक सरल होता है। यद्यपि परखनली शिशु का जन्म जीव विज्ञान की दृष्टि से एक अत्यधिक सफल उपलब्धि है, किन्तु इससे जुड़ी अनेक कानूनी व नैतिक समस्याएँ भी सामने आ रही हैं, जैसे इस प्रकार जन्मे बच्चे के ऊपर कानूनी हक आदि।

प्रश्न 2.
मनुष्य में यौन सम्बन्धी उत्पन्न रोगों के लक्षण बताइए।
उत्तर
मनुष्य में यौन सम्बन्धी उत्पन्न रोग
इन्हें लैंगिक संचारित रोग (sexual transmitted disease, STD) कहते हैं। ये लैंगिक संसर्ग से या प्रजनन मार्ग से संचारित होते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –
1. क्लेमायइिओसिस (Chlamydiosis) – यह सर्वाधिक रूप में पाया जाने वाला जीवाणु जनित STD है। यह रोग क्लेमायडिआ ट्रेकोमेटिस (Chlamydia trachomatis) नामक जीवाणु से होता है। संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध बनाने से इस रोग का संचारण होता है। इसका उद्भवन काल (incubation period) एक सप्ताह का होता है।
लक्षण (Symptoms) – इस रोग में पुरुष के शिश्न से गाढ़े मवाद जैसा स्राव होता है तथा मूत्र-त्याग में अत्यन्त पीड़ा होती है। स्त्रियों में इस रोग के कारण गर्भाशय-ग्रीवा, गर्भाशय व मूत्र नलिकाओं में प्रदाह (inflammation) होता है। उपचार न होने पर यह श्रोणि प्रदाह रोग (pelvic inflammatory disease) में परिवर्तित होकर बन्ध्यता का कारण बनता है।

2. सुजाक (Gonorrhoea) – यह (ग्रामऋणी) जीवाणुवीय STD है जो डिप्लोकॉकस जीवाणु, नाइसेरिया गोनोरिया (Neisseria gonorrhoeae) द्वारा होता है। संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध बनाने से यह रोग फैलता है। इसका उद्भवन काल 2 से 10 दिन होता है।
लक्षण (Symptoms) – इस रोग का प्रमुख लक्षण यूरोजेनीटल (urogenital) पथ की श्लेष्मा कला में अत्यधिक जलन होना है। रोगी को मूत्र-त्याग के समय जलन महसूस होती है। सुजाक के लक्षण पुरुष में अधिक प्रभावी होते हैं। सुजाक से अन्य विकार; जैसे–प्रमेय जन्य सन्धिवाह (gonorrheal arthritis), पौरुष ग्रंथ प्रवाह (prostatitis), मूत्राशय प्रवाह (cystitis) व स्त्रियों में जरायु प्रदाह (meritis), डिम्ब प्रणाली प्रदाह (sapingititis), बन्ध्यता आदि हो जाते हैं।

3. एड्स (AIDS) – विषाणुओं से चार प्रमुख STDs होते हैं एड्स अर्थात् उपार्जित प्रतिरोध क्षमता अभाव सिन्ड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome) एक विषाणु जनित रोग है। जो भयंकर रूप से फैल रहा है। एड्स रीट्रोवाइरस या HIV अथवा लिम्फोट्रापिक विषाणु टाइप III या HTLV III आदि नामक विषाणु से होता है। इस रोग का उद्भवन काल 9-30 माह है। रक्त आधान से सम्बन्धित व्यक्तियों में यह काल 4-14 माह होता है।
लक्षण (Symptoms) – निरन्तर ज्वर, पेशियों में दर्द, रातों को पसीना आना तथा लसीका ग्रंथियों का चिरस्थायी विवर्धन, लिंग अथवा योनि से रिसाव, जननांगीय क्षेत्र में अल्सर या जाँघों में सूजन आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

4. जेनीटल हर्षीज Genital Herpes) – यह रोग टाइप-2 हपज सिम्पलेक्स विषाणु (type-2 herpes simplex virus) से उत्पन्न होता है। परगामी व्यक्ति से सम्भोग करने पर यह रोग फैलता है।
लक्षण (Symptoms) – इस रोग के प्राथमिक लक्षण जननांगों पर छाले पड़ना व दर्द होना, ज्वर, मूत्र-त्याग में पीड़ा, लसीका ग्रन्थियों की सूजन आदि हैं। छालों के फूटने से संक्रमण तेजी से फैलता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंख्या वृद्धि पर कैसे नियन्त्रण किया जा सकता है? परिवार नियोजन की वैज्ञानिक विधियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
जन्म नियन्त्रण के लिए प्रयोग होने वाले विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
जनसंख्या नियन्त्रण
भारत में तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाये जा सकते हैं –
1. शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार – शिक्षित व्यक्ति प्रायः आय एवं व्यय के सिद्धान्त से भली-भाँति परिचित होने के कारण सीमित परिवार के महत्त्व को समझते हैं। यही कारण है कि शिक्षित परिवार सामान्यतः सीमित ही होते हैं।

2. बच्चों की संख्या का निर्धारण – जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए प्रति परिवार बच्चों की संख्या निर्धारित की जानी चाहिए। इसके लिए सरकारी स्तर पर कानून में संशोधन किये जाने चाहिए और यदि सम्भव न हो तो सीमित परिवार वाले व्यक्तियों को ऐसे प्रोत्साहन दिये जाने चाहिए जिनसे कि जन-सामान्य में इसके प्रति रुचि उत्पन्न हो सके। परिवार में बच्चों की संख्या निश्चित करके अनियन्त्रित ढंग से बढ़ रही जनसंख्या पर तुरन्त प्रभावी रोक लगायी जा सकती है।

3. विवाह योग्य आयु में वृद्धि – विवाह का जनन से सीधा सम्बन्ध है; अतः विवाह योग्य आयु में वृद्धि करने से प्रजनन दर में कमी लायी जा सकती है। वर्तमान समय में यह स्त्रियों के लिए कम-से-कम 18 वर्ष तथा पुरुषों के लिए कम-से-कम 21 वर्ष है। इसे अब क्रमशः 23 वर्ष और 25 वर्ष कर देना चाहिए। इसके साथ-साथ देर से विवाह करने वाले स्त्रियों एवं पुरुषों को प्रोत्साहन पुरस्कार देना भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

4. गर्भपात को ऐच्छिक एवं सुविधापूर्ण बनाना – हमारे देश में गर्भपात को प्राचीन समय से ही घृणित माना गया है। गर्भपात की सुविधा को शीघ्र ही राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध कराना जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए बहुत आवश्यक है। अनावश्यक गर्भ से छुटकारा पाकर स्त्रियाँ अपने परिवार में बच्चों की संख्या सीमित रख सकती हैं।

5. समन्वित ग्रामीण विकास एवं परिवार कल्याण कार्यक्रमों में तालमेल – सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक विकास योजनाएँ चला रखी हैं। यदि इनके साथ परिवार कल्याण के कार्यक्रमों को भी जोड़ दिया जाये तथा इन्हें सफलतापूर्वक प्रतिपादित करने के लिए विकास खण्डों के स्तर पर आर्थिक सहायता एवं अन्य प्रोत्साहन दिये जाएँ तो इन कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार को सन्तति निरोध के साधन व दवाएँ निःशुल्क बॉटनी चाहिए तथा नसबन्दी ऑपरेशन के लिए शिविर आयोजित कराने चाहिए।

6. कृषि एवं उद्योगों के उत्पादन में वृद्धि – ग्रामीण क्षेत्रों में प्राय: यह सोचा जाता है कि कृषि के लिए अधिकाधिक जनशक्ति आवश्यक है, जिसके फलस्वरूप इन क्षेत्रों में सीमित परिवार की विचारधारा ठीक से नहीं पनप पायी है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक कृषि यन्त्रों एवं तकनीकों को अधिकाधिक उपलब्ध कराया जाये तो कम जनशक्ति द्वारा ही कृषि की जा सकेगी तथा सीमित परिवार के प्रति लोगों में रुचि उत्पन्न होगी। उद्योगों के उत्पादन में वृद्धि से भी बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता मिलेगी, रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी तथा आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

7. सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों में वृद्धि एवं सुधार – सरकार को सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों; जैसे–पेंशन, ग्रेच्युटी एवं सेवानिवृत्त होने पर मिलने वाली सुविधाएँ आदि में इतनी वृद्धि करनी चाहिए कि सेवा-निवृत्त होने पर कर्मचारी को अपने परिवार पर बोझ बनकर न रहना पड़े। इससे आम व्यक्ति ‘सन्तान बुढ़ापे की लाठी’ जैसी विचारधारा से मुक्ति पा सकेंगे तथा उनमें सीमित परिवार के प्रति रुचि बढ़ेगी।

8. परिवार कल्याण कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाया जाये – जनसंख्या वृद्धि की समस्या का वास्तविक निदान जनसंख्या को नियोजित एवं नियन्त्रित करने में निहित है। इसके लिए निम्नलिखित बातों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए –

  1. आकाशवाणी एवं दूरदर्शन जैसे संचार माध्यमों द्वारा परिवार कल्याण के कार्यक्रमों को अधिकाधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए।
  2. बन्ध्याकरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए चल चिकित्सालयों, चिकित्सा शिविरों एवं अन्य आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था व्यापक स्तर पर की जानी चाहिए।
  3. सन्तति निरोध सम्बन्धी विभिन्न सामग्री को नि:शुल्क अथवा अत्यधिक सस्ते मूल्यों पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  4. बन्ध्याकरण के लिए आवश्यक योग्य चिकित्सकों एवं अन्य कर्मचारियों को समय-समय पर ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा जाना चाहिए और यदि सम्भव हो तो शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् चिकित्सकों को एक या दो वर्ष के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा करने के लिए बाध्य किया जाए।

9. सकारात्मक और निषेधात्मक प्रेरकों पर आधारित विवेकपूर्ण जनसंख्या नीति – जनसंख्या को नियन्त्रित रखने के लिए विवेकपूर्ण नीति को अपनाया जाना तथा समय-समय पर उसका पुनर्मूल्यांकन कर उसमें आवश्यक संशोधन करते रहना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।

10. विदेशियों के आगमन पर रोक – भारत में प्रतिवर्ष अनेकानेक विदेशी आकर बस जाते हैं। प्राय: बांग्लादेश और नेपाल से अनेक लोग आकर भारत में बस गये हैं। सरकार को विदेशी लोगों के आगमन को प्रतिबन्धित कर देना चाहिए, साथ ही अनाधिकृत रूप से भारत में आकर बस गये विदेशियों को हटाने की व्यवस्था करनी चाहिए।

11. जनसंख्या के धार्मिक आयाम का अध्ययन एवं वस्तुनिष्ठ निर्णय – भारत में जनसंख्या वृद्धि के मजहबी आयाम को धर्म निरपेक्षता के नाम में अनदेखा किया जाता है। अब वह समय आ गया है जब सभी धर्मावलम्बियों, राजनीतिज्ञों एवं आम व्यक्तियों को कठोर निर्णय लेने ही चाहिए।

परिवार नियोजन की विधियाँ/गर्भ निरोधक
जनसंख्या को सीमित रखने के लिए विभिन्न प्रकार से परिवारों में सन्तानोत्पत्ति की दर को नियन्त्रित करके मानव जनसंख्या की वृद्धि को कम किया जा सकता है। इस प्रकार परिवार के आकार को सीमित रखना ही परिवार नियोजन है। इसके लिए कई विधियाँ अपनायी जाती हैं। इन्हें निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा गया है –
1. बन्ध्याकरण या नसबन्दी (Sterilization) – इस प्रक्रिया को वैसेक्टॉमी (vasectomy) भी कहते हैं। इस प्रक्रिया में पुरुषों में वृषणकोष के ऊपरी भाग में शुक्रवाहिकाओं को काटकर इनके दोनों कटे सिरों को बाँध देते हैं। स्त्रियों में इसे सैल्पिजेक्टोमी या ट्युबेक्टोमी (salpingectomy or tubectomy) कहते हैं।

2. कण्डोम का प्रयोग (Use of Condom) – यह एक पतली झिल्ली होती है। पुरुष सम्भोग के समय इसे लिंग पर चढ़ा लेता है। इस प्रकार, वीर्य स्त्री की योनि में स्खलित न होकर कण्डोम
में ही रह जाता है।

3. गर्भ निरोधक गोलियाँ (Contraceptive Pills) – इसमें ऐसे हॉर्मोन्स की गोलियाँ होती हैं जो युग्मानुजनन तथा गर्भधारण में हस्तक्षेप करते हैं। इन हॉर्मोन्स के कारण पिट्यूटरी ग्रन्थि के
हॉर्मोन्स (FSH तथा LH) का स्रावण बहुत घट जाता है, जो अण्डाशयों को सक्रिय करते हैं।

4. अन्तः गर्भाशयी यन्त्र (Intrauterine Device = IUD) – इस विधि में प्लास्टिक या ताँबे या स्टील की कोई युक्ति (device) गर्भाशय में रोप दी जाती है। जितने समय तक यह युक्ति
गर्भाशय में रहती है, भ्रूण का रोपण गर्भाशय में नहीं हो पाती।

5. बाधा विधियाँ (Barrier Methods) – ये विधियाँ शुक्राणुओं को गर्भाशय में पहुँचने से रोकती हैं। इन विधियों में योनिधानी (vaginal pouch), तनुपट (diaphragm) तथा ग्रीवा टोपी (cervical cap) का प्रयोग किया जाता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance (स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance (स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 2
Chapter Name Electrostatic Potential and Capacitance (स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता)
Number of Questions Solved 104
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance (स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
5 x 10-8 C तथा -3 x 10-8 C के दो आवेश 16 cm दूरी पर स्थित हैं। दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के किस बिन्दु पर विद्युत विभव शून्य होगा? अनन्त पर विभव शून्य लीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q1.1UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance

प्रश्न 2.
10 cm भुजा वाले एक सम-षट्भुज के प्रत्येक शीर्ष पर 5 µC का आवेश है। षट्भुज के केन्द्र पर विभव परिकलित कीजिए।
हल-
समषट्भुज के केन्द्र से प्रत्येक शीर्ष की दूरी समान होती है तथा यह इसकी भुजा a = 10 सेमी के बराबर होगी (चित्र 2.3)। चूंकि प्रत्येक शीर्ष पर (UPBoardSolutions.com) आवेश भी समान (q = 5 µC = 5 x 10-6 C) है, अत: प्रत्येक शीर्ष पर स्थित आवेश के कारण केन्द्र O पर विभव समान होगा।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance

प्रश्न 3.
6 cm की दूरी पर अवस्थित दो बिन्दुओं A एवं B पर दो आवेश 2 µC तथा -2 µC रखे है।
(a) निकाय के सम विभव पृष्ठ की पहचान कीजिए।
(b) इस पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर विद्युत-क्षेत्र की दिशा क्या है?
हल-
(a) दिया है, A व B पर दो आवेश 2 µC और -2 µC रखे हैं।
AB = 6 सेमी = 0.06 मीटर
दो दिए गए आवेशों के निकाय का समविभवी पृष्ठ A व B को मिलाने वाली रेखा के अभिलम्बवत् होगा। यह पृष्ठ, रेखा AB के मध्य बिन्दु C से गुजरेगा।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q3
इस प्रकार इस पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर समान विभव है और यह शून्य है। अतः यह एक समविभवी पृष्ठ है।
(b) हमें ज्ञात है कि वैद्युत क्षेत्र सदैव + से – आवेश (UPBoardSolutions.com) की ओर दिष्ट होता है। इस प्रकार यहाँ वैद्युत क्षेत्र (+ve) बिन्दु A से ऋणावेशित (-ve) बिन्दु B की ओर कार्य करता है। तथा यह समविभवी पृष्ठ के अभिलम्बवत् है।
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प्रश्न 4.
12 cm त्रिज्या वाले एक गोलीय चालक के पृष्ठ पर 1.6 x 10-7 C पर आवेश एकसमान रूप से वितरित है।
(a) गोले के अन्दर
(b) गोले के ठीक बाहर
(c) गोले के केन्द्र से 18 cm पर अवस्थित, किसी बिन्दु पर विद्युत-क्षेत्र क्या होगा?
हल-
आवेश सदैव चालक के पृष्ठ पर रहता है तथा बाहरी बिन्दुओं के लिए यह ऐसे व्यवहार करता है जैसे सम्पूर्ण आवेश इसके केन्द्र पर स्थित हो।
(a) गोले के भीतर वैद्युत क्षेत्र, Ein = 0
(b) गोले के पृष्ठ पर वैद्युत क्षेत्र
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प्रश्न 5.
एक समान्तर पट्टिका संधारित्र, जिसकी पट्टिकाओं के बीच वायु है, की धारिता 8 pF (1 pF = 10-12 F) है। यदि पट्टिकाओं के बीच की दूरी को आधा कर दिया जाए और इनके बीच के स्थान में 6 परावैद्युतक’का एक पदार्थ भर दिया जाए तो इसकी धारिता क्या होगी?
हल-
दिया है : पट्टिकाओं के बीच वायु होने पर समान्तर पट्ट संधारित्र की धारिता
C0 = 8 pF = 8 x 10-12 F
यदि प्रत्येक पट्टिका का क्षेत्रफल = A
तथा पट्टिकाओं के बीच दूरी = d हो, तो
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प्रश्न 6.
9 pF धारिता वाले तीन संधारित्रों को श्रेणीक्रम में जोड़ा गया है।
(a) संयोजन की कुल धारिता क्या है?
(b) यदि संयोजन को 120 V के संभरण (सप्लाई) से जोड़ दिया जाए, तो प्रत्येक संधारित्र पर क्या विभवान्तर होगा?
हल-
तीनों संधारित्रों में प्रत्येक की धारिता 9 pF है।
अर्थात् C1 = C2 = C3 = 9 pF; संभरण वोल्टता V = 120 वोल्ट
(a) यदि इनके श्रेणी संयोजन की कुल धारिता Cs हो
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प्रश्न 7.
2 pF, 3 pF और 4 pF धारिता वाले तीन संधारित्र पाश्र्वक्रम में जोड़े गए हैं।
(a) संयोजन की कुल धारिता क्या है?
(b) यदि संयोजन को 100 V के संभरण से जोड़ दें तो प्रत्येक संधारित्र पर आवेश ज्ञात कीजिए।
हल-
यहाँ C1 = 2 pF, C2 = 3 pF, C3 = 4 pF तथा संभरण वोल्टता V = 100 वोल्ट
(a) संधारित्रों के पाश्र्वक्रम (समान्तर संयोजन) की कुल धारिता
C = C1 + C2 + C3 = 2 pF + 3 pF + 4 pF = 9 pF
(b) पाश्र्वक्रम संयोजन के प्रत्येक संधारित्र के सिरों के बीच वोल्टता संभरण वोल्टता के बराबर ही होगी अर्थात् V = 100 वोल्ट
अतः C1 = 2 pF = 2 x 10-12 F पर आवेश
Q1 = C2 x V = 2 x 10-12 F x 100 वोल्ट = 2 x 10-10 कूलॉम
C2 = 3 pF = 3 x 10-12 F पर आवेश
Q2 = C2 x V = 3 x 10-12 F x 100 वोल्ट = 3 x 10-10 कूलॉम
C3 = 4 pF = 4 x 10-12 F पर आवेश
Q3 = C3 x V = 4 x 10-12 F x 100 वोल्ट = 4 x 10-10 कूलॉम

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प्रश्न 8.
पट्टिकाओं के बीच वायु वाले समान्तर पट्टिको संधारित्र की प्रत्येक पट्टिका का क्षेत्रफल 6 x 10-3 m2 तथा उनके बीच की दूरी 3 mm है। संधारित्र की धारिता को परिकलित कीजिए। यदि इस संधारित्र को 100 V के संभरण से जोड़ दिया जाए तो संधारित्र की प्रत्येक पट्टिका पर कितना आवेश होगा?
हल-
दिया है, प्लेट क्षेत्रफल A = 6 x 10-3 m, y = 100 वोल्ट
बीच की दूरी d = 3 mm = 3 x 10-3 m
धारिता C = ?, प्रत्येक पट्टी पर आवेश = ?
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प्रश्न 9.
प्रश्न 8 में दिए गए संधारित्र की पट्टिकाओं के बीच यदि 3 mm मोटी अभ्रक की एक शीट (पत्तर) (परावैद्युतांक = 6) रख दी जाती है तो स्पष्ट कीजिए कि क्या होगा जब
(a) विभव (वोल्टेज) संभरण जुड़ा ही रहेगा।
(b) संभरण को हटा लिया जाएगा?
हल-
प्रश्न 8 के परिणाम से,
V = 100 वोल्ट,
q = 18 x 10-10 C
अब माध्यम का परावैद्युतांक K = 6
परावैद्युत की मोटाई t = 3 mm = 3 x 10-3 m
t = d; अत: संधारित्र पूर्णतः परावैद्युत द्वारा भरा है।
संधारित्र की नई धारिता C = KC0 = 6 x 18 pF [C0 = 18 pF]
= 108 pF
(a) विभव संभरण जुड़ा हुआ है; अत: संधारित्र का विभवान्तर नियत अर्थात् 100 वोल्ट रहेगा।
संधारित्र पर नया आवेश q = CV = 108 x 10-12 x 100
= 1.08 x 10-8 C
अतः इस स्थिति में, C = 108 pF, V = 100 V, q = 1.08 x 10-8 C
(b) विभव संभरण हटा लिया गया है; अत: संधारित्र पर आवेश q = 18 x 10-10 C नियत रहेगा।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q9

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प्रश्न 10.
12pF का एक संधारित्र 50 V की बैटरी से जुड़ा है। संधारित्र में कितनी स्थिर विद्युत ऊर्जा संचित होगी?
हल-
यहाँ C = 12 pF = 12 x 10-12 फैरड; V = 50 वोल्ट
अत: स्थिर वैद्युत ऊर्जा
U = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] CV²
= [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x (12 x 10-12) x (50)² जूल
= 1.50 x 10-8 जूल

प्रश्न 11.
200 V संभरण (सप्लाई) से एक 600 pF से संधारित्र को आवेशित किया जाता है। फिर इसको संभरण से वियोजित कर देते हैं तथा एक अन्य 600 pF वाले अनावेशित संधारित्र से जोड़ देते हैं। इस प्रक्रिया में कितनी ऊर्जा का ह्रास होता है?
हल-
दिया है, धारिताएँ C1 = 600 x 10-12 F, C2 = 600 x 10-12 F
विभवान्तर V1 = 200 V, V2 = 0 V .
प्रक्रिया में ऊर्जा का हास ΔU = ?
आवेश के बाद संभरण को हटा दिया जाता है; अतः निकाय पर कुल’ आवेश नियत रहेगा।
माना संधारित्रों को जोड़ने पर उनका उभयनिष्ठ विभव V है,
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q11
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 12.
मूल बिन्दु पर एक 8 mC का आवेश अवस्थित है। -2 x 10-9 के एक छोटे से आवेश को बिन्दु P(0, 0, 3 cm) से, बिन्दु R(0, 6 cm, 9 cm) से होकर, बिन्दु Q(0, 4 cm, 0) तक ले जाने में किया गया कार्य परिकलित कीजिए।
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हल-
मूल बिन्दु पर आवेश Q = 8 x 10-3 C
दूसरा आवेश q = -2 x 10-9 C
स्थिरविद्युत क्षेत्र में किसी आवेश को एक बिन्दु से दूसरी बिन्दु तक ले जाने में किया जाने वाला कार्य मार्ग के स्थान पर अन्त्य बिन्दुओं पर निर्भर करता है।
आवेश q को बिन्दु P से Q तक ले जाने में किया गया कार्य
W = q (VQ – VP)
यहाँ बिन्दु Q की मूल बिन्दु से दूरी rQ = OQ = 0.04 m
तथा बिन्दु P की मूल बिन्दु से दूरी rP = OP = 0.03 m
मूल बिन्दु पर स्थित आवेश Q के कारण Q व P के बीच विभवान्तर
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प्रश्न 13.
b भुजा वाले एक घन के प्रत्येक शीर्ष पर q आवेश है। इस आवेश विन्यास के कारण घन के केन्द्र पर विद्युत विभव तथा विद्युत-क्षेत्र ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q13
हल-
चित्र 2.6 में घन की भुजा = b
अतः घन का प्रत्येक विकर्ण = [latex s=2]\sqrt { { b }^{ 2 }+{ b }^{ 2 }+{ b }^{ 2 } }[/latex] = b√3
घन के प्रत्येक शीर्ष पर स्थित आवेश = q तथा प्रत्येक आवेश की घन के केन्द्र O (चारों विकर्णो AF, EB, CH तथा GD का छेदन बिन्दु, जो इनका मध्य बिन्दु होता है) से दूरी
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चूंकि प्रत्येक विकर्ण के शीर्ष पर समान परिमाण तथा समान प्रकृति के आवेश रिथत हैं, अतः इनके कारण.O पर तीव्रता परिमाण में बराबर तथा दिशा में विपरीत होगी। अतः ये एक-दूसरे को निरस्त कर देंगी। अतः O पर परिणामी तीव्रता शून्य होगी।

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प्रश्न 14.
1.5 μC और 2.5 μC आवेश वाले दो सूक्ष्म गोले 30 cm दूर स्थित हैं।
(a) दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के मध्य बिन्दु पर, और
(b) मध्य बिन्दु से होकर जाने वाली रेखा के अभिलम्ब तल में मध्य बिन्दु से 10 cm दूर स्थित किसी बिन्दु पर विभव और विद्युत-क्षेत्र ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q14
हल-
(a) मध्य बिन्दु की प्रत्येक आवेश से दूरी
rA = rB = 0.15 m
मध्य बिन्दु पर विभव
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q14.2
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प्रश्न 15.
आन्तरिक त्रिज्या तथा बाह्य त्रिज्या r1 वाले एक गोलीय चालक खोल (कोश) पर r2 आवेश है।
(a) खोल के केन्द्र पर एक आवेश q रखा जाता है। खोल के भीतरी और बाहरी पृष्ठों पर पृष्ठ आवेश घनत्व क्या है?
(b) क्या किसी कोटर (जो आवेश विहीन है) में विद्युत-क्षेत्र शून्य होता है, चाहे खोल गोलीय न होकर किसी भी अनियमित आकार का हो? स्पष्ट कीजिए।
हल-
(a) जब चालक को केवल Q आवेश दिया गया है तो यह पूर्णत: चालक के बाह्य पृष्ठ पर रहता है। हम जानते हैं कि एक चालक के भीतर नैट आवेश शून्य (UPBoardSolutions.com) रहता है; अतः खोल के केन्द्र पर q आवेश रखने पर, खोल की भीतरी सतह पर -q आवेश प्रेरित हो जाता है तथा बाहरी सतह पर अतिरिक्त + q आवेश आ जाता है।
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(b) हाँ, यदि कोटर आवेशविहीन है तो उसके अन्दर विद्युत-क्षेत्र शून्य होगा। इसके विपरीत कल्पना करें कि किसी चालक के भीतर एक अनियमित आकृति का आवेशविहीन कोटर है जिसके भीतर विद्युत-क्षेत्र शून्य नहीं है। अब एक ऐसे बन्द लूप पर विचार करें जिसका कुछ भाग कोटर के भीतर क्षेत्र रेखाओं के समान्तर है तथा शेष भाग कोटर से बाहर परन्तु चालक के भीतर है। चूंकि चालक के भीतर विद्युत-क्षेत्र शून्य है; अतः यदि एकांक आवेश को इस बन्द लूप के अनुदिश ले जाया जाए तो क्षेत्र द्वारा किया गया नैट कार्य प्राप्त होगा। परन्तु यह स्थिति स्थिरविद्युत क्षेत्र के लिए सत्य नहीं है (बन्द लूप पर नैट कार्य शून्य होता है)। अत: हमारी परिकल्पना कि कोटर के भीतर विद्युत-क्षेत्र शून्य नहीं है, गलत है। अर्थात् चालक के भीतर आवेशविहीन कोटर के भीतर विद्युत-क्षेत्र शून्य होगा।

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प्रश्न 16.
(a) दर्शाइए कि आवेशित पृष्ठ के एक पाश्र्व से दूसरे पाश्र्व पर स्थिरविद्युत-क्षेत्र के अभिलम्ब घटक में असांतत्य होता है, जिसे
[latex]\left( \vec { {E}_{2} } -\vec { {E}_{1} } \right) \hat { n } =\frac { \sigma }{ { \varepsilon }_{ 0 } }[/latex]
द्वारा व्यक्त किया जाता है। जहाँ एक बिन्दु पर पृष्ठ के अभिलम्ब एकांक सदिश है तथा [latex s=2]\sigma [/latex] उस बिन्दु पर पृष्ठ आवेश घनत्व है ([latex]\overset { \wedge }{ n }[/latex] की दिशा पाश्र्व 1 से पाश्र्व 2 की ओर है)। अतः
दर्शाइए कि चालक के ठीक बाहर विद्युत-क्षेत्र [latex]\frac { \sigma \hat { n } }{ { \varepsilon }_{ 0 } }[/latex] है।
(b) दर्शाइए कि आवेशित पृष्ठ के एक पाश्र्व से दूसरे पाश्र्व पर स्थिरविद्युत-क्षेत्र का स्पर्शीय घटक संतत है।
[संकेत- (a) के लिए गौस-नियम का उपयोग कीजिए। (b) के लिए इस तथ्य का उपयोग करें कि संवृत पाश पर एक स्थिर वैद्युत क्षेत्र द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है।)
उत्तर-
(a) माना AB एक आवेशित पृष्ठ है जिस पर पृष्ठीय आवेश घनत्व [latex s=2]\sigma [/latex] है। पृष्ठ के समीप प्रत्येक बिन्दु पर विद्युत-क्षेत्र [latex s=2]\overrightarrow { E }[/latex] समान तथा पृष्ठ के लम्बवत् बाहर की ओर है।
चित्र में एक बेलनाकार गाउसीय पृष्ठ को प्रदर्शित किया गया है। इस पृष्ठ के वृत्ताकार परिच्छेदों पर अभिलम्ब सदिश [latex s=2]{ \overset { \wedge }{ n } }_{ 1 }[/latex] व [latex s=2]{ \overset { \wedge }{ n } }_{ 2 }[/latex] क्रमश: क्षेत्रों [latex s=2]\overrightarrow { { E }_{ 1 } }[/latex] व [latex s=2]\overrightarrow { { E }_{ 2 } }[/latex] के समदिश हैं जबकि वक्र पृष्ठ पर अभिलम्ब संगत क्षेत्र [latex s=2]\overrightarrow { { E }_{ 3 } }[/latex] के लम्बवत् हैं।
माना प्रत्येक वृत्तीय परिच्छेद का क्षेत्रफल ΔA है तब गाउसीय पृष्ठ से गुजरने वाला विद्युत फ्लक्स
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q16
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q16.3
(b) आवेशित पृष्ठ के एक ओर से दूसरी ओर जाने पर स्थिरविद्युत-क्षेत्र का स्पर्श रेखीय घटक सतत (सर्वथा शून्य) होता है, अन्यथा पृष्ठ के विभिन्न बिन्दु अलग-अलग विभवों पर होंगे तथा धनावेश पृष्ठ के अनुदिश उच्च विभव से निम्न विभव के बिन्दुओं की ओर गति करता रहेगा।

प्रश्न 17.
रैखिक आवेश घनत्व λ वाला एक लम्बा आवेशित बेलन एक खोखले समाक्षीय चालक बेलन द्वारा घिरा है। दोनों बेलनों के बीच के स्थान में विद्युत-क्षेत्र कितना है?
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प्रश्न 18.
एक हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन लगभग 0.53 Å दूरी पर परिबद्ध हैं:
(a) निकाय की स्थितिज ऊर्जा का eV में परिकलन कीजिए, जबकि प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन के मध्य की अनन्त दूरी पर स्थितिज ऊर्जा को शून्य माना गया है।
(b) इलेक्ट्रॉन को स्वतन्त्र करने में कितना न्यूनतम कार्य करना पड़ेगा, यदि यह दिया गया है कि इसकी कक्षा में गतिज ऊर्जा (a) में प्राप्त स्थितिज ऊर्जा के परिमाण की आधी है?
(c) यदि स्थितिज ऊर्जा को 1.06 Å पृथक्करण पर शून्य ले लिया जाए तो, उपर्युक्त (a) और (b) के उत्तर क्या होंगे?
हल-
यहाँ q1 = -1.6 x 10-19 C, q2 = +1.6 x 10-19 C
r = 0.53 Å = 5.3 x 10-11 m
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प्रश्न 19.
यदि H, अणु के दो में से एक इलेक्ट्रॉन को हटा दिया जाए तो हमें हाइड्रोजन आण्विक आयन(H2+) प्राप्त होगा। (H2+) की निम्नतम अवस्था (ground state) में दो प्रोटॉन के बीच दूरी लगभग 1.5 Å है और इलेक्ट्रॉन प्रत्येक प्रोटॉन से लगभग 1 Å की दूरी पर है। निकाय की स्थितिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए। स्थितिज ऊर्जा की शून्य स्थिति के चयन का उल्लेख कीजिए।
हल-
स्थितिज ऊर्जा की शुन्य स्थितिअनन्त पर मानते हुए दिए गए वैद्युत निकाय (जिसमें चित्र 2.12 के । अनुसार दो प्रोटॉम एवं एक इलेक्ट्रॉन है) की स्थितिज ऊर्जा
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q19
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance

प्रश्न 20.
a और b त्रिज्याओं वाले दो आवेशित चालक गोले एक तार द्वारा एक-दूसरे से जोड़े गए हैं। दोनों गोलों के पृष्ठों पर विद्युत-क्षेत्रों में क्या अनुपात है? प्राप्त परिणाम को, यह समझाने में प्रयुक्त कीजिए कि किसी एक चालक के तीक्ष्ण और नुकीले सिरों पर आवेश घनत्व, चपटे भागों की अपेक्षा अधिक क्यों होता है?
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q20.1

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प्रश्न 21.
बिन्दु (0, 0, -a) तथा (0, 0, a) पर दो आवेश क्रमशः -q और +q स्थित हैं।
(a) बिन्दुओं (0, 0, z) और (x, y, 0) पर स्थिरविद्युत विभव क्या है?
(b) मूल बिन्दु से किसी बिन्दु की दूरी पर विभव की निर्भरता ज्ञात कीजिए, जबकि [latex s=2]\frac { r }{ a }[/latex] >> 1
(c) x-अक्ष पर बिन्दु (5, 0, 0) से बिन्दु (-7, 0, 0) तक एक परीक्षण आवेश को ले जाने में कितना कार्य करना होगा? यदि परीक्षण आवेश को उन्हीं बिन्दुओं के बीच x-अक्ष से होकर न ले जाएँ तो क्या उत्तर बदल जाएगा?
हल-
दिए गए बिन्दु आवेश एक विद्युत द्विध्रुव बनाते हैं।
आवेशों के बीच की दूरी = 2a
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q21.1
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance

प्रश्न 22.
नीचे दिए गए चित्र 2.14 में एक आवेशविन्यास जिसे विद्युत चतुर्भुवी कहा जाता है, दर्शाया गया है। चतुर्भुवी के अक्ष पर स्थित किसी बिन्दु के लिए पर विभव की निर्भरता प्राप्त कीजिए जहाँ [latex s=2]\frac { r }{ a }[/latex] >> 1। अपने परिणाम की तुलना एक विद्युत द्विध्रुव व विद्युत एकल ध्रुव (अर्थात् किसी एकल आवेश) के लिए प्राप्त परिणामों से कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q22
हल-
माना P की विभिन्न आवेशों से दूरियाँ निम्नलिखित हैं-
r – a, r, r + a
चतुर्भुवी होने के कारण बिन्दु P पर विद्युत विभव
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance

प्रश्न 23.
एक विद्युत टैक्नीशियन को 1 kV विभवान्तर के परिपथ में 2 μF संधारित्र की आवश्यकता है। 1 μF के संधारित्र उसे प्रचुर संख्या में उपलब्ध हैं जो 400 V से अधिक का विभवान्तर वहन नहीं कर सकते। कोई सम्भव विन्यास सुझाइए जिसमें न्यूनतम संधारित्रों की आवश्यकता हो।
हल-
माना हम प्रत्येक पंक्ति में n संधारित्र जोड़ते हैं तथा ऐसी m पंक्तियों को समान्तर क्रम में जोड़ते हैं।
श्रेणीक्रम में, 1 kV = 1000 V को विभवान्तर n संधारित्रों में बराबर बँट जाएगा।
प्रत्येक संधारित्र पर विभवान्तर = [latex s=2]\frac { 1000 }{ n }[/latex]
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
हमें 3-3 संधारित्रों को श्रेणीक्रम में जोड़कर इस प्रकार की 6 पंक्तियाँ बनानी होंगी। अब इन 6 पंक्तियों को समान्तर क्रम में जोड़ना होगा।

प्रश्न 24.
2F वाले एक समान्तर पट्टिका संधारित्र की पट्टिका का क्षेत्रफल क्या है, जबकि पट्टिकाओं का पृथकन 0.5 cm है? [अपने उत्तर से आप यह समझ जाएँगे कि सामान्य संधारित्र uF या कम परिसर के क्यों होते हैं? तथापि विद्युत-अपघटन संधारित्रों (Electrolytic capacitors) की धारिता कहीं अधिक (0.1 F) होती है क्योंकि चालकों के बीच अति सूक्ष्म पृथकन होता है।
हल-
दिया है, समान्तर पट्ट संधारित्र की धारिता C = 2F.
इसकी प्लेटों के बीच पृथक्करण (दूरी) d= 0.5 cm = 5 x 10-3 m
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q24

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प्रश्न 25.
चित्र 2.15 के नेटवर्क (जाल) की तुल्य धारिता प्राप्त 100 pF कीजिए। 300 V संभरण (सप्लाई) के साथ प्रत्येक संधारित्र का आवेश व उसकी वोल्टता ज्ञात कीजिए।
हल-
दिए गए नेटवर्क को संलग्न चित्र 2.16 की भाँति व्यवस्थित किया जा सकता है-
सर्वप्रथम C2 व C3 श्रेणीक्रम में जुड़े हैं, इनकी तुल्य धारिता
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
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शेष संयोजन का विभवान्तर V = 300 V – 200 V = 100 V
C1, C2 व C3 के श्रेणी संयोजन से समान्तर क्रम में जुड़ा है,
C1 का विभवान्तर = 100 V
तथा C2 व C3 के श्रेणी संयोजन का विभवान्तर = 100 V
C1 पर आवेश q1 = C1V1 = 100 x 10-12 F x 100 V = 10-8 C
C2 = C3; अतः कुल विभवान्तर 100 V इन पर बराबर-बराबर बंटेगा।
प्रत्येक का विभवान्तर = 50 V
प्रत्येक पर आवेश q2 = C2V2 = 200 x 10-12 F x 50 V = 10-8 C
अतः संयोजन की धारिता C = [latex s=2]\frac { 200 }{ 3 }[/latex] pF
C1 का विभवान्तर = 100 V तथा आवेश = 10-8 C
C2 का विभवान्तर = 50 V तथा आवेश = 10-8 C
C3 का विभवान्तर = 50 V तथा आवेश = 10-8 C
C4 का विभवान्तर = 200 V तथा आवेश = 2 x 10-8 C

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प्रश्न 26.
किसी समान्तर पट्टिका संधारित्र की प्रत्येक पट्टिका का क्षेत्रफल 90 cm² है और उनके बीच पृथकन 2.5 mm है। 400 V संभरण से संधारित्र को आवेशित किया गया है।
(a) संधारित्र कितना स्थिरविद्युत ऊर्जा संचित करता है?
(b) इस ऊर्जा को पट्टिकाओं के बीच स्थिरविद्युत-क्षेत्र में संचित समझकर प्रति एकांक आयतन ऊर्जा u ज्ञात कीजिए। इस प्रकार, पट्टिकाओं के बीच विद्युत-क्षेत्र E के परिमाण और u में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
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प्रश्न 27.
एक 4 μF के संधारित्र को 200 V संभरण (सप्लाई) से आवेशित किया गया है। फिर संभरण से हटाकर इसे एक अन्य अनावेशित 2 μF के संधारित्र से जोड़ा जाता है। पहले संधारित्र की कितनी स्थिरविद्युत ऊर्जा का ऊष्मा और विद्युत चुम्बकीय विकिरण के रूप में ह्रास होता है?
हल-
दिया है, C1 = 4 x 10-6 F, V1 = 200 V, C2 = 2 x 10-6 F, V2 = 0 V
माना जोड़ने के पश्चात् दोनों का उभयनिष्ठ विभव V है।
जोड़ने से पूर्व संभरण को हटा लिया गया है; अतः कुल आवेश स्थिर रहेगा।
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प्रश्न 28.
दर्शाइए कि एक समान्तर पट्टिका संधारित्र की प्रत्येक पट्टिका पर बल का परिमाण [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] QE है, जहाँ संधारित्र पर आवेश है और E पट्टिकाओं के बीच विद्युत-क्षेत्र का परिमाण है। घटक [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] के मूल को समझाइए।
हल-
माना दोनों पट्टिकाओं के बीच लगने वाला पारस्परिक आकर्षण बल F है तथा प्लेटों के बीच की दूरी है। दूरी x में dx की वृद्धि करने पर आकर्षण बल F के विरुद्ध कृत कार्य
dW = F dx …..(i)
प्लेटों के बीच विद्युत-क्षेत्र E है; अत: संधारित्र के एकांक आयतन में संचित ऊर्जा [latex]u=\frac { 1 }{ 2 } { \varepsilon }_{ 0 }{ E }^{ 2 }[/latex]
प्लेटों का क्षेत्रफल A व बीच की दूरी ४ है; अत: संधारित्र की कुल ऊर्जा
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q28
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q28.1
घटक [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] का मूल इस तथ्य में निहित है कि चालक प्लेट के बाहर विद्युत-क्षेत्र [latex s=2]\frac { E }{ 2 }[/latex] तथा प्लेट के भीतर शून्य होता है। अत: औसत विद्युत-क्षेत्र में होता है, जिसके विरुद्ध प्लेट को खिसकाया जाता है।

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प्रश्न 29.
दो संकेन्द्री गोलीय चालकों जिनको उपयुक्त विद्युतरोधी आलम्बों से उनकी स्थिति में रोका गया है, से मिलकर एक गोलीय संधारित्र बना है (चित्र 2.17)। दर्शाइए कि (UPBoardSolutions.com) गोलीय संधारित्र की धारिता C इस प्रकार व्यक्त की जाती है:
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उत्तर-
गोलीय अथवा गोलाकार संधारित्र की धारिता (Capacitance of Spherical Capacitor) का व्यंजक-माना गोलीय संधारित्र धातु के दो समकेन्द्रीय खोखले गोलों A व B का बना है, जो एक-दूसरे को कहीं भी स्पर्श नहीं करते (चित्र 2.17)। जब गोले A को-q आवेश दिया जाता है तो (UPBoardSolutions.com) प्रेरण द्वारा गोले B पर +q आवेश उत्पन्न हो जाता है। चूंकि गोले B का बाहरी तल पृथ्वी से जुड़ा है; अतः गोले B के बाहरी तल पर उत्पन्न -q आवेश पृथ्वी से आने वाले इलेक्ट्रॉनों से निरावेशित हो जाता है। इस प्रकार गोले B के आन्तरिक पृष्ठ पर +q आवेश रह जाता है। माना गोले A की त्रिज्या r2 तथा गोले B की त्रिज्या b है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q29.1
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प्रश्न 30.
एक गोलीय संधारित्र के भीतरी गोले की त्रिज्या 12 cm है तथा बाहरी गोले की त्रिज्या 13 cm है। बाहरी गोला भू-सम्पर्कित है तथा भीतरी गोले पर 2.5 μC का आवेश दिया गया है। संकेन्द्री गोलों के बीच के स्थान में 32 परावैद्युतांक का द्रव भरा है।
(a) संधारित्र की धारिता ज्ञात कीजिए।
(b) भीतरी गोले का विभव क्या है?
(c) इस संधारित्र की धारिता की तुलना एक 12 cm त्रिज्या वाले किसी वियुक्त गोले की धारिता से कीजिए। व्याख्या कीजिए कि गोले की धारिता इतनी कम क्यों है?
हल-
दिया है, r1 = 13 cm = 0.13 m, r2 = 0.12 m, K = 32, Q = 2.5 x 10-6 C
(a) गोलीय संधारित्र की धारिता
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अर्थात् गोलीय संधारित्र की धारिता एकल गोले की धारिता से 416 गुनी अधिक है। इससे यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि एकल चालक के समीप एक अन्य (UPBoardSolutions.com) भू-सम्पर्कित चालक रखकर उनके बीच के स्थान में परावैद्युत भरने से धारिता बहुत अधिक बढ़ जाती है।

प्रश्न 31.
सावधानीपूर्वक उत्तर दीजिए :

  1. दो बड़े चालक गोले जिन पर आवेश Q1 और Q2 हैं, एक-दूसरे के समीप लाए जाते हैं। क्या इनके बीच स्थिर विद्युत बल का परिमाण तथ्यत:
    [latex]\frac { { Q }_{ 1 }{ Q }_{ 2 } }{ 4\Pi { \varepsilon }_{ 0 }{ r }^{ 2 } }[/latex]
    द्वारा दर्शाया जाता है, जहाँ r इनके केन्द्रों के बीच की दूरी है।
  2. यदि कूलॉम के नियम में [latex s=2]\frac { { 1 } }{ { r }^{ 3 } }[/latex] निर्भरता का समावेश ([latex s=2]\frac { { 1 } }{ { r }^{ 2 } }[/latex] के स्थान पर) हो तो क्या गाउस का नियम अभी भी सत्य होगा?
  3. स्थिरविद्युत-क्षेत्र विन्यास में एक छोटा परीक्षण आवेश किसी बिन्दु पर विराम में छोड़ा जाता है। क्या यह उस बिन्दु से होकर जाने वाली क्षेत्र रेखा के अनुदिश चलेगा?
  4. इलेक्ट्रॉन द्वारा एक वृत्तीय कक्षा पूरी करने में नाभिक के क्षेत्र द्वारा कितना कार्य किया जाता है? यदि कक्षा दीर्घवृत्ताकार हो तो क्या होगा?
  5. हमें ज्ञात है कि एक आवेशित चालक के पृष्ठ के आर-पार विद्युत-क्षेत्र असंतत होता है। क्या वहाँ विद्युत विभव भी असंतत होगा?
  6. किसी एकल चालक की धारिता से आपका क्या अभिप्राय है?
  7. एक सम्भावित उत्तर की कल्पना कीजिए कि पानी का परावैद्युतांक (= 80), अभ्रक के परावैद्युतांक (= 6) से अधिक क्यों होता है?

हल-

  1. यदि दोनों गोले एक-दूसरे से बहुत अधिक दूरी पर होंगे तभी वे बिन्दं आवेशों की भाँति कार्य करेंगे। कूलॉम का नियम केवल बिन्दु आवेशों के लिए सत्य है; अत: गोलों को समीप लाने पर कूलॉम का नियम लागू नहीं होगा।
  2. नहीं, गाउस का नियम केवल तभी तक सत्य है जब तक कि कूलॉम के नियम में निर्भरता [latex s=2]\frac { { 1 } }{ { r }^{ 2 } }[/latex] अतः कूलॉम के नियम में निर्भरता ([latex s=2]\frac { { 1 } }{ { r }^{ 3 } }[/latex]) होने पर गाउस का नियम लागू नहीं होगा।
  3. नहीं, यदि क्षेत्र रेखा एक सरल रेखा है, केवल तभी परीक्षण आवेश क्षेत्र रेखा के अनुदिश चलेगा।
  4. शून्य, स्थिर विद्युत क्षेत्र में बिन्दु आवेश के बन्द वक्र पर चलाने में किया गया कार्य शून्य होता है। यदि वक्र दीर्घवृत्ताकार है तो भी कार्य शून्य होगा।
  5. नहीं, चालक की पूरी सतह (UPBoardSolutions.com) पर विद्युत विभव सतत होता है।
  6. एकल चालक की धारिता एक ऐसे संधारित्र की धारिता है, जिसकी दूसरी प्लेट अनन्त पर है।
  7. जल के अणुओं का अपना स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण होता है; अत: जल का परावैद्युतांक उच्च होता है, इसके विपरीत अभ्रक के अणुओं का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है; अत: इसका परावैद्युतांक निम्न होता है।

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प्रश्न 32.
एक बेलनाकार संधारित्र में 15 cm लम्बाई एवं त्रिज्याएँ 1.5 cm तथा 1.4 cm के दो समाक्ष बेलन हैं। बाहरी बेलन भू-सम्पर्कित है और भीतरी बेलन को 3.5 μF का आवेश दिया गया है। निकाय की धारिता और भीतरी बेलन का विभव ज्ञात कीजिए। अन्त्य प्रभाव (अर्थात सिरों पर क्षेत्र रेखाओं का मुड़ना) की उपेक्षा कर सकते हैं।
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प्रश्न 33.
3 परावैद्युतांक तथा 107 Vm-1 की परावैद्युत सामर्थ्य वाले एक पदार्थ से 1 kV वोल्टता अनुमतांक के समान्तर पट्टिका संधारित्र की अभिकल्पना करनी है। [परावैद्यत सामर्थ्य वह अधिकतम विद्युत-क्षेत्र है जिसे कोई पदार्थ बिना भंग हुए अर्थात आंशिक आयनन द्वारा बिना विद्युत संचरण आरम्भ किए सहन कर सकता है। सुरक्षा की दृष्टि से क्षेत्र को कभी भी परावैद्युत सामर्थ्य के 10% से अधिक नहीं होना चाहिए।] 50 pF धारिता के लिए पट्टिकाओं का कितना न्यूनतम क्षेत्रफल होना चाहिए?
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प्रश्न 34.
व्यवस्थात्मकतः निम्नलिखित में संगत समविभव पृष्ठ का वर्णन कीजिए :

  1. z-दिशा में अचर विद्युत-क्षेत्र
  2. एक क्षेत्र जो एकसमान रूप से बढ़ता है, परन्तु एक ही दिशा (मान लीजिए z-दिशा) में रहता है।
  3. मूल बिन्दु पर कोई एकल धनावेश, और
  4. एक समतल में समान दूरी पर समान्तर लम्बे आवेशित तारों से बने एकसमान जाल।

उत्तर-

  1. x-y समतल के समान्तर समतल।
  2. समविभव पृष्ठ x-y समतल के समान्तर होंगे, परन्तु बढ़ते क्षेत्र के साथ, भिन्न-भिन्न नियत विभव वाले समतल एक-दूसरे के समीप होते जाएँगे।
  3. संकेन्द्रीय गोले जिनके केन्द्र मूल बिन्दु पर हैं।
  4. ग्रिड के समीप, समविभव पृष्ठों की आकृति समय के साथ बदलेगी परन्तु ग्रिड से दूर जाने पर समविभव पृष्ठ ग्रिड (जाल) के अधिकाधिक समान्तर होते जाएँगे।

प्रश्न 35.
किसी वान डे ग्राफ प्रकार के जनित्र में एक गोलीय धातु कोश 15 x 106 V का एक इलेक्ट्रोड बनाना है। इलेक्ट्रोड के परिवेश की गैस की परावैद्युत सामर्थ्य 5 x 107 Vm-1 है। गोलीय कोश की आवश्यक न्यूनतम त्रिज्या क्या है? [इस अभ्यास से आपको यह ज्ञान होगा कि एक छोटे गोलीय कोश से आप स्थिरवैद्यत जनित्र, जिसमें उच्च विभव प्राप्त करने के लिए कम आवेश की आवश्यकता होती है, नहीं बना सकते।
हल-
दिया है, गोलीय कोश का विभव V = 15 x 106 V
गैस की परावैद्युत सामर्थ्य Emax = 5 x 107 V/m
माना कोश की न्यूनतम त्रिज्या r है, तब
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance Q35

प्रश्न 36.
r1 त्रिज्या तथा q1 आवेश वाला एक छोटा गोला r2 त्रिज्या और q2 आवेश के गोली खोल (कोश) से घिरा है। दर्शाइए यदि q1 धनात्मक है तो (जब दोनों को एक तार द्वारा जोड़ दिया जाता है) आवश्यक रूप से आवेश, गोले से खोल की तरफ ही प्रवाहित होगा, चाहे खोल पर आवेश q2 कुछ भी हो।
उत्तर-
हम जानते हैं कि किसी चालक का सम्पूर्ण आवेश उसके बाह्य पृष्ठ पर रहता है; अतः जैसे ही दोनों गोलों को चालक तार द्वारा जोड़ा जाएगा वैसे ही अन्दर वाले छोटे (UPBoardSolutions.com) गोले को सम्पूर्ण आवेश तार से होकर बाहरी खोल की ओर प्रवाहित हो जाएगा, चाहे खोल पर आवेश q2 कुछ भी क्यों न हो।

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प्रश्न 37.
निम्न का उत्तर दीजिए:
(a) पृथ्वी के पृष्ठ के सापेक्ष वायुमण्डले की ऊपर परत लगभग 400 kV पर है, जिसके संगत विद्युत-क्षेत्र ऊँचाई बढ़ने के साथ कम होता है। पृथ्वी के पृष्ठ के सापेक्ष विद्युत-क्षेत्र लगभग 100 Vm-1 है। तब फिर जब हम घर से बाहर खुले में जाते हैं तो हमें विद्युत आघात क्यों नहीं लगता? (घर को लोहे का पिंजरा मान लीजिए; अतः उसके अन्दर कोई विद्युत-क्षेत्र नहीं है।)

(b) एक व्यक्ति शाम के समय अपने घर के बाहर 2 m ऊँचा अवरोधी पट्ट रखता है जिसके शिखर पर एक 1 m क्षेत्रफल की बड़ी ऐलुमिनियम की चादर है। अगली सुबह वह यदि धातु की चादर को छूता है तो क्या उसे विद्युत आघात लगेगा?

(c) वायु की थोड़ी-सी चालकता के कारण (UPBoardSolutions.com) सारे संसार में औसतन वायुमण्डल में विसर्जन धारा 1800 A मानी जाती है। तब यथासमय वातावरण स्वयं पूर्णतः निरावेशित होकर विद्युत उदासीन क्यों नहीं हो जाता? दूसरे शब्दों में, वातावरण को कौन आवेशित रखता है?

(d) तड़ित के दौरान वातावरण की विद्युत ऊर्जा, ऊर्जा के किन रूपों में क्षयित होती है?
[संकेत : पृष्ठ आवेश घनत्व = 10-9 Cm-2 के अनुरूप पृथ्वी के (पृष्ठ) पर नीचे की दिशा में लगभग 100 Vm-1 का विद्युत क्षेत्र होता है। लगभग 50 km ऊँचाई तक (जिसके बाहर यह अच्छा चालक है) वातावरण की थोड़ी सी चालकता के कारण लगभग + 1800 C का आवेश प्रति सेकण्ड समग्र रूप से पृथ्वी में पंप होता रहता है। तथापि, पृथ्वी निरावेशित नहीं होती, क्योंकि संसार में हर समय लगातार तड़ित तथा तड़ित-झंझा होती रहती है, जो समान मात्रा में ऋणावेश पृथ्वी में पंप कर देती है।]
उत्तर-
(a) हमारा शरीर तथा पृथ्वी के समान विभव पर रहने के कारण हमारे शरीर से होकर कोई विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होती इसीलिए हमें कोई विद्युत आघात नहीं लगता।

(b) हाँ, पृथ्वी तथा ऐलुमिनियम की चादर मिलकर एक संधारित्र बनाती हैं तथा अवरोधी पट्ट परावैद्युत का कार्य करती है। ऐलुमिनियम की चादर वायुमण्डलीय (UPBoardSolutions.com) आवेश के लगातार गिरते रहने से आवेशित होती रहती है और उच्च विभव प्राप्त कर लेती है; अतः जब व्यक्ति इस चादर को छूता है तो उसके शरीर से होकर एक विद्युत धारा प्रवाहित होती है और इस कारण उस व्यक्ति को विद्युत आघात लगेगा।

(c) यद्यपि वायुमण्डल 1800 A की औसत विसर्जन धारा के कारण लगातार निरावेशित होता रहता है। परन्तु साथ ही तड़ित तथा झंझावात के कारण यह लगातार आवेशित भी होता रहता है और इन दोनों के बीच एक सन्तुलन बना रहता है जिससे कि वायुमण्डल कभी भी पूर्णत: निरावेशित नहीं हो पाता।

(d) तड़ित के दौरान वातावरण की विद्युत ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, ध्वनि ऊर्जा तथा ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में क्षयित होती है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वैद्युत विभव का मात्रक है (2011, 14)
(i) जूल/कूलॉम
(ii) जूल x कूलॉम
(iii) कूलॉम/जूल
(iv) न्यूटन/कूलॉम
उत्तर-
(i) जूल/कूलॉम

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प्रश्न 2.
E = 0 तीव्रता वाले वैद्युत-क्षेत्र में विभव V का दूरी r के साथ परिवर्तन होग (2010, 12, 17)
(i) V ∝ [latex s=2]\frac { 1 }{ r }[/latex]
(ii) V ∝ r
(iii) V ∝ [latex s=2]\frac { { 1 } }{ { r }^{ 2 } }[/latex]
(iv) V, r पर निर्भर नहीं करेगा
उत्तर-
(iv) V, r पर निर्भर नहीं करेगा

प्रश्न 3.
दो प्लेटें एक-दूसरे से 1 सेमी दूरी पर हैं और उनमें विभवान्तर 10 वोल्ट है। प्लेटों के बीच वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता है- (2009)
(i) 10 न्यूटन/कूलॉम
(ii) 500 न्यूटन/कूलॉम
(iii) 1000 न्यूटन/कूलॉम
(iv) 250 न्यूटन/कूलॉम
उत्तर-
(iii) 1000 न्यूटन/कूलॉम

प्रश्न 4.
1 इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) मात्रक है
(i) ऊर्जा का
(ii) विभव का
(iii) वेग का
(iv) कोणीय संवेग का
उत्तर-
(i) ऊर्जा का

प्रश्न 5.
एक वोल्ट विभवान्तर पर त्वरित करने पर इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा होती है|
(i) 1 जूल
(ii) 1 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
(iii) 1 अर्ग
(iv) 1 वाट
उत्तर-
(ii) 1 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट

प्रश्न 6.
वैद्युत द्विध्रुव के कारण, केन्द्र से दूरी पर अक्ष में स्थित बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता एवं विभव क्रमशः E तथा V हैं। E तथा V में सम्बन्ध होगा (2017)
(i) E = [latex s=2]\frac { V }{ R }[/latex]
(ii) E = [latex s=2]\frac { V }{ 2r }[/latex]
(iii) E = [latex s=2]\frac { 2V }{ r }[/latex]
(iv) E = 2rV
उत्तर-
(i) E = [latex s=2]\frac { V }{ R }[/latex]

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प्रश्न 7.
निम्न में से कौन-सा तथ्य समविभव पृष्ठ के लिए सत्य नहीं है ? (2009)
(i) पृष्ठ पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर शून्य होता है।
(ii) वैद्युत बल रेखाएँ पृष्ठ के सर्वथा लम्बवत् होती हैं।
(iii) पृष्ठ पर किसी आवेश को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने पर कोई कार्य नहीं होता है।
(iv) समविभव पृष्ठ सर्वदा गोलाकार होते हैं।
उत्तर-
(iv) समविभव पृष्ट सर्वदा गोलाकार होते हैं।

प्रश्न 8.
एक इलेक्ट्रॉन को दूसरे इलेक्ट्रॉन के अधिक नजदीक लाने पर निकाय की वैद्युत स्थितिज ऊर्जा (2010)
(i) घटती है।
(ii) बढ़ती है।
(iii) उतनी ही रहती है।
(iv) शून्य हो जाती है।
उत्तर-
(ii) बढ़ती है।

प्रश्न 9.
वायु में 1 सेमी दूरी पर रखे प्रत्येक 1 माइक्रो कूलॉम के दो धनात्मक बिन्दु आवेशों के निकाय की वैद्युत स्थितिज ऊर्जा है- (2016)
(i) 0.9 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट
(ii) 0.9 जूल
(iii) 1 जूल
(iv) 9 जूल
उत्तर-
(ii) 0.9 जूल

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से धारिता का मात्रक कौन-सा है?
(i) कूलॉम
(ii) ऐम्पियर
(iii) वोल्ट
(iv) कूलॉम/वोल्ट
उत्तर-
(iv) कूलॉम/वोल्ट

प्रश्न 11.
एक आवेशित संधारित्र बैटरी से जुड़ा है। यदि प्लेटों के बीच परावैद्युत पदार्थ की एक पट्टी रखी जाये तो निम्न में से क्या परिवर्तित नहीं होगा ? (2010)
(i) आवेश
(ii) विभवान्तर
(iii) धारिता
(iv) ऊर्जा
उत्तर-
(ii) विभवान्तर

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प्रश्न 12.
वायु में रखे दो धनावेशों के मध्य परावैद्युत पदार्थ रख देने पर इनके बीच प्रतिकर्षण बल का मान (2015)
(i) बढ़ जायेगा
(ii) घट जायेगा
(iii) वही रहेगा।
(iv) शून्य
उत्तर-
(ii) घट जायेगा।

प्रश्न 13.
दिये गये चित्र 2.18 में बिन्दुओं A व B के बीच तुल्य धारिता है
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(i) 4 μF
(ii) [latex s=2]\frac { 12 }{ 7 }[/latex] μF
(iii) [latex s=2]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] μF
(iv) [latex s=2]\frac { 7 }{ 12 }[/latex] μF
उत्तर-
(i) 4 μF

प्रश्न 14.
दिये गये चित्र 2.19 में बिन्दुओं A व B के बीच तुल्य धारिता है- (2009)
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(i) [latex s=2]\frac { 2 }{ 3 }[/latex] μF
(i) [latex s=2]\frac { 3 }{ 2 }[/latex] μF
(ii) [latex s=2]\frac { 11 }{ 3 }[/latex] μF
(iv) 1 μF
उत्तर-
(i) 1 μF

प्रश्न 15.
चित्र 2.20 में प्रदर्शित संधारित्रों की तुल्य धारिता A व B के बीच है (2015)
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(i) 4 μF
(ii) 2.5 μF
(iii) 2 μF
(iv) 0.25 μF
उत्तर-
(ii) 2.5 μF

प्रश्न 16.
100 माइक्रोफैरड धारिता वाले संधारित्र को 10 वोल्ट तक आवेशित करने पर उसमें संचित ऊर्जा होगी (2016)
(i) 5.0 x 10-3 जूल
(ii) 0.5 x 10-3 जूल।
(iii) 0.5 जूल।
(iv) 5.0 जूल।
उत्तर-
(i) 5.0 x 10-3 जूल।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वैद्युत-विभव की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विमा लिखिए। (2012, 17)
उत्तर-
वैद्युत-विभव-वैद्युत- क्षेत्र में किसी बिन्दु पर वैद्युत-विभव (V), परीक्षण-आवेश (+q0) को अनन्त से उस बिन्दु तक लाने में किये गये कार्य (W) तथा परीक्षण-आवेश के मान की निष्पत्ति के बराबर होता है।
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प्रश्न 2.
इलेक्ट्रॉन-वोल्ट की परिभाषा दीजिए।
या
eV क्या है? इसका मान जूल में ज्ञात कीजिए।
उत्तर-
इलेक्ट्रॉन-वोल्ट- यह ऊर्जा का जूल की तुलना में बहुत छोटा मात्रक है। इसको इस प्रकार परिभाषित किया जाता है-
“1 इलेक्ट्रॉन-बोल्ट (eV) वह ऊर्जा है जो कि 1 इलेक्ट्रॉन (आवेश q = e = 1.6 x 10-19 कूलॉम) 1 वोल्ट विभवान्तर पर त्वरित होने पर प्राप्त करता है।”
यदि q कूलॉम आवेश से आवेशित कण ΔV विभवान्तर पर त्वरित होता है तो उसके द्वारा प्राप्त गतिज ऊर्जा K = q x ΔV
यहाँ, q = e = 1.6 x 10-19 कूलॉम तथा V = 1 वोल्ट
1 इलेक्ट्रॉन-वोल्ट ऊर्जा = 1.6 x 10-19 कूलॉम x 1 वोल्ट = 1.6 x 10-19 जूल।
इस प्रकार 1 eV = 1.6 x 10-19 जूल

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प्रश्न 3.
1 Mev को जूल में व्यक्त कीजिए।
हल-
1 MeV = 106 eV= 106 x 1.6 x 10-19 जूल = 1.6 x 10-13 जूल

प्रश्न 4.
क्या यह सम्भव है कि किसी बिन्दु पर वैद्युत विभव शून्य हो, लेकिन वैद्युत क्षेत्र शून्य न हो?
उत्तर-
हाँ। उदाहरण के लिए, वैद्युत द्विध्रुव की निरक्षीय स्थिति में।

प्रश्न 5.
1 सेमी त्रिज्या के गोले को 1 कूलॉम आवेश देने से गोले के पृष्ठ पर उत्पन्न विभव की गणना कीजिए। (2016)
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प्रश्न 6.
+ 40 माइक्रोकूलॉम के दो आवेश परस्पर 0.4 मीटर की दूरी पर स्थित हैं। इनके मध्य बिन्दु पर विभव की गणना कीजिए। माध्यम का परावैद्युतांक 2 है। (2014)
हल-
+ 40 माइक्रोकूलॉम के दोनों आवेशों के कारण उनके मध्य बिन्दु पर वैद्युत विभव
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प्रश्न 7.
विभव-प्रवणता तथा वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर-
वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता E = – विभव प्रवणता = [latex s=2]\frac { \triangle V }{ \triangle x }[/latex]

प्रश्न 8.
विभव-प्रवणता का मात्रक एवं विमीय सूत्र लिखिए।
उत्तर-
मात्रक-वोल्ट/मीटर तथा विमा- [MLT-3A-1]

प्रश्न 9.
दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर 50 V है। एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक 2 x 10-5 कूलॉम आवेश को ले जाने पर कितना कार्य करना होगा ? (2011, 12, 18)
हल-
कार्य (W) = आवेश x विभवान्तर = 2 x 10-5 कूलॉम x 50 वोल्ट = 10-3 जूल।

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प्रश्न 10.
10 सेमी की दूरी पर स्थित दो बिन्दु A व B के विभव क्रमशः +10 वोल्ट तथा -10 वोल्ट हैं। 1.0 कूलॉम आवेश को A से B तक ले जाने में कितना कार्य करना होगा? (2012)
हल-
1.0 कूलॉम आवेश को A से B तक ले जाने में किया गया कार्य
W = (VB – VA) q0 = (-10 – 10) x 1.0 = -20 जूल
अत: कार्य प्राप्त होगा।

प्रश्न 11.
सम-विभव पृष्ठ से क्या तात्पर्य है? (2015, 17)
उत्तर-
किसी वैद्युत क्षेत्र में खींचा गया वह पृष्ठ जिस पर स्थित सभी बिन्दुओं पर वैद्युत विभव बराबर हो, समविभव पृष्ठ कहलाता है।

प्रश्न 12.
किसी समविभव पृष्ठ के दो बिन्दुओं के मध्य 800 μC आवेश को गति कराने में कितना कार्य होगा? (2013)
हल-
समविभव पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर विभव का मान समान होता है। अतः पृष्ठ के किन्हीं भी दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर ΔV = 0
अतः q = 800 μC = 800 x 10-6 कूलॉम को इन बिन्दुओं के बीच गति कराने में किया गया कार्य
W = q x ΔV = (800 x 10-6) x 0 = 0 (शून्य) [∴ 1 μC = 10-6 C]

प्रश्न 13.
संधारित्र किसे कहते हैं? (2014)
उत्तर-
संधारित्र एक ऐसा समायोजन है जिसमें किसी चालक के आकार में परिवर्तन किये बिना उस पर आवेश की पर्याप्त मात्रा संचित की जा सकती है।

प्रश्न 14.
संधारित्र की धारिता की परिभाषा लिखिए। (2014, 15)
उत्तर-
किसी संधारित्र की धारिता, उसकी एक प्लेट को दिए गए आवेश तथा दोनों प्लेटों के बीच उत्पन्न विभवान्तर के अनुपात के बराबर होती है।
अर्थात् संधारित्र की धारिता C = [latex s=2]\frac { q }{ V }[/latex]

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प्रश्न 15.
M.K.S. पद्धति में धारिता की विमा लिखिए। इसका मात्रक क्या है?
उत्तर-
धारिता की विमा [M-1L-2T4A2] तथा मात्रक फैरड है।

प्रश्न 16.
परावैद्युत पदार्थ क्या है? (2010, 12)
उत्तर-
परावैद्युत पदार्थ वह पदार्थ होता है जिसके अन्दर सभी परमाणुओं में उनके सभी इलेक्ट्रॉन नाभिक के आकर्षण बल से दृढ़तापूर्वक बँधे रहते हैं। अतः ऐसे पदार्थों में वैद्युत चालन के लिए कोई भी मुक्त इलेक्ट्रॉन उपलब्ध नहीं होता अथवा मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या नगण्य होती है। अतः परावैद्युत पदार्थ वे पदार्थ हैं जिनमें होकर वैद्युत प्रवाह नहीं होता। फिर भी यदि कोई वैद्युत-क्षेत्र किसी परावैद्युत पदार्थ पर आरोपित (UPBoardSolutions.com) किया जाता है तो परावैद्युत पदार्थ के पृष्ठों पर प्रेरित आवेश उत्पन्न हो जाता है। अतः परावैद्युत पदार्थ वे कुचालक (insulator) पदार्थ हैं जिनमें वैद्युत प्रभाव (electric effects) बिना वैद्युत चालन के संचरित होते हैं।” किसी वैद्युत चालक के किसी बिन्दु पर दिया गया आवेश उसकी पूरी सतह पर शीघ्रता से फैल जाता है, जबकि किसी परावैद्युत के किसी बिन्दु पर दिया गया आवेश उसी के निकटवर्ती क्षेत्र में स्थिर रहता है। उदाहरण-काँच, रबर, प्लास्टिक, ऐबोनाइट, माइका, मोम, कागज, लकड़ी आदि।

प्रश्न 17.
संधारित्र में साधारणतया प्रयुक्त होने वाले किन्हीं दो परावैद्युत पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर-
अभ्रक व काँच।

प्रश्न 18.
किसी परावैद्युत पदार्थ के वैद्युत ध्रुवण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
द्युत धुवण- किसी परावैद्युत अथवा विद्युतरोधी को बाह्य वैद्युत क्षेत्र में रखने पर इसके धन व ऋण आवेशों के केन्द्र पृथक्-पृथक् हो जाते हैं, जिससे इनमें वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण प्रेरित हो जाते हैं। ऐसे परावैद्युत को ध्रुवित होना कहते हैं तथा इस घटना को वैद्युत ध्रुवण कहते हैं।

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प्रश्न 19.
संधारित्रों में परावैद्युत के उपयोग से धारिता क्यों बढ़ जाती है? (2010, 11)
या
किसी संधारित्र की प्लेटों के बीच परावैद्युत पदार्थ भरने पर इसकी धारिता पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2014)
उत्तर-
संधारित्रों की प्लेटों के बीच परावैद्युत भरने से इसके अन्दर प्लेटों के बीच उपस्थित वैद्युत-क्षेत्र के विपरीत दिशा में एक आन्तरिक वैद्युत-क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है, जो इसकी सतह पर प्लेटों के विपरीत आवेश के प्रेरित होने से उत्पन्न होता है। अतः प्लेटों के बीच विभवान्तर घट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप धारिता बढ़ जाती है।

प्रश्न 20.
परावैद्युत सामर्थ्य एवं भंजक विभवान्तर को स्पष्ट कीजिए। (2013).
उत्तर-

  • परावैद्युत सामर्थ्य- परावैद्युत पर आरोपित वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता का वह अधिकतम मान जिसको परावैद्युत बिना परावैद्युत भंजन के सहन कर सकता है, परावैद्युत की परावैद्युत सामर्थ्य कहलाती है।
  • भंजक विभवान्तर- किसी परावैद्युत पदार्थ के भंजक हुए बिना उसके दोनों सिरों के बीच लगाए गए वैद्युत विभवान्तर के अधिकतम मान को उस परावैद्युत का भंजक विभवान्तर कहते हैं।

प्रश्न 21.
एक आवेशित संधारित्र एवं एक वैद्युत सेल में मूल अन्तर क्या है? (2009)
उत्तर-
आवेशित संधारित्र में वैद्युत आवेश संग्रहीत रहता है, जबकि वैद्युत सेल में वैद्युत आवेश का प्रवाह होता है।

प्रश्न 22.
समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता के लिए व्यंजक लिखिए तथा प्रतीकों का अर्थ बताइए। (2007)
उत्तर-
C = [latex s=2]\frac { { \varepsilon }_{ 0 }A }{ d }[/latex]
A = प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल,
d = प्लेटों के बीच की दूरी तथा
[latex s=2]{ \varepsilon }_{ 0 }[/latex] = वायु या निर्वात् की वैद्युतशीलता।

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प्रश्न 23.
दो संधारित्र जिनकी धारिताएँ क्रमशः 20 तथा 30 μF हैं, श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। उनकी तुल्य धारिता ज्ञात कीजिए। (2011)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance VSAQ 23

प्रश्न 24.
नीचे दिये गये परिपथ में A और B बिन्दुओं के बीच तुल्य धारिता ज्ञात कीजिए- (2015)
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हल-
दिये गये परिपथ को निम्नांकित चित्र से प्रतिस्थापित कर सकते हैं
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
स्पष्ट है कि दिया गया परिपथ व्हीटस्टोन सेतु व्यवस्था है, अतः 8 μF पर कोई आवेश संचित नहीं होगा।
अतः चित्र 2.22 को चित्र 2.23 से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
अत: A व B के बीच तुल्य धारिता C = 2 μF + 2 μF = 4 μF
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प्रश्न 25.
एक समान्तर प्लेट वायु संधारित्र की धारिता 100 μF है। यदि इसे 50 वोल्ट तक आवेशित किया जाए, तो इसमें संचित ऊर्जा कितनी होगी? (2009)
हल-
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प्रश्न 26.
एक 10 μF के संधारित्र का विभवान्तर 100 वोल्ट से 200 वोल्ट कर देने पर उसकी ऊर्जा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए। (2011, 12, 14)
हल-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance VSAQ 26

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता तथा विभव-प्रवणता के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2011)
या
विभव-प्रवणता से क्या तात्पर्य है ? विभव-प्रवणता एवं विद्युत-क्षेत्र की तीव्रता के मध्य सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2012)
या
विभव-प्रवणता से आप क्या समझते हैं ? (2018)
उत्तर-
माना बिन्दु O पर स्थित +q आवेश के वैद्युत-क्षेत्र में, जिसकी तीव्रता [latex s=2]\overrightarrow { E }[/latex] है, O से क्रमशः ॐ तथा (x + Δx) दूरी पर x-अक्ष की धनात्मक दिशा में स्थित बिन्दु A तथा बिन्दु B हैं। यदि एक परीक्षण धनावेश +qo बिन्दु B पर रख दिया जाये तो (UPBoardSolutions.com) इस आवेश पर इस वैद्युत-क्षेत्र के कारण लगने वाला वैद्युत बल F = q0E होगा। इस बल की दिशा [latex s=2]\overrightarrow { E }[/latex] की दिशा में अर्थात् X-अक्ष की धनात्मक दिशा में होगी। अत: +q0 आवेश को बिन्दु B से बिन्दु A तक बल [latex s=2]\overrightarrow { E }[/latex] के विरुद्ध ले जाया गया है। बिन्दु A, बिन्दु O से x दूरी पर स्थित है, अत: इस प्रक्रिया में बाह्य कर्ता को बल [latex s=2]\overrightarrow { F }[/latex] के विरुद्ध कार्य करना पड़ेगा। अत: यदि यह कार्य ΔW हो तो
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राशि [latex s=2]\frac { \triangle V }{ \triangle x }[/latex], दूरी के साथ विभव-परिवर्तन की दर है तथा इसे ही विभव-प्रवणता कहते हैं। अतः किसी वैद्युत-क्षेत्र में किसी बिन्दु पर किसी दिशा में वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता उस दिशा में क्षेत्र की । ऋणात्मक विभव-प्रवणता के बराबर होती है। (UPBoardSolutions.com) प्राप्त समीकरण (2). में ऋणात्मक चिह्न यह दर्शाता है कि वैद्युत-क्षेत्र की दिशा में विभव घटता है तथा : वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता की दिशा विभव-प्रवणता की दिशा के विपरीत होती है।

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प्रश्न 2.
किसी वैद्युत-द्विध्रुव के अक्ष (अनुदैर्ध्य स्थिति) पर स्थित किसी बिन्दु पर वैद्युत-विभव का सूत्र स्थापित कीजिए। (2011, 17)
या
वैद्युत-द्विध्रुव को परिभाषित कीजिए। किसी वैद्युत-द्विध्रुव की अक्षीय स्थिति में किसी बिन्दु पर वैद्युत विभव का सूत्र स्थापित कीजिए। (2012, 14, 15, 16, 18)
उत्तर-
वैद्युत-द्विधुव- कम दूरी पर स्थित दो बराबर तथा विपरीत आवेशों के निकाय को वैद्युत-द्विध्रुव कहते हैं।
वैद्युत-द्विध्रुव के अक्ष पर स्थित किसी बिन्दु पर वैद्युत- विभव-माना K परावैद्युतांक वाले माध्यम में एक वैद्युत-द्विध्रुव AB रखा है। द्विध्रुव +q व -q कूलॉम के आवेशों से बना है जिनके बीच की दूरी 2l है। द्विध्रुव के मध्य बिन्दु O से r मीटर की दूरी पर इसकी अक्षीय स्थिति में बिन्दु P पर वैद्युत-विभव ज्ञात करना है। चित्र 2.25 से स्पष्ट है कि बिन्दु P की आवेश +q से दूरी (r – l) तथा -q से (r + l) हैं।
आवेश +q के कारण P पर विभव,
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प्रश्न 3.
सिद्ध कीजिए कि निरक्षीय स्थिति में किसी बिन्दु पर वैद्युत-द्विध्रुव द्वारा वैद्युत-विभव शून्य होता है। (2010, 15, 16)
उत्तर-
वैद्युत-द्विध्रुव की निरक्षीय स्थिति में वैद्युत-विभव- माना वैद्युत-द्विध्रुव AB की लम्ब-अर्द्धक रेखा पर द्विध्रुव के मध्य-बिन्दु O से r मीटर की दूरी पर स्थित बिन्दु P वह बिन्दु है, जहाँ हमें वैद्युत-विभव ज्ञात करना है। (चित्र 2.26)। अब बिन्दु P पर द्विध्रुव के आवेश (+q) के कारण विभव
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प्रश्न 4.
दिये गये आवेशों के निकाय की कुल वैद्युत स्थितिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए। (2014)
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प्रश्न 5.
निम्न चित्र में विभवान्तर (VA – VB) के मान की गणना कीजिए- (2016)
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प्रश्न 6.
किसी वैद्युत द्विध्रुव को एकसमान विद्युत क्षेत्र में संतुलन की स्थिति से कोण घुमाने में किये गये कार्य का सूत्र प्राप्त कीजिए। (2017)
हल-
माना p वैद्युत-द्विध्रुव आघूर्ण का एक वैद्युत-द्विध्रुव, किसी एकसमान वैद्युत क्षेत्र E में रखा है तथा वैद्युत द्विध्रुव को वैद्युत क्षेत्र के भीतर घुमाया जा रहा है (चित्र 2.29)। माना किसी क्षण वैद्युत-द्विध्रुव आघूर्ण p की दिशा क्षेत्र की दिशा से α कोण बनाती है, तब वैद्युत-द्विध्रुव पर वैद्युत-क्षेत्र के कारण कार्य करने वाले बल-युग्म का आघूर्ण
τ = pE sin α
वैद्युत-द्विध्रुव को इस स्थिति से आगे अल्पांश कोण dα द्वारा घुमाने में वैद्युत-क्षेत्र के विरुद्ध कृत कार्य
dW = बल-युग्म का आघूर्ण x कोणीय विस्थापन
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प्रश्न 7.
किसी आवेशित चालक की स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक U = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] CV²
अथवा [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } \left( \frac { { q }^{ 2 } }{ C } \right)[/latex] प्त कीजिए, जहाँ C चालक की धारिता, q चालक पर आवेशं तथा V उसका विभव है। (2011, 16)
या
सिद्ध कीजिए कि E , जहाँ E = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } \left( \frac { { q }^{ 2 } }{ C } \right)[/latex] आवेशित चालक की ऊर्जा, q = चालक
पर आवेश तथा C उसकी धारिता है। या सिद्ध कीजिए कि आवेशित संधारित्र की स्थितिज ऊर्जा U = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] CV² होती है। (2017)
उत्तर-
आवेशित चालक की स्थितिज ऊर्जा- किसी चालक को आवेशित करने में किया गया कार्य उसमें वैद्युत-स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है। चूंकि प्रारम्भ में चालक पर आवेश शून्य है; अतः चालक तल पर विभव भी शून्य होगा। जैसे-जैसे चालक को आवेश दिया जाता है, (UPBoardSolutions.com) उसका विभव वैसे-वैसे बढ़ता जाता है, क्योंकि चालक का विभव उसे पर उपस्थित आवेश के अनुक्रमानुपाती होता है। माना चालक को कुल आवेश q कूलॉम देने पर उसका विभव V वोल्ट (बैटरी के विभव के बराबर) हो जाता है। हम यह मान सकते हैं कि चालक को आवेश देते समय उसका औसत विभव (0 + V) / 2 = V/2 रहा; अतः चालक को आवेशित करने में किया गया कुल कार्य
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प्रश्न 8.
एक समान्तर प्लेट संधारित्र को बैटरी से आवेशित किया जाता है। बैटरी का सम्बन्ध संधारित्र से विच्छेदित करने के उपरान्त प्लेटों के बीच की दूरी दोगुनी करने पर संधारित्र की धारिता तथा संग्रहित ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (2011)
उत्तर-
माना कि संधारित्र पर संचित आवेश q है।
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प्रश्न 9.
किसी चालक की वैद्युत धारिता से क्या तात्पर्य है ? RC का विमीय समीकरण निकालिए, जहाँ प्रतिरोध तथा C धारिता है। (2011)
उत्तर-
किसी चालक की वैद्युत धारिता- किसी चालक द्वारा आवेश ग्रहण करने की क्षमता उसकी वैद्युत धारिता कहलाती है। यह चालक को दिये गये आवेश तथा उसके संगत विभव में होने वाली वृद्धि के अनुपात के बराबर होती है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance SAQ 9
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प्रश्न 10.
संधारित्र के ऊर्जा घनत्व से क्या तात्पर्य है? प्रदर्शित कीजिए कि एकांक आयतन में किसी समानान्तर प्लेट संधारित्र में संचित ऊर्जा, [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } { \varepsilon }_{ 0 }{ E }^{ 2 }[/latex] है, जहाँ प्रतीकों का सामान्य अर्थ है। (2011, 15, 17)
उत्तर-
आवेशित संधारित्र की ऊर्जा उसकी प्लेटों के बीच स्थित माध्यम में निहित रहती है। संधारित्र की प्लेटों द्वारा घेरे गये माध्यम के एकांक आयतन में निहित ऊर्जा को संधारित्र का ऊर्जा घनत्व कहते हैं। अतः संधारित्र का ऊर्जा घनत्व
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प्रश्न 11.
तीन संधारित्र C1, C2 और C3 श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। इनकी समतुल्य धारिता का व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2015, 17)
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance SAQ 11.1
प्रश्न 12.
एक समान्तर प्लेट संधारित्र की प्लेटों का व्यास 8 सेमी है। प्लेटों के बीच वायु भरी है। यदि इस संधारित्र की धारिता 100 सेमी त्रिज्या के गोले की धारिता के बराबर हो, तो इसकी प्लेटों के बीच दूरी की गणना कीजिए। (2014)
हल-
समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता = 100 सेमी त्रिज्या वाले गोले की धारिता
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प्रश्न 13.
100 μF समान्तर प्लेट संधारित्र 400 वोल्ट तक आवेशित है। यदि इसके प्लेटों के बीच दूरी आधी कर दें तो प्लेटों के बीच नया विभवान्तर क्या होगा और संचित ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा ? (2014)
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प्रश्न 14.
दिये गये परिपथ में यदि A तथा B बिन्दुओं के बीच 150 वोल्ट विभवान्तर लगाया जाये तो 6 μF के संधारित्र के प्लेटों के बीच उत्पन्न विभवान्तर एवं संचित ऊर्जा की गणना कीजिए। (2015)
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प्रश्न 15.
संधारित्रों के दिये गये नेटवर्क में बिन्दुओं A और B के बीच तुल्य धारिता ज्ञात कीजिए और 4 μF संधारित्र के प्लेटों के बीच विभवान्तर की गणना कीजिए। (2016)
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हल-
चित्र 2.32 में 3 μF, 3 μF तथा 3 μF समान्तर क्रम में हैं। अत: इनकी तुल्य धारिता यदि C1 हो, तो।
C1 = 3 + 3 + 3 = 9 μF
तथा 18 μF एवं C = 9 μF श्रेणीक्रम में हैं।
अतः इनकी तुल्य धारिता यदि C2 हो, तो
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प्रश्न 16.
वैद्युत संधारित्र क्या होते हैं? इनके किन्हीं दो उपयोगों का उल्लेख कीजिए। धातु के दो गोलों की त्रिज्याएँ 18 सेमी तथा 27 सेमी हैं। प्रत्येक को 75 माइक्रोकूलॉम आवेश दिया गया है। चालक द्वारा दोनों गोलों को जोड़ने पर उभयनिष्ठ विभव का मान ज्ञात कीजिए। (2016)
उत्तर-
वैद्युत संधारित्र- वैद्युत संधारित्र एक ऐसा समायोजन है जिसमें किसी चालक के आकार में परिवर्तन किए बिना उस पर आवेश की पर्याप्त मात्रा संचित की जा सकती है। माना कि किसी चालक को q आवेश देने पर उसका वैद्युत विभव V हो जाता है, तब चालक की धारिता, C = [latex s=2]\frac { q }{ V }[/latex]
संधारित्रों के उपयोग- संधारित्रों के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं-

1. आवेश का संचय करने में संधारित्र को मुख्यत: आवेश का संचय करने में उपयोग किया जाता है। किसी परिपथ में क्षणिक एवं प्रबल धारी प्राप्त करने के लिए उस परिपथ में एक आवेशित संधारित्र जोड़ दिया जाता है। क्षणिक एवं शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करने के (UPBoardSolutions.com) लिए स्पन्दित वैद्युत चुम्बक (pulsed electromagnet) का प्रयोग करते हैं जो किसी आवेशित संधारित्र से ही प्रबल धारा प्राप्त करते हैं।

2. ऊर्जा का संचय करने में-आवेशित संधारित्र की प्लेटों के बीच वैद्युत क्षेत्र में पर्याप्त वैद्युत स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है। यदि संख्या में बहुत अधिक आवेशित संधारित्रों का एक स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता 93 संयोजन (संधारित्र बैंक) बनाएँ तो उस ऊर्जा की बड़ी मात्रा को संचित किया जा सकता है और समय आने पर उससे आवश्यकतानुसार ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।

3. इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में विभिन्न कार्यों के लिए संधारित्रों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, रेडियो-आवृत्ति के वैद्युत चुम्बकीय (UPBoardSolutions.com) दोलनों के उत्पादन एवं संसूचन में अर्थात् रेडियो, टेलीविजन इत्यादि के कार्यक्रमों के प्रसारण तथा अभिग्रहण में, वैद्युत शक्ति-सम्भरण (electric power supply) में वोल्टता के उच्चावचन (fluctuations) कम करने में प्रायः फिल्टर प्रयोग होते हैं और संधारित्र एकदिशीय धारा के स्पन्दनों (pulses) के आयाम को कम करके दिष्ट धारा प्राप्त कराने में सहायक होता है।

4. वैद्युत उपकरणों में—वैद्युत उपकरणों जैसे-प्रेरण कुण्डली (induction coil), मोटर इंजन के ज्वलन तन्त्र (ignition system), बिजली के पंखे इत्यादि में संधारित्रों का उपयोग किया जाता है। हम जानते हैं कि जब किसी प्रेरकीय परिपथ को अचानक तोड़ा जाता है, तो उस स्थान पर चिंगारी (spark) उत्पन्न होती है, परन्तु यदि उसे परिपथ में संधारित्र को लगाया गया है, तो परिपथ के टूटने से उत्पन्न प्रेरित धारा संधारित्र की प्लेटों को आवेशित कर चिंगारी उत्पन्न होने की सम्भावना को समाप्त कर देती है।

5. वैज्ञानिक अध्ययन में-वैज्ञानिक अध्ययनों में भी संधारित्रों का विशेष महत्त्व है। विभिन्न प्रकार के संधारित्रों में विभिन्न आकार की प्लेटों के बीच अलग-अलग (UPBoardSolutions.com) विन्यासों (configurations) के वैद्युत क्षेत्र स्थापित कर उसमें विभिन्न परावैद्युत पदार्थों को रखकर वैद्युत क्षेत्र में उनके वैद्युत व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है।
दिया है, गोलों की त्रिज्याएँ 0.18 मीटर तथा 0.27 मीटर हैं। a मीटर त्रिज्या के गोले की धारिता

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वैद्युत विभव की परिभाषा लिखिए। वैद्युत-आवेश के कारण किसी बिन्दु पर वैद्युत विभव के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2015)
उत्तर-
वैद्युत-विभव वैद्युत- क्षेत्र में किसी बिन्दु पर वैद्युत-विभव (V) परीक्षण आवेश (+q0) को अनन्त से उस बिन्दु तक लाने में किये गये कार्य (W) तथा परीक्षण-आवेश के मान की निष्पत्ति के बराबर होता है।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance LAQ 1.1UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
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प्रश्न 2.
समान्तर-प्लेट संधारित्र की धारिता के लिए व्यंजक का निगमन कीजिए। इसकी धारिता को कैसे बढ़ाया जा सकता है। (2013, 15, 16, 17)
या
किसी समान्तर-पट्ट संधारित्र की धारिता का व्यंजक प्राप्त कीजिए, जबकि दोनों प्लेटों के बीच परावैद्युत भरा हो। (2013)
या
किसी समान्तर-प्लेट संधारित्र की धारिता के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2011, 14)
या
किसी समतल आवेशित प्लेट के निकट वैद्युत-क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र लिखिए। इसका उपयोग करके समान्तर-प्लेट संधारित्र की धारिता के व्यंजक का निगमन कीजिए। (2011)
उत्तर-
समान्तर-प्लेट संधारित्र की धारिता- चित्र 2.34 में एक समान्तर-प्लेट संधारित्र दिखाया। गया है जिसमें मुख्यत: धातु की लम्बी व समतल दो प्लेटें Xव Y होती हैं जो एक-दूसरे के आमने-सामने थोड़ी दूरी पर दो विद्युतरोधी स्टैण्डों में लगी रहती हैं। इन समान्तर-प्लेटों के बीच वायु के स्थान (UPBoardSolutions.com) पर कोई विद्युतरोधी माध्यम (परावैद्युतांक K) भरा है। समतल प्लेटों में से प्रत्येक का क्षेत्रफल A मीटर तथा उनके बीच की दूरी d मीटर है।

जब प्लेट X को +q आवेश दिया जाता है तो प्रेरण के कारण प्लेट Y पर अन्दर की ओर -q आवेश तथा बाहर की ओर +q आवेश उत्पन्न हो जाता है, चूंकि प्लेंट Y पृथ्वी से जुड़ी है; अतः इसके बाहरी तल का +q आवेश पृथ्वी में चला जाएगा। अंतः प्लेटों के बीच वैद्युत-क्षेत्र उत्पन्न हो जाएगा और लगभग सभी जगह क्षेत्र की तीव्रता एकसमान होगी।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance LAQ 2
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समान्तर प्लेट संधारित्र की धारिता को निम्नलिखित प्रकार से बढ़ाया जा सकता है-

  1. प्रयुक्त प्लेटें अधिक क्षेत्रफल की होनी चाहिए।
  2. प्लेटों के बीच ऐसा माध्यम रखना चाहिए जिसका परावैद्युतांक अधिक हो।
  3. प्लेटों के बीच की दूरी (d) कम लेनी चाहिए अर्थात् प्लेटें परस्पर समीप रखनी चाहिए।

प्रश्न 3.
समान धारिता के चार संधारित्र समान्तर-क्रम में जुड़े हैं। 1.5 वोल्ट की बैटरी से जोड़ने पर प्रत्येक संधारित्र पर संचित आवेश 1.5 माइक्रोकूलॉम है। यदि इन्हें श्रेणीक्रम में जोड़कर उसी बैटरी से आवेशित किया जाए, तो प्रत्येक संधारित्र पर संचित आवेश की गणना कीजिए। (2016)
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प्रश्न 4.
एक समान्तर प्लेट वायु संधारित्र की धारिता 2 μF है। जब इसकी प्लेटों के बीच, प्लेटों के बीच की दूरी की तीन-चौथाई मोटाई की k परावैद्युतांक की प्लेट रखी जाती है, तब संधारित्र की धारिता 4 μF हो जाती है। k का मान ज्ञात कीजिए जहाँ प्लेटों का तथा परावैद्युत प्लेट का क्षेत्रफल समान है। (2014)
हल-
माना प्लेट का क्षेत्रफल = A
प्लेटों के बीच की दूरी = d
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प्रश्न 5.
दिये गये चित्र 2.35 में A और B बिन्दुओं के बीच तुल्यधारिता ज्ञात कीजिए। (2012)
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प्रश्न 6.
एक समान्तर प्लेट संधारित्र की प्रत्येक प्लेट का क्षेत्रफल 40 सेमी है तथा दोनों प्लेटों के बीच विद्युत-क्षेत्र की तीव्रता 50 न्यूटन प्रति कूलॉम है। प्रत्येक प्लेट पर आवेश की गणना कीजिए। (2014)
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प्रश्न 7.
दिए गए परिपथ में संधारित्र की वैद्युत स्थितिज ऊर्जा की गणना कीजिए। (2013)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance LAQ 7
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प्रश्न 8.
दिए गए परिपथ में दोनों संधारित्रों पर संचित आवेशों की गणना कीजिए।
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प्रश्न 9.
वानडे ग्राफ जनित्र की संरचना तथा कार्यविधि चित्र की सहायता से समझाइए। (2015)
या
वानडे ग्राफ जनित्र के सिद्धान्त एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए। (2017)
या
वानडे ग्राफ जनित्र के गुण-दोष/उपयोग का वर्णन कीजिए।
या
वानडे ग्राफ जनित्र का नामांकित चित्र बनाइए। इसके कार्य करने का सिद्धान्त बताइए। यह किस तरह से उच्च वोल्टेज उत्पन्न करता है? (2018)
उत्तर-
प्रोफेसर वानडे ग्राफ ने सन् 1931 में एक ऐसे स्थिर वैद्युत उत्पादक यन्त्र (electrostatic generator) की रचना की जिसके द्वारा दस लाख वोल्ट या इससे भी उच्च कोटि का विभवान्तर उत्पन्न किया जा सकता है। इस जनित्र को उनके नाम पर ही वानडे ग्राफ जनित्र कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance
सिद्धान्त-
इस जनित्र का सिद्धान्त निम्न दो स्थिर वैद्युत घटनाओं पर आधारित है-
(i) एक खोखले चालक का आवेश उसकी बाहरी सतह पर विद्यमान रहता है।
(ii) किसी चालक से वायु में वैद्युत विसर्जन, उसके नुकीले सिरों की प्राथमिकता से होता है। इस जनित्र की कार्यविधि वैद्युत चालक के नुकीले सिरों (pointed ends) की क्रिया पर आधारित है। चालक के नुकीले भाग पर आवेश का पृष्ठ घनत्व बहुत अधिक होने के कारण, इसे भाग के (UPBoardSolutions.com) पास तीव्र वैद्युत क्षेत्र उपस्थित होता है, जिससे वहाँ भी वायु का आयनीकरण (ionisation) हो जाता है। तब विपरीत प्रकृति का आवेश आकर्षण के कारण नुकीले भाग के पास तथा समान प्रकृति का आवेश प्रतिकर्षण के कारण नुकीले भाग से दूर की ओर दौड़ता है अर्थात् नुकीले भाग से वैद्युत पवन उत्पन्न हो जाता है।

यदि किसी खोखले चालक गोले के अन्दर जुड़े किसी चालक के (नुकीले भाग के) पास कोई आवेश लाया जाए, तो यह सम्पूर्ण आवेश खोखले चालक के बाहरी पृष्ठ पर स्थानान्तरित हो जाता है, चाहे खोखले चालक को विभव कितना भी अधिक हो। इस प्रकार खोखले चालक पर बार-बार आवेश देकर इसके आवेश तथा विभव को बहुत अधिक मान तक बढ़ाया जा सकता है। इसकी सीमा वैद्युतरोधी कठिनाइयों द्वारा निर्धारित की जाती है।

रचना-
चित्र 2.39 में वानडे ग्राफ जनित्र की रचना प्रदर्शित है। इसमें लगभग 5 मीटर व्यास के धातु का खोखला गोला S होता है जो लगभग 15 मीटर ऊँचे विद्युतरोधी स्तम्भों A व B पर टिका रहता है। P1 और P2 दो घिरनियाँ होती हैं जिनमें से होकर विद्युतरोधी पदार्थ; जैसे-रबर या रेशम की बनी एक पट्टी (belt) गुजरती है।

नीचे की घिरनी P को एक वैद्युत मोटर के द्वारा घुमाया जाता है जिससे पट्टी ऊध्र्वाधर तल में तीर की दिशा में घूमने लगती है। C1 और C2 धातु की दो कंघियाँ होती हैं। C1 (UPBoardSolutions.com) को फुहार कंघी (spray comb) तथा C2 को संग्राहक कंघी (collection comb) कहते हैं। कंघी C1 को एक उच्च विभव की बैटरी के धने सिरे से जोड़ दिया जाता है ताकि वह लगभग 10000 वोल्ट के पृथ्वी धनात्मक विभवे पर रह सके। कंघी C2 को गोले S के हैं आन्तरिक पृष्ठ से जोड़ दिया जाता है। D एक विसर्जन-नलिका (discharge tube) है।

चित्र 2.39 गोले से आवेश के क्षरण (leakage) को रोकने के लिए जनित्र को एक लोहे के टैंक में जिसमें दाब । युक्त (लगभग 15 वायुमण्डलीय दाब) वायु भरी होती है, बन्द कर देते हैं। लोहे का टैंक पृथ्वीकृत होता है।

कार्यविधि-
जब कंघे C1 को अति उच्च विभव दिया जाता है, तो तीक्ष्ण बिन्दुओं की क्रिया के फलस्वरूप यह इसके स्थान में आयन उत्पन्न करता है। धन आयनों व कंघे C1 के बीच प्रतिकर्षण के कारण ये धन आयन बेल्ट पर चले जाते हैं। गतिमान बेल्ट द्वारा ये आयन ऊपर ले जाए जाते हैं। C2 के तीक्ष्ण सिरे बेल्ट को ठीक छूते हैं। इस प्रकार कंघा C2 बेल्ट के धन आवेश को एकत्रित करता है। यह धन आवेश शीघ्र ही गोले S के बाहरी पृष्ठ पर स्थानान्तरित हो जाता है। चूंकि बेल्ट घूमती रहती है, यह धन आवेश को ऊपर की ओर ले जाती है (UPBoardSolutions.com) जो कंघे C2 द्वारा एकत्रित कर लिया जाता है तथा गोले S के बाहरी पृष्ठ पर स्थानान्तरित हो जाता है। इस प्रकार गोले S का बाहरी पृष्ठ निरन्तर धन आवेश प्राप्त करता है तथा इसका विभवे अति उच्च हो जाती है। जब गोले S का विभवे बहुत अधिक हो जाता है, तो निकटवर्ती वायु की परावैद्युत तीव्रता (dielectric strength) टूट जाती है तथा आवेश का निकटवर्ती वायु में क्षरण (leakage) हो जाता है। अधिकतम विभव की स्थिति में आवेश के क्षरण होने की दर गोले पर स्थानान्तरित आवेश की दर के बराबर हो। जाती है। गोले से आवेश का क्षरण रोकने के लिए, जनित्र को पृथ्वी से सम्बन्धित तथा उच्च दाबे पर वायू भरे टैंक में रखा जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 2 Electrostatic Potential and Capacitance LAQ 9.1

वास्तविक जनित्र में एक खोखले गोले S के स्थान पर दो खोखले गोले प्रयुक्त करके, एक गोले पर धनावेश तथा दूसरे गोले पर ऋणावेश एकत्रित करके, इन दोनों गोलों के बीच एक अत्यन्त उच्च विभवान्तर प्राप्त कर लिया जाता है।
वानडे ग्राफ जनित्र धन आवेशित कणों को अति उच्च वेग तक त्वरित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार का जनित्र IIT कानपुर में लगा है जो आवेशित कणों को 2 Mev ऊर्जा तक त्वरित करता
उपयोग-
वानडे ग्राफ जनित्र के उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. उच्च विभवान्तर उत्पन्न करने के लिए,
  2. तीव्र एक्स किरणों के उत्पादन में,
  3. नाभिकीय विघटन के प्रयोगों में आवेशित कणों (प्रोटॉन, ड्यूट्रॉन तथा α कण आदि) को उच्च गतिज ऊर्जा प्रदान करने में,
  4. नाभिकीय भौतिकी के अध्ययन में इसका उपयोग कण त्वरक (particle accelerator) के रूप में किया जाता है।

दोष-
वानडे ग्राफ जनित्र के दोष निम्नवत् हैं-

  1. इसके आकार के बड़ा होने के कारण इसका उपयोग असुविधाजनक होता है।
  2. उच्च विभव के कारण इसको उपयोग खतरनाक होता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction (मानव जनन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Biology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction (मानव जनन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 3
Chapter Name Human Reproduction
Number of Questions Solved 37
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction (मानव जनन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें
(क) मानव …… उत्पत्ति वाला है। (अलैगिक/लैगिक)
उत्तर
लैंगिक।

(ख) मानव हैं। अण्डप्रजक, सजीवप्रजक, अण्डजरायुज)
उत्तर
सजीवप्रजक।

(ग) मानव में …….. निषेचन होता है। (बाह्य/आन्तरिक)
उत्तर
आन्तरिक।

(घ) नर एवं मादी ……. युग्मक होते हैं। (अगुणित/द्विगुणित)
उत्तर
अगुणित।

(ङ) युग्मनज ……. होता है। (अगुणित/द्विगुणित)
उत्तर
द्विगुणित।

(च) एक परिपक्व पुटक से अण्डाणु (ओवम) के मोचित होने की प्रक्रिया को …… कहते हैं।
उत्तर
अण्डोत्सर्ग (ovulation)

(छ) अण्डोत्सर्ग (ओव्यूलेशन) …… नामक हॉर्मोन द्वारा प्रेरित (इन्ड्यूस्ड) होता है।
उत्तर
ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (LH)

(ज) नर एवं मादा युग्मक के संलयन (फ्यूजन) ……. को हैं।
उत्तर
निषेचन।

(झ) निषेचन …….. में संपन्न होता है।
उत्तर
अण्डवाहिनी नली के संकीर्ण पथ व तुंबिका के संधिस्थल।

(ज) युग्मनज विभक्त होकर …….. की रचना करता है जो गर्भाशय में अंतरोपित (इंप्लांटेड) होता है।
उत्तर
ब्लास्टोसिस्ट (कोरकपुटी)।

(ट) भ्रूण और गर्भाशय के बीच संवहनी सम्पर्क बनाने वाली संरचना को …….. कहते हैं।
उत्तर
अपरा (placenta)।

प्रश्न 2.
पुरुष जनन तन्त्र का एक नामांकित आरेख बनाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-1

प्रश्न 3.
स्त्री जनन तन्त्र का एक नामांकित आरेख बनाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-2

प्रश्न 4.
वृषण तथा अण्डाशय के बारे में प्रत्येक के दो-दो प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
वृषण के कार्य

  1.  वृषण में जनन कोशिकाओं से शुक्रजनन (spermatogenesis) द्वारा शुक्राणुओं (sperms) का निर्माण होता है।
  2. वृषण की सर्टोली कोशिकाएँ (Sertoli cells) शुक्रजन कोशिकाओं तथा शुक्राणुओं का पोषण करती हैं।
  3. वृषण की अन्तराली कोशिकाओं से एन्ड्रोजन (androgens) हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं, ये द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (secondary sexual characters) के विकास को प्रभावित करते हैं।

अण्डाशय के कार्य

  1. अण्डाशय की जनन कोशिकाओं से अण्डजनन द्वारा अण्डाणुओं (ova) का निर्माण होता है।
  2. अण्डाशय की ग्राफियन पुटिका (Graafian follicle) से एस्ट्रोजन हॉर्मोन (estrogen hormone) स्रावित होता है, यह अण्डोत्सर्ग (ovulation) को प्रेरित करता है।
  3. अण्डाशय में बनी संरचना कॉर्पस ल्यूटियम (corpus luteum) से स्रावित प्रोजेस्टेरोन (progesterone) हॉर्मोन गर्भाशय में निषेचित अण्डाणु को स्थापित करने में सहायक होता है।

प्रश्न 5.
शुक्रजनक नलिका की संरचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर
शुक्रजनक नलिका
वृषण का निर्माण अनेक शुक्रजनक नलिकाओं (seminiferous tubules) से होता है। शुक्रजनक नलिकाओं के मध्य संयोजी ऊतक में स्थान-स्थान पर अन्तराली कोशिकाओं (interstitial cells) के समूह स्थित होते हैं। इन्हें लेडिग कोशिकाएँ (Leydig’s cells) भी कहते हैं। इनसे स्रावित नर हॉर्मोन्स (testosterone) के कारण द्वितीयक लैंगिक लक्षण विकसित होते हैं।

प्रत्येक शुक्रजनक नलिका पतली एवं कुण्डलित होती है। यह दो पर्यों से घिरी रहती है। बाहरी पर्त को बहिःकुंचक (tunica propria) तथा भीतरी पर्त को जनन एपिथीलियम (germinal epithelium) कहते हैं। जनन एपिथीलियम का निर्माण मुख्य रूप से जनन कोशिकाओं (gem cells) से होता है। इनके मध्य स्थान-स्थान पर सटली कोशिकाएँ (Sertoli cells or nurse cells) पायी जाती हैं। जनन कोशिकाओं से शुक्रजनन द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है। शुक्राणु सटली कोशिकाओं से पोषक पदार्थ एवं ऑक्सीजन प्राप्त करते हैं। वृषण की शुक्रजनक नलिकाएँ वृषण नलिकाओं के माध्यम से शुक्रवाहिकाओं में खुलती हैं। शुक्रवाहिकाएँ अधिवृषण (epididymis) में खुलती हैं। अधिवृषण से एक शुक्रवाहिनी निकलकर वंक्षण नाल (inguinal canal) से होती हुई उदर गुहा में प्रवेश करती है। शुक्रवाहिनी मूत्रवाहिनी के साथ फंदा बनाकर मूत्रमार्ग के अधर भाग में खुलती है।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-3

प्रश्न 6.
शुक्राणुजनन क्या है? संक्षेप में शुक्राणुजनन की प्रक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर
नर युग्मक (शुक्राणुओं) की निर्माण प्रक्रिया, शुक्रजनन कहलाती है। वृषण की जनन उपकला के अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणु बनते हैं। यह क्रिया निम्न प्रकार होती है –
(अ) स्पर्मेटिड का निर्माण – यह क्रिया अग्रलिखित उप चरणों में पूरी होती है –

  1. गुणन प्रावस्था (Multiplication Phase) – प्राथमिक जनन कोशिकाएँ समसूत्री विभाजन के द्वारा विभाजित होती हैं तथा स्पर्मेटोगोनिया बनाती हैं। ये सभी कोशिकाएँ द्विगुणसूत्री (diploid) होती हैं।
  2. वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) – स्पर्मेटोगोनिया नर्सिंग कोशिकाओं से खाद्य पदार्थ ग्रहण करके आकार में बड़ी हो जाती हैं तथा इस अवस्था को प्राथमिक स्पर्मेटोसाइट कहते हैं। यह अवस्था भी द्विगुणसूत्री होती है।
  3. परिपक्वन प्रावस्था (Maturation Phase) – प्राथमिक स्पर्मेटोसाईट में एक अर्धसूत्री विभाजन होता है जिससे द्विगुणित कोशिकाएँ बनती हैं जिन्हें द्वितीयक स्पर्मेटोसाइट कहते हैं। प्रत्येक द्वितीयक स्पर्मेटोसाइट में समसूत्री विभाजन होता है। अतः प्रत्येक प्राथमिक स्पर्मेटोसाइट से 4 कोशिकाएँ बनती हैं, जिन्हें स्पर्मेटिड कहते हैं।

(ब) स्पर्मेटिड का कायान्तरण – स्पर्मेटिड में कुछ परिवर्तन होते हैं जिनके द्वारा शुक्राणु बनता है। ये परिवर्तन निम्न हैं –

  1. न्यूक्लिअस ठोस हो जाता है। स्पर्मेटिड से RNA निकलने के कारण केंद्रक आगे की तरफ नुकीला हो जाता है, न्यूक्लिओलस (nucleolus) तथा प्रोटीन खत्म हो जाती है।
  2. माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) दूरस्थ सेन्ट्रीओल के चारों तरफ एकत्रित होकर एक आवरण बना लेता है जो शुक्राणुओं को ऊर्जा देता है। गॉल्जीकाय केंद्रक के अग्र भाग पर
    एक्रोसोम में परिवर्तित हो जाता है।
  3. दूरस्थ सेन्ट्रीओल एक्सोनीमा बनाता है।
  4. अधिकतर कोशिकाद्रव्य नष्ट हो जाता है, लेकिन इसका कुछ भाग शुक्राणु की पूँछ के चारों तरफ एक पर्त बना लेता है।

उपर्युक्त सभी क्रियाएँ सटली कोशिकाओं के जीवद्रव्य में होती हैं। परिपक्व शुक्राणु शुक्रजनक नलिका की गुहा में छोड़ दिए जाते हैं तथा वहाँ से निकलकर लगभग 18-24 घण्टे एपीडाइडीमस (epididymus) में रहते हैं।

प्रश्न 7.
शुक्राणुजनन की प्रक्रिया के नियमन में शामिल हॉर्मोनों के नाम बताइए।
उत्तर
शुक्राणुजनन की प्रक्रिया के नियमन में निम्न हॉर्मोन शामिल होते हैं –

  1. गोनेडोट्रॉपिन रिलीजिंग हार्मोन (GRH)
  2. ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH)
  3. फॉलिकल स्टीमुलेटिंग हार्मोन (FSH)
  4. एन्ड्रोजेन (Androgen)
  5. इनहिबिन

प्रश्न 8.
शुक्राणुजनन एवं वीर्यसेचन (स्परमिएशन) की परिभाषा लिखिए।
उत्तर
शुक्राणुजनन (Spermatogenesis) – वृषण में शुक्राणुजन कोशिकाओं से शुक्राणुओं (sperms) के बनने की क्रिया शुक्राणुजनन कहलाती है। शुक्राणुजन कोशिकाओं से अचल स्पर्मेटिड्स का निर्माण तीन अवस्थाओं में होता है, इन्हें क्रमशः गुणन प्रावस्था, वृद्धि प्रावस्था तथा परिपक्वन प्रावस्था कहते हैं। अचल स्पर्मेटिड्स (Spermatids) के चल शुक्राणुओं (motile sperms) में बदलने की प्रक्रिया को शुक्राणुजनन या शुक्राणु-कायान्तरण (spermiogenesis) कहते हैं।

वीर्यसेचन (Spermiation) – शुक्राणु कायान्तरण के पश्चात् मुक्त शुक्राणुओं के शीर्ष सली कोशिकाओं (sertoli cells) में अन्त:स्थापित (embedded) हो जाते हैं। शुक्रजनक नलिकाओं से शुक्राणुओं के मोचित (released) होने की प्रक्रिया को वीर्यसेचन (spermiation) कहते हैं।

प्रश्न 9.
शुक्राणु का एक नामांकित आरेख बनाइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-4

प्रश्न 10.
शुक्रीय प्रद्रव्य (सेमिनल प्लाज्मा) के प्रमुख संघटक क्या हैं?
उत्तर
अधिवृषण (epididymis), शुक्रवाहक (vas deferens), शुक्राशय (seminal vesicle), पुरःस्थ ग्रन्थियों (prostate gland) तथा बल्बोयूरेथल ग्रन्थियों के स्राव शुक्राणुओं को गतिशील बनाए रखने तथा इन्हें परिपक्व बनाने में सहायक होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से शुक्रीय प्रद्रव्य (seminal plasma) कहते हैं। शुक्राणु तथा शुक्रीय प्रदव्य मिलकर वीर्य (semen) बनाते हैं। शुक्रीय प्रद्रव्य में मुख्यतः फ्रक्टोस, कैल्सियम तथा एन्जाइम होते हैं।

प्रश्न 11.
पुरुष की सहायक नलिकाओं एवं ग्रन्थियों के प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर
पुरुष की सहायक नलिकाओं के प्रमुख कार्य निम्न हैं –

  1. ये वृषण से शुक्राणुओं को मूत्र मार्ग द्वारा बाहर लाती हैं।
  2. ये शुक्राणुओं का संग्रह करती हैं।

पुरुष की सहायक ग्रन्थियों के प्रमुख कार्य निम्न हैं –

  1. पुरस्थ द्रव का स्राव करना जो शुक्राणुओं को सक्रिय करता है।
  2. काउपर्स ग्रन्थि चिपचिपा तरल स्रावित करती है जो योनि को चिकना बनाता है।
  3. नर हार्मोन उत्पन्न करना।

प्रश्न 12.
अण्डजनन क्या है? अण्डजनन की संक्षिप्त व्याख्या करें।
उत्तर
स्त्री के अण्डाशय के जनन एपीथिलियम की कोशिकाओं से अण्डाणुओं का निर्माण, अण्डजनन कहलाता है। अण्डजनन निम्नलिखित चरणों में पूर्ण होता है –
(i) प्रोलीफेरेशन प्रावस्था (Proliferation Phase) – इस अवस्था की शुरुआत उस समय से होती है जब मादा फीट्स (foetus) माँ के गर्भ में लगभग 7 माह की होती है। जनन कोशिकाएँ विभाजित होकर अण्डाशय की गुहा में कोशिका गुच्छ बना देती हैं जिसे पुटिका (follicle) कहते हैं। पुटिका की एक कोशिका आकार में बड़ी हो जाती है तथा इसे ऊगोनियम (ooagonium) कहते हैं।

(ii) वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) – यह अवस्था भी उस समय पूरी हो जाती है जब मादा माँ के गर्भ में होती है। इस अवस्था में ऊगोनियम पोषण कोशिकाओं से भोजन एकत्रित करते समय आकार में बड़ी हो जाती है। उसे प्राथमिक ऊसाइट (primary 0ocyte) कहते हैं।

(iii) परिपक्व प्रावस्था (Maturation Phase) – यह क्रिया पूरे जनन काल (11-45) वर्ष में लगातार होती रहती है। प्राथमिक ऊसाइट में पहला अर्द्धसूत्री विभाजन होता है तथा दो असमान कोशिकाएँ बन जाती हैं। बड़ी कोशिका द्वितीयक ऊसाइट (secondary 0ocyte) कहलाती है, जबकि छोटी कोशिका को प्रथम ध्रुवीकाय (first polar body) कहते हैं। यह विभाजन अण्डोत्सर्ग से पहले होता है। दूसरा समसूत्री विभाजन अण्डवाहिनी में, अण्डोत्सर्ग के बाद होता है जिसके फलस्वरूप एक अण्डाणु तथा एक द्वितीयक ध्रुवीकाय (second polar body) बनती है। सभी ध्रुवीकाय नष्ट हो जाती हैं तथा इस सम्पूर्ण क्रिया में एक अण्डाणु प्राप्त होता है। ध्रुवीकार्य का निर्माण अण्डाणुओं को पोषण प्रदान करने के लिए होता है।

प्रश्न 13.
अण्डाशय की अनुप्रस्थ काट (ट्रांसवर्स सेक्शन) का एक नामांकित आरेख बनाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-5

प्रश्न 14.
ग्राफी पुटिका (ग्राफियन फॉलिकिल) का एक नामांकित आरेख बनाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-6

प्रश्न 15.
निम्नलिखित के कार्य बताइए –

  1. पीत पिंड (कॉर्पस ल्यूटीयम)
  2. गर्भाशय अन्तः स्तर (एन्डोमेट्रियम)
  3. अग्र पिंडक (एक्रोसोम)
  4. शुक्राणु पुच्छ (स्पर्म टेल)
  5. झालर (फिम्ब्री)

उत्तर

  1. पीत पिंड (कॉर्पस ल्यूटीयम) – यह प्रोजेस्ट्रॉन, एस्ट्रोजेन, रिलेक्सिन नामक हार्मोन का स्राव करता है जो गर्भाशय के अन्तः स्तर को बनाए रखते हैं।
  2. गर्भाशय अन्तः स्तर (एन्डोमेट्रियम) – यह निषेचित अण्डे के प्रत्यारोपण तथा सगर्भता के लिए आवश्यक है। मासिक चक्र के दौरान इसमें परिवर्तन आता है। यह अपरा निर्माण में भी सहायक है।
  3. अग्र पिंडक (एक्रोसोम) – इसमें उपस्थित एन्जाइम, निषेचन में सहायक होते हैं।
  4. शुक्राणु पुच्छ (स्पर्म टेल) – यह शुक्राणु के गमन में सहायता करती है।
  5. झालर (फिम्ब्री) – यह अण्डोत्सर्ग के समय; अण्डाशय से निकले अण्डाणु के संग्रह में सहायता करती है।

प्रश्न 16.
सही अथवा गलत कथनों को पहचानें –

  1. पुंजनों (एन्ड्रोजेन्स) का उत्पादन सटली कोशिकाओं द्वारा होता है। (सही/गलत)
  2. शुक्राणु को सटली कोशिकाओं से पोषण प्राप्त होता है। (सही/गलत)
  3. लीडिंग कोशिकाएँ, अण्डाशय में पायी जाती हैं। (सही/गलत)
  4. लीडिंग कोशिकाएँ पूंजनों (एन्ड्रोजेन्स) को संश्लेषित करती हैं। (सही/गलत)
  5. अण्डजनन पीत पिंड (कॉपर्स ल्यूटियम) में सम्पन्न होता है। (सही/गलत)
  6. सगर्भता (प्रेगनेंसी के दौरान आर्तव चक्र (मेन्सट्रअल साइकिल) बंद होता है। (सही/गलत)
  7. योनिच्छद (हाइमेन) की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति कौमार्य (वर्जिनिटी) या यौन अनुभव का विश्वसनीय संकेत नहीं है।(सही/गलत)

उत्तर

  1. गलत
  2. सही
  3. गलत
  4. सही
  5. गलत
  6. सही
  7. सही।

प्रश्न 17.
आर्तव चक्र क्या है? आर्तव चक्र (मेन्स्ट्रअल साइकिल) का कौन-से हार्मोन नियमन करते हैं?
उत्तर
मादाओं (प्राइमेट्स) में अण्डाणु निर्माण 28 दिन के चक्र में होती है जिसे आर्तव चक्र अथवा मासिक चक्र या ऋतु स्राव चक्र कहते हैं। प्रत्येक स्त्री में यह चक्र 12-13 वर्ष की आयु से प्रारम्भ हो जाती है तथा 45-55 वर्ष की आयु में खत्म हो जाता है। यह चक्र अण्डाशय में अण्डाणु निर्माण को दर्शाता है तथा इसके प्रारम्भ होने के साथ ही मादा गर्भधारण में सक्षम हो जाती है। आर्तव चक्र (मेन्सट्रअल साइकिल) का नियमन निम्न दो हामोंन करते हैं-(i) LH हार्मोन (ii) FSH हॉर्मोन।

प्रश्न 18.
प्रसव (पारट्यूरिशन) क्या है? प्रसव को प्रेरित करने में कौन-से हॉर्मोन शामिल होते हैं?
उत्तर
गर्भकाल पूरा होने पर पूर्ण विकसित शिशु का माता के गर्भ से बाहर आना, प्रसव (पारट्यूरिशन) कहलाता है। इस दौरान गर्भाशयी तथा उदरीय संकुचन होते हैं व गर्भाशय फैल जाता है। जिससे गर्भस्थ शिशु बाहर आ जाता है। प्रसव का प्रेरण ऑक्सिटोसिन, एस्ट्रोजेन व कॉर्टिसोल नामक हार्मोन करते हैं।

प्रश्न 19.
हमारे समाज में पुत्रियों को जन्म देने का दोष महिलाओं को दिया जाता है। बताएँ कि यह क्यों सही नहीं है?
उत्तर
स्त्री में XX गुणसूत्र तथा पुरुष में XY गुणसूत्र पाये जाते हैं। जब स्त्री का X गुणसूत्र तथा पुरुष का Y गुणसूत्र मिलते हैं तो पुत्र (XY) उत्पन्न होता है। इसके विपरीत स्त्री का X गुणसूत्र तथा पुरुष का X गुणसूत्र मिलने पर पुत्री (XX) उत्पन्न होती है। अतः उत्पन्न संतान का लिंग निर्धारण पुरुष के गुणसूत्र द्वारा होता है न कि स्त्री के गुणसूत्र से। चूंकि पुरुष में 50% X तथा 50% Y गुणसूत्र होते हैं। अतः पुरुष के गुणसूत्र का X या Y होना ही सन्तान के लिंग के लिए उत्तरदायी है।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पुत्रियों को जन्म देने का दोष महिलाओं को देना सर्वदा गलत है।

प्रश्न 20.
एक माह में मानव अण्डाशय से कितने अण्डे मोचित होते हैं? यदि माता ने समरूप जुड़वाँ बच्चों को जन्म दिया हो तो आप क्या सोचते हैं कि कितने अण्डे मोचित हुए होंगे? क्या आपका उत्तर बदलेगा यदि जन्मे हुए जुड़वाँ बच्चे द्विअण्ड यमज थे?
उत्तर
एक माह में मानव अण्डाशय से सिर्फ एक अण्डा मोचित होता है। समरूप जुड़वाँ बच्चों का जन्म होने पर भी एक माह में एक ही अण्डा मोचित हुआ होगा। द्विअण्ड यमज के सन्दर्भ में एक माह में दो अण्डे मोचित हुए होंगे।

प्रश्न 21.
आप क्या सोचते हैं कि कुतिया जिसने 6 बच्चों को जन्म दिया है, के अण्डाशय से कितने अण्डे मोचित हुए थे?
उत्तर
6 अण्डे मोचित हुए थे।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
समरूप जुड़वाँ बच्चे पैदा होते हैं जब
(क) एक शुक्राणु दो अंडाणुओं का निषेचन करे
(ख) एक अण्डाणु का दो शुक्राणु निषेचन करें
(ग) दो अण्डाणु दो भिन्न शुक्राणुओं द्वारा निषेचित हों
(घ) एक निषेचित अण्डा दो कोरक खण्डों में विभक्त होकर पृथक्-पृथक् दो स्वतंत्र भ्रूण के रूप में विकसित हो
उत्तर
(घ) एक निषेचित अण्डा दो कोरक खण्डों में विभक्त होकर पृथक्-पृथक् दो स्वतंत्र भ्रूण के रूप में विकसित हो

प्रश्न 2.
ब्लास्टुला अवस्था में भ्रूण को सर्वप्रथम गर्भाशय से जोड़ने का कार्य निम्न में से कौन-सी झिल्ली करती है?
(क) एम्निओन
(ख) अपरा/कोरियोन
(ग) ऐलेन्टॉयस
(घ) योक सैक
उत्तर
(ख) अपरा/कोरियोन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फर्टीलाइजिन तथा एण्टी-फर्टीलाइजिन प्रक्रिया पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
अण्डाणु से फर्टीलाइजिन तथा शुक्राणु से एण्टीफर्टीलाइजिन स्रावित होते हैं, इसलिए शुक्राणु अण्डाणु की ओर आकर्षित हो जाते हैं।

प्रश्न 2.
कृत्रिम शुक्रसंसेचन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
इसमें परिरक्षित शुक्राणु द्वारा स्त्री की फैलोपियन नलिका से लिए गए अण्डाणु का परखनली में निषेचन किया जाता है। इसके पश्चात् युग्मनज को स्त्री के गर्भाशय में रोपित कर दिया जाता है। इस प्रकार की सन्तान को परखनली शिशु कहते हैं।

प्रश्न 3.
ऐसे दो जन्तुओं के नाम लिखिए जिनमें रुधिर जरायु अपरा पाया जाता है।
उत्तर
यूथीरिया अधोवर्ग के प्राणियों में रुधिर जरायु अपरा पाया जाता है; जैसे-कपि तथा मनुष्य।

प्रश्न 4.
मॉरुला तथा ब्लास्टुला में एक अन्तर लिखिए।
उत्तर
मॉरुला कोशिकाओं से बनी ठोस गेंद सदृश रचना होती है, इसके विपरीत ब्लास्टुला में कोरक गुहा या ब्लास्टोसील नामक गुहा का निर्माण हो जाता है।

प्रश्न 5.
भ्रूण के मीजोडर्म स्तर द्वारा निर्मित किन्हीं चार अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर
त्वचा की डर्मिस, संयोजी ऊतक, वृक्क, जनद, हृदय, रक्त वाहिनियाँ तथा लसीका वाहिनियाँ, नोटोकॉर्ड तथा अन्त:कंकाल।

प्रश्न 6.
आपातकालीन ग्रन्थि का नाम लिखिए।
उत्तर
ऐड्रीनल मेड्यूला को आपातकालीन ग्रन्थि कहते हैं।

प्रश्न 7.
शिशुजन्म के बाद कौन-सा हॉर्मोन दूध मुक्त करता है? उसका स्रोत बताइए।
उत्तर
शिशुजन्म के बाद प्रोलेक्टिन (prolactin) हॉर्मोन दूध मुक्त करता है तथा एक अन्य हॉर्मोन दूध को स्तन से बाहर निकलने को उद्दीपित करता है। इसका स्रोत पीयूष ग्रन्थि है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यौवनारम्भ क्या है? इस अवस्था में बालक एवं बालिकाओं के शरीर में होने वाले परिवर्तन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
यौवनारम्भ भौतिक परिवर्तनों की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालकों का शरीर एक वयस्क शरीर के रूप में विकसित होता है तथा उनमें प्रजनन एवं निषेचन की क्षमता भी विकसित हो जाती है।

बालक के यौवनारम्भ पर उत्पन्न लक्षण
बालक के शरीर में यौवनावस्था (puberty) प्रारम्भ होने के समय (लगभग 15-18 वर्ष) से ही निम्नलिखित लक्षण विकसित होने लगते हैं –

  1. शरीर की सुडौलता – शरीर अधिक मजबूत, मांसपेशीयुक्त, सुडौल, अधिक शक्तिशाली होने लगता है; कन्धे अधिक चौड़े हो जाते हैं तथा वृद्धि के कारण लम्बाई बढ़ने लगती है।
  2. शरीर पर बाल – चेहरे पर मूंछ और बाद में दाढ़ी के बाल निकलने लगते हैं, वृषण कोषों आदि पर तथा उनके आस-पास बाल निकल आते हैं।
  3. आवाज का भारीपन – आवाज में काफी परिवर्तन आने लगता है। यह भारी होने लगती है तथा | इसकी दृढ़ता में भी बढ़ोतरी होती है।

उपर्युक्त परिवर्तन गौण लैंगिक लक्षण कहलाते हैं तथा वृषणों में बनने वाले नर हॉर्मोन, टेस्टोस्टेरोन के कारण सम्भव होते हैं जो प्रारम्भ में लगभग 20 वर्ष की आयु तक अधिक मात्रा में स्रावित होता है और अनेक शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन लाता है।

बालिका के यौवनारम्भ पर उत्पन्न लक्षण
बालिकाओं में रजोधर्म प्रारम्भ होने से पूर्व होने वाले परिवर्तनों में अण्डाशयों तथा उनके सहायक अंगों का विकास सम्मिलित है। पीयूष ग्रन्थि से उत्पन्न जनद प्रेरक हॉर्मोन्स इन कार्यों को 11 से 13 वर्ष की उम्र में प्रेरित करने लगते हैं और अण्डाशये के अन्दर उपस्थित पुटिकाओं से एस्ट्रोजेन्स (हॉर्मोन्स) स्रावित होने लगते हैं, फलस्वरूप यौवनारम्भ (puberty) के लिए परिवर्तन होने लगते हैं। इन्हीं के प्रभाव से निम्नलिखित गौण लैंगिक लक्षण भी विकसित होते हैं –

  1. स्तनों की वृद्धि तथा सुडौल होना (इनमें दुग्ध ग्रन्थियों का बनना आदि भी)।
  2. बाह्य जननांगों; जैसे–योनि, लैबिया, भगशिश्न आदि का समुचित विकास।
  3. श्रोणि भाग का चौड़ा होना तथा नितम्बों का भारी होना।
  4. बगल तथा जननांगों (भगद्वार) आदि के आस-पास बालों का उगना।
  5. स्वभाव में शीतलता तथा आवाज का महीन होना।
  6. मासिक स्राव एवं आर्तव चक्र का प्रारम्भ होना।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
(क) मानव भ्रूण का रोपण,
(ख) स्तनियों में अपरा,
या
अपरा क्या है? इसके मुख्य कार्य लिखिए।
उत्तर
(क) मानव भ्रूण का रोपण
निषेचन के लगभग एक घण्टे के बाद युग्मनज (zygote) का विदलन शुरू हो जाता है और चौथे दिन तक चार बार मिटॉटिक विभाजनों द्वारा विभाजित होकर 16 कोरकखण्डों (blastomeres) की एक गोल ठोस संरचना बनती है, यह संरचना मॉरुला (morula) कहलाती है। इसका निर्माण होते-होते यह गर्भाशय में पहुँच जाता है।

मॉरुला के गर्भाशय में जाने के बाद गर्भाशय गुहा का ग्लाइकोजनयुक्त पोषक तरल मॉरुला (भ्रूण) में भीतर जाने लगता है, जिससे मॉरुला के अन्दर पोषक तरल से भरी हुई एक गुहा-सी बन जाती है। इस गुहा को ब्लास्टोसील (blastocoel) कहते हैं। भ्रूण की इस प्रावस्था को ब्लास्टोसिस्ट (blastocyst) कहते हैं। इसके बनते-बनते भ्रूण का पारभासी आवरण समाप्त हो जाता है। गुहा की दीवार की कोशिकाएँ चपटी हो जाती हैं। इन्हें अब ट्रोफोब्लास्ट (trophoblast) कहते हैं। ट्रोफोब्लास्ट गर्भाशय से पोषक रसों का अवशोषण करती है। ट्रोफोब्लास्ट आँवल (placenta) के निर्माण में भी भाग लेती हैं। ब्लास्टुला की भीतरी कोशिका पिण्ड को भ्रूणबीज (embryoblast) कहते हैं, क्योंकि इसी से भावी भ्रूण के विभिन्न भाग बनते हैं।

निषेचन के एक सप्ताह बाद ब्लास्टोसिस्ट गर्भाशय के ऊपरी भाग में इसकी भित्ति से चिपक जाता है। अर्थात् ब्लास्टोसिस्ट का गर्भाशय भित्ति में रोपण प्रारम्भ हो जाता है। ट्रोफोब्लास्ट की बाह्य सतह से कुछ अंगुली सदृश प्रवर्ध निकलकर गर्भाशय भित्ति के अन्तः स्तर में घुसकर निषेचन के लगभग 8 दिन बाद भ्रूण को गर्भाशयी भित्ति से जोड़ देते हैं, यही क्रिया भ्रूण का रोपण (implantation of embryo) है।

(ख) स्तनियों में अपरा, आँवल या जरायु
अपरा एक संयुक्त ऊतक है जो स्तनपोषियों में, मादा के गर्भ में, भ्रूण (embryo) का गर्भाशय भित्ति के साथ संरचनात्मक तथा क्रियात्मक सम्बन्ध स्थापित करती है। निषेचन (fertilization) के बाद निषेचित अण्डाणु, विदलन (cleavage) करता हुआ एक परिवर्द्धनशील भ्रूण में परिवर्तित होकर जब गर्भाशय (uterus) में पहुँचता है तो गर्भाशय भित्ति के चिपचिपा हो जाने के कारण उसी से चिपक जाता है। यह क्रिया रोपण (implantation) है। इस समय तक कॉर्पस ल्यूटियम (corpus luteum) द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) के प्रभाव से गर्भाशय भित्ति में अनेक परिवर्तन होते हैं।
गर्भाशय भित्ति से चिपके हुए भ्रूण की विशिष्ट कलाएँ तथा गर्भाशय भित्ति मिलकर अपरा (placenta) का निर्माण करते हैं। इस सम्पूर्ण क्रिया को गर्भाधान (conception) कहते हैं।

अपरा के कार्य (Functions of Placenta) – अपरा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ऊतक है, इसका भ्रूण की जीवन-क्रियाओं को चलाने के लिए मादा के शरीर से विशिष्ट सम्बन्ध है। अपरा के अग्रलिखित कार्य होते हैं –
1. भूण का पोषण – भ्रूण अपरा के द्वारा ही माता से समस्त पोषक पदार्थ प्राप्त करता है। माता की रुधिर वाहिनियों का सम्बन्ध भ्रूण की रुधिर वाहिनियों से होता है; अतः माता के रुधिर में आने वाले पचे हुए खाद्य पदार्थ, सरल रूप में भ्रूण को मिलते रहते हैं। अपरा में इन खाद्य पदार्थों का और भी सरलीकरण किया जाता है तथा यह भ्रूण की आवश्यकता के लिए कुछ खाद्य पदार्थों का संग्रह भी करता है।

2. भूण का श्वसन – माता के शरीर से रुधिर के द्वारा ही भ्रूण को ऑक्सीजन के अणु प्राप्त होते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड भी इसी रुधिर द्वारा वापस की जाती है। इस प्रकार श्वसन क्रिया के लिए वात विनिमय (gaseous exchange) का कार्य अपरा ही करता है।

3. भूण का उत्सर्जन – भ्रूण के उत्सर्जी पदार्थ भ्रूण के रुधिर से अपरा क्षेत्र में माता के रुधिर में विसरित होते रहते हैं। इनका निष्कासन भी माता के उत्सर्जी अंगों द्वारा किया जाता है।

4. हॉर्मोन्स का स्रावण – गर्भावस्था को उचित रूप में बनाये रखने आदि के लिए अपरा से एस्ट्रोजेन्स, प्रोजेस्टेरॉन, जरायु गोनैडोट्रॉपिन आदि हॉर्मोन्स का स्रावण होता है। इसी प्रकार प्रसव | को आसान करने के लिए अपरा द्वारा रिलैक्सिन हॉर्मोन का भी स्रावण होता है।

प्रश्न 3.
अपरा द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
अपरा से दो स्टेरॉइड तथा दो प्रोटीन हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं –

  1. कोरिओनिक गोनेडोट्रॉपिक हॉर्मोन (CGH) – यह प्रोटीन हॉमोंन गर्भधारण (pregnancy) को बनाये रखता है। यह कॉर्पस ल्यूटियम के विकास तथा इसके हॉर्मोन स्राव पर नियन्त्रण करता है।
  2. प्लेसैन्टस लैक्टोजन – यह प्रोटीन हॉमोंन दुग्ध ग्रन्थियों को प्रेरित करता है।
  3. ऐस्ट्रेडियॉल – यह स्टेरॉइड हॉर्मोन गर्भाशय की पेशियों के संकुचन का नियन्त्रण करता है।
  4. प्रोजेस्टेरॉन – यह स्टेरॉइड हॉर्मोन गर्भधारण में सहायता करता है।

प्रश्न 4.
गर्भ झिल्लियों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
या
एम्निऑन के चार महत्त्वपूर्ण कार्य लिखिए।
उत्तर
गर्भ झिल्लियाँ
भ्रूण की देह के बाहर विकसित होने वाली झिल्लियाँ अथवा कलाओं (membranes) को भ्रूण-बहिस्थ कलाएँ कहते हैं। ये भ्रूण के परिवर्द्धन एवं जीवन के लिए विशेष कार्य करती हैं, परन्तु भ्रूण के अंगोत्पादन में भाग नहीं लेतीं। जन्म अथवा डिम्बोद्गमन के समय इनका निष्कासन हो जाता है। मानव तथा अन्य सभी स्तनियों, सरीसृपों, पक्षियों में चार भ्रूण-बहिस्थ कलाएँ या गर्भ झिल्लियाँ निर्मित होती हैं। ये चार भ्रूणीय-बहिस्थ कलाएँ इस प्रकार हैं –
1. उल्व (Amnion) – यह कला भ्रूण को चारों ओर से घेरे रहती है। भ्रूण के चारों ओर की इस गुहा को उल्व गुहा (amniotic cavity) कहते हैं। इस गुहा में एक तरल भरा रहता है जिसे उल्व तरल या एम्निऑटिक तरल (amniotic fluid) कहते हैं। इस तरल में मन्द गति होती रहती है जिसके कारण भ्रूण के अंग परस्पर चिपकते नहीं। इस प्रकार, एम्निऑटिक तरल भ्रूण के अंगों में विकृतियाँ उत्पन्न होने से बचाता है। यह निम्नलिखित कार्य करता है –

  • एम्निऑटिक तरल भ्रूण की बाह्य आघातों से रक्षा करता है।
  • एम्निऑन भ्रूण को कवच एवं भ्रूण-बहिस्थ कलाओं से पृथक् रखकर इनसे चिपकने से रोकता है।
  • एम्निऑटिक तरल में डूबे रहने से भ्रूण के सूखने (desiccation) का भय नहीं होता।
  • एम्निऑटिक तरल में होने वाली मन्द गति के कारण अंग आपस में चिपकते नहीं।

2. चर्मिका (Chorion) – कॉरिऑन में वृद्धि तीव्र गति से होती है। यह एम्निऑन के बाहर की ओर निर्मित होती है। कॉरिऑन जरायु (placenta) का निर्माण करती है। एम्निऑन तथा कॉरिऑन के बीच की गुहा को कॉरिऑनिक गुहा (chorionic cavity) कहते हैं। कॉरिऑन की एक्टोडर्म या ट्रोफोब्लास्ट की बाह्य सतह पर दीर्घ अंकुर उत्पन्न होते हैं जिन्हें कॉरिऑनिक अंकुर (chorionic villi) कहते हैं। ये अंकुर गर्भाशय की भित्ति में धंस जाते हैं। ये रसांकुर भ्रूण के पोषण, श्वसन तथा उत्सर्जन में सहायक हैं।

कॉरिऑन से एक हॉर्मोन, कॉरिओनिक गोनैडोट्रॉपिन का स्रावण होता है, जो प्लैसेण्टा विकसित होने तक डिम्ब ग्रन्थि में कॉर्पस ल्यूटियम को सक्रिय रखता है।

3. पीतक कोष (Yolk Sac) – मानव का पीतक कोष छोटा होता है और यह भ्रूण-बहिस्थ गुहा द्वारा चर्मका से पृथक् रहता है। स्तनियों के भ्रूण में पीतक नहीं होता है। पीतक कोष में रुधिर निर्माण होता है। विकास की अन्तिम प्रावस्थाओं में जब अपरापोषिका विकसित हो जाती है, तब पीतक कोष छोटा होने लगता है और धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

4. अपरापोषक या एलैण्टोइस (Allantois) – मानव के भ्रूण में अपरापोषक एक अवशेषी अंग के रूप में होती है। अन्य स्तनियों में अपरापोषक स्प्लैंकनोप्ल्यूर (एण्डोडर्म एवं स्प्लैंकनिक मीसोडर्म) से निर्मित होती है। स्प्लैंकनिक मीसोडर्म कॉरिऑन के मीसोडर्म स्तर के सम्पर्क में आकर इससे समेकित (fuse) हो जाती है। इस प्रकार, एक मिश्रित भित्ति निर्मित होती है जिसे एलैण्टोकोरिऑन (allantochorion) कहते हैं। एलैण्टोकॉरिऑन, एलैण्टॉइक प्लैसेण्टा की उत्पत्ति में भाग लेती है।

पीतक कोष एवं एलैण्टोइस के वृन्त संयुक्त रूप से नाभि रज्जु (umbilical cord or belly stalk) निर्मित करते हैं।

स्तनधारियों में एलैण्टोइस मूत्राशय का कार्य नहीं करती, क्योंकि भ्रूण के उत्सर्जी पदार्थों का माँ के रुधिर परिवहन में विसरण हो जाता है एवं माँ के वृक्कों के द्वारा इनका उत्सर्जन होता है। एलैण्टोइस का रुधिर परिवहन तन्त्र भ्रूण को ऑक्सीजन एवं पोषण प्रदान कराता है।

प्रश्न 5.
प्राणियों में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष भ्रूणीय विकास में उदाहरण सहित अन्तर बताइए।
या
प्रत्यक्ष एवं परोक्ष भ्रूणीय विकास क्या हैं ? इनके उदाहरण दीजिए।
उत्तर
जाइगोट से शिशु निर्माण तक जो भी परिवर्तन होते हैं, उन्हें भ्रूणीय विकास (embryonic development) कहते हैं। भ्रूणीय विकास दो प्रकार का होता है –

1. परोक्ष भूणीय विकास (Indirect Embryonic Development) – जब परिवर्द्धन (development) के बाद अण्डे से निकला जन्तु सामान्य शिशु से काफी भिन्न होता है और फिर यह रूपान्तरण (metamorphosis) के द्वारा सामान्य शिशु में परिवर्तित होता है, ऐसे परिवर्द्धन को परोक्ष या अप्रत्यक्ष विकास कहते हैं। अण्डे से निकले जन्तु को विकास की शिशु प्रावस्था (larval stage) कहते हैं। इस प्रकार का परिवर्द्धन मुख्यत: अकशेरुकी जन्तुओं तथा अन्य कुछ कशेरुकी, विशेषत: मेंढक तथा अन्य उभयचरों में पाया जाता है। इनमें भ्रूण के पोषण के लिए पीत (yolk) की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

2. प्रत्यक्ष भूणीय विकास (Direct Embryonic Development) – इस प्रकार के विकास में अण्डे से निकला जीव अथवा नवजात शिशु रचना में वयस्क प्राणि के समान ही होता है जिनमें जनन परिपक्वता (sexual maturity) नहीं होती। इनमें आयु के साथ-साथ शरीर की वृद्धि तथा जनन परिपक्वता आ जाती है तभी यह प्रौढ़ होता है। ऐसे भ्रूणीय विकास को प्रत्यक्ष भ्रूणीय विकास कहते हैं। इनमें भ्रूण के पोषण के लिए अधिक पीत (yolk) पाया जाता है। इस प्रकार का विकास घोंघों, पक्षियों, सरीसृपों तथा सभी स्तनियों में पाया जाता है। मानव में मादा आँवल (placenta) के द्वारा भ्रूण को पोषण देती है, यही कारण है कि इस प्रकार के जन्तुओं में एक बार में कम सन्ताने उत्पन्न होती हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निषेचन क्रिया किसे कहते हैं? मनुष्य में निषेचन में होने वाली क्रियाओं का उल्लेख कीजिए तथा अण्डाणु में शुक्राणु के प्रवेश का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर
निषेचन क्रिया
मनुष्य के जीवन चक्र में प्रत्यक्ष भ्रूणीय विकास होता है। यह भ्रूणीय विकास माता के गर्भाशय (uterus) में होता है।

मनुष्य के भ्रूणीय विकास का प्रारम्भ निषेचन से होता है। मनुष्य में निषेचन (fertilization) फैलोपियन नलिका (fallopian tube) में होता है। इस क्रिया में फैलोपियन नलिका में मैथुन (सम्भोग) के समय पुरुष द्वारा छोड़े हुए वीर्य में उपस्थित शुक्राणुओं (sperms) में से एक अगुणित शुक्राणु (haploid sperm) एक अगुणित अण्डाणु (haploid ovum) से समेकित (fuse) हो जाता है और एक द्विगुणित रचना युग्मनज (zygote) बनाता है। समेकन की इस क्रिया को निषेचन कहते हैं।

निषेचन क्रिया में मादा युग्मक या अण्डाणु सम्पूर्ण रूप में किन्तु नर युग्मक अर्थात् शुक्राणु का केवल केन्द्रक (nucleus = n) ही भाग लेता है। मैथुन से निषेचन तक की वास्तविक क्रिया के निम्नलिखित चरण होते हैं –
1. शुक्राणु का अण्डाणु की ओर पहुँचना – मादा की योनि में नर के द्वारा स्खलित वीर्य में से कुछ सफल शुक्राणु (sperms) अपनी पूँछ की सहायता से 1-4 मिमी प्रति मिनट की गति से फैलोपियन नलिका में पहुँचते हैं। इस कार्य में गर्भाशय की सीरिंज अवशोषण क्रिया तथा क्रमाकुंचन गति इन्हें ऊपर चढ़ने में सहायक होती है। फैलोपियन नलिका में संकुचन की उत्तेजना वीर्य में उपस्थित प्रोस्टाग्लाण्डिस तथा ऑक्सीटोसिन की उपस्थिति से प्रेरित होती है।

2. समूहन प्रक्रिया – मैथुन के पश्चात् जब अण्डाणु और शुक्राणु समीप आते हैं तब अण्डाणु फर्टीलाइजिन तथा शुक्राणु एण्टीफर्टीलाइजिन नामक पदार्थ का स्राव करता है। एण्टीफर्टीलाइजिन फर्टीलाइजिन की ओर आकर्षित होता है, जिसके फलस्वरूप अण्डाणु शुक्राणु की ओर आता है और इनका समूहन होता है। अब तक स्रावों की मात्रा कम हो जाने से अण्डे तक पहुँचने वाले शुक्राणुओं की संख्या कम होती जाती है।
स्त्री के जनन नाल में शुक्राणु 1-5 दिन तक जीवित रह सकते हैं किन्तु ये स्खलन के 12-24 घण्टों की अवधि में अण्डाणु का निषेचन कर सकते हैं।

3. संधारण – वीर्य योनि की अम्लीयता को समाप्त करके शुक्राणुओं को अण्डाणु का निषेचन करने में सहायक होते हैं। इस प्रक्रिया को संधारण कहते हैं। सामान्यत: केवल एक शुक्राणु ही अण्डाणु में प्रवेश कर पाता है। वह क्षेत्र जहाँ से ध्रुवकाय (polar body) के बाहर निकलने पर शुक्राणु इसमें प्रवेश करता है उसे सक्रिय ध्रुव (active pole) कहते हैं। अण्डाणु की सतह पर स्थित कुछ ग्राहियों की सहायता से शुक्राणु का शीर्ष अण्डाणु की सतह से चिपक जाता है।

4. शुक्राणु द्वारा अण्डाणु का बेधन – अण्डाणु की सतह से चिपकने के बाद शुक्राणु का एक्रोसोम (acrosome) स्पर्म लाइसिन (sperm lysin) नामक एन्जाइम का स्राव करता है। इसमें हाइल्यूरोनिडेज (hyaluronidase) तथा प्रोटियेज (protease) एन्जाइम्स होते हैं। ये । एन्जाइम अण्डाणु के कोरोना रेडिएटा तथा जोना पेलुसिडा को विघटित करके शुक्राणु को अण्डाणु में प्रवेश के लिये मार्ग बनाते हैं। जैसे ही शुक्राणु अण्डाणु में प्रवेश करता है अण्डाणु में कुछ ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं, जिससे दूसरा शुक्राणु इसमें प्रवेश नहीं कर सकता। शुक्राणु की पूँछ अण्डाणु में प्रवेश नहीं करती है। अण्डाणु के चारों ओर हाइल्यूरोनिक अम्ल द्वारा चिपकी फॉलिकल कोशिकाओं का अपघटन करने के लिए शुक्राणु हाइल्यूरोनिडेज (hyaluronidase) एन्जाइम स्रावित करता है। इससे सम्पर्क स्थल पर अण्डे के बाहरी आवरण कोरोना रेडियेटा (corona radiata) तथा जोना पेलुसिडा (zona pellucida) नष्ट हो जाते हैं।

शुक्राणु के सम्पर्क स्थल पर अण्डाणु की बाहरी दीवार (भित्ति) फूलकर एक निषेचन शंकु (fertilization cone) बनाती है। अण्डाणु की प्लाज्माकला से चिपकने के पश्चात् शुक्राणु का एक्रोसोम स्पर्म लाइसिन एन्जाइम स्रावित करता है। इसके द्वारा अण्डाणु की प्लाज्मा कला घुल जाती है और शुक्राणु धीरे-धीरे अण्डाणु में प्रवेश कर जाता है।

5. अण्डाणु का सक्रियण – शुक्राणु के प्रवेश करते ही अण्ड कोशिका से एक रासायनिक संकेत अण्डाणु की सतह की ओर प्रेषित होता है, जिसके कारण अण्डकोशिका के चारों ओर स्थित शुक्राणुओं में से कोई भी शुक्राणु अब अण्डाणु में प्रवेश नहीं करने पाता है। अण्डाणु की प्लाज्माकला के नीचे स्थित कॉर्टिकल कणिकाएँ निषेचन झिल्ली बनाती हैं। इसे अण्डाणु का सक्रियण कहते हैं। निषेचन झिल्ली अन्य शुक्राणुओं को अण्डाणु में प्रवेश करने से रोक देती है।

6. शुक्राणु तथा अण्डाणु के केन्द्रक का संलयन – शुक्राणु के अण्डे में प्रवेश करते ही उसके कोशिकाद्रव्य एवं कॉर्टेक्स में अनेक परिवर्तन होने लगते हैं। इन परिवर्तनों के कारण सक्रिय अण्डाणु में समसूत्री विभाजन (mitosis) की तैयारियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-7

अण्डाणु के अन्दर शुक्राणु का नर पूर्व केन्द्रक (male pronucleus) एक निश्चित पथ पर अण्डाणु के मादा पूर्व केन्द्रक (female pronucleus) की ओर अग्रसर होता है। इस पथ को शुक्राणु प्रवेश पथ (sperm penetration path) कहते हैं। अब नर एवं मादा पूर्व केन्द्रकों का परस्पर स्थापित हो जाने से दोनों का संलयन (fusion) हो जाता है, जिसके फलस्वरूप युग्मनज (zygote) बनता है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या पुनः द्विगुणित (2n) हो जाती है। इसके साथ ही माता-पिता के गुणसूत्रों का परस्पर मिश्रण हो जाता है।

निषेचित अण्डे को अब युग्मनज (zygote) तथा इसके केन्द्रक को सिन्कैरिओन (synkaryon) कहते हैं। दोनों पूर्व केन्द्रकों के संलयन को उभय मिश्रण (amphimixis) कहते हैं। सेण्ट्रिओल सहित शुक्राणु केन्द्रक के प्रवेश से अण्डाणु के कोशिकाद्रव्य में तर्क निर्माण प्रारम्भ हो जाता है और युग्मनज प्रथम केन्द्रक विभाजन के लिए तैयार हो जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-8

प्रश्न 2.
विदलन एवं समसूत्री विभाजन में अन्तर स्पष्ट कीजिए । मनुष्य के युग्मनज में विदलन को समझाइए एवं इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर
विदलन तथा समसूत्री विभाजन में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 3 Human Reproduction img-9
मनुष्य के युग्मनज में विदलन
निषेचन के पश्चात् युग्मनज में तेजी से समसूत्री विभाजन होता है अत: यह अनेक कोशिकाओं के समूह में विभाजित होता है। इसके आकार में कोई परिवर्तन नहीं आता है व इसे क्रिया को विदलन (cleavage) कहते हैं। इससे कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है। विदलने द्वारा बनी कोशिकाएँ ब्लास्टोमीयर्स (blastomeres) कहलाती हैं। मानव में पूर्णभंजी विदलन (holoblastic cleavage) होता है। युग्मनज में प्रथम विदलन प्रायः निषेचन के तीस घण्टे बाद होता है तथा युग्मनज के अण्डवाहिनी के ऊपरी हिस्से में उपस्थित होने के दौरान यह विदलन होता है। पहले विदलन में युग्मनज मध्य अक्ष से पूर्ण रूप से दो ब्लास्टोमीयर्स में बँट जाता है।

दूसरा विदलन निषेचन के प्रायः 44 घण्टे बाद होता है व यह प्रथम विदलन के समकोण पर होता है। अतः युग्मनज चार समान ब्लास्टोमीयर्स में विभाजित हो जाता है। तृतीय विदलन प्रायः निषेचन के तीन दिन बाद होता है तथा ये पहले दो विभाजनों के 90° के कोण पर होता है। विदलन के दौरान भ्रूण अण्डवाहिनी में नीचे की ओर खिसकता जाता है। तृतीय विदलन के पश्चात् विदलन अनिश्चित रूप से होता है तथा चौथे दिन भ्रूण गर्भाशय में पहुंच जाता है। यह भ्रूण 32 कोशिकाओं (32 cells) का होता है व इसे मोरूला (morula) कहते हैं।

विदलन के लाभ
विदलन द्वारा होने वाले लाभ निम्नवत् हैं –

  1. युग्मनज का जीवद्रव्य ब्लास्टोमीयर्स में विभाजित हो जाता है।
  2. विदलन जीवद्रव्य को गति प्रदान करता है तथा जनन स्तर (germ layers) बनाने में सहायता | करता है।
  3. यह ऊतक तथा अंग बनाने में सहायता करता है।
  4. विदलन के कारण निश्चित केंद्रकी जीवद्रव्य अनुपात (ratio) बनता है।
  5. इसके फलस्वरूप एककोशिकीय युग्मनज बहुकोशिकीय भ्रूण में परिवर्तित हो जाता है।

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