UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 फ्रांसीसी क्रान्ति

UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 फ्रांसीसी क्रान्ति

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 फ्रांसीसी क्रान्ति.

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई?
उत्तर:
फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत निम्न परिस्थितियों में हुई-
1. राजनैतिक कारण-तृतीय स्टेट के प्रतिनिधियों ने मिराब्यो एवं आबेसिए के नेतृत्व में स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित कर इस बात की शपथ ली कि जब तक वे लोग सम्राट की शक्तियों को सीमित करने तथा अन्यायपूर्ण विशेषाधिकारों वाली सामंतवादी प्रथा को समाप्त करने वाला संविधान नहीं बना लेंगे तब तक राष्ट्रीय सभा को भंग नहीं करेंगे। राष्ट्रीय सभा जिस समय संविधान बनाने में व्यस्त थी, उस समय (UPBoardSolutions.com) सामंतों को विस्थापित करने के लिए अनेक स्थानीय विद्रोह हुए। अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1774 ई. में ‘लुईस सोलहवाँ ‘ फ्रांस का राजा बना था। वह एक सज्जन परन्तु अयोग्य शासक था। राजा पर उसकी पत्नी ‘मैरी एंटोइनेट’ को भारी प्रभाव था।

प्रांतीय प्रशासन दो भागों में बँटा हुआ था जिन्हें क्रमशः ‘गवर्नमेंट’ तथा ‘जनरेलिटी’ के नामों से जाना जाता था। फ्रांसीसी शासन में एकरूपता का अभाव था। देश के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कानून लागू थे। इसी बीच खाद्य संकट गहरा गया तथा जनसाधारण का गुस्सा गलियों में फूट पड़ा। 14 जुलाई को सम्राट ने सैन्य टुकड़ियों को पेरिस में प्रवेश करने के आदेश दिये। इसके प्रत्युत्तर में सैकड़ों क्रुद्ध पुरुषों एवं महिलाओं ने स्वयं की सशस्त्र टुकड़ियाँ बना लीं। ऐसे ही लोगों की एक सेना बास्तील किले की जेल (सम्राट की निरंकुश शक्ति का प्रतीक) में जा घुसी और उसको नष्ट कर दिया। इस प्रकार फ्रांसीसी क्रांति का प्रारंभ हुआ और व्यवस्था बदलने को आतुर लोग क्रांति में शामिल हो गए।

2. फ्रांस की आर्थिक परिस्थितियाँ-बूळू वंश का लुई सोलहवाँ 1774 में फ्रांस का राजा बना। उसने ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी एंटोइनेट से विवाह किया। उसके सत्तासीन होने के समय फ्रांस का कोष रिक्त था। राज्य पर कर्ज का बोझ निरंतर बढ़ रहा था। राज्य की कर (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था असमानता और पक्षपात के सिद्धांत पर निर्मित होने के कारण अत्यंत दूषित थी। कर दो प्रकार के थे- प्रत्यक्ष कर (टाइल) और धार्मिक कर (टाइद)। पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग जिनका फ्रांस की लगभग 40% भूमि पर स्वामित्व था, प्रत्यक्ष करों से पूर्ण मुक्त थे तथा अप्रत्यक्ष करों से भी प्रायः मुक्त थे। ऐसे समय में अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के सरकारी निर्णय ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया।

सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को एस्टेट के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेट को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इंस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट (UPBoardSolutions.com) के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए। फ्रांसीसी जनसंख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरूप, पावरोटी (अधिकतर लोगों के भोजन का मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।

3. दार्शनिकों का योगदान- इस काल में फ्रांसीसी समाज में मांटेस्क्यू, वोल्टेयर तथा रूसो आदि विचारकों के विचारों के कारण तर्कवाद का प्रसार आरम्भ हुआ। इन विचारकों ने अपने साहित्य द्वारा पादरियों, चर्च की सत्ता तथा सामंती व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया। अठारहवीं सदी के दौरान मध्यम वर्ग शिक्षित एवं धनी बन कर उभरा। सामंतवादी समाज द्वारा प्रचारित विशेषाधिकार प्रणाली उनके हितों के विरुद्ध थी। शिक्षित होने के कारण इस वर्ग के सदस्यों की पहुँच फ्रांसीसी एवं अंग्रेज राजनैतिक एवं सामाजिक दार्शनिकों (UPBoardSolutions.com) द्वारा सुझाए गए समानता एवं आजादी के विभिन्न-विचारों तक थी। ये विचार सैलून एवं कॉफीघरों में जनसाधारण के बीच चर्चा तथा वाद-विवाद के फलस्वरूप पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा लोकप्रिय हो गए। दार्शनिकों के विचारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जॉन लॉक, जीन जैक्स रूसो एवं मांटेस्क्यू ने राजा के दैवीय सिद्धान्त को नकार दिया।

4. सामाजिक परिस्थितियाँ- फ्रांस में सामंतवादी प्रथा प्रचलित थी, जो तीन वर्गों में प्रचलित थी। इन वर्गों को एस्टेट कहते थे। प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग आता था। इनका देश की 10% भूमि पर अधिकार था। द्वितीय एस्टेट में फ्रांस का कुलीन वर्ग सम्मिलित था। इनका देश की 30% भूमि पर अधिकार था। तृतीय एस्टेट में फ्रांस की लगभग 94% जनसंख्या आती थी। इस वर्ग में मध्यम वर्ग (लेखक, डॉक्टर, जज, वकील, अध्यापक, असैनिक अधिकारी आदि), किसानों, मजदूरों और दस्तकारों को सम्मिलित किया जाता था। यह (UPBoardSolutions.com) केवल तृतीय एस्टेट ही थी जो सभी कर देने को बाध्य थी। पादरी एवं कुलीन वर्ग के लोगों को सरकार को कर देने से छूट प्राप्त थी परन्तु सरकार को कर देने के साथ-साथ किसानों को चर्च को भी कर देना पड़ता था। यह एक अन्यायपूर्ण स्थिति थी जिसने तृतीय एस्टेट के सदस्यों में असंतोष की भावना को बढ़ावा दिया।

5. तात्कालिक कारण- लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को नए करों के प्रस्ताव हेतु 1614 ई. में निर्धारित संगठन के आधार पर तीनों एस्टेट की एक बैठक बुलाई। तृतीय एस्टेट की माँग थी कि सभी एस्टेट की एक संयुक्त बैठक बुलाई जाए तथा ‘एक व्यक्ति एक मत’ के आधार पर मतदान कराया जाए। लुई सोलहवें ने ऐसा करने से मना कर दिया। अतः 20 जून को तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि टेनिस कोर्ट में एकत्रित हुए तथा नवीन संविधान बनाने की घोषणा की।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
फ्रांसीसी समाज के किन तबकों को क्रान्ति का फायदा मिला? कौन-से समूह सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर हो गए? क्रांति के नतीजों से समाज के किन समूहों को निराशा हुई होगी?
उत्तर:
फ्रांसीसी क्रान्ति से सर्वाधिक लाभ तृतीय एस्टेट के धनी सदस्यों को हुआ। तृतीय एस्टेट में किसान, मजदूर, वकील, छोटे अधिकारीगण, अध्यापक, डॉक्टर एवं व्यवसायी शामिल थे। क्रांति से पहले इन्हें सभी कर अदा करने पड़ते थे। साथ ही इन लोगों को पादरियों और कुलीनों के द्वारा अपमानित भी किया जाता था। लेकिन क्रांति के बाद उनके साथ समाज के उच्च वर्ग के समान व्यवहार किया जाने लगा। (UPBoardSolutions.com) पादरियों एवं कुलीन वर्ग के लोगों को अपने विशेषाधिकारों को त्यागने पर विवश होना पड़ा। क्रान्ति के परिणामों से महिलाओं को निराशा हुई क्योंकि वे लैंगिक आधार पर पुरुषों की समानता का अधिकार हासिल नहीं कर सकीं।

प्रश्न 3.
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रान्ति कौन-सी विरासत छोड़ गई?
उत्तर:
इस क्रान्ति से विश्व के लोगों को निम्न विरासत प्राप्त हुई-

  1. फ्रांसीसी क्रान्ति वैश्विक स्तर पर मानव इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
  2. यह विश्व का पहला ऐसा राष्ट्रीय आंदोलन था जिसने स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारे जैसे विचारों को अपनाया।
    19वीं व 20वीं सदी के प्रत्येक देश के लोगों के लिए ये विचार आधारभूत सिद्धान्त बन गए।
  3. राजा राममोहन राय जैसे नेता फ्रांसीसियों द्वारा राजशाही एवं उसके निरंकुशवाद के विरुद्ध प्रचारित विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।
  4. इस क्रान्ति ने जनता की आवाज को प्रश्रय दिया। जनता उस समय दैवी अधिकार की धारणा, सामंती विशेषाधिकार, दास प्रथा एवं नियंत्रण को समाप्त करके योग्यता को सामाजिक उत्थान का आधार बनाना चाहती थी।
  5. इसने यूरोप के लगभग सभी देशों सहित दक्षिण अमेरिका में प्रत्येक क्रान्तिकारी आंदोलन को प्रेरित किया।
  6. इसने ‘राष्ट्रवादी आंदोलन को बढ़ावा दिया। इस क्रांति ने पोलैण्ड, जर्मनी, नीदरलैण्ड तथा इटली के लोगों को अपने देशों में राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हेतु प्रेरित किया।
  7. इसने राजतंत्रात्मक स्वेच्छाचारी शासन का अन्त कर यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में गणतंत्र की स्थापना को बढ़ावा दिया।
  8. इसने देश के सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार की अवधारणा का प्रचार किया जो बाद में कानून के सम्मुख लोगों की समानता की धारणा का आधार बना।

प्रश्न 4.
उन जनवादी अधिकारों की सूची बनाएँ जो आज हमें मिले हुए हैं और जिनका उद्गम फ्रांसीसी क्रान्ति में है।
उत्तर:
ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार जिनका हम आज सरलता से प्रयोग करते हैं तथा जिनका उद्भव फ्रांस की क्रान्ति के फलस्वरूप हुआ था, उनका विवरण इस प्रकार है-

  1. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  2. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  3. संवैधानिक उपचारों का अधिकार
  4. विचार अभिव्यक्ति का अधिकार
  5. समानता का अधिकार
  6. स्वतंत्रता का अधिकार
  7. एकत्र होने तथा संगठन बनाने का अधिकार
  8. सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार
  9. संपत्ति का अधिकार।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अंतर्विरोध थे?
उत्तर:
विश्व में नागरिक अधिकारों की प्रथम घोषणा का प्रयास संभवतः फ्रांस में ही किया गया। फ्रांस के सार्वभौमिक अधिकारों के संदेश में स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के तीन मौलिक सिद्धान्तों पर बल दिया गया। वर्तमान में सभी लोकतांत्रिक देशों द्वारा इन सिद्धान्तों को अंगीकार (UPBoardSolutions.com) किया गया है।
लेकिन यह सत्य है कि फ्रांस का सार्वभौमिक अधिकारों का संदेश अनेक विरोधाभासों से घिरा हुआ है जिनका विवरण इस प्रकार है-

  1. व्यापार और कार्य की स्वतंत्रता का कोई उल्लेख नहीं था।
  2. स्वतंत्रता को अधिक प्रोत्साहन दिया गया था।
  3. व्यक्ति के चहुँमुखी विकास को लक्ष्य नहीं बनाया गया।
  4. शिक्षा के अधिकार को कोई महत्त्व नहीं दिया गया।
  5. घोषणा में कहा गया था कि “कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।” किन्तु जब फ्रांस एक संवैधानिक राजशाही बना तो लगभग 30 लाख नागरिक जिनमें 25 वर्ष से कम आयु के पुरुष एवं महिलाएँ शामिल थीं, उन्हें बिल्कुल वोट ही नहीं डालने दिया गया।
  6. फ्रांस ने उपनिवेशों पर कब्जा करना व उनकी संख्या बढ़ाना जारी रखा।
  7. फ्रांस में उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक दासप्रथा जारी रही।

प्रश्न 6.
नेपोलियन के उदय को कैसे समझा जा सकता है?
उत्तर:
नेपोलियन का उदय 1796 में निर्देशिका के पतन के बाद हुआ। निदेशकों का प्रायः विधान सभाओं से झगड़ा होता था जो कि बाद में उन्हें बर्खास्त करने का प्रयास करती। निर्देशिका राजनैतिक रूप से अत्यधिक अस्थिर थी; अतः नेपोलियन सैन्य तानाशाह के रूप में सत्तारूढ़ हुआ। सन् 1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने स्वयं को फ्रांस का सम्राट बना लिया। 1799 ई. में डायरेक्टरी के शासन का अंत करके वह फ्रांस का प्रथम काउंसल बन गया। शीघ्र ही शासन की समस्त शक्तियाँ उसके हाथों में केंद्रित हो गईं।

सन् 1793-96 के मध्य फ्रांसीसी सेनाओं ने लगभग सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप पर विजय हासिल कर ली। जब नेपोलियन माल्टा, मिस्र और सीरिया की ओर बढ़ा (1797-99) तथा इटली से फ्रांसीसियों को बाहर ढकेल दिया गया तब सत्ता पर नेपोलियन का कब्जा हुआ, फ्रांस ने अपने खोए हुए भूखण्ड पुनः वापस ले लिए। उसने आस्ट्रिया को 1805 में, प्रशा को 1806 में और रूस को 1807 में परास्त किया। समुद्र के ऊपर ब्रिटिश नौ सेना पर फ्रांसीसी अपना प्रभुत्व कायम नहीं कर सके। अंततः लगभग सारे यूरोपीय देशों ने मिलकर 1813 ई. में लिव्जिंग (UPBoardSolutions.com) में फ्रांस को परास्त किया। बाद में इन मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने पेरिस (फ्रांस की राजधानी) पर अधिकार कर लिया। जून, 1815 ई. में नेपोलियन ने वाटरलू में पुनः विजय प्राप्त करने का असफल प्रयास किया। नेपोलियन ने अपने शासन काल में निजी संपत्ति की सुरक्षा और नाप-तोल की एक समान दशमलव प्रणाली सम्बन्धी कानून बनाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गिलोटिन किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह दो स्तम्भों और एक फरसे से मिलकर बना एक ऐसा यंत्र है जिसमें फरसा ऊपर से नीचे की ओर आता है ओर नीचे लिटाये गए मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति का एक ही बार में सिर धड़ से अलग कर देता है। फ्रांसीसी क्रांति के बाद इस यंत्र का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
आतंक के राज्य से क्या आशय है?
उत्तर:
फ्रांस में क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आयी रोब्सपियर सरकार में कुलीन एवं पादरी, दूसरे राजनीतिक दल के सदस्यों, रोब्सपियर की कार्य-पद्धति से असहमत पार्टी के सदस्यों को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया जाता था। इन बंदियों पर क्रान्तिकारी अदालत में मुकदमा चलाया जाता था। दोष सिद्ध होने पर इन लोगों को गिलोटिन पर चढ़ा दिया जाता था।

प्रश्न 3.
रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर:
रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-

  1. खाद्यान्न संकट को देखते हुए मांस और पावरोटी की बिक्री हेतु राशनिंग व्यवस्था लागू कर दी गयी।
  2. मजदूरी और कीमतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने वाला कानून बनाया गया।

प्रश्न 4.
रोब्सपियर को गिलोटिन पर चढ़ाने का कारण बताइए।
उत्तर:
रोब्सपियर की कठोर नीतियों को फ्रांस में निर्ममता से लागू किया गया, जिसमें हजारों निर्दोष लोग भी सन्देह में मारे गए। सन् 1794 में न्यायालय द्वारा रोब्सपियर को उत्पीड़ने का दोषी ठहराया गया और बंदी बना लिया गया तथा अगले ही दिन उसे गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।

प्रश्न 5.
‘सोसाइटी ऑफ रेवोल्यूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन’ की प्रमुख माँग बताइए।
उत्तर:
इस क्लब की प्रमुख माँग थी कि फ्रांस के समाज में महिला-पुरुष के बीच लैंगिक आधार पर विभेद न करके उन्हें एक समान माना जाए और समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाएँ।

प्रश्न 6.
नेपोलियन बोनापार्ट का उदय किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
डायरेक्टरी शासन के दौरान फ्रांस में डायरेक्टरी के सदस्यों के मध्य परस्पर झगड़ा विधान परिषदों से होता था और विधान परिषद् डायरेक्टरी को बर्खास्त करने का प्रयास करती थी। डायरेक्टरी की राजनीतिक अस्थिरता ने
सेनिक तानाशाह नेपोलियन बोनापार्ट के उद्भव का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 7.
फ्रांस के राष्ट्रीय गान को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
फ्रांस के राष्ट्रीय गान को ‘मार्सिले’ नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
जैकोबिन क्लब के नेता का नाम लिखिए। उत्तर मेक्समिलियन रोबेस्प्येर।। प्रश्न 9. फ्रांसीसी क्रांति के समय फ्रांस पर किस शासक का शासन था?
उत्तर:
लुईस XVI (सोलहवाँ) का।

प्रश्न 10.
लुईस सोलहवाँ फ्रांस की राजगद्दी पर कब आसीन हुआ था?
उत्तर:
1774 ई. में।

प्रश्न 11.
लुईस XVI किस राजवंश से संबंधित था?
उत्तर:
बूबों राजवंश।

प्रश्न 12.
फ्रांसीसी समाज किन तीन प्रमुख वर्गों में बँटा हुआ था?
उत्तर:

  1. प्रथम एस्टेट,
  2. द्वितीय एस्टेट,
  3. तृतीय एस्टेट।

UP Board Solutions

प्रश्न 13.
धार्मिक करों को किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
टाइद।

प्रश्न 14.
एस्टेट जनरल की बैठक में तीनों वर्गों के कितने-कितने प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए थे?
उत्तर:
प्रथम एस्टेट (300 प्रतिनिधि), द्वितीय एस्टेट (300 प्रतिनिधि)।

प्रश्न 15.
एस्टेट जनरल की बैठक में किन वर्गों का प्रवेश वर्जित था?
उत्तर:

  1. किसानों,
  2. औरतों,
  3. कारीगरों।

प्रश्न 16.
बास्तील का पतन कब हुआ?
उत्तर:
14 जुलाई, 1789 ई.।

प्रश्न 17.
नेशनल असेम्बली ने सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश कब पारित किया?
उत्तर:
4 अगस्त, 1789 ई.।

प्रश्न 18.
त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती आँख किसका प्रतीक है?
उत्तर:
त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती सर्वदर्शी आँख ज्ञान का प्रतीक है।

प्रश्न 19.
फ्रांस के राष्ट्रीय रंग कौन-से हैं?
उत्तर:

  1. लाल,
  2. सफेद,
  3. नीला।

प्रश्न 20.
प्रारम्भिक वर्षों में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार के लिए किस तरह के कानून पास किए?
उत्तर:
सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी (UPBoardSolutions.com) लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे।

UP Board Solutions

प्रश्न 21.
18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज कितने एस्टेट्स में बँटा हुआ था?
उत्तर:
18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेट्स में बँटा हुआ था-

  1. प्रथम एस्टेट-पादरी वर्ग,
  2. द्वितीय एस्टेट–कुलीन वर्ग,
    तृतीय एस्टेट-बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान, कारीगर, छोटे किसान, भूमिहीन, मजदूर, नौकर।

प्रश्न 22.
18वीं सदी में फ्रांस में किस नए सामाजिक वर्ग का उदय हुआ?
उत्तर:
मध्यम वर्ग का।

प्रश्न 23.
एस्टेट जनरल (प्रतिनिधि सभा) की अन्तिम बैठक कब हुई थी?
उत्तर:
1614 ई.।

प्रश्न 24.
‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ नामक पुस्तक किसने लिखी थी?
उत्तर:
रूसो।

प्रश्न 25.
जैकोबिन सरकार के पतन के बाद फ्रांस में किस तरह की सरकार स्थापित हुई?
उत्तर:
जैकोबिन सरकार के पतन के उपरान्त एक नया संविधान लागू किया गया जिसने समाज के संपत्तिहीन नागरिकों को मताधिकार से वंचित रखा। संविधान में दो चुनी गई विधान परिषदों का प्रावधान था। इन परिषदों ने पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका डाइरेक्ट्री को नियुक्त किया जिसे डाइरेक्ट्री शासन कहा गया।

प्रश्न 26.
तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ किस तरह के कार्य करती थीं?
उत्तर:
तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ जीविका निर्वाह के लिए काम करती थीं। वे सिलाई, बुनाई, कपड़ों की धुलाई करती थीं, बाजारों में फल-फूल और सब्जियाँ बेचती थीं अथवा संपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रान्तिकारी महिला ओलिम्प डि गाजेस (1748-1793) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
फ्रांस की क्रान्तिकालीन राजनीति में सक्रिय ओलिम्प सबसे महत्त्वपूर्ण महिला थी। उन्होंने फ्रांस के संविधान नथा ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र’ का विरोध किया क्योंकि उनमें महिलाओं को मानव मात्र के मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया था। इसलिए उन्होंने 1791 ई. में ‘महिला एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र तैयार किया जिसे महारानी एवं नेशनल असेंबली के सदस्यों पर यह माँग करते हुए (UPBoardSolutions.com) भेजा गया था कि वे इस पर कार्यवाही करें। सन् 1793 में ओलिम्प ने महिला क्लवों को जबरन बंद करने के लिए जैकोबिन सरकार की आलोचना की। उन पर नेशनल कन्वेंशन द्वारा मुकदमा चलाया गया तथा फाँसी पर लटका दिया गया।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रान्ति के बाद समता स्थापित करने के लिए रोबेस्प्येर सरकार ने कौन-से नियम बनाए?
उत्तर:

  1. बोलचाल और संबोधन में भी बराबरी का आचार-व्यवहार लागू करने की कोशिश की गई। परंपरागत मॉन्स्यूर (महाशय) एवं मदाम (महोदया) के स्थान पर अब सभी फ्रांसीसी पुरुषों एवं महिलाओं को सितोयेन (नागरिक) एवं सितोयीन (नागरिका) नाम से संबोधित किया जाने लगा।
  2. चर्को को बन्द कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्तर बना दिया गया।
  3. रोबेस्प्येर सरकार ने कानून बना कर मजदूरी एवं कीमतों की अधिकतम सीमा तय कर दी।
  4. गोश्त एवं पावरोटी की राशनिंग कर दी गई।
  5. किसानों को अपना अनाज शहरों में ले जाकर सरकार द्वारा तय कीमत पर बेचने के लिए बाध्य किया गया।
  6. महँगे सफेद आटे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। सभी नागरिकों के लिए साबुत गेहूं से बनी और बराबरी का प्रतीक मानी जाने वाली ‘समता रोटी खाना अनिवार्य कर दिया गया।

प्रश्न 3.
फ्रांस में जून, 1793 ई. से जुलाई, 1794 ई. के बीच के कालखण्ड को ‘आतंक का राज्य’ क्यों कहते हैं?
उत्तर:
फ्रांस में जून, 1793 से जुलाई, 1794 ई. तक के फ्रांसीसी शासन को ‘आतंक का राज्य के नाम से संबोधित किया जाता है। इसके पीछे निम्न तथ्य उत्तरदायी हैं-

  1. चर्चे को बन्द कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्तर बना दिया गया।
  2. रोब्सपियर ने अपनी नीतियों को सख्ती से लागू किया। उसके लिए दया का अर्थ था देशद्रोह। उसके एक साल के शासन काल में हजारों व्यक्तियों को मृत्यु-दण्ड दिया गया जिसके कारण उसके सहयोगी भी उसके दुश्मन बन गए और 27 जुलाई, 1794 ई. को उसे कैद कर लिया गया।
  3. क्योंकि इस काल में शासन के समस्त सूत्र जैकोबिन क्लब के नेता रोब्सपियर के हाथों में केन्द्रित हो गए थे। उसके अनुसार फ्रांस का कल्याण क्रांति की सफलता में ही निहित है और क्रांति की सफलता आतंक का राज्य स्थापित करके ही प्राप्त की जा सकती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने सभी असहमत वर्गों के नेताओं तथा व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया तथा दोषी व्यक्तियों को गिलोटिन पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दे दिया गया।
  4. उसने देश की रक्षा के लिए सेना की भर्ती आरंभ की और शीघ्र ही 7,50,000 फ्रेंच सेना तैयार हो गई।
  5. उसने मजदूरी तथा कीमतों की (UPBoardSolutions.com) अधिकतम सीमा निर्धारित की। गोश्त तथा पावरोटी की राशनिंग आरम्भ कर दी गई।
    इस प्रकार उसने महँगाई रोकने के लिए अनेक प्रयास किए।

प्रश्न 4.
जैकोबिन क्लब से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जैकोबिन क्लब की शुरुआत क्रान्ति के आरम्भिक समय में ही हो चुकी थी। शुरुआत में जैकोबिन के अनुयायी उदार तथा सुधारवादी ही थे। लेकिन धीरे-धीरे उसकी नीति उग्र होती गयी, फलस्वरूप मिराबो लाफाएत जैसे नरम विचार वाले सदस्य उससे पृथक् ही हो गए। परिणाम यह हुआ कि क्लब पर रोब्सपियर जैसे उग्र विचारक का नियंत्रण हो गया। इस क्लब का नाम पेरिस के भूतपूर्व कान्वेंट ऑफ सेंट जैकब के नाम पर पड़ा। इस क्लब का प्रधान स्थान पेरिस था। इस क्लब के सदस्य लम्बी धारीदार पतलून पहनते थे इसलिए इन्हें ‘सौं कुलॉत’ भी कहा जाता था। इसकी 400 के लगभग शाखाएँ थीं जो सारे देश में फैली हुई थीं। धीरे-धीरे यह क्लब अधिक शक्तिशाली हो गया और उसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् फ्रांस की सत्ता पर जैकोबिनों को नियन्त्रण स्थापित हो गया।

प्रश्न 5.
कुलीन वर्ग के फ्रांस से पलायन के क्या कारण थे?
उत्तर:
14 जुलाई, 1789 ई. को फ्रांस की क्रुद्ध भीड़ बास्तील के किले पर धावा बोलकर उसे नष्ट कर दिया तथा वहाँ के जेल में बन्द कैदियों को मुक्त कर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह फैल गयी कि जागीरों के मालिक भाड़े पर लठैतोंलुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो पकी फसलों को नष्ट करने के लिए निकल पड़े हैं। अनेक जिलों में भय से आक्रान्त किसानों ने कुदालों और बेलचों से ग्रामीण किलों पर आक्रमण कर दिए। किसानों ने अन्न भण्डारों को लूट लिया तथा लगान सम्बन्धी दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। ऐसी अराजक स्थिति में बड़ी संख्या में कुलीन अपनी जागीरें छोड़कर पलायन कर गए।
और उन्होंने पड़ोसी देशों में शरण लेकर अपना जीवन सुरक्षित किया।

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
क्रान्तिकालीन फ्रांस में महिलाओं की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस में सामाजिक परिवर्तन लाने में महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका है। महिलाओं ने अपने जीवन में सुधार लाने के लिए क्रान्तिकारी सरकार पर आवश्यक कदम उठाने के लिए दबाव डाला। तत्कालीन फ्रांसीसी महिलाएँ अपने पतियों एवं परिवार की आर्थिक रूप से सहायता करने के (UPBoardSolutions.com) लिए सिलाई-बुनाई, कपड़े धोने, बाजार में फूल, फल तथा सब्जियाँ बेचने का कार्य करती थीं। अपनी स्थिति में सुधार तथा इस पर चर्चा झुरने के लिए उन्होंने अनेक राजनैतिक क्लब एवं अखबार शुरू किए तथा कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए, जो इस प्रकार हैं-

  1. उनकी माँगों में यह भी शामिल था कि उन्हें भी पुरुषों के समान राजनैतिक अधिकार दिए जाएँ।
  2. उन्होंने मताधिकार, सभा में चुने जाने एवं राजनैतिक पद ग्रहण कर सकने की भी माँग की।
  3. फ्रांस के विभिन्न शहरों में लगभग साठ क्लब अस्तित्व में आए।
  4. सभी वर्गों की महिलाओं को शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए।
  5. उन्होंने माँग की कि उन्हें भी उन दिनों पुरुषों को दी जा रही उच्च मजदूरी के समान ही मजदूरी मिले।

प्रश्न 7.
फ्रांस की क्रान्ति का फ्रांस पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
फ्रांस की क्रान्ति के फ्रांस पर निम्न महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े-

  1. फ्रांसीसी क्रांति ने जनता की माँगों का समर्थन किया, दैवीय अधिकार के विचार, सामन्ती विशेषाधिकारों, दासत्व तथा नियंत्रण की समाप्ति तथा सामाजिक उत्थान के लिए योग्यता को आधार बनाया।
  2. फ्रांस में राजशाही का अन्त हो गया। फ्रांस गणतंत्र बन गया।
  3. पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा भी फ्रांसीसी क्रांति की देन थी जिसने समानता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अधिकार दिए।

प्रश्न 8.
फ्रांस के 1791 ई. के संविधान की विशेषता बताइए।
उत्तर:

  1. निर्वाचक की योग्यता पाने के लिए और पुनः सभा का सदस्य बनने के लिए लोगों को उच्च श्रेणी का करदाता होना आवश्यक था।
  2. सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। केवल 25 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष जो कि कम से कम एक मजदूर की 3 दिन की मजदूरी के समान कर अदा करते थे उन्हें ही सक्रिय नागरिक का दर्जा प्रदान किया गया अर्थात् उन्हें ही वोट देने का अधिकार था। बचे हुए सभी पुरुषों तथा सभी महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया था।
  3. सन् 1791 के संविधान ने कानून बनाने की (UPBoardSolutions.com) शक्ति राष्ट्रीय सभा को दे दी जो कि अप्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती थी अर्थात् नागरिक किसी चुनने वाले समूह को वोट देते तथा वह समूह फिर सभा को चुनता।।

प्रश्न 9.
फ्रांस में सेंसरशिप की समाप्ति का प्रभाव बताइए।
उत्तर:
1789 ई. में बास्तील के पतन के बाद जो सबसे महत्त्वपूर्ण कानून अस्तित्व में आया, वह ‘सेंसरशिप की समाप्ति’ से सम्बन्धित था। इसके प्रभाव का विवरण इस प्रकार है-

  1. नाटक, संगीत और उसकी जुलूसों में असंख्य लोग जाने लगे।
  2. स्वतंत्रता और न्याय के बारे में राजनीतिज्ञों व दार्शनिकों के पांडित्यपूर्ण लेखन को समझने और उससे जुड़ने का यह लोकप्रिय तरीका था क्योंकि किताबों को पढ़ना तो मुट्ठी भर शिक्षितों के लिए ही संभव था।
  3. अब अधिकारों के घोषणापत्र ने भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नैसर्गिक अधिकार घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप फ्रांस के शहरों में अखबारों, पर्चा, पुस्तकों एवं छपी हुई तस्वीरों की बाढ़ आ गई जहाँ से वह तेजी से गाँव-देहात तक जा पहुँची। उनमें फ्रांस में घट (UPBoardSolutions.com) रही घटनाओं एवं परिवर्तनों का ब्यौरा और उन पर टिप्पणी होती थी।
  4. प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब यह था कि किसी भी घटना पर परस्पर विरोधी विचार भी व्यक्त किए जा सकते थे।
    प्रिंट माध्यम का उपयोग करके एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को अपने दृष्टिकोण से सहमत कराने की कोशिश की।

UP Board Solutions

प्रश्न 10.
18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास-प्रथा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा इस प्रकार थी-
(1) दास-व्यापार सत्रहवीं शताब्दी में शुरू हुआ। फ्रांसीसी सौदागर बोर्दै और नान्ते बंदरगाह से अफ्रीका तट पर जहाज ले जाते थे, जहाँ वे स्थानीय सरदारों से दास खरीदते थे। दासों को दाग कर एवं हथकड़ियाँ डालकर अटलांटिक महासागर के पार कैरिबिआई देशों तक तीन माह की लम्बी समुद्री-यात्रा के लिए जहाजों में ढूंस दिया जाता था। वहाँ उन्हें बागान-मालिकों को बेच दिया जाता था। दास-श्रुम के बल पर यूरोपीय बाजारों में चीनी, कॉफी एवं नील की बढ़ती माँग को पूरा करना संभव हुआ। बोर्दे और नान्ते जैसे बंदरगाह फलते-फूलते दास-व्यापार के कारण। ही समृद्ध नगर बन गए।

(2) फ्रांसीसी उपनिवेशों में से कैरिबिआई उपनिवेश-मार्टिनिक, गॉडेलोप और सैन डोमिंगों-तंबाकू, नील, चीनी एवं कॉफ़ी जैसी वस्तुओं के महत्त्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता थे। अपरिचित एवं दूर देश जाने और काम करने के प्रति यूरोपियों की अनिच्छा का मतलब था–बागानों में श्रम की कमी। इस कमी को यूरोप, अफ्रीका एवं अमेरिका के बीच त्रिकोणीय दास-व्यापार द्वारा पूरा किया गया।

प्रश्न 11. 
फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन निम्न प्रकार हुआ-

  1. फ्रांस में दास प्रथा की अधिक निन्दा 18वीं सदी में नहीं हुई। नेशनल असेंबली में लम्बी बहस के बाद भी यह निर्धारित नहीं किया जा सका कि समस्त फ्रांसीसी प्रजा को समान अधिकार प्रदान किया जाए या नहीं। किन्तु दास-व्यापार पर निर्भर व्यापारियों के विरोध के भय के फलस्वरूप नेशनल असेंबली कोई कानून पारित नहीं कर सकी।
  2. 1794 ई. के कन्वेंशन ने फ्रांसीसी उपनिवेशों में स्थित दासों को मुक्त करने सम्बन्धी कानून पारित कर दिया। यह कानून मात्र 10 वर्ष तक लागू रहा। दस वर्ष बाद (UPBoardSolutions.com) नेपोलियन ने दास-प्रथा पुनः शुरू कर दी। अब फ्रांस में सक्रिय बागान मालिकों को अपने आर्थिक हित साधने के लिए अफ्रीकी नीग्रो लोगों को गुलाम बनाने की स्वतंत्रता मिल गयी।
  3. सन् 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास-प्रथा का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया गया।

प्रश्न 12.
18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति निम्न प्रकार थी-

  1. अधिकांश महिलाओं के पास पढ़ाई-लिखाई तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के मौके नहीं थे। केवल कुलीनों की लड़कियाँ अथवा तीसरे एस्टेट के धनी परिवारों की लड़कियाँ ही कॉन्वेंट में पढ़ पाती थीं, इसके बाद उनकी शादी कर दी जाती थी।
  2. कामकाजी महिलाओं को अपने परिवार का पालन-पोषण भी करना पड़ता था-जैसे खाना पकाना, पानी लाना, लाइन लगाकर पावरोटी लाना और बच्चों की देख-रेख करना आदि। उनकी मजदूरी पुरुषों की तुलना में कम थी।
  3. महिलाएँ शुरू से ही फ्रांसीसी समाज में इतने अहम् परिवर्तन लाने वाली गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थीं। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी भागीदारी क्रांतिकारी सरकार को उनका जीवन सुधारने हेतु ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी।
  4. तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ जीविका निर्वाह के लिए काम करती थीं। वे सिलाई-बुनाई, कपड़ों की धुलाई करती थीं, बाजारों में फल-फूल-सब्जियाँ, बेचती थीं अथवा संपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं। बहुत सारी महिलाएँ , वेश्यावृत्ति करती थीं।

प्रश्न 13.
फ्रांस में व्याप्त आर्थिक तनाव क्रान्ति में किस प्रकार सहायक बना?
उत्तर:
लुई सोलहवाँ 1774 ई. में फ्रांस का राजा बना। उस समय फ्रांस का राजकोष रिक्त था। सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को एस्टेट्स के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेटस को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट्स ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया।

उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट्स के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए। फ्रांसीसी जनसंख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरूप, (UPBoardSolutions.com) पावरोटी’ (अधिकतर लोगों के भोजन को मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।

प्रश्न 14.
फ्रांस में जीविका संकट किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
फ्रांस की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही थी। फ्रांस की जनसंख्या 1715 ई. में 2 करोड़ 30 लाख से बढ़कर 1789 ई. में 2 करोड़ 80 लाख हो गयी। फलस्वरूप इससे खाद्यान्न की माँग बहुत तेजी से बढ़ी। इसलिए पावरोटी की कीमत भी तेजी से बढ़ी क्योंकि यह आम आदमी का भोजन थी। बहुत से कामगार कारखानों में मजदूर का काम करते थे जिनके मालिक उनकी मजदूरी निर्धारित करते थे। किन्तु उनकी (UPBoardSolutions.com) मजदूरी बढ़ती कीमतों के हिसाब से नहीं बढ़ रही थी। इसलिए अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ गई। जब कभी अकाल पड़ता या ओलावृष्टि होती तो फसल कम होने से स्थिति और बिगड़ जाती। इससे जीविका संकट पैदा हुआ।

UP Board Solutions

प्रश्न 15.
फ्रांसीसी क्रान्ति में दार्शनिकों का योगदान बताइए।
उत्तर:
फ्रांसीसी क्रान्ति में दार्शनिकों की भूमिका को हम निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं-

  1. फ्रांसीसी दार्शनिकों ने क्रांतिकारी विचार प्रदान किए एवं फ्रांस के लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने हेतु प्रेरित किया। उन्होंने सम्राट की अक्षमता की सफलतापूर्वक कलई खोली और लोगों को उसे चुनौती देने के लिए उकसाया।
  2. इन दार्शनिकों के इन विचारों पर सैलून एवं कॉफी-घरों में गहन चर्चा हुई और ये विचार पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा जनसाधारण के बीच फैल गए। इसने 1789 ई. में होने वाली क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
  3. जॉन लॉक ने राजा के दैवीय एवं स्वेच्छाचारी सिद्धान्त को नकार दिया।
  4. रूसो ने लोगों एवं उनके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक करार पर आधारित सरकार का विचार सामने रखा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांसीसी क्रान्ति की शुरुआती घटनाओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
(i) एस्टेट्स जनरल की बैठक- 5 मई, 1789 ई. को फ्रांस के शासक लुई सोलहवें ने नए करों के प्रस्ताव को 1614 ई. में निर्धारित संगठन के आधार पर वर्साय के महल में एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई। इस सभा में प्रथम और द्वितीय एस्टेट के 300-300 प्रतिनिधि और तृतीय एस्टेट के 600 प्रतिनिधियों को बुलाया गया। मतदान की प्राचीन पद्धति के अनुसार एस्टेट के प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार दिया गया था लेकिन लुई सोलहवाँ लोकतांत्रिक सिद्धान्त के आधार पर एक व्यक्ति एक मत’ को अपनाने के स्थान पर (UPBoardSolutions.com) कुलीन-वर्ग और साधारण वर्ग की माँगों के बीच समझौता कराना चाहता था। लुई चाहता था कि वित्तीय प्रश्न पर एक व्यक्ति एक मत’ का सिद्धान्त अपनाया जाए तथा अन्य माँगों पर वर्ग के आधार पर मतदान का सिद्धान्त अपनाया जाए।

(ii) राष्ट्रीय सभा की स्थापना- 6 मई, 1789 ई. को राष्ट्रीय सभा की बैठक के दूसरे दिन यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि तीन एस्टेट के सदस्य अलग-अलग भवनों में मतदान करेंगे या एक साथ एक भवन में मतदान करेंगे। सर्वसाधारण वर्ग ने अलग बैठने से मना कर दिया। सरकार ने इस गतिरोध को समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। अंततः सर्वसाधारण वर्ग के प्रतिनिधियों ने स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित करके एक क्रान्तिकारी कदम उठाया। क्रमशः कुलीन व पादरी वर्ग के लोग राष्ट्रीय सभा में सम्मिलित हो गए। अंततः 26 जून को लुई सोलहवें ने विवश होकर कुलीन वर्ग का सर्वसाधारण वर्ग के साथ बैठक का आदेश जारी कर दिया।

(iii) संविधान का प्रारूप- राष्ट्रीय सभा ने संविधान का प्रारूप तैयार कर दिया जिसका प्रमुख उद्देश्य सम्राट की शक्तियों को सीमित करना तथा एक संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना करना था जिसमें शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका में बाँटा जा सके।

(iv) बास्तील का पतन- किसी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए सम्राट ने पेरिस में सेना को एकत्रित करना आरम्भ कर दिया। सेना को एकत्रित होता देख जन आक्रोश भड़क उठा। पेरिस में आर्थिक असन्तोष को लेकर जगहजगह दंगे भड़क उठे। ये दंगे उस भुखमरी, महँगाई और बेरोजगारी के फलस्वरूप शुरू हुए थे, जो तत्कालीन पेरिस में व्याप्त थी। आक्रोशित जनता ने 14 जुलाई को बास्तील के किले पर धावा बोल दिया। बास्तील का पतन निरंकुश शासन के पतन का प्रतीक था। फ्रांस में प्रत्येक वर्ष 14 जुलाई का दिन राष्ट्रीय (UPBoardSolutions.com) त्योहार के रूप में मनाया जाता है। धीरे-धीरे यह आंदोलन गाँवों में फैल गया। किसानों ने ग्रामीण किलों को नष्ट करके अन्न भंडारों को लूट लिया और लगान संबंधी दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया। कुलीन-वर्ग के लोग बड़ी संख्या में दूसरे क्षेत्रों अथवा देशों में पलायन कर गए।

(v) संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना- जनता की शक्ति को भाँपते हुए फ्रांस के राजा लुई सोलहवें ने संवैधानिक राजतंत्र को मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हो गई। राष्ट्रीय सभा ने एक आदेश पारित किया जिसके द्वारा धार्मिक करों को समाप्त कर दिया गया, चर्च के स्वामित्व वाली जमीन जब्त कर ली गई, पादरी-वर्ग को उसके विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए विवश किया गया तथा सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया गया।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस की राजनीतिक स्थिति का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(i) फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस पर लुई सोलहवें को शासन था। 1774 ई. में अपने पितामह की मृत्यु के बाद वह कठिन परिस्थिति में सिंहासनारूढ़ हुआ, उस समय राजकोष रिक्त था। राजा के ऊपर अत्यधिक ऋण भार था। इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए जिस योग्यता की आवश्यकता थी, वह लुई में नहीं थी।

(ii) दूसरे फ्रांसीसी राजाओं की भाँति उसकी पत्नी मैरी इंटोइनेट का शासन पर अत्यधिक प्रभाव था। उसकी इच्छा शक्ति बड़ी दृढ़ थी, उसमें साहस था और तुरंत निर्णय भी कर सकती थी। इस प्रकार जो गुण राजा में नहीं थे वे उसमें विद्यमान थे परन्तु उसमें भी शासन की समस्याओं को समझने तथा (UPBoardSolutions.com) उनका समाधान करने की योग्यता नहीं थी। उसे अपने आमोद-प्रमोद से मतलब था। वह सदा लोभी, चाटुकारों से घिरी रहती थी जो उस समय की व्यवस्था से लाभ उठाते थे और इसी कारण सुधार के शत्रु थे।

वह शासन-कार्य में हस्तक्षेप करती रहती थी, मंत्रियों की नियुक्ति में दखल देती थी और सदा षड्यंत्रों में लगी रहती थी जिसके परिणाम सदा फ्रांस के हित के विपरीत होते थे। इन कारणों से तथा उसके विलासमय जीवन एवं अत्यधिक खर्चीले रहन-सहन से राज्य की कठिनाइयाँ बढ़ती रहीं। इस काल में फ्रांस का शासन भी बड़ा अक्षम, अव्यवस्थित और खर्चीला था। शासन का प्रमुख राजा था। उसकी सहायता के लिए पाँच समितियाँ होती थीं जो कानून बनाती थीं, राज्यादेश निकालती थीं और राज्य का समस्त
आंतरिक एवं बाह्य कार्य-संचालन करती थीं। यह व्यवस्था राजधानी में थी।

(iii) तत्कालीन फ्रांस के प्रांतीय शासन को दो प्रकार के प्रांतों में बाँटा गया था। एक प्रकार के प्रांत गवर्नमेंट कहलाते थे, जिनकी संख्या 40 थी। इनमें से अधिकांश फ्रांस के प्राचीन प्रांत थे। इनका शासन में कोई सहभागिता नहीं था। इन प्रांतों के गवर्नर उच्च वर्ग के कुलीन लोग होते थे। ये लोग अधिक वेतन पाते थे और राजा के सानिध्य में ऐशो-आराम की जिन्दगी व्यतीत करते थे।

(iv) शासन का वास्तविक कार्य फ्रांस के 36 अन्य प्रान्त करते थे, जिन्हें जेनरेलिटी कहते थे। प्रत्येक जेनरेलिटी में राजा द्वारा नियुक्त एक कर्मचारी होता था जिसे इंटेंडेट कहते थे। ये कर्मचारी मध्यम वर्ग के लोग होते थे तथा राजा के आदेशों का पालन करते थे। इन्हें जन आकांक्षाओं की ओर ध्यान (UPBoardSolutions.com) देने की स्वतंत्रता नहीं थी। इसलिए ये अपने अधीन काम करने वालों में बहुत अलोकप्रिय होते थे।

(v) सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पहुँच के आधार पर होती थी। स्थानीय स्वशासन की कोई व्यवस्था नहीं थी।

(vi) स्थानीय कर्मचारियों को भी छोटी-छोटी बातों के लिए केन्द्र से आदेश प्राप्त करना पड़ता था। इस तरह शासन में जनता की भूमिका नगण्य थी। इसी के परिणामस्वरूप क्रांति के समय जब जनता ने शासन-सूत्र अपने हाथ में लिया तो अनेक गल्तियाँ भी कीं।

प्रश्न 3.
फ्रांस के नए संविधान में शक्तियों का विभाजन किस प्रकार किया गया था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस में नया संविधान बनाने के लिए राष्ट्रीय सभा ने 6 जुलाई, 1789 को एक समिति गठित की थी। इस नवनियुक्त समिति ने दो आधार पर संविधान तैयार किया-
(i) जनता की प्रभुता और
(ii) शक्ति विभाजन।

इस तरह संविधान पर मांटेस्क्यू का प्रभाव स्पष्ट था। संविधान में शक्तियों का विभाजन-

  1. विधायिका,
  2. कार्यपालिका और
  3. न्यायपालिका के मध्य किया गया जिनका विवरण इस प्रकार है–

(1) विधायिका- नए संविधान के अन्तर्गत एक सदनीय विधान सभा की स्थापना की गयी। इसमें प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित 745 सदस्य रखे गए, जिनका कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित किया गया। निर्वाचन के लिए नागरिक दो भागों में विभक्त किए गए। जिन नागरिकों की अवस्था कम से कम 25 वर्ष की थी, जो कम से कम 3 दिन की आय कर के रूप में देते थे और जिनके नाम नगरपालिका के रजिस्टरों में तथा राष्ट्रीय रक्षक-दल में दर्ज थे वे सक्रिय नागरिकों की श्रेणी में रखे गए, शेष निष्क्रिय नागरिक रहे। सक्रिय नागरिक प्रति सौ (UPBoardSolutions.com) नागरिकों के लिए एक फ्रांसीसी क्रान्ति निर्वाचक चुनते थे और इन निर्वाचकों का ‘निर्वाचक-मंडल’ प्रतिनिधि चुनता था। निर्वाचक के लिए यह आवश्यक था कि वह संपत्ति का स्वामी हो और वर्ष में 10 दिन की आय कर के रूप में देता हो।

प्रतिनिधि कोई भी सक्रिय नागरिक चुना जा सकता था, उसके लिए भूमि का स्वामी होना और 54 फ्रैंक कर के रूप में देना आवश्यक था। परन्तु न्यायिक अथवा प्रशासनिक पद पर नियुक्त कोई भी व्यक्ति विधान-सभा का सदस्य नियुक्त नहीं हो सकता था। इस विधान सभा को कानून-निर्माण के पूर्ण अधिकार थे। उस पर एकमात्र नियंत्रण राजा के ‘स्थगनकारी निषेध’ (सस्पेंशन वीटो) का था। राजा किसी भी कानून को दो सत्रों के लिए स्वीकार करने से इनकार कर सकता था, परन्तु उसका यह अधिकार आर्थिक बातों में लागू नहीं होता था।

(2) कार्यपालिका- कार्यपालिका प्रमुख के रूप में राजा का अस्तित्व बना रहा। उसे मंत्रियों की नियुक्ति, सेना का नेतृत्व एवं विदेश नीति को निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त था, लेकिन विधान सभा उसके प्रभाव से पूरी तरह मुक्त थी। वह विधानसभा के अधिवेशन आमंत्रित नहीं कर सकता था, न उसे भंग कर सकता था और न ही उसके सामने कानून के प्रस्ताव ही प्रस्तुत कर सकता था। उसे केवल स्थगनकारी निषेध का अधिकार मिला। न्यायालयों तथा न्यायाधीशों पर भी उसका कोई अधिकार नहीं रहा। उसके मंत्री विधानसभा (UPBoardSolutions.com) के सदस्य नहीं हो सकते थे और इस तरह उन पर सभा का कोई नियंत्रण नहीं था। इस प्रकार राष्ट्रीय सभा ने इंग्लैण्ड का अनुकरण करके सांविधानिक एकतंत्र स्थापित किया, परन्तु इसके साथ मांटेस्क्यू के सिद्धान्त तथा अमेरिका के उदाहरण के अनुसार कार्यपालिका और विधायिका का परस्पर कोई संबंध नहीं रखा।

(3) न्यायपालिका- फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने देश में प्रचलित प्राचीन न्याय-व्यवस्था के स्थान पर नए केन्द्रीय एवं स्थानीय न्यायालयों का निर्माण किया। इन न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए सक्रिय न्यायाधीशों द्वारा निर्वाचन की व्यवस्था की गयी। मुद्रायुक्त पत्रों का चलन अवरुद्ध कर दिया गया (UPBoardSolutions.com) और जूरी द्वारा मुकदमे पर विचार करने की व्यवस्था की गयी।

प्रश्न 4.
पुरुष एवं नागरिक घोषणा-पत्र के प्रमुख बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. मनुष्य स्वतंत्र पैदा होते हैं, स्वतंत्र रहते हैं जो और उनके अधिकार समान होते हैं।
  2. कानून सम्मत प्रक्रिया के बाहर किसी व्यक्ति को न तो दोषी ठहराया जा सकता है और न ही गिरफ्तार या नजरबंद किया जा सकता है।
  3. स्वतंत्रता का आशय ऐसे काम करने की शक्ति से है जो औरों के लिए नुकसानदेह न हो।
  4. समाज के लिए किसी भी हानिकारक कृत्य पर पाबंदी लगाने का अधिकार कानून के पास है।
  5. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।
  6. प्रत्येक नागरिक बोलने, लिखने और छापने के लिए आजाद है। लेकिन कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ऐसी स्वतंत्रता के दुरुपयोग की जिम्मेदारी भी उसी की होगी।
  7. सार्वजनिक सेना तथा प्रशासन के खर्चे चलाने के लिए एक सामान्य कर लगाना अपरिहार्य था। सभी नागरिकों पर उनकी आय के अनुसार समान रूप से कर लगाया जाना चाहिए।
  8. चूँकि सम्पत्ति का अधिकार एक पावन एवं अनुलंघनीय अधिकार है, अतः किसी भी व्यक्ति को इससे वंचित नहीं किया जा सकता है, जब तक कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक आवश्यकता के लिए संपत्ति का अधिग्रहण करना आवश्यक न हो। ऐसे मामले में अग्रिम मुआवजा जरूर दिया जाना चाहिए।
  9. प्रत्येक राजनीतिक संगठन का लक्ष्य आदमी के नैसर्गिक एवं अहरणीय अधिकारों को संरक्षित रखना है। ये अधिकार हैं—स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा एवं शोषण के प्रतिरोध का अधिकार।
  10. समग्र सम्प्रभुता का स्रोत राज्य में निहित है; कोई भी समूह या व्यक्ति ऐसा अनधिकार प्रयोग नहीं करेगा जिसे जनता की सत्ता की स्वीकृति न मिली हो।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
फ्रांस में राजतंत्र का अन्त एवं गणतन्त्र की स्थापना किस प्रकार हुई?
उत्तर:
1791 ई. में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने संविधान का पूर्ण प्रपत्र तैयार किया। संविधान द्वारा राजा के अधिकार सीमित करते हुए शासन की शक्तियाँ विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में वितरित की गयीं। इस प्रकार फ्रांस को संवैधानिक राजतंत्र में रूपांतरित किया गया। संविधान का प्रारम्भ (UPBoardSolutions.com) पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा के साथ हुआ जिन्हें नैसर्गिक एवं अहरणीय रूप में स्थापित किया गया जिन्हें कोई नहीं छीन सकता था। यह सरकार का कर्तव्य था कि वह प्रत्येक नागरिक के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करे।

यद्यपि लुई सोलहवें ने संविधान पर हस्ताक्षर कर दिए थे बथापि उसने प्रशा के राजा से गुप्त समझौता कर लिया। इससे पहले कि लुई सोलहवाँ सन् 1789 की गर्मियों से चली आ रही घटनाओं को दबाने की अपनी योजनाओं पर अमल कर पाता, राष्ट्रीय सभा ने प्रशा एवं ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का प्रस्ताव पारित कर दिया। जनसंख्या के बड़े वर्गों का यह विश्वास था कि क्रांति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता थी क्योंकि 1791 ई. के संविधान ने धनी वर्ग को ही राजनैतिक अधिकार प्रदान किए थे।

राजनैतिक क्लब उन लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण बैठक स्थल बन गए जो सरकार की नीतियों पर चर्चा करना चाहते थे और अपनी रणनीति की योजना बनाई जाती थी। इनमें से एक जैकोबिन क्लब था। जैकोबिन क्लब के सदस्य मुख्यतः समाज के कम समृद्ध वर्ग से सम्बन्ध रखते थे जैसे कि छोटे दुकानदार, कारीगर, जूते बनाने वाले, पेस्ट्री बनाने वाले, घड़ीसाज, छपाई करने वाले, नौकर तथा दैनिक (UPBoardSolutions.com) मजदूर आदि। उनके नेता का नाम मैक्समिलियन रोब्सपियर था। इन जैकोबिन लोगों को सौं कुलॉत के नाम से जाना जाने लगा। सौं कुलॉत लोग इसके अतिरिक्त एक लाल टोपी भी पहनते थे जो आजादी का प्रतीक थी।

1792 ई. की गर्मियों में जैकोबिन लोगों ने प्रशा के विरुद्ध विद्रोह की योजना बनाई जो कि कम आपूर्ति एवं खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों से गुस्साए हुए थे। 10 अगस्त की सुबह उन्होंने ट्यूलेरिए के महल पर आक्रमण कर दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला और स्वयं राजा को घण्टों तक बंधक बनाए रखा। बाद में सभा ने शाही परिवार को जेल में डाल देने का प्रस्ताव पारित किया। चुनाव कराए गए तथा तब से 21 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी पुरुष, चाहे उनके पास संपत्ति हो या नहीं, सभी को वोट डालने का अधिकार मिल गया।

फ्रांस में नवनिर्वाचित सभा को कन्वेंशन नाम दिया गया। 21 सितम्बर, 1792 ई. को फ्रांस गणतन्त्र घोषित कर दिया गया। इसी के साथ फ्रांस में वंशानुगत राजतंत्र का अन्त हो गया। (UPBoardSolutions.com) न्यायालय ने राजद्रोह के आरोप में लुई सोलहवें कों मृत्युदण्ड की सजा सुनाई। प्लेस डी ला कन्कोर्ड में 21 जनवरी, 1793 ई. को लुई सोलहवें को फाँसी दे दी गयी और इसके बाद रानी मैरी इंटोइनेट को भी फाँसी दे दी गयी।

प्रश्न 6.
ओलिम्प डि गॉजेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित मूल अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ओलिम्प डि गाँजेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित मूल अधिकारों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिकों का या तो व्यक्तिगत रूप से
    या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि-निर्माण में दखल होना चाहिए। यह सभी के लिए समान होना चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिक अपनी योग्यता एवं प्रतिभा के बल पर समान रूप से एवं बिना किसी भेदभाव के हर तरह के सम्मान वे सार्वजनिक पद के हकदार हैं।
  2. कोई भी महिला अपवाद नहीं है। वह विधिसम्मत प्रक्रिया द्वारा अपराधी ठहराई जा सकती है, गिरफ्तार और नजरबंद की जा सकती है। पुरुषों की तरह महिलाएँ भी इस कठोर कानून का पालन करें।
  3. औरत जन्मना स्वतंत्र है और अधिकारों में पुरुष के समान है।
  4. सभी राजनीतिक संगठनों का लक्ष्य पुरुष एवं महिला के नैसर्गिक अधिकारों को संरक्षित करना है। ये अधिकार हैं स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और सबसे बढ़कर शोषण के प्रतिरोध का अधिकार।
  5. समग्र संप्रभुता का स्रोत राष्ट्र में निहित है जो पुरुषों एवं महिलाओं के संघ के सिवाय कुछ नहीं है।

प्रश्न 7.
फ्रांस की क्रान्ति के बाद महिलाओं की स्थिति में आए परिवर्तनों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस की क्रान्ति के बाद महिलाओं की स्थिति में निम्न परिवर्तन घटित हुए-
(i) फ्रांस में आतंक के राज के दौरान देश में सक्रिय महिला अधिकारों के प्रति चेतना का प्रसार करने वाले क्लबों को | बन्द कर दिया गया। साथ ही महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया गया। अनेक राजनीतिक रूप से सक्रिय महिलाओं को बन्दी बनाया गया तथा उनमें से कुछ को मृत्युदण्ड दे दिया गया।

(ii) मताधिकार और समान वेतन के लिए महिलाओं का आंदोलन अगली सदी में भी अनेक देशों में चलता रहा।
मताधिकार का संघर्ष उन्नीसवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी के प्रारंभ तक अंतर्राष्ट्रीय मताधिकार आंदोलन के जरिए जारी रहा। क्रांतिकारी आंदोलन के दौरान फ्रांसीसी महिलाओं की (UPBoardSolutions.com) राजनीतिक सरगर्मियों को प्रेरक स्मृति के रूप में जिंदा रखा गया। अंततः सन् 1946 में फ्रांस की महिलाओं ने मताधिकार हासिल कर लिया।

(iii) फ्रांस की क्रांति के काल में ही महिलाओं ने अपने अधिकारों की माँग को लेकर अनेक महिला राजनीतिक क्लबों की स्थापना आरम्भ कर दी थी। ‘द सोसाइटी ऑफ रेवलूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन’ सबसे मशहूर क्लब था। उनकी एक प्रमुख माँग यह थी कि महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। महिलाएँ इस बात से निराश हुईं कि 17 ई. के संविधान में उन्हें निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया था। महिलाओं ने मताधिकार, असेंबली के लिए चुने जाने तथा राजनीतिक पदों की माँग रखी। उनका
मानना था कि तभी नई सरकार में उनके हितों का प्रतिनिधित्व हो पाएगा।

(iv) प्रारम्भिक वर्षों में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार लाने वाले कुछ कानून लागू किए। सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे। शादी को स्वैच्छिक अनुबन्ध माना गया और नागरिक कानूनों के तहत उनका पंजीकरण किया जाने लगा। (UPBoardSolutions.com) तलाक को कानूनी रूप दे दिया गया और मर्द-औरत दोनों को ही इसकी अर्जी देने का अधिकार दिया गया। अब महिलाएँ व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकती थीं, कलाकार
बन सकती थीं और छोटे-छोटे व्यवसाय चला सकती थीं।

प्रश्न 8.
फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए प्रथम एस्टेट का उत्तरदायित्व सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस में प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग को शामिल किया जाता था। इस वर्ग में एक लाख तीस हजार के लगभग पादरी थे और इनका देश की 10 प्रतिशत भूमि पर नियंत्रण था। चर्च भी किसानों से टाइद (धार्मिक कर) नामक कर वसूलता था। इन्हें सरकारी करों से मुक्ति प्राप्त थी। साथ ही चर्च राज्य को दिए जाने वाले पंचवर्षीय अनुदान के द्वारा सरकार पर वित्तीय दबाव डालने की स्थिति में थे। फ्रांस की शिक्षा पद्धति, प्रचार के साधन तथा नैतिक व अनैतिक में अन्तर करने का अधिकार भी उन्हीं के हाथ में था।

फ्रांस का चर्च 18वीं सदी में बहुत अधिक बदनाम तथा अलोकप्रिय हो गया था। इस अलोकप्रियता के कारण पादरियों के व्यक्तिगत चरित्र, एवं जीवन से कम तथा तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों से अधिक संबद्ध थे। व्यक्तिगत तौर पर आम पादरी का आचरण अपने युग के अनुकूल ही था, उससे बुरा नहीं। लोगों की नजरों में खटकने वाली बात तो यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक (UPBoardSolutions.com) कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे। चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस, विशेषकर उसके नगरों तथा मध्यम-वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव में ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दोनों ही विवाद का विषय बन गए थे।

एक दूसरा कारण चर्च के सामंतीय अधिकार तथा उनका कठोरता के साथ लागू किया जाना था, जिसके कारण किसानों में उसके विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होता रहा। अन्त में पादरीवर्ग के अन्दर ही एकता को अभाव था। चर्च के उच्च पदों पर कुलीन-वर्ग के वंशजों का एकाधिकार था और इससे छोटे पादरियों में असंतोष बढ़ा तथा वे चर्च के प्रजातंत्रीय स्वरूप की स्थापना हेतु उत्सुक हो रहे थे।

प्रश्न 9.
फ्रांस का मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से क्यों असन्तुष्ट था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
तत्कालीन फ्रांस के मध्यम वर्ग में लेखक, डॉक्टर, वकील, जज, अध्यापक और असैनिक अधिकारी जैसे शिक्षित व्यक्ति तथा व्यापारी, बैंकर और कारखाने वाले धनी व्यक्ति सम्मिलित थे। समाज में इस वर्ग का आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व था। मध्यम वर्ग उन लोगों का अग्रगामी था, जिन्होंने 19वीं सदी में आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से निम्न कारणों से असन्तुष्ट था-

(i) कुलीन-वर्ग के साथ ही तत्कालीन शासन-पद्धति से भी मध्यम-वर्ग के औद्योगिक एवं व्यावसायिक अंग को शिकायत थी। समाज का यह वर्ग मात्र एक उद्देश्य लेकर चल रहा था–भौतिक सम्पत्ति की वृद्धि; किन्तु तत्कालीन शासन उसके इस उद्देश्य की पूर्ति में अपनी गलत नीतियों के कारण बाधक सिद्ध हो रहा था।

(ii) मध्यम-वर्ग का बुद्धिजीवी भाग आदर्श भावना से भी प्रेरित था। यह आदर्श था विवेक एवं बुद्धि पर आधारित समाज की संरचना जिसमें सभी कुछ तर्कसंगत हो।

(iii) इतिहास में व्यापारियों-उद्योगपतियों के ये समूह बिलकुल नए थे, किन्तु अमेरिका के फ्रांसीसी उपनिवेशों से व्यापार करने के कारण ये बहुत धनी हो गए थे और इनका महत्त्व बहुत बढ़ गया था। इनमें से कुछ ने जमीन खरीद ली थी और उनके पास बड़ी-बड़ी जमींदारियाँ हो गई थीं। इन व्यक्तियों के पास पर्याप्त धन था, इसलिए राज्य, पादरी और अभिजात-वर्ग सभी इनके ऋणी थे।

सामाजिक दृष्टि से वह स्तर पर आधारित श्रेणीबद्ध समाज के विरोधी न होकर समर्थक ही थे और उनकी महत्त्वाकांक्षा थी कि सामाजिक सीढ़ी की ऊँची पदान पर उन्हें स्थान मिले किन्तु रक्त के आधार पर श्रेणीबद्ध फ्रेंच समाज में कुलीन-वर्ग ने उस स्थान से उन्हें वंचित कर रखा था। इस प्रकार 18वीं शताब्दी का फ्रेंच बुर्जुआ (मध्यम-वर्ग) अपने को एक अजीब स्थिति में पाता था। उसके पास धन था, उसके पास (UPBoardSolutions.com) योग्यता थी किन्तु इस धन और योग्यता के अनुरूप समाज में प्रतिष्ठा नहीं थी, सरकारी पद नहीं थे। इस विषमता को तभी दूर किया जा सकता था जब सामंतीय समाज के ढाँचे को नष्ट कर दिया जाए।

UP Board Solutions

प्रश्न 10.
क्रांति से पहले की फ्रांस की आर्थिक स्थिति का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
क्रान्ति ( 1789 ) से पहले फ्रांस की आर्थिक स्थिति- फ्रांस की आर्थिक स्थिति अत्यन्त कठिन दौर से गुजर रही थी, ऐसे में सरकार की फिजूलखर्ची ने दशा को और भी शोचनीय बना दिया। उस समय फ्रांस में कर दो प्रकार के थेप्रत्यक्ष और परोक्ष। प्रत्यक्ष कर (टाइल) जायदाद, व्यक्तिगत संपत्ति तथा आय पर लिए जाते थे। कुलीन वर्ग और पादरी इनमें से कुछ करों से तो बिल्कुल मुक्त थे और शेष करों से प्रायः मुक्त थे, क्योंकि कर निर्धारण करने वाले राज्य-कर्मचारी डरकर उन पर नाममात्र का कर लगाया करते थे। उसकी सारी कमी शेष जनता पर कर लगाकर पूरी की जाती थी और इस प्रकार उस पर करों का अत्यधिक भार था। कुलीन-वर्ग और पादरी भी सम्पन्न थे, रुपये में तीन आने भी कर नहीं देते थे जबकि मध्यमवर्ग के व्यक्ति से प्रायः दस गुना कर वसूल लिया जाता था। परोक्ष करों में मुख्य रूप से नमक, शराब, तंबाकू आदि पर लिए जाने वाले कर थे।

दूषित कर-व्यवस्था के फलस्वरूप राज्य जनता की सम्पत्ति का राष्ट्रीय कामों के लिए उपयोग नहीं कर सकता था। उसकी वाणिज्य-नीति भी ऐसी थी जिसमें राज्य में सम्पत्ति की उत्पत्ति भी पूरी तरह न हो पाती थी। फ्रेंच व्यापार अभी पूरी तरह से उन्नति नहीं कर पाया था। इस दोषपूर्ण अर्थ-व्यवस्था का परिणाम यह निकला कि राज्य का व्यय सदैव ही उसकी आय से अधिक रहा था तथा इस घाटे की पूर्ति हेतु सरकार को ऋण का आश्रय लेना पड़ा। अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों के स्वतंत्रता-संग्राम में भाग लेने के सरकारी निर्णय ने स्थिति को (UPBoardSolutions.com) और अधिक गंभीर बना दिया। अगर इस संघर्ष में सम्मिलित होने के समय को फ्रांस सरकार के संकट का प्रारम्भ-बिन्दु माना जाए तो अत्युक्ति न होगी। इस संघर्ष की सफल समाप्ति ने फ्रांस में स्वतंत्रता की भावना को बल ही प्रदान नहीं किया अपितु उसका आर्थिक भार सरकार के लिए एक असह्य बोझ सिद्ध हुआ जिसे सम्हाल न सकने के कारण वह टूटकर बिखर गई।

Hope given UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 are helpful to complete your homework.

If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you.

UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 6 जनसंख्या

UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 6 जनसंख्या

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 6 जनसंख्या.

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए चार विकल्पों में सही विकल्प चुनिए-
(i) निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में प्रवास, आबादी की संख्या, वितरण एवं संरचना में परिवर्तन लाता है?
(क) प्रस्थान करने वाले क्षेत्र में
(ख) आगमन वाले क्षेत्र में
(ग) प्रस्थान एवं आगमन दोनों क्षेत्रों में
(घ) इनमें से कोई नहीं

UP Board Solutions

(ii) जनसंख्या में बच्चों का एक बहुत बड़ा अनुपात निम्नलिखित में से किसका परिणाम है?
(क) उच्च जन्मदर
(ख) उच्च मृत्युदर
(ग) उच्च जीवनदर
(घ) अधिक विवाहित जोड़े

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा एक जनसंख्या वृद्धि का परिणाम दर्शाता है?
(क) एक क्षेत्र की कुल जनसंख्या
(ख) प्रत्येक वर्ष लोगों की संख्या में होने वाली वृद्धि,
(ग) जनसंख्या वृद्धि की दर
(घ) प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या

(iv) 2001 की जनगणना के अनुसार एक साक्षर’ व्यक्ति वह है
(क) जो अपने नाम को पढ़ एवं लिख सकता है।
(ख) जो किसी भी भाषा में पढ़ एवं लिख सकता है।
(ग) जिसकी उम्र 7 वर्ष है तथा वह किसी भी भाषा को समझ के साथ पढ़ एवं लिख सकता है।
(घ) जो पढ़ना-लिखना एवं अंकगणित, तीनों जानता है।
उत्तर:
(i) (ग) प्रस्थान एवं आगमन दोनों क्षेत्र में
(ii) (क) उच्च जन्म दर
(iii) (ग) जनसंख्या वृद्धि की दर
(iv) (ग) जिसकी उम्र 7 साल, किसी भाषा को समझना, पढ़ना तथा लिखना।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित के उत्तर संक्षेप में दें-

  1. जनसंख्या वृद्धि के महत्त्वपूर्ण घटकों की व्याख्या करें।
  2. 1981 से भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर क्यों घट रही है?
  3. आयु संरचना, जन्मदर एवं मृत्युदर को परिभाषित करें।
  4. प्रवास, जनसंख्या परिवर्तन का एक कारक।

उत्तर:
(1) जनसंख्या वृद्धि के महत्त्वपूर्ण घटक इस प्रकार हैं-

  1. उच्च जन्म दर,
  2. निम्न मृत्यु दर,
  3. प्रवसन।

(2) 1981 के बाद भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी के कारण निम्नलिखित हैं-

  1. परिवार कल्याण विधियों का अपनाया जाना,
  2. स्वास्थ्य के प्रति महिलाओं की अधिक जागरूकता,
  3. महिलाओं में शिक्षा का तेज गति से प्रसार,
  4. सरकारी

(3) आयु संरचना-किसी देश में जनसंख्या की आयु संरचना वहाँ के विभिन्न आयु समूहों के लोगों की संख्या को बताता है। यह जनसंख्या की मूल आवश्यकताओं में से एक है। जन्मदर-एक वर्ष के दौरान 1000 लोगों पर जीवित पैदा हुए बच्चों की संख्या को जन्मदर कहते हैं। मृत्युदर-एक वर्ष की अवधि में 1000 लोगों पर मृत व्यक्तियों की संख्या को मृत्युदर कहते हैं।

(4) प्रवास, जनसंख्या परिवर्तन का एक कारक है लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाने को प्रवास कहते हैं। जनसंख्या वितरण एवं उसके घटकों को परिवर्तित करने में प्रवास की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि यह आगमन तथा प्रस्थान दोनों ही स्थानों के जनसांख्यिकीय आँकड़ों को प्रभावित (UPBoardSolutions.com) करता है। प्रवास आंतरिक (देश के भीतर) या अंतर्राष्ट्रीय (देशों के बीच) हो सकता है। आंतरिक प्रवास जनसंख्या के आकार में परिवर्तन नहीं करता लेकिन देश में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करता है।

  1. प्रवास जनसंख्या के गठन एवं वितरण में बदलाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  2. भारत में अधिकतर प्रवास ग्रामीण क्षेत्रों से ‘अपकर्षण’ कारक प्रभावी होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी एवं बेरोजगारी की प्रतिकूल अवस्थाएँ हैं तथा नगर का ‘कर्षण’ प्रभाव रोजगार में वृद्धि एवं अच्छे जीवन स्तर को दर्शाता है। 1951 में शहरी जनसंख्या 17.29 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 31.2 प्रतिशत हो गई।
  3. 2001-2011 के बीच एक ही दशक के दौरान ‘‘दस लाख से अधिक की जनसंख्या वाले महानगर 35 से बढ़कर 53 हो गए हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या परिवर्तन के बीच अंतर स्पष्ट करें?
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या परिवर्तन के बीच निम्नलिखित अंतर हैं-

जनसंख्या वृद्धि

जनसंख्या परिवर्तन

 1. जनसंख्या वृद्धि से तात्पर्य किसी क्षेत्र में निश्चित अवधि के दौरान रहने वाले लोगों की संख्या में  परिवर्तन है। 1. जनसंख्या परिवर्तन से आशय किसी क्षेत्र में निश्चित अवधि के दौरान जनसंख्या वितरण, संरचना या आकार में परिवर्तन से है।
2. इसमें पिछली जनसंख्या को बाद की जनसंख्या से घटाकर ज्ञात किया जाता है। 2. जनसंख्या परिवर्तन तीन प्रक्रियाओं के आपसी संयोजन के कारण आता है- जन्मदर, मृत्युदर और प्रवास।
 3. वृद्धि को संख्या के रूप में प्रकट किया जाता है। 3. जनसंख्या परिवर्तन सापेक्ष वृद्धि और प्रतिवर्ष होने वाले प्रतिशत परिवर्तन के द्वारा देखा जाता है।

प्रश्न 4.
व्यावसायिक संरचना एवं विकास के बीच क्या संबंध है?
उत्तर:
व्यावसायिक संरचना एवं विकास के बीच सम्बन्ध–मुख्य रूप से व्यवसायों को तीन वर्गों में रखा जाता है-प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक व्यवसाय। प्राथमिक व्यवसाय कृषि आदि से संबंधित हैं, द्वितीयक व्यवसाय निर्माण उद्योगों से संबंधित है तथा तृतीयक व्यवसाय सेवाओं से सम्बन्धित होते हैं। विकसित एवं विकासशील देशों में द्वितीयक एवं तृतीयक व्यवसायों में कार्य करने वाले लोगों का अनुपात अधिक (UPBoardSolutions.com) होता है। विकासशील देशों में प्राथमिक क्रियाकलापों में कार्यरत लोगों का अनुपात अधिक होता है। भारत में कुल जनसंख्या का 64 प्रतिशत भाग केवल कृषि कार्य करता है। द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की संख्या का अनुपात क्रमशः 13 तथा 20 प्रतिशत है। वर्तमान समय में बढ़ते हुए औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में वृद्धि होने के कारण

द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में व्यावसायिक परिवर्तन हुआ है।
विकास के लिए जनसंख्या का स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है।
इस प्रकार स्वस्थ जनसंख्या निम्नलिखित रूप से लाभकारी हो सकती है-

  1. बीमारियों पर कम खर्च होता है। इसके अतिरिक्त धन को विकास कार्यों में लगाया जाता है।
  2. विकास की गति तीव्र होती है।
  3. सरकार को अधिक स्वास्थ्य सेवाएँ बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती।
  4. लोगों में स्वस्थ वातावरण का संचार होता है।
  5. स्वस्थ जनसंख्या अधिक समय तक काम करती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है।
  6. स्वस्थ जनसंख्या में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।
  7. हृष्ट-पुष्ट नागरिक उत्पन्न होते हैं।
  8. अधिक तेज तथा अधिक कार्यक्षम होते हैं।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति वर्ष 2004 में घोषित की गयी।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1.  किशोर-किशोरियों को असुरक्षित यौन संबंधों के कुप्रभावों/कुपरिणामों के बारे में जागरूक करना।
  2. गर्भनिरोधक सेवाओं को पहुँच और खरीद के दायरे के भीतर रखना।
  3. खाद्य संपूरक को पोषणिक सेवाएँ उपलब्ध कराना।
  4. बाल विवाह को रोकने के कानून को और अधिक कारगर बनाना।
  5. शिक्षा और स्वास्थ्य की शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार करना।
  6. किशोर-किशोरियों की पहचान जनसंख्या के उस भाग के रूप में करें जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
  7. इनकी पोषणिक आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना।।
  8. अवांछित गर्भधारण तथा यौन संबंधों से होने वाली बीमारियों से किशोर-किशोरियों की सुरक्षा करना।
  9. किशोर-किशोरियों की अन्य आवश्यकताओं के प्रति विशेष ध्यान देना।
  10. देर से विवाह और देर से संतानोत्पत्ति को प्रोत्साहित करना।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
एक प्रश्नावली बनाकर कक्षा की जनगणना कीजिए। प्रश्नावली में कम-से-कम पाँच प्रश्न होने चाहिए। ये प्रश्न विद्यार्थियों के परिवारजनों, कक्षा में उनकी उपलब्धि, उनके स्वास्थ्य आदि से संबंधित हों। प्रत्येक विद्यार्थी को वह प्रश्नावली भरनी चाहिए। बाद में सूचना को संख्याओं में (प्रतिशत में) संग्रहीत कीजिए। इस सूचना को वृत्त-रेखा, दंड-आरेख या अन्य किसी प्रकार से प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
स्वयं करें।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंख्या का अध्ययन करना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
किसी देश की जनसंख्या ही उस देश के संसाधनों का विकास करती है और उनका उपभोग करती है। ऐसे में किसी देश के लोगों की संख्या, उनका वितरण एवं विकास तथा गुणवत्ता पर्यावरण को समझने का मूलभूत आधार है। इसलिए जनसंख्या का अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण है।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
अरुणाचल प्रदेश का जनघनत्व कम क्यों है?
उत्तर:
अरुणाचल प्रदेश एक पर्वतीय क्षेत्र है। यहाँ की जलवायु ठण्डी है। यहाँ कृषि तथा उद्योग भी विकसित नहीं है। इसीलिए यहाँ का जनघनत्व कम है।

प्रश्न 3.
भारत में किस राज्य की साक्षरता सबसे अधिक है?
उत्तर:
भारत में केरल राज्य की साक्षरता सबसे अधिक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार केरल राज्य की साक्षरता दर 94.0% है।

प्रश्न 4.
भारत के अति सघन आबादी वाले दो भागों के नाम बताइए। इनमें सघन जनसंख्या होने के दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारत में ऊपरी गंगाघाटी तथा मालाबार क्षेत्र में अति सघन जनसंख्या है।
सघन जनसंख्या के दो कारण इस प्रकार हैं-

  1.  इन प्रदेशों में उद्योगों का अत्यधिक विकास हुआ है।
  2. इन प्रदेशों की भूमि उपजाऊ है।

प्रश्न 5.
लिंगानुपात (स्त्री-पुरुष) से क्या आशय है?
उत्तर:
स्त्री-पुरुष के बीच जनसंख्या के संख्यात्मक अनुपात को स्त्री-पुरुष अनुपात कहते हैं। इसे प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या के रूप में व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 6.
मृत्यु-दर के तेजी से घटने के दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. मृत्यु-दर के तेजी से घटने का मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवाओं का प्रसार है।
  2. शिक्षा के प्रसार से भी मृत्यु-दर में अत्यधिक कमी आयी है।

UP Board Solutions

प्रश्न 7.
भारत में जनसंख्या वृद्धि के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या वृद्धि के दो मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

  1. चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार के कारण मृत्यु-दर में तो कमी आयी है, लेकिन जन्म-दर में आशा के अनुरूप कमी नहीं आ पाई है।
  2. भारत में अधिकतर लोग निर्धन एवं अनपढ़ हैं। वे छोटे परिवारों के महत्त्व को नहीं समझते हैं। वे सन्तान को ईश्वर की कृपा समझकर गर्भ-निरोध का प्रयास नहीं करते हैं।

प्रश्न 8.
जनसंख्या घनत्व का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी देश-प्रदेश के प्रति एक वर्ग किलोमीटर में रहने वाले लोगों की औसत जनसंख्या को जनसंख्या घनत्व कहते हैं। इसे व्यक्ति प्रति वर्ग किमी में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 9.
भारत की लगभग आधी आबादी कितने राज्यों में निवास करती है?
उत्तर:
भारत की लगभग आधी जनसंख्या इन पाँच राज्यों में निवास करती है-उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं आंध्र प्रदेश।

प्रश्न 10.
प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्रियाकलापों के अंतर्गत कौन-कौन से व्यवसाय सम्मिलित हैं?
उत्तर:
प्राथमिक क्षेत्र के अंतर्गत कृषि, पशुपालन, वृक्षारोपण एवं मछली पालन तथा खनन आदि क्रियाएँ शामिल हैं। द्वितीयक क्रियाकलापों में उत्पादन करने वाले उद्योग, भवन एवं निर्माण कार्य आते हैं। तृतीयक क्रियाकलापों में परिवहन, संचार, वाणिज्य, प्रशासन तथा सेवाएँ शामिल हैं।

प्रश्न 11.
भारत सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के क्या उपाय अपनाए गए हैं?
उत्तर:
भारत सरकार ने 1952 में एक व्यापक परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रारंभ किया। 1975 में इंदिरा कांग्रेस सरकार ने परिवार नियोजन कार्यक्रम तथा 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने इसे परिवार कल्याण कार्यक्रम नाम रख दिया। परिवार कल्याण कार्यक्रम जिम्मेदार तथा सुनियोजित पितृत्व को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 कई वर्षों के नियोजित प्रयासों का परिणाम है।

प्रश्न 12.
भारत की जनसंख्या का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्षण बताइए।
उत्तर:
भारत की जनसंख्या का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्षण इसकी किशोर जनसंख्या का आकार है। यह भारत की कुल जनसंख्या का पाँचवाँ भाग है। किशोर प्रायः 10 से 19 वर्ष की आयु वर्ग के होते हैं। ये भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन हैं।

प्रश्न 13.
जनसंख्या की सापेक्ष एवं निरपेक्ष वृद्धि किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी विशेष समय के अंतराल में जैसे 10 वर्षों के भीतर, किसी देश/राज्य के निवासियों की संख्या में परिवर्तन सापेक्ष वृद्धि कहलाता है। पहले की जनसंख्या (UPBoardSolutions.com) जैसे 2001 की जनसंख्या को बाद की जनसंख्या जैसे 2011 की जनसंख्या से घटाकर इसे प्राप्त किया जाता है। इसे निरपेक्ष वृद्धि कहा जाता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 14.
आश्रित जनसंख्या के अंतर्गत किन-किन आयु वर्ग के लोगों को सम्मिलित किया जाता है?
उत्तर:
आश्रित जनसंख्या के अंतर्गत बच्चों तथा वृद्ध जिनकी आयु क्रमशः 15 वर्ष से कम और 59 वर्ष से अधिक है, आयु वर्ग के लोग सम्मिलित होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण जनसंख्या और नगरीय जनसंख्या में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या और नगरीय जनसंख्या में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-

नगरीय जनसंख्या

ग्रामीण जनसंख्या

1. भारत की नगरीय जनसंख्या 37.7 करोड़ है, लेकिन 35 महानगरों में 27% से अधिक नगरीय जनसंख्या रहती है। 1. ग्रामीण जनसंख्या 83.32 करोड़ है। इसका बहुत छोटा भाग गौण व तृतीयक व्यवसाय में लगा है।
2. नगरीय जनसंख्या को सर्वाधिक सुविधाएँ सुलभ हैं। 2. ग्रामीण जनसंख्या को सार्वजनिक सेवाएँ बहुत कम सुलभ हैं।
3. नगरीय जनसंख्या का जीवन स्तर सामान्यतः उच्च पाया जाता है। 3. ग्रामीण जनसंख्या का जीवन स्तर सामान्यतः निम्न पाया जाता है।
4. देश की लगभग 31.2% जनसंख्या नगरों में रहती  है। 4. भारत गाँवों का देश है। देश की लगभग 68.8% जनसंख्या गाँवों में रहती है।
 5. नगरीय जनसंख्या का 65 प्रतिशत भाग प्रथम श्रेणी के नगरों में रहता है। प्रथम श्रेणी के नगरों की संख्या 2929 है। 5. ग्रामीण जनसंख्या अधिकतर प्राथमिक व्यवसाय में लगी होती है। जैसे कृषि करना, लकड़ी काटना, मछली पकड़ना,  पशु-पालन, खनन आदि।

प्रश्न 2.
जन्म-दर और वृद्धि-दर में अंतर कीजिए।
उत्तर:
जन्म-दर और वृद्धि-दर में निम्नलिखित अन्तर हैं-

वृद्धि -दर

जन्म-दर

1. विकासशील देशों में वृद्धिदर सामान्य से अधिक है। विकसित देशों में वृद्धि-दर 1 प्रतिशत से कम है । 1. विकसित देशों में जन्म-दर कम होती है और विकासशील देशों में जन्म-दर अधिक होती है।
2. उच्च-वृद्धिदर से प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ता है। 2. उच्च जन्मदर पिछड़ेपन का प्रतीक बन गई है।
3. जन्म-दर और मृत्यु-दर के अंतर को वृद्धि दर कहते हैं। 3. किसी देश या क्षेत्र में वर्ष के मध्य जीवित जन्मे बच्चों की  संख्या को जन्म-दर कहते हैं।
4. वृद्धिदर को प्रतिशत में व्यक्त करते हैं। 4. जन्मदरे प्रति हजार में व्यक्त की जाती है।
 5. आजकल भारत की प्राकृतिक वार्षिक वृद्धि दर 21.3 प्रतिशत है। 5. भारत में जन्म दर 26.1 व्यक्ति प्रति हजार है।

प्रश्न 3.
भारत के मैदानी भागों में सघन आबादी पाए जाने के कारण बताइए।
उत्तर:
भारत के मैदानी भागों में सघन जनसंख्या पाए जाने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

  1. समतल मैदान,
  2. उपजाऊ मिट्टी,
  3. पर्याप्त मात्रा में वर्षा,
  4. सिंचाई के विकसित साधन,
  5. परिवहन के विकसित साधन,
  6. उद्योग एवं कृषि का विकास।

प्रश्न 4.
भारत में राज्यवार जनसंख्या वितरण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 19.981 करोड़ है। यहाँ भारत की कुल जनसंख्या का 16.51 प्रतिशत निवास करते हैं।
भारत की सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम है तथा लक्षद्वीप केन्द्रशासित प्रदेशों में सबसे कम जनसंख्या वाला क्षेत्र है। सिक्किम की जनसंख्या 6 लाख, 10 हजार है जबकि लक्षद्वीप में जनसंख्या 64,429 है। भारत की जनसंख्या का लगभग 50 प्रतिशत भाग निम्नलिखित पाँच राज्यों में निवास करता है।

  1. उत्तर प्रदेश             16.51%
  2. महाराष्ट्र                    9.28%
  3. बिहार                      8.60%
  4. पश्चिम बंगाल            7.54%
  5. आंध्र प्रदेश              6.99%.

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
नगरों में बढ़ती हुई जनसंख्या ने न केवल नगरीय केन्द्रों में समस्याएँ पैदा की हैं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। प्रत्येक के विषय में दो बिन्दु स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण नगरीय केन्द्रों में उत्पन्न समस्यायें इस प्रकार हैं-

  1. लोगों के नैतिक मूल्यों में परिवर्तन और गिरावट।
  2. चोरबाजारी, कालाबाजारी, रिश्वत तथा लूट-पाट का बोलबाला।।
  3. नगरों के संसाधनों तथा जन सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ता है।
  4. आवश्यक वस्तुओं की कमी तथा उनके मूल्यों में आशातीत वृद्धि।
  5. वस्तुओं की गुणवत्ता में गिरावट आना।

(ख) नगरीय जनसंख्या में वृद्धि का ग्रामीण क्षेत्रों पर प्रभाव इस प्रकार है-

  1. रोजगार की खोज में लोगों को ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्रों की ओर पलायन करना।
  2. भूमिहीन किसानों की निर्धनता में वृद्धि। 3. कृषि जोतों का अलाभकारी होना तथा छोटे किसानों के गाँव में बेकार हो जाने से उनका नगरों में जाकर मजदूरी करना।

प्रश्न 6.
भारत में भूमि की उर्वरता जनसंख्या वितरण को किस प्रकार प्रभावित करती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व का दूसरा बड़ा देश है। यहाँ की जनसंख्या वितरण बहुत असमान है। सामान्यतः जनसंख्या का वितरण भूमि की उर्वरता के अनुरूप पाया जाता है। जिन क्षेत्रों में मिट्टी अधिक उपजाऊ पाई जाती है, वहाँ जनसंख्या की सघनता अधिक मिलती है और जिन क्षेत्रों में मिट्टी कम उपजाऊ होती है, वहाँ जनसंख्या कम पाई जाती है। भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि और मिट्टी का सीधा संबंध है। हमारे भरण-पोषण की अधिकांश सामग्री प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से ही मिलती है।

उदाहरण के लिए उत्तरी मैदान, पूर्व तटीय मैदान, पश्चिम तटीय मैदान, डेल्टाई मैदान एवं घाटी प्रदेश सघन आबादी वाले हैं। यदि इन प्रदेशों का भी अवलोकन करें तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक प्रदेश में जनसंख्या का वितरण संभव नहीं है। उत्तरी मैदान में जनसंख्या पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है। हरियाणा राज्य पश्चिमी बंगाल की तुलना में कम सघन है। पश्चिमी बंगाल की मृदा बहुत उर्वरक है। पर्वतीय (UPBoardSolutions.com) प्रदेश में मिट्टी की परत पतली होती है। इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मिट्टी की परत मोटी और उपजाऊ होती है। अतः घाटी प्रदेशों में पर्वतीय प्रदेशों से अधिक सघन जनसंख्या पाई जाती है।

प्रश्न 7.
भारत में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उपाय बताइए।
उत्तर:
भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि को जन्मदर कम करके ही रोका जा सकता है। जन्मदर को निम्न उपायों के माध्यम से कम किया जा सकता है-

  1. गर्भधारण से लेकर प्रजनन प्रक्रिया से जुड़ी अनेकानेक समस्याओं का ज्ञान होने के कारण शिक्षित महिलाओं की जीवन प्रत्याशा अधिक होती है। वह अपने और अपने बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग होती है।
  2. शिक्षित महिलाओं की दृष्टि व्यापक होती है, उनकी सोच राष्ट्रीय स्तर की होने के कारण बड़े परिवार को राष्ट्रीय संसाधनों पर बोझ मानती हैं।
  3. भारत में दो बच्चों के परिवार को राष्ट्रीय आदर्श माना गया है, उसकी दृढ़ता से पालन कराया जाए।
  4. भारतीय संविधान में निर्धारित शादी की न्यूनतम आयु लड़कियों की 18 तथा लड़कों की 21 वर्ष को व्यावहारिक रूप दिया जाए।
  5. स्त्री शिक्षा पर अधिक बल दिया जाए।
  6. दो या इससे कम बच्चों वाले माता-पिता को सरकारी नियुक्तियों एवं पदोन्नतियों में प्राथमिकता दी जाए। साथ ही विशेष वेतन-वृद्धि का प्रावधान हो।
  7. परिवार कल्याण सुविधाओं का देशभर में विस्तार किया जाए।

प्रश्न 8.
भारत के आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों का विकास आवश्यक क्यों है?
उत्तर:

  1. प्राकृतिक संसाधनों को संपत्ति में तभी बदला जा सकता है, जब लोगों की गुणवत्ता या उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जाए।
  2. देश की प्राकृतिक संपदा के पूर्ण विकास के लिए पर्याप्त संख्या, आवश्यक तकनीकी ज्ञान, पूँजी तथा लोगों का कुशल, क्रियाशील, परिश्रमी व ईमानदार होना आवश्यक है।
  3. अच्छे स्वास्थ्य एवं सुविधाओं की सुलभता भी प्राकृतिक संपदा के विकास पर निर्भर है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि देश के आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक तथा मानव दोनों ही संपदाओं का विकास साथ-साथ होना चाहिए।
  4. किसी देश का आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय संसाधनों पर निर्भर करता है। किसी एक के अभाव में विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
  5. प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों की विपुलता व संपन्नता, आर्थिक प्रगति की गति तेज करती है।
  6. मानव संसाधनों द्वारा ही प्राकृतिक संपदा को अधिकाधिक मात्रा में उपयोगी वस्तुओं में बदलकर, बड़े पैमाने पर संपदा प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 9.
जनसंख्या का गाँवों से नगरों की ओर पलायन क्यों हो रहा है?
उत्तर:
गाँवों से नगरों की ओर जनसंख्या का तेजी से पलायन निम्न कारणों से हो रहा है-

  1. गाँवों में सार्वजनिक सुविधाओं का अभाव – शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि का गाँवों में अभाव है। नगरों में इन सुविधाओं को बराबर आकर्षण है।
  2. गाँवों में रोजगार के अवसरों का अभाव – गाँवों में शिक्षित और अशिक्षित युवकों के लिए रोजगार के साधनों की कमी है। शिक्षित और प्रशिक्षित युवकों के लिए गाँवों में रोजगार का और भी अभाव है। फलतः रोजगार की तलाश में गाँवों से नगरों की ओर पलायन की (UPBoardSolutions.com) स्वाभाविक प्रक्रिया बन गई है। नगरों में रोजगार मिलने के बाद उनकी आश्रित संख्या भी नगरों में आकर बस जाती है।
  3. अलाभकारी जोतों का बढ़ना – छोटे और सीमांत किसान की पैतृक जोतों के बँटवारे होते रहने से उनका छिटका होना तथा भूमि का छोटा टुकड़ा हिस्से में आना, जोत को अलाभकारी बना देता है। अंततः छोटा किसान अपनी भूमि को बेचने के लिए विवश हो जाता है और काम-धंधे की तलाश में वह शहर की ओर चल पड़ता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 10.
जन्म-दर की तुलना में मृत्यु-दर में अधिक कमी का कारण क्या है?
उत्तर:
भारत में जन्म-दर एवं मृत्यु-दर दोनों ही निरंतर घट रही हैं। यह देश के विकास का प्रतीक है। लेकिन इन दोनों के घटने की दर में अंतर है। मृत्यु-दर तो तेजी से नीचे आयी है, लेकिन जन्म-दर में ह्रास मंद गति से हो रहा है। जन्म-दर की तुलना में मृत्यु-दर में अधिक कमी के निम्न कारण हैं-

  1. देश में मलेरिया, हैजा, चेचक, प्लेग जैसी महामारियों को अब नियंत्रित कर लिया गया है। नई और प्रभावशाली ओषधियों का निर्माण व उपयोग किया जा रहा है।
  2. देशभर में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के अधिक प्रसार के कारण वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जन्म पर प्रत्येक बच्चे की जीवन-प्रत्याशी बढ़कर 64 वर्ष हो गई है, जो इस शताब्दी के प्रारंभ में केवल 27 वर्ष थी।
  3. मृत्यु-दर का तेजी से घटने का मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवाओं का प्रसार रहा है।
  4. शिक्षा के प्रसार ने भी मृत्युदर को कम करने में सहायता की है क्योंकि शिक्षित व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरुक रहते हैं।

प्रश्न 11.
जनसंख्या वृद्धि किसे कहते हैं? इसे कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि से तात्पर्य किसी क्षेत्र में निश्चित अवधि के दौरान स्हने वाले लोगों की संख्या में परिवर्तन से है। ऐसे परिवर्तन को दो तरीके से व्यक्त किया जा सकता है-

  1. प्रतिवर्ष प्रतिशत वृद्धि के रूप में,
  2. सापेक्ष वृद्धि के रूप में।

प्रत्येक वर्ष या एक दशक में बढ़ी जनसंख्या, केवल संख्या में वृद्धि का परिणाम है। इसकी गणना बाद की जनसंख्या में से पहले की जनसंख्या को साधारण रूप से घटाकर की जाती है। जनसंख्या वृद्धि की दर अथवा गति का अध्ययन प्रतिशत प्रतिवर्ष में किया जाता है। इसे वार्षिक वृद्धि दर कहा जाता है। जैसे-10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर का अर्थ है कि किसी वर्ष के दौरान प्रत्येक 100 लोगों की मूल जनसंख्या में 10 लोगों की वृद्धि हुई।

प्रश्न 12.
किसी देश की जनसंख्या की तीन प्रमुख श्रेणियों का वर्णन कीजिए। इनमें से कौन-सा समूह पराश्रित है?
उत्तर:
आयु संरचना किसी भी देश की जनसंख्या की मूलभूत विशेषता होती है। जनसंख्या की आयु संरचना से आशय किसी देश में विभिन्न आयु वर्ग के लोगों से है। किसी भी देश की जनसंख्या को सामान्यतः तीन विस्तृत श्रेणियों में बांटा जा सकता है-

  1. बच्चे (सामान्यतः 15 वर्ष से कम आयु वाले)-ये आर्थिक रूप से उत्पादनशील नहीं होते हैं तथा इनको भोजन, वस्त्र एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की आवश्यकता होती है।
  2. वयस्क (15 वर्ष से 59 वर्ष)-ये आर्थिक रूप से उत्पादनशील तथा जैविक रूप से प्रजननशील होते हैं। यह जनसंख्या का कार्यशील वर्ग है।
  3. वृद्ध ( 59 वर्ष से अधिक)-ये आर्थिक रूप से उत्पादनशील या अवकाश प्राप्त हो सकते हैं। ये स्वैच्छिक रूप से कार्य कर सकते हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया के द्वारा इनकी नियुक्ति नहीं होती है। भारत में जनसंख्या संरचना-युवा 58.7%, वृद्ध 6.9%, बच्चे 34.4%। बच्चों तथा वृद्धों का प्रतिशत निर्भरता अनुपात को प्रभावित करता है क्योंकि ये समूह उत्पादनशील नहीं होते।

प्रश्न 13.
भारत के लिए स्वास्थ्य का स्तर आज भी चिंता का विषय है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देश ने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की है। स्वास्थ्य स्तर में भी महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ, फिर भी इस सम्बन्ध में अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
असन्तोषजनक स्वास्थ्य परिस्थितियों के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

  1. शुद्ध पीने का पानी तथा मूल स्वास्थ्य रक्षा सुविधाएँ ग्रामीण जनसंख्या के केवल एक-तिहाई लोगों को उपलब्ध हैं।
  2. प्रति व्यक्ति कैलोरी की खपत अनुशंसित स्तर से काफी कम है तथा हमारी जनसंख्या का एक बड़ा भाग कुपोषण से प्रभावित है।

UP Board Solutions

प्रश्न 14.
क्या स्त्रियों को अच्छी शिक्षा देकर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है?
उत्तर:
विश्व के विकसित देशों में अशिक्षा को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया है। शिक्षा का स्तर बढ़ने से स्त्री-पुरुष अनुपात एवं सन्तानोत्पत्ति को नियंत्रित करने में सहायता मिली है। विकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि एक प्रतिशत से भी कम है बल्कि कुछ देशों में यह ऋणात्मक हो गयी है। यह स्थापित तथ्य है कि स्त्रियों को शिक्षित एवं जागरूक करके जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है।
इसके लिए निम्न प्रयास किए जा सकते है-

  1. अच्छी शिक्षा पाने के लिए एक लंबी अवधि की आवश्यकता पड़ती है। अतः शिक्षित लड़कियों की अधिक उम्र में जाकर शादी होती है। तब तक परिवार-दायित्व का ज्ञान आसानी से हो जाता है।
  2. शिक्षित स्त्रियों को रोजगार मिल जाता है। रोजगार प्राप्त महिलाएँ अधिक बच्चे की अच्छी देख-रेख करने में अपने को असमर्थ पाती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केरल में जनसंख्या की स्थिति देश के अन्य राज्यों से किस प्रकार भिन्न है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या के विभिन्न पक्षों-घनत्व, स्त्री-पुरुष अनुपात, क्रियाशीलता, साक्षरता, जीवन-प्रत्याशी आदि पर विचार करने पर यह स्पष्ट है कि केरल की जनसंख्या की प्रवृत्ति देश के अन्य राज्यों से निम्न कारणों से भिन्न है-

(1) जीवन – प्रत्याशा सार्वजनिक चिकित्सा सुविधाओं एवं शिक्षा में विस्तार के कारण जीवन-प्रत्याशा में वृद्धि हुई है। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की जीवन-प्रत्याशा कम रही है। परंतु अब इस प्रवृत्ति में परिवर्तन आ गया है। अतः स्त्रियों की जीवन-प्रत्याशा पुरुषों की अपेक्षा (UPBoardSolutions.com) कुछ अधिक है। जन्म के समय स्त्रियों की औसत जीवनप्रत्याशा 67.7 वर्ष तथा पुरुषों की औसत जीवन-प्रत्याशा 64.6 वर्ष थी। केरल में जीवन-प्रत्याशा अधिक है। यहाँ स्त्रियों की जीवन-प्रत्याशा 72% तथा पुरुषों की 71% है।

(2) क्रियाशीलता – भारत में बड़ी जनसंख्या आश्रितों की है। एक-तिहाई क्रियाशील जनसंख्या पर दो-तिहाई आश्रित जनसंख्या का दबाव है। सामान्यतः क्रियाशील जनसंख्या का अधिक अनुपात दुर्गम क्षेत्रों अथवा विकसित क्षेत्रों में पाया जाता है। इस दृष्टि से केरल विकसित क्षेत्रों में आता है। यहाँ अर्जक जनसंख्या का अनुपात देश के औसत अनुपात से लगभग डेढ़ गुना अधिक है।

(3) साक्षरता – मानवीय संसाधनों के विकास में शिक्षा का भारी महत्त्व है। सन् 2011 में साक्षरता का प्रतिशत 73 रहा है। मनुष्य का दीर्घ आयु होना साक्षरता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। साक्षरता से क्रियाशील जनसंख्या का अनुपात बढ़ता है। केरल राज्य साक्षरता में सबसे आगे है। यहाँ 2011 की जनगणना के अनुसार 94% साक्षरता पाई गई है।

(4) घनत्व – केरल में जनघनत्व (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) सबसे अधिक है। यहाँ भारत के औसत जनघनत्व से लगभग तीन गुना जनघनत्व पाया जाता है। केरल में जनसंख्या का घनत्व 860 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। केरल में अधिक वर्षा तथा वर्षा की अवधि भी अधिक होने के कारण वर्ष में दो-तीन फसलें उगाई जाती हैं।

यहाँ के पाश्च जलों एवं तटवर्ती सागरों में भारी मात्रा में मछली पकड़ी जाती है, जिससे सघन जनसंख्या की खाद्य-आपूर्ति हो जाती है। स्त्री-पुरुष अनुपात-स्त्री-पुरुष गृहस्थ जीवन की गाड़ी के दो पहिए हैं। एक पहिए के कमजोर या उसके न होने पर गाड़ी का सही चलना संभव नहीं। संसार के (UPBoardSolutions.com) प्रत्येक सभ्य समाज में स्त्री और पुरुषों की संख्या में समानता है। हमारे देश के अनेक क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष अनुपात में बहुत अंतर मिलता है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति हजार पुरुषों पर 943 स्त्रियाँ थीं।

केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य है जिसमें पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या अधिक है। यहाँ स्त्री-पुरुष अनुपात 1084 :1000 हैं। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट है कि केरल एक सघन आबाद क्षेत्र होते हुए भी मानवीय संपदा का अधिक विस्तार कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। यहाँ के लोग परिश्रमी एवं संघर्षशील हैं, ये लोग अपनी कर्तव्यनिष्ठा के आधार पर उपलब्ध प्राकृतिक संपदा का भरपूर उपयोग करते हैं।

प्रश्न 2.
भारत के महानगरों में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या चिंता का विषय क्यों बन गई है? इससे उत्पन्न परिणामों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्ष 2011 में भारत की नगरीय जनसंख्या बढ़कर 37.7 करोड़ हो गयी है, यह कुल जनसंख्या का 27.78 प्रतिशतॆ है। भारत की नगरीय जनसंख्या का 65% प्रथम श्रेणी के नगरों में निवास करता है। भारत की एक तिहाई से भी अधिक जनसंख्या केवल 35 महानगरों में निवास करती है। यह एक चिंता का विषय है। नगरीकरण विकास का प्रतीक है। परंतु महानगरों में तीव्रता से बढ़ती जनसंख्या न केवल (UPBoardSolutions.com) महानगरों में समस्या खड़ी कर रही है, अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। नगरों में जनसंख्या के तेजी से बढ़ने के कारण, इनके वर्तमान संसाधनों तथा उपलब्ध जन सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ रहा है। कभी-कभी तो यहाँ लोगों को आवश्यक सुविधाएँ भी नहीं मिल पातीं।

महानगरों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के प्रमुख परिणाम इस प्रकार हैं-
(1) लिंग-अनुपात का असन्तुलित होना – रोजगार की तलाश में पहले पुरुष वर्ग नगरों की ओर जाता है। फलतः नगरों में लिंग अनुपात में बहुत अंतर पाया जाता है। इस विषम अनुपात से अनेक सामाजिक कुरीतियाँ एवं बुरी आदतें पड़ जाती हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक स्थिति और भी बिगड़ जाती है।

(2) आवास की समस्या – महानगरों की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ने के कारण आवास की बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। अधिकतर लोग तंग, अँधेरे तथा दूषित वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आवास की समस्या मजदूर वर्ग में तो और भी गंभीर है। झुग्गी-झोपड़ियों में और खुले आकाश के नीचे लोग अपनी रातें बिता रहे हैं।

(3) रोजगार की समस्या – रोजगार पाने के लिए गाँवों से लोग नगरों में आ रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में रोजगार के साधन नहीं बढ़ रहे हैं। अतः नगरों में रोजगार की समस्या बढ़ रही है। भिखारियों की संख्या बढ़ रही है। चोर-गिरहकटों की संख्या बढ़ रही है। लूट-पाट के मामले बढ़ रहे हैं। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त अति नगरीकरण के कारण नगरों में पेयजल की समस्या, सफाई एवं स्वास्थ्य की (UPBoardSolutions.com) समस्या, वायु प्रदूषण की समस्या, ध्वनि प्रदूषण की समस्या, शिक्षा की समस्या, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि की समस्या तथा परिवहन की समस्या नगरों से जुड़ गयी है।

प्रश्न 3.
भारत में जनसंख्या घनत्व के वितरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है। साथ ही भारत विश्व की घनी आबादी वाले देशों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जहाँ बिहार का जनसंख्या घनत्व 1106 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, वहीं अरुणाचल प्रदेश का जनसंख्या घनत्व 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।

पर्वतीय क्षेत्र तथा प्रतिकूल जलवायवी अवस्थाएँ इन क्षेत्रों की विरल जनसंख्या के लिए उत्तरदायी हैं। असोम एवं अधिकतर प्रायद्वीपीय राज्यों का जनसंख्या घनत्व मध्यम है। पहाड़ी, कटे-छैटे एवं पथरीले भूभाग, मध्यम से कम वर्षा, छिछली एवं कम उपजाऊ मिट्टी इन राज्यों के जनसंख्या (UPBoardSolutions.com) घनत्व को प्रभावित करती है। उत्तर मैदानी भाग एवं दक्षिण में केरल का जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है, क्योंकि यहाँ समतल मैदान एवं उपजाऊ मिट्टी पायी जाती है तथा पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 4.
व्यावसायिक संरचना का अर्थ स्पष्ट कीजिए। विभिन्न व्यवसायों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या के वितरण को विभिन्न व्यवसायों के आधार पर वर्गीकृत करना व्यावसायिक ढाँचा कहलाता है। भारत में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक विविधता विद्यमान है।
व्यवसायों को प्रायः प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक श्रेणियों में बाँटा गया है जिसका विवरण इस प्रकार है-

  1. प्राथमिक क्रियाकलापों में कृषि, पशुपालन, वृक्षारोपण एवं मछली पालन तथा खनन आदि क्रियाएँ शामिल हैं।
  2. द्वितीयक क्रियाकलापों में उत्पादन करने वाले उद्योग, भवन एवं निर्माण कार्य आते हैं।
  3. तृतीयक क्रियाकलापों में परिवहन, संचार, वाणिज्य, प्रशासन तथा सेवाएँ शामिल हैं।

भाग्त में कुल जनसंख्या का 64 प्रतिशत भाग केवल कृषि कार्य करता है। द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की संख्या का अनुपात क्रमशः 13 तथा 20 प्रतिशत है। वर्तमान समय में बढ़ते हुए औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में वृद्धि होने के कारण द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में व्यावसायिक परिवर्तन हुआ है।

प्रश्न 5.
बढ़ती हुई जनसंख्या के दुष्प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बढ़ती हुई जनसंख्या के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं-
(i) बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण – देश की जनसंख्या बढ़ने से विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार का प्रदूषण बढ़ रहा है जो भयंकर खतरे का संकेत दे रहा है। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। वनस्पति व प्राणी जगत के ह्रास (UPBoardSolutions.com) के कारण पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। प्रदूषण की रोक-थाम के साथ-साथ बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाई जाए।

(ii) खनिज संपदा का ह्रास – खनिज संपदा की मात्रा निश्चित है, उसे बढ़ाया नहीं जा सकता। एक बार उसका उपभोग, उतनी ही मात्रा को कम कर देता है। जनसंख्या बढ़ने से खनन काम तेजी से बढ़ रहा है। अतः खनिजों के शीघ्र ही समाप्त होने की समस्या पैदा हो गई है। आवश्यकता इस बात की है कि खनिजों का उपभोग कम किया जाए, पूरक वस्तुओं का विकास किया जाए तथा उनके संरक्षण की विधियाँ अपनाई जाएँ।

(iii) मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी – भारत में प्राचीनकाल से खेती होते रहने से मृदा की उपजाऊपन की क्षमता कम हो गई है। इधर जनसंख्या के बढ़ने से वर्ष में 2-3 फसलें लेना भी आवश्यक है। यह सिंचाई के साधनों के विस्तार तथा रासायनिक उर्वरकों के भरपूर उपयोग से भी संभव है। ऐसा करने पर मृदा में क्षारीय तत्त्वों का बढ़ना तथा भूमि का जलाक्रान्त होना स्वाभाविक है। इससे मृदा का उपजाऊपन कम हो जाता है और कहीं-कहीं तो मृदा की समाप्ति भी देखी गई है। अतः इस समस्या के निदान के लिए रासायनिक खादों का वैज्ञानिक उपयोग तथा मृदा सर्वेक्षण की आवश्यकता है।

(iv) वनों का तेजी से ह्रास – पेट की भूख मिटाने के लिए कृषि का विकास और विस्तार आवश्यक हो जाता है। खाद्यान्नों की माँग को पूरा करने के लिए वनों को साफ करके खेतों में बदला गया है। फलतः देश में 21 प्रतिशत से भी कम भू-भाग पर वनों का विस्तार रह गया। वनों की कमी से वर्षा से (UPBoardSolutions.com) कभी बाढ़ों का आना, मृदा का अपरदन होना तथा बहुमूल्य वन संपदा के न मिलने से समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं। अतः वनों के विस्तार एवं वृक्षारोपण पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।

(v) चरागाह भूमि की कमी – भारत में पशु संपदा संसार में सर्वाधिक है। चरागाह भूमि घटते-घटते केवल 4% रह गई। फलतः पशुओं से अपेक्षित उत्पाद नहीं मिल पाते हैं। वनीय भूमि का पशुचारण के लिए उपयोग किया जा रहा है। इससे समस्या का निदान नहीं, अपितु दूसरे प्रकार की समस्या और उठ खड़ी होती है। अतः योजनाबद्ध तरीकों से चरागाह भूमि का विस्तार कर पशुपालन को सुव्यवस्थित व सुदृढ़ किया जाए।

(vi) कृषि योग्य भूमि का घटना – जनसंख्या के बढ़ने से पैतृक कृषि भूमि का बँटवारा निरंतर होता चला आ रहा है। फलतः कृषि योग्य भूमि का प्रति व्यक्ति अनुपात घटकर 0.29 हेक्टेयर रह गया है। इस समस्या का एक ही हल है कि जनसंख्या की वृद्धि पर नियंत्रण किया जाए।

प्रश्न 6.
भारत के सबसे अधिक तथा सबसे कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों का जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों को ध्यान में रखते हुए विवरण दीजिए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल जनसंख्या 121.08 करोड़ है और जनसंख्या का औसत घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। लेकिन दिल्ली में तो घनत्व 11320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है तो अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। उदाहरण के लिए पश्चिमी बंगाल, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु में घनत्व 401 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से 1106 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी तक है। कुछ संघ राज्यों जैसे दिल्ली, चंडीगढ़, (UPBoardSolutions.com) लक्षद्वीप तथा पांडिचेरी में 2547 से 11320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर तक है। कहीं दूसरे राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मेघालय, नगालैण्ड, सिक्किम, मणिपुर आदि में घनत्व 17 से लेकर 128 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी ही है।

इस असमान वितरण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं-
(i) औद्योगिक विकास – देश के जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास अधिक हुआ है, वहाँ रोजगार के अवसर तथा अन्य सुविधाएँ बढ़ जाती हैं। अतः इन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व बढ़ जाता है। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास कम हुआ है, वहाँ जनसंख्या का घनत्व कम है।

(ii) प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता – संसाधनों से संपन्न क्षेत्र जनसंख्या को आकर्षित करते हैं। जल, मृदा, खनिज, वन आदि देश की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है। इसके लिए जनशक्ति चाहिए। दामोदर घाटी खनिज संपदा से संपन्न है। फलतः वहाँ अधिक जनसंख्या पाई जाती है। उपजाऊ मृदा क्षेत्र सघन आबाद हैं। डेल्टाई-क्षेत्र देश के सघनतम जनसंख्या वाले हैं।

(iii) यातायात की सुविधाओं का विकास – जिन क्षेत्रों में नदियों, नहरों, सड़कों व रेल मार्गों का जाल है, वहाँ आवश्यक वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध होती हैं। लोग काम के केंद्रों पर आसानी से आ-जा सकते हैं। परिवहन के साधनों के विकास से मैदानी भागों में अधिक जनसंख्या पाई जाती है।
पर्वतीय, मरुस्थलीय तथा वनीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों की कमी के कारण विरल आबाद है।

(iv) स्थल का स्वरूप – भारत में पर्वत, पठार एवं मैदान तीनों ही स्थलाकृतियाँ विस्तृत क्षेत्र में फैली हैं। देश की अधिकांश जनसंख्या मैदानी भागों में रहती है, क्योंकि मैदानी भाग में कृषि करना आसान व लाभदायक है, जिससे अधिक लोगों का जीवन निर्वाह होता है। मैदानों में जनसंख्या के वितरण में भी असमानता है। अधिक उपजाऊ मैदानी भागों में अधिक सघन जनसंख्या पाई जाती है।

(v) जलवायु – अधिक गर्म व शुष्क भागों में जनसंख्या कम पाई जाती है। अधिक ठंडे प्रदेश भी विरल जनसंख्या वाले हैं। राजस्थान का पश्चिमी भाग तथा हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है। देश के समजलवायु वाले क्षेत्रों तथा उष्ण आई भागों में सघन जनसंख्या (UPBoardSolutions.com) पाई जाती है। पश्चिमी बंगाल और केरल क्रमशः सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्य हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 7.
भारतीय जनसंख्या से संबंधित पाँच समस्याएँ नीचे दी गई हैं। प्रत्येक समस्या का एक दुष्परिणाम और प्रत्येक समस्या का एक व्यवहारिक समाधान लिखो।

  1. उच्च जनघनत्व
  2. असंतुलित लिंग-अनुपात
  3. सभी को स्वास्थ्य-सुविधाओं को अभाव
  4. बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण संबंधी समस्या
  5. स्त्रियों की आर्थिक भागीदारी।

उत्तर:
1. जनघनत्व

  • दुष्परिणाम : जनघनत्व से प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक दबाव पड़ता है तथा पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है।
  • समाधान : नए उद्योगों की स्थापना करके रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना होगा। अधिक जन-घनत्व वाले क्षेत्रों से कम जनघनत्व वाले क्षेत्रों की ओर उद्योगों तथा कार्यालयों को स्थानान्तरित करना होगा।

2. असंतुलित लिंग-अनुपात

  • दुष्परिणाम : स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार तथा समाज में स्त्रियों के प्रति प्रतिकूल दृष्टिकोण।
  • समाधान : स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार करके उनके हितों की रक्षा करना।

3. सभी को स्वास्थ्य-सुविधाओं का अभाव

  • दुष्परिणाम : प्रति व्यक्ति समुचित स्वास्थ्य-सुविधाओं के न मिलने के कारण स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव।
  • समाधान : स्त्री-बच्चों सहित सबके लिए एकीकृत स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराना।

4. बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण संबंधी समस्या

  • दुष्परिणाम : वायु जल तथा ध्वनि प्रदूषण की समस्या।
  • समाधान : पर्यावरण के संरक्षण के लिए लोगों में जागृति उत्पन्न करना।

5. स्त्रियों की आर्थिक भागीदारी

  • दुष्परिणाम : स्त्रियों में आर्थिक भागीदारी का बहुत कम होना।
  • समाधान : शिक्षा के अवसर प्रदान करके स्त्रियों की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना।

Hope given UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 6 are helpful to complete your homework.

If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you.

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 3 कार्य-व्यवस्था

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 3 कार्य-व्यवस्था

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 3 कार्य-व्यवस्था.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
कार्य-व्यवस्था से क्या आशय है? गृह-कार्य-व्यवस्था के महत्व को भी स्पष्ट कीजिए। या घर तथा परिवार के सन्दर्भ में कार्य-व्यवस्था के अर्थ को स्पष्ट कीजिए। सुचारू रूप से गृह-कार्य व्यवस्था का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
कार्य-व्यवस्था का अर्थ

घर तथा परिवार के सन्दर्भ में कार्य-व्यवस्था से आशय है कि घर तथा परिवार से सम्बन्धित समस्त कार्यों को सुनियोजित ढंग से पूरा किया जाए। गृह-कार्य व्यवस्था के लिए समस्त कार्यों की योजना तैयार की जानी चाहिए और योजना के अनुसार कार्य किए जाने चाहिए। कार्य-प्रक्रिया पर समुचित नियन्त्रण रहना चाहिए तथा समय-समय पर कार्यों को समुचित मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। यह कार्य-व्यवस्था (UPBoardSolutions.com) का सैद्धान्तिक विवेचन है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी कार्य-व्यवस्था का अर्थ स्पष्ट करना आवश्यक है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से आवश्यक है कि सर्वप्रथम परिवार के समस्त कार्यों को निर्धारित कर लिया जाए तथा प्राथमिकता के अनुसार कार्यों का वर्गीकरण कर लिया जाए।

इसके उपरान्त समस्त कार्यों के किए जाने का समय भी निर्धारित कर लेना चाहिए। इतनी व्यवस्था हो जाने के उपरान्त विशेष सूझ-बूझ द्वारा समस्त कार्यों को करने के उत्तरदायित्व का विभाजन परिवार के सभी सदस्यों में करना चाहिए। परिवार के सदस्यों को पारिवारिक कार्य सौंपते समय उनकी योग्यता, क्षमता तथा समय सम्बन्धी सुविधाओं को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए-यदि परिवार में अवकाश प्राप्त वृद्ध पिता हों, जो प्रातः घूमने जाते हैं, तो उन्हें दूध लाने का कार्य सौंपा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि घर-परिवार में समस्त कार्यों को अधिक-से-अधिक अच्छे, नियमित तथा सरल ढंग से पूरा करने की व्यवस्था ही गृह-कार्य-व्यवस्था है।

गृह-कार्य-व्यवस्था का महत्त्व

निःसन्देह रूप से कहा जा सकता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। व्यवस्था से सरलता, सुचारूता तथा उत्तमता के लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। व्यवस्थित ढंग से कोई भी कार्य करने से सामान्य रूप से कार्य में सफलता की प्राप्ति निश्चित हो जाती हैं तथा उत्तम परिणाम ही प्राप्त होते हैं। यही तथ्य घर-परिवार के सन्दर्भ में भी सत्य है। घर-परिवार के सन्दर्भ में कार्य-व्यवस्था के महत्त्व का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है

(1) आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक:
परिवार के सभी सदस्यों की अनेक आवश्यकताएँ हुआ करती हैं। प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करने के लिए कुछ-न-कुछ प्रयास या कार्य करने पड़ते हैं। इस स्थिति में यदि समस्त गृह-कार्यों को सुव्यवस्थित ढंग से किया जाता है, तो निश्चित रूप से निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति सरल हो जाती है। इस प्रकार हम (UPBoardSolutions.com) कह सकते हैं कि गृह-कार्य-व्यवस्था को अपनाकर ही हम परिवार के सभी सदस्यों की विभिन्न आवश्यकताओं की सुचारू ढंग से पूर्ति कर सकते हैं।

(2) उत्तम पारिवारिक वातावरण बनाए रखने में सहायक:
यदि किसी परिवार द्वारा उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था को व्यवहार में लागू कर लिया जाता है, तो उस स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों में कार्यात्मक सामंजस्य बना रहता है। ऐसे में इनके आपसी सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण तथा सहयोगात्मक बने रहते हैं तथा सामान्य रूप से तनाव या परस्पर विरोध के अवसर नहीं आते। उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था की स्थिति में पारिवारिक कलह की भी प्रायः आशंका नहीं रहती।

(3) श्रम-विभाजन में सहायक:
परिवार के सदस्यों द्वारा उत्तम कार्य-व्यवस्था को लागू करने से श्रम-विभाजन की उत्तम व्यवस्था प्राप्त हो जाती है। इस स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों को अपनी योग्यता, क्षमता तथा अभिरुचि के अनुसार कार्य उपलब्ध हो जाता है। यह व्यवस्था परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए विशेष रूप से सन्तोषदायक होती है।

(4) उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था में सहायक:
परिवार की सुख-शान्ति एवं समृद्धि के लिए उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था अति आवश्यक होती है। उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था परिवार की अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण होती है। उत्तम कार्य-व्यवस्था की स्थिति में परिवार के सभी कार्य सही समय पर तथा अच्छे ढंग से पूरे हो जाते हैं। इससे परिवार की अर्थव्यवस्था भी सही बनी रहती है तथा सामान्य रूप से किसी गम्भीर आर्थिक संकट को भी सामना नहीं करना पड़ता।

(5) परिवार के सदस्यों के उत्तम स्वास्थ्य में सहायक:
परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी गृह-कार्य-व्यवस्था लाभदायक सिद्ध होती है। उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था लागू होने की स्थिति में परिवार के किसी एक सदस्य को अधिक तथा अनावश्यक कार्य-भार नहीं सँभालना पड़ता। इसके अतिरिक्त कार्यों के छूट जाने की चिन्ता तथा (UPBoardSolutions.com) हानि को भी नहीं सहना पड़ता। इस प्रकार की व्यवस्था उपलब्ध होने पर परिवार के सदस्य स्वस्थ एवं सुखी जीवन व्यतीत करते हैं।

(6) रहन-सहन के स्तर को उन्नत बनाने में सहायक:
आज प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उसका तथा उसके परिवार के रहन-सहन का स्तर उन्नत हो। उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था इसमें भी सहायक होती है। उत्तम कार्य-व्यवस्था होने की स्थिति में परिवार के सभी कार्य सही समय पर पूर्ण हो जाते हैं। ऐसी । स्थिति में परिवार के सदस्य अधिक धनोपार्जन कर सकते हैं तथा उसका उत्तम उपभोग भी कर सकते हैं। इससे परिवार के रहन-सहन का स्तर उन्नत होता है तथा परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 2:
गृह-कार्य-व्यवस्था के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था के सिद्धान्त

पारिवारिक सुख-शान्ति, प्रगति एवं समृद्धि के दृष्टिकोण से गृह-कार्य-व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। गृह-कार्य-व्यवस्था को सफल व सुचारू बनाए रखने के लिए गृह-कार्य-व्यवस्था का सैद्धान्तिक ज्ञान होना आवश्यक होता है। गृह-कार्य-व्यवस्था के मुख्य सिद्धान्तों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) गृह-कार्य-सुनियोजन:
गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए आवश्यक है कि समस्त कार्यों का पूर्व नियोजन किया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि समस्त कार्यों को ध्यान में रखकर उनका विभाजन परिवार के सभी सदस्यों में कर देना चाहिए। कार्यों को सौंपते समय परिवार के सभी (UPBoardSolutions.com) सदस्यों की योग्यता, क्षमता तथा सुविधा को ध्यान में रखना आवश्यक है। कार्यों का व्यवस्थित बँटवारा करने के साथ-ही-साथ कार्यों को करने का समय भी निर्धारित कर देना चाहिए। इस प्रकार गृह-कार्यों की जितनी अच्छी तथा व्यावहारिक योजना तैयार कर ली जाएगी, उतनी ही गृह-कार्य-व्यवस्था में सफलता प्राप्ति की सम्भावना बढ़ जाएगी।

(2) निर्धारित कार्य-योजना का नियन्त्रण:
गृह-कार्य-व्यवस्था का दूसरा सिद्धान्त सूझ-बूझ द्वारा तैयार की गई योजना को व्यावहारिक रूप से लागू करना है। इस सिद्धान्त को कार्य-योजना का नियन्त्रण कहा जाता है। कार्य-योजना के नियन्त्रण के अन्तर्गत यह देखना आवश्यक होता है कि परिवार , के विभिन्न सदस्यों को सौंपे गए कार्य ठीक (UPBoardSolutions.com) ढंग से तथा ठीक समय पर किए जा रहे हैं या नहीं। परिवार के सदस्यों को समय-समय पर अपने-अपने कार्य करने के लिए निर्देश देना कार्य-योजना का नियन्त्रण ही है। कार्य-योजना के नियन्त्रण का दायित्व भी परिवार के मुखिया या गृहिणी को ही होता है। नियन्त्रित ढंग से गृह-कार्य होने पर अव्यवस्था की सम्भावना प्रायः नहीं रहती।

(3) कार्य-मूल्यांकन:
निर्धारित योजना के अनुसार सौंपे गए कार्यों को समय-समय पर मूल्यांकन भी किया जाना आवश्यक होता है। यह देखना होता है कि कौन-कौन से गृह-कार्य पूरे किए जा रहे हैं और कौन-कौन से कार्य समय पर नहीं हो पा रहे हैं? कार्य ठीक ढंग से हो रहे हैं या नहीं? गृह-कार्य-व्यवस्था में कार्य-मूल्यांकन का विशेष महत्त्व है। लेविन के अनुसार, मूल्यांकन के मुख्य रूप से चार उद्देश्य हैं

  1.  उपलब्धियों की जाँच,
  2. आगामी योजना के लिए आधार प्राप्त करना,
  3. निर्धारित योजना में यदि कुछ कमी है, तो उसमें सुधार के लिए आधार प्रस्तुत करना तथा
  4.  नए उपाय सुझाना।

(4) कुशलता:
गृह-कार्य-व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि समस्त कार्य कुशलतापूर्वक किए जाएँ। कुशलता से आशय यह है कि समस्त गृह-कार्य सही ढंग से तथा सही समय पर पूरे किए जाएँ। कुशलतापूर्वक कार्य करना ही कार्य-व्यवस्था की मुख्य कसौटी है। भले ही योजना कितनी भी अच्छी क्यों न हो, यदि निर्धारित कार्य कुशलतापूर्वक न किए जाएं तो कार्य व्यवस्था दोषपूर्ण ही कहलाएगी। उदाहरण के लिए-बच्चे के जन्म-दिवस के अवसर पर योजना के अनुसार परिवार के सभी सदस्यों को भिन्न-भिन्न कार्य सौंप दिए जाते हैं। यदि निर्धारित समय तक (UPBoardSolutions.com) सजावट पूरी नहीं हो पाती या मेहमानों के आ जाने के उपरान्त भी केक नहीं आता तो कहा जाएगा कि कार्य-कुशलता का अभाव है। यदि केक भी आ गया हो तथा मेज पर रख दिया गया हो परन्तु उस पर लगाने वाली मोमबत्तियाँ उपलब्ध न हों, तो भी कहा जाएगा कि कार्य-कुशलता का अभाव है। इस प्रकार कार्य-कुशलता का सर्वाधिक महत्त्व है। कुशलतापूर्वक किया गया प्रत्येक कार्य सन्तोष, आनन्द तथा प्रशंसा प्रदान करता है। यही गृह-कार्य-व्यवस्था का अन्तिम लक्ष्य है।

प्रश्न 3:
गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था को लागू करने के लिए किन-किन कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक कारक

यह सत्य है कि प्रत्येक परिवार चाहता है कि उसकी कार्य-व्यवस्था उत्तम हो। कार्य-व्यवस्था के उत्तम होने के लिए आवश्यक है कि कार्य-व्यवस्था के लिए अनुकूल कारकों का प्रभावपूर्ण ढंग से उपयोग किया जाए तथा कार्य-व्यवस्था के लिए प्रतिकूल कारकों को उन्मूलन किया जाए। कार्य-व्यवस्था के लिए अनुकूल कारक उन कारकों को कहा जाता है जो कार्य-व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक होते हैं। गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू रूप बनाए रखने में सहायक मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं

(1) उचित योजना का निर्धारण:
गृह-कार्य-व्यवस्था की सफलता के लिए आवश्यक है कि घर-परिवार से सम्बन्धित समस्त कार्यों को सम्पन्न करने के लिए उचित योजना का पूर्व-निर्धारण कर लिया जाए। इस कारक के अन्तर्गत व्यावहारिक दृष्टिकोण से निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना
आवश्यक होता है

  1. सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों की सूची बना लेनी चाहिए और उनका व्यवस्थित वर्गीकरण कर लेना चाहिए। दैनिक कार्यों, साप्ताहिक कार्यों, मासिक कायों तथा वार्षिक कार्यों की अलग-अलग सूची बना लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त आकस्मिक कार्यों के लिए भी अलग से प्रावधान होना चाहिए।
  2. प्रत्येक कार्य को करने का समय निश्चित कर लेना चाहिए। प्रत्येक कार्य में लगने वाला समय भी निर्धारित कर लेना चाहिए।
  3. परिवार के समस्त कार्यों को व्यवस्थित रीति से परिवार के सभी सदस्यों में बाँट देना चाहिए। कार्यों के इस बँटवारे के समय परिवार के सभी सदस्यों से विचार-विमर्श भी करना चाहिए तथा उनकी योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों आदि को भी ध्यान में रखना चाहिए।
  4.  कार्यों को करने में कार्यों के महत्त्व एवं अनिवार्यता को ध्यान में रखकर उनको प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  5. गृह-कार्यों की योजना लचीली होनी चाहिए अर्थात् परिस्थितियों के परिवर्तित होने की दशा में कार्यों के क्रम, प्राथमिकता आदि में परिवर्तन किया जा सकता है।

(2) कार्य-व्यवस्था में परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग:
गृह-कार्य-व्यवस्था की सफलता के लिए अति आवश्यक कारक है-कार्य-व्यवस्था में परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग प्राप्त करना। यदि परिवार के सभी सदस्य गृह-कार्यों की व्यवस्था में अपना-अपना सहयोग प्रदान करते हैं, तो सभी कार्य ठीक समय पर तथा सही ढंग से पूरे हो जाते हैं। इससे न तो गृह-कार्य अधूरे ही रह पाते हैं और न ही परिवार के किसी एक या दो सदस्यों पर अतिरिक्त बोझ ही पड़ता है। परिवार के (UPBoardSolutions.com) सभी सदस्यों में यदि गृह-कार्यों का उचित बँटवारा कर दिया जाए, तो गृहिणी को भी लाभ होता है तथा परिवार के सदस्य भी पारिवारिक कार्यों में सहयोग देकर सन्तोष का अनुभव करते हैं। बिना विचार-विमर्श किए अथवा क्षमता और रुचि के विपरीत सौंपे गए कार्य थोपे गए लगते हैं, उन्हें पूर्ण करना भार महसूस होता है, घर का कार्य प्रत्येक व्यक्ति को सौंपने से उन्हें परिवार में अपने महत्त्व का अनुमान हो जाता है तथा वह अपने को उपेक्षित अनुभव नहीं करते परिवार में बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ या पुरुष भी गृह-कार्यों में महत्वपूर्ण सहयोग दे सकते हैं।

अनाज तथा दालें साफ करना, साग बीनना या सब्जी काटने का कार्य बड़ी-बूढ़ी औरतें बड़े चाव से करती हैं तथा अच्छे ढंग से भी करती हैं। यदि परिवार में कोई वृद्ध पुरुष हो, तो वह निकट के पार्क या बागे में बच्चों को घुमाने ले जा सकते हैं। किशोर (UPBoardSolutions.com) बच्चों को घर की वस्तुएँ; जैसे कि कपड़े, किताबें आदि समेटकर यथास्थान रखने का कार्य सौंपा जा सकता है। ये बच्चे ही जूतों को साफ करने, बिस्तर बिछाने तथा झाड़-पोंछ करने का कार्य भी कर सकते हैं। परिवार की कार्य-व्यवस्था को सुचारू एवं सरल बनाने के लिए पति को भी गृह-कार्यों में यथासम्भव सहयोग देना चाहिए।

(3) गृह-कार्य करने की सही विधियों का ज्ञान:
गृह-कार्यों की व्यवस्था में सहायक कारकों में कार्य करने की सही विधियों का ज्ञान भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वास्तव में, कार्य करने के परम्परागत ढंग एवं विधियाँ आज के वैज्ञानिक युग के लिए उपयुक्त नहीं रहीं। अब सभी कार्यों को अच्छे ढंग से करने के लिए नई-नई विधियों को अपनाया जा रहा है। कम समय तथा कम श्रम द्वारा कार्यों को पूरा करना ही अभीष्ट समझा जाता है। कार्य करने की यान्त्रिक (UPBoardSolutions.com) विधियों को अपनाना चाहिए। सही विधियों को अपनाकर कार्य करने से जहाँ एक ओर समय तथा श्रम की बचत होती है, वहीं कार्य अच्छे ढंग से पूरा होता है तथा घर की वस्तुएँ भी नष्ट होने से बच जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि घर पर सही विधि को अपनाकर खाना पकाया जाए तो निश्चित रूप से श्रम तथा समय की बचत होती है तथा पकाए गए भोजन के पोषक तत्त्वों को भी नष्ट होने से बचाया जा सकता है।

(4) अच्छे तथा पर्याप्त भौतिक साधन उपलब्ध होना:
गृह-कार्यों को व्यवस्थित रूप में पूरा करने के लिए अनिवार्य है कि कार्य करने में सहायक अच्छे तथा पर्याप्त साधन उपलब्ध हों। अच्छे साधनों द्वारा कार्य करने से कार्य-कुशलता बढ़ती है तथा समय एवं श्रम की बचत होती है। उदाहरण के लिए-सब्जी काटने तथा छीलने के लिए अच्छा तेज चाकू तथा पिलर आदि का होना आवश्यक है। पर्याप्त संख्या में आवश्यक बर्तन होने भी आवश्यक हैं। यदि घर में एक से अधिक प्रेशर-कुकर हों तो एक के बाद दूसरा व्यंजन बनाने के लिए कुकर को धोना नहीं पड़ता तथा एक साथ ही गैस के (UPBoardSolutions.com) दोनों चूल्हों पर दो कुकर चढ़ाए जा सकते हैं। इससे काम शीघ्र पूरा हो जाएगा तथा कुकर को तुरन्त नहीं धोनी पड़ेगा। इसी प्रकार कपड़े धोने की मशीन, मिक्सर-ग्राइण्डर, ओवन, टोस्टर आदि यन्त्रों के उपलब्ध होने पर सभी कार्य शीघ्र, उत्तम तथा सरलता से पूरे हो जाते हैं तथा गृह-कार्य-व्यवस्था बनी रहती है।

(5) अनुभव एवं ज्ञान:
गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारू बनाने में सहायक कारक कार्य-अनुभव भी है। वास्तव में, किसी भी कार्य को स्वयं करने से अनेक बातों की जानकारी प्राप्त हो जाती है। जैसे-जैसे कार्य का अनुभव होता है, वैसे-वैसे उसे करने की त्रुटियाँ कम होती हैं तथा कार्य सही समय पर पूरा होने लगता है।
अनुभव के साथ-ही-साथ ज्ञान का भी विशेष महत्त्व होता है। गृह-कार्यों को समुचित ज्ञान माता-पिता या अन्य अनुभवी व्यक्तियों से भी प्राप्त हो सकता है तथा पुस्तकों से भी आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 4:
गृह-कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाले अर्थात् प्रतिकूल कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गह-कार्य-व्यवस्था को कपभावित करने वाले कारक यह सत्य है कि कुछ कारक गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक होते हैं। परन्तु इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि कुछ कारक ऐसे भी होते हैं जो गृह-कार्य-व्यवस्था पर बुरा प्रभाव डालते हैं। गृह-कार्य-व्यवस्था पर बुरा प्रभाव डालने वाले कारकों को, (UPBoardSolutions.com) कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाले कारक कहा जाता है। इस प्रकार के कारकों के प्रबल हो जाने की दशा में गृह-कार्य-व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा घरेलू कार्य सुचारू रूप से नहीं हो पाते। कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित हैं

(1) सूझ-बूझ की न्यूनता:
यदि गृहिणी तथा परिवार के अन्य मुख्य सदस्यों में गृह-कार्य सम्बन्धी आवश्यक सूझ-बूझ की कमी हो तो अधिक-से-अधिक साधन सम्पन्न होने पर भी गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती। सूझ-बूझ की न्यूनता या अभाव गृह-कार्य-व्यवस्था को गम्भीर रूप से प्रभावित करती है।

(2) आवश्यक साधनों का अभाव:
गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ साधनों की भी आवश्यकता होती है। इन साधनों को ही सूझ-बूझ से इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक गृह-कार्य सम्पन्न किए जाते हैं। यदि परिवार में आवश्यक साधनों का अभाव हो, तो सूझ-बूझ होते हुए भी गृह-कार्य-व्यवस्था को उत्तम नहीं बनाए रखा जा सकता। पारिवारिक साधनों में सर्वाधिक महत्त्व आर्थिक साधनों का होता है। इस स्थिति में कहा जा सकता (UPBoardSolutions.com) है कि आवश्यक साधनों का अभाव भी पारिवारिक कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाला एक उल्लेखनीय कारक है। उदाहरण के लिए—भले ही गृहिणी कितनी भी कार्यकुशल एवं गृह-कार्यों में दक्ष क्यों न हो, यदि उसके भण्डार-गृह में कच्ची खाद्य सामग्री न हो, ईंधन एवं अन्य उपकरण उपलब्ध न हों, तो वह परिवार के सदस्यों के लिए भोजन तैयार नहीं कर सकती।

(3) पारिवारिक-कलह:
गृह-कार्यों को करने की सूझ-बूझ तथा समस्त आवश्यक साधनों के उपलब्ध होने पर भी यदि परिवार में सौहार्दपूर्ण वातावरण न हो, तो गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू रूप से लागू नहीं की जा सकती। परिवार में कलह एवं तनाव का वातावरण होने की स्थिति में न तो गृहिणी स्वयं ही रुचिपूर्वक गृह-कार्यों को कर पाती है और न ही उसे परिवार के अन्य सदस्यों का सहयोग ही प्राप्त हो पाता है। ऐसी स्थिति (UPBoardSolutions.com) में गृह-कार्य-व्यवस्था कैसे सुचारू रूप से चल सकती है? इस प्रकार कहा जा सकता है कि पारिवारिक कलह भी गृह-कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाला एक प्रबल कारक है।
प्रत्येक गृहिणी तथा परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्यों का दायित्व है कि वे गृह-कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाले कारकों के प्रति सजग रहें तथा इन कारकों को प्रबल न होने दें।

प्रश्न 5:
कार्य-व्यवस्था के विभिन्न साधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कार्य-व्यवस्था के निम्नलिखित दो साधन हैं
(1) मानवीय अथवा अमूर्त साधन।
(2) अमानवीय अथवा भौतिक साधन।

(1) मानवीय अथवा अमूर्त साधन:
इन साधनों के अन्तर्गत मनुष्यों में पाए जाने वाले गुण, कौशल एवं विशेषताओं को सम्मिलित किया जाता है। ये निम्नलिखित हैं
(i) रुचि:
रुचि मनुष्य की एक मनोवैज्ञानिक विशेषता है। कुछ रुचियाँ मनुष्यों में जन्म से होती हैं। तो कुछ समय के साथ-साथ विकसित होती हैं। इन मनोवैज्ञानिक साधनों का प्रयोग कर लड़कों को व्यायाम, खेल-कूद तथा अन्य साहसिक कार्यों के लिए तथा लड़कियों को ललित कलाओं के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

(ii) ज्ञान:
शिक्षित गृहिणी को कार्य-व्यवस्था का अधिक ज्ञान होता है। वह उत्तम कार्य-व्यवस्था का सरलता से पालन करती है। अच्छी सन्तान के विकास के लिए भी माता का शिक्षित होना आवश्यक है।

(iii) शक्ति:
गृहिणियों में शारीरिक शक्ति शारीरिक कार्यों के लिए तथा मानसिक शक्ति मानसिक कार्यों के लिए कुशलता का साधन है।

(iv) योग्यता एवं प्रवीणता:
प्रायः सभी लड़कियाँ गृह-कार्य (खाना बनाना, सिलाई, कढ़ाई, गृह-परिचर्या आदि) करने की योग्यता रखती हैं, परन्तु उनका इन कार्यों में प्रवीण या दक्ष होना आवश्यक नहीं है। प्रवीणता का गृह-प्रबन्ध में अत्यधिक महत्त्व है। इसका विकास निरन्तर अभ्यास एवं अनुभव द्वारा किया जा सकता है।

(v) समय:
यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साधन है, क्योंकि इसके अभाव में कार्य योजनाओं का क्रियान्वयन लगभग असम्भव ही है। अतः समय का सदुपयोग करना चाहिए।

(2) अमानवीय अथवा भौतिक साधन
ये निम्नलिखित हैं

(i) धन:
धन का अर्थ विनिमय मूल्य है। हमारे देश में रुपया विनिमय का माध्यम है। धन से लगभग सभी भौतिक साधन प्राप्त किए जा सकते हैं। धन के अन्तर्गत वेतन एवं ब्याज द्वारा अर्जित आय इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) भौतिक वस्तुएँ:
मकान, फर्नीचर, गृह-सज्जा की वस्तुएँ, खाद्य पदार्थ, बर्तन, वस्त्र, मशीनें वाहन आदि प्रमुख भौतिक वस्तुएँ हैं। इनका अपना अलग-अलग महत्त्व है। किसी परिवार में इनका . आपेक्षित मात्रा में होना उस परिवार के आर्थिक स्तर पर निर्भर करता है।

(iii) सार्वजनिक गएँ:
ये सुविधाएँ किसी समय केवल बड़े नगरों तक ही सीमित थीं। आज इन सुविधाओं को गाँवों तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य केन्द्र, राजकीय अस्पताल व शिक्षा संस्थाएँ, बाजार, जीवन बीमा निगम, डाकखाने, बैंक, यातायात व मनोरंजन के साधन आदि अनेक सार्वजनिक सुविधाएँ हैं, जिनके उपलब्ध होने से परिवार के साधन बढ़ जाते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रायः मानवीय व भौतिक (UPBoardSolutions.com) साधनों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा इन दोनों प्रकार के साधनों के सन्तुलन, उपलब्धि एवं समायोजन पर ही परिवार एवं समाज की प्रगति निर्भर करती है। उत्तम एवं सुचारू गृह कार्य-व्यवस्था के लिए सभी साधन उपलब्ध होना आवश्यक माना जाता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
एक गृहिणी को दैनिक जीवन से समय, अर्थ एवं श्रम की बचत के लिए किन उपायों एवं उपकरणों की सहायता लेनी चाहिए? समझाइए।
या
गृह-संचालन में धन, श्रम और समय की बचत आप किस प्रकार करेंगी?
या
गृह के संचालन में समय, अर्थ व श्रम की बचत किन-किन उपायों द्वारा की जा सकती है? विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
गृहिणी गृह की संचालिका है। नि:सन्देह उसे गृह के अधिकांश कार्य स्वयं सम्पन्न करने पड़ते हैं, जिससे उसे बहुत श्रम करना पड़ता है। प्रत्येक गृहिणी की शारीरिक शक्ति सीमित होती है। इस स्थिति में यदि कुछ बातों को ध्यान में न रखा जाए तो गृहिणी को गृह- कार्यों से अधिक थकान हो सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसे उपाय किए जाने चाहिए, जो गृहिणी के समय तथा श्रम को बचाने में सहायक हों।

समय व श्रम की बचत के उपाय

निम्नलिखित उपाय एवं उपकरणों की सहायता से समय व श्रम की बचत होती है

  1. कार्य करते समय यह ध्यान रखें कि इसके लिए अनावश्यक क्रियाएँ अथवा श्रम न करना पड़े। उदाहरण के लिए-वस्तुओं को एक व्यवस्थित क्रम में रखने पर कार्य करने के समय उनको ढूंढ़ने में समय अथवा श्रम व्यर्थ नहीं होता।
  2.  खाद्य पदार्थ, मिर्च, मसाले आदि सामग्री, बर्तन इत्यादि का रसोई-गृह में इस क्रम में रखा जाए जिससे कि उनको लेने-रखने में अधिक चलना, झुकनां व उचकना न पड़े।
  3. एक साथ उपयोग में आने वाली आवश्यक वस्तुओं को एक साथ रखें; जैसे–मिर्च, मसाले व नमक आदि को मसालेदानी में रखें। चीनी एवं चाय की पत्ती को पास-पास ही रखें।
  4. श्रम व समय की बचत करने वाले उपकरणों एवं यन्त्रों; जैसे-गैस का चूल्हा, प्रेशर कुकर, वाशिंग मशीन, बिजली की प्रेस आदि का यथासम्भव प्रयोग किया जाना चाहिए।
  5. प्रयोग में आने वाले सभी उपकरण ठीक स्थिति में होने चाहिए तथा इनकी गुणवत्ता भी सन्तोषजनक होनी चाहिए।
  6.  कार्य करते समय गृहिणी की शारीरिक स्थिति अथवा उठने, बैठने व खड़े होने का ढंग इस प्रकार हो कि जिसमें कम-से-कम थकावट हो।
  7.  एक कार्य करते हुए गृहिणी जब थकने लगे, तो उसे कार्य-परिवर्तन करना चाहिए।
  8. मेज-कुर्सी आदि फर्नीचर गृहिणी की ऊँचाई के अनुसार होने चाहिए, जिससे थकावट कम हो।
  9.  सभी दैनिक कार्यों को उपयुक्त योजना बनाकर करना चाहिए।
  10. परिवार के सभी सदस्यों के मध्य उनकी कार्यक्षमता एवं योग्यता के अनुसार कार्यों का विभाजन करना चाहिए।

अर्थ (धन) की बचत के उपाय

परिवार की लगभग सभी आवश्यकताएँ आर्थिक साधनों अर्थात् धन पर निर्भर करती हैं। अतः आर्थिक साधनों का सोच-समझकर व नियन्त्रित ढंग से उपयोग करना चाहिए तथा भविष्य के लिए बचत का प्रावधान अवश्य रखना चाहिए। अग्रलिखित उपायों से यह सम्भव हो सकती है

(1) आय-व्यय में सन्तुलन बनाए रखना:
परिवार के आर्थिक साधन प्रायः सीमित होते हैं, परन्तु आवश्यकताएँ अनन्त होती हैं। अतः आय-व्यय का सन्तुलन प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति को ही प्राथमिकता देकर (UPBoardSolutions.com) किया जा सकता है। आय के साधनों एवं आवश्यकताओं के अनुसार प्रत्येक गृहिणी को बजट बनाना चाहिए तथा उसे सिद्धान्त रूप से बजट में निर्धारित मदों पर निर्धारित धनराशि का ही व्यय करना चाहिए।

(2) मितव्ययिता के उपाय प्रयोग में लाना:
निम्नलिखित उपायों के आधार पर गृहिणी दैवीक जीवन में धन की बचत कर सकती है

  1.  केवल अत्यावश्यक वस्तुओं को ही खरीदना।
  2.  समान पौष्टिक गुणों वाले सस्ते खाद्य पदार्थ खरीदना।
  3. प्रतिकूल ऋतु में सस्ता सामान खरीदना, जैसे कि ग्रीष्म ऋतु में ऊन।
  4.  पानी, ईंधन व बिजली का केवल आवश्यक उपयोग करना।
  5.  खाद्य पदार्थों की बर्बादी न करना।
  6.  कम-से-कम नौकर रखना।
  7. बच्चों को ट्यूटर न रखकर स्वयं पढ़ाना।

प्रश्न 7:
गृह की सुव्यवस्था के लिए गृहिणी में किन गुणों का होना आवश्यक है? लिखिए।
या
एक कुशल गृहिणी अपना घर किस प्रकार सुव्यवस्थित रख सकती है? समझाइए।
या
गृह की सुव्यवस्था के लिए एक आदर्श गृहिणी में किन-किन गुणों का होना आवश्यक है? विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
गृहिणी गृह-संचालन में मुख्य भूमिका निभाती है। वह पत्नी, माता, गुरु व गृह-स्वामिनी के कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने गृह में समृद्धि, सुख एवं सन्तोष का वातावरण बनाए रखती है। गृह
की सुव्यवस्था के लिए प्रत्येक गृहिणी में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है|

(1) कर्तव्यों का ज्ञान:
पति से मधुर व्यवहार करना, सास-ससुर का आदर करना, ननद व देवर से स्नेह रखना, अतिथियों का सत्कार करना, बच्चों से प्रेम करना व उन्हें अच्छी शिक्षा देना आदि ऐसे कर्तव्य हैं, जिनका पालन कर गृहिणी सबका हृदय जीत लेती है।

(2) अनुकूलता:
एक कुशल गृहिणी परिवार के सभी सदस्यों से मधुर सम्बन्ध बनाए रखती है। वह प्रत्येक सदस्य की अभिरुचियों, कार्यक्षमता व भावनाओं का ज्ञान रखती है तथा गृह की सुव्यवस्था में सदस्यों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त करती है।

(3) परिश्रमी होना:
गृह-कार्यों को करने के लिए प्रत्येक गृहिणी को परिश्रमी होना चाहिए। इसके लिए गृहिणी को सामान्य स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए।

(4) चरित्रवान होना:
अच्छे चरित्र को बच्चों पर व परिवार के अन्य सदस्यों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। अतः गृहिणी का चरित्रवान होना अनिवार्य है।

(5) कार्य-कुशलता:
गृह की सुयवस्था के लिए गृहिणी का गृह-कार्यों में निपुण होना अत्यन्त आवश्यक है। कुशल गृहिणी के सभी का सही समय पर होते हैं, घर स्वच्छ रहता है तथा परिवार के सभी सदस्य सन्तुष्ट रहते हैं।

(6) भोजन की सुव्यवस्था:
भोजन शरीर के विकास एवं निर्माण का आधार है। रुचिकर एवं पौष्टिक भोजन परिवार के सदस्यों को सन्तुष्ट एवं स्वस्थ रखता है। एक कुशल गृहिणी अपने परिवार के सदस्यों के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार पौष्टिक तथा सन्तुलित आहार की व्यवस्था करती है। परिवार में बच्चों, वृद्धों एवं रोगी सदस्यों के लिए कुछ भिन्न प्रकार के आहार की आवश्यकता हो सकती

(7) गृह-परिचर्या:
प्रत्येक गृहिणी को गृह-परिचर्या का आवश्यक ज्ञान होना चाहिए, जिससे कि वह समय पड़ने पर घर पर परिवार के किसी रोगी सदस्य की उचित देखभाल कर सके।

(8) नियोजन का ज्ञान:
प्रत्येक गृहिणी को सभी गृह-कार्य एक उचित योजना बनाकर करने चाहिए। इससे समय व श्रम की बचत होती है।

(9) आय-व्यय का सन्तुलन:
प्रत्येक गृहिणी को आय-व्यय का सन्तुलन बनाए रखने के लिए बजट बनाना चाहिए। धन को प्रायः आवश्यक कार्यों में ही व्यय करना चाहिए तथा भविष्य के लिए बचत का प्रावधान रखना चाहिए।

(10) परिवार में शान्ति बनाए रखना:
प्रत्येक गृहिणी को महत्त्वपूर्ण कार्य सभी सदस्यों के परामर्श से करने चाहिए। गृहिणी को सभी सदस्यों से यथोक्ति व्यवहार करना चाहिए तथा आपसी मनमुटाव व झगड़ों को हतोत्साहित करना चाहिए। इस दृष्टिकोण को अपनाने से परिवार का वातावरण सौहार्दपूर्ण बना रहता है।

(11) सेवकों के प्रति व्यवहार:
सेवकों को समय पर वेतन देना चाहिए तथा उनके अच्छे कार्यों की प्रशंसा करनी चाहिए। सेवकों के प्रति सन्तुलित व्यवहार रखना चाहिए अर्थात् उनके प्रति न तो अधिक कठोर व्यवहार करना चाहिए और न ही उन्हें आवश्यकता से अधिक ढील ही दी जानी चाहिए।

(12) अतिथि सत्कार:
प्रत्येक गृहिणी को अतिथियों का समुचित आदर-सत्कार करना चाहिए। इससे परिवार को सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

(13) पति के प्रति कर्तव्य:
पति की सेवा करना व आज्ञा-पालन करना गृहिणी का सबसे महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है। अच्छे-अच्छे कार्यों के लिए पति को उत्साहित करना, मानसिक व आर्थिक कठिनाइयों में (UPBoardSolutions.com) पति का साहस बढ़ाना, गृहस्थी के दायित्वों के प्रति पति को सदैव सजग रखना इत्यादि ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य हैं, जिनको अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से केवल एक कुशल गृहिणी ही कर सकती है।

UP Board Solutions

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
एक गृहिणी को अपने कार्यों का विभाजन किस प्रकार करना चाहिए? कार्य-विभाजन से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
कार्यों का विभाजन प्रायः निम्नलिखित प्रकार से किया जाता है –

(1) दैनिक कार्य:
बच्चों को प्रतिदिन स्कूल भेजना, घर की सफाई, दोनों समय भोजन व सुबह नाश्ता तैयार करना इत्यादि दैनिक कार्य कहलाते हैं।
(2) साप्ताहिक कार्य: बाजार से साप्ताहिक सामग्री लाना व धोबी को कपड़े देना व लेना आदि प्रायः प्रत्येक परिवार में साप्ताहिक कार्य होते हैं।
(3) मासिक कार्य: मकान का किराया व बिजली-पानी का बिल देना, दूध वाले व समाचार-पत्र वाले का हिसाब करना तथा आय-व्यय का बजट रखना आदि प्रमुख मासिक कार्य हैं।
(4) वार्षिक कार्य: मकान में रंगाई-पुताई करवाना, जीवन बीमा की वार्षिक किश्त देना व आयकर का भुगतान करना इत्यादि प्रमुख वार्षिक कार्य होते हैं।
(5) आकस्मिक कार्य: परिवार में अतिथियों के आने पर उनका आदर-सत्कार, अचानक यात्रा पर जाना, विवाह, किसी सदस्य की अस्वस्थता सम्बन्धी कार्य आदि आकस्मिक कार्य कहलाते हैं।
कार्य-विभाजन के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

  1. सभी सदस्यों को कार्य अपनी योग्यता के अनुसार मिल जाते हैं।
  2.  घर में व्यवस्था बनी रहती है।
  3.  गृहिणी के श्रम व समय की बचत होती है।

प्रश्न 2:
टिप्पणी लिखिए-गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक उपकरण।
उत्तर:
वर्तमान नगरीय जीवन विभिन्न कारणों से अत्यधिक व्यस्त हो गया है। प्रत्येक शहरी व्यक्ति समय की कमी से परेशान है। इस तथ्य का गम्भीर प्रभाव गृह-कार्य-व्यवस्था पर भी पड़ा है। अब गृह-कार्यों को करने के लिए सीमित समय ही उपलब्ध हो पाता है। इस स्थिति में स्वाभाविक ही था कि गृह-कार्यों को करने के लिए यथासम्भव अधिक-से-अधिक उपकरणों को खोजा जाता। वैज्ञानिक प्रगति ने इस क्षेत्र में विशेष सहायता प्रदान की तथा अनेक ऐसे उपकरण दिए जो गृह-कार्यों को कम समय तथा कम श्रम द्वारा पूरा करने में सहायक होते हैं। घरेलू कार्यों में दो प्रकार के कार्य नियमित रूप से किए जाते हैं। ये कार्य हैं–रसोई एवं पाक-क्रिया सम्बन्धी कार्य तथा घर (UPBoardSolutions.com) की सफाई सम्बन्धी कार्य। इन दोनों ही वर्गों के कार्यों को करने के लिए विभिन्न ऐसे उपकरण तैयार किए जा चुके हैं जो समय, श्रम तथा धन की बचत में सहायक होते हैं। इनमें से रसोईघर में उपयोग में आने वाले मुख्य उपकरण हैं-कुकर, विद्युत चालित केतली, टोस्टर, मिक्सर ग्राइण्डर, गैस का चूल्हा, ओवन, फ्रिज आदि। इनके अतिरिक्त घर की सफाई के लिए उपयोगी उपकरण हैं-वैक्यूम क्लीनर, कारपेट स्वीपर, बर्तन धोने की मशीन, कपड़े धोने की मशीन आदि। ये सभी उपकरण गृह-कार्यों को कम समय, कम श्रम तथा कम खर्चे में पूरी कर देते हैं। अतः इन सभी उपकरणों को गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक उपकरण माना जाता है।

प्रश्न 3:
गृह-कार्य-व्यवस्था का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था के महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1.  इससे परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
  2.  पारिवारिक सदस्यों के मध्य कार्यों के विभाजन से उनकी कार्यक्षमता का उचित उपयोग होता है, श्रम का विभाजन होता है तथा सभी सदस्य सन्तोष का अनुभव करते हैं।
  3.  उपयुक्त कार्य-व्यवस्था के फलस्वरूप परिवार में आर्थिक सन्तुलन बना रहता है।
  4.  परिवार के सदस्यों के मध्य सद्भावना बनी रहती है।
  5. रहन-सहन का स्तर सुधरता है तथा परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।

प्रश्न 4:
गृह-कार्यों में परिवार के सदस्यों के सहयोग का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
कोई भी गृहिणी घर के सभी कार्यों को अकेले नहीं कर सकती। अपने मधुर व्यवहार एवं कार्य लेने की योग्यता के आधार पर वह परिवार के अन्य सदस्यों का सहयोग प्राप्त करती है। वह सदस्यों के मध्य उनकी योग्यता एवं रुचि के अनुसार कार्यों का विभाजन करती है, जिसके फलस्वरूप कार्य कम समय में व अधिक कुशलतापूर्वक सम्पन्न होते हैं। इस प्रकार सदस्यों के सहयोग से गृह-कार्यों में श्रम व समय की बचत होती है तथा कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 5:
गृह-कार्य-व्यवस्था को पारिवारिक आय किस प्रकार प्रभावित करती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रबल कारक है-पारिवारिक आय। समुचित पारिवारिक आय के अभाव में गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू हो ही नहीं सकती। वास्तव में गृह-कार्य के लिए विभिन्न भौतिक साधन अनिवार्य होते हैं। भौतिक साधनों को अर्जित करने के लिए धन की आवश्यकता होती है तथा धन की प्राप्ति आय के माध्यम से होती है। आये से आशय है-एक निश्चित (UPBoardSolutions.com) अवधि में अर्जित वह धनराशि जो आर्थिक प्रयासों के परिणामस्वरूप प्राप्त होती है तथा जिसमें अन्य सुविधाएँ; जैसे-नि:शुल्क मकान, नि:शुल्क चिकित्सा तथा नि:शुल्क शिक्षा आदि भी सम्मिलित रहती हैं।

गृह-कार्य-व्यवस्था के लिए आय के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि यदि परिवार की आय अपर्याप्त है, तो पर्याप्त सूझ-बूझ, कार्य-कुशलता तथा परिवार के सदस्यों में सहयोग होने पर भी गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती, क्योंकि गृह-कार्यों के लिए आवश्यक भौतिक साधनों को अर्जित करने के लिए पारिवारिक आय अनिवार्य है। उदाहरण के लिए यदि परिवार की आय पर्याप्त है, तो गृह-कार्य-व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए श्रम एवं समय की बचत करने वाले विभिन्न उपकरण खरीदे जा सकते (UPBoardSolutions.com) हैं तथा उनके माध्यम से गृह-कार्य सरलतापूर्वक ठीक समय पर पूरे किए जा सकते हैं। इसके विपरीत, यदि परिवार की आय कम है, तो पर्याप्त कार्य-कुशल गृहिणी भी अपने परिवार को अच्छा एवं पौष्टिक आहार तक उपलब्ध नहीं करा सकती, क्योंकि उसके लिए भी पर्याप्त खाद्य-सामग्री चाहिए।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि उत्तम गृह-व्यवस्था के लिए पारिवारिक आय पर्याप्त होनी चाहिए, परन्तु पर्याप्त आय होने पर भी सूझ-बूझ, कार्य-कुशलता, लगन तथा परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सहयोग का भी विशेष महत्त्व होता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
टिप्पणी लिखिए-परिवार कल्याण तथा गृह-कार्य-व्यवस्था।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है-परिवार कल्याण। परिवार कल्याण अपने आपमें एक दृष्टिकोण है, जिसके अन्तर्गत परिवार के सर्वांगीण हितों को ध्यान में रखा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार परिवार के सभी सदस्यों के लिए पर्याप्त तथा सन्तुलित आहार, शिक्षा, चिकित्सा तथा मनोरंजन सम्बन्धी सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए। उत्तम आवास तथा स्वास्थ्य में सहायक रहन-सहन की दशाएँ भी परिवार-कल्याण के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। परिवार कल्याण के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ही परिवार को सीमित रखने का सुझाव दिया जाता है। । परिवार कल्याण के दृष्टिकोण को अपना लेने की स्थिति में (UPBoardSolutions.com) गृह-कार्य-व्यवस्था को भी उसी के अनुरूप ढालना पड़ता है। परिवार के सभी सदस्यों को परिवार के कल्याण सम्बन्धी कार्यों के प्रति जागरूक होना पड़ता है। बच्चों की उत्तम शिक्षा के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं। बच्चों के स्वास्थ्य के विकास के लिए भी समय एवं धन का व्यय करना पड़ता है। इसके साथ-साथ परिवार के सभी सदस्यों के स्वस्थ मनोरंजन के लिए कुछ अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है तथा समय का सूझ-बुझपूर्वक नियोजन भी करना पड़ता है। वैसे यह सत्य है कि परिवार कल्याण के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए ही गृह-कार्य-व्यवस्था का निर्धारण किया जाना चाहिए। गृह-कार्य-व्यवस्था तो अपने आप में साधन है। इस साधन को अपनाकर जिस लक्ष्य को प्राप्त करना है, वह है- परिवार कल्याण।

प्रश्न 7:
परिवार के सदस्यों की संख्या तथा कार्य-व्यवस्था में क्या सम्बन्ध है? या ”परिवार की सदस्य-संख्या गृह-कार्य-व्यवस्था को प्रभावित करती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समस्त गृह-कार्य मुख्य रूप से परिवार के सदस्यों द्वारा ही किए जाते हैं। इसके साथ यह भी सत्य है कि समस्त गृह-कार्य परिवार के सदस्यों के लिए होते हैं अर्थात् परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही समस्त गृह-कार्य किए जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि परिवार के सदस्यों की संख्या तथा गृह-कार्य-व्यवस्था के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यदि किसी परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होती है अर्थात् परिवार का आकार बड़ा होता है, तो निश्चित रूप से उस परिवार के सदस्यों को अधिक गृह-कार्य करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए-बड़े आकार के परिवार के लिए गृहिणी को अधिक मात्रा में भोजन तैयार करना पड़ता है तथा अधिक वस्त्रों को धोना पड़ता है तथा अन्य कार्य भी अधिक करने पड़ते हैं। इस स्थिति में यदि परिवार (UPBoardSolutions.com) के सदस्यों के कार्यों का समुचित विभाजन नहीं होता, तो परिवार के कुछ सदस्यों पर कार्य का अधिक बोझा पड़ जाता है तथा ऐसे में गृह-कार्य-व्यवस्था अस्त-व्यस्त भी हो सकती है। इसके विपरीत, यदि समस्त गृह-कार्यों को परिवार के सभी सदस्यों में उचित ढंग से विभाजित कर लिया जाए, तो समस्त कार्य सरलता से तथा शीघ्र ही सम्पन्न हो सकते हैं। यदि परिवार के सदस्यों की संख्या कम हो तो उस स्थिति में समस्त गृह-कार्य निश्चित रूप से उन्हीं सदस्यों को करने पड़ते हैं। इस स्थिति में विशेष सूझ-बूझ की आवश्यकता होती है।

समस्त कार्यों को नियोजित तथा सुव्यवस्थित ढंग से करना पड़ता है। कम सदस्य संख्या वाले परिवार कुछ कार्यों को परिवार के बाहर की संस्थाओं द्वारा भी करवा लेते हैं। उदाहरण के लिए–लाण्ड्री से कपड़े धुलवाना, कुछ डिब्बा बन्द भोज्य सामग्रियाँ इस्तेमाल करना तथा घर की सफाई व्यवस्था के लिए मेहरी रखना आदि। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि कम सदस्य संख्या (UPBoardSolutions.com) वाले परिवारों में कोई भी सदस्य सामान्य रूप से कामचोर नहीं होता। इस स्थिति में गृह-कार्य-व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहती है। इसके विपरीत, अधिक सदस्य संख्या वाले परिवारों में कुछ सदस्य कामचोर भी होते हैं। ऐसे में परिवार में तनाव तथा कटुता का वातावरण बना रहता है तथा गृह-कार्य-व्यवस्था भी उत्तम नहीं बन पाती।

प्रश्न 8:
परिवार के सदस्यों का व्यवहार गृह-कार्य-व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित करता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था पर प्रभाव डालने वाले कारकों में परिवार के सदस्यों का व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण कारक है। वास्तव में, परिवार के सदस्यों के व्यवहार से ही कार्य बनते या बिगड़ते हैं। । परिवार में अनेक सदस्य होते हैं तथा परिवार के सभी सदस्य परिवार की कार्य-व्यवस्था में भाग लेते हैं। परिवार के सभी सदस्यों में पारस्परिक सम्बन्ध होते हैं। परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध इनके पारस्परिक व्यवहारों द्वारा निर्धारित होते हैं। यदि परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध मधुर, सहयोगात्मक तथा सामंजस्यपूर्ण होते हैं, तो गृह-कार्य-व्यवस्था अच्छी बनी रहती है। इसके विपरीत, यदि परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्ध कटु, तनावपूर्ण (UPBoardSolutions.com) तथा असहयोगात्मक हों, तो निश्चित रूप से परिवार की कार्य-व्यवस्था अच्छी नहीं रह सकती। इस प्रकार के पारिवारिक सम्बन्धों की स्थिति में गृह-कार्य-व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा कोई भी कार्य सुचारू रूप से नहीं हो पाता। परिवार के सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों को सौहार्दपूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य का व्यवहार उत्तम हो।

परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा इस प्रकार का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए कि किसी अन्य सदस्य की भावनाओं को ठेस पहुँचे। परिवार के सभी सदस्यों का अन्य सदस्यों के प्रति मधुर व्यवहार होना चाहिए। इस प्रकार के मधुर व्यवहार गृह-कार्य-व्यवस्था को उत्तम बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। परिवार में कुछ वरिष्ठ सदस्यों द्वारा नियन्त्रणकारी व्यवहार भी किया जाना चाहिए। इस प्रकार का नियन्त्रणकारी व्यवहार भी (UPBoardSolutions.com) गृह-कार्य-व्यवस्था पर अनुकूल प्रभाव डालता है। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त घर के नौकरों के प्रति भी सन्तुलित व्यवहार होना चाहिए अर्थात् नौकरों के प्रति न तो अधिक कठोर व्यवहार होना चाहिए और न अधिक कोमलता का। नौकरों के प्रति सन्तुलित व्यवहार होने पर ही वे गृह-कार्य-व्यवस्था में समुचित तथा कुशलतापूर्वक योगदान प्रदान करते हैं।

प्रश्न 9:
परिवार के सदस्यों की अभिरुचि का गृह कार्य-व्यवस्था से क्या सम्बन्ध है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परिवार के सदस्यों की अभिरुचियाँ भी गृह-कार्य-व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। अभिरुचि एक व्यक्तिगत गुण या विशेषता होती है। व्यक्ति की किसी कार्य के प्रति रुचि तथा उसे सीखने की क्षमता को सम्मिलित रूप से अभिरुचि कहते हैं। अभिरुचि के लिए कार्य के प्रति रुचि तथा कार्य करने की योग्यता दोनों का ही होना आवश्यक है।
उत्तम गृह-कार्य-व्यवस्था को प्राप्त करने के लिए परिवार के सदस्यों की अभिरुचियों को ध्यान में रखना नितान्त आवश्यक होता है। गृह-कार्यों का विभाजन परिवार के सदस्यों की (UPBoardSolutions.com) अभिरुचियों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। परिवार के प्रत्येक सदस्य को गृह-कार्य-व्यवस्था के अन्तर्गत उसकी अभिरुचि के अनुकूल कार्य ही सौंपना चाहिए। अभिरुचि के अनुकूल कार्य सौंपने पर सम्बन्धित कार्य उत्तम एवं शीघ्र हो जाता है तथा साथ-साथ कार्य करने वाला भी प्रसन्न तथा अपने कार्य से सन्तुष्ट रहा करता है। इस स्थिति में गृह-कार्य-व्यवस्था उत्तम रहती है तथा परिवार का वातावरण भी अच्छा एवं उत्साहवर्द्धक रहता है। इसके विपरीत, यदि परिवार के सदस्यों को उनकी अभिरुचि के विरुद्ध कार्य सौंप दिए जाएँ तो वे न तो सम्बन्धित कार्य को ही अच्छे ढंग से कर पाते हैं और न ही उन्हें सम्बन्धित कार्य को करने में किसी प्रकार की प्रसन्नता ही होती है। (UPBoardSolutions.com) ऐसी स्थिति में गृह-कार्य जैसे-तैसे पूरे तो हो सकते हैं। परन्तु न तो गृह-कार्य-व्यवस्था उत्तम रह सकती है और न ही परिवार के सदस्य प्रसन्न रह सकते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिया जाता है कि जहाँ तक हो सके परिवार के प्रत्येक सदस्य को उसकी अभिरुचि के अनुकूल ही गृह-कार्य सौंपने चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घर-परिवार के सन्दर्भ में कार्य-व्यवस्था से क्या आशय है?
उत्तर:
घर-परिवार के सम्बन्ध में कार्य-व्यवस्था से आशय है-घर तथा परिवार से सम्बन्धित समस्त कार्यों को सुनियोजित ढंग से पूरा करना।

UP Board Solutions

प्रश्न 2:
गृह-कार्य व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
गृह-कार्य व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्य हैं-समय, श्रम तथा धन की समुचित बचत करना।

प्रश्न 3:
गृह-कार्य-व्यवस्था के लक्ष्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य व्यवस्था का लक्ष्य है-परिवार के रहन-सहन के स्तर को उन्नत बनाना। इसके माध्यम से पारिवारिक जीवन को सुखी एवं सरल बनाया जाता है।

प्रश्न 4:
गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारू एवं उत्तम बनाने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था को सुचारु एवं उत्तम बनाने के उपाय हैं-परिवार के सभी सदस्यों द्वारा गृह-कार्यों में अपनी शक्ति, क्षमता, बुद्धि एवं रुचि के अनुसार कुशलतापूर्वक यथासम्भवं योगदान देना।

प्रश्न 5:
गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक चार मुख्य कारक बताइए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक चार मुख्य कारक हैं

  1.  समस्त गृह-कार्यों का समुचित नियोजन,
  2. गृह-कार्यों में परिवार के सभी सदस्यों का यथासम्भव सहयोग प्रदान करना,
  3. उत्तम कार्य-विधियों का ज्ञान तथा
  4.  समस्त आवश्यक साधनों का उपलब्ध होना।

UP Board Solutions

प्रश्न 6:
गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक मुख्य उपकरणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था में सहायक मुख्य उपकरण हैं-कुकर, मिक्सरे-ग्राइण्डर, टोस्टर, ओवन, फ्रिज, वैक्यूम क्लीनर, बर्तन धोने की मशीन तथा कपड़े धोने की मशीन।।

प्रश्न 7:
अभिरुचि से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
किसी कार्य के प्रति रुचि तथा उसे सीखने की क्षमता को सम्मिलित रूप से अभिरुचि कहते

प्रश्न 8:
परिवार के सदस्यों की अभिरुचि के अनुसार कार्य सौंपने से क्या लाभ होता है?
उत्तर:
परिवार के सदस्यों को अभिरुचि के अनुसार कार्य सौंपने पर सभी कार्य अच्छे ढंग से तथा शीघ्र ही पूरे हो जाते हैं।

प्रश्न 9:
कुछ सार्वजनिक अथवा सामुदायिक सुविधाएँ बताइए।
उत्तर:

  1. डाकघर एवं बैंक,
  2.  शिक्षण संस्थाएँ,
  3. बाजार,
  4. चिकित्सा सुविधा आदि।

प्रश्न 10:
नियोजित परिवार के सुखी रहने के कारण बताइए।
उत्तर:

  1. सदस्यों के शारीरिक व मानसिक विकास के अधिक अवसरों की उपलब्धि।
  2.  बच्चों को शिक्षा के अच्छे अवसर।
  3. आर्थिक क्षमता एवं सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि।

UP Board Solutions

प्रश्न 11:
गृह-कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-कार्य-व्यवस्था को कुप्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं

  1.  सूझ-बूझ की न्यूनता,
  2.  आवश्यक साधनों का अभाव,
  3.  पारिवारिक कलह।

प्रश्न 12:
घर पर कार्य करने वाले नौकरों के प्रति कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए?
उत्तर:
घर पर कार्य करने वाले नौकरों के प्रति सन्तुलित व्यवहार करना चाहिए, अर्थात् उनके प्रति न तो कठोर व्यवहार किया जाना चाहिए और न ही उन्हें आवश्यकता से अधिक ढील दी जानी चाहिए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) गृह-कार्य-व्यवस्था से आशय है
(क) परिवार के लिए अधिक धन जुटाना,
(ख) घर की सफाई एवं सजावट की व्यवस्था करना,
(ग) घर-परिवार के कार्यों को सुचारू रूप से चलाना,
(घ) घर के कार्य जैसे-तैसे पूरे कर देना।

(2) गृह-कार्य-व्यवस्था को प्रभावित करने वाला मुख्यतम कारक है
(क) मधुर व्यवहार,
(ख) पारिवारिक आय का अधिक होना,
(ग) सुनियोजित ढंग से कार्य करना,
(घ) सहयोगपूर्वक कार्य करना।

(3) भौतिक साधनों में सर्वश्रेष्ठ साधन है
(क) खाद्य पदार्थ,
(ख) घरेलू उपकरण,
(ग) वस्त्र,
(घ) धनः

UP Board Solutions

(4) उत्तम कार्य-व्यवस्था के लिए गृहिणी को मिलना चाहिए
(क) पुरस्कार,
(ख) प्रोत्साहन,
(ग) धन,
(घ) कुछ नहीं।

5. कार्यों को कुशलतापूर्वक करने के लिए उपयोग करना चाहिए
(क) धन की,
(ख) उपयोगी यन्त्रों एवं उपकरणों को,
(ग) परिश्रम को,
(घ) समय का।

(6) गृहिणी को पारिवारिक सदस्यों के मध्य कार्य-विभाजन का आधार रखना चाहिए
(क) उनकी कार्यक्षमता,
(ख) उनकी योग्यता,
(ग) उनकी योग्यता एवं कार्यक्षमता,
(घ) उनकी स्वयं की इच्छा।

(7) गृह-कार्य-व्यवस्था का स्तर निर्भर करता है
(क) अधिक आय पर,
(ख) धन की मितव्ययिता पर,
(ग) समय तथा श्रम बचाने वाले साधनों पर,
(घ) इनमें से कोई नहीं।

(8) रसोईघर में श्रम की बचत करने वाला उपकरण है
(क) टोस्टर,
(ख) हीटर,
(ग) प्रेशर कुकर,
(घ) मिक्सर-ग्राइण्डर।

UP Board Solutions

9. बिना पूर्व सूचना के मेहमान आ जाने पर किए जाने वाले अतिरिक्त कार्यों को कहा जाता है
(क) अनावश्यक कार्य,
(ख) थकाने वाला कार्य,
(ग) आकस्मिक कार्य,
(घ) वार्षिक कार्य।

उत्तर:
(1). (ग) घर-परिवार के कार्यों को सुचारू रूप से चलाना,
(2). (ग) सुनियोजित ढंग से कार्य करना,
(3). (घ) धन,
(4). (ख) प्रोत्साहन,
(5). (ख) उपयोगी यन्त्रों एवं उपकरणों का,
(6). (ग) उनकी योग्यता एवं कार्यक्षमता,
(7). (ग) समय तथा श्रम बचाने वाले साधनों पर,
(8). (घ) मिक्सर-ग्राइण्डर,
(9). (ग) आकस्मिक कार्य।

We hope the UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 3 कार्य-व्यवस्था help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 3 कार्य-व्यवस्था, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions

UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions (रचनाएँ)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions (रचनाएँ).

प्रश्नावली 11.1

प्रश्न 1. एक दी हुई किरण के प्रारम्भिक बिन्दु पर 90° के कोण की रचना कीजिए और कारण सहित रचना की पुष्टि कीजिए।
हल :
दिया है : AB एक दी हुई किरण है जिसका प्रारम्भिक बिन्दु A है।
रचना करनी है: किरण AB के बिन्दु A पर 90° के कोण की।
विश्लेषण : हम 60° का कोण बना सकते हैं।
इस कोण के साथ 60° का एक संलग्न कोण बनाकर उसे समद्विभाजित करें और इसमें जोड़ दें तो 90° का कोण प्राप्त होगा।
अर्थात 90° = 30° + 60°
रचना :

  1. किरण AB खींची।
  2. A को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या का चाप खींचा जो किरण AB को बिन्दु P पर काटता है।
  3. अब P को केन्द्र मानकर उसी त्रिज्या का एक चाप खींचा जो पहले चाप को बिन्दु Q पर काटता है। ∠PAQ = 60° है।
  4. पुनः Q को केन्द्र मानकर उसी (AP) त्रिज्या से एक अन्य चाप खींचा जो पहले चाप को बिन्दु R पर काटे। ∠QAR = 60° है।
  5. बिन्दु Q तथा R को केन्द्र मानकर चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु C पर काटते हैं। रेखाखण्ड CA खींचा। ∠CAQ = 30° है।

प्रकार ∠CAB = ∠BAQ + ∠QAC = 60° + 30° = 90° हुआ।
अत: ∠CAB अभीष्ट कोण है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-1

प्रश्न 2.
एक दी हुई किरण के प्रारम्भिक बिन्दु पर 45° के कोण की रचना कीजिए और कारणसहित रचना की पुष्टि कीजिए।
हुल :
दिया है : OP एक दी हुई किरण है जिसका प्रारम्भिक बिन्दू 0 है।
रचना करनी है : किरण OP के बिन्दु 0 पर 45° के कोण की।
विश्लेषण : 45° = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x 90°
अत: 90° का कोण बनाकर उसे समद्विभाजित करके 45° का कोण प्राप्त होगा।
रचना :

  1. किरण OP खींची।
  2. O को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या OA का एक चाप लगाया जो किरण OP को A पर काटता है।
  3. A को केन्द्र मानकर उसी त्रिज्या का एक चाप खींचा जो पहले चाप को B पर काटता है।
  4. B को केन्द्र मानकर उसी त्रिज्या का एक अन्य चाप खींचा जो केन्द्र O वाले चाप को C पर काटता है।
  5. B तथा C को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु R पर काटते हैं। रेखाखण्ड OR खींचा जो चाप BC को D पर काटता है। ∠POR = 90° है।
  6. बिन्दुओं A तथा D को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो। चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु Q पर काटते हैं। रेखाखण्ड OQ खींचा। ∠POQ = 45° क्योंकि OQ, ∠POR = 90° का समद्विभाजक है।

अतः ∠POQअभीष्ट कोण है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-2

UP Board Solutions

प्रश्न 3. निम्नलिखित मापों के कोणों की रचना कीजिए :
(i) 30°
(ii) 22[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]°
(iii) 15°
हल :
(i) रचना करनी है : 30° के कोण की। विश्लेषण : 30° = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x 60°
रचना :

  1. एक किरण OA खींची।
  2. किरण OA के अन्त्य बिन्दु O को केन्द्र मानकर कोई त्रिज्या OB लेकर एक चाप लगाया जो GA को B पर काटता है।
  3. अब B को केन्द्र मानकर उसी त्रिज्या से एक अन्य चाप खींचा जो पहले चाप को बिन्दु,C पर काटता है। ∠AOC = 60° है।
  4. बिन्दुओं B तथा C को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु D पर काटते हैं।
  5. ∠AOC का अर्धक (समद्विभाजक) OD खींचा। तब ∠AOD= 30° जो कि अभीष्ट कोण है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-3

(ii) रचना करनी है : 22[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]° के कोण की।
विश्लेषण : 90° के कोण का समद्विभाजक खींचने पर 45° का कोण प्राप्त होता है और इस 45° के कोण का समद्विभाजक खींचने पर 22[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]° का कोण प्राप्त होगा।
22[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]° = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x [latex]\frac { 90 }{ 2 }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x 45°
रचना :

  1. एक किरण OA खींची।।
  2. किरण OA के अन्त्य बिन्दु 0 को केन्द्र मानकर OP त्रिज्या का एक चाप खींचा जो किरण OA को बिन्दु Pपर काटता है।
  3. P को केन्द्र मानकर OP त्रिज्या से एक चाप खींचा जो पहले चाप को Q पर काटता है।
  4. Q को केन्द्र मानकर उसी OP त्रिज्या का चाप खींचा जो चाप PQ को R पर काटता है।
  5. Q और R को केन्द्र मानकर चाप खींचे जो परस्पर T पर काटता है। रेखाखण्ड OT खींचा जो चाप PQR को S पर काटता है। ∠AOT = 90° है।।
  6. बिन्दुओं P तथा S को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु C पर काटते हैं।
  7. ∠AOT का समद्विभाजक OC खींचा। जो चाप PQR को U पर काटता है। ∠AOC = 45° है।
  8. बिन्दुओं P तथा U को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु B पर काटते हैं।
  9. ∠POU का समद्विभाजक OB खींचा।

अतः ∠AOB = 22[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]° जो कि अभीष्ट कोण है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-4
(iii) रचना करनी है : 15° के कोण की।
विश्लेषण : 60° के कोण का समद्विभाजक 30° का कोण बनाया। अब 30°C के कोण का समद्विभाजक 15° का कोण बनाया।
अर्थात 15° = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ([latex]\frac { 60 }{ 2 }[/latex]) = [latex]\frac { 30 }{ 2 }[/latex]
रचना :

  1. किरण OA के अन्त्य बिन्दु 0 से किरण OA पर ∠AOC = 60° इस अध्याय की रचना-3 में वर्णित विधि से बनाया।
  2. ∠AOC का समद्विभाजक OD खींचा। ∠AOD = 30° है जिसे इस प्रश्न के भाग (i) में वर्णित विधि से बनाया।
  3. बिन्दुओं B तथा P को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु E पर काटते हैं।
  4. अब ∠AOD का समद्विभाजक OE खींचा। तब ∠AOE = 15° जो कि अभीष्ट कोण है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-5

प्रश्न 4. निम्नलिखित कोणों की रचना कीजिए और चाँदे द्वारा मापकर पुष्टि कीजिए :
(i) 75°
(ii) 105°
(iii) 135°
हल :
(i) रचना करनी है : 75° के कोण की।
विश्लेषण : 75° = 90° – 15° = 90° – (30° के कोण [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex])
रचना :

  1. प्रश्न-1 की भाँति वर्णित विधि से ∠POQ= 90° बनाया और किरण OB खींची।
  2. बिन्दुओं B तथा T को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु S पर काटते हैं।
  3. ∠BOQ = ∠POQ – ∠POB = 90° – 60° = 30° का। समद्विभाजक OS खींचा। जिससे ∠QOS = 15°
  4. स्पष्ट है कि ∠POS = ∠POQ – ∠QOS = 90° – 15° = 75°
    अतः ∠POS अभीष्ट कोण है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-6

(ii) रचना करनी है : 105° के कोण की।
विश्लेषण : 60° + 30° + (30° x [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]) = 105°
अथवा 90 अथवा 90° + (30° x [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]) = 105°
रचना :

  1. प्रश्न-1 की भाँति वर्णित विधि से सर्वप्रथम ∠POQ = 90° बनाया।
  2. किरण OC खींची। (स्पष्ट है कि ∠QOC = 30°)
  3. बिन्दुओं T तथा C को केन्द्र मानकर किसी त्रिज्या के दो चाप खींचे जो परस्पर बिन्दु S पर काटते हैं।
  4. ∠QOC का समद्विभाजक OS खींचा जिससे ∠QOS = 15°।
    स्पष्ट है कि ∠POS = ∠POQ + ∠QOS = 90° + 15° = 105°
    इस प्रकार, ∠POS = 105° का अभीष्ट कोण है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-7

(iii) रचना करनी है : 135° के कोण की।
विश्लेषण : 135° = 90° + 45°
रचना :

  1. रेखा QP खींची और इस पर एक बिन्दु 0 लिया।
  2. प्रश्न-1 की भाँति वर्णित विधि से O से OR ⊥ QP खींची जिससे ∠POR = 90°
  3. प्रश्न-2 की भाँति वर्णित विधि से ∠QOR का समद्विभाजक OS खींचा।
    ∠ROS = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x ∠QOR = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x 90° = 45° (∠POR = ∠QOR = 90°]
    तथा ∠POS = ∠POR + ∠ROS = 90° + 45° = 135°
    तब ∠POS अभीष्ट 135° का कोण है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-8

प्रश्न 5. एक समबाहु त्रिभुज की रचना कीजिए, जब इसकी भुजा दी हो तथा कारण सहित रचना कीजिए।
हल :
दिया है : समबाहु त्रिभुज ABC की भुजा BC
रचना करनी है : समबाहु त्रिभुज ABC की।
रचना :

  1. रेखाखण्ड BC दी गई माप का खींचा।
  2. B तथा Cको केन्द्र मानकर BC त्रिज्या के दो चाप लगाए जो परस्पर A पर काटते हैं।
  3. रेखाखण्ड AB तथा AC खींचे।
    त्रिभुज ABC अभीष्ट समबाहु त्रिभुज है।
    उपपत्ति : AB = BC और AC = BC (रचना से)
    ⇒ AB = BC = AC
    त्रिभुज ABC समबाहु ही है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-9

प्रश्नावली 11.2

UP Board Solutions

प्रश्न 1. एक त्रिभुज ABC की रचना कीजिए जिसमें BC = 7 सेमी, ∠B = 75° और AB + AC = 13 सेमी हो।
हल :
दिया है : ∆ABC में BC = 7 सेमी, ∠B = 75° और AB+ AC = 13 सेमी है।
रचना करनी है : ∆ABC की।
रचना :

  1. एक किरण BX खींचकर उसमें से रेखाखण्ड BC = 7.0 सेमी काटा।
  2. BC के बिन्दु B से BC पर ∠CBY = 75° बनाया।
  3. BY में से BD = 13 सेमी काटा।
  4. CD को मिलाया और उसका लम्ब समद्विभाजक खींचा जिसने BD को बिन्दु A पर काटा।
  5. रेखाखण्ड AC खींचा।
    ∆ABC अभीष्ट त्रिभुज है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-10

प्रश्न 2. एक त्रिभुज ABC की रचना कीजिए जिसमें BC = 8 सेमी, ∠B = 45° और AB – AC = 3.5 सेमी हो।
हल :
दिया है : ABC एक त्रिभुज है जिसमें BC = 8 सेमी, ∠B = 45° व AB – AC = 3.5 सेमी है।
रचना करनी है : ∆ABC की।
रचना :

  1. एक रेखाखण्ड BC = 8.0 सेमी खींचा।
  2. बिन्दु B से BC पर ∠XBC = 45° बनाया।
  3. BX में से BD = 3.5 सेमी काटा।
  4. CD को मिलाया।
  5. CD को लम्बे समद्विभाजक खींचा जो बढ़ी हुई BD को A पर काटता है।
  6. AC को मिलाया।
    ∆ABC अभीष्ट त्रिभुज है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-11

प्रश्न 3. एक त्रिभुज PQR की रचना कीजिए जिसमें QR = 6 सेमी, ∠Q = 60° और PR – PQ = 2 सेमी हो।
हल :
दिया है : ∆PQR में, QR = 6 सेमी, ∠Q = 60°, भुजा PQ < PR और PR – PG = 2 सेमी है।
रचना करनी है : ∆PQR की।
रचना :

  1. रेखाखण्ड QR = 6 सेमी खींचा।
  2. Q से QR पर ∠XQR = 60° बनाया।
  3. X को आगे बढ़ाया और उसमें से QS = (PR – PQ) = 2 सेमी काट लिया।
  4. SR को मिलाया।
  5. SR का लम्ब समद्विभाजक खींचा जो OX को P पर काटता है।
  6. रेखाखण्ड PR खींचा। ∆PQR अभीष्ट त्रिभुज है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-12

प्रश्न 4. एक त्रिभुज XYZ की रचना कीजिए, जिसमें ∠Y = 30°, ∠Z = 90° और XY + YZ + ZX = 11 सेमी हो।
हल :
दिया है : ∆XYZ में, ∠Y = 30°, ∠Z = 90° है
तथा XY + YZ + ZX = 11 सेमी है।
रचना करनी है : ∆XYZ की।
रचना :

  1. त्रिभुज की परिमाप (XY + YZ + ZX)= 11 सेमी के बराबर माप का रेखाखण्ड PQ खींचा।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-13
  2. P पर ∠RPQ = 30° व Q पर ∠SQP = 90° दिए हुए आधार कोण बनाए।
  3. ∠RPQ व ∠SQP के समद्विभाजक खींचे जो परस्पर शीर्ष X पर काटते हैं।
  4. PX का लम्ब समद्विभाजक खींचा जो PQ को Y पर काटता है।
  5. QX का लम्ब समद्विभाजक खींचा जो PQ को Z पर काटता है।
  6. XY और XZ को मिलाया।
    ∆XYZ अभीष्ट त्रिभुज है।

UP Board Solutions

प्रश्न 5. एक समकोण त्रिभुज की रचना कीजिए जिसका आधार 12 सेमी और कर्ण व अन्य भुजा का योग 18 सेमी हो।
हल :
दिया है : समकोण ∆ABC में आधार BC = 12 सेमी, ∠C = 90°
तथा कर्ण AB व एक अन्य भुजा AC का योग 18 सेमी हो।
रचना करनी है : समकोण ∆ABC की।
रचना :

  1. रेखाखण्ड BC = 12 सेमी खींचा।
  2. बिन्दु C से BC पर ∠BCX = 90° बनाया।
  3. CX में से CD = (AB + AC) = 18 सेमी काट लिया।
  4. रेखाखण्ड BD खींचा।
  5. BD का लम्ब समद्विभाजक खींचा जिसने CD को बिन्दु A पर काटा।
  6. रेखाखण्ड AB खींचा।
    ∆ABC अभीष्ट त्रिभुज है।
    UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 11 Constructions img-13

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वायु क्या है? इसमें सम्मिलित तत्त्वों का वर्णन कीजिए। शुद्ध वायु स्वास्थ्य के लिए क्यों आवश्यक है?
या
वायु के प्राकृतिक संगठन का विस्तार से वर्णन कीजिए।शुद्ध वायु के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वायु से प्रत्येक व्यक्ति भली-भाँति परिचित है। भले ही वायु को हम देख नहीं सकते परन्तु प्रत्येक व्यक्ति वायु का अनुभव एवं सेवन करता रहता है। प्राणी-मात्र के जीवन का आधार वायु ही है। वायु के अभाव में किसी प्रकार के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अब प्रश्न उठता है कि वैज्ञानिक (UPBoardSolutions.com) दृष्टिकोण से वायु क्या है? वायु वास्तव में कुछ गैसों का मिश्रण है। गैसों का यह मिश्रण रंगहीन, स्वादहीन तथा गन्धहीन होता है। वायु में भार होता है तथा यह दबाव डालती है। वायु फैल सकती है तथा संकुचित हो सकती है। इसमें विसरण का गुण भी पाया जाता है। वायु हमारी पृथ्वी के चारों ओर एक व्यापक क्षेत्र में हर समय रहती है। इस क्षेत्र को वायुमण्डल कहा जाता है।

वायू का संगठन

एक समय था जब वायु को एक तत्त्व समझा जाता था। उस समय वायु की गिनती पाँच मुख्य तत्त्वों में की जाती थी, परन्तु विभिन्न वैज्ञानिक खोजों के परिणामस्वरूप इस धारणा को बदलना पड़ा। वर्तमान ज्ञान के अनुसार वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण मात्र है। वायु में विद्यमान मुख्य गैसें हैं-ऑक्सीजन (UPBoardSolutions.com) तथा नाइट्रोजन। इन दो मुख्य गैसों के अतिरिक्त वायु में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रोजन, ऑर्गन तथा जलवाष्प भी विद्यमान रहती है। वायु में लगभग पाँचवा भाग ऑक्सीजन होता है। वायु में विद्यमान गैसों का संगठन निम्नवर्णित तालिका द्वारा स्पष्ट हो जाएगा।
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन
वायु के इस संगठन को चित्र द्वारा भी दर्शाया गया है। वायु में विद्यमान विभिन्न गैसों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन
ऑक्सीजन:
वायु में ऑक्सीजन का आयतन लगभग 21% होता है। ऑक्सीजन जीवन के लिए . अति आवश्यक है। इसे प्राण-वायु भी कहते हैं। ऑक्सीजन प्रायः सभी जीवधारियों की श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक है। प्राणी हों अथवा पौधे, सभी श्वसन क्रिया के लिए ऑक्सीजन लेते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन करते हैं। श्वसन क्रिया में नासिका द्वारा शुद्ध वायु हमारे फेफड़ों में पहुँचती है। फेफड़ों की रुधिर कोशिकाओं में ऑक्सीजन का अवशोषण होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड वायु में छोड़ दी जाती है ताकि बाह्य-श्वसन (UPBoardSolutions.com) द्वारा वायुमण्डल में मुक्त हो जाए। रुधिर द्वारा ऑक्सीजन विभिन्न ऊतकों एवं केशिकाओं में पहुँचती है। यहाँ यह खाद्य के ज्वलन अथवा ऑक्सीकरण में सहायता करती है। इस क्रिया में ऊर्जा उत्पन्न होती है जोकि हमारे शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं का मूल आधार है। इसके अतिरिक्त वायुमण्डल में उपस्थित ऑक्सीजन अन्य ज्वलन क्रियाओं में भी सहायता करती है। कोयला, लकड़ी, तेल, कपड़ा, कागज आदि सभी पदार्थ ऑक्सीजन की उपस्थिति में ही जलते हैं। इन क्रियाओं में ऑक्सीजन प्रयोग में आती है तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। आग के धुएँ में प्राय: कार्बन डाइऑक्साइड व कार्बन मोनोऑक्साइड गैसें होती हैं।

कार्बन डाइऑक्साइड:
वायु में कार्बन डाइऑक्साइड का आयतन लगभग 0.03% होता है। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पौधों एवं प्राणियों की श्वसन क्रिया द्वारा तथा वस्तुओं के जलने के फलस्वरूप बढ़ती रहती है। अन्तः श्वसन (प्रश्वसित वायु) तथा बाह्य श्वसन (उच्छ्वसित वायु) क्रिया में वायु की प्रतिशत मात्रा में परिवर्तन निम्न प्रकार से होता है| इस प्रकार हम देखते हैं कि जैसे-जैसे वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि होती है उसी अनुपात में ऑक्सीजन की मात्रा घटती है। यह स्थिति जीवधारियों के लिए घातक हो सकती है। (UPBoardSolutions.com) इससे बचाव करते हैं हरे पौधे। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश में कार्बन डाइऑक्साइड व जल को प्रयोग कर अपने भोजन का निर्माण करते हैं। इस क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड प्रयुक्त होती है तथा ऑक्सीजन बाहर निकलती है। इस प्रकार हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा वायुमण्डल में ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड गैसों की मात्रा में सन्तुलन बनाए रखते हैं।

नाइट्रोजन:
वायुमण्डल में इसकी मात्रा सर्वाधिक (लगभग 78.08%) होती है। प्रत्यक्ष रूप में यह गैस अधिक उपयोगी नहीं है। न तो यह गैस स्वयं जलती है और न ही वस्तुओं के जलने में सहायता करती है। अतः यह एक प्रकार से निष्क्रिय गैस है, परन्तु परोक्ष रूप से यह एक अति महत्त्वपूर्ण गैस है। यह (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अथवा ज्वलनशील प्रक्रिया की तीव्रता पर अंकुश लगाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वायुमण्डल में यदि नाइट्रोजन न हो, तो ऑक्सीजन की उपस्थिति में संसार की सभी वस्तुएँ जलकर राख हो जाएँगी।

ओजोन:
यह अन्य गैसों (हाइड्रोजन, ऑर्गन, जलवाष्प आदि) के साथ मिलकर वायु का लगभग 0.94% भाग होती है। यह गैस सूर्य की हानिकारक किरणों का अधिकांश भाग सोखकर पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देती है। यह फलों एवं सब्जियों को सड़ने से बचाती है। कुछ रोगों में भी यह लाभकारी पाई गई है। कुल मिलाकर यह गैस मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हुई है।

जलवाष्प:
यह वायु को नम एवं ठण्डा बनाती है। वायुमण्डल में इसकी प्रतिशत मात्रा स्थान विशेष के तापक्रम पर निर्भर करती है। कम ताप पर इसकी मात्रा अधिक व अधिक ताप पर इसकी मात्रा कम होती है। इसकी वायुमण्डल में प्रतिशत मात्रा को आपेक्षिक आर्द्रता कहते हैं। अधिक आर्द्रता वातावरण को भारी व सीलनयुक्त बनाती है। ऐसा वातावरण (जैसे कि वर्षा ऋतु) स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, क्योंकि (UPBoardSolutions.com) इसमें मक्खी, मच्छर व अनेक रोगाणु आसानी से पनपते हैं। समुद्रतल से ऊँचाई की ओर (जैसे कि ऊँची पर्वत-श्रृंखलाएँ) बढ़ने पर वायु की संरचना बदलने लगती है। अधिक ऊँचाई पर वायुमण्डल में ऑक्सीजन की प्रतिशत मात्रा घट जाती है। यही कारण है कि ऊँचाई पर पहुँचकर साँस लेने में कठिनाई अनुभव होती है। उपर्युक्त गैसों के अतिरिक्त वायुमण्डल में धूल के कण, रेडियोधर्मी तत्त्वे व अनेक प्रकार के कीटाणु भी पाए जाते हैं।

शुद्ध वायु का महत्त्व

शुद्ध वायु संसार के सभी प्राणियों एवं पेड़-पौधों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। सभी जीवधारी शुद्ध वायु की उपस्थिति में ही जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण श्वसन क्रिया सम्पादित करते हैं। इसके अतिरिक्त भी शुद्ध वायु से अनेक लाभ हैं, जिनका विस्तृत विवरण अग्रलिखित है

मनुष्यों के लिए उपयोगिता

हमारे जीवन में शुद्ध वायु अनेक रूप में उपयोगी है; जैसे कि

(1) श्वसन क्रिया:
प्रश्वसन क्रिया में हम शुद्ध वायु को नासिका छिद्रों द्वारा फेफड़ों तक खींचते हैं। फेफड़ों में रक्त-केशिकाओं का जाल बिछा होता है। केशिकाओं में उपस्थित रक्त द्वारा वायु से (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन का अवशोषण होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन होता है जो कि नि:घसन द्वारा वायुमण्डल में पहुँच जाती है। रक्त संचरण के द्वारा ऑक्सीजन विभिन्न कोशिकाओं तथा ऊतकों तक पहुँचती है तथा खाद्य के ऑक्सीकरण द्वारा ऊर्जा मुक्त करती है। यह मुक्त ऊर्जा मानव शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक है।

(2) शरीर के ताप को नियमन:
स्वस्थ शरीर का तापमान प्राय: 37° से० के लगभग होता है, जबकि कमरे का तापमान 15°-20° से० तक होता है। अत: कम तापमान वाली वायु जब शरीर को स्पर्श करती है, तो शरीर से कुछ गर्मी लेकर जाती है। इस प्रकार लगातार शरीर की गर्मी अथवा ऊष्मा कम होती रहती है। इसी प्रकार शरीर की त्वचा से पसीने का जब वाष्पीकरण होता है, तो भी शरीर के तापमान में कमी आती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 2:
संवातन से क्या तात्पर्य है? प्राकृतिक साधनों पर आधारित संवातन के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संवातन का अर्थ घर के वायुमण्डल में उत्पन्न हो जाने वाली गर्मी, नमी तथा स्थिरता को समाप्त अथवा कम कर देने की प्रक्रिया को संवातन कहते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत घर के कमरों से गर्म, नम व अशुद्ध स्थिर वायु का निष्कासन तथा शुद्ध, शुष्क व शीतल वायु का प्रवेश होता है। इस (UPBoardSolutions.com) प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी आवासीय स्थल से अशुद्ध वायु के निष्कासन तथा बाहर से शुद्ध वायु के आगमन की समुचित व्यवस्था ही संवातन है। संवातन के परिणामस्वरूप ही किसी आवासीय स्थल में निरन्तर शुद्ध वायु उपलब्ध होती रहती है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से संवातन की समुचित व्यवस्था अति आवश्यक है।

प्राकृतिक साधनों पर आधारित संवतन

प्रकृति ने हमारे वातावरण में संवतन की समुचित व्यवस्था की है। प्राकृतिक संवातन मुख्य रूप से वायुमण्डल में होने वाली चूषण, संनयन तथा विसरण नामक क्रियाओं द्वारा सम्पन्न होता है। इन तीनों क्रियाओं का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है।

(1) चूषण–प्रायः
सभी गैसों का संवहन सिद्धान्त रूप से कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर होता है। इसे चूषण क्रिया कहते हैं। फुटबॉल का उदाहरण देखें। हवा भरने वाले पम्प से दबाव के साथ फुटबॉल में हवा भरी जाती है। पूरी हवा भर जाने पर फुटबॉल के अन्दर वायु का दबाव वायुमण्डल में उपस्थित वायु के दबाव से अधिक हो जाता है। अब फुटबॉल का वाल्व ढीला करने पर इसके भीतर की वायु कम दबाव वाले वायुमण्डल (UPBoardSolutions.com) में तेजी से संवहन करती है और तब तक करती रहती है जब तक कि फुटबॉल के भीतर की वायु का दबाव वायुमण्डल के दबाव के समान नहीं हो जाता। इस सिद्धान्त का उपयोग घर की संवातन व्यवस्था में किया जाता है।

(2) संनयन-यह प्रक्रिया प्रायः
द्रव पदार्थों व गैसों में होती है। हल्के पदार्थों में यह प्रक्रिया तीव्र होती है। उदाहरण के लिए किसी द्रव पदार्थ को गर्म करने पर इसका प्रथम कण अथवा अणु गर्म होते ही फैलकर व हल्का होकर ऊपर की ओर प्रसारित हो जाता है तथा इसका स्थान अपेक्षाकृत ठण्डा कण ले लेता है। फिर यह भी गर्म होकर प्रसारित हो जाता है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार गर्म होने पर कमरे की वायु हल्की होकर ऊपर उठ जाती है तथा इसके द्वारा रिक्त किए गए स्थान की पूर्ति शीतल वायु द्वारी (कमरे के बाहर से) होती है। इस प्रकार संनयन प्रक्रिया द्वारा कमरे में लगातार शीतल एवं शुद्ध वायु का प्रवेश होता रहता है।

(3) विसरण:
इस प्रक्रिया में पदार्थ अधिक सान्द्रता अथवा मात्रा वाले स्थान से कम सान्द्रता अथवा मात्रा वाले स्थान की ओर विसरित करते हैं; उदाहरणार्थ-एक सेण्ट अथवा इत्र की शीशी कमरे के एक कोने में खोलने पर धीरे-धीरे इत्र की सुगन्ध पूरे कमरे में फैल जाती है। इसी प्रकार एक गिलास पानी में स्याही की एक बूंद डालकर हिलाने पर पूरा पानी ही रंगीन हो जाता है। ठोस, द्रव तथा गैस तीनों ही प्रकार के पदार्थों में विसरण (UPBoardSolutions.com) की यह प्रक्रिया पाई जाती है। विसरण की प्रक्रिया संवातन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। कमरे की वायु नमी व बाह्य श्वसन की – कार्बन डाइऑक्साइड गैस के कारण सान्द्र हो जाती है; अत: यह बाहर (कम सान्द्र वायु) की ओर विसरण करती है तथा कम सान्द्रता वाली शुद्ध व शीतल वायु कमरे में अन्दर की ओर विसरण करती है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि कमरे के अन्दर व बाहर की वायु की सान्द्रता समान नहीं हो जाती।

संवातन की प्राकृतिक व्यवस्था के लिए उपयोगी उपाय

व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए उपयुक्तं संवातन व्यवस्था का होना आवश्यक है।
अतः संवातन की उपयुक्त व्यवस्था के लिए निम्नलिखित उपायों को प्रयोग में लाना विवेकपूर्ण है

(1) मकान की व्यवस्था:
नियोजित बस्तियों में आवास-गृहों का निर्माण परस्पर पर्याप्त दूरी पर होना चाहिए, एक-दूसरे से मिले हुए मकानों में वायु का प्रवेश स्वतन्त्र रूप से नहीं हो पाता, जबकि दूर-दूर बने मकानों में वायु का संवातन भली प्रकार से होता है।

(2) दरवाजे एवं खिड़कियाँ:
मकान में दरवाजे एवं खिड़कियाँ पर्याप्त संख्या में होनी आवश्यक हैं। कमरों में दरवाजों एवं खिड़कियों की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए कि जिससे वायु आमने-सामने
आर-पार सरलता से आ-जा सके।

(3) रोशनदान:
गर्म होने से वायु हल्की हो जाती है तथा ऊपर की ओर उठती है। अतः गर्म एवं अशुद्ध वायु के निष्कासन के लिए कमरे में रोशनदान का होना अनिवार्य है। रोशनदान का एक लाभ यह भी है कि सूर्य की किरणें इससे कमरे में प्रवेश पाकर हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करती रहती हैं।

(4) चिमनी:
यह प्राय: रसोई-गृह में निर्मित की जाती हैं। ईंधन के जलने से उत्पन्न धुआँ चिमनी द्वारा ही रसोई-गृह से निष्कासित होता है। इसका लाभ यह है कि गृहिणी न तो घुटन महसूस करती है। और न ही उसके नेत्रों पर धुएँ का कुप्रभाव पड़ता है। आधुनिक युग में धुआँ उत्पन्न करने वाले ईंधन का प्रयोग धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है तथा इसके स्थान पर कुकिंग गैस व विद्युत चूल्हों का उपयोग होने लगा है। अतः अब रसोई-गृह में चिमनी के निर्माण की आवश्यकता लगभग नगण्य हो गई है।

प्रश्न 3:
संवातन के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली कृत्रिम विधियों का वर्णन कीजिए।
या
सामान्य विद्युत पंखों, निर्वातक पंखों एवं वातानुकूलन संयन्त्रों का संवातन के लिए उपयोग किन-किन पद्धतियों के आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
संवातन के प्राकृतिक साधनों के अनुसार मकान में कमरे पर्याप्त लम्बे, चौड़े व ऊँचे होने चाहिए तथा कमरों में पारगमन संवातन के लिए दरवाजे व खिड़कियाँ अधिक संख्या में तथा उपयुक्त स्थानों पर बनी होनी चाहिए, परन्तु इसमें प्रायः निम्नलिखित दो कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है

  1.  स्थान के अभाव के कारण प्राय: पर्याप्त लम्बाई, चौड़ाई व ऊँचाई वाले कमरों के मकानों का निर्माण करना सम्भव नहीं हो पाता है।
  2. वर्ष में अनेक बार (जैसे कि ग्रीष्म ऋतु में) वायु अत्यन्त मन्द गति से संचरण करती है, जिसके फलस्वरूप मकानों में शुद्ध एवं शीतल वायु का उपयुक्त संवातन नहीं हो पाता है; अतः मकानों में घुटन भरा गर्म वातावरण रहता है।
    उपर्युक्त कठिनाइयों से निपटने के लिए आज के आधुनिक युग में अनेक प्रकार के विद्युत उपकरणों (संवातन के कृत्रिम साधन) का उपयोग किया जाता है। मकानों एवं सार्वजनिक भवनों में संवातन की उत्तम व्यवस्था के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले प्रमुख विद्युत संयन्त्र निम्नलिखित हैं

(1) सामान्य विद्युत पंखे:
सामान्य पंखे प्लीनम पद्धति पर आधारित होते हैं। इनके द्वारा वायु की गति अधिक संवहनशील हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप दूषित वायु की निकासी शीघ्र होती रहती है।

(2) निर्वातक पंखे (एक्जॉस्ट फैन):
ये पंखे निर्वात पद्धति पर आधारित होते हैं। इस पद्धति में कमरे की अशुद्ध गर्म वायु को पंखों द्वारा बाहर धकेल दिया जाता है, जिसका स्थान शुद्ध एवं शीतल वायु लेती रहती है, परिणामस्वरूप कमरे में संवतन की व्यवस्था ठीक बनी रहती है। निर्वातक पंखे प्रायः प्रयोगशालाओं, अस्पतालों, छविगृहों व घुटन भरे कमरों में लगाए जाते हैं।

(3) सामान्य व निर्वातक पंखों का मिश्रित उपयोग:
इन दोनों प्रकार के पंखों का एक साथ उपयोग मिश्रित अथवा मिली-जुली पद्धति पर आधारित है। इस पद्धति का उपयोग विशाल भवनों, छविगृहों एवं अस्पतालों आदि में किया जाता है। इसके अनुसार निर्वातक पंखे अशुद्ध एवं गर्म वायु को बाहर फेंकते हैं तथा सामान्य पंखे अन्दर की वायु को गति प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह पद्धति संवात्नन व्यवस्था को अत्यन्त प्रभावी बना देती है।

(4) वातानुकूलन:
आदर्श संवातन की यह आधुनिकतम पद्धति है। इस पद्धति में वायु को उचित तापमान, वांछित स्वच्छता तथा उपयुक्त आर्द्रता प्रदान की जाती है। कमरे में श्वसन क्रिया के कारण उत्पन्न हुई अशुद्ध वायु वातानुकूलन संयन्त्र के शुद्धिकरण भाग में पहुँचकर शुद्ध हो जाती है। बाहर से आने वाली वायु भी सर्वप्रथम शुद्धिकरण भाग में प्रवेश करती है, जिससे यह धूल के कणों एवं कीटाणुओं से मुक्त हो जाती है।
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन
संयन्त्र के शीतलीकरण भाग द्वारा कमरे में वांछित तापमान बनाए रखा जाता है। इस प्रकार इस विधि द्वारा कमरे की संवातन व्यवस्था अत्यन्त प्रभावी बनी रहती है। इस विधि की एकमात्र कमी यह है कि अत्यधिक महँगी होने के कारण यह जनसाधारण की पहुँच से बाहर है। वातानुकूलन यन्त्रों का उपयोग प्रायः धनी परिवारों, छविगृहों, बड़े-बड़े राजकीय अस्पतालों, सार्वजनिक व राजकीय भवनों तथा उच्च श्रेणी के रेल के डिब्बों इत्यादि में किया जाता है।

UP Board Solutions

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वायु के कौन-कौन से चार प्रमुख कार्य हैं?
उत्तर:
वायु के महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं

  1.  समस्त जीवधारियों की श्वसन क्रियों का मूल आधार होना,
  2.  प्राणियों में शारीरिक तापमान का नियमन करना,
  3. जल की उत्पत्ति करना तथा
  4.  हरे पौधों में भोजन-निर्माण की प्रक्रिया का मूल आधार होना।

प्रश्न 2:
वर्षा ऋतु की नमी से हमें क्या हानियाँ हैं?
उत्तर:
वर्षा ऋतु में नमी होने के कारण वायु में जलवाष्प (आर्द्रता) की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार के वातावरण में फफूदी, कीटाणु व कीट-पतंगे अधिक पनपते हैं। इसके हानिकारक परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. फफूदी के कारण भोज्य पदार्थ शीघ्र ही सड़ने लगते हैं तथा खाने योग्य नहीं रहते।
  2. चमड़े, लकड़ी व कागज की वस्तुएँ फफूदी के पनपने के कारण अपनी गुणवत्ता खो देती हैं।
  3.  कीटाणुओं के वातावरण में पनपने के कारण विभिन्न रोगों के होने की सम्भावनाएँ बन जाती हैं।
  4. वस्तुओं पर फफूदी व अन्य सूक्ष्मजीवियों के पनपने के कारण वातावरण में सड़न की दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3:
प्रकृति वायुमण्डल में प्राण-वायु( ऑक्सीजन) की मात्रा का सन्तुलन किस प्रकार कर पाती है?
या
वायु को शुद्ध करने में प्रकृति किस प्रकार सहायता करती है?
उत्तर:
वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग 21 प्रतिशत होती है। ऑक्सीजन समस्त प्राणियों को उनकी श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक है। श्वसन क्रिया में प्राणी वायु से ऑक्सीजन लेते हैं। तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैसे निष्कासित करते हैं। इसके अतिरिक्त लगभग सभी वस्तुएँ; जैसे लकड़ी, कोयला, कागज आदि ऑक्सीजन की उपस्थिति में ही जलती हैं तथा धुएँ के रूप में कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड गैसों को वायुमण्डल में निष्कासित करती हैं। परिणाम यह होता है कि वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा घटने (UPBoardSolutions.com) लगती है। प्रकृति इस स्थिति से निपटने के लिए पूर्णरूप से सक्षम है। हरे पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड व पानी का उपयोग कर अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं। इस क्रिया के फलस्वरूप वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा घटती है तथा इसे क्रिया में ऑक्सीजन गैस उत्पन्न होती है। इस प्रकार हरे पौधे वायुमण्डल में ऑक्सीजन गैस निष्कासित कर इसकी मात्रा का सन्तुलन बनाए रखते हैं।

प्रश्न 4:
अच्छे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से आप अपने मकान में किस प्रकार के कमरे बनवाएँगी?
उत्तर:
सामान्यतः मनुष्य एक घण्टे में लगभग 100 घन मीटर वायु ग्रहण करता है। यदि उस वायु का एक घण्टे में तीन बार भी परिवर्तन हो, तो एक मनुष्य के लिए लगभग 33 घन मीटर स्थान की आवश्यकता पड़ेगी। अतः मकान में लम्बे, चौड़े व ऊँचे कमरों का होना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद रहता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए घर के अन्दर व बाहर उत्तम संवातन व्यवस्था का होना भी आवश्यक है। अतः कमरों में दरवाजे व खिड़कियाँ इस प्रकार से होनी चाहिए कि वायु का पारगमन सरलतापूर्वक हो सके।

UP Board Solutions

प्रश्न 5:
घर से बाहर की संवातन व्यवस्था के सम्भावित उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
घर के अन्दर वायु का प्रवेश सदैव बाहर से ही होता है। अत: घर की अच्छी-से-अच्छी आन्तरिक संवातन व्यवस्था भी तब तक अप्रभावी ही रहेगी जब तक कि बाहर की संवातन व्यवस्था ठीक प्रकार की न हो। बाहर की. संवातन व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए

  1.  सड़कें तथा गलियाँ चौड़ी होनी चाहिए।
  2.  बस्ती अथवा मौहल्ले में मकानों के बीच पर्याप्त दूरी होनी चाहिए।
  3.  सड़कों व नालियों की सफाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  4. मकानों के आस-पास पार्क व क्रीड़ास्थल होने चाहिए।
  5.  मकानों के आस-पास व सड़कों के दोनों ओर हरे पेड़-पौधे लगे होने चाहिए।

प्रश्न 6:
घर के अन्दर संवातन के मुख्य साधन कौन-कौन से हैं?
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन

प्रश्न 7:
संवातन का क्या महत्त्व है? समझाइए।
उत्तर:
संवातन वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से किसी आवासीय स्थल पर निरन्तर वायु का आवागमन होता रहता है। संवातन की व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप सम्बन्धित स्थल पर शुद्ध एवं स्वच्छ वायु उपलब्ध होती रहती है। इस स्थिति में कमरे की दूषित, गर्म एवं दुर्गन्धयुक्त वायु बाहर निकल जाती है तथा उसके स्थान पर शीतल, शुद्ध वायु प्रवेश कर जाती है। अवासीय स्थल पर संवातन की (UPBoardSolutions.com) उचित व्यवस्था होने की दशा में विभिन्न रोगों के जीवाणुओं को पनपने का अवसर उपलब्ध नहीं होता, कमरे में नमी या घुटन नहीं होती तथा वहाँ का तापमान भी सामान्य बना रहता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संवतन की व्यवस्था सम्बन्धित व्यक्तियों के सामान्य स्वास्थ्य में सहायक होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वायु अपने आप में क्या है?
उत्तर:
वायु अपने आप में विभिन्न गैसों की एक मिश्रण है।

प्रश्न 2:
वायु-रूपी गैसीय मिश्रण में विद्यमान मुख्य गैसों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वायु-रूपी गैसीय मिश्रण में विद्यमान मुख्य गैसें हैं ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, ओजोन तथा ऑर्गन आदि।

प्रश्न 3:
वायु जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
वायु निम्नलिखित दो रूपों में जीवन के लिए आवश्यक है
(1) जीवधारियों में श्वसन क्रिया वायु की उपस्थिति में ही होती है।
(2) यह हमारे शरीर के ताप को नियन्त्रित करने में सहायता करती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 4:
वस्तुओं के जलने से कौन-सी गैस बनती है?
उत्तर:
वस्तुओं के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है।

प्रश्न 5:
संवातन क्या है?
उत्तर:
किसी आवासीय स्थान पर शुद्ध वायु के प्रवेश एवं अशुद्ध वायु के बाहर जाने की व्यवस्था को संवातन कहते हैं।

प्रश्न 6:
रोशनदानों का संवातन में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अशुद्ध वायु गर्म होकर हल्की हो जाती है तथा ऊपर उठकर कमरे में बने रोशनदानों से बाहर निकल जाती है।

प्रश्न 7:
कृत्रिम संवतन के मुख्य साधन क्या हैं?
उत्तर:
कृत्रिम संवातन के मुख्य साधन है

  1.  सामान्य विद्युत पंखे,
  2.  निर्वातक पंखे,
  3.  वातानुकूलन संयन्त्र।

प्रश्न 8:
पारगाम संवातन को प्रभावी बनाने का क्या उपाय है?
उत्तर:
इसके लिए दरवाजों एवं खिड़कियों को ठीक आमने-सामने स्थित होना चाहिए।

प्रश्न 9:
रात्रि में पेड़ के नीचे सोना क्यों हानिकारक है?
उत्तर:
रात्रि में पेड़-पौधों में श्वसन क्रिया अधिक होती है जिसके फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन भी अधिक होता है।
अतः रात्रि में पेड़ के नीचे सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

UP Board Solutions

प्रश्न 10:
पृथ्वी पर वायुमण्डल का क्षेत्र कितना विस्तृत है?
उत्तर:
पृथ्वी पर लगभग 400 किलोमीटर ऊपर तक वायु पाई जाती है।

प्रश्न 11:
वायु को शुद्ध करने में सूर्य के प्रकाश तथा पेड़-पौधों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पेड़-पौधे प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत पेड़-पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड गैस ग्रहण कर लेते हैं तथा
ऑक्सीजन विसर्जित करके वायु को शुद्ध करते हैं।

प्रश्न 12:
वायु में पाई जाने वाली सक्रिय गैस कौन-सी है?
उत्तर:
वायु में पाई जाने वाली मुख्य सक्रिय गैस है-ऑक्सीजन।

प्रश्न 13:
वायु में पाई जाने वाली मुख्य निष्क्रिय गैस कौन-सी है?
उत्तर:
वायु में पाई जाने वाली मुख्य निष्क्रिय गैस है-नाइट्रोजन।

प्रश्न 14:
वर्षा ऋतु में वायु में मुख्य रूप से क्या परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
वर्षा ऋतु में वायु में नमी की दर बढ़ जाती है तथा धूल-कणों एवं अन्य लटकने वाली अशुद्धियाँ घट जाती हैं।

प्रश्न 15:
प्राणवायु अथवा जीवन-रक्षक गैस कौन-सी है?
उत्तर:
ऑक्सीजन गैस, जो कि प्राणियों में श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक होती है।

प्रश्न 16:
वायु संगठन में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का प्रतिशत क्या है?
उत्तर:
वायु संगठन में ऑक्सीजन 20.95% तथा कार्बन डाइऑक्साइड 0.03% होती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) प्रकृति में ऑक्सीजन का सन्तुलन बनाए रखते हैं
(क) मनुष्य,
(ख) कीट-पतंगे,
(ग) वन्य जीव-जन्तु,
(घ) पेड़-पौधे।

UP Board Solutions

(2) वायु को दूषित करने वाला कारक है
(क) प्राणियों की श्वसन क्रिया,
(ख) जैविक पदार्थों का विघटन,
(ग) दहन की व्यापक प्रक्रिया,
(घ) ये सभी कारक।

(3) वायु में विद्यमान गैसों में से सर्वाधिक सक्रिय गैस है
(क) नाइट्रोजन,
(ख) हाइड्रोजन,
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड,
(घ) ऑक्सीजन।

4. वायु में विद्यमान मुख्य निष्क्रिय गैस है
(क) ऑक्सीजन,
(ख) ओजोन,
(ग) नाइट्रोजन,
(घ) कार्बन मोनोऑक्साइड।

(5) संवातन का मुख्य उद्देश्य है
(क) कमरे से दुर्गन्ध को हटाना,
(ख) कमरे में सुगन्ध को बढ़ाना,
(ग) कमरे में शुद्ध वायु प्राप्त करना,
(घ) कमरे को ठण्डा रखना।

(6) कमरे में उत्तम संवातन व्यवस्था के लिए आवश्यक है
(क) दरवाजे,
(ख) खिड़कियाँ,
(ग) रोशनदान,
(घ) पारगामी व्यवस्था।

(7) विद्युत पंखों द्वारा वायु को प्रदान की जाती है
(क) स्थिरता,
(ख) स्थायित्व,
(ग) गति,
(घ) आर्द्रता।

(8) दीवारों में बनी चिमनियों से कमरे की वायु
(क) बाहर निकलती है,
(ख) बाहर भी जाती है तथा अन्दर भी जाती है,
(ग) बाहर से अन्दर आती है,
(घ) कोई प्रभाव नहीं होता।

UP Board Solutions

(9) श्वसन क्रिया में रक्त का शुद्धिकरण करती है
(क) नाइट्रोजन,
(ख) हाइड्रोजन,
(ग) ऑक्सीजन,
(घ) कार्बन मोनोऑक्साइड।

उत्तर:
(1) (घ) पेड़-पौधे,
(2) (घ) ये सभी कारक,
(3) (घ) ऑक्सीजन,
(4) (ग) नाइट्रोजन,
(5) (ग) कमरे में शुद्ध वायु प्राप्त करना,
(6) (घ) पारगामी व्यवस्था,
(7) (ग) गति,
(8) (क) बाहर निकलती है,
(9) (ग) ऑक्सीजन।

We hope the UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.