UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 4 अर्थव्यवस्था : परिवार की मूलभूत आवश्यकताएँ

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
गृह-अर्थव्यवस्था का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह विज्ञान’ घर तथा परिवार सम्बन्धी व्यवस्था का अध्ययन है। घर तथा परिवार की व्यवस्था के अनेक पक्ष हैं। इन पक्षों में ‘अर्थव्यवस्था एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। अन्य समस्त पक्षों में गृहिणी एवं परिजनों के दक्ष होते हुए भी, यदि घर की अर्थव्यवस्था सुचारु न हो, तो परिवार की सुख-शान्ति एवं (UPBoardSolutions.com) समृद्धि संदिग्ध हो जाती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृह विज्ञान में अर्थव्यवस्था का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है तथा प्रत्येक सुगृहिणी से आशा की जाती है कि वह गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम बनाए रखने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करेगी। गृह-अर्थव्यवस्था के अर्थ, परिभाषा तथा उसे प्रभावित करने वाले कारकों का विवरण निम्नवर्णित है

गृह-अर्थव्यवस्था का अर्थ एवं परिभाषा

सार्वजनिक जीवन में अर्थव्यवस्था’ एक विशिष्ट प्रकार की व्यवस्था है जिसका सम्बन्ध मुख्य रूप से धन-सम्पत्ति से होता है। रुपए-पैसे की योजनाबद्ध व्यवस्था ही अर्थव्यवस्था है। प्रत्येक संस्था एवं संगठन के सुचारू संचालन के लिए स्पष्ट एवं सुदृढ़ अर्थव्यवस्था आवश्यक होती है। जब अर्थव्यवस्था को अध्ययन घर-परिवार के सन्दर्भ में किया जाता है, तब इसे गृह-अर्थव्यवस्था कहा जाता है। अर्थव्यवस्था के अर्थ को जान (UPBoardSolutions.com) लेने के उपरान्त गृह-अर्थव्यवस्था का वैज्ञानिक अर्थ भी स्पष्ट किया जा सकता है। घर-परिवार के आय-व्यय को अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर नियोजित करना तथा इस नियोजन के माध्यम से परिवार को अधिक-से-अधिक आर्थिक सन्तोष प्रदान करना ही गृह-अर्थव्यवस्था है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए निकिल तथा डारसी ने गृह-अर्थव्यवस्था को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “परिवार की आय तथा व्यय पर नियन्त्रण होना तथा आय को गृह के सृजनात्मक कार्यों में व्यय करना गृह-अर्थव्यवस्था कहलाता है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि गृह-अर्थव्यवस्था का सम्बन्ध, परिवार की आर्थिक क्रियाओं से होता है। इस स्थिति में यह भी जानना आवश्यक है कि आर्थिक क्रियाओं से क्या आशय है? आर्थिक क्रियाएँ व्यक्ति या परिवार की उन क्रियाओं को कहा जाता है, जिनका धन के उपभोग, उत्पादन, विनिमय अथवा वितरण से होता है। परिवार की विभिन्न आर्थिक गतिविधियाँ ही परिवार की आर्थिक पूर्ति में सहायक होती हैं। इस दृष्टिकोण से परिवार की आर्थिक गतिविधियों का विशेष महत्त्व होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रत्येकै परिवार निरन्तर रूप से असंख्य आवश्यकताओं को महसूस करता है तथा चाहता है कि उसकी समस्त आवश्यकताएँ पूरी होती रहें। परन्तु समस्त आवश्यकताओं को पूरा कर पाना प्रायः सम्भव नहीं होता। इस स्थिति में व्यक्ति अथवा परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित किया जाता है। यह कार्य भी (UPBoardSolutions.com) गृह-अर्थव्यवस्था के ही अन्तर्गत किया जाता है। परिवार का अर्थ-व्यवस्थापक परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करता है तथा प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित प्रयास किए जाते हैं। इस प्रकार की दृष्टिकोण अपना लेने से गृह-अर्थव्यवस्था उत्तम बनी रहती है। सफल गृह-अर्थव्यवस्था के लिए परिवार की आर्थिक गतिविधियों को सुनियोजित बनाना नितान्त आवश्यक है। किसी भी स्थिति में पारिवारिक व्यय को पारिवारिक आय से अधिक नहीं होना चाहिए। आय की तुलना में व्यय के अधिक हो जाने की स्थिति में पारिवारिक अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है तथा परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ जाता है।

गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक

घर-परिवार की सुख-शान्ति तथा समृद्धि के लिए गृह-अर्थव्यवस्था का उत्तम होना नितान्त आवश्यक है। गृह-अर्थव्यवस्था को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों को संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

(1) गृह-अर्थव्यवस्था की सुचारू प्रक्रिया:
परिवार की सम्पूर्ण आय को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक व्यय की व्यवस्थित योजना तैयार करना ही, गृह-अर्थव्यवस्था की प्रक्रिया कहलाती है। इस योजना के अन्तर्गत आय तथा व्यय में सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक होता है। इसके लिए पारिवारिक-बजट का निर्धारण तथा उसका पालन करना सहायक सिद्ध होता है। आय एवं व्यय में परस्पर सन्तुलन रखने की यह योजना गृह-अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से प्रभावित करती है।

(2) पारिवारिक आय:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारकों में पारिवारिक आय एक अति महत्त्वपूर्ण कारक है। पारिवारिक आय के अर्जन में प्रमुख योगदान परिवार के मुखिया का होता है। वास्तव में धनोपार्जन का दायित्व मुख्य रूप से परिवार के मुखिया का ही माना जाता है। मुखिया की आय परिवार की अर्थव्यवस्था को विशेष रूप से प्रभावित करती है। यदि मुखिया के अतिरिक्त परिवार का कोई अन्य सदस्य भी धनोपार्जन करता हो, तो उसकी आय को भी गृह-अर्थव्यवस्था के लिए प्रभावकारी कारक माना जाता है।

(3) गृहिणी की कुशलता:
निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि गृहिणी की कुशलता भी गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। कुशल गृहिणी परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करके आय के अनुसार व्यय करती है। मितव्ययिता ही अच्छी गृहिणी का आवश्यक गुण है। कुशल गृहिणी गृह-अर्थव्यवस्था के लिए जहाँ एक ओर बचत का बजट निर्धारित करती है, वहीं दूसरी
ओर परिवार की आय में यथासम्भव वृद्धि के उपाय भी करती है।

(4) पारिवारिक व्यय का नियोजन:
यह सत्य है कि गृह-अर्थव्यवस्था को परिवार की आय मुख्य रूप से प्रभावित करती है, परन्तु आय के साथ-साथ व्यय का नियोजन भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भले ही परिवार की आय कितनी भी अधिक क्यों न हो, यदि आय से व्यय अधिक हो जाए तो समस्त प्रयास करने के उपरान्त भी (UPBoardSolutions.com) परिवार की अर्थव्यवस्था सन्तुलित नहीं रह पाती। इस प्रकार कहा जा सकता है कि उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था के लिए पारिवारिक व्यय का नियोजन भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यदि नियोजित ढंग से व्यय नहीं किया जाता, तो परिवार की अर्थव्यवस्था के बिगड़ जाने की आशंका रहती है।

(5) परिवार के रहन-सहन का स्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक अन्य कारक है-परिवार के रहन-सहन का स्तर। प्रत्येक परिवार चाहती है कि उसका रहन-सहन का स्तर उन्नत हो। रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए पर्याप्त धन व्यय करना पड़ता है। इस स्थिति में यदि इस प्रकार से किया जाने वाला (UPBoardSolutions.com) व्यय पारिवारिक आय के अनुरूप नहीं होता, तो निश्चित रूप से गृह-अर्थव्यवस्था बिगड़ जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि रहन-सहन के स्तर को पारिवारिक आय को ध्यान में रखकर ही निर्धारित किया जाना चाहिए।

(6) निरन्तर होने वाले सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन:
समाज में निरन्तर रूप से होने वाले सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन भी परिवार की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। फैशन, नवीन प्रचलन, मनोरंजन के नए-नए साधन आदि कारक परिवार के व्यय को बढ़ाते हैं। इस प्रकार यदि आय में वृद्धि नहीं होती तो परिवार का व्यय बढ़ जाने पर परिवार की अर्थव्यवस्था क्रमशः बिगड़ने लगती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिया जाता है कि अपनी आय को ध्यान में रखते हुए ही फैशन, मनोरंजन एवं सामाजिक उत्सवों आदि पर व्यय करना चाहिए।

(7) परिवार का आकार:
परिवार के आकार से आशय है-परिवार के सदस्यों की संख्या। परिवार के सदस्यों की संख्या भी परिवार की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक उल्लेखनीय कारक है। यदि परिवार की आय सीमित हो तथा उस आय पर ही निर्भर रहने वाले परिवार के सदस्यों की संख्या अधिक हो, तो निश्चित रूप से परिवार के रहन-सहन का स्तर निम्न होगी तथा गृह-अर्थव्यवस्था भी संकट में रहेगी। इससे भिन्न यदि (UPBoardSolutions.com) किसी परिवार में धनोपार्जन करने वाले सदस्यों की संख्या अधिक हो तथा उन पर निर्भर रहने वाले सदस्यों की संख्या कम हो तो निश्चित रूप से परिवार की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ बनी रहती है तथा रहन-सहन का स्तर भी उन्नत बन सकता है। आधुनिक दृष्टिकोण से ‘छोटा-परिवार, सुखी-परिवार’ की धारणा को ही उत्तम माना जाता है।

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प्रश्न 2:
‘आवश्यकता’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए। परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
परिवार की मूल आवश्यकताएँ कौन-सी हैं? उनकी पूर्ति क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
आवश्यकता का अर्थ

परिवार एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जो अपने सदस्यों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापक प्रयास करती है। आवश्यकताओं को अनुभव करना तथा उनकी पूर्ति करना ही जीवन है। अब प्रश्न उठता है कि आवश्यकता से क्या आशय है? व्यक्ति की आवश्यकताएँ मूल रूप से व्यक्ति की कुछ विशिष्ट इच्छाएँ ही होती हैं, परन्तु व्यक्ति की समस्त इच्छाओं को उसकी आवश्यकताएँ नहीं माना (UPBoardSolutions.com) जा सकता। इच्छाएँ हमारी भावनाओं से पोषित होती हैं। वे भौतिक जगत् की यथार्थताओं से दूर होती हैं, परन्तु आवश्यकताओं का सीधा सम्बन्ध भौतिक यथार्थताओं से होता है। आवश्यकताएँ हमारे भौतिक साधनों के अनुरूप होती हैं। इस प्रकार हमारी प्रबल इच्छाएँ तथा साधनानुकूल इच्छाएँ ही हमारी आवश्यकताएँ बन जाती हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि हम उस इच्छा को आवश्यकता कह सकते हैं जिसमें कल्पना के अतिरिक्त अन्य तीन तत्त्व भी विद्यमान हैं। ये तत्त्व हैं क्रमशः इच्छा की प्रबलता, इच्छा को पूर्ण करने के लिए समुचित प्रयास तथा इच्छापूर्ति के लिए सम्बन्धित त्याग के लिए तत्परता। इस प्रकार से हम व्यक्ति की उस इच्छा को आवश्यकता कह सकते हैं जिस इच्छा को पूरा करने के लिए उस व्यक्ति के पास समुचित साधन हैं तथा साथ-ही-साथ वह व्यक्ति उस इच्छा को पूरा करने के लिए सम्बन्धित साधन को इस्तेमाल करने के लिए तत्पर भी हो। आवश्यकता के अर्थ को पेन्शन ने इन शब्दों में स्पष्ट (UPBoardSolutions.com) किया है, “आवश्यकता विशेष वस्तुओं की पूर्ति हेतु एक प्रभावपूर्ण इच्छा है जो उन्हें प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रयत्न अथवा त्याग के रूप में प्रकट होती है।” आवश्यकता के अर्थ एवं प्रकृति को ध्यान में रखते हुए स्मिथ तथा पैटर्सन ने स्पष्ट किया है, ”आवश्यकता किसी वस्तु को प्राप्त करने की वह इच्छा है जिसे पूरा करने के लिए मनुष्य में योग्यता है और वह उसके लिए व्यय करने के लिए तैयार हो।”

परिवार की मूल आवश्यकताएँ

मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताएँ होती हैं। आज के वैज्ञानिक युग में निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकताओं ने मानव-जीवन को बड़ा जटिल बना दिया है। आज किसी के पास कितना ही धन हो, वह उसकी आवश्यकता के अनुपात में कम ही प्रतीत होता है। अतः कुशल संचालन के लिए आवश्यक है कि गृहिणी को आवश्यकताओं की जानकारी हो, जिससे वह कुशलतापूर्वक उनकी पूर्ति कर सके।
अनिवार्य आवश्यकताएँ ही मूल आवश्यकताएँ कहलाती हैं, जो प्रत्येक परिवार में प्राय: निम्नलिखित होती हैं

(1) भोजन:
पोषक तत्वों से युक्त सन्तुलित भोजन परिवार की प्रथम मूल आवश्यकता है। परिवार के सभी सदस्यों (बच्चे, स्त्री व पुरुष) को पोषणयुक्त भोजन पर्याप्त मात्रा में मिलना चाहिए।

(2) वस्त्र:
परिवार के सभी सदस्यों को पर्याप्त एवं उपयुक्त वस्त्र उपलब्ध होने चाहिए। उपयुक्त वस्त्रों से हमारा तात्पर्य है कि ये मौसम, व्यक्तिगत रुचि, सामाजिक स्थिति, रीति-रिवाजों आदि के अनुरूप होने चाहिए।

(3) आवासीय व्यवस्था:
परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं के अनुसार उचित आवास का होना एक अनिवार्य आवश्यकता है। पर्याप्त एवं शुद्ध जल, वायु, सूर्य का प्रकाश इत्यादि का उपलब्ध होना उचित आवास की आवश्यक विशेषताएँ हैं।

(4) शिक्षा:
बच्चों की अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करना परिवार की मूल एवं अनिवार्य आवश्यकता है। उपयुक्त शिक्षा से व्यक्तित्व का विकास होता है। अतः बालक-बालिकाओं की शिक्षा का प्रबन्ध करना अति आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उपयोगी सूचना देने वाली पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रत्येक परिवार के लिए अलग महत्त्व है, क्योंकि ये सदस्यों के स्वास्थ्य, मनोरंजन, राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक ज्ञान में वृद्धि करती हैं।

(5) चिकित्सा एवं स्वास्थ्य रक्षा:
पोषणयुक्त भोजन, आवश्यक व्यायाम, मौसम के अनुरूप वस्त्र एवं घर व आस-पास की स्वच्छता आदि परिवार के सदस्यों को स्वस्थ रखने के लिए अति आवश्यक हैं। इनका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी भी सदस्य के बीमार पड़ने पर उसे उपयुक्त चिकित्सा उपलब्ध होनी चाहिए।

(6) बच्चों की देखभाल:
बच्चे परिवार एवं देश का भविष्य होते हैं। अतः स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा व आचार-व्यवहार के दृष्टिकोण से उनकी देखभाल अति आवश्यक है। बच्चों की उचित देखभाल को परिवार की मूल आवश्यकताओं में सम्मिलित किया जाता है।

(7) मनोरंजन:
मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ मनोरंजन अति आवश्यक है। अतः परिवार में मनोरंजन के यथा योग्य साधन अवश्य उपलब्ध होने चाहिए।

(8) प्रेम, स्नेह एवं सहयोग:
एकाकी परिवार में प्राय: पति-पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। संयुक्त परिवार पति-पत्नी, उनके माता-पिता व भाई-बहनों के संयुक्त रूप से रहने के कार अधिक बड़ा हो जाता है। परिवार छोटा हो या फिर बड़ा, दोनों ही में सदस्यों के स्नेह व परस्पर सह की भावना का होना (UPBoardSolutions.com) आवश्यक है। परिवाररूपी सामाजिक संस्था का कुशल संचालन प्रेम, स्नेह एवं सहयोग पर ही निर्भर करता है। यह प्रवृत्ति भी परिवार की मूल आवश्यकता है।

(9) आय:
यह परिवार की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। धन से प्रायः सभी भौतिक आवश्यकताएँ क्रय की जा सकती हैं। परिवार में धन का प्रमुख स्रोत पारिवारिक आय होती है। प्रत्येक परिवार की आय प्राय: सभी सदस्यों की मूल आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य होनी चाहिए।

(10) बचते:
आकस्मिक संकटों (बीमारी आदि) का सामना करने के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त लड़के-लड़कियों के विवाह, लड़कों के व्यवसाय एवं धार्मिक कार्यों आदि में भी अकस्मात् ही धन की आवश्यकता पड़ती है। धन की इस आकस्मिक आवश्यकता की पूर्ति एक (UPBoardSolutions.com) बुद्धिमान् गृहिणी नियमित बचत द्वारा करती है। अतः प्रत्येक गृहिणी का कर्तव्य है कि वह आय-व्यय में सन्तुलन रखकर परिवार के भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उचित एवं अधिक-से-अधिक बचत करे। प्राथमिक एवं गौण आवश्यकताओं में भिन्नता लाना इतना सरल नहीं है जितना हम समझते हैं। वास्तव में जो वस्तु एक परिवार के लिए विलासिता की श्रेणी में है, वह वस्तु किसी अन्य परिवार के लिए अनिवार्य आवश्यकता की श्रेणी में मानी जा सकती है। अतः विभिन्न आवश्यकताएँ परिवार की आर्थिक दशा, रहन-सहन एवं समाज में स्तर तथा प्रतिष्ठा के अनुसार प्राथमिक अथवा गौण हो सकती हैं। परिवार के मुखिया तथा अन्य सदस्यों का दायित्व है कि वे पारिवारिक परिस्थितियों एवं उपलब्ध साधनों को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित कर लें तथा उनकी क्रमिक पूर्ति के लिए प्रयास करें।

प्रश्न 3:
परिवार की मूल आवश्यकताओं पर प्रभाव डालने वाले कारक कौन-कौन से हैं? विस्तारपूर्वक समझाइए।
या
आवश्यकताओं की वृद्धि एवं तीव्रता को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किसी भी परिवार के सफल संचालन के लिए उसकी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति अति आवश्यक है। परन्तु बढ़ती हुई महँगाई एवं वैज्ञानिक आविष्कारों के आज के युग में यह कोई सरल कार्य नहीं है। इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि मूल आवश्यकताएँ किन-किन कारकों से प्रभावित होती हैं। परिवार की मूल आवश्यकताओं को प्रायः निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं
(क) व्यक्तिगत कारक,
(ख) वस्तुगत कारक,
(ग) पारिस्थितिक कारक।

(क) व्यक्तिगत कारक:
ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(1) आर्थिक स्थिति:
एक व्यक्ति अथवा परिवार की आय के अनुसार ही उसकी आवश्यकताएँ होती हैं। आय में वृद्धि के साथ-साथ आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए-एक
पवर्गीय परिवार की आवश्यकताएँ कम होती हैं, जबकि एक धनी परिवार की आवश्यकताएँ विलासिताओं की सीमा तक बढ़ जाती हैं।

(2) रहन-सहन का स्तर:
रहन-सहन का स्तर आवश्यकताओं के वर्गीकरण को बदल देता है। उदाहरण के लिए एक मध्यमवर्गीय परिवार की आवश्यकता बिजली के पंखे से भी पूर्ण हो जाती है,
जबकि एक धनी परिवार वातानुकूलन को आवश्यक समझता है।

(3) रुचि एवं आदत:
रुचि के अनुसार वस्तुओं को रखना आवश्यकता है; जैसे कि संगीत में रुचि रखने वाली गृहिणी के लिए वाद्य यन्त्र आवश्यक है, जबकि किसी अन्य रुचि वाली महिला के लिए यह अनुपयोगी है। इसी प्रकार पान, चाय, कॉफी इत्यादि की जिन्हें आदत है उनके लिए ये आवश्यकताएँ हैं, जबकि अन्य के लिए ये धन के अपव्यय की वस्तुएँ हैं।

(4) सामाजिक स्तर:
यह भी आवश्यकताओं का अर्थ बदल देता है। एक उच्चवर्गीय परिवार के लिए वैभवशाली आवासीय व्यवस्था व मोटरकार इत्यादि यदि एक ओर आवश्यकताएँ हैं, तो दूसरी ओर साधारण मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए विलासिता की वस्तुएँ हैं। इसी प्रकार निम्नवर्गीय परिवारों के लिए कच्चे मकान व झोपड़े आदि आवश्यकताओं की श्रेणी में आते हैं।

(5) शरीर-रचना एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी कारक:
मानवीय आवश्यकताओं को व्यक्ति की अपनी शरीर-रचना तथा स्वास्थ्य भी प्रभावित करते हैं; उदाहरण के लिए—यदि किसी व्यक्ति की टाँग में कोई विकृति या दोष हो, तो उनके लिए छड़ी या बैसाखी एक प्रबलतम आवश्यकता होती है। इसी प्रकार जिसकी नजर या दृश्य-क्षमता कमजोर हो, उसके लिए चश्मा अति आवश्यक या अनिवार्य आवश्यकता माना जाता है।

(6) व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण:
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है। कुछ व्यक्ति भौतिकवादी होते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए भौतिक सुख-सुविधा सम्बन्धी आवश्यकताएँ अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं। ऐसा व्यक्ति घर में सुन्दर सोफा, कलर टी० वी०, डायनिंग टेबल आदि अनिवार्य समझता है। इससे भिन्न (UPBoardSolutions.com) एक धार्मिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति के लिए सोफा खरीदने की तुलना में तीर्थ-यात्रा का महत्त्व अधिक हो सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी एक ऐसा कारक है जो मानवीय आवश्यकताओं को गम्भीरता से प्रभावित करता है।

(ख) वस्तुगत कारक
आवश्यकताओं को सीधे ही प्रभावित करती हैं; जैसे कि

(1) वस्तुओं का मूल्य:
साधारण मूल्यों वाली वस्तुओं को प्रायः आवश्यकताओं के वर्ग में तथा अत्यधिक मूल्य वाली वस्तुओं को विलासिता की श्रेणी में रखा जाता है। इस प्रकार वस्तुओं का मूल्य आवश्यकताओं से सीधा सम्बन्ध रखता है।

(2) वस्तुओं की संख्या:

उपभोग की प्रेरक वस्तुओं के सन्दर्भ में उनकी प्रति व्यक्ति अथवा : परिवार के अनुसार संख्या सदैव महत्त्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए–एक परिवार में एक कार आवश्यकता हो सकती है, जबकि एक से अधिक कारें होना विलासिता कहलाएँगी। इसी प्रकार एक व्यक्ति के पास दो या चार जोड़ी अच्छे वस्त्र होना आवश्यकता है, जबकि अत्यधिक संख्या में वस्त्रों को होना विलासिता माना जाएगा।

(ग) पारिस्थितिक कारक:
मैं परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं; जैसे कि

(1) देश एवं काल:
प्रत्येक देश की भौगोलिक परिस्थितियों पर उसकी आवश्यकताएँ निर्भर करती हैं। उदाहरण के लिए-उष्ण देशों में आवास, वस्त्र एवं भोजन आदि की आवश्यकताएँ ठण्डे देशों से भिन्न होती हैं। इसी प्रकार किसी भी देश में ग्रीष्म ऋतु की आवश्यकताएँ शीत ऋतु से सदैव भिन्न होती हैं।

(2) फैशन एवं रीति-रिवाज:

प्रत्येक देश एवं प्रदेश में रीति-रिवाज प्रायः भिन्न होते हैं। इसके अनुसार ही भोजन, वस्त्र एवं आवास जैसी मूल आवश्यकताएँ भी प्रायः बदल जाया करती हैं।

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प्रश्न 4:
परिवार की आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में गृहिणी का क्या योगदान है? विस्तारपूर्वक लिखिए।
या
एक कुशल गृहिणी अर्थव्यवस्था को किस प्रकार व्यवस्थित कर सकती है? समझाइए।
उत्तर:
गृहिणी गृह-संचालिका होती है। उसकी बुद्धिमत्ता, व्यवहार-कुशलता एवं सूझ-बूझ पर ही उत्तम पारिवारिक व्यवस्था एवं सुदृढ़ अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। वह पारिवारिक आय के अनुसार ही व्यय करती है। पारिवारिक आय से हमारा अभिप्राय निम्नलिखित है

(1) प्रत्यक्ष आय:
सदस्यों के वेतन एवं व्यापार आदि से अर्जित आय। इसके अतिरिक्त सम्पत्ति का किराया व ब्याज आदि से प्राप्त धन भी इसमें सम्मिलित है।
(2) अप्रत्यक्ष आय:
यह सुख-सुविधाओं के रूप में होती है; जैसे कि नि:शुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा तथा पैतृक मकान, जिसका किराया नहीं देना होता है इत्यादि। । पारिवारिक आय प्रायः घटती-बढ़ती रहती है। एक कुशल गृहिणी इसका सदैव ध्यान रखती है। वह निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर अर्थव्यवस्था का संचालन करती है

(i) मूल आवश्यकताओं को प्राथमिकता:
भोजन, वस्त्र एवं मकान जीवनरक्षक मूल आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इनके लिए यह भी आवश्यक है कि इन पर पारिवारिक आय के अनुसार ही व्यय हो।

(ii) आवश्यकताओं में समन्वय:
विभिन्न आवश्यकताओं को सन्तुलित रूप से पूरा किया जाना चाहिए। आवश्यकताओं की पूर्ति उनके महत्त्व के क्रम में प्राथमिकता के सिद्धान्त के अनुसार की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए–जीवनरक्षक आवश्यकताओं में भोजन सर्वप्रथम आता है तथा वस्त्र एवं मकान बाद में। अतः गृहिणी को सर्वप्रथम यह देखना चाहिए कि परिवार के सभी सदस्यों को आवश्यक पौष्टिक भोजन मिले, इसके पश्चात् ही आय का व्यय वस्त्र व मकान की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाना चाहिए।

(ii) आय के अनुसार व्यय:
जिस प्रकार धन का अपव्यय करना अनुचित है, उसी प्रकार धन का आवश्यकता से कम व्यय करना भी कोई अच्छी बात नहीं है। एक कुशल गृहिणी अर्थव्यवस्था का संचालन रहन-सहन के सामाजिक स्तर के अनुसार करती है। यदि पारिवारिक आय कम है, तो इसका व्यय केवल मूल (UPBoardSolutions.com) आवश्यकताओं की पूर्ति में ही करती है। इसके विपरीत यदि आय अधिक है, तो वह स्तर के अनुरूप विलासिता की वस्तुओं (जैसे कि वातानुकूलन, टेलीविजन, गृह सज्जा की वस्तुएँ इत्यादि) पर भी धन व्यय कर सकती है अर्थात् एक कुशल गृहिणी को आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिए।

(iv) मुद्रा की क्रय-शक्ति:
आज महँगाई के युग में मुद्रा की क्रय-शक्ति प्रायः घटती रहती है। एक कुशल गृहिणी मुद्रा की क्रय-शक्ति का विशेष ध्यान रखती है तथा इसके अनुसार ही अपने परिवार की अर्थव्यवस्था का संचालन करती है।

(v) पारिवारिक सन्तोष:
पारिवारिक आय एवं परिवार के सदस्यों की संख्या में सीधा सम्बन्ध होता है। कम सदस्यों के परिवार में अर्थव्यवस्था के संचालन में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती, परन्तु यदि परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक है तो गृहिणी की व्यवहार-कुशलता एवं सूझ-बूझ के द्वारा ही अर्थव्यवस्था का संचालन सम्भव है। एक कुशल गृहिणी परिवार के सभी सदस्यों के सुख, सन्तोष एवं रुचि का ध्यान रखती है तथा आवश्यकता पड़ने पर पारिवारिक आय में वृद्धि के उपाय अपनाती है।

(vi) भविष्य के लिए बचत:
एक कुशल गृहिणी कभी भी धन का अनुचित व्यय नहीं करती है। वह अर्थव्यवस्था का संचालन योजना बनाकर करती है। वह प्रत्येक परिस्थिति में भविष्य की योजनाओं व आकस्मिक कार्यों (बीमारी व विवाह आदि) के लिए धन की बचत का प्रावधान रखती है। प्रत्येक कुशल गृहिणी पारिवारिक स्तर के अनुरूप धन का व्यय करती है तथा एक निश्चित मात्रा में धन की बचत कर उसको सुरक्षित एवं अधिक लाभप्रद राष्ट्रीय बचत योजनाओं में लगाती है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि परिवार की बढ़ती आवश्यकताओं की सन्तुष्टि तभी सम्भव हो सकती है जब विभिन्न आवश्यकताओं तथा उनकी तीव्रता को ध्यान में (UPBoardSolutions.com) रखकर सीमित साधनों से सन्तुष्ट किया जाए। इस उद्देश्य के लिए आय-व्यय का सन्तुलन अत्यन्त आवश्यक है। यदि पारिवारिक आय-व्यय का सन्तुलन न किया जाए, तो गृह की अर्थव्यवस्था अव्यवस्थित हो जाएगी और यह भी सम्भव है कि परिवार की आय से व्यय अधिक हो जाए। परिवार की आय से अधिक व्यय हो जाने पर परिवार पर ऋण का बोझ हो जाएगा और ऋण से परिवार की सुख-शान्ति समाप्त हो जाएगी।
वास्तव में, एक सुव्यवस्थित या कुशल अर्थव्यवस्था ही इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकती है। अतः एक आदर्श गृह-व्यवस्था में कुशल अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण स्थान है। गृहिणी को इस बात की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए कि मानव की किस-किस अवस्था की । कौन – कौन सी आवश्यकताएँ महत्वपूर्ण हैं; (UPBoardSolutions.com) जैसे-शिशु की आवश्यकता, भूख व सुरक्षा। उसके। पश्चात् बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हैं। सभी बातों को ध्यान में रखते हुए अपना पूर्ण उत्तरदायित्व निभाएँ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
सफल गृह-अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यह सत्य है कि परिवार की सुख-शान्ति एवं समृद्धि के लिए गृह-अर्थव्यवस्था का उत्तम एवं सुनियोजित होना आवश्यक है। अब प्रश्न उठता है कि किस प्रकार की गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम या सफल कहा जा सकता है, अर्थात् सफल गृह-अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ या लक्षण क्या हैं? सफल गृह-अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित मानी जाती हैं ।

  1.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था में परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाती है।
  2. सफल गृह-अर्थव्यवस्था में परिवार की विभिन्न आवश्यकताओं में समन्वय स्थापित किया जाता है।
  3.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित कर लिया जाता है।
  4.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत आय के अनुसार व्यय का निर्धारण किया जाता है।
  5.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत अनिवार्य रूप से बचत का प्रावधान होता है।
  6. सफल गृह-अर्थव्यवस्था में पारिवारिक सन्तोष का ध्यान रखा जाता है। प्रश्न 2-गृह-अर्थव्यवस्था के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर:
किसी भी परिवार की उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित सिद्धान्तों को ध्यान में रखना चाहिए

  1.  पारिवारिक लक्ष्यों के निर्धारण का सिद्धान्त,
  2. आय के विश्लेषण का सिद्धान्त,
  3.  विभिन्न पारिवारिक योजनाओं सम्बन्धी सिद्धान्त,
  4.  पारिवारिक भविष्य की सुरक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त,
  5. परिवार के सदस्यों की सन्तुष्टि का सिद्धान्त।

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प्रश्न 3:
आवश्यकताएँ कितने प्रकार की होती हैं?
या
अनिवार्य आवश्यकताएँ किन्हें कहा जाता है?
या
आरामदायक आवश्यकताओं से आप क्या समझती हैं?
या
विलासात्मक आवश्यकताओं से क्या आशय है?
उत्तर:
व्यक्ति की आवश्यकताएँ अनन्त होती हैं तथा वे कभी भी पूर्ण नहीं होतीं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मानवीय आवश्यकताओं का एक व्यवस्थित वर्गीकरण किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त मानवीय आवश्यकताओं को तीन वर्गों में रखा गया है। ये वर्ग हैं-अनिवार्य आवश्यकताएँ, आरामदायक आवश्यकताएँ तथा विलासात्मक आवश्यकताएँ। इन तीनों प्रकार की आवश्यकताओं का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है

(1) अनिवार्य आवश्यकताएँ:
मानव जीवन के लिए अत्यधिक अनिवार्य आवश्यकताओं को इस वर्ग में सम्मिलित किया जाता है। इस वर्ग की मानवीय आवश्यकताओं को व्यक्ति की मौलिक आवश्यकताएँ भी कहा जाता है। इस वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में मनुष्य का जीवन भी कठिन हो जाता है। मुख्य रूप से (UPBoardSolutions.com) भोजन, वस्त्र तथा आवास को इस वर्ग की आवश्यकताएँ माना गया है। व्यापक रूप से इस वर्ग में भी तीन प्रकार की आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें क्रमशः जीवनरक्षक अनिवार्य आवश्यकताएँ, कार्यक्षमतारक्षक अनिवार्य आवश्यकताएँ तथा प्रतिष्ठारक्षक
अनिवार्य आवश्यकताएँ कहा जाता है।

(2) आरामदायक आवश्यकताएँ:
इस वर्ग में उन आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जाता है। जिनकी पूर्ति से व्यक्ति का जीक्न निश्चित रूप से अधिक सुखी तथा सुविधामय हो जाता है। उदाहरण के
लिए – विभिन्न घरेलू उपकरण इसी वर्ग की आवश्यकताएँ हैं। इन उपकरणों को अपनाकर जीवन अधिक सरल हो जाता है।

(3) विलासात्मक आवश्यकताएँ:
इस वर्ग में उन आवश्यकताओं को सम्मिलितं किया जाता है। जो व्यक्ति की विलासात्मक इच्छाओं से सम्बन्धित होती हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में न तो व्यक्ति के जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और न ही व्यक्ति की कार्यक्षमता ही घटती है। विलासात्मक आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न समाज में भिन्न-भिन्न होती हैं। विलासात्मक आवश्यकताएँ भी तीन प्रकार की होती हैं, जिन्हें क्रमशः हानिरहित विलासात्मक आवश्यकताएँ, हानिकारक विलासात्मक आवश्यकताएँ तथा सुरक्षा सम्बन्धी विलासात्मक आवश्यकताएँ कहा (UPBoardSolutions.com) जाता है। अधिक महँगी कार, आलीशान भवन, महँगे तथा अधिक संख्या में वस्त्र रखना हानिरहित विलासात्मक आवश्यकताओं की श्रेणी में आते हैं। भोग-विलास के साधने नशाखोरी तथा नैतिक एवं चारित्रिक पतन के साधनों को अपनाना हानिकारक विलासात्मक आवश्यकताओं से सम्बद्ध हैं। जहाँ तक सुरक्षात्मक विलासात्मक आवश्यकताओं का सम्बन्ध है, इनमें बहुमूल्य गहनों तथा विभिन्न सम्पत्तियों को सम्मिलित किया जाता है। ये वस्तुएँ व्यक्ति के संकट-काल में सहायक होती हैं।

प्रश्न 4:
आरामदायक तथा विलासात्मक आवश्यकताओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मानवीय आवश्यकताओं के वर्गीकरण में आरामदायक तथा विलासात्मक आवश्यकताओं को अलग-अलग वर्ग में प्रस्तुत किया गया है। स्थूल रूप से देखने पर इन दोनों प्रकार की आवश्यकताओं में कोई स्पष्ट अन्तर दिखाई नहीं देता। एक ही आवश्यकता एक व्यक्ति के लिए विलासात्मक आवश्यकता हो सकती है और वही आवश्यकता किसी अन्य व्यक्ति के लिए आरामदायक आवश्यकता हो सकती है। वास्तव (UPBoardSolutions.com) में, ये दोनों सापेक्ष हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि जिस आवश्यकता से सम्बन्धित व्यक्ति का किसी प्रकार अहित होने की आशंका हो, वह आवश्यकता विलासात्मक आवश्यकता की श्रेणी में आएगी। इससे भिन्न जो आवश्यकता केवल जीवन की सुख-सुविधा में वृद्धि करती है, वह आरामदायक आवश्यकता की श्रेणी में आएगी।

प्रश्न 5:
मानवीय आवश्यकताओं की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानवीय आवश्यकताओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं ।

  1. मानवीय आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।
  2. मानवीय आवश्यकताओं में पुनरावृत्ति होती है। उदाहरण के लिए–एक बार भोजन ग्रहण कर लेने के उपरान्त कुछ समय बाद पुनः भोजन की आवश्यकता महसूस होने लगती है।
  3. आवश्यकताओं की एक विशेषता यह है कि इनमें विकल्प भी सम्भव होते हैं। उदाहरण के लिए–प्रकाश की आवश्यकता के लिए साधन के रूप में लैम्प, मोमबत्ती, वैद्युत-बल्ब आदि में विकल्प हो सकता है।
  4. कुछ आवश्यकताएँ परस्पर पूरक होती हैं। उदाहरण के लिए मोटर की पूरक आवश्यकता पेट्रोल है।
  5. मानवीय आवश्यकताओं में प्रतिस्पर्धा होती है तथा उनकी प्रबलता में अन्तर होता है।
  6. वर्तमान सम्बन्धी मानवीय आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं।
  7. कुछ मानवीय आवश्यकताएँ आदत का रूप ले लेती हैं।
  8. जानकारी बढ़ने के साथ-साथ आवश्यकताएँ बढ़ती हैं।
  9. आवश्यकताओं पर विज्ञापन एवं प्रचार का भी प्रभाव पड़ता है।
  10. मानवीय आवश्यकताओं की एक विशेषता यह है कि इन पर प्रचलित रीति-रिवाजों तथा फैशन का भी प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 6:
आवश्यकता की अनिवार्यता आप किस प्रकार निर्धारित करेंगी?
उत्तर:
आवश्यकता की अनिवार्यता निम्नलिखित आधारों पर निर्भर करती है

(1) कुशलता में वृद्धि का आधार:
यदि किसी आवश्यकता की पूर्ति से परिवार की कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है, तो वह आवश्यकता अति अनिवार्य हो जाती है।

(2) सुख-सन्तोष का आधार:
जिन आवश्यकताओं की पूर्ति से पारिवारिक सदस्यों को सुख एवं सन्तोष की प्राप्ति होती है, वे अनिवार्यता की श्रेणी में आती हैं।

(3) मूल्य एवं माँग का आधार:
यदि किसी आवश्यक वस्तु के मूल्य में वृद्धि की आशंका हो तो वह अनिवार्यता की श्रेणी में आ जाती है।

प्रश्न 7:
आवश्यकताओं के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। विज्ञान के विभिन्न आविष्कारों के अन्वेषण का आधार सदैव मनुष्य की आवश्यकताएँ ही रही हैं। आदि मानव से आज के मानव का सामाजिक विकास समय-समय पर आवश्यकताओं की उत्पत्ति एवं तुष्टि के कारण ही सम्भव हुआ है। आधुनिक युग में आवश्यकताओं की पूर्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन धन है। आवश्यकताओं में वृद्धि होने पर परिवार के (UPBoardSolutions.com) सदस्य पारिवारिक आय में वृद्धि का प्रयास करते हैं, जिसके फलस्वरूप रहन-सहन का स्तर ऊँचा होता है। सम्मिलित आर्थिक प्रयासों से पारिवारिक सदस्यों में स्नेह, सहयोग एवं दायित्व की भावना में वृद्धि होती है तथा परिवार की उन्नति होती है।

प्रश्न 8:
परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना कठिन होता है। क्यों?
उत्तर:
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन मुख्य साधन है। परिवार में धन का मुख्य स्रोत पारिवारिक आय होती है। आवश्यकताएँ अनन्त होती हैं और आय प्रायः सीमित। अतः आवश्यकताओं की पूर्ति अनिवार्यता के क्रम में की जाती है। सर्वप्रथम मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है और यदि धन शेष बचता है तो कुछ और आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। शेष आवश्यकताओं की पूर्ति का (UPBoardSolutions.com) एकमात्र उपाय पारिवारिक सदस्यों के सम्मिलित प्रयासों से ही सम्भव हो सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना एक कठिन कार्य है।

प्रश्न 9:
आवश्यकता एवं आर्थिक क्रियाओं को सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। यदि आवश्यकताएँ न होतीं तो किसी प्रकार के आर्थिक प्रयास आदि का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः आर्थिक प्रयत्न की जननी आवश्यकता ही है। इस प्रकार आर्थिक क्रियाओं एवं आवश्यकताओं में अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। वास्तव में, आवश्यकताएँ ही (UPBoardSolutions.com) मनुष्य को आर्थिक प्रयत्न करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए मनुष्य विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन आर्थिक क्रियाओं में उत्पादन, विनिमय, वितरण आदि को सम्मिलित किया जा सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
गृह-अर्थव्यवस्था की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
‘परिवार की आय तथा व्यय पर नियन्त्रण होना तथा आय का गृह के सृजनात्मक कार्यों में व्यय करना गृह-अर्थव्यवस्था कहलाता है।” निकिल तथा डारसी

प्रश्न 2:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला मुख्यतम कारक क्या है?
उत्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला मुख्यतम कारक है-धन या आय।

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प्रश्न 3:
गृह-अर्थव्यवस्था के किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था के दो सिद्धान्त है

  1. आय के विश्लेषण का सिद्धान्त तथा
  2.  पारिवारिक भविष्य की सुरक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त।

प्रश्न 4:
सफल गृह-अर्थव्यवस्था की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सफल गृह-अर्थव्यवस्था की दो विशेषताएँ हैं

  1.  परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करना तथा
  2.  गृह-अर्थव्यवस्था में बचत का प्रावधान रखना।

प्रश्न 5:
परिवार की अति अनिवार्य मूलभूत आवश्यकता क्या है?
उत्तर:
भोजन परिवार की अति अनिवार्य मूलभूत आवश्यकता है।

प्रश्न 6:
जीवनरक्षक आवश्यकता से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
भोजन एवं वस्त्र मानव अस्तित्व की जीवनरक्षक आवश्यकताएँ हैं।

प्रश्न 7:
विलासिता सम्बन्धी आवश्यकताओं से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
ये सामाजिक प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य एवं दिखावे सम्बन्धी आवश्यकताएँ हैं; जैसे कि रंगीन टी० वी०, वातानुकूलित यन्त्र आदि।

प्रश्न 8:
आधुनिक समाज के विभिन्न परिवारों को आप कौन-कौन सी श्रेणियों में वर्गीकृत करेंगी?
उत्तर:
आधुनिक समाज को प्रायः तीन-उच्च, मध्यम व निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

प्रश्न 9:
गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम बनाने में सर्वाधिक योगदान परिवार के किस सदस्य का होता है?
उत्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम बनाने में सर्वाधिक योगदान परिवार के मुखिया का होता है।

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प्रश्न 10:
उत्तम एवं सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए परिवार का आकार किस प्रकार का होना चाहिए?
उत्तर:
उत्तम एवं सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए परिवार का आकार छोटा होना चाहिए।

प्रश्न 11:
परिवार के बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था किस प्रकार की पारिवारिक आवश्यकता है?
उत्तर:
परिवार के बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था परिवार की मूलभूत आवश्यकता है।

प्रश्न 12:
कपड़े धोने की मशीन किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
कपड़े धोने की मशीन एक आरामदायक आवश्यकता है।

प्रश्न 13:
बहुमूल्य गहने किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
बहुमूल्य गहने सुरक्षात्मक विलासात्मक आवश्यकता है।

प्रश्न 14:
एक डॉक्टर के लिए कार किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
एक डॉक्टर के लिए कार अनिवार्य आवश्यकता है।

प्रश्न 15:
सिगरेट या शराब पीना कैसी आवश्यकता है?
उत्तर:
सिगरेट या शराब पीना आदत सम्बन्धी आवश्यकता के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 16:
आपके अनुसार परिवार के सदस्यों के लिए स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था परिवार की किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
हमारे अनुसार परिवार के सदस्यों के लिए स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था परिवार की मूलभूत आवश्यकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) किसी परिवार द्वारा अपनी आय-व्यय तथा धन-सम्पत्ति के लिए की जाने वाली व्यवस्था को कहते हैं
(क) अनिवार्य व्यवस्था,
(ख) पारिवारिक व्यवस्था,
(ग) गृह-अर्थव्यवस्था,
(घ) अनावश्यक व्यवस्था।

(2) कुशल अर्थव्यवस्था का आधार है
(क) पारिवारिक आय,
(ख) सीमित आवश्यकताएँ,
(ग) विवेकपूर्ण व्यय,
(घ) पैतृक सम्पत्ति।

(3) यदि गृह-अर्थव्यवस्था सुचारू हो, तो
(क) परिवार के सदस्यों की प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है,
(ख) परिवार के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है,
(ग) परिवार आर्थिक संकट का शिकार नहीं होता,
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

(4) पारिवारिक आय को मितव्ययिता से व्यय करने के लाभ हैं
(क) सुख-सुविधाओं की प्राप्ति,
(ख) भविष्य के लिए बचत,
(ग) सुदृढ़ अर्थव्यवस्था,
(घ) ये सभी।

(5) व्यक्ति की सर्वाधिक अनिवार्य आवश्यकता है
(क) सभी इच्छाओं की पूर्ति,
(ख) सन्तुलित एवं पौष्टिके भोजन,
(ग) नींद,
(घ) भव्य एवं आकर्षक भवन।

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(6) मानवीय आवश्यकताएँ होती हैं
(क) दो,
(ख) चार,
(ग) सीमित,
(घ) असीमित।

(7) सबसे अधिक सुखी होता है
(क) धनी वर्ग,
(ख) नियन्त्रित आवश्यकताओं वाला वर्ग,
(ग) श्रमिक वर्ग,
(घ) मध्यम श्रेणी का वर्ग।

(8) जीवनरक्षक आवश्यकता होती है
(क) जिसकी पूर्ति मानव अस्तित्व के लिए की जाती है,
(ख) जो रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाती है,
(ग) जिसकी पूर्ति से कार्य-कुशलता बढ़ती है,
(घ) जिसकी पूर्ति से अत्यधिक सुख का अनुभव होता है।

उत्तर:
(1) (ग) गृह-अर्थव्यवस्था,
(2) (ग) विवेकपूर्ण व्यय,
(3) (घ) उपर्युक्त सभी लाभ प्राप्त होते हैं,
(4) (घ) ये सभी,
(5) (ख) सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन,
(6) (घ) असीमित,
(7) (ख) नियन्त्रित आवश्यकताओं वाला वर्ग,
(8) (क) जिसकी पूर्ति मानव अस्तित्व के लिए की जाती है।

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UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु : प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु : प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु : प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
‘तन्तु’ (Fibers) से आप क्या समझती हैं? वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का एक वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
या
विभिन्न प्रकार के वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
वनस्पतियों से प्राप्त होने वाले वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
जन्तुओं से प्राप्त होने वाले वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
तन्तु का अर्थ

तैयार वस्त्र की साज-सज्जा तथा प्रयोग आदि से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है, परन्तु इस बात का ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति को नहीं है कि वस्त्र कैसे तथा किससे-तैयार किए जाते हैं। वस्त्रों का निर्माण अनेक प्रकार के तन्तुओं से होता है। अब प्रश्न उठता है कि तन्तु किसे कहते हैं? वस्त्र-विज्ञान की भाषा में वस्त्र-निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं। तन्तुओं से धागा तैयार किया जाता है तथा धागों से वस्त्र का निर्माण किया (UPBoardSolutions.com) जाता है। इस प्रकार वस्त्र-निर्माण के लिए अपनाए जाने वाले विभिन्न तन्तुओं के आकार, शक्ल, गुण, लम्बाई तथा स्रोत भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रारम्भ में व्यक्ति केवल प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होने वाले तन्तुओं से ही वस्त्र तैयार करता था, परन्तु आधुनिक युग में मनुष्य ने कृत्रिम रूप से भी वस्त्रोपयोगी तन्तु तैयार कर लिए हैं।

वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का वर्गीकरण

तन्तुओं के विभिन्न स्रोत निम्नलिखित हैं
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग

उपर्युक्त वर्णित तालिका के आधार पर कहा जा सकता है कि वस्त्रोपयोगी तन्तु मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-प्राकृतिक तन्तु तथा कृत्रिम तन्तु। प्राकृतिक तन्तु उन तन्तुओं को कहा जाता है जिन्हें प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त किया जाता है। इन तन्तुओं को पुनः तीन उपवर्गों में बाँटा जा सकता है-वनस्पति-जगत् से प्राप्त होने वाले तन्तु, प्राणी या जन्तु-जगत् से प्राप्त होने वाले तन्तु तथा खनिज स्रोतों से प्राप्त होने वाले तन्तु। वस्त्रोपयोगी कृत्रिम तन्तु मानव-निर्मित हैं। इन्हें यान्त्रिक तथा रासायनिक विधियों द्वारा बनाया जाता है। विभिन्न प्रकार के वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) वनस्पति-जगत् से प्राप्त होने वाले तन्तु:
पेड़-पौधों के विभिन्न भागों से अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण वस्त्रोपयोगी तन्तु प्राप्त होते हैं। इनमें से मुख्य कपास, जूट, लिनेन तथा हैम्प के तन्तु हैं। वनस्पति-जगत् से प्राप्त (UPBoardSolutions.com) होने वाले तन्तुओं में सेल्यूलोस की सर्वाधिक मात्रा पाई जाती है। अतः इन तन्तुओं को ‘सेल्यूलोस तन्तु’ भी कहा जाता है। इन तन्तुओं का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

(क) कपास अथवा रूई ( कॉटन):
कपास के पौधे के बीजों की सतह पर पाए जाने वाले रेशों से वस्त्रोपयोगी तन्तु प्राप्त किए जाते हैं। इन तन्तुओं को ही कपास के तन्तु कहा जाता है। इन तन्तुओं से सूती वस्त्रों (जैसे-खद्दर, हथकरघा वस्त्र व मिल-निर्मित वस्त्र आदि) का निर्माण किया जाता है। कपास के तन्तु की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. एक पाउण्ड कपास में लगभग 9,00,00,000 (नौ करोड़) तन्तु होते हैं।
  2. कपास के तन्तु आधार पर चौड़े तथा नुकीले सिरों के होते हैं।
  3.  प्रत्येक तन्तु में लगभग 90% सेल्यूलोस, 2-3% प्रोटीन, 0.6% जल व 0.3% शर्करा होती है।
  4.  ये अत्यधिक मजबूत व टिकाऊ होते हैं।
  5.  ये अत्यधिक ताप सह सकते हैं।
  6. इनमें जल सोखने की क्षमता होती है। अतः इनसे बने वस्त्र ग्रीष्म ऋतु में (पसीना सोख पाने के कारण) अत्यन्त उपयोगी होते हैं।
  7. सूती वस्त्रों को धोना सरल होता है। इन्हें किसी भी साबुन से सरलता से धो सकते हैं।
  8.  सूती वस्त्रों में प्रत्यास्थता तथा प्रतिस्कन्दता का गुण नहीं पाया जाता; अतः इनमें सामान्य लचक नहीं होती तथा शीघ्र ही सलवटें पड़ जाती हैं।
  9.  सूती वस्त्रों पर कोई भी रंग आसानी से चढ़ाया जा सकता है।
  10.  सूती वस्त्रों पर क्षार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु सान्द्र अम्लों के सम्पर्क से ये नष्ट हो जाते हैं।
  11. सूती वस्त्रों को यदि नम अवस्था में कुछ समय तक रख लिया जाए, तो इनमें फफूदी लग जाती है।

(ख) अन्य वानस्पतिक तन्तु:
ये प्रायः पौधों के स्तम्भ अथवा तने से प्राप्त किए जाते हैं। इनके उदाहरण निम्नलिखित हैं

  1. फ्लैक्स: लाइनम नामक पौधों से प्राप्त ये तन्तु लाइनिन-वस्त्र, कालीन व कागज आदि के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
  2. हैम्प: एक विशेष पौधे से प्राप्त ये तन्तु निम्न श्रेणी के वस्त्र, रस्सियों व थैलों के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
  3.  जूट: कोरकोरस नामक पौधे से प्राप्त इस तन्तु का उपयोग रस्सियाँ, कालीन, परदे व कागज आदि बनाने में होता है।
  4.  कौइर: नारियल के मध्य भाग से कौइर अथवा जटा प्राप्त होती है। इसका उपयोग रस्सियाँ, दरवाजों के पायदान, फर्श की चटाई इत्यादि बनाने में होता है।

(2) जन्तुओं से प्राप्त तन्तु

रेशम एवं ऊन दो महत्त्वपूर्ण तन्तु हैं जो हमें जन्तुओं से प्राप्त होते हैं। प्राणी-जगत् से प्राप्त होने वाले इन तन्तुओं में प्रोटीन की अधिकता होती है; अतः इन तन्तुओं को प्रोटीन तन्तु’, भी कहा जाता है।

(क) रेशम:
रेशम का कीट प्रायः शहतूत के पौधे की पत्तियों पर अपना जीवन व्यतीत करता है। इसके लारवा शहतूत की पत्तियों पर एक लसदार पदार्थ अपने चारों ओर निर्मित कर (UPBoardSolutions.com) एक संरचना बनाते हैं, जिसे कोया या ‘कोकून’ कहते हैं। इन संरचनाओं को गर्म पानी में डालने पर इनके अन्दर के कीट मर जाते हैं तथा बाह्य खोलों से रेशम के लम्बे तथा महीन तन्तु प्राप्त किए जाते हैं।

रेशम के तन्तु की विशेषताएँ

  1. यह एक लम्बा, समान मोटाई का तथा चिकना एवं चमकदार तन्तु होता है।
  2. ये सफेद अथवा क्रीम रंग के होते हैं।
  3.  इनकी जल-अवशोषण क्षमता लगभग शून्य होती है।
  4. हल्के अम्ल के प्रयोग से रेशम के तन्तु अधिक चमकदार हो जाते हैं।
  5.  कास्टिक सोडे के हल्के घोल में डालने पर इनकी चमक नष्ट हो जाती है तथा इनके गलने की सम्भावना रहती है।
  6.  रगड़ने व मलने से रेशम के तन्तुओं की कोमलता के नष्ट होने की सम्भावना रहती है।
  7.  अधिक गर्म वायु अथवा धूप में रखने से रेशम की गुणवत्ता कम हो जाती है।
  8.  रेशम के तन्तु जलाने पर बालों के जलने के समान गन्ध देते हैं।
  9.  जलाने पर रेशम के तन्तुओं की काली गोली बन जाती है।
  10.  रेशम का तन्तु पानी में गीला करने पर न तो फैलता है और न ही सिकुड़ता है।

(ख) ऊन:
यह मुख्यतः भेड़ों के बालों से निर्मित की जाती है। भारतवर्ष में पाई जाने वाली मैरीनो जाति की भेड़ों से सर्वोत्तम प्रकार की ऊन प्राप्त होती है। भेड़ के मेमनों से प्राप्त ऊन (UPBoardSolutions.com) अति कोमल व उच्च गुणवत्ता की होती है। भेड़ों के अतिरिक्त ऊँट, बकरी व खरगोश आदि प्राणियों के बालों से भी ऊन प्राप्त की जाती है। काश्मीर में पाई जाने वाली बकरियों से प्राप्त ऊन भी सर्वोच्च श्रेणी की होती है।

ऊन के तन्तु की विशेषताएँ:

  1.  उत्तम ऊनी तन्तु लम्बाई में 5-15 सेमी तक होता है।
  2.  यह लगभग गोलाकार तथा लहरियापन लिए होता है।
  3. रेशम के तन्तु के समान इसमें चमक पाई जाती है।
  4. धुलाई व रँगाई में प्रयुक्त होने वाले सामान्य व हल्के अम्लीय घोलों को ऊन पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. कपड़े धोने के सोडे (कास्टिक सोडे) के प्रयोग से ऊन के तन्तु परस्पर चिपक जाते हैं तथा उनकी कोमलता नष्ट हो जाती है, परन्तु सुहागा व अमोनिया अथवा उत्तम साबुन के प्रयोग से ऊन की गुणवत्ता नष्ट नहीं होती है।
  6. उच्च ताप अथवा तीव्र धूप में ऊन का रंग हल्का पड़ जाता है तथा इसकी गुणवत्ता भी कुप्रभावित होती है।
  7. भीगे हुए तन्तुओं को मलने से वे नरम पड़ जाते हैं।
  8. ऊन वायु से सहज ही नमी को सोख लेती है।
  9.  अनुपयुक्त ताप व असावधानीपूर्वक धोने से ऊन के तन्तु सिकुड़ जाते हैं।
  10.  जलाने पर ऊन चिड़िया के पंखों के जलने जैसी गन्ध देती है तथा सज्जी के घोल में 5-6 मिनट तक उबालने पर ऊन पूर्ण रूप से घुलकर अदृश्य हो जाती है।
  11.  ऊन ऊष्मा की कुचालक होती है; अत: शारीरिक ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देती। इसलिए शरद ऋतु में ऊनी वस्त्रों का उपयोग लाभकारी होता है।

(3) खनिज पदार्थों से निर्मित तन्तु

(क) सोने-चाँदी से निर्मित तन्तु:
इनका निर्माण मशीनों द्वारा किया जाता है। इन तन्तुओं (महीन तारों) को रेशमी अथवा सूती तन्तुओं के साथ मिश्रित कर वस्त्रों का निर्माण किया जाता है। इन वस्त्रों का जरीदार अथवा किमखाब कहा जाता है। ये बहुमूल्य होते हैं। आजकल इनके स्थान पर ऐलुमिनियम के तन्तुओं का प्रयोग कर कृत्रिम जरीदार एवं सस्ते मूल्य के वस्त्रों का निर्माण किया जाने
लगा है।

(ख) ऐस्बेस्टॉस से निर्मित तन्तु:
इन पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं होता है; अतः इनसे अग्नि शमकों के वस्त्र व अन्य प्रकार के अग्नि से सुरक्षित रखने वाले वस्त्र निर्मित किए जाते हैं।

(4) कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित तन्तु
मनुष्य ने अनेक यान्त्रिक एवं रासायनिक विधियों द्वारा कई प्रकार के तन्तुओं का आविष्कार किया है। ये कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित तन्तु कहलाते हैं। सामान्यत: आधुनिक समय में निम्न प्रकार के कृत्रिम तन्तु प्रचलित हैं

(क) रेयॉन:
सामान्यतः लकड़ी, बॉस अथवा रूई की लुग्दी बनाकर उसे द्रव में परिवर्तित किया जाता है। इस द्रव को मशीन के महीन छिद्रों में से निकालकर व शुष्क करके लम्बे व चमकदार तन्तु प्राप्त किए जाते हैं। रेयॉन के तन्तु समान व्यास के तथा सेलुलोस के बने होते हैं। अधिक गर्म जल में धोने से अथवा अधिक ताप पर ये कमजोर पड़ जाते हैं। अम्लों व क्षारों का इन पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

(ख) नायलॉन:
यह तन्तु कोयला, जल व वायु के संयोग से रासायनिक विधियों द्वारा निर्मित किया जाता है। नायलॉन ताप को सुचालक है। अत्यधिक ताप पर यह पिघलकर नष्ट हो जाता है; अतः नायलॉन के वस्त्रों पर अत्यधिक गर्म इस्तरी (प्रेस) का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसको जलाने पर प्लास्टिक के जलने (UPBoardSolutions.com) जैसी गन्ध आती है। हल्के अम्लों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्षारों से अप्रभावित रहने के कारण इसे अनेक बार धोया जा सकता है।

(ग) पोलिएस्टर तन्तु:
डैकरॉन एवं टेरीलीन मुख्य पोलिएस्टर तन्तु हैं। हल्के अम्लों को इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्षारों से ये अप्रभावित रहते हैं। अत्यधिक ताप पर ये नष्ट हो जाते हैं। ज्वलनशील होने के कारण इनसे निर्मित वस्त्रों को अग्नि से दूर रखना चाहिए।

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प्रश्न 2:
वस्त्रों का हमारे जीवन में क्या उपयोग तथा महत्त्व है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वस्त्रों का जीवन में उपयोग तथा महत्त्व

सभ्य मानव का वस्त्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वस्त्रविहीन मनुष्य को मानव समाज में कदापि सम्मिलित नहीं किया जा सकता। वस्त्रों से मनुष्य अपने शरीर को प्राकृतिक कारकों से बचाता है। वस्त्रों से ही वह अपने शरीर को सजाता-सँवारता है। वेशभूषा के अतिरिक्त व्यक्ति के दैनिक जीवन में वस्त्रों के अन्य अनेक उपयोग भी हैं। मनुष्य के लिए वस्त्रों के उपयोग एवं महत्त्व का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

(1) शरीर को सुरक्षा प्रदान करना:
वस्त्र हमें विभिन्न प्राकृतिक कारकों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। सर्दी-गर्मी तथा बरसात आदि कारकों से बचने के लिए वस्त्र धारण किए जाते हैं। गर्मी में लू से बचने में वस्त्र (UPBoardSolutions.com) सहायक होते हैं। वस्त्रविहीन शरीर सूर्य की तेज किरणों से झुलस सकता है। सर्दी से बचने के लिए ऊनी वस्त्र धारण किए जाते हैं। बरसात से बचने के लिए जल अवरोधक वस्त्र तथा छाते आदि इस्तेमाल किए जाते हैं।

(2) शरीर को छिपाने में सहायक:
सभ्य समाज में मनुष्य द्वारा शरीर की गोपनीयता को बनाए रखने के लिए वस्त्र धारण किए जाते हैं। वस्त्रविहीन अर्थात् नग्न व्यक्ति को असभ्य अथवा पागल ही माना जाता है।

(3) वस्त्र शरीर को सजाने सँवारने में सहायक होते हैं:
मनुष्य के लिए वस्त्रों का एक विशिष्ट महत्त्व है–शरीर को सजाना तथा सँवारना। विभिन्न प्रकार की आकर्षक एवं उत्तम वेशभूषा धारण करके स्त्री-पुरुष अपने शरीर को अधिक-से-अधिक सजाते-सँवारते हैं। उत्तम वेशभूषा से व्यक्तित्व में अतिरिक्त निखार आ जाता है।

(4) वस्त्र सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करते हैं:
वस्त्र व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करने वाले कारक भी हैं। धनवान् लोग अधिक-से-अधिक कीमती तथा उत्तम वस्त्र धारण करके समाज में प्रतिष्ठा (UPBoardSolutions.com) अर्जित करते हैं। कीमती वस्त्रों के अतिरिक्त उचित ढंग से वस्त्र धारण करना, सौम्य वस्त्र धारण करना आदि भी प्रतिष्ठा के चिह्न माने जाते हैं। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति भद्दे ढंग से वस्त्र धारण करता है तो समाज में उसकी प्रतिष्ठा घट भी सकती है।

(5) वस्त्र व्यक्ति को विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं:
वस्त्रों को देखकर अनेक व्यक्तियों को सरलता से पहचान लिया जाता है। सामान्य रूप से स्कूल के बच्चों, सेना, पुलिस, डाक-तार विभाग, रेलवे तथा अस्पताल के कर्मचारियों आदि की वेशभूषा निर्धारित होती है। ऐसे व्यक्ति की वेशभूषा को देखकर ही उसकी पहचान की जा सकती है।

(6) वस्त्रों के कुछ अन्य उपयोग:
वेशभूषा के अतिरिक्त वस्त्रों के कुछ अन्य उपयोग भी हैं। घर को सजाने-सँवारने तथा उपयोग की अनेक वस्तुओं के निर्माण में वस्त्रों की मुख्यतम भूमिका होती है। परदे, कालीन, बिस्तर, दरियाँ आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। वस्त्रों से ही तम्बू तथा शामियाने बनाए जाते हैं। विभिन्न उद्योगों (UPBoardSolutions.com) में भी वस्त्रों का अत्यधिक उपयोग होता है। दैनिक जीवन में विभिन्न वस्तुओं को लाने-ले जाने के लिए कपड़ों से निर्मित थैले, बोरियाँ तथा रस्सियाँ आदि इस्तेमाल होते हैं। इसके अतिरिक्त चिकित्सा के क्षेत्र में भी कपड़े का भरपूर इस्तेमाल होता है। घाव हो जाने पर, शल्य चिकित्सा होने पर, हड्डी टूट जाने अथवा मोच आ जाने पर उपचार के लिए कपड़ों से निर्मित पट्टियाँ ही सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
कपड़ा बनाने के लिए किन स्रोतों से तन्तु प्राप्त किए जाते हैं?
उत्तर:
कपड़ा बनाने के लिए दो प्रमुख स्रोतों से तन्तु प्राप्त किए जाते हैं

(1) प्राकृतिक स्रोत तथा
(2) कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित स्रोत। प्राकृतिक स्रोत के अन्तर्गत

तन्तु:
(क) वनस्पतियों,
(ख) जन्तुओं तथा
(ग) खनिज पदार्थों से प्राप्त किए जाते हैं। कृत्रिम तन्तुओं
में: (क) रेयॉन,
(ख) नायलॉन तथा
(ग) पोलिएस्टर आते हैं।

 

प्रश्न 2:
तन्तुओं के आधार पर वस्त्र कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त तन्तुओं से निम्न प्रकार के वस्त्र निर्मित किए जाते हैं

(क) वानस्पतिक तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

  1.  सूती वस्त्र-कपास के तन्तुओं से धागे (सूत) तैयार कर इन वस्त्रों का निर्माण किया जाता है।
  2.  लिनेन वस्त्र–फ्लैक्स के पौधों से प्राप्त तन्तुओं से धागा तैयार कर इन्हें निर्मित किया जाता है।

(ख) जन्तुओं से प्राप्त अथवा जान्तव तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

  1.  रेशमी वस्त्र:
    रेशम के कीड़ों द्वारा निर्मित तन्तुओं से इन वस्त्रों को तैयार किया जाता है।
  2. ऊनी वस्त्र:
    ये ऊन से तैयार किए जाते हैं तथा ऊन के तन्तु प्रायः ऊँट, खरगोश, भेड़ों व बकरियों के शरीर में उगने वाले बालों से प्राप्त होते हैं।

(ग) खनिज पदार्थों से प्राप्त तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

  1. जरीदार वस्त्र:
    ये मूल्यवान् वस्त्र चाँदी-सोने अथवा ऐलुमिनियम के महीन तारों को रेशमी अथवा सूती तन्तुओं के साथ मिश्रित करे तैयार किए जाते हैं।
  2.  अग्निप्रतिरोधक वस्त्र:
    ऐस्बेस्टॉस से निर्मित तन्तुओं से इस प्रकार के वस्त्र तैयार किए जाते हैं।

(घ) कृत्रिम तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

मनुष्य द्वारा रासायनिक विधियों के प्रयोग से निर्मित तन्तुओं से तैयार किए जाने वाले वस्त्र हैं

  1.  रेयॉन,
  2.  नायलॉन एवं
  3.  पोलिएस्टर वस्त्र इत्यादि।

प्रश्न 3:
प्राकृतिक तन्तु तथा कृत्रिम तन्तु में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वस्त्रोपयोगी तन्तु मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—प्राकृतिक तन्तु तथा कृत्रिम तन्तु। इन दोनों प्रकार के तन्तुओं में विद्यमान अन्तर को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग image - 1

प्रश्न 4:
ऊन की शुद्धता आप किस प्रकार निश्चित करेंगी?
उत्तर:
ऊन की शुद्धता के लिए ऊन की निम्नलिखित विशेषताओं का निरीक्षण आवश्

  1.  ऊन का धागा लगभग गोलाकार तथा लहरियापन लिए होता है।
  2.  कास्टिक सोडे के प्रयोग से ऊन के तन्तु परस्पर चिपक जाते हैं।
  3.  जलाने पर ऊन चिड़िया के पंखों के जलने के समान गन्ध देती है।
  4.  सज्जी या क्षार घोल में 5-6 मिनट तक उबालने पर ऊन इसमें पूर्णरूप से घुलकर अदृश्य हो जाती है।

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प्रश्न 5:
सूती वस्त्रों की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
सूती वस्त्रों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  1.  अपेक्षाकृत कम मूल्य के होते हैं।
  2.  हल्के अम्लों व क्षारों से अप्रभावित रहने के कारण इन्हें सहज ही व अनेक बार साबुन से धोया जा सकता है।
  3.  इनमें पसीना सोखने की क्षमता अधिक होती है।
  4.  ये शीघ्र सूख जाते हैं।
  5.  अधिक ताप सहन-शक्ति के कारण इन पर सरलतापूर्वक इस्तरी की जा सकती है।
  6.  जल शोषण करने की अधिक क्षमता के कारण तौलिये व झाड़न आदि के लिए सूती वस्त्र सर्वोत्तम होते हैं।
  7.  सूती वस्त्रे शरीर की गर्मी को सहज ही बाहर निकलने देते हैं; अत: ग्रीष्म ऋतु के लिए ये सर्वोत्तम वस्त्र होते हैं। ।
  8.  सूती वस्त्र प्रायः प्रथम बार धोने पर अधिक सिकुड़ते हैं; अतः वस्त्र-विशेष को निर्मित कराने से पूर्व इन्हें धोकर सुखा लेना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
तन्तु से क्या आशय है?
उत्तर:
वस्त्र-निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु कहते हैं।

प्रश्न 2:
वस्त्रोपयोगी तन्तुओं के दो प्रमुख वर्ग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वस्त्रोंपयोगी तन्तुओं के दो प्रमुख वर्ग हैं
(क) वस्त्रोपयोगी प्राकृतिक तन्तु तथा
(ख) वस्त्रोंपयोगी कृत्रिम तन्तु।

प्रश्न 3:
तन्तु तथा धागे में क्या अन्तर है?
उत्तर:
तन्तु वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी एवं स्वतन्त्र इकाई है। अनेक तन्तुओं को निश्चित विधि द्वारा परस्पर सम्बद्ध करके धागे का निर्माण होता है। तन्तु सामान्य रूप से प्रकृतिजन्य होते हैं जबकि धागे विधिवत् तैयार किए जाते हैं।

प्रैश्न 4:
वस्त्रोपयोगी प्राकृतिक तन्तुओं की प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वस्त्रोपयोगी प्राकृतिक तन्तुओं की प्राप्ति के स्रोत हैं-वनस्पति-जगत्, प्राणी-जगत् तथा खनिज स्रोत।।

प्रश्न 5:
वनस्पतिजन्य तन्तुओं को अन्य किस नाम से जाना जाता है? कारण भी बताइए।
उत्तर:
वनस्पतिजन्य तन्तुओं में अधिकांश भाग सेलुलोस का होता है। अत: इन तन्तुओं को सेलुलोस तन्तु भी कहा जाता है।

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प्रश्न 6:
सूती रेशे की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
कपास के बीज रोमों से प्राप्त सूती रेशे अधिक मजबूत व टिकाऊ होते हैं। इनमें अधिक ताप सहने व जल सोखने की क्षमता होती है।

प्रश्न 7:
प्राणिजन्य तन्तुओं को अन्य किस नाम से जाना जाता है? कारण भी बताइए।
उत्तर:
प्राणिजन्य तन्तुओं में अधिकांश भाग प्रोटीन का पाया जाता है; अत: इन तन्तुओं को ‘प्रोटीन तन्तु’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 8:
कृत्रिम तन्तुओं से प्रायः कौन-कौन से वस्त्र बनते हैं?
उत्तर:
कृत्रिम तन्तुओं से निर्मित होने वाले प्रमुख प्रकार के वस्त्र हैं

  1.  रेयॉन,
  2.  नायलॉन,
  3.  डैकरॉन,
  4. टेरीलीन।

प्रश्न 9:
रेयॉन किस प्रकार को तन्तु है?
उत्तर:
रेयॉन यान्त्रिक विधि से निर्मित कृत्रिम तन्तु है।

प्रश्न 10:
ऊनी तन्तु किस वर्ग के तन्तु हैं?
उत्तर:
ऊनी तन्तु प्राणिजन्य प्राकृतिक तन्तु हैं।

प्रश्न 11:
जरीदार वस्त्र किस प्रकार निर्मित किए जाते हैं?
उत्तर:
सोने, चाँदी अथवा ऐलुमिनियम के महीन तारों को सूती अथवा रेशमी धागों के साथ मिश्रित करे जरीदार वस्त्र निर्मित किए जाते हैं।

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प्रश्न 12:
शुद्ध रेशम की क्या पहचान है?
उत्तर:

  1.  रेशम के तन्तु जलाने पर बालों के जलने के समान गन्ध देते हैं तथा इनकी काली-सी गोली बन जाती है।
  2.  पानी में धोने पर रेशम न तो फैलता है और न ही सिकुड़ता है।

प्रश्न 13:
बर्तन पोंछने के तौलिए (डस्टर)प्रायः सूती ही क्यों प्रयोग किए जाते हैं?
उत्तर:
क्योंकि सूती डस्टर अधिक गर्मी सहन कर लेते हैं तथा बर्तनों की नमी सोख लेते हैं। ये शीघ्र ही आग को नहीं पकड़ते।

प्रश्न 14:
गर्म जलवायु में सूती वस्त्र अधिक सुविधाजनक क्यों प्रतीत होते हैं?
उत्तर:
गर्म जलवायु में शरीर से अधिक पसीना निकलता है। सूती वस्त्रे इस पसीने को शीघ्र ही सोख लेते हैं तथा चिपचिपाहट नहीं होती। अतः ये अधिक सुविधाजनक प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 15:
उत्तम ऊन किस प्रकार की भेड़ों से प्राप्त होती है?
उत्तर:
उत्तम ऊन प्रायः मैरीनो जाति की जीवित भेड़ों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 16:
ऊनी वस्त्र गर्म क्यों माने जाते हैं? या ऊनी कपड़ों की विशेषता लिखिए।
उत्तर:
ऊनी तन्तुओं के ऊष्मा के कुचालक होने के कारण ऊनी वस्त्र शरीर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते, जिससे ये शीत ऋतु में ठण्डे स्थानों के लिए गर्म व उपयुक्त वस्त्र माने जाते हैं।

प्रश्न 17:
जान्तव तन्तु कौन-से होते हैं? किसी एक के बारे में बताइए।
उत्तर:
जन्तुओं से प्राप्त होने वाले तन्तु को जान्तव तन्तु या प्राणिजन्य तन्तु कहते हैं। रेशम एवं ऊन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।।

प्रश्न 18:
नायलॉन, डैकरॉन, आरलॉन तथा एक्रीलॉन नामक वस्त्रोपयोगी तन्तु किस वर्ग के तन्तु हैं? इन्हें किस विधि द्वारा तैयार किया जाता है?
उत्तर:
नायलॉन, डैकरॉन, आरलॉन तथा एक्रीलॉन नामक वस्त्रोपयोगी तन्तु कृत्रिम वर्ग के तन्तु हैं? इन्हें रासायनिक विधि द्वारा तैयार किया जाता है।

प्रश्न 19:
क्षार का नायलॉन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
क्षार का नायलॉन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

प्रश्न 20:
गन्धक के तेजाब के गाढ़े घोल का ऊनी वस्त्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
गन्धक के तेजाब (सल्फ्यूरिक अम्ल) के गाढ़े घोल से ऊनी तन्तु नष्ट हो जाते हैं।

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प्रश्न 21:
दैनिक उपयोग के लिए किस प्रकार के वस्त्र सुविधाजनक हैं?
उत्तर:
दैनिक उपयोग के लिए सूती वस्त्र उपयोगी हैं और इसमें भी खादी के वस्त्र सर्वश्रेष्ठ ।

प्रश्न 22:
वस्त्रों का व्यक्ति के जीवन में उपयोग एवं महत्त्व बताइए।
उत्तर:

  1.  वस्त्र शरीर को प्राकृतिक कारकों से सुरक्षा प्रदान करते हैं,
  2.  वस्त्र शरीर को गोपनीयता प्रदान करते हैं,
  3. वस्त्र शरीर को सजाने एवं सँवारने में सहायक होते हैं,
  4. वस्त्र व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा एवं विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं तथा
  5. वस्त्र दैनिक जीवन के अनेक कार्यों में उपयोगी हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) वस्त्र विज्ञान के अनुसार वस्त्र-निर्माण की सबसे छोटी इकाई है
(क) कपास,
(ख) ऊन,
(ग) तन्तु,
(घ) धागा।

(2) सूती वस्त्र के लिए तन्तु प्राप्त किए जाते हैं
(क) रासायनिक पदार्थों से,
(ख) प्राणी-जगत् से,
(ग) व्यर्थ पदार्थों से,
(घ) वनस्पति-जगत् से।

(3) भारतवर्ष में प्रायः सूती वस्त्र अधिक पहने जाते हैं, क्योंकि ये
(क) बहुमूल्य होते हैं,
(ख) सहज ही उपलब्ध हैं,
(ग) वातावरण के अनुरूप हैं,
(घ) ऊष्मा के कुचालक हैं।

(4) नायलॉन के तन्तु हैं
(क) प्राकृतिक तन्तु,
(ख) प्राणिजन्य तन्तु,
(ग) यान्त्रिक विधि से निर्मित तन्तु ,
(घ) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम तन्तु।

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(5) ऊन प्राप्त की जा सकती है
(क) भेड़ों से,
(ख) बकरियों से,
(ग) ऊँटों से,
(घ) इन सभी से।

(6) उच्च गुणवत्ता की ऊन प्राप्त की जाती है
(क) बकरियों से,
(ख) भेड़ों से,
(ग) मेमनों से,
(घ) ऊँट से।

(7) निम्नलिखित में मानव-निर्मित तन्तु नहीं है।
(क) रेयॉन,
(ख) रेशम,
(ग) पोलिएस्टर,
(घ) नायलॉन।

(8) निम्नलिखित में पौधों से न प्राप्त होने वाली तन्तु है
(क) टेरीलीन,
(ख) सूत,
(ग) लिनन,
(घ) जूट।

(9) निम्नलिखित में से किस तन्तु पर आग का प्रभाव नहीं पड़ता है
(क) खनिज ( धातुमय) तन्तु ,
(ख) वनस्पति तन्तु,
(ग) जान्तव तन्तु,
(घ) कृत्रिम तन्तु।

(10) निम्नलिखित में से प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त तन्तु निर्मित वस्त्र है
(क) नायलॉन,
(ख) पोलिएस्टर,
(ग) खद्दर,
(घ) डैकरॉन।

(11) रेयॉन नामक कृत्रिम तन्तु बनाया जाता है
(क) नितान्त सरल विधि द्वारा,
(ख) रासायनिक विधि द्वारा,
(ग) जटिल विधि द्वारा,
(घ) यान्त्रिक विधि द्वारा।

(12) ग्रीष्म ऋतु के लिए वस्त्र होता है
(क) सूती,
(ख) लिनन,
(ग) रेशमी,
(घ) टेरीलीन।

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(13) हमारे लिए वस्त्रों की उपयोगिता है
(क) प्राकृतिक कारकों से सुरक्षा प्रदान करना,
(ख) शरीर को सजाना-सँवारना,
(ग) सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करना,
(घ) ये सभी।

उत्तर:
(1) (ग) तन्तु,
(2) (घ) वनस्पति-जगत् से,
(3) (ग) वातावरण के अनुरूप हैं,
(4) (घ) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम तन्तु,
(5) (घ) इन सभी से,
(6) (ग) मेमनों से,
(7) (ख) रेशम,
(8) (क) टेरीलीन,
(9) (क) खनिज (धातुमय) तन्तु,
(10) (ग) खद्दर,
(11) (घ) यान्त्रिक विधि द्वारा,
(12) (क) सूती,
(13) (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 17 सामान्य घरेलू देशज औषधियाँ तथा सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 17 सामान्य घरेलू देशज औषधियाँ तथा सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 17 सामान्य घरेलू देशज औषधियाँ तथा सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
सामान्य घरेलू देशज औषधियों से क्या आशय है? कुछ मुख्य घरेलू औषधियों का सामान्य परिचय दीजिए।
या
कुछ घरेलू देशज औषधियों के नाम एवं उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
सामान्य देशज औषधियाँ
रोग एवं दुर्घटनाएँ घरेलू अथवा पारिवारिक जीवन की सामान्य घटनाएँ हैं जो कि प्रायः पीड़ित व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी अनेक प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों में डाल देती हैं। प्राथमिक चिकित्सा तथा घरेलू औषधियों के ज्ञान का धैर्यपूर्वक उपयोग कर इन कठिनाइयों की गम्भीरता को न केवल कम किया जा सकता है, वरन् कई बार इनका सहज ही निवारण भी किया जा सकता है। सामान्यतः घरों में प्रयुक्त होने वाले मसालों, तरकारियों एवं फलों तथा सहज ही उपलब्ध सामान्य औषधियों का देशज घरेलू औषधियों के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि घर पर उपलब्ध होने वाले सामान्य पदार्थों को घरेलू देशज औषधियाँ कहा जाता है। ये पदार्थ विभिन्न शारीरिक विकारों में कष्ट-निवारक के रूप में इस्तेमाल किए (UPBoardSolutions.com) जाते हैं। इन घरेलू देशज औषधियों की जानकारी मनुष्य ने अपने दीर्घकालिक अनुभवों द्वारा प्राप्त की है तथा यह जानकारी पीढ़ी दर-पीढ़ी इसी रूप में हस्तान्तरित होती रहती है; उदाहरण के लिए–प्रायः सभी परिवारों के पेट दर्द में अजवाइन का प्रयोग किया जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अजवाइन को घरेलू देशज औषधि की श्रेणी में रखा जाता है। वैसे सामान्य रूप से अजवाइन एक मसाले के रूप में इस्तेमाल होती है। मुख्य सामान्य घरेलू देशज औषधियों तथा उनकी उपयोगिता का सामान्य परिचय निम्नर्णित है

(क) कुछ मसाले घरेलू औषधियों के रूप में
मसालों के रूप में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न पदार्थ, कई छोटे-छोटे रोगों और कष्टों के लिए लाभप्रद गुण रखते हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिखित सूची देखिए

  1. अजवाइन: यह पेट के दर्द को कम करती है। अफारा और गैस में भी लाभदायक है।
  2. सोंठ: यह वायु के रोगों के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
  3.  हींग: यह पेट के रोगों के लिए अत्यधिक लाभप्रद है। गैस, अफारा आदि में इसे पानी में घोलकर पेट पर लगाने से भी आराम मिलता है। अन्य पदार्थ; जैसे-अजवाइन, सोंठ, नमक आदि के साथ मिलाकर देने से पेट का दर्द, गैस, अफारे की शिकायत दूर हो जाती है।
  4.  काली मिर्च: यह गले को साफ करती है और कफ को हटाती है।
  5.  जीरा: यह पाचन क्रिया के लिए बहुत अच्छां पदार्थ है। भूख को बढ़ाता है।
  6.  मेथी: यह भूख को बढ़ाती है। इसके बने लड्डू वायु के दर्द में लाभप्रद हैं।
  7.  हल्दी: यह रक्त को शुद्ध करती है। इसका प्रयोग त्वचा को साफ करने में किया जाता है। यह कीटाणुनाशक है। छोटे-मोटे पेट के कीड़े इससे नष्ट हो जाते हैं।
  8.  लोंग: यह दाँत के दर्द के लिए एक अच्छी औषधि है। इसे पीसकर लगाने से दर्द बन्द हो जाता है। गले की खराश में भी लोग चूसी जाती है।
  9.  राई: मिरगी के रोगी को बारीक पिसी हुई राई सुंघाने से मूच्र्छा दूर हो जाती है।
  10.  अदरक: यह पाचन-क्रिया में सहायक है तथा वायु के रोगों को ठीक करता है।
  11.  नमक: यह घाव को साफ करने के लिए एक अच्छा पदार्थ है। गरम पानी में मिलाकर सिकाई करने से सूजन ठीक हो जाती है। गरम पानी में घोलकर गरारे करने से गला साफ होता है, कफ हटता है और सूजन कम हो जाती है।
  12.  सौंफ: यह खुनी पेचिश के लिए अत्यधिक लाभप्रद दवा है। पानी में उबालकर अर्क देने से यह बीमारी ठीक हो जाती है। इसका पानी अधिक प्यास को कम करता है तथा गर्मी के कारण होने वाले सिर दर्द को ठीक करता है।।
  13.  दाल: चीनी-दस्त और मरोड़ों में कत्था के साथ प्रयोग की जाती है।
  14.  पोदीना: सूखा हुआ पोदीना तथा उसका अर्क उल्टियों को बन्द करता है। पोदीना पाचन क्रिया में भी सहायक है।

(ख) कुछ सामान्य घरेलू उपयोग के पदार्थ

  1. आमाहल्दी: पिसी हुई अवस्था में चोट या मोच के रोगी को दी जाती है जो कि काफी आरामदायक है।
  2.  चूना: चोट, मोच इत्यादि पर आमाहल्दी चूने के साथ लगाने से दर्द में कमी होती है तथा मोच ठीक हो जाती है। बरौं के डंक मारने पर भी चूना लगाया जा सकता है।
  3. फिटकरी: रक्त-स्राव को रोकती है। गुलाब जल में मिलाकर आँख में डालने से दुखती हुई आँखें ठीक हो जाती हैं।
  4. कत्था: इसका चूरा मुँह के छालों को ठीक करता है।
  5.  तुलसी: तुलसी की पत्तियाँ जुकाम, बुखार आदि के लिए आराम देने वाली हैं। शहद के साथ प्रयोग करने से खाँसी ठीक हो जाती है।
  6. गोले का तेल: जले हुए स्थान पर लगाने से जलन कम होती है। घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है।
  7.  गुलाब जल: अनेक नेत्र रोगों के लिए शान्तिदायक है।
  8.  मुलहटी: खाँसी को ठीक करती है। मुँह में डालने से खाँसी बन्द हो जाती है।
  9.  ईसबगोल: इसकी भूसी कब्जनाशक है। पानी या दूध के साथ लेने पर कब्ज-निवारक होती है तथा दही में अच्छी तरह से मिला कर लेने पर दस्त को रोकती है।
  10.  नीम की पत्तियाँ: कीटाणुनाशक हैं, चर्म रोगों के लिए अति गुणकारी हैं। इनके पानी से नहाने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। सर्पदंश में इसको खिलाने से विष का प्रभाव कम हो जाता है। पानी में उबाल कर बालों को धोने से जुएँ नष्ट हो जाती हैं।

(ग) कुछ औषधियाँ तथा रासायनिक पदार्थ

  1.  पोटैशियम परमैंगनेट या लाल दवा:
    अनेक कीट पतंगों के काटने, बिच्छू के डंक मारने तथा सर्पदंश के घाव में भरने से विष को नष्ट कर देती है। संक्रामक रोगों के फैलने के समय इसे पानी में मिलाकर पीना चाहिए।
  2. स्प्रिट: घाव साफ करने तथा अन्य कामों के लिए उपयोगी है।
  3. बोरिक एसिड: घाव धोने के काम आता है। यह कीटाणुनाशक है। इसका हल्का घोल आँख । धोने के काम में लाया जाता है।
  4.  मरक्यूरोक्रोम: जल के साथ इसका घोल घाव पर लगाने से घाव शीघ्र भर जाता है तथा इस
    पर अन्य विषों का प्रभाव नहीं होता है।
  5.  अमोनिया: इसे सुंधाने से मूच्र्छा दूर हो जाती है। इसे विषैले कीट द्वारा काटने पर अथवा डंक मारने पर प्रयोग में लाया जाता है।
  6.  अमृत धारा: जी मिचलाना, दस्त, उल्टी (वमन) आदि में महत्त्वपूर्ण घरेलू औषधि है।
  7. डिटॉल: यह कीटाणुनाशक है। घाव धोने के काम आता है।
  8.  बरनॉल:  जले स्थान पर लगाने के लिए एक अच्छी क्रीम है।
  9. आयोडेक्स: यह एक सूजन कम करने वाली औषधि है, जो मोच एवं दर्द में आराम देती है।
  10.  कुनैन: यह शुद्ध अथवा रासायनिक पदार्थों के साथ मिश्रित रूप में प्रायः गोलियों के आकार में सहज ही उपलब्ध हो जाती है। मलेरिया ज्वर के लिए यह एक उत्तम औषधि है।

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प्रश्न 2:
विष कितने प्रकार के होते हैं? विषपान किए व्यक्ति का सामान्य उपचार आप किस प्रकार करेंगी?
या
यदि किसी बच्चे ने कोई विषैला पदार्थ खा लिया है, तो उसे किस प्रकार का प्रतिकारक पदार्थ दिया जाएगा? उदाहरण दीजिए। क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?
या
टिप्पणी लिखिए-विष कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
विष के प्रकार

सामान्यतः शरीर को हानि पहुँचाने वाले पदार्थ विष कहलाते हैं। ये पदार्थ प्रायः मुँह के द्वारा अथवा विषैले जीव-जन्तुओं के काटने पर शरीर में अन्दर प्रवेश करते हैं। विषपान करने पर शरीर में प्रवेश करने वाले विषैले पदार्थों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

(1) जलन उत्पन्न करने वाले विष:
ये विष शरीर के जिस भाग में प्रवेश करते हैं उसे या तो जला देते हैं अथवा उसमें जलन उत्पन्न करते हैं। कास्टिक सोडा, अमोनिया, कार्बोलिक एसिड तथा खनिज अम्ल आदि इस वर्ग के प्रमुख विष हैं। इस प्रकार के विष से प्रायः जीभ, गले तथा मुखगुहा में भयंकर जलन होती है तथा श्वास लेने में कठिनाई का अनुभव होता है।

(2) उदर अथवा आहारनाल को हानि पहुँचाने वाले विष:
इस प्रकार के विष उदर में पहुंचकर भयंकर उथल-पुथल पैदा करते हैं। ये कण्ठ, ग्रासनली, आमाशय एवं आँतों में जलन एवं दर्द उत्पन्न करते हैं। इनके शिकार व्यक्ति उदरशूल अनुभव करते हैं तथा उन्हें मतली आने लगती है। इस वर्ग के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख विष हैं संखिया, पारा, पिसा हुआ शीशा तथा विषैले एवं सड़े-गले खाद्य पदार्थ।

(3) निद्रा उत्पन्न करने वाले विष:
इस प्रकार के विष को खाने पर नींद आने लगती है जो कि विष की अधिकता होने पर प्रगाढ़ निद्रा अथवा संज्ञा-शून्यता में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रकार के विष का अत्यधिक सेवन करने से कई बार रोगियों की मृत्यु भी हो जाती है। अफीम, मॉर्फिन तथा डाइजीपाम (कम्पोज, वैलियम आदि) इत्यादि इस वर्ग के प्रमुख विष हैं।

(4) तन्त्रिका-तन्त्र को हानि पहुँचाने वाले विष:
इनका प्रभाव प्रायः स्नायुमण्डल अथवा विभिन्न नाड़ियों पर होता है; जिसके फलस्वरूप नेत्रों की पुतलियाँ फैल जाती हैं, मस्तिष्क चेतना शून्य हो सकता है अथवा शरीर के विभिन्न अंगों में पक्षाघात हो सकता है। भाँग, धतूरा, क्लोरोफॉर्म तथा मदिरा इसी प्रकार के प्रमुख विष हैं।

विषपान करने पर उपचार

विषपाने एक गम्भीर दुर्घटना है, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिदिन अनेक व्यक्ति अनेक प्रकार के कष्ट भोगते हुए अकाल ही मृत्यु की गोद में चले जाते हैं। इस समस्या का समाधान करना सम्भव है, यदि पीड़ित व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो जाए तथा कुछ सुरक्षात्मक उपायों का (UPBoardSolutions.com) कठोरतापूर्वक पालन किया जाए। चिकित्सा सहायता सदैव समय पर उपलब्ध होनी सम्भव नहीं है; अतः विषपान करने वाले व्यक्तियों के सामान्य उपचार के उपायों की जानकारी प्राप्त करना अति आवश्यक

(क) सुरक्षात्मक उपाय:
कई बार अनेक व्यक्ति (विशेष रूप से बच्चे) अज्ञानतावश अथवा नादानी में विषपान का शिकार हो जाते हैं। इस प्रकार की दुर्घटनाओं को निम्नलिखित उपायों का कठोरतापूर्वक पालन कर सहज ही टाला जा सकता है

  1.  घर में प्रयुक्त होने वाले सभी क्षारों एवं अम्लों को नामांकित कर यथास्थान रखें। ध्यान रहे कि ये स्थान बच्चों की पहुँच से सदैव दूर हों।
  2.  पुरानी तथा प्रयोग में न आने वाली औषधियों को घर में न रखें।
  3.  सभी औषधियों को उनकी मूल शीशी अथवा डिब्बी में रखें।
  4. कभी भी अन्धकार में कोई औषधि प्रयोग न करें।
  5.  चिकित्सक के पूर्व परामर्श के बिना कोई जटिल औषधि न प्रयोग करे।
  6.  पेण्ट वाले पदार्थ प्रायः विषैले होते हैं; अत: इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक करें।
  7.  कीटाणुनाशक (स्प्रिट व डिटॉल, फिनाइल) आदि तथा कीटनाशक (फ्लिट व बेगौन स्प्रे आदि) पदार्थ विषैले होते हैं। इन्हें सावधानीपूर्वक प्रयोग करें तथा प्रयोग करते समय कम-से-कम श्वालें।
  8. खाना पकाने से पूर्व दाल, शाक-सब्जियों एवं फलों को अच्छी प्रकार से धोएँ ताकि ये पूर्णरूपसे कीटनाशक रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त हो जायें।
  9.  बच्चों को समय-समय पर प्रेमपूर्वक उपर्युक्त बातों की जानकारी दें।

(ख) प्राथमिक चिकित्सा सहायता:
योग्य चिकित्सक अथवा अस्पताल से चिकित्सा सहायता प्रायः विलम्ब से प्राप्त होती है, जबकि विषपान किए व्यक्ति का उपचार तत्काल होना आवश्यक है। अतः विषपान सम्बन्धी प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान होना अति आवश्यक है। इसके लिए कुछ महत्त्वपूर्ण बातों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए

  1. रोगी के आस-पास विष की शीशी अथवा पुड़िया की खोज करें जिससे कि विष का प्रकार ज्ञात हो सके तथा उसके अनुसार उपयुक्त उपचार प्रारम्भ किया जा सके।
  2.  विष का प्रभाव कम करने के लिए रोगी को वमन कराकर उसके उदर से विष दूर करने का प्रयास करें।
  3.  यदि रोगी क्षारक अथवा अम्लीय विष से पीड़ित है, तो वमन न कराएँ। इस प्रकार के रोगियों को विष-प्रतिरोधक देना ही उचित रहता है।
  4.  क्षारीय विष से पीड़ित व्यक्ति को नींबू का रस अथवा सिरका पिलाना लाभप्रद रहता है। अम्लीय विष से पीड़ित व्यक्तियों को चूने का पानी, खड़िया, मिट्टी अथवा मैग्नीशियम का घोल देना उत्तम रहता है।
  5. आस्फोटक विष के उपचार के लिए रोगी को गरम पानी में नमक मिलाकर वमन कराना चाहिए। कई बार वमन कराने के बाद उसे अरण्डी का तेल पिलाना चाहिए।
  6. निद्रा उत्पन्न करने वाले विष के उपचार में रोगी को जगाए रखने का प्रयास करें। वमन कराने के उपरान्त उसे तेज चाय अथवा कॉफी पीने के लिए देना लाभप्रद रहता है।
  7. रोगी के हाथ व पैर सेंकते रहना चाहिए। रोगी को गुदा द्वारा नमक का पानी चढ़ाना लाभप्रद रहता है।
  8. आवश्यकता पड़ने पर रोगी को कृत्रिम उपायों से श्वास दिलाने का प्रयास करना चाहिए।
  9.  रोगी को अस्पताल भिजवाने का तुरन्त प्रबन्ध करें। रोगी के साथ उसके वमन अथवा लिए गए विष का नमूना अवश्य ले जाएँ। इससे विष के सम्बन्ध में शीघ्र जानकारी प्राप्त होने से उपयुक्त चिकित्सा तत्काल आरम्भ हो सकती है।

(ग) सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थों का उपयोग:
विषपान किए व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त विष एवं उसके प्रतिरोधक पदार्थ की जानकारी होने से विषपान के रोगी का उपचार सहज ही सम्भव है। सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ प्रायः निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(1) जलन पैदा करने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

(अ) क्षारीय विष:
क्षारीय विषों के प्रभाव को समाप्त करने के लिए अम्लों का प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण-नींबू का रस एवं सिरका।
(ब) अम्लीय विष:
इनके प्रतिकारक पदार्थ क्षारीय होते हैं। गन्धक, शोरे व नमक के अम्लों को प्रभावहीन करने के लिए

  1.  चूना या खड़िया मिट्टी पानी में मिलाकर दें।
  2. जैतून का तेल पानी में मिलाकर दें।
  3. पर्याप्त मात्रा में दूध दें।

(2) आहार नाल को हानि पहुँचाने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

  1. संखिया: यह एक भयानक विष है। टैनिक अम्ल के प्रयोग द्वारा इस विष के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  2. गन्धक: कार्बोनेट एवं मैग्नीशिया गन्धक के विष को प्रभावहीन करने के लिए उत्तम रासायनिक पदार्थ हैं।

(3) निद्रा उत्पन्न करने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

  1. अफीम: इस विष से पीड़ित व्यक्ति को गरम पानी में नमक मिलाकर वमन कराना चाहिए।
  2. निद्रा की गोलियाँ: इनसे प्रभावित व्यक्ति का उपचार अफीम के समान ही किया जाता है। रोगी को नमक के गरम पानी द्वारा वमन कराया जाता है तथा उसके उदर की सफाई की जाती है।

(4) तन्त्रिका-तन्त्र को हानि पहुँचाने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

  1. तम्बाकू: इसमें निकोटीन नामक विष होता है। गरम पानी में नमक डालकर रोगी को वमन करायें तथा तेज चाय व कॉफी पीने के लिए दें।
  2.  मदिरा: मदिरा के प्रभाव को नष्ट करने के लिए रोगी को वमन कराएँ तथा उसके उदर की पानी द्वारा सफाई करें। नींबू व नमक मिला गरम पानी पिलाने से लाभ होता है।
  3. भाँग एवं गाँजा: पीड़ित व्यक्ति को वमन कराकर खट्टी वस्तुएँ खिलानी चाहिए। यदि रोगी होश में है, तो उसे गरम दूध पिलाया जा सकता है।
  4. क्लोरोफॉर्म: इस विष का प्रतिकारक है एमाइल नाइट्राइट जो कि इसके प्रभाव को कम करता है।
  5. धतूरा: धतूरे के बीजों में घातक विष होता है। इस विष से पीड़ित व्यक्ति को होश में लाकर वमने कराना चाहिए। इसके बाद उसे गर्म दूध में एक चम्मच ब्राण्डी मिलाकर दी जा सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घरेलू औषधियों का महत्त्व बताइए।
या
गृहिणी के लिए घरेलू औषधियों का ज्ञान क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
घरेलू देशज औषधियों का महत्त्व

प्रत्येक घर-परिवार में रोगों एवं दुर्घटनाओं का होना सामान्य बातें हैं। परन्तु ये सामान्य बातें ही कई बार गम्भीर समस्याओं को जन्म दे सकती हैं। उदाहरण के लिए-रोग की प्रारम्भिक अवस्था में चिकित्सक के पास न जाने पर रोग गम्भीर रूप धारण कर लेता है। अथवा किसी रोग एवं दुर्घटना में (UPBoardSolutions.com) तत्काल चिकित्सा सहायता न उपलब्ध हो पाने पर रोगी की हालत गम्भीर हो सकती है। उपर्युक्त दोनों ही प्रकार की समस्याओं के निदान के लिए घरेलू देशजे औषधियों का व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। इससे प्रत्येक गृहिणी निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित हो सकती है—

(1) तत्काल उपचार:
घरेलू देशज औषधियों का व्यावहारिक ज्ञान होने पर गृहिणी किसी भी सामान्य रोग का तत्काल उपचार कर सकती है, जिसके फलस्वरूप रोग एवं दुर्घटनाएँ गम्भीर रूप नहीं ले पाते।

(2) समय एवं धन की बचत:
घरेलू देशज औषधियों से परिचित होने पर गृहिणी को घर-परिवार में होने वाले छोटे-छोटे रोगों के लिए चिकित्सक तक दौड़ने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे (UPBoardSolutions.com) उसके समय की पर्याप्त बचत होती है। घरेलू औषधियाँ प्रायः अपेक्षाकृत संस्ती एवं सहज ही उपलब्ध होती हैं। इनका समय-समय पर उपयोग करने से अपेक्षाकृत कम व्यय होता है अर्थात् धन की. पर्याप्त बचत होती है।

(3) साहस एवं आत्मविश्वास में वृद्ध:
घरेलू औषधियों से भली प्रकार परिचित गृहिणी परिवार के किसी सदस्य के रोग अथवा दुर्घटनाग्रस्त होने पर अपना धैर्य नहीं खोती तथा उत्पन्न समस्या का साहसपूर्वक एवं आत्मविश्वास से सामना करती है।

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प्रश्न 2:
तीन घरेलू दवाइयों के नाम एवं उपयोग बताइए।
या
दो घरेलू दवाइयों के नाम एवं उपयोग बताइए।
उत्तर:
कुछ महत्त्वपूर्ण घरेलू दवाइयों के नाम एवं उपयोग अग्रलिखित हैं

(1) हींग:
यह पेट के रोगों में बहुत लाभ पहुँचाती है। गैस व अफारा आदि में पानी में घोलकर पेट | पर लगाने से रोगी को पर्याप्त लाभ होता है। अजवाइन, सौंठ वे नमक के साथ मिलाकर देने से यह
अधिक प्रभावी हो जाती है।

(2) नमक:
सामान्य नमक (सोडियम क्लोराइड) घावों को साफ करने के लिए एक अच्छी औषधि का कार्य करता है। गरम पानी में मिलाकर सिकाई करने पर यह पर्याप्त आराम पहुँचाता है। जल-अल्पता या निर्जलीकरण होने पर इसे उबाल कर ठण्डा किए हुए पानी में चीनी के साथ मिलाकर बार-बार (UPBoardSolutions.com) पिलाने पर रोगी को अत्यधिक लाभ होता है। गरम पानी में नमक डालकर गरारे करने से गले के रोगों में विशेष लाभ होता है।

(3) सौंफ:
खुनी पेचिश के लिए सौंफ एक उत्तम औषधि है। इस रोग में सौंफ को पानी में उबालकर उसका अर्क दिया जाता है। यह प्यास को कम करती है तथा गर्मी के कारण होने वाले सिर दर्द में आराम पहुँचाती है।

प्रश्न 3:
कृमि रोग का उपचार आप कैसे करेंगी?
उत्तर:
इस रोग में पेट में विभिन्न प्रकार के बड़े-बड़े कीड़े हो जाते हैं, जिनके कारण रोगी के पेट में दर्द रहता है, उसके मुँह से लार टपकती है तथा वह सोते समय दाँत किटकिटाता है। इस प्रकार के रोगी को पपीते के बीज (ताजे अथवा सूखे) पीसकर खिलाने से उसके पेट के कीड़े मरकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। एक से दो माशे तक अजवाइन का चूर्ण गुड़ के साथ दिन में दो या तीन बार देने से कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4:
हैजा रोग का उपचार आप किस प्रकार करेंगी?
उत्तर:
हैजा रोग में दस्त एवं वमन के कारण पीड़ित व्यक्ति के शरीर में पानी की कमी हो जाती है; अत: उसे एक लीटर उबले हुए पानी में आधा चम्मच नमक, आधा चम्मच खाने का सोडा तथा एक चम्मच चीनी अथवा गुड़ मिलाकर बार-बार पिलाना चाहिए। अब रोगी को अमृतधारा की 10-15 बूंदें पानी में (UPBoardSolutions.com) डालकर देनी चाहिए जिससे कि रोगी की वमन रुक सकें। अब हरा धनिया, पुदीना और सौंफ को समान मात्रा में लेकर तथा इसमें सेंधा नमक मिलाकर चटनी की तरह पीस लें। इसके सेवन से रोगी को पर्याप्त आराम मिलता है। समय मिलते ही रोगी को किसी योग्य चिकित्सक को दिखाएँ।

प्रश्न 5:
निमोनिया रोग का उपयक्तु उपचार लिखिए।
उत्तर:
इस रोग में सामान्यतः ज्वर के साथ रोगी शीत का अनुभव करता है। उसके सीने में कफ एकत्रित हो जाता है, खाँसी रहती है तथा पसलियों में दर्द रहता है। पीड़ित व्यक्ति को गर्म स्थान में रखकर उसकी पसलियों के दोनों ओर पिसी हुई अलसी लगी रुई के पैड लगाने चाहिए। फूला हुआ सुहागा, फूली हुई फिटकरी, तुलसी की पत्तियाँ, अदरक पीसकर पान के रस एवं शहद में मिलाकर रोगी को दिन में चार या पाँच बार देना चाहिए।

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प्रश्न 6:
जुकाम अथवा नजले का घरेलू उपचार बताइए।
उत्तर:
जुकाम एवं नजला सामान्य रोग हैं जो कि प्रायः ऋतु परिवर्तन के समय अथवा शीत ऋतु में अधिक होते हैं। छींक आना, आँखों एवं नाक से पानी जाना, कान बन्द हो जाना तथा खाँसी व कफ निकलना आदि रोग के सामान्य लक्षण हैं।
शीत ऋतु में हुई खाँसी एवं श्वास रोग में सहजन की जड़ की छाल को घी या तेल में मिलाकर धूम्रपान करने से लाभ होता है। जुकाम के प्रारम्भ में दूध में हल्दी डालकर (UPBoardSolutions.com) उबालकर पीने से लाभ होता हैं। अधिक सिर दर्द व नाक से पानी बहने पर लौंग का दो बूंद तेल शक्कर अथवा बताशे के साथ खाने से अत्यधिक लाभ होता है। नए जुकाम में पीपल का चूर्ण शहद में अथवा चाय में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र आराम होता है। चाय में काली मिर्च का चूर्ण डालकर पीने से भी जुकाम में पर्याप्त लाभ होता है?

प्रश्न 7:
बिच्छू एवं शहद की मक्खी के काटने पर आप क्या उपचार करेंगी?
उत्तर:
बिच्छू के काटने पर उपचार-बिच्छू द्वारा काटने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  1. काटने के स्थान के थोड़ा ऊपर टूर्नीकेट बाँधना चाहिए।
  2.  काटे हुए स्थान पर बर्फ रखने पर तथा नोवोकेन का इन्जेक्शन लगाने पर पीड़ा में कमी आती है।
  3.  रोग नियन्त्रित न होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

शहद की मक्खी के काटने पर उपचार:
पीड़ित व्यक्ति को काटने के स्थान पर सूजन आ जाती है। तथा भयंकर जलन होती है। इसके लिए निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  1.  काटे स्थान को दबाकर डंक निकालना चाहिए।
  2.  घाव पर अमोनिया अथवा नौसादर एवं चूने की सम मात्रा मिलाकर लगानी चाहिए।
  3. काटे हुए स्थान पर स्प्रिट लगानी चाहिए।
  4. एण्टी-एलर्जी की गोलियाँ (एविल आदि) लेने से लाभ होता है।

प्रश्न 8:
विष कितने प्रकार से शरीर में पहुँचता है?
उत्तर:
प्राय: निम्नलिखित चार प्रकार से विष हमारे शरीर में प्रवेश करता है

  1. मुँह द्वारा-खाने-पीने की वस्तुओं में मिलाकर खाने अथवा खिलाने से विष शरीर में प्रवेश कर सकता है।
  2.  सँघने से कुछ विशेष प्रकार के विष पूँघने पर श्वास क्रिया के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उदाहरण-पेन्ट्स, फिनिट आदि।
  3.  विषैले जीव-जन्तुओं के काटने पर-अनेक जीव-जन्तु (बिच्छू, साँप, मधुमक्खी आदि) विषैले होते हैं। ये काटने अथवा डंक मारने पर अपने विष को हमारे शरीर में प्रवेश करा देते हैं।
  4. सामान्य घाव या इन्जेक्शन के घाव द्वारा इस विधि द्वारा अनेक विषैले कीटाणु एवं विष – हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घरेलू देशज औषधियों से क्या आशय है?
उत्तर:
जब किसी रोग या कष्ट के निवारण के लिए घर पर सामान्य इस्तेमाल की वस्तुओं को उपयोग में लाया जाता है तो उन सामान्य वस्तुओं को घरेलू देशज औषधि कहा जाता है। जैसे कि पेट-दर्द के निवारण के लिए अजवाइन एक घरेलू औषधि है।

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प्रश्न 2:
गुलाब जल का क्या प्रयोग है? .
उत्तर:
यह नेत्रों की अत्यन्त उपयोगी औषधि है। यह नेत्र रोगों को ठीक करता है तथा नेत्रों को ठण्डक व शान्ति देने वाला होता है।

प्रश्न 3:
जल जाने पर कोई दो घरेलु औषधियों के नाम बताए।
उत्तर:
गोले का तेल या बरनॉल।

प्रश्न 4:
साँप के काटने पर अंग में बन्ध क्यों लगाया जाता है?
उत्तर:
अंग में बन्ध लगाने से उस स्थान से रुधिर का तेजी से इधर-उधर बहना बन्द हो जाता है। और विष पूरे शरीर में नहीं फैलता।

प्रश्न 5:
तुलसी के पत्ते का औषधि उपयोग बताइए।
उत्तर:
तुलसी के पत्ते ज्वर तथा जुकाम को शान्त करते हैं। शहद के साथ खाँसी में लाभदायक हैं।

प्रश्न 6:
आमाहल्दी का उपयोग बताइए।
उत्तर:
पिसी हुई आमाहल्दी दूध के साथ देने से चोट तथा मोच में आराम मिलता है।

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प्रश्न 7:
किन्हीं दो घरेलू औषधियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अजवाइन, हींग, काला नमक आदि।

प्रश्न 8:
नकसीर छूटने पर आप कौन-सी घरेलू औषधिय प्रयोग करेंगी?
उत्तर:
नाक में देशी घी डालने तथा गीली-पीली मिट्टी सुंघाने से नाक द्वारा होने वाले रक्तस्राव में कमी आती है।

प्रश्न 9:
विष की शीशियों को लेबल करने से क्या लाभ है?
उत्तर:
विष की शीशियों को नामांकित (लेबल) कर रखने से भूलवश विषपान का भय नहीं रहता।

प्रश्न 10:
औषधियों का सेवन सदैव पर्याप्त प्रकाश में करना चाहिए। क्यों?
उत्तर:
क्योंकि अन्धकार में गलत औषधियाँ खा लेने की सम्भावना रहती है।

प्रश्न 11:
भाँग पिए व्यक्ति का आप क्या उपचार करेंगी?
उत्तर:
ऐसे व्यक्ति को खटाई (जैसे कि इमली का पानी) पिलाने से भाँग के विषैले प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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प्रश्न 12:
जी मिचलाने अथवा उल्टी आने पर प्रयुक्त होने वाली किन्हीं दो घरेलू औषधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जी मिचलाने अथवा वमन रोकने के लिए

  1.  अमृतधारा की 5-6 बूंदें पानी में डालकर पिलायें तथा
  2. पोदीना व प्याज पीसकर तथा उसमें नीबू का रस डालकर रोगी को पिलायें।

प्रश्न 13:
लू लगने पर रोगी को पीने के लिए क्या देना चाहिए?
उत्तर:
लू लगने पर रोगी को पीने के लिए आम का पन्ना देना चाहिए।

प्रश्न 14:
बेल का शर्बत क्यों उपयोगी माना जाता है ?
उत्तर:
बेल का शर्बत पेट सम्बन्धी विकार दूर करता है तथा पेचिश में विशेष लाभदायक होता है।

प्रश्न 15:
दाँतों में दर्द होने पर आप क्या औषधि प्रयोग करेंगी?
उत्तर:
पिसी हुई लौंग अथवा लौंग का तेल प्रभावित दाँत के निचले भाग पर लगाने से दर्द में पर्याप्त लाभ होता है।

प्रश्न 16:
मुँह एवं जीभ पर छाले होने पर आप क्या उपचार करेंगी?
उत्तर:
प्रभावित भाग पर ग्लिसरीन अथवा कत्थे का चूरा लगाने से पर्याप्त लाभ होता है।

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प्रश्न 17:
मलेरिया ज्वर में रोगी को कौन-सी घरेलू औषधि देनी चाहिए?
उत्तर:
तुलसी के पत्ते में काली मिर्च को सम मात्रा में पीसकर दिन में तीन या चार बार देने से मलेरिया के रोगी को लाभ होगा।

प्रश्न 18:
अफीम खा लेने पर चेहरे का रंग कैसा हो जाता है?
उत्तर:
अफीम खा लेने पर चेहरा पीला पड़ जाता है तथा नेत्रों की पुतलियाँ सिकुड़कर छोटी हो जाती हैं।

प्रश्न 19:
विभिन्न दवाएँ घर पर रखते समय आप क्या सावधानियाँ रखेंगी?
उत्तर:

  1.  घर में दवाएँ उनकी मूल शीशियों, डिब्बों अथवा रैपर में रखनी चाहिए।
  2.  दवाइयों को उनके निर्देशानुसार ठण्डे अथवा गरम तथा प्रकाश अथवा अन्धकार आदि निर्दिष्ट स्थान में रखना चाहिए।
  3.  दवाइयाँ सदैव सुरक्षित स्थान पर बच्चों की पहुँच से दूर रखी जानी चाहिए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) घरेलू देशज औषधियों के प्रयोग को उपयोगी माना जाता है
(क) आकस्मिक रोगों या दुर्घटनाओं के तुरन्त उपचार के लिए,
(ख) इनके प्रयोग से धन एवं समय की बचत होती है,
(ग) दुर्घटना घटित होने पर गृहिणी का मनोबल बना रहता है,
(घ) उपर्युक्त सभी उपयोग एवं लाभ।

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(2) सौंफ का प्रयोग किस रोग में किया जाता है?
(क) खूनी पेचिश,
(ख) निमोनिया,
(ग) कृमि रोग,
(घ) जुकाम।

(3) कृमि रोग में दिए जाते हैं
(क) धतूरे के बीज,
(ख) पपीते के बीज,
(ग) टमाटर के बीज,
(घ) खरबूजे के बीज।

(4) अमृतधारा का प्रयोग किया जाता है
(क) मलेरिया में,
(ख) कृमि रोग में,
(ग) खुनी पेचिश में,
(घ) वमन रोकने में।

(5) ईसबगोल की भूसी दी जाती है
(क) श्वास सम्बन्धी रोगों में,
(ख) हृदय रोग में,
(ग) पेचिश में,
(घ) काली खाँसी में।

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(6) जले हुए स्थान पर जलन कम करने के लिए आप क्या लगाएँगी?
(क) लौंग का तेल,
(ख) गोले का तेल,
(ग) सरसों का तेल,
(घ) अमृतधारा।

(7) नींद लाने वाला विष कौन-सा है?
(क) अफीम,
(ख) कास्टिक सोडा,
(ग) धतूरा,
(घ) संखिया।

(8) सबसे अधिक खतरनाक एवं हानिकारक विष कौन-से होता है?
(क) आहारनाल में जल उत्पन्न करने वाले विष
(ख) नींद लाने वाले विष,
(ग) मस्तिष्क तथा तन्त्रिकाओं पर बुरा प्रभाव डालने वाले विष,
(घ) मांसपेशियों में ऐंठन लाने वाले विष।

(9) निमोनिया के रोगी को आप कौन-सा पेय पदार्थ देंगी?
(क) लस्सी,
(ख) शर्बत,
(ग) चाय,
(घ) कोका कोला।

(10) साँप के काटे घाव पर कौन-सी वस्तु लगानी चाहिए?
(क) सल्फर,
(ख) बरनॉल,
(ग) पोटैशियम परमैंगनेट,
(घ) नमक।

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(11) बिच्छू के काटने पर तुरन्त दिया जाता है
(क) गर्म चाय,
(ख) गर्म दूध,
(ग) कहवा,
(घ) ब्राण्डी।

(12) कीटाणुनाशक पदार्थ है
(क) टाटरी,
(ख) अमृतधारा,
(ग) डिटॉल,
(घ) गोले का तेल।

(13) मुलहठी दी जाती है
(क) विष फैलने पर,
(ख) दस्तों के लिए,
(ग) खाँसी होने पर,
(घ) मलेरिया ज्वर में।

(14) पोटैशियम परमैंगनेट काम आता है
(क) चोट पर लगाने के लिए,
(ख) घाव को साफ करने के लिए,
(ग) घाव को भरने के लिए,
(घ) कीड़े-मकोड़ों को मारने के लिए।

(15) मलेरिया ज्वर के लिए एकमात्र दवा है
(क) सौंठ, अजवाइन तथा हींग,
(ख) कुनैन की गोलियाँ,
(ग) लौंग का पान,
(घ) पोदीने का पानी।

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(16) अम्ल तथा क्षार मुख्य रूप से उत्पन्न करते हैं
(क) जलन,
(ख) पीड़ा,
(ग) बेचैनी,
(घ) नींद।

उत्तर:
(1) (घ) उपर्युक्त सभी उपयोग एवं लाभ,
(2) (क) खूनी पेचिश,
(3) (ख) पपीते के बीज,
(4) (घ) वमन रोकने में,
(5) (ग) पेचिश में,
(6) (ख) गोले का तेल,
(7) (क) अफीम,
(8) (ग) मस्तिष्क तथा तन्त्रिकाओं पर बुरा प्रभाव डालने वाले विष,
(9) (ग) चाय,
(10) (ग) पोटैशियम परमैंगनेट,
(11) (क) गर्म चाय,
(12) (ग) डिटॉल,
(13) (ग) खाँसी होने पर,
(14) (ख) घाव को साफ करने के लिए,
(15) (ख) कुनैन की गोलियाँ,
(16) (क) जलन ।

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UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles

UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles (त्रिभुज)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles (त्रिभुज).

प्रश्नावली 7.1

प्रश्न 1.
चतुर्भुज ACBD में, AC = AD है और रेखाखण्ड AB, ∠A को समद्विभाजित करता है। दर्शाइए कि ∆ABC = ∆ABD है। BC और BD के बारे में आप क्या कह सकते हैं?
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-1
हल :
दिया है : ACBD एक चतुर्भुज है जिसमें भुजा AC = AD है और रेखाखण्ड AB, ∠A को समद्विभाजित करता है।
सिद्ध करना है : ∆ABC = ∆ABD; और
ज्ञात करना है : BC और BD में सम्बन्ध।
उपपत्ति: ∆ABC और ∆ABD की तुलना करने पर,
AC = AD (दिया है)
∠CAB = ∠DAB (दिया है)।
AB = AB (उभयनिष्ठ है)
∆ABC = ∆ABD (S.A.S. से)
Proved.
BC = BD

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प्रश्न 2.
ABCD एक चतुर्भुज है जिसमें AD = BC और ∠DAB = ∠ CBA है। सिद्ध कीजिए कि
(i) ∆ABD = ∆BAC
(ii) BD = AC
(iii) ∠ABD = ∠BAC
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-2
हल :
दिया है : चतुर्भुज ABCD में AD = BC और ∠DAB = ∠CBA
सिद्ध करना है :
(i) ∆ABD = ∆BAC
(ii) BD = AC
(iii) ∠ ABD = ∠BAC
उपपत्ति (i) ∆ABD और ∆BAC में,
AD = BC (दिया है)
∠DAB = ∠CBA (दिया है)
AB = AB (उभयनिष्ठ है)
∆ABD = ∆BAC (S.A.S. से)
(ii) सर्वांगसम त्रिभुजों में संगत मापें बराबर होती हैं और ∆ABD और ∆BAC सर्वांगसम हैं।
संगत भुजाएँ BD = AC
(iii) ∆ABD = ∆BAC
∠ABD = ∠BAC (C.P.C.T.) Proved.

प्रश्न 3.
एक रेखाखण्ड AB पर AD और BC दो बराबर लम्ब रेखाखण्ड हैं। दर्शाइए कि CD, रेखाखण्ड AB को समद्विभाजित करता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-3
हल :
दिया है : AB एक रेखाखण्ड है जिसके सिरों A तथा B पर क्रमश: AD और BC लम्ब इस प्रकार हैं कि AD = BC
सिद्ध करना है : CD, रेखाखण्ड AB को समद्विभाजित करता है।
उपपत्ति: प्रश्नानुसार, ∠DAB = 90° ⇒ ∠ DAO = 90°
तथा ∠CBA = 90° ⇒ ∠CBO = 90°
∠DAO = ∠CBO …(1)
∠AOD = ∠COB …(2) (शीर्षाभिमुख कोण)
(1) और (2) को जोड़ने पर,
∠DAO + ∠AOD = ∠CBO + ∠COB
⇒ 180° – ∠ADO = 180° – ∠BCO (त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग 180° होता है।)
⇒ ∠ODA = ∠OCB …(3)
अब ∆AOD व ∆BOC में,
∠DAO = ∠CBO [समीकरण (1) से]
AD = BC (दिया है)
∠ODA = ∠OCB [ समीकण (3) से]
∆AOD = ∆BOC (S.A.S. से)
AO = BO (C.P.C.T.)
रेखाखण्ड AB बिन्दु O पर समद्विभाजित होता है।
अत: CD, रेखाखण्ड AB को बिन्दु0 पर समद्विभाजित करता है।
Proved.

प्रश्न 4.
l और m दो समान्तर रेखाएँ हैं जिन्हें समान्तर रेखाओं pऔर qका एक अन्य युग्म प्रतिच्छेदित करता है। दर्शाइए कि ∆ABC = ∆CDA
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-4
हल:
दिया है। l और m दो समान्तर रेखाएँ हैं जिनको एक अन्य दो समान्तर रेखाओं p और q का युग्म बिन्दुओं A, B, C और D पर प्रतिच्छेदित करता है। रेखाखण्डे AC खींचा गया है।
सिद्ध करना है : ∆ABC = ∆CDA
उपपत्ति : l || m और AC एक तिर्यक रेखाखण्ड इन्हें प्रतिच्छेदित करता है।
∠DAC = ∠ BCA (एकान्तर कोण युग्म)
इसी प्रकार, p || q है और AC एक तिर्यक रेखाखण्ड इन्हें प्रतिच्छेदित करता है।
∠DCA = ∠BAC (एकान्तर कोण युग्म)
अब ∆ABC और ∆CDA में, ∠BCA = ∠DAC (ऊमर सिद्ध किया है)
AC = AC (उभयनिष्ठ है)
∠BAC = ∠DCA (ऊपर सिद्ध किया है)
∆BC = ∆CDA (A.S.A से)
Proved.

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प्रश्न 5.
रेखा l कोण A को समद्विभाजित करती है और B रेखा पर स्थित कोई बिन्दु है। BP और BQ कोण A की भुजाओं पर B से डाले गए लम्ब हैं। दर्शाइए कि
(i) ∆APB = ∆AQB
(ii) BP = BQ अर्थात बिन्दु B कोण A की भुजाओं से समदूरस्थ है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-5
हल :
दिया है। एक रेखा है जो ∠A को समद्विभाजित करती है। रेखा l पर कोई बिन्दु B स्थित है। बिन्दु B से ∠ A की भुजाओं AP और AQ पर क्रमशः BP और BQ लम्ब खींचे गए हैं।
सिद्ध करना है : (i) ∆APB = ∆AQB,
(ii) BP = BQ अर्थात् बिन्दु B कोण ∆की भुजाओं से समदूरस्थ है।
उपपत्ति : (i) BP ⊥ AP और BQ ⊥ AQ
∠P = 90° और ∠Q = 90° …(1)
A रेखा l, ∠A को समद्विभाजित करती है।
∠QAB = ∠PAB
∠QAB= ∠PAB = x° …(2)
तब ∆APB और ∆AQB के अन्त:कोणों के योग की समानता से,
∠ABP + ∠PAB + ∠P = ∠ABQ + ∠QAB + ∠Q
∠ABP + x + 90° = ∠ABQ + x° + 90° [समीकरण (1) तथा (2) से]
∠ABP =∠ABQ
Proved.
अब ∆APB और ∆AQB में, ∠PAB = ∠QAB (दिया है)
AB = AB (उभयनिष्ठ है)
∠ABP = ∠ABQ (अभी सिद्ध किया है)
∆APB = ∆AQB (A.S.A से)
(ii) : ∆APB = ∆AQB
BP= BQ (C.P.C.T.)
अर्थात बिन्दु B, ∠A की भुजाओं से समदूरस्थ है।
Proved.

प्रश्न 6.
दी गई आकृति में, AC = AE, AB = AD और ∠BAD = ∠EAC है, दर्शाइए कि BC = DE है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-6
हल :
दिया है : दी गई आकृति के ∆ABD में AB = AD तथा ∆ACE में AC = AE है और ∠BAD = ∠EAC। रेखाखण्ड DE खींचा। गया है।
सिद्ध करना है : BC = DE
उपपत्ति : ∠ BAD = ∠ EAC दोनों ओर ∠DAC जोड़ने पर,
∠BAD + ∠DAC = ∠EAC + ∠DAC
∠BAC = ∠DAE
अब ∆ABC तथा ∆ADE में,
AB = AD (दिया है)
∠BAC = ∠DAE [समीकरण (1) से]
AC = AE (दिया है)
∆ABC = ∆DE (S.A.S. से)
अतः BC = DE (C.P.C.T.)
Proved.

प्रश्न 7.
AB एक रेखाखण्ड है और Pइसका मध्य बिन्दु है। D और E रेखाखण्ड AB के एक ही ओर स्थित दो बिन्दु इस प्रकार हैं कि ∠BAD = ∠ABE और ∠EPA = ∠DPB है। दर्शाइए कि
(i) ∆DAP = ∆EBP
(ii) AD = BE
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-7
हल :
दिया है : AB एक रेखाखण्ड है जिसका मध्य-बिन्दु P है। AB के एक ही ओर दो बिन्दु D और E हैं। D से रेखाखण्ड DA और DP खींचे गए हैं और E से रेखाखण्ड EB और EP खींचे गए हैं जिससे ∠BAD = ∠ABE तथा ∠EPA = ∠DPB है।
सिद्ध करना है :
(i) ∆DAP = ∆EBP
(ii) AD = BE
उपपत्ति (i) P, AB का मध्य बिन्दु है जिससे AP= BP
और ∠BAD = ∠ABE (दिया है)
∠PAD = ∠PBE
हमें ज्ञात है कि ∠EPA = ∠DPB
दोनों पक्षों में ∠EPD जोड़ने पर,
∠EPA + ∠ EPD = ∠DPB + ∠EPD
∠DPA = ∠EPB (चित्र से)
अब ∆DAP तथा ∆EBP में, ∠DPA = ∠ EPB (अभी सिद्ध किया है)
AP = BP (P, AB का मध्य-बिन्दु है)
∠PAD = ∠PBE (सिद्ध कर चुके हैं)
∆DAP = ∆EBP (A.S.A. से)
(ii) ∆DAP = ∆EBP
AD = BE (C.P.C.T.)
Proved.

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प्रश्न 8.
एक समकोण त्रिभुज ABC में, जिसमें ∠C समकोण है, M कर्ण AB का मध्य बिन्दु है। C को M से मिलाकर D तक इस प्रकार बढ़ाया गया है कि DM = CM है। बिन्दु D को बिन्दु B से मिला दिया जाता है। दर्शाइए कि :
(i) ∆AMC = ∆BMD
(ii) ∠DBC एक समकोण है।
(iii) ∆DBC = ∆ACB
(iv) CM = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-8
हल :
दिया है: ABC एक समकोण त्रिभुज है जिसमें ∠C = 90° है तथा कर्ण AB को मध्य-बिन्दु M है। रेखाखण्ड CM खींचकर इसे बिन्दु D तक इस प्रकार बढ़ाया गया है कि CM = DM है। बिन्दु D को बिन्दु B से मिलाकर रेखा BD खींची गई है।
सिद्ध करना है :
(i) ∆AMC = ∆BMD
(ii) ∠DBC एक समकोण है।
(iii) ∆DBC = ∆ACB
(iv) CM = AB
उपपत्ति : (i) ∆AMC और ∆BMD में,
AM = BM (M, AB का मध्य-बिन्दु है)
∠AMC = ∠BMD (शीर्षाभिमुख कोण)
CM = DM (दिया है)
∆AMC = ∆BMD (S.A.S. से)
(ii) ∆AMC = ∆BMD
∠MAC = ∠ MBD
AC || BD
∠DBC + ∠ACB = 180°
∠DBC + 90° = 180°
(iii) ∆DBC और ∆ACB में,
DB = AC (C.P.C.T.) [∆AMC = ∆BMD]
∠DBC = ∠ACB [ भाग (ii) से ]
BC = BC (उभयनिष्ठ)
∆DBC = ∆ACB (S.A.S. से)
(iv) DC = AB (C.P.C.T.)
2CM = AB (DM = CM)
CM = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
Proved.

प्रश्नावली 7.2

प्रश्न 1.
एक समद्विबाहु त्रिभुज ABC में जिसमें AB = AC है, ∠B और ∠C के समद्विभाजक परस्पर बिन्दु O पर प्रतिच्छेद करते हैं। A और O को जोड़िए और दर्शाइए कि
(i) OB = OC
(ii) AO, ∠A को समद्विभाजित करता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-9
हल :
दिया है : समद्विबाहु ∆ABC में, AB = AC है।
∠B और ∠C के समद्विभाजक BO तथा CO बिन्दु O पर मिलते हैं। रेखाखण्ड AO को जोड़ा गया है।
सिद्ध करना है :
(i) OB = OC
(ii) AO, ∠A को समद्विभाजित करता है।
उपपत्ति :
(i) ∆ABC में, AC = AB (दिया है)
∠ABC = ∠ACB
(त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं)
[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠ABC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠ACB
∠OBC = ∠OCB …(1) (BO, CO क्रमशः ∠B और ∠C के समद्विभाजक हैं) :
∆OBC में,
∠OBC = ∠OCB
अतः OB = OC (त्रिभुज में समान कोणों की सम्मुख भुजाएँ समान होती हैं।)
(ii) ∆ABO तथा ∆ACO में,
AB = AC (दिया है)
OB = OC (ऊपर सिद्ध किया है)
AO = AO (उभयनिष्ठ भुजा है)
∆ABO = ∆ACO (S.S.S. से)
∠BAO = ∠CAO (C.P.C.T.)
अर्थात, AO, ∠A को समद्विभाजित करता है।
Proved.

प्रश्न 2.
∆ABC में AD भुजा BC का लम्ब समद्विभाजक है दर्शाइए कि ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है, जिसमें AB = AC है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-10
हल :
दिया है : ABC एक त्रिभुज है जिसमें भुजा BC का लम्ब समद्विभाजक AD है।
सिद्ध करना है : ∆ABC समद्विबाहु त्रिभुज है जिसमें AB = AC है।
उपपत्ति : AD, BC का लम्ब समद्विभाजक है।
BD = CD तथा ∠ADB = ∠ADC = 90°
अब ∆ABD और ∆ACD में,
BD = CD (ऊपर सिद्ध किया है)
∠ADB = ∠ADC (ऊपर सिद्ध किया है)
AD = AD (उभयनिष्ठ भुजा है)
∆ABD = ∆ACD (S.A.S.से)
AB = AC (C.P.C.T.)
अर्थात् ∆ABC समद्विबाहु है।
Proved.

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प्रश्न 3.
ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है, जिसमें बराबर भुजाओं AC और AB पर क्रमशः शीर्षलम्ब BE तथा CF खींचे गए हैं। दर्शाइए कि ये शीर्ष लम्ब बराबर हैं।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-11
हल :
दिया है : एक समद्विबाहु ∆ABC में AB = AC तथा शीर्ष B से भुजा AC पर BE लम्ब डाला गया है और शीर्ष C से भुजा AB पर CF लम्ब डाला। गया है।
सिद्ध करना है : BE = CF
उपपत्ति: ∆ABC में,
AC = AB (दिया है)
∠ABC = ∠ACB … (1) (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं)
अब ∆BCF और ∆CBE में,
∠ BFC = ∠CEB (BE ⊥ AC तथा CF ⊥ AB)
BC = BC (उभयनिष्ठ भुजा)
∠FBC = ∠ ECB (∠ABC = ∠FBC तथा ∠ACB = ∠ECB)
∆BCF = ∆CBE (A.S.A. से)
BE = CF (C.P.C.T.)
Proved.
अर्थात दोनों शीर्षलम्ब बराबर हैं।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-12

प्रश्न 4.
ABC एक त्रिभुज है जिसमें AC और AB पर खींचे गए शीर्षलम्ब BE तथा CF बराबर हैं। दर्शाइए कि
(i) ∆ABE = ∆ACF
(ii) AB = AC अर्थात ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-13
हल :
दिया है : ∆ABC में शीर्ष B से शीर्षलम्ब BE तथा शीर्ष C से शीर्षलम्ब CF, क्रमशः AC और AB पर इस प्रकार खींचे गए हैं कि BE = CF है।
सिद्ध करना है :
(i) ∆ABE = ∆ACF
(ii) AB = AC अर्थात ∆ABC समद्विबाहु है।
उपपत्ति : (i) BE शीर्षलम्ब है AC पर ∠AEB = 90°
∠ABE = 90° – A (त्रिभुज के अन्त:कोणों को योग 180° होता है)
इसी प्रकार, CF शीर्षलम्ब है AB पर
∠AFC = 90°
∠ACF = 90° – A ( त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग 180° होता है)
∠ABE = ∠ACF …….(1)
अब ∆ABE और ∆ACF में,
∠ABE = ∠ACF [समीकरण (1) से]
BE = CF (दिया है)
∠AEB= ∠AFC (प्रत्येक 90°)
∆ABE = ∆ACF (A.S.A.से)
(ii) ∆ABE = ∆ACF
AB = AC (C.P.C.T.)
अत: ∆ABC समद्विबाहु है।
Proved.
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-14

प्रश्न 5.
ABC और DBC समान (एक ही) आधार पर स्थित दो समद्विबाहु त्रिभुज हैं। दर्शाइए कि ∠ABD = ∠ACD
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-15
हल :
दिया है। दो समद्विबाहु ∆ABC और ∆DBC एक ही आधार BC पर स्थित हैं और AB = AC तथा DB = DC
सिद्ध करना है : ∠ABD = ∠ACD
उपपत्ति : ∆ABC में,
AB = AC (दिया है)
∠ACB = ∠ABC (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं) …(1)
पुनः ∆DBC में, DB = DC (दिया है)
∠BCD = ∠CBD (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं) …(2)
समीकरण (1) व (2) को जोड़ने पर,
∠ ACB + ∠BCD = ∠ABC + ∠CBD
∠ACD = ∠ABD
अतः ∠ABD = ∠ACD
Proved.

प्रश्न 6.
ABC एक समद्विभाहु त्रिभुज है, जिसमें AB = AC है। भुजा BA बिन्दु D तक इस प्रकार बढ़ाई गई है कि AD = AB है। दर्शाइए कि ∠BCD एक समकोण है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-16
हल :
दिया है : ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है जिसमें भुजा AB = AC है और भुजा BA को , बिन्दु D तक इस प्रकार बढ़ाया गया है कि AD = AB है।
सिद्ध करना है : ∠BCD एक समकोण है।
उपपत्ति : ∆ABC में,
AC = AB (दिया है)
∠ABC = ∠ACB (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं) …(1)
भुजा BA को बिन्दु D तक इस प्रकार बढ़ाया गया है कि
AB = AD
परन्तु दिया है कि AB = AC भी हैं।
AC = AD
∆ACD में,
∠ADC = ∠ACD (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं) …(2)
समीकरण (1) व समीकरण (2) को जोड़ने पर,
∠ABC + ∠ADC = ∠ACB + ∠ACD
∠ABC + ∠ADC = ∠ BCD (चित्र से)
∠DBC +∠BDC = ∠BCD (∠ ABC = ∠ DBC तथा ∠ ADC = ∠BDC) …(3)
अब : ∆BCD में,
∠DBC + ∠BDC + ∠BCD = 180° (त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग 180° होता है)
∠BCD + ∠BCD = 180° [ समीकरण (3) से]
2 ∠BCD = 180°
∠BCD = 90°
अतः ∠BCD एक समकोण है।
Proved.

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प्रश्न 7.
ABC एक समकोण त्रिभुज है, जिसमें ∠A = 90° और AB = AC है। ∠B और ∠C ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-17
हल :
दिया है : ABC एक समकोण त्रिभुज है जिसमें A = 90° और बराबर भुजाओं में AB = AC है।
ज्ञात करना है : ∠B तथा ∠C
गणना : ∆ABC समद्विबाहु है जिसमें AB = AC है।
∠C = ∠B (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं) …(1)
त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग 180° होता है।
∠A + ∠B + ∠C = 180°
90° +∠B + ∠B = 180° [समीकरण (1) से]
2 ∠B = 180° – 90° = 90°
∠B = 45° …(1)
∠C = ∠ B
∠C = 45°
अतः ∠B = 45° तथा ∠C = 45°

प्रश्न 8.
दर्शाइए कि किसी समबाहु त्रिभुज का प्रत्येक कोण 60° होता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-18
हल :
दिया है : ABC एक समबाहु त्रिभुज है जिसमें भुजाएँ AB, BC और CA परस्पर समान लम्बाई की हैं।
∠A, ∠B और ∠C समबाहु त्रिभुज के अन्त: कोण हैं।
सिद्ध करना है : त्रिभुज का प्रत्येक अन्त:कोण = 60°
उपपत्ति: ∆ABC समबाहु है जिसमें AB = BC = AC
यदि AB = AC तो ∠C = ∠B …..(1)
यदि AB = BC तो ∠C = ∠A …(2) (त्रिभुज में समान भुजाओं के सम्मुख कोण समान होते हैं)
समीकरण (1) व समीकरण (2) से
∠A = ∠B = ∠C …(3)
परन्तु त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग = 180°
∠A + ∠B + ∠C = 180°
⇒ ∠A + ∠A + ∠A = 180°
⇒ 3 ∠A = 180°
⇒ ∠A = 60°
तब समीकरण (3) से
∠A = ∠B = ∠C = 60°
अतः समबाहु त्रिभुज का प्रत्येक अन्त: कोण = 60°
Proved.

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प्रश्नावली 7.3

प्रश्न 1.
∆BC और ∆DBC एक ही आधार BC पर बने दो समद्विबाहु त्रिभुज इस प्रकार हैं कि A और D, भुजा BC के एक ही ओर स्थित हैं। यदि AD बढ़ाने पर BC को P पर प्रतिच्छेद करे तो दर्शाइए कि :
(i) ∆ABD = ∆ACD
(ii) ∆ABP = ∆ACP
(iii) AP, ∠A और ∠D दोनों को समद्विभाजित करता है।
(iv) AP, रेखाखण्ड BC का लम्ब समद्विभाजक है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-19
हल :
दिया है। एक ही आधार BC पर दो समद्विबाहु त्रिभुज, ∆ABC और ∆DBC ऐसे स्थित हैं कि A और D, BC के एक ही ओर हैं।
AD को बढ़ाने पर यह BC को P पर काटती है।
सिद्ध करना है :
(i) ∆ABD = ∆ACD
(ii) ∆ABP = ∆ACP
(iii) AP, ∠A और ∠D दोनों को समद्विभाजित करता है।
(iv) AP, रेखाखण्ड BC का लम्ब समद्विभाजक है।
उपपत्ति : ∆ABC समद्विबाहु है जिसको आधार BC है।
AB = AC
और ∆DBC समद्विबाहु है जिसका आधार BC है।
BD = CD
(i) ∆ABD और ∆ACD में,
AB = AC [समीकरण (1) से]
BD = CD [समीकरण (2) से ]
AD = AD (उभयनिष्ठ भुजा से)
∆ABD = ∆ACD (S.S.S. से)
(ii) ∆ABD = ∆ACD
∠BAD = ∠CAD
अर्थात् AD, ∠A का समद्विभाजक है। (C.P.C.T.)
तबे AD को आगे बढ़ाने पर AP भी ∠A का समद्विभाजक होगा।
अब ∆ABP और ∆ACP में,
AB = AC [समीकरण (1) से]
∠BAP = ∠CAP ( AP, ∠A का समद्विभाजक है।)
AP = AP (उभयनिष्ठ भुजा)
∆ABP = ∆ACP (S.A.S. से)
(iii) ∆ABP = ∆ACP के ∠BDP = ∠CDP (C.P.C.T.)
DP, ∠D का समद्विभाजक है।
AP, ∠D का समद्विभाजक है। और हम अभी सिद्ध कर चुके हैं कि AP, ∠A का समद्विभाजक है।
तब, AP, ∠A और ∠D दोनों को समद्विभाजित करता है।
(iv) अभी हमने सिद्ध किया है कि ∆ABP = ∆CP
∠APB = ∠APC
तथा BP = CP (C.P.C.T.)
अब BP = CP
AP, भुजा BC का समद्विभाजक है।
∠ APB + ∠ APC = 180° और ∠APB = ∠APC (रेखीय युग्म)
तब हल करने पर,
∠APB = ∠APC = 90°
AP, BC पर लम्ब है।
AP, BC पर लम्ब भी है और AP, BC का समद्विभाजक भी है।
अतः AP रेखाखण्ड BC का लम्ब समद्विभाजक है।
Proved.

प्रश्न 2.
AD एक समद्विबाहु त्रिभुज ABC का शीर्षलम्ब है, जिसमें AB = AC है। दर्शाइए कि
(i) AD, रेखाखण्ड BC को समद्विभाजित करता है।
(ii) AD, ∠A को समद्विभाजित करता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-20
हल :
दिया है : ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है जिसमें AB = AC है।
त्रिभुज के शीर्ष A से BC पर AD लम्ब डाला गया है जिससे AD शीर्षलम्ब है।
सिद्ध करना है :
(i) AD, रेखाखण्ड BC को समद्विभाजित करता है।
(ii) AD, ∠A को समद्विभाजित करता है।
उपपत्ति : AD, ∆ABC का शीर्षलम्ब है।
AD ⊥ BC के ∠ADB = 90°
और ∠ADC = 90°
AB, ∆ABD को और AC, ∆ACD का कर्ण है।
तब समकोण त्रिभुज ABD और समकोण त्रिभुज ACD में, ∠ADB = ∠ADC (प्रत्येक 90°)
AB = AC (दिया है)
AD = AD (उभयनिष्ठ भुजा)
∆ABD = ∆ACD (R.H.S.)
(i) ∆BD = ∆ACD
BD = CD (C.P.C.T.)
D, BC का मध्य-बिन्दु है।
अत: AD, रेखाखण्ड BC को समद्विभाजित करता है।
(ii) ∆ABD = ∆ACD
∠BAD = ∠CAD (C.P.C.T.)
अत: AD, ∠A को समद्विभाजित करता है।
Proved.

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प्रश्न 3.
एक ∆BC की दो भुजाएँ AB तथा BC और माध्यिका AM क्रमशः एक-दूसरे ∆PQR की भुजाओं PQ तथा QR और माध्यिका PN के बराबर है। दर्शाइए कि
(i) ∆ABM = ∆PQN
(ii) ∆ABC = ∆PQR
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-21
हल :
दिया है: ∆ABC और ∆PQR दो त्रिभुज हैं जिनमें AB = PQ, BC = QR तथा माध्यिका AM = PN
सिद्ध करना है :
(i) ∆ABM = ∆PQN
(ii) ∆ABC = ∆PQR
उपपत्ति : BC = QR (दिया है)
[latex]\frac { BC }{ 2 }[/latex] = [latex]\frac { QR }{ 2 }[/latex]
BM = QN (AM व PN माध्यिकाएँ हैं)
(i) ∆ABM और ∆PQN में,
AB = PQ (दिया है)
AM = PN (दिया है)
BM = QN (ऊपर सिद्ध किया है)
∆ABM = ∆PQN (S.S.S. से)
(ii) ∆ABM = ∆PQN ⇒ ∠B = ∠Q (C.P.C.T.) …(1)
अब ∆BC तथा ∆PVR में,
AB = PQ (दिया है)
BC = QR (दिया है)
∠B = ∠Q [समीकरण (1) से]
अतः ∆BC = APQR (S.A.S. परीक्षण से)
Proved.

प्रश्न 4.
BE और CF एक ∆ABC के दो बराबर शीर्षलम्ब हैं। R.H.S. सर्वांगसमता नियम का प्रयोग करके सिद्ध कीजिए कि ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-22
हल :
दिया है : ABC एक त्रिभुज है जिसमें शीर्ष B से भुजा AC पर BE शीर्ष लम्ब खींचा गया है और शीर्ष C से भुजा AB पर CF शीर्षलम्ब इस प्रकार है कि BE = CF
सिद्ध करना है: ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है।
उपपत्ति : ∆ABC में BE, शीर्ष B से AC पर शीर्षलम्ब है।
∠BEC = 90°
∆BEC एक समकोण त्रिभुज है जिसमें कर्ण BC है।
पुनः ∆ABC में CF, शीर्ष C से AB पर शीर्षलम्ब है।
∠ BFC = 90°
∆BFC एक समकोण त्रिभुज है जिसमें कर्ण BC है।
समकोण त्रिभुज ∆BEC और ∆BFC में,
∠ BEC = ∠CFB (प्रत्येक 90°)
BE = CF (दिया है)
BC = BC (उभयनिष्ठ भुजा)
∆BEC = ∆BFC (R.H.S.)
∠ECB = ∠ FBC
⇒ ∠ACB =∠ ABC (C.P.C.T.)
अब ∆ABC में,
∠ACB = ∠ABC
AB = AC (त्रिभुज में समाने कोणों की सम्मुख भुजाएँ समान होती हैं)
अतः ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है।
Proved.

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प्रश्न 5.
ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है जिसमें AB = AC है। AP ⊥ BC खींचकर दर्शाइए कि ∠B = ∠C
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-23
हल :
दिया है: ∆ABC एक समद्विबाहु त्रिभुज है जिसमें AB = AC है।
शीर्ष A से BC पर AP लम्ब खींचा गया है। सिद्ध करना है : ∠B = ∠C
उपपत्ति: AP⊥ BC
∆APB में, ∠APB = 90° जिससे कर्ण AB है।
और ∆APC में, ∠APC = 90° जिससे कर्ण AC है।
अब ∆APB और ∆APC में,
∠APB = ∠ APC (प्रत्येक 90°)
AB = AC (दिया है)
AP = AP (उभयनिष्ठ भुजा)
∆APB = ∆APC (R.H.S. से)
अतः ∠B = ∠C (C.P.C.T.)
Proved.

प्रश्नावली 7.4

प्रश्न 1.
दर्शाइए कि समकोण त्रिभुज में कर्ण सबसे लम्बी (या सबसे बड़ी) भुजा होती है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-24
हल :
दिया है : ∆ABC में, ∠C = 90° तथा भुजा AB कर्ण है।
सिद्ध करना है : कर्ण AB, सबसे बड़ी भुजा है।
उपपत्ति: ∆ABC में, ∠C = 90° (दिया है)
∠A + ∠B = 180° – ∠C = 180° – 90° = 90° (त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग 180° होता है)
∠A तथा ∠B, 90° से छोटे हैं।
∠C > ∠A तथा ∠C >∠B
∆ABC में,
∠C > ∠A
AB > BC (प्रमेय-4 से)
∠C > ∠B
AB > CA (प्रमेय-4 से)
AB > BC और AB > CA
AB, दोनों (BC व CA) से बड़ी है।
अतः कर्ण AB सबसे बड़ी भुजा है।
Proved.

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प्रश्न 2.
सम्मुख आकृति में, ∆ABC की भुजाओं AB और AC को क्रमशः बिन्दुओं P और Q तक बढ़ाया गया है साथ ही ∠PBC < ∠QCB है। दर्शाइए कि AC > AB
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-25
हल :
दिया है : ∆ABC में भुजाओं AB और AC को आगे बढ़ाया गया है। बढ़ी हुई AB पर बिन्दु P और बढ़ी हुई AC पर बिन्दु Q लिया गया है।
इस प्रकार बने बहिष्कोणों में ∠PBC < ∠QCB सिद्ध करना है : AC > AB
उपपत्ति : PBC, ∆ABC का बहिष्कोण है।
∠PBC = ∠ACB +∠A …..(1)
और ∠QCB भी ∆ABC का बहिष्कोण है।
∠QCB = ∠ABC + ∠A …(2)
∠PBC < ∠QCB
∠ACB + ∠A < ∠ABC + ∠A
[समीकरण (1) तथा (2) से
∠ACB < ∠ABC
अब ∆ABC में,
∠ACB < ∠ABC ∠ABC > ∠ACB
AC > AB (बड़े कोण की सम्मुख,भुजा बड़ी होती है)
Proved.

प्रश्न 3.
सम्मुख आकृति में ∠B < ∠A और ∠C < ∠D है। दर्शाइए कि AD < BC
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-26
हल :
दिया है : दी गई आकृति में ∆ABO में ∠B < ∠A
और ∆CDO में ∠C < ∠D.
सिद्ध करना है : ऋजु रेखा AD < BC
उपपत्ति: ∆ABO में,
∠B < ∠A
AO < BO (प्रमेय-4 से) …(1)
इसी प्रकार ∆CDO में, ∠C < ∠D
OD < OC (प्रमेय-4 से) …(2) (
1) व (2) को जोड़ने पर,
AO + OD < BO + OC
AD < BC
AD < BC Proved.

प्रश्न 4.
सम्मुख आकृति में, AB और CD क्रमशः एक चतुर्भुज ABCD की सबसे छोटी और सबसे बड़ी भुजाएँ हैं। दर्शाइए कि ∠A > ∠C और ∠B > ∠D
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-27
हल :
दिया है : ABCD एक चतुर्भुज है जिसमें AB सबसे छोटी और CD सबसे बड़ी भुजा है।
सिद्ध करना है : ∠A > ∠C और ∠B > ∠D
रचना : रेखाखण्ड AC तथा BD खींचिए।
उपपत्ति : AB सबसे छोटी भुजा है। तब ∆ABC में,
BC > AB
∠BAC > ∠ACB (प्रमेय-3 से) …(1)
पुनः CD सबसे बड़ी भुजा है।
∆ACD में,
CD > AD
∠DAC > ∠DCA (प्रमेय-3 से) …(2)
(1) व (2) को जोड़ने पर,
∠ BAC + ∠DAC > ∠ACB + ∠DCA
∠BAD > ∠BCD
∠A > ∠C
AB सबसे छोटी भुजा है।
तब ∆ABD में,
AD > AB
∠ABD >∠ADB (प्रमेय-3 से) …(3)
इसी प्रकार, CD सबसे बड़ी भुजा है।
तब ∆BCD में,
CD > BC
∠CBD > ∠BDC (प्रमेय-3 से) …(4)
(3) व (4) को जोड़ने पर,
∠ABD + ∠CBD > ∠ADB + ∠BDC
∠ABC > ∠ADC
∠B > ∠D
Proved.
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-28

प्रश्न 5.
सम्मुख आकृति में, PR > PQ है और PS, ∠QPR को समद्विभजित करता है। सिद्ध कीजिए कि ∠PSR > ∠PSQ है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-29
हल :
दिया है: ∆PQR में, PR > PQ और ∠QPR को समद्विभाजक, QR से बिन्दु S पर मिलता है।
माना ∠PSR = x° तथा ∠PSQ = y°
सिद्ध करना है : ∠PSR > ∠PSQ
उपपत्ति: ∆PQR में,
PR > PQ
∠Q > ∠R (प्रमेय-3 से)
PS, ∠P को समद्विभाजक है।
∠QPS = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠P
तथा ∠RPS = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠P
∠x°, ∆PQS का भुजा QS के बिन्दु S पर बहिष्कोण है।
x°=∠Q + ∠QPS
⇒ ∠Q = x°- ∠QPS
∠Q = x° – [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠P …..(1)
∠y°, ∆PRS का भुजा RS के बिन्दु S पर बहिष्कोण है।
y° = ∠R + ∠RPS
⇒ ∠R = y° – [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠RPS
⇒ ∠R = y° – [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠P
∠Q > ∠R …..(2)
x° – [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠P > y°- [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] ∠P
[समीकरण (1) व (2) से ]
x° > y°
∠PSR > ∠PSQ
Proved.
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-30

प्रश्न 6.
दर्शाइए कि एक रेखा पर एक दिए हुए बिन्दु से, जो उस रेखा पर स्थित नहीं है, जितने रेखाखण्ड खींचे जा सकते हैं उनमें लम्ब रेखाखण्ड सबसे छोटा होता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-31
हल :
दिया है: AB एक सरल रेखा है और P उसके बाहर दिया हुआ एक बिन्दु है। P से रेखा AB पर PM और PN रेखाखण्ड खींचे गए हैं, जिनमें PM ⊥ AB
सिद्ध करना है : PM < PN
उपपत्ति : ∆MPN में, ∠M = 90°, PM ⊥ AB शेष कोण ∠MPN +∠PNM = 90° (त्रिभुज के अन्त:कोणों का योग 180° होता है)
∠PMN सबसे बड़ा कोण है। ∠M > ∠N
PN > PM (प्रमेय-4 से)
अत: P से खींचे रेखाखण्डों में PM सबसे छोटा है।
Proved.

UP Board Solutions

प्रश्नावली 7.5

प्रश्न 1.
ABC एक त्रिभुज है। इसके अभ्यन्तर में एक ऐसा बिन्दु ज्ञात कीजिए जो ∆ABC के तीनों शीर्षों से समदूरस्थ है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-32
हल :
एक ∆ABC के अभ्यन्तर में एक ऐसा बिन्दु P ज्ञात करना है जो त्रिभुज के तीनों शीर्षों A, B व C से समान दूरी पर हो।
रचना विधि :
(1) सर्वप्रथम दिया हुआ त्रिभुज ABC बनाइए।
(2) AB तथा BC के लम्ब समद्विभाजक खींचिए जो परस्पर बिन्दु P पर काटें।
(3) रेखाखण्ड PA, PB और PC खींचिए।
P अभीष्ट बिन्दु है जो तीनों शीर्षों से समदूरस्थ है।

प्रश्न 2.
किसी त्रिभुज के अभ्यन्तर में एक ऐसा बिन्दु ज्ञात कीजिए जो त्रिभुज की सभी भुजाओं से समदूरस्थ है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-33
हल :
माना ABC एक त्रिभुज है जिसके अभ्यन्तर में एक ऐसा बिन्दु P ज्ञात करना है जो त्रिभुज की तीनों भुजाओं AB, BC और CA से समदूरस्थ हो।
रचना विधि :
(1) सर्वप्रथम दिया हुआ ∆ABC बनाइए।
(2) ∠B और ∠C के समद्विभाजक खींचिए जो परस्पर बिन्दु P पर काटें।
P अभीष्ट बिन्दु है जो तीनों भुजाओं से समदूरस्थ है।

प्रश्न 3.
एक बड़े पार्क में, लोग तीन बिन्दुओं (स्थानों ) पर केन्द्रित हैं :
A : जहाँ बच्चों के लिए फिसलपट्टी और झूले हैं।
B : जिसके पास मानव निर्मित एक झील है।
C : जो एक बड़े पार्किंग स्थल और बाहर निकलने के रास्ते के निकट है।
एक आइसक्रीम का स्टॉल कहाँ लगाना चाहिए ताकि वहाँ लोगों की अधिकतम संख्या पहुँच सके?
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-34
हल :
A, B और C तीन बिन्दु स्थान हैं। आइसक्रीम का स्टॉल लगाने के लिए लोगों की उस पर अधिकतम पहुँच होने के लिए यह आवश्यक है कि स्टॉल तीनों स्थानों से B’ समदूरस्थ हो।
अत: आइसक्रीम स्टॉल लगाने के लिए हमें एक ऐसे स्थान (बिन्दु) P का चयन करना है जो पार्क के तीनों स्थानों से समान दूरी पर हो।
ज्ञात करने की विधिः
(1) बिन्दु ∆से बिन्दु B को, बिन्दु B से बिन्दु C को और बिन्दु C से बिन्दु A को ऋजु रेखाओं द्वारा मिलाकर ∆ABC बनाइए।
(2) किन्हीं दो भुजाओं (AB व BC) के लम्ब समद्विभाजक खींचिए जो परस्पर बिन्दु P पर काटें।
आइसक्रीम स्टॉल के चयन के लिए उपयुक्त स्थान बिन्दु P होगा जो तीनों है स्थानों से समदूरस्थ है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-35

प्रश्न 4.
घड्भुजीय और तारे के आकार की रंगोलियों को 1 सेमी भुजा वाले समबाहु त्रिभुजों से भरकर पूरा कीजिए। प्रत्येक स्थिति में त्रिभुजों की संख्या गिनिए। किसमें अधिक त्रिभुज हैं?
हल :
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-36
चित्रों से स्पष्ट है कि विकर्गों को मिलाने पर षड्भुजीय आकृति को 6 समबाहु त्रिभुजों में और तारे के आकार की आकृति को 1∠समबाहु त्रिभुजों में विभाजित किया जा सकता है जबकि समबाहु त्रिभुजों में प्रत्येक भुजा, 5 सेमी है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 7 Triangles img-37
पुनः षड्भुजीय आकृति के एक समबाहु त्रिभुज जिसकी भुजा 5 सेमी है, को 1 सेमी भुजा वाले समबाहु त्रिभुजों में विभाजित कर स्पष्ट किया गया है कि 5 सेमी भुजा वाले एक समबाहु त्रिभुज को 1 सेमी भुजा वाले 25 त्रिभुजों में विभाजित किया जा सकता है।
तब स्थिति 1 : षड्भुजीय रंगोली
इसको 1 सेमी भुजा वाले 6 x 25 = 150 समबाहु त्रिभुजों में बाँटा जा सकता है।
स्थिति 2 : तारे के आकार की रंगोली
5 सेमी भुजा वाले समबाहु त्रिभुजों की संख्या = 12
आकृति में 1 सेमी भुजा वाले समबाहु त्रिभुजों की संख्या = 12 x 25 = 300
स्पष्ट है कि तारे के आकार वाली आकृति में त्रिभुजों की संख्या अधिक है।

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UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry

UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry (युक्लिड के ज्यामिति का परिचय)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry (युक्लिड के ज्यामिति का परिचय).

प्रश्नावली 5.1

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथनों में से कौन-से कथन सत्य हैं और कौन-से कथन असत्य हैं? अपने उत्तरों के लिए। कारण दीजिए।
(i) एक बिन्दु से होकर केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है।
(ii) दो भिन्न बिन्दुओं से होकर जाने वाली असंख्य रेखाएँ हैं।
(iii) एक सांत रेखा दोनों ओर अनिश्चित रूप से बढ़ाई जा सकती है।
(iv) यदि दो वृत्त बराबर हैं तो उनकी त्रिज्याएँ बराबर होती हैं।
(v) दी गई आकृति में, यदि AB = PQ और PQ = XY है तो AB = XY होगा :
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-1
हल :
(i) क्योंकि प्रतिच्छेदी रेखाएँ, संगामी रेखाएँ इत्यादि ज्यामिति तथ्य दिए कथन को खण्डित करते हैं।
साथ-ही-साथ एक बिन्दु से होकर अपरिमित रूप से अनेक रेखाएँ खींची जा सकती हैं।
अत: कथन असत्य है।
(ii) क्योंकि दो भिन्न बिन्दुओं से होकर केवल एक रेखा खींची जा सकती है।
अतः कथन असत्य है।
(iii) एक सांत रेखा दोनों ओर अनिश्चित रूप से बढ़ाई जा सकती है।
अत: कथन सत्य है।
(iv) क्योंकि दो वृत्तों की त्रिज्याएँ समान होने पर ही वृत्त समान होते हैं।
अत: कथन सत्य है।
(v) यदि AB= PQ और PQ= XY ।
तो AB = XY (यूक्लिड के प्रथम अभिगृहीत से)
अत: कथन सत्य है।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों में से प्रत्येक की परिभाषा दीजिए। क्या इनके लिए कुछ ऐसे पद हैं जिन्हें परिभाषित करने की आवश्यकता है? वे क्या हैं और आप इन्हें कैसे परिभाषित कर पाएँगे? ।
(i) समान्तर रेखाएँ
(ii) लम्ब रेखाएँ
(iii) रेखाखण्डे
(iv) वृत्त की त्रिज्या
(v) वर्ग।
हल :
(i) समान्तर रेखाएँ : दो सरल रेखाएँ जिनमें कोई भी उभयनिष्ठ बिन्दु नहीं होता है एक-दूसरे के समान्तर कहलाती हैं।
‘बिन्दु’ तथा ‘सरल रेखा कुछ ऐसे पद हैं जिन्हें परिभाषित करने की आवश्यकता है। ‘बिन्दु’ तथा ‘सरल रेखा’ को यूक्लिड के शब्दों में परिभाषित कर सकते हैं :
एक बिन्दु वह है जिसका कोई भाग नहीं होता है।
एक रेखा चौड़ाई रहित लम्बाई होती है तथा एक सीधी रेखा ऐसी रेखा है जो स्वयं पर बिन्दुओं के साथ सपाट रूप से स्थित होती है।

(ii) लम्बरेखाएँ : यदि दो समान्तर रेखाओं में से कोई एक 90° के कोण पर घूमती है तब दोनों रेखाएँ एक-दूसरे के
लम्बवत् होती हैं। ‘90° के कोण का घुमाव’ ऐसा पद है जिसे परिभाषित करने की आवश्यकता है।
घुमाव को अन्तर्ज्ञानात्मक रूप मान लिया जाता है, अतः इसका प्रयोग नहीं कर सकते हैं।

(iii) रेखाखण्ड : दो अन्त बिन्दुओं (end points) के साथ किसी रेखा को रेखाखण्ड कहते है|
‘बिन्दु’ तथा ‘रेखा’ कुछ ऐसे पद हैं जिन्हें परिभाषित करने की आवश्यकता है। परन्तु इन्हें भाग (i) में परिभाषित कर चुके हैं।

(iv) वृत्त की त्रिज्या : किसी वृत्त के केन्द्र से वृत्त की परिधि के किसी बिन्दु तक खींचे रेखाखण्ड को वृत्त की त्रिज्या कहते हैं।
केन्द्र ऐसा पद है जिसे परिभाषित करने की आवश्यकता है।
केन्द्र’ को वृत्त के अन्दर एक बिन्दु के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसकी वृत्त पर स्थित सभी बिन्दुओं से दूरी समान होती है।

(v) वर्ग : वर्ग वह क्षेत्र या प्रदेश है जो समान लम्बाई के चार रेखाखण्डों से घिरा होता है तथा प्रत्येक दो किनारों के बीच 90° का कोण होता है।
क्षेत्र या प्रदेश, किनारे तथा कोण को अन्तर्ज्ञानात्मक रूप मान लिया जाता है।

प्रश्न 3.
नीचे दी हुई दो अभिधारणाओं पर विचार कीजिए :
(i) दो भिन्न बिन्दु A और B दिए रहने पर, एक तीसरा बिन्दु C ऐसा विद्यमान है जो A और B के बीच स्थित होता है।
(ii) यहाँ कम-से-कम ऐसे तीन बिन्दु विद्यमान हैं कि वे एक रेखा पर स्थित नहीं हैं।
क्या इन अभिधारणाओं में कोई अपरिभाषित शब्द हैं? क्या ये अभिधारणाएँ अविरोधी हैं? क्या ये यूक्लिड की अभिधारणाओं से प्राप्त होती हैं? स्पष्ट कीजिए।
हल :
दोनों अभिधारणाओं में निम्न दो शब्द अपरिभाषित हैं : बिन्दु और रेखा।
दोनों अभिधारणाएँ परस्पर अविरोधी नहीं हैं।
ये अभिधारणाएँ यूक्लिड की अभिधारणाओं का अनुसरण नहीं करतीं परन्तु ये निम्न अभिगृहीत के अनुरूप हैं।
दिए गए दो भिन्न बिन्दुओं से होकर एक अद्वितीय रेखा खींची जा सकती है।
(i) माना AB एक सरल रेखा है।
अपरिमित रूप से ऐसे अनेक बिन्दु हैं जो इस रेखा पर स्थित हैं। दो अन्त बिन्दुओं A तथा B को छोड़कर इनमें से किसी का भी चयन करते हैं। यह बिन्दु A तथा B के मध्य स्थित होता है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-2
(ii) कम-से-कम ऐसे तीन बिन्दुओं का होना आवश्यक है जिनमें से एक बिन्दु को अन्य दोनों बिन्दुओं को जोड़ने वाली सरल रेखा पर नहीं होना चाहिए।

UP Board Solutions

प्रश्न 4.
यदि दो बिन्दुओं A और B के बीच एक बिन्दु C ऐसा स्थित है कि AC = BC है, तो सिद्ध कीजिए कि AC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB है। एक आकृति खींचकर इसे स्पष्ट कीजिए।
हल :
बिन्दु C दो बिन्दुओं A और B के बीच स्थित है,
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-3
AC + BC = AB
परन्तु दिया है। AC = BC
AC + AC = AB
2AC = AB
[latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] . 2AC = AB (बराबरों के आधे भी परस्पर बराबर होते हैं)
AC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
Proved.

प्रश्न 5.
प्रश्न 4 में, C रेखाखण्ड AB को मध्य-बिन्दु कहलाता है। सिद्ध कीजिए कि रेखाखण्ड का एक और केवल एक ही मध्य-बिन्दु होता है।
हल :
माना यदि सम्भव है तो C और C” रेखाखण्ड AB के दो मध्य-बिन्दु हैं।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-4
C, रेखाखण्ड AB का मध्य-बिन्दु है।
AC = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
पुनः C”, रेखाखण्ड AB का मध्य-बिन्दु है।
AC” = [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] AB
यूक्लिड के अभिगृहीत से,
AC = AC”
AC – AC” = AC” – AC”
CC” = 0
C और C” समान बिन्दु हैं।
अतः रेखाखण्ड का एक और केवल एक ही मध्य-बिन्दु होता है।
Proved.

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प्रश्न 6.
दी गई आकृति में, यदि AC = BD है, तो सिद्ध कीजिए कि AB = CD है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-5
हल :
बिन्दु B, बिन्दुओं A तथा C के मध्य स्थित है।
AB + BC = AC
पुनः बिन्दु C, बिन्दुओं B तथा D के मध्य स्थित है। .
BC + CD = BD परन्तु दिया है।
AC = BD
AB + BC = BC + CD
बराबरों से बराबर (BC) घटाने पर,
AB + BC – BC = BC + CD – BC
AB = CD
Proved.

प्रश्न 7.
यूक्लिड की अभिगृहीतों की सूची में दिया हुआ अभिगृहीत 5 एक सर्वव्यापी सत्य क्यों माना जाता है?
हल :
यूक्लिड का 5वाँ अभिगृहीत निम्नलिखित है :
पूर्ण अपने भाग से बड़ा होता है?
यह सर्वव्यापी सत्य है क्योंकि पूर्ण का कोई भी भाग क्यों न हो, वह अस्तित्व में पूर्ण से ही आया होगा तब इसके लिए प्रमाण देने की आवश्यकता ही नहीं है।

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प्रश्नावली 5.2

प्रश्न 1.
आप यूक्लिड की पाँचवीं अभिधारणा को किस प्रकार लिखेंगे ताकि वह सरलता से समझी जा सके।
हल :
यदि दो रेखाओं l और m को तीसरी रेखा n काटती है और रेखा n के एक ही ओर बने दोनों अन्तः कोणों का योग दो समकोण से कम हो तो l और m रेखाएँ बढ़ाने पर उसी ओर मिलेंगी जिस ओर के कोणों का योग 2 समकोण से कम होगा।
अथवा
दो भिन्न प्रतिच्छेदी रेखाएँ एक ही रेखा के समान्तर नहीं हो सकतीं।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-6

प्रश्न 2.
क्या यूक्लिड की पाँचवीं अभिधारणा से समान्तर रेखाओं के अस्तित्व का औचित्य निर्धारित होता है? स्पष्ट कीजिए।
हल :
यदि दो रेखाओं l और m को तीसरी रेखा n काटती है और n के एक ही ओर बने अन्त: कोणों ∠1 और ∠2 का योग 2 समकोण हो तो रेखाएँ l और m, बढ़ाने पर रेखा n को इस ओर प्रतिच्छेद नहीं करेंगी। इसी प्रकार यदि ∠3 + ∠4 = 2 समकोण तो रेखाएँ l और m, बढ़ाने पर रेखा n के इस ओर भी प्रतिच्छेद नहीं करेंगी। अत: रेखाएँ l और m कभी प्रतिच्छेद नहीं करती। हैं। इस प्रकार रेखाएँ l और m समान्तर होंगी।
अत: यह कथन सत्य है।
UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 5 Introduction to Euclid’s Geometry img-7

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