UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Sound

UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Sound (ध्वनि)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Sound (ध्वनि).

पाठ्य – पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 182)

प्रश्न 1.
किसी माध्यम में ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ आपके कानों तक कैसे पहुँचता है?
उत्तर-
जब ध्वनि के कारण किसी माध्यम में कोई विक्षोभ उत्पन्न होता है तो यह विक्षोभ माध्यम के कणों में गति उत्पन्न कर देता है। ये कण अपने समीपवर्ती माध्यम के अन्य कणों में (UPBoardSolutions.com) उसी प्रकार की गति उत्पन्न कर देते हैं। यह क्रिया इसी प्रकार माध्यम के अन्य कणों से फैलती जाती है और विक्षोभ हमारे कानों तक पहुँच जाता है।

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पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 182)

प्रश्न 1.
आपके विद्यालय की घंटी, ध्वनि कैसे उत्पन्न करती है?
उत्तर-
जब घंटी पर हथौड़े से आघात किया जाता है। तो घंटी कंपित हो उठती है। घंटी के कंपित होने से ध्वनि उत्पन्न होती है।

प्रश्न 2.
ध्वनि तरंगों को यांत्रिक तरंगें क्यों कहते हैं?
उत्तर-
ध्वनि तरंगों को यांत्रिक तरंगें इसलिए कहते हैं क्योंकि उसके संचरण के लिए द्रव्यात्मक माध्यम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
मान लीजिए कि आप अपने मित्र के साथ चन्द्रमा पर गए हुए हैं। क्या आप अपने मित्र द्वारा उत्पन्न ध्वनि को सुन पाएँगे?
उत्तर-
नहीं। चंद्रमा पर वायुमण्डल नहीं है जिससे होकर ध्वनि अपनी गति कर सके। हम जानते हैं कि ध्वनि की गति माध्यम के कणों में उत्पन्न कंपन के कारण (UPBoardSolutions.com) होती है।
अत: इसके अभाव में मित्र से उत्पन्न ध्वनि नहीं सुन सकते।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 186)

प्रश्न 1.
तरंग की कौन-सा गुणनिम्नलिखित को निर्धारित करता है-
(a) प्रबलता
(b) तारत्व?
उत्तर-
(a) ध्वनि की प्रबलता कंपन का आयाम निर्धारित करती है।
(b) ध्वनि का तारत्व कंपन की आवृत्ति निर्धारित करता है।

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प्रश्न 2.
अनुमान लगाइए कि निम्न में से किस ध्वनि का तारत्व अधिक है?
(a) गिटार
(b) कार का हार्न?
उत्तर-
गिटार की ध्वनि का तारत्व अधिक होता है।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 186)

प्रश्न 1.
किसी ध्वनि तरंग की तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति, आवर्तकाल तथा आयाम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
तरंगदैर्ध्व – किन्ही दो निकटतम श्रृंगों अथवा गर्तों के बीच की दूरी को या एक दोलन पूरा करने के तरंग द्वारा चली गई दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं।
आवृत्ति – एक सेकण्ड में दोलनों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं।
आवर्तकाल – एक दोलन पूरा करने में लगा समय आवर्तकाल कहलाता है।
आयाम – किसी तरंग के संचरण में माध्यम के (UPBoardSolutions.com) कणों का संतुलन (मध्यमान) की स्थिति में अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।

प्रश्न 2.
किसी ध्वनि तरंग की तरंगदैर्ध्य तथा आवृत्ति उसके वेग से किस प्रकार सम्बन्धित है?
उत्तर-
ध्वनि तरंगों की आवृत्ति, तरंगदैर्ध्य तथा वेग निम्न रूप से सम्बन्धित हैं।
तरंग का वेग = तरंगदैर्घ्य x आवृत्ति
υ = n x λ
जहाँ υ = तरंग का वेग, n = आवृत्ति, λ = तरंगदैर्घ्य

प्रश्न 3.
किसी दिए हुए माध्यम में एक ध्वनि तरंग की आवृत्ति 220 Hz तथा वेग 440 m/s है। इस तरंग की तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
हल-
ध्वनि तरंग की आवृत्ति, n = 220 Hz
ध्वनि की चाल, υ = 440m/s
ध्वनि तरंग की तरंगदैर्घ्य λ = ?
हम जानते हैं कि
υ = n x λ
λ = [latex]\frac { \nu }{ n }[/latex] = [latex]\frac { 440 }{ 220 }[/latex] = 2 m.
अतः ध्वनि की तरंगदैर्ध्य = 2m.

प्रश्न 4.
किसी ध्वनि स्रोत से 450 m की दूरी पर बैठा हुआ कोई व्यक्ति 500 Hz की ध्वनि को सुनता है। स्रोत से मनुष्य के पास तक पहुँचने वाले दो क्रमागत संपीडनों में कितना समय अंतराल होगा?
हल-
ध्वनि तरंग की आवृत्ति n = 500 Hz
व्यक्ति की स्रोत से दूरी = 450 m.
दो लगातार संपीडनों के बीच की दूरी को तय करने में लगा समय उसके आवर्त काल के बराबर होता है।
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अतः व्यक्ति तक पहुँचने वाले तो लगातार संपीडनों के बीच लगा समय 0.02 सेकण्ड होगा।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 187)

प्रश्न 1.
ध्वनि की प्रबलता तथा तीव्रता में अन्तर बताइए।
उत्तर-
तीव्रता – किसी एकांक क्षेत्रफल से, एक सेकण्ड में गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं।
प्रबलता – प्रबलता ध्वनि के लिए कानों की संवेदन -शीलता की माप है। उदाहरण के लिए, दो ध्वनियाँ समान तीव्रता की हो सकती हैं। परन्तु हम एक को दूसरे की (UPBoardSolutions.com) अपेक्षा अधिक प्रबल ध्वनि के रूप में सुन सकते हैं। क्योंकि हमारे कान इसके लिए अधिक संवेदनशील हैं।

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पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 188)

प्रश्न 1.
वायु, जल या लोहे में से किस माध्यम में ध्वनि सबसे तेज चलती है?
उत्तर –
ध्वनि वायु (346 m/s), जल (1498 m/s) से अधिक तेज लौह (5950 m/s) माध्यम में चलती है।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 189)

प्रश्न 1.
कोई प्रतिध्वनि 3 s के पश्चात् सुनाई देती है। यदि ध्वनि की चाल 342 ms-1 हो तो स्रोत तथा परावर्तक सतह के बीच कितनी दूरी होगी?
हल-
ध्वनि की चाल, v = 342 m/s
परावर्तक सतह की स्रोत से दूरी = d
ध्वनि द्वारा तय की गई दूरी = 2d
ध्वनि द्वारा 2d दूरी तय करने में लिया गया समय, = 3 सेकण्ड
हम जानते हैं कि,
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पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 190)

प्रश्न 1.
कंसर्ट हॉल की छतें वक्राकार क्यों होती हैं?
उत्तर-
बड़े हालों में बनी कंक्रीट की छतों को वक्राकार बनाया जाता है ताकि वक्राकार छतों से ध्वनि का परावर्तन होकर, ध्वनि हाल के प्रत्येक कोने में समान रूप से पहुँच सके।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 191)

प्रश्न 1.
सामान्य मनुष्य के कानों के लिए श्रव्यता परास क्या है?
उत्तर-
सामान्य मनुष्य के कानों के लिए श्रव्यता परिसर 20 Hz से 20,000 Hz (या 20 kHz) है।

प्रश्न 2.
निम्न से सम्बन्धित आवृत्तियों का परास क्या है?
(a) अवश्रव्य ध्वनि
(b) पराध्वनि।
उत्तर-
(a) 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनि को अवश्रव्य ध्वनि कहते हैं।
(b) पराध्वनि की आवृत्ति 20 kHz से अधिक होती है।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 193)

प्रश्न 1.
एक पनडुब्बी सोनार स्पन्द उत्सर्जित करती है, जो पानी के अंदर एक खड़ी चट्टान से टकराकर 1.02 s के पश्चात् वापस लौटता है। यदि खारे पानी में ध्वनि की चाल 1531 m/s हो, तो चट्टान की दूरी ज्ञात कीजिए।
हल-
समय, t = 1.02 s
खारे जल में ध्वनि का वेग = 1531 m/s
सोनार पल्स से चली दूरी = 2d
जहाँ कि चट्टान की दूरी d है।
2d = सोनारे स्पंद की चाल x समय = 1531 m/s x 1.02 s = 1561.62 m
अथवा d = 780.8 m.
इसलिए चट्टान 780.8 m दूर होगी।

अभ्यास प्रश्न (पृष्ठ संख्या 195 – 197)

प्रश्न 1.
ध्वनि क्या है और यह कैसे उत्पन्न होती है?
उत्तर-
ध्वनि – ध्वनि एक प्रकार की ऊर्जा है जो हमारे कानों में सुनने की संवेदना उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए हम बहुत-से स्रोतों जैसे-अलार्म घड़ी की ध्वनि, सड़क पर दौड़ते हुए स्कूटर एवं कारों की ध्वनि, पक्षियों की चहचहाहट, विद्यालय की घंटी की ध्वनि, तबले तथा हारमोनियम (UPBoardSolutions.com) की ध्वनि आदि सुनते हैं।
ध्वनि का उत्पन्न होना – ध्वनि किसी वस्तु के कंपन द्वारा उत्पन्न होती है। कंपन का अर्थ है किसी वस्तु का अपनी माध्य स्थिति के दोनों ओर इधर-उधर गति करना है। हम विभिन्न वस्तुओं में उन्हें खींचकर, चोट मारकर, हूँक मारकर, रगड़कर अथवा, उसे हिलाकर कंपन उत्पन्न कर सकते हैं।

सितार, वीणा आदि डोरी वाले वाद्य यंत्रों में कर्षण द्वारा तारों में कंपन पैदा किए जाते हैं तो ये ध्वनि उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकारे जब चिमटे की दो भुजाओं को एकदूसरे से टकराते हैं तो उनमें, कंपन के साथ ध्वनि उत्पन्न होती है। सभी वाद्य यंत्र, जैसे-ढोल या नगाड़े की चर्म (membrane), बांसुरी के अन्दर की वायु, हारमोनियम की रीड ध्वनि उत्पन्न करते समय कंपन की स्थिति में होते हैं।

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प्रश्न 2.
एक चित्र की सहायता से वर्णन कीजिए कि ध्वनि के स्रोत के निकट वायु में संपीडन तथा विरलने कैसे उत्पन्न होते हैं?
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उत्तर-
ध्वनि सबसे अधिक हवा के माध्यम में गमन करती है। कोई कंपित वस्तु जब आगे बढ़ती है, तो वो अपने सामने वाली हवा पर बल लगाकर उसे संपीडित करती है, जिससे कि उच्च दबाव का क्षेत्र बनता है। यह क्षेत्र संपीडन (C) कहलाता है। यह क्षेत्र कंपित वस्तु से दूर जाने लगता है। तथा (UPBoardSolutions.com) कंपित वस्तु पीछे की ओर हटती है, जिससे निम्न दबाव को क्षेत्र बनता है। यह क्षेत्र विरलन (R) कहलाता है। जैसे-जैसे वस्तु कंपित होती है, अर्थात् तीव्रता से आगे-पीछे हिलती है, वैसे-वैसे हवा में संपीडनों और विरलनों की श्रृंखला बनती चली जाती है। इससे हवा में ध्वनि का संचरण होता है?

प्रश्न 3.
किस प्रयोग से यह दर्शाया जा सकता है। कि ध्वनि संचरण के लिए एक द्रव्यात्मक माध्यम की आवश्यकता होती है।
उत्तर-
जब विद्युत घंटी में स्विच को दबाकर विद्युत-धारा प्रवाहित की जाती है तो हमें विद्युत घंटी की
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आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है। जब निर्वात पम्प की सहायता से धीरे-धीरे बेलजार के अन्दर की वायुं बाहर निकालें तो जैसे-जैसे बेलजार की वायु बाहर निकलती जाती है घंटी की आवाज भी धीमी होती जाती है। यद्यपि घंटी में समाने विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। जब बेलजार में निर्वात पैदा हो जाता है तो हमें घंटी की आवाज सुनाई नहीं देती क्योंकि बेलजार में ध्वनि के संचरण के लिए कोई द्रव्यात्मक माध्यम नहीं रहा। अत: इस प्रयोग से यह प्रदर्शित हो जाता है ध्वनि संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
ध्वनि तरंगों की प्रकृति अनुदैर्ध्य क्यों
उत्तर-
ध्वनि तरंगें द्रव्यात्मक (material) माध्यम में ही संचारित होती हैं। ये तरंगें संपीडनों तथा विरलनों की सहायता से द्रव्यात्मक माध्यम में संचारित होती है। इन तरंगों के संचरण में माध्यम के कण ध्वनि संचरण की दिशा में ही अपनी माध्य स्थिति के दोनों ओर कंपन करते हैं। क्योंकि माध्यम के कणों की कंपन की दिशा ध्वनि तरंगों के संचरण की दिशा के अनुदिश है या समान्तर है। अत: ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें होती हैं।

प्रश्न 5.
ध्वनि का कौन-सा अभिलक्षण किसी अन्य अंधेरे कमरे में बैठे आपके मित्र की आवाज पहचानने में आपकी सहायता करता है?
उत्तर-
ध्वनि की गुणता, अंधेरे कमरे में बैठे मित्र की आवाज पहचानने में सहायता करती है।

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प्रश्न 6.
तड़ित की चमक तथा गर्जन साथ-साथ उत्पन्न होते हैं। लेकिन चमक दिखाई देने के कुछ सेकण्ड पश्चात् गर्जन सुनाई देती है। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर-
यह प्रकाश की काफी उच्च चाल के कारण (UPBoardSolutions.com) होता है कि तड़ित की चमक हम पहले देखते हैं और तुलनात्मक रूप से ध्वनि की निम्न चाल के कारण यह होता है कि गर्जन कुछ सेकण्ड पश्चात् सुनाई देती है।

प्रश्न 7.
किसी व्यक्ति का औसत श्रव्य परास 20 Hz से 20 kHz है। इन दो आवृत्तियों के लिए ध्वनि तरंगों की तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। वायु में ध्वनि का वेग 344 ms-1 लीजिए।
हल-
(i) आवृत्ति, n = 20 Hz
वायु में ध्वनि का वेग = 344 ms-1
υ = nλ
अथवा 344 = 20 x λ
अथवा λ = [latex]\frac { 344 }{ 20 }[/latex] = 17.2 m

(ii) आवृत्ति, n = 20 KHz = 20,000 Hz
वायु में ध्वनि का वेग = 344ms-1
υ = n x λ
344 = 20,000 x λ
अथवा λ = [latex]\frac { 344 }{ 20000 }[/latex] = 0.0172 m = 0.017 m

प्रश्न 8.
दो बालक किसी ऐलुमिनियम पाइप के दो सिरों पर हैं। एक बालक पाइप के एक सिरे पर पत्थर से आघात करता है। दूसरे सिरे पर स्थित बालक तक वायु तथा (UPBoardSolutions.com) ऐलुमिनियम से होकर जाने वाली ध्वनि तरंगों द्वारा लिए गए समय का अनुपात ज्ञात कीजिए।
हल-
माना छड़ की लंबाई = x m
वायु से होकर जाने में ध्वनि द्वारा लिया गया समय
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प्रश्न 9.
किसी ध्वनि स्रोत की आवृत्ति 100 Hz है। एक मिनट में यह कितनी बार कंपन करेगा?
हल-
आवृत्ति = 100 Hz
समय = 1 मिनट = 60 सेकण्ड
कंपनों की संख्या = आवृत्ति x समय = 100 Hz x 60 सेकण्ड = 6000 कंपन

प्रश्न 10.
क्या ध्वनि परावर्तन के उन्हीं नियमों को पालन करती है जिनका कि प्रकाश की तरंगें करती हैं? इन नियमों को बताइए।
उत्तर-
हाँ, ध्वनि भी परावर्तन के उन्हीं नियमों का पालन करती है जिनका प्रकाश की तरंगें करती हैं। ये नियम निम्न प्रकार हैं-

  • अभिलंब तथा ध्वनि के आपतन होने की दिशा तथा परावर्तन होने की दिशा के बीच बने कोण आपस में बराबर होते हैं।
  • इन तीनों की दिशाएँ एक ही तल में होती हैं।

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प्रश्न 11.
ध्वनि का एक स्रोत किसी परावर्तक सतह के सामने रखने पर उसके द्वारा प्रदत्त ध्वनि तरंग की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यदि स्रोत तथा परावर्तक सतह की दूरी स्थिर रहे तो किस दिन प्रतिध्वनि अधिक शीघ्र सुनाई देगी-
(i) जिस दिन तापमान अधिक हो?
(ii) जिस दिन तापमान कम हो?
उत्तर-
गर्म दिन में हमें प्रतिध्वनि जल्दी सुनाई देगी क्योंकि ध्वनि की चाल माध्यम के ताप पर निर्भर करती है। माध्यम का ताप बढ़ने के कारण ध्वनि की चाल भी बढ़ जाती है। अत: जिस दिन ताप अधिक मेगा उस दिन हमें प्रतिध्वनि ठंडे दिन की अपेक्षा जल्दी सुनाई देगी।

प्रश्न 12.
ध्वनि तरंगों के परावर्तन के दो व्यावहारिक उपयोग लिखिए।
उत्तर-
ध्वनि परावर्तन के उपयोग निम्नलिखित हैं-
1. मेगाफोन, हॉर्न, तूर्य तथा शहनाई जैसे-वाद्य यंत्र सभी इस प्रकार बनाए जाते हैं कि ध्वनि सभी दिशाओं में फैले बिना केवल एक विशेष दिशा में ही जाती है। इन यन्त्रों में एक नली का आगे का खुला भाग शंक्वाकार होता है। यह स्रोत से उत्पन्न ध्वनि तरंगों को बार-बार परावर्तित करके (UPBoardSolutions.com) श्रोताओं की ओर आगे की दिशा में भेज देता है तथा ध्वनि सभी दिशाओं में नहीं फैलती।
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2. कन्सर्ट हॉल, सम्मेलन कक्षों तथा सिनेमा हॉल की छतें भी वक्राकार बनाई जाती हैं जिससे कि परावर्तन के बाद ध्वनि हाल के सभी भागों तक पहुँच जाय। कभी-कभी वक्राकार ध्वनि-पट्टों को मंच के पीछे रख दिया जाता है जिससे ध्वनि, ध्वनि-पट्ट से परावर्तित होकर समान रूप से पूरे हॉल में फैल जाय।

प्रश्न 13.
500 मी ऊँची किसी मीनार की चोटी से एक पत्थर मीनार के आधार पर स्थित एक पानी के तालाब में गिराया जाता है। पानी में इसके गिरने की ध्वनि चोटी पर कब सुनाई देगी? (g = 10 ms-2 तथा ध्वनि की चाल = 340 ms-1)
हल-
(i) मीनार की ऊँचाई, h = 500 m
पत्थर को आरंभिक वेग, u = 0
पत्थर द्वारा तालाब तक पहुँचने में लिया गया समय = t
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पत्थर द्वारा पानी के सतह तक पहुँचने में लिया गया समय तथा ध्वनि द्वारा मीनार की चोटी तक पहुँचने में लिया गया समय = 10 + 1.47 = 11.47 s
अत: ध्वनि चोटी पर 11.47 s के बाद सुनाई देगी।

प्रश्न 14.
एक ध्वनि तरंग 339 ms-1 की चाल से चलती है। यदि इसकी तरंगदैर्घ्य 1.5 cm हो, तो तरंग की आवृत्ति कितनी होगी? क्या ये श्रव्य होंगी?
हल-
ध्वनि तरंग की चाल υ = 339 ms-1
तरंगदैर्घ्य λ = 1.5 cm = 0.015 m
तरंग की आवृत्ति n = ?
υ = n x λ
n = [latex]\frac { \nu }{ \lambda }[/latex] = [latex]\frac { 339 }{ 0.015 }[/latex] = 22,600 Hz
ये ध्वनि श्रव्य नहीं होगी क्योंकि इनकी आवृत्ति 20,000 Hz से अधिक है। अतः ये पराश्रव्य ध्वनि है।

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प्रश्न 15.
अनुरणन क्या है? इसे कैसे कम किया जा सकता है?
उत्तर-
अनुरणन-किसी बड़े हॉल जैसे-सम्मेलन कक्ष, सिनेमा हॉल आदि में स्रोत से उत्पन्न ध्वनि बार-बार परावर्तन के कारण काफी समय तक बनी रहती है जब तक कि यह इतनी कम न हो जाए कि यह सुनाई ही न पड़े। यह बारंबार ध्वनि का परावर्तन जिसके कारण ध्वनि निर्बन्ध होता है तथा ध्वनि स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ती, अनुरणन कहलाता है।

अनुरणन को कम करने के लिए सभा भवन या सिनेमा हॉलों की छतों तथा दीवारों पर ध्वनि अवशोषक पदार्थ जैसे-संपीडित फाइबर बोर्ड, खुरदरे प्लास्टर, (UPBoardSolutions.com) थर्मोकोल अथवा पर्दे लगा दिए जाते हैं। सीटों के पदार्थों का चुनाव भी ध्वनि अवशोषक पदार्थों के गुणों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 16.
ध्वनि की प्रबलता से क्या अभिप्राय है? यह किन कारकों पर निर्भर करती है?
उत्तर-
ध्वनि की प्रबलता-हमारे कान में उत्पन्न संवेदन जिनके कारण हम तीव्र तथा मंद ध्वनि के बीच विभेदन कर सकते हैं ध्वनि की प्रबलता कहलाती है। ध्वनि की प्रबलता ध्वनि तरंगों के आयाम से पहचानी जाती है। विभिन्न आयाम की ध्वनि तरंगों की प्रबलता भी भिन्न-भिन्न होती है।

ध्वनि का आयाम उस बल पर निर्भर करता है जिस बल से हम वस्तु को कंपित करते हैं। यदि हम किसी मेज पर किसी वस्तु को बहुत अधिक बल लगाकर ठोकते हैं। तो हमें उच्च या तीव्र ध्वनि सुनाई पड़ती है क्योंकि इस प्रकार उत्पन्न ध्वनि का आयाम तथा ऊर्जा अधिक होती है। यदि हम मेज पर किसी वस्तु को धीरे से मारते हैं तो हमें मंद ध्वनि सुनाई देती है क्योंकि इस प्रकार उत्पन्न ध्वनि का आयाम तथा ऊर्जा कम होती है।

यदि ध्वनि तरंग स्रोत से दूर जाती है तो इसका आयाम कम होता जाता है जिससे उसकी प्रबलता भी कम हो जाती है और हमें आवाज या ध्वनि धीमी सुनाई पड़ती है।

प्रश्न 17.
चमगादड़ अपना शिकार पकड़ने के लिए पराध्वनि का उपयोग किस प्रकार करता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर-
चमगादड़ अपना शिकार पकड़ने के लिए पराश्रव्य ध्वनि का उपयोग करते हैं। चमगादड़ वास्तव में दृष्टिहीन होता है। उड़ान के समय चमगादड़ उच्च आवृत्ति की पराश्रव्य तरंगें अल्प समय अंतराल में क्रमबद्ध तरीके से उत्सर्जित करता है। ये तरंगें आस-पास के कीटों से टकराकर (UPBoardSolutions.com) परावर्तित होती हैं तथा चमगादड़ के कानों तक वापस पहुँच जाती हैं। परावर्तित तरंगों की प्रकृति के आधार पर चमगादड़ कीटों की उपस्थिति का पता लगा लेता है। तथा अपनी इच्छा के अनुसार उसे पकड़ लेता है। अतः चमगादड़ पराश्रव्य ध्वनि का उपयोग करके अपने शिकार या कीटों को पकड़ता है।

प्रश्न 18.
वस्तुओं को साफ करने के लिए पराध्वनि का उपयोग कैसे करते हैं?
उत्तर-
पराध्वनि का उपयोग किसी वस्तु के उन भागों को साफ करने के लिए किया जाता है जहाँ तक पहुँचना कठिन होता है, जैसे- सर्पिलाकार नली, विषम आकार के पुर्जे तथा इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे आदि। जिन वस्तुओं को साफ करना होता है उन्हें साफ करने वाले अपमार्जक विलयन में रखते हैं और इस विलयन में पराध्वनि तरंगें भेजी जाती हैं। उच्च आवृत्ति के कारण धूल, चिकनाई तथा गंदगी के कण अलग होकर नीचे गिर जाते हैं। इस प्रकार वस्तु पूर्णतया साफ हो जाती है।

प्रश्न 19.
सोनार (SONAR) की कार्यविधि तथा उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
सोनार (SONAR) – वास्तव में सोनार (SONAR) साउण्ड नेवीगेशन एंड रेंजिंग (Sound Navigation and Ranging) का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ है ध्वनि द्वारा संचालन तथा परिसर निर्धारण करना। सोनार एक ऐसी युक्ति है जिसमें पराश्रव्य ध्वनि तरंगों का उपयोग जल में स्थित अदृश्य पिंडों, जैसे पनडुब्बियों, जहाज, चट्टानों तथा समुद्र की गहराई आदि के बारे में जानकारी प्राप्त (UPBoardSolutions.com) करने के लिए किया जाता है।

कार्यप्रणाली – सोनार की कार्यप्रणाली में पराश्रव्य तरंगों का उपयोग किया जाता है। सोनार में एक प्रेषित यंत्र (ट्रांसमीटर) तथा एक अभिग्राही लगा होता है जिसे जहाज के पैंदे में लगाया जाता है। ट्रांसमीटर पराश्रव्य ध्वनि को उत्सर्जित करके महासागर के जल के गहराई तक भेजते हैं। ये ध्वनि तरंगें जब सागर की तली या समुद्र के भीतर स्थित किसी पिंड से टकराती हैं तो परावर्तित हो जाती हैं। इन परावर्तित तरंगों को संसूचक जहाज के पैंदे में लगे किसी अभिग्राही द्वारा ग्रहण किया जाता है। यह अभिग्राही यंत्र पराश्रव्य ध्वनि को विद्युत सिग्नल में बदल देता है जिससे उनके बारे में आसानी से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
उपयोग –
(i) इस तकनीक का उपयोग समुद्र की गहराई तथा जल के अन्दर उपस्थित वस्तुओं की समुद्र तल से दूरी ज्ञात करने में किया जाता है।
मान लिया पराश्रव्य सिग्नलों के प्रेषण तथा उसी बिन्दु पर उनकी परावर्तित ध्वनि के अभिग्रहण के बीच लगा समय अन्तराल t है। यदि समुद्री जल में पराश्रव्य तरंगों की चाल ७ हो और समुद्र तल की गहराई या जल में स्थिर किसी पिंड की समुद्र तल से दूरी d हो तो
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(ii) सोनार तकनीक का उपयोग समुद्री जल में स्थित चट्टानों, पनडुब्बियों, डूबे हुए जहाजों, छुपे हुए प्लावी बर्फ (हिम शैल) आदि का पता लगाने में किया जाता है।

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प्रश्न 20.
एक पनडुब्बी पर लगी एक सोनार युक्ति, संकेत भेजती है और उनकी प्रतिध्वनि 5s पश्चात् ग्रहण करती है। यदि पनडुब्बी से वस्तु की दूरी 8825 m हो तो ध्वनि की चाल की गणना कीजिए।
हल-
वस्तु की पनडुब्बी से दूरी d = 5625 m
ध्वनि द्वारा वस्तु तक जाने तथा परावर्तित होकर वापस आने में लगा समय है = 5 s
ध्वनि द्वारा चली गई कुल दूरी = 2 x d = 2 x 3625 = 7250 m
ध्वनि की चाल, υ = ?
हम जानते हैं कि
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प्रश्न 21.
किसी धातु के ब्लॉक में दोषों का पता लगाने के लिए पराध्वनि का उपयोग कैसे किया जाता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पराध्वनि का उपयोग धातुओं से बने ब्लॉकों के दोषों का पता लगाने के लिए किया जाता है। धातु केॉकों में विद्यमान दरार या छिद्र जो बाहर से दिखाई नहीं देते, भवन या पुल की संरचना की मजबूती को कम कर देते हैं। पराध्वनि तरंगें धातु के ब्लॉक से गुजारी जाती हैं और प्रेषित तरंगों का (UPBoardSolutions.com) पता लगाने के लिए संसूचकों का उपयोग किया जाता है। यदि जरा-सा भी दोष आता है तो पराध्वनि तरंगें परावर्तित हो जाती हैं जो दोष की उपस्थिति को दर्शाती हैं।
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प्रश्न 22.
मनुष्य का कान किस प्रकार कार्य करता है। विवेचना कीजिए।
उत्तर-
ध्वनि कपन द्वारा उत्पन्न होती है। कंपन करता हुआ कोई स्रोत अपने आस-पास की वायु में तरंगें उत्पन्न करता है ये तरंगें संपीडनों तथा विरलनों की सहायता से अनुदैर्ध्य तरंगों के रूप में द्रव्यात्मक माध्यम में संचारित होती हैं। जब ये ध्वनि तरंगें जिनकी आवृत्ति 20 Hz से 20,000 Hz के बीच होती है, हमारे कानों तक पहुँचती है। तो कान के पर्दे में कंपन उत्पन्न होता है जिससे हमारे कानों में श्रवण की संवेदना उत्पन्न होती है।

कान की संरचना तथा कार्यप्रणाली – कान का बाह्य भाग पिन्ना कहलाता है। यह भाग ध्वनि तरंगों को संपीडनों तथा विरलनों के रूप में ग्रहण करता है तथा इन्हें कर्णनाल में भेज देता है। कर्णनाल की त्वचा में बोल तथा सूक्ष्म ग्रंथियाँ होती हैं जिनमें से कुछ पदार्थ निकलता है जिसे कर्णमोम कहते हैं। यह कान को धूल तथा कीड़ों से बचाता है। कर्णनाल के अंतिम भाग में कर्णपट (ear drum) होता है। ध्वनि तरंगें कर्णनाल द्वारा कर्णपट तक पहुँचती हैं। तो पहले कर्णपट की झिल्ली पर दबाव बढ़ता है तथा फिर घटता है, इस प्रकार कर्णपट कंपन करने लगता है।

कर्णपट के अन्दर की सतह की ओर मध्य कर्ण में तीन अस्थियाँ (मुग्दरक, निहाई तथा वलयक स्टीरप) होती हैं जो लीवर का कार्य करती हैं तथा कर्णपट में उत्पन्न कंपन को कई गुना प्रवर्धित कर देती हैं। मध्य कान ध्वनि तरंगों से प्राप्त प्रवर्धित दाब परिवर्तनों को आन्तरिक कान तक पहुँचाता है। (UPBoardSolutions.com) आन्तरिक कान इन दाब परिवर्तनों को कोकलिआ (Cochlea) द्वारा विद्युत सिग्नल या संकेतों में बदल देता है। ये विद्युत सिग्नल मस्तिष्क तक श्रवण तंत्रिका द्वारा भेजे जाते हैं जिससे हमें ध्वनि सुनाई देती है।
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अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ध्वनि’ किसे कहते हैं?
उत्तर-
ध्वनि (Sound) – जिन यांत्रिक तरंगों का अनुभव हम अपने कानों से कर सकते हैं, उन्हें ‘ध्वनि (Sound) कहते हैं। ध्वनि तरंगों की आवृत्तियाँ 20 हर्ट्ज से 20,000 हर्ट्ज के बीच होती हैं। ध्वनि तरंगों को संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
‘अवश्रव्य’ तथा ‘पराश्रव्य’ तरंगों में अन्तर बताइए।
उत्तर-
20 हर्ट्ज से कम आवृत्ति की यांत्रिक तरंगों को अवश्रव्य तथा 20,000 हर्ट्ज़ से अधिक आवृत्ति की यांत्रिक तरंगों को पराश्रव्य तरंगें कहते हैं।

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प्रश्न 3.
‘श्रृंग’ तथा ‘गर्त’ किस प्रकार की तरंग में उत्पन्न होते हैं?
उत्तर-
अनुप्रस्थ तरंगों में।

प्रश्न 4.
किसी पदार्थ में तरंग का संचरण होते समय पदार्थ के कण किस प्रकार की गति करते हैं?
उत्तर-
सरल आवर्त गति।

प्रश्न 5.
अनुप्रस्थ तरंगों के संचरण के लिए माध्यम में क्या गुण होने चाहिए?
उत्तर-

  1. अनुप्रस्थ तरंगों के संचरण के लिए माध्यम दृढ़ होना चाहिए।
  2. माध्यम ठेस या द्रव अवस्था में होना चाहिए।
  3. द्रव की सतह पर ही अनुप्रस्थ तरंगों का संचरण हो सकता है।

प्रश्न 6.
(a) अनुप्रस्थ, (b) अनुदैर्ध्य तरंग में कणों के दोलन की दिशा तथा तरंग के संचरण की दिशा में क्या सम्बन्ध होता है?
उत्तर-
(a) अनुप्रस्थ तरंग में कणों के दोलन की दिशा, तरंग संचरण की दिशा के अभिलम्बवत् होती है।
(b) अनुदैर्ध्य तरंग में कणों के दोलन की दिशा तरंग संचरण की दिशा के अनुदिश होती है।

प्रश्न 7.
(क) तरंग गति के संदर्भ में निम्नलिखित राशियों की परिभाषा दीजिए तथा मात्रक बताइए
(a) आयाम
(b) आवृत्ति
(c) तरंगदैर्घ्य
(d) तरंग वेग।
(ख) किसी तरंग की आवृत्ति, चाल तथा तरंगदैर्घ्य में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर-
(क) (a) आयाम (Amplitude) – तरंग के मार्ग में माध्यम के कणों के दोलन में माध्य स्थिति में अधिकतम विस्थापन को तरंग का आयाम कहते हैं। इसका मात्रक मीटर है।
(b) आवृत्ति (Frequency) – तरंग के मार्ग में माध्यम के कणों के दोलनों की संख्या प्रति एकांक समय को तरंग की आवृत्ति कहते हैं। इसका मात्रक सेकण्ड-1 अथवा हर्ट्ज है।
(c) तरंग-दैर्घ्य (wavelength) – किसी तरंग गति में, परस्पर समान काल में दोलन करने वाले दो क्रमागत कणों के बीच की दूरी को तरंगदैर्घ्य (wavelength) कहते हैं। इसका मात्रक मीटर है।
(d) तरंग वेग (Wave Velocity) – किसी तरंग द्वारा 1 सेकण्ड में तय की गयी दूरी तरंग वेग कहलाती है। इसका मात्रक मी/से है।
(ख) यदि तरंग की आवृत्ति (n), चाल (υ) तथा तरंगदैर्घ्य λ हो तो
चाल = आवृत्ति x तरंगदैर्घ्य
υ = n x λ

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प्रश्न 8.
किसी तरंग की तरंग दैर्घ्य (λ), वेग (υ) तथा आवर्तकाल (T) में सम्बन्ध का समीकरण लिखिए।
उत्तर-
तरंग की चाल = आवृत्ति x तरंग दैर्घ्य
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प्रश्न 9.
किसी माध्यम में दो कणों के बीच की दूरी [latex]\frac { 3\lambda }{ 2 }[/latex] है। इनकी कलाएँ समान होंगी या विपरीत।
उत्तर-
[latex]\frac { 3\lambda }{ 2 }[/latex] दूरी चलने में समय [latex]\frac { 3T }{ 2 }[/latex] लगेगा। अतः कलाएँ विपरीत होंगी।

प्रश्न 10.
किसी माध्यम में दो क्रमागत कणों में से एक का विस्थापान + a तथा दूसरे का विस्थापन उसी क्षण पर – a है। इनके दोलनों में कितना समयान्तर होगा तथा इनके बीच की दूरी कितनी होगी यदि आवर्तकाल T तथा तरंग दैर्ध्य λ हो ?
उत्तर-
महत्तम विस्थापन की एक स्थिति (दोलन पथ का एक सिरा) से दूसरी विपरीत स्थिति (दोलन पथ का दूसरा सिरा) तक जाने में [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] दोलन होता है अर्थात् इसमें [latex]\frac { T }{ 2 }[/latex] समय लगेगा।
अतः दोलनों का समयान्तर [latex]\frac { T }{ 2 }[/latex] है।
[latex]\frac { T }{ 2 }[/latex] समय में तरंग द्वारा चली गयी दूरी [latex]\frac { \lambda }{ 2 }[/latex] होगी।
अतः कणों के बीच की दूरी [latex]\frac { \lambda }{ 2 }[/latex] है।

प्रश्न 11.
किसी तरंग का दोलन-आयाम तीन गुना बढ़ा देने पर तरंग की तीव्रता में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर-
तीव्रता = (3)² = 9 गुना बढ़ जायगी [नियम तीव्रता ∝ (आयाम)² से ]।

प्रश्न 12.
ऐसी दो प्रकार की यांत्रिक तरंगों के नाम लिखिए जो हमें सुनायी नहीं देती हैं।
उत्तर-
अवश्रव्य तरंगें तथा पराश्रव्य तरंगें।

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प्रश्न 13.
एक दोलन के समय में तरंग द्वारा चली गयी दूरी को क्या कहते हैं?
उत्तर-
तरंगदैर्घ्य।

प्रश्न 14.
वायु में ध्वनि तरंगें किस प्रकार की होती हैं?
उत्तर-
वायु में गमन करने वाली तरंगें अनुदैर्घ्य तरंगें होती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिद्ध कीजिए कि υ = n x λ, जहाँ संकेतों के सामान्य अर्थ हैं।
उत्तर-
हम जानते हैं कि,
υ = [latex]\frac { \lambda }{ T }[/latex]
जहाँ T आवर्तकाल है अर्थात् λ दूरी चलने में लगा समय है।
पर आवृत्ति में n = [latex]\frac { 1 }{ T }[/latex] होता है।
υ = n x [latex]\frac { 1 }{ T }[/latex]
υ = λ x n
υ = nλ

प्रश्न 2.
‘अनुप्रस्थ तरंग’ तथा ‘अनुदैर्ध्य तरंग’ का अर्थ उदाहरण देकर बताइए। इनकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse waves) – अनुप्रस्थ तरंगों में माध्यम के कण, तरंग गति की दिशा के लम्ब दिशा में कंपन करते हैं।
शान्त जल में पत्थर डालने पर जल की सतह पर उत्पन्न तरंगें अनुप्रस्थ होती हैं। यदि इन तरंगों के रास्ते में एक कागज का छोटा टुकड़ा रख दें तो वह अपने ही स्थान पर ऊपर-नीचे कंपन करता है, आगे नहीं बढ़ता अर्थात् तरंग गति दिशा के लम्बवत् कंपन करता है। तनी डोरी जैसे, (UPBoardSolutions.com) सितार के तार अथवा एक सिरे पर दीवार से बँधी डोरी को दूसरे सिरे से ऊपर-नीचे झटका देने पर अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न होती हैं।
चित्र में रस्सी में अनुप्रस्थ तरंगें दिखाई गयी हैं।
UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Sound image -2
अनुप्रस्थ तरंगों की विशेषताएँ (Characteristics of Transverse Waves) –

  • इनके माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत् कम्पन करते हैं।
  • उनके संचरण में श्रृंग तथा गर्त होते हैं।
  • ये तरंगें ठोसों में तथा द्रवों की सतह पर चल सकती हैं।

अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal waves) – अनुदैर्घ्य तरंगें वे तरंगें हैं जिनमें माध्यम के कण, तरंग-संचरण की दिशा में ही कम्पन करते हैं।
लोहे के टुकड़े को ठोकने पर उसके अन्दर अनुदैर्घ्य तरंगें होती हैं जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।
इसके अतिरिक्त हमारे बोलने पर वायु में उत्पन्न तरंगें या किसी गैस में उत्पन्न तरंगें भी अनुदैर्घ्य होती हैं।
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अनुदैर्ध्य तरंगों की विशेषताएँ (Characteristics of Longitudinal waves) – अनुदैर्ध्य तरंग की निम्न विशेषताएँ हैं|

  • इनके माध्यम के कण तरंग संचरण की दिशा में ही कम्पन करते हैं।
  • इनके संचरण से संपीडन तथा विरलन होते हैं।
  • ये तरंगें ठोस, द्रव व गैस तीनों माध्यमों में चल सकती हैं।
  • इन तरंगों के कारण दाब-परिवर्तन होता है।

प्रश्न 3.
दो कणों के दोलनों का ‘समान कला’ तथा विपरीत कला’ में होने का क्या अर्थ है? इनके कलान्तर को आवर्तकाल के पदों में लिखिए।
उत्तर-
सरल आवर्त गति करने वाले दो कण यदि गति-पथ की विभिन्न स्थितियों (जैसे माध्य स्थिति, महत्तम विस्थापन आदि) में एक-साथ समान क्षणों पर पहुँचे तो उन्हें ‘समान-कला’ में कहा जाता है। ऐसे कणों का कलान्तर 0, T, 2T, 3T,…. अर्थात् शून्य अथवा आवर्त-काल को पूर्ण (UPBoardSolutions.com) गुणित होता है।
यदि सरल आवर्त गति करने वाले दो कणों के किसी विशेष स्थिति अथवा कला में पहुँचने में आधे दोलन अर्थात् समय [latex]\frac { T }{ 2 }[/latex] का अन्तर हो तो उनके दोलन ‘विपरीत-कला’ में होते हैं। ऐसे कणों का कलान्तर [latex]\frac { T }{ 2 }[/latex] , [latex]\frac { 3T }{ 2 }[/latex] , [latex]\frac { 5T }{ 2 }[/latex], ……
अर्द्ध-आवर्तकाल ([latex]\frac { T }{ 2 }[/latex]) का विषम गुणित होता है।

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प्रश्न 4.
तरंगदैर्ध्य से आप क्या समझते हैं? तरंगदैर्घ्य, आवर्तकाल एवं तरंग की चाल का सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर-
किसी तरंग गति में परस्पर समान कला में दोलन करने वाले दो क्रमागत कणों के बीच की दूरी को तरंग दैर्ध्य कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Sound image -3
प्रश्न 5.
किसी माध्यम में यांत्रिक तरंगों की आवृत्ति बढ़ाने से तरंगदैर्ध्य पर क्या प्रभाव होगा? आवश्यक सूत्र देकर बताइए।
उत्तर-
तरंग की चाल = आवृत्ति x तरंगदैर्घ्य
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इसलिए आवृत्ति बढ़ाने पर तरंगदैर्घ्य घट जायगा।

प्रश्न 6.
एक निश्चित आवृत्ति की तरंग वायु में तथा जल में संचरित होती है। कारण देते हुए बताइए कि किस माध्यम में तरंग का तरंगदैर्घ्य अधिक होगा?
उत्तर-
सूत्र : तरंग की चाल = आवृत्ति x तरंग-दैर्घ्य
UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Sound image -4
यदि आवृत्ति नियत हो तो तरंगदैर्घ्य तरंग की चाल
अत: तरंग की चाल अधिक होने से तरंग-दैर्घ्य अधिक होगा। चूँकि वायु की अपेक्षा जल में तरंगों की चाल अधिक होती है अतः जल में तरंग दैर्ध्य अधिक होगा।

प्रश्न 7.
अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य तरंगों में क्या अन्तर है?
उत्तर-
अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य तरंगों में अन्तर (Difference between Transverse Waves and Longitudinal Waves)-
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित को अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्घ्य तरंगों में वर्गीकृत कीजिए-
(i) स्प्रिंग उत्पन्न तरंगें
(ii) तने हुए तार में उत्पन्न तरंगें
(iii) जल के तल पर उत्पन्न तरंगें,
(iv) वायु में उत्पन्न तरंगें।
उत्तर-
(i) अनुदैर्घ्य तरंगें
(ii) अनुप्रस्थ तरंगें
(iii) अनुप्रस्थ तरंगें
(iv) अनुदैर्ध्य तरंगें।

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प्रश्न 9.
किसी तरंग के गुणधर्म क्या हैं? अथवा किसी तरंग के गुणधर्म लिखिए।
उत्तर-
तरंग के गुणधर्म-तरंग के निम्न गुणधर्म हैं-

  1. तरंग, कम्पन करते स्रोत द्वारा आवर्ती (Periodic) विक्षोभ के कारण होता है।
  2. तरंग के कारण ऊर्जा का स्थानान्तरण होता है, न कि पदार्थ का।
  3. तरंग में माध्यम के कण संचरित नहीं होते, वे अपनी मूल स्थिति में ही कम्पन करते हैं एवं अपने आस-पास के कणों में ऊर्जा को स्थानान्तरण करते हैं।
  4. तरंग की गति माध्यम की (UPBoardSolutions.com) प्रकृति पर निर्भर करती है, तरंग स्रोत की गति या कम्पन पर नहीं।
  5. यदि तरंग स्रोत के चारों तरफ का माध्यम एकसमान (समांगी) है तो तरंग गति भी सभी दिशाओं में समान रहती है।

प्रश्न 10.
वस्तुओं को साफ करने के लिए पराध्वनि का उपयोग किस प्रकार करते हैं?
उत्तर-
वस्तुओं को साफ करने के लिए पराध्वनि का उपयोग – पराध्वनि प्रायः उन भागों को साफ करने में उपयोग में लाई जाती है जिन तक पहुँचना बहुत कठिन होता है। जिन वस्तुओं की सफाई करनी होती है उन्हें साफ करने वाले विलयन में रखकर उसमें पराध्वनि प्रेषित की जाती हैं। उच्च आवृत्ति के विक्षोभ के कारण चिकनाई, धूल कण एवं गन्दगी के कण अलग होकर विलयन में आ जाते हैं और इस प्रकार वस्तु पूर्णतया साफ हो जाती हैं।
इस विधि का उपयोग प्रायः विषम आकार के पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक अवयव आदि को साफ करने में किया जाता है।

प्रश्न 11.
चमगादड़ किस प्रकार अन्धकार में अपना शिकार हूँढ़ते हैं?
उत्तर-
चमगादड़ द्वारा अन्धकार में अपना शिकार ढूँढ़ने की युक्ति – चमगादड़ अन्धकार में अपना शिकार ढूँढ़ने के लिए सोनार युक्ति का उपयोग करते हैं। वे उड़ते समय पराध्वनि तरंगें उत्सर्जित करते हैं जो उच्च आवृत्ति के कारण अवरोधों एवं कीटों से परावर्तित होकर चमगादड़ के कानों तक पहुँचती हैं जिनका चमगादड़े संसूचन करते हैं। इन परावर्तित स्पन्दों की प्रकृति से चमगादड़ को पता चल जाता है कि उसका शिकार कहाँ है तथा किस प्रकार का है।

प्रश्न 12.
सोनार की कार्यविधि लिखिए।
उत्तर-
सोनार की कार्यविधि – सोनार में एक प्रेषित्र एवं एक संसूचक लगा होता है। जहाज पर लगे प्रेषित्रों द्वारा नियमित समय अन्तरालों पर पराश्रव्य ध्वनि के शक्तिशाली स्पन्दों अर्थात् सिग्नलों को लक्ष्य तक भेजा जाता है। ये तरंगें जल में गति करती हैं तथा लक्ष्य से टकराने के बाद परावर्तित होकर संसूचक द्वारा ग्रहण कर ली जाती हैं। संसूचक पराध्वनि को विद्युत संकेतों में बदल । देता है जिनकी व्याख्या कर (UPBoardSolutions.com) ली जाती है। जल में ध्वनि की चाल तथा पराध्वनि के प्रेषण एवं अधिग्रहण के समय को ज्ञात करके लक्ष्य की दूरी की गणना कर ली जाती है।

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प्रश्न 13.
सोनार के उपयोग लिखिए।
उत्तर-
सोनार के उपयोग – सोनार के निम्नांकित प्रमुख उपयोग हैं

  1. चमगादड़ द्वारा अन्धकार में अपना शिकार हूँढ़ने में।
  2. चमगादड़ का रात्रि में उड़ते समय अवरोधों से टकराने से बचाव करने में।
  3. पारपाईस मछलियों द्वारा अँधेरे में अपने भोजन की खोज करने में।
  4. समुद्र में डूबे हुए जहाज एवं पनडुब्बियों का पता लगाने में तथा समुद्र की गहराई ज्ञात करने में।
  5. समुद्र के अन्दर स्थित चट्टानों, घाटियों, हिम शैलों एवं अन्य अवरोधों की स्थिति का पता करने में।

प्रश्न 14.
ध्वनि के परावर्तन के व्यावहारिक उपयोग लिखिए।
उत्तर-
ध्वनि के परावर्तन के व्यावहारिक उपयोग-ध्वनि के परावर्तन के प्रमुख व्यावहारिक उपयोग निम्नलिखित हैं-

  1. मेगाफोन, लाउडस्पीकर, हॉर्न, तूर्य तथा शहनाई जैसे वाद्ययन्त्रों द्वारा ध्वनि विस्तार में।
  2. स्टेथोस्कोप द्वारा हृदय की धड़कनों को डाक्टर के कानों तक पहुँचाने में।
  3. बड़े हॉलों एवं सभाकक्षों में वक्राकार छतों द्वारा ध्वनि को परावर्तित करके कक्षों के प्रत्येक हिस्से में ध्वनि को प्रेषित करने में।
  4. कर्ण तूर्या’ जैसी श्रवण सहाय युक्तियों के कार्य करने में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तरंग गति से क्या तात्पर्य है? स्पष्ट रूप से समझाइए तथा तरंग गति की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
तरंग गति (Wave Motion) – यदि किसी तालाब के शान्त जल में एक पत्थर ऊपर से डाला जाय तो जिस स्थान पर पत्थर गिरता है, वहाँ पर जल के कण अपने स्थान से हट जाते हैं अर्थात् वहाँ पर जल में एक विक्षोभ (Disturbance ) उत्पन्न होता है। इस विक्षोभ के कारण जल के कण ऊपर-नीचे दोलन करने लगते हैं।

जब जल का कोई कण, जो चारों ओर अन्य कणों से घिरा है, अपनी साम्यावस्था से हटता है तो जिन दूसरे कणों के निकट जाता है वे जल की (अंतर-आणविक बल से उत्पन्न) प्रत्यास्थता के कारण उसे प्रतिकर्षित करते हैं तथा ये कण जिन कणों से दूर हटता है वे उसे आकर्षित करते हैं, इस प्रकार कण पर प्रत्यानयन बल उत्पन्न होता है जो कण की माध्य-स्थिति से उसके विस्थापन के अनुक्रमानुपाती तथा मध्य-स्थिति की दिशा में होता है। अतः कण अपनी माध्य-स्थिति के इधर-उधर सरल-आवर्त-गति करने लगता है।
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अब इस कण पर लगे प्रत्यानयन-बल की प्रतिक्रिया में इसके निकटवर्ती दूसरे कण पर भी ठीक इसी प्रकार का बल लगता है, जिसके कारण दूसरा कण भी अपने स्थान से विस्थापित होकर दोलन-गति करने लगता है। एक कण से दूसरे में दोलन-गति अथवी विक्षोभ के स्थानान्तरण की यह प्रक्रिया क्रमागत कणों में आगे बढ़ती जाती है तथा जल के तल पर एक स्थान पर उत्पन्न विक्षोभ चारों ओर फैलता जाता है। इसी प्रकार किसी भी माध्यम (ठोस, द्रव, या गैस) में किसी स्थान पर उत्पन्न विक्षोभ, माध्यम में सभी ओर को (UPBoardSolutions.com) स्थानान्तरित होता हुआ फैलता जाता है। प्रारम्भ में जिस स्थान पर विक्षोभ उत्पन्न किया जाता है। वहाँ परे कणों की गति के कारण उनमें गतिज ऊर्जा होती है। जैसे-जैसे विक्षोभ आगे बढ़ता जाता है, दोलन करने वाले अन्य कणों को भी गतिज ऊर्जा मिलती जाती है अत: उपर्युक्त संपूर्ण प्रक्रिया में, माध्यम में ऊर्जा का भी स्थानान्तरण होता है। इस संपूर्ण प्रक्रिया को तरंग गति (Wave Motion) कहते हैं।
अतः “तरंग गति ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी माध्यम में उत्पन्न विक्षोभ, माध्यम के क्रमागत कणों के दोलनों की सहायता से, माध्यम में एक निश्चित चाल से स्थानान्तरित होता है।”

उपर्युक्त उदाहरणों में तरंग गति की विशेषताओं को निम्नवत् दिया जा सकता है-

  • तरंग गति की उत्पत्ति किसी माध्यम में किसी स्थान पर विक्षोभ उत्पन्न करने से होती है।
  • तरंग गति के कारण माध्यम में विक्षोभ एक निश्चित चाल से एक कण से दूसरे कण को स्थानान्तरित होते हुए आगे बढ़ता है।
  • तरंग गति के कारण माध्यम के कण विक्षोभ के साथ आगे गति नहीं करते वरन् अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर आवर्त गति करते हैं।
  • माध्यम के कणों के दोलनों के द्वारा विक्षोभ उत्पन्न होने के स्थान से गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का सभी दिशाओं में एक कण से अगले कण में स्थानान्तरण होता जाता है, अर्थात् यांत्रिक ऊर्जा (गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा) का संचरण होता है।

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प्रश्न 2.
तरंगें कितने प्रकार की होती हैं? उनके एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
किसी माध्यम में तरंग गति होने पर दो प्रकार की गतियाँ होती हैं-
(i) माध्यम के कणों की अपनी माध्य-स्थिति के इधर-उधर दोलन-गति तथा
(ii) माध्यम में विक्षोभ अथवा तरंग की गति।
इन गतियों के आधार पर तरंगें दो प्रकार की होती हैं|
(i) अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Wave) – जब माध्यम के कणों के दोलन करने की दिशा, तरंग की गति की दिशा के लम्बवत् होती है, तो ऐसी तरंग को अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं।
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(ii) अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal wave) – अनुदैर्ध्य तरंग में माध्यम के कणों के दोलन की दिशा, तरंग-गति की दिशा के समान्तर होती है।
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इसके अतिरिक्त अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य तरंगों में निम्न अन्तर होते हैं|
1. अनुदैर्ध्य तरंगें सभी प्रकार के माध्यमों (ठोस, द्रव या गैस) में संचरित हो सकती हैं, जबकि अनुप्रस्थ तरंगें केवल ठोस माध्यम में तथा द्रवों के केवल बाहरी (UPBoardSolutions.com) पृष्ठ पर संचरित होती हैं। अनुप्रस्थ तरंगें गैसों में नहीं चल सकतीं।
2. अनुदैर्ध्य तरंगों में माध्यम में सभी बिन्दुओं पर संपीड़न (compression) तथा विरलन (Rarefaction), अर्थात् दाब का बढ़ना-घटना (आवर्त परिवर्तन) होता है, जबकि अनुप्रस्थ तरंगों द्वारा दाब का परिवर्तन नहीं होता।
उदाहरण :
अनुप्रस्थ तरंग –
(i) एक सिरे पर बँधी डोरी के दूसरे सिरे को ऊपर-नीचे या दाहिने-बाएँ हिलाने पर डोरी में उत्पन्न तरंगें अनुप्रस्थ होती हैं।
(ii) जल या किसी द्रव के ऊपरी तल पर पत्थर गिराने या द्रव के तल को ऊपर-नीचे हिलाने से उत्पन्न तरंगें।
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(iii) किसी तनी हुई डोरी, तार या एक सिरे पर कसी हुई छड़ को लंबाई के लंबवत् हटाकर छोड़ने से उत्पन्न तरंगें।
अनुदैर्ध्य तरंग-
(i) वायु में ध्वनि करती या कंपन हुई वस्तु से वायु या किसी गैस में अनुदैर्ध्य तरंगें उत्पन्न होती हैं।
(ii) तने हुए तार, डोरी या छड़ को लम्बाई की दिशा में रगड़ने से अनुदैर्ध्य तरंग उत्पन्न होती है।
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(ii) किसी स्प्रिंग के एक सिरे पर कोई भार बाँध कर लटकाने तथा भार को कुछ नीचे खींचकर छोड़ देने से स्प्रिंग में ऊपर-नीचे दोलन होता है तथा तरंग भी ऊपर-नीचे चलती है। यह अनुदैर्ध्य तरंग है।

प्रश्न 3.
तरंग गति में ‘कलान्तर’ से क्या तात्पर्य है? कलान्तर के आधार पर तरंगदैर्घ्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा सूत्र υ = nλ का निगमन कीजिए।
उत्तर-
कलान्तर (Phase-difference) – सरल आवर्त गति करता हुआ कोई कण, अपने गतिपथ पर, विभिन्न क्षणों पर, विभिन्न स्थितियों में होता है तथा अपने पूर्ण आवर्तकाल T में, गतिपथ की सभी स्थितियों से गुजरता हुआ पुनः गति आरंभ की अवस्था में आ जाता है। उदाहरणतः यदि कण O क्षण पर माध्य स्थिति 0 से गति आरंभ करे तो महत्तम विस्थापन की स्थिति A पर T/4 समय में, पुनः O पर [latex]\frac { T }{ 2 }[/latex] समय में, A’ पर [latex]\frac { 3T }{ 4 }[/latex]
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समय में तथा वापस O पर T समय में पहुँचता है। गतिपथ की इन स्थितियों को समय के पदों में, O, [latex]\frac { T }{ 4 }[/latex], [latex]\frac { T }{ 2 }[/latex], [latex]\frac { 3T }{ 4 }[/latex], T व्यक्त किया जा सकता है। इसी प्रकार गतिपथ पर कण की किसी भी स्थिति को, उस पर पहुँचने वाले क्षण को T की किसी भिन्न स्थिति द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। गतिपथ में कण की स्थिति को व्यक्त करने वाली राशि को कण के दोलन की कला (phase) कहते है।
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इससे स्पष्ट है कि यदि समान आवर्त-काल के दो या दो से अधिक कण एक-दूसरे के बाद भिन्न-भिन्न क्षणों पर दोलन गति आरंभ करें तो वे गति-पथ की किसी भी नियत स्थिति पर भिन्न-भिन्न क्षणों पर पहुँचेंगे। इसका अर्थ है कि इन कणों के दोलनों की कलाएँ भिन्न-भिन्न होंगी अथवा कणों के दोलनों में कलान्तर (Phase Difference) होगा।

किसी माध्यम में किसी बिन्दु पर उत्पन्न विक्षोभ उत्पन्न होने से, माध्यम में विक्षोभ का संचरण एक नियत वेग से होता है, जिसके फलस्वरूप किसी एक दिशा में स्थित क्रमागत कण, विक्षोभ के पहुँचने पर, भिन्न-भिन्न समयों पर दोलन गति आरंभ करते हैं तथा एक निश्चित क्रमागत कलान्तर के साथ माध्यम के कणों के दोलन के द्वारा विक्षोभ के संचरण को ही तरंग गति कहते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि तरंग-गति में माध्यम के क्रमागत कणों के दोलनों में एक निश्चित कलान्तर होता है।

अब यदि माध्यम में किसी कण A से दूसरे कण B तक विक्षोभ के संचरण का समय आवर्तकाल (T) के बराबर हो तो जिस क्षण पर कण B पहला दोलन पूरा करके दूसरा दोलन प्रारंभ कर रहा होगा, ठीक उसी क्षण पर कण B अपना पहला दोलन प्रारंभ करेगा अर्थात् कण A तथा (UPBoardSolutions.com) कण B दोनों एक साथ दोलन प्रारंभ करने की अवस्था में होंगे। अतः कण A एवं B परस्पर समान कला में होंगे अथवा कलान्तर शून्य होगा।

किसी तरंग गति में परस्पर समान कला में दोलन करने वाले दो क्रमागत कणों के बीच की दूरी को तरंगदैर्घ्य (Wavelength) कहते हैं। इसे प्रतीक λ से व्यक्त किया जाता है।
उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है तरंग द्वारा एक पूर्ण दोलन करने में लगा समय (T), चली गयी दूरी तरंग दैर्घ्य (λ) के बराबर होती है।
अत: यदि माध्यम में तरंग का वेग υ हो तो
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प्रश्न 4.
अल्ट्रासोनोग्राफी क्या है? इसकी कार्य| विधि एवं उपयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
अल्ट्रासोनोग्राफी (Ultrasonography) – वह तकनीक जिसके द्वारा शरीर के किसी आंतरिक भाग | या अंग का प्रतिबिम्ब, पराध्वनि तरंगों का प्रयोग कर मॉनीटर | पर प्रदर्शित या फिल्म पर मुद्रित किया जा सके, | अल्ट्रासोनोग्राफी कहलाता है।
कार्य-विधि- अल्ट्रासोनोग्राफी प्राप्त करने के लिए, पराध्वनि संसूचक का प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक में, पराध्वनि तरंगें उस भाग या अंग से प्रवाहित की जाती हैं और उस भाग के ऊतकों से परावर्तित हो जाती हैं। विभिन्न घनत्व वाले भागों से उनका परावर्तन भिन्न होता है। (UPBoardSolutions.com) परावर्तित तरंगों को विद्युत संकेतों में बदलकर उस भाग या अंग का प्रतिबिम्ब प्राप्त कर लिया जाता है।
उपयोग-

  • अल्ट्रासोनोग्राफी का उपयोग आंतरिक अंगों जैसे यकृत, पित्ताशय, वृक्क, गर्भाशय आदि की संरचना के प्रतिबिम्ब प्राप्त करने में किया जाता है।
  • अल्ट्रासोनोग्राफी का उपयोग गर्भकाल में भ्रूण की जाँच तथा जन्मजात दोष या अनियमितताओं का पता लगाने में किया जाता है।
  • अल्ट्राध्वनि तरंगें वृक्क की पथरी को तोड़कर महीन कणों में बदलने में उपयोगी हैं जो मूत्र के साथ। बाहर निकाल दिए जाते हैं।

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प्रश्न 5.
मानव कर्ण की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मानव कर्ण एक अति संवेदी युक्ति है, जो मनुष्य को सुनने में सहायक है। मानव कर्ण के तीन भाग हैं-
(i) बाह्य कर्ण (External ear)
(ii) मध्य कण (Middle ear)
(iii) अन्तः कर्ण (Inner ear)।
(i) बाह्य कर्ण – यह’ कर्ण-पल्लव’ (pinna) कहलाता है। यह परिवेश से ध्वनि-तरंगों को एकत्रित करता है।
(ii) मध्य कर्ण – बाह्य कर्ण एवं मध्य कर्ण के बीच एक 2-3 सेमी लम्बी नलिका होती है जिसे श्रवण-नलिका (Ear canal) कहते हैं। श्रवण-नलिका के सिरे पर एक पतली, प्रत्यास्थ एवं गोल झिल्ली होती है जिसे कर्ण–पटल या कर्ण-पटह (Ear drum) कहते हैं। इसे Tympanum भी कहते हैं। कर्ण-पटल के आगे तीन छोटी एवं कोमल हड्डयाँ होती हैं जो मुग्दरक (Hammer), निहाई (Anvil) और वलयक (Stirrup) कहलाती हैं। मुग्दरक कर्ण-पटल से जुड़ा रहता है।
(iii) अन्तः कर्ण – इसमें एक कुंडलित नलिका कर्णावर्त (Cochlea) होती है जो मध्य कर्ण से एक झिल्ली द्वारा संबंधित रहती है। कर्णावर्त में एक तरल (UPBoardSolutions.com) भरा होता है। कर्णावर्त का दूसरा सिरा श्रवण तंत्रिका (Auditory Nerve) से जुड़ा होता है जो मस्तिष्क को जाती है। बाह्य कर्ण व मध्य कर्ण में वायु भरी होती है।
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आंकिक प्रश्न

प्रश्न 1.
उस ध्वनि तरंग का तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए, जिसकी आवृत्ति 150 हर्ट्ज है। ध्वनि की चाल = 300 मीटर/सेकण्ड।
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प्रश्न 2.
उस ध्वनि तरंग की लम्बाई ज्ञात कीजिए, जिसकी कम्पन संख्या 150 हर्ट्ज है। (ध्वनि का वेग = 300 मीटर.सेकण्ड-1)
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प्रश्न 3.
एक स्वरित्र का आवर्तकाल 0.05 सेकण्ड है। इससे उत्पन्न तरंग की तरंगदैर्घ्य 16 मीटर है। तरंग की चाल ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 4.
एक स्वरित्र 10 सेकण्ड में 500 दोलन करता है। इसकी आवृत्ति तथा आवर्तकाल की गणना कीजिए।
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प्रश्न 5.
किसी पुरुष के स्वर की आवृत्ति 400 कम्पन-सेकण्ड-1 हैतथा उत्पन्न ध्वनि तरंगों की तरंगदैर्घ्य 1 मीटर है। यदि किसी महिला के स्वर की तरंगदैर्घ्य 80 सेमी हो तो उसके स्वर की आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 6.
तरंगों A और B की आवृत्तियों की तुलना कीजिए जबकि A का वेग 5 x 103 मी.से-1 तथा तरंगदैर्घ्य 25.0 मीटर और B का वेग 4 x 103 मी. से-1 तथा तरंग दैर्घ्य 200 मीटर है।
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प्रश्न 7.
एक तरंग की आवृत्ति 130 हर्ट्ज है। यदि तरंग की चाल 520 मी.से- हो तो उसकी तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
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प्रश्न 8.
किसी माध्यम में चलते वाली दो यांत्रिक तरंगों की आवृत्तियों का अनुपात 2 : 3 है। इन तरंगों के
(i) तरंगदैर्ध्य का अनुपात क्या होगा?
(ii) आवर्तकाल का अनुपात क्या होगा?
उत्तर-
(i) 3 : 2
(ii) 3 : 2.

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प्रश्न 9.
किसी माध्यम में चलने वाली दो यांत्रिक तरंगों की आवृत्तियों का अनुपात 4 : 5 है।
(i) इन तरंगों के तरंगदैर्ध्य का अनुपात क्या होगा ?
(ii) इन तरंगों के आवर्तकाल का अनुपात क्या होगा ?
उत्तर-
(i) 5 : 4.
(ii) 5 : 4.

प्रश्न 10.
एक स्वरित्र 5 सेकण्ड में 1000 दोलन करता है। इसकी आवृत्ति तथा आवर्तकाल की गणना कीजिए।
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प्रश्न 11.
एक कम्पित वस्तु 1 सेकण्ड में 240 दोलन करती है। इसके द्वारा किये गये 15 कम्पनों के समय में तरंग कितनी दूर जायेगी? वायु में तरंग की चाल 330 मी.से-1 है।
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प्रश्न 12.
दो स्वरित्र A तथा B वायु में कंपन कर रहे हैं। A की आवृत्ति 116 हज एवं उसके द्वारा उत्पन्न तरंगों की तरंगदैर्घ्य 200 सेमी है। B की आवृत्ति 83 हर्ट्ज है। B द्वारा उत्पन्न तरंगों की तरंगदैर्घ्य कितनी होगी? वायु में तरंग का वेग कितना है?
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प्रश्न 13.
एक सरल लोलक 20 सेकण्ड में 40 दोलन पूरे करता है। दोलनों की आवृत्ति तथा आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 14.
एक स्वरित्र का आवर्तकाल [latex]\frac { 1 }{ 256 }[/latex] सेकण्ड है। इसकी आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 15.
किसी माध्यम में चलने वाली दो यांत्रिक तरंगों की आवृत्तियों का अनुपात 3 : 4 है। इन तरंगों के तरंग दैर्ध्य का अनुपात ज्ञात कीजिए।
हल :
तरंगदैर्ध्य का अनुपात = 4 : 3

प्रश्न 16.
एक स्वरित्र का आवर्तकाल 0.05 सेकण्ड है। उससे उत्पन्न तरंग का तरंग दैर्ध्य 16 मीटर है। तरंग की चाल ज्ञात कीजिए।
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अभ्यास प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

निर्देश : प्रत्येक प्रश्न में दिये गये वैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर चुनिए
1. हर्ट्ज मात्रक है
(a) ऊर्जा को
(b) वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का
(c) आवृत्ति का
(d) तरंगदैर्घ्य का

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2. चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है। चन्द्रमा की गति
(a) सरल आवर्त गति
(b) कम्पनित गति है।
(c) दोलन गति है
(d) आवर्त गति है।

3. किसी गैस में तरंगें उत्पन्न हो सकती हैं
(a) केवल अनुप्रस्थ
(b) केवल अनुदैर्घ्य
(c) अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्घ्य दोनों
(d) दोनों में से कोई नहीं

4. अनुप्रस्थ तरंगों में दो शृंगों के बीच की दूरी ह्येती है
(a) आयाम
(b) अर्द्ध-आयाम
(c) तरंग दैर्घ्य
(d) अर्द्ध तरंग दैर्घ्य

5. ध्वनि की चाल सर्वाधिक होती है
(a) ठोस में
(b) द्रव में
(c) गैस में।
(d) ठोस व द्रव में

6. एक तरंग की तरंगदैर्घ्य 50 सेमी तथा आवृत्ति 400 प्रति सेकण्ड है। तरंग की चाल होगी
(a) 8 सेमी.सेकण्ड-1
(b) 20,000 सेमी.सेकण्ड-1
(c) 400 सेमी.सेकण्ड-1
(d) 200 सेमी.सेकण्ड-1

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7. अनुदैर्घ्य तरंगों में माध्यम के कण दोलन करते हैं
(a) तरंग गति की दिशा के लम्बवत्
(b) तरंग गति की दिशा से 60° के कोण पर
(c) तरंग गति की दिशा के समान्तर
(d) किसी दिशा में नहीं

8. अनुप्रस्थ तरंगों में माध्यम के कण दोलन करते हैं
(a) तरंग गति की दिशा के लम्बवत्
(b) तरंग गति की दिशा के समान्तर
(c) तरंग गति की दिशा से 120° कोण पर
(d) किसी दिशा में नहीं

9. पानी में पत्थर डालने पर पानी की सतह पर उत्पन्न तरंगें होती हैं
(a) केवल अनुदैर्घ्य
(b) केवल अनुप्रस्थ
(c) अनुप्रस्थ व अनुदैर्घ्य दोनों
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं

10. वायु में ध्वनि तरंगों की प्रकृति होती है
(a) केवल अनुप्रस्थ
(b) केवल अनुदैर्घ्य
(c) विद्युत चुम्बकीय तरंगें।
(d) अनुप्रस्थ एवं अनुदैर्घ्य दोनों प्रकार की

11. किसी तरंग की चाल (υ), आवर्तकाल (T) तथा तरंगदैर्घ्य λ में सही सम्बन्ध है
(a) υ = λT
(b) υ = [latex]\frac { T }{ \lambda }[/latex]
(c) υ = [latex]\frac { \lambda }{ T }[/latex]
(d) T = λυ

12. ध्वनि तरंगों की आवृत्ति होती है
(a) 20 हर्ट्ज से कम
(b) 20,000 हर्ट्ज़ से अधिक
(c) 20 हर्ट्ज से 20,000 हर्ट्ज तक
(d) उपर्युक्त तीनों

13. तरंगदैर्घ्य (λ), आवृत्ति (n) तथा तरंग दैर्यो की चाल (υ) में सही सम्बन्ध है-
(a) n = [latex]\frac { \lambda }{ \nu }[/latex]
(b) υ = [latex]\frac { n }{ \lambda }[/latex]
(c) λ = [latex]\frac { \nu }{ n }[/latex]
(d) λ = [latex]\frac { n }{ \nu }[/latex]

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14. वायु में दो ध्वनियों की तरंग दैर्ध्य का अनुपात 1 : 4 है। इनकी आवृत्तियों का अनुपात होगा
(a) 1 : 4
(b) 1 : 2
(c) 4 : 1
(d) 2 : 1

उत्तरमाला

  1. (c)
  2. (d)
  3. (b)
  4. (c)
  5. (a)
  6. (b)
  7. (c)
  8. (a)
  9. (b)
  10. (d)
  11. (c)
  12. (c)
  13. (c)
  14. (c)

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UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings

UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings

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SOLVED EXERCISES BASED ON TEXT BOOK
EXERCISE : 1

Insert commas, wherever necessary in the following sentences :
Questions.
1. Lucknow the capital of Uttar Pradesh is a historical place.
2. Alexander riding on a fine horse led the attack.
3. Books copies pens and pencils are sold here.
4. In fact there was nothing else to do.
5. You did not however gain your object.
6. Speak clearly if you would be understood.
7. What are you reading Sita.
8. It being a fine day I went out for a walk.
9. Even a fool when he holdeth his peace is counted wise.
10. Sachin Tendulker is moreover an all round cricketer.
11. Milton the famous English poet was blind.
12. He is gentle upright outspoken and kind hearted.
13. At midnight however I was round by the tramp of horse’s hoofs in the yard.
14. Hearing the noise the boy woke up.
15. Sir I would rather be right than be President.
Answers:
1. Lucknow, the capital of Uttar Pradesh, is a historical place.
2. Alexander, riding on a fine horse, led the attack.
3. Books, copies, pens and pencils are sold here.
4. Infact, there was nothing else to do.
5. You did not however, gain your object.
6. Speak clearly, if you would be understood.
7. What are you reading, Sita?
8. It being a fine day, I went out for a walk.
9. Even a fool, when he holdeth his peace, is counted wise.
10. Sachin Tendulker is, more over, an all round cricketer.
11. Milton, the famous English poet, was blind.
12. He is gentle, upright, outspoken and kind-hearted.
13. At midnight, however, I was round by the tramp of horses hoofs in the yard.
14. Hearing the noise, the boy woke up.
15. Sir, I would rather be right than be President.

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EXERCISE : 2

Punctuate the following sentences and use the Capital Letters wherever necessary :
Questions.
1. he wrote his exercise neatly quickly and correctly.
2. the master said to the servant what do you say now.
3. he wrote I cant come because i am ill.
4. Radha said uncle may I come in.
5. it was a long dull and uneasi some journey.
6. how does this machine work asked the boy.
7. how do you say so child asked his mother.
8. sindhbad said to boy what have i done to deserve this.
9. who are you sir and what do you want they said.
10. the poor man cried will none of you help me.
11. are you coming home with me he said.
12. raman is the head of his class for he studies hard.
13. he lost land money reputation and friends.
14. subhash chandra bose was of course a wise intelligent and brave leader.
15. chandra gupt maurya having conquered his enemies returned to pataliputra.
Answers:
1. He wrote his exercise neatly and correctly.
2. The master said to the servant, “What do you say now?”
3. He wrote I can’t come because I am ill.
4. Radha said, Uncle, may I come in.
5. It was a long dull and uneasy some journey.
6. How does this machine work, asked the boy?
7. How do you say so? Child asked his mother.
8. Sindhbad said to boy, “What have I done to deserve this?”
9. “Who are you, sir and what do you want?”, they said.
10. The poor man cried, “Will none of you help me?”
11. “Are you coming home with me?”, he said.
12. Raman is the head of his class for he studies hard.
13. He lost land, money, reputation and friends.
14. Subhash Chandra Bose was of course a wise, intelligent and brave leader.
15. Chandragupta Maurya, having conquered his enemies, returned to Pataliputra.

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SPELLING STUDY
अंग्रेजी भाषा में Spellings का बड़ा महत्त्व है। Spellings ध्यानपूर्वक याद रखना चाहिए। Spellings बनाने का कोई विशेष नियम ऐसा नहीं है जो प्रत्येक दशा में सदैव लागू हो जाये। फिर भी विद्यार्थियों की सुविधा के लिए कुछ नियम नीचे दिये जाते हैं। विद्यार्थी इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़े और याद करेंअंग्रेजी भाषा में A, E, I, O, U स्वर (Vowels) कहलाते हैं और बाकी सभी. अक्षर व्यंजन (Consonants) होते हैं।
(B) Rules for Spellings

नियम
1. के साथ सदैव ॥ होता है, जैसे
queen, quarrel, quite, quiet, quick, question, quality, qualified, quench, etc.
2. यदि किसी शब्द के बाद ‘full’ जोड़ा जाये, तो full का एक ‘I’ कम हो जाता है, जैसे
faith+full = faithful; | help+full = helpful; cheer+full = cheerful; fear+full = fearful; harm+full = harmful.
3. यदि उन शब्दों के बाद, जिनके अन्त में ‘II’ हो, कुछ जोड़ा जाये, तो केवल एक ‘I’ रह जाता है, जैसे
well+come = welcome; well+fare = welfare; skill+full = skilful; all+most = almost; all+ready = already; will+full = wilful. अपवाद: well+being=well-being
4.यदि well या will किसी शब्द के अन्त में जोड़ा जाये, तो एक ‘I’ कम नहीं होगा, जैसे
fare+well = farewell; un+well = unwell; good+will = goodwill.
5. यदि किसी शब्द के अन्त में ‘ee’ है, तो उसमें ing या dom बढ़ाते समय कोई परिवर्तन नहीं होता, जैसे
agree+ing = agreeing; free+dom = freedom; see+ing = seeing.
6. क्रिया के अन्त में -ing जोड़ने पर कभी-कभी परिवर्तन नहीं होता, जैसे
sleep+ing = sleeping; weep+ing = weeping; kill+ing =killing.
7. यदि Verb के अन्त में -ie हो, तो -ing बढ़ाते समय -ie का –y हो जाता है, जैसे
die=ing=dying; lie+ing= lying.
8. यदि Verb के अन्तिम अक्षर (w, r,y को छोड़कर) के पहले स्वर हो, तो ing बढ़ाते समय अन्तिम अक्षर दो बार लिखा जाता है, जैसे
run+ing=running; worship+ing= Worshipping; put+ing=putting; cut+ing = cutting, set+ing = setting; beg+ing=begging.
अपवाद : pardon+ing=pardoning; iron+ing=ironing; open+ing=opening; burn+ing=burming.
9. जिन Verbs के अन्त में w, r, या y हो तथा उनसे पूर्व स्वर (vowel) हो, तो -ing बढ़ाते समय अन्तिम अक्षर को double नहीं लिखते, जैसे
blow+ing=blowing; draw+ing=drawing; grow+ing= growing; answer+ing= answering; order+ing=ordering; buy+ing=buying; fly+ing=flying;
copy+ing= copying; play+ing =playing; say+ing = Saying.
10. यदि संज्ञा (Noun) के अन्त में –y से पहले स्वर (vowel) हो, तो plural बनाते समय कोई परिवर्तन नहीं होता; केवल अन्त में -s बढ़ा दिया जाता है,जैसे day से days; boy से boys, toy से toys; key से keys,monkey monkeys, etc.
11. यदि किसी संज्ञा के अन्त में -y हो और इससे पूर्व व्यंजन (consonant) हो, तो plural बनाते समय –y को -ies में बदल देते हैं, जैसे
lady से ladies; baby से babies; body से bodies, duty से duties, city से cities; army armies, fly flies; story से stories, etc.
12. यदि किसी शब्द के अन्त में -y हो, तो उस शब्द के अन्त में full जोड़ते समय -y को -i में बदल देते हैं, जैसे
duty+full = dutiful; beauty+full = beautiful. (नियम 2 भी देखो)
13. जिन संज्ञाओं के अन्त में –f या -fe हो, तो उनकी plural बनाते समय इनको –ves में बदल देते हैं, जैसे
leaf से leaves, thief से thieves; knife से knives; wife से wives; calf से calves, etc.
अपवाद : chief से chiefs; gulf से gulfs, safe से safes.
14. जिन संज्ञाओं के अन्त में –f हो और इससे पूर्व -00 हो, तो plural बनाते समय केवल –s बढ़ा देते हैं, जैसे
proof से proofs; roof से roofs, hoof से hoofs.
15. यदि संज्ञा के अन्त में -0 है और इससे पहले व्यंजन (consonant) है, तो बहुवचन बनाते समय —es बढ़ा देते हैं, जैसे
mango से mangoes, hero से heroes, etc.
16. यदि किसी शब्द में -i और —e मिलकर -ee (ई) की आवाज दे, तो -i पहले आयेगा तथा –e बाद में, जैसे
believe; yield; relieve, niece. अपवाद-seize.
17. यदि नियम 16 के अन्तर्गत ‘ई’ की आवाज से पूर्व – हो, तो —e पहले आयेगा और — बाद में, जैसे
conceive; deceive, receive, perceive.
18. यदि किसी शब्द के अन्त में -ate हो, तो उससे संज्ञा बनाते समय -e को -ion में बदल देते हैं, जैसे
translate से translation; educate से education, dictate dictation vacate से vacation; manipulate manipulation;
hesitate से hesitation; legislate से legislation; narrate से narration; calculate से calculation; relate से relation.

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EXERCISE : 3
Examples :

Complete the following words by filling in suitable letters in the space provided. Study examples :
Questions.
(i) be..ty
(ii) f.rw.rd
(iii) sc..nce
(iv) b.c.cl.
Answers:
(i) beauty
(ii) forward
(iii) science
(iv) bicycle.

Questions.

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Answers:
UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings image 2
UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings image 3

EXERCISE : 4

Complete the following words by filling in suitable letters in the space provided :
Questions.
UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings image 4
Answers:
UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings image 5
UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings image 6

EXERCISE : 5

Complete any two of  the following words by filling in suitable letters in the space provided :
Questions.
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Answers:
UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 13 Punctuation and Spellings image 8

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UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 6  मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 6  मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 6  मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए तथा काव्यगत सौन्दर्य भी स्पष्ट कीजिए :

(पंचवटी)

1. चारु चन्द्र की ……………………………………. झोंकों से।
शब्दार्थ- चारु = सुन्दर । अवनि = धरती। अम्बरतले = आकाश। पुलक = आनन्दमय रोमांचित । तृण = घास । झीम = झूमना ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘पंचवटी’ से लिया गया है।
प्रसंग- यहाँ कवि ने पंचवटी के प्राकृतिक सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है।
व्याख्या- गुप्त जी कहते हैं कि सुन्दर चन्द्रमा की किरणें जल और थल में फैली हुई हैं। पृथ्वी और आकाश में स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है। हरी-हरी घास की नोकें (UPBoardSolutions.com) ऐसी लगती हैं मानो वे पृथ्वी के सुख से रोमांचित हो रही हैं। वहाँ के सभी वृक्ष मन्दमन्द वायु के झोंकों से झूमते प्रतीत होते हैं।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. भाषा- खड़ीबोली । चाँदनी रात का बड़ा सुन्दर शब्द-चित्र प्रस्तुत किया गया है।
  2. अलंकार- अनुप्रास, उत्प्रेक्षा एवं मानवीकरण । रस- श्रृंगार । गुण- माधुर्य ।

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2. पंचवटी की छाया ……………………………………. दृष्टिगत होता है।
शब्दार्थ-  पर्णकुटीर = पत्तों की कुटिया। सम्मुख = सामने । स्वच्छ = साफ, निर्मल । शिला = पत्थर । निर्भीकमना = निर्भय मनवाला। धनुर्धर = धनुष धारण करनेवाला। भुवन-भर = सम्पूर्ण संसार। भोगी = भोग करनेवाला, राजा। कुसुमायुध = कामदेव।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ शीर्षक कविता से उद्धृत है।
प्रसंग- इसमें प्रहरी के रूप में लक्ष्मण को सुन्दर चित्रण किया गया है।
व्याख्या- कवि कहता है कि पंचवटी की घनी छाया में एक सुन्दर पत्तों की कुटिया बनी हुई है। उस कुटिया के सामने एक स्वच्छ विशाल पत्थर पड़ा हुआ है और उस पत्थर (UPBoardSolutions.com) के ऊपर धैर्यशाली, निर्भय मनवाला वीर पुरुष बैठा हुआ है। सारा संसार सो रहा है परन्तु यह धनुषधारी इस समय भी जाग रहा है। यह वीर ऐसा दिखायी पड़ता है जैसे भोग करनेवाला कामदेव यहाँ योगी बनकर आ बैठा हो ।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. भाषा- खड़ीबोली । रस- शान्त । अलंकार- अनुप्रास अलंकार की छटा है, उपमा अलंकार की सुन्दर योजना है। प्रसाद गुण युक्त सरल साहित्यिक खड़ीबोली भाषा है। गुण- प्रसाद।

3. किस व्रत में ……………………………………. जीवन है।
शब्दार्थ-व्रती = व्रत धारण करनेवाला । विपिन = वन । विराग = वैराग्य, विरक्ति। प्रहरी = पहरेदार । कुटीर = कुटिया। रस = लगा हुआ। राज भोग्य = राज भोगने योग्य।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ खण्डकाव्य से अवतरित है।
प्रसंग- यहाँ राम और सीता की कुटी पर पहरा देते हुए लक्ष्मण की विशेषताओं का चित्रण किया गया है।
व्याख्या- इस वीर पुरुष ने यह कौन-सा व्रत धारण किया है, जिसके कारण इस प्रकार नींद का त्याग कर दिया है। यह तो राज्य के सुखों को भोगने योग्य है परन्तु किस कारण (UPBoardSolutions.com) से यह वन में वैराग्य ग्रहण किये हुए बैठा है। पता नहीं इस कुटिया में ऐसा कौन-सा अमूल्य धन रखा हुआ है, जिसकी रक्षा में तन-मन और जीवन लगाते हुए लक्ष्मण प्रहरी बना हुआ है।
काव्यगत सौन्दर्य 

  1. यहाँ एक निर्भीक और कर्तव्यनिष्ठ प्रहरी के रूप में लक्ष्मण का सजीव चित्रण हुआ है।
  2. भाषा- सरस व शुद्ध खड़ीबोली।
  3. शैली- वर्णनात्मक।
  4. अलंकार- अनुप्रास।
  5. गुण-ओज
  6. रस- अद्भुत ।

4. मर्त्यलोक-मालिन्य ……………………………………. माया ठहरी।
शब्दार्थ- मर्त्यलोक-मालिन्य =
संसार के पाप ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य पंक्तियाँ ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ खण्डकाव्य से उद्धृत हैं।
प्रसंग- कवि ने उस अनुपम धन की महानता का वर्णन किया है, जिसकी रक्षा में वीर, व्रती लक्ष्मण एकाग्र मन से संलग्न हैं।
व्याख्या- वास्तव में इस कुटी के अन्दर ऐसा अनुपम धन है, जिसकी रक्षा एक वीर पुरुष ही कर सकता है। तीनों लोकों को साक्षात् लक्ष्मी सीताजी इस कुटी के अन्दर विद्यमान हैं। वे अपने पति राम के साथ इस कुटी में रह रही हैं। मनुष्य लोक की बुराइयों को दूर करने के लिए वे अपने पति राम के (UPBoardSolutions.com) साथ आयी हैं; अतः इस कुटी में तीनों लोकों की लक्ष्मी स्वरूप सीताजी विराजमान हैं। वे वीरों के वंश की प्रतिष्ठा हैं। रघुवंश वीरों की वंश है। उनकी रक्षा से ही रघुवंश की प्रतिष्ठा हो सकती है। यदि सीताजी की प्रतिष्ठा में कोई आँच आती है तो रघुकुल की प्रतिष्ठा में धब्बा लगता है। इसीलिए लक्ष्मण जैसे प्रहरी को यहाँ नियुक्त किया गया है। वीर लक्ष्मण इस कुटी में उपस्थित सीताजी की रक्षा में अपना तन, मन और जीवन समर्पित किये हुए हैं।
                 यह वन निर्जन है। रात्रि काफी शेष है। यहाँ पर राक्षस लोग चारों ओर घूम रहे हैं। वे किसी माया के जाल में फंसाकर विपत्ति खड़ी कर सकते हैं। अतः रात्रि के समय निर्जन प्रदेश में राक्षसों की माया से बचने के लिए लक्ष्मण जैसा वीर ही उपयुक्त पहरेदार है।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. यहाँ कवि ने वीर लक्ष्मण को उपयुक्त पहरेदार के रूप में चित्रित किया है।
  2. सीता ‘वीर वंश की लाज’ हैं।
  3. भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली।
  4. शैली- चित्रात्मक एवं गीत ।
  5. रस- शान्त ।
  6. छन्द- मात्रिक।
  7. अलंकार- अनुप्रास, रूपक। गुण-माधुर्य ।

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5. क्या ही स्वच्छ……………………………………. और चुपचाप।
शब्दार्थ- निस्तब्ध = सन्नाटे से भरी। स्वच्छन्द= स्वतन्त्र । सुमन्द = मन्द-मन्द। गन्धवह = हवा, वायु। निरानन्द = आनन्दरहित । नियति-नटी = नियतिरूपी । नटी = नर्तकी । नियति = भवितव्यता, भाग्य । कार्य-कलाप = क्रिया-कलाप, काम।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ पाठ से उधृत है।
प्रसंग- पंचवटी में दूर तक फैली चाँदनी का वर्णन करते हुए कवि कहता है
व्याख्या- पंचवटी में जो दूर-दूर तक चाँदनी फैली हुई है, वह बहुत ही साफ दिखायी दे रही है और रात सन्नाटे से भरी है। कोई शब्द नहीं हो रहा है। वायु स्वच्छन्द गति से, अपनी स्वतन्त्र चाल से मन्द-मन्द बह रही है। इस समय उत्तर-पश्चिम आदि सभी दिशाओं में आनन्द-ही-आनन्द (UPBoardSolutions.com) व्याप्त है। कोई भी दिशा आनन्द-शून्य नहीं है। ऐसे समय में भी नियति नामक शक्ति-विशेष के समस्त कार्य सम्पन्न हो रहे हैं। कहीं कोई रुकावट नहीं। नियति-नटी अपने क्रिया-कलापों को बहुत ही शान्ति से सम्पन्न कर रही है। वह एकान्त भाव से अर्थात् अकेले-अकेले और चुपचाप अपने कर्तव्यों का निर्वाह किये जा रही है।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. नियति के क्रिया-कलाप निरन्तर चलते रहते हैं। उनमें दिन या रात का कोई व्यवधान नहीं आता।
  2. भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली।
  3. छन्द- मात्रिक।
  4. अलंकार- अनुप्रास, रूपक।
  5. रस- शान्त
  6. शैली- भावात्मक।

6. है बिखेर देती……………………………………. झलकाता है।
सन्दर्भ- प्रस्तुत अवतरण मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ नामक काव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संगृहीत किया गया है।
प्रसंग- वनवास के समय पंचवटी में निवास करते हुए लक्ष्मण एक पर्णकुटी में सीता की रक्षा करते हुए रात की प्राकृतिक शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं
व्याख्या- यह पृथ्वी सबके सो जाने पर नित्यप्रति आकाश में नक्षत्ररूपी मोतियों को फैला देती है और सूर्य सदा ही प्रातः काल हो जाने पर उनको बटोरकर रख लेता है। वह सूर्य.भी.नक्षत्ररूपी मोतियों को संध्यारूपी सुन्दरी को देकर अपने लोक चला जाता है। अतः नक्षत्ररूपी मोतियों को धारण (UPBoardSolutions.com) करके उस सन्ध्यारूपी सुन्दरी का शून्य-सा श्यामल रूप झिलमिल करता हुआ अति दीप्त हो जाता है।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. प्रकृति वर्णन में मानवीकरण किया गया है।
  2. अलंकार-अतिशयोक्ति अलंकार । भाषा-शुद्ध परिमार्जित खड़ीबोली। गुण-प्रसाद, शैली-वर्णनात्मक। छन्द-मात्रिक।

7. सरल तरल जिन तुहिन ……………………………………. सदय भाव से सेती है।
शब्दार्थ- तुहिन = ओस, पाला। सेती है = रक्षा करती है। अदय = निर्दय।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘पंचवटी’ से लिया गया है।
प्रसंग- पंचवटी में लक्ष्मण शिला पर विराजमान हो प्रकृति के रूप और उनके व्यवहार के सम्बन्ध में सोच रहे हैं। वे कहते हैं
व्याख्या- कभी तो प्रकृति पृथ्वी पर जिन ओस के कणों से हँसती और प्रसन्न होती-सी प्रतीत होती है उन्हीं ओस के कणों के माध्यम से वह हमारे अत्यन्त ही निकट और आत्मीय हो कष्टों से व्यथित होकर रुदन करती-सी प्रतीत होती है अर्थात् कभी ओस की बूंदें मोती-सी चमकदार प्रकृति की प्रसन्नता को व्यक्त करती हैं और कभी आँख के आँसुओं के रूप में हमारे दुःखों से दुःखित हो रोती हुई-सी प्रतीत (UPBoardSolutions.com) होती हैं। कभी तो यह इतनी निर्दय और निष्ठुर हो जाती हैं कि वह अनजाने में हमारे द्वारा की गयी भूलों के कारण हमें कठोर से कठोर दण्ड तक ने सकती हैं; जैसे-भूकम्प, अतिवृष्टि, बाढ़ आदि। कभी इतनी दयालु हो जाती हैं। कि बूढों की भी बच्चों की भाँति दया-भाव से सेवा करती हैं।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. इस पद में प्रकृति के शिव और अशिव दोनों रूपों का वर्णन है।
  2. यहाँ पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है जो छायावादी कविता का प्रभाव है।
  3. ‘हँती हरित होती है’, ‘अति आत्मीयता से सेती है’ अनुप्रास अलंकार है। छन्द- मात्रिक।भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली। रस- शृंगार । गुण- माधुर्य।

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8. तेरह वर्ष ….………………………………….. किस धन की?
शब्दार्थ- तात = पिताजी। आर्त = दु:ख से। इन जन को = मुझे।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ से उद्धृत है।
प्रसंग- कवि ने वनवास के 13 वर्ष व्यतीत हो जाने पर लक्ष्मण के घर लौटने की प्रसन्नता का वर्णन किया है।
व्याख्या- वनवास के समय यद्यपि तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परन्तु सम्पूर्ण बात कल की बात की तरह हृदय पटल पर अंकित है, जबकि पिताजी हमको वन में आते देख दुःख से अचेत हो गये थे। वनवास की अवधि की समाप्ति निकट है परन्तु मुझे इसँ वनवास से बढ़कर और किस धन की प्राप्ति हो सकती है। काव्यगत सौन्दर्य

  1. भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली । रस- शान्त । गुण- प्रसाद । छन्द- मात्रिक। अलंकार- उत्प्रेक्षा, रूपक।

9. और आर्य को?…..………………………………….. यह नरलोक?
शब्दार्थ- प्रजार्थ = प्रजा के लिए। लोकोपकार = संसार की भलाई।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ से उद्धृत है।
प्रसंग- कवि कहता है कि लक्ष्मण कल्पना कर रहे हैं कि जब रामचन्द्र को राज्य मिल जायेगा तो वे अपने कर्तव्य में इतने व्यस्त हो जायेंगे कि हमें भूल जायेंगे। राम के जन कल्याण में लगे होने के कारण इसको हम बुरा नहीं मानेंगे।
व्याख्या- आर्य राम को इससे अधिक सुख और (UPBoardSolutions.com) क्या हो सकता है? रामचन्द्र जी सिंहासन पर बैठकर प्रजा के सुख के लिए राज्य करेंगे। उस कार्य में व्यस्त होकर हमको भी भुला देने को विवश हो जायेंगे। परन्तु संसार की भलाई के विचार से हमको इसमें तनिक भी दुःख नहीं होगा, किन्तु क्या यह मनुष्य समाज राजा का आश्रय न लेकर अपनी भलाई स्वयं नहीं कर सकता।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. भाषा- खड़ीबोली है।
  2. रस- शान्त। गुण- माधुर्य । छन्द- मात्रिक। इसमें यह भाव दर्शाया गया है कि क्या मनुष्य बिना किसी के सहारे अपनी भलाई स्वयं नहीं कर सकता? अलंकार-उत्प्रेक्षा।

प्रश्न 2. मैथिलीशरण गुप्त की जीवनी एवं रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा मैथिलीशरण गुप्त की साहित्यिक सेवाओं एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
अथवा मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य एवं जीवन-परिचय पर प्रकाश डालिए।

मैथिलीशरण गुप्त
( स्मरणीय तथ्य )

जन्म- सन् 1886 ई०, चिरगाँव जिला झाँसी, (उ० प्र०)। मृत्यु- सन् 1964 ई०।
रचनाएँ- मौलिक काव्य-‘भारत-भारती’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘पंचवटी’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘द्वापर’, ‘सिद्धराज’ आदि। 
अनूदित-‘मेघनाद-वध’, ‘वीरांगना’, ‘विरहिणी-ब्रजांगना’, ‘प्लासी का युद्ध’, ‘रुबाइयाँ’, ‘उमर-खैयाम’।
काव्यगत विशेषताएँ
वर्य-विषय- ‘राष्ट्रप्रेम’, ‘आर्य संस्कृति से प्रेम’, ‘प्रकृति-प्रेम’,’मानव हृदय चित्र’, ‘नारी महत्त्व’।
भाषा- शुद्ध तथा परिष्कृत खड़ीबोली।
शैली- प्रबन्धात्मक, उपदेशात्मक, गीतिनाट्य तथा भावात्मक।
रस तथा अलंकार- प्रायः सभी। विप्रलम्भ श्रृंगार में विशेष सफलता मिली है।

  • जीवन-परिचय- राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव जिला झाँसी में सन् 1886 ई० में हुआ था। गुप्तजी के पिता का नाम सेठ रामचरण जी था जो अत्यन्त ही सहृदय और काव्यानुरागी व्यक्ति थे। पिता के संस्कार पुत्र को पूर्णतः प्राप्त थे। इनकी शिक्षा-दीक्षा प्रायः घर पर ही हुई थी । हिन्दी के अतिरिक्त इन्होंने संस्कृत, बंगला, मराठी आदि भाषाओं का अध्ययन किया था। आचार्य पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के सम्पर्क में आने से इनकी रचनाएँ सरस्वती में प्रकाशित होने लगीं। द्विवेदीजी की प्रेरणा से ही इनके काव्य में गम्भीरता एवं उत्कृष्टता का विकास हुआ। इनके काव्य में राष्ट्रीयता की छाप है। (UPBoardSolutions.com) गाँधी दर्शन से आप विशेष प्रभावित हैं। इन्होंने असहयोग आन्दोलन में जेल यात्रा भी की है। आगरा विश्वविद्यालय ने इनकी हिन्दी सेवा पर सन् 1948 ई० में डी० लिट्० की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया। ‘साकेत’ नामक प्रबन्ध काव्य पर इनको मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिल चुका है। आप स्वतन्त्र भारत के राज्यसभा में सर्वप्रथम सदस्य मनोनीत किये गये थे। आपकी मृत्यु सन् 1964 ई० में हो गयी।
  • रचनाएँ– गुप्तजी की रचनाएँ दो प्रकार की हैं- (1) मौलिक एवं (2) अनूदित ।
    1. मौलिक- जयद्रथ-वध, भारत-भारती, पंचवटी, नहुष आदि।
    2. अनूदित रचनाएँ- मेघनाद वध, वीरांगना, स्वप्नवासवदत्ता आदि।’साकेत’ आधुनिक युग का प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसमें रामकथा को एक नये परिवेश में चित्रित कर उपेक्षित उर्मिला के चरित्र को उभारा गया है। यशोधरा में बुद्ध के चरित्र का चित्रण हुआ है। यह एक चम्पू काव्य है जिसमें गद्य और पद्य दोनों में रचना की गयी है। भारत-भारती गुप्त जी की सर्वप्रथम खड़ीबोली की राष्ट्रीय रचना है जिसमें देश की अधोगति को बड़ा ही मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है।

काव्यगत विशेषताएँ

  • (क) भाव-पक्ष-
    1. गुप्तजी की कविता के वर्ण्य-विषय मुख्यतः भक्ति, राष्ट्र-प्रेम, भारतीय संस्कृति और समाजसुधार हैं।
    2. इनकी धार्मिकता में संकीर्णता का आरोप नहीं किया जा सकता है।
    3. ये भारतीय संस्कृति के सच्चे पुजारी हैं।
    4. गुप्तजी लोक सेवा को सर्वोपरि मानते हैं।
    5. इनके हृदय में नारी जाति के प्रति अपार आदर और सहानुभूति है।
    6. राष्ट्रप्रेम तो गुप्तजी के शब्द-शब्द में भरा है।
    7. इनकी राष्ट्रीयता पर गाँधीवाद की पूरी छाप है।
    8. इनकी रचनाओं में समाज सुधारवादी दृष्टिकोण भी दिखलाई पड़ता है।
    9. गुप्तजी के प्रकृति-चित्रण में सरसता एवं सजीवता है।
    10. मनोभावों के चित्रण में गुप्तजी को विशेष दक्षता प्राप्त है।
    11. संवादों की अभिव्यक्ति अत्यन्त ही सरल तर्क-व्यंग्य से मुक्त है।
  • (ख) कला-पक्ष- भाषा और शैली- गुप्तजी की भाषा शुद्ध परिष्कृत खड़ीबोली है जिसका विकास धीरे-धीरे हुआ है। इनकी प्रारम्भिक काव्य रचनाओं में गद्य की भाँति शुष्कता है, किन्तु बाद की रचनाओं में सरसता और मधुरता अपने आप आ गयी है। इनकी भाषा में संस्कृत (UPBoardSolutions.com) के तत्सम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। शब्द-चयन में भी ये काफी कुशल हैं। उसमें मुहावरे और लोकोक्तियों के प्रयोग से चार चाँद लग गये हैं। भाषा में प्रसाद गुण की प्रधानता है। कहीं-कहीं तुक मिलाने के प्रयास में इन्हें शब्दों को विकृत भी करना पड़ा है जो कभी-कभी खटक जाता है।
    काव्य-रचना की दृष्टि से गुप्तजी की शैली चार प्रकार की है –
    भावात्मक शैली- झंकार तथा अन्य गीति काव्य। उपदेशात्मक शैली- भारत-भारती, गुरुकुल आदि। गीति-नाट्य शैली- यशोधरा, सिद्धराज, नहुष आदि। प्रबन्धात्मक शैली- साकेत, पंचवटी, जयद्रथ-वध आदि।
  • रस-छन्द-अलंकार- गुप्तजी के काव्य में वीर, रौद्र, हास्य आदि सभी रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है। गुप्तजी ने नये और पुराने दोनों प्रकार के छन्द अपनाये हैं। हरिगीतिका गुप्तजी का अत्यन्त ही प्रिय छन्द है। गुप्तजी की कविता में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विषयोक्ति, संदेह, यमक, श्लेष, अनुप्रास आदि अलंकारों की प्रधानता है। विशेषण-विपर्यय और मानवीकरण आदि नये ढंग के अलंकार भी इनकी रचनाओं में छायावाद प्रभाव के कारण आ गये हैं।
  • साहित्य में स्थान- गुप्तजी आधुनिक हिन्दी काव्य-जगत् के अनुपम रत्न हैं। ये सही अर्थों में राष्ट्रकवि थे। इन्होंने अपनी प्रेरणादायक और उद्बोधक कविताओं से राष्ट्रीय जीवन में चेतना का संचार किया है।

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प्रश्न 3. ‘पंचवटी’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
         ‘पंचवटी’ कविता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘पंचवटी’ खण्डकाव्य से उधृत है। इसमें पंचवटी के प्राकृतिक सौन्दर्य का जीवन्त वर्णन है। प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त श्रीराम के विशाल व्यक्तित्व का भी इसमें सजीव चित्रण है। कविता का सारांश निम्न प्रकार है –
             सारांश- चन्द्रमा की स्वच्छ चाँदनी पृथ्वी तल पर तथा आकाश में फैली हुई है। पृथ्वी पर हरित-दूब उगी हुई है। मन्द पवन के झोंकों से वृक्ष मानो मस्त होकर झूम रहे हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण पंचवटी पर श्रीराम की कुटी बनी हुई है। इस कुटी के सामने श्वेत शिला पर कामदेव की भाँति धनुष धारण कर लक्ष्मण योगी रूप में कुटी की रक्षा में सम्पूर्ण राज्य-सुखों को त्याग कर लीन हैं। आज तीनों लोकों की रानी सीता ने इस कुटी को अपना लिया है। रानी सीता रघुवंश की लाज हैं। इसलिए लक्ष्मण इस कुटी का प्रहरी वीर-वेश धारण किये हुए हैं।
            प्रकृति-सुन्दरी यहाँ अपना नाटक पूरा करती है। इसलिए वह प्रतिदिन शाम को पृथ्वी पर सुन्दर मोती (ओस-कण) बिखेर देती है और सूर्य सबेरा होते ही उन्हें समेट लेता है।
इस प्रकार वन में राम, लक्ष्मण और सीता को रहते हुए तेरह वर्ष बीत चुके। श्रीराम प्रजा के हित के लिए अतिशीघ्र राज्य ग्रहण करेंगे और लोक का उपकार करेंगे। राज्यभार ग्रहण कर वे अति व्यस्त हो जायेंगे। व्यस्तता में वे हमें भी भूल जायेंगे परन्तु लोकोपकार की भावना में ऐसा होने पर हमें कोई दु:ख नहीं होगा। इसी समय लक्ष्ण के मन में विचार उठता है कि क्या संसार के लोग स्वयं अपना उपकार नहीं कर सकते?

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘पंचवटी’ की प्रकृति का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर- गुप्तजी की कविताओं में प्रकृति का सजीव चित्रण देखने को मिलता है। उन्होंने प्रकृति के मोहक चित्र अपने काव्य में प्रस्तुत किये हैं। पंचवटी’ में तो प्रकृति-चित्रण साकार हो उठा है। वे चाँदनी रात का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ”चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में स्वच्छ चाँदी बिछी हुई हैं, अवनि और अम्बर तल में।” पृथ्वी पर निकली हरी घास की नोकें हिल रही हैं, मानो पृथ्वी उन्हीं के द्वारा अपनी (UPBoardSolutions.com) प्रसन्नता को प्रकट कर रही है। रात्रि के समय चारों ओर चाँदनी छिटकी हुई है और वातावरण शान्त है। प्रात:काल सूर्य के निकलने पर ओस की बूंदें गायब हो जाती हैं। सन्ध्या के समय तारे निकल आते हैं, जिससे उसको सौन्दर्य और अधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 2. ‘प्रहरी बना हुआ वह’ (लक्ष्मण) कुटीर के किस धन की रक्षा कर रहा है?
उत्तर- लक्ष्मण जी प्रहरी बनकर सीतारूपी महान् धन की रक्षा कर रहे हैं।

प्रश्न 3. लक्ष्मण संसार के मनुष्यों से क्या करने की आशा रखते हैं?
उत्तर- लक्ष्मण जी अपेक्षा करते हैं कि संसार के सभी व्यक्ति लोकोपकार में लगे रहें, अपने हित का चिन्तन करें और अपने हित के लिए दूसरों पर निर्भर न रहें।

प्रश्न 4. पंचवटी’ कविता में निहित मूल भाव से सम्बन्धित चार वाक्य लिखिए।
उत्तर- चन्द्रमा की स्वच्छ चाँदनी पृथ्वी तल और आकाश में छायी हुई है। पृथ्वी पर हरी-भरी दूब उगी हुई है। मन्द पवन के झोंकों से पेड़ मानो मस्त होकर झूम रहे हैं। इस प्रकार प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी हुई पंचवटी में श्रीराम की कुटी बनी हुई है। कवि के मन में प्रश्न उठता है कि इस श्वेत शिला (UPBoardSolutions.com) पर कामदेव की भाँति सुन्दर यह कौन धनुर्धारी योगी बैठा जाग रहा है? यह योगी सम्पूर्ण राज्य-सुखों को त्यागकर इस कुटी में कौन-से धन की रक्षा कर रहा है?

प्रश्न 5. मैथिलीशरण गुप्त की भाषा-शैली लिखिए।
उत्तर- गुप्तजी ने शुद्ध, साहित्यिक एवं परिमार्जित खड़ीबोली में रचनाएँ की हैं। इनकी भाषा सुगठित तथा ओज एवं प्रसाद गुण से युक्त है। इन्होंने अपने काव्य में संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू एवं प्रचलित विदेशी शब्दों के भी प्रयोग किये हैं। इनके द्वारा प्रयुक्त शैलियाँ हैं-प्रबन्धात्मक शैली, उपदेशात्मक (UPBoardSolutions.com) शैली, विवरणात्मक शैली, गीति शैली तथा नाट्य शैली। वस्तुतः आधुनिक युग में प्रचलित अधिकांश शैलियों को गुप्तजी ने अपनाया है।

प्रश्न 6. सन्ध्या को सूर्य की विरामदायिनी क्यों कहा गया है?
उत्तर- सूर्य दिन भर आकाश मार्ग में चलता है। जब सन्ध्या होती है तब सूर्य की यात्रा रुकती है। कवि कल्पना के अनुसार सूर्य विश्राम करता है। इस कारण सन्ध्या को सूर्य की विरामदायिनी कहा गया है। सूर्य के अतिरिक्त सन्ध्या पक्षियों, किसान आदि के लिए भी विरामदायिनी है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. मैथिलीशरण गुप्त किस युग के कवि हैं?
उत्तर- मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के कवि हैं।

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प्रश्न 2. मैथिलीशरण गुप्त की दो प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर- साकेत और यशोधरा।।

प्रश्न 3. ‘साकेत’ रचना पर गुप्तजी को कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ है?
उत्तर- ‘साकेत’ रचना पर गुप्तजी को ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्राप्त हुआ।

प्रश्न 4. ‘साकेत’ की विषय-वस्तु क्या है?
उत्तर- ‘साकेत’ में लक्ष्मण और उर्मिला के त्याग को दर्शाया गया है।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से सही उत्तर के सम्मुख सही (√) का चिह्न लगाइए-
उत्तर-

(अ) पंचवटी में श्रीराम की कुटी बनी हुई है।                         (√)
(ब) सूर्य के निकलने पर ओस की बूंदें गायब हो जाती हैं।      (√)
(स) मैथिलीशरण गुप्त भारतेन्दु युग के कवि हैं।                    (×)
(द) ‘सखि, वे मुझसे कहकर जाते’ यह यशोधरा का कथन है। (√)

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
(अ) चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल-थल में।
(ब) जाग रहा ये कौन धनुर्धर जबकि भुवन-भर सोता है?
(स) मर्त्यलोक मालिन्य मेटने स्वामि संग जो आयी है।
उत्तर-

  • (अ) काव्यगत विशेषताएँ- 
    1. पंचवटी का सौन्दर्य वर्णित है।
    2. भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली।
    3. शैली- वर्णनात्मक।
    4. गुण- ओज।
    5. अलंकार- अनुप्रास, पुनरुक्ति।
  • (ब) काव्यगत विशेषताएँ-
    1. कवि ने लक्ष्मण की कर्तव्यनिष्ठा का वर्णन किया है।
    2. भाषा में तत्सम तथा तद्भव शब्दों का सुन्दर समन्वय हुआ है।
  • (स) काव्यगत विशेषताएँ- 
    1. यहाँ भारतीय नारी के महान् आदर्शों का चित्रण किया गया है कि वह सुख-दुःख में अपने पति को ही साथ देती है। सीताजी को तीन लोकों की ‘श्री’ कहा गया है।
    2. भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली।
    3. शैली- गीतात्मक एवं चित्रात्मक।
    4. अलंकार- अनुप्रास, रूपक।
    5. गुण- माधुर्य ।
    6. रस- शान्त।
    7. छन्द- मात्रिक।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में सन्धि-विच्छेद कीजिए तथा सन्धि का नाम बताइए-
प्रजार्थ, लोकोपकार, कुसुमायुध, निरानन्द।

उत्तर-
प्रजार्थ = प्रजा + अर्थ  = दीर्घ सन्धि
लोकोपकार = लोक + उपकार =  गुण सन्धि
कुसुमायुध = कुसम + आयुध =  
दीर्घ सन्धि
निरानन्द = निर + आनन्द = दीर्घ सन्धि

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प्रश्न 3. निम्नलिखित पदों में समास विग्रह करके समास का नाम लिखिए-
पंचवटी, वीरवंश, सभय, कुसुमायुध, ध्वनि संकेत, नरलोक।
उत्तर-
पंचवटी = पाँच वटों का समाहार = बहुब्रीहि समास
वीरवंश = वीरों का वंश = 
सम्बन्ध तत्पुरुष
सभय = भय से युक्त  = अव्ययी भाव
कुसुमायुध = कुसुम है आयुध जिसके =  बहुब्रीहि समास
वह (कामदेव)
ध्वनि संकेत = ध्वनि का संकेत = षष्ठी तत्पुरुष समास
नरलोक  = नरों का लोक =तत्पुरुष समास

प्रश्न 4. ‘पंचवटी’ शीर्षक कविता से अनुप्रास अलंकार का कोई एक उदाहरण बताइए।
उत्तर- चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में।

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UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 12 Word Formation

UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 12 Word Formation

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SOLVED EXERCISES BASED ON TEXT BOOK

EXERCISE : 1

Make Nouns from :

Questions.

1. act
2. wise
3.employ
4. appear
5. obey
6. please
7. able
8. propose
9. enter
10.fertile.
Answers:
1. action
2. wisdom
3. employee
4. appearance
5. obedience
6. pleasure
7. ability
8. proposal
9. entry
10. fertility.

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EXERCISE : 2

Make Nouns from :

Questions.

1. deliver
2. waste
3. deny
4. close
5. confirm
6. govern
7. educate
8. avoid
9. gentle
10. heavy.
Answers:
1. delivery
2. wastage
3. denial
4. closure
5. confirmation
6. government
7. education
8. avoidance
9. gentleness
10. heaviness.

EXERCISE : 3

Make Adjectives from :
Questions.
1. nation
2. origin
3. favour
4. value
5. thirst
6. hunger
7. storm
8. worth
9. blood
10. magic.
Answers:
1. national
2. original
3. favourable
4. valuable
5. thirsty
6. hungry
7. stormy
8. worthy
9. bloody
10. magical.

EXERCISE : 4

Make Verbs from :
Questions.
1. able
2. large
3. joy
4. fool
5. bitter
6. rich
7. power
8. friend
9. courage
10. little.

Answers:
1. enable
2. enlarge
3. enjoy
4. befool
5.embitter
6. enrich
7. empower
8. befriend
9. encourage
10. elittle.

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EXERCISE : 5

Fill in the blanks with suitable compound forms of the words given in the brackets in the
following sentences :
(a)
Questions.
1. How can I do the……… (possible)?
2. Never be ………… (polite) to anyone, whoever it may be.
3. “Do you agree with me?” “No, I ………… (agree).”
4. His action is ……… (legal). He is sure to be prosecuted.
5. These apples are still ……… (ripe).
6. The bullock-cart has not ………. (live) its usefulness.
7. Never ……….. (estimate) the strength of an enemy.
8. This man claims to be able to ………. (tell) future events.
9. The Government …………. (consider) the orders and cancelled them.
10. Hoarders and smugglers are …………. (social) persons.
11. Is he ……….. (Australia) or British ?
12. A journal which is published twice a month is called a …………..(weekly).
13. The sub-inspector is …………. (power) to arrest a law-breaker.
14. His uncle’s influence ………. (able) him to get a job soon countries.
Answers:
1. impossible
2. impolite
3. disagree
4. illegal
5. unripe
6. outlived
7. underestimate
8. foretell
9. reconsidered
10. anti-social
11. non-Australian
12. bi-weekly
13. empowered
14. enabled.

(b)
Questions.
1. Mr. Sohanlal is one of the best …….. …….. (cricket) our state has produced.
2. My headmaster has known me since my ……… (boy).
3. Great sacrifices were made in the struggle for our ………….. (free).
4. The ……………… (inhabit) of that island are short and dark skinned.
5. .…….. (elect) to Parliament have been postponed.
6. People in many districts faced ……….. (starve) owing to the drought.
7. An ………….. (agree) was signed between the two parties yesterday.
8. He was very rich, but found no real …………….. (happy) in being wealthy.
9. We can calculate the time of eclipses with great …………… (accurate).
10. The …………… (post) for registration of letters has been increased recently.
11. The saying is that ……………….. (fail) is a stepping stone to success.
12. The story of the Ramayana has been ………………. (simple) in that book.
13. This road has been (wide) by cutting down the trees on both sides of it.
14. He received a lot of …………. (assist) from his uncle for his college education.
Answers:
1. cricketers
2. boyhood
3. freedom
4. inhabitants
5. elections
6. starvation
7. agreement
8. happiness
9. accuracy
10. postage
11. failure
12. simplified
13. widened
14. assistance.

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UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
(1)
ठेले पर बर्फ की सिलें लादे हुए बर्फ वाला आया। ठण्डे, चिकने, चमकते बर्फ से भाप उड़ रही थी। मेरे मित्र का जन्म स्थान अल्मोड़ा है, वे क्षण भर उस बर्फ को देखते रहे, उठती हुई भाप में खोये रहे और खोये-खोये से ही बोले, “यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।” और तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ‘ठेले पर हिमालय’ । पर आपको इसलिए बता रहा हूँ कि अगर आप नये कवि हों तो भाई, इसे ले जायँ (UPBoardSolutions.com) और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ बेडौल-बेतुकी लिख डालें-शीर्षक मौजूं है और अगर नयी कविता से नाराज हों, सुललित गीतकार हों तो भी गुंजाइश है, इस बर्फ को डाँटें, “उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो? ओ नये कवियो! ठेले पर लादो । पान की दुकानों पर बिको।”
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) हिमालय की शोभा क्या है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से उद्धत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती जी हैं। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने बर्फ का वर्णन किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- ठेले पर लदे हुए बर्फ को देखकर लेखक कहता है कि एक मेरा मित्र है जिनका जन्मस्थान अल्मोड़ा है। वे पल भर उसे बर्फ को एकटक देखते रहे। बर्फ से उठती हुई भाप को देखकर वे बोले कि ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है’। मेरे मन में तुरन्त यह शीर्षक प्रवेश कर गया, ‘ठेले पर हिमालय।’ मैं आपको इसलिए बताना उचित समझता हूँ कि यदि आप एक (UPBoardSolutions.com) नये कवि हों तो आप इसे ले जायें और इस पर दो-तीन सौ पंक्तियों में रचना कर दीजिए। यह शीर्षक बहुत ही रुचिकर है। यदि आपकी नयी कविता में रुचि नहीं है और सुललित कवि हैं तो झड़प लगावें कि नीचे उतर जाइये। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की भाँति क्यों बैठे हो। ठेले पर चढ़ो और चाय, पान आदि की दुकानों पर बिको ।
  3. हिमालय की शोभा बर्फ है।

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(2) सच तो यह है कि सिर्फ बर्फ को बहुत निकट से देख पाने के लिए ही हम लोग कौसानी गये थे। नैनीताल से रानीखेत और रानीखेत से मझकाली के भयानक मोड़ों को पार करते हुए कोसी । कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा चली जाती है, दूसरी कौसानी। कितना कष्टप्रद, कितना सूखी और कितना कुरूप है वह रास्ता । पानी का कहीं नाम-निशान नहीं, सूखे भूरे पहाड़, हरियाली का नाम नहीं । ढालों को काटकर बनाये हुए टेढ़े-मेढ़े खेतं, जो थोड़े से हों तो शायद अच्छे भी लगें, पर उनको एकरस सिलसिला बिल्कुल शैतान की आँत मालूम पड़ता है।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कहाँ गया?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले परे हिमालय’ से लिया गया है। लेखक बर्फ को निकट से देखने के लिए कौसानी जाता है। वह रास्ते में पड़े मुख्य दृश्यों का वर्णन करता है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक बताता है कि कौसानी जाने के लिए नैनीताल से रानीखेत जाना पड़ता है। और रानीखेत से मझकाली के दुर्गम मोड़ों को पार करते हुए एक रास्ता कोसी जाता है। कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा को जाती है और दूसरी सड़क कौसानी को जाती है। यह मार्ग अत्यन्त कष्टप्रद और दुर्गम है। मार्ग में पानी कहीं नहीं दिखायी पड़ता है। सूखे-सूखे पहाड़ (UPBoardSolutions.com) दिखायी पड़ते हैं। हरे-भरे दृश्य देखने को मन तरस जाता है। ढालों को काटकर टेढ़े-मेढ़े खेत तैयार किये जाते हैं, जो देखने में अच्छे नहीं लगते हैं।
  3. बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कौसानी गया।

(3) कौसानी के अड्डे पर जाकर बस रुकी। छोटा-सा, बिल्कुल उजड़ा-सा गाँव बर्फ का तो कहीं नाम-निशान नहीं। बिल्कुल ठगे गये हम लोग। कितना खिन्न था मैं, अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया। कितना अपार सौन्दर्य बिखरा था, सामने की घाटी में। इसे कौसानी की पर्वतमाला ने अपने अंचल में यह जो कत्यूर की रंग-बिरंगी घाटी छिपा रखी है; इसमें किन्नर और यक्ष ही तो वास करते होंगे। पचासों मील चौड़ी यह घाटी, हरे मखमली कालीनों जैसे खेत, सुन्दर गेरू की शिलाएँ काटकर बने हुए लाल-लाल रास्ते, जिनके किनारेकिनारे सफेद-सफेद पत्थरों की कतार और इधर-उधर से आकर आपस में उलझ जानेवाली बेलों की लड़ियों-सी नदियाँ। मन में बेसाख्ता यहाँ आया कि इन बला की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लें, आँखों से लगा हूँ।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) कौन-सी घाटी थी, जिसमें अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण डॉ० धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक यात्रा-वृत्तान्त से उद्धृत है। यह यात्रा-वृत्तान्त हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में संकलित है। यहाँ नैनीताल से कौसानी तक की यात्रा का वर्णन अत्यन्त रोचक ढंग से किया गया है तथा कौसानी की पर्वत-श्रृंखला के आसपास के सौन्दर्य की झाँकी प्रस्तुत की गयी है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- धर्मवीर भारती कहते हैं कि कौसानी के सामने की घाटी के सौन्दर्य और उसके आकर्षण से खिंचा हुआ मैं मन्त्रमुग्ध-सा उसे देखता रहा। वह कत्यूर घाटी थी, जिसमें अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था। जिस प्रकार कोई सुन्दरी अपने सौन्दर्य को अपने आँचल में छिपाकर रखती है, उसी प्रकार कौसानी की इस पर्वत-श्रृंखला ने कत्यूर घाटी के सौन्दर्य को छिपा रखा (UPBoardSolutions.com) था। कत्यूर घाटी के सौन्दर्य में जो आकर्षण है, उससे आकर्षित होकर निश्चय ही प्रेम, सौन्दर्य तथा संगीत के उपासक यक्ष और किन्नर यहाँ आते रहते होंगे। तात्पर्य यह है कि इस कत्यूर घाटी के सौन्दर्य से आकर्षित होकर देवता भी यहाँ आने के लिए उत्सुक रहे। होंगे। यह घाटी लगभग पचास मील चौड़ी है। इस घाटी में हरे-भरे खेत भी हैं, जो हरी मखमली चादर के समान प्रतीत होते हैं। यहाँ गेरू की लाल-लाल शिलाएँ काटकर रास्ते बनाये गये हैं, जो लाल रंग के हैं और अत्यन्त आकर्षक लगते हैं। इन लाल-लाल रास्तों के किनारे सफेद पर्वत खड़े हैं, जो ऐसे लगते हैं मानो सफेद रंग की कोई रेखा खींचे दी गयी हो। उलझी हुई बेलों की लड़ियों के समान नदियाँ वहाँ गॅथी हुई प्रतीत होती हैं। इस सौन्दर्य ने मेरा मन मोह लिया और सहसा मेरे मन में यह विचार आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर, अपनी कलाई में लपेटकर आँखों से लगा लूंगा।
  3. कत्यूर घाटी में अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था।

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(4) हिमालय की शीतलता माथे को छू रही है और सारे संघर्ष, सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे ताप जैसे नष्ट हो रहे हैं। क्यों पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप कहा था और उसे नष्ट करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे, यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था और अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ। कितनी, कितनी पुरानी है यह हिमराशि । जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को कहा है-चिरन्तन हिम।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) कुछ विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम क्यों कहा है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि प्राचीनकाल से साधकों के हिमालय पर जाने का क्या प्रयोजन था?
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक स्पष्ट करता है कि पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप की संज्ञा दी थी और वे इस कष्ट से मुक्त होने के लिए हिमालय जाते थे। यह बात मेरी समझ में आयी । हिमालय तापे का नाशक और शीतलता का सूचक है। एकाएक मेरे मन में यह विचार आया कि यह हिमराशि कितनी पुरानी है, न जाने किस काल से यह उत्तुंग (UPBoardSolutions.com) शिखरों पर जमा हुआ है। इसीलिए विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरंतन हिम की संज्ञा प्रदान की है।
  3. न जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम भी कहा है।

(5) सूरज डूबने लगा और धीरे-धीरे ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलो में बदलने लगी, घाटियाँ गहरी नीली हो गयीं। अँधेरा होने लगा तो हम उठे और मुँह-हाथ धोने और चाय पीने में लगे। पर सब चुपचाप थे, गुमसुम जैसे सबका कुछ छिन गया हो या शायद सबको कुछ ऐसा मिल गया हो, जिसे अन्दर-ही-अन्दर सहजेने में सब आत्मलीन हो अपने में डूब गये हों।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) किस समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने कौसानी की सायंकालीन बेला का चित्रण किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि जब सूर्य अस्त होने का समय आया तो ग्लेशियरों में पिघली केसर प्रवाहित होने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने-सी प्रतीत होने लगी और घाटियाँ नीली दिखायी पड़ने लगीं। अँधेरा हो गया। मैं उठा और हाथ-मुँह धोकर चाय पीने लगा। उस समय का वातावरण बिल्कुल शान्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सबका सर्वस्व (UPBoardSolutions.com) छिन गया हो या सभी को सब कुछ मिल गया हो और ऐसा लग रहा था जैसे सभी अन्दर-अन्दर संजोने में तल्लीन होकर आत्मविभोर हो गये हों। यह दृश्य अत्यन्त मनमोहक था।
  3. सूर्य अस्त के समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी।

(6) आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है। कल ठेले के बर्फ को देखकर मेरे मित्र उपन्यासकार जिस तरह स्मृतियों में डूब गये, उसे दर्द को समझता हूँ और जब ठेले पर हिमालय की बात कहकर हँसता हूँ तो वह उस दर्द को भुलाने का ही बहाना है। ये बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं और हम हैं कि चौराहों पर खड़े ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था-‘कबहुँक हैं यदि रहिन रहगो’-मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकेंगा, वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर?
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) किसने हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से अवतरित है। इस अवतरण में लेखक कहता है कि मुझे बार-बार हिमालय का स्मरण आता है। हिमालय की ऊँचाइयों को देखने की इच्छा उसके मन में बार-बार उत्पन्न होती है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि आज भी जब हिमालय की याद आती है तो मन दर्द के मारे कराह उठता है। मेरे उपन्यासकार मित्र ठेले की बर्फ को देखकर स्मृतियों में डूब जाते थे। जब हिमालय का वास्तविक दर्शन होता तो क्या स्थिति होती। मैं उनके इस दर्द को भली-भाँति समझता हूँ। बर्फ की ऊँचाइयों को देखकर ऐसा मालूम होता है जैसे वे मुझे बुला v(UPBoardSolutions.com) रही हैं। हम ठेले पर लदे बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उन्हें भी हिमालय की ऊँची-ऊँची शिखरों से बेहद लगाव था।
  3. तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है।

प्रश्न 2. डॉ० धर्मवीर भारती की जीवनी एवं कृतियों का उल्लेख कीजिए।

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प्रश्न 3. डॉ० धर्मवीर भारती के साहित्यिक अवदान एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 4. डॉ० धर्मवीर भारती का जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए।
अथवी डॉ० धर्मवीर भारती का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा डॉ० धर्मवीर भारती के लेखन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

डॉ० धर्मवीर भारती
( स्मरणीय तथ्य )

जन्म- 25 दिसम्बर, सन् 1926 ई० । मृत्यु- 4 सितम्बर, सन् 1997 ई० । जन्म-स्थान– इलाहाबाद (उ० प्र०) ।
शिक्षा- प्रयाग में । प्रयाग विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि ।
रचनाएँ-काव्य- ‘ठण्डा लोहा’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘अन्धायुग’।
कहानी संग्रह- चाँद और टूटे हुए लोग।
नाटक- नदी प्यासी थी, नीली झील (एकांकी संग्रह)।
उपन्यास- ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
समीक्षा-साहित्य- मानव मूल्य और साहित्य। सम्पादन- ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।
साहित्य-सेवा- कवि के रूप में, गद्य लेखक के रूप में एवं सम्पादक के रूप में।
भाषा- शुद्ध परिमार्जित खड़ीबोली । संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग।
शैली- विषयानुकूल, शैली में पर्याप्त विविधता ।
अलंकार योजना- उपमा, मानवीकरण, रूपक तथा रूपकातिशयोक्ति।

  • जीवन-परिचय- आधुनिक हिन्दी के सशक्त कथाकार एवं ललित निबन्धकार डॉ० धर्मवीर भारती का जन्म इलाहाबाद में 25 दिसम्बर, सन् 1926 ई० को हुआ था। इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० करने के पश्चात् पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय तक प्रयाग से निकलने वाले साप्ताहिक हिन्दी पत्र ‘संगम’ का सम्पादन किया तथा कुछ वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक भी रहे। सन् 1958 ई० में वे मुम्बई से प्रकाशित होनेवाले प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र ‘धर्मयुग’ (UPBoardSolutions.com) के सम्पादक हो गये। पत्रकारिता के प्रयोजन से आपने देश-विदेश का भ्रमण भी किया है। भारत सरकार ने सन् 1972 ई० में उनकी हिन्दी-सेवाओं एवं हिन्दी पत्रकारिता के लिए ‘पद्मश्री’ से अलंकृत कर सम्मानित किया। उन्होंने ‘धर्मयुग’ पत्रिका का सफलतापूर्वक सम्पादन किया। हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार एवं ‘अंधायुग’ एवं ‘गुनाहों का देवता’ जैसी लोकप्रिय पुस्तकों के प्रणेता डॉ० धर्मवीर भारती का निधन 4 सितम्बर, सन् 1997 ई० को हो गया।
  • रचनाएँ-भारती जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। इन्होंने कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी आदि सभी कुछ लिखा है। इनकी रचनाएँ निम्न हैं –
  • काव्य- ‘ठण्डा लोहा’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘अंधायुग’।
    1. निबन्ध-संग्रह-‘कहानी-अनकहनी’, ‘ठेले पर हिमालय’ और ‘पश्यन्ती’ आदि।
    2. उपन्यास- ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
    3. नाटक और एकांकी संग्रह- ‘नदी प्यासी थी’, ‘नीली झील’।
    4. कहानी- संग्रह-‘चाँद और टूटे हुए लोग।
    5. आलोचना- ‘मानव मूल्य और साहित्य’ ।
    6. सम्पादन- ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।
    7. अनुवाद- ‘देशान्तर’।
  • भाषा- भारती जी की भाषा शुद्ध तथा परिमार्जित खड़ीबोली है। नवीन शिल्प के प्रतिनिधि लेखक होने के नाते ये भावों को प्रकट करने के लिए किसी विशेष भाषा-शैली का मुँह नहीं ताकते। अत: इनकी भाषा में संस्कृत (मूर्ति, स्तब्ध, सहयोगी आदि), अंग्रेजी (कैमरा, अकादमी, थर्मस, शेड आदि), उर्दू (खासा, दिलचस्प, यकीन, गुंजाइश आदि) के प्रचलित शब्दों तथा देशज शब्दों और मुहावरों (शैतान की आँख, चाँद-तारों से बात करना) आदि का खुलकर प्रयोग हुआ है।
  • साहित्यिक विशेषताएँ- डॉ० धर्मवीर भारती एक प्रतिभाशाली कवि, कथाकार, नाटककार एवं ललित निबन्धकार थे। इनकी कविताओं में रागतत्त्व, कहानियों और उपन्यासों में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को लेकर बड़े जीवन्त चरित्र प्रस्तुत किये गये हैं। डॉ० भारती में किसी भी दृश्य को शब्दों की सीमा में बाँधकर उसमें चित्रमयता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता थी। (UPBoardSolutions.com) समय-समय पर आपने जो संस्मरण, रेखाचित्र तथा ललित निबन्ध लिखे थे उनके माध्यम से हिन्दी में एक प्रयोग के संकेत मिलते हैं। इन्होंने अन्य भाषाओं की कुछ प्रसिद्ध रचनाओं के भी अनुवाद प्रस्तुत किये हैं।
  • भाषा और शैली- डॉ० भारती की भाषा अत्यन्त ही सरल, स्वाभाविक एवं प्रवाहपूर्ण है। उसमें विचारों की अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता होने के साथ-साथ मधुर काव्यमयता है। भाषा ओज और प्रसाद गुणों से सम्पन्न है। लाक्षणिकता एवं व्यंग्य पुटों से भाषा और भी जीवन्त हो गयी है। डॉ० भारती की भाषा में देशज और अंग्रेजी-उर्दू आदि भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में प्रयोग कर उन्हें पचा लेने की अद्भुत क्षमता थी। डॉ० भारती के गद्य की शैली वर्णनात्मक और विवरणात्मक (UPBoardSolutions.com) दोनों प्रकार की हैं। संस्मरण, रेखाचित्र तथा यात्रा-विवरणों में विवरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। रिपोर्ताज में वर्णनात्मक शैली प्रयुक्त हुई है। उक्त सभी विधाओं में आत्मव्यंजक शैली भी प्रयोग में लायी गयी है।

( लघु उत्तरीय प्रश्न )

प्रश्न 1. कौसानी की यात्रा में नैनीताल से कोसी तक लेखक का सफर कैसा रहा?
उत्तर- कौसानी की यात्रा में नैनीताल से कोसी तक लेखक का सफर कष्टप्रद था। भयानक-भयानक मोड़ थे और ऊबड़खाबड़ मार्ग था ।

प्रश्न 2. कोसी के आगे जो बदलाव आया उसका मुख्य कारण क्या था?
उत्तर- कोसी के आगे जो बदलाव आया उसका मुख्य कारण था कि प्रसन्नवदन शुक्ल जी मिल गये और उनकी सारी थकान दूर हो गयी।

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प्रश्न 3. कौसानी पहुँचने पर पहले लेखक को अवाक् मूर्ति-सा स्तब्ध कर देने वाला कौन-सा दृश्य दिखायी दिया?
उत्तर- कौसानी के अड्डे पर बस रुकने पर जब लेखक को वहाँ एक उजड़ा-सा गाँव दिखा तो वह खिन्न हो उठा। वहाँ बर्फ का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। लगता था जैसे लेखक ठगा गया हो लेकिन जब वह बस से नीचे उतरा तो वह जहाँ था वहाँ पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया यह देखकर कि सामने की घाटी में तो अपार सौन्दर्य बिखरा पड़ा है।

प्रश्न 4. कत्यूर घाटी के पार बादलों की ओट के बीच से दिखता हिमालय का एक श्रृंग उसे कैसा लगा? |
उत्तर- कत्यूर घाटी के पास बादलों की ओट के बीच से दिखता हिमालय का एक श्रृंग लेखक को ऐसा दिखा जैसे वह खिड़की से झाँक रहा है। लेखक प्रसन्नता से चीख उठा ‘बरफ’। सभी ने देखा लेकिन अकस्मात् वह फिर लुप्त हो गया।

( अतिलघु उत्तरीय प्रश्न )

प्रश्न 1. धर्मवीर भारती की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर- धर्मवीर भारती की दो रचनाएँ- (1) गुनाहों का देवती, (2) सूरज का सातवाँ घोड़ा।

प्रश्न 2. धर्मवीर भारती किस युग के लेखक हैं?
उत्तर- धर्मवीर भारती आधुनिक युग के लेखक हैं।

प्रश्न 3. धर्मवीर भारती का जन्म कब हुआ था?
उत्तर- धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर सन् 1926 ई० को इलाहाबाद में हुआ था।

प्रश्न 4. हिमालय की शोभा क्या है? |
उत्तर- हिमालय की शोभा बर्फ है।

प्रश्न 5. हिम श्रृंग के क्षणिक दर्शन का उस पर क्या प्रभाव हुआ?
उत्तर- हिम श्रृंग के क्षणिक दर्शन से लेखक की सारी खिन्नता, निराशा, थकावट छुमन्तर हो गयी।

प्रश्न 6. पूरी हिम-श्रृंखला देखने पर लेखक के मन में कैसे भाव उदित हुए?
उत्तर- हिमालय की शीतलता लेखक के माथे को छू रही थी। लेखक के मन में भाव उत्पन्न हुआ कि पुराने साधक लोग दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों को नष्ट करने के लिए हिमालय की शरण में आते थे।

प्रश्न 7. रात होने पर चाँद दिखायी दिया तब लेखक को क्यों लगने लगा कि जैसे उसका मन कल्पनाहीन हो गया हो?
उत्तर- जब चाँद निकला तो सब शान्त था, जैसे हिम सो रहा हो। लेखक को लगा जैसे उसका मन अत्यन्त कल्पनाहीन हो गया। इसी हिमालय को देखकर लेखक एवं कवियों ने अनेक रचनाएँ कर डालीं । लेखक कहता है-यह मेरा मन है कि मैंने एक पंक्ति भी नहीं लिखी।

प्रश्न 8. बैजनाथ पहुँचकर गोमती में स्नान करते हुए लेखक के मन में हिमालय के प्रति कैसे भाव जगते हैं?
उत्तर- बैजनाथ पहुँचकर गोमती में स्नान करते हुए लेखक के मन में अनेक भाव उत्पन्न हुए। उसे लगा जैसे गोमती की उज्ज्वल जलराशि में हिमालय की बर्फीली चोटियों की छाया तैर रही हो। लेखक कहता है कि पता नहीं उन शिखरों पर कैसे और कब पहुँचूँगा ।

व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्न में समास-विग्रह कीजिए और समास का नाम भी बताइए-
हिमालय, शीर्षासन, जलराशि, पर्वतमाला, तन्द्रालस, प्रसन्नवदन।
उत्तर-
हिमालय – हिम का आलय – षष्ठी तत्पुरुष समास
शीर्षासन – शीर्ष के द्वारा आसन – तृतीया तत्पुरुष समास
जलराशि – जल की राशि – षष्ठी तत्पुरुष समास
पर्वतमाला – पर्वत की माला – षष्ठी तत्पुरुष समास
तन्द्रालस – तन्द्रा से पूर्ण आलस –  तृतीया तत्पुरुष समास
प्रसन्नवदन – प्रसन्न वदन वाला – कर्मधारय समास

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प्रश्न 2. इस पाठ के आधार पर भारती जी की भाषा-शैली पर एक लेख लिखिए।
उत्तर- भारती जी की भाषा परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ीबोली है। इनकी भाषा में सरलता, सजीवता और आत्मीयता को पुट है तथा देशज, तत्सम एवं तद्भव शब्दों का (UPBoardSolutions.com) प्रयोग हुआ है। मुहावरों और कहावतों के प्रयोग से भाषा में गति और बोधगम्यता आ गयी है। विषय और विचार के अनुकूल भारती जी की इस रचना में भावात्मक, समीक्षात्मक, वर्णनात्मक, चित्रात्मक शैलियों के प्रयोग हुए हैं।

प्रश्न 3. निम्न शब्दों से प्रत्यय अलग कीजिए –
सुहावनापन, कष्टप्रद, शीतलता।
उत्तर- पन, प्रद, ता।

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