UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 20 Population Structure and Urbanization

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 20
Chapter Name Population Structure and Urbanization (जनसंख्या की संरचना तथा नगरीकरण)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 20 Population Structure and Urbanization (जनसंख्या की संरचना तथा नगरीकरण)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(अ) पुरुष-महिला अनुपात अथवा लिंगानुपात, (ब) जनसंख्या की आयु-संरचना, (स) भारत में साक्षरता, (द) जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना, (य) ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या।
या
भारत की जनगणना 2011 के अनुसार भारत का लिंगानुपात या लिंगानुपात से आप क्या समझते हैं? बताइए। [2016]
या
भारत में लिंगानुपात की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
लिंगानुपात से आप क्या समझते हैं? [2011, 12]
या
भारत में लिंगानुपात की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2009]
या
भारत की जनगणना, 2011 के अनुसार भारत का लिंगानुपात बताइए। [2016]
उत्तर

(अ) पुरुष-महिला अनुपात अथवा लिंगानुपात
Sex-Ratio

भारत में सन् 2011 ई० की जनगणना के अनुसार 62.37 करोड़ पुरुष (51.53%) तथा 58.65 करोड़ महिलाएँ (48.46%) हैं। इस प्रकार प्रति 1,000 पुरुषों के पीछे 940 महिलाएँ हैं। इस अनुपात के सम्बन्ध में एक विशेष बात यह है कि पिछले 100 वर्षों में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की तुलना में निरन्तर कम होती गयी है। सन् 2001 में प्रति 1,000 पुरुषों के पीछे 933 महिलाएँ थीं।
भारत में लिंगानुपात Sex Ratio in India
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पुरुषों के अनुपात में महिलाओं की संख्या में कमी के निम्नलिखित तीन कारण हो सकते हैं –

  1. भारत में महिलाओं की अपेक्षा पुरुष-शिशुओं का जन्म अधिक होता है।
  2. भारत के अनेक प्रदेशों में महिला-शिशुओं की देखभाल कम होने अथवा प्रसूति अवस्था में मृत्यु-दर का अधिक होना है।
  3. भारत में बाल-विवाह प्रथा प्रचलित है और कम आयु में लड़कियों को सातृत्व का भार वहन न कर पाने के कारण बहुत-सी लड़कियों की प्रसूति काल में अकाल मृत्यु हो जाती है।

भारतीय ग्रामीण समाज में प्रसूतावस्था में महिलाओं की उचित देखभाल न हो पाने के कारण वे रोगग्रस्त हो जाती हैं जिससे महिलाओं की संख्या में कमी की प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। देश के उत्तरी क्षेत्रों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या कम है, परन्तु ज्यों-ज्यों दक्षिण की ओर बढ़ते जाते हैं, महिलाओं की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जाती है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार केरल राज्य में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या सबसे अधिक (1,084) है।

(ब) जनसंख्या की आयु-संरचना
Age Structure of Population

भारत में उच्च जन्म-दर ने आयु-संरचना को एक वृहत् आधार प्रदान किया है जो ऊपर की ओर छोटा होता जाता है। इसे जनांकिकी में युवा जनसंख्या कहा जाता है। प्रायः4 वर्ष की आयु तक शिशु,5 से 14 वर्ष तक की आयु वालों को किशोर-किशोरियाँ, 15 से 29 वर्ष की आयु वालों को नवयुवक-नवयुवतियाँ, 30 से 50 वर्ष तक की आयु वालों को अधेड़ तथा इससे अधिक आयु वालों को वयोवृद्ध माना जाता है। इस आधार पर देश की 44% जनसंख्या 56% जनसंख्या पर आश्रित है, जो अधिकांशत: 15 से 60 वर्ष की आयु-वर्ग के मध्य है। वास्तव में यही जनसंख्या कार्यशील कहलाती है।
आयु-संरचना Age Structure
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आयु – संरचना के सम्बन्ध में एक प्रमुख तथ्य यह है कि पिछले 40 वर्षों में जनसंख्या की प्रत्याशित आयु में निरन्तर वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण असाध्य रोगों पर नियन्त्रण किया जाना है, जिससे बाल मृत्यु-दर एवं सामान्य मृत्यु-दर में कमी आयी है।

(स) भारत में साक्षरता
Literacy in India

साक्षर से तात्पर्य उस व्यक्ति से होता है जो किसी भाषा को सामान्य रूप से लिख-पढ़ सकता है। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार भारत में केवल 5.35% व्यक्ति साक्षर थे। सन् 1951 तक यह प्रतिशत मन्द गति से बढ़ा। इस वर्ष यह प्रतिशत 18.33 हो गया था, जबकि इसके बाद इस प्रतिशत में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। सन् 1981 में यह प्रतिशत 43.57 हो गया जो सन् 1991 में बढ़कर 52.21% हो गया। सन् 2001 में साक्षरता 64.8% हो गयी। यद्यपि पिछले 80 वर्षों में महिला साक्षरता में पुरुष साक्षरता की अपेक्षा अधिक वृद्धि हुई है तो भी साक्षरता में पुरुषों की ही संख्या अधिक रही है। सन् 1901 में पुरुषों की साक्षरता 9.8% थी सन् 1991 में यह बढ़कर 64.13% हो गयी है। सन् 1901 में महिला साक्षरता 0.6% थी जो सन् 2001 में बढ़कर 54.16% हो गयी है। सन् 2011 में यह 74.04% हो गयी। यह प्रतिशत नगरों की अपेक्षा ग्रामों में काफी कम है। ग्रामीण जनसंख्या का 40% भाग तथा नगरीय जनसंख्या का 20% भाग आज भी अशिक्षित है।

राज्यों के अनुसार साक्षरता की दर सबसे अधिक केरल राज्य में है, जो सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 93.91% थी, जबकि सबसे कम बिहार में 63.82% है। केरल राज्य ने पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। देश में साक्षरता के स्तर में वृद्धि करना अति आवश्यक है जिससे देशवासी विकास–योजनाओं को समझ सकें तथा देश के आर्थिक विकास में वृद्धि की जा सके।

(द) जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना
Occupational Structure of Population

व्यावसायिक संरचना के अनुसार भारत की लगभग 65% जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुई है, जबकि उद्योग-धन्धों में केवल 12% जनसंख्या ही लगी है। देश में विभिन्न जनगणना वर्षों में कार्यशील जनसंख्या का प्रतिशत इस प्रकार रहा है-1911 में 48.2%, 1921 में 47.1%, 1931 में 46.6%, 1951 में 46%, 1961 में 45%, 1981 में 42% तथा 1991 में 37.3% तथा 2011 में 21.3%। इन आँकड़ों से ज्ञात होता है कि भारत की कुल जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या पर आश्रित जनसंख्या का भार बढ़ता जा रहा है। कार्यशील जनसंख्या का लमभग 65% भाग कृषि-कार्यों पर निर्भर करता है।

भारत में कृषि पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है। सन् 2011 में कुल जनसंख्या का 65% भाग कृषि-कार्य पर निर्भर था। राष्ट्रीय आय में वृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि कृषि पर जनसंख्या की निर्भरता कम की जाये तथा उसे अन्य कार्यों; जैसे-उद्योग-धन्धों, व्यापार, परिवहन, निर्माण आदि कार्यों की ओर उन्मुख किया जाये।

(य) ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या
Rural and Urban Population

भारत वास्तविक रूप से ग्रामों का देश है। आज भी देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग ग्रामों में निवास करता है। सन् 1891 की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या का केवल 9.5% भाग नगरों में निवास करता था तथा 90.5% जनसंख्या ग्रामों में निवास करती थी। सन् 1891 से लेकर सन् 1941 तक नगरीय जनसंख्या के अनुपात में बहुत ही मन्द गति से वृद्धि हुई तथा यह प्रतिशत 10 से 14 के मध्य ही रहा। सन् 1951 में नगरीय जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई तथा देश की 17.34% जनसंख्या नगरों में निवास करने लगी थी। इस वृद्धि का प्रमुख कारण देश के विभाजन के फलस्वरूप पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों एवं शरणार्थियों को नगरों में बस जाना था। सन् 1961 की जनगणना के अनुसार 82.1% जनसंख्या ग्रामों में रह रही थी। इस वर्ष 17.9% जनसंख्या नगरों में रहती थी।

सन् 1981 की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 5.5 लाख ग्राम और 3,245 नगर थे। इस प्रकार इन ग्रामों में 76.27% तथा नगरों में 23.73% जनसंख्या निवास कर रही थी, जबकि सन् 1991 की जनगणना के अनुसार 74.28% जनसंख्या ग्रामों में तथा 25.72% जनसंख्या नगरों में निवास कर रही थी। सन् 2011 की जनगणना में देश में लगभग 6.41 लाख ग्राम व 7,936 नगर थे। सन् 2011 में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत बढ़कर 31.16 तथा ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत घनत्व घटकर 68.84 रह गया है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि भारत में कुल जनसंख्या में ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत धीरे-धीरे घटता जा रहा है तथा नगरों की संख्या तथा उनकी जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
प्रो० ब्लॉश के अनुसार, “भारत ग्रामीण अधिवास का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारत में ग्रामीण जीवन बड़ी विकसित अवस्था में है। ये ग्राम भारतीय संस्कृति का आधार-स्तम्भ रहे हैं। ग्रामीण जीवन संगठन पर आधारित होता है। प्राचीन काल में गाँव तो स्वावलम्बी ही होते थे जिनमें पारस्परिक सहयोग की भावना होती थी।

भारतीय ग्रामों का जन्म सहकारिता के आधार पर माना जाता है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से व्यक्तिवाद की भावना में वृद्धि, संयुक्त परिवार प्रथा का विघटन, आधुनिक एवं पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव, परिवहन साधनों का विकास, नगरों में उद्योग-धन्धों के विकसित हो जाने के कारण ग्रामीण जनसंख्या का नगरों की ओर प्रवास एवं ग्रामीण लघु-कुटीर उद्योग-धन्धों का विनाश आदि ऐसे आर्थिक एवं सामाजिक कारण रहे हैं जिनसे ग्रामों का प्राचीन वैभव नष्ट होता जा रहा है, जबकि आज भी देश की लगभग तीन-चौथाई जनसंख्या ग्रामों में ही निवास कर रही है। भारत धीरे-धीरे नगरीकरण की ओर अग्रसर होता जा रहा है।

प्रश्न 2
नगरीकरण क्या है? भारत से उदाहरण लेते हुए नगरीकरण और औद्योगीकरण के अन्तःसम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
या
नगरीकरण से क्या तात्पर्य है? [2006]
या
भारत में नगरीकरण की प्रवृत्ति एवं अर्थव्यवस्था पर उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए। [2007]
या
भारत में नगरीकरण की विवेचना कीजिए। [2010]
या
नगरीकरण की परिभाषा दीजिए। [2012, 15]
उत्तर
नगरीकरण से आशय व्यक्तियों द्वारा नगरीय संस्कृति को स्वीकारना है। प्रत्येक देश में गाँवों से नगरों की ओर निरन्तर जनसंख्या का प्रवास होता रहता है। यह प्रवास सामान्यत: गाँवों से कस्बों, कस्बों से नगरों तथा नगरों से महानगरों की ओर होता रहता है। यह प्रक्रिया सतत् रूप से जारी है।

नगरीकरण की प्रक्रिया नगर से सम्बन्धित है। नगर सामाजिक विभिन्नताओं का वह समुदाय है। जहाँ द्वितीयक एवं तृतीयक समूहों और नियन्त्रणों, उद्योग और व्यापार, सघन जनसंख्या और वैयक्तिक सम्बन्धों की प्रधानता हो। नगरीकरण की प्रक्रिया द्वारा गाँव धीरे-धीरे नगर में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार कृषि (प्राथमिक व्यवसाय) का उद्योग एवं व्यापार आदि में परिवर्तन नगरीकरण कहलाता है। श्री बर्गेल ग्रामों के नगरीय क्षेत्र में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया को ही नगरीकरण कहते हैं।

इसी प्रकार किसी प्रदेश में उद्योग-धन्धों का विकास हो जाने के कारण जब ग्रामीण जनसंख्या रोजगार की खोज में ग्रामीण बस्तियों को छोड़कर नगरों की ओर प्रस्थान करने लगती है, तो नगरीय जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है। इस रूप में, नगरीकरण का अर्थ ‘नगरों के विकास’ से लिया जाता है। यह एक ऐसी शाश्वत प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति गाँवों से नगरों में प्रस्थान कर निवास करने लगते हैं।

भारत की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होने के साथ-साथ नगरीकरण में भी भारी वृद्धि हुई है। सन् 1901 में कुल नगरीय जनसंख्या 2.57 करोड़ थी, जो सन् 2001 में बढ़ते-बढ़ते 28.53 करोड़ हो गयी है। इस प्रकार इन 100 वर्षों के दौरान नगरीय जनसंख्या दस गुनी से भी अधिक हो गयी है, परन्तु फिर भी नगरीय जनसंख्या का कुल जनसंख्या में अनुपात उतनी वृद्धि नहीं कर पाया है जितनी कि कुल जनसंख्या में वृद्धि हुई है। भारत में सन् 1901 में नगरों व कस्बों की संख्या 1,916 थी जो सन् 1991 में बढ़कर 3,768 हो गयी। इस अवधि में देश में 2.57 करोड़ नगरीय जनसंख्या बढ़कर 21.76 करोड़ पहुँच गयी। अतः स्पष्ट है कि जहाँ एक ओर नगरीय जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई है, वहीं ग्रामीण जनसंख्या में भी भारी वृद्धि अंकित की गयी है। निम्नांकित तालिका भारत में नगरीकरण की दर को प्रकट करती है –

भारत में नगरीकरण
Urbanization in India
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उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि सन् 1901 से लेकर सन् 1941 तक नगरीय जनसंख्या में वृद्धि की दर बहुत ही धीमी गति से हुई है, परन्तु सन् 1951 के जनगणना वर्ष में नगरीय जनसंख्या में तीव्र वृद्धि अंकित की गयी। कुल जनसंख्या में पिछले 40 वर्षों के दौरान भी इतनी नगरीय जनसंख्या में वृद्धि नहीं हो पायी थी जितनी कि सन् 1941 से 1951 के दशक में। इसका प्रमुख कारण यह था कि देश विभाजन के फलस्वरूप बहुत-सी विस्थापित एवं शरणार्थी जनसंख्या पाकिस्तान से आकर नगरों में बस गयी थी। इसके साथ ही 1921 के बाद से देश प्राकृतिक विपदाओं से सुरक्षित रहा, परन्तु फिर भी अन्य पश्चिमी देशों की अपेक्षा भारत में नगरीय जनसंख्या में कोई विशेष वृद्धि नहीं हो पायी।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय भारत में आर्थिक विकास, राजनीतिक अस्थिरता के कारण काफी मन्द रहा, जिस कारण नगरीय जनसंख्या वृद्धि पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। सन् 1961 के बाद से जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि अंकित की गयी है। सन् 1961 से 1981 के बीस वर्षों में नगरीय जनसंख्या वृद्धि पिछले साठ वर्षों से भी काफी अधिक रही है। वर्तमान समय में कुल जनसंख्या में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत 25.75 हो गया है। नगरीय जनसंख्या में इस भारी वृद्धि से नगरों की संख्या एवं उनकी जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि अंकित की गयी है। सन् 2011 में देश में 7,936 नगर व 6.41 लाख गाँव थे।

नगरों की जनसंख्या में अतिशय वृद्धि के कारण
Causes of Excess Growth of Population in Cities

  1. देश में उद्योग-धन्धों एवं व्यापारिक कार्यों में वृद्धि,
  2. ग्रामीण जनसंख्या को भारी संख्या में नगरों की ओर स्थानान्तरण,
  3. अनेक ग्रामीण बस्तियों का नगरीय बस्तियों में परिवर्तित हो जाना,
  4. नवीन नगरों का विकसित होना तथा (5) वर्तमान नगरों को अपने क्षेत्रफल एवं जनसंख्या आकार में भारी वृद्धि करना।

भारत में नगरीकरण की विशेषताएँ
Characteristics of Urbanization in India

भारत में सन् 1941 से 1961 तक के 20 वर्षों में नगरीय जनसंख्या में सबसे अधिक वृद्धि हुई है। जो 49% अंकित की गयी है। यह वृद्धि-दर विश्व के अन्य विकसित देशों; जैसे जापान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका से भी कहीं अधिक है। वास्तव में इस अतिशय वृद्धि का कारण देश का विभाजन था, जिस कारण लाखों विस्थापित परिवार पाकिस्तान से आकर देश के नगरों में बस गये थे। सन् 1951 से 1961 के दशक में देश में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से औद्योगीकरण की आधारशिला रखी गयी, परन्तु नगरीय जनसंख्या की प्रतिशत वृद्धि बढ़ने के स्थान पर और भी घट गयी। नगरों में जन्म एवं मृत्यु-दर तथा ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों की ओर होने वाले स्थानान्तरण के सही आँकड़े उपलब्ध न होने से नगरीय जनसंख्या में वृद्धि के कारणों के विषय में निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता है, परन्तु फिर भी अनुमान लगाया गया है कि नगरीय जनसंख्या में वृद्धि की दर उतनी ही है जितनी सम्पूर्ण देश में जनसंख्या-वृद्धि की दर हैं। वर्तमान में जनसंख्या वृद्धि की दर 17.64% वार्षिक है।

ग्रामीण क्षेत्रों से जनसंख्या नगरों की ओर प्रवास करती रहती है, परन्तु यह जनसंख्या कितनी है, इस विषय में विद्वानों के विचार अलग-अलग हैं। ग्रामों से नगरों में आकर बसने वाली जनसंख्या 82 लाख से 1 करोड़ 2 लाख तक अनुमानित की गयी है। इस जनसंख्या में वे 20 लाख व्यक्ति सम्मिलित नहीं हैं जो सन् 1941-51 के दशक में देश-विभाजन के समय पाकिस्तान से आकर नगरों में बस गये थे।

नगरीकरण (Urbanization) – वर्तमान समय में विश्व में नगरीकरण एक महत्त्वपूर्ण घटना है। नगरों की संख्या तथा उनकी जनसंख्या में अपार वृद्धि वर्तमान युग का महत्त्वपूर्ण तथ्य है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वीतल पर नगरों का उद्भव सबसे पहले 5,000 से 6,000 वर्ष पूर्व हुआ था। अतः इन्हें नवीन घटना के रूप में नहीं लिया जा सकता है, परन्तु मानवीय इतिहास में नगरीकरण की प्रक्रिया बहुत ही मन्द रही हैं, परन्तु यहाँ पर प्रश्न उठता है कि यह नगरीकरण क्या है?

ट्विार्था ने बताया है कि, “कुल जनसंख्या में नगरीय स्थानों में रहने वाली जनसंख्या का अनुपात ही नगरीकरण का स्तर बताता है।”
प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता ग्रिफिथ टेलर का कहना है, “गाँवों से नगरों की जनसंख्या का स्थानान्तरण ही नगरीकरण कहलाता है।
यदि नगरों की जनसंख्या में वृद्धि ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि की ही भाँति होती है, तो ऐसी दशा में यह नहीं कहा जा सकता कि नगरीकरण में कोई वृद्धि हुई है। नगरीकरण का भौगोलिक उद्देश्य उस सामाजिक वर्ग से है जो प्रायः अकृषि कार्यों (उद्योग, व्यापार, परिवहन, संचार, निर्माण, सेवा आदि) में लगा होता है। नगरीकरण एवं औद्योगीकरण में गहन सम्बन्ध होता है।

नगरीकरण को अर्थव्यवस्था से सम्बन्ध
Relation of Urbanization with Economy

नगरीकरण का अर्थव्यवस्था से गहरा सम्बन्ध है, क्योंकि नगरीकरण द्वारा देश की अर्थव्यवस्था कृषि (प्राथमिक कार्यों) से उद्योगों, व्यापार, संचार आदि कार्यों (गौण या अप्राथमिक कार्य) की ओर प्रवृत्त होती है। इससे प्रति व्यक्ति आय एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। वास्तव में नगरीकरण में वृद्धि ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय केन्द्रों की ओर लोगों के पलायन के कारण हुई है। नगरीकरण का अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित रूपों में प्रभाव पड़ता है –

  1. भारत में औद्योगिक क्रान्ति का प्रभाव तीव्र गति से पड़ा है। इसके कारण भूमि की उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई है, क्योंकि कृषि-कार्यों में नवीन वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया जाने लगा है। इससे खाद्यान्नों का उत्पादन अतिरिक्त मात्रा में होने लगी तथा देश की खाद्य समस्या के हल होने में काफी सहायता मिली है।
  2. कृषि-कार्यों के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता होती है तथा बहुत अधिक क्षेत्र कम लोगों को रहने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसके विपरीत नगरीय कार्यों; जैसे-उद्योग-धन्धे, निर्माण कार्य, व्यापार, सेवा आदि के लिए कम स्थान की आवश्यकता होती है, अर्थात् ये कार्य एक ही स्थान पर एकत्रित होकर अधिक लोगों को आर्थिक आधार प्रदान करते हैं।
  3. उद्योग-धन्धों एवं सेवा कार्यों की अपेक्षा कृषि-उत्पादों को बाजार कम विस्तृत है जिससे इन नगरीय कार्यों ने बड़े क्षेत्रों तक अपना प्रभाव जमा लिया है जिससे अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ आधार मिला है।
  4. भूमि की उत्पादकता में जैसे-जैसे वृद्धि होती गयी, प्राथमिक वस्तुओं के उत्पादन के लिए मानव शक्ति की आवश्यकता भी कम होने लगी। इस अतिरिक्त मानवीय श्रम की खपत उद्योगों, व्यापार, परिवहन एवं संचार तथा सेवाओं आदि कार्यों में बढ़ गयी। इन कार्यों से मानव अधिक आर्थिक लाभ अर्जित करने लगा।

उपर्युक्त सभी तथ्यों ने मिलकर ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाली जनसंख्या को नगरों की ओर आकर्षित करने में सहायता की है। इस अतिरिक्त जनसंख्या को नगरों में आकर्षण मिलने के कारण उन्हें आर्थिक अवसर भी अच्छे मिलने लगे। इस प्रकार, भारत में नगरीकरण ऐसी प्रक्रिया है जिससे समाज की आय एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि हुई है तथा उनका जीवन-स्तर पहले की अपेक्षा उच्च हुआ है। अतः नगरीकरण देश के आर्थिक एवं सामाजिक कल्याण के लिए सार्थक सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 3
भारत में नगरीकरण के कारणों एवं समस्याओं की विवेचना कीजिए।
या
भारत में नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं के समाधान हेतु कोई पाँच सुझाव दीजिए। [2016]
या
भारत में नगरीकरण के कारणों की विवेचना कीजिए। [2014]
उत्तर

भारत में नगरीकरण के कारण
Causes of Urbanization in India

भारत के नगरों के विकास के मुख्यतः अग्रलिखित कारण रहे हैं –

  1. रेलों के विकास के कारण व्यापार महत्त्वपूर्ण स्टेशनों के मार्गों द्वारा होने लगा।
  2. भयानक दुर्भिक्षों के कारण बड़े पैमाने पर किसान बेरोजगार हो गये। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार न मिल सकने के कारण जनसंख्या का रोजगार की तलाश में नगरों की ओर प्रवास होने लगा।
  3. भूमिहीन श्रम वर्ग के विकास के कारण ही नगरीकरण प्रोत्साहित हुआ। इस वर्ग के जिन लोगों को नगर क्षेत्रों में स्थायी रोजगार अथवा अपेक्षाकृत ऊँची मजदूरी मिल गयी, वे वहीं बस गये।
  4. नगरों के आकर्षण के कारण धनी जमींदारों के नगरों में बसने की प्रवृत्ति भी बढ़ी। नगरों में । कुछ ऐसे आकर्षण थे, जिनका गाँवों में अभाव था।
  5. नये उद्योगों की स्थापना अथवा पुराने उद्योगों के विस्तार के कारण श्रम-शक्ति नगरों में खपने लगी।

उपर्युक्त कारणों के विश्लेषण के पश्चात् प्रो० डी० आर० गाडगिल इस निष्कर्ष पर पहुँचे, ‘‘इने सब कारणों में उद्योगों का विकास अन्य सभी देशों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण रहा है, किन्तु भारत में इसका प्रभाव निश्चय ही इतना सशक्त नहीं रहा। सच तो यह है कि भारत में बहुत कम ऐसे नगर हैं। जिनका उद्भव नये उद्योगों के कारण हुआ है।

भारत में औद्योगीकरण का निश्चित प्रभाव जनसंख्या को ग्रामीण क्षेत्रों से स्थानान्तरित करने की दृष्टि से प्रबल रूप से व्यक्त नहीं हुआ। इसका प्रमाण यह है कि भारत में कुल श्रमिकों की सामान्य वृद्धि के साथ कृषि और गैर-कृषि श्रमिकों दोनों की संख्या में एक साथ वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के प्रबल प्रभाव के फलस्वरूप कृषि-श्रमिकों का अनुपात गैर कृषि-श्रमिकों के अनुपात की तुलना में काफी कम हो जाना चाहिए था।

नगरीकरण से उत्पन्न समस्याएँ या प्रभाव या परिणाम
Problems or Effects or Results Produced by Urbanization

भारत में तेजी से बढ़ते हुए नगरीकरण से निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं –
(1) अपर्याप्त आधारभूत ढाँचा और सेवाएँ – यद्यपि नगरीकरण की तीव्रता से विकास प्रकट होता है, परन्तु अति तीव्र नगरीकरण से नगरों में नगरीय सेवाओं और सुविधाओं की कमी हो जाती है। यह सर्वविदित तथ्य है कि मैट्रोपोलिटन नगरों की 30% से 40% तक जनसंख्या गन्दी बस्तियों में रहती है। ऐसी आवास-विहीन जनसंख्या भी बहुत अधिक है जिसका जीवन-स्तर बहुत निम्न होता है।

(2) परिवहन की असुविधा – नगरों में भीड़ बढ़ने से परिवहन की समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

(3) अपराध बढ़ जाते हैं – आज नगरों में अपराधों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, जो तेजी से बढ़ती हुई नगरीय जनसंख्या का परिणाम है।

(4) आवास की कमी – जितनी तेजी से नगरों की जनसंख्या बढ़ रही है उतनी तेजी से आवासों का निर्माण नहीं हो पाता; अत: आवासों की भारी कमी चल रही है।
(5) औद्योगीकरण – नगरों का विकास हो जाने के कारण औद्योगीकरण की प्रक्रिया बढ़ गयी है। प्राचीन युग के उद्योग-धन्धे समाप्त हो गये हैं। इन उद्योग-धन्धों के विकास के कारण भारत में सामाजिक संगठन में परिवर्तन हुए हैं। पूँजीपति एवं श्रमिक वर्ग के बीच संघर्ष बढ़ गये हैं। स्त्रियों में आत्मनिर्भरता बढ़ गयी है। व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे हैं। कारखानों की स्थापना, गन्दी बस्तियों की समस्याओं व हड़तालों आदि के कारण जीवन में अनिश्चितता आ गयी है।

(6) द्वितीयक समूहों की प्रधानता – नगरीकरण के कारण भारत में परिवार, पड़ोस आदि जैसे प्राथमिक समूह प्रभावहीन होते जा रहे हैं। वहाँ पर समितियों, संस्थाओं एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के द्वारा ही सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है। इस प्रकार के सम्बन्धों में अवैयक्तिकता पायी जाती है।

(7) अवैयक्तिक सम्बन्धों की अधिकता – नगरीकरण के कारण नगरों में जनसंख्या में वृद्धि हो गयी है। जनसंख्या की इस वृद्धि के कारण लोगों में व्यक्तिगत सम्बन्धों की सम्भावना कम हो गयी,है। इसी आधार पर आर० एन० मोरिस ने लिखा है कि जैसे-जैसे नगर विस्तृत हो जाते हैं वैसे-वैसे इस बात की सम्भावना भी कम हो जाती है कि दो व्यक्ति एक-दूसरे को जानेंगे। नगरों में सामाजिक सम्पर्क अवैयक्तिक, क्षणिक, अनावश्यक तथा खण्डात्मक होता है।

(8) पारम्परिक सामाजिक मूल्यों की प्रभावहीनता – नगरीकरण के कारण व्यक्तिवादी विचारधारा का विकास हुआ है। इस विचारधारा के कारण प्राचीन सामाजिक मूल्यों का प्रभाव कम हो गया है। प्राचीन समय में बड़ों का आदर, तीर्थ स्थानों की पवित्रता, ब्राह्मण, गाय तथा गंगा के प्रति श्रद्धा और धार्मिक संस्थानों की मान्यता थी, परिवार की सामाजिक स्थिति का ध्यान रखा जाता था, किन्तु आज नगरों का विकास हो जाने से प्राचीन सामाजिक मूल्य प्रभावहीन हो गये हैं। उनका स्थान भौतिकवाद तथा व्यक्तिवाद ने ले लिया है।

(9) श्रम-विभाजन और विशेषीकरण – नगरीकरण एवं औद्योगीकरण के विकास के कारण आज विभिन्न देशों में कुशल कारीगरों का महत्त्व बढ़ गया है। कोई डॉक्टर है, कोई वकील है और कोई इन्जीनियर। डॉक्टरों, वकीलों तथा इन्जीनियरों के भी अपने विशिष्ट क्षेत्र हो गये हैं।

(10) अन्धविश्वासों की समाप्ति – अभी तक भारत में धार्मिक विश्वासों पर आँख मींचकर चलने की प्रथा थी, किन्तु आज विज्ञान ने दृष्टिकोण की संकीर्णता को व्यापक बना दिया है। अनेक आविष्कारों के कारण व्यक्ति को दृष्टिकोण तार्किक हो गया है।

(11) जातीय नियन्त्रण का अभाव – अभी तक भारतीय समाज में जाति-प्रथा के कारण बाल-विवाह, विधवा-विवाह निषेध, पर्दा-प्रथा, विवाह-संस्कार व स्त्रियों की निम्न दशा का प्रचलन था, किन्तु आज नगरीकरण के कारण शिक्षा का प्रसार हुआ है और भारत में विवाह सम्बन्धी अधिनियम को पारित करके विवाह सम्बन्धी मान्यता को बदल दिया गया है। आज विवाह की आयु निर्धारित कर दी गयी है, बाल-विवाह समाप्त हुए हैं, अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन मिला है, विधवा पुनर्विवाह आरम्भ हो गया है। जाति के सभी प्रतिमान बदल गये हैं, यातायात के साधनों का विकास हो जाने से जाति-पाँति के बन्धन टूट गये हैं।

नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं का समाधान
Solution of the Problems Produced by Urbanization

  1. आवासीय भूमि का विकास – नगरीकरण से जनसंख्या की वृद्धि होने से आवासीय भवनों की कमी हो जाती है। इसलिए नये आवासीय क्षेत्रों को विकसित करना चाहिए जिससे नगर के केन्द्रीय भाग में आवासों (मकानों) का जमघट न बढ़े। नयी आवासीय बस्तियों के विकास से नगर केन्द्रों पर जनसंख्या का भार घटता है। निवासियों को नियमित आवास भी प्राप्त होते हैं।
  2. सड़क परिवहन व्यवस्था में सुधार – नगरों की एक बड़ी समस्या सड़कों पर अतिक्रमण है। गैर-आवासीय या बाजार क्षेत्रों में यह समस्या विकट परिस्थितियाँ पैदा करती है। सड़कों पर चलती-फिरती दुकानों, ठेलों, वाहनों आदि का जमघट सड़कों को तंग बना देता है। इस समस्या के निवारण के लिए उपयुक्त उपाय अपनाने चाहिए। पार्किंग आदि की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए।
  3. पेयजल, जल-मल निकास-सफाई आदि की व्यवस्था – नगरों में पेयजल, बिजली, जल-मल निकास आदि की भारी समस्याएँ रहती हैं। इनके लिए उपयुक्त कदम उठाने चाहिए। नाली-नालों की सफाई, कूड़ा-करकट तथा मल निकास की उपयुक्त व्यवस्था आवश्यक है।
  4. मलिन बस्तियों की उचित व्यवस्था – निर्धन मजदूर, बेरोजगार, गाँवों से पलायन करने वाले लोग शहरों के महँगे मकान खरीदने या किराये पर लेने में असमर्थ होते हैं; अतः वे नगर के बाहर या सड़कों के किनारे झुग्गी-झोंपड़ी डालकर रहते हैं। ऐसी मलिन बस्तियों में बिजली, पानी, सड़कों, नालियों की कोई व्यवस्था नहीं होती। प्रायः यहाँ सामाजिक अपराध पनपते हैं। अत: इनका सुधार करना। आवश्यक है।
  5. आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई – नगरों में जनसंख्या बढ़ने पर दैनिक उपभोग की वस्तुओं; जैसे—दूध, अण्डे, सब्जी, फल आदि की कमी हो जाती है। अतः इनकी पर्याप्त उपलब्धता की व्यवस्था होनी चाहिए।
  6. प्रदूषण पर नियन्त्रण – नगरों में छोटे-बड़े अनेक उद्योग स्थापित हो जाते हैं जो पर्यावरण को दूषित करते हैं। अत: उद्योगों को नगर के बाहर विशिष्ट क्षेत्र में स्थानान्तरित करना चाहिए तथा कारखानों से होने वाले प्रदूषण पर भी नियन्त्रण करना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में कम साक्षरता के दो कारणों की विवेचना कीजिए। उत्तर भारत में कम साक्षरता के दो कारण निम्नलिखित हैं –
(1) जनसंख्या का निर्धन होना – देश की अधिकांश जनसंख्या निर्धनता और अभावों में जीवन बिताती रही है; फलतः उसके लिए अपने बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना एक कठिन कार्य रहा है। वहीं दूसरी ओर बच्चे के विद्यालय चले जाने से खेती या अन्य कार्य करने वाले एक श्रमिक की भी कमी हो जाती है। इसी कारण शिक्षा पर लोगों का ध्यान कम है।

(2) शिक्षा योजनाओं का असफल होना – भारत की अनेक शिक्षा योजनाएँ केवल इसलिए असफल हो जाती हैं कि जिनके लाभार्थ वे बनायी जाती हैं वे उनको समझ सकने की स्थिति में नहीं हैं। अथवा उन्हें इस बारे में कुछ भी नहीं समझाया जा सकता है।

प्रश्न 2
भारत में नगरीकरण से उत्पन्न किन्हीं चार समस्याओं की विवेचना कीजिए। [2007, 09, 14]
उत्तर
भारत में नगरीकरण से उत्पन्न चार समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. अवसंरचनात्मक सुविधाओं की कमी – बढ़ते हुए नगरीकरण से नगरों में मकानों तथा नगरीय सुविधाओं (परिवहन, जलापूर्ति, गन्दे जल, शौच, कूड़ा-करकट आदि का निस्तारण, विद्युत आपूर्ति आदि) की कमी हो जाती है। बड़े नगरों में मलिन बस्तियों की संख्या बहुत बढ़ जाती है।
  2. पर्यावरण प्रदूषण – नगरों में परिवहन के साधनों, उद्योगों आदि से पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है।
  3. पारम्परिक सामाजिक मूल्यों का हास – नगरीकरण के कारण व्यक्तिवादी दृष्टिकोण में वृद्धि होती है। इससे प्राचीन परम्परागत सामाजिक मूल्यों का ह्रास होता है। बड़ों के प्रति आदर, धर्म के प्रति श्रद्धा, तीर्थों की पवित्रता आदि मूल्य प्रभावहीन हो गये हैं। इनका स्थान भौतिकवाद तथा व्यक्तिवाद ने ले लिया है।
  4. सामाजिक अपराधों में वृद्धि – नगरों में आर्थिक विषमताएँ अधिक पायी जाती हैं। बेरोजगारी की भी भारी समस्या है। इस कारण लोगों में चोरी, डकैती, लूट-पाट आदि की प्रवृत्ति बढ़ी है। मलिन बस्तियाँ प्रायः ऐसे असामाजिक तत्वों के गढ़ होते हैं। ये सभी सामाजिक प्रदूषण के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 3
भारत की भाषाई जनसंख्या पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
भारत में 845 भाषाएँ बोली जाती हैं। इनमें 720 भाषाएँ ऐसी हैं जो (प्रत्येक) एक लाख से भी कम व्यक्तियों द्वारा प्रयोग में लायी जाती हैं। देश में 63 अभारतीय भाषाओं का प्रयोग होता है। सामान्यत: भारत में 91% जनता संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं का प्रयोग करती है। 4% व्यक्ति आदिवासी भाषाओं तथा 5% व्यक्तियों द्वारा अन्य भाषाएँ प्रयोग की जाती हैं।

प्रश्न 4
भारत के प्रमुख भाषाई संगठनों के नाम बताइए।
उत्तर
भारत में भाषाओं के भौगोलिक वितरण के दृष्टिकोण से देश में 12 भाषाई संघटन या प्रदेश मुख्य है-
(1) कश्मीरी, (2) पंजाबी, (3) हिन्दी, (4) बंगला, (5) असमिया, (6) उड़िया, (7) गुजराती, (8) मराठी, (9) कन्नड़, (10) तेलुगू, (11) तमिल तथा (12) मलयालम।
इन सभी संगठनों में हिन्दी भाषाई प्रदेश सबसे अधिक विस्तृत हैं जिसमें हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड तथा छत्तीसगढ़ सम्मिलित हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में सन 2011 की जनगणना के अनुसार साक्षरता दर कितनी है? [2011]
उत्तर
74.04%.

प्रश्न 2
भारत में लिंगानुपात के घटने के कोई दो कारण बताइए। [2011]
उत्तर

  1. भारत के अनेक प्रदेशों में महिला-शिशुओं की देखभाल कम होने अथवा प्रसूति अवस्था में मृत्यु-दर का अधिक होना है।
  2. पुत्र-प्राप्ति की चाहत में भ्रूणहत्या।

प्रश्न 3
भारत में नगरीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति के दो प्रमुख कारणों को बताइए। [2008, 09, 11, 12]
या
भारत में ग्रामीण जनसंख्या के नगरों की ओर बढ़ते उत्प्रवास के किन्हीं दो कारणों का वर्णन कीजिए। [2011]
उत्तर

  1. गाँवों में कृषि से पर्याप्त रोजगार प्राप्त न होना।
  2. औद्योगीकरण के कारण नगरों में रोजगार के अधिक अवसर प्राप्त होना।

प्रश्न 4
भारत में नगरीय जनसंख्या की वृद्धि के दो कारण बताइए। [2008, 09, 11, 13, 16]
उत्तर
भारत में नगरीय जनसंख्या की वृद्धि के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. ग्रामीण क्षेत्रों, रोजगार, सेवाओं एवं सुरक्षा आदि के कारण नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या का पलायन।
  2. नगरीय क्षेत्रों में रोजगार के कारण उत्पन्न श्रमिक जनसंख्या की माँग अधिक होने के कारण नगरों की ओर ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या के पलायन से नगरीय जनसंख्या में वृद्धि।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
2011 की जनणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर है –
(क) 74.04%
(ख) 70.85%
(ग) 75.85%
(घ) 80.0%
उत्तर
(क) 74.04%

प्रश्न 2
2011 की जनगणना के अनुसार महिला साक्षरता प्रतिशत है –
(क) 53.57
(ख) 41.82
(ग) 65.46
(घ) 59.70
उत्तर
(ग) 65.46

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 20 Population Structure and Urbanization

प्रश्न 3
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कितना लिंगानुपात है?
(क) 927
(ख) 931
(ग) 940
(घ) 935
उत्तर
(ग) 940

प्रश्न 4
भारत का न्यूनतम साक्षरता वाला राज्य है –
(क) झारखण्ड
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) बिहार,
(घ) राजस्थान वर
उत्तर
(ग) बिहार

प्रश्न 5
भारत का सर्वाधिक घनत्व वाला राज्य है – [2007]
या
निम्नलिखित में से किस राज्य में 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक है? [2014]
(क) तमिलनाडु
(ख) बिहार
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) महाराष्ट्र
उत्तर
(ख) बिहार

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 1 Geographical and Cultural Environment and Their Effect on Social Life

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 1 Geographical and Cultural Environment and Their Effect on Social Life (भौगोलिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 1 Geographical and Cultural Environment and Their Effect on Social Life (भौगोलिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 1
Chapter Name Sociology and Cultural Environment
and Their Effect on Social Life
(भौगोलिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का
सामाजिक जीवन पर प्रभाव)
Number of Questions Solved 46
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 1 Geographical and Cultural Environment and Their Effect on Social Life (भौगोलिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
पर्यावरण की परिभाषा दीजिए भौगोलिक पर्यावरण से मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए [2009, 10, 12, 16]
या
पर्यावरण क्या है? इसके दो प्रकार भी बताइए मानव-व्यवहारों पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए [2010, 13]
या
भौगोलिक पर्यावरण क्या है तथा इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है ? विवेचना कीजिए [2007, 08, 12]
या
भौगोलिक पर्यावरण क्या है ? यह सामाजिक जीवन को किस प्रकार से प्रभावित करता है ? [2007, 10]
या
सामाजिक जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभावों को व्यक्त कीजिए [2012, 14, 15, 16]
या
मनुष्य के जीवन में पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए [2013, 15]
या
सम्पूर्ण पर्यावरण की अवधारणा स्पष्ट कीजिए [2011]
या
पर्यावरण को परिभाषित कीजिए [2017] 
या
प्राकृतिक पर्यावरण एवं मानव समाज में सम्बन्ध बताइए [2017]
या
पर्यावरण से आप क्या अर्थ लगाते हैं ? भौगोलिक पर्यावरण के अप्रत्यक्ष प्रभावों का उल्लेख कीजिए [2009]
या
पर्यावरण क्या है? भौगोलिक पर्यावरण का मनुष्य के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2016]
या
भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों का उल्लेख कीजिए [2016, 17]
उत्तर :

पर्यावरण का अर्थ

पर्यावरण ‘परि + आवरण’ दो शब्दों के मेल से बना है ‘परि’ का अर्थ है ‘चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ है ‘घेरा इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा जीव के चारों ओर जो प्राकृतिक और सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं उनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है पर्यावरण का क्षेत्र अत्यन्त विशद् है पर्यावरण उन समस्त शक्तियों, वस्तुओं और दशाओं का योग है जो मानव को चारों ओर से आवृत्त किये हुए हैं मानव से लेकर वनस्पति तथा सूक्ष्म जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं पर्यावरण उन सभी बाह्य दशाओं एवं प्रभावों का योग है जो जीव के कार्यों एवं प्रगति पर अपना गहरा प्रभाव डालता है पर्यावरण को मानव-जीवन से पृथक् करना उतना ही असम्भव है जैसे शरीर से आत्मा को मैकाइवर एवं पेज ने तो कहा भी है कि “जीवन और परिस्थिति आपस में सम्बन्ध रखती हैं वास्तव में, जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, परम्पराओं, धर्म और संस्कृति को समग्र रूप में पर्यावरण ही कहा जा सकता है

पर्यावरण की परिभाषा

पर्यावरण का ठीक-ठीक अर्थ समझने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं को अनुशीलन करना होगा विभिन्न विद्वानों ने पर्यावरण को निम्नवत् परिभाषित किया है
ई० ए० रॉस के अनुसार, “पर्यावरण हमें प्रभावित करने वाली कोई भी बाहरी शक्ति है’
जिसबर्ट के अनुसार, “पर्यावरण वह सब कुछ है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है”
टी० डी० इलियट के अनुसार, चेतन पदार्थ की इकाई के प्रभावकारी उद्दीपन और अन्त:क्रिया के क्षेत्र को पर्यावरण कहते हैं”
हर्सकोविट्स ने पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “यह सभी बाह्य दशाओं और प्रभावों का योग है जो जीवों के कार्यों एवं विकास को प्रभावित करता है”

पर्यावरण का वर्गीकरण
अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से स्थूल रूप में पर्यावरण को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है
1. प्राकृतिक पर्यावरण – इस पर्यावरण के अन्तर्गत सभी प्राकृतिक और भौगोलिक शक्तियों का समावेश होता है पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, वनस्पति और जीव-जन्तु प्राकृतिक पर्यावरण के अंग हैं प्राकृतिक पर्यावरण का प्रभाव मानव-जीवन पर सर्वाधिक पड़ता है

2. सामाजिक पर्यावरण – 
सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा सामाजिक पर्यावरण कहलाता है इसे सामाजिक सम्बन्धों को पर्यावरण भी कहा जा सकता है परिवार, पड़ोस, सम्बन्धी, खेल के साथी और विद्यालय सामाजिक पर्यावरण के अंग हैं

3. सांस्कृतिक पर्यावरण – 
मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप का परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है सांस्कृतिक पर्यावरण भौतिक और अभौतिक दो प्रकार का होता – है—आवास, विद्यालय, टेलीविजन, कुर्सी, मशीनें, भौतिक पर्यावरण तथा धर्म, संस्कृति, भाषा, लिपि, रूढ़ियाँ, कानून और प्रथा अभौतिक पर्यावरण हैं

उपर्युक्त तीनों पर्यावरणों को समग्र रूप में सम्पूर्ण पर्यावरण (Total Environment) कहा जाता है मनुष्य पर सम्पूर्ण पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है

भौगोलिक (प्राकृतिक) पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषा

भौगोलिक पर्यावरण या प्राकृतिक पर्यावरण प्रकृति द्वारा निर्मित पर्यावरण है मनुष्य पर जिन प्राकृतिक शक्तियों को चारों ओर से प्रभाव पड़ता है, उसे भौगोलिक पर्यावरण कहा जाता है ये सभी शक्तियाँ स्वतन्त्र रहकर मानव को प्रभावित करती हैं पर्वत, सरिता, वन, पवन, आकाश, पृथ्वी तथा जीव-जगत् सभी भौगोलिक पर्यावरण के अंग हैं प्रमुख विद्वानों ने इसे निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन दशाओं से मिलकर बनता है जो प्रकृति मनुष्य को प्रदान करती है इसे पर्यावरण में इन्होंने पृथ्वी का धरातल एवं उसकी सभी प्राकृतिक दशाओं, प्राकृतिक साधनों, भूमि और पानी, पर्वतों व मैदानों, खनिज पदार्थों, पौधों, पशुओं, जलवायु की शक्ति, गुरुत्वाकर्षण, विद्युत एवं विकिरण शक्तियाँ, जो पृथ्वी पर क्रियाशील हैं, को सम्मिलित किया है इन सबका मानव-जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है

सोरोकिन के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण को सम्बन्ध ऐसी भौगोलिक दशाओं से है जिनका अस्तित्व मानवीय क्रियाओं से स्वतन्त्र है और जो मानव के अस्तित्व तथा कार्यों की छाप पड़े बगैर अपनी प्रकृति के अनुसार बदलती हैं इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य द्वारा सभी अनियन्त्रित शक्तियों को भौगोलिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जा सकता है

डॉ० डेविस के अनुसार, “मनुष्य के सम्बन्ध में भौगोलिक पर्यावरण से अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनमें वह रहता है, जिनका उसकी आदतों और क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है”

भौगोलिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर प्रभाव

भौगोलिक पर्यावरण बहुत अधिक प्रभावी और शक्तिमान होता है जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य इसके प्रभाव में रहता है मनुष्य का रंग, रूप, आकार, स्वभाव से लेकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवेश सब कुछ भौगोलिक पर्यावरण की ही देन हैं भौगोलिक पर्यावरण के मानव-जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ते हैं

भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभाव
भौगोलिक पर्यावरण से मानव के जीवन पर निम्नलिखित प्रत्यक्ष प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं

1. जनसंख्या पर प्रभाव – किसी देश की जनसंख्या कितनी होगी, यह वहाँ की अनुकूल या भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है यदि भौगोलिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल होंगी, अर्थात् भूमि कम उपजाऊ है, रेगिस्तान, बंजर, पर्वत इत्यादि अधिक हैं तो वहाँ जनसंख्या कम होगी इसके विपरीत, यदि भूमि समतल है, उपजाऊ है और सिंचाई के अच्छे साधन हैं तो जनसंख्या अधिक होगी इस प्रकार भौगोलिक परिस्थितियाँ जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करती हैं गंगा, सतलुज और ब्रह्मपुत्र के मैदान में अनुकूल पर्यावरण होने के कारण ही जनसंख्या सघन है, जब कि थार का मरुस्थल कठोर पर्यावरणीय दशाओं के कारण विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र है

आलोचनात्मक मूल्यांकन – यह सत्य है कि भौगोलिक पर्यावरण का ‘मानव जनसंख्या पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, किन्तु अन्य कारकों को भी जनसंख्या एवं जनसंख्या के घनत्व पर प्रभाव पड़ता है उदाहरणार्थ-अनेक स्थान ऐसे हैं जहाँ भौगोलिक पर्यावरण में कोई अन्तर न होने पर भी वहाँ की जनसंख्या में निरन्तर अत्यधिक वृद्धि हो रही है; जैसे–1901ई० से लेकर अब तक दिल्ली, कोलकाता आदि की जनसंख्या में कई गुना वृद्धि हो गयी है, जब कि वहाँ की भौगोलिक दशाओं में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ

2. आवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है उदाहरणार्थ-पर्वतीय क्षेत्रों में पत्थरों और लकड़ियों का प्रयोग मकानों में अधिक होता है इनकी छतें ढलावदार होती हैं, जिससे वर्षा का पानी न रुके इसके विपरीत, मैदानी इलाकों में ईंटों या मिट्टी इत्यादि का अधिक प्रयोग होता है जापान में भूचाल से बचने के लिए लकड़ी के मकान बनाये जाते हैं न्यूयॉर्क में कठोर धरातल होने के कारण गगनचुम्बी भवन बनाये जाते हैं इस प्रकार मकानों की बनावट तथा इसमें प्रयुक्त सामग्री भौगोलिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होती है

आलोचनात्मक मूल्यांकन – इसमें सन्देह नहीं कि भौगोलिक पर्यावरण ‘मानव निवास’ की सम्पूर्ण व्यवस्था में सहायता करता है, परन्तु उस पर अन्य कारकों का भी प्रभाव रहता है उदाहरणार्थ-महल और झोंपड़ी एक ही भौगोलिक पर्यावरण में सामाजिक पर्यावरण की दुहाई देते रहते हैं

3. वेश-भूषा पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का लोगों की वेश-भूषा पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है गर्म जलवायु वाले देशों में लोग बारीक व ढीले वस्त्र पहनते हैं, जब कि ठण्डे देशों में गर्म व चुस्त कपड़ों का अधिक इस्तेमाल होता है अनेक ठण्डे प्रदेशों में जानवरों की खाल से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते हैं टुण्ड्रा प्रदेश में लोग समूरधारी पशुओं की खाल के वस्त्र पहनते हैं

आलोचनात्मक मूल्यांकन – यह सत्य है कि ‘वस्त्रों’ पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, तथापि मानव वस्त्र केवल भौगोलिक पर्यावरण पर ही आधारित नहीं होते, इस पर संस्कृति (Culture) का भी विशेष प्रभाव पड़ता है उदाहरणार्थ-गरीबों और अमीरों की वेश-भूषा भी अलग-अलग होती है, जब कि वे एक ही भौगोलिक पर्यावरण में निवास करते हैं

4. खान-पान पर प्रभाव – भोजन की सामग्री भी भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होती है जिस क्षेत्र में जो खाद्य पदार्थ अधिक होते हैं उनको प्रचलने वहीं पर अधिक होता है बंगाल व चेन्नई में चावल अधिक खाये जाते हैं, जब कि उत्तर भारत में गेहूं का अधिक प्रयोग होता है ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति मांसाहारी अधिक होते हैं, जब कि गर्म क्षेत्रों में रहने वाले शाकाहारी अधिक होते हैं यदि आसपास कोई नदी आदि है तो मछली इत्यादि का प्रयोग अधिक होता है पंजाब के निवासी दाल-रोटी खाते हैं, जब कि बंगाली चावल और मछली का भोजन करते हैं

आलोचनात्मक मूल्यांकन – भौगोलिक पर्यावरण तथा खान-पान में इतना सम्बन्ध होते हुए भी भौगोलिक निर्धारणवाद का सिद्धान्त ठीक नहीं उतरता वास्तव में, मानव-जीवन का सम्बन्ध संस्कृति और आर्थिक स्थिति से अधिक होता है, पर्यावरण से कम एक ही स्थान पर रहने वाले कुछ व्यक्ति शाकाहारी भी होते हैं और मांसाहारी भी इस प्रकार एक ही क्षेत्र में रहने वाले निर्धन और धनवान का भोजन भी एक-दूसरे से अलग होता है

5. पशु-जीवन पर प्रभाव – पशुओं को भी एक विशेष पर्यावरण की आवश्यकता होती है, क्योंकि इनमें मनुष्य की तरह अनुकूलन की शक्ति नहीं होती; जैसे–शेर के लिए जंगल में तथा ऊँट के लिए रेगिस्तान में भौगोलिक परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं और ये यहीं अधिक प्रसन्न रहते हैं इसी प्रकार मछली भी समुद्र में ही प्रसन्न रहती है

आलोचनात्मक मूल्यांकन – यह सत्य है कि पशुओं को प्राकृतिक पर्यावरण की ही आवश्यकता होती है और वे इसमें ही प्रसन्न रहते हैं, परन्तु आजकल बड़े-बड़े चिड़ियाघरों में कृत्रिम पर्यावरण उत्पन्न करके देश-विदेश के विभिन्न पशु-पक्षियों को रखा जाता है

भौगोलिक पर्यावरण के अप्रत्यक्ष प्रभाव
भौगोलिक पर्यावरण अप्रत्यक्ष रूप से भी मानव की सामाजिक दशाओं को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करता है

1. सामाजिक संगठन पर प्रभाव-भौगोलिक पर्यावरण अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है लीप्ले का कथन है कि “ऐसे पहाड़ी व पठारी देशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है, वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और ऐसी विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या में वृद्धि न हो जौनसार बाबर में खस जनजाति में सभी भाइयों की एक ही पत्नी होती है इससे जनसंख्या-वृद्धि रुक जाती है विवाह की आयु, परिवार का आकार तथा प्रकार भी अप्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं मानसूनी प्रदेश घनी जनसंख्या के अभिशाप से ग्रसित हैं

आलोचना – परन्तु यह सदैव ठीक नहीं है और अनेक एकसमान क्षेत्रों में परिवार व विवाह की भिन्न-भिन्न प्रथाएँ देखी गयी हैं

2. आर्थिक संरचना पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण उद्योगों के विकास की गति निर्धारित करता है यदि खनिज पदार्थों की प्रचुरता है तो आर्थिक विकास अधिक होगा और लोगों का जीवन-स्तर उच्च होगा यदि प्राकृतिक साधनों की कमी है तो आर्थिक विकास प्रभावित होगा और लोगों का रहन-सहन व जीवन-स्तर अपेक्षाकृत निम्न कोटि का होगा व्यावसायिक संरचना भी इससे प्रभावित होती है इस प्रकार भौगोलिक पर्यावरण आर्थिक संरचना को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है भूमध्यरेखीय प्रदेश में कच्चे मालों की प्रचुरता होते हुए भी तकनीक एवं विज्ञान का विकास न हो पाने के कारण उद्योग-धन्धों की स्थापना नहीं हो पायी है

आलोचना – आर्थिक संरचना पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव के विपक्ष में समीक्षकों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि एकसमान जलवायु में समान उद्योग-धन्धों का विकास नहीं हो पाता है

3. राजनीतिक संगठन पर प्रभाव – राज्य तथा राजनीतिक संस्थाएँ भी भौगोलिक परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होती हैं प्रतिकूल पर्यावरण में लोगों का जीवन घुमन्तू होता है और स्थायी संगठनों का विकास नहीं हो पाता अनुकूल पर्यावरण आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करता है, राजनीति को स्थायी रूप प्रदान करता है और समानता पर आधारित प्रजातन्त्र या साम्यवाद जैसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ विकसित होती हैं अत्यधिक आर्थिक समानता कुलीनतन्त्र का विकास करती है इस प्रकार सरकार के स्वरूप तथा राज्य के संगठन पर भी भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव देखा गया है

आलोचना – इस प्रभाव की भी आलोचना इस आधार पर की गयी है कि एकसमान भौगोलिक परिस्थितियों वाले देशों में एकसमान राजनीतिक संगठन व सरकारें नहीं हैं एक ही देश में समयसमय पर होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल और सरकारों के स्वरूप में होने वाले हेर-फेर भी इसके प्रतीक हैं कि राजनीतिक संस्थाएँ भौगोलिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित नहीं होतीं

4. धार्मिक जीवन पर प्रभाव – धर्म प्रत्येक समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग है भौगोलिक निश्चयवादी इस बात पर बल देते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण अथवा प्राकृतिक शक्तियाँ धर्म के विकास को प्रभावित करती हैं मैक्समूलर ने धर्म की उत्पत्ति का सिद्धान्त ही प्राकृतिक शक्तियों के भय से उनकी पूजा करने के रूप में प्रतिपादित किया है जिन देशों में प्राकृतिक प्रकोप अधिक हैं, वहाँ पर धर्म का विकास तथा धर्म पर आस्था रखने वाले लोगों की संख्या अधिक होती है एशिया की मानसूनी जलवायु के कारण ही यहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं कृषिप्रधान देशों में इन्द्र की पूजा होना सामान्य बात है वृक्ष, गंगा और गाय भारतीयों के लिए उपयोगी हैं अतः ये सब पूजनीय हैं

आलोचना – भौगोलिकवादियों के इस तर्क को कि “प्राकृतिक शक्तियाँ ही धर्म के विकास को निर्धारित करती हैं स्वीकार नहीं किया जा सकता एकसमान भौगोलिक परिस्थितियों अथवा प्राकृतिक शक्तियों वाले देशों में धर्म का विकास एकसमान रूप से नहीं हुआ है समाज-विशेष की सामाजिक आवश्यकताओं तथा सामाजिक मूल्यों से धर्म अधिक प्रभावित होता है

5. साहित्य पर प्रभाव – साहित्य पर भी भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है भौगोलिक पर्यावरण जितना सुन्दर व अनुकूल होता है उतनी ही सृजनता अधिक होती है और साहित्य भी उतना ही सजीव और सुन्दर बन जाता है भारत में साहित्य के विकास को भौगोलिक व प्राकृतिक शक्तियों से पृथक् करके नहीं समझा जा सकता है यूनान ने सुकरात जैसे दार्शनिक और साहित्यकार दिये, यह सब वहाँ के भौगोलिक पर्यावरण की ही देन थी

आलोचना – यद्यपि साहित्य कुछ सीमा तक अप्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होता है, तथापि समान परिस्थितियों वाले समाजों में साहित्य का विकास समान नहीं हुआ है साहित्य के विकास में समाज की सामाजिक-आर्थिक दशाओं का गहरा प्रभाव पड़ता है

6. कला पर प्रभाव – साहित्य के साथ वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य तथा नाटकों पर भी भौगोलिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है सुन्दर प्राकृतिक पर्यावरण में चित्रकारी और कृत्रिम पर्यावरण में होने वाली चित्रकारी का केन्द्रबिन्दु अलग-अलग होता है चित्रकार, संगीतकार, नर्तक इत्यादि प्राकृतिक पर्यावरण से अलग होकर अपनी कलाओं का विकास नहीं कर सकते हैं यूनान और रोम में ललित कलाओं का विकास वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही हुआ था

आलोचना – आज कला का विकास भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित नहीं है, क्योंकि यातायात व संचार साधनों के विकास से इसमें अन्तर्राष्ट्रीय आयाम जुड़ गया है तथा यह किसी एक देश की सम्पत्ति नहीं रहा है साथ ही इसके विकास में समाज की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि मानव का सामाजिक जीवन पूरी तरह भौगोलिक पर्यावरण पर टिका है भौगोलिक पर्यावरण उसके सामाजिक जीवन को पग-पग पर दिग्दर्शन करता है

प्रश्न 2
सांस्कृतिक पर्यावरण से क्या तात्पर्य है ? सांस्कृतिक पर्यावरण के समाज पर प्रभावों को बताइए [2013, 15]
या
सांस्कृतिक पर्यावरण क्या है? इसके भिन्न-भिन्न प्रभावों का उल्लेख कीजिए [2013]
या
सांस्कृतिक पर्यावरण की परिभाषा दीजिए यह सामाजिक जीवन को किस प्रकार से प्रभावित करता है? [2015]
उत्तर :

सांस्कृतिक पर्यावरण का अर्थ और परिभाषा

पर्यावरण के निर्माण में प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य का भी हाथ रहता है मनुष्य द्वारा निर्मित पर्यावरण सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है सांस्कृतिक पर्यावरण के स्वरूप को सँभालने में प्रत्येक आगामी पीढ़ी का योगदान रहता है इस प्रकार भौतिक और अभौतिक रूप में पीढ़ी को अपने पूर्वजों से जो प्राप्त होता है उसे ही सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है भवन, विद्यालय, बाँध, शक्तिगृह, जलयान, रेलगाड़ी, मेज, पेन व चश्मा सभी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं इन्हें भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत रखा जाता है रीति-रिवाज, धर्म, आचरण, भाषा, लिपि व साहित्य भी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं इन्हें अभौतिक संस्कृति कहा जाता है विभिन्न विद्वानों ने सांस्कृतिक पर्यावरण को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है

हर्सकोविट्स के अनुसार, “सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मानव ने किया है”

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “सम्पूर्ण सामाजिक विरासत सांस्कृतिक पर्यावरण है’ उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि भूमण्डल की समस्त भौतिक और अभौतिक सांस्कृतिक धरोहर सांस्कृतिक पर्यावरण है हर्सकोविट्स का मानना है कि सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण मानव द्वारा होता है प्राकृतिक पर्यावरण से मानव जिस कृति को निर्माण करती है, इन्हीं कृतियों के सम्पूर्ण योग को सांस्कृतिक पर्यावरण कही जाता है सम्पूर्ण भौतिक, अभौतिक सांस्कृतिक विरासत को सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है सांस्कृतिक पर्यावरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता है प्रत्येक काल में इसमें सुधार होता है और इसकी अभिवृद्धि होती है सांस्कृतिक पर्यावरण को इस प्रकार भी समझा जा सकता है यदि सम्पूर्ण पर्यावरण में से भौगोलिक पर्यावरण को घटा दें तो जो कुछ बचता है उसे सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है प्राकृतिक पर्यावरण की तरह सांस्कृतिक पर्यावरण भी मानव के सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग होता है

सांस्कृतिक पर्यावरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव

संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार है यह मानव के सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है संस्कृति से सांस्कृतिक पर्यावरण जन्म लेता है सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत सांस्कृतिक पर्यावरण के रूप में सामाजिक मानव का प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन करती है यह पग-पग पर मानव-व्यवहार को नियन्त्रित कर उसे सुखी और सम्पन्न जीवनयापन का मार्ग दिखाती है सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत मनुष्य को पशुवत् व्यवहार करने से रोककर समाज में सद्गुणों का समावेश करती है सांस्कृतिक पर्यावरण के समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता है–

1. सामाजिक संगठन पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है, क्योंकि संस्कृति के अनुरूप ही सामाजिक संगठन, सामाजिक संरचना तथा सामाजिक संस्थाओं का विकास होता है उदाहरण के लिए, किसी समाज में परिवार तथा विवाह का क्या रूप होगा, यह वहाँ के सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों पर निर्भर करता है व्यक्ति की सामाजिक स्थिति, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, उत्तर :ाधिकार के नियम, विवाह-विच्छेद के नियम इत्यादि सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रभावित होते हैं इसीलिए विभिन्न संस्कृतियों में पनपने वाले सामाजिक संगठन भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं सांस्कृतिक पर्यावरण की परिवर्तनशील प्रकृति होने पर सामाजिक संगठन में भी तेजी से परिवर्तन आता है

2. आर्थिक जीवन पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तियों के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में सहायता देने वाले हैं तो वहाँ व्यक्तियों का आर्थिक जीवन अधिक उन्नत होगा। मैक्स वेबर (Max Weber) ने हमें बताया है कि प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों की धार्मिक मान्यताएँ पूँजीवादी प्रवृत्ति के विकास में सहायक हुई हैं। इसीलिए प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों के बहुमत वाले देशों में पूँजीवाद अधिक है। यदि सांस्कृतिक मूल्ये आर्थिक विकास में बाधक हैं तो व्यक्तियों के आर्थिक जीवन पर इनका कुप्रभाव पड़ता है तथा वे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं।

3. प्रौद्योगिकीय विकास पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण आर्थिक जीवन को प्रभावित करने के साथ-साथ प्रौद्योगिकीय विकास की गति को भी निर्धारित करता है। भौतिकवादी संस्कृति भौतिक उपलब्धियों तथा भोग-विलास पर अधिक बल देती है तथा वैज्ञानिक आविष्कारों को तीव्र गति प्रदान करती है। आध्यात्मिकता पर बल देने वाली संस्कृति में रचनात्मक व आध्यात्मिक सुख के साधनों के विकास पर अधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार प्रौद्योगिकीय विकास व आविष्कार भी सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होते हैं।

4. राजनीतिक संगठन पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण का राजनीतिक संगठन तथा राजनीतिक संस्थाओं पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी देश में सरकार का स्वरूप क्या होगा, सभी व्यक्तियों को समान रूप से वयस्क मताधिकार मिलेगा या नहीं, सभी को राजनीतिक क्रियाओं में भाग लेने की स्वतन्त्रता होगी या नहीं इत्यादि सभी बातों पर सांस्कृतिक मूल्यों का गहरा प्रभाव पड़ता है। राज्य द्वारा सभी नागरिकों की रक्षा या विशेष वर्ग की रक्षा करना अथवा राज्य द्वारा बनाये जाने वाले कानूनों व अधिनियमों पर भी सांस्कृतिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। इसी कारण विभिन्न संस्कृतियों वाले समाजों में राजनीतिक संगठन की दृष्टि से अन्तर पाये जाते हैं।

5. धार्मिक व्यवस्था पर प्रभाव – व्यक्तियों का धार्मिक जीवन भी सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा प्रभावित होता है। धार्मिक संस्थाओं व संगठनों का रूप संस्कृति द्वारा निर्धारित होता है; उदाहरणार्थ-भारतीय संस्कृति ने धर्म के विकास में सहायता दी है और इसी कारण आज सभी प्रमुख धर्मों के लोग भारत में विद्यमान हैं। आज भी भारतीय अलौकिक शक्तियों में विश्वास करते हैं, जब कि पश्चिमी देशों में लौकिकीकरण तेजी से हुआ है और धर्म का प्रभाव भौतिकवादी संस्कृति के कारण दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। सांस्कृतिक पर्यावरण में परिवर्तन आने पर ही धर्म का स्वरूप भी बदल जाता है। भारतीय संस्कृति के कारण ही धर्म जीवन पद्धति का अंग बना हुआ है। यहाँ सामाजिक जीवन में अध्यात्मवाद विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है।

6. समाजीकरण की प्रक्रिया पर प्रभाव – सांस्कृतिक पर्यावरण समाजीकरण की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। बच्चा जन्म के समय तो केवल एक जीवित पुतला होता है जिसे सामाजिक गुण वहाँ की संस्कृति के अनुरूप प्राप्त होते हैं। सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप वह बोलना, खाना-पीना, वस्त्र पहनना तथा प्रथाओं व रीति-रिवाजों को सीखता है। भारतीय समाज में समाजीकरण की प्रक्रिया भारतीय संस्कृति से प्रभावित है, जब कि पश्चिमी देशों में समाजीकरण की प्रक्रिया वहाँ की संस्कृति के अनुरूप है। अतः व्यक्ति में विकसित होने वाले सामाजिक गुण उसके सांस्कृतिक पर्यावरण की उपज होते हैं।

7. व्यक्तित्व के निर्माण पर प्रभाव – संस्कृति का व्यक्तित्व से गहरा सम्बन्ध है। व्यक्ति को व्यक्तित्व किस प्रकार से निर्मित होगा, यह वहाँ की संस्कृति पर निर्भर करता है। समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से ही व्यक्ति उन बातों को ग्रहण करता है जो वहाँ की संस्कृति के अनुरूप होती हैं। अहिंसा, त्याग, सम्मान, नैतिकता, स्वतन्त्रता आदि मूल्यों का अधिग्रहण व्यक्ति संस्कृति द्वारा ही करता है। अनेक अध्ययनों से हमें पता चला है कि संस्कृति के अनुरूप ही व्यक्तित्व का विकास होता है। उपर्युक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि सांस्कृतिक पर्यावरण का व्यक्ति के सामाजिक जीवन तथा अन्य सभी पक्षों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। समाज का सम्पूर्ण ढाँचा सांस्कृतिक पर्यावरण के अनुरूप ही बनता है। सांस्कृतिक पर्यावरण वह महत्त्वपूर्ण शक्ति है जो मानव-जीवन को समग्र रूप से प्रभावित और परिवर्तित करती है। यद्यपि सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य द्वारा ही होता है फिर भी वह उससे पूरी तरह प्रभावित होता है। एक व्यक्ति जिस सांस्कृतिक पर्यावरण में रहता है उसमें वैसी ही संस्कृति का उविकास होता है। वहाँ के सांस्कृतिक मूल्य उसके व्यवहार में पूरी तरह रच-बस जाते हैं। मानवीय जीवन की दशाएँ और सामाजिक जीवन के प्रतिमान सांस्कृतिक पर्यावरण द्वारा ही निर्धारित होते हैं

प्रश्न 3
आधुनिकीकरण के भारतीय समाज एवं संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए। [2007, 09, 13]
उत्तर :
भारतीय समाज आज आधुनिकीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय समाज एवं संस्कृति पर आधुनिकीकरण के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले प्रमुख परिवर्तनों को निम्नलिखित क्षेत्रों में देखा जा सकता है|

1. प्रौद्योगिक विकास – भारत में आधुनिकीकरण का सर्वप्रमुख परिणाम प्रौद्योगिक विकास के रूप में देखने को मिलता है। आज भारत में सूती कपड़ों, रासायनिक खादों, सीमेण्ट, जूट, भारी मशीनों, दवाइयों, कारों आदि के उत्पादन के बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हो चुके हैं। प्रौद्योगिक विकास के साथ विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में इतनी वृद्धि हुई कि हमारे समाज में अनेक संरचनात्मक परिवर्तन होने लगे।

2. जीवन-स्तर में सुधार – भारत में भूमि-सुधारों तथा विभिन्न विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप जीवन के सभी पक्षों में आधुनिकीकरण को प्रोत्साहन मिला। कुछ समय पहले तक समाज के जो दुर्बल वर्ग जीवन की अनिवार्य सुविधाएँ पाने से भी वंचित थे, उनमें भी चीनी और स्टील के बर्तनों का उपयोग देखने को मिलता है। जीवन-स्तर में होने वाला यह सुधार उन मनोवृत्तियों का परिणाम है, जो आधुनिकता की उपज हैं।

3; कृषि का आधुनिकीकरण – आधुनिकता का स्पष्ट प्रभाव ग्रामीण समाज पर देखने को मिलता है, जहाँ कृषि की नयी प्रविधियों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। अब अधिकांश ग्रामीण ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, पम्पिंग सैटों, श्रेसर तथा स्प्रेयर आदि का प्रयोग करके कृषि उत्पादन को बढ़ाने में लगे हैं। कृषि के आधुनिकीकरण से गाँव और नगर के लोगों की दूरी कम हुई तथा ग्रामीणों का विस्तृत जगत से सम्पर्क बढ़ने लगा।

4. समाज-सुधार को प्रोत्साहन – आधुनिकीकरण का सामाजिक संरचना पर सबसे स्पष्ट प्रभाव समाज-सुधार की प्रक्रिया के रूप में देखने को मिलता है। आधुनिकीकरण से उत्पन्न होने वाली मनोवृत्तियों के परिणामस्वरूप उन अन्धविश्वासों और कुरीतियों का प्रभाव तेजी से कम होने लगा जो सैकड़ों वर्षों से भारतीय सामाजिक जीवन को विघटित कर रही थीं। अस्पृश्यता, पर्दा प्रथा, बहुपत्नी विवाह तथा दहेज-प्रथा जैसी सामाजिक कमजोरियाँ क्षीण होती जा रही हैं।

5. शिक्षा का प्रसार – आधुनिकीकरण का एक अन्य प्रभाव शिक्षा के प्रति लोगों की मनोवृत्तियों में व्यापक परिवर्तन होना है। आज अधिकांश माता-पिता आर्थिक तंगी के बाद भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के पक्षधर हैं। इसी के फलस्वरूप शिक्षित लोगों के प्रतिशत तथा शिक्षा के स्तर में व्यापक सुधार हो सका।

6. सामाजिक मूल्यों एवं मनोवृत्तियों में परिवर्तन – आधुनिकीकरण के प्रभाव से भारत के परम्परागत मूल्यों में परिवर्तन होने के साथ ही विभिन्न वर्गों की मनोवृत्तियों में भी व्यापक परिवर्तन हुए। अब अधिकांश लोग भाग्य की अपेक्षा व्यक्तिगत योग्यता और परिश्रम को अधिक महत्त्व देने लगे हैं। जातिगत विभेदों की जगह समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों के प्रभाव में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 4
संस्कृति की परिभाषा दीजिए। भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2016]
या
भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में अन्तर बताइए। [2014]
या
भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में चार अन्तर लिखिए। [2013]
उत्तर :
संस्कृति का अर्थ मनुष्य ने आदिकाल से प्राकृतिक बाधाओं को दूर करने के लिए व अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक समाधानों की खोज की है। इन खोजे गए उपायों को मनुष्य ने आगे आने वाली पीढ़ी को ही हस्तान्तरित किया। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान और कला का और अधिक विकास किया है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों के ज्ञान को संचित किया है। और इसे ज्ञान के आधार पर नवीन ज्ञान और अनुभव का भी अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अन्तर्गत यन्त्र, प्रविधियाँ, प्रथाएँ, विचार और मूल्य आदि आते हैं। ये मूर्त और अमूर्त वस्तुएँ संयुक्त रूप से संस्कृति’ कहलाती है। इस प्रकार, वर्तमान पीढ़ी ने अपने पूर्वजों तथा स्वयं के प्रयासों से जो अनुभव व व्यवहार सीखी है, वही संस्कृति है।

संस्कृति की परिभाषा

प्रमुख विद्वानों ने संस्कृति को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है।
1. हॉबल के अनुसार “संस्कृति सम्बन्धित सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का सम्पूर्ण योग है जो कि एक समाज के सदस्यों की विशेषताओं को बतलाता है और जो इसलिए प्राणिशास्त्रीय विरासत का परिणाम नहीं होता।”
2. ई०एस० बोगार्डस के अनुसार “संस्कृति किसी समूह के कार्य करने में सोचने की समस्त विधियाँ हैं।”
3. मैकाइवर तथा पेज के अनुसार “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनन्द में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों में हमारी प्रकृति . की अभिव्यक्ति है।”
4. हर्सकोविट्स के अनुसार ‘‘संस्कृति पर्यावरण का मानव निर्मित भाग है।”
5. मैलिनोव्स्की के अनुसार ‘संस्कृति प्राप्त आवश्यकताओं की एक व्यवस्था और उद्देश्यात्मक क्रियाओं को संगठित व्यवस्था है।”
6. बीरस्टीड के अनुसार “संस्कृति वह सम्पूर्ण जटिलता है, जिसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज का सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि संस्कृति में दैनिक जीवन में पायी जाने वाली समस्त वस्तुएँ आती हैं। मनुष्य भौतिक, मानसिक तथा प्राणिशास्त्रीय रूप में जो कुछ पर्यावरण से सीखता है, उसी को संस्कृति कहा जाता है।

संस्कृति के प्रकार

टायलर के अनुसार संस्कृति एक जटिल समग्रता है, जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा ऐसी ही अन्य किसी भी योग्यता और आदत का समावेश रहता है, जिन्हें मनुष्य समाज का सदस्य होने के नाते अर्जित करता है। ऑगबर्न ने संस्कृति को दो भागों में विभाजित किया है।

(क) भौतिक संस्कृति मनुष्यों ने अपनी आवश्यकताओं के कारण अनेक आविष्कारों को जन्म दिया है। ये आविष्कार हमारी संस्कृति के भौतिक तत्त्व माने जाते हैं। इस प्रकार भौतिक संस्कृति उन आविष्कारों का नाम है जिनको मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के कारण जन्म दिया है। यह भौतिक संस्कृति मानव जीवन है। बाह्य रूप से सम्बन्धित है भौतिक संस्कृति को ही सभ्यता कहा जाता है। मोटर, रेलगाड़ी, हवाईजहाज, मेज-कुर्सी, बिजली का पंखा आदि सभी भतिक तत्त्व; भौतिक संस्कृति अथवा सभ्यता के ही प्रतीक हैं। संस्कृति के भौतिक पक्ष को मैथ्यू आरनोल्ड, अल्फ्रेड वेबर तथा मैकाइवर और पेज ने सभ्यता कहा है। भौतिक संस्कृति अथवा सभ्यता को परिभाषित करते हुए मैकाइवर तथा पेज ने लिखा है कि “मनुष्य ने अपने जीवन की दशाओं पर नियन्त्रण करने के प्रयत्न में जिस सम्पूर्ण कला विन्यास की रचना की है, उसे सभ्यता कहते हैं।” क्लाइव बेल के अनुसार-“सभ्यता मूल्यों के ज्ञान के आधार पर स्वीकृत किया गया तर्क और तर्क के आधार पर कठोर एवं भेदनशील बनाया गया मूल्यों का ज्ञान है।”

(ख) अभौतिक संस्कृति मानव जीवन को संगठित करने के लिए मनुष्य ने अनेक रीतिरिवाजों, प्रथाओं, रूढ़ियों आदि को जन्म दिया है। ये सभी तत्त्व मनुष्य की अभौतिक संस्कृति के रूप हैं। ये तत्त्व अमूर्त तत्त्वों का योग है, जो नियमों, उपनियमों, रूढ़ियों, रीति-रिवाजों आदि के रूप में मानव व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं। इस प्रकार संस्कृति के अन्तर्गत वे सभी चीजें सम्मिलित की जा सकती हैं, जो व्यक्ति की आन्तरिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। दूसरे शब्दों में, संस्कृति में वे भी पदार्थ सम्मिलित किए जा सकते हैं, जो मनुष्य के व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। टायलर ने लिखा है कि “संस्कृति मिश्रित-पूर्ण व्यवस्था है, जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता के सिद्धान्त, विधि-विधान, प्रथाएँ एवं अन्य समस्त योग्यताएँ सम्मिलित हैं तथा जिन्हें व्यक्ति समाज का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है।”

भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में अन्तर

भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति में निम्नलिखित प्रमुख भेद या अन्तर पाए जाते हैं

  1. भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत मनुष्य द्वारा निर्मित वे सभी वस्तुएँ आ जाती हैं, जिनका उनकी उपयोगिता द्वारा मूल्यांकन किया जाता है, जबकि अभौतिक संस्कृति का सम्बन्ध मूल्यों, विचारों व ज्ञान से है।
  2. भौतिक संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति की बाहरी दशा से होता है, जबकि अभौतिक संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति की आन्तरिक अवस्था से होता है।
  3. भौतिक संस्कृति में तीव्रता से परिवर्तन होता रहता है, जबकि अभौतिक संस्कृति धीरे-धीरे परिवर्तित होती है।
  4. भौतिक संस्कृति का प्रसार तीव्रता से होता है तथा इसे ग्रहण करने हेतु बुद्धि की आवश्यकता नहीं होती, जबकि अभौतिक संस्कृति का प्रसार बहुत धीमी गति से होता है।
  5. भौतिक संस्कृति आविष्कारों से सम्बन्धित है, जबकि अभौतिक संस्कृति आध्यात्मिकता से सम्बन्धित है।
  6. भौतिक संस्कृति का कितना विकास होगा, यह निश्चय अभौतिक संस्कृति ही करती है।
  7. भौतिक संस्कृति मानव द्वारा निर्मित वस्तुओं का योग है, जबकि अभौतिक संस्कृति रीति रिवाजों, रूढ़ियों, प्रथाओं, मूल्यों, नियमों, व उपनियमों का योग है।
  8. भौतिक संस्कृति मूर्त होती है, जबकि अभौतिक संस्कृति अमूर्त होती है।
  9. भौतिक संस्कृति मानव आवश्यकताओं की पूर्ति से सम्बन्धित होने के कारण एक साधन है, जबकि अभौतिक संस्कृति व्यक्ति को जीवन-यापन का तरीका बतलाती है।
  10. भौतिक संस्कृति का मापदण्ड उपयोगिता पर आधारित है, जबकि अभौतिक संस्कृति हमारी आन्तरिक भावनाओं से सम्बन्धित है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
लैण्डिस द्वारा प्रस्तुत पर्यावरण के वर्गीकरण को लिखिए। [2011]
उत्तर :
लैण्डिस ने सम्पूर्ण पर्यावरण को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा है
1. प्राकृतिक पर्यावरण – इसके अन्तर्गत वे सभी प्राकृतिक शक्तियाँ एवं वस्तुएँ आती हैं, जिनका निर्माण प्रकृति ने किया है; जैसे-भूमि, तारे, सूर्य, चन्द्र, नदी, पहाड़, समुद्र, जलवायु, पेड़-पौधे, पशु-जगत्, भूकम्प, बाढ़ आदि। ये सभी मानव एवं समाज को प्रभावित करते हैं।

2, सामाजिक पर्यावरण – 
इसके अन्तर्गत मानवीय सम्बन्धों से निर्मित सामाजिक समूह, संगठन, समाज, समुदाय, समिति, संस्था आदि आते हैं, जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करते हैं, उसका समाजीकरण करते हैं और उसे मानव की संज्ञा प्रदान करने में सहायक होते हैं।

3. सांस्कृतिक पर्यावरण – 
इसके अन्तर्गत धर्म, नैतिकता, प्रथाएँ, लोकाचार, कानून, प्रौद्योगिकी, व्यवहार-प्रतिमान आदि आते हैं, जिन्हें मनुष्य अपने अनुभवों एवं सामाजिक सम्पर्क के कारण सीखता है और उनके अनुरूप अपने को ढालने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2
भौगोलिक निश्चयवादी (निर्धारणवादी) विचारधारा की समालोचना कीजिए।
उत्तर :
भौगोलिक निश्चयवादी विचारधारा की आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं
1. भौगोलिक निश्चयवादियों ने मनुष्य को कीड़े-मकोड़े एवं पशु-पक्षियों की भाँति असहाय एवं निरुपाय मान लिया है। वे यह भूल जाते हैं कि मानव बुद्धिमान एवं चिन्तनशील प्राणी है जिसने आविष्कारों के बल पर भाग्य और जीवन की दीन दशी को ही बदल दिया है।
2. यदि भौगोलिक पर्यावरण ही मानव की सभ्यता, संस्कृति एवं व्यवहार को तय करता है तो फिर एक ही पर्यावरण में रहने वाले लोगों के भोजन, वस्त्र, मकान, प्रथाओं एवं परम्पराओं में अन्तर क्यों होता है, इसका उत्तर : भौगोलिक निश्चयवाद के आधार पर नहीं दिया जा सकता।।
3. मानव के प्रत्येक कार्य को केवल भौगोलिक पर्यावरण की ही उपजे मानकर भूगोलविदों ने अतिवाद का परिचय दिया, जब कि मानव-कार्य एवं व्यवहार को प्रभावित करने में, भौगोलिक कारक कई कारकों में से एक है, न कि सब कुछ।

प्रश्न 3
भौगोलिक पर्यावरण सामाजिक संस्थाओं को कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर :
कई भूगोलविदों ने भौगोलिक कारकों एवं सामाजिक संस्थाओं का सम्बन्ध प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, जिन स्थानों पर खाने-पीने एवं रहने की सुविधाएँ होती हैं, वहाँ संयुक्त परिवार पाये जाते हैं और जहाँ इनका अभाव होता है वहाँ एकाकी परिवार। जहाँ प्रकृति से संघर्ष करना होता है, वहाँ पुरुष-प्रधान समाज होते हैं। इसी प्रकार से जहाँ जीविकोपार्जन की सुविधाएँ सरलता से मिल जाती हैं और कृषि की प्रधानता होती है, वहाँ बहुपत्नी-प्रथा तथा जहाँ जीवनयापन कठिन होता है, वहाँ बहुपति-प्रथा अथवा एक-विवाह की प्रथा पायी जाती है। इसका कारण यह है कि संघर्षपूर्ण पर्यावरण में स्त्रियों का भरण-पोषण सम्भव न होने से कन्या-वध आदि की प्रथा पायी जाती है जिससे उनकी संख्या घट जाती है। जिन स्थानों पर जीवन-यापन के लिए कठोर श्रम एवं सामूहिक प्रयास करना होता है, वहाँ सामाजिक संगठन सुदृढ़ होता है।

प्रश्न 4
“मानव पहले प्रकृति का दास था, परन्तु अब स्वामी बनता जा रहा है।” इस कथन पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
भौगोलिक निश्चयवादी मानव के खान-पान, वेश-भूषा, मकान, व्यवहार, धर्म, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं आदि पर भौगोलिक प्रभाव को प्रमुख मानते हैं। वे मानव को प्रकृति के हाथों में खिलौना मात्र ही समझते हैं। भौगोलिक निश्चयवादियों की बात कुछ समय पहले तक उचित मानी जा सकती थी, जब मानव ने आज जितनी प्रगति, विकास और आविष्कार नहीं किये थे और उसका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति पर निर्भर था, उससे ही नियन्त्रित व निर्देशित होता था। शिकारी अवस्था से कृषि अवस्था तक मानव की प्रकृति की दासता अधिक थी, किन्तु आज के वैज्ञानिक युग में मानव ने प्रकृति पर विजय पायी है। विज्ञान के सहारे ही मानव ने चन्द्रमा पर विजय की है, समुद्रों का मंथन किया है, आकाश में उड़ा है। अब दलदल, पहाड़ और रेगिस्तान उसके मार्ग में बाधा नहीं रहे। मानव ने अपने प्रयत्नों से रेगिस्तानों व टुण्ड्रा प्रदेशों को रहने योग्य एवं हरे-भरे खेतों में बदल दिया है। कृत्रिम वर्षा की जाने लगी है। मौसम के प्रभाव से बचने के लिए वातानुकूलित कमरे बनने लगे हैं। प्रत्येक क्षेत्र में आज मानव प्रकृति की दासता से मुक्त होता जा रहा है और नवीन आविष्कारों, प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान के सहारे प्रकृति के रहस्यों को ज्ञात कर उन्हें अपनी इच्छानुसार प्रयोग में ला रहा है।

प्रश्न 5
भौतिक संस्कृति की विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भौतिक संस्कृति की विशेषताओं को हम संक्षेप में इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं

  1. भौतिक संस्कृति मूर्त होती है।
  2. भौतिक संस्कृति संचयी होती है; अत: इसके अंगों एवं मात्रा में निरन्तर वृद्धि होती जाती
  3. चूंकि भौतिक संस्कृति मूर्त है, अत: उसे मापा जा सकता है।
  4. भौतिक संस्कृति की उपयोगिता एवं लाभ का मूल्यांकन सरल है।
  5. भौतिक संस्कृति में परिवर्तन शीघ्र होते हैं।
  6. एक स्थान से दूसरे स्थान पर संस्कृति का प्रसार होने पर भौतिक संस्कृति में बिना परिवर्तन हुए ही उसे ग्रहण किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिकन फर्नीचर की डिजाइन, पेन, वेश-भूषा एवं मशीनों को हम बिना परिवर्तन के ग्रहण कर सकते हैं।
  7. भौतिक संस्कृति में कई विकल्प पाये जाते हैं। अत: व्यक्ति अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार उनमें से चुनाव कर सकता है।

प्रश्न 6
सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तित्व-निर्माण को कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर :
मानव जन्म से कुछ शारीरिक गुण एवं क्षमताएँ लेकर पैदा होता है, किन्तु संस्कृति लेकर नहीं। सांस्कृतिक पर्यावरण में ही मानव के गुणों व क्षमता का विकास होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति को समाज व संस्कृति की अनेक बातें सिखायी जाती हैं। व्यक्तित्व संस्कृति की ही देन है, संस्कृति के अभाव में व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो सकता। सांस्कृतिक पर्यावरण में रहकर ही व्यक्ति परम्पराओं, विश्वासों, नैतिकता, आदर्श आदि को ग्रहण करता है, जो उसके व्यक्तित्व का अंग बन जाते हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण में भिन्नता के कारण ही हमें विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व देखने को मिलते हैं और व्यक्ति की मनोवृत्तियों, विचारों, विश्वासों एवं व्यवहारों में भिन्नता पायी जाती है। उदाहरणार्थ-भारत में किसी व्यक्ति का सम्मान करने के लिए लोग खड़े हो जाते हैं और हाथ जोड़ते हैं, जब कि अंग्रेज लोग सम्मान प्रकट करने के लिए सिर से अपना टोप उतार देते हैं। मुस्लिम स्त्रियाँ बुर्का पहनती हैं, किन्तु अमेरिकन स्त्रियाँ नहीं। स्पष्ट है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में सांस्कृतिक पर्यावरण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 7
भौगोलिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2009, 11, 13, 15]
उत्तर :
भौगोलिक़ पर्यावरणा से अभिप्राय प्राकृतिक पर्यावरण से है, जब कि सांस्कृतिक पर्यावरण मानव या समाज द्वारा निर्मित पर्यावरण है। दोनों में पर्याप्त अन्तर हैं, जो इस प्रकार हैं

  1. भौगोलिक पर्यावरण का सम्बन्ध प्रकृति से है; अत: यह मानव से स्वतन्त्र है, जब कि सांस्कृतिक पर्यावरण, मानव द्वारा निर्मित पर्यावरण है।
  2. भौगोलिक पर्यावरण में भौतिक वस्तुएँ, जल, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा आदि आते हैं, जब कि सांस्कृतिक पर्यावरण में भौतिक और अभौतिक दोनों प्रकार की वस्तुएँ आती हैं।
  3. भौगोलिक पर्यावरण मूर्त होता है, जब कि सांस्कृतिक पर्यावरण अमूर्त होती है।
  4. भौगोलिक पर्यावरण की अपेक्षा सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तियों के जीवन को अधिक प्रभावित करता है।

प्रश्न 8
भौगोलिक पर्यावरण का धर्म तथा मानव-व्यवहार पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
या
भौगोलिक पर्यावरण के चार प्रभावों का उल्लेख कीजिए। भौगोलिक पर्यावरण के दो अप्रत्यक्ष प्रभाव लिखिए। [2008]
या
भौगोलिक पर्यावरण के अप्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2011, 12]
या
भौगोलिक पर्यावरण के मानव व्यवहार पर दो प्रभाव बताइए। [2012, 15, 16]
उत्तर :
भौगोलिक पर्यावरण के चार प्रभाव निम्नलिखित हैं

1. धर्म पर प्रभाव – धर्म प्रत्येक समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। भौगोलिक निश्चयवादी इस बात पर बल देते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण अथवा प्राकृतिक शक्तियाँ धर्म के विकास को प्रभावित करती हैं। मैक्स मूलर ने धर्म की उत्पत्ति का सिद्धान्त ही प्राकृतिक शक्तियों के भय से उनकी पूजा करने के रूप में प्रतिपादित किया है। जिन देशों में प्राकृतिक प्रकोप अधिक हैं, वहाँ पर धर्म का विकास तथा धर्म पर आस्था रखने वाले लोगों की संख्या अधिक होती है। एशिया की मानसूनी जलवायु के कारण ही यहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं। कृषिप्रधान देशों में इन्द्र की पूजा होना सामान्य बात है। वृक्ष, गंगा और गाय भारतीयों के लिए उपयोगी हैं; अतः ये सब पूजनीय हैं।

2. मानव-व्यवहार पर प्रभाव – भूगोलविदों का मत है कि मानवीय व्यवहारों, कार्यक्षमता, मानसिक योग्यता, आत्महत्या, अपराध एवं जन्म-दर और मृत्यु-दर पर जलवायु, तापक्रम एवं आर्द्रता आदि भौगोलिक कारकों का प्रभाव पड़ता है। लकेसन के अनुसार, “अपराध ऋतुओं के हिसाब में परिवर्तित होते हैं। सर्दियों में सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध अधिक होते हैं और गर्मियों में व्यक्ति सम्बन्धी’’; उदाहरणार्थ-उपजाऊ भूमि, अनुकूल वर्षा तथा ठण्डे मौसम वाले क्षेत्रों में अपराध कम होते हैं। उनकी कार्यक्षमता भी अपेक्षाकृत अधिक होती है।

3. आर्थिक जीवन पर प्रभाव – किसी देश या समाज के आर्थिक क्षेत्र का निर्धारण वहाँ की भौगोलिक दशाओं से होता है। यदि किसी देश में उपजाऊ मैदान अधिक हैं, तो वहाँ का आर्थिक ढाँचा कृषि पर निर्भर होगा। यदि किसी देश में खनिज पदार्थों की अधिकता है, तो उस देश की आर्थिक उन्नति करने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं। इसी प्रकार यदि भौगोलिक पर्यावरण ने उस देश को कच्चा माल और शक्ति के साधन प्रदान किये हैं, तो उस देश का आर्थिक संगठन उद्योगों पर आधारित होता है।

4. सामाजिक संगठन पर प्रभाव – कुछ लोगों का कहना है कि सामाजिक संगठनों का स्वरूप भौगोलिक दशाओं से निर्धारित होता है। जंगली प्रदेशों में कुटुम्ब बड़े होते हैं, क्योंकि लोगों को जंगली जानवरों से अपनी रक्षा सामूहिक रूप से करनी पड़ती है और उदर-पूर्ति के लिए भी मिलकर कार्य करना पड़ता है। नगरों में परिवार छोटे होते हैं, क्योंकि स्त्री-पुरुष अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार के बिना भी कर लेते हैं और इसलिए तलाकों की संख्या भी वहाँ अधिक होती है। रेगिस्तानों और घास के मैदानों में लोगों को अपने जानवरों को लेकर घूमना-फिरना पड़ता है, इसलिए उनके जीवन में स्थायित्व नहीं आ पाता। इसके विपरीत, खेती और उद्योग-धन्धे वाले क्षेत्रों के परिवारों में अधिक स्थायित्व होता है और उनके सामाजिक संगठनों में स्थिरता होती है।

प्रश्न 9
संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2016]
उत्तर :
संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ संस्कृति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
1. सीखा हुआ व्यवहार – व्यक्ति समाज की प्रक्रिया में कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। ये सीखे हुए अनुभव, विचार-प्रतिमान आदि की संस्कृति के तत्त्व होते हैं। इसलिए संस्कृति को सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है।

2. संगठित प्रतिमा – 
संस्कृति में सीखे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप में होते हैं। संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति के आचरणों या इकाइयों में एक व्यवस्था और सम्बन्ध होता है। किसी भी मनुष्य का आचरण उसके पृथक्-पृथक् आचरणों की सूची नहीं होती।

3. हस्तान्तरण की विशेषता – 
संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित हो जाती है। संस्कृति का अस्तित्व हस्तान्तरण के कारण ही स्थायी बना रहता है। हस्तान्तरण की यह प्रक्रिया निरन्तर होती रहती है। समाजीकरण की प्रक्रिया संस्कृति के हस्तान्तरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

4. पार्थिव तथा अपार्थिव दोनों तत्त्वों का विद्यमान रहना – 
संस्कृति के अंतर्गत दो प्रकार के तत्त्व आते हैं—एक पार्थिव व दूसरा अपार्थिव। ये दोनों ही तत्त्व संस्कृति का निर्माण करते हैं। अपार्थिव स्वरूप को हम आचरण या क्रिया कह सकते हैं; अर्थात् जिन्हें छुआ या देखा न जा सके या जिनका कोई स्वरूप ही नहीं है; जैसे–बोलना, गाना, अभिवादन करना आदि। जिन पार्थिव या साकार वस्तुओं का मनुष्य सृजन करता है वे पार्थिव तत्त्वों के अन्तर्गत आती हैं; जैसे-रेडियो, मोटर साइकिल, टेलीविजन, सिनेमा आदि।

5. परिवर्तनशीलता – 
संस्कृति सदा परिवर्तनशील है। इसमें परिवर्तन होते रहते हैं, चाहे वे परिवर्तन धीरे-धीरे हों या आकस्मिक रूप में। वास्तव में संस्कृति मनुष्य की विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम है। चूंकि समाज में परिस्थितियाँ सदा एक-सी नहीं रहती हैं, इसलिए आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों में भी परिवर्तन करना पड़ता है।

6. आदर्शात्मक – संस्कृति में सामाजिक विचार, व्यवहार प्रतिमान आदर्श रूप में होते हैं। इनके अनुसार कार्य करना सुसंस्कृत होने का प्रतीक माना जाता है। सभी मनुष्य संस्कृति के आदर्श प्रतिमानों के अनुसार अपने जीवन को बनाने का प्रयास करते हैं।

7. सामाजिकता का गुण – संस्कृति का जन्म समाज में तथा समाज के सदस्यों द्वारा होता है। मानव समाज के बाहर संस्कृति की रक्षा नहीं की जा सकती है। दूसरी ओर पशु-समाज में किसी प्रकार की संस्कृति नहीं पाई जाती है।

8. भिन्नता – प्रत्येक समाज की संस्कृति भिन्न होती है; अर्थात् प्रत्येक समाज की अपनी पृथक् प्रथाएँ, परम्पराएँ, धर्म, विश्वास, कला का ज्ञान आदि होते हैं। संस्कृति में भिन्नता के कारण ही विभिन्न समाजों में रहने वाले लोगों का रहन-सहन भिन्न होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
‘भौगोलिक पर्यावरण क्या है? यह किस प्रकार मानव-समाज को प्रभावित करता है?
उत्तर :
भौगोलिक पर्यावरण प्रकृति द्वारा निर्मित पर्यावरण है। मनुष्य पर जिन प्राकृतिक शक्तियों का चारों ओर से प्रभाव पड़ता है, उसे ‘भौगोलिक पर्यावरण’ कहा जाता है। ये सभी शक्तियाँ स्वतन्त्र रहकर मानव को प्रभावित करती हैं। पर्वत, सरिता, वन, पवन, आकाश, पृथ्वी तथा जीव जगत् सभी भौगोलिक पर्यावरण के अंग हैं।

भौगोलिक पर्यावरण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानव-समाज को प्रभावित करता है। प्रत्यक्ष रूप में यह मानव-समाज को जनसंख्या, आवास, वेश-भूषा, खान-पान, पशु-जीवन आदि पर प्रभाव डालकर उसको प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष रूप में यह मानव-समाज को सामाजिक संगठन, आर्थिक संरचना, राजनीतिक संगठन, धार्मिक जीवन, साहित्य, कला आदि पर प्रभाव डालकर उनको प्रभावित करता है।

प्रश्न 2
मैकाइवर एवं पेज ने सम्पूर्ण पर्यावरण को क्या वर्गीकरण किया है ?
उत्तर :
मैकाइवर एवं पेज ने सम्पूर्ण पर्यावरण को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया हैसामाजिक पहलू एवं भौतिक पहलू। सामाजिक पहलू के अन्तर्गत लोकरीतियों, प्रथाओं, कानूनों, संस्थाओं, सामाजिक सम्बन्धों, जातीय समूहों, वंशानुगत प्रथाओं, सामाजिक विरासत आदि को सम्मिलित किया गया है। भौतिक या प्राकृतिक पहलू बहुत विस्तृत है, इसे दो भागों में बाँटा गया है–

  • मानव द्वारा असंशोधित एवं
  • मानव द्वारा संशोधित।

प्रश्न 3
भौगोलिक पर्यावरण का जन्म-दर व मृत्यु-दर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
भौगोलिक पर्यावरण एवं जन्म व मृत्यु-दर के बीच सह-सम्बन्ध बताते हुए जेनकिन (Jenkin) कहते हैं कि भूमध्य रेखा की ओर मृत्यु-दर अधिक व ध्रुवीय प्रदेशों की ओर कम होती जाती है। उष्ण प्रदेशों में शीत प्रदेशों की तुलना में जीवन-अवधि कम होती है। इसी प्रकार से जुलाई, अगस्त, सितम्बर व अक्टूबर में जन्म-दर अन्य महीनों की अपेक्षा अधिक एवं जनवरी, फरवरी व मार्च में बहुत कम होती है। मौसम का परिवर्तन यौन-व्यवहारों को प्रभावित करता है, जिससे जन्म-दर पर भी असर पड़ता है। प्राकृतिक विपदाएँ, रोग एवं महामारियाँ मृत्यु-दर को प्रभावित करती हैं। इस तरह प्राकृतिक कारक एवं जन्म तथा मृत्यु-दर परस्पर सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 4
भौगोलिक पर्यावरण के चार प्रत्यक्ष प्रभाव बताइए।
उत्तर :
भौगोलिक पर्यावरण के चार प्रत्यक्ष प्रभाव निम्नवत् हैं
1. जनसंख्या पर प्रभाव – किसी देश की जनसंख्या कितनी होगी यह वहाँ की अनुकूल या भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
2. आवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का मनुष्य के आवास पर पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-पर्वतीय क्षेत्रों में मकानों को बनाने में पत्थरों और लकड़ियों का अधिक प्रयोग होता है। वहीं, मैदानी इलाकों में ईंटों या मिट्टी आदि का।
3. वेशभूषा पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का मनुष्य की वेशभूषा पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। गर्म जलवायु वाले देशों में लोग बारीक व ढीले वस्त्र पहनते हैं, वहीं ठण्डे क्षेत्रों में गर्म व चुस्त कपड़ों का अधिक उपयोग होता है। खान-पान पर प्रभाव-भोजन की सामग्री भी भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होती है। जिस क्षेत्र में जो खाद्य पदार्थ अधिक होते हैं। उनका प्रचलन वहीं पर अधिक होता है।

प्रश्न 5
भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति के दो-दो उदाहरण दीजिए। [2011, 12, 16]
या
संस्कृति के दो प्रकार कौन-कौन से हैं? [2011, 12]
या
संस्कृति के प्रकार लिखिए। [2015]
उत्तर :
अमेरिकन समाजशास्त्री ऑगबर्न ने संस्कृति को भौतिक और अभौतिक दो भागों में बाँटा है। उनके इस वर्गीकरण को अन्य वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है।

भौतिक संस्कृति के दो उदाहरण – भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत मानव द्वारा निर्मित सभी भौतिक एवं मूर्त वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है जिन्हें हम देख सकते हैं, छू सकते हैं और इन्द्रियों द्वारा महसूस कर सकते हैं। भौतिक संस्कृति के दो उदाहरण हैं-मशीनें तथा परिवहन के साधन।

अभौतिक संस्कृति के दो उदाहरण – अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत उन सभी सामाजिक तथ्यों को सम्मिलित किया जाता है जो अमूर्त हैं; जिनकी कोई माप-तोल, आकार व रंग-रूप नहीं होता, वरन् जिन्हें हम महसूस कर सकते हैं। अभौतिक संस्कृति के दो उदाहरण हैं-आदर्श नियम तथा विचार।

प्रश्न 6
सभ्यता सदैव आगे बढ़ती है, किन्तु संस्कृति नहीं। कैसे ?
उत्तर :
सभ्यता सदैव आगे बढ़ती है, किन्तु संस्कृति नहीं; इसका प्रमुख कारण यह है कि सभ्यता उन्नतिशील है, वह निरन्तर प्रगति करती रहती है। आविष्कारों एवं खोजों के कारण उसमें समय-समय पर नवीन तत्त्व जुड़ते जाते हैं, किन्तु संस्कृति के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। वैदिककालीन साहित्य, मनोरंजन, नैतिक आदर्श, प्रथाएँ, धर्म, कला, चित्रकारी आदि को आज के युग से कम या अधिक श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि संस्कृति की प्रगति की कोई दिशा निर्धारित नहीं होती है।

प्रश्न 7
सभ्यता साधन है, जब कि संस्कृति साध्य। कैसे ?
उत्तर :
सभ्यता साधन है, जब कि संस्कृति साध्य; इसका कारण यह है कि संस्कृति से मानव को सन्तुष्टि एवं आनन्द का अनुभव होता है। संस्कृति को प्राप्त करना स्वयं में एक उद्देश्य या साध्य है। इस संस्कृति (साध्य) को अपनाने के लिए सभ्यता का साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ-धर्म, कला एवं संगीत आदि हमें मानसिक शान्ति एवं आनन्द प्रदान करते हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए हम कई पवित्र भौतिक वस्तुओं, कलाकारी के उपकरणों एवं वाद्य-यन्त्रों का प्रयोग करते हैं, जो कि सभ्यता के अंग हैं।

प्रश्न 8
संस्कृति एवं सभ्यता के चार अन्तर बताइए। [2007, 14]
उत्तर :
संस्कृति एवं सभ्यता के चार अन्तर निम्नलिखित हैं
1. सभ्यता की माप सरल है, पर संस्कृति की नहीं – क्योंकि सभ्यता का सम्बन्ध भौतिक वस्तुओं की उपयोगिता से है। संस्कृति की माप सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रत्येक समाज में अपनी मूल्य-व्यवस्था होती है तथा मूल्यों में भिन्नता का कोई सर्वमान्य पैमाना नहीं जिसके आधार पर संस्कृति को मापा जा सके।

2. सभ्यता सदैव आगे बढ़ती है, किन्तु संस्कृति नहीं – सभ्यता उन्नतिशील होती हैं और वह एक दिशा में निरन्तर प्रगति करती है, जब तक उसके मार्ग में बाधा न आये। संस्कृति के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। उदाहरणार्थ-हम यह नहीं कह सकते कि कालिदास के नाटक आज के नाटकों से अच्छे हैं या बुरे।

3. सभ्यता साधन है, जब कि संस्कृति साध्य – संस्कृति से मानव को सन्तुष्टि प्राप्त होती है। संस्कृति को प्राप्त करना अपने आप में एक उद्देश्य, एक साध्य है। इस संस्कृति और साध्य को अपनाने के लिए, सभ्यता का साधने के रूप में प्रयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ-संगीत का आनन्द प्राप्त करने के लिए विभिन्न उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।

4. सभ्यता बाह्य है, जब कि संस्कृति आन्तरिक – सभ्यता का सम्बन्ध जीवन की भौतिक वस्तुओं से है, जिनका अस्तित्व मूर्त रूप में मानव अस्तित्व के बाहर है। संस्कृति का सम्बन्ध मानव के आन्तरिक गुणों से है, उसके विचारों, विश्वासों, मूल्यों, भावनाओं एवं आदर्शो से है।

प्रश्न 9
सांस्कृतिक पर्यावरण का समाजीकरण की प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा एक व्यक्ति सामाजिक प्राणी बनता है, वह अपने समाज की संस्कृति को आत्मसात् करता है और अपने व्यक्तित्व का विकास करता है। परिवार, क्रीड़ासमूह, पड़ोस, नातेदारी-समूह, जाति एवं द्वितीयक समूहों के सम्पर्क से व्यक्ति का समाजीकरण होता है। वह अपने समाज के धर्म, रीति-रिवाजों, प्रथाओं, परम्पराओं आदि को ग्रहण करता है, जो कि सांस्कृतिक पर्यावरण के ही अंग हैं। हम समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही भाषा का प्रयोग करना सीखते हैं, किस शब्द का क्या अर्थ होगा, यह संस्कृति ही तय करती है। व्यक्ति में मानवीय गुणों का विकास भी समाजीकरण के द्वारा ही होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा हम किन बातों को सीखेंगे, यह हमारे सांस्कृतिक पर्यावरण पर ही निर्भर है।।

प्रश्न 10
चेतनात्मक (भौतिक) संस्कृति की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
चेतनात्मक (भौतिक) संस्कृति की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. भौतिक संस्कृति मूर्त होती है।
  2. चूँकि भौतिक संस्कृति मूर्त है; अतः उसे मापा जा सकता है।
  3. भौतिक संस्कृति संचयी है; अत: इसके अंगों एवं मात्रा में निरन्तर वृद्धि होती जाती है।
  4. भौतिक संस्कृति की उपयोगिता एवं लाभ का मूल्यांकन सरल है।

प्रश्न 11
“हम जो भी सोचते हैं, करते हैं और रखते हैं वही हमारी संस्कृति है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
संस्कृति की सर्वोत्तम परिभाषा रॉबर्ट बीरस्टीड द्वारा दी गयी है। इनके अनुसार, संस्कृति एक जटिल सम्पूर्णता है जिसमें वे सभी विशेषताएँ सम्मिलित हैं जिन पर हम विचार करते हैं (we think), कार्य करते हैं (we do) और समाज के सदस्य होने के नाते उन्हें अपने पास रखते हैं (we have)।’ इस परिभाषा में संस्कृति के भौतिक और अभौतिक दोनों पक्षों को सम्मिलित किया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि संस्कृति जैविकीय विरासत से सम्बन्धित न होकर सामाजिक विरासत का परिणाम है।

प्रश्न 12
प्राकृतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत सभी प्राकृतिक और भौगोलिक शक्तियों का समावेश होता है। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, वनस्पति और जीव-जन्तु पर्यावरण के अंग हैं। प्राकृतिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप का परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। आवास, विद्यालय, टेलीविजन, मशीनें, धर्म, संस्कृति, भाषा, रूढ़ियाँ, सभी सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं। इन सभी का निर्धारण प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा किया जाता है। इस प्रकार प्राकृतिक पर्यावरण हमारे रहनसहन, भोज्य पदार्थ, वस्त्र-चयन आदि सभी को प्रभावित करता है। इन दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

प्रश्न 13
प्राकृतिक पर्यावरण और सांस्कृतिक पर्यावरण की किन्हीं दो विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
प्राकृतिक पर्यावरण की दो विशेषताएँ—

  1. प्राकृतिक पर्यावरण प्रकृति-प्रदत्त है तथा इसमें भौतिक वस्तुएँ; जैसे-नदी, पहाड़, नक्षत्र, पृथ्वी, समुद्र आदि आते हैं तथा
  2. प्राकृतिक पर्यावरण मानव, पशु और वनस्पति सभी को प्रभावित करता है।

सांस्कृतिक पर्यावरण की दो विशेषताएँ–

  1. सांस्कृतिक पर्यावरण केवल मानव को प्रभावित करता है तथा
  2. सांस्कृतिक पर्यावरण परिवर्तनशील है, मानव अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इसमें संशोधन एवं परिवर्तन करता रहता है।

प्रश्न 14
प्राकृतिक पर्यावरण को उपयुक्त उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए। [2013]
उत्तर :
प्राकृतिक पर्यावरण-जो भी वस्तुएँ प्रकृति ने मानव को प्रदान की हैं; जैसे–पानी, मिट्टी, जलवायु, भूमि, वनस्पति, नदियाँ आदि, वे सभी इसके अन्तर्गत आती हैं। प्राकृतिक पर्यावरण के दो भाग किये जा सकते हैं

  1. अनियन्त्रित पर्यावरण – इसके अन्तर्गत उन भौतिक तत्त्वों का समावेश होता है जिन पर मानव का कोई नियन्त्रण नहीं होता है।
  2. नियन्त्रित पर्यावरण – इसमें मानव द्वारा नियन्त्रण होता है; जैसे—मकान आदि। इसे औद्योगिक पर्यावरण भी कहा जाता है।

प्रश्न 15
‘भौगोलिक निश्चयवादी’ तथा ‘भौगोलिक निश्चयवाद’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
जो विद्वान् यह मानते हैं कि मानव के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक एवं शारीरिक सभी पक्ष भौगोलिक पर्यावरण से प्रभावित होते हैं, उन्हें भौगोलिक निश्चयवादी (निर्धारणवादी) एवं उनकी विचारधारा को भौगोलिक निश्चयवाद कहते हैं।

प्रश्न 16
सांस्कृतिक पर्यावरण किसे कहते हैं ?
उत्तर :
सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत धर्म, नैतिकता, प्रथाएँ, लोकाचार, कानून, व्यवहारप्रतिमान, समस्त भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ; जैसे—रेल, मकान, सड़क आदि आते हैं, जिन्हें मनुष्य अपने अनुभवों एवं सामाजिक सम्पर्क के कारण सीखता है और उनके अनुरूप अपने को ढालने का प्रयास करता है।

प्रश्न 17
संस्कृति केवल मानव-समाज में ही क्यों पायी जाती है ?
उत्तर :
मनुष्य में कुछ ऐसी मानसिक एवं शारीरिक विशेषताएँ हैं जिनके कारण वह संस्कृति को निर्मित एवं विकसित कर सका है। अन्य प्राणियों में, मानवे के समान शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं के अभाव के कारण संस्कृति का निर्माण नहीं हो सका।

प्रश्न 18
भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत किन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है ?
उत्तर :
भौतिक संस्कृति के अन्तर्गत मानव द्वारा निर्मित सभी भौतिक एवं मूर्त वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें हम देख सकते हैं, छू सकते हैं और इन्द्रियों द्वारा महसूस कर सकते हैं।

निश्चित उत्तररीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक पर्यावरण से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
सामाजिक पर्यावरण के अन्तर्गत मानवीय सम्बन्धों से निर्मित सामाजिक समूह, संगठन, समुदाय, समिति आदि आते हैं, जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करते हैं और उसका समाजीकरण करते हैं।

प्रश्न 2
भौगोलिक सम्प्रदाय से सम्बन्धित विचारकों के नाम लिखिए।
या
प्रमुख भौगोलिकविदों के नाम लिखिए।
या
भौगोलिक सम्प्रदाय के दो विचारकों के नाम लिखिए।
या
भौगोलिक सम्प्रदाय से सम्बन्धित दो समाजशास्त्रियों का नाम लिखिए। [2015]
उत्तर :
भौगोलिक सम्प्रदाय के प्रमुख विचारक मॉण्टेस्क्यू, लीप्ले, बकल, हंटिंग्टन आदि हैं।।

प्रश्न 3
भौगोलिक निश्चयवादी (निर्धारणवाद) विचारधारा को मानने वाले चार विद्वानों के नाम बताइए। [2012]
उत्तर :
भौगोलिक निश्चयवादी विचारधारा को मानने वाले चार विद्वान् हैं—अरस्तू, हिप्पोक्रेटिज, मॉण्टेस्क्यू और बकल।

प्रश्न 4
हंटिंग्टन ने प्रतिभा व सभ्यताओं के विकास के लिए क्या आवश्यक माना है ?
उत्तर :
हंटिंग्टन ने प्रतिभा व सभ्यताओं के विकास के लिए अनुकूल जलवायु का होना आवश्यक माना है।

प्रश्न 5
भौगोलिक निर्णयवाद की अवधारणा के जनक कौन हैं ?
उत्तर :
भौगोलिक निर्णयवाद की अवधारणा के जनक हंटिंग्टन हैं।

प्रश्न 6
“पर्यावरण वह सब कुछ है, जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है और उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर :
यह कथन जिसबर्ट का है।

प्रश्न 7
‘संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित भाग है।’ यह कथन किसका है ? [2007, 11, 12]
उत्तर :
यह कथन प्रमुख समाजशास्त्री हर्सकोविट्स का है।

प्रश्न 8
समाजशास्त्र में संस्कृति का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
समाजशास्त्र में संस्कृति का अर्थ मानव-जाति के रहन-सहन, आचार-विचार, भावनाएँ, विश्वास और विचारों के समग्र रूप से है।

प्रश्न 9
ऑगबर्न द्वारा दिए गए संस्कृति के दो प्रकारों को लिखिए। [2013]
उतर :

  • प्रौद्योगिकीय विलम्बना,
  • सांस्कृतिक विलम्बना।

प्रश्न10
किस विद्वान ने प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक व्यवहार के साथ जोड़ने का प्रयास किया है ? [2007]
उतर :
मैक्स मूलर।

प्रश्न 11
संस्कृति के भौतिक पक्ष को क्या कहा गया है ? [2007, 10]
उत्तर :
संस्कृति के भौतिक पक्ष को सांस्कृतिक पर्यावरण कहा गया है।

प्रश्न 12
आदर्शात्मक संस्कृति की अवधारणा किसने दी ? [2011, 12]
उत्तर :
आदर्शात्मक संस्कृति की अवधारणा पिटरिम ए० सोरोकिन ने दी।

प्रश्न 13
संस्कृति को चेतनात्मक, विचारात्मक एवं आदर्शात्मक–तीनों प्रकारों में प्रस्तुत करने वाले समाजविज्ञानी कौन हैं?
उत्तर :
संस्कृति को तीनों प्रकारों में प्रस्तुत करने वाले समाजविज्ञानी चार्ल्स कूले हैं।

प्रश्न 14
चेतनात्मक संस्कृति किस समाजशास्त्री की अवधारणा है ? [2007, 11, 12]
उत्तर :
चेतनात्मक संस्कृति सोरोकिन की अवधारणा है।

प्रश्न 15
भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति की अवधारणा किस समाजशास्त्री की है ? [2011, 16]
उत्तर :
भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति की अवधारणा अमेरिकन समाजशास्त्री ऑगबर्न की है।

प्रश्न 16
‘सांस्कृतिक विलम्बना या पिछड़न किसकी अवधारणा है ?
या
सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ?
उत्तर :
‘सांस्कृतिक विलम्बना या पिछड़न’ ऑगबर्न की अवधारणा है।

प्रश्न 17
विचारात्मक (संवेदनात्मक) संस्कृति की अवधारणा किस समाजशास्त्री से . सम्बन्धित है ? [2012]
उत्तर :
विचारात्मक संस्कृति की अवधारणा मैकाइवर एवं पेज से सम्बन्धित है।

प्रश्न 18
मैकाइवर और पेज ने मानव द्वारा निर्मित पर्यावरण को क्या संज्ञा दी है ?
उत्तर :
मैकाइवर और पेज ने मानव द्वारा निर्मित पर्यावरण को सम्पूर्ण सामाजिक विरासत’ की संज्ञा दी है।

प्रश्न 19
सोरोकिन द्वारा वर्णित दो संस्कृतियों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर :
(i) भावात्मक संस्कृति,
(ii) संवेदनात्मक संस्कृति।

प्रश्न 20
समाजशास्त्र में प्रत्यक्षवाद के प्रणेता कौन हैं? [2015]
उत्तर :
आगस्त कॉम्टे।

प्रश्न 21
सभ्यता के विकास के लिए आदर्श जलवायु’ की कल्पना किसने की है?
उत्तर :
सभ्यता के विकास के लिए आदर्श जलवायु की कल्पना टॉयनबी ने की है।

प्रश्न 22
संस्कृति के दो प्रकार लिखिए।
उत्तर :
संस्कृति के दो प्रकार हैं-

  • भौतिक संस्कृति तथा
  • अभौतिक संस्कृति।

प्रश्न 23
सभ्यता की दो विशेषताएँ लिखिए। [2014, 15]
उत्तर :

  • सभ्यता संस्कृति के विकास का उच्च व जटिल स्तर है।
  • सभ्यता में परिवर्तनशीलता का गुण पाया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)

1. “पर्यावरण एक बाहरी शक्ति है, जो हमें प्रभावित करती है।” यह कथन किसका है ? [2015, 16, 17]
(क) जिसबर्ट
(ख) लैण्डिस
(ग) मोटवानी
(घ) रॉस

2. “भौगोलिक पर्यावरण में वे समस्त दशाएँ सम्मिलित हैं जो प्रकृति मनुष्य को प्रदान करती है।” यह कथन किसका है? [2013]
(क) सोरोकिन
(ख) पी० जिसबर्ट
(ग) मैकाइवर एवं पेज
(घ) एफ०एच० गिडिंग्स।

3. भौतिक संस्कृति का गुण होता है।
(क) स्थिरता
(ख) अमूर्तता
(ग) परिवर्तनशीलता
(घ) जटिलता

4. निम्नलिखित नामों में कौन भौगोलिकविद् नहीं है ?
(क) मॉण्टेस्क्यू
(ख) मैकाइवर
(ग) हंटिंग्टन
(घ) एच०टी० बकल

5. निम्नलिखित में कौन भौगोलिक (प्राकृतिक) पर्यावरण का तत्त्व है ?
(क) कृत्रिम वर्षा
(ख) पत्थर का मकान
(ग) मिट्टी के बर्तन
(घ) पेड़-पौधे

6. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राकृतिक पर्यावरण से सम्बन्धित है ?
(क) सड़क के किनारे के पेड़
(ख) मकान
(ग) खनिज पदार्थ
(घ) पुराने मन्दिर

7. भौगोलिक पर्यावरण किन तत्त्वों से बनता है ?
(क) मनुष्य
(ख) प्राकृतिक दशाएँ
(ग) धार्मिक विश्वास
(घ) प्रथाएँ।

8. निम्नलिखित में से कौन भौगोलिक तत्त्व नहीं है ?
(क) नदी
(ख) आकाश
(ग) सूर्य
(घ) लकड़ी का फर्नीचर

9. निम्नलिखित में भौतिक संस्कृति का गुण है।
(क) बाध्यता का गुण
(ख) क्रमिक विकास का गुण
(ग) माप का गुण।
(घ) स्थिरता का गुण

10. सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण होता है।
(क) धार्मिक विश्वासों द्वारा
(ख) प्राकृतिक दशाओं द्वारा
(ग) मनुष्य द्वारा
(घ) अलौकिक शक्तियों द्वारा

11. निम्नलिखित में आप किसे अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत नहीं रखेंगे ?
(क) उपन्यास को
(ख) भवन को
(ग) अन्धविश्वास को
(घ) संस्कार को

12. निम्नलिखित में से आप किसे सांस्कृतिक पर्यावरण में सम्मिलित करेंगे ?
(क) मौसम को
(ख) मन्दिर को
(ग) भाषा को
(घ) नदी को

13. निम्नलिखित में से किसे आप सांस्कृतिक पर्यावरण में सम्मिलित नहीं करेंगे ?
(क) भाषा को
(ख) रीति-रिवाज को
(ग) मार्गों की बनावट को
(घ) धार्मिक विश्वास को

14. निम्नलिखित में से कौन-सा अभौतिक संस्कृति का गुण है ?
(क) परिवर्तनशीलता का गुण
(ख) स्थिरता का गुण
(ग) माप का गुण
(घ) वैकल्पिकता का गुण

15. निम्नांकित में किसने ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत की हैं? [2015]
(क) आगस्त कॉम्टे
(ख) कार्ल मार्क्स
(ग) हरबर्ट स्पेन्सर
(घ) जॉर्ज सिपेल

16. संस्कृति की विशेषता है? [2016 ]
(क) संस्कृति मनुष्य द्वारा निर्मित होती है।
(ख) संस्कृति एक लिखित व्यवहार है।
(ग) संस्कृति अनुसूचित नहीं होती है।
(घ) इनमें से कोई नहीं

17. संस्कृतिकरण की अवधारणा किसने विकसित की? [2017]
(क) एम० एन० श्रीनिवास
(ख) ए० आर० देसाई
(ग) एस० सी० दूबे
(घ) राधाकमल मुखर्जी

उत्तर :

1. (घ) रॉस, 2. (ग) मैकाइवर एवं पेज, 3. (ग) परिवर्तनशीलता, 4. (ख) मैकाइवर, 5. (घ)पेड़-पौधे, 6. (ग) खनिज पदार्थ,
7. (ख) प्राकृतिक दशाएँ, 8. (घ) लकड़ी का फर्नीचर, 9. (ग) माप का गुण, 10. (ग) मनुष्य द्वारा, 11. (ख) भवन को,
12. (ग) भाषा को, 13. (ग) मार्गों की बनावट को, 14. (ख) स्थिरता का गुण, 15. (ख) कार्ल मार्क्स,
16.
(क) संस्कृति मनुष्य द्वारा निर्मित होती है, 17. (क) एम० एन० श्रीनिवास।

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 1 Neuron, Synapse and Nerve Impulse

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 1 Neuron, Synapse and Nerve Impulse (स्नायु, स्नायु-सन्धि-स्थल तथा तन्त्रिका आवेग) are part of UP Board Solutions for Class 12 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Psychology Chapter 1 Neuron, Synapse and Nerve Impulse (स्नायु, स्नायु-सन्धि-स्थल तथा तन्त्रिका आवेग).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 1
Chapter Name Neuron, Synapse and Nerve Impulse
(स्नायु, स्नायु-सन्धि-स्थल तथा तन्त्रिका आवेग)
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 1 Neuron, Synapse and Nerve Impulse (स्नायु, स्नायु-सन्धि-स्थल तथा तन्त्रिका आवेग)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्नायु अथवा न्यूरॉन (Neuron) का अर्थ स्पष्ट कीजिए। चित्र के माध्यम से स्नायु की संरचना को स्पष्ट कीजिए तथा स्नायु के प्रकारों का भी सामान्य परिचय दीजिए।(2018)
या
न्यूरॉन किसे कहते हैं? न्यूरॉन के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए। (2008)
या
न्यूरॉन का चित्र बनाइए तथा उसकी कार्यप्रणाली का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (2010)
या
न्यूरॉन का चित्र बनाकर उसके भागों को नामांकित कीजिए। (2013)
उत्तर
प्राणियों के अधिकांश व्यवहार का सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में उनके शरीर से अवश्य होता है। शरीर की संरचना व्यवहार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यवहार को निर्धारित करने में सर्वाधिक योगदान स्नायु-संस्थान का होता है। स्नायु-संस्थान ही उत्तेजनाओं को ग्रहण करता है तथा व्यवहार को निर्देशित करता है। स्नायु-संस्थान की सबसे छोटी इकाई को स्नायु अगवा न्यूरॉन (Neuron) कहते हैं।

स्नायु अथवा न्यूरॉन का अर्थ

जीवित प्राणियों के शरीर की एक विशेष प्रकार की कोशिकाओं को स्नायु अथवा न्यूरॉन कहा जाता है। स्नायु अथवा स्नायु कोशिका का सम्बन्ध शरीर के स्नायु-तन्त्र से होता है। स्नायु अथवा न्यूरॉन का मुख्य कार्य स्नायु-प्रवाहों या आवेगों (Nerve Impulses) को शरीर में परिचालित करना अथवा ढोना होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्नायु अथवा न्यूरॉन शरीर की वे कोशिकाएँ हैं जो शरीर में स्नायु-प्रवाह को ढोने या चलाने का कार्य करती हैं।

स्नायु की संरचना य

दि स्नायु की संरचना का अध्ययन किया जाए तो स्नायु में तीन प्रमुख भाग दिखाई पड़ते हैं
(1) वृक्षतन्तु
(2) जीवकोश तथा
(3) अक्षतन्तु। इन तीनों भागों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

(1) वृक्षतन्तु (Dendrite)- स्नायु अथवा न्यूरॉन वृक्षतन्तु या वृक्षिका को एक भाग वृक्षतन्तु या वृक्षका कहलाता है। स्नायु के । इस भाग की सम्बन्ध जीवकोश से होता है। जहाँ तक इस अक्षतन्तु भाग के आकार का प्रश्न है, यह बिल्कुल किसी वृक्ष की शाखाओं के समान अनियमित-सा होता है। अनेक है -शाखाओं-प्रशाखाओं के कारण स्नायु का यह भाग घना-सा दिखाई देता है। वृक्षतन्तु द्वारा सामान्य रूप से दो
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प्रकार के कार्य किये जाते हैं। इसका प्रथम कार्य जीवकोश है-स्नायु-प्रवाह को ग्रहण करना तथा द्वितीय कार्य चित्र-स्नायु अथवा न्यूरॉन की रचना है—ग्रहण किये गये स्नायु-प्रवाह को स्नायु के मूल भाग जीवकोश को प्रदान करना। वृक्षतन्तु द्वारा स्नायु-आवेग को ग्रहण करने का मुख्य कार्य सम्पन्न करने के कारण इसे ग्राहीतन्तु भी कहते हैं।

(2) जीवकोश (Cell body)- जीवकोश जीवधारियों की एक इकाई है तथा इसे जीवन का मौलिक आधार कहा जाता है।
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इन्हें स्नायुकोश या कोशाण भी कह सकते हैं। इनकी आकृति वृत्ताकार या अण्डाकार हो सकती है। एक जीवकोश की रचना कई अवयवों से मिलकर होती है। सभी जीवकोश जीवद्रव्य (Protoplasm) नामक तरल पदार्थ से बनते हैं जो रंगहीन जैली की तरह होता है। जीवकोश की रचना कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) और केन्द्रक (Nucleus) से होती है। जीवकोश के चारों ओर एक झिल्ली, कोशिका झिल्ली (Cell-membrane) होती है जो अत्यन्त पतली व लचीली होती है और दबाव पड़ने से फट सकती है। जीवकोश के मध्य में केन्द्रक होता है जिसके भीतर एक पतली झिल्ली होती है जिसे केन्द्रक जीवद्रव्य (Nucleoplasm) कहते हैं। स्नायु का जीवकोश एक महत्त्वपूर्ण अंग है जिससे प्रत्येक स्नायु-आवेग गुजरता है। वृक्षतन्तुओं द्वारा ग्रहण किये जाने वाले स्नायु-आवेग जीवकोश के केन्द्र में आते हैं और यहाँ से अक्षतन्तु की ओर भेज दिये जाते हैं। अक्षतन्तु से ये स्नायु-आवेग स्नायु-ग्रन्थि या मांसपेशी आदि तक पहुँचते हैं।

(3) अक्षतन्तु (Axons)- स्नायु की संरचना में ‘अक्षतन्तु’ स्नायु का सबसे लम्बा भाग होता है। ये दुम की तरह निकले होते हैं। अक्षतन्तु के एक सिरे पर अन्तिम छोर वाले भाग को एण्ड-ब्रश (End-brush) कहते हैं। अक्षतन्तु की संरचना में तीन झिल्लियाँ होती हैं। जो स्नायु-आवेग जीवकोश में आता है, वह अक्षतन्तु के माध्यम से एण्ड-ब्रश से गुजरता हुआ दूसरे स्नायु वृक्ष के तन्तु को, मांसपेशियों को या किसी ग्रन्थि को भेज दिया जाता है।

वस्तुत: बाह्य एवं आन्तरिक उद्दीपकों से उत्पन्न उत्तेजनाओं को वृक्षतन्तु (Dendrites) तथा अक्षतन्तु (Axons) के माध्यम से केन्द्रों तक प्रेषित किया जाता है। स्नायु तन्तु तथा मांसपेशियाँ अक्सर ‘हाँ/ना’ के इस नियम का पालन करती हैं कि उद्दीपक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकते हैं या नहीं।

स्नायुओं के प्रकार

प्रकार्यात्मक (Functional) दृष्टि से स्नायुओं के तीन प्रमुख प्रकार हैं-
(1) ज्ञानवाही स्नायु,
(2) कर्मवाही स्नायु तथा
(3) संयोजक स्नायु। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
(1) ज्ञानवही स्नायु (Sensory Neurons)- भ. ज्ञानवाही स्नायुओं में वृक्षतन्तु अपेक्षाकृत अधिक लम्बे तथा । ज्ञानेन्द्रियों की तरफ होते हैं। ये स्नायु-आवेगों को ज्ञानेन्द्रियों से वृक्षतन्तुओं के माध्यम से ग्रहण कर सुषुम्ना नाड़ी या मस्तिष्क तक प्रेषित करते हैं। संवेदनाओं को उत्पन्न करने । का कार्य भी इन्हीं का होता है; जैसे—स्पर्श, गर्मी, सर्दी या चित्र-ज्ञानवाही स्नायु पीड़ा की संवेदना।
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(2) कर्मवाही स्नायु (Motor Neurons)- कर्मवाही स्नायुओं में प्रायः जीवकोश ऊपर की ओर स्थित होता है जिसमें वृक्षतन्तुओं की संख्या कम होती है और वृक्षतन्तु जीवकोश के चारों ओर मिलते हैं। इस तरह के कर्मवाही स्नायु शरीर के विभिन्न भागों के अलावा सुषुम्ना नाड़ी और मस्तिष्क में भी पाये जाते हैं। कर्मवाही स्नायु का मुख्य कार्य स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क से बाहर ले जाकर ऊतकों तक पहुँचाना है। इन स्नायुओं द्वारा मांसपेशियों में गति उत्पन्न होती है तथा ग्रन्थियों को क्रियाशील बनाने हेतु स्राव उत्पन्न होता है।

(3) संयोजक स्नायु (Co-ordinating Neurons)- संयोजक स्नायु शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार की संरचना वाले होते हैं। ये संयोजक स्नायु सुषुम्ना 7 नाड़ी और मस्तिष्क में सबसे ज्यादा संख्या में उपस्थित रहते हैं और सुषुम्ना व मस्तिष्क के बीच सम्पर्क स्थापित करते हैं। इन्हें ज्ञानवाही तथा कर्मवाही स्नायुओं के बीच में फैला हुआ। चित्र-कर्मवाही स्नायु देखा जा सकता है। इनका प्रधान कार्य विभिन्न
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स्नायुओं को आपस में जोड़ने का है। व्रस्तुतः ये एक विशाल भवन में टेलीफोन व्यवस्था की तरह हैं। जिसमें कुछ तार अन्दर जाते हैं तो कुछ तार बाहर आते हैं और भवन के प्रत्येक हिस्से से सम्पर्क स्थापित कर देते हैं। इसी तरह से ये स्नायु-तन्तु आन्तरिक तारों के समान शरीर के विभिन्न विभागों व क्षेत्रों को परस्पर जोड़ने का कार्य करते हैं। इसके परिणामतः शरीर के विभिन्न अंग अच्छी तरह कार्य करने लगते हैं।

स्नायु-तन्त्र के कार्य (Functions of Neurons)- स्नायु-तन्त्र की कार्यात्मक इकाई स्नायु या न्यूरॉन है, अतः स्नायु-तन्त्र के कार्य स्नायु या न्यूरॉन द्वारा ही किये जाते हैं। स्नायु द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है—विभिन्न उत्तेजनाओं को ग्रहण करना तथा उन्हें शरीर से सम्बन्धित केन्द्रों में। भेजना। यह कार्य स्नायु-प्रवाह अथवा आवेग के माध्यम से सम्पन्न होता है। स्नायु के वृक्षतन्तु नामक भाग द्वारा स्नाय-आवेग को ग्रहण किया जाता है। वह उसके जीवकोश नामक भाग को संचारित कर देता है। जीवकोश द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-आवेग पुनः अक्षतन्तु नामक भाग को संचारित कर दिया जाता है जहाँ से यह आवेग स्नायु-तन्त्र के अभीष्ट केन्द्र को भेज दिया जाता है तथा अभीष्ट ज्ञान। प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न2
तन्त्रिका आवेग से क्या आशय है? इसके मापन का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

तन्त्रिका आवेग 

तन्त्रिका-तन्त्र की विभिन्न नाड़ियाँ अनेक स्नायुओं से मिलकर बनी होती हैं। इन्हीं स्नायुओं में तन्त्रिको आवेग या नाड़ी आवेग या नाड़ी प्रवाह (Nerve Impulse) 300 से 500 फीट प्रति सेकण्ड की गति से कार्य करता है। प्रत्येक तन्त्रिका आवेग का एक निश्चित सीमान्त होता है। इस भाँति, तन्त्रिका आवेग एक तरह का स्वतः उद्दीप्त (Self-initiated) आवेग या प्रवाह होता है जो एक स्नायु में एकसमान गति से प्रवाहित होता है।

अध्ययनों का निष्कर्ष है कि प्रत्येक तन्त्रिका आवेग विद्युत-रासायनिक प्रकृति (Electro Chemical Nature) का होता है। जब कोई स्नायु, तन्त्रिका आवेगरहित स्थिति अर्थात् विश्राम की अवस्था (Resting State) में होता है तो स्नायु की झिल्ली के दोनों ओर अर्थात् अन्दर व बाहर की तरफ विद्युत-रासायनिक विभवान्तर पैदा होता है। इसका अभिप्राय यह है कि स्नायु के बाहर की तरफ धनात्मक आवेश (Positive Ions) तथा अन्दर की तरफ ऋणात्मक आवेश (Negative Ions) होते हैं। दोनों ही आवेशों को वोल्टमीटर की मदद से मापा जा सकता है।
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धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेशों के निःधुवण (Depolarization) के समय सम्पूर्ण स्नायु में या तो कुल नि:ध्रुवण होता है या यह बिल्कुल भी नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, स्नायु का नि:ध्रुवण ‘सम्पूर्ण या कुछ भी नहीं सिद्धान्त (All or None Law) पर आधारित होता है। स्नायुओं में तन्त्रिका आवेग (नाड़ी प्रवाह) विद्युतीय निःधुवण (Electric Depolarization) के आधार पर आगे बढ़ता है।

स्नायु सन्धि पर तन्त्रिका आवेग के प्रवाहित होने का आधार,खासतौर पर रासायनिक होता है और रासायनिक पदार्थों के आधार पर ही ज्यादातर स्नायु सन्धियों पर तन्त्रिका आवेग एक स्नायु से दूसरे स्नायु की ओर प्रवाहित होता है। प्रयोगों से यह भी पता चला है कि एक स्नायु को एक बार नि:ध्रुवण होने के बाद दूसरी बार नि:ध्रुवण तत्काल न होकर कुछ समय के उपरान्त होता है। इस समय-अन्तराल या अवधि को तिर्यक अवधि (Refractory Period) कहा जाता है और इसका औसत काल एक सेकण्ड का एक हजारवाँ भाग ([latex]\cfrac { 1 }{ 1000 } [/latex] वाँ भाग) मापा गया है। इस भाँति, तन्त्रिका आवेग स्नायुओं में प्रवाहित होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्नायु-सन्धि (Synapse) से आप क्या समझते हैं?
या
सन्धि-स्थल को चित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए। (2016)
उत्तर
स्नायु-सन्धि शरीर के भीतर वे स्थान हैं जहाँ दो-या-दो से अधिक स्नायु एक-दूसरे से नाड़ी आवेग को लेते या देते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न भागों पर स्नायु-तन्तुओं के जोड़ या संयोजक या सन्धियाँ दिखाई पड़ती हैं, जिन्हें स्नायु-सन्धि (Synapse) कहा जाता है। हालाँकि दो स्नायुओं के सिरे एक-दूसरे के बहुत समीप होते हैं, किन्तु शरीर-रचना-शास्त्र के अनुसार दो स्नायु कभी आपस में पूरी तरह जुड़ते नहीं हैं। दो स्नायुओं का यह संगम (Junction) ही स्नायु-सन्धि है। इस सन्धि पर अधिक या एक अक्षतन्तु का सिरा दूसरे स्नायुओं के वृक्षतन्तु को सन्देश या आवेग सम्प्रेषित करता है। अर्थात् अपने में से होकर गुजरने देता है।
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प्रश्न 2
स्नायु-सन्धि की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
स्नायु-सन्धि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. स्नायु-सन्धियाँ एकपक्षीय मार्ग (One-way Traffic) पर कार्य करती हैं। इनसे नाड़ी आवेग या सन्देश एक ही दिशा में प्रवाहित हो सकता है, उसके विपरीत दिशा में नहीं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि एक स्नायु के अक्षतन्तु से नाड़ी आवेग दूसरे स्नायु के वृक्षतन्तु या जीवकोश की ओर गुजर सकता है, इसकी विपरीत दिशा में नहीं गुजर सकता।
  2. किसी भी स्नायु–सन्धि पर दो-या-दो से अधिक स्नायु सम्बन्धित होते हैं।
  3. किन्हीं भी दो स्नायुओं के बीच कुछ-न-कुछ खाली स्थान होना अपरिहार्य समझा जाता है।
  4. स्नायु की अपेक्षा स्नायु-सन्धि को पार करने में नाड़ी आवेग को अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है।
  5. स्नायु-सन्धि से नाड़ी आवेग गुजरते समय, स्नायु-सन्धि परे नाड़ी आवेग या स्नायु आवेग की गति अपेक्षाकृत धीमी हो जाती है।

तिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्नायु द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्यों को स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर
स्नायु-तन्त्र की कार्यात्मक इकाई स्नायु या न्यूरॉन है; अतः स्नायु-तन्त्र के कार्य स्नायु या न्यूरॉन द्वारा ही किये जाते हैं। स्नायु द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है—विभिन्न उत्तेजनाओं को ग्रहण करना तथा उन्हें शरीर के सम्बन्धित केन्द्रों में भेजना। यह कार्य स्नायु-प्रवाह अथवा आवेग के माध्यम से सम्पन्न होता है। स्नायु के वृक्षतन्तु नामक भाग द्वारा स्नायु-आवेग को ग्रहण किया जाता है। जो उसे जीवकोश नामक भाग को संचारित कर देता है। जीवकोश द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-आवेग पुनः अक्षतन्तु नामक भाग को संचारित कर दिया जाता है जहाँ यह आवेग स्नायु-तन्त्र के अभीष्ट केन्द्र को भेज दिया जाता है तथा अभीष्ट ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 2
संयोजक स्नायुकोश का क्या कार्य है? (2017)
उत्तर
संयोजक स्नायुकोशों का मुख्य कार्य विभिन्न स्नायुओं को आपस में जोड़ने का है। ये सुषुम्ना तथा मस्तिष्क के बीच सम्पर्क स्थापित करते हैं। संयोजक स्नायु शरीर के विभिन्न विभागों तथा क्षेत्रों को परस्पर जोड़ने का कार्य करते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न अंग अच्छी तरह से कार्य करने लगते हैं।

निश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1 निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए
1. स्नायु-तन्त्र का निर्माण करने वाली कोशिकाओं को …………. कहते हैं।
2. तन्त्रिका-तन्त्र की मौलिक इकाई को …………. कहते हैं।
3. तन्त्रि-तन्त्र में पाये जाने वाले कोशों को ………… कहते हैं।
4. जीवकोश ………… का एक अंग है। 
(2012)
5. स्नायु अथवा न्यूरॉन का मुख्य कार्य ……..को शरीर में परिचालित करना अथवा ढोना होता है।
6. सूचनाओं को मस्तिष्क तथा सुषुम्ना तक पहुँचाने का कार्य ……………का होता है। (2009)
7. वृक्षतन्तु द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-आवेग ……………. को प्रदान कर दिया जाता है।
8. ज्ञानेन्द्रियों से स्नायु-प्रवाह को ग्रहण करने वाले स्नायुओं को ……………… कहते हैं।
9. स्नायु-प्रवाह को मांसपेशियों तथा पिण्डों तक पहुँचाने का कार्य करने वाले स्नायुओं को 
……….. कहते हैं।
10. ज्ञानवाही तथा कर्मवाही स्नायुओं को परस्पर सम्बद्ध करने वाले स्नायुओं को
……….. कहते हैं।
11. स्नायु-तन्त्र में दो या दो से अधिक स्नायुओं के परस्पर सम्बद्ध होने के स्थल को 
………………. कहते हैं।
12. ……………… पर स्नायु-प्रवाह ‘सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं’ के नियम से संचालित होता है। 
(2011)
13. सन्धि-स्थल पर स्नायु-प्रवाह………………. के नियम से संचालित होता है। (2010)
14. स्नायु-तन्त्र में स्नायु-आवेग………………. के माध्यम से ही अग्रसर होता है।
15. स्नायु कोशिका में उत्पन्न होने वाले विद्युत-रासायनिक विक्षोभ को . …………….. कहते हैं।
16. स्नायु-आवेग का मापन ……………… द्वारा किया जाता है।
उत्तर
1.स्नायु अथवा न्यूरॉन, 2. न्यूरॉन, 3. न्यूरॉन, 4. स्नायु कोशिका या न्यूरॉन, 5. स्नायु-आवेग, 6. न्यूरॉन, 7. जीवकोश, 8. ज्ञानवाही स्नायु, 9. कर्मवाही स्नायु, 10. संयोजक स्नायु, 11. स्नायु-सन्धि, 12. सन्धि-स्थल, 13. ‘सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं’, 14. स्नायु-सन्धि, 15, स्नायु-आवेग, 18. गैल्वेनोमीटर।

प्रश्न II.निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए- :
प्रश्न 1.
न्यूरॉन का अर्थ लिखिए।
उत्तर
स्नायु-तन्त्र की कोशिकाओं को न्यूरॉन कहते हैं।

प्रश्न 2.
‘स्नायु अथवा ‘न्यूरॉन की परिभाषा लिखिए। |
उत्तर
‘स्नायु’ अथवा ‘न्यूरॉन’ शरीर की वे कोशिकाएँ हैं जो शरीर में स्नायु-प्रवाह को ढोने या चलाने का कार्य करती हैं।

प्रश्न 3.
स्नायु अथवा न्यूरॉन के मुख्य भागों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
(1) वृक्षतन्तु या वृक्षिका,
(2) जीवकोश तथा
(3) अक्षतन्तु।

प्रश्न 4.
स्नायु-तन्त्र में पाये जाने वाले न्यूरॉन के प्रकार बताइए।
उत्तर
(1) ज्ञानवाही न्यूरॉन
(2) कर्मवाही न्यूरॉन तथा
(3) संयोजक स्नायु।

प्रश्न 5.
कर्मवाही स्नायु के मुख्य कार्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
कर्मवाही स्नायु का मुख्य कार्य स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क से बाहर ले जाकर ऊतकों तक पहुँचाना है।

प्रश्न 6.
स्नायु-सन्धि से क्या आशय है? ।
उत्तर
स्नायु-सन्धि शरीर के भीतर वे स्थान हैं जहाँ दो या दो से अधिक स्नायु एक-दूसरे से स्नायु-आवेग को लेते या देते हैं।

प्रश्न 7.
तन्त्रिका आवेग की प्रकृति क्या होती है?
उत्तर
तन्त्रिका आवेग की प्रकृति विद्युत-रासायनिक होती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
शरीर में स्नायु आवेग को संचारित करने वाली कोशिका को कहते हैं
(क) रक्त कोशिका
(ख) साधारण कोशिका
(ग) न्यूरॉन या स्नायु
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) न्यूरॉन या स्नायु

प्रश्न 2.
स्नायु-तन्त्र की संरचनात्मक इकाई को कहते हैं
(क) कोशिका
(ख) वृक्षतन्तु
(ग) स्नायु
(घ) सुषुम्ना
उत्तर:
(ग) स्नायु

प्रश्न 3.
इनमें से कौन स्नायुकोश (न्यूरॉन) का अंग है?
(क) वृक्षतन्तु
(ख) थायरॉइड
(ग) संग्राहक
(घ) ज्ञानवाही स्नायु
उत्तर:
(क) वृक्षतन्तु

प्रश्न 4.
कौन न्यूरॉन का भाग है? (2011, 15)
(क) सेतु
(ख) जीवकोश
(ग) उद्दीपक
(घ) ज्ञानेन्द्रिय
उत्तर:
(ख) जीवकोश

प्रश्न 5.
कौन न्यूरॉन का अंग नहीं है।
(क) वृक्षतन्तु
(ख) जीवकोश
(ग) सेतु
(घ) अक्षतन्तु
उत्तर:
(ग) सेतु

प्रश्न 6.
न्यूरॉन के उस भाग को क्या कहते हैं जिसके द्वारा स्नायु-प्रवाह को ग्रहण किया जाता है?
(क) वृक्षतन्तु
(ख) अक्षतन्तु
(ग) जीवकोश
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) वृक्षतन्तु

प्रश्न 7.
जीवकोश द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-प्रवाह
(क) वृक्षतन्तु को प्रेषित किया जाता है
(ख) अन्य जीवकोशे को प्रेषित किया जाता है।
(ग) अक्षतन्तु को प्रेषित किया जाता है
(घ) अपने आप में समेट लिया जाता है।
उत्तर:
(ग) अक्षतन्तु को प्रेषित किया जाता है

प्रश्न 8.
ज्ञानेन्द्रियों से स्नायु-प्रवाह को ग्रहण करने वाले स्नायु को कहते हैं
(क) ज्ञानवाही स्नायु
(ख)कर्मवाही स्नायु
(ग) संयोजक स्नायु
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ज्ञानवाही स्नायु

प्रश्न 9.
स्नायु-तन्त्र में एक स्नायु के वृक्षतन्तु तथा दूसरे स्नायु के अक्षतन्तु में सम्बन्ध स्थापित होने के स्थल को कहते हैं
(क) ज्ञानकेन्द्र
(ख) मिलन बिन्दु
(ग) स्नायु-सन्धि
(घ) ये सभी
उत्तर:
(ग) स्नायु-सन्धि

प्रश्न 10.
स्नायु कोशिका के उद्दीप्त होने के कारण उसमें उत्पन्न होने वाले विद्युत-रासायनिक विक्षोभ को कहते हैं (2012)
(क) ज्ञान का संचार
(ख) स्नायु आवेग
(ग) स्नायविक कण्ट
(घ) उत्तेजना
उत्तर:
(ख) स्नायु आवेग

प्रश्न 11.
स्नायु सन्धि-स्थल के सम्बन्ध में गलत कथन है (2017)
(क) स्नायु सन्धि-स्थल पर दो स्नायुकोशों के बीच कुछ दूरी होती है।
(ख) स्मायु सन्धि-स्थल पर स्नायु प्रवाह ‘सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं’ के नियम से संचालित 
होता है।
(ग) स्नायु सन्धि-स्थल पर स्नायु प्रवाह कुछ धीमा पड़ जाता है।
(घ) स्नायु सन्धि-स्थल पर स्नायु-प्रवाह रुक जाता है।
उत्तर:
(घ) स्नायु सन्धि-स्थल पर स्नायु-प्रवाह रुक जाता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources : Quality and Quantity

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources : Quality and Quantity (मानवीय संसाधन : गुणवत्ता एवं मात्रा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources : Quality and Quantity (मानवीय संसाधन : गुणवत्ता एवं मात्रा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 19
Chapter Name Human Resources : Quality and Quantity (मानवीय संसाधन : गुणवत्ता एवं मात्रा)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources : Quality and Quantity (मानवीय संसाधन : गुणवत्ता एवं मात्रा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के कारणों का परीक्षण कीजिए। [2010, 12, 13, 14]
या
टिप्पणी लिखिए-भारत में जनसंख्या का वितरण। [2010]
या
भारत में जनसंख्या वृद्धि हेतु उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए। [2013]
या
जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारकों की विवेचना करते हुए भारत में जनसंख्या वितरण का विवरण लिखिए। [2007, 08, 10]
या
भारत में जनसंख्या के असमान वितरण हेतु उत्तरदायी भौगोलिक कारकों की विवेचना कीजिए। [2009, 11]
या
भारत की जनसंख्या का विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत लिखिए –
(i) वृद्धि,
(ii) भौगोलिक वितरण,
(iii) आन्तरिक स्थानान्तरण (प्रवास)। [2010]
या
भारत में जनसंख्या की वृद्धि तथा वितरण की विवेचना कीजिए। [2008, 09, 11]
या
भारत में जनसंख्या के घनत्व एवं वितरण को स्पष्ट कीजिए तथा बढ़ती हुई जनसंख्या के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डालिए। [2008, 09]
या
भारत में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिए। [2014]
उत्तर

जनसंख्या की वृद्धि Growth of Population

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में भारत की जनसंख्या का अनुमान मोरलैण्ड के अनुसार केवल 10 करोड़ होने का था। सन् 1750 में यह 13 करोड़ हो गयी। फिण्डले शिराज के अनुसार, जनसंख्या वृद्धि की गति 2% प्रति दशाब्दी थी। सन् 1847 और 1850 के बीच भारत की अनुमानित जनसंख्या लगभग 15 करोड़ थी लेकिन ये अनुमान विश्वसनीय नहीं माने जाते हैं। सन् 1881 में पहली बार भारत में जनगणना की गयी जिसके अनुसार जनसंख्या 25 करोड़ थी। तत्पश्चात् प्रति दशाब्दी में जनगणना होती रही है। वर्ष 1991 में कुल जनसंख्या 84.63 करोड़ थी जो 1921 की तुलना में लगभग 3.4 गुना अधिक हो गयी थी।

वर्ष 1891 से 1921 तक के तीस वर्षों में केवल 1.20 करोड़ की वृद्धि हुई, अर्थात् प्रतिवर्ष 4 लाख की दर से किन्तु वर्ष 1921 के उपरान्त जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई, अतः वर्ष 1951 को Great Divide की संज्ञा दी गयी है क्योंकि जहाँ वर्ष 1921 से 1951 के मध्य यह वृद्धि 11 करोड़ रही, वहीं स्वतन्त्रता के पश्चात् वर्ष 1951 से होने वाली वृद्धि दर ने पूर्व सभी अनुमानों को पीछे छोड़ दिया। वर्ष 1951 और वर्ष 1961 के बीच 7.8 करोड़ की वृद्धि हुई। वर्ष 1961 से 1971 के बीच वृद्धि की मात्रा 10.8 करोड़ एवं 1971 से 1981 के मध्य 13.7 करोड़ एवं वर्ष 1981-91 के बीच यह वृद्धि 16.66 करोड़ हुई जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है। सन् 2001 में देश की जनसंख्या 102.7 करोड़ हो गयी।

इस प्रकार सन् 1991-2001 में दशकीय वृद्धि 21.34% रही। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या का औसत घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, परन्तु विभिन्न क्षेत्रों में इसमें भारी भिन्नता । पायी जाती है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ हो गयी है तथा औसत जनघनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। एक ओर बिहार राज्य में जनसंख्या का घनत्व 1,102 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, वहीं दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश में मात्र 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी निवास करते हैं।

जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक
Geographical Factors Affecting to the Distribution of Population

भारत में जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं –
(1) धरातल या भू-आकृति – धरातल की प्रकृति या भू-आकृति जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। समतल मैदानी भागों में मनुष्य के लिए आजीविका के साधन (विशेषतः कृषि) तथा परिवहन के साधन आदि पर्याप्त विकसित होते हैं, इसलिए भारत में सर्वाधिक जनसंख्या मैदानों (नदी-घाटियों तथा डेल्टाओं) में निवास करती है। गंगा घाटी तथा डेल्टा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी के डेल्टा प्रदेश इसीलिए घने आबाद हैं। इसके विपरीत पठारी, पहाड़ी तथा मरुस्थलीय क्षेत्रों में कम आबादी मिलती है। हिमालय के उच्च पर्वतीय क्षेत्र तथा थार मरुस्थले विरल आबाद हैं। प्रायद्वीप के पठारी क्षेत्रों में मध्यम सघन आबादी मिलती है।

(2) स्वास्थ्यप्रद जलवायु – अनुकूल जलवायु मानव को क्षेत्र विशेष में रहने को आकर्षित करती है। भाबर, तराई, गंगा का निम्न डेल्टा आदि क्षेत्रों में दलदल व वनों की अधिकता तथा आर्द्र जलवायु के कारण विषैले कीड़े-मकोड़े तथा जंगली जीवों एवं बीमारी के कारण बहुत कम घने बसे हैं, जबकि भारत के मैदानी क्षेत्रों में अच्छी जलवायु के कारण सर्वत्र अधिक जनसंख्या पायी जाती है।

(3) तापमान – अधिक ऊँचे तापमान जनसंख्या के जमाव में बाधा डालते हैं, जबकि सामान्य तापमान इसको आकर्षित करते हैं। बहुत ही नीचे तापमान, जैसे ऊँचे हिमालय प्रदेश शीत के कारण जनसंख्या से शून्य होते हैं, किन्तु निचले पहाड़ी ढाल ग्रीष्म ऋतु में मैदानी भागों की अपेक्षा ठण्डे रहते हैं। अत: शिमला, नैनीताल, मसूरी आदि की ग्रीष्म ऋतु में जनसंख्या बढ़ जाती है, किन्तु शीत ऋतु में ठण्ड के कारण फिर से घट जाती है।

(4) वर्षा की मात्रा (जल उपलब्धता) – भारत जैसे कृषिप्रधान देश में जनसंख्या का वितरण एवं घनत्वं वर्षा की मात्रा अथवा जल उपलब्धता से विशेष रूप से प्रभावित है। 100 सेमी वर्षा रेखा के पश्चिमी भाग, वर्षा की कमी के कारण कम घने हैं, जबकि इसके पूर्वी भागों में घनत्व अधिक पाया जाता है। कम वर्षा वाले भागों में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में सिंचित क्षेत्रों के कारण जनसंख्या अधिक पायी जाती है। इसके विपरीत, असम तथा हिमाचल प्रदेश में जल का निकास ठीक न होने से अधिक वर्षा होने पर भी जनसंख्या कम पायी जाती है।

(5) उपजाऊ भूमि – भारत में सबसे अधिक जनसंख्या उपजाऊ समतल मैदानों, नदियों की घाटियों, तटीय मैदानों या डेल्टाओं में निवास करती है, क्योंकि इन क्षेत्रों की उपजाऊ भूमि उन्हें पर्याप्त
खाद्यान्न एवं जीविकोपार्जन के साधन प्रदान करती है। यही कारण है कि भारत में जनसंख्या का घनत्व उत्तर के विशाल मैदान और पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय मैदानों में अधिक पाया जाता है, जबकि दक्कन के पठार तथा थार के मरुस्थल में जनसंख्या कम निवास करती है।

(6) यातायात के साधन – यातायात के साधन मानव-जीवन में उपयोगी पदार्थों की आपूर्ति करते हैं। व्यापार, उद्योग, कृषि आदि सभी यातायात साधनों से प्रभावित होते हैं। पर्वतीय वनों से ढके हुए तथा मरुस्थलीय प्रदेशों में, जहाँ परिवहन के साधनों का विकास नहीं हो पाया है, अपेक्षाकृत कम जनसंख्या निवास करती है। गंगा-यमुना के विशाल मैदानों में रेलों एवं सड़कों का जाल बिछा होने के कारण जनसंख्या का जमघट पाया जाता है।

(7) उद्योग-धन्धे – उद्योग-धन्धे जनसंख्या के वितरण को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। मानव प्राचीन काल से ही जीवन-यापन के विविध साधनों की ओर आकर्षित होता रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों में लोग रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से दूर-दूर से आकर बस जाते हैं। फलतः इन क्षेत्रों में जनसंख्या को अत्यधिक केन्द्रीकरण हो जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु राज्य उद्योग-धन्धों के कारण ही घने बसे हुए हैं।

(8) खनिज पदार्थ – जिन राज्यों में कोयला, लौह-अयस्क, ताँबा, सोना, खनिज तेल आदि उपयोगी एवं बहुमूल्य खनिज पदार्थ निकाले जाते हैं, वहाँ जनसंख्या का घनत्व भी अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। भारत में छोटा नागपुर का पठार, बिहार, ओडिशा तथा तमिलनाडु राज्यों में जैसे-जैसे खनिज पदार्थों का खनन होता गया वैसे-वैसे जनसंख्या के घनत्व में निरन्तर वृद्धि होती गयी। इसी प्रकार असम और गुजरात के खनिज तेल क्षेत्रों में भी धीरे-धीरे जनसंख्या घनत्व में वृद्धि हो रही है।

(9) शान्ति एवं सुरक्षा – मानव स्वभाव से उन्हीं क्षेत्रों में बसना चाहता है जहाँ उसे चोर-डाकुओं का भय नहीं रहता तथा उसे अपनी जान-माल को सुरक्षित रखने में कोई कठिनाई नहीं होती। चम्बल घाटी में डाकुओं के भय से लोग अन्य स्थानों पर बस गये हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में पड़ोसी देशों द्वारा सदैव घुसपैठ करते रहने के कारण शान्ति एवं सुरक्षा भंग होती रहती है; अत: इन क्षेत्रों में सामान्यतः जनसंख्या कम पायी जाती है अथवा अस्थायी रूप से निवास करती है; जैसे-जम्मू-कश्मीर राज्यों में द्रास एवं कारगिल क्षेत्र।

उपर्युक्त कारणों के आधार पर भारत में औद्योगिक केन्द्रों, पत्तनों के समीप, नदियों की घाटियों, समतल मैदानों एवं खनन क्षेत्रों के समीप जहाँ जीवन-यापन एवं आवागमन के साधनों की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जनसंख्या अधिक निवास करती है। इसके विपरीत पहाड़ी, पठारी एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों, जहाँ प्रतिकूल जलवायु एवं जल का अभाव पाया जाता है, जनसंख्या कम निवास करती है। भारत के कृषि-क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व सघन पाया जाता है। यह कृषि-क्षेत्र पंजाब के सिंचित क्षेत्र से आरम्भ होकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल होते हुए पूर्वी घाट के ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु राज्यों से पश्चिमी घाट, केरल, गोआ, महाराष्ट्र एवं गुजरात तक विस्तृत है।

भारत में जनसंख्या का वितरण
Distribution of Population in India

भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है। सम्पूर्ण देश में जनसंख्या का औसत घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। एक ओर कुछ क्षेत्रों में इस घनत्व में अधिकता है तो दूसरी ओर कुछ भागों में यह पर्याप्त अन्तर रखता है। सन् 1921 के बाद से अर्थात् 80 वर्षों में जनसंख्या का घनत्व तीन गुचे से भी अधिक हो गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद इसमें विशेष रूप से वृद्धि हुई है। देश में जहाँ एक ओर राजस्थान की शुष्क पेटी, असम की पहाड़ियों और दक्षिण के पठार पर अधिकांश भागों में जनसंख्या कम पायी जाती है, वहीं दूसरी ओर नदियों की घाटियों, समुद्रतटीय मैदानों, खनिज-प्राप्ति के क्षेत्रों तथा औद्योगिक केन्द्रों के निकटवर्ती भागों में आवश्यकता से अधिक जनसंख्या के जमाव पाये जाते हैं।

भारत में जनसंख्या के वितरण को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
(1) सघन जनसंख्या वाले क्षेत्र – इसके अन्तर्गत वे राज्य शामिल हैं जहाँ जन-घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक पाया जाता है। उन राज्यों में जन-घनत्व विशेष रूप से अधिक पाया जाता है जहाँ भूमि की उत्पादकता अधिक है, क्योंकि देश की लगभग 65% जनसंख्या कृषि-कार्यों में लगी हुई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी बंगाल राज्यों में उपजाऊ कॉप मिट्टी अधिकांश भागों में पायी जाती है। विशाल मैदान में देश की लगभग 39% जनसंख्या का निवास है, जबकि उसका क्षेत्रफल कुल का 19% ही है। इस मैदान पर जनसंख्या वर्षा के वितरण का अनुसरण करती है। वर्षा की मात्रा जैसे-जैसे पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की ओर कम होती जाती है, जनसंख्या का घनत्व भी उसके अनुसार ही कम होता जाता है।

भारत के राज्यों में जनसंख्या का वितरण एवं घनत्व: 2011
Distribution and Density of Population in the States of India : 2011

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources Quality and Quantity 1
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources Quality and Quantity 2
गेहूँ एवं चावल विशाल मैदान की प्रमुख खाद्यान्न फसलें हैं। चावल उत्पादक क्षेत्रों में जनसंख्या भी अधिक मिलती है। चावल की कृषि उपजाऊ मिट्टी एवं अधिक वर्षा पर निर्भर करती है। इसी कारण भारत में जनसंख्या के क्षेत्र चावल उत्पादक क्षेत्र ही हैं।

(2) मध्यम जनसंख्या के क्षेत्र – इसके अन्तर्गत उन राज्यों को सम्मिलित किया जा सकता है, जहाँ जन-घनत्व 200 से 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी के मध्य पाया जाता है। आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, असम, गुजरात, ओडिशा, महाराष्ट्र, हरियाणा, गोआ, त्रिपुरा आदि राज्य मध्यम जनसंख्या रखने वाले हैं। देश के उन भागों में जहाँ मानवीय आवास के लिए भौगोलिक सुविधाएँ अपेक्षाकृत कुछ कम अनुकूल हैं, वहाँ मध्यम जनसंख्या के क्षेत्र ही विकसित हुए हैं।

प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्रों में जहाँ चौड़ी नदी-घाटियाँ, सिंचाई की व्यवस्था, खनिजों की प्राप्ति एवं उद्योग-धन्धों का जमाव पाया जाता है, वहाँ पर जनसंख्या अधिक निवास करती है। पठार के पूर्वी क्षेत्रों में खनिजों की उपलब्धि के कारण बहुत-से उद्योगों का विकास हुआ है, वहाँ नवीन बस्तियों के उदय होने से अधिक जनसंख्या निवास करने लगी है।

(3) कम जनसंख्या के क्षेत्र – इसमें वे राज्य सम्मिलित हैं, जहाँ जनसंख्या का घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से कम पाया जाता है। इस श्रेणी के अन्तर्गत हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, मणिपुर, नागालैण्ड, मेघालय, सिक्किम, राजस्थान, अण्डमान-निकोबार द्वीप-समूह, जम्मू-कश्मीर तथा मिजोरम राज्य सम्मिलित किये जा सकते हैं।
इन क्षेत्रों में जनसंख्या के संकेन्द्रण विकसित नहीं हो पाये हैं। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी भारत तथा प्रायद्वीपीय पठारी भाग के पहाड़ी क्षेत्रों में कम जनसंख्या निवास करती है। इन क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ-निम्न तापमान, ऊबड़-खाबड़ असमतल धरातल, सघन वन, कम वर्षा, आवागमन के साधनों की कमी तथा असुरक्षा की भावना ने अधिक जनसंख्या के निवास को आकर्षित . नहीं किया है। फलस्वरूप यहाँ पर कम जनसंख्या ही निवास करती है।

जनसंख्या का आन्तरिक स्थानान्तरण
Internal Transfer of Population

स्थानान्तरण से तात्पर्य मानव-समूह या व्यक्ति के भौगोलिक या स्थान सम्बन्धी स्थानान्तरण से है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, “प्रवसन एक प्रकार की भौगोलिक प्रवासित अथवा स्थानिक प्रवासित है, जो एक भौगोलिक इकाई और दूसरी भौगोलिक इकाई के बीच देखने को मिलती है, जिनमें रहने का मूल स्थान अथवा पहुँचने का स्थान दोनों भिन्न होते हैं।”

स्थानान्तरण के प्रकार Types of Transfer
मानव का स्थानान्तरण दो प्रकार का होता है –
(1) स्थानीय एवं
(2) अन्तर्राष्ट्रीय।
(1) स्थानीय स्थानान्तरण से तात्पर्य किसी समुदाय या स्थानीय क्षेत्रों में ही आने-जाने से लिया जाता है। यह दो प्रकार का होता है-
(i) अन्तक्षेत्रीय और
(ii) गाँवों से नगरों की ओर।

(i) अन्तक्षेत्रीय स्थानान्तरण से तात्पर्य जनसंख्या के देश के किसी एक भाग से दूसरे भाग में जाने से होता है; जैसे-राजस्थान से मारवाड़ियों का व्यापार के सिलसिले में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल या भारत के अन्य राज्यों में। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक अथवा सामाजिक होता है।
(ii) गाँवों से नगरों को स्थानान्तरण में प्रायः औद्योगीकरण एवं व्यापार के फलस्वरूप नगरों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होने से गाँव से नगरों की ओर मानव-समूह का प्रवास अधिक होता है। कहीं इस प्रकार का प्रवास अल्पकालीन होता है और कहीं दीर्घकालीन। ऐसे स्थानान्तरण का मुख्य कारण अधिकतर रोजगार-प्राप्ति, शिक्षा अथवा चिकित्सा सम्बन्धी सुविधाओं का लाभ उठाना आदि है।

(2) अन्तर्राष्ट्रीय स्थानान्तरण के अन्तर्गत मानव समूह का प्रवास एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र को होता है। इस प्रकार चीनी लोग इण्डोनेशिया और वियतनाम में, भारतीय श्रीलंका, दक्षिणी-पूर्वी एशिया, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैण्ड में जाकर बसे हैं।

प्रश्न 2
भारत में जनसंख्या की समस्या पर एक भौगोलिक निबन्ध लिखिए। [2009]
या
भारत में जनसंख्या की समस्याओं का वर्णन कीजिए तथा जनसंख्या नियन्त्रण के लिए उपाय सुझाइए। [2016]
या
भारत में जनसंख्या-वृद्धि के उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए। [2010]
या
भारत में जनसंख्या-वृद्धि के कारणों पर प्रकाश डालते हुए इससे उत्पन्न समस्याओं के निराकरण हेतु सुझाव दीजिए। [2007, 08]
या
भारत में जनसंख्या की समस्याओं की विवेचना कीजिए तथा उनके समाधान के उपायों को सुझाइए। [2010, 14]
या
भारत में जनसंख्या की समस्याओं का वर्णन कीजिए। (2015)
या
भारत में जनसंख्या की वृद्धि तथा इससे उत्पन्न समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर

भारत में जनसंख्या-वृद्धि के कारण
Causes of Growth of Population in India

भारत में सन् 1991 की जनगणना के अनुसार 84.63 करोड़ व्यक्ति निवास कर रहे थे। यह जनसंख्या सन् 2011 की जनगणनानुसार 121.02 करोड़ हो गयी है। देश में जनसंख्या वृद्धि की दर 1971 से 1981 के बीच 24.66% थी, जबकि सन् 1981 से 1991 के दशक में 23.87% थी। सन् 2001-2011 के बीच 17.64% जनसंख्या-वृद्धि अंकित की गयी है। पिछले 80 वर्षों के अन्तराल में जनसंख्या तीन गुनी से भी अधिक हो गयी है। इस अतिशय जनसंख्या वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं –

  1. उष्ण जलवायु – भारत के उष्ण जलवायु का देश होने के कारण युवक एवं युवतियाँ शीघ्र ही सन्तति उत्पन्न करने योग्य हो जाते हैं, जिससे जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है।
  2. जन्म-दर का ऊँचा होना – भारत में जन्म-दर विश्व के अन्य विकासशील देशों से अधिक है, जबकि मृत्यु-दर कम है। फलस्वरूप जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
  3. शिक्षा एवं साक्षरता की कमी – भारतीय जनसंख्या का केवल 74.04% भाग ही साक्षर अर्थात् पढ़ा-लिखा है। इनमें भी पुरुष 82.14% तथा महिलाएँ 65.46% ही साक्षर हैं, जबकि ग्रामीण जनसंख्या की साक्षरता इससे भी कम है। इस प्रकार अधिकांश भारतीय रूढ़िवादी एवं भाग्यवादी हैं, जो अधिक सन्तानोत्पत्ति करना अपनी नियति समझते हैं।
  4. गरीबी एवं बेकस – भारत की अधिकांश जनसंख्या, मसेन एवं बेरोजगारी से त्रस्त है। उनका रहनसन एवं जीवनयापनका ढंगबहुत ही निम्न श्रेणी का है। इसे भी जनसंख्या-वृद्धि को बल मिला है।
  5. कम आयु में सिह करना – भारत में बहुत-से क्षेत्र आज भी ऐसे हैं, जहाँ छोटी आयु में ही विवाहकल दियेमतेज़स्थान राज्य इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इससे दम्पति कम आयु में ही सन्तान उत्पन्न करना आरम्भ कर देते हैं तथा जनसंख्या में वृद्धि होती जाती है।
  6. विवाह की अनिवार्यता – भारत में प्रत्येक व्यक्ति के लिए विवाह करना अनिवार्य समझा जाता है तथा विवाह होते ही बच्चे पैदा करना उससे भी अधिक आवश्यक माना जाता है। इस प्रकार निरन्तर सन्तानोत्पत्ति से जनसंख्या में वृद्धि होती जाती है।
  7. पुत्र-मोह का होना – अधिकांश भारतीय पुत्र-मोह से बँधे रहते हैं तथा पुत्र-प्राप्ति अनिवार्य समझते हैं। फलस्वरूप पुत्र प्राप्ति के लिए कभी-कभी कई-कई पुत्रियाँ जन्म ले लेती हैं।
  8. संयुक्त परिवारप्रम – भारत के अनेक क्षेत्रों में आज भी संयुक्त परिवार प्रथा का प्रचलन है। इस प्रथा में बच्चों का लालन-पालन सुगमता से हो जाता है। इसी कारण बच्चों की संख्या में वृद्धि हो जाने से जनसंख्या में भी तीव्र गति से वृद्धि होती है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक बच्चे परिवार की सुरक्षा समझे जाते हैं।
  9. परिवार-कल्याण कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार न होना – देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी परिवार कल्याण कार्यक्रमों का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया है। अशिक्षित जनसंख्या सन्तति निरोध तथा गर्भनिरोधक साधनों का प्रयोग नहीं करती। फलस्वरूप जनसंख्या में अबाध गति से वृद्धि होती रहती है।

भारत में जनसंख्या-वृद्धि के कारण उत्पन्न समस्याएँ
या
जनसंख्या-वृद्धि का भारत के आर्थिक विकास पर प्रभाव
Problems Produced by Population Growth in India
Or
Effects of Population Growth on Economic Development of India
देश में तीव्र जनसंख्या वृद्धि से अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है –

(1) प्रति व्यक्ति आय में कमी – भारत में आज भी 46% जनता गरीबी की रेखा से नीचे अपना जीवन बसर कर रही है, अर्थात् जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति आय में कमी आ गयी है। इससे निर्धनता में वृद्धि हुई है।

(2) जीवन-स्तर का निम्न होना – देश में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति आय में तो कमी हुई ही है, साथ ही जनता का जीवन-स्तर भी निम्न हो गया है। निर्धनता के कारण वे निम्न जीवन-स्तर बिताने के लिए बाध्य हो गये हैं। उनकी प्राथमिक आवश्यकताएँ; जैसे-भोजन, वस्त्र एवं आवास की भी पूर्ति नहीं हो पाती। देश के बहुत-से लोग आज भी गन्दी बस्तियों में नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

(3) बेरोजगारी की समस्या का होना – देश में तीव्र गति से जनसंख्या वृद्धि के कारण बेकारी की समस्या उग्र रूप धारण करती जा रही है। जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में देश में रोजगार साधनों की वृद्धि नहीं हो पाती है। फलस्वरूप देश के 7 करोड़ से अधिक नवयुवक रोजगार साधनों की तलाश में भटक रहे हैं।

(4) आर्थिक विकास की गति का अवरुद्ध होना – भारत में तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण आर्थिक-विकास की जो दिशा निर्धारित की गयी थी, उसको प्राप्त करना कठिन हो रहा है, क्योंकि अतिरिक्त जनसंख्या की प्राथमिक आवश्यकताओं के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा आदि के लिए व्यवस्था करनी पड़ती है, अर्थात् अतिरिक्त संसाधन जुटाने के कारण आर्थिक विकास की गति अवरुद्ध हो जाती है।

(5) पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या-जनसंख्या – वृद्धि के कारण अतिरिक्त उत्पादन में वृद्धि के लिए वनों का भारी विनाश किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती जा रही है। मानवोपयोगी सुविधाओं के अभाव के कारण भी प्रदूषण की समस्या बढ़ी है। इस ओर तुरन्त ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है अन्यथा देशवासियों का जीवन दूभर हो जाएगा।

(6) अपराधों एवं अनैतिक कार्यों में वृद्धि – देश में तीव्र जनसंख्या-वृद्धि के कारण बेरोजगारी में भारी वृद्धि हुई है। बेरोजगार युवक एवं युवतियाँ पथ-भ्रष्ट हो गये हैं तथा उनका झुकाव अपराधों एवं अनैतिक कार्यों की ओर हो गया है। इसी कारण देश में आज अपराधों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है।

(7) जीवन-यापन सम्बन्धी साधनों की कमी – तीव्र जनसंख्या-वृद्धि से देश में आवास, मनोरंजन, शिक्षा, चिकित्सा आदि जीवनोपयोगी सुविधाओं की कमी हो गयी है। व्यक्ति जीवन-पर्यन्त इन्हीं साधनों की प्राप्ति में भटक रहा है। उसका जीवन अशान्त हो जाने के कारण वह व्याधियों से घिर गया है।

(8) उत्पादक भूमि का ह्रास – तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण देश में उत्पादक भूमि में कमी होती जा रही है, क्योंकि उनकी आवासीय समस्या के समाधान के लिए उत्पादक कृषि भूमि में आवासों का विकास किया जा रहा है। उनके लिए परिवहन, संचार, व्यापार, उद्योग आदि सुविधाओं के विस्तार के कारण उत्पादक भूमि का ह्रास होता जा रहा है।

इस प्रकार, भारत में जनसंख्या विस्फोट के कारण भयावह स्थिति उत्पन्न हो गयी है। यदि समय रहते इस पर रोक न लगायी गयी तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। भारत सरकार इस दिशा में प्रयासरत है।

जनसंख्या-वृद्धि निवारण हेतु उपाय
Measured to solve the problem of Population Growth

पिछले 80 वर्षों में जनसंख्या लगभग तीन गुनी हो गयी है। इस अतिशय जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाना अति आवश्यक है, क्योंकि देश को खाद्यान्न उत्पादन उस गति से नहीं बढ़ पाया है, जिस गति से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है। जनसंख्या की इस वृद्धि को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –
(1) विवाह की आयु में वृद्धि करना – भारत में युवक एवं युवतियों के विवाह छोटी आयु में करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। दोनों के पूर्ण वयस्क हो जाने पर ही विवाह करने की छूट होनी चाहिए। विवाह जितनी अधिक आयु में किया जाएगा, बच्चे भी उतने ही कम उत्पन्न होंगे। अधिक आयु में विवाह करने के कारण युवतियाँ शिक्षा प्राप्त करेंगी या फिर उनकी रुचि सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यों के प्रति आकर्षित होगी। इन कार्यक्रमों से अधिक सन्तानोत्पत्ति में कमी आएगी तथा जनसंख्या वृद्धि की समस्या का समाधान करने के प्रयासों में भी वृद्धि होगी।

(2) उत्पादन में वृद्धि करना – आर्थिक उत्पादन में वृद्धि करने से मानव की रुचि एवं भौतिक समृद्धि में वृद्धि होती है तथा उसके रहन-सहन के स्तर में भी वृद्धि होती है। भारत के कृषि उत्पादन में वृद्धि होने की अभी पर्याप्त सम्भावनाएँ विद्यमान हैं तथा यदि देश में प्रति एकड़ उपज बढ़ा ली जाती है। तो उससे बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकता की पूर्ति की जा सकेगी। कृषि-क्षेत्र में विस्तार अभी भी किया जा सकता है। यदि राजस्थान में सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि कर दी जाए तो कुछ क्षेत्रों में बड़े-बड़े कृषि फार्म बनाये जा सकते हैं।

अन्य राज्यों में गहन खेती द्वारा प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाया। जा सकता है। देश में हरित क्रान्ति द्वारा खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के यथासम्भव प्रयास किये जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से देश में कृषि विश्वविद्यालयों तथा कृषि अनुसन्धान संस्थानों की स्थापना की गयी है। इनमें उन्नत किस्म के बीजों, खादों, सिंचाई, कीटनाशक औषधियों तथा वैज्ञानिक यन्त्रों का प्रयोग कर कृषि उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। फलों के उत्पादन में भी वृद्धि की जा रही है। दूध देने वाले पशुओं की नस्ल सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं जिससे देश में ‘श्वेत क्रान्ति’ ने जन्म लिया है।

(3) औद्योगीकरण का विकास – पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश में उद्योग-धन्धों का विकास किया जा रहा है। इससे बढ़ती हुई जनसंख्या को आजीविका के साधन प्राप्त होंगे तथा आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। इसके साथ-साथ परिवहन, संचार एवं व्यापार आदि कार्यों में भी विकास होगा। इससे बेरोजगारी की समस्या का निदान किया जा सकेगा तथा कुछ हद तक जनसंख्या समस्या का भी निदान हो सकेगा।

(4) नगरीकरण में वृद्धि – विश्व के विकसित देशों में देखा गया है कि बड़े-बड़े औद्योगिक नगरों में जनसंख्या वृद्धि की दर नीची होती है। टोकियो, न्यूयॉर्क, पेरिस, मॉस्को, मुम्बई आदि नगर इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस कारण जापान ने इस समस्या के हल के लिए बड़े-बड़े नगरों का विकास कर लिया है तथा 80% से भी अधिक जनसंख्या नगरों में निवास कर रही है और जनसंख्या वृद्धि की दर में कमी आ गयी है, परन्तु सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अभी केवल 31.16% जनसंख्या ही नगरों में निवास करती है, जबकि लगभग 68.84% जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। अतः जनसंख्या-वृद्धि पर रोक लगाने के लिए देश का नगरीकरण किया जाना अति आवश्यक है।

(5) शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार – शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी का अधिकाधिक प्रयोग कर मानव का जीवन-स्तर उच्च हो सकता है। शिक्षित जनसंख्या की मनोवृत्ति जनसंख्या वृद्धि की ओर कम होगी। वे जनसंख्या वृद्धि के दोषों से परिचित होंगे। इससे देश आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में प्रगति कर सकेगा।

(6) प्रवास – यूरोपीय देशों-ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फ्रांस, बेल्जियम आदि देशों ने अपनी तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या का हल प्रवास द्वारा कर लिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिणी अफ्रीका, ब्राजील, अर्जेण्टाइन आदि देशों में यूरोपीय ग्रंवासी जा बसे थे, परन्तु इन नये बसे हुए देशों की सरकारों ने काली एवं पीली जातियों के आवास पर राजनीतिक प्रतिबन्ध लगा दिये हैं। यदि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड तथा दक्षिणी अफ्रीका अपनी श्वेत नीति को त्यागकर आवास का मार्ग खोल दें तो चीन, भारत एवं जापान की बढ़ती हुई जनसंख्या को इन देशों में सुगमता से भरण-पोषण प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार प्रवास जनसंख्या समस्या के समाधान का एक ऐसा कारगर उपाय है जिससे उपलब्ध संसाधनों एवं जनसंख्या के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।

(7) परिवार नियोजन एवं जन्म-दर पर नियन्त्रण – जनसंख्या वृद्धि न होने का स्थायी समाधान तो परिवार नियोजन एवं जन्म-दर पर नियन्त्रण करना है। नसबन्दी, बन्ध्याकरण एवं गर्भ निरोधक गोलियों तथा औषधियों का प्रयोग इस दिशा में अधिक कारगर है। इन विधियों के प्रचार-प्रसार द्वारा भी जन्म-दर पर नियन्त्रण पाया जा सकता है जिससे जनसंख्या वृद्धि को रोकने का स्थायी समाधान खोजा जा सकता है। इन योजनाओं को लागू करने के लिए नियम एवं कानून भी बनाये जा सकते हैं तथा उनका कड़ाई से पालन किया जाना अपेक्षित है। इस ओर लोगों को प्रोत्साहित किया जाना अति
आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 .
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को नियन्त्रित करने के कोई चार उपाय सुझाइए। [2011]
या
भारत में जनसंख्या नियन्त्रण के किन्हीं दो उपायों का वर्णन कीजिए। [2014, 15, 16]
उत्तर
जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण के लिए चार उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. साक्षरता एवं शिक्षा का प्रसार – साक्षरता तथा शिक्षा के प्रसार से जीवन के प्रति दृष्टिकोण में सुधार होता है। छोटे परिवार का महत्त्व तथा इसे अपनाने में रुचि में वृद्धि होती है। अतएव शिक्षा का प्रसार (विशेषतः गाँवों में) करना चाहिए।
  2. सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना – भारत में सन्तानोत्पत्ति का एक कारण या उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा की भावना भी है। बेरोजगारी, दुर्घटना या वृद्धावस्था की दशा में लोग अपनी सन्तान पर निर्भर करते हैं। इस प्रकृति पर नियन्त्रण के लिए सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम आवश्यक हैं।
  3. विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि – यद्यपि कानून द्वारा विवाह की न्यूनतम आयु सुनिश्चित है तथापि समाज के अनेक वर्ग इसका पालन नहीं करते हैं। देर से विवाह होने पर सन्तानोत्पत्ति देर से होती है। यह जनसंख्या को नियन्त्रित करने का प्रभावी उपाय है।।
  4. परिवार नियोजन कार्यक्रम – देश में व्यापक रूप से ये कार्यक्रम सुचारु रूप से चलाने चाहिए। अशिक्षित तथा निर्धन परिवारों में परिवार नियोजन के प्रति उत्साह कम देखा जाता है। उन्हें इस ओर आकर्षित करना चाहिए।

प्रश्न 2
पश्चिम बंगाल में अधिक जनसंख्या घनत्व के कारण बताइए। [2010]
उत्तर
पश्चिम बंगाल में अधिक जनसंख्या घनत्व के अनेक कारण हैं। इस राज्य में अनेक औद्योगिक क्षेत्र हैं; जहाँ जीविका के साधन उपलब्ध हैं। यह एक उपजाऊ कृषि क्षेत्र भी है, जो न केवल चावल, जूट आदि की उपज के लिए उपयुक्त है बल्कि लोगों को रोजगार के अवसर भी प्रदान करता है। पश्चिम बंगाल खनन क्षेत्रों से युक्त है तथा अनेक खनन क्षेत्रों के समीप है; जहाँ जीवन-यापन एवं आवागमन के साधनों की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पश्चिम बंगाल के पत्तन भी वहाँ पर अधिक जनसंख्या घनत्व का एक महत्त्वपूर्ण कारण हैं।

प्रश्न 3
भारत में जनसंख्या के असमान वितरण के पाँच कारकों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (2009, 13, 15)
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत ‘जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले भौगलिक कारक’ शीर्षक देखें।

प्रश्न 4
भारत में जनसंख्या विस्फोट से उत्पन्न किन्हीं चार समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 के अन्तर्गत भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण उत्पन्न समस्याएँ’ शीर्षक देखें।

प्रश्न 5
भारत के उत्तरी विशाल मैदान में घनी जनसंख्या हेतु उत्तरदायी किन्हीं दो प्रमुख कारकों की विवेचना कीजिए। (2013, 15)
उत्तर
भारत के उत्तरी विशाल मैदान में घनी जनसंख्या हेतु उत्तरदायी दो प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –
(1) उपजाऊ भूमि – भारत में सबसे अधिक जनसंख्या उपजाऊ समतल मैदानों, नदियों की घाटियों, तटीय मैदानों या डेल्टाओं में निवास करती है क्योंकि इन क्षेत्रों की उपजाऊ भूमि उन्हें पर्याप्त खाद्यान्न एवं जीविकोपार्जन के साधन प्रदान करती है। यही कारण है कि भारत में जनसंख्या का घनत्व उत्तर के विशाल मैदान और पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय मैदानों में अधिक पाया जाता है, जबकि दक्कन के पठार तथा थार के मरुस्थल में कम जनसंख्या निवास करती है।

(2) यातायात के साधन – यातायात के साधन मानव-जीवन में उपयोगी पदार्थों की आपूर्ति करते हैं। व्यापार, उद्योग, कृषि आदि सभी यातायात साधनों से प्रभावित होते हैं। पर्वतीय वनों से ढके हुए तथा मरुस्थलीय प्रदेशों में, जहाँ परिवहन के साधनों का विकास नहीं हो पाया है, अपेक्षाकृत कम जनसंख्या निवास करती है। गंगा-यमुना के विशाल मैदानों में रेल एवं सड़कों का जाल बिछा होने के कारण
जनसंख्या का जमघट पाया जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत में सन 2011 की जनगणनानुसार कुल जनसंख्या कितनी है?
उत्तर
भारत में सन् 2011 की जनगणनानुसार कुल जनसंख्या 121.02 करोड़ है।

प्रश्न 2
भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या का कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
मृत्यु-दर में तेजी से गिरावट तथा जन्म-दर में कोई विशेष परिवर्तन न होना, जनसंख्या का तेजी से बढ़ने का मुख्य कारण है।

प्रश्न 3
उत्तर प्रदेश की अपेक्षा मध्य प्रदेश में जनसंख्या का घनत्व कम होने के दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. उत्तर प्रदेश का धरातल मैदानी है, जबकि मध्य प्रदेश का धरातल पठारी है।
  2. उत्तर फ्रदेश की अधिकांश नदियाँ सदावाहिनी हैं, जबकि मध्य प्रदेश की नदियाँ मौसमी (वर्षाकालीन) हैं।

प्रश्न 4
जनसंख्या घनत्व से क्या तात्पर्य है? [2011, 12, 13, 16]
उत्तर प्रति वर्ग इकाई (मील या किलोमीटर) क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या को जनसंख्या घनत्व कहते हैं।

प्रश्न 5
ग्रामीण क्षेत्रों से नगरों की ओर जनसंख्या के तेजी से अन्तरण को नियन्त्रित करने हेतु कोई दो सुझाव दीजिए। [2011]
उत्तर

  1. गाँवों में रोजगार उपलब्ध कराये जाएँ तथा
  2. गाँवों में मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराये जाएँ।

प्रश्न 6
भारत में न्यूनतम जनसंख्या वाले प्रदेश का नाम लिखिए। [2012]
उत्तर
सिक्किम।

प्रश्न 7
भारत में जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले दो कारकों का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर

  1. स्वास्थ्यप्रद जलवायु,
  2. तापमान।

प्रश्न 8
मानवीय संसाधन से क्या अभिप्राय है? [2016]
उत्तर
मानवीय संसाधन से अभिप्राय किसी देश की जनसंख्या तथा उसकी कुशलता एवं उत्पादकता से है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या कितनी है?
(क) 101.5 करोड़
(ख) 102.4 करोड़
(ग) 121.02 करोड़
(घ) 103.5 करोड़
उत्तर
(ग) 121.02 करोड़

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 19 Human Resources : Quality and Quantity

प्रश्न 2
सन 2011 के अनुसार भारत का प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व है –
(क) 267
(ख) 382
(ग) 330
(घ) 335
उत्तर
(ख) 382

प्रश्न 3
जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में स्थान है –
(क) प्रथम
(ख) द्वितीय
(ग) तृतीय।
(घ) चतुर्थ
उत्तर
(ख) द्वितीय

प्रश्न 4
निम्नतम जनसंख्या घनत्व पाया जाता है – [2016]
(क) मेघालय में
(ख) मिजोरम में
(ग) सिक्किम में
(घ) अरुणाचल प्रदेश में
उत्तर
(घ) अरुणाचल प्रदेश में

प्रश्न 5
भारत के किस राज्य में जन्म-दर सबसे कम है?
(क) आन्ध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर
(ग) केरल

प्रश्न 6.
किस राज्य में साक्षरता का प्रतिशत सर्वाधिक है? [2016]
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) पंजाब
(ग) हरियाणा
(घ) केरल
उत्तर
(घ) केरल

प्रश्न 7.
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत के किस राज्य में सर्वाधिक जनसंख्या पायी जाती है? [2011, 13, 14 16]
या
निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य 2011 की जनगणना के अनुसार सर्वाधिक जनसंख्या वाला है? [2013]
या
भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य कौन-सा है? [2013, 14, 15, 16]
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) केरल
(ग) बिहार
(घ) पश्चिम बंगाल
उत्तर
(क) उत्तर प्रदेश

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World (विश्व के प्रमुख पत्तन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World (विश्व के प्रमुख पत्तन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 18
Chapter Name Major Ports of the World (विश्व के प्रमुख पत्तन)
Number of Questions Solved 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World (विश्व के प्रमुख पत्तन)

विस्तृत उतरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
रेखाचित्र की सहायता से निम्नलिखित पत्तनों के विकास के कारणों का उल्लेख कीजिए-
(अ) टोकियो, (ब) न्यूयॉर्क, (स) लन्दन, (द) ब्यूनस-आयर्स, (य) सिडनी, (र) शंघाई, (ल) सिंगापुर, (व) मुम्बई।
या
बन्दरगाह के रूप में न्यूयॉर्क पर टिप्पणी लिखिए।
या
सिंगापुर और मुम्बई बन्दरगाहों की स्थिति एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
या
लन्दन और मुम्बई बन्दरगाहों की स्थिति और महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2015)
या
मुम्बई की भौगोलिक अवस्थिति को एक रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए। [2016]
उत्तर

(अ) टोकियो Tokyo

टोकियो जापान की राजधानी तथा विश्व का एक बड़ा नगर है। टोकियो महानगर 35° 40 उत्तरी अक्षांश तथा 138° 45′ पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। यह छोटी-छोटी नदियों द्वारा निर्मित सगामी की खाड़ी की एक शाखा पर स्थित है। टोकियो का पत्तन उथला है; अतः जलयाने याकोहामा तक ही आ-जा सकते हैं। याकोहामा इसका जुड़वाँ नगर है जो इसे पत्तन की सुविधा प्रदान करता है। जापान का लगभग एक-तिहाई व्यापार इसी पत्तन द्वारा किया जाता है।

टोकियो-याकोहामा अपने पृष्ठ प्रदेश (क्वाण्टो मैदान) से सड़क एवं रेलमार्गों द्वारा जुड़ा है। यह पृष्ठ प्रदेश सघन जनसंख्या रखता है। यह औद्योगिक प्रदेश के रूप में विकसित हुआ है। इस फ्रदेश में विद्युत-यन्त्र, चीनी मिट्टी के बर्तन, रेल के इंजन एवं डिब्बे, सूती-रेशमी वस्त्र, रसा, दिन, गझपार्चा तथा रबड़ के खिलौने बनाने के अनेक कारखाने विकसित हुए हैं। टोकियो-याकोहामा के पृष्ठ, प्रदेश में पेट्रो-रसायन, रेशम, जलयान उद्योग विकसित हुए हैं। याकोहामा जलयान-निर्माण गोदियों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। ये दोनों ही केन्द्र अपने पृष्ठ प्रदेश से रेलों, सड़कों व ट्राम-गाड़ियों द्वारा जुड़े हैं। इस प्रकार दोनों ही केन्द्र जापान के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्रों के रूप में विकसित हुए हैं तथा दोनों जुड़वाँ नगर देश एवं विदेश की व्यापारिक एवं आर्थिक सेवा कर रहे हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World 1
टोकियो जापान का राजधानी मुख्यालय होने के कारण राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में विकसित हुआ है। टोकियो एक खूबसूरत नगर है; अतः यह विदेशी पर्यटकों के लिए एक आकर्षक भ्रमण केन्द्र के रूप में विकसित हुआ है। यह जापानी शिक्षा, संस्कृति एवं सभ्यता का केन्द्र है। इस नगर में दिन-रात चहल-पहल रहती है। यहाँ के जगमगाते होटल, आकर्षक बाजार तथा तीव्र गति वाले परिवहन इस नगर की सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं तथा पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

टोकियो के प्रमुख निर्यात सूती-रेशमी वस्त्र, रबड़, विद्युत एवं काँच का सामान, कागज, लुग्दी एवं ताँबा हैं। प्रमुख आयातक वस्तुओं में कोयला, लौह-अयस्क, कपास, चावल, चीनी एवं अन्य खाद्यान्न पदार्थ हैं।

(ब) न्यूयॉर्क New York

न्यूयॉर्क विश्व के विशालतम महानगरों में से एक तथा विशालतम पत्तन है। यह एक प्राकृतिक पत्तन है जो संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी तट पर, हडसन नदी के मुहाने पर, मानहट्टन द्वीप पर, उत्तरी अटलांटिक महासागर के तट पर, 40°44 उत्तरी अक्षांश तथा 74° पश्चिमी देशान्तर पर स्थित है। इरी झील द्वारा यह महान् आन्तरिक झील मार्ग से जुड़ा है। यह एक गहरा तथा सुरक्षित पत्तन है जो यूरोप महाद्वीप के औद्योगिक देशों के निकट स्थित है। इस महानगर में अनेक उप-नगर हैं जिन्हें मिलाकर वृहत् न्यूयॉर्क महानगरीय प्रदेश की संरचना की गयी है। जनसंख्या की दृष्टि से न्यूयॉर्क विश्व में चौथे स्थान परे है।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World 2
न्यूयॉर्क की स्थिति न्यूयॉर्क नगर की स्थापना न्यू-एमस्टर्डम नाम से 1926 ई० में हुई, परन्तु बाद में ड्यूक जेम्स (Duke James) की स्मृति में इस नगर का नाम न्यूयॉर्क पड़ा। इसका पृष्ठ प्रदेश बड़ा धनी एवं सघन बसा है। यह रेलों, सड़कों, नदियों तथा नहरों द्वारा देश के भीतरी भागों में सभी प्रमुख नगरीय केन्द्रों से जुड़ा है। न्यूयॉर्क का पृष्ठ प्रदेश बड़ा ही उपजाऊ, उन्नतशील एवं दूर-दूर तक विस्तृत है।

न्यूयॉर्क एक प्रसिद्ध औद्योगिक, व्यापारिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र है। यहाँ सूती-ऊनी वस्त्र, कृत्रिम रेशम, लोहा एवं इस्पात का सामान, सिगरेट, कागज, मशीनें एवं यान्त्रिक उपकरण बनाने के बड़े-बड़े कारखाने विकसित हुए हैं। न्यूयॉर्क विश्व का सबसे बड़ा वित्तीय संकुल (Financial Foci) है, क्योंकि यहाँ विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय विनिमय कोष आदि वित्तीय संस्थान स्थापित हुए हैं। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकसित हुआ है, जिसके द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका का लगभग आधा व्यापार किया जा रहा है।

प्रमुख आयातक वस्तुओं में रबड़, कच्चा रेशम, वनस्पति तेल, चाय, जूट, कहवा, चीनी, चावल, तिलहन, लकड़ी, कागज की लुग्दी, वैज्ञानिक उपकरण, फोटोग्राफी का सामान, बिजली के बल्ब, जलयान, मशीनी उपकरण आदि हैं। प्रमुख निर्यातक वस्तुओं में कपड़ा, लोहे एवं इस्पात का सामान, मोटरकारें, कृषि-यन्त्र एवं उपकरण, सीसा, जस्ता, ताँबा, रासायनिक पदार्थ तथा विद्युत उपकरण एवं अन्य सामान आदि हैं।
न्यूयॉर्क अन्तर्राष्ट्रीय जल एवं वायुमार्गों का महत्त्वपूर्ण मिलन-केन्द्र है। विश्व में यह नगर बहुमंजिली इमारतों के लिए विख्यात है। यहाँ पर सबसे ऊँची 108 मंजिल तक की इमारत है। यह विश्व के बड़े एवं प्रमुख नगरों में से एक है।

(स) लन्दन London

ग्रेटर लन्दन यूरोप महाद्वीप का प्रमुख नगर, ब्रिटेन का राजधानी मुख्यालय तथा विश्व का दूसरा : बड़ा नगर है। लन्दन महानगर 51° 30 उत्तरी अक्षांश तथा 0.05′ पश्चिमी देशान्तर पर स्थित है। यह टेम्स नदी के मुहाने पर सागर से 120 किमी की दूरी पर ऐसे सुरक्षित स्थान पर स्थित है, जहाँ तक जलयान आसानी से आ-जा सकते हैं। इसके विशाल डॉक्स, सुरक्षित भव्य पोताश्रय, उत्तरी अटलाण्टिक महासागरीय मार्ग की निकटता, पश्चिमी यूरोपीय देशों के सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों का समीपवर्ती भागों में स्थित होना, कोयले एवं लोहे की सुविधा से औद्योगिक विकास, व्यापारिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास आदि लन्दन महानगर की उन्नति एवं प्रगति के प्रमुख कारण रहे हैं।
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लन्दन एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र है। यह विश्व का सबसे बड़ा निर्यात का केन्द्र है। यह एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक नगर भी है, जहाँ कागज, लोहा, इस्पात, रासायनिक पदार्थ, जूते, विद्युत उपकरण, शराब, फर्नीचर आदि के उद्योग-धन्धे विकसित हुए हैं। सुरक्षित पोताश्रय, डॉक्स की सुविधा एवं विशाल पृष्ठ प्रदेश ने इसे एक महत्त्वपूर्ण पत्तन के रूप में विकसित होने में मदद प्रदान की है। अन्ध महासागरीय जलमार्ग के निकटवर्ती भागों में स्थित होने के कारण अन्य पत्तनों की निकटता ने भी इस पत्तन की स्थिति को प्रभावित किया है।

यहाँ अन्तर्राष्ट्रीय बैंक एवं विनिमय की सुविधाएँ सर्वाधिक हैं। पुनर्निर्यात केन्द्र के रूप में चाय, कहवा, ऊनं, अनाज, मांस, लकड़ी, शराब, फल, रबड़ आदि वस्तुओं को आयात कर देश के आन्तरिक भागों एवं यूरोप के अन्य देशों को भेजता है। लन्दन एक सार्वभौमिक नगर है जहाँ विश्व के सभी धर्मावलम्बी निवास करते हैं। लन्दन रेलमार्गों द्वारा ब्रिटेन के सभी प्रमुख नगरों से जुड़ा है। यह शिक्षा एवं संस्कृति के एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में भी विकसित हुआ है। यहाँ पर स्थित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय विश्व-प्रसिद्ध है। लन्दन महानगर एक बड़ी व्यापारिक मण्डी के रूप में भी विकसित हुआ है। कोवेण्ट गार्डन फलों एवं सब्जियों, स्मिथ फील्ड चर्बी, मांस एवं पनीर के सुव्यवस्थित थोक बाजार के रूप में विख्यात है। इस प्रकार लन्दन एक ऐसा पत्तन है जो भारी मात्रा में कच्चे पदार्थों को आयात करता है तथा विनिर्मित माल को विश्व के कोने-कोने तक निर्यात करता है।

(द) ब्यूनस-आयर्स Buenos-Aires

ब्यूनस-आयर्स दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप का प्रमुख पत्तन एवं महत्त्वपूर्ण नगरीय केन्द्र है। यह अर्जेण्टीना देश की राजधानी है, जो लाप्लाटा नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी स्थिति 34° 35′ दक्षिणी अक्षांश तथा 58° 20′ पश्चिमी देशान्तर पर है। इसका पृष्ठ प्रदेश पशुपालन एवं कृषि में उत्पादन के लिए। विश्वविख्यात है। यह पृष्ठ प्रदेश रेलमार्गों, सड़कमार्गों एवं वायुमार्गों द्वारा इस केन्द्र से जुड़ा है।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 18 Major Ports of the World 4
ब्यूनस-आयर्स के पृष्ठ प्रदेश में गेहूँ, मक्का, दूध, मांस, पनीर, मक्खन आदि भारी मात्रा में उत्पन्न किये जाते हैं। यह एक औद्योगिक नगर के रूप में विकसित हुआ है। रोजारियो यहाँ जलयान, वायुयान, रसायन, लुग्दी एवं कागज, जूते, मांस से निर्मित पदार्थ, चमड़े की वस्तुएँ, चीनी, सिगरेट, सूती-ऊनी वस्त्र, आटा मिल एवं तेल को परिष्कृत करने के उद्योग विकसित हुए हैं। इस पत्तन से गेहूँ, मक्का आदि खाद्यान्न, मांस, चमड़ा, ऊन, फल, ताँबा तथा दुग्ध-निर्मित पदार्थों का निर्यात किया जाता है, जब कि पेट्रोलियम पदार्थ, मोटर- कारें, मशीनें, निर्मित वस्त्र, रासायनिक पदार्थ, विद्युत उपकरण, सूती वस्त्र आदि वस्तुएँ आयात की जाती हैं।

(य) सिडनी Sydney

सिडनी ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का प्रमुख पत्तन एवं महत्त्वपूर्ण नगर तथा न्यू-साउथवेल्स की राजधानी है, जो इस महाद्वीप के दक्षिणी-पूर्वी तट पर 33° 30 दक्षिणी अक्षांश तथा 151° पूर्वी देशान्तर के मिलन स्थल पर स्थित है। इसका पत्तन अधिक गहरा प्राकृतिक एवं सुरक्षित है। इसका पृष्ठ प्रदेश धनी एवं बहुमूल्य खनिज पदार्थों का अक्षय भण्डार है। सिडनी विद्युतचालित रेलगाड़ियों तथा सड़क परिवहन द्वारा अपने पृष्ठ प्रदेश से जुड़ा है। इसके पृष्ठ प्रदेश में तीव्रगामी परिवहन के साधन विकसित हैं। इस प्रदेश की जलवायु बड़ी ही मनोरम है जिसने इसके निवासियों को लगनशील एवं बड़ा परिश्रमी बना दिया है।
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सिडनी ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक नगर है। यहाँ रेल के इंजन, जूते, साबुन, चीनी, ताँबा, टिन की चादरें, चमड़े की वस्तुएँ, आटा, मांस, कच्चा ऊन आदि वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। यह एक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र भी है तथा ऑस्ट्रेलिया की संघीय राजधानी कैनबरा से केवल 280 किमी की दूरी पर उत्तर-पूर्व में स्थित है।

इस पत्तन से ऊन, कोयला, चमड़ा, खनिज पदार्थ, सीसा, गेहूँ, मांस, सूखा दुग्ध पाउडर, मक्खन, फल आदि पदार्थों का विदेशों को निर्यात किया जाता है, जब कि यहाँ विदेशों से मशीनी उपकरण, परिवहन-उपकरण, सूती-रेशमी वस्त्र, पेट्रोलियम पदार्थ, विद्युत उपकरण, रासायनिक पदार्थ आदि वस्तुएँ आयात की जाती हैं। इस प्रकार ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में इस पत्तन का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

(र) शंघाई Shanghai

शंघाई चीन का प्रमुख व्यापारिक नगर एवं पूर्वी एशिया का महत्त्वपूर्ण पत्तन है। यह महानगर 34°15′ उत्तरी अक्षांश तथा 121° 29′ पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। उन्नतशील पृष्ठ प्रदेश होने के कारण इस नगर का व्यापारिक महत्त्व बहुत अधिक है। इसकी स्थिति यांगटिसीक्यांग की मुख्य धारा से लगभग 22 किमी दक्षिण में वांगपू नदी पर है। यह विश्व के प्रमुख महानगरों में से एक है। सागर तट से यह नगर केवल 86 किमी की दूरी पर स्थित है। यह एक प्रसिद्ध पुनर्निर्यात केन्द्र है, जहाँ से चीन, जापान, कोरिया आदि देशों को सामान वितरित किया जाता है।

शंघाई पत्तन का पृष्ठ प्रदेश बड़ा ही धनी एवं सघन बसा है। इसके पृष्ठ प्रदेश में जनसंख्या का घनत्व 500 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से भी अधिक है। इस पृष्ठ प्रदेश में 300 से भी अधिक कारखाने स्थित हैं, जिनमें सूती-रेशमी वस्त्रे, रबड़ का सामान, साबुन, कागज, सिगरेट, रासायनिक पदार्थ, सीमेण्ट, ग्रामोफोन, मशीनी उपकरण, विद्युत उपकरण, जलयान, वायुयान आदि के निर्माण कार्य प्रमुख हैं। यह अपने पृष्ठ प्रदेश से रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा है। इस प्रदेश में बीजिंग से नानकिंग होकर शंघाई तथा हांगचाऊ तक रेलमार्ग महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
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इस पत्तन से कपास, रेशम तथा चाय का निर्यात किंया जाता है, जब कि आयातक वस्तुओं में वस्त्र, चीनी, खनिज तेल, तम्बाकू एवं लौह-इस्पात का सामान प्रमुख हैं।

(ल) सिंगापुर Singapore

मलाया के दक्षिण में 1.2 किमी लम्बे रेल तथा सड़क मार्ग द्वारा जुड़े हुए 42 किमी लम्बे व 22.5 किमी चौड़े सिंगापुर द्वीप पर स्थित यह है पत्तन वास्तव में एक आन्पो पत्तन (entre port) है। इसका पृष्ठ प्रदेश सम्पूर्ण सिंगापुर द्वीप है जहाँ टिन शोधन, रबड़ की वस्तुएँ, पेट्रोलियम, सूती कपड़ा, सिगरेट, शराब, फर्नीचर, साबुन, मछली आदि उद्योग विकसित हैं। यहाँ रबड़, टिन, गर्म मसाले, रासायनिक पदार्थ, तम्बाकू, प्लाईवुड, सुमात्रा मशीनरी व मोटर-गाड़ियाँ आयात करके पुनः विदेशों को निर्यात की जाती हैं। अन्तर्राष्ट्रीय जल एवं वायुमार्गों पर स्थित होने के कारण यह पत्तन अफ्रीका एवं दक्षिणी एशिया से चीन व जापान की ओर जाने वाले जलयानों के लिए ईंधन, पानी आदि की सुविधाएँ प्रदान कर मार्ग-पत्तन (port of call) का भी कार्य करता है।
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(व) मुम्बई बन्दरगाह की स्थिति और महत्त्व
Importance and Situation of Mumbai Port

यह भारत का ही नहीं, अपितु विश्व का एक प्रमुख पत्तन है। देश का 20% से भी अधिक व्यापार मुम्बई पत्तन द्वारा किया जाता है। इस पत्तन को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं –
(1) स्थिति – मुम्बई पत्तन सालसट द्वीप पर लगभग 200 वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है। यह भारत के पश्चिमी तट पर एक प्राकृतिक कटान में स्थित है, जहाँ मानसून काल के तूफानों से जलयान सुरक्षित खड़े रह सकते हैं। यह पत्तन यूरोप, पूर्वी एशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के मार्ग में पड़ता है। पत्तन के निकट 11 मीटर गहराई होने से जलयान समुद्रतट तक आकर ठहर जाते हैं। यहाँ पर एक खाड़ी बन गयी है जो 23 किमी लम्बी एवं 10 किमी चौड़ी है। स्वेज नहर को पार करके आने वाले सभी प्रकार के जलयान यहाँ पर आसानी से ठहर सकते हैं। इस प्रकार पश्चिम से पूर्व को जोड़ने में इस पत्तन की भूमिका बड़ी ही महत्त्वपूर्ण है।

(2) संचार की सुविधाएँ – मुम्बई को यद्यपि पश्चिमी घाट ने देश के भीतरी भागों से अलग-थलग कर दिया है, परन्तु, दिल्ली थालघाट एवं भोरघाट दरों ने इसे सड़क एवं रेलमार्गों द्वारा उत्तरी-दक्षिणी एवं मध्य-पूर्वी भारत से जोड़ दिया है। मुम्बई अन्तर्राष्ट्रीय वायु सेवाओं का भी प्रमुख केन्द्र है।
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(3) पोताश्रय – जिस स्थान पर मुम्बई पत्तने का निर्माण किया गया है, वहाँ जल की गहराई 11 मीटर है। इतनी गहराई में वे सभी जलयान आकर ठहर सकते हैं, जो स्वेज नहर से होकर निकल सकते हैं, क्योंकि स्वेज नहर की गहराई भी लगभग इतनी ही है।
मुम्बई पत्तन के तीन मुख्य डॉक्स हैं – प्रिंस डॉक में 12, विक्टोरिया डॉक में 13 और एलेक्जेण्ड्रा डॉक में 17 बर्थ हैं। यहाँ पर 2 शुष्क डॉक भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उप-पत्तनों का भी विकास किया गया है जिनमें नावों से आने वाला ‘सामान एवं यात्री उतरते-चढ़ते हैं। तटीय व्यापार की दृष्टि से इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस पत्तन के निकट ही पेट्रोलियम के गोदाम भी बनाये गये हैं। एक नया गोदाम बचूर द्वीप के समीप में भी निर्मित किया गया है। विशाल गोदामों का होना मुम्बई पत्तन की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ अनाज एवं कपास रखने के गोदाम भी बनाये गये हैं जिनमें 178 अग्नि-सुरक्षित कमरे हैं। इन गोदामों में अग्नि-सुरक्षा, आवागमन, अस्पताल, जलपान-गृह आदि की भी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

(4) पृष्ठ प्रदेश – मुम्बई पत्तन का पृष्ठ प्रदेश बड़ा ही विशाल है, जो दक्षिण में तमिलनाडु के पश्चिमी भाग से लेकर उत्तर में कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों तक फैला है। इसका पृष्ठ प्रदेश कृषि उत्पादन में बड़ा ही धनी है।
इस पत्तन के विकास के लिए 1969 ई० में मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट अधिकरण बनाया गया है जिससे इसके विकास की विभिन्न योजनाएँ बनाई गयी हैं। कुल मिलाकर 55 घाटों का निर्माण किया गया है जहाँ पर एक साथ कई जलयानों से माल लादा एवं उतारा जा सकता है। प्रारम्भ में इसकी व्यापार क्षमता 150 लाख मीट्रिक टन थी जिसे बढ़ाकर 300 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया है।

(5) व्यापार – व्यापार की दृष्टि से इस पत्तन का भारत में प्रथम स्थान है। देश के पेट्रोलियम व्यापार का 45%, सामान्य व्यापार को 44%, खाद्यान्न व्यापार का 30% तथा यात्रियों को लाने-ले जाने का
अधिकांश कार्य इसी पत्तन द्वारा किया जाता है। इस पत्तन द्वारा अलसी, मूंगफली, चमड़े का सामान, तिलहन, लकड़ी, ऊन एवं सूती वस्त्र, चमड़ा, मैंगनीज, अभ्रक, इन्जीनियरिंग का सामान, लकड़ी, चॉदी आदि वस्तुएँ विदेशों को निर्यात की जाती हैं।

पेट्रोलियम का आयात इसी पत्तन द्वारा सबसे अधिक किया जाता है। बॉम्बे-हाई (Bombay-High) में तेल के भारी उत्पादन से इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ गया है। यहाँ पर विदेशों से सूती, ऊनी एवं रेशमी वस्त्र, मशीनें, नमक, कोयला, कागज, रंग-रोगन, फल, रासायनिक पदार्थ, मिट्टी का तेल एवं लोहे का सामान, उत्तम किस्म की कपास, रासायनिक उर्वरक आदि वस्तुओं का आयात किया जाता है।
इस पत्तन के कारण ही इसके पृष्ठ प्रदेश में सूती वस्त्र उद्योग का विकास सम्भव हो सका है। दो पेट्रोल-शोधनशालाएँ ट्राम्बे में आयातित पेट्रोल के कारण स्थापित की जा सकी हैं। इसके अतिरिक्त रासायनिक उर्वरक, इन्जीनियरिंग, ऊनी वस्त्र, चमड़ा, दवाइयाँ, सीमेण्ट, मोटर, सिनेमा आदि उद्योग भी काफी विकसित हैं।

इस पत्तन पर 3,557 जलयानों का आवागमन प्रतिवर्ष होता है जिनके द्वारा 286 लाख टन सामान का व्यापार किया जाता है, जिसमें 134 लाख टन का आयात तथा 152 लाख टन का निर्यात किया जाता है। इसकी व्यापार क्षमता और भी अधिक बढ़ गयी है, क्योंकि इसके निकट ही न्हावाशेवा एक नया पत्तन विकसित किया गया है।

मुम्बई पत्तन के विकास के कारण –

  1. अन्य भारतीय पत्तनों की अपेक्षा यूरोप के अधिक निकट स्थिति।
  2. स्वेज नहर मार्ग तथा उत्तमाशा-अन्तरीप मार्ग पर केन्द्रीय स्थिति रखना।
  3. प्राकृतिक एवं विस्तृत पोताश्रय।
  4. पत्तन का वर्ष भर आवागमन के लिए खुले रहना।
  5. अपने पृष्ठ प्रदेश से रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़ा होना।
  6. इसके पृष्ठ प्रदेश का कपास, गेहूं, गन्ना, मूंगफली जैसी फसलों के उत्पादन में विशेष स्थान।
  7. पश्चिमी घाट की प्राकृतिक स्थिति का जल-विद्युत शक्ति के विकास के लिए अनुकूल होना।
  8. समीप में तारापुर अणु शक्ति-गृह का स्थापित किया जाना।
  9. इसके पृष्ठ प्रदेश में सघन जनसंख्या का निवास होना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
उत्तम पोताश्रय के गुण लिखिए।
उत्तर
पत्तन का वह भाग जहाँ जलयान ठहरते हैं एवं यात्रियों व माल का लदान करते हैं, पोताश्रय कहलाता है। ये दो प्रकार के होते हैं-
(i) प्राकृतिक तथा
(ii) कृत्रिम। कुछ पत्तन पोताश्रयविहीन होते हैं, जहाँ माल की लदाई व उतराई खुले तटों पर होती है। उत्तम पोताश्रय में निम्नलिखित आठ गुण पाए जाते हैं

  1. पवन तथा समुद्री लहरों से सुरक्षा होनी चाहिए। इस दृष्टि से मुम्बई का प्राकृतिक पोताश्रय उत्तम है। किन्तु चेन्नई में कंकरीट की तरंग-अवरोधी दीवारयुक्त कृत्रिम पोताश्रय बनाया गया है। संयुक्त
    राज्य अमेरिका में हाउस्टन पत्तन की लहरों से सुरक्षा करने के लिए समुद्री नहर बनाई गई है।
  2. तट के निकट जल की गहराई 30 मीटर तक होनी चाहिए। न्यूयॉर्क, एण्टवर्प, रॉटरडम, शंघाई आदि पत्तनों के निकट उथले समुद्री तट के कारण निरन्तर पोताश्रय का तलमार्जन (dredging) कराना पड़ता है।
  3. जलयानों को लंगर डालने के लिए पर्याप्त विस्तृत स्थान आवश्यक है।
  4. पोताश्रय द्वार पर्याप्त चौड़ा, सीधा व गहरा होना चाहिए।
  5. उच्च एवं निम्न ज्वार में 5 मीटर से अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए।
  6. शीतकाल में पोताश्रय हिमरहित होना चाहिए। मॉण्ट्रियल, अर्केन्जिल, ब्लाडीवोस्टक आदि पत्तनों को हिम भंजकों का प्रयोग करना पड़ता है।
  7. कोहरे व धुंधरहित पोताश्रय उपयुक्त रहते हैं।
  8. पोताश्रय में घाट, गोदाम, वैल्ट लाइन व रेलपथ, पारगमन शेड आदि अग्रान्त सुविधाएँ (terminal facilities) होना आवश्यक है।

उपर्युक्त दृष्टि से लन्दन, लिवरपूल, न्यूयॉर्क, सैनफ्रांसिस्को, बोस्टन, लीहार्वे, एण्टवर्प, हैम्बर्ग, रियोडिजेनेरो, सिडनी आदि विश्व के उत्तम पत्तन हैं।

प्रश्न 2
पत्तन कितने प्रकार के होते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर
कार्यों अथवा उपयोग के आधार पर पत्तन निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

  1. व्यापारिक पत्तन (commercial port) ये वे पत्तन हैं जो माल के आयात व निर्यात का संचालन करते हैं। यद्यपि वहाँ यात्री-सेवाएँ भी उपलब्ध होती हैं; जैसे- मुम्बई व कोलकाता।
  2. यात्री पत्तन (passenger port) इन पत्तनों पर मुख्यत: डाक एवं यात्रियों की सेवाएँ उपलब्ध होती हैं।
  3. आन्त्रपो पत्तन (entre port) ये वे पत्तन हैं जो माल का आयात अपने पृष्ठ प्रदेश में वितरण के लिए नहीं अपितु पुनः निर्यात के लिए करते हैं। ये पत्तन उत्तम पोताश्रय व अग्रान्त सुविधाओं से
    सम्पन्न होते हैं। सिंगापुर व हांगकांग इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  4. अन्तः स्थलीय पत्तन (inland port) ये पत्तन समुद्र से भीतर की ओर किसी नदी या नहर के किनारे स्थित होते हैं। सुरक्षित एवं अग्रान्त सुविधाओं से सम्पन्न इन पत्तनों का प्रमुख उदाहरण
    कोलकाता है।
  5. बाह्म पत्तन (out port) सागर तट पर अधिक रेत एकत्रित होने पर जलयान वहाँ तक नहीं पहुँच पाते, तब बाहर की ओर एक अन्य छोटा उप-पत्तन स्थापित कर लिया जाता है। हैम्बर्ग, ब्रीमेन व
    लन्दन पत्तनों के लिए उप-पत्तनं बनाए गए हैं।
  6. नौसैनिक पत्तन (naval port) सैनिक उपयोग की दृष्टि से निर्मित पत्तनों पर युद्धपोत, *पनडुब्बियों आदि की सुरक्षा के लिए विशेष सुविधाएँ स्थापित की जाती हैं। उनके पृष्ठ प्रदेश की
    उपयोगिता का विचार नहीं किया जाता।
  7. मत्स्य पत्तन (fishing port) मछली पकड़ने के विशेष उद्देश्य से स्थापित किए गए पत्तनों पर | जलयान, मोटरबोट, नौका, प्रशीतन (refrigeration) आदि की विशिष्ट सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।
    कालीकट व कोचीन पत्तन इसी श्रेणी में आते हैं।
  8. मार्ग पत्तन (port of call) महासागरों में लम्बी यात्राओं के दौरान जलयानों को ईंधन-पानी आदि लेने की आवश्यकता होती है। इस उद्देश्य से विशिष्ट पत्तन स्थापित किए जाते हैं। अदन इसी प्रकार का पत्तन है।।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पूर्व का द्वार किसे कहा गया है?
या
कौन-सा पत्तन ‘पूर्व का प्रवेशद्वार’ कहलाता है तथा क्यों? [2009]
उत्तर
महत्त्वपूर्ण नगर सिंगापुर पत्तन को पूर्व का द्वार कहा जाता है, क्योंकि पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड से आने वाले सभी जलयान यहाँ से होकर जाते हैं।

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प्रश्न 2
सिडनी की स्थिति को एक रेखा-मानचित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर
चित्र 18.5 देखें।

प्रश्न 3
विश्व के दो प्रमुख बन्दरगाहों के नाम बताइए। [2011, 12, 13, 14, 15]
उत्तर

  1. न्यूयॉर्क तथा
  2. सिंगापुर।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित में से कौन आन्त्रपो पत्तन नहीं है?
(क) सिंगापुर
(ख) हांगकांग
(ग) रॉटरडम
(घ) कोलकाता
उत्तर
(घ) कोलकाता

प्रश्न 2
निम्नलिखित में से कौन नदीय पत्तन नहीं है?
(क) हैम्बर्ग
(ख) लन्दन
(ग) ग्लासगो
(घ) कोलकाता
उत्तर
(क) हैम्बर्ग

प्रश्न 3
पत्तनों व देशों का गलत जोड़ा बताइए
(क) मार्सेलीज-फ्रांस
(ख) एम्सटरडम-नीदरलैण्ड्स
(ग) लिवरपूल-ग्रेट ब्रिटेन
(घ) हैम्बर्ग-इटली
उत्तर
(घ) हैम्बर्ग-इटली

प्रश्न 4
निम्नलिखित में से कौन-सा पत्तन (बन्दरगाह) संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित है?
(क) लन्दन
(ख) सैनफ्रांसिस्को
(ग) लॉस एंजिल्स
(घ) न्यूयॉर्क
उत्तर
(घ) न्यूयॉर्क

प्रश्न 5
वैकुवर बन्दरगाह स्थित है।
(क) उत्तरी अटलाण्टिक मार्ग पर
(ख) उत्तरी प्रशान्त महासागर मार्ग पर
(ग) स्वेज नहर मार्ग पर
(घ) पनामा नहर मार्ग पर
उत्तर
(ख) उत्तरी प्रशान्त महासागर मार्ग पर

प्रश्न 6
निम्न में से कौन-सा बन्दरगाह पूर्व का द्वार’ कहलाता है? [2009]
(क) टोकियो
(ख) हांगकांग
(ग) सिडनी
(घ) सिंगापुर उन्ट
उत्तर
(घ) सिंगापुर

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