UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments (स्थानीय शासन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments (स्थानीय शासन).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत का संविधान ग्राम पंचायत को स्व-शासन की इकाई के रूप में देखता है। नीचे कुछ स्थितियों का वर्णन किया गया है। इन पर विचार कीजिए और बताइए कि स्व-शासन की इकाई बनने के क्रम में पंचायत के लिए ये स्थितियाँ सहायक हैं या बाधक?

(क) प्रदेश की सरकार ने एक बड़ी कम्पनी को विशाल इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति दी है। इस्पात संयंत्र लगाने से बहुत-से गाँवों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। दुष्प्रभाव की चपेट में आने वाले गाँवों में से एक की ग्राम सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया कि क्षेत्र में कोई भी बड़ा उद्योग लगाने से पहले गाँववासियों की राय ली जानी चाहिए और उनकी शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए।

(ख) सरकार का फैसला है कि उसके कुल खर्चे का 20 प्रतिशत पंचायतों के माध्यम से व्यय होगा।

(ग) ग्राम पंचायत विद्यालय का भवन बनाने के लिए लगातार धन माँग रही है, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने माँग को यह कहकर ठुकरा दिया है कि धन का आवंटन कुछ दूसरी योजनाओं के लिए हुआ है और धन को अलग मद में खर्च नहीं किया जा सकता।

(घ) सरकार ने डूंगरपुर नामक गाँव को दो हिस्सों में बाँट दिया है और गाँव के एक हिस्से को जमुना तथा दूसरे को सोहना नाम दिया है। अब डूंगरपुर गाँव सरकारी खाते में मौजूद नहीं है।

(ङ) एक ग्राम पंचायत ने पाया कि उसके इलाके में पानी के स्रोत तेजी से कम हो रहे हैं। ग्राम पंचायतों ने फैसला किया कि गाँव के नौजवान श्रमदान करें और गाँव के पुराने तालाब तथा कुएँ को फिर से काम में आने लायक बनाएँ।
उत्तर-
(क) यह स्थिति ग्राम पंचायत में बाधक है क्योंकि यहाँ पर सरकार ने ग्राम पंचायत से परामर्श किए बिना एक बड़ा इस्पात संयंत्र लगाने का फैसला किया जिससे ग्राम के गरीब लोगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

(ख) यह स्थिति भी ग्राम पंचायत के लिए बाधक है क्योंकि इससे ग्राम पंचायत पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।

(ग) तीसरी स्थिीत में भी ग्राम पंचातय की विद्यालय भवन-निर्माण के लिए की जा रही धन की माँग को ठुकरा दिया गया है जिससे ग्राम पंचायत की स्थिति कमजोर होती है।

(घ) यहाँ ग्राम के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया गया है; अतः ग्राम पंचायत होगी ही नहीं।

(ङ) ग्राम पंचायत के लिए यह स्थिति सहायक है। इसमें पानी की कमी को दूर करने के लिए ग्राम के नौजवानों का सहयोग लेकर पुराने कुओं और तालाबों को कामयाब बनाने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 2.
मान लीजिए कि आपको किसी प्रदेश की तरफ से स्थानीय शासन की कोई योजना बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ग्राम पंचायत स्व-शासन की इकाई के रूप में काम करे, इसके लिए आप उसे कौन-सी शक्तियाँ देना चाहेंगे? ऐसी पाँच शक्तियों का उल्लेख करें और प्रत्येक शक्ति के बारे में दो-दो पंक्तियों में यह भी बताएँ कि ऐसा करना क्यों जरूरी है।
उत्तर-
ग्राम पंचायतों को योजना की सफलता के लिए निम्नलिखित शक्तियाँ प्रदान की जा सकती हैं-
1. शिक्षा के विकास के क्षेत्र में – शिक्षा का विकास ग्रामीण क्षेत्र के लिए अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षा-प्राप्ति के पश्चात् ही नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जान सकेंगे तथा अपनी भागीदारी को निश्चित करेंगे।
2. स्वास्थ्य के विकास के क्षेत्र में – ग्रामों में स्वास्थ्य शिक्षा का व स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रायः अभाव रहता है; अत: इस क्षेत्र में ग्राम पंचायत की महत्त्वपूर्ण भूमिका अपेक्षित है।
3. कृषि के विकास के क्षेत्र में – कृषि का विकास ग्रामीण क्षेत्र की प्रमुख आवश्यकता है, क्योंकि ग्रामीण जीवन कृषि पर ही निर्भर करता है। ग्राम पंचायत, ग्राम व सरकार के बीच कड़ी है। अत: इस क्षेत्र में ग्राम पंचायत को विशेष कार्य करना चाहिए।
4. खेतों में उत्पन्न फसल को बाजार तक ले जाने के बारे में जानकारी देना – ग्रामीणों को खेतों में उपजे अन्न को ग्राम में ही बेचना पड़ता है, जिसके कारण उन्हें पैदावार का उचित लाभ नहीं मिल पाता। अतः यह आवश्यक है कि पैदावार सही समय पर बाजार में पहुंचाई जाए।
5. पंचायतों के वित्तीय स्रोतों को एकत्र करना – ग्राम की आर्थिक दशा हमेशा कमजोर रहती है; अत: ग्राम के सभी स्रोतों का समुचित उपयोग करना चाहिए और ग्राम पंचायत को सरकार से ग्रामीण विकास के लिए आवश्यक धन लेना चाहिए।

प्रश्न 3.
सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए संविधान के 73वें संशोधन में आरक्षण के क्या प्रावधान हैं? इन प्रावधानों से ग्रामीण स्तर के नेतृत्व का खाका किस तरह बदलता है?
उत्तर-
संविधान के 73 वें संशोधन से अनुसूचित जाति के लोगों के लिए व महिलाओं के लिए कुछ सीटों में से प्रत्येक वर्ग के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। यह आरक्षण ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों व जिला परिषदों में सदस्यों व पदों में किया गया है। इस आरक्षण से महिलाओं की व अनुसूचित जाति के लोगों की स्थिति में सम्मानजनक परिवर्तन हुआ है। इससे पहले इन वर्गों की स्थानीय संस्थाओं में पर्याप्त भागीदारी नहीं हुआ करती थी। परन्तु अब यह भागीदारी निश्चित हो गई है। जिससे इनमें एक विश्वास उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न 4.
संविधान के 73 वें संशोधन से पहले और संशोधन के बाद स्थानीय शासन के बीच मुख्य भेद बताएँ।
उत्तर-

  1. 73वें संविधान संशोधन से पूर्व ग्राम पंचायतें सरकारी आदेशों के अनुसार गठित की जाती थीं परन्तु 73वें संशोधन के पश्चात् से इनका संवैधानिक आधार हो गया है।
  2. 73वें संविधान संशोधन से पूर्व इन संस्थाओं के चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से हुआ करते थे परन्तु 73 वें संशोधन के बाद से चुनाव प्रत्यक्ष होते हैं।
  3. 73वें संविधान संशोधन से पहले अनुसूचित जाति व महिलाओं के लिए स्थानों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी परन्तु 73वें संविधान संशोधन के पश्चात् महिलाओं व अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण दिया गया है।
  4. पहले इन संस्थाओं के कार्यकाल अनिश्चित थे परन्तु अब निश्चित कर दिए गए हैं।
  5. 73वें संविधान संशोधन से पूर्व ये संस्थाएँ आर्थिक रूप से कमजोर थीं परन्तु अब आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं।

प्रश्न 5.
नीचे लिखी बातचीत पढे। इस बातचीत में जो मुद्दे उठाए गए हैं उसके बारे में अपना मत दो सौ शब्दों में लिखें।

आलोक – हमारे संविधान में स्त्री और पुरुष को बराबरी का दर्जा दिया गया है। स्थानीय निकायों से स्त्रियों को आरक्षण देने से सत्ता में उनकी बराबर की भागीदारी सुनिश्चित हुई है।

नेहा – लेकिन, महिलाओं को सिर्फ सत्ता के पद पर काबिज होना ही काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि स्थानीय निकायों के बजट में महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान हो।

जएश – मुझे आरक्षण का यह गोरखधन्धा पसन्द नहीं। स्थानीय निकाय को चाहिए कि वह गाँव के सभी लोगों का खयाल रखे और ऐसा करने पर महिलाओं और उनके हितों की देखभाल अपने आप हो जाएगी।
उत्तर-
विगत 60 वर्षों की स्थानीय संस्थाओं की कार्यशैली व ग्रामीण वातावरण के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इन स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं का व अनुसूचित जाति के लोगों का इनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं हुआ। जो प्रतिनिधित्व था वह बहुत कम था। 73वें तथा 74वें संविधान संशोधन के आधार पर महिलाओं व अनुसूचित जाति के लोगों को ग्रामीण व नगरीय स्थानीय संस्थाओं में प्रत्येक को कुल स्थानों का एक-तिहाई आरक्षण दिया गया है जिससे महिलाओं की व अनुसूचित जाति के लोगों की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया है वे इनमें एक विश्वास उत्पन्न हुआ है। इस आरक्षण से इन वर्गों की स्थानीय संस्थाओं में भागीदारी सुनिश्चित हुई है।

स्थानीय संस्थाएँ प्रशासन की इकाई हैं जिन्हें आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए स्थानीय स्रोतों का उपभोग करने के साथ-साथ प्रान्तीय सरकारों के केन्द्र सरकारों को भी इन स्थानीय संस्थाओं की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए।

साथ ही महिलाओं के लिए भी बजट में अलग प्रावधान होना चाहिए। साथ ही यह भी सत्य है कि केवल आरक्षण ही काफी नहीं है, स्थानीय निकाय को चाहिए कि वे गाँव के सभी लोगों के लिए विकास कार्यों का ध्यान रखें।

प्रश्न 6.
73 वें संशोधन के प्रावधानों को पढे। यह संशोधन निम्नलिखित सरोकारों में से किससे ताल्लुक रखता है?
(क) पद से हटा दिए जाने का भय जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
(ख) भूस्वामी सामन्त और ताकतवर जातियों का स्थानीय निकायों में दबदबा रहता है।
(ग) ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता बहुत ज्यादा है। निरक्षर लोगों गाँव के विकास के बारे में फैसला नहीं ले सकते हैं।
(घ) प्रभावकारी साबित होने के लिए ग्राम पंचायतों के पास गाँव की विकास योजना बनाने की शक्ति और संसाधन का होना जरूरी है।
उत्तर-
(घ) प्रभावकारी साबित होने के लिए ग्राम पंचायतों के पास गाँव की विकास योजना बनाने की शक्ति और संसाधन को होना जरूरी है।

प्रश्न 7.
नीचे स्थानीय शासन के पक्ष में कुछ तर्क दिए गए हैं। इन तर्को को आप अपनी पसंद से वरीयता क्रम में सजाएँ और बताएँ कि किसी एक तर्क की अपेक्षा दूसरे को आपने ज्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों माना है? आपके जानते वेगवसल गाँव की ग्राम पंचायत का फैसला निम्नलिखित कारणों में से किस पर और कैसे आधारित था?
(क) सरकार स्थानीय समुदाय को शामिल कर अपनी परियोजना कम लागत में पूरी कर सकती है।
(ख) स्थानीय जनता द्वारा बनायी गई विकास योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बनायी गई विकास योजना से ज्यादा स्वीकृत होती है।
(ग) लोग अपने इलाके की जरूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं। सामुदायिक भागीदारी द्वारा उन्हें विचार-विमर्श करके अपने जीवन के बारे में फैसला लेना चाहिए।
(घ) आम जनता के लिए अपने प्रदेश अथवा राष्ट्रीय विधायिका के जन-प्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।
उत्तर-
उपर्युक्त को वरीयता क्रम निम्नवत् होगा-
(1) ग (2) क (3) खे (4) घ।
बैंगेवसल गाँव की पंचायत का फैसला ‘ग’ उदाहरण पर आधारित है जिसमें यह व्यक्त किया गया है। कि स्थानीय लोग अपनी समस्याओं, हितों व प्राथमिकताओं को बेहतर समझते हैं। अत: उन्हें अपने बारे में निर्णय लेने का स्वयं अधिकार प्रदान करना चाहिए।

प्रश्न 8.
आपके अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा विकेंद्रीकरण का साधन है? शेष को विकेंद्रीकरण के साधन के रूप में आप पर्याप्त विकल्प क्यों नहीं मानते?
(क) ग्राम पंचायत का चुनाव होगा।
(ख) गाँव के निवासी खुद तय करें कि कौन-सी नीति और योजना गाँव के लिए उपयोगी है।
(ग) ग्राम सभा की बैठक बुलाने की ताकत।
(घ) प्रदेश सरकार ने ग्रामीण विकास की एक योजना चला रखी है। प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) ग्राम पंचायत के सामने एक रिपोर्ट पेश करता है कि इस योजना में कहाँ तक प्रगति हुई है।
उत्तर-
(ख) उदाहरण में शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की स्थिति है जिसमें ग्राम के लोग स्वयं यह निश्चित करते हैं कि कौन-सी परियोजना उनके लिए उपयोगी है। अन्य उदाहरणों में विकेन्द्रीकरण की स्थितिं निम्नलिखित कारणों से प्रतीत नहीं होती-
(क) ग्राम पंचायतों के चुनाव से सम्बद्ध है।
(ग) ग्राम सभा की बैठक बुलाने की बात कही गई है।
(घ) बीडीओ ग्राम पंचायत के समक्ष रिपोर्ट पेश करता है।

प्रश्न 9.
दिल्ली विश्वविद्यालय का एक छात्र प्राथमिक शिक्षा के निर्णय लेने में विकेन्द्रीकरण की भूमिका का अध्ययन करना चाहता था। उसने गाँववासियों से कुछ सवाल पूछे। ये सवाल नीचे लिखे हैं। यदि गाँववासियों में आप शामिल होते तो निम्नलिखित प्रश्नों के क्या उत्तर देते?
गाँव का हर बालक/बालिका विद्यालय जाए, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कौन-से कदम उठाए जाने चाहिए-इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए ग्राम सभा की बैठक बुलाई जानी है।

(क) बैठक के लिए उचित दिन कौन-सा होगा, इसका फैसला आप कैसे करेंगे? सोचिए कि आपके चुने हुए दिन में कौन बैठक में आ सकता है और कौन नहीं?
(अ) प्रखण्ड विकास अधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा तय किया हुआ कोई दिन।
(ब) गाँव का बाजार जिस दिन लगता है।
(स) रविवार।
(द) नाग पंचमी/संक्रांति

(ख) बैठक के लिए उचित स्थान क्या होगा? कारण भी बताएँ।
(अ) जिला-कलेक्टर के परिपत्र में बताई गई जगह।
(ब) गाँव का कोई धार्मिक स्थान।
(स) दलित मोहल्ला।
(द) ऊँची जाति के लोगों का टोला।
(ध) गाँव का स्कूल।

(ग) ग्राम सभा की बैठक में पहले जिला-समाहर्ता (कलेक्टर) द्वारा भेजा गया परिपत्र पढ़ा गया। परिपत्र में बताया गया था कि शैक्षिक रैली को आयोजित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएँ और रैली किस रास्ते होकर गुजरे। बैठक में उन बच्चों के बारे में चर्चा नहीं हुई जो कभी स्कूल नहीं आते। बैठक में बालिकाओं की शिक्षा के बारे में, विद्यालय भवन की दशा के बारे में और विद्यालय के खुलने-बंद होने के समय के बारे में भी चर्चा नहीं हुई। बैठक रविवार के दिन हुई इसलिए कोई महिला शिक्षक इस बैठक में नहीं आ सकी। लोगों की भागीदारी के लिहाज से इसको आप अच्छा कहेंगे या बुरा? कारण भी बताएँ।।

(घ) अपनी कक्षा की कल्पना ग्राम सभा के रूप में करें। जिस मुद्दे पर बैठक में चर्चा होनी थी उस पर कक्षा में बातचीत करें और लक्ष्य को पूरा करने के लिए कुछ उपाय सुझाएँ।
उत्तर-
(क) प्रखण्ड विकास अधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा निश्चित किया हुआ कोई दिन।
(ख) गाँव का स्कूल बैठक के लिए उचित स्थान रहेगा क्योकि यहाँ पर गाँव के सभी लोग आते हैं। वे इस स्थान से भली-भाँति परिचित हैं।
(ग) उपर्युक्त स्थिति में स्पष्ट किया गया है कि स्थानीय सरकारों की वास्तविक स्थिति क्या है तथा स्थानीय संस्थाओं की बैठकों में स्थानीय लोगों की भागीदारी कितनी कम होती है। इन संस्थाओं की बैठकें केवल औपचारिकताएँ होती हैं तथा स्थानीय लोगों को निर्णयों की सूचना दे दी जाती है। महिलाओं की अनुपस्थिति इन बैठकों में लगभग ने
के बराबर ही होती है तथा उनके विचारों पर कोई ध्यान नहीं देती।
(घ) अगर हमारी कक्षा एक ग्राम सभा में परिवर्तित हो जाए और उसमें चर्चा का विषय, स्थानीय लोगों का कल्याण व भागीदारी हो तो इस बात का सर्वसम्मति से निर्णय करने का प्रयाय किया जाएगा कि शक्तियों के विकेन्द्रीकरण के उद्देश्य को प्राप्त किया जाए। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-

  • ग्राम विकास में स्थानीय लोगों की भागीदारी होनी चहिए।
  • शक्तियों का अधिक-से-अधिक विकेन्द्रीकरण हो।
  • महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • कमजोर वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।
  • सरकार की ग्रामों तक सीधी पहुँच हो।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायत समिति का क्षेत्र है –
(क) ग्राम
(ख) जिला
(ग) विकास खण्ड
(घ) नगर
उत्तर :
(क) ग्राम

प्रश्न 2.
पंचायती राज-व्यवस्था में एकरूपता संविधान के किस संशोधन द्वारा लाई गई?
(क) 42वें संशोधन द्वारा
(ख) 73वें संशोधन द्वारा
(ग) 46वें संशोधन द्वारा
(घ) 44वें संशोधन द्वारा
उत्तर :
(ख) 73वें संशोधन द्वारा

प्रश्न 3.
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई है –
(क) ग्राम
(ख) जिला
(ग) प्रदेश
(घ) नगर
उत्तर :
(ख) जिला

प्रश्न 4.
पंचायती राज का सबसे निचला स्तर है –
(क) ग्राम पंचायत
(ख) ग्राम सभा
(ग) पंचायत समिति
(घ) न्याय पंचायत
उत्तर :
(क) ग्राम पंचायत।

प्रश्न 5.
न्याय पंचायत के कार्य-क्षेत्र में सम्मिलित नहीं है
(क) छोटे दीवानी मामलों का निपटारा
(ख) मुजरिमों पर जुर्माना
(ग) मुजरिमों को जेल भेजना
(घ) छोटे फौजदारी मामलों का निपटारा
उत्तर : 
(ग) मुजरिमों को जेल भेजना।

प्रश्न 6.
जिला परिषद् के सदस्यों में सम्मिलित नहीं है –
(क) जिलाधिकारी
(ख) पंचायत समितियों के प्रधान
(ग) कुछ विशेषज्ञ
(घ) न्यायाधीश
उत्तर :
(घ) न्यायाधीश।

प्रश्न 7.
ग्राम पंचायत की बैठक होनी आवश्यक है –
(क) एक सप्ताह में एक
(ख) एक माह में एक
(ग) एक वर्ष में दो
(घ) एक वर्ष में चार
उत्तर :
(ख) एक माह में एक।

प्रश्न 8.
नगरपालिका के अध्यक्ष का चुनाव होता है –
(क) एक वर्ष के लिए
(ख) पाँच वर्ष के लिए
(ग) चार वर्ष के लिए
(घ) तीन वर्ष के लिए
उत्तर :
(ख) पाँच वर्ष के लिए।

प्रश्न 9.
नगरपालिका परिषद् का ऐच्छिक कार्य है
(क) नगरों में रोशनी का प्रबन्ध करना
(ख) नगरों में पेयजल की व्यवस्था करना
(ग) नगरों की स्वच्छता का प्रबन्ध करना
(घ) प्रारम्भिक शिक्षा से ऊपर शिक्षा की व्यवस्था करना
उत्तर :
(घ) प्रारम्भिक शिक्षा से ऊपर शिक्षा की व्यवस्था करना।

प्रश्न 10.
जिला परिषद की आय का साधन है –
(क) भूमि पर लगान
(ख) चुंगी कर
(ग) हैसियत एवं सम्पत्ति कर
(घ) आयकर
उत्तर :
(ग) हैसियत एवं सम्पत्ति कर।

प्रश्न 11.
जिला पंचायत कार्य नहीं करती
(क) जन-स्वास्थ्य के लिए रोगों की रोकथाम करना
(ख) सार्वजनिक पुलों तथा सड़कों का निर्माण करना
(ग) प्रारम्भिक स्तर से ऊपर की शिक्षा का प्रबन्ध करना
(घ) यातायात का प्रबन्ध करना
उत्तर :
(घ) यातायात का प्रबन्ध करना

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य नगरपालिका परिषद् नहीं करती ?
(क) पीने के पानी की आपूर्ति
(ख) रोशनी की व्यवस्था
(ग) उच्च शिक्षा का संगठन
(घ) जन्म-मृत्यु का लेखा
उत्तर :
(ग) उच्च शिक्षा का संगठन।

प्रश्न 13.
जनपद का सर्वोच्च अधिकारी है –
(क) मुख्यमन्त्री
(ख) जिलाधिकारी
(ग) पुलिस अधीक्षक
(घ) जिला प्रमुख
उत्तर :
(ख) जिलाधिकारी।

प्रश्न 14.
जिले के शिक्षा विभाग का प्रमुख अधिकारी है –
(क) जिला विद्यालय निरीक्षक
(ख) बेसिक शिक्षा अधिकारी
(ग) राजकीय विद्यालय क़ा प्रधानाचार्य
(घ) माध्यमिक शिक्षा परिषद् का क्षेत्रीय अध्यक्ष
उत्तर :
(क) जिला विद्यालय निरीक्षक।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय स्वशासन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
स्थानीय स्वशासन से आशय है-किसी स्थान विशेष के शासन का प्रबन्ध उसी स्थान के लोगों द्वारा किया जाना तथा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजना।।

प्रश्न 2.
स्थानीय शासन तथा स्थानीय स्वशासन में दो भेद बताइए।
उत्तर :

  1. स्थानीय शासन उतना लोकतान्त्रिक नहीं होता जितना स्थानीय स्वशासन होता है।
  2. स्थानीय शासन स्थानीय स्वशासन की अपेक्षा कम कुशल होता है।

प्रश्न 3.
क्या पंचायती राज-व्यवस्था अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हो सकी है ?
उत्तर :
यद्यपि कहीं-कहीं पर पंचायती राज व्यवस्था ने कुछ अच्छे कार्य किये हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि पंचायती राज व्यवस्था अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल कम ही हुई है।

प्रश्न 4.
पंचायती राज की तीन स्तरीय व्यवस्था क्या है ?
उत्तर :
पंचायती राज की तीन स्तरीय व्यवस्था के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तीन इकाइयों का प्रावधान किया गया है –

  1. ग्राम पंचायत
  2. पंचायत समिति तथा
  3. जिला परिषद्।

प्रश्न 5.
पंचायती राज को सफल बनाने के लिए किन शर्तों का होना आवश्यक है ?
उत्तर :
पंचायती राज को सफल बनाने के लिए इन शर्तों का होना आवश्यक है –

  1. लोगों का शिक्षित होना
  2. स्थानीय मामलों में लोगों की रुचि
  3. कम-से-कम सरकारी हस्तक्षेप तथा
  4. पर्याप्त आर्थिक संसाधन।

प्रश्न 6.
जिला प्रशासन के दो मुख्य अधिकारियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जिला प्रशासन के दो मुख्य अधिकारी हैं –

  1. जिलाधीश तथा
  2. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एस०एस०पी०)।

प्रश्न 7.
जिला पंचायत के चार अनिवार्य कार्य बताइए।
उत्तर :
जिला पंचायत के चार अनिवार्य कार्य हैं :

  1. पीने के पानी की व्यवस्था करना
  2. प्राथमिक स्तर से ऊपर की शिक्षा का प्रबन्ध करना
  3. जन-स्वास्थ्य के लिए महामारियों की रोकथाम तथा
  4. जन्म-मृत्यु का हिसाब रखना।

प्रश्न 8.
जिला पंचायत की दो प्रमुख समितियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जिला पंचायत की दो प्रमुख समितियाँ हैं :

  1. वित्त समिति तथा
  2. शिक्षा एवं जनस्वास्थ्य समिति।

प्रश्न 9.
क्षेत्र पंचायत का सबसे बड़ा वैतनिक अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
क्षेत्र पंचायत का सर्वोच्च वैतनिक अधिकारी क्षेत्र विकास अधिकारी होता है।

प्रश्न 10.
ग्राम सभा के सदस्य कौन होते हैं ?
उत्तर :
ग्राम की निर्वाचक सूची में सम्मिलित प्रत्येक ग्रामवासी ग्राम सभा का सदस्य होता है।

प्रश्न 11.
अपने राज्य के ग्रामीण स्थानीय स्वायत्त शासन की दो संस्थाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :
ग्रामीण स्वायत्त शासन की दो संस्थाओं के नाम हैं –

  1. ग्राम सभा तथा
  2. ग्राम पंचायत।

प्रश्न 12.
ग्राम पंचायत के अधिकारियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
ग्राम पंचायत के अधिकारी हैं –

  1. प्रधान तथा
  2. उप-प्रधान।

प्रश्न 13.
ग्राम पंचायत के चार कार्य बताइए।
उत्तर :
ग्राम पंचायत के चार कार्य हैं –

  1. ग्राम की सम्पत्ति तथा इमारतों की रक्षा करना
  2. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना
  3. कृषि और बागवानी का विकास करना तथा
  4. लघु सिंचाई परियोजनाओं से जल-वितरण का प्रबन्ध करना।

प्रश्न 14.
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल क्या है ?
उत्तर :
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। विशेष परिस्थितियों में सरकार इसे कम भी कर सकती है।

प्रश्न 15.
न्याय पंचायत के पंचों की नियुक्ति किस प्रकार होती है ?
उत्तर :
ग्राम पंचायत के सदस्यों में से विहित प्राधिकारी न्याय पंचायत के उतने ही पंच नियुक्त करता है जितने कि नियत किये जाएँ। ऐसे नियुक्त किये गये व्यक्ति ग्राम पंचायत के सदस्य नहीं रहेंगे।

प्रश्न 16.
पंचायती राज की तीन स्तर वाली व्यवस्था की संस्तुति करने वाली समिति का नाम लिखिए।
उत्तर :
बलवन्त राय मेहता समिति।

प्रश्न 17.
किन संविधान संशोधनों द्वारा पंचायतों और नगरपालिकाओं से सम्बन्धित उपबन्धों का संविधान में उल्लेख किया गया ?
उत्तर :

  1. उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 द्वारा जिला पंचायत की व्यवस्था।
  2. उत्तर प्रदेश नगर स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 द्वारा नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासने की व्यवस्था।

प्रश्न 18.
नगर स्वायत्त संस्थाओं के नाम बताइए।
उत्तर :

  1. नगर-निगम तथा महानगर निगम
  2. नगरपालिका परिषद् तथा
  3. नगर पंचायत।

प्रश्न 19.
नगर-निगम किन नगरों में स्थापित की जाती है ? उत्तर प्रदेश में नगर-निगम का गंठन किन-किन स्थानों पर किया गया है ?
उत्तर :
पाँच लाख से दस लाख तक जनसंख्या वाले नगरों में नगर-निगम स्थापित की जाती है। उत्तर प्रदेश के आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद, बरेली, मेरठ, अलीगढ़, मुरादाबाद, गाजियाबाद, गोरखपुर आदि में नगर-निगम कार्यरत हैं। कानपुर तथा लखनऊ में महानगर निगम स्थापित हैं।

प्रश्न 20.
नगर-निगम के दो कार्य बताइए।
उत्तर :
नगर निगम के दो कार्य हैं –

  1. नगर में सफाई व्यवस्था करना तथा
  2. सड़कों व गलियों में प्रकाश की व्यवस्था करना।

प्रश्न 21.
नगर-निगम की दो प्रमुख समितियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
नगर-निगम की दो प्रमुख समितियाँ हैं –

  1. कार्यकारिणी समिति तथा
  2. विकास समिति।

प्रश्न 22.
नगर-निगम का अध्यक्ष कौन होता है ?
उत्तर :
नगर-निगम का अध्यक्ष नगर प्रमुख (मेयर) होता है।

प्रश्न 23.
नगर-निगम में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कितनी होती है ?
उत्तर :
नगर-निगम के निर्वाचित सदस्यों (सभासदों) की संख्या सरकारी गजट में दी गयी विज्ञप्ति के आधार पर निश्चित की जाती है। यह संख्या कम-से-कम 60 और अधिक-से-अधिक 110 होती है।

प्रश्न 24.
उत्तर प्रदेश में नगरपालिका परिषद का गठन किन स्थानों के लिए किया जाएगा ?
उत्तर :
नगरपालिका परिषद् का गठन 1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या वाले ‘लघुतर नगरीय क्षेत्रों में किया जाता है।

प्रश्न 25.
जिले (जनपद) का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी कौन है ?
उत्तर :
जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी जिलाधिकारी (उपायुक्त) होता है।

प्रश्न 26.
जिलाधिकारी का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन-सा है ?
उत्तर :
जिले में शान्ति-व्यवस्था की स्थापना करना जिलाधिकारी का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है।

प्रश्न 27.
जिलाधिकारी की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर :
जिलाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।

प्रश्न 28.
जिले में शिक्षा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
जिले में शिक्षा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक होता है।

प्रश्न 29.
जिले के विकास-कार्यों से सम्बन्धित जिला स्तरीय अधिकारी का पद नाम लिखिए।
उत्तर :
मुख्य विकास अधिकारी।

प्रश्न 30.
जिले में पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
जिले में पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (S.S.P) होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय स्वशासन से आप क्या समझते हैं ? इस प्रदेश में कौन-कौन-सी स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ कार्य कर रही हैं ?
उत्तर :
केन्द्र व राज्य सरकारों के अतिरिक्त, तीसरे स्तर पर एक ऐसी सरकार है, जिसके सम्पर्क में नगरों और ग्रामों के निवासी आते हैं। इस स्तर की सरकार को स्थानीय स्वशासन कहा जाता है, क्योंकि यह व्यवस्था स्थानीय निवासियों को अपना शासन-प्रबन्ध करने का अवसर प्रदान करती है। इसके अन्तर्गत मुख्यतया ग्रामवासियों के लिए पंचायत और नगरवासियों के लिए नगरपालिका उल्लेखनीय हैं। इन संस्थाओं द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान के प्रयास किये जाते हैं।

  • नगरीय क्षेत्र – नगर-निगम या नगर महापालिका, नगरपालिका परिषद् और नगर पंचायत।
  • ग्रामीण क्षेत्र – ग्राम पंचायत, न्याय पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत।।

प्रश्न 2.
भारत में स्थानीय संस्थाओं का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का देश की राजनीति और प्रशासन में विशेष महत्त्व है। किसी भी गाँव या कस्बे की समस्याओं का सबसे अच्छा ज्ञान उस गाँव या कस्बे के निवासियों को ही होता है। इसलिए वे अपनी छोटी सरकार का संचालन करने में समर्थ तथा सर्वोच्च होते हैं। इन संस्थाओं का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है –

  1. इनके द्वारा गाँव तथा नगर के निवासियों की प्रशासन में भागीदारी सम्भव होती है।
  2. ये संस्थाएँ प्रशासन तथा जनता के मध्य अधिकाधिक सम्पर्क बनाये रखने में सहायक होती हैं। इसके फलस्वरूप जिला प्रशासन को अपना कार्य करने में आसानी होती है।
  3. स्थानीय विकास तथा नियोजन की प्रक्रियाओं में भी ये संस्थाएँ सहायक सिद्ध होती हैं।

प्रश्न 3.
ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत में निम्नलिखित अन्तर हैं –

  1. ग्राम पंचायत, ग्राम सभा से सम्बन्धित होती है तथा ग्राम सभा के कार्यों का सम्पादन ग्राम पंचायत के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार ग्राम पंचायत, ग्राम सभा की कार्यकारिणी होती है। ग्राम पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन ग्राम सभा के सदस्य ही करते हैं।
  2. ग्राम सभा का प्रमुख कार्य क्षेत्रीय विकास के लिए योजनाएँ बनाना और ग्राम पंचायत का कार्य उन योजनाओं को व्यावहारिक रूप प्रदान करना है।
  3. ग्राम सभा की वर्ष में दो बार तथा ग्राम पंचायत की माह में एक बार बैठक होना आवश्यक है।
  4. कर लगाने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है न कि ग्राम पंचायत को।
  5. ग्राम सभा एक बड़ा निकाय है, जबकि ग्राम पंचायत उसकी एक छोटी संस्था है।
  6. ग्राम सभा का निर्वाचन नहीं होता है, जबकि ग्राम पंचायत, ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित संस्था होती है।

दीर्घ लघु उरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायती राज के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
या
भारत में पंचायती राज-व्यवस्था का प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ ?
उत्तर :
पंचायती राज’ का अर्थ है-ऐसा राज्य जो पंचायत के माध्यम से कार्य करता है। ऐसे शासन के अन्तर्गत ग्रामवासी अपने में से वयोवृद्ध व्यक्तियों को चुनते हैं, जो उनके विभिन्न झगड़ों का निपटारा करते हैं। इस प्रकार के शासन में ग्रामवासियों को अपनी व्यवस्था के प्रबन्ध में प्रायः पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। इस प्रकार पंचायती राज स्वशासन का ही एक रूप है।

यद्यपि भारत के ग्रामों में पंचायतें बहुत पुराने समय में भी विद्यमान थीं, परन्तु वर्तमान समय में पंचायती राज-व्यवस्था का जन्म स्वतन्त्रता के पश्चात् ही हुआ। पंचायती राज की वर्तमान व्यवस्था का सुझाव बलवन्त राय मेहता समिति ने दिया था। देश में पंचायती राज-व्यवस्था सर्वप्रथम राजस्थान में लागू की गयी, बाद में मैसूर (वर्तमान कर्नाटक), तमिलनाडु, उड़ीसा, असम, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में भी यह व्यवस्था लागू की गयी। बलवन्त राय मेहता की मूल योजना के अनुसार पंचायतों का गठन तीन स्तरों पर किया गया –

  1. ग्राम स्तर पर पंचायतें
  2. विकास खण्ड स्तर पर पंचायत समितियाँ तथा
  3. जिला स्तर पर जिला परिषद्।

संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1993 द्वारा पूरे प्रदेश में इस व्यवस्था के स्वरूप में एकरूपता लायी गयी है।

प्रश्न 2.
पंचायती राज के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

पंचायती राज की उपलब्धियाँ (गुण) –

  1. पंचायती राज पद्धति के फलस्वरूप ग्रामीण भारत में जागृति आयी है।
  2. पंचायतों द्वारा गाँवों में कल्याणकारी कार्यों के कारण गाँवों की हालत सुधरी है।
  3. पंचायतों द्वारा संचालित प्राथमिक और वयस्क विद्यालयों के फलस्वरूप गाँवों में साक्षरता और शिक्षा का प्रसार हुआ है।
  4. पंचायतों ने सफलतापूर्वक अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं की ओर अधिकारियों का ध्यान खींचा है।

पंचायती राज के दोष – पंचायती राज पद्धति के कारण गाँवों के जीवन में कई बुराइयाँ भी आयी हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. पंचायतों के लिए होने वाले चुनावों में हिंसा, भ्रष्टाचार और जातिवाद का बोलबाला रहता है। यहाँ तक कि निर्वाचित प्रतिनिधि भी इससे परे नहीं होते।
  2. यह भी कहा जाता है कि पंचायती राज के सदस्य चुने जाने के पश्चात् लोग अपने कर्तव्यों को ठीक प्रकार से नहीं करते।
  3. यहाँ रिश्वतखोरी चलती है और धन का बोलबाला रहता है। धनी आदमी पंचों को खरीद लेते
  4. स्वयं पंच लोग अनपढ़ होते हैं, इसलिए वे विभिन्न समस्याओं को सुलझाने की योग्यता ही नहीं रखते।
  5. पंच लोग पार्टी-लाइनों पर चुने जाते हैं, इसलिए वे सभी लोगों को निष्पक्ष होकर न्याय नहीं दे सकते। संक्षेप में, भारत में पंचायती राज एक मिश्रित वरदान है।

प्रश्न 3.
ग्राम पंचायत के संगठन, पदाधिकारी, कार्यकाल एवं इसके पाँच कार्यों का विवरण दीजिए।
उत्तर :

संगठन – ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधान के अतिरिक्त 9 से 15 तक सदस्य होते हैं। इसमें 1,000 की जनसंख्या पर 9 सदस्य; 1,000-2,000 की जनसंख्या तक 11 सदस्य; 2,000 3,000 की। जनसंख्या तक 13 सदस्य तथा 3,000 से ऊपर की जनसंख्या पर सदस्यों की संख्या 15 होती है। ग्राम पंचायत के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है। ग्राम पंचायत में नियमानुसार सभी वर्गों तथा महिलाओं को आरक्षण प्रदान किया गया है।

कार्यकाल – ग्राम पंचायत का निर्वाचन 5 वर्ष के लिए होता है, किन्तु विशेष परिस्थितियों में सरकार इसे समय से पूर्व भी विघटित कर सकती है।

पदाधिकारी – ग्राम पंचायत का प्रमुख अधिकारी ग्राम प्रधान’ कहलाता है। प्रधान की सहायता के लिए उप-प्रधान’ की व्यवस्था होती है। प्रधान का निर्वाचन ग्राम सभा के सदस्य पाँच वर्ष की अवधि के लिए करते हैं। उप-प्रधान का निर्वाचन पंचायत के सदस्य पाँच वर्ष के लिए करते हैं।

ग्राम पंचायत

पाँच कार्य – ग्राम पंचायत के कार्य इस प्रकार हैं –

  1. कृषि और बागवानी का विकास तथा उन्नति, बंजर भूमि और चरागाह भूमि का विकास तथा उनके अनधिकृत अधिग्रहण एवं प्रयोग की रोकथाम करना।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार और भूमि संरक्षण में सरकार तथा अन्य एजेन्सियों की सहायता करना, भूमि चकबन्दी में सहायता करना।
  3. लघु सिंचाई परियोजनाओं से जल वितरण में प्रबन्ध और सहायता करना; लघु सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण, मरम्मत और रक्षा तथा सिंचाई के उद्देश्य से जलापूर्ति का विनियमन।
  4. पशुपालन, दुग्ध उद्योग, मुर्गी-पालन की उन्नति तथा अन्य पशुओं की नस्लों का सुधार करना।
  5. गाँव में मत्स्य पालन का विकास।

प्रश्न 4.
नगरपालिका परिषद् के पाँच प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर :
नगरपालिका परिषद् के पाँच प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

(1) सफाई की व्यवस्था – सम्पूर्ण नगर को स्वच्छ एवं सुन्दर रखने का दायित्व नगरपालिका का ही होता है। यह सड़कों, नालियों और अन्य सार्वजनिक स्थानों की सफाई कराती है तथा नगर को स्वच्छ रखने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय एवं मूत्रालयों का निर्माण कराती है।

(2) पानी की व्यवस्था – नगरवासियों के लिए पीने योग्य स्वच्छ जल का प्रबन्ध नगरपालिका परिषद् ही करती है।

(3) शिक्षा का प्रबन्ध – अपने नगरवासियों की शैक्षिक स्थिति को सुधारने के लिए नगरपालिका परिषदें प्राइमरी स्कूल खोलती हैं। ये लड़कियों एवं अशिक्षित लोगों की शिक्षा का विशेष रूप से प्रबन्ध करती हैं।

(4) निर्माण सम्बन्धी कार्य – नगरपालिका परिषदें नगर में नालियाँ, सड़कें, पुल आदि बनवाने की व्यवस्था करती हैं। सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष एवं पार्क बनवाना भी इनके प्रमुख कार्य हैं। कुछ समृद्ध नगरपालिका परिषदें यात्रियों के लिए होटल, सरायों एवं धर्मशालाओं की भी व्यवस्था करती हैं। निर्माण सम्बन्धी ये कार्य नगरपालिका की ‘निर्माण समिति’ करती है।

(5) रोशनी की व्यवस्था – सड़कों, गलियों एवं सभी सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश का समुचित प्रबन्ध भी नगरपालिका परिषद् ही करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्नं 1.
स्थानीय स्वशासन का क्या अर्थ है ? स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता तथा महत्त्व बताइए।
या
भारत में स्थानीय स्वशासन के अर्थ, आवश्यकता और उसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में केन्द्र व राज्य सरकारों के अतिरिक्त, तीसरे स्तर पर एक ऐसी सरकार है जिसके सम्पर्क में नगरों और ग्रामों के निवासी आते हैं। इस स्तर की सरकार को स्थानीय स्वशासन कहा जाता है, क्योंकि यह व्यवस्था स्थानीय निवासियों को अपना शासन-प्रबन्ध करने का अवसर प्रदान करती है। इसके अन्तर्गत मुख्यतया ग्रामवासियों के लिए ग्राम पंचायत और नगरवासियों के लिए नगरपालिका उल्लेखनीय हैं। इन संस्थाओं द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान के प्रयास किये जाते हैं। व्यावहारिक रूप में वे सभी कार्य जिनका सम्पादन वर्तमान समय में ग्राम पंचायतों, जिला पंचायतों, नगरपालिकाओं, नगर निगम आदि के द्वारा किया जाता है, वे स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत आते हैं।

स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता एवं महत्त्व

स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है –

(1) लोकतान्त्रिक परम्पराओं को स्थापित करने में सहायक – भारत में स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्पराओं को स्थापित करने के लिए स्थानीय स्वशासन व्यवस्था ठोस आधार प्रदान करती है। उसके माध्यम से शासन-सत्ता वास्तविक रूप से जनता के हाथ में चली जाती है। इसके अतिरिक्त स्थानीय स्वशासन-व्यवस्था, स्थानीय निवासियों में लोकतान्त्रिक संगठनों के प्रति रुचि उत्पन्न करती है।

(2) भावी नेतृत्व का निर्माण – स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ भारत के भावी नेतृत्व को तैयार करती हैं। ये विधायकों और मन्त्रियों को प्राथमिक अनुभव एवं प्रशिक्षण प्रदान करती हैं, जिससे वे भारत की ग्रामीण समस्याओं से अवगत होते हैं। इस प्रकार ग्रामों में उचित नेतृत्व का निर्माण करने एवं विकास कार्यों में जनता की रुचि बढ़ाने में स्थानीय स्वशासन की महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है।

(3) जनता और सरकार के पारस्परिक सम्बन्ध – भारत की जनता स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के माध्यम से शासन के बहुत निकट पहुँच जाती है। इससे जनता और सरकार में एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझने की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त दोनों में सहयोग भी बढ़ता है, जो ग्रामीण उत्थान एवं विकास के लिए आवश्यक है।

(4) स्थानीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच की कड़ी – ग्राम पंचायतों के कार्यकर्ता और पदाधिकारी स्थानीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच की कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। इन स्थानीय पदाधिकारियों के सहयोग के अभाव में न तो राष्ट्र के निर्माण का कार्य सम्भव हो पाता है और न ही सरकारी कर्मचारी अपने दायित्व का समुचित रूप से पालन कर पाते हैं।

(5) प्रशासकीय शक्तियों का विकेन्द्रीकरण – स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ केन्द्रीय व राज्य सरकारों को स्थानीय समस्याओं के भार से मुक्त करती हैं। स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के माध्यम से ही शासकीय शक्सियों एवं कार्यों का विकेन्द्रीकरण किया जा सकता है। लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की इस प्रक्रिया में शासन-सत्ता कुछ निर्धारित संस्थाओं में निहित होने के स्थान पर, गाँव की पंचायत के कार्यकर्ताओं के हाथों में पहुँच जाती है। भारत में इस व्यवस्था से प्रशासन की कार्यकुशलता में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

(6) नागरिकों को निरन्तर जागरूक बनाये रखने में सहायक – स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ लोकतन्त्र की प्रयोगशालाएँ हैं। ये भारतीय नागरिकों को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रयोग की शिक्षा तो देती ही हैं, साथ ही उनमें नागरिकता के गुणों का विकास करने में भी सहायक होती हैं।

(7) लोकतान्त्रिक परम्पराओं के अनुरूप – लोकतन्त्र का आधारभूत तथा मौलिक सिद्धान्त यह है। कि सत्ता का अधिक-से-अधिक विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। स्थानीय स्वशासन की इकाइयाँ इस सिद्धान्त के अनुरूप हैं।

(8) नौकरशाही की बुराइयों की समाप्ति – स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी से प्रशासन में नौकरशाही, लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार जैसी बुराइयाँ उत्पन्न नहीं होती हैं।

(9) प्रशासनिक अधिकारियों की जागरूकता – स्थानीय लोगों की शासन में भागीदारी के कारण प्रशासन उस क्षेत्र की आवश्यकताओं के प्रति अधिक सजग तथा संवेदनशील हो जाता है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि स्थानीय स्वशासन लोकतन्त्र का आधार है। यह लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण (Democratic Decentralisation) की प्रक्रिया पर आधारित है। यदि प्रशासन को जागरूक तथा अधिक कार्यकुशल बनाना है तो उसका प्रबन्ध एवं संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय संस्थाओं के द्वारा ही सम्पन्न किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
पंचायती राज-व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? ग्राम पंचायत के कार्यों तथा शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत गाँवों का देश है। ब्रिटिश राज में गाँवों की आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था शोचनीय हो गयी थी; अतः स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद देश में पंचायती राज-व्यवस्था द्वारा गाँवों में राजनीतिक तथा आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण का प्रयास किया गया। बलवन्त राय मेहता -मिति ने पंचायती राज-व्यवस्था के लिए त्रि-स्तरीय योजना का परामर्श दिया। इस योजना में स. निचले स्तर पर ग्राम सभा और ग्राम पंचायतें हैं। मध्य स्तर पर क्षेत्र समितियाँ तथा उच्च स्तर पर जिला परिषदों की व्यवस्था की गयी थी।

भारतीय गाँवों में बहुत पहले से ही ग्राम पंचायतों की व्यवस्था रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने संयुक्त प्रान्तीय पंचायत राज कानून बनाकर पंचायतों के संगठन सम्बन्धी उल्लेखनीय कार्य को किया था। सन् 1947 ई० के इस कानून के अनुसार ग्राम पंचायत के स्थान पर ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और न्याय पंचायत की व्यवस्था की गयी थी। अब उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 के अनुसार भी ग्राम सभा, ग्राम पंचायत तथा न्याय पंचायत की ही व्यवस्था को रखा गया है।

ग्राम पंचायत के कार्य तथा शक्तियाँ

ग्राम सभा के निर्देशन तथा मार्गदर्शन में कार्य करती हुई ग्राम पंचायत, पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी आधारभूत इकाई है। यह ग्राम पंचायत सरकार की कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है। ग्राम पंचायत के कार्यों तथा शक्तियों की विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है –

ग्राम पंचायत के कार्य

ग्राम पंचायत के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं –

  1. गाँव की सफाई-व्यवस्था करना
  2. रोशनी का प्रबन्ध करना
  3. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना
  4. गाँव एवं गाँव की इमारतों की रक्षा करना
  5. जन्म-मरण का लेखा-जोखा रखना
  6. बालक एवं बालिकाओं की शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना
  7. खेलकूद की व्यवस्था करना
  8. कृषि की उन्नति का प्रयत्न करना
  9. श्मशान भूमि की व्यवस्था करना
  10. सार्वजनिक चरागाहों की व्यवस्था करना
  11. आग बुझाने का प्रबन्ध करना
  12. जनगणना और पशुगणना करना
  13. प्राथमिक चिकित्सा का प्रबन्ध करना
  14. खाद एकत्र करने के लिए स्थान निश्चित करना
  15. जल-मार्गों की सुरक्षा का प्रबन्ध करना
  16. प्रसूति-गृह खोलना
  17. सरकार द्वारा सौंपे गये अन्य कार्य करना
  18. आदर्श नागरिकता की भावना को प्रोत्साहन देना
  19. ग्रामीण जनता को शासन-व्यवस्था से परिचित कराना
  20. अस्पताल खुलवाना
  21. पुस्तकालय एवं वाचनालयों की व्यवस्था करना
  22. पार्क बनवाना
  23. गृहउद्योगों को उन्नत करने का प्रयत्न करना
  24. पशुओं की नस्ल सुधारना
  25. स्वयंसेवक दल का संगठन करना
  26. सहकारी समितियों का गठन करना
  27. सहकारी ऋण प्राप्त करने में किसानों की सहायता करना
  28. अकाल या अन्य विपत्ति के समय गाँव वालों की सहायता करना तथा
  29. सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाना आदि कार्य सम्मिलित होते हैं।

ग्राम पंचायत की शक्तियाँ

ग्राम पंचायत के कुछ सदस्य न्याय पंचायत के रूप में कार्य करते हुए अपने गाँव के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा भी करते हैं। दीवानी के मामलों में ये ₹ 500 के मूल्य तक की सम्पत्ति के मामलों की सुनवाई कर सकते हैं तथा फौजदारी के मुकदमों में इसे ₹ 250 तक का जुर्माना करने का अधिकार प्राप्त है।

भारतीय संविधान में किये गये 73वें संशोधन के द्वारा ग्राम पंचायत को व्यापक अधिकार एवं शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं। साथ ही ग्राम पंचायत के कार्य-क्षेत्र को भी व्यापक बनाया गया है जिसके अन्तर्गत 29 नियमों से युक्त एक विस्तृत सूची को रखा गया है।

प्रश्न 3.
क्षेत्र पंचायत किस प्रकार संगठित की जाती है ? यह अपने क्षेत्र के विकास के लिए कौन-कौन-से कार्य करती है ?
या
क्षेत्र पंचायत (पंचायत समिति) के संगठन, कार्यों तथा शक्तियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश रायत (संशोधन) अधिनियम, 1994′ के सेक्शन 7 (1) के द्वारा क्षेत्र समिति का नाम बदलकर क्षेत्र पंचायत कर दिया गया है। यह ग्राम पंचायत के ऊपर के स्तर की इकाई होती है। राज्य सरकार गजट में अधिसूचना द्वारा प्रत्येक खण्ड के लिए एक क्षेत्र पंचायत स्थापित करेगी। पंचायत का नाम खण्ड के नाम पर होगा।

संगठन – क्षेत्र पंचायत एक प्रमुख और निम्नलिखित प्रकार के सदस्यों से मिलकर बनती है –

  1. खण्ड की सभी ग्राम पंचायतों के प्रधान।
  2. निर्वाचित सदस्य – ये पंचायती क्षेत्र के 2000 जनसंख्या वाले प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
  3. लोकसभा और विधानसभा के ऐसे सदस्य, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पूर्णत: अथवा अंशत: उस खण्ड में सम्मिलित हैं।
  4. राज्यसभा तथा विधान परिषद् के ऐसे सदस्य, जो खण्ड के अन्तर्गत निर्वाचको के रूप में पंजीकृत हैं।

उपर्युक्त सदस्यों में केवल निर्वाचित सदस्यों को ही प्रमुख अथवा उप-प्रमुख के निर्वाचन तथा उनके विरुद्ध अविश्वास के मामलों में मत देने का अधिकार होता है।

योग्यता – क्षेत्र पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए प्रत्याशी में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं –

  1. उसका नाम क्षेत्र पंचायत की प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में हो।
  2. वह विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  3. उसकी आयु 21 वर्ष हो।
  4. वह किसी लाभ के सरकारी पद पर न हो।

स्थानों को आरक्षण – प्रत्येक क्षेत्र पंचायत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे। क्षेत्र पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में आरक्षित स्थानों का अनुपात यथासम्भव वही होगा जो उस खण्ड में अनुसूचित जातियों अथवा जनजातियों की या पिछड़े वर्गों की जनसंख्या का अनुपात उस खण्ड की कुल जनसंख्या में है। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27% से अधिक नहीं होगा।

अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित स्थानों की कुल संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे।

पदाधिकारी – क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही एक प्रमुख, एक ज्येष्ठ उप-प्रमुख तथा एक कनिष्ठ उप-प्रमुख चुने जाते हैं। राज्य में क्षेत्र पंचायतों के प्रमुखों के पद अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए आरक्षित किये गये हैं।

कार्यकाल – क्षेत्र पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु राज्य सरकार 5 वर्ष की अवधि से पहले भी क्षेत्र पंचायत को विघटित कर सकती है। प्रमुख, उप-प्रमुख अथवा क्षेत्र पंचायत का कोई भी सदस्य 5 वर्ष की अवधि से पूर्व भी त्यागपत्र देकर अपना पद त्याग सकता है। प्रमुख तथा उप-प्रमुख के द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन न करने की स्थिति में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उन्हें पदच्युत किया जा सकता है। क्षेत्र पंचायत के विघटन के छ: माह की अवधि के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।

अधिकारी – क्षेत्र पंचायत का सबसे प्रमुख अधिकारी ‘खण्ड विकास अधिकारी (Block Development Officer) होता है। इस पर समस्त प्रशासन का उत्तरदायित्व होता है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अधिकारी भी होते हैं।

अधिकार और कार्य – क्षेत्र पंचायत के प्रमुख अधिकार और कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. कृषि, भूमि विकास, भूमि सुधार और लघु सिंचाई सम्बन्धी कार्यों को करना।
  2. सार्वजनिक निर्माण सम्बन्धी कार्य करना।
  3. कुटीर और ग्राम उद्योगों तथा लघु उद्योगों का विकास करना।
  4. पशुपालन तथा पशु सेवाओं में वृद्धि करना।
  5. स्वास्थ्य तथा सफाई सम्बन्धी कार्यों की देखभाल करना।
  6. शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास से सम्बद्ध कार्य कराना।
  7. पेयजल, ईंधन और चारे की व्यवस्था करना।
  8. ग्रामीण आवास की व्यवस्था करना।
  9. चिकित्सा तथा परिवार कल्याण सम्बन्धी कार्यों की देखभाल करना।
  10. बाजार तथा मेलों की व्यवस्था करना।
  11. प्राकृतिक आपदाओं में सहायता प्रदान करना।
  12. ग्राम सभाओं का निरीक्षण करना तथा खण्ड विकास योजनाएँ लागू करना।

प्रश्न 4.
न्याय पंचायत का संगठन किस प्रकार होता है ? इसके प्रमुख अधिकार क्या हैं ?
उत्तर :
प्रत्येक ग्राम सभा न्याय पंचायत के लिए पंचों का निर्वाचन करती है। इन निर्वाचित सदस्यों में से सरकारी अधिकारी शिक्षा, प्रतिष्ठा, अनुभव एवं योग्यता के आधार पर पंच मनोनीत करता है। प्रत्येक न्याय पंचायत में सदस्यों की संख्या इस प्रकार होती है कि वह पाँच से पूरी-पूरी विभक्त हो जाए। 1 से 6 गाँव सभाओं वाली न्याय पंचायत के पंचों की संख्या 15, 7 से 9 तक 20 तथा 9 से अधिक होने पर 25 होगी।

न्याय पंचायत के सदस्य अपने मध्य से एक सरपंच तथा एक सहायक सरपंच चुनते हैं। इस पद पर उन्हीं पढ़े-लिखे व्यक्तियों को निर्वाचित किया जाता है जो कार्यवाही लिख सकें।

प्रमुख अधिकार

न्याय पंचायत को दीवानी, फौजदारी तथा माल के मुकदमे देखने का अधिकार प्राप्त है। न्याय पंचायतों को ₹ 500 की मालियत के मुकदमे सुनने का अधिकार दिया गया है। फौजदारी के मुकदमों में वह ₹ 250 तक जुर्माना कर सकती है। यह किसी को कारावास या शारीरिक दण्ड नहीं दे सकती। यदि कोई गवाह उपस्थित नहीं होता है तो यह है 25 का जमानती वारण्ट जारी कर सकती है। यदि न्याय पंचायत यह समझ ले कि किसी व्यक्ति से शान्ति भंग होने की आशंका है तो वह उससे 15 दिन तक के लिए ₹ 100 का मुचलका ले सकती है।

न्याय पंचायत को न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं। न्याय पंचायत का अनादर करने वाले व्यक्ति को न्याय ५ पंचायत मानहानि का अपराधी बनाकर उस पर ₹ 5 जुर्माना कर सकती है। न्याय पंचायत के निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती। चोरी, अश्लीलता, गाली-गलौज, स्त्री की लज्जा, अपहरण आदि के मुकदमो की सुनवाई न्याय पंचायत करती है। इन मुकदमों में वकीलों को पेश होने का प्रावधान नहीं रखा गया है। किसी मुकदमे में अन्याय होने पर न्याय पंचायत के दीवानी के मुकदमे की निगरानी मुंसिफ के यहाँ तथा माल के मुकदमे की निगरानी हाकिम परगना के यहाँ हो सकती है। राज्य सरकार न्याय पंचायतों के कार्यों पर नियन्त्रण रखती है, जिससे निर्णयों में कोई पक्षपात न हो सके तथा न्याय पंचायतें सही रूप से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें।

प्रश्न 5.
जिला पंचायत का गठन किस प्रकार होता है ? इसके प्रमुख कार्य तथा आय के साधन लिखिए।
उत्तर :
त्रि-स्तरीय पंचायती राज-व्यवस्था की सर्वोच्च इकाई जिला पंचायत होती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 पारित करके जिला परिषद् का नाम बदलकर जिला पंचायत कर दिया है।

गठन – जिला पंचायत के गठन में निम्नलिखित दो प्रकार के सदस्य होते हैं –

(क) निर्वाचित सदस्य – निर्वाचित सदस्यों की सदस्य-संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाती है। साधारणतया 50,000 से अधिक की जनसंख्या पर एक सदस्य निर्वाचित किया जाता है। यह निर्वाचन वयस्क मतदान द्वारा होता है।

(ख) अन्य सदस्य – अन्य सदस्यों में कुछ पदेन सदस्य होते हैं, जो कि निम्नवत् हैं –

  1. जनपद की सभी क्षेत्र पंचायतों के प्रमुख।
  2. लोकसभा तथा विधानसभा के वे सदस्य जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें जिला पंचायत क्षेत्र का कोई भाग समाविष्ट है।
  3. राज्यसभा तथा विधान परिषद् के वे सदस्य जो उस जिला पंचायत क्षेत्र में मतदाताओं के रूप में पंजीकृत हैं।

आरक्षण – प्रत्येक जिला पंचायत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए नियमानुसार स्थान आरक्षित रहेंगे। आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, जिला अनुपात में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होगा, जो अनुपात इन जातियों एवं वर्गों की जनसंख्या का जिला पंचायत क्षेत्र की समस्त जनसंख्या में है। संशोधित प्रावधानों के अन्तर्गत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27% से अधिक नहीं होगा। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान; इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे। प्रत्येक जिला पंचायत में निर्वाचित स्थानों की कुल संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान; महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे।

योग्यता – जिला पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ अपेक्षित हैं –

  1. ऐसे सभी व्यक्ति, जिनका नाम उस जिला पंचायत के किसी प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में सम्मिलित है।
  2. जो राज्य विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की आयु-सीमा के अतिरिक्त अन्य सभी योग्यताएँ रखता है।
  3. जिसने 21 वर्ष की आयु पूरी कर ली है।

अधिकारी – प्रत्येक जिला पंचायत में दो अधिकारी होते हैं-अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, जिनका चुनाव निर्वाचित सदस्यों द्वारा गुप्त मतदान प्रणाली के आधार पर होता है। अध्यक्ष बनने के लिए यह आवश्यक है कि वह जिले में रहता हो, उसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो तथा उसका नाम मतदाता सूची में हो। इन दोनों का निर्वाचन पाँच वर्ष के लिए किया जाता है। राज्य सरकार पाँच वर्ष की अवधि, से पूर्व भी इन्हें पदच्युत कर सकती है। ये पद भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित होते हैं। अध्यक्ष पंचायतों की बैठकों का सभापतित्व करता है, पंचायत के कार्यों का निरीक्षण करता है एवं कर्मचारियों पर नियन्त्रण रखता है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसका पदभार उपाध्यक्ष सँभालता है।

इन अधिकारियों के अतिरिक्त छोटे-बड़े, स्थायी-अस्थायी अनेक वैतनिक कर्मचारी भी होते हैं, जो इन अधिकारियों के प्रति जिम्मेदार होते हैं तथा जिला पंचायत का कार्य निष्पादित करते हैं।

कार्य – जिले के समस्त ग्रामीण क्षेत्र की व्यवस्था तथा विकास का उत्तरदायित्व जिला पंचायत पर है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए जिला परिषद् निम्नलिखित कार्य करती है

  1. सार्वजनिक सङ्कों, पुलों तथा निरीक्षण-गृहों का निर्माण एवं मरम्मत करवाना।
  2. प्रबन्ध हेतु सड़कों का ग्राम सड़कों, अन्तग्रम ग्राम सड़कों तथा जिला सड़कों में वर्गीकरण करना।
  3. तालाब, नाले आदि बनवाना।
  4. पीने के पानी की व्यवस्था करना।
  5. रोशनी का प्रबन्ध करना।
  6. जनस्वास्थ्य के लिए महामारियों और संक्रामक रोगों की रोकथाम की व्यवस्था करना।
  7. अकाल के दौरान सहायता हेतु राहत कार्य चलाना।
  8. क्षेत्र समिति एवं ग्राम पंचायत के कार्यों में तालमेल स्थापित करना।
  9. ग्राम पंचायतों तथा क्षेत्र समितियों के कार्यों का निरीक्षण करना।
  10. प्राइमरी स्तर से ऊपर की शिक्षा का प्रबन्ध करना।
  11. सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाना।
  12. कांजी हाउस तथा पशु चिकित्सालय की व्यवस्था करना।
  13. जन्म-मृत्यु का हिसाब रखना।
  14. परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू करना।
  15. अस्पताल खोलना तथा मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था करना।
  16. पुस्तकालय-वाचनालय का निर्माण एवं उनका अनुरक्षण करना।
  17. कृषि की उन्नति के लिए उचित प्रबन्ध करना।
  18. खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकना आदि।

आय के साधन – जिला पंचायत अपने कार्यों को पूर्ण करने के लिए निम्नलिखित साधनों से आय प्राप्त करती है –

  1. हैसियत एवं सम्पत्ति कर
  2. स्कूलों से प्राप्त फीस
  3. अचल सम्पत्ति से कर
  4. लाइसेन्स कर
  5. नदियों के पुलों तथा घाटों से प्राप्त उतराई कर
  6. कांजी हाउसों से प्राप्त आय
  7. मेलों, हाटों एवं प्रदर्शनियों से प्राप्त आय तथा
  8. राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान।

प्रश्न 6.
अपने प्रदेश में नगरपालिका परिषद का गठन किस प्रकार होता है ? नगर के विकास के लिए वे कौन-कौन-से कार्य करती हैं ?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 ई०’ के अनुसार 1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या वाले नगर को ‘लघुतर नगरीय क्षेत्र का नाम दिया गया है तथा इनके प्रबन्ध के लिए नगरपालिका परिषद् की व्यवस्था का निर्णय लिया गया है।

गठन – नगरपालिका परिषद् में एक अध्यक्ष और तीन प्रकार के सदस्य होंगे। ये तीन प्रकार के सदस्य निम्नलिखित हैं –

(1) निर्वाचित सदस्य – नगरपालिका परिषद् में जनसंख्या के आधार पर निर्वाचित सदस्यों की संख्या 25 से कम और 55 से अधिक नहीं होगी। राज्य सरकार सदस्यों की यह संख्या निश्चित करके सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा प्रकाशित करेगी।

(2) पदेन सदस्य – (i) इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभा के ऐसे समस्त सदस्य सम्मिलित होते हैं, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें पूर्णतया अथवा अंशतः वे नगरपालिका क्षेत्र सम्मिलित होते हैं।
(ii) इसमें राज्यसभा और विधान परिषद् के ऐसे समस्त सदस्य सम्मिलित होते हैं, जो उस नगरपालिका क्षेत्र के अन्तर्गत निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हैं।

(3) मनोनीत सदस्य – प्रत्येक नगरपालिका परिषद् में राज्य सरकार द्वारा ऐसे सदस्यों को मनोनीत किया जाएगा, जिन्हें नगरपालिका प्रशासन का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव हो। ऐसे सदस्यों की संख्या 3 से कम और 5 से अधिक नहीं होगी। इन मनोनीत सदस्यों को नगरपालिका परिषद् की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होगा। नगर निगम के निर्वाचित सदस्यों के समान (सभासद) नगरपालिका परिषद् के सदस्यों को भी सभासद’ ही कहा जाएगा।

पदाधिकारी – प्रत्येक नगरपालिका परिषद् में एक ‘अध्यक्ष और एक ‘उपाध्यक्ष होगा। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में या पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष के द्वारा अध्यक्ष के रूप में कार्य किया जाता है। अध्यक्ष का निर्वाचन 5 वर्ष के लिए समस्त मतदाताओं द्वारा वयस्क मताधिकार तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता है। उपाध्यक्ष का निर्वाचन नगरपालिका परिषद् के सभासदों द्वारा एक वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है।

अधिकारी और कर्मचारी – उपर्युक्त के अतिरिक्त परिषद् के कुछ वैतनिक अधिकारी व कर्मचारी भी होते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी’ (Executive Officer) होता है। जिन परिषदों में ‘प्रशासनिक अधिकारी न हों, वहाँ परिषद् विशेष प्रस्ताव द्वारा एक या एक से अधिक सचिव नियुक्त करती है।

कार्य – नगरपालिका अपनी समितियों के माध्यम से नगरों के विकास के लिए निम्नलिखित कार्य करती है –

(I) अनिवार्य कार्य – नगरपालिका परिषद् को निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं –

  1. सड़कों का निर्माण तथा उनकी मरम्मत व सफाई करवाना।
  2. नगरों में जल की व्यवस्था करना।
  3. नगरों में प्रकाश की व्यवस्था करना।
  4. सड़कों के किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाना।
  5. नगर की सफाई का प्रबन्ध करना।
  6. औषधालयों का प्रबन्ध करना तथा संक्रामक रोगों से बचने के लिए टीके लगवाना।
  7. शवों को जलाने एवं दफनाने की उचित व्यवस्था करना।
  8. जन्म एवं मृत्यु का विवरण रखना।
  9. नगरों में शिक्षा की व्यवस्था करना।
  10. आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की व्यवस्था करना।
  11. सड़कों तथा मोहल्लों का नाम रखना व मकानों पर नम्बर डलवाना।
  12. बूचड़खाने बनवाना तथा उनकी व्यवस्था करना।
  13. अकाल के समय लोगों की सहायता करना।

(II) ऐच्छिक कार्य – नगरपालिका परिषद् निम्नलिखित कार्यों को भी पूरा करती है –

  1. नगर को सुन्दर तथा स्वच्छ बनाये रखना।
  2. पुस्तकालय, वाचनालय, अजायबघर व विश्राम-गृहों की स्थापना करना।
  3. प्रारम्भिक शिक्षा से ऊपर की शिक्षा की व्यवस्था करना।
  4. पागलखाना और कोढ़ियों के रखने के स्थानों आदि की व्यवस्था करना।
  5. बाजार तथा पैंठ की व्यवस्था करना।
  6. पागल तथा आवारा कुत्तों को पकड़वाना।
  7. अनाथों के रहने तथा बेकारों के लिए रोजी का प्रबन्ध करना।
  8. नगर में नगर-बस सेवा चलवाना।
  9. नगर में नये-नये उद्योग-धन्धे विकसित करने के लिए सुविधाएँ प्रदान करना।

प्रश्न 7.
नगर-निगम की रचना और उसके कार्यों पर प्रकाश डालिए।
या
उच्चर प्रद्वेश के नगर-निगम के संगठन व कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन-विधि (संशोधन), 1994 के अन्तर्गत 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक नगर को ‘वृहत्तर नगरीय क्षेत्र घोषित कर दिया गया है तथा ऐसे प्रत्येक नगर में स्वायत्त शासन के अन्तर्गत नगर-निगम की स्थापना का प्रावधान किया गया है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, आगरा, वाराणसी, मेरठ, इलाहाबाद, गोरखपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़, गाजियाबाद, बरेली तथा सहारनपुर नगरों में नगर-निगम स्थापित कर दिये गये हैं। उत्तर प्रदेश के दो नगरों-कानपुर और लखनऊ-की जनसंख्या 10 लाख से अधिक है, अत: इन्हें महानगर तथा इनका प्रबन्ध करने वाली संस्था को ‘महानगर निगम की संज्ञा दी गयी है। वर्तमान में कुछ और नगर-आगरा, वाराणसी, मेरठे—भी ‘महानगर निगम’ बनाये जाने के लिए प्रस्तावित हैं।

गठन – नगर-निगम के गठन हेतु नगर प्रमुख, उपनगर प्रमुख व तीन प्रकार के सदस्य क्रमशः निर्वाचित सदस्य, मनोनीत सदस्य व पदेन सदस्यों का प्रावधान किया गया है। ये तीन प्रकार के सदस्य इस प्रकार हैं –

(1) निर्वाचित सदस्य – नगर-निगम के निर्वाचित सदस्यों को सभासद कहा जाता है। सभासदों की संख्या कम-से-कम 60 व अधिक-से-अधिक 110 निर्धारित की गयी है। यह संख्या राज्य सरकार द्वारा सरकारी गजट में दी गयी विज्ञप्ति के आधार पर निश्चित की जाती है।

योग्यता – नगर-निगम के सभासद के निर्वाचन में भाग लेने हेतु निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए –

  1. सभासद के निर्वाचन में भाग लेने के लिए नगर-निगम क्षेत्र की मतदाता सूची (निर्वाचन सूची) में उसका नाम अंकित होना चाहिए।
  2. आयु 21 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।
  3. वह व्यक्ति राज्य विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की सभी योग्यताएँ व उपबन्ध पूर्ण करता हो।

विशेष – जो स्थान आरक्षित श्रेणियों के लिए आरक्षित किये गये हैं, उन पर आरक्षित वर्ग का व्यक्ति ही निर्वाचन में भाग ले सकेगा।

सभासदों का निर्वाचन – नगर-निगम के सभासदों का चुनाव नगर के वयस्क नागरिकों द्वारा होता है। चुनाव के लिए नगर को अनेक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है, जिन्हें कक्ष’ (Ward) कहा जाता है। प्रत्येक कक्ष से संयुक्त निर्वाचन पद्धति के आधार पर एक सभासद का चुनाव होता है। इस पद हेतु नगर का कोई भी ऐसा नागरिक प्रत्याशी हो सकता है, जिसकी आयु 21 वर्ष हो और जो निवास सम्बन्धी समस्त शर्ते पूरी करता हो।

स्थानों का आरक्षण – प्रत्येक निगम में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित किये जाएँगे। इस प्रकार से आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात; निगम में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होगा, जो अनुपात नगर-निगम क्षेत्र की कुल जनसंख्या में इन जातियों का है। प्रत्येक नगर-निगम में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले स्थानों का 27 प्रतिशत स्थान पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित किया जाएगा। इन आरक्षित स्थानों में कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे। इन महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों को सम्मिलित करते हुए, प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे।

(2) मनोनीत सदस्य – नगर-निगम में राज्य सरकार द्वारा ऐसे सदस्यों को मनोनीत किया जाएगा जिन्हें नगर-निगम प्रशासन का विशेष ज्ञान व अनुभव हो। इन सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाएगी। मनोनीत सदस्यों को नगर निगम की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होगा। इनकी संख्या 5 व 10 के मध्य होगी।

(3) पदेन सदस्य –

  1. लोकसभा और राज्य विधानसभा के वे सदस्य जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें नगर पूर्णतः अथवा अंशत: समाविष्ट हैं।
  2. राज्यसभा और विधान परिषद् के वे सदस्य, जो उस नगर में निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हैं।
  3. उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 ई० के अधीन स्थापित समितियों के वे अध्यक्ष जो नगर-निगम के सदस्य नहीं हैं।

कार्यकाल – नगर-निगम का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु राज्य सरकार धारा 538 के अन्तर्गत निगम को इसके पूर्व भी विघटित कर सकती है।

समितियाँ – नगर-निगम की दो प्रमुख समितियाँ होंगी – (1) कार्यकारिणी समिति तथा (2) विकास समिति। इसके अतिरिक्त नगर-निगम में निगम विद्युत समिति, नगर परिवहन समिति और इसी प्रकार की अन्य समितियाँ भी गठित की जा सकती हैं; परन्तु इन समितियों की संख्या 12 से अधिक नहीं होनी चाहिए। अधिनियम, 1994 के अन्तर्गत नगर-निगम को नगर-निगम क्षेत्र में वे ही कार्य करने का निर्देश दिया गया है जो कार्य नगरपालिका परिषद् को नगरपालिका क्षेत्र में करने का निर्देश है।

कार्य

नगर – निगम का कार्य-क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। उत्तर प्रदेश के निगमों को 41 अनिवार्य और 43 ऐच्छिक कार्य करने होते हैं; यथा –

अनिवार्य कार्य – इन कार्यों के अन्तर्गत नगर में सफाई की व्यवस्था करना, सड़कों एवं गलियों में प्रकाश की व्यवस्था करना, अस्पतालों एवं औषधालयों का प्रबन्ध करना, इमारतों की देखभाल करना, पेयजल का प्रबन्ध करना, संक्रामक रोगों की रोकथाम की व्यवस्था करना, जन्म-मृत्यु का लेखा रखना, प्राथमिक एवं नर्सरी शिक्षा का प्रबन्ध करना, नगर नियोजन एवं नगर सुधार कार्यों की व्यवस्था करना आदि विभिन्न कार्य सम्मिलित किये गये हैं।

ऐच्छिक कार्य – इन कार्यों के अन्तर्गत निगम को पुस्तकालय, वाचनालय, अजायबघर आदि की व्यवस्था के साथ-साथ समय-समय पर लगने वाले मेलों और प्रदर्शनियों की व्यवस्था भी करनी होती है। इन ऐच्छिक कार्यों में ट्रक, बस आदि चलाना एवं कुटीर उद्योगों का विकास करना आदि भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार नगर-निगम लगभग उन्हीं समस्त कार्यों को बड़े पैमाने पर सम्पादित करता है, जो छोटे नगरों में नगरपालिका करती है।

पदाधिकारी – प्रत्येक नगर-निगम में एक नगर प्रमुख तथा एक उप-नगर प्रमुख होगा। नगर प्रमुख का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इस अवधि से पहले अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा नगर प्रमुख को पद से हटाया जा सकता है।

नगर-निगम में दो प्रकार के अधिकारी होते हैं – निर्वाचित एवं स्थायी। निर्वाचित अधिकारी अवैतनिक तथा स्थायी अधिकारी वैतनिक होते हैं।

(I) निर्वाचित अधिकारी – निर्वाचित अधिकारी मुख्य रूप से इस प्रकार होते हैं –

नगर प्रमुख – प्रत्येक नगर-निगम में एक नगर प्रमुख होता है। नगर प्रमुख के पद के लिए वही व्यक्ति प्रत्याशी हो सकता है, जो नगर का निवासी हो और उसकी आयु कम-से-कम 30 वर्ष हो। नगर प्रमुख का पद अवैतनिक होता है; उसका निर्वाचन नगर के समस्त मतदाताओं द्वारा वयस्क मताधिकार तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता है।

उप-नगर प्रमुख – प्रत्येक नगर-निगम में एक ‘उप-नगर प्रमुख भी होता है। नगर प्रमुख की अनुपस्थिति अथवा पद रिक्त होने पर उप-नगर प्रमुख ही नगर प्रमुख के कार्यों का सम्पादन करता है। इसका चुनाव एक वर्ष के लिए सभासद करते हैं।

(II) स्थायी अधिकारी – ये अधिकारी इस प्रकार हैं –

मुख्य नगर अधिकारी – प्रत्येक नगर-निगम का एक मुख्य नगर अधिकारी होता है। यह अखिल भारतीय शासकीय सेवा (I.A.S.) का उच्च अधिकारी होता है। राज्य सरकार इसी अधिकारी के माध्यम से नगर-निगम पर नियन्त्रण रखती है।

अन्य अधिकारी – मुख्य नगर अधिकारी के अतिरिक्त एक या अधिक ‘अपर मुख्य नगर अधिकारी भी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ प्रमुख अधिकारी भी होते हैं; जैसे—मुख्य अभियन्ता, नगर स्वास्थ्य अधिकारी, मुख्य नगर लेखा-परीक्षक आदि।

प्रश्न 8.
नगर पंचायत के संगठन और उसके कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
नगर पंचायत की रचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन),1994 के अनुसार 30 हजार से 1 लाख की जनसंख्या वाले क्षेत्र को ‘संक्रमणशील क्षेत्र घोषित किया गया है, अर्थात् जिन स्थानों पर ‘टाउन एरिया कमेटी’ थी, उन स्थानों को अब ‘टाउन एरिया’ नाम के स्थान पर नगर पंचायत’ नाम दिया गया है। ये स्थान ऐसे हैं जो ग्राम के स्थान पर नगर बनने की ओर अग्रसर हैं।

संरचना – प्रत्येक नगर पंचायत में एक अध्यक्ष व तीन प्रकार के सदस्य होंगे। सदस्य क्रमश: इस प्रकार होंगे –

  1. निर्वाचित सदस्य
  2. पदेन सदस्य तथा
  3. मनोनीत सदस्य।

(1) निर्वाचित सदस्य – नगर पंचायतों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कम-से-कम 10 और अधिक-से-अधिक 24 होगी। नगर पंचायत के सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाएगी तथा यह संख्या सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा प्रकाशित की जाएगी। निर्वाचित सदस्यों को सभासद कहा जाएगा। सभासद के निर्वाचन के लिए नगर को लगभग समान जनसंख्या वाले क्षेत्रों (वार्ड) में विभक्त किया जाएगा। वार्ड एक सदस्यीय होगा। प्रत्येक सभासद को निर्वाचन वार्ड के वयस्क मताधिकार प्राप्त नागरिकों के द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति के आधार पर किया जाएगा।

सभासद की योग्यता –

  1. सभासद का नाम नगर की मतदाता सूची में पंजीकृत होना चाहिए।
  2. उसकी आयु कम-से-कम 21 वर्ष होनी चाहिए।
  3. वह राज्य विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने के सभी उपबन्ध पूरे करता हो।
  4. जो स्थान आरक्षित हैं, उन स्थानों से आरक्षित वर्ग का स्त्री/पुरुष ही चुनाव लड़ सकता है।

आरक्षण – जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए वार्ड का आरक्षण होगा। पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत वार्ड आरक्षित होंगे, जिनमें अनुसूचित जाति जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के आरक्षण की एक-तिहाई महिलाएँ सम्मिलित होंगी।

(2) पदेन सदस्य – लोकसभा व विधानसभा के वे सभी सदस्य पदेन सदस्य होंगे, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें पूर्णतया या अंशतया वह नगर पंचायत क्षेत्र सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त राज्यसभा व विधान-परिषद् के ऐसे सभी सदस्य, जो उस नगर पंचायत क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में पंजीकृत हैं, पदेन सदस्य होंगे।

(3) मनोनीत सदस्य – प्रत्येक नगर पंचायत में राज्य सरकार द्वारा ऐसे 2 या 3 सदस्यों को मनोनीत किया जाएगा, जिन्हें नगरपालिका प्रशासन का विशेष ज्ञान व अनुभव होगा। ये मनोनीत सदस्य नगर पंचायत की बैठकों में मत नहीं दे सकेंगे।

कार्यकाल – नगर पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा। राज्य सरकार नगर पंचायत का विघटन भी कर सकती है, परन्तु नगर पंचायत के विघटन के दिनांक से 6 माह की अवधि के अन्दर पुनः चुनाव कराना अनिवार्य होगा।

कार्य – नगर पंचायत मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य करेगी –

(1) सर्वसाधारण की सुविधा से सम्बन्धित कार्य करना – इनमें सड़कें बनवाना, वृक्ष लगवाना, सार्वजनिक स्थानों का निर्माण कराना, अकाल, बाढ़ या अन्य विपत्ति के समय जनता की सहायता करना आदि प्रमुख हैं।

(2) स्वास्थ्य-रक्षा सम्बन्धी कार्य करना – इनमें संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीके लगवाना, खाद्य-पदार्थों का निरीक्षण करना, अस्पताल, ओषधियों तथा स्वच्छ जल की व्यवस्था करना आदि प्रमुख हैं।

(3) शिक्षा सम्बन्धी कार्य करना – इनमें प्रारम्भिक-शिक्षा के लिए पाठशालाओं की व्यवस्था करना, वाचनालय और पुस्तकालय बनवाना तथा ज्ञानक्र्द्धन के लिए प्रदर्शनी लगाना आदि प्रमुख हैं।

(4) आर्थिक कार्य करना – इनमें जल और विद्युत की पूर्ति करना, यातायात के लिए बसों की तथा मनोरंजन के लिए सिनेमा-गृहों (छवि-गृहों) या मेलों आदि की व्यवस्था करना प्रमुख हैं।

(5) सफाई सम्बन्धी कार्य करना – इनमें सड़कों, गलियों तथा नालियों की सफाई कराना, सड़कों पर पानी का छिड़काव कराना आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 9.
जिला प्रशासन में जिलाधिकारी का क्या महत्त्व है ? जिलाधिकारी के कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
जिले के शासन में जिलाधिकारी का क्या स्थान है ? उसके अधिकार एवं कर्तव्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

जिलाधिकारी का महत्त्व

प्रो० प्लाण्डे का यह कथन कि “जिलाधीश राज्य सरकार की आँख, कान, मुँह और भुजाओं के समान है”, जिलाधिकारी के महत्त्व को भली-भाँति बताता है। इस पद पर अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित अनुभवी अधिकारी की ही नियुक्ति की जाती है। जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाकर उसका समुचित विकास करना जिलाधिकारी का मुख्य कार्य होता है राज्य सरकार की आय के साधन तो पूरे राज्य में बिखरे पड़े होते हैं। जिलाधिकारी का एक मुख्य कार्य यह भी है कि राज्य-कोष में उसके जिले का अधिकतम योगदान हो। इसके अतिरिक्त यह राज्य सरकार एवं जिले की जनता के बीच एक सेतु का कार्य भी करता है। वह जन-भावनाओं और राज्य सरकार की अपेक्षाओं को इधर से उधर पहुँचाता है जिलाधिकारी के पास अनेक शक्तियाँ होती हैं। वह शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए सेना की सहायता तक ले सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जिलाधिकारी का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

जिलाधिकारी के अधिकार एवं कार्य (कर्तव्य)

(1) प्रशासन सम्बन्धी अधिकार – जिले में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने का पूर्ण उत्तरदायित्व जिलाधिकारी पर होता है। इसका यह कार्य सबसे महत्त्वपूर्ण होता है, इसलिए पुलिस विभाग उसके नियन्त्रण में रहकर ही कार्य करता है। जिले की सम्पूर्ण सूचना जिलाधिकारी ही राज्य सरकार के पास भेजता है। जिले में किसी भी प्रकार का झगड़ा होने या शान्ति भंग होने की आशंका होने पर वह सभाओं व जुलूसों पर प्रतिबन्ध लगा सकता है, सेना की सहायता भी ले सकता है तथा गोली चलाने की आज्ञा भी दे सकता है। इसके अतिरिक्त वह प्राकृतिक प्रकोपों के आने पर या महामारियाँ फैलने पर राज्य सरकार से सहायता प्राप्त करके जनता की सहायता भी करता है।

(2) न्याय सम्बन्धी अधिकार – जिलाधिकारी को राजस्व सम्बन्धी तथा किराया नियन्त्रण कानून के अन्तर्गत शहरी सम्पत्ति के विवादों के निपटारे से सम्बद्ध न्यायिक कार्य भी करना होता है। इसी कारण उसे जिलाधीश भी कहा जाता है। अपने अधीनस्थ अधिकारियों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकारी भी जिलाधीश को प्राप्त है।

(3) मालगुजारी (राजस्व) सम्बन्धी अधिकार – जिलाधिकारी सम्पूर्ण जिले की मालगुजारी वसूल करता है तथा इससे सम्बन्धित बड़े-बड़े झगड़ों का समाधान भी करता है। इस कार्य में इसकी सहायता के लिए इसके अधीन डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल आदि होते हैं। जिले का सरकारी कोष इसी के अधिकार में रहता है।

(4) निरीक्षण सम्बन्धी अधिकार – सम्पूर्ण जिले की शान्ति एवं व्यवस्था का भार जिलाधिकारी पर होता है। इसलिए इसे प्रत्येक विभाग के निरीक्षण करने का अधिकार दिया गया है। जिलाधिकारी जिले के लगभग सभी विभागों का समय-समय पर निरीक्षण करता है और उन पर अपना नियन्त्रण भी रखता है।

(5) विकास सम्बन्धी अधिकार – यद्यपि जिले में विकास सम्बन्धी कार्यों की देख-रेख के लिए एक मुख्य विकास अधिकारी की नियुक्ति की जाती है, तथापि जिले के विकास का उत्तरदायित्व जिलाधिकारी पर ही होता है। जिले के विकास के लिए विभिन्न विकास योजनाएँ बनाना, उनका क्रियान्वयन कराना तथा उन पर नियन्त्रण रखना भी जिलाधिकारी का ही कार्य है।

(6) जनता व सरकार के मध्य सम्बन्ध – जिलाधिकारी ही जनता और सरकार के मध्य एक कड़ी, के रूप में काम करता है तथा तहसील दिवस आदि के सदृश आयोजनों में वह जनता की समस्याओं को सुनकर उनका समाधान भी करता है।

(7) अन्य कार्य – जिले की समस्त स्थानीय संस्थाओं पर पूर्ण नियन्त्रण रखने के साथ-साथ विभिन्न आग्नेयास्त्रों (राइफल, बन्दूक, पिस्तौल आदि) के लाइसेन्स देने का अधिकार भी जिलाधिकारी को ही होता है। वह जिले में अनेक छोटे-छोटे कर्मचारियों की नियुक्ति का कार्य भी करता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जिले का सर्वोच्च पदाधिकारी होने के कारण जिलाधिकारी को प्रशासन एवं विकास-सम्बन्धी अनेक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना पड़ता है। वस्तुत: जिलाधिकारी के अधिकार तथा शक्तियाँ व्यापक हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments (स्थानीय शासन) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments (स्थानीय शासन), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom (परमाणु की संरचना)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom (परमाणु की संरचना).

पाठ के अन्तर्गत दिएर गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
(i) एक ग्राम भार में इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
(ii) एक मोल इलेक्ट्रॉनों के द्रव्यमान और आवेश का परिकलन कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-1

प्रश्न 2.
(i) मेथेन के एक मोल में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
(ii) 7mg14C में न्यूट्रॉनों की
(क) कुल संख्या तथा
(ख) कुल द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (न्यूट्रॉन का द्रव्यमान =1.675×10-27 kg मान लीजिए।)
(iii) मानक ताप और दाब(STP) पर 34 mg NH3 में प्रोटॉनों की
(क) कुल संख्या और
(ख) कुल द्रव्यमान बताइए।
दाब और ताप में परिवर्तन से क्या उत्तर परिवर्तित हो जाएगा?
उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित नाभिकों में उपस्थित न्यूट्रॉनों और प्रोटॉनों की संख्या बताइए-
[latex]_{ 6 }^{ 13 }{ C }_{ 8 }^{ 16 }{ O }_{ 12 }^{ 24 }{ Mg }_{ 26 }^{ 56 }{ Fe }_{ 38 }^{ 88 }{ Sr }[/latex]
उत्तर
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प्रश्न 4.
नीचे दिए गए परमाणु द्रव्यमान (A) और परमाणु संख्या (Z) वाले परमाणुओं का पूर्ण प्रतीक लिखिए-
(i) Z = 1,A = 35
(ii) Z = 92, A = 233
(iii) Z = 4, A = 9
उत्तर
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प्रश्न 5.
सोडियम लैम्प द्वारा उत्सर्जित पीले प्रकाश की तरंगदैर्घ्य (λ) 580 mm है। इसकी आवृत्ति (v) और तरंग-संख्या (V) की परिकलन कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 6.
प्रत्येक ऐसे फोटॉन की ऊर्जा ज्ञात कीजिए-
(i) जो 3×1016 Hz आवृत्ति वाले प्रकाश के संगत हो।
(ii) जिसकी तरंगदैर्घ्य 0:50 A हो।
उत्तर
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प्रश्न 7.
2.0×10-10 s काल वाली प्रकाश तरंग की तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति और तरंग-संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 8.
ऐसा प्रकाश, जिसकी तरंगदैर्घ्य 4000 pm हो और जो 1J ऊर्जा दे, के फोटॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
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प्रश्न 9.
यदि 4×10-7m तरंगदैर्घ्य वाला एक फोटॉन 2.13 ev कार्यफलन वाली धातु की सतह स’ टकराता है तो-
(i) फोटॉन की ऊर्जा (ev में)
(ii) उत्सर्जन की गतिज ऊर्जा और
(iii) प्रकाशीय इलेक्ट्रॉन के वेग का परिकलन कीजिए। (1 eV = 1,6020 x 10-19 J)
उत्तर
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प्रश्न 10.
सोडियम परमाणु के आयनंन के लिए 242 nm तरंगदैर्ध्य की विद्युत-चुम्बकीय विकिरण पर्याप्त होती है। सोडियम की आयनन ऊर्जा kJ mol-1 में ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 11.
25 वाट का एक बल्ब 0.57um तरंगदैर्घ्य वाले पीले रंग का एकवर्णी प्रकाश उत्पन्न करता है। प्रति सेकण्ड क्वाण्टा के उत्सर्जन की दर ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 12.
किसी धातु की सतह पर 6800 A तरंगदैर्ध्व वाली विकिरण डालने से शून्य वेग वाले इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं। धातु की देहली आवृत्ति (v°) और कार्यफलन (W°) ज्ञात
कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 13.
जब हाइड्रोजन परमाणु के n= 4ऊर्जा स्तर से n= 2 ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉन जाता है तो किस तरंगदैर्घ्य का प्रकाश उत्सर्जित होगा?
उत्तर
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प्रश्न 14.
यदि इलेक्ट्रॉन n=5 कक्षक में उपस्थित हो तो H-परमाणु के आयनन के लिए कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी? अपने उत्तर की तुलना हाइड्रोजन परमाणु के आयनन एन्थैल्पी से कीजिए। (आयनन एन्थैल्पी n=1 कक्षक से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा होती है।)
उत्तर
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प्रश्न 15.
जब हाइड्रोजन परमाणु में उत्तेजित इलेक्ट्रॉन = 6 से मूल अवस्था में जाता है तो प्राप्त उत्सर्जित रेखाओं की अधिकतम संख्या क्या होगी?
उत्तर
उत्सर्जित रेखाओं की प्राप्त संख्या 15 होगी। यह निम्न संक्रमणों के कारण प्राप्त होंगी-
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प्रश्न 16.
(i) हाइड्रोजन के प्रथम कक्षक से सम्बन्धित ऊर्जा – 2.18×10-18Jatom-1 है पाँचवें कक्षक से सम्बन्धित ऊर्जा बताइए।
(ii) हाइड्रोजन परमाणु के पाँचवें बोर कक्षक की त्रिज्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 17.
हाइड्रोजन परमाणु की ‘बामर श्रेणी में अधिकतम तरंगदैर्घ्य वाले संक्रमण की तरंग-संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
बामर श्रेणी में अधिकतम तरंगदैर्घ्य वाले संक्रमण के लिए
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प्रश्न 18.
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन को पहली कक्ष से पाँचवीं कक्ष तक ले जाने के लिए आवश्यक ऊर्जा की जूल में गणना कीजिए। जब यह इलेक्ट्रॉन तलस्थ अवस्था में लौटता है तो किस तरंगदैर्घ्य का प्रकाश उत्सर्जित होगा? (इलेक्ट्रॉन की तलस्थ अवस्था ऊर्जा -2.18 x 10-11erg है)।
उत्तर

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प्रश्न 19.
हाइड्रोजन परमाणु में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा En = [latex]\frac { \left( -2.18\times { 10 }^{ -18 } \right) }{ { n }^{ 2 } } [/latex]J द्वारा दी जाती है। n=2 कक्षा से इलेक्ट्रॉन को पूरी तरह निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए। प्रकाश की सबसे लम्बी तरंगदैर्घ्य (cm में) क्या होगी जिसका प्रयोग इस | संक्रमण में किया जा सके?
उत्तर
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प्रश्न 20.
2.05 x 107ms-1 वेगं से गंति कर रहे किसी इलेक्ट्रॉन का तरंगदैर्ध्य क्या होगी?
उत्तर
दे-ब्रॉग्ली समीकरण के अनुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-24

प्रश्न 21.
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9.1×10-31kg है। यदि इसकी गतिज ऊर्जा 3.0×10-25 Jहो तो इसकी तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 22.
निम्नलिखित में से कौन सम-आयनी स्पीशीज हैं, अर्थात् किनमें इलेक्ट्रॉनों की समान संख्या है?
Na+, K+, Mg2+, Ca2+, S2-,Ar
उत्तर
दी गई स्पीशीज में इलेक्ट्रॉन्स की संख्या निम्नवत् है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-26

प्रश्न 23.
(i) निम्नलिखित आयनों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए
(क) H
(ख) Na+
(ग) O2-
(घ) F
(ii) उन तत्वों की परमाणु संख्या बताइए जिनके सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनों को निम्नलिखित रूप में दर्शाया जाता है-
(क) 3s1
(ख) 2p3 तथा
(ग) 3p5
(iii) निम्नलिखित विन्यासों वाले परमाणुओं के नाम बताइए-
(क) [He] 2s1
(ख) [Ne] 3s23p3
(ग) [Ar]4s23d1
उत्तर
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प्रश्न 24.
किस निम्नतम n मान द्वारा g-कक्षक का अस्तित्व अनुमत होगा?
उत्तर
g उपकोश के लिए, 1 = 4
चूँकि । का मान 0 तथा (n-1) के बीच होता है, g-कक्षक के अस्तित्व के लिए ॥ का निम्नतम मान n = 5 होगा।

प्रश्न 25.
एक इलेक्ट्रॉन किसी 3d-कक्षक में है। इसके लिए n, 1 और m1 के सम्भव मान दीजिए।
उत्तर
3d कक्षक के लिए, n = 3,1=2
1=2 के लिए, m1=-2,-1, 0, +1, +2
इस प्रकार, दिये गये इलेक्ट्रॉन के लिए।
n= 3,1= 2, m1 = -2, -1, 0, +1,+ 2

प्रश्न 26.
किसी तत्व के परमाणु में 29 इलेक्ट्रॉन और 35 न्यूट्रॉन हैं-
(i) इसमें प्रोटॉनों की संख्या बताइए।
(ii) तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास बताइए।
उत्तर
एक उदासीन परमाणु के लिए
Z= प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
इसलिए, दिये गये तत्त्व का परमाणु क्रमांक (Z) = 29
(i) इसमें उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या = 29
(ii) दिये गये तत्त्व को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न है-
1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s1 or [Ar]3d10 4s1

प्रश्न 27.
[latex]{ H }_{ 2 }^{ + }[/latex], H2 और [latex]{ O }_{ 2 }^{ + }[/latex] स्पीशीज में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
H2 में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 1+1=2
[latex]{ H }_{ 2 }^{ + }[/latex] में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 2-1=1
[latex]{ O }_{ 2 }^{ + }[/latex] में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = (8+ 8)-1= 15

प्रश्न 28.
(i) किसी परमाणु कक्षक का n = 3 है। उसके लिए। और 2m1 के सम्भव मान क्या होंगे ?
(ii) 3d-कक्षक के इलेक्ट्रॉनों के लिए m1 और क्वाण्टम संख्याओं के मान बताइए।
(iii) निम्नलिखित में से कौन-से कक्षक सम्भव हैं
lp, 2s, 22 और 3f
उत्तर
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प्रश्न 29.
s, p, 4 संकेतन द्वारा निम्नलिखित क्वाण्टम संख्याओं वाले कक्षकों को बताइए–
(क) n = 1; l= 0
(ख) n = 3:l=1
(ग) n = 4;1= 2
(घ) n = 4:1= 3
उत्तर
(क) as
(ख) 3p
(ग) 4d
(घ) 4f

प्रश्न:30.
कारण देते हुए बताइए कि निम्नलिखित क्वाण्टम संख्या के कौन-से मान सम्भव नहीं हैं-
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उत्तर
(क) सम्भव नहीं है, क्योंकि n का मान कभी शून्य नहीं होता।
(ख) सम्भव है।
(ग) सम्भव नहीं है, क्योंकि जब n=1,1= 0 केवल
(घ) सम्भव है।
(ङ) सम्भव नहीं है, क्योंकि जब n= 3,1= 0, 1, 2
(च) सम्भव है।

प्रश्न 31.
किसी परमाणु में निम्नलिखित क्वाण्टम संख्याओं वाले कितने इलेक्ट्रॉन होंगे
(क) n=4, m2 =[latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(ख) n= 3,l= 0
उत्तर
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प्रश्न 32.
यह दर्शाइए कि हाइड्रोजन परमाणु की बोर कक्षा की परिधि उस कक्षा में गतिमान इलेक्ट्रॉन की दे-ब्राग्ली तरंगदैर्घ्य को पूर्ण गुणक होती है।
उत्तर
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2πr बोर कक्षक की परिधि को इर्शाता है। इस प्रकार, हाइड्रोजन परमाणु के लिए बोर कक्षक की परिधि दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य की पूर्ण गुणांक होगी।

प्रश्न 33.
He+ स्पेक्ट्रम के += 4 से n = 2 बामर संक्रमण से प्राप्त तरंगदैर्घ्य के बराबर वाला संक्रमण हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में क्या होगा?
उत्तर
हाइड्रोजन जैसी स्पीशीज़ के लिए
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-32
यह तभी सम्भव है जब n1 =1 तथा ny = 2 हो।
अत: H स्पेक्ट्रम में समान तरंगदैर्घ्य के लिए संगत संक्रमण n=2 से n=1 होगा।

प्रश्न 34.
He+ (g) → He+ (g) +e प्रक्रिया के लिए आवश्यक ऊर्जा की गणना कीजिए।
हाइड्रोजन परमाणु की तलस्थ अवस्था में आयनन ऊर्जा 2.18 x 10-18Jatom-1 है।
उत्तर
हाइड्रोजन जैसी स्पीशीज के लिए, nth कक्षक की ऊर्जा निम्न व्यंजक से प्राप्त की जा सकती है-
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प्रश्न 35.
यदि कार्बन परमाणु का व्यास 0.15 nm है तो उन कार्बन परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए जिन्हें 20 cm स्केल की लम्बाई में एक-एक करके व्यवस्थित किया जा सकता है।
उत्तर
कार्बन परमाणु का व्यास = 0.15 nm = 1.5×10-10m=1.5×10<sup-8+ cm स्केल की लम्बाई जिसमें कार्बन परमाणु व्यवस्थित हैं = 20cm
∴ कार्बन परमाणुओं की संख्या जों स्केल की लम्बाई में एक-एक करके व्यवस्थित होंगे-
[latex]=\frac { 20 }{ 1.5\times { 10 }^{ -8 } } =1.33\times { 10 }^{ 9 }[/latex]

प्रश्न 36.
कार्बन के 2×108 परमाणु एक कतार में व्यवस्थित हैं। यदि इस व्यवस्था की लम्बाई 2.4 cm है तो कार्बन परमाणु के व्यास की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-34

प्रश्न 37.
जिंक परमाणु का व्यास 2.6Å है—(क) जिंक परमाणु की त्रिज्या pm में तथा (ख) 1-6 cm की लम्बाई में कतार में लगातार उपस्थित परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-35
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प्रश्न 38.
किसी कण का स्थिर विद्युत आवेश 2.5×10-16c है। इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-37
प्रश्न 39.
मिलिकन के प्रयोग में तेल की बूंद पर चमकती x-किरणों द्वारा प्राप्त स्थैतिक विद्युत-आवेश प्राप्त किया जाता है। तेल की बूंद पर यदि स्थैतिक विद्युत-आवेश
-1. 282 x 10-18c है तो इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन द्वारा लिया गया आवेश = -1.6022×10-19C
∴ तेल की बूंद पर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = [latex]\frac { -1.282\times { 10 }^{ -16 } }{ -1.6022\times { 10 }^{ -19 } } =8[/latex]

प्रश्न 40.
रदरफोर्ड के प्रयोग में सोने, प्लैटिनम आदि भारी परमाणुओं की पतली पन्नी पर ए-कणों द्वारा बमबारी की जाती है। यदि ऐलुमिनियम आदि जैसे हल्के परमाणु की पतली पन्नी ली जाए तो उपर्युक्त परिणामों में क्या अन्तर होगा?
उत्तर
हल्के परमाणुओं जैसे एलुमिनियम के नाभिक छोटे तथा कम धन आवेश युक्त होते हैं। यदि | इनका प्रयोग रदरफोर्ड के प्रयोग में 0-कणों द्वारा बमबारी के लिए किया जाये तो नाभिकों के छोटे होने के कारण अधिकतर -कण लक्ष्य परमाणुओं से बिना टकराये ही बाहर निकल जायेंगे। जो कण नाभिक से टकरायेगें वे भी कम नाभिकीय आवेश के कारण अधिक विचलित नहीं होंगे।

प्रश्न 41.
[latex]_{ 35 }^{ 79 }{ Br }[/latex] तथा 79Br प्रतीक मान्य हैं, जबकि [latex]_{ 79 }^{ 35 }{ Br }[/latex] तथा 35Br मान्य नहीं हैं। संक्षेप में कारण बताइए।
उत्तर
एक तत्त्व के लिए परमाणु संख्या को मान स्थिर होता है, लेकिन द्रव्यमान संख्या का मान तत्त्व के समस्थानिक की प्रकृति पर निर्भर करता है। अतः द्रव्यमान संख्या को प्रतीक के साथ दर्शाना आवश्यक हो जाती है। परम्परा के अनुसार तत्त्व के प्रतीक में द्रव्यमान संख्या को ऊपर बायें तथा परमाणु संख्या को नीचे दायें ओर इस प्रकार लिखा जाता है- AXZ,

प्रश्न 42.
एक 81 द्रव्यमान संख्या वाले तत्व में प्रोटॉनों की तुलना में 31.7% न्यूट्रॉन अधिक हैं। इसका परमाणु प्रतीक लिखिए।
उत्तर
दिये गये तत्त्व की द्रव्यमान संख्या = 81
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प्रश्न 43.
37 द्रव्यमान संख्या वाले एक आयन पर ऋणावेश की एक इकाई है। यदि आयन में इलेक्ट्रॉन की तुलना में न्यूट्रॉन 11.1% अधिक है तो आयन का प्रतीक लिखिए।
उत्तर
माना कि आयन में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या x है।
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प्रश्न 44.
56 द्रव्यमान संख्या वाले एक आयन पर धनावेश की 3 इकाई हैं और इसमें इलेक्ट्रॉन की तुलना में 30.4% न्यूट्रॉन अधिक हैं। इस आयन का प्रतीक लिखिए।
उत्तर
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प्रश्न 45.
निम्नलिखित विकिरणों के प्रकारों को आवृत्ति के बढ़ते हुए क्रम में व्यवस्थित कीजिए
(क) माइक्रोवेव ओवन (oven) से विकिरण
(ख) यातायात-संकेत से त्रणमणि (amber) प्रकाश
(ग) एफ०एम० रेडियो से प्राप्त विकिरण
(घ) बाहरी दिक् से कॉस्मिक किरणें ।
(ङ) x-किरणें।
उत्तर
FM < माइक्रोवेव < एम्बर प्रकाश <X-किरणें < कॉस्मिक किरणें।

प्रश्न 46.
नाइट्रोजन लेजर 337.1 nm की तरंगदैर्ध्य पर एक विकिरण उत्पन्न करती है। यदि उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या 5.6 x 10-24 हो तो इस लेजर की क्षमता की गणना कीजिए।
उत्तर
विकिरण की तरंगदैर्घ्य
λ = 337.1nm= 337.1×10-9m
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प्रश्न 47.
निऑन गैस को सामान्यतः संकेत बोर्डों में प्रयुक्त किया जाता है। यदि यह 616 nm पर प्रबलता से विकिरण-उत्सर्जन करती है तो
(क) उत्सर्जन की आवृत्ति,
(ख) 30 सेकण्ड में इस विकिरण द्वारा तय की गई दूरी,
(ग) क्वाण्टम की ऊर्जा तथा
(घ) उपस्थित क्वाण्टम की संख्या की गणना कीजिए। (यदि यह 2J की ऊर्जा उत्पन्न करती है)।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-42

प्रश्न 48.
खगोलीय प्रेक्षणों में दूरस्थ तारों से मिलने वाले संकेत बहुत कमजोर होते हैं। यदि फोटॉन संसूचक 600 nm के विकिरण से कुल 3.15×10-18 J प्राप्त करता है तो संसूचक द्वारा प्राप्त फोटॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 49.
उत्तेजित अवस्थाओं में अणुओं के जीवनकाल का माप प्रायः लगभग नैनो-सेकण्ड परास वाले विकिरण स्रोत का उपयोग करके किया जाता है। यदि विकिरण स्रोत का काल 2ns और स्पन्दित विकिरण स्रोत के दौरान उत्सर्जित फोटॉनों की संख्या 2.5×10-15 है तो स्रोत की ऊर्जा की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 50.
सबसे लम्बी द्विगुणित तरंगदैर्घ्य जिंक अवशोषण संक्रमण 589 और 589.6 nm पर देखा ‘. जाता है। प्रत्येक संक्रमण की आवृत्ति और दो उत्तेजित अवस्थाओं के बीच ऊर्जा के अन्तर की गणना कीजिए।
उत्तर
प्रथम संक्रमण के लिए :
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प्रश्न 51.
सीजियम परमाणु का कार्यफलन 1.9 ev है तो
(क) उत्सर्जित विकिरण की देहली तरंगदैर्घ्य,
(ख) देहली आवृत्ति की गणना कीजिए।
यदि सीजियम तत्व को 500 pm की तरंगदैर्घ्य के साथ विकीर्णित किया जाए तो निकले हुए फोटो इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा और वेग की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 52.
जब सोडियम धातु को विभिन्न तरंगदैर्यों के साथ विकीर्णित किया जाता है तो निम्नलिखित परिणाम प्राप्त होते है-
λ (nm) : 500 450 400
vx10-5 (cm s-1) : 2.55 4.35 5.35
देहली तरंगदैर्घ्य तथा प्लांक स्थिरांक की गणना कीजिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-48

प्रश्न 53.
प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रयोग में सिल्वर धातु से फोटो इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन 0.35V की वोल्टता द्वारा रोका जा सकता है। जब 256.7 nm के विकिरण का उपयोग किया जाता है तो सिल्वर धातु के लिए कार्यफलन की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 54.
यदि 150 pm तरंगदैर्घ्य का फोटॉन एक परमाणु से टकराता है और इसके अन्दर बँधा हुआ इलेक्ट्रॉन 1.5×107 ms-1 वेग से बाहर निकलता है तो उस ऊर्जा की गणना कीजिए जिससे यह नाभिक से बँधा हुआ है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-51

प्रश्न 55.
पाश्चन श्रेणी का उत्सर्जन संक्रमण ॥ कक्ष से आरम्भ होता है। कक्ष n=3 में समाप्त होता है तथा इसे = 3.29 x 1015(Hz) [latex]\left[ \frac { 1 }{ { 3 }^{ 2 } } -\frac { 1 }{ { n }^{ 2 } } \right] [/latex] से दर्शाया जा सकता है। यदि संक्रमण 1285 nm पर प्रेक्षित होता है तो के मान की गणना कीजिए तथा स्पेक्ट्रम का क्षेत्र बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-52

प्रश्न 56.
उस उत्सर्जन संक्रमण के तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए, जो 1.3225 pm त्रिज्या वाले कक्ष से आरम्भ और 211.6 pm पर समाप्त होता है। इस संक्रमण की श्रेणी का नाम और स्पेक्ट्रम का क्षेत्र भी बताइए।
उत्तर
मानते हुए कि निहित प्रतिदर्श एक H परमाणु है, nth कक्ष की त्रिज्या
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-53

प्रश्न 57.
दे-ब्रॉग्ली द्वारा प्रतिपादित द्रव्य के दोहरे व्यवहार से इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की खोज हुई, जिसे जैव अणुओं और अन्य प्रकार के पदार्थों की अति आवधित प्रतिबिम्ब के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस सूक्ष्मदर्शी में यदि इलेक्ट्रॉन का वेग 1.6×10-ms-1 है। तो इस इलेक्ट्रॉन से सम्बन्धित दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-54

प्रश्न 58.
इलेक्ट्रॉन विवर्तन के समान न्यूट्रॉन विवर्तन सूक्ष्मदर्शी को अणुओं की संरचना के निर्धारण में प्रयुक्त किया जाता है। यदि यहाँ 800 pm की तरंगदैर्घ्य ली जाए तो न्यूट्रॉन से सम्बन्धित अभिलाक्षणिक वेग की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-55

प्रश्न 59.
यदि बोर के प्रथम कक्ष में इलेक्ट्रॉन का वेग 2.9 x106 ms-1 है तो इससे सम्बन्धित दे-ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-56

प्रश्न 60.
एक प्रोटॉन, जो 1000v के विभवान्तर में गति कर रहा है, से सम्बन्धित वेग 4.37×105 ms-1 है। यदि 0.1 kg द्रव्यमान की हॉकी की गेंद इस वेग से गतिमान है तो इससे सम्बन्धित तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 61.
यदि एक इलेक्ट्रॉन की स्थिति + 0.002 nm की शुद्धता से मापी जाती है तो इलेक्ट्रॉन के संवेग में अनिश्चितता की गणना कीजिए। यदि इलेक्ट्रॉन का संवेग [latex]\frac { 5 }{ 4\Pi m } \times 0.05[/latex]pm है तो । क्या इस मान को निकालने में कोई कठिनाई होगी?
उत्तर
प्रश्नानुसार, Ax= 0.002nm=2×10-12m
हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-58
वास्तविक संवेग को परिभाषित नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह संवेग में अनिश्चितता (Ap) से छोटा है।

प्रश्न 62.
छः इलेक्ट्रॉनों की क्वाण्टम संख्याएँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ऊर्जा के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए। क्या इनमें से किसी की ऊर्जा समान है?
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-59
उत्तर
दिये गये इलेक्ट्रॉन कक्षक 1.4d, 2. 3d, 3.4p, 4. 3d, 5. 3p तथा 6.4p से सम्बन्धित हैं। इनकी ऊर्जा इस क्रम में होगी-
5<2=4<6=3<1

प्रश्न 63.
ब्रोमीन परमाणु में 35 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसके 2p कक्षक में छः इलेक्ट्रॉन, 3p कक्षक में छः इलेक्ट्रॉन तथा 4p कक्षक में पाँच इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनमें से कौन-सा इलेक्ट्रॉन न्यूनतम प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करता है?
उत्तर
4p इलेक्ट्रॉन्स न्यूनतम प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करते हैं, क्योंकि ये नाभिक से सबसे अधिक दूर हैं।

प्रश्न 64.
निम्नलिखित में से कौन-सा कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा?
(i) 2s और 3s,
(ii) 44 और 4 तथा
(iii) 3d और 3p.
उत्तर
(i) 25 कक्षक, 3s कक्षक की तुलना में नाभिक के अधिक निकट होगा। अत: 25 कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।
(ii) d कक्षक, / कक्षकों की तुलना में अधिक भेदक (penetrating) होते हैं। इसलिए 44 कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।
(iii) p कक्षक, 4 कक्षकों की तुलना में अधिक भेदक (penetrating) होते हैं। इसलिए, 3p कक्षक उच्च प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा।।

प्रश्न 65.
Al तथा Si में 3p कक्षक में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। कौन-सा इलेक्ट्रॉन नाभिक से अधिक प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेगा?
उत्तर
सिलिकॉन (+14) में, ऐलुमिनियम (+13) की तुलना में अधिक नाभिकीय आवेश होता है। अत: सिलिकॉन में उपस्थित अयुग्मित 3p इलेक्ट्रॉन अधिक प्रभावी नाभिकीय आवेश अनुभव करेंगे।

प्रश्न 66.
इन अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए|
(क) P
(ख) Si
(ग) Cr
(घ) Fe
(ङ) Kr
उत्तर
इन तत्त्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या निम्न है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-60

प्रश्न 67.
(क) n = 4 से सम्बन्धित कितने उपकोश हैं?
(ख) उस उपकोश में कितने इलेक्ट्रॉन उपस्थित होंगे जिसके लिए ms =-[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] एवं ॥= 4 हैं?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-61

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कैथोड किरणों के लिए कौन-सा कथन असत्य है?
(i) सीधी रेखा में कैथोड की तरफ चलती हैं।
(ii) ऊष्मा उत्पन्न करती हैं।
(iii) ऋण आवेश रहता है।
(iv) उच्च परमाणु भार वाली धातु से टकराकर X-किरणें उत्पन्न करती हैं।
उत्तर
(i) सीधी रेखा में कैथोड की तरफ चलती हैं।

प्रश्न 2.
न्यूट्रॉन एक मौलिक कण है जिसमें
(i) +1 आवेश एवं एक इकाई द्रव्यमान होता है।
(ii) 0 आवेश एवं एक इकाई द्रव्यमान होता है।
(iii) 0 आवेश एवं 0 द्रव्यमान होता है।
(iv) -1 आवेश एवं इकाई द्रव्यमान होता है।
उत्तर
(ii) 0 आवेश एवं एक इकाई द्रव्यमान होता है।

प्रश्न 3.
किसी तत्व के 3d उपकोश में 7 इलेक्ट्रॉन हैं। तत्त्व का परमाणु क्रमांक है
(i) 24
(ii) 27
(iii) 28
(iv) 29
उत्तर
(ii) 27

प्रश्न 4.
परमाणु क्रमांक 12 वांले तत्त्व में इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 0
(ii) 12
(iii) 6
(iv) 14
उत्तर
(ii) 12

प्रश्न 5.
किसी तत्त्व के समस्थानिक ,xm में न्यूट्रॉनों की संख्या होगी
(i) m+n
(ii) m
(iii) n
(iv) m-n
उत्तर
(iv) m-n

प्रश्न 6.
दे-ब्रॉग्ली के सिद्धान्त के अनुसार
(i) E= mc2
(ii) [latex]\lambda =\frac { h }{ p } [/latex]
(iii) ∆E= ∆h
(iv) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 2\Pi } [/latex]
उत्तर
(ii) [latex]\lambda =\frac { h }{ p } [/latex]

प्रश्न 7.
निश्चितता के सिद्धान्त के अनुसार
(i) E = mc2
(ii) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 4\Pi } [/latex]
(iii) [latex]\lambda =\frac { h }{ p } [/latex]
(iv) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 2\Pi } [/latex]
उत्तर
(i) [latex]\triangle x\times \triangle p=\frac { h }{ 4\Pi } [/latex]

प्रश्न 8.
निम्न में कौन-सा क्वाण्टम संख्याओं का समूह असम्भव है ?
या
किसी परमाणु में कौन-सी इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था सम्भव नहीं है?
(i) 3,2,-2,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(ii) 4, 0, 0,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iii) 3, 2, 3,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iv) 5,3, 0, [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
उत्तर
(i) 3,2,-3,[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]

प्रश्न 9.
3d3 निकाय के तीसरे इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याओं का सही क्रम
(i) n = 3,1= 2, m= +3, s=[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(ii) n = 3,l= 2, m= + 1, s=[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iii) n= 3, 1= 2, m= +2, s=[latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
(iv) n = 3,1= 2, m= 0, s=[latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
उत्तर
(iv) n= 3, 1 = 2, m=0 s= [latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]

प्रश्न 10.
चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या बताती है।
(i) ऑर्बिटलों की आकृति
(ii) ऑर्बिटलों का आकार
(iii) ऑर्बिटलों का अभिविन्यास
(iv) नाभिकीय स्थायित्व
उत्तर
(iii) ऑर्बिटलों का अभिविन्यास

प्रश्न 11.
परमाणु उपकोशों की बढ़ती ऊर्जा का सही क्रम है।
(i) 5p<4f< 6s< 5d
(ii) 5p< 6s<4f<5d
(iii) 4f<5p<5d<6s
(iv) 5p<5d <4f< 6s
उत्तर
(ii) 5p<6s<4f<5d

प्रश्न 12.
ताँबा परमाणु की आद्य अवस्था में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है।
(i) [Ar] 3d94s2
(ii) [Ar] 3d104s2
(iii) [Ar] 3d104s1 ,
(iv) [Ar] 3d104s2 4p1
उत्तर
(iii) [Ar] 3d104s1

प्रश्न 13.
Fe3+ (परमाणु क्रमांक Fe=26) का सही विन्यास है।
(i) 1s2, 2s2, 3s2 3p6 3d5
(ii) 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p6 3d6, 4s2
(iii) 1s2, 2s2 2p6, 3s2 3p63d5, 4s2
(iv) 1s2 ,2s2 2p6, 3s2 3p6 3d5 4s1
उत्तर
(i) s2, 2s2, 3s2 3p6 3d5

प्रश्न 14.
Cr परमाणु (Z = 24) की तलस्थ अवस्था में सही इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है।
(i) [Ar] 3d4,4s2
(ii) [Ar] 3d5,4s2
(iii) [Ar] 3d6,4s2
(iv) [Ar] 3d5,4s1
उत्तर
(iv) [Ar] 3d6,4s1

प्रश्न 15.
Fe2+(z= 26) में 4-इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर नहीं है।
(i) Ne (Z=10) में p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(ii) Mg (Z= 12) में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(iii) Fe में d-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(iv) Cl(Z=17) में p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
उत्तर
(iv) Cl(2=17) में p-इलेक्ट्रॉनों की संख्या

प्रश्न 16.
H का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है।
(i) 1s0
(ii) 1s1
(iii) 1s2
(iv) 1s2, 2s1
उत्तर
(iii) H में 2 इलेक्ट्रॉन हैं, अत: विकल्प (iii) 1s2 सही है।

प्रश्न 17.
निम्न आयनों में कौन अनुचुम्बकीय है?
(i) Zn2+
(ii) Ni2+
(iii) Cu2+
(iv) Ca2+
उत्तर
(ii) एवं (iii)

प्रश्न 18.
प्रतिचुम्बकीय आयन है।
(i) Cu2+
(ii) Fe2+
(iii) Ni2+
(iv) Zn2+
उत्तर
(iv) Zn2+

प्रश्न 19.
(n+1) नियमानुसार इलेक्ट्रॉन np ऊर्जा स्तर पूर्ण करने के बाद
(i) (n-1)d में प्रवेश करता है।
(ii) (n+ 1)s में प्रवेश करता है।
(iii) (n+ 1)p में प्रवेश करता है।
(iv) nd में प्रवेश करता है।
उत्तर
(ii) (n+1)s में प्रवेश करता है।

प्रश्न 20.
p ऑर्बिटलों में चारों इलेक्ट्रॉनों का सही वितरण है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-62
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-63

प्रश्न 21.
Cu2+ (z=29) में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 1
(ii) 2
(iii) 3
(iv) 4
उत्तर
(i) 1

प्रश्न 22.
निम्नलिखित में सेमान अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले आयनों को पहचानिए
I. Fe3+ (Z=26)
II. Zn2+ (Z= 30)
III. Cr3+ (Z = 24)
IV. Mn2+ (2=25)
(i) I तथा II ।
(ii) I, II तथा III
(iii) I तथा III
(iv) I तथा IV
उत्तर
(iv) I तथा IV

प्रश्न 23.
निम्न में से किसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं हैं?
(i) Fe2+
(ii) Ni2+
(iii) Cu2+
(iv) Zn2+
उत्तर
(iv) Zn2+

प्रश्न 24.
निम्नलिखित किस आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिकतम है?
(i) Cr3+ (Z=24)
(ii) Ni2+ (Z= 28)
(iii) Mn2+ (Z=25)
(iv) Ti22+ (Z= 22)
उत्तर
(iii) Mn2+ (Z= 25)

प्रश्न 25.
Ni2+(z = 28) आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 1
(ii) 2
(iii) 3
(iv) 8
उत्तर
(ii) 2

प्रश्न 26.
Cr2+ (2=24) आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 6
(ii) 4
(iii) 3
(iv) 1
उत्तर
(ii) 4

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में से किस आयन में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या शून्य (0) है?
(i) Cr22+ (2=24)
(ii) Fe2+(Z= 26)
(iii) Cu2+ (Z = 29)
(iv) Zn2+(Z= 30)
उत्तर
(iv) Zn2+ (Z = 30)

प्रश्न 28.
कार्बन परमाणु में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
(i) 1
(ii) 4
(iii) 3
(iv) 2
उत्तर
(iv) 2

प्रश्न 29.
आयन जिसमें सबसे अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं, है।
(i) Fe3+
(ii) Co2+
(iii) Ni2+
उत्तर
(i) Fe3+

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दो कारण दीजिए जिनके आधार पर इलेक्ट्रॉन को पदार्थ का मौलिक कण समझा जाता है।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन सभी पदार्थों के मौलिक कण होते हैं। ऐसा कई प्रकार की घटनाओं के अध्ययन द्वारा सिद्ध हुआ है। इसके दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. तापायनिक उत्सर्जन-जब किसी पदार्थ को उच्च ताप तथा कम दाब पर गर्म किया जाता है। तब पदार्थ से इलेक्ट्रॉन बाहर निकलने लगते हैं।
  2. प्रकाश वैद्युत प्रभाव-जब X-किरणें, y-किरणे अथवा पराबैंगनी किरणें धातुओं से टकराती | हैं, तब भी इलेक्ट्रॉन उन धातुओं से बाहर निकलने लगते हैं।

प्रश्न 2.
इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रवृतिं क्या है ? इससे सम्बन्धित व्यंजक लिखिए।
उत्तर
सन् 1924 में दे-ब्रॉग्ली ने यह विचार प्रस्तुत किया कि गतिशील सूक्ष्म कण; जैसे—इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि तरंग के गुण प्रदर्शित करते हैं। यदि m द्रव्यमान का एक सूक्ष्म कण ) वेग से गतिमान है, तो उसके तरंगदैर्घ्य 2 और संवेग p=) में निम्नलिखित सम्बन्ध होता है।

[latex]\lambda =\frac { h }{ p } =\frac { h }{ mv } [/latex]

प्रश्न 3.
इलेक्ट्रॉन की द्वैती प्रकृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
इलेक्ट्रॉन, कण तथा तरंग दोनों के गुण व्यक्त करते हैं, इसे इलेक्ट्रॉन की द्वैती प्रकृति कहते हैं; जैसे

  1. कैथोड किरणें (जिनमें केवल इलेक्ट्रॉन होते हैं) अपने मार्ग में रखी हल्की वस्तु को चला | सकती हैं। इससे सिद्ध होता है कि इलेक्ट्रॉनों में कण के गुण हैं।
  2. प्रकाश किरणों की तरह इलेक्ट्रॉन किरणपुंज भी विवर्तन और व्यतिकरण प्रक्रिया प्रदर्शित करता है। इससे सिद्ध होता है कि इलेक्ट्रॉनों में तरंग के गुण हैं।

प्रश्न 4.
इलेक्ट्रॉन को ऋणात्मक आवेश की इकाई क्यों माना जाता है?
उत्तर
इलेक्ट्रॉन पर उपस्थित आवेश विद्युत का सूक्ष्मतम आवेश होता है इसलिए इलेक्ट्रॉन के आवेश को इकाई ऋणावेश माना जाता है।

प्रश्न 5.
द्रव्यमान संख्या तथा परमाणु भार में सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान लगभग नगण्य होता है तथा प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन का द्रव्यमान लगभग 1 amu होता है। अतः परमाणु भार और द्रव्यमान संख्या लगभग बराबर होती है।

परमाणु भार = द्रव्यमान संख्या

प्रश्न 6.
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का नियम स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, किसी गतिशील कण की स्थिति तथा वेग दोनों का एक साथ यथार्थ निर्धारण सम्भव नहीं है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-64

यदि ∆x किसी कण की स्थिति निर्धारण की अनिश्चितता हो और ∆p उसके संवेग (द्रव्यमान x वेग) के निर्धारण की अनिश्चितता हो तो इस सिद्धान्त के अनुसार,

[latex]\triangle x\times \triangle y\ge \frac { h }{ 4\Pi } [/latex]
जहाँ h = प्लांक स्थिरांक (6.625×10-27 अर्ग-सेकण्ड)

प्रश्न 7.
हाइड्रोजन परमाणु का इलेक्ट्रॉन मेघ मॉडल समझाइए।
उत्तर
आधुनिक विचारों के अनुसार, नाभिक के चारों ओर स्पष्ट वृत्तीय कक्षाएँ नहीं हैं, अपितु इलेक्ट्रॉन मेघ है। हाइड्रोजन परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन का ऋणावेश एक मेघ (cloud) के रूप में नाभिक के चारों ओर विसरित रहता है। जिन क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉन के उपस्थित होने की प्रायिकता अधिक होती है, उन क्षेत्रों में ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन मेघ का घनत्व अधिक होता है। वे त्रिविम क्षेत्र, जिनमें निश्चित ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन के उपस्थित होने की प्रायिकता अधिकतम होती है, ऑर्बिटल (कक्षक) कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न उपकोशों में कक्षकों की संख्याएँ भिन्न-भिन्न होती हैं।

प्रश्न 8.
कोश एवं उपकोश क्या हैं?
उत्तर
समान मुख्य क्वाण्टम संख्या n के परमाणु कक्षकों का समूह कोश कहलाता है जबकि समान मुख्य क्वाण्टम संख्या n की और दिगंशी क्वाण्टम संख्या । के परमाणु कक्षकों का समूह उपकोश कहलाता है।

प्रश्न 9.
कक्षक किसे कहते हैं? एक कक्षक में अधिकतम कितने इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं?
उत्तर
कक्षक नाभिक के चारों ओर स्थित आकाश के उन त्रिविम क्षेत्रों को कहते हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन औसतन अधिक पाए जाते हैं। प्रत्येक कक्षक का केन्द्र परमाणु का नाभिक होता है। एक कक्षक में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं जिनके चक्रण विपरीत दिशा में होते हैं।

प्रश्न 10.
d-उपकोश में पाँच कक्षक होते हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
d-उपकोश में अधिकतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या 10 होती है, जबकि एक कक्षक में केवल ” अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं, अतः 4-उपकोश में पाँच कक्षक होते हैं।

प्रश्न 11.
एक तत्त्व के 47 उपकोश में 7 इलेक्ट्रॉन हैं। इस / उपकोश के अन्तिम इलेक्ट्रॉन की चारों क्वाण्टम संख्याएँ लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-65

प्रश्न 12.
क्लोरीन के अन्तिम इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-66

प्रश्न 13.
एक तत्त्व (परमाणु क्रमांक = 21) के अन्तिम डाले गये इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-67

प्रश्न 14.
मुख्य क्वाण्टम संख्या 2 के लिए सभी चुम्बकीय क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-68

प्रश्न 15.
3d8 इलेक्ट्रॉन के लिए #, 1, तथा s के मान लिखिए।
उत्तर

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-69

प्रश्न 16.
Fe (Z = 26) के 24 वें इलेक्ट्रॉन के लिए क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
-Fe (Z = 26) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-70

प्रश्न 17.
Sc (परमाणु क्रमांक =210) में अन्तिम इलेक्ट्रॉन के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान लिखिए।
उत्तर
Sc (Z = 21) तत्त्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-71

प्रश्न 18.
L कोश में कितने उपकोश होते हैं। इसके उपकोशों की आकृतियाँ तथा अभिविन्यास बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-72

प्रश्न 19.
s, p और 4 कक्षकों की आकृतियाँ बताइए?
उत्तर
कक्षक की आकृति गोलाकार, p कक्षक की आकृति डम्बलाकार तथा d कक्षक की आकृति द्वि-डम्बलाकार होती है।

प्रश्न 20.
ऑफबाऊ सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
इस सिद्धान्त के अनुसार, “विभिन्न कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का प्रवेश उपकोशों की ऊर्जा की वृद्धि के क्रमानुसार होता है. और इलेक्ट्रॉन एक-एक करके ऊर्जा के बढ़ते क्रम वाले उपकक्षकों में प्रवेश पाते हैं।”

प्रश्न 21.
पाउली के अपवर्जन नियम को स्पष्ट कीजिए तथा एक परमाणु के चतुर्थ मुख्य ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
इस सिद्धान्त के अनुसार, “किसी परमाणु में दो इलेक्ट्रॉनों के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान समान नहीं हो सकते हैं। यदि किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों के लिए n, 1 तथा m के मान समान भी हो जायें, तो s का मान निश्चित रूप से भिन्न होगा। इस स्थिति में यदि प्रथम इलेक्ट्रॉन के लिए ” का मान [latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex] हो, तो दूसरे इलेक्ट्रॉन के लिए यह मान [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex] होगा। परमाणु के चतुर्थ मुख्य ऊर्जा स्तर में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या = 2n2 = 2×16= 32

प्रश्न 22.
हुण्ड के नियम का उल्लेख कीजिए। एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
हुण्ड के नियम के अनुसार, “किसी उपकोश के कक्षक में इलेक्ट्रॉन तभी युग्मित होते हैं जब उस उपकोश के सभी कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन भर जाता है। इलेक्ट्रॉन जब युग्मित होते हैं तो युग्म के दोनों इलेक्ट्रॉन विपरीत चक्रण वाले होते हैं।”

इस नियम के अनुसार, इ-कक्षक में दूसरे इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर, p-कक्षक में चौथे इलेक्ट्रॉन के प्रवेश । पर, 4-कक्षक में छठे इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर तथा f-कक्षक में आठवें इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर युग्मन आरम्भ होता है। उदाहरणार्थ-नाइट्रोजन परमाणु में p-उपकोश में तीनों इलेक्ट्रॉन अलग-अलग । p-कंक्षकों अर्थात् px, py और pz में रहते हैं। ये इलेक्ट्रॉन अयुग्मित तथा समदिश चक्रण वाले होते हैं।
इस परमाणु में इलेक्ट्रॉन वितरण इस प्रकार होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-73

प्रश्न 23.
किसी तत्त्व के 34 उपकोश में 4 इलेक्ट्रॉन हैं। तत्त्व के 4 उपकोश में इलेक्ट्रॉनों का वितरण प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर
हुण्ड के नियमानुसार, इलेक्ट्रॉनों का वितरण निम्नवत् होगा-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-74

प्रश्न 24.
Cu2+तथा Mn4+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास s, p, 4, f में लिखिए।
(Cu की परमाणु संख्या = 29, Mn की परमाणु संख्या = 25)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-75

प्रश्न 25.
एक तत्त्व के बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 4s2 4p5 है। इस तत्त्व का पूर्ण | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए। इस तत्त्व का परमाणु क्रमांक क्या है ?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-76

प्रश्न 26.
मैग्नीशियम, कैल्सियम तथा ब्रोमीन के परमाणु क्रमांक क्रमशः 25, 20 तथा 35 हैं। निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए Mn2+,ca2+ तथा Br-1
उत्तर

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-77

प्रश्न 27.
Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए।
(Z =26)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-78

प्रश्न 28.
कोबाल्ट (Z = 27) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए एवं उसमें उपस्थित अयुग्मित | इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-79
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-80

प्रश्न 29.
किसी परमाणु के 7 उपकोश में दस इलेक्ट्रॉन हैं। इनका बॉक्स वितरण दिखाते हुए अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए। अपने उत्तर का आधार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-81

प्रश्न 30.
क्रोमियम (Cr) का परमाणु क्रमांक 24 है। Cr3+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यासs, p, d,f के | रूप में दीजिए तथा अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बताइए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-82

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की खोज किसने की? इन कणों के अभिलक्षण भी लिखिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन अति सूक्ष्म ऋणावेशित कण हैं। एक इलेक्ट्रॉन पर इकाई ऋणावेश होता है। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान (me = 5.4860×10-4 amu) हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान (mh = 100797amu) का लगभग [latex]\frac { 1 }{ 1837 } [/latex] है। इलेक्ट्रॉन की खोज सन् 1897 में अंग्रेज वैज्ञानिक जे०जे० टॉमसन ने कैथोड किरणों में की। सभी परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन होते हैं। प्रोटॉन-प्रोटॉन अति सूक्ष्म धनावेशित कण हैं। एक प्रोटॉन पर इकाई धनावेश होता है।

प्रोटॉन का द्रव्यमान (mp = 1.007276amu) हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान के लगभग बराबर है। हाइड्रोजन परमाणु में से इलेक्ट्रॉन बाहर निकल जाने पर जो इकाई धनावेशित कण (H+) शेष रह जाता है उसे हाइड्रोजन परमाणु का नाभिक या प्रोटॉन कहते हैं। अंग्रेज भौतिक विज्ञानी अर्नेस्ट रदरफोर्ड (191) ने प्रोटॉन की खोज की और सिद्ध किया कि सभी परमाणुओं में प्रोटॉन होते हैं।

न्यूट्रॉन-न्यूट्रॉन विद्युत् उदासीन कण हैं। न्यूट्रॉन का द्रव्यमाने (mn = 1.008665 amu) हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान के लगभग बराबर है। न्यूट्रॉन की खोज सन् 1932 में अंग्रेज वैज्ञानिक जे० चैडविक ने की। हाइड्रोजन-1 परमाणु ([latex]_{ 1 }^{ 1 }{ H }[/latex]) को छोड़कर अन्य सभी परमाणुओं में न्यूट्रॉन होते हैं।

प्रश्न 2.
टॉमसन का परमाणु मॉडल समझाइए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर
टॉमसन का परमाणु मॉडल ।। कैथोड किरणों और धन किरणों पर किए गए प्रयोगों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जे०जेटॉमसन (J.J. Thomson, 1904) ने प्रथम परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया। टॉमसन मॉडल के अनुसार, परमाणु अतिसूक्ष्म गोलाकार (spherical) विद्युत-उदासीन कण हैं जो धन और ऋण आवेशित द्रव्य से बने हुए हैं। धनावेशित द्रव्य परमाणु में एक समान रूप से फैला हुआ है तथा इलेक्ट्रॉन धन-आवेश में इस प्रकार पॅसे हुए हैं जैसे तरबूज में बीज धंसे रहते हैं।

टॉमसन परमाणु मॉडल, परमाणु का “तरबूज मॉडल” (water-melon model) भी कहलाता है। यह मॉडल परमाणु स्पेक्ट्रम की उत्पत्ति की व्याख्या करने में असफल रहा। सन् 1911 में लॉर्ड रदरफोर्ड ने ऐल्फा-कणों के प्रकीर्णन प्रयोग द्वारा इस मॉडल का खण्डन किया और परमाणु का नाभिकीय मॉडल प्रस्तुत किया।

प्रश्न 3.
परमाणु क्रमांक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
किसी तत्व के परमाणु नाभिक पर स्थित धनावेश इकाइयों की संख्या को उस तत्व का परमाणु क्रमांक (2) कहते हैं। परमाणु नाभिक पर स्थित धनावेश इकाइयों की संख्या नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है। अत: किसी तत्व के परमाणु नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या उस तत्व का परमाणु क्रमांक (Z) होता है। प्रत्येक तत्व का परमाणु क्रमांक निश्चित और स्थिर होता है। भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु क्रमांक भिन्न-भिन्न होते हैं। किसी तत्व के सभी परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या समान होती है। अतः परमाणु क्रमांक (2) तत्वों का मूल लक्षण (fundamental property) है। हाइड्रोजन का परमाणु क्रमांक 1 है, इस कथन से यह अभिप्राय है कि हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक में एक प्रोटॉन है। कार्बन का परमाणु क्रमांक 6 और सोडियम का परमाणु क्रमांक 11 है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-83

प्रश्न 4.
निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए।
(i) समस्थानिक,
(ii) समभारिक
उत्तर
(i) समस्थानिक–किसी एक तत्त्व के ऐसे परमाणु जिनकी परमाणु संख्या समान होती है। परन्तु द्रव्यमान संख्या भिन्न होती है, समस्थानिक कहलाते हैं। ऐसे परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या तो समान होती है परन्तु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है। उदाहरणार्थ-प्रोटियम (1H1), ड्यूटीरियम (1H2) तथा ट्राइटियम (1H3) हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं। इन समस्थानिकों की परमाणु संख्या 1 है। परन्तु द्रव्यमान संख्याएँ क्रमशः 1, 2 व 3 हैं।

(ii) समभारिक–विभिन्न तत्त्वों के ऐसे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या समान होती है, समभारिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- 18Ar40, 19K40 तथा 20Ca40 समभारिक हैं।

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन-से इलेक्ट्रॉनिक विन्यास नियमानुसार सही नहीं हैं। सम्बन्धित नियमों को परिभाषित भी कीजिए
(i) 1s2, 2s2
(ii) 1s2, 2s2, 2p2x, 2p1y
(iii) 1s2, 2s2, 2p2x, 2p2y , 2p1z
(iv) 1s2, 2s2, 2p7
उत्तर
(ii) 1s2,2s2,2p2x,2p1y), इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सही नहीं है, क्योंकि हुण्ड के नियमानुसार इसका सही विन्यास 1s2,2s2,2p1x,2p1y, 2p1z होना चाहिए। हुण्ड का नियम–किसी उपकोश के कक्षक, में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन तब तक नहीं हो सकता जब तक प्रत्येक ऑर्बिटल में समदिश स्पिन के एक-एक इलेक्ट्रॉन नहीं हो जाते हैं।
(iv) 1s2,2s2,2p7 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास सही नहीं है क्योंकि पाउली के अपवर्जन नियम के अनुसार, p उपकोश में अधिकतम 6 इलेक्ट्रॉन ही हो सकते हैं। सही इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार होना चाहिए 1s2,2s2,2p6,3s1

पाउली का अपवर्जन नियम-“किसी परमाणु के किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों के लिए चारों क्वाण्टम संख्याओं के मान समान नहीं हो सकते हैं।”

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल (सिद्धान्त) का उल्लेख कीजिए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल (सिद्धान्त ) : विभिन्न तत्वों के परमाणुओं पर तीव्रगामी o-कणों की बमबारी के प्रयोग से प्राप्त प्रेक्षणों के आधार पर रदरफोर्ड ने निम्नलिखित सिद्धान्त दिया, जिसे परमाणु का नाभिकीय सिद्धान्त कहते हैं जो कि निम्न प्रकार है-

  1. परमाणु अति सूक्ष्म, गोलाकार, विद्युत-उदासीन कण है। यह धनावेशित नाभिक के चारों ओर विशाल त्रिविम आकाश में गतिशील इलेक्ट्रॉनों का एक समूह होता है।
  2. परमाणु का केन्द्रीय भाग, जिसमें परमाणु का कुल धनावेश और लगभग समस्त द्रव्यमान निहित होता है, नाभिक कहलाता है।
  3. नाभिक पर कुल केन्द्रित धनावेश, इलेक्ट्रॉनों के कुल ऋणावेशों के बराबर होता है जिससे परमाणु में विद्युत आवेशों का सन्तुलन बना रहता है और वह उदासीन रहता है।
  4. नाभिक की त्रिज्या 10-12 सेमी और परमाणु की त्रिज्या 10-8 सेमी होती है। स्पष्ट है कि परमाणु की त्रिज्या नाभिक की त्रिज्या से लगभग 10,000 गुना अधिक होती है।
  5. परमाणु के ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इसके धनावेशित नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं।
  6. परमाणु के नाभिक में स्थित धनावेशित कणों की संख्या उसके ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है; अतः परमाणु विद्युत-उदासीन होता है।
  7. नाभिक तथा उसके चारों ओर भ्रमण कर रहे इलेक्ट्रॉन के बीच परस्पर स्थिर-वैद्युत आकर्षण होने के बाद भी इलेक्ट्रॉन तीब्र गति से भ्रमण करते रहते हैं और नाभिक में नहीं गिरते; क्योंकि इन इलेक्ट्रॉनों के परिक्रमण से उत्पन्न अपकेन्द्री बल नाभिक के स्थिर-वैद्युत आकर्षण बल को सन्तुलित कर देता है।

रदरफोर्ड के उपर्युक्त मॉडल को परमाणु का मॉडल (nuclear model) कहा गया। इस मॉडल को सौर (solar) या ग्रहीय (planetary) मॉडल भी कहते हैं; क्योंकि इस मॉडल में यह कल्पना की गई है कि जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर ग्रह परिक्रमा करते हैं; उसी प्रकार नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं। रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की सीमाएँ (अर्थात् दोष या कमियाँ) निम्नलिखित हैं-

  1. रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर विभिन्न कक्षाओं में तीव्र गति से चक्कर लगाते हैं। क्लार्क मैक्सवेल ने बताया कि विद्युत-चुम्बकीय सिद्धान्त के अनुसार, ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों को धनावेशित नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाने के कारण सतत रूप से प्रकाश विकिरण उत्सर्जित करने चाहिए जिससे लगातार ऊर्जा की क्षति होनी चाहिए तथा उनकी कक्षा की त्रिज्या लगातार कम होती जानी चाहिए और अन्त में वे नाभिक में गिरकर नष्ट हो जाने चाहिए। परन्तु ऐसा नहीं होता है क्योंकि परमाणु एक स्थायी निकाय है। अतः रदरफोर्ड मॉडल परमाणु निकाय के स्थायित्व की व्यवस्था करने में असफल रहा है।
  2. रदरफोर्ड के -कणों के प्रकीर्णन प्रयोग से परमाणु में उपस्थित प्रोटॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों की । | संख्या के बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती है। अतः यह परमाणु संरचना के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं करता है।
  3. इस सिद्धान्त के द्वारा यह भी स्पष्ट नहीं होता कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कहाँ और कैसे स्थित रहता है और उसकी ऊर्जा क्या है।
  4. परमाणु रेखीय स्पेक्ट्रम (line spectrum) देते हैं, जबकि यदि इलेक्ट्रॉन के परिक्रमण से निरन्तर ऊर्जा का उत्सर्जन होता है तो रेखीय स्पेक्ट्रम के स्थान पर सतत स्पेक्ट्रम (continuous spectrum) प्राप्त होना चाहिए था। दूसरे शब्दों में, स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृत्ति की रेखाएँ नहीं होनी चाहिए, परन्तु वास्तव में परमाणु का स्पेक्ट्रम सतत नहीं होता। इसके स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृति’ की कई रेखाएँ होती हैं। अतः रदरफोर्ड परमाणु मॉडल परमाणुओं के रैखिक स्पेक्ट्रम (line spectrum) को समझाने में असफल रहा है।

रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की कमियों को दूर करने के लिए नील बोर ने सन् 1913 में स्पेक्ट्रमी अध्ययन और क्वाण्टम सिद्धान्त की सहायता से अपना परमाणु सिद्धान्त तथा परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया।

प्रश्न 2.
बोर के परमाणु मॉडल का वर्णन कीजिए तथा उसकी सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर
बोर का परमाणु मॉडल यह प्लांक के क्वाण्टम सिद्धान्त (Planck’s quantum theory) पर आधारित है। यह रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में पाये जाने वाले दोषों को दूर करता है और परमाणु के स्थायित्व व उसके रैखिक स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है। नील बोर (Neils Bohr, 1913) ने परमाणु संरचना के सम्बन्ध में निम्नलिखित अभिकल्पनाएँ (assumptions) प्रस्तुत की

  1. इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किसी विशेष वृतीय कक्ष (circular orbit) में बिना ऊर्जा का | उत्सर्जन (emission) किये चक्कर लगाते रहते हैं। इन कक्षों को स्थायी कक्षाएँ (stationary orbits) कहते हैं।
  2. नाभिक के चारों ओर अनेक वृत्तीय कक्षाएँ सम्भव हैं परन्तु इलेक्ट्रॉन इन सभी सम्भव कक्षाओं में चक्कर नहीं लगाते हैं। इलेक्ट्रॉन केवल उसी कक्षा में चक्कर लगाते हैं जिसमें उसका कोणीय संवेग (angular momentum) [latex]\frac { h }{ 2\Pi } [/latex] का गुणित (integral multiple) होता है। यदि m द्रव्यमान का इलेक्ट्रॉन, r त्रिज्या वाली कक्षा में v वेग से घूमता है, तो इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-84
    [latex]mvr=\frac { nh }{ 2\Pi } [/latex]
    जहाँ, h प्लांक नियतांक है।
    n स्थायी कक्षा की क्रम संख्या (principal quantum number) है। n= 1, 2, 3, … या K, L, M, N …
    यदि किसी इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग h/2π हैं, तो वह परमाणु के K-कोश में चक्कर लगाता है। इसी प्रकार यदि किसी इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग [latex]\frac { 2h }{ 2\Pi } [/latex] अर्थात् [latex]\frac { h }{ \Pi } [/latex] है, तो वह परमाणु के L-कोश (n=2) में चक्कर लगाती है।
  3.  प्रत्येक स्थायी कक्षा की एक निश्चित ऊर्जा होती है। इसलिए इन कक्षाओं को ऊर्जा स्तर (energy level) भी कहते हैं। जैसे-जैसे मुख्य क्वाण्टम संख्या (n) का मान बढ़ता है वैसे-वैसे स्थायी कक्षा की त्रिज्या (r) और उसकी ऊर्जा (E) का मान बढ़ता जाता है। जब तक इलेक्ट्रॉन एक-निश्चित ऊर्जा वाली स्थायी कक्षा में घूमता रहता है, तो वह ऊर्जा का शोषण या उत्सर्जन नहीं कर सकता।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-85
  4. जब कोई इलेक्ट्रॉन एक स्थायी कक्षा (ऊर्जा स्तर) से दूसरी स्थायी कक्षा (ऊर्जा स्तर) में कूदता है, तो दोनों ऊर्जा स्तरों की ऊर्जा का अन्तर (∆E) एक विकिरण के रूप में अवशोषित (absorb) या उत्सर्जित (emit) होता है। इस विकिरण की आवृत्ति (v) या तरंगदैर्घ्य (λ) का मान निम्नलिखित समीकरण से निकाल सकते हैं।
    [latex]{ E }_{ 2 }-{ E }_{ 1 }=\left( \triangle E \right) =hv=\frac { hv }{ \lambda } [/latex]
    जब इलेक्ट्रॉन एक न्यून ऊर्जा (E1) के स्तर से एक उच्च ऊर्जा (E2) के स्तर में कूदता है, तो परमाणु द्वारा ∆E ऊर्जा अवशोषित होती है। इसके विपरीत, यदि इलेक्ट्रॉन एक-उच्च ऊर्जा (E2) स्तर से एक न्यून ऊर्जा (E1) के स्तर में कूदता है तो ऊर्जा विकिरण के रूप में परमाणु द्वारा उत्सर्जित होती है।
  5. इन परिवर्तनों के फलस्वरूप प्राप्त स्पेक्ट्रम में निश्चित आवृति की रेखायें (lines) उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार यह मॉडल परमाणु के रैखिक स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है।
    परमाणु में इलेक्ट्रॉन हमेशा निम्नतम ऊर्जा वाली कक्षाओं में रहते हैं। इस अवस्था को परमाणु की आद्य अवस्था (ground state) कहते हैं। बाहर से ऊर्जा देने पर इलेक्ट्रॉन उत्तेजित (excite) होकर अधिक ऊर्जा वाली कक्षाओं में कूद जाते हैं। परमाणु की इस अवस्था को उत्तेजित अवस्था (excited state) कहते हैं। परमाणु को बाहर से बहुत अधिक ऊर्जा देने पर इलेक्ट्रान परमाणु को छोड़कर उससे बाहर निकल जाते हैं और धनायन (cation) प्राप्त होते हैं।

बोर के परमाणु मॉडल की सीमाएँ निम्नवत् हैं-

  1. बोर का परमाणु मॉडल केवल उन परमाणुओं और आयनों के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करता है। जिनमें केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है; जैसे-H-परमाणु, He+ और Li2+ आयन। यह उन निकायों (systems) की व्याख्या नहीं करता जिनमें एक से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं। जैसे-N, ,0, Cl आदि।
  2. बोर के सिद्धान्त द्वारा जीमनं प्रभाव (Zeeman effect) और स्टार्क प्रभाव (Stark effect) की व्याख्या नहीं की जा सकती है। जिस वस्तु से विकिरण का उत्सर्जनं हो रहा है उस वस्तु को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर उसकी स्पेक्ट्रम रेखाएँ विभक्त (split) हो जाती हैं। इस प्रकार स्पेक्ट्रम रेखाओं का चुम्बकीय क्षेत्र में विभक्त होना जीमन-प्रभाव (Zeeman effect) कहलाता है। इसी प्रकार वैद्युत क्षेत्र में स्पेक्ट्रम रेखाओं का विभक्त होना स्टार्क प्रभाव कहलाता है।
  3. यह हाइड्रोजन परमाणु के सूक्ष्म स्पेक्ट्रम की संरचना (fine spectrum of H-atom) की व्याख्या नहीं करता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom img-86
    जब हाइड्रोजन के स्पेक्ट्रम का अध्ययन उच्च विभेदन क्षमता (high resolving power) वाले स्पेक्ट्रोस्कोप (spectroscope) से करते हैं तो यह पाया जाता है कि प्रत्येक एकल रेखा (single line) वास्तव में कई सूक्ष्म रेखाओं (fine lines) से मिलकर बनी हैं। हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में इन सूक्ष्म रेखाओं को हाइड्रोजन परमाणु का सूक्ष्म स्पेक्ट्रम (fine spectrum of H-atom) कहते हैं। बोर का परमाणु मॉडल इसकी व्याख्या नहीं कर सकता है।
  4. बोर का परमाणु मॉडल हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धान्त (Heisenberg’s uncertainty principle) के विरूद्ध है।

प्रश्न 3.
क्वाण्टम संख्याएँ क्या हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं? इनमें से प्रत्येक को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
क्वाण्टम संख्याएँ-जिन संख्याओं का प्रयोग करके हम परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा तथा स्थिति (नाभिक से दूरी, कक्षक की आकृति, अभिविन्यास तथा चक्रण की दिशा) से सम्बन्धित समस्त जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, उन्हें क्वाण्टम संख्याएँ कहते हैं। क्वाण्टम संख्याएँ निम्नलिखित चार प्रकार की होती हैं।

1. मुख्य क्वाण्टम संख्या—यह क्वाण्टम संख्या परमाणु के इलेक्ट्रॉन के मुख्य ऊर्जा स्तर अथवा
कोश (shell) को व्यक्त करती है। इसे n से प्रदर्शित करते हैं। यह क्वाण्टम संख्या, परमाणु के इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा तथा नाभिक से उसकी कोश की औसत दूरी प्रदर्शित करती है। इसका मान ‘0 के अतिरिक्त कोई पूर्णांक 1, 2, 3, 4 इत्यादि हो सकता है। मुख्य ऊर्जा स्तरों को क्रमशः नाभिक से आरम्भ करके K, L, M, N आदि अक्षरों से भी व्यक्त करते हैं। इन कोशों हेतु ॥ का मान क्रमशः 1, 2, 3, 4 आदि होता है। अर्थात् ॥=1 का अर्थ है न्यूनतम ऊर्जा स्तर अर्थात् K-कोश
n=2 का अर्थ है L-कोश
n= 3 का अर्थ है M-कोश
n= 4 का अर्थ है N-कोश इत्यादि।
n का मान बढ़ने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा तथा उसकी नाभिक से औसत दूरी प्राय: बढ़ती जाती है।
2. दिगंशी क्वाण्टम संख्या—इसे कोणीय संवेग (angular momentum) या भौम क्वाण्टम संख्या (secondary quantum number) भी कहते हैं। इसे 1 से प्रदर्शित करते हैं। तत्त्वों के स्पेक्ट्रमों में मुख्य रेखाओं के अतिरिक्त बारीक रेखाएँ भी होती हैं। इन बारीक रेखाओं की उत्पत्ति को समझाने के लिए यह सुझाया गया कि किसी बहुइलेक्ट्रॉनिक परमाणु के मुख्य कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा समान नहीं होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये इलेक्ट्रॉन विभिन्न पथों पर गति करते हैं और इनके कोणीय संवेग भी भिन्न-भिन्न होते हैं। अत: एक ही मुख्य कोश में अनेक उपकोश (sub-shell) अथवा ऊर्जा के उपस्तर (sub levels) होते हैं। इनके कारण ही इलेक्ट्रॉनों की कूदों (jumps) की संख्या बढ़ जाती है जिससे स्पेक्ट्रम में अधिक संख्या में रेखाएँ प्राप्त होती हैं।
दिगंशी क्वाण्टम संख्या 1, इलेक्ट्रॉन के उप ऊर्जा-स्तर (उपकोश) को प्रदर्शित करती है। के मान मुख्य क्वाण्टम संख्या n पर निर्भर करते हैं। किसी n के लिये । के मान 0 से लेकर (n-1) तक होते हैं।
n=1 तो, 1= 0
n=2 तो, 1=0 और 1
n=3 तो,1= 0, 1 और 2
जिन उपकोशों के लिये । के मान क्रमश: 0, 1, 2 और 3 होते हैं उन्हें क्रमशः s, p, d और f अक्षरों द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
1 का मान उप ऊर्जा-स्तर का प्रतीक
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किसी n के लिये 1 के मानों की कुल संख्या ॥ के बराबर होती है अर्थात् किसी कोश में उपकोशों की कुल संख्या उस कोश की मुख्य क्वाण्टम संख्या n के बराबर होती है।। का मान । उपकोश के कक्षकों की आकृति को निर्धारित करता है।
3. चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या—इसे m या m; द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
यह क्वाण्टम संख्या उप ऊर्जा-स्तरों के कक्षकों को प्रदर्शित करती है। m के मान दिगंशी क्वाण्टम संख्या के मान पर निर्भर करते हैं। किसी m के मान +1 से लेकर -1 तक (शून्य सहित) या -1 से +1 तक होते हैं।
यदि l= 0 तो, m=0
1= 1 तो, m= + 1, 0 -1
1= 2 तो, m= + 2, + 1, 0, -1 -2
1= 3 तो, m= +3, +2, + 1, 0,-1,- 2,-3
किसी 1 के लिए m के मानों की कुल संख्या (21+1) होती है, अर्थात् किसी उपकोश में कक्षकों की कुल संख्या (21+ 1) होती है।
(जहाँ । उपकोश की दिगंशी क्वाण्टम संख्या है)।
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कभी-कभी + चिन्हों को बिना किसी विभेद के प्रयोग किया जाता है। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में किसी उपकोश में उपस्थित सभी कक्षकों की ऊर्जाएँ । समान होती हैं। ऐसे कक्षकों को समभ्रंश कक्षक (degenerate orbital) कहते हैं। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति में किसी एक उपकोश में उपस्थित कक्षकों की ऊर्जाओं में थोड़ा अन्तर आ जाता है। किसी स्पेक्ट्रमी रेखा के कई रेखाओं में विभक्त होने का कारण भी यह ऊर्जाओं में अन्तर है।
4. चक्रण क्वाण्टम संख्या—इसे s या m, से प्रदर्शित करते हैं। इस संख्या की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि परमाणु में इलेक्ट्रॉन न केवल नाभिक के चारों ओर घूमता है बल्कि अपने अक्ष पर घूर्णन (चक्रण) करता है। यह संख्या इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा को प्रदर्शित करती है। इलेक्ट्रॉन के चक्रण की दिशा दक्षिणावर्त (clockwise) या वामावर्त (anticlockwise) हो सकती है। m के किसी मान के लिए : के केवल दो मान होते हैं- [latex]+\frac { 1 }{ 2 } [/latex] या [latex]-\frac { 1 }{ 2 } [/latex] इन दोनों मानों को विपरीत दिशाओं को दर्शाते हुए तीरों (क्रमश: ↑ और ↓) द्वारा प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक इलेक्ट्रॉन का उसके चक्रण के कारण कोणीय संवेग होता है जिसका परिमाण निम्न व्यंजक से प्राप्त होता है।
चक्रण कोणीय संवेग [latex]\sqrt { s\left( s+1 \right) } \times \overline { h } [/latex] जहाँ [latex]s=+\frac { 1 }{ 2 } [/latex]
इस क्वाण्टम संख्या से पदार्थों के चुम्बकीय गुणों के विषय में भी जानकारी मिलती है। घूमता हुआ इलेक्ट्रॉन छोटे चुम्बक के समान व्यवहार करता है। यदि किसी कक्षक में दो इलेक्ट्रॉन होते हैं तो वे एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्त कर देते हैं। यदि किसी परमाणु के सभी कक्षक पूर्णतः भरे होते हैं तो सभी इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के चुम्बकीय प्रभाव को नष्ट कर देते हैं और पदार्थ प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) होता है। ऐसा पदार्थ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षित होता है। दूसरी ओर यदि पदार्थ में कुछ अर्द्ध-पूर्ण कक्षक होते हैं तो इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के चुम्बकीय प्रभाव को पूर्णतः नष्ट नहीं कर पाते। ऐसा पदार्थ अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है। यह पदार्थ बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की तरफ आकर्षित होता हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 10 Development

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 10 Development (विकास)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आप ‘विकास’ से क्या समझते हैं? क्या ‘विकास की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ होता है?
उत्तरं-
‘विकास’ शब्द अपने व्यापक अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है। कोई समाज के बारे में अपनी समझ द्वारा यह स्पष्ट करता है कि समाज के लिए समग्र रूप से उसकी दृष्टि क्या है और उसे प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है? साधारणतया विकास शब्द का प्रयोग प्रायः आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज को आधुनिकीकरण जैसे संकीर्ण अर्थों में भी होता रहता है। ‘विकास’ की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ नहीं होता है। प्रायः देखा गया है कि विकास को काम समाज के व्यापक दृष्टिकोण के अनुसार नहीं होता है। इस प्रक्रिया में समाज के कुछ हिस्से लाभान्वित होते हैं जबकि शेष लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन-शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ सकता है।

प्रश्न 2.
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे पड़ने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे निम्नलिखित सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव पड़े हैं-
सामाजिक प्रभाव
विकास की समाज को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। अन्त बातों के अतिरिक्त बड़े बाँधों के निर्माण,
औद्योगिक गतिविधियों और उत्खनन कार्यों के कारण बड़ी संख्या में लोगों को उनके घरों और क्षेत्रों से विस्थापन हुआ है। विस्थापन का परिणाम आजीविका खोने और दरिद्रता में वृद्धि के रूप में हमारे सामने आया है। अगर ग्रामीण खेतिहर समुदाय अपने परम्परागत पेशे और क्षेत्र से विस्थापित होते हैं, तो वे समाज के हाशिए पर चले जाते हैं। कालान्तर में वे नगरीय और ग्रामीण गरीबों की विशाल संख्या में सम्मिलित हो जाते हैं। उनके परम्परागत कौशल नष्ट हो जाते हैं। संस्कृति भी नष्ट होती है क्योंकि जब लोग नई जगह पर जाते हैं, तो वे अपनी पूरी सामुदायिक जीवन पद्धति खो बैठते हैं।

पर्यावरणीय प्रभाव
विकास के कारण अनेक देशों के पर्यावरण को भी बहुत नुकसान पहुँचा है। जब दक्षिणी और दक्षिण-पूर्व एशिया के तटों पर सुनामी ने कहर ढाया, तो यह देखा गया कि तटीय वनों के नष्ट होने और समुद्र तट के निकट वाणिज्यिक उद्यमों के स्थापित होने के कारण ही इतना अधिक नुकसान हुआ। कालान्तर में पारिस्थितिकी संकट से हम बुरी तरह प्रभावित होंगे। वायु प्रदूषण सभी को प्रभावित करने वाली समस्या है। भूमि का जल स्तर भी गिर गया है, ग्रामीण महिलाओं को पानी लेने अब बहुत दूर जाना पड़ता है।

विकास के लिए हम जिन क्रियाओं पर निर्भर हैं वे ऊर्जा के निरन्तर बढ़ते उपयोग से सम्पन्न होते हैं। विश्व में प्रयुक्त ऊर्जा का अधिकांश भाग कोयला अथवा पेट्रोलियम जैसे स्रोतों से आता है, जिन्हें पुनः प्राप्त करना सम्भव नहीं है। उपभोक्ताओं की बढ़ी हुई आवश्यकताओं को पूरा करने में अमेजन के बरसाती जंगलों का विशाल भू-भाग उजड़ता जा रहा है। इस प्रकार विकास ने समाज और पर्यावरण को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है।

प्रश्न 3.
विकास की प्रक्रिया ने किन नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है?
उत्तर-
विकास की प्रक्रिया ने जिन नए अधिकारों के दावों को जन्म दिया है, उनमें प्रमुख हैं-
1. आजीविका के अधिकार का दावा – विकास की कीमत अत्यन्त दरिद्रों और आबादी के असुरक्षित भाग को चुकानी पड़ती है। चाहे यह कीमत पारिस्थितिकी तन्त्र में नुकसान के कारण हो या विस्थापन के समय आजीविका खाने के कारण। लोकतन्त्र में लोगों को यह अधिकार है। कि वे सरकार के सामने आजीविका के अधिकार की माँग कर सकते हैं।
2. नैसर्गिक संसाधनों पर अधिकार का दावा – आदिवासी और आदिम समुदाय जिनका पर्यावरण से गहन संबंध होता है नैसर्गिक संसाधनों के उपयोग के परम्परागत अधिकारों का दावा करने लगे हैं।

प्रश्न 4.
विकास के बारे में निर्णय सामान्य हित को बढ़ावा देने के लिए किए जाएँ, यह सुनिश्चित करने में अन्य प्रकार की सरकार की अपेक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संसाधनों को लेकर विरोध या बेहतर जीवन के विषय में विभिन्न विचारों के द्वन्द्व का हल विचार-विमर्श और सभी के अधिकारों के प्रति सम्मान के माध्यम से होता है। इन्हें ऊपर से थोपा नहीं जा सकता। इस प्रकार अगर बेहतर जीवन प्राप्त करने में समाज का प्रत्येक व्यक्ति साझीदार है, तो विकास के लक्ष्य तय करने और उसके कार्यान्वयन के तरीके खोजने में भी प्रत्येक व्यक्ति को सम्मिलित करने की आवश्यकता है। इस प्रकार विकास के बारे में निर्णय लेने में अन्य सरकार की अपेक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ही लाभ है।

प्रश्न 5.
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनवाने में लोकप्रिय संघर्ष और आन्दोलन कितने सफल रहे हैं।
उत्तर-
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनवाने में पर्यावरण आन्दोलन बड़े सफल रहे हैं। पर्यावरण आन्दोलन की जड़े औद्योगीकरण के विरुद्ध 19वीं सदी में विकसित हुए विद्रोह में देखी जा सकती हैं। वर्तमान में पर्यावरणीय आन्दोलन एक विश्वव्यापी प्रकरण बन गया है और इसके गवाह हैं विश्वभर में फैले हजारों गैर-सरकारी संगठन और बहुत-सी ‘ग्रीन’ पार्टियाँ। कुछ जाने-माने पर्यावरण संगठनों में ग्रीन पीस और वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड शामिल हैं। भारत में भी हिमालय के वन क्षेत्र को बचाने के लिए ‘चिपको आन्दोलन’ का जन्म हुआ। ये समूह पर्यावरण उद्देश्यों की रोशनी में सरकार की औद्योगिक एवं विकास नीतियों को बदलने के लिए दबाव डालने का प्रयत्न करते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
बेहतर जीवन की कामना से संबंधित है
(क) विकास
(ख) पर्यावरण
(ग) तानाशाही
(घ) योजना
उत्तर-
(क) विकास।

प्रश्न 2.
मानव विकास प्रतिवेदन प्रकाशित करता है
(क) योजना आयोग
(ख) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP)
(ग) भारतीय संसद
(घ) मानवाधिकार आयोग
उत्तर-
(ख) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP)।

प्रश्न 3.
‘चिपको आन्दोलन किससे सम्बद्ध है?
(क) पर्यावरण
(ख) विधि
(ग) योजना
(घ) नर्मदा बाँध
उत्तर-
(क) पर्यावरण।

प्रश्न 4.
ओगोनी प्रान्त किस देश में है?
(क) नाइजीरिया
(ख) दक्षिणी अफ्रीका
(ग) इजरायल
(घ) फिलिस्तीन
उत्तर-
(क) नाइजीरिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एशियाई व अफ्रीकी देशों के लोगों की क्या समस्याएँ हैं?
उत्तर-
एशियाई व अफ्रीकी देशों में गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, निरक्षरता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की समस्याएँ हैं।

प्रश्न 2.
पर्यावरणवादियों के क्या विचार हैं?
उत्तर-
पर्यावरणवादियों का विचार है कि मानव को पारिस्थितिकी के सुर-में-सुर मिलाकर जीना चाहिए और पर्यावरण में अपने तात्कालिक हितों के लिए छेड़छाड़ करना बंद करना चाहिए।

प्रश्न 3.
‘चिपको आन्दोलन क्या है?
उत्तर-
यह एक पर्यावरणीय आन्दोलन है और भारत में हिमालय के वनक्षेत्र को बचाने के लिए प्रारम्भ किया गया था।

प्रश्न 4.
‘मानव विकास प्रतिवेदन क्या है?
उत्तर-
‘मानव विकास प्रतिवेदन संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) प्रकाशित करता है। यह उसका वार्षिक प्रकाशन है। इस प्रतिवेदन में साक्षरता और शैक्षिक स्तर, आयु सम्भावित और मातृ-मृत्यु दर जैसे विभिन्न सामाजिक संकेतकों के आधार पर देशों का दर्जा निर्धारित किया जाता है।

प्रश्न 5.
लोकतन्त्र और विकास दोनों का समान उद्देश्य क्या है?
उत्तर-
लोकतन्त्र और विकास दोनों का समान उद्देश्य जनसाधारण के लिए रोजगार प्राप्त कराना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘विकास’ शब्द का क्या अर्थ है? ।
उत्तर-
‘विकास’ शब्द अपने व्यापकतम अर्थ में उन्नति, प्रगति, कल्याण और बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों का वाहक है। कोई समाज विकास के बारे में अपनी समझे द्वारा यह स्पष्ट करता है कि समाज के लिए समग्र रूप से उसकी दृष्टि क्या है और उसे प्राप्त करने का सर्वोत्तम तरीका क्या है? विकास शब्द का प्रयोग प्रायः आर्थिक विकास की दर में वृद्धि और समाज का आधुनिकीकरण जैसे संकीर्ण अर्थों में भी होता रहता है। दुर्भाग्यवश विकास को साधारणतया पूर्व निर्धारित लक्ष्यों का बाँध, उद्योग, अस्पताल जैसी परियोजनाओं को पूरा करने से जोड़कर देखा जाता है। विकास का काम । समाज के व्यापक दृष्टिकोण के अनुसार नहीं होता है। इस प्रक्रिया में समाज के कुछ हिस्से लाभान्वित होते हैं जबकि शेष लोगों को अपने घर, जमीन, जीवन-शैली को बिना किसी भरपाई के खोना पड़ सकता है।

प्रश्न 2.
विकास की सामाजिक अवधारणा क्या है?
उत्तर-
विकास की सामाजिक अवधारणा का प्रयोग करने का श्रेय एल०टी० हॉबहाउस (L.T. Hobhouse) को दिया जाता है जिन्होंने अपनी पुस्तक सोशल डेवलपमेण्ट (Social Development) में विकास की सामाजिक अवधारणा, विकास की दशाओं तथा विभिन्न प्रकार के विकासों (जैसे कि संस्थाओं का विकास अथवा बौद्धिक विकास) इत्यादि अनेक विषयों पर समुचित प्रकाश डाला है। हॉबहाउस (Hobhouse) के अनुसार, “विकास का अभिप्राय नए प्रकायों के उदय होने के परिणामस्वरूप सामान्य कार्यक्षमता में वृद्धि अथवा पुराने प्रकार्यों की एक-दूसरे के साथ समायोजना के कारण सामान्य उपलब्धि में वृद्धि से है।

हॉबहाउस ने विकास की अवधारणा को समुदायों के विकास के संदर्भ में विकसित किया है। यदि कोई समुदाय अपने स्तर, कुशलता, स्वतन्त्रता तथा पारस्परिकता में आगे बढ़ता है तो हम यह कह सकते हैं। कि वह अमुक समुदाय विकास की ओर अग्रसर है। किसी एक तत्त्व का ही नहीं अपितु सभी तत्त्वों का समन्वय विकास के लिए अनवार्य है।

प्रश्न 3.
नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
नर्मदा बचाओ आंदोलन’ नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर परियोजना के अंतर्गत बनने वाले बाँधों के निर्माण के विरुद्ध एक मिशन है। बड़े बाँधों के समर्थकों का तर्क है कि इनसे बिजली उत्पन्न होगी, काफी बड़े क्षेत्र में जमीन की सिंचाई में सहायता मिलेगी। सौराष्ट्र और कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र को पेयजल भी उपलब्ध होगा। बड़े बाँधों के विरोधी (नर्मदा बचाओ आंदोलन) इन दावों का खण्डन करते हैं। इसके अतिरिक्त अपनी जमीन के डूबने और उसके कारण अपनी आजीविका के छिनने से दस लाख से अधिक लोगों के विस्थापन की समसया उत्पन्न हो गई है। इनमें से अधिकांश लोग जनजाति या दलित समुदायों के हैं और देश के अति वंचित समूहों में आते हैं।

प्रश्न 4.
‘सामाजिक विकास एक बहु-आयामी अवधारणा है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
‘सामाजिक विकास’ को टी०बी० बॉटोमोर ने इस प्रकार परिभाषित किया है, ‘सामाजिक विकास से हमारा तात्पर्य उस स्थिति से है जिसमें समाज के व्यक्तियों में ज्ञान की वृद्धि हो और व्यक्ति प्रौद्यागिक आविष्कारों द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लें साथ ही वे आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर हो जाएँ।” सामाजिक विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत औद्योगीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप आर्थिक व राजनीतिक संगठनों की कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है तथा इसके आधार पर समाजों को विकसित तथा अविकसित या विकासशील जैसी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

सामाजिक विकास का अभिप्राय जैवकीय विकास न होकर मानवीय ज्ञान में वृद्धि तथा प्राकृतिक पर्यावरण पर मानवीय नियंत्रण में अधिकाधिक वृद्धि है। मानवीय ज्ञान में वृद्धि की दृष्टि से अगर समाज में व्यक्ति अपने पूर्वजों की अपेक्षा ज्ञान में अभिवृद्धि कर चुके हैं तो उसे हम विकसित समाज कह सकते हैं। प्राकृतिक पर्यावरण पर मानवीय नियन्त्रण की वृद्धि भी विकास का एक सूचक है तथा जिन समाजों ने इस नियन्त्रण में सफलता प्राप्त कर ली है वे विकसित समाज हैं। वास्तव में, सामाजिक विकास को केवल आर्थिक विकास तक ही सीमित करना उचित नहीं है। विकासशील देशों के लिए ‘सामाजिक विकास’ एक बहु-आयामी अवधारणा है।

प्रश्न 5.
विकास का ‘जनांकिकीय संक्रान्ति सिद्धान्त क्या है?
उत्तर-
किसी भी देश के आर्थिक विकास का उस देश की मानव-शक्ति पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव को ‘जनांकिकीय संक्रान्ति सिद्धान्त’ द्वारा स्पष्ट किया जाता है जिसके अनुसार-

1. किसी भी अविकसित राष्ट्र में अशिक्षा, बाल विवाह एवं अन्य धार्मिक विश्वासों के कारण जन्म-दर अधिक होती है तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मृत्यु-दर भी अधिक होती है। इसलिए मानव-शक्ति में विशेष वृद्धि नहीं होती।

2. किसी भी विकासशील राष्ट्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ने से मृत्यु-दर कम होती है किन्तु
जन्म-दर में कोई विशेष कमी नहीं होती। इससे जनसंख्या में वृद्धि होती है तथा प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन अधिक होने लगता है। ऐसा होने से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। किन्तु एक सीमा से अधिक जनसंख्या बढ़ जाने पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है जिसे दूर करने के लिए मानव-शक्ति का नियोजन आवश्यक हो जाता है।

3. किसी भी विकसित राष्ट्र में शिक्षा की वृद्धि एवं रहन-सहन का स्तर ऊँचा होने के कारण रूढ़िवादिता एवं पारम्परिक दृष्टिकोण समाप्त हो जाता है जिससे जन्म-दर में कमी आ जाती है। तथा स्वस्थ सेवाओं एवं उत्पादन में वृद्धि के कारण मृत्यु-दर में भी कमी आती है। इसलिए मानव-शक्ति में वृद्धि होती है तथा समाज में आर्थिक संतुलन की स्थिति बन जाती है।

प्रश्न 6.
मानवीय संसाधनों का विकास किन विधियों द्वारा किया जा सकता है?
उत्तर-
टी० डब्ल्यूशुल्ज (T.W. Schultz) का मत है कि मानवीय साधनों का विकास निम्नलिखित पाँच विधियों से किया जा सकता है-

  1.  कार्यरत प्रशिक्षण की व्यवस्था करके,
  2.  वयस्क श्रमिकों के लिए अध्ययन कार्यक्रमों का संगठन करना, जिसमें कृषि संबंधी विस्तार । कार्यक्रम सम्मिलित हों,
  3.  ऐसी स्वास्थ्य सेवाएँ, सम्मिलित करना जिनसे लोगों का जीवन-स्तर, शक्ति एवं तेज में वृद्धि हो,
  4.  प्रारम्भिक, माध्यमिक एवं उच्चतर स्तर पर संगठित शिक्षा की व्यवस्था करना तथा
  5.  व्यक्तियों व परिवारों को स्थान परिवर्तित करके उन्हें नौकरी के अवसरों से समायोजित करना। | इस सूची में तकनीकी सहायता, विशेषज्ञों, तथा सलाहकारों का आयात करना भी जोड़ा जा सकता है। ।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक विकास की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
आर्थिक विकास के निम्नलिखित प्रमुख लक्षण इसकी प्रकृति को स्पष्ट करते हैं-

1. आर्थिक विकास एक प्रक्रिया- आर्थिक विकास किसी विशेष आर्थिक स्थिति का परिचायक नहीं है। यह तो प्रक्रिया है जो अविकसित या अर्द्धविकसित समाजों के उन प्रयासों को प्रकट करती है जो एक विशेष समय सन्दर्भ में उने लक्ष्यों की प्राप्ति से संबंधित हैं जिनके द्वारा वह
समाज विकसित अथवा औद्योगीकृत समाजों के रूप में रूपान्तरित होने के लिए करता है।

2. एक, चेतन प्रक्रिया- आर्थिक विकास एक चेतन प्रक्रिया है जिसमें विकास के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं और उनकी प्राप्ति के लिए कार्यक्रम नियोजित किया जाता है।

3. नवोदित राष्ट्रों की तीसरी दुनिया से संबंधित- यह प्रक्रिया विशेषतः एशिया और अफ्रीका के उन राष्ट्रों में घटित हो रही है जो औद्योगीकरण की राह में पिछड़े हुए हैं। वे अपनी परम्परागत कृषि व्यवस्था में औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उनके अपने विभिन्न मॉडल और प्रयास हैं।

4. संक्रमणकालिक स्थिति- उपर्युक्त विशेषता इस बात को भी प्रकट करती है कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया संक्रमण अथवा रूपान्तर के दौर से संबंधित है। विकास के एक निश्चित बिंदु पर पहुँचकर इस प्रक्रिया का अर्थ और संदर्भ बदल जाता है क्योंकि तब तो संबंधित राष्ट्र विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ चुके होते हैं।

प्रश्न 2.
विकास के कुप्रभावों से बचने के लिए हमें अपनी जीवन-शैली में किस प्रकार के बदलाव लाने होंगे?
उत्तर-
विकास का वैकल्पिक प्रारूप विकास की महँगी, पर्यावरण की नुकसान पहुँचाने वाली और प्रौद्योगिकी से संचालित सोच से दूर होने का प्रयास करता है। विकास को देश में मोबाइल फोनों की संख्या अत्याधुनिक हथियारों अथवा कारों की बढ़ती संख्या से नहीं बल्कि लोगों के जीवन की उस गुणवत्ता से नापा जाना चाहिए, जो उनकी प्रसन्नता, सुख-शांति और बुनियादी आवश्यकताओं के पूरा होने में झलकती है।

एक स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित रखने और ऊर्जा के पुनः प्राप्त हो सकने वाले स्रोतों का यथासंभव उपयोग करने के प्रयास किए जाने चाहिए। वर्षा जल संचयन, सौर एवं जैव गैस संयन्त्र, लघु-पनबिजली परियोजना, जैव कचरे से खाद बनाने के लिए कम्पोस्ट गड्ढे बनाना आदि इस दिशा में संभव प्रयासों के कुछ उदाहरण हैं। बड़े सुधार को प्रभावी बनाने के लिए बड़ी परियोजनाएँ ही एकमात्र तरीका नहीं हैं। बड़े बाँधों के विरोधियों ने छोटे बाँधों की वकालत की है, जिनमें बहुत कम निवेश की आवश्यकता होती है और विस्थापन भी कम होता है। ऐसे छोटे बाँध नागरिकों के लिए अधिक लाभप्रद हो सकते हैं।

इसी के साथ-साथ हमें अपने जीवन स्तर को बदलकर उन साधनों की आवश्यकताओं को भी कम करने की आवश्यकता है, जिनका नवीकरण नहीं हो सकता। यह एक उलझा हुआ मामला है। इसे चयन की आजादी में कटौती भी माना जा सकता है, लेकिन जीवन जीने के वैकल्पिक तरीकों की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करने का आशय अच्छे जीवन की वैकल्पिक दृष्टि को खोलकर स्वतंत्रता और सृजनशीलता की संभावना बढ़ाना भी है। ऐसी किसी नीति के लिए देश-भर के लोगों और सरकार के बीच बड़े पैमाने पर सहयोग की आवश्यकता होगी। इसका अर्थ होगा कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने के लिए लोकतान्त्रिक पद्धति अपनाई जाए। अगर हम विकास को किसी की स्वतंत्रता में वृद्धि की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं और लोगों को निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं मानकर विकास-लक्ष्यों को निर्धारित करने में सक्रिय भागीदारी मानते हैं, तो वैसे मसलों पर सहमति तक पहुँचना संभव है।

प्रश्न 3.
मानवीय विकास पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
विकास का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू ‘मानव’ है। इसलिए किसी भी देश का आर्थिक विकास वस्तुत: वहाँ की मानव-शक्ति की अवस्था एवं उसके विकास पर अत्यधिक निर्भर करता है। अंतर्राष्ट्रीय विकास संगठनों के प्रलेखों एवं कार्यक्रमों में विकास को जनसाधारण की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के रूप में देखा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की इस घोषणा के पश्चात् कि विकास का अतिंम लक्ष्य सभी को अच्छे जीवन हेतु अधिक अवसर प्रदान करता है’ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, सामाजिक कल्याण एवं पर्यावरण संरक्षण जैसी सुविधाओं में सुधार पर बल दिया गया है। इसी प्रकार यूनीसेफ की विकास संबंधी नीति; जैसे सुरक्षित जल, संतुलित आहार, स्वच्छ आवास, मौलिक शिक्षा, महिला विकास आदि अनेक दैनिक आवश्यकताओं के प्रावधान पर केन्द्रित है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी आधुनिक क्षेत्र के विकास की आवश्यकताओं को अनदेखा किए बिना लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन योजनाओं के विकास पर बल दिया है।

यद्यपि प्राकृतिक संसाधन, पूँजी निर्माण, तकनीकी व नवाचार, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक संस्थाएँ, विदेशी सहायता एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की आर्थिक विकास में अपनी-अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है, तथापि इन सब से ‘मानव संसाधन के विकास का प्रश्न जुड़ा हुआ है। मानव विकास एवं आर्थिक विकास साथ-साथ चलने वाली क्रियाएँ हैं तथा एक के बिना दूसरी की न तो कल्पना की जा सकती है और न ही एक दूसरी के बिना आगे बढ़ सकती है। आर्थिक विकास में यंत्र, उपकरण, कच्चा माल, वित्त इत्यादि अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह करते हैं किंतु मानवीय कारक एवं मानवीय सहायता के बिना आर्थिक विकास का कोई भी साधन न तो गति प्राप्त कर सकता है और न ही आर्थिक विकास में अपना समुचित योगदान ही प्रदान कर सकता है। इसलिए यह माना जाता है कि आर्थिक विकास के समस्त भौतिक संसाधन मानव के लिए हैं और मानव ही उनका उपयोग आर्थिक विकास के निमित्त करता है।

यदि मनुष्य पूर्ण क्षमता से कार्य करता है तो भौतिक संसाधन भी अपना पूरा योगदान आर्थिक विकास में देते हैं, किंतु यदि मानव संसाधन की कमी होती है तो अन्य संसाधनों की सम्पूर्णता के बावजूद यथेष्ट आर्थिक विकास नहीं होता। आर्थिक विकास में एक ओर मानव के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया जाता है तथा दूसरी ओर आर्थिक विकास स्वयं मानवीय साधनों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। मानवीय पूँजी में वृद्धि से ही विश्व के विकसित राष्ट्रों ने विकास की गति को बढ़ाया है तथा आज आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया में मानवीय संसाधन को महत्त्वपूर्ण मानते हुए मानव पूंजी में निवेश की विचारधारा विकसित हुई है।

प्रश्न 4.
केन सारो वीवा के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
सन् 1950 में नाइजीरिया के ओगोनी प्रान्त में तेल पाया गया। जल्द ही आर्थिक वृद्धि और बड़े व्यापार के दावेदारों ने ओगोनी के चारों ओर राजनीतिक षड्यन्त्र, पर्यावरणीय समस्याओं और भ्रष्टाचार का घना ताना-बाना बुन दिया। इसने उसी क्षेत्र के विकास को रोक दिया जहाँ तेल मिला था। केन सारो वीवा जम से एक ओगोनीवासी थे और 1980 के दशक में एक लेखक, पत्रकार एवं टेलीविजन निर्माता के रूप में जाने जाते थे। अपने काम के दौरान उन्होंने देखा कि तेल और गैस उद्योग ने गरीब ओगोनी किसानों के पैरों के नीचे दबे खजाने को लूट लिया और बदले में उनकी जमीन को प्रदूषित और किसानों को बेघर कर दिया। सारो वीवा ने अपने चारों ओर होने वाले इस शोषण पर प्रतिक्रिया दर्ज की। सारो वीवा ने सन् 1990 में एक खुले, जमीनी और समुदाय पर टिके हुए राजनीतिक आंदोलन द्वारा अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व किया।

आंदोलन का नाम ‘मूवमेण्ट फॉर सरवायवल ऑफ ओगोनी पीपल’ था। आंदोलन इतना असरदार हुआ कि तेल कंपनियों को 1993 तक ओगोनी से वापस जाना पड़ा। लेकिन सारो वीवा को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। नाइजीरिया के सैनिक शासकों ने उसे एक हत्या के मामले में फंसा दिया और सैनिक न्यायाधिकरण ने उसे फाँसी की सजा सुना दी। सारो वीवा का कहना था कि सैनिक ऐसी शैल’ नामक उस बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी के दबाव में कर रहे हैं जिसे ओगोनी से भागना पड़ा था। दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों ने इस मुकदमे को विरोध किया और सारो वीवा को छोड़ देने का आह्वान किया। विश्वव्यापी विरोध की अवहेलना करते हुए नाइजीरिया के शासकों ने सन् 1995 में सारो वीवा को फाँसी दे दी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास का अर्थ एवं परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
राजनीतिक विज्ञान में विकास शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। उदाहरण के लिए, औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया तथा आर्थिक एवं राजनीतिक संगठनों की कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए शब्द का प्रयोग किया गया है। अनेक विद्वानों ने विकास शब्द का प्रयोग दो प्रकार के देशों-विकसित (Developed) तथा विकासशील (Developing) में भेद करने के लिए किया है। वास्तव में, विकास (जोकि जैविक एवं सावयविक अवधारणा है) की अवधारणा का सामाजिक विज्ञानों के अध्ययनों में प्रयोग किए जाने का एक प्रमुख कारण ही नए राष्ट्रों का उदय तथा उनके द्वारा विभिन्न सामाजिक समस्याओं के समाधान के प्रयास हैं। नवीन राष्ट्रों के सम्मुख एक प्रमुख समस्या देश को आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से सुदृढ़ बनाने तथा राष्ट्र-निर्माण करके समस्याओं के समाधान की रही है।

विकास शब्द से अभिप्राय उन्नत दिशा में विभेदीकरण है जो कि अनेक दशाओं में वृद्धि इत्यादि में देखा जा सकता है। इन दशाओं में तीन दशाएँ प्रमुख हैं-

  1.  श्रम-विभाजन में वृद्धि,
  2.  संस्थाओं और समितियों की संख्या में वृद्धि तथा
  3.  संचार साधनों में वृद्धि। इस शब्द का प्रयोग केवल परिमाणात्मक वृद्धि के लिए ही नहीं किया जाता अपितु संगठन की कार्यकुशलता में वृद्धि के लिए भी किया जाता है।

एस०एफ० नैडल (S.F. Nadel) के अनुसार विकास शब्द से तात्पर्य केवल उस परिवर्तन से नहीं है। जिससे कोई अप्रकट अथवा छिपी चीज सामने आती है, अपितु इनका संबंध संभावित परिवर्तनों से भी है। उनका कहना है कि विकास की प्रक्रिया का अतिंम रूप ही किसी समाज को प्रगति की अवस्था तक पहुँचाता है। अधिकांश विद्वान् (जैसे पारसन्स इत्यादि) विकास शब्द का प्रयोग उन परिवर्तनों के लिए करते हैं जो औद्योगीकरण के कारण सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संस्थाओं पर परिलक्षित होते हैं।

एस० चोडक (S. Chodak) के अनुसार, विकास शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में क्रिया जाता है, जिनमें से चार का उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तक सोसाइटल डिवेलपमेण्ट (Societal Development) में किया है। ये अर्थ हैं-

  1.  उविकास (Evolution) के दृष्टिकोण के अनुसार विकास संगठन की उच्च अवस्था की ओर होने वाली आकस्मिक प्रक्रिया है जोकि धीमी गति से होती है।
  2.  उत्पत्ति (Genetic) संबंधी दृष्टिकोण के अनुसार विकास आंतरिक तत्त्वों में वृद्धि है।
  3.  संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक (Structural-functional) दृष्टिकोण के अनुसार विकास संरचना और प्रकार्यों में परिवर्तन की एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके परिणामस्वरूप विशेषीकरण, विभेदीकरण, अंगों की पारस्परिक आश्रितता तथा समग्र की स्वतन्त्रता में वृद्धि होती हैं।
  4.  निर्णायकवाद (Determinism) दृष्टिकोण के अनुसार विकास स्वतः होने वाली परिवर्तन की एक जटिल प्रक्रिया है जिसके द्वारा संरचनाओं व अन्तक्रियाओं में जटिलता आ जाती है।

प्रश्न 2.
संपोषित या सतत विकास से क्या आशय है? इसके लक्ष्य क्या है?
उत्तर-
आज सम्पूर्ण विश्व में संपोषित विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है। यह विकास की वह प्रक्रिया है जिसे कोई भी देश अपने संसाधनों द्वारा इसे दीर्घकालीन अवधि तक बनाए रख सकता है। इस प्रकार के विकास द्वारा वर्तमान की आवश्यकताएँ तो पूरी होती ही हैं, साथ ही भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं के प्रति जवाबदेही भी निश्चित की जाती है। इसका अर्थ ऐसा विकास है जो ने केवल मानव समाज की तत्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल देता है अपितु स्थायी तौर पर भविष्य के लिए भी निर्वाध विकास का आधार प्रस्तुत करता है। संपोषित विकास की धारणा सर्वप्रथम सन् 1987 ई० में ब्रटलैण्ड प्रतिवदेन में सम्मिलित की गई जिसमें इस तथ्य पर जोर दिया गया कि आर्थिक विकास की ऐसी पद्धति बनाई जानी चाहिए जिससे भावी पीढ़ियों के विकास पर किसी प्रकार की, आँच न आए। इस प्रकार का संरक्षण सकारात्मक प्रकृति का होता है जिसके अंतर्गत पारिस्थितिकीय तंत्र के तत्त्वों का संचय, रखरखाव, पुनस्र्थापन, दीर्घावधिक उपयोग एवं अभिवृद्धि सभी समाहित होती है।

संपोषित विकास की धारणा विकास को केवल आर्थिक एवं औद्योगीकरण के पहलू से ही नहीं देखती अपितु इसमें उसके सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर भी समुचित विचार किया जाता है। आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव के जीवन-स्तर में गुणात्मक सुधार बनाए रखना संपोषित विकास का प्रमुख लक्ष्य है। विकास के विश्लेषण का यह परिप्रेक्ष्य समग्र विकास पर बल देता है। संपोषित विकास एक बहुमुखी धारणा है जिसमें समानता, सामाजिक सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण की क्षमता विकेन्द्रीकरण, आत्म-निर्भरता, मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है। संपोषित विकास हेतु आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन, वस्त्र और आवास के साथ-साथ बिजली, पानी परिवहन एवं संचार जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों। इसके साथ ही मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा हो तथा उसे काम करने हेतु प्रदूषणरहित पर्यावरण, पोषित आहार तथा चिकित्सा सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकें।

संपोषित विकास जनसाधारण को आर्थिक गतिविधियों में रोजगार के अवसर प्रदान करने पर बल देता है ताकि उनका जीवन-स्तर ऊँचा हो सके। संपोषित विकास का लक्ष्य आर्थिक विकास, सामाजिक समानता एवं न्याय तथा पर्यावरण संरक्षण में वृद्धि करना है। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि संपोषित विकास का लक्ष्य आर्थिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक आवश्यकताओं में संतुलन बनाए रखना है ताकि वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसके निम्नलिखित चार लक्षण हैं-

  1.  सामाजिक प्रगति एवं समानता,
  2.  पर्यावरणीय संरक्षण,
  3.  प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण,
  4.  स्थायी आर्थिक वृद्धि।

संपोषित विकास एक ऐसा दीर्घकालीन एवं समकालीन परिप्रेक्ष्य है जो स्वस्थ समुदाय के विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु आर्थिक, पर्यावरणीय एवं सामाजिक मुद्दों की ओर संयुक्त रूप से ध्यान देता है तथा सम्पूर्ण प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपभोग से बचने का प्रयास करता है। इस प्रकार का विकास हमें अपने प्राकृतिक स्रोतों को बचाने एवं उनमें वृद्धि करने की प्रेरणा देता है। संपोषित विकास की धारणा को अनेक उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। सभी जानते हैं कि भूमि के नीचे पानी का स्तर घटता जा रहा है एवं पानी की मात्रा कम होती जा रही है। आने वाले दशकों में पानी की मात्रा इतनी कम हो जाएगी कि इसके लिए भी संघर्ष होने लगेगा। यदि कोई देश संपोषित विकास द्वारा इस समस्या का हल करना चाहता है तो उसे न केवल पानी का उपयोग कम करना होगा अपितु इसमें वृद्धि के उपाय भी खोजने होंगे। इसी भाँति, औद्योगिक विकास के समय पर्यावरणीय संरक्षण एवं संतुलन का ध्यान रखना होगा। निर्धनता एवं स्वास्थ्य का निम्न स्तर परस्पर जुड़े हुए हैं। इसके समाधान हेतु ऐसी योजना बनाने की आवश्यकता है कि रोगों की रोकथाम हेतु प्रभावी उपाए किए जाएँ साथ ही निर्धनता उन्मूलन के कार्यक्रम लागू किए जाएँ।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 9 Peace

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप जानते हैं कि एक शान्तिपूर्ण दुनिया की ओर बदलाव के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है? क्या मस्तिष्क शान्ति को बढ़ावा दे सकता है? क्या मानव मस्तिष्क पर केन्द्रित रहना शान्ति स्थापना के लिए पर्याप्त है?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनिसेफ) के संविधान ने उचित टिप्पणी की है कि चूंकि युद्ध का आरम्भ लोगों के दिमाग से होता है, इसलिए शान्ति के बचाव भी लोगों के दिमाग में ही रचे जाने चाहिए।’ इस कथन से स्पष्ट है कि शान्तिपूर्ण दुनिया के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है। मस्तिष्क शान्ति को बढ़ावा दे सकता है। इस दिशा में करुणा जैसे अनेक पुरातन आध्यात्मिक सिद्धान्त और ध्यान बिल्कुल उपयुक्त हैं।

हिंसा का आरम्भ केवल किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से नहीं होता, वरन् इसकी जड़े कुछ सामाजिक संरचनाओं में भी होती हैं। न्यायपूर्ण और लोकतान्त्रिक समाज की रचना सरंचनात्मक हिंसा को निर्मूल करने के लिए अनिवार्य है। शान्ति, जिसे सन्तुष्ट लोगों के समरस सह-अस्तित्व के रूप में समझा जाता है, ऐसे ही समाज की उपज हो सकती है। शान्ति एक बार में हमेशा के लिए प्राप्त नहीं की जा सकती है। शान्ति कोई अन्तिम स्थिति नहीं बल्कि ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें व्यापकतम अर्थों में मानव-कल्याण की स्थापना के लिए आवश्यक नैतिक और भौतिक संसाधनों के सक्रिय क्रिया-कलाप सम्मिलित होते हैं। स्पष्ट है कि मानव मस्तिष्क पर केन्द्रित रहना शान्ति स्थापना के लिए पर्याप्त नहीं है।

प्रश्न 2.
राज्य को अपने नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा अवश्य ही करनी चाहिए। हालाँकि कई बार राज्य के कार्य इसके कुछ नागरिकों के विरुद्ध हिंसा के स्रोत होते हैं। कुछ उदाहरणों की मदद से इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
राज्य को अपने नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा अवश्य करनी चाहिए। इसके लिए राज्यों ने बल प्रयोग के अपने उपकरणों को मजबूत किया है। राज्य से अपेक्षा यह थी कि वह सेना या पुलिस का प्रयोग अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए करेगा लेकिन वास्तव में इन दोनों शक्तियों का प्रयोग अपने ही नागरिकों के विरोध के स्वर को दबाने के लिए किया गया है। इसके सबसे उत्कृष्ट उदाहरण म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश हैं। यहाँ सेना ने नागरिक की आवाज को हमेशा दबाया है। म्यांमार व पाकिस्तान में तो सैनिक तानाशाही स्पष्ट दिखाई देती है।

समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान सार्थक लोकतन्त्रीकरण और अधिक नागरिक स्वतन्त्रता की एक कारगर पद्धति में है। इसके माध्यम से राज्यसत्ता को अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है। रंगभेद की समाप्ति के पश्चात् दक्षिण अफ्रीका में यही पद्धति अपनाई गई, जो अद्यतन राजनीतिक सफलता का एक प्रमुख उदाहरण है।

प्रश्न 3.
शान्ति को सर्वोत्तम रूप में तभी पाया जा सकता है जब स्वतन्त्रता, समानता और न्याय कायम हो। क्या आप सहमत हैं?
उत्तर-
शान्ति को सर्वोत्तम रूप में तभी पाया जा सकता है जब स्वतन्त्रता, समानता और न्याय पूर्ण से राज्य में स्थापित हों। शान्ति एक स्थायी भाव है। शान्ति विकास के लिए भी आवश्यक है। यदि देश में नागरिकों को स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होगी तो वे कुण्ठित रहेंगे। यही कुण्ठा अशान्ति या हिंसा को जन्म देगी। इसी प्रकार समानता का भाव न होने से वैमनस्यता, ईष्र्या, द्वेष के भाव जन्मेंगे। यह भी अशान्ति के कारक हैं, इसलिए राष्ट्र में समानता भी आवश्यक है। न्याय एक ऐसी संस्था है जो शान्तिपूर्ण वातावरण स्थापित करने में अत्यन्त सहायक है।

प्रश्न 4.
हिंसा के माध्यम से दूरगामी न्यायोचित उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता। आप इस कथन के बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर-
अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि हिंसा एक बुराई है लेकिन कभी-कभी यह शान्ति लाने के लिए अनिवार्य होती है। यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि तानाशाहों और उत्पीड़कों को जबरन हटाकर ही उन्हें, जनता को निरन्तर नुकसान पहुँचाने से रोका जा सकता है। या फिर, उत्पीड़ित लोगों के मुक्ति संघर्षों को हिंसा के कुछ प्रयोग के बाद भी न्यायपूर्ण ठहराया जा सकता है। लेकिन अच्छे उद्देश्य से भी हिंसा का सहारा लेना आत्मघाती हो सकता है। एक बार प्रारम्भ हो जाने पर इसकी प्रवृत्ति नियन्त्रण से बाहर हो जाने की होती है और इसके कारण यह अपने पीछे मौत और बरबादी की एक श्रृंखला छोड़ जाती है।

शान्तिवादी को उद्देश्य लड़ाकुओं की क्षमता को कम करके आँकना नहीं है, वरन् प्रतिरोध के अहिंसक स्वरूप पर जोर देना है। संघर्ष का एक प्रमुख तरीका सविनय अवज्ञा है और उत्पीड़न की संरचना की नींव हिलाने में इसका अच्छा प्रयोग हो रहा है। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधी जी द्वारा सत्याग्रह का प्रयोग एक अच्छा उदाहरण है। गांधी जी ने न्याय को अपना आधार बनाया और विदेशी शासकों के अन्त:करण को आवाज दी। जब उससे काम न चला तो उन पर नैतिक और राजनैतिक दवाब बनाने के लिए उन्होंने जन-आन्दोलन आरम्भ किया, जिसमें अनुचित कानूनों को अहिंसक रूप में खुलेआम तोड़ना सम्मिलित है। उनसे प्रेरणा लेकर मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में काले लोगों के साथ भेदभाव के विरुद्ध सन् 1960 में इसी प्रकार का संघर्ष प्रारम्भ किया था। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिंसा के माध्यम से दूरगामी न्यायोचित उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता।

प्रश्न 5.
विश्व में शान्ति स्थापना के जिन दृष्टिकोणों की अध्याय में चर्चा की गई है? उनके बीच क्या अन्तर है?
उत्तर-
शान्ति के क्रियाकलापों में सद्भावनापूर्ण सामाजिक सम्बन्ध के सृजन और सम्वर्द्धन के अविचल प्रयास सम्मिलित होते हैं, जो मानव कल्याण और खुशहाली के लिए प्रेरक होते हैं। शान्ति के मार्ग में अन्याय से लेकर उपनिवेशवाद तक अनेक अवरोध हैं, लेकिन उन्हें हटाने में बेलाग हिंसा के प्रयोग का लालच अनैतिक और अत्यधिक जोखिमपूर्ण दोनों हैं। नस्ल संहार, आतंकवाद और पूर्ण युद्ध के योग में, जो नागरिक और योद्धा के बीच की रेखा को धूमिल करता है, शान्ति की खोज को राजनीतिक कार्यवाहियों के समाधान और साध्ये, दोनों को ही रूपायित करना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
फ्रेड्रिक नीत्शे किस देश का दार्शनिक था?
(क) जर्मनी
(ख) फ्रांस
(ग) जापान
(घ) भारत
उत्तर-
(क) जर्मनी।

प्रश्न 2.
विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति कहलाता है-
(क) रूस
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) फ्रांस
(घ) चीन
उत्तर-
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 3.
भ्रूण हत्यारूपी हिंसा किनसे संबंधित है?
(क) महिलाओं से
(ख) पुरुषों से
(ग) विचारों से
(घ) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर-
(क) महिलाओं से।

प्रश्न 4.
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को लेकर हिंसा कब तक होती रही?
(क) 1997
(ख) 1996
(ग) 1992
(घ) 1998
उत्तर-
(ग) 1992.

प्रश्न 5.
भारत में अंहिसा का पुजारी किसे कहा जाता है?
(क) महात्मा गांधी को
(ख) जवाहरलाल नेहरू को
(ग) लाला लाजपतराय को
(घ) रवींद्रनाथ टैगोर को
उत्तर-
(ग) महात्मा गांधी को।

प्रश्न 6.
रवांडा कहाँ है?
(क) एशिया में
(ख) अफ्रीका में
(ग) ऑस्ट्रेलिया में
(घ) भारत में
उत्तर-
(ख) अफ्रीका में।

प्रश्न 7.
फिलिस्तीनी संघर्ष किसके विरुद्ध है?
(क) इजराइल के
(ख) ईरान के
(ग) इराक के
(घ) संयुक्त अरब अमीरात के
उत्तर-
(क) इजराइल के।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शांति के विषय में नकारात्मक विचार रखने वाले दो विचारकों के नाम लिखिए।
उत्तर-

  1.  फेड्रिक नीत्शे,
  2.  विल्फ्रेडो पैरेटो।

प्रश्न 2.
द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका द्वारा जापान के किन नगरों पर परमाणु बम गिराए गए थे?
उत्तर-

  1.  हिरोशिमा,
  2.  नागासाकी।

प्रश्न 3.
क्यूबाई मिसाइल संकट का समाधान कैसे हुआ?
उत्तर–
क्यूबाई मिसाइल संकट का समाधान सोवियत संघ द्वारा अपनी मिसाइलें क्यूबा से हटा लेने के बाद हुआ।

प्रश्न 4.
हिंसा या अशांति के कारण कौन-से हो सकते हैं?
उत्तर-
जातिभेद, वर्गभेद, पितृसत्ता, उपनिवेशवाद, नस्लवाद, साम्प्रदायिकता आदि अशांति के कारण हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
टिकाऊ शांति किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर-
न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतों और संघर्षों के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीत्शे और पैरेटो के शांति संबंधी विचार लिखिए।
उत्तर-
अतीत के अनेक महत्त्वपूर्ण विचारकों ने शांति के बारे में नकारात्मक ढंग से लिखा है। जर्मन दार्शनिक फेड्रिक नीत्शे युद्ध को महिमामण्डित करने वाले विचारक थे। नीत्शे ने शांति का महत्त्व नहीं दिया, क्योंकि उसको मानना था कि केवल संघर्ष ही सभ्यता की उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसी प्रकार अन्य अनेक विचारकों ने शांति को व्यर्थ बताया है और संघर्ष की प्रशंसा. व्यक्तिगत बहादुरी और सामाजिक जीवंतता के वाहक के रूप में की है। इटली के समाज सिद्धांतकार विल्फ्रेडो पैरेटो (1843-1923) का दावा था कि अधिकांश समाजों में शासक वर्ग का निर्माण सक्षम और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए शक्ति का प्रयोग करने के लिए तैयार लोगों से होता है। उसने ऐसे लोगों का वर्णन शेर के रूप में किया है।

प्रश्न 2.
‘शिकायतें किस प्रकार अशांति को जन्म देती हैं?
उत्तर-
हिंसा का शिकार व्यक्ति जिन मनोवैज्ञानिक और भौतिक हानियों से गुजरता है वे उसके भीतर शिकायतें उत्पन्न करती हैं। ये शिकायतें पीढ़ियों तक बनी रहती हैं। ऐसे समूह कभी-कभी किसी घटना अथवा टिप्पणी से उत्तेजित होकर संघर्ष (हिंसा) शुरू कर देते हैं। दक्षिण एशिया में विभिन्न समुदायों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध मन में रखी पुरानी शिकायतों के उदाहरण हमारे सामने हैं, जैसे सन् 1947 में भारत के विभाजन के दौरान भड़की हिंसा से पैदा हुई शिकायते।

न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति अप्रकट शिकायतें और संघर्ष के कारणों को साफ-साफ व्यक्त करने और बातचीत द्वारा हल करने के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती हैं। इसलिए भारत और पाकिस्तान के बीच समस्याओं का हल करने के वर्तमान प्रयासों में प्रत्येक वर्ग के लोगों के बीच अधिक सम्पर्क को प्रोत्साहित करना भी शामिल है।

प्रश्न 3.
मार्टिन लूथर किंग के नागरिक अधिकार के क्षेत्र में योगदान की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर-

  1.  मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में रंगभेद तथा जाति-विभेद की नीति के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन प्रारम्भ किया। उसके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप बसों तथा भोजनालयों में काले लोगों के साथ किए जाने वाले भेदभाव को समाप्त किया गया।
  2.  उन्होंने काले लोगों के लिए सिविल अधिकार प्राप्त करने की दिशा में सराहनीय कार्य किया। उनके प्रयासों से सिविल अधिकारों को कानूनी अधिकार मान लिया गया तथा काले लोगों को मताधिकार प्राप्त हो गया। इसके लिए लूथर किंग को अपने जीवन का बलिदान देना पड़ा।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शान्तिवाद के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
‘शान्तिवाद’ विवादों को सुलझाने के हथियार के रूप में युद्ध अथवा हिंसा के बजाय शान्ति का उपदेश देता है। इसमें विचारों की अनेक छवियाँ सम्मिलित हैं। इसके क्षेत्र में कूटनीति को अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का समाधान करने में प्राथमिकता देने से लेकर किसी भी हालत में हिंसा और शक्ति के प्रयोग के पूर्ण निषेध तक आते हैं। शान्तिवाद सिद्धान्तों पर भी आधारित हो सकती है और व्यावहारिकता पर भी।

सैद्धान्तिक शान्तिवाद का जन्म इस विश्वास से होता है कि युद्ध सुविचारित घातक हथियार, हिंसा या किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती नैतिक रूप से गलत है। व्यावहारिक शान्तिवाद ऐसे किसी चरम सिद्धान्त का अनुसरण नहीं करता है। व्यावहारिक शान्तिवाद मानता है कि विवादों के समाधान में युद्ध से बेहतर तरीके भी हैं या फिर यह समझता है कि युद्ध पर लागत अधिक आती है, लाभ कम होते हैं। युद्ध से बचने के पक्षधर लोगों के लिए ‘श्वेत कपोत’ जैसे अनौपचारिक शब्दों का प्रयोग होता है। शब्द सुलह-समझौते के पक्षधरों की सौम्य प्रकृति की ओर इशारा करते हैं। कुछ लोग सुलह-समझौते के पक्षधरों को शान्तिवादी के वर्ग में नहीं रखते, क्योंकि वे कतिपय परिस्थितियों में युद्ध को औचित्यपूर्ण मान सकते हैं।

‘बाज’ या युद्ध-पिपासु लोग कपोत प्रकृति के विपरीत होते हैं। युद्ध का विरोध करने वाले कुछ शान्तिवादी सभी प्रकार की जोर-जबरदस्ती जैसे शारीरिक बल प्रयोग या सम्पत्ति की बरबादी के विरोधी नहीं होते। उदाहरणस्वरूप, असैन्यवादी साधारणतया हिंसा के बजाय आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की सैनिक संस्थाओं के विशेष रूप से विरोधी होते हैं। अन्य शान्तिवादी अंहिसा के सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं, क्योंकि वे केवल अहिंसक कार्यवाही के स्वीकार्य होने का विश्वास करते हैं।

प्रश्न 2.
शान्ति स्थापित करने में समकालीन चुनौतियाँ कौन-सी हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
वर्तमान विश्व में शक्तिशाली राष्ट्रों ने अपनी सम्प्रभुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन किया है और क्षेत्रीय सत्ता संरचना तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को भी अपनी प्राथमिकताओं और धारणाओं के आधार पर बदलना चाहा है। इसके लिए उन्होंने सीधी सैन्य कार्यवाही को भी सहारा लिया है और विदेशी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है। इस प्रकार के आचरण का प्रत्यक्ष उदाहरण अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका ताजा हस्तक्षेप है। इस प्रक्रिया से उपजे युद्ध में बहुत लोगों की जानें गईं।

आतंकवाद के उदय का एक कारण आक्रामक राष्ट्रों का स्वार्थपूर्ण आचरण भी रहा है। प्रायः आधुनिक हथियारों और उन्नत तकनीक का दक्ष और निर्मम प्रयोग करके आतंकवादी इन दिनों शान्ति के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। 11 सितम्बर, 2001 को आतंकवादियों द्वारा अमेरिका के न्यूयार्क स्थित विश्व व्यापार केन्द्र को ध्वस्त किया जाना इस अमंगलकारी वास्तविकता की उल्लेखनीय अभिव्यक्ति है। इन ताकतों द्वारा अति विध्वंसक जैविक, रासायनिक अथवा परमाण्विक हथियारों के प्रयोग की आशंका दहला देने वाली है।

वैश्विक समुदाय धौंस जमाने वाली ताकतों की लोलुपता और आतंकवादियों की गुरिल्ला युक्तियों को रोकने में असफल है। वह नस्ल संहार का मूक दर्शन बना रहता है। यह स्थिति रवांडा में दिखाई देती है। इस अफ्रीकी देश में सन् 1994 में लगभग 5 लाख तुत्सी लोगों को हुतू लोगों ने मार डाला। हत्याकाण्ड के आरम्भ होने के पूर्व गुप्त सूचना प्राप्त होने और इसके भड़कने पर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में घटना का विवरण आने के बावजूद कोई अन्तर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र ने रवांडा के खून-खराबे को रोकने के लिए शान्ति अभियान चलाने से मना कर दिया।

इसका आशय यह नहीं कि शान्ति एक चुका हुआ सिद्धान्त है। दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान और कोस्यरिका जैसे देशों ने सैन्यबल नहीं रखने का निर्णय लिया। विश्व के अनेक भागों में परमाण्विक हथियार से मुक्त क्षेत्र बने हैं, जहाँ आण्विक हथियारों को विकसित और तैनात करने पर एक अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त समझौते के अन्तर्गत पाबन्दी लगी है। आज इस तरह के छह क्षेत्र हैं जिसमें ऐसा हुआ है या इसकी प्रक्रिया चल रही है। इसका विस्तार दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी एशिया, अफ्रीका, दक्षिण प्रशान्त क्षेत्र और मंगोलिया तक है। तत्कालीन सोवियत संघ के सन् 1991 में विघटन से अति शक्तिशाली देशों के बीच सैनिक प्रतिद्वन्द्विता (विशेषकर परमाण्विक प्रतिद्वन्द्विता) पर पूर्णविराम लग गया और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए प्रमुख खतरा समाप्त हो गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संरचनात्मक हिंसा के विविध रूप कौन-से हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
संरचनात्मक हिंसा के विविध रूप निम्नलिखित हैं-

1. अस्पृश्यता- परम्परागत जाति व्यवस्था कुछ विशिष्ट समूह के लोगों को अस्पृश्य मानकर व्यवहार करती थी। स्वतन्त्र भारत के संविधान द्वारा गैर-कानूनी घोषित किए जाने तक अस्पृश्यता के प्रचलन ने उन्हें सामाजिक बहिष्कार और अत्यधिक वंचना का शिकार बना रखा था। भयावह रीति-रिवाजों के इन घावों को देश अभी तक सह रहा है। हालाँकि वर्ग आधारित समाज व्यवस्था अधिक लचीली दिखती है, लेकिन इसने भी काफी असमानती और उत्पीड़न को जन्म दिया है। विकासशील देशों की अधिकांश कार्यशील जनसंख्या असंगठित क्षेत्र से सम्बद्ध है, जिसमें पारिश्रमिक और काम की दशा बहुत खराब है।

2. स्त्री हिंसा- समाज में पितृसत्ता के आधार पर जिन सामाजिक संगठनों का निर्माण होता है, उनकी परिणति महिलाओं को व्यवस्थित रूप से अधीन बनाने और उनके साथ भेदभाव करने में होती है। इसकी अभिव्यक्ति कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियों को पर्याप्त पोषण और शिक्षा न देना, बाल-विवाह, पत्नी को पीटना, दहेज से जुड़े अपराध, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार, हत्या के रूप में होती है। भारत में निम्न लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर 933 स्त्रियाँ) पितृसत्ता विध्वंस का मर्मस्पर्शी सूचक है।

3. गुलामी का जीवन- उपनिवेशवादी विदेशी शासन के फलस्वरूप लोगों पर प्रत्यक्ष और दीर्घकाल के लिए गुलामी थोप दी गई थी। अब ऐसा होना लगभग असम्भव है। पर इजरायली प्रभुत्व के विरुद्ध जारी फिलिस्तीनी संघर्ष दिखाता है कि इसका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके अतिरिक्त, यूरोपीय उपनिवेशवादी देशों के पूर्ववर्ती उपनिवेशों को अभी भी बहुआयामी शोषण के उन प्रभावों से पूरी तरह उभरना शेष है, जिसे उन्होंने औपनिवेशिक काल में झेला।

4. रंगभेद और साम्प्रदायिकता- रंगभेद और साम्प्रदायिकता में एक सम्पूर्ण नस्लगत समूह अथवा समुदाय पर लांछन लगाना और उनका दमन करना सम्मिलित रहता है। हालाँकि मानवता को विभिन्न नस्लों के आधार पर विभाजित कर सकने की अवधारणा वैज्ञानिक रूप से अप्रमाणिक है लेकिन अनेक बार इसका उपयोग मानव विरोधी कुकृत्यों को उचित ठहराने में किया ही जाता है। सन् 1865 तक अमेरिका में अश्वेत लोगों को गुलाम बनाने की प्रथा; हिटलर के समय जर्मनी में यहूदियों का कत्लेआम तथा दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार की सन् 1992 तक अपनी बहुसंख्यक अश्वेत आबादी के साथ निम्न दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार करने वाली रंगभेद की नीति इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं। पश्चिमी देशों में नस्ली भेदभाव गोपनीय रूप से अभी भी जारी है। अब इसका प्रयोग प्राय: एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों के आप्रवासियों के विरुद्ध होता है। साम्प्रदायिकता को नस्लवाद को दक्षिण एशियाई प्रतिरूप स्वीकारा जा सकता है। जहाँ शिकार अल्पसंख्यक धार्मिक समूह हुआ करते हैं।

हिंसा का शिकार व्यक्ति जिन मनोवैज्ञानिक और भौतिक हानियों से गुजरता है ये हानियाँ उसके भीतर शिकायतें उत्पन्न करती हैं। ये शिकायतें पीढ़ियों तक बनी रहती हैं। ऐसे समूह कभी-कभी किसी घटना या टिप्पणी से भी उत्तेजित होकर संघर्षों के ताजा दौर की शुरूआत कर सकते हैं। दक्षिण एशिया में विभिन्न समुदायों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध लम्बे समय से मन में रखी पुरानी शिकायतों के उदाहरण हमारे सामने हैं; जैसे-सन् 1947 में भारत के विभाजन के दौरान भड़की हिंसा से उपजी शिकायतें आज भी लोगों में टीस पैदा करती हैं।

न्यायपूर्ण और टिकाऊ शान्ति अप्रकट शिकायतें और संघर्ष के कारणों को साफ-साफ प्रकट करने और बातचीत द्वारा हल करने के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती हैं। इसीलिए भारत और पाकिस्तान के बीच की समस्याओं का हल करने के वर्तमान प्रयासों में प्रत्येक वर्ग के लोगों
के बीच अधिक सम्पर्क को प्रोत्साहित करना भी सम्मिलित है।

प्रश्न 2.
शान्ति स्थापित करने के विभिन्न तरीकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
शान्ति स्थापित करने और बनाए रखने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई गई हैं। इन रणनीतियों को आकार देने के लिए तीन तरीकों ने सहायता दी है जो निम्नलिखित हैं-

1. प्रथम तरीका राष्ट्रों को केन्द्रीय स्थान प्रदान करता है, उनकी सम्प्रभुता का सम्मान करता है। उनके बीच प्रतिद्वन्द्विता को जीवन्त सत्य मानता है। उसकी प्रमुख प्रतिद्वन्द्विता के उपयुक्त प्रबन्धन तथा संघर्ष की आशंका का शमन सत्ता-सन्तुलन की पारस्परिक व्यवस्था के माध्यम से करने की होती है। कहा जाता है कि वैसा एक सन्तुलन 19वीं सदी में प्रचलित था, जब प्रमुख यूरोपीय देशों ने सम्भावित आक्रमण को रोकने और बड़े पैमाने पर युद्ध से बचने के लिए अपने सत्ता संघर्षों में गठबन्धन बनाते हुए तालमेल किया।

2. दूसरा तरीका भी राष्ट्रों की गहराई तक जमी आपसी प्रतिद्वन्द्विता की प्रकृति को स्वीकार करता है, लेकिन इसका जोर सकारात्मक उपस्थिति और परस्पर निर्भरता की सम्भावनाओं पर है। यह विभिन्न देशों के बीच विकासमान सामाजिक आर्थिक सहयोग को रेखांकित करता है। अपेक्षा रहती है कि वैसे सहयोग राष्ट्र की सम्प्रभुता को नरम करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय समझदारी को प्रोत्साहित करेंगे। परिणामस्वरूप वैश्विक संघर्ष कम होंगे, जिससे शान्ति की अच्छी सम्भावनाएँ। बनेंगी। इस पद्धति के पक्षकारों द्वारा अक्सर दिया जाने वाला एक उदाहरण द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् के यूरोप का है, जो आर्थिक एकीकरण से राजनीतिक एकीकरण की ओर बढ़ता गया है।

3. तीसरी पद्धति राष्ट्र आधारित व्यवस्था को मानव इतिहास की समाप्तप्राय अवस्था स्वीकारती है। यह अधिराष्ट्रीय व्यवस्था को मनोचित्र बनाती है और वैश्विक समुदाय के अभ्युदय को शान्ति की विश्वसनीय गारण्टी मानती है। वैसे समुदाय के बीज राष्ट्रों की सीमाओं के आर-पार बढ़ती आपसी अन्त:क्रियाओं और संश्रयों में दिखते हैं जिसमें बहुराष्ट्रीय निगम और जनान्दोलन जैसे विविध गैर-सरकारी कर्ता सम्मिलित हैं। इस तरीके के प्रस्तावक और समर्थक तर्क देते हैं कि वैश्वीकरण की चल रही प्रक्रिया राष्ट्रों को पहले से ही घट गई प्रधानता और सम्प्रभुता को और अधिक क्षीण कर रही है, जिसके फलस्वरूप विश्व-शान्ति स्थापित होने की परिस्थितियाँ बन रही हैं।

यह कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र तीनों की पद्धतियों के प्रमुख तत्त्वों को साकार कर सकता है। सुरक्षा परिषद्, जो स्थायी सदस्यता और पाँच प्रमुख राष्ट्रों को निषेधाधिकार (अन्य सदस्यों द्वारा समर्थित प्रस्ताव को भी गिरा देने का अधिकार) देता है, प्रचलित अन्तर्राष्ट्रीय श्रेणीबद्धता को ही व्यक्त करता है। आर्थिक-सामाजिक परिषद् अनेक क्षेत्रों में राष्ट्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करता है। मानवाधिकार आयोग अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों को आकार देना
और लागू करना चाहता है।

प्रश्न 3.
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा बनाए रखने के लिए शान्तिपूर्ण समाधान की प्रक्रियाओं की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
या
“संयुक्त राष्ट्र संघ का मूल उद्देश्य चार्टर के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखना है।” विवेचना कीजिए।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना इस दृष्टि से की गई थी कि वह विश्व में शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखेगा। चार्टर के अन्तर्गत यह दायित्व सुरक्षा परिषद् को सौंपा गया और विशेष परिस्थिति में महासभा भी इस कार्य में अपना योगदान दे सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य चार्टर के अनुच्छेद 2 के अनुसार इस बात के लिए वचनबद्ध हैं कि वे वर्तमान चार्टर के अनुसार सुरक्षा परिषद् के सभी निर्णयों को स्वीकार करेंगे तथा उनका पालन करेंगे। चार्टर के अध्याय 6 तथा 7 में उन प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है, जिसके द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के प्रयास किए जाएँगे। चार्टर की वर्तमान व्यवस्था के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएँ प्रयोग में लाई जाती हैं।

शान्तिपूर्ण समाधान की प्रक्रियाएँ

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अनुच्छेद 33 से 38 तक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान की प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है। विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान के लिए अनुच्छेद 33 में जो उपाय बताए गए हैं, वे सभी यह स्पष्ट करते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सभी विवादों की प्रकृति समान नहीं । हो सकती और न ही किसी एक उपाय द्वारा सभी विवादों का समाधान सम्भव है। पिछले वर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष प्रस्तुत विवादों के तीन रूप रहे हैं-
1. तथ्यमूलक विवाद- इन विवादों में एक पक्ष दूसरे पक्ष पर अनुचित कार्यवाही करने का दोष लगाते हैं। उदाहरणार्थ-1960 में रूस द्वारा अमेरिका के R.B.-47 विमान को मार गिराना तथ्यमूलक विवाद था।
2. कानून सम्बन्धी विवाद- इन विवादों में वैधानिक अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रश्न निहित होते हैं। आयरलैण्ड तथा ब्रिटेन का विवाद कानून संबंधी विवाद था।
3. नीति संबंधी विवाद- इस प्रकार के विवाद वे होते हैं जिनमें विवादी पक्षों की नीतियों से संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। बर्लिन की स्थिति संबंधी समस्या नीति संबंधी विवाद था जिसमें तत्कालीन सोवियत संघ तथा मित्र राष्ट्रों की नीतियों में टकराहट थी।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तथा संयुक्त राष्ट्र के विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं-

1. वार्ता- वार्ता का साधन कूटनीतिक माना जाता है। विवादी पक्षों के बीच वार्ता या तो शीर्ष स्तर | पर सीधे राज्याध्यक्षों के बीच होती है या उनके द्वारा नियुक्त अभिकर्ताओं द्वारा। यह वार्ता सुविधानुसार सम्पन्न होती है।

2. जाँच- अनुच्छेद 34 तथा 36 के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि सुरक्षा परिषद् किसी ऐसे विवाद या स्थिति की जाँच-पड़ताल कर सकती है जो अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष का रूप धारण कर सकता हो या जिससे दूसरा गंभीर विवाद उठ खड़ा होने की आशंका हो।

3. सौमनस्य या संराधन- विवादों के समाधान का एक प्रभावशाली साधन सौमनस्य है। इसमें विभिन्न उपायों का प्रयोग किया जाता है। इन उपायों को तीसरा पक्ष दो या दो से अधिक राज्यों के विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निर्णीत करने के लिए अपनाते हैं। इस दृष्टि से संराधन की प्रक्रिया में तथ्यों की जाँच, मध्यस्थता तथा वाद-विवाद के लिए प्रस्ताव का प्रेक्षण किया जाता है।

4. वाद-विवाद- सुरक्षा परिषद् या महासभा किसी भी प्रकार की सिफारिश करने से पहले विवादी पक्षों को लिखित या मौखिक रूप से अपने दावे प्रस्तुत करने के लिए भी आमंत्रित करती है। वहाँ वे अपनी शिकायतों को निष्पक्ष रूप में रखते हैं और द्विपक्षीय कूटनीति के माध्यम से ऐसी स्थिति में पहुँच सकते हैं जहाँ विवाद के समाधान के लिए कोई समझौता हो सके।

5. सत्सेवा तथा मध्यस्थता- जब कभी कोई विवाद वार्ता या अन्य किसी तरीके से सुलझाए नहीं जा सकते, तब तीसरा मित्र राज्य अपनी सत्सेवा या मध्यस्थता द्वारा मतभेदों को मैत्रीपूर्ण ढंग से दूर करने में सहायता कर सकता है। यह दशा उस समय उत्पन्न होती है जब विवाद में उलझे पक्ष स्वार्थान्ध भाव का परिचय देते हैं। तीसरा राज्य अपने प्रभाव द्वारा सत्सेवा के इस कार्य का सम्पादन करता है तथा दोनों पक्षों के बीच शांतिपूर्ण समझौता करा देता है।

6. न्यायिक समाधान- विवादों को न्यायिक समाधान अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के माध्यम से होता है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णयों की मान्यता के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अनुच्छेद 94 में यह स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि “संघ का प्रत्येक सदस्य प्रतिज्ञा करता है कि वह किसी मामले में विवादी होने पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय को मानेगा।” संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य अपने आप ही अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की संविधि के सदस्य बन जाते हैं। इसके लिए प्रत्येक मामले में महासभा सुरक्षा परिषद् की संस्तुति पर आवश्यक शर्तों का , निधारण करती है। यद्यपि न्यायालय का आवश्यक तथा सार्वभौम क्षेत्राधिकारी नहीं है तथापि इसके निर्णय उन पक्षों पर बाध्यकारी होते हैं जो इसके न्यायाधिकरण को स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं।

7. पंच निर्णय- साधारण रूप से वार्ता, सौमनस्य, मध्यस्थता, जाँच आदि उपाय निर्णयेत्तर कहलाते हैं, क्योंकि विवादी पक्ष इस बात के लिए बाध्य नहीं होते कि इन उपायों द्वारा दिए गए। सुझावों या निर्णयों को स्वीकार करें। इन्हें प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ अन्य उपाय भी किए जाते हैं जिनके निर्णयों को दोनों पक्षों द्वारा मानना आवश्यक होता है। ये निर्णयात्मक उपाय पंच निर्णय तथा न्यायिक निर्णय कहलाते हैं।

8. मध्यस्थ या प्रतिनिधि- कुछ विवाद ऐसे होते हैं जिनके समाधान में सुरक्षा परिषद् महासभा या आयोग की अपेक्षा एक अकेला व्यक्ति, मध्यस्थ या प्रतिनिधि के रूप में अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। सुरक्षा परिषद्, महासभा के सभापतियों तथा महासचिव ने इस दृष्टि से अनेक अवसरों पर प्रभावशाली भूमिका निभाई है। किसी तटस्थ स्थान पर अथवा विपक्षी दलों की राजधानियों में या विवाद-स्थल पर संयुक्त राष्ट्रीय मध्यस्थ या प्रतिनिधि ने विवाद के समाधान या मतभेदों को समाप्त करने की दिशा में अपनी महती उपयोगिता सिद्ध की है।

9. अवरोधक कूटनीति- अवरोधक कूटनीति का उपाय शांतिपूर्ण समाधान का रूपक है जिसका उद्देश्य विवाद में तनाव को कम करना तथा स्थिति को बिगड़ने से बचाने का होता है। वर्तमान में महासभा में निर्गुट राष्ट्र शांति स्थापित करने में जो नई भूमिका निभा रहे हैं तथा शीतयुद्ध के क्षेत्र को सीमित करते जा रहे हैं, वे अवरोधक कूटनीति की ही विशेषताएँ हैं। इस प्रकार अपने सीमित साधनों तथा परिस्थितियों के अंतर्गत तथा राष्ट्रों के प्रभुसत्ता सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अनेक उल्लेखनीय प्रयास किए हैं जिनमें से बहुतों में उसको सफलता प्राप्त हुई तथा महाशक्तियों के अवरोध:के कारण अनेक बार उसे विफल भी होना पड़ा है।

प्रश्न 4.
अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की जाने वाली बाध्यकारी कार्यवाही की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर-
बाध्यकारी कार्यवाही
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अध्याय 7 में यह व्यवस्था की गई है कि यदि विश्व-शांति तथा सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न हो या शांति भंग से अथवा विश्व के किसी भी क्षेत्र में सशस्त्र आक्रमण होने की स्थिति उत्पन्न हो या हो गई हो तो संयुक्त राष्ट्र संघ शांति स्थापनार्थ बल प्रयोग कर सकता है। वह प्रतिरोधात्मक उपायों का आश्रय भी ले सकता है। यह बल प्रयोग संघ दो प्रकार से करता है-

  1.  जिसमें सशस्त्र सेना के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती एवं
  2.  जिसमें सशस्त्र सैन्य बल का प्रयोग आवश्यक हो जाता है।

अनुच्छेद 39 के अनुसार सुरक्षा परिषद् ही यह निर्णय करती है कि किन कार्यों द्वारा शांति भंग की दशा में आक्रमण की संक्रिया की जा सकती है। इस अनुच्छेद के अनुसार परिषद् सिफारिश तथा निर्णय दोनों प्रकार के कार्य करती है। अनुच्छेद 40 में यह व्यवस्था है कि किसी स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए सुरक्षा परिषद् अपनी सिफारिशें करने अथवा किसी कार्यवाही का निश्चय करने से पूर्व विवादी पक्षों से ऐसे अस्थायी कदम उठाने की माँग करेगी, जिन्हें वह आवश्यक समझती हो। इन अस्थायी कार्यों से विवादी पक्ष के अधिकारों, दावों या उनकी हैसियत को किसी प्रकार की हानि नहीं होगी। यदि कोई पक्ष इस प्रकार के अस्थायी कदम नहीं उठाता है तो सुरक्षा परिषद् इसकी ओर भी ध्यान रखेगी।

बल प्रयोग के दोनों उपाय सुरक्षा परिषद् के निर्णय के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्यों को मानने पड़ते हैं। इसका संचालन भी सुरक्षा परिषद् ही करती है। चार्टर में कहीं ‘आक्रमण’, ‘शांति भंग’, ‘शांति का संकट’, ‘घरेलू मामला’ आदि वाक्यों को स्पष्ट नहीं किया गया है। यदि एक राष्ट्र की दृष्टि । में कोई आक्रमण होता है तो दूसरे राष्ट्र की दृष्टि में वही ‘घरेलू मामला हो सकता है। इस प्रकार के सभी मामलों के निर्णय के लिए परिषद् के 5 स्थायी सदस्यों के मतों सहित कुल 9 सदस्यों के स्वीकारात्मक मत आवश्यक होते हैं। परन्तु राजनीतिक गुटबन्दी के कारण इस प्रकार का निर्णय लेना कठिन कार्य हो जाता है। यही कारण है कि सुरक्षा परिषद् ऐसे मामलों में तत्क्षण कोई निर्णय नहीं ले पाती है।

एक बार यह निश्चित हो जाने पर कि किसी देश के लिए युद्ध जैसी परिस्थितियाँ या किसी देश पर हुआ आक्रमण विश्व शांति के लिए संकट है तो इस स्थिति में सुरक्षा परिषद् तुरंत कार्यवाही कर सकती है। इस प्रकार की कार्यवाही में सैनिक तथा असैनिक दोनों प्रकार की अनुशास्तियाँ निहित हैं। और संघ के सभी सदस्य परिषद् के निर्णय पर अमल करने के लिए, संघ के विधानानुसार बाध्य हैं। जब विवाद में,सशस्त्र संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तो संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न हो जाती है। सिद्धांततः चार्टर के अनुच्छेद 7 के अनुसार विवादी पक्षों पर अनुशास्तियाँ स्थापित करने की व्यवस्था है, तथापि संयुक्त राष्ट्र संघ सामान्यतया दमनकारी या प्रतिरोध के उपायों से दूर रहने का प्रयत्न करता है तथा कूटनीतिक, राजनीतिक या वैधानिक उपायों से समस्या को सुलझाने का प्रयास करता है। सशस्त्र संघर्ष को विराम देने के लिए वैसे तो चार्टर में स्पष्टतः युद्ध विराम आदेश के विषय में कुछ नहीं कहा गया है, तथापि अनुच्छेद 40 के बारे में विस्तार से लिखा गया है।

अनेक मामलों में विवादी पक्ष युद्ध विराम के लिए तैयार हो जाते हैं। परन्तु इस बात की भी प्रबल सम्भावना रहती है कि विवादी राष्ट्रों द्वारा सुरक्षा के आदेशों या सिफारिशों को ठुकरा दिया जाए। इण्डोनेशिया और डचों, यहूदियों और अरबों, साइप्रस के यूनानियों तथा तुर्को और दो अवसरों पर भारतीयों तथा पाकिस्तानियों के बीच युद्ध रोकने में सुरक्षा परिषद् की युद्ध विराम की आज्ञाएँ प्रभावी मानी गईं।

अनुच्छेद 41 के अंतर्गत यह व्यवस्था है कि सुरक्षा परिषद् अपने निर्णयों पर अमल करने के लिए कोई भी कार्यवाही कर सकती है, जिसमें सशस्त्र सेना का प्रयोग न हो। यह संघ-सदस्यों में इस प्रकार की कार्यवाही करने की माँग कर सकती है। इन कार्यवाहियों के अनुसार आर्थिक संबंध पूर्णरूपेण या आंशिक रूप से समाप्त किए जा सकते हैं। समुद्र, वायु, डाक-तार, रेडियो और यातायात के अन्य साधनों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है और कूटनीतिक संबंधों को समाप्त किया जा सकता है।

अनुच्छेद 42 में चर्चा की गई है कि शांति तथा सुरक्षा के लिए की जाने वाली कार्यवाहियाँ यदि अपर्याप्त सिद्ध हो गई हों तो जल, थल और वायु सेनाओं द्वारा आवश्यक कार्यवाही की जा सकती है। इस कार्यवाही में विरोध प्रदर्शन माकेबन्दी तथा संघ के सदस्य राष्ट्रों की जल, थल तथा वायु सेनाओं द्वारा की जाने वाली कोई भी कार्यवाही सम्मिलित है।

अनुच्छेद 43 के अनुसार परिषद् इस बात को निश्चित करती है कि उपयुक्त कार्यवाही संघ के कुछ सदस्यों द्वारा की जाए या सभी सदस्यों द्वारा। जो कार्य किया जाए वह स्वतन्त्र रूप से हो या प्रत्यक्ष हो या फिर उसे क्रियान्वित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहायता ली जाए। सदस्य राष्ट्रों को यह कर्तव्य है कि वे सुरक्षा परिषद् के माँगने पर तथा विशेष समझौते के अनुसार अपनी सशस्त्र सेनाएँ, सहायता तथा अन्य सुविधा उपलब्ध कराएँगे। संघ की व्यवस्था के अनुसार जिस प्रकार के समझौतों द्वारा यह निश्चिय किया जाना था कि संघ का प्रत्येक सदस्य कितनी सहायता देगा, सेनाओं की उपलब्धता क्या होगी, ये अविलम्ब कार्यवाही करने के लिए कैसे तैयार होंगी तथा प्रत्येक सदस्य किस प्रकार अन्य सुविधाएँ प्रदान करेगा-परन्तु ऐसे समझौते अभी तक हुए नहीं हैं। उस दशा में अनुच्छेद में यह कहा गया है-“जब सुरक्षा परिषद् बल प्रयोग करने का निश्चय कर ले तो किसी ऐसे सदस्य से, जिसे इसमें प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है, सशस्त्र सेनाएँ जुटाने के लिए कहने से पूर्व वह उस देश को, यदि संबंधित देश चाहे तो उसकी सशस्त्र सेनाओं के प्रयोग से संबंधित निर्णयों में भाग लेने को आमंत्रित करेगी।”

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism (धर्मनिरपेक्षता)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी बातें धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत हैं? कारण सहित बताइए।
(क) किसी धार्मिक समूह पर दूसरे धार्मिक समूह का वर्चस्व न होना।
(ख) किसी धर्म को राज्य के धर्म के रूप में मान्यता देना।
(ग) सभी धर्मों को राज्य का समान आश्रय होना।
(घ) विद्यालयों में अनिवार्य प्रार्थना होना।
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना।
(च) सरकार द्वारा धार्मिक संस्थाओं की प्रबन्धन समितियों की नियुक्ति करना।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेप।
उत्तर-
(ङ) किसी अल्पसंख्यक समुदाय को अपने पृथक् शैक्षिक संस्थान बनाने की अनुमति होना, धर्मनिरपेक्षता के विचार से संगत है। क्योंकि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए सरकार सहायता कर रही है। यह कार्य भारतीय संविधान द्वारा भी मान्यता प्राप्त है।
(छ) किसी मन्दिर में दलितों के प्रवेश के निषेध को रोकने के लिए सरकार का हस्तक्षेत्र उचित है, क्योंकि सरकार का यह व्यवहार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को प्रकट करता है।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी और भारतीय मॉडल की कुछ विशेषताओं का आपस में घालमेल हो गया है। उन्हें अलग करें और एक नई सूची बनाएँ।
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 8 Secularism 1

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? क्या इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से की जी सकती है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि उस राज्य में विभिन्न धर्मों तथा मत मतान्तरों को मानने वाले रहते हैं। लेकिन राज्य का अपना कोई विशिष्ट धर्म नहीं होगा तथा वह धार्मिक कार्यों में भाग भी नहीं लेगा और किसी के धर्म में रुकावट भी उत्पन्न नहीं करेगा। इसकी बराबरी धार्मिक सहनशीलता से नहीं की जा सकती है। राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा सुदृढ़ता के लिए धर्मनिरपेक्षता को ही अपनाना उचित है। सभी नागरिकों से एकसमान न्याय करने के उद्देश्य से भी धर्मनिरपेक्षता की नीति तर्क संगत है।

प्रश्न 4.
क्या आप नीचे दिए गए कथनों से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच
असमानता के खिलाफ है।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
उत्तर-
(क) धर्मनिरपेक्षता हमें धार्मिक पहचान बनाए रखने की अनुमति नहीं देती है। यह कथन गलत है धर्मनिरपेक्षता में हम अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं। चूंकि राज्य धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता है।
(ख) धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच असमानता के खिलाफ है। यह कथन सही हैं। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ही यह है कि धार्मिक समुदायों में हस्तक्षेप न किया जाए। सभी को समान दृष्टि से देखा जाए।
(ग) धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। यह कथन गलत है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप से भिन्न है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता भारतीय विचारकों की देन है।

प्रश्न 5.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन उससे अधिक किन्ही बातों पर है। इस कथन को समझाइए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता केवल धर्म और राज्य के बीच सम्बन्धविच्छेद पर बल देती है। अन्तरधार्मिक समानता भारतीय संकल्पना के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ इसकी प्रकृति को स्पष्ट करती हैं। सर्वप्रथम तो भारतीय धर्मनिरपेक्षता गहरी धार्मिक विविधता के सन्दर्भ में जन्मी थी। यह विविधता पश्चिमी आधुनिक विचारों और राष्ट्रवाद के आगमन से पूर्व की चीज है। भारत में पूर्व से ही अन्तर धार्मिक सहिष्णुता’ की संस्कृति मौजूद थी। हमें याद रखना। चाहिए कि ‘सहिष्णुता’ धार्मिक वर्चस्व की विरोधी नहीं है। सम्भव है सहिष्णुता में हर किसी को कुछ मौका मिल जाए, लेकिन ऐसी स्वतन्त्रता प्रायः सीमित होती है। इसके अतिरिक्त सहिष्णुता हम में उन लोगों को बर्दाश्त करने की क्षमता उत्पन्न करती है जिन्हें हम पसन्द नहीं करते हैं। यह उस समाज के लिए तो विशिष्ट गुण है जो किसी बड़े गृहयुद्ध से उभर रहा हो मगर शान्ति के समय में नहीं जब लोग समान मान-मर्यादा के लिए संघर्षरत हों।

पश्चिमी आधुनिकता के प्रभावस्वरूप भारतीय चिन्तन में समानता की अवधारणा उभरकर सामने आई। इसने हमें समुदाय में समानता पर जोर देने की दिशा में अग्रसर किया। इसने भारतीय समाज में मौजूद श्रेणीबद्धता को हटाने के लिए अन्तर सामुदायिक समानता के विचार को भी उद्घाटित किया। इस प्रकार भारतीय समाज में पूर्व से ही मौजूद धार्मिक विविधता और पश्चिम से आए विचारों के बीच अन्त:क्रिया प्रारम्भ हुई जिसके परिणामस्वरूप भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने विशिष्ट रूप धारण कर लिया।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने अन्त:धार्मिक और अन्तरधार्मिक वर्चस्व पर एक साथ ध्यान केन्द्रित किया। इसने हिन्दुओं के अन्दर महिलाओं के उत्पीड़ने और भारतीय मुसलमानों अथवा ईसाइयों के अन्दर महिलाओं के प्रति भेदभाव तथा बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के अधिकारों पर उत्पन्न किए जा सकने वाले खतरों का समान रूप से विरोध किया। इस प्रकार, यह मुख्य धारा की पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से पहली महत्त्वपूर्ण भिन्नता है। इसी से सम्बद्ध दूसरी भिन्नता यह है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सम्बन्ध व्यक्तियों की धार्मिक स्वतन्त्रता से ही नहीं, अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक स्वतन्त्रता से भी है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसन्द का धर्म मानने का अधिकार है।

इसी प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी अपनी स्वयं की संस्कृति और शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है। एक अन्य भिन्नता भी है, चूंकि धर्मनिरपेक्ष राज्य को अन्तरधार्मिक वर्चस्व के मसले पर भी समान रूप से चिन्तित रहना है; अतः भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की जगह भी है और अनुकूलता भी। अन्त में, धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व अथवा सहिष्णुता से बहुत आगे तक जाता है। इस मुहावरे का आशय विभिन्न धर्मों के प्रति सम्मान की भावना है, तो इसमें एक अस्पष्टता है, जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता विविध धर्मों में राज्य सत्ता के सैद्धान्तिक हस्तक्षेप की अनुमति प्रदान करती है। ऐसा हस्तक्षेप प्रत्येक धर्म के कुछ विशिष्ट पहलुओं के प्रति असम्मान प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 6.
सैद्धान्तिक दूरी क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर-
भारतीय संविधान घोषणा करता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में स्वतन्त्रता और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है। मगर वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप अभी दिखाई देते हैं। इसके अग्रलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं-

  1. सन् 1984 के दंगों में दिल्ली और देश के शेष भागों में लगभग 4,000 सिखों को मार दिया गया। पीड़ितों के परिजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है।
  2. हजारों कश्मीरी पण्डितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दर्शकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
  3. सन् 2002 में गुजरात में लगभग 2,000 मुसलमान मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए अनेक सदस्य अभी भी अपने गाँव वापस नहीं जा सके हैं, जहाँ से वे उजाड़ दिए गए थे।

उपर्युक्त प्रस्तुत उदाहरणों में किसी-न-किसी रूप में भेदभाव दिखाई देता है। प्रत्येक मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया और उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें सताया गया। दूसरों शब्दों में नागरिकों के एक समूह को बुनियादी स्वतन्त्रता से वंचित किया गया। यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्त उदाहरण अन्तरधार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न के प्रकरण हैं। धर्मनिरपेक्षता को सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धान्त समझा जाना चाहिए जो अन्तर धार्मिक वर्चस्व का विरोध करता है। हालाँकि यह धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से केवल एक है।
धर्मनिरपेक्षता का इतना ही महत्त्वपूर्ण दूसरा पहलू अन्त:धार्मिक वर्चस्व अर्थात् धर्म में । छिपे वर्चस्व का विरोध करना है। यही सैद्धान्तिक दूरी है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है?
(क) पाकिस्तान
ख) भूटान
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर-
(ग) भारत।

प्रश्न 2.
जन समुदाय के लिए अफीम किसे माना गया है?
(क) धर्म को
(ख) राष्ट्र को
(ग) साम्प्रदायिकता को
(घ) प्रशासन को
उत्तर-
(क) धर्म को।

प्रश्न 3.
मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने धर्मनिरपेक्षता का मॉडल किस राज्य में प्रस्तुत किया?
(क) तुर्की में
(ख) फ्रांस में
(ग) चीन में
(घ) भारत में
उत्तर-
(क) तुर्की में।

प्रश्न 4.
भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार संविधान के किस अनुच्छेद में दिया गया है?
(क) अनुच्छेद 25-28
(ख) अनुच्छेद 26-27
(ग) अनुच्छेद 31-32
(घ) अनुच्छेद 30-35
उत्तर-
(क) अनुच्छेद 25-28.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘धर्मनिरपेक्ष शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है-‘संसार’ अथवा ‘युग’।

प्रश्न 2.
धर्मनिरपेक्ष की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
जॉर्ज ऑस्लर के अनुसार, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
एच० बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही यह अधर्मी राज्य है और न ही धर्म-विरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”

प्रश्न 4.
धर्मनिरपेक्षता किस प्रकार की अवधारणा है?
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है।

प्रश्न 5.
धर्मनिरपेक्ष राज्य के कोई दो गुण लिखिए।
उत्तर-
(i) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्रीय भावनाओं को प्रोत्साहन प्राप्त होता है।
(ii) धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में साम्प्रदायिकता की भावना को कम किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
लीसवीं सदी के प्रथमार्द्ध में तुर्की में धर्मनिरपेक्षता अमल में आई। यह धर्मनिरपेक्षता संगठित धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाने के स्थान पर धर्म में सक्रिय हस्तक्षेप के माध्यम से उसके दमन की पक्षधर थी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता प्रस्तुत की और उसे प्रयोग में भी लाए।
अतातुर्क प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् सत्ता में आए। वे तुर्की के सार्वजनिक जीवन में खिलाफत को समाप्त कर देने के लिए कटिबद्ध थे। वे मानते थे कि परम्परागत सोच-विचार और अभिव्यक्तियों से नाता तोड़े बगैर तुर्की को उसकी दु:खद स्थिति से नहीं उभारा जा सकता। उन्होंने तुर्की को आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए आक्रामक ढंग से कदम बढ़ाए। उन्होंने स्वयं अपना नाम मुस्तफा कमाल पाशा से बदलकर अतातुर्क कर लिया। (अतातुर्क का अर्थ होता है तुर्को का पिता)। हैट कानून के माध्यम से मुसलमानों द्वारा पहनी जाने वाली परम्परागत फैज टोपी को प्रतिबन्धित कर दिया। स्त्रियों-पुरुषों के लिए पश्चिमी पोशाकों को बढ़ावा दिया गया। तुर्की पंचांग की जगह पश्चिमी (ग्रिगोरियन) पंचांग लाया गया। 1928 ई० में नई तुर्की वर्णमाला को संशोधित लैटिन रूप से अपनाया गया।

प्रश्न 2.
वास्तविक धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर-
सचमुच धर्मनिरपेक्ष होने के लिए राज्य को न केवल धर्मतान्त्रिक होने से मना करना होगा बल्कि उसे किसी भी धर्म के साथ किसी भी तरह के औपचारिक कानूनी गठजोड़ से दूरी भी रखनी होगी। धर्म और राज्यसत्ता के बीच सम्बन्ध-विच्छेद धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता के लिए आवश्यक है, मगर केवल यही पर्याप्त नहीं है। धर्मनिरपेक्ष राज्य को ऐसे सिद्धान्तों और लक्ष्यों के लिए अवश्य प्रतिबद्ध होना चाहिए जो अंशत: ही सही, गैर-धार्मिक स्रोतों से निकलते हों। ऐसे लक्ष्यों में शान्ति, धार्मिक स्वतन्त्रता, धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और वर्जना से आजादी और साथ ही अन्तर-धार्मिक व अन्त:धार्मिक समानता सम्मिलित रहनी चाहिए।

प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
समाजवादी पन्थनिरपेक्ष राज्य।
उत्तर-
पन्थनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है तथा राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने को अधिकार होगा। राज्य, धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा तथा धार्मिक मामलों में विवेकपूर्ण निर्णय लेगा। इसके अतिरिक्त, राज्य के द्वारा सभी व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को सुनिश्चित एवं सुरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। राज्य धार्मिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा, वरन् धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक समभाव की नीति को प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा। धर्म के सम्बन्ध में राज्य सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करेगा। इस प्रकार की पन्थ-निरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का पालन करने वाले शासन को पन्थनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में धर्मनिरपेक्षता को अपनाना क्यों आवश्यक था?
उत्तर-
हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल लोकतान्त्रिक देश है। ऐसे देश में राज्य को धर्म-निरपेक्ष बनाना सर्वथा आवश्यक है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता मूल रूप से एक लोकतान्त्रिक अवधारणा है। यदि हम इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र सहगामी हैं। जब कभी धर्म की आड़ में राजाओं ने जनता पर अत्याचार किए तब जनता ने उनके शासन के विरुद्ध विद्रोह करना प्रारम्भ किया। भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध 1857 ई० की क्रान्ति को प्रमुख कारण यह था कि ब्रिटिश शासकों ने हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही धर्मों के मानने वालों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया था। कालान्तर में धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र दोनों को मान्यता मिली। इसके अतिरिक्त, एक लोकतान्त्रिक देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना इसलिए भी उचित होती है कि स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातत्व एवं सहिष्णुता के जिन आदर्शों की स्थापना लोकतन्त्र द्वारा होती है, वे धर्मनिरपेक्षता के भी आदर्श होते हैं।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मनिरपेक्ष से क्या अभिप्राय है? धर्मनिरपेक्ष राज्य की परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द अंग्रेजी भाषा के सेक्युलर’ (Secular) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Secular शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सरक्युलम’ (Sarculum) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है–‘संसार’ अथवा युग’। इस प्रकार शब्द-व्युत्पत्ति के आधार पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द से अभिप्राय सांसारिक, लौकिक अथवा ऐतिहासिक से है। दूसरे शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष धार्मिक अथवा पारलौकिक का प्रतिलोम है।” धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
जॉर्ज ऑस्लर के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष का अर्थ इस विश्व या वर्तमान जीवन से सम्बन्धित है, जो धार्मिक या द्वैतवादी विचारों से बँधा हुआ न हो।”
एच०बी० कामथ के अनुसार, “एक धर्मनिरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर-रहित है, न ही यह अधर्मी राज्य है। और न ही धर्मविरोधी। धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का अर्थ यह है कि इसमें ईश्वर पर आधारित धर्म के अस्तित्व को नहीं माना जाता।”
डोनाल्ड स्मिथ के शब्दों में, “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है, जिसके अन्तर्गत धर्म-विषयक व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्वतन्त्रता सुरक्षित रहती है; जो व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय धर्म को बीच में नहीं लाता; जो संवैधानिक रूप से किसी धर्म से सम्बन्धित नहीं है और न किसी धर्म की उन्नति का प्रयास करता है तथा न ही किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप करता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य से अभिप्राय एक ऐसे राज्य से है जिसका अपना कोई धर्म नहीं होता और जो धर्म के आधार पर व्यक्तियों में कोई भेदभाव नहीं करता है। इसका अर्थ एक धर्म-विरोधी, अधर्मी या ईश्वररहित राज्य से नहीं है, वरन् एक ऐसे राज्य से है जो धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ रहता है क्योंकि यह धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत वस्तु मानता है।

प्रश्न 2.
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप क्या है?
उत्तर-
भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य का रूप
भारत संविधान से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संविधान निर्माताओं ने भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को स्थापित करने का पूर्ण प्रयास किया है। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य के दो आधार हैं

प्रथम, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न केवल इस बात का उल्लेख किया गया है कि यहाँ सभी नागरिकों को विचार-अभिव्यक्ति, विश्वास व धर्म की उपासना की स्वतन्त्रता प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।” वरन् इसमें 42वें संशोधन द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जोड़कर स्थिति और भी स्पष्ट कर दी गई है।

द्वितीय, संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना का दूसरा आधार भारतीय नागरिकों को मूल अधिकार के रूप में, धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान किया जाना है। संविधान के 25वें से 28वें अनुच्छेद नागरिकों की धार्मिक स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का उल्लेख करते हैं।

भारत में धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को न केवल सिद्धान्त में वरन् व्यवहार में भी अपनाया गया है। भारत में धार्मिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता, वरन् यहाँ सभी धर्मों को समान रूप से मान्यता दी गई है। उदाहरण के लिए-1956 ई० में दिल्ली में आयोजित ‘बौद्ध धर्म सम्मेलन’ तथा 1964 ई० में मुम्बई में आयोजित ईसाई धर्म सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता और प्रशासनिक सहयोग भी दिया। इसके अतिरिक्त, भारत में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त का लागू किया जाना इस बात से भी सिद्ध होता है कि यहाँ धर्मों के प्रतिभाशाली व्यक्ति शासन में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना को न केवल भारत के लिए उचित समझा जाता है, वरन् भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श को लागू भी किया गया है।

प्रश्न 3.
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क पूर्ण उत्तरदीजिए।
उत्तर-
धर्मनिरपेक्षता वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है। अनुभवजन्य रूप में यह पूर्णतः असत्य भी नहीं है। प्रथमतः लोकतन्त्र में राजनेताओं के लिए वोट पाना आवश्यक है। यह उनके काम का अंग है और लोकतान्त्रिक राजनीतिक बहुत कुछ ऐसी ही है। लोगों के किसी समूह के पीछे लगने या उनका वोट प्राप्त करने की खातिर कोई नीति बनाने का वादा करने के लिए राजनेताओं को दोष देना उचित नहीं होगा। वास्तविक रूप से प्रश्न तो यह है कि वे ठीक-ठीक किस उद्देश्य से वोट पाना चाहते हैं? इसमें सिर्फ उन्हीं का हित है या विचाराधीन समूह का भी हित है। यदि किसी राजनेता को वोट देने वाला समूह उसके द्वारा बनवाई गई नीति से लाभान्वित नहीं हुआ, तो बेशक वह राजनेता दोषी होगा।

यदि अल्पसंख्यकों को वोट चाहने वाले धर्मनिरपेक्ष राजनेता उनकी इच्छा पूरी करने में समर्थ होते हैं, तो यह उस धर्मनिरपेक्ष परियोजना की सफलता होगी, जो आखिरकार अल्पसंख्यकों के हितों की भी रक्षा करती है।

लेकिन, अगर कोई व्यक्ति विचाराधीन समूह का कल्याण अन्य समूहों के कल्याण और अधिकारों की कीमत पर करना चाहे, तब क्या होगा? यदि ये धर्मनिरपेक्ष राजनेता बहुसंख्यकों के हितों को नुकसान, पहुँचाएँ, तब क्या होगा? तब एक नया अन्याय सामने आएगा। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि पूरा राजनीति तन्त्र अल्पसंख्यकों के पक्ष में झुका हुआ हो परन्तु भारत में ऐसा कुछ हुआ है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। संक्षेप में, वोट बैंक की राजनीति स्वयं में इतनी गलत नहीं है। गलत तो वोट बैंक की वैसी राजनीति है, जो अन्याय को जन्म देती है। केवल यह तथ्य कि धर्मनिरपेक्ष दल वोट बैंक का प्रयोग करते हैं, कष्टकारक नहीं है। भारत में हर समुदाय के सन्दर्भ में सभी दल ऐसा करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की आलोचना के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं-

1. धर्म-विरोधी- धर्मनिरपेक्षता, धर्म-विरोधी है। हम सम्भवतया यह दिखा पाने में सफल हुए हैं। | कि धर्मनिरपेक्षता संस्थाबद्ध धार्मिक वर्चस्व का विरोध करती है। यह धर्म-विरोधी होने का पर्याय नहीं है।

2. पश्चिम से आयातित- धर्मनिरपेक्षता के विषय में कहा जा सकता है कि यह पश्चिम से आयातित है अर्थात् यह ईसाइयतं से सम्बद्ध है। यह आलोचना बड़ी विचित्र है। पश्चिमी राष्ट्र तब ,धर्म-निरपेक्ष बने, जब एक महत्त्वपूर्ण स्तर पर उन्होंने ईसाइयत से सम्बन्ध समाप्त कर लिया। पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में वैसी कोई ईसाइयत नहीं है। धर्म धर्म और राज्य का पारस्परिक निषेध, जिसे पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष समाजों का आदर्श माना जाता है, सभी धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता की प्रमुख विशेषता भी नहीं है। सम्बन्धविच्छेद के विचार की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से की जा सकती है। कोई धर्मनिरपेक्ष राज्य सत्ता समुदायों के बीच शान्ति को बढ़ावा देने के लिए धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाए रख सकती है और विशिष्ट समुदायों की रक्षा के लिए वह उसमें हस्तक्षेप भी कर सकती है। भारत में ठीक यही बात हुई, यहाँ ऐसी धर्मनिरपेक्षता विकसित हुई है, जो न तो पूरी तरह ईसाइयत से सम्बद्ध है न भारतीय जमीन पर सीधे-सीधे पश्चिमी आरोपण ही है। तथ्य तो यह है कि धर्मनिरपेक्षता का विगत इतिहास पश्चिमी और गैर-पश्चिमी, दोनों मार्गों का अनुसरण करता दिखाई देता है। पश्चिमी में राज्य और चर्च का सम्बन्ध विच्छेद का प्रश्न केन्द्रीय था और भारत जैसे देशों में शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व जैसे प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

3. अल्पसंख्यकवाद- धर्मनिरपेक्षता पर अल्पसंख्यकवाद का आरोप भी लगाया जाता है। यह सच है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता अल्संख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। मगर यह पैरवी न्यायोचित रूप से करती है, आलोचकों को अल्पसंख्यक अधिकारों को विशेष सुविधाओं के रूप में नहीं देखना चाहिए।

4. अधिक हस्तक्षेप- कुछ आलोचक कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता उत्पीड़नकारी है और समुदायों।
की धार्मिक स्वतन्त्रता में अधिक हस्तक्षेप करती है। यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के बारे में गलत समझ है। यह सच है कि पारस्परिक निषेध के रूप में धर्म और राज्य में सम्बन्ध-विच्छेद के विचार को न मानकर भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म में हस्तक्षेप को अस्वीकार कर देती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि यह अधिक हस्तक्षेपकारी है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता धर्म से सैद्धान्तिक दूरी बनाकर रखती है, साथ-साथ कुछ हस्तक्षेप की गुंजाइश भी रखती है किन्तु इस हस्तक्षेप का आशय उत्पीड़नकारी हस्तक्षेप नहीं होता।

प्रश्न 2.
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में
प्राचीनकाल से ही धर्म का बहुत महत्त्व रहा है तथा भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन धर्म से ओत-प्रोत रहा है। वर्तमान भारत का लोकतान्त्रिक गणराज्य नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानव धर्म पर आधारित है। भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य को सुदृढ़ करने के लिए संविधान में निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गई हैं

1. राज्य का अपना कोई धर्म नहीं- संविधान के अनुसार भारत का अपना कोई धर्म नहीं है। राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं।

2. धार्मिक आधार पर भेदभाव समाप्त- भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को यह विश्वास | दिलाया गया है कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

3. कानून की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान- संविधान के अनुच्छेद 14 अनुसार भारतीय राज्य-क्षेत्र में सभी व्यक्ति कानून की दृष्टि से समान होंगे और धर्म, जाति अथवा लिंग के | आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 25-28 द्वारा धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। इसमें नागरिकों को अपने अन्त:करण के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने, छोड़ने, प्रचार करने आदि का पूर्ण अधिकार है। किसी भी नागरिक को किसी धर्म-विशेष का पालन करने या न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

5. धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और धर्म-प्रचार की स्वतन्त्रता- संविधान के अनुसार सभी , धर्मों को स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। इसके अनुसार प्रत्येक नागरिक को धार्मिक तथा परोपकारी उद्देश्य के लिए संस्थाएँ स्थापित करने, उनका संचालन करने, धार्मिक मामलों का प्रबन्ध करने, चल व अचल सम्पत्ति रखने और प्राप्त करने तथा ऐसी सम्पत्ति का कानून के अनुसार प्रबन्ध करने का अधिकार है।

6. धार्मिक शिक्षा का निषेध- अनुच्छेद 28 के अनुसार सरकारी शिक्षण संस्थाओं में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती तथा सरकार से आर्थिक सहायता यी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में भी किसी को धार्मिक गतिविधियों तथा कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

7. धार्मिक कार्यों के लिए किया जाने वाला व्यय कर-मुक्त- भारतीय संविधान अपने नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतन्त्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, वरन् संविधान के अन्तर्गत धार्मिक कार्यों के लिए किए जाने वाले व्यय को भी कर-मुक्त घोषित किया गया है।

8. साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त- संविधान द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का अन्त कर दिया गया है। अब प्रत्येक धर्म के अनुयायी को वयस्क मताधिकार के आधार पर मत देने का अधिकार दिया गया है।
भारत का संविधान देश की एकता तथा अखण्डता को बनाए रखने तथा सार्वजनिक हित की। दृष्टि से धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार पर कुछ प्रतिबन्ध भी आरोपित करता है। भारत में सच्चे धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है।

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