UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 18 Co-operation and Rural Society

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 18
Chapter Name Co-operation and Rural Society (सहकारिता एवं ग्रामीण समाज)
Number of Questions Solved 38
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 18 Co-operation and Rural Society (सहकारिता एवं ग्रामीण समाज)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सहकारिता का अर्थ एवं परिभाषा दीजिए। इसके सिद्धान्तों का विवरण देते हुए भारत में कार्यरत सहकारी समितियों का उल्लेख कीजिए।
या
सहकारिता का क्या तात्पर्य है? सहकारी समितियों का सामाजिक जीवन में महत्त्व बताइए। [2013]
उत्तर:
सहकारिता का अर्थ एवं परिभाषाएँ
सहकारिता का सामान्य अर्थ पारस्परिक सहयोग द्वारा कार्य करना है। अकेला व्यक्ति जिस कार्य को करने में सक्षम नहीं होता, वह दूसरों की सहायता से उस लक्ष्य को पाने में सफल हो जाता है। सहकारिता शब्द ‘सहकारिता’ शब्दों से मिलकर बना है। ‘सह’ का अर्थ है साथ-साथ, जब कि ‘कारिता’ कार्य करने का बोधक है। अतः सहकारिता का शाब्दिक अर्थ हुआ-‘साथ-साथ मिलजुल कर कार्य करना।’

इस प्रकार सहकारिता एक ऐसा संगठन है जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से आत्म-उन्नति के लिए सम्मिलित होते हैं। सहकारिता एक ऐच्छिक संगठन है जिसका निर्माण प्रजातान्त्रिक आधार पर किया जाता है। भारत में सहकारिता आन्दोलन का प्रारम्भ 1904 ई० में हुआ था, परन्तु इसकी प्रगति अत्यन्त मन्द थी। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् इस आन्दोलन में तेजी आयी है। स्वेच्छा से समान हितों की पूर्ति के लिए मिलजुल कर कार्य करने की भावना सहकारिता कहलाती है।

सहकारिता का ठीक-ठीक अर्थ जानने के लिए हमें उसकी परिभाषाओं पर दृष्टि निक्षेप करना होगा। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने सहकारिता को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
सहकारी नियोजन समिति के अनुसार, “सहकारिता एक ऐसा संगठन है जिसमें लोग स्वेच्छा के आधार पर अपनी आर्थिक उन्नति के लिए सम्मिलित होते हैं।’
सी० आर० फे के अनुसार, “सहकारिता मिलजुलकर कार्य करने की एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें किसी विशिष्ट उद्देश्य को लेकर सामूहिक हित के लिए स्वेच्छा से प्रयास किया जाता है। सहकारिता का मूल मन्त्र है – सब एक के लिए और एक सबके लिए।
होरेस प्लंकेट के अनुसार, “सहकारिता संगठन के द्वारा बनाया गया प्रभावपूर्ण स्वावलम्बन है।”
हेरिक के शब्दों में, “सहकारिता स्वेच्छा से संगठित उन दुर्बल व्यक्तियों की क्रिया है जो संयुक्त शक्तियों और साधनों का आपसी प्रबन्ध के द्वारा उपयोग करते हैं तथा जिनका उद्देश्य सामान्य लाभ प्राप्त करना होता है।”
इस प्रकार सहकारिता ऐसे व्यक्तियों का ऐच्छिक संगठन है, जो समानता, स्व-सहायता तथा प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के आधार पर सामूहिक हित के लिए कार्य करता है।

सहकारिता के मुख्य सिद्धान्त

सहकारिता कुछ मूलभूत सिद्धान्तों पर आधारित है। सहकारिता के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित

  1.  ऐच्छिक संगठन – सहकारी समितियों की सदस्यता अनिवार्य न होकर ऐच्छिक होती है। स्वेच्छा से इनकी सदस्यता को प्राप्त किया जा सकता है।
  2.  प्रजातान्त्रिक नियन्त्रण – इसमें प्रत्येक सदस्य को एक ही मत देने का अधिकार है, चाहे उसकी कितनी ही पूँजी या भूमि संगठन में क्यों न लगी हो।।
  3. लाभ के वितरण का सिद्धान्त-सहकारी समितियों के लाभ को सदस्यों की पूँजी के अनुपात में बाँटा जाता है।
  4. एकता व भाई-चारे का सिद्धान्त – सहकारिता सदस्यों में भाई-चारे की भावना उत्पन्न करती है। इस संगठन में सभी के साथ समानता का व्यवहार होता है।
  5. पारस्परिक तथा आत्म-सहायता – सहकारी संस्थाएँ प्रायः अपने साधनों पर निर्भर करती हैं, जिसे आत्म-सहायता कहते हैं। सहकारिता का मुख्य उद्देश्य पारस्परिक हित और सामूहिक
    लाभ होता है।
  6. समानता – समानता सहकारिता का मुख्य सिद्धान्त है। सहकारिता में प्रत्येक के अधिकार समान होते हैं। अंशों की अधिकता होने पर भी सदस्य को केवल एक ही मत देने का अधिकार
  7. सहानुभूति – सहकारिता में सभी सदस्य परस्पर मिलजुलकर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में जुटे रहते हैं। एक सदस्य दूसरे के प्रति सहानुभूति से ओत-प्रोत रहता है।
  8.  एकता – सहकारिता का आधारभूत सिद्धान्त एकता है। इसमें सभी सदस्य एकजुट होकर लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करते हैं। इसमें एक सबके लिए तथा सब एक के लिए’ कोआदर्श रहता है।
  9. मितव्ययिता – सहकारिता कम व्ययसाध्य होती है। एक साथ सामूहिक प्रयास होने पर कार्य कम समय में ही पूरा हो जाता है। सदस्य-संख्या में वृद्धि के साथ-साथ सहकारिता में
    मितव्ययिता में भी वृद्धि होती चली जाती है।
  10.  आय का समान रूप से वितरण – सहकारिता आय के समान और उचित वितरण के सिद्धान्त पर टिकी हुई है। सहकारिता के उत्पादन का वितरण अंशों के अनुरूप, उचित और न्यायपूर्ण ढंग से किया जाता है। सदस्यों को श्रेष्ठ और उचित मूल्य पर वस्तुएँ उपलब्ध कराना सहकारिता का मुख्य ध्येय है।

सहकारिता की विशेषताएँ

सहकारिता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. सहकारिता स्वैच्छिक संगठन है। व्यक्ति अपनी इच्छा से इस संगठन का सदस्य बन जाता है।
  2. सहकारिता की कार्यप्रणाली लोकतान्त्रिक होती है। सहकारिता के सभी सदस्यों को एकसमान अधिकार प्राप्त होते हैं। वे अपने मध्य से कुछ प्रतिनिधियों को संगठन के पदाधिकारी चुन लेते हैं।
  3. सहकारिता का लक्ष्य सदस्यों को विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक सुविधाएँ प्रदान कर उनमेंआत्मनिर्भरता उत्पन्न करना है।
  4.  सहकारिता सबके लाभ का संगठन है। ‘संयुक्त लाभ पद्धति’ सहकारिता की प्रमुख विशेषता है।
  5. सहकारिता में कम व्यय द्वारा सदस्यों को अधिक-से-अधिक लाभ उपलब्ध कराया जाता है।
  6. सहकारिता संयुक्त दायित्व वाला संगठन है। संयुक्त दायित्वों की पूर्ति संयुक्त प्रयास द्वारा की जाती है।
  7. सहकारिता की भावना ‘एक सबके लिए तथा सब एक के लिए प्रमुख है।
  8. सहकारिता न्याय और समानता पर आधारित है।
  9.  सहकारिता की सदस्यता सबके लिए उपलब्ध है।
  10. सहकारिता का संचालन नियमबद्ध ढंग से किया जाता है।

भारत में कार्यरत सहकारी समितियाँ

भारत सरकार ने 1904 ई० में ग्रामीण ऋणग्रस्तता समाप्त होने के उद्देश्य से सरकारी ऋण समितियाँ अधिनियम’ पारित किया। इसके पश्चात् 1912 ई० में ‘सहकारिता समितियाँ अधिनियम पारित करके देश में सहकारी समितियों का संगठन किया गया। वर्तमान समय में भारत में 3.56 लाख सहकारी समितियाँ कार्य कर रही हैं। इनमें से 67% समितियाँ ग्रामीण विकास में लगी हैं। इन समितियों की सदस्य-संख्या 16.1 करोड़ तथा इनकी कार्यशील कुल पूँजी 62,570 करोड़ रुपये है।

भारत में इस समय निम्नलिखित सहकारी समितियाँ कार्य कर रही हैं

1. प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ – यह एक सहकारी साख समिति है, जिसका प्रमुख कार्य किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए उन्हें ऋण उपलब्ध करवाना है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि इन समितियों की कुल संख्या लगभग 94 हजार है तथा 9.20 करोड़ से भी अधिक कृषक इनके सदस्य हैं। ऋण का भुगतान केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है। ठीक प्रकार से कार्य निष्पादन न कर पाने के कारण इन समितियों की संख्या निरन्तर घट रही है। गोरवाला समिति के सुझाव के अनुसार बड़े आकार वाली सहकारी समितियाँ स्थापित की जानी चाहिए।

2. सहकारी भूमि विकास बैंक – यह भी एक सहकारी साख समिति है, जिसका उद्देश्य कृषकों को लम्बी अवधि के लिए कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाना है। इसकी 1,707 से अधिक शाखाएँ हैं तथा सहकारी भूमि विकास बैंक कृषकों की आर्थिक स्थिति, ऋण की उपयोगिता तथा भूमि की दशा और विकास की सम्भावनाओं को देखते हुए ऋण प्रदान करते हैं। इसके अन्तर्गत (1) केन्द्रीय विकास बैंक तथा (2) प्राथमिक भूमि विकास बैंक किसानों की भूमि रहन रखकर ऋण उपलब्ध कराते हैं।

3. सहकारी कृषि समितियाँ – ये उत्पादन व वितरण से सम्बन्धित सहकारी समितियाँ हैं, जिनका उद्देश्य कृषि की दशा में सुधार करना तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि करना है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कृषि समितियाँ कार्यरत हैं

  1. सहकारी संयुक्त कृषि समितियाँ,
  2.  सहकारी उत्तम कृषि समिति,
  3. सहकारी काश्तकारी कृषि समिति,
  4. सहकारी सामूहिक कृषि समिति,
  5.  सहकारी चकबन्दी समितियाँ,
  6.  सहकारी सिंचाई समितियाँ तथा
  7. दुग्ध वितरण सहकारी समिति।

सहकारी सिंचाई समितियाँ कुएँ खोदने तथा नलकूप लगाने इत्यादि के लिए ऋण देती हैं, जबकि चकबन्दी समितियाँ बिखरे टुकड़ों को एक ही बनाने का कार्य करती हैं।

4. सहकारी औद्योगिक समितियाँ – इन सहकारी समितियों का उद्देश्य गाँवों में लोगों को लघु एवं कुटीर उद्योग लगाने की सुविधाएँ तथा रोजगार के अवसर प्रदान करने में सहायता देना है। कच्चे माल तथा प्रशिक्षण भी इन समितियों द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं। 54 हजार से भी अधिक ऐसी औद्योगिक समितियाँ अनेक प्रकार के उद्योगों के विकास में तथा सामान को बेचने व निर्यात करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। चमड़ा रँगने, फल व सब्जियों को डिब्बों में बन्द करने, मिट्टी के बर्तन बनाने, तेल, गुड़, साबुन और ताड़ उद्योगों से सम्बन्धित सहकारी समितियाँ भी स्थापित की गयी हैं।

5. सहकारी दुग्ध-आपूर्ति समितियाँ – इनका कार्य दुग्ध एवं डेयरी उद्योग को प्रोत्साहन देना है। पशुओं की नस्ल सुधारने तथा दुग्ध उत्पादन में वृद्धि करने में इन समितियों का विशेष योगदान है। आज 31 हजार से भी अधिक प्राथमिक दुग्ध-पूर्ति समितियों की स्थापना हो चुकी ै और अधिक-से-अधिक लोग इनसे लाभान्वित हो रहे हैं।

6. सहकारी विपणन समितियाँ – इन समितियों की स्थापना का उद्देश्य किसानों को दलालों के शोषण से बचाना तथा उनकी उपज का सही मूल्य दिलवाना है। ये समितियाँ किसानों से सीधे अनाज खरीदती हैं तथा बाजार मूल्य पर किसानों को तुरन्त भुगतान भी कर दिया जाता है।

7. बह-उद्देशीय सहकारी समितियाँ – आर्थिक विकास के लिए गठित इन समितियों का उद्देश्य लोगों के जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं से सम्बन्धित वस्तुएँ प्रदान करना है। ऋण देने के साथ-साथ ये समितियाँ जंगलों से प्राप्त पदार्थों के विक्रय तथा कृषि उपकरणों को भी प्रबन्ध करती हैं।

8. सहकारी उपभोक्ता समितियाँ – इनका उद्देश्य गाँवों तथा नगरों में उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर वस्तुएँ प्रदान करना है। ऋण देने के साथ-साथ ये समितियाँ जंगलों में पदार्थों के विक्रय तथा कृषि उपकरणों का भी प्रबन्ध करती हैं।

9. सहकारी आवास समितियाँ – इनका मुख्य उद्देश्य सदस्यों को आवास की सुविधाएँ उपलब्ध कराने और गृह-निर्माण के लिए भिन्न प्रकार के ऋण उपलब्ध कराना है। ऐसी समितियाँ रोशनी, सड़कों का निर्माण तथा पीने के पानी की व्यवस्था करने का कार्य भी करती हैं।

अतः विभिन्न प्रकार की समितियाँ लोगों को भिन्न प्रकार की सुविधाएँ प्रदान करके उनके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सहकारी संघ की भी स्थापना की गयी है। विभिन्न सहकारी समितियों के विकास तथा क्रियान्वयन के लिए सहकारी राष्ट्रीय संघ भी बनाये गये हैं।

प्रश्न 2
ग्रामीण क्षेत्रो के पुनर्निर्माण में सहकारिता का क्या महत्त्व है? [2009]
या
ग्रामीण क्षेत्रों पर सहकारी समितियों के प्रभावों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सहकारिता ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रगति का रहस्य है। भारत जैसे कृषि-प्रधान और विकासशील राष्ट्र के लिए सहकारिता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आन्दोलन है। सहकारी आन्दोलन ग्रामीण जीवन की आधारशिला है। भारत की 75% ग्रामीण जनसंख्या के उत्थान में सहकारिता की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही है। लोकतन्त्र की शक्ति के रूप में चलाया गया सहकारी आन्दोलन ग्रामीण जीवन को सुखी और सम्पन्न बनाने में अहम् भूमिका निभा रहा है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण में सहकारिता के महत्त्व को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।

1. पशुओं की दशा में सुधार – पशु भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार स्तम्भ हैं। सहकारी दुग्ध उत्पादक समितियों ने पशुओं की दशा सुधारने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है, जिससे कृषकों की आय में तो वृद्धि हुई ही है, साथ ही दुग्ध उत्पादन में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। सहकारिता ग्रामीण क्षेत्रों में श्वेत क्रान्ति लाने में सफल हो रही है। इसी ने राष्ट्र में ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम को सफल बनाया है।

2. आवास-व्यवस्था में सुधार – गृह – निर्माण से सम्बन्धित सहकारी समितियों ने ग्रामीण समाज तथा नगरों में नये मकान बनाकर आवासीय समस्या को सुलझाने में पर्याप्त सहायता की है। इन समितियों द्वारा प्रकाश, सड़कों का निर्माण और पानी की व्यवस्था भी की गयी

3. बिचौलियों से मुक्ति – सहकारी समितियों के माध्यम से क्रय-विक्रय करने से किसानों को बिचौलियों के शोषण से मुक्ति मिल गयी है। उन्हें कम ब्याज पर पैसा ऋण के रूप में ही नहीं मिल जाता, अपितु उत्पादन की ठीक कीमत भी मिल जाती है। बिचौलियों का अन्त होने से कृषकों की आर्थिक दशा में गुणात्मक सुधार आया है। अब ग्रामीण जीवन में खुशहाली दिखाई पड़ने लगी है।

4. स्वच्छता एवं सड़कों की व्यवस्था –  सहकारिता ने ग्रामीण क्षेत्र में युगों से व्याप्त गन्दगी को दूर करने में सहायता प्रदान की है तथा सड़कों का निर्माण कराकर गाँवों में विकास के
द्वार खोल दिये हैं।

5. बचत तथा विनियोग में वृद्धि – सहकारी समितियों ने कृषकों में कम व्यय की आदत डाली है, जिससे वे बचत करने लगें तथा उनका विनियोग डाकखानों तथा सहकारी बैंकों में होने लगे।

6. ग्रामीण विकास – सहकारी समितियों ने कुटीर तथा लघु उद्योगों का विकास करके, नौकरी के अवसर प्रदान करके तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि करके ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में तीव्रता प्रदान की है। ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सहकारिता का सर्वाधिक योगदान रहा है। सहकारिता ने ग्रामीण विकास के नये द्वार खोल दिये हैं।

7. सामाजिक व राजनीतिक चेतना – सहकारिता का सिद्धान्त सहयोग है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक चेतना में वृद्धि हुई है। लोकतान्त्रिक प्रणाली पर आधारित होने के कारण सहकारी समितियाँ ग्रामवासियों को लोकतन्त्र की शिक्षा भी स्वत: प्रदान करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नेतृत्व का विकास हुआ है, जिसने ग्रामवासियों का ठीक प्रकार से मार्गदर्शन करना प्रारम्भ कर दिया है।

8. उत्तरदायित्व की भावना का विकास – सहकारिता में प्रत्येक सदस्य प्रत्येक कार्य के लिए जिम्मेदार होता है, जिसके कारण सभी अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से समझने लगते हैं।

9. नैतिक गुणों का विकास –  सहकारिता ग्रामवासियों में नैतिक गुणों के विकास में भी सहायक है। आत्मविश्वास, आत्म-सहायता, ईमानदारी तथा मितव्ययिता जैसे गुणों का विकास करने में
सहकारिता सहायक है।

10. जीवन को श्रेष्ठ बनाने में सहायक – सहकारिता ने ग्रामवासियों के जीवन को श्रेष्ठ बनाने में सहायता प्रदान की है। ऋण की सुविधाओं तथा क्रय-विक्रय की सुविधाओं के कारण वे शोषण से बच गये हैं। सहकारिता से मिलने वाली अनेक सुविधाओं ने ग्रामवासियों का जीवन श्रेष्ठ बनाने में सहायता प्रदान की है।

11. तनाव एवं संघर्ष से मुक्ति – सहकारी आन्दोलन के फलस्वरूप ग्रामवासियों में सहयोग, प्रेम और एकता का संचार हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में संघर्ष तथा मुकदमेबाजी कम होने से तनाव घट गया है। ऋणों से छुटकारा, कृषि उपजों को उचित मूल्य तथा भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाने से कृषकों में आत्म-सन्तोष उत्पन्न हो गया है। तनाव तथा संघर्ष से मुक्त होकर ग्रामवासी अब समाज तथा राष्ट्र के नव-निर्माण में भरपूर सहयोग देने लगे हैं।

12. ग्रामीण पुनर्निर्माण का आधार – सहकारिता आन्दोलन ग्रामीण पुनर्निर्माण की आधारशिला कहलाता है। वर्तमान समय में लगभग 16 करोड़ सदस्य सहकारिता के गुणों से सम्पन्न होकर गाँवों के नव-निर्माण में अपना पूरा-पूरा सहयोग दे रहे हैं। सहकारी आन्दोलन ने ग्रामीण क्षेत्रों , की अर्थव्यवस्था, सामाजिक दशी, कृषि, पशुपालन तथा जीवन-यापन को नवीनतम आयाम दिये हैं। प्रगति की डगर पर ग्रामीण लोग अब राष्ट्र के अन्य लोगों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं। सहकारी आन्दोलन वह सुदृढ़ आधार है, जिस पर ग्रामीण विकास
एवं पुनर्निर्माण का भव्य भवन टिका हुआ है।

13. विकास योजनाओं में सहयोग – भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी आन्दोलन के माध्यम से विकास योजनाएँ लागू की गयी हैं। सहकारी समितियों ने इन्हें सुधरे हुए बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाएँ तथा नवीनतम कृषि यन्त्र देकर हरित-क्रान्ति की सफलता में प्रमुख भूमिका निभायी है। अनेक विकास योजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक असमानता को समूल नष्ट कर दिया है।
इस प्रकार सहकारी समितियों ने ग्रामीण समाज को धन-धान्य से भरपूर करके सभी ओर समृद्धि बिखेर दी है। इसने अच्छे और चरित्रवान नागरिकों के निर्माण में सहायता देकर लोकतन्त्र की सफलता की आधारशिला रख दी है। शोषण पर रोक लगाकर ग्रामीण लोगों को आदर्श एवं सुखी जीवन व्यतीत करने योग्य बनाया है। वास्तव में, सहकारी समितियाँ ग्रामीण समाज के पुनर्निर्माण की कुंजी सिद्ध हो रही हैं। सहकारी आन्दोलन को गति प्रदान करके ग्रामीण क्षेत्रों की प्रगति और सम्पन्नता की नींव रखी जा सकती है। भारत सरकार सहकारी आन्दोलन को नया स्वरूप देने के लिए प्रयासरत है।

प्रश्न 3
ग्रामीण विकास में सहकारी समितियों का महत्त्व व योगदान बताइए।
या
ग्रामीण विकास समितियों के महत्त्व पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए। [2016]
या
ग्रामीण समाज में सहकारी समितियों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ग्रामीण समाज में सहकारी समितियों का महत्त्व व योगदान
ग्रामीण समाज की काया पलटने में सहकारी समितियों का सहयोग बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। इन समितियों ने ग्रामीण ऋणग्रस्तता, कृषि के पिछड़ेपन, बँधुआ मजदूरी आदि समस्याओं का निराकरण करके ग्रामीण जीवन को सुख और समृद्धि से पाट दिया है। सहकारी समितियाँ ग्रामीण समाज के लिए कल्पवृक्ष सिद्ध हो रही हैं। इन्होंने ग्रामीण समाज का नव-निर्माण करके उसे एक सुधरा रूप दिया है। ग्रामीण समाज के उत्थान में सहकारी समितियों के महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है

1. पुराने ऋणों से मुक्ति – भारतीय गाँवों की मुख्य समस्या ऋणग्रस्तता थी। कहा जाता था कि भारतीय कृषक ऋणों में जन्म लेता है और ऋणों में ही मर जाता है। एक बार लिया हुआ ऋण पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता था। साहूकार तथा जमींदार ग्रामीण समाज के शोषण में आकण्ठ डूबे थे। सहकारी समितियों ने किसानों को उचित ब्याज की दर पर सुगमता से ऋण उपलब्ध कराकर उन्हें उनके प्राचीन ऋणों से मुक्ति दिलवा दी।

2. आर्थिक विकास में गति – सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास में गति आ गयी है। अर्थव्यवस्था में सुधार आने से ग्रामीण समाज में खुशहाली की लहर दो से है। तीव्र गति से हुए आर्थिक विकास ने भारतीय कृषकों को कृषि, पशुपालन तथः कुटीर उद्योग-धन्धों के क्षेत्र में पर्याप्त निर्भरता प्रदान कर दी है।

3. सामाजिक चेतना का विकास – सहकारी समितियों ने ग्रामीण समाज के सदस्यों में परस्पर सहयोग, एकता, सामुदायिकता, सहानुभूति तथा प्रेम का भाव जाग्रत कर सामाजिक चेतना के विकास में अद्वितीय योग दिया है। ग्रामीण समाज के सभी सदस्य एकजुट होकर समाज के नव-निर्माण के लिए प्रयत्नशील हो उठे हैं।

4. झगड़ों और मुकदमेबाजी में कमी – सहकारी समितियों ने हम की भावना जगाकर ग्रामीण समाज में अपनत्व का भाव जगा दिया है। ग्रामीण समाज के सदस्य सामूहिक हित को ध्यान में रखकर तथा वैर-भाव छोड़कर तन-मन-धन से सहकारिता के कार्यों में सहयोग दे रहे हैं। सहयोग के कारण झगड़ों का अन्त हो गया और मुकदमेबाजी में कमी आ गयी है। इस प्रकार सामाजिक सनाव और संघर्ष में भी गिरावट आ गयी है।

5. पारस्परिक सहयोग का विकास – सहकारी समितियों का आधार पारस्परिक सहयोग है। सभी लोग इन समितियों के सदस्य बनकर एकता और सहयोग का प्रदर्शन करते हैं। सहयोग और एकता, प्रगति और शक्ति की आधारशिला है। सहयोग के कारण मित्रता, भाई-चारा, समानता और स्वतन्त्रता आदि गुणों का उदय होता है, जो राष्ट्रीय एकता को बल प्रदान करते हैं।

6. लोकतन्त्र का प्रशिक्षण – सहकारी समितियों का संगठन और संचालन लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अनुरूप होता है। सहकारी समितियों के सदस्य बनकर ग्रामीण समाज के लोग स्वतन्त्रता, समानता व भाई-चारे का पाठ पढ़ते हैं तथा कर्तव्य और अधिकारों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार सहकारी समितियाँ लोकतन्त्र के लिए प्रबुद्ध और जागरूके नागरिकों का सृजन करने में बहुत सहयोग देती हैं।

7. सामाजिक कल्याण में अभिवृद्धि – सहकारी समितियाँ और इन समितियों के सदस्य सामूहिक हित को ध्यान में रखकर कार्य करते हैं। इस प्रकार सहकारी समितियाँ सामाजिक कल्याण में अभिवृद्धि करने का सशक्त माध्यम हैं।

8. ग्रामीण समाज का पुनर्निर्माण – सहकारी समितियाँ ग्रामीण जीवन के पुनर्निर्माण में बहुत सहायक होती हैं। इनसे सहभागिता प्राप्त कर ग्रामीण समाज का जीर्ण-शीर्ण कलेवर पुनः तरुणाई प्राप्त कर लेता है। ग्रामवासियों को नया सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश मिल जाता है। वे स्वयं को राष्ट्र की मुख्य धारा का एक अभिन्न अंग समझने लगते हैं। सहकारी समितियों ने ग्रामीण समाज के सदस्यों को सम्मानित और सुखी जीवन प्रदान करा दिया है।

इस प्रकार सहकारी समितियों ने ग्रामीण समाज को धन-धान्य से भरपूर करके सभी ओर समृद्धि बिखेर दी है। इसने अच्छे और चरित्रवान् नागरिकों के निर्माण में सहायता देकर लोकतन्त्र की सफलता की आधारशिला रख दी है। इसने शोषण पर रोक लगाकर ग्रामीण लोगों को आदर्श एवं सुखी जीवन व्यतीत करने के योग्य बनाया है। वास्तव में, सहकारी समितियाँ ग्रामीण समाज के पुनर्निर्माण की कुंजी सिद्ध हो रही हैं।

प्रश्न 4
भारतीय समाज में सहकारी आन्दोलन की धीमी गति होने के कारण बताइए तथा इन्हें प्रभावशाली बनाने के उपाय सुझाइए। [2010]
या
भारत में सहकारिता आन्दोलन पर अपने विचार (लेख, निबन्ध) लिखिए। [2007, 11, 15]
या
भारत में सहकारी आन्दोलन को और अधिक प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है? [2007]
या
सहकारी आन्दोलन की धीमी (मन्द) गति अथवा इसकी असफलता के कारणों का उल्लेख कीजिए। [2011]
या
भारत में सहकारी आन्दोलन की सफलता के लिए आवश्यक उपायों को सुझाइए। [2013]
या
भारतीय समाज में सहकारिता आन्दोलन पर प्रकाश डालते हुए इसकी असफलता के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारत में सहकारिता आन्दोलन का इतिहास

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पहले सहकारी आन्दोलन – सहकारिता का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में हुआ था। सर्वप्रथम सहकारी समितियों का संगठन जर्मनी में हुआ तथा वहाँ इन्हें पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई। जर्मनी में इनकी सफलताओं से प्रभावित होकर 1901 ई० में भारत सरकार ने सर एडवर्ड ला की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। इस समिति की सिफारिश के आधार पर 1904 ई० में ‘सहकारी साख समिति अधिनियम’ (Co-operative Credit Societies Act, 1904) पारित हुआ। 1908 ई० तक सहकारिता आन्दोलन ने पर्याप्त प्रगति की। 1912 ई० में ‘सहकारी साख अधिनियम’ पारित हुआ। इस अधिनियम के अधीन सहकारिता के गैर-साख रूपों अर्थात् उत्पादन, क्रय-विक्रय, बीमा, मकानों आदि के निर्माण के लिए सहकारी समितियों की स्थापना की गयी 1914 ई० में भारत सरकार ने मैकलेगन की अध्यक्षता में एक सहकारी समिति की नियुक्ति की।

1919 ई० में माउण्ट-फोर्ड सुधारों (लॉर्ड माउण्टबेटन तथा लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा किये गये सुधार) के अन्तर्गत सहकारिता को एक राजकीय विषय बना दिया गया। 1925 ई० में बम्बई (मुम्बई) सरकार ने अपना ‘सहकारी समिति अधिनियम’ पारित किया। बम्बई के पश्चात् 1932 ई० में मद्रास (चेन्नई) में, 1934 ई० में बिहार में तथा 1943 ई० में बंगाल की प्रान्तीय सरकारों ने सहकारी समितियों से सम्बन्धित कानूनों का निर्माण किया। 1929 ई० तक सहकारी समितियों की संख्या 1 लाख तक बढ़ गयी। 1939 ई० में दूसरा महायुद्ध छिड़ा, जिसके परिणामस्वरूप कृषि उपज में पर्याप्त वृद्धि हुई।

अत: किसानों की आर्थिक दशा में सुधार हुआ। इससे सहकारिता आन्दोलन में और तीव्रता आयी और उनकी संख्या में 1945 ई० तक 41% की वृद्धि हुई। 1942 ई० में एक ‘सहकारिता योजना समिति’ (Co-operative Planning Committee) की नियुक्ति की गयी। इस समिति ने सिफारिश की कि प्राथमिक साख-समितियों का निर्माण किया जाए। साथ ही ऐसा प्रयास किया जाए जिससे कि दस वर्षों में देश में कम-से-कम 50% गाँवों व 30% शहरों के लिए समितियाँ बनायी जाएँ। रिजर्व बैंक से इस बात के लिए अनुरोध किया गया कि वह सहकारी समितियों को सफल बनाने के लिए अधिक-से-अधिक सहायता दे।।

स्वतन्त्रता के पश्चात सहकारी आन्दोलन–स्वतन्त्रता के पश्चात् देश के आर्थिक विकास से कार्यक्रमों में सहकारिता को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। पंचवर्षीय योजनाओं में भी सहकारिता के विकास पर अधिक बल दिया गया है और उसकी सफलता के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। वर्ष 1950-51 में प्राथमिक साख-समितियों की कुल संख्या 1.05 लाख थी। वर्ष 1960-61 में इन समितियों की संख्या 2.10 लाख तक जा पहुँची। 1965 ई० में हैं 10 करोड़ की प्रारम्भिक पूँजी से ‘राष्ट्रीय कृषि साख दीर्घकालीन कोष’ (National Agricultural Credit Long-term Operation Fund) की स्थापना की गयी। इस कोष का मुख्य कार्य राज्य सरकारों को सहकारी संस्थाओं के विकास के लिए ऋण प्रदान करना था। सहकारिता आन्दोलन से सम्बन्धित अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए ‘सहकारिता प्रशिक्षण की केन्द्रीय समिति’ (Central Committee for Co-operative Training) की स्थापना की गयी।

वर्ष 1977-78 में सहकारी समितियों की संख्या 3 लाख, प्राथमिक समितियों की सदस्य संख्या 193 लाख, हिस्सा पूँजी १ 1,812 करोड़ तथा कार्यशील पूँजी र 16,691 करोड़ थी। वर्ष 1982-83 में यह संख्या क्रमशः 2.91 लाख, 1,208 लाख, * 2,305 करोड़ तथा १ 21,857 करोड़ थी। जून, 1983 ई० के अन्त तक 94,089 प्राथमिक कृषि साख समितियाँ कार्य कर रही थीं तथा 96% व्यक्ति इनके अन्तर्गत थे। 1989 ई० में ये समितियाँ ग्रामीण क्षेत्र के 98% भाग में फैल चुकी थीं लेकिन वर्तमान में भारत में विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियों की संख्या 5.04 लाख ही पहुँच पाई है, जिनकी सदस्य संख्या 22 करोड़ है। आज भारत में अनेक प्रकार की सहकारी समितियाँ कार्य कर रही हैं। इनमें साख सहकारी समितियाँ (प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ तथा सहकारी भूमि विकास बैंक), सहकारी उत्पादन समितियाँ (सहकारी कृषि समितियाँ, सहकारी औद्योगिक समितियाँ व सहकारी दुग्धपूर्ति समितियाँ), सहकारी विपणन समितियाँ, बहु-उद्देशीय जनजातीय सहकारी समितियाँ, सहकारी उपभोक्ता समितियाँ तथा सहकारी आवास समितियाँ प्रमुख हैं।

भारत में सहकारी आन्दोलन की धीमी गति (असफलता) के कारण

भारत में सहकारी आन्दोलन बहुत ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसने ग्रामीण क्षेत्रों की युगों-युगों से व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी, ऋणग्रस्तता और संघर्षों को समाप्त कर दिया है। भारत में सहकारिता के 100 वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी इसकी प्रगति मन्द रही है। कुछ क्षेत्रों में तो सहकारी आन्दोलन असफल ही हो गया है। ग्रामीण विकास की यह सर्वोच्च आशा मन्द गति से आगे बढ़ रही है। भारत में सहकारी आन्दोलन की मन्द गति होने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. अशिक्षा – सहकारिता की धीमी प्रगति का प्रमुख कारण ग्रामवासियों में व्याप्त अशिक्षा है। अशिक्षा के कारण ग्रामवासी सहकारिता के महत्त्व को नहीं समझ पाते तथा न ही विभिन्न समितियों के अधिनियमों को ही समझ पाते हैं। प्रभुतासम्पन्न लोग इसमें कोई रुचि नहीं लेते, क्योंकि इनसे उन्हें कोई लाभ नहीं पहुँचता। अत: अशिक्षित लोग सहकारिता का पूरा लाभ नहीं
उठा पाते जिससे सहकारी आन्दोलन की गति मन्द रहती है।

2. अकुशल प्रबन्ध – सहकारिता की धीमी प्रगति का दूसरा कारण प्रबन्ध की अकुशलता है। सहकारी समितियों में मितव्ययिता की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जाता है, अपितु ऋण की वसूली पर भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। साथ ही अनेक सही व्यक्तियों को ऋण प्राप्त नहीं हो पाते हैं, जिससे इनका लाभ सीमित लोगों को ही मिल पाता है।

3. जन-सहयोग का अभाव – सहकारिता को सामान्य ग्रामवासियों ने अपने विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम न मानकर इसे एक सरकारी आन्दोलन माना है। सरकार ने इसका प्रचार भी इसी ढंग से किया है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक जनता इस ओर आकर्षित नहीं हो पायी है। जनसामान्य का भरपूर सहयोग न मिल पाने के कारण यह आन्दोलन असफल रहा है।

4. अपर्याप्त साधन – सहकारी समितियाँ वित्तीय साधनों की कमी के कारण अपने सदस्यों को पूर्ण सहायता भी नहीं दे पायी हैं। अपर्याप्त साधनों के कारण कृषकों को समय पर ऋण नहीं मिल पाता तथा उन्हें साहूकारों के चंगुल में फंसना पड़ता है। साधनों की अपर्याप्तता के कारण सहकारी आन्दोलन पिछड़ जाता है।

5. ब्याज की विभिन्न दरें – विभिन्न राज्यों में सहकारी समितियों द्वारा दिये जाने वाले ऋणों की दर में भिन्नता (6 प्रतिशत से लेकर 12 प्रतिशत) के कारण भी इनकी सफलता प्रभावित
हुई है। निर्धन किसान अधिक ब्याज अच्छे उत्पादन के दिनों में भी सहन नहीं कर सकता है।

6. लाल फीताशाही – सहकारी आन्दोलन की धीमी प्रगति को एक अन्य कारण सहकारी आन्दोलन से सम्बन्धित सहकारी विभागों में असामंजस्य तथा लाल फीताशाही को पाया जाना है। प्राथमिक, प्रान्तीय तथा केन्द्रीय समितियों में सहयोग का अभाव है तथा ऋण वितरण इत्यादि में अधिकारी भ्रष्ट तरीके अपनाते हैं। अतः जनसाधारण इनका लाभ नहीं उठा पाता है।

7. जनता की उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण – सहकारी समितियों में होने वाले पक्षपात, जातिगत भावना, भ्रष्टाचार आदि के कारण जनसाधारण ने इनके प्रति उपेक्षापूर्ण नीति अपना ली है। धन का अनुचित उपयोग, फर्जी ऋण तथा गबन आदि का अखाड़ा बनती जा रही इन समितियों में ग्रामवासियों का विश्वास ही नहीं रहा।

8. व्यापारिक सिद्धान्तों की अवहेलना तथा पक्षपात – सहकारी समितियों की असफलता का एक अन्य कारण व्यापारिक नियमों की अवहेलना है। केवल ब्याज लेकर ऋण का नवीनीकरण कर देना, आवश्यकतानुसार ऋण न देना, ऋण देने में पक्षपात करना इत्यादि कारण जनता को इन समितियों के प्रति उदासीन बना देते हैं।

9. दलबन्दी – सहकारी आन्दोलन की मन्द गति का प्रमुख कारण दलबन्दी है। दलबन्दी के कारण जो संघर्ष उत्पन्न होते हैं उनसे सहकारी आन्दोलन की गति मन्द पड़ जाती है।

10. अन्य कारण – जातिवाद, स्वार्थपरता, व्यापक भ्रष्टाचार, नियन्त्रण तथा मार्गदर्शन का अभाव, प्रतिस्पर्धा व अकुशल प्रबन्ध के कारण भी भारत में सहकारी आन्दोलन की गति मन्द रही है।

भारत में सहकारी आन्दोलन को सफल बनाने के लिए सुझाव

सहकारी आन्दोलन को सफल बनाने में निम्नलिखित सुझाव सहायक हो सकते हैं

  1.  जनसाधारण में सहकारिता के सिद्धान्तों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की जानी चाहिए, जिससे वे स्वत: उनके सदस्य बनकर इनसे लाभान्वित होने लगे।
  2.  सहकारी समितियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाना चाहिए, जिससे वे अपने कार्य-क्षेत्र का विस्तार कर सकें।
  3. शिक्षा द्वारा जनता को सहकारिता लाभों से परिचित कराया जाना चाहिए।
  4.  सहकारी समितियों में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद तथा जातिवाद समाप्त किया जाना चाहिए।
  5. इसकी नीतियाँ अधिक व्यावहारिक रूप से बनायी जानी चाहिए, जिससे उन्हीं लोगों को इनका लाभ मिल सके, जिन्हें उसकी आवश्यकता है।
  6. सहकारिता से सम्बन्धित सरकारी विभागों में समन्वय रखा जाए और लालफीताशाही समाप्त की जाए।
  7. सरकारी हस्तक्षेप कम किया जाना चाहिए जिससे इनकी प्रगति आशातीत हो सके।
  8. कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे सहकारी समितियाँ प्रभावी हो सकें।
  9.  सहकारी समितियों में दलबन्दी को समाप्त किया जाए, जिससे वे स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य संचालन कर सकें।
  10.  सहकारिता की कार्य-विधि को ठीक से सुधारा जाए, जिससे जनता को इस आन्दोलन का पूरा-पूरा लाभ मिल सके।
  11. सहकारिता का प्रशिक्षण देकर जनसामान्य को इस आन्दोलन में सहभागी बनने के लिए प्रेरित किया जाए।
  12. सहकारी समितियों के लेखे-जोखे की समय-समय पर जाँच करायी जाए।
  13. अलाभकारी समितियों को समाप्त कर दिया जाए, जिससे अपव्यय पर रोक लग सके।
  14. प्रचार तथा जनसामान्य से सम्पर्क करके लोगों की अभिरुचि इस आन्दोलन के प्रति जगायी जाए।
  15. महिलाओं में सहकारिता के प्रति लगाव पैदा किया जाए, जिससे उनकी उत्पादक प्रवृत्ति का लाभ इस आन्दोलन को प्राप्त हो सके।

निष्कर्ष – भारत में सहकारिता की धीमी गति तथा असफलताओं को देखते हुए यह नहीं समझ लेना चाहिए कि यह आन्दोलन व्यर्थ है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए सहकारिता बहुत आवश्यक है। मोरारजी देसाई के शब्दों में, “सचमुच का सहकारिता आन्दोलन प्रजातन्त्र की शक्ति बन सकता है।” सहकारिता पूँजीवाद और समाजवाद की अति को समाप्त करने वाला अमोघ अस्त्र है। यह मानव-समाज को सुधार कर सुखी तथा सम्पन्न जीवन प्रदान करने में पूर्णतः सक्षम है।

इससे ग्रामीण समाज में शोषण और अन्याय पर अंकुश लगेगा तथा समूचे समाज में खुशहाली और समृद्धि की लहर फैल जाएगी। श्री फखरुद्दीन अली अहमद के शब्दों में, भारत जैसे विकासशील राष्ट्रों में सामाजिक परितोष से युक्त आर्थिक संगठन के रूप में सहकारिता का एक विशेष महत्त्व है।’ यह शोषण से बचाव का सशक्त माध्यम है। मिर्धा समिति के शब्दों में, “सहकारी आन्दोलन निर्धन व्यक्ति की शक्तिशाली और सम्पन्न वर्ग द्वारा किये जाने वाले शोषण से रक्षा करने का अति उत्तम संगठन प्रस्तुत करता है। भारत में इस महान आन्दोलन को सफल बनाने की आवश्यकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
सहकारिता के चार मुख्य उद्देश्य बताइए। या सहकारिता के कोई दो लाभ बताइए। [2016]
उत्तर:
सहकारिता के चार मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

1. ग्रामीण पुनर्निर्माण – भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार ग्राम हैं। अत: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के उद्देश्य से सहकारिता आन्दोलन का शुभारम्भ किया गया। प्रारम्भ में सहकारिता का क्षेत्र केवल साख-समितियों तक ही सीमित था, किन्तु बाद में यह उद्योग, कृषि, बाजार, उपभोग आदि के क्षेत्रों में भी अपनाया गया।

2. साधनों एवं शक्तियों का सम्मिलित उपयोग – सहकारिता की क्रिया को दुर्बल और निर्धन व्यक्तियों ने इस उद्देश्य से अपनाया जिससे कि वे अपनी संयुक्त शक्तियों और साधनों का आपसी प्रबन्ध के द्वारा उपयोग कर सकें तथा लाभ प्राप्त कर सकें। इस प्रकार सहकारिता ऐसे व्यक्तियों का ऐच्छिक संगठन है जो समानता, स्व-सहायता तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था के आधार पर सामूहिक हित के लिए करता है।

3. बिचौलियों तथा सूदखोरों से मुक्ति – किसानों को अपनी फसल को बेचने तथा कृषि के लिए खाद, बीज, ट्रैक्टर आदि खरीदने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता था। . इसके अतिरिक्त धनाभाव में वे सूदखोरों से भारी ब्याज पर ऋण लेते थे। सहकारिता का उद्देश्य कृषकों को इन बिचौलियों तथा सूदखोरों से मुक्ति दिलाना है। अब ये कार्य वे सहकारी समितियों के माध्यम से करते हैं तथा बिचौलियों और सूदखोरों के शोषण से बच जाते हैं।

4. उत्तरदायित्व की भावना का विकास – सहकारिता में प्रत्येक सदस्य प्रत्येक कार्य में साझीदार होता है तथा अपने कार्य के प्रति उत्तरदायी होता है। उसमें उत्तरदायित्व की भावना
का विकास होता है तथा वह एक जिम्मेदार नागरिक बनता है।

प्रश्न 2
सहकारिता के चार आर्थिक लाभों को समझाइए। [2009]
उत्तर:
सहकारिता से मिलने वाले निम्नलिखित आर्थिक लाभों के कारण भारत में सहकारिता को व्यापक रूप से अपनाना अत्यन्त लाभदायक होगा

  1. कम ब्याज पर ऋण – सहकारी साख समितियाँ किसानों एवं कारीगरों को कम ब्याज पर ऋण प्रदान करके उन्हें महाजनों के शोषण से बचाती हैं।
  2. मध्यस्थों का अन्त – कई राष्ट्रों में सहकारी आन्दोलन ने उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं की सहकारी समितियों को परस्पर सम्बद्ध करके विपणन-प्रणाली से मध्यस्थों को पर्याप्त सीमा
    तक हटा दिया है।
  3.  कृषि का विकास – बहु-उद्देशीय सहकारी समितियाँ कृषकों के लिए उत्तम बीज, यन्त्र तथा उर्वरकों की व्यवस्था करके उनकी कृषि-उपज में वृद्धि करने में सहायक होती हैं। इसी प्रकार
    चकबन्दी समितियाँ तथा कृषि समितियाँ कृषि के विकास में सहायक सिद्ध होती हैं।
  4. निवास की समस्या का समाधान – सहकारी गृहनिर्माण समितियाँ अपने निर्धन तथा निस्सहाय सदस्यों के लिए निवास की व्यवस्था करती हैं।

प्रश्न 3
सहकारी कृषि समितियों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गाँवों की कृषि सम्बन्धी एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटे हुए हैं। भूमि-विभाजन की इस समस्या का समाधान करने के लिए जिन चार प्रकार की सहकारी समितियों की स्थापना की गयी, वे हैं
(i) सहकारी संयुक्त कृषि समिति,
(ii) सहकारी उत्तम कृषि समिति,
(iii) सहकारी काश्तकारी कृषि समिति तथा
(iv) सहकारी सामूहिक कृषि समिति।।

  1. सहकारी संयुक्त कृषि समिति में कई लोगों की भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक बड़े कृषि फार्म के रूप में एकत्रित कर दिया जाता है। इस संयुक्त फार्म पर सभी लोग सामूहिक रूप
    से कृषि करते हैं और लाभ को सभी साझेदारों में उनकी भूमि के अनुपात में बाँट दिया जाता है। भूमि सामूहिक होते हुए भी प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी भूमि का मालिक बना रहता है।
  2.  सहकारी उत्तम कृषि समिति किसानों के लिए उत्तम किस्म के बीज, खाद एवं कृषि-यन्त्र जुटाती है, जिससे अधिक फसल पैदा हो सके।
  3. सहकारी काश्तकारी कृषि समिति गाँव की सारी भूमि को खरीद लेती है, उस पर ग्रामीणों से खेती करवाती है और बदले में उन्हें वेतन एवं लाभांश देती है।
  4. सहकारी सामूहिक कृषि समिति भी उत्पादन बढ़ाने के लिए सामूहिक रूप से कृषि करने को प्रोत्साहन देती है।

प्रश्न 4
सहकारी भूमि विकास बैंक पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भूमि सुधार, पुराने ऋणों को चुकाने एवं सिंचाई की सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए किसानों को ब्याज पर दीर्घावधि ऋण जुटाने हेतु सहकारी भूमि विकास बैंकों की स्थापना की गयी है। प्रारम्भ में इनका नाम ‘भूमि बन्धक बैंक’ था। सहकारी भूमि विकास बैंक भी निम्नलिखित दो प्रकार के हैं

  1. केन्द्रीय भूमि विकास बैंक – ये राज्य स्तर पर होते हैं। ये बैंक ऋण-पत्र जारी करते हैं। वर्तमान में इनकी संख्या 1,707 है।
  2. प्राथमिक भूमि विकास बैंक – ये बैंक गाँवों में कार्यरत् हैं जो किसानों को पम्पिंग सेट खरीदने, बिजली लगाने, भारी कृषि-यन्त्र खरीदने तथा गिरवी भूमि को छुड़ाने के लिए दीर्घकालीन ऋण देते हैं। ये बैंक किसानों की भूमि रेहन (गिरवी) रखकर उन्हें ऋण देते हैं। इस प्रकार इन बैंकों ने किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

प्रश्न 5
सहकारिता से उपभोक्ताओं को होने वाले लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सहकारी संस्थाओं से सबसे अधिक लाभ उपभोक्ताओं को प्राप्त होते हैं। सहकारी आन्दोलन से उपभोक्ताओं को मुख्यतया निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं

1. उचित कीमत पर अच्छी किस्म की वस्तुओं की प्राप्ति – सहकारी भण्डार सीधे उत्पादकों से थोक मूल्य पर वस्तुएँ खरीदते हैं जिस कारण वे अपने सदस्यों को कम मूल्य पर वस्तुएँ देने में समर्थ होते हैं। साथ ही ‘सहकारी वितरण प्रणाली’ कम तोल, मिलावट, व्यापारियों द्वारा उपभोक्ताओं का शोषण आदि बुराइयों को दूर करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है।

2. बचत में वृद्धि – उपभोक्ताओं को वस्तुओं के उचित कीमत पर उपलब्ध होने के कारण उनकी बचत में वृद्धि होती जाती है। अपनी बचतों को उपभोक्ता अन्य उपयोगी कार्यों में लगा सकते हैं।

3. मध्यस्थों द्वारा शोषण में कमी – सहकारी उपभोक्ता भण्डारों की स्थापना से उपभोक्ताओं तथा उत्पादकों के मध्य सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण मध्यस्थों (दुकानदारों) द्वारा उपभोक्ताओं के किये जाने वाले शोषण में कमी हो जाती है।

4. सदस्यों में लाभ का वितरण – सहकारी भण्डारों को जो शुद्ध वार्षिक लाभ होता है उसके एक भाग को संचित कोष में डालकर शेष लाभ को सदस्यों में बाँट दिया जाता है। इससे सदस्यों की आय में वृद्धि होती है।

5. रहन-सहन के स्तर का उन्नत होना – उपभोक्ताओं को अच्छी वस्तुएँ उपलब्ध होने तथा उनकी बचत एवं आय में वृद्धि होने से उनका रहन-सहन का स्तर उन्नत हो जाता है।

6. महाजनों से छुटकारा – सहकारी साख समितियाँ अपने सदस्यों को कम ब्याज पर ऋण प्रदान करके उनकी महाजनों व साहूकारों के शोषण से रक्षा करती हैं।

7. सहकारी तथा सेवा – भावना का विकास-सहकारी संस्थाएँ अपने सदस्यों को संगठित करके उन्हें लोकतन्त्रीय ढंग से कार्य करने की शिक्षा प्रदान करती हैं। फिर इन संस्थाओं का प्रमुख उद्देश्य अपने सदस्यों की सेवा करना होता है न कि लाभ कमाना। इस दृष्टि से ये संस्थाएँ अपने सदस्यों में सेवा-भावना का विकास करती हैं।

8. सार्वजनिक हित के कार्य – सहकारी संस्थाएँ अपने संचित कोषों का पर्याप्त भाग पुस्तकालय, वाचनालय, क्लब आदि की स्थापना पर व्यय करती हैं। इससे सदस्यों (उपभोक्ताओं) के सामाजिक-कल्याण में वृद्धि होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
सहकारिता के पाँच आधारभूत सिद्धान्तों के नाम बताइए।
उत्तर:
सहकारिता के पाँच आधारभूत सिद्धान्तों के नाम हैं

  1. ऐच्छिक संगठन,
  2. लोकतन्त्रीय प्रबन्ध,
  3. पारस्परिक सहायता द्वारा आत्म-सहायता,
  4. एकता व भाई-चारे का सिद्धान्त तथा
  5. लाभ के न्यायोचित वितरण का सिद्धान्त।

प्रश्न 2
सहकारिता की पाँच विशेषताएँ बताइए। उत्तर सहकारिता की पाँच विशेषताएँ हैं

  1.  ऐच्छिक संगठन,
  2.  आर्थिक हितों की रक्षार्थ गठन,
  3.  लोकतन्त्रीय सिद्धान्त के आधार पर संचालन,
  4. सामूहिक प्रयासों द्वारा सामूहिक कल्याण तथा
  5. न्यायपूर्ण आधार पर लाभों का वितरण।।

प्रश्न 3
सहकारिता को परिभाषित कीजिए तथा उसकी चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सहकारिता ऐसे व्यक्तियों का ऐच्छिक संगठन है, जो समानता, स्व-सहायता तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था के आधार पर सामूहिक हितों के लिए कार्य करता है। सहकारिता की चार विशेषताएँ हैं

  1. यह एक ऐच्छिक संगठन है,
  2. यह लोकतन्त्रात्मक संगठन है,
  3. इसका प्रमुख उद्देश्य सेवा है न कि लाभ कमाना तथा
  4. यह समानता को बढ़ावा देती है।।

प्रश्न 4
पाँच प्रकार की सहकारी समितियों के नाम बताइए।
या
किन्हीं दो सहकारी समितियों के नाम लिखिए।
उत्तरं:
पाँच प्रकार की सहकारी समितियाँ निम्नलिखित हैं

  1.  सहकारी साख समितियाँ,
  2. बहु-उद्देशीय सहकारी समितियाँ,
  3. सहकारी बुनकर समितियाँ,
  4. सहकारी औद्योगिक समितियाँ तथा
  5. सहकारी उपभोक्ता समितियाँ (भण्डार)।।

प्रश्न 5
सहकारी उद्योग समितियों के बारे में आप क्या जानते हैं ? [2007]
उत्तर:
ग्रामीण कुटीर उद्योग एवं अन्य उद्योगों को बढ़ावा देने, उनसे सम्बन्धित कच्चा माल एवं मशीनें उपलब्ध कराने आदि की दृष्टि से भी सहकारी समितियों की स्थापना की गयी है। 30 जून, 1997 तक देश में कुल 67,449 औद्योगिक सहकारी समितियाँ थीं जिनकी सदस्य संख्या 54.12 लाख थी। वर्ष 1996-97 में इन समितियों ने ₹ 2,532.27 करोड़ का कारोबार किया। जुलाहों एवं बुनकरों के लिए माल की सुविधाएँ जुटाने एवं बिक्री के लिए सहकारी बुनकर समितियाँ बनायी गयी हैं। चमड़ा रेंगने, मिट्टी के बर्तन बनाने, फल व सब्जी को डिब्बों में बन्द करने एवं साबुन, तेल, गुड़ और ताड़ उद्योगों से सम्बन्धित सहकारी समितियाँ भी स्थापित की गयी हैं। सन् 1966 में राष्ट्रीय औद्योगिक सहकारी संघ की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य सहकारी समितियों के उत्पादों की बिक्री में सहायता करना है।

प्रश्न 6
दुग्ध वितरण सहकारी समितियों के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
दूध, मक्खन और घी की सुविधाएँ जुटाने के लिए सहकारी डेयरी समितियों की स्थापना की गयी है। ये समितियाँ किसानों को अधिक दूध उत्पन्न करने और आय बढ़ाने की सुविधाएँ प्रदान करती हैं। 30 जून, 1997 में 67,121 प्राथमिक दुग्ध आपूर्ति सहकारी समितियाँ थीं, जिनकी सदस्य-संख्या 84.5 लाख थी। सन् 1970 में डेयरी सहकारी समितियों का एक राष्ट्रीय परिसंघ बनाया गया, जिसका मुख्यालय आनन्द में है।

प्रश्न 7
सहकारी विपणन समितियों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने की दृष्टि से सहकारी विपणन समितियों की स्थापना की गयी है। भारतीय किसानों को उनकी अज्ञानता एवं गरीबी के कारण उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। वे न तो माल के गुण जानते हैं और न ही मण्डियों तक ले जाने में सक्षम होते हैं। उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए दलाल एवं महाजन उनसे कम कीमत पर माल खरीद लेते हैं। सहकारी विक्रय समितियों की स्थापना इस ओर एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जो किसानों की दलालों से रक्षा करती हैं और उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाती हैं। ‘सहकारी विपणन निगम इस प्रकार की समितियों को कई सुविधाएँ भी उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 8
सहकारी उपभोक्ता भण्डारों के क्या उद्देश्य होते हैं ? [2009]
उत्तर:
सहकारी उपभोक्ता भण्डारों के उद्देश्य हैं

  1.  उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर शुद्ध वस्तुएँ उपलब्ध कराना,
  2. मध्यस्थों के अनावश्यक लाभ समाप्त करना,
  3.  उचित वितरण प्रणाली स्थापित करना,
  4. मूल्य वृद्धि को रोकने में सहायता देना तथा
  5. उपभोक्ताओं में एकता की भावना उत्पन्न करना।

प्रश्न 9
ग्रामीण समाज में सहकारी समितियों के दो कार्यों को लिखिए। [2007, 10]
या
ग्रामीण भारत में सहकारी समितियों के किन्हीं दो उपयोगी योगदानों को बताइए। [2009, 10, 11]
उत्तर:
ग्रामीण समाज में सहकारी समितियों के निम्नलिखित दो कार्य हैं

1. ग्रामीण कृषि व्यवसाय में सुधार करना – सहकारी संयुक्त कृषि समितियों, सहकारी सामूहिक समितियों तथा सहकारी काश्तकार समितियों आदि के द्वारा ग्रामीण कृषि व्यवसाय में सुधार करने के प्रयास किये जाते हैं।

2. कारीगरों, श्रमिकों एवं उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाना – सहकारी समितियाँ केवल कृषकों को लाभ नहीं पहुँचाती, अपितु इनसे कारीगरों, श्रमिकों तथा उपभोक्ताओं को भी लाभ होता है।

प्रश्न 10
साख सहकारिताओं से आप क्या समझते हैं ? [2007, 14]
उत्तर:
ग्रामीण ऋणग्रस्तता को समाप्त करने के लिए ‘सहकारी ऋण समितियाँ अधिनियम पारित किया गया। इस समय विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियाँ देश में कार्यरत हैं, जिनमें सहकारी साख समितियों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें निम्नलिखित मुख्य हैं

  1. प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ – ये प्रमुख सहकारी साख समितियाँ हैं, जिनका मुख्य कार्य किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए उन्हें ऋण उपलब्ध कराना है। लगभग
    10 करोड़ कृषक इन समितियों के सदस्य हैं।
  2. सहकारी भूमि विकास बैंक – यह भी एक सहकारी साख समिति है, जिसका उद्देश्य कृषकों को लम्बी अवधि के लिए कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराना है। इसकी लगभग 1,700 शाखाएँ हैं। इसके अन्तर्गत केन्द्रीय विकास बैंक तथा प्राथमिक भूमि विकास बैंक किसानों की भूमि रहन रखकर ऋण उपलब्ध कराते हैं।

प्रश्न 11
सहकारी समितियों के असन्तोषजनक कार्यों के चार कारकों को लिखिए। [2013]
उत्तर:
सहकारी समितियों के असन्तोषजनक कार्यों के चार कारक निम्नलिखित हैं

  1. सहकारी समितियों के प्रबन्धकों ने अधिक कुशलता से कार्य नहीं किया है।
  2. सहकारी आन्दोलनों को सफल बनाने के लिए सरकार ने पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं करायी है।
  3. सरकार के विभिन्न विभागों में सहकारिता आन्दोलन को सफल बनाने के लिए जरूरी सामंजस्य का अभाव रहा है।
  4.  सहकारी समितियों के चुनावों ने ग्रामीणों में गुटबन्दी को उत्साहित कर इसके प्रभावशाली ढंग से कार्य करने में बाधा डाली है।

प्रश्न 12
भारत में सहकारी आन्दोलन की मन्द गति के दो कारण बताइए। [2016]
उत्तर:
भारत में सहकारी आन्दोलन की मन्द गति के दो कारण निम्नलिखित हैं

  1.  भ्रष्टाचार – यह सहकारी समितियों की प्रमुख समस्या है। इन समितियों के सदस्य निजी स्वार्थों की पूर्ति के कारण अपनी जिम्मेदारियों का सही प्रकार से निर्वहन नहीं करते हैं।
  2.  सदस्यों में बचत की आदत का अभाव – जब तक सदस्यों में बचत की आदत को विकसित नहीं किया जाएगा, तब तक सहकारी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता है।

प्रश्न 13
साख समितियों से आप क्या समझते हैं? [2012]
उत्तर:
सहकारी साख समितियाँ – सहकारी साख समितियों का गठन ग्रामवासियों को ऋणग्रस्तता से छुटकारा दिलाने के लिए किया गया है। इन समितियों द्वारा ग्रामवासियों को ऋण, चिकित्सा इत्यादि की सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। सहकारी साख समितियों अनेक प्रकार की होती हैं, जिनमें प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ तथा सहकारी भूमि विकास बैंक प्रमुख हैं। कृषि ऋण समितियाँ किसानों को ऋण उपलब्ध कराने का कार्य करती हैं, जबकि विकास ऋण पुराने ऋण चुकाने, कृषि में सुधार करने, अतिरिक्त सिंचाई साधन जुटाने हेतु दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराती है। सहकारी भूमि विकास बैंक दो प्रकार के होते हैं केन्द्रीय भूमि विकास बैंक तथा प्राथमिक भूमि विकास बैंक। पहले प्रकार के बैंक राज्य स्तर पर गठित किए जाते हैं, जबकि द्वितीय प्रकार के बैंक ग्राम स्तर पर होते हैं।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
सहकारिता का मुख्य आधार क्या है? [2012, 14]
उत्तर:
पारस्परिक जन सहयोग।

प्रश्न 2
भारत में सहकारी समितियाँ अधिनियम (को-ऑपरेटिव सोसाइटीज ऐक्ट) कब पारित हुआ था ? [2007]
उत्तर:
भारत में सहकारी समितियाँ अधिनियम 1912 ई० में पारित हुआ था।

प्रश्न 3
सहकारी साख-समितियाँ कितने प्रकार की होती हैं ? उनके नाम बताइए।
उत्तर:
सहकारी साख-समितियाँ दो प्रकार की होती हैं

  1. अल्पावधि ऋण देने वाली; जैसे‘प्राथमिक कृषि ऋण-समिति’ तथा
  2.  लम्बी अवधि के लिए ऋण देने वाली; जैसे ‘सहकारी भूमि विकास बैंक’।

प्रश्न 4
बहु-उद्देशीय सहकारी समितियाँ क्या होती हैं ?
उत्तर:
जो सहकारी समितियाँ अपने सदस्यों के साथ कई उद्देश्यों या आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं, वे बहुउद्देशीय सहकारी समितियाँ कहलाती हैं; जैसे – सदस्यों के हितार्थ ऋण, विपणन, खाद, बीज आदि की व्यवस्था।

प्रश्न 5
कृषि के क्षेत्र में सहकारिता के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
कृषि क्षेत्र में सहकारिता के दो लाभ ये हैं

  1. खेती करने की विधियों में सुधार तथा
  2. कृषि-वस्तुओं की बिक्री-व्यवस्था में सुधार।

प्रश्न 6
कृषि-कार्यों के लिए नलकूप तथा कुएँ लगाने के लिए ऋण कौन-सी समितियाँ देती
उत्तर:
कृषि-कार्यों के लिए नलकूप तथा कुएँ लगाने के लिए ऋण सहकारी सिंचाई समितियाँ देती हैं।

प्रश्न 7
सहकारी आन्दोलन की सफलता किस बात पर निर्भर है ?
उत्तर:
सहकारी आन्दोलन की सफलता जन-सहयोग पर निर्भर है।

प्रश्न 8
किसानों को उनकी उपज का समुचित मूल्य दिलवाने का काम कौन-सी सहकारी समितियाँ करती हैं ?
उत्तर:
किसानों को उनकी उपज का समुचित मूल्य दिलवाने का काम सहकारी विपणन (विक्रय) समितियाँ करती हैं।

प्रश्न 9
सहकारी भूमि विकास बैंक किसानों को किन कार्यों के लिए ऋण उपलब्ध कराते हैं ?
उत्तर:
सहकारी भूमि विकास बैंक किसानों को भूमि-सुधार, पुराने ऋणों को चुकाने एवं सिंचाई की सुविधा प्राप्त करने के लिए ऋण उपलब्ध कराते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
भारत में सहकारिता का प्रारम्भ निम्नलिखित में से किस वर्ष में हुआ ?
(क) सन् 1902 में
(ख) सन् 1904 में
(ग) सन् 1905 में
(घ) सन् 1907 में

प्रश्न 2
निम्नलिखित में से किसका सम्बन्ध सहकारिता से नहीं है ?
(क) सामाजिक संगठन
(ख) ऐच्छिक संगठन
(ग) लाभ का वितरण
(घ) सदस्यों का आर्थिक कल्याण

प्रश्न 3
किसानों के लिए अच्छे बीजों और उपकरणों की सुविधा कौन-सी समिति द्वारा दी जाती है?
(क) विक्रय समिति
(ख) औद्योगिक समिति
(ग) कृषि समिति
(घ) उपभोक्ता समिति

प्रश्न 4
सहकारी भूमि विकास बैंक किसानों को कौन-सा ऋण देने का कार्य करते हैं ?
(क) आवश्यकतानुसार
(ख) मध्यकालीन
(ग) अल्पकालीन
(घ) दीर्घकालीन

प्रश्न 5
प्रत्येक सबके लिए तथा सब प्रत्येक के लिए यह किसका मूल मंत्र है? [2012]
(क) श्रम दान का
(ख) भूदान का
(ग) सहकारिता का
(घ) इन सभी का

प्रश्न 6
ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक आवास प्रदान करने के लिए ‘समग्र आवास योजना’ कब प्रारम्भ की गयी।
(क) 1998 ई० में
(ख) 1999 ई० में
(ग) 2000 ई० में
(घ) 2001 ई० में

प्रश्न 7
भारत में सहकारी आन्दोलन का प्रमुख दोष है
(क) सरकारी सहायता पर निर्भरता
(ख) मूल्यों में वृद्धि
(ग) मध्यस्थों का अन्त
(घ) लाभ का समान वितरण

उत्तर:
1. (ख) सन् 1904 में,
2. (क) सामाजिक संगठन,
3. (ग) कृषि समिति,
4. (घ) दीर्घकालीन,
5. (ग) सहकारिता का,
6. (ख) 1999 ई० में,
7. (क) सरकारी सहायता पर निर्भरता।

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 5 Thinking

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 5 Thinking (चिन्तन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Psychology Chapter 5 Thinking (चिन्तन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Thinking
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 5 Thinking (चिन्तन)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
चिन्तन (Thinking) से आप क्या समझते हैं ? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। चिन्तन के विषयक में स्पीयरमैन द्वारा प्रतिपादित नियमों का भी उल्लेख कीजिए। चिन्तन से आप क्या समझते हैं?
या
चिन्तन का स्वरूप स्पष्ट कीजिए। (2009, 11, 12, 16)
या
चिन्तन को परिभाषित कीजिए। (2008)
उत्तर
जीवन के विकास क्रम में मनुष्य की सर्वोच्च स्थिति (पशुओं की तुलना में) बुद्धि, विवेक एवं चिन्तन जैसी उच्च मानसिक क्रियाओं के कारण है। पशु किसी चीज को देखकर उसका प्रत्यक्षीकरण कर पाते हैं, किन्तु मनुष्य उस वस्तु के अभाव में न केवल उसका प्रत्यक्षीकरण कर लेते हैं अपितु उसके विषय में पर्याप्त रूप से सोच-विचार भी सकते हैं। यह सोच-विचार या चिन्तन (Thinking) मनुष्य का ऐसा स्वाभाविक गुण है जिसकी बढ़ती हुई प्रबलता उसे अधिक-से-अधिक श्रेष्ठता की ओर उन्मुख करती है।

चिन्तन का अर्थ

कल्पना एवं प्रत्यक्षीकरण के समान ही चिन्तन भी एक महत्त्वपूर्ण ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है। जो वस्तुओं के प्रतीकों (Symbols) के माध्यम से चलती है। इस आन्तरिक प्रक्रिया में प्रत्यक्षीकरण एवं कल्पना दोनों का ही मिश्रण पाया जाता है। मनुष्य अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों का सामना करता है। कुछ परिस्थितियाँ सुखकारी होती हैं तो कुछ दु:खकारी। दुःखकारी परिस्थितियाँ समस्या पैदा करती हैं और उनका समाधान खोजने के लिए सर्वप्रथम मनुष्य विभिन्न मानसिक प्रयास करता है। दूसरे शब्दों में, शारीरिक रूप से प्रचेष्ट होने से पहले वह उस समस्या का समाधान अपने मस्तिष्क में खोजता है। इसके लिए मस्तिष्क उस समस्या के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत कर सम्बन्धित विचारों की एक श्रृंखला विकसित करता है। समुद्र की लहरों के समान एक के बाद एक विचार उठते हैं जिनके बीच से समस्या का सम्भावित समाधान प्रकट होता है। समस्या का समाधान मिलते ही चिन्तन की मानसिक प्रक्रिया रुक जाती है। अतएव चिन्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत कोई मनुष्य किसी समस्या का समाधान खोजता है।

चिन्तन की परिभाषा

मनोवैज्ञानिकों ने चिन्तन को निम्न प्रकार परिभाषित किया है

  1. जे०एस०रॉस के अनुसार, “चिन्तन ज्ञानात्मक रूप में एक मानसिक प्रक्रिया है।
  2. वुडवर्थ के शब्दों में, “किसी बाधा पर विजय प्राप्त करने का तरीका चिन्तन कहलाता है।”
  3. बी०एन० झा के मतानुसार, “चिन्तन एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें मन किसी विचार की गति को प्रयोजनात्मक रूप में नियन्त्रित एवं नियमित करता है।”
  4. रायबर्न के अनुसार, “चिन्तने ईच्छा सम्बन्धी वह प्रक्रिया है, जो असन्तोष के फलस्वरुप उत्पन्न होती है और प्रयास एवं त्रुटि के आधार पर उक्त इच्छा की सन्तुष्टि करती है।”
  5. वारेन के अनुसार, “चिन्तन एक विचारात्मक प्रक्रिया है, जिसका स्वरूप प्रतीकात्मक होता है। इसका प्रारम्भ व्यक्ति के समक्ष उपस्थित किसी समस्या अथवा क्रिया से होता है। इसमें प्रयास-मूल की क्रियाएँ निहित रहती है, किन्तु समस्या के प्रत्यक्ष प्रभाव से प्रभावित होकर चिन्तन प्रक्रिया अन्तिम रूप से समस्या समाधान की ओर उन्मुख होती है।”
  6. जॉनड्यूवी के अनुसार, “चिन्तन किसी विश्वास या अनुमानित ज्ञान का उसके आधारों एवं निष्कर्षों के माध्यम से सक्रिय सतत् तथा सतर्कतापूर्वक विचार करने की प्रक्रिया होती है।

    चिन्तन का स्वरूप

चिन्तन में व्यक्ति किन्हीं समस्याओं का हल अपने मस्तिष्क में खोजता है; अतएव वुडवर्थ नामक मनोवैज्ञानिक ने चिन्तन को मानसिक खोज (Mental Exploration) का नाम दिया है। हल खोजने की इस क्रियात्मक प्रक्रिया में प्रयास एवं भूल विधि के अन्तर्गत मन में कई प्रकार के विचार जन्म लेते हैं जिनमें से सर्वाधिक उपयुक्त विचार छाँटकर ग्रहण कर लिया जाता है। चिन्तन को प्रतीकात्मक व्यवहार (Symbolic Behaviour) इसलिए कहा जा सकता है, क्योकि यह प्रतीकों के प्रति प्रतिक्रिया है न कि प्रत्यक्ष वस्तु के प्रति। वस्तुओं का प्रत्यक्ष रूप से अभाव होने पर भी उनकी स्मृति/प्रतीक की उपस्थिति में चिन्तन का जन्म सम्भव है। इस दृष्टि से चिन्तन में अमूर्तकरण का भी सहयोग रहता है। चिन्तन प्रतीकों के मानसिक समायोजन (या प्रहस्तन) की क्रिया है जिसमें विचारों के विश्लेषण के साथ-साथ उनका संश्लेषण भी उपयोगी है। चिन्तन के दौरान व्यक्ति के मन में उपस्थित विचार क्रमबद्ध रूप से निहित रहते हैं तथा उन विचारों में एक तारतम्य एवं सम्बन्ध पाया जाता है। जैसे ही व्यक्ति के सम्मुख कोई समस्या उपस्थित होती है, चिन्तन का यह स्वरूप क्रियाशील हो जाता है। तथा विचार सम्बन्धी मानसिक प्रहस्तन के द्वारा व्यक्ति उपयुक्त हल खोज लेता है।

चिन्तन के विषय में स्पीयरमैन के नियम 

चिन्तन की जटिल प्रक्रिया में विश्लेषण और संश्लेषण और इस प्रकार पृथक्करण और संगठन ये दोनों प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। संश्लेषणात्मक दृष्टि से ज्ञान का संगठन होता है जिसका आधार स्मृति एवं कल्पनाएँ हैं। विश्लेषणात्मक दृष्टि से कल्पनाओं का आधार पृथक्करण है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्पीयरमैन द्वारा प्रतिपादित पृथक्करण सम्बन्धी नियमों का अध्ययन, चिन्तन की व्याख्या में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। स्पीयरमैन द्वारा पृथक्करण के दो मुख्य नियम बताये गये हैं
(I) सम्बन्धों का पृथक्करण तथा
(II) सह-सम्बन्धों का पृथक्करण।

(I) सम्बन्धों का पृथक्करण
सम्बन्धों का पृथक्करण चिन्तन के विषय में स्पीयरमैन द्वारा प्रतिपादित पहला नियम है। यह नियम बताता है कि चिन्तन की प्रक्रिया में जब किसी व्यक्ति के सामने कुछ वस्तुएँ रखी जाती हैं तो वह उनके बीच सम्बन्धों की खोज कर लेता है। इन सम्बन्धों का आधार आकार, निकटता व दूरी आदि होते हैं। ये सम्बन्ध ‘वास्तविक सम्बन्ध हैं।

वास्तविक सम्बन्ध–प्रमुख वास्तविक सम्बन्धों के आधार निम्नलिखित हैं

(1) गुण– प्रत्येक वस्तु का अपना एक विशेष गुण होता है और इस गुण के साथ ही वस्तु का वास्तविक सम्बन्ध बोध होता है। नींबू खट्टा होता है। खट्टापन नींबू का विशेष गुण है तथा नींबू व खट्टेपन में एक ऐसा वास्तविक सम्बन्ध है जिसे किसी भी दशा में पृथक् नहीं किया जा सकता।

(2) कालगत सम्बन्ध- कालगत सम्बन्ध वस्तुओं के बीच समय का वास्तविक सम्बन्ध है। राम प्रतिदिन 9.30 बजे प्रात: स्कूल के लिए रवाना होता है। 9.30 बजते ही उसके मन में चलने का विचार आ जाता है। यह 9.30 बजे तथा स्कूल चलने का कालगत सम्बन्ध है।

(3) स्थानगत सम्बन्ध- कुछ वस्तुएँ एक ही स्थान पर साथ-साथ पायी जाती हैं। उदाहरणार्थ-फाउण्टेन पेन और उसका ढक्कन एक ही जगह साथ-साथ मिलते हैं। अब जब वस्तुएँ स्थान के आधार पर सम्बन्धित हों तो यह विशेष सम्बन्ध होता हैं।

(4) कार्य-कारण सम्बन्ध– प्रत्येक क्रिया किसी-न-किसी कारणवश होती है। यदि वर्षा हो रही है तो आसमान में बादल अवश्य होंगे। बादल वर्षा का कारण है। इस भॉति किसी घटना को उसके कारण-विशेष से वास्तविक सम्बन्ध कार्य कारण सम्बन्ध कहलाएगा।

(5) वस्तुगत सम्बन्ध– हिमालय की ऊँची चोटियों पर चाँदी जैसी बर्फ चमक रही है। यहाँ पहाड़ की चोटी तथा बर्फ में वस्तुगत वास्तविक सम्बन्ध बोध होता है। |

(6) निर्माणात्मक सम्बन्ध- किसी भी वस्तु का निर्माण अन्य सहायक सामग्रियों द्वारा होता है। इस प्रकार निर्माणक एवं निर्मित वस्तु के मध्ये एक अभिन्न तथा वास्तविक सम्बन्ध पाया जाता है। कुर्सी का लकड़ी से तथा घड़े का मिट्टी से वास्तविक सम्बन्ध है।

विचारात्मक सम्बन्ध–विचारात्मक सम्बन्ध हृदयगत एवं आन्तरिक होते हैं। इनके निम्नलिखित आधार हो सकते हैं

  1. समानता—इसके अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं में गुणों की समानता के आधार पर चिन्तन का जन्म होता है।
  2. समीपता-वस्तुओं के समीप रहने पर उनमें सम्बन्ध बोध होता है; जैसे–चाँद-तारा।
  3. पूर्वपक्ष एवं निष्कर्ष-पूर्वपक्ष एवं निष्कर्ष के बीच विचारात्मक सम्बन्ध पाया जाता है। रात के समय कुत्ते के लगातार भौंकने का सम्बन्ध किसी अजनबी वस्तु या व्यक्ति की उपस्थिति से होता है। यहाँ कुत्ते का भौंकना पूर्वपक्ष है तथा अजनबी विषय-वस्तु की उपस्थिति का बोध निष्कर्ष है।
  4. नियोजनात्मक सम्बन्ध-कुछ सम्बन्ध नियोजन के आधार पर होते हैं। बहन और भाई के मध्य नियोजनात्मक सम्बन्ध है।

(II) सह-सम्बन्धों का पृथक्करण

स्पीयरमैन के अनुसार, सह-सम्बन्धों के पृथक्करण की प्रक्रिया को सरल बनाने की दृष्टि से किसी शब्द को सम्बन्ध के संकेत के साथ उपस्थित किया जाना आवयश्यक है। उदाहरण के तौर पर–यदि कहें कि गाजर का रंग लाल है और मूली का रंग? तो उत्तर मिलेगा-सफेद। इसी प्रकार मिर्च तीखी है और चीनी? तो उत्तर होगा-मीठी। मिलने वाला उत्तर सह-सम्बन्धों के पृथक्करण पर आधारित होता है।

प्रश्न 2
वैध चिन्तन’ से क्या तात्पर्य है? वैध चिन्तन के लिए अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
या
वैध चिन्तन की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ बताइए।  (2018)
उत्तर

 वैध चिन्तन का आशय

यदि चिन्तन की प्रक्रिया के परिणामतः निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति हो जाती है तो उसे ‘वैध चिन्तन (Valid Thinking) कहा जाएगा। सामान्यतः चिन्तन का निर्धारित लक्ष्य किसी समस्या-विशेष का समाधान खोजना होता है; अतः सफल या प्रामाणिक चिन्तन वह चिन्तन है, जिसमें समस्या का हल निकल आये। प्रामाणिक चिन्तन, सभी भाँति तटस्थ एवं बाह्य प्रभावों से मुक्त होता है। हमें जानते हैं कि

आत्मगत सुझावों, संवेगों तथा अन्धविश्वासों से युक्त चिन्तने दोषपूर्ण हो जाता है। दोषपूर्ण चिन्तन की वैधता एवं उपयोगिता समाप्त हो जाती है। वैध, प्रामाणिक एवं दोषमुक्त चिन्तन के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

चिन्तन की अनुकूल परिस्थितियाँ या प्रभावित करने वाली दशाएँ। अच्छे चिन्तन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ या प्रभावित करने वाली दशाएँ निम्नलिखित हैं

(1) सबल प्रेरणा (Strong Motivation)– चिन्तन की प्रक्रिया को शुरू करने के लिए प्रेरणा बहुत आवश्यक है। प्रेरणा की अनुपस्थिति में दोषमुक्त एवं व्यवस्थित चिन्तन सम्भव नहीं है। वस्तुतः चिन्तन की शुरुआत किसी समस्या से होती है। यह समस्या चिन्तन के लिए स्वत: ही एक प्रेरणा का कार्य करती है। व्यक्ति का सम्बन्ध समस्या से जितना, गहरा होगा, वह उसके समाधान हेतु उतनी ही गम्भीरता से कार्य करेगा। बाहरी प्रेरणाएँ जितनी अधिक सबल होंगी, चिन्तन भी उतना ही अधिक प्रबल होगा। इस प्रकार, प्रामाणिक चिन्तन के लिए सबल प्रेरणाएँ पर्याप्त रूप से सहायक समझी जाती हैं।

(2) रुचि (Interest)– रुचि, चिन्तन को प्रभावित करने वाली एक मुख्य दशा है। रुचि होने पर व्यक्ति सम्बन्धित समस्या के समाधान हेतु पूर्ण मनोयोग से प्रयास करता है। अपनी आदत के मुताबिक अरोचक विषयों से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु चिन्तन करने के लिए या तो व्यक्ति प्रचेष्ट ही नहीं होगा और यदि अनमने मन से चेष्टा करेगा भी तो उसे पूर्ण नहीं करेगा।

(3) अवधान (Attention)- चिन्तन के पूर्व और चिन्तन की प्रक्रिया के दौरान सम्बन्धित समस्या की ओर व्यक्ति का अवधान (ध्यान) होना चाहिए। समस्या पर अवधान केन्द्रित न होने से चिन्तन करना सम्भव नहीं हो पाता।

(4) बुद्धि (Intelligence)– चिन्तन का बुद्धि से सीधा सम्बन्ध है। चिन्तन एक बौद्धिक या मानसिक प्रक्रिया है; अतः बुद्धि का क्षेत्र या मात्रा चिन्तन में सहायक होती है। बुद्धि से सम्बन्धित तीनों पक्ष-अन्तर्दृष्टि, पूर्वदृष्टि तथा पश्चात् दृष्टि के सम्यक् एवं समन्वित प्रयोग से चिन्तन की सफलता सुनिश्चित होती है। देखने में आया है कि अधिक बुद्धिमान व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक सफल चिन्तक बन जाता है।

(5) सतर्कता (Vigilence)- वैध चिन्तन के लिए सतर्कता एक अनुकूल दशा है। चिन्तन के दौरान सतर्कता बरतने से भ्रान्त धारणाओं तथा गलतियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा सतर्कता नवीन उपायों तथा विधियों का भी ज्ञान कराती है, जिन्हें आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है।

(6) लचीलापन (Flexibility)– चिन्तन में लचीलापन अनिवार्य है। व्यक्ति की मनोवृत्ति में लचीलापन रहने से चिन्तन में स्वतन्त्रता आती है। रूढ़िगत एवं अन्धविश्वास से युक्त चिन्तन संकुचित एवं सीमित रह जाता है। चिन्तन में देश-काल एवं पात्रानुसार परिवर्तन आने चाहिए। स्पष्टतः यह चिन्तन में लचीलेपन के गुण से ही सम्भव है। |

(7) पर्याप्त समय (Enough Time)– चिन्तन के लिए समय की पाबन्दी लगाना उचित नहीं है। चिन्तन करते समय चिन्तक को यह ज्ञात नहीं रहता कि उसे किसी समस्या पर विचार करने में कितना समय लगेगा। अतः चिन्तन में स्वाभाविकता लाने के लिए समय की सीमा कठोर नहीं होनी चाहिए। चिन्तन के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध रहना चाहिए।

(8) गर्भीकरण (Incubation)– गर्भीकरण अथवा सेने से अण्डे में बच्चा तैयार हो जाता है। जो समयानुसार पूर्ण रूप में आसानी से बाहर आ जाता है। गर्भीकरण का विचार चिन्तन की मानसिक प्रक्रिया के लिए एक अनुकूल दशा है। कभी-कभी लगातार एवं अवधानपूर्ण चिन्तन के बावजूद भी समस्या का समुचित हल नहीं निकल पाता। ऐसी दशा में चिन्तन के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए और उसे कुछ समय के लिए स्थगित कर देना चाहिए। इसे मानसिक विश्राम भी कहते हैं। गर्भीकरण की क्रिया में व्यक्ति समस्या से बेखबर अन्य कार्यों में उलझा रहता है। उसका मस्तिष्क समस्या को सेता रहता है। उचित समय पर समस्या का हल स्वतः ही मस्तिष्क में उभर आता है।

चिन्तन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ

जिस प्रकार वैध चिन्तन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं, उसी प्रकार कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं जो अच्छे चिन्तन को ऋणात्मक के रूप से प्रभावित करती हैं तथा उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती हैं। इस तरह की परिस्थितियाँ चिन्तन को मैला करती हैं; अत: वैध चिन्तन के लिए इनसे बचाव अनिवार्य है।

चिन्तन एक महत्त्वपूर्ण मानसिक प्रक्रिया है जो न केवल समस्या-समाधान की ओर उन्मुख होती। है अपितु व्यक्ति की अभिवृत्तियों तथा गहराई से परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि प्रारम्भ से मानव को प्रगति और अधोगति, रीति-रिवाज तथा अन्धविश्वास शुद्ध चिन्तन के स्रोत को प्रदूषित करते हैं।

इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति किन्हीं पूर्वाग्रहों से ग्रसित होगा या उसका रवैया किसी वस्तु/व्यक्ति विशेष के लिए पक्षपातपूर्ण होगा तो इसका विपरीत असर चिन्तन पर अवश्य पड़ेगा। भावुक व्यक्तियों का चिन्तन किसी एक दिशा में प्रवाहित हो जाता है, सम्भव है वह भ्रामक या त्रुटिपूर्ण दिशा हो। गलत सुझाव भी चिन्तन को विकासग्रस्त बना देते हैं।

चिन्तन में वस्तुओं की वास्तविक उपस्थिति जरूरी नहीं होती, बल्कि हम उस वस्तु या उद्दीपक का कुछ प्रतीक (Symbols) तथा प्रतिमाएँ (Images) मन में बना लेते हैं और उन्हीं के आधार पर चिन्तन करते हैं। दोषपूर्ण प्रतीक या प्रतिमाएँ दोषपूर्ण चिन्तन को जन्म दे सकती हैं।

चिन्तन की वैधता संप्रत्ययों की वैधता पर भी निर्भर करती है। संप्रत्यय जितने ही सरल तथा स्पष्ट होते हैं, चिन्तन उतना ही सरल होता है। जटिल और विशिष्ट संप्रत्ययों से सम्बन्धित चिन्तन अधिक स्पष्ट नहीं होता है।

स्पष्टतः चिन्तन के उपकरण; यथा—पदार्थ, संकेत, प्रतीक, प्रतिमा तथा संप्रत्यय; अपनी जटिलता, अस्पष्टता या दोषों के कारण वैध चिन्तन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकते हैं।

प्रश्न 3
व्यक्ति के चिन्तन में भाषा की क्या भूमिका है? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। (2009)
या
चिन्तन की प्रक्रिया में भाषा के स्थान एवं योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
यह सत्य है कि चिन्तन की विकसित प्रक्रिया केवल मनुष्यों में ही पायी जाती है अर्थात् केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो व्यवस्थित चिन्तन करता है तथा उससे लाभान्वित भी होता है। मनुष्यों द्वारा चित्तने की उन्नत प्रक्रिया को सम्पन्न करने में सर्वाधिक योगदान भाषा का है। विकसित भाषा भी मनुष्य की ही एक मौलिक क्षमता है। मनुष्यों के अतिरिक्त किसी अन्य प्राणी को विकसित भाषा की क्षमता उपलब्ध नहीं है।

भाषा एक ऐसा प्रबल एवं व्यवस्थित माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों का आदान-प्रदान किया करते हैं तथा सभी सामाजिक अन्तक्रियाएँ स्थापित किया करते हैं। भाषा का मुख्य रूप शाब्दिक ही होता है तथा भाषा में विभिन्न प्रतीकों को प्रयोग किया जाता है। जहाँ तक चिन्तन की प्रक्रिया का प्रश्न है, इसमें भी भाषा द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। वास्तव में, चिन्तन की प्रक्रिया को हम आत्म-भाषण या आन्तरिक सम्भाषण भी कह सकते हैं।

चिन्तन में भाषा की भूमिका मानवीय चिन्तन अपने आप में एक अत्यधिक तथा विकसित प्रक्रिया है। मानवीय चिन्तन में भाषा की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

चिन्तन में भाषा की भूमिका का विवरण निम्नलिखित 

(1) निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हमारी चिन्तन की प्रक्रिया सदैव शब्दों अथवा भाषा के माध्यम से सम्पन्न होती है। मॉर्गन तथा गिलीलैण्ड ने इससे सम्बन्धित परीक्षण किये तथा स्पष्ट किया कि चिन्तन में भाषा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भाषा में चिह्नों का प्रयोग होता है तथा ये विचारों के माध्यम की भूमिका निभाते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि शब्द-विन्यास विचारों के संकेत के रूप में भूमिका निभाते हैं।

(2) चिन्तन की प्रक्रिया में स्मृति की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। जहाँ तक व्यक्ति के विचारों की स्मृति का प्रश्न है, उसके निर्माण का कार्य भी भाषा द्वारा होता है। व्यक्ति के विचार उसके मस्तिष्क में मानसिक संस्कारों के रूप में स्थान ग्रहण कर लेते हैं तथा जब कभी आवश्यकता पड़ती है तो यही मानसिक संस्कार भाषा के आधार पर सरलता से याद कर लिये जाते हैं।

(3) जहाँ तक चिन्तन की प्रक्रिया की अभिव्यक्ति का प्रश्न है, उसमें भी भाषा की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। व्यक्ति द्वारा किये गये चिन्तन की अभिव्यक्ति भी भाषा के ही माध्यम से होती है। व्यक्ति अपने विचारों को अन्य व्यक्तियों के सम्मुख सदैव भाषा के ही माध्यम से प्रस्तुत करता है।समाज में व्यक्तियों के विचारों का आदान-प्रदान भी भाषा के ही माध्यम से होता है। कोई भी व्यक्ति अपने विचारों को लिखित भाषा के माध्यम से संगृहीत कर सकता है। चिन्तन की प्रक्रिया विचारों के माध्यम से चलती है तथा विचार भाषा के माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि चिन्तन में भाषा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

(4) चिन्तन की प्रक्रिया को कम समय में पूर्ण होने में भी भाषा का सर्वाधिक योगदान होता है। भाषा द्वारा विचारों की विस्तृत श्रृंखला को सीमित रूप प्रदान किया जा सकता है। इस प्रकार चिन्तन की प्रक्रिया को भी सीमित बनाया जा सकता है।

(5) चिन्तन तथा भाषा में अन्योन्याश्रिता का भी सम्बन्ध है। जहाँ एक ओर चिन्तन की प्रक्रिया में भाषा का योगदान है वहीं दूसरी ओर भाषा के विकास में भी चिन्तन द्वारा उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया जाता है। व्यक्ति के विचारों के समृद्ध होने के साथ-साथ चिन्तन का विकास होता है तथा चिन्तन एवं विचार के विकास का भाषा के विकास पर भी विशेष प्रभाव पड़ता है।

(6) हम जानते हैं कि समस्त साहित्य की रचना भाषा के माध्यम से हुई है। सम्पूर्ण साहित्य व्यक्ति को चिन्तन के लिए प्रेरित करता है तथा साहित्य-अध्ययन के माध्यम से व्यक्ति की चिन्तन-क्षमता का भी विकास होता है। इस दृष्टिकोण से भी चिन्तन के क्षेत्र में भाषा का योगदान उल्लेखनीय है।

प्रश्न4
चिन्तन की प्रक्रिया के तत्वों के रूप में प्रतिमाओं एवं प्रतीकों का सामान्य परिचय दीजिएतथा चिन्तन की प्रक्रिया में इनके योगदान को भी स्पष्ट कीजिए। चिन्तन की प्रक्रिया के सन्दर्भ में प्रत्यय-निर्माण की प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिए।
या
चिन्तन में प्रत्ययों तथा प्रतिमाओं की क्या भूमिका है? (2008)
उत्तर

प्रतिमाएँ और प्रतीक

चिन्तन एकं जटिल मानसिक प्रक्रिया है जिसमें प्रत्यक्ष, प्रतिमा, प्रत्यय तथा प्रतीक इत्यादि तत्त्वों का प्रहस्तन होता हैं। इन समस्त तत्त्वों की चिन्तन की प्रक्रिया में विशिष्ट भूमिका रहती है। सच तो यह है कि चिन्तन की वास्तविक प्रक्रिया इन्हीं तत्त्वों के माध्यम से चलती है। अपने संक्षिप्त परिचय के साथ चिन्तन में इनका योगदान निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत है

(1) प्रतिमा (Images)- वास्तविक या प्रत्यक्ष वस्तु के सामने से हट जाने पर भी जब उसके गुणों का अनुभव ज्ञानेन्द्रियाँ करती हैं तो इसे हम ‘प्रतिमा’ कहते हैं। ‘प्रतिमा’ वास्तविक उत्तेजक की अनुपस्थिति में ही बनती है। व्यक्ति के भूतकालीन अनुभव प्रतिमाओं के रूप में उसके मस्तिष्क में विद्यमान रहते हैं। आँखों के सम्मुख रखी सुन्दर तस्वीर की सूचना दृष्टि स्नायुओं द्वारा मस्तिष्क को पहुँचायी गयी और हमने उसका प्रत्यक्षीकरण कर लिया। एकान्त में बाँसुरी की मीठी तान की सूचना मस्तिष्क को मिली और हमने उस ध्वनि का प्रत्यक्षीकरण कर लिया।

किसी ने अचानक ही तस्वीर को आँखों के सामने से हटा लिया और बाँसुरी की आवाज भी आनी बन्द हो गयी। तस्वीर सामने न होने पर भी उसकी शक्ल कुछ समय तक आँखों के सामने छायी रहती है। इसी प्रकार बाँसुरी बन्द होने पर भी उसकी आवाज कानों में कुछ समय तक गूंजती रहती है। यह बाद तक चल रही तस्वीर की शक्ल तथा बाँसुरी की गूंज प्रतिमा है। प्रतिमाएँ कई प्रकार की हो सकती हैं; जैसे-दृश्य, श्रवण, स्वाद, स्पर्श तथा गन्ध से सम्बन्धित प्रतिमाएँ। मानस पटल पर प्रतिमाओं की स्पष्टता इस बात पर निर्भर करती है। कि उससे सम्बन्धित घटना या तथ्य हमारे जीवन को कितनी गहराई तक प्रभावित कर पाये। गहरे प्रभाव स्पष्ट प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं।

चिन्तन की प्रक्रिया में प्रतिमा का योगदान– चिन्तन की प्रक्रिया में प्रतिमाओं का काफी योगदान रहता है। पूर्व-अनुभव तो यथावत् मस्तिष्क में नहीं रहते, किन्तु उनके अभाव में मानसिक प्रतिमाएँ अवश्य रहती हैं। व्यक्ति की समस्त चिन्तन इन प्रतिमाओं के इर्द-गिर्द ही चलता रहता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का मत है कि चिन्तन में प्रतिमाएँ अनिवार्य नहीं हैं और न ही ये चिन्तन में अधिक सहायता ही कर पाती हैं। लोग प्रतिमाओं के स्थान पर प्रतीकों का प्रयोग कर लेते हैं।

(2) प्रतीक (Symbols)- प्रतीक’ वास्तविक वस्तु के स्थानापन्न के रूप में कार्य करते हैं। वास्तविक वस्तु के अभाव में मस्तिष्क में उसका ध्यान दो प्रकार से आता है—प्रथम, प्रतिमा के रूप में जब मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों के सम्मुख वस्तु का स्थूल रूप ही प्रतीत हो रहा हो और द्वितीय, प्रतीक के रूप में जो उस वस्तु का सूक्ष्म प्रतिनिधित्व करता हो। ज्यादातर विचार-प्रक्रिया के अन्तर्गत वस्तु की प्रतिमा मस्तिष्क में न आने पर उसके प्रतीक को प्रयोग कर लिया जाता है। उदाहरणार्थ–किसी व्यक्ति या वस्तु का नाम एक प्रतीक है जो उसकी अनुपस्थिति में सूक्ष्म प्रतिनिधित्व कर उसका बोध करा देता है। क्रॉसिंग पर लाल बत्ती रुकने तथा हरी बत्ती चलने का प्रतीक है। किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में ये प्रतीक चिह्नों में बदल जाते हैं; जैसे—-गणित में *, , +, –, ×, ÷ ,—,= आदि के चिह्न प्रयोग में आते हैं।

चिन्तन की प्रक्रिया में प्रतीक का योगदान–प्रतीक चिन्तने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रतीक और चिह्न चिन्तन में मिलकर एक साथ कार्य करते हैं तथा इनके माध्यम से चिन्तन के किसी कार्य को सुगमता एवं शीघ्रता से पूरा कर लिया जाता है। उदाहरण के तौर पर विचार (चिन्तन) करते समय एक नजदीक के रिश्तेदार ‘मोहन’ का प्रसंग आता है तो उसकी अनुपस्थिति में उसका नाम ‘मोहन’ ही प्रतीक रूप में मस्तिष्क में होगा। यूँ तो दुनिया में न जाने कितने मोहन हैं, किन्तु यहाँ उस समय ‘मोहन’ एक विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है।

प्रतीक सरल, संक्षिप्त तथा साधारण विचारों के प्रतिनिधि होते हैं; यथा—लाल रंग से बना क्रॉस का निशान (अर्थात् ‘+’) रेडक्रॉस संस्था तथा चिकित्सकों का प्रतीक है। एक विशेष प्रकार की घण्टी/सायरन की लगातार आवाज के साथ दमकल की गाड़ी का भागना आग लगने का प्रतीक है और यह आग से सम्बन्धित चिन्तन को जन्म देता है। इसी भॉति चिह्न चिन्तन की क्रियाओं में सहायता करते हैं; यथा” का अर्थ है भाग देना तथा A का अर्थ है A X A X  A। वस्तुतः चिन्तन की प्रक्रिया प्रतीकों के माध्यम से संचालित होती है। प्रतीक व चिह्न चिन्तन के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करते हैं तथा इनके प्रयोग से समय और शक्ति की काफी बचत होती है।

प्रत्यय प्रत्यय चिन्तन की पहली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया भिन्न-भिन्न वस्तुओं, अनुभवों, घटनाओं तथा परिस्थितियों के मध्य समानाताओं का प्रतिनिधित्व करती है। प्रत्यय एक प्रकार से सामान्य विचार हैं। जिनका जन्म चिन्तन द्वारा ही होता है और जो जन्म के पश्चात् पुन: चिन्तन की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण योग देने लगते हैं। हमारे चारों तरफ के वातावरण में उपस्थित जितनी भी वस्तुओं का हमें बोध होता है, उतने ही प्रत्यय हमारे मस्तिष्क में बनते हैं। इस प्रकार, प्रत्ययों का सम्बन्ध हमारे मस्तिष्क में बने संस्कारों से होता है। हमारे मस्तिष्क में अगणित वस्तुओं के संस्कार एवं प्रत्यय निर्मित होते हैं।

उदाहरणार्थ-कागज, कलम, कुर्सी, पलंग, गाय, नारी, वृद्ध, मृत्यु, नैतिकता आदि-आदि के स्वरूप, रूप-रंग, गुण एवं आधार की एक प्रतिछाया मस्तिष्क में उपस्थित रहती है। किसी भी वस्तु या पदार्थ का एक सामान्य शब्द किसी-न-किसी प्रत्यय का प्रतिनिधित्व अवश्य करता है। उस शब्द को सुनते ही वस्तु की सम्पूर्ण जाति के गुण हमारे ध्यान में आ जाते हैं। प्रारम्भ में तो ये प्रत्यय अधिक विकसित नहीं होते, किन्तु व्यक्ति की आयु वृद्धि के साथ-साथ प्रत्ययों में अन्य अर्थ भी सम्मिलित होने लगते हैं और इस भाँति प्रत्यय का स्वरूप अधिक विस्तृत एवं व्यापक हो जाता है। विद्वानों के अनुसार, ये प्रत्यय चिन्तन की प्रक्रिया के आवश्यक तत्त्व हैं।

प्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया मानव-मस्तिष्क में प्रत्यय का निर्माण एकदम नहीं हो जाता, अपितु प्रत्यय विशिष्ट मानसिक प्रक्रियाओं द्वारा निर्मित एवं विकसित होते हैं।

प्रत्यय निर्माण की मुख्य प्रक्रियाएँ निम्नलिखित 

(1) प्रत्यक्षीकरण (Perception)- प्रत्यय निर्माण की पहली सीढ़ी विभिन्न विषय-वस्तुओं का प्रत्यक्षीकरण है। प्रत्ययन (Conception) की शुरुआत ही प्रत्यक्षीकरण (Perception) से होती है। बच्चा अपने जीवन के प्रारम्भ में विभिन्न वस्तुओं तथा तत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण करता है, किन्तु सिर्फ

एक वस्तु या तत्त्व का प्रत्यक्ष कर लेने (देखने) से ही प्रत्यय का निर्माण नहीं हो जाता। माना, बच्चे से एक चिड़िया देखी जिसका एक निश्चित रूप उसके मानस-पटल पर अंकित हो गया। इसके बाद वह कई प्रकार की छोटी-बड़ी, अनेक रंगों वाली, आवाजों वाली चिड़ियाँ देखता है। अनेक बार यह प्रक्रिया दोहराने पर पक्षी के स्मृति-चिह्न स्थायी एवं प्रबल होते जाएँगे। इस भॉति किसी विषय-वस्तु के प्रत्यक्षीकरण का विकास होता है और उसमें व्यापकता आती है।

(2) विश्लेषण (Analysis)- प्रत्यय निर्माण का द्वितीय चरण विशिष्ट प्रत्ययों के गुणों का विश्लेषण करना है। बच्चा जिस वस्तु का भी प्रत्यय बनाता है उसके प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में सम्बन्धित गुणों का विश्लेषण भी करता है। उदाहरणार्थ-चिड़िया का विशिष्ट रूप, उसकी चोंच की बनावट, उसका रंग, बोलने का ढंग, फुदकने तथा उड़ने का तरीका; इन सबका विश्लेषण वह मस्तिष्क से करता है।

(3) तुलना (Comparison)- विश्लेषण के बाद, बच्चा प्रत्यक्षीकरण की जाने वाली वस्तु के गुणों की तुलना, उसी जाति की अन्य वस्तुओं से करता है। वह उनके बीच समानता एवं विभिन्नता के बिन्दुओं की खोज करता है। उदाहरण के लिए सामान्य चिड़िया और मोर दोनों ही पक्षी हैं। दोनों की आकृति तो कुछ-कुछ मिलती है लेकिन मोर सामान्य चिड़िया से काफी बड़ा है, पीछे लम्बे-लम्बे सुन्दर मोर-पंख भी हैं, मोर नाचता है और नाचते समय मोर-पंखों की छत्र जैसी विशेष आकृति सामान्य पक्षियों में नहीं मिलती।।

(4) संश्लेषण (Synthesis)– विश्लेषण तथा तुलना के उपरान्त एक ही जाति के कई वस्तुओं के समान गुणों का संश्लेषण किया जाता है। एक जैसे गुणों का सामान्यीकरण करके उस वस्तु के जातीय गुणों के आधार पर सम्बन्धित वस्तु का एक रूप मस्तिष्क में धारण कर लिया जाता है।

(5) नामकरण (Naming)- किसी वस्तु का कोई विशेष रूप मस्तिष्क द्वारा धारण कर लेने के उपरान्त उसे एक खास नाम प्रदान किया जाता है। प्रत्यय का नाम उसका प्रतीक होता है।प्रत्यय निर्माण की यह प्रक्रिया बाल्यावस्था से शुरू होती है तथा नये-नये अनुभव प्राप्त करने तक चलती रहती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
चिन्तन की प्रक्रिया की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
चिन्तन की प्रक्रिया की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. चिन्तन की प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें अनेक मानसिक प्रक्रियाएँ निहित होती हैं। चिन्तन की प्रक्रिया का ज्ञानात्मक पक्ष सर्वाधिक विकसित होता है।
  2. चिन्तन की प्रक्रिया स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होती है।
  3. चिन्तन की प्रक्रिया में संश्लेषण तथा विश्लेषण की क्रियाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
  4. किसी समस्या के उत्पन्न होने की स्थिति में ही चिन्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।
  5. चिन्तन की प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति का मस्तिष्क विशेष रूप से क्रियाशील रहता है।
  6. चिन्तन की प्रक्रिया में भाषा के साथ-ही-साथ प्रत्ययों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका तथा योगदान होता है।
  7. चिन्तन की प्रक्रिया के माध्यम से सम्बन्धित समस्या का समाधान प्राप्त कर लिया जाता है।
  8. चिन्तन की प्रक्रिया अपने आप में उद्देश्यपूर्ण होती है। इस स्थिति में चिन्तन की प्रत्येक प्रक्रिया किसी-न-किसी प्रेरणा से प्रभावित होती है।

प्रश्न 2
चिन्तन के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं? 
(2011, 12, 16, 18)
उत्तर
चिन्तन के मुख्य प्रकारों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है-

(1) प्रत्यक्षात्मक चिन्तन– सर्वाधिक रूप से सरल एवं निम्न स्तर के इस चिन्तन में चिन्तन का विषय (वस्तु) सम्मुख होने पर ही उसके विषय में चिन्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कुतुबमीनार को देखकर उसके विषय में उठने वाले विचारों की श्रृंखला को प्रत्यक्षात्मक चिन्तन कहा जाएगा।

(2) कल्पनात्मक चिन्तन- कल्पनात्मक चिन्तन में प्रत्ययों तथा प्रतिमाओं के आधार पर भावी जीवन, विषयों एवं परिस्थितियों पर विचार किया जाता है। इस भाँति यह कल्पनाप्रधान चिन्तन है। उदाहरणार्थ-कोई शासक या नेता अपने देश की भावी उन्नति के लिए कल्पनात्मक चिन्तन के आधार पर योजनाएँ तैयार करता है।

(3) प्रत्ययात्मक चिन्तन– प्रत्ययों, प्रतिमाओं तथा भाषा के आधार पर चलने वाला चिन्तन प्रत्ययात्मक चिन्तन होता है। इसमें पूर्व-अनुभवों की प्रधानता नहीं होती। उदाहरण के लिए—मन में किसी मकान का विचार आने पर चिन्तन किसी विशेष मकान से नहीं जुड़ता; यह सिर्फ एक सामान्य मकान से सम्बन्धित होता है और यह कोई भी सामान्य मकान हो सकता है।

(4) तार्किक चिन्तन– तार्किक चिन्तन किसी गम्भीर समस्या को लेकर पैदा होता है। कोई गम्भीर समस्या उपस्थित होने पर एक जटिल प्रकार के चिन्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है जिसमें समस्त प्रकार के चिन्तनों का प्रयोग होता है। इस प्रकार समस्या का हल खोज लिया जाता है।

प्रश्न 3
सृजनात्मक चिन्तन की महत्त्वपूर्ण अवस्थाएँ बताइए। (2017)
उत्तर
चिन्तन के एक विशिष्ट रूप को सृजनात्मक अथवा रचनात्मक चिन्तन के रूप में जाना जाता है। सृजनात्मक चिन्तन उन्नत प्रकार का चिन्तन है तथा इसके माध्यम से ही विभिन्न रचनात्मक कार्य किए जाते हैं। समस्त वैज्ञानिक आविष्कार सृजनात्मक चिन्तन के ही परिणाम होते हैं। सृजनात्मक चिन्तन की प्रक्रिया अपने आप में व्यवस्थित प्रक्रिया होती है तथा इसकी निश्चित अवस्थाएँ या चरण होते हैं।
जिनका सामान्य परिचय निम्नवर्णित है-

(1) तथ्य एकत्र करना या तैयारी- सृजनात्मक चिन्तन की प्रक्रिया के प्रथम चरण या अवस्था में चिन्तन की समस्या से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्र किया जाता है। इस अवस्था को तैयारी की अवस्था भी कहा जाता है। इस अवस्था में एकत्र किए गए तथ्य ही आगे चलकर समस्या समाधान में सहायक होते हैं।

(2) गर्भीकरण- चिन्तन की प्रक्रिया की इस अवस्था में आकर पहले एकत्र किए गए तथ्यों का अचेतन मस्तिष्क में मंथन किया जाता है। यह मंथन ही चिन्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सहायक होता है तथा व्यक्ति को सम्भावित समाधान सूझता है।

(3) स्फुरणं- सृजनात्मक चिन्तन की प्रक्रिया की तीसरी अवस्था स्फुरण कहलाती है। इस अवस्था में चिन्तन के लिए ली गयी समस्या का कुछ समाधान प्राप्त होने लगता है।

(4) प्रमापन- यह अन्तिम अवस्था है। वैज्ञानिक क्षेत्र की सभी समस्याओं के प्राप्त किए गए हल की वैधता तथा विश्वसनीयता की जाँच करनी आवश्यक होती है। प्रमापन की अवस्था में इसी प्रकार की जाँच की जाती है। प्रमापन हो जाने पर सृजनात्मक चिन्तन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।

प्रश्न 4
कल्पना और चिन्तन के सम्बन्ध एवं अन्तर का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
ये दोनों मानसिक क्रियाएँ एक-दूसरे की विरोधी न होकर परस्पर सहायक सिद्ध होती हैं। कल्पना यदि मानसिक प्रहस्तन (Mental Manipulation) है तो चिन्तन एक मानसिक खोज (Mental Exploration) है। कल्पना चिन्तन का एक मुख्य अवयव है तथा चिन्तन की प्रक्रिया में कल्पना का आधार लिया जाता है; अतः इन दोनों का एक-दूसरे से अलगाव सम्भव नहीं है। कल्पनाविहीन व्यक्ति सृजन की ओर नहीं बढ़ सकता। सृजन चाहे साहित्य से सम्बन्धित हो, चित्र से या शिल्प से; कल्पना प्रत्येक कला की एक पूर्व आवश्यकता है।
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 5 Thinking 1
किन्तु कल्पना एक सीमा से बाहर जाकर अव्यावहारिक, असामान्य एवं अनुपयोगी सिद्ध होती है; अतः अत्यधिक कल्पना कष्टदायक होती है। वस्तुतः कल्पना की उपयोगिता मानव-जीवन की विभिन्न समस्याओं के समाधान तलाशने तथा नवनिर्माण के लिए सबसे अधिक प्रतीत होती है। दूसरे शब्दों में, चिन्तन से जुड़ी कल्पना महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक है।

कल्पना और चिन्तन के पारस्परिक सम्बन्ध से उनके मध्य समानता के कुछ बिन्दु दृष्टिगोचर होते हैं तथापि उनके बीच कुछ अन्तर भी विद्यमान हैं। ये अन्तर अग्रलिखित हैं

प्रश्न 5
चिन्तन तथा स्मृति या स्मरण करने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विगत अनुभवों को वर्तमान में याद करना या चेतना में लाना स्मृति कहलाती है। स्मृति भी एक मानसिक प्रक्रिया है तथा चिन्तन भी एक मानसिक प्रक्रिया है। इन दोनों में विद्यमान अन्तर को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है
UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 5 Thinking 2
प्रश्न 6
चिन्तन के सन्दर्भ में प्रत्यय और प्रतिमा में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चिन्तंन की प्रक्रिया में प्रत्यय (Concept) तथा प्रतिमा (Image) का विशेष महत्त्व होता है। प्रत्यय को चिन्तन की पहली प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है। ये प्रक्रियाएँ पृथक्-पृथक् लगने वाली वस्तुओं, अनुभवों, घटनाओं तथा परिस्थितियों के बीच समानताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रत्यय चिन्तन से उत्पन्न होकर पुनः चिन्तन की प्रक्रिया को क्रियाशील बनाते हैं। प्रतिमाएँ व्यक्ति के भूतकालीन अनुभवों तथा स्मृतियों द्वारा बनती हैं।

स्पर्श, गन्ध, स्वाद तथा श्रवण इत्यादि की प्रतिमाएँ बनती हैं जो धूमिल होती हैं। ये चिन्तन में सहायक हैं, किन्तु अधिक नहीं। इनकी जगह प्रतीक से काम लिया जाता है। प्रत्यय मानसिक, अमूर्त (Abstract) तथा सामान्य होता है किन्तु प्रतिमा मूर्त तथा विशिष्ट होती है। चिन्तन की प्रक्रिया में प्रतिमा के बिना तो काम चल सकता है, किन्तु प्रत्यय के बिना नहीं। प्रत्यय, चिन्तन का अनिवार्य यन्त्र होता है।प्रत्यय तथा प्रतिमा के अन्तर को अग्रलिखित रूप से भी प्रस्तुत किया जा सकता है ।

  1.  समस्त प्रत्यय सदैव अमूर्त तथा सामान्य होते हैं तथा इनसे भिन्न प्रतिमाएँ सदैव मूर्त तथा विशेष होती हैं। |
  2. प्रत्ययों के अभाव में चिन्तन की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो सकती, परन्तु प्रतिमाओं के अभाव में चिन्तन की प्रक्रिया सम्पन्न हो सकती है।
  3. कोई एक प्रत्यय एक से अधिक वस्तुओं का प्रतिनिधित्व कर सकता है, परन्तु एक प्रतिमा का सम्बन्ध केवल एक ही वस्तु से होता है।
  4. प्रत्ययों का विकास एक दीर्घकालिक प्रक्रिया के माध्यम से होता है, जबकि प्रतिमा का विकास सरल प्रक्रिया द्वारा होता है।
  5. प्रत्यय के निर्माण की प्रक्रिया जटिल होती है, जबकि प्रतिमा के निर्माण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत रूप से सरल होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
चिन्तन की प्रक्रिया पर पड़ने वाले पूर्वाग्रहों के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चिन्तन की तटस्थ प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कारकों में से एक मुख्य कारक है-व्यक्ति के पूर्वाग्रह। पूर्वाग्रह के कारण व्यक्ति बिना किसी तर्क के ही सम्बन्धित विषये अथवा व्यक्ति के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण विकसित कर लेता है। पूर्वाग्रह के कारण व्यक्ति सम्बन्धित विषय अथवा व्यक्ति के सन्दर्भ में तटस्थ एवं प्रामाणिक चिन्तन नहीं कर पाता तथा उसका चिन्तन पक्षपातपूर्ण हो जाता है। उदाहरण के लिए-यदि किसी व्यक्ति का पूर्वाग्रह हो कि प्रत्येक सरकारी कर्मचारी रिश्वतखोर है, तो वह किसी भी सरकारी कर्मचारी को ईमानदार नहीं मान सकता तथा इसका प्रभाव भी चिन्तन प्रक्रिया पर अवश्य पड़ता है। अतः तटस्थ चिन्तने के लिए व्यक्ति को पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए।

प्रश्न2
चिन्तन की प्रक्रिया पर अन्धविश्वासों का क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
चिन्तन की तटस्थ प्रक्रिया पर व्यक्ति के अन्धविश्वासों को प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। किसी भी प्रकार के अन्धविश्वास से ग्रस्त व्यक्ति तटस्थ एवं सामान्य चिन्तन नहीं कर पाता है। उदाहरण के लिए कुछ व्यक्तियों का अन्धविश्वास है कि यदि किसी कार्य को प्रारम्भ करते समय कोई छींक दे तो कार्य में बाधाएँ आती हैं। इस प्रकार के अन्धविश्वास वाला व्यक्ति अपने कार्य में उत्पन्न होने वाली बाधाओं के यथार्थ कारण को जानने के लिए तटस्थ चिन्तन कर ही नहीं सकता, वह बार-बार छींकने वाले व्यक्ति को ही दोष देता है। अत: तटस्थ एवं प्रामाणिक चिन्तन के लिए व्यक्ति को हर प्रकार के अन्धविश्वासों से मुक्त होना अनिवार्य है।

प्रश्न 3
चिन्तन की प्रक्रिया पर प्रबल संवेगों का क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर
प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति की चिन्तन की प्रक्रिया तटस्थ नहीं रह पाती है। प्रबल संवेगों की दशा में व्यक्ति शान्त एवं सन्तुलित नहीं रह पाता तथा इस स्थिति में वह प्रामाणिक चिन्तन नहीं कर पाता है। संवेगावस्था में व्यक्ति उत्तेजित हो उठता है तथा उत्तेजना की स्थिति में वैध चिन्तन प्रायः नहीं हो पाता है। उदाहरण के लिए-घृणा से ग्रस्त व्यक्ति सम्बन्धित विषय अथवा व्यक्ति के सन्दर्भ में तटस्थ चिन्तन कर ही नहीं सकता।

प्रश्न 4
व्यक्ति के चिन्तन पर अन्य व्यक्तियों के सुझावों का क्या प्रभाव पड़ता है? संक्षेप में 
बताइए।
उत्तर
तटस्थ चिन्तन मूल रूप से एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है तथा व्यक्ति स्वयं ही इस प्रक्रिया को चलाता है, परन्तु कुछ दशाओं में अन्य व्यक्ति भी अपने-अपने सुझाव प्रस्तुत करने लगते हैं। अन्य व्यक्तियों द्वारा दिये गये सुझाव निश्चित रूप से व्यक्ति के चिन्तन को प्रभावित करते हैं तथा प्राय: उसे पर प्रतिकूल प्रभाव ही डालते हैं। अन्य व्यक्तियों के सुझावों को स्वीकार करने पर व्यक्ति का चिन्तन तटस्थ न रहकर पक्षपातपूर्ण हो जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी भी गम्भीर विषय पर चिन्तन करते समय व्यक्तियों के सुझाव तो आमन्त्रित किये जा सकते हैं, परन्तु उन्हें ज्यों-का-त्यों बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए।

प्रश्न I. निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए

1. चिन्तन एक……….. प्रक्रिया है, जो वस्तुओं के प्रतीकों के माध्यम से चलती है।
2. किसी समस्या के मानसिक समाधान के लिए होने वाले मानसिक प्रयास को ……..कहते हैं।
3. विभिन्न प्रतीकों के मानसिक प्रहस्तन को ……….. कहते हैं।
4. चिन्तन की प्रक्रिया यथार्थ विषयों के………… के माध्यम से चलती है।
5. चिन्तन की प्रक्रिया पर सुझावों, अन्धविश्वासों तथा संवेगों का………… प्रभाव पड़ता है।
6. सुचारु चिन्तन के लिए प्रबल प्रेरणा एक………. कारक है।
7. सरल एवं व्यवस्थित चिन्तन में भाषा …………….सिद्ध होती है।
8. यदि चिन्तन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति हो जाती है तो उसे………..
चिन्तन कहा जाएगा।
9. कुतुबमीनार या ताजमहल को देखकर उसके विषय में होने वाले चिन्तन को …….. कहते हैं।
10. चिन्तन के विषय में व्यवस्थित नियमों के प्रतिपादने का श्रेय ….. नामक मनोवैज्ञानिक का है।
उत्तर
1. ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया, 2. चिन्तन, 3. चिन्तन, 4. प्रतीकों, 5. प्रतिकूल, 6. सहायक, 7. सहायक, ३. वैध, 9. प्रत्यक्षात्मक चिन्तन, 10. स्पीयरमैन।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए

प्रश्न 1.
किसी समस्या के उत्पन्न होने पर उसके समाधान के लिए मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले 
उपाय को मनोविज्ञान की भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर
चिन्तन

प्रश्न 2.
समस्या के समाधान के लिए चिन्तन की प्रक्रिया के अन्तर्गत क्या किया जाता है?
उत्तर
समस्या के समाधान के लिए चिन्तन की प्रक्रिया के अन्तर्गत मस्तिष्क द्वारा उस समस्या के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है तथा विचारों की एक श्रृंखला विकसित की जाती है।

प्रश्न 3.
चिन्तन किस प्रकार की प्रक्रिया है?
उत्तर
चिन्तन अपने आप में एक ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 4.
चिन्तन की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उक्ट
बी०एन०झा के अनुसार, “चिन्तन एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें मन किसी विचार की गति को प्रयोजनात्मक रूप में नियन्त्रित एवं नियमित करता है।”

प्रश्न 5.
वुडवर्थ के अनुसार चिन्तन से क्या आशय है? |
उत्तर
वुडवर्थ के अनुसार, चिन्तन एक मानसिक खोज है।

प्रश्न 6.
चिन्तन की प्रक्रिया मुख्य रूप से किनके माध्यम से चलती है?
उत्तर
चिन्तन की प्रक्रिया मुख्य रूप से प्रतीकों के माध्यम से चलती है।

प्रश्न 7.
चिन्तन के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर
चिन्तन के मुख्य प्रकार हैं-प्रत्यक्षात्मक चिन्तन, कल्पनात्मक चिन्तन, प्रत्ययात्मक चिन्तन तथा तार्किक चिन्तन।

प्रश्न 8.
उत्तम चिन्तन के लिए चार अनुकूल कारकों या परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
उत्तम चिन्तन के लिए चार अनुकूल कारक या परिस्थितियाँ हैं—

  1. प्रबल प्रेरणाएँ
  2. रुचि
  3. अवधान तथा
  4. बुद्धि

प्रश्न 9.
चिन्तन की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
चिन्तन की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले चार कारक हैं

  1. सुझाव
  2. पूर्वाग्रह
  3. अन्धविश्वास तथा
  4. प्रबल संवेग।

प्रश्न 10.
चिन्तन की प्रक्रिया में भाषा का क्या मुख्य योगदान है?
उत्तर
भाषा चिन्तन की प्रक्रिया को व्यवस्थित तथा सरल बना देती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
मनुष्य के सन्दर्भ में चिन्तन किस प्रकार का गुण है?
(क) आवश्यक
(ख) अनावश्यक
(ग) मौलिक
(घ) शारीरिक
उतर
(ग) मौलिक

प्रश्न 2.
चिन्तन के सन्दर्भ में कौन-सा कथन सत्य है?
(क) चिन्तन एक ज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है।
(ख) व्यवस्थित चिन्तन केवल मनुष्य का ही मौलिक गुण है।
(ग) चिन्तन की प्रक्रिया में वस्तुओं का नहीं बल्कि उनके प्रतीकों का मानसिक प्रहस्तन | होता है।
(घ) चिन्तन सम्बन्धी उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं।
उतर
(घ) चिन्तन सम्बन्धी उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं।

प्रश्न 3.
चिन्तन ज्ञानात्मक रूप में एक मानसिक प्रक्रिया है।” चिन्तन की यह परिभाषा किस मनोवैज्ञानिक द्वारा प्रतिपादित है?
(क) बी०एन०झा
(ख) वुडवर्थ
(ग) मैक्डूगल
(घ) जे०एस०रॉस
उतर
(घ) जे०एस०रॉस

प्रश्न 4.
किस प्रकार के चिन्तन में विषय-वस्तु सामने होने पर ही उसके विषय में चिन्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है?
(क) प्रत्यक्षात्मक चिन्तन
(ख) कल्पनात्मक चिन्तन
(ग) प्रत्ययात्मक चिन्तन
(घ) तार्किक चिन्तन
उतर
(क) प्रत्यक्षात्मक चिन्तन 

प्रश्न 5.
चिन्तन के किस प्रकार के अन्तर्गत प्रत्यक्षों एवं प्रतिमानों के आधार पर भविष्य के विषयों एवं परिस्थितियों का चिन्तन किया जाता है?
(क) प्रत्यक्षात्मक चिन्तन
(ख) कल्पनात्मक चिन्तन
(ग) प्रत्ययात्मक चिन्तन
(घ) तार्किक चिन्तन
उतर
(ख) कल्पनात्मक चिन्तन

प्रश्न 6.
किसी गम्भीर समस्या के समाधान के लिए किये जाने वाले चिन्तन को कहते हैं
(क) प्रत्यक्षात्मक चिन्तन
(ख) कल्पनात्मक चिन्तन ।
(ग) तार्किक चिन्तन
(घ) प्रत्ययात्मक चिन्तन
उतर
(ग) तार्किक चिन्तन

प्रश्न 7.
चिन्तन के विषय में सम्बन्धों के पृथक्करण तथा सह-सम्बन्धों के पृथक्करण के दो नियम किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं?
(क) मैक्डूगल
(ख) फ्रॉयड
(ग) स्पीयरमैन
(घ) बी०एन०झा
उतर
(ग) तार्किक चिन्तन

प्रश्न 8.
ध्यान एवं रुचि चिन्तन की प्रक्रिया के लिए होते हैं
(क) बाधक
(ख) अनावश्यक
(ग) सहायक
(घ) व्यर्थ
उतर
(ग) सहायक

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व चिन्तन की प्रक्रिया में बाधक नहीं है?
(क) प्रेरणाएँ
(ख) पूर्वाग्रह
(ग) अन्धविश्वास
(घ) ये सभी
उतर
(क) प्रेरणाएँ

प्रश्न 10.
चिन्तन की प्रक्रिया में प्रतीकों को अपनाने से चिन्तन की प्रक्रिया
(क) अस्त-व्यस्त हो जाती है।
(ख) सरल एवं उत्तम हो जाती है।
(ग) जटिल एवं कठिन हो जाती है।
(घ) असम्भव हो जाती है।
उतर
(ख) सरल एवं उत्तम हो जाती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour

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Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Emotional Bases of Behaviour
(व्यवहार के संवेगात्मक आधार)
Number of Questions Solved 51
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour (व्यवहार के संवेगात्मक आधार)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संवेग (Emotion) से आप क्या समझते हैं? संवेगों की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
संवेग का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। संवेग की मुख्य विशेषताएँ भी बताइए।
या
संवेग को परिभाषित कीजिए।

उत्तर :

संवेग का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Emotion)

‘संवेग’ अंग्रेजी भाषा के शब्द Emotion का हिन्दी रूपान्तर है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द Emovere (इमोवेयर) से हुई है। इमोवेयर का शाब्दिक अर्थ है–‘हिला देना, क्रियाशील बना देना या उत्तेजित कर देना। इसका अभिप्राय यह है कि शारीरिक प्रेरणाओं के समान ही संवेग मनुष्य को हिला देते हैं, क्रियाशील बना देते हैं अथवा उसे उत्तेजित कर देते हैं। यह उत्तेजना उसके कार्यों और व्यवहारों को प्रभावित करती है।

संवेग एक जटिल, भावात्मक और मानसिक प्रक्रिया है। जब भाव का प्रकटीकरण बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों में हो जाता है, तब यह संवेग कहलाता है। । विभिन्न मनोवैज्ञानिकों द्वारा संवेग को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) गेलडार्ड के मतानुसार, “संवेग क्रियाओं को उत्तेजक होता है। प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेग से व्यक्ति की क्रियाओं में गति आती है।

(2) आर्थर टी० जर्सील्ड के अनुसार, “संवेग शब्द किसी भी प्रकार के आवेग में आने, भड़क उठने या उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।” प्रस्तुत परिभाषा में संवेगावस्था के मुख्य लक्षणों का उल्लेख किया गया है।

(3) इंगलिश तथ इंगलिश के अनुसार, “संवेग एक जटिल भावात्मक अवस्था है जिसमें कुछ विशेष शारीरिक तथा ग्रन्थीय क्रियाएँ होती हैं। प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेगों में भावात्मक तत्त्व की प्रधानता होती है तथा इनके परिणामस्वरूप कुछ क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

(4) वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रत्येक संवेग एक अनुभूति होता है तथा साथ ही प्रत्येक संवेग उसी समय एक गत्यात्मक तत्परता होता है।”

(5) पी० टी० यंग के कथनानुसार, “संवेग सम्पूर्ण व्यक्ति का तीव्र उपद्रव है, जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है तथा जिसके अन्तर्गत व्यवहार चेतन अनुभूति तथा जाठरिक क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।” प्रस्तुत कथन द्वारा स्पष्ट होता है कि संवेगों की उत्पत्ति सदैव मनोवैज्ञानिक कारकों से होती है तथा इनकी परिणति व्यवहार, अनुभवों तथा जाठरिक क्रियाओं में होती हैं।

इन परिभाषाओं के अध्ययन के उपरान्त हमें संवेग से सम्बन्धित जिन तत्त्वों का ज्ञान होता है, वे इस प्रकार हैं–एक विशिष्ट परिस्थिति उत्पन्न होती है—मनुष्य इस परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करते हैं–परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया के कारण मनुष्य में उत्तेजना का जन्म होता है—मनुष्य सचेतन रूप से उत्तेजना का अनुभव करता है और अन्ततः–मनुष्य का संवेगात्मक व्यवहार अभिव्यक्त होता है।

संवेगों की विशेषताएँ
(Characteristics of Emotions)

संवेगों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) मनोवैज्ञानिक कारणों से उत्पन्न – संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है। उदाहरण के लिए, बच्चा अचानक किसी अजीब-सी चीज को देखकर भयभीत हो जाता है। वह इसलिए भयभीत हुआ क्योंकि उसने उस अजीब चीज को अचानक देखा। यदि बच्चा उस वस्तु को देखने का अभ्यस्त होता या उसे ऐसी किसी वस्तु के पहले से दिखाई पड़ने की सम्भावना रहती और वह उसे अपने लिए खतरनाक न समझता तो भय का संवैग उत्पन्न ही नहीं होता। स्पष्टतः यदि मनोवैज्ञानिक कारण पर्याप्त रूप में विद्यमान नहीं हैं तो संवेग उत्पन्न नहीं होगा। वास्तव में, पर्याप्त मनोवैज्ञानिक कारणों के अभाव में संवेगों की उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती। कुछ विद्वान मानते हैं कि मादक द्रव्यों के सेवन के उपरान्त भी संवेगों की अनुभूति हो सकती है, परन्तु यह धारणा न तो उचित है। और न ही मान्य है। मादक द्रव्यों के प्रभाव से व्यक्ति की मनोदशा अस्त-व्यस्त हो जाती है, परन्तु वह संवेगावस्था नहीं होती।

(2) यकायक एवं तीव्र उपद्रव – संवेग मनोवैज्ञानिक कारणों से यकायक उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण जीव के सापेक्ष एक तीव्र उपद्रव है। यह यकायक उत्पन्न होता है और कुछ क्षणों के उपरान्त लुप्त हो जाता है। यद्यपि संवेग तीव्रता लिये होता है, किन्तु सभी संवेग तीव्र नहीं होते। कभी-कभी संवेग की अवस्था में व्यक्ति कुछ भी कर पाने में असमर्थ रहता है और निष्क्रिय-सा हो जाता है। अत: कहा जा सकता है कि संवेग अन्य मानसिक प्रक्रियाओं; यथा–भाव, स्थिति (मूड) आदि की अपेक्षा अधिक तीव्र होते हैं।

(3) सार्वभौमिकता – संवेग सार्वभौमिक हैं अर्थात् ये हर एक प्राणी में पाये जाते हैं। मनुष्य को शिशु, बाल, किशोर, प्रौढ़ तथा वृद्ध प्रत्येक अवस्था में संवेग दिखाई पड़ते हैं। पशुओं में भी संवेग दृष्टिगोचर होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में इनकी प्रबलता एकसमान नहीं होती, यह बदल जाती है; जैसे—बालक एवं कम पढ़े-लिखे लोगों में संवेगों की अभिव्यक्ति स्वतन्त्र रूप से तथा अत्यन्त तीव्र रूप में दिखाई पड़ती है तो वृद्ध एवं पढ़े-लिखे लोगों में यह अभिव्यक्ति नियन्त्रित तथा अपेक्षाकृत कम तीव्रता लिये होती है।

(4) शारीरिक परिवर्तन – संवेग की अवस्था में व्यक्ति के शरीर में मुख्यतया दो प्रकार के परिवर्तन उत्पन्न होते हैं-आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन एवं बाह्य शारीरिक परिवर्तन। हृदय की धड़कन तथा रक्तचाप में परिवर्तन, श्वसन क्रिया की तीव्रता, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन्स का निकलना और पाचन-क्रिया का धीमा पड़ना या रुक जाना आदि आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन हैं। संवेग की दशा में कुछ बाह्य शारीरिक परिवर्तन भी होते हैं; यथा-चेहरे की रेखाओं तथा शारीरिक आसनों में परिवर्तन, शरीर काँपना, स्वर बदल जाना, पसीना निकलना, नेत्रों का लाल हो जाना तथा शरीर का रोमांचित हो उठना आदि विभिन्न क्रियाएँ।।

(5) व्यक्तिगत विभेद – संवेग की अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत विभेद पाये जाते हैं। संवेगात्मक संरचना तथा प्रकटीकरण सम्बन्धी विशिष्टता के कारण हर एक व्यक्ति संवेग की अभिव्यक्ति अपने अलग ढंग से करता है। वातावरण का एक ही उत्तेजक विभिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न संवेग उत्पन्न कर देता है। उदाहरणतः, केले के छिलके से फिसलकर गिरते व्यक्ति को देखकर किसी के मन में सहानुभूति पैदा होती है तो किसी में दया और कोई उसे देखकर हँस पड़ता है। उत्तेजक एक है जबकि प्रतिक्रियाएँ विभिन्न हैं।

(6) स्थानान्तरण – संवेगों की विशेषता स्थानान्तरण भी है। ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में स्थानान्तरित हो जाते हैं। संवेग की अवस्था में संवेग की अभिव्यक्ति के समय जो भी व्यक्ति मौजूद होते हैं, उनमें से किसी भी व्यक्ति में संवेगात्मक क्रिया स्थानान्तरित हो सकती है। उदाहरण के लिए-एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति अपना क्रोध प्रकट कर रहा है और इसी दौरान एक अन्य व्यक्ति भी उपस्थित हो जाए तो वह भी क्रोध को भागी बन सकता है।

(7) अस्थिर एवं परिवर्तनशील – संवेग की अवस्था अस्थिर एवं परिवर्तनशील होती है। यह अधिक समय तक नहीं रहती। जैसे ही वातावरण का कोई उत्तेजक संवेग की दशा उत्पन्न करता है और उससे सम्बन्धित क्रिया समाप्त होती है, वैसे ही उसका स्वरूप भी बदल जाता है। इसके अलावा, एक उत्तेजक द्वारा उत्पन्न संवेग उस समय समाप्त हो जाता है जब दूसरे उत्तेजक द्वारा किसी अन्य प्रकार के संवेग की उत्पत्ति होती है। स्पष्टतः संवेगावस्था में चंचलता का गुण विद्यमान है।

(8) स्थायित्व – चंचल प्रवृत्ति के बावजूद भी संवेगों में कुछ-न-कुछ स्थायित्व अवश्य रहता , है। संवेग की मुख्य अवस्था समाप्त होने के बाद व्यक्ति की अवशिष्ट मनोदशा इस संवेग के स्थायित्वं की परिचायक है। उदाहरणार्थ-महान् शोक से पीड़ित व्यक्ति शोक की तीव्र परिस्थिति से उबरकर भी कुछ समय तक मायूस पाया जाता है।

(9) विचार-शक्ति का लोप – संवेगावस्था में भावात्मक पहलू की प्रबलता तथा तीव्र शारीरिक हलचल के कारण विचार-शक्ति क्षीण पड़ जाती है अथवा इसका लोप हो जाता है। यही कारण है कि संवेग के वशीभूत व्यक्ति कभी-कभी ऐसा काम कर देता है जिसके लिए बाद में उसे गहरा प्रायश्चित करना पड़ता है।

(10) सुख-दुःख की अनुभूतियाँ – विभिन्न प्रकार के संवेगों में से कुछ सुख उत्पन्न करते हैं। तो कुछ दु:ख। प्रेम का संवेग सुख उत्पन्न करता है, जबकि भय को संवेग दुःख उत्पन्न करता है।

(11) क्रियात्मक पक्ष – भावात्मक पक्ष के अतिरिक्त संवेग का एक क्रियात्मक पक्ष भी है। संवेगावस्था में क्रियात्मक पक्ष की क्रियाशीलता के कारण व्यक्ति कोई-न-कोई काम करने के लिए विवश एवं तत्पर हो जाता है।

(12) मूल प्रवृत्तियों से सम्बन्ध – संवेग का सम्बन्ध मूल प्रवृत्ति से है। मूल प्रवृत्ति द्वारा अपनी सन्तुष्टि की आवश्यकता उत्पन्न होने पर या सन्तुष्टि में अवरोध पैदा होने पर संवेग का प्रकटीकरण होता

संवेग की उपर्युक्त विशेषताओं के अध्ययन से जहाँ एक ओर संवेग का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है, वहीं दूसरी ओर, संवेग के स्वरूप का एक विस्तृत चित्र भी उभरकर सामने आता है।

प्रश्न 2.
भाव अथवा अनुभूति (Feeling) तथा संवेग (Emotion) की समानताओं तथा भिन्नताओं का उल्लेख कीजिए।
या
भाव तथा संवेग में पाये जाने वाले अन्तरों का विस्तार से विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर :

भाव और संवेग में अन्तर
(Difference between Feeling and Emotion)

मानव-मन के तीन प्रमुख पक्ष हैं : ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक। मन के भावात्मक पक्ष से सम्बन्धित एक प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया भाव है जो प्राणी को सुख या दु:ख का अनुभव कराती है। मन के चेष्टात्मक अथवा इच्छात्मक और ज्ञानात्मक, इन दो पक्षों के माध्यम से भाव का अनुभव होता है। इसी को हम ‘अनुभूति’ (Feeling) भी कहते हैं जिसे मन की चेतनावस्था में अनुभव किया जाता है। उदाहरण के लिए प्रसन्नता, सन्तोष, करुणा, चिन्ता, उल्लास तथा आश्चर्य आदि भाव या अनुभूतियाँ हैं। भाव और संवेग कुछ बिन्दुओं पर समानताएँ रखते हैं तो कुछ बिन्दुओं पर एक-दूसरे से भिन्नताएँ। ये समानताएँ और भिन्नताएँ निम्न प्रकार हैं –

समानताएँ – भाव और संवेग के मध्य गहरा सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध की घनिष्ठता इतनी अधिक है कि कुछ मनोवैज्ञानिक भाव और संवेग में अन्तर नहीं करते और दोनों को एक ही स्वीकार करते हैं। ये समानताएँ इस प्रकार हैं –

  1. भाव और संवेग, इन दोनों का सम्बन्ध स्नायु-संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क से होता है।
  2. अनेक संवेग साधारणतया भाव होते हैं, जबकि भाव तीव्र रूप में संवेग बन जाता है।
  3. भाव और संवेग दोनों में ही सुख या दु:ख पाया जाता है।

अन्तर – यद्यपि भाव और संवेग दोनों का सम्बन्ध मन के भावात्मक पक्ष से है, तथापि ये दोनों भिन्न मानसिक प्रक्रियाएँ हैं। दोनों के मध्य निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

(1) जटिलता सम्बन्धी अन्तर – संवेग एक जटिल भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है, जबकि भाव एक सरल तथा प्राथमिक मानसिक प्रक्रिया है। संवेग परिस्थिति-विशेष की भूतकालीन स्मृति या भावी कल्पना द्वारा उत्तेजना पाकर भी उत्पन्न हो सकते हैं। इनकी उत्पत्ति के लिए किसी प्रत्यक्ष परिस्थिति का होना अनिवार्य नहीं है। उदाहरण के लिए-शीतकाल की बर्फीली रात में एक बीमार बूढ़े आदमी का नंगे बदन ठिठुरना, जब भी स्मृति में आता है तो वह करुणा का संवेग उत्पन्न करता है। विमान परिचारिका बनकर दुनियाभर की सैर करने की भावी कल्पना किसी लड़की के मन में उत्साह । पैदा करती है। इसके विपरीत, भावों की उत्पत्ति इन्द्रियजनित सरल संवेदनाओं के फलस्वरूप होती है। उदाहरण के लिए-पुरस्कार की प्राप्ति से सुख का भाव तथा शरीर में चोट लगने से दु:ख का भाव उत्पन्न होता है।

(2) व्यापकता सम्बन्धी अन्तर – संवेग भाव से अधिक व्यापक होते हैं। संवेग की स्थिति में शरीर और मन पर्याप्त रूप से प्रभावित होते हैं। इसके अन्तर्गत हृदय की धड़कन, श्वास की गति, रक्तचाप, रक्त संचार, नलिकाविहीन एवं आमाशय की ग्रन्थियाँ आदि सभी परिवर्तित दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः संवेग में भाव का होना आवश्यक है, किन्तु संवेग के बिना ही भाव की अनुभूति होती है अर्थात् भाव में संवेग सम्मिलित नहीं होता, किन्तु संवेग भावयुक्त होता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति के बाहरी तथा आन्तरिक व्यवहारों में भाव का प्रकटीकरण होने से वह संवेग का रूप धारण कर लेता है। स्पष्ट रूप से संवेग का क्षेत्र अधिक विस्तृत है। इसके विपरीत, भाव एक सीमित और संकुचित मन:स्थिति है, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति के शरीर और मन की दशा में विशेष बदलाव नहीं आते।

(3) उग्रता सम्बन्धी अन्तर – भाव और संवेग के बीच एक अन्तर उग्रता का है। संवेग अपेक्षाकृत उग्र होता है। संवेग में एक अजीब उथल-पुथल के कारण व्यक्ति असामान्य अवस्था धारण कर लेता है। और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। वस्तुत: ‘उग्र भाव’ का ही दूसरा नाम संवेग है, जिसका प्रभाव स्मृति पर एक लम्बे समय तक बना रहता है। किसी शव को देखकर दु:ख का भाव उत्पन्न होता है, किन्तु घर में जवान मौत हो जाए तो दुःख का भाव उग्र होकर संवेग में बदल जाएगा। स्पष्टत: संवेग के विपरीत भाव में थोड़ी बहुत अव्यवस्था के बावजूद भी व्यक्ति की सामान्य अवस्था पाई जाती है।

(4) सक्रियता सम्बन्धी अन्तर – भाव की अपेक्षा संवेग के समय व्यक्ति में अधिक सक्रियता दिखाई पड़ती है। संवेग के दौरान हमारे शरीर का एक बड़ा भाग (जिसमें वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स स्वत:संचालित स्नायुमण्डल तथा हाइपोथैलेमस होते हैं) प्रभावित होता है, जबकि भाव की दशा में केवल वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स ही प्रभावित होती है, परिणामस्वरूप भाव की अपेक्षा संवेग की दशा में व्यक्ति अधिक सक्रिय रहता है।

(5) प्रकार सम्बन्धी अन्तर – संवेग के विभिन्न प्रकार हैं जिसके अन्तर्गत भय, शोक, क्रोध, घृणा, प्रेम तथा आश्चर्य के संवेग आते हैं। इसके विपरीत भाव के दो ही प्रकार, सुख और दुःख का भाव, मान्य हैं।

(6) उपागम सम्बन्धी अन्तर – भाव और संवेग के मध्य एक प्रमुख अन्तर उपागम (Approach) को लेकर है। उपागम (पहुँच के मार्ग) दो हैं-आत्मगत (Subjective) तथा वस्तुगत (Objective), क्योंकि भाव की अनुभूति व्यक्ति को स्वयं अपने अन्दर होती है और वह किसी अन्य के भाव को प्रत्यक्ष रूप में नहीं देख सकता; अत: भाव ‘आत्मगत’ होता है। संवेग को व्यक्ति स्वयं में तो अनुभव करता ही है, इसके साथ ही व्यवहारों के माध्यम से इसका प्रकटीकरण भी हो जाता है; अतः संवेग ‘आत्मगत और वस्तुगत’ दोनों है। व्यक्ति अपने दुःख-सुख के भाव की अनुभूति तो कर सकता है, लेकिन दूसरों की नहीं—इसलिए आत्मगत है, किन्तु क्रोध का संवेग स्वयं भी अनुभव होता है और व्यवहार द्वारा इसकी अभिव्यक्ति भी होती है-इसलिए आत्मगत के साथ वस्तुगत भी है।

प्रश्न 3.
संवेगों का एक व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए। मुख्य सरल एवं जटिल संवेगों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
सरल एवं जटिल संवेगावस्था का सामान्य परिचय देते हुए मुख्य संवेगों की उत्पत्ति, अभिव्यक्ति तथा लाभ एवं हानि का वर्णन कीजिए।

उत्तर :

संवेगों का वर्गीकरण
(Classification of Emotions)

विभिन्न प्राणियों के व्यवहार की पृष्ठभूमि में संवेगों का अत्यधिक महत्त्व है। मानव-व्यवहार के विश्लेषणात्मक अध्ययन से ज्ञात होता है कि मानव आवश्यकतानुसार अनेक प्रकार के संवेगों को प्रकट करता है। संवेगों के प्रकार के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों में मतभेद हैं। मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत भिन्न-भिन्न वर्गीकरण निम्नलिखित हैं –

सरल एवं जटिल संवेगात्मक अवस्थाएँ

व्यक्ति की संवेगात्मक अवस्था को ‘सरलता या जटिलता के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है–

(1) सरल संवेगात्मक अवस्था (Simple Emotional State) – सरल संवेगात्मक अवस्था के अन्तर्गत सामान्यतया एक ही. संवेग उत्पन्न होता है और इनमें कोई अन्य संवेग मिश्रित नहीं होता। सरल संवेग स्पष्ट एवं स्वाभाविक होते हैं और अपनी शुद्ध अवस्था में साधारण रूप से बालकों में देखे जा सकते हैं। इन्हें समझने में कोई कठिनाई नहीं आती। क्रोध, भय, आश्चर्य, हर्ष एवं शोक आदि सरल संवेग हैं।

(2) जटिल संवेगात्मक अवस्था (Complicated Emotional State) – जटिल संवेगात्मक अवस्था में कई प्रकार के संवेग मिश्रित रहते हैं। ये सामाजिक परिस्थितियों में क्रमश: विकसित होते हैं। और इनकी अभिव्यक्ति जटिल होती है। बढ़ती हुई आयु और परिपक्वता के साथ जब अनुभव तथा सीखने का प्रभाव पड़ने लगता है तो संवेग अस्पष्ट व अस्वाभाविक होते जाते हैं, जिन्हें समझना प्रायः कठिन होता है। क्रोध की संवेगावस्था में ईष्र्या, द्वेष, घृणा और हीनता का भाव मिश्रित रहता है। कपटी और धूर्त व्यक्तियों की संवेगात्मक अवस्थाएँ अत्यन्त जटिल होती हैं, जिन्हें सहज ही नहीं समझा जा सकता है।

कुछ प्रमुख संवेग
(Some Important Emotions)

कुछ विशिष्ट संवेगों का विवेचन निम्नलिखित है –

सरल संवेगावस्था के उदाहरण

(1) क्रोध (Ange) – क्रोध एक द्वेषात्मक प्रबल संवेग है जिसे आधुनिक मनोविज्ञान में अर्जित संवेग माना गया है। मैक्डूगल ने इसे लड़ने की मूल-प्रवृत्ति का संवेगात्मक पक्ष स्वीकार किया है तो गिलफोर्ड ने इसे प्राथमिक संवेग माना है।

उत्पत्ति का कारण – क्रोध की उत्पत्ति सम्बन्धी कारणों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि क्रोध के मूल में ऐसी इच्छाएँ, आशाएँ अथवा धारणाएँ कार्य करती हैं जिनकी पूर्ति नहीं हो पाती या जिनकी पूर्ति में रुकावट पैदा होने लगती है। लक्ष्य-सिद्धि में अवरोधक या बाधक वस्तु, संवेग को उत्तेजक (प्रेरक) कही जाती है और उसके विरुद्ध  संवेगयुक्त व्यक्ति में तीव्र विद्वेष तथा वैमनस्य का भाव जाग्रत हो जाता है, परिणामस्वरूप क्रुद्ध व्यक्ति वस्तु या व्यक्ति की बड़ी-से-बड़ी हानि के लिए उद्यत हो उठता है।

क्रोध की अभिव्यक्ति – क्रोध के संवेग से ग्रस्त शक्तिहीन शिशु रोने-चिल्लाने लगता है, हाथ-पैरं पटकने लगता है तथा आन्तरिक विद्रोह को व्यक्त करने लगता है। शनैः-शनैः शक्ति प्राप्त करता हुआ उसकी अभिव्यक्ति का ढंग भी बदलता है और वह आज्ञा न मानना, अपमान व बुराई करना, डाँट-फटकार, गाली या मारपीट करना जैसे कार्य करता है। क्रोध में व्यक्ति आक्रामक (Aggressive) स्वरूप धारण कर लेता है। इस दशा में उसकी शारीरिक क्रियाएँ चेहरा लाल होना, भौंहें चढ़ना, होंठ काँपना, मुट्ठी कसना, दाँत पीसना, काँपना, आघात या ठोकर मारना तथा गरजना आदि हैं। हत्या इसकी चरम परिणति है।

क्रोध से हानि – क्रोध की संवेगावस्था में शारीरिक-मानसिक शक्ति का ह्रास होता है। रक्त चाप, रक्त परिसंचरण तथा पाचन क्रिया बुरी तरह प्रभावित होते हैं। शरीर में निकले कुछ रासायनिक द्रव्य रक्त से मिलकर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। क्रोध की अवस्था विवेकहीनता को जन्म देती है, जिसमें भयंकरतम भूल तथा अक्षम्य अपराध भी हो सकते हैं।

क्रोध से लाभ – क्रुद्ध व्यक्ति प्रेरित होकर अधिक शक्ति प्राप्त करता है, जिससे उसे असामान्य कार्य करने में मदद मिलती है। युद्ध में सैनिक का क्रोध राष्ट्रहित में कार्य करता है, जिससे शत्रु परास्त होता है। अपनी असफलताओं पर क्रुद्ध व्यक्ति कई गुनी ताकत से सफलता के लिए जुट जाता है।

(2) भय (Fear) – भय भी एक द्वेषीत्मक संवेग है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसे झगड़ा करने की प्रवृत्ति से जोड़ा है, जबकि मैक्डूगल ने इसे पलायन की मूल-प्रवृत्ति से सम्बन्धित किया है। वस्तुतः व्यक्ति भय के कारण से दूर रहना चाहता है या उससे स्वयं को छिपाना चाहती है। विद्वानों की दृष्टि में भय दो प्रकार के हैं-वास्तविक और काल्पनिक। शेर को देखकर वास्तविक भय पैदा होता है, किन्तु राक्षस की कल्पना करके भयभीत होना काल्पनिक भय है।

उत्पत्ति का कारण – भय की उत्पत्ति के अनेकानेक कारण और परिस्थितियाँ हैं। जब किन्हीं भयानक परिस्थितियों से घिरकर व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तो उसमें भय की उत्पत्ति होती है। शिशु अवस्था में विपत्ति की आशंका उत्पन्न करने वाली तथा अस्वाभाविक जान पड़ने वाली अनेक परिस्थितियाँ; जैसे–काली चीजें, अन्धकार, बिजली की चमक, अपरिचित आवाज या जोरदार धमाका आदि; भय पैदा करती हैं। विकास की अवस्थी में आयु वृद्धि के साथ पिछले अनुभव तथा मानसिक प्रन्थियाँ भय उत्पादन में सहयोग करते हैं। प्रौढ़ व्यक्ति स्वयं से अधिक बलशाली चीजों या व्यक्तियों, विषैले प्राणियों, हिंसक जीवों, तूफान, समुद्र, पुलिस, जेल तथा कानूनी दण्ड आदि से भय खाती है।

भय की अभिव्यक्ति – भय का संवेग आन्तरिक, व्यावहारिक तथा चेतनात्मक तीनों ही प्रकार के परिवर्तनों को जन्म देता है। भय की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से होती है; जैसे–भागना, मुँह पीला पड़ना, काँपने लगना, पसीना आना, हृदय की धड़कने यी रक्त चाप बढ़ना, चीखना या छिपने की कोशिश करना। व्यक्ति भय की अवस्था में स्वयं को असमर्थ पाता है। कुछ लोग भय को छिपाने के लिए क्रोध का प्रदर्शन करते हैं तो कुछ मृदु-व्यवहार और उपेक्षा का प्रदर्शन करते हैं। अत्यधिक भय के कारण लँगी व्यक्ति सबसे आगे भागने की कोशिश करता है और कुछ लोग तो मलमूत्र-त्याग तक करते देखे गये हैं।

भय से हानि – भय का संवेग हानिकारक है। भयभीत शिशुओं के व्यक्तित्व का ठीक से विकास नहीं हो पाता, उनकी परिलब्धियाँ सीमित रह जाती हैं और वे उन्नति की ओर नहीं बढ़ पाते हैं। डरपोक वयस्कों के लिए उस समय काफी मुश्किलें आती हैं जब मानसिक ग्रन्थियाँ उन्हें जरा-जरा सी चीजों से भयभीत करती हैं। इसी कारण बहुत-से लोग प्रौढ़ अवस्था में भी रात को अकेले नहीं सो सकते और यहाँ तक कि केचुएँ, कॉकरोच और चूहे से भी डर जाते हैं।

भय से लाभ – मानव-जीवन को सुव्यवस्थित एवं अनुशासित रूप में संचालित करने की दृष्टि से भय का महत्त्वपूर्ण स्थान है और इसी कारण यह संवेग लाभकारी भी है। भय के कारण व्यक्ति खतरनाक और जोखिम भरी चीजों से बचने की कोशिश करता है। धर्म, समाज, शिक्षा, अर्थ एवं राष्ट्रीय क्षेत्रों में भय की संवेगावस्था सुचारु व्यवस्था को कायम रखती है। यदि कानून और पुलिस का भय समाप्त हो जाए तो अपराधी सामान्यजनों को एक पल भी न जीने देंगे।

(3) हर्ष (Joy) – हर्ष नामक संवेग की दशा में उत्साह और उल्लास की उमंग से प्रेरित व्यक्ति प्रत्येक कार्य को करने के लिए उद्यत होती है। हर्ष, मानव-मन को हल्का कर उसे प्रसन्नता से भर देता है। यह शोक की विपरीत संवेगावस्थी मानी जाती है।

उत्पत्ति के कारण – हर्ष की उत्पत्ति आवश्यकताओं, प्रवृत्तियों तथा इच्छाओं की पूर्ति के परिणामस्वरूप होती है। लम्बे परिश्रम यो संघर्ष के पश्चात् जब सफलता प्राप्त होती है तब भी हर्ष पैदा होता है। यदि कोई लाभकारी घटना मन के अनुकूल घटित होती है तो उसके कारण भी व्यक्ति हर्षित होता है। वस्तुतः हर्ष की उत्पत्ति के कारण; देशाओं और परिस्थितियों के साथ बदलते रहते हैं।

हर्ष की अभिव्यक्ति – हर्ष की अभिव्यक्ति कुछ बाह्य शारीरिक लक्षणों के साथ होती है; यथा-चेहरा खिलना, मुस्कानयुक्त चेहरा, हास्य भाव, आँखों में चमक, प्रसन्नतावश ताली बजाना, उछलना, नाचना-कूदना तथा गाने लगना आदि। यदा-कदा हर्षातिरेक के दौरान व्यक्ति को गला भर आता है और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं। वैसे कोई भी व्यक्ति न तो बहुत लम्बे समय तके हर्षित रह सकता है और न शोक मग्न ही।।

हर्ष से हानि-हर्ष उस समय हानिकारक हो जाता है जब आवश्यकता से अधिक हर्षित व्यक्ति कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार किये बिना, कोई न करने योग्य कार्य कर बैठे। ऐसी अवस्था में कर्तव्य के प्रति लापरवाही या उदासीनता भी दिखा सकता है।

हर्ष से लाभ – हर्ष की संवेगावस्था में उत्साह से पूर्ण व्यक्ति गति के साथ अधिक कार्य कर लेता है। उसे थकान कम होती है और उसके स्वास्थ्य में भी अभिवृद्धि होती है।

(4) शोक (Grief) – शोक का संवेग विद्रोह या हानि से जुड़ा है। किसी इच्छित वस्तु या प्रियजन की हानि से शोक का संवेग उत्पन्न होता है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों अथवा सोपानों में व्यक्ति साधारणतया शोक की अनुभूति करता है। दैनिक जीवन में प्राय: सभी व्यक्ति यदा-कदा शोक के संवेग को अनुभव करते हैं। छोटे बच्चे तो एक साधारण से खिलौने के टूट जाने पर भी शोकमग्न हो जाते हैं, जब कि वयस्क व्यक्ति अपने प्रियजन के वियोग या मृत्यु से शोकमग्न होते हैं।

शोक की अभिव्यक्ति – शोकाकुल व्यक्ति के अनेक बाह्य लक्षण हैं; जैसे—उसका चेहरा उतर जाता है, गला अवरुद्ध हो जाता है, वह रोता-पीटता या विलाप करता है और उसे मूच्र्छा भी आ सकती है।

(5) आश्चर्य (wonder) – आश्चर्य के संवेग को मैक्डूगल ने जिज्ञासा की मूल-प्रवृत्ति से जोड़ा है। व्यक्ति में आश्चर्य का संवेग उस समय प्रकाशित होता है जब वह किसी ऐसी चीज, घटना अथवा परिस्थितिको अपने सामने पाता है जिसकी न तो उसे पूर्व कल्पना थी या जिसके लिए वह पहले से तैयार नहीं था। बालकों को आश्चर्य का संवेग वयस्कों की अपेक्षा अधिक प्रभावित करता है।

आश्चर्य की अभिव्यक्ति – आश्चर्य की संवेगावस्था में अनेक बाह्य लक्षण प्रकट होते हैं; जैसे- चौंक पड़ना,आँखें फैल जाना, होंठ खुले रह जाना, साँस रुक जाना और काँपना आदि। जटिल संवेगावस्था के उदाहरण

(1) प्रेम (Love) – प्रेम रागात्मक जटिल संवेगावस्था है जिसकी उत्पत्ति व्यक्ति द्वारा सुखात्मक भावनाओं तथा इच्छाओं को किसी विशिष्ट व्यक्ति अथवा पदार्थ पर केन्द्रित करने से होती है। गिलफोर्ड ने इसकी गणना कृत्रिम केन्द्रित संवेगों में, पदार्थात्मक संवेगावस्था में की है। मैक्डूगल के अनुसार, यह काम (Sex) से सम्बन्धित संवेग है जबकि फ्रॉयड ने प्रेम की प्रत्येक दशा को वासनाजनित कहा है। लिंटन नामक मनोवैज्ञानिक इसे एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता मानता है।

प्रेम की जटिल संरचना में स्नेह, वात्सल्य, दया, ममता, सहानुभूति तथा कामवासना का योग रहता है। प्रेम की अभिव्यक्ति शारीरिक स्पर्श, चुम्बन, गोद में बिठलाना, रोमांचित होना, लम्बी-लम्बी साँसें लेना तथा आलिंगन करना आदि हैं। कभी-कभी प्रेम मात्र एक संवेग ही नहीं रहता बल्कि एक ‘स्थायी भाव’ का रूप ले लेता है। उदाहरण के लिए–माँ की अपने बच्चे के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति स्थायी संवेग की दशा है।

प्रेम की संवेगावस्था उत्साहवर्द्धन करती है जिससे आशावादी दृष्टिकोण पैदा होता है और उच्च भावना ग्रन्थि विकसित होती है। प्रेम की स्थिति में आँखों की चमक बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त कार्यक्षमता में वृद्धि के कारण कार्य द्रुतगति से होता है। प्रेम में व्यक्तित्व का विस्तार होता है।

(2) घृणा (Hate) – प्रेम के सदृश की घृणा भी एक रागात्मक जटिल संवेगावस्था है जिसकी उत्पत्ति दु:खात्मक, विरक्तिमूलक, भय अथवा क्रोधमिश्रित भावनाओं को किसी व्यक्ति या पदार्थ विशेष पर केन्द्रित करने से मानी जाती है। वस्तुतः घृणा का संवेग उस परिस्थिति, वस्तु या व्यक्ति के प्रति पाया जाता है जिसे हम स्वयं से दूर रखना चाहते हैं। उदाहरण के लिए–दुष्ट या दुर्जन व्यक्ति को सामान्यतया सभी लोग स्वयं से दूर रखना चाहते हैं, यही कारण है कि दुष्ट या दुर्जन से हर कोई घृणा करता है। घृणा में प्रेम के विपरीत निराशावादी दृष्टिकोण तथा हीनभावना का विकास होता है तथा घृणा करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व संकुचित होता है।

प्रश्न 4.
संवेग में शारीरिक परिवर्तनों का क्या स्थान है? उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिए।
या
संवेग की अवस्था में कौन-कौन से परिवर्तन होते हैं?”
या
संवेगावस्था में होने वाले आन्तरिक और बाह्य शारीरिक परिवर्तनों को स्पष्ट कीजिए।
या
संवेगावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

संवेगात्मक अवस्था में परिवर्तन
(Changes in Emotional Stage)

प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव प्राणी के शरीर में कुछ स्पष्ट शारीरिक परिवर्तनों को जन्म देता है। ये शारीरिक परिवर्तन दो प्रकार के हैं—बाह्य शारीरिक परिवर्तन तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन। बाह्य शारीरिक परिवर्तन उन परिवर्तनों को माना जाता है जिन्हें बाहर से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जबकि आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों को अन्दर से अनुभव किया जाता है। संवेगात्मक स्थिति में होने वाले इन दोनों प्रकार के शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन निम्नलिखित है –

बाह्य शारीरिक परिवर्तन
(External Bodily Changes)

सभी संवेग उत्पत्ति के साथ ही अपना बाह्य प्रकाशन करते हैं जो बाह्य शारीरिक परिवर्तनों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इन परिवर्तनों को देखकर ही संवेग का अनुमान लगा लिया जाता है। संवेगावस्था में जो बाह्य लक्षण प्रकट होते हैं वे निम्न प्रकार हैं –

(1) मुखमण्डलीय अभिव्यक्ति (Facial Expression) – मुखमण्डल अर्थात् चेहरा हमारे आन्तरिक भावों की सही-सही अभिव्यक्ति कर देता है। संवेगात्मक स्थिति से सम्बन्धित बाह्य परिवर्तन की सर्वप्रथम अभिव्यक्ति चेहरे द्वारा होती है। मुखाकृति संवेग की सबसे सशक्त एवं महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति मानी जाती है। संवेग के समय चेहरे पर तेजी से परिवर्तन आते हैं जिसका प्रभाव मुख की मांसपेशियों के फैलने और सिकुड़ने, आँख, नाक, मुख की रेखाओं के विशिष्ट रूप में प्रभावित होने से है। सुखद संवेगावस्था में एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति का चेहरा मांसपेशियों के फैलाव के कारण खिला हुआ दिखायी देता है। इसके विपरीत दु:खद संवेगावस्था में एक दुःखी व्यक्ति का चेहरा लटक जाता। है। लज्जा की अवस्था में आँखें नीची हो जाती हैं और चेहरा शर्म से लाल हो जाता है। क्रोधावस्था में भौंहें तन जाती हैं, आँखें बाहर की ओर उभर जाती हैं व लाल हो जाती हैं, नथुने फड़कने लगते हैं, होंठ काँपने लगते हैं तथा व्यक्ति अपने दाँत पीसने लगता है।

मुखमण्डलीय अभिप्रकाशने का सही-सही अनुमान कुशल एवं सूक्ष्म निरीक्षण की क्षमता पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के सिर्फ चित्र को देखकर ही चेहरे की अभिव्यक्ति से सम्बन्धित परिवर्तनों का निर्णय नहीं लिया जा सकता। कुछ मुखमण्डलीय अभिव्यक्तियाँ जन्मजात होती हैं तो कुछ अर्जित। संस्कृति और प्रशिक्षण, इन दोनों के प्रभाव से चेहरे की संवेगावस्था को समझा या पहचाना जा सकता है।

(2) स्वर की अभिव्यक्ति (Vocal Expression) – स्वर बाह्य अभिव्यक्ति को एक प्रमुख लक्षण है। संवेगात्मक दशाओं में स्वर में परिवर्तन आ जाता है। हम अनुभव करते हैं कि प्रेमावस्था में स्वर मधुर हो जाता है, क्रोध आने पर स्वर तीव्र और भारी हो जाता है, भय में स्वर काँप उठता है या घिग्घी बँध जाती है तथा चिन्ता की अवस्था में स्वर तीव्र व कर्कश हो जाता है। इस प्रकार संवेग के समय हमारे स्वर की गम्भीरता, ऊँचाई तथा गति सामान्यावस्था से अधिक हो जाती है। मनोवैज्ञानिक खोजों से ज्ञात होता है कि स्वर के आधार पर संवेग की पहचान कठिन है, क्योंकि संवेगावस्था में स्वर का परिवर्तन साधारण रूप से होता है। संगीतशास्त्र के अन्तर्गत विविध रागों के माध्यम से स्वरों में संवेग उत्पन्न करने की क्षमता रहती है।

(3) शारीरिक मुद्रा या आसनिक अभिव्यक्ति (Postural Expression) – संवेगात्मक दशाओं में शारीरिक मुद्राओं या आसनों में परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। इसके अन्तर्गत शरीर की समूची स्थिति में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। व्यक्ति के बैठने तथा खड़े होने के आसन संवेग के माध्यम से प्रभावित होते हैं। आसनों द्वारा संवेगों की अभिव्यक्ति में सामाजिक रीति-रिवाज, परम्पराओं, शिक्षा तथा संस्कृति का पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ता है। हम देखते हैं कि क्रोध आने पर कुछ लोग इधर-उधर घूमने लगते हैं, कुछ गालियाँ बकते हैं, कुछ हाथों की मुट्ठियाँ तानकर हाथ फेंकते हैं, तनकर खड़े हो । जाते हैं, पैर पटकते हैं या दूसरे पर वार कर देते हैं।

आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन
(Internal Bodily Changes)

संवेग उत्पन्न होने के समय केवल बाह्य व्यवहार, मुद्राओं एवं अभिव्यक्तियों में ही परिवर्तन नहीं आते, अपितु व्यक्ति की अनेक आन्तरिक क्रियाओं में भी परिवर्तन आते हैं। निश्चय ही, ये आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन बाहर से दिखाई नहीं पड़ते हैं। इन परिवर्तनों का निरीक्षण करने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा अनेक विशिष्ट यन्त्रों को प्रयोग किया जाता है। संवेगावस्था में होने वाले विभिन्न आन्तरिक परिवर्तनों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है –

(1) हृदय की गति में परिवर्तन (Change in the Heart-Beats) – सामान्यतः संवेगावस्था में हृदय की गति में कुछ-न-कुछ परिवर्तन अवश्य आता है। रक्त नलिकाओं के संकुचन अथवा प्रसारण के कारण व्यक्ति के अंग विशेष में रक्त का प्रवाह कम या अधिक होने के कारण हृदय गति प्रभावित होती है। रक्त प्रवाह तेज होने पर हृदय गति तेज हो जाती है। उदाहरणार्थ-क्रोध व लज्जा के कारण गालों का रंग लाल हो जाता है, किन्तु भय के कारण रक्तप्रवाह धीमा होने की वजह से हृदय गति भी मन्द रहती है और चेहरे का रंग पीला या सफेद पड़ जाता है। हृदय गति के परिवर्तन को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ नामक यन्त्र द्वारा मापते हैं।

(2) रक्तचाप में परिवर्तन (Change in Blood Pressure) – संवेगावस्था में रक्तचाप में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। हृदय जिस शक्ति या दाब से शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता है उसे रक्तचाप कहते हैं। रक्तचाप की माप प्लेथिस्मोग्राफ (Plethysmograph) नामक यन्त्र की सहायता से की जाती है। वस्तुतः रक्तचाप को संवेग की दशाओं का ज्ञान करने के लिए एक प्रभावकारी सूचक मान लिया गया है। जो व्यक्ति किसी विशेष संवेग के प्रति अभ्यस्त हो जाते हैं उनके रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं मिलता, किन्तु संवेग के अनभ्यस्त लोगों का रक्तचाप संवेगावस्था में बदल जाता है। झूठ बोलने वाले अनभ्यस्त लोगों का रक्तचाप बढ़ जाता है, किन्तु झूठ बोलने वाले अभ्यस्त व्यक्तियों के रक्तचाप में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसी के आधार पर मनोवैज्ञानिक लोग अपराधियों की बातों से झूठ या सच का पता लगा लेते हैं।

(3) रक्त-रसायन में परिवर्तन (Change in Blood Chemicals) – रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन मापने वाले यन्त्रों के प्रयोग से ज्ञात हुआ है कि संवेगावस्था में रक्त-रसायन (रक्त के रासायनिक तत्त्वों) में भी परिवर्तन आते हैं। संवेग जाग्रत होने पर रक्त की श्वेत एवं लाल रक्त कणिकाओं की संरचना बदल जाती है। कैनन आदि मनोवैज्ञानिकों ने कुत्ते, बिल्ली और मानव पर विभिन्न प्रयोग किये हैं। ज्ञात होता है क़ि क्रोध की संवेगावस्था में मानव की अभिवृक्क ग्रन्थियाँ, अभिवृक्की (Adrenaline) नामक रस निकालती हैं। यह रस सीधा रक्त में मिलकर रक्त की शर्करा को बढ़ा देता है, जिससे व्यक्ति को अधिक शक्ति अनुभव होती है। अतः संवेग में रक्त-रसायन में परिवर्तन आते हैं।

(4) रसपरिपाक में परिवर्तन (Change in Metabolic) – रसपरिपाक अर्थात् पाचन-क्रिया में परिवर्तन, संवेगावस्था का एक महत्त्वपूर्ण आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन है। रसपरिपाक की प्रक्रिया के अन्तर्गत भोजन का पाचन होता है और वह रक्त में मिलता है। बसविक नामक मनोवैज्ञानिक के प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि भय, क्रोध तथा दु:ख आदि की संवेगावस्था में रसपरिपाक की प्रक्रिया बन्द हो जाती है, किन्तु आश्चर्य का संवेग उसमें वृद्धि लाता है जबकि प्रसन्नता तथा हँसी-मजाक के दौरान किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। कैनन ने इस सम्बन्ध में बिल्ली पर प्रयोग किये। प्रयोग में बिल्ली को खाना खिलाया गया जिसके उपरान्त उसमें रसपरिपाक (पाचन) की क्रिया प्रारम्भ हो गयी। तभी उसके सामने एक कुत्ते को लाया गया जिसे देखते ही भय का संवेग उत्पन्न होने के कारण रसपरिपाक की क्रिया बन्द हो गयी। इससे सिद्ध हुआ कि भय का संवेग उठने पर रसपरिपाक की क्रिया अक्रुद्ध हो जाती है।

(5) साँस की गति में परिवर्तन (Change in Rate of Respiration) – संवेगावस्था में सॉस की गति में परिवर्तन आ जाता हैं। सामान्य अवस्था में साँस की गति निश्चित रहती है और श्वासप्रश्वास का अनुपात 1:4 होता है। क्रोध, हर्ष तथा प्रत्याशा आदि के संवेग में साँस की गति बढ़ जाती है, जबकि भय, दुःख तथा आश्चर्य आदि के समय इसकी गति कम हो जाती है अथवा रुक जाती है। साँस की गति को न्यूमोग्राफ (Pneumograph) नामक यन्त्र की सहायता से मापते हैं।

(6) वैद्युत त्वक अनुक्रिया में परिवर्तन (Change in Galvanic Skin Response) – संवेग की स्थिति में वैद्युत त्वक्-अनुक्रिया निश्चित रूप से उपस्थित रहती है। यह त्वचा की विद्युत अवरोधों की क्रिया है। त्वक्-अनुक्रिया परिवर्तन के अन्तर्गत शरीर में रोमांच या सिहरन पैदा होना, रोंगटे खड़े हो जाने या पसीने की ग्रन्थियों में परिवर्तन आना दृष्टिगोचर होते हैं। इनसे संवेगावस्था का न्यूनाधिक आभास मिल ही जाता है। इसे साइकोगैल्वनोमीटर (Psychogalvanometer) की सहायता से मापा जाता है।

(7) मस्तिष्क तरंगों में परिवर्तन (Change in Brain waves) – संवेगावस्था में मस्तिष्क तरंगों की आवृत्ति में भी परिवर्तन पाया जाता है। इस प्रकार के परिवर्तनों में सहानुभूतिक नाड़ी मण्डल तथा उपसहानुभूतिक नाड़ी मण्डल जो स्वतन्त्र स्नायु मण्डल के भाग हैं, प्रभावित होते हैं।

निष्कर्ष यह है कि साधारण रूप से एक ही प्रकार के आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन विभिन्न संवेगावस्थाओं में मिलते हैं तथा हर एक संवेग के दौरान एक विशिष्ट प्रकार के आन्तरिक परिवर्तनों की एक जैसी श्रृंखला नहीं पायी जाती।

प्रश्न 5.
संवेग के जेम्स-लॉज सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत कीजिए।
या
जेम्स लॉज का संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त क्या है?
या
संवेग के सम्बन्ध में विभिन्न मतों (सिद्धान्तों) का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

संवेग के सिद्धान्त
(Theories of Emotion)

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि संवेगावस्था में शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन होते हैं। दूसरे शब्दों में, संवेगों का बाह्य तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों के साथ गहरा सम्बन्ध है। प्रश्न यह उठता है कि संवेगावस्था में होने वाले इन परिवर्तनों का आधार क्या है ? संवेग की दशा में पहले शारीरिक परिवर्तन आते हैं यो मानसिक परिवर्तन ? इन आधारों को समझने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा अध्ययन किये गये हैं जिनके परिणामस्वरूप इस सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों में से प्रमुख सिद्धान्त ये हैं –

  1. जेम्स-लाँज का सिद्धान्त;
  2. कैनन-बार्ड का सिद्धान्त;
  3. लीपर का प्रेरणात्मक सिद्धान्त;
  4. सक्रियकरण सिद्धान्त।

जेम्स-लॉज का सिद्धान्त
(James-Lange Theory)

संवेग सम्बन्धी ‘जेम्स-लॉज का सिद्धान्त’ दो मनोवैज्ञानिकों के पृथक् एवं स्वतन्त्र प्रयासों का परिणाम है। अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स तथा डेनमार्क के दैहिक मनोवैज्ञानिक लाँज ने स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग कार्य करते हुए सन् 1884-85 में अपने-अपने संवेग विषयक सिद्धान्त प्रस्तुत किए। संयोगवश दोनों विद्वानों ने लगभग एक जैसे ही विचारों का प्रतिपादन किया था। इसी कारण इनके द्वारा प्रस्तुत किए गए निष्कर्षों को संयुक्त रूप से जेम्स-लॉज सिद्धान्त का नाम दिया गया।

सिद्धान्त की व्याख्या – संवेगों के सम्बन्ध में एक सामान्य सिद्धान्त या विचारधारा प्रचलित है। जिसके अनुसार सर्वप्रथम संवेगात्मक अनुभूति होती है और इसके बाद संवेगात्मक व्यवहार होता है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी उत्तेजना के सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति पहले किसी परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करता है, तब उसके अन्दर मानसिक परिवर्तन होते हैं जो शारीरिक परिवर्तनों को जन्म देते हैं और इस प्रकार वह कोई कार्य (व्यवहार) करता है। उदाहरण के लिए–बहुत दिनों के बाद एक माँ अपने बेटे को देखती है जिससे उसके अन्दर मानसिक परिवर्तन आते हैं और वात्सल्य का संवेग जन्म लेता है। यह वात्सल्य को संवेग प्यार, दुलार और आलिंगन जैसी शारीरिक क्रियाओं द्वारा व्यक्त होता है। सामान्य सिद्धान्त को निम्न प्रकार से भली प्रकार समझा जा सकता है –

व्यक्ति को उत्तेजना से सम्पर्क → परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण →
मानसिक परिवर्तन (संवेगात्मक अनुभूति) → शारीरिक परिवर्तन एवं क्रियाएँ

किन्तु जेम्स और लॉज उपर्युक्त प्रचलित विचारधारा के विपरीत अपनी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के विशिष्ट संवेगात्मक व्यवहार (अथवा शारीरिक परिवर्तनों) के फलस्वरूप ही अभीष्ट संवेगों की अनुभूति होती है। विलियम जेम्स ने अपने विचारों को इस प्रकार प्रकट किया है, मेरा सिद्धान्त है कि शारीरिक परिवर्तन उद्दीपक के प्रत्यक्षीकरण के तुरन्त बाद होता है और जैसे ही वे संवेग में होते हैं उनके प्रति हमारी अनुभूति बदल जाती है।’ संवेगात्मक व्यवहार के विषय में उनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है, “हमें दुःख होता है क्योंकि हम रोते हैं, क्रोध उत्पन्न होता है क्योंकि हम मारते हैं, भय लगता है क्योंकि हमें काँपते हैं, हम इसलिए नहीं रोते, मारते या काँपते क्योंकि हमें दु:ख होता है, क्रोध उत्पन्न होता है या भय लगता है।” जेम्स के ही समान लाँज ने भी संवेगों की उत्पत्ति के लिए शारीरिक क्रियाओं को जिम्मेदार माना। लॉज के शब्दों में, “हमारे हर्षों और विषादों के लिए, हमारे आनन्दों और व्यथाओं के लिए, हमारे मानसिक जीवन के सम्पूर्ण संवेदनात्मक पहलू के लिए वाहिनी पेशी संस्थान उत्तरदायी है।”

जेम्स-लाँज सिंद्धान्त का सार-संक्षेप यह है कि उद्दीपने के उपस्थित होने पर व्यक्ति में क्रियाओं का प्रारम्भ होता है और उसके शरीर में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इन क्रियाओं और परिवर्तनों का ज्ञान व्यक्ति के अन्दर संवेग पैदा करता है जिसकी उसे अनुभूति होती है। इसे निम्न प्रकार से भली प्रकारे समझ सकते हैं।

परिस्थिति को प्रत्यक्षीकरण शारीरिक परिवर्तन एवं क्रियाएँ →
मानसिक परिवर्तन (संवेगात्मक अनुभूति)

जेम्स-लॉज सिद्धान्त के पक्ष में तर्क या प्रमाण

जेम्स-लाँज ने अपने संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तर्क या प्रमाण प्रस्तुत किये हैं –

(1) संवेग जाग्रत होने से पूर्व शारीरिक परिवर्तनों की उत्पत्ति – यदि कोई उद्दीपक अचानक ही उपस्थित हो जाए तो संवेग जाग्रत होने से पूर्व ही कुछ शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। इस बारे में जेम्स का मत है कि अगर कोई व्यक्ति अन्धकार में किसी काली चीज को अचानक देख ले तो किसी संवेग के जगने से पहले ही उसके हृदय की धड़कनें बढ़ जाती हैं, मुँह सूख जाता है और वह हाँफने लगता है। इसके अलावा किसी भयंकर ध्वनि या धमाके को सुनकर भी व्यक्ति बिना किसी संवेग के चौंक उठती है। इसके बाद जब वह उस ध्वनि या धमाके का अभिप्राय समझता है तो उसमें भय अथवा आश्चर्य उत्पन्न होता है।

(2) शारीरिक अभिव्यक्ति का संवेग से घनिष्ठ सम्बन्ध – शरीर के अंगों की अभिव्यक्ति को संवेग से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होना जेम्स-लाँज सिद्धान्त’ के पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण तर्क है। ऐसे संवेग की कल्पना करना दुष्कर है जिसमें शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति न होती हो। संवेग की अनुभूति के लिए तद्नुरूप शारीरिक आसन (Bodily Posture) का होना बहुत जरूरी है।

(3) शारीरिक अभिव्यक्ति के विरोधस्वरूप संवेग का भी विरोध – यदि शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति का विरोध किया जाए तो इसके फलस्वरूप तत्सम्बन्धी संवेग को भी विरोध हो सकता है। यदि कोई उद्दीपक सम्मुख आ जाए और उसके प्रति की जाने वाली स्वाभाविक क्रियाओं को हम रोक लें तो संवेग जाग्रत नहीं होगा। जेम्स के अनुसार, यदि किसी की मृत्यु पर कोई रुदन-क्रन्दन न केरे अथवा ऐसी ही कोई शारीरिक क्रिया प्रदर्शित न करे तो दुःख का संवेग नहीं माना जायेगा।

(4) कृत्रिम अभिव्यक्तियों के माध्यम से संवेग की जाग्रति – कृत्रिम अर्थात् बनावटी ढंग से शारीरिक अंगों की अभिव्यक्तिंयाँ प्रदर्शित करने से संवेग जाग्रत हो जाते हैं। इसे जेम्स ने फिल्म और नाटक के अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का उदाहरण प्रस्तुत कर समझाया है। ये कलाकार फिल्म और नाटक में अभिनय के दौरान कृत्रिम व्यवहार अथवा क्रियाओं तथा हाव-भावों का प्रदर्शन कर संवेगाभिव्यक्ति करते हैं। यह बनावटी व्यवहार या क्रियाएँ उनमें तत्सम्बन्धी संवेग को जाग्रत कर देते हैं। जिससे उनका अभिनय जीवन्त एवं सफल हो जाता है।

(5) शराब अथवा नशीले पदार्थों के सेवन से संवेग की उत्पत्ति – शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से भी संवेग की उत्पत्ति होती है। इसका कारण यह है कि इन उत्तेजक पदार्थों के कारण शारीरिक अवस्था कुछ इस प्रकार की हो जाती है कि वह विभिन्न संवेगों को उत्पन्न कर देती है। जेम्स स्वीकार करता है कि किसी व्यक्ति द्वारा मादक या नशीले पदार्थों का सेवन करने से, बिना किसी बाहरी उद्दीपक के, उसमें स्वत: ही खुशी, दु:ख, साहस, करुणा आदि के संवेग उत्पन्न होने लगते हैं।

(6) रोगों से संवेग की उत्पत्ति – जेम्स का मत है कि किन्हीं रोगों में बाह्य उद्दीपन के बिना ही संवेग उत्पन्न होने लगते हैं। उसके अनुसार, “यकृत के रोग अवसाद तथा चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करते हैं, जबकि स्नायविक रोग भय एवं निराशा को जन्म देते हैं।”

स्पष्टत: उपर्युक्त वर्णित एवं जेम्स द्वारा पुष्ट किये गये तर्को तथा प्रमाणों के आधार पर ‘जेम्स-लॉज सिद्धान्त’ की यह अवधारणा सिद्ध होती है, “जब तक शारीरिक व्यवहार नहीं होगा, तब तक उससे सम्बन्धित संवैग की अनुभूति हमें नहीं होगी।”

जेम्स-लाँज सिद्धान्त के विपक्ष में तर्क या आलोचना

जेम्स-लॉज के सिद्धान्त के प्रस्तुतीकरण के उपरान्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त की प्रयोगात्मक परीक्षा की। सिद्धान्त की जाँच के पश्चात् बहुत-से मनोवैज्ञानिक इस विचार से सहमत नहीं थे कि शारीरिक परिवर्तनों के बाद ही संवेग की अनुभूति होती है। फलतः इस सिद्धान्त की कटु आलोचना हुई और इसके विपक्ष में निम्नलिखित तर्क या प्रमाण प्रस्तुत किये गये –

(1) शेरिंगटन (Sherington) ने एक कुत्ते पर प्रयोग करके जेम्स-लॉज के सिद्धान्त के विरुद्ध यह सिद्ध कर दिया कि शारीरिक परिवर्तनों के अभाव में भी संवेगात्मक प्रतिक्रियाएँ सम्भव हैं। शेरिंगटन द्वारा एक कुत्ते के गले की नाड़ियों को इस भॉति पृथक् कर दिया गया कि जिससे उसके आन्तरिक परिवर्तनों का सन्देश उसके मस्तिष्क को न मिले। कुत्ते के सम्मुख संवेगात्मक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने पर पाया गया कि कुत्ते ने प्रत्येक संवेग को पूर्ण अभिव्यक्ति दी। इस प्रकार कुत्ता शारीरिक परिवर्तनों के बिना भी संवेगों का अनुभव कर रहा था। यह प्रमाण जेम्स-लाँज के सिद्धान्त का विरोध करता है।

(2) कैनन (Canon) ने बिल्लियों पर प्रयोग किये। बिल्ली के स्वतन्त्र स्नायु मण्डल की माध्यमिक या सहानुभूति स्नायुओं को शल्य क्रिया द्वारा काटकर अलग कर दिया गया। निरीक्षण के दौरान पाया गया कि संवेगावस्था में आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन तो बन्द हो गये, किन्तु बाह्य अभिव्यक्ति पहले की तरह होती रही। बिल्ली के सामने क्रोध का उद्दीपक आने पर वह गुर्रायी तथा कान को पीछे की तरफ भी खींचा। इस प्रकार क्रोध के बाह्य लक्षण अभिव्यक्त करके भी उसमें आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं हुए।

(3) जेम्स-लाँज के संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त की मान्यता है कि किसी संवेग की उत्पत्ति के लिए सम्बन्धित वस्तु का प्रत्यक्षीकरण ही काफी होता है। आलोचकों ने इस मान्यता को अस्वीकार किया है। तर्क यह है कि यदि यह मान्यता सत्य होती तो किसी एक वस्तु या घटना के प्रत्यक्षीकरण के परिणामस्वरूप प्रत्येक परिस्थिति में एक ही प्रकार की प्रतिक्रिया प्रकट की जाती, परन्तु व्यवहार में प्रायः ऐसा नहीं होता। बार्ड ने एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “मान लीजिए, जेम्स का मुकाबला पहले तो पिंजरे में बन्द भालू• से होता है और तत्पश्चात् खुले हुए भालू से। पहली वस्तु (भालु) को वह मूंगफली देता है और दूसरी वस्तु (उसी भालू) से भागता है।” प्रस्तुत उदाहरण द्वारा स्पष्ट होता है कि किसी संवेग की उत्पत्ति के लिए अभीष्ट वस्तु के साथ ही कुछ परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इस तर्क द्वारा भी जेम्स-लॉज सिद्धान्त को खण्डन किया गया है।

(4) डॉ० डाना (Dr. Dana) ने एक चालीस वर्षीय महिला के सम्बन्ध में भी, जो घोड़ेसे गिर गयी थी, यही कुछ पाया। महिला की गर्दन में चोट आ जाने के कारण उसका सहानुभूतिक नाड़ीमण्डल संवेदना प्राप्त नहीं कर पाता था, किन्तु वह संवेगों की अनुभूति कर उन्हें भली-भांति प्रकट कर सकती थी। इससे पता चला कि संवेगात्मक अनुभूति के लिए अन्तरावयव संवेदनाएँ तथा शारीरिक परिवर्तन आवश्यक नहीं हैं।

(5) आर्चर (Archer) नामक मनोवैज्ञानिक ने जब फिल्म और नाटक से जुड़े अभिनेताओं के सम्बन्ध में जाँच की तो इसके परिणाम जेम्स की अवधारणा के विपरीत हासिल हुए। बहुत से कलाकारों ने व्यक्त किया कि शारीरिक अंगों की अभिव्यक्ति के समय उन्हें किसी प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति नहीं हुई।

(6) जेम्स-लाँज सिद्धान्त की मान्यता है कि शराब या मादक पदार्थों के सेवन से संवेग की उत्पत्ति होती है। अनेक व्यक्तियों को मादक तथा उत्तेजक पदार्थों का सेवन कराया गया, फिर भी उन्हें किसी प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति नहीं हुई। इससे जेम्स-लाँज सिद्धान्त का खण्डन होता है।

(7) आन्तरिक परिवर्तन तथा जाठरिक उपद्रवों के सन्दर्भ में संवेगावस्था की जाँच करने के लिए मैरेनन केन्ड्रिल, हन्ट तथा कैनन ने प्रयोग किये, जिनसे सिद्ध हुआ कि आन्तरिक परिवर्तन तथा जठरिक उपद्रवों के होने पर भी संवेग का उठना आवश्यक नहीं है।

(8) शारीरिक अभिव्यक्तियों के आधार पर संवेग प्रकट नहीं होते। प्रायः देखा गया है कि विशिष्ट संवेग विशिष्ट प्रकार की शारीरिक अभिव्यक्तियों से सम्बन्ध नहीं रखते, बल्कि कई संवेगों के साथ ही एक ही प्रकार की शारीरिक अभिव्यक्ति होती है। दुःख और अत्यधिक हर्ष एकदम विपरीत संवेग हैं, किन्तु इनकी शारीरिक अभिव्यक्ति एकसमान है-दोनों में आँसू निकल पड़ते हैं।

(9) अन्तिम रूप से, यौन ग्रन्थियों के न रहने पर भी लोगों में यौन सम्बन्धी संवेग जाग्रत होते हुए देखा गया है-यह भी सिद्धान्त के विपरीत तथ्य है।

जेम्स-लाँज का सिद्धान्त मनोवैज्ञानिकों की कटु आलोचनाओं की परिधि में रहा और पूर्णत: मान्य न हो सका। स्वयं जेम्स को इन आलोचनाओं में वर्णित तथ्यों पर ध्यान देना पड़ा और उसने आगे चलकर अपनी विचारधारा में कुछ संशोधन भी किये जिसके परिणामस्वरूप सिद्धान्त का संशोधित रूप सामान्य विचारधारा के सदृश ही हो गया। फिर भी शारीरिक परिवर्तन तथा आंगिक क्रियाओं को महत्त्व प्रदान करने वाले इस सिद्धान्त का संवेग के क्षेत्र में अपूर्व योगदान रहा है।

प्रश्न 6.
कैनन के संवेग सम्बन्धी सिद्धान्त की विवेचना प्रस्तुत कीजिए।
या
संवेग सम्बन्धी कैनन-बार्ड सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।

उत्तर :

कैनन को संवेग सिद्धान्त
(Canon’s Theory of Emotion)

शारीरिक परिवर्तनों के ज्ञान तथा अनुभव करने को ही संवेग की संज्ञा देने वाले जेम्स-लॉज सिद्धान्त की विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने कटु आलोचना की। इन मनोवैज्ञानिकों में कैनन भी एक प्रमुख वैज्ञानिक है। कैनन और उनके सहयोगी बार्ड ने जेम्स-लाँज सिद्धान्त के विरुद्ध अपना सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसे कैनन-बार्ड का सिद्धान्त (Canon-Bard Theory) के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं में हाइपोथैलेमस का स्राव प्रमुख कार्य करता है; अतः इसे हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त (Hypothalamic Theory) या आकस्मिक सिद्धान्त (Emergency Theory) भी कहते हैं।

कैनन-बार्ड सिद्धान्त की व्याख्या-मानव मस्तिष्क में संवेगात्मक अनुभूति का केन्द्र ‘वृहद् मस्तिष्क (Cerebral Cortex) है तथा संवेगात्मक अभिव्यक्ति का केन्द्र ‘अ ्तर्मस्तिष्क (Diencephalon) है। इसके दो मुख्य भाग हैं–हाइपोथैलेमस तथा थैलेमस। हाइपोथैलेमस ग्रन्थि , समस्त संवेगों का केन्द्र है तथा इसका स्राव संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं में मुख्य रूप से कार्य करती है। संवेग की क्रिया के समय सर्वप्रथम तो संवेगात्मक परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण होता है जिसके कारण हाइपोथैलेमस उत्तेजित हो उठता है। अत: सबसे पहले आदेश या संवेग हाइपोथैलेमस में उत्पन्न होता है। इसके बाद यह एक साथ ही वृहद् मस्तिष्क के कॉक्स तथा आन्तरिक अंगों की माँसपेशियों में जाता है। परिणामस्वरूप संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार एक साथ दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः कैनन-बार्ड सिद्धान्त की अवधारणा के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार दोनों की उत्पत्ति एक साथ ही एवं परस्पर स्वतन्त्र रूप से होती है।

होता यह है कि सर्वप्रथम परिस्थिति या उद्दीपक संग्राहकों को प्रभावित करती है जिससे ज्ञानवाही नाड़ियों के माध्यम से स्नायु-प्रवाह थैलेमस में पहुँचता है। थैलेमस में इस स्नायु-प्रवाह के साथ संवेगात्मक तत्त्व सम्मिलित होते हैं और अब यह प्रवाह वृहद् मस्तिष्क में भेज दिया जाता है। फलस्वरूप व्यक्ति-विशेष में किसी संवेग का अनुभव पैदा होता है। जिस समय स्नायु प्रवाह वृहद् मस्तिष्क की ओर चलता है तो थैलेमस द्वारा उसका कुछ भाग जठर तथा स्केलेटल मांसपेशियों की तरफ मोड़ दिया जाता है। इस भॉति सांवेगिक क्रियाएँ उत्पन्न होती हैं।

सिद्धान्त की विशेषताएँ – कैनन-बार्ड या हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त, जेम्स-लॉज सिद्धान्त के विरोध में प्राप्त परिणामों की उचित रूप से व्याख्या करने में सफल पाया गया। इस विचारधारा के माध्यम से पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त की भ्रान्त धारणाओं को सुधारने का प्रयास हुआ है। कैनन सिद्धान्त के अनुसार जब आन्तरिक अवयव तथा वृहद् मस्तिष्क का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो उस दशा में भी वृहद् मस्तिष्क तथा हाइपोथैलेमस का आपसी सम्बन्ध बना रहता है। जेम्स-लॉज सिद्धान्त के अनुसार यदि सुषुम्ना नाड़ी गर्दन के पास से काट दी जाये या कट जाये तो आन्तरिक अवयवों से सम्बन्धित क्रियाएँ रुक जाएँगी और संवेग उत्पन्न नहीं होगा। इसके विपरीत, कैनन सिद्धान्त के अनुसार संवेग का आवेश हाइपोथैलेमस ग्रन्थि में उत्पन्न होता है तथा वृहद् मस्तिष्क की कॉर्टेक्स में चला जाता है, इसलिए संवेग की अनुभूति सुषुम्ना के कट जाने पर भी रहती है, क्योंकि हाइपोथैलेमस ग्रन्थि को क्रियाशील होने में जरा भी समय नहीं लगता, अतः संवेग की अनुभूति भी अविलम्ब ही हो जाती है। स्पष्ट है कि जेम्स-लॉज के सिद्धान्त की तुलना में कैनन का सिद्धान्त अधिक उपयुक्त है और इस तथ्य की पुष्टि करता है कि संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों एक साथ ही होते हैं।

सिद्धान्त के दोष – कैनन-बार्ड या हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त भी पूर्णतः दोषमुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के दोष निम्न प्रकार हैं –

  1. हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त संवेगावस्था के अन्तर्गत सिर्फ हाइपोथैलेमस को महत्त्व प्रदान करता है, जबकि वास्तव में, हाइपोथैलेमस द्वारा उत्पन्न संवेगात्मक व्यवहार न केवल क्षणिक होता है अपितु स्वाभाविक या प्राकृतिक संवेगात्मक व्यवहार से भिन्न भी होता है।
  2. संवेगों की उत्पत्ति के लिए, हाइपोथैलेमस के अतिरिक्त, स्नायु संस्थान के कुछ भाग भी उत्तरदायी हैं तथा अपना पृथक् महत्त्व रखते हैं।
  3. इन अन्य भागों द्वारा उत्पन्न व्यवहार परिस्थिति से समायोजन की क्षमता रखता है लेकिन हाइपोथैलेमस से उपजे संवेगात्मक व्यवहार में यह क्षमता नहीं होती।
  4. अन्ततः यह बात सिद्ध नहीं हो सकी है कि संवेगात्मक अनुभूति की उत्पत्ति में केवल हाइपोथैलेमिक क्रियाएँ ही महत्त्व रखती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव-जीवन में संवेगों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कोई भी व्यक्ति अनेकानेक मनोवैज्ञानिक कारणों से व्यवहार प्रदर्शित करता है। संवेग भी एक प्रबल मनौवैज्ञानिक कारण है जो व्यक्ति के विशिष्ट व्यवहार को जन्म देता है। वस्तुतः मानव-जीवन से सम्बन्धित अनुभवों तथा व्यवहारों में संवेग महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मनुष्य में परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया करने की प्रेरणा संवेग से ही आती है, जबकि संवेग के अभाव में वह स्वयं को निष्क्रिय पाता है। वीरता और शौर्य के असामान्य कार्यों की प्रेरणा मानव को संवेगों से ही मिलती है। युद्धभूमि में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाला देशभक्त सिपाही बुद्धि से नहीं, संवेगों से प्रेरित होता है। हँसते-हँसते फॉसी का फन्दा चूमने वाले अमर शहीद भगत सिंह का असामान्य व्यवहार संवेगों से ही परिचालित था। संवेग की अवस्था में मनुष्य कभी-कभी ऐसे अद्भुत कार्य कर डालता है। जिनकी वह सामान्य अवस्था में कल्पना भी नहीं कर सकता। तेज ज्वर से पीड़ित बीमार होते हुए भी माता अपने शिशु को सूखे स्थान पर सुलाती है और स्वयं गीले स्थान पर लेटती है। माता-पिता का अपने बच्चों के लिए त्याग वात्सल्य के संवेग के कारण है।

भावात्मक अनुभवों के आधार पर भी कुछ व्यवहार किये जाते हैं। सहानुभूति से द्रवित होकर कोई व्यक्ति अपनी क्षमता से अधिक ऐसे लोगों की मदद कर सकता है जो सहानुभूति के पात्र हैं; किन्तु यदा-कदा सहानुभूति में किया गया व्यवहार सिर्फ कर्तव्य पूर्ति के लिए ही होता है। सामाजिक कर्तव्य का | निर्वाह करने की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति के यहाँ शोक संवेदना व्यक्त करने जाना पड़ता है, जिनसे हमारे विचार कभी नहीं मिलते। इसी प्रकार न चाहते हुए, केवल प्रदर्शन के लिए ही उत्सव में भी सम्मिलित होना पड़ता है। मैक्डूगल ने इसे मिथ्या-प्रवृत्ति (Pseudo-Instinct) का नाम दिया है।

प्रश्न 2.
संवेगों के अवदमन से क्या आशय है?
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में मानव-जीवन में संवेगों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। प्रायः संवेग शक्ति के प्रबल स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। संवेगात्मक परिस्थिति में शरीर में असाधारण शक्ति को संचार होता है और संकटकालीन परिस्थितियों में यही शक्ति शरीर की रक्षा करने में सहायता करती है। आग से बचने के लिए बीमार और कमजोर व्यक्ति भी सिर पर पैर रखकर भाग लेता है और अपने प्राणों की रक्षा करता है, किन्तु यदि संवेगात्मक उद्दीपक अत्यधिक रूप से प्रभावशाली है तो वह मस्तिष्क को संज्ञाविहीन भी कर सकता है, जिससे शरीर की क्रियाशीलता समाप्त हो सकती है।

व्यक्ति, स्वहित में तथा समाज में अपनी भूमिका के सन्दर्भ में, संवेग की अभिव्यक्ति सुविचारित रूप से करता है और उन्हें नियन्त्रित रूप से ही प्रकट होने देता है। कोई भी व्यक्ति सभी के प्रति घृणा का भाव रखते हुए समाज में अच्छे सम्बन्ध स्थापित नहीं रख सकता, फलस्वरूप उसे घृणा से सम्बन्धित अपने संवेग पर नियन्त्रण रखना होगा। स्पष्टत: परिस्थिति विशेष में व्यक्ति अपने संवेगों का अवदमन (Repression of Emotions) करता है। मालिक ने नौकर को दुकान पर प्रताड़ित किया है, अन्दर-ही-अन्दर जला भुना नौकर घर जाते समय एक पहलवान व्यक्ति का अप्रिय व्यवहार भी सह जाता है और अपने क्रोध का प्रदर्शन नहीं कर पाता। नौकर खीझ में अपने क्रोध का अवदमन करती है।

प्रश्न 3.
संवेगों के अवदमन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
संवेगों के अवदमन का कारण उनकी अभिव्यक्ति में बाधा उत्पन्न होना है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रॉयड के अनुसार, उन्हीं इच्छाओं तथा संवेगों का अवदमन सबसे ज्यादा होता है जिन्हें करने की आज्ञा हमारा आत्मसम्मान, परिवार या समाज हमें प्रदान नहीं करता है। हो सकता है, हमारी ये इच्छाएँ और संवेग समाज-विरोधी अथवा अश्लील हों।

फ्रॉयड ने मन के तीन विभाग बताये हैं – (i) चेतन मन, (ii) अवचेतन मन तथा (iii) अचेतन मन। अवदमने की यह क्रिया अचेतन रूप से होती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत दु:खदायी तथा अवांछनीय विचार, स्मृतियाँ तथा प्रवृत्तियाँ चेतन से अवचेतन और फिर अचेतन मन की ओर भेज दिये जाते हैं। व्यक्ति की कोई भी इच्छा, भावना तथा संवेग सबसे पहले चेतन मन में स्थान पाते हैं। चेतन मन इनकी अभिव्यक्ति, पूर्ति एवं सन्तुष्टि के लिए प्रयासरत रहता है, किन्तु यदि इसमें कोई बाधा आती है तो उन्हें अचेतन मन की ओर धकेल दिया जाता है। अवचेतन मन, यद्यपि इन संवेगों के प्रकाशन एवं पूर्ति के लिए यथासम्भव प्रयास करता है, किन्तु मन के इस विभाग में, चेतन में बनी इच्छाओं के कारण इन्हें स्पष्टता नहीं मिलती और अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन्हें अचेतन मन में जाना पड़ता है। इस भाँति चेतन मन के जो संवेग परिस्थितियों के कारण सन्तुष्ट नहीं हो पाते या खुले रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाते, उनका अचेतन मन में अवदमन हो जाता है।

क्योंकि समस्त असन्तुष्ट तथा अप्रदर्शित विचार, स्मृतियाँ, प्रवृत्तियाँ, इच्छाएँ तथा संवेग, अन्ततोगत्वा, अचेतन मन में संगृहीत होते जाते हैं; अतः स्वभावतः, अचेतन मन, चेतन मन की अपेक्षा काफी बड़ा हो जाता है। यह समुद्र में उत्प्लवन करते हिमखण्ड की भाँति है, जिसका एक-चौथाई अंश पानी के ऊपर है और तीन-चौथाई अंश पानी में डूबा हुआ। वस्तुत: चेतन मन सारे समाज-विरोधी, अश्लील अथवा यौनजनित संवेगों को अवचेतन मन में ठेलकर उन्हें पुनः अपने यहाँ वापिस नहीं आने देता। यही कारण है कि इन्हें अवदमित संवेगों के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 4.
संवेगों के अवदमन का मानव-व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेगों के छिपाने या अवदमन से मनुष्य के व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व की सन्तुलित एवं साम्यावस्था के लिए संवेगों का अभिप्रकाशन तथा उनका अवदमन दोनों ही आवश्यक समझे जाते हैं। अत्यधिक रूप से अवदमित संवेग मानव स्वभाव एवं प्रकृति के विपरीत स्वीकार किये गये हैं। विद्वानों के अनुसार संवेगों का प्रकटीकरण एक प्राकृतिक आवश्यकता है और इसके प्रकटीकरण को जबरदस्ती रोक देने से अनेक विकृतियाँ जन्म ले सकती हैं।

मनोविश्लेषणवादियों ने दमित संवेगों से कई मानसिक तथा स्नायुविक व्याधियों का उल्लेख किया है। संवेगों का अवदमन मानव व्यक्तित्व को असामान्य तथा कुण्ठा ग्रस्त बना देता है, जिससे व्यक्तित्व का समुचित तथा अभीष्ट विकास अवरुद्ध हो जाता है।

अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जिस व्यक्ति की इच्छाएँ, भावनाएँ या संवेग पूर्णतः सन्तुष्ट नहीं हो पाते, उनके व्यबहारों में असामान्यता उत्पन्न होने लगती है, उनका व्यक्तित्व विच्छेदन की ओर उन्मुख होने लगता है तथा वे अनेक मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। उनमें आत्महीनता, शक, ईष्र्या तथा डर के भाव उत्पन्न हो जाते हैं तथा मानसिक विकृतियों की वजह से वे ज्यादातर शारीरिक-मानसिक तनाव से कष्ट पाते रहते हैं। स्पष्टतः संवेगों का अवदमन एक निश्चित सीमा से अधिक उचित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 5.
संवेगों के नियन्त्रण के समुचित उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य हैं कि समाज में रहते हुए व्यक्ति अपने संवेगों की पूर्ण रूप से मुक्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, परन्तु संवेगों का अत्यधिक अवदमन किसी समय विस्फोटक स्थिति को जन्म दे सकता है। सामाजिक परिस्थितियों के साथ तालमेल की दृष्टि से संवेगों पर काबू रखने के लिए और उन्हें स्वाभाविक रूप में प्रकटित होने का अवसर प्रदान करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रयुक्त हो सकते हैं –

(1) अवांछनीय संवेगों के विपरीत परिस्थितियों का सृजन – अवांछनीय संवेगों को रोकने का एक उपाय यह है कि उनके विपरीत परिस्थितियों अथवा विरोधी संवेगों को प्रोत्साहित किया जाए। इस भाँति वांछनीय संवेगों की उत्पत्ति के लिए उसे वातावरण तथा परिस्थिति पर काबू पाना होगी जो अवांछनीय संवेगों के लिए उत्तरदायी है। शोक को कम करने के लिए सुखकारी परिस्थितियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

(2) संवेगों का रेचन – रेचन (Chatharsis) से अभिप्राय ‘भड़ास निकालने या भावनाओं को उभारने से है। संवेगों के रेचन से अनचाहे भाव शान्त होते हैं तथा प्राकृतिक आनन्द की प्राप्ति होती है। भय के संवेग को उभारकर बाहर निकालने के लिए बहुत से लोग डरावनी कहानियाँ या घटनाएँ पढ़ते हैं। पति की मृत्यु के आघात से यदि शोकाकुल पत्नी गुमसुम बैठी है और रो नहीं पा रही तो यह भयंकर रूप से हानिकारक हो सकता है। अक्सर स्त्रियाँ जोर-जोर से विलाप कर किसी भी प्रकार उसके दुःख के संवेग को उभारकर उसे रोने के लिए प्रेरित करती हैं। रोने से जी हल्का होता है तथा चित्त को शान्ति मिलती है।

(3) संवेगों का शोधन – इसके अन्तर्गत संवेगात्मक अभिव्यक्ति के परिमार्जन एवं परिवर्द्धन द्वारा स्वस्थ मानसिकता को उत्पन्न किया जाता है। संगीत, चित्रकला, लेखन तथा काव्य आदि के माध्यम से संवेगों को उत्तम अभिव्यक्ति मिलती है।

(4) संवेग का मार्ग परिवर्तन – मार्ग परिवर्तन द्वारा भी संवेग को नियन्त्रित किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति में घृणा का संवेगात्मक प्रकाशन अधिक होता है तो उसे अपने घृणा का भाव दुर्जन व्यक्तियों पर करना चाहिए न कि सज्जन व्यक्तियों पर।

प्रश्न 6.
बाल्यावस्था में संवेगों के होने वाले अवदमन के सम्भावित कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों के मतानुसार बालक में संवेगात्मक व्यवहार शनैः-शनैः विकसित होते हैं और आयु में वृद्धि के साथ-ही-साथ उसके संवेगात्मक व्यवहार स्पष्ट होने लगते हैं। अध्ययन बताते हैं कि संवेगात्मक व्यवहार का विकास नाड़ी-पेशीय यन्त्रों की परिपक्वता पर निर्भर करता है। जीवन के विकास-क्रम में नयी-नयी परिस्थितियों तथा वातावरण के सम्पर्क में आकर बालक नयी-नयी क्रियाओं को सीखता है और इस प्रकार वह साधारण से जटिल संवेगात्मक अवस्थाओं की ओर बढ़ता है। पारिवारिक परिस्थितियों में बालक के प्राकृतिक संवेगों को समाज की सभ्यता, संस्कृति, दर्शन एवं मान्यताओं के अनुसार ढालने की कोशिश की जाती है। इस अनुकूलन के लिए संवेगावस्था पर । नियन्त्रण एक पूर्व आवश्यकता है, किन्तु नियन्त्रण की सीमाओं का अतिक्रमण करने से उत्पन्न भय एवं दबाव की परिस्थितियाँ ‘संवेगों के अवदर्मन’ को जन्म देंगी और बालक स्वयं को तनाव में महसूस करेगा। बालक को जबरदस्त भूख लगी है लेकिन उसे भोजन नहीं मिल पा रहा। क्योंकि उसकी इच्छाओं की तृप्ति में बाधा आ रही है; अतः इससे क्रोध का जन्म होगा ही। यदि बालक को अधिक डराया-धमकाया जाएगा तो वह क्रोध प्रकट न करके अन्दर-ही-अन्दर कुंठित होगा। अवदमन के कारण कुण्ठित और हीनमानसिकता से ग्रस्त व्यक्तित्व आत्मविश्वास में कमी, दब्बूपन, खीझ, मार-पीट, तोड़-फोड़ तथा विद्रोहात्मक रवैये को जन्म देता है। कभी-कभी बालक अपनी हीनभावनाएँ छुपाने के लिए तथा कुण्ठाओं के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के अपराधों में फँस जाते हैं। फ्रायड की अवधारणा के अनुसार, यदि बालक के चेतन मन में उपजे संवेगों की सन्तुष्टि नहीं की जाएगी और उन्हें दबाया जायेगा तो वे अचेतन मन में पहुँचकर मानसिक विकृतियों को जन्म देंगे। वास्तव में, बाल्यावस्था की दमित भावनाएँ समाप्त नहीं होतीं, ये अन्दर-ही-अन्दर सक्रिय रहती हैं तथा बहुधा भयंकर मानसिक अस्वस्थता में बदल जाती हैं। कठोर नियन्त्रण तथा प्रेम व सहानुभूति के अभाव में बालक में संवेगात्मक असुरक्षा के कारण व्यक्तित्व असन्तुलित हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व को समाज में सम्मान प्राप्त नहीं होता।

निष्कर्षतः बालक के स्वाभाविक संवेगों के अवदमन की जगह उनका परिमार्जन कर सही दिशा में प्रकाशन होना चाहिए। इसके लिए परिवार एवं विद्यालय सदृश समाज की प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ सुन्दर भूमिका निभा सकती हैं।

प्रश्न 7.
सहानुभूति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
‘सहानुभूति’ (Sympathy) शब्द दो शब्दों ‘सह + अनुभूति’ का सम्मिलित रूप है, जिसका अर्थ है–‘अन्य प्राणियों के समान ही अनुभूति करना। वुडवर्थ ने ‘सहानुभूति’ का अर्थ बताया है-दूसरे व्यक्ति के साथ अनुभव करना। सामान्यतः लोग गरीब, बीमार तथा अपंग व्यक्तियों के प्रति उन्हीं के समान अनुभूति करने लगते हैं। यह उनके प्रति सहानुभूति कही जाएगी। धनी, स्वस्थ तथा भले-चंगे व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति पैदा नहीं होती। शिकार-पक्षी के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है शिकारी के प्रति नहीं। सहानुभूति को मनोवैज्ञानिक एक प्रकार का संवेग ही मानते हैं जिसका आधार भावात्मक है। मैक्डूगल ने इसे मिथ्या-प्रवृत्ति (Pseudo-Instinct) माना है।

सहानुभूति के प्रकार-सहानुभूति दो प्रकार की होती है –

(i) निष्क्रिय सहानुभूति – इसमें शाब्दिक सहानुभूति प्रदर्शित की जाती है; जैसे—मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करना।

(ii) सक्रिय सहानुभूति – इसके अन्तर्गत हमारी सहानुभूति क्रियाशील होती है; जैसे दु:खी व्यक्ति का कष्ट कम करने के लिए प्रयत्नशील होना, भूकम्प पीड़ितों के लिए राहत कार्य में भाग लेना।

सहानुभूति की व्याख्या – सहानुभूति का जीवन में बड़ा महत्त्व है। सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार लोगों को एक-दूसरे के करीब लाता है। यह त्याग की भावना में वृद्धि करता है। वस्तुतः जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर हर एक व्यक्ति को सहानुभूति की आवश्यकता पड़ती है। सहानुभूति एवं जन-समर्थन पाकर लोग महानतम कष्ट सहन करते हैं। सहानुभूति प्रकट करने वाले व्यक्ति की सहानुभूति उसके पूर्व अनुभवों पर आधारित होती है अर्थात् सहानुभूति के अन्तर्गत व्यक्ति वही व्यवहार या प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है जो उसने समान परिस्थितियों में अन्य व्यक्तियों से प्राप्त की थी। सहानुभूति के लिए कल्पना की भी जरूरत पड़ती है, क्योंकि कल्पना के आधार पर ही दूसरे व्यक्ति के कष्टों का अनुमान किया जा सकता है। व्यवहार में सहानुभूति का प्रकटीकरण दूसरे व्यक्तियों का अनुकरण करके सीखा जाता है, किन्तु सहानुभूति मात्र अनुकरण ही नहीं है बल्कि इसके लिए। एक-दूसरे की अनुभूतियों में सहभागिता भी आवश्यक है। सहानुभूति के संवेग में पर्याप्त रूप से जन्मजात और अर्जित दोनों अंश विद्यमान होते हैं। सहानुभूति की भावना सर्वव्यापक है यानी सभी में पायी जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भाव या अनुभूति से क्या आशय है?
उत्तर :
भाव या अनुभूति (Feeling) का सम्बन्ध मानव-जीवन के भावात्मक पहलू से है। भाव प्राणी को सुख-दुःख की अनुभूति कराने वाली एक ऐसी प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया है जिसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। इच्छाओं की सन्तुष्टि से सुख का भाव तथा उसमें बाधा पड़ने पर दु:ख का भाव पैदा होता है। वस्तुतः मन के इच्छात्मक या चेष्टात्मक एवं ज्ञानात्मक, दोनों पहलुओं के माध्यम से भाव का अनुभव होता है। अधिकांश मनोवैज्ञानिकों ने दो प्रकार के भाव बताये हैं-सुखद तथा दु:खद। रॉयस ने इसके साथ एक तीसरा भाव उद्दीप्त एवं शान्त, भी जोड़ दिया है। वुण्ट ने भावों का त्रि-दिशात्मक सिद्धान्त प्रस्तुत किया है–सुखद-दु:खद, उद्दीप्त-शान्त तथा विक्षेप-विराम। तथ्य यह है कि सुखद और दुःखद, इन दोनों भावों के अलावा अन्य किसी प्रकार के भाव को प्रयोगात्मक परिणामों के आधार पर सत्य सिद्ध नहीं किया जा सका।

प्रश्न 2.
भाव या अनुभूति की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भाव या अनुभूति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भाव सरलतम तथा प्रारम्भिक प्रक्रिया है।
  2. इसका विश्लेषण सम्भव नहीं है।
  3. भाव चंचल तथा क्षणिक होता है। दु:ख के बाद सुख तथा सुख के बाद तत्काल ही दुःख की अनुभूति होने लगती है।
  4. मिश्रित भाव’ का अनुभव नहीं किया जा सकता है अर्थात् हम एक ही समय में एक से अधिक भावों का अनुभव नहीं कर सकते।
  5. भाव की प्रबलता कम या अधिक हो सकती है अर्थात् भाव की मात्रा एक समान नहीं होती।
  6. व्यक्ति की हर एक अनुभूति और व्यवहार के साथ किसी-न-किसी प्रकार का भाव मिला रहता है और अन्तिम रूप से,
  7. भाव को आत्मगत कहा जाता है, क्योंकि व्यक्ति भाव को सदैव अपने अन्दर महसूस करता है।

प्रश्न 3.
भाव तथा संवेग के अन्तर को अति संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भाव (Feeling) तथा संवेग (Emotion) के अन्तर का अति संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour 1
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 4 Emotional Bases of Behaviour 2
प्रश्न 4.
संवेग की अवस्था में होने वाले कोई चार महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तन बताइए।
उत्तर :
संवेग की अवस्था में होने वाले मुख्य शारीरिक परिवर्तन हैं –

  1. मुखाकृति में परिवर्तन
  2. स्वर में परिवर्तन
  3. शारीरिक मुद्राओं में परिवर्तन तथा
  4. हृदय एवं श्वास गति में परिवर्तन।

प्रश्न 5.
संवेग के जेम्स-लॉज तथा कैनन बार्ड सिद्धान्त में अन्तर बताइए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अन्तर्गत मानवीय संवेगों की उत्पत्ति के विषय में मुख्य रूप से दो सिद्धान्तों को मान्यता प्राप्त है। ये सिद्धान्त हैं-जेम्स-लॉज का सिद्धान्त तथा कैनन-बार्ड का सिद्धान्त। ये दोनों सिद्धान्त भिन्न तथा परस्पर विरोधी हैं। जेम्स-लाँज सिद्धान्त के अनुसार संवेगों की अनुभूति शारीरिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप होती है। इस मान्यता के आधार पर कहा गया है कि यदि शारीरिक परिवर्तनों पर रोक लगा दी जाए तो संवेगों की अनुभूति भी नहीं होगी। इसके विपरीत या भिन्न रूप से कैनन-बार्ड सिद्धान्त के अनुसार संवेगों की अनुभूति बाहरी विषय-वस्तुओं के परिणामस्वरूप होती है तथा संवेग की। अनुभूति के बाद ही कुछ शारीरिक परिवर्तन तथा कुछ क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। कैनन-बार्ड सिद्धान्त ने स्पष्ट किया है कि संवेगों की उत्पत्ति का केन्द्र मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस नामक भाग होता है। यही कारण है कि इस सिद्धान्त को हाइपोथैलेमस सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 6.
गिलफोर्ड के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
गिलफोर्ड ने संवेगों का एक व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। उसने समस्त मानवीय संवेगों को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बाँटा है

(1) प्राथमिक संवेग – इस वर्ग में शक्तिशाली एवं प्रबल संवेगों को सम्मिलित किया गया है। ये संवेग उत्तेजना होने पर प्रकट होते हैं तथा तीव्र हलचल मचा देते हैं। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-क्रोध तथा भय।।

(2) गौण संवेग – इस वर्ग में उन संवेगों को सम्मिलित किया जाता है जो प्राथमिक संवेगों के समान तीव्र नहीं होते। इन संवेगों की उत्पत्ति एकाएक न होकर धीमी गति से होती है; जैसे-भूख।

(3) कृत्रिम केन्द्रित संवेग – गिलफोर्ड ने इस वर्ग में पाँच प्रकार के संवेगों को सम्मिलित किया है, जिनका सामान्य परिचय निम्नलिखित है

  1. आत्मकेन्द्रित संवेग-व्यक्ति के आत्म एवं स्वार्थ से सम्बन्धित संवेग; जैसे-आत्मरक्षा का भाव।।
  2. बौद्धिक संवेग–बौद्धिक क्रियाओं से सम्बन्धित संवेग; जैसे—साहित्य सृजन में आनन्द लेना या स्वाध्याय द्वारा मानसिक शान्ति लाभ।
  3. सौन्दर्यात्मक संवेग-सौन्दर्यानुभूति से सम्बन्धित संवेग; जैसे—संगीत अथवा प्रकृति का आनन्द लेना।
  4. पदार्थात्मक संवेग–अन्य पदार्थों या लोगों के हित अथवा सम्पर्क से सम्बन्धित संवेग; जैसे–प्रेम, घृणा, दया तथा परोपकार।
  5. नैतिक संवेग-नैतिक व्यवहार तथा मान्यताओं से सम्बन्धित संवेग; जैसे—शुभ, अशुभ तथा सत्य।

प्रश्न 7.
मैक्डूगल के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मैक्डूगल ने संवेग की अवधारणा को मूल प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में स्पष्ट किया है। मैक्डूगल के अनुसार, प्रत्येक संवेग किसी-न-किसी मूल प्रवृत्ति से सम्बद्ध होता है। मैक्डूगल ने कुल 14 मूल-प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है तथा इस आधार पर उसने 14 ही संवेगों का उल्लेख किया है। इन 14 संवेगों तथा सम्बद्ध मूल प्रवृत्तियों का विवरण इस प्रकार है

  1. भय संवेग-पलायन मूल प्रवृत्ति
  2. क्रोध संवेग-युयुत्सा मूल प्रवृत्ति
  3. घृणा संवेग-निवृत्ति मूल प्रवृत्ति
  4. वात्सल्य संवेग-पुत्र-कामनी मूल प्रवृत्ति
  5. करुणा संवेग-शरणागत मूल प्रवृत्ति
  6. कामुकता संवेग-काम मूल प्रवृत्ति
  7. आश्चर्य संवेग-जिज्ञासा मूल प्रवृत्ति
  8. आत्महीनता संवेग-दैन्य मूल प्रवृत्ति
  9. आत्माभिमान संवेग-आत्म-गौरव मूल प्रवृत्ति
  10. एकाकीपन संवेग-सामूहिकता मूल प्रवृत्ति
  11. भूख संवेग-भोजनान्वेषण
  12. स्वामित्व भाव संवेग-संग्रह प्रवृत्ति
  13. कृतिभाव संवेग-रचना प्रवृत्ति
  14. आमोद संवेग-हास मूल प्रवृत्ति।

प्रश्न 8.
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ० जायसवाल के अनुसार संवेगों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ० जायसवाल ने संवेगों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बाँटा है –

  1. जिज्ञासु संवेग – इस वर्ग में उन संवेगों को सम्मिलित किया गया है जिनको सम्बन्ध जिज्ञासा से है। ज्ञान-प्राप्ति की इच्छा या ज्ञानार्जन का प्रेम इसी वर्ग का संवेग है।
  2. स्वार्थी संवेग – इस वर्ग में व्यक्तिगत स्वार्थ से सम्बद्ध संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-क्रोध, भय, आत्मसम्मान की भावना तथा आत्महीनता की भावना।
  3. सामाजिक संवेग – व्यक्ति के समाज से सम्बन्ध स्थापित कराने वाले संवेगों को सामाजिक संवेग कहा गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं—प्रेम, सहानुभूति तथा सम्मान।
  4. नैतिक संवेग – इस वर्ग में नैतिकता से सम्बद्ध संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-दया, करुणा, परोपकार तथा कर्तव्यपालन।
  5. सौदर्यात्मक संवेग – इस वर्ग में सौन्दर्य बोध से जुड़े हुए संवेगों को सम्मिलित किया गया है। इस वर्ग के मुख्य संवेग हैं-संगीत, कला या आकर्षक वस्तुओं से प्रेम।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. संवेग मूल रूप से जटिल, भावात्मक और ……………………. प्रक्रिया है।।
  2. प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति का मनोशारीरिक सन्तुलन ……………………. जाता है।
  3. प्रत्येक संवेग की उत्पत्ति के पीछे कोई-न-कोई ……………………. कारण निहित होता है।
  4. संवेगावस्था में अनिवार्य रूप से कुछ ……………………. परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं।
  5. प्रबल संवेगावस्था का व्यक्ति की चिन्तन क्षमता पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  6. युद्धभूमि में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाला देशभक्त सिपाही बुद्धि ……………………. से नहीं से प्रेरित होता है।
  7. संवेग जटिल तथा व्यापक होते हैं तथा भाव ……………………. होते हैं।
  8. सरल संवेगावस्था ……………………. में प्रकट होता है।
  9. जटिल संवेगावस्था में ……………………. संवेग मिश्रित रहते हैं।
  10. क्रोध तथा भय अपने आप में ……………………. संवेग हैं।
  11. प्रेम तथा घृणा अपने आप में ……………………. संवेग हैं।
  12. संवेगावस्था में प्रकट होने वाला मुख्य बाहरी शारीरिक परिवर्तन है ……………………. में परिवर्तन।
  13. प्रबल संवेगावस्था में हृदय की गति तथा रक्तचाप में ……………………. |
  14. उद्दीपक के प्रत्यक्षीकरण के पश्चात् पहले शारीरिक परिवर्तन होते हैं और इसके बाद संवेग की अनुभूति। यह ……………………. का मत है।
  15. ……………………. ने संवेग के हाइपोथैलेमस सिद्धान्त का प्रतिपादित किया।
  16. संवेग के विषय में कैनन-बार्ड द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त को ……………………. जाता है।
  17. संवेगों के अति अवदमन का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर ……………………. प्रभाव पड़ता है।
  18. संवेगों के रेचन तथा मार्गान्तरीकरण द्वारा उन्हें ……………………. किया जा सकता है।

उत्तर :

  1. मानसिक
  2. बिगड़
  3. मनोवैज्ञानिक
  4. शारीरिक
  5. प्रतिकुल
  6. संवेग
  7. सरल तथा सीमित
  8. केवल एक ही संवेग
  9. दो या दो से अधिक
  10. सरल
  11. जटिल
  12. मखमण्डलीय अभिव्यक्ति
  13. अवश्य परिवर्तन होता है
  14. जेम्स-लॉज
  15. कैनन-बाडे
  16. हाइपोथैलेमिक सिलान्त
  17. प्रतिकूल
  18. नियन्त्रिता

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
संवेग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
संवेग एक जटिल, भावात्मक एवं मानसिक प्रक्रिया है। जब भाव का प्रकटीकरण बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों में हो जाता है, तब उसे संवेग कहते हैं।

प्रश्न 2.
संवेग की कोई एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
पी० टी० यंग के अनुसार, “संवेग सम्पूर्ण व्यक्ति का तीव्र उपद्रव है, जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है तथा जिसके अन्तर्गत व्यवहार चेतन अनुभूति तथा जाठरिक क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।”

प्रश्न 3.
संवेगों की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(अ) संवेगों की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है, (ब) संवेगों में कुछ बाहरी तथा आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन होते हैं, (स) संवेगों में विचार-शक्ति का लोप हो जाता है। तथा (द) प्रत्येक संवेग का सम्बन्ध किसी-न-किसी मूल प्रवृत्ति से होता है।

प्रश्न 4.
भाव तथा संवेगे में क्या-क्या समानताएँ हैं?
उत्तर
(अ) भाव तथा संवेग दोनों का सम्बन्ध, मस्तिष्क से होता है, (ब) अनेक संवेग साधारण रूप में भाव होते हैं तथा भाव भी तीव्र रूप में संवेग बन जाता है और (स) भाव तथा संवेग दोनों में ही सुख या दुःख पाया जाता है।

प्रश्न 5.
भाव तथा संवेग में पाये जाने वाले चार मुख्य अन्तर लिखिए।
उत्तर :
(अ) भाव की तुलना में संवेग अधिक जटिल होते हैं, (ब) भाव की तुलना में संवेग अधिक व्यापक होते हैं, (स) भाव की तुलना में संवेग अधिक उग्र होते हैं तथा (द) भाव की तुलना में संवेग की दशा में अधिक सक्रियता पायी जाती है।

प्रश्न 6.
क्रोध नामक संवेग के बाहरी शारीरिक लक्षण बताइए।
उत्तर :
क्रोध की दशा में व्यक्ति का चेहरा लाल हो जाता है, भौंहें चढ़ जाती हैं, होंठ कापने लगते हैं, मुट्ठियाँ कस जाती हैं, दाँत पीसने लगते हैं तथा व्यक्ति आघात करता एवं गरजता है।

प्रश्न 7.
भय नामक संवेग की उत्पत्ति के मुख्य कारण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
जब किन्हीं भयानक परिस्थितियों से घिरकर व्यक्ति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तब भय नामक संवेग की उत्पत्ति होती है।

प्रश्न 8.
हर्ष नामक संवेग के बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
हर्ष नामक संवेग के मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षण हैं-चेहरा खिल उठना, चेहरे पर मुस्कान तथा हास्य भाव आना, आँखों में चमक आ जाना, प्रसन्नतावश ताली बजाना, उछलना, नाचना, कूदना, गाना गाने लगना आदि।

प्रश्न 9.
आश्चर्य नामक संवेग के मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
आश्चर्य नामक संवेग के मुख्य बाहरी लक्षण हैं-चौंक पड़ना, आँखें फैल जाना, होंठ खुले रह जाना, साँस रुक जाना, काँपना आदि।

प्रश्न 10.
संवेगावस्था में प्रकट होने वाले मुख्य बाहरी शारीरिक लक्षणों का उल्लेख कीजिए!
उत्तर :
(अ) मुखमण्डलीय अभिव्यक्तियों में परिवर्तन, (ब) स्वर में परिवर्तन तथा (स) शारीरिक मुद्राओं या आसनिक अभिव्यक्ति में परिवर्तन।

प्रश्न 11.
संवेगावस्था में होने वाले मुख्य आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए। या संवेग की अवस्था में होने वाले चार महत्त्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तनों को बताइए।
उत्तर :
(अ) हृदय की गति में परिवर्तन, (ब) रक्तचाप में परिवर्तन, (स) रक्त रसायन में परिवर्तन, (द) रसपरिपाक में परिवर्तन, (य) साँस की गति में परिवर्तन, (र) वैद्युत त्वक्-अनुक्रिया में परिवर्तन तथा (ल) मस्तिष्क तरंगों में परिवर्तन।

प्रश्न 12.
संवेगों की व्याख्या करने वाले कैनन-बार्ड सिद्धान्त को किन नामों से भी जाना जाता है?
उत्तर :
कैनन-बार्ड सिद्धान्त को ‘हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त’ तथा ‘आकस्मिक सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 13.
संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को रोकने या टालने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर :
संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को रोकने या टालने की प्रक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में ‘संवेगों को अवदमन’ कहते हैं।

प्रश्न 14.
संवेगों को नियन्त्रित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(अ) अवांछनीय संवेगों के विपरीत परिस्थितियों का सृजन, (ब) संवेगों का रेचन, (स) संवेगों का शोधन तथा (द) संवेगों का मार्ग-परिवर्तन।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
व्यक्ति की उस दशा को क्या कहते हैं जिसमें व्यक्ति आवेश में आ जाता है, भड़क उठता है। अथवा उत्तेजित हो जाता है?
(क) भाव
(ख) प्रेरणा
(ग) मूल प्रवृत्ति
(घ) संवेग

प्रश्न 2.
“संवेग शब्द किसी भी प्रकार के आवेग में आने, भड़क उठने या उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।” यह कथन किसका है?
(क) गिलफोर्ड
(ख) वुडवर्थ
(ग) आर्थर टी० जर्सील्ड
(घ) पी० टी० यंग

प्रश्न 3.
संवेगों की स्थिति में सर्वप्रथम परिवर्तित हो जाती है –
(क) व्यक्ति की बातचीत
(ख) व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियाँ
(ग) चेहरे की अभिव्यक्तियाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 4.
संवेगों की अवस्था में क्रियाशील हो जाता है-
(क) थैलेमस
(ख) हाइपोथैलेमस
(ग) सुषुम्ना
(घ) लघु मस्तिष्क

प्रश्न 5.
संवेगावस्था में निम्नलिखित में से कौन-सा गुण विद्यमान होता है?
(क) चंचलता
(ख) स्थायित्व
(ग) मानसिक साम्य
(घ) निष्क्रियता

प्रश्न 6.
संवेगावस्था में होने वाले मुख्य आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन हैं
(क) रक्तचाप तथा रक्त-रसायन में परिवर्तन
(ख) हृदय तथा श्वास की गति में परिवर्तन
(ग) रस-परिपाक में उल्लेखनीय परिवर्तन
(घ) ये सभी परिवर्तन

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा संवेग सरल संवेग है ?
(क) प्रेम
(ख) भय
(ग) घृणा
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 8.
जेम्स-लॉज सिद्धान्त का सम्बन्ध है
(क) संवेग से
(ख) अधिगम से
(ग) चिन्तन से
(घ) स्मृति से

प्रश्न 9.
शारीरिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप ही संवेग की अनुभूति होती है। यह मान्यता किस सिद्धान्त की है?
(क) कैनन-बार्ड सिद्धान्त
(ख) जेम्स-लॉज सिद्धान्त
(ग) लीपर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 10.
संवेग सम्बन्धी हाइपोथैलेमिक सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं –
(क) जेम्स तथा लाँज :
(ख) कैनन तथा बार्ड
(ग) लेपियर
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 11.
कैनन-बार्ड सिद्धान्त का सम्बन्ध है –
(क) विस्मृति से
(ख) संवेग से
(ग) अभिप्रेरणा से
(घ) चिन्तन से

प्रश्न 12.
किस सिद्धान्त के अनुसार संवेगावस्था में शारीरिक परिवर्तन तथा संवेग की अनुमति साथ-साथ होती है?
(क) लीपर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त
(ख) जेम्स-लाँज सिद्धान्त
(ग) कैनन-बार्ड सिद्धान्त
(घ) ये सभी सिद्धान्त

प्रश्न 13.
संवेगों के अवदमन से क्या आशय है?
(क) प्रायः शान्त बैठे रहना।
(ख) सदैव संवेगों की मुक्त अभिव्यक्ति
(ग) संवेग की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाना
(घ) सदैव प्रसन्न रहना

प्रश्न 14.
संवेगों के अति अवदमन के परिणाम स्वरूप
(क) व्यक्ति मानसिक एवं स्नायविक रोगग्रस्त हो सकता है।
(ख) व्यक्तित्व का सुचारु विकास अवरुद्ध हो सकता है।
(ग) व्यक्ति कुण्ठाओं का शिकार हो सकता है।
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 15.
संवेगों को नियन्त्रित किया जा सकता है –
(क) संवेगों के विरोध द्वारा
(ख) संवेगों के रेचन द्वारा
(ग) संवेगों के मार्गान्तरीकरण एवं शोध द्वारा
(घ) इन सभी उपायों द्वारा

उत्तर :

  1. (घ) संवेग
  2. (ग) आर्थर टी० बसल्ड
  3. (ग) चेहरे की अभिव्यक्तियाँ
  4. (ख) हाइपोथैलेमस
  5. (क) चंचलता
  6. (घ) ये सी परिवर्तन
  7. (ख) भय
  8. (क) संवेग से
  9. (ख) जेम्स-लाँज सिद्धान्त
  10. (ख) कैनन तथा बार्ड
  11. (ख) संवेग से
  12. (ग) कैन-बार्ड सिद्धान्त
  13. (ग) संवेगों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाना
  14. (घ) उपर्युक्त सभी
  15. (घ) इन सभी उपायों द्वारा।

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UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power (कार्य, ऊर्जा और शक्ति)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power (कार्य, ऊर्जा और शक्ति).

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर 

प्रश्न 1.
किसी वस्तु पर किसी बल द्वारा किए गए कार्य का चिह्न समझना महत्त्वपूर्ण है। सावधानीपूर्वक बताइए कि निम्नलिखित राशियाँ धनात्मक हैं या ऋणात्मक –

(a) किसी व्यक्ति द्वारा किसी कुएँ में से रस्सी से बँधी बाल्टी को रस्सी द्वारा बाहर निकालने में किया गया कार्य।
(b) उपर्युक्त स्थिति में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य।
(c) किसी आनत तल पर फिसलती हुई किसी वस्तु पर घर्षण द्वारा किया गया कार्य।
(d) किसी खुरदरे क्षैतिज तल पर एकसमान वेग से गतिमान किसी वस्तु पर लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य।
(e) किसी दोलायमान लोलक को विरामावस्था में लाने के लिए वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य।

उत्तर :

(a) चूँकि मनुष्य द्वारा लगाया गया बल तथा बाल्टी का विस्थापन दोनों ऊपर की ओर दिष्ट हैं; अत: कार्य धनात्मक होगा।
(b) चूँकि गुरुत्वीय बल नीचे की ओर दिष्ट है तथा बाल्टी का विस्थापन ऊपर की ओर है; अतः गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।
(c) चूँकि घर्षण बेल सदैव वस्तु के विस्थापन की (UPBoardSolutions.com) दिशा के विपरीत दिष्ट होता है; अत: घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।
(d) वस्तु पर लगाया गया बल घर्षण के विपरीत अर्थात् वस्तु की गति की दिशा में है; अत: इस बल द्वारा कृत कार्य धनात्मक होगा।
(e) वायु का प्रतिरोधी बल सदैव गति के विपरीत दिष्ट होता है; अतः कार्य ऋणात्मक होगा।

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प्रश्न 2.
2kg द्रव्यमान की कोई वस्तु जो आरम्भ में विरामावस्था में है, 7N के किसी क्षैतिज बल के प्रभाव से एक मेज पर गति करती है। मेज का गतिज-घर्षण गुणांक 0:1 है। निम्नलिखित का परिकलन कीजिए और अपने परिणामों की व्याख्या कीजिए –

(a) लगाए गए बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(b) घर्षण द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(c) वस्तु पर कुल बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(d) वस्तु की गतिज ऊर्जा में 10 s में परिवर्तन।

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व्याख्या – गतिज ऊर्जा में कुल-परिवर्तन (625 J) बाह्य बल द्वारा किए गए कार्य (875 J) से कम है। इसका कारण यह है कि बाह्य बल के द्वारा किए गए कार्य का कुछ भाग घर्षण के प्रभाव को समाप्त करने में व्यय होता है।

प्रश्न 3.
चित्र – 6.1 में कुछ एकविमीय स्थितिज ऊर्जा-फलनों के उदाहरण दिए गए हैं। कण की कुल ऊर्जा कोटि-अक्ष पर क्रॉस द्वारा निर्देशित की गई है। प्रत्येक स्थिति में, कोई ऐसे क्षेत्र बंताइए, यदि कोई हैं तो जिनमें दी गई ऊर्जा के लिए, कण को नहीं पाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, कण की कुल न्यूनतम ऊर्जा भी निर्देशित कीजिए। कुछ ऐसे भौतिक सन्दर्भो के विषय में सोचिए जिनके लिए ये स्थितिज ऊर्जा आकृतियाँ प्रासंगिक हों।
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उत्तर :
K.E. + P.E. = E (constant)
∴ K.E. = E – P.E.

(a) इस ग्राफ में x < a के लिए स्थितिज ऊर्जा वक्र, दूरी अक्ष के साथ (UPBoardSolutions.com) सम्पाती है (P.E. = O) जबकि x > a के लिए स्थितिज ऊर्जा कुल ऊर्जा से अधिक है; अतः गतिज ऊर्जा ऋणात्मक हो जाएगी जो कि असम्भव है।

अतः कण x > a क्षेत्र में नहीं पाया जा सकता।
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प्रश्न 4.
रेखीय सरल आवर्त गति कर रहे किसी कण का (d) स्थितिज ऊर्जा फलन v (x) = 1/2 kx2 / 2 है, जहाँ k दोलक का बल नियतांक है। k= 0.5 N m-1 के लिए v (x) व x के मध्य ग्राफ चित्र-6.2 में दिखाया गया है। यह दिखाइए कि इस विभव के अन्तर्गत गतिमान कुल 1J ऊर्जा वाले कण को अवश्य ही ‘वापस आना चाहिए जब यह x = ± 2 m पर पहुँचता है।
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित का उत्तर दीजिए –

(a) किसी रॉकटे का बाह्य आवरण उड़ान के दौरान घर्षण के कारण जल जाता है। जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा किसके व्यय पर प्राप्त की गई रॉकेट या वातावरण?

(b) धूमकेतु सूर्य के चारों ओर बहुत ही दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में घूमते हैं। साधारणतया धूमकेतु पर सूर्य का गुरुत्वीय बल धूमकेतु के लम्बवत नहीं होता है। फिर भी धूमकेतु की सम्पूर्ण कक्षा में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है। क्यों?

(c) पृथ्वी के चारों ओर बहुत ही क्षीण वायुमण्डल में घूमते हुए किसी कृत्रिम उपग्रह की ऊर्जा धीरे-धीरे वायुमण्डलीय प्रतिरोध (चाहे यह कितना ही कम क्यों न हो) के विरुद्ध क्षय के कारण कम होती जाती है फिर भी जैसे-जैसे कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के (UPBoardSolutions.com) समीप आता है तो उसकी चाल में लगातार वृद्धि क्यों होती है?

(d) चित्र-6.3 (i) में एक व्यक्ति अपने हाथों में 15 kg का कोई द्रव्यमान लेकर 2 m चलता है। चित्र-6.3 (ii) में वह उतनी ही दूरी अपने पीछे रस्सी को खींचते हुए चलता है। रस्सी घिरनी पर चढ़ी हुई है और उसके दूसरे सिरे पर 15 kg का द्रव्यमान लटका हुआ है। परिकलन कीजिए कि किस स्थिति में किया गया कार्य अधिक है?
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उत्तर :

(a) बाह्य आवरण के जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा रॉकेट की यान्त्रिक ऊर्जा (K.E. + P.E.) से प्राप्त की गई।

(b) धूमकेतु पर सूर्य द्वारा आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल एक संरक्षी बल है। संरक्षी बल के द्वारा बन्द पथ में गति करने वाले पिण्ड पर किया गया नेट कार्य शून्य होता है; अत: धूमकेतु की सम्पूर्ण कक्षा में सूर्य ‘क गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा कृत कार्य शून्य होगा।

(c) जैसे-जैसे उपग्रह पृथ्वी के समीप आता है वैसे-वैसे उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा घटती है, ऊर्जा संरक्षण के अनुसार गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है; अत: उसकी चाल बढ़ती जाती है। कुल ऊर्जा का कुछ भाग घर्षण बल के विरुद्ध कार्य करने में खर्च हो जाती है।

(d) (i) इस दशा में व्यक्तिद्रव्यमान को उठाए रखने के लिए भार के विरुद्ध ऊपर की ओर बल लगाता है जबकि उसका विस्थापन क्षैतिज दिशा में है (θ = 90°)

∴ मनुष्य द्वारा कृत कार्य W = F d cos 90° = 0

(ii) इस दशा में पुली मनुष्य द्वारा लगाए गए क्षैतिज बल की दिशा को ऊर्ध्वाधर कर देती है तथा द्रव्यमान का विस्थापन भी ऊपर की ओर है (θ = 0° )

∴ मनुष्य द्वारा कृत कार्य W = m g h cos 0° = 15 kg × 10 m s-2 × 2 m = 300 J

अतः दशा (ii) में अधिक कार्य किया जाएगा।

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प्रश्न 6.
सही विकल्प को रेखांकित कीजिए –

(a) जब कोई संरक्षी बल किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य करता है तो वस्तु की स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है/घटती है/अपरिवर्ती रहती है।
(b) किसी वस्तु द्वारा घर्षण के विरुद्ध किए गए कार्यका परिणाम हमेशा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा में क्षय होता है।
(c) किसी बहुकण निकाय के कुल संवेग-परिवर्तन की दर निकाय के बाह्य बल/ आन्तरिक बलों के जोड़ के अनुक्रमानुपाती होती है।
(d) किन्हीं दो पिण्डों के अप्रत्यास्थ संघट्ट में वे राशियाँ, जो संघट्ट के बाद नहीं बदलती हैं; निकाय की कुल गतिज ऊर्जा/कुल रेखीय संवेग/कुल ऊर्जा हैं।

उत्तर :

(a) घटती है, क्योंकि संरक्षी बल के विरुद्ध किया गया कार्य (बाह्य बल द्वारा धनात्मक कार्य) ही स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है।
(b) गतिज ऊर्जा, क्योंकि घर्षण के विरुद्ध कार्य तभी होता है जबकि गति हो रही हो।
(c) बाह्य बल, क्योंकि बहुकण निकाय में आन्तरिक बलों (UPBoardSolutions.com) का परिणामी शून्य होता है तथा आन्तरिक बल संवेग परिवर्तन के लिए उत्तरदायी नहीं होते।
(d) कुल रेखीय संवेग

प्रश्न 7.
बताइए कि निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य। अपने उत्तर के लिए कारण भी दीजिए –

(a) किन्हीं दो पिण्डों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, प्रत्येक पिण्ड का संवेग व ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(b) किसी पिण्ड पर चाहे कोई भी आन्तरिक व बाह्य बल क्यों न लग रहा हो, निकाय की कुल ऊर्जा सर्वदा संरक्षित रहती है।
(c) प्रकृति में प्रत्येक बल के लिए किसी बन्द लूप में, किसी पिण्ड की गति में किया गया कार्य शून्य होता है।
(d) किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट में, किसी निकाय की अन्तिम गतिज ऊर्जा, आरम्भिक गतिज ऊर्जा से हमेशा कम होती है।

उत्तर :

(a) असत्य, पूर्ण निकाय का संवेग व गतिज ऊर्जा संरक्षित रहते हैं।
(b) सत्य, निकाय की कुल ऊर्जा सदैव संरक्षित रहती है।
(c) असत्य, केवल संरक्षी बलों के लिए, बन्द लूप में गति के दौरान पिण्ड पर किया गया कार्य शून्य होता है।
(d) सत्य, क्योंकि अप्रत्यास्थ संघट्ट में गतिज ऊर्जा की सदैव हानि होती है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित का उत्तर ध्यानपूर्वक, कारण सहित दीजिए –

(a) किन्हीं दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, क्या गेंदों के संघट्ट की अल्पावधि में (जब वे सम्पर्क में होती हैं) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है?
(b) दो गेंदों के किसी प्रत्यास्थ संघट्ट की लघु अवधि में क्या कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता
(c) किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट के लिए प्रश्न (a) व (b) के लिए आपके उत्तर क्या हैं?
(d) यदि दो बिलियर्ड-गेंदों की स्थितिज ऊर्जा केवल उनके केन्द्रों के मध्य, पृथक्करण-दूरी पर निर्भर करती है तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा या अप्रत्यास्थ? (ध्यान दीजिए कि यहाँ हम संघट्ट के दौरान बल के संगत स्थितिज ऊर्जा की बात कर रहे हैं, न कि गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा की)

उत्तर :

(a) नहीं, संघट्ट काल के दौरान गेंदें संपीडित हो जाती हैं; अत: गतिज ऊर्जा, गेंदों की स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है।
(b) हाँ, संवेग संरक्षित रहता है।
(c) उत्तर उपर्युक्त ही रहेंगे।
(d) चूंकि स्थितिज ऊर्जा केन्द्रों की पृथक्करण दूरी पर निर्भर (UPBoardSolutions.com) करती है, इसका यह अर्थ हुआ कि संघट्ट काल में पिण्डों के बीच लगने वाला संरक्षी बल है; अत: ऊर्जा संरक्षित रहेगी। इसलिए संघट्ट प्रत्यास्थ होगा।

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प्रश्न 9.
कोई पिण्ड जो विरामावस्था में है, अचर त्वरण से एकविमीय गति करता है। इसको किसी। समय पर दी गई शक्ति अनुक्रमानुपाती है –

  1. t1/2
  2. t
  3. t3/2
  4. t2

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प्रश्न 10.
एक,पिण्ड अचर शक्ति के स्रोत के प्रभाव में एक ही दिशा में गतिमान है। इसकाt समय में विस्थापन, अनुक्रमानुपाती है –

  1. t1/2
  2. t
  3. t3/2
  4. t2

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 9

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प्रश्न 11.
किसी पिण्ड पर नियत बल लगाकर उसे किसी निर्देशांक प्रणाली के अनुसार z – अक्ष के अनुदिश गति करने के लिए बाध्य किया गया है, जो इस प्रकार है –
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 10
जहाँ  [latex]\hat { i }[/latex] , [latex]\hat { j }[/latex] तथा [latex]\hat { k }[/latex] क्रमशः x , y एवं z – अक्षों के अनुदिश एकांक सदिश हैं। इस वस्तु को 2-अक्ष के अनुदिश 4 मी की दूरी तक गति कराने के लिए आरोपित बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 11

प्रश्न 12.
किसी अन्तरिक्ष किरण प्रयोग में एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटॉन का संसूचन होता है जिसमें पहले कण की गतिज ऊर्जा 10 kev है और दूसरे कण की गतिज ऊर्जा 100 kev है। इनमें कौन-सा तीव्रगामी है, इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन? इनकी चालों को अनुपात ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 6 Work Energy and power 12

प्रश्न 13.
2 मिमी त्रिज्या की वर्षा की कोई बूंद 500 मी की ऊँचाई से पृथ्वी पर गिरती है। यह अपनी आरम्भिक ऊँचाई के आधे हिस्से तक (वायु के श्यान प्रतिरोध के कारण) घटते त्वरण के साथ गिरती है और अपनी अधिकतम (सीमान्त) चाल प्राप्त कर लेती है, और उसके बाद एकसमान चाल से गति करती है। वर्षा की बूंद पर उसकी यात्रा के पहले व दूसरे अर्द्ध भागों में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा? यदि बूंद की चाल पृथ्वी तक पहुँचने पर 10 मी / से-1 हो तो सम्पूर्ण यात्रा में प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
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प्रश्न 14.
किसी गैस-पात्र में कोई अणु200 m s-1 की चाल से अभिलम्ब के साथ 30° का कोण बनाता हुआ क्षैतिज दीवार से टकराकर पुनः उसी चाल से वापस लौट जाता है। क्या इस संघट्ट में संवेग संरक्षित है? यह संघट्ट प्रत्यास्थ है या अप्रत्यास्थ?
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प्रश्न 15.
किसी भवन के भूतल पर लगा कोई पम्प 30 m3 आयतन की पानी की टंकी को 15 मिनट में भर देता है। यदि टंकी पृथ्वी तल से 40 m ऊपर हो और पम्प की दक्षता 30% हो तो पम्प द्वारा कितनी विद्युत शक्ति का उपयोग किया गया?

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प्रश्न 16.
दो समरूपी बॉल-बियरिंग एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं और किसी घर्षणरहित मेज। पर विरामावस्था में हैं। इनके साथ समान द्रव्यमान का कोई दूसरा बॉल-बियरिंग, जो आरम्भ में y चाल से गतिमान है. सम्मुख संघट्ट करता है। यदि संघट्ट प्रत्यास्थ है तो संघट्ट के पश्चात् निम्नलिखित (चित्र-6.4) में से कौन-सा परिणाम सम्भव है?
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∴ केवल दशा (ii) में ही गतिज ऊर्जा संरक्षित रही है; अतः केवल यही परिणाम सम्भव है।

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प्रश्न 17.
किसी लोलक के गोलक A को, जो ऊधर से 30° का कोण बनाता है, छोड़े जाने पर मेज पर, विरामावस्था में रखे दूसरे गोलक B से टकराता है जैसा कि चित्र-6.5 में प्रदर्शित है। ज्ञात कीजिए कि संघट्ट के पश्चात् गोलक A कितना ऊँचा उठता है? गोलकों के आकारों की उपेक्षा कीजिए और मान लीजिए कि संघट्ट प्रत्यास्थ है।
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उत्तर :
दोनों गोलक समरूप हैं तथा संघट्ट प्रत्यास्थ है; अतः संघट्ट के दौरान लटका हुआ गोलक अपना सम्पूर्ण संवेग नीचे रखे गोलक को दे देता है और जरा भी ऊपर नहीं उठता।

प्रश्न 18.
किसी लोलक के गोलक को क्षैतिज अवस्था से छोड़ा गया है। यदि लोलक की लम्बाई 1.5 m है तो निम्नतम बिन्दु पर आने पर गोलक की चाल क्या होगी? यह दिया गया है कि इसकी प्रारम्भिक ऊर्जा का 5% अंश वायु प्रतिरोध के विरुद्ध क्षय हो जाता है।
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प्रश्न 19.
300 kg द्रव्यमान की कोई ट्रॉली, 25 kg रेत का बोरा लिए हुए किसी घर्षणरहित पथ पर 27 km h-1 की एकसमान चाल से गतिमान है। कुछ समय पश्चात बोरे में किसी छिद्र से रेत 0.05 kg s-1 की दर से निकलकर ट्रॉली के फर्श पर रिसने लगती है। रेत का बोरा खाली होने के पश्चात् ट्रॉली की चाल क्या होगी?
उत्तर :
ट्रॉली तथा रेत का बोरा एक ही निकाय के अंग हैं जिस पर कोई बाह्य बल नहीं लगा है (एकसमान वेग के कारण); अत: निकाय का रैखिक संवेग नियत रहेगा भले ही निकाय में किसी भी प्रकार का आन्तरिक परिवर्तन (रेत ट्रॉली में ही गिर रहा है, बाहर नहीं) (UPBoardSolutions.com) क्यों न हो जाए। अतः ट्रॉली की चाल 27 km h-1 ही बनी रहेगी।

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प्रश्न 20.
0.5 kg द्रव्यमान का एक कण = a x 3/2 वेग से सरल रेखीय मति करता है, जहाँ a = 5 m-1/2 s-1 है। x = 0 से x= 2m तक इसके विस्थापन में कुल बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
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प्रश्न 21.
किसी पवनचक्की के ब्लेड, क्षेत्रफल A के वृत्त जितना क्षेत्रफल प्रसर्प करते हैं।
(a) यदि हवा υ वेग से वृत्त के लम्बवत दिशा में बहती है तो t समय में इससे गुजरने वाली वायु का द्रव्यमाने क्या होगा?
(b) वायु की गतिज ऊर्जा क्या होगी?
(c) मान लीजिए कि पवनचक्की हवा की 25% ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित कर देती है। यदि A = 30 मी2 और υ = 36 किमी/घण्टा-1 और वायु का घनत्व 1 : 2 किग्रा – मी-3  है। तो उत्पन्न विद्युत शक्ति का परिकलन कीजिए।
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प्रश्न 22.
कोई व्यक्ति वजन कम करने के लिए 10 किग्रा द्रव्यमान को 0.5 मी की ऊँचाई तक 1000 बार उठाता है। मान लीजिए कि प्रत्येक बार द्रव्यमान को नीचे लाने में खोई हुई ऊर्जा क्षयित हो जाती है।
(a) वह गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध कितना कार्य करता है?
(b) यदि वसा 3.8 × 107 J ऊर्जा प्रति किलोग्राम आपूर्ति करता हो जो कि 20% दक्षता की दर से यान्त्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है तो वह कितनी वसा खर्च कर डालेगा
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प्रश्न 23.
कोई परिवार 8 kw विद्युत-शक्ति का उपभोग करता है।
(a) किसी क्षैतिज सतह पर सीधे आपतित होने वाली सौर ऊर्जा की औसत दर 200 w m-2 है। यदि इस ऊर्जा का 20% भाग लाभदायक विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित किया जा सकता है तो 8kw की विद्युत आपूर्ति के लिए कितने क्षेत्रफल की आवश्यकता होगी?
(b) इस क्षेत्रफल की तुलना किसी विशिष्ट भवन की छत के क्षेत्रफल से कीजिए।
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 24.
0.012 kg द्रव्यमान की कोई गोली 70 ms-1  की क्षैतिज चाल से चलते हुए 0.4 kg द्रव्यमान के लकड़ी के गुटके से टकराकर गुटके के सापेक्ष तुरन्त ही विरामावस्था में आ जाती है। गुटके को छत से पतली तारों द्वारा लटकाया गया है। परिकलन कीजिए कि गुटका किस ऊँचाई तक ऊपर उठता है? गुटके में पैदा हुई ऊष्मा की मात्रा का भी अनुमान लगाइए।
हल : गोली का द्रव्यमान, m= 0.012 किग्रा
गोली की प्रारम्भिक चाल µ = 70 मी से-1 तथा गुटके का द्रव्यमान M = 0.4 किग्रा
जब गोली गुटके से टकराकर गुटके के सापेक्ष विरामावस्था में (UPBoardSolutions.com) आ जाती है तो इसका अर्थ है कि गोली गुटके में घुसकर रुक जाती है तथा (गोली + गुटका) निकाय (माना) एक साथ υ वेग से गति करके (माना) h ऊँचाई ऊपर उठ जाता है।
संवेग संरक्षण के सिद्धान्त से,
mu + M × 0 = (M + m) υ
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प्रश्न 25.
दो घर्षणरहित आनत पथ, जिनमें से एक की ढाल अधिक है। और दूसरे की ढाल कम है, बिन्दु A पर मिलते हैं। बिन्दु A से प्रत्येक पथ पर एक-एक पत्थर को विरामावस्था से नीचे सरकाया जाता है (चित्र-6.7) क्या ये पत्थर एक ही समय 40 पर नीचे पहुँचेंगे? क्या वे वहाँ एक ही चाल से पहुँचेंगे? व्याख्या कीजिए। यदि θ1 = 30°, θ2, = 60° और h= 10 m दिया है तो दोनों पत्थरों की चाल एवं उनके द्वारा नीचे पहुँचने में लिए गए समय क्या हैं?
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प्रश्न 26.
किसी रूक्ष आनत तल पर रखा हुआ 1 kg द्रव्यमान का गुटका किसी 100 N m-1 स्प्रिंग नियतांक वाले स्प्रिंग से दिए गए चित्र 6.8 के अनुसार जुड़ा है। गुटके को सिंप्रग की बिना खिंची। स्थिति में, विरामावस्था से छोड़ा जाता है। गुटका विरामावस्था में आने से पहले आनत तल पर 10 cm नीचे खिसक जाता है। गुटके और आनत तल चित्र 6.8 के मध्य घर्षण गुणांक ज्ञात कीजिए। मान लीजिए कि स्प्रिंग का द्रव्यमान उप्रेक्षणीय है और घिरनी घर्षणरहित है।
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हल : यहाँ दिये गये गुटके पर कार्य करने वाले विभिन्न बल चित्र 6.9 में (UPBoardSolutions.com) प्रदर्शित किये गये हैं। नत समतल के लम्बवत् पिण्ड की साम्यावस्था के लिए तल की गुटके पर अभिलम्ब प्रतिक्रिया
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प्रश्न 27.
0.3 kg द्रव्यमान का कोई बोल्ट 7 m s-1 की एकसमान चाल से नीचे आ रही किसी लिफ्ट की छत से गिरता है। यह लिफ्ट के फर्श से टकराता है (लिफ्ट की लम्बाई = 3m) और वापस नहीं लौटता है। टक्कर द्वारा कितनी ऊष्मा उत्पन्न हुई? यदि लिफ्ट स्थिर होती तो क्या आपको उत्तर इससे भिन्न होता?
हल : जड़त्व के कारण बोल्ट की प्रारम्भिक चाल, लिफ्ट की चाल के बराबर है। अत: लिफ्ट के सापेक्ष बोल्ट की प्रारम्भिक चाल शून्य है। जब बोल्ट नीचे गिरता है, इसकी स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदलती है, जो अन्त में ऊष्मा में बदल जाती है।

∴ उत्पन्न ऊष्मा = mgh = 3 × 9.8 × 3 जूल = 8.82 जूल।

यदि लिफ्ट स्थिर होती तो भी बोल्ट की लिफ्ट के सापेक्ष चाल शून्य (UPBoardSolutions.com) होती; इसलिए उत्तर अब भी वही रहेगा अर्थात् अब भी इस दशा में उत्पन्न ऊष्मा = 8.82 जूल।

प्रश्न 28.
200 kg द्रव्यमान की कोई ट्रॉली किसी घर्षणरहित पथ पर 36 km h-1 की एकसमान चल से गतिमान है। 20 kg द्रव्यमान का कोई बच्चा ट्रॉली के एक सिरे से दूसरे सिरे तक (10 m दूर) ट्रॉली के सापेक्ष 4 m s-1 की चाल से ट्रॉली की गति की विपरीत दिशा में दौड़ता है। और ट्रॉली से बाहर कूद जाता है। ट्रॉली की अन्तिम चाल क्या है? बच्चे के दौड़ना आरम्भ करने के समय से ट्रॉली ने कितनी दूरी तय की ?
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प्रश्न 29.
चित्र-6.10 में दिए गए स्थितिज ऊर्जा वक़ों में से कौन-सा वक्र सम्भवतः दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट का वर्णन नहीं करेगा? यहाँr गेंदों के केन्द्रों के मध्य की दूरी है और प्रत्येक गेंद का अर्धव्यास R है।
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उत्तर :
जब गेंदें संघट्ट करेंगी और एक-दूसरे को संपीडित करेंगी तो उनके केन्द्रों के बीच की दूरी r, 2R से घटती जाएगी और इनकी स्थितिज ऊर्जा बढ़ती जाएगी।

प्रत्यानयन काल में गेंदें अपने आकार को वापस पाने की क्रिया में एक-दूसरे से दूर हटेंगी तो उनकी स्थितिज ऊर्जा घटेगी और प्रारम्भिक आकार पूर्णतः प्राप्त कर लेने पर (r = 2R) स्थितिज ऊर्जा शून्य हो जाएगी।

केवल ग्राफ (V) की ही उपर्युक्त व्याख्या हो सकती है; अतः अन्य ग्राफों में से कोई भी बिलियर्ड गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट को प्रदर्शित नहीं करता है।

प्रश्न 30.
विरामावस्था में किसी मुक्त न्यूट्रॉन के क्षय पर विचार कीजिए n → p + e

प्रदर्शित कीजिए कि इस प्रकार के द्विपिण्ड क्षय से नियत ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) का कोई इलेक्ट्रॉन अवश्य उत्सर्जित होना चाहिए, और इसलिए यह किसी न्यूट्रॉन या किसी नाभिक के β – क्ष्य में प्रेक्षित सतत ऊर्जा वितरण का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। (चित्र-6.11)

[नोट – इस अभ्यास का हल उन कई तर्कों में से एक है जिसे डब्ल्यु पॉली द्वारा β – क्षय के क्षय उत्पादों में किसी तीसरे कण के अस्तित्व का पूर्वानुमान करने के लिए दिया गया था। यह कण न्यूट्रिनो के नाम से जाना जाता है। अब हम जानते हैं कि यह निजी प्रचक्रण 1/2 (जैसे e, p या n) का कोई कण है। लेकिन यह उदासीन है या द्रव्यमानरहित या इसका द्रव्यमान (इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान की तुलना में) अत्यधिक कम है और जो द्रव्य के साथ दुर्बलता से परस्पर क्रिया करता है। न्यूट्रॉन की उचित क्षय – प्रक्रिया इस प्रकार है : n → p + e + v]
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उत्तर :
चूँकि न्यूट्रॉन विरामावस्था में है; अत: उक्त अभिक्रिया के अनुसार न्यूट्रॉन क्षय में एक नियत ऊर्जा मुक्त होनी चाहिए और β – कण को उस नियत ऊर्जा के साथ नाभिक से उत्सर्जित होना चाहिए। इस प्रकार नाभिक से उत्सर्जित β – कण की ऊर्जा नियत होनी चाहिए, जबकि दिया गया ग्राफ यह प्रदर्शित करता है कि उत्सर्जित β – कण शून्य से लेकर एक महत्तम मान के बीच कोई भी ऊर्जा लेकर बाहर आ सकता है; अतः न्यूट्रॉन क्षय की उक्त अभिक्रिया ग्राफ द्वारा प्रदर्शित हु-कणों के सतत ऊर्जा वितरण की व्याख्या नहीं कर सकता।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य ऊर्जा प्रमेय है।
(i) न्यूटन के गति के प्रथम नियम का समाकल रूप
(ii) न्यूटन के द्वितीय नियम का समाकल रूप
(iii) न्यूटन के तृतीय नियम का समाकल रूप
(iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर :
(i) न्यूटन के गति के प्रथम नियम का समाकल रूप

प्रश्न 2.
कार्य का S.I. मात्रक है।
(i) जूल
(ii) अर्ग
(iii) किग्रा-भार x मीटर
(iv) किलोवाट
उत्तर :
(i) जूल

प्रश्न 3.
यदि किसी पिण्ड का संवेग दोगुना कर दिया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा हो जायेगी
(i) दोगुनी
(ii) आधी
(iii) चार गुनी
(iv) चौथाई
उतर :
(ii) चार गुनी

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प्रश्न 4.
किसी पिण्ड का द्रव्यमान दोगुना तथा वेग आधा करने पर उसकी गतिज ऊर्जा हो जायेगी
(i) आधी
(ii) दोगुनी
(iii) अपरिवर्तित
(iv) चौथाई
उत्तर :
(i) आधी

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन गतिज ऊर्जा का उदाहरण है।
(i) पृथ्वी-तल से 2 मीटर ऊँचाई पर उठा हुआ 5 किग्रा-भार का एक पिण्ड
(ii) चाबी भरी हुई घड़ी का स्प्रिंग
(iii) भूमि पर लुढ़कती क्रिकेट की गेंद
(iv) बन्द बेलन में पिस्टन द्वारा सम्पीडित गैस
उत्तर :
(iii) भूमि पर लुढ़कती क्रिकेट की गेंद

प्रश्न 6.
संरक्षी बल [latex]\overrightarrow { (F) } [/latex] तथा स्थितिज ऊर्जा (U) में सम्बन्ध होता है।
(i) [latex]\overrightarrow { F } [/latex] = ∆U
(ii) U = ∆ . [latex]\overrightarrow { F } [/latex]
(iii) [latex]\overrightarrow { F } [/latex] = ∆U
(iv) U = – ∆ . [latex]\overrightarrow { F } [/latex]
उत्तर :
(iii) [latex]\overrightarrow { F } [/latex] = ∆U

प्रश्न 7.
ऊर्जा संरक्षण के नियम का अभिप्राय है।
(i) कुल यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(ii) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(iii) कुल स्थितिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(iv) सभी प्रकार की ऊर्जाओं का योग संरक्षित रहता है।
उत्तर :
(iv) सभी प्रकार की ऊर्जाओं का योग संरक्षित रहता है।

प्रश्न 8.
शक्तिका S.I. मात्रक है।
(i) जूल
(ii) अश्वशक्ति
(iii) वाट
(iv) किलोवाट
उत्तर :
(iii) वाट

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प्रश्न 9.
किलोवाट-घण्टा मात्रक है।
(i) शक्ति का
(ii) ऊर्जा का
(iii) दोनों का
(iv) किसी का भी नहीं
उत्तर :
(ii) ऊर्जा का

प्रश्न 10.
एक किलोवाट बराबर होता है।
(i) 1.34 अश्व-सामर्थ्य
(ii) 10 अश्व-सामर्थ्य
(iii) 746 अश्व-सामर्थ्य
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(i) 1.34 अश्व-सामर्थ्य

प्रश्न 11.
कार्य एवं सामर्थ्य में सम्बन्ध होता है।
(i) कार्य = सामर्थ्य x समय
(ii) कार्य = सामर्थ्य + समय
(iii) कार्य = समय/सामर्थ्य
(iv) कार्य = सामर्थ्य/समय
उत्तर :
(i) कार्य = सामर्थ्य x समय

प्रश्न 12.
एक मशीन 200 जूल कार्य 8 सेकण्ड में करती है। मशीन की सामर्थ्य होगी
(i) 25 वाट
(ii) 25 जूल
(iii) 1600 जूले-सेकण्ड
(iv) 25 जूल-सेकण्ड
उत्तर :
(i) 25 वाट

प्रश्न 13.
दो पिण्डों की प्रत्यास्थ टक्कर में
(i) निकाय की केवल गंतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
(ii) निकाय का केवल संवेग संरक्षित रहता है।
(iii) निकाय की गतिज ऊर्जा व संवेग दोनों संरक्षित रहते हैं।
(iv) निकाय की न तो गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है और न ही संवेग
उत्तर :
(iii) निकाय की गतिज ऊर्जा व संवेग दोनों संरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 14.
पूर्णतः अप्रत्यास्थ संघट्ट में होते हैं।
(i) संवेग एवं गतिज ऊर्जा दोनों संरक्षित
(ii) संवेग एवं गतिज ऊर्जा दोनों असंरक्षित
(iii) संवेग संरक्षित एवं गतिज ऊर्जा असंरक्षित
(iv) संवेग असंरक्षित एवं गतिज ऊर्जा संरक्षित
उत्तर :
(iii) संवेग संरक्षित एवं गतिज ऊर्जा असंरक्षित

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1 जूल से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
यदि किसी वस्तु पर 1 न्यूटन का बल कार्य करता है और वस्तु को अपनी ही दिशा में 1 मीटर विस्थापित कर देता है तो बल द्वारा किया गया कार्य 1 जूल कहलाता है।
1 जूल = 1 न्यूटन × 1 मीटर अर्थात्
= 1 न्यूटन मीटर

प्रश्न 2.
एक क्षैतिज प्लेटफॉर्म पर अपने सिर पर बॉक्स रखकर कुली घूम रहा है। क्या वह गुरुत्व बल के विरुद्ध कोई कार्य कर रहा है? वह किस बल के विरुद्ध कार्य कर रहा है?
उत्तर :
उसकी गति क्षैतिज है और गुरुत्व बल ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर होता है, (UPBoardSolutions.com) अत: वह कोई कार्य नहीं कर रहा है। परन्तु चलते समय वह घर्षण बल के विरुद्ध कार्य कर रहा है।

प्रश्न 3.
5.0 ग्राम द्रव्यमान की एक गेंद 1.0 किमी की ऊँचाई से गिर रही है। यह 50.0 मी/से के वेग से पृथ्वी से टकराती है। किये गये कार्य की गणना कीजिए। (g = 10 मी/से2)
हल : गुरुत्वीय बल f = mg = 5.0 × 10 = 50 न्यूटन
∴ कृत कार्य, W = बल × विस्थापन = 50 × 1000= 50,000 जूल

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प्रश्न 4.
एक हल्की और एक भारी वस्तु के संवेग समान हैं तो किसकी गतिज ऊर्जा अधिक होगी?
उत्तर :
हल्की वस्तु की। (∵ K = p2/2m)

प्रश्न 5.
स्थितिज ऊर्जा किन कारणों से उत्पन्न होती है?
उत्तर :
वस्तु की विकृत अवस्था एवं स्थिति के कारण।

प्रश्न 6.
स्थितिज ऊर्जा का मान धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों ही हो सकते हैं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
ऊर्जा संरक्षण नियम से, कुल ऊर्जा E = K + U = नियतांक। अब क्योंकि गतिज ऊर्जा K = 1/2 mυ2, सदैव धनात्मक है, अत: U का मान धनात्मक या ऋणात्मक दोनों ही सम्भव हैं।

प्रश्न 7.
द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध लिखिए। यह किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर :
E = mc2 (आइन्स्टीन की द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध)।

प्रश्न 8.
किलोवाट-घण्टा तथा जूल में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर :
1 किलोवाट-घण्टा =3.6 × 106 जूल।

प्रश्न 9.
72 किमी प्रति घण्टाकी चाल से क्षैतिज सड़क पर चलने वाली कोई कार 180 न्यूटन बल का सामना कर रही है। उसके इंजन की शक्ति ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 10.
अप्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा-हानि का क्या होता है?
उत्तर :
टकराने वाले पिण्डों की आन्तरिक उत्तेजन ऊर्जा ऊष्मीय तथा ध्वनि ऊर्जा में बदल जाती है।

प्रश्न 11.
प्रत्यास्थ टक्कर में ऊर्जा का आदान-प्रदान अधिकतम कब होता है?
उत्तर :
जब टकराने वाली वस्तुओं के द्रव्यमान बराबर होते हैं।

प्रश्न 12.
दर्शाइए कि समान द्रव्यमान की दो गतिशील वस्तुओं के प्रत्यास्थ संघटन के बाद उनके वेग आपस में बदल जाते हैं।
उत्तर :
माना संघट्टन के बाद उनके वेग क्रमशः υ1 तथा υ2 हैं (UPBoardSolutions.com) तो संवेग संरक्षण के नियम से,
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य क्या है? इसका S.I. मात्रक तथा विमीय सूत्र लिखिए।
उत्तर :
कार्य – बल लगाकर किसी वस्तु को बल की दिशा में विस्थापित करने की क्रिया को कार्य कहते
कार्य = बल × बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन
W = F. s. कार्य एक अदिश राशि हैं।
कार्य का S.I. पद्धति में मात्रक जूल तथा विमा [ML2-T-2] है।

प्रश्न 2.
एक पिण्ड पर बल लगाकर उसे विस्थापित किया जाता है, बताइए

  1. पिण्ड पर किस दिशा में बल लगाने पर अधिकतम कार्य होगा?
  2. पिण्ड पर किस दिशा में बल लगाने पर कार्य शून्य होगा?

या
अधिकतम एवं न्यूनतम कार्य के लिए बल तथा विस्थापन के बीच कितना कोण होना चाहिए?
उत्तर :
पिण्ड पर किए गए कार्य का सूत्र w = F × s cos θ से,

(i) यदि 8 = 0° तो cos θ = 1 जो कि Cose का अधिकतम मान है। Wmax= F × s

अतः जब पिण्ड का विस्थापन लगाए गए बल की दिशा में होता है, अर्थात् θ = 0° तो किया गया कार्य अधिकतम होगा।

(ii) यदि θ = 90° तो cos 90° = 0 जो कि cos θ का न्यूनतम मान है। Wmin (न्यूनतम) = 0

अतः जब पिण्ड का विस्थापन लगाए गए बल के लम्बवत् होता है, अर्थात् θ = 90° तो किया गया कार्य शून्य (न्यूनतम) होगा।

प्रश्न 3.
गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा किसे कहते हैं? किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का व्यजंक प्राप्त कीजिए।
उत्तर :
किसी वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा उस कार्य के बराबर है जो (UPBoardSolutions.com) गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध वस्तु को पृथ्वी के तल से उच्च स्थिति में रखने में किया जाता है।

किसी पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक – माना m द्रव्यमान का एक पिण्ड पृथ्वी तल से उठाकर h ऊँचाई पर रखा जाता है।

तब पिण्ड की स्थितिज ऊर्जा = पिण्ड को गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध h ऊँचाई तक रखने में कृत कार्य = बाह्य बल (F) × दूरी (h)
परन्तु बाह्य बल = पिण्ड का भार = mg

∴ स्थितिज ऊर्जा = भार × ऊँचाई = (mg) × h = mgh

स्थितिज ऊर्जा (mgh) गुरुत्वीय के विरुद्ध कार्य करने के कारण है, इसलिए इसे गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।

प्रश्न 4.
द्रव्यमान-ऊर्जा समलुल्यता का अर्थ स्पष्ट कीजिए। आइन्स्टाइन का द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर :
द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता – सन् 1905 में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने प्रदर्शित किया कि द्रव्यमान तथा ऊर्जा एक-दूसरे के तुल्य हैं। द्रव्य को ऊर्जा एवं ऊर्जा को द्रव्य में परिवर्तित किया जा सकता है। उन्होंने द्रव्य को ऊर्जा में बदलने के लिए एक सरल समीकरण का प्रतिपादन किया जिसे द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता कहते हैं।
द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध E = mc2
(जहाँ m = द्रव्यमान तथा c = प्रकाश की निर्वात् में चाल 3 × 108 मी/से) इसे ही द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बन्ध कहते हैं।
1 किग्रा द्रव्यमान के तुल्य ऊर्जा E = 1 × (3 × 108) जूल = 9 × 1016 जूल

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प्रश्न 5.
ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर :
ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त – ऊर्जा संरक्षण सिद्धान्त के अनुसार, “ऊर्जा न तो नष्ट की जा सकती है और न ही इसे उत्पन्न किया जा सकता है इसका एक रूप से दूसरे रूप में रूपान्तरण ही सम्भव है। दूसरे शब्दों में, जब ऊर्जा का एक रूप विलुप्त होता है तो वही ऊर्जा इतने ही परिमाण में किसी और रूप में प्रकट हो जाती है।

यह व्यापक सिद्धान्त संरक्षी एवं असंरक्षी दोनों प्रकार के बलों के लिए समान उपयोगी है।

उदाहरण – बाँधों में संचित जल की स्थितिज ऊर्जा, टरबाइन की गतिज ऊर्जा में बदलती है जो अन्ततः जेनरेटर द्वारा विद्युत ऊर्जा में बदल दी जाती है।

प्रश्न 6.
प्रत्यास्थ तथा अप्रत्यास्थ संघट्ट से आप क्या समझते हैं?
या
प्रत्यास्थ संघट्ट की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :

  1. प्रत्यास्थ संघट्ट – यदि संघट्ट के दौरान निकाय की कुले गतिज ऊर्जा एवं संवेग नियत रहते हैं, तो संघट्ट प्रत्यास्थ संघट्ट कहलाता है। अपरमाणविक कणों (sub atomic particles) में संघट्ट प्रायः प्रत्यास्थ होता है। ऐसे संघट्टों में यांत्रिक ऊर्जा की हानि नहीं होती। दो स्टील की गेंदों का संघट्ट लगभग प्रत्यास्थ होता है।
  2. अप्रत्यास्थ संघट्ट – यदि संघट्ट के दौरान निकाय की कुल गतिज ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) नियत न रहे, तो संघट्ट अप्रत्यास्थ कहलाता है। दैनिक जीवन में होने वाले संघट्ट सामान्यत: अप्रत्यास्थ ही होते हैं। बन्दूक की गोली का लक्ष्य से संघट्ट अप्रत्यास्थ है। यदि दो वस्तुएँ संघट्ट के पश्चात् परस्पर चिपक जाती हैं, तो संघट्ट पूर्णत: अप्रत्यास्थ कहलाता है। दीवार के साथ कीचड़ का संघट्ट पूर्णतः अप्रत्यास्थ है।

प्रश्न 7.
10 किग्रा के द्रव्यमान की, जिसका वेग 5 मीटर/सेकण्ड है, एक अन्य 10 किग्रा के द्रव्यमान से, जो विरामावस्था में है, सम्मुख प्रत्यास्थ टक्कर होती है। टक्कर के बाद दोनों द्रव्यमानों के वेग ज्ञात कीजिए।
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चूँकि टक्कर पूर्ण प्रत्यास्थ है तथा दोनों द्रव्यमान बराबर हैं, अतः टक्कर के पश्चात् दूसरा द्रव्यमान 5 मी/से के वेग से गति करेगा तथा पहला विरामावस्था में आ जायेगा। अतः टक्कर के बाद υ1 = 0 तथा υ2 =5 मी/से।

प्रश्न 8.
4.0 मी/से वेग से गतिमान एक 10 किग्रा द्रव्यमान की वस्तु एक घर्षणहीन मेज से जुड़े हुए स्प्रिंग से टकराती है और स्थिर हो जाती है। यदि स्प्रिंग का बल नियतांक 4 × 105 न्यूटन/मी हो तो स्प्रिंग की लम्बाई में कितना परिवर्तन होगा?
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्य-ऊर्जा प्रमेयः बताइए तथा उसको सिद्ध कीजिए। इस प्रमेय की उपयोगिता समझाइए।
या
कार्य-ऊर्जा प्रमेय का कथन लिखिए।
या
कार्य-ऊर्जा प्रमेय का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कार्य-ऊर्जा प्रमेय –“जब किसी बाह्य बल द्वारा किसी वस्तु पर कुछ कार्य किया जाता है तो वस्तु की गतिज ऊर्जा में इस कार्य के बराबर वृद्धि हो जाती है। इसके विपरीत यदि कोई वस्तु किसी अवरोधी बल के विरुद्ध कुछ कार्य करती है.तो उसकी गतिज ऊर्जा में इस कार्य के बराबर कमी हो जाती है।”

अतः कार्य-ऊर्जा प्रमेय के अनुसार, “कार्य तथा गतिज ऊर्जा एक-दूसरे (UPBoardSolutions.com) के समतुल्य हैं तथा गतिज ऊर्जा में परिवर्तन किये गये कार्य के बराबर होता है।”

उपपत्ति Proof – स्थिति 1 : जब वस्तु पर अचर (constant) बल लगा हो – माना एक अचर या नियत बल [latex]\xrightarrow { F } [/latex] , m द्रव्यमान की वस्तु पर कार्य करता है। यदि इस बल के कारण, बल की दिशा में, विस्थापन [latex]\xrightarrow { S } [/latex] हो तो किया गया कार्य

W = [latex]\xrightarrow { F } [/latex] . [latex]\xrightarrow { S } [/latex] = Fs

यदि बल द्वारा वस्तु में त्वरण a उत्पन्न होता है, तो F = ma (न्यूटन के गति विषयक द्वितीय नियम से)
∴ w = (ma) s = m (as) ……(1)
वस्तु के प्रारम्भिक और अन्तिम वेगों के परिमाण क्रमशः µ तथा υ हैं तब गति की तृतीय समीकरण υ2 = u2 +2as से,
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अत: किसी नियत बल द्वारा किसी वस्तु पर किया गया कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है। (यही कार्य-ऊर्जा प्रमेय का कथन है।)
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स्थिति 2 : जब वस्तु पर परिवर्ती (variable) बल लगा हो – माना m द्रव्यमान का एक कण बिन्दु A से B तक। एक वक्र के अनुदिश (चित्र 6.12) एक परिवर्ती बल के आधीन गति करता है। अब यदि कण के बिन्दु A से B तक की यात्रा के मध्य कृत कार्य की गणना करनी हो तो ऐसी दशा में बिन्दु A व B के बीच के पथ को ∆x लम्बाई के छोटे-छोटे खण्डों में इस प्रकार विभाजित किया जाना चाहिए कि इन खण्डों में बल F लगभग नियत रहे। (UPBoardSolutions.com) यदि प्रथम अन्तराल के मध्य औसत बल F1 हो तथा यह लघुखण्ड ∆X1, से θ1, कोण बनाता हो। इसी प्रकार द्वितीय लघु खण्ड ∆x2 पर लग रहा औसत बल F2 हो और यह खण्ड ∆X2 से θ2 कोण बनाता हो तब,
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अत: यह स्पष्ट है कि परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य वस्तु की गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है (यही कार्य ऊर्जा-प्रमेय का कथन है)। इस प्रकार कार्य-ऊर्जा प्रमेय, चाहे बल नियत हो या परिवर्ती, दोनों ही स्थितियों में सत्य होती है।

कार्य-ऊर्जा प्रमेय की उपयोगिता – अनेक समस्याओं में बल और उसके विस्थापन का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता है, अत: बल द्वारा किये गये कार्य की गणना सीधे ही नहीं की जा सकती। ऐसी समस्याओं में प्रायः वस्तु की या निकाय की गतिज ऊर्जा में वृद्धि या कमी को आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।

गतिज ऊर्जा में यह परिवर्तन ही बल द्वारा किये गये कार्य के बराबर होता है।

प्रश्न 2.
किसी पिण्ड की यान्त्रिक-ऊर्जा से क्या तात्पर्य है? मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड के लिए यान्त्रिक ऊर्जा के संरक्षण सिद्धान्त की पुष्टि कीजिए।
या
सिद्ध कीजिए कि मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड में प्रत्येक बिन्दु पर स्थितिज ऊर्जा तथा गतिज ऊर्जा का योग सदैव स्थिर रहता है।
उत्तर :
यान्त्रिक-ऊर्जा के संरक्षण का नियम-यदि बल संरक्षी है, तो कण की यान्त्रिक ऊर्जा नियत रहती है। अर्थात्
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मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड का उदाहरण

मुक्त रूप से गिरते हुए पिण्ड की यान्त्रिक ऊर्जा (अर्थात् गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा) नियत रहती है। इसे गणनों द्वारा निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है
माना m द्रव्यमान की कोई वस्तु पृथ्वी तंल से h ऊँचाई पर स्थित बिन्दु A से गिरती है। प्रारम्भ में बिन्दु A पर गतिज ऊर्जा शून्य है और केवल स्थितिज ऊर्जा है।
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∴A बिन्दु पर वस्तु में कुल ऊर्जा
= गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
= 0 + mgh = mgh …(1)
माना गिरते समय किसी क्षण वस्तु बिन्दु B पर है, जो अपनी प्रारम्भिक स्थिति से x दूरी गिर चुकी है। यदि बिन्दु B पर वस्तु का वेग υ हो, तो सूत्र
υ2 = u2 + 2as
υ2 = 0 + 2gx = 2gx

∴ बिन्दु B पर वस्तु की गतिज ऊर्जा =[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] mυ2
= [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] m x 2gx = mgx
बिन्दु B पर वस्तु की स्थितिज ऊर्जा = mg (h – x)

∴ बिन्दु B पर वस्तु की कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
= mgx + mg (h – x) = mgh …(2)

अब माना वस्तु पृथ्वी तल पर स्थित बिन्दु c के ठीक ऊपर है तथा वस्तु पृथ्वी से ठीक टकराने ही वाली है। अब उसकी स्थितिज ऊर्जा शून्य है। वस्तु द्वारा गिरी ऊँचाई = h
सूत्र = υ2 +u2 + 2as से, C पर वस्तु का वेग (a = g तथा s = h),
υ2 = 0 + 2gh = 2gh

C पर वस्तु की गतिज ऊर्जा = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] m (υ’)2 = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] m × 2gh = mgh
C पर वस्तु की कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा
= mgh + 0 = mgh

इस प्रकार हम देखते हैं कि गिरती वस्तु के प्रत्येक बिन्दु पर गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग नियत बना रहता है। अतः गुरुत्वीय बल के अन्तर्गत वस्तु की कुल यान्त्रिक ऊर्जा नियत रहती है।

प्रश्न 3.
प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा से आप क्या समझते हैं। किसी स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा के लिए व्यंजक का निगमन कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा – किसी वस्तु में उसके सामान्य आकार अथवा विन्यास में परिवर्तन के कारण जो कार्य करने की क्षमता होती है, वस्तु की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।

जब किसी प्रत्यास्थ वस्तु को उसकी सामान्य अवस्था से विकृत किया जाता है, तो वस्तु पर एक प्रत्यानंयन बल (restoring force) कार्य करता है जो वस्तु को उसकी सामान्य अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। इस प्रत्यानयन बल के कारण ही विकृत वस्तु में कार्य करने की क्षमता निहित रहती है।
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सिंप्रग की प्रत्यास्थ ऊर्जा के लिए व्यंजक – जब किसी स्प्रिंग को संपीडित या प्रसारित किया जाता है, तो स्प्रिंग में एक प्रत्यानयन बल (restoring force) कार्य करता है, जो स्प्रिंग में होने वाले परिवर्तन का विरोध करता है। अतः लगाए गए बाह्य बल को प्रत्यानयन बल के विरूद्ध कार्य करना पड़ता है जो स्प्रिंग में प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।

अतः संपीडित अथवा प्रसारित स्प्रिंग में जो कार्य करने की क्षमता निहित रहती है, स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा कहलाती है।

माना एक भारहीन एवं पूर्ण प्रत्यास्थ स्प्रिंग का एक सिरा एक दृढ़ आधार (UPBoardSolutions.com) (rigid support) से जुड़ा है तथा इसके दूसरे सिरे से m द्रव्यमान का एक गुटका सम्बन्धित है जो एक घर्षणरहित क्षैतिज समतल मेज पर गति के लिए स्वतन्त्र है।

स्प्रिंग की सामान्य स्थिति में गुटके की माध्य स्थिति बिन्दू o पर है। [चित्र-6.14 (a)] स्प्रिंग पर बाह्य बल लगाकर उसकी लम्बाई में ऋणात्मक वृद्धि करने पर स्प्रिंग पर एक प्रत्यानयन बल कार्य करता है जो स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि के अनुक्रमानुपाती होता है।

यदि स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि x हो, तब उस पर कार्यरत् है प्रत्यानयन बल F α – x अथवा F = – kx

जहाँ k एक नियतांक है जिसे स्प्रिंग का बल नियतांक या स्प्रिंग नियतांक कहते हैं।

सिंप्रग की लम्बाई में वृद्धि के लिए प्रत्यानयन बल के विपरीत दिशा में बराबर बाह्य बल लगाना पड़ता है। [चित्र – 6.14(b)]। अतः स्प्रिंग पर लगाया गया बाह्य बल
Fext = – F = – (- kx) = kx

बाह्य बल द्वारा स्प्रिंग की लम्बाई में अत्यन्त सूक्ष्म वृद्धि dx करने में किया गया कार्य
dw = Fext × dx = kx dx

बाह्य बल द्वारा स्प्रिंग की लम्बाई में x1 = 0 से x2 = x तक वृद्धि करने में किया गया कार्य
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प्रश्न 4.
X – अक्ष में 0.1 किग्रा द्रव्यमान की एक गेंद 4.0 मी/से के वेग से गति करती हुई, उसी दिशा में 3.0 मी/से के वेग से गतिशील 0.2 किग्रा की दूसरी गेंद से टकराती है। टक्कर के बाद प्रथम गेंद 0.2 मी/से के वेग से वापस लौटने लगती है। दूसरी गेंद की टक्कर के बाद गतिज ऊर्जा की गणना कीजिए।
हल : दिया है, पहली गेंद का द्रव्यमान, m1 = 0.1 किग्रा,
पहली गेंद का वेग u1 = 4.0 मी/से,
दूसरी गेंद का द्रव्यमान m2 = 0.2 किग्रा
तथा दूसरी गेंद का वेग u2 = 3.0 मी/से
टक्कर के पश्चात् पहली गेंद का विपरीत दिशा में वेग υ1 = – 0.2 मी/से
(ऋणात्मक चिह्न इसलिए लिया गया है, क्योंकि गेंद टक्कर के बाद वापस लौटने लगती है।) संवेग संरक्षण के नियमानुसार,
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प्रश्न 5.
0.5 किग्रा द्रव्यमान का एक पिण्ड 4.0 मी/से के वेग से एक चिकने तल पर गति कर रहा है। यह एक-दूसरे से 1.0 किग्रा के स्थिर पिण्ड से टकराता है और वे एक पिण्ड के रूप में एक साथ गति करते हैं। संघट्ट के समय ऊर्जा हास की गणना कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 7 Federalism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 7 Federalism (संघवाद)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 7 Federalism (संघवाद).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे कुछ घटनाओं की सूची दी गई है। इनमें से किसको आप संघवाद की कार्य-प्रणाली के रूप में चिह्नित करेंगे और क्यों?

(क) केन्द्र सरकार ने मंगलवार को जीएनएलएफ के नेतृत्त्व वाले दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल को छठी अनुसूची में वर्णित दर्जा देने की घोषणा की। इससे पश्चिम बंगाल के इस पर्वतीय जिले के शासकीय निकाय को ज्यादा स्वायत्तता प्राप्त होगी। दो दिन के गहन विचार-विमर्श के बाद नई दिल्ली में केन्द्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

(ख) वर्षा प्रभावित प्रदेशों के लिए सरकार कार्य-योजना लाएगी। केन्द्र सरकार ने वर्षा प्रभावित प्रदेशों से पुनर्निर्माण की विस्तृत योजना भेजने को कहा है ताकि वह अतिरिक्त राहत प्रदान करने की उनकी माँग पर फौरन कार्रवाई कर सके।

(ग) दिल्ली के लिए नए आयुक्त। देश की राजधानी दिल्ली में नए नगरपालिका आयुक्त को बहाल किया जाएगा। इस बात की पुष्टि करते हुए एमसीडी के वर्तमान आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि उन्हें अपने तबादले के आदेश मिल गए हैं और संभावना है। कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अशोक कुमार उनकी जगह सँभालेंगे। अशोक कुमार अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव की हैसियत से काम कर रहे हैं। 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री मेहता पिछले साढ़े तीन साल से आयुक्त की हैसियत से काम कर रहे हैं।

(घ) मणिपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा। राज्यसभा ने बुधवार को मणिपुर विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान करने वाला विधेयक पारित किया। मानव संसाधन विकास मन्त्री ने वायदा किया है कि अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी ऐसी संस्थाओं का निर्माण होगा।

(ड) केन्द्र ने धन दिया। केन्द्र सरकार ने अपनी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश को 533 लाख रुपये दिए हैं। इस धन की पहली.किस्त के रूप में अरुणाचल प्रदेश को 466 लाख रुपये दिए गए हैं।

(च) हम बिहारियों को बताएँगे कि मुंबई में कैसे रहना है। करीब 100 शिव सैनिकों ने मुंबई के जे०जे०, अस्पताल में उठा-पटक करके रोजमर्रा के कामधंधे में बाधा पहुँचाई, नारे लगाए और धमकी दी कि गैर-मराठियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई तो इस मामले को वे स्वयं ही निपटाएँगे।

(छ) सरकार को भंग करने की माँग कांग्रेस विधायक दल ने प्रदेश के राज्यपाल को हाल में सौंपे एक ज्ञापन में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नागालैंड (डीएएन) की सरकार को तथाकथित वित्तीय अनियमितता और सार्वजनिक धन के गबन के आरोप में भंग करने की माँग की है।

(ज) एनडीए सरकार ने नक्सलियों से हथियार रखने को कहा। विपक्षी दल राजद और उसके सहयोगी कांग्रेस और सीपीआई (एम) के वॉक आउट के बीच बिहार सरकार ने आज नक्सलियों से अपील की कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें। बिहार को विकास के नए युग में ले जाने के लिए बेरोजगारी को जड़ से खत्म करने के अपने वादे को भी सरकार ने दोहराया।
उत्तर-
उपर्युक्त उदाहरणों में ‘क’ में वास्तविक संघीय प्रणाली की स्थिति दिखाई देती है क्योंकि इसमें सांस्कृतिक व भौगोलिक समीपता के आधार पर स्वायत्त परिषद् का निर्माण कर शक्तियों का बँटवारा किया जाता है जिससे निश्चित क्षेत्र का वहाँ के स्थानीय लोगों की इच्छा व अपेक्षाओं के अनुसार विकास हो सके। दूसरा उदाहरण (ख) भी वास्तविक संघीय प्रणाली की स्थिति को प्रकट करता है जिसमें केन्द्र उन राज्यों से व्यय का विवरण माँगता है जो वर्षा से अधिक प्रभावित हुए हैं ताकि उन्हें आवश्यक सहायता दी जा सके। उदाहरण (ङ) में भी वास्तविक संघीय प्रणाली की स्थिति है क्योंकि इसमें भी अरुणाचल प्रदेश की पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 2.
बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही होगा और क्यों?
(क) संघवाद से इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग मेल-जोल से रहेंगे और उन्हें इस बात का भय नहीं रहेगा कि एक की संस्कृति दूसरे पर लाद दी जाएगी।
(ख) अलग-अलग किस्म के संसाधनों वाले दो क्षेत्रों के बीच आर्थिक लेन-देन को संघीय प्रणाली से बाधा पहुँचेगी।
(ग) संघीय प्रणाली इस बात को सुनिश्चित करती है जो केन्द्र में सत्तासीन हैं उनकी शक्तियाँ सीमित रहें।
उत्तर-
उपर्युक्त में प्रथम कथन (क) सही है क्योंकि संघीय प्रणाली में सभी को अपनी-अपनी संस्कृति के विकास का पूरा अवसर प्राप्त होता है जिसमें यह भी भय नहीं रहता है कि किसी पर दूसरे की संस्कृति लाद दी जाएगी। तीसरा कथन (ग) भी सही है क्योंकि संघीय प्रणाली में शक्तियों का केन्द्र व राज्यों में बँटवारा करके केन्द्र की शक्तियों को सीमित किया जाता है।

प्रश्न 3.
बेल्जियम के संविधान के कुछ प्रारंभिक अनुच्छेद नीचे लिखे गए हैं। इसके आधार पर बताएँ कि बेल्जियम में संघवाद को किस रूप में साकार किया गया है। भारत के संविधान के लिए ऐसा ही अनुच्छेद लिखने का प्रयास करके देखें।
शीर्षक-1 : संघीय बेल्जियम, इसके घटक और इसका क्षेत्र
अनुच्छेद-1 – बेल्जियम एक संघीय राज्य है—जो समुदायों और क्षेत्रों से बना है।
अनुच्छेद-2 – बेल्जियम तीन समुदायों से बना है—फ्रेंच समुदाय, फ्लेमिश समुदाय और जर्मन समुदाय।
अनुच्छेद-3 – बेल्जियम तीन क्षेत्रों को मिलाकर बना है-वैलून क्षेत्र, फ्लेमिश क्षेत्र और ब्रूसेल्स क्षेत्र।
अनुच्छेद-4 – बेल्जियम में 4 भाषाई क्षेत्र हैं- फ्रेंच-भाषी क्षेत्र, डच-भाषी क्षेत्र, ब्रसेल्स की राजधानी का द्विभाषी क्षेत्र तथा जर्मन भाषी क्षेत्र। राज्य का प्रत्येक ‘कम्यून’ इन भाषाई क्षेत्रों में से किसी एक का हिस्सा है।
अनुच्छेद-5 – वैलून क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले प्रान्त हैं-वैलून ब्राबैंट, हेनॉल्ट, लेग, लक्जमबर्ग और नामूर। फ्लेमिश क्षेत्र के अन्तर्गत शामिल प्रांत हैं- एंटीवर्प, फ्लेमिश ब्राबैंट, वेस्ट फ्लैंडर्स, ईस्ट फ्लैंडर्स और लिंबर्ग।
उत्तर-
बेल्जियम के उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि बेल्जियम समाज एक बहुसंख्यक (संघीय) समाज है जिसमें विभिन्न जाति, भाषा, बोली के लोग रहते हैं। ये अलग-अलग क्षेत्रों व प्रान्तों में रहते हैं; अतः बेल्जियम में संघीय समाज के कारण संघीय शासन-प्रणाली की भी आवश्यकता है यह एक ऐसा संघ होगा जिसमें विभिन्न क्षेत्र व प्रान्त सम्मिलित होंगे।

भारतीय समाज भी एक संघीय समाज है जिसमें विभिन्न जाति, धर्म, संस्कृति, बोली व भाषा के लोग रहते हैं। भारत 29 राज्यों का संघ है। भारत में संघीय शासन-प्रणाली है परन्तु इसमें अनेक एकात्मक तत्त्व हैं जिन्हें भारतीय एकता, अखण्डता की सुरक्षा के लिए सम्मिलित किया गया है। संविधान की योजना के आधार पर केन्द्र व राज्यों में शक्तियों का विभाजन किया गया है। राज्य अपने क्षेत्र में प्रभावकारी है परन्तु मुख्य विषयों पर केन्द्र को शक्तिशाली बनाया गया है। शक्तियों का विभाजन भी केन्द्र के पक्ष में अधिक है यद्यपि प्रशासन के क्षेत्र में व विकास के क्षेत्र में केन्द्र व राज्य आपसी सहयोग के आधार पर काम करते हैं।

प्रश्न 4.
कल्पना करें कि आपको संघवाद के संबंध में प्रावधान लिखने हैं। लगभग 300 शब्दों का एक लेख लिखें जिसमें निम्नलिखित बिन्दुओं पर आपके सुझाव हों-
(क) केन्द्र और प्रदेशों के बीच शक्तियों का बँटवारा
(ख) वित्त-संसाधनों का वितरण
(ग) राज्यपालों की नियुक्ति
उत्तर-
बहुल समाज में सभी वर्गों के विकास के लिए वे उनके हितों की रक्षा के लिए प्रजातन्त्रीय संघीय शासन-प्रणाली आवश्यकता है। संघीय ढाँचे का निर्माण संविधान की योजना के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

संघीय शासन-प्रणाली की प्रमुख विशेषता केन्द्र व राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन से है। संघ का निर्माण संघीय सिद्धान्तों के आधार पर होना चाहिए जिसमें संघ राज्यों की मर्जी पर आधारित होना चाहिए।, प्रान्तीय व क्षेत्रीय विषयों पर राज्यों का ही नियन्त्रण रहना चाहिए। संघ के पास केवल राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के विषय होने चाहिए। रक्षित शक्तियाँ राज्यों के पास होनी चाहिए। राज्यों की केन्द्र पर निर्भरता कम-से-कम होनी चाहिए। राज्यों के स्रोतों को राज्यों के विकास के लिए अधिक-से-अधिक उपयोग होना चाहिए। केन्द्र व राज्यों में आर्थिक स्रोतों का विभाजन विवेकपूर्ण आधार पर होना चाहिए।

राज्यपाल राज्यों का संवैधानिक मुखिया कहलाता है जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति राज्यपालों की नियुक्ति केन्द्र सरकार की सलाह पर करता है। राज्यपाल का पद राज्यों में महत्त्वपूर्ण पद है जो संवैधानिक मुखिया के साथ-साथ केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल के पद की इस स्थिति के कारण इसका राजनीतिकरण हो गया है। अतः संघीय व्यवस्था की सफलता के लिए आवश्यक है कि इस पद का दुरुपयोग न हो व राज्यपाल की नियुक्ति में राज्यों के मुख्यमन्त्रियों का परामर्श लिया जाना चाहिए व इस पद पर योग्य व निष्पक्ष व्यक्ति की नियुक्ति की जानी चाहिए।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन-सा प्रांत के गठन का आधार होना चाहिए और क्यों?
(क) सामान्य भाषा
(ख) सामान्य आर्थिक हित
(ग) सामान्य क्षेत्र
(घ) प्रशासनिक सुविधा
उत्तर-
यद्यपि अभी तक भारत में राज्यों का गठन 1956 के कानून के आधार पर भाषा आधारित होता रहा है परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासनिक सुविधा को राज्यों के पुनर्गठन का प्रमुख आधार माना जा रहा है जिससे लोगों को कुशल प्रशासन प्रदान किया जा सके जिसमें स्थानीय लोगों का विकास भी सम्भव हो सके।

प्रश्न 6.
उत्तर भारत के प्रदेशों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार के अधिकांश लोग हिंदी बोलते हैं। यदि इन सभी प्रांतों को मिलाकर एक प्रदेश बना दिया जाए तो क्या ऐसा करना संघवाद के विचार से संगत होगा? तर्क दीजिए।
उत्तर-
यदि उत्तर भारत के प्रदेशों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार जो कि सभी हिन्दी भाषी हैं, सभी को मिला दिया जाए तो भाषाई व सांस्कृतिक दृष्टि से तो वे सभी एक-इकाई के रूप में इकट्ठे हो सकते हैं परन्तु प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से यह उचित नहीं होगा। संघीय प्रशासन का प्रमुख आधार प्रशासनिक सुविधा है। देश में छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड व झारखण्ड का निर्माण प्रशासनिक आधार पर किया गया है।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान की ऐसी चार विशेषताओं का उल्लेख करें जिनमें प्रादेशिक सरकार की अपेक्षा केन्द्रीय सरकार को ज्यादा शक्ति प्रदान की गई।
उत्तर-
निम्नलिखित चार विशेषताएँ ऐसी हैं जिनके आधार पर केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है-

  1. केन्द्र के पक्ष में शक्तियों का विभाजन,
  2. राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ,
  3. राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था,
  4. अखिल भारतीय सेवाओं की भूमिका।

प्रश्न 8.
बहुत-से प्रदेश राज्यपाल की भूमिका को लेकर नाखुश क्यों हैं?
उत्तर-
भारतीय राजनीति में वर्तमान में सर्वाधिक चर्चित पद राज्यपाल का है। देश के अधिकांश राज्यों को अपने यहाँ के राज्यपालों से किसी-न-किसी रूप में शिकायत रहती है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश राज्यपालों की राजनीतिक पृष्ठभूमि होती है जिसके आधार पर केन्द्र के शासक दल द्वारा उनकी नियुक्ति की जाती है। इस कारण राज्यपाल निरपेक्ष रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते। इनकी भूमिका केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में होती है जिसके आधार पर इनकी जिम्मेदारी केन्द्र के हितों की रक्षा करना होता है परन्तु ये केन्द्र में जिस दल की सरकार होती है उसके रक्षक बन जाते हैं जिससे राज्यों की सरकारों और राज्यपालों में टकराव उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 9.
यदि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुकूल नहीं चल रहा, तो ऐसे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। बताएँ कि निम्नलिखित में कौन-सी स्थिति किसी देश में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिहाज से संगत है और कौन-सी नहीं? संक्षेप में कारण भी दें।
(क) राज्य की विधानसभा के मुख्य विपक्षी दल के दो सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया है और विपक्षी दल प्रदेश की सरकार को भंग करने की माँग कर रहा है।
(ख) फिरौती वसूलने के लिए छोटे बच्चों के अपहरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा हो रहा है।
(ग) प्रदेश में हुए हाल के विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला है। भय है कि एक दल दूसरे दल के कुछ विधायकों से धन देकर अपने पक्ष में उनका समर्थन हासिल कर लेगा।
(घ) केन्द्र और प्रदेशों में अलग-अलग दलों का शासन है और दोनों एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हैं।
(ङ) सांप्रदायिक दंगे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।
(च) दो प्रदेशों के बीच चल रहे जल-विवाद में एक प्रदेश ने सर्वोच्च न्यायालय का आदेश मानने से इनकार कर दिया है।
उत्तर-
उपर्युक्त परिस्थितियों में (ग) में दिया गया उदाहरण राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए सबसे उपयुक्त है। ऐसी स्थिति में जब चुनाव के बाद किसी भी दल को आवश्यक बहुमत प्राप्त न हो तो इस बात की सम्भावना बढ़ जाती है कि राजनीतिक दलों द्वारा सरकार बनाने के प्रयास में जोड़-तोड़ की राजनीति व विधायकों की खरीद-फरोख्त प्रारम्भ हो जाती है।

प्रश्न 10.
ज्यादा,स्वायत्तता की चाह में प्रदेशों ने क्या माँगें उठाई हैं?
उत्तर-
1960 से निरन्तर विभिन्न राज्यों से प्रान्तीय स्वतन्त्रता की माँग निरन्तर उठाई जाती रही है। पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर व कुछ उत्तर पूर्वी राज्यों से विशेष रूप से यह माँग आती रही है-

  1. केन्द्र व राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन राज्यों के पक्ष में होना चाहिए।
  2. राज्यों की केन्द्र पर आर्थिक निर्भरता नहीं होनी चाहिए।
  3. राज्यों के मामलों में केन्द्र का कम-से-कम हस्तक्षेप होना चाहिए।
  4. राज्यपाल के पद का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए व राज्यपाल की नियुक्ति में राज्यों में मुख्यमन्त्रियों का परामर्श लिया जाना चाहिए।
  5. सांस्कृतिक स्वायत्तता होनी चाहिए।
  6. सभी राज्यों का समान विकास होना चाहिए।
  7. संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 11.
क्या कुछ प्रदेशों में शासन के लिए विशेष प्रावधान होने चाहिए? क्या इससे दूसरे प्रदेशों में नाराजगी पैदा होती है? क्या इन विशेष प्रावधानों के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच एकता मजबूत करने में मदद मिलती है?
उत्तर-
संघीय प्रशासन के सिद्धान्तों के अनुसार सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। सभी राज्यों में विकास कार्य समान होने चाहिए। भारत में ऐसा नहीं है। भारत में कुछ छोटे राज्य हैं, कुछ बड़े। राज्यसभा में राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व है। जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत विशेष दर्जा दिया गया है जिसके आधार पर जम्मू-कश्मीर की राज्य के रूप में अपनी प्रभुसत्ता है। इसी प्रकार से उत्तर-पूर्वी राज्यों (असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश व त्रिपुरा) के विकास के लिए विशेष प्रावधान हैं। इन राज्यों के राज्यपाल को विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं। कमजोर और पिछड़े राज्यों के विकास के लिए विशेष सुविधाएँ देना अनुचित नहीं है और न ही अन्य प्रदेशों को इससे असहमत होना चाहिए। सभी राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा किया जाना चाहिए जिससे राष्ट्रीय एकता, अखण्डता को कोई खतरा उत्पन्न न हो।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘फेडरेशन ऑफ वेस्टइंडीज का जन्म किस वर्ष हुआ था?
(क) सन् 1958 में
(ख) सन् 1962 में
(ग) सन् 1963 में
(घ) सन् 1964 में
उत्तर :
(क) सन् 1958 में

प्रश्न 2.
‘यूनियन’ शब्द किस देश के संविधान से लिया गया है?
(क) ऑस्ट्रेलिया
(ख) कनाडा
(ग) ब्रिटेन
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर :
(ख) कनाडा

प्रश्न 3.
“भारत वस्तुतः एक संघात्मक राज्य नहीं है, वरन् अर्द्ध संघात्मक राज्य है।” यह किसका। कथन है?
(क) के० सी० ह्वीयर
(ख) जी० एन० जोशी
(ग) के० सन्थानम,
(घ) डॉ० बी०आर० अम्बेडकर
उत्तर :
(ख) जी० एन० जोशी।

प्रश्न 4.
“भारत का ढाँचा संघात्मक है, किन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है।” यह किसका कथन है?
(क) दुर्गादास बसु
(ख) जस्टिस सप्रू
(ग) एम०वी० पायली
(घ) रणजीत सिंह सरकारिया
उत्तर :
(ग) एम०वी० पायली।

प्रश्न 5.
राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन कब हुआ था?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1954 ई० में
(घ) 1956 ई० में
उत्तर :
(ग) 1954 ई० में

प्रश्न 6.
संघ सूची में कुल कितने विषय है?
(क) 66
(ख) 97
(ग) 47
(घ) 100
उत्तर :
(ख) 97

प्रश्न 7.
राज्य सूची में कितने विषय हैं?
(क) 62
(ख) 64
(ग) 60
(घ) 72
उत्तर :
(क) 62

प्रश्न 8.
समवर्ती सूची पर कानून निर्मित करने का अधिकार किसको प्राप्त है?
(क) केन्द्र को
(ख) राज्य को
(ग) केन्द्र तथा राज्य दोनों को
(घ) केन्द्र-शासित प्रदेश को
उत्तर :
(ग) केन्द्र तथा राज्य दोनों को

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा विषय संघ सूची में सम्मिलित नहीं है?
(क) रक्षा
(ख) विदेश
(ग) वाणिज्य
(घ) शिक्षा
उत्तर :
(घ) शिक्षा

प्रश्न 10.
42वें संविधान संशोधन द्वारा निम्नलिखित में से कौन-सा विषय समवर्ती सूची में सम्मिलित किया गया है?
(क) कृषि
(ख) जेल
(ग) पुलिस
(घ) वन
उत्तर :
(घ) वन

प्रश्न 11.
आपातकालीन स्थिति में भारतीय संघ का ढाँचा हो जाता है –
(क) पूर्ण संघात्मक
(ख) अर्द्ध-संघात्मक
(ग) एकात्मक
(घ) कोई प्रभाव नहीं
उत्तर :
(ग) एकात्मक।

प्रश्न 12.
केन्द्र-राज्य संबंधों से जुड़े मसलों की जाँच के लिए सरकारिया आयोग कब गठित किया गया था?
(क) सन् 1947 में
(ख) सन् 1983 में
(ग) सन् 1984 में
(घ) सन् 1985 में
उत्तर :
(ख) सन् 1983 में

प्रश्न 13.
प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से उत्तर प्रदेश को विभाजित कर कौन-सा राज्य गठित किया गया?
(क) उत्तराखण्ड
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) झारखण्ड
(घ) हरियाणा
उत्तर :
(क) उत्तराखण्ड।

प्रश्न 14.
कावेरीजल प्रवाह किन दो राज्यों के मध्य है?
(क) गुजरात-महाराष्ट्र
(ख) उत्तराखण्ड-हिमाचल प्रदेश
(ग) तमिलनाडु-कर्नाटक
(घ) मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र
उत्तर :
(ग) तमिलनाडु-कर्नाटक

प्रश्न 15.
संविधान के अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत किस राज्य को विशिष्ट स्थिति प्रदान की गई
(क) पंजाब
(ख) मिजोरम
(ग) सिक्किम
(घ) जम्मू-कश्मीर
उत्तर :
(घ) जम्मू-कश्मीर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान संघात्मक है या एकात्मक?
उत्तर :
भारतीय संविधान संघात्मक भी है और एकात्मक भी।

प्रश्न 2.
संविधान के दो संघात्मक तत्त्व बताइए।
उत्तर :

  1. लिखित संविधान तथा
  2. स्वतन्त्र व निष्पक्ष न्यायपालिका

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के दो एकात्मक लक्षण बताइए।
उत्तर :

  1. शक्तिशाली केन्द्र तथा
  2. इकहरी नागरिकता।

प्रश्न 4.
भारतीय संघ में कितने राज्य हैं?
उत्तर :
भारत में राज्यों की कुल संख्या 29 है।

प्रश्न 5.
संघ सूची में कितने विषय है?
उत्तर :
संघ सूची में 97 विषय हैं।

प्रश्न 6.
संघ सूची में सम्मिलित किन्हीं दो विषयों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. रक्षा तथा
  2. वैदेशिक मामले।

प्रश्न 7.
समवर्ती सूची के दो विषयों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. फौजदारी विधि एवं प्रक्रिया और
  2. शिक्षा

प्रश्न 8.
समवर्ती सूची के विषयों पर किसे कानून बनाने का अधिकार है?
उत्तर :
समवर्ती सूची के विषयों पर केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार है।

प्रश्न 9.
उस परिस्थिति का उल्लेख कीजिए, जब संसद राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है।
उत्तर :
यदि राज्यसभा अपने 2/3 बहुमत से राज्य सूची में निहित किसी विषय को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित कर दे।

प्रश्न 10.
संघ सरकार की आय के ऐसे दो साधन बताइए, जो राज्य सरकार की आय के साधन नहीं हैं।
उत्तर :

  1. केन्द्रीय उत्पाद शुल्क तथा
  2. आयकर।

प्रश्न 11.
संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार किसको है?
उत्तर :
संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का एकमात्र अधिकार भारतीय संसद को है।

प्रश्न 12.
केन्द्र तथा राज्यों में शक्तियों का विभाजन की तीन सूचियों में से शिक्षा किस सूची में
उत्तर :
शिखा को समवर्ती सूची में सम्मिलित किया गया है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान में विधायी शक्तियों का विभाजन जिन सूचियों में किया गया है, उनके नाम बताइए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में विधायी शक्तियों का विभाजन निम्नलिखित तीन सूचियों में किया गया

  1. संघ सूची
  2. समवर्ती सूची तथा
  3. राज्य सूची।

प्रश्न 14.
राज्य सूची में कितने विषय हैं?
उत्तर :
राज्य सूची में 62 विषय हैं।

प्रश्न 15.
समवर्ती सूची में कितने विषय हैं?
उत्तर :
समवर्ती सूची में विषयों की संख्या 52 है।

प्रश्न 16.
वित्त आयोग की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर :
वित्त आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करती है।

प्रश्न 17.
राज्य पुनर्गठन आयोग (1956) के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर :
राज्य पुनर्गठन आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे।

प्रश्न 18.
एक संघात्मक राज्य में उच्चतम (सर्वोच्च न्यायालय क्यों आवश्यक है?
उत्तर :
संघ और इकाइयों के बीच विवादों को हल करने के लिए संघात्मक राज्य में एक उच्चतम (सर्वोच्च) न्यायालय का होना आवश्यक है।

प्रश्न 19.
भारत को एक संघात्मक राज्य क्यों कहा जाता है?
उत्तर :
भारत 29 राज्यों तथा 7 संघशासित प्रदेश से बना हुआ एक संघ है और इसमें संघात्मक राज्य की सभी विशेषताएँ हैं, इसलिए इसे संघात्मक राज्य कहा जा सकता है।

प्रश्न 20.
भारतीय संविधान की संघात्मकता की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. संविधान की सर्वोच्चता तथा
  2. केन्द्र व राज्यों में शक्तियों का विभाजन।

प्रश्न 21.
राज्य सूची पर कौन कानून बनाता है?
उत्तर :
राज्य सूची पर राज्य सरकार कानून बनाती है, परन्तु यदि कोई विषय राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित किए जाने पर, उस पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार को प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 22.
संविधान का अनुच्छेद 370 किस राज्य से संबंधित है?
उत्तर :
संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य से संबंधित है।

लघु उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संघात्मक शासन के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
संघात्मक शासन व्यवस्था वह शासन व्यवस्था होती है जिसमें दो प्रकार की सरकारें होती हैं। वह सरकार, जो समस्त देश का प्रशासन करती है, ‘संघीय सरकार’ कहलाती है तथा दूसरी वह सरकार, जो राज्य का प्रशासन करती है, ‘राज्य-सरकार’ कहलाती है। फ्रीमैन के शब्दों में, “संघात्मक शासन वह है जो दूसरे राष्ट्रों के साथ संबंध में एक राज्य के समान हो, परन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह अनेक राज्यों का योग हो।’ डायसी के शब्दों में, “संघात्मक राज्य एक ऐसे राजनीतिक उपाय के अतिरिक्त कुछ नहीं है जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता तथा राज्यों के अधिकारों में मेल स्थापित करना है।”

प्रश्न 2.
भारत में केन्द्र तथा राज्यों के संबंधों पर केन्द्र की स्थिति किस प्रकार की प्रतीत होती है?
उत्तर :
केन्द्र तथा राज्यों के मध्य संबंधों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में केन्द्रीय सरकार को अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया गया है। राज्यों की स्वायत्तता की अपेक्षा केन्द्र को शक्तिशाली बनाने पर अत्यधिक बल दिया गया है। वास्तव में, बजाय इसके कि केन्द्र के हस्तक्षेप पर प्रतिबन्ध लगाए जाते, संविधान ने राज्यों की शक्तियों पर प्रतिबंध लगाए हैं। भारतीय संविधान में अनेक ऐसे प्रावधानों की व्याख्या की गई है, जिन्होंने राज्यों की स्थिति पर विपरीत प्रभाव डाला है तथा राज्यों को संघ सरकार के अधीन कर दिया है। इस स्थिति को देखते हुए आलोचकों को यह कहने का अवसर प्राप्त हुआ है कि भारतीय संघ पूर्ण रूप से एक संघीय राज्य नहीं है।

प्रश्न 3.
संघ (केन्द्र) सूची का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
संघ (केन्द्र) सूची के अन्तर्गत उन विषयों को रखा गया है, जिन पर केवल केन्द्र सरकार ही कानूनों का निर्माण कर सकती है। ये विषय बहुत महत्त्वपूर्ण एवं राष्ट्रीय स्तर के हैं। संघ सूची में 97 विषय हैं। इस सूची में प्रमुख विषय–रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध व सन्धि तथा बैंकिंग हैं।

प्रश्न 4.
समवर्ती सूची पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
औपचारिक रूप में और कानूनी दृष्टि से इन तीनों सूचियों के विषयों की संख्या वही बनी हुई है। जो मूल संविधान में है। लेकिन 42वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य-सूची के चार विषय (शिक्षा, वन, जंगली पशु तथा पक्षियों की रक्षा एवं नाप-तौल) समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिये गये हैं और समवर्ती सूची में इन चार के अतिरिक्त एक नवीन विषय ‘जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन’ भी सम्मिलित किया गया है। इस सूची में साधारणतया वे विषय रखे गये हैं जिनका महत्त्व क्षेत्रीय एवं संघीय दोनों ही दृष्टियों से है। इस सूची के विषय पर संघ तथा राज्य दोनों को ही कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। यदि इस सूची के किसी विषय पर संघीय तथा राज्य सरकार द्वारा बनाये गये कानुन परस्पर विरोधी हों तो सामान्यतया संघ का कानुन मान्य होगा। इस सूची में कुल 52 विषय हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं-फौजदारी विधि तथा प्रक्रिया, निवारक निरोध, विवाह एवं विवाह-विच्छेद, दत्तक एवं उत्तराधिकार, कारखाने, श्रमिक संघ, औद्योगिक विवाद, आर्थिक और सामाजिक योजना, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा, पुनर्वास और पुरातत्त्व, शिक्षा, जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन, वन इत्यादि।

प्रश्न 5.
भारत के संविधान में शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना क्यों की गई है?
उत्तर :
भारत के संविधान में शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना इसलिए की गई है, क्योकि –

  1. यह भारत की एकता तथा अखण्डता की परिचायक है।
  2. यह भारत में एकता बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली साधन है।
  3. समस्त भारत की प्रगति और उन्नति के लिए शक्तिशाली केन्द्र आवश्यक है।
  4. भारत का इतिहास इस बात को सिद्ध करता है कि जब-जब भारत में केन्द्रीय सत्ता कमजोर हुई है,

भारत पर विदेशी राज्यों का आक्रमण हुआ तथा भारत छोटे-छोटे राज्यों की आन्तरिक फूट के कारण अनेक वर्षों तक दासता की जंजीरों में जकड़ा रहा। इसीलिए भारत के संविधान-निर्माताओं ने सोच-विचार कर शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना की।

प्रश्न 6.
भारत में संघीय व्यवस्था का भविष्य किस बात पर निर्भर करता है? संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर :
भारत में संघीय व्यवस्था का भविष्य केन्द्र-राज्य संबंधों के सफल संचालन पर निर्भर करता है। केन्द्र तथा राज्यों का संबंध कतिपय तात्कालिक समस्याओं के समाधान पर निर्भर करेगा। ये समस्याएँ हैं-केन्द्र द्वारा राज्यों को अपने क्षेत्र में अधिक-से-अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करना, केन्द्रीय वित्तीय संसाधनों का राज्यों के मध्य न्यायपूर्ण विभाजन, खाद्य समस्या तथा रिजर्व बैंक में राज्यों द्वारा ओवर ड्राफ्ट लेना। इन समस्याओं में दोनों सरकारों के बीच सहयोग होना चाहिए न कि प्रतिस्पर्धा तथा विरोध।

प्रश्न 7.
भारतीय संघवाद के विशिष्ट लक्षणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संघवाद के विशिष्ट लक्षण निम्नलिखित हैं –

  1. संविधान के उपबन्धों द्वारा औपचारिक रूप में स्थापित, भारतीय संघीय व्यवस्था का स्वरूप प्रादेशिक है।
  2. भारतीय संघवाद क्षैतिज है जिसका एक सशक्त केन्द्र के प्रति झुकाव है।
  3. भारतीय संघ इस रूप में लचीला है कि वह विशेषतया संकटकाल में एकात्मकस्वरूप में सहजता से बदला जा सकता है।
  4. भारतीय संघ व्यवस्था इस रूप में सहकारी है कि वह सामान्य हितों के मामले में केन्द्र तथा राज्यों से सहयोग की अपेक्षा करती है।
  5. केन्द्र पर एक दल के आधिपत्य के कारण संघ का स्वरूप एकात्मक हो गया है।

प्रश्न 8.
राष्ट्रपति शासन से क्या आशय है?
उत्तर :
भारतीय संविधान में राज्यों में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत की गई है। यह निम्नलिखित परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है –

  1. किसी राज्य में कानून व्यवस्था भंग हो जाने की स्थिति में।
  2. राज्य में राजनैतिक अस्थिरता की स्थिति में।
  3. किसी भी दल को चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत प्राप्त न हुआ हो। और सरकार का गठन सम्भव न होने की स्थिति में।
  4. सरकार संविधान के अनुसार न चलाई जा रही हो अर्थात् राज्य में केन्द्र सरकार के कानूनों व आदेशों की अवहेलना हो रही हो।

उपर्युक्त स्थितियों में से एक स्थिति में भी राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेकर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है।

प्रश्न 9.
राज्यपाल की विवेकीय शक्तियाँ समझाइए।
उत्तर :
जिन शक्तियों को राज्यपाल स्वयं मुख्यमंत्री व मन्त्रिमण्डल के परामर्श के बिना प्रयोग करता है, उन्हें उसकी विवेकीय शक्तियाँ कहते हैं। राज्यपाल के पास अनेक विवेकीय शक्तियाँ हैं जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं –

  1. राज्यपाल किसी ऐसे बिल को, जिसे विधानसभा ने पास कर दिया हो, राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज सकता है।
  2. जब चुनाव के बाद, राज्य में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत प्राप्त न हो तो राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर किसी दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित करता है।
  3. कानून व्यवस्था का मूल्यांकन व राजनीतिक अस्थिरता का मूल्यांकन करना।
  4. राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान में निहित एकात्मक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान यद्यपि संघात्मक है परन्तु उसमें अनेक एकात्मक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है। इसी कारण के० सी० क्लीयर ने इसे ‘अर्द्ध-संघात्मक राज्य की संज्ञा प्रदान की है। भारत की संघात्मक व्यवस्था में निम्नलिखित एकात्मक तत्त्व पाए जाते हैं –

  1. भारत में इकहरी नागरिकता है।
  2. भारत का इकहरा संविधान है।
  3. न्यायपालिका का स्वरूप एकीकृत है।
  4. आपातकालीन स्थिति में राज्य का संघात्मक रूप एकात्मक में परिणत हो जाता है।
  5. राज्य में राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है।
  6. राज्य को केन्द्र से पृथक् होने का अधिकार नहीं है।
  7. संसद के उच्च सदन में राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया गया है।
  8. केन्द्र; राज्यों की सीमाओं, नामों में परिवर्तन करके नए राज्य का निर्माण कर सकता है।
  9. केन्द्र द्वारा अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
भारतीय राजनीति पर अनुच्छेद 370 के प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
वर्तमान में अनुच्छेद 370 विवादास्पद बना हुआ है क्योंकि इसके कारण कश्मीर को विशेष स्थिति प्राप्त है जो उसको शेष भारत से मनोवैज्ञानिक ढंग से पृथक् करती है। कश्मीर को यह विशेष स्थिति तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए अस्थायी रूप से प्रदान की गई थी परन्तु राजनीतिज्ञों न इसे राजनीतिक लाभ के लिए स्थायी बना दिया। अनुच्छेद 370 के कारण ही कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ है। भारतीय संघ में केवल जम्मू-कश्मीर ही ऐसा राज्य है जिसका पृथक् संविधान है। वहाँ पर कोई भी गैर कश्मीरी भारतीय, भूमि नहीं खरीद सकता है तथा स्थायी रूप से निवास नहीं बना सकता है जबकि 1947 ई० में कश्मीर से पाकिस्तान गए लोगों को पुनः कश्मीर वापस लौटने तथा वहाँ बसने का अधिकार है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत का संघात्मक स्वरूप अन्य संघों से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
विश्व के अनेक राज्यों में संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त भारत में भी संघात्मक शासन व्यवस्था की नींव डाली गई। हमने अपनी संघात्मक व्यवस्था को अमेरिका से न लेकर कनाडा से ग्रहण किया है। हमने संघ के लिए यूनियन शब्द का प्रयोग किया है। भारत के संघ को विद्वानों ने कमजोर संघ अथवा अर्द्ध-संघ के नाम से सम्बोधित किया है। भारत के संघ में संघात्मक सरकार के सभी लक्षणों का समावेश किया गया है परन्तु फिर भी भारत का संघात्मक स्वरूप अन्य संघों से अनेक प्रकार से भिन्न है। जैसे

(1) भारतीय संविधान में कहीं पर भी संघात्मक शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, इसमें केवल यह कहा गया है कि भारत राज्यों का संघ है।

(2) दूसरे संघों में केन्द्र की तुलना में राज्यों को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं परन्तु भारत में राज्यों की तुलना में केन्द्र को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। संघ की सूची में वर्णित विषयों की संख्या 97 है जबकि राज्यों को मात्र 62 विषय प्रदान किए गए हैं। समवर्ती सूची में 52 विषयों को सम्मिलित किया गया है। समवर्ती सूची पर केन्द्र तथा राज्यों (दोनों) को कानून-निर्माण करने की शक्ति प्रदान की गई है परन्तु यदि इन दोनों के निर्मित कानूनों में। टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो केन्द्र के कानून को मान्यता प्राप्त होती है।

(3) आपातकालीन स्थिति में भारतीय संघीय व्यवस्था एकात्मक में परिवर्तित हो जाती है।

(4) हमारे संघ का निर्माण इस प्रकार से नहीं हुआ है, जैसे अमेरिका के संघ का निर्माण हुआ था। हमने भारत के विभिन्न राज्यों का समय-समय पर विभाजन करके नए-नए राज्यों का निर्माण किया है जबकि अन्य संघात्मक राज्यों में स्वतन्त्र तथा सम्प्रभु राज्य सम्मिलित हुए थे।

(5) केन्द्रीय विधायिका (संसद) किसी भी राज्य की सीमा में परिवर्तन कर सकती है, यहाँ तक कि वह किसी भी राज्य को समाप्त करके नए राज्य का निर्माण कर सकती है जबकि अन्य संघात्मक राज्यों में इस स्थिति को नहीं अपनाया गया है।

प्रश्न 2.
भारत में संघीय व्यवस्था को क्यों अपनाया गया है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान ने संघात्मक शासन-प्रणाली की व्यवस्था की है। भारत में वर्षों तक अंग्रेजों का शासन रहा। भारत की अपनी परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि अंग्रेजों ने भी 1935 के अधिनियम द्वारा भारत में संघीय प्रणाली की व्यवस्था की थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान निर्माताओं ने इसी व्यवस्था को अपनाया। भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा निम्नलिखित कारणों से संघात्मक व्यवस्था को अपनाया गया –

  1. भारत भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से एक उप-महाद्वीप के समान है जिसमें प्रशासनिक दृष्टिकोण से संघात्मक व्यवस्था ही उपयुक्त हो सकती थी।
  2. भारतीय समाज में विभिन्न धर्म, भाषा, जाति, संस्कृति आदि पाए जाते हैं जिनमें सामंजस्य स्थापित करने के लिए संघात्मक व्यवस्था ही उचित समझी गई।
  3. अंग्रेजों ने भारत को स्वतन्त्र करने के साथ-साथ देशी रियासतों को भी स्वतन्त्र कर दिया था। इन देशी रियासतों को भारत में मिलाने के लिए संघात्मक व्यवस्था ही उपयुक्त थी। इसके द्वारा । स्थानीय स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय एकता दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति हो जाती है।
  4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सदैव संघात्मक व्यवस्था की माँग की थी।
  5. भारतीयों को संघात्मक व्यवस्था का अनुभव भी था क्योंकि 1935 में भारत सरकार अधिनियम के अन्तर्गत संघात्मक व्यवस्था ही अपनाई गई थी।

संविधान सभा में डॉ० बी०आर० अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह एक संघीय संविधान है क्योंकि यह दोहरे शासन तन्त्र की व्यवस्था करता है जिसमें केंद्र में सघीय सरकार तथा उसके चारों ओर परिधि में राज्य सरकारें हैं जो संविधान द्वारा निर्धारित क्षेत्रों में सर्वोच्च सत्ता का प्रयोग करती हैं।

प्रश्न 3.
केंद्र तथा राज्य संबंधों में राज्यपाल की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
राज्य का अध्यक्ष राज्यपाल होता है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त अपने पद पर रहता है। राज्यपाल की नियुक्ति पाँच वर्ष के लिए की जाती है; परन्तु वास्तविकता यह है कि वह अपनी नियुक्ति तथा पदच्युति के लिए केंद्रीय सरकार पर आश्रित रहता है। उसकी यही आश्रियता केंद्र तथा राज्य संबंधों में तनाव का कारण बन जाती है।

जब केंद्र तथा राज्य में विभिन्न दलों की सरकार हो तो राज्य सरकार यह दावा करती है कि राज्यपाल की नियुक्ति उसके परामर्श से की जाए। परन्तु केंद्रीय सरकार अपनी पसंद के व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करके राज्य सरकार पर नियन्त्रण रखने का प्रयत्न करती है।

राज्यपाल को कुछ ऐसे अधिकार भी प्राप्त हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छा से करता है, मंत्रिमण्डल की सलाह पर नहीं। ये अधिकार महत्त्वपूर्ण भी हैं। राज्य में संवैधानिक मशीनरी के असफल होने की रिपोर्ट वह अपने विवेक से करता है जिसके आधार पर केंद्र राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करता है। केंद्र ने अनेक बार उन राज्यों से जहाँ अन्य दल की सरकार थी, राज्यपाल से मनमाने ढंग से ऐसी रिपोर्ट ली और राष्ट्रपति शासन लागू कराया। राज्यपाल के ऐसे कार्यों ने केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव को बढ़ाया है। दिसम्बर 1992 की अयोध्या घटना के पश्चात् केंद्र ने भाजपा द्वारा शासित चारों राज्योंउत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश तथा राजस्थान में राज्यपाल की रिपोर्टों के आधार पर राष्ट्रपति , शासन लागू कर दिया था।

राज्यपाल का एक अधिकार जिसका प्रयोग वह अपने विवेक से करता है और राज्यपालों ने केंद्रीय सरकार के हित में इसका अत्यधिक प्रयोग किया है, वह है राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए गए। किसी बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजना। इससे राज्य की विधायिका शक्ति प्रभावित होती है और बिल राष्ट्रपति के पास बहुत दिनों तक उसकी स्वीकृति के लिए पड़े रहते हैं। इस प्रकार केंद्र-राज्य संबंधों की दृष्टि से राज्यपाल की भूमिका अत्यन्त विवादास्पद रही है और इसने केंद्र और राज्यों के बीच कटुता और तनाव की स्थिति को बढ़ाया है।

प्रश्न 4.
केन्द्र तथा राज्य के मध्य तनाव के राजनीतिक एवं व्यावहारिक कारण लिखिए।
उत्तर :
केन्द्र तथा राज्यों के मध्य तनाव के राजनीतिक कारण केन्द्र तथा राज्य सम्बन्धों का राजनीतिक पक्ष बहुत मुखरित रहा है। केन्द्र तथा राज्य सरकारें एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लागती हैं, जिन्हें अग्रनुसार रखा जा सकता है –

(1) केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा एक – दूसरे पर संकीर्ण दलबन्दी की भावना के अनेक आरोप लगाए जाते रहे हैं। केन्द्र में कांग्रेसी शासन के साथ जब कभी किसी राज्य में गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो उसका यही आरोप रहा कि केन्द्र राज्य सरकार को गिराने अथवा नीचा दिखाने को प्रयत्नशील है। दूसरी ओर केन्द्र का यह आरोप रहा है कि राज्य सरकार केन्द्र के साथ असहयोग की राजनीति कर रही है। इस तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों से पारस्परिक संबंधों में तनाव पैदा होता है।

(2) डॉ० मिश्र ने लिखा है, “कुछ विपक्षी दल क्षेत्रीय साम्प्रदायिक भावनाओं की मदद से जनता में लोकप्रिय होना चाहते हैं तथा क्षेत्रीय स्तर पर निर्वाचन में सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से केन्द्र तथा राज्य के मध्य तनाव पैदा करते हैं। कुछ वामपन्थी दल, जिनकी लोकप्रियता कुछ क्षेत्रों तक सीमित है निर्वाचन नीति के रूप में केन्द्र के विरुद्ध राजनीतिक प्रचार करते हैं।”

केन्द्र तथा राज्यों के मध्य तनाव के व्यावहारिक कारण

केन्द्र तथा राज्य संबंधों में तनाव के लिए कतिपय व्यावहारिक कारण भी उत्तरदायी रहे हैं, जिनका उल्लेख निम्नानुसार किया जा सकता है –

  1. केन्द्र तथा राज्यों में ये तनाव पैदा हो जाता है कि राज्य द्वारा आर्थिक अनुदान अथवा आर्थिक सहायता माँगने पर केन्द्रीय सरकार एक ओर तो उदार रवैया न अपनाकर यह आरोप लगाती है। कि राज्य सरकारें अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों का समुचित विदोहन नहीं करतीं। केन्द्र का यह भी आरोप रहा है कि कुछ राज्य सरकारें उपलब्ध राशि को विकास योजनाओं पर उचित समय पर व्यय नहीं करतीं।
  2. ओवर-ड्राफ्ट को लेकर केन्द्र एवं राज्यों के मध्य संघर्ष तथा तनाव की स्थिति बनी रहती है।
  3. अंतर्राज्यीय विवादों को हल करने के संबंध में केन्द्र सरकार की निष्पक्षता को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते रहे हैं।

प्रश्न 5.
नए राज्यों की माँग केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव का कारण किस प्रकार है?
उत्तर :
भारत की संघीय व्यवस्था में नए राज्यों के गठन की माँग को लेकर भी तनाव रहा है। राष्ट्रीय आन्दोलन ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय एकता को नहीं बल्कि समान भाषा, क्षेत्र और संस्कृति के आधार पर एकता को भी जन्म दिया। हमारा राष्ट्रीय आन्दोलन लोकतन्त्र के लिए भी एक आन्दोलन था। अतः राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान यह भी तय किया गया कि यथासम्भव समान संस्कृति और भाषा के आधार पर राज्यों का गठन होगा।

इससे स्वतन्त्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की माँग उठी। सन् 1954 में राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की गई जिसने प्रमुख भाषाई समुदायों के लिए भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की सिफारिश की सन् 1956 में कुछ राज्यों का पुनर्गठन हुआ। इससे भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की शुरुआत हुई और यह प्रक्रिया आज भी जारी है। सन् 1960 में गुजरात और महाराष्ट्र का गठन हुआ; सन् 1966 में पंजाब और हरियाणा को अलग-अलग किया गया। बाद में पूर्वोत्तर के राज्यों का पुनर्गठन किया गया और अनेक नए राज्यों; जैसे—मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश अस्तित्व में आए।

1990 के दशक में नए राज्य बनाने की माँग को पूरा करने तथा अधिक प्रशासकीय सुविधा के लिए कुछ बड़े राज्यों का विभाजन किया गया। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को विभाजित कर तीन नए राज्य क्रमश: झारखण्ड, उत्तराखण्ड और छतीसगढ़ बनाए गए। कुछ क्षेत्र और भाषाई समूह अब भी अलग राज्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिनमें आन्ध्र प्रदेश में तेलंगाना, उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश और महाराष्ट्र में विदर्भ प्रमुख हैं। सन् 2014 में आन्ध्र प्रदेश को विभाजित कर ‘तेलंगाना राज्य का गठन कर दिया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“भारत का संविधान अर्द्ध-संघीय शासन-व्यवस्था की स्थापना करता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
“भारत का संविधान संघात्मक भी है और एकात्मक भी।” व्याख्या कीजिए।
या
“भारतीय संविधान का रूप संघात्मक है, लेकिन उसकी आत्मा एकात्मक।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
भारत के संघवाद के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
या
“भारत एक संघात्मक राज्य है।” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
या
भारतीय संघात्मक व्यवस्था के एकात्मक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय संविधान में संघ और राज्यों के बीच शक्तियों में बँटवारे का आधार और महत्त्व बताइए।
उत्तर :
भारत एक विशाल तथा विभिन्नताओं वाला राज्य है। इस प्रकार के राज्य का प्रबन्ध एक केन्द्रीय सरकार द्वारा सफलतापूर्वक चलाया जाना कठिन ही नहीं अपितु असम्भव भी है। इसी कारण भारत में संघीय शासन-व्यवस्था को अपनाया गया है। लेकिन इसके बावजूद भारत में संघात्मक स्वरूप सम्बन्धी विवाद पाया जाता है, क्योंकि भारतीय संविधान में न तो कहीं ‘संघात्मक और न ही कहीं ‘एकात्मक’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप सम्बन्धी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए प्रो० डी० एन० बनर्जी ने उचित ही कहा है कि “भारतीय संविधान स्वरूप में संघात्मक तथा भावना में एकात्मक है।” भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप को भली प्रकार से समझने के लिए हमें इसके दोनों पक्षों (संघात्मक तथा एकात्मक) का अध्ययन करना पड़ेगा जो कि निम्नलिखित हैं

भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ (लक्षण)

हालांकि भारतीय संविधान में ‘संघ’ शब्द का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी व्यवहार में संघात्मक शासन-प्रणाली को ही स्वीकार किया गया है। भारतीय संविधान में कहा गया है कि भारत राज्यों का एक ‘संघ’ होगा। इस तथ्य की अवहेलना नहीं की जा सकती कि भारतीय संविधान में एकात्मक तत्त्व विद्यमान हैं, लेकिन यह भी अटल सत्य है कि भारतीय संविधान में संघात्मक प्रणाली के भी समस्त लक्षण विद्यमान हैं, जिन्हें निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया जा सकता है –

(1) संविधान की सर्वोच्चता – संघात्मक शासन में संविधान को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। संविधान और संविधान द्वारा बनाये गये कानून देश के सर्वोच्च कानून होते हैं। भारतीय संविधान में संवैधानिक सर्वोच्चता का उल्लेख नहीं है, लेकिन फिर भी संविधान की सर्वोच्चता को इस रूप में स्वीकार किया गया है कि भारतीय राष्ट्रपति, संसद इत्यादि सभी संविधान से शक्तियाँ ग्रहण करते हैं और वे संविधान से ऊपर नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय राष्ट्रपति द्वारा शपथ ग्रहण करते समय यह स्पष्ट किया जाता है कि वह संविधान की रक्षा करेंगे इसके साथ ही भारत की संसद अथवा विधानसभा द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया जा सकता जो संविधान के विपरीत हो। अतः कहा जा सकता है कि भारत में संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार किया गया है।

(2) लिखित संविधान – संघात्मक शासन का एक लक्षण संविधान का लिखित होना भी है। यहाँ पर यह प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है कि संघात्मक राज्य का संविधान लिखित होना क्यों आवश्यक है? लिखित संविधान स्थायी होता है और इसके सम्बन्ध में बाद में मतभेद उत्पन्न होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है। चूंकि संघात्मक शासन में दोहरा शासन अर्थात्के न्द्रीय शासन तथा प्रान्तों का शासन होता है, इसलिए इसमें विवादों की सम्भावना बनी रहती है। लेकिन यदि लिखित संविधान के अनुसार प्रत्येक बात को लिखित रूप में दिया गया हो तो फिर परस्पर मतभेद उत्पन्न होने की सम्भावना कम-से-कम हो जाती है।

(3) कठोर संविधान – जब संवैधानिक कानून को साधारण कानून से ऊँचा दर्जा दिया जाता है और संवैधानिक कानून को परिवर्तित करने हेतु साधारण कानून के निर्माण की प्रक्रिया से पृथक् तरीका अपनाया जाता है तो संविधान कठोर होता है। इस दृष्टि से भारतीय संविधान भी कठोर संविधान की श्रेणी में आता है। इसमें साधारण विषयों को छोड़कर महत्त्वपूर्ण संशोधन करने के लिए संघ राज्य के साथ-साथ इकाई राज्यों के सहयोग की भी आवश्यकता होती है। कठोर संविधान होने के कारण ही उसमें संशोधन प्रक्रिया जटिल है।

(4) विषयों का विभाजन – शासन के संघात्मक स्वरूप का एक लक्षण यह भी है कि इसमें विषयों का विभाजन किया जाता है। भारतीय संविधान में भी विषयों का विभाजन किया गया है। इस दृष्टि से भारतीय संविधान में तीन सूचियाँ हैं—संघीय सूची जिसमें 98 विषय हैं और जिन पर संसद ही कानून बना सकती है। राज्य सूची जिसमें 62 विषय हैं और जिन पर सामान्यतया राज्यों की विधानसभाएँ ही कानून बनाती हैं। समवर्ती सूची जिसके अन्तर्गत 52 विषय हैं और जिन पर संसद एवं विधानसभा दोनों ही कानून बना सकती हैं। अवशिष्ट विषय संघीय सरकार को सौंपे गये हैं।

(5) दोहरी शासन-व्यवस्था – संघात्मक शासन-प्रणाली में दोहरी शासन-व्यवस्था – (i) केन्द्र सरकार तथा (ii) प्रान्तों की सरकार होती है। भारत में केन्द्र सरकार नयी दिल्ली में है जो कि सम्पूर्ण देश को शासन-प्रबन्ध करती है और दूसरी सरकार प्रत्येक प्रान्त की राजधानी में है जो प्रान्त के हितों को ध्यान में रखती है।

(6) द्विसदनात्मक विधानमण्डल – संघीय सरकार में द्विसदनीय विधानमण्डल की व्यवस्था की जाती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार भारत में भी द्विसदनीय विधानमण्डल का प्रबन्ध है, जिसे संघीय संसद कहा जाता है। भारतीय संघीय संसद के उच्च सदन का नाम राज्यसभा है। संघीय संसद के निम्न (निचले) सदन का नाम लोकसभा है इसके सदस्य एक-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में जनसाधारण द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं।

(7) न्यायपालिका की सर्वोच्चता – संघात्मक शासन में अन्य अंगों से न्यायपालिका को सर्वोच्च स्तर दिया जाता है; क्योंकि

  1. संविधान की रक्षा हेतु
  2. संविधान की व्याख्या करने हेतु तथा
  3. केन्द्र एवं राज्यों के विवादों का निपटारा करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है।

भारतीय संविधान में भी केन्द्र में सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्यों में उच्च न्यायालय का प्रबन्ध करके इन्हें स्वतन्त्र बनाये रखने हेतु सभी व्यवस्थाएँ की गयी हैं। ये न्यायपालिकाएँ भारतीय संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती हैं।

भारतीय संविधान की एकात्मक विशेषताएँ (लक्षण)

(1) इकहरी (एकल) नागरिकता – एकात्मक सरकार में इकहरी नागरिकता के सिद्धान्त को अपनाया जाता है, व्यक्ति प्रान्तों के नागरिक न होकर सम्पूर्ण देश के नागरिक होते हैं भारतीय संविधान के अन्तर्गत इसी सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है अर्थात् सभी भारतीयों को चाहे वे किसी भी प्रान्त के निवासी क्यों न हों, उन्हें भारतीय नागरिक के रूप में स्वीकार किया गया है। यह एकात्मक तत्त्व का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है।

(2) विषयों के विभाजन का अभाव – सामान्यतः संघात्मक शासन-व्यवस्था में केन्द्र अथवा संघ को कुछ सीमित शक्तियाँ प्रदान की जाती हैं तथा शेष शक्तियाँ राज्यों को प्राप्त होती हैं। लेकिन भारत में इसके विपरीत शक्तियों का बँटवारा किया गया है जो शक्तिशाली केन्द्र का निर्माण करते हैं तथा राज्य अधिक स्वायत्तता का उपभोग नहीं कर सकते।

(3) भारत में समूचे राष्ट्र के लिए एक ही संविधान रखा गया है, जो पुनः एकात्मक तत्त्व है।

(4) एकल न्याय-व्यवस्था – भारत में एकीकृत न्याय-व्यवस्था लागू की गयी है। संयुक्त राज्य अमेरिका की भाँति भारत में दोहरी न्यायिक व्यवस्था नहीं है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय समूचे देश का एकमात्र सर्वोच्च न्यायालय है जिसके आदेशों के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती।

(5) आपातकालीन स्थिति – भारतीय संविधान द्वारा अनुच्छेद 352, 356 तथा 360 में राष्ट्रपति को आपातकालीनं घोषणा करने की शक्ति प्रदान की गयी है। आपातकालीन स्थिति में राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो सकती है। पायली के मतानुसार, आपातकालीन स्थिति की घोषणा भारत में संघात्मक शासन के स्वरूप को समाप्त कर देती है। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि आपातकाल की घोषणा होते ही बिना किसी औपचारिक संशोधन के भारतीय संविधान एकात्मक हो जाता है।

(6) राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति – भारतीय संघ में इकाई राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति केन्द्रीय शासन के अंग राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा इन्हें उनके पद से हटाने का अधिकार भी राष्ट्रपति के ही पास है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राज्यों के राज्यपाल केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं।

(7) संविधान संशोधन के सम्बन्ध में केन्द्र की सशक्त स्थिति – संविधान के कुछ उपबन्धों का संशोधन तो केन्द्रीय संसद साधारण कानून पारित करके, कुछ उपबन्धों का संशोधने सदन के दोनों सदन अपने-अपने दो-तिहाई बहुमत से तथा कुछ उपबन्धों का संशोधन संसद आधे से अधिक राज्यों की विधान-सभाओं की स्वीकृति से कर सकती है। राज्यों की विधानसभाएँ अपनी ओर से कोई संशोधन प्रस्तावित नहीं कर सकतीं। इस प्रकार संविधान के संशोधन की व्यवस्था में राज्यों की तुलना में केन्द्र की स्थिति सबल है।

(8) राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने का संसद का अधिकार – भारतीय संविधान के अनुसार संसद कानून द्वारा वर्तमान राज्यों के क्षेत्र को कम अथवा अधिक कर सकती है, उनके नाम बदल सकती है और दो अथवा उससे अधिक राज्यों को मिलाकर एक नवीन राज्य का गठन कर सकती है।

समीक्षा – भारतीय संविधान के उपर्युक्त एकात्मक लक्षणों को देखते हुए प्रो० के० सी० ह्वीयर का कथन है कि “भारतीय संविधान एक ऐसी शासन-प्रणाली की स्थापना करता है, जो अधिक-से-अधिक अर्द्धसंघीय (Quasi-federal) है। यह एक ऐसे एकात्मक राज्य की स्थापना करता है, जिसमें गौण रूप से कुछ संघात्मक तत्त्व हों।” इसी प्रकार जी० एन० जोशी का विचार है कि भारतीय संघ एक संघ नहीं, वरन् अर्द्धसंघ है, जिसमें एकात्मक राज्य की कतिपय महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का समावेश है।” डॉ० डी० डी० बसु के अनुसार, “भारतीय संविधान न तो नितान्त संघात्मक है और न ही एकात्मक, वरन् यह दोनों का मिश्रण है। इसी प्रकार पायली का मत है कि “भारत के संविधान का ढाँचा (रूप) संघात्मक व आत्मा एकात्मक है। कभी-कभी इन एकात्मक लक्षणों को संघात्मक व्यवस्था के उल्लंघनकारी तत्त्व की संज्ञा दे दी जाती है।

प्रश्न 2.
संघात्मक शासन-प्रणाली के गुण लिखिए।
उत्तर :

संघात्मक शासन-प्रणाली के गुण

संघात्मक शासन-प्रणाली के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

1. संघीय सरकार निरंकुश नहीं हो पाती – केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों के कार्य एवं अधिकार-क्षेत्र संविधान द्वारा निश्चित होते हैं, इसलिए केन्द्र तथा राज्यों में से कोई भी किसी अन्य की सीमा में हस्तक्षेप करके निरंकुश नहीं हो पाता है।

2. प्रशासन में कुशलता – इस व्यवस्था में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों के बीच कार्य एवं शक्तियाँ विभाजित होती हैं। इसीलिए केन्द्रीय सरकार अपनी शक्तियों का समुचित प्रयोग करते हुए देश के महत्त्वपूर्ण कार्यों को सम्पादित करती है और स्थानीय अथवा इकाई सरकारें अपनी शक्तियों का स्वतन्त्रापूर्वक उपयोग करते हुए स्थानीय समस्याओं का समाधान करती हैं इस प्रकार देश का प्रशासन सुचारु रूप से संचालित होता है।

3. विविधता में एकता – प्रत्येक संघ सरकार में अनेक राज्य सम्मिलित होते हैं, जो विभिन्न अर्थों (जाति, धर्म, भाषा, रीति-रिवाज इत्यादि) में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, किन्तु वे अपनी सामान्य समस्याओं को सुलझाने के लिए एक सूत्र में बँधकर रहते हैं। इस प्रकार संघीय शासन के अन्तर्गत विविधता में एकता होती है।

4. बड़े देशों के लिए उपयोगी – विस्तृत क्षेत्र वाले देशों के लिए यह शासन व्यवस्था उत्तम है, क्योंकि एक ही स्थान (केन्द्र) से दूर के स्थानों का शासन ठीक प्रकार से संचालित करना कठिन होता है।

5. नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा – संघात्मक संविधानों में नागरिकों के मूल अधिकारों में सरलता से संशोधन नहीं हो सकता, क्योंकि संविधान कठोर होता है। इसके संशोधन के लिए केन्द्र तथा राज्य दोनों ही की आवश्यकता होती है।

6. स्थानीय स्वशासन में कुशलता-लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “संघवाद स्थानी विधानमण्डलों को काफी शक्तियाँ प्रदान करके राष्ट्रीय विधानमण्डलों को उन बहुत-से कार्यों से मुक्ति दिलाता है, जो उसके लिए अन्यथा बोझ बन जाते हैं। अत: संघीय सरकार को भी राष्ट्रीय हित के विषयों पर पूरा-पूरा ध्यान देने का अवसर मिल जाता है, जिससे प्रशासन में दृढ़ता आ जाती

7. स्थानीय स्वशासन का लाभ – संघात्मक शासन में इकाइयों को स्वशासन का पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है, इसलिए ये अपनी जनता की आवश्यकतानुसार आचरण करके नागरिकों के हितों में वृद्धि करती हैं। विगत कुछ वर्षों से, भारत के परिप्रेक्ष्य में पंचायती राज्यों के अधिकारों में वृद्धि इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

8. राजनीतिक चेतना एवं विश्व-संघ की ओर कदम – संघीय शासन अपने नागरिकों को श्रेष्ठ राजनीतिक प्रशिक्षण प्रदान करके उनमें राजनीतिक चेतना उत्पन्न करता है। संघ राज्य विश्व-संघ के निर्माण की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

प्रश्न 3.
केन्द्र व राज्यों के मध्य विधायी सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
संघात्मक शासन व्यवस्था की यह विशेषता होती है कि इसमें केन्द्र और इकाई राज्य सरकारों के मध्य शक्तियों, अधिकारों एवं कार्यों का संविधान द्वारा स्पष्ट विभाजन कर दिया जाता है, जिससे केंद्र एवं राज्य-सरकारों के मध्य किसी भी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो, दोनों सरकारें अपने-अपने कार्यों एवं उत्तरदायित्वों का समुचित रूप से पालन कर सकें और सम्पूर्ण देश में शान्ति एवं सुरक्षा का वातावरण बना रहे।

केंद्र व राज्य के मध्य विधायी संबंध

संविधान ने विधि या कानून का निर्माण करने से संबंधित विषयों की तीन सूचियाँ बनाई हैं। इन सूचियों को बनाने का उद्देश्य केंद्र और राज्यों की सरकारों के मध्य विधि-निर्माण संबंधी क्षेत्रों को विभक्त करनी है। ये सूचियाँ निम्नलिखित हैं –

1. संघ सूची (Union List) – इस सूची के अंतर्गत उन विषयों को रखा गया है, जिन पर केवल केंद्र सरकार की कानूनों का निर्माण कर सकती है। ये विषय बहुत महत्त्वपूर्ण एवं राष्ट्रीय स्तर के हैं। इस संघ सूची में 97 विषय हैं। इस सूची के प्रमुख विषय–रक्षा, वैदेशिक मामले, युद्ध व संधि तथा बैंकिंग आदि हैं।

2. राज्य सूची (State List) – मूल संविधान में इस सूची में 66 विषय थे। परन्तु 42वें संवैधानिक संशोधन के उपरान्त अब इस सूची में 62 विषय रह गए हैं। इन सब विषयों से संबंधित कानूनों का निर्माण करने का अधिकार राज्य सरकारों को होता है। वैसे तो इन विषयों पर केवल राज्य सरकारें ही कानून बना सकती हैं; किंतु कुछ विशेष स्थितियों में केंद्र सरकार भी इन विषयों पर कानून बना सकती है। इस सूची के प्रमुख विषय-पुलिस, न्याय, कृषि, स्थानीय स्वशासन आदि हैं।

3. समवर्ती सूची (Concurrent List) – मूल संविधान में इस सूची में 47 विषय थे, परन्तु अब इस सूची में 52 विषय हो गए हैं। इन विषयों पर राज्य एवं केंद्र-दोनों सरकारों को कानून बनाने का समान अधिकार है, परन्तु मतभेद की स्थिति में संघ सरकार के कानून को प्राथमिकता दी जाती है। इस सूची के प्रमुख विषय फौजदारी विधि-प्रक्रिया, शिक्षा, विवाह, न्यास (ट्रस्ट), वन आदि हैं।

4. अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers) – यदि कोई विषय उपर्युक्त तीनों सूचियों में सम्मिलित न हो तो वह अवशिष्ट विषय कहा जाता है और उस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संघ सरकार को ही है।

अतः इन सूचियों के विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों के विधि-निर्माण से संबंधित अधिकार-क्षेत्र पृथक्-पृथक् हैं। इस विभाजन के आधार पर यह भी स्पष्ट होता है कि केन्द्र सरकार राज्य सरकार की तुलना में अधिक शक्तिसम्पन्न है। यद्यपि समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दोनों सरकारों को प्राप्त होता है; किन्तु सामान्यतया इन विषयों पर संसद ही कानूनों का निर्माण करती है तथा मतभेद होने की स्थिति में संघ सरकार का कानूनी मान्य होता है।

[नोट – 42वें संवैधानिक संशोधन 1976 के द्वारा राज्य सूची के चार विषय (शिक्षा, वन, वन्य जीव-जन्तुओं और पक्षियों का रक्षण तथा नाप-तौल (समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिए गए तथा समवर्ती सूची में एक नया विषय जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन’ जोड़ा गया। अब समवर्ती सूची में 52 विषय और राज्य सूची में 62 विषय रह गए हैं।]

राज्य सूची के विषयों पर कानून-निर्माण की संसद की शक्ति – संविधान ने संसद को विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार दिया है। ये परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं –

1. संकटकाल की घोषणा के समय – आपातकाल में राज्य सूची के अंतर्गत आने वाले विषयों पर संसद को विधि-निर्माण का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।

2. राज्य सूची का कोई विषय राष्टीय महत्त्व का होने पर – यदि राज्यसभा अपने दो-तिहाई बहुमत से अपने एक प्रस्ताव के माध्यम से राज्य सूची के किसी विषय के संबंध में यह घोषणा कर दे कि राष्ट्रीय हित में उस विषय पर केंद्रीय सरकार को कानून-निर्माण करना चाहिए तो केंद्रीय सरकार (संसद) उस विषय पर कानून बना सकती है। यह कानून एक वर्ष तक लागू रह सकता है। राज्यसभा इसी आशय का दोबारा प्रस्ताव पारित करके इसकी अंवधि में वृद्धि कर सकती है।

3. राज्यों के विधानमण्डलों की प्रार्थना पर – यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमण्डल यह प्रस्ताव पारित करें या याना करें कि राज्य सूची के अधीन किसी विषय पर संसद कानून बनाए तो संसद उस विषय पर भी कानून बनाती है।

4. विदेशी राज्यों से संधि के पालन करने के लिए – संविधान के अनुसार संसद को ही किसी संधि, समझौते या अन्य देशों के साथ होने वाले सभी प्रकार के समझौतों का पालन करवाने हेतु कानून बनाने का अधिकार है, भले ही वे विषय राज्य सूची के अंतर्गत आते हों।

5. राज्य में संवैधानिक व्यवस्था भंग होने पर – यदि किसी राज्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाए या इस राज्य का संवैधानिक तन्त्र विफल हो जाए तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत लगाए गए राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत राष्ट्रपति राज्य विधानमण्डल के समस्त अधिकार संसद को प्रदान कर सकता है।

6. राज्यपाल द्वारा विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना – राज्य के राज्यपाल को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राज्य व्यवस्थापिका द्वारा पारित किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए आरक्षित कर सकता है। राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह उस विधेयक को स्वीकार करे अथवा अस्वीकार करे। केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन होने पर भी विशेष स्थितियों में केंद्र को राज्यों के विषयों पर कानून-निर्माण के व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।

प्रश्न 4.
केन्द्र और राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्धों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

केन्द्र और राज्यों के प्रशासनिक सम्बन्ध

श्री दुर्गादास बसु के शब्दों में, “संघीय व्यवस्था की सफलता और दृढ़ता संघ की विविध सरकारों के बीच अधिकाधिक सहयोग तथा समन्वय पर निर्भर करती है। इसी कारण प्रशासनिक सम्बन्धों की व्यवस्था करते हुए जहाँ राज्यों को अपने-अपने क्षेत्रों में सामान्यतः स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है वहाँ इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि राज्यों के प्रशासनिक तन्त्र पर संघ का नियन्त्रण बना रहे और संघ तथा राज्यों के बीच संघर्ष की सम्भावना कम-से-कम हो जाए। राज्य सरकारों पर संघीय शासन के नियन्त्रण की व्यवस्था निम्नलिखित उपायों के आधार पर की गयी है –

(1) राज्य सरकारों को निर्देश – केन्द्र द्वारा राज्यों को निर्देश सामान्यतया संघीय व्यवस्था के अनुकूल नहीं समझे जाते हैं, लेकिन भारतीय संघ में केन्द्र द्वारा राज्य सरकारों को निर्देश देने की व्यवस्था की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 256 में स्पष्ट कहा गया है कि “प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार होगा कि संसद द्वारा निर्मित कानूनों का पालन सुनिश्चित रहे।

(2) राज्य सरकारों को संघीय कार्य सौंपना – संघीय सरकार राज्य सरकारों को कोई भी कार्य सौंप सकती है। यदि राज्यों की सरकार या उसके अधिकारी उसे पूरा न करें, तो राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह संकटकालीन स्थिति की घोषणा कर राज्य शासन अपने हाथ में ले ले।

(3) अखिल भारतीय सेवाएँ – संविधान संघ तथा राज्य सरकारों के लिए अलग-अलग सेवाओं की व्यवस्था करता है, लेकिन कुछ ऐसी सेवाओं की भी व्यवस्था करता है जो संघ तथा राज्य सरकारें दोनों के लिए सामान्य हैं। इन्हें अखिल भारतीय सेवाएँ कहते हैं और इन सेवाओं के अधिकारियों पर संघीय सरकार का विशेष नियन्त्रण रहता है।

(4) सहायता अनुदान – संघीय शासन द्वारा राज्यों को आवश्यकतानुसार सहायता अनुदान भी दिया जा सकता है। अनुदान देते समय संघ राज्यों पर कुछ शर्ते लगाकर उनके व्यय को भी नियन्त्रित कर सकता है।

(5) अन्तर्राज्यीय नदियों पर नियन्त्रण – संसद को अधिकार है कि वह विधि द्वारा किसी अन्तर्राज्यीय नदी अथवा इसके जल के प्रयोग, वितरण या नियन्त्रण के सम्बन्ध में व्यवस्था करे।

(6) अन्तर-राज्य परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना (जून 1990 ई०) – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 में एक ‘अन्तर-राज्य परिषद् की स्थापना का प्रावधान किया गया है और राजमन्नार आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग तथा सबसे अन्त में सरकारिया आयोग, जिसने नवम्बर, 1987 ई० में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की; इन सभी ने अपनी सिफारिशों में इस बात पर बल दिया कि अन्तर- राज्य परिषद् की स्थापना की जानी चाहिए, लेकिन व्यवहार में मई 1990 ई० तक अन्तर-राज्य परिषद् की स्थापना नहीं की गयी थी  इस परिषद् की स्थापना जून 1990 ई० में की गयी है। यह परिषद् संघीय व्यवस्था और केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के सुचारु संचालन हेतु एक विचार-मंच का कार्य करेगी। परिषद् के दिन प्रतिदिन के कार्य हेतु एक स्थायी सचिवालय की स्थापना की गयी है।

(7) संचार साधनों की रक्षा – समस्त भारतीय संघ के संचार साधनों की रक्षा का भार भी संघीय सरकार पर ही है। संघ सरकार राज्यों के अन्तर्गत हवाई अड्डों, रेलों तथा अन्य राष्ट्रीय महत्त्व के आवागमन और संचार साधनों की रक्षा के लिए राज्य सरकारों को आवश्यक आदेश दे सकती है जिनका पालन राज्य सरकारों के लिए आवश्यक है। इन आदेशों के पालन में राज्य सरकारों को जो अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, वह संघ सरकार राज्य सरकार को देगी।

(8) राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति – इस सबके अतिरिक्त राज्य सरकारों पर संघीय शासन के नियन्त्रण का एक प्रमुख उपाय यह है कि प्रधानमन्त्री के परामर्श से राष्ट्रपति राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति करता है जो वहाँ राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं।

(9) मुख्यमन्त्री तथा अन्य मन्त्रियों के विरुद्ध आरोपों की जाँच – यदि किसी राज्य में मुख्यमन्त्री या मन्त्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार या अन्य किसी प्रकार के आरोप लगाये जाते हैं तो इस प्रकार का आरोप-पत्र कार्यवाही के लिए राष्ट्रपति को भेज दिया जाता है और केन्द्रीय सरकार को ही इस बात के सम्बन्ध में निर्णय लेने का अधिकार है कि इन आरोपों की न्यायिक जाँच करवानी चाहिए अथवा नहीं। आरोप सिद्ध हो जाने पर केन्द्रीय सरकार सम्बन्धित मन्त्रियों को पद छोड़ने के लिए कह सकती है। पंजाब के मुख्यमन्त्री कैरो और ओडिशा के मुख्यमन्त्री वीरेन मित्रा को न्यायिक जाँच में दोषी पाये जाने पर ही त्याग-पत्र देना पड़ा था।

(10) राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करना – इन सबके अलावा संविधान के अनुच्छेद 356 में कहा गया है कि यदि किसी राज्य में संवैधानिक तन्त्र भंग हो जाता है तो राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर या अपने विवेक से राष्ट्रपति द्वारा उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। राज्य में संवैधानिक तन्त्र भंग हुआ है अथवा नहीं; इस सम्बन्ध में निर्णय लेने की शक्ति राष्ट्रपति अर्थात् केन्द्रीय शासन को ही प्राप्त है और राष्ट्रपति शासन की यह बड़ी छड़ी राज्यों को केन्द्र के सभी निर्देश मानने के लिए बाध्य करती है। इस प्रकार प्रशासनिक क्षेत्र में राज्यों पर भारत सरकार को प्रभावदायक नियन्त्रण है, लेकिन इनके साथ यह नहीं भुला देना चाहिए कि ये प्रावधान बहुत अधिक सावधानीपूर्वक और संकटकाल में ही उपयोग के लिए हैं। सामान्यतया राज्य को कानून निर्माण और प्रशासन के सम्बन्ध में अपने निश्चित क्षेत्र में पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त होगी।

प्रश्न 5.
केन्द्र और राज्यों के मध्य वित्तीय सम्बन्धों की परीक्षण कीजिए।
उत्तर :
वित्तीय क्षेत्र में संविधान के द्वारा संघ व राज्य सरकारों के क्षेत्र अलग-अलग कर दिये गये हैं। तथा दोनों ही सरकारें सामान्यतया अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करती हैं। इस सम्बन्ध में संविधान द्वारा की गयी व्यवस्था निम्न प्रकार है –

संघीय आय के साधन – संघीय सरकार को आय के अलग साधन प्राप्त हैं। इन साधनों में कृषि आय को छोड़कर अन्य आय पर कर, सीमा-शुल्क, निर्यात-शुल्क, उत्पादन-शुल्क, निगम कर, कम्पनियों के मूल धन पर कर, कृषि भूमि को छोड़कर अन्य सम्पत्ति शुल्क आदि प्रमुख हैं।

राज्यों की आय के साधन – वित्त के क्षेत्र में राज्य सरकार के आय के साधन भी अलग कर दिये गये हैं। उनमें भू-राजस्व, कृषि आयकर, कृषि भूमि का उत्तराधिकार शुल्क व सम्पत्ति शुल्क, मादक वस्तुओं पर उत्पादन कर, बिक्री कर, यात्री कर, मनोरंजन कर, दस्तावेज कर आदि प्रमुख हैं। (42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा रेडियो और टेलीविजन से प्रसारित विज्ञापनों पर कर राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में रख दिया गया है।)

व्यय की प्रमुख मदें – संघीय शासन की व्यय की मदें सेना, परराष्ट्र सम्बन्ध आदि हैं, जब कि राज्य शासन के व्यय की मुख्य मदें पुलिस, कारावास, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य आदि हैं।

राज्यों की वित्तीय सहायता – क्योंकि राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपर्युक्त साधन पर्याप्त नहीं समझे गये, इसलिए संघीय शासन द्वारा राज्यों को वित्तीय सहायता की व्यवस्था की गयी है, जो इस प्रकार है।

पहले प्रकार के कर ऐसे हैं जो केन्द्र द्वारा लगाये और वसूल किये जाते हैं, पर जिनकी सम्पूर्ण आय राज्यों में बाँट दी जाती है। इस प्रकार के करों में प्रमुख रूप से उत्तराधिकार कर, सम्पत्ति कर, समाचार-पत्र कर आदि आते हैं।

दूसरे प्रकार के वे कर हैं, जो केन्द्र निर्धारित करता, किन्तु राज्य एकत्रित करते और अपने उपयोग में लाते हैं। स्टाम्प शुल्क करं एक ऐसा ही कर है। केन्द्र शासित क्षेत्रों में इन करों की वसूली केन्द्रीय सरकार करती है।

तीसरे प्रकार के कर वे हैं जो केन्द्र द्वारा लगाये व वसूल किये जाते हैं, पर जिनकी शुद्ध आय संघ व राज्यों के बीच बाँट दी जाती है। कृषि आय के अतिरिक्त अन्य आय पर कर प्रमुख रूप से इसी प्रकार का कर है।

राज्यों को अनुदान – संविधान के अनुच्छेद 275 के अनुसार जिन राज्यों को संसद विधि द्वारा अनुदान देना निश्चित करे उन राज्यों को अनुदान दिया जाएगा। ये अनुदान पिछड़े हुए वर्गों को ऊँचा उठाने और अन्य विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए दिये जाएँगे।

सार्वजनिक ऋण प्राप्ति की व्यवस्था – संघीय सरकार अपनी संचित निधि की जमानत पर संसद की आज्ञानुसार ऋण ले सकती है। राज्यों की सरकारें भी विधानमण्डल द्वारा निर्धारित सीमा तक ऋण ले सकती हैं। संघीय सरकार विदेशों से भी ऋण ले सकती है, किन्तु राज्य सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं।

वित्त आयोग – संविधान के अनुच्छेद 280 में व्यवस्था में की गयी है कि प्रति 5 वर्ष बाद राष्ट्रपति एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा। इस आयोग के द्वारा संघ और राज्य सरकारों के बीच करों के वितरण, भारत की संचित निधि में से धन के व्यय तथा वित्तीय व्यवस्था से सम्बन्धित अन्य विषयों पर सिफारिश करने का कार्य किया जाएगा।

प्रश्न 6.
केंद्र तथा राज्य के मध्य तनाव के सांविधानिक कारण लिखिए।
उत्तर :

केन्द्र तथा राज्यों के मध्य तनाव के सांविधानिक कारण

समय-समय पर केन्द्र तथा राज्य सरकारों के मध्य उपस्थित होने वाले संघर्ष एवं तनावों के कारणों को निम्नलिखित वर्गों में रखा गया है –

(1) भारतीय संविधान में शक्तियों का वितरण केन्द्र के पक्ष में अधिक है। संघ सूची तथा समवर्ती सूची में केन्द्रीय कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका को इतने अधिकार प्रदान किए गए हैं कि राज्यों की स्वायत्तता पर आँच आ सकती है। 1970 में तमिलनाडु सरकार द्वारा नियुक्त राजमन्नार समिति ने सिफारिश की थी कि –

  1. संघ सूची तथा समवर्ती सूची में से कुछ शक्तियाँ निकालकर राज्य सूची में डाल देनी चाहिए।
  2. वित्त आयोग को एक अस्थायी अधिकरण बना देना चाहिए, एवं
  3. केन्द्रीय राजस्व स्रोतों को हटाकर राज्यों को हस्तान्तरित कर देना चाहिए जिससे केन्द्र पर राज्यों की वित्तीय निर्भरता कम हो।

(2) राज्य सदैव यह अनुभव करते हैं कि उनकी विधायी तथा प्रशासनिक शक्तियाँ सीमित हैं तथा उन्हें अपने निर्णयों के कार्यान्वयन में केन्द्र के निर्णय का इन्तजार करना पड़ता है। जब केन्द्र तथा राज्य में एक ही दल की सरकार रहती है तब तो समस्या प्रबल नहीं हो पाती है, किन्तु विपरीत स्थिति में तनाव प्रायः बढ़ जाता है। उदाहरणार्थ-1967 के पश्चात् राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं तो शक्तियों के पुनः वितरण की आवाज विशेष रूप से उठाई गई।

(3) राज्यपाल केन्द्र द्वारा नियुक्त ऐसे शक्तिशाली अभिकरण हैं जो राज्यों में केन्द्र का वर्चस्व रखने में सहयोग देते हैं। संविधान उन्हें अधिकार देता है कि समवर्ती सूची में संबंधित विधेयकों को वे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए सुरक्षित रखें तथा केन्द्रीय सरकार को यह अवसर प्रदान करें कि वह राष्ट्रपति द्वारा राज्यों द्वारा पारित विधेयक अथवा विधेयकों को अस्वीकृत करा दे। केरल के राज्यपाल ने ई०एम०एस० नम्बूदरीपाद के नेतृत्व वाली साम्यवादी सरकार का प्रगतिशील भूमि सुधार विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के लिए सुरक्षित रख लिया था। इसके पश्चात् केन्द्रीय सरकार ने इस विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत करा दिया। गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारें राज्यपालों की भूमिका से सशंकित रहती हैं। आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन०टी० रामाराव ने तो उन्हें केन्द्रीय जासूस’ तक की संज्ञा दे दी थी। अनेक अवसरों पर गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा राज्यपाल पद को ही समाप्त करने की माँग की गई है। राज्यपाल पद ने केन्द्र-राज्य संबंधों में तनाव तथा संघर्ष की स्थिति उत्पन्न की है।

(4) आपातकालीन उपबन्धों ने संविधान को एकात्मक स्वरूप प्रदान कर दिया है तथा आपातकाल के समय राज्य सम्पूर्णत: केन्द्र निर्देशित इकाइयाँ बन जाते हैं। यह स्थिति कुछ राज्य सरकारों हेतु बहुत अप्रिय रही है। तनाव के सांविधानिक कारणों का अध्ययन करने पर यह लक्ष्य सामने आती है। राज्य चाहते हैं कि उन्हें अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाए तथा उन पर केन्द्र का अंकुश न रहे।

प्रश्न 7.
अनुच्छेद 370 के सन्दर्भ में बताइए कि जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति भारतीय संघ के अन्य राज्यों से किस प्रकार भिन्न है?
या
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 पर अपने विचार लिखिए।
या
भारतीय संविधान की धारा 370 के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को दी गयी किन्हीं दो सुविधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति भारतीय संघ के अन्य राज्यों से भिन्न है –

(1) भारतीय संघ के अन्य किसी भी राज्य का अपना संविधान नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना संविधान है जो 26 नवम्बर, 1957 ई० में लागू हुआ था तथा जम्मू-कश्मीर राज्य का प्रशासन इस संविधान के उपबन्धों के अनुसार चलता है।

(2) भारतीय संविधान द्वारा संघ और राज्यों के बीच जो शक्ति-विभाजन किया गया है, उसके अन्तर्गत अवशेष शक्तियाँ संघीय सरकार को सौंपी गयी हैं और अवशेष विषयों के सम्बन्ध में कानून- निर्माण का अधिकार संघीय संसद को प्राप्त है, लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य इस सम्बन्ध में अपवाद है। अनुच्छेद 370 में व्यवस्था की गयी है कि जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में अवशेष शक्तियाँ जम्मू-कश्मीर राज्य के पास ही रहेंगी।

(3) इस राज्य के लिए विधि बनाने की संघीय संसद की शक्ति संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी, जिनको जम्मू-कश्मीर राज्य की सरकार के साथ परामर्श करके उन विषयों के ‘तत्स्थानी विषय’ (Correspond to matters) घोषित कर दें, जिनके सम्बन्ध में ‘अधिमिलन-पत्र’ में भारतीय संसद को अधिकार दिया गया है।

(4) संसद संघ सूची और समवर्ती सूची के अन्य विषयों पर विधि राज्य सरकार की सहमति से ही बना सकेगी।

(5) संविधान के आपातकालीन प्रावधानों के सम्बन्ध में भी जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रसंग में विशेष व्यवस्था है। अनुच्छेद 352, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय संकट की घोषणा करने का अधिकार प्राप्त है, जम्मू-कश्मीर राज्य में एक सीमा तक ही और जम्मू-कश्मीर राज्य की सहमति से ही लागू हो सकता है। अनुच्छेद 360, जो राष्ट्रपति को वित्तीय संकट घोषित करने का अधिकार देता है, जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होता। अनुच्छेद 356 के उपबन्ध अर्थात् राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू होगी।

(6) भारत के नागरिक स्वत: ही जम्मू-कश्मीर के नागरिक नहीं बन जाते, उन्हें जम्मू-कश्मीर राज्य में बसने का भी कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है। भारत संघ के अन्य राज्यों के निवासियों को जम्मू-कश्मीर राज्य में भूमि अथवा अन्य कोई चल सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकार भी नहीं है। अनुच्छेद 370 के कारण ही केन्द्र के अनेक लाभकारी और प्रगतिशील कानून; जैसे-सम्पत्ति कर, शहरी भूमि सीमा कानून और उपहार कर, इत्यादि यहाँ लागू नहीं हो सकते।

(7) राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों से सम्बन्धित संविधान के भाग 4 के उपबन्ध जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होते हैं।

(8) संसद जम्मू-कश्मीर राज्य के विधानमण्डल की सहमति के बिना उस राज्य के नाम, क्षेत्र या सीमाओं में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती।

(9) अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान में किये गये संशोधन जम्मू-कश्मीर राज्य में तब तक लागू नहीं होंगे, जब तक कि राष्ट्रपति आदेश द्वारा उसे जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं कर दें।

जम्मू – कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में धारा 370 की आलोचना अथवा विवाद

जम्मू – कश्मीर राज्य को भारतीय संघ में यह विशेष स्थिति तत्कालीन विशेष परिस्थितियों के कारण प्रदान की गयी थी। जम्मू-कश्मीर राज्य को प्राप्त यह विशेष स्थिति संविधान का अस्थायी या संक्रमणकालीन प्रावधान ही है और इस कारण यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर राज्य को सदैव ही यह विशेष स्थिति प्राप्त रहेगी। वर्तमान समय में भारत की एकता और अखण्डता के प्रबल समर्थकों और भारतीय राजनीति के एक प्रमुख दल भाजपा द्वारा यह कहा जाता है कि जम्मू-कश्मीर में आज आतंकवाद और अलगाववाद की जो स्थिति समय-समय पर खड़ी हो जाती है उसका मूल कारण अनुच्छेद 370 या भारतीय संघ के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्थिति है तथा अलगाववाद की इस स्थिति को समाप्त करने हेतु अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर राज्य के भूतपूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अपनी पुस्तक ‘कश्मीर : समस्या और विश्लेषण’ में पूरे विस्तार के साथ विचार व्यक्त किया है कि “अनुच्छेद 370 विविध निहित स्वार्थों के हाथों शोषण का साधन बन गया है। इस अनुच्छेद के कारण एक दुष्चक्र स्थापित हो गया है जो अलगाववादी शक्तियों को जन्म देता है और ये शक्तियाँ बदले में अनुच्छेद 370 को मजबूत बनाती हैं।” जगमोहन के इस विश्लेषण में तार्किकता और सत्य का अंश है। यह तथ्य है कि अनुच्छेद 370 के कारण अलगाववादी तत्त्वों ने अपनी शक्ति में वृद्धि की है तथा यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर राज्य के आर्थिक विकास में भी एक प्रमुख बाधक तत्त्व रहा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी तथ्य है कि जम्मू-कश्मीर राज्य में आज आतंकवाद और अलगाववाद की जो स्थिति है, अनुच्छेद 370 उसका मूल कारण नहीं है। आज की परिस्थितियों में अटल बिहारी वाजपेयी का यह कथन अधिक सत्य है। कि “मेरा मानना यह है कि केवल धारा 370 हटाने से ही कश्मीर-समस्या हल नहीं हो सकती।” राजनीतिक दलों के आपसी मतभेदों के कारण ही सरकार ने अनुच्छेद 370 को अब स्थायी कर दिया है। 27 जून, 2000 ई० को जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने तीन-चौथाई बहुमत से स्वायत्तता प्रस्ताव पारित किया जिसे स्वीकार करना सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का यह निश्चित रूप से उपयुक्त समय नहीं है। यदि आज अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का प्रयत्न किया जाए, तो वह जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति को अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकता है। निष्कर्षतः । भविष्य में अनुच्छेद 370 को समाप्त किया जा सकता है और किया जाना चाहिए, लेकिन आज इस कार्य के लिए उपयुक्त समय नहीं है।

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