UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name कुहासा और किरण
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर)

प्रश्न 1
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु (कथानक, सारांश) पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रथम अंक की कथावस्तु लिखिए। [2012,13,14,15, 16, 17, 18]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सारांश लिखिए। [2011, 12, 14, 15, 16, 17]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के तृतीय अंक की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए। [2011, 12, 15, 16, 17]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के अन्तिम अंक की कथावस्तु लिखिए। [2016, 17]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक का कथानक समस्यामूलक है, जो स्वाधीन भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित है। कथावस्तु के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक का सारांश लिखिए। [2010, 11, 12, 13, 14]
या
‘कुहासा और किरण’ का कथासार अपने शब्दों में लिखिए। [2017]
उत्तर

‘कुहासा और किरण’ का सारांश

विष्णु प्रभाकर जी का ‘कुहासा और किरण’; राजनीतिक वातावरण पर आधारित नाटक है। नाटक की पृष्ठभूमि में स्वतन्त्रता-प्राप्ति से 15 वर्ष पूर्व की कथा छिपी है।

मुलतान में चन्द्रशेखर, राजेन्द्र, चन्दर, हाशमी तथा कृष्णदेव नाम के देशभक्तों ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति की योजना बनायी। अंग्रेज सरकार इन लोगों के षड्यन्त्र से बौखला गयी। इसी समय कृष्णदेव सरकार का मुखबिर बन गया। इस कारण शेष चार साथियों को कठोर कारावास मिला। सन् 1946 ई० में ये लोग जेल से मुक्त हुए। हाशमी और चन्दर निर्धनता के कारण समाप्त हो गये। राजेन्द्र ने नौकरी की, परन्तु उसका शरीर कार्य करने में सक्षम न था। चन्द्रशेखर तपेदिक रोग से पीड़ित हो गया और उसकी पत्नी मालती बेसहारा हो गयी। सन् 1947 ई० में देश स्वतन्त्र हुआ। सन् 1942 ई० का धोखेबाज मुखबिर कृष्णदेव अब देशभक्त नेता बन गया। उसने अपना नाम कृष्ण चैतन्य रख लिया। नाटक के सारांश को तीन अंकों में प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रथम अंक-नाटक का प्रारम्भ नेताजी कृष्ण चैतन्य के निवास पर उनकी षष्ठिपूर्ति के अवसर पर उनकी सेक्रेटरी सुनन्दा और अमूल्य के वार्तालाप से होता है। उन्होंने इस अवसर पर नेताजी को बधाई दी। अन्य लोग भी उन्हें बधाई देने के लिए पहुँचे। अब कृष्ण चैतन्य सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में 250 रुपये प्रति माह राजनीतिक पेंशन पाते हैं। वे प्रत्येक प्रकार के गैर-कानूनी कार्य करते हैं। उन्होंने सुनन्दा नामक लड़की को अपनी व्यक्तिगत सचिव नियुक्त किया और उसके माध्यम से ब्लैकमेल जैसे घृणित कार्य भी किये। कृष्ण चैतन्य के ये कार्य उसकी पत्नी गायत्री को नहीं सुहाते थे। देशभक्त राजेन्द्र के पुत्र अमूल्य के नौकरी की तलाश में कृष्ण चैतन्य के पास आने पर वे उसे विपिन बिहारी के यहाँ सम्पादक की नौकरी दिला देते हैं। अमूल्य के रिश्ते की एक बहन प्रभा; चैतन्य के यहाँ आती-जाती है।

चन्द्रशेखर की विक्षिप्त पत्नी मालती; कृष्ण चैतन्य से राजनीतिक पेंशन दिलाने का आग्रह करने हेतु उसके पास आती है और उसको पहचान लेती है। वहाँ उपस्थित अमूल्य को भी उसकी असली स्थिति का आभास हो जाता है।

द्वितीय अंक-द्वितीय अंक का प्रारम्भ विपिन बिहारी के निजी कक्ष से होता है। पाँच-पाँच पत्रिकाओं के मुख्य अधिकारी विपिन बिहारी अपने कक्ष में बैठे हैं। अमूल्य के आवेदन-पत्र को पढ़कर विपिन बिहारी उसके पिता के विषय में पूछते हैं। अमूल्य ने मुलताने षड्यन्त्र केस के विषय में विपिन बिहारी को बताया। सुनन्दा ने विपिन बिहारी से कहा कि कृष्ण चैतन्य कांग्रेस का मुखौटा लगाये एक देशद्रोही है, किन्तु विपिन बिहारी किसी भी कीमत पर कृष्ण चैतन्य का विरोध करने का साहस नहीं कर पाता। सभी को यह पता चल जाता है कि आज का महान् कांग्रेसी नेता कृष्ण चैतन्य देशद्रोही व मित्रघाती-मुखबिर कृष्णदेव है।

अपनी वास्तविकता को प्रकट हुआ देख कृष्ण चैतन्य, अमूल्य को फँसाने का प्रयास करता है। यातनाओं के कारण अमूल्य आत्महत्या करने का भी प्रयास करता है, परन्तु पुलिस उसको बचाकर अस्पताल ले जाती है। कृष्ण चैतन्य की पत्नी गायत्री को यह सब जानकर बहुत ग्लानि होती है और वह अपने पति को सभी बुरे कार्य छोड़ने का परामर्श देती है। गायत्री की कार एक ट्रक के साथ टकरा जाती है। और गायत्री का देहान्त हो जाता है। पत्नी की मृत्यु के बाद चैतन्य को आत्मग्लानि होती है। यहीं पर दूसरा अंक समाप्त हो जाता है।

तृतीय अंक-यह अंक कृष्ण चैतन्य के निवास से आरम्भ होता है। कृष्ण चैतन्य अपनी पत्नी गायत्री के चित्र के सम्मुख बैठकर अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं तथा गायत्री के बलिदान की महत्ता को स्वीकार करते हैं। सभी लोग शंकित हैं कि यह मामला गायत्री की मृत्यु का नहीं वरन् आत्महत्या का है।

सुनन्दा द्वारा दी गयी सूचना पर वहाँ गुप्तचर विभाग के अधिकारी आ जाते हैं। सुनन्दा अमूल्य का परिचय देते हुए उसे निर्दोष बताती है। कृष्ण चैतन्य भी कागज-चोरी की कहानी को मनगढ़न्त बताते हैं। वे विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र के कुकृत्यों का भी पर्दाफाश कर देते हैं। तभी मालती अपनी पेंशन के लिए उनके पास पहुँच जाती है। कृष्ण चैतन्य उससे क्षमा याचना करते हुए उसे अपना सर्वस्व सौंप देते हैं। विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र को बन्दी बना लिया जाता है। गुप्तचर अधिकारी कृष्ण चैतन्य को भी साथ चलने के लिए कहते हैं। वे अपनी पत्नी के चित्र को प्रणाम करके उनके साथ चल देते हैं। अमूल्य को निर्दोष सिद्ध होने पर छोड़ दिया जाता है। उसके बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता’-इस कथन के साथ ही नाटक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 2
‘कुहासा और किरण’ नाटक के उस पुरुष-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो। [2012]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्र (नायक) अमूल्य का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2016]
उत्तर

अमूल्य का चरित्र-चित्रण

अमूल्य; श्री विष्णु प्रभाकर कृत ‘कुहासों और किरण’ नाटक का नायक तथा देशभक्त राजेन्द्र का पुत्र है। अमूल्य ऐसे नवयुवकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो देश के भ्रष्ट वातावरण में भी ईमानदारी का जीवन जीना चाहते हैं तथा जिन्हें देश से प्रेम है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) देशभक्त युवक–अमूल्य का पिता सच्चा देशभक्त था। पिता के गुण अमूल्य में भी विद्यमान हैं। वह देश को व्यक्ति से अधिक मूल्यवान मानता है। उसका कथन है-“हमारे लिए देश सबसे ऊपर है। देश की स्वतन्त्रता हमने प्राणों की बलि देकर पायी थी, उसे अब कलंकित न होने देंगे।”
(2) कर्तव्यपरायण–अमूल्य अपने सभी कर्तव्यों के प्रति जागरूक है। पिता की असमय मृत्यु के पश्चात् भी परिश्रम के बल पर वह अपना अध्ययन पूरा करता है। वह जिस कार्य पर भी लगता है, उसे पूर्ण लगन के साथ पूरा करता है।
(3) सत्यवादी–अमूल्य सत्यवादी है। कृष्ण चैतन्य जैसे व्यक्ति के सम्पर्क में आकर भी वह अपनी ईमानदारी और सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ता। षड्यन्त्र में फंसने पर भी वह दृढ़ रहता है और कहता है— ‘चलिए, कहीं भी चलिए। मुझे जो कहना है, वह कहूँगा।”
(4) निर्भीक तथा साहसी–अमूल्य साहसी युवक है। वह पुलिस इंस्पेक्टर से नहीं डरता और विपिन बिहारी को सबके सामने बेईमान कहता है। पुलिस इंस्पेक्टर के सामने वह साहसपूर्वक कहता है-”यह षड्यन्त्र है …….:” आप सदा ब्लैक से कागज बेचते हैं और मुझे फंसाना चाहते हैं। ……….. आप सब नीच हैं ……….. आप देशभक्त की पोशाक पहने देशद्रोही हैं, भेड़िये हैं।”
(5) आदर्श मार्गदर्शक-अमूल्य आधुनिक युवकों के लिए एक आदर्श मार्गदर्शक है। वह भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्तियों के मुखौटे उतारने का संकल्प लेता है। देशसेवा के प्रति अमूल्य के शब्दों को देखिए-“अब आवश्यकता है कि हम देशसेवा का अर्थ समझें। जो शैतान मुखौटे लगाए शिव बनकर घूम रहे हैं, उनके वे मुखौटे उतारकर उनकी वास्तविकता प्रकट करें।”
(6) सरल स्वभाव वाला—अमूल्य सरल स्वभाव वाला स्वामिभक्त युवक है। सुनन्दा उसके सरल स्वभाव को देखकर ही कहती है—“पिताजी की बात अभी रहने दो। देखा नहीं था तुमने ? उनका नाम सुनकर सब चौंक पड़े थे। उनसे पिताजी की बात मत कहना अभी।”

इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ नाटक का सबसे अनमोल चरित्र अमूल्य का है। वह नाटक का नायक भी है। वह भ्रष्टाचार तथा निराशापूर्ण कुहासे को भेदकर कर्तव्यनिष्ठा, दृढ़ता, सत्यता, देशभक्ति तथा निर्भीकता की स्वर्णिम प्रकाश किरणों से समाज को आलोकित करना चाहता है। अमूल्य ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्श का प्रतीक है।

प्रश्न 3
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2012, 13, 14, 17, 18]
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर कृष्ण चैतन्य की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2010, 14, 16, 18]
उत्तर

कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण

‘कुहासा और किरण’ नाटक में कृष्ण चैतन्य’ का चरित्र अवसरवादी, स्वार्थी तथा सभी प्रकार से भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह नाटक का खलनायक है। आज कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक नेता अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु; समाज और देश को खोखला करने में लगे हैं। कृष्ण चैतन्य के चरित्र से सम्बद्ध धनात्मक और ऋणात्मक विशिष्टताओं की विवेचना निम्नलिखित है|

(1) अवसरवादी–कृष्ण चैतन्य पक्का अवसरवादी है। वह पहले अंग्रेजों का दलाल बना रहता है, फिर कांग्रेसी नेता बन जाता है।
(2) मित्रघाती-वह अपने साथियों की मुखबिरी करके उन्हें पकड़वा देता है। इस प्रकार मित्रघाती होने का भी वह दोषी है, यद्यपि वह इस कलंक को छिपाने की भरसक चेष्टा करता है।
(3) चतुर-चालाक–कृष्ण चैतन्य चतुर तथा चालाक है। उसका मत है कि–“कुछ करने से पहले सौ बार सोच लेना बुद्धिमानी का लक्षण है।”
(4) भ्रष्टाचार का प्रतीक-कृष्ण चैतन्य सभी प्रकार के गलत हथकण्डों में माहिर है। वह ब्लैकमेल करता है, रिश्वत लेता है। इसी प्रकार की दूसरी अनेक बुराइयाँ; जैसे क्रूरता, कठोरता और धनलिप्सा का आधिक्य भी उसमें विद्यमान है।
(5) देशद्रोही-‘मुलताने षड्यन्त्र’ की मुखबिरी करके वह देशद्रोही बनता है। इसके उपरान्त भी वह समाज तथा देश के साथ गद्दारी करता ही रहता है।
(6) कृत्रिमता तथा आडम्बर से परिपूर्ण-कृष्ण चैतन्य का जीवन कृत्रिमता तथा आडम्बर से पूर्ण है। वह मुलतान केस में अंग्रेजों को मुखबिर बनकर देश के साथ गद्दारी करता है, किन्तु देश और समाज की सेवा का ढोंग रचता है, जिससे वह शासन और जनता दोनों की आँखों में धूल झोंकता रहता है।
(7) प्रभावशाली व्यक्तित्व-कृष्ण चैतन्य का व्यक्तित्व प्रभावशाली है। उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ही सरकार व प्रशासन पर उसका पर्याप्त प्रभाव है।
(8) दूरदर्शी-कृष्ण चैतन्य दूरदर्शी व्यक्ति है। अपनी दूरदर्शिता के कारण ही वह अपने वास्तविक नाम ‘कृष्णदेव’ को बदलकर ‘कृष्ण चैतन्य’ रख लेता है। विपिन बिहारी के यहाँ अमूल्य की नियुक्ति उसकी दूरदर्शिता का ही परिचायक है।
(9) आत्मपरिष्कार की भावना–गायत्री का बलिदान कृष्ण चैतन्य में प्रायश्चित्त का भाव उत्पन्न करता है। वह गायत्री के चित्र के सम्मुख पश्चात्ताप करते हुए कहता है-”मेरी आँखें खोलने के लिए तुमने प्राण दे दिये।”
(10) कूटनीतिज्ञ-कृष्ण चैतन्य एक प्रतिभाशाली और कूटनीतिज्ञ पात्र है। यह ठीक है कि वह अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग करता है, जिसके कारण उसका चरित्र घृणित हो जाता है, परन्तु यदि उसकी प्रतिभा का सदुपयोग होता तो वह एक श्रेष्ठ पुरुष बन सकता था।

इस प्रकार कृष्ण चैतन्य के चरित्र में अनेकानेक दोष हैं। अन्त में वह अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित्त करते हुए कहता है–‘चलिए टमटा साहब, मैंने देश के साथ जो गद्दारी की है, उसकी सजा मुझे मिलनी चाहिए।” इस प्रकार अन्त में अपने दोषों के परिष्कार के प्रयास से वह पाठकों की सहानुभूति का पात्र बन जाता है।

प्रश्न 4
सुनन्दा के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। [2009, 11, 12, 13, 14]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 16, 17]
या
‘कुहासा और किरण’ की नायिका के चरित्र की विशेषताएँ उदघाटित कीजिए। [2013]
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर ‘सुनन्दा’ को चरित्रांकन (चरित्र-चित्रण) कीजिए। [2015, 16, 17, 18]
उत्तर
सुनन्दा का चरित्र-चित्रण श्री विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘कुहासा और किरण’ नाटक की सुनन्दा प्रमुख नारी-पात्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं
(1) भ्रष्टाचार की विरोधी नवयुवतियों की प्रतिनिधि–वह उन नवयुवतियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो जागरूक एवं सजग हैं। सुनन्दा दूरदर्शी, साहसी, चतुर, विनोदी, कर्तव्यपरायणा एवं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध एक सहयोगी तथा कर्मशीला नवयुवती है। उसे अमूल्य से सहानुभूति है तथा वह समाज के पाखण्डियों के रहस्य खोलने में अन्त तक अमूल्य का साथ देती है। मुखौटाधारी भ्रष्टाचारियों से वह कहती है-“मैं पुकार-पुकार कर कहूंगी कि आप सब भ्रष्ट हैं, नीच हैं, देशद्रोही हैं। आज नहीं तो कल आपको समाज के सामने जवाब देना होगा।”

(2) जागरूक नवयुवती–सुनन्दा, कृष्ण चेतन्य की सेक्रेटरी है। उसकी आयु 25 वर्ष है। वह जागरूक नवयुवती है और समाचार-पत्रों के महत्त्व तथा उसमें निहित शक्ति को पहचानती है। उसी के शब्दों में– ‘शक्ति-संचालन का सूत्र जितना समाचार-पत्रों के हाथ में है, उतना और किसी के नहीं।”

(3) वाक्पटु–सुनन्दा की वाक्पटुता देखते ही बनती है। वह उमेशचन्द्र और कृष्ण चैतन्य की मिली- भगत से परिचित है। उसकी व्यंग्यपूर्ण वाक्पटुता देखिए–“आकाश जैसे पृथ्वी को आवृत्त किये है, वैसे ही आप उनको (कृष्ण चैतन्य को) आवृत्त किये हैं। आकाश के कारण ही पृथ्वी अन्नपूर्णा होती है।”

(4) देशद्रोहियों की प्रबल विरोधी-स्वच्छ मुखौटाधारी देशद्रोहियों को सुनन्दा प्रबल विरोध करती है। वह विपिन बिहारी को भी खरी-खोटी सुनाती है। वह उससे कृष्ण चैतन्य के विषय में स्पष्ट कहती है—“क्या आपको अब भी पता नहीं कि कृष्ण चैतन्य वह नहीं हैं जो दिखाई देते हैं। वह मुखौटा लगाये एक देशद्रोही हैं।”

(5) मुखौटाधारियों की विरोधिनी–अवसर आने पर सुनन्दा मुखौटाधारियों का प्रबल विरोध करती है। यहाँ तक कि वह चाहती है कि गायत्री द्वारा लिखा गया पत्र पुलिस के हवाले कर दिया जाए, क्योंकि पत्र पुलिस के हाथ में पहुँचने पर कृष्ण चैतन्य की परेशानी बढ़ सकती थी। वह उमेशचन्द्र अग्रवाल को लक्ष्य कर कहती है—“मुझे घिनौने चेहरों से सख्त नफरत है। गायत्री माँ के बलिदान के पीछे जो उदात्त भावना है, वह जनता तक पहुँचनी ही चाहिए।”

(6) सहृदयी-सुनन्दा के हृदय में अमूल्य के प्रति सहानुभूति है। वह उसकी विवशता को समझती है। जब अमूल्य झूठी चोरी के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है, तब वह अन्याय से जूझने के लिए तत्पर हो जाती है। | इस प्रकार सुनन्दा एक प्रगतिशील, व्यवहारकुशल व स्वदेश-प्रेमी नवयुवती के रूप में पाठकों पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ती है।

प्रश्न 5.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर अमूल्य और कृष्ण चैतन्य के चरित्रों की तुलना कीजिए।
उत्तर

अमूल्य और कृष्ण चैतन्य के चरित्रों की तुलना

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण img 1
[संकेत–उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत इस प्रश्न का विस्तार कीजिए। विस्तार के लिए प्रश्न संख्या 2 और 3 देखिए।]

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 पञ्चशील-सिद्धान्ताः

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 पञ्चशील-सिद्धान्ताः are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 पञ्चशील-सिद्धान्ताः.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name पञ्चशील-सिद्धान्ताः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 पञ्चशील-सिद्धान्ताः

अवतरणों का सन्दर्भ अनुवाद

(1) पञ्चशीलमिति …………………………………………………. गृहीतवन्तः ।
बौद्धयुगे इमे सिद्धान्ताः …………………………………………………… स्वरूपं गृहीतवन्तः । [2014, 16, 18]
बौद्धयुगे इमे सिद्धान्ताः ………………………………………………………… एवाभवत् ।
बौद्धयुगे: ……………………………………………………… निष्ठावन्तौ । [2010]
परमद्य इमे …………………………………………………. बौद्धधर्मे निष्ठावन्तौ ।

[ शास्ति स्म = उपदेश दिया था। अस्तेयम् = चोरी न करना। अप्रमादः = असावधान न होना।
गृहीतवन्तः = ग्रहण किया। ]
सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यखण्ड हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘पञ्चशील-सिद्धान्ताः’ नामक पाठ से उधृत है।
अनुवाद-पंचशील शिष्टाचार-सम्बन्धी सिद्धान्त हैं। महात्मा गौतम बुद्ध ने इन पाँच सिद्धान्तों का पंचशील के नाम से अपने शिष्यों को उपदेश दिया था। इसलिए यह शब्द अब भी वैसा ही स्वीकृत है। ये सिद्धान्त क्रमश: इस प्रकार हैं–

  1. अहिंसा,
  2. सत्य,
  3. स्तेय (चोरी न करना),
  4. अप्रमाद (प्रमाद न करना) तथा
  5. ब्रह्मचर्य।

बौद्ध-युग में ये सिद्धान्त व्यक्तिगत जीवन की उन्नति के लिए प्रयुक्त थे, किन्तु आजकल ये सिद्धान्त राष्ट्रों की पारस्परिक मैत्री एवं सहयोग के आधार (तथा) विश्व-बन्धुत्व और विश्व-शान्ति के साधन हैं। राष्ट्रनायक श्री जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमन्त्रित्व-काल में चीन के साथ भारत की मैत्री पंचशील सिद्धान्तों के आधार पर ही हुई थी, क्योंकि दोनों ही देश बौद्ध धर्म में आस्था रखते थे। आधुनिक विश्व में पंचशील सिद्धान्तों ने नया राजनीतिक स्वरूप ग्रहण किया है।

(2) एवं च व्यवस्थिताः ……………………………………………..दृढीकुर्वन्ति ।

[ व्यवस्थिताः = निश्चित किये गये हैं। व्याघातं = बाधा, हस्तक्षेप। नाक्र्स्यते (न + आक्रुस्यते) =
आक्रमण नहीं करेगा।]
सन्दर्भ-पूर्ववत्।। अनुवाद-वे इस प्रकार निश्चित (किये गये) हैं-

  1. कोई राष्ट्र किसी भी अन्य राष्ट्र के आन्तरिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  2. प्रत्येक राष्ट्र परस्पर प्रभुसत्ता और प्रादेशिक अखण्डता का सम्मान करेगा।
  3. प्रत्येक राष्ट्र परस्पर समानता का व्यवहार करेगा।
  4. कोई भी राष्ट्र दूसरे (राष्ट्र) पर आक्रमण नहीं करेगा।
  5. सारे ही राष्ट्र परस्पर मिलकर अपनी-अपनी प्रभुसत्ता की शान्तिपूर्वक रक्षा करेंगे। विश्व में जो राष्ट्र शान्ति चाहते हैं, वे इन नियमों को स्वीकार कर दूसरे राष्ट्र के साथ अपने मैत्रीभाव को दृढ़ करते हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 पञ्चशील-सिद्धान्ताः help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 पञ्चशील-सिद्धान्ताः, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races (मानव प्रजातियाँ) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races (मानव प्रजातियाँ).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 6
Chapter Name Human Races (मानव प्रजातियाँ)
Number of Questions Solved 20
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races (मानव प्रजातियाँ)

विस्तृ त उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रजाति का क्या अर्थ है? विश्व की मानव-जातियों का वर्गीकरण बताइए। (2016)
या
विश्व की प्रमुख प्रजातियों पर टिप्पणी लिखिए।
या
टेलर द्वारा किये गये प्रजाति वर्गीकरण की विवेचना कीजिए।
या
मानव-प्रजातियों पर टिप्पणी लिखिए।
या
मानव-प्रजातियों की विशेषताओं और उनके विश्व-वितरण का वर्णन कीजिए। (2007)
या
‘मानव-प्रजाति’ से आप क्या समझते हैं? विश्व में मानव-प्रजातियों के वर्गीकरण के किन्हीं दो आधारों का उल्लेख कीजिए। (2008, 14, 16)
या
पृथ्वी के धरातल पर मानव प्रजातियों के वितरण का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर

प्रजाति का अर्थ
Meaning of Race

प्रजाति एक जैविक विचार है जिसका अभिप्राय उस मानव वर्ग से है जो वंशानुक्रम द्वारा शारीरिक लक्षणों में समानता रखता हो। यह एक नस्ल है या जन्मजात सम्बन्धों का मानव-वर्ग है। मानव-जाति के कई वर्ग होते हैं जिनकी भिन्नता का आधार शारीरिक बनावट के विभिन्न लक्षण होते हैं। मानव-जाति एक प्राकृतिक नस्ल है। किसी भी मानव-जाति के शारीरिक लक्षण वंशानुक्रम द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे भविष्य में जारी रहते हैं। इस प्रकार शारीरिक लक्षणों के आधार पर विशिष्ट मानव-समूह को प्रजाति कहा जाता है। विभिन्न विद्वानों ने प्रजाति को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनके विचार निम्नलिखित हैं –

“मानव-प्रजाति नस्ल (Breed) को प्रकट करती है, न कि सभ्यता (Culture) को।” – ग्रिफिथ टेलर
“मानव-जाति का वर्गीकरण मानव-शरीर की आकृति और शारीरिक लक्षणों के आधार पर होता है।” – विडाल-डि-लों ब्लॉश
मानव-जाति एक जैविक नस्ल है जिसके प्राकृतिक लक्षणों का योग दूसरी जाति के प्राकृतिक लक्षणों के योग से भिन्न हो। ये प्राकृतिक लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक वैसे ही चलते रहते हैं।’ –हैडन
“प्रजाति एक प्रमाणित प्राणिशास्त्रीय संकल्पना है। यह एक समूह है जो वंशानुक्रमण, वंश या प्रजातीय गुण अथवा उपसमूह द्वारा जुड़ा है। यह सामाजिक-सांस्कृतिक संकल्पना नहीं है।”- क्रोबर
“एक प्रजाति मनुष्यों को उपविभाग है जिसमें कुछ भौतिक लक्षणों की पैतृक देन रहती है।” – गोल्डन वीजर

इस प्रकार प्रजाति का अर्थ मानव-वर्ग से है। जिस वर्ग के सभी मानवों की शारीरिक रचना के बाह्य लक्षण; जैसे शरीर का कद, त्वचा का रंग, सिर की लम्बाई-चौड़ाई, बालों की आकृति, आँखों की आकृति तथा रंग, होंठों की बनावट, नाक को चपटापन या नुकीलापने आदि; एकजैसे हों तथा उनका रक्त भी एक ही वर्ग का हो, प्रजाति कहलाती है। समान प्रकार के शारीरिक लक्षणों और रक्त-गुणों वाले मानव-वर्ग की आने वाली सन्तानों में भी वैसे ही शारीरिक लक्षण और रक्त-गुण भी बहुत-सी पीढ़ियों तक चलते रहते हैं। जो विशेषताएँ शरीर के जिन अंगों द्वारा आगे चलती हैं उनको ‘जीन्स’ (Genes) कहते हैं। इन्हीं जीन्स के कारण मानव के शरीर और मस्तिष्क निर्मित होते हैं।

प्रजाति के विकास के कारण
Causes of the Development of Race

मानव-प्रजातियों की शारीरिक रचना में बाह्य गुणों में अन्तर उपस्थित करने वाले कितने ही कारण हैं, जिनमें निम्नलिखित मुख्य हैं –

  1. जलवायविक परिवर्तन (Climatic Changes)
  2. ग्रन्थि-रसों का परिवर्तन (Harmones Changes)
  3. छाँट एवं जैविक परिवर्तन (Selection and Biological Changes)
  4. प्रवास द्वारा जातियों का मिश्रण (Racial Mixture by Migration)

प्रजाति वर्गीकरण के आधार तत्व
Basic Elements of Racial Classification

मानव-प्रजातियों का वर्गीकरण उनके शारीरिक लक्षणों के आधार पर निश्चित किया जाता है। निम्नलिखित आधार तत्त्व मुख्य हैं –

1. प्रजाति वर्गीकरण की सीमा (Extent of Racial Classification) – मानव-प्रजातियों को वर्गीकरण केवल उनके बाह्य शारीरिक लक्षणों के आधार पर किया जाना चाहिए, क्योंकि प्राकृतिक पर्यावरण परिवर्तन से ग्रन्थि-रस आदि के कारण जो परिवर्तन मानव-शरीर में होते हैं, वे केवल बाह्य लक्षणों में ही होते हैं। सभी प्रजातियों में बौद्धिक विकास, चरित्र विकास-सद्गुण या दुर्गुण, वीरता, कर्तव्यपरायणता, सत्य का पालन, देश-प्रेम आदि लक्षण एक जैसे होते हैं।

2. शारीरिक लक्षण (Physical Traits) – शरीर के बाह्य लक्षणों को अधिकाधिक प्रजातियों के वर्गीकरण का आधार बनाना चाहिए। शारीरिक लक्षणों में निम्नलिखित बाह्य लक्षण महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. सिर की आकृति या कपाल सूचकांक (Cephalic Index)।
  2. बालों की बनावट (Texture of Hairs)।
  3. नासिका देशना (Nosel Index)।
  4. त्वचा का रंग (Skin Colour)।

मानव-प्रजातियों का वर्गीकरण करते समय किसी वर्ग के व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या के औसत गुणों को ही आधार मानना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग व्यक्ति एक-दूसरे से बहुत भिन्न हो सकते हैं, परन्तु उनके औसत में बहुत कम अन्तर होता है।

3. विशेष लक्षण (Special Traits) – मानव-प्रजातियों में कुछ विशेष शारीरिक लक्षण भी होते हैं, जो केवल विशेष जातियों में ही पाये जाते हैं; जैसे–मंगोलॉयड जाति के लोगों के नेत्र तिरछे होते हैं। इसके अतिरिक्त मंगोल जाति में गालों की हड्डियाँ उभरी हुईं, नाक चपटी तथा मस्तक सपाट होता है। त्वचा का रंग, सिर, नाक, केशों की आकृति और शरीर का कद ऐसे स्थायी लक्षण हैं जो एक बार अलग होने के बाद स्थिर हो गये हैं। ये लक्षण एक युग से दूसरे युग तक चलते रहते हैं तथा जातियों के मिश्रित होने पर भी थोड़ी-अधिक मात्रा में शुद्धता से जारी रहते हैं।

प्रजाति वर्गीकरण को इतिहास
History of Racial Classification

अनेक मानवशास्त्रियों ने प्रजाति वर्गीकरण के प्रयास किये हैं। आरम्भ में त्वचा के वर्ण तथा महाद्वीपों के आधार पर वर्गीकरण प्रस्तुत किये गये। उदाहरणार्थ- वर्नियर ने 1684 ई० में मानव-प्रजाति का प्रथम वर्गीकरण महाद्वीपीयता व त्वचा के वर्ण के आधार पर प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् लिनेकस (1758) ने विशुद्ध महाद्वीपीय आधार पर प्रजाति वर्गीकरण करते हुए विश्व में चार प्रजातियाँ बताय-यूरोपीय, अमेरिकी, एशियाई व अफ्रीकी। ब्लूमैनबैच (1806) ने त्वचा के वर्ण व कपाल की आकृति के आधार पर पाँच प्रजातियाँ, बतायीं-काकेशियन, मंगोलियन, इथोपियन, अमेरिकन व मलायन। कूवियर (1817) का वर्गीकरण बाइबल के वितरण पर आधारित है। प्रिकार्ड (1840), हुक्सले (1870), हेकल (1879), टोपीनार्ड (1878), डेनिकर (1889), रिपले (1900), बियासुती (1912), डिक्सन (1923), हैडन (1924), इक्सटेड (1934), क्रोबर (1935) आदि विद्वानों ने विभिन्न वर्गीकरण प्रस्तुत किये। इनमें प्रायः सभी अपूर्ण व दोषपूर्ण माने जाते हैं।

टेलर का वर्गीकरण Taylor’s Classification
ग्रिफिथ टेलर ने 1919 ई० में सिर-घातांक, केश-रचना, कद, नासिका-रचना आदि तत्त्वों के । आधार पर प्रजाति वर्गीकरण’ प्रस्तुत किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तनों के सन्दर्भ में प्रजातियों के विकास को ‘प्रवास कटिबन्ध सिद्धान्त’ (Migration Zone Theory) के द्वारा स्पष्ट किया। उनके मतानुसार, मध्य एशिया समस्त मानव जाति का उद्गम स्थल है। यहीं से सभी प्रजातियाँ क्रमशः विकसित हुईं। बाद में विकसित होने वाली प्रजाति ने पहले विकसित प्रजाति को बाहरी भागों की ओर खदेड़ दिया। इसी नियमानुसार सबसे बाद में विकसित प्रजातियाँ अब महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में उपस्थित हैं तथा प्राचीनतम प्रजातियाँ महाद्वीपों के किनारों पर स्थित हैं।
टेलर के अनुसार, एशिया एक केन्द्रीय महाद्वीप है। यूरेफ्रिका, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका इसके प्रायद्वीप हैं। इसमें क्रमश: निम्नलिखित सात प्रजातियाँ विकसित पायी जाती हैं –

  1. नेग्रीटो (बहुत पतला सिर)
  2. नीग्रो (बहुत लम्बे सिर)
  3. ऑस्ट्रेलॉयड (लम्बा सिर)
  4. मेडिटरेनियन (मॅझला लम्बा सिर)
  5. नॉर्डिक (मॅझला सिर)
  6. अल्पाइन (चौड़ा सिर) तथा
  7. मंगोलियन (बहुत चौड़ा सिर)।

यह एक प्रमाणित तथ्य है कि प्राचीनतम विकसित प्रजाति महाद्वीप की परिधि पर तथा नवीनतम विकसित प्रजाति महाद्वीप के केन्द्रीय स्थान पर पायी जाती है। इस वर्गीकरण की विशेषता यह है कि इसमें कपाल घातांक क्रमश: आरोही (चढ़ते हुए) क्रम में उपस्थित मिलता है। टेलर ने यह भी स्पष्ट किया है। कि प्रजातियों के क्रमिक विकास के साथ ही सिर की आकृति के अतिरिक्त केश की रचना में भी परिवर्तन होता गया। बालों की आकृति छल्लेदार से लहरदार, बाद में सीधी व सपाट होती गयी। चेहरे की आकृति में भी सुधार हुआ–यह उत्तल से अवतल होती गयी तथा नाक भी क्रमशः चौड़ी से पतली व सुन्दर होती गयी। त्वचा को वर्ण क्रमशः काले से भूरा, श्वेत व अन्त में पीला होता गया।

1. नेग्रीटो (Negrito) – यह अत्यन्त नाटे कद की, चॉकलेटी से काले रंग वाली प्रजाति है। इनके बाल छल्लेदार (Pepper corn) होते हैं। इनका जबड़ा अत्यधिक बाहर की ओर निकला हुआ (Prognathous) तथा चेहरा भी आगे की ओर निकला हुआ (Convex) होता है। वर्तमान समय में विशुद्ध नेग्रीटो लुप्त हो चुके हैं। अनुमानतः आरम्भ में उनके सिर की आकृति बहुत लम्बी रही होगी, जिसका घातांक 68 से 70 रहा होगा। वर्तमान में कुछ ही हजार नेग्रीटो जीवित हैं। उनमें अन्य प्रजातियों के रक्त का पर्याप्त मिश्रण हो गया है। इस प्रजाति के लोग श्रीलंका, मलेशिया, फिलीपीन्स, इण्डोनेशिया, लूजोन और न्यूगिनी के पर्वतीय वन प्रदेशों में पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त अफ्रीका के कांगो बेसिन, कैमरून व फ्रांसीसी विषुवत्रेखीय भागों तथा अण्डमान द्वीप समूहों में भी यह प्रजाति मिश्रित रूप में पायी जाती है। तस्मानिया व जावा द्वीपों में भी एक शताब्दी पहले ये रहते थे।

2. नीग्रो (Negro) – यह लम्बे सिर वाली प्रजाति है जिसका कपाले घातांक 70-72 होता है। इनके बाल ऊनी (Woolly) घंघराले होते हैं। बालों की ऊर्ध्वकाट 50 होती है। त्वचा का वर्ण काजल के समान काला होता है। नाक चौड़ी व चपटी होती है। इनका जबड़ा बाहर की ओर निकला हुआ तथा होंठ मोटे होते हैं। यह प्रजाति पुरानी दुनिया के दो दूरस्थ छोरों पर निवास करती है। अफ्रीका में सूडान व पश्चिमी अफ्रीका तंट तथा न्यूगिनी के पापुआ प्रदेश इनके प्रमुख निवास स्थान हैं। मानवशास्त्रियों के विचार में प्रागैतिहासिक काल में यह प्रजाति दक्षिणी यूरोप व दक्षिणी एशिया में भी निवास करती थी। ग्रिमाल्डी नामकं प्राचीन मानव नीग्रोइड ही था।

3. ऑस्ट्रेलॉयड (Australoid) – इस प्रजाति का सिर लम्बा, बाल ऊन के समान एवं धुंघराले होते हैं। इनकी त्वचा का रंग चमकदार काले से लेकर चॉकलेटी तक होता है। इनके जबड़े कुछ आगे की ओर निकले होते हैं तथा नाक मध्यम चौड़ाई की होती है। ये लोग पूरे ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में निवास करते थे, जबकि यह महाद्वीप ब्रिटिश उपनिवेश नहीं था। भारत के मध्य और दक्षिणी भागों में ऑस्ट्रेलॉयड जाति का निवास अधिक है। प्रागैतिहासिक काल में ये लोग उत्तरी अमेरिका, पूर्वी एशिया और दक्षिणी यूरोप में भी बसे हुए थे। न्यू-मैक्सिको में भी इनके प्रमाण मिलते हैं।

4. मेडिटरेनियन (Mediterranean) – ये लम्बे सिर वाले होते हैं। इनकी नाक अण्डाकार, बाल धुंघराले तथा जबड़े आगे को निकले होते हैं। इनके चेहरे की बनावट हड्डीदार होती है। इनमें आइबीरियन, सैमाइट्स को भी सम्मिलित किया जाता है। मेडिटरेनियन प्रजाति छ: बसे हुए महाद्वीपों के बाह्य सिरों पर पायी जाती है। इस प्रजाति में ऐसे लोग शामिल हैं जैसे यूरोप में पुर्तगाली, अफ्रीका में मिस्री, ऑस्ट्रेलिया में माइक्रोनेशियन, उत्तरी अमेरिका में इरोक्वाइस और दक्षिणी अमेरिका में तूपी।

5. नॉर्डिक (Nordic) – नॉर्डिक मॅझले सिर, लहरदार बाल, चपटा चेहरा, नाक लम्बी तथा आगे से चोंच के समान मुड़ी हुई, त्वचा का रंग गुलाबीपन लिये हल्का भूरा तथा त्वचा में रक्त वर्ण की चमक होती है। उत्तरी यूरोप के लोगों की त्वचा श्वेत एवं गुलाबी-श्वेत होती है।
मानव इतिहास के प्रारम्भ में नॉर्डिक प्रजाति यूरोप, एशिया तथा उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका में रहती थी। यह प्रजाति न्यूजीलैण्ड तथा ऑस्ट्रेलिया के महासागरीय भागों में पोलिनेशियन क्षेत्र में भी निवास करती थी। अफ्रीका महाद्वीप को छोड़कर पूरे विश्व में यह प्रजाति पायी जाती है।

6. अल्पाइन (Alpine) – अल्पाइन प्रजाति का सिर चौड़ा, चेहरा एवं जबड़ा एक सीध में, नाक पतली तथा बाल सीधे होते हैं। त्वचा का रंग भूरे से श्वेत तक होता है। इसमें स्विस, स्लीव, आरमेनियन एवं अफगान लोग शामिल हैं। आरम्भ में इनका निवास यूरेशिया, उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका में था।

मंगोलियन (Mongolian) – इनका सिर गोल होता है। बाल सीधे एवं चपटे होते हैं। इनका जबड़ा भीतर की ओर धंसा हुआ तथा चेहरा अवतल होता है। इनकी नाक पतली, त्वचा का रंग पीले से खुबानी तक होता है। आरम्भ में इस प्रजाति के निवास क्षेत्र एशिया के मध्यवर्ती भाग थे। बाद में यह पश्चिम में तुर्किस्तान तथा पूर्व में महाद्वीपीय तट तक फैलती चली गयी तथा अल्पाइन, नॉर्डिक एवं मेडिटरेनियन प्रजातियाँ इसमें मिश्रित हो गयीं। चीन तथा उसके पड़ोसी देशों में इस प्रजाति का अधिक विकास हुआ।

प्रश्न 2
बुशमैन तथा बद्दू लोगों के निवास-क्षेत्र, अर्थव्यवस्था एवं समाज का विवरण प्रस्तुत कीजिए। या बुशमैन की जीवन-पद्धति एवं अर्थतन्त्र पर निवास-क्षेत्र के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

बुशमैन Bushman

निवास-क्षेत्र – बुशमैन दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल में निवास करते हैं। यह प्रदेश एक उच्च पठारी प्रदेश है, जिसकी औसत ऊँचाई 1,500 मीटर है। इसके पूर्व में उच्च पर्वत-श्रेणियाँ स्थित हैं। इस प्रदेशका क्षेत्रफल लगभग 2 लाख वर्ग किमी है। कालाहारी मरुस्थल की उत्पत्ति बेचुआनालैण्ड से हुई है। कुछ शताब्दियों पूर्व बुशमैन एक विस्तृत क्षेत्रफल में निवास करते थे। बसूतोलैण्ड, नैटाल, दक्षिणी रोडेशिया, टैंगानिका तथा पूर्वी अफ्रीका की उच्च भूमि पर यह प्रजाति विस्तृत है। बाद में नीग्रो कृषक जातियाँ इनके क्षेत्रों पर अधिकार करती गयीं तथा यह आखेटक प्रजाति स्थानान्तरित होकर सिकुड़ते-सिकुड़ते केवल कालाहारी मरुस्थल में ही बस गयी। बटू नीग्रो, हाटेण्टाट तथा दक्षिणी अफ्रीका में जाकर बसने वाली यूरोप की गोरी जातियों के आक्रमण से बुर्शमैन लोगों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती चली गयी। वर्तमान समय में यहाँ लगभग 10,000 बुशमैन निवास करते हैं, जो विभिन्न उपजातियों में विभाजित हैं।

दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल के निवासी बुशमैन लोगों का निवास प्रदेश 18° दक्षिणी अक्षांश से 24° दक्षिणी अक्षांश तक विस्तृत है। बुशमैन कालाहारी मरुस्थल में भ्रमण करने वाली एक खानाबदोश प्रजाति है। हॉलैण्डवासियों ने 17वीं शताब्दी में इन लोगों को बुशमैन नाम से सम्बोधित किया था। ओकोवांगो नदी के क्षेत्रों, नगामी झील के दलदली क्षेत्रों, लिम्पोपो नदी तथा नोसोब नदी के क्षेत्रों में बुशमैन विरल रूप से विस्तृत हैं। इनका जीवन-निर्वाह पूर्ण रूप से आखेट पर निर्भर था। हॉलैण्ड के आक्रमणकारियों ने इनको निश्चित भू-भागों में बसने के लिए बाध्य किया।

अर्थव्यवस्था – 1. भोजन – बुशमैन लोगों की अर्थव्यवस्था आखेट पर निर्भर करती है। ये लोग चतुर शिकारी होते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय पशु-पक्षियों को आखेट करना, मछली पकड़ना, जंगली कन्दमूल एवं फल एकत्र करना तथा शहद इकट्ठा करना है। इस प्रकार बिना आखेट इन लोगों का जीवित रहना बड़ा ही कठिन होता है। ये लोग शिकार करने वाले पशुओं को पहले घायल कर लेते हैं और . उनका पीछा कर उन्हें घेरकर मार डालते हैं। कुछ बुशमैन अपने द्वारा घायल किये गये जेबरा या जिराफ आदि जन्तुओं के पीछे 40-50 किमी तक पीछा करते चले जाते हैं। मरुस्थलीय क्षेत्रों में वनस्पति में प्राप्त होने वाली भोजन सामग्री कम होती है, इसी कारण ये लोग जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं।

प्रत्येक परिवार अपने लिए भोजन एकत्रित करने का कार्य करता है। स्त्रियाँ एवं बच्चे जंगलों से कन्दमूल-फल, कीड़े-मकोड़े एकत्र करते हैं तथा छोटे जन्तुओं का आखेट करते हैं। इन छोटे जन्तुओं में मेंढक, कछुए, गिरगिट, छिपकली आदि प्रमुख हैं। पुरुष बड़े जन्तुओं का शिकार करते हैं। ये लोग जंगली जानवरों की बोली की नकल करने में बड़े दक्ष होते हैं। जन्तुओं को फन्दों में फंसाकर भी मारा जाता है। विषैले तीरों द्वारा भी शिकार किया जाता है। आखेट किये गये जंगली जानवरों को आपस में बाँट लिया जाता है।

बुशमैन सर्वभक्षी होते हैं। ये लोग मांस बड़ी मात्रा में खाते हैं। एक व्यक्ति एक बार में आधी भेड़ तक खा जाता है। इनका भोजन एवं उसके खाने का ढंग बड़ा ही गन्दा होता है। ये लोग भविष्य के लिए भोजन का संचय नहीं करते हैं। कभी-कभी शिकार न मिलने की स्थिति में भूखों भी रहना पड़ता है। शुष्क ऋतु में वन्य जन्तु अन्यत्र चरागाहों को चले जाते हैं; अत: भोजन की कमी हो जाती है।

2. वस्त्र – बुशमैन बहुत कम वस्त्रों का उपयोग करते हैं जो खाल से बने होते हैं। पुरुष एक तिकोना खाल को टुकड़ा (लँगोट) बाँधते हैं। स्त्रियाँ खाल के दो टुकड़े पहनती हैं, जो आगे-पीछे कमर से घुटनों तक लटके रहते हैं। इनके सिर नंगे रहते हैं। ये खाल या छाल से बने जूते पहनते हैं। ठण्ड से बचने के लिए स्त्री-पुरुष खाल से बना कम्बल ओढ़ते हैं। ये लोग शरीर पर चर्बी एवं मिट्टी का लेप लगाते हैं जो धूप एवं विषैले कीटों के काटने से इनके शरीर की रक्षा करता है। बीजों को डोरी में बाँधकर स्त्रियाँ आभूषण बनाकर पहनती हैं। शुतुरमुर्ग के अण्डों के छिलकों से भी आभूषण बनाये जाते हैं।

3. आवास – आखेटक एवं घुमक्कड़ होने के कारण बुशमैन स्थायी मकान बनाकर नहीं रह सकते। मौसम के प्रकोप से बचने के लिए ये लोग गुफाएँ, कन्दराएँ एवं झोंपड़ियाँ बनाकर रहते हैं। झोंपड़ियाँ लकड़ी एवं खरपतवार से बनाई जाती हैं। इन झोंपड़ियों को घेरे के रूप में बनाया जाता है तथा बीच में आग जला दी जाती है जिससे गर्मी बनी रहे एवं जंगली जानवर भी दूरी पर रहें। बुशमैन के, छोटे-छोटे ग्रामों में 8-10 झोंपड़ियाँ बनी होती हैं जिनमें वे रात्रि में विश्राम करते हैं एवं दिन के समय धूप से अपने शरीर की रक्षा करते हैं।

4. अस्त्र-शस्त्र – बुशमैन के अस्त्र-शस्त्रों में तीर-कमान, फेंककर वार करने वाली लाठियाँ, चाकू, बर्छियाँ एवं भूमि खोदने की लकड़ी की कुदालें मुख्य हैं। कुछ बुशमैन लोहे का उपयोग भी करने । लगे हैं जिससे तीर एवं कुल्हाड़े का निर्माण किया जाता है।

सामाजिक व्यवस्था – बुशमैन आदिमकालीन अवस्था में निवास करते हैं, जिनकी सामाजिक, व्यवस्था बड़ी ही साधारण है। एक वर्ग में 20 व्यक्तियों से भी कम होते हैं। प्रत्येक परिवार अपना डेरा अलग लगाता है। ये लोग भूत-प्रेतों में विश्वास करते हैं। आखेट में सफलता प्राप्त करने के लिए जादू-टोने का सहारा लेते हैं।
ये लोग कंठिन परिश्रमी, उत्साही, तीव्र दृष्टि वाले तथा स्मृतिवान होते हैं। देवी-देवताओं तथा भूतप्रेतों में विश्वास करने वाले होते हैं। ईश्वर, स्वर्ग-नरक के विचारों से अनभिज्ञ हैं। कुछ स्थानों पर इनमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव भी दिखलाई पड़ता है। इन लोगों की जनसंख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। अत: सभ्य समाज को इस आदिम जनजाति की सुरक्षा करनी चाहिए।

बट्दू Baddus

निवास-क्षेत्र – अरब प्रायद्वीप बद्दू जनजाति के लोगों का निवास-क्षेत्र है। ये लोग खानाबदोशी होते हैं जो अरब के उत्तरी भाग में बसे हैं। यहाँ हमद एवं नेफद के मरुस्थल हैं। इन मरुस्थलों के निवासी खानाबदोश हैं, जो ऊँटों एवं भेड़-बकरियों के झुण्ड पालते हैं। हमद का क्षेत्र पथरीला मरुस्थल है। हमद एवं नेफद के उत्तरी भाग में स्टेप्स प्रकार की छोटी घास उगती है जो ग्रीष्म ऋतु में सूख जाती है। इस प्रदेश के निवासी ऊँट पालने का व्यवसाय करते हैं, जिन्हें बदू अथवा रूवाला नाम से जाना जाता है।

अर्थव्यवस्था – बद्द् लोग ऊँट एवं भेड़-बकरी पालते हैं, जो इनका प्रमुख व्यवसाय है। वर्ष के 9-10 माह ये लोग मरुस्थल के शुष्क चरागाहों के भीतरी भागों में रहते हैं। ग्रीष्मकाल के 2-3 माह ये लोग अपने पशुओं को लेकर बाहरी क्षेत्रों में स्थायी बस्तियों के समीप आ जाते हैं, जहाँ वे अपने पालतू ऊँटों, भेड़-बकरियों एवं घोड़ों के बदले खाद्यान्न, वस्त्र एवं शस्त्र ले लेते हैं।

1. भोजन – ऊँटनी का दूध इन लोगों का प्रिय भोजन है। इसे ताजा या खट्टा बनाकर पिया जाता है, परन्तु मक्खन एवं पनीर का उपयोग नहीं करते। ऊँट के बालों से रस्से, दरे, फर्श, बोरे आदि बनाते हैं। ऊँट की खाल से थैले एवं कुप्पे बनाये जाते हैं। सवारी ढोने वाला ऊँट एक दिन में 160 किमी तथा पूर्ण बोझे से लदा ऊँट 80 किमी की यात्रा पूर्ण कर लेता है। भेड़-बकरियाँ एवं घोड़े कम संख्या में पाले जाते हैं जिनमें से कुछ पशुओं को खाद्यान्न, वस्त्र एवं शस्त्रों के बदले में बेच दिया जाता है।

2. वस्त्र – बर्दू लोग लम्बे-चौड़े पाजामे पहनते हैं तथा सिर पर साफा बाँधते हैं। ऐसे वस्त्र पहनने का प्रमुख कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों में प्रवाहित उष्ण वायु से अपने शरीर की रक्षा करना है। स्त्रियाँ भी पाजामा एवं कुर्ता पहनती हैं तथा इसके ऊपर काले रंग का बुर्का पहना जाता है। इनके वस्त्र बहुत ही ढीले होते हैं।

3. आवास – बद्दू लोग तम्बुओं में अपने आवास बनाते हैं। इनके तम्बू बकरी के बालों से बुनी। हुई पट्टियों से बनाये जाते हैं। एक ही स्थान पर कई तम्बुओं की संरचना कर ली जाती है जिसमें एक ही कुटुम्ब (कबीला) के लोगों का निवास होता है।
सामाजिक व्यवस्था – बद्दू लोग व्यापारी प्रवृत्ति के होते हैं; अतः सभ्य समाज से इनका सम्पर्क बना रहता है। भेड़-बकरी के बालों से बने बोरों में खाद्यान्न, छुआरे एवं नमक रखा जाता है। एक कबीले के लोग दूसरे कबीले के लोगों पर आक्रमण कर लूट-पाट कर लेते हैं। मेहमाननवाजी में ये लोग बड़े दक्ष होते हैं तथा मेहमानों की रक्षा भी करते हैं। ये लोग इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं तथा अपने पीर-पैगम्बरों को मानते हैं। सभ्य समाज के सम्पर्क में आने के कारण बद्दू लोग आधुनिक सभ्यता से अछूते नहीं हैं। ये लोग धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
एस्किमो की जीवन-पद्धति एवं अर्थतन्त्र पर निवास-क्षेत्र के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
एस्किमो की निवास-क्षेत्र–एस्किमो जनजाति टुण्ड्रा प्रदेश (ग्रीनलैण्ड, अलास्का तथा उत्तरी कनाडा के हिंभाच्छादित क्षेत्रों) में निवास करती है। इस उच्च अक्षीय क्षेत्र में 8-10 मास तक धरातल हिमाच्छादित रहता है तथा केवल 2-4 मास में अल्पकालीन ग्रीष्म ऋतु के दौरान हिम पिघलती है। ग्रीष्म ऋतु के दौरान धरातल पर मॉस, लाइकेन, रंग-बिरंगी घासें तथा फूल उगते हैं। वर्ष के शेष भाग में कोई भी वनस्पति नहीं उगती है। शीतकाल में बर्फीली आँधियाँ चलती हैं तथा तापमान हिमांक के नीचे रहता है। निवा-क्षेत्र की इन दशाओं का प्रभाव एस्किमो लोगों की जीवन-पद्धति तथा अर्थतन्त्र पर स्पष्ट दिखाई देता है।

अर्थतन्त्र – एस्किमो मूलतः आखेटक हैं। ये लोग टुण्ड्रा प्रदेश के वन्य जीवों, विशेषतः ध्रुवीय भालू, सील मछली आदि का शिकार करते हैं। शीतकाल में ये धरातलीय जीवों का शिकार करते हैं तथा ग्रीष्म काल में हिम पिघलने पर समुद्रों से मछली पकड़ने का कार्य करते हैं। आखेट के लिए ये लोग हापूंन नामक भाले का प्रयोग करते हैं तथा मछली के शिकार के लिए नावों का प्रयोग करते हैं।

जीवन-पद्धति – एस्किमो लोग मांसाहारी हैं। ये कच्चा मांस खाते हैं, क्योंकि यहाँ भोजन पकाने के साधन प्राप्त नहीं हैं। शिकार द्वारा उपलब्ध मांस या रेण्डियर पशु, जिन्हें ये पालते हैं, इनका प्रमुख आहार है। निवास क्षेत्र की कठोर जलवायवीय दशाओं के कारण ये समूर वाले पशुओं के समूह तथा खालों के वस्त्र पहनते हैं। ये अपने मकान हिमपिण्डों से बनाते हैं जिन्हें ‘इग्लू’ कहते हैं। ग्रीष्मकाल में ये तम्बुओं में रहते हैं। यातायात के साधनों के अभाव में ये बिना पहियों की स्लेज गाड़ी का प्रयोग करते हैं। जिसे रेण्डियर या कुत्ते खींचते हैं। शिकार के लिए ये लोग ‘उमियाक’ तथा ‘कायाक’ नावों का प्रयोग करते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि एस्किमो लोगों का जीवन तथा अर्थतन्त्र उनके निवास-क्षेत्र की भौगोलिक दशाओं से पूर्णत: नियन्त्रित होता है।

प्रश्न 2
हैडन के अनुसार विश्व में प्रजातियों के प्रकार बताइए।
उत्तर
1924 ई० में हैडन ने केश रचना को मुख्य आधार मानते हुए, त्वचा के वर्ण, शरीर के कद व सिर की आकृति आदि अन्य लक्षणों को भी सम्मिलित करते हुए अपनी पुस्तक ‘Races of Man’ में मानव प्रजाति का वर्गीकरण किया है। उनके अनुसार तीन मुख्य प्रजाति वर्ग निम्नलिखित हैं

1. छल्लेदार बालों वाली प्रजाति (ulotrichi or woolly haired) इस प्रजाति के बाल ऊन की भाँति छल्लेदार होते हैं जिनकी ऊर्ध्वकोट 40 से 50 होती है। इनकी त्वचा का वर्ण काला, कद नाटा व सिर लम्बा होता है। ये लक्षण नेग्रिटो व नीग्रो प्रजातियों में पाए जाते हैं। नेग्रिटो नाटे कद वाली तथा नीग्रो लम्बे कद वाली प्रजाति है। इस प्रजाति के लोग अफ्रीका में सूडान, कांगो बेसिन, युगांडा, टैंगानिका, दक्षिणी अफ्रीका, मैडागास्कर में तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया में न्यूगिनी, अण्डमान, फिलीपीन्स, मलाया व सुमात्रा में पाए जाते हैं।

2. लहरदार बालों वाली प्रजाति (cymotrichi or wavy haired) इस प्रजाति के बालों की ऊर्ध्वकाट 60-70 होती है तथा बाल लहरदार होते हैं। यह मध्यम कद, लम्बे सिर तथा श्वेत से लेकर श्याम वर्ण वाली प्रजाति है। त्वचा वर्ण के आधार पर इस प्रजाति के दो वर्ग किए जा सकते हैं।

  1. काले वर्ण की ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति जिसकी बालों की ऊर्ध्वकाट 60 होती है। यह लम्बे सिर वाली प्रजाति है। इनका कद मध्यम होता है। यह प्रजाति ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी भारत व ब्राजील में पायी जाती
    है। लंका के वेद्दा तथा मलेशिया व इण्डोनेशिया के निवासी भी इसी प्रजाति के लोग हैं।
  2. भूरे कत्थई व गोरे रंग की कॉकेशियन प्रजातियाँ (गहरे भूरे रंग की मेडिटरेनियन प्रजाति, भूरे रंग की अल्पाइन व गोरे रंग की नॉर्डिक प्रजाति) इस वर्ग में आती हैं। इनमें मेडिटरेनियन, नॉर्डिक व अफगान मॅझले सिर वाली तथा अल्पाइन चौड़े सिर वाली प्रजाति है। इस प्रजाति का वितरण उत्तरी-पश्चिमी यूरोप से लेकर दक्षिणी पूर्वी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका, अरब, ईरान, आरमीनिया, अफगानिस्तान, उत्तरी भारत तक है। जापान के आइनू लोग भी इसी प्रजाति वर्ग के हैं।

3. सपाट बालों वाली प्रजाति (leotrichi or straight haired) – इस प्रजाति के बाल सीधे व सपाट होते हैं जिनकी ऊर्ध्वकाट 80 होती है। इनकी त्वचा का वर्ण पीला या कत्थई व कद मध्यम होता है। यह प्रजाति चौड़े सिर वाली है। इनमें मंगोल प्रजाति प्रधान है, जिसके अनेक उपवर्ग हैं-चीन, उत्तरी साइबेरिया, मंचूरिया, रूसी, तुर्किस्तान, मध्य एशिया, तिब्बत, सिक्यांग व मलाया में यह प्रजाति पाई जाती है।
उपर्युक्त तीन प्रमुख प्रजातियों के अतिरिक्त हैडन ने दोनों अमेरिका में पायी जाने वाली ‘अमेरिण्ड’ जाति का विशिष्ट वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया है तथा इसके चार प्रमुख वर्ग बताए हैं –

  1. पैले अमेरिण्ड ब्राजील के पूर्वी पठार एवं लैगोस प्रदेश में निवास करने वाली यह प्रजाति इण्डो-अफगान व नैसियत जातियों के समान धुंघराले बालों वाली है।
  2. ऐस्किमो सपाट बालों वाली यह प्रजाति उत्तरी कनाडा के टुण्ड्रा व ग्रीनलैण्ड में निवास करती
  3. नार्दर्न अमेरिण्ड सपाट बाल तथा मंगोल व प्राचीन एशियाटिक प्रजातियों के समान लक्षणों वाली यह प्रजाति रॉकी तथा एण्डीज के पर्वतीय प्रदेश एवं अर्जेण्टाइना में निवास करती है।
  4. निओ-अमेरिण्ड तुर्क तथा मंगोल जाति के समान लक्षणों और सीधे व सपाट बालों वाली यह प्रजाति दक्षिणी चिली के तेहुएलची व उत्तरी-पश्चिमी तटीय प्रदेश की जाति वर्गों में पाई जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विश्व की प्रमुख जनजातियों के नाम लिखिए। [2009]
या
किन्हीं दो मानव प्रजातियों के नाम लिखिए।
या
विश्व की किन्हीं चार जनजातियों का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तर
विश्व की प्रमुख जनजातियाँ हैं-

  1. नेग्रीटो
  2. नीग्रो
  3. ऑस्ट्रेलॉयड
  4. मेडिटरेनियन
  5. नॉर्डिक
  6. अल्पाइन और
  7. मंगोलियन।

प्रश्न 2
मंगोलॉयड जाति के लोगों में कौन-से विशेष लक्षण पाये जाते हैं?
उत्तर
मंगोलॉयड जाति के लोगों के नेत्र तिरछे होते हैं। इनके गालों की हड्डियाँ उभरी हुईं, नाक चपटी तथा मस्तक सपाट होता है।

प्रश्न 3
भारत में ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति का निवास कहाँ पर है?
उत्तर
भारत के मध्य और दक्षिणी भागों में ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति का निवास अधिक है।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races

प्रश्न 4
मंगोलियन प्रजाति का निवास एशिया में कहाँ अधिक है?
उत्तर
चीन तथा इसके पड़ोसी देशों में मंगोलियन प्रजाति का निवास अधिक है।

प्रश्न 5
बुशमैन कहाँ निवास करते हैं तथा इनकी अर्थव्यवस्था किस पर निर्भर करती है?
उत्तर
बुशमैन दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल में निवास करते हैं। इनकी अर्थव्यवस्था आखेट पर निर्भर करती है।

प्रश्न 6
बद्दू जनजाति के लोग कहाँ निवास करते हैं तथा ये लम्बे-चौड़े पाजामे क्यों पहनते हैं?
उत्तर
अरब प्रायद्वीप बद्दू जनजाति के लोगों का निवास-क्षेत्र है। इनके लम्बे-चौडे पाजामे पहनने का प्रमुख कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों में प्रवाहित उष्ण वायु से अपने शरीर की रक्षा करना है।

प्रश्न 7
गर्म मरुस्थल की दो जनजातियों के नामों का उल्लेख कीजिए। (2007)
उत्तर

  1. बुशमैन, तथा
  2. बद्।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
विश्व की किस जनजाति के लोग बर्फ के घर बनाते हैं?
(क) बर्दू
(ख) खिरगीज
(ग) एस्किमो
(घ) बुशमैन
उत्तर
(ग) एस्किमो।

प्रश्न 2
विश्व की जनजाति जो भ्रमणशील पशुचारण द्वारा जीवनयापन करती है –
(क) एस्किमो
(ख) बर्दू
(ग) बुशमैन
(घ) पिग्मी
उत्तर
(ख) बद्।

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से किस प्रजाति से चीन के लोग सम्बन्धित हैं?
(क) नेग्रिटो
(ख) निग्रायड
(ग) मंगोलॉयड
(घ) काकेसाइड
उत्तर
(ग) मंगोलॉयड।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races

प्रश्न 4
बुशमैन का निवास-क्षेत्र है – [2011, 13, 16]
(क) अमेजन बेसिन
(ख) अरब प्रायद्वीप
(ग) कालाहारी
(घ) कांगो बेसिन
उत्तर
(ग) कालाहारी।

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से किस प्रजाति के बाल ऊन जैसे होते हैं?
(क) ऑस्ट्रेलॉयड
(ख) मंगोलॉयड
(ग) नीग्रोयड
(घ) नेग्रिटो
उत्तर
(घ) नेग्रिटो।

प्रश्न 6
हैडन ने मानव प्रजातियों का वर्गीकरण किस आधार पर किया है?
(क) नाक की बनावट
(ख) बालों की विशेषता
(ग) त्वचा का रंग
(घ) कद
उत्तर
(ख) बालों की विशेषता।

प्रश्न 7
टेलर के प्रजाति वर्गीकरण का प्रमुख आधार क्या है?
(क) त्वचा का रंग
(ख) कद
(ग) नाक की बनावट
(घ) कपाल घातांक एवं बालों की रचना
उत्तर
(घ) कपाल घातांक एवं बालों की रचना।

प्रश्न 8
निम्नलिखित में से किस प्रजाति की त्वचा का रंग पीला होता है?
(क) ऑस्ट्रेलॉयड
(ख) मंगोलॉयड
(ग) मेडिटरेनियन
(घ) काकेसॉयड
उत्तर
(ख) मंगोलॉयड।

प्रश्न 9
प्रजाति का प्रवास कटिबन्ध सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया था?
(क) टेलर
(ख) हैडन
(ग) हक्सले
(घ) क्रोबर
उत्तर
(क) टेलर।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races (मानव प्रजातियाँ) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 Human Races (मानव प्रजातियाँ), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 निन्दा रस

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 निन्दा रस (हरिशंकर परसाई) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 निन्दा रस (हरिशंकर परसाई).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name निन्दा रस (हरिशंकर परसाई)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 निन्दा रस (हरिशंकर परसाई)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
हरिशंकर परसाई के जीवन-परिचय का उल्लेख करते हुए उनकी कृतियों (रचनाओं) पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 16]
या
हरिशंकर परसाई का साहित्यिक परिचय दीजिए एवं उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-श्री हरिशंकर जी का जन्म मध्य प्रदेश में इटारसी के निकट जमानी नामक स्थान पर 22 अगस्त, 1924 ई० को हुआ था। आरम्भ से लेकर स्नातक स्तर तक इनकी शिक्षा मध्य प्रदेश में हुई। नागपुर विश्वविद्यालय से इन्होंने हिन्दी में एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। परसाई जी ने कुछ वर्षों तक अध्यापन-कार्य किया तथा साथ-साथ साहित्य-सृजन आरम्भ किया। नौकरी को साहित्य-सृजन में बाधक जानकर इन्होंने उसे तिलांजलि दे दी और स्वतन्त्रतापूर्वक साहित्य-सृजन में जुट गये। इन्होंने जबलपुर से ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका का सम्पादन और प्रकाशन आरम्भ किया, परन्तु आर्थिक घाटे के कारण उसे बन्द कर देना पड़ा। इनकी रचनाएँ साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग आदि पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं। परसाई जी ने मुख्यत: व्यंग्यप्रधान ललित निबन्धों की रचना की है। 10 अगस्त, 1995 ई० को जबलपुर में इनका देहावसान हो गया।

साहित्यिक योगदान–परसाई जी हिन्दी व्यंग्य के आधार-स्तम्भ थे। इन्होंने हिन्दी व्यंग्य को नयी दिशा प्रदान की है और अपनी रचनाओं में व्यक्ति और समाज की विसंगतियों पर से परदा हटाया है। ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ ग्रन्थ पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य संस्थान’ तथा मध्य प्रदेश कला परिषद् द्वारा भी इन्हें सम्मानित किया गया। इन्होंने कथाकार, उपन्यासकार, निबन्धकार तथा सम्पादक के रूप में हिन्दी-साहित्य की महान् सेवा की।

रचनाएँ-परसाई जी अपनी कहानियों, उपन्यासों तथा निबन्धों में व्यक्ति और समाज की कमजोरियों, विसंगतियों और आडम्बरपूर्ण जीवन पर गहरी चोट करते हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. कहानी-संग्रह-हँसते हैं, रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे’।।
  2. उपन्यास–‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘तट की खोज’।।
  3. निबन्ध-संग्रह-तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडण्डियों का जमाना’, ‘सदाचार का तावीज’, ‘शिकायत मुझे भी है, और अन्त में।

इनकी समस्त रचनाओं का संग्रह ‘परसाई ग्रन्थावली’ के नाम से प्रकाशित हो चुका है। साहित्य में स्थान-परसाई जी हिन्दी साहित्य के एक समर्थ व्यंग्यकार थे। इन्होंने हिन्दी निबन्ध साहित्य में हास्य-व्यंग्य प्रधान निबन्धों की रचना करके एक विशेष अभाव की पूर्ति की है। इनकी शैली का प्राण व्यंग्य और विनोद है। अपनी विशिष्ट शैली से परसाई जी ने हिन्दी साहित्य में अपना प्रमुख स्थान बना लिया है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
अद्भुत है मेरा यह मित्र। उसके पास दोषों का ‘केटलाग’ है। मैंने सोचा कि जब वह हर परिचित की निन्दा कर रहा है, तो क्यों न मैं लगे हाथ विरोधियों की गत, इसके हाथों करा लें। मैं अपने विरोधियों का नाम लेता गया और वह उन्हें निन्दा की तलवार से काटता चला। जैसे लकड़ी चीरने की आरा मशीन के नीचे मजदूर लकड़ी का लट्ठा खिसकाता जाता है और वह चीरता जाता है, वैसे ही मैंने विरोधियों के नाम एक-एक कर खिसकाये और वह उन्हें काटता गया। कैसा आनन्द था। दुश्मनों को रण-क्षेत्र में एक के बाद एक कटकर गिरते हुए देखकर योद्धा को ऐसा ही सुख होता होगा।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने किसका उदाहरण आरा मशीन से दिया है?
(iv) लेखक ने अपने विरोधियों की गत किसके हाथों कराने का विचार किया?
(v) योद्धा को क्या देखकर निन्दक के जैसा ही सुख प्राप्त होता होगा?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ शीर्षक व्यंग्यात्मक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- निन्दा रस।
लेखक का नाम-हरिशंकर परसाई।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक श्री हरिशंकर परसाई जी का कहना है कि उनका निन्दक मित्र बहुत ही अद्भुत और विचित्र है जिसके पास दोषों और बुराइयों को अच्छा-खासा सूची-पत्र है। उनके सम्मुख जिस किसी की भी चर्चा छिड़ जाती वह उसी की निन्दा में चार-छ: वाक्य बोल दिया करता था। लेखक के मन में विचार आया कि क्यों न वह भी अपने कुछ-एक परिचितों की जो उसके विरोधी हैं, की निन्दा उसके माध्यम से करवा ले।
(iii) लेखक ने निन्दक का उदाहरण आरा मशीन से दिया है।
(iv) लेखक ने अपने विरोधियों की गत निन्दक मित्र के हाथों कराने का विचार किया।
(v) दुश्मनों को रण-क्षेत्र में एक के बाद एक कटकर गिरते हुए देखकर योद्धा को निन्दक जैसा ही सुख प्राप्त होता होगा।

प्रश्न 2.
ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा भी होती है। लेकिन इसमें वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निन्दा करने में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुखी होता है। ईष्र्या-द्वेष से चौबीसों घंटे जलता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शांति अनुभव करता है। ऐसा निन्दक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करने वाले को कोई दण्ड देने की जरूरत नहीं है। वह निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए?
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मिशनरी निन्दक शान्ति का अनुभव कब करता है?
(iv) किस प्रकार के निन्दक को दण्ड देने की कोई जरूरत नहीं होती? कारण सहित उत्तर दीजिए।
(v) अपनी अक्षमता से पीड़ित निन्दक दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर कैसा व्यवहार करता है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ शीर्षक व्यंग्यात्मक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम– निन्दा रस।
लेखक का नाम-हरिशंकर परसाई।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक ने कहा है कि निन्दा ईष्र्या भाव से प्रेरित होती है और मिशनरी भाव से भी। मिशनरी भाव से की गयी निन्दा बिना किसी द्वेष-भाव के धर्म-प्रचार जैसे पुण्य कार्य की भावना से की जाती है। ईर्ष्या भाव से प्रेरित होकर निन्दा करने में वह आनन्द नहीं आता, जो मिशनरी भाव से प्रेरित होकर निन्दा करने में आता है।
(iii) मिशनरी निन्दक ईष्र्या-द्वेष से चौबीसों घण्टे जलता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शान्ति अनुभव करता है।
(iv) मिशनरी निन्दक को दण्ड देने की कोई जरूरत नहीं होती। कारण यह कि ऐसा निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है।
(v) अपनी अक्षमता से पीड़ित निन्दक दूसरे की सक्षमता को चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है।

प्रश्न 3.
निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईष्र्या-द्वेष और इनसे उत्पन्न निन्दा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे बनायो महल और बिन बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईष्र्या होती है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) निन्दा का उद्गम कहाँ से होता है?
(iv) निन्दक व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके कैसा अनुभव करता है?
(v) इन्द्र को ईष्र्यालु क्यों माना जाता है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित तथा हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ शीर्षक व्यंग्यात्मक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- निन्दा रस।।
लेखक का नाम-हरिशंकर परसाई।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि इन्द्र को बड़ा ईष्र्यालु माना जाता है; क्योंकि वह निठल्ला रहता है, उसे कुछ नहीं करना पड़ता। उसे खाने के लिए अन्न नहीं उगाना पड़ता, फल पाने के लिए पेड़ नहीं बोने पड़ते तथा रहने के लिए बना-बनाया महल मिल जाता है। स्वर्ग में ये सभी चीजें स्वत: प्राप्त हो जाती हैं, इन्हें प्राप्त करने के लिए कुछ भी श्रम नहीं करना पड़ता। खाली रहने के कारण उसे अपनी अप्रतिष्ठा का डर बना रहता है। इसलिए वह किसी तपस्वी को तपस्या करते देखकर, किसी कर्मठ व्यक्ति को श्रेष्ठ कर्म करते देखकर ही भयभीत हो जाता है कि कहीं यह अपनी कर्मठता से मेरे पद को न छीन ले; अत: वह उससे ईर्ष्या करने लगता है।
(iii) निन्दा का उद्गम हीनता और कमजोरी से होता है।
(iv) निन्दक व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है।
(v) निठल्ला होने के कारण इन्द्र को ईर्ष्यालु माना जाता है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 निन्दा रस (हरिशंकर परसाई) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 निन्दा रस (हरिशंकर परसाई), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure (जनसंख्या : वृद्धि, घनत्व, वितरण एवं संरचना) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure (जनसंख्या : वृद्धि, घनत्व, वितरण एवं संरचना).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 4
Chapter Name Population : Growth, Density, Distribution and Structure (जनसंख्या : वृद्धि, घनत्व, वितरण एवं संरचना)
Number of Questions Solved 35
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure (जनसंख्या : वृद्धि, घनत्व, वितरण एवं संरचना)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संसार में जनसंख्या के घनत्व तथा वितरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारकों की विवेचना कीजिए। [2007, 08, 10, 14]
या
जनसंख्या के असमान वितरण के लिए उत्तरदायी भौगोलिक कारकों का वर्णन कीजिए। (2007)
विश्व में एशिया के असमान वितरण की व्याख्या कीजिए तथा ऐसे असमान वितरण के किन्हीं तीन कारणों का वर्णन कीजिए। [2016]
या
जनसंख्या-वृद्धि के लिए उत्तरदायी भौगोलिक कारकों का विश्लेषण कीजिए। [2012,16]
या
जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों की समीक्षा कीजिए। [2008, 14]
या

विश्व की जनसंख्या का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक
(ख) जनसंख्या का वितरण। [2013]
उत्तर
मानव- भूगोल के अध्ययन में मानवे का केन्द्रीय स्थान है, क्योकि मानव ही अपने प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का उपभोग करता है, उनसे प्रभावित होता है और उनमें अपनी आवश्यकतानुसार परिवर्तन करता है। पृथ्वीतल पर सभी आर्थिक व्यवसाय मानव द्वारा सम्पन्न होते हैं। इसी कारण पृथ्वीतल पर जनसंख्या कितनी है, उसका वितरण किन प्रदेशों में अधिक या कम है, उसमें कितनी वृद्धि अथवा कमी हुई है, उसकी क्षमता कैसी है तथा उसकी समस्याएँ क्या हैं आदि सभी तथ्यों का अध्ययन करना बड़ा महत्त्वपूर्ण है।
जनसंख्या अध्ययन का मुख्य उद्देश्य पृथ्वीतल के विभिन्न प्रदेशों में जनसंख्या की स्थिति, वृद्धि अथवा कमी, उसकी भिन्नताएँ, घनत्व, आवास-प्रवास, शारीरिक शक्ति, आयु-वर्ग, पुरुष-महिला अनुपात तथा जनसंख्या के आर्थिक विकास की अवस्थाओं का पता लगाना होता है।

विश्व में जनसंख्या के वितरण में प्राचीन काल से अब तक बहुत-से परिवर्तन हुए हैं। पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भूतल पर मनुष्यों का निवास असमान है। केवल कुछ प्रदेश ऐसे हैं जहाँ मानव-निवास अति सघन है, जबकि बहुत-से भूभाग खाली पड़े हैं। विश्व की 50 प्रतिशत जनसंख्या; भू-स्थल के केवल 5 प्रतिशत भाग पर निवास करती है, जबकि 7 प्रतिशत क्षेत्रफल ऐसा है जहाँ केवल 5% जनसंख्या ही रहती है; अत: स्थल-खण्ड का कम बसा भाग बहुत बड़ा है। पश्चिमी गोलार्द्ध के स्थल भाग पर केवल एक-चौथाई जनसंख्या निवास करती है। इस वितरण पर प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विषमताओं का भी प्रभाव पड़ता है।

जनसंख्या के घनत्व तथा वितरण को प्रभावित करने वाले कारक
Factors Affecting the Density and Distribution of Population

जनसंख्या का घनत्व – जनसंख्या के घनत्व का आशये किसी क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या की सघनता से है। जनसंख्या के घनत्व को प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर निवास करने वाले व्यक्तियों की संख्या के रूप में मापा जाता है। घनत्व ज्ञात करने के लिए किसी क्षेत्र की कुल जनसंख्या को उसके क्षेत्रफल से भाग दिया जाता है। घनत्व से जनसंख्या के किसी क्षेत्र में संकेन्द्रण की मात्रा का बोध होता है।
जनसंख्या के घनत्व तथा वितरण पर निम्नलिखित भौगोलिक एवं अन्य कारकों का प्रभाव पड़ता है –

1. स्थिति (Location) – किसी प्रदेश की स्थिति का प्रभाव उसके समीपवर्ती देशों, परिवहन, व्यापार तथा मानव इतिहास पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, हिन्द महासागर में भारत की स्थिति केन्द्रीय होने के कारण मध्य-पूर्व के देशों तथा पूर्वी गोलार्द्ध के देशों के साथ समुद्री व्यापार की सुविधा रखने वाली है। विश्व की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या तटीय भागों तथा उनकी सीमा-पेटियों में निवास करती है। भूमध्यसागरीय भागों में उसके चारों ओर प्राचीन काल से ही मानव-बस्तियों का विकास होता रही हैं। यहाँ मछलियों की प्राप्ति, सम-जलवायु, समतल मैदानी भूमि जिसमें कृषि, उद्योग, परिवहन एवं मानव-आवासों का तीव्र गति से विकास हुआ है। इसीलिए इन भागों में सघन जनसंख्या का संकेन्द्रण हुआ है।

2. जलवायु (Climate) – सभी कारकों में जलवायु महत्त्वपूर्ण साधन है, जो जनसंख्या को । किसी स्थान पर बसने के लिए प्रेरित करती है। विश्व के सबसे घने बसे भाग मानसूनी प्रदेश तथा सम-शीतोष्ण जलवायु के प्रदेश हैं। चीन, जापान, भारत, म्यांमार, वियतनाम, बांग्लादेश तथा पूर्वी-द्वीप समूह की जलवायु मानसूनी है, जबकि पश्चिमी यूरोप एवं संयुक्त राज्य की जलवायु सम-शीतोष्ण है; अतः इन देशों में सघन जनसंख्या का निवास हुआ है।

इसके विपरीत जिन प्रदेशों की जलवायु उष्ण एवं शुष्क है, वहाँ बहुत ही कम जनसंख्या निवास करती है। उदाहरण के लिए, सहारा, कालाहारी, अटाकामा, अरब, थार एवं ऑस्ट्रेलियाई मरुस्थलों में जनसंख्या का घनत्व एक व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। अति उष्ण एवं आर्दै प्रदेशों में भी जनसंख्या कम है; जैसे- अमेजन बेसिन के पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्रों में।
मानव-आवास के लिए स्वस्थ अनुकूलतम जलवायु वह है जिसमें ग्रीष्म ऋतु का अधिकतम औसत तापमान 18°सेग्रे से कम तथा शीत ऋतु के सबसे ठण्डे महीने का तापमान 3° सेग्रे से कम न हो। सामान्यतया 4°-21° सेग्रे तापमान के प्रदेश जनसंख्या के आवास के लिए सर्वाधिक अनुकूल माने जाते हैं। वर्षा की मात्रा में वृद्धि के साथ-साथ जनसंख्या के घनत्व में भी वृद्धि होती जाती है तथा उसके घटने के साथ-साथ जनसंख्या घनत्व में कमी होती जाती है।

3. भू-रचना (Terrain) – भू-रचना का जनसंख्या से गहरा सम्बन्ध है। समतल मैदानी भागों में कृषि, सिंचाई, परिवहन, व्यापार आदि का विकास अधिक होता है; अतः मैदानी क्षेत्र सघन रूप से बस जाते हैं। पर्वतीय एवं पहाड़ी क्षेत्रों में कष्टदायकं एवं विषम भूमि की बनावट होने के कारण बहुत कम लोग निवास करना पसन्द करते हैं। भारत के असम राज्य में केवल 397 मानव प्रति वर्ग किमी निवास करते हैं, जबकि गंगा के डेल्टा में 800 से भी अधिक व्यक्ति प्रति वर्ग किमी निवास कर रहे हैं। विश्व में जनसंख्या के चार समूहों का संकेन्द्रण हुआ है-

  1. चीन एवं जापान,
  2. भारत एवं बांग्लादेश,
  3. यूरोपीय देश एवं
  4. पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका।

विश्व में उपजाऊ भूमि के कारण नदी-घाटियाँ भी सघन रूप से बसी हैं।

4. स्वच्छ जल की पूर्ति (Supply of Clean water) – जल मानव की मूल आवश्यकता है। जल की आवश्यकता मुख्यत: तीन प्रकार की है –

  1. घरेलू आवश्यकताओं के लिए जल की पूर्ति
  2. औद्योगिक कार्यों के लिए जल की पूर्ति एवं
  3. सिंचाई के लिए जल की पूर्ति।

अतः जिन प्रदेशों एवं क्षेत्रों में शुद्ध एवं स्वच्छ मीठे जल की पूर्ति की सुविधी होती है, वहाँ जनसंख्या भी अधिक निवास करने लगती है; जैसे-नदी-घाटियों एवं समुद्रतटीय क्षेत्रों में।

5. मिट्टियाँ (Soils) – जनसंख्या का मूल आधार भोजन है जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकती। शाकाहारी भोजन प्रत्यक्ष रूप से एवं मांसाहारी भोजन अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी में ही उत्पन्न होते हैं। जिन प्रदेशों की मिट्टियाँ उपजाऊ होती हैं, वहाँ सघन जनसंख्या निवास करती है। चीन, भारत एवं यूरोपीय देशों में नदियों की घाटियों में मिट्टी की अधिक उर्वरा शक्ति के कारण सघन जनसंख्या निवास कर रहा है।

6. खनिज पदार्थ (Minerals) – जिन प्रदेशों में खनिज पदार्थों का बाहुल्य होता है, वहाँ उद्योगों के विकसित होने की पर्याप्त सम्भावनाएँ रहती हैं। इस कारण ये क्षेत्र जनसंख्या को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा विषम परिस्थितियों में भी इन प्रदेशों में सघन जनसंख्या का आवास रहता है। यूरोप महाद्वीप के सघन बसे प्रदेश कोयले एवं लोहे की खानों के समीप ही स्थित मिलते हैं। इसी प्रकार रूस के उन क्षेत्रों में जनसंख्या अधिक है, जहाँ खनिज भण्डार अधिक हैं।

7. शक्ति के संसाधन (Power Resources) – उद्योगों एवं परिवहन के साधनों के संचालन में कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत एवं प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है तथा इनकी प्राप्ति वाले क्षेत्रों में जनसंख्या भी सघन रूप में निवास करने लगती है।

8. आर्थिक उन्नति की अवस्था (Stage of Economic Progress) – किसी प्रदेश की आर्थिक स्थिति में वृद्धि होने पर उसकी जनसंख्या-पोषण की क्षमता में भी वृद्धि हो जाती है; अत: इन प्रदेशों में जनसंख्या भी अधिक निवास करने लग जाती है। कृषि उत्पादन कम होने पर भी इन प्रदेशों में खाद्यान्न विदेशों से आयात कर लिये जाते हैं, क्योंकि आयात करने के लिए उनकी आर्थिक स्थिति अनुकूल होती है।

9. तकनीकी प्रगति का स्तर (Level of Technological Progress) – तकनीकी विकास के द्वारा नवीन यन्त्रों, उपकरणों एवं मशीनों के उत्पादन में वृद्धि होती है जिससे विभिन्न क्षेत्रों के उत्पादों में भी वृद्धि होती है एवं ऋतु तथा जलवायु की विषमताओं पर नियन्त्रण कर लिया जाता है। इन सुविधाओं के स्तर में वृद्धि से जनसंख्या में भी वृद्धि हो जाती है। यूरोप के औद्योगिक प्रदेशों में 700 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से भी अधिक जन-घनत्व इसी कारण मिलता है।

10. सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक (Social and Cultural Factors) – सामाजिक रीतिरिवाजों, धार्मिक विश्वासों एवं जीवन के प्रति दृष्टिकोण का प्रभाव जनसंख्या वितरण पर भी पड़ता है। जिस समाज में लोग भाग्यवादी होते हैं, उनमें परिवार-कल्याण कार्यक्रमों के प्रति विश्वास एवं रुचि न होने के कारण अधिक सन्तति से जनसंख्या में वृद्धि होती चली जाती है। उदाहरण के लिए, भारत में मुस्लिम लोगों का परिवार-कल्याण के प्रति धार्मिक विश्वास न होने के कारण उनकी जनसंख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है।

11. राजनीतिक कारक (Political Factors) – राजनीतिक नियमों का प्रभाव भी जनसंख्या वितरण पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। उदाहरणार्थ- ऑस्ट्रेलिया का क्षेत्रफल भारत की अपेक्षा लगभग तीन गुना अधिक है, जब कि ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या भारत की जनसंख्या का केवल 1/50 भाग ही है। इसका प्रमुख कारण ऑस्ट्रेलिया सरकार की श्वेत नीति (White Policy) है जो गोरी जातियों के अतिरिक्त दूसरी नस्ल के लोगों को ऑस्ट्रेलिया में बसने से रोकती है।

12. मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors) – किसी प्रदेश में मानव के कम या अधिक निवास के लिए उसकी छाँट दो सीमाओं के मध्य रहती है। एक ओर प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा निश्चित की हुई सीमा तथा दूसरी ओर सरकारी नीति। इस प्रकार कुछ मानव थोड़े संसाधनों के क्षेत्र में बसे होते हैं तथा उनकी जीविकोपार्जन की विधि भी पिछड़ी हुई होती है। ऐसे उदाहरण पर्वतीय तथा वन-क्षेत्रों में अधिक मिलते हैं। विश्व के दक्षिणी महाद्वीपों में ऐसे क्षेत्र अधिक मिलते हैं।

13. पर्यावरण की वांछनीयता (Environmental Desirability) – मानवीय सभ्यता के विकास के साथ-सांथ परिवहन, संचार आदि साधनों में वृद्धि से विभिन्न प्रदेशों की वांछनीयता में भी परिवर्तन हो जाते हैं। जहाँ आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ अत्यधिक दिखलाई पड़ती हैं, उन क्षेत्रों में मानव के बसने की इच्छा भी अधिक रहती है। उदाहरणार्थ-बिहार राज्य के उत्तरी भाग में कृषि द्वारा सघन जनसंख्या पोषण करने की क्षमता विद्यमान है और दक्षिण की ओर छोटा नागपुर पठारे में खनिज पदार्थों के कारण औद्योगिक विकास की भारी क्षमता है। अत: बिहार राज्य में इन सम्भावनाओं के कारण जनसंख्या भी सघन होती जा रही है। इसके विपरीत सम्भावनाओं की कमी के कारण हिमालय के तराई प्रदेश में जनसंख्या विरल है।

14. अन्तर्राष्ट्रीय पारस्परिक निर्भरता (International Interdependence) – वर्तमान समय में विशेषीकरण में वृद्धि के फलस्वरूप सभ्य राष्ट्र अपनी खाद्यान्न आवश्यकता के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन तथा जर्मनी के खाद्यान्न अधिकतर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अर्जेण्टाइना आदि देशों से मशीनों के बदले आते हैं; अर्थात् एक देश दूसरे देश की उपज को आसानी से बदल सकता है। इससे विशेषीकरण में वृद्धि होती है तथा अधिक जनसंख्या का पोषण सम्भव हो सकता है। इसी प्रकार जापान ने भी सघन जनसंख्या के पोषण की क्षमता आसानी से प्राप्त कर ली है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार ने विभिन्न देशों की आर्थिक निर्भरता की अपेक्षा विशेषीकरण को प्रोत्साहन दिया है, परन्तु कभी-कभी राजनीतिक सम्बन्ध खराब होने से विभिन्न देशों में युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अतः इसके लिए एक देश को दूसरे देश की विशेषताओं को उचित प्रकार से समझना चाहिए।

प्रश्न 2
एशिया में जनसंख्या के असमान वितरण हेतु भौगोलिक कारकों की विवेचना कीजिए। [2015]
या
एशिया में जनसंख्या के असमान वितरण के कारणों की विवेचना कीजिए। [2008, 10, 11, 16]
उत्तर
विश्व में जनसंख्या का वितरण समान नहीं है। सन् 1992 में विश्व की जनसंख्या 5.48 अरब थी जो 2013 ई० तक बढ़कर 7.125 अरब पहुँच गयी है। इस प्रकार विश्व जनसंख्या में 9.7 करोड़ मानव प्रतिवर्ष बढ़ जाते हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि सन् 2050 तक विश्व की जनसंख्या 9.10 अरब हो जाएगी। यह जनसंख्या 135 करोड़ वर्ग किमी क्षेत्रफल पर निवास करती है। विश्व में जनसंख्या का सामान्य घनत्व 93 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। किन्तु कहीं-कहीं पर यह 3,000 से 4,000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से भी अधिक पाया जाता है, जबकि कुछ प्रदेशों में 5 व्यक्तियों से भी कम है।

इस प्रकार दो-तिहाई जनसंख्या कुल क्षेत्रफल के सातवें भाग पर निवास करती है। इससे पता चलता है कि विश्व की जनसंख्या का वितरण बड़ा ही असमान है। यदि जनसंख्या-वितरण का अध्ययन करें तो पता चलता है। कि एशिया महाद्वीप में विश्व की सबसे अधिक अर्थात् 60.8% जनसंख्या निवास करती है। यूरोप, अफ्रीका, उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका महाद्वीपों में क्रमश: 12%, 13.9%, 7% तथा 5.8% जनसंख्या निवास करती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में बहुत ही कम अर्थात् केवल 0.7 प्रतिशत जनसंख्या ही निवास करती है। निम्नांकित तालिकी विश्व में जनसंख्या वितरण को प्रकट करती है-
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population Growth, Density, Distribution and Structure 1

यदि विश्व में जनसंख्या वृद्धि का अध्ययन किया जाये तो पता चलता है कि जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। ऐसे क्षेत्र, जो पहले जनशून्य थे, अब मानव ने उन निर्जन क्षेत्रों में भी अपने बसाव प्रारम्भ कर दिये हैं। मानव ने अपने जीवन-निर्वाह के साधनों की खोज में अब पर्वतीय, पठारी, मरुस्थलीय एवं ध्रुवीय प्रदेशों की ओर प्रयास तेज कर दिये हैं। विश्व की अधिकांश जनसंख्या थोड़े-से क्षेत्रफल में ही निवास करती है; अर्थात् विश्व की दो-तिहाई जनसंख्या केवल तीन बड़े क्षेत्रों में केन्द्रित है –

  1. दक्षिणी-पूर्वी एशियाई मानसूनी देश
  2. पश्चिमी और मध्य यूरोपीय देश
  3. पूर्वी तथा मध्य

संयुक्त राज्य अमेरिका। विश्व का अधिकांश क्षेत्रफल कम जनसंख्या रखने वाला है। इन तथ्यों को जनसंख्या के महाद्वीपीय वितरण से समझा जा सकता है।

जनसंख्या का महाद्वीपीय वितरण
Continental Distribution of Population

एशियाई जनसमूह – एशिया महाद्वीप में विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या निवास करती है। विश्व के लगभग 60.8% अर्थात् लगभग 357 करोड़ लोग एशिया महाद्वीप में निवास करते हैं, परन्तु यहाँ पर जनसंख्या का वितरण बड़ा ही असमान है। चीन, जापान, कोरिया, फिलीपीन्स तथा वियतनाम देशों में कुल मिलाकर विश्व की लगभग 25% जनसंख्या निवास करती है। चीन की जनसंख्या 138.4 करोड़ (सन् 2016 में) हो गयी है। जापान में भी 12 करोड़ 81 लाख (लगभग) व्यक्ति निवास कर रहे हैं। दक्षिणी-पूर्वी एशिया में इस महाद्वीप की जनसंख्या को 75% भाग समुद्रतटीय क्षेत्रों तथा नदियों की घाटियों में निवास करता है।

भारतवर्ष में सन् 2011 की जनगणनानुसार 121.01 करोड़ व्यक्ति निवास कर रहे थे। इस प्रकार”एशिया महाद्वीप में बहुत थोड़े क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ घनी आबादी निवास करती है, जबकि अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ बहुत ही कम लोग निवास करते हैं।” एशिया महाद्वीप के कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 550 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, जबकि कुछ भागों में 1 से 25 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी ही है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में जनसंख्या का घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। मंगोलिया, सिक्यांग एवं तिब्बत का पठार तथा साइबेरिया के विस्तृत भाग और अरब का मरुस्थल विशेष रूप से कम जनसंख्या रखने वाले विस्तृत प्रदेश हैं।

एशिया महाद्वीप में जनसंख्या के सघन कुंज लगभग 10 से 40° उत्तरी अक्षांशों के मध्य पाये जाते हैं। यहाँ जनसंख्या का मुख्य आर्थिक आधार कृषि-कार्य हैं। मानसूनी जलवायु, सिंचाई की सुविधाएँ,
उपजाऊ कॉप मिट्टी के मैदान, परिश्रमी कृषक, सदावाहिनी नदियों से जल की उपलब्धि आदि के द्वारा वर्ष में 2 से 3 तक फसलों का उत्पादन किया जाता है। नदियों की घाटियाँ और डेल्टाई भागों में गेहूं एवं चावल उत्पादक क्षेत्र मानव समूहों से भरे पड़े हैं। इन देशों में 70% से 80% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है।

यूरोपीय जनसमूह – यूरोप महाद्वीप का जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में तृतीय स्थान है। यहाँ पर 727 करोड़ व्यक्ति निवास करते हैं। यहाँ जनसंख्या का घनत्व 101 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। विश्व की 12.8% जनसंख्या इस महाद्वीप में निवास करती है। जनसंख्या के समूह 40° उत्तरी अक्षांश से 60° उत्तरी अक्षांश के मध्य फैले हैं, किन्तु सबसे सघन बसाव 45° उत्तर से 55° उत्तरी अक्षांशों के बीच है जहाँ कोयला अधिक मात्रा में प्राप्त होता है। 50°उत्तरी अक्षांश के साथ जनसंख्या का जमाव पश्चिम में इंग्लिश चैनल से लेकर पूरब में यूक्रेन देश तक विस्तृत है।

इस क्षेत्र को ‘यूरोपीय जनसंख्या की धुरी’ कहा जाता है जो पश्चिम से पूरब की ओर सँकरी होती गयी है। वास्तव में यूरोप की जनसंख्या का आधार औद्योगिक-प्राविधिक विकास है। औद्योगिक विकास के साथ-साथ परिवहन के साधनों का विकास एवं विस्तार हुआ जिससे व्यापार को प्रश्रय मिला। यही कारण है कि यूरोप के जनसंख्या जमघट में नगरों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि नगर ही सम्पर्क तथा आर्थिक कार्यों के केन्द्र बिन्दु हैं। इन देशों की 70%-85% जनसंख्या नगरीय केन्द्रों में निवास करती है।

उत्तरी अमेरिकी जनसमूह – एशिया एवं यूरोप महाद्वीप की अपेक्षा उत्तरी अमेरिका महाद्वीप में जनसंख्या कम है। यहाँ पर विश्व की लगभग 7% जनसंख्या निवास करती है तथा घनत्व 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जनसंख्या का जमघट पूर्वी भाग में 100° पश्चिमी देशान्तर से पूर्व में 30° से 45° उत्तरी अक्षांशों के मध्य हुआ है। उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग में यूरोपियन प्रवासी सबसे पहले आकर बसे थे, परन्तु अब पश्चिमी भागों में कैलीफोर्निया में भी जनसंख्या अधिक हो गयी है। यहाँ पर औद्योगिक विकास के साथ-साथ कृषि भी आधुनिक ढंग से की जाती है।

उत्तरी अमेरिका में नदियों के बेसिन तथा उपजाऊ मैदान सघन बसे हैं। महान् झीलों का समीपवर्ती क्षेत्र, पूर्वी तटीय भाग, मध्यवर्ती क्षेत्र तथा मिसीसिपी का मैदान तथा कनाडा में झीलों एवं सेण्ट लारेंस के निकटवर्ती क्षेत्र सर्वाधिक जनसंख्या रखने वाले हैं। यहाँ पर जन-घनत्व 200 से 300 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। पश्चिमी द्वीप समूह, मध्य एवं पूर्वी मैक्सिको तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्यवर्ती भागों में जनसंख्या का घनत्व 50 से 100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। ग्रीनलैण्ड, अलास्का, न्यूफाउण्डलैण्ड, रॉकी पर्वत तथा मरुस्थलीय प्रदेश कम जनसंख्या रखने वाले हैं, जहाँ जनसंख्या का घनत्व केवल 10 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। इन प्रदेशों में विषम जलवायु तथा आर्थिक विषमताएँ मानव-बसाव में बाधक बनी हुई हैं।

दक्षिणी अमेरिकी जनसमूह – जनसंख्या के दृष्टिकोण से यह महाद्वीप अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है। क्षेत्रफल की तुलना में जनसंख्या बहुत ही कम (विश्व की लगभग 5.8%) है। जनसंख्या का घनत्व भी केवल 16 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।असमतल धरातल, विषम जलवायु, सघन वन, शुष्क मरुस्थल तथा अनुपजाऊ भूमि के कारण यहाँ जनसंख्या कम मिलती है। यहाँ पर कुछ जनसंख्या समूहों के रूप में भी बसी है। प्रमुख रूप से मध्यवर्ती पूर्वी भागों में जनसंख्या के जमघट विकसित हुए हैं। इन तटीय भागों में उपजाऊ भूमि के कारण मानव-आवास संघन हुए हैं तथा जनसंख्या का घनत्व भी 100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक मिलता है। इस महाद्वीप की सघन जनसंख्या कृषि क्षेत्रों, तटीय भागों, विशाल नगरों तथा राजधानियों में निवास करती है। दक्षिणी-पूर्वी ब्राजील, लाप्लाटा बेसिन, मध्य चिली, कैरेबियन तट तथा ओरीनीको डेल्टा घने बसे हुए क्षेत्र हैं।

इस महाद्वीप के उत्तरी तथा उत्तरी-पश्चिमी तटीय भागों में मध्यम जनसंख्या निवास करती है। यहाँ पर जनसंख्या का घनत्व 10 से 30 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। कोलम्बिया के पूर्वी तट, वेनेजुएला का उत्तरी भाग, पीरू का उत्तरी-पश्चिमी तट, इक्वेडोर, बोलीविया का मध्य भाग, अर्जेण्टाइना का मध्य भाग तथा पैराग्वे का मध्य भाग मध्यम जनसंख्या के क्षेत्रों में सम्मिलित किये जा सकते हैं। दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के पर्वतीय क्षेत्रों, मरुस्थलों, अविकसित क्षेत्रों तथा दलदली भागों में बहुत ही कम जनसंख्या निवास करती है। पैन्टागोनिया एवं अटाकामा के शुष्क मरुस्थल, एण्डीज तथा बोलीविया के उच्च शिखरों पर विरल जनसंख्या पायी जाती है। यहाँ पर 40% क्षेत्र में न्यून जनसंख्या निवास करती है। इस महाद्वीप की 65% से 70% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है।

अफ्रीकी जनसमूह – अफ्रीका महाद्वीप में क्षेत्रफल की अपेक्षा जनसंख्या बहुत ही कम है। जनसंख्या के दृष्टिकोण से विश्व में एशिया एवं यूरोप महाद्वीप के बाद अफ्रीका का स्थान आता है। यहाँ 81.8 करोड़ मानव निवास करते हैं जो विश्व की कुल जनसंख्या का 13.9% भाग है तथा जनसंख्या घनत्व 20 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। अफ्रीका महाद्वीप को अधिकांश क्षेत्रफल ऊबड़-खाबड़, असमतल, पठारी, मरुस्थलीय तथा विषम जलवायु एवं कठोर पर्यावरण वाला होने के कारण मानव-आवास के अयोग्य है।

अफ्रीका महाद्वीप के उत्तरी – पूर्वी भागों में सघन जनसंख्या निवास करती है। इन भागों में जनसंख्या का घनत्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। नील नदी के डेल्टाई भागों में 500 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से भी अधिक मानव निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त दक्षिणी अफ्रीकी संघ, तटीय मैदानी भाग तथा उत्तरपश्चिमी भागों में भी जनसंख्या का घनत्व अधिक है। अल्जीरिया के उत्तरी भाग, घाना, नाइजीरिया तथा मेडागास्कर में मध्यम जनसंख्या निवास करती है, जहाँ जन-घनत्व 50 से 100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। इस महाद्वीप का 50% क्षेत्र न्यून जनसंख्या रखने वाला है, जहाँ जनसंख्या का घनत्व केवल 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। इनमें सहारा का मरुस्थल, कालाहारी मरुस्थल तथा अबीसीनिया का पठार सम्मिलित हैं।

ऑस्ट्रेलियाई जनसमूह – ऑस्ट्रेलिया विश्व में सबसे कम जनसंख्या रखने वाला महाद्वीप है। यहाँ विश्व की केवल 0.7% जनसंख्या ही निवास करती है। जनसंख्या का घनत्व भी 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। यहाँ पर यूरोपियन श्वेत लोगों का आधिक्य है जो सोना एवं अन्य बहुमूल्य खनिजों की खोज में आये थे।
दक्षिण – पूर्वी तथा दक्षिण-पश्चिमी एवं समुद्रतटीय भागों में मरे-डार्लिंग एवं स्वॉन नदी का डेल्टा, मेलबोर्न तथा सिडनी के निकटवर्ती भागों में जनसंख्या का आधिक्य है। इन भागों में जनसंख्या का घनत्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्वी तट, पश्चिमी तथा दक्षिणी तट मध्यम जनसंख्या के क्षेत्र हैं। यहाँ औसत घनत्व 30 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी मिलता है। तस्मानिया द्वीप भी इसी श्रेणी में आता है। पर्वतीय, पठारी तथा मरुस्थलीय क्षेत्रों में विरल जनसंख्या है जहाँ जन-घनत्व केवल 1 से 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।

प्रश्न 3
विश्व में मानव-निवास क्षेत्रों की व्याख्या कीजिए।
या
“विश्व के कुछ भाग घने बसे हैं और अधिकांश भाग जनशून्य हैं।” इस कथन की सत्यता की परख कीजिए।
उत्तर

विश्व में जनसंख्या-वितरण
Population Distribution in the World

विश्व-मानचित्र पर यदि हम जनसंख्या के वितरण पर दृष्टिपात करें तो जनसंख्या-वितरण की असमानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या विस्फोट, तो कुछ क्षेत्र जनसंख्याविहीन दृष्टिगोचर होते हैं। विश्व की लगभग 60.8% जनसंख्या एशिया महाद्वीप में, 12% यूरोप महाद्वीप में, 7% उत्तरी अमेरिका महाद्वीप में, 13.9% अफ्रीका महाद्वीप में, 5.8% जनसंख्या दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में तथा 0.7% ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों में निवास करती है। उपर्युक्त आँकड़ों में सबसे अधिक आकर्षित करने वाले इस तथ्य से पता चलता है कि विश्व की दो-तिहाई जनसंख्या इसके क्षेत्रफल के सातवें भाग पर ही केन्द्रित है। इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विश्व के कुछ भाग अत्यन्त घने बसे हुए हैं और अधिकांश भाग जनशून्य हैं अथवा बहुत ही कम जनसंख्या वाले हैं।

विश्व की अधिकांश जनसंख्या तीन बसे हुए क्षेत्रों में केन्द्रित है। जनसंख्या के इन जमघटों का समूह उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। मानव-बसाव के आधार पर विश्व को इन क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
(क) सघन बसे हुए क्षेत्र Densed Region
विश्व के निम्नलिखित क्षेत्र जनसंख्या के घने बसे हुए क्षेत्रों के अन्तर्गत आते हैं –

1. पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के मानव समूह – इस क्षेत्र में विश्व की 60% जनसंख्या निवास करती है। दक्षिण-पूर्वी एशिया के बसे हुए क्षेत्रों के अन्तर्गत भारत में गंगा की निम्न घाटी एवं डेल्टाई क्षेत्र, चीन में ह्वांग्हो, यांगटिसीक्यांग और जेचुआन बेसिन (रेड बेसिन), जापान में पूर्वी समुद्रतटीय मैदानी क्षेत्र, पाकिस्तान में सिंचित क्षेत्र, बांग्लादेश तथा इण्डोनेशिया सम्मिलित हैं। इस क्षेत्र में जनसंख्या का संकेन्द्रण पूर्णत: कृषि-कार्यों पर आधारित है। इस क्षेत्र की लगभग 70से भी अधिक जनसंख्या की आजीविका को साधन कृषि-कार्यों पर ही निर्भर करता है। एशिया के इस विशाल जन-समूह को ‘कृषि सभ्यता’ या ‘चावल सभ्यता’ के नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि यहाँ का मुख्य धन्धा कृषि एवं प्रमुख फसल चावल है।

2. उत्तर-पश्चिमी यूरोप के मानव समूह – उत्तर-पश्चिमी यूरोपीय देश भी बहुत सघन बसे हुए हैं। इस क्षेत्र को यूरोप की जनसंख्या की धुरी की संज्ञा दी जाती है। इस क्षेत्र में ब्रिटेन से लेकर रूस के डोनेत्ज बेसिन तक जनसंख्या के सघन संकेन्द्रण पाये जाते हैं। इस क्षेत्र के अन्तर्गत विश्व की लगभग 20% जनसंख्या निकस करती है। इसमें रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, हॉलैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस, पोलैण्ड, इटली तथा स्पेन आदि देश सम्मिलित हैं। इस क्षेत्र के जनसमूह का मुख्य आधार उद्योग, वाणिज्य तथा व्यापार है।

3. उत्तरी अमेरिका के उत्तर-पूर्वी मानव समूह – उत्तरी अमेरिका को यह जनसमूह महान् झीलों के पूर्वी क्षेत्र में 30° उत्तरी अक्षांश से 45° उत्तरी अक्षांश तथा 100° पश्चिमी देशान्तर के पूर्व तक विस्तृत है। यहाँ इस महाद्वीप की लगभग 85% जनसंख्या निवास करती है। इस क्षेत्र में जनसंख्या का बसाव मिसीसीपी नदी के पूर्व में, ओहियो नदी के उत्तर में तथा सेण्ट लारेंस नदी की घाटी में केन्द्रित है। इस जनसमूह में विश्व की केवल 5% जनसंख्या पायी जाती है। इस क्षेत्र में संयुक्त राज्य की कृषि-पेटियाँ स्थित हैं। अधिकांश जनसंख्या विस्तृत एवं आधुनिक यन्त्रों से सुसज्जित कृषि-फार्मों तथा औद्योगिक केन्द्रों में बसी हुई है।

(ख) विरल बसे हुए क्षेत्र Rared Region
वास्तव में विश्व का 70% क्षेत्र अति विरल जनसंख्या वाला है जिसमें विश्व की केवल 5% जनसंख्या ही निवास करती है। इन क्षेत्रों की विषम तथा कठोर परिस्थितियाँ; जैसे- कठोर जलवायु, विषम धरातल, मरुस्थलीय क्षेत्रों का विस्तार, पर्वत तथा पठार आदि संरचना पायी जाती हैं। बिना बसे हुए क्षेत्रों के अन्तर्गत विश्व के निम्नलिखित क्षेत्र सम्मिलित हैं –

1. अत्यधिक ठण्डे क्षेत्र – इस क्षेत्र का विस्तार उत्तर में आर्कटिक महासागर तथा दक्षिण में अण्टार्कटिक महाद्वीप के समीपवर्ती क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अन्तर्गत ग्रीनलैण्ड, अण्टार्कटिका, उत्तरी साइबेरिया, उत्तरी कनाडा तथा अलास्का आदि देश सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में कठोर शीत ऋतु, न्यूनतम तापमान, हिम एवं पाले की कठोरता के फलस्वरूप अत्यन्त अल्प जनसंख्या निवास करती है। टुण्ड्रा प्रदेश में 60° उत्तरी अक्षांश के उत्तर में जन-विन्यास केवल नाममात्र को ही पाया जाता है। आन्तरिक महाद्वीपीय भागों में बर्फ से ढकी पर्वत श्रेणियाँ भी जनसंख्यारहित क्षेत्र हैं।

2. मध्य अक्षांशीय उष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र – इन क्षेत्रों में बालू की प्रधानता, शुष्क एवं उष्ण जलवायु, भीषण तापमान तथा प्राकृतिक संसाधनों का अभाव मानव-बसाव में बाधक हैं। इन क्षेत्रों में जल की कमी होने के कारण कृषि व्यवसाय तथा अन्य आर्थिक कार्य विकसित नहीं हो पाये हैं। अफ्रीका महाद्वीप में सहारा व कालाहारी के उष्ण मरुस्थल; एशिया महाद्वीप में गोबी, थार, अरब, तुर्किस्तान व मंगोलिया; ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का मरुस्थल; उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के संयुक्त राज्य अमेरिका में ग्रेट बेसिन व आन्तरिक पठार तथा दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में पेंटागोनिया तथा अटाकामा के मरुस्थल इन क्षेत्रों के अन्तर्गत आते हैं। जल की कमी, शुष्कता तथा उष्णता के कारण ये क्षेत्र प्रायः मानव बसाव के योग्य नहीं हैं; अत: यहाँ पर बहुत-ही कम जनसंख्या निवास करती है।

3. विषुवतरेखीय उष्णार्द्र वन प्रदेश – ये क्षेत्र उच्च तापमान, अत्यधिक वर्षा, विषैली मक्खी एवं मच्छर तथा संक्रामक महामारियों जैसी विषम परिस्थितियों के कारण अल्प जनसंख्या रखने वाले हैं। इस क्षेत्र के अन्तर्गत दक्षिणी अमेरिका के अमेजन तथा अफ्रीका के कांगो-बेसिन के सघन वन क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में भूमध्यरेखीय उष्ण एवं आर्द्र जलवायु के कारण सघन वनस्पति पायी जाती है। यह जलवायु मानव-बसाव के अनुकूल नहीं है; अतः यहाँ जनसंख्या का बसाव बहुत कम है।

4. ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी व पठारी क्षेत्र – उच्च पर्वत तथा पठारी क्षेत्र भी कम बसे हुए भागों के अन्तर्गत आते हैं। ये क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ धरातल, कठोर एवं विषम जलवायु, कृषि-योग्य भूमि की कमी, यातायात के साधनों का अभाव, उद्योग-धन्धों की कमी आदि के कारण जन-शून्य हो गये हैं। विश्व में हिमालय, रॉकी, आल्प्स तथा एण्डीज पर्वतों के भू-भाग कम बसे हुए हैं। एशिया के मध्यवर्ती पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्रों को इसी कारण ‘एशिया का मृत हृदय’ कहकर पुकारा जाता है।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure

प्रश्न 4
जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जनसंख्या के भौगोलिक अध्ययन में निम्नलिखित तथ्य सम्मिलित किये जाते हैं –

  1. संख्या
  2. घनत्व एवं
  3. वृद्धि।

परन्तु केवल इन्हीं तथ्यों को ही जान लेना पर्याप्त नहीं है, वरन् यह जानना भी आवश्यक है कि किसी प्रदेश की जनसंख्या में मनुष्यों का

  1. स्वास्थ्य कैसा है?
  2. उनमें लिंग-अनुपात (स्त्री-पुरुष अनुपात) क्या है?
  3. उनकी आयु-संरचना अर्थात् जनसंख्या का आयु- संघटन क्या है?
  4. विभिन्न व्यवसायों का स्तर कैसा है?
  5. ग्रामीण एवं नगरीयं जनसंख्या को अनुपात क्या है? तथा
  6. शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीकी प्रगति किस अवस्था तक हुई है?

उपर्युक्त सभी तथ्यों के सम्मिलित अध्ययन से किसी देश की जनसंख्या की वास्तविक शक्ति और उन्नति की क्षमता को ठीक-ठीक अनुमान लगाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेश के किसी देश में उद्योगों तथा वैज्ञानिक संस्थानों में काम करने वाले 1,000 मानव में तथा उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश के किसी देश में निवास करने वाले 1,000 मानव में, दोनों की संख्या तो बराबर है, परन्तु उनकी उत्पादन क्षमता में बहुत भारी अन्तर हो सकता है। इसीलिए जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं को जान लेना अति आवश्यक है, जिनका विवरण निम्नलिखित है –

आयु-संरचना (Age-composition) – जनसंख्या की क्षमता और शक्ति के अध्ययन में सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी आयु-संरचना है। इसके अन्तर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि किसी देश की जनसंख्या में विभिन्न आयु के व्यक्तियों की संख्या कितने प्रतिशत है; अर्थात् उसमें बच्चों, जवानों और बूढ़ों की संख्या कितनी है? इसके द्वारा अग्रलिखित तीन बातों का पता चलता है –

  1. किसी राष्ट्र की वास्तविक और भावी श्रम-शक्ति कितनी है?
  2. सैन्य महत्त्व की दृष्टि से सैनिक मानव-शक्ति कितनी है?
  3. भविष्य में कितने मानवों के लिए शिक्षा और सहायता की योजना बनाई जाए। सरकारी कार्यालयों, सुरक्षा मन्त्रालयों, योजना समितियों और रोजगार देने वालों को इस प्रकार की जानकारी आवश्यक होती है।

आयु-संरचना के विचार से जनसंख्या के निम्नलिखित चार बड़े वर्ग होते हैं –

  1. बाल्यावस्था-15 वर्ष से कम,
  2. किशोरावस्था-15 से 20 वर्ष तक,
  3. सामान्य श्रमिक अवस्था—20 से 65 वर्ष तक तथा
  4. उत्तरावस्था अथवा वृद्धावस्था-65 वर्ष से अधिक।

स्टाम्प ने मानव की आयु के केवल तीन खण्ड बताये हैं। उन्होंने बालक और किशोर दोनों अवस्थाओं को एक साथ मिलाकर 0 से 19 वर्ष तक पहला खण्ड,20 से 64 वर्ष तक दूसरा खण्ड और 65 वर्ष से ऊपर तीसरा खण्ड माना है। इस गणना के आधार पर स्टाम्प ने विश्व को आयु-संरचना के दृष्टिकोण से निम्नलिखित चार बड़े वर्गों में बाँटा है –

  1. प्रथम वर्ग में उत्तर-पश्चिमी यूरोपीय देश, ब्रिटेन, बेल्जियम, फ्रांस, डेनमार्क, नीदरलैण्ड आदि देश हैं जिनमें उत्तरावस्था और श्रमिक आयु के मनुष्यों की संख्या बहुत अधिक है तथा बच्चों की संख्या कम है। जापान भी इसी वर्ग में सम्मिलित है।
  2. द्वितीय वर्ग में एशियाई और अफ्रीकी देश आते हैं जिनमें उच्च जन्म-दर और निम्न प्रत्याशित आयु है, जिसके कारण जनसंख्या में बच्चों की संख्या अधिक है और वृद्धि कम।
  3. तीसरे वर्ग में दक्षिणी अमेरिकी देश सम्मिलित हैं जिनकी संख्या में बच्चे अधिक हैं।
  4. चौथे वर्ग में मध्य अक्षांशों में स्थित नये बसे हुए देश संयुक्त राज्य, ऑस्ट्रेलिया आदि हैं। जिनमें पश्चिमी यूरोप के सघन देशों की अपेक्षा छोटी उम्र के बच्चे अधिक हैं और वृद्धों की संख्या कुछ कम है।

जनसंख्या के आयु-संरचना की दृष्टि से पिछले 70 वर्षों में काफी परिवर्तन हुए हैं। अब से 100 वर्ष पूर्व ब्रिटेन में चिकित्सा विज्ञान की उतनी उन्नति नहीं हुई थी। उस समय ब्रिटेन में बच्चों की संख्या अधिक थी तथा वृद्धों की कम। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् ब्रिटेन में प्रत्याशित आयु में वृद्धि हो गयी, तब 35 वर्ष से 40 वर्ष की आयु वाले स्त्री-पुरुषों की संख्या बढ़ गयी थी। सन् 1960 में ब्रिटेन में 20 वर्ष से 64 वर्ष की आयु के व्यक्तियों की संख्या लगभग 60% हो गयी थी। बेल्जियम में श्रमिक आयु के व्यक्ति 61% के लगभग हैं, जबकि भारत में यह जनसंख्या केवल 49% है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में सन् 1850 में 15 वर्ष तक के बच्चों की संख्या 42% थी जो सन् 1950 में 27% रह गयी, परन्तु सन् 1950 के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्म-दर में कुछ वृद्धि हुई है, जिसके फलस्वरूप 1970 ई० में वहाँ बच्चों की संख्या लगभग 31% थी।
एशियाई देशों में जैसे भारत, चीन, जापान, श्रीलंका आदि; दक्षिणी अमेरिकी तथा अफ्रीकी देशों में कम आयु की जनसंख्या अधिक है। इनमें 35% से 40% जनसंख्या 15 वर्ष से कम आयु की है। इन देशों में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा क्षेत्रों में इतनी प्रगति नहीं हुई है जितनी पश्चिमी यूरोपीय देशों एवं संयुक्त राज्य में हुई है।

लिंगानुपात (Sex Ratio) – जनसंख्या में स्त्री-पुरुष अनुपात से जनसंख्या की शारीरिक शक्ति का अनुमान होता है। भारत में सन् 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति 1,000 पुरुषों के पीछे 940 स्त्रियाँ हैं, जब कि 1981-1991 के दशक में यह संख्या 927 थी, परन्तु राज्यों में यह अन्तर अलग-अलग है। पंजाब में स्त्रियों की संख्या 893, पश्चिमी बंगाल में 947, उत्तर प्रदेश में 908, तमिलनाडु में 995 और केरल में 1,084 है। इस स्थिति की एक व्याख्या यह है कि अधिकांश व्यक्ति लड़का चाहते हैं और लड़की की मन से देखभाल करना पसन्द नहीं करते हैं।

ब्रिटेन में प्रति 1,000 पुरुषों के पीछे लगभग 1,090 स्त्रियाँ हैं। जिन देशों की जनसंख्या विदेशों को प्रवास कर गयी है; जैसे- इटली, नार्वे आदि, उन देशों में स्त्रियों की जनसंख्या अधिक है। इसके विपरीत जिन देशों में विदेशों से जनसंख्या को आवास हुआ है; जैसे-कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका आदि में, वहाँ पुरुषों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रवास करने वाली जनसंख्या में पुरुषों की संख्या अधिक होती है, जबकि स्त्रियाँ कम होती हैं।

साक्षरता (Literacy) – जनसंख्या में साक्षरता से व्यक्ति के मानसिक स्तर का अनुमान होता है। यूरोप में साक्षरता का प्रतिशत बहुत अधिक है, जबकि एशिया में यह अपेक्षाकृत काफी कम है। भारत में स्त्री और पुरुषों में साक्षरता के प्रतिशत में बहुत अन्तर है। पुरुषों में साक्षरता का स्तर 2011 ई० की जनगणना के आधार पर 82.14% है, जबकि स्त्रियों में यह 65.46% प्रतिशत है। केरल भारत का सबसे अधिक साक्षर प्रदेश है। यहाँ पर 93.91 प्रतिशत जनसंख्या साक्षर है। साक्षरता की सबसे कम दर बिहार में है, जहाँ केवल 63.82 प्रतिशत व्यक्ति ही साक्षर हैं।

सामाजिक एवं आर्थिक विशेषताएँ (Social and Economic Characteristics) – इस प्रकार की विशेषताओं के अन्तर्गत सामाजिक संगठन, शिक्षा का स्तर, व्यावसायिक स्थिति, धार्मिक विश्वास, ग्रामीण एवं नगरीय बस्तियाँ, आर्थिक उत्पादन आदि का विचार किया जाता है।
यूरोप, संयुक्त राज्य, रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड एवं जापान में तकनीकी-वैज्ञानिक शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा है, जबकि एशियाई देशों में यह स्तर नीचा है तथा अफ्रीकी देशों में और भी अधिक कम है। जिन देशों में वैज्ञानिक प्रगति अधिक है उनमें यान्त्रिक कृषि, निर्माण उद्योग एवं व्यापार, परिवहन आदि कार्यों का विकास अधिक हुआ है।

ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के विचार से विश्व की 75% जनसंख्या ऐसे देशों में रहती है, जहाँ लोग कृषि कार्य करते हुए ग्रामों में निवास करते हैं। सबसे अधिक नगरीय बस्तियाँ इन चार प्रदेशों में विकसित हुई हैं-

  1. उत्तर-पश्चिमी यूरोप,
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा,
  3. ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैण्ड तथा
  4. दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप का दक्षिणी भाग।

भारत में 26%, जापान में 60%, संयुक्त राज्य में 82% तथा ब्रिटेन में 92% व्यक्ति नगरीय बस्तियों में निवास करते हैं। वास्तव में नगरीकरण का प्रचार यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति से आरम्भ हुआ है। यूरोपीय देशों से प्रवासी बहुत-से नये बसे हुए देशों को गये हैं और वहाँ यूरोपीय सभ्यता के प्रचार-प्रसार द्वारा नगरीय बस्तियों को विकसित किया है। जापान में औद्योगिक क्रान्ति के श्रीगणेश द्वारा नगरीय जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। टोकियो विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नगर है। इसके बाद साओपालो एवं न्यूयॉर्क नगरों का स्थान आता है। एशियाई एवं अफ्रीकी देशों में अधिकांश जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। भारतवर्ष में सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 70% जनसंख्या ग्रामों में निबास कर रही थी।

प्रश्न 5
नगरीकरण क्या है? भारत में नगरीकरण की समस्याओं और उनके समाधान की विवेचना कीजिए। [2007,14,16]
या
नगरीकरण की प्रमुख समस्याओं का विवरण दीजिए तथा उनके समाधान हेतु उपायों को सुझाइए। [2012,13]
या
नगरीकरण क्या है? बढ़ते नगरीकरण के कारणों को बताइए। [2015]
उत्तर

नगरीकरण का अर्थ

नगरीकरण से आशय व्यक्तियों द्वारा नगरीय संस्कृति को स्वीकारना है। नगरीकरण की प्रक्रिया नगर से सम्बन्धित है। नगर सामाजिक विभिन्नताओं का वह समुदाय है जहाँ द्वितीयक एवं तृतीयक समूहों-उद्योग और व्यापार, सघन जनसंख्या और वैयक्तिक सम्बन्धों की प्रधानता हो। नगरीकरण की प्रक्रिया द्वारा गाँव धीरे-धीरे कस्बे, कस्बे से नगर में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में ग्रामीण बस्ती का प्राथमिक भूमि उपयोग; द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों में परिवर्तित हो जाता है। श्री बर्गेल ग्रामों के नगरीय क्षेत्र में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया को ही नगरीकरण कहते हैं।
विभिन्न विद्वानों ने नगरीकरण को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है –

  1. ग्रिफिथ टेलर ने ग्रामों से नगरों की ओर जनसंख्या की अभिमुखता” को नगरीकरण की संज्ञा दी है।
  2. जी०टी० ट्विार्थ के अनुसार, “कुल जनसंख्या में नगरीय स्थानों में रहने वाली जनसंख्या के अनुपात को नगरीकरण का स्तर कहा जाता है।”

नगरीकरण के कारण उत्पन्न समस्याएँ एवं उनका समाधान

  1. अपर्याप्त आधारभूत ढाँचा और सेवाएँ
  2. परिवहन की असुविधा
  3. अपराधों में वृद्धि
  4. आवास की कमी
  5. औद्योगीकरण
  6. द्वितीयक समूहों की प्रधानता
  7. वर्गीय व्यवस्था का उदय
  8. अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण का अभाव
  9. अवैयक्तिक सम्बन्धों की अधिकता
  10. भौतिकवादी विचारधारा का विकास
  11. पारम्परिक सामाजिक मूल्यों की प्रभावहीनता

1. अपर्याप्त आधारभूत ढाँचा और सेवाएँ यद्यपि नगरीकरण की तीव्रता से विकास की गति प्रकट होती है, परन्तु अति तीव्र नगरीकरण से नगरों में नगरीय सेवाओं और सुविधाओं का अभाव हो जाता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि दस-लक्षीय महानगरों की 30% से 40% तक जनसंख्या गन्दी बस्तियों (Slums) में निवास करती रही है। नगरों में ऐसी आवासविहीन जनसंख्या बहुत अधिक है जिसका जीवन-स्तर बहुत ही निम्न होता है।

एक अनुमान के अनुसार नगरीय केन्द्रों में केवल 35% घरों में विद्युत की सुविधा है, 33% घरों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध है और 68% घरों में शौच की सुविधा उपलब्ध है। अत: नगरीय जनसंख्या में वृद्धि के आधार पर नगरीय प्रशासन के आधारभूत ढाँचे और सेवाओं में विस्तार करना चाहिए। इसके लिए वित्तीय साधनों की पूर्ति नगरीय सेवाओं के बदले लगाए गए करों और केन्द्र सरकार द्वारा अनुदानों के द्वारा की जा सकती है।

2. परिवहन की असुविधा नगरों में जनसंख्या की भीड़ बढ़ने से परिवहन की समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं, परिवहन के साधन कम पड़ने लगे हैं तथा परिवहन मार्ग संकुचित हो गए हैं जिससे दुर्घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

3. अपराधों में वृद्धि आज नगरों में अपराधों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। चोरी, डकैती, हत्या, जुआखोरी, शराबखोरी, बलात्कार, धोखाधड़ी आदि का कारण तेजी से बढ़ती हुई नगरीय जनसंख्या ही है।

4. आवास की कमी जितनी तेजी से नगरों की जनसंख्या बढ़ रही है, उतनी तेजी से आवासों का निर्माण नहीं हो पा रहा है; अतः नगरों में आवासों की भारी कमी हो गई है।
नगरों में बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण परिवहन एवं आवास की समस्याएँ जटिल रूप धारण करती जा रही हैं। इसी के कारण नगरों में अपराधों की संख्या में भी वृद्धि होती है। अतः नगरों में परिवहन एवं आवास समस्याओं को दूर करने के लिए नगर मास्टर प्लान बनाया जाना चाहिए, साथ ही भूमि उपयोग नियोजन और भूमि क्रय-विक्रय नीति बनाई जानी चाहिए। अपराधों को रोकने के लिए सुरक्षा और जनशिक्षा का प्रसार महत्त्वपूर्ण उपाय होगा।

5. औद्योगीकरण नमरों का विकास हो जाने के कारण औद्योगीकरण की प्रक्रिया में तीव्रती आई है। प्राचीन उद्योग-धन्धे समाप्त हो गए हैं। नवीन उद्योग-धन्धों के विकास के कारण भारत में सामाजिक संगठन में परिवर्तन हुए हैं। पूँजीपति एवं श्रमिक वर्ग के बीच संघर्ष बढ़ गए हैं। स्त्रियों की आत्मनिर्भरता में वृद्धि हुई है। व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करने लगे हैं। कारखानों की स्थापना से गन्दी बस्तियों की समस्याओं एवं हड़तालों आदि के कारण जीवन में अनिश्चितता आ गई है।

6. द्वितीयक समूहों की प्रधानता नगरीकरण के कारण भारत में परिवार, पड़ोस आदि जैसे प्राथमिक समूह प्रभावहीन होते जा रहे हैं। वहाँ पर समितियों, संस्थाओं एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के द्वारा
ही सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना की जा सकती है। इस प्रकार के सम्बन्धों में अवैयक्तिकता की भावना पायी जाती है।

7. वर्गीय व्यवस्था का उदय नगरीकरण के प्रभाव से समाज में वर्गों का संगठन विभिन्न आधारों पर हो रहा है। एक वर्ग के व्यक्ति केवल अपने ही वर्ग के सदस्यों के साथ सम्बन्धों की स्थापना करते हैं। और उन्हीं का हित चाहते हैं। ये वर्ग प्रायः व्यवसायों के आधार पर बन गए हैं। इसीलिए आज अध्यापक वर्ग, श्रमिक वर्ग, लिपिक वर्ग, कर्मचारी वर्ग, अधिकारी वर्ग आदि के नाम सुने जाते हैं। इन वर्गों ने समाज को विभिन्न टुकड़ों में विभाजित कर दिया है।

वर्गीय व्यवस्था में परस्पर सामाजिक एकता की भावना के विकास हेतु सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। गन्दी बस्तियों की समस्याओं हेतु नगरों से पर्याप्त दूरी पर निर्बल वर्गीय आवासों का प्रबन्धन सरकारी स्तर पर किया जाना उपयुक्त होगा। इससे वर्गीय असन्तोष एवं समस्याओं को दूर किया जा सकता है।

8. अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण का अभाव नगरीकरण के कारण व्यक्तिवादी भावना का जन्म हुआ है। इस भावना के परिणामस्वरूप प्राचीन सामाजिक रीति-रिवाज प्रभावहीन हो गए हैं। प्राचीन समय में लोग समाज के नीति-रिवाज, पारिवारिक प्रथाओं तथा परम्पराओं के अनुसार काम करते थे, परन्तु नगरीकरण द्वारा उत्पन्न वैयक्तिक भावना के कारण सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन (जैसे–परिवार, प्रथाएँ, परम्पराएँ, रूढ़ियाँ, धर्म इत्यादि) प्रभावहीन हो गए हैं; अतः इन साधनों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।

9. अवैयक्तिक सम्बन्धों की अधिकता नगरीकरण के कारण नगरों में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि हुई है। जनसंख्या की इस वृद्धि के कारण लोगों में व्यक्तिगत सम्बन्धों में कमी आ गई है। इसी आधार पर आर० एन० मोरिस ने लिखा है-“जैसे-जैसे नगर विस्तृत होते जाते हैं, वैसे-वैसे इस बात की सम्भावना भी कम हो जाती है कि दो व्यक्ति एक-दूसरे को जानेंगे। नगरों में सामाजिक सम्पर्क अवैयक्तिक, क्षणिक, अनावश्यक तथा खण्डात्मक होता है। अत: नगरों में जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने हेतु विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।

10. भौतिकवादी विचारधारा का विकास नगरीकरण का विकास नागरिकों के दृष्टिकोण में भारी परिवर्तन लाया है। अभी तक भारत में अध्यात्मवाद की भावना पर बल दिया जाता था, परन्तु नगरों का विकास हो जाने से लोगों में भौतिकवाद की भावना का जन्म हुआ है। इस भौतिकवाद के कारण व्यक्ति का दृष्टिकोण उपयोगितावादी बन गया है। वह प्रत्येक वस्तु अथवा विचारधारा को उसी समय ग्रहण करता है जबकि वह उसके लिए भौतिक दृष्टि से उपयोगी हो या उसकी आर्थिक स्थिति में वृद्धि करती हो। इस भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण भारत में वैयक्तिक सम्बन्धों का अभाव पाया जाता है।

11. पारम्परिक सामाजिक मूल्यों की प्रभावहीनता नगरीकरण के कारण व्यक्तिवादी विचारधारा का विकास हुआ है। इस विचारधारा के कारण प्राचीन सामाजिक मूल्यों का ह्रास होने लगा है। प्राचीन समय में बड़े-बुजुर्गों का आदर, तीर्थ-स्थानों की पवित्रता, धर्म के प्रति आस्था, ब्राह्मण, गाय व गंगा नदी के प्रति श्रद्धा की मान्यता थी, परिवार की सामाजिक स्थिति का ध्यान रखा जाता था। परन्तु नगरीकरण का विकास हो जाने से प्राचीन सामाजिक मूल्य प्रभावहीन हो गए हैं। उनका स्थान भौतिकवाद तथा व्यक्तिवाद ने ले लिया है। अत: लोगों में नैतिक शिक्षा और मूल्यों के विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

नगरीकरण से उत्पन्न उपर्युक्त समस्याओं और उनके समाधान की विवेचना से स्पष्ट है कि जब तक नगर और ग्राम दोनों के विकास पर समान स्तर पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक इनमें उत्पन्न समस्याओं का समाधान कठिन है। वर्तमान समय में ग्रामों में विकास के प्रति उदासीनता के कारण ग्रामीण जनसंख्या नगरों की ओर पलायन कर रही है जिससे नगरों में जनसंख्या दबाव के कारण और ग्रामों से जनसंख्या प्रवास के कारण सामाजिक व आर्थिक अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इसलिए नगरीय समस्याओं को रोकने के लिए ग्रामों का विकास सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समाधान है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में जनसंख्या के असमान वितरण के लिए उत्तरदायी दो कारकों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप सबसे विरल आबाद महाद्वीप है, जहाँ जनसंख्या का औसत घनत्व 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से भी कम है। किन्तु इस महाद्वीप पर जनसंख्या का वितरण बहुत विषम है। दक्षिण-पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी समुद्रतटीय भागों में जनसंख्या का घनत्व 100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, जब कि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के मरुस्थलीय भागों में औसत जनघनत्व 1 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से भी कम है। इस विषम वितरण के अग्रलिखित कारण हैं –

  1. महाद्वीप के विशाल क्षेत्र पर मरुस्थल का विस्तार है, जहाँ कठोर जलवायु के कारण आबादी का घनत्व बहुत कम है।
  2. पूर्वी तथा दक्षिणी समुद्रतटीय भागों में पर्याप्त वर्षा, नदियों द्वारा जल की उपलब्धता, निचली पहाड़ियों के कारण मनोरम जलवायु, यातायात आदि सुविधाएँ प्राप्त होने के कारण घनी आबादी मिलती है।

प्रश्न 2
विश्व में अधिक जनसंख्या घनत्व वाले तीन क्षेत्रों का सकारण विवरण दीजिए। [2010]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 के अन्तर्गत (क) सघन बसे हुए क्षेत्र शीर्षक देखें।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure

प्रश्न 3
नगरीकरण वृद्धि के दो प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए। (2008, 15)
उत्तर
नगरीकरण वृद्धि के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  1. ग्रामीण जनसंख्या का प्रवास वर्तमान समय में ग्रामीण जनसंख्या नगरों की ओर तेजी से प्रवास कर रही है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन के लिए पर्याप्त आवश्यक सुविधाओं का अभाव है।
  2. असन्तुलित विकास ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास के असन्तुलन के कारण ग्रामीण क्षेत्र के लोग जीवनयापन के लिए रोजगार और अन्य आधारभूत सेवाओं के लिए नगरों में चले जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के लिए उपलब्ध कृषि विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कुटीर और लघु उद्योगों का भी ग्रामों में विकास नहीं किया गया है। इसलिए इस असन्तुलित
    आर्थिक विकास के कारण नगरीकरण में वृद्धि होती रहती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या घनत्व से क्या तात्पर्य है? [2009, 10]
उत्तर
जनसंख्या के घनत्व का आशय किसी क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या की सघनता से है। जनसंख्या के घनत्व को प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर निवास करने वाले व्यक्तियों की संख्या के रूप में मापा जाता है।

प्रश्न 2
पृथ्वीतल पर सभी आर्थिक व्यवसाय किसके द्वारा सम्पन्न होते हैं?
उत्तर
पृथ्वीतल पर सभी आर्थिक व्यवसाय मानव द्वारा सम्पन्न होते हैं।

प्रश्न 3
भूमध्यसागरीय भागों में मानव-बस्तियों के विकास के क्या कारण हैं?
उत्तर
भूमध्यसागरीय भागों में उसके चारों ओर मानव-बस्तियों के विकास के कारण हैं- मछलियों की प्राप्ति, सम जलवायु, समतल मैदानी भूमि जिसमें कृषि, परिवहन एवं मानव के आवासों का तीव्र गति से विकास हुआ है।

प्रश्न 4
वर्ष 2011 के अनुसार पृथ्वीतल पर कितनी जनसंख्या है?
उत्तर
वर्ष 2011 के अनुसार पृथ्वीतल पर 6.90 अरब जनसंख्या है।

प्रश्न 5
पृथ्वी पर जनसंख्या वितरण की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर
पृथ्वी पर जनसंख्या क्तिरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भूतल पर मनुष्यों का निवास असमान है।

प्रश्न 6
लिंगानुपात से क्या तात्पर्य है? [2009, 12, 15]
या
लिंग-अनुपात की व्याख्या कीजिए। [2013, 14]
उत्तर
लिंगानुपात या स्त्री-पुरुष अनुपात से अभिप्राय प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या से है।

प्रश्न 7
विश्व में जनसंख्या के किन चार समूहों का संकेन्द्रण हुआ है?
उत्तर
विश्व में जनसंख्या के जिनं चार समूहों का संकेन्द्रण हुआ है, वे हैं-

  1. चीन वं जापान
  2. भारत एवं बांग्लादेश
  3. यूरोपीय देश एवं
  4. पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 8
भारत में 2011 ई० की जनगणना के आधार पर जनसंख्या घनत्व क्या था?
उत्तर
2011 ई० की जनगणना के आधार पर भारत में जनसंख्या का घनत्व 382 प्रति वर्ग किमी था।

प्रश्न 9
दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में जनसंख्या का घनत्व क्यों कम है?
उत्तर
असमतल धरातल, विषम जलवायु, सघन वन, शुष्क मरुस्थल तथा अनुपजाऊ भूमि के कारण, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में जनसंख्या घनत्व कम (16 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी) है।

प्रश्न 10
अफ्रीका महाद्वीप के वे प्रमुख क्षेत्र बताइए जहाँ जनसंख्या का घनत्व मात्र 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।
उत्तर
अफ्रीका महाद्वीप के वे क्षेत्र जहाँ जनसंख्या का घनत्व मात्र 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, इस प्रकार हैं-सहारा का मरुस्थल, कालाहारी मरुस्थल तथा अबीसीनिया का पठार।

प्रश्न 11
किस जनसमूह को ‘कृषि सभ्यता या ‘चावल सभ्यता के नाम से पुकारा जाता है?
उत्तर
पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के मानव समूह को ‘कृषि सभ्यता’ या ‘चावल सभ्यता’ के नाम से पुकारा जाता है, क्योंकि यहाँ का मुख्य धन्धा कृषि एवं प्रमुख फसल चावल है।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure

प्रश्न 12
विश्व के किस महाद्वीप में सबसे कम जनसंख्या निवास करती है?
उत्तर
ऑस्ट्रेलिया विश्व में सबसे कम जनसंख्या रखने वाला महाद्वीप है। यहाँ विश्व की केवल 0.7% जनसंख्या निवास करती है तथा यहाँ जनसंख्या का घनत्व भी 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।

प्रश्न 13
उत्तर-पश्चिमी यूरोप को जनसंख्या की धुरी की संज्ञा क्यों दी जाती है?
उत्तर
यूरोप के उत्तर-पश्चिमी देश बहुत सघन बसे हुए हैं, इसी कारण इस क्षेत्र को जनसंख्या की धुरी की संज्ञा दी जाती है।

प्रश्न 14
एशिया का ‘मृत हृदय से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
एशिया के मध्यवर्ती पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्र लगभग जन-शून्य हैं। इन क्षेत्रों को एशिया का ‘मृत हृदय’ कहा जाता है।

प्रश्न 15
जनसंख्या के कृषि घनत्व से आप क्या समझते हैं? [2007, 12, 15]
उत्तर
कृषि के अन्तर्गत क्षेत्रफल एवं कृषक जनता के अनुपात को कृषि घनत्व कहते हैं।

प्रश्न 16
अंकगणितीय घनत्व से आप क्या समझते हैं? या जनसंख्या के गणितीय घनत्व की व्याख्या कीजिए। [2010]
उत्तर
किसी प्रदेश के क्षेत्रफल तथा वहाँ निवास करने वाली जनसंख्या का अनुपात गणितीय घनत्व कहलाता है। जनसंख्या में क्षेत्रफल से भाग देने पर प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व प्राप्त हो जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population Growth, Density, Distribution and Structure 3

प्रश्न 17
विश्व के किन्हीं दो जन संकुल क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर

  1. चीन व जापान तथा
  2. भारत एवं बांग्लादेश।

प्रश्न 18
जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की विवेचना कीजिए। [2009]
उत्तर
कुल जनसंख्या में कार्यशील जनसंख्या जो विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में संलग्न है; व्यावसायिक जनसंख्या की संरचना करती है। इस जनसंख्या को उच्च मानव संसाधन माना जाता है। देश के आर्थिक विकास एवं सामाजिक और परिवार के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1
विश्व के तटीय भागों तथा सीमा-पेटियों में निवास करने वाली जनसंख्या है –
(क) 28 प्रतिशत
(ख) 75 प्रतिशत
(ग) 57 प्रतिशत
(घ) 70 प्रतिशत
उत्तर
(ख) 75 प्रतिशत।

प्रश्न 2
निम्नलिखित में से कौन-सा देश निम्नजन्मदर एवं निम्न मृत्युदर से सम्बन्धित है?
(क) डेनमार्क
(ख) बेल्जियम
(ग) ब्रिटेन
(घ) इटली
उत्तर
(क) डेनमार्क।

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में जनसंख्या सर्वाधिक पाई जाती है?
(क) पूर्वी एशिया
(ख) दक्षिणी-पूर्वी एशिया
(ग) पश्चिमी यूरोप व उत्तरी पूर्वी
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर
(ख) दक्षिणी-पूर्वी एशिया।

प्रश्न 4.
वह महाद्वीप जिसका क्षेत्रफल विश्व का 16% है और जनसंख्या निवास केवल 8% है, वह है –
(क) एशिया महाद्वीप
(ख) अफ्रीका महाद्वीप
(ग) उत्तरी अमेरिका महाद्वीप
(घ) दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप
उत्तर
(ग) उत्तरी अमेरिका महाद्वीप।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure

प्रश्न 5
विकासशील देशों में जनाधिक्य होने का मुख्य कारण है –
(क) उच्च मृत्यु-दर
(ख) निम्न मृत्यु-दर
(ग) उच्च जन्म-दर
(घ) जन्म-दर की अपेक्षा कम मृत्यु-दर
उत्तर
(घ) जन्म-दर की अपेक्षा कम मृत्यु-दर।

प्रश्न 6
निम्नांकित में किसमें जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक पाया जाता है?
(क) भूमध्यरेखीय प्रदेश
(ख) उष्ण मानसूनी प्रदेश
(ग) चीन तुल्य प्रदेश
(घ) स्टेपी तुल्य प्रदेश
उत्तर
(ग) चीन तुल्य प्रदेश।

प्रश्न 7
निम्नांकित में किस राज्य में लिंग-अनुपात न्यूनतम है? [2007]
(क) छत्तीसगढ़
(ख) ओडिशा
(ग) हरियाणा
(घ) गुजरात
उत्तर
(ग) हरियाणा।

प्रश्न 8
निम्नलिखित देशों में से किस देश की जनसंख्या सर्वाधिक है ? [2010, 11, 12]
(क) भारत
(ख) चीन
(ग) रूस
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर
(ख) चीन।

प्रश्न 9
जैनसंख्यों के अधिक घनत्व के सम्बन्ध में निम्नलिखित में कौन सही है ? [2009]
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population Growth, Density, Distribution and Structure 2

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure (जनसंख्या : वृद्धि, घनत्व, वितरण एवं संरचना) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 4 Population : Growth, Density, Distribution and Structure (जनसंख्या : वृद्धि, घनत्व, वितरण एवं संरचना), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.