UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 1
Chapter Name Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence (स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था)
Number of Questions Solved 63
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1 Indian Economy on the Eve of Independence (स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों का केंद्र बिंदु क्या था? उन नीतियों के क्या प्रभाव हुए?
उत्तर
भारत में औपनिवेशिक शासकों द्वारा रची गई आर्थिक नीतियों का मूल केंद्र बिंदु भारत का आर्थिक विकास न होकर अपने मूल देश के आर्थिक हितों का संरक्षण और संवर्द्धन था। इन नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था के स्वरूप के मूल रूप को बदल डाला।। संक्षेप में, आर्थिक नीतियों के भारतीय अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े

  1. भारत, इंग्लैण्ड को कच्चे माल की आपूर्ति करने तथा वहाँ के बने तैयार माल का आयात करने वाला देश बनकर रह गया।
  2. राष्ट्रीय आय और प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि की दर धीमी हो गई।
  3. कृषि उत्पादकता में निरंतर कमी हुई।
  4. भारतीय उद्योगों का पतन होता चला गया।
  5. बेरोजगारी का विस्तार हुआ।
  6. साक्षरता दर में आशानुकूल वृद्धि न हो सकी।
  7. पूँजीगत एवं आधारभूत उद्योगों का विस्तार न हो सका।
  8. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव बना रहा।
  9. बार-बार प्राकृतिक आपदाओं और अकाल ने जनसामान्य को बहुत ही निर्धन बना डाला। इसके कारण, उच्च मृत्यु दर का सामना करना पड़ा

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नाम बताइए।
उत्तर
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री थे

  1. दादाभाई नौरोजी,
  2. विलियम डिग्वी,
  3. फिडले शिराज,
  4. डॉ० वी०के०आर०वी० राव,
  5. आर०सी० देसाई।

प्रश्न 3.
औपनिवेशिक शासन काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर
औपनिवेशिक शासन काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

  1. औपनिवेशिक शासन द्वारा लागू की गई भू-व्यवस्था प्रणाली।
  2. किसानों से अधिक लगान संग्रह।
  3.  प्रौद्योगिकी का निम्न स्तर।
  4.  सिंचाई सुविधाओं का अभाव।
  5. उर्वरकों का नगण्य प्रयोग।
  6. आर्थिक एवं सामाजिक पिछड़ापन।

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के समय देश में कार्य कर रहे कुछ आधुनिक उद्योगों के नाम बताइए।
उत्तर
स्वतंत्रता के समय देश में कार्य कर रहे कुछ आधुनिक उद्योगों के नाम इस प्रकार हैं

  1. सूती वस्त्र उद्योग,
  2. पटसन उद्योग,
  3. लोहा और इस्पात उद्योग (TISCO की स्थापना 1907 में हुई),
  4. चीनी उद्योग,
  5. सीमेंट उद्योग,
  6. कागज उद्योग।।

प्रश्न 5.
स्वतंत्रता पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत के व्यवस्थितवि-औद्योगीकरण का दोहरा ध्येय क्या था?
उत्तर
भारत के वि-औद्योगीकरण के पीछे विदेशी शासकों का दोहरा उद्देश्य यह था कि प्रथम, वे भारत को इंग्लैण्ड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बना सकें तथा द्वितीय, वे उन उद्योगों के उत्पादन के लिए भारत को ही एक विशाल बाजार बना सकें। इस प्रकार, वे अपने उद्योगों के विस्तार द्वारा अपने देश (ब्रिटेन) के लिए अधिकतम लाभ सुनिश्चित करना चाहते थे।

प्रश्न 6.
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परम्परागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कारण बताइए।
उत्तर
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परम्परागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। इसके निम्नलिखित कारण थे

  1. अंग्रेजी शासनकाल में राजाओं व नवाबों, जो हस्तकला उद्योगों को संरक्षण प्रदान करते थे, की स्वायत्तता समाप्त होती गई और उनकी आय भी सीमित हो गई।
  2. पाश्चात्य सभ्यता के प्रभावस्वरूप, भारतीयों की रुचियों व फैशन में परिवर्तन होने लगा। इससे माँग | का स्वरूभी बदलने लगा।
  3. अंग्रेजों ने शिल्पकारों पर भयंकर अत्याचार किए।
  4. इंग्लैण्ड में भारत से आयातों पर रोक लगा दी गई।
  5. ब्रिटिश सरकार की आर्थिक व औद्योगिक नीति भारतीय उद्योगों के विपक्ष में थी।
  6. शिल्पकारों के उत्पाद, कारखानों में निर्मित उत्पादों की प्रतियोगिता के समक्ष ठहर नहीं सके।
  7. सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति ने इन उद्योगों को पनपने नहीं दिया।

प्रश्न 7.
भारत में आधारिक संरचना विकास की नीतियों से अंग्रेज अपने क्या उद्देश्य पूरे करना चाहते थे?
उत्तर
औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत देश में रेलों, पत्तनों, जल-परिवहन व डाक-तार आदि का विकास हुआ। इसका उद्देश्य जनसामान्य को अधिक सुविधाएँ प्रदान करना नहीं था। अपितु देश के भीतर प्रशासन व पुलिस व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने एवं देश के कोने-कोने से कच्चा माल एकत्र करके अपने देश में भेजने तथा अपने देश में तैयार माल को भारत में पहुँचाना था।

प्रश्न 8.
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीतियों की कमियों की आलोचनात्मक विवेचना करें।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीति की निम्नलिखित कमियाँ थीं

  1. भारत में एक सृदृढ़ औद्योगिक आधार का विकास न करना।
  2. देश की विश्वप्रसिद्ध शिल्पकलाओं का धीरे-धीरे ह्रास होने देना।
  3. भारत को इंग्लैण्ड में विकसित हो रहे उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बनाना।
  4. इंग्लैण्ड के उद्योगों में बने माल के लिए भारत को ही विशाल बाजार बनाना।
  5. भावी औद्योगीकरण को हतोत्साहित करने हेतु पूँजीगत उद्योगों का विकास न करना।

प्रश्न 9.
औपनिवेशिक काल में भारतीय सैम्पत्ति के निष्कासन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
ब्रिटिश शासकों ने नागरिक प्रशासन तथा सेना के लिए बड़ी संख्या में अंग्रेज अधिकारी भर्ती किए तथा उन्हें भारतीय सहयोगियों की अपेक्षा बहुत अधिक वेतन और भत्ते दिए गए। सभी उच्च पदों पर ब्रिटिश अधिकारी ही नियुक्त किए गएं। असीमित प्रशासनिक शक्ति के कारण वे रिश्वत के रूप में भारी धनराशि लेने लगे। सेवानिवृत्त होने पर उन्हें पेंशन भी मिलती थी। भारत में रह रहे अधिकारी अपनी बचतों, पेंशन व अन्य लाभों के एक बड़े भाग को इंग्लैण्ड भेज देते थे। इन्हें पारिवारिक प्रेषण कहा गया। यह प्रेषण भारतीय सम्पत्ति को इंग्लैण्ड को निष्कासन था। इसके अतिरिक्त स्टर्लिंग ऋणों पर भारी ब्याज देना पड़ता था। इन्हें गृह ज्ञातव्य (home charges) का भुगतान करना पड़ता था। भारत को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के युद्धों का खर्च भी देना पड़ता था। इस प्रकार औपनिवेशिक काल में भारतीय सम्पत्ति का निष्कासन होता रहा।

प्रश्न 10.
जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष कौन-सा माना जाता है?
उत्तर
जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष 1921 माना जाता है।

प्रश्न 11.
औपनिवेशिक काल में भारत की जनांकिकीय स्थिति का एक संख्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करें।
उत्तर
ब्रिटिश भारत की जनसंख्या के विस्तृत ब्यौरे सबसे पहले 1881 की जनगणना के तहत एकत्रित किए गए। बाद में प्रत्येक दस वर्ष बाद जनगणना होती रही। वर्ष 1921 के पूर्व का भारत जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम सौपाने पर था। द्वितीय सोपान को आरम्भ 1921 के बाद माना जाता है। कुल मिलाकर साक्षरता दर तो 16 प्रतिशत से भी कम ही थी। इसमें महिला साक्षरता दर नगण्य, केवल 7 प्रतिशत आँकी गई थी। शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हजार थी। इस काल में औसत जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष थी। देश की अधिकांश जनसंख्या अत्यधिक गरीब थी।

प्रश्न 12.
स्वतंत्रता पूर्व भारत की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
औपनिवेशिक काल में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रकों में लगे कार्यशील श्रमिकों के आनुपातिक विभाजन में कोई परिवर्तन नहीं आया। कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था जिसमें 70-75 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी। विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्रकों में क्रमशः 10 प्रतिशत तथा 15 से 20 प्रतिशत जनसमुदाय को रोजगार मिल रहा था। इस काल में क्षेत्रीय विषमताओं में बड़ी विलक्षणती थी। मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ क्षेत्रों में कृषि पर जनसंख्या की निर्भरता कम हो रही थी। विनिर्माण तथा सेवा श्रेत्रकों का महत्त्व बढ़ रहा था वहीं दूसरी ओर पंजाब, राजस्थान एवं उड़ीसा में कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या में बढोत्तरी हो रही थी।

प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित करें।
उत्तर
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आर्थिक चुनौतियाँ इस प्रकार थीं

  1. कृषि क्षेत्र में अत्यधिक श्रम-अधिशेष एवं निम्न उत्पादकता।।
  2. औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ापन।
  3. पुरानी व परम्परागत तकनीक।
  4. विदेशी व्यापार पर इंग्लैण्ड का एकाधिकार।
  5. व्यापक गरीबी।
  6. व्यापक बेरोजगारी।
  7. क्षेत्रीय विषमताएँ।
  8. आधारिक संरचना का अभाव।

प्रश्न 14.
भारत में प्रथम सरकारी जनगणना किस वर्ष में हुई थी?
उत्तर
वर्ष 1881 में।

प्रश्न 15.
स्वतंत्रता के समय भारत के विदेशी व्यापार के परिमाण और दिशा की जानकारी दें।
उत्तर
विदेशी व्यापार का परिमाण द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत के विदेशी व्यापार की मात्रा में कमी हुई। आयातों में कमी होने के मुख्य कारण थे—शत्रु राष्ट्रों के साथ आयातों में कटौती, निर्यातक देशों का युद्ध में संलग्न होना, जहाजी यातायात की तंगी, यातायात भाड़े में वृद्धि और मशीनों के आयातों पर नियंत्रण। महाद्वीपीय देशों को निर्यात बंद हो जाने और जहाजी परिवहन की कमी के कारण ब्रिटेन को होने वाले निर्यातों में भी कमी आई। किंतु बाद के तीन वर्षों में इनमें तेजी से वृद्धि हुई।
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युद्ध के कारण विदेशी व्यापार की संरचना में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। आयात मद में कच्चे माल का हिस्सा बड़ा जबकि निर्मित वस्तुओं का हिस्सा घटा। इसके विपरीत निर्यातों में कच्चे माल का हिस्सा घटा जबकि निर्मित घस्तुओं का भाग बढ़ा। वस्तुओं की दृष्टि से इस अवधि में चाय तथा निर्मित जूट का निर्यात निरंतर बढ़ता रहा जबकि कच्चे जूट व तिलहन का निर्यात युद्ध से पूर्व तो बढ़ा किंतु उसके बाद घटता गया। सूती धागा, चीनी, सीमेंट, माचिस अन्य निर्मित माल तथा अन्य उपभोग वस्तुओं के आयात में निरंतर गिरावट आई जबकि खनिज तेल, रसायन, रंग आदि के आयात बढ़ते गए।

विदेशी व्यापार की दिशा- युद्धकाल में ब्रिटेन के साथ भारत के निर्यात और आयात दोनों प्रकार के व्यापार का प्रतिशत कम हो गया लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के देशों के साथ व्यापार में बहुत वृद्धि हुई। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार में तेजी से वृद्धि हुई। कनाडा के साथ व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। यूरोपीय देशों-फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैण्ड, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया आदि के साथ भारत का व्यापार घटता चला गया। जापान के युद्ध में कूद पड़ने के कारण भारत का उसके साथ व्यापार बंद हो गया।

प्रश्न 16.
क्या अंग्रेजों ने भारत में कुछ सकारात्मक योगदान भी दिया था? विवेचना करें।
उत्तर
भारत के आर्थिक विकास में अंग्रेजों का नकारात्मक पक्ष सकारात्मक पक्ष की तुलना में अधिक प्रबल है। यद्यपि अंग्रेजी इतिहासकार भारत के अल्पविकास के लिए अंग्रेजी शासन को उत्तरदायी नहीं मानते। इस बारे में एल०सी०ए० नोल्स (L.C.A. Knowles) का कहना है-“ब्रिटिश शासकों ने तो आर्थिक विकास को प्रोत्साहन दिया, न कि उसमें बाधा डाली। वेरा एन्स्टे (Vera Anstey) का कहना है कि नसंख्या में अत्यधिक वृद्धि और लोगों के दृष्टिकोण के कारण यह देश आर्थिक दृष्टि से अल्पविकसित रह गया। इसके लिए आर्थिक नीतियाँ अधिक जिम्मेदार नहीं हैं। भारतीय  अर्थशास्त्री-दादाभाई नौरोजी, रमेशचन्द्र दत्त, रजनी पाम दत्त, वी०वी० भट्ट आदि इन विचारों का खण्डन करते हैं। यद्यपि, भारत के अल्पविकास के लिए ब्रिटिश शासन ही उत्तरदायी है तथापि ब्रिटिश साम्राज्य का भारत के विकास में सकारात्मक योगदान भी रहा है जो निम्नलिखित है।

  1. ब्रिटिश शासन के अंतर्गत राजनीतिक एवं प्रशासन की दृष्टि से भारत एक इकाई बन गया।
  2. शांति एवं व्यवस्था की दृष्टि से स्थिति में सुधार हुआ।
  3. परिवहन और संचार सुविधाओं में वृद्धि हुई।
  4. नगरीय क्षेत्रों में पाश्चात्य उत्तरदायी विचारों का प्रभाव पड़ा।
    । इसके बावजूद राज्य की शोषणकारी आर्थिक नीति ने विकास के पुराने भौतिक आधार को नष्ट कर दिया. जो आगे चलकर भारत के आर्थिक विकास में बाधक बना।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने कब ब्रिटिश शासन की नींव डाली?
(क) सन् 1757 में
(ख) सन् 1857 में
(ग) सन् 1557 में
(घ) सन् 1657 में
उत्तर
(क) सन् 1757 में

प्रश्न 2.
कब तक भारत आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सम्पन्न तथा समृद्ध देश रहा?
(क) 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक
(ख) 18वीं शताब्दी के अंत तक
(ग) 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक
(घ) 19वीं शताब्दी के अंत तक
उत्तर
(ख) 18वीं शताब्दी के अंत तक

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय भारत की आजीविका का मुख्य स्रोत क्या था?
(क) उद्योग
(ख) पशुपालन ।
(ग) कृषि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) कृषि

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व भारत में भू-राजस्व संबंधी कितनी प्रणालियाँ प्रचलित थीं?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार ।
(घ) पाँच
उत्तर
(ख) तीन ।

प्रश्न 5.
भारत में अंग्रेजी शासन कब तक रहा?
(क) सन् 1847 तक
(ख) सन् 1740 तक
(ग) सन् 1950 तक
(घ) सन् 1947 तक
उत्तर
(घ) सन् 1947 तक ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से क्या आशय है?
उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद से आशय एक वर्ष की अवधि में देश की घरेलू सीमा में अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के प्रवाह से है।

प्रश्न 2.
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से क्या आशय है?
उत्तर
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से आशय है—देश में प्रति व्यक्ति द्वारा एक वर्ष में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रवाह। मापने का सूत्र
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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय आय में विभिन्न क्षेत्रों का क्या योगदान था?
उत्तर
वर्ष 1947 में राष्ट्रीय आय में विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिशत योगदान इस प्रकार था
1. प्राथमिक क्षेत्र = 587 प्रतिशत,
2. द्वितीयक क्षेत्र = 14.3 प्रतिशत,
3. तृतीयक क्षेत्र =27 प्रतिशत।

प्रश्न 4.
प्राथमिक क्षेत्र में कौन-कौन-सी आर्थिक क्रियाएँ शामिल की जाती है।
उत्तर
1. कृषि,
2. वानिकी,
3. मत्स्य पालन,
4. खनन।

प्रश्न 5.
‘स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ेपन की स्थिति में थी। इसके पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
1. कृषि पर अत्यधिक निर्भरता एवं कृषि ही आजीविका का मुख्य साधन थी। .
2. कार्यशील जनसंख्या का एक बड़ा भाग कृषि क्षेत्र में कार्यरत था। 

प्रश्न 6.
कृषि के सीमित व्यापारीकरण का क्या कारण था?
उत्तर
कृषि उत्पादन अधिकतर कृषि परिवारों के जीवन निर्वाह के लिए किया जाता था। बाजार में बिक्री के लिए बहुत कम उत्पादन बच पाता था।

प्रश्न 7.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था कैसी अर्थव्यवस्था थी?
उत्तर
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था

  1. एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी;
  2. एक गतिहीन अर्थव्यवस्था थी;
  3. एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था थी।

प्रश्न 8.
प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र क्या हैं?
उत्तर
1. प्राथमिक क्षेत्र—वह क्षेत्र जिसमें प्राकृतिक साधनों का प्रयोग करके वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है।
2. द्वितीयक क्षेत्र-  वह क्षेत्र जिसमें उद्यम एक प्रकार की वस्तु को दूसरे प्रकार में परिवर्तित करते
3. तृतीयक क्षेत्र— वह क्षेत्र जो सेवाओं का उत्पादन करता है।

प्रश्न 9.
व्यावसायिक संरचना से क्या आशय है?
उत्तर
व्यावसायिक संरचना का अर्थ है-कार्यशील जनसंख्या का विभिन्न व्यवसायों में वितरण।

प्रश्न 10.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की व्यावसायिक संरचना क्या थी?
उत्तर
स्वतंत्रता के समय 72.7 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्र में, 10.1 प्रतिशत द्वितीयक क्षेत्र में तथा 17.2 प्रतिशत जनसंख्या तृतीयक क्षेत्र में कार्यरत थी।

प्रश्न 11.
स्वतंत्रता के समय भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के नाम बताइए।
उत्तर
कच्चे उत्पादे; जैसे-रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील और पटसन।

प्रश्न 12.
स्वतंत्रता के समय भारत में आयात की जाने वाली वस्तुओं के नाम बताइए।
उत्तर
सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्रों जैसी अन्तिम उपभोग वस्तुएँ एवं इंग्लैण्ड के कारखानों में बनी हल्की मशीनें।

प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के समय व्यापार संतुलन की क्या स्थिति थी?
उत्तर
व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में था।

प्रश्न 14.
भारत में निर्याताधिक्य का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
देश के आंतरिक बाजारों में अनाज, कपड़ा और मिट्टी के तेल जैसी अनेक वस्तुओं का अभाव हो गया और उनके मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि होने लगी।

प्रश्न 15.
भारत में जनसंख्या की दृष्टि से महान विभाजक वर्ष कौन-सा है?
उत्तर
वर्ष 1921 को जनसंख्या की दृष्टि से महान विभाजक वर्ष माना जाता है।

प्रश्न 16.
स्वतंत्रता के समय विभिन्न सामाजिक अभिसूचकों की क्या स्थिति थी?
उत्तर
साक्षरता दर = 16.7%;
जीवन प्रत्याशा =32.1
वर्ष; मृत्यु दर = 29.4%;
शिशु मृत्यु दर = 218 प्रति हजार;
महिला साक्षरता दर = 7%l गरीबी,
व्यापक बेरोजगारी एवं असमानताएँ उस समय की विशेषताएँ थीं।

प्रश्न 17.

कुटीर उद्योगों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
1. कुटीर उद्याग मुख्यत: कृषि व्यवसाय से संबद्ध होते हैं।
2. इनमें अधिकांश कार्य मानवीय श्रम द्वारा किए जाते हैं।

प्रश्न 18.
ढाका की मलमल को अरब देशों में क्या कहा जाता था?
उत्तर
ढाका की मलमल को अरब देशों में ‘आबेहयात’ कहा जाता था।

प्रश्न 19.
ब्रिटिश काल में भारतीय शिल्प उद्योगों के पतन के दो कारण बताइए।
उत्तर
1. राजदरबारों की समाप्ति होने पर इन उद्योगों को संरक्षण मिलना बंद हो गया।
2. पाश्चात्य प्रभाव के फलस्वरूप रुचि एवं फैशन में परिवर्तन के कारण इनके प्रति जनरुचि कम हो गई।

प्रश्न 20.
भारतीय उद्योगों के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति कैसी थी?
उत्तर
ब्रिटिश सरकार की नीति भारतीय उद्योगों के विकास को अवरुद्ध करने की थी।

प्रश्न 21.
द्वितीय विश्वयुद्ध का भारतीय उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
मुद्रा प्रसार के कारण मूल्यों में तेजी से वृद्धि हुई, सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं का अभाव हो गया और आधारभूत उद्योगों की उपेक्षा हुई।

प्रश्न 22.
रैयतवाड़ी प्रथा के दो दोष बताइए।
उत्तर
1. लगाने का निर्धारण मनमाने एवं पक्षपातपूर्ण ढंग से किया गया।
2. लगान वृद्धि ने भू-सुधार कार्यक्रमों में बाधा डाली। 

प्रश्न 23.
जमींदारी प्रथा के विपक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
1. मध्यस्थों की संख्या में वृद्धि हुई।
2. लगान व शोषण में वृद्धि हुई।

प्रश्न 24.
हिल्टन यंग कमीशन की मुख्य सिफारिशें क्या थीं?
उत्तर
हिल्टन यंग कमीशन की मुख्य सिफारिशें थीं
1. देश में स्वर्ण धातुमान की स्थापना की जाए।
2. रुपए की विनिमय दर 1 शिलिंग 6 पेंस निर्धारित की जाए।

प्रश्न 25.
प्रेसीडेंसी बैंक कौन-कौन से थे? ।
उत्तर
1. बैंक ऑफ बंगाल,
2. बैंक ऑफ मुंबई,
3. बैंक ऑफ मद्रास।

प्रश्न 26.
भारत कब से कब तक ब्रिटिश उपनिवेश रहा?
उत्तर
भारत सन् 1757 से 1947 तक ब्रिटिश उपनिवेश रहा।

प्रश्न 27.
भारत में औपनिवेशिक शोषण के दो रूप बताइए।
उत्तर
1. दोषपूर्ण व्यापारिक नीतियों के फलस्वरूप भारतीय धन का निकास हुआ।
2. ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा भारत से ब्याज, लाभांश और लाभ के छ में धन बाहर ले जाया गया।

प्रश्न 28.
भारत के किस क्षेत्र में रैयतवाड़ी प्रथा लागू की गई?
उत्तर
सर टॉमस मुनरो ने सन् 1792 में मद्रास में रैयतवाड़ी प्रथा प्रारम्भ की। बाद में इसका विस्तार मुंबई एवं उत्तर भारत के ब्रिटिश क्षेत्रों में कर दिया गया।

प्रश्न 29. 
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई थी। दो तर्क दीजिए।
उत्तर
1. देश का आर्थिक ढाँचा अत्यधिक क्षीण था।
2. आधारभूत उद्योगों का विकास नहीं हुआ था।

प्रश्न 30.
भारतीय अर्थव्यवस्था के गतिहीन बने रहने के दो कारण दीजिए।
उत्तर
1. निम्न मजदूरी एवं निम्न क्रय-शक्ति के कारण मजदूरों की दशा अत्यधिक दयनीय थी।
2. ग्रामोद्योग एवं शिल्पकारों के पतन के कारण कृषि पर जनसंख्या का बोझ निरंतर बढ़ता जा रहा था।

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत आर्थिक विकास का स्तर निम्न था।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का मुख्य उद्देश्य इंग्लैण्ड में तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक आधार के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को एक पोषक अर्थव्यवस्था तक ही सीमित रखना था। अत: देश के आर्थिक विकास के स्थान पर वे अपने आर्थिक हितों के संरक्षण एवं संवर्द्धन में ही लगे रहे। भारत इंग्लैण्ड को कच्चे माल की पूर्ति करने तथा वहाँ के बने तैयार माल को आयात करने वाला देश ही बनकर रह गया। एक आकलन के अनुसार, 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत की राष्ट्रीय आय की वार्षिक संवृद्धि दर 2 प्रतिशत से कम रही तथा प्रति व्यक्ति उत्पाद वृद्धि दर मात्र आधा प्रतिशत ही रही।

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में कृषि क्षेत्र की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासनकाल में भारत मूलतः एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था ही बना रहा। देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर ही निर्भर थी किंतु कृषि उत्पादकता में निरंतर कमी होती गई, यह लगभग गतिहीन बनी रही। इस गतिहीनता का प्रमुख कारण दोषपूर्ण भू-व्यवस्था प्रणालियाँ थीं जिनमें मध्यस्थों की संख्या बढ़ती जा रही थी। कृषि लाभ के अधिकांश भाग को जमींदार ही हड़प जाते थे। राजस्व व्यवस्था भी जमींदारों के पक्ष में जाती थी। परम्परागत तकनीकी, सिंचाई-सुविधाओं का अभाव और उर्वरकों के नगण्य प्रयोग के कारण कृषि उत्पादकता के स्तर में वृद्धि न हो सकी। कृषि का व्यवसायीकरण सीमित था और नकदी फसलें ब्रिटेन के कारखानों में उपयोग के लिए भेज दी जाती थीं। स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन ने भी कृषि व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र (द्वितीयक क्षेत्र) की क्या  स्थिति थीं ।
उत्तर
कृषि की भाँति औपनिवेशिक व्यवस्था के अंतर्गत भारत एक सुदृढ़ औद्योगिक आधार का निर्माण नहीं कर पाया। विश्वप्रसिद्ध शिल्पकलाओं का पतन होता रहा और आधुनिक औद्योगिक आधार की नींव नहीं रखी गई। इसके पीछे ब्रिटिश सरकार के दो उद्देश्य थे—

  1. भारत को कच्चे माल का निर्यातक बनाना,
  2. इंग्लैण्ड के निर्मित माल के लिए भारत को एक विशाल बाजार बनने देना। इस दौरान जो भी विनियोग हुआ, वह उपभोक्ता उद्योगों के क्षेत्र में ही हुआ; जैसे—सूती वस्त्र, पटसन आदि। आधारभूत उद्योग के रूप में केवल एक उद्योग “टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी’ की 1907 में स्थापना की गई। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चीनी, कागज व सीमेंट के भी कुछ कारखाने स्थापित किए गए। अत: पूँजीगत उद्योगों का अभाव ही बना रहा। न केवल औद्योगिक क्षेत्र की संवृद्धि दर बहुत कम थी अपितु राष्ट्रीय आय में इनका योगदान भी बहुत कम था। सार्वजनिक क्षेत्र रेल, बंदरगाह, विद्युत व संचार तथा कुछ विभागीय उपक्रमों तक ही सीमित था।

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के समय भारत की व्यावसायिक संरचना किस प्रकार की थी?
उत्तरें
औपनिवेशिक काल में कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था और क्षेत्रीय विषमताओं में निरंतर वृद्धि हो रही थी। मद्रास प्रेसीडेंसी के क्षेत्रों में कृषि पर निर्भर कार्यशील जनसंख्या में कमी आ रही थी तो पंजाब, राजस्थान और उड़ीसा के क्षेत्रों में कृषि में संलग्न श्रमिकों में वृद्धि हो रही थी। 1951 में भारत में व्यावसायिक वितरण निम्नांकित प्रकार था-
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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता के समय भारत में आधारिक संरचना की क्या स्थिति थी?
उत्तर
औपनिवेशिक शासन के दौरान देश में रेलों, पत्तनों, जल परिवहन व डाकतार आदि का विकास हुआ किंतु इसके पीछे ब्रिटिश प्रशासकों का उद्देश्य जन-साधारण को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना नहीं था बल्कि अपने हितों का संवर्द्धन करना था। सड़कों का निर्माण इसलिए किया गया कि देश के भीतर उनकी सेवाओं के आवागमन में सुविधा हो तथा माल को निकट की मण्डियों तक पहुँचाया जा सके। रेलों के विकास ने कृषि के व्यवसायीकरण को प्रोत्साहित किया, निर्यात व्यापार की माँग में विस्तार हुआ। आंतरिक व्यापार एवं जलमार्गों के विकास पर भी ध्यान दिया गया। डाक सेवाओं का भी विस्तार किया गया। स्वतंत्रता के समय भारत की आधारिक संरचना की स्थिति इस प्रकार थी
रेलवे लाइन की लंबाई = 33,000 मील;
पक्की सड़कों की लंबाई = 97,500 मील;
समुद्री जहाजों का भार = 31 लाख GRT;
बैंकों की कुल शाखाएँ =4115;
विद्युत उत्पादन क्षमता = 23 लाख किलोवाट;
विद्युतीकरण ग्रामों की संख्या = 3,000

प्रश्न 6.
भारत में दि-औद्योगीकरण के क्या परिणाम हुए?
उत्तर
भारत में वि-औद्योगीकरण (उद्योगों के पतन) के निम्नलिखित परिणाम हुए

  1. उद्योगों में कार्यरत कर्मचारियों, शिल्पकारों व अन्य कारीगरों के समक्ष जीवन-यापन की समस्या आरम्भ हो गई। वैकल्पिक रोजगार के अभाव में कृषि ने उन्हें आश्रय दिया। फलतः कृषि पर आश्रित जनसंख्या का अनुपात बढ़ता गया। यह सन् 1861 में 55% से बढ़कर सन् 1911 तक 72% हो गया।
  2. भारत की व्यापारिक स्थिति में व्यापक परिवर्तन हुए। 18वीं शताब्दी के अंत तक भारत अधिकांशत: तैयार वस्तुएँ बाहर भेजता था। इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप कच्चे माल की माँग बढ़ी जिसकी आपूर्ति भारत जैसे विशाल उपनिवेशों से ही हो सकती थी। दूसरी ओर इंग्लैण्ड के कारखानों में बनी वस्तुओं के लिए भारत में विशाल बाजार उपलब्ध था। अतः भारतीय उद्योगों के पतन के साथ-साथ इंग्लैण्ड में तैयार वस्तुएँ भारत में आने लगीं और इसके बदले यहाँ से कच्चे माल का निर्यात बढ़ता गया।
  3. शिल्पकारों के कृषि के क्षेत्र में आने पर भूमि की माँग बढ़ गई। 19वीं शताब्दी के अकालों केकारण भी कारीगर ग्रामीण उद्योगों में अपनी जीविकोपार्जन करने में असमर्थ हो चले थे। अत: कृषि क्षेत्र में आने वाले बहुत कम व्यक्ति भूमि खरीदकर खेती करने की स्थिति में थे। फलस्वरूप कृषि क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ती गई जो भूमिहीन थे और केवल श्रम द्वारा ही जीविकोपार्जन करना चाहते थे।
  4. शिल्पकारों की आर्थिक स्थिति खराब होती गई।

प्रश्न 7.
देश विभाजन का भारतीय उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर
15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, साथ ही वह दो भागों में विभाजित भी हो गया। यद्यपि यह विभाजन राजनीतिक था तथापि आर्थिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण था। भारतीय उद्योगों पर देश विभाजन के निम्नांकित प्रभाव पड़े

  1. भारत को अविभाजित देश के क्षेत्रफल का 77%, जनसंख्या का 82%, औद्योगिक संस्थाओं का 91% और रोजगार प्राप्त श्रमिकों का 93% भाग मिला।
  2. अधिकांश खनिजभण्डार भारत में ही रहे। भारत को अविभाजित भारत के संपूर्ण खनिज साधनों के केवल 3% मूल्य के खनिज पदार्थों की हानि हुई।
  3. देश के दो प्रमुख उद्योगों—सूती वस्त्र और जूट उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसका कारण कच्चे माल का अभाव था। अविभाजित भारत को कच्चे जूट के उत्पादन पर एकाधिकार प्राप्त था,लेकिन विभाजन के परिणामस्वरूप जूट उत्पादन क्षेत्र का 81% भाग पाकिस्तान में चला गया।
  4. पाकिस्तान में चले जाने वाले क्षेत्र में भारतीय उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की पर्याप्त माँग रहती थी। विभाजन के बाद इन वस्तुओं की माँग में कमी आ गई। अत: इन उद्योगों को अपने उत्पादन की खपत के लिए नये बाजारों की खोज करनी पड़ी।
  5. विभाजन के फलस्वरूप भारत से बड़ी मात्रा में योग्य एवं कुशल श्रमिक पाकिस्तान चले गए;फलस्वरूप भारतीय उद्योगों में कुशल श्रमिकों की कमी हो गई।
  6. उद्योगों की विविधता के कारण अधिकांश उद्योगपति भारत आ गए। इससे भारत में औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिला।
  7. विभाजन के पश्चात् देश में अनिश्चित एवं अस्थिर वातावरण उत्पन्न हो गया। भारतीय अर्थव्यवस्था पर विदेशियों के विश्वास में कमी आई और देश में विदेशी पूँजी का प्रवाह कम हो गया।
  8. विभाजने के पश्चात् रेलवे की स्थिति भी असंतोषजनक रही। चटगाँव और करांची बंदरगाह विदेशी | हो गए तथा मुंबई और कोलकाता बंदरगाहों पर विशेष भार आ पड़ा। कुल मिलाकर पाकिस्तान कीतुलना में भरत लाभदायक स्थिति में रहा।

प्रश्न 8.
भारत में उपनिवेशी शोषण के परिणाम क्या थे?
उत्तर
उपनिवेशी शोषण के निम्नांकित परिणाम हुए-

  1. भारत मूलत: ‘कृषि-प्रधान देश ही रहा और चाय, कॉफी, मसाले, तिलहन, गन्ना तथा अन्य सामग्रियों और अन्य कच्चे माल के निर्यात द्वारा ग्रेट ब्रिटेन के हितों की रक्षा के लिए भारतीय कृषि वाणिज्यीकृत हो गई।
  2. भारत को अपने औद्योगिक ढाँचे का आधुनिकीकरण नहीं करने दिया गया। इसके हस्तशिल्पों को | नष्ट कर दिया गया तथा वह निर्मित माल का आयातक बन गया।
  3. साम्राज्य अधिमान की भेदमूलक संरक्षण नीति अपनाने का परिणाम यह हुआ कि भारत के ब्रिटिश विनियोक्ताओं के लिए सुरक्षित विश्वस्त क्षेत्र ढूंढने में सहायता मिली।
  4. उपभोक्ता वस्तु उद्योगों-चाय, कॉफी और रबड़ बागान में प्रत्यक्ष ब्रिटिश विनियोग किया गया, लेकिन भारी और आधारभूत उद्योगों के विकास के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया।
  5. प्रबन्ध अभिकरण प्रणाली का स्वरूप शोषणकारी ही रहा।
  6. अंग्रेजों ने गृह ज्ञातव्य (home charges) के रूप में आर्थिक विकास द्वारा भारत का शोषण किया। परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था अल्पविकास की स्थिति में ही रह गई।

प्रश्न 9.
“स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विभिन्न शोषणकारी नीतियों एवं गरीबी और बेरोजगारी के परिणामस्वरूप अर्थचक्र बदलते-बदलते ऐसी स्थिति आ गई कि स्वतंत्रता के समय देश का आर्थिक ढाँचा अत्यधिक क्षीण हो गया था। अक्षम कृषि प्रणाली और दूषित भू-स्वामित्व व्यवस्था के नीचे करोड़ों किसान पिस रहे थे। कृषि मूलतः जीवन निर्वाहपरक ही बनी हुई थी। औद्योगिक क्षेत्र में भी स्थिति संतोषजनक न थी। वास्तव में, ब्रिटिश सरकार की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों ने हमारे देश को मुख्य रूप से प्राथमिक वस्तुओं के उत्पादक के रूप में 
परिवर्तित कर दिया। कुल राष्ट्रीय आय का केवल 17.1% भाग ही खनन उद्योग तथा लघु उद्योगों से प्राप्त होता था। उत्पादक उद्योगों में उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रधानता थी। इन उपभोक्ता वस्तु उद्योगों के वर्ग में भी कृषि क्षेत्र से प्राप्त उत्पादन की प्रक्रिया (process) करने वाले उद्योगों का प्रमुख स्थान था। ये उद्योग तकनीकी दृष्टि से अत्यधिक पिछड़े थे। उत्पादकता का स्तर भी निम्न था। पूँजीगत वस्तुओं, विद्युत उपकरणों तथा रसायन उत्पादनों की मात्रा अत्यधिक नगण्ये थी। वास्तव में, यह ब्रिटेन के हितों के अनुकूल ही था कि भारत औद्योगिक दृष्टि से एक पिछड़ा देश रहा। जो थोड़े-बहुत उद्योग देश में स्थापित थे उनमें विदेशी पूँजी की प्रधानता थी।

दीर्घ उतरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के औपनिवेशिक शोषण के विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अंग्रेज व्यापार करने आए थे किंतु 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल पर आधिपत्य स्थापित कर ब्रिटिश शासन की नींव डाली और सन् 1947 ई० तक भारत पर शासन किया। इस उपनिवेश की शासन व्यवस्था के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का शोषण किया गया। उपनिवेशी शोषण के मुख्य रूप निम्नांकित थे
1. व्यापार नीतियों द्वारा शोषण- ब्रिटिश सरकार ने ऐसी व्यापारिक नीतियों का सहारा लिया कि ब्रिटिश उद्योगों को कच्चे माल की पर्याप्त आपूर्ति की जा सके।
(1) सरकार ने नील-निर्यात को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने किसानों को अपनी भूमि पर नील उगाने 
और बहुत कम मूल्य पर नील के पौधे बेचने को विवश किया।
(2) दस्तकारों को बाजार मूल्य से बहुत कम मूल्य पर सूती वस्त्र व रेशमी वस्त्र बेचने को 
विवश किया गया। इसके अतिरिक्त दस्तकारों को बंधक मजदूरों के रूप में काम करना | पड़ा।
(3) आयात और निर्यात शुल्कों में व्यापक परिवर्तन किए गए; यथा—

(अ) सन् 1700 के बाद छपे हुए कपड़ों का इंग्लैण्ड में आयात बंद कर दिया गया,
(ब) भारतीय वस्तुओं पर भारी सीमा-शुल्क और ब्रिटिश वस्तुओं के भारत में आयात पर बहुत मामूली शुल्क लगाए गए,
(स) भेद-मूलक संरक्षण नीति के अंतर्गत ऐसे उद्योगों को संरक्षण दिया गया जिन्हें 
ग्रेट ब्रिटेन के अलावा अन्य देशों से प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता था।

2. ब्रिटिश पूँजी के निर्यात द्वारा शोषण- भारत में अंग्रेजों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में विनियोग किए गए। जैसे-रेलवे, बंदरगाह, जहाजरानी, विद्युत, जल प्रबंध, सड़क व परिवहन, वाणिज्यिक कृषि, | चाय, कहवा व रबड़, कपास, पटसन, तम्बाकू, चीनी वे कागज, बैंक, बीमा एवं व्यापार, इंजीनियरिंग, रसायन व मशीन-निर्माण। ये सभी विनियोग ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय निगमों तथा अनुषंगी कम्पनियाँ बनाकर किए गए। ये निगम शोषण के प्रमुख उपकरण थे और भारत के ब्याज, लाभांश * और लाभ के रूप में धन बाहर ले जाते थे।

3. प्रबन्ध अभिकरण प्रणाली द्वारा वित्त पूँजी से शोषण- कम्पनियों के प्रबंध का कार्य प्रबंध अभिकर्ताओं को सौपा गया था। ये प्रबंध अभिकर्ता कच्चे माल, भण्डार उपकरण और मशीनों तथा उत्पादन की बिक्री जैसे कुछ कामों पर दलाली पाते थे, कार्यालय भत्ते लेते थे और लाभ का एक अंश प्राप्त करते थे।

4. ब्रिटिश प्रशासन व्यय के भुगतान द्वारा शोषण— ब्रिटिश शासकों ने नागरिक प्रशासन एवं सेना के लिए बहुत अधिक वेतन और भत्तों पर अंग्रेज अधिकारी भर्ती किए। अनेक सुविधाएँ एवं असीमित प्रशासनिक शक्ति के कारण उन्हें बड़ी मात्रा में रिश्वत मिलती थी, सेवानिवृत्त होने पर पेंशन मिलती थी। बचत, पेंशन व अन्य लाभों को वे इंग्लैण्ड अपने घर भेज देते थे। स्टर्लिंग ऋणों पर भारी ब्याज भी इंग्लैण्ड ही जाता था। इस प्रकार हमारे संसाधनों का भारी निकास (drain) हुआ।

प्रश्न 2.
भारतीय शिल्प उद्योगों के पतन के मुख्य कारण बताइए।
उत्तर
18वीं शताब्दी के अंत तक भारत आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सम्पन्न तथा समृद्ध देश था। यहाँ के कृषकों, शिल्पकारों तथा व्यापारियों की कार्यकुशलता विश्वभर में प्रसिद्ध थी। भारतीय औद्योगिक आयोग, 1916 ने लिखा है-“जिस समय आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के उद्गम पश्चिमी यूरोप में असभ्य जातियाँ निवास करती थीं, भारत अपने शासकों के वैभव तथा शिल्पकारों की उच्चकोटि की काना हेतु विख्यात था।” परंतु 19वीं शताब्दी की अनेक घटनाओं ने हमारे उद्योगों व हस्तकलाओं को प्रायः नष्ट कर दिया। डॉ० गाडगिल के अनुसार, 1880 तक भारतीय उद्योगों का पराभव हो चुका था। भारतीय शिल्प उद्योगों के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

1. राजदरबारों की समाप्ति- सामान्यतः राजा, महाराजा और सामंत लोग हस्तकलाओं के पारखी हुआ करते थे। उनके संरक्षण में ही भारतीय उद्योग फले-फूले थे। ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ इनकी स्थिति दयनीय होती गई और हस्तकलाओं का पराभव होने लगा।

2. रुचि व फैशन में परिवर्तन- धीरे-धीरे भारतीय पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होने लगे। उनकी रुचि और फैशन में परिवर्तन के साथ-साथ, इनकी माँग के स्वरूप में भी परिवर्तन होने लगा। इससे स्वदेशी उद्यागों को धक्का लगा।

3. शिल्पकारों पर अत्याचार- ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा नियुक्त ठेकेदार शिल्पकारों पर भयानक अत्याचार करते थे। बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत पर उत्पाद खरीदना सामान्य बात थी। प्रशासन का अधिकार मिलने पर दमन व शोषण की यह प्रक्रिया और तीव्र हो गई। इससे परेशान होकर अनेक शिल्पकारों ने यह कार्य ही छोड़ दिया।

4. इंग्लैण्ड में भारतीय वस्तुओं के आयात पर रोक– भारत से आयात की जाने वाली वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगा दिए गए। ये कर 50 प्रतिशत से 400 प्रतिशत तक थे। रेशमी वस्त्रों का आयात पूर्णतः बंद कर दिया गया।

5. दोषपूर्ण आर्थिक एवं औद्योगिक नीति– ब्रिटिश सरकार ने अपनी आर्थिक और औद्योगिक नीति का निर्माण इस प्रकार किया जिससे भारतीय उद्योगों पर कुठाराघात हो। उदाहरण के लिए मुक्त व्यापार नीति, भारी आयात-निर्यात कर एवं भारी अंतर्राज्यीय करों ने भारतीय उद्योगों को अत्यधिक क्षति पहुँचाई। :

6. पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव- जैसे-जैसे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार होता गया। देश का धनी वर्ग ब्रिटिश प्रशासकों का कृपापात्र बनने के लिए पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने लगा। वह भारतीय माल की अपेक्षा विदेशी माल का उपयोग करने लगा और भारतीय उत्पादों की माँग देश में कम हो गई।

7. विदेशी वस्तुओं से प्रतियोगिता में असफल- इंग्लैण्ड के आधुनिक उद्योगों में प्रयुक्त मशीनों से उत्पन्न माल के समक्ष परम्परागत तकनीक से निर्मित भारतीय माल न ठहर सका। इसका कारण यह था कि मिल में बनी वस्तुएँ सस्ती, गुण में अच्छी और अधिक टिकाऊ थीं।

8. शिल्पकला का ह्रास– विदेशी वस्तुओं के समक्ष प्रतियोगिता में न ठहर पाने के साथ-साथ स्वदेशी वस्तुओं के गुण, स्तर, किस्म और आकर्षण में कमी आने लगी। दुर्भाग्य से इसी समय भारतीय सामंतशाही स्वदेशी वस्तुओं को ही घृणा की दृष्टि से देखने लगी। इसका भारतीय उद्योगों पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

9. सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति- भारत में ब्रिटिश सरकार ने न केवल यहाँ के उद्योगों के प्रति उपेक्षा दिखाई अपितु अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें नष्ट भी किया। देश का कच्चा माल इंग्लैण्ड भेजा जाने लगा और उसी कच्चे माल से निर्मित माल वहाँ से देश में आने लगी। आंतरिक व्यापार को नष्ट करके विदेशी व्यापार में वृद्धि की गई और भारत सरकार भारत की प्रगति के बारे में तटस्थ तथा निष्क्रिय बनी रही। इस प्रकार धीरे-धीरे भारतीय हस्तकलाओं का ह्रास होता गया।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

1. प्रति व्यक्ति आय का निम्न स्तर–स्वतंत्रता के समय देश की प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी। देश में निर्धनता व्यापक रूप में विद्यमान थी। इस समय, अभाव तथा भुखमरी भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा का बयान करती थी।

2. कृषि एक मुख्य व्यवसाय—स्वतंत्रता के समय भारत में कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था थी। यहाँ की लगभग 72.7 प्रतिशत जनसंख्या कृषि-कार्य में लगी हुई थी। विकसित देशों की तुलना में यह प्रतिशत बहुत अधिक था।

3. कृषि, आजीविका का मुख्य स्रोत– स्वतंत्रता के समय कृषि भारत की आजीविका का मुख्य स्रोत थी। 72.7 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी तथा राष्ट्रीय आय में इसका योग आधे से भी अधिक लगभग 56 प्रतिशत था।

4. उत्पादकता का निम्न स्तर– स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि क्षेत्र का उत्पादन उसकी माँग की तुलना में कम था। इसके अतिरिक्त उत्पादकता का स्तर भी निम्न था। यह भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का प्रतीक था। उत्पादन की परम्परागत तकनीक कृषि के विकास में बाधक बनी हुई थी।

5. मध्यस्थों की अधिकता– स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में भू-राजस्व संबंधी तीन प्रणालियाँ
प्रचलित थीं—

  1. जमींदारी प्रथा,
  2. महालवाड़ी प्रथा तथा
  3. रैयतवाड़ी प्रथा। सरकार तथा किसानों के बीच मध्यस्थों की एक बड़ी श्रृंखली थी। ये मध्यस्थ किसानों से बहुत अधिक लगान वसूल करने लगे। मध्यस्थों द्वारा किए जाने वाले इस शोषण ने कृषि उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला।

6. कृषि व्यवसायीकरण का अभाव- स्वतंत्रता से पूर्व भातीय कृषि मात्र जीवन-निर्वाह का साधन थी। कृषि का व्यवसायीकरण सीमित था। बाजार में बिक्री के लिए बहुत कम उत्पादन बेच पाता था, सारा का सारा स्व-उपयोग पर ही व्यय हो जाता था।

7. उपभोक्ता उद्योगों का धीमा विकास– भारत में ब्रिटिश पूँजी की सहायता से कुछ उपभोक्ता उद्योगों; (जैसे-कपड़ा, जूट, चीनी, माचिस आदि) की स्थापना एवं विकास किया गया था किंतु इन उद्योगों में किए गए निवेश पर ब्याज तथा प्राप्त लाभांश विदेश भेज दिया जाता था। इसका उपयोग देश के औद्योगिक विकास के लिए नहीं किया गया।

8. आधारभूत उद्योगों का अभाव- स्वतंत्रता के समय देश में पूँजीगत, भारी एवं आधारभूत उद्योगों का अभाव था। केवल एक ही आधारभूत उद्योग था-टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर। देश का औद्योगिक आधार अत्यधिक कमजोर था।

9. कुटीर एवं लघु उद्योगों का हास– ब्रिटिश शासनकाल से पूर्व भारतीय शिल्प उद्योग चरमोत्कर्षपर थे। ढाका की मलमल (आबेहयात) विश्वभर में प्रसिद्ध थी। किंतु ब्रिटिश प्रशासकों की दोषपूर्ण नीति के कारण धीरे-धीरे उनका पतन हो गया। 18. आधारभूत संरचना का अभाव-स्वतंत्रता के

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name कविवर बिहारी
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
बिहारी का जीवन-परिचय लिखिए।
या
बिहारी की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
कविवर बिहारी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – कविवर बिहारी का जन्म संवत् 1660 (सन् 1603 ई०) के लगभग ग्वालियर के निकट वसुआ गोविन्दपुर नामक ग्राम में हुआ था। ये चतुर्वेदी ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम केशवराय था। इनकी युवावस्था ससुराले (मथुरा) में ही बीती थी। अधिक दिन तक ससुराल में रहने के कारण इनका आदर कम हो गया; अतः ये खिन्न होकर जयपुर-नरेश महाराजा जयसिंह के यहाँ चले गये। इस जीवन में इन्हें अनेक कटु अनुभव प्राप्त हुए, जिनके सम्बन्ध में इनकी सतसई में कई दोहे मिलते हैं। कहा जाता है कि उस समय जयसिंह अपनी नवोढ़ा रानी के प्रेम में लीन थे; अत: राजकाज बिल्कुल नहीं देखते थे। इस पर बिहारी ने निम्नलिखित दोहा लिखकर महाराजा के पास भेज दिया

नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काले।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगैं कौन हवाल॥

राजा के हृदय पर इस दोहे ने जादू का-सा असर किया। वे पुन: राजकाज में रुचि लेने लगे। बिहारी बड़े गुणज्ञ थे। उन्हें अनेक विषयों की जानकारी थी। सुह बात उनकी सतसई का अध्ययन करने पर स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाती है। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारी को वैराग्य हो गया और वे दरबार छोड़कर वृन्दावन चले गये। वहाँ पर संवत् 1720 (सन् 1663 ई०) के आस-पास इनकी मृत्यु हो गयी।

ग्रन्थ – बिहारी ने कुल 719 दोहे लिखे हैं, जिन्हें ‘बिहारी सतसई के नाम से संगृहीत किया गया है। इसकी अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। ‘बिहारी-सतसई’ के समान लोकप्रियता रीतिकाल के किसी अन्य ग्रन्थ को प्राप्त न हो सकी।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ
बिहारी रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि थे। इनकी ‘सतसई में नायिका–भेद, नखशिख-वर्णन, विभावों, अनुभावों, संचारी भावों आदि का चित्रण प्रमुख रूप से पाया जाता है, जो रीतिकाल की परम्परा के अनुकूल है। दोहे जैसे छोटे छन्द में बिहारी ने भाव का सागर लहरा दिया है। यह वास्तव में गागर में सागर भरने जैसा कार्य है। इसी विशेषता के कारण उनके दोहों की प्रशंसा करते हुए किसी कवि ने कहा है

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। ।
देखने में छोटे लगैं, घाव करें गम्भीर ॥

सौन्दर्य के चितेरे – बिहारी सौन्दर्य के रससिद्ध कवि थे। इन्होंने बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के सौन्दर्य का सुन्दर चित्रण किया है। नायिका के बाह्य सौन्दर्य का एक चित्र निम्नांकित है

नीको लसत ललाट पर, टीको ज़रित जराय।
छविहिं बढ़ावत रवि मनौ, ससि मंडल में आये।

प्रकृति-चित्रण – बिहारी ने प्रकृति का कहीं-कहीं आलम्बन-रूप में भी चित्रण किया है, जो रीतिकाल के कवियों में कम मिलता है। ठण्डी हवा का यह स्वरूप द्रष्टव्य है

लपटी पुहुप पराग पर, सनी सेंद मकरंद ।
आवति नारि नवोढ़ लौ, सुखद वायु गति मंद।।

प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण तो रीतिकाल की सामान्य विशेषता ही थी। उसके सुन्दर चित्रों की ‘बिहारी-सतसई’ में भरमार है।

भक्ति-भावना – बिहारी श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उनका जीवन भगवद्भक्ति में ही बीता। अपने भक्ति सम्बन्धी दोहों में उन्होंने सच्ची और दृढ़ भक्ति पर बल दिया है। उनकी भक्ति सखा-भाव की है। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक मन में कपट है, तब तक भगवान् की प्राप्ति असम्भव है

तौ लौ या मन सदन में, हरि आर्दै केहि बाट।
निपट जटै नैं लौ विकट, खुलै न कपट कपाट॥

मुक्तक कवि के रूप में – मुक्तक काव्य में सफलता पाने के लिए कवि में दो बातों का होना नितान्त आवश्यक होता है (1) भावों को समेटने की शक्ति तथा (2) थोड़े शब्दों में अधिक बात कह सकने की क्षमता। बिहारी में ये दोनों गुण पूर्ण रूप में विद्यमान थे। उन्होंने अपने दोहों में व्यंजना का सहारा लेकर बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहकर चमत्कार कर दिखाया है।

अनुभाव-योजना – अनुभावों की योजना में बिहारी बड़े कुशल हैं। थोड़े-से शब्दों में वे एक पूरा सवाक् चित्र-सा खड़ा कर देते हैं

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात ।
भरे भौन मैं करते हैं, नैननु ही सौं बात ॥

इस दोहे में कवि ने नायक और नायिका का पूरा वार्तालाप आँखों के इशारों में ही करा दिया है।

रस-योजना – यद्यपि बिहारी मुख्यतः श्रृंगारी कवि थे, तथापि इनके दोहों में हास्य, शान्त आदि रसों को भी परिपाक मिलता है। बिहारी को सर्वाधिक सफलता श्रृंगार वर्णन में मिली है। श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का चित्रण करने में इन्होंने ‘अपूर्व कौशल दिखाया है। प्रेमिका के संयोग श्रृंगार का चित्रण कितना मनोहारी है

बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाई॥

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – इनकी भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें कहीं-कहीं बुन्देली, अरबी, फारसी आदि के शब्द भी पाये जाते हैं। मुहावरों के प्रयोग द्वारा भाषा में बहुत प्रवाह आ गया है। बिहारी की भाषा इतनी सुगठित है कि उसका एक शब्द भी अपने स्थान से हटाया नहीं जा सकता।

शैली
– बिहारी की शैली विषय के अनुसार बदलती है। भक्ति एवं नीति के दोहों में प्रसाद गुण की तथा श्रृंगार के दोहों में माधुर्य एवं प्रसाद की प्रधानता है।

अलंकार-विधान – बिहारी ने अलंकारों का अधिकारपूर्वक प्रयोग किया है। असंगति अलंकार का एक उदाहरण द्रष्टव्य है

दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर-चित प्रीति ।
परति गाँठ दुरजन हियै, दई नई यह रीति ॥

साहित्य में स्थान – निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि बिहारी उच्चकोटि के कवि एवं कलाकार थे। असाधारण कल्पना-शक्ति, मानव-प्रकृति के सूक्ष्म ज्ञान तथा कला-निपुणता ने बिहारी के दोहों में अपरिमित रस भर दिया है। इन्हीं गुणों के कारण इन्हें रीतिकालीन कवियों का प्रतिनिधि कवि कहा जाता है।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

भक्ति एवं शृंगार

प्रश्न 1:
अजौं तरुयौना ही रह्यौ, श्रुति सेवत इक रंग ।
नाक बास बेसरि लह्यौ, बसि मुकतनु के संग ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) बेसर नामक आभूषण कहाँ पहना जाता है?
(iv) वेदों के अध्ययन से श्रेष्ठ किसे बताया गया है?
(v) प्रस्तुत दोहे में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) यह दोहा महाकवि बिहारी की विख्यात कृति ‘सतसई’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भक्ति एवं श्रृंगार’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – भक्ति एवं श्रृंगार।
कवि का नाम – कविवर बिहारी ।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – निरन्तर कानों का सेवन करने पर भी कान का आभूषण, निम्न स्थान पर ही रहा; अर्थात् उसका आज तक उद्धार न हो सका, जबकि नाक के आभूषण ने मोतियों के साथ बसकर, नाक के उच्च स्थान को प्राप्त कर लिया। तात्पर्य यह है कि निरन्तर वेदों की वाणी सुनकर भी एक व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त न कर सका, जब कि निम्न समझे जाने वाले अन्य व्यक्ति ने सत्संगति के माध्यम से उच्चावस्था अथवा मोक्ष को प्राप्त कर लिया।
(iii) बेसर नामक आभूषण कान में पहना जाता है।
(iv) वेदों के अध्ययन से श्रेष्ठ सत्संग को बताया गया है।
(v) प्रस्तुत दोहे में श्लेष अलंकार है।

प्रश्न 2:
बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ ।
सौंह करै, भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाई ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राधिकाजी श्रीकृष्ण की मुरली छिपाकर क्यों रख देती हैं?
(iv) श्रीकृष्ण के मुरली के बारे में पूछने पर राधिकाजी क्या कहती हैं?
(v) ‘बतरस-लालच लाल की’ में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या – राधिकाजी ने बातों का रस लेने के लालच से लाल ( श्रीकृष्ण) की मुरली कहीं छिपाकर रख दी है। श्रीकृष्ण उनसे पूछते हैं कि क्या मेरी मुरली तुम्हारे पास है? इस पर राधिका शपथ लेने लगती हैं (कि मुरली का मुझे कुछ पता नहीं है), किन्तु भौंहों में मुस्करा देती हैं (जिससे श्रीकृष्ण को उनके पास मुरली होने का सन्देह हो जाता है)। जब श्रीकृष्ण उनसे मुरली देने के लिए कहते हैं तो वे साफ मना कर देती हैं (कि मुरली मेरे पास नहीं है)।
(iii) राधिकाजी वार्तालाप के आनन्द के लोभ से मुरली छिपाकर रख देती हैं।
(iv) श्रीकृष्ण के मुरली के बारे में पूछने पर राधिकाजी शपथ लेने लगती हैं किन्तु भौंहों में मुस्करा देती हैं।
(v) अनुप्रास अलंकार।

प्रश्न 3:
कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात ।
भरे भौन मै करत हैं, नैननु ही सौं बात ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत दोहे के अनुसार नायक-नायिका भरे हुए भवन में किस तरह बातें कर लेते हैं?
(iv) नायक और नायिका के नेत्र मिल जाने पर क्या होता है?
(v) प्रस्तुत दोहे में कौन-सा रस है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – देखो, कैसी चातुरी से ये दोनों परिजनों से भरे हुए भवन में आँखों-ही-आँखों में अपने मतलब की सब बातें कर लेते हैं। नायक कुछ कहता है (रति की प्रार्थना करता है), जिस पर नायिका मना कर देती है। नायक उसकी इस (मना करने की) चेष्टा पर रीझता है, तब नायिका उसकी रीझने की चेष्टा पर बनावटी खीझ प्रकट करती है। फिर दोनों की दृष्टि मिल जाती है और दोनों का चित्त खिल (प्रसन्न हो) उठता है। नायक, नायिका के चटपट खीझ छोड़ देने पर हँस देता है और नायिका उसके हँस देने पर लज्जालु हो जाती है।
(iii) प्रस्तुत दोहे के अनुसार नायक-नायिको भरे हुए भवन में आँखों के इशारों से बातें कर लेते हैं।
(iv) नायक-नायिका के नेत्र मिल जाने पर दोनों के चित्त खिल उठते हैं।
(v) प्रस्तुत दोहे में श्रृंगार रस है।

प्रश्न 4:
अनियारे दीरघ दृगनु, किती न तरुनि समान ।
वह चितवनि औरै कछु, जिहिं बस होत सुजान ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किनकी रीति एक-जैसी नहीं होती?
(iv) चतुर लोग किन पर अनुरक्त होते हैं?
(v) प्रस्तुत दोहा कौन-से रस का उपयुक्त उदाहरण है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – बिहारी कहते हैं कि यद्यपि नुकीली और बड़े नेत्रों वाली अनेक ‘स्त्रियाँ संसार में हैं और उन सभी का नेत्र-सौन्दर्य भी एक-सा प्रतीत होता है, तथापि सौन्दर्य के पारखी अथवा रसिकजन ऐसी सभी दृष्टियों पर अनुरक्त नहीं होते। वे तो उस विशेष प्रकार की दृष्टि के ही वशीभूत होते हैं, जो प्रेमपूर्ण और किसी-किसी की ही होती हैं।
(iii) सभी बड़े नेत्रों वाली स्त्रियों की रीति एक-जैसी नहीं होती।
(iv) जिनमें कुछ विशेष आन्तरिक भाव होता है चतुर लोग उन पर अनुरक्त होते हैं।
(v) प्रस्तुत दोहा श्रृंगार रस का?उपयुक्त उदाहरण है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 8 विविधा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name विविधा (सेनापति, देव, घनानन्द)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 8 विविधा (सेनापति, देव, घनानन्द)

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न 1:
सेनापति का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – रीतिकालीन कवि सेनापति को हिन्दी-काव्य-जगत् में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। अलंकार-विवेचन एवं रस-निरूपण की दृष्टि से इनकी गणना उच्च स्तरीय आचार्य कवियों में होती है। इनका ऋतु-वर्णन’ हिन्दी-साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

कविवर सेनापति के जीवन से सम्बन्धित प्रामाणिक सामग्री का अत्यधिक अभाव है। इनके सम्बन्ध में अब तक जो कुछ भी ज्ञात है वह इनके अपने काव्य-ग्रन्थ ‘कवित्त-रत्नाकर’ के आधार पर ही है, जिसमें अपना परिचय इन्होंने निम्नवत् दिया है

दीक्षित परशुराम दादा हैं विदित नाम,
जिन कीन्हें जज्ञ जाकी बिपुल बड़ाई है।
गंगाधर पिता गंगाधर के समान जाके,
गंगातीर बंसति ‘अनूप’ जिन पाई है।
महा जानमनि, विद्यादान हूँ में चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित ते पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई सीतापति के प्रसाद जाकी,
सबै कवि कान दै सुनत कविताई है।

उपर्युक्त कवित्त से स्पष्ट होता है कि ये अनूपशहर के रहने वाले कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम गंगाधर दीक्षित, पितामह का नाम परशुराम दीक्षित और गुरु का नाम हीरामणि दीक्षित था।

यह सम्भव है कि अनूपशहर उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले में स्थित अनूपशहर नाम का ही स्थान हो। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा कुछ अन्य विद्वामों ने झ्नका जन्म संवत् 1646 वि० (सन् 1589 ई०) माना है। अपनी एकमात्र रचना ‘कवित्त-रत्नाकर’ के आधार पर सेनापति की गणना रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में की जाती है। इस ग्रन्थ की रचना संवत् 1706 वि० (सन् 1649 ई०) के आस-पास की मानी जाती है। इनकी मृत्यु के सम्बन्ध में प्रामाणिक सामग्री का पूर्णतया अभाव है। इनके काव्य की मूल-प्रवृत्ति के आधार पर इन्हें रीतिकालीन युग का कवि माना जाता है।
हिन्दी-साहित्य में सेनापति की प्रसिद्धि उनके प्रकृति-वर्णन एवं श्लेष के उत्कृष्ट प्रयोगों के कारण है। प्रकृति-चित्रण की दृष्टि से सेनापति अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। इनके जैसी प्रकृति के सूक्ष्म-निरीक्षण का भाव अन्य किसी शृंगारिक एवं भक्त कवि को प्राप्त नहीं था। इनके काव्य में मर्मस्पर्शी भावुकता की अभिव्यक्ति मिलती है।

रचनाएँ – सेनापति की अब तक ‘कवित्त-रत्नाकर’ नामक एक ही प्रमुख कृति प्राप्त हुई है। इनकी एक अन्य कृति ‘काव्य-कल्पद्रुम’ का उल्लेख भी मिलता है, किन्तु यह रचना अप्राप्य है। कुछ विद्वान् इन दोनों कृतियों को एक ही मानते हैं। ‘कवित्त-रत्नाकर’ के कुल 394 छन्द ही उपलब्ध हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

सेनापति विलक्षण प्रतिभा से युक्त कवि थे। इनकी एकमात्र रचना ‘कवित्त-रत्नाकर’ में इनकी काव्य-प्रतिभा का जो स्वरूप प्राप्त होता है, वह इन्हें श्रेष्ठ कवि के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

भावपक्ष की विशेषताएँ

श्रृंगार-वर्णन – सेनापति के काव्य में, श्रृंगार-वर्णन का विशिष्ट स्वरूप प्राप्त होता है। इन्होंने नायिका के. नख-शिख सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है। इनके काव्य में उद्दीपन भाव, वय: सन्धि आदि के मनोहारी चित्रण भी दर्शनीय हैं। इनमें भावुकता एवं चमत्कार का बहुत सुन्दर मिश्रण है।

ऋतु वर्णन – सेनापति को ऋतु वर्णन में अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है। इनके काव्य में ऋतुओं का सहज एवं सजीव चित्रण अपने यथार्थ स्वरूप में अभिव्यक्त हुआ है। प्रत्येक ऋतु के आगमन पर जन-मानस में उत्पन्न होने वाले भावों की भी इन्होंने सहज अभिव्यक्ति दी है। हिन्दी के किसी भी श्रृंगारी एवं भक्त कवि में सेनापति जैसा प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करने वाला कवि नहीं मिलता।

भक्ति-भावना – कवित्त-रत्नाकर’ नामक ग्रन्थ पाँच तरंगों में विभाजित है। इसकी चौथी एवं पाँचवीं तरंग में राम के प्रति उनके भक्तिभाव की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति हुई है।

वीर रस – ‘कवित्त-रत्नाकर’ की चौथी तरंग में रामचरित का वर्णन है, जिसमें कवि ने यत्र-तत्र वीर रस की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति भी की है।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भाषा – भाषा पर सेनापति जैसा अधिकार सम्भवतः किसी रीतिकालीन कवि का नहीं है। सेनापति ने अपने काव्य में ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, किन्तु शब्दों के चयन में माधुर्य एवं भाव का ध्यान में रखकर अलंकार, छन्द आदि का ध्यान रखा है। इनका पद-विन्यास भी बहुत ललित है।

छन्द-योजना – सेनापति रीतिकालीन कवि थे। इसीलिए इनके काव्य में छन्दों का सटीक एवं उत्कृष्ट प्रयोग मिलता है।

अलंकार-योज़ना – सेनापति ने अपने काव्य में श्लेष, यमक, अनुप्रास, उपमा, रूपक आदि अलंकारों का चमत्कारिक प्रयोग किया है; किन्तु इसमें इन्होंने श्लेष अलंकार को प्रधानता दी है। कहीं-कहीं विरामों पर अनुप्रास के निर्वाह और यमक के चमत्कार दर्शनीय हो जाते हैं। ‘कवित-रत्नाकर’ की प्रथम तरंग पूर्णतया श्लेष अलंकार के चमत्कारों से युक्त है। इनके श्लेष-अत्यन्त रोचक एवं चमत्कृत कर देने वाले हैं। श्लेष अलंकार के प्रयोग में इन्हें आचार्य केशवदास के समकक्ष माना जाता है।

साहित्य में स्थान – अपनी एक ही रचना ‘कवित्त-रत्नाकर’ के आधार पर सेनापति की गणना रीतिकाल के श्रेष्ठ कवियों में की जाती है। अलंकार-विधान, प्रकृति-चित्रण एवं छन्द-विधान की दृष्टि से इन्हें केशवदास के समकक्ष स्थान प्राप्त है।।

प्रश्न 2:
कविवर देव का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
कविवर ‘देव’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – रीतिकालीन कवियों में महाकवि देवदत्त का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। इनके द्वारा किया गया रीति-विवेचन कई दृष्टियों से विशिष्ट माना जाता है। बाह्याडम्बरों में इनकी किंचित् भी आस्था नहीं थी। ‘भाव-विलास’ नामक ग्रन्थ के आधार पर इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा (उत्तर प्रदेश) जिले में संवत् 1730 वि० (सन् 1673 ई०) में एक सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम बिहारीलाल दूबे था। 94 वर्ष की अवस्था में इनकी मृत्यु अनुमानतः संवत् 1824 वि० (सन् 1767 ई०) के आस-पास हुई थी।

रचनाएँ – देव प्रमुख रूप से दरबारी कवि थे। ये अपने जीवनकाल में अनेक राजा, रईसों एवं नवाबों के आश्रय में रहे। इनके द्वारा रचित विपुल साहित्य का उल्लेख मिलता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का । इतिहास में इनके उपलब्ध ग्रन्थों की संख्या 23 बतायी है और उनके नामोल्लेख भी किये हैं, जो इस प्रकार हैं

(1) भाव-विलास,
(2) अष्टयाम,
(3) भवानी-विलास,
(4) सुजान-विनोद,
(5) प्रेमतरंग,
(6) राग-रत्नाकर,
(7) कुशल विलास,
(8) देवचरित,
(9) प्रेमचन्द्रिका,
(10) जाति-विलास,
(11) रसविलास,
(12) काव्य-रसायन या शब्द-रसायन,
(13) सुखसागर तरंग,
(14) वृक्ष-विलास,
(15) पावसविलास,
(16) ब्रह्मदर्शन पचीसी,
(17) तत्त्वदर्शन पचीसी,
(18) आत्मदर्शन पचीसी,
(19) जगदर्शन पचीसी,
(20) रसानंद लहरी,
(21) प्रेमदीपिका,
(22) नखशिख,
(23) प्रेमदर्शन।

इनके द्वारा रचित जितने भी ग्रन्थ हैं, वे एक-दूसरे से स्वतन्त्र नहीं हैं। इनके बहुत-सारे पद, जो एक ग्रन्थ में पाये जाते हैं, दूसरे ग्रन्थों में भी देखे जा सकते हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

रीतिकालीन कवियों में देव को इनकी काव्यात्मक अनुभूति की तीव्रता के कारण एक श्रेष्ठ कवि माना जाता है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

भावपक्ष की विशेषताएँ

श्रृंगार भाव – यद्यपि देव ने रीति-निरूपण एवं तत्त्व-चिन्तन सम्बन्धी रचनाएँ भी की हैं, तथापि इनकी रचनाओं में श्रृंगार भाव की प्रधानता रही है। इनके काव्य में राग-पक्ष (प्रेम-पक्ष) निखार के साथ उभरा है। कल्पना की ऊँची उड़ान के कारण इनकी बिम्ब-योजना में रंग, वैभव, सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री आदि का सजीव चित्र प्रस्तुत हुआ है। एक ओर तो यौवन और श्रृंगार इनकी कविता का विषय बना है, तो दूसरी ओर ज्ञान, वैराग्य और वेदान्त। इनमें मौलिकता और कवित्व शक्ति पर्याप्त मात्रा में है।

भावानुभूति की प्रधानता – रीतिकालीन कवियों के शास्त्रीय काव्यों की नीरसता के विपरीत देव के काव्य में भावानुभूति की तीव्रता अत्यन्त प्रभावी रूप से अभिव्यक्त हुई है। रूप, अनुभव, मिलन आदि के बिम्ब भाव-प्रधान एवं मर्मस्पर्शी हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ

अलंकार-योजना – देव के काव्यालंकार सम्बन्धी निरूपण में रीतिकालीन प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। इनके द्वारा प्रयुक्त लक्षणों की सुबोधता, संक्षिप्तता तथा उदाहरणों की तदनुरूपता और सरसता प्रशंसनीय है

दधि घृत मधु पायस तजि वयसु चाम चबात।

इनकी अलंकार-योजना में मौलिक उद्भावना का समावेश मिलता है, किन्तु इसमें यत्र-तत्र अस्पष्टता एवं अव्यवस्था का दोष भी परिलक्षित होता है। इनकी कविता में कहीं-कहीं अनुप्रासों की छटा देखने को मिल जाती है।

छन्द-योजना: देव ने शास्त्रीय रूप से मान्य छन्दों के अतिरिक्त कुछ नवीन छन्दों का भी आविष्कार किया और उन्हें अपनी रचनाओं में प्रयुक्त किया है।

भाषा – देव ने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में की हैं। इनकी भाषा में संस्कृत का पुट भी मिलता है। इनकी नवीन छन्द-योजना एवं भाषा की सशक्तता को निम्नलिखित पंक्तियों में देखा जा सकता है

देव मैं सीस बसायो सनेह कै, भाल मुगम्मद-बिंद के भाख्यौ।
कंचुकि मैं चुपयौ करि चोवा, लगाय लियो डर सों अभिलाख्यौ।

इनकी भाषा में प्रसाद गुण, गाम्भीर्य और मुहावरों के प्रयोग भी देखने को मिलते हैं। भाषा-व्याकरण की दृष्टि से देव की भाषा सदोष है और उसमें पुनरुक्तियाँ भी हैं, किन्तु जहाँ इनकी भाषा सुव्यवस्थित और स्वच्छ है, वहाँ इनकी कविता अत्यन्त सरस और हृदयग्राही बन पड़ी है।

साहित्य में स्थान – रीतिकालीन कवियों में देव को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। भावपक्ष के साथ-साथ कवित्व, छन्द, अलंकार आदि की दृष्टि से भी इनकी काव्यात्मक प्रतिभा को सम्माननीय दृष्टि से देखा जाता है। इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति को काव्यात्मक रूप में सँवारा है। विरह की चरम अवस्था का वर्णन करने में ये अत्यन्त दक्ष थे।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “इनका-सा अर्थ-सौष्ठव और नवोन्मेष बिरले ही कवियों में मिलता है। रीतिकाल के कवियों में ये बड़े ही प्रगल्भ और प्रतिभा-सम्पन्न कवि थे, इसमें सन्देह नहीं। इस काल के बड़े कवियों में इनका विशेष गौरव का स्थान है।”

प्रश्न 3:
घनानन्दका साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
घनानन्द की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
घनानन्द का संक्षिप्त जीवन-परिचय लिखिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – रीतिकालीन कवियों में घनानन्दं को उनके काव्यों की स्वच्छन्दता एवं भावात्मकता की दृष्टि से हिन्दी-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भावनात्मक, लक्षणात्मक, रहस्यात्मक एवं वैयक्तिकता की दृष्टि से इनकी काव्यात्मक प्रतिभा विलक्षण मानी जाती है। रीतिकालीन काव्य में इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनायी है तथा अपने विशिष्ट व्यक्तित्व का परिचय दिया है।
घनानन्द जी का जन्म संवत् 1746 वि० (सन् 1689 ई०) में माना जाता है, लेकिन इनके जीवन से सम्बन्धित प्रामाणिक तथ्य अभी तक उपलब्ध नहीं हो सके हैं। किंवदन्तियों के अनुसार ये जाति के कायस्थ थे और दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह रँगीला के मीर मुंशी थे। वहाँ के दरबारी दाँव-पेचों से सामंजस्य न स्थापित कर पाने के कारण इन्होंने दरबार छोड़ दिया और वृन्दावन में रहने लगे। कुछ विद्वान् इनके दरबार छोड़ने का कारण सुजान नाम की एक नर्तकी को मानते हैं, जिससे ये बहुत अधिक प्रेम करते थे। दरबार से चलते समय इन्होंने सुजान से , भी साथ चलने को कहा, लेकिन वह इनके साथ नहीं आयी। इसी पर इन्हें विराग उत्पन्न हो गया। बहुत-से विद्वान् इस किंवदन्ती से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार सुजान का अर्थ कृष्ण है और इन्होंने कृष्ण-भक्ति में ही अपनी विप्रलम्भ श्रृंगार प्रधान रचनाएँ की हैं। वृन्दावन में आकर ये निम्बार्क सम्प्रदाय के दीक्षित वैष्णव हो गये और वहीं पूर्ण विरक्त भाव से रहने लगे। इनका निधन संवत् 1796 वि० (सन् 1739 ई०) में नादिरशाह की सेना के सिपाहियों द्वारा हाथ काट दिये जाने के कारण हुआ।

रीतिकालीन कवियों में भावप्रवण कवि के रूप में घनानन्द को सम्माननीय दृष्टि से देखा जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें ‘साक्षात रसमूर्ति’ के नाम से सम्बोधित किया है। इन्हें बहुत-से विद्वान् रीतिकालीन रीतिमुक्त धारा का सर्वश्रेष्ठ कवि मानते हैं।

रचनाएँ – घनानन्द जी के
(1) सुजान सागर,
(2) बिरहलीला,
(3) कोकसागर,
(4) रसकेलिवल्ली
और
(5) कृपाकन्द
नाम के ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं। इसके अतिरिक्त इनके कवित्त-सवैया के फुटकर संग्रह 150 से लेकर 425 कवित्तों तक के मिलते हैं। कृष्णभक्ति सम्बन्धी इनको एक वृहदाकार ग्रन्थ छत्रपुर के राज पुस्तकालय में है, जिसमें प्रिया-प्रसाद, ब्रज-व्यवहार, वियोग-बेलि, कृपाकंद-निबन्ध, गिरि-गाथा, भावनाप्रकाश, गोकुलविनोद, धामचमत्कार, कृष्णकौमुदी, नाममाधुरी, वृन्दावन-मुद्रा, प्रेम-पत्रिका, रस-वसन्त इत्यादि अनेक विषय वर्णित हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

रीतिमुक्त धारा के श्रेष्ठ कवि घनानन्द के काव्य की रसानुभूति एवं अभिव्यक्ति को प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से उत्कृष्ट माना जाता है। इनकी काव्यगत विशेषताओं का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है ।

भाव पक्ष की विशेषताएँ
श्रृंगार रस की उत्कृष्टता
– धनानन्द की रचनाओं में श्रृंगार रस की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति हुई है। इसीलिए घनानन्द को ‘प्रेम के कवि’ के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। वियोग श्रृंगार के जो मर्मस्पर्शी भाव इनके काव्य में दृष्टिगोचर होते हैं, उनकी भावानुभूति हृदय को रोमांचित कर देती है। विरह की आभ्यन्तर अनुभूति को इन्होंने बहुत ही हृदयद्रावक वर्णन किया है।

प्रकृति का नैसर्गिक चित्रण – घनानन्द के काव्य में प्रकृति के सुन्दर चित्र प्राप्त होते हैं। इन्होंने प्रकृति का चित्रण अपने काव्य के मुख्य भाव के उद्दीपन रूप में किया है।

कलापक्ष की विशेषताएँ
भाषा – घनानन्द के काव्य की भाषा ब्रजभाषा है। इनकी भाषा में स्वच्छता, सुघड़ता एवं एकरूपता के दर्शन होते हैं। इन्होंने भाषा का प्रयोग अपनी बुद्धि के अनुरूप नहीं, अपितु हृदय के भावों के अनुरूप किया है। इस कारण इनकी भाषा इनके भावों की अभिव्यक्ति करने में पूर्णतया सक्षम रही है। घनानन्द का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा के सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कहना है कि, “इनकी-सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। ……. भाषा मानो इनके हृदय के साथ जुड़कर ऐसी वशवर्तिनी हो गयी थी कि ये उसे अपनी अनूठी भावभंगी के साथ-साथ जिस रूप में चाहते थे, उस रूप में मोड़ सकते थे।” क्योंकि समूचे रीतिकाल में ही मुक्तक शैली की प्रधानता रही, अत: नि:संकोच यह कहा जा सकता है कि घनानन्द जी ने भी अपनी रचनाएँ मुक्तक शैली में ही कीं, किन्तु इनकी कुछ फुटकर रचनाएँ प्रबन्ध शैली में भी मिलती हैं।

छन्द-योजना – घनानन्द ने अपने काव्य में मुख्यत: कवित्त, सवैया एवं घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग किया है। इनकी छन्द-योजना इनके काव्य के मुख्य भाव के अनुरूप है।

अलंकार-योजना – रीतिमुक्त परम्परा के कवि होने के कारण घनानन्द ने अपने काव्य में मात्र पाण्डित्य के प्रदर्शन के लिए बोझिल अलंकारों का प्रयोग नहीं किया है। इन्होंने अपने भावों को व्यक्त करने वाले अलंकारों को प्रयुक्त किया है, जिनकी लाक्षणिकता एवं ध्वन्यात्मकता का भावों के साथ प्रभावपूर्ण समायोजन हुआ है। इन्होंने अपने लाक्षणिक प्रयोगों और अर्थ-शक्ति में पर्याप्त अभिवृद्धि के लिए विरोधाभास, विशेषण-विपर्यय, मानवीकरण, रूपक, रूपकातिशयोक्ति, प्रतीप जैसे अलंकारों के प्रयोग किये हैं।

साहित्य में स्थान – रीतिकालीन युग से सम्बन्धित रीतिमुक्त काव्यधारा के कवियों में घनानन्द को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ये एक सहज और भावुक कवि थे। इन्हें अपने हृदय के भावों का स्पष्टीकरण मात्र ही अभीष्ट था। इनके बारे में नि:संकोच कहा जा सकता है कि, “भक्ति-काल के ब्रजभाषा काव्य में जो स्थान सूरदास का है, रीतिकालं के ब्रजभाषा काव्य में वही स्थान घनानन्द जी का है।’

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

सेनापति

प्रश्न 1:
वृष कौं तरनि तेज सहसौ किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं ।
तचति धरनि जग जरत झरनि सीरी,
छाँह कौं पकरि पंथी-पंछी बिरमत हैं ।।
‘सेनापति’ नैक दुपहरी के ढरते होत,
धमका विषम ज्यौं न पात खरकत हैं ।
मेरे जान पौनौं सीरी ठौर कौं पकरि कौनौं,
घरी एक बैठि कहूँ घामै बितवत हैं ।

(i) उपर्युक्त पंक्तियों के कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) गर्मियों के समय में वृष राशि का सूर्य कैसा प्रतीत हो रहा है?
(iv) भयंकर गर्मी में पथिकों और पक्षियों की क्या हालत हो रही है?
(v) दोपहर के ढलने और वातावरण के शांत होने पर कवि कैसा अनुभव करते हैं?

उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित कविवर सेनापति के पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
कवि का नाम – सेनापति।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – वृष राशि का सूर्य अत्यधिक ताप से युक्त होकर अपनी हजारों किरणों से भयंकर ज्वालाओं का समूह बरसा रहा है। पृथ्वी अत्यधिक तप्त हो उठी है। सारा संसार (आकाश से बरसती) लपटों (आग) से जल रहा है।
(iii) गर्मियों के समय में वृष राशि का सूर्य अत्यधिक तप्त होकर अपनी हजारों किरणों से भयंकर ज्वालाओं का समूह बरसा रहा है।
(iv) भयंकर गर्मी में पथिक और पक्षी छाया हूँढ़कर विश्राम कर रहे हैं।
(v) दोपहर के ढलने और वातावरण के शांत होने पर इतनी अधिक उमस पैदा होती है कि ऐसे में कवि को लगता है कि हवा भी कहीं घड़ी भर के लिए विश्राम कर रही है।

देव

प्रश्न 1:
डार द्रुम पलना बिछौना नवपल्लव के,
सुमन सँगूला सोहै तन’ छबि भारी है ।
पवन झुलावै केकी कीर बहरावै, ‘देव’,
कोकिल हलावै हुलसावे करतारी है ॥
पूरित पराग सौं उतारौ करै राई-लोन,
कंजकली नायिका लतानि सिर सारी है ।
मदन, महीपजू को बालक बसंत ताहि,
प्रातहिं जगावत गुलाब चटकारी है ।।

(i) उपर्युक्त पंक्तियों के कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने कामदेव का पुत्र किसे बताया है।
(iv) वसंतरूपी शिशु को झूला कौन झुलाता है?
(v) कमल की कलीरूपी नायिका वसंतरूपी नवजात शिशु को दुष्ट नजर से बचाने के लिए क्या करती है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित महाकवि देव के पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
कवि का नाम – देव।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – यह वसन्त एक सलोना-सा बालक है। वृक्षों की हरी-भरी डालियाँ इसको पालना हैं। उनमें निकले नये-नये कोमल पत्ते ही उसका बिछौना हैं। जैसे छोटे बच्चे के लिए बिछौना बिछाया जाता है, उसी प्रकार वसन्तरूपी बालक के लिए वृक्षों के पत्ते ही बिछौना हैं। पुष्पों कारंग-बिरंगा झबला इसके शरीर की शोभा बढ़ा रहा है।
(iii) कवि ने वसंत को कामदेव का पुत्र बताया है।
(iv) वसंतरूपी शिशु को पवन झूला झुलाती है।
(v) कमल की कलीरूपी नायिका लहराती लताओं की झाड़ी अपने सिर पर ओढ़कर इस वसंतरूपी नवजात शिशु को दुष्ट नजर से बचाने के लिए पुष्प-परागरूपी राई और नमक उतारती है।

घनानन्द

अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं ।
तहाँ साँचे चलें तजि ओपुनपौ झझकैं कपटी जे निसाँक नहीं ।
‘घनआनँद’ प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक से दूसरो आँक नहीं।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ कहौ मून लेहु पै देहु छटाँक नहीं ।।

(i) उपर्युक्त पंक्तियों के कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रेम का मार्ग कैसा है और इसमें क्या नहीं होता?
(iv) कैसे व्यक्ति प्रेम-पथ के पथिक नहीं बन सकते?
(v) ‘मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं’ अंश में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत सवैया हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित कविवर घनानन्द के पदों से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
कवि का नाम – घनानन्द।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – रीतिकाल के कवि घनानन्द प्रेम की पीर के अमर गायक थे। वे अपनी प्रेमिका सुजान अथवा श्रीकृष्ण की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि मैंने तुमसे एकनिष्ठ प्रेम किया है। और अपना हृदय तक तुम्हें दे दिया है, पर तुमने न जाने कौन-सी पट्टी पढ़ी है या कौन-सी सीख सीखी है, जो मन भर तो ले लेते हो, पर बदले में छटाँक भर भी नहीं देते हो। तात्पर्य यह है कि हमारा मन तो तुमने ले लिया है, पर अपनी एक झलक तक नहीं दिखाई है।
(iii) प्रेम का मार्ग बहुत ही सीधा-सादा है और इसमें कहीं भी कुटिलता नहीं होती।
(iv) छल-कपट तथा चालाकी दिखाने वाले व्यक्ति प्रेम-पथ के पथिक नहीं बन सकते।
(v) श्लेष अलंकार।

कथा-भारती

प्रश्न 1:
कहानी के तत्त्वों पर प्रकाश डालिए।
या
कहानी में कथोपकथन (संवाद) तत्त्व अथवा वातावरण (देश-काल) तत्त्व को सोदाहरण समझाइट।
उत्तर:
कहानी के तत्त्वों के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ विद्वान् आरम्भ और अन्त तथा प्रभावान्विति को कहानी के तत्त्वों में ही स्वीकार करते हैं किन्तु अधिकांश विद्वानों ने कहानी के निम्नलिखित सात तत्त्व ही स्वीकार किये हैं-

(1) शीर्षक – शीर्षकं कहानी का अनिवार्य अंग है। कहानी के शीर्षक में कुछ विशेषताएँ होती हैं। शीर्षक मुख्य विषय से सम्बन्धित, स्पष्ट, आकर्षक, अर्थपूर्ण, संक्षिप्त तथा नयापन लिये हुए होना चाहिए।

(2) कथानक – कहानी का वर्ण्य-विषय ही उसका कथानक कहलाता है। कथानक अत्यन्त संक्षिप्त, सरल, स्वाभाविक, रोचक, सुगठित एवं प्रभावशाली होना चाहिए। कथानक में पात्रों एवं परिस्थितियों के बीच द्वन्द्व का चित्रण होता है तथा वह लेखक के दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति करता है। कथानक के विकास के चार चरण होते हैं—आरम्भ, मध्य, चरम-सीमा तथा अन्त। कथानक अधिकांशतः चार प्रकार के होते हैं
(i) घटनाप्रधान,
(ii) चरित्रप्रधान,
(iii) भावप्रधान एवं
(iv) वातावरणप्रधान।।

(3) पात्र अथवा चरित्र – चित्रण कथाकार पात्रों के माध्यम से जीवन तथा जगत् के संघर्षों को पाठक के समक्ष उपस्थित करता है। कहानीकार उन्हीं पात्रों को चुनता है, जो कहानी के विकास के लिए अनिवार्य होते हैं। जीवन्त और यथार्थ जीवन से जुड़े पात्र कहानी की श्रेष्ठता के निकट होते हैं। कहानी के पात्र अनेक प्रकार के होते हैं; जैसे – यथार्थवादी, आदर्शवादी, काल्पनिक, मुख्य, गौण, स्थिर, गतिशील, व्यक्ति, वर्ग, ऐतिहासिक आदि।

(4) संवाद अथवा कथोपकथन 
– यह कहानी का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। कथाकार कथोपकथन के माध्यम से कथानक में सजीवता और नाटकीयता लाता है। कथोपकथन के द्वारा पात्रों की भावनाओं, अनुभवों, क्रिया-कलापों एवं उनकी चारित्रिक विशेषताओं का बोध होता है। संवाद संक्षिप्त, तीखे, सार्थक, स्वाभाविक तथा सजीव होने चाहिए। थोड़े में अधिक कहने की क्षमता संवाद का महत्त्वपूर्ण गुण है।

(5) भाषा-शैली-भाषा – शैली को कहानी के गठन में विशिष्ट महत्त्व होता है। कहानी की भाषा में चित्रमयता, प्रवाह, प्रतीकात्मकता तथा बिम्बात्मकता होनी चाहिए। भाषा; पात्र एवं समय के अनुरूप होनी चाहिए। मुहावरों, लोकोक्तियों एवं परिहास का समावेश कहानी की भाषा को सशक्त बनाता है। कहानी की शैली के अन्तर्गत कहानी का शिल्प एवं रचना-विधान आती है। कहानी की रचना के लिए अनेक शैलियाँ प्रचलित हैं, जिनमें कथात्मक, ऐतिहासिक, आत्मचरित, पत्रात्मक, डायरी, नाटकीय आदि प्रमुख हैं।

(6) देश-काल या वातावरण – कहानी में स्वाभाविकता, सजीवता तथा विश्वसनीयता की सृष्टि के लिए वातावरण की योजना की जाती है। वातावरण से अभिप्राय है किसी देश, समाज एवं जाति के आचारविचार, उसकी सभ्यता-संस्कृति तथा राजनीतिक परिस्थितियों का चित्रण। कहानीकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसने जिस काल-विशेष का कथानक प्रस्तुत किया है, उसके अनुरूप ही वह संस्कृति और वातावरण भी अंकित करे।

(7) उद्देश्य – कहानी का कोई – न-कोई उद्देश्य अवश्य होता है। समाज-सुधार, सन्देश, मनोरंजन, भावअभिव्यंजना, सिद्धान्त-प्रतिपादन आदि का प्रस्तुतीकरण कहानी के प्रमुख उद्देश्यों में से है। कहानीकार समसामयिक समस्याओं से प्रभावित होता है। अपने चारों ओर के इन प्रभावों, शाश्वत समस्याओं व समाधान को वह कहानी के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाता है।

प्रश्न 2:
कहानी की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) लिखिए।
उत्तर:
एक अच्छी कहानी में निम्नलिखित विशेषताएँ (लक्षण) होनी आवश्यक हैं
(1) कथानक संक्षिप्त हो।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name केशवदास
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 5 केशवदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
केशवदास का जीवन-परिचय दीजिए।
या
केशवदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
केशवदास का जीवन-परिचय लिखते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय – आचार्य केशवदास का जन्म ओरछा (बुन्देलखण्ड) में संवत् 1612(सन् 1555 ई०) में हुआ था। ये सनाढ्य ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम पं० काशीनाथ था। आचार्य केशवदास का कुल संस्कृत के पाण्डित्य के लिए प्रसिद्ध था। केशवदास स्वयं कहते हैं कि

भाषा बोलि न जानहीं, जिनके कुल के दास।

ओरछा-नरेश महाराजा इन्द्रजीत सिंह इन्हें अपना गुरु मानते थे और उनके दरबार में इनका बड़ा मान था। महाराजा इन्द्रजीत सिंह ने इनको 21 गाँव दानस्वरूप दिये थे। इनका जीवन राजसी ठाठ-बाट का था। ये स्वभाव से गम्भीर और स्वाभिमानी थे। अपनी प्रशंसा में केशव द्वारा रचित एक पद पर बीरबल ने छह हजार रुपये की हुण्डियाँ न्यौछावर की थीं। एक बार अकबर ने इन्द्रजीत सिंह पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना कर दिया, जिसे केशव ने आगरा जाकर बीरबल की सहायता से माफ करवाया। इससे इनका सम्मान और भी बढ़ गया। संवत् 1662 के लगभग जहाँगीर ने ओरछा का राज्य बीरसिंहदेव को दे दिया। कुछ काल तक नये राजा के दरबार में रहकर बाद में ये गंगाघाट पर जाकर रहने लगे। संवत् 1674(सन् 1617 ई०) के लगभग इनका देहावसाने हुआ।

ग्रन्थ
(क) रीतिग्रन्थ – (1) कविप्रिया, (2) रसिकप्रिया।
(ख) महाकाव्य –  (3) रामचन्द्रिका।
(ग) ऐतिहासिक काव्य – (4) जहाँगीर-जस-चन्द्रिका, (5) रतनबावनी, (6) वीरसिंह देवचरित, (7) नखशिख।
(घ) वैराग्यपरक –  (8) विज्ञान गीता।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

केशव चमत्कारवादी कवि – केशव चमत्कारवादी कवि थे। ये अलंकारों से रहित कविता को कविता मानने को ही तैयार न थे। इन्होंने प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही प्रकार के काव्य रचे। ‘रामचन्द्रिका’ में इन्होंने रामचरित का विस्तृत वर्णन किया है, पर चमत्कारप्रियता के कारण वे इसमें उतने सफल नहीं हो पाये। ‘रामचन्द्रिका’ छन्दों का अजायबघर-सा प्रतीत होती है; क्योंकि इन्होंने एक सर्ग में एक छन्द के नियम का पालन न करके एक सर्ग में अनेक छन्दों का प्रयोग किया है, जिससे कथा-प्रवाह बार-बार बाधित हो जाता है। विविध अलंकारों के विधान एवं शब्दों के अप्रचलित अर्थों के प्रयोग के कारण इनकी भाषा बड़ी क्लिष्ट हो गयी है, जिससे इन्हें ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा जाता है ।

विषमय यह गोदावरी अमृतन के फल-देत।

[ यहाँ ‘विष’ का अर्थ ‘जल’ है, जो अत्यधिक अप्रचलित है।]।

प्रकृति-चित्रण – प्रकृति के सौन्दर्य में केशव का मन न रमा। इन्होंने व्यापक भ्रमण द्वारा प्रकृति का निकट से सूक्ष्म परिचय भी प्राप्त नहीं किया था। इसीलिए वे मिथिला (बिहार) के वनों में ‘एला ललित लवंग संग पुंगीफल सोहे’ कहते समय यह भूल जाते हैं कि इलायची, लौंग, सुपारी आदि के वृक्ष समुद्र-तट पर होते हैं । कि बिहार में। इसके अतिरिक्त वे प्रकृति पर उत्प्रेक्षा, सन्देह, रूपक आदि अलंकारों का इतना अधिक आरोप कर देते हैं कि उससे प्रकृति की शोभा का भाव लुप्त होकर कई बार बड़ी नीरसता उत्पन्न हो जाती है; उदाहरणार्थ  वे प्रातःकालीन सूर्य के बिम्ब को कालरूपी कापालिक का खून से भरा खप्पर बताते हैं

कै सोनित कलित-कपाल यह किल कापालिक-काल को।

वस्तुतः उनका हृदय प्रकृति की सुषमा में न रमकर मानव-सौन्दर्य में अधिक रमा है।
संवाद-योजना – केशव की प्रसिद्धि ‘रामचन्द्रिका’ की संवाद-योजना के कारण है। केशव दरबारी कवि थे, इसलिए इन्हें राजनीतिक दावपेंच के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर देने का ढंग खूब आता था। फलतः उनके संवाद बड़े नाटकीय बन पड़े हैं। उनमें वाग्वैदग्ध्य (वाणी की चतुरता) खूब मिलता है। इनमें पात्रों के अनुरूप क्रोध, उत्साह आदि की व्यंजनों भी सुन्दर हुई है। संवादों की भाषा भी अलंकारों के बोझ से रहित सरल और स्वाभाविक है। इसीलिए इनके संवाद बड़े ही हृदयग्राही बन गये हैं। केशव के परशुराम-राम संवाद और अंगद-रावण-संवाद ” जैसे सुन्दर संवाद हिन्दी के अन्य प्रबन्धकाव्यों में नहीं मिलते।

पाण्डित्य-प्रदर्शन – केशव अपने पाण्डित्य की धाक जमाना चाहते थे। संस्कृत काव्य की उक्तियों को उन्होंने अपने काव्य में सँजोया है, किन्तु भाषा की असमर्थता के कारण वे उन्हें स्पष्ट नहीं कर सके।

कवि एवं आचार्य – प्रबन्धकाव्य के अतिरिक्त केशव ने मुक्तककाव्य भी रचा है। ‘कविप्रिया’ में मुख्य रूप से अलंकारों के लक्षण, उदाहरण, काव्यदोष आदि का वर्णन है तथा ‘रसिकप्रिया’ में रस, उसके अंगों (भाव, विभाव, अनुभाव आदि), नायिका-भेद आदि का वर्णन है। इन ग्रन्थों में, केशव का कवि हृदय देखा जा सकता है, जिनके कारण ही केशव को रीतिकालीन काव्य-परम्परा में प्रथम आचार्य का पद प्राप्त हुआ।

रस-योजना – केशवदास ने श्रृंगार, वीर, करुण और शान्त रसों का अधिक प्रयोग किया है। अन्य रस भी यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हो जाते हैं। इनमें भी श्रृंगार रस कवि को अधिक प्रिय हैं। शृंगारपरक अनुभावों का कवि ने सहज, स्वाभाविक और आकर्षक वर्णन किया है। वीर रस भी कवि को प्रिय है। रामचन्द्रिका में ऐसे अनेक ओजपूर्ण प्रसंग देखे जा सकते हैं। कारुणिक प्रसंगों का भी कवि ने बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है। लव की वस्तुत: उनका हृदय प्रकृति की सुषमा में ने रमकर मानव-सौन्दर्य में अधिक रमा है।

संवाद-योजना – केशव की प्रसिद्धि रामचन्द्रिका’ की संवाद-योजना के कारण है। केशव दरबारी कवि थे, इसलिए इन्हें राजनीतिक दावपेंच के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर देने का ढंग खूब आता था। फलतः उनके संवाद बड़े नाटकीय बन पड़े हैं। उनमें वाग्वैदग्ध्य (वाणी की चतुरता) खूब मिलता है। इनमें पात्रों के अनुरूप क्रोध, उत्साह आदि की व्यंजना भी सुन्दर हुई है। संवादों की भाषा भी अलंकारों के बोझ से रहित सरल और स्वाभाविक है। इसीलिए इनके संवाद बड़े ही हृदयग्राही बन गये हैं। केशव के परशुराम-राम संवाद और अंगद-रावण-संवाद जैसे सुन्दर संवाद हिन्दी के अन्य प्रबन्धकाव्यों में नहीं मिलते।

पाण्डित्य-प्रदर्शन – केशव अपने पाण्डित्य की धाक जमाना चाहते थे। संस्कृत काव्य की उक्तियों को उन्होंने अपने काव्य में सँजोया है, किन्तु भाषा की असमर्थता के कारण वे उन्हें स्पष्ट नहीं कर सके।

कविएवं आचार्य – प्रबन्धकाव्य के अतिरिक्त केशव ने मुक्तककाव्य भी रचा है।’कविप्रिया’ में मुख्य रूप से अलंकारों के लक्षण, उदाहरण, काव्यदोष आदि का वर्णन है तथा ‘रसिकप्रिया’ में रस, उसके अंगों (भाव, विभाव, अनुभाव आदि), नायिका-भेद आदि का वर्णन है। इन ग्रन्थों में, केशव का कवि हृदय देखा जा सकता है, जिनके कारण ही केशव को रीतिकालीन काव्य-परम्परा में प्रथम आचार्य का पद प्राप्त हुआ।

रस-योजना – केशवदास ने शृंगार, वीर, करुण और शान्त रसों का अधिक प्रयोग किया है। अन्य रस भी यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हो जाते हैं। इनमें भी शृंगार रस कवि को अधिक प्रिय हैं। शृंगारपरक अनुभावों का कवि ने सहज, स्वाभाविक और आकर्षक वर्णन किया है। वीर रस भी कवि को प्रिय है। रामचन्द्रिका में ऐसे अनेक ओजपूर्ण प्रसंग देखे जा सकते हैं। कारुणिक प्रसंगों का भी कवि ने बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है। लव की मूच्र्छावस्था का समाचार पाकर सीता व्याकुल होकर अचेत हो जाती हैं। उनकी अवस्था को व्यक्त करती हुई कवि की उक्ति है

मनो चित्रे की पुत्तिका, मन क्रम वचन समेत।

इस प्रकार श्रृंगारे, करुण एवं वीर रस के विविध दृश्य केशव ने अंकित किये हैं, परन्तु रस-परिपाक की दृष्टि से केशव को अधिक सफलता नहीं मिली है।

कलापक्ष की विशेषताएँ
केशव काव्यकला के मर्मज्ञ थे, इस कारण उनको कलापक्ष बहुत पुष्ट है। अलंकारवादी आचार्य होने के कारण उन्होंने इस ओर विशेष ध्यान भी दिया है।

भाषा – केशव संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। वे बुन्देलखण्ड के रहने वाले थे, पर उन्होंने अपनी कविताएँ ब्रजभाषा में ही लिखी हैं, जिस पर संस्कृत, बुन्देलखण्डी, अवधी, अरबी-फारसी आदि कितनी ही तत्कालीन प्रचलित भाषाओं का प्रभाव परिलक्षित होता है। ‘रामचन्द्रिका’ की भाषा प्राय: संस्कृत की तत्सम शब्दावली के अत्यधिक प्रयोग से बोझिल है, पर रसिकप्रिया’ की भाषा बड़ी सरल, सरस और सुन्दर है। केशव की भाषा में अभिधा का ही प्राधान्य है। इन्होंने अभिधा के द्वारा ही अपनी कविता में चमत्कार उत्पन्न करने की चेष्टा की है तथा लाक्षणिक प्रयोगों का सहारा कम लिया है। पाण्डित्य-प्रदर्शन की प्रवृत्ति के कारण केशव की भाषा में संस्कृत के ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग मिलता है, जिसे संस्कृत का पण्डित ही समझ सकता है। इनके संवादों की भाषा प्राय: ओजस्विनी और प्रवाहपूर्ण है।

अलंकार-विधान – केशव अलंकारों के विधान में अत्यधिक कुशल थे; क्योंकि वे थे ही अलंकारवादी आचार्य इनके काव्य में काव्यशास्त्र में गिनाये गये लगभग सभी अलंकार मिलते हैं, पर इन्हें चमत्कारप्रधान अलंकार प्रिय थे। एक ही पद में अनेक अलंकारों को भर देना केशवदास के लिए बायें हाथ का खेल था। आलंकारिक सौन्दर्य रामचन्द्रिका’ की प्रमुख विशेषता है। केशवकाव्य में मुख्य रूप से यमक, श्लेष, अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, सन्देह आदि अलंकार तो कदम-कदम पर मिलते हैं। इनके अतिरिक्त परिसंख्या, विरोधाभास, विभावना, अतिशयोक्ति आदि अलंकार भी यत्र-तत्रे भरे पड़े हैं।

छन्द-विधान – पिंगलशास्त्र पर केशव का बड़ा अधिकार था। इस विषय पर उन्होंने ‘रामालंकृत-मंजरी’ नामक एक ग्रन्थ की रचना भी की है। वैसे ‘रामचन्द्रिका’ भी पिंगलशास्त्र का ग्रन्थ मालूम पड़ता है; क्योंकि उसमें एकाक्षरी से लेकर अनेकाक्षरी तथा मात्रिक एवं वर्णिक दोनों प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया गया है। इसमें पग-पग पर छन्द-परिवर्तन दिखाई पड़ता है।

साहित्य में स्थान – केशव के काव्य में भावपक्ष अवश्य हीन है, परन्तु उनका कलापक्ष सर्वाधिक पुष्ट है। इनके , किसी प्रशंसक ने तो ‘सूर-सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास’ लिखकर इन्हें हिन्दी कवियों में सूर-तुलसी के बाद तीसरे स्थान का अधिकारी बताया है। इतना न मानें तो भी यह तो नि:संकोच कहा ही जा सकता है कि “केशवदास हिन्दी के समर्थ कवियों में से एक हैं।”

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

स्वयंवर-कथा

प्रश्न 1:
पावक पवन मणिपन्नग पतंग पितृ,
जेते ज्योतिवंत जग ज्योतिषिन गाये हैं ।

असुर प्रसिद्ध सिद्ध तीरथ सहित सिंधु,
केशव चराचर जे वेदन बताये हैं ।।
अजर अमर अज अंगी औ अनंगी सब,
बरणि सुनावै ऐसे कौन गुण पाये हैं ।
सीता के स्वयंवर को रूप अवलोकिबे को,
भूपन को रूप धरि विश्वरूप आये हैं ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) सीता-स्वयंवर देखने कौन-कौनं आए हुए हैं?
(iv) ‘पवन’ शब्द का सन्धि-विच्छेद कीजिए।
(v) ‘अजर अमर अज अंगी औ अनंगी सब पद्यांश में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद महाकवि केशवदास द्वारा रचित ‘रामचन्द्रिका’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘स्वयंवर-कथा’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – स्वयंवर-कथा।
कवि का नाम – केशवदास।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – सीता के स्वयंवर का दृश्य देखने के लिए समस्त संसार के सभी
चर-अचर रूपवान राजाओं का आकार धारण करके आये हैं। इन प्राणियों में अग्नि, वायु, मणियों वाले शेष, वासुकि आदि सर्प, पक्षी, पितृगण (मनुष्यों के पितृलोकवासी पितर) आदि जितने भी ज्योतियुक्त प्राणियों का उल्लेख ज्योतिषियों ने किया है; उस स्वयंवर में उपस्थित थे।
(iii) सीता-स्वयंवर देखने के लिए समस्त संसार के सभी चर-अचर रूपवान राजाओं का रूप धारण करके आए हुए हैं।
(iv) ‘पवन’ का सन्धि-विच्छेद है-पो + अन।
(v) अनुप्रास अलंकार।।

विश्वामित्र और जनक की भेंट

प्रश्न 1:
केशव ये मिथिलाधिप हैं जग में जिन कीरतिबेलि बयी है ।
दान-कृपान-विधानन सों सिगरी बसुधा जिन हाथ लयी है ।
अंग छ सातक आठक सों भव तीनिहु लोक में सिद्धि भयी है।
वेदत्रयी अरु राजसिरी परिपूरणता शुभ योगमयी है ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) विश्वामित्र जी राम को किसका परिचय दे रहे हैं?
(iv) जनक जी ने किसके द्वारा सारी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया है?
(v) वेद के कितने अंग होते हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद आचार्य केशवदास के महाकाव्य ‘रामचन्द्रिका’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘विश्वामित्र और जनक की भेंट’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – विश्वामित्र और जनक की भेट।
कवि का नाम – केशवदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – इस पद्यांश में विश्वामित्र जी ने श्रीराम को महाराज जनक का परिचय
देते हुए बताया है कि हे रामचन्द्र! देखो ये मिथिला-नरेश (जनक) हैं, जिन्होंने संसार में अपनी कीर्ति की बेल लगायी है; अर्थात् संसार भर में इनका यश फैला हुआ है, जैसे बेल की सुगन्धि चारों ओर फैलती है, वैसे ही इनका यश भी चारों ओर फैल रहा है।
(iii) विश्वामित्र जी राम को जनक जी का परिचय दे रहे हैं।
(iv) जनक जी ने दानवीरता और युद्धवीरता द्वारा सारी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया है।
(v) वेद के छ: अंग होते हैं।

प्रश्न 2:
प्रथम टंकोर झुकि झारि संसार मद,
चंड कोदंड रह्यौ मंडि नवे खंड को ।।

चालि: अचला अचल घालि दिगपाल बल,
पालि ऋषिराज के बचन परचंड को ।।
सोधु दै ईश को, बोधु जगदीश को,
क्रोध उपजाई भृगुनंद बरिबंड को ।
बाधि वर स्वर्ग को, साधि अपवर्ग, धनु
भंग को शब्द गयो भेदि ब्रह्मड को ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसकी ध्वनि सारे संसार का मद हटाकर नवखण्डों में गूंज उठी?
(iv) धनुष की टंकार ने विष्णु को क्या बोध कराया?
(v) ऋषिराज’ शब्द में कौन-सा समास है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – उस प्रचण्ड धनुष की प्रथम टंकोर (टंकार) ने क्रुद्ध होकर सारे संसार का मद हटा दिया (गर्व चूर कर दिया) और नवों खण्डों में यह ध्वनि पूँज उठी।
(iii) प्रचंड धनुष की टंकार ने क्रुद्ध होकर सारे संसार को मद हटा दिया और नवों खण्डों में यह ध्वनि पूँज उठी।
(iv) धनुष की टंकार ने विष्णु को.यह बोध कराया कि उनकी इच्छा के अनुसार संसार का कार्य हो रहा है।
(v) ऋषिराज’ शब्द में ‘तत्पुरुष समास’ है।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 9
Chapter Name Uses of Statistical Methods
Number of Questions Solved 25
Category UP BoardSolutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 9 Uses of Statistical Methods (सांख्यिकीय विधियों के उपयोग)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

परियोजना निर्माण-एक उदाहरण
प्रश्न 1.
प्राथमिक आँकड़ों का प्रयोग करके किसी एक परियोजना का निर्माण करें। इसमें उपयुक्त सांख्यिकीय विधियों का उपयोग करें।
उत्तर
किसी भी परियोजना के निर्माण के लिए अपनाए जाने वाले विभिन्न चरण निम्नलिखित हैं
1. अध्ययन-क्षेत्र की समस्या को पहचानना तथा उसके उद्देश्य एवं क्षेत्र आदि को ध्यान में रखते हुए 
एक व्यापक एवं स्पष्ट योजना तैयार करना।
2. लक्ष्य समूह का चयन करना।
3. उचित रीति द्वारा आँकड़ों का संकलन करना।
4. संकलित समंकों को विभिन्न समंकों में श्रेणियों में विभाजित करना तथा उपयुक्त सांख्यिकीय 
विधियों द्वारा (साध्य, चित्र, बिन्दुरेखा) समंकों का प्रस्तुतीकरण करना।
5. विभिन्न सांख्यिकीय मापों द्वारा समंकों का विश्लेषण करना तथा प्राप्त परिणामों के आधार पर 
निष्पक्ष एवं उचित निष्कर्ष निकालकर उनकी व्याख्या करना।
6. प्रतिवेदन तैयार करना और आवश्यक सुझाव देना।
7. ग्रंथ सूची देना।

विषय : Close Up टूथपेस्ट के उपभोक्ता जागरूकता को मापना

समस्या- एक टूथपेस्ट कम्पनी अपने टूथपेस्ट °Close Up’ का उत्पादन एवं विपणन करती है। यद्यपि कम्पनी का प्रदर्शन अच्छा है तथापि वह अपनी बिक्री को बढ़ाना चाहती है। इसके लिए वह एक , परियोजना (Project) तैयार करती है ताकि वह टूथपेस्ट के संबंध में उपभोक्ताओं को रुचियों, अच्छे प्रचार के उपायों एवं बिक्री बढ़ाने की विधियों के बारे में योजना बना सके।
उददेश्य – परियोजना में निहित कम्पनी के उददेश्य निम्नांकित हैं

  1. यह पता लगाना कि उपभोक्ता Close Up का उपयोग उसके गुणों के कारण करते हैं अथवा केवल एक दंतमंजन के रूप में।
  2. क्या वे Close Up को खरीदते समय इसकी कीमत, गुण, भार आदि के बारे में अन्य टूथपेस्टों से” तुलना करते हैं।
  3. Close Up के बारे में जानने का उनका स्रोत क्या है? विज्ञापन, टी०वी०, पड़ोस, विक्रेता अथवा कोई अन्य।
  4. उपभोक्ता के माध्यम से उत्पाद की कमियों का पता लगाना।
  5.  उपचार तकनीक के द्वारा बाजार का विस्तार करना। लक्ष्य समूह-समंक संकलन के लिए शहरी एवं ग्रामीण उपभोक्ताओं का संकलन किया गया। अनुपात : 70:30 रखा गया।

समंक संकलन- परियोजना में प्राथमिक समंक एकत्रित किए गए। कुल मिलाकर 500 उपभोक्ताओं का चयन किया गया। इसमें से 350 उपभोक्ता शहरी क्षेत्र से तथा 150 उपभोक्ता ग्रामीण क्षेत्र से लिए गए। उपभोक्ताओं का चयन आयु, आय एवं लिंग के आधार पर किया गया। सभी उपभोक्ताओं को एक प्रश्नावली दी गई। प्रश्नावली का प्रारूप निम्नवत् था-

प्रश्नावली

सामान्य सूचना— यह सूचना नितांत गोपनीय रखी जाएगी।
1. नाम : ….
2. आयु : ….
3.  लिंग : पुरुष … महिला ….
4. पता : ….पिन कोड
5. वैवाहिक स्तर : विवाहित …. अविवाहित …..
6. आयु (वर्षों में) : व्यक्तियों की संख्या

  • 10 वर्ष से कम
  • 10-20
  • 20-30
  • 30-40
  • 40-50
  • 50 से अधिक

7. परिवार में सदस्यों की संख्या

  • 1-2
  •  3-4
  • 5-6
  • 6 से अधिक

8. परिवार में आय अर्जकों की संख्या
9. मासिक पारिवारिक आय (१ में)

  • 10,000 वर्ष से कम
  • 10,000-20,000
  • 20,000–30,000
  • 30,000 से अधिक

10. निवासी ; शहरी ग्रामीण
11. प्रमुख अर्जक सदस्य का मुख्य व्यवसाय

  • नौकरी (सेवा)
  • व्यावसायिक
  •  विनिर्माता
  •  व्यापारी
  • अन्य (कृपया बताएँ)

12. अपने दाँतों की सफाई के लिए आप क्या प्रयोग करते हैं?

  • टूथ पाउडर
  • टूथपेस्ट
  • अन्य (कृपया नाम बताएँ)

13. आपके टूथपेस्ट का ब्राण्ड कौन-सा है?

  • सिबाका
  • बबूल
  • क्लोज अप ।
  • कोलगेट
  • पेप्सोडेण्ट ।
  • प्रोमिस
  • फोरहैन्स |
  • अन्य (कृपया नाम बताएँ)

14. प्रत्येक 100 ग्राम टूथपेस्ट पैक की कीमत
15. क्या आपको यह टूथपेस्ट महँगा लगता है? हाँ ………..! नहीं ………….
16. क्या आप टूथपेस्ट खरीदते समय मानक चिह्न, विनिर्माण तिथि एवं समाप्ति तिथि देखते हैं?
हाँ … नहीं …
17. क्या आप Close Up की गुणवत्ता से संतुष्ट हैं? हाँ—–
नहीं…….
18. संतुष्ट न होने पर क्या आप दुकानदार से शिकायत करते हैं? हाँ …….. नहीं ………….
19. क्या आपकी शिकायत सुनी जाती है?
हाँ ……… नहीं …………..
20. यदि दुकानदार आपकी शिकायत पर ध्यान न दें तो आप क्या करते हैं? 

  • कम्पनी से शिकायत करते हैं।
  • उपभोक्ता अदालत जाते हैं।

21. आपको उत्पाद के बारे में जानकारी कहाँ से प्राप्त हुई? |
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22. आप उत्पाद खरीदने के लिए किस घटक से आकर्षित हुए? |
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Uses of Statiscal Method 2

23. आप हमारे उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए क्या सुझाव देंगे?
(कृपया एक पंक्ति लिखें)………………………………
आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण- लगभग विभिन्न वर्गों के 800 उपभोक्ताओं को प्रश्नावली भेजी गई जिनमें से केवल 500 प्रश्नावलियाँ प्राप्त हुईं। इनको निम्नांकित प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है–

(i) आयु के आधार पर उपभोक्ताओं का वर्गीकरणवर्ष
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प्रेक्षण-
सर्वेक्षण किए गए उपभोक्ताओं में सबसे अधिक उपभोक्ता (330) 20-50 आयु वर्ग से 
थे।

(ii) परिवार का आकार–
चयनित 500 उपभोक्ता 100 परिवारों से संबंधित थे। इन परिवारों की 
संख्या आकार के अनुरूप निम्नवत् थी
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प्रेक्षण- सर्वेक्षण किए गए अधिकांश परिवारों (70) में 3-6 सदस्य थे।

(iii) परिवार की मासिक आय प्रस्थिति-
  चयनित परिवारों की मासिक आय प्रस्थिति को अग्रांकित 
तालिका में दिखाया गया है-
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(iv) प्रमुख व्यावसायिक प्रस्थिति– व्यावसायिक दृष्टि से चयनित परिवारों की संख्या निम्नवत्  थी
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(v) प्रयोग किए जाने वाले टूथपेस्ट (प्राथमिकता के क्रम से)- सर्वेक्षण में 500 उपभोक्ताओं का चयन किया गया था। प्रयोग किए जाने वाले टूथपेस्ट का प्राथमिकता क्रम निम्नवत् था-
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प्रेक्षण- उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि चयनित उपभोक्ताओं में से सबसे अधिक उपभोक्ता (210) क्लोजअप टूथपेस्ट का प्रयोग करते थे किंतु यह भी मात्र 42 प्रतिशत था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह टूथपेस्ट भी बहुत अधिक प्रसिद्ध नहीं था और 58 प्रतिशत उपभोक्ता इसका प्रयोग नहीं करते थे।

(vi) चयन का आधार-
चयनित परिवारों के टूथपेस्ट के चयन का आधार निम्नवत् था-
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प्रेक्षण- उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अधिकांश लोगों ने मानक चिह्न (35) तथा उत्पाद की कीमत (20) गुणवत्ता (15) व विक्रयोपरांत सेवा (15) के आधार पर उत्पाद का चयन किया।

(vii) संचार-
साधनों का प्रभाव- विभिन्न संचार-साधनों का चयनित परिवारों पर अग्रवत् प्रभाव 
पड़ा-
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प्रेक्षण- उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि अधिकांश परिवारों पर (75) टूथपेस्ट के चयन में टेलीविजन व समाचार-पत्रों का प्रभाव पड़ा।
परियोजना रिपोर्ट- यह सर्वेक्षण टूथपेस्ट के प्रयोग के लिए किया गया। अधिकांश लोग शहरी क्षेत्रों से थे। शहरी-ग्रामीण उपभोक्ताओं का अनुपात 70: 30 था। इनमें से अधिकांश 20-25 वर्ष आयु वर्ग के थे। उनके परिवार में औसतन 3 से 6 सदस्य थे। अधिकांश परिवारों की मासिक आय के 10,000 से १ 30,000 तक थी और वे मुख्यत: नौकरीपेशा व व्यापारी वर्ग से थे। सर्वेक्षण में क्लोजअप, कोलगेट व पेप्सोडेण्ट अधिकांश उपभोक्ताओं को पसंद थे। अधिकांश लोग विज्ञापन
से प्रभावित हुए थे तथा टेलीविजन व समाचार-पत्र संचार के मुख्य माध्यम थे।
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