UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 3 Organisation of Data

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 3 Organisation of Data (आँकड़ों का संगठन)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प सही है
(i) एक वर्ग मध्यबिन्दु बराबर है
(क) उच्च वर्ग सीमा तथा निम्न वर्ग सीमा के औसत के
(ख) उच्च वर्ग सीमा तथा निम्न वर्ग सीमा के गुणनफल के
(ग) उच्च वर्ग सीमा तथा निम्न वर्म सीमा के अनुपात के
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर :
(क) उच्च वर्ग सीमा तथा निम्न वर्ग सीमा के औसत के

(ii) दो चरों के बारम्बारता वितरण को इस नाम से जानते हैं
(क) एकविचर वितरण
(ख) द्विचर वितरण
(ग) बहुचर वितरण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) द्विचेर वितरण

(iii) वर्गीकृत आँकड़ों में सांख्यिकीय परिकलन आधारित होता है
(क) प्रेक्षणों के वास्तविक मानों पर
(ख) उच्च वर्ग सीमाओं पर
(ग) निम्ने वर्ग सीमाओं पर
(घ) वर्ग के मध्य बिन्दुओं पर
उत्तर :
(घ) वर्ग के मध्य बिन्दुओं पर

(iv) अपवर्जी विधि के अन्तर्गत
(क) किसी वर्ग की उच्च वर्ग सीमा को वर्ग अन्तराल में समावेशित नहीं करते।
(ख) किसी वर्ग की उच्च वर्ग सीमा को वर्ग अन्तराल में समायोजित करते हैं।
(ग) किसी वर्ग की निम्न वर्ग सीमा को वर्ग अन्तराल में समावेशित नहीं करते
(घ) किसी वर्ग की निम्न वर्ग सीमा को वर्ग अन्तराल में समावेशित करते हैं।
उत्तर :
(क) किसी वर्ग की उच्च वर्ग सीमा को वर्ग–अन्तराल में समावेशित नहीं करते।

(v) परास का अर्थ है
(क) अधिकतम एवं न्यूनतम प्रेक्षणों के बीच अन्तर
(ख) न्यूनतम एवं अधिकतम प्रेक्षणों के बीच अन्तर
(ग) अधिकतम एवं न्यूनतम प्रेक्षणों को औसत
(घ) अधिकतम एवं न्यूनतम प्रेक्षणों का अनुपात
उत्तर :
(क) अधिकतम एवं न्यूनतम प्रेक्षणों के बीच अन्तर

प्रश्न 2.
वस्तुओं को वर्गीकृत करने में क्या कोई लाभ हो सकता है? अपने दैनिक जीवन से एक उदाहरण देकर व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
वर्गीकरण का तात्पर्य एकसमान वस्तुओं को समूह या वर्गों में व्यवस्थित करने से है; जैसे-पुस्तकालयों में पुस्तकों को विषयवार रखना वर्गीकरण है। जब आपको भूगोल की किसी विशेष पुस्तक की आवश्यकता पड़ती है तो आपको केवल यह करना है कि ‘भूगोल, समूह में उस पुस्तक को खोजें। अन्यथा आपको अपनी यह विशेष पुस्तक सारी पुस्तकों के ढेर में खोजनी पड़ेगी।

प्रश्न 3.
चर क्या है? एक संतत तथा विविक्त चर के बीच भेद कीजिए।
उत्तर :
चर – वे मूल्य जिनका मान एक मद से दूसरे मद में बदलता रहता है और जो संख्यात्मक रूप में मापे जा सकते हैं उन्हें चर कहते हैं।
संतत तथा विविक्त चर में भेद – संतत चर का कोई भी संख्यात्मक मान हो सकता है; जैसे 1, 2,
[latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex], [latex s=2]\frac { 3 }{ 4 }[/latex], [latex s=2]\sqrt { 2 }[/latex], 1.732 आदि। जबकि विविक्त चर केवल निश्चित मान वाले हो सकते हैं; जैसे—छात्रों की संख्या, परिवार के सदस्यों की संख्या।

प्रश्न 4.
आँकड़ों के वर्गीकरण में प्रयुक्त अपवर्जी तथा समावेशी विधियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
अपवर्जी विधि – 
इस विधि के द्वारा वर्गों का गठन इस प्रकार से किया जाता है कि एक वर्ग की उच्च वर्ग सीमा, अगले वर्ग की निम्न वर्ग सीमा के बराबर होती है। इस विधि से आँकड़ों की संततता बनी रहती है। इस विधि के अन्तर्गत, उच्च वर्ग सीमा को छोड़ देते हैं, परन्तु एक वर्ग की निम्न सीमा को शामिल कर लिया जाता है।

समावेशी विधि – अपवर्जी विधि की तुलना में समावेशी विधि किसी वर्ग अन्तराल में उच्च वर्ग सीमा को नहीं छोड़ती। इस विधि में किसी वर्ग में उच्च – सीमा को सम्मिलित किया जाता है। अत: दोनों वर्ग सीमाएँ वर्ग अन्तराल का हिस्सा होती हैं।

प्रश्न 5.
सारणी 3.2 के आँकड़ों का प्रयोग करें, जो 50 परिवारों के भोजन पर मासिक व्यय (₹ में) को दिखलाती है, और
(क) भोजन.पर मासिक पारिवारिक व्यय का प्रसार ज्ञात कीजिए।
(ख) परास को वर्ग अन्तराल की उचित संख्याओं में विभाजित करें तथा व्यय का बारम्बारता वितरण प्राप्त करें।

  • उन परिवारों की संख्या पता कीजिए जिनका भोजन पर मासिक व्यय

(क) ₹ 2000/- से कम है।
(ख) ₹ 3000/- से अधिक है।
(ग) ₹ 1500/- और ₹ 2500/- के बीच है।
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(क) अधिकतम मूल्य = ₹ 5090
न्यूनतम मूल्य = ₹ 1007 विस्तार = अधिकतम मूल्य.- न्यूनतम मूल्य
= 5090 – 1007 = 4083
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  • उन परिवारों की संख्या जिनका भोजन पर मासिक व्यय

(क) ₹ 2000/- से कम है = 33
(ख) ₹ 3000/- से अधिक है = 06
(ग) ₹ 1500/- और ₹ 2500/- के बीच है = 19

प्रश्न 6.
एक शहर में, यह जानने हेतु 45 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया कि वे अपने घरों में कितनी संख्या में घरेलू उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। नीचे दिए गए उनके उत्तरों के आधार पर एक बारम्बारता सारणी तैयार कीजिए।
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प्रश्न 7.
वर्गीकृत आँकड़ों में सूचना की क्षति का क्या अर्थ है?
उत्तर :
बारम्बारता वितरण के रूप में आँकड़ों के वर्गीकरण में एक अन्तर्निहित दोष पाया जाता है। यह अपरिष्कृत आँकड़ों का सारांश प्रस्तुत कर उन्हें संक्षिप्त एवं बोधगम्य तो बनाता है, परन्तु इसमें वे विस्तृत विवरण नहीं हो पाते जो अपेक्षाकृत आँकड़ों में पाए जाते हैं। आवृत्ति वितरण के द्वारा आँकड़े संक्षिप्त हो जाते हैं वर्गीकृत होने से आँकड़ों से सूचना की क्षति होती है। एक बार आँकड़ों का वर्गीकरण हो जाने पर व्यक्तिगत आँकड़ों का अस्तित्व खत्म हो जाता हैं सांख्यिकीय गणनाएँ वास्तविक मूल्य पर आधारित नहीं होती हैं।

प्रश्न 8.
क्या आप इस बात से सहमत हैं कि अपरिष्कृत आँकड़ों की अपेक्षा वर्गीकृत आँकड़े बेहतर होते हैं?
उत्तर :
अपरिष्कृत आँकड़े अत्यधिक अव्यवस्थित होते हैं, जिन्हें सँभालना कठिन होता है। इनसे सार्थक निष्कर्ष निकालना श्रम-साध्य कार्य है, क्योंकि सांख्यिकीय विधियों को इन पर सरलता से प्रयोग नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर वर्गीकृत आँकड़े सामान्य एवं संक्षिप्त होते हैं। उनसे अर्थपूर्ण निष्कर्ष निकालना आसान होता है। हम वर्गीकृत आँकड़ों को आसानी से चिह्नित कर सकते हैं। बिना किसी बाधा के उनसे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। इस प्रकार वर्गीकृत आँकड़े अपरिष्कृत आँकड़ों से बेहतर होते हैं।

प्रश्न 9.
एकविचर एवं द्धिचर बारम्बारता वितरण के बीच अन्तर बताइए।
उत्तर :
एकल चर के बारम्बारता वितरण को एकविचर वितरण कहा जाता है जैसे किसी छात्र के प्राप्तांक एकल चर के एकविचर विचरण को प्रदर्शित करते हैं। जबकि एक द्विचर बारम्बारता वितरण दो चरों का बारम्बारता वितरण है जैसे किसी क्षेत्र में रहने वाले लोगों का वजन।

प्रश्न10.
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर 7 का वर्ग-अन्तराल लेकर समावेशी विधि द्वारा एक बारम्बारता वितरण तैयार कीजिए
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुणात्मक वर्गीकरण कितने प्रकार का होता है?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर :
(क) दो

प्रश्न 2.
“वर्गीकरण समंकों को उनकी सामान्य विशेषताओं के आधार पर क्रम अथवा समूहों में क्रमबद्ध व विभिन्न परन्तु सम्बद्ध भागों में अलग-अलग करने की विधि है।” यह परिभाषा किसने दी?
(क) बोनिनि ने।
(ख) होरेस सेक्राइस्ट ने
(ग) पीटर एच० मन ने
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) होरेस सेक्राइस्ट ने

प्रश्न 3.
आय, व्यय, लम्बाई, चौड़ाई के आधार पर वर्गीकरण अथवा तथ्यों को आवृत्ति विवरण हैं|
(क) गणनात्मक वर्गीकरण
(ख) गुणात्मक वर्गीकरण
(ग) ऋणात्मक वर्गीकरण
(घ) ये सभी
उत्तर :
(क) गणनात्मक वर्गीकरण

प्रश्न 4.
जहाँ परिवर्तनशील विशेषताएँ संख्याओं में मापी जा सकें वहाँ प्रयोग किया जाता है
(क) चर पद का
(ख) अचर पद का
(ग) (क) तथा (ख) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) चर पद को

प्रश्न 5.
प्रत्येक 10 वर्ष बाद की जाने वाली जनगणना किस आधार का उदाहरण है?
(क) गुणात्मक
(ख) गणनात्मक
(ग) सामयिक
(घ) भौगोलिक
उत्तर :
(ग) सामयिक

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्गीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर :
वर्गीकरण एक क्रिया है जिसके द्वारा समान तथा असमान आँकड़ों को विभिन्न वर्गों के क्रम के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :

  • आँकड़ों को विभिन्न वर्गों में बाँटा जाता है।
  • समान इकाइयों को एक वर्ग में तथा असमान इकाइयों को दूसरे वर्ग में रखा जाता है।

प्रश्न 3.
वर्गीकरण के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर :

  • आँकड़ों को सरल एवं संक्षिप्त रूप में प्रकट करना।
  • ऑकड़ों को व्यवस्थित रूप में वैज्ञानिक आधार प्रदान करना।

प्रश्न 4.
भौगोलिक वर्गीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
जब वर्गीकरण; आँकड़ों की स्थिति अथवा भौगोलिक भिन्नता के आधार पर किया जाता है तो यह भौगोलिक वर्गीकरण कहलाता है।

प्रश्न 5.
समयानुसार वर्गीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
जब आँकड़ों का वर्गीकरण समय के आधार पर किया जाता है तो इसको समयानुसार वर्गीकरण कहते हैं।

प्रश्न 6.
गुणात्मक वर्गीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
जब आँकड़ों को गुणों (विशेषताओं) के आधार पर (धर्म, बौद्धिक स्तर) वर्गीकृत किया जाता है। तो इसे+गुणात्मक वर्गीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 7. चर किसे कहते हैं।
उत्तर :
किसी तथ्य की वह विशेषता जिसे संख्याओं के रूप में मापा जा सकता है, चर (variable) कहलाती है।

प्रश्न 8.
खण्डित या विच्छिन्न चर से क्या आशय है?
उत्तर :
वे चर जिनके मूल्य पूर्णांकों में प्रकट किए जाते हैं, खण्डित चर (discrete variable) कहलाते हैं। ये निश्चित संख्या में व्यक्त किए जाते हैं, भिन्नात्मक (fractional) संख्या में नहीं।

प्रश्न 9.
अखण्डित या अविच्छिन्न चर से क्या आशय है?
उत्तर :
वे चर जो निरन्तर धीरे-धीरे बढ़ते हैं, अखण्डित चर कहलाते हैं। ये भिन्नात्मक (fractional) होते हैं अर्थात् निश्चित सीमाओं के अन्दर इनका कोई भी मूल्य हो सकता है।

प्रश्न10.
श्रृंखला (series) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
“श्रृंखला उन आँकड़ों या आँकड़ों के गुणों को कहते हैं जो किसी तर्कपूर्ण क्रम के अनुसार व्यवस्थित किए जाते हैं।” होरेस सेक्राइस्ट

प्रश्न11.
निम्नलिखित आँकड़े 11वीं कक्षा में अर्थशास्त्र में प्राप्त अंकों के हैं 50 37 24 30 42 18 25 15 35 45 उपर्युक्त श्रृंखला को आरोही व अवरोही क्रम में लिखो।
उत्तर :
आरोही क्रम – 15 18 24 25 30 35 37 42 45 50 ।
अवरोही क्रम – 50 45 42 37 35 30 25 24 18 15

प्रश्न12.
आवृत्ति frequency) किसे कहते हैं?
उत्तर :
किसी समग्र में एक मद जितनी बार आती है अर्थात् जितनी बार उसकी पुनरावृत्ति होती है, उसे उस मद की आवृत्ति कहा जाता है।

प्रश्न13.
आवृत्ति विन्यास एवं आवृत्ति वितरण में मुख्य अन्तर बताइए।
उत्तर :
आवृत्ति विन्यास में X चर एक खण्डित चर होता है जबकि आवृत्ति वितरण में X चर एक खण्डित चर न होकर विभिन्न वर्ग आवृत्तियों का वितरण होता है। इस प्रकार आवृत्ति विन्यास से अभिप्राय खण्डित श्रृंखला से है जबकि आवृत्ति वितरण से अभिप्राय अखण्डित श्रृंखला से है।

प्रश्न14.
वर्ग (class) किसे कहते हैं?
उत्तर :
संख्याओं के किसी निश्चित समूह को जिसमें मदें शामिल होती हैं, वर्ग कहते हैं जैसे 0-10, 10-20 आदि।

प्रश्न15.
वर्ग विस्तार किसे कहते हैं?
उत्तर :
किसी वर्ग की ऊपरी व निचली सीमा में अन्तर को वर्ग विस्तार कहते हैं जैसे–10-20 वर्ग का विस्तार 20 – 10 = 10 होगा।

प्रश्न16.
मध्य मूल्य किसे कहते हैं?
उत्तर :
किसी वर्ग की ऊपरी सीमा व निचली सीमा के औसत मूल्य को मध्य मूल्य कहते हैं; जैसे-10-20 वर्ग का मध्य मूल्य = [latex s=2]1\frac { 20+10 }{ 2 }[/latex] = 15 होगा।

प्रश्न17.
अपवर्जी श्रृंखला (Exclusive Series) से क्या आशय है?
उत्तर :
अपवर्जी श्रृंखला वह श्रृंखला है जिसमें एक वर्ग की ऊपरी सीमा दूसरे वर्ग की निचली सीमा होती। है तथा प्रत्येक वर्गान्तर की ऊपरी सीमा के मूल्य स्तर वाला मद उस वर्ग में सम्मिलित न होकर अगले वर्गान्तर की निचली सीमा में सम्मिलित होता है।

प्रश्न18.
समावेशी श्रृंखला (Inclusive Series) से क्या आशय है?
उत्तर :
समावेशी श्रृंखला वह श्रृंखला है जिसमें एक वर्ग की ऊपरी सीमा दूसरे वर्ग की निचली सीमा के बराबर नहीं होती। अत: इसमें एक वर्ग की ऊपरी सीमा का मूल्य भी उसी वर्ग में शामिल होता है।

प्रश्न19.
खुले सिरे वाली श्रृंखला (Open End series) से क्या आशय है?
उत्तर :
खुले सिरे वाली श्रृंखला वह श्रृंखला है जिसमें न तो प्रथम वर्ग की निम्न सीमा दी हुई होती है और न ही अन्तिम वर्ग की उच्च सीमा। अर्थात् इसमें प्रथम वर्ग की निचली सीमा के स्थान पर ‘से कम’ एवं अन्तिम वर्ग की ऊपरी सीमा के स्थान पर से अधिक’ लिखा होता है।

प्रश्न20.
संचयी आवृत्ति क्या है?
उत्तर :
वे आवृत्तियाँ जिन्हें वर्गानुसार अलग-अलग न रखकर संचयी रूप से जोड़ कर रखा जाता है, संचयी आवृत्तियाँ कहलाती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्गीकरण के मुख्य आधार क्या हैं?
उत्तर :

वर्गीकरण के मुख्य आधार

अनुसन्धान क्रिया में सामान्यतया निम्नलिखित प्रमुख आधारों को सामने रखकर वर्गीकरण किया जाता है
1. गुणात्मक आधार – इसके अनुसार, वर्गीकरण किसी गुण के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के लिए जाति, प्रजाति, धर्म, वैवाहिक स्थिति, शैक्षणिक योग्यता, व्यवसाय आदि विशेषताओं के आधार पर किया गया वर्गीकरण गुणात्मक वर्गीकरण’ कहा जाएगा।

2. गणनात्मक आधार – 
यदि एकत्रित आँकड़े ऐसे हैं कि उन्हें गुणों के आधार पर व्यक्त करने की अपेक्षा संख्याओं में व्यक्त करना सरल है तो गणनात्मक आधार का सहारा लिया जाता है। उदाहरण के लिए ऊँचाई, वजन, आयु, आय, व्यय, उत्पादन आदि के आधार पर किया गया वर्गीकरण ‘गणनात्मक वर्गीकरण’ कहा जाएगा।

3. सामयिक आधार – 
आँकड़ों का वर्गीकरण समय के आधार पर भी किया जाता है। इन्हें समय, दिन, सप्ताह, माह अथवा वर्षों में व्यक्त किया जा सकता है। प्रत्येक 10 वर्ष बाद की जाने वाली जनगणना सामयिक आधार का ही उदाहरण है।

4. भौगोलिक आधार – 
विभिन्न स्थानों के आधार पर भी समंकों का वर्गीकरण किया जाता है। विभिन्न प्रान्तों अथवा किसी एक प्रान्त के जिलों में जनसंख्या का वर्गीकरण ‘भौगोलिक वर्गीकरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
20 विद्यार्थियों के सांख्यिकी में निम्नलिखित प्राप्तांकों को सतत आवृत्ति वितरण के रूप में प्रस्तुत कीजिए। अपवर्जी (Exclusive) और समावेशी (Inclusive) दोनों वर्गान्तर स्पष्ट कीजिए
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प्रश्न 3.
70 विद्यार्थियों के भार (पौण्ड में) के निम्नलिखित आँकड़ों को ऐसे आवृत्ति वितरण के रूप में प्रस्तुत कीजिए, जिसमें पहला वर्गान्तर 60-69 हो
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित श्रेणियों को साधारण अविच्छिन्न श्रेणी (Simple Continuous series) में बदलिए|
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हल :
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प्रश्न 5.
50 परीक्षार्थियों के सांख्यिकी में प्राप्तांक (पूर्णांक 100) निम्नलिखित हैं
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10-10 प्राप्तांकों का वर्ग विस्तार लेते हुए एक आवृत्ति वितरण की रचना कीजिए। प्रथम वर्गान्तर 0-10 रखिए।
हल :
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्गीकरण का अर्थ एवं उद्देश्य बताइए। एक अच्छे वर्गीकरण की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर :
आर्थिक अनुसन्धान किसी समस्या से आरम्भ होता है। समस्या से सम्बन्धित उपकल्पनाएँ बनाई जाती हैं तथा इनका परीक्षण करने के लिए विभिन्न अनुसन्धान प्रविधियों में से सबसे उपयुक्त प्रविधियों का चयन करके आँकड़ों का संकलन किया जाता है। आँकड़े एकत्रित कर लेने के पश्चात् आँकड़ों को व्यवस्थित करना अनिवार्य है ताकि अर्थपूर्ण ढंग से आँकड़ों पर आधारित निष्कर्ष निकाले जा सकें। वर्गीकरण का उद्देश्य बिखरे हुए आँकड़ों को व्यवस्थित करना होता है।

वर्गीकरण का अर्थ व परिभाषा

वर्गीकरण का अर्थ विभिन्न वस्तुओं अथवा बिखरी हुई सामग्री को समान गुणों (अथवा विशेषताओं) के आधार पर विभिन्न श्रेणियों अथवा वर्गों में विभाजित करना है। इस प्रकार वर्गीकरण एकरूपता एवं समानताओं के आधार पर तथ्यों का विभिन्न श्रेणियों में विभाजन है।

पीटर एच० मन के अनुसार-“वर्गीकरण अनिवार्य रूप से वस्तुओं को उनकी समान विशेषताओं के आधार पर एक-साथ रखने का प्रकार है ताकि उन्हें सरलता से समझा जा सके।”

एल० आर० कॉनर के शब्दों में-“वर्गीकरण वस्तुओं को उनकी विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर समूहों एवं वर्गों में क्रमबद्ध करने की एक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य विभिन्नताओं के बीच समान वस्तुओं को खोजकर एक-साथ रखना है।”

होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में-“वर्गीकरण समंकों को उनकी सामान्य विशेषताओं के आधार पर क्रम अथवा समूहों में क्रमबद्ध व विभिन्न परन्तु सम्बद्ध भागों में अलग-अलग करने की विधि है।” स्पर तथा बोनिनि के अनुसार-“वर्गीकरण तथ्यों का वर्गों में, जिन्हें महत्त्वपूर्ण विशेषताओं के आधार पर किया जाता है, समूहीकरण है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्गीकरण एकत्रित आँकड़ों को समान गुणों के आधार पर विभिन्न वर्गों अथवा श्रेणियों में विभाजित करने की प्रक्रिया है ताकि आँकड़ों को व्यवस्थित करके निष्कर्ष निकालने में सहायता मिल सके।

वर्गीकरण के उद्देश्य

1. तथ्यों की प्रकृति स्पष्ट करना – वर्गीकरण का प्रमुख उद्देश्य एकत्रित तथ्यों की प्रकृति को स्पष्ट करना है अर्थात् यह बताना है कि इनमें क्या समानताएँ वे असमानताएँ हैं।
2. तथ्यों को संक्षिप्त एवं बोधगम्य बनाना – वर्गीकरण का दूसरा उद्देश्य तथ्यों को तार्किकता के आधार पर समूहों एवं श्रेणियों में बाँटना है और इस प्रकार तथ्यों को संक्षिप्त तथा बोधगम्य बनाना
3. तथ्यों के विश्लेषण में सहायता देना – वर्गीकरण का एक उद्देश्य तथ्यों एवं आँकड़ों को विश्लेषण के लिए उपयुक्त बनाना है।
4. सामान्यीकरण में सहायता देना – वर्गीकरण का उद्देश्य सामान्यीकरण की प्रक्रिया को संक्षिप्त एवं सरल बनाना है।
5. तुलना में सहायता देना – वर्गीकरण का उद्देश्य संकलित सामग्री को तुलनात्मक अध्ययनों के लिए उपयुक्त बनाना है।
6. पारस्परिक सम्बन्ध स्पष्ट करना – वर्गीकरण द्वारा घटना के कारण और परिणाम में सम्बन्ध ज्ञात करने में सहायता मिलती है।
7. सारणीयन का आधार प्रस्तुत करना – वर्गीकरण सांख्यिकीय सामग्री के सारणीयन तथा सांख्यिकीय विश्लेषण की अन्य क्रियाओं के लिए समुचित आधार प्रस्तुत करता है।

एक अच्छे वर्गीकरण की विशेषताएँ

एक अच्छे वर्गीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • वर्गीकरण स्पष्ट होना चाहिए।
  • विभिन्न वर्ग एक-दूसरे से भिन्न होने चाहिए।
  • वर्गीकरण का आधार एक होना चाहिए।
  • वर्गीकरण में स्थायित्व होना चाहिए।
  • वर्गों अथवी श्रेणियों का आधार उपयुक्त होना चाहिए।
  • वर्गीकरण व्यापक होना चाहिए।
  • वर्गीकरण में परिवर्तनशीलता होनी चाहिए।

प्रश्न 2.
गुणात्मक वर्गीकरण क्या है? यह कितने प्रकार का होता है? प्रत्येक को चार्ट के आधार पर समझाइए।
उत्तर :

गुणात्मक वर्गीकरण

विभिन्न गुणों के आधार पर तथ्यों का वर्गीकरण ‘गुणात्मक वर्गीकरण’ कहा जाता है। यह दो प्रकार का होता है
(अ) सरल या द्वैत वर्गीकरण – इस प्रकार के वर्गीकरण में आँकड़ों को किसी एक गुण के आधार पर
दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, जिन आँकड़ों में वह गुण है, उन्हें एक श्रेणी में तथा जिनमें वह गुण नहीं है उन्हें दूसरी श्रेणी में रखा जाता है। ये दोनों श्रेणियाँ पूर्णतया अपवर्जी अर्थात् एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिखित वर्गीकरण द्वैत वर्गीकरण है
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ऐसे वर्गीकरण में गुण की उपस्थिति या गुण की अनुपस्थिति से ही वर्ग बनाए जाते हैं।

(ब) बहुगुणी वर्गीकरण – इसमें तथ्यों को एक से अधिक गुणों के आधार पर, वर्गीकृत किया जाता है। इसके फलस्वरूप दो से अधिक वर्ग बनते हैं। यदि किसी स्थान की जनसंख्या को वयस्कता (A), पुल्लिग (B), शिक्षित (C) गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया जाए तो यह बहुगुणी वर्गीकरण कहलाएगा और वर्गीकरण इस प्रकार होगा
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गुणात्मक वर्गीकरण में दो बातों पर विशेष ध्यान रखा जाता है–

  • गुण को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए।
  • गुणों में होने वाले परिवर्तनों का ध्यान रखा जाए।

प्रश्न 3.
संख्यात्मक वर्गीकरण क्या है? यह कितने प्रकार का होता है? प्रत्येक को स्पष्ट रूप से समझाइए।
उत्तर :

गणनात्मक अथवा संख्यात्मक वर्गीकरण

इसमें सामग्री को अंकों अर्थात् संख्याओं में प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरण के लिए आय, व्यय, लम्बाई, चौड़ाई के आधार पर वर्गीकरण करना अथवा तथ्यों का आवृत्ति वितरण ‘गणनात्मक वर्गीकरण है। इस प्रकार का वर्गीकरण सांख्यिकीय श्रेणियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह वर्गीकरण निम्नवर्णित हो सकता है
(अ) खण्डित अथवा विच्छिन्न माला के अनुसार वर्गीकरण – इस प्रकार के वर्गीकरण में मूल्यों की आवृत्ति जितनी बार होती है, उसे उसी संख्या के सामने लिखकर एक आवृत्ति सारणी के रूप में दिखाया जाता है; जैसे।
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(ब) सतत माला अथवा वर्गान्तर के अनुसार वर्गीकरण–इनमें आँकड़ों को पृथक्-पृथक् प्रस्तुत न करके वर्गों में प्रस्तुत किया जाता है। वर्ग अथवा वर्गान्तर की सीमाएँ स्वैच्छिक तौर पर निश्चित की जाती हैं; जैसे
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प्रश्न 4.
वर्गीकरण की अपवर्जी विधि व समावेशी विधि को सोदाहरण समझाइए। समावेशी वर्गान्तर को अपवर्जी वर्गान्तर में कैसे बदला जाता है?
उत्तर :
वर्गान्तरों के वर्गीकरण की दो विधियाँ हैं-
(अ) अपवर्जी विधि तथा
(ब) समावेशी विधि।
(अ) अपवर्जी विधि – इसमें पहले वर्ग की उच्च सीमा (upper limit) तथा दूसरे वर्ग की निम्न सीमा (lower limit) समान हाती है। अत: यह समस्या उत्पन्न होती है कि उच्च सीमा को किस वर्ग में रखा जाए। इस विधि में किसी वर्ग की उच्च सीमा को उस वर्ग के अन्तर्गत शामिल न करके, उसके बाद वाले वर्ग में शामिल किया जाता है। उदाहरण के लिए|
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कभी-कभी निचली सीमा को भी अपवर्जी कर दिया जाता है।

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(ब) समावेशी विधि – इसमें निम्न सीमा व उच्च सीमा दोनों को उसी वर्ग में सम्मिलित कर लिया जाता है। इसमें दो बातों का ध्यान रखा जाता है

  • किसी वर्गान्तर की ऊपरी सीमा उससे अगले वर्गान्तर की निचली सीमा के बराबर न हो।
  • इन दोनों में अधिकतम अन्तर 1 संख्या का हो।

समावेशी रीति का उदाहरण निम्नलिखित है
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समावेशी वर्गान्तरों को अपवर्जी वर्गान्तर में बदलना – यदि वर्गान्तर समावेशी हैं, तो उन्हें तुरन्त अपवर्जी वर्गान्तरों में बदल देना चाहिए। इसका नियम यह है कि एक वर्ग की उच्च सीमा तथा अगले वर्ग की निम्न सीमा के अन्तर का आधा करके उसे निचली सीमा में से घटा दिया जाता है और ऊपरी सीमा में जोड़ दिया जाता है। उपर्युक्त उदाहरण के आधार पर
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प्रश्न 5.
चर किसे कहते हैं? चर के प्रकार बताते हुए चर तथा गुण के बीच अन्तर लिखिए।
उत्तर :

चर की अवधारणा

किसी तथ्य की वह विशेषता या प्रक्रिया जिसे संख्याओं के रूप में मापा जा सकता है चर कहलाती है। चर से अभिप्राय उस मात्रा से है जिसमें परिवर्तन होते रहते हैं तथा जिन्हें किसी इकाई द्वारा मापा जा सकता है। यदि किसी कक्षा के विद्यार्थियों के वजन को मापते हैं तो विद्यार्थियों का वजन चर कहलाएगा। चर दो प्रकार के हो सकते हैं
1. खण्डित या विच्छिन्न चर – खण्डित चर वे चर हैं जिनके मूल्य पूर्णाकों के रूप में प्रकट किए जाते हैं अर्थात् जो एक निश्चित मात्रा में होते हैं भिन्नात्मक नहीं होते। इसके एक मूल्य से दूसरे मूल्य के बीच कुछ अन्तर पाया जाता है, इसीलिए इन्हें खण्डित कहा जाता है। उदाहरण के लिए किसी कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या 1, 2, 3, 10, 11, 15 या 20 हो सकती है परन्तु यह [latex s=2]1\frac { 1 }{ 4 }[/latex], [latex s=2]1\frac { 1 }{ 2 }[/latex], [latex s=2]1\frac { 3 }{ 4 }[/latex] या [latex s=2]1\frac { 3 }{ 2 }[/latex] नहीं हो सकती। अन्य शब्दों में खण्डित चर पूरे अंकों के रूप में बढ़ते हैं;
जैसे – 1 या 2 या 3 या 4। ये 1 से [latex s=2]1\frac { 1 }{ 4 }[/latex] या [latex s=2]1\frac { 3 }{ 4 }[/latex] अर्थात् निरन्तर धीरे-धीरे नहीं बढ़ते।

2. अखण्डित या अविच्छिन्न चर – अखण्डित चर वे चर हैं जो निरन्तर धीरे-धीरे बढ़ते हैं। यह
भिन्नात्मक होते हैं। इनका निश्चित सीमाओं के अन्तर्गत कोई भी मूल्य हो सकता है। इनके मूल्य से दूसरे मूल्य के मध्य कोई निश्चित अन्तर नहीं होता। उदाहरण के लिए विद्यार्थियों की ऊँचाई
5’1″, 5’2″, 5’3 [latex s=2]\frac { 1 }{ 4 }[/latex]”, …………………………………………. 5’4″ हो सकती है।

खण्डित चर तथा अखण्डित चर में मुख्य अन्तर

खण्डित चर तथा अखण्डित चर में मुख्य अन्तर यह है कि खण्डित चर का मूल्य पूर्णांकों जैसे 2, 4, 6, 8 आदि के रूप में व्यक्त किया जाता है जबकि अखण्डित श्रृंखला के चर का मूल्य, भिन्नों के रूप में जैसे 2.4, 4.6 तथा 6.8 या 2-4, 4-6 आदि वर्गान्तरों के मूल्य के रूप में प्रकट किया जाता है।

चर तथा गुण के बीच अन्तर

सामान्य भाषा में, ‘चर’ पद से आशय ऐसी विशेषताओं से है जो परिवर्तनशील होती हैं। परन्तु सांख्यिकी में ‘चर’ का यह अर्थ नहीं होता। मनुष्य के बालों का रंग समय के साथ परिवर्तित होता है। क्या यह एक चर है? नहीं, यह चर नहीं है क्योंकि बालों में होने वाले परिवर्तन का संख्याओं में वर्णन नहीं किया जा सकता। चर पद’ का प्रयोग तभी किया जाता है जब ये परिवर्तनशील विशेषताएँ संख्याओं में मापी जा सकें।

उदाहरण के लिए वर्ष 2016 में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों की औसत लम्बाई 56″ थी जबकि पिछले वर्ष 5’5″ थी। गुणात्मक परिवर्तन, उन परिवर्तनों को जिन्हें संख्यात्मक रूप में नहीं मापा जा सकता, उन्हें गुण कहा जाता है। उदाहरण के लिए दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों की बुद्धिमत्ता में परिवर्तन। गुणात्मक परिवर्तन का गुणों की कोटियों के आधार पर वर्गीकरण कर सकते हैं; जैसे–प्रथम, द्वितीय, तृतीय। जहाँ ‘प्रथम’ का अर्थ है अति उत्तम, द्वितीय’ का अर्थ है उत्तम तथा तृतीय’ का अर्थ है अच्छा।

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements (s-ब्लॉक तत्त्व)

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पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्षार धातुओं के सामान्य भौतिक तथा रासायनिक गुण क्या हैं?
उत्तर
वर्ग 1 के तत्व: क्षार धातुएँ (Elements of Group 1: Alkali Metals) क्षार धातुओं के भौतिक तथा रासायनिक गुणों में परमाणु क्रमांक के साथ एक नियमित प्रवृत्ति पाई जाती है। इन तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणों की व्याख्या निम्नलिखित है-
भौतिक गुण (Physical Properties)
क्षार धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण निम्नलिखित सारणी में सूचीबद्ध हैं।
सारणी-1: क्षार धातुओं के भौतिक गुण (Physical Properties of the Alkali Metals)

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1. परमाणु त्रिज्या (Atomic radi)–क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्या ( धात्विक त्रिज्या) का मान अपने आवर्ती में सबसे अधिक होता है तथा ये मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते जाते हैं।
किसी परमाणु के नाभिक के केन्द्र से संयोजकता कोश में उपस्थित बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी परमाणु त्रिज्या कहलाती है। क्षार धातुएँ, आवर्त का प्रथम तत्व होते हुए, सर्वाधिक परमाणु त्रिज्या रखती हैं, चूंकि इनके संयोजकता कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है। परिणामस्वरूप नाभिक के साथ आकर्षण बल का परिमाण न्यूनतम होता है। वर्ग में नीचे जाने पर इलेक्ट्रॉन क्रोशों की क्ररि वृद्धि के कारण परमाणु त्रिज्या बढ़ती है। इसके अतिरिक्त वर प्रभाव का परिमाण भी बढ़ता है जो परमाणु के नाभिक के साथ संयोजी -इलेक्ट्रॉनों के आकर्षण को कम कर देता है, इसके – नाभिकीय आवेश भी बढ़ता है जो नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण को बढ़ा देता है। परन्तु इसका परिमाण आवरण प्रभाव की तुलना में अत्यन्त कम होता है। इस प्रकार परमाणु आकार पर कुल परिमाण द्वारा यह प्रेक्षित होता है कि वर्ग में नीचे जाने पर तत्वों के परमाणु आकार बढ़ते हैं।

2. आयनिक त्रिज्या (Ionic radii)-क्षार धातु परमाणु संयोजी s (ns’)-इलेक्ट्रॉन खोकर एकलसंयोजी धनायन बनाते हैं। ये धनायनी त्रिज्या मूल परमाणु की तुलना में छोटी होती हैं। सारणी-3 के अनुसार आयनिक त्रिज्या के मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते हैं। चूंकि एकल संयोजी धनायनों का निर्माण परमाणु के संयोजकता कोश में उपस्थित केवल एक इलेक्ट्रॉन के निष्कासन पर होता है; अतः शेष इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक द्वारा अधिक आकर्षित होकर उसके समीप हो जाते हैं। परिणामस्वरूप धनायनों का आकार कम हो जाता है। जैसा कि आयनों का आकार अपने मूल परमाणुओं से सम्बद्ध होता है; इसलिए आयनिक त्रिज्या भी परमाणु त्रिज्या के समान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है।

3. आयनन एन्थैल्पी (lonisation enthalpies)-गैसीय अवस्था में किसी उदासीन विलगित परमाणु से सर्वाधिक शिथिल बद्ध (loosely bound) इलेक्ट्रॉन हटाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को न्यूनतम मात्रा, आयनन एन्थैल्पी कहलाती है। इसे kJ mol-1 या ev इकाइयों में व्यक्त किया जा सकता है।

1eV = 96.472 kJ mol-1

क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी अपने आवर्ती में न्यूनतम होती है तथा वर्ग में नीचे जाने पर यह घटती है। इन तत्वों के प्रथम आयनन ऊर्जा के मान सारणी-1 में दिए गए हैं ।
क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी के मान कम होने का कारण इनका परमाणु आकार अधिक होना है। जिसके कारण संयोजी -इलेक्ट्रॉन (ns’) को सरलता से निकाला जा सकता है। आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग में नीचे जाने पर भी घटते हैं; क्योंकि परमाणु त्रिज्या के बढ़ने तथा आवर! प्रभाव को परिमाण अधिक होने पर नाभिक के आकर्षण बल का परिमाण घट जाता है। इसके अतिरिक्त एक ही तत्व के लिए प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों में बहुत अधिक अन्तर होता है।
उदाहरणार्थ-सोडियम के लिए प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान 496 kJ mol-1 है, जबकि इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का मान 4562 kJmol-1 है। इसका प्रमुख कारण है कि एक इलेक्ट्रॉन खोकर बनने वाला एकल संयोजी धनायन (M+) उच्च सममिताकार तथा समीपवर्ती उत्कृष्ट गैस की स्थायी संरचना को प्राप्त कर लेता है। परिणामस्वरूप दूसरे इलेक्ट्रॉन का निष्कासन अत्यन्त कठिन प्रक्रिया हो जाती है जैसा कि उपर्युक्त उदाहरण में दिए सोडियम के प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों से स्पष्ट हो जाता है।

4. विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity)–किसी तत्व की विद्युत ऋणात्मकता इसके परमाणु की इलेक्ट्रॉनों (बन्ध के साझे युग्म के लिए) को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता को कहते हैं। क्षार धातुओं की विद्युत ऋणात्मकता कम होती है जिसका अर्थ है कि इनकी इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने की क्षमता कम होती है। विद्युत ऋणात्मकता के मान वर्ग में नीचे जाने पर घटते हैं।
क्षार धातु परमाणुओं का ns1 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है जिसका अर्थ है कि इनको प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन त्यागने की होती है न कि ग्रहण करने की। अतः इनकी विद्युत ऋणात्मकता के मान कम होते हैं। चूंकि वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ते हैं; अतः परमाणु की संयोजी इलेक्ट्रॉन को थामे रखने की क्षमता में क्रमिक कमी आती है। इसलिए वर्ग में नीचे जाने पर विद्युत ऋणात्मकता घटती है।

5. ऑक्सीकरण-अवस्था एवं धन विद्युती गुण (Oxidation states and electropositive characters)–क्षार धातु परिवार के सभी सदस्य अपने यौगिकों में +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं तथा प्रबल धन विद्युती होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धन विद्युती गुण बढ़ता है। क्षार धातुओ की आयनन एन्थेपी के भान बहुत कम होने के कारण इनके परमाणुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर एकल संयोजी धनायन बनाने की प्रवृत्ति बहुत अधिक होती है। परिमाणस्वरूप एन्थैल्पी का मान घटता है; अत: धन विद्युती गुण बढ़ता है।

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6. धात्विक लक्षण (Metallic character)- वर्ग 1 के तत्व प्रारूपिक धातुएँ हैं तथा अत्यन्त कोमल हैं। इन्हें चाकू द्वारा सरलता से काटा जा सकता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर इनके धात्विक लक्षणों में अत्यधिक वृद्धि होती है।
किसी तत्व का धात्विक गुण उसके इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाने की प्रवृत्ति से सम्बन्धित होता है। धात्विक बन्ध की प्रबलता इलेक्ट्रॉन समुद्र (electron sea) में उपस्थित संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनेल (kernal) के मध्य आकर्षण बल पर निर्भर करती है। करनेल का आकार जितना छोटा होगा तथा संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होगी, धात्विक बन्ध उतना ही प्रबल होगा। दूसरे शब्दों में, धातु की कठोरता धात्विक बन्ध के प्रबल होने पर अधिक होगी। क्षार धातुओं में करनेल बड़े आकार के होते हैं तथा इनमें केवल एक संयोजी इलेक्ट्रॉन होता है। अतः क्षार धातुओं में धात्विक बन्ध दुर्बल होते हैं तथा क्षार धातुएँ कोमल होती हैं। लीथियम सबसे कठोर होता है, चूंकि इसका करनेल सबसे छोटे आकार का होता है।

7. गलनांक तथा क्वथनांक (Melting and boiling points)-क्षार धातुओं के गलनांक तथा क्वथनांक अत्यन्त कम होते हैं जो वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटते हैं।
क्षार धातुओं के परमाणुओं को आकार ‘अधिक होता है; अतः क्रिस्टल-जालक में इनकी बन्धन ऊर्जा बहुत कम होतो है। परिणामस्वरूप इनके गलनांक कम होते हैं। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार में वृद्धि के साथ-साथ गलनांक के मान घटते हैं। क्वथनांक कम होने का कारण भी यही होता है।

8. घनत्व (Density)-क्षार धातुएँ अत्यन्त हल्की होती हैं। इस परिवार के पहले तीन सदस्य जल से भी हल्के होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता है।
क्षार धातुओं के परमाणुओं का आकार बड़ा होता है; अत: वे अन्तराकाश में अधिक संकुलित (closely packed) नहीं होते हैं तथा इनका घनत्व कम होता है। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण घनत्व कम होना चाहिए; परन्तु यह बढ़ता है। चूंकि परमाणु आकार के साथ-साथ परमाणु भार भी बढ़ता है जिसका प्रभाव अधिक है; अत: घनत्व (भार/आयतन) वर्ग में नीचे जाने पर। बढ़ता है। इसका एक अपवाद पोटेशियम (K) हैं जिसका घनत्व सोडियम से कम है। इसका मुख्य कारण पोटेशियम के परमाणु आकार तथा परमाणु आयतन में असामान्य वृद्धि है।

9. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy)-जलयोजन एन्थैल्पी (A Hd ) वह ऊर्जा है जो जलीय विलयन में आयनों के जलयोजित होने पर मुक्त होती है। क्षार धातु आयनों की जलयोजन एन्थैल्पी निम्नलिखित क्रम में होती है-

Li+ > Na+ >K+ > Rb+ >Cs+

जलयोजन में आयनों तथा चारों ओर उपस्थित जल अणुओं के मध्य आकर्षण होता है। अतः आयन का आकार छोटा होने पर, इस पर आवेश का परिमाण अधिक होगा तथा इनकी जलयोजित होने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी। क्षार धातुओं में Li+ आयन की जलयोजन एन्थैल्पी सर्वाधिक होती है। इसलिए लीथियम के लवण अधिकतर जलयोजी प्रवृत्ति के होते हैं (LiC1.2H2O)।

10. ज्वाला में रंग देना (Colouration to the flame)-क्षार धातुओं के यौगिकों (मुख्य रूप से क्लोराइड) को प्लैटिनम के तार पर गर्म करने पर ये ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करते हैं।
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चूँकि क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी बहुत कम होती है; अत: इनके इलेक्ट्रॉनों को उच्च ऊर्जा स्तर तक उत्तेजित करना सरल होता है। जब इन धातुओं को प्लैटिनम की तार पर रखकर ज्वाला दी जाती है। तो ज्वाला की ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर उच्च ऊर्जा स्तर पर पहुँच जाते हैं। पुनः जब ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर आते हैं तो विकिरण के रूप में दृश्य प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। फलस्वरूप क्षार धातुएँ ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करती हैं।

11. प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric effect)-लीथियम के अतिरिक्त सभी क्षार धातुएँ प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करती हैं। प्रकाश-विद्युत प्रभाव को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है–“जब किसी धातु की सतह पर निश्चित आवृत्ति की किरणें टकराती हैं तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होकर निकलते हैं। इसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहते हैं। दूसरे शब्दों में, धातु की सतह पर फोटॉन के प्रहार से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहलाता है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव का कारण क्षार धातुओं की न्यूनतम आयनन एन्थैल्पी है। धातु की सतह पर गिरने वाले फोटॉनों के पास इतनी ऊर्जा होती है कि वे इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से उत्सर्जित कर देते हैं। चूंकि लीथियम के छोटे आकार के कारण इसकी आयनन ऊर्जा अधिक होती है; अतः इस धातु पर गिरने वाला फोटॉन नाभिक और, इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण बल को कम करने में सक्षम नहीं होता है। इस प्रकार प्रकाश के.दृश्य क्षेत्र में यह धातु प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित नहीं करती।

रासायनिक गुण (Chemical Preperties)
क्षार धातुएँ बड़े आकार तथा कर्म आयनन एन्थैल्पी के कारण अत्यधिक क्रियाशील होती हैं। इनकी क्रियाशीलता वर्ग में ऊपर से नीचे क्रमशः बढ़ती जाती है। इस वर्ग के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण रासायनिक गुण निम्नलिखित हैं-

1. वायु के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air)-क्षार धातुएँ वायु की उपस्थिति में मलिन (exposed) हो जाती हैं; क्योकि वायु की उपस्थिति में इन पर ऑक्साइड तथा हाइड्रॉक्साइड की पर्त बन जाती है। ये ऑक्सीजन में तीव्रता से जलकर ऑक्साइड बनाती हैं। लीथियम और सोडियम क्रमशः मोनोक्साइड तथा परॉक्साइड का निर्माण करती हैं, जबकि अन्य धातुओं द्वारा सुपर ऑक्साइड आयन का निर्माण होता है। सुपर ऑक्साइड 0,- बड़े धनायनों; जैसे-K’, RB’ तथा Cs’ की उपस्थिति में स्थायी होता है।

4Li+O2 → 2Li2O (ऑक्साइड)
2Na +O2 → Na2O2 (परॉक्साइड)
M+O2 → MO2 (सुपर ऑक्साइड) (M =K, Rb, Cs)

इन सभी ऑक्साइडों में क्षार की ऑक्सीकरण अवस्था +1 होती है। लीथियम अपवादस्वरूप वायु में उपस्थित नाइट्रोजन से अभिक्रिया करके नाइट्राइड, LisN बना लेता है। इस प्रकार लीथियम भिन्न स्वभाव दर्शाता है। क्षार धातुओं को वायु एवं जल के प्रति उनकी अति सक्रियता के कारण साधारणतया रासायनिक रूप से अक्रिय विलायकों; जैसे-किरोसिन में रखा जाता है।

2. जल के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with water)-क्षार धातुएँ, इनके ऑक्साइड, परॉक्साइड तथा सुपर ऑक्साइड भी जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड, जो घुलनशील होते हैं तथा क्षार (alkalies) कहलाते हैं, बनाती हैं।

2Na + 2H2O → 2Na+ + 2OH +H2
Li2O+H2O → 2LiOH
Na2O2 + 2H2O → 2NaOH +H2O2
2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O2 +O2

यद्यपि लीथियम के मानक इलेक्ट्रोड विभव (E) का मान अधिकतम ऋणात्मक होता है, परन्तु जल के साथ इसकी अभिक्रियाशीलता सोडियम की तुलना में कम है, जबकि सोडियम के E] का मान अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा न्यून ऋणात्मक होता है। लीथियम के इस व्यवहार का कारण इसके छोटे आकार तथा अत्यधिक जलयोजन ऊर्जा का होना है। अन्य क्षार धातुएँ जल के साथ विस्फोटी अभिक्रिया करती हैं। चूँकि अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होती है तथा विमुक्त होने वाली हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है, इसलिए क्षार धातुओं को जल के सम्पर्क में नहीं रखते। क्षार धातुएँ प्रोटॉनदाता (जैसे-ऐल्कोहॉल, गैसीय अमोनिया, ऐल्काइन आदि) से भी अभिक्रियाएँ करती हैं।

3. डाईहाइड्रोजन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen)—लगभग 673K (लीथियम के लिए 1073K) पर क्षार धातुएँ डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाती हैं। सभी क्षार धातुओं के हाइड्राइड रंगहीन, क्रिस्टलीय एवं आयनिक होते हैं। इन हाइड्राइडों के गलनांक उच्च होते हैं।

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हाइड्राइडों का आयनिक गुण Li से Cs तक बढ़ता है। क्षार धातुओं की कम आयनन एन्थैल्पी के कारण इनके परमाणु सरलता से संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर आयनिक हाइड्राइड (M+H) बनाते हैं। चूंकि आयनन एन्थैल्पी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटती है; अतः धनात्मक आयन बनाने की प्रवृत्ति उसी अनुसार बढ़ती है। इसलिए हाइड्रोइडों का आयनिक गुण भी बढ़ता है।

4. हैलोजेन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens)-क्षार धातुएँ हैलोजेन से शीघ्र प्रबल अभिक्रिया करके आयनिक ऑक्साइड हैलाइड M+X बनाती हैं।

2M+X2 → 2M+ X

यद्यपि लीथियम के हैलाइड आंशिक रूप से सहसंयोजक होते हैं। इसका कारण लीथियम की उच्च ध्रुवण-क्षमता है। (धनायन के कारण ऋणायन के इलेक्ट्रॉन अभ्र का विकृत होना ‘ध्रुवणता (polarisation) कहलाता है।) लीथियम आयन का आकार छोटा है; अत: यह हैलाइड आयन के इलेक्ट्रॉन अभ्र को विकृत करने की अधिक क्षमता दर्शाता है। चूंकि बड़े आकार का ऋणायन आसानी से विकृत हो जाता है, इसलिए लीथियम आयोडाइड सहसंयोजक प्रकृति सबसे अधिक दर्शाते हैं। अन्य क्षार धातुएँ आयनिक प्रवृत्ति की होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं। गलित हैलाइड विद्युत के सुचालक होते हैं। इनका प्रयोग क्षार धातुएँ बनाने में किया जाता है।

5. अपचायक प्रकृति (Reducing nature)-क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करती हैं। जिनमें लीथियम प्रबलतम एवं सोडियम दुर्बलतम अपचायक है। मानक इलेक्ट्रोड विभव (E), जो अपचायक क्षमता का मापक है, सम्पूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है-

M(s) → M(g) ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी
M(g) → M+(g) + e आयनन एन्थैल्पी
M+ (g) + H22O → M+ (aq) जलयोजन एन्थैल्पी

स्पष्ट है कि E का मान जितना कम होगा अपचायक गुण उतना ही अधिक होगा। लीथियम आयन का आकार छोटा होने के कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी का मान अधिकतम होता है, जो इसके उच्च ऋणात्मक E मान तथा इसके प्रबल अपचायक होने की पुष्टि करता है।

6. द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia)-क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं। अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है।

M+(x+ y)NH3 → [M(NH3)x]+ + [NH3)y]

विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त करता है। फलस्वरूप, विलयन में ऐमाइड बनता है।

M+ (am) +e +NH3(2) → MNH2 (am) + 1/2H2(g)

जहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है। सान्द्र विलयन में नीला रंग ब्रॉन्ज रंग में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) हो जाता है।

7. सल्फर तथा फॉस्फोरस के साथ अभिक्रिया (Reaction with sulphur and phosphorus)- क्षार धातुएँ सल्फर तथा फॉस्फोरस से गर्म करने पर अभिक्रिया करके सम्बन्धित सल्फाइड तथा फॉस्फाइड बनाती हैं।

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सोडियम फॉस्फाइड सल्फाइड तथा फॉस्फाइड दोनों जल द्वारा जल-अपघटित हो जाते हैं।

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प्रश्न 2.
क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण एवं गुणों में आवर्तिता की विवेचना कीजिए।
उत्तर
वर्ग 2 के तत्व: क्षारीय मृदा धातुएँ (Elements of Group2:Alkaline Earth Metals) आवर्त सारणी के वर्ग 2 के तत्वं हैं-बेरिलियम (Be), मैग्नीशियम (Mg), कैल्सियम (Ca), स्ट्रॉन्शियम (Sr), बेरियम (Ba) एवं रेडियम (Ra)। बेरिलियम के अतिरिक्त अन्य तत्व संयुक्त रूप से ‘मृदा धातुएँ’ कहलाती हैं। प्रथम तत्व बेरिलियम वर्ग के अन्य तत्वों से भिन्नता दर्शाता है एवं ऐलुमिनियम के साथ विकर्ण सम्बन्ध (diagonal relationship) दर्शाता है। वर्ग का अन्तिम तत्व रेडियम रेडियोऐक्टिव प्रकृति का है। इन तत्वों को विशिष्ट नाम निम्नलिखित कारणों से दिया जाता है-

  1. इन तत्वों के ऑक्साइड क्षार धातुओं के समान जल में घुलकर हाइड्रॉक्साइड अथवा क्षार बनाते हैं।
  2. ‘मृदा’ नाम इन्हें इसलिए दिया गया; क्योंकि ऐलुमिना (Al2O3) जैसे पदार्थ ऊष्मा के प्रति अधिक स्थायी होते हैं। कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम तथा बेरियम के ऑक्साइड भी ऊष्मा के प्रति स्थायी होते हैं तथा अत्यधिक गर्म किए जाने पर भी अपघटित नहीं होते। ये धातु ऑक्साइड तथा
    धातुएँ भी क्षारीय मृदा कहलाती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration)
इन तत्वों के संयोजकता-कोश के s-कक्षक में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [उत्कृष्ट गैस]ns2 होता है। क्षार धातुओं के समान ही इनके यौगिक भी मुख्यत: आयनिक प्रकृति के होते हैं।
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क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण तथा गुणों में आवर्तिता इनके भौतिक तथा रासायनिक गुणों से स्पष्ट होती है। इनकी विवेचना निम्नवत् है-
भौतिक गुण (Physical Properties)
क्षारीय मृदा धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण सारणी-2 में सूचीबद्ध हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
1. परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्या (Atomic and ionic radii)-आवर्त सारणी के संगत आवर्ती में क्षार धातुओं की तुलना में क्षारीय मृदा धातुओं की परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्याएँ छोटी होती हैं। ये वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती हैं। इसका कारण इन तत्वों के नाभिकीय आवेशों में वृद्धि होना

2. आयनन एन्थैल्पी (lonisation enthalpies)-क्षारीय मृदा धातुओं के परमाणुओं के बड़े आकार के कारण इनकी आयनने एन्थैल्पी के मान न्यून होते हैं। चूंकि वर्ग में आकार ऊपर से नीचे क्रमश: बढ़ता जाता है; अत: इनकी आयनन एन्थैल्पी के मान कम होते जाते हैं जैसा कि सारणी-2 में स्पष्ट है। क्षारीय मृदा धातुओं के प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान क्षार धातुओं के प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में अधिक है। यह इनकी क्षार धातुओं की संगत तुलनात्मक रूप से छोटे आकार होने के कारण होती है, परन्तु इनके द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मान क्षार धातुओं के द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में कम हैं। उदाहरणार्थ-Mg के प्रथम यिनन एन्थैल्पी को मान Na से अधिक है जिसका कारण Mg का छोटा आकार तथा सममित्ताकार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है। परन्तु एक इलेक्ट्रॉन खोकर Na+ आयन उत्कृष्ट गैस निऑन को विन्यास (1s2,2s2 2p6) प्राप्त कर लेता है, जबकि Mg के संयोजकता कोश में अभी भी एक इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता है (1s2,2s2 2p6, 3s1)। सोडियम के द्वितीयक आयनन एन्थैलपी का उच्च मान इसके सममिताकार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण होता है।

3. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy)-क्षार धातुओं के समान इसमें भी वर्ग में ऊपर से नीचे आयनिक आकार बढ़ने पर इनकी जलयोजन एन्थैल्पी के मान कम होते जाते हैं।

Be2+ > Mg2+ >Ca2+ >Sr2+ > Ba2+

क्षारीय मृदा धातुओं की जलयोजन एन्थैल्पी क्षार धातुओं की जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में अधिक होती है। इसीलिए मृदा धातुओं के यौगिक क्षार धातुओं के यौगिकों की तुलना में अधिक जलयोजित होते हैं। जैसे–MgCl2 एवं CaCl2 जलयोजित अवस्था MgCl2.6H2O एवं CaCl2.6H2O में पाए जाते हैं, जबकि NaCl एवं KCI ऐसे हाइड्रेट नहीं बनाते हैं।

4. धात्विक गुण (Metallic character)-क्षारीय मृदा धातुएँ सामान्यतया चाँदी की भाँति सफेद, चमकदार एवं नर्म, परन्तु अन्य धातुओं की तुलना में कठोर होती हैं। बेरिलियम तथा मैग्नीशियम लगभग धूसर रंग (greyish) के होते हैं। क्षारीय मृदा धातुओं में समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं की तुलना में प्रबल धात्विक बन्ध होते हैं। उदाहरणार्थ-मैग्नीशियम, सोडियम की तुलना में अधिक कठोर तथा सघन होता है।

5. गलनांक तथा क्वथनांक: (Melting and boiling points)–इनके गलनांक एवं क्वथनांक क्षार धातुओं की तुलना में उच्च होते हैं; क्योंकि इनके आकार छोटे होने के कारण ये निविड संकुलित (closely packed) होते हैं तथा इनमें प्रबल धात्विक बन्ध होते हैं। फिर भी इनके गलनांकों तथा क्वथनांकों में कोई नियमित परिवर्तन नहीं दिखता है।

6. धनविद्युती गुण (Electropositive character)–निम्न आयनन एन्थैल्पी के कारण क्षारीय मृदा धातुएँ प्रबल धनविद्युती होती हैं। धनविद्युती गुण ऊपर से नीचे Be से Ba तक बढ़ता है।

7. ज्वाला को रंग प्रदान करना (Colouration to the flame)-कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियमं एवं बेरियम ज्वाला को क्रमशः ईंट जैसा लाल (brick red) रंग, किरमिजी लाल (crimson red) एवं हरा (apple’. green) रंग प्रदान करते हैं। ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प-अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा-स्तर पर चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुन: अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित होती है। परिणामस्वरूप ज्वाला रंगीन दिखने लगती है। बेरिलियम तथा मैग्नीशियम के बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी प्रबलता से बँधे रहते हैं कि ज्वाला की ऊर्जा द्वारा इनका उत्तेजित होना कठिन हो जाता है। अतः ज्वाला में इन धातुओं का अपना कोई अभिलाक्षणिक रंग नहीं होता है। गुणात्मक विश्लेषण में Ca, Sr एवं Ba मूलकों की पुष्टि ज्वाला-परीक्षण के आधार पर की जाती है तथा इनकी सान्द्रता का निर्धारण ज्वाला प्रकाशमापी द्वारा किया जाता है। क्षारीय मृदा धातुओं की क्षार धातुओं की तरह विद्युत एवं ऊष्मीय चालकता उच्च होती है। यह इनका अभिलाक्षणिक गुण होता है।
सारणी-2 : क्षारीय मृदा धातुओं के परमाण्वीय एवं भौतिक गुण (Atomic and Physical Properties of the Alkaline Earth Metals)
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8. विद्युत-ऋणात्मकता (Electronegativity)-क्षारीय मृदा धातुओं के विद्युत-ऋणात्मकता मान क्षार धातुओं के लगभग समान होते हैं (कुछ अधिक)। विद्युत-ऋणात्मकता मान बेरिलियम से रेडियम तक घटते हैं तथा आयनिक यौगिक बनाने की प्रवृत्ति में वृद्धि व्यक्त करते हैं। बेरिलियम का उच्च विद्युत ऋणात्मकता मान (1.5) प्रदर्शित करता है कि यह धातु आयनिक यौगिक बनाती है।
रासायनिक गुण (Chemical Properties)
क्षारीय मृदा धातुएँ क्षार धातुओं से कम क्रियाशील होती हैं। इन तत्वों की अभिक्रियाशीलता वर्ग में ऊपरे: से नीचे जाने पर बढ़ती है।
1. वायु एवं जल के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air and water)–बेरिलियम एवं मैग्नीशियम गतिकीय रूप से ऑक्सीजन तथा जल के प्रति निष्क्रिय हैं; क्योंकि इन धातुओं के पृष्ठों (surfaces) पर ऑक्साइड की फिल्म जम जाती है। फिर भी, बेरिलियम चूर्ण रूप में वायु में जलने पर BeO एवं Be2N3 बना लेता है। मैग्नीशियम अधिक धनविद्युतीय है, जो वायु में अत्यधिक चमकीले प्रकाश के साथ जलते हुए MgO तथा Mg3N2 बना लेता है। कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम वायु से शीघ्र अभिक्रिया करके ऑक्साइड तथा नाइट्राइड बनाते हैं। ये जल से और भी अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करते हैं; यहाँ तक कि ठण्डे जल से अभिक्रिया कर हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।

2. हैलोजेन के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens)-सभी क्षारीय मृदा धातुएँ हैलोजेन के साथ उच्च ताप पर अभिक्रिया करके हैलाइड बना लेती हैं-

M+X2 → MX2 (X= F, CI, Br, I)

BeF2 बनाने की सबसे सरल विधि (NH4)2BeF4 का तापीय अपघटन है, जबकि BeCl2, ऑक्साइड से सरलतापूर्वक बनाया जा सकता है

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इन धातुओं के ऑक्साइडों, हाइड्रॉक्साइडों तथा कार्बोनेटों पर हैलोजेन अम्लों (HX) की प्रतिक्रिया द्वारा भी हैलाइड बनाए जा सकते हैं।

M+2HX → MX2 +H2
MO+2HX→ MX2 +H2O
M(OH)2 + 2HX → MX2 + 2H2O
MCO3 +2HX → MX2 +H2O+CO2

3. हाइड्रोजन के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen)-बेरिलियम के अतिरिक्त सभी क्षारीय मृदा धातुएँ गर्म करने पर डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया करके हाइड्राइड बनाती हैं।

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BeH2 को BeCl2 एवं LiAlH4 की अभिक्रिया से बनाया जा सकता है

2BeCl2 +LiAlH4 → 2BeH2 +LiCl + AlCl3

BeH2 तथा MgH2 प्रवृत्ति में सहसंयोजी होते हैं, जबकि अन्य धातुओं के हाइड्राइडों की आयनिक संरचना होती है। आयनिक हाइड्राइड; जैसे—CaH2 (यह हाइड्रोलिथ भी कहलाता है।) जल से क्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।

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4. अम्लों के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with acids)-क्षारीय मृदा धातुएँ शीघ्र ही अम्लों . से अभिक्रिया कर डाइहाइड्रोजन गैस मुक्त करती हैं।

M+2HCI→ MCl2 +H2

5. अपचायक प्रकृति (Reducing nature)—प्रथम वर्ग की धातुओं के समान क्षारीय मृदा धातुएँ प्रबल अपचायक हैं। इसका बोध इनके अधिक ऋणात्मक अपचयन विभव के मानों से होता है। यद्यपि इनकी अपचयन-क्षमता क्षार धातुओं की तुलना में कम होती है। बेरिलियम के अपचयन विभव का मान अन्य क्षारीय मृदा धातुओं से कम ऋणात्मक होता है फिर भी इसकी अपचयन-क्षमता का कारण Be2+ आयन के छोटे आकार, इसकी उच्च जलयोजन ऊर्जा एवं धातु की उच्चं परमाण्वीयकरण एन्थैल्पी का होना है।

6. द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia)-क्षार धातुओं की भाँति क्षारीय मृदा धातुएँ भी द्रव अमोनिया में विलेय होकर गहरे नीले-काले रंग का विलयन बना लेती हैं। इस विलयन से धातुओं के अमोनीकृत आयन प्राप्त होते हैं-

M+(x + y)NH3 → [M(NH3)x]2+ + 2[e(NH3)y]

इन विलयनों से पुन: अमोनिएट्स (ammoniates) [M(NH3)6]2+ प्राप्त किए जा सकते हैं।

7. कार्बोनेटों का बनना (Formation of carbonates)-धातु के हाइड्रॉक्साइडों के जलीय विलयनों में CO2 की वाष्प की सीमित मात्रा प्रवाहित करने पर धातुओं के कार्बोनेट सफेद अवक्षेप के रूप में प्राप्त किए जा सकते हैं।

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प्रश्न 3.
क्षार धातुएँ प्रकृति में क्यों नहीं पाई जाती हैं?
उत्तर
बहुत अधिक अभिक्रियाशीलता के कारण क्षार धातुएँ प्रकृति में मुक्त अवस्था में नहीं पायी जाती हैं। जाती हैं।

प्रश्न 4.
Na2O3 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर
माना Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था x है। Na2O2 एक परॉक्साइड है और इसमें एक परॉक्सी ——O बन्ध है। इसमें ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था -1 है।
इस प्रकार, Na2O2 के लिये
(2xx)+(-1×2)= 0
x = +1

प्रश्न 5.
पोटैशियम की तुलना में सोडियम कम अभिक्रियाशील क्यों है? बताइए।
उत्तर
सोडियम का मानक झ्लेक्ट्रोड विभव (E = -2.714 V) पोटैशियम के मानक इलेक्ट्रोड विभ्रव (-2.925 V) की तुलना में अधिक है। इसके अतिरिक्त, सोडियम की आयनन एन्थैल्पी (496kJ mol-1) भी पोटैशियम की आयनन एन्थैल्पी (419kJ mol-1 से अधिक है। अत: सोडियम पोटैशियम से कम अभिक्रियाशील है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित के सन्दर्भ में क्षार धातुओं एवं क्षारीय मृदा धातुओं की तुलना कीजिए-
(क) आयनन एन्थैल्पी,
(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता,
(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता।
उत्तर

  1. क्षारीय मृदा धातुओं की आयनन एन्थैल्पी क्षार धातुओं की तुलना में अधिक होती है, क्योंकि क्षारीय मृदा धातुओं में नाभिकीय आवेश अधिक होता है।
  2. क्षार धातु ऑक्साइड क्षारीय मृदा धातु ऑक्साइडों की तुलना में अधिक क्षारीय होते हैं, क्योंकि क्षार धातुएँ क्षारीय मृदा धातुओं की तुलना में अधिक विद्युत धनात्मक होती हैं।
  3. क्षार धातु हाइड्रॉक्साइड क्षारीय मृदा धातु हाइड्रॉक्साइडों की तुलना में जल में अधिक घुलनशील होते हैं, क्योंकि क्षारीय मृदा धातुओं की जालक एन्थैल्पी क्षार धातुओं की तुलना में अधिक होती है।

प्रश्न 7.
लीथियम किस प्रकार मैग्नीशियम से रासायनिक गुणों में समानताएँ दर्शाता है?
उत्तर
लीथियम एवं मैग्नीशियम के रासायनिक गुणों में समानताएँ (Similarities between Chemical Properties of Lithium and Magnesium)
लीथियम एवं मैग्नीशियम के रासायनिक गुणों में समानता के प्रमुख बिन्दु निम्नवत् हैं-

  1. लीथियम एवं मैग्नीशियम जल के साथ धीमी गति से अभिक्रिया करते हैं। इनके ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड बहुत.कम घुलनशील हैं। हाइड्रॉक्साइड गर्म करने पर विघटित हो जाते हैं। दोनों ही नाइट्रोजन से सीधे संयोग करके नाइट्राइडे क्रमश: Li3N एवं Mg3N2 बनाते हैं।
  2. Li2O एवं MgO ऑक्सीजन के आधिक्य से अभिक्रिया करके सुपर ऑक्साइड नहीं बनाते हैं।
  3. लीथियम एवं मैग्नीशियम धातुओं के कार्बोनेट गर्म करने पर सरलतापूर्वक विघटित होकर उनके ऑक्साइड एवं CO2 बनाते हैं। दोनों ही ठोस हाइड्रोजन कार्बोनेट नहीं बनाते हैं।
  4. LiCl एवं MgCl2 एथेनॉल में विलेय हैं।
  5. LiCl एवं MgCl2 दोनों ही प्रस्वेद्य (deliquescent) यौगिक हैं। ये जलीय विलयन से | LiCl.2H2O एवं MgCl2.8H2O के रूप में क्रिस्टलीकृत होते हैं।

प्रश्न 8.
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ रासायनिक अपचयन विधि से क्यों नहीं प्राप्त किए जा सकते हैं? समझाइए।
उत्तर
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ सामान्य उपयोग में आने वाले अपचायकों से अधिक प्रबल अपचायक हैं। इसलिए ये रासायनिक अपचयन विधियों द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती हैं।

प्रश्न 9.
प्रकाश विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम एवं सीजियम क्यों प्रयुक्त किए जाते हैं?
उत्तर
लीथियम की आयनन एन्थैल्पी (ionisation enthalpy) (520 kJmol-1), पोटैशियम (419kJ mol-1) और सीजियम (376 kJ mo-1) की आयनन एन्थैल्पी से बहुत अधिक है। इस कारण यह प्रकाश की क्रिया से इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन नहीं करता जबकि पोटैशियम और सीजियम ऐसा करने में समर्थ हैं। इसलिए प्रकाश वैद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम तथा सीजियम को प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 10.
जब एक क्षार धातु को द्रव अमोनिया में घोला जाता है, तब विलयन विभिन्न रंग प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार के रंग-परिवर्तन का कारण बताइए।
उत्तर
जब एक क्षार धातु को द्रव अमोनिया में घोला जाता है तो अमोनीकृत धनायन (ammoniated cations) और अमोनीकृत इलेक्ट्रॉन् (ammoniated electrons) बनते हैं।

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अमोनीकृत इलेक्ट्रॉन दृश्य प्रकाश (visible light) से ऊर्जा अवशोषित कर उत्तेजित हो जाते हैं और विलयन में गहरी नीला रंग उत्पन्न करते हैं। सान्द्र विलयन में, नीला रंगे काँस्य रंग में बदल जाता है।

प्रश्न 11.
ज्वाला को बेरिलियम एवं मैग्नीशियम कोई रंग नहीं प्रदान करते हैं, जबकि अन्य क्षारीय मृदा धातुएँ ऐसा करती हैं। क्यों?
उत्तर
Be और Mg की आयनन एन्थैल्पी (ionisation enthalpies) अधिक होने के कारण इनके संयोजक इलेक्ट्रॉन (valence electrons) बहुत मजबूती से बंधे होते हैं। ये बुन्सन ज्वाला (bunsen flame) की ऊर्जा द्वारा उत्तेजित नहीं होते हैं। इसलिए ये तत्त्व ज्वाला में कोई रंग नहीं देते हैं। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं की आयनन एन्थैल्पी कम होती है और इनके संयोजक इलेक्ट्रॉन ज्वाला (flame) द्वारा उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं। इस कारण ये धातुएँ ज्वाला को विशेष रंग प्रदान करती हैं।

प्रश्न 12.
सॉल्वे प्रक्रम में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर
सॉल्वे प्रक्रम (Solvay Process)—साधारणतया सोडियम कार्बोनेट ‘सॉल्वे विधि द्वारा बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में लाभ यह है कि सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट जो अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट एवं सोडियम क्लोराइड के संयोग से अवक्षेपित होता है, अल्प विलेय होता है। अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट C0, गैस को सोडियम क्लोराइड के अमोनिया से संतृप्त सान्द्र विलयन में प्रवाहित कर बनाया जाता है। वहाँ पहले अमोनियम कार्बोनेट और फिर अमोनियम हाइड्रोजन कार्बोनेट बनती है। सम्पूर्ण प्रक्रम की अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं-

2NH3 +H2O + CO2 → (NH4)2CO3

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प्रकार सोडियम बाइकार्बोनेट के क्रिस्टल पृथक् हो जाते हैं जिन्हें गर्म करके सोडियम कार्बोनेट प्राप्त किया जाता है-

2NaHCO3 → Na2CO3 +CO2 ↑ +H2O

इस प्रक्रम में NH4Cl युक्त विलयन की Ca(OH)2 से अभिक्रिया पर NHS को पुनः प्राप्त किया जा सकता है। कैल्सियम क्लोराइड सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है

2NH4Cl+Ca(OH)2 → 2NH3 ↑ +CaCl2 +2H2O

प्रश्न 13.
पोटैशियम कार्बोनेट सॉल्वे विधि द्वारा नहीं बनाया जा सकता है। क्यों?
उत्तर
पोटैशियम हाइड्रोजन कार्बोनेट (KHCO3) कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति में जल में पर्याप्त मात्रा में घुलनशील है और अवक्षेपित नहीं होता है। इसलिए, K2CO3 को सॉल्वे विधि द्वारा नहीं बनाया जा सकता।

प्रश्न 14.
Li2CO3 कम ताप पर एवं Na2CO3 उच्च ताप पर क्यों विघटित होता है?
उत्तर
Li2CO3 कम ताप पर एवं Na2CO3 उच्च ताप पर विघटित होता है। Li2CO3 ऊष्मा के प्रति Na2CO3 से कम स्थायी है क्योंकि Li+ आयन आकार में बहुत छोटा है और यह बड़े ऋणायन को ध्रुवित कर अधिक स्थायी Li2O और CO2 का निर्माण करता है। यही कारण है कि Li2CO3 कम ताप पर विघटित हो जाता है। Na+ आयन आकार में बड़ा होता है और CO2-3 को ध्रुवित करने में असमर्थ है। इसलिएं Na2CO3 उच्च ताप पर स्थिर है।

प्रश्न 15.
क्षार धातुओं के निम्नलिखित यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर कीजिए—
(क) नाइट्रेट
(ख) कार्बोनेट
(ग) सल्फेट।
उत्तर
विलेयता–सभी क्षार धातुओं के नाइट्रेट, कार्बोनेट, सल्फेट जल में घुलनशील हैं और इनकी विलेयता समूह में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती है, क्योंकि जलयोजन ऊर्जा (hydration energy) की तुलना में जालक ऊर्जा तेजी से घटती है।
सभी क्षारीय मृदा धातुओं के नाइट्रेट भी जल में घुलनशील हैं, परन्तु इनकी विलेयता समूह में नीचे चलने पर घटती जाती है क्योकि जलयोजन, ऊर्जा (hydration energy) जालक ऊर्जा (lattice energy) की अपेक्षा तेजी से घटती है। क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट जल में अधिक घुलनशील नहीं हैं और इनकी विलेयता समूह में ऊपर से नीचे जाने पर घटती है। BeCO3 जल में सूक्ष्म विलेय है और CaCO3 लगभग अविलेय। समूह में ऊपर से नीचे जाने पर विलेयता घटती है क्योंकि जलयोजन ऊर्जा घटती है। क्षारीय मृदा धातु सल्फेट क्षार धातु सल्फेट से जल में कम विलेय है। इनकी विलेयता समूह में ऊपर से नीचे चलने पर घटती है।
क्षारीय मृदा धातु सल्फेटों की जालक ऊर्जा क्षार धातु सल्फेटों की जालक ऊर्जा से अधिक होती है। यही कारण है कि इनकी विलेयता क्षार धातु सल्फेटों से कम होती है। समूह, में ऊपर से नीचे जाने पर जलयोजन ऊर्जा का मान घटता है परन्तु जालक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिए BeSO4 से BaSO4 तक जाने पर विलेयता घटती है।
तापीय स्थायित्व
(क) क्षारीय मृदा धातुओं और क्षार धातुओं के नाइट्रेट गर्म करने पर विघटित हो जाते हैं। क्षार धातु के नाइट्रेट (Li के अतिरिक्त) विघटित होकर धातु नाइट्राइट बनाते हैं।

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सभी क्षारीय मृदा धातु नाइट्रेट विघटित होकर धातु ऑक्साइड, NO2 तथा O2 देते हैं।

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(ख) क्षार धातु के कार्बोनेट (Li के अतिरिक्त) उच्च ताप पर भी विघटित नहीं होते हैं। लीथियम कार्बोनेट विघटित होकर लीथियम ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड देता है।

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क्षारीय मृदा धातुओं के कार्बोनेट गर्म करने पर विघटित होकर धातु ऑक्साइड और CO2 बनाते हैं।

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क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेटों के विघटन का ताप समूह में ऊपर से नीचे चलने पर बढ़ता है। इस कारण इनके स्थायित्व में वृद्धि होती है जो समूह में ऊपर से नीचे जाने पर विद्युत धनात्मक गुणों (electropositive character) में वृद्धि के कारण है।
(ग) क्षार धातुओं के सल्फेट (Li के अतिरिक्त) बहुत अधिक स्थायी होते हैं और आसानी से विघटित नहीं होते। लीथियम सल्फेट निम्न प्रकार विघटित होता है-

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क्षारीय मृदा धातुओं के सल्फेटों में भी ऊष्मीय स्थायित्व (thermal stability) होता है और गर्म करने पर आसानी से विघटित नहीं होते हैं। यह इनकी उच्च जालक ऊर्जा के कारण होता है। फिर भी, ये अति उच्च ताप पर विघटित हो सकते हैं।

प्रश्न 16.
सोडियम क्लोराइड से प्रारम्भ करके निम्नलिखित को आप किस प्रकार बनाएँगे?
(i) सोडियम धातु
(ii) सोडियम हाइड्रॉक्साइड,
(iii) सोडियम परॉक्साइड,
(iv) सोडियम कार्बोनेट।
उत्तर
(i) सोडियम धातु NaCl (40%) और CaCl2(60%) के मिश्रण का विद्युत अपघटन करने पर प्राप्त होती है। इसमें लोहा (iron) कैथोड और ग्रेफाइट ऐनोड (Down’s cell) का प्रयोग किया जाता है। CaCl2 का उपयोग NaCl का गलनांक कर्म करने के लिए किया जाता है। विद्युत अपघटन करने पर। Na कैथोड (cathode) पर प्राप्त होता है।

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(ii) सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन का नेलसन सेल अथवा कास्टनर-कैलनर सेल में विद्युत अपघटन करने पर सोडियम हाइड्रॉक्साइड (sodium hydroxide) बनता है। इसमें पारा (mercury) कैथोड तथा कार्बन (carbon) ऐनोड का प्रयोग किया जाता है।
नेलसन सेल में-

NaCl → Na+ + Cl
H2O ⇌ H+ + OH
Na+ + OH ⇌ NaOH

कास्टनर-कैलनर सेल में-

NaCl→ Na+ + Cl
H2O ⇌ H+ + OH
Na+ + e → Na
Na + Hg → Na/Hg
NaOH→ Na+ +OH
H2O ⇌ H+ + OH
OH → OH+ e
Na/Hg → NaOH+e

(iii) सोडियम को CO2 मुक्त वायु की अधिकता में गर्म करने पर सोडियम परॉक्साइड बनता है।

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(iv) CO2 अमोनिया युक्त नमक के घोल में प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट (NaHCO3) का अवक्षेप प्राप्त होता है जो गर्म करने पर सोडियम कार्बोनेट (Na2CO3) देता है (Solvay ammonia soda process)।

NaCl + NH3 + CO2 + H2O → NaHCO3 ↓+ NH4Cl
2NaHCO3 → Na2CO4 + CO2 +H2O

प्रश्न 17.
क्या होता है जब?
(i) मैग्नीशियम को हवा में जलाया जाता है।
(ii) बिना बुझे चूने को सिलिका के साथ गर्म किया जाता है।
(iii) क्लोरीन बुझे चूने से अभिक्रिया करती है।
(iv) कैल्सियम नाइट्रेट को गर्म किया जाता है।
उत्तर
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प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से प्रत्येक के दो-दो उपयोग लिखिए
(i) कॉस्टिक सोडा
(ii) सोडियम कार्बोनेट
(iii) बिना बुझा चूना।।
उत्तर
(i) कॉस्टिक सोडा के उपयोग (Uses of caustic soda)-

  1. साबुन, कागज, कृत्रिम रेशम तथा कई अन्य रसायनों के निर्माण में।
  2. पेट्रोलियम के परिष्करण में।।

(ii) सोडियम कार्बोनेट के उपयोग (Uses of sodium carbonate)-

  1. जल के मृदुकरण, धुलाई एवं निर्मलन में।
  2. काँच, साबुन, बोरेक्स एवं कॉस्टिक सोडा के निर्माण में।

(iii) बिना बुझा चूना के उपयोग (Uses of quick lime)-

  1. सीमेण्ट के निर्माण के लिए प्राथमिक पदार्थ के रूप में तथा क्षारक के सबसे सस्ते रूप में।
  2. शर्करा के शुद्धिकरण में एवं रंजकों (dye stuffs) के निर्माण में।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित की संरचना बताइए
(i) BeCl2 (वाष्प),
(ii) BeCl2 (ठोस)।
उत्तर
BeCl2 की संरचना (Structure of BeCl2)
(i) वाष्प अवस्था में (In vapour state)-वाष्प अवस्था में यह यौगिक द्विलक (dimer) के रू में पाया जाता है। (Be परमाणु sp-संकरित होता है) जो लगभग 1000K ताप पर अपघटित होकर एक एकलक (monomer) देता है जिसमें Be परमाणु sp-संकरण अवस्था में होता है।

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(ii) ठोस अवस्था में (In solid state)–ठोस अवस्था में बेरिलियम क्लोराइड की श्रृंखला संरचना (बहुलक) होती है जिसमें समीपवर्ती अणुओं पर उपस्थित क्लोरीन परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन-युग्म इलेक्ट्रॉन न्यून Be परमाणु को दान करके उपसहसंयोजी बन्ध निम्नवत् बनता है

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बहुलक उपर्युक्त श्रृंखला संरचना में Be परमाणु sp3 -संकरित होता है, परन्तु Cl—Be—Cl बन्ध कोण सामान्य चतुष्फलकीय बन्ध कोण (109:5°) से अत्यधिक कम (98°) होता है।

प्रश्न 20.
सोडियम एवं पोटैशियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में विलेय हैं, जबकि मैग्नीशियम एवं कैल्सियम के संगत लवण जल में अल्प विलेय हैं, समझाइए।
उत्तर
सोडियम एवं पोटैशियम आयनों का आकार मैग्नीशियम एवं कैल्सियम आयनों की अपेक्षा बड़ा होता है। बड़े आकार के कारण, सोडियम तथा पोटैशियम के हाइड्रॉक्साइडों एवं कार्बोनेटों की जालक ऊर्जाओं का मान मैग्नीशियम एवं कैल्सियम के हाइड्रॉक्साइडों एवं कार्बोनेटों की जालक ऊर्जाओं (lattice energies) के मान से बहुत कम है। यही कारण है कि सोडियम तथा पोटैशियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में आसानी से विलेय हो जाते हैं, जबकि मैग्नीशियम एवं कैल्सियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में अल्प विलेय हैं।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित की महत्ता बताइए
(i) चूना पत्थर,
(ii) सीमेण्ट,
(iii) प्लास्टर ऑफ पेरिस।
उत्तर
(i) चूना पत्थर की महत्ता (Importance of Lime stone)

  1. संगमरमर के रूप में भवन निर्माण में।
  2. बुझे चूने के निर्माण में।
  3. कैल्सियम कार्बोनेट को मैग्नीशियम कार्बोनेट के साथ लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण में फ्लक्स (flux) के रूप में।
  4. विशेष रूप से अवक्षेपित CaCO3 के प्रयोग से वृहद् रूप में उच्च गुणवत्ता वाले कागज के निर्माण में।
  5. ऐन्टासिड, टूथपेस्ट में अपघर्षक के रूप में, च्यूइंगम के संघटक एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में पूरक के रूप में।

(ii) सीमेण्ट की महत्ता (Importance of Cement)
लोहा तथा स्टील के पश्चात् सीमेण्ट ही एक ऐसा पदार्थ है जो किसी राष्ट्र की उपयोगी वस्तुओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसका उपयोग कंक्रीट, प्रबलित कंक्रीट, प्लास्टरिंग, पुल निर्माण आदि में किया जाता है।

(iii) प्लास्टर ऑफ पेरिस की महत्ता (Importance of Plaster of Paris)
प्लास्टर ऑफ पेरिस का वृहत्तर उपयोग भवन निर्माण उद्योग के साथ-साथ टूटी हुई हड्डियों के प्लास्टर में भी होता है। इसका उपयोग दन्त-चिकित्सा, अलंकरण-कार्य एवं मूर्तियों तथा अर्द्ध-प्रतिमाओं को बनाने में भी होता है।

प्रश्न 22.
लीथियम के लवण साधारणतया जलयोजित होते हैं, जबकि अन्य क्षार धातुओं के लवण साधारणतया निर्जलीय होते हैं। क्यों?
उत्तर
सभी क्षार धातु आयनों में Li+ आयन आकार में सबसे छोटा है। अपने छोटे आकार के कारण यह जल अणु (water molecule) को ध्रुवित कर देता है, उससे जुड़ जाता है और अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा आसानी से जलयोजित हो जाता है। इस कारण लीथियम के लवण सामान्यत: जलयोजित होते हैं, जैसे-LiCl.2H2O

प्रश्न 23.
LiF जल में लगभग अविलेय होता है, जबकि LiCl न सिर्फ जल में, बल्कि ऐसीटोन में भी विलेय होता है। कारण बताइए।
उत्तर
LiF की जालक ऊर्जा (-1005 kJ mol-1) LiCl की जालक ऊर्जा (- 845 kJ mol-1) से अधिक है जिस कारण LiF जल में लगभग अविलेय तथा LiCl जल में विलेय है। इसके अतिरिक्त Cl आयन के F आयन की अपेक्षा आकार में बड़ा होने के कारण LiCl की ध्रुवीकरण की मात्रा LiF की अपेक्षा अधिक होती है। उच्च ध्रुवीकरण की मात्रा के कारण LiCl में सहसंयोजक गुण अधिक होता है। और यह ऐसीटोन organic solvent) में विलेय है।

प्रश्न 24.
जैव द्रवों में सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम एवं कैल्सियम की सार्थकता बताइए।
उत्तर
सोडियम एवं पोटैशियम की जैव द्रवों में सार्थकता (Significance of Sodium and Potassium in Biological Fluids) 70 किग्रा भार वाले एक सामान्य व्यक्ति में लगभग 90 ग्राम सोडियम एवं 170 ग्राम पोटैशियम होता है, जबकि लोहा केवल 5 ग्राम तथा ताँबा 0:06 ग्राम होता है।
सोडियम आयन मुख्यतः अन्तराकाशीय द्रव में उपस्थित रक्त प्लाज्मा, जो कोशिकाओं को घेरे रहता है, में पाया जाता है। ये आयन शिरा-संकेतों के संचरण में भाग लेते हैं, जो कोशिका झिल्ली में जलप्रवाह को नियमित करते हैं तथा कोशिकाओं में शर्करा और ऐमीनो अम्लों के प्रवाह को भी नियन्त्रित करते हैं। सोडियम एवं पोटैशियम रासायनिक रूप से समान होते हुए भी कोशिका झिल्ली को पार करने की क्षमता एवं एन्जाइम को सक्रिय करने में मात्रात्मक रूप से भिन्न हैं। इसीलिए कोशिकाद्रव्य में पोटैशियम धनायन बहुतायत में होते हैं, जहाँ ये एन्जाइम को सक्रिय करते हैं तथा ग्लूकोस के ऑक्सीकरण से ATP बनने में भाग लेते हैं। सोडियम आयन शिरा-संकेतों के संचरण के लिए। उत्तरदायी हैं।
कोशिका झिल्ली के अन्य भागों में पाए जाने वाले सोडियम एवं पोटैशियम आयनों की सान्द्रता में अत्यधिक भिन्नता पाई जाती है। उदाहरण के लिए-रक्त प्लाज्मा में लाल रक्त कणिकाओं में सोडियम की मात्रा 143 m mol L-1 है, जबकि पोटैशियम का स्तर केवल 5 m mol L-1 है। यह सन्द्रिता 10 m mol L-1 (Na+) एवं 105 m mol L-1 (K) तक परिवर्तित हो सकती है। यह असाधारण आयनिक उतार-चढ़ाव, जिसे सोडियम-पोटैशियम पम्प कहते हैं, कोशिका झिल्ली पर कार्य करता है, जो मनुष्य की विश्रामावस्था के कुल उपभोगित ATP की एक-तिहाई से ज्यादा का उपयोग कर लेता है, जो मात्रा लगभग 15 किलो जूल प्रति 24 घण्टे तक हो सकती है।

मैग्नीशियम एवं कैल्सियम की जैव द्रवों में सार्थकता (Significance of Magnesium and Calcium in Biological Fluids)
एक वयस्क व्यक्ति में लगभग 25 ग्राम मैग्नीशियम एवं 1200 ग्राम कैल्सियम होता है, जबकि लोहा मात्र 5 ग्राम एवं ताँबा 0-06 ग्राम होता है। मानव-शरीर में इनकी दैनिक आवश्यकता 200-300 मिग्री अनुमानित की गई है।
समस्त एन्जाइम, जो फॉस्फेट के संचरण में ATP का उपयोग करते हैं, मैग्नीशियम का उपयोग सह-घटक के रूप में करते हैं। पौधों में प्रकाश-अवशोषण के लिए मुख्य रंजक (pigment) क्लोरोफिल में भी मैग्नीशियम होता है। शरीर में कैल्सियम का 99% दाँतों तथा हड्डियों में होता है। यह अन्तरतांत्रिकीय पेशीय कार्यप्रणाली, अन्तरतांत्रिकीय प्रेषण, कोशिका झिल्ली अखण्डता (cell membrane integrity) तथा रक्त-स्कन्दन (blood-coagulation) में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्लाज्मा में कैल्सियम की सान्द्रता लगभग 100 mg L-1 होती है। दो हॉर्मोन कैल्सिटोनिन एवं पैराथायरॉइड इसे बनाए रखते हैं। चूँकि हड्डी अक्रिय तथा अपरिवर्तनशील पदार्थ नहीं है, यह किसी मनुष्य में लगभग 400 मिग्रा प्रतिदिन के अनुसार विलेयत और निक्षेपित होती है। इसका सारा कैल्सियम प्लाज्मा में से ही गुजरता है।

प्रश्न 25.
क्या होता है जब?
(i) सोडियम धातु को जल में डाला जाता है।
(ii) सोडियम धातु को हवा की अधिकता में गर्म किया जाता है।
(iii) सोडियम परॉक्साइड को जल में घोला जाता है।
उत्तर
(i) 2Na (s) +2H2O(l) → 2NaOH(aq) + H2 (g)
H2 गैस मुक्त होती है जो अभिक्रिया में उत्पन्न ऊर्जा के कारण आग पकड़ लेती है।
(ii) UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-26
(iii) Na2O2(s) + 2H2O (l) → 2NaOH(aq) + H2O2(aq)

प्रश्न 26.
निम्नलिखित में से प्रत्येक प्रेक्षण पर टिप्पणी लिखिए-
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता Li+ <Na+ <K+ <Rb+ <Cs+ क्रम में होती है।
(ख) लीथियम ऐसी एकमात्र क्षार धातु है, जो नाइट्राइड बनाती है।
(ग) M2+ (aq) + 2e → M(s) हेतु E (जहाँ M = Ca, Sr या Ba) लगभग स्थिरांक है।
उत्तर
(क) क्षार धातु आयन का आकार जितना छोटा होगा, उसकी जलयोजन की मात्रा उतनी अधिक होगी और उसकी गतिशीलता भी उतनी ही कम होगी। क्षार धातु आयनों के आकार का क्रम निम्न हैLi’ <Na’ <K’ < Rb <Cs’ इसलिए क्षार धातु आयनों की गतिशीलता का क्रम Li+ < Na+ K+ < Rb+ < Cs+
(ख) लीथियम और मैग्नीशियम विकर्ण सम्बन्ध रखते हैं। ये दोनों लगभग समान विद्युत ऋणात्मक हैं। इसलिए Mg की तरह लीथियम भी नाइट्रोजन से अभिक्रिया करके नाइट्राईड बन्मता है जबकि दूसरे । क्षार धातु ऐसा करने में असमर्थ हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-27
(ग) किसी भी निकाय के लिए E मान निम्नलिखित तीन कारकों पर निर्भर करता है

  1. वाष्पन की ऊष्मा
  2. आयनन की ऊष्मा
  3. जलीकरण की ऊष्मा

उपर्युक्त तीनों कारकों का सम्मिलित प्रभाव Ca, Sr और Ba पर समान है। इसलिये इन तीनों के लिए E का मान लगभग समान होता है।

प्रश्न 27.
समझाइए कि क्यों
(क) Na2CO3 का विलयन क्षारीय होता है।
(ख) क्षार धातुएँ उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत-अपघटन से प्राप्त की जाती हैं।
(ग) पोटैशियम की तुलना में सोडियम अधिक उपयोगी है।
उत्तर
(क) Na2CO3 एक दुर्बल अम्ल (H2CO3) और एक प्रबल क्षार (NaOH) से बना लवण है। जब यह जल में घोला जाता है, तो निम्न प्रकार से जल अपघटित हो जाता है-

NaCO3 → 2Na+ + CO2-3
CO2-3 +2H2O →H2CO3 + 2OH

OH की अधिकता के कारण विलयन क्षारीय होता है।
(ख) क्षार धातु आयनों के मानक अपचयन विभव का मान हाइड्रोजन के मानक अपचयन विभव के मान से बहुत कम होता है। इसलिए, क्षार धातु क्लोराइड के जलीय विलयन का विद्युत अपघटन करने पर क्षार धातु के स्थान पर हाइड्रोजन कैथोड पर मुक्त होती है। क्षार धातुओं का निर्माण उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत अपघटन से किया जाता है।
(ग) सोडियम जैविक क्रियाविधि में पोटैशियम (K) की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। सोडियम आयन तन्त्रिका (nerve) आवेग के संचरण में, कोशिका झिल्ली (cell membrane) में जल के परिवहन में और शुगर वे अमीनो अम्लों के कोशों में परिवहन में सहायता करता है। सोडियम कोशों को घेरे हुए blood plasma में रहता है। यद्यपि K+ आयन भी जैविक तन्त्रों में उपयोगी कार्य करते हैं फिर भी Na+ का कार्य अधिक महत्त्वपूर्ण है। यही कारण है कि सोडियम, पोटैशियम से अधिक आवश्यक है।

प्रश्न 28.
निम्नलिखित के मध्य क्रियाओं के सन्तुलित समीकरण लिखिए
(क) Na2CO3 एवं जल
(ख) KO2 एवं जल
(ग) Na2O एवं CO2.
उत्तर
(क) Na2O2 (s) + 2H2O(l) → 2NaOH(aq) + H2O2 (aq)
(ख) 2KO2 (s)+ 2H2O(l) → 2KOH(aq) + H2O2 (aq) + O2 (g)
(ग) Na2O(s) + CO2(g) → Na2CO3 (s)

प्रश्न 29.
आप निम्नलिखित तथ्यों को कैसे समझाएँगे
(क) Be0 जल में अविलेय है, जबकि BeSO4 विलेय है।
(ख) BaO जल में विलेय है, जबकि BaSO4 अविलेय है।
(ग) एथेनॉल में Lil, KI की तुलना में अधिक विलेय है।
उत्तर
(क) BeO सहसंयोजक प्रकृति का होता है और जल में अविलेय है, जबकि BeSO4 आयनिक प्रकृति का होता है और जल में विलेय है। BeSO4 की जलयोजन ऊर्जा Be2+ आयन का आकार छोटा होने के कारण जालक ऊर्जा से बहुत अधिक होती है। इस कारण यह जल में विलेय है।
(ख) BaO और BaSO4 दोनों आयनिक प्रकृति के होते हैं, परन्तु SO2-4 आयन का आकार O2-2 आयन के आकार से अधिक होता है। चूंकि एक छोटा ऋणायन बड़े धनायन को जितनी स्थिरता प्रदान करता है, बड़ा ऋणायन बड़े धनायन को उससे कहीं अधिक क्षमता से स्थिर बनाता है, अत: BaSO4 की जालक ऊर्जा BaO से बहुत अधिक होती है। यही कारण है कि BaO जल में विलेय है जबकि BaSO4 अविलेय।।
(ग) Li+ आयन K+ आयन से बहुत छोटा होता है और यह I आयन को K+ आयन की अपेक्षा अधिक सीमा तक ध्रुवित कर सकता है। इस प्रकार LiI में सहसंयोजक गुण KI से अधिक है। यही कारण है कि LiI एथिल ऐल्कोहल में KI की अपेक्षा अधिक घुलनशील है।

प्रश्न 30.
इनमें से किस क्षार धातु का गलनांक न्यूनतम है?
(क) Na
(ख) K
(ग) Rb
(घ) Cs
उत्तर
(घ) Cs धातु के परमाणु का आकार बढ़ने पर गलनांक कम हो जाता है, क्योंकि आकार बढ़ने पर धातु आबन्ध कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षार धातु जलयोजित लवण देती है?
(क) Li
(ख) Na
(ग) K
(घ) Cs
उत्तर
(क) Li उपर्युक्त सभी क्षार धातुओं में Li+ का आकार सबसे छोटा है। इस कारण Li+
आयन H2O अणु को अधिक ध्रुवित कर देता है, उससे जुड़ जाता है और जलयोजित हो जाता है।

प्रश्न 32.
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट ताप के प्रति सबसे अधिक स्थायी है?
(क) MgCO3
(ख) CaCO3
(ग) SrCO3
(घ) BaCO3
उत्तर
(घ) BaCO3 धातु का विद्युत धनात्मक गुण बढ़ने पर धातु कार्बोनेट का ताप के प्रति स्थायित्व बढ़ता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षार धातुएँ सम्बन्धित हैं।
(i) -ब्लॉक
(ii) p-ब्लॉक
(iii) d-ब्लॉक
(iv) f-ब्लॉक
उत्तर
(i) -ब्लॉक

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किसकी हाइड्रेशन (जलयोजन) ऊर्जा अधिकतम है?
(i) Li+
(ii) Na+
(iii) K+
(iv) Rb+
उत्तर
(i) Li+

प्रश्न 3.
Mg2+ की जलयोजन क्षमता निम्न की अपेक्षा अधिक होती है।
(i) Al3+
(ii) Na+
(iii) Mg3+
(iv) Be2+
उत्तर
(ii) Na+

प्रश्न 4.
किस आयन की जल में चालकता सबसे अधिक है?
(i) Li+
(ii) Na+
(iii) K+
(iv) Cs+
उत्तर
(iv) Cs+

प्रश्न 5.
सोडियम तत्त्व को किसमें रखा जाता है?
(i) केरोसीन में
(ii) टॉलूईन में
(iii) बेन्जीन में
(iv) ऐल्कोहॉल में
उत्तर
(i) केरोसीन में

प्रश्न 6.
सोडा ऐश है ।
(i) Na2CO3 . 6H2O
(ii) Na2CO3 . 10H2O
(iii) Na2CO3
(iv) Na2CO3 . 2H2O
उत्तर
(iii) Na2CO3

प्रश्न 7.
एक सफेद पदार्थ का जलीय विलयन क्षारीय है। यह पदार्थ हो सकता है।
(i) Na2CO3
(ii) NH4Cl
(ii) NaNO3
(iv) Fe2O3
उत्तर
(i) Na2CO3

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से किस यौगिक का औद्योगिक उत्पादन NaCI के विद्युत-अपघटन द्वारा किया जाता है?
(i) NaHCO3
(ii) Na2CO3
(iii) NaOH
(iv) NaOCl
उत्तर
(iii) NaOH

प्रश्न 9.
सोडियम हाइड्रॉक्साइड के औद्योगिक उत्पादन में सह-उत्पाद है।
(i) क्लोरीन
(ii) ऑक्सीजन
(iii) सोडियम कार्बोनेट
(iv) सोडियम क्लोराइड
उत्तर
(i) क्लोरीन

प्रश्न 10.
जलीय NaOH के वैद्युत अपघटन पर कौन-से आयन ऐनोड पर जाएँगे?
(i) Na+
(ii) OH
(iii) H+
(iv) O2-
उत्तर
(i) OH

प्रश्न 11.
जिंक को कास्टिक सोडा की अधिकता वाले विलयन में मिलाने से बनता है।
(i) Zn(OH)2
(ii) ZnO
(iii) Na2ZnO2
(iv) NaZnO2
उत्तर
(iii) Na2ZnO2

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में घनत्व उच्चतम होता है।
(i) मैग्नीशियम का
(ii) कैल्सियम का
(iii) स्ट्रॉन्शियम का
(iv) बेरियम का
उत्तर
(iii) स्ट्रॉन्शियम का

प्रश्न 13.
निम्न में कौन-सी धातु न्यूनतम आयनिक क्लोराइड बनाती है?
(i) Be
(ii) Ca
(iii) Mg
(iv) Sr
उत्तर
(i) Be

प्रश्न 14.
निम्न में सबसे कम क्षारीय है।
(i) पोटैशियम
(ii) कैल्सियम
(iii) बेरीलियम
(iv) मैग्नीशियम
उत्तर
(iii) बेरीलियम

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समूह I के तत्त्व क्षार धातुएँ क्यों कहलाते हैं?
उत्तर
समूह I के तत्त्व जल से अभिक्रिया करके क्षारीय प्रकृति के हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं इसलिए इन्हें सामान्यतः क्षार धातुएँ कहते हैं।

प्रश्न 2.
सोडियम तथा पोटैशियम के एक महत्त्वपूर्ण अयस्क का नाम लिखिए।
उत्तर
सोडियम के प्रमुख अयस्क रॉक साल्ट (NaCl), चीली साल्टपीटर (NaNO3) तथा क्रायोलाइट (Na3AlF6) हैं। पोटैशियम के प्रमुख अयस्क सिल्वाइट (KCl), फेलस्पार (K2O.Al2O36SiO2) तथा कार्नेलाइट (KCl· MgCl2·6H,0) हैं।

प्रश्न 3.
क्षार धातुओं की निम्न आयनन ऊर्जाएँ होती हैं। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर
क्षार धातुओं की आयनन ऊर्जाएँ निम्न होती हैं क्योंकि इनके परमाणु में उत्कृष्ट गैस क्रोड संयोजी कोश में उपस्थित एक s-इलेक्ट्रॉन को नाभिक के आकर्षण बल से परिरक्षित करता है। अतः बाह्य कोश के 5-इलेक्ट्रॉन पर कार्यरत प्रभावी नाभिकीय आवेश कम होता है। इसलिए इस इलेक्ट्रॉन को थोड़ी ऊर्जा देकर ही निकाला जा सकता है।

प्रश्न 4.
क्षार धातुओं के घनत्व कम क्यों होते हैं?
उत्तर
क्षार धातुओं की काय केन्द्रित घनीय संरचना होती है। यह संरचना अन्य धातु संरचनाओं की तुलना में कम सघन होती है। क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्याएँ भी बड़ी होती हैं। इन कारणों से क्षार धातुओं के घनत्व कम होते हैं।

प्रश्न 5.
क्षार धातुओं में से किस तत्त्व का/कौन-सा तत्त्व :
(i) उच्चतम गलनांक होता है?
(ii) प्रबलतम अपचायक है?
(iii) सबसे कम विद्युत ऋणात्मक है?
उत्तर

  1. लीथियम का गलनांक उच्चतम (454 K) होता है।
  2. गैसीय अवस्था में सीजियम तथा जलीय अवस्था में लीथियम प्रबलतम अपचायक है।
  3. सीजियम सबसे कम विद्युत ऋणात्मक अर्थात् सबसे अधिक विद्युत धनात्मक है।

प्रश्न 6.
क्षार धातु प्रबल अपचायक क्यों हैं? समझाइए।
उत्तर
क्षार धातुओं में इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रबल प्रवृत्ति होती है इसलिए ये प्रबल अपचायकों के रूप में कार्य करती हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पदार्थों के रासायनिक नाम तथा सूत्र लिखिए।
(i) सोडा ऐश।
(ii) बेकिंग सोडा
(iii) कास्टिक सोडा
(iv) धावन सोडा।
उत्तर

  1. सोडा ऐश ⇒ सोडियम कार्बोनेट, Na2CO3
  2. बेकिंग सोडा ⇒ सोडियम बाइकार्बोनेट, NaHCO3
  3. कास्टिक सोडा ⇒ सोडियम हाइड्रॉक्साइड, NaOH
  4. धावन सोडा ⇒ सोडियम कार्बोनेट, Na2CO3·10H2O

प्रश्न 8.
सोडियम कार्बोनेट’के मुख्य उपयोग लिखिए।
उत्तर

  1. काँच, कागज तथा बोरेक्स के निर्माण में।
  2. जल को मृदु बनाने में।
  3. बेकिंग सोडा, कास्टिक सोडा आदि बनाने में।
  4. कपड़ों को साफ करने में।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित पर कास्टिक सोडा की अभिक्रियाएँ लिखिए
(i) Zn
(ii) P4
(iii) CO2
(iv) Cl2
उत्तर
(i) कास्टिक सोडा Zn से अभिक्रिया करके सोडियम जिंकेट बनाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-28

(ii) कास्टिक सोडा PA से अभिक्रिया करके फॉस्जीन गैस बनाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-29

(iii) कास्टिक सोडा CO2 से अभिक्रिया करके Na2CO3 बनाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-30

(iv) कास्टिक सोडा Cl2 से अभिक्रिया करके सोडियम हाइपोक्लोराइट और सोडियम क्लोराइड बनाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-31

प्रश्न 10.
गुणात्मक विश्लेषण में NaOH के दो उपयोग लिखिए।
उत्तर
1. यह फेरिक क्लोराइड को फेरिक हाइड्रॉक्साइड में अवक्षेपित कर देता है।

FeCl3 +3NaOH → Fe(OH)3 ↓ + 3NaCl

2. यह CuSO4 से क्रिया करके इसे क्यूपिक हाइड्रॉक्साइड के रूप में अवक्षेपित करता है।

CuSO2 + 2NaOH → Cu(OH)2+Na2SO4

प्रश्न 11.
क्या कारण है कि गलित कैल्सियम हाइड्राइड का वैद्युत-अपघटन करने पर हाइड्रोजन ऐनोड पर मुक्त होती है ?
उत्तर
गलित कैल्सियम हाइड्राइड का वैद्युत-अपघटन इस प्रकार होता है।

CaH2 ⇌ Ca2+ + 2H

हाइड्रोजन आयन के ऋणावेशित होने के कारण हाइड्रोजन ऐनोड पर मुक्त होती है।

प्रश्न 12.
कैल्सियम ऑक्साइड या बिना बुझे चूने के विरचन की एक विधि दीजिए।
उत्तर
कैल्सियम ऑक्साइड या बिना बुझा चूना लाइमस्टोन (CaCO3) को घूर्णी भट्ठी में 1070-1270K ताप पर गर्म करके प्राप्त किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-32

प्रश्न 13.
कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड या बुझे चूने को बनाने की एक विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड या बुझे चूने को बिना बुझे चूने में जल मिलाकर प्राप्त किया जाता है। । इस प्रक्रिया को चूने का बुझना कहते हैं।
CaO+ H2O → Ca(OH)2

प्रश्न 14.
प्लास्टर ऑफ पेरिस के जमने की रासायनिक अभिक्रिया का समीकरण दीजिए।
उत्तर
प्लास्टर ऑफ पेरिस जमर्कर कड़ा छिद्रयुक्त ठोस बन जाता है, जिसे प्लास्टर ऑफ पेरिस का जमना कहते हैं। वस्तुतः यह अभिक्रिया प्लास्टर ऑफ पेरिस का जिप्सम में परिवर्तन है।

(CasO4) 2 · H2O+ 3H2O → 2(CasO4·2H2O)

प्रश्न 15.
किंलकर क्या है? इससे सीमेण्ट कैसे बनाया जाता है?
उत्तर
सीमेण्ट के कच्चे पदार्थों से बने मिश्रण को सीमेण्ट की भट्ठी में डालकर गर्म करने के बाद छोटी-छोटी गोलियों के रूप में प्राप्त पदार्थ को किंलकर कहते हैं। क्लिकर; डाइकैल्सियम सिलिकेट, ट्राइकैल्सियम सिलिकेट, ट्राइकैल्सियम ऐलुमिनेट तथा टेट्राकैल्सियम ऐलुमिनोफेराइट का मिश्रण है। क्लिकर में 2-3% जिप्सम मिलाकर इसको पीसकर प्रयोग योग्य सीमेण्ट प्राप्त किया जाता है जिसको पोर्टलैण्ड सीमेण्ट कहते हैं।

प्रश्न 16.
सीमेण्ट किंलकर के मुख्य अवयव क्या हैं? इसमें जिप्सम क्यों मिलाया जाता है?
उत्तर
सीमेण्ट किंलकर के मुख्य अवयव निम्नलिखित हैं-

  1. डाइकैल्सियम सिलिकेट (2CaO.SiO2)
  2. ट्राइकैल्सियम सिलिकेट (3CaO.SiO2)
  3. ट्राइकैल्सियम ऐलुमिनेट (3CaO.Al2O3) तथा
  4. टेट्राकैल्सियम ऐलुमिनोफेराइट (4CaO.Al2O2.Fe2O3)

सीमेण्ट किंलकर जल के प्रति अति सुग्राही होता है जिससे यह नमी और जल के सम्पर्क में आकर जम जाता है। इसकी जमने की क्षमता को शिथिल करने के लिए मन्दक पदार्थ मिलाए जाते हैं। जिप्सम एक मन्दक पदार्थ है, जिसके मिलाने से सीमेण्ट क्लिकर के जमने की क्षेमतो मन्द हो जाती है और अधिक जल के सम्पर्क में आने पर ही यह जमता है।

प्रश्न 17.
सीमेण्ट के प्रयोग में बालू का क्या उपयोग होता है?
उत्तर
सीमेण्ट जल या नमी के प्रति अति सुग्राही है। नमी के कारण इसमें आन्तरिक प्रतिबल उत्पन्न जाता है, जिससे इसमें दरार पड़ जाती है और इसकी क्षमता कम हो जाती है। बालू मिलाने से। सीमेण्ट में आन्तरिक प्रतिबल उत्पन्न नहीं होता, जिससे सीमेण्ट में दरार नहीं पड़ती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लीथियम की तरह सोडियम और पोटैशियम जटिल यौगिक क्यों नहीं बनाते?
उत्तर
लीथियम परमाणु त्रिज्या छोटी होने तथा उच्च आवेश घनत्व एवं d ऑर्बिटल की अनुपस्थिति के कारण जटिल यौगिक बनाता है। जबकि सोडियम एवं पोटैशियम आकार बड़ा होने एवं आवेश घनत्व अपेक्षाकृत निम्न होने के कारण जटिल यौगिक नहीं बनाते हैं।

प्रश्न 2.
क्षार धातुओं की रासायनिक अभिक्रियाशीलता का वर्णन कीजिए।
उत्तर
क्षार धातुएँ बहुत अभिक्रियाशील तत्व हैं, क्योंकि इन धातुओं की ऊर्ध्वपातन ऊष्माएँ (heat of sublimation).और इनके आयनन विभव (l1) बहुत नीचे हैं। इनकी सक्रियता आयनन विभव घटने के साथ बढ़ती है(Li→ Cs)। वायु में रखने पर क्षार धातुओं की धात्विक चमक (metallic lustre) शीघ्रता से मलिन (tarmish) हो जाती है, क्योंकि धातु की सतह पर धातु ऑक्साइड की परत (film) जम जाती है। वायु एवं जल द्वारा सुगमता से ऑक्सीकृत हो जाने के कारण क्षार धातुओं को मिट्टी के तेल में रखते हैं। क्षार धातु (M) अधिकांश अधातुओं के साथ सीधी अभिक्रिया करते हैं। नाइट्रोजन के साथ केवल लीथियम सीधे अभिक्रिया करता है।
लीथियम को ऑक्सीजन के साथ 200°C पर गर्म करने पर लीथियम मोनॉक्साइड, Li2O, बनता है। लीथियम केवल मोनॉक्साइड बनाता है। सोडियम, पोटैशियम व उच्च परमाणु क्रमांक के अन्य क्षार धातु ऑक्सीजन के साथ बहुत शीघ्रता से अभिक्रिया करते हैं। ये धातु वायु या ऑक्सीजन में जलते हैं। सोडियम Na2O और Na2O2(सोडियम परॉक्साइड) का मिश्रण बनाता है। सोडियम धातु को शुष्क शुद्ध ऑक्सीजन गैस की धारा में 300°C पर गर्म करने पर हल्के पीले रंग का ठोस सोडियम परॉक्साइड बनता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-33
सोडियम परॉक्साइड पोटैशियम व उच्च परमाणु क्रमांक के अन्य क्षार धातु आयनिक परॉक्साइड (जैसे—K2O2) और सुपरऑक्साइड (जैसे-KO2) बनाते हैं। आयनिक परॉक्साइडों में परॉक्साइड आयन O2-2 और सुपरऑक्साइडों में सुपरऑक्साइड आयन O2 होता है। क्षार धातु क्लोरीन व अन्य हैलोजनों के साथ सीधे संयोग करते हैं। ये हाइड्रोजन के साथ उच्च ताप पर अभिक्रिया करते हैं। क्षार धातु जल के साथ बहुत तीव्रता (violently) से अभिक्रिया करते हैं। अभिक्रिया में हाइड्रोजन गैस उत्पन्न होती है।

2M + 2H2O → 2MOH + H2

इस अभिक्रिया से उत्पन्न ऊष्मा से क्षार धातु पिघल जाता है और हाइड्रोजन के प्रज्वलित हो जाने से ज्वाला उत्पन्न होती है। रूबिडियम (Rb) और सीजियम (Cs) विस्फोट के साथ अभिक्रिया करते हैं। क्षार धातु (M) अम्लों के साथ तीव्रता से अभिक्रिया करते हैं। अभिक्रिया में हाइड्रोजन मुक्त होती है।

2M + H2SO4 → M2SO4 + H2

क्षार धातु ऐल्कोहॉल से हाइड्रोजन विस्थापित करते हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-34

क्षार धातु कई धातुओं के ऑक्साइडों और क्लोराइडों को धातु में अपचयन करते हैं।

BeCl2 + 2Na → Be + 2NaCl

सोडियम धातु कार्बन डाइऑक्साइड गैस में जलता है और उसे कार्बन में अपचयित कर देता है।

3CO2 + 4Na → 2Na2CO3 + C

प्रश्न 3.
लीथियम के असंगत गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
आवर्त सारणी के प्रत्येक वर्ग का प्रथम तत्व वर्ग के अन्य तत्वों से गुणों में भिन्नता प्रदर्शित करता है। यह तत्व का असंगत व्यवहार (anomalous behaviour) कहलाता है। वर्ग के प्रथम तत्व की परमाणु एवं आयनिक त्रिज्या वर्ग के अन्य तत्वों के अपेक्षाकृत बहुत छोटी होने के कारण तत्व असंगत व्यवहार प्रदर्शित करता है।
वर्ग 1 का प्रथम तत्व लीथियम (Li) वर्ग के अन्य तत्वों से गुणों में भिन्नता प्रदर्शित करता है। लीथियम का असंगत व्यवहार लीथियम आयन, Li+ की बहुत छोटी त्रिज्या और उच्च आवेश घनत्व के कारण हैं।
लीथियम के अन्य क्षार धातुओं के गुणों से भिन्न कुछ गुण (असंगत गुण) निम्नलिखित हैं

  1. क्षार धातुओं में लीथियम (L+ /Li) का मानक इलेक्ट्रोड विभव (मानक अपचयन विभव) असामान्य रूप से उच्च ऋणात्मक है। यह Li+ आयन की बहुत छोटी त्रिज्या और उच्च हाइड्रेशन ऊर्जा के कारण है। जलीय विलयन में लीथियम अन्य क्षार धातुओं से प्रबल
    अपचायक है।
  2. क्षार धातुओं में केवल लीथियम, नाइट्रोजन से अभिक्रिया करता है और लीथियम नाइट्राइट (Li3N) बनाता है। लीथियम और नाइट्रोजन दोनों के परमाणु बहुत छोटे हैं और लीथियम नाइट्राइट की जालक ऊर्जा (lattice energy) उच्च है, इसीलिए लीथियम नाइट्राइट बनता है।
  3. लीथियम ऑक्सीजन के साथ केवल सामान्य ऑक्साइड, लीथियम मोनॉक्साइड (Li2O) बनाता है। सोडियम मोनॉक्साइड (Na2O) और परॉक्साइड (Na2O2) बनाता है। पोटैशियम मोनॉक्साइड (K2O), परॉक्साइड (Ka2O2) और सुपर ऑक्साइड (KO2) बनाता है। रूबीडियम और सीजियम’ भी मोनॉक्साइड, परॉक्साइड और सुपर ऑक्साइड बनाते हैं। क्षार धातु को ऑक्सीजन के आधिक्य में गर्म करने पर लीथियम का मोनॉक्साइड (Li2O), सोडियम को परॉक्साइड (Na2O2) और पोटैशियम का सुपर ऑक्साइड (KO2) बनता है। रूबीडियम और सीजियम का भी सुपर ऑक्साइड बनता है।
  4. लीथियम हाइड्रॉक्साइड (LiOH) और लीथियम कार्बोनेट (Li2CO3), जल में अल्प विलेय हैं, जबकि सोडियम, पोटेशियम व अन्य क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइड और कार्बोनेट जल में पूर्ण विलेय हैं।
  5. लीथियम बाइकार्बोनेट (LiHCO3) जल में पूर्ण विलेय है जबकि सोडियम, पोटैशियम व अन्य क्षार धातुओं के बाइकार्बोनेट जल में अल्प विलेय हैं।।
  6. लीथियम कार्बोनेट गर्म करने पर शीघ्रता से अपघटित हो जाता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-35
    जबकि सोडियम कार्बोनेट, पोटैशियम कार्बोनेट व अन्य क्षार धातुओं के कार्बोनेट बहुत स्थायी हैं। गर्म करने पर बहुत कठिनाई से अति उच्च ताप पर अपघटित होते हैं।
  7. लीथियम के बड़े, अध्रुवणीय (non-polarizable) ऋणायमों, जैसे-ClO4 आयन के साथ लवण अन्य क्षार धातुओं के संगत लवणों की अपेक्षा जल में अधिक विलेय होते हैं। यह Li+ आयन की उच्च हाइड्रेशन ऊर्जा के कारण है।
  8. लीथियम सल्फेट (Li2SO4) फिटकरियाँ (alums) नहीं बनाता है, जबकि अन्य क्षार धातुएँ फिटकरियाँ (alums) बनाती हैं। द्विक सल्फेट (double sulphates) जिनका संघटन M’2SO4.R””2 (SO4)3.24H2O होता है फिटकरियाँ कहलाती हैं, जैसे M’ = NH+4ई या एक संयोजी धातु (जैसे—Na, K आदि) और R’”= त्रि-संयोजी धातु (जैसे-Fe, AI, Cr, Mn
    आदि) हैं।
    हाइड्रेटेड लीथियम धनायन का आकार बहुत छोटा होने के कारण लीथियम फिटकरी नहीं बनाता है।
  9.  लीथियम नाइट्रेट गर्म करने पर ऑक्साइड में अपघटित हो जाता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-36
    सोडियम नाइट्रेट और पोटैशियम नाइट्रेट गर्म करने पर नाइट्राइट में अपघटित होते हैं।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-37
  10. लीथियम फ्लुओराइड जल में अल्प विलेय है जबकि सोडियम, पोटैशियम व अन्य क्षार धातुओं के फ्लुओराइड और जल में विलेय हैं।
    लीथियम आयन (Li+) और फ्लुओराइड आयन (F) दोनों का छोटा आकार होने के कारण . लीथियम फ्लुओराइड की जालक ऊर्जा उच्च है, इसीलिए LiF जल में अल्प विलेय है।

प्रश्न 4.
सोडियम क्लोराइड का निर्माण किस प्रकार किया जाता है। विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
समुद्र, नमक की झीलें और खनिज लवण निक्षेप सोडियम क्लोराइड के मुख्य प्राकृतिक स्रोत हैं जिनसे सोडियम क्लोराइड प्राप्त किया जाता है।
परिस्थितियों के अनुसार, लवण या तो लवण निक्षेपों से खनन द्वारा प्राप्त किया जाता है या लवण संस्तरों से जलीय विलयन ब्राइन (brine) में जल द्वारा निष्कर्षित किया जाता है या समुद्र जल से वाष्पन (evaporation) द्वारा प्राप्त किया जाता है।
नमक युक्त जलीय विलयन का लवण के क्रिस्टलित होने तक सान्द्रण वाष्पन द्वारा किया जाता है। विलयन के सान्द्रण की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. खुले कडाहा विधि (Open pan process)
  2. सौर वाष्पन विधि (Solar evaporation process)
  3. निर्वात् वाष्पन विधि (Vacuum evaporation process)

लवण निक्षेपों से खनिज ठोस लवण को संदलन के उपरान्त छलनी से छानकर उसका शोधन जल में विलेय करके और विलयन को क्रिस्टलित करके किया जाता है।
कई लवण संस्तरों में, बेधन (boring) करके या कूप (well) खोदकर पाइपों के द्वारा जल प्रवाह करके लवण ब्राइन के रूप में प्राप्त किया जाता है। ब्राइन को पम्प द्वारा बाहर निकालकर विलयन को बहु-प्रभाव उद्वाष्पित्रों (evaporators) में कम दाब पर उद्वाष्पन द्वारा सान्द्रित किया जाता है या विलयन का सान्द्रण उसे उथले (shallow) खुले कडाहों (open pans) में गर्म करके किया जाता है। वायु और सूर्य से उच्छादित (exposed) खुली टंकियों में समुद्र-जल को सान्द्रण वाष्पन द्वारा होता है, जैसे-जैसे ब्राइन सान्द्रित होता है लवण के क्रिस्टल पृथक् होने लगते हैं। क्रिस्टलों को छिद्रित शॉवल द्वारा बाहर निकाल लेते हैं।
उपरोक्त विधियों द्वारा प्राप्त सोडियम क्लोराइड (नमक) में अन्य लवणों, जैसे-कैल्सियम क्लोराइड, मैग्नीशियम क्लोराइड, कैल्सियम सल्फेट और मैग्नीशियम सल्फेट की अल्प मात्राएँ अशुद्धि के रूप में उपस्थित होती है। निर्वात् उद्द्वाष्पन (vacuum evaporation) द्वारा विनिर्मित लवण में लगभग 99.9% सोडियम क्लोराइड उपस्थित होता है। खुले कडाहा (open pan) विधि या सौर वाष्पन (solar evaporation) विधि द्वारा प्राप्त लवण में लगभग 97 से 99% सोडियम क्लोराइड उपस्थित होता है। खनिज, नमक या सेंधा नमक (rock salt) में लगभग 95 से 99% सोडियम क्लोराइड उपस्थित होता है।

प्रश्न 5.
सोडियम बाइकार्बोनेट के विरचन की विधियों एवं उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
सोडियम बाइकार्बोनेट के विरचन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. सोडियम कार्बोनेट से-सोडियम कार्बोनेट के ठण्डे सान्द्र विलयन में कार्बन डाइऑक्साड गैस प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट सफेद ठोस के रूप में अवक्षेपित हो जाता है। उसे छानकर अलग कर लेते हैं।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-38
  2. अमोनिया-सोडा प्रक्रम( सॉल्वे प्रक्रम) द्वारा–सॉल्वे प्रक्रम द्वारा सोडियम कार्बोनेट का निर्माण करने में पहले सोडियम बाइकार्बोनेट बनता है जिसे अपघटित करके सोडियम कार्बोनेट प्राप्त किया जाता है।
    सॉल्वे विधि में अमोनिया द्वारा संतृप्त सान्द्र सोडियम क्लोराइड विलयन की कार्बन डाइऑक्साइड गैस से क्रिया कराने पर सोडियम बाइकार्बोनेट अविलेय ठोस के रूप में पृथक् हो जाता है।

NaCl + NH3 + H2O → NaHCO3 + NH2Cl

सोडियम बाइंकार्बोनेट को छानकर अलग कर लेते हैं। गर्म करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट, सोडियम कार्बोनेट में अपघटित हो जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-39

सोडियम कार्बोनेट में अमोनियम लवणों की अशुद्धि होती है। सोडियम कार्बोनेट को जल में घोलकर सान्द्र विलयन में कार्बन डाइऑक्साइड गैस प्रवाहित करते हैं जिससे शुद्ध सोडियम बाइकार्बोनेट अवक्षेपित हो जाता है, उसे छानकर पृथक् कर लेते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-40
सोडियम बाइकार्बोनेट के प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं-

  1. सोडियम बाइकार्बोनेट का उपयोग बेकिंग पाउडर में होता है, इसलिए सोडियम बाइकार्बोनेट बेकिंग सोडा कहलाता है।
  2. सोडियम बाइकार्बोनेट स्वास्थ्य हितकर लवणों और सेलिट्स पाउडर का महत्वपूर्ण घटक है।
  3. सोडियम बाइकार्बोनेट का उपयोग अग्निशामकों (fire extinguisheres) में किया जाता है।
  4. सोडियम बाइकार्बोनेट का उपयोग चर्म उत्पादन में होता है।
  5. कॉपर, जिंक और लेड के नॉर्मल कार्बोनेट बनाने में।
  6. चर्म रोगों के लिए मन्द पूर्तिरोधी (antiseptic) के रूप में।

प्रश्न 6.
क्षारीय मृदा धातुओं की रासायनिक अभिक्रियाशीलता का वर्णन कीजिए।
उत्तर
क्षारीय मृदा धातुएँ बहुत अभिक्रियाशील हैं, परन्तु ये क्षार धातुओं से कम क्रियाशील हैं। इनकी सक्रियता धन विद्युत प्रकृति बढ़ने के साथ बढ़ती है (Be → Ra) वायु में रखने पर इनकी धात्विक चमक मलिन हो जाती है, क्योकि धातु की सतह पर ऑक्साइड की परत बन जाती है। इन तत्वों में बेरिलियमें सबसे कम क्रियाशील है। परमाणु त्रिज्या छोटी और ऊर्ध्वपातन ऊर्जा व आयनन ऊर्जा • अपेक्षाकृत ऊँची होने के कारण बेरिलियम अन्य क्षारीय मृदा धातुओं से गुणों में भिन्नता प्रदर्शित करता है।
क्षारीय मृदा धातु (M) ऑक्सीजन के साथ ऑक्साइड (MO), नाइट्रोजन के साथ नाइट्राइड (M3N2), हाइड्रोजन के साथ हाइड्राइड (MH2) और हैलोजनों के साथ हैलाइड (MX2) बनाते हैं। बेरिलियम हाइड्रोजन से सीधी अभिक्रिया नहीं करता है।
बेरिलियम को छोड़कर अन्य सभी क्षारीय मृदा धातु जल से क्रिया करते हैं। मैग्नीशियम उच्च ताप पर जल (भाप) से क्रिया करता है, क्योंकि मैग्नीशियम के पृष्ठ पर ऑक्साइड की परत जमी होती है।

M + 2H2O → M(OH)2 + H2

क्षारीय मृदा धातु (M) अम्लों से हाइड्रोजन विस्थापित करते हैं। बेरिलियम अम्लों और क्षारकों दोनों से हाइड्रोजन विस्थापित करता है।

M + H2SO4 → MSO4 + H2

धातुओं में केवल मैग्नीशियम और मैंगनीज ठण्डे और अति तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ हाइड्रोजन गैस (H2) देते हैं।

Mg + 2HNO3 → Mg(NO3)2 + H2
Mn + 2HNO3 → Mn(NO3)2 + H2

प्रश्न 7.
बेरिलियम के असंगत गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
बेरिलियम की परमाणु और आयनिक त्रिज्याएँ अन्य क्षारीय मृदा धातुओं की त्रिज्याओं के अपेक्षाकृत बहुत छोटी होने के कारण बेरिलियम अन्य क्षारीय मृदा धातुओं से गुणों में भिन्नता प्रदर्शित करता है। बेरिलियम के कुछ असंगत गुण (anomalous properties) निम्नलिखित हैं-

  1. बेरिलियम जल से अभिक्रिया नहीं करता है। अन्य सभी क्षारीय मृदा धातुएँ जल से अभिक्रिया करती हैं।
  2. बेरिलियम हाइड्रोजन से सीधी अभिक्रिया नहीं करता है। अन्य क्षारीय मृदा धातुएँ हाइड्रोजन से सीधी अभिक्रिया करती हैं।
  3. बेरिलियम उभयधर्मी (amphoteric) धातु है। बेरिलियम प्रबल क्षारों और अम्लों दोनों के विलयनों से अभिक्रिया करता है और हाइड्रोजन विस्थापित करता है। अन्य क्षारीय मृदा धातुएँ केवल अम्लों से अभिक्रिया करती हैं।
    Be + 2NaOH + 2H2O → Na2[Be(OH)4] + H2
    Be + H2SO4 → BeSO4 + H2
  4. बेरिलियम आयन, Be2+, का आवेश/त्रिज्या अनुपात उच्च होने के कारण बेरिलियम की ध्रुवण क्षमता (polarising Power) अन्य क्षारीय मृदा धातु आयनों की अपेक्षा उच्च होती है, अत: बेरिलियम की सहसंयोजक बन्ध बनाने की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक होती है। बेरिलियम के यौगिकों में सहसंयोजक लक्षण की प्रधानता होती है। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के यौगिक मुख्यत: आयनिक होते हैं।
  5. बेरिलियम फ्लुओराइड जल में पूर्ण विलेय है। बेरिलियम फ्लुओराइड की जल में विलेयता बेरिलियम आयन की उच्च हाइड्रेशन ऊर्जा के कारण है। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के फ्लुओराइड जल में अल्प विलेय हैं।
  6. बेरिलियम ऑक्साइड सहसंयोजक यौगिक है। यह जल के साथ अभिक्रिया नहीं करता है। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड आयनिक यौगिक हैं और जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।
  7. बेरिलियम ऑक्साइड (BeO) उभयधर्मी (amphoteric) ऑक्साइड है। यह अम्ल और क्षार दोनों के विलयनों के साथ अभिक्रिया करता है। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय हैं।
    Be0 + 2NaOH + H2O → Na2 [Be(OH)4]
    BeO + H2SO4 → BeSO4 + H2O
  8. बेरिलियम हाइड्रॉक्साइड [Be(OH)4] उभयधर्मी है। यह अम्ल और क्षारों दोनों के साथ अभिक्रिया करता है। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षार हैं।
    Be(OH)2 + 2NaOH → Na2[Be(OH)4]
    Be(OH)2 + H2SO4 → BeSO4 + 2H2O
  9. बेरिलियम हाइड्रॉक्साइड और मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड जल में अविलेय हैं। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइड जल में विलेय हैं।
  10. बेरिलियम सल्फेट और मैग्नीशियम सल्फेट जल में विलेय हैं, परन्तु अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के सल्फेट जल में अविलेय हैं।
  11. बेरिलियम की अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के अपेक्षाकृत संकर यौगिक बनाने की प्रबल प्रवृत्ति है। बेरिलियम फ्लुओराइड आयनों के साथ संकर यौगिक, Na2[BeF4], सोडियम टेट्राफ्लुओरोबेरिलेट बनाता है।
    ऐसीटिक अम्ल की बेरिलियम हाइड्रॉक्साइड से क्रिया कराने पर बेसिक बेरिलियम ऐसीटेट, Bea0 (CHCOO) बनता है। यह सहसंयोजक यौगिक है। इसका गलनांक और क्वथनांक नीचा है और ये बिना अपघटित हुए सिवित हो जाता है। अन्य क्षारीय मृदा सहसंयोजक बेसिक ऐसीटेट नहीं बनाती हैं।
  12. बेरिलियम क्लोराइड (BeCl2) सहसंयोजन वाष्पशील यौगिक है। यह जल-अपघटित हो जाता है। अन्य क्षारीय मृदा धातुओं के क्लोराइड आयनिक यौगिक हैं जो जल-अपघटित नहीं होते हैं।
    BeCl2 + 2H2O → Be(OH)2 + 2HCl

प्रश्न 8.
चूने के कोई चार औद्योगिक उपयोग लिखिए।
उत्तर
चूने के उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. बिल्डिग सामग्री के निर्माण में।
  2. पोर्टलैण्ड सीमेन्ट बनाने में।
  3. आयरन के निष्कर्षण में गालक के रूप में।
  4. जल की अस्थायी कठोरता को दूर करने में।
  5. बुझा चूना, बिना बुझा चूना, दूधिया चूना आदि के निर्माण में।

प्रश्न 9.
प्लास्टर ऑफ पेरिस के विरचन की विधि, गुण एवं उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
प्लास्टर ऑफ पेरिस (CaSO4·[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]H2O या 2CaSO4 ·H2O) कैल्सियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट, CaSO4·[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]H2O को प्लास्टर ऑफ पेरिस कहते हैं। इसे प्रायः 2CaSO4 ·H2O सूत्र द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
प्लास्टर ऑफ पेरिस बनाने की विधि
जिप्सम (gypsum) को 150-169°C पर गर्म करने से प्लास्टर ऑफ पेरिस बनता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-41
प्लास्टर ऑफ पेरिस के गुण
1. प्लास्टर ऑफ पेरिस सफेद रंग का चूर्ण है जो तेज गर्म करने पर पहले निर्जल CaSO4 के 7-रूप में फिर γ-रूप में बदल जाता है।
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बहुत उच्च ताप (1100°C) पर गर्म करने पर निर्जल कैल्सियम-सल्फेट, कैल्सियम ऑक्साइड और सल्फर ट्राइऑक्साइड में अपघटित हो जाता है।
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2. प्लास्टर ऑफ पेरिस की जल से क्रिया कराने पर ऊष्मा उत्पन्न होती है और वह जल अवशोषित करके शीघ्रता से जिप्सम में बदलकर, जम जाता है। इस क्रिया को प्लास्टर ऑफ पेरिस का जमना (setting) कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-44
प्लास्टर ऑफ पेरिस के उपयोग

  1. टूटी हुई हड्डियों का प्लास्टर करने में।
  2. साँचे और मॉडल बनाने में।
  3. मूर्तियाँ, खिलौने एवं अन्य सजावटी वस्तुएँ बनाने में।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आवर्त सारणी में क्षार धातुओं की स्थिति 1A समूह में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर समझाइए।
या
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी के क्षार धातुओं (Li, Na, K) की स्थिति की विवेचना कीजिए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास–सोडियम तथा पोटैशियम आवर्त सारणी के IA समूह में रूबीडियम, सीजियम व फ्रैंसियम के साथ स्थित हैं। इस उप-समूह की धातुओं को क्षार धातुएँ कहते हैं, क्योंकि इनके हाइड्रॉक्साइड जल में घुलकर क्षारीय विलयन बनाते हैं। इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-45
इन तत्त्वों के भीतरी कोश का विन्यास अक्रिय गैस के समान है। समान इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होने के कारण ये तत्त्व समान गुण प्रदर्शित करते हैं। अतः इन्हें एक ही उप-समूह में रखा जाना उचित है।
गुणों में समानता

  1. सभी चाँदी के समान सफेद तथा नर्म धातुएँ हैं।
  2. इनकी ऑक्सीकरण संख्या + 1 है।।
  3. ये वैद्युत तथा ऊष्मा के सुचालक हैं।
  4. वायु या ऑक्सीजन में गर्म करने पर सामान्य ऑक्साइड बनाते हैं तथा वायु या ऑक्सीजन में जलाने पर परॉक्साइड बनाते हैं।
    4Na + O2 → 2Na2O; 4K + O2 2K2O
    2Na + O2 → Na2O2; 2K + O2→ K2O2
  5. शुष्क हाइड्रोजन के साथ गर्म करने पर हाइड्राइड बनाते हैं।
    2Na + H2 → 2NaH; 2K + H2 → 2KH
  6. ये हैलोजन से क्रिया करके हैलाइड बनाते हैं।
    2Na + Cl2 → 2NaCl; 2K + Cl2 → 2KCl
  7. जल तथा ऐल्कोहॉल के साथ क्रिया करके हाइड्रोजन निकालते हैं।
    2Na + 2H2O → 2NaOH + H2
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-46

भौतिक गुणों का श्रेणीकरण

  1. परमाणु क्रमांक बढ़ने पर क्षार धातुओं की कठोरता कम होती है।
  2. इनके गलनांक, क्वथनांक तथा विशिष्ट ऊष्मा परमाणु क्रमांक की वृद्धि के साथ घटते हैं।
  3. परमाणु क्रमांक की वृद्धि के साथ इनकी क्रियाशीलता बढ़ती है।
  4. परमाणु आयतन तथा आपेक्षिक घनत्व परमाणु क्रमांक की वृद्धि के साथ बढ़ते हैं।
  5. परमाणु क्रमांक बढ़ने पर बाइकार्बोनेटों का अपघटन घटता है।

रासायनिक गुणों की समानता एवं भौतिक गुणों के श्रेणीबद्ध परिवर्तन के अध्ययन से इन तत्त्वों की आवर्त सारणी में एक ही उपवर्ग में स्थित होने की पुष्टि होती है।

प्रश्न 2.
कास्टनर-कैलनर सेल विधि द्वारा कास्टिक सोडा का निर्माण किस प्रकार किया जाता है? सचित्र वर्णन कीजिए। इसके दो उपयोग लिखिए।
उत्तर
कास्टनर-कैलनर सेल में स्लेट का बना हुआ एक टैंक होता है, जो स्लेट के विभाजकों द्वारा तीन भागों में बँटा रहता है। स्लेट के विभाजक पारे (Hg) से ढकी हुई टैंक की तली को स्पर्श करते हैं। टैंक के बाएँ तथा दाएँ कक्षों में NaCl का सान्द्र विलयन (ब्राइन) भरा जाता है तथा इन कक्षों में ग्रेफाइट ऐनोड लगे रहते हैं। बीच के कक्ष में जल भरा रहता है तथा लोहे की छड़ों का कैथोड लगा रहता है।
विद्युत धारा प्रवाहित करने पर, दाएँ तथा बाएँ कक्षों में ग्रेफाइट ऐनोड पर क्लोरीन मुक्त होती है। मर्करी कैथोड पर सोडियम अमलगम बनता है।
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इस इलेक्ट्रोड पर Hg सोडियम से क्रिया करके अमलगम बनाती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 10 The s-block Elements img-48
सोडियम अमलगम सेल के बाएँ कक्ष के नीचे लगे विकेन्द्रित पहिये को घुमाकर सेल को इधर-उधर हिलाया जाता है। इस प्रकार, सोडियम-अमलेगम दाएँ वे बाएँ कक्षों से बीच के कक्ष में कर लेते हैं।
इसमें Na-Hg जल से क्रिया करके NaOH का निर्माण करता है और H, गैस मुक्त होती है। Hg को , छानकर पृथक् कर देते हैं।

2(Na-Hg) + 2H2O → 2NaOH + 2Hg ↓ + H2

सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का वाष्पन करने से ठोस सोडियम हाइड्रॉक्साइड प्राप्त कर लेते हैं।
गन्धक के साथ क्रिया-हाइपो प्राप्त होता है।
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उपयोग-

  1. साबुन बनाने में।
  2. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants (पौधों में परिवहन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants (पौधों में परिवहन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विसरण की दर को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर :
विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कारक निम्न हैं

1. तापमान :
तापमान के बढ़ने से विसरण की दर बढ़ती है।

2. विसरण कर रहे पदार्थों का घनत्व :
विसरण की दर विसरण कर रहे पदार्थों के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसको ग्राह्म के विसरण का नियम (Graham’ law of diffusion) कहते हैं।

3. विसरण का माध्यम :
अधिक सान्द्र माध्यमे में विसरण की दर कम हो जाती है।

4. विसरण दाब प्रवणता :
विसरण दाब प्रवणता जितनी अधिक होती है अणुओं का विसरण उतना ही तीव्र होता है।

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प्रश्न 2.
पोरीन्स क्या हैं? विसरण में ये क्या भूमिका निभाते हैं?
उत्तर :
पोरीन्स प्रोटीन के वृहत अणु हैं जो माइटोकॉण्डूया, क्लोरोप्लास्ट तथा (UPBoardSolutions.com) कुछ जीवाणुओं की बाह्य कला में धंसे रहते हैं। ये बड़े छिद्र बनाते हैं जिससे बड़े अणु उसमें से निकल सकें। अत: ये सहज विसरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 3.
पादपों में सक्रिय परिवहन के दौरान प्रोटीन पम्प के द्वारा क्या भूमिका निभाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
पादप कला के लिपिड स्तर में वाहक प्रोटीन के अणु मिलते हैं। ये ऊर्जा का उपयोग कर सान्द्रता विभव के विरुद्ध अणुओं को भेजते हैं। अत: उन्हें प्रोटीन पम्प कहते हैं। ये आयन का परिवहन कला के आर-पार इन प्रोटीन पम्पों की सहायता से करते हैं।

प्रश्न 4.
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव क्यों होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर :
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योकि

  1. जल अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है।
  2.  किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है।
  3.  जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तन्त्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं।
  4. जल विभव को ग्रीक चिह्न Ψ (Psi) से चिह्नित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्त किया जाता है।
  5. मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का विभव (water potential) शून्य होता है।
  6.  किसी विलयन तन्त्र का जल विभव उस विलयन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है।
  7.  शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव (UPBoardSolutions.com) कम होता  जाता है। अतः सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential Ψs ) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं। जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाती है। इसे दाब विभव (Pressure potential) कहते हैं। दाब विभव प्रायः सकारात्मक होता है, लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसारोहण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  8. किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियन्त्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs ) तथा मैट्रिक्स विभव (Ψn)। मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है। अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं
    Ψ = Ψp + Ψs
  9. जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीत कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है।
  10. जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता हैं।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए
(क) विसरण एवं परासरण
(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण
(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव
(घ) विसरण तथा अन्तः शोषण
(च) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ
(छ) बिन्दुस्राव एवं परिवहन (अभिगमन)।
उत्तर :
(क)
विसरण एवं परासरण में अन्तर

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(ख)
वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण में अन्तर

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(ग)
परासारी दाब तथा परासारी विभव में अन्तर

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(घ)
विसरण एवं अन्तः शोषण में अन्तर

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(च)
पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ एपोप्लास्ट पथ

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(छ)
बिन्दुसाव एवं परिवहन (अभिगमन) में अन्तर

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प्रश्न 6.
जल विभव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। कौन-से कारक इसे प्रभावित करते हैं? जल विभव, विलेय विभव तथा दाब विभव के आपसी सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
“अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर” में शीर्षक के प्रश्न 4 का उत्तर देखिए।

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प्रश्न 7.
लब क्या होता है जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है?
उत्तर :
जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है। तो इसका जल विभव बढ़ जाता है। जब पौधों या कोशिका में जल विसरण द्वारा प्रवेश करता है तो कोशिका आशून (turgid) हो जाती है। इसके फलस्वरूप (UPBoardSolutions.com) दाब विभव (pressure potential) बढ़ जाता है। दाब विभव अधिकतर सकारात्मक होता है। इसे 9 से प्रदर्शित करते हैं। जल विभव घुलित तथा दाब विभव से प्रभावित होता है।

प्रश्न 8.
(क) रेखांकित चित्र की सहायता से पौधों में जीवद्रव्यकुंचने की विधि का वर्णन उदाहरण देकर कीजिए।
(ख) यदि पौधे की कोशिका को उच्च जल विभव वाले विलयन में रखा जाए तो क्या होगा?
उत्तर :
(क)
रिक्तिकामय पादप कोशिका को अतिपरासारी विलयन (hypertonic solution)
में रख देने पर कोशिकारस कोशिका से बाहर आने लगता है। यह क्रिया बहिःपरासरण (exosmosis) के कारण होती है। इसके फलस्वरूप जीवद्रव्य सिकुड़कर कोशिका में एक ओर एकत्र हो जाता है। इस अवस्था में कोशिका पूर्ण श्लथ (fully flaccid) हो जाती है। इस क्रिया को जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) कहते हैं। जीवद्रव्यकुंचित कोशिका की कोशिका भित्ति और जीवद्रव्य के मध्य अतिपरासारी विलयन एकत्र हो जाता है, लेकिन यह विलयन कोशिकारिक्तिका में नहीं पहुँचता। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोशिका भित्ति पारगम्य होती है और रिक्तिका कला अर्द्धपारगम्य होती है।
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जीवद्रव्यकुंचित कोशिका को आसुत जल या अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution) में रखा जाए तो कोशिका पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। इस प्रक्रिया को जीवद्रव्यविकुंचन (deplasmolysis) कहते हैं। कोशिका को समपरासारी विलयन (isotonic solution) में रखने पर (UPBoardSolutions.com) कोशिका में कोई परिवर्तन नहीं होता, जितने जल अणु कोशिका से बाहर निकलते हैं उतने  जल अणु कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं।

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(ख)
अल्पसारी विलयन (hypotonic solution)
कोशिकारस या कोशिकाद्रव्य की अपेक्षा तनु (dilute) होता है। इसका जल विभव (water potential) अधिक होता है। अतः पादप कोशिका को अल्पपरासारी विलयन में रखने पर अन्त:परासरण की क्रिया होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप अतिरिक्त जल कोशिका में पहुँचकर स्फीति दाब (turgor pressure) उत्पन्न करता है। स्फीति दाब भित्ति दाब (wall pressure) के बराबर होता है। स्फीति दाब को दाब विभव (pressure potential) भी कहते हैं। कोशिका भित्ति की दृढ़ता एवं स्फीति दाब के कारण कोशिका भित्ति क्षतिग्रस्त नहीं होती। स्फीति या आशूनता के कारण कोशिका में वृद्धि होती है। स्फीति दाब एवं परासरण दाब के बराबर हो जाने पर कोशिका में जल का आना रुक जाता है।

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प्रश्न 9.
पादप में जल एवं खनिज के अवशोषण में माइकोराइजल (कवकमूले सहजीवन) सम्बन्ध कितने सहायक हैं?
उत्तर :
माइकोराइजल या कवकमूलीय सहजीवन अनेक उच्च पादपों की जड़े कवक मूल द्वारा संक्रमित हो जाती हैं; जैसे–चीड़, देवदार, ओक आदि। कवक तन्तु की जड़ों की सतह पर बाह्यपादपी कवकमूल (ectophytic mycorrhiza) बनाता है। कभी-कभी कवक तन्तु जड़ के अन्दर पहुँच जाते हैं और अन्त:पादपी कवकमूल बनाते हैं। कवक मूल संगठन में कवक तन्तु अपना भोजन पोषक (host) की जड़ों से प्राप्त करते हैं तथा वातावरण की नमी व भूमि की ऊपरी सतह से लवणों का अवशोषण कर पोषक पौधे को प्रदान करने का कार्य करते हैं। कुछ आवृतबीजी पौधे; जैसे-निओशिया (Neottii), मोनोटोपा (Monotropd) भी कवकमूल सहजीवन (UPBoardSolutions.com) प्रदर्शित करते हैं। इन पौधों को अगर कवक सेहजीविता समय पर उपलब्ध नहीं होती तो ये मर जाते हैं। चीड़ के बीज कवक सहजीविता स्थापित न होने की स्थिति में अंकुरित होकर नवोदुभिद् (seedings) नहीं बना पाते।

प्रश्न 10.
पादप में जल परिवहन हेतु मूलदाब क्या भूमिका निभाता है?
उत्तर :

मूलदाब

मूल वल्कुट (root cortex) की कोशिकाओं की स्फीति (आशून) स्थिति में अपने कोशिकाद्रव्य पर पड़ने वाले दाब को मूलदाब (root pressure) कहते हैं। मूलदाब के फलस्वरूप जल (कोशिकारस) जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूलदाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephan Hales, 1927) ने किया। स्टॉकिंग (Stocking, 1956) के अनुसार जड़ के जाइलम में उत्पन्न दाब, जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं से उत्पन्न होता है, मूलदाब कहलाता है। मूलदाब सामान्यतया + 1 से + 2 बार तक होता है। इससे जल कुछ ऊँचाई तक चढ़ सकता है। शुष्क मृदा में मूलदाब उत्पन्न नहीं होता। बहुत-से पौधों; जैसे–अनावृतबीजी (gymnosperms) में मूलदाब उत्पन्न हीं नहीं होता। अतः आधुनिक मतानुसार रसारोहण में मूलदाब का विशेष कार्य नहीं है।

प्रश्न 11.
पादपों में जल परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल की व्याख्या कीजिए। वाष्पोत्सर्जन क्रिया को कौन-सा कारक प्रभावित करता है? पादपों के लिए कौन उपयोगी है?
उत्तर :

रेसारोहण या जल परिवहन

पौधे जड़ों द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। अवशोषित जल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पर्याप्त ऊँचाई तक (पत्तियों तक) पहुँचता है। यह ऊँचाई सिकोया (Sequoid) में 370 फुट तक होती है। गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण कहते हैं। सर्वमान्य वाष्पोत्सर्जनाकर्षण जलीय संसंजक मत (Transpiration Pull Cohesive Force of Water Theory) के अनुसार रसारोहण निम्नलिखित कारणों से होता है

1. वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल) :
पत्तियों की कोशिकाओं से जल के वाष्पन के फलस्वरूप कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाबे न्यूनता (Diffusion pressure deficit) अधिक हो जाती है। इसके फलस्वरूप जल जाइलम से परासरण द्वारा पर्ण कोशिकाओं में पहुँचता रहता है। जलवाष्प रन्ध्रों से वातावरण में विसरित होती रहती है। इसके फलस्वरूप जाइलम में उपस्थित जल स्तम्भ पर एक तनाव उत्पन्न हो
जाता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होने वाले इस तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpiration pull) कहते हैं।

2. जल अणुओं का संसंजन बल (Cohesive Force of water Molecules) :
जल अणुओं के मध्य संसंजन बल (cohesive force) होता है। इसी संसंजन बल के कारण जल (UPBoardSolutions.com) स्तम्भ 400 वायुमण्डलीय दाब पर भी खण्डित नहीं होता और इसकी निरन्तरता बनी रहती है। संसंजन बल के कारण जल 1500 मीटर ऊँचाई तक चढ़ सकता है।

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3. जल तथा जाइलम भित्ति के मध्य आसंजन (Adhesion between Water and Cell wall of Xylem Tissue) :
जाइलम ऊतक की कोशिकाओं और जल अणुओं के मध्य आसंजन (adhesion) का आकर्षण होता है। यह आसंजन जल स्तम्भ को सहारा प्रदान करता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न तनाव जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है।
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वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक

पौधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों को दो समूहों में बाँट सकते हैं
(अ) बाह्य कारक (External Factors)
(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors)

(अ)
बाह्य कारक

1. वायुमण्डल की अपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity of Atmosphere) :
वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता कम होने पर वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। आपेक्षिक आर्द्रता अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

2. प्रकाश (Light) :
प्रकाश के कारणरन्ध्र खुलते हैं, तापमान में वृद्धि होती है; अत: वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। रात्रि में रन्ध्र बन्द हो जाने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

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3. वायु (Wind) :
वायु की गति अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक हो जाती है।

4. तापक्रम (Temperature) :
ताप के बढ़ने से आपेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। ताप कम होने पर आपेक्षिक आर्द्रता अधिक हो जाती हैं और वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

5. उपलब्ध जल (Available Water) :
वाष्पोत्सर्जन की दर जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है। मृदा में जल की (UPBoardSolutions.com) कमी होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

(ब)
आन्तरिक कारक

पत्तियों की संरचना, रन्ध्रों की संख्या एवं संरचना आदि वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती है।

वाष्पोत्सर्जन की उपयोगिता

  1. पौधों में अवशोषण एवं परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करता है।
  2. मृदा से प्राप्त खनिजों के पौधों के सभी अंगों (भागों) तक परिवहन में सहायता करता है।
  3. पत्ती की सतह को वाष्पीकरण द्वारा 10-15°C तक ठण्डा रखता है।
  4. कोशिकाओं को स्फीति रखते हुए पादपों के आकार एवं बनावट को नियन्त्रित रखने में सहायता करता है।

प्रश्न 12.
पादपों में जाइलम रसारोहण के लिए जिम्मेदार कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
रसारोहण गुरुत्वाकर्षण के विपरीत मूलरोम से पत्तियों तक कोशिकारस (cell sap) के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण (Ascent of sap) कहते हैं। रसारोहण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpiration pull) के कारण होता है। यह निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है

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(1) संसंजन (Cohesion) :
जल के अणुओं के मध्य आकर्षण।

(2) आसंजन (Adhesion) :
जल अणुओं का ध्रुवीय सतह (जैसे-जाइलम ऊतक) से आकर्षण।

(3) पृष्ठ तनाव (Surface Tension) :
जल अणुओं की द्रव अवस्था में गैसीय अवस्था। जल की उपर्युक्त विशिष्टताएँ जल को उच्च तन्य सामर्थ्य (high tensile strength) प्रदान करती हैं। वाहिकाएँ एवं वाहिनिकाएँ (tracheids & vessels) केशिका (capillary) के समान लघु व्यास वाली कोशिकाएँ होती हैं।

प्रश्न 13.
पादपों में खनिजों के अवशोषण के दौरान अन्तःत्वचा की आवश्यक भूमिका क्या होती है?
उत्तर :
जड़ों की अन्तस्त्वचा कोशिकाओं की कोशिकाकला पर अनेक वाहक प्रोटीन्स पाई जाती हैं। ये प्रोटीन्स जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाने वाले घुलितों की मात्रा और प्रकार को नियन्त्रित करने वाले बिन्दुओं की भाँति कार्य करती हैं। अन्तस्त्वचा की सुबेरिनमय (suberinised) कैस्पेरी पट्टियों (casparian strips) द्वारा खनिज या घुलित पदार्थों के आयन्स या अणुओं का परिवहन एक ही दिशा (unidirection) में होता है। अतः अन्तस्त्वचा (endodermis) खनिजों की मात्रा (UPBoardSolutions.com) और प्रकार (quantity & type) को जाइलम तक पहुँचने को नियन्त्रित करती है। जल तथा खनिजों की गति मूलत्वचा (epiblema) से अन्तस्त्वचा तक सिमप्लास्टिक (symplastic) होती है।

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प्रश्न 14.
जाइलम परिवहन एकदिशीय तथा फ्लोएम परिवहन द्विदिशीय होता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
1. जाइलम परिवहन (Xylem Transport) :
पौधे अपने लिए आवश्यक जल एवं खनिज पोषक मृदा से प्राप्त करते हैं। ये सक्रिय या निष्क्रिय अवशोषण या सम्मिश्रित प्रक्रिया द्वारा अवशोषित । होकर जाइलम तक पहुँचते हैं। जाइलम द्वारा जल एवं पोषक तत्त्वों का परिवहन एकदिशीय  (unidirection) होता है। ये पौधों के वृद्धि क्षेत्र की ओर विसरण द्वारा पहुँचते हैं।

2. फ्लोएम परिवहन (Phloem Transport) :
फ्लोएम द्वारा सामान्यतया कार्बनिक भोज्य पदार्थों का परिवहन होता है। कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण पत्तियों द्वारा होता है। पत्तियों में निर्मित भोज्य पदार्थों का पौधे के संचय अंगों (कुण्ड-सिक) तक परिवहन होता है। लेकिन यह स्रोत (पत्तियाँ) और कुण्ड (संचय अंग) अपनी भूमिकाएँ मौसम और आवश्यकतानुसार बदलते रहते हैं; जैसे-जड़ों में संचित अघुलनशील भोज्य पदार्थ बसन्त ऋतु के प्रारम्भ में घुलनशील शर्करा में बदलकर वर्दी और पुष्प कलिकाओं तक पहुँचने लगता है। इससे स्पष्ट है कि संश्लेषण स्रोत और संचय स्थल (कुण्ड-सिंक) का सम्बन्ध बदलता रहता है। अतः फ्लोएम में घुलनशील शर्करा का परिवहन द्विदिशीय या बहुदिशीय (bidirectional or multidirectional) होता है।

प्रश्न 15.
पादपों में शर्करा के स्थानान्तरण के दाब प्रवाह परिकल्पना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
शर्करा के स्थानान्तरण की दाब प्रवाह परिकल्पना खाद्य पदार्थों (शर्करा) के वितरण की सर्वमान्य क्रियाविधि दाब प्रवाह परिकल्पना है। पत्तियों में संश्लेषित ग्लूकोस, सुक्रोस (sucrose) में बदलकर फ्लोएम की चालनी नलिकाओं और सहचर कोशिकाओं द्वारा पौधों के संचय अंगों में स्थानान्तरित होता है। पत्तियों में निरन्तर भोजन निर्माण होता रहता है। फ्लोएम ऊतक की चालनी नलिकाओं में जीवद्रव्य के प्रवाहित होते रहने के कारण उसमें घुलित भोज्य पदार्थों के अणु भी प्रवाहित होते रहते हैं। यह स्थानान्तरण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थानों की ओर होता है। पत्तियों की कोशिकाओं में निरन्तर भोज्य पदार्थों का निर्माण होता रहता है, इसलिए पत्ती की कोशिकाओं में परासरण दाब अधिक रहता है। जड़ों तथा अन्य संचय भागों में भोज्य पदार्थों के अघुलनशील पदार्थों में बदल जाने या प्रयोग कर लिए जाने (UPBoardSolutions.com) के कारण इन कोशिकाओं का परासरण दाब कम बना रहता है। भोज्य पदार्थों के परिवहन हेतु जल जाइलम ऊतक से प्राप्त होता है। संचय अंगों में मुक्त जल जाइलम ऊतक में वापस पहुँच जाता है। इस प्रकार फ्लोएम द्वारा सुगमतापूर्वक कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन होता रहता है।
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प्रश्न 16.
वाष्पोत्सर्जन के दौरान रक्षके द्वार कोशिका खुलने एवं बन्द होने के क्या कारण हैं?

उत्तर :

वाष्पोत्सर्जन

पौधों के वायवीय भागों से होने वाली जल हानि को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहते हैं। यह सामान्यतया रन्ध्र (stomata) द्वारा होता है। उपचर्म (cuticle) तथा वातारन्ध्र (lenticel) इसमें सहायक होते हैं। रन्ध्र रक्षक द्वार कोशिकाओं (guard cells) से घिरा सूक्ष्म छिद्र होता है। रक्षक द्वार कोशिकाएँ सेम के बीज या वृक्क के आकार की होती हैं। ये चारों ओर से बाह्य त्वचीय कोशिकाओं अथवा सहायक कोशिकाओं से घिरी रहती हैं। रक्षक द्वार कोशिका (UPBoardSolutions.com) में केन्द्रक तथा हरितलवक (chloroplast) पाए जाते हैं। रक्षक द्वार कोशिका की भीतरी सतह मोटी भित्ति वाली तथा बाह्य सतह पतली भित्ति वाली होती है।

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रन्ध्र को खुलना या बन्द होना रक्षक द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) पर निर्भर करता है। जब रक्षक कोशिकाएँ स्फीति होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब ये श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। रन्ध्र के खुलने में रक्षक कोशिका की भित्तियों में उपस्थित माइक्रोफाइब्रिल सहायता करते हैं। ये अरीय क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। सामान्यतया रन्ध्र दिन के समय खुले रहते हैं। औ रात्रि के समय बन्द हो जाते हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बिन्दुस्राव प्रायः पाया जाता है
(क) जलीय पौधों में
(ख) समोभिद् पौधों में
(ग) मरुद्भिद् पौधों में
(घ) शाकीय पौधों में
उत्तर :
(घ) शाकीय पौधों में

प्रश्न 2.
वाष्पोत्सर्जन की क्रिया हो सकती है
(क) उपचर्मीय
(ख) वातरन्ध्रीय
(ग) रन्ध्रीय
(घ) सभी प्रकार की
उत्तर :
(घ) सभी प्रकार की

प्रश्न 3.
अधिक वाष्पोत्सर्जन होता है
(क) वातरन्ध्र में
(ख) रन्ध्र में
(ग) उपत्वचा में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) रन्ध्र में

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से किन पौधों में रन्ध्र रात में खुले तथा दिन में बन्द रहते हैं?
(क) मरुद्भिद्
(ख) समोद्भिद्
(ग) मांसलोभिद्
(घ) जलोभिद्
उत्तर :
(ग) मांसलोभिद्

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प्रश्न 5.
पौधों में खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण होता है
(क) मूलरोमों द्वारा
(ख) रन्ध्रों द्वारा
(ग) दारु कोशिकाओं द्वारा
(घ) फ्लोएम कोशिकाओं द्वारा
उत्तर :
(घ) फ्लोएम कोशिकाओं द्वारा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उस पादप शारीरिक क्रिया का नाम लिखिए जो जलरन्ध्रों द्वारा होती है।
उत्तर :
जलरन्ध्रों (hydathodes) के द्वारा होने वाली शारीरिक क्रिया (physiological activity) बिन्दुस्रवण (guttation) कहलाती है।

प्रश्न 2.
वाष्पोत्सर्जन की दर नापने वाले उपकरण का नाम लिखिए।
उत्तर :
पोटोमीटर।

प्रश्न 3.
उस तत्त्व का नाम बताइए जो रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने में सक्रिय भूमिका निभाता (भाग लेता) है।
उत्तर :
पोटैशियम तत्त्व (K+) के एकत्र होने से लेविट (Levit) के अनुसार रन्ध्र खुल जाता है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए
(क) स्फीति दाब व भित्ति दाब।
(ख) अन्तः शोषण व परासरण।
उत्तर :

(क)
स्फीति दाब व भित्ति दाब
जल अवशोषण के कारण कोशिका के अन्दर जीवद्रव्य की मात्रा बढ़ जाती है तथा कोशिका स्फीति दशा में आ जाती है। इस समय जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति पर लगाया जाने वाला दाब स्फीति दाब कहलाता है। इस दाब के विरुद्ध दृढ़ कोशिका भित्ति द्वारा जो दाब आरोपित होता है उसे भित्ति दाब कहते हैं।

(ख)
अन्तःशोषण व परासरण
ठोस एवं कोलॉइडी पदार्थों द्वारा जल अवशोषण अन्त:शोषण कहलाता है जैसे काष्ठ द्वारा जल (UPBoardSolutions.com) का अवशोषण। इसके विपरीत परासरण वह क्रिया है जिसमें जल एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली से होकर कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर जाता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
परासरण किसे कहते हैं? परासरण क्रिया की चित्र द्वारा व्याख्या कीजिए। या चित्र की सहायता से अण्डे की झिल्ली द्वारा परासरण की परिघटना का प्रदर्शन कीजिए और परासरण की परिभाषा भी लिखिए।
उत्तर :
परासरण पौधे जन्तुओं से कोशिका भित्ति (cell wall) के आधार पर भिन्न होते हैं। कोशिका भित्ति पौधों में सबसे बाहरी तरफ पायी जाती है। यह एक पारगम्य परत होती है। अत: यह विभिन्न पदार्थों के परिवहन या गति के लिए बाधक नहीं होती है। एक पौधे की कोशिकाओं में प्राय: एक केन्द्रीय रसधानी (central vacuole) होती है, जिसका रसधानीयुक्त रस कोशिका के विलेय विभव में भागीदारी करता है। पादप कोशिका में कोशिका झिल्ली तथा रसधानी की झिल्ली, टोनोप्लास्ट, दोनों एक साथ कोशिका के भीतर एवं बाहर अणुओं की गति निर्धारित करने के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। परासरण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता हैवह क्रिया जिसमें विलायक के अणु अपनी अधिक सान्द्रता से कम सान्द्रता की ओर एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा तब तक गति करते रहते हैं जब तक कि सान्द्रता एकसमान न हो जाये, परासरण (osmosis) कहलाती है।
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इसे हम निम्न प्रयोग द्वारा समझ सकते हैंशर्करा के विलयन को एक कीप में लिया गया है, जो एक बीकर में रखे गए जल से अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा अलग है। आप इस प्रकार की झिल्ली एक अंडे से प्राप्त कर सकते हैं। आप अंडे के एक सिरे पर छोटा सा छेद करके सारा पीला एवं श्वेत पदार्थ (योल्क एवं एल्यूमिन) निकाल लें और फिर अंडे के कवच को कुछ घण्टों के लिए तनु नमक के अम्ल (HCI) में छोड़ दें। अंडे का कवच घुल जायेगा और उसकी झिल्ली साबुत (UPBoardSolutions.com) प्राप्त हो जाएगी। जल कीप की ओर गति करेगा और कीप में घोल का स्तर बढ़ जाएगा। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक कि साम्यावस्था की स्थिति नहीं आ जाती । कीप के ऊपरी भाग पर बाहरी दाब डाला जा सकता है ताकि झिल्ली के माध्यम से कीप में जल विसरित न हो। यह दाब जल को विसरित होने से रोकता है। विलेय सान्द्रता अधिक होने पर जल को विसरित होने से रोकने के लिए अधिक दाब की भी आवश्यकता होगी। संख्यात्मक आधार पर परासरण दाब परासरण विभव के बराबर होता है लेकिन इसका संकेत विपरीत होता है। परासरण दाब में प्रयुक्त दाब सकारात्मक होता है जबकि परासरण विभव नकारात्मक होता है।

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प्रश्न 2.
जीवद्रव्यकुंचन तथा विसरण में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या जीवद्रव्यकुंचन पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर :
जीवद्रव्यकुंचन तथा विसरण में अन्तर ज
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प्रश्न 3.
जड़ों द्वारा जल-अवशोषण क्रिया को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। या जल-अवशोषण क्रिया में ऑक्सीजन का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर :
जल-अवशोषण को प्रभावित करने वाले कारक जल-अवशोषण को निम्न कारक प्रभावित करते हैं

1. प्राप्य भूमि-जल (Available Soil Water) :
यद्यपि मृदा में विभिन्न प्रकार के जल की मात्रा पायी जाती है परन्तु केवल केशिका जल (capillary water) ही पौधों के लिए उपयोगी होता है। यह जल उस भूमि की क्षेत्रीय जल-धारिता (water at field capacity) तथा स्थाई म्लानि-प्रतिशत (permanent wilting percentage) के बीच की मात्रा होती है। यदि मृदा में जल की मात्रा स्थाई म्लानि-प्रतिर्शत या उससे कम हो जाती है तो पौधा मुरझा जाता है। यदि स्थाई म्लानि-प्रतिशत से क्षेत्रीय जल-धारिता तक जल की मात्रा (UPBoardSolutions.com) बढ़ाई जाए तो जल-अवशोषण बढ़ता जाएगा, परन्तु इससे अधिक जल की मात्रा होने से मृदा के अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) से वायु निकल जाने से जल-अवशोषण कम हो जाता है। इस अवस्था को जलाक्रान्ति (water-logging) कहते हैं।

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2. मृदा का तापमान (Temperature of Soil) :
जब मृदा का तापमान कम होता है तो जड़ों द्वारा जल-अवशोषण की क्रिया की दर कम हो जाती है। अधिकतर पौधों को पर्याप्त जल-अवशोषण के लिए 20° से 35°C तापमान की आवश्यकता होती है। कम तापमान के कारण जल-अवशोषण में निम्न कारणों से कमी हो जाती है

  1.  मूल-वृद्धि कम हो जाती है।
  2.  मृदा से मूल की ओर जल की गति धीमी (slow) हो जाती है।
  3.  कोशिका कला की पारगम्यता (permeability of cell membrane) कम हो जाती है।
  4. कोशिकाद्रव्य का आलगत्व (viscosity) बढ़ जाता है।

3. मृदा विलयन की सान्द्रता (Concentration of Soil Solution) :
यदि मृदा विलयन की सान्द्रता (परासरण दाब भी) मूलरोम के रिक्तिका-रस की सान्द्रता (परासरण दाब भी) की तुलना में कम होगी तो उन जड़ों द्वारा जल का अवशोषण सुगम होगा, यदि मृदा विलयन की सान्द्रता अधिक होगी तो जड़ों द्वारा जल-अवशोषण कठिन होगा। दूसरी अवस्था में मृदा दैहिक रूप से शुष्क (physiologically dry) हो जाती है। कभी-कभी खेती में उर्वरकों (fertilizers) का प्रयोग करने पर यदि शीघ्र ही काफी जल से खेतों की सिंचाई नहीं होती तो मृदा में लवणों की सान्द्रता अधिक हो जाने के कारण पौधे मुरझा जाते हैं। यह म्लानि के कारण होता है।

4. मृदा की वायु (Soil Air) :
अच्छे वातन वाली (well aerated) मृदा से जल का अवशोषण अधिक होता है तथा जलाक्रान्ति मृदा (water logged soil) से जल का अवशोषण कम होता है। इसका कारण यह है कि जल-अवशोषण क्रिया एक भौतिक प्रक्रम (physical process) नहीं है
वरन यह एक जैविक क्रिया (vital activity) है जिसके लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जड़ों की कोशिकाओं को जीवित रखने के लिए श्वसन की आवश्यकता होती है जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में नहीं होगा। साथ ही ऑक्सीजन की कमी में अनॉक्सीय जीवाणु (anaerobic bacteria) उत्पन्न हो जाते हैं। ये जीवाणु कार्बन डाइऑक्साइड एवं कार्बनिक अम्ल अधिक मात्रा में उत्पन्न करते हैं जो जड़ों के लिए घातक होते हैं।

प्रश्न 4.
मूल-दाब से आप क्या समझेंतेहै? एक प्रयोग की सहायता से मूल दाब को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

मूल-दाब

मूल-दाब मूल वल्कुट (root cortex) कोशिकाओं की स्फीति दशा में अपने कोशिकाद्रव्य पर पड़ने वाली वह दाब है जिसके फलस्वरूप उसमें उपस्थित द्रव, जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूल-दाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हैल्स (Stephan Hales) ने सन् 1727 में किया। स्टॉकिंग (Stocking 1956) के अनुसार, “मूल की वाहिकाओं में उत्पन्न दाब जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं द्वारा उत्पन्न होता है, मूल-दाब (UPBoardSolutions.com) कहलाता है।” मूलरोमों द्वारा मृदा से अवशोषित जल वल्कुट (cortex) की ऊतियों में इकट्ठा होता रहता है जिसके फलस्वरूप वल्कुट (cortex) की कोशिकाएँ पूर्ण स्फीति दशा (turgidity condition) में हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की भित्ति लचीली होने के कारण यह कोशिकाओं में भरे द्रव पर दबाव डालती हैं। जिसके फलस्वरूप द्रव का कुछ भाग जाइलम वाहिकाओं में चला जाता है तथा यह तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चला जाता है। इस प्रकार मूल-दाब रसारोहण में सहायता करता है।

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प्रयोग
किसी पर्याप्त जलवातीय भूमि में उगे पौधे के तने को भूमि से कुछ इंच ऊपर से काट दिया जाता है। तने के कटे सिरे पर रबर की नली की सहायता से काँच की एक नली बाँधकर उसमें थोड़ा जल भर दिया जाता है। अब काँच की नली के दूसरे सिरे पर रबर की सहायता से एक U के आकार की (U-shaped) ट्यूब में कुछ पारा भरकर मेनोमीटर लगाकर बाँध दिया जाता है। कुछ समय पश्चात् देखने से ज्ञात होता है कि मेनोमीटर की नली में पारा ऊपर चढ़ गया है और काँच की नली में भी जल पहले से अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि काँच की नली में तने के कटे सिरे से जल निकाय इकट्ठा हो गया है जिससे पारे पर दबाव पड़ने के कारण यह मेनोमीटर (UPBoardSolutions.com) में ऊपर चढ़ जाता है। इससे यह स्पष्ट है कि मूल-दाब के कारण जल तने में ऊपर चढ़ता है। चित्र-मूल-दाब को प्रदर्शित करने का उपकरण

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प्रश्न 5.
बिन्दुस्रवण पर टिप्पणी लिखिए। या बिन्दुस्रवण क्या है? टमाटर अथवा प्रीमूला पत्ती के सिरे पर स्थित जल स्रावण ग्रन्थि की अनुदैर्घ्य काट का चित्र बनाकर इसे समझाइए।
उत्तर :
जब मृदा में अवशोषण योग्य जल की पर्याप्त मात्रा हो, परन्तु वाष्पोत्सर्जन न हो सकता हो तब धनात्मक मूलदाब के कारण जल (वास्तव में घोल) का बिन्दुओं के रूप में पत्तियों के किनारों पर
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जलरन्ध्र के मार्ग में स्रावण, बिन्दुस्रवण कहलौता है। यह क्रिया साधारणतया रात्रि में होती है। यदि पौधे नम व गर्म वातावरण, अर्थात् आर्द्र दशाओं में उगे हों तो यह क्रिया दिन के समय में भी होती है।

प्रश्न 6.
वाष्पोत्सर्जन की परिभाषा लिखिए। यह पौधों के लिए क्यों आवश्यक है? समझाइए।
उत्तर :

वाष्पोत्सर्जन

वाष्पोत्सर्जन (transpiration) वह क्रिया है जिसमें जीवित पौधे, अपने वायवीय भागों; जैसे-पत्तियों, हरे प्ररोह आदि के द्वारा आन्तरिक ऊतकों से, अतिरिक्त पानी को वाष्प के रूप में बाहर निकालते हैं। पौधे अपनी जड़ों द्वारा जितना पानी पृथ्वी से अवशोषित करते हैं, उसकी सम्पूर्ण मात्रा उपापचयी। क्रियाओं (metabolic activities) में काम नहीं आती। इसका अत्यधिक अंश पौधे के लिए बेकार होता है। कभी-कभी तो अवशोषित जल का 5% से भी कम भाग (UPBoardSolutions.com) ही पौधे के लिए उपयोगी होता है। और शेष जल (95% से भी अधिक भाग) पौधे से विभिन्न रूपों में वातावरण में उत्सर्जित किया जाता है। अन्य क्रियाओं की अपेक्षा यह पानी सदैव ही (रात-दिन) किसी-न-किसी दर से वाष्पोत्सर्जन की क्रिया द्वारा पौधों की वायवीय सतहों से वाष्प बनकर उड़ता रहता है। वाष्पोत्सर्जन (transpiration) की यह क्रिया एक भौतिक क्रिया (physical process) होने के साथ-साथ किसी सीमा तक एक जैविक क्रिया (vital activity) है तथा जीवद्रव्य के द्वारा नियन्त्रित रहती है।

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वाष्पोत्सर्जन पौधों के लिए आवश्यक है।
वाष्पोत्सर्जन को आवश्यक बुराई (necessary evil) कहा गया है, क्योंकि यह एक ओर पौधे के जल को कम करने की बुराई है तो दूसरी ओर इसके द्वारा उत्पन्न अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं के चलते ही पौधे में अधिक जल, खनिज लवण इत्यादि ग्रहण करने की क्षमता आती है। विशेष शुष्क स्थानों (xeric conditions) में तो इसे रोकने के लिए अनेक प्रकार के उपाय पौधे द्वारा किये जाते हैं फिर भी वाष्पोत्सर्जन पौधे के लिए अत्यन्त उपयोगी है। निम्नलिखित प्रक्रियायें महत्त्वपूर्ण हैं

1. अतिरिक्त जल का निस्तारण :
पौधे भूमि से लगातार अपने मूलरोमों द्वारा परासरण व अन्त:शोषण (osmosis and imbibition) के द्वारा पानी का अवशोषण करते हैं। शरीर में आवश्यकता की अपेक्षा यह पानी कई गुना अधिक होता है अतः वाष्पोत्सर्जन द्वारा अनावश्यक तथा अतिरिक्त जल (excess water) पौधों के शरीर से बाहर निकलता रहता है।

2. खनिज लवणों की प्राप्ति :
वाष्पोत्सर्जन तथा जल के अवशोषण (absorption) में एक घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। पौधे द्वारा जितना अधिक वाष्पोत्सर्जन होता है उतना ही अधिक भूमि से जल का अवशोषण होता है। मृदा जल में खनिज लवणों की मात्रा बहुत ही कम होती है अतः पौधों के द्वारा जितना अधिक जल का अवशोषण होता है उतने ही अधिक खनिज लवण (mineral salts) इसमें घुलकर पौधे के शरीर में पहुँचते रहते हैं। अधिक वाष्पोत्सर्जन से रिक्तिका रस में परासरण दाब बढ़ जाता है, इस प्रकार और अधिक लवण पादप शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

3. वाष्पोत्सर्जन, कर्षण तथा रसारोहण :
वाष्पोत्सर्जन के द्वारा चूषण बल (suction pressure) उत्पन्न होता है जो रसारोहण (ascent of sap) के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इससे जल बड़े-बड़े वृक्षों में भी उनकी अत्यधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता है।

4. ताप का नियमन :
वाष्पोत्सर्जन के कारण ही पौधे झुलसने से बच जाते हैं, क्योंकि जल की वाष्प बनने के कारण ठण्डक पैदा होती है, इस प्रकार गुप्त ऊष्मा के वाष्प में चले जाने के कारण उसका उपयोग पौधा ताप से बचने में करता है।

5. जल का समान वितरण :
वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधों के सभी भागों में पानी का वितरण (distribution) समान रूप से हो जाता है।

6. फलों में शर्करा की सान्द्रता :
अर्धिक वाष्पोत्सर्जन के कारण फलों में शर्करा की सान्द्रता बढ़ जाती है जिससे फल अधिक मीठे हो जाते हैं।

7. यान्त्रिक ऊतकों व आवरण का निर्माण :
अधिक वाष्पोत्सर्जन से पौधों में अधिक यान्त्रिक ऊतकों की वृद्धि होती है जिसके कारण पौधे मजबूत होते हैं। ये ऊतक पौधे की जीवाप्नुओं, कवकों आदि से रक्षा भी करते हैं, विशेषकर बाहरी भागों पर बने उपचर्म (cuticle) आदि के आवरण से।

प्रश्न 7.
रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं? इसका क्या महत्व है।
उत्तर :
रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (Stomatal Transpiration) :
पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनको रन्ध्र (स्टोमेटा) कहते हैं। इन्हीं रन्ध्रों से वाष्प विसरित (diffuse) होकर वातावरण में चली जाती है। इस प्रकार के वाष्पोत्सर्जन को रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन (stomatal transpiration) कहते हैं। कभी-कभी रन्ध्र (stomata) पत्ती की (UPBoardSolutions.com) ऊपरी सतह पर भी पाए जाते हैं। लगभग 80-90% वाष्पोत्सर्जन रन्ध्रों (stomata) के द्वारा होता है। रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन के फलस्वरूप पौधों में निम्न कार्य सम्पन्न होते हैं, जिसके कारण इसका बहुत महत्त्व है

1. जल का परिसंचरण (Circulation of Water) :
पौधे के मूल से चोटी तक लगातार जल की धारा वाष्पोत्सर्जन के द्वारा ही प्रवाहित होती है, परन्तु यह धारणा ठीक प्रतीत नहीं होती, क्योंकि यदि वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल की हानि नहीं होती तो जल के अधिक मात्रा में ऊपर चढ़ने की भी आवश्यकता नहीं होती।

2. खनिज तत्वों का अवशोषण तथा परिवहन (Absorption and Transportation of Mineral Elements) :
कुछ लोगों का मत है कि वाष्पोत्सर्जन खनिज अवशोषण एवं परिवहन में सहायता करता है, परन्तु यह सिद्ध किया जा चुका है कि जल अवशोषण एवं खनिज अवशोषण एक-दूसरे से भिन्न क्रियाएँ हैं। खनिज परिवहन में वाष्पोत्सर्जन अवश्य सहायता करता है।

3. तापक्रम-सन्तुलन (Regulation to Temperature) :
पत्तियों पर पड़ने वाले प्रकाश का केवल 12% भाग परावर्तित होकर वातावरण में जाता है। 83% प्रकाश पत्ती द्वारा शोषित किया जाता है तथा 5% प्रकाश पत्ती में से होता हुआ पार निकल जाता है। वाष्पोत्सर्जन में यह ऊर्जा काम में आ जाती है। इस प्रकार वाष्पोत्सर्जन तापक्रम-सन्तुलन बनाए रखने में पौधों की सहायता करता है, परन्तु वाष्पोत्सर्जन का पत्तियों का तापक्रम कम करने में अधिक महत्त्व नहीं है, क्योंकि पत्ती का वाष्पोत्सर्जन रोकने पर अधिक-से-अधिक 5°C तक तापमान बढ़ता है जो विशेष हानिकारक नहीं है।

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प्रश्न 8.
टिप्पणी लिखिए-जलरंध्र
उत्तर :
ये विशेष संरचनाएँ प्रमुख रूप से जल में उगने वाले पौधों या नमीदार स्थानों में उगने वाले शाकों (herbs) में होती हैं। ये पत्तियों के सिरों पर होती हैं। इनमें अनेक जीवित कोशिकाएँ समूह के रूप में होती हैं जिनमें बीच-बीच में जल से भरे बहुत से अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) होते हैं। इन जीवित कोशिकाओं को एपीथेम कोशिकाएँ (epithem cells) कहते हैं। ये कोशिकाएँ एक या दो गुहिकाओं (chambers) में खुलती हैं और ये गुहिकाएँ बाहर की ओर छोटे छिद्रों (UPBoardSolutions.com) द्वारा खुलती हैं। इन छिद्रों को जलरन्ध्र (hydathode or water pores) कहते हैं। जलरन्ध्र (hydathode) द्वारा जल बूंद के रूप में बाहर निकलता है। जल के साथ कुछ उत्सर्जी पदार्थ भी निकलते है।

प्रश्न 9.
वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रवण में अन्तर बताइए।
उत्तर :
वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रवण में अन्तर
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प्रश्न 10.
सक्रिय जल अवशोषण तथा निष्क्रिय जल अवशोषण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सक्रिय तथा निष्क्रिय जल अवशोषण में अन्तर
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पौधों की जड़ों द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। या पौधों में परासरण द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। या जड़ों द्वारा जल के अवशोषण की क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। या सक्रिय अवशोषण का वर्णन कीजिए। या मूलरोमों द्वारा जल अवशोषण की क्रिया-विधि का चित्र की सहायता से वर्णन कीजिए।
उत्तर :
जडों द्वारा भूमि से जल का अवशोषण जल तथा खनिज लवणों को भूमि से अवशोषित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य जड़े करती हैं। मूलरोम तथा बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकायें जल का अवशोषण करके वल्कुट (cortex) की कोशिकाओं को दे देती हैं। जल के अवशोषण का प्रमुख कार्य सर्वाधिक तथा काफी बड़े पैमाने पर जड़ के मूलरोम प्रदेश (root hair region) में होता है, क्योंकि मूलरोम बाह्य त्वचा का सम्पर्क तल भूमि के जल के साथ हजारों गुना बढ़ा देते हैं। यह जल अन्तिम रूप से जड़ में स्थित जाइलम वाहिनियों में पहुँचता है।

अवशोषण की क्रिया विधि
मूलरोम बाह्यत्वचा की किसी भी कोशिका की कोशिका भित्ति जोकि सेलुलोस की बनी होती है, जल के लिए पूर्णतः पारगम्य होती है। कोशिका का जीवद्रव्य (protoplasm) तथा कोशिका कला (plasmalemma) मिलकर एक वरणात्मक पारगम्य कला (selectively permeable membrane) की तरह कार्य करते हैं। मूलरोम तथा बाह्यत्वचा की अन्य कोशिकाएँ भी भूमि में मृदा कणों के मध्य उपस्थित जल विशेषकर केशिकीय जल (capillary water) के साथ सम्पर्क (UPBoardSolutions.com) बनाती हैं। मूलरोम के अन्दर उपस्थित केन्द्रीय रिक्तिका (central vacuole) में अनेक पदार्थों का विलयन अर्थात् कोशिका का रिक्तिका रस या कोशिका रस (cell sap) होता है। जल अवशोषण की निम्नलिखित दो प्रकार की विधियाँ होती हैं

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1. जल अवशोषण की परासरणी विधि
कोशिका रस का परासरण दाब (osrmotic pressure) मृदा जल से अधिक लगभग 2 atm रहता है। इस प्रकार, केशिका जल अपने अन्दर अल्प मात्रा में घुले खनिज लवणों के साथ रिक्तिका रस और केशिका जल के मध्य उपस्थित जीवद्रव्यरूपी वरणात्मक पारगम्य कला में होकर रिक्तिका रस में परासरित हो जाता है। यद्यपि, प्रारम्भिक अवस्थाओं में तो पेक्टिन तथा सेलुलोस जैसे पदार्थों से बनी कोशिका भित्ति में यह जल अन्तःचूषित (imbibe) ही होता है। अतः स्पष्ट है कि जब तक बाह्य त्वचा की कोशिका अथवा मूलरोमों में विसरण दाब की कमी (DPD) बनी रहेगी, मृदा जल परासरण के द्वारा कोशिकाओं में प्रवेश करता रहेगा।

2. जल अवशोषण की परासरण विहीन विधि
परासरण की सामान्य क्रिया द्वारा जल के अवशोषण के अतिरिक्त जल के अवशोषण की अन्य अवस्थाओं में अन्य क्रिया-विधियाँ भी होती हैं; जैसे

(i) ऊर्जा की उपस्थिति में सक्रिय अवशोषण (active absorption) की क्रिया तथा
(ii) लगभग यान्त्रिक विधि द्वारा निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption)।

(i) जल का सक्रिय अवशोषण (Active Absorption of Water)
एक जीवित कोशिका में ऊर्जा की उपस्थिति में जल के सक्रिय अवशोषण की क्रिया अनेक प्रमाण देकर स्पष्ट रूप से समझायी गयी है। जड़ों में इस प्रकार का अवशोषण परासरण दाब के विपरीत भी होता है। इस कार्य के लिए ऊर्जा जड़ की जीवित कोशिकाओं में हो रही श्वसन क्रिया से प्राप्त होती है। इसी कारण श्वसन को कम करने वाले सभी कारक, ऑक्सीजन की कमी, कम ताप आदि अवशोषण को भी कम कर देते हैं। इसी प्रकार, विभिन्न पदार्थ, ऊर्जाएँ अथवा परिस्थितियाँ आदि जो उपापचयी क्रियाओं को बढ़ाते हैं, अवशोषण को भी बढ़ाने का कार्य करते हैं जबकि इन क्रियाओं को कम करने वाली परिस्थितियाँ, पदार्थ, ऊर्जा आदि; जैसे विष, कम ताप आदि अवशोषण को कम कर देती हैं।

(ii) जल का निष्क्रिय अवशोषण (Passive Absorption of Water) 
जब मृदा में प्राप्य जल की मात्रा की कोई कमी न हो तथा अधिक वाष्पोत्सर्जन हो रहा हो तो एक प्रकार का यान्त्रिक अवशोषण होता है, इसे निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption) कहते हैं। अधिक वाष्पोत्सर्जन होने पर तथा जाइलम वाहिकाओं में, जल की कमी होने पर उनके आस-पास उपस्थित मृदूतकीय कोशिकाओं से जल की आपूर्ति हो जाती है। इस प्रकार, यह जल क्रमशः परिरम्भ, अन्तस्त्वचा तथा कॉर्टेक्स की कोशिकाओं से अवशोषित किया जाता है और अन्त में इस जल की कमी को मूलरोम या बाह्यत्वचा की कोशिकायें पूरा कर देती हैं। स्पष्ट है, जल के इस प्रकार के अवशोषण के लिए ऊर्जा अथवा परासरण दाब की भी आवश्यकता नहीं होती। वास्तव में, यह पौधे में उत्पन्न वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) के द्वारा ही होता रहता है। अतः यह अवशोषण कोशिकाओं के द्वारा किसी क्रिया विशेष के द्वारा नहीं बल्कि कोशिकाओं में होकर होता है।

जड़ में जल को पाश्र्व चालन
भूमि से मूलरोम को सतत् जल मिलता रहता है क्योंकि केशिका जल (capillary water) दूर-दूर से भी यहाँ पहुँचता रहता है।
मूलरोम या बाह्य त्वचा के तुरन्त सम्पर्क में अन्दर कॉर्टेक्स (cortex) की मृदूतकीय कोशिकायें (parenchymatous cells) होती हैं। चित्र में A तथा B कोशिकाओं के कोशिका रस की जल की माँग में अन्तर है। B कोशिका की जल की माँग (DPD) निश्चित रूप से अधिक होगी। अतः जल का परासरण A से B में हो जाता है। अब अगली कोशिका C में पहले अगर B तथा C की DPD एक जैसी थी तो भी अब C की अपेक्षाकृत अधिक होगी। अतः जल B से C में, इसी प्रकार (UPBoardSolutions.com) C से D में इत्यादि जाता रहेगा। परासरण के द्वारा जल, इस प्रकार, मृदा विलयन से मूलरोम में तथा यहाँ से कॉर्टेक्स की कोशिकाओं में, क्रमशः होता हुआ अन्तस्त्वचा (endodermis), परिरम्भ (pericycle) की कोशिका के द्वारा जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) में पहुँचता है। स्पष्ट है जल के
अनुप्रस्थ चालन की इस विधि में जल रिक्तिकाओं से होकर जाता है। विसरण दाब की कमी इस प्रकार बाहरी कोशिकाओं से भीतरी कोशिकाओं में अधिक होना और क्रमानुसार बदलते रहना विसरण दाब की प्रवणता (gradient of diffusion pressure deficit) कहलाता है।

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इस आधार पर जल का मूल में पार्श्व चालन (lateral movement) रिक्तिकीय पथ द्वारा चालन (movement through vacuolar pathway) कहलाता है तथा सर्वमान्य है फिर भी वर्तमान में यह भी माना जाने लगा है क्रि

  1. जल का विसरण मूलरोम से कॉर्टेक्स की कोशिकाओं में होकर जाइलम वाहिकाओं तक आपस में सम्बन्धित जीवद्रव्यी तन्तुओं (plasmodesmata) के द्वारा ही हो जाता है। इस प्रकार जल का निरन्तर पार्श्व प्रवाह जीवद्रव्यी पथ (symplast pathway) से होकर होता रहता है और रिक्तिकाओं या उनके सेल सैप की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
  2. जल के पार्श्व चालन के लिए विभिन्न कोशिकाओं की कोशिका भित्ति (cell wall) को एक स्वतन्त्र तन्त्र के रूप में माना जाने लगा है अर्थात् कोशिका भित्तीय पथ (apoplast pathway) से होकर जल के इस प्रकार निरन्तर प्रवाह में कोशिका के जीवद्रव्य अथवा उसमें उपस्थित रिक्तिकी की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है।

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प्रश्न 2.
स्टोमेटा के खुलने तथा बन्द होने की कार्य-विधि का संक्षेप में सचित्र वर्णन कीजिए। या रन्ध्रों के खुलने एवं बन्द होने में पौटेशियम आयन का कार्य लिखिए।
उत्तर :
पर्णरन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया-विधि

पर्णरन्ध्र का निर्माण दो विशेष आकार-प्रकार की द्वार कोशिकाओं (guard cells) के द्वारा होता है। इन्हीं कोशिकाओं की स्फीति के कारण आकार में परिवर्तन पर रन्ध्र का छोटा या बड़ा होना निर्भर करता है। जब ये कोशिकायें स्फीत (turgid) होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाता है। द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) में परिवर्तन उनके परासरण दाब (osmotic pressure) में परिवर्तन पर निर्भर करता है। परासरण दाब बढ़ने पर आस-पास की सहायक कोशिकाओं (subsidiary cells) से परासरण की क्रिया के द्वारा पानी आ जाता है और द्वार कोशिकायें स्फीत हो जाती हैं। अत: भीतरी मोटी (UPBoardSolutions.com) भित्ति, बाहरी भित्ति के बाहर की ओर फूलने के कारण, द्वार कोशिका के अन्दर ही घुस जाती है, फलतः रन्ध्र खुल जाता है। परासरण दाब घटने पर द्वार कोशिकाओं से जल पड़ोसी कोशिकाओं में चले जाने के कारण ये श्लथ हो जाती हैं और रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। परासरण दाब में परिवर्तन का प्रश्न कार्यिकीविदों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाया है
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1. मण्ड-शर्करा परिवर्तन मत
दिन के समय जब सम्पूर्ण CO2 कोशिका में प्रकाश संश्लेषण में समाप्त हो जाती है तो माध्यम क्षारीय हो जाता है अर्थात् pH बढ़ जाता है और संचित मण्ड (starch) ग्लूकोज (glucose) में बदल जाता है। इस प्रकार, इन कोशिकाओं का रिक्तिका रस (cell sap) अधिक गाढ़ा हो जाता है अर्थात् कोशिकाओं का परासरण दाब बढ़ जाता है। अब पास की सहायक कोशिकाओं (subsidiary cells) द्वारा जल कोशिकाओं में आता है जिससे द्वार कोशिकाएँ स्फीत (turgid) हो जाती हैं और रन्ध्र खुले (open) जाते हैं। रात्रि के समय जब कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण बन्द हो जाता है और CO2 की मात्रा बढ़ने के कारण माध्यम अम्लीय (कम pH) हो जाता है तब कोशिकाओं में उपस्थित शर्कराएँ मण्ड में बदल जाती हैं। इन कोशिकाओं से पानी वापस पास वाली कोशिकाओं में चले जाने के कारण ये कोशिकायें शिथिल हो जाती हैं। उपर्युक्त विवरण सैयरे (Sayre J. D., 1926) के मतानुसार है, जबकि यिन तथा तुंग (Yin and Tung, 1948) ने द्वार कोशिकाओं के क्लोरोप्लास्ट्स में फॉस्फोराइलेज (phosphorylase) एन्जाइम की उपस्थिति को स्पष्ट किया जो कि अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करता है।
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उपर्युक्त समीकरण में एन्जाइम की उपस्थिति में मण्ड का अकार्बनिक फॉस्फेट (iP) के साथ ग्लूकोज फॉस्फेट बनना प्रदर्शित किया गया है। इसमें pH की दशा विशेष परिस्थिति है, जिसके कम होने से मण्ड का निर्माण हो जाता है।
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यद्यपि कुछ वैज्ञानिक स्टार्च  ⇌  शर्करा परिवर्तन की विचारधारा को सही नहीं मानते, फिर भी यह मत तो लगभग सर्वमान्य है कि pH के परिवर्तन के अनुसार तथा परासरण दाब के आधार पर ही पर्णरन्ध्र (stomata) खुलते या बन्द होते हैं। स्टेवार्ड (Steward, 1964) के मतानुसार जब तक ग्लूकोज 6-फॉस्फेट, ग्लूकोज तथा अकार्बनिक फॉस्फेट में परिवर्तित नहीं हो जाता तब तक द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। रन्ध्र के बन्द होने (UPBoardSolutions.com) के लिए ऊर्जा ATP से ली जाती है। अतः इस क्रिया के लिए श्वसन भी आवश्यक है, जिसमें कि ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

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2. लेविट का सक्रिय K’ स्थानान्तरण मत
लेविट के अनुसार प्रकाश में द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल (malic acid) बनता है जो मैलेट व Hमें वियोजित हो जाता है। H+ बाहर जाते हैं और K+ अन्दर आकर पोटैशियम मैलेट का निर्माण करता है। इसकी उपस्थिति में द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब में वृद्धि होने से रन्ध्र (stomata) खुल जाता है।
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प्रश्न 3.
डिक्सन तथा जौली वाद के अनुसार पौधों में रसारोहण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। या रसारोहण क्या है ? इसकी क्रिया-विधि को वर्णन कीजिए।
उत्तर :
रसारोहण पौधों में गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल (तथा उसमें घुले खनिज लवणों) के ऊपर की ओर चढ़ने की। क्रिया को रसारोहण (ascent of sap) कहते हैं। जल तथा उसमें घुले खनिज लवण जड़ों द्वारा अवशोषित होकर पौधों के विभिन्न भागों (विशेषकर) पत्तियों तक पहुँचते हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि जल तथा उसमें घुले हुए खनिज पदार्थ जाइलम वाहिकाओं या वाहिनिकाओं (xylem vessels or tracheids) की गुहा (lumen) में होकर ऊपर चढ़ते हैं। (UPBoardSolutions.com) छोटे-छोटे पौधों में तो इन पदार्थों को 0.5-1.0 मीटर ऊँचा ही चढ़ना पड़ता है, बड़े-बड़े वृक्षों में जो 80-85 मीटर से भी ऊँचे हो सकते हैं, इनको गुरुत्वाकर्षण के विपरीत चढ़ना पड़ता है।
इस क्रिया के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा अलग-अलग तरह के मत व्यक्त किये गये हैं। इन मतों में, अनेक प्रकार के बलों, दाबों आदि का विचार रखा गया और अलग-अलग मतों में केशिकाव (capillarity), अन्तःशोषण (imbibition), मूलदाब (root pressure), वायुमण्डलीय दाबे (atmospheric pressure) आदि को अलग-अलग करके रसारोहण का कारण समझाया गया अथवा कुछ जीवित कोशिकाओं की स्पन्दन गति (pulpitation movement) को इसके लिए उपयुक्त मान लिया गया। सामान्यत: बड़े-बड़े तथा ऊँचे पौधों के लिए अनेक प्रयोगों आदि के आधार पर इन धारणाओं को अमान्य कर दिया गया।

जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को पूर्ण रूप से समझाने के लिए कई बलों को एक साथ क्रियात्मक रूप में संयोजित करके डिक्सन तथा जौली (Dixon and Jolly) ने वर्ष 1894 में वाष्पोत्सर्जन-संसंजन-तनाव वादे (transpiration-cohesion- tension theory) प्रस्तुत किया। वाष्पोत्सर्जन-संसंजन-तनाव वाद यह वाद निम्नलिखित तीन प्रमुख सिद्धान्तों पर आधारित है

  1. जाइलम वाहिकाओं में जल एक लगातार स्तम्भ के रूप में रहता है।
  2. जल के अणुओं के मध्य शक्तिशाली संसंजन (cohesion), अर्थात् आकर्षण रहता है।
  3. वाष्पोत्सर्जन-कर्षण (transpiration pull) का जल स्तम्भ पर तनाव।

जाइलम वाहिकाएँ एक-दूसरे से सिरे से सिरे पर सम्बन्धित होती हैं, साथ ही इनके अन्दर उपस्थित जल एक अविरत जल स्तंम्भ के रूप में होता है। यह जल स्तम्भ विभिन्न शाखाओं, पत्तियों तथा पर्णकों में उपस्थित शिराओं (veins) और उनकी शाखाओं इत्यादि में होकर जल के एक द्रवस्थैतिक तन्त्र (hydrostatic system) का निर्माण करता है, जिसके एक सिरे पर लगा हुआ तनाव पूरे तन्त्र को प्रभावित करता है। दूसरी ओर जल अणुओं में अत्यधिक संसंजन (cohesion) होने के कारण इतना अधिक आकर्षण बल होता है  कि यह जल स्तम्भ अत्यधिक तनाव इत्यादि को भी सहन कर लेता है। समझा जाता है कि संसंजन बल (cohesive force) के कारण 400 वायुमण्डलीय दाब (atmospheric pressure) पर भी जल स्तम्भ खण्डित नहीं होता है। दूसरी ओर जाइलम वाहिकाएँ जो केवल मृत आशय की तरह काम करती हैं, जल स्तम्भ इनकी भीतरी भित्तियों के साथ आसंजित रहता है। यह आसंजन बल (adhesive force) भी जल स्तम्भ को खण्डित नहीं होने देता। वाष्पोत्सर्जन इस अविरत जल स्तम्भ के ऊपरी सिरों पर खिंचाव उत्पन्न किये रखता है। अतः सम्पूर्ण जल स्तम्भ ऊपर की ओर खिंचा चला जाता है। यहाँ अविरत जल स्तम्भ उस रस्से की तरह है जिसे कोई व्यक्ति कई मंजिल ऊपर खड़े होकर तथा बहुत कम बल लगाकर ही ऊपर खींच सकता है; क्योंकि रस्सी के सारे रेशे आपस में चिपक कर एक सामान्य स्तम्भ का निर्माण कर रहे होते हैं जैसा कि यहाँ जेल के अणु एक-दूसरे से संसंजित हैं।

किसी पौधे के सम्पूर्ण वायवीय मुलायम भागों से जल का अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन होता है। पर्णरन्ध्र इस कार्य को मुख्य रूप से करते हैं। पर्णरन्ध्र पत्तियों की पर्णमध्योतकीय कोशिकाओं के बीच-बीच में पाये जाने वाले अन्तराकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) में भरी हुई जल वाष्प (water vapours) को वायुमण्डल में विसरित करते रहते हैं। इस प्रकार इन अन्तराकोशिकीय स्थानों में जल वाष्प की माँग निरन्तर पर्णमध्योतकीय कोशिकाओं (mesophyll cells) के द्वारा (UPBoardSolutions.com) पूरी की जाती है।और पर्णमध्योतकीय कोशिकाओं से उत्पन्न हुई जल की माँग (DPD) को जाइलम वाहिकाओं में उपस्थित जल भण्डार (जल स्तम्भ) से पूरा किया जाता है। इन अवस्थाओं में एक प्रकार का खिंचाव, वाष्पोत्सर्जन-कर्षण (transpiration pull) उत्पन्न हो जाता है, जो जाइलम वाहिकाओं में उपस्थित जल स्तम्भ को ऊपर खींचता रहता है। यह वाष्पोत्सर्जन-कर्षण अधिक वाष्पोत्सर्जन काल में अधिक होता है जिससे जड़ों में निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption) भी उत्पन्न होता है।

अधिक वाष्पोत्सर्जन की दशा में यह सिद्धान्त पूर्णत: उपयुक्त लगता है और डिक्सन तथा जौली के इसी मत को मान्यता मिली हुई है, किन्तु अब सामान्यतः यह माना जाता है कि रसारोहण संसंजन-वाष्पोत्सर्जन यदि जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है तो धनात्मक मूलदाब भी काफी दूरी तक जाइलम वाहिनियों में जल को ऊपर धकेलने में सहायक होता है। इस प्रकार, अन्य अवस्थाओं में अथवा उपर्युक्त दशाओं में भी अन्य प्रकार के दाब इस कार्य में अपनी-अपनी सीमा में सहायता अवश्य करते हैं।

प्रश्न 4.
वर्तमान संकल्पनाओं के आधार पर पौधों में खाद्य पदार्थों के स्थानान्तरण की प्रक्रिया समझाइए। या भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण से सम्बन्धित मुंच की परिकल्पना की व्याख्या कीजिए। या खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण किसे कहते हैं? इसके पथ तथा स्थानान्तरण की दिशा का चित्र की सहायता से वर्णन कीजिए। या पौधों में कार्बनिक पदार्थों के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं? इसकी क्रियाविधि एवं महत्त्व को लिखिए।
उत्तर :

पादपों में खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण

फ्लोएम के द्वारा भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण की क्रिय-विधि को समझाने का समय-समय पर प्रयास किया गया है; जैसे—विसरण परिकल्पना तथा जीवद्रव्य धारा प्रवाह परिकल्पना। किन्तु ये सिद्धान्त मान्यता प्राप्त नहीं कर सके क्योंकि ये तथ्यों पर खरे नहीं उतरते। सामान्यतः मान्य तथा अधिक स्पष्ट मत निम्नलिखित है

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मात्रा प्रवाह या दाब प्रवाह परिकल्पना
मुंच (Munch, 1927-30) के अनुसार, इस परिकल्पना में बताया गया है कि फ्लोएम में भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण की यह क्रिया विलेय स्वरूप में इन खाद्य पदार्थों के अधिक सान्द्रण वाले स्थानों से कम सान्द्रण वाले स्थानों में परासरण (osmosis) द्वारा होती है। पर्णमध्योतक कोशिकाओं (mesophyll cells) में इन पदार्थों के निरन्तर बनते रहने के कारण परासरण दाब (osmotic pressure) अधिक ही रहती है। दूसरी ओर जड़ों या अन्य स्थानों में इन (UPBoardSolutions.com) पदार्थों के उपयोग में आते रहने अथवा अविलेय (insoluble) रूप में संचित हो जाने से सान्द्रण कम हो जाता है। अतः पर्णमध्योतक कोशिकाओं से फ्लोएम में होकर सामूहिक रूप में (in mass form) अथवा परासरण दाब के कारण आवश्यकता के स्थानों पर स्थानान्तरण होता रहता है। इस सिद्धान्त को समझाने के लिए निम्नलिखित प्रयोग किया जाता है
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants image 25
सत्यापन प्रयोग के लिए दो परासरणदर्शी (osmometers) लिए जाते हैं। परासरणदर्शी में एक नली के सिरे पर अण्डे की झिल्ली या अन्य कोई अर्द्धपारगम्य झिल्ली बॉधी जाती है (चित्र A)। दोनों परासरणदर्शियों को एक नली ‘T’ द्वारा सम्बन्धित किया जाता है। परासरणदर्शी A में शक्कर का सान्द्र विलयन भरा जाता है तथा ‘B’ में शक्कर का तनु विलयन अथवा सादा जल। दोनों परासरणदर्शियों को जल से भरे पात्रों में रखा जाता है तथा दोनों पात्रों को भी एक नली ‘t’ के द्वारा सम्बन्धित किया जाती है। स्पष्ट है परासरणदर्शी ‘A’ में पात्र से काफी मात्रा में जल परासरित होगा और यहाँ अत्यधिक परासरण दाब के कारण अत्यधिक स्फीति दाब (turgor pressure) पैदा होगा। अतः ‘A’ का विलयन अविरल धार के रूप में (mass flow) ‘B’ की ओर प्रवाहित होगा, क्योंकि दोनों ओर झिल्लियों के फैलने के लिए बराबर बल चाहिए। यह प्रवाह क्रम तब तक चलता रह सकता है जब तक कि दोनों ओर शक्कर का सान्द्रण बराबर नहीं हो जाता है। उधर ‘B’ में आकर विलयन से जल पात्र में और पात्र से ‘A’ में जल आता रहता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants image 26

यहाँ यह स्पष्ट है कि यदि परासरणदर्शी ‘A’ में शक्कर की मात्रा को अर्थात् विलयन के सान्द्रण को कम न होने दिया जाये, साथ ही परासरणदर्शी ‘B’ में आयी हुई शक्कर को निरन्तर हटाया जाता रहे तो निश्चय ही यह धारा प्रवाह लगातार तथा तीव्र गति से होता रह सकता है। उपर्युक्त रेखाचित्र (UPBoardSolutions.com) (B) में ‘A’ पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं की तरह है, जहाँ प्रकाश संश्लेषण के द्वारा शर्करा का निर्माण होता रहता है। अतः परासरण दाब कम नहीं होने पाता जबकि ‘B’ जड़ों या अन्य स्थानों की तरह है जहाँ शर्कराओं को या तो उपयोग में ले लिया जाता है अथवा अविलेय अवस्था में परिवर्तित करके संचित किया जाता रहता है। इसके अतिरिक्त चित्रे (A) के उपकरण की नली T’ चालनी नलिकाओं के समान तथा पात्र जाइलम के समान है।

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उपर्युक्त प्रयोग मुंच के सिद्धान्त को सत्यापित करता है कि जल में घुले भोज्य पदार्थों की एक अविरल धार मात्रा प्रवाह या दाब प्रवाह (mass flow or pressure flow) के रूप में सतत् फ्लोएम में प्रवाहित होती रहती है। मुंच की इस परिकल्पना की आपत्ति यह है कि इस परिकल्पना में खाद्य पदार्थों के विभिन्न दिशाओं में एक साथ स्थानान्तरण के सम्बन्ध में कुछ नहीं बताया गया है।

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UP Board Solutions for Class 11 English Poetry Figures Of Speech

UP Board Solutions for Class 11 English Poetry Figures Of Speech

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Figures of Speech यो ‘अलंकार’ शब्दों का ऐसा असाधारण प्रयोग है जो भाषा में सुन्दरता को पैदा करता है और उसके प्रभाव को और अधिक बढ़ाता है। मुख्य Figures of Speech की परिभाषाएँ एवं उदाहरण नीचे दिए गए हैं-

1. SIMILE (उपमा)

इसमें दो भिन्न-भिन्न समुदायों की दो.भिन्न-भिन्न वस्तुओं में किसी समान गुण की तुलना की जाती है। इसमें like, such as, just as, as….. as, so……as आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
Definition : A simile expresses comparison between two unlike objects or events. Usually the comparison is expressed by using like, such as, just as, as….. as, so ….. as.

Examples :
1. I wandered lonely as a cloud.
2. Childhood is like a swiftly passing dream.
3. Rana Pratap was as brave as a lion.
4. The lake was clear as a crystal.
5. Errors like straws, upon the surface flow.
6. I could lie down like a tired child, and weep away the life of care.

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि Simile को पहचानने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. Simile कभी भी एक ही जाति या समुदाय के दो व्यक्ति या वस्तुओं में नहीं होती, अपितु वे दोनों वस्तुएँ भिन्न-भिन्न जाति या समुदाय की होनी चाहिए। जैसे उदाहरण 1 में I की उपमा cloud से दी गई है। यदि I की उपमा किसी व्यक्ति से दी जाती, तब वह Simile नहीं होती।
2. उन दोनों वस्तुओं में समान गुण की तुलना की जानी चाहिए।
3. समानता बताने के लिए so, as, like, so…. as या as … as शब्दों का प्रयोग होना चाहिए।
Note : ध्यान रखें एक ही जाति या समुदाय के दो व्यक्तियों या वस्तुओं की तुलना Simile नहीं होती।

2. METAPHOR( रूपक)

इसमें भी दो भिन्न-भिन्न समुदायों के प्राणी अथवा वस्तुओं में किसी समान गुण की तुलना तो की जाती है, किन्तु तुलना करने के लिए like, so, as …..as यो so…. as शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता है।
Definition : A Metaphor is an implied Simile.
 or 
In a Metaphor, two things are compared but the words of comparison are not used.
Childhood is like a swiftly passing dream. (Simile)
Childhood is a swiftly passing dream (Metaphor)

उपर्युक्त उदाहरणों में स्पष्ट होता है कि Metaphor मेंso, as, like आदि शब्दों का प्रयोग करके उसे Simile में बदला जा सकता है।

Note : Metaphor का प्रयोग Noun, Adjective या Verb में से किसी भी रूप में हो सकता है।

1. Noun के रूप में-
1. The camel is the ship of the desert.
2. The fire of passion made him blind.
3. A ray of hope is very valuable in the clouds of despair.
4. My son is the star of our family.
5. Lala Lajpat Rai was the lion of the Punjab.

2. Adjective के रूप में-
1. It is a golden opportunity for you.
2. My principal has iron courage.
3. It is a lame excuse.
4. A terrorist has a stony heart.
5. In winter the people don’t like piercing wind.

3. Verb के रूप में-
1. The waves thundered on the shore.
2. You are fond of blowing your own trumpet.

Note: ध्यान रखें यदि उपमा (Simile) वाले वाक्यों में से so, as, like जैसे शब्दों को हटा दें तब वह वाक्य रूपक (Metaphor) में बदला जा सकता है तथा so, as, like आदि शब्दों का प्रयोग करके उसे उपमा (Simile) में बदलता जा सकता है; जैसे-

1. Life is like a dream. (Simile)
Life is a dream. (Metaphor)
2. Rana Pratap was a lion in the fight. (Metaphor)
Rana Pratap fought like a lion. (Simile)

3. PERSONIFICATION (मानवीकरण)

जब किसी अदृश्य वस्तु या विचार को व्यक्ति के समान सजीव मान लेते हैं, तब वह मानवीकरण होता है; जैसे-
Opportunity knocks at the door but once.
‘अवसर केवल एक ही बार दरवाजा खटखटाता है। इस वाक्य में अवसर अदृश्य वस्तु है और वह खटखटाने का कार्य कर रहा है जो एक जीवित प्राणी का कार्य है, अतः यह मानवीकरण अलंकार हुआ।
Definition : In Personification lifeless objects and abstract ideas are thought of as living beings.

Examples:
1. Let not Ambition mock their useful toil.
2. Experience is the best teacher.
3. Authority forgets a dying king.
4. Death lays his icy hands on kings.
5. Anxiety is sitting on her face.

4. APOSTROPHE ( सम्बोधन)

इसमें किसी निर्जीव, अदृश्य वस्तु या विचार को या किसी मृत प्राणी को जीवित, दृश्य या उपस्थित मानकर सम्बोधन किया जाता है तथा उस वस्तु या व्यक्ति के पश्चात् कौमा (,) या सम्बोधन का चिह्न (!) भी अवश्य होता है या उससे पूर्व को लगा होता है; जैसे-

1.  O Death! Where is thy sting ?
2. O Liberty! What crimes have been committed in thy name ?
3. Milton! Thou should’st be living at this hour.

उपर्युक्त वाक्य 1 में मृत्यु को तथा वाक्य 2 में स्वतन्त्रता को सम्बोधन किया गया है जो दोनों वस्तुएँ निर्जीव . एवं अदृश्य हैं तथा वाक्य 3 में Milton को सम्बोधन किया गया है जो मृत प्राणी है। अत: इन वाक्यों में Apostrophe अलंकार का प्रयोग है।
Definition : In Apostrophe, we address a dead person or some lifeless thing or an abstract idea as a living person.

Examples:
1. Frailty! Thy name is woman.
2. Roll on, thou deep and dark blue ocean ………… Roll !
3. O Luxury! Thou ………… by heaven’s decree. (Goldsmith)
4. O Grave! Where is thy victory.
5. O Wild West Wind, thou breath of Autumn’s being. (Shelley)

Note: Personification और Apostrophe में केवल इतना भेद है कि Personification में निर्जीव वस्तुओं तथा विचारों को जीवित मान लिया जाता है और वे जीवित के से कार्य भी करते हैं, जबकि Apostrophe में मृत व्यक्ति, वस्तुओं या विचारों को जीवित के समान सम्बोधन करते हैं।

5. HYPERBOILE ( अतिशयोक्ति )

इस अलंकार में किसी व्यक्ति या वस्तु के गुणों को आवश्यकता से अधिक बढ़ाकर या घटाकर वर्णन किया जाता है; जैसे-
Belinda smiled and all the world was gay.
अर्थात् जब Belinda मुस्कराई तब पूरा संसार प्रसन्न हो गया। इससे स्पष्ट है कि Belinda के मुस्कराने से काफी लोग प्रसन्न हुए होंगे, किन्तु इस बात को इतना बढ़ा दिया गया कि पूरा संसारं प्रसन्न हो गया।
Definition : In Hyperbole, a statement is made emphatic by overstatement.

Examples:
1. She wept oceans of tears.
2. Rivers of blood flowed in the battle.
3. They build a nation’s pillars deep and lift them to the sky.
4. Ten thousand saw l at a glance.
5. They were swifter than eagles and stronger than lions.

Note: प्रायः जब कोई व्यक्ति कवि या नाटककार, साहित्यकार अपने कथन में किसी व्यक्ति या वस्तुओं को इतना अधिक बढ़ा-चढ़ाकर या घटाकर कहे जो सम्भव न हो तब उसे Hyperbole figure of speech कहते हैं।

6. OxYMORON ( विरोधाभास)

इसमें एक ही व्यक्ति या वस्तु में दो विरोधी गुण एक साथ दिए जाते हैं; जैसे-
James I was the wisest fool.
जेम्स प्रथम सबसे बुद्धिमान मूर्ख था अर्थात् जेम्स प्रथम में बुद्धिमानी तथा मूर्खता दोनों परस्पर विरोधी गुण बताए गए हैं।
Definition : In Oxymoron, we find the association of two words or phrases having opposite meanings.

Examples:
1. He is regularly irregular in the class.
2. She is feeling sweet pain.
3. The more haste, the less speed.
4. This is an open secret.
5. Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts.

Note: इस अलंकार में प्राय: एक ही वस्तु या व्यक्ति में दो परस्पर विरोधी गुण दर्शाए जाते हैं और उन्हें अधिकतर जोड़े में प्रयोग करते हैं; जैसे-regularly irregular, bitter sweet, pleasing pain आदि।

7. ONOMATOPOEIA( ध्वनि अलंकार)

इसमें शब्द की ध्वनि से ही अर्थ स्पष्ट हो जाता है। प्रायः जानवरों, पक्षियों या कुछ प्राकृतिक वस्तुओं की ध्वनि के लिए अलग शब्दों का प्रयोग होता है जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह ध्वनि किसकी है; जैसे-
1. I hear the humming of bees. (भिनभिनाहट)
2. The snakes hiss. (फुंकार मरना )
Definition : An Onomatopoeia consists in using a word similar to the sound.

Examples:
1. Urgent drum beat of destiny calls.
2. Get thee on boughs and clap thy wings.
3. I chatter, chatter as I flow. (Tennyson)
4. I heard the water lapping on the crag.
5. Cooing of doves is very pleasant.
6. A murmuring whisper through the nunnery ran.

Note: इस अलंकार को पहचानने के लिए Animals तथा Birds की आवाजों (Cries) का ज्ञान सहायक होगा क्योंकि उससे Animal या Bird की जानकारी हो जाती है; जैसे-
1. Cattle low.
2. Elephant trumpets.
3. A peacock screams.
4. A horse neighs.
5. A sheep bleats.

EXERCISE 1

Pick out the Figures of Speech in the following sentences:

1. I could lie down like a tired child,
And weep away the life of care.
2. The war of Love against folly and wrong.
3. He sneezed and cloud would break.
4. The news is dagger to my heart.
5. That in black ink my love may still shine bright.
6. O Wild West Wind, thou breath of Autumn’s being.
7. Whose conscience is his strong retreat.
8. O Grave! Where is thy victory.
9. Life is but a walking shadow.
10. Great lord of all things yet a prey to all.
11. She wept oceans of tears.
12. Hope is the poor man’s bread.
13. This is an open secret.
14. He is the moon of the family.
15. Errors like straws upon the surface flow.
16. Ethereal minstrel! pilgrim of the sky!
17. Life is like a dream.
18. The curfew tolls the knell of parting day.
The lowing herd winds slowly over the lea.
19. As shines the moon in clouded skies,
She in her poor attire was seen.
20. Rivers of blood flowed in the battle field.
21. A murmuring whisper through the nunnery ran.
22. Revenge is a kind of wild justice.
23. But such a Tide as moving seems asleep.
24. The quality of mercy is not stained,
It droppeth as the gentle rain from heaven.
25. O Captain! My Captain! Our fearful trip is done.

Answers :
1. Simile,
2. Personification,
3. Hyperbole,
4. Metaphor,
5. Oxymoron,
6. Apostrophe,
7. Metaphor,
8. Apostrophe,
9. Metaphor,
10. Oxymoron,
11. Hyperbole,
12. Metaphor,
13. Oxymoron,
14. Metaphor,
15. Simile,
16. Apostrophe,
17. Simile,
18. Onomatopoeia,
19. Simile,
20. Hyperbole,
21. Onomatopoeia,
22. Metaphor,
23. Oxymoron,
24. Simile,
25. Apostrophe.

EXERCISE 2

Point out the Figures of Speech in the following sentences:

1. A load of learning lumbering in his head.
2. A pleasing pain is love.
3. A fleet of planes whirred above our heads.
4. Cowardly brave ! Yes, that describes him, because he fights only when he cannot
run away.
5. Cowards die many times before their death.
6. For death had illuminated the land of sleep,
And his lifeless body lay.
7. Frailty ! Thy name is woman.
8. Grunt, grunt, goes the hog.
9. He is a man of iron will.
10. He saw within the moonlight in his room,
An angel-like a lily in bloom.
11. Hitler’s mad policy let loose the dogs of war.
12. He sneezed and cloud would break.
13. His words pierced like an arrow.
14. He got a golden opportunity to pass the examination.
15. In the sunset of his days, Sir Winston Churchill was a pathetic figure. Or He is now in the sunset of his days.
16. I see a lily on thy brows.
17. I heard the rippling of water.
18. I heard buzzing of bees.
19. I am the daughter of earth and water.
20. King James I was known as the wisest fool in Christendom.

Answers :
1. Hyperbole,
2. Oxymoron,
3. Onomatopoeia,
4. Apostrophe,
5. Hyperbole
6. personification,
7. Apostrophe,
8. Onomatopoeia,
9. Metaphor,
10. Simile,
11. Personification,
12. Hyperbole,
13. Simile,
14. Metaphor,
15. Metaphor,
16. Metaphor,
17. Onomatopoeia,
18. Onomatopoeia,
19. Metaphor,
20. Oxymoron.

EXERCISE 3

Point out the Figures of Speech in the following sentences:

1. O.Solitude ! Where are thy charms.
2. Revenge is a kind of wild justice.
3. Rome, thou hast seen much better days.
4. The sea (waves) rose mountains high.
5. Truth sits upon the lips of a dying man.
6. The man in the cave had the strength of a thousand elephants.
7. That cowardly fellow had the heart of chickens.
8. Errors like straw upon the surface flow.
9. There is dagger in thy words.
10. The chair collapsed under the weight of mountainous philosopher.
11. The Himalayas wear frowning look which threatens a storm.
12. The sky shrunk upward with unusual dread.
And trembling Jamuna dived beneath its bed.
13. There rolls the sea where grew the tree.
O Earth, what changes hast thou seen.
14. That in black ink my love may still shine bright.
15. The murmuring of innumerable bees.
16. The glorious lamp of heaven, the sun.
17. The whispering waves were half asleep.
The clouds were gone to play.
18. The river glideth at its own sweet will.
19. Thus idly busy rolls their world away.
20. The moon veiled her face.

Answers :
1. Apostrophe,
2. Oxymoron,
3. Apostrophe,
4. Hyperbole,
5. Personification,
6. Hyperbole,
7. Metaphor,
8. Simile,
9. Metaphor,
10. Hyperbole,
11. Personification,
12. Hyperbole,
13. Apostrophe,
14. Oxymoron,
15. Onomatopoeia,
16. Metaphor,
17. Personification,
18. Personification,
19. Oxymoron,
20. Personification.

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व)

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पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
(क) B से TT तक तथा (ख) C से Ph तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता के क्रम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
(क) B से TI तक (बोरॉन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from B to TI (Boron family)] बोरॉन परिवार (वर्ग 13) के तत्वों का विन्यास ns’p’ होता है। इसका तात्पर्य यह है कि बन्ध निर्माण के लिए तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन उपलब्ध हैं। इन इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके ये परमाणु अपने यौगिकों में +3
ऑक्सीकरण अंवस्था प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि इन तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्था में निम्नलिखित प्रवृत्ति प्रेक्षित होती है-

  1. प्रथम दो तत्व बोरॉन तथा ऐलुमिनियम यौगिकों में केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, परन्तु शेष तत्व-गैलियम, इण्डियम तथा थैलियम +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ-साथ +1 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करते हैं अर्थात् ये परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।
  2. +3 ऑक्सीकरण अवस्था को स्थायित्व ऐलुमिनियम से आगे जाने पर घटता है तथा अन्तिम तत्व थैलियम की स्थिति में, +1 ऑक्सीकरण अवस्था, +3 ऑक्सीकरण अवस्था से अधिक स्थायी होती है। इसका अर्थ यह है कि TICI, TIC1 से अधिक स्थायी होता है।

(ख) c से Pb तक (कार्बन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from C to Pb (Carbon family)] कार्बन परिवार (समूह 14) के तत्वों का विन्यास nsp होता है। स्पष्ट है कि इन तत्वों के परमाणुओं के बाह्यतम कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन तत्वों द्वारा सामान्यत: +4 तथा +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाई जाती है। कार्बन ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करता है। चूंकि प्रथम चार आयनन एन्थैल्पी का योग अति उच्च होता है; अतः +4 ऑक्सीकरण अवस्था में अधिकतर यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते हैं। इस समूह के गुरुतर तत्वों में Ge< Sn

  1. SnCl4 तथा PbCl4 की तुलना में SnCl2 तथा PbCl2 अधिक सरलता से बनते हैं।
  2. PbCl2, SnCl2 से अधिक स्थायी होता है चूंकि इसमें अक्रिय युग्म प्रभाव की परिमाण अधिक होता है।

चतु:संयोजी अवस्था में अणु के केन्द्रीय परमाणु पर आठ इलेक्ट्रॉन होते हैं। इलेक्ट्रॉन परिपूर्ण अणु होने के कारण सामान्यतया इलेक्ट्रॉनग्राही या इलेक्ट्रॉनदाता स्पीशीज की अपेक्षा इनसे नहीं की जाती है। यद्यपि कार्बन अपनी सहसंयोजकता +4 का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, परन्तु समूह के अन्य तत्व ऐसा करते हैं। यह उन तत्वों में 4-कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है। यही कारण है कि ऐसे तत्वों के हैलाइड जल-अपघटन के उपरान्त दाता स्पीशीज (donor species) से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके संकुल बनाते हैं। उदाहरणार्थ-कुछ स्पीशीज; जैसे—(SiF6)2-, (GeCl6)2- तथा Sn(OH)22-– ऐसी होती हैं, जिनके केन्द्रीय परमाणु sp3d2 संकरित होते हैं।

प्रश्न 2.
TiCl3 की तुलना में BCl3 के उच्च स्थायित्व को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर
उत्तेजित अवस्था में बोरॉन की संयोजक कोश (valence shell) में तीन इलेक्ट्रॉन होते हैं जो तीन Cl परमाणु से सहसंयोजक आबन्ध द्वारा जुड़कर BCl3 अणु का निर्माण करते हैं। BCl3 में बोरोन +3 ऑक्सीकरण अवस्था और sp संकरित अवस्था में पाया जाता है। pπ-pπ back bonding BCl3 अणु को आंशिक रूप से स्थायी बनाती है। दूसरी ओर अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण Tl के 6sइलेक्ट्रॉन युग्म बन्ध बनाने में रूचि नहीं रखते। इस कारण Tl की +1 ऑक्सीकरण अवस्था +3 ऑक्सीकरण अवस्था से अधिक स्थाई है। इसलिए +3 ऑक्सीकरण अवस्था में निर्मित TlC3, अधिक स्थाई नहीं होता। इस कारण BCl3 TlCl3 से अधिक स्थाई होता है।

प्रश्न 3.
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड लूइस अम्ल के समान व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है?
उत्तर
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड BF3 अणु में F परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों से साझा करके केन्द्रीय बोरॉन परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की संख्या 6 (तीन युग्म) होती है। अत: यह एक इलेक्ट्रॉन-न्यून अणु है तथा यह स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके लूइस अम्ल के समान व्यवहार प्रदर्शित करता है।
उदाहरणार्थ-बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड सरलतापूर्वक अमोनिया से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके BF3.NH3 उपसहसंयोजक यौगिक बनाता है।

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प्रश्न 4.
BCl3 तथा CCl4, यौगिकों का उदाहरण देते हुए जल के प्रति इनके व्यवहार के औचित्य को समझाइए।
उत्तर
BCl3 के केन्द्रीय परमाणु B के संयोजक कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसलिए यह इलेक्ट्रॉन न्यून अणु है और H2O द्वारा दिये गये इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण कर लेता है। अतः जब BCl3 को जल में घोला जाता है तो यह जल-अपघटित (hydrolysis) होकर बोरिक अम्ल और HCI देता है।

BCl3 + 3H2O → H3BO3 + 3HCl

CCl4 में C का अष्टक पूर्ण होता है और यह इलेक्ट्रॉन युग्म त्यागने अथवा ग्रहण करने की प्रवृत्ति नहीं रखता है। अतः यह जल से कोई क्रिया नहीं करता है।

प्रश्न 5.
क्या बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल है? समझाइए।
उत्तर
नहीं, बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल नहीं है, क्योंकि यह जल में आयनित होकर H+ तथा OH नहीं देता है। B के छोटे आकार और उसके संयोजक कोश में 6 इलेक्ट्रॉन उपस्थित होने के कारण H3BO3 एक लूइस अम्ल (Lewis acid) की तरह व्यवहार करता है। जब यह जल में मिलाया जाता है। तो यह H2O के O परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त करके [B(OH)24] का निर्माण करता है।

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इस अभिक्रिया में एक H+ के उद्गम के कारण यह एक दुर्बल मोनोबेसिक अम्ल की भाँति व्यवहार करता है।

प्रश्न 6.
क्या होता है, जब बोरिक अम्ल को गर्म किया जाता है?
उत्तर
370 K से अधिक ताप पर गर्म किए जाने पर बोरिक अम्ल (ऑर्थोबोरिक अम्ल) मेटाबोरिक अम्ल (HBO2) बनाता है, जो और अधिक गर्म करने पर बोरिक ऑक्साइड (B2O3) में परिवर्तित हो जाता है।

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प्रश्न 7.
BF3 तथा BH4 की आकृति की व्याख्या कीजिए। इन स्पीशीज में बोरॉन के संकरण को निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड (Boron trifluoride, BFs)—इसमें केन्द्रीय परमाणु बोरॉन है। जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2, 2s2 2p1 है। तलस्थ अवस्था में इसमें केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है जिसके आधार पर केवल एक सहसंयोजक बन्ध ही बन सकता है। अतः BF3 अणु बनने में यह अवश्य ही उत्तेजित अवस्था में होगा जिस स्थिति में एक s-इलेक्ट्रॉन p-कक्षक में उन्नत हो
जाएगा-
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उत्तेजित बोरॉन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं जिससे यह तीन सहसंयोजक बन्ध बना सकता है। तीन फ्लुओरीन BF3 में युग्मन के लिए तीन इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं।

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इसमें एक बन्ध -इलेक्ट्रॉन के माध्यम से है तथा अन्य दो बन्ध दो p-इलेक्ट्रॉनों के माध्यम से हैं। अतः तीनों बन्ध समान नहीं होने चाहिए। s तथा px व py कक्षकों की ऊर्जा का संचय होकर तीनों कक्षकों में बराबर राशि में वितरित हो जाता है। इस प्रकार तीन sp- संकर कक्षकों का उद्भव होता है। इन कक्षकों के बीच 120° का, कोण होता है जिससे इलेक्ट्रॉन युग्मों में पारस्परिक प्रतिकर्षण न्यूनतम रहता है।

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ये sp2– संकर कक्षक F परमाणुओं के कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके बन्ध बनाते हैं। इस प्रकार BF3 में बन्ध कोण 120° होता है तथा अणु त्रिकोणीय व समतल होता है।

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बोरॉन टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन (BH4)-वर्ग 13 के तत्व MH; प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। ये हाइड्राइड दुर्बल लूइस अम्ल होते हैं तथा प्रबल लूइस क्षारकों (:B) के साथ MH3 : B प्रकार के योग उत्पाद बनाते हैं (M = B, Al, Ga)। इन हाइड्राइडों का निर्माण इनके बाह्यतम कोश में उपस्थित रिक्त । p-कक्षकों के कारण होता है जो हाइड्राइड आयन (H) से तुरन्त इलेक्ट्रॉन युग्म लेकर टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन बनाते हैं। BH4 की संरचना संकरण के प्रकार के आधार पर निर्धारित की जा सकती है। संकरण का प्रकार निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है

H = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex][V + M – C + A]

जहाँ H= संकरण में सम्मिलित कक्षकों की संख्या, V= केन्द्रीय परमाणु के संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या, M= एकल संयोजी परमाणुओं की संख्याए,C= धनायन पर आवेश, A = ऋणायन पर आवेश इस प्रकार

H = [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex][3+4-0+1]=4

चूँकि संकरण में भाग लेने वाले कक्षकों की संख्या 4 है; अत: यह sp3 संकरण है। sp3 संकरण में एक -कक्षक तथा तीन p-कक्षकों के सम्मिश्रण से चार समतुल्य संकर कक्षक बनते हैं। इन चारों कक्षकों में अल्पतम प्रतिकर्षण होने के लिए वे एक समचतुष्फलक के चारों कोनों की ओर दिष्ट होते हैं। तथा परस्पर 109°28′ का कोण बनाते हैं। अत: BH4 की आकृति निम्नवत् होगी-

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प्रश्न 8.
ऐलुमिनियम के उभयधर्मी व्यवहार दर्शाने वाली अभिक्रियाएँ दीजिए।
उत्तर
ऐलुमिनियम अम्लों तथा क्षारों दोनों से क्रिया कर उभयधर्मी व्यवहार दर्शाता है।
उदाहरणार्थ-

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प्रश्न 9.
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्या होते हैं? क्या BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक हैं? समझाइए।
उत्तर
जिन स्पीशीज में केन्द्रीय परमाणु का अष्टक पूर्ण नहीं होता (अर्थात् संयोजक कोश में आठ इलेक्ट्रॉन नहीं होते), वे इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक कहलाते हैं।
BCl3 के केन्द्रीय परमाणु में मात्र 6 इलेक्ट्रॉन हैं। इसलिए यह इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है। SiCl4 में । केन्द्रीय परमाणु Si (silicon) के पास 8 इलेक्ट्रॉन हैं। इसलिए उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार यह इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक नहीं है।

प्रश्न 10.
CO2-3 तथा HCO3 की अनुनादी संरचनाएँ लिखिए।
उत्तर
CO3 आयन की अनुनाद संरचनाएँ-

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HCO3 की अनुनाद संरचनाएँ-

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प्रश्न 11.
(क) CO2-3,
(ख) हीरा तथा
(ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था क्या होती है?
उत्तर
(क) sp2
(ख) sp3
(ग) sp2

प्रश्न 12.
संरचना के आधार पर हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में निहित भिन्नता को समझाइए।
उत्तर
हीरा तथा ग्रेफाइट में संरचनात्मक भिन्नता (Structural differences between Diamond and Graphite)
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प्रश्न 13.
निम्नलिखित कथनों को युक्तिसंगत कीजिए तथा रासायनिक समीकरण दीजिए
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके PbCl4 देता है।
(ख) लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी है।
(ग) लेड एक आयोडाइड PbI4 नहीं बनाता है।
उत्तर
(क) लेड (II) क्लोराइड, PbCl2 क्लोरीन से क्रिया करके PbCl4 नहीं बनाती है। इसका कारण यह है कि अक्रिय युग्म प्रभाव (inert pair effect) के कारण Pb की +2 ऑक्सीकरण अवस्था +4 ऑक्सीकरण अवस्था से अधिक स्थायी होती है। दूसरे शब्दों में, PbCl2, PbCl4 से अधिक स्थायी है।
(ख) अक्रिय युग्म प्रभाव (inert pair effect) के कारण, Pb की +4 ऑक्सीकरण अवस्था +2 ऑक्सीकरण अवस्था से कम स्थायी है। इस कारण लेड (IV) क्लोराइड गर्म करने पर विघटित होकर अधिक स्थायी लेड (II) क्लोराइड बनाता है।

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(ग) PbI4 का अस्तित्व ज्ञात नहीं है। इसका कारण Ph4+ की ऑक्सीकरण प्रकृति और I की अपचायक प्रकृति का संयुक्त प्रभाव है।

प्रश्न 14.
BF3 में तथा BF4 में बन्ध लम्बाई क्रमशः 130 pm तथा 143 pm होने के कारण बताइए।
उत्तर
BF3 अणु-में pm-pr back bonding के कारण B—F आबन्ध की लम्बाई को कम कर देते। हैं। BF4 में B—F बन्ध शुद्ध एकल आबन्ध होता है और इसकी आबन्ध लम्बाई अधिक होती है। इसी कारण BF3 में B—F आबन्ध लम्बाई BF4 से कम होती है।

प्रश्न 15.
B—Cl आबन्ध द्विध्रुव आघूर्ण रखता है, किन्तु BCl3 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। क्यों?
उत्तर
बोरॉन की विद्युत ऋणात्मकता 2, जबकि Cl की 3 होती है। विद्युत ऋणात्मक में अन्तर के कारण, B—Cl बन्ध पोलर हो जाता है और निश्चित द्विध्रुव आघूर्ण रखता है। BCl3 अणु में B परमाणु के sp2 संकरित होने के कारण यह एक त्रिकोणीय समतलीय अणु है। BCl3 में तीन B—Cl बन्ध 120° पर एक ही तल में होते हैं। इसलिए दो B—Cl बन्धों के द्विध्रुव आघूर्ण का परिमाण तीसरे B—Cl बन्ध के द्विध्रुव आघूर्ण के परिमाण के बराबर तथा विपरीत दिशा में होता है। परिणामस्वरूप BCl3 का शुद्ध द्विध्रुव आघूर्ण शून्य हो जाता है जैसा निम्नांकित से स्पष्ट है-

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प्रश्न 16.
निर्जलीय HF में ऐलुमिनियम ट्राइफ्लुओराइड अविलेय है, परन्तु NaF मिलाने पर घुल जाता है। गैसीय BF3 को प्रवाहित करने पर परिणामी विलयन में से ऐलुमिनियम ट्राइफ्लुओराइडे अवक्षेपित हो जाता है। इसका कारण बताइए।
उत्तर
AlF3 निर्जलीय HF में नहीं घुलता क्योंकि HF एक सहसंयोजक और प्रबल रूप से हाइड्रोजन आबन्ध युक्त यौगिक है। NaF एक आयनिक यौगिक और F आयन देता है जो AlF3 से संयुक्त होकर जल में विलेय जटिल यौगिर्क Na3AlF6 का निर्माण करता है। इसलिए AlF3 , NaF की उपस्थिति में घुल जाता है।

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जब परिणामी विलयन में BF3 गैस प्रवाहित की जाती है तो B (बोरॉन) अपने छोटे आकार और उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण Na3[AlF6] में प्रवेश कर जाता है और Al को निष्कासित कर देता है। इसलिए AlF3 अवक्षेपित हो जाता है।

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प्रश्न 17.
CO के विषैली होने का एक कारण बताइए।
उत्तर
रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन शरीर के ऊतकों को O2, पहुँचाने का कार्य करता है। CO का रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के साथ जुड़कर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन (carboxyhaemoglobin) बनाती है जो ऑक्सीहीमोग्लोबिन (oxyheamoglobin) से 300 गुना अधिक स्थिर है। यह शरीर के विभिन्न अंगों में हीमोग्लोबिन की O2 वाहक क्षमता को समाप्त कर देता है। फलस्वरूप ऑक्सीजन की कमी के कारण व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।

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प्रश्न 18.
COI2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय तापवृद्धि के लिए उत्तरदायी कैसे है?
उत्तर
CO2 चक्र के कारण प्राकृतिक रूप से वातावरण में CO2 की सान्द्रता स्थिर रहती है लेकिन, जब वातावरण में CO2 की सान्द्रता मानवीय क्रियाओं के कारण एक निश्चित स्तर से अधिक हो जाती है, तो वायुमण्डल में उपस्थित CO2 का आधिक्य पृथ्वी द्वारा विकरणित ऊष्मा को अवशोषित कर लेता है। अवशोषित ऊष्मा का कुछ भाग वायुमण्डल में निस्तारित हो जाता है और शेष भाग पृथ्वी पर वापस विकरणित हो जाता है जिससे पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ जाता है और भूमण्डलीय ताप में वृद्धि होती है। इस प्रभाव को ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है।

प्रश्न 19.
डाइबोरेन तथा बोरिक अम्ल की संरचना समझाइए।
उत्तर
(क) डाइबोरेन की संरचना (Structure of Diborane)
डाइबोरेन की संरचना को चित्र-4 (क) द्वारा दर्शाया गया है। इसमें सिरे वाले चार हाइड्रोजन परमाणु तथा दो बोरॉन परमाणु एक ही तल में होते हैं। इस तल के ऊपर तथा नीचे दो सेतुबन्ध (bridging) हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। सिरे वाले चार B—H बन्ध सामान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (two centre-two electron) बन्ध भिन्न प्रकार के होते हैं जिन्हें ‘त्रिकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन बन्ध’ कहते हैं। चित्र-4 (ख)।

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(ख) बोरिक अम्ल की संरचना (Structure of Boric acid)
ठोस अवस्था में, बोरिक अम्ल की पर्तीय संरचना होती है, जहाँ समतलीय B05 की इकाइयाँ हाइड्रोजन बन्ध द्वारा एक-दूसरे से 318 pm की दूरी पर जुड़ी रहती हैं (चित्र-5)।

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प्रश्न 20.
क्या होता है, जब?
(क) बोरेक्स को अधिक गर्म किया जाता है।
(ख) बोरिक अम्ल को जल में मिलाया जाता है।
(ग) ऐलुमिनियम की तनु NaOH से अभिक्रिया कराई जाती है।
(घ) BF3 की क्रिया अमोनिया से की जाती है।
उत्तर
(क) जब बोरेक्स के चूर्ण को बुन्सन बर्नर की ज्वाला में अधिक गर्म किया जाता है, सर्वप्रथम यह जल के अणु का निष्कासन कर्के फूल जाता है। पुनः गर्म करने पर यह एक पारदर्शी द्रव में परिवर्तित हो जाता है, जो काँच के समान एक ठोस में परिवर्तित हो जाता है। इसे बोरेक्स मनका कहते हैं|

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(ख) यह जल में घुल जाता है; क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक है।

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(ग) ऐलुमिनियम NaOH विलयन में घुलकर एक विलेय संकुल बनाता है तथा हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।

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(घ) BF (व्यवहार में लूइस अम्ल) NH3 (व्यवहार में लूइस-क्षारक) के साथ योगात्मक यौगिक बनाता है।

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प्रश्न 21.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को समझाइए-
(क) कॉपर की उपस्थिति में उच्च ताप पर सिलिकन को मेथिल क्लोराइड के साथ गर्म किया जाता है।
(ख) सिलिकन डाइऑक्साइड की क्रिया हाइड्रोजन फ्लुओराइड के साथ की जाती है।
(ग) C0 को Zn0 के साथ गर्म किया जाता है।
(घ) जलीय ऐलुमिना की क्रिया जलीय NaOH के साथ की जाती है।
उत्तर
(क) जब सिलिकन को मेथिल क्लोराइड के साथ उच्च ताप पर Cu की उपस्थिति में गर्म किया जाता है, तो मोनो, डाइ तथा ट्राइमिथाइलक्लोरोसाइलेन और थोड़ी मात्रा में टेट्रामिथाइलक्लोरोसाइलेन युक्त एक मिश्रण प्राप्त होता है।

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(ख) जब SiO2 की क्रिया HF से की जाती है तो सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड बनता है, जो HF में घुलकर हाइड्रोफ्लोरो सिलिसिक अम्ल (hydrofluorosilicic acid) बनाता है।

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(ग) जब कार्बन मोनोऑक्साइड को जिंक ऑक्साइड के साथ गर्म किया जाता है, तो ZnO अपचयित होकर जिंक धातु बनाता है।

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(घ) जब जलयोजित ऐलुमिना (hydrated alumina) को NaOH के जलीय विलयन के साथ गर्म किया जाता है तो सोडियम टेट्राहाइड्रॉक्सी ऐलुमिनेट (III) बनता है।

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प्रश्न 22.
कारण बताइए
(क) सान्द्र HNO3 का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है।
(ख) तनु NaOH तथा ऐलुमिनियम के टुकड़ों के मिश्रण का प्रयोग प्रवाहिका खोलने के लिए किया जाता है।
(ग) ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
(घ) हीरा का प्रयोग अपघर्षक के रूप में होता है।
(ङ) वायुयान बनाने में ऐलुमिनियम मिश्रधातु का उपयोग होता है।
(च) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए।
(छ) संचरण केबल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।
उत्त
(क) सान्द्र HNO3 ऐलुमिनियम (AI) से क्रिया करके इसकी सतह पर ऐलुमिनियम ऑक्साइड की एक पतली परत बनाता है जो Al की सान्द्र HNO3 से पुन: क्रिया को रोकती है। दूसरे शब्दों में, Al सान्द्र HNO3 के प्रभाव से निष्क्रिय हो जाता है।

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अतः सान्द्र HNO3 के परिवहन में Al कन्टेनर का उपयोग किया जाता है।
(ख) Al तनु NaOH से क्रिया करने पर हाइड्रोजन मुक्त करता है। इस प्रकार उच्च दाब पर विमुक्त H, का उपयोग बन्द नालियों (closed drains) को खोलने में किया जा सकता है।

2Al(s) + 2NaOH(aq) + 6H2O(l) → 2Na+[Al(OH)4] (aq) + 3H2(g)

(ग) ग्रेफाइट (graphite) की संरचना एक परतीय संरचना होती है जिसमें षटकोणीय वलय (hexagonal ring) की विशाल परतें एक-दूसरे से दुर्बल वाण्डर वाल्स बलों (weak van der Waals’ forces) द्वारा सम्बन्धित होती हैं। ये परतें एक-दूसरे से स्थायी रूप से नहीं जुड़ी होती हैं और एक-दूसरे पर फिसलती रहती हैं। यही कारण है कि ग्रेफाइट मुलायम होता है और एक शुष्क स्नेहक (dry lubricant) की भाँति प्रयोग किया जाता है।

(घ) हीरे की संरचना एक त्रिविमीय नेटवर्क संरचना है जिसमें sp संकरित कार्बन परमाणु एक-दूसरे से मजबूत सहसंयोजक आबन्धों द्वारा जुड़े रहते हैं। इसका नेटवर्क बहुत कठोर होता है। यही कारण है कि हीरा अत्यधिक कठोर होता है और इसका उपयोग एक अपघर्षक (abrasive) के रूप में किया जाता है।

(ङ) ऐलुमिनियम की मिश्र धातुएँ (alloys) हल्की होती हैं और ये अत्यन्त मजबूत एवं क्षय प्रतिरोधी होती हैं। इसलिए इनका उपयोग हवाई जहाजों को बनाने में किया जाता है।

(च) ऐलुमिनियम जल से तथा घुलित ऑक्सीजन से क्रिया कर अपनी सतह पर ऐलुमिनियम ऑक्साइड की एक पर्त बनाता है।

2Al(s) + O2 (g) + H2O(l) → Al2O3 (3) + H2 (g)

इस परत में स्थित कुछ Al3+ आयन पानी में घुलकर एक विलयन बनाते हैं। Al3+ आयन विषैला होता है और पीने के पानी व खाने के पदार्थों में इसकी उपस्थिति अवांछित है।

(छ) ऐलुमिनियम विद्युत धारा का अच्छा चालक है। भारानुसार यह Cu की तुलना में दो गुनी अधिक विद्युत धारा को संचालित कर सकता है। Al के तार हल्के और सस्ते होते हैं। इसलिए Al का उपयोग संचरण केबिल (transmission cables) बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 23.
कार्बन से सिलिकॉन तक आयनीकरण एन्थैल्पी में प्रघटनीय कमी होती है। क्यों?
उत्तर
कार्बन से सिलिकॉन तक आयनीकरण में प्रघटनीय कमी होती है; क्योंकि कार्बन की परमाणु त्रिज्या (77pm) की तुलना में सिलिकॉन की परमाणु त्रिज्या अधिक (118 pm) होती है। इसलिए इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन सरलतापूर्वक हो जाता है। सिलिकॉन से जर्मेनियम तक आयनन एन्थैल्पी में कमी प्रघटनीय नहीं होती; क्योंकि तत्वों के परमाणु आकार एकसमान रूप से बढ़ते हैं।

प्रश्न 24.
Al की तुलना में Ga की कम परमाण्वीय त्रिज्या को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर
ऐलुमिनियम (Al) की तुलना में Ga की कम परमाण्वीय त्रिज्या को प्रथम संक्रमण श्रेणी (Z=21 से 30) के दस तत्वों की उपस्थिति के आधार पर समझाया जा सकता है। इनमें इलेक्ट्रॉन 3d-कक्षकों में होते हैं। चूँकि 4-कक्षकों का आकार d-कक्षकों की तुलना में अधिक होता है; अत: अन्तरस्थ इलेक्ट्रॉनों के पास नाभिकीय आवेश में वृद्धि के प्रभाव को निरस्त करने के लिए पर्याप्त परिरक्षण प्रभाव नहीं होता। इसलिए Ga की स्थिति में प्रभावी नाभिकीय आवेश का मान कम होता है। इससे अपवादस्वरूप Ga का परमाणु आकार घट जाता है जिसे वास्तव में बढ़ा होना चाहिए था।

प्रश्न 25.
अपररूप क्या होता है? कार्बन के दो महत्त्वपूर्ण अपररूप हीरा तथा ग्रेफाइट की संरचना का चित्र बनाइए। इन दोनों अपरूपोंक्षे,भौतिक गुणों पर संरचना का क्या प्रभाव पड़ता, है?
उत्तर
अपररूप (Allotropes)
प्रकृति में शुद्ध कार्बन दो रूपों में पाया जाता है-हीरा तथा ग्रेफाइट। यदि हीरे अथवा ग्रेफाइट को वायु में अत्यधिक गर्म किया जाए तो यह पूर्ण रूप से जल जाते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं। जब हीरे तथा ग्रेफाइट की समान मात्रा दहन की जाती है, तब कार्बन डाइऑक्साइड की बराबर मात्रा उत्पन्न होती है तथा कोई अवशेष नहीं बचता। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि ह्मस तथा ग्रेफाइट रासायनिक रूप से एकसमान हैं तथा केवल कार्बन परमाणुओं बने हैं। इनके नैतिक गुण अत्यधिक भिन्न होते हैं। अतः इस प्रकार के गुणों को प्रदर्शित करने वाले तत्वों को अपररूप कहते हैं।

हीरा (Diamond)
हीरा में क्रिस्टलीय जालक होता है। इसमें प्रत्येक परमाणु sp3-संकरित होता है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति से अन्य चार कार्बन परमाणुओं से जुड़ा रहता है। इसमें कार्बन-कार्बन बन्ध लम्बाई 154 pm होती है। कार्बन परमाणु दिक (space) में दृढ़ त्रिविमीय जालक (rigid three dimensional network) का निर्माण करते हैं। इस संरचना (चित्र-6) में सम्पूर्ण जालक में दिशात्मक सहसंयोजक बन्ध उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार विस्तृत सहसंयोजक बन्धन को तोड़ना कठिन कार्य होता है। अत: हीरा पृथ्वी पर पाया जाने वाला सर्वाधिक कठोर पदार्थ है। इसका उपयोग धार तेज करने के लिए अपघर्षक (abrasive) के रूप में, रूपदा (dies) बनाने में तथा विद्युत-प्रकाश लैम्प में टंगस्टन तन्तु (filament) बनाने में होता है।

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ग्रेफाइट (Graphite)
ग्रेफाइट की पर्तीय संरचना (layered structure) होती है। ये पर्ते वाण्डर वाल्स बल द्वारा जुड़ी रहती हैं। इस कारण ग्रेफाइट चिकना (slippery) तथा मुलायम (soft) होता है। दो पर्तों के मध्य की दूरी 340 pm होती है। प्रत्येक पर्त में कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय (hexagonal rings) के रूप में व्यवस्थित होते हैं जिसमें CC बन्ध लम्बाई 141-5 pm होती है। षट्कोणीय वलय में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2-संकरित होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु तीन निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं से तीन सिग्मा बन्ध बनाता है (चित्र-7)। इसका चौथा इलेक्ट्रॉन -बन्ध बनाता है। सम्पूर्ण पर्त में इलेक्ट्रॉन विस्थानीकृत। होते हैं। इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं; अतः ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है। उच्च ताप पर जिन मशीनों में तेल का प्रयोग स्नेहक (lubricant) के रूप में नहीं हो सकता है, उनमें ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक का कार्य करता है।

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प्रश्न 26.
(क) निम्नलिखित ऑक्साइड को उदासीन, अम्लीय, क्षारीय तथा उभयधर्मी ऑक्साइड के रूप में वर्गीकृत कीजिए-
C0, B2O3, SiO2, CO2, Al2O3, PbO2, Tl2O3
(ख) इनकी प्रकृति को दर्शाने वाली रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर
(क) उदासीन ऑक्साइड : CO
अम्लीय ऑक्साइड : B2O3, SiO2,CO2
उभयधर्मी ऑक्साइड : Al2O3, PbO2
क्षारीय ऑक्साइड : Tl2O3
(ख)
(i) अम्लीय ऑक्साइडों की क्षारों के साथ अभिक्रिया

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-31

(ii) उभयधर्मी ऑक्साइडों की अम्लों व क्षारों के साथ अभिक्रिया

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-32

(iii) क्षारीय ऑक्साइड की अम्ल के साथ अभिक्रिया

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-33

प्रश्न 27.
कुछ अभिक्रियाओं में थैलियम, ऐलुमिनियम से समानता दर्शाता है, जबकि अन्य में यह समूह-I के धातुओं से समानता दर्शाता है। इस तथ्य को कुछ प्रमाणों के द्वारा सिद्धे करें।
उत्तर
ऐलुमिनियम के समाने, थैलियम Tl2O3, TlCl3, Tl2 (SO4 )3 आदि में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। Al तथा Tl के जटिल यौगिक भी समान प्रकार के होते हैं। जैसे– [AlF6]3- तथा [TlF6]3-
अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण यह समूह 1 ग्रुप की क्षार धातुओं के समान +1 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करता है। +1 ऑक्सीकरण अवस्था में यह Tl2O, TlCl आदि यौगिकों का निर्माण करता है जो Na2O, NaCl आदि यौगिकों के समान है। Tl2O, Na2O के समान प्रबल क्षार हैं। अत: यह समूह 1 की धातुओं से भी समानता प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 28.
जब धातु X की क्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ की जाती है तो श्वेत अवक्षेप (A) प्राप्त होता है, जो NaOH के आधिक्य में विलेय होकर विलेय संकुल (B) बनाता है। यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर यौगिक (C) बनाता है। यौगिक (A) को अधिक गर्म किए जाने पर यौगिक (D) बनता है, जो एक निष्कर्षित धातु के रूप में प्रयुक्त होता है। X, A, B, C तथा D को पहचानिए तथा इनकी पहचान के समर्थन में उपयुक्त समीकरण दीजिए।
उत्तर
दी गई अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं कि धातु X ऐलुमिनियम है। अभिक्रियाओं को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-34

प्रश्न 29.
निम्नलिखित से आप क्या समझते हैं?
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव,
(ख) अपररूप,
(ग) श्रृंखलन।
उत्तर
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव (Inert pair effect)-कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (n-1)d10 ns2np1 वाले तत्व में, 4-कक्षक के इलेक्ट्रॉन दुर्बल परिरक्षण प्रभाव प्रस्तावित करते हैं। इसलिए ns2 इलेक्ट्रॉन नाभिक के धनावेश द्वारा अधिक दृढ़ता से बँधे रहते हैं। इस प्रबल आकर्षण के परिणामस्वरूप, ns इलेक्ट्रॉन युग्मित रहते हैं तथा बन्ध में भाग नहीं लेते हैं अर्थात् अक्रिय रहते हैं। यह प्रभाव अक्रिय युग्म प्रभाव कहलाता है। इस स्थिति में, ns2np1 विन्यास में, तीन इलेक्ट्रॉनों में से केवल एक इलेक्ट्रॉन बन्ध-निर्माण में भाग लेता है।
(ख) अपररूप (Allotropes)-किसी तत्व का समान रासायनिक अवस्था में दो या अधिक भिन्न-रूपों में पाया जाना अपररूपता कहलाता है। तत्व के ये विभिन्न रूप अपररूप कहलाते हैं। किसी तत्व के सभी अपररूपों के समान रासायनिक गुण होते हैं, परन्तु इनके भौतिक गुणों में अन्तर होता है।
(ग) श्रृंखलन (Catenation)-कार्बन में अन्य परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बन्ध द्वारा जुड़कर लम्बी श्रृंखला या वलय बनाने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को श्रृंखलन कहते हैं। C—C बन्ध अधिक प्रबल होने के कारण ऐसा होता है।

प्रश्न 30.
एक लवण x निम्नलिखित परिणाम देता है
(क) इसका जलीय विलयन लिटमस के प्रति क्षारीय होता है।
(ख) तीव्र गर्म किए जाने पर यह काँच के समान ठोस में स्वेदित हो जाता है।
(ग) जब X के गर्म विलयन में सान्द्र H2SO4 मिलाया जाता है तो एक अम्ल Z का श्वेत क्रिस्टल बनता है। उपर्युक्त अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए और X, Y तथा Z को पहचानिए।
उत्तर
(क) चूंकि दिये गये लवण का जलीय विलयन लिटमस के प्रति क्षारीय है तो यह सुनिश्चित है कि यह प्रबल क्षार और दुर्बल अम्ल से मिलकर बना लवण है।
(ख) लवण [X] गर्म करने पर फूल जाता है और काँच जैसे पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए [४] को बोरेक्स (borax) और [Y] को सोडियम मेटाबोरेट और बोरिक ऐनहाइड्राइड का मिश्रण होना चाहिए।
(ग) जब बोरेक्सा [X] के गर्म विलयन में सान्द्र H2SO4 मिलाया जाता है, तो ऑथ्रो बोरिक अम्ल [2] के सफेद क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।
अतः, [X]= Na2B4O7·10H2O, [Y]= NaBO2 + B2O3 और [2]= H3 BO3
अभिक्रियाओं को निम्न प्रकार लिखा जा सकता है-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-35

प्रश्न 31.
सन्तुलित समीकरण दीजिए-
(क) BF3 + LiH →
(ख) B2H6 + H2O→
(ग) NaH + B2H6
(घ) UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-102
(ङ) Al + NaOH →
(च) B2H6 + NH3 →
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-36

प्रश्न 32.
C0 तथा CO2 प्रत्येक के संश्लेषण के लिए एक प्रयोगशाला तथा एक औद्योगिक विधि दीजिए।
उत्तर
(क) कार्बन मोनोक्साइड (Carbon monoxide) प्रयोगशाला विधि (Laboratory method)—सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल का 373 K पर फॉर्मिक अम्ल .. के द्वारा निर्जलीकरण कराने पर अल्प मात्रा में शुद्ध कार्बन मोनोक्साइड प्राप्त होती है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-37

औद्योगिक विधि (Industrial method)-औद्योगिक रूप से इसे कोक पर भाप (steam) प्रवाहित करके बनाया जाता है। इस प्रकार CO तथा H2 का प्राप्त मिश्रण ‘वाटर गैस’ अथवा ‘संश्लेषण गैस’ (synthesis gas) कहलाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-38

जब भाप के स्थान पर वायु का प्रयोग किया जाता है, तब CO तथा N2 का मिश्रण प्राप्त होता है। इसे प्रोड्यूसर गैस कहते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-39

(ख) कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon dioxide) प्रयोगशाला विधि (Laboratory method)—प्रयोगशाला में इसे कैल्सियम कार्बोनेट पर तनु HC1 की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है।

CaCO3(s) + 2HCl(aq) → CaCl2 (aq) +CO2(g) + H2O(1)

औद्योगिक विधि (Industrial method)-औद्योगिक रूप में चूना पत्थर (lime stone) को गर्म करके CO2 बनाई जा सकती है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-40

प्रश्न 33.
बोरेक्स के जलीय विलयन की प्रकृति कौन-सी होती है?
(क) उदासीन
(ख) उभयधर्मी
(ग) क्षारीय
(घ) अम्लीय
उत्तर
(ग) ऐसा इसलिए है क्योंकि बोरेक्स प्रबल क्षार (NaOH) और दुर्बल अम्ल (H3BO3) से बना लवण है। जल में, यह जल अपघटित होकर क्षारीय विलयन बनाता है।

प्रश्न 34.
बोरिक अम्ल के बहुलकीय होने का कारण
(क) इसकी अम्लीय प्रकृति है।
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।
(ग) इसकी ऐकक्षारीय प्रकृति है।
(घ) इसकी ज्यामिति है।
उत्तर
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।।

प्रश्न 35.
डाइबोरेन में बोरॉन का संकरण कौन-सा होता है?
(क) sp
(ख) sp2
(ग) sp3
(घ) dsp2
उत्तर
(ग) sp3

प्रश्न 36.
ऊष्मागतिकीय रूप से कार्बन का सर्वाधिक स्थायी रूप कौन-सा है?
(क) हीरा
(ख) ग्रेफाइट
(ग) फुलरीन्स
(घ) कोयला
उत्तर
(ख) ग्रेफाइट

प्रश्न 37.
निम्नलिखित में से समूह-14 के तत्वों के लिए कौन-सा कथन सत्य है?
(क) +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
(ग) M2- तथा M4+ आयन बनाते हैं।
(घ) M2+ तथा M4- आयन बनाते हैं।
उत्तर
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 38.
यदि सिलिकॉन निर्माण में प्रारम्भिक पदार्थ RSiCl3 है तो बनने वाले उत्पाद की संरचना बताइए।
उत्तर
यदि अभिक्रिया में प्रारम्भिक पदार्थ RSiCl3 है तो अन्तिम उत्पाद एक क्रॉस लिन्कड सिलिकॉन (cross-linked silicone) होगा, जैसा कि निम्न से स्पष्ट है-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-41

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐलुमिनियम का विकर्ण सम्बन्ध है।
(i) Li से
(ii) Be से
(iii) B से
(iv) Si से
उत्तर
(ii) Be से

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में अम्लीय ऑक्साइड है।
(i) B2O3
(ii) Al2O3
(iii) In2O3
(iv) Ga2O3
उत्तर
(i) B2O3

प्रश्न 3.
B2O3 है।
(i) आयनिक
(ii) क्षारीय
(iii) अम्लीय
(iv) उभयधर्मी
उत्तर
(iii) अम्लीय

प्रश्न 4.
बोरॉन की सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ अभिक्रिया कराने पर बनता है।
(i) Na3BO3
(ii) Na3BO2
(iii) Na2B4O7
(iv) NaBO3
उत्तर
(i) Na3 BO3

प्रश्न 5.
BF3 अणु है।
(i) लुईस अम्ल
(ii) लुईस क्षारक
(iii) उदासीन लवण
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i) लुईस अम्ल

प्रश्न 6.
बोरेक्स है।
(i) सोडियम मेटाबोरेट
(ii) सोडियम बोरेट
(iii) सोडियम टेट्राबोरेट
(iv) सोडियम बाइबोरेट
उत्तर
(iii) सोडियम टेट्राबोरेट।

प्रश्न 7.
बोरेक्स (सुहागा) का अणुसूत्र है।
(i) Na2B4O7
(ii) Na2B4O7·4H2O
(iii) Na2B4O7·7H2O
(iv) Na2B4O7·10H2O
उत्तर
(iv) Na2B4O7·10H2O

प्रश्न 8.
धातु लवणों की पहचान के लिए बोरेक्स मनका परीक्षण करते हैं।
(i) श्वेत लवण से
(ii) रंगीन लवण से
(iii) जलयोजित लवण से
(iv) अम्लीय लवण से
उत्तर
(ii) रंगीन लवण से

प्रश्न 9.
बोरेक्स बीड परीक्षण में नीली बीड बनाएगा।
(i) Cr
(ii) Co2+
(iii) Ni2+
(iv) Cd2+
उत्तर
(ii) Co2+

प्रश्न 10.
बोरिक अम्ल के बारे में कौन-सा कथन असत्य है?
(i) यह बोरेक्स के जलीय विलयन को अम्लीकृत करके तैयार किया जाता है।
(ii) इसकी संरचना परतीय होती है जिसमें समतल BO3 इकाई हाइड्रोजन आबन्धों द्वारा जुड़ी होती है।
(iii) यह एक प्रबल त्रि-क्षारकी अम्ल है ।
(iv) यह प्रोटॉन दाता के रूप में कार्य नहीं करता, परन्तु हाइड्रॉक्सिल आयन स्वीकार करके एक लुईस अम्ल की तरह कार्य करता है।
उत्तर
(iv) यह प्रोटॉन दाता के रूप में कार्य नहीं करता, परन्तु हाइड्रॉक्सिल आयन स्वीकार करके एक लुईस अम्ल की तरह कार्य करता है।

प्रश्न 11.
बोरिक अम्ल के सम्बन्ध में कौन-सा कथन गलत है?
(i) यह एक एकक्षारकी (monobasic) अम्ल की भाँति कार्य करता है।
(ii) यह बोरॉन के हैलाइडों के जल-अपघटन से बनता है।
(iii) इसकी संरचना समतलीय है।
(iv) यह एक त्रि-क्षारकी अम्ल की भाँति कार्य करता है।
उत्तर
(iv) यह एक त्रि-क्षारकी अंम्ल की भाँति कार्य करता है।

प्रश्न 12.
बोरेक्स पर किसकी अभिक्रिया के द्वारा बोरिक अम्ल बनाया जाता है?
(i) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
(ii) सोडियम हाइड्रॉक्साइड
(iii) कार्बन डाइऑक्साइड
(iv) सोडियम कार्बोनेट
उत्तर
(iv) सोडियम कार्बोनेट

प्रश्न 13.
ऑर्थोबोरिक अम्ल को गर्म करने पर प्राप्त होता है।
(i) मेटाबोरिक अम्ल
(ii) पाइरोबोरिक अम्ल
(iii) जलयोजित लवण
(iv) अम्लीय लवण
उत्तर
(iv) अम्लीय लवण

प्रश्न 14.
BCl3 की LiAlH4 से अभिक्रिया का मुख्य उत्पाद है।
(i) B2H6
(ii) AlCl3
(iii) LiCl
(iv) तीनों उत्पाद
उत्तर
(i) B2H6

प्रश्न 15.
B2H6 से निम्नलिखित में से किसे नहीं बनाया जा सकता है?
(i) H3BO3
(ii) B2(CH3)4H2
(iii) B2(CH3) 6
(iv) NaBH4
उत्तर
(iii) B2(CH3) 6

प्रश्न 16.
निम्न में से कौन-सा ऑक्साइड उदासीन है?
(i) CO
(ii) SnO2
(iii) ZnO
(iv) SiO2
उत्तर
(i) CO

प्रश्न 17.
ऊष्मागतिकीय रूप के कार्बन का सर्वाधिक स्थायी रूप कौन-सा है?
(i) हीरा
(ii) ग्रेफाइट
(iii) फुलरीन
(iv) कोयला
उत्तर
(ii) ग्रेफाइट

प्रश्न 18.
शुष्क बर्फ है।
(i) फ्रीऑन
(ii) द्रव क्लोरीन
(iii) ठोस कार्बन डाइऑक्साइड
(iv) प्लास्टर ऑफ पेरिस
उत्तर
(ii) ठोस कार्बन डाइऑक्साइड

प्रश्न 19.
निम्न में कौन-सा पदार्थ अर्द्धचालक के रूप में प्रयुक्त होता है?
(i) Au
(ii) Ge
(iii) Pt
(iv) Si
उत्तर
(iv) Si

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निर्जल AICIs नम वायु को धूम क्यों देता है? समझाइए।
उत्तर
निर्जल AICI नम वायु (H2O) से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन क्लोराइड गैस की तेज धूम देता है।

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प्रश्न 2.
ऐलुमिनियम का वैद्युत-अपघटन गलित अवस्था में किया जाता है, जलीय विलयन में नहीं, क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ऐलुमिनियम को वैद्युत-अपघंटन जलीय विलयन में नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्राप्त ऐलुमिनियम उबलते हुए जल से क्रिया कर ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड बनाता है, जो स्वयं विच्छेदित होकर पुनः ऐलुमिना में बदल जाता हैं।

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प्रश्न 3.
क्या होता है जब सोडियम हाइड्रॉक्साइड का विलयन धीरे-धीरे ऐलुमिनियम क्लोराइड विलयन में डाला जाता है?
उत्तर
इसमें पहले ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड का सफेद अवक्षेप प्राप्त होता है जो NaOH के आधिक्य में घुलकर सोडियम मेटाऐलुमिनेट देता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-44

प्रश्न 4.
निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड का फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया में उपयोग दीजिए।
उत्तर
निर्जल AlCl3, ऐल्किल हैलाइड या ऐसिड क्लोराइड को इलेक्ट्रोफाइल पर परिवर्तित करके फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया दर्शाता है। निर्जल AlCl3, का फ्रीडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया में उत्प्रेरक के रूप में उपयोग होता है।

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प्रश्न 5.
ऐलुमिनियम सल्फेट को ऐलुमिनियम क्लोराइड में कैसे परिवर्तित करोगे, समीकरण दीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-46

प्रश्न 6.
क्या होता है जब बोरेक्स को जल में घोला जाता है?
उत्तर
NaOH बनने के कारण क्षारीय विलयन प्राप्त होता है।

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प्रश्न 7.
बोरिक अम्ल के दो प्रमुख उपयोग लिखिए।
उत्तर

  1. पूतिरोधी (antiseptic) के रूप में।
  2. आँखों की औषधि के निर्माण में।

प्रश्न 8.
कृत्रिम गोल्ड (रोल्ड गोल्ड) का संघटन तथा उपयोग लिखिए।
उत्तर
कृत्रिम गोल्ड (ऐलुमिनियम ब्रांज) में 10% Al तथा शेष कॉपर होता है। यह बर्तन, मुद्राएँ, कृत्रिम आभूषण, पेन्ट आदि बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 9.
हीरा एक कुचालक है परन्तु ग्रेफाइट विद्युत का अच्छा चालक है। समझाइए।
उत्तर
हीरे की आन्तरिक संरचना इस प्रकार होती है कि इसमें सभी इलेक्ट्रॉन सहसंयोजक बन्ध बनाने में भाग लेते हैं। कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होता है इसलिए यह विद्युत का कुचालक है। जबकि ग्रेफाइट की संरचना इस प्रकार होती है कि उसमें मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं इसलिए ग्रेफाइट विद्युत का चालक है। चालक है।

प्रश्न 10.
सिलिकॉन कार्बाइड बनाने का रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्ग 13 के तत्वों की अभिक्रियाशीलता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
बोरॉन साधारण ताप पर अनअभिक्रियाशील (unreactive) है। अक्रिस्टलीय बोरॉन उच्च ताप पर नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, सल्फर और हैलोजन से सीधे संयोग करके नाइट्राइड (BN), ऑक्साइड (B2O3), सल्फाइड (B2S3) और हैलाइड (BCl3) बनाता है। यह रक्त-तप्त पर जल-वाष्प (steam) को हाइड्रोजन में अपचयित करता है। गर्म सान्द्र नाइट्रिक अम्ल अक्रिस्टलीय बोरॉन को ऑर्थोबोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत करता है।

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अक्रिस्टलीय बोरॉन गलित सोडियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया करके बोरेट बनाता है।

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ऐलुमिनियम साधारण ताप पर वायु से अभिक्रिया करता है, ऐलुमिनियम के पृष्ठ पर ऑक्साइड की एक कठोर व चीमड़ (tough) पतली परत बन जाती है जो धातु की रासायनिक अभिकर्मकों के आक्रमण से रक्षा करती है। ऐलुमिनियम उच्च ताप पर गर्म करने पर ऑक्सीजन, सल्फर, नाइट्रोजन और हैलोजनों से सीधे संयोग करके ऑक्साइड (Al2O3), सल्फाइड (Al2S3), नाइट्राइड (AIN) और हैलाइड (AlF3, Al2Cl6) बनाता है।
ऐलुमिनियम जल से अभिक्रिया नहीं करता है, क्योंकि उसके पृष्ठ पर ऐलुमिनियम ऑक्साइड की पतली परत जम जाती है।
ऐलुमिनियम गर्म सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन से अभिक्रिया करके सोडियम मेटाऐलुमिनेट बनाता है और हाइड्रोजन गैस निकलती है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-51

ऐलुमिनियम जल सोडियम हाइड्रॉक्साइड सोडियम मेटाऐलुमिनेट हाइड्रोजन ऐलुमिनियम नाइट्रिक अम्ल द्वारा निष्क्रिय (passive) हो जाता है, क्योंकि उसके पृष्ठ पर ऐलुमिनियम ऑक्साइड की अभेद्य परत बन जाती है। ऐलुमिनियम सान्द्र HCl और गर्म सान्द्र H2SO4 से अभिक्रिया करता है।

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वर्ग में Ga, In और TI रासायनिक व्यवहार में समानता प्रदर्शित करते हैं। गैलियम और इन्डियम वायु द्वारा प्रभावित नहीं होते हैं। थैलियम उनके अपेक्षाकृत कुछ अधिक अभिक्रियाशील है और पृष्ठ पर ऑक्साइड बनाता है।

प्रश्न 2.
बोरॉन एवं ऐलुमिनियम के असंगत गुणधर्मों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
बोरॉन और ऐलुमिनियम दोनों तत्वों के बाह्यतम कोश का विन्यास ‘p’ है, अत: उनके गुणों में कई समानताएँ हैं, परन्तु उनके पिछले कोश में, बोरॉन में 2 इलेक्ट्रॉन और ऐलुमिनियम में 8 इलेक्ट्रॉन हैं। इस भिन्नता के कारण बोरॉन और ऐलुमिनियम कई गुणों में असमानताएँ प्रदर्शित करते हैं। जो निम्नलिखित हैं-

  1. बोरॉन अधातु है, ऐलुमिनियम धातु है।
  2. बोरॉन विद्युत अचालक (bad conductor) है, ऐलुमिनियम बहुत अच्छा विद्युत चालक है।
  3. बोरॉन अपररूपता प्रदर्शित करता है, ऐलुमिनियम अपररूपता प्रदर्शित नहीं करता है।
  4. ऐलुमिनियम की तुलना में बोरॉन अति उच्च गलनांक का अधात्विक ठोस है।
  5. बोरॉन ट्राइऑक्साइड (B2O3) अम्लीय ऑक्साइड है। ऐलुमिनियम ट्राइऑक्साइड (Al2O3) उभयधर्मी (amphoteric) ऑक्साइड है।
  6. बोरॉन के हाइड्रॉक्सी यौगिक, जैसे, H3BO3 अम्ल है। ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड Al(OH)3
    उभयधर्मी (armphoteric) है।
  7. Al2 (SO4)3, Al(NO2 )3 आदि स्थाई लवण हैं। बोरॉने इनके संगत लवण नहीं बनाता है। ऐलुमिनियम द्विक सल्फेट जैसे पोटाश फिटकरी K2 SO4 · Al2 (SO4)3·24H2O, बनाता है। बोरॉन फिटकरियाँ (alums) नहीं बनाता है।
  8. बोरॉन तनु अम्लों से क्रिया नहीं करता है। ऐलुमिनियम तनु अम्लों से क्रिया करके हाइड्रोजन विस्थापित करता है।
  9. गर्म सान्द्र HNO3 बोरॉन को बोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत करता है। सान्द्र HNO3 से क्रिया कराने पर ऐलुमिनियम निष्क्रिय (passive) हो जाता है।
  10.  बोरॉन बड़ी संख्या में सहसंयोजक हाइड्राइड बनाता है। ऐलुमिनियम स्थाई हाईड्राइड नहीं बनाता है।
  11.  बोरॉन के हैलाइड, BX3 सूत्र के सहसंयोजक यौगिक हैं जिनकी त्रिकोणीय समतल संरचना है। ये जल से क्रिया कराने पर ऑर्थोबोरिक अम्ल में जल-अपघटित हो जाते हैं। निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड (Al2 Cl6) सूत्र का सहसंयोजक यौगिक हैं जिसकी क्लोरीन-ब्रिज संरचना है। हाइड्रेटेड ऐलुमिनियम क्लोराइड (AlCl3 : 6H2O), जलीय विलयन में Al3+ और Cl आयनों में वियोजित होता है।
  12. बोरॉन कार्बाइड (B4C) अति उच्च गलनांक का बहुत कठोर सहसंयोजक ठोस है एवं रासायनिक रूप से अक्रिये (inert) है।

प्रश्न 3.
कोलमैनाइट द्वारा बोरेक्स बनाने की विधि एवं रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर
कोलमैनाइट को सोडियम कार्बोनेट के सान्द्र विलयन के साथ उबालने पर बोरेक्स बनती है।

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विलयन को छानकर उसका क्रिस्टलीकरण करने पर बोरेक्स के क्रिस्टल प्राप्त होते हैं। क्रिस्टलों को पृथक् करके मातृ द्रव में CO2 ‘प्रवाहित करने पर सोडियम मेटाबोरेट, बोरेक्स में बदल जाता है।

4NaBO2 + CO2 → Na2B4O7 + Na2CO3

प्रश्न 4.
बोरिक अम्ल बनाने की विधि एवं इसके दो रासायनिक गुण लिखिए। सम्बन्धित रासायनिक समीकरण भी दीजिए।
उत्तर
बोरिक अम्ल बनाने की विधि-बोरेक्स के सीन्द्र जलीय विलयन पर HCI या H2SO4 अम्ल की क्रिया से बोरिक अम्ल बनता है।

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रासायनिक गुण

  1. बोरिक अम्ल को गर्म करने पर बोरिक ऐनहाइड्राइड बनता है।
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  2. बोरिक अम्ल को सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में एथिल ऐल्कोहॉल के साथ गर्म करने पर एथिल बोरेट की वाष्प बनती है जो जलाए जाने पर हरे रंग की ज्वाला से जलती है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-56

प्रश्न 5.
बोरिक अम्ल से प्रारम्भ करके निम्नलिखित यौगिकों को कैसे प्राप्त करोगे?
1. बोरॉन ऐनहाइड्राइड
2. बोरॉन ट्राइक्लोराइड
3. बोरॉन हाइड्राइड
4. बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड।
उत्तर

  1. बोरिक अम्ल से बोरॉन ऐनहाइड्राइड में परिर्वतन–बोरिक अम्ल को रक्त तप्त करने पर बोरॉन ऐनहाइड्राइड प्राप्त होता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-57
  2. बोरिक अम्ल से बोरॉन ट्राइक्लोराइड में परिवर्तन-उपर्युक्त विधि से सबसे पहले बोरॉन ऐनहाइड्राइड को प्राप्त कर लिया जाता है। बोरॉन ऐनहाइड्राइड को कार्बन के साथ मिलाकर रक्त तप्त करने पर, क्लोरीन गैस प्रवाहित की जाती है, तो बोरॉन ट्राइक्लोराइड प्राप्त हो जाता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-58
  3. बोरिक अम्ल से बोरॉन हाइड्राइड में परिवर्तन–उपर्युक्त विधि से प्राप्त बोरॉन ऐनहाइड्राइड को मैग्नीशियम चूर्ण के साथ गर्म करके मैग्नीशियम बोराइड प्राप्त कर लिया जाता है। मैग्नीशियम बोराइड तनु HCl से अभिक्रिया करके वाष्पशील हाइड्राइडों का मिश्रण देता है।
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  4. बोरिक अम्ल से बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड़ में परिवर्तन-जब बोरिक अम्ल को सान्द्र H2SO4 और CaF2 के साथ गर्म किया जाता है; तो बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड की वाष्प प्राप्त हो जाती है।।
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प्रश्न 6.
वर्ग 14 के तत्वों की अभिक्रियाशीलता को समझाइए।
उत्तर
वर्ग 14 में कार्बन की रासायनिक प्रवृत्ति अन्य तत्वों से भिन्न है। सिलिकन वर्ग के अन्य तत्वों से गुणों में भिन्नता प्रदर्शित करता है। वर्ग 14 में Ge, Sn और Pb तीनों O2, Cl2, S, सान्द्र HNO2 और गर्म सान्द्र NaOH विलयन से अभिक्रिया करते हैं।

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प्रश्न 7.
‘वर्ग 14 के प्रथम तत्व अर्थात कार्बन के असंगत व्यवहार पर टिपणी लिखिए।
उत्तर
वर्ग 14 में स्थित सभी तत्वों के बाह्यतम कोश का विन्यास s2p2 है। इस समानता के कारण वर्ग 14 के तत्व कई गुणों में समानताएँ प्रदर्शित करते हैं, परन्तु बाह्यतम कोश से पिछले कोश में, c(6) में 2, Si (14) में 8, Ge (32), Sn (50) और Pb (82) में 18 इलेक्ट्रॉन हैं। इस भिन्नता के कारण कार्बन (C) और सिलिकन (Si) के गुणों में तथा Si और Ge, Sn, Pb के गुणों में बहुत असमानताएँ हैं। कार्बन वर्ग 14 का प्रथम तत्व है तथा यह छोटी परमाणु त्रिज्या, उच्च विद्युत ऋणात्मकता, पिछले कोश में 2 इलेक्ट्रॉन और बाह्यतम कोश में केवल s और p ऑर्बिटलों की उपस्थिति के कारण सिलिकन और वर्ग के अन्य तत्वों से गुणों में भिन्नताएँ प्रदर्शित करता है। ये भिन्नताएँ निम्नवत् हैं-

  1. C (6) की विद्युत ऋणात्मकता 2.5 और Si (14) की 1.8 है।
  2. कार्बन की परमाणु त्रिज्या 0.77A और Si की 1.17A है।
  3. C—C बन्ध की बन्धन ऊर्जा 85 kcal mol-1 और Si—Si बन्ध की 53 kcal mol-1 है। कार्बन में श्रृंखलित होने की प्रवृत्ति सिलिकन की अपेक्षा बहुत प्रबल है। इस गुण के कारण कार्बन के यौगिकों की संख्या बहुत अधिक है।
  4. कार्बन परमाणु एक-दूसरे के साथ तथा ऑक्सीजन, सल्फर और नाइट्रोजन परमाणुओं से द्वि-बन्ध या त्रि-बन्ध बना सकते हैं, किन्तु सिलिकन द्वि-बन्ध और त्रि-बन्ध नहीं बनाता है।
  5. कार्बन के संयोजी कोश में केवल 5 और 2 ऑर्बिटल हैं। संयोजी कोश में 4 ऑर्बिटलों की अनुपस्थिति के कारण कार्बन अपने बाह्यतम कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं रख सकता है। अत: कार्बन की अधिकतम सहसंयोजकता 4 है। सिलिकन के बाह्यतम कोश में d ऑर्बिटलों की उपस्थिति के कारण सिलिकन अपने बाह्यतम कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन रख सकता है। सिलिकन की अधिकतम सहसंयोजकता 6 है।

अत: कार्बन के CX4 प्रकार के यौगिक पूर्णत: संतृप्त और स्थाई हैं। सिलिकन के SiX4 प्रकार के यौगिक असंतृप्त और अस्थाई हैं और ये यौगिक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म युक्त अणुओं, जैसे- UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-63 UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-64 आदि से अभिक्रिया करके योगात्मक यौगिक बनाते हैं।

प्रश्न 8.
कार्बन-कार्बन में श्रृंखला के गुण को समझाइए।
या
श्रृंखलित होने के गुण से आप क्या समझते हैं। चौदहवें समूह के उस तत्त्व का नाम लिखिए जो सबसे ज्यादा शृंखलित होने का गुण रखता है।
उत्तर
किसी तत्त्व के समान परमाणुओं के द्वारा परस्पर मिलकर लम्बी श्रृंखला बनाने के गुण को श्रृंखलन कहते हैं। तत्त्वों की इस प्रवृत्ति को श्रृंखलन प्रवृत्ति कहते हैं। चौदहवें समूह के कार्बन में श्रृंखलित होने का गुण सर्वाधिक होता है। इसीलिए ये बन्द तथा खुली श्रृंखला के यौगिक बनाते हैं। श्रृंखलन गुण के कारण ही कार्बनिक यौगिकों की संख्या बहुत अधिक है।
कार्बन-कार्बन आबन्ध की बन्धन ऊर्जा सर्वाधिक 85 जूल किलो कैलोरी/मोल होती है।

प्रश्न 9.
कार्बन मोनोक्साइड तथा कार्बन डाइऑक्साइड के दो-दो रासायनिक गुण लिखिए।
उत्तर
कार्बन मोनोक्साइड के रासायनिक गुण

  1. कार्बन मोनॉक्साइड गैस वायु में नीली ज्वाला के साथ जलती है तथा CO2 गैस बनती है।
    2CO+O2 → 2CO
    कार्बन मोनोक्साइड और वायु का मिश्रण विस्फोटक होता है।
  2. कार्बन मोनोक्साइड सक्रियत चारकोल की उपस्थिति में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके कार्बोनिल क्लोराइड (फॉस्जीन) बनाती है।।
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कार्बन डाइऑक्साइड के रासायनिक गुण

  1. मैग्नीशियम का तार प्रज्वलित करने पर कार्बन डाइऑक्साइड में जलता है।
    CO2 → 2Mg + 2MgO+C
  2. अमोनियम के आधिक्य में कार्बन डाइऑक्साइड के साथ 200°C ताप और 200 वायुमण्डलीय दाब पर गर्म करने पर यूरिया बनता है।
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प्रश्न 10.
कार्बन डाइऑक्साइड एवं कार्बन मोनॉक्साइड के उपयोग लिखिए।
उत्तर
कार्बन डाइऑक्साइड के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं

  1. यूरिया [CO(NH2)2] उर्वरक के निर्माण में।
  2. धातु कार्बोनेटों और बाइकार्बोनेटों के निर्माण में; जैसे—NaHCO3, Na2CO3 अवक्षेपित CaCO3 आदि के निर्माण में।
  3. ऑक्सीजन से मुक्त वातावरण प्राप्त करने में।
  4. शुष्क बर्फ (dry ice) बनाने में।

कार्बन मोनॉक्साइड के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं-

  1. धातु निष्कर्षण में, जैसे–मॉण्ड प्रक्रम द्वारा निकिल का निष्कर्षण।
  2. धातुओं के शोधन में, जैसे-Ni और Fe का शोधन।।
  3. धातु कार्बोनिल, जैसे- Ni(CO)4 Fe(CO)5 बनाने में।
  4. धातु ऑक्साइडों के अपचयन में, जैसे– Fe0+ CO→ Fe+CO2
  5. ईंधन के रूप में।
  6. फॉस्जीन (COCl2) बनाने में।

प्रश्न 11.
कार्बन सबऑक्साइड पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
मेलोनिक अम्ल का वायु की अनुपस्थिति में फॉस्फोरस पेन्टॉक्साइड द्वारा 140°C पर निर्जलीकरण कराने पर कार्बन सबऑक्साइड गैस बनती है।
गुण

  1. कार्बन सबऑक्साइड अक्रिय गन्ध की रंगहीन गैस है।
  2. गर्म करने पर 200°C पर यह कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन में अपघटित हो जाती है।
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    कार्बन सबऑक्साइड की निम्न संरचना है।
    O= C=C=C=O

प्रश्न 12.
कार्बन के हैलोजन यौगिकों के उपयोग लिखिए।
उत्तर
कार्बन के प्रमुख हैलोजन यौगिक एवं उनके उपयोग निम्नवत् हैं-
1. कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4)-कार्बन टेट्राक्लोराइड के कुछ उपयोग निम्नलिखित हैं|

  1. अग्निशामक (Fire extinguisher) के रूप में कार्बन टेट्राक्लोराइड की वाष्प अज्वलनशील और वायु से भारी होती है। अत: कार्बन टेट्राक्लोराइड का उपयोग अग्निशामक के रूप में किया जाता है। CCl4 को पाइरीन (pyrene) कहते हैं।
  2.  विलायक के रूप में कार्बन टेट्राक्लोराइड का उपयोग तेल, वसा, रेजिन, आयोडीन, ब्रोमीन आदि के लिए विलायक के रूप में किया जाता है।

2. फ्रेऑन (Freons)-मेथेन और एथेन के क्लोरोफ्लुओरो व्युत्पन्न फ्रेऑन कहलाते हैं। फ्रेऑन का उपयोग प्रशीतक के रूप में और वातानुकूलन में किया जाता है।

डाइक्लोरोडाइफ्लुओरोमेथेन–(फ्रेऑन-12), CCl2F2 और ट्राइक्लोरोफ्लुओरोमेथेन (फ्रेऑन-11), CFCl3 : ये दोनों यौगिक अविषैली एवं बहुत स्थायी और अज्वलनशील (non-inflammable) गैसें हैं। ये सुगमता से द्रवित हो जाती हैं। ये रासायनिक रूप से निष्क्रिय हैं। इनका उपयोग प्रशीतक (refrigerant) के रूप में एवं वातानुकूलन (air conditioning) में किया जाता है।

प्रश्न 13.
सिलिकन कार्बाइड (कार्बोरण्डम) के उपयोग लिखिए।
उत्तर
बहुत कठोर होने के कारण सिलिकन कार्बाइड का उपयोग अपघर्षी चूर्ण (abrasive powder), होनस्टोन (honestone), घर्षण व्हील (grinding wheels), वेटस्टोन (whetstone), पॉलिश स्टोन (polishing stone), पॉलिश क्लॉथ (polishing cloths), रेगमाल (sand paper) आदि वस्तुएँ। बनाने में होता है। अति उच्च तापसह एवं दुर्गलनीय (refractory) प्रकृति तथा उच्च ऊष्मा चालकता होने के कारण सिलिकन कार्बाइड का उपयोग धातुओं को गलाने के लिए क्रूसिबल (crucible) बनाने में होता है। कार्बोरन्डम की छड़ों (rods) के रूप में प्रतिरोध हीटर (resistance heaters), औद्योगिक भट्टियों में प्रयुक्त किए जाते हैं।

प्रश्न 14.
सिलिकेटों के मुख्य वर्ग, सूत्र और उनकी संरचनाओं को दर्शाइए।
उत्तर
सिलिकेटों के मुख्य वर्गों, सूत्रों तथा संरचनाओं को निम्नंकित सारणी में दर्शाया गया है-
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प्रश्न 15.
जियोलाइट पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
जियोलाइट खुली संरचना के हाइड्रेटेड त्रिविम ऐलुमिनोसिलिकेट हैं जो आण्विक छन्नी (molecular sieve) के रूप में कार्य करने के अतिरिक्त, अपने धनायनों का विलयन में उपस्थित धनायनों से विनिमय (exchange) कर सकते हैं। जियोलाइट में पंजर (cages) बहुत सममित और परिशुद्ध आकार (precise size) के होते हैं। जियोलाइट आकृति वर्णात्मक (shape selective) विषमांगी उत्प्रेरण के लिए भी प्रयुक्त किए जाते हैं।
उदाहणार्थ-आण्विक छन्नी ZSM-5 का ऑर्थोजाइलीन को संश्लेषण करने में उपयोग किया जाता है, ऑर्थोंजाइलीन के साथ अन्य जाईलीने नहीं बनती हैं, क्योंकि उत्प्रेरक प्रक्रम जियोलाइट के पंजरों (cages) और उसकी सुरंगों (tunnels) के आकार और आकृति द्वारा नियन्त्रित होता है। औद्योगिक प्रयोजनों के लिए वर्णात्मक आकार और आकृति के संश्लेषित जियोलाइट (synthetic zeolites) बनाए गए हैं। कुछ आण्विक छन्नियाँ (molecular sieves) और जियोलाइटों के संघटन निम्नलिखित हैं-

Na12[(AlO2)12(SiO2)12]· xH2O
Ca22[(AlO4)4 (SiO2)8]· xH2O
Na3[(AiO2 )3(SiO2 )]·xH2O

निम्न खनिज भी जियोलाइट हैं-
ऐनलसाइट (Analcite), Na[AlSi2O6]· H2O
सोडालाइट (Sodalite), Na6[(Al6Si6O24]·2H2O
प्राकृतिक और संश्लिष्ट (synthetic) दोनों प्रकार के जियोलाइट बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी पदार्थ हैं जिनके रसायन एवं उद्योग में कई अनुप्रयोग हैं।
खुली संरचना के कारण (1) जियोलाइट धनायन विनिमायक (cation exchanger) का कार्य करते हैं। कठोर जल के मृदुकरण में जियोलाइटों का उपयोग होता है। (2) जियोलाइट आण्विक छन्नियों (molecular sieves) का कार्य करते हैं, क्योंकि इनकी गुहिकाओं और चैनलों में से अणु स्वतन्त्रतापूर्वक अभिगमन कर सकते हैं। छिद्रों के आकार से बहुत बड़े अणु प्रभावित नहीं होते हैं। वांछित आकार के छिद्रों की गुहिकाओं के जियोलाइट संश्लेषित किए गए हैं जिनका उपयोग कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण, शोधन आदि में किया गया है। उदाहरणार्थ-एक संश्लिष्ट जियोलाइट ऋजु-श्रृंखला (straight chain) ऐल्केनों को तो अधिशोषित करता है, परन्तु शाखित श्रृंखला ऐल्केनों और ऐरोमैटिक यौगिकों को नहीं करता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में बोरॉन परिवार (वर्ग 13) की स्थिति की विवेचना कीजिए।
उत्तर
आवर्त सारणी में p-ब्लॉक के वर्ग 13 में पाँच तत्व हैं—बोरॉन (B), ऐलुमिनियम (Al), गैलियम (Ga), इण्डियम (In) और थैलियम (Tl)। बोरॉन को छोड़कर सभी तत्व धातु हैं। इन तत्वों के बाह्यतम कोश को विन्यास ns2np1 है, परन्तु निम्नतम क्रोड भिन्न है। इन तत्वों के आन्तरिक कोश पूर्ण भरे होते हैं। बाह्यतम कोश का विन्यास ns2np1 होने के कारण ही उन्हें p ब्लॉक के वर्ग 13 में रखा गया है। बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में समानता होने के कारण ये तत्व गुणों में समानताएँ प्रदर्शित करते हैं।
बोरॉन परिवार के तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् हैं-

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गुणों में समानता

  1. बोरॉन को छोड़करे सभी तत्व धातु हैं।
  2. ये प्रकृति में मुक्त अवस्था में भी मिलते हैं।
  3. बोरॉन परिवार के तत्वों की वर्ग संयोजकता 3 है।
  4. ये सभी तत्व त्रि-संयोजीयौगिक बनाते हैं।
  5. इन तत्वों की आयनन ऊर्जाएँ उच्च हैं।

गुणों में क्रमिक परिवर्तन

  1. वर्ग में नीचे जाने पर तत्वों (M) के परमाणु साइज में वृद्धि होने के साथ M—x बन्ध की बन्धन ऊर्जा घटती है। वर्ग में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ उच्च ऑक्सीकरण अवस्था निम्न ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में कम स्थायी होती जाती है।
  2. वर्ग में नीचे की ओर जाने पर अधात्विक लक्षण घटता है तथा धात्विक लक्षण बढ़ता है।
  3. वर्ग में धन विद्युत लक्षण B से Tl तक बढ़ता है।
  4. वर्ग में नीचे की ओर जाने पर परमाणु त्रिज्याएँ बढ़ती हैं।
  5. वर्ग में नीचे की ओर जाने पर आयनिक त्रिज्याएँ बढ़ती हैं।
  6. वर्ग में तत्वों का घनत्व B में Tl तक बढ़ता है।

अत: इनके गुणों से समानता तथा गुणों के क्रमिक परिवर्तन तत्वों को एक ही उपवर्ग में रखे जाने की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 2.
बोरॉन के निर्माण की विधि, भौतिक गुण एवं रासायनिक गुण लिखिए।
उत्तर
प्रकृति में बोरॉन मुख्यत: बोरेक्स और कोलमैनाइट के रूप में पाया जाता है। यह अपररूपता प्रदर्शित करता है। बोरॉन के दो अपररूप निम्नवत् हैं-

1. अक्रिस्टलीय बोरॉन
निर्माण विधि-बोरिक ऐनहाइड्राइड (B2SO4) का उच्च ताप पर सोडियम, पोटैशियम या मैग्नीशियम द्वारा अपचयन कराने पर बोरॉन भूरे-काले रंग के अक्रिस्टलीय (amorphous) चूर्ण के रूप में प्राप्त होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-71

‘बोरॉन ट्राइऑक्साइड मैग्नीशियम अक्रिस्टलीय बोरॉन मैग्नीशियम (बोरिक ऐनहाइड्राइड) (भूरे-काले रंग का चूर्ण) ऑक्साइड बोरॉन ट्राइऑक्साइड को सोडियम, पोटैशियम या मैग्नीशियम रिबन के टुकड़ों के साथ एक ढ़के हुए क्रूसिबल में तेज गर्म करते हैं। संगलित द्रव्य को तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ उबालकर छानने पर अक्रिस्टलीय बोरॉन का गहरा भूरा ठोस अवशेष प्राप्त होता है।
बोरॉन के प्रमुख भौतिक निम्नवत् हैं-

  1. यह भूरे-काले रंग का चूर्ण है।
  2. इसका आपेक्षिक घनत्व 1.73 है।
  3. इसका गलनांक 2100°C है।
  4. इसका क्वथनांक 2150°C है।

बोरॉन के प्रमुख रासायनिक गुण गुण निम्नवत् हैं-
बोरॉन का अक्रिस्टलीय रूप अभिक्रियाशील है। यह उच्च ताप पर नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, सल्फर और हैलोजनों (F2, Cl2, Br2) से सीधे संयोग करके नाइट्राइड, ऑक्साइड, सल्फाइड और हैलाइड बनाता है।

  1. बोरॉन नाइट्राइड, ऑक्साइड और सल्फाइड की वृहत् अणु संरचनाएँ हैं जिनमें सम्पूर्ण क्रिस्टल में परमाणु एक-दूसरे से सहसंयोजक बंधों द्वारा जुड़े होते हैं।
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  2. अक्रिस्टलीय बोरॉन रक्त-तप्त ताप पर जल-वाष्प (steam) को हाइड्रोजन में अपचयित करता है।
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  3. गर्म सान्द्र नाइट्रिक अम्ल अक्रिस्टलीय बोरॉन को ऑर्थोबोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत करता है।
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  4. अक्रिस्टलीय बोरॉन उच्च ताप पर कई ऑक्साइडों, सल्फाइडों और क्लोराइडों को अपचयित करता है।
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  5. अक्रिस्टलीय बोरॉन गलित सोडियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया करके मेटाबोरेट बनाता है। और हाइड्रोजन गैस उत्पन्न होती है।
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2. क्रिस्टलीय बोरॉन
निर्माण विधि-क्रिस्टलीय बोरॉन वैद्युत-तप्त टैनटेलम फिलामेन्ट पर 1000-1300°C पर बोरॉन ट्राइब्रोमाइड वाष्प का और हाइड्रोजन के मिश्रण को प्रवाहित करके या बोरॉन ट्राइआयोडाइड वाष्प और हाइड्रोजन के मिश्रण के तापीय अपघटन द्वारा बनाया जाता है।

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गुण–क्रिस्टलीय बोरॉन बहुत कठोर और रासायनिक रूप से निष्क्रिय काला क्रिस्टलीय ठोस है।

प्रश्न 3.
ऐलुमिनियम के गुण तथा उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
भौतिक गुण-ऐलुमिनियम में सफेद रंग की धात्वीय चमक होती है। यह विद्युत और ऊष्मा का सुचालक होता है। इसका घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घन सेमी होता है। इसका गलनांक 600°C है।
रासायनिक गुण-ऐलुमिनियम के मुख्य रासायनिक गुण निम्नलिखित हैं-

  1. वायु का प्रभाव वायु में जलाने पर यह तीव्र प्रकाश से जलता है तथा Al2O3 बनाता है और बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।
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  2. जल से क्रिया-यह उबलते हुए जल को अपघटित कर H2 उत्पन्न करता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-79
  3. अम्लों से क्रिया–
    •  यह तनु या सान्द्र HCl से क्रिया करके क्लोराइड बनाता है और H2 गैस निकालता है।
      UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-80
    •  यह तनु H2SO4 से क्रिया करके H2 निकालता है और गर्म तथा सान्द्र H2 SO4 के साथ SO2 निकालता है।
      UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 11 The p-block Elements img-81
    • यह तनु HNO3 से धीरे-धीरे क्रिया करके नाइट्रेट बनाता है, परन्तु सान्द्र HNO3 का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
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  4. क्षारों के साथ क्रिया-यह कॉस्टिक क्षारों के गर्म विलयन के साथ क्रिया करके सोडियम, मेटाऐलुमिनेट बनाता है और H2 निकलती है।
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  5. हैलोजन से क्रिया-Al के गर्म चूर्ण पर हैलोजन प्रवाहित करने पर ऐलुमिनियम हैलाइड बनता है।
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  6. नाइट्रोजन के साथ क्रिया-Al के गर्म चूर्ण पर N2 प्रवाहित करने पर ऐलुमिनियम नाइट्राइड बनता है।
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  7. धातु ऑक्साइडों का अपचयन-Al की ऑक्सीजन के प्रति अधिक बन्धुता होने के कारण | यह धातु ऑक्साइडों का धातु में अपचयन कर देता है।
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उपयोग–ऐलुमिनियम के प्रमुख उपयोग इस प्रकार हैं-

  1. ऐलुमिनियम की चादर व बर्तन बनाने में,
  2. बिजली के तार बनाने में,
  3. थर्माइट वेल्डिंग में,
  4. क्रोमियम, लोहा तथा मैंगनीज धातु के निष्कर्षण में,
  5. हवाई जहाज तथा मोटर आदि में लगने वाली मिश्रधातुओं के बनाने में,
  6. इसके पत्र (foils) साबुन, सिगरेट आदि लपेटने में प्रयुक्त होते हैं,
  7. ऐलुमिनियम पाउडर तेल के साथ मिलाकर पेन्ट बनाने के काम आता है।

प्रश्न 4.
एक अकार्बनिक लुइस अम्ल (x) निम्नलिखित अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करता है-
(i) यह नम वायु में धुआँ देता है।
(ii) NH4OH में भीगी हुई छड़ को इसके समीप लाने पर धुएँ की तीव्रता बढ़ जाती है।
(iii) (x) के अम्लीय घोल में NH4Cl तथा NH4OH मिलाकर NaOH मिलाने पर यह घुल जाता है।
(iv) (x) का अम्लीय घोल H2S के साथ अवक्षेप नहीं देता है। (x) को पहचानिए तथा (G) से (iii) पदों पर होने वाली अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 5.
(i) जब एक खनिज (A) को Na2CO3 के विलयन के साथ उबाला जाता है, तो एक सफेद अवक्षेप (B) बनता है।
(ii) अवक्षेप को छानने पर छनित में दो यौगिक (C) तथा (D) उपस्थित होते हैं। यौगिक (C) को | क्रिस्टलीकरण (crystallisation) द्वारा पृथक् किया जाता है मातृ द्रव (mother liquor) में CO2 प्रवाहित करने पर (D) का (C) में परिवर्तन हो जाता है।
(iii) यौगिक (C), प्रबल गर्म करने पर दो यौगिक (D) और (E) देता है।
(iv) (E) को कोबाल्ट ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर नीले रंग का एक पदार्थ (F) प्राप्त होता है। (A) से (F) को पहचानिए तथा (i) से (iv) पदों में होने वाली अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में (A) तथा (B) की पहचान कीजिए तथा इसके सूत्र उत्तर-पुस्तिका में लिखिए
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उत्तर
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प्रश्न 7.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में कार्बन परिवार (वर्ग i4) की स्थिति की विवेचना कीजिए।
उत्तर
कार्बन, सिलिकन तथा लेड को आवर्त सारणी के IV समूह में रखा गया है। IV समूह दो उपसमूहों में विभाजित है। कार्बन इस समूह का प्रारूपिक तत्त्व है, जो सिलिकन के साथ उपसमूह A तथा B में से किसी भी उपसमूह का सदस्य बन सकता है, परन्तु रासायनिक गुणों एवं इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर यह उपसमूह-A का सदस्य माना जाता है; अत: कार्बन, सिलिकन व लेड IVA समूह के तत्त्वों को कार्बन परिवार (carbon family) के तत्त्व कहते हैं, जिनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार है।

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उपर्युक्त इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से स्पष्ट है कि सभी तत्त्वों के बाह्य कोश में 4 इलेक्ट्रॉन हैं और बाह्य कोश की संरचना as up है; अतः इन्हें एक ही उपवर्ग में रखा जाना उचित है। समान इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होने के कारण ये समान गुण प्रदर्शित करते हैं तथा परमाणु क्रमांक बढ़ने पर उनमें श्रेणीबद्ध परिवर्तन होता है।
गुणों में समानता

  1. उपवर्ग के सभी तत्त्वों की मुख्य संयोजकता 4 है, परन्तु इनमें कुछ तत्त्वों में 2 संयोजकता भी पाई जाती है।
  2. कार्बन व लेड के अतिरिक्त सभी तत्त्व जटिल यौगिक बनाते हैं।
  3. सभी तत्त्व सहसंयोजक हाइड्राइड बनाते हैं, जिनका स्थायित्व CH4से PbH4 तक घटता है।
  4. सभी तत्त्व डाइऑक्साइड बनाते हैं, परन्तु इनके कुछ तत्त्व मोनोऑक्साइड भी बनाते हैं।
  5. सभी तत्त्व चतुष्फलकीय सह-संयोजक हैलाइड बनाते हैं।
  6. ये सभी तत्त्व ऑक्सी अम्ल बनाते हैं।

गुणों में क्रमिक परिवर्तन

  1. इन तत्त्वों के आयनन विभव उच्च हैं तथा कार्बन से लेड की ओर कम होते जाते हैं।
  2. इंनकी विद्युत ऋणात्मकता नियमित क्रम से नहीं बदलती। कार्बन की विद्युत ऋणात्मकता 2.5 तथा शेष सभी (Si, Ge, Sn, Pb) की लगभग 2.8 है।
  3. कार्बन से लेड की ओर चलने पर धात्विक गुण; घनत्व, परमाणु त्रिज्या तथा परमाणु आयतनों में वृद्धि होती है।
  4. ऑक्साइडों का अम्लीय स्वभाव कार्बन से लेड की ओर कम होता जाता है।
  5. इन तत्त्वों में लेड को छोड़कर अन्य सभी तत्त्वों की श्रृंखला बनाने की क्षमता होती है। यह क्षमता कार्बन से लेड तक घटती हैं।

अत: इनके गुणों में समानता तथा गुणों में क्रमिक परिवर्तन तत्त्वों को एक ही उपवर्ग में रखे जाने की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 8.
कार्बन के भौतिक एवं रासायनिक गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कार्बन के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. कार्बन के तीन अपररूप हैं—
    • डायमण्ड (हीरा),
    • ग्रेफाइट तथा
    • फुलरीन
  2. इसका गलनांक 3570°C है।।
  3. इनका क्वथनांक 4827°C है।
  4. इसका घनत्व 293 K पर डायमण्ड के लिए 3.5 तथा ग्रेफाइट के लिए 2.22 है।
  5. भूपर्पटी में इनकी बहुतयता 0.08 (प्रतिशत द्रव्यमान से) है।

कार्बन के प्रमुख रासायनिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. वायु या ऑक्सीजन से क्रिया–कार्बन को वायु या ऑक्सीजन में जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड बनती है।
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  2. सल्फर से क्रिया-कार्बन को सल्फर के साथ विद्युत भट्टी में गर्म करने पर कार्बन डाइसल्फाइड बनती है।
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  3. सान्द्र नाइट्रिक अम्ल से क्रिया-गर्म सान्द्र नाइट्रिक अम्ल द्वारा कार्बन कार्बन, डाइऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाता है।
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  4. सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल से क्रिया-सन्द्रि सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर कार्बन H2SO4 को SO2 में अपचयित कर देता है।
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  5. भाप (steam) से क्रिया-रक्त-तप्त कार्बन (कोक) पर भाप प्रवाहित करने पर कार्बन , मोनॉक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण बनता है जिसे जल-गैस (water gas) कहते हैं।
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  6. धातु ऑक्साइडों का अपचयन–टिन, लेड, जिंक और आइरन के ऑक्साइड काबर्न के साथ उच्च ताप पर गर्म करने पर धातु में अपचयित हो जाते हैं।
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प्रश्न 9.
सिलिकोन्स क्या हैं? इनके गुणों व उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
सिलिकोन्स–सिलिकोन्स कार्बनिक सिलिकॉन बहुलक होते हैं। इनमें R2SiO इकाइयाँ एक-दूसरे से SiO—बन्ध (Si—O) द्वारा जुड़ी होती हैं। इनका सामान्य सूत्र (R2SiO)n होता है। यहाँ R ऐल्किल या ऐरिल समूह होता है। चूंकि इन बहुलकों के सामान्य सूत्र (R2SiO) कीटोन के सामान्य सूत्र R2CO के समान होते है; इसलिए इन्हें सिलिकोन्स कहते हैं। सिलिकोन्स मुख्यत: निम्न हैं-

  1. रेखीय सिलिकोन्स।
  2. चक्रीय सिलिकोन्स।
  3. शाखायुक्त सिलिकोन्स।

सिलिकोन्स के प्रमुख गुण निम्नवत् हैं

  1. ये रासायनिक दृष्टि से अक्रिय होते हैं।
  2. ये विषैले नहीं होते हैं तथा जल को प्रतिकर्षित करते हैं।
  3. ताप परिवर्तन से इनकी श्यानता प्रभावित नहीं होती है।

उपयोग-

  1. उच्चताप सह तेल बाध तथा निर्वात् पम्पों के निर्माण में।
  2. विद्युत कुचालक के रूप में।
  3. जलरोधी कपड़े बनाने में तथा कागज के निर्माण में।

प्रश्न 10.
सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड के विरचन की विधियाँ, गुणों एवं उपयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
विरचन की विधियाँ सिलिकॉन टेट्रोक्लोराइड को निम्न में से किसी भी विधि द्वारा बनाया जा सकता है–

  1. सिलिकॉन को क्लोरीन के साथ गर्म करने पर सिलिकॉन टेट्रोक्लोराइड वाष्प बनती है जिसे द्रवित करने पर सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड द्रव प्राप्त होता है।
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  2. कार्बन और सिलिका के मिश्रण को क्लोरीन की धारा में गर्म करने पर टेट्राक्लोराइड वाष्प बनती है जिसे द्रवित करने पर सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड द्रव प्राप्त होता है। द्रव को मर्करी के साथ हिलाकर पुनः आसवित करने पर क्लोरीन की अशुद्धि दूर हो जाती है और शुद्ध सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड प्राप्त होता है।
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सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड के प्रमुख भौतिक एवं रासायनिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड रंगहीन सधूम द्रव (fuming liquid) है, जो वायु में धूम देता है।
  2. सिलिकॉन टेट्राक्लोराइट का क्वथनांक 59.6°C और हिमांक -70°C है।
  3. सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड जल द्वारा सिलिका में अपघटित हो जाता है।
    SiCl4 +2H2O → SiO2 + 4HCl
    कार्बन टेट्राक्लोराइड जल द्वारा अपघटित नहीं होता है।
  4. सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड वाष्प को हाइड्रोजन गैस की उपस्थिति में गलित ऐलुमिनियम धातु पर। प्रवाहित करने पर सिलिकॉन प्राप्त होता है।
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  5. सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड की लीथियम ऐलुमिनियम हाइड्राइड से अभिक्रिया कराने पर मोनोसिलेन (SiH4) बनती है। ।
    SiCl4 (l) + LiAlH4 → SiH4 (g) + LiCl + AlCl3

सिलिकॉन टेट्राक्लोराइड के प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं-

  1. शुद्ध सिलिका के उत्पादन में।
  2. सिलिसिक अम्ल के एस्टर (esters) बनाने में।
  3. सिलिकॉन (silicones) के निर्माण में।

प्रश्न 11.
SiCl4 से प्रारम्भ करके निम्नलिखित के निर्माण की विधि, कोष्ठकों में दिए गए। अधिकतम पदों की सीमा को ध्यान में रखकर (केवल रासायनिक समीकरण दीजिए)
(i) सिलिकन (Silicon) (एक पद में)।
(ii) रेखीय सिलिकोन्स (silicones) जिसमें केवल मेथिल समूह है। (4 पदों में)
(iii) Na2SiO3 (3 पदों में)
उत्तर
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