UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics chapter 1 Introduction

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics chapter 1 Introduction (परिचय)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन सही हैं अथवा गलत? इन्हें तदनुसार चिह्नित करें

(क) सांख्यिकी केवल मात्रात्मक आँकड़ों का अध्ययन करती है।
(ख) सांख्यिकी आर्थिक समस्याओं का समाधान करती है।
(ग) आँकड़ों के बिना अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का कोई उपयोग नहीं है।

उत्तर :

(क) गलत,
(ख) सही,
(ग) सही।

प्रश्न 2.
उन क्रियाकलापों की सूची बनाएँ जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग होते हैं। क्या ये आर्थिक क्रियाकलाप हैं?
उत्तर :
उन क्रियाकलापों की सूची जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग होते हैं, निम्नलिखित हैं|

  1. आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए वस्तुओं को क्रय करना।
  2. लाभ कमाने के लिए वस्तुओं का उत्पादन करना।
  3. किसी अन्य व्यक्ति के लिए कार्य करना और बदले में पारिश्रमिक लेना।
  4. पारिश्रमिक (वेतन/मजदूरी) पाने के लिए दूसरे व्यक्ति को सेवा प्रदान करना।
  5. लाभ कमाने के लिए वस्तुएँ बेचना (विक्रेता का कार्य)।

उपर्युक्त सभी क्रियाएँ आर्थिक हैं क्योंकि ये सभी धन सम्बन्धी क्रियाएँ हैं और मौद्रिक लाभ कमाने के उद्देश्य से की जाती हैं।

प्रश्न 3.
सरकार और नीति निर्माता आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त नीतियों के निर्माण के लिए
सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग करते हैं। दो उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए।
अथवा सरकार एवं नीति-निर्माताओं के लिए सांख्यिकीय आँकड़ों के प्रयोग का महत्व बताइए।
उत्तर :
1. सरकार द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग देश में पूर्ण रोजगार के स्तर को बनाए रखने के लिए सरकार को अपनी व्यय नीति, कर नीति, मौद्रिक नीति आदि में समायोजन करना पड़ता है, परन्तु यह समायोजन सांख्यिकीय तथ्यों के आधार पर ही हो सकता है। सरकारी बजट का निर्माण भी सांख्यिकीय आँकड़ों के आधार पर किया जाता है। सरकार द्वारा नियुक्त आयोगों, समितियों आदि के प्रतिवेदनों का आधार भी समंक ही होते हैं। वास्तव में, सांख्यिकीय आँकड़े एक ऐसा आधार है जिसके चारों ओर सरकारी क्रियाएँ घूमती हैं।

2. नीति-निर्माताओं द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग-सांख्यिकीय आँकड़े नीति निर्माण की आधारशिला हैं। योजनाएँ बनाने, उन्हें क्रियान्वित करने तथा उनकी उपलब्धियों/असफलताओं का मूल्यांकन करने में पग-पग पर सांख्यिकीय आँकड़ों का सहारा लेना पड़ता है। नीति-निर्माता समंकों का प्रयोग निम्नलिखित बातों के लिए करते हैं

  • अन्य देशों की तुलना में अपने देश के आर्थिक विकास की स्थिति को जानने के लिए; .
  • आर्थिक विकास के निर्धारक तत्त्वों के प्रभाव, तकनीकी प्रगति व उत्पादकता की स्थिति जानने के लिए;
  • अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में प्राथमिकताएँ निर्धारित करने के लिए;
  • विभिन्न क्षेत्रों के निर्धारित लक्ष्यों व वित्तीय साधनों का अनुमान लगाने के लिए;
  • विभिन्न परियोजनाओं के कार्यकरण का मूल्यांकन करने के लिए

प्रश्न 4.
आपकी आवश्यकताएँ असीमित हैं तथा उनकी पूर्ति करने के लिए आपके पास संसाधन सीमित हैं। दो उदाहरणों द्वारा इसकी व्याख्या करें।
उत्तर :
उदाहरण 1 – माना हमारे पास केवल १ 10 हैं। हम इससे फल, सब्जियाँ, पुस्तक, खेल का सामान आदि खरीदना चाहते हैं, सिनेमा भी देखना चाहते हैं। क्या हम ऐसा कर सकते हैं? नहीं। क्योंकि हमारे पास साधन सीमित अर्थात् मात्र 10 हैं। अतः हम इन आवश्यकताओं को वरीयता के क्रम में रखकर सर्वाधिक आवश्यक उन वस्तुओं को खरीद पाएँगे जिनका मूल्य र 10 तक होगा।

उदाहरण 2 – माना एक व्यक्ति के पास मात्र १ 10,000 की पूँजी है। वह इसे अनाज को संग्रह करने, अंश पत्रों व ऋण पत्रों में लगाने, कम्प्यूटर लगाकर जॉब वर्क करने आदि कार्यों में लगाना चाहता है। वह ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास पूँजी सीमित (मात्र १ 10,000) है। अत: वह वही कार्य कर पाएगा जिसमें अधिकतम पूँजी की आवश्यकता मात्र १ 10,000 हो।

प्रश्न 5.
उन आवश्यकताओं का चुनाव आप कैसे करेंगे जिनकी आप पूर्ति करना चाहेंगे?
उत्तर :
जिन आवश्यकताओं की हम पूर्ति करना चाहेंगे उनका चुनाव निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर किया जाएगा

  1. विभिन्न आवश्यकताओं की तीव्रता देखकर, अधिक तीव्रता वाली आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए चुनाव किया जाएगा।
  2. यह देखा जाएंगा कि हमारे पास उन आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए कितने साधन उपलब्ध हैं।
  3. यह भी देखा जाएगा कि उपलब्ध संसाधनों के कितने वैकल्पिक प्रयोग हो सकते हैं। संक्षेप में, साधनों की उपलब्धता उनके वैकल्पिक प्रयोगों के आधार पर, अधिक तीव्रता वाली आवश्यकताओं की क्रमानुसार सन्तुष्टि की जाएगी।

प्रश्न 6.
आप अर्थशास्त्र का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? कारण बताइए।
उत्तर :
हम अर्थशास्त्र का अध्ययन निम्नलिखित कारणों से करना चाहते हैं

  1. अर्थशास्त्र के अध्ययन से ज्ञान में वृद्धि होती है, तर्क शक्ति बढ़ती है और दृष्टिकोण विस्तृत एवं वैज्ञानिक हो जाता है।
  2. अर्थशास्त्र के अध्ययन से चुनाव योग्यता में वृद्धि होती है और हम आवश्यक तथा अनावश्यक आवश्यकताओं में भेद करने में समर्थ हो जाते हैं।
  3. पारिवारिक बजट बनाकर हम विवेकपूर्ण ढंग से व्यय करना सीख जाते हैं। इससे हमें अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त होती है।
  4. न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन कैसे किया जाए, इसको ज्ञान हमें, अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होता है।
  5. अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमें देश में जन-कल्याण हेतु चलाई जा रही विभिन्न परियोजनाओं का ज्ञान होता है।
  6. अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमारी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  7. हमें देश में प्रचलित विभिन्न कुरीतियों एवं समस्याओं का ज्ञान होता है; जैसे–निर्धनता, बेरोजगारी, जनसंख्या में वृद्धि, अल्प-पोषण, जाति प्रथा, दहेज प्रथा, बाल-विवाह आदि। अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमें इन समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।

प्रश्न 7.
सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होतीं।’ टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होतीं यह बात सर्वथा सत्य है। अत: इसका प्रयोग विशेष सावधानी के साथ उसकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए एक उपयुक्त व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए अन्यथा उससे निकाले गए निष्कर्ष भ्रामक होंगे। इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
उदाहरण – एक बार चार व्यक्तियों का एक परिवार (पति-पत्नी तथा दो बच्चे) नदी पार करने निकला। पिता को नदी की औसत गहराई की जानकारी थी। अतः उसने परिवार के सदस्यों के औसत । कद का हिसाब लगाया। चूँकि परिवार के सदस्यों का औसत कद नदी की औसत गहराई से अधिक था, इसलिए उसने सोचा कि वे सभी सुरक्षित रूप से नदी पार कर सकते हैं। परिणामस्वरूप नदी पार करते समय बच्चे पानी में डूब गए। स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने ‘औसत’ का दुरुपयोग किया था। स्पष्ट है कि सांख्यिकी का प्रयोग पूर्ण योग्यता तथा ज्ञान के साथ, अत्यधिक सावधानी बरतते हुए तथा उसके विज्ञान की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, एक उपयुक्त व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए ताकि निकाले गए निष्कर्ष सही तथा स्पष्ट हों।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जो मानव व्यवहार का अध्ययन साध्यों एवं सीमित तथा वैकल्पिक प्रयोगों वाले साधनों के बीच संबंध के रूप में करता है।” यह कथन किसका है?
(क) जे०के० मेहता
(ख) मार्शल
(ग) रॉबिन्स
(घ) पीगू
उत्तर :
(ग) रोबिन्स

प्रश्न 2.
आवश्यकताविहीनता की संकल्पना का प्रतिपादन किया था
(क) मार्शल ने
(ख) जे०के० मेहता ने
(ग) रोबिन्स ने
(घ) ए०के० सेन ने।
उत्तर :
(ख) जे०के० मेहता ने

प्रश्न 3.
अर्थशास्त्र के जनक कहे जाते हैं
(क) एडम स्मिथ
(ख) रिकाडों
(ग) प्रो० रोबिन्स
(घ) प्रो० मार्शल
उत्तर :
(क) एडम स्मिथ

प्रश्न 4.
प्रो० रोबिन्स के अनुसार अर्थशास्त्र है
(क) केवल आदर्श विज्ञान
(ख) केवल वास्तविक विज्ञान ,
(ग) वास्तविक व आदर्श विज्ञान
(घ) विज्ञान व कला दोनों
उत्तर :
(ख) केवल वास्तविक विज्ञान

प्रश्न 5.
सुख की प्राप्ति ही मानव-जीवन का लक्ष्य है, किस भारतीय विचारक से संबंधित है।
(क) जे०के० मेहता
(ख) एम०के० गाँधी
(ग) ए०के० सेन
(घ) रवीन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर :
(क) जे०के० मेहता

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र क्या है?
उत्तर :
अर्थशास्त्र वह सामाजिक विज्ञान है जिसके अंतर्गत सामाजिक, वास्तविक व सामान्य मनुष्यों की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
अर्थशास्त्र की धन केन्द्रित परिभाषा दीजिए तथा उसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
“अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन के स्वरूप तथा कारणों की खोज से संबंधित है।”
विशेषताएँ–

  • ‘धन’ ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री का केन्द्र-बिन्दु है।
  • व्यक्तिगत समृद्धि के द्वारा ही राष्ट्रीय धन एवं सम्पत्ति में वृद्धि संभव है।

प्रश्न 3.
अर्थशास्त्र की कल्याण केन्द्रित परिभाषा दीजिए एवं उसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
“अर्थशास्त्र मानव जीवन के सामान्य व्यवसाय का अध्ययन है; इसमें व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रियाओं के उस भाग की जाँच की जाती है जिसका भौतिक सुख के साधनों की प्राप्ति और उपयोग से बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है।”
विशेषताएँ-

  1. अर्थशास्त्र में सामान्य, सामाजिक तथा वास्तविक मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. अर्थशास्त्र मानव के जीवन के साधारण व्यवसाय’ का अध्ययन करता है। इसका आशय मनुष्य की उन क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनका संबंध दैनिक जीवन से है।

प्रश्न 4.
प्रो० रोबिन्स द्वारा दी गई अर्थशास्त्र की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें साध्य तथा सीमितता और अनेक उपयोग वाले साधनों से संबंधित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।”

प्रश्न 5.
रोबिन्स की परिभाषा अन्य परिभाषाओं से श्रेष्ठ है।’ इस कथन के पक्ष में उपयुक्त तर्क दीजिए।
उत्तर :

  • रोबिन्स की परिभाषा अधिक वैज्ञानिक है क्योंकि यह ‘आर्थिक समस्या’ अर्थात् चुनाव करने के पहलू की बात करते अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री को मजबूत आधार प्रदान करती है।
  • रोबिन्स की परिभाषा तर्कपूर्ण है।
  • यह परिभाषा अर्थशास्त्र के क्षेत्र को अधिक व्यापक करती है।

प्रश्न 6.
उपभोक्ता किसे कहते हैं?
उत्तर :
जब एक व्यक्ति अपनी आवश्यकता की प्रत्यक्ष संतुष्टि के लिए किसी वस्तु को खरीदता है तो वह ‘उपभोक्ता’ कहलाता है।

प्रश्न 7.
विक्रेता किसे कहते हैं?
उत्तर :
जो व्यक्ति वस्तुओं को स्वयं के लाभ के लिए दूसरों को बेचता है तो वह विक्रेता’ कहलाता है।

प्रश्न 8.
उत्पादक किसे कहते हैं?
उत्तर :
उत्पादक वह व्यक्ति है जो अपने लाभ के लिए वस्तुओं का उत्पादन करता है।

प्रश्न 9.
सेवाधारी किसे कहते हैं?
उत्तर :
वह व्यक्ति जो नौकरी करता है अर्थात् दूसरों के लिए कार्य करता है जिसके लिए उसे पारिश्रमिक दिया जाता है, ‘सेवाधारी’ कहलाता है।

प्रश्न 10.
सेवा प्रदाता किसे कहते हैं?
उत्तर :
वे व्यक्ति जो, भुगतान लेकर अन्य व्यक्तियों को सेवा प्रदान करते हैं (जैसे–डॉक्टर, वकील, बैंकर, अध्यापक आदि) सेवा प्रदाता’ कहलाते हैं।

प्रश्न 11
 आर्थिक क्रियाओं का अर्थ लिखिए।
उत्तर :
वे सभी क्रियाएँ जो धन प्राप्त करने के लिए की जाती हैं, “आर्थिक क्रियाएँ’ कहलाती हैं।

प्रश्न 12.
आर्थिक समस्या क्या है?
उत्तर :
असीमित आवश्यकताओं, सीमित साधनों एवं उनके वैकल्पिक प्रयोग के कारण उत्पन्न चुनाव की समस्या ही ‘आर्थिक समस्या है।

प्रश्न 13.
सांख्यिकी शब्द का एकवचन में क्या अर्थ है?
उत्तर :
एकवचन में सांख्यिकी शब्द से आशय ‘सांख्यिकी विज्ञान’ से है। ए०एल० बाउले ने इसे ‘गणना का विज्ञान’ कहा है।

प्रश्न 14.
बहुवचन में सांख्यिकी का क्या अर्थ है?
उत्तर :
बहुवचन में सांख्यिकी का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित संख्यात्मक तथ्ये हो सकते हैं; जैसे—राष्ट्रीय आय समंक, कृषि समंक आदि।

प्रश्न 15.
समंकों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :

  • समंक तथ्यों के समूह होते हैं।
  • समंक संख्या में व्यक्त किए जाते हैं।

प्रश्न 16.
सांख्यिकी की एक उपयुक्त परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी एक विज्ञान और कला है जो सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक व अन्य समस्याओं से संबंधित समंकों के संग्रहण, सारणीयन, प्रस्तुतीकरण, संबंध स्थापन, निर्वचन और पूर्वानुमान से संबंध रखती है ताकि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।

प्रश्न 17.
सांख्यिकीय रीतियों से क्या आशय है।
उत्तर :
सांख्यिकीय रीतियों के अंतर्गत उन सिद्धांतों एवं तकनीकों का समावेश होता है जिनका व्यवहार समूहों को संकलन, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और निर्वचन में किया जाता है और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

प्रश्न 18.
विवरणात्मक सांख्यिकी से क्या आशय है?
उत्तर :
विवरणात्मक सांख्यिकी से आशय समंकों के विधियन, वर्गीकरण, सारणीयन एवं केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन आदि से हैं। इनके द्वारा संख्यात्मक तथ्यों की मौलिक विशेषताओं को प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 19.
सांख्यिकी की प्रकृति क्या है?
उत्तर :
सांख्यिकी विज्ञान व कला दोनों हैं क्योंकि इसका प्रयोग केवल ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से ही नहीं किया जाता अपितु तथ्यों को समझने तथा उनसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकालने के उद्देश्य से भी किया जाता है।

प्रश्न 20.
सांख्यिकी के दो कार्य बताइए।
उत्तर :

  • तथ्यों को सूक्ष्म तथा सरल रूप में प्रस्तुत करना,
  • तथ्यों को तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत करना।

प्रश्न 21.
सांख्यिकी की दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर :

  • सांख्यिकी समूहों का अध्ययन करती है, व्यक्तिगत इकाइयों का नहीं।
  • सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों को ही अध्ययन करती है, गुणात्मक तथ्यों का नहीं। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र क्या है?
उत्तर :
मनुष्य की आवश्यकताएँ असीमित हैं किंतु इनकी तीव्रता में अंतर पाया जाता है। इनमें से कुछ आवश्यकताएँ अधिक तीव्र होती हैं जिनको संतुष्ट करना अत्यधिक आवश्यक होता है। समाज के सभी सदस्य इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं; उदाहरण के लिए वकील न्यायालय में बहस करता है, डॉक्टर व नर्स अस्पताल में मरीजों की देखभाल करते हैं, अध्यापक विद्यालय में पढ़ाता है, किसान खेत जोतता है और मजदूर पत्थर तोड़ता है इत्यादि। ये सभी क्रियाएँ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही की जाती हैं। मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किए गए ऐसे सभी प्रयत्नों का अध्ययन अर्थशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है।

अर्थशास्त्र की सामान्य परिभाषा–
“अर्थशास्त्र वह सामाजिक विज्ञान है जिसके अंतर्गत सामाजिक वास्तविक व सामान्य मनुष्यों की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का अध्ययन किया जाता है।”

प्रश्न 2.
अर्थशास्त्र की धन संबंधी परिभाषाओं के प्रमुख दोष बताइए।
उत्तर :
प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को धन का विज्ञान माना और उन्होंने धन के अंतर्गत केवल भौतिक वस्तुओं को ही सम्मिलित किया। उन्होंने एक ऐसे आर्थिक मनुष्य का अध्ययन किया जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना होता है। इन परिभाषाओं के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

  1. धन संबंधी परिभाषाओं में धन पर, जो कि साधन है, आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है। और मानव, जो कि साध्य है, की उपेक्षा की गई है। वास्तव में, धन तो केवल ‘साधन’ है जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, ‘साध्य’ (end) नहीं।
  2. प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने एक ऐसे आर्थिक मनुष्य की कल्पना की थी, जो केवल धन कमाने के लिए आर्थिक क्रियाएँ करता है। आर्थिक मनुष्य की उनकी धारणा पूर्णतः काल्पनिक थी।
  3. धन संबंधी परिभाषाओं में केवल धनोत्पादन एवं धन संग्रह पर ही बल दिया गया था, उनके न्यायपूर्ण वितरण एवं मानव कल्याण में वृद्धि पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था।

प्रश्न 3.
रोबिन्स की अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए और इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
रोबिन्स की परिभाषा-“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें साध्यों तथा सीमितता और उनके उपयोग वाले साधनों से संबंधित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।” परिभाषा की विशेषताएँ-प्रो० रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

  1. प्रो० रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र प्रत्येक क्रिया के आर्थिक पक्ष का अध्ययन करता है। इस प्रकार यह परिभाषा अर्थशास्त्र को आर्थिक-अनार्थिक क्रियाओं, भौतिक-अभौतिक कल्याण एवं साधारण-असाधारण व्यवसाय आदि के बंधन से मुक्त कर देती है।
  2. प्रो० रोबिन्स ने सामाजिक व्यवहार के स्थान पर मानव व्यवहार को अर्थशास्त्र का विषय-क्षेत्र माना है। इसलिए इस विज्ञान का कार्य-क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है।
  3. प्रो० रोबिन्स ने अर्थशास्त्र को केवल वास्तविक विज्ञान (Positive Science) माना है। उनकी दृष्टि में अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है। दूसरे शब्दों में, अर्थशास्त्री का क्या होना चाहिए से कोई संबंध नहीं है।
  4. यह परिभाषा सार्वभौमिक है। यह सभी देशों एवं सभी आर्थिक प्रणालियों (चाहे वह पूँजीवादी व्यवस्था हो, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा साम्यवादी) के सम्बन्ध में लागू होती है।
  5. आर्थिक समस्या का जन्म आवश्यकताओं की असीमितता एवं साधनों की दुर्लभता के कारण होता है। यह आर्थिक समस्या ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री है।।
  6. यह परिभाषा तार्किक दृष्टि से खरी एवं वैज्ञानिक है।

प्रश्न 4.
मार्शल तथा रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषाओं की तुलना कीजिए।
उत्तर :
मार्शल व रोबिन्स की परिभाषाओं की तुलना

  1. मार्शल की परिभाषा श्रेणी-विभाजक है। उन्होंने मानवीय क्रियाओं को भौतिक-अभौतिक, आर्थिक-अनार्थिक तथा साधारण-असाधारण व्यवसाय के रूप में वर्गीकृत किया है। इसके विपरीत, रोबिन्स की परिभाषा विश्लेषणात्मक है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र ‘चुनाव का विज्ञान’ है।
  2. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र में केवल ‘धन’ से सम्बन्धित क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। जबकि रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र प्रत्येक क्रिया का चुनाव करने की दृष्टि से अध्ययन करता
  3. मार्शल अर्थशास्त्र को सामाजिक विज्ञान’ मानते हैं, जबकि रोबिन्से उसे ‘मानव विज्ञान मानते हैं।
  4. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र मनुष्य की केवल आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करता है। इसके विपरीत, रोबिन्स के विचार में अर्थशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य की सभी प्रकार की क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
  5. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र ‘मानव कल्याण’ का शास्त्र है, जबकि रोबिन्स के अनुसार अर्थशास्त्र का कल्याण से कोई सम्बन्ध नहीं है। अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है।
  6. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र विज्ञान तथा कला दोनों है, जबकि रोबिन्स के अनुसार अर्थशास्त्र केवल वास्तविक विज्ञान है।
  7. मार्शल आर्थिक विश्लेषण के लिए निगमन तथा आगमन दोनों ही प्रणालियों का प्रयोग करते हैं, जबकि रोबिन्स आर्थिक विश्लेषण के लिए केवल निगमन रीति का ही प्रयोग करते हैं।
  8. मार्शल की परिभाषा सरल तथा व्यावहारिक है, जबकि रोबिन्स की परिभाषा वैज्ञानिक तथा सैद्धान्तिक है।

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र की एक विकास केन्द्रित परिभाषा दीजिए और इसकी विशेषताएँ बताइए। अथवा प्रो० सेमुअल्सन द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए और इसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
आर्थिक विकास की समस्या आज की ज्वलन्त समस्या है। अतः आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र की परिभाषा में ‘आर्थिक विकास की समस्या को विशेष महत्त्व दिया है।

प्रो० सेमुअल्सन द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा –
“अर्थशास्त्र इस बात का अध्ययन करता है कि व्यक्ति और समाज अनेक प्रयोग में आ सकने वाले उत्पादन के सीमित साधनों का चुनाव एक समयावधि में विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में लगाने और उनको समाज में विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के उपभोग हेतु वर्तमान व भविष्य में, बाँटने के लिए किस प्रकार करते हैं, ऐसा वे चाहे मुद्रा का प्रयोग करके करें अथवा इसके बिना करें। यह साधनों के आवंटन के स्वरूप में सुधार करने की लागतों व उपयोगिताओं का विश्लेषण करता है।”

परिभाषा की विशेषताएँ – उपर्युक्त परिभाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. साधन सीमित तथा वैकल्पिक प्रयोग वाले हैं जिनको विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है।
  2. ‘आर्थिक विकास की प्रकृति प्रावैगिक है। अत: इस समस्या को शामिल करने से यह परिभाषा ‘प्रावैगिक हो गई है।
  3. प्रो० सेमुअल्सन ने चुनाव की समस्या’ या ‘साधनों के वितरण की समस्या’ को ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ और ‘मुद्रा विनिमय प्रणाली’ दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं में लागू किया है। फलस्वरूप अर्थशास्त्र का क्षेत्र व्यापक हो गया है।
  4. यह परिभाषा सार्वभौमिक है और सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं (पूँजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी) में लागू होती है।
  5. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आय, उत्पादन, रोजगार व आर्थिक विकास आदि की समस्याओं का समावेश करके यह परिभाषा अर्थशास्त्र के क्षेत्र को विस्तृत कर देती है।

प्रश्न 6.
अर्थशास्त्र के विज्ञान होने के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र के विज्ञान होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं।—

  1. इसमें तथ्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन वैज्ञानिक रीति पर आधारित होता है।
  2. इसमें ‘कारण’ एवं परिणाम के सम्बन्ध पर आधारित नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।
  3. भावी घटनाओं के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाए जाते हैं।
  4. अनेक नियम सर्वव्यापकता को गुण रखते हैं; जैसे—उपयोगिता ह्रास नियम, माँग का नियम आदि।

प्रश्न 7.
“अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी है। इस सम्बन्ध में विभिन्न अर्थशास्त्रियों के विचार बताइए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र एक विज्ञान है, यह सर्वसम्मति सेस्वीकार किया जाता है किन्तु अर्थशास्त्रियों में इस बारे में मतभेद है कि यह वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान है अथवा नहीं। सीनियर, केयरनीज, रोबिन्स, सेमुअल्सन व बोल्डिग अर्थशास्त्र को केवल वास्तविक विज्ञान मानते हैं। रोबिन्स के अनुसार-“अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है।” प्रो० बोल्डिग के अनुसार—अर्थशास्त्री चुनाव का अध्ययन करता है, उनका मूल्यांकन नहीं।” इसके विपरीत, वर्तमान समय में अधिकांश अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र को वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी मानते हैं वे यह स्वीकार करते हैं-“अर्थशास्त्री का कार्य केवल व्याख्या या खोज करना ही नहीं अपितु समर्थन तथा निंदा करना भी है।”

प्रो० पीगू के अनुसार – 
“इसका (अर्थशास्त्र का) प्रमुख महत्त्व तो इस बात में है कि वह नीतिशास्त्र से अलग नहीं किया जी सकता।” इस प्रकार अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी है।

प्रश्न 8.
अर्थशास्त्र कला है।’ इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र कला है क्योंकि अर्थशास्त्र की अनेक शाखाएँ व्यावहारिक समस्याओं का हल बताती हैं; उदाहरण के लिए अर्थशास्त्री बताता है कि ब्याज की उचित दर क्या होनी चाहिए, आदर्श मजदूरी व पूर्ण रोजगार के स्तर पर कैसे पहुँचा जाए, किन करों के द्वारा बजट के घाटे को पूरा किया जाए। कीन्स, मिल, मार्शल व पीगू आदि अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र को कला मानते हैं। उनके अनुसार, कला व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने का एक साधन है। प्रो० पीगू के अनुसार-“हमारा मनोवेग एक दार्शनिक जैसा नहीं होता जो ज्ञान के लिए ही ज्ञान प्राप्त करता है बल्कि वह एक शरीर विज्ञाता (डॉक्टर) के दृष्टिकोण की भाँति होना चाहिए, जो ज्ञान इसलिए प्राप्त करता है क्योंकि वह रोग तथा पीड़ा को दूर करने में सहायता करता है।”

प्रश्न 9.
अर्थशास्त्र की सीमाएँ बताइए।
उत्तर :
विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अर्थशास्त्र की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. अर्थशास्त्र केवल मानवीय क्रियाओं का अध्ययन करता है, पशु-पक्षी अथवा जीव-जन्तुओं की क्रियाओं का नहीं।
  2. अर्थशास्त्र में वास्तविक मनुष्यों की क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है काल्पनिक मनुष्यों की क्रियाओं का नहीं।
  3. अर्थशास्त्र में केवल सामान्य मनुष्य के कार्यों का अध्ययन किया जाता है; पागल, कंजूस, शराबी आदि के कार्यों का अध्ययन नहीं।
  4. अर्थशास्त्र केवल सामाजिक मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करता है और धन आर्थिक क्रिया का मापदण्ड है।
  5. अर्थशास्त्र के नियम प्राकृतिक विज्ञानों की तुलना में कम निश्चित होते हैं।

प्रश्न 10.
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का महत्त्व – आर्थिक विश्लेषण में समंक अत्यधिक उपयोगी होते हैं। मार्शल के अनुसार-“समंक वे तृण हैं, जिनसे मुझे अन्य अर्थशास्त्रियों की भाँति ईंटें बनानी हैं।” अर्थशास्त्र की प्रत्येक शाखा में सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है|

  1. उपभोग के क्षेत्र में – उपभोग समंक यह बताते हैं कि विभिन्न आय-वर्ग किस प्रकार अपनी आय को व्यय करते हैं, उनका रहन-सहन का स्तर तथा उनकी करदान क्षमता क्या है।
  2. उत्पादन के क्षेत्र में – उत्पादन समंक माँग एवं पूर्ति में समायोजन करने में सहायक होते हैं। ये समंक देश की उत्पादकता के मापक होते हैं।
  3. विनिमय के क्षेत्र में – समंकों के माध्यम से बाजार माँग व पूर्ति की विभिन्न दशाओं पर आधारित मूल्य निर्धारण के नियम व लागत मूल्य का अध्ययन किया जाता है।
  4. वितरण के क्षेत्र में – समंकों की सहायता से ही राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है, इसीलिए कहा जाता है-“कोई भी अर्थशास्त्री सांख्यिकीय तथ्यों के विस्तृत अध्ययन के बिना उत्पादन या वितरण संबंधी निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न नहीं करेगा।”

प्रश्न 11.
सांख्यिकी की सीमाएँ बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकी की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. सांख्यिकी समूहों का अध्ययन करती है, व्यक्तिगत इकाइयों का नहीं।
  2. सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का ही अध्ययन करती है, गुणात्मक तथ्यों को नहीं।
  3. सांख्यिकी के परिणाम असत्य सिद्ध हो सकते हैं, यदि उनका अध्ययन बिना संदर्भ के किया जाए।
  4. सांख्यिकीय समंकों में एकरूपता व सजातीयता होनी आवश्यक है, विजातीय समंकों से सार्थक निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।
  5. सांख्यिकी के नियम दीर्घकाल में तथा औसत रूप से ही सत्य होते हैं।
  6. सांख्यिकी की रीति किसी समस्या के अध्ययन की विभिन्न रीतियों में से एक रीति है, एकमात्र रीति नहीं।
  7. सांख्यिकी विश्लेषण को साधन मात्र है, समस्या का समाधान नहीं।

प्रश्न 12.
सांख्यिकी के प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकी के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. सांख्यिकी का कार्य तथ्यों को सूक्ष्म तथा सरल रूप में प्रस्तुत करना है।
  2. सांख्यिकी समंकों के बीच तुलनात्मक अध्ययन के लिए आधार प्रस्तुत करती है।
  3. सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण कार्य सामान्य वितरणों को संक्षिप्त एवं निश्चित रूप में प्रस्तुत करना है।
  4. सांख्यिकी का एक कार्य व्यक्तिगत ज्ञान व अनुभव की वृद्धि करना है।
  5. सांख्यिकी सरकार का नीति-निर्माण में पथ-प्रदर्शन करती है।
  6. सांख्यिकी समंकों की सहायता से अन्य विज्ञानों के नियमों की सत्यता की जाँच की जाती है।
  7. सांख्यिकी नीति प्रभावों के मापने में सहायता करती है।
  8. सांख्यिकी दो या अधिक तथ्यों के मध्य संबंधों का अध्ययन करती है।
  9. सांख्यिकी द्वारा वर्तमान तथ्यों व परिस्थितियों के आधार पर भविष्य के बारे में भी अनुमान किया जा सकता है।

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो धन की विवेचना करता है।” इस कथन की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
अथवा प्रो० एडम स्मिथ व उसके अनुयायियों द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषाओं की म आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
अथवा अर्थशास्त्र की ‘धन-केन्द्रित परिभाषाओं को लिखिए तथा इनकी आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र की धन सम्बन्धी परिभाषाएँ
प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को ‘धन का विज्ञान माना है। प्रो० एडम स्मिथ, जिन्हें ‘अर्थशास्त्र को जनक’ कहा जाता है, ने अपनी पुस्तके An Enquiry into the Nature and Causes of wealth of Nations’ में अर्थशास्त्र को इन शब्दों में परिभाषित किया है-

“अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन के स्वरूप तथा कारणों की खोज से सम्बन्धित है।” उपर्युक्त परिभाषा के समर्थन में स्मिथ के समर्थकों द्वारा दी गई कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नांकित हैं
(i) जे०बी० से के अनुसार –“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो धन की विवेचना करता है।”
(i) एफ०एल० वाकर के अनुसार –“अर्थशास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जो धन से सम्बन्धित है।” धन सम्बन्धी परिभाषाओं की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. ‘धन’ ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री का केन्द्र-बिन्दु है।
  2. मनुष्य की अपेक्षा धन अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मानवीय सुख का एकमात्र आधार धन ही है। धन के अभाव में मानवीय सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  3. ‘धन’ के अन्तर्गत केवल भौतिक वस्तुओं को शामिल किया जाता है, सेवाओं को नहीं।
  4. व्यक्तिगत समृद्धि द्वारा ही राष्ट्रीय धन एवं सम्पत्ति में वृद्धि सम्भव है।
  5. मनुष्य केवल स्व:हित (Self-interest) की भावना से प्रेरित होकर आर्थिक क्रियाएँ करता है।

अतः वह ‘आर्थिक मनुष्य’ (Economic Man) की भाँति है। उसका उद्देश्य मात्र धन कमाना होता

धन सम्बन्धी परिभाषाओं की आलोचना
धन सम्बन्धी परिभाषाएँ दोषपूर्ण थीं। अतः इनकी निम्नलिखित आधारों पर तीव्र आलोचनाएँ की गईं–

  1. मनुष्य की अपेक्षा धन पर अधिक बल-धन सम्बन्धी परिभाषाओं में धन पर जो कि साधन है, आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है और मानव, जो कि साध्य है, की उपेक्षा की गई है। वास्तव में, धन तो केवल ‘साधन है जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, ‘साध्य’ (end) नहीं।।
  2. अर्थशास्त्र का संकुचित क्षेत्र-धन सम्बन्धी परिभाषाओं ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र को संकुचित कर दिया है क्योंकि प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने धन के अन्तर्गत केवल भौतिक पदार्थों को ही शामिल किया था, सेवाओं (डॉक्टर, वकील, अध्यापक आदि की सेवाएँ) को नहीं। यह अनुचित था।
  3. आर्थिक मनुष्य की कल्पना प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने एक ऐसे आर्थिक मनुष्य (Economic Man) की कल्पना की थी, जो केवल धन की प्रेरणा और अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर कार्य करता है तथा जिस पर देशप्रेम, धर्म, परोपकार आदि भावनाओं को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आर्थिक मनुष्य की यह धारणा पूर्णतः कल्पित थीं।
  4. धन के न्यायपूर्ण वितरण की उपेक्षा-इन परिभाषाओं में केवल धनोत्पादन एवं धन संग्रह पर ही बल दिया गया है तथा धन के उचित वितरण तथा प्रयोग द्वारा मानव-कल्याण में होने वाली वृद्धि पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

उपर्युक्त दोषों के कारण कार्लाइल (Carlyle), रस्किन (Ruskin), विलियम मॉरिस (William Morris) आदि विद्वानों ने अर्थशास्त्र को ‘कुबेर की विद्या’, ‘घृणित विज्ञान’, ‘रोटी और मक्खन का विज्ञान’ कहकर इसकी कड़ी आलोचना की।

प्रश्न 2.
“राजनीतिक अर्थव्यवस्था अथवा अर्थशास्त्र मानव के सामान्य व्यवसायं का अध्ययन है। यह व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रिया के उस भार्ग का अध्ययन करता है जो सुख के भौतिक साधनों की प्राप्ति तथा प्रयोग से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है।” अर्थशास्त्र के इस दृष्टिकोण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
अथवा अर्थशास्त्र मानव के भौतिक कल्याण का अध्ययन है।” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। अथवा मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा को समझाइए।
उत्तर :
मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा
मार्शल की परिभाषा ‘मानव कल्याण पर केन्द्रित है। धन तो मानव कल्याण में वृद्धि का साधन मात्र है। मार्शल ने अपनी परिभाषा को अन्तिम रूप इस प्रकार दिया है अर्थशास्त्र मानव जीवन के सामान्य व्यवसाय का अध्ययन है; इसमें व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रियाओं के उस भाग की जाँच की जाती है जिसका भौतिक सुख के साधनों की प्राप्ति और उपयोग से बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है।”

मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की विशेषताएँ

  1. मार्शल ने अर्थशास्त्र को ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ से अलग करके एक स्वतन्त्र विषय ‘अर्थशास्त्र का नाम दिया।
  2. मार्शल ने धन के स्थान पर मनुष्य को प्रमुख स्थान दिया, क्योंकि धन ‘साधन’ है और मनुष्य ‘साध्य’। इस प्रकार उन्होंने मानव को अर्थशास्त्र का प्रमुख अंग माना।
  3. अर्थशास्त्र में सामान्य, सामाजिक तथा वास्तविक मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
  4. अर्थशास्त्र मानव के जीवन के साधारण व्यवसाय’ का अध्ययन करता है। इसका आशय मनुष्य की उन क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनका सम्बन्ध दैनिक जीवन से है।
  5. अर्थशास्त्र में मनुष्य की क्रियाओं के केवल उस भाग का अध्ययन होता है, जिसका सम्बन्ध धन कमाने व खर्च करने से होता है।
  6. अर्थशास्त्र के अन्तर्गत केवल उन्हीं आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जो आर्थिक कल्याण में वृद्धि करती हैं।
  7. अर्थशास्त्र केवल ऐसे मनुष्य की क्रियाओं का अध्ययन करता है, जो समाज में रहता है, समाज से प्रभावित होता है और समाज को प्रभावित करता है।
  8. अर्थशास्त्र एक विज्ञान है और उसका अध्ययन वैज्ञानिक आधार पर किया जाना चाहिए।

मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की आलोचना
रोब्रिन्स ने कल्याण केन्द्रित परिभाषाओं की कटु आलोचना की है। मुख्य आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  ये परिभाषाएँ श्रेणी विभाजक हैं, विश्लेषणात्मक नहीं-

    • मार्शल ने अर्थशास्त्र के अध्ययन को केवल भौतिक साधनों की प्राप्ति तथा उपयोग तक ही सीमित रखा है, परन्तु साधन अभौतिक भी होते हैं; जैसे-डॉक्टर, वकील, अध्यापक, मजदूर आदि की सेवाएँ। ये सेवाएँ धन-प्राप्ति में सहायक होती हैं।
    • मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र में मनुष्य की केवल आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। रोबिन्स के अनुसार, क्रियाओं को आर्थिक एवं अनार्थिक–इने दो भागों में बाँटना अनुचित है; क्योंकि एक ही प्रकार की क्रिया एक समय आर्थिक हो सकती है और दूसरे समय अनार्थिक।
    • मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र में मनुष्य के ‘साधारण व्यवसाय का अध्ययन’ है, परन्तु क्रियाओं को ‘साधारण व्यवसाय’ और ‘असाधारण व्यवसाय में बाँटना सम्भव नहीं है।
  2. अर्थशास्त्र को कल्याण से सम्बद्ध करना अनुचित – प्रो० रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र र्को कल्याण से सम्बद्ध करना अनुचित है, क्योंकि मानव कल्याण एक मनोवैज्ञानिक धारणा है जिसकी सही-सही माप सम्भव नहीं है।
  3. अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है – रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है। उद्देश्य अच्छे हों अथवा बुरे, अर्थशास्त्र का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है।
  4. अर्थशास्त्र एक मानव विज्ञान है – प्रो० मार्शल ने अर्थशास्त्र को ‘सामाजिक विज्ञान’ बताया है, परन्तु प्रो० रोबिन्स इसे मानव विज्ञान’ मानते हैं।
  5. अर्थशास्त्र का संकुचित क्षेत्र – कल्याण प्रधान परिभाषाओं ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र को संकुचित कर दिया है क्योकि इनके अनुसार अनार्थिक, अभौतिक तथा असामान्य क्रियाओं का अध्ययन अर्थशास्त्र के अन्तर्गत नहीं किया जाता है।
  6. अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है – मार्शल की परिभाषा के आधार पर अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान बन गया है, जबकि रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है, आदर्श विज्ञान नहीं। निष्कर्ष–उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि मार्शल ने अर्थशाग्र की धन सम्बन्धी परिभाषाओं में व्यापक सुधार करके अर्थशास्त्र को एक सम्मानजनक स्थान टि… आज भी मार्शल की परिभाषा सरल एवं व्यावहारिक मानी जाती है।

प्रश्न 3.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जो मानव व्यहार का अध्ययन साध्यों एवं सीमित तथा वैकल्पिक प्रयोगों वाले साधनों के बीच सम्बन्ध के रूप में करता है”-रोबिन्स। अर्थशास्त्र की इस परिभाषा की आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
अथवा प्रो० एल रोबिन्स द्वारा दी गई अर्थशास्त्र की परिभाषा लिखिए और उसका आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :
रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा प्रो० रोबिन्स ने अपनी पुस्तक ‘An Essay on the Nature and Significance of Economic Science में अर्थशास्त्र की परिभाषा एक नए दृष्टिकोण से दी जो इस प्रकार है अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें साध्यों तथा सीमितता और अनेक उपयोग वाले साधनों से सम्बन्धित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।”

रोबिन्स की परिभाषा के मूल तत्त्व
प्रो० रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा के मूल तत्त्व निम्नलिखित हैं

  • मनुष्य की आवश्यकताएँ असीमित होती हैं और जैसे ही एक आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है, वैसे ही दूसरी आवश्यकता सामने आ जाती है।
  • मनुष्य के पास साधन सीमित होते हैं।
  • साध्यों (आवश्यकताओं) की तीव्रता में अन्तर होता है।
  • साधनों के वैकल्पिक प्रयोग सम्भव हैं अर्थात् आवश्यकता पूर्ति के एक ही साधन का अनेक प्रकार से प्रयोग हो सकता है।

असीमित आवश्यकताओं तथा वैकल्पिक प्रयोग वाले सीमित साधनों के कारण मनुष्य के सामने चुनाव की समस्या आती है और आर्थिक समस्या का जन्म होता है। यही आर्थिक समस्या आर्थिक जीवन (अर्थशास्त्र) का आधार है।

परिभाषा की आलोचना
अनेक अर्थशास्त्रियों; जैसे—डरबिन, वूटन, फ्रेजर आदि ने रोबिन्स की परिभाषा की कड़ी आलोचना की है। कुछ प्रमुख आलोचनाएँ अग्रलिखित हैं

  1. अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति पूर्णतः तटस्थ नहीं है-प्रो० रोबिन्स की यह धारणा कि अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति पूर्णतः तटस्थ है, गलत है। व्यवहार में अर्थशास्त्र को कल्याण की भावना से पूर्णत: मुक्त नहीं किया जा सकता। स्वयं रोबिन्स की परिभाषा में ‘कल्याण’ भावना का समावेश
  2. इस परिभाषा से अर्थशास्त्र का क्षेत्र एक-साथ अत्यन्त विस्तृत’ एवं ‘अत्यन्त संकुचित’ हो गया है-प्रो० रोबिन्स ने अर्थशास्त्र के अन्तर्गत सभी प्रकार के मनुष्यों की सभी प्रकार की क्रियाओं के अध्ययन का समावेश करके उसके क्षेत्र को अत्यधिक व्यापक बना दिया है। दूसरी
    ओर, प्रो० रोबिन्स की परिभाषा ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित भी कर दिया है। इसका कारण यह है कि रोबिन्स का अर्थशास्त्र ‘साधनों की दुर्लभता से उत्पन्न समस्याओं का तो अध्ययन करता है किन्तु ‘प्रचुरता से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का अध्ययन नहीं करता।।
  3. अर्थशास्त्र केवल वास्तविक विज्ञान नहीं है-रोबिन्स ने अर्थशास्त्र को ‘विशुद्ध वास्तविक विज्ञान माना है। इसके विपरीत, वास्तविकता यह है कि अर्थशास्त्र में केवल वास्तविक विज्ञान है। वरन् यह आदर्श विज्ञान और कला भी है।
  4. ‘साध्यों’ एवं ‘साधनों के बीच अन्तर स्पष्ट नहीं है—प्रो० रोबिन्स ने अपनी परिभाषा में ‘साध्यों एवं ‘साधनों के मध्य अन्तर को स्पष्ट नहीं किया है।
  5. ‘सीमित’ एवं वैकल्पिक प्रयोग’ शब्दों का प्रयोग अनावश्यक–साधन सदैव सीमित होते हैं। एवं उनका वैकल्पिक प्रयोग किया जा सकता है। अत: परिभाषा में इन शब्दों का प्रयोग अनावश्यक है।
  6. अन्य शास्त्रों से अन्तर स्पष्ट करना सरल नहीं-यदि रोबिन्स की परिभाषा का व्यवहार में पालन किया आए तो अर्थशास्त्र एवं अन्य शास्त्रों में अन्तर करना सरल नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने . अर्थशास्त्र के अन्तर्गत सभी प्रकार के मनुष्यों की सभी प्रकार की क्रियाओं को शामिल किया है।
  7. केवल निगमन प्रणाली का प्रयोग-प्रो० रोबिन्स ने अपने आर्थिक विश्लेषण में केवल निगमन प्रणाली का ही प्रयोग किया है, जबकि सन्तुलित निष्कर्षों की प्राप्ति के लिए आगमन तथा निगमन दोनों ही प्रणालियों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  8. स्थैतिक परिभाषा-प्रो० रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की प्रकृति स्थैतिक है, क्योंकि यह ‘आर्थिक विकास एवं उससे उत्पन्न समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देती।
  9. मानव व्यवहार सदैव विवेकपूर्ण नहीं—प्रो० रोबिन्स की मान्यता है कि मानव व्यवहार सदैव विवेकपूर्ण होता है, जबकि वास्तविक जीवन में हम ऐसा नहीं पाते।
  10. सामाजिक पक्ष की उपेक्षा-प्रो० रोबिन्स ने समाज के अन्दर तथा बाहर रहने वाले सभी प्रकार के मनुष्यों को अर्थशास्त्र का विषय माना है। यह गलत है, क्योंकि जब तक आर्थिक समस्याएँ सामाजिक रूप नहीं ले लेतीं, उन्हें अर्थशास्त्र के अन्तर्गत शामिल नहीं किया जा सकता।
  11. सैद्धान्तिक पक्ष की प्रधानता–रोबिन्स की परिभाषा सैद्धान्तिक अधिक और व्यावहारिक कम है। इस कारण यह सामान्य लोगों के लाभ एवं उपयोग का शास्त्र नहीं रह गया है। इसके सैद्धान्तिक स्वरूप ने विषय को जटिल बना दिया है।

प्रश्न 4.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो आवश्यकताविहीन अवस्था प्राप्त करने में मानव व्यवहार का एक साधन के रूप में अध्ययन करता है।” प्रो० जे०के० मेहता द्वारा प्रस्तुत अर्थशास्त्र की इस परिभाषा का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
अथवा ‘अर्थशास्त्र आवश्यकताविहीनता का शास्त्र है।’ आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
प्रो० जे० के० मेहता द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा
अर्थशास्त्र एक विज्ञान है जो आवश्यकताविहीन अवस्था प्राप्त करने में मानव, व्यवहार का एक साधन के रूप में अध्ययन करता है।”
परिभाषा की व्याख्या – उपर्युक्त परिभाषा मूलतः भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के अनुरूप है.तया भारतीय धर्म, दर्शन एवं परम्परा से प्रेरित है। प्रो० मेहता के अनुसार, अर्थशास्त्र का प्रमुख उद्देश्य ‘वास्तविक सुख’ को अधिकतम करना है, जो आवश्यकताओं को न्यूनतम करके ही प्राप्त किया जा सकता है। वे सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श में विश्वास रखते हुए आवश्यकताओं को न्यूनतम करके अन्ततः उन्हें समाप्त कर देने पर बल देते हैं। जे०के० मेहता के शब्दों में-“आवश्यकता से मुक्ति पाने की समस्या ही आर्थिक समस्या है।”

प्रो० मेहता के अनुसार, सुख वह अनुभव है, जो मनुष्य को उस स्थिति में प्राप्त होता है जब उसे आवश्यकता का अनुभव ही न हो। प्रो० मेहता के अनुसार, इच्छारहित अवस्था में जबकि मानव का मस्तिष्क पूर्ण सन्तुलन में होता है, जो अनुभव प्राप्त होता है, उसे ‘सुख’ कहते हैं। अर्थशास्त्र का उद्देश्य इसी सुख को अधिकतम करना है।

सुख की स्थिति प्राप्त करने के निम्नलिखित दो उपाय हैं

  • बाह्य शक्तियों का, जो असन्तुलन की अवस्था उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं, इस प्रकार से समन्वये किया जाए कि वे मस्तिष्क के साथ मेल खाएँ।
  • मस्तिष्क को ऐसी अवस्था में रखा जाए जिससे वह बाह्य शक्तियों से प्रभावित न हो। इस हेतु मस्तिष्क को दबाने की नहीं बल्कि उसे ‘शिक्षित करने की आवश्यकता है।

ऐसी स्थिति को एकदम प्राप्त करना मनुष्य के लिए असम्भव है। अतः उसे धीरे-धीरे अपनी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए।

परिभाषा की विशेषताएँ
प्रो० मेहता द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं–

  • यह परिभाष ‘मनोविज्ञान तथा नैतिकता’ पर आधारित है।
  • प्रो० मेहता ‘सन्तुष्टि के स्थान पर ‘सुख की प्राप्ति को मानव जीवन का लक्ष्य मानते हैं।
  • अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान है।
  • यह परिभाषा ‘साम्यवादी अवस्था’ का समर्थन करती है।
  • प्रो० मेहता के अर्थशास्त्र की प्रकृति स्थैतिक है।

परिभाषा की आलोचना
प्रो० मेहता की परिभाषा की निम्नवत् आलोचना की गई है

  1. प्रो० मेहता की परिभाषा अर्थशास्त्र को अनावश्यक रूप से धर्म, दर्शन तथा नीतिशास्त्र से सम्बन्धित कर देती है और इस प्रकार अर्थशास्त्र को अव्यावहारिक बना देती है।
  2. प्रो० मेहता अर्थशास्त्र को केवल आदर्श विज्ञान मानते हैं, जबकि यह आदर्श विज्ञान होने के साथ-साथ वास्तविक विज्ञान भी है।
  3. प्रो० मेहता को दृष्टिकोण काल्पनिक तथा अव्यावहारिक है।
  4. प्रो० मेहता की परिभाषा भौतिक विकास की विरोधी है, क्योंकि सभ्यता के विकास से मनुष्य की आवश्यकताएँ बढ़ती हैं न कि घटती हैं।
  5. प्रो० मेहता की परिभाषा को स्वीकार कर लेने पर अर्थशास्त्र का महत्त्व ही समाप्त हो जाता है।

वास्तव में, जब मनुष्य आवश्यकताविहीनता की स्थिति में पहुँच जाता है तो उसके लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन ही व्यर्थ हो जाता है। अत: इस परिभाषा का कोई व्यावहारिक महत्त्व नहीं है।

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री क्या है? विवेचना कीजिए।
उत्तर :

अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री

अर्थशास्त्र मानव के व्यवहारों का अध्ययन है। मानव के आर्थिक व्यवहारों को अग्रलिखित पाँच भागों में बाँटा जा सकता है। ये विभाग ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री माने जाते हैं

1. उपभोग – उपभोग समस्त आर्थिक क्रियाओं का आदि तथा अंत है। इसके अंतर्गत मानवीय आवश्यकताओं, उनकी विशेषताओं, उनका वर्गीकरण, तुष्टिगुण व उससे संबंधित नियमों एवं सिद्धांतों, माँग का नियम व माँग की लोच आदि का अध्ययन किया जाता है।

2. उत्पादन –
वस्तुओं में आर्थिक उपयोगिता का सृजन ही उत्पादन है। अर्थशास्त्र के इस विभाग के अन्तर्गत उत्पादन का अर्थ, उत्पादन के विभिन्न नियम, उत्पादन प्रणालियाँ तथा उत्पादन के उपादानों एवं उनसे संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

3. विनिमय –
उत्पादित वस्तुओं का विनिमय किया जाता है, जिसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करता है। अर्थशास्त्र के इस विभाग के अन्तर्गत विभिन्न बाजार दशाओं में मूल्य निर्धारण, उत्पादन लागत तथा मुद्रा एवं बैंकिंग की विभिन्न प्रणालियों एवं समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

4. वितरण – 
आधुनिक युग में उत्पादन-कार्य उत्पत्ति के सभी साधनों के परस्पर सहयोग द्वारा किया जाता है और उत्पादित धन उत्पत्ति के विभिन्न साधनों में वितरित किया जाता है, यही वितरण है। अर्थशास्त्र के इस विभाग के अन्तर्गत राष्ट्रीय आय, उत्पत्ति के साधनों के पारिश्रमिक—लगान, मजदूरी, ब्याज, लाभ आदि के निर्धारण सम्बन्धी सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।

5. लोक वित्त या राजस्व – 
राजस्व अर्थशास्त्र का एक नया किंतु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विभाग है। इसके अन्तर्गत कर निर्धारण के सिद्धांतों, सार्वजनिक आय, सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक ऋण तथा इनसे संबंधित सिद्धांतों, कल्याणकारी राज्य की स्थापना आदि महत्त्वपूर्ण विषयों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 6.
अर्थशास्त्र की प्रकृति की विवेचना कीजिए। अथवा अर्थशास्त्रविज्ञान है अथवा कला अथवा दोनों? स्पष्ट कीजिए।
अथवा ‘अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है। क्या आप रोबिन्स के इस तर्क से सहमत हैं? यदि नहीं, तो क्यो
उत्तर :
अर्थशास्त्र की प्रकृति से आशय यह जानने से है कि अर्थशास्त्र विज्ञान है अथवा कला। अर्थशास्त्र विज्ञान है तो उसका स्वरूप क्या है अर्थात् अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान है अथवा आदर्श विज्ञान।

विज्ञान का अर्थ – विज्ञान ज्ञान का एक क्रमबद्ध अध्ययन है, जो कारण तथा परिणाम के मध्य पारस्परिक संबंध स्थापित करता है। विज्ञान में विषय विशेष का नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। किसी भी शास्त्र को ‘विज्ञान’ होने के लिए उसमें निम्नांकित बातें होनी चाहिए

  • ज्ञान का अध्ययन क्रमबद्ध होना चाहिए।
  • तथ्यों के विश्लेषण के फलस्वरूप कुछ नियमों एवं सिद्धांतों का प्रतिपादन होना चाहिए।
  • इन सिद्धांतों का निर्माण कारण और परिणाम के संबंधों के आधार पर होना चाहिए।
  • इन नियमों में सर्वव्यापकता का गुण होना चाहिए।
  • विज्ञान द्वारा एक निश्चित भविष्यवाणी की जानी चाहिए।

‘अर्थशास्त्र विज्ञान है, के पक्ष में तर्क – ‘अर्थशास्त्र विज्ञान है, इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

  • इसमें तथ्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन वैज्ञानिक नीति पर आधारित होता है।
  • कारण एवं परिणाम के संबंध पर आधारित नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।
  • भावी घटनाओं के संबंध में पूर्वानुमान लगाए जाते हैं।
  • अनेक नियम सर्वव्यापकता का गुण रखते हैं; जैसे—उपयोगिता ह्रास नियम, माँग का नियम आदि।

विज्ञान के स्वरूप – विज्ञान दो प्रकार के होते हैं–
(अ) वास्तविक विज्ञान,
(ब) आदर्श विज्ञान।

(अ) वास्तविक विज्ञान – वास्तविक विज्ञान किसी विषय की वास्तविक रूप में अध्ययन करता है। इसमें क्या है? (What is?) का अध्ययन किया जाता है। यह ‘वस्तुस्थिति कैसी है?’, का उत्तर देता है। यह वस्तुस्थिति का अध्ययन करके कारण एवं परिणाम में संबंध स्थापित करता है।

अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान है – अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है, क्योंकि इसमें वास्तविक आर्थिक घटनाओं के कारण तथा परिणामों का विवेचन किया जाता है और इन संबंधों को नियमों के द्वारा व्यक्त किया जाता है; उदाहरण के लिए माँग को नियम यह बताता है कि कीमत में वृद्धि होने पर माँग में कमी और कीमत में कमी होने पर माँग में वृद्धि होती है। यहाँ कीमत में परिवर्तन ‘कारण’ और माँग में परिवर्तन परिणाम है।

(ब) आदर्श विज्ञान – आदर्श विज्ञान का मुख्य कार्य मानवीय आचरण के लिए आदर्श प्रस्तुत करना है। यह ‘क्या होना चाहिए? (What ought to be?) का उत्तर देता है और बताता है कि हमें किन आदर्शों का पालन करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह हमें वांछनीय और अवांछनीय का ज्ञान कराता है।

अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान है – अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान है, क्योंकि यह हमें मानवीय कल्याण को अधिकतम करने के लिए आर्थिक आदर्शों का ज्ञान कराता है; उदाहरण के लिए एक अर्थशास्त्री केवल मजदूरी निर्धारण के विभिन्न सिद्धांतों का ही अध्ययन नहीं करता अपितु वह यह भी बताता है कि उचित मजदूरी क्या होनी चाहिए। इसी प्रकार अर्थशास्त्र में हम केवल इस बात का ही अध्ययन नहीं करते कि लगान कैसे निर्धारित होता है। अपितु इस बात का भी अध्ययन करते हैं कि लगान की आदर्श मात्रा क्या होनी चाहिए।

इस प्रकार अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी है।

कला – कला का आशय ‘किसी उद्देश्य को प्राप्त करने की विधियों से है। वास्तव में, कला ‘आदर्श को प्राप्त करने के सर्वोत्तम तरीका बतलाती है। यह वास्तविक विज्ञान और आदर्श विज्ञान के बीच पुल का कार्य करती है। कोसा के अनुसार–एक विज्ञान हमें जानने के संबंध में बतलाता है और कला करने के संबंध में बतलाती है। दूसरे शब्दों में–‘विज्ञान व्याख्या तथा खोज करता है, कला निर्देशन करती है।”

अर्थशास्त्र कला है – अर्थशास्त्र कला है, क्योंकि अर्थशास्त्र की अनेक शाखाएँ व्यावहारिक समस्याओं का हल बनाती हैं; उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्री बताता है कि ब्याज की उचित दर क्या होनी चाहिए, आदर्श मजदूरी व पूर्ण रोजगार के स्तर पर कैसे पहुंच जाए, किन करों के द्वारा बजट के घाटे को पूरा किया जाए? कींस, मिल, मार्शल व पीगू आदि अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र को कला मानते हैं। उनके अनुसार, कला व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने का एक साधन है।

निष्कर्ष – प्रो० पीगू के अनुसार-“अर्थशास्त्र न केवल विज्ञान है अपितु कला भी है।” वे अर्थशास्त्र के व्यावहारिक पक्ष को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। वास्तव में, अर्थशास्त्र केवल प्रकाशदायक ही नहीं अपितु फलदायक भी है। प्रो० चैपमैन के शब्दों में–“अर्थशास्त्र आर्थिक तथ्यों के वांछित रूपों के बारे में जिज्ञासा करता हुआ एक आदर्श विज्ञान है तथा वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने के तरीकों को ज्ञात करते हुए एक कला है।’ संक्षेप में, अर्थशास्त्र विज्ञान एवं कला दोनों है।

प्रश्न 7.
आधुनिक युग में अर्थशास्त्र के अध्ययन का क्या महत्त्व है? अथवा अर्थशास्त्र के अध्ययन का सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक लाभ बताइए।
उत्तर :

अर्थशास्त्र के अध्ययन का महत्त्व

मार्शल के शब्दों में-“अर्थशास्त्र के अध्ययन का उद्देश्य प्रथम तो ज्ञान के लिए ज्ञान प्राप्त करना है। तथा दूसरे व्यावहारिक जीवन में मार्गदर्शन करना है।” नि:संदेह अर्थशास्त्र केवल ज्ञानवर्द्धक ही नहीं बल्कि फलदायक भी है। अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होने वाले लाभों को दो भागों में बाँटा जाता है
(I) सैद्धांतिक लाभ तथा
(II) व्यावहारिक लाभ।

(I) अर्थशास्त्र के अध्ययन के सैद्धांतिक लाभ
सैद्धांतिक दृष्टि से अर्थशास्त्र के अध्ययन से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं|

  1. ज्ञान में वृद्धि–अर्थशास्त्र के अध्ययन से मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती है। मनुष्य को बेरोजगारी, अति-जनसंख्या, निर्धनता, तेजी व मन्दी आदि विभिन्न आर्थिक समस्याओं का ज्ञान हो जाता है।
  2. तर्कशक्ति में वृद्धि–ज्ञान में वृद्धि होने से मनुष्य की तर्कशक्ति बढ़ती है। मनुष्य पहले की | अपेक्षा कहीं अधिक संतुलित मत व्यक्त कर सकता है।
  3. चुनाव योग्यता में वृद्धि–अर्थशास्त्र के अध्ययन से मनुष्य की चुनाव-योग्यता में वृद्धि हो जाती है। वह आवश्यक तथा अनावश्यक आवश्यकताओं में भेद करने में समर्थ हो जाता है।
  4. विस्तृत दृष्टिकोण-अर्थशास्त्र के अध्ययन से मनुष्य को दृष्टिकोण विस्तृत तथा वैज्ञानिक हो जाता है क्योंकि अर्थशास्त्र ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन है।

(II) अर्थशास्त्र के अध्ययन के व्यावहारिक लाभ
अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होने वाले प्रमुख व्यावहारिक लाभ निम्नलिखित हैं

1. गृहस्वामियों तथा उपभोक्ताओं को लाभ-

  • सम-सीमांत उपयोगिता नियम का पालन करके उपभोक्ता अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर सकता है।
  • गृहस्वामी पारिवारिक बजट बनाना और उसके अनुसार व्यय करना जाने जाते हैं। इससे अति व्यय नहीं होता।।
  • मनुष्य परिवार नियोजन के महत्त्व को जान जाता है।

2. उत्पादकों तथा व्यापारियों को लाभ-

  • उत्पादकों को उत्पादन (प्रतिफल) के नियमों, श्रम विभाजन के लाभों, आन्तरिक व बाह्य बचतों, व्यापार-चक्रों आदि की जानकारी हो जाती है।
  • उत्पादकों तथा व्यापारियों को बाजार की गतिविधियों, बाजार में पाई जाने वाली प्रतियोगिता, वस्तु की माँग व पूर्ति में होने वाले परिवर्तन, विज्ञापन, बैंक व बीमा कम्पनियों की कार्यप्रणाली आदि बातों की जानकारी होती है।
  • उत्पादकों को भूमि, श्रम, पूँजी तथा संगठन के पारिश्रमिक का निर्धारण करने में सहायता मिलती है।

3. कृषकों को लाभ-

  • किसानों को इस बात की जानकारी हो जाती है कि कृषि-उत्पादन में वृद्धि करने के लिए कौन-से उपादानों का अधिक प्रयोग किया जाए, खेती की कौन-सी विधि अपनाई जाए इत्यादि।
  • अर्थशास्त्र के अध्ययन से किसानों को यह निश्चित करने में सहायता मिलती है कि उन्हें उपज कब और कहाँ बेचनी चाहिए ताकि उन्हें उचित कीमत प्राप्त हो सके।
  • किसानों को विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियों के महत्त्व का ज्ञान हो जाता है।
  • किसानों को विभिन्न कृषि समस्याओं तथा उनके समाधान के उपायों की जानकारी मिलती

4. राजनीतिज्ञों को लाभ-

  • अधिकांश समस्याएँ आर्थिक कारणों से उत्पन्न होती हैं। अत: विभिन्न समस्याओं को समझने हेतु अर्थशास्त्र आर्थिक मामलों में राजनीतिज्ञों को विशेष जानकारी प्रदान करता है।
  • अच्छा सरकारी बजट बनाने हेतु वित्तमंत्री के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान परमावश्यक है।
  • आर्थिक योजनाएँ बनाने के लिए राजनीतिज्ञों को वर्तमान आर्थिक समस्याओं के बारे में जानकारी प्राप्त हो जाती है।
  • चुनाव संबंधी प्रभावशाली घोषणा तैयार करने के लिए राजनीतिज्ञों को आर्थिक समस्याओं की जानकारी हो जाती है।

5. श्रमिकों को लाभ-

  • अर्थशास्त्र के अध्ययन से श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  • श्रमिकों को श्रमसंघों के महत्त्व की जानकारी हो जाती है; श्रमसंघ श्रमिकों की मजदैरी में वृद्धि, काम की दशाओं में सुधार आदि के लिए प्रयत्न करते हैं; अत: यह संगठित होने लगता है।

6. समाज सुधारकों को लाभ – अर्थशास्त्र का अध्ययन करके समाज सुधारक विभिन्न आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं को सुलझा सकते हैं। जनसंख्या-वृद्धि, निर्धनता, बेकारी आदि समस्याओं के समाधान के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान अनिवार्य है। इसी प्रकार, जाति प्रथा, दहेज प्रथा तथा संयुक्त परिवार प्रथा के आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।

निष्कर्ष – माल्थस के विचार में–“अर्थशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसके बारे में यह कहा जा सकता है कि इसकी अज्ञानता केवल भलाई से ही वंचित नहीं करती बल्कि भारी बुराइयाँ भी उत्पन्न कर देती है।”

प्रश्न 8.
सांख्यिकी को परिभाषित कीजिए। अथवा एकवचन तथा बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ दीजिए।
उत्तर :
अंग्रेजी भाषा के STATISTICS’. (सांख्यिकी) शब्द को दो रूपों में प्रयोग होता है
(I) एकवचन में और
(II) बहुवचन में।

बहुवचन में स्टैटिस्टिक्स शब्द का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित संख्यात्मक तथ्य होते हैं, जैसे—कृषि के समंक, जनसंख्या समंक, राष्ट्रीय आय समंक आदि। एकवचन में ‘स्टैटिस्टिक्स’ शब्द का अर्थ सांख्यिकी विज्ञान से है।

(I) एकवचन के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

स्टैटिस्टिक्स शब्द का एकवचन में अर्थ सांख्यिकी विज्ञान से है। सामान्य रूप में सांख्यिकी विज्ञान की परिभाषाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है
(अ) संकीर्ण परिभाषाएँ
1. ए०एल० घाउले
ने सांख्यिकी की तीन परिभाषाएँ दी हैं

  • “सांख्यिकी, गणना का विज्ञान है।”
  • “सांख्यिकी को उचित रूप से औसतों का विज्ञान कहा जा सकता है।”
  • “सांख्यिकी वह विज्ञान है, जो सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर सभी रूपों में उसका मापन करता है।”

2. बोडिंगटन के अनुसार-“सांख्यिकी अनुमानों और सम्भाविताओं का विज्ञान है।”

(II) बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

  1. ए० एल० बाउले के अनुसार-“समंक अनुसंधान के किसी विभाग में तथ्यों के संख्यात्मक विवरण हैं, जिनका एक-दूसरे से संबंधित रूप में अध्ययन किया जाता है।”
  2. यूल तथा केण्डाल के अनुसार-“समंक से तात्पर्य उन आँकड़ों से है, जो पर्याप्त सीमा तक | अनेक प्रकार के कारणों से प्रभावित होते हैं।”
  3. होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार-“समंक से हमारा अभिप्राय तथ्यों के उन समूहों से है, जो अगणित कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्याओं में व्यक्त किए जाते हैं, एक उचित मात्रा की शुद्धता के अनुसार गिने या अनुमानित किए जाते हैं, किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य के लिए एक व्यवस्थित ढंग से एकत्र किए जाते हैं और जिन्हें एक-दूसरे से संबंधित रूप में प्रस्तुत किया जाता है।”

(ब) व्यापक परिभाषाएँ
1. प्रो० किंग के अनुसार – “गणना तथा अनुमानों के संग्रह को विश्लेषण के आधार पर प्राप्त परिणामों से सामूहिक, प्राकृतिक अथवा सामाजिक घटनाओं पर निर्णय करने की रीति को सांख्यिकी विज्ञान कहते हैं।”

2. सैलिगमैन के अनुसार – 
“सांख्यिकी वह विज्ञान है, जो किसी विषय पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से संग्रह किए गए आँकड़ों के संग्रहण, वर्गीकरण, प्रदर्शन, तुलना और व्याख्या करने की रीतियों का विवेचन करता है।”

3. क्रॉक्सटन व काउड्डेन के अनुसार – 
“सांख्यिकी को संख्या संबंधी समंकों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर सांख्यिकी की एक उपयुक्त परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-“सांख्यिकी एक विज्ञान और कला है, जो सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक व अन्य समस्याओं से संबंधित समंकों के संग्रहण, सारणीयन, प्रस्तुतीकरण, संबंध स्थापन, निर्वचन और पूर्वानुमान से संबंध रखती है ताकि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।”

प्रश्न 9.
आधुनिक युग में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। अथवा “सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है तथा जीवन के अनेक बिन्दुओं को स्पर्श करती है।” समीक्षा कीजिए।
उत्तर :

सांख्यिकी का महत्त्व

सांख्यिकी के बारे में सत्य ही कहा गया है-“संख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है तथा जीवन के अनेक बिन्दुओं को स्पर्श करती है।” सांख्यिकी के कारण ही अनेक क्षेत्रों में तीव्र गति से प्रगति हुई है। एफ०जे० मोरोने के अनुसार-आधुनिक जीवन का शायद ही कोई छेद या कोना हो, जिसमें; सांख्यिकीय सिद्धांतों का व्यवहार, चाहे वह सरल हो या न हो; परिणाम लाभपूर्ण न हो।” सेक्राइस्ट के अनुसार-“व्यापार, सामाजिक नीति तथा राज्य से संबंधित शायद ही कोई समस्या हो, जिसको समझने के लिए समंकों की आवश्यकता न पड़ती हो।”

एडवर्ड जे० कैने के अनुसार-“आज सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग ज्ञान एवं अन्वेषण की लगभग प्रत्येक शाखा–बिन्दुरेखीय कला से लेकर नक्षत्र भौतिकी तक और प्रायः प्रत्येक प्रकार के व्यवहार–संगीत रचना से लेकर प्रक्षेपास्त्र निर्देशन तक में किया जाता है।”

1. अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का महत्त्व-आर्थिक विश्लेषण में समंक अत्यधिक उपयोगी होते हैं। मार्शल के अनुसार-“समंक वे तृण हैं, जिनसे मुझे अन्य अर्थशास्त्रियों की भाँति ईंटें बनानी हैं।” अर्थशास्त्र की प्रत्येक शाखा में साख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है

  • उपभोग के क्षेत्र में – उपभोग समंक यह बताते हैं कि विभिन्न आय-वर्ग किस प्रकार अपनी आय को व्यय करते हैं, उनका रहन-सहन का स्तर तथा उनकी करदान क्षमता क्या
  • उत्पादन के क्षेत्र में – उत्पादन समंक माँग एवं पूर्ति में समायोजन करने में सहायक होते हैं। ये समंक देश की उत्पादकता के मापक होते हैं।
  • विनिमय के क्षेत्र में – समंकों के माध्यम से बाजार माँग व पूर्ति की विभिन्न दशाओं पर आधारित मूल्य निर्धारण के नियम व लागत मूल्य का अध्ययन किया जाता है।
  • वितरण के क्षेत्र में – समंकों की सहायता से ही राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है, इसीलिए कहा जाता है-“कोई भी अर्थशास्त्री सांख्यिकीय तथ्यों के विस्तृत अध्ययन के बिना उत्पादन या वितरण संबंधी निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न नहीं करेगा।”

2. आर्थिक नियोजन में सांख्यिकी का महत्व – समंकों की आधारशिला पर ही योजना का भवन बनाया जाता है। योजनाएँ बनाने, उन्हें क्रियान्वित करने तथा उनकी सफलताओं का मूल्यांकन करने में पग-पग पर समंकों का सहारा लेना पड़ता है। आर्थिक नियोजन में समंकों का प्रयोग निम्नलिखित बातों के लिए किया जाता है

  • अन्य देशों की तुलना में अपने देश के आर्थिक विकास की स्थिति जानने के लिए।
  • आर्थिक विकास के निर्धारक तत्त्वों के प्रभावे, तकनीकी प्रगति व उत्पादकता की स्थिति जानने के लिए।
  • अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में प्राथमिकताएँ निर्धारित करने के लिए।
  • विभिन्न क्षेत्रों के निर्धारित लक्ष्यों व वित्तीय साधनों का अनुमान लगाने के लिए।
  • योजना की सफलता का मूल्यांकन करने के लिए।

3. राज्य के लिए सांख्यिकी को महत्व – ठीक ही कहा गया है कि समंक शासन के नेत्र हैं। कल्याणकारी राज्य की धारणा के साथ समंकों का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। देश में पूर्ण रोजगार के स्तर को बनाए रखने के लिए सरकार को अपनी व्यय नीति, कर नीति, मौद्रिक नीति आदि में समायोजन करना पड़ता है, परन्तु समायोजन संख्यात्मक तथ्यों के आधार पर ही हो सकता है। सरकारी बजट का निर्माण भी समंकों के आधार पर ही किया जाता है। सरकार द्वारा नियुक्त आयोगों, समितियों आदि के प्रतिवेदनों के आधार भी समंक ही होते हैं। वास्तव में, समंक एक ऐसा आधार है, जिसके चारों ओर सरकारी क्रियाएँ घूमती हैं।

4. वाणिज्य तथा उद्योगों में सांख्यिकी का महत्त्व – व्यापार तथा उद्योगों में सांख्यिकीय रीतियों का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है। प्रो० बोर्डिंगटन के अनुसार-“एक अच्छा व्यापारी वह है, जिसका अनुमान यथार्थता के बहुत निकट हो।” यह उसी दशा में सम्भव है, जबकि सांख्यिकीय रीतियों तथा समंकों को अनुमान का आधार बनाया जाए। विपणि तथा उत्पादन शोध, विनियोग नीति, गुण नियन्त्रण, कर्मचारियों के चुनाव, आर्थिक पूर्वानुमान, अंकेक्षण आदि अनेक व्यापारिक क्रियाओं में सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक व्यापारी को मूल्यों की प्रवृत्ति व क्रियाओं की गति आदि का अनुमान करने के लिए सांख्यिकीय रीतियों का सहारा लेना पड़ता है। बीमा, व्यवसायी, बैंकर, स्टॉक व शेयर दलाल, सट्टेबाज, निवेशकर्ता आदि सभी के लिए सांख्यिकीय रीतियाँ समान रूप से उपयोगी हैं।

सांख्यिकी क सार्वभौमिक उपयोगिता है।
आधुनिक युग में सांख्यिकी को प्रयोग सर्वत्र होता है। सामान्य मनुष्य के दैनिक जीवन से लेकर उच्च ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में सांख्यिकी का प्रयोग होता है। लगभग सभी विज्ञानों के सिद्धान्तों के प्रतिपादन तथा पुष्टीकरण के लिए सांख्यिकीय रीतियों को प्रयोग में लाया जाता है। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, मनोविज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायनशास्त्र, चिकित्साशास्त्र सभी में सांख्यिकीय विवेचन नितान्त आवश्यक है।

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 12 Mineral Nutrition 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 12 Mineral Nutrition (खनिज पोषण)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पौधों में उत्तरजीविता के लिए उपस्थित सभी तत्त्वों की अनिवार्यता नहीं है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
खनिज तत्त्व जो मृदा में उपस्थित होते हैं वे पौधों में जड़ों द्वारा जल के साथ अवशोषित कर लिए जाते हैं, परन्तु सभी तत्त्व आवश्यक तत्त्व हों ऐसा नहीं है। जो तत्त्व मृदा में अधिक मात्रा में उपस्थित होते हैं उनका अवशोषण भी अधिक हो जाता है; जैसे—सिलीनियम की मात्रा अधिक (UPBoardSolutions.com) होने पर पौधों द्वारा इसका अधिक अवशोषण हो जाता है जो असल में उनके लिए आवश्यक नहीं है। लगभग 60 से अधिक तत्त्व पौधों में मिलते हैं परन्तु बहुत थोड़े-से ही आवश्यक तत्त्व होते हैं। अतः आवश्यक तत्त्व वे हैं जो सीधे पादप उपापचयी क्रियाओं में सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 2.
जल संवर्धन में खनिज पोषण हेतु जल और पोषक लवणों की शुद्धता जरूरी क्यों है?
उत्तर :
अशुद्ध जल में अनेक खनिज घुले हो सकते हैं। इसी प्रकार लवणों में भी अशुद्धता मिलती है। यदि जल संवर्धन में अशुद्ध जल व लवणों का प्रयोग होता है तो ये पौधे की वृद्धि में बाधा उत्पन्न करते हैं। अत: जल संवर्धन में शुद्ध जल तथा ज्ञात आवश्यक तत्त्वों का ही खनिज पोषण विलयन प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 3.
उदाहरण के साथ व्याख्या करें-वृहत पोषक तत्त्व, सूक्ष्म पोषक तत्त्व, हितकारी पोषक तत्त्व, आविष तत्व तथा अनिवार्य तत्त्व।
उत्तर :

1. वृहत पोषक तत्त्व (Macro Nutrients) :
वे तत्त्व जिनकी पौधों को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है वृहत पोषक तत्त्व (macro nutrient) (UPBoardSolutions.com) कहलाते हैं; जैसे—N, B S, Ca, Mg आदि। पादप ऊतक में इनकी सान्द्रता 1-10 mg/L शुष्क मात्रा में होती है।

2. सूक्ष्म पोषक तत्त्व (Micro Nutrients) :
वे तत्त्व जिनकी आवश्यकता पौधों को बहुत कम मात्रा में होती है, सूक्ष्म पोषक तत्त्व कहलाते हैं। जैसे—Mn, Cu, Fe, Mo, Zn, B, Cl, Ni आदि। इनकी सान्द्रता पादप ऊतक में 0.1/mg/L शुष्क मात्रा में होती है।

3. हितकारी पोषक तत्त्व (Beneficial Nutrients) :
वे तत्त्व जिनकी उच्च पादपों में बड़े तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के अतिरिक्त आवश्यकता होती है, हितकारी पोषक तत्त्व कहलाते हैं; जैसे-Na, Si, Co, se आदि।

4. आविष तत्त्व (Toxic Elements) :
वे खनिज तत्त्व जो पौधों के लिए हानिकारक होते हैं या जिस सान्द्रता में वे पादप ऊतक के शुष्क भार को 10 प्रतिशत तक घटा सकते हैं, आविष तत्त्व कहलाते हैं।

5. अनिवार्य तत्त्व (Essential Elements) :
वे तत्त्व जो पौधे की उपापचयी क्रियाओं में सीधे तौर पर सम्मिलित होते हैं और उनकी कमी से पौधों में निश्चित लक्षण दिखाई देते हैं, अनिवार्य तत्त्व कहलाते हैं।

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प्रश्न 4.
पौधों में कम-से-कम पाँच अपर्याप्तता के लक्षण दें। उन्हें वर्णित करें और खनिजों की कमी से उनका सहसम्बन्ध बनाएँ।
उत्तर :

1. क्लोरोसिस (Chlorosis) :
क्लोरोफिल का ह्रास होता है जिससे पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। यह N, K, S, Mg, Fe, Mn, Zn तथा Co आदि की कमी से होता है।

2. नेकरोसिस (Necrosis) :
ऊतक की कोशिकाओं का क्षय होता है। इसके कारण दिखाई देने वाले लक्षण हैं-ब्लाइट, रॉट, पत्ती पर धब्बे आदि। यह लक्षण Ca, Mg, Cu, K आदि की कमी से होता है।

3. कोशिका विभाजन का निरोधी (Supression of Cell Division) :
पौधे की वृद्धि कम होने से पौधे बौने रह जाते हैं। यह लक्षण N, S, K, Mo आदि की (UPBoardSolutions.com) कमी से होता है।

4. विकृति (Malformation) :
रंगहीनता, विभज्योतक ऊतकों के संगठन में कमी, विकृति आदि अन्त में मृत्यु का कारण बनते हैं। यह बोरोन की कमी का लक्षण है।

5. पुष्पन में देरी (Delay in Flowering) :
N, S, Mo आदि के कम सान्द्रता से कुछ पौधों में पुष्पन कुछ समय के लिए टल जाता है।

प्रश्न 5.
अगर एक पौधे में एक से ज्यादा तत्त्वों की कमी के लक्षण प्रकट हो रहे हैं तो प्रायोगिक तौर पर आप कैसे पता करेंगे कि अपर्याप्त खनिज तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर :
ऐसे पौधों को विभिन्न जल संवर्धन में उगाते हैं। प्रत्येक तत्त्व की कमी का लक्षण अलग-अलग पता चल जाता है जिससे तुलना करके दिए गए पौधों में पोषक तत्त्व की कमी का पता किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
कुछ निश्चित पौधों में अपर्याप्तता लक्षण सबसे पहले नवजात भाग में क्यों पैदा होता है, जबकि कुछ अन्य में परिपक्व अंगों में?
उत्तर :
पोषक तत्त्वों की कमी से पौधों में कुछ आकारिकीय बदलाव (morphological change) आते हैं। ये परिवर्तन अपर्याप्तता को प्रदर्शित करते हैं। ये विभिन्न तत्त्वों के अनुसार अलग-अलग होते हैं। अपर्याप्तता के लक्षण पोषक तत्वों की गतिशीलता पर निर्भर करते हैं। ये लक्षण कुछ पौधों के नवजात भागों में या पुराने ऊतकों में पहले प्रकट होते हैं। पादप में जहाँ तत्त्व सक्रियता से गतिशील रहते हैं तथा तरुण विकासशील ऊतकों में नियतित होते (UPBoardSolutions.com) हैं, वहाँ अपर्याप्तता के लक्षण पुराने ऊतकों में पहले प्रकट होते हैं; जैसे-N, K, Mg अपर्याप्तता के लक्षण सर्वप्रथम जीर्णमान पत्तियों में प्रकट होते हैं। पुरानी पत्तियों में ये तत्त्व विभिन्न जैव अणुओं के विखण्डित होने से उपलब्ध होते हैं और नई पत्तियों तक गतिशील होते हैं। जब तत्त्व अगतिशील होते हैं और वयस्क अंगों से बाहर अभिगमित नहीं होते तो अपर्याप्तता लक्षण नई पत्तियों में प्रकट होते हैं; जैसे-कैल्सियम, सल्फर आसानी से स्थानान्तरित नहीं होते। अपर्याप्तता लक्षणों को पहचानने के लिए पौधे के विभिन्न भागों में प्रकट होने वाले लक्षणों का अध्ययन मान्य तालिका के अनुसार करना होता है।

प्रश्न 7.
पौधों के द्वारा खनिजों का अवशोषण कैसे होता है?
उत्तर :
खनिज तत्त्वों का अवशोषण खनिज तत्त्वों का अवशोषण दो प्रकार से होता है

1.”ऐपोप्लास्ट पथ (Apoplast Pathway) :
कोशिकाओं के बाह्य स्थान में तीव्र गति से आयन का अन्तर्ग्रहण, निष्क्रिय अवशोषण होता है। आयनों की निष्क्रिय गति साधारणतया आयन चैनलों के द्वारा होती है। ये ट्रांस झिल्ली प्रोटीन होते हैं और चयनात्मक छिद्रों का कार्य करते हैं।

2. सिमप्लास्ट पथ (Symplast Pathway) :
कोशिकाओं के आन्तरिक स्थान में आयन धीमी गति से अन्तर्ग्रहण किए जाते हैं। आयनों के प्रवेश और निष्कासन में उपापचयी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह सक्रिय अवशोषण होता है। कोशिका में आयनों की गति को अन्तर्वाह (influx) तथा कोशिका से बाहर आयन की गति को बहिर्वाह (efflux) कहते हैं।

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प्रश्न 8.
राइजोबियम के द्वारा वातावरणीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के लिए क्या शर्ते हैं तथा N2 स्थिरीकरण में इनकी क्या भूमिका है?
उत्तर :

वायुमण्डलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण की शर्ते

  1. नाइट्रोजिनेस एन्जाइम (Nitrogenase enzyme)
  2. लेग्हीमोग्लोबीन (Leghaemoglibin, Ib)
  3.  ATP
  4. अनॉक्सी वातावरण।

मुख्यतया मटर कुल के पौधों की जड़ों में ग्रन्थिकाएँ पाई जाती हैं। इनमें राइजोबियम (Rhizobiure) जीवाणु पाया जाता है। ग्रन्थिकाओं में नाइट्रोजिनेस (nitrogenase) एन्जाइम एवं लेग्हीमोग्लोबीन (leghaemoglobin) आदि सभी जैव-रासायनिक संघटक पाए जाते हैं। नाइट्रोजिनेस एन्जाइम वातावरणीय नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलने के लिए उत्प्रेरित करता है। नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सक्रियता के लिए अनॉक्सी वातावरण आवश्यक होता है। लेग्हीमोग्लोबीन (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन से नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सुरक्षा करता है। अमोनिया संश्लेषण के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। एक अमोनिया अणु को 8 ATP ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की आपूर्ति पोषक कोशिकाओं के ऑक्सी श्वसन से होती है। अमोनिया ऐमीनो अम्ल में ऐमीनो समूह के रूप में सम्मिलित हो जाती है।
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प्रश्न 9.
मूल ग्रन्थिका के निर्माण हेतु कौन-कौन से चरण भागीदार हैं?

उत्तर :
मूल ग्रन्थिका निर्माण पोषक पौधों (सामान्यतया मटर कुल के पौधे) की जड़ एवं राइजोबियम में पारस्परिक प्रक्रिया के कारण ग्रन्थिकाओं का निर्माण निम्नलिखित चरणों में होता है

  1.  राइजोबियम जीवाणु बहुगुणित होकर जड़ के चारों ओर एकत्र होकर मूलरोम एवं मूलीय त्वचा से जुड़ जाते हैं। जीवाणु संक्रमण के कारण जीवाणु मूलरोम से होकर वल्कुट (cortex) में पहुँच जाते हैं। वल्कुट में जीवाणुओं के कारण कोशिकाओं का विशिष्टीकरण नाइट्रोजन स्थिरीकरण कोशिकाओं के रूप में होने लगता है। इस प्रकार ग्रन्थिकाओं (nodules) का निर्माण हो जाता है। ग्रन्थिकाओं के जीवाणुओं का पोषक पादप से पोषक तत्वों के आदान-प्रदान हेतु संवहनी सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
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प्रश्न 10.
निम्नलिखित कथनों में कौन सही है? अगर गलत हैं तो उन्हें सही कीजिए
(क) बोरोन की अपर्याप्तता से स्थूलकाय अक्ष बनता है।
(ख) कोशिका में उपस्थित प्रत्येक खनिज तत्त्व उसके लिए अनिवार्य है।
(ग) नाइट्रोजन पोषक तत्त्व के रूप में पौधे में अत्यधिक अचल है।
(घ) सूक्ष्म पोषकों की अनिवार्यता निश्चित करना अत्यन्त ही आसान है; क्योंकि ये बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में लिए जाते हैं।
उत्तर :
(क)
सत्य कथन।

(ख)
असत्य कथन। 105 खनिज तत्त्वों में से लगभग 60 तत्त्व विभिन्न पौधों में पाए गए हैं। इनमें से 17 खनिज तत्त्व ही अनिवार्य होते हैं।

(ग)
असत्य कथन। नाइट्रोजन अत्यधिक गतिमान पोषक खनिज तत्त्व है।

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(घ)
असत्य कथन। सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की अनिवार्यता निश्चित करना अत्यन्त कठिन कार्य होता है। क्योंकि ये अति सूक्ष्म मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं। सामान्यतया पोषक लवणों में अशुद्धता के कारण इनकी. अनिवार्यता स्थापित करना कठिन होता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धान का ‘खैरा रोग किस तत्त्व की कमी के कारण होता है?
(क) कैल्सियम
(ख) मैग्नीशियम
(ग) मॉल्ब्डेनम
(घ) जिंक
उत्तर :
(घ) जिंक

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (nitrogen fixation) क्या है?
उत्तर :
वायु में उपस्थित नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलने की प्रक्रिया।

प्रश्न 2.
नाइट्रीकरण (nitrification) क्या है ?
उत्तर :
अमोनिया पहले नाइट्रोसोमोनास यो नाइटोकोकस जीवाणु द्वारा नाइट्राइट में बदल दी जाती है। तथा नाइट्राइट को नाइट्रोबैक्टर की सहायता से नाइट्रेट में बदल दिया जाता है ये प्रक्रियाएँ नाइट्रीकरण कहलाती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हाइड्रोपोनिक्स पर टिप्पणी लिखिए। या जलसंवर्धन क्या है? परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
पौधों में विभिन्न तत्वों की क्या उपयोगिता है, इसका अध्ययन मृदाविहीन संवर्धन (soilless culture) अथवा विलयन संवर्धन (solution culture) विधि द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया को हाइड्रोपोनिक्स (hydroponics) कहते हैं। मृदाविहीन संवर्धन इस सिद्धान्त पर आधारित है कि वे सभी अनिवार्य खनिज पदार्थ जो पौधे मृदा से जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं उनके विलयन में पौधों को उगाया जाता है। यह पोषक विलयन (nutrient solution) (UPBoardSolutions.com) कहलाता है। जिस पोषक विलयन में सभी अनिवार्य खनिज पदार्थ उपस्थित हों उसे सामान्य पोषक विलयन (normal nutrient solution) कहते हैं। सामान्य पोषक विलयन (normal nutrient solution) में निम्नलिखित परिस्थितियाँ आवश्यक हैं

  1. इसमें सभी अनिवार्य खनिज घुलनशील अवस्था में हों।
  2. विलयन काफी तनु (dilute) हो तथा समय-समय पर उसे बदलते रहना चाहिए।
  3. विलयन सन्तुलित हो जिससे अनिवार्य आयन का प्रचूषण हो सके।
  4. विलयन को सदैव हवा मिलती रहे, क्योंकि प्रचूषण के लिए श्वसन ऊर्जा आवश्यक है।
  5. विलयन का pH आवश्यकतानुसार हो।

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प्रश्न 2.
पौधों में बोरोन व कॉपर की कमी से उत्पन्न लक्षणों के बारे में लिखिए।
उत्तर :

1. बोरोन (Boron) :
यह ([latex]{ BO }_{ 3}^{ 3-}[/latex])  अथवा B4[latex]{ O }_{ 7}^{ 2- }[/latex]आयनों के रूप में अवशोषित होता है। इसकी अनिवार्यता Ca 2+ को ग्रहण तथा उपयोग करने, झिल्ली की कार्यशीलता व पराग अंकुरण, कोशिका दीर्घाकरण, कोशिका विभेदन एवं कार्बोहाइड्रेट के स्थानान्तरण में होती है। पौधों में इसकी कमी से प्ररोहशीर्ष की मृत्यु होने लगती है, पुष्पन रुक जाता है, पत्तियों के शिखर काले पड़ने लगते हैं, विभिन्न अंगों की वृद्धि रुक जाती है।

2. ताँबा (Copper) :
यह क्यूप्रिंक आयन (Cu 2+) के रूप में अवशोषित होता है। यह पादपों के समग्र उपापचय के लिए अनिवार्य होता है। लौह की तरह यह भी रेडॉक्स प्रतिक्रिया से जुड़े विशेष एन्जाइमों के साथ संलग्न रहता है तथा यह भी विपरीत दिशा में Cuसे Cu 2+ में ऑक्सीकृत होता है। नींबू प्रजाति के पौधों में इसकी कमी से शीर्षारंभी रोग (dieback disease) तथा धान एवं लेग्यूम पौधों में रीक्लेमेशन रोग (reclamation disease) उत्पन्न हो जाता है। नई पत्तियों पर ऊतकक्षयी क्षेत्र बनने लगते हैं।

प्रश्न 3.
पौधे में लोहा और मैंगनीज की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

1. लोहा (Iron) :
पादप लोहे को फेरिक आयन (Fe 3+) के रूप में लेते हैं। पौधों को इसकी अनिवार्यता किसी अन्य सूक्ष्ममात्रिक तत्त्व की अपेक्षा अधिक मात्रा में होती है। यह फेरेडॉक्सिन तथा साइटोक्रोम जैसे प्रोटीन का भाग है जो कि इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण में संलग्न रहता है। इसका इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण के समय Fe 2+ से Fe 3+ के रूप में विपरीत ऑक्सीकरण होता है। यह कैटेलैज एन्जाइम को सक्रिय कर देता है और पर्णहरित के निर्माण के लिए अनिवार्य होता (UPBoardSolutions.com) है। लौह की कमी से पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं, शिराएँ गहरे रंग की होने लगती हैं तथा पत्तियों में हरिमहीनता उत्पन्न होने लगती है, हरितलवक का निर्माण धीमी गति से होने लगता है।

2. मैंगनीज (Manganese) :
यह मैंगनस आयन (Mn 2+) के रूप में अवशोषित किया जाता है। यह प्रकाश-संश्लेषण, श्वसन तथा नाइट्रोजन उपापचय के अनेक एंजाइमों को सक्रिय कर देता है। मैंगनीज का प्रमुख कार्य प्रकाश-संश्लेषण के दौरान जल के अणुओं को विखण्डित कर ऑक्सीजन को उत्सर्जित करना है। इसकी कमी के लक्षण सर्वप्रथम पुरानी पत्तियों में प्रकट होते हैं। पत्तियों में अन्तराशिरीय हरिमहीनता उत्पन्न हो जाती है। पत्तियों पर मृत ऊतकक्षयी क्षेत्र बनने लगते हैं।

प्रश्न 4.
‘खनिज तत्त्वों की कमी को दूर करना शीर्षक पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
अधिकांश मृदाओं में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम इत्यादि खनिज तत्त्वों की कमी रहती है। जिसके कारण पौधों को भी इसकी उचित मात्रा प्राप्त नहीं हो पाती है। इन तत्त्वों की कमी को पूरा करने के लिए हमें मृदा में खाद या उर्वरक मिश्रित करने की आवश्यकता होती है। कुछ प्रमुख खादों; जैसे-गोबर की खाद, कम्पोस्ट इत्यादि को मृदा में मिश्रित करना उत्तम रहता है। उर्वरक के रूप में हम मृदा में अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइट्रेट, सुपर फॉस्फेट, (UPBoardSolutions.com) अस्थि चूर्ण इत्यादि मिश्रित कर सकते हैं। ये उर्वरक क्रमशः नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम इत्यादि तत्त्वों की पूर्ति मृदा में करते हैं। इस प्रकार से हम खनिज तत्त्वों की कमी को दूर कर सकते हैं।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खनिज पोषण से आप क्या समझते हैं? पादप पोषण में कैल्सियम, पोटैशियम एवं नाइट्रोजन के महत्त्व की विवेचना कीजिए। या दीर्घ मात्रा पोषक तत्त्व एवं लघु मात्रा पोषक तत्त्व क्या हैं? टिप्पणी कीजिए। या खनिज अवशोषण का उल्लेख संक्षेप में कीजिए। या ‘खनिज लवणों का अन्तर्ग्रहण’ पर टिप्पणी लिखिए। या खनिज तत्वों के कार्य बताइए। या सूक्ष्म पोषक तत्वों का वर्णन कीजिए। या पौधों के पोषण में पोटैशियम तथा नाइट्रोजन तत्त्वों के विशेष कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : 

खनिज तत्त्व और खनिज पोषण

हरे पौधों को स्वपोषित (autotrophic) कहते हैं। प्रकृति में केवल हरे पेड़-पौधों में ही यह गुण पाया जाता है कि वे अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। ये पौधे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड  (CO2)(वायु से) तथा जल (H2O)(भूमि से) की सहायता से ऊर्जायुक्त कार्बनिक पदार्थ, मुख्यतः कार्बोहाइड्रेट्स (CH12O6) का निर्माण करते हैं। प्रायः सभी पौधे जल व अकार्बनिक तत्त्वों को भूमि से प्राप्त करते हैं। अकार्बनिक तत्त्व भूमि में खनिजों (minerals) के रूप में उपस्थित रहते हैं। इन्हें खनिज तत्त्व या पोषक तत्त्व (mineral elements or nutrient elements) तथा इनके पोषण को खनिज पोषण (mineral nutrition) कहते हैं।

बड़े एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्व

केवल कुछ ही तत्त्वे पौधों की वृद्धि एवं उपापचय के लिए नितान्त रूप से अनिवार्य माने गए हैं। उनको उनकी आवश्यक मात्रा के आधार पर दो व्यापक श्रेणियों में बाँटा गया है

1. बड़े पोषक तत्त्व (Macro nutrients) :
बड़े पोषक तत्वों को सामान्यतः पादप के शुष्क पदार्थ का 1 से 10 मिग्रा/लीटर की सान्द्रता से विद्यमान होना चाहिए। इस श्रेणी में आने वाले तत्त्व हैं—कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O), फॉस्फोरस (F), सल्फर (S), पोटैशियम (K), कैल्सियम (Ca) और मैग्नीशियम (Mg)। (UPBoardSolutions.com) इनमें से कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन मुख्यतया CO, एवं H2Oसे प्राप्त होते हैं, जबकि दूसरे मृदा से खनिज के रूप में अवशोषित किए जाते हैं।

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2. सूक्ष्म पोषक तत्त्व (Micro nutrients) :
पौधों को सूक्ष्म पोषक तत्त्वों अथवा लेशमात्रिक तत्त्वों की अनिवार्यता अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में होती है 0.1 मिग्रा/लीटर शुष्क भार के बराबर या उससे कम)। इनके अन्तर्गत लौह (Fe), मैंगनीज (Mg), ताँबा (Cu), मॉलिब्डेनम (Mo), जिंक (Zn), बोरोन (B), क्लोरीन (C) और निकिल (Ni) सम्मिलित हैं।

कैल्सियम

पादप कैल्सियम को मृदा से कैल्सियम आयनों (Ca 2+) के रूप में अवशोषित करते हैं। इसकी आवश्यकता विभज्योतक तथा विभेदित होते हुए ऊतकों को अधिक होती है। कोशिका विभाजन के दौरान कोशिका भित्ति के संश्लेषण में भी इसका उपयोग होता है। विशेष रूप से मध्य पट्टिका में कैल्सियम पेक्ट्रेट के रूप में इसकी अनिवार्यता समसूत्री विभाजन में तर्क निर्माण के दौरान भी होती है। यह पुरानी पत्तियों में एकत्रित हो जाता है। यह कोशिका झिल्लियों की सामान्य क्रियाओं में शामिल होता है। यह कुछ एन्जाइमों को सक्रिय करता है तथा उपापचय के नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसकी कमी से हरितलवक ठीक से कार्य नहीं करता है। पुष्पों का विकास ठीक से नहीं हो पाता है, वे शीघ्र ही गिर जाते हैं पत्तियों में हरिमहीनता (chlorosis) उत्पन्न हो जाती है।

पोटैशियम

पादपों द्वारा इसका अवशोषण पोटैशियम आयन (K+) के रूप में होता है। इसकी पौधों के विभज्योतक ऊतकों, कलिकाओं, पर्यों, मूलशीर्षों में अधिक मात्रा की जरूरत होती है। पोटैशियम कोशिकाओं में धनायन-ऋणायन सन्तुलन का निर्धारण करने में सहायक होता है। (UPBoardSolutions.com) साथ ही यह प्रोटीन संश्लेषण, रन्ध्रों के खुलने और बन्द होने, एन्जाइम सक्रियता और कोशिकाओं को स्फीत अवस्था में बनाए रखने में शामिल होता है। इसकी कमी से पौधा बौना (dwarf) हो जाता है कोशिकाओं में टूट-फूट की मरम्मत नहीं हो पाती है, पत्तियों पर अनेक पीले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं तथा तने पीले एवं कमजोर हो जाते हैं।”

नाइट्रोजन

इस तत्त्व की अनिवार्यता पौधों में सर्वाधिक मात्रा में होती है। पौधे अपनी जड़ों द्वारा इसका अवशोषण मुख्यत: [latex]{ NO }_{ 3}^{ – }[/latex]के रूप में करते हैं लेकिन कुछ मात्रा  NO, अथवा  NH, के रूप में भी ली जाती है। इसकी अनिवार्यता पौधों के सभी भागों विशेषत: विभज्योतक ऊतकों एवं सक्रिय उपापचयी कोशिकाओं में होती है। नाइट्रोजन प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्लों, विटामिन और हॉर्मोन का एक मुख्य संघटक है। पौधों में इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है, पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं, पत्तियाँ अधिक छोटी एवं मोटी हो जाती हैं। तथा पुष्पों का विकास नहीं हो पाता है।

प्रश्न 2.
दीर्घपोषक तत्त्वों एवं लघुपोषक तत्वों में क्या अन्तर है? सल्फर, पोटैशियम, मैग्नीशियप एवं जिंक तत्त्वों की कमी से उत्पन्न लक्षणों का वर्णन कीजिए।” या सल्फर, पोटैशियम, मैग्नीशियम एवं जिंक तत्त्वों की कमी से उत्पन्न लक्षणों का वर्णन कीजिए। [संकेत–दीर्घ पोषक तत्वों एवं लघु पोषक तत्त्वों में अन्तर के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।]
उत्तर :

1. गन्धक (Sulphur) :
पादप गन्धक को सल्फेट ([latex]{ SO }_{ 4}^{ 2- }[/latex]) के रूप में लेते हैं। यह सिस्टीन (Cysteine) व मेथियोनीन (methionine) नामक अमीनो अम्लों में पाया जाता है तथा अनेक विटामिनों (थायमीन, बायोटीन, कोएन्जाइम ए) एवं फेरेडॉक्सिन का मुख्य संघटक है। युवा पत्तियों में गन्धक की कमी हरिमहीनता उत्पन्न करती है, पत्तियों में एन्थोसायनिन का संचय होने लगती है, पत्तियों की वृद्धि रुक जाती है तथा पौधे बौने रह जाते हैं।

2. मैग्नीशियम (Magnesium) :
यह पादपों द्वारा द्वियोजी मैग्नीशियम (Mg2+) आयन के रूप में अवशोषित होता है। यह प्रकाश-संश्लेषण तथा श्वसन क्रिया के एंजाइमों को सक्रियता प्रदान करता है। तथा DNA एवं RNA के संश्लेषण में भी शामिल होता है। यह क्लोरोफिल की वलय संरचना का संघटक है और (UPBoardSolutions.com) राइबोसोम के आकार को बनाए रखने में सहायक है। इसकी कमी से पत्तियों में हरिमहीनता आ जाती है जो बाद में तरुण पत्तियों में भी दिखाई देती है, पत्तियों में एन्थोसायनिन की। मात्रा बढ़ जाती है, पौधे के विभिन्न भागों में ऊतकक्षयी धब्बे बन जाते हैं।

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3. जिंक (Zinc) :
पादप जिंक को, जिंक आयन (Zn2+)के रूप में लेते हैं। यह विविध एंजाइमों को विशेषत: कार्बोक्सीलेस को सक्रिय करता है। इसकी अनिवार्यता ऑक्सिन संश्लेषण में भी होती है। इसकी कमी से पत्तियाँ विकृत होने लगती हैं। इनके शीर्ष पर हरिमहीनता के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। पौधों में पुष्पन ठीक से नहीं हो पाता है।

4. पोटैशियम (Potassium) :
[संकेत–कृपया दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 में देखें।

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UP Board Solutions for Class 11 English Vocabulary Chapter 5 Synonyms

UP Board Solutions for Class 11 English Vocabulary Chapter 5 Synonyms

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons (हाइड्रोकार्बन)

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पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
उत्तर
मेथेन का क्लोरीनीकरण एक मुक्त मूलक अभिक्रिया है जो निम्नलिखित क्रियाविधि से होती है-
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों के I.U.P.A.C. नाम लिखिए-
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उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों, जिनमें द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की संख्या दर्शाई गई है, के सभी सम्भावित स्थिति समावयवियों के संरचना सूत्र एवं I.U.P.A.C. नाम दीजिए-
(क) C4H8 (एक द्विआबन्ध)
(ख) C5H8 (एक त्रिआबन्ध)
उत्तर
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों के ओजोनी-अपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए-
(i) पेन्ट-2-ईन
(ii) 3, 4-डाइमेथिल-हेप्ट-3-ईन
(iii) 2-एथिल ब्यूट-1-ईन
(iv) 1-फेनिल ब्यूट-1-ईन
उत्तर
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प्रश्न 5.
एक ऐल्कीन ‘A’ के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा एथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। ‘A’ का I.U.P.A.C. नाम तथा संरचना दीजिए।
उत्तर
ऐल्कीन ‘A’ 3-एथिल पेन्ट-2-ईन है। यह ओजोनी अपघटन पर एथेनले तथा पेन्टेन-3-ओन देता है। इनकी संरचनाएँ निम्नलिखित है-
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प्रश्न 6.
एक ऐल्केन A में तीन C—C, आठ C—H सिग्मा-आबन्ध तथा एक C—C पाई आबन्ध हैं। A ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का आई०यू०पी०ए०सी० नाम लिखिए।
उत्तर
44 u मोलर द्रव्यमान का ऐल्डिहाइड एथेनल (CH3CHO) है। एथेनल के दो मोलों को एक साथ लिखकर उनके ऑक्सीजन परमाणु हटाते हैं और उन्हें द्विआबन्ध द्वारा जोड़ देते हैं।
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प्रश्न 7.
एक ऐल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
उत्तर
उत्पाद हैं-
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए-
(i) ब्यूटेन,
(ii) पेन्टीन,
(iii) हेक्साइन,
(iv) टॉलूईन।
उत्तर
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प्रश्न 9.
हेक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएँ बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?
उत्तर
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किसी अणु का क्वथनांक द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाओं पर निर्भर करता है। चूंकि सिस समावयवी में उच्च द्विध्रुव आघूर्ण होता है, अतः इसका क्वथनांक उच्च होता है।

प्रश्न 10.
बेन्जीन में तीन द्वि-आबन्ध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
उत्तर
बेंजीन का अति स्थायित्व अनुनाद या 7-इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण के कारण होता है। बेंजीन में सभी 67t-इलेक्ट्रॉन (तीन द्विआबन्धों के) विस्थानीकृत (delocalised) होते हैं तथा अणु को स्थायित्व प्रदान करते हैं।
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प्रश्न 11.
किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्ते क्या हैं?
उत्तर
किसी अणु के ऐरोमैटिक होने के लिए आवश्यक शर्ते निम्न हैं-

  1. अणु में तल के ऊपर तथा नीचे विस्थानीकृत -इलेक्ट्रॉनों का एक चक्रीय अभ्र (cyclic cloud) होना चाहिए।
  2. अणु समतलीय होना चाहिए। ये इसलिए आवश्यक है क्योंकि 7-इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण विस्थानीकरण के लिए वलय समतलीय होनी चाहिए जिससे p-कक्षकों का चक्रीय अतिव्यापन हो सके।
  3. इसमें (4n+2) π-इलेक्ट्रॉनं होने चाहिए, जहाँ n = 0, 1, 2, 3, … है। इसे हकल नियम कहते हैं।

प्रश्न 12.
इनमें से कौन-से निकाय ऐरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिए-
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उत्तर
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में एक sp3 संकरित कार्बन परमाणु है, अतः अणु समतलीय नहीं होगा। अणु में 6π-इलेक्ट्रॉन हैं। लेकिन निकाय पूर्णत: संयुग्मित नहीं है चूँकि सभी π-इलेक्ट्रॉन चक्रीय वलय के सभी परमाणुओं के चारों ओर चक्रीय इलेक्ट्रॉन अभ्र नहीं बनाते हैं, अतः यह ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है।
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ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है क्योंकि इसमें एक sp3 कार्बन परमाणु हैं जिसके कारण अणु समतलीय नहीं है। पुनः इसमें केवल 4-इलेक्ट्रॉन हैं अत: निकाय ऐरोमैटिक नहीं है क्योकि (4n +2) π-इलेक्ट्रॉनों युक्त । समतलीय चक्रीय अभ्र उपस्थित नहीं है।
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ऐरोमैटिक नहीं है क्योंकि यह 8-इलेक्ट्रॉनों युक्त निकाय है अतः यह हकल के नियम अर्थात् (4n +2) π-इलेक्ट्रॉन का पालन नहीं करता है। साथ ही यह समतलीय न होकर टब आकृति (tub-shaped) का होता है।

प्रश्न 13.
बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे-
(i) p-नाइट्रोब्रोमोबेन्जीन
(ii) m-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(iii) p-नाइट्रोटॉलूईन
(iv) ऐसीटोफीनोन।
उत्तर
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प्रश्न 14.
ऐल्केन HC-CH2-C-(CH32-CH2-CH(CH3) में 1°, 2° तथा 3° कार्बन परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबन्धित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।
उत्तर
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पाँच 1° कार्बन परमाणुओं से 15 H संलग्न हैं।
दो 2° कार्बन परमाणुओं से 4 H संलग्न हैं।
एक 3° कार्बन परमाणु से 1 H संलग्न है।

प्रश्न 15.
क्वथनांक पर ऐल्केन की श्रृंखला के शाखन का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ऐल्केनों के क्वथनांक शाखन के साथ घटते हैं क्योंकि शाखन (branching) बढ़ने पर ऐल्केन का पृष्ठ क्षेत्रफल गोले (sphere) के समान हो जाता है। चूंकि गोले का पृष्ठ क्षेत्रफल न्यूनतम होता है, अतः वाण्डर वाल्स बल न्यूनतम होते हैं। अतः शाखन पर क्वथनांक घटते हैं।

प्रश्न 16.
प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2-ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेंजॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1-ब्रोमोप्रोपेन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका
कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रोपीन पर HBr का योग आयनिक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया है जो मारकोनीकॉफ नियमानुसार होती है। इस अभिक्रिया में सर्वप्रथम Hजुड़कर 2° कार्बोधनायन देता है। इस कार्योधनायन पर नाभिकस्नेही Br- आयन को शीघ्रता से आक्रमण होता है तथा 2-ब्रोमोप्रोपेन प्राप्त होती है।

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बेन्जॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में अभिक्रिया मुक्त मूलक क्रियाविधि के अनुसार होती है। इस अभिक्रिया में Br मुक्त मुलक इलेक्ट्रॉनस्नेहीं के रूप में कार्य करता है जो बेन्जॉयल परॉक्साइड की HBr से क्रिया द्वारा प्राप्त होता है।

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मुक्त मूलक प्रोपीन पर इस प्रकार क्रिया करता है कि अधिक स्थायी द्वितीयक (2°) मुक्त मूलक की उत्पत्ति हो सके। यह 2° मूलक HBr से एक H-परमाणु ग्रहण कर 1-ब्रोमोप्रोपेन देता है।

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प्रश्न 17.
1, 2-डाइमेथिलबेन्जीन (o-जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार
करता है?
उत्तर
0-जाइलीन को निम्नलिखित दो केकुले संरचनाओं को अनुनाद संकर माना जाता है। प्रत्येक के ओजोनी अपघटन से दो उत्पाद प्राप्त होते हैं-
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अतः समग्र रूप से तीन उत्पाद निर्मित होते हैं। चूंकि सभी तीन उत्पाद दो केकुले संरचनाओं में से एक से प्राप्त नहीं हो सकते हैं इससे प्रदर्शित होता है कि o-जाइलीन दो केकुले संरचनाओं का अनुनाद संकर है।

प्रश्न 18.
बेन्जीन, n-हैक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।
उत्तर
इन तीनों यौगिकों में कार्बन की संकरण अवस्था निम्नवत् है-
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कक्षक का 5-लक्षण बढ़ने पर अम्लीय लक्षण बढ़ता है अतः अम्लीय लक्षण निम्न क्रम में घटता है-
ऐसीटिलीन > बेंजीन > हेक्सेन

प्रश्न 19.
बेन्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती हैं, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
उत्तर
C6H6 (बेंजीन) की कक्षक संरचना प्रदर्शित करती है कि -इलेक्ट्रॉन अभ्र वलय के ऊपर तथा नीचे स्थित है तथा ढीला व्यवस्थित है अत: इलेक्ट्रॉनस्नेही के लिए आसानी से उपलब्ध है, अत: बेंजीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ शीघ्रता से देती है तथा नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन क्रियाएँ: कठिनता से देती है।

प्रश्न 20.
आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?
(i) एथाइन
(ii) एथीन
(iii) हेक्सेन।
उत्तर
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प्रश्न 21.
उन सभी ऐल्कीनों की संरचनाएँ लिखिए, जो हाइड्रोजनीकरण करने पर 2-मेथिल । ब्यूटेन देती हैं।
उत्तर
उत्पाद की संरचना निम्नवत् है-
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प्रश्न 22.
निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(क) क्लोरोबेन्जीन, 2, 4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेन्जीन, p-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(ख) टॉलूईन, p-H3C-C6H4-NO2,p-O2N-C6H4-NO2
उत्तर
(क) क्लोरोबेंजीन > p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन > 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन,
(ख) टॉलूईन > p-H3C-C6H4-NO2> p-O2N-C6H4-NO2

प्रश्न 23.
बेन्जीन, m-डाइनाइट्रोबेन्जीन तथा टॉलूईन में से किसका नाइट्रीकरण आसानी से होता है और क्यों?
उत्तर
CH3 समूह इलेक्ट्रॉनदाता समूह होता है जबकि -NO2 समूह इलेक्ट्रॉन निष्कासक होता है। अतः अधिकतम इलेक्ट्रॉन घनत्व टॉलूईन में होगा उससे कम बेंजीन में तथा सबसे कम m-डाइनाइट्रोबेंजीन में। अतः नाइट्रीकरण का घटता हुआ क्रम निम्न होगा-
टॉलूईन > बेंजीन > m-डाइनाइट्रोबेंजीन

प्रश्न 24.
बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड के स्थान पर कोई दूसरा लूइस अम्ल सुझाइए।
उत्तर
निर्जल FeCl3, SnCl4, BF3 आदि।

प्रश्न 25.
क्या कारण है कि वुज अभिक्रिया विषम संख्याकार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विषम संख्या कार्बन परमाणु युक्त ऐल्केनों के बनाने में दो ऐल्किल हैलाइडों का प्रयोग किया जाता है। ये दो ऐल्किल हैलाइड तीन भिन्न प्रकारों से अभिकृत होकर वांछित ऐल्केन के स्थान पर तीन ऐल्केनों का मिश्रण बनाते हैं। 1-ब्रोमोप्रोपेन तथा 1-ब्रोमोब्यूटेन की वुटुंज अभिक्रिया से हेक्सेन, हेप्टेन तथा ऑक्टेन का मिश्रण प्राप्त होता है जैसा कि नीचे प्रदर्शित है-
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन-सा ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है?
(i) बेंजीन
(ii) ऐनिलीन
(iii) साइक्लोहेक्सेन
(iv) पिरीडीन
उत्तर
(iii) साइक्लोहेक्सेन

प्रश्न 2.
निम्नलिखित ब्यूटेनॉल के सम्भव समावयवियों में प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करने वाला यौगिक है।
(i) CH3CHOHCH2—CH3
(ii) CH3-CH2 CH2-CH2-OH
(iii) (CH3)2CHCH2-OH
(iv) (CH3)3COH
उत्तर
(i) CH3CHOHCH2-CH3

प्रश्न 3.
प्रयोगशाला में बॉयर अभिकर्मक का प्रयोग किया जाता है।
(i) द्विबन्ध की जाँच के लिए
(ii) ग्लूकोस की जाँच के लिए
(iii) अपचयन के लिए
(iv) ऑक्सीकरण के लिए
उत्तर
(i) द्विबन्ध की जाँच के लिए

प्रश्न 4.
ऐसीटिलीन अणु में हैं।
(i) 5 δ बन्ध
(ii) 4 δ तथा 1 π बन्ध
(iii) 3 δ तथा 2 π बन्ध
(iv) 2 δ तथा 3 π बन्ध
उत्तर
(iii) 3 δ तथा 2 π बन्ध

प्रश्न 5.
C5H10 आणविक सूत्र वाले निम्न में से किस यौगिक के ओजोनी अपघटन से ऐसीटोन प्राप्त होती है?
(i) 3-मेथिल-ब्यूट-1-ईन
(ii) साइक्लोपेन्टेन
(iii) 2-मेथिल-ब्यूट-1-ईन
(iv) 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन
उत्तर
(iv) 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन

प्रश्न 6.
प्रोपाइन तथा प्रोपीन पहचाने जा सकते हैं।
(i) सांद्र H2SO4 द्वारा।
(ii) CCl4 में Br2 के द्वारा।
(iii) तनु KMnO4 द्वारा
(iv) अमोनियाकृत AgNO3 द्वारा
उत्तर
(iv) अमोनियाकृत AgNO3 द्वारा

प्रश्न 7.
निम्न में से कौन-सा यौगिक द्विध्रुव आघूर्ण प्रदर्शित करता है?
(i) 1,4- डाइक्लोरोबेंजीन
(ii) 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन
(iii) ट्रान्स-1,2-डाइक्लोरोएथेन
(iv) ट्रान्स-ब्यूट-2-ईन
उत्तर
(i) 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन

प्रश्न 8.
रक्त-तप्त नलियों में C2H2 को गर्म करने पर कौन-सा यौगिक बनता है।
(i) एथिलीन
(ii) बेंजीन
(iii) एथेन
(iv) मेथेन
उत्तर
(ii) बेंजीन

प्रश्न 9.
निम्न में से बेंजीन के सल्फोनीकरण में कौन भाग लेता है?
(i) SO2
(ii) SO3H+
(iii) SO3
(iv) SO3H
उत्तर
(ii) SO3

प्रश्न 10.
बेंजीन पर सूर्य के प्रकाश में क्लोरीन की अभिक्रिया से बनता है।
(i) पिक्रिक अम्ल
(ii) क्लोरोपिक्रिन
(iii) नाइट्रोमेथेन
(iv) गैमेक्सीन
उत्तर
(iv) गैमेक्सीन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐलिफैटिक संतृप्त हाइड्रोकार्बन या ऐल्केन से आप क्या समझते हैं?
या
ऐल्केनों को पैराफिन क्यों कहते हैं?
उत्तर
ऐलिफैटिक संतृप्त हाइड्रोकार्बन वे यौगिक होते हैं जिनमें उपस्थित परमाणुओं की सभी श्रृंखलाएँ खुली हुई होती हैं, प्रत्येक कार्बन परमाणु की चारों संयोजकताएँ एकल आबन्धों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं तथा केवल कार्बन और हाइड्रोजन उपस्थित होते हैं। इने यौगिकों को ऐल्केन भी कहते हैं। चूंकि ये यौगिक (ऐल्केन) अन्य कार्बनिक यौगिकों की तुलना में कम क्रियाशील होते हैं; इसलिए इन्हें पैराफिन कहते हैं।

प्रश्न 2.
ऐल्केनों की संरचना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ऐल्केनों में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता है अत: प्रत्येक कार्बन परमाणु की संरचना समचतुष्फलकीय होती है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक कार्बन परमाणु एक समचतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित होता है तथा उसकी संयोजकताएँ समचतुष्फलक के शीर्षों की ओर दिष्ट होती हैं। किन्हीं भी दो संयोजकताओं के मध्य 109°28′ का कोण होता है।
ऐल्केनों में C—C आबन्ध लम्बाई 1.54 तथा C—H आबन्ध लम्बाई 1.09Å होती है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों का संरचनात्मक सूत्र लिखिए
(i) 3, 4, 4, 5-टेट्रामेथिलहेप्टेन
(ii) 2, 5-डाइमेथिलहेक्सेन
उत्तर
(i) CH3–CH2–CH(CH3)=C(CH3)2-CH(CH3)–CH2–CH3
(ii) CH2—CH(CH3)–CH2–CH2–CH(CH3)2CH3

प्रश्न 4.
वुटुंज अभिक्रिया द्वारा आप प्रोपेन किस प्रकार बनाएँगे?
उत्तर
एथिल आयोडाइड और मेथिल आयोडाइड की सोडियम से अभिक्रिया ईथर की उपस्थिति में कराने पर प्रोपेन एवं अन्य हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-28

प्रश्न 5.
प्रोपेन के विरचन के लिए किस अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होगी? अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
प्रोपेन के विरचन के लिए ब्यूटेनोइक अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-29

प्रश्न 6.
ऐल्केन के शाखित होने से उसकी गलनांक किस प्रकार प्रभावित होगा?
उत्तर
ऐल्केन के शाखित होने से उसके अणु क्रिस्टल जालक में दूर-दूर हो जाते हैं। इससे गलनांक घट जाता है। यदि शाखित होने पर अणु सममित हो जाता है तो अणु क्रिस्टल जालक में निविड संकुलित हो जाते हैं जिससे गलनांक में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 7.
ऐल्केनों की दहन अभिक्रिया को समझाइए।
उत्तर
ऐल्केनें ऑक्सीजन या वायु की अधिकता में ज्योतिहीन ज्वाला के साथ जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाती हैं। अभिक्रिया में ऊष्मा (heat) और प्रकाश (light) निकलते हैं।

CH4 + 2O2 → CO2 +2H2O+212.8Kcal
C2H6 + 3[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]O2 → 2CO2 + 3H2O+373.0 Kcal

मेथेन और वायु (आधिक्य) के मिश्रण को प्रज्वलित करने पर विस्फोट होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं। कोयले की खानों में विस्फोट होने का यही कारण है।

प्रश्न 8.
ऐल्केनों के ताप अपघटन को समझाइए।
उत्तर
वायु की अनुपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करने से कार्बनिक यौगिक का तापीय अपघटन (thermal decomposition) उनका ताप अपघटन (pyrolysis) कहलाता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-30

उच्च ऐल्केनें वायु की अनुपस्थिति में, उच्च ताप (500-600°C) पर गर्म करने पर छोटे अणुओं में अपघटित हो जाती है। उच्च अणु भार को ऐल्केनों का लघु अणु भार के हाइड्रोकार्बनों में ताप अपघटन भंजन (cracking) कहलाता है। किसी ऐल्केन के भंजन से प्राप्त उत्पाद ऐल्केन की संरचना दाब, ताप, उत्प्रेरक की उपस्थिति आदि कारकों पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 9.
ऐल्केनों के भंजन में C—H आबंधों के स्थान पर C—C आबंध क्यों टूटते हैं।
उत्तर
C—C आबंधों की आबंध वियोजन ऊर्जा C—H आबंधों की आबंध वियोजन ऊर्जा की तुलना में कम होती है। इसलिए ऐल्केनों के भंजन के दौरान C—Cआबंध C—H आबंधों की तुलना में आसानी से टूटते हैं।

प्रश्न 10.
सामान्य ताप पर एथेन के शुद्ध संरूपणों को पृथक करना संभव क्यों नहीं है?
उत्तर
एथेन के दो चरम रूपों (ग्रसित तथा सांतरित संरूपणों) के मध्य ऊर्जा का अंतर 12.5 kJ mol-1 होता है जो कि बहुत कम है। सामान्य ताप पर अंतराण्विक संघट्टों के द्वारा एथेन अणु में तापीय तथा गतिज ऊर्जा होती है जो 12.5kJ mol-1 के ऊर्जा अवरोध को पार करने में सक्षम होती है। इसलिए सामान्य ताप पर एथेन के शुद्ध ग्रसित तथा शुद्ध सांतरित संरूपणों को पृथक् करना संभव नहीं है।

प्रश्न 11.
ऐल्कीन क्या हैं तथा इन्हें ओलीफिन क्यों कहते हैं?
उत्तर
वे ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें केवल एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध उपस्थित होता है, ऐल्कीन कहलाते हैं। ऐल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य एथिलीन है जो क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके तेल जैसा पदार्थ एथिलीन डाइक्लोराइड बनाता है। इसीलिए इस श्रेणी के सदस्यों को ओलीफिन (तेल बनाने वाला) कहते हैं।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-31
उत्तर

  1. 2,8-डाइमेथिल डेका-3,6-डाइईन
  2. ऑक्टा -1,3,5,7-टेट्राईन
  3. 2-प्रोपिलपेन्ट-1-ईन
  4. 4-एथिल-2,6-डाइमेथिलडेके-4-ईन

प्रश्न 13.
ऐल्कीनों में संरचनात्मक समावयवता को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
ऐल्कीन श्रेणी के प्रथम दो सदस्य (एथीन तथा प्रोपीन) समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं। इस श्रेणी के अन्य सदस्य स्थिति समावयवता तथा श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-अणुसूत्र C4H8 तीन समावयवी ऐल्कीनों को प्रदर्शित करता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-32

यहाँ संरचनाएँ I और II स्थिति समावयवियों को और संरचनाएँ I और II तथा II और II श्रृंखला समावयवियों को प्रदर्शित करती हैं।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित यौगिकों के समपक्ष (cis) तथा विपक्ष (trans) समावयवी बनाइए और उनके IUPAC नाम लिखिए
(i) CHCl = CHCl
(ii) C2H5C(CH3)=C(CH3)C2H5
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-33

प्रश्न 15.
किस धातु का कार्बाइड जल से क्रिया करके ऐसीटिलीन गैस उत्पन्न करता है? रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-34

प्रश्न 16.
ऐल्कीनों के सामान्य भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्कीनों के प्रमुख सामान्य भौतिक गुण निम्नवत् हैं

  1. इस श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य एथीन, प्रोपीन तथा ब्यूटीन रंगहीन गैसें हैं। इसके बाद के | C16H32 तक के सदस्य द्रव तथा इससे ऊँचे सदस्य ठोस होते हैं।
  2. ये जल में अविलेय होते हैं परन्तु ऐल्कोहॉल, बेंजीन तथा ईथर जैसे कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
  3. अणु भार के बढ़ने के साथ इनके आपेक्षिक घनत्व, गलनांक तथा क्वथनांक बढ़ते जाते हैं।
  4. सभी ऐल्कीन वायु में प्रकाश-युक्त लौ के साथ जलती हैं।

प्रश्न 17.
एथेन की तुलना में एथिलीन अधिक क्रियाशील है। क्यों?
उत्तर
एथिलीन में 1 π बन्धं उपस्थित है इसलिए एथिलीन, एथेन की तुलना में अधिक क्रियाशील है।

प्रश्न 18.
HCI, HBr, HI तथा HF को उनकीं ऐल्कीनों से क्रियाशीलता के घटते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
HI > HBr > HCl> HF

प्रश्न 19.
एथेन और एथीन में कैसे विभेद करेंगे?
उत्तर
एथेन और एथीन में विभेद परीक्षण
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-35

प्रश्न 20.
ऐल्काइन क्या हैं?
उत्तर
वे ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें केवल एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध उपस्थित होता है, ऐल्काइन कहलाते हैं। इनमें उपस्थित त्रि-आबन्धों को ऐसीटिलीनिक आबन्ध भी कहते हैं।

प्रश्न 21.
ऐल्काइनों के प्रमुख भौतिक गुणधर्म लिखिए।
उत्तर
ऐल्काइनों के प्रमुख भौतिक गुणधर्म निम्नवत् हैं-

  1. ऐल्काइन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य (C2 से C4) गैसें, अगले आठ सदस्य (C52 से C12) द्रव तथा शेष उच्च सदस्य ठोस हैं।
  2. ऐल्काइने रंगहीन तथा स्वादहीन होती हैं।
  3. ऐल्काइने जल में लगभग अविलेय और कार्बनिक विलायकों में विलेय होती हैं।
  4. ऐल्काइनों के गलनांक, क्वथनांक और आपेक्षिक घनत्व उनके अणुभार बढ़ने के साथ-साथ बढ़ते हैं।

प्रश्न 22.
एथीन और एथाइन में विभेद करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले दो अभिकर्मकों के नाम लिखिए।
उत्तर
अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन और अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन।

प्रश्न 23.
ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अथवा ऐरीन क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
वे हाइड्रोकार्बन तथा उनके ऐल्किल, ऐल्किनिल एवं एल्काइनिल व्युत्पन्न जिनमें एक अथवा अधिक बेंजीन वलय होती हैं, ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अथवा ऐरीन कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-बेंजीन, टॉलूईन, नैफ्थेलीन, बाइफेनिल आदि।

प्रश्न 24.
निम्न के IUPAC नाम लिखिए
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-36
उत्तर

  1. 2-हाइड्रॉक्सी 3-फेनिल ब्यूटेनल,
  2. एथिल एथेनोएटप्रश्न

प्रश्न 25.
प्रोपाइन, ब्यूट डाइईन, बेंजीन में से किसमें सर्वाधिक आबंध हैं?
उत्तर
बेंजीन में (3)।

प्रश्न 26.
बेंजीन अति असंतृप्त होती है परन्तु फिर भी यह योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करती है। क्यों?
उत्तर
ऐसा इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण (delocalization) के कारण अतिरिक्त स्थायित्व के कारण होता है।

प्रश्न 27.
मेसीटिलीन के ओजोनी अपघटन के उद क्या होंगे?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-37

प्रश्न 28.
फ्रीडल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-38

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐल्केनों में पायी जाने वाली समावयवता का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्केन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य अर्थात् मेथेन, एथेन तथा प्रोपेन समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं। इस श्रेणी के अन्य सभी सदस्य श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-अणु सूत्र C2H10, C5H12, तथा C6H14 द्वारा प्रदर्शित समावयवियों की संरचनाएँ तथा उनके नाम निम्नवत् हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-39
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-40
स्पष्ट है कि अणु सूत्र C4H10, C5H12 तथा C2H14 द्वारा प्रदर्शित समावयवियों की कुल संख्या क्रमशः दो, तीन व पाँच हैं। ऐल्केनों में किसी अन्य प्रकार की संरचनात्मक समावयवता नहीं पायी जाती है।

प्रश्न 2.
एक ऐल्केन (अणुभार = 72) मोनोक्लोरीनीकरण करने पर केवल एक क्रियाफल देती है। ऐल्केन का नाम बताइए।
उत्तर
ऐल्केन का सामान्य सूत्र CnH2n+2 होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-41
प्रश्नानुसार, ऐल्केन का मोनो क्लोरीनीकरण कराने पर केवल एक उत्पाद बनता है; अतः सभी हाइड्रोजन एक जैसे होने चाहिए। इसलिए वह ऐल्केन 2, 2-डाइमेथिल प्रोपेन होगी।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-42

प्रश्न 3.
ऐल्केनों के भौतिक गुणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्केनों के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. अवस्था-ऋजु श्रृंखला ऐल्केनों के प्रथम चार सदस्य (C1 से C4) रंगहीन, गंधहीन गैसें हैं। अगले उच्च सदस्य (C5 से C17) रंगहीन वाष्पशील द्रव हैं तथा और उच्च सदस्य रंगहीन ठोस हैं|
  2. विलेयता-ऐल्केन अध्रुवीय प्रकृति की होने के कारण ध्रुवीय विलायकों में अविलेय लेकिन अध्रुवीय कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं (समान समान को घोलता है)।
  3. घनत्व—ऐल्केनों के घनत्व ऐल्केनों के अणुभार बढ़ने के साथ बढ़ते हैं। किसी भी ऐल्केन का घनत्व 0.8 gcm-3 से अधिक नहीं है अर्थात् सभी ऐल्केनें जल से हल्की होती हैं।
  4. क्वथनांक-सीधी श्रृंखला या n-ऐल्केनों के क्वथनांक कार्बन परमाणुओं की संख्या बढ़ने पर नियमित रूप से बढ़ते हैं। सामान्यतः श्रेणी के दो उत्तरोत्तर सदस्यों (प्रथम कुछ सदस्यों को छोड़कर) के क्वथनांकों में अन्तर 20-30°C होता है। समावयवी ऐल्केनों में साधारण समावयवी का क्वथनांक शाखित श्रृंखला समावयवी से अधिक होता है। श्रृंखला अधिक शाखित होने पर क्वथनांक कम होते हैं।
    क्वथनांक में परिवर्तन को अन्तराण्विक आकर्षण बलों के पदों में समझाया जा सकता है। ये बल अणु की सतह के सापेक्ष कार्य करते हैं तथा इनका परिमाण पृष्ठ सतह के क्षेत्रफल के बढ़ने पर बढ़ता है। जैसे ही श्रेणी में आण्विक आकार बढ़ता है वैसे ही पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ता है। तथा क्वथनांक भी बढ़ते हैं।
    n-ऐल्केनों में शाखित श्रृंखला समावयवियों की तुलना में अधिक पृष्ठ क्षेत्रफल होता है, अत: अन्तराण्विक बल शाखित श्रृंखला समावयवियों में दुर्बल होते हैं। अतः इनके क्वथनांक सीधी श्रृंखला समावयवियों की तुलना में निम्न होते हैं।
  5. गलनांक-आण्विक आकार के बढ़ने के साथ-साथ ऐल्केनों के गलनांकों में क्रमिक परिवर्तन, नहीं पाया जाता है। सम संख्या में कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केनों के गलनांक विषम संख्या में कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केनों से उच्च होते हैं। सम कार्बन संख्या वाले n-ऐल्केन विषम कार्बन संख्या वाले n-ऐल्केनों की तुलना में अधिक सममित होते हैं अर्थात् वे क्रिस्टल जालक में अधिक निविड़ संकुलित (closely packed) होते हैं। दूसरे शब्दों में, इनमें अन्तराण्विक आकर्षण बल अधिक होते हैं, अत: इनके गलनांक कुछ उच्च होते हैं।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-43

प्रश्न 4.
संरूपण क्या है? एथेन के परिप्रेक्ष्य में वर्णन कीजिए।
उत्तर
संरूपण-ऐसे परमाणुओं की त्रिविम व्यवस्थाएँ जो C—C एकल आबन्ध के घूर्णन के कारण एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती हैं, संरूपण, संरूपणीय समावयव या घूर्णी कहलाती हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-44

एथेन के सॉहार्स प्रक्षेप एथेन के संरूपण-एथेन के असंख्य संरूपण होते हैं। इनमें से दो संरूपण चरम होते हैं। एक रूप में दोनों कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के अधिक पास हो जाते हैं उसे ग्रस्त रूप कहते हैं। दूसरे रूप में, हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं से अधिकतम दूरी पर रहते हैं। उन्हें सांतरित रूप कहते हैं। इनके अलावा कोई भी मध्यवर्ती संरूपण विषमतलीय संरूपण कहलाता है। सभी संरूपणों में आबन्ध कोण तथा आबन्ध लम्बाई समान रहती है। ग्रस्त तथा सांतरित संरूपणों को सॉहार्स तथा न्यूमैन प्रक्षेप द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

  1. सॉहार्स प्रक्षेप–इस प्रक्षेपण में अणु को आण्विक अक्ष की दिशा में देखा जाता है। कागज पर केंद्रीय C-C आबंध को दिखाने के लिए दाईं या बाईं ओर झुकी हुई एक सीधी रेखा खींची जाती है। इस रेखा को कुछ लंबा बनाया जाता है। आगे वाले कार्बन को नीचे बाईं ओर तथा पीछे वाले कार्बन को ऊपर दाईं ओर से प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक कार्बन से संलग्न तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को तीन रेखाएँ। खींचकर दिखाया जाता है। ये रेखाएँ एक-दूसरे से 120° का कोण बनाकर झुकी होती हैं।
  2. न्यूमैन प्रक्षेप–इस प्रक्षेपण में अणु को सामने से देखा जाता है। आँख के पास वाले कार्बन को एक बिंदु द्वारा दिखाया जाता है और उससे जुड़े तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को 120° कोण पर खींची तीन रेखाओं के सिरों पर लिखकर प्रदर्शित किया जाता है। पीछे (आँख से दूर) वाले कार्बन को एक वृत्त द्वारा दर्शाते हैं तथा इसमें आबंधित हाइड्रोजन परमाणुओं को वृत्त की परिधि से परस्पर 120° के कोण पर स्थित तीन छोटी रेखाओं से जुड़े हुए दिखाया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-45

प्रश्न 5.
ऐल्कीनों में पाये जाने वाले कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध की संरचना समझाइए।
या
द्विआबन्धं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ऐल्कीनों में C=C द्विआबंध होता है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा (σ) आबंध (आबंध एंथैल्पी लगभग 348 kJmol-1 है) होता है, जो दो कार्बन परमाणुओं के spसंकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है। इसमें दो कार्बन परमाणुओं के 2p2 असंकरित कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन करने पर एक दुर्बल पाई (π) आबंध, (आबंध एंथैल्पी 251 kJmol-1 है) बनता है।
C—C एकल आबंध लंबाई (154 pm) की तुलना में C=C द्विआबंध लंबाई (134 pm) छोटी होती है। पाई (π) आबंध दो p-कक्षकों के दुर्बल अतिव्यापन के कारण दुर्बल होते हैं। अतः पाई (π) आबंध वाले ऐल्कीनों को दुर्बल बंधित गतिशील इलेक्ट्रॉनों का स्रोत कहा जाता है। अत: ऐल्कीनों पर उन अभिकर्मकों अथवा यौगिकों, जो इलेक्ट्रॉनों की खोज में होते हैं, का आक्रमण आसानी से हो जाता है। एथीन अणु के कक्षीय आरेख चित्र निम्नवत् हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-46

प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-48
उत्तर

  1. 3, 3-डाइमेथिल-1-हेक्सिन,
  2. 2-एथिल ब्यूटानॉइल क्लोराइड।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-49
उत्तर

  1. 2-एथिल ब्यूटानल,
  2. 2-एथिल 3-मेथिल ब्यूटीन।

प्रश्न 8.
ऐल्कीनों में ज्यामितीय समावयवता को समझाइए।
या
ऐल्कीन ज्यामितीय समावयवता क्यों प्रदर्शित करती हैं?
उत्तर
द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जुड़कर संतुष्ट करते हैं। अगर प्रत्येक कार्बन से जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न हैं तो इसे YXC = CXY द्वारा प्रदर्शित करते हैं। ऐसी संरचनाओं को दिक् में निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है|
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-50
संरचना ‘a’ में एकसमान दो परमाणु (दोनों x या दोनों Y) द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के एक ही ओर स्थित होते हैं। संरचना ‘b’ में दोनों x अथवा दोनों Y द्विआबंधित कार्बन की दूसरी तरफ या द्विआबंधित कार्बन परमाणु के विपरीत स्थित होते हैं, जो विभिन्न ज्यामिति दर्शाते हैं। इनका दिक् में परमाणु या समूहों की भिन्न स्थितियों के कारण विन्यास भिन्न होता है।
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अतः ये त्रिविम समावयवी (stereo isomers) हैं। इनकी समान ज्यामिति तब होती है, जब द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं या समूहों का घूर्णन हो सकता है, परन्तु C= C द्विआबंध में मुक्त घूर्णन नहीं होता। यह प्रतिबंधित होता है। अत: परमाणुओं अथवा समूहों के द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के मध्य प्रतिबंधित घूर्णन के कारण यौगिकों द्वारा भिन्न ज्यामितियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस प्रकार के त्रिविम समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह एक ही ओर स्थित हों, उन्हें समपक्ष (cis) कहा जाता है, जबकि दूसरे समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह विपरीत ओर स्थित हों, विपक्ष (trans) समावयवी कहलाते हैं। इसलिए दिक् में समपक्ष तथा विपक्ष समावयवों की संरचना समान होती है, किंतु विन्यास भिन्न होता है। दिक् में परमाणुओं या समूहों की भिन्न व्यवस्थाओं के कारण ये समावयवी अनेक गुणों (जैसे-गलनांक, क्वथनांक, द्विध्रुव आघूर्ण, विलेयता आदि) में भिन्नता दर्शाते हैं। ब्यूट-2-ईन की ज्यामितीय समावयवता अथवा समपक्ष-विपक्ष समावयवता को निम्नलिखित संरचना द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-52
ऐल्कीन का समपक्ष रूप विपक्ष की तुलना में अधिक ध्रुवीय होता है।
उदाहरणार्थ-समपक्ष ब्यूट-2-ईन का द्विध्रुव आघूर्ण 0.350 डिबाई है, जबकि विपक्ष ब्यूट-2-ईन का लगभग शून्य होता है। अतः विपक्ष ब्यूट-2-ईन अध्रुवीय है। इन दोनों रूपों की निम्नांकित विभिन्न ज्यामितियों को बनाने से यह पाया गया है कि विपक्ष-ब्यूट-2-ईन के दोनों मेथिल समूह, जो विपरीत दिशाओं में होते हैं, प्रत्येक C-CH, आबंध के कारण ध्रुवणता को नष्ट करके विपक्ष रूप को निम्न प्रकार अध्रुवीय बनाते हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-53
ठोसों में विपक्ष समावयवियों के गलनांक समपक्ष समावयवियों की तुलना में अधिक होते हैं। ज्यामितीय या समपक्ष (cis) विपक्षः (trans) समावयवता, XYC = CXZ तथा XYC = CZW प्रकार की ऐल्कीनों द्वारा भी प्रदर्शित की जाती है।

प्रश्न 9.
ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मकों से अभिक्रिया करती हैं न कि नाभिकस्नेही अभिकर्मकों से। क्यों?
या
ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं न कि इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ क्यों?
उत्तर
ऐल्कीन में द्विआबंध होता है। इनमें से एक प्रबल कार्बन-कार्बन सिग्मा (π) आबंध और एक दुर्बल पाई (σ) आबंध होता है। π – इलेक्ट्रॉनों का इलेक्ट्रॉन अभ्र σ-आबंधित कार्बन परमाणुओं के तल के ऊपर तथा नीचे स्थित होता है। अतः π-इलेक्ट्रॉन कार्बन परमाणुओं से शिथिलता (loosely) से बद्ध होते हैं। चूंकि इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण होते हैं इसलिए π-इलेक्ट्रॉन इलेक्ट्रॉनस्नेही को आकर्षित और नाभिकस्नेही को प्रतिकर्षित करते हैं। अतः ऐल्कीन इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं।
इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाएँ दो प्रकार की हो सकती हैं-योगात्मक तथा प्रतिस्थापन।
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में एक σ- कार्बन-हाइड्रोजन आबंध टूटता है और द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही के मध्य एक नया σ-आबंध बनता है। इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में अधिक ऊर्जा परिवर्तन नहीं होता है क्योंकि σ-कार्बन-हाइड्रोजन आबंध तथा नए σ – C – X आबंध की आबंध ऊर्जाओं में अधिक अंतर नहीं होता है।
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं में एक दुर्बल -आबंध टूटता है और दो प्रबल o-आबंधों का निर्माण होता है। इस अभिक्रिया में 445 kJmol-1 (2 x 348 kJmol-1 – 251 kJmol-1) ऊर्जा मुक्त होती है। स्पष्ट है कि ऊर्जा की दृष्टि से इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं से अधिक अनुकूल होती हैं। यही कारण है कि ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं न कि इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ।

प्रश्न 10.
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि समझाइए।
या
एथिलीन के Br2 से योग की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि को एथिलीन के Br2 से योग के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। यह अभिक्रिया निम्न दो पदों में होती है-
पद 1–ब्रोमीन अणु (अध्रुवीय) जब एथिलीन अणु के पास आता है तो द्विआबंध के E-इलेक्ट्रॉन ब्रोमीन अणु में दोनों ब्रोमीन परमाणुओं को बाँधे रखने वाले इलेक्ट्रॉन युग्म को प्रतिकर्षित करने लगते हैं जिससे ब्रोमीन अणु का ध्रुवण हो जाता है। इस ब्रोमीन द्विध्रुव को धन सिरा इलेक्ट्रॉनस्नेही की भाँति व्यवहार करता है। एथिलीन अणु के 7-इलेक्ट्रॉन इस सिरे को आकर्षित करके -संकर (E-complex) बनाते हैं जो बाद में कार्बोधनायन और ब्रोमाइड आयन देता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-54
यह पद मंद पद (slow step) है। अतः यह अभिक्रिया का दर निर्धारक पद (rate determining step) है।
पद 2–प्राप्त कार्बोधनायन अत्यंत क्रियाशील होता है। विलयन में उपस्थित ब्रोमाइड आयन इस पर नाभिकस्नेही आक्रमण करके योगोत्पाद (addition product) बनाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-55

प्रश्न 11.
मारकोनीकॉफ नियम तथा परॉक्साइड प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर
मारकोनीकॉफ का नियम-इस नियम के अनुसार-जब कोई असममित ऐल्कीन किसी असममित अणु से योग करती है तो जुड़ने वाले अणु का धनात्मक भाग द्विआबंध बनाने वाले उस कार्बन परमाणु से जुड़ता है जिस पर अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित होते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-56
इस प्रकार उपरोक्त अभिक्रिया में HBr का धनात्मक भाग अर्थात् H+ कार्बन परमाणु संख्या 1 से संयुक्त होता है क्योंकि कार्बन परमाणु संख्या 1 पर कार्बन परमाणु संख्या 2 की तुलना में अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित हैं।
परॉक्साइड प्रभाव या खैराश प्रभाव-खैराश (Kharasch) तथा उनके सहयोगियों ने सन् 1933 में प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात किया कि परॉक्साइड जैसे बेन्जोइल परॉक्साइड की उपस्थिति में असममित ऐल्कीनों पर HBr (HCl अथवा HI का नहीं) का योग मारकोनीकॉफ के नियम के विरुद्ध होता है।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-57
परॉक्साइड परॉक्साइड की उपस्थिति में ऐल्कीनों के इस अपसामान्य (abnormal) व्यवहार को खैराश प्रभाव (Kharasch effect) या परॉक्साइड प्रभाव (peroxide effect) कहते हैं।

प्रश्न 12.
मेथिल ऐसीटिलीन, अमोनियम क्यूप्रस क्लोराइड के साथ क्रिया करके लाल अवक्षेप देती है जबकि डाइमेथिल ऐसीटिलीन लाल अवक्षेप नहीं देती है। कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-58
मेथिल ऐसीटिलीन में एक अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित है इसकी CuCl तथा NH4OH से अभिक्रिया कराने पर क्यूप्रस मेथिल ऐसीटेलाइड का लाल अवक्षेप बनता है। डाइमेथिल ऐसीटिलीन में कोई अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित नहीं है, इसलिए यह NH4OH तथा CuCl के साथ लाल अवक्षेप नहीं देता है।

प्रश्न 13.
ऐल्काइनों द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली समावयवता का वर्णन कीजिए।
या
ऐल्काइनों में पायी जाने वाली समावयवता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ऐल्काइन निम्नलिखित प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करती हैं-

  1. स्थान समावयवता या स्थिति समावयवता–ऐल्काइन श्रेणी के प्रथम दो सदस्य एथाइन तथा प्रोपाइन केवल एक रूप में पाए जाते हैं। ब्यूटाइन तथा अन्य उच्च ऐल्काइन कार्बन श्रृंखला में त्रिआबंध की विभिन्न स्थितियों के अनुसार स्थिति समावयवती प्रदर्शित करते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-59
  2. श्रृंखला समावयवता–पाँच तथा उससे अधिक कार्बन परमाणु वाले ऐल्काइन श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं। यह समावयवता कार्बन श्रृंखला की विभिन्न संरचनाओं के कारण होती है।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-60
  3. क्रियात्मक समावयवता-ऐल्काइन दो द्विआबंधों वाले यौगिकों के क्रियात्मक समावयवी होते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-61
  4. वलय-श्रृंखला समावयवता-ऐल्काइन साइक्लोऐल्कीनों के साथ वलय-श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-62

प्रश्न 14.
एथाइन का उदाहरण देते हुए त्रिआबन्ध की संरचना को समझाइए।
या
त्रिआबन्ध की संरचना पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
एथाइन ऐल्काइन श्रेणी का सरलतम अणु है। इसके प्रत्येक कार्बन परमाणु के दो sp संकरित कक्षकों के समअक्षीय अतिव्यापन से कार्बन-कार्बन सिग्मा आबंध बनता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु का शेष sp संकरित कक्षक अन्तरानाभिकीय अक्ष के सापेक्ष हाइड्रोजन परमाणु के 1s कक्षक के साथ अतिव्यापन करके दो C-H सिग्मा आबंध बनाते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-63
H — C—C आबंध कोण 180° का होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास C—C आबंध तथा तल के लंबवत् असंकरित p-कक्षक होते हैं। एक कार्बन परमाणु को 2p कक्षक दूसरे के समांतर होता है, जो समपाश्विक अतिव्यापन करके दो कार्बन परमाणुओं के मध्य दो (पाई) बंध बनाते हैं। अतः एथाइन अणु में एक C—C(सिग्मा) आबंध, दो C — H (सिग्मा) आबंध तथा दो C—C (पाई) आबंध होते हैं।
C ☰ C की आबंध सामर्थ्य 823 kJmol-1 है, जो C⚌C द्विआबंध आबंध एंथैल्पी 681 kJmol-1C—C एकल आबंध आबंध एंथैल्पी 348 kJmol-1 से अधिक होती है। C ☰ C की त्रिआबंध लम्बाई (120 pm), C=C द्विआबंध (134 pm) तथा C—C एकल आबंध (154 pm) की तुलना में छोटी होती है। अक्षों पर दो कार्बन परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन अभ्र अंतरानाभिकीय सममित बेलनाकार स्थिति में होते हैं। एथाइन एक रेखीय अणु है।

प्रश्न 15.
बेंजीन की संरचना से सम्बन्धित अनुनाद संकल्पना क्या है?
उत्तर
अनुनाद संकल्पना के अनुसार बेंजीन को दोनों केकुले संरचनाओं का अनुनादी संकर माना जाता है।
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बेंजीन की वास्तविक संरचना न तो I है और न ही II है लेकिन इन दोनों संरचनाओं का मध्यमान है। इसके समस्त गुणों की व्याख्या संरचना I या II से नहीं की जा सकती है लेकिन संरचना I तथा II के मध्यमान से की जा सकती है। अत: बेंजीन में प्रत्येक कार्बन-कार्बन आबन्ध की लम्बाई एकल आबंध लम्बाई 1.54 Å तथा द्विआबन्ध लम्बाई 1.34Å के मध्य 1.39 Å होती है। अनुनाद का प्रमुख प्रभाव यह होता है कि अनुनाद संकर का स्थायित्व अनुनाद संरचनाओं के स्थायित्व से अधिक होता है। इस प्रकार बेंजीन की अनुनाद संरचना से इसके स्थायित्व की व्याख्या भी हो जाती है।

प्रश्न 16.
बेंजीन की संरचना की आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना के अनुसार बेंजीन अणु में छ: कार्बन परमाणु एक चक्रीय श्रृंखला में उपस्थित होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2 संकरित होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु में तीन sp2 संकरित ऑर्बिटल तीन सिग्मा आबन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु एक सिग्मा आबन्ध एक हाइड्रोजन परमाणु से तथा एक-एक सिग्मा आबन्ध समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं से बनाता है। इस प्रकार ये छ: कार्बन परमाणु एक समषट्भुज बनाते हैं। बेंजीन में C-C- H व C-C-C आबंध कोण 120° के होते हैं तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु पर एक अप्रयुक्त p- ऑर्बिटल शेष रहता है। ये सभी p-ऑर्बिटल एक-दूसरे के समानान्तर होते हैं।

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प्रत्येक p-ऑर्बिटल अपने बायें या दायें वाले p-ऑर्बिटल से अतिव्यापन करके एक ए-आबन्ध बना सकता है। इस प्रकार बेंजीन अणु के दो ऑर्बिटल आरेख (orbital diagrams) प्राप्त होते हैं। ये दोनों आरेख दोनों केकुले संरचनाओं के समतुल्य हैं।
आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना के अनुसार π–इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण (delocalisation) से अधिक स्थायी संरचना प्राप्त होती है। अत: बेंजीन में π – इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण हो जाता है। प्रत्येक p-ऑर्बिटल अपने बायें तथा दायें दोनों ओर अतिव्यापन करता है तथा एक विस्थानीकृत आण्विक ऑर्बिटल प्राप्त होता है जिसमें छ: इलेक्ट्रॉन होते हैं।
इस प्रकार बेंजीन अणु एक सैण्डविच के समान है जिसमें छ: कार्बन परमाणु दो इलेक्ट्रॉन मेघों के…। मध्य एक सैण्डविच के रूप में स्थित होते हैं। बेंजीन को केकुले संरचनाओं I या II से प्रदर्शित किया जा सकता है। चूंकि ये संरचनाएँ बेंजीन की वास्तविक संरचनाएँ नहीं हैं, अतः इसकी वास्तविक संरचना को प्रायः संलग्न चित्र में प्रदर्शित संरचना से प्रदर्शित किया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-66

प्रश्न 17.
बेंजीन संरचना में निम्न की पुष्टि कीजिए
(i) यह एक बन्द श्रृंखला का यौगिक है।
(ii) यह एक संतृप्त यौगिक की भाँति व्यवहार करती है।
उत्तर
बेंजीन की संगत ऐल्केन का अणुसूत्र Cn H2n+2 के अनुसार C6H14 है। बेंजीन में इससे आठ हाइड्रोजन परमाणु कम हैं। अतः यदि बेंजीन की संरचना में कार्बन परमाणु एक विवृत श्रृंखला (open chain) बनाते हैं तो उसमें चार द्विआबन्ध या इसके अनुरूप द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध उपस्थित होने चाहिये। इस आधार पर बेंजीन की निम्नलिखित विवृत श्रृंखला संरचनाएँ सम्भव हैं|

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-67

बेंजीन की विवृत श्रृंखला संरचनाएँ निम्नलिखित कारणों से सम्भव नहीं हैं-

  1. उपरोक्त संरचनाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि एथिलीन तथा अन्य ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों की भॉति बेंजीन भी Br2/CCl4 का रंग उड़ा देगी तथा बॉयर अभिकर्मक का रंग परिवर्तित कर देगी। बेंजीन ऐसा नहीं करती है। अत: बेंजीन की उपरोक्त संरचनाएँ दोषपूर्ण हैं।
  2. बेंजीन हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण तथा अन्य प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक प्रदर्शित करती है। इन अभिक्रियाओं में बेंजीन अणु में उपस्थित एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु अन्य परमाणुओं या समूहों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन इस प्रकार की अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करते हैं। अत: बेंजीन की इन अभिक्रियाओं को उपरोक्त संरचनाओं के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता है।
  3. उपरोक्त संरचनाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि बेंजीन का एक अणु हाइड्रोजन के चार अणुओं का योग करेगा। वास्तव में बेंजीन का एक अणु हाइड्रोजन के तीन अणुओं का योग करता है। अत: बेंजीन की उपरोक्त संरचनाएँ दोषपूर्ण हैं। उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि बेंजीन की विवृत श्रृंखला संरचना सम्भव नहीं है; इसमें तीन कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध उपस्थित हैं तथा इसमें उपस्थित द्विबन्धों की प्रकृति ऐलिफैटिक अंसतृप्त हाइड्रोकार्बनों में उपस्थित द्विआबन्धों की प्रकृति से भिन्न है। इस प्रकार उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि बेंजीन एक बंद श्रृंखला का यौगिक है तथा यह एक संतृप्त यौगिक की भाँति व्यवहार करता है।

प्रश्न 18.
ऐरीनों या बेंजीन के भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐरीनों या बेंजीन के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. गंध, रंग तथा भौतिक अवस्था—ये सामान्यतः विशिष्ट गंधयुक्त, रंगहीन, द्रव या ठोस होते हैं। आप नैफ्थेलीन की गोलियों से चिरपरिचित हैं। इसकी विशिष्ट गंध तथा शलभ प्रतिकर्षी गुणधर्म के कारण इसे शौचालय में तथा कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किया जाता है।
  2. विलेयता-वृहद जलविरागी हाइड्रोकार्बन भाग के कारण ये जल में अमिश्रणीय तथा कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
  3. दहन-ये कज्जली लौ के साथ जलते हैं।
  4. गलनांक तथा क्वथनांक-क्वथनांक आण्विक आकार में वृद्धि के साथ बढ़ते हैं। ऐसा वान्डरवाल्स बलों (आकर्षण) में वृद्धि के कारण होता है।

गलनांक आण्विक आकार और सममिति पर निर्भर करते हैं। अणु जितना अधिक सममित होता है। गलनांक उतना ही अधिक होता है।

प्रश्न 19.
टॉलूईन की पाश्र्व श्रृंखला प्रतिस्थापन तथा नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया के रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
(i) टॉलूईन की पाश्र्व श्रृंखला प्रतिस्थापन अभिक्रिया

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-68

(ii) टॉलूईन की नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-69

प्रश्न 20.
ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों से होने वाली कैन्सरजनीयता तथा विषाक्तता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
बेन्जीन एवं अनेक बहुचक्री ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन बहुत आविषालु (toxic) और कैन्सरजनी (carcinogenic) रासायनिक यौगिक हैं। कैन्सरजनी पदार्थ जैव ऊतकों में कैन्सर उत्पन्न कर सकते हैं। सिगरेट के धुएँ, कोल और पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन के उत्पादों में चिमनियों के धुएँ एवं चिमनियों में एकत्रित काजल (soot) में कैन्सरजनी बहुचक्री ऐरामैटिक हाइड्रोकार्बन उपस्थित होते हैं।
1,2-बेन्जऐन्ग्रेसीन (IV), 9, 10-डाइमेथिल-1,2-बेन्जऐन्ट्रेसीन (V) और 1,2-बेन्जपाइरीन (VI), कैन्सरजनी पदार्थ हैं। कैन्सरजनी पदार्थ मानव-शरीर में प्रवेश करके विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाएँ करते हैं और कोशिकाओं (cells) के DNA को क्षति पहुँचाकर कैन्सर पैदा करते हैं। DNA के म्यूटेशन के परिणामस्वरूप कैन्सर होता है।
कुछ कार्बनिक पदार्थ वास्तव में स्वयं कैन्सरजनी नहीं होते, किन्तु जीव में उपाचयी क्रियाओं द्वारा सक्रिय कैन्सरजनों (carcinogens) में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार के यौगिक प्रोकार्सीनोजन (procarcinogens) कहलाते हैं।
1,2-बेन्जपाइरीन (VI) एक कैन्सरजनी (carcinogens) है। यह लीवर में उपस्थित एन्जाइम द्वारा एपॉक्सी डायॉल (epoxy diol) में परिवर्तित हो जाता है जो म्यूटेशन प्रेरित करता है जिसके परिणास्वरूप कुछ कोशिकाओं की अनियन्त्रित वृद्धि हो सकती है।
बेन्जीन एक कैन्सरजुनी यौगिक है। लीवर में उपस्थित एन्जाइम द्वारा बेन्जीन का बेन्जीन ऑक्साइड में ऑक्सीकरण होता है। बेन्जीन ऑक्साइड़ और उससे व्युत्पन्न यौगिक कैन्सरजनी हैं और DNA से क्रिया करके म्यूटेशन प्रेरित कर सकते हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐल्केनों की हैलोजनीकरण अभिक्रिया को मुक्त मूलक क्रियाविधि सहित समझाइए।
उत्तर
हैलोजनीकरण-ऐल्केनें सूर्य के प्रकाश या उत्प्रेरक की उपस्थिति में या उच्च ताप पर हैलोजनों के साथ प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ करती हैं। किसी हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का हैलोजन परमाणुओं द्वारा विस्थापन हैलोजनीकरण कहलाता है। किसी ऐल्केन के प्रति हैलोजनों की अभिक्रियाशीलता का क्रम E, > Cl, > Br, > I, है। ऐल्केनों की हैलोजनीकरण अभिक्रियाएँ साधारणतः क्लोरीन और ब्रोमीन के साथ करायी जाती हैं, क्योंकि ऐल्केनों की फ्लुओरीन से सीधी अभिक्रिया अति प्रचण्ड व विस्फोटक होती है तथा ऐल्केनों की आयोडीन से अभिक्रिया उत्क्रमणीय एवं अति मन्द होती है।
1. क्लोरीनीकरण-हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन क्लोरीनीकरण कहलाता है।
उदाहरणार्थ-मेथेन और क्लोरीन के मिश्रण को सूर्य के विसरित प्रकाश में रखने पर या उच्च ताप (250-400°C) पर गर्म करने पर मेथेन के चारों हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। अभिक्रिया के उत्पादों के रूप में क्लोरोमेथेनों और हाइड्रोजन क्लोराइड का मिश्रण प्राप्त होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-70

क्लोरोफॉर्म क्लोरीन कार्बन टेट्राक्लोराइड क्लोरीनीकरण की क्रिया बहुत तीव्र गति से होती है। प्राप्त मिश्रण में मेथिल क्लोराइड (CH3Cl2), मेथिलीन क्लोराइड (CH2Cl2), क्लोरोफॉर्म (CHCl3) और कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) चारों क्लोरोमेथेन उपस्थित होती हैं। मेथेन और क्लोरीन के आयतनों के अनुपात को नियन्त्रित करके अभिक्रिया ऐच्छिक पद तक करायी जा सकती है। मेथेन की बहुत अधिकता होने पर मेथिल क्लोराइड मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-71

अभिक्रिया की क्रिया-विधि–सूर्य के विसरित प्रकाश में मेथेन की क्लोरीन से प्रतिस्थापन अभिक्रिया एक मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रिया है। मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रिया कई पदों में होती है। इसके प्रारम्भन (initiation), संचालन (propagation) और अन्तिम (termination) पद होते हैं। सूर्य के प्रकाश में मेथेन के क्लोरीनीकरण की क्रिया-विधि निम्नलिखित हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-72

अभिक्रिया के प्रारम्भन पद (1) में Cl2 अणु का क्लोरीन परमाणुओं (मुक्त मूलकों) में होमोलिटिक विदलन होता है। इस पद के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रकाश से प्राप्त होती है। अत्यधिक अभिक्रियाशील क्लोरीन परमाणु शीघ्र मेथेन से अभिक्रिया करता है और उसमें से एक हाइड्रोजन परमाणु को हटा देता। है जिससे UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-73 “(मेथिल मुक्त मूलक) और HCl अणु बन जाता है (पद 2)। मैथिल मुक्त मूलक अत्यधिक अभिक्रियाशील होता है और यह शीघ्र क्लोरीन अणु से अभिक्रिया करके मेथिल क्लोराइड (CH3Cl) और क्लोरीन परमाणु UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-74 बनाता है (पद 3)। क्लोरीन परमाणु पुनः मेथेन अणु से अभिक्रिया करके मेथिल मूलक बनाता है और मेथिल मूलक पुनः क्लोरीन अणु से अभिक्रिया करके क्लोरीन परमाणु बनाता है। पद (2), (3), (2), (3) का यह क्रम लगातार चलता रहता है। पद (2) और (3) श्रृंखला संचालन पद (chain propagating steps) कहलाते हैं। संचालन पद में एक मूलक लुप्त होता है और दूसरा मूलक उत्पन्न होता है। अभिक्रिया में क्लोरीन मूलक श्रृंखला वाहक (chain carrier) का कार्य करता है। अभिक्रिया श्रृंखला का अन्त दो क्लोरीन परमाणुओं के संयोजन से Cl2 अणु बनने (पद 4), या मेथिल मूलक और क्लोरीन मूलक के संयोजन से CH3Cl बनने (पद 5) से होता है। पद (4), (5) श्रृंखला के अन्तिम पद (chain terminating step) कहलाते हैं। सूर्य के सीधे प्रकाश में मेथेन और क्लोरीन का 1 : 2 मिश्रण विस्फोट के साथ अति तीव्र अभिक्रिया करता है। अभिक्रिया में कार्बन और हाइड्रोजन क्लोराइड बनते हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-75

एथेन और क्लोरीन के मिश्रण को सूर्य के विसरित प्रकाश में रखने पर मेथेन के सदृश एथेन के सभी हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। अभिक्रिया उत्पादों के रूप में क्लोरोएथेनों और हाईड्रोजन क्लोराइड का जटिल मिश्रण प्राप्त होता है। प्रोपेन व अन्य उच्च ऐल्केनों का क्लोरीनीकरण करने पर समावयवी मोनोक्लोरोऐल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
उदाहरणार्थ-प्रोपेन का क्लोरीनीकरण करने पर n-प्रोपिल क्लोराइड (CH3CH2CH2Cl) और आइसोप्रोपिल क्लोराइड (CH3 CHClCH3 ) का मिश्रण बनता है। n-ब्यूटेन । का क्लोरीनीकरण करने पर n-ब्यूविंल क्लोराइड (CH3 CH2CH2CH2Cl) और s-ब्यूटिल क्लोराइड (CH3CH2 CHClCH3) का मिश्रण बनता है। क्लोरीन की अधिकता होने पर विभिन्न क्लोरोऐल्केनों का जटिल मिश्रण प्राप्त होता है।

2. ब्रोमीनीकरण हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का ब्रोमीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन ब्रोमीनीकरण कहलाता है। ऐल्केनों की क्लोरीन की भाँति ब्रोमीन के साथ प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ होती हैं, परन्तु ब्रोमीनीकरण अपेक्षाकृत मन्द गति से होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-76

3. आयोडिनीकरण हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का आयोडीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन आयोडिनीकरण कहलाता है। ऐल्केनों की आयोडीन से प्रतिस्थापन अभिक्रिया बहुत मन्द और उत्क्रमणीय होती है, अतः उनको सीधा आयोडिनीकरण नहीं कराया जा सकता है। ऐल्केनों का आयोडिनीकरण प्राय: किसी ऑक्सीकारक (जैसे, HIO3 HNO3, आदि) की उपस्थिति में कराया जाता है। ऑक्सीकारक अभिक्रिया में बने HI को I2 में ऑक्सीकृत कर देता है, जिससे विपरीत अभिक्रिया नहीं होती है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-77

प्रश्न 2.
ऐल्कीनों के विरचन की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए।
या
निर्जलीकरण अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
ऐल्कीनों के विरचने की प्रमुख विधियों का वर्णन निम्नवत् है-
1. ऐल्काइनों के आंशिक अपचयन से-ऐल्काइनों की हाइड्रोजन से योग अभिक्रिया का अन्तिम उत्पाद ऐल्केन हैं। इस अभिक्रिया में Ni को उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त करते हैं तथा ताप 250-300°C रखा जाता है। यदि ऐल्काइन को अधिक मात्रा में लिया जाए तथा अभिक्रिया कम ताप पर सम्पन्न करायी जाए तो अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐल्कीन भी प्राप्त होती हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-78

2. ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण से-ऐल्कोहॉलों को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल अथवा सान्द्र फॉस्फोरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-79

इस अभिक्रिया में ऐल्कोहॉल के एक अणु में से जल की एक अणु निकल जाता है। इस प्रकार की अभिक्रियाओं को निर्जलीकरण (dehydration) कहते हैं।

3. ऐल्किल हैलाइडों के विहाइड्रोहैलोजनीकरण से-ऐल्किल हैलाइडों को कास्टिक पोटाश के ऐल्कोहॉलीय विलयन के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है। इस क्रिया में ऐल्किल हैलाइड के एक अणु में से हाइड्रोजन हैलाइड का एक अणु निकल जाता है। अतः इस क्रिया ‘ को विहाइड्रोहैलोजनीकरण (dehydrohalogenation) कहते हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-80

4. डाइहैलोऐल्केनों के विहैलोजनीकरण से-जिन डाइहैलाइडों में दो हैलोजन परमाणु दो समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं पर स्थित होते हैं उन्हें विसिनल डाइहैलाइड (vicinal dihalides) अथवा 1, 2-डाइहैलोऐल्कॅन (1, 2- dihaloalkanes) कहते हैं। इस प्रकार के डाइहैलाइडों को मेथेनॉल अथवा एथेनॉल में जिंक चूर्ण के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-81

5. डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों के वैद्युत-अपघटन से कोल्बे अभिक्रिया-डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवणों के जलीय विलयन के वैद्युत-अपघटन से ऐनोड पर ऐल्कीन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-पोटैशियम सक्सिनेट के जलीय विलयन का वैद्युत-अपघटन करने पर ऐनोड पर एथिलीन प्राप्त होती है।

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यह अभिक्रिया कोल्बे वैद्युत-अपघटनी अभिक्रिया (Kolbe’s electrolytic reaction) कहलाती है और निम्न पदों में होती है-

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6. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक से-हैलोजन प्रतिस्थापित ऐल्कीन (halogen substituted alkenes) तथा ग्रिगनार्ड अभिकर्मकों की अभिक्रिया से उच्च ऐल्कीन प्राप्त की जा सकती हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-84

7.अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के टेट्रा-ऐल्किल व्युत्पन्नों से-अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के टेट्रा-ऐल्किल व्युत्पन्नों को गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-85

8. ऐल्केनों के भंजन से-ऐल्केनों को वायु की अनुपस्थिति में 773-973 K ताप पर गर्म करने |से उनके अधिक अणुभार वाले अणु कम अणु भार वाले अणुओं में विभाजित हो जाते हैं। प्राप्त मिश्रण में निम्न ऐल्केन, ऐल्कीन तथा हाइड्रोजन होते हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-86

प्राप्त मिश्रण के अवयवों को उपयुक्त विधियों द्वारा अलग-अलग किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
ऐल्कीनों के प्रमुख रासायनिक गुणों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
द्विआबन्ध की उपस्थिति के कारण ऐल्कीन अत्यन्त क्रियाशील होती हैं तथा प्रायः ऐसी अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं जिनमें द्विआबन्ध का T-आबन्ध विखण्डित हो जाता है। इनकी प्रमुख अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-
1. योगात्मक अभिक्रियाएँ-ऐल्कीनों में द्विआबन्ध की उपस्थिति के कारण ये यौगिक योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। इन अभिक्रियाओं में द्विआबन्ध का π-आबन्ध तथा अभिकर्मक दो भागों में विभक्त हो जाता है।
अभिकर्मक का एक भाग द्विआबन्ध बनाने वाले एक कार्बन परमाणु से तथा दूसरा भाग दूसरे परमाणु से जुड़ जाता है।

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ऐल्कीनों की योगात्मक अभिक्रियाओं के कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(i) हाइड्रोजन का योग–ऐल्कीन निकिल चूर्ण की उपस्थिति में 523-573 K ताप पर हाइड्रोजन से योग करके ऐल्केन बना देती हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-88

निकिल की उपस्थिति में ऐल्कीनों तथा हाइड्रोजन की योग अभिक्रिया को सेवातिये तथा सेण्डर्न की अभिक्रिया कहते हैं। यह अभिक्रिया उच्च ताप पर होती है। पैलेडियम या प्लेटिनम उत्प्रेरक की उपस्थिति में ऐल्कीन तथा हाइड्रोजन साधारण ताप पर ही अभिक्रिया कर लेती हैं तथा ऐल्केन बनाती हैं।

(ii) हैलोजनों का योग-ऐल्कीन, हैलोजनों के साथ संयोग करके डाइहैलोजन यौगिक बनाती हैं। इस अभिक्रिया में हैलोजनों की क्रियाशीलता का क्रम Cl2 > Br2 >I2 है। यह अभिक्रिया किसी अध्रुवीय विलायक जैसे CCl4 तथा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में या किसी ध्रुवीय विलायक जैसे जल में की जाती है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-89

(iii) हाइड्रोजन हैलाइडों का योग-किसी भी ऐल्कीन का एक अणु किसी भी हाइड्रोजन हैलाइड के एक अणु से संयोग करके योगात्मक यौगिक बनाता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-90

इस अभिक्रिया में हैलोजन हैलाइडों की क्रियाशीलता का क्रम HI > HBr > HCI है।

(iv) जल का योग–अम्लीय उत्प्रेरकों की उपस्थिति में ऐल्कीनों तथा जल की योग अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐल्कोहॉल प्राप्त होते हैं। जल का योग मारकोनीकॉफ के नियम के अनुसार होता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-91

(v) ओजोन का योग–ऐल्कीनों के ईथरीय विलयन में ओजोन प्रवाहित करने पर योगात्मक यौगिक बनते हैं जिन्हें ओजोनाइड (ozonides) कहते हैं। ओजोनाइडों को जल के साथ उबालने पर ये अपघटित हो जाते हैं। जल-अपघटन की क्रिया Zn चूर्ण की उपस्थिति में करायी जाती है। यह जल-अपघटन से प्राप्त हाइड्रोजन परॉक्साइंड को अपघटित कर देता है ताकि यह अन्य उत्पादों से अभिक्रिया न कर सके। ऐल्कीनों तथा ओजोन की योग अभिक्रिया तथा ओजोनाइडों के जल-अपघटन की अभिक्रिया, इस सम्पूर्ण क्रिया को ओजोनी अपघटन (ozonolysis) कहते हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-92

स्पष्ट है कि सम्पूर्ण अभिक्रिया में द्विआबन्ध टूट जाता है तथा जिन कार्बन परमाणुओं से द्विआबन्ध जुड़ा था, वे ऑक्सीजन परमाणु से जुड़ जाते हैं।

2. प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ-असंतृप्त होने के कारण ऐल्कीन मुख्यतः योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं तथा प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करती हैं लेकिन उच्च ताप पर हैलोजनों के साथ संयोग करके ये प्रतिस्थापन उत्पाद भी देती हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-93

3. ऑक्सीकरण
(i) दहन-हवा अथवा ऑक्सीजन में ऐल्कीन दीप्तिमान ज्वाला के साथ जलती हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-94

(ii) क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन से—1% क्षारीय KMnO4 विलयन से ऑक्सीकृत होकर ऐल्कीन, डाइहाइड्रॉक्सी यौगिक बनाती हैं।

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इस अभिक्रिया में KMnO4 का गुलाबी रंग लुप्त हो जाता है तथा K2MnO4 बनने के कारण हरा रंग प्राप्त होता है। इस अभिक्रिया की सहायता से दिये गए कार्बनिक यौगिक में कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध की उपस्थिति की अर्थात् असंतृप्तता की जाँच की जा सकती है। 1% क्षारीय KMnO4 को बॉयर अभिकर्मक (Baeyer’s reagent) तथा असंतृप्तता के इस परीक्षण को बॉयर परीक्षण (Baeyer’s test) कहते हैं।

(iii) अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन से-अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन के प्रभाव में ऐल्कीन अणु उस स्थान से विखण्डित हो जाता है जहाँ द्विआबन्ध होता है तथा अम्ल, ऐल्डिहाइड या कीटोन प्राप्त होते हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-96

उपरोक्त अभिक्रियाओं सेप्राप्त फॉर्मिक अम्ल अभिक्रिया की परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड व जल में ऑक्सीकृत हो जाता है।

HCOOH +[O] → CO2 + H2O

उपर्युक्त के अतिरिक्त ऐल्कीने बहुलकीकरण, समावयवीकरण, ऑक्सीमरक्यूरेशन डीमरक्यूरेशन तथा हाइड्रोबोरोनेशन या हाइड्रोबोरेशन अभिक्रियाएँ भी प्रदर्शित करती हैं।

प्रश्न 4.
ऐल्काइनों के विरचन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
या
ऐसीटिलीन के विरचन की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्काइनों के विरचन की विभिन्न विधियों का वर्णन निम्नवत् है-

1. डाइहैलोऐल्केन से—KOH के उबलते हुए ऐल्कोहॉलीय विलयन में डाइहैलोऐल्केन मिला देने से ऐल्काइन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

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2. हैलोफॉर्म से—क्लोरोफॉर्म (CHCl3) अथवा आयोडोफॉर्म (CHI3) को सिल्वर चूर्ण के साथ गर्म करने पर ऐसीटिलीन गैस प्राप्त हो जाती है।

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3. संश्लेषण विधिहाइड्रोजन गैस के वातावरण में दो कार्बन इलेक्ट्रोडों के मध्य विद्युतीय आर्क (electric arc) उत्पन्न करने पर ताप लगभग 3270K हो जाता है तथा कार्बन व हाइड्रोजन के संयोग से ऐसीटिलीन गैस बनती है।

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4. मैलिक अथवा फ्यूमेरिक अम्ल के सोडियम अथवा पोटैशियम लवण के वैद्युत अपघटन से (कोल्बे की विधि)-मैलिक अथवा फ्यूमेरिक अम्ल के सोडियम अथवा पोटैशियम लवण के जलीय विलयन का वैद्युत-अपघटन करने पर ऐनोड पर ऐसीटिलीन गैस प्राप्त हो जाती है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-100

5. टेट्रालाइडों के विहैलोजनीकरण से टेट्राहैलोऐल्केनों को जिंक चूर्ण (मेथेनॉल में) के साथ गर्म करने पर इनका विहैलोजनीकरण हो जाता है और ऐल्काइन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-101

6. कैल्सियम कार्बाइड से (प्रयोगशाला विधि)-कैल्सियम कार्बाइड को जल में मिलाने पर ये । दोनों पदार्थ साधारण ताप पर ही एक-दूसरे से अभिक्रिया करके ऐसीटिलीन बनाते हैं।

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इस अभिक्रिया का उपयोग ऐसीटिलीन को प्रयोगशाला में बनाने में किया जाता है। प्रयोगशाला विधि–एक शंक्वाकार फ्लास्क (conical flask) में रेत के ऊपर कैल्सियम कार्बाइड के टुकड़े रख दिए जाते हैं। फ्लास्क में दो छेद वाला कॉर्क लगा होता है जिसमें बिन्दु कीप (dropping funnel) तथा निकास नली लगा दी जाती हैं। निकास नली को एक धावन बोतल से जोड़ देते हैं जिसमें कॉपर सल्फेट का अम्लीय विलयन भरा रहता है। धावन बोतल को गैस जार से जोड़ देते हैं। बिन्दु कीप से बूंद-बूंद करके फ्लास्क में रखे कैल्सियम कार्बाइड पर जल गिराया जाता है। अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐसीटिलीन गैस तीव्रता से निकलती है। इसे । गैस में अशुद्धियों के रूप में फॉस्फीन, हाइड्रोजन सल्फाइड, आर्सीन और अमोनिया गैसें मिली। होती हैं जो अम्लीय कॉपर सल्फेट विलयन द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। शुद्ध ऐसीटिलीन गैस को पानी के ऊपर गैस जार में एकत्रित कर लिया जाता है।

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7. ऐसीटिलीन से उच्च ऐल्काइनों का संश्लेषण-पहले ऐसीटिलीन की सोडियम धातु से 475K पर अथवा द्रव अमोनिया में सोडामाइड (sodamide) से 196K पर अभिक्रिया कराते हैं। जिससे सोडियम ऐसीटिलाइड बनता है। यह ऐल्किल हैलाइडों से अभिक्रिया करके उच्च ऐल्काइन देता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-104

प्रश्न 5.
ऐल्काइनों की प्रमुख योगात्मक अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिए।
या
ऐल्काइनों की अम्लीय प्रकृति को समझाइए।
उत्तर
ऐल्काइनों की प्रमुख योगात्मक अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-
1. इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ—ये अभिक्रियाएँ निम्न दो पदों में होती हैं-

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कुछ प्रमुख इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ निम्न हैं-
(i) हैलोजनों का योग-क्लोरीन और ब्रोमीन ऐल्काइनों से योग करके पहले 1, 2-डाइहैलोऐल्कीन और बाद में 1, 1, 2, 2-टेट्राहैलोऐल्केन बनाती हैं।
उदाहरणार्थ

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इस अभिक्रिया में Br2 का लाल भूरा रंग लुप्त हो जाता है इसलिए इस अभिक्रिया का उपयोग असंतृप्तता के परीक्षण के लिए किया जाता है।

(ii) हैलोजन हैलाइडों का योग-हैलोजन हैलाइड ऐल्काइनों से योग करके पहले वाइनिल हैलाइड और फिर ऐल्किलीडीन हैलाइड (alkylidene halide) बनाते हैं। ये योग मारकोनीकॉफ के नियम के अनुसार होते हैं।
उदाहरणार्थ-

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(iii) हाइपोक्लोरस अम्ल का योग–ऐल्काइन हाइपोक्लोरस अम्ल से दो पदों में योग करती।

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(iv) जल का योग–ऐल्काइन 333K पर मयूंरिक सल्फेट तथा तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में जल के एक अणु के साथ संयुक्त होकर कार्बोनिल यौगिक देती हैं।

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(v) हाइड्रोजन सायनाइड का योग-ऐसीटिलीन Ba(CN)2 अथवा HCl में CuCl की उपस्थिति में हाइड्रोजन सायनाइड से योग करके वाइनिल सायनाइड (vinyl cyanide) बनाती है।

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2. नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ-ऐसीटिलीन को पोटैशियम मेथॉक्साइड (दाब पर) की सूक्ष्म मात्रा (1-2%) की उपस्थिति में 433-473K पर मेथेनॉल में से गुजारने पर मेथिल वाइनिल ईथर प्राप्त होता है।

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3. ऐल्काइनों की अम्लीय प्रकृति-ऐल्काइनों के त्रिआबंध से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय होते हैं। यह तथ्य निम्न अभिक्रियाओं द्वारा सत्यापित होता है-
(i) सोडामाइड से अभिक्रिया-सोडामाइड एक प्रबल क्षारक है। एथाइन और अन्य टर्मिनल ऐल्काइन अथवा 1-ऐल्काइन द्रव अमोनिया में सोडामाइड से अभिक्रिया करके
सोडियम ऐसीटिलाइड (क्षारीय) बनाती हैं।

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(ii) सोडियम से अभिक्रिया-एथाइन तथा अन्य टर्मिनल ऐल्काइनों को सोडियम (प्रबल क्षारक) के साथ गर्म करने पर सोडियम ऐसीटिलाइड बनते हैं।

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(iii) अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया-ऐल्काइनों के त्रिआबंध पर जुड़े हाइड्रोजन परमाणु भारी धातु आयनों जैसे Ag’ आयनों द्वारा भी प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ऐल्काइन् अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया करके सिल्वर ऐसीटिलाइड बनाती हैं।

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(iv) अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन से अभिक्रिया-एथाइन तथा टर्मिनल ऐल्काइन अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन से अभिक्रिया करके कॉपर ऐसीटिलाइड के लाल अवक्षेप बनाती हैं।

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प्रश्न 6.
बेंजीन की प्रमुख प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का क्रियाविधि सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
बेंजीन की प्रमुख प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-
1. हैलोजनीकरण-बेंजीन सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में तथा हैलोजन वाहक जैसे Fe या FeCl, की उपस्थिति में कमरे के ताप पर ही क्लोरीन या ब्रोमीन से अभिक्रिया करके प्रतिस्थापन उत्पाद बनाती है।

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क्रियाविधि—बेंजीनं पर हैलोजनीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है-

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2. सल्फोनीकरण-बेंजीन को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर बेंजीनसल्फोनिक अम्ल प्राप्त होता है। सधूम सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ यह अभिक्रिया साधारण ताप पर ही हो जाती है।

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क्रियाविधि-बेंजीन का सल्फोनीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है-

    1. सांद्र H2SO4 एक SO3 अणु को निष्कासित करता है।
      H2SO4 + H2SO4 ⇌ H3O++ HSO4 + SO3
      SO3 निम्न अनुनाद संरचनाओं को एक अनुनाद संकर है।
    2. इलेक्ट्रॉनस्नेही बेंजीन रिंग पर आक्रमण कर एक σ -जटिल का निर्माण करता है।
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    3.  σ-संकर क्षारक HSO4 से क्रिया कर प्रतिस्थापन उत्पाद बनाता है।
      UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-122

3. नाइट्रीकरण-बेंजीन सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में सान्द्र नाइट्रिक अम्ल से क्रिया करके नाइट्रोबेंजीन बनाती है।

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साधारण ताप पर यह अभिक्रिया धीमी गति से तथा ताप बढ़ाने पर तेजी से होती है। अधिक ताप पर तथा नाइट्रिक अम्ल की अधिक मात्रा प्रयुक्त करने पर डाइ-तथा ट्राइ-प्रतिस्थापन उत्पाद अर्थात् m-डाइनाइट्रोबेंजीन तथा 1, 3, 5-ट्राइनाइट्रोबेंजीन प्राप्त होते हैं।
क्रियाविधि-बेंजीन का नाइट्रीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है

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4. फ्रीडल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण—किसी लूईस अम्ल जैसे AlCl3 की उपस्थिति में बेंजीन की अभिक्रिया किसी ऐल्किल हैलाइड से कराने पर बेंजीन का ऐल्किलीकरण हो जाता है।
उदाहरणार्थ-

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5. फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण-किसी लूईस अम्ल जैसे AlCl3 की उपस्थिति में बेंजीन की अभिक्रिया किसी ऐसिल हैलाइड से कराने पर बेंजीन का ऐसिलीकरण हो जाता है।
उदाहरणार्थ-

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क्रियाविधि-बेंजीन का फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data (आँकड़ों का संग्रह)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प सही है
(i) जब आप एक नई पोशाक खरीदते हैं तो इनमें से किसे सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं
(क) कपड़े का रंग
(ख) कपड़े की कीमत
(ग) कपड़े को किस कम्पनी ने बनाया है।
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

(ii) आप कम्प्यूटर का इस्तेमाल कितनी बार करते हैं
(क) दिन में एक बार
(ख) कभी-कभी
(ग) दिन में तीन बार
(घ) दिन में अनेक बार
उत्तर :
(घ) दिन में अनेक बार

(iii) निम्नलिखित में से आप किस समाचार-पत्र को नियमित रूप से पढ़ते हैं|
(क) हिन्दुस्तान
(ख) दैनिक जागरण
(ग) दैनिक भास्कर
(घ) टाइम्स ऑफ इण्डिया
उत्तर :
(ख) दैनिक जागरण

(iv) पेट्रोल की कीमत में वृद्धि न्यायोचित है
(क) यदि पेट्रोल की माँग में वृद्धि हुई है।
(ख) यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि हुई है।
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) उपर्युक्त दोनों

(v) आपके परिवार की मासिक आमदनी कितनी है–
(क) 5 हजार से कम
(ख) 10 हजार से कम
(ग) 15 हजार से कम
(घ) 20 हजार
उत्तर :
(घ) 20 हजार

प्रश्न 2.
पाँच द्धिमार्गी प्रश्नों की रचना करें (हाँ/नहीं के साथ)
उत्तर :
(क) क्या आप रोज सुबह टहलने जाते हैं?                       (हाँ/नहीं)
(ख) क्या आप नियमित रूप से नहाते हैं?                        (हाँ/नहीं)
(ग) क्या आप घर पर कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं?          (हाँ/नहीं)
(घ) क्या आपके पास मारुति कार है?                              (हाँ/नहीं)
(ङ) क्या आपके पास एक हरा कलम है?                         (हाँ/नहीं)

प्रश्न 3.
सही विकल्प को चिह्नित करें
(क) आँकड़ों के अनेक स्रोत होते हैं। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।
(ख) आँकड़ा-संग्रह के लिए टेलीफोन सर्वेक्षण सर्वाधिक उपयुक्त विधि है, विशेष रूप से जहाँ पर जनता निरक्षर हो और दूर-दराज के काफी बड़े क्षेत्रों में फैली हो। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।
(ग) सर्वेक्षक/शोधकर्ता द्वारा संग्रह किए गए आँकड़े द्वितीय आँकड़े कहलाते हैं। ” (सही/गलत)
उत्तर :
गलत।
(घ) प्रतिदर्श के अयादृच्छिक चयन में पूर्वाग्रह (अभिनति) की संभावना रहती है। (सही/गलत)
उत्तर :
सही
(ङ) अप्रतिचयन त्रुटियों को बड़ा प्रतिदर्श अपनाकर कम किया जा सकता है। (सही/गलत)
उत्तर :
गलत।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रश्नों के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आपको इन प्रश्नों में कोई समस्या दिखाई दे रही है? यदि हाँ, तो कैसे?
(क) आप अपने सबसे नजदीक के बाजार से कितनी दूर रहते हैं?
उत्तर :
मैं अपने नजदीक के बाजार से 5 किमी दूर रहता हूँ।

(ख)
यदि हमारे कूड़े में प्लास्टिक की थैलियों की मात्रा 5 प्रतिशत है तो क्या इन्हें निषेधित किया जाना चाहिए?
उत्तर :
हाँ, क्योंकि प्लास्टिक एक अविघटनीय पदार्थ है। यह मृदा-प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक की थैलियाँ नालों और नालियों में पानी के बहाव को अवरुद्ध करती हैं। इस प्रकार पर्यावरण के हिसाब से प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग हानिकारक है और इनको निषेध किया जाना चाहिए।

(ग)
क्या आप पेट्रोल की कीमत में वृद्धि का विरोध नहीं करेंगे?
उत्तर :
पेट्रोल की कीमत में वृद्धि होने पर आवश्यक वस्तुओं के दामों में भी वृद्धि हो जाती है, इसलिए । पेट्रोल की कीमत में वृद्धि का विरोध अवश्य करना चाहिए।

(घ)
क्या आप रासायनिक उर्वरक के उपयोग के पक्ष में हैं?
उत्तर :
रासायनिक उर्वरक के उपयोग से हम फसल की उत्पादन मात्रा बढ़ा सकते हैं। परन्तु हमें उर्वरकों का प्रयोग सीमित मात्रा में कराना चाहिए। इनके अधिक प्रयोग से मृदा तथा जल प्रदूषण होता है।

(ङ)
(अ) क्या आप अपने खेतों में उर्वरक इस्तेमाल करते हैं?
उत्तर :
हाँ, परन्तु सीमित मात्रा में।

(ब)
आपके खेत में प्रति हेक्टेयर कितनी उपज होती है?
उत्तर :
40 क्विटल प्रति हेक्टेयर।

प्रश्न 5.
आप बच्चों के बीच शाकाहारी आटा नूडल की लोकप्रियता का अनुसंधान करना चाहते हैं। इस उद्देश्य से सूचना-संग्रह करने के लिए उपयुक्त प्रश्नावली बनाएँ।
उत्तर :

प्रश्नावली

  1. क्या आप शाकाहारी आटा नूडल का प्रयोग करते हैं?
  2. क्या आपको इसका स्वाद दूसरे खाद्य पदार्थों की तुलना में अधिक अच्छा लगता है?
  3. आप दिन में कब और कितनी बार इसको खाते हैं?
  4. क्या आपको इसकी कीमत उचित लगती है।
  5. एक दिन में आप इस पर कितना खर्च करते हैं?
  6. क्या आप इसे घर पर ही तैयार करते हैं अथवा बाजार से खरीदते हैं?
  7. आप इसे क्यों पसन्द करते हैं?
  8. क्या यह आपकी सेहत के लिए अच्छी है?
  9. क्या आप इसके स्थान पर कुछ औरोंग करना चाहेंगे?

प्रश्न 6.
200 फार्म वाले एक गाँव में फसल उत्पादन के स्वरूप पर एक अध्ययन आयोजित किया गया। इनमें से 50 फार्मों का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें से 50 प्रतिशत पर केवल गेहूँ उगाए जाते हैं। यहाँ पर समष्टि एवं प्रतिदर्श को पहचान कर बताएँ।
उत्तर :
समष्टि : 200 फार्म ।
प्रतिदर्श : 50 फार्म, जिनका सर्वेक्षण किया गया है।

प्रश्न 7.
प्रतिदर्श, समष्टि तथा चर के दो-दो उदाहरण दें।
उत्तर :
प्रतिदर्श – प्रतिदर्श समष्टि के एक खण्ड या एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे सूचना प्राप्त की जा सकती है। एक आदर्श प्रतिदर्श सामान्यतः समष्टि से छोटा होता है।
उदाहरण –

  • एक कॉलेज के 5000 विद्यार्थियों में से 500 विद्यार्थियों का चयन।
  • एक गाँव के 700 कृषि-श्रमिकों में से अध्ययन के लिए 70 कृषि-श्रमिकों का चयन।

समष्टि – सांख्यिकी में समष्टि शब्द से तात्पर्य है-अध्ययन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी मदों/इकाइयों की समग्रता।

उदाहरण –

  • एक जिले के समस्त कृषि-श्रमिक।
  • एक फैक्ट्री के समस्त मजदूर।

चर – वे मूल्य जिनका मान एक मद से दूसरे मद में बदलता रहता है और जो संख्यात्मक रूप में मापे जा सकते हैं, तब उन्हें चर कहा जाता है।

उदाहरण–

  • प्रत्येक वर्ष खाद्यान्न उत्पादन।
  • लोगों की आयु।

प्रश्न 8.
इनमे से कौन-सी विधि द्वारा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं, और क्यों?
(क) गणना(जनगणना),
(ख) प्रतिदर्श।।
उत्तर :
गणना विधि की तुलना में प्रतिदर्श विधि द्वारा आँकड़े एकत्र करने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। सांख्यिकी में प्रतिदर्श विधि को निम्नलिखित कारणों से प्राथमिकता दी जाती है

  1. प्रतिदर्श कम खर्च में एवं अल्प समय में पर्याप्त विश्वसनीय एवं सही सूचनाएँ उपलब्ध करा सकते
  2. प्रतिदर्श में सघन पूछताछ के द्वारा अधिक विस्तृत जानकारियाँ संगृहीत की जा सकती हैं।
  3. प्रतिदर्श के लिए परिगणकों की छोटी टोली की ही जरूरत होगी जिन्हें आसानी से प्रशिक्षित किया जा सकता है तथा उनके कार्य की निगरानी भली-भाँति की जा सकती है।
  4. गणना संबंधी त्रुटियों की संभावना घट जाती है।

प्रश्न 9.
इनमें कौन-सी त्रुटि अधिक गंभीर है और क्यों?
(क) प्रतिचयन त्रुटि
(ख) अप्रतिचयन त्रुटि।
उत्तर :
(क) प्रतिचयन त्रुटि – प्रतिचयन त्रुटियाँ प्रतिदर्श आकलन और समष्टि विशेष के वास्तविक मूल्य (जैसे-औसत आय आदि) के बीच अंतर प्रकट करती हैं। यह त्रुटि, तब सामने आती है जब आप समष्टि से प्राप्त किए गए प्रतिदर्श का प्रेक्षण करते हैं। जैसे-देहरादून के 5 कृषकों की आमदनी का उदाहरण लें। मान लें चर x (आमदनी) के मापन 600, 650, 700, 750, 800 हैं।

हमने देखा कि यहाँ समष्टि का औसत 600 + 650 + 700 + 750 + 800 +5=3500 * 700 है। अब मान लीजिए कि हम दो कृषकों का एक ऐसा प्रतिदर्श चुनते हैं जहाँ चर (X) का मूल्य 600 व 700 है। तब प्रतिदर्श का औसत (600 + 700 + 2 = 1300 + 2 = 650) होता है। यहाँ आकलन की प्रतिचयन त्रुटि है-700 (असली मान) – 650 (आकलन) = 50

(ख) अप्रतिचयन त्रुटियाँ – सर्वेक्षण क्षेत्र से आँकड़ों के संकलन के समय मापन, प्रश्नावली, रिकॉर्डिंग, अंकगणित संबंधी त्रुटियों को अप्रतिचयन त्रुटियाँ कहा जाता है। अप्रतिचयन त्रुटियाँ प्रतिचयन त्रुटियों की अपेक्षा गंभीर होती है।

प्रश्न 10.
मान लीजिए आपकी कक्षा में 10 छात्र हैं। इनमें से आपको तीन चुनने हैं तो इसमें कितने प्रतिदर्श संभव हैं?
उत्तर :
कक्षा में 10 छात्रों में से 3 छात्रों को चुनने के लिए प्रतिचयनों की संख्या = “0X2= 30 अत: इसमें 30 प्रतिदर्श संभव हैं।

प्रश्न 11.
अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 को चुनने के लिए आप लॉटरी विधि का उपयोग कैसे करेंगे? चर्चा करें।
उत्तर :
अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 छात्रों को चुनने के लिए हम लॉटरी विधि का प्रयोग इस प्रकार करेंगे

  • सर्वप्रथम कागज की एक ही आकार की 10 चिटें तैयार करेंगे।
  • इन चिटों पर छात्रों का नाम अलग-अलग चिट पर लिखेंगे।
  • चिटों को एक बक्से/घड़े में डालकर अच्छी तरह हिलाएँगे।
  • बक्से/घड़े से एक-एक करके तीन चिट निकालेंगे।
  • निकाली गई चिटों पर अंकित छात्रों के नाम ही लॉटरी विधि से निकाले गए छात्रों के नाम होंगे।

प्रश्न 12.
क्या लॉटरी विधि सदैव एक यादृच्छिक प्रतिदर्श देती है? बताइए।
उत्तर :
लॉटरी विधि द्वारा हमेशा यादृच्छिक का प्रतिचयन ही प्राप्त होता है। इस विधि में प्रत्येक इकाई को शामिल किया जाता है। समग्र की सभी इकाइयों की पर्चियाँ अथवा गोलियाँ बना ली जाती हैं और उन पर्चियों को एक डिब्बे में डाल दिया जाता है। फिर किसी निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा अथवा स्वयं आँखें बंद करके उतनी ही पर्चियाँ या गोलियाँ उठा ली जाती हैं जितनी इकाइयाँ प्रतिचयन में शामिल करनी होती हैं। प्रतिचयन की इकाइयों के निष्पक्ष चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि सभी पर्चियाँ या गोलियाँ एक-सी बनाई जाएँ, उनका आकार एवं रूप एकसमान हो तथा छाँटने से पूर्व उन्हें हिला-मिला लिया जाए। इस प्रकार इस प्रणाली में प्रत्येक इकाई के चुनाव की समान सम्भावना रहती है।

प्रश्न 13.
यादृच्छिक संख्या सारणी का उपयोग करते हुए, अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 छात्रों के चयन के लिए यादृच्छिक प्रतिदर्श की चयन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
10 छात्रों को दिए जाने वाले अंक हैं –  01 02 03 04 05 06 07 08 09 10
इन संख्याओं में से किसी एक संख्या को दैव आधार पर चयन किया जाएगा। इसके बाद दो क्रमागत संख्याओं का चयन करके 3 छात्रों का चुनाव कर लिया जाएगा। माना, दैव आधार पर चयनित संख्या 5 है तो चयनित छात्रों की संख्याएँ होंगी-5, 6 व 7.

प्रश्न 14.
क्या सर्वेक्षणों की अपेक्षा प्रतिदर्श बेहतर परिणाम देते हैं? अपने उत्तर की कारण सहित व्याख्या करें।
उत्तर :
हाँ, यह सत्य है कि सर्वेक्षणों की अपेक्षा प्रतिदर्श बेहतर परिणाम देते हैं। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—

  • प्रतिदर्श प्रणाली में समय, धन व श्रम सर्वेक्षणों की तुलना में कम व्यय होता है।
  • इस प्रणाली का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत क्षेत्र में किया जा सकता है।
  • इस प्रणाली में गणना संबंधी त्रुटियाँ कम होती हैं।
  • इस प्रणाली में अपेक्षाकृत कम गणनाकारों व पर्यवेक्षकों की आवश्यकता होती है।

संक्षेप में प्रतिदर्श प्रणाली अधिक सरल, मितव्ययी व शुद्ध निष्कर्ष देने वाली हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति का प्रयोग सर्वप्रथम भारत में किसने किया?
(क) ली प्ले ने
(ख) आर्थर यंग ने
(ग) यूल ने
(घ) सैलिगमैन ने
उत्तर :
(ख) आर्थर यंग ने

प्रश्न 2.
द्वितीयक समंकों का प्रयोग करने से पूर्व इनमें से किस बात की जाँच कर लेनी चाहिए?
(क) समंकों की उद्देश्य के प्रति अनुकूलता
(ख) समंकों की विश्वसनीयता
(ग) समंकों की पर्याप्तता
(घ) उपर्युक्त सभी की
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी की।

प्रश्न 3.
संकलन के विचार से समंकों के प्रकार हैं
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
उत्तर :
(क) दो।

प्रश्न 4.
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान रीति का दोष है
(क) यह रीति मितव्ययी है।
(ख) यह रीतिं सरल एवं सुविधाजनक है।
(ग) यह रीति विस्तृत क्षेत्र में उपयोगी है।
(घ) इसमें समंकों में एकरूपता नहीं रहती।
उत्तर :
(घ) इसमें समंकों में एकरूपता नहीं रहती

प्रश्न 5.
“एक दैव प्रतिदर्श वह प्रतिदर्श है, जिनका चयन इस प्रकार हुआ हो कि समग्र की प्रत्येक इकाई को सम्मिलित होने का समान अवसर रहा हो।” यह कथन किसका है?
(क) पीगू का
(ख) प्रो० हाटे का
(ग) हार्पर का
(घ) पार्टन का
उत्तर :
(ग) हार्पर का

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राथमिक समंक किसे कहते हैं?
उत्तर :
प्राथमिक समंक वे समंक होते हैं जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है।

प्रश्न 2.
द्वितीयक समंक से क्या आशय है?
उत्तर :
द्वितीयक समंक वे समंक हैं जो पहले से अस्तित्व में हैं और वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्रित किए गए हैं।

प्रश्न 3.
प्राथमिक और द्वितीयक समंकों में एक अंतर बताइए।
उत्तर :
प्राथमिक समंकों के संकलन में धन, समय, श्रम व बुद्धि का प्रयोग करना पड़ता है जबकि द्वितीय समंकों को सिर्फ उद्धृत किया जाता है।

प्रश्न 4.
प्राथमिक समंकों को एकत्र करने की प्रमुख रीतियाँ बताइए।
उत्तर :

  • प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान,
  • अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान,
  • स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति,
  • सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना तथा
  • प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरना।

प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • एकत्रित समंक अत्यधिक विश्वसनीय होते हैं।
  • समंकों में मौलिकता रहती है।

प्रश्न 6.
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान रीति क्या है?
उत्तर :
इस रीति के अनुसार, सूचकों से प्रत्यक्ष रूप में समंक प्राप्त न करके उन व्यक्तियों से प्राप्त किए जाते हैं, जिनका उन समंकों से कोई प्रत्यक्ष संबंध होता है।

प्रश्न 7.
सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना रीति के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  • यह प्रणाली लोचदार नहीं है।
  • यदि प्रश्नावली जटिल है तो उत्तर अशुद्ध होंगे और फलस्वरूप परिणाम भी अशुद्ध होंगे।

प्रश्न 8.
द्वितीयक समंकों के स्रोत बताइए।
उत्तर :

  • सरकारी प्रकाशन
  • अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रकाशन
  • पत्र-पत्रिकाओं द्वारा
  • अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के प्रकाशन।

प्रश्न 9.
अनुसूची से क्या आशय है?
उत्तर :
‘अनुसूची’ प्रश्नों की वह सूची है जिसे प्रगणकों द्वारा सूचकों से पूछताछ करके भरा जाता है।

प्रश्न 10.
प्रश्नावली व अनुसूची में अंतर बताइए।
उत्तर :
प्रश्नावली में प्रश्नों के उत्तर सूचकों द्वारा स्वयं दिए जाते हैं। इसके विपरीत, अनुसूची में प्रश्नों की सूची के प्रगणकों द्वारा सूचकों से सूचना प्राप्त करके भरा जाता है।

प्रश्न 11.
केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (CSO) का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर :
राष्ट्रीय आय के आँकड़ों का संकलन करना एवं उन्हें प्रकाशित करना।

प्रश्न 12.
समग्र से क्या आशय है?
उत्तर :
अनुसंधान क्षेत्र की संपूर्ण इकाइयाँ सामूहिक रूप से ‘समग्र’ कहलाती हैं।

प्रश्न 13.
संगणना अनुसंधान किसे कहते हैं?
उत्तर :
जब अनुसंधान के विषय में संबंधित समग्र या समूह की प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है। तो वह ‘संगणना अनुसंधान’ कहलाएगा।

प्रश्न 14.
संगणना अनुसंधान रीति के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • इस रीति द्वारा संकलित समंक अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं।
  • इस रीति के द्वारा समग्र की प्रत्येक इकाई के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 15.
निदर्शन अनुसंधान रीति के लिए उपयुक्त चार दशाएँ बताइए।
उत्तर :

  • जब समग्र अनंत हो,
  • जब समग्र विस्तृत हो,
  • जब धन, समय की बचत करनी हो तथा
  • जब समग्र की प्रकृति परिवर्तनशील हो।।

प्रश्न 16.
दैव निदर्शन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
दैव निदर्शन एक ऐसा रूप है जिसको चुनने की विधि के रूप में प्रयोग करने से यह निश्चित हो जाता है कि समग्र की प्रत्येक इकाई अथवा तत्त्व को चुने जाने का समान अवसर हो।

प्रश्न 17.
दैव निदर्शन रीति के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • इस रीति द्वारा चयन में पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं रहती।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें श्रम, समय व धन की बचत होती है।

प्रश्न 18.
दैव निदर्शन रीति के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  • आकार के छोटा होने अथवा उसमें विषमता अधिक होने पर, इस रीति द्वारा लिए गए न्यादर्श समग्र का ठीक प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  • अनुसंधान का क्षेत्र छोटा होने पर न्यादर्श की इकाइयों का चुनाव करना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 19.
सम्पादन से क्या आशय है?
उत्तर :
सम्पादन से आशय संकलित समंकों की शुद्धता की जाँच करना, अशुद्धि को दूर करना तथा शुद्ध समंकों को प्राप्त करने से है।

प्रश्न 20.
उपसादन से क्या आशय है?
उत्तर :
वास्तविक और जटिल संख्याओं को किसी स्थानीय मान के आधार पर निकटतम सरल संख्याओं में व्यक्त करने की क्रिया को उपसादन कहते हैं।

प्रश्न 21.
सांख्यिकीय विभ्रम से क्या आशय है?
उत्तर :
सांख्यिकीय विभ्रम ‘वास्तविक मूल्य’ और ‘अनुमानित मूल्य’ का अंतर है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकीय इकाई क्या है? एक आदर्श सांख्यिकीय इकाई की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकीय इकाई का अर्थ-सांख्यिकीय इकाई माप करने का वह साधन है जिसके आधार पर आँकड़े एकत्र किए जाते हैं, उनका विश्लेषण किया जाता है तथा वे प्रस्तुत किए जाते हैं। अनुसंधान के प्रारम्भ से अंत तक सांख्यिकीय इकाई की एक ही परिभाषा आनी चाहिए ताकि आँकड़े एकरूप व तुलनीय बने रहें। एक आदर्श सांख्यिकीय इकाई की विशेषताएँ–

  • सांख्यिकीय इकाई की परिभाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए।
  • इकाई निश्चित होनी चाहिए।
  • सांख्यिकीय इकाई का मूल्य स्थिर, प्रामाणिक एवं सर्वमान्य होना चाहिए।
  • इकाई की परिभाषा अनुसंधान के उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
  • सांख्यिकीय इकाई में सजातीयता एवं समानता होनी चाहिए।

प्रश्न 2.
प्राथमिक एवं द्वितीयक समंकों से क्या आशय है? प्रत्येक की एक-एक परिभाषा दीजिए। उत्तर-संकलन के विचार से समंक दो प्रकार के होते हैं

  1. प्राथमिक समंक तथा
  2. द्वितीयक समंक।

1. प्राथमिक समंक – प्राथमिक समंक, वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है। दूसरे शब्दों में, यह अनुसंधाने मौलिक होता है। होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में-“प्राथमिक समंकों से यह आशय है कि वे मौलिक हैं अर्थात् उनका समूहीकरण बहुत ही कम हुआ है या नहीं हुआ है, घटनाओं का अंकन या गणन उसी प्रकार किया गया है जैसा पाया गया है। मुख्य रूप से वे कच्चे पदार्थ होते हैं।”

2. द्वितीयक समंक – “द्वितीयक समंक, वे समंक हैं, जो पहले से किसी अन्य अनुसंधानकर्ता द्वारा अपने किसी निजी उद्देश्य के लिए एकत्रित किए हुए होते हैं। इन्हें अनुसंधानकर्ता स्वयं संकलित नहीं करता अपितु वह किसी अन्य उद्देश्य के लिए संकलित सामग्री का प्रयोग करता है। ब्लेयर के शब्दों में “द्वितीयक समंक वे हैं जो पहले से अस्तित्व में हैं और जो वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्रित किए गए हैं।”

प्रश्न 3.
द्वितीयक सामग्री का प्रयोग करैते समय क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?
उत्तर :
द्वितीयक सामग्री का प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रक्नी चाहिए

  1. पिछला अनुसंधानकर्ता योग्य, कार्यकुशल, ईमानदार व अनुभवी होना चाहिए।
  2. उद्देश्य एवं क्षेत्र समान होना चाहिए।
  3. न्यादर्श का आकार उपयुक्त होना चाहिए।
  4. समंक संकलन के लिए अपनाई गई रीति विश्वसनीय होनी चाहिए।
  5. इकाई उपयुक्त होनी चाहिए।
  6. शुद्धता का स्तर ऊँचा होना चाहिए।
  7. उपसादन कम-से-कम अंशों तक किया जाना चाहिए।
  8. इस बात की जाँच कर लेनी चाहिए कि समंक किस ‘समय’ में तथा किन ‘परिस्थितियों में प्रयुक्त | किए गए थे।
  9. यदि अनेक स्रोतों से समंक लिए जाएँ तो उनकी तुलनीयता की जाँच कर लेनी चाहिए।
  10. प्रतिशत, दर, गुणांक आदि की गणना करके उनकी सत्यता की जाँच कर लेनी चाहिए। द्वितीयक समंकों का प्रयोग करते समय यह देख लेना चाहिए कि समंक विश्वसनीय पर्याप्त एवं उपयुक्त

प्रश्न 4.
सर्वेक्षण अथवा संगणना एवं निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान से क्या आशय है?
उत्तर :
संगणना अथवा सर्वेक्षण अनुसंधान-जब अनुसंधान के विषय से संबंधित समग्र या समूह की प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है तो वह संगणना अथवा सर्वेक्षण अनुसंधान कहलाता है। इस रीति के अनुसार अनुसंधान करते समय अनुसंधानकर्ता समस्त समूह की जाँच करता है और अनुसंधान से संबंधित प्रत्येक इकाई के संबंध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है; जैसे-जनगणना, उत्पादन संगणना।

निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान – निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान के अंतर्गत समग्र में से कुछ इकाइयों को छाँटकर उनका विधिवत् अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि हमें किसी कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य से संबंधित सर्वेक्षण करना हो तो कॉलेज के प्रत्येक विद्यार्थी का अध्ययन न करके, हम कुछ विद्यार्थियों को लेकर ही उनको अध्ययन कर सकते हैं। इससे जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे समस्त समग्र पर लागू होंगे।

प्रश्न 5.
निदर्शन अनुसंधान के लिए आवश्यक दशाएँ बताइए।
उत्तर :
निम्नलिखित दशाओं में निदर्शन प्रणाली का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है

  1. जब समग्र अनंत अथवा कभी भी समाप्त न होने वाला हो।
  2. जब समग्र अत्यधिक विस्तृत हो।
  3. जब संगणना प्रणाली द्वारा समस्या का अध्ययन असंभव हो।
  4. जब समग्र नाशवान प्रकृति का हो।
  5. जब धन, समय व परिश्रम की बचत करनी हो।
  6. जब व्यापक दृष्टि से नियमों का प्रतिपादन करना हो।
  7. जब समग्र की प्रकृति परिवर्तनशील हो।

प्रश्न 6.
संगणना व निदर्शन प्रणाली में अंतर बताइए।
उत्तर :
संगणना व निदर्शन प्रणाली में अंतर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 1
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 2
प्रश्न 7.
दैव (यादृच्छिक) निदर्शन के गुण व दोष बताइए।
उत्तर :

दैव निदर्शन रीति के गुण,

  • इस नीति द्वारा चयन में पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं रहती क्योंकि समग्र की प्रत्येक इकाई को न्यादर्श के रूप में चुने जाने का अवसर प्राप्त होता है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें श्रम, समय व धन की बचत होती है।
  • दैव निदर्शन द्वारा चुने गए न्यादर्श समग्र के वास्तविक प्रतिनिधि होते हैं।
  • इस रीति में निदर्शन विभ्रमों की माप की जा सकती है।
  • दैव न्यादर्श में संभावना सिद्धांत को व्यावहारिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • चुनाव के लिए कोई विस्तृत योजना नहीं बनानी पड़ती।

दैव निदर्शन रीति के दोष

  • यदि केवल कुछ समंक ही उपलब्ध हों तो दैव निदर्शन संभव नहीं है।
  • यदि समग्र का आकार छोटा है या उसमें विषमता अधिक है तो इस रीति द्वारा लिए गए न्यादर्श समग्र का ठीक प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  • यदि अनुसंधान का क्षेत्र बहुत छोटा है तो न्यादर्श की इकाइयों का चुनाव करना कठिन हो जाता है। इन दोषों के कारण ही दैव न्यादर्श को पूर्ण न्यादर्श नहीं माना जाता है।

प्रश्न 8.
सांख्यिकीय विभ्रम क्या है? विभ्रम और अशुद्ध में अंतर बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकीय विभ्रम का अर्थ–सांख्यिकीय विभ्रम समंकों के वास्तविक मूल्य’ व ‘अनुमानित मूल्य’ में अंतर होता है। यह अशुद्धि से भिन्न है।
विभ्रम एवं अशुद्धि में अंतर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 3
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 4

प्रश्न 9.
अभिनत एवं अनभिनत विभ्रम से क्या आशय है?
उत्तर :
सांख्यिकी विभ्रम दो प्रकार के होते हैं–

1. अभिनत विभ्रम तथा
2. अनभिनत विभ्रम।

1. अभिनत विभ्रम – अभिनत विभ्रम (biased error) प्रमाणकों अथवा सूचकों के पक्षपात अथवा दोषपूर्ण मापक यंत्रों के कारण उत्पन्न होते हैं। इन विभ्रमों का प्रभाव एक ही दिशा में होता है; अतः इनकी प्रकृति संचयी होती है।

2. अनभिनत विभ्रम – 
अनभिनत विभ्रम (unbiased error) बिना किसी पक्षपात की भावना के कारण उत्पन्न होते हैं और एक-दूसरे को काटने की प्रवृत्ति रखते हैं, इसीलिए इन्हें क्षतिपूरक विभ्रम’ भी कहते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राथमिक तथा द्वितीयक समंकों से क्या आशय है? इनमें अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अनुसंधान के आयोजन के उपरांत अगला कदम समंकों का संकलन करना होता है। समंक अनुसंधान के संपूर्ण ढाँचे का आधार-स्तम्भ माने जाते हैं। अत: समंकों का संकलन अत्यंत सावधानी, सतर्कता, दृढ़ता, विश्वास और धैर्य के साथ किया जाना चाहिए। संकलन के विचार से समंक दो प्रकार के होते हैं–
(अ) प्राथमिक समंक तथा
(ब) द्वितीय समंक।

(अ) प्राथमिक समंक (Primary data) प्राथमिक समंक, वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है। दूसरे शब्दों में, यह अनुसंधान मौलिक होता है। होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में-“प्राथमिक समंकों से यह आशय है कि वे मौलिक हैं अर्थात् उनका समूहीकरण बहुत ही कम या नहीं हुआ है, घटनाओं का अंकन या गणन उसी प्रकार किया गया है, जैसा पाया गया है। मुख्य रूप से वे कच्चे पदार्थ होते हैं।”

(ब) द्वितीयक समंक (Secondary data) – द्वितीयक समंक, वे समंक हैं, जो पहले से किसी अन्य अनुसंधानकर्ता द्वारा अपने किसी निजी उद्देश्य के लिए एकत्रित किए हुए होते हैं। इन्हें अनुसंधानकर्ता स्वयं संकलित नहीं करता अपितु वह किसी अन्य उद्देश्य के लिए संकलित सामग्री का प्रयोग करता है। ब्लेयर के शब्दों में—“द्वितीयक समंक वे हैं, जो पहले से अस्तित्व में हैं और जो वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्रित किए गए हैं।”

प्राथमिक एवं द्वितीय समंकों में अंतर

प्राथमिक व द्वितीयक समंकों में अंतर मात्रा का न होकर प्रकृति का है। प्रो० सेक्राइस्ट के शब्दों में-“व्यापक रूप से प्राथमिक तथा द्वितीयक समंकों में भेद केवल अंशों का है। जो समंक एक पक्ष के लिए द्वितीयक हैं, वे ही अन्य पक्ष के लिए प्राथमिक होंगे।”
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 5

प्रश्न 2.
प्राथमिक समंकों को संकलित करने की मुख्य रीतियाँ बनाइए। प्रत्येक के गुण व दोषों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
प्राथमिक समंकों को संकलित करने की रीतियाँ प्राथमिक समंकों को संकलित करने की प्रमुख रीतियाँ निम्नलिखित हैं

1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान,
2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान,
3. स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति,
4. सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना,
5. प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरना।

1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान
इस रीति के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता स्वयं अपनी योजना के अनुसार पूरे क्षेत्र (समग्र) में जाकर विभिन्न सांख्यिकीय इकाइयों से संपर्क स्थापित करके समंक एकत्रित करता है। इस रीति का प्रयोग सर्वप्रथम यूरोप में ली प्ले (Le Play) और भारत में आर्थर यंग (Arthur Young) ने किया।
उपयुक्ता – इस रीति का प्रयोग वहाँ किया जाना चाहिए|

  • जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र अत्यधिक सीमित तथा स्थानीय प्रकृति का हो।
  • जहाँ मौलिक समंकों की आवश्यकता हो।
  • जहाँ शुद्धता पर अधिक जोर देना हो।
  • जहाँ समस्या इतनी अधिक जटिल हो कि अनुसंधानकर्ता की उपस्थिति अनिवार्य हो।
  • जहाँ समंकों को गोपनीय रखना हो।

रीति के गुण

  • इस विधि द्वारा एकत्रित समंक शुद्ध होते हैं।
  • एकत्रित समंक अधिक विश्वसनीय होते हैं।
  • समंकों में मौलिकता रहती है।
  • यह प्रणाली लोचदार है।
  • संकलित समंकों में एकरूपता व सजातीयता पाई जाती है।
  • अन्य सहायक सूचनाएँ भी प्राप्त हो जाती हैं।
  • अनुसंधानकर्ता को समंकों की जाँच का अवसर मिल जाता है।

रीति के दोष

  • इसका प्रयोग क्षेत्र सीमित होता है। विस्तृत क्षेत्र के लिए यह रीति अनुपयुक्त है।
  • इसमे पक्षपात (bias) की संभावना अधिक होती है।
  • यह रीति अपव्ययी है। इसमें धन, समय तथा श्रम का अधिक व्यये होता है।
  • सीमित क्षेत्र में लागू करने पर निष्कर्ष भ्रामक हो सकते हैं।

2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान
इस रीति के अनुसार सूचकों से प्रत्यक्ष रूप में समंक प्राप्त न करके उन व्यक्तियों से प्राप्त किए जाते हैं, जिनका उन समंकों से कोई अप्रत्यक्ष संबंध होता है। इन व्यक्तियों को साक्षी कहते हैं। इस विधि को सर्वाधिक उपयोग जाँच समितियों तथा आयोगों द्वारा किया जाता है। उपयुक्तता-इस रीति का प्रयोग वहाँ किया जाना चाहिए

  • जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र विस्तृत हो।
  • जहाँ सूचकों से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित न हो सके।
  • जहाँ सूचकं संबंधित सूचना न देना चाहें।
  • जहाँ अनुसंधान को गोपनीय रखा जाए।

रीति के गुण

  • यह रीति मितव्ययी है। इसमें धन, समय व परिश्रम कम खर्च होता है।
  • विस्तृत क्षेत्र में यही रीति उपयोगी होती है।
  • इसमें विशेषज्ञों को सहमति व सुझाव मिल जाते हैं।
  • यह रीति सरल व सुविधाजनक है।
  • इसमें व्यक्तिगत पक्षपात की संभावना नहीं रहती।
  • इस रीति के द्वारा अपेक्षाकृत अधिक जल्दी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

रीति के दोष

  • इसमें शुद्धता की उच्च मात्रा की आशा नहीं रहती।
  • सूचना एकत्रित करने वाले व्यक्तियों के पक्षपात की संभावना रहती है।
  • प्राप्त होने वाली सूचनाओं में त्रुटियाँ तथा अविश्वास की संभावना बनी रहती है।
  • प्रायः सूचनाएँ लापरवाही तथा अनिच्छा से दी जाती हैं।
  • समंकों में एकरूपता नहीं रहती।

3. स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति
इस रीति के अनुसार, अनुसंधान से संबंधित सामग्री एकत्रित करने के लिए स्थानीय व्यक्ति नियुक्त किए। जाते हैं, जो अपने ढंग से सूचनाएँ एकत्रित करते हैं और बाद में अनुसंधानकर्ता के पास भेज देते हैं। समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं तथा बाजार भावों के संबंध में इस रीति को अपनाया जाता है। उपयुक्तता—यह रीति वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ उच्च स्तर की शुद्धता की आवश्यकता न हो और केवल अनुमान और प्रवृत्तियाँ ज्ञात करनी हों।

रीति के गुण

  • अधिक विस्तृत क्षेत्र के लिए यह प्रणाली अधिक उपयोगी है।
  • अधिक फैले हुए (विकेन्द्रित) क्षेत्र के लिए यह प्रणाली अत्यधिक उपयोगी है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें धन, समय व श्रम की बचत होती है।
  • यह विधि सरल व सस्ती है।।

रीति के दोष

  • इस रीति के द्वारा निष्कर्ष संवाददाताओं के पक्षपात से प्रभावित हो सकते हैं।
  • अनुमान पर आधारित होने के कारण निष्कर्ष शुद्धता से दूर होते हैं।
  • एकत्रित समंकों में एकरूपता व सजातीयता का अभाव बना रहता है।
  • समंक संकलन में विलम्ब अधिक हो सकता है।
  • संकलित समंकों में मौलिकता का अभाव रहता है।

4. सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना
इसके अनुसार, अनुसंधानकर्ता द्वारा एक प्रश्नावली या अनुसूची तैयार की जाती है और संबंधित व्यक्तियों के पास डाक द्वारा भिजवा दी जाती है। इस प्रश्नावली के साथ एक अनुरोध-पत्र भी होता है, जिसका उद्देश्य सूचना देने वाले व्यक्ति का सहयोग प्राप्त करना होता है। तत्पश्चात् सूचना देने वाले व्यक्ति उस प्रश्नावली को उत्तर सहित अनुसंधानकर्ता के पास भेज देते हैं। उपयुक्तता—यह रीति वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत हो, उस क्षेत्र की जनसंख्या शिक्षित हो और प्रश्नावलियों को भरना जानती हो।

रीति के गुण

  • यह प्रणाली विस्तृत क्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त है। |
  • यह रीति मितव्ययी है और इसमें धन, समय व परिश्रम कम लगता है।
  • इसमें अशुद्धि की कम संभावना रहती है।
  • सूचनाएँ मौलिक व निष्पक्ष होती हैं।

रीति के दोष

  • सूचना देने वालों की इसमें प्राय: रुचि नहीं होती; अत: अधिकतर सूचनाएँ नहीं मिलतीं या मिलती हैं तो अपूर्ण होती हैं।
  • यदि प्रश्नावली जटिल है तो उत्तर अशुद्ध होंगे, फलस्वरूप परिणाम भी अशुद्ध होंगे।
  • यदि सूचक पक्षपातपूर्ण व्यवहार करते हैं तो परिणाम अशुद्ध होंगे।
  • कभी-कभी सूचना देने वाले इस बात से डरते हैं कि कहीं उनकी सूचनाओं का दुरुपयोग न हो।
  • यह प्रणाली लोचदार नहीं है।

5. प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरना
इस रीति में प्रश्नावलियों अथवा अनुसूचियों को भरने का कार्य प्रशिक्षित प्रगणकों को सौंपा जाता है। प्रगणकों को छपी हुई अनुसूचियाँ दे दी जाती हैं और वे सूचकों से और पूछताछ करके उन प्रश्नावलियों को स्वयं भरते हैं। इस प्रणाली की सफलता पूर्णतः प्रगणकों पर निर्भर करती है। अत: प्रगणकों को योग्य, चतुर, परिश्रमी, व्यवहारकुशल, विनम्र और संबंधित क्षेत्र से परिचित होना चाहिए। उपयुक्तता–यह रीति वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ अनुसंधानकर्ता अधिक व्यय वहन कर सके। यह रीति सरकारी कार्यों में ही अधिक प्रयोग में आती है। भारत में जनगणना इसी रीति, द्वारा की जाती है। रीति के गुण

  • इस रीति द्वारा व्यापक क्षेत्र से सूचना प्राप्त की जा सकती है।
  • सूचकों से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित किए जा सकने के कारण जटिल प्रश्नों के भी शुद्ध व विश्वसनीय उत्तर प्राप्त हो जाते हैं।
  • संकलित समंकों में पर्याप्त शुद्धता रहती है।
  • व्यक्तिगत पक्षपात का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

रीति के दोष

  • यह रीति व्ययसाध्य है क्योंकि इसमें प्रगणकों के प्रशिक्षण पर काफी व्यय होता है।
  • अनुसंधान कार्य में अधिक समय लगता है।
  • प्रगणकों को प्रशिक्षण देना व उनके कार्य का निरीक्षण करना पड़ता है।
  • प्रगणकों में पक्षपात की भावना होने पर उसका प्रभाव निष्कर्ष को अविश्वसनीय बना देता है।

प्रश्न 3.
समंक संकलन की उचित रीति का चयन किन बातों पर निर्भर करता है? उत्तर–
समंक संकलन की उपयुक्त रीति का चयन प्राथमिक समंकों के संकलन की विभिन्न रीतियों में से किसी भी एक रीति को सर्वश्रेष्ठ नहीं कहाँ जा सकता। समंक संकलन के लिए किस रीति को अपनाया जाए, यह निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है–

1. अनुसंधान की प्रकृति – यदि अनुसंधान में सूचकों से व्यक्तिगत संपर्क रखने की आवश्यकता है। तो ‘प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति’; यदि शिक्षित व्यक्तियों से जानकारी प्राप्त करनी है तो ‘डाक द्वारा अनुसूचियाँ प्राप्त करने की रीति’; यदि अनुसंधान का क्षेत्र व्यापक है तो प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने की रीति तथा यदि नियमित रूप से किसी एक विषय में जानकारी प्राप्त करनी है तो संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति की रीति’ अधिक उपयुक्त रहेगी।

2. अनुसंधान का उद्देश्य एवं क्षेत्र – यदि अनुसंधान का क्षेत्र सीमित है तो प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान की रीति’ तथा व्यापक क्षेत्र में प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने की रीति’ अधिक उपयुक्त रहेगी।

3. आर्थिक साधन – आर्थिक साधन अधिक होने पर प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति’ अथवा ‘प्रगणकों द्वारा अनुसूची भरवाने की रीति’ को अपनाया जा सकता है। इसके विपरीत, आर्थिक साधनों के सीमित होने पर डाक द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने की रीति अपनाई जा सकती है।

4. अपेक्षित शुद्धता की मात्रा – प्रत्यक्ष अनुसंधान रीति में अत्यधिक शुद्धता रहती है। अप्रत्यक्ष अनुसंधान रीति में अधिक शुद्ध परिणाम प्राप्त नहीं होते। संवाददाताओं द्वारा सूचनाएँ प्राप्त करने पर शुद्धता का परिणाम और भी कम हो जाता है। प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने पर शुद्धता का स्तर अधिक होता है, परन्तु सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने में शुद्धता का स्तर अपेक्षाकृत कम ही रहता है।

5. उपलब्य समय – समय कम होने पर ‘संवाददाताओं से जानकारी प्राप्त करने की रीति’ अथवा ‘सूचकों से प्रश्नावलियाँ भरने की रीति’ अधिक उपयुक्त है। उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर ही उपयुक्त समंक संकलन विधि का चुनाव करना चाहिए।

प्रश्न 4.
द्वितीयक समंक क्या होते हैं। द्वितीयक सामग्री के मुख्य स्रोत बताइए। इनका प्रयोग करने से पूर्व क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?
उत्तर :

द्वितीयक समंक से आशय

किसी अन्य अनुसंधानकर्ता द्वारा संकलित, विश्लेषित तथा प्रकाशित सामग्री ‘द्वितीयक समंक’ कहलाती है। किंतु इस सामग्री का प्रयोग दूसरे अनुसंधानकर्ताओं द्वारा भी किया जा सकता है। ये आँकड़े व्यापारिक संस्थानों, सरकारी विभागों तथा वैज्ञानिकों के यहाँ अथवा समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, सरकारी गजटों, व्यापारिक-पत्रों आदि में मिलते रहते हैं। आँकड़ों को प्राप्त करने की यह पद्धति मितव्ययी एवं सरल है।

द्वितीयक सामग्री के मुख्य स्रोत

द्वितीयक सामग्री को प्रकाशित अथवा अप्रकाशित स्रोतों से उपलब्ध किया जा सकता है

(अ) सांख्यिकीय तथ्यों को प्रकाशित करने वाले स्रोत
विभिन्न विषयों पर सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण समंकों को एकत्रित करके उन्हें समय-समय पर प्रकाशित करती रहती हैं। यह सामग्री अत्यधिक उपयोगी होती हैं और विभिन्न अनुसंधानकर्ता इसका प्रयोग करते हैं। प्रकाशित समंकों के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं

1. सरकारी प्रकाशन – केन्द्रीय व राज्य सरकारों के विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों द्वारा समय-समय पर विभिन्न विषयों से संबंधित समंक प्रकाशित होते रहते हैं। ये समंक अत्यधिक विश्वसनीय एवं महत्त्वपूर्ण होते हैं। प्रमुख सरकारी प्रकाशन हैं-Statistical Abstract of India, Monthly Abstract of Statistics, Annual Survey of Industries, Agricultural Statistics of India.

2. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रकाशन – विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे U.N.O., I.L.O., ECAFE तथा I.M.F. आदि महत्त्वपूर्ण समंकों का संकलन प्रकाशित करती हैं।

3. समितियों व आयोगों के प्रतिवेदन – विभिन्न समस्याओं के संबंध में उपयुक्त सुझाव देने हेतु सरकार द्वारा समय-समय पर समितियाँ व आयोग गठित किए जाते हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन सांख्यिकीय तथ्यों के भण्डार होते हैं।

4. अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के प्रकाशन – नगर निगम, नगरपालिका, जिला परिषद् आदि विभिन्न प्रकार के आँकड़े एकत्रित कराकर प्रकाशित कराते हैं; जैसे–स्वास्थ्य तथा जन्म व मृत्यु से संबंधित आँकड़े।

5. व्यापारिक संस्थाओं व परिषदों के प्रकाशन – अनेक बड़ी-बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ, व्यापार परिषदें, स्कन्ध विपणियाँ तथा उपज विपणियाँ भी अनेक प्रकार के समंक संकलित कराकर प्रकाशित कराती रहती हैं।

6. विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थानों के शोध कार्य – विश्वविद्यालयों, रिसर्च ब्यूरो व अनुसंधान संस्थाओं द्वारा शोध परियोजनाओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के समंक संकलित कराए जाते हैं, जिन्हें बाद में प्रकाशित करा दिया जाता है। ये समंक निष्पक्ष होते हैं। ये संस्थान हैं-N.C.A.E.R., I.S.I. आदि।

7. पत्र-पत्रिकाओं द्वारा विभिन्न समाचार – पत्र व पत्रिकाएँ भी अपने विशिष्ट क्षेत्रों में समंकों का संकलन व प्रकाशन करते हैं; जैसे-Economic Times, Industrial Times, Commerce आदि। अनेक समाचार-पत्र दैनिक बाजार भाव भी प्रकाशित करते हैं।

8. बाजार समाचार – बाजार समाचार व समीक्षा व्यापार के संबंध में महत्त्वपूर्ण तथ्यों को प्रकाश में * लाती है।

9. व्यक्तिगत अनुसंधानकर्ता द्वारा – अनेक व्यक्ति अपने-अपने विषयों पर अनुसंधान कार्य करके संकलित समंकों को प्रकाशित करवाते हैं।

(ब) अप्रकाशित स्रोत
सरकार, संस्थाएँ एवं अनेक अनुभवी व योग्य व्यक्ति विभिन्न उद्देश्यों से सांख्यिकीय सामग्री संकलित करते हैं, जो अत्यधिक उपयोगी होती है लेकिन किन्हीं कारणों से प्रकाशित नहीं हो पाती। अनुसंधानकर्ता इस सामग्री का द्वितीय सामग्री के रूप में प्रयोग कर सकता है।

द्वितीयक सामग्री के प्रयोग में सावधानियाँ

द्वितीयक समंक अनेक त्रुटियों से पूर्ण हो सकते हैं। ये त्रुटियाँ अनेक कारणों से हो सकती हैं; . जैसे—साख्यिकीय इकाई की परिभाषा में परिवर्तन, सूचना की अपर्याप्तता व अपूर्णता,. पक्षपात, उद्देश्य व क्षेत्र की भिन्नता आदि। अत: द्वितीयक समंकों का उपयोग करने से पूर्व उनकी भली-भाँति जाँच कर लेनी चाहिए।

द्वितीयक समंकों का प्रयोग करने से पूर्व निम्नलिखित बातों की जाँच कर लेनी चाहिए|

  • समंकों की उद्देश्य के प्रति अनुकूलता,
  • समंकों की विश्वसनीयता,
  • समंकों की पर्याप्तता।

अनुसंधानकर्ता को द्वितीयक समंकों का प्रयोग करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

1. पिछले अनुसंधानकर्ता की योग्यता, अनुभव व ईमानदारी – समंकों का संकलन करने वाले अनुसंधानकर्ता की योग्यता, कार्यक्षमता, ईमानदारी व अनुभव पर विचार करना चाहिए। यदि अनुसंधानकर्ता योग्य, निष्पक्ष, अनुभवी व ईमानदार है तो समंकों पर विश्वास किया जा सकता है। अन्यथा नहीं।

2. अनुसंधान का उद्देश्य एवं क्षेत्र – प्राथमिक अनुसंधान के उद्देश्य एवं क्षेत्र का पता लगा लेना चाहिए। समान उद्देश्य एवं क्षेत्र के लिए समंकों का उपयोग लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

3. अनुसंधान का प्रकार : संगणना अथवा प्रतिदर्श – आँकड़ों का संकलन संगणना अथवा प्रतिदर्श रीति द्वारा किया जा सकता है। संगणना रीति अधिक विश्वसनीय होती है। यदि समंक एकत्रित करने में प्रतिदर्श रीति का उपयोग किया गया है तो यह जानना आवश्यक है कि प्रतिदर्श का आकार उचित था या नहीं और प्रतिदर्श लेने की रीति उपयुक्त थी या नहीं।

4. समंक संकलन की रीति – द्वितीयक सामग्री का प्रयोग करने से पूर्व यह देखना चाहिए कि समंक संकलन में जिस रीति को अपनाया गया था, वह उपयुक्त व विश्वसनीय थी या नहीं।

5. इकाई की परिभाषा – यह भी देखा जाना चाहिए कि पिछले अनुसंधान में इकाई को किस प्रकार परिभाषित किया गया था तथा प्रस्तुत अनुसंधान के लिए इकाइयाँ उपयुक्त हैं या नहीं। यदि इकाई की परिभाषा में अंतर है तो आवश्यक समायोजन कर लेने चाहिए।
6. शुद्धता का स्तर – समंकों में शुद्धता का स्तर भी देखा जाना चाहिए। यदि शुद्धता का स्तर ऊँचा रखा गया था, तो उन समंकों का प्रयोग किया जा सकता है।

7. उपसादन का स्तर – 
यह जानना चाहिए कि समंकों को सारणीबद्ध करते समय कितने अंशों तक उपसादन (approximation) किया गया था। जितने कम अंशों तक उपसादन किया गया होगा, शुद्धता का स्तर उतना ही उच्च होगा।

8. प्राथमिक अनुसंधाम का समय व परिस्थितियाँ – 
इनका प्रयोग करने से पूर्व इस बात की जाँच कर लेनी चाहिए कि समंक किस समय में तथा किन परिस्थितियों में प्रयुक्त किए गए थे। सामान्य समय में एकत्रित किए गए समंक अधिक विश्वसनीय होते हैं। सामान्य परिस्थितियों में एकत्रित किए गए.समंक उसी प्रकार की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त होते हैं।

9. तुलना – यदि एक समस्या से संबंधित अनेक स्रोतों से द्वितीय समंक उपलब्ध हैं तो उनकी परस्पर तुलना कर लेनी चाहिए। यदि उनमें अंतर है तो नए सिरे से स्वयं अनुसंधान करना चाहिए।

10. परीक्षात्मक जाँच – समंकों के विश्वसनीय होने पर भी उनकी परीक्षात्मक जाँच करनी चाहिए। प्रतिशत, दर, गुणांक आदि की गणना करके उनकी सत्यता की जॉच अवश्य कर लेनी चाहिए।

उपर्युक्त बातों के आधार पर यदि द्वितीयक समंक विश्वसनीय, पर्याप्त एवं उपयुक्त प्रतीत हों तो उनका प्रयोग कर लेना चाहिए अन्यथा नहीं। जे०एम० बेवन के अनुसार-“अन्य व्यक्तियों के परिणामों को अपनाना ही हमारे शोध को उचित दिशा देने के लिए पर्याप्त न होगा। हमें सामान्य ज्ञान, दूरदर्शिता तथा विद्यमान ज्ञान का उपयोग करते हुए उनकी गहराई में जाकर अज्ञानता के क्षेत्र, जिसमें हम अनुसंधान कर रहे हैं, की खोज करनी चाहिए।”

प्रश्न 5.
संगणना (सर्वेक्षण) अनुसंधानें क्या है? इसके गुण व दोष बताइए।
उत्तर :
अनुसंधान क्षेत्र की संपूर्ण इकाइयाँ सामूहिक रूप से ‘समग्र’ कहलाती हैं। समग्र दो प्रकार का होता है
(अ) निश्चित अथवा अनन्त समग्र – निश्चित समग्र में इकाइयों की संख्या निश्चित होती है; जैसे—किसी कॉलेज के छात्र या मिल के श्रमिक। इसके विपरीत, अनंत समग्र में इकाइयों की संख्या भी अनंत होती है; जैसे-नवजात शिशुओं का भार अथवा स्वास्थ्य के विषय में अनुसंधान।
(ब) वास्तविक अथवा काल्पनिक समग्र – ठोस विषय वाले समग्र को वास्तविक समग्र कहते हैं; जैसे – विश्वविद्यालय के छात्र। काल्पनिक विषय वाले समग्र को काल्पनिक समग्र कहते हैं; जैसे – सिक्कों की उछाल के आधार पर चित्र-पट के गिरने की संख्या में बना समग्र।

अनुसंधान के प्रकार अनुसंधान की प्रकृति दो प्रकार की हो सकती है
(अ) संगणना अनुसंधान,
(ब) प्रतिदर्श अनुसंधान।

संगणना अनुसंधान

जब अनुसंधान के विषय में संबंधित समग्र या समूह की प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है तो वह ‘संगणना अनुसंधान’ कहलाता है। इस रीति के अनुसार, अनुसंधान करते समय अनुसंधानकर्ता समस्त समूह की जाँच करता है और अनुसंधान से संबंधित प्रत्येक इकाई के संबंध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है; जैसे-जनगणना, उत्पादन संगणना।

उपयुक्तता – संगणना अनुसंधान का प्रयोग वहाँ उचित है|

  • जहाँ समग्र या क्षेत्र का आकार सीमित हो।
  • जहाँ सांख्यिकीय इकाई में विजातीयता अथवा विविध गुण पाए जाते हैं।
  • जहाँ परिशुद्धता का ऊँची स्तर आवश्यक हो।
  • जहाँ विषय का गहन अध्ययन करना हो अथवा व्यापक सूचनाएँ एकत्र करनी हों।

संगणना अनुसंधान के गुण

  1. गहन अध्ययन–इस रीति द्वारा विषय का गहन अध्ययन संभव है। इससे अनुसंधानकर्ता को उस विषय को पूर्ण ज्ञान हो जाता है।
  2. अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय परिणाम-इस रीति द्वारा संकलित समंक अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं। अत: उनसे निकाले गए परिणाम भी अधिक सत्य एवं विश्वसनीय होते हैं।
  3. विस्तृत जानकारी—इस रीति द्वारा समग्र की प्रत्येक इकाई के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। अत: अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आ जाते हैं।
  4. उपयुक्तता-जब समग्र का आकार सीमित हो और सांख्यिकीय इकाइयों में विजातीयता अथवा विविधता का गुण पाया जाता हो तो यह रीति सर्वथा उपयुक्त होती है।
  5. कुछ दशाओं में आवश्यक-यदि जाँच की प्रकृति ऐसी हो कि सभी पदों का समावेश आवश्यक हो तो इस रीति का प्रयोग आवश्यक होता है।

संगणना अनुसंधान के दोष

  1. अधिक व्ययसाध्य-यह विधि अत्यधिक खर्चीली है, क्योंकि इसमें अनुसंधानकर्ता को समग्र की प्रत्येक इकाई से संबंध स्थापित करना पड़ता है।
  2. अधिक समय व परिश्रम-इस रीति में समय भी अधिक लगता है और अनुसंधानकर्ता को परिश्रम भी अधिक करना पड़ता है।
  3. सांख्यिकीय विभ्रम—इस रीति में सांख्यिकीय विभ्रम (Statistical errors) का पता नहीं लगाया जा सकता।
  4. व्यापक संगठन की आवश्यकताइस रीति द्वारा अनुसंधानकर्ता को कार्य में व्यापक संगठ की आवश्यकता पड़ती है।
  5. अनेक परिस्थितियों में असंभव-यदि समग्र अनंत है, अनुसंधान क्षेत्र विशाल व जटिल है, समग्र की प्रत्येक इकाई से संपर्क स्थापित करना संभव नहीं है अथवा अनुसंधान विधि में समग्र की संपूर्ण इकाइयाँ नष्ट हो जाती हैं तो संगणना अनुसंधान असंभव हो जाता है।

प्रश्न 6.
निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान क्या है? प्रतिदर्श प्रणाली के गुण व दोष बताइए।
उत्तर :

निदर्शन याप्रतिदर्श अनुसंधान

संगणना के विपरीत, इस प्रणाली के अंतर्गत समग्र में से कुछ इकाइयों को छाँटकर (दूसरे शब्दों में समस्त समूह के एक अंग का) उनका विधिवत् अध्ययन किया जाता है; उदाहरण के लिए यदि किसी एक कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य से संबंधित सर्वेक्षण करना है तो कॉलेज के प्रत्येक विद्यार्थी का अध्ययन न करके, हम कुछ विद्यार्थियों को लेकर ही उनका अध्ययन कर सकते हैं। इससे जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे समस्त समग्र पर लागू होंगे। प्रतिदर्श प्रणाली का आधार यह है कि छाँटे हुए प्रतिदर्श (Sample) समग्र का सदैव प्रतिनिधित्व करते हैं अर्थात् उनमें वही विशेषताएँ होती हैं, जो सम्मिलित रूप से सम्पूर्ण समग्र में देखने को मिलती हैं।

वास्तव में, प्रतिदर्श प्रणाली को संगणना प्रणाली से अधिक अच्छा समझा जाता है; क्योंकि संगणना प्रणाली की समस्त सीमाओं को प्रतिदर्श प्रणाली द्वारा दूर किया जाता है। प्रतिदर्श प्रणाली का प्रयोग कहीं-कहीं तो आवश्यक हो जाता है; क्योंकि कुछ ऐसी समस्याएँ व समग्र होते हैं, जहाँ संगणना प्रणाली का प्रयोग किया ही नहीं जा सकता।

प्रतिदर्श अनुसंधान के लिए उपयुक्त दशाएँ – निम्नलिखित दशाओं में प्रतिदर्श प्रणाली का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है।
1. जब समग्र अनंत हो – जब समग्र अनंत अथवा कभी न समाप्त होने वाला हो तो संगणना अनुसंधान संभव नहीं हो पाता जैसे नवजात शिशुओं की किसी निश्चित समय पर गणना करना संभव नहीं है। इस प्रकार की समस्याओं में प्रतिदर्श प्रणाली ही उपयुक्त होती है; क्योंकि इसमें समय, धन व परिश्रम की बचत होती है।

2. जब समग्र नाशवान् प्रकृति का हो – 
कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं, जिनका सर्वेक्षण संगणना प्रणाली द्वारा करने पर समस्या या समग्र के ही नष्ट हो जाने की संभावना हो जाती है; उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के शरीर में पाए जाने वाले रक्त का परीक्षण संगणना प्रणाली के आधार पर नहीं किया जा सकता। ऐसी समस्याओं में प्रतिदर्श प्रणाली का प्रयोग करना ही उचित होता है।

3. जब समग्र विस्तृत हो – 
विस्तृत समग्र के लिए प्रतिदर्श प्रणाली ही उपयुक्त होती है; क्योंकि इससे अनुसंधान कार्य कम समय, कम धन वे कम श्रम से ही संपन्न किया जा सकता है।

4. जब संगणना प्रणाली अव्यावहारिक हो – 
कुछ समस्याओं में प्रतिदर्श प्रणाली को ही प्रयोग किया जाता है; क्योंकि संगणना द्वारा उन समस्याओं का अध्ययन अव्यावहारिक होता है; उदाहरण के लिए भूगर्भ में छिपे हुए खनिज पदार्थों का अनुमान सदैव प्रतिदर्श प्रणाली के आधार पर ही किया जाता है।

5. जब धन, समय या परिश्रम की बचत करनी हो – 
प्रतिदर्श प्रणाली एक मितव्ययी प्रणाली है। अतः जब धन, समय या परिश्रम की बचत करनी हो तो इसी प्रणाली का उपयोग किया जाता है।

6. जब नियमों का प्रतिपादन करना हो – जब व्यापक दृष्टि से नियमों का प्रतिपादन करना हो तो इस प्रणाली का प्रयोग ही श्रेयस्कर होता है।

7. जब समग्र की प्रकृति परिवर्तनशील हो – 
यदि अनुसंधान से संबंधित वस्तुएँ शीघ्र परिवर्तनशील हैं तो प्रतिदर्श प्रणाली ही अपनाई जाती है।

प्रतिदर्श प्रणाली के गुण

  • यह रीति मितव्ययी है। इसमें समय, धन तथा श्रम सभी की बचत होती है।
  • शीघ्रता से बदलती हुई आर्थिक व सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में यह प्रणाली अधिक उपयोगी है।
  • ऐसे सामाजिक अनुसंधानों में, जहाँ विस्तृत तथा निरन्तर अन्वेषण की आवश्यकता होती है, प्रतिदर्श अनुसंधान ही सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है।
  • इस प्रणाली द्वारा गहन अनुसंधान संभव है।
  • इस प्रणाली के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष पूर्णत: विश्वसनीय तथा शुद्ध होते हैं।
  • प्रतिदर्श अनुसंधान कार्य का संगठन व प्रशासन करना अधिक सुविधाजनक होता है।
  • कुछ विशेष दशाओं में प्रतिदर्श अनुसंधान ही एकमात्र उपयुक्त प्रणाली होती है।

प्रतिदर्श प्रणाली के दोष

  • यदि प्रतिदर्श की इकाइयों का चुनाव निष्पक्ष रूप से नहीं किया गया तो निष्कर्ष भ्रामक हो सकते हैं।
  • प्रतिनिधि प्रतिदर्श बनाना कठिन होता है।
  • प्रतिदर्श अनुसंधान प्रणाली के प्रयोग के लिए विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसके अभाव में अनुसंधानकर्ता भयंकर त्रुटियाँ कर सकता है।
  • कभी-कभी समग्र इतना छोटा होता है कि उनमें से प्रतिदर्श बनाना संभव ही नहीं होता।
  • विजातीय और अस्थिर समग्र में प्रतिदर्श प्रणाली अधिक उपयुक्त नहीं होती है।

प्रश्न 7.
प्रतिदर्शअथवा निदर्शन की विभिन्न रीतियों को समझाइए। प्रमुख रीतियों के गुण व दोष भी बताइए।
उत्तर :

प्रतिदर्श अथवा निदर्शन की रीतियाँ

एक समग्र में से प्रतिदर्श अथवा निदर्शन का चुनाव करने की निम्नलिखित रीतियाँ हैं

  1. सविचार प्रतिदर्श (Purposive sampling),
  2. दैव प्रतिदर्श (Random sampling),
  3. मिश्रित या स्तरित प्रतिदर्श (Mixed or Stratified sampling),
  4. अन्य रीतियाँ (Other methods)
  • सुविधानुसार प्रतिदर्श (Convenience sampling),
  • कोटा प्रतिदर्श (Quota sampling),
  • बहुस्तरीय क्षेत्रीय दैव प्रतिदर्श (Multiphase area random sampling),
  • बहुचरण प्रतिदर्श (Multiphase sampling), ,
  • विस्तृत प्रतिदर्श (Extensive sampling)।

1. सविचार प्रतिदर्श
इसमें चयनकर्ता प्रतिदर्श की इकाइयों का चुनाव समझ-बूझकर करता है। चुनाव करते समय वह यह प्रयत्न करता है कि समग्र की सब विशेषताएँ प्रतिदर्श में आ जाएँ। वह इसके लिए कोई प्रमाप निश्चित कर लेता है और उसी के आधार पर ऐसे पदों को चुनता है, जो समस्त समग्र का प्रतिनिधित्व करें।

रीति के गुण

  • यह पद्धति बहुत सरल है।
  • प्रमाप निश्चित करके प्रतिदर्श का चुनाव करने से चुनाव के ठीक होने की संभावना होती है।
  • यह उस अनुसंधान के लिए अधिक उपयुक्त है, जहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण इकाइयों को शामिल करना अनिवार्य हो।

रीति के दोष

  • चयनकर्ता की पूर्व धारणाओं का प्रतिदर्श के चुनाव पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इससे निष्कर्ष अशुद्ध हो जाते हैं।
  • प्रतिदर्श विभ्रम (Sampling error) ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  • प्रतिदर्श अनुमानों की सत्यता की कोई गारण्टी नहीं होती।
  • प्रतिदर्श के परिणामों की तुलना अन्य प्रतिदर्शों के परिणामों से नहीं की जा सकती।

2. दैव प्रतिदर्श
एक प्रतिदर्श दैव विधि से उस समय चुना जाता है, जब प्रत्येक संभव प्रतिदर्श को चुने जाने का समान अवसर हो। पार्टन (Parten) के शब्दों में-“दैव प्रतिदर्श एक ऐसा रूप है, जिसको चुनने की विधि के रूप में प्रयोग करने से यह निश्चित हो जाता है कि समग्रे की प्रत्येक इकाई अथवा तत्त्व को चुने जाने का समान अवसर हो।’

हार्पर (W.M. Harper) के शब्दों में-‘‘एक दैव प्रतिदर्श वह प्रतिदर्श है, जिसका चयन इस प्रकार हुआ हो कि समग्र की प्रत्येक इकाई को सम्मिलित होने का समान अवसर रहा हो।’ इस रीति के अंतर्गत प्रतिदर्श में कौन-सी इकाई शामिल की जाए और कौन-सी नहीं, यह अनुसंधानकर्ता की अपनी इच्छा पर निर्भर न करके दैव अथवा अवसर पर निर्भर करता है। इसमें विभेद (discrimination) की कोई गुंजाइश नहीं होती। वास्तव में, इसका चुनाव मानवीय निर्णयों से पूर्णतया स्वतन्त्र होता है, तभी इसमें सत्यता व सूक्ष्मता लाई जा सकती है। दैव प्रतिदर्श रीति से प्रतिदर्श लेने के निम्नलिखित तरीके हैं

(i) लॉटरी रीतिं – 
यह रीति सबसे सरल तथा प्रचलित है। इसके अनुसार समग्र की सभी इकाइयों की पर्चियाँ अथवा गोलियाँ बनाकर किसी निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा या स्वयं आँखें बंद करके उतनी पर्चियाँ या गोलियाँ उठा ली जाती हैं, जितनी इकाइयाँ प्रतिदर्श में शामिल करनी होती हैं। प्रतिदर्श की इकाइयों के निष्पक्ष चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि सभी पर्चियाँ या गोलियाँ एक-सी बनाई जाएँ, उनका आकार, रूप व रंग एकसमान हो तथा उन्हें छाँटने से पूर्व खूब हिला-मिला लिया जाए।

(ii) ढोल घुमाकर – 
इस रीति के अनुसार एक ढोल में समान आकार के लोहे या लकड़ी अथवा गत्ते के गोल टुकड़े जिन पर 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 अंक लिखे रहते हैं, डाल दिए जाते हैं तथा ढोल को हाथ या बिजली से खूब घुमाया जाता है जिससे सभी अंक मिल जाएँ। तत्पश्चात् कोई निष्पक्ष व्यक्ति उसमें से उतने टुकड़े निकाल लेता है, जितने पर प्रतिदर्श लेने होते हैं। ये टुकड़े जिन पदों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें प्रतिदर्श में शामिल कर लिया जाता है।

(iii) सुनियोजित या निश्चित क्रम के आधार पर –
इस रीति के अनुसार सर्वप्रथम पदों को किसी भी क्रम में (भौगोलिक, संख्यात्मक अथवा वर्णात्मक) व्यवस्थित किया जाता है और फिर आकस्मिक रूप से कुछ पदों को चुन लिया जाता है; उदाहरण के लिए कुल 150 इकाइयों में से 15 इकाइयों को चुनना है तो 15 समूह बना लिए जाएँगे। प्रत्येक समूह में 10-10 इकाइयाँ होंगी। अब प्रत्येक समूह में दैव प्रतिदर्श द्वारा एक-एक पद चुन लिया जाएगा।

(iv) टिप्पेट की संख्याओं अथवा दैव प्रतिदर्श सारणियों द्वारा – इस रीति का प्रतिपादन टिप्पेट महोदय ने किया था। उन्होंने विभिन्न देशों की जनसंख्या रिपोर्टों के आधार पर 41,600 अंकों के प्रयोग से चार-चार अंक वाली 10,600 संख्याओं की एक तालिका बनाई है, जिनमें से प्रथम पैंतीस संख्याएँ निम्नवत् हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 6
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 7
इस सारणी के आधार पर यदि 6000 में से 20 संख्याएँ छाँटनी हों तो पहले 6000 विद्यार्थियों को 1 से 6000 तक क्रम संख्याओं में क्रमबद्ध किया जाएगा और फिर उपर्युक्त सारणी में से आरम्भ में 20 अंक छाँट लिए जाएँगे, जो 6000 से अधिक न हों। ये 20 अंक निम्नवत् होंगे –
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 8
उपर्युक्त 20 विद्यार्थियों को प्रतिदर्श में शामिल किया जाएगा।
रीति के गुण

  • इस रीति द्वारा चयन में पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं रहती क्योंकि समग्र की प्रत्येक इकाई को प्रतिदर्श के रूप में चुने जाने का अवसर प्राप्त होता है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें श्रम, समय व धन की बचत होती है।
  • दैव प्रतिदर्श द्वारा चुने गए प्रतिदर्श समग्र के वास्तविक प्रतिनिधि होते हैं।
  • इस रीति में प्रतिदर्श विभ्रमों की माप की जा सकती है।
  • दैव प्रतिदर्श में संभावना सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • चुनाव के लिए कोई विस्तृत योजना नहीं बनानी पड़ती।

रीति के दोष

  • यदि केवल कुछ समंक ही उपलब्ध हों तो दैव प्रतिदर्श संभव नहीं हैं।
  • यदि समग्र का आकार छोटा है या उसमें विषमता अधिक है तो इस रीति द्वारा लिए गए प्रतिदर्श समग्र का ठीक प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  • यदि अनुसंधान का क्षेत्र बहुत छोटा है तो प्रतिदर्श की इकाइयों का चुनाव करना कठिन हो जाता है। इन दोषों के कारण ही दैव प्रतिदर्श को पूर्ण प्रतिदर्श नहीं माना जाता है।

3. मिश्रित या स्तरित प्रतिदर्श
स्तरित प्रतिदर्श विधि का प्रयोग उस समय उचित होता है, जब समग्र की इकाइयों में सजातीयता की अभाव हो तथा उनको विभिन्न विशेषताओं के आधार पर अनेक खण्डों अथवा स्तरों में विभक्त करना संभव हो। प्रत्येक खण्ड अथवा स्तर में से प्रतिदर्श में उसी अनुपात में इकाइयाँ ली जाती हैं, जो अनुपात उस खण्ड अथवा स्तर का पूर्ण समग्र के साथ होता है; उदाहरण के लिए किसी समग्र में 5000 इकाइयाँ हैं, ज़िनमें से प्रतिदर्श के लिए 10% अथवा 500 इकाइयों का चुनाव करना हो तो समग्र को चार खण्डों अथवा स्तरों में बाँटा जा सकता है तथा इन खण्डों व स्तरों में क्रमशः समग्र की 10, 20, 30 तथा 40 प्रतिदर्श इकाइयाँ हैं तो प्रतिदर्श के लिए इकाइयों का चुनाव इस प्रकार किया जाएगा –
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 9
स्तरित प्रतिदर्श के लिए आवश्यक है

  • समग्र की विभिन्न विशेषताओं को ज्ञात करके उनके आधार पर विभिन्न खण्डों अथवा स्तरों में बाँटा जाए।
  • प्रत्येक खण्ड अथवा स्तर इतना बड़ा अवश्य होना चाहिए, जिसमें से प्रतिदर्श के लिए इकाइयों का चुनाव संभव हो।
  • विभिन्न खण्डों अथवा स्तरों में पूर्ण रूप से सजातीयता हो।
  • प्रतिदर्श के लिए विभिन्न खण्डों अथवा स्तरों में से इकाइयों का चुनाव अनुपात में किया जाए, जो अनुपात संबंधित स्तर अथवा समग्र में है।

रीति के गुण

  • इसमें कोई भी महत्त्वपूर्ण समूह ऐसा नहीं रहता, जिसका प्रतिनिधित्व प्रतिदर्श में न हो।।
  • प्रतिदर्श में से कोई इकाई खो जाने पर उसी खण्ड में अन्य इकाइयों में से पुनस्र्थापन किया जा सकता है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें धन, श्रम के समय की बचत होती है।
  • यह अधिक विश्वसनीय है।
  • जहाँ मौलिक समग्र में विषमता पाई जाती है, यह उचित रहता है।

रीति के दोष

  • समग्र का खण्डों में विभाजन उचित न होने पर परिणामों में अभिनति (bias) का प्रभाव आ जाएगा।
  • इकाइयों के चयन में अनुपात लाने के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।
  • गैर-आनुपातिक स्तरीकरण में विभिन्न वर्गों की इकाइयों को भार देने में अभिनति की गुंजाइश रहती है।
  • स्तर बनाने में कठिनाई होती है।

4. अन्य रीतियाँ
(अ) सुविधानुसार प्रतिदर्श – इस प्रणाली में अनुसंधानकर्ता अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिदर्श को चुनकर जाँच करता है।

रीति के गुण

  • यह रीति अत्यंत आरामदायक है।
  • यह रीति मितव्ययी है क्योंकि इसमें समय, श्रम व धन की बहुत बचत होती है।

रीति के दोष

  • यह प्रणाली अवैज्ञानिक है।
  • इस रीति के द्वारा निकाले गए निष्कर्ष अविश्वसनीय होते हैं।

(ब) कोटा प्रतिदर्श – इस प्रणाली में प्रतिदर्श की इकाइयाँ छाँटने का कार्य प्रगणकों पर छोड़ दिया जाता है। अनुसंधानकर्ता इस संबंध में प्रगणकों को पर्याप्त निर्देश दे देता है कि उन्हें किस भाग से कितनी इकाइयों का चुनाव करना है।

रीति के गुण
इस प्रणाली के गुण मिश्रित या स्तरित प्रतिदर्श की ही भाँति हैं; उदाहरण के लिए इस रीति में सभी समूहों
का प्रतिनिधित्व हो जाता है, यह प्रणाली मितव्ययी एवं अधिक विश्वसनीय है तथा जहाँ समग्र में मौलिक विषमता पाई जाती है, वहाँ यह रीति अधिक उपयुक्त रहती है किंतु इस रीति द्वारा संतोषजनक फल केवल उस दशा में मिल सकते हैं, जबकि प्रगणक ईमानदारी व परिश्रम से कार्य करें।

रीति के दोष
इस प्रणाली के दोष मिश्रित स्तरित प्रतिदर्श की भाँति ही है; उदाहरण के लिए इसके चयन एवं निष्कर्षों में अभिनति का प्रभाव पड़ता है, स्तर बनाने में कठिनाई होती है और भार (weight) देने में पक्षपात की गुंजाइश रहती है। इसके अतिरिक्त प्रगणकों में उतनी ईमानदारी, निष्पक्षता व सावधानी की आशा करना, जितना अनुसंधानकर्ता स्वयं दिखाता है, गलत होगा।

(स) बहुस्तरीय क्षेत्रीय दैव प्रतिदर्श – 
इस प्रणाली में प्रतिदर्शों के चुनाव का कार्य विभिन्न स्तरों पर किया जाता है। समस्या से संबंधित पहले स्तर तय किए जाते हैं। तत्पश्चात् दैव प्रतिदर्श के आधार पर प्रतिदर्श लिए जाते हैं। इस प्रकार इस विधि की निम्नलिखित दो प्रमुख विशेषताएँ हैं

  • चुनाव कई स्तरों पर होता है।
  • प्रत्येक स्तर पर दैव प्रतिदर्श के आधार पर प्रतिदर्श लिए जाते हैं।

रीति के गुण

  • बड़े शहरों की क्षेत्रीय स्तर पर जनसंख्या ज्ञात करने के लिए यह प्रणाली अत्यधिक उपयुक्त है।
  • इसमें प्रत्येक इकाई को चुने जाने के समान अवसर प्राप्त होते हैं।
  • इस रीति में दैव प्रतिदर्श रीति के सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

रीति के दोष

  • विभिन्न क्षेत्रों में एकरूपता नहीं पाई जाती।
  • इसमें दैव प्रतिदर्श के सभी दोष आ जाते हैं।

(द) बहुचरण प्रतिदर्श – जब एक ही प्रकार के समंकों की सहायता से विभिन्न समस्याओं से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त करनी होती हैं तो एक ही बार में समग्र के उचित प्रतिनिधि के रूप में पर्याप्त मात्रा में प्रतिदर्श चुन लिया जाता है और फिर उसमें से प्रत्येक समस्या के अध्ययन के लिए उप-प्रतिदर्श लिए जाते हैं।
इन उप-प्रतिदर्शो को क्रमश: प्रथम, द्वितीय, तृतीय ……… चरण प्रतिदर्श कहते हैं।

रीति के गुण

  • एक ही प्रतिदर्श से अनेक प्रकार की समस्याओं का अध्ययन हो जाता है।
  • यह रीति मितव्ययी है। इसमें धन, परिश्रम व श्रम की बचत होती है।
  • यह रीति सुविधाजनक है।

रीति के दोष

  • प्रतिदर्श के दोषपूर्ण होने पर सभी उप-प्रतिदर्श भी दोषपूर्ण होंगे।
  • प्रतिदर्श की जाँच की सुविधा नहीं होती।

(य) विस्तृत प्रतिदर्श – इस विधि में बहुत बड़ा प्रतिदर्श लिया जाता है। लगभग 80 या 90% इकाइयाँ प्रतिदर्श में शामिल की जाती हैं। यह विधि संगणना अनुसंधान विधि से मिलती-जुलती हैं।

रीति के गुण

  • परिणाम अधिक शुद्ध होते हैं।
  • परिणाम पर पक्षपात का कम प्रभाव पड़ता है।
  • जाँच विस्तृत होती है।

रीति के दोष

  • यह प्रणाली व्ययसाध्य है। इसमें धन, श्रम व समय का अपव्यय होता है।
  • समग्र के बड़े अंश के उपलब्ध न होने पर यह रीति संभव नहीं होती।

प्रतिदर्श प्रणाली की उपर्युक्त सभी रीतियों के अपने-अपने गुण-दोष हैं; अतः कोई भी रीति सभी क्षेत्रों व परिस्थितियों में सर्वोत्तम नहीं हो सकती। उपयुक्त रीति का चयन करने से पहले अनुसंधान के उद्देश्य, प्रकृति, आकार, शुद्धता की मात्रा व समग्र की इकाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। वैसे सामान्यत: दैये प्रतिदर्श व स्तरित रीति का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
प्रश्नावली क्या है? प्रश्नावली व अनुसूची में क्या अन्तर है? प्रश्नावली बनाते समय किन सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर :
सूचना दो प्रकार से प्राप्त हो सकती है

1. प्रश्नावलियों के प्रयोग से तथा
2. अनुसूचियों के द्वारा।

1. प्रश्नावली – प्रश्नावली में प्रश्न दिए रहते हैं। इनमें प्रश्नों के उत्तर के लिए रिक्त स्थान नहीं होता। उत्तर सूचकों द्वारा अलग प्रपत्रों पर लिखे जाते हैं। आजकल प्रश्नावली में प्रत्येक प्रश्न के साथ वैकल्पिक उत्तर छाप देने की पद्धति अपनाई जाती है जिससे सूचक सही उत्तर पर निशान लगा देता है।

2. अनुसूची – 
‘अनुसूची’ प्रश्नों की वह सूची है जिसे प्रगणकों द्वारा सूचकों से पूछताछ करके भरा जाता हैं यह एक रिक्त सारणी के रूप में होती है जिसमें प्रत्येक मद के सामने या नीचे प्रश्नों के उत्तर लिखने के लिए रिक्त स्थान होता है।

प्रश्नावली तथा अनुसूची में अंतर – सामान्यतः प्रश्नावली एवं अनुसूची को एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है क्योंकि दोनों का ही उद्देश्य सूचना देने वालों से सूचना प्राप्त करना है किंतु प्रयोग विधि के आधार पर इन दोनों में सूक्ष्म अंतर है। प्रश्नावली में प्रश्नों के उत्तर सूचकों द्वारा स्वयं दिए जाते हैं। इसके विपरीत, अनुसूची में प्रश्नों की सूची के प्रगणकों द्वारा सूचकों से सूचना प्राप्त करके भरा जाता है। प्रश्नों के उत्तर के लिए रिक्त स्थान छोड़ दिया जाता है। व्यवहार में दोनों का प्रयोग एक ही अर्थ में किया जाता है।

प्रश्नावली का उदाहरण

आप अपने नगर में महाविद्यालय के छात्रों के व्ययों का अध्ययन करना चाहते हैं। इसके लिए प्रश्नावली का नमूना तैयार कीजिए।

मेरठ नगर के महाविद्यालयों में छात्रों की व्यय प्रवृत्ति का सर्वेक्षण

1. छात्र/छात्रा …………………………………………………………..
2. कक्षा-स्नातक/स्नातकोत्तर                                                                           संकाय : विधि/विज्ञान/कला/वाणिज्य
3. कॉलेज का नाम …………………………………………………………..
4. स्थायी निवास (गाँव/नगर का नाम)
5. यदि आप मेरठ के निवासी नहीं हैं तो मेरठ में रहने की व्यवस्था क्या है? छात्रावास/किराये का कमरा/रिश्तेदारों या परिचित के यहाँ आवास/प्रतिदिन आना-जाना।
6. आयु ……………………. वर्ष ……………………. माह ………………………….
7. पिता का नाम …………………………………………………………..
8. माँ का नाम …………………………………………………………..
9. पिता का व्यवसाय …………………………………………………………..
10. पिता की आय …………………………………………………………..
11. परिवार के अन्य सदस्यों की आय (यदि कोई हो) …………………………………………………………..
12. छात्र की मासिक आय (यदि कोई हो) …………………………………………………………..
13. छात्र की प्रतिमाह व्यय के लिए प्राप्त होने वाली राशि ………………………………..
(अ) परिवार से …………………………………………………………..
(ब) निजी आय से …………………………………………………………..
(स) छात्रवृत्ति से …………………………………………………………..
कुल राशि …………………………………………………………..
14. छात्र के मासिक व्यय के मद और राशि मद व्यय की राशि (निकटतम रुपया)
(i) कॉलेज की फीस …………………………………………………………..
(ii) पुस्तक एवं पाठ्य-सामग्री …………………………………………………………..
(iii) छात्रावास का किराया …………………………………………………………..
(iv) भोजन …………………………………………………………..
(v) बस/रेल का किराया …………………………………………………………..
(vi) खेलकूद व मनोरंजन पर व्यय …………………………………………………………..
(vii) अन्य व्यय …………………………………………………………..
15. क्या आपको मिलने वाली राशि पर्याप्त है? यदि नहीं, तो कितनी आवश्यकता और समझते हो? ……………………………….
16. क्या आप अपने वर्तमान मासिक व्यय में से कुछ बचत कर सकते हैं? यदि हाँ, तो मद और बचत का अनुमानित विवरण ……………..
17. अन्य संबंधित सूचना …………………………………………………………..

उत्तम प्रश्नावली के लिए सावधानियाँ

सांख्यिकीय अनुसंधान की सफलता मुख्य रूप से प्रश्नावली की उत्तमता पर निर्भर करती है; अतः प्रश्नावली तैयार करते समय सावधानी व सतर्कता बरतनी आवश्यक है। एक प्रश्नावली की रचना करते समय अग्रलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए
1. निवेदन पत्र – अनुसंधानकर्ता को प्रश्नावली के साथ एक निवेदन पत्र लगाना चाहिए जिससे वह अपना परिचय दे, अनुसंधान का उद्देश्य बताए तथा सूचना को गुप्त रखने तथा इसका दुरुपयोग न करने का विश्वास दिलाए।

2. प्रश्नों की संख्या कम – 
प्रश्नावली में प्रश्नों की संख्या कम होनी चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रश्न इतने कम न हो जाएँ कि पर्याप्त सूचना ही प्राप्त न हो सके।

3. सरल व स्पष्ट प्रश्न – 
प्रश्न सरल, स्पष्ट व सूक्ष्म होने चाहिए। अधिकांश प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनका उत्तर ‘हाँ’ या नहीं में दिया जा सके। प्रश्नों में अप्रचलित, जटिल व असम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

4. उचित क्रम – 
प्रश्न प्राथमिकता अथवा महत्त्व के क्रम में रखे जाने चाहिए। परस्पर संबंधित प्रश्नों ” को एक ही स्थान पर केन्द्रित किया जाना चाहिए।

5. वर्जित प्रश्न – 
प्रश्नावली में ऐसे प्रश्न सम्मिलित नहीं किए जाने चाहिए जिनसे सूचक के आत्मसम्मान तथा सामाजिक व धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचे, जो उनके मन में संदेह, उत्तेजना या विरोध उत्पन्न करे अथवा जो उसके व्यक्तिगत व्यवहार से संबंधित हों। प्रो० सेक्राइस्ट के शब्दों में-“यदि कठिन तथा अपरिचित प्रश्नों अथवा अविश्वास या संदेह उत्पन्न करने वाले प्रश्नों को पूछा जाता है तो उनके उत्तर अपूर्ण, संक्षिप्त, अर्थहीन, सामान्य या जानबूझकर टालने वाले होने की संभावना रहती है।”
6. प्रश्नों की प्रकृति – प्रश्न चार प्रकार के हो सकते हैं—
(i) सामान्य विकल्पीय प्रश्न – ऐसे प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ या नहीं’ अथवा ‘गलत’ या ‘सही’ दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए क्या आपके पास कार है? अथवा क्या आप किराये के मकान में रहते हैं? इस प्रकार के प्रश्नों का गठन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

(ii) बहुविकल्पीय प्रश्न – 
इस प्रकार के प्रश्नों में अनेक संभव उत्तर होते हैं। ये उत्तर प्रश्नावली में छपे होते हैं और सूचक उनमें से किसी एक पर निशान लगा देता है।

(iii) विशिष्ट जानकारी देने वाले प्रश्न – ये प्रश्न विशिष्ट जानकारी प्रदान करते हैं; जैसे-आपकी आयु क्या है? आपके कितने बच्चे हैं?

(iv) खुले प्रश्न – 
इन प्रश्नों का उत्तर सूचक को अपने शब्दों में देना होता है। उदाहरण के लिए भारत में मुद्रा स्फीति को किस प्रकार नियन्त्रित किया जा सकता है? प्रश्नावली में जहाँ तक संभव हो सके, प्रथम प्रकार के प्रश्न पूछे जाने चाहिए।

7. प्रश्नों में उचित शब्दों का प्रयोग – 
प्रश्नों के गठन में सही स्थान पर सही शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनके अर्थ प्रमापित एवं सर्वविदित हों।

8. प्रत्यक्ष संबंध – 
प्रश्न अनुसंधान से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होने चाहिए ताकि व्यर्थ की सूचना एकत्र करने में धन, श्रम व समय का अपव्यय न हो।

9. सत्यता की जाँच – 
प्रश्नावली में ऐसे प्रश्नों को भी समावेश होना चाहिए जिससे उत्तरों की यथार्थता की परस्पर जाँच की जा सके।

10. प्रश्नावली का गठन – 
प्रश्नावली के गठन पर उपयुक्त ध्यान दिया जाना चाहिए। उत्तर लिखने के लिए पर्याप्त स्थान छोड़ना चाहिए।

11. सूचक की योग्यता के अनुसार प्रश्न – 
प्रश्नावली में ऐसे प्रश्न होने चाहिए जिनके उत्तर सूचक सरलता से दे दें।

12. आवश्यक निर्देश – 
प्रश्नावली भरने के संबंध में प्रश्नावली के प्रारम्भ में अथवा अंत में स्पष्ट रूप से आवश्यक निर्देश दिए जाने चाहिए ताकि सूचक को सूचना देने में आसानी हो।

13. पूर्व परीक्षण एवं संशोधन – 
प्रश्नावली के तैयार हो जाने पर, अनुसंधान कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व उसका कुछ लोगों पर परीक्षण कर लेना चाहिए। इससे प्रश्नावली के दोषों को दूर करने में सहायता मिलेगी।