UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 17 व्यापारिक बैंक

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Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 17
Chapter Name व्यापारिक बैंक
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 17 व्यापारिक बैंक

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा खाता बैंकों में खोला जाता है?
(a) पूँजी खाता
(b) चालू खाता
(c) बहीखाता
(d) रोकड़ खाता
उत्तर:
(b) चालू खाता

प्रश्न 2.
14 बड़े व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किस तिथि को हुआ? (2014)
अथवा
14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किस वर्ष में हुआ था? (2017)
(a) 17 जुलाई, 1970
(b) 1 अप्रैल, 1960
(c) 19 जुलाई, 1969
(d) 15 फरवरी, 1980
उत्तर:
(c) 19 जुलाई, 1969

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा व्यापारिक बैंक नहीं है?
(a) रिज़र्व बैंक ऑफ इण्डिया
(b) देना बैंक
(c) केनरा बैंक
(d) विजया बैंक
उत्तर:
(a) रिज़र्व बैंक ऑफ इण्डिया

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा बैंक राष्ट्रीयकृत है?
(a) बैंक ऑफ महाराष्ट्र
(b) बैंक ऑफ राजस्थान
(c) कर्नाटक बैंक
(d) जम्मू एवं कश्मीर बैंक
उत्तर:
(d) बैंक ऑफ महाराष्ट्र

प्रश्न 5.
निम्न में कौन-सा बैंक भारत में राष्ट्रीयकृत बैंक है? (2016)
(a) एक्सिस बैंक
(b) बैंक ऑफ अमेरिका
(c) पंजाब नेशनल बैंक
(d) एच डी एफ सी बैंक
उत्तर:
(c) पंजाब नेशनल बैंक

प्रश्न 6.
भारत में राष्ट्रीयकृत बैंकों की वर्तमान संख्या है।
(a) 18
(b) 19
(c) 20
(d) 25
उत्तर:
(b) 19

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निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
व्यापारिक बैंक जनता को अल्पकालीन/दीर्घकालीन ऋण देते हैं।
उत्तर:
अल्पकालीन

प्रश्न 2.
व्यापारिक बैंक जमा राशि पर ब्याज देता है/नहीं देता है।
उत्तर:
देता है

प्रश्न 3.
बचत बैंक खाते पर अधिविकर्ष की सुविधा मिलती है/नहीं मिलती है। (2010)
उत्तर:
नहीं मिलती है

प्रश्न 4.
सन् 1969 में भारत सरकार द्वारा 19/14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। (2010)
उत्तर:
14

प्रश्न 5.
बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख उद्देश्य शहरी/ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवा का विकास करना है।
उत्तर:
ग्रामीण

प्रश्न 6.
ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसका बैंक में खाता होता है, ………. ” कहलाता है। (ग्राहक/ऋणी)
उत्तर:
ग्राहक

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
व्यापारिक बैंक किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यापारिक बैंक वे बैंक होते हैं, जो सामान्य बैंकिंग का कार्य करते हैं। भारत में सभी राष्ट्रीयकृत बैंक व्यापारिक बैंक हैं। व्यापारिक बैंक अनुसूचित बैंक भी होते हैं। ये बैंक केन्द्रीय बैंक के निर्देशन में कार्य करते हैं। ये बैंक जनता से निक्षेप (UPBoardSolutions.com) स्वीकार करते हैं, अल्पकालीन ऋण प्रदान करते हैं व साख का निर्माण करते हैं। व्यापारिक बैंक साख नियन्त्रण का कार्य नहीं करते हैं।

प्रश्न 2.
अनुसूचित बैंक किसे कहते हैं? (2007)
उत्तर:
भारत में वे बैंक अनुसूचित बैंक कहलाते हैं, जिनका नाम भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित किया हुआ है। ये बैंक निम्न शर्तों का पालन करते हैं

  1. उस बैंक की प्रदत्त पूँजी तथा कोष कम-से-कम ३ 5 लाख हो
  2. उस बैंक के कार्य अपने जमाकर्ताओं के हित के विरुद्ध न हों
  3. वह बैंक भारतीय कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत हो

प्रश्न 3.
एक व्यापारिक बैंक के दो प्रमुख कार्य लिखिए। (2016)
उत्तर:
व्यापारिक बैंक के दो कार्य निम्नलिखित हैं

  1. जमाएँ स्वीकार करना व्यापारिक बैंक जनता के धन को बचत खाते, चालू खाते, सावधि जमा खाते, आवर्ती जमा खाते, आदि के द्वारा जमा करके उन पर ब्याज देते हैं।
  2. धन उधार देना ये बैंक अनेक प्रकार के अल्पकालीन ऋण प्रदान (UPBoardSolutions.com) करते हैं; जैसे-नकद साख द्वारा, अधिविकर्ष सुविधाओं द्वारा, आदि।

प्रश्न 4.
किन्हीं चार गैर-राष्ट्रीयकृत बैंकों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर:
गैर-राष्ट्रीयकृत बैंक निम्न हैं-

  1. येस बैंक
  2. एच डी एफ सी बैंक
  3. एक्सिस बैंक
  4. आई सी आई सी आई बैंक

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प्रश्न 5.
भारत के किन्हीं चार राष्ट्रीयकृत बैंकों के नाम लिखिए। (2016)
उत्तर:
राष्ट्रीयकृत बैंकों के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
  2. पंजाब नेशनल बैंक
  3. बैंक ऑफ बड़ौदा
  4. यूनियन बैंक

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
वाणिज्यिक बैंक के कार्यों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (2011)
उत्तर:
वाणिज्यिक या व्यापारिक बैंकों के कार्य निम्नलिखित हैं

1. जमाएँ स्वीकार करना व्यापारिक बैंक जनता के धन को बचत खाते, चालू खाते, सावधि जमा खाते, आवर्ती जमा खाते, आदि के द्वारा जमा करके उन पर ब्याज देते हैं।
2. धन उधार देना ये बैंक अनेक प्रकार के अल्पकालीन ऋण भी देते हैं; जैसे-नकद साख द्वारा, अधिविकर्ष सुविधाओं द्वारा, व्यापारिक विपत्रों के हुण्डियों को भुनाकर, आदि।
3. एजेन्सी सम्बन्धी कार्य ये बैंक एजेण्ट के रूप में धन का हस्तान्तरण (UPBoardSolutions.com) करना, ग्राहकों की ओर से भुगतान प्राप्त करना, ग्राहकों की ओर से भुगतान करना, विनिमय-पत्रों आदि का भुगतान प्राप्त करना, ग्राहकों को आर्थिक सलाह देना, आदि कार्य करते हैं।
4. अन्य कार्य

  • विदेशी व्यापार को सरल बनाना।
  • रुपयों के हस्तान्तरण का कार्य।
  • व्यापारिक सूचना सम्प्रेषित करने का कार्य।
  • धन के विनियोजन सम्बन्धी कार्य।

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प्रश्न 2.
वाणिज्यिक बैंकों के पाँच दोषों का वर्णन कीजिए। (2006)
उत्तर:
वाणिज्यिक या व्यापारिक बैंकों के दोष निम्नलिखित हैं

  1. बैंकिंग सिद्धान्तों की अवहेलना व्यापारिक बैंक बैंकिंग सिद्धान्तों की अवहेलना करके अपनी जमाओं को कम सुरक्षित स्थानों पर भी विनियोजित कर देते हैं।
  2. असन्तुलित विकास व्यापारिक बैकों का अधिकतर विकास शहरों में ही किया गया, किन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग विकास पर ध्यान ही नहीं दिया गया।
  3. प्रबन्धकीय अकुशलता व्यापारिक बैंकों में प्रबन्धकीय कुशलता का अभाव पाया जाता है। अधिकतर बैंक बड़े-बड़े उद्योगपतियों के स्वामित्व में कार्य करते हैं।
  4. पारस्परिक सहयोग का अभाव व्यापारिक बैंकों में आपसी सहयोग के .. स्थान पर प्रतिस्पर्धा पाई जाती है।
  5. व्यक्तिगत जमानत पर ऋण न देना व्यापारिक बैंक किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत जमानत पर ऋण प्रदान नहीं करते हैं।
  6. राष्ट्रीय ऋण नीति का अभाव व्यापारिक बैंकों में कुशल राष्ट्रीय ऋण नीति का अभाव पाया जाता है, जिससे किए जाने वाले विनियोग आर्थिक विकास में योगदान नहीं दे पाते हैं।
  7. ऋण देने की दोषपूर्ण नीति ये बैंक कृषि व लघु उद्योगों को कम ऋण प्रदान करते हैं, जबकि बड़े-बड़े व्यापारियों व उद्योगपतियों को अधिक ऋण प्रदान करते हैं।

प्रश्न 3.
बैंक के राष्ट्रीयकरण के लाभ बताइए। (2008)
उत्तर:
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लाभ बैंकों के राष्ट्रीयकरण से निम्नलिखित लाभ हुए हैं

  1. आर्थिक विकास में वृद्धि बैंकों को राष्ट्रीयकृत किए जाने से इनकी जमाओं में वृद्धि हुई है। अत: इन जमाओं का उपयोग देश की आर्थिक नीति के अनुसार किया जाने लगा, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला।
  2. सहयोग में वृद्धि 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो जाने से इन्हें रिज़र्व बैंक का सहयोग प्राप्त हुआ, जिससे देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हुई है।
  3. बैंकों की कार्यकुशलता में वृद्धि गैर-राष्ट्रीयकृत बैंकों की अपेक्षा राष्ट्रीयकृत बैंकों की कार्यकुशलता में अधिक वृद्धि हुई है।
  4. समाजवाद को बढ़ावा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों की धनराशि का प्रयोग पूँजीपतियों के अतिरिक्त समाज के सामान्य वर्ग के लिए भी किया गया, जिससे समाजवाद को बढ़ावा मिला।
  5. उद्योग-धन्धों में वृद्धि बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने से उद्योग-धन्धों के विकास हेतु सरकार द्वारा उदार ऋण नीति को अपनाया गया।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण की हानियाँ बैंकों के राष्ट्रीयकरण से निम्नलिखित हानियाँ हुई हैं-

  1. भ्रष्टाचार में वृद्धि राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों की कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिला, क्योंकि बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो जाने से बैंकों से ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत लम्बी व कठिन हो गई।
  2. राजनीति का प्रवेश राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों के संचालन व प्रबन्ध में राजनीतिज्ञों का प्रवेश होने के कारण बैंकों की समस्त पूँजी कुछ ही हाथों में जाने का भय उत्पन्न हो गया है।
  3. कर्मचारियों की कार्यकुशलता में कमी राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों में (UPBoardSolutions.com) सरकारी नौकरी हो जाने के कारण कर्मचारियों की कार्यकुशलता में कमी आई है।
  4. नौकरशाही का प्रभुत्व बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंक सरकारी क्षेत्रों में आ गए, जिससे अन्य सरकारी क्षेत्रों की भाँति बैंकों में नौकरशाही व लालफीताशाही व्याप्त होने लगी है।
  5. क्षेत्रीय संकीर्णता राष्ट्रीयकृत बैंकों की अधिक शाखाओं का विस्तार शहरों में होने के कारण शहरी क्षेत्रों की जमाओं का प्रयोग उसी क्षेत्र में किया जाता है, जिस कारण पिछड़े हुए एवं अविकसित क्षेत्रों का विकास रुक जाता है।

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प्रश्न 4.
भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पाँच उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। (2006)
अथवा
सन् 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। (2006)
अथवा
भारत में वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पाँच प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  1. बैंकिंग सुविधाओं का सन्तुलित विकास बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का पर्याप्त विकास करना था।
  2. आर्थिक सत्ता के केन्द्रीकरण का अन्त राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य पूँजीपतियों की सत्ता को समाप्त करना था, जिससे पूँजी का सभी वर्गों में समान वितरण हो।
  3. कृषि साख प्रदान करना बैंकों के राष्ट्रीयकरण द्वारा किसानों को (UPBoardSolutions.com) आवश्यक मात्रा में ऋण उपलब्ध करवाना था।
  4. शाखाओं को प्रसार बैंकों के राष्ट्रीयकरण से सभी क्षेत्रों में बैंकिंग शाखाओं का विस्तार करना था।
  5. राष्ट्रीय आय में वृद्धि राष्ट्रीयकरण से ग्रामीण व शहरी लोगों को बैंकिंग सुविधा उपलब्ध करवाकर उनमें बचते की आदत को प्रोत्साहित करना था, जिससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो सके।
  6. लघु उद्योगों को साख राष्ट्रीयकरण के द्वारा लघु उद्योगों को ऋण उपलब्ध करवाकर लघु उद्योगों का विकास करना था।
  7. साख का राष्ट्रहित में प्रयोग बैंकों के राष्ट्रीयकरण से साख का प्रयोग देश के विकास के लिए करना था।
  8. सामान्य व्यक्तियों की सहायता राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य आम-आदमी को उसकी आवश्यकतानुसार ऋण देकर सहायता उपलब्ध कराना था।
  9. विकास के लिए वित्त बैंकों के राष्ट्रीयकरण के द्वारा देश में तीव्र आर्थिक विकास की वित्त की व्यवस्था करना था, जिससे आर्थिक नियोजन के अनुसार देश का विकास किया जा सके।
  10. समाजवाद की स्थापना बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य समाजवाद की स्थापना करना था। जिससे प्रत्येक समाज को विकास की ओर अग्रसर किया जा सके।

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प्रश्न 5.
सन् 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरणं पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2011)
अथवा
सन् 1969 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीयकृत दस बैंकों के नामों का उल्लेख कीजिए। (2010, 06)
उत्तर:
व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण बैंकिंग व्यवसाय को प्रभावी एवं मजबूत बनाने के उद्देश्य से 19 जुलाई, 1969 को देश के 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इन बैंकों के राष्ट्रीयकरण का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवा का विकास करना था। (UPBoardSolutions.com) इन बैंकों की जमा राशि के 50 करोड़ से अधिक थी। ये बैंक निम्नलिखित हैं

  1. सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
  2. बैंक ऑफ इण्डिया
  3. बैंक ऑफ बड़ौदा
  4. पंजाब नेशनल बैंक
  5. केनरा बैंक
  6. यूनाइटेड कॉमर्शियल बैंक
  7. यूनाइटेड बैंक ऑफ इण्डिया
  8. सिण्डीकेट बैंक
  9. बैंक ऑफ महाराष्ट्र
  10. देना बैंक
  11. इलाहाबाद बैंक
  12. यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया
  13. इण्डियन बैंक
  14. इण्डियन ओवरसीज़ बैंक
  15. अप्रैल, 1980 को सरकार ने 6 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया।

जिन बैंकों की जमाएँ 200 करोड़ तक थीं। ये बैंक हैं-

  1. दी आन्ध्रा बैंक
  2. दो न्यू बैंक ऑफ इण्डिया
  3. कॉर्पोरेशन बैंक
  4. दी ओरिएण्टल बैंक ऑफ कॉमर्स
  5. दी पंजाब एण्ड सिन्ध बैंक
  6. विजया बैंक

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सितम्बर, 1993 में दीं न्यू बैंक ऑफ इण्डिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय कर देने के बाद वर्तमान में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 19 हो गई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
वाणिज्यिक बैंकों से आप क्या समझते हैं? वाणिज्यिक बैंकों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं का वर्णन कीजिए। (2008)
अथवा
वाणिज्यिक बैंक किसे कहते हैं? वाणिज्यिक बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2007)
उत्तर:
वाणिज्यिक या व्यापारिक बैंक से आशय व्यापारिक बैंक वे बैंक होते हैं, जो सामान्य बैंकिंग का कार्य करते हैं। भारत में सभी राष्ट्रीयकृत बैंक व्यापारिक बैंक होते हैं तथा ये बैंक अनुसूचित बैंक भी होते हैं। ये बैंक केन्द्रीय बैंक के निर्देशन में कार्य करते हैं एवं (UPBoardSolutions.com) जनता से निक्षेप स्वीकार करते हैं, अल्पकालीन ऋण प्रदान करते हैं तथा साख का निर्माण भी करते हैं। व्यापारिक बैंकों के निम्नलिखित दो प्रकार हैं

1. अनुसूचित बैंक भारत में वे बैंक अनुसूचित बैंक कहलाते हैं, जिनका नाम भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित किया हुआ है। ये बैंक निम्नलिखित शर्तों का पालन करते हैं

  • उस बैंक की प्रदत्त पूँजी तथा कोष कम-से-कम ₹ 5 लाख हो।
  • उस बैंक के कार्य अपने जमाकर्ताओं के हित के विरुद्ध न हों।
  • वह बैंक भारतीय कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत हो।
  • उस बैंक की आर्थिक स्थिति अच्छी हो।

2. गैर-अनुसूचित बैंक जिन बैंकों का नाम भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की द्वितीय अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है, वे गैर-अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक कहलाते हैं।

वाणिज्यिक या व्यापारिक बैंकों के कार्य या सेवाएँ वाणिज्यिक या व्यापारिक बैंकों के कार्य या सेवाएँ निम्नलिखित हैं –

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I. मुख्य कार्य या प्राथमिक कार्य

1. जमा पर धन प्राप्त करना बैंक की प्रमुख कार्य जमा पर धन प्राप्त करना
है। बैंक जनता से जमा के रूप में धन को स्वीकार करता है। बैंक पाँच प्रकार के खातों द्वारा जनता से जमा प्राप्त करता है

(i) चालू खाता ये खाते मुख्य रूप से व्यापारियों और व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा खोले जाते हैं। इन खातों में दिन में कई बार धन जमा कराने व निकालने की सुविधा रहती है। इस प्रकार के खाते पर बैंक प्रायः ब्याजे नहीं देते हैं।

(ii) बचत बैंक खाता यह खाता कम तथा निश्चित आय वर्ग वाले व्यक्तियों के लिए अधिक लाभकारी होता है। इस प्रकार के खाते का मुख्य उद्देश्य जनता क़ी छोटी-छोटी बचतों को एकत्र करके उनमें बचत की भावना को विकसित करना होता है। यह खाता कोई भी साधारण व्यक्ति खोल सकता है। बैंक इस खाते पर 4% की दर से ब्याज भी देता है।

(iii) सावधि जमा खाता जिन व्यक्तियों का उद्देश्य अधिक ब्याज कमाना होता है, उनके द्वारा यह खाता खोला जाता है। यह खाता एक निश्चित अवधि के लिए होता है। यह खाता एक नाम, संयुक्त नाम या नाबालिग के द्वारा भी खोला जा सकता है।

(iv) निरन्तर/आवर्ती जमा खाता इस प्रकार के खाते में प्रतिमाह एक निश्चित (UPBoardSolutions.com) धनराशि जमा करानी पड़ती है। यह एक निश्चित अवधि के लिए खोला जाता है। यह खाता ३5 के गुणक में खोला जाता है। इस खाते में चक्रवृद्धि दर से ब्याज मिलता है।

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2. ऋण देना व्यापारिक बैंक सामान्यत: निम्नांकित प्रकार के ऋण प्रदान करते हैं-

(i) अधिविकर्ष द्वारा जब बैंक अपने ग्राहकों को उनके द्वारा जमा की गई राशि से अधिक रुपया निकालने की अनुमति दे देता है, तो वह अतिरिक्त राशि अधिविकर्ष (Overdraft) कहलाती है। यह सुविधा प्रायः बैंक द्वारा चालू खाते पर प्रदान की जाती है। यह सुविधा अल्पकालीन होती है।

(ii) नकद साख इसमें व्यापारी बैंक से अपने ऋण की एक सीमा तय कर लेता है। इस प्रकार वह राशि व्यापार के खाते में जमा हो जाती है। व्यापारी अपनी आवश्यकतानुसार रुपया निकालता और जमा कराता रहता है। इसमें ब्याज सम्पूर्ण राशि पर न लगाकर केवल निकाली गई राशि पर ही लगाया जाता है और यह सुविधा बैंक द्वारा चल-अचल सम्पत्ति की जमानत पर प्रदान की जाती है।

(iii) ऋण और अग्रिम जब ऋण पूर्व निश्चित अवधि के लिए दिया जाता है, तो उसे ऋण और अग्रिम (Loan and Advance) कहते हैं। इसमें पूर्ण धनराशि पर ब्याज प्रारम्भ से ही लगाया जाता है, चाहे ऋण का प्रयोग करें या न करें। यह ऋण भी बैंक द्वारा चल-अचल सम्पत्ति की जमानत पर प्रदान किया जाता है।

(iv) अल्प सूचना पर देय यह ऋण सामान्यत: बड़े नगरों में ही प्रचलित है। इस पर ब्याज 0.5% से लेकर 3.5% तक ही वसूला जाता है।

(v) हुण्डियों तथा विनिमय-विपत्रों को भुनाना व्यापारिक बैंक हुण्डियों तथा विनिमय-विपत्रों को भुनाने का कार्य भी करते हैं। अतः इन्हें भुनाकर बैंक ऋण देने की व्यवस्था करते हैं। ये ऋण व्यक्तिगत जमानत एवं प्रतिभूतियों की जमानत दोनों पर प्रदान किए जाते हैं।

3. एजेन्सी के रूप में कार्य व्यापारिक बैंक अपने ग्राहकों के लिए निम्न एजेन्सी सम्बन्धी कार्य भी करते हैं|

  • ग्राहकों की ओर से बीमे की किस्त का भुगतान करना।
  • लॉकर्स की सुविधा प्रदान करना।
  • ये गहने अथवा बहुमूल्य वस्तुओं का क्रय-विक्रय करते हैं।
  • ये अंश व ऋणपत्रों का क्रय-विक्रय करते हैं।
  • ये बैंक अपने ग्राहकों को आर्थिक सलाह व सम्मति भी देते हैं।
  • ये बैंक साख-पत्रों, बिल, ड्राफ्ट, हुण्डी, विनिमय-विपत्र, आदि का निर्गमन करते हैं।
  • ये बैंक अंशपत्रों पर लाभांश व ऋणपत्रों पर ब्याज एकत्रित करते हैं।

4. विदेशी विनिमय का कार्य आधुनिक व्यापारिक बैंक एक देश की मुद्रा को दूसरे देश की मुद्रा में बदलने का कार्य भी करते हैं।
5. रुपये के हस्तान्तरण का कार्य ये बैंक एक स्थान से दूसरे स्थान पर रुपये भेजने की शीघ्र, सस्ती व सरल सुविधा प्रदान करने का कार्य भी करते हैं।
6. व्यापारिक सूचना सम्प्रेषित करने का कार्य ये बैंक बाजार की माँग से सम्बन्धित आँकड़ों का संग्रह करके अपने ग्राहकों तक पहुँचा देने का कार्य भी करते हैं।
7. धन के विनियोजन सम्बन्धी कार्य ये बैंक अपनी जमा को लगभग 26% धन (UPBoardSolutions.com) विनियोग में लगाते हैं।
8. साख निर्धारण का कार्य सेयर्स के अनुसार, “बैंक केवल एक मुद्रा जुटाने वाली संस्था ही नहीं है, वरन् मुद्रा की निर्माता भी है।” अर्थात् बैंक नकद जमा, साख जमा, आदि का भुगतान करके साख का निर्माण भी करते हैं अर्थात् “बैंक उस जगह पर काटते हैं, जहाँ पर बोते नहीं।’
9. अन्य सेवाएँ बैंक अपने ग्राहकों को अन्य आवश्यक सेवाएँ भी प्रदान करते हैं; जैसे

  1. सरकार तथा अन्य संस्थाओं के ऋणों का अभिगोपन करना।
  2. यात्री चैक जारी करना।
  3. आँकड़ों व व्यापारिक सूचनाओं को एकत्रित करके उनका प्रकाशन करना, आदि।

प्रश्न 2.
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लाभ एवं हानियों का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लाभ बैंकों के राष्ट्रीयकरण से निम्नलिखित लाभ हुए हैं

  1. आर्थिक विकास में वृद्धि बैंकों को राष्ट्रीयकृत किए जाने से इनकी जमाओं में वृद्धि हुई है। अत: इन जमाओं का उपयोग देश की आर्थिक नीति के अनुसार किया जाने लगा, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला।
  2. सहयोग में वृद्धि 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो जाने से इन्हें रिज़र्व बैंक का सहयोग प्राप्त हुआ, जिससे देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हुई है।
  3. बैंकों की कार्यकुशलता में वृद्धि गैर-राष्ट्रीयकृत बैंकों की अपेक्षा राष्ट्रीयकृत बैंकों की कार्यकुशलता में अधिक वृद्धि हुई है।
  4. समाजवाद को बढ़ावा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों की धनराशि का प्रयोग पूँजीपतियों के अतिरिक्त समाज के सामान्य वर्ग के लिए भी किया गया, जिससे समाजवाद को बढ़ावा मिला।
  5. उद्योग-धन्धों में वृद्धि बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने से उद्योग-धन्धों के विकास हेतु सरकार द्वारा उदार ऋण नीति को अपनाया गया।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण की हानियाँ बैंकों के राष्ट्रीयकरण से निम्नलिखित हानियाँ हुई हैं-

  1. भ्रष्टाचार में वृद्धि राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों की कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिला, क्योंकि बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो जाने से बैंकों से ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत लम्बी व कठिन हो गई।
  2. राजनीति का प्रवेश राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों के संचालन व प्रबन्ध में राजनीतिज्ञों का प्रवेश होने के कारण बैंकों की समस्त पूँजी कुछ ही हाथों में जाने का भय उत्पन्न हो गया है।
  3. कर्मचारियों की कार्यकुशलता में कमी राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंकों में सरकारी नौकरी हो जाने के कारण कर्मचारियों की कार्यकुशलता में कमी आई है।
  4. नौकरशाही का प्रभुत्व बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् बैंक सरकारी क्षेत्रों में आ गए, जिससे अन्य सरकारी क्षेत्रों की भाँति बैंकों में नौकरशाही व लालफीताशाही व्याप्त होने लगी है।
  5. क्षेत्रीय संकीर्णता राष्ट्रीयकृत बैंकों की अधिक शाखाओं का विस्तार शहरों में होने के कारण शहरी क्षेत्रों की जमाओं का प्रयोग उसी क्षेत्र में किया जाता है, जिस कारण पिछड़े हुए एवं अविकसित क्षेत्रों का विकास रुक जाता है।

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प्रश्न 3.
एक व्यापारिक बैंक में ग्राहकों द्वारा खोले जाने वाले विभिन्न प्रकार के खातों का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
बैंक में कितने प्रकार के खाते खोले जा सकते हैं? समझाइए। (2006)
अथवा
बैंक में खोले जाने वाले विभिन्न प्रकार के खातों का वर्णन कीजिए। (2006)
उत्तर:
बैंक मुख्य रूप से निम्नलिखित खाते खोलने की सुविधा देते हैं-

1. चालू खाता यह खाता व्यापारियों तथा उद्योगपतियों के द्वारा खोला जाता है। इस खाते में दिन में कितनी भी बार लेन-देन किया जा सकता है। चालू खाते में जमा राशि पर ब्याज नहीं दिया जाता है।

चालू खाता खोलने की विधि चालू खाता खोलने के लिए बैंक से नि:शुल्क फॉर्म प्राप्त करके इसे भरना पड़ता है। इस आवेदन-पत्र में व्यक्ति या संस्था का नाम, व्यवसाय का पूरा पता, साक्षी के हस्ताक्षर, खाता खोलने वाले के हस्ताक्षर, नमूने के हस्ताक्षर, आदि सूचनाओं की पूर्ति करनी पड़ती है।

नमूने के हस्ताक्षर खाता खोलने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर को बैंक अपनी हस्ताक्षर-प्राप्त पुस्तिका में नमूने के रूप में ले लेता है, जिन्हें बैंक भविष्य के लिए अपने पास सुरक्षित रखता है।

न्यूनतम जमा राशि चालू खाते में ग्राहकों को बैंक द्वारा निश्चित की गई न्यूनतम राशि सदैवं जमा रखनी पड़ती है।

चालू खाता खोलने पर प्राप्त होने वाली पुस्तकें
चालू खाता खोलने पर बैंक द्वारा निम्नलिखित तीन पुस्तकें प्रदान की जाती हैं-

  • पास बुक यह एक छोटी पुस्तक होती है, जिसमें ग्राहक व बैंक के मध्ये किए गए सभी लेन-देन का तिथिवार विवरण लिखा होता है।
  • चैक बुक यह एक पुस्तक की तरह होती है। इसमें धनराशि निकालने के लिए 10 से 100 तक के कोरे फॉर्म लगे रहते हैं। इसके दो भाग होते हैं- बाँया वे दाँया। बाँया भाग प्रतिपर्ण वे दाँया भाग चैक कहलाता है। चैक या चैक बुक खो जाने (UPBoardSolutions.com) पर बैंक को तुरन्त सूचित करना चाहिए।
  • जमा की पुस्तक इस पुस्तक का उपयोग धनराशि जमा कराने के लिए किया जाता है। इसमें धनराशि जमा कराने के लिए कोरे फॉर्म लगे रहते हैं। यह फॉर्म चैक, बिल, ड्राफ्ट व नकदी के साथ जमा कराया जाता

2. बचत बैंक खाता यह खाता सामान्यतः छोटी-छोटी बचतें जमा करने के लिए खोला जाता है। इस खाते पर अधिविकर्ष की सुविधा नहीं मिलती है। खाता खोलने की विधि इस प्रकार का खाता खोलने के लिए बैंक से प्राप्त निःशुल्क आवेदन-पत्र भरना होता है, जिसमें नाम, पता व व्यवसाय, आदि भरकर हस्ताक्षर करके जमा करानी पड़ती है। यह खाता कम-से-कम ₹ 500 जमा करवाकर खोला जा सकता है। खाता खोलते समय बैंक में नमूने के हस्ताक्षर करने होते हैं। इसे बैंक भविष्य के लिए सुरक्षित रखता है। खाताखोलने पर पास बुक, चैक बुक व जमा की पुस्तक, आदि प्रदान की जाती हैं।

3. सावधि जमा खाता सावधि जमा खाता एक निश्चित अवधि के लिए खोला जाता है। परिपक्वता की तिथि पर ब्याज सहित राशि लौटा दी जाती है। खाता खोलने की विधि इसमें बैंक से एक छपा हुआ आवेदन फॉर्म प्राप्त : कर उसे भरना होता है। बैंक जमाकर्ता को एक रसीद देता है, जिसे ‘स्थायी जमा रसीद’ कहा जाता है। इसमें जमाकर्ता का नाम, पता, धनराशि, जमा की अवधि व ब्याज दर, आदि का उल्लेख होता है।

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4. निरन्तर/आवर्ती जमा खाता इस प्रकार के खाते को ‘संचयी जमा खाता भी पड़ती है। यह खाता ₹ 5 के गुणक में खोला जाता है। यह एक निश्चित अवधि के लिए खोला जाता है। इस खाते में चक्रवृद्धि दर से ब्याज मिलता है। इसमें निर्धारित अवधि समाप्त होने पर जमा राशि ब्याज सहित निकाली जा सकती है।

प्रश्न 4.
बैंक तथा ग्राहक के मध्य सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बैंक और ग्राहक का सम्बन्ध बैंक और ग्राहक का सम्बन्ध जानने से पूर्व बैंक और ग्राहक का अर्थ जान लेना चाहिए। बैंक का अर्थ बैंक वह संस्था है, जो मुद्रा को व्यवसाय करती है। यह एक ऐसी संस्था है जहाँ धन जमा कराने, ऋण देने एवं कटौती की सुविधाएँ दी जाती हैं।

ग्राहक का अर्थ ग्राहक की कोई वैधानिक परिभाषा नहीं होती है। सामान्यत: ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसका बैंक में खाता है, वह ग्राहक कहलाती है। सामान्यत: बैंक और ग्राहक के मध्य तीन प्रकार के सम्बन्ध पाए जाते हैं

1. ऋणी और ऋणदाता को सम्बन्ध बैंक और ग्राहक के मध्ये सबसे महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध ऋणी एवं ऋणदाता का है। जब ग्राहक बैंक में धन जमा कराता है, तो बैंक को इस धन का इच्छानुसार उपयोग करने का अधिकार मिल जाता है। ऐसी स्थिति में बैंक ऋणी तथा ग्राहक ऋणदाता होता है। इसके विपरीत जब ग्राहक अपने खाते में जमा राशि से अधिक राशि निकालता है, तो बैंक ऋणदाता तथा ग्राहक ऋणी होगा। ऋणी व ऋणदाता के रूप में बैंक और ग्राहक के मध्य निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं

  • ऋण के उपयोग की स्वतन्त्रता बैंक अपने ग्राहकों के जमा धन को अपनी इच्छानुसार उपयोग कर सकता है।
  • ऋण लौटाने की स्वतन्त्रता न होना बैंक ग्राहकों की धनराशि को इच्छानुसार (UPBoardSolutions.com) नहीं लौटा सकता है। वह इस राशि को तभी लौटा सकता है, जब ग्राहक भुगतान प्राप्त करना चाहता है।
  • ग्राहकों के खातों व धनराशि की गोपनीयता बैंक अपने ग्राहकों के खातों की स्थिति गोपनीय रखता है।

2. अभिकर्ता (एजेण्ट) और प्रधान का सम्बन्ध वर्तमान समय में बैंक अपने ग्राहकों को अभिकर्ता के रूप में अनेक प्रकार की सेवाएँ प्रदान करते हैं; जैसे

  • ग्राहकों के चैकों, प्रतिज्ञा-पत्रों, विनिमय बिलों, आदि का भुगतान प्राप्त करना।
  • ग्राहक के ऋणपत्रों पर ब्याज, लाभांश, ऋण की राशि, मकान का किराया, आदि वसूल करना।
  • ग्राहक की ओर से ऋणों की किस्तें, ब्याज, चन्दा, किराया, बीमे की किस्तें, कर, आदि का भुगतान करना।
  • ग्राहकों के धन का एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरण करना।
  • ग्राहक की ओर से प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय करना।
  • ग्राहक के आदेशानुसार अन्य कार्य करना।

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3. धरोहरधारी और धरोहरकर्ता का सम्बन्ध बैंक ग्राहकों को धन, बहुमूल्य प्रपत्र एवं अन्य महँगी वस्तुएँ सुरक्षार्थ रखते हैं। इन वस्तुओं का स्वामित्व तो ग्राहक का ही होता है, लेकिन अधिकार बैंक के पास रहता है। बैंक का उन वस्तुओं को सुरक्षित रखने व माँगने पर वापस लौटाने का दायित्व होता है। इस प्रकार, बैंक एक धरोहरधारी व धरोहरकर्ता के रूप में कार्य करता है। बैंक ग्राहक की धरोहर को सुरक्षित रखने व इसे लौटाने की गारण्टी देता है। यदि लापरवाही (UPBoardSolutions.com) से ग्राहक की कोई हानि होती है, तो बैंक ही इसके लिए उत्तरदायी होता है। इस प्रकार मूल्यवान् वस्तु को धरोहर के रूप में रखने वाले ग्राहक को ‘धरोहरकर्ता एवं बैंक को ‘धरोहरधारी’ कहते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 4 तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 4 तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 4 तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 4
Chapter Name तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ
Number of Questions Solved 43
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 4 तन्त्रिका तन्त्र एवं ज्ञानेन्द्रियाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
न्यूरॉन किस तन्त्र की कोशिका है? (2011, 15)
(a) पाचन तन्त्र
(b) अस्थि तन्त्र
(c) तन्त्रिका तन्त्र
(d) परिसंचरण तन्त्र
उत्तर:
(c) तन्त्रिका तन्त्र

प्रश्न 2.
न्यूरॉन कहते हैं  (2017)
(a) अस्थि कोशिका को
(b) पेशी कोशिका को
(c) तन्त्रिका कोशिका को
(d) रक्त कोशिका को
उत्तर:
(c) तन्त्रिका कोशिका को

प्रश्न 3.
अनुमस्तिष्क का कार्य है  (2016)
(a) गन्ध ग्रहण करना
(b) स्मृति
(c) दृश्य संवेदनाएँ ग्रहण करना
(d) शरीर का सन्तुलन
उत्तर:
(d) शरीर का सन्तुलन

प्रश्न 4.
प्रतिवर्ती क्रिया का उदाहरण है
(a) हृदय गति
(b) आमाशय में क्रमांकुचन
(c) तीव्र प्रकाश में पुतली का सिकुड़ना
(d) ग्रन्थियों की क्रियाएँ
उत्तर:
(c) तीव्र प्रकाश में पुतली का सिकुड़ना

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन परिधीय तन्त्रिका तन्त्र की तन्त्रिकाएँ हैं?
(a) कपालीय तन्त्रिकाएँ
(b) रीढ़ तन्त्रिकाएँ
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों
(d) स्वायत्त तन्त्रिकाएँ
उत्तर:
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों

प्रश्न 6.
नलिकाविहीन ग्रन्थि कौन-सी है? (2006, 09, 11, 13)
(a) पीयूष ग्रन्थि
(b) लार ग्रन्थि
(c) अमाशय
(d) हृदय
उत्तर:
(a) पीयूष ग्रन्थि

प्रश्न 7.
डायबिटीज किसकी कमी के कारण होता है?  (2015)
(a) ग्लूकैगन
(b) थायरॉक्सिन
(c) इन्सुलिन
(d) ये सभी
उत्तर:
(c) इन्सुलिन

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से किसका सम्बन्ध इन्सुलिन निर्माण से है?  (2016)
(a) पीयूष ग्रन्थि
(b) अधिवृक्क ग्रन्थि
(c) अग्न्याशय
(d) लार ग्रन्थि
उत्तर:
(c) अग्न्याशय

प्रश्न 9.
आँख के किस भाग पर वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बनता है?  (2012, 14)
(a) लेन्स पर
(b) पीत बिन्दु पर
(c) अन्ध बिन्दु पर
(d) ये सभी
उत्तर:
(b) पीत बिन्दु पर

प्रश्न 10.
दूर की वस्तु को न देख पाना रोग है  (2017)
(a) निकट दृष्टि दोष
(b) दूर दृष्टि दोष
(c) मोतियाबिन्द
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) निकट दृष्टि दोष

प्रश्न 11.
एक छात्रा मेज पर रखी पुस्तक पढ़ने में कठिनाई अनुभव करती है, परन्तु श्यामपट्ट पर लिखे शब्दों को ठीक पढ़ लेती है। इस दोष को क्या कहते हैं?  (2010)
(a) दूर दृष्टि दोष
(b) निकट दृष्टि दोष
(C) रंग दृष्टि दोष (वर्णान्धता)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दूर दृष्टि दोष

प्रश्न 12.
कान के अन्दर अस्थि होती है  (2017)
(a) मुगदर (Malleus)
(b) पैरिलिम्फ
(c) एम्पुला
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) मुगदर

प्रश्न 13.
किस लेंस को दूर दृष्टि दोष में प्रयोग करते हैं?  (2017)
(a) उत्तर लेंस
(b) अवतल लेंस
(c) ‘d’ और ‘b’ दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) उत्तल लेंस

प्रश्न 14.
कान की अर्द्धचन्द्राकार नलिकाओं का क्या कार्य है?  (2012)
(a) ज्ञान प्राप्त करना
(b) शरीर का सन्तुलन बनाना
(c) सँघना
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) शरीर का सन्तुलन बनाना।

प्रश्न 15.
जिह्वा विभिन्न स्वाद ग्रहण करती है  (2012)
(a) जिह्वा के अग्र भाग से
(b) जिह्वा के भिन्न-भिन्न भागों से
(c) जिह्वा के पिछले भाग से
(d) जिह्वा के मध्य भाग से
उत्तर:
(b) जिह्वा के भिन्न-भिन्न भागों से

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
तन्त्रिकाएँ कितने प्रकार की होती हैं?
अथवा
तन्त्रिका तन्त्र के मुख्य भाग कौन-कौन से हैं?  (2018)
उत्तर:
तन्त्रिकाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं
1. संवेदी तन्त्रिका ये उद्दीपनों को केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र तक पहुँचाती हैं।
2. प्रेरक या चालक तन्त्रिका ये मस्तिष्क या मेरुरज्जु से आदेश को सम्बन्धित कंकाल पेशी या ग्रन्थि तक पहुँचाती है।
3. मिश्रित तन्त्रिका ये उद्दीपन व प्रेरणा दोनों का संवहन करती हैं।

प्रश्न 2.
प्रतिवर्ती क्रिया क्या है?   (2006, 10, 12)
उत्तर:
ऐसी अनैच्छिक क्रिया, जो बाहरी उद्दीपनों के कारण अनुक्रिया के रूप में होती है, प्रतिवर्ती क्रिया कहलाती है। इसे मेरुरज्जु नियन्त्रित करती है।

प्रश्न 3.
प्रतिवर्ती क्रियाओं से आप क्या समझते हैं? (2017)
अथवा
स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र का क्या कार्य है?
उत्तर:
स्वायत्त तन्त्रका तन्त्र शरीर को स्वायत्त अनैच्छिक क्रियाओं का संचालन करता है; जैसे-हृदय, यकृत, आमाशय, अन्त:स्रावी ग्रन्थियों की क्रियाएँ आदि। यह तन्त्र स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हुए भी अन्तिम रूप से केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र द्वारा नियन्त्रित होता है।

प्रश्न 4.
किस ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन शरीर की उपापचय क्रियाओं का नियमन करता है?
उत्तर:
थायरॉइड ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन शरीर की उपापचय क्रियाओं का नियमन करता है। शरीर में इसकी कमी से हृदय की गति धीमी, शरीर में सुस्ती, मस्तिष्क की कमजोरी आदि रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ कौन-से हॉर्मोन्स स्रावित करती हैं?
उत्तर:
लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ ग्लूकैगन एवं इन्सुलिन नामक हॉर्मोन्स स्रावित करती हैं। इन्सुलिन रक्त में शर्करा की मात्रा को नियन्त्रित करने का कार्य करता है। इन्सुलिन के अल्पस्रावण से मधुमेह (Diabetes) नामक रोग हो जाता है।

प्रश्न 6.
शरीर में रुधिर शर्करा के स्तर को नियन्त्रित करने वाले सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हॉर्मोन का नाम बताइए।  (2005)
उत्तर:
शरीर में रुधिर शर्करा के स्तर को नियन्त्रित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण हॉर्मोन इन्सुलिन है।

प्रश्न 7.
शरीर की दो आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शरीर की दो आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियाँ हैं-
1. गति संवेदन तन्त्र
2. प्रघाण तन्त्र।

प्रश्न 8.
नेत्र की समंजन शक्ति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
नेत्र लेन्स की फोकस दूरी की घटाने-बढ़ाने की क्षमता को समंजन शक्ति कहते हैं।

प्रश्न 9.
नेत्र की किस परत पर प्रतिबिम्ब का निर्माण होता है?
उत्तर:
नेत्र की सबसे भीतरी परत रेटिना पर प्रतिबिम्ब का निर्माण होता है।

प्रश्न 10.
निकट दृष्टि दोष से क्या आशय है?  (2018)
उत्तर:
इस दोष में पास की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं, किन्तु दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। प्रतिबिम्ब रेटिना के आगे बनता है।

प्रश्न 11.
वर्णान्धता से क्या आशय है?  (2016)
उत्तर:
यह एक वंशानुगत रोग हैं। इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों में विभिन्न रंगों (विशेषत: लाल एवं हरा रंग) को पहचाने की क्षमता नहीं होती है। इससे मुख्यतः पुरुष प्रभावित होता है। सामान्य रूप से इस दोष का निवारण नहीं हो | पाता है।

प्रश्न 12.
नाक में बाल क्यों होते हैं?  (2018)
उत्तर:
धूल के कणों एवं जीवाणुओं को रोकने के लिए नासागुहा की सतह पर छोटे-छोटे रोएँ (बाल) होते हैं।

प्रश्न 13.
स्वादेन्द्रिय के कार्य बताइए।  (2011)
उत्तर:
स्वादेन्द्री अर्थात् जीभ का प्रमुख कार्य अनेक प्रकार के स्वाद की संवेदनाओं को ग्रहण करना है, इसके लिए जीभ पर विशिष्ट भाग पाए जाते हैं।

लघु उतरीय प्रश्न (2 अक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
‘तन्त्रिका तन्त्र के भाग’ टिप्पणी लिखिए।  (2017)
अथवा
स्नायु की रचना का सचित्र वर्णन कीजिए।  (2005)
अथवा
तन्त्रिका कोशिका का सचित्र वर्णन कीजिए।  (2010)
उत्तर:
मस्तिष्क, मेरुरज्जु तथा तन्त्रिकाएँ सभी तन्त्रिका ऊतक से बनी होती हैं। तन्त्रिका ऊतक की कोशिका को न्यूरॉन कहते हैं। इन कोशिकाओं का निर्माण पूणावस्था में ही हो जाता है। ये एक बार नष्ट होने पर दोबारा नहीं बनती अर्थात् इनका पुनरुद्भव (Regeneration) सम्भव नहीं है।

ये कोशिकाएँ विशिष्ट प्रकार की होती हैं, जो सन्देशवाहक का कार्य करती हैं। एक न्यूरॉन से सन्देश दूसरे न्यूरॉन तक पहुँचता है, वहाँ से लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक, दो या बहुत से न्यूरॉन्स की सहायता लेता है।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 1

न्यूरॉन के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं
1. कोशिका काय (Cyton) जिसमें एक केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य होता हैं।
2. डेण्ड्राइट न्यूरॉन (Neuron) के कोशिका काय से निकले हुए पतले तन्तु, जो एक या अधिक होते हैं, डेण्ड्राइट (Dendrite) कहलाते हैं।
3. एक्सॉन कोशिका काय से प्रारम्भ होकर एक बहुत पतला एवं लम्बा तन्त्रिका तन्तु निकलता है। यह एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक सन्देशवाहक का कार्य करता है, जिसे एक्सॉन (Axon) कहते हैं।

प्रश्न 2.
मेरुरज्जु की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाकर संक्षिप्त वर्णन कीजिए।  (2005, 16)
अथवा
मेरुरज्जु के कार्य बताइए।  (2017)
उत्तर:
मस्तिष्क पुच्छ अर्थात् मेड्यूला ऑब्लोंगटा का पिछला भाग ही मेरुरज्जु (Spinal cord) बनाता है। केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र का यह भाग कशेरुक दण्ड (Vertebral column) के अन्दर स्थित रहता है। कशेरुक दण्ड या रीढ़ की हड्डी कशेरुकाओं से बनी होती हैं तथा इनके मध्य में एक तन्त्रिको नाल (Neural canal) होती है। मेरुरज्जु इसी तन्त्रिका नाल में सुरक्षित रहती हैं। मेरुरज्जु का अन्तिम सिरा एक पतले सूत्र के रूप में होता है, यह भाग अन्त्य सूत्र कहलाता है।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 2

मस्तिष्क के समान मेरुरज्जु के चारों ओर तीन झिल्लियों-इथूरामैटर, एरेक्नॉइड तथा पायामैटर का बना आवरण पाया जाता है। इन झिल्लियों के बीच में एक लेसदार तरल द्रव्य भरा रहता है, जो बाह्य आघातों से मेरुरज्जु की रक्षा करता है।

मेरुरज्जु के मध्य में एक संकरी नाल पाई जाती है, जिसे केन्द्रीय नाल (Central canal) कहते हैं। केन्द्रीय नाल के चारों ओर मेरुरज्जु का भाग दो स्तरों में बंटा होता हैं-भीतरी स्तर को धूसर द्रव्य (Grey matter) तथा बाहरी स्तर को श्वेत द्रव्य (White matter) कहते हैं। धूसर द्रव्य से पंख के समान पृष्ठ श्रृंग (horm) तथा प्रतिपृष्ठ भुग निकले रहते हैं। इन्हीं श्रृंगों में तन्त्रिका तन्तु एकत्रित होकर स्पाइनल तन्त्रिकाओं (Spinal nerve) का निर्माण करते हैं। मेरुरज्जु के धूसर द्रव्य का ऊपरी आधा भाग संवेदी (Sensory) क्रियाओं से तथा निचला आधा भाग चालक या प्रेरक (Motor) क्रियाओं से सम्बन्ध रखती हैं।

मेरुरज्जु के कार्य
मेरुरज्जु के दो कार्य इस प्रकार है
1. यह मस्तिष्क द्वारा प्रेषित आदेशों तथा मस्तिष्क को जाने वाली संवेदनाओं को मार्ग प्रदान करता है।
2. यह प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियन्त्रण एवं समन्वय करता है।

प्रश्न 3.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं? इसे उदाहरण सहित समझाइए।  (2002, 03, 06, 09)
अथवा
प्रतिवर्ती क्रिया पर टिप्पणी लिखिए।   (2018, 16)
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रिया का अर्थ
मनुष्य के दैनिक जीवन में कुछ क्रियाएँ, किसी बाह्य उद्दीपन के अनुक्रिया स्वरूप, बिना मस्तिष्क की जानकारी के अकस्मात् हो जाती हैं।उदाहरणतः किसी सर्प (साँप) को अकस्मात् देखते ही एकाएक कूदकर पीछे हट जाना। यहाँ सर्प ने या उद्दीपन का कार्य किया और चौंककर कूदना एक ऐसी अनैच्छिक क्रिया हुई, जिसके लिए मस्तिष्क ने प्रेरणा नहीं दी। ऐसी अनैच्छिक क्रियाओं को ही प्रतिवर्ती क्रियाओं (Reflex actions) की संज्ञा दी जाती हैं।

इनके लिए किसी विचार अथवा प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। ये क्रियाएँ मेरुरज्जु (Spinal cord) से नियन्त्रित होती हैं। बाह्य उद्दीपनों या संवेदनाओं को ग्राही अंगों (नेत्र, कान, नाक, जीभ एवं त्वचा) द्वारा ग्रहण कर संवेदी तन्त्रिका कोशिका से मेरुरज्जु तक पहुंचा दिया जाता हैं। मेरुरज्जु इन संकेतों को प्राप्त कर उचित आदेश निर्गत करता है। ये आदेश प्रेरक तन्त्रिका कोशिका द्वारा सम्बन्धित अंगों की ऐच्छिक पेशियों तक पहुँचा दिए जाते हैं। इस सम्पूर्ण मार्ग को प्रतिवर्ती चाप (Reflex arc) की संज्ञा दी जाती हैं।

प्रतिवर्ती क्रिया के प्रकार
प्रतिक्त क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं
1. अनुबन्धित प्रतिवर्ती क्रिया (Conditioned Reflex Action) कुछ | क्रियाएँ नियमित अभ्यास के बाद स्वचालित हो जाती हैं। इनका नियन्त्रण मस्तिष्क के स्थान पर मेरुरज्जु द्वारा होने लगता है; जैसे- भोजन देखकर मुंह में पानी आना, साइकिल चलाना, नृत्य करना एवं अन्य कौशल आदि।
2. अबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Unconditioned Reflex Action) ये प्रतिवर्ती क्रियाएँ अर्जित न होकर जन्मजात होती है; जैसे-तेज प्रकाश पड़ने पर पुतली का सिकुड़ना, ठण्ड में रोंगटे खड़े होना, छींकना, खाँसना, पलक का झपकना एवं उबासी लेना आदि।

प्रश्न 4.
प्रतिवर्ती क्रियाओं के महत्त्व को उदाहरण सहित समझाइए।  (2010, 12)
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रियाओं का महत्त्व
प्रतिवर्ती क्रियाओं के महत्त्वे का संक्षिप्त विवरण निम्न है
1. प्रतिवर्ती क्रियाओं द्वारा विभिन्न बाह्य आक्रमणों एवं खतरों से हमारी रक्षा सुनिश्चित हो पाती है। उदाहरणतः किसी गर्म वस्तु पर हाथ पड़ जाने से एकदम से हाथ को वापस खींच लेना अथवा आँख के सामने अचानक किसी वस्तु के आ जाने से पलक का झपकना, जिससे आँखें सुरक्षित रहें।

2. कुछ आन्तरिक प्रतिवर्ती क्रियाएँ भी विशेष महत्त्व रखती हैं। ये क्रियाएँ शरीर | के लिए आवश्यक एवं उपयोगी क्रियाओं को पूरा करने में सहायक होती हैं। उदाहरणत: भोजन ग्रहण से पूर्व मुंह में लार का स्राव, भोजन के पाचन के लिए विशेष महत्त्व रखता है।

3. कुछ प्रतिवर्ती क्रियाएँ, परिवर्तनशील पर्यावरण के साथ अनुकूलन स्थापित करने में भी विशेष भूमिका निभाती हैं। उदाहरणत: अचानक वातावरण का | ताप बढ़ जाने पर, शरीर प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा त्वचा से पसीने को निकालना , प्रारम्भ कर देता है तथा शरीर का ताप सामान्य बना रहता है।

प्रश्न 5.
मादक पदार्थों का स्नायु तन्त्र पर क्या प्रभाव पड़ता है? (2006, 08)
उत्तर:
मादक पदार्थ ऐसे नशीले पदार्थ हैं, जो शरीर के तन्त्रिका-तन्त्र को उत्तेजित करते हैं, इनसे अल्प समय के लिए तन्त्रिका तन्त्र से शेष शरीर का सन्तुलन बिगड़ जाता है। शरीर में उत्पन्न उत्तेजना के कारण व्यक्ति को आंशिक स्फूर्ति का आभास होता है। उल्लेखनीय है कि इन मादक पदार्थों का कोई पोषक मूल्य नहीं होता है। मादक पदार्थ तरल एवं ठोस दोनों रूपों में पाए जाते हैं। इनके उदाहरण हैं- एल्कोहॉल (शराब), तम्बाकू, अफीम, कोकीन, भाँग आदि।

स्नायु-तन्त्र पर प्रभाव
मादक वस्तुएँ परिसंचरण के माध्यम से मस्तिष्क तथा शरीर के समस्त भागों में पहुँचती हैं। धूम्रपान के प्रभाव को फेफड़े से दिमाग तक पहुँचने में केवल सात सेकण्ड लगते हैं। मादक वस्तुओं के प्रभाव से स्नायु तन्त्र का पेशियों पर नियन्त्रण क्रमशः कमजोर होने लगता है। ऐसे व्यक्ति का प्रतिक्रिया काल बढ़ जाता है अर्थात् वह उत्तेजनाओं के प्रति देर से प्रतिक्रिया करता है।
इसी प्रकार व्यक्ति का शारीरिक सन्तुलन भी बिगड़ने लगता है। मादक पदार्थों के अत्यधिक व्यसन से व्यक्ति की सोचने-समझने एवं विश्लेषण करने की शक्ति क्षीण होती रहती है। एकाग्रता हीनता, स्मरण शक्ति की क्षीणता, पहचान शक्ति की
कमी एवं आत्मसंयम का अभाव इसके अन्य दुष्प्रभाव हैं।

प्रश्न 6.
ज्ञानेन्द्रिय क्या हैं? शरीर की ज्ञानेन्द्रियों के नाम लिखकर उनके कार्य लिखिए।  (2010)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-ज्ञानेन्द्रियाँ।   (2014)
उत्तर:
ज्ञानेन्द्रियों का अर्थ
हमारे बाह्य वातावरण में विविध प्रकार के उद्दीपक उपस्थित होते हैं; जैसे—संगीत, मिठाई, फूल की सुगन्ध, कपड़े का चिकनापन आदि। ये उद्दीपन विभिन्न प्रकार की सूचनाओं के स्रोत हैं। शरीर के वे अंग जो इन सूचनाओं को प्राप्त एवं संग्रहीत करते हैं तथा उन्हें आवेग के रूप में तन्त्रिका तन्त्र को पहुँचाते हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ या संवेदनाग्राही अंग कहलाते हैं।

मानव शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ
हमारे शरीर में पाँच बाह्य ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जिल्ला एवं त्वचा) च दो आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियाँ हैं गति संवेदी तन्त्र, प्रद्याण तन्त्र हैं।

बाह्य ज्ञानेन्द्रियाँ
1. कर्ण (Ear) इनका कार्य ध्वनि संवेदनाओं को ग्रहण करना है। कानों के माध्यम से हम ध्वनि की विशेषताओं तीव्रता (Loudness), तारत्व (Pitch) ” अथवा स्वर का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
2. नेत्र (Eyes) इनका मुख्य कार्य बाहरी वस्तुओं के आकार एवं रंग की संवेदनाओं को ग्रहण करना हैं। दृष्टिपटल (Retina) की प्रकाश संवेदी
कोशिकाएँ दण्ड (Rodes) एवं शंकु (Cones) दृष्टि के ग्राही होते हैं।

3. नासिका (Nose) नाक के माध्यम से हमें गन्ध विशेष का ज्ञान होता है।
4. जिल्ला (Tongue) इसका प्रमुख कार्य स्वाद सम्बन्धी संवेदनाओं को ग्रहण करना है।
5. त्वचा (Skin) त्वचा एक संवेदी अंग है, जिससे स्पर्श (दबाव), गर्मी, सर्दी तथा पीड़ा आदि की संवेदनाएँ उत्पन्न होती हैं। हमारी त्वचा में इनमें से प्रत्येक संवेदना के लिए विशिष्ट ग्राहियाँ होती हैं।

आन्तरिक ज्ञानेन्द्रियाँ
1. गति संवेदन तन्त्र (Kinesthetic System) इसके ग्राही अंग स्नायु तथा मांसपेशियों में पाए जाते हैं। यह तन्त्र हमारे शरीर के अंगों की परस्पर स्थिति के विषय में सूचना देता है।
2. प्रघाण तन्त्र (Vestibular System) यह तन्त्र हमारे सन्तुलन बोध को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इस तन्त्र के संवेदी अंग, आन्तरिक कान में स्थित होते हैं।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए। (2004)
1. स्वादेन्द्रियाँ
2. घ्राणेन्द्रियाँ
अथवा
टिप्पणी लिखिए-स्वादेन्द्रिय के कार्य।  (2011)
उत्तर:
1. स्वादेन्द्रिय जिह्वा स्वादेन्द्रिय है। स्वाद के संवेदी ग्राहक, हमारी जीभ के छोटे उभरे हुए भाग में पाए जाते हैं, जिन्हें पैपिला या अंकुर कहते हैं। प्रत्येक पैपिला में स्वाद कलिका के गुच्छे होते हैं। इन्हीं स्वाद कलिकाओं में संवेदी कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जो स्वाद के अनुभवों को मस्तिष्क को भेजती हैं। मूल स्वाद केवल चार प्रकार के होते हैं- मीठा, खट्टा, कड़वा तथा नमकीन। जीभ के स्वतन्त्र छोर पर मीठे तथा नमकीन का, जीभ के पाश्र्व में खट्टे का और पश्च में कड़वे का ज्ञान कराने वाले स्वाद ग्राही होते हैं, किन्तु हम अन्य कई स्वादों का अनुभव भी करते हैं, कारण कि हम केवल भोजन के स्वाद से ही परिचित नहीं होते, बल्कि उसकी गन्ध, कण, तापमान, जीभ पर उसके दबाव तथा अन्य बहुत-सी संवेदनाओं से परिचित होते हैं। ये सभी कारक मिलकर हमें विशिष्ट स्वाद का अनुभव देते हैं।

2. घ्राणेन्द्रियाँ नाक गन्धग्राही इन्द्री है, इसके माध्यम से हमें गन्ध का ज्ञान होता है। गन्ध संवेदना के उद्दीपक हवा में विद्यमान विभिन्न पदार्थों के अणु होते हैं। ये अणु नासा वेश्म (Nasal chamber) में प्रवेश करते हैं, जहाँ वे नाक की श्लेष्मा (नमी) में घले जाते हैं। यहाँ से गन्ध के रासायनिक उद्दीपनों को नासा वेश्म की भित्ति (घ्राण उपकला) में स्थित संवेदी कोशिकाएँ ग्रहण करती है एवं मस्तिष्क को भेजती हैं।
मस्तिष्क के विश्लेषण के पश्चात् मनुष्य को सुगन्ध या दुर्गन्ध का बोध होता हैं। जुकाम आदि होने पर गन्ध की अनुभूति नहीं होती, क्योंकि श्लेष्मा झिल्ली पर सूजन आ जाने के कारण वायु के कण ऊपर तक नहीं पहुँच पाते हैं।

प्रश्न 8.
बहरेपन के क्या कारण हैं? (2014)
उत्तर:
कान एक श्रवणेन्द्रिय है, जिसका मुख्य कार्य ध्वनि की संवेदनाओं को ग्रहण करना है। इस क्रिया के अवरुद्ध होने को कान का बहरापन कहा जाता है। इसमें या तो कान की बनावट में ही कोई विशेष कमी या विकृति होती हैं अथवा किसी अन्य कारणों से; जैसे—संक्रमण होने या चोट लगने, आदि से कान कोई भी ध्वनि उद्दीपन ग्रहण नहीं कर पाते हैं।

बहरेपन के कारण

बहरेपन के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

  1. किसी दुर्घटना अथवा असावधानों के कारण कान का पर्दा फट जाने से।
  2. किसी आन्तरिक संरचना की अतिवृद्धि के कारण कर्ण नली का बन्द हो जाना।
  3. कान में संक्रमण के कारण मवाद आदि के भर जाने से।
  4. संवेदनाओं का संवहन करने वाली श्रवण तन्त्रिका अथवा मस्तिष्क के श्रवण केन्द्रों में दोष भी बहरेपन के कारण हो सकते हैं।
  5. कान के पर्दे पर अधिक गन्दगी अथवा स्राव इत्यादि के मैल के रूप में जमा होने पर।
  6. लम्बी अवधि तक ध्वनि प्रदूषण के कारण भी बहरेपन की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
  7. जुकाम, एवं फ्लू आदि की स्थिति में कण्ठ-कर्ण नली प्रभावित हो सकती है। नली के बन्द होने तथा सूजन आदि आने से कान में वायुदाब सन्तुलन के बिगड़ने की सम्भावना बढ़ जाती है। इससे ध्वनि उद्दीपनों को ग्रहण करने में व्यवधान उत्पन्न होता है।

प्रश्न 9.
कार्य के आधार पर त्वक् ज्ञानेन्द्रिय (Cutinuous Sense 0rgan) को कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर:
कार्य के आधार पर इन्हें दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। |
1. पीड़ा संवेदांग (Pain Receptore) त्वचा की अधिचर्म तथा चर्म में । शाखामय संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं का जाल फैला रहता है। इसके स्वतन्त्र पुटिकाविहीन छोर पीड़ा, खुजली, जलन आदि का ज्ञान कराते हैं।

2. स्पर्श संवेदांग (Tactile Receptors) इन संवेदी तन्त्रिका तन्तुओं के अन्तिम छोर घुण्डीदार, चपटे या तश्तरीनुमा होते हैं। चर्म में स्थित संवेदी । तन्त्रिका तन्तुओं के छोर पर बेलनाकार संवेदी संरचनाएँ मीसनर के देहाणु (Moiteners corpuscles) होते हैं। इसी प्रकार अधिचर्म में प्यालीनुमा देहाणु के समूह ‘मरकेल की तश्तरियाँ’ (Merkel’s dises) पाए जाते हैं। ये स्पर्श की संवेदनाओं को ग्रहण करते हैं। चर्म की गहराई में स्थित पैसिनाइ के देहाणु (Pacinian corpuscles) दबाव के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 10.
नाक से साँस लेना क्यों लाभदायक है? (2018)
उत्तर:
नाक द्वारा साँस लेने से अनेक लाभ हैं। यह हमारे मस्तिष्क के साथ-साथ फेफड़ों के लिए भी बहुत लाभकारी होती है। नाक से गहरी साँस लेना दिमागी ताकत को बढ़ाता है तथा इससे यादाशश्त भी मजबूत होती है। नाक से श्वास लेने पर दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, किन्तु मुंह से साँस लेने पर यह प्रक्रिया लागू नहीं होती। नाक के छिद्रों में रोएँ होते हैं। ये रोएँ सांस लेने की प्रक्रिया के दौरान नमी, धूल के कण, जीवाणु तथा गर्मी इत्यादि को छानकर फेफड़ों तक पहुँचाते हैं। इससे बाहरी गन्दगी फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाती।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
मस्तिष्क की रचना चित्र बनाकर समझाइए तथा इसके विभिन्न भागों के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2018, 07)
अथवा
मस्तिष्क की रचना एवं कार्य समझाइए। (2009)
उत्तर:
मस्तिष्क : संरचना तथा विभिन्न भागों के कार्य
मस्तिष्क पूरे शरीर तथा स्वयं तन्त्रिका तन्त्र का नियन्त्रण कक्ष है। यह तन्त्रिका ऊतकों का बना एक कोमल अंग है। इसका कुल औसतन भार 1300 ग्राम होता है। मस्तिष्क अस्थियों के खोल क्रेनियम में बन्द रहता है, जो इसे बाहरी आघातों से बचाता है। इसके चारों ओर तीन झिल्लियों का आवरण होता है, इसे मेनिनजेस कहते हैं। आवरण की सबसे चाहा झिल्ली को दृढ़तानिका (Duramater), मध्य परत को जालतानिका (Arachnoid) तथा सबसे भीतरी परत को मृदुतानिका (Pin tmater) कहते हैं। भीतरी झिल्ली में अनेक रुधिर केशिकाओं का जाल फैला रहता है। इन्हीं के माध्यम से मस्तिष्क को ऑक्सीजन एवं भोज्य पदार्थों की आपूर्ति होती हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 3
मस्तिष्क आवरण गुहा में एक पोषक द्रव्य भरा रहता है। सेरीम्रोस्पाइनल द्रव नामक यह तरल मस्तिष्क को नम बनाए रखता है।

मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग होते हैं– अग्न, मध्य एवं पश्च मस्तिष्क। इन भागों का विवरण निम्नलिखित है।
मस्तिष्क के तीन

  • अग्र मस्तिष्क
  • मध्य मस्तिष्क
  • पश्न मस्तिष्क

1. अग्र मस्तिष्क (Fore Brain)
यह मस्तिष्क का सबसे अगला भाग है। यह कुल मस्तिष्क का 2/3 भाग होता है, इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं।
(i) घ्राण पिण्ड (Olfactory lobes) मस्तिष्क में सबसे आगे धूसर द्रव्य (Gray matter) के बने दो पृथक् घ्राण पिण्ड होते हैं।
कार्य यह भाग गन्ध को पहचानने (Sense of   smell) का कार्य करता है।

(ii) प्रमस्तिष्क (Cerebrum) घ्राण पिण्डों के ठीक पीछे स्थित प्रमस्तिष्क, बाहर से धूसर पदार्थ (Gray matter) तथा अन्दर से श्वेत पदार्थ (White matter) द्वारा निर्मित होता है। यह दो गोलाद्ध का बना होता है, जिन्हें प्रमस्तिष्क अर्द्ध-गोलाई (Cerebral hemispheres) कहते हैं।प्रमस्तिष्क की बाहरी सतह पर अनेक टेढ़े मेढे उभार होते हैं, जिनके बीच-बीच में खाँचे होते हैं। इन उभारों के आधार पर सेरीब्रम् को चार भागों में बाँटा जा सकता है-फ्रण्टल पालि, पैराइटल पालि, टैम्पोरल पालि तथा ऑक्सीपीटल पालि।

  • फ्रण्टल पालि द्वारा ऐच्छिक पेशियों पर नियन्त्रण होता है।
  • पैराइटल पालि द्वारा हमारी त्वचा से प्राप्त संवेदन प्राप्त किए जाते हैं; जैसे-स्पर्श, दबाव आदि।
  • ऑक्सीपीटल पालि द्वारा दृश्य संवेदनाएँ ग्रहण की जाती हैं।
  • टेम्पोरल पालि श्रवण (सुनने) में सहायक है।

कार्य मस्तिष्क का यह भाग बुद्धिमता, चेतना शक्ति तथा स्मरण शक्ति का केन्द्र है। ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त संवेदनाओं का यहाँ विश्लेषण चे समन्वय करता है तथा ऐच्छिक पेशियों को समुचित प्रतिक्रिया हेतु सूचनाएं प्रसारित करता है।
Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 4

(iii) डाइएनसिफैलान (Diencephalon) इस भाग से पीनियल काय (Pineal body) तथा पिट्यूटरी ग्रन्थि (Pituitary gland) निकलती हैं। थैलेमस व हाइपोथैलेमस इसी के भाग हैं।

थैलेमस के कार्य यह अत्यधिक ताप, शीत या पीड़ा आदि के ज्ञान का केन्द्र होता है।
हाइपोथैलेमस के कार्य यह भूख, प्यास, निद्रा, थकान, आदि का अनुभव करता है, इसके अतिरिक्त यह प्यार, घृणा, क्रोध आदि मनोभावनाओं का केन्द्र होता है। यह उपापचय तथा जनन क्रिया आदि का नियमन भी करता है।

2. मध्य मस्तिष्क (Mid Brain) प्रमस्तिष्क के पीछे गोल उभारों के रूप में मध्य मस्तिष्क होता है। मध्य मस्तिष्क का तन्तुओं के बण्डल सदृश भाग अग्न मस्तिष्क को पश्च मस्तिष्क से जोड़ने का कार्य करता है।
कार्य
यह दृष्टि-ज्ञान तथा सुनने की संवेदनाओं के समन्वय को नियन्त्रित
करता है।.
3. पश्च मस्तिष्क (Hind Brain)
इसके अन्तर्गत अनुमस्तिष्क तथा मस्तिष्क पुच्छ आता है।
(i) अनुमस्तिष्क (Cerebellum) यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग में नीचे की
ओर स्थित होता है। यह पिचके गोले के समान संरचना है, जिसके तल पर धारियाँ होती हैं।

कार्य

  •   यह प्रमस्तिष्क द्वारा भेजी गई सूचनाओं के अनुसार ऐच्छिक पेशियों के संकुचन पर नियन्त्रण करता है
  • चलना, कूदना, दौड़ना आदि सभी गतियाँ इसी के नियन्त्रण द्वारा होती हैं।
  • शरीर का सन्तुलन भी इसी से बना रहता है।

(ii) मस्तिष्क पुच्छ (Medulla 0blongata) यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग हैं। यह अनुमस्तिष्क के सामने स्थित होता है, इसकी आकृति बेलनाकार होती हैं।
कार्य
यह भाग हृदय स्पन्दन, श्वास-दर, रक्त दाब, उपापचय, आहारनाल के क्रमांकुचन, ताप नियन्त्रण, ग्रन्थियों के स्राव आदि को नियन्त्रित करता हैं।

  • उल्टी, छींक, जुकाम, हिचकी आदि पर भी नियन्त्रण करता है।
  • यह मेरुरज्जु तथा शेष मस्तिष्क के बीच संवेदनाओं के संवहन मार्ग का कार्य भी करता है।

प्रश्न 2.
नेत्र का नामांकित चित्र बनाकर उसके कार्य लिखिए। (2018, 04)
अथवा
आँख के गोलक में कौन-कौन सी तीन परतें पाई जाती हैं? उनके नाम व कार्य लिखिए। (2013, 16)
उत्तर:
आँखें दृश्येन्द्रियाँ हैं, ये प्रकाश के लिए संवेदी होती हैं और वस्तुओं को देखने में सहायता करती हैं। चेहरे पर प्रत्येक आँख एक गोलक (Eyeball) के रूप में अस्थियों के बने एक साँचे (नेत्र कोटर) में स्थित होती हैं। ये नेत्र गोलक मांसपेशियों से जुड़े होते हैं, फलतः नेत्र कोटर के भीतर सभी दिशाओं में घुमाए जा सकते हैं। आँखों की सुरक्षा के लिए ऊपर-नीचे दो पलकें होती हैं। पलकों के किनारों पर बरौनियाँ (Eyelashes) तथा माइबोमियन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। इन ग्रन्थियों से तेल सदृश पदार्थ स्रावित होता है, जो पलकों के किनारों पर फैला रहता है। यह आँखों को धूल-मिट्टी के कणों से सुरक्षा प्रदान करता है। आँखों के कोनों में अश्रु या लैक्राइमल ग्रन्थियाँ होती हैं।

इनसे स्रावित जलीय तरल पलकों व आँखों को सदैव नम बनाए रखता है एवं इनकी सफाई करता है। शिशु जन्म के चार महीने बाद अश्रु ग्रन्थियां सक्रिय होती हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 5

नेत्र की आन्तरिक संरचना
प्रत्येक नेत्र गोलक की रचना तीन परतों से होती है। ये तीन परतें निम्नलिखित प्रकार हैं।
1. बाह्य पटल या दृव पटल (Sclerotic) नेत्र गोलक की सबसे बाहरी परत श्वेत तथा दृढ़ होती है, इसे दृढ़ पटल कहते हैं। इसका 4/5 अपारदर्शक भाग नेत्र कोटर में स्थित होता है, केवल 1/5 पारदर्शक भाग बाहर की ओर उभरा रहता है. इस उभरे भाग को कॉर्निया (Cornea) कहते हैं। कॉर्निया पर एक पतली झिल्ली फैली होती है, जिसे कंजक्टाइवा (Conjunctiva) कहते हैं। यह ऊपरी और निचली पलकों के मध्य की त्वचा होती हैं। दृढ़ पटल के पिछले भाग से दृष्टि तृन्त्रिका (0ptic nerve) निकलती है, जो मस्तिष्क से सम्बन्ध स्थापित करती है। दृढ़ पटल के द्वारा नेत्र के भीतरी भागों की सुरक्षा होती है। साथ ही यह नेत्रों को स्पष्ट आकृति प्रदान करता हैं।

2. मध्य पटल या रक्तकपटल (Choroid) यह नेत्रगोलक का कोमल, अपेक्षाकृत पतला तथा मध्य स्तर होता है। इसमें रक्त-नलिकाओं तथा अनेक रंगयुक्त कोशिकाओं का जाल फैला रहता है। इसी कारण यह परत काले रंग की दिखाई पड़ती है। काले रंग के कारण यह प्रकाश को अवशोषित करती है तथा नेत्र के भीतरी परावर्तन को रोकती हैं। इससे सुनिश्चित होता है कि केवल बाहर से आने वाली प्रकाश किरणे ही रेटिना पर पड़ती हैं। इस स्तर के प्रमुख भाग निम्नलिखित प्रकार हैं।

(i) उषतारा या आइरिस जितने वृत्ताकार भाग में कॉर्निया रहता है, वहां से यह मध्य परत दर पटल से पृथक् हो जाती है एवं भीतर की ओर एक रंगीन गोल पर्दा बनाती है, जिसे उपतारा या आइरिस कहते हैं।
(ii) नेत्र तारा या पुतली आइरिस के बीच में एक छिद्र होता है, जिसको नेत्र तारा या पतली कहते हैं। यह गोल एवं कालो दिखाई देती है। आइरिस की पेशियों आवश्यकतानुसार पुतली के व्यास को पटा-बढ़ा सकती हैं। इससे नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करना सम्भव होता है।
(iii) सिनियरी काय उपता के आधार पर मध्य पटन अत्यधिक पेशोयुक्त होकर एक मोटी धारी के रूप में भीतर की ओर उभरा रहता है, जिसे स्पिलियरी काय कहते हैं। यह अत्यधिक संकुचनशील संरचना है।

(iv) नेत्र लेन्स नेत्र गोलक में एक उभयोत्तल लेन्स (Biconvex lens) स्थित होता है। यह पारदर्शी, रंगहीन और लचीला होता है। लेन्स सिलियरी तन्तुओं द्वारा सिलियरी काय से जुड़ा होता है। सिलियरी तन्तुओं द्वारा लेन्स की फोकस दूरी को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। इस शक्ति को समंजन शक्ति (Accommodation power) कहते हैं।
(v) जल वेश्म तथा जेली वेश्म कॉर्निया एवं नेत्र-लेन्स के बीच के स्थान को जल वेश्म (Aqueous chamber) कहते हैं। इसमें जल के समान पारदर्शी द्रव भरा रहता है। इसी प्रकार लेन्स एवं अन्तः पटल के बीच के स्थान को जेली वेश्म (Vitreous chamber) कहते हैं। इसमें एक पारदर्शक जेली सदृश काचाभ द्रव भरा रहता है। ये द्रव, नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणों को अपवर्तित (तिरछा) करते हैं, जिससे अन्तः पटल पर प्रतिबिम्ब बनता हैं।

3. अन्तः पटल या दृष्टिपटले (Retina) यह सबसे अन्दर की तन्त्रिका संवेदी परत है। इसकी रचना काफी जटिल होती है, इसका निर्माण स्नायु कोशिकाओं से होता है। यह आँख की सबसे महत्त्वपूर्ण परत हैं, क्योंकि इसी पर वस्तु का प्रतिबिम्ब बनता है।

नेत्र गोलक के पिछले स्तर पर बाह्य पटल एवं मध्य पटल को भेदती हुई दृष्टि तन्त्रिका, दृष्टि पटल पर तन्त्रिका जाल के रूप में फैली रहती है, जिस स्थान पर यह प्रवेश करती है, वहाँ रेटिना की अनुपस्थिति के कारण कोई प्रतिबिम्ब नहीं बन सकता, इसलिए इसे अन्ध विन्द (Blind spot) कहते हैं। अन्ध बिन्दु के पास पीत बिन्दु (Yellow spot) होता है, जहाँ सबसे स्पष्ट चित्र बनता है।

नेत्र की कार्यविधि
जब हम किसी वस्तु को प्रकाश में देखते हैं, तो प्रकाश की किरणे वस्तु से टकराकर नेत्र की कॉर्निया पर पड़ती हैं। कॉर्निया तथा अलीय द्रव, प्रकाश किरणों को लगभग दो-तिहाई तिरछा कर देते हैं अर्थात् इनको अपवर्तित कर देते हैं। तत्पश्चात् ये किरणे पुतली में प्रवेश करती हैं। आइरिस, पुतली को छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा का नियन्त्रण करता है। तीव्र प्रकाश में पुतली सिकुड़ जाती है तथा कम प्रकाश नेत्र के अन्दर प्रवेश करता है। कम प्रकाश में पुतली फैल जाती हैं तथा अधिक प्रकाश नेत्र के भीतर प्रवेश करता है। तत्पश्चात् किरणे पुतली से होकर लेन्स पर पड़ती हैं।

लेन्स इनको पूर्ण अपवर्तित कर देता हैं और रेटिना पर वस्तु का वास्तविक एवं उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है। रेटिना की संवेदी कोशिकाएँ दृष्टि के उद्दीपनों को ग्रहण करती हैं। इन संवेदनाओं को दृष्टि तन्त्रिका मस्तिष्क में पहुँचाती हैं, जहाँ
प्रतिबिम्ब का विश्लेषण होता है और व्यक्ति को वस्तु की वास्तविक स्थिति का | ज्ञान हो जाता है।

प्रश्न 3.
दृष्टि के मुख्य दोष कौन-कौन से हैं? इनके प्रारम्भिक लक्षण एवं उपचार क्या हैं? समझाइए।  (2003, 09, 12)
अथवा
निकट दृष्टि दोष का संक्षिप्त विवरण दीजिए।  (2016)
उत्तर:
दृष्टि के मुख्य दोष/लक्षण एवं उपचार
दृष्टि के दोष, कारण, लक्षण एवं उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं।
1. निकट दृष्टि दोष (Short Sightedness or Myopia) इस दोष में नेत्र के गोलक के कुछ बड़े हो जाने या कॉर्निया अथवा लेन्स के अधिक उत्तल (Convex) हो जाने के कारण फोकस बिन्दु एवं रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाती है अर्थात् प्रतिविम्ब रेटिना के आगे बनता है। अतः इस दोष में पास की वस्तुएँ तो साफ दिखाई देती हैं, परन्तु दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई देती हैं।
कारण पौष्टिक भोजन का अभाव, गलत तरीके से बैठकर या लेटकर पढ़ना, बहुत कम या अधिक प्रकाश में पढ़ना, आँखों पर अधिक जोर देना आदि कारणों से यह दोष हो सकता है।
लक्षण दूर की वस्तुएँ अस्पष्ट दिखाई देना, आँखों के ऊपरी भागों तथा सिर में दर्द रहना, आँखों में पानी आना तथा टीवी देखने में परेशानी आदि।
उपचार अवतल लेन्स (Concave) वाले चश्मे का प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उपरोक्त कारणों का निदान आवश्यक है।

2. दूर दृष्टि दोष (Long Sightedness or Hypermetropia) इस दोष में नेत्र गोलक का व्यास छोटा होने अथवा लेन्स के चपटा होने से प्रकाश की किरणे अपवर्तन के बाद केन्द्रीभूत होने से पहले ही रेटिना पर पड़ती हैं। अतः प्रतिबिम्ब रेटिना के पीछे बनता है। फलतः पास की वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। दूरदर्शिता में दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई पड़ती है।
कारण पोषण के अभाव में इस दोष की उत्पत्ति होती है। इसके अतिरिक्त बढ़ती उम्र में शारीरिक क्षमता घटने के साथ इस दोष की सम्भावना बढ़ जाती है।
लक्षण वस्तु को अपने से दूर करके देखना, आँखों का अन्दर की ओर धंस जाना, बारीक काम करने में अत्यधिक परेशानी होना एवं सिर में दर्द रहना आदि इस दोष के लक्षण हैं।
उपचार इस दोष की स्थिति में उत्तल (Convex) लेन्स वाले चश्मे का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही, आहार में पोषक तत्वों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।

3. जरादूरदृष्टिता (Preubyopia) वृद्धावस्था में लेन्स अथवा सिलियरी पेशियों की लचक कम हो जाती हैं, जिसके कारण समीपवर्ती वस्तुओं का प्रतिबिम्ब अच्छी तरह फोकस नहीं हो पाता। इस प्रकार मूलत: समस्या सामंजस्य में होती हैं।
लक्षण इस दोष में व्यक्ति दूर की वस्तुएँ देखने में सक्षम होता है। अतः व्यक्ति पढ़ते समय पुस्तक को आँखों से बहुत दूर रखती हैं।
उपचार इस दोष में व्यक्ति को उत्तल लेन्स के चश्मे का प्रयोग करना चाहिए।

4. भैंगापन (Strabismus) यह दोष नेत्र गोलक को घुमाने वाली पेशियों में कमजोरी आ जाने के कारण या पेशियों के छोटे अथवा बड़े हो जाने के कारण होता है।
लक्षण इस दोष में व्यक्ति का नेत्र गोलक एक ओर को झुका सा दिखाई देता है।
उपचार ऑपरेशन द्वारा सम्बन्धित पेशी को ठीक किया जा सकता है।

5. मोतियाबिन्दै (Cataract) इस दोष में लेन्स आंशिक रूप से अथवा पूर्णत: अपारदर्शी हो जाता हैं। फलत: प्रकाश किरणें दृष्टिपटल तक नहीं पहुंच पाती।
लक्षण इस दोष में व्यक्ति को धीरे-धीरे दिखाई देना बन्द हो जाता है।
उपचार ऑपरेशन द्वारा अपारदर्शी लेन्स को निकालकर उसके स्थान पर कृत्रिम लेन्स प्रतिस्थापित कर दिया जाता हैं। इसके अतिरिक्त सीसीएम फेको विधि में मोतियाबिन्द (आच्छादित परत) को काटकर उसे बाहर खींच लिया जाता हैं। इस ऑपरेशन में अल्ट्रासाउण्ड तरंगों का प्रयोग किया जाता है।

6. रतौंधी (Night Blindness) यह रोग भोजन में विटामिन ‘A’ की कमी के कारण होता है। इसमें रेडॉप्सिन नामक दृष्टि वर्णक का संश्लेषण कम होता है।
लक्षण इसमें व्यक्ति को कम या धुंधले प्रकाश में कम दिखाई देता है।
उपचार आहार में विटामिन ‘A’ युक्त भोज्य पदार्थों; जैसे-पपीता, गाजर,
मछली का तेल आदि को शामिल करके इस रोग का उपचार सम्भव है।

7. वर्णान्यता (Colour Blindness) यह एक वंशानुगत रोग है। इस रोग से ग्रसित व्यक्तियों में विभिन्न रंगों (विशेषतः लाल एवं हरा रंग) को पहचानने की क्षमता नहीं होती है। इससे मुख्यतः पुरुष प्रभावित होता है। सामान्य रूप से इस दोष का निवारण नहीं हो पाता है।

8. नेत्रों के कुछ अन्य सामान्य रोग निम्नलिखित हैं
(i) कंजक्टाइवा शोथ (Conjunctivitis) यह विभिन्न सूक्ष्मजीवों के संक्रमण से होता है। इससे प्रभावित नेत्र में जलन तथा किरकिरापन – अनुभव होता है, पलके सूज जाती हैं तथा कंजक्टाइवा (नेत्र श्लेष्म) लाल हो जाता है। रोगी प्रकाश सहन नहीं कर पाता है। इसके उपचार हेतु चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए एवं संक्रमण से बचाव के उपाय करने चाहिए।
(ii) आँखों का तिरछा होना (Squint) इसमें बच्चों की दोनों आँखों की दृष्टि में अन्तर होता है, जिसके कारण प्रत्येक वस्तु को देखने के लिए आँखों को परिश्रमपूर्वक इधर-उधर घुमाना पड़ता है। इससे पेशियों की कार्यक्षमता क्षीण होती जाती है। यह रोग ऑपरेशन द्वारा ठीक किया जा सकता है।
(iii) गुहेरी (Sty) पलकों की वसा ग्रन्थियों में सूजन आने से आँख में एक छोटी फुन्सी हो जाती है। आँखों में गन्दे हाथ लगाने या पेट की खराबी से भी यह रोग उत्पन्न हो जाता है। इसके उपचार हेतु आँखों को साफ रखना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
कान का नामांकित चित्र बनाकर उसके कार्यों को समझाइए।  (2004, 06)
उत्तर:
मानव खोपड़ी में, नेत्रों के पीछे की ओर दोनों ओर एक-एक कान स्थित होते हैं। कान दो प्रमुख कार्य करते हैं-एक सुनने (Hearing) का तथा दूसरा शरीर का सन्तुलन बनाए रखने का, इसी कारण इन्हें श्रवणोसन्तुलन ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं।
कान की संरचना
कान को तीन प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है-बाह्य कर्ण, मध्य कर्ण तथा अन्तः कर्ण।.

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 6

1. बाह्य कर्ण (External ear) यह कान का सबसे बाहरी भाग है, इसके दो भाग होते हैं।

(i) कर्णपल्लव अथवा पिन्ना (Pinna) यह उपास्थि से बना कीपनुमा बाहर से दिखाई देने वाला भाग है। यह खोपड़ी की हड्डियों से जुड़ा
रहता है। यह ध्वनि तरंगों को एकत्र करने में सहायक है।

(ii) कर्ण नली (Auditory Canal) कर्णपल्लव अन्दर की ओर एक पतली नली से जुड़ा रहता है, इसे कर्ण नली कहते हैं। नली का कुछ भाग अस्थि एवं कुछ भाग उपास्थि का बना होता है। नली की भीतरी सतह पर छोटे-छोटे रोम पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त सतह से सीबम नामक मोम जैसा पदार्थ स्रावित होता है। इन्हीं कारणों से धूल आदि के कण अन्दर प्रवेश नहीं कर पाते एवं मैल के रूप में कर्ण नली से चिपक जाते हैं।कर्ण नली के अन्तिम सिरे पर, झिल्ली के समान कान का पर्दा होता है, जहाँ ध्वनि तरंगें टकराती हैं।

2. मध्य कर्ण (Middle ear) यह कान के पर्दे के भीतर की ओर एक गुहा के रूप में होता है, इसे कर्ण-गुहा (Tyrmpanic cavity) कहते हैं। इसमें हवा भरी रहती है।
यह गुहा एक चौड़ी नलिका द्वारा कण्ठ से मिलती है। इस नलिका को कण्ठ-कर्ण नली (Eustachian tube) कहते हैं। यह नली, कान के पर्दे के दोनों ओर वायुदाब समान रखती हैं, जिससे पर्दा सुरक्षित रहता है। कर्ण गुहा में तीन क्रमानुसार (बाहर से भीतर की ओर) छोटी-छोटी हड्डियाँ होती हैं, जिनका नाम उनकी आकृति के अनुसार होता है। पहली हथौड़े के आकार की मेलियस, दूसरी नेहाई के आकार की इन्कस तथा तीसरी रकाब के आकार की स्टेपीज कहलाती है। जब ध्वनि तरंगे कान के पर्दे से टकराती हैं, तो कम्पन उत्पन्न होता है। उपरोक्त तीन अस्थियों की श्रृंखला इस कम्पन्न को अन्त:कर्ण तक पहुँचाती हैं।

3. अन्त:कर्ण (Internal ear) अन्त:कर्ण एक अर्द्धपारदर्शक झिल्ली से बनी जटिल रचना होती है, जिसे कलागन (Membranous labyrinth) कहते हैं। कलागहन, खोपड़ी की टैम्पोरल अस्थि के खोल (कोष) में रहता है, इस खोल को अस्थीय लेबिरिन्थ (Bony labyrinth) कहते हैं। अस्थीय लेबिरिन्थ में परिलसीका (Perilymph) भरा रहता है, जिसमें कलागहन तैरता रहता है। कलागहन के भीतर अन्तः लसीका (Endolymph) भरा रहता है। कलागहन के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं।

  • अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ कलागहन से तीन अर्द्धवृत्ताकार नलिकाएँ निकलती हैं, जो घूमकर वापस इसी में खुल जाती हैं। ये नलिकाएँ जहाँ खुलती हैं, वह भाग कुछ फूला हुआ होता है। इस फूले भाग को ऐपुला (Ampulla) कहते हैं। इस भाग में संवेदी अंग उपस्थित होते हैं, जो शारीरिक सन्तुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं।
  •  वैस्टीब्यूल यह भाग अन्त:कर्ण के मध्य में स्थित होता है, इसमें एक बड़ा अण्डाकार छिद्र होता है, जो एक झिल्ली से ढका रहता है। यह भाग अन्त:कर्ण के प्रथम भाग को अन्तिम भाग से जोड़ता है।
  • कॉक्लियर नलिका (Cochlear tube) यह एक कुण्डलित नलिका है, जो घोंघे के कवच के समान स्वयं पर मुड़ी होती है। काँक्लियर नलिका की गुहा में संवेदी संरचना कॉरटाई के अंग (Organ of corti) पाए जाते हैं। ये अंग ध्वनि के उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं। ये सुनने की क्रिया के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

कानों की क्रियाविधि
1. सुनने की क्रिया (Process of Hearing) कर्णपल्लव ध्वनि तरंगों को एकत्र करने में सहायक होते हैं। ध्वनि तरंगें, कर्णपल्लव से टकराकर कर्ण नली में आगे की ओर बढ़ती हैं तथा कान के पर्दे से टकराकर इसमें कम्पन उत्पन्न करती हैं। मध्य कर्ण में उपस्थित कर्ण अस्थियाँ इन कम्पनों की तीव्रता को लगभग 10 गुना बढ़ाकर अन्त:कर्ण तक पहुँचाती हैं। इसके फलस्वरूप सर्वप्रथम अन्त:कर्ण के परिलसीका तथा इसके बाद कलागहन के भीतर स्थित अन्तः लसीका में कम्पन होने लगता है। कम्पनों के कारण कॉरट के अंग में संवेदनाएँ उत्पन्न होती हैं, जो श्रवण तन्त्रिकाओं द्वारा ग्रहण करके मस्तिष्क में भेज दी जाती हैं। मस्तिष्क में इन कम्पनों का विश्लेषण होता है और अन्ततः सुनने की क्रिया सम्पन्न होती हैं।

2. सन्तुलन क्रिया (Control on Body Balance) शरीर का सन्तुलन बनाए रखने में ऐम्पुला की विशेष भूमिका होती है। शरीर की गति एवं गमन के अनुसार कलागहन के भीतर स्थित अन्त: लसीका में भी गति होती है। अन्तः । लसीका के हिलने-डुलने से ऐम्पुला की संवेदी कोशिकाएँ उत्तेजित हो जाती हैं। यही उत्तेजना अर्थात् संवेदनाएँ तन्त्रिकाओं के माध्यम से सेरीबेलम (अनुमस्तिष्क) में पहुँचती हैं। मस्तिष्क का यह भाग सम्बन्धित पेशियों को सूचना भेजकर शरीर के सन्तुलन को बनाए रखता है।
उल्लेखनीय है कि शरीर की स्थिर अवस्था में होने के बाद भी सिर की स्थिति में परिवर्तन से ऐम्पुला की संवेदी कोशिकाएँ उत्तेजित हो जाती हैं तथा ये संवेदनाएँ मस्तिष्क में पहुँचती हैं। इसी कारण लिफ्ट में चढ़ते-उतरते समय अथवा रेल या गाड़ियों के धक्कों आदि से हमें मितली या उल्टी का आभास होने लगता है। सिर को झुका लेने से यह संवेदना कम हो जाती है।

प्रश्न 5.
त्वचा की रचना तथा कार्यों का चित्र सहित वर्णन कीजिए।  (2018)
उत्तर:
त्वचा या त्वक् (Skin) शरीर का बाह्य आवरण होती है, जिसे आह्यत्वचा (एपिडर्मिस) भी कहते हैं। यह वेष्टन प्रणाली का सबसे बड़ा अंग हैं, जो उपकला ऊतकों की कई परतों द्वारा निर्मित होती है और अन्तर्निहित मांसपेशियों, अस्थियों, अस्थिबध (लिगामेण्ट) और अन्य आन्तरिक अंगों की रक्षा करती है। त्वचा सीधे वातावरण के सम्पर्क में आती है, इसलिए यह रोगजनकों के विरुद्ध शरीर की सुरक्षा में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अन्य कायों में; जैसे-तापवरोधन (इन्सुलेशन), तापमान विनियमन, संवेदना, विटामिन डी का संश्लेषण और विटामिन बी फोलेट का संरक्षण करती हैं। क्षतिग्रस्त त्वचा निशान ऊतक बना कर ठीक होने की कोशिश करती हैं। यह अक्सर रंगहीन और वर्णनहीन होती हैं।

त्वचा की बनावट त्वचा शरीर की खाल को कहते हैं। इसे चर्म तथा त्वचा आदि नामों के अतिरिक्त अग्रेजी में स्किन के नाम से भी जाना जाता है। चर्म समस्त शरीर की रक्षा के लिए कई परतों वाला एक स्तर है। इससे स्पर्श ज्ञान भी होता है। हथेली और तलुओं को छोड़कर लगभग सभी स्थानों पर इसके ऊपर न्यूनाधिक बाल लगे रहते हैं। त्वचा के दो भाग होते हैं —

1. उपचर्म (बाहर की त्वचा) इसे अंग्रेजी में एपिडर्मिस कहा जाता है। यह भीतरी चर्म के ऊपर आवरण के रूप में चढ़ी रहती हैं। यह कठोर और नुकीले ऊतकों (Tishu) से बनी है और शरीर के रात-दिन काम करने से घिसती और पुनः बनती रहती है। यह साँप की केंचुली के समान होती है, जिसकी मोटाई भिन्न भिन्न स्थानों पर अलग-अलग होती है। हथेली और पैर के तलवों पर इसकी मोटाई 1.25 मिमी तक होती है। पीठ पर इसकी मोटाई मिमी होती है दूसरे स्थानों पर इसकी मोटाई 0.12 मिमी होती हैं। बाहरी चर्म के पित्त में रक्त वाहिनियों (Blood vessels) नहीं होती हैं, बाह्य त्वचा (उपचर्म) के नीचे मनुष्य का रंग बनाने वाली त्वचा रहती हैं। यह जिस रंग की होती है, मनुष्य उसी रंग का गोरा, काला अथवा गेहूआ दिखाई पड़ता है। वर्ण सूचक रंजित त्वचा की सेले सूरज की सख्त गर्मी और सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं।

2. चर्म या अन्तस्तवक चर्म (भीतर की त्वचा) यह बाहरी चर्म के नीचे की त्वचा है, जो संयोजन एवं स्थितिस्थापक ऊतकों (Connective and Elastic tissues ) से बनी होती है। यह मांसपेशीय ऊतको (Muscular tissues) और चर्बी के ऊपर होती है। भीतर चर्म में अनेकों रक्त कोशिकाओं, सूक्ष्म रक्त वाहिनियों एवं स्नायु के सिरों के जाल फैले हुए रहते हैं। इसके ऊपरी भाग में रक्त कोशिकाओं (Blood capilaries) के गुच्छे होते हैं। नीचे का भाग लचीला होता है, जिसके अधोभाग में क्रमशः चर्बी वाले ऊतक (Fatty tissues), कोशीय ऊतक (Cellular tissue8) होते हैं। ये परते प्रायः चिकनी होती हैं। चूंकि चब बाहरी ताप का ग्राहक है, इसलिए चर्म को यह चिकनाई या वसा (Fat) शरीर को बाहरी सर्दी के प्रभाव से बचाती है और शरीर के ताप को नियन्त्रित रखती हैं।

त्वचा के कार्य
त्वचा के कार्य निम्नलिखित हैं
1. शरीर की सुरक्षा (Protection of Body) त्वचा शरीर के भीतर स्थित सभी ऊतकों, अंगों, आदि को पूर्णतया ढककर उनकी सुरक्षा करती है। यह रोगाणुओं तथा रसायनों को शरीर के अन्दर प्रवेश करने से रोकती है। साथ ही शरीर के कोमल आन्तरिक अंगों को रगड़ व चोट से बचाती है। त्वचा में उपस्थित मिलेनिन नामक वर्णक सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से शरीर की रक्षा करती है।

2. ताप नियन्त्रण एवं उत्सर्जन (Temperature Control and Excretion) मानव समतापी प्राणी (Homeothermous) है। शरीर के ताप नियमन में त्वचा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। मानव त्वचा मौसम अनुसार ताप नियमन में सहायक होती है। ग्रीष्म ऋतु में त्वचा में उपस्थित स्वेद ग्रन्थियों के कारण हमारे शरीर से पसीना ज्यादा निकलता है, जिसके वाष्पीकरण से शरीर का तापमान नियन्त्रित रहता है। पसीने में यूरिया, यूरिक अम्ल, अमोनिया, फॉस्फेट्स तथा क्लोराइड्स, आदि उत्सर्जी पदार्थों के रूप में होते हैं।
शीत प्रातु में त्वचा की अधिकतर रुधिर केशिकाएँ सिकुड़कर बन्द हो जाती हैं। ताकि त्वचा द्वारा ऊष्मा की हानि को कम किया जा सके।

3. त्वक् संवेदांग (Cutaneous Sense Receptors) त्वचा के चर्म स्तर में | पाई जाने वाली संवेदी कोशिकाएँ हमें स्पर्श, दाब, पीड़ा, ताप, आदि उद्दीपनों का अनुभव कराती है।
4. अवशोषण (Absorption) त्वचा जल एवं हानिकारक पदार्थों को शरीर के अन्दर नहीं जाने देती है, परन्तु कुछ उपयोगी पदार्थों जैसे दवाइयों का अवशोषण भी करती है।

5. तेल ग्रन्थियाँ (Sebaceous Glands) त्वचा में उपस्थित तेल ग्रन्थियों त्वचा को चिकना एवं जलरोधी बनाने हेतु तेलीय द्रव्य का लावण करती है।.
6. स्तन ग्रन्थियाँ (Mammary Glands) मादाओं को स्तन प्रन्थियाँ शिशु जन्म के बाद दुग्ध स्रावण करती हैं, जो नवजात का मुख्य पोषण होता हैं।
7. बाल या रोम (Hair) त्वचा पर उपस्थित बाल शरीर पर तापरोधी के समान कार्य करते हैं। साथ ही पलकों तथा बरोनियों के रूप में ये नेत्र की सुरक्षा करते हैं। ठण्ड लगने या उत्तेजना के कारण ये खड़े हो जाते हैं तथा शरीर की रक्षा करते हैं। साथ ही इनकी पेशियों के संकुचन से उत्पन्न ऊर्जा मानव शरीर को तत्काल ऊष्मा देती है, इसीलिए ठण्ड लगने पर कपकपी आती हैं।

8. विटामिन -D का संश्लेषण (Synthesis of Vitamin-D) सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करके त्वचा में विटामिन-D का संश्लेषण होता रहता है। यह विटामिन हमारी अस्थियों से सम्बन्धित मुख्य विटामिन हैं।
9. समस्थापन (HormeOstasia) त्वचा ताप नियमन, जल नियमन, आदि द्वारा शरीर के अन्त:वातावरण को सन्तुलित रखती है।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 4 7

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान are part of UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान
Number of Questions 41
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान

नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार परीक्षा में रेखांकित शब्दों में लगी विभक्ति अथवा दिये गये शब्दों में प्रयुक्त विभक्ति से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके लिए 2 अंक निर्धारित हैं। ये प्रश्न बहुविकल्पीय भी हो सकते हैं। विभक्ति का निर्देश करते समय छात्र से उससे सम्बन्धित सूत्र का उल्लेख करने की अपेक्षा भी की जाती है।

(1) सूत्र-अभितः परितः समया निकषा हा प्रतियोगेऽपि।
अभितः (चारों ओर या सभी ओर), परितः (सभी ओर), समया (समीप), निकषा (समीप), हा (शोक के लिए प्रयुक्त शब्द), प्रति (ओर, तरफ) शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-1

(2) सूत्र-येनाङ्गविकारः
जिस,अंग में विकार होने से शरीर विकृत दिखाई दे, उस विकारयुक्त अंग में तृतीया विभक्ति होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-2

(3) सूत्र-सहयुक्तेऽप्रधाने
साथ अर्थ वाले सह, साकम्, सार्धम्, समम् शब्दों के योग में अप्रधान (जिसके साथ जाने वाला जाये) में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
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(4) सूत्र-साधकतमं करणम्
जिसकी सहायता से कार्य पूर्ण होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण प्रकृत्या साधु। प्रकृति से साधु।

(5) सूत्र-नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट् योगाच्च
नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (आहुति), स्वधा (बलि), अलम् (समर्थ, पर्याप्त), वषट् (आहुति)-इन शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
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(6) सूत्र-ध्रुवमपायेऽपादानम्
स्वयं से अलग करने वाले अर्थात् ध्रुव (मूल) में पंचमी विभक्ति होती है; जैसे-वृक्ष से पत्ते गिरते हैं। इस वाक्य में पत्तों को स्वयं से अलग करने वाला वृक्ष है; अतः वृक्ष में पंचमी विभक्ति होगी।
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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-6

(7) सूत्र-आख्यातोपयोगे
नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करने में जिससे विद्या ग्रहण की ‘ती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
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(8) सूत्र-भीत्रार्थानां भयहेतुः
‘भय’ तथा ‘रक्षा’ अर्थ वाली धातुओं के योग में जिससे डरा जाता है या रक्षा की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
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(9) सूत्र-षष्ठी शेषे
छह कारकों के अतिरिक्त सम्बन्ध अर्थ शेष बचता है। सम्बन्ध अर्थ में षष्ठी विभक्ति होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-9

(10) सूत्र-यतश्च निर्धारणम्
जहाँ बहुतों में से किसी एक को छाँटा जाये, वहाँ जिसमें से छाँटा जाये, उसमें षष्ठी अथवा सप्तमी विभक्ति, होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-10

विशेष—संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान से सम्बन्धित प्रश्नों के चार सम्भावित प्रारूप हो सकते हैं। विभिन्न परीक्षा प्रश्न-पत्रों में इन चारों प्रारूपों के पूछे गये प्रश्न दिये जा रहे हैं

प्रश्न (क)
निम्नलिखित शब्दों के शुद्ध विभक्ति रूप की पहचान कीजिए
या
दिये गये विकल्पों में जो सही विकल्प है, उसे बताइए

प्रश्न 1.
‘राजन्’ शब्द को चतुर्थी विभक्ति एक वचन का रूप होता है—
(क) राजानम्
(ख) राजभिः
(ग) राज्ञे
(घ) राज्ञः
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 2.
‘सरित्’ शब्द का पंचमी विभक्ति द्विवचन का रूप होता है—
(क) सरिते
(ख) सरित्सु
(ग) सरिभ्याम्
(घ) सरिति
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 3.
‘आत्मन्’ शब्द का तृतीयो एकवचन का रूप होता है—
(क) आत्मनि
(ख) आत्मने
(ग) आत्मना
(घ) आत्मनः
उत्तर:
(क)

प्रश्न 4.
‘इदम्’ शब्द का षष्ठी विभक्ति बहुवचन का रूप होता है—
(क) अस्मिन्
(ख) एषाम्
(ग) अस्मै
(घ) अस्य
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 5.
‘सर्व’ शब्द ( पुं० ) द्वितीया विभक्ति, बहुवचन का रूप होता है—
(क) सर्वेभ्यः
(ख) सर्वस्य
(ग) सर्वान्
(घ) सर्वम्
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 6.
‘जगत्’ का पंचमी एकवचन में होता है—
(क) जगती
(ख) जम्बोः
(ग) जगति
(घ) जगत:
उत्तर:
(घ)

प्रश्न 7.
‘नदी’ का सप्तमी बहुवचन में रूप होना है—
(क) नदीभ्यः
(ख) नद्यो:
(ग) नदीषु
(घ) नद्या:
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 8.
‘सरित्’ का तृतीया विभक्ति एकवचन में रूप होता है—
(क) सरितेन
(ख) सरितौ
(ग) सरितो:
(घ) सरिता
उत्तर:
(घ)

प्रश्न 9.
‘जगत्’ का सप्तमी बहुवचन में रूप होता है—
(क) जगति
(ख) जगेत्सु
(ग) जगताम्
(घ) जगद्भिः
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 10.
‘पितृ’ का षष्ठी एकवचन में रूप होता है—
(क) पितुः
(ख) पित्रे
(ग) पितरः
(घ) पित्रोः
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 11.
‘सर्वे’ (पुं०) तृतीया बहुवचन का रूप है—
(क) सर्वो
(ख) सर्वयोः
(ग) सर्वैः
(घ) सर्वस्य
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 12.
‘आत्मन्’ का चतुर्थी, एकवचन का रूप होता है—
(क) आत्मनः
(ख) आत्मना
(ग) आत्मने
(घ)
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 13.
पुत्र’ शब्द का तृतीया एकवचन में रूप होता है—
(क) पुत्रेषु
(ख) पुत्रान्
(ग) पुत्रेण
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 14.
‘राजन्’ शब्द का षष्ठी एकवचन में रूप होता है—
(क) राज्ञाम्
(ख) राज्ञः
(ग) राज्ञां
(घ) राज्ञोः
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 15.
‘राजन्’ शब्द का तृतीया बहुवचन में रूप होता है—
(क) राज्ञः
(ख) राजभिः
(ग) राजान्ः
(घ) राजभ्यः
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 16.
जगत्’ शब्द का सप्तमी द्विवचन में रूप होता है—
(क) जगते
(ख) जगन्ति
(ग) जगतो:
(घ) जगति
उत्तर:
(ग)

प्रश्न (ख).
निम्नलिखित शब्दों की विभक्ति और वचन के सही विकल्प को चुनकर लिखिए—

प्रश्न 1.
रामाय—
(क) चतुर्थी एकवचन
(ख) सप्तमी एकवचन
(ग) तृतीया द्विवचन
(घ) द्वितीया एकवचन
उत्तर:
(क)

प्रश्न 2.
हस्तेन—
(क) प्रथमा बहुवचन
(ख) पञ्चमी एकवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) चतुर्थी द्विवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 3.
रामानाम्—
(क) चतुर्थी एकवचन
(ख) षष्ठी एकवचन
(ग) षष्ठी बहुवचन
(घ) द्वितीया बहुवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 4.
शिश्वोः—
(क) तृतीया द्विवचन
(ख) द्वितीया द्विवचन
(ग) द्वितीया बहुवचन
(घ) सप्तमी द्विवचन
उत्तर:
(घ)

प्रश्न 5.
नदीषु—
(क) सप्तमी बहुवचन
(ख) चतुर्थी बहुवचन
(ग) पञ्चमी एकवचन
(घ) सप्तमी एकवचन
उत्तर:
(क)

प्रश्न 6.
आत्मने—
(क) द्वितीया बहुवचन
(ख) चतुर्थी एकवचन
(ग) षष्ठी द्विवचन
(घ) सप्तमी द्विवचने
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 7.
नामसु—
(क) तृतीया एकवचन
(ख) द्वितीया बहुवचन
(ग) पञ्चमी द्विवचन
(घ) सप्तमी बहुवचन
उत्तर:
(घ)

प्रश्न 8.
भानून्—
(क) षष्ठी बहुवचन
(ख) सप्तमी एकवचन
(ग) द्वितीया बहुवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 9.
राज्ञि—
(क) तृतीया बहुवचन
(ख) सप्तमी एकवचन
(ग) षष्ठी द्विवचन
(घ) पञ्चमी एकवचन
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 10.
जगता—
(क) द्वितीया बहुवचन
(ख) चतुर्थी द्विवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) षष्ठी एकवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 11.
आत्मनि—
(क) सप्तमी एकवचन
(ख) षष्ठी द्विवचन
(ग) पञ्चमी बहुवचन
(घ) प्रथमा द्विवचन
उत्तर:
(क)

प्रश्न 12.
आत्मनाम्—
(क) द्वितीया एकवचन
(ख) चतुर्थी द्विवचन।
(ग) षष्ठी बहुवचन
(घ) सप्तमी एकवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 13.
नामभिः—
(क) प्रथमा बेहुवचन
(ख) तृतीया बहुवचन
(ग) चतुर्थी बहुवचन
(घ) सप्तमी बहुवचन
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 14.
रामात्—
(क) द्वितीया एकवचन
(ख) पञ्चमी एकवचन
(ग) तृतीया द्विवचन
(घ) सप्तमी एकवचन
उत्तर:
(क)

प्रश्न 15.
सरिते—
(क) चतुर्थी एकवचन
(ख) तृतीया द्विवचन
(ग) प्रथम बहुवचन
(घ) षष्ठी बहुवचन
उत्तर:
(क)

प्रश्न 16.
मतीनाम्—
(क) सप्तमी बहुवचन
(ख) चतुर्थी द्विवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) षष्ठी बहुवचन
उत्तर:
(घ)

प्रश्न 17.
नयः—
(क) प्रथमा बहुवचन
(ख) षष्ठी एकवचन
(ग) तृतीया एकवचन
(घ) द्वितीया बहुवचन
उत्तर:
(क)

प्रश्न 18.
वानराः—
(क) तृतीया एकवचन
(ख) सप्तमी द्विवचन
(ग) प्रथमा बहुवचन
(घ) द्वितीया एकवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 19.
हरिभिः—
(क) तृतीया एकवचन
(ख) द्वितीया द्विवचन
(ग) तृतीया बहुवचन
(घ) प्रथमा द्विवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 20.
जगत्सु—
(क) पंचमी एकवचन
(ख) षष्ठी एकवचन
(ग) द्वितीया बहुवचन
(घ) सप्तमी, बहुवचन
उत्तर:
(घ)

प्रश्न 21.
आत्मानम्—
(क) षष्ठी बहुवचन
(ख) द्वितीया एकवचने,
(ग) सप्तमी द्विवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन
उत्तर:
(ख)

प्रश्न 22.
राज्ञाम्—
(क) पञ्चमी द्विवचन
(ख) द्वितीया एकवचन
(ग) षष्ठी बहुवचन
(घ) चतुर्थी एकवचन
उत्तर:
(ग)

प्रश्न 23.
रमायाम्—
(क) पंचमी बहुवचन
(ख) चतुर्थी एकवचन
(ग) षष्ठी द्विवचन
(घ) सप्तमी एकवचन
उत्तर:
(घ)

प्रश्न (ग)
इन संस्कृत शब्दों में से काले अक्षरों में छपे शब्दों में विभक्ति को पहचान कर लिखिए—
(1) राज्ञः पुत्रः
(2) पुत्रेण सह।
(3) वृक्षात् पतति।
(4) पादेन खञ्जः।
(5) छात्रेभ्यः स्वस्ति।
(6) ग्रामं निकषा।
उत्तर:
(1) षष्ठीएकवचन,
(2) तृतीया एकवचन,
(3) पञ्चमी एकवचन,
(4) षष्ठी/सप्तमी द्विवचन,.
(5) चतुर्थी बहुवचन,
(6) द्वितीया एकवचन।

प्रश्न (घ)
निम्नांकित शब्दों में प्रयुक्त विभक्ति और वचन का उल्लेख कीजिए—
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-13
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-14
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-11
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-12
ध्यातव्य—यद्यपि पाठ्यक्रम में शब्द-रूप निर्धारित नहीं हैं, फिर भी विद्यार्थियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विभक्तियों से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कुछ शब्दों के रूप दिये जा रहे हैं—

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-15
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-16
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-17
UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-18
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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi संस्कृत शब्दों में विभक्ति की पहचान img-20
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UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper कृषि विज्ञान

UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper are part of UP Board Class 7 Model Papers. Here we have given UP Board Class 7 Agricultural Science  Model Paper.

Board UP Board
Class Class 7
Subject Agricultural Science
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper कृषि विज्ञान

सत्र-परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय – कृषि विज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकृति में जल किन-किन रूपों में पाया जाता है?
उत्तर:
प्रकृति में जल ठोस (बर्फ), द्रव (पानी) तथा गैस (पाप) के रूप में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
उर्वरकों के लगातार अधिक प्रयोग से मृदा ………. हो जाती है। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
उर्वरकों के लगातार अधिक प्रयोग से मृदा खराब हो जाती है।

प्रश्न 3.
पहाड़ों पर किस प्रकार की खेती होती है?
उत्तर:
पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेती होती है।

प्रश्न 4.
ढालू खेतों में फसलों का उत्पादन कम क्यों होता है?
उत्तर:
ढालू खेतों में भू-क्षरण अधिक होने से उनकी उपजाऊ क्षमता घटती रहती है।

प्रश्न 5.
मृदा संरक्षण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
मृदा संरक्षण का अर्थ-मृदा को क्षरण से बचाना है।

प्रश्न 6.
खेत व नालों से बहते पानी को रोकने के हेतु क्या करते हैं?
उत्तर:
खेतों व नालों में बहते हुए पानी को रोकने के लिए रोक बाँध’ (चेक डैम) बनाना पड़ता है, जिससे भू-क्षरण पर रोक लगती है।

प्रश्न 7.
मृदा अपरदन किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूमि के कणों का अपने मूल स्थान से हटने एवं दूसरे स्थान पर एकत्र होने की क्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं।

प्रश्न 8.
खेत को समतल एवं मेंड़बंदी करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर:
खेतों को समतल करके उसके चारों ओर मेड़बंदी करने से खेत का पानी बाहर नहीं जाता है जिससे भू-क्षरण नहीं होता है।

प्रश्न 9.
पौधे ran”को आसानी से ग्रहण करते हैं। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
पौधे केशिको जल को आसानी से ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 10.
मृदा कणों के वितरण या सजावट को क्या कहते हैं?
उत्तर:
मृदा विन्यास या मृदा संरचना।

प्रश्न 11.
हमारे देश की वार्षिक वर्षा का कितना भाग पानी बहकर नदी-नालों में चला जाता है?
उत्तर:
एक तिहाई भाग।

प्रश्न 12.
किस मृदा में रंध्रावकाश अधिक होता है?
उत्तर:
मोटे कण वाली मृदा में।

प्रश्न 13.
जल विज्ञान में किसका अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
न जल चक्र का।

प्रश्न 14.
मृदा में जल संरक्षित क्यों किया जाता है?
उत्तर:
फसलों की अच्छी पैदावार के लिए।

प्रश्न 15.
सैंडड्यून क्या है?
उत्तर:
रेतीली भूमि में तेज हवा के कारण बने बड़े-बड़े बालू के टीलों को सैंडड्यून कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16.
गहरी जुताई क्यों की जाती है? यदि गहरी जुताई न की जाए तो क्या नुकसान होगा?
उत्तर:
भूमि की 40 सेमी या इससे अधिक गहराई तक की जुताई को गहरी जुताई कहते हैं। इसका उद्देश्य नमी को सुरक्षित रखना एवं भूमि की निचली सतह से कमजोर परत तोड़ना होता है। गहरी जुताई न करने से भूमि में नमी सुरक्षित रखना संभव नहीं हो पाएगा।

प्रश्न 17.
मृदा संरक्षण के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मृदा की सुरक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। इसके लिए हमें उचित मृदा संरक्षण विधियाँ अपनाना आवश्यक है। यदि भूमि पर घास वनस्पतियाँ नहीं हैं, तो भू-क्षरण अधिक होता है। जिससे नदी, नालों में मिट्टी जमा होने से उनकी जल धारण क्षमता घटती हैं और बाढ़ का कारण बनती है।

प्रश्न 18.
मृदा विन्यास किस-किस चीजों से प्रभावित होता है?
उत्तर:
भूपरिष्करण (जुताई, गुड़ाई, निराई आदि) से, कार्बनिक खाद (चूना, जिप्सम आदि) से, फसल चक्र द्वारा, मिट्टी की दशा एवं किस्म से, उर्वरकों के प्रयोग तथा जल निकास से आदि।

प्रश्न 19.
रंध्रावकाश पौधों के लिए किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर.
निम्न कारणों से रंध्रावकाश पौधों के लिए महत्त्वपूर्ण है

  1. रंध्रावकाश पौधों को समुचित जल, वायु एवं पोषक तत्व उपलब्ध कराने में सहायता करता है।
  2. मृदा के लाभदायक जीवों की वृद्धि में सहायक होता है।
  3. पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक घुलनशील तत्वों की वृद्धि में सहायता करता है।
  4. जड़ों के समुचित विकास में सहयोग करता है।

प्रश्न 20.
जल ही जीवन है कैसे? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हमें अपने जीवन के सभी कार्यों के लिए जल की आवश्यकता होती है, जैसे-खाना बनाने, सफाई, सिंचाई, खेती आदि कार्यों में। इसके बिना हम कोई भी कार्य नहीं कर सकते हैं। इसलिए जल हमारे जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 21.
भू-क्षरण किन-किन कारकों द्वारा होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भू-क्षरण के कारक- भू-क्षरण की क्रिया वर्षा या वायु को मृदा से संपर्क होते ही प्रारंभ होती है। जैसे जैसे वर्षा या वायु वेग घटता-बढ़ता है, वैसे-वैसे भू-क्षरण का रूप और प्रकार बदलता रहता है। भू-क्षरण मुख्य रूप से दो कारकों द्वारा होता है, जल एवं वायु के द्वारा होने वाले भू क्षरण को क्रमश: जलीय भू-क्षरण एवं वायु भू-क्षरण कहते हैं।

प्रश्न 22.
मृदा विन्यास कितने प्रकार का होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मृदा विन्यास चार प्रकार के होते हैं

  1. स्तंभी विन्यास
  2. तिर्यक (तिरछा) विन्यास
  3. संहत (सघन) विन्यास
  4. दानेदार (कणीय) विन्यास

स्तंभी विन्यास वाली मृदा भुरभुरी व मुलायम होती है। यह मृदा खेती के लिए उत्तम व उपजाऊ होती है। तिर्यक विन्यास वाली मृदा में रंध्रावकाश कम होने से पैदावार कम होती है। संहत (सघन) विन्यास वाली मृदा में जल और वायु का संचार मुश्किल से होता है। दानेदार (कणीय) विन्यास सर्वोत्तम होता है। चिकनी दोमट एवं दोमट मृदाओं में यह पाया जाता है।

प्रश्न 23.
उर्वरकों के अधिक प्रयोग से भूमि पर होने वाले हानिकारक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मृदा में असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मृदा जल एवं कृषि उत्पादों पर पड़ता है।
प्रत्यक्ष प्रभाव-

  1. मृदा अम्लीय व ऊसर हो जाती है।
  2. लाभदायक जीव जन्तु, जैसेकेंचुए, जीवाणु आदि नष्ट हो जाते हैं।
  3. पोषक तत्वों का सन्तुलन बिगड़ जाता है।
  4. कृषि उत्पादों की गुणवत्ता घट जाती है।
  5. मृदा-विन्यास खराब हो जाता है।
  6. मृदा की जल धारण क्षमता कम हो जाती है।

अप्रत्यक्ष कुप्रभाव-

  1. वर्षा जल के साथ उर्वरकों के अंश नदी, तालाब में चले जाते हैं, जो मत्स्य विकास और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं।
  2. फलों, सब्जियों, दलहनों, अनाजों के पोषक तत्वों पर कुप्रभाव से उनके स्वाद व गुणवत्ता में कमी आ जाती है।
  3. अधिक नमी से उर्वरक के कुछ अंश नीचे चले जाते हैं, जिससे भूमिगत जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

प्रश्न 24.
भू-क्षरण की परिभाषा दीजिए। जलीय भू-क्षरण के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमि के कणों का अपने मूल स्थान से हटने एवं दूसरे स्थान पर एकत्र होने की क्रिया को भू-क्षरण या मृदा अपरदन कहते हैं। बरसात में जल के द्वारा होने वाले भू-क्षरण को जलीय भू-क्षरण कहते हैं। यह निम्न प्रकार का होता है-

  1. वर्षा-बूंद भू-क्षरण
  2. परत भू क्षरण
  3. अल्पसरिता भू-क्षरण
  4. खड्ड या अवनालिका भू क्षरण
  5. बीहड़ भू-क्षरण
  6. नदी तट भू-क्षरण
  7. समुद्रतट भू-क्षरण
  8. हिमनद भू-क्षरण
  9. भूस्खलन भू-क्षरण जो पहाड़ों पर चट्टानों के खिसकने से होता है जिससे नीचे के खेत, सड़क व बस्तियाँ दब जाती हैं।

 

अद्र्धवार्षिक परीक्षा प्रश्न-पत्र
कक्षा-7
विषय – कृषि विज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भूमि का कटाव किस क्रिया द्वारा कम होता है?
उत्तर:
भूमि का कटाव भू-परिष्करण द्वारा कम होता है।

प्रश्न 2.
राइजोबियम बैक्टीरिया मृदा में …………. स्थिर करता है। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
राइजोबियम बैक्टीरिया मृदा में नाइट्रोजन स्थिर करता है।

प्रश्न 3.
कंदवाली फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शकरकंद, आलू, अरबी, बंडा आदि कंदवाली फसलें हैं।

प्रश्न 4.
वायुमण्डल में नाइट्रोजन कितने प्रतिशत पाया जाता है?
उत्तर:
वायुमण्डल में नाइट्रोजन 78 प्रतिशत पाया जाता है।

प्रश्न 5.
त्वरित भू-क्षरण किसके द्वारा होता है?
उत्तर:
त्वरित भू-क्षरण मनुष्य द्वारा होता है।

प्रश्न 6.
देशी हल का प्रयोग कहाँ होता है?
उत्तर:
देशी हल का प्रयोग मिट्टी की जुताई के लिए होता है।

प्रश्न 7.
मृदा की जैविक उर्वरता बढ़ाने के लिए क्या प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
मृदा की जैव उर्वरक बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
मृदा परीक्षण उर्वरता निर्धारण करने की ……………. विधि है। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
मृदा परीक्षण उर्वरता निर्धारण करने की एक रासायनिक विधि है।

प्रश्न 9.
बीहड़ (रेवाइन) किन स्थानों पर पाया जाता है?
उत्तर:
बीहड़ (रेवाइन) नदी या नालों के किनारे व आस-पास पाया जाता है।

प्रश्न 10.
ज्वार की खेती किस भूमि पर की जाती है?
उत्तर:
ज्वार की खेती बलुई-दोमट भूमि पर की जाती है।

प्रश्न 11.
अरहर की पैदावार प्रति हेक्टेयर कितनी होती है?
उत्तर:
अरहर की पैदावार प्रति हेक्टेयर 20-25 कुंतल होती है।

प्रश्न 12.
फूलगोभी की अगेती किस्म की नर्सरी की बुआई किस माह में होती है?
उत्तर:
फूल गोभी की अगेती किस्म की नर्सरी की बुआई जून माह में होती है।

प्रश्न 13.
बाजरे की फसल में दीमक का नियंत्रण किस कीटनाशक से करते हैं?
उत्तर:
बाजरे की फसल में दीमक का नियंत्रण BHC 20 EC नामक कीटनाशक से करते हैं।

प्रश्न 14.
कम समय में पकने वाली अरहर की प्रजातियों के नाम बताइए।
उत्तर:
कम समय में पकने वाली अरहर की प्रजातियाँ-

  1. टाइप-21
  2. यू.पी.ए,एस, 120 तथा
  3. प्रभात।

प्रश्न 15.
अरहर की अच्छी फसल के लिए कितनी खाद देनी चाहिए?
उत्तर:
अरहर की अच्छी फसल के लिए 15-20 किग्रा नाइट्रोजन और 40-50 किग्रा फॉस्फोरस देना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16.
मृदा में नाइट्रोजन की कमी का पौधों पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
मृदा में नाइट्रोजन की कमी से पौधों में वृद्धि रुक जाती है। पौधों की पत्तियों पीली पड़ जाती हैं। फल छोटे-छोटे और कम हो जाते हैं और पकने से पूर्व गिर जाते हैं।

प्रश्न 17.
जैव उर्वरक क्या है?
उत्तर:
जैव उर्वरक सूक्ष्म कल्चर होते हैं। जो मृदा में नाइट्रोजन बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। कुछ जीव फॉस्फोरस बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं, तो कुछ कार्बनिक पदार्थ को शीघ्र सड़ाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। जैव उर्वरक बहुत सस्ते होते हैं। इनका प्रयोग बहुत आसान होता है और इनके प्रयोग में 50 से 80 रु प्रति हेक्टेयर खर्च होता है।

प्रश्न 18.
खाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
वे कार्बनिक पदार्थ जिनसे पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति की जाती है, खाद कहलाते हैं। खाद में पौधों के लिए सभी आवश्यक तत्व पाए जाते हैं। कम्पोस्ट की खाद, मल मूत्र व गोबर की सड़ी-गली खाद, जैविक खाद तथा हरी खाद इसके अंतर्गत आती है।

प्रश्न 19.
फूलगोभी के बोने का समय तथा बीज की मात्रा का विवरण दीजिए।
उत्तर:
बुआई का समय तथा बीज की मात्रा-फूलगोभी की विभिन्न किस्मों के बीज की नर्सरी में बुआई का उचित समय निम्न प्रकार है

  1. अगेती किस्में – जून माह में
  2. मध्यम किस्में – जुलाई-अगस्त
  3. पछेती किस्में – सितम्बर-अक्टूबर

अगेती तथा मध्यम किस्मों की एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए लगभग 500-600 ग्राम बीज की पौध पर्याप्त होती हैं।

प्रश्न 20.
बाजरे की संकर प्रजातियों, उनके पकने का समय तथा उपज बताइए।
उत्तर:
बाजरे की संकर प्रजातियों में पूसा-322, पूसा-23 व आई. सी. एम. एच. 451 है। इनके पकने में 85-90 दिन लगते हैं। इनसे 25-30 कुंतल उपज प्रति हेक्टेयर होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 21.
मिश्रित उर्वरक से आप क्या समझते हैं? उसके लाभ एवं हानि बताइए।
उत्तर:
दो या दो से अधिक उर्वरकों के मिश्रण को मिश्रित उर्वरक कहते हैं। मिश्रित उर्वरक तीन मानक (ग्रेड) के होते हैं

(i) कम मानक – इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश की कम प्रतिशत मात्रा होती है, इसका प्रतिशत योग 14 से कम होता है; जैसे – 2-8 2, 2-4-6 ग्रेड।
(ii) मध्यम मानक – इसमें तीनों को योग 15-25 तक होता है।
(iii) उच्च मानक – इसमें तीनों को योग 25 से अधिक होता है।

लाभ –

  1. किसान सरलता से प्रयोग कर सकता है
  2. इसे सुगमता से रखा जा सकता है।

हानियाँ-

  1. जब मृदा में एक या दो तत्वों की कमी हो, तो प्रयोग लाभकारी नहीं होता है।
  2. इसमें एक तत्व की अधिकता जबकि दूसरे तत्व की कमी होती है।

प्रश्न 22.
नाइट्रोजन उर्वरक का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
नाइट्रोजन उर्वरक का वर्गीकरण- रासायनिक आधार पर नाइट्रोजन उर्वरकों को निम्न वर्गों में बाँटा गया है
(i) नाइट्रेट उर्वरक-

  • (क) सोडियम नाइट्रेट- 16% नाइट्रोजन
  • (ख) कैल्सियम नाइट्रेट 15% नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग खड़ी फसल में छिड़काव के रूप में किया जाता है।

(ii) अमोनियम उर्वरक-

  • (क) अमोनियम सल्फेट- 20% नाइट्रोजन
  • (ख) डाई अमोनियम फॉस्फेट 18% नाइट्रोजन। नाइट्रोजन अमोनियम रूप में मिलता है। इन उर्वरकों को मिट्टी में मिलाया जाता है।

(iii) अमोनियम और नाइट्रेट उर्वरक-

  • (क) अमोनियम नाइट्रेट 33.5% नाइट्रोजन
  • (ख) अमोनियम सल्फेट नाइट्रेट-26% नाइट्रोजन। इन उर्वरकों को बोआई के समय खेत में मिलाया जाता है।

प्रश्न 23.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए- ( मिलान करके)
(i) ज्वार – (क) वी. के. 560
(ii) बाजरा – (ख) मऊरानीपुर
(iii) उकठा रोग – (ग) सरकोस्पोरा फर्फेद
(iv) पत्ती का धब्बा रोग – (घ) फ्यूजेरियम उडम फर्कैद
(v) अरहर – (ङ) दलहनी फसल
(vi) गेहूँ। – (च) वर्षा ऋतु की फसल
(vii) धान – (छ) रबी की फसल
उत्तर:
(i)  (ख) मऊरानीपुर
(ii) (क) वी. के. 560
(iii) (घ) फ्यूजेरियम उडम फर्कैद
(iv) (ग) सरकोस्पोरा फर्फेद
(v) (ङ) दलहनी फसल
(vi) (छ) रबी की फसल
(vii) (च) वर्षा ऋतु की फसल

 

वार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7 
विषय – कृषि विज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फल तथा सब्जियों को बिना खराब हुए कितने दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता
उत्तर:
इन्हें परिरक्षक द्वारा बहुत दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक आपदा किन-किन रूपों में आती हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक आपदा बाढ़, सूखा, भू-स्खलन, सुनामी आदि रूपों में आती है।

प्रश्न 3.
बोतल बंदी में पात्र को खौलते पानी में क्यों उबालते हैं?
उत्तर:
उबालने से पात्र के अन्दर और बाहर के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
किन्हीं तीन लताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
तीन लताओं के नाम-

  1. वोगन वीलिया
  2. ऐंटीगोनन लेप्टोपस
  3. बिगनोनियां

प्रश्न 5.
स्क्वैश किससे तैयार किया जाता है?
उत्तर:
स्क्वैश नींबू से तैयार किया जाता है।

प्रश्न 6.
बैक्टीरिया तथा कवक किस ताप पर नष्ट हो जाते हैं?
उत्तर:
बैक्टीरिया तथा कवक 71.4°C ताप पर नष्ट हो जाते हैं?

प्रश्न 7.
फलों में रंग परिवर्तन किसके कारण होता है?
उत्तर:
फलों में रंग परिवर्तन एंजाइम के कारण होता है।

प्रश्न 8.
कायिक प्रवर्धन के कितने तरीके हैं?
उत्तर:
कायिक प्रवर्धन के दो तरीके हैं-

  1. कलम लगाना
  2. दाब लगाना।

प्रश्न 9.
केले का जन्म स्थान कहाँ माना जाता है?
उत्तर:
मलाया।

प्रश्न 10.
नाशपाती के लिए कैसी जलवायु होनी चाहिए?
उत्तर:
शीतोष्ण जलवायु।

प्रश्न 11.
फलों और सब्जियों में परिरक्षक के रूप में किस रसायन का उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट, सोडियम बेंजोएट, सोडियम मेटाबाई सल्फाइट।

प्रश्न 12.
नाशपाती के वृक्ष पर फल कब लगते हैं?
उत्तर:
5 से 8 वर्ष में।

प्रश्न 13.
प्रत्येक साल फल देने वाली आम की कौन-सी प्रजाति है?
उत्तर:
आम्रपाली और मल्लिका।

प्रश्न 14.
ऊतक कोशिकाएँ विभाजन द्वारा किसका निर्माण करती हैं?
उत्तर:
कैलस (Callus) का।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 15.
बाढ़ आने के क्या कारण हो सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वनों की अंधाधुंध कटाई तथा बड़े-बड़े उद्योगों द्वारा अत्यधिक मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस छोड़े जाने के कारण पृथ्वी के ताप में अत्यधिक वृद्धि होती है जिससे पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगती है और बाढ़ का कारण बनती है।

प्रश्न 16.
पोटैशियम मेटाबाई सल्फाइड क्या है? इसकी प्रयोग विधि बताइए।
उत्तर:
यह एक रवेदार गंधक लवण है, यह अम्लीय व क्षारीय माध्यम से प्रभावित नहीं होता है फलों के रसों में उपस्थित सिट्रिक अम्ल के प्रभाव से पोटैशियम साइट्रेट में बदल जाता हैं। सल्फर डाइऑक्साइड गैस पानी से मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती है, जो परिरक्षक का कार्य करती है।

प्रश्न 17.
भू-स्खलन के क्या कारण हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कभी-कभी कोयले की खानों से अत्यधिक मात्रा में खनिज पदार्थ निकाल लिए जाते हैं, जिससे उसका आधार समाप्त हो जाता है और जमीन धंसने लगती है। इसके अतिरिक्त वर्षा या बाढ़ आने पर बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे भारी मात्रा में कटाव हो जाने से भी भू-स्खलन होता है।

प्रश्न 18.
प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के क्या उपाय हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के निम्नलिखित उपाय हैं

  1. अधिकाधिक वृक्षारोपण।
  2. वनों का संरक्षण।
  3. उद्योगों से निकली कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घटाना।
  4. आपदाओं के संबंध में पूर्व सूचना मिलना।
  5. आपदाओं से संबंधित सूचनाओं को प्रसारण।
  6. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बाँध बनाना, जलाशयों को गहरा करना।
  7. सिंचाई के लिए नहरें बनाना, बिजली पैदा करना।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए
(i) गुलमोहर – (क) लतर
(ii) चमेली – (ख) अलंकृत पौधा
(iii) केला – (ग) मौसमी पौधा
(iv) गेंदा – (घ) फल का पौधा
उत्तर:
(i) (ख) अलंकृत पौधा
(ii) (क) लतर
(iii) (घ) फल का पौधा
(iv) (ग) मौसमी पौधा

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 20.
बीज प्रवर्धन किसे कहते हैं? इन प्रवर्धनों से होनेवाले लाभ तथा हानियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
बीज द्वारा जब बहुत से पौधे तैयार किए जाते हैं, तब हम इस क्रिया को बीज प्रवर्धन कहते हैं।
बीज प्रवर्धन के लाभ

  1. पेड़ अधिक ऊँचे तथा फैलने वाले होते हैं।
  2. पेड़ों की आयु अधिक होती है।
  3. पेड़ बहुत मजबूत होते हैं
  4. बीमारियों तथा मौसम के प्रकोप को सहन करने की इनमें शक्ति होती है।
  5. प्रति पेड़ उपज अधिक होती है।
  6. यह सबसे सरल एवं सस्ती विधि हैं।

बीज प्रवर्धन से हानि

  1. पौधे मातृ वृक्ष के समान नहीं होते हैं।
  2. वृक्ष अधिक ऊँचा होने के कारण फलो की तुड़ाई में कठिनाई होती है।
  3. फल अच्छी गुणवत्ता वाले नहीं होते हैं।
  4. फल देर से लगता है।

प्रश्न 21.
आँवले का मुरब्बा कैसे बनाया जाता है?
उत्तर:
सर्वप्रथम आँवले को धोकर स्टील के काँटों से गोदते हैं। 20% फिटकरी के उबलते घोल में 5-10 मिनट पकाते हैं। भगौने में एक किलोग्राम आँवले के लिए डेढ़ किलोग्राम चीनी डालते हैं। पहले भगौने में चीनी की तह, फिर आँवले की तह लगाते जाते हैं। आँवले को चीनी की तहों में चौबीस घंटे रखते हैं। दूसरे दिन आँवले निकाल कर चीनी की चाशनी बनाकर आँवलों को चौबीस घंटे उसमें छोड़ देते हैं। तीसरे दिन आँवले निकालकर चीनी को 70 % करने के लिए पकाते हैं। आँवले गर्म चाशनी में डाल देते हैं। 20-25 दिन में मुरब्बा खाने योग्य हो जाता है।

प्रश्न 22.
वृक्षारोपण से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वृक्षारोपण के अंतर्गत फलों के अलावा कुछ विशेष स्थानों पर विशेष प्रकार के वृक्ष । लगाए जाते हैं जो उपयोगी होते हैं। वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देने के लिए वन महोत्सव जैसे कार्यक्रम प्रचलित किए गए हैं। हमारे जीवन निर्वाह के लिए वृक्षारोपण के महत्त्व
निम्न प्रकार हैं

  • वृक्ष हमें फल देते हैं।
  • वृक्षारोपण से हमें इमारती, फर्नीचर तथा ईंधन की लकड़ी मिलती है।
  • पेड़ हमें हरियाली, छाया व पर्यावरण सुरक्षा देते हैं।
  • प्राकृतिक सौंदर्य की वृद्धि और वर्षा में सहायक है।
  • बाढ़ और भू-क्षरण को रोकते हैं।
  • प्राणवायु (ऑक्सीजन) उपलब्ध कराते हैं।

प्रश्न 23.
नींबू अथवा सन्तरा स्कवैश बनाने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नींबू का स्क्वैश बनाना – ताजे नींबू धोकर, छिलका उतारकर जूसर से जूस निकालते हैं और छलनी से छानते हैं।

आवश्यक सामग्री – नींबू रस – 1 लीटर, पानी – 2 ली, चीनी – 2 किग्रा, सिट्रिक अम्ल – 10 ग्राम, पोटैशियम मेटाबाई सल्फाइट – 3 ग्राम

विधि – स्टील के भगौने में पानी में चीनी डालकर गर्म करते हैं और बीच-बीच में रस को चलाते रहते हैं। एक उबाल पर उतारकर चाशनी ठंडी होने पर नींबू का रस और पौटेशियम मेटाबाई सल्फाइट को मिला दिया जाता है। परिरक्षक पहले थोड़े पानी में घोलते हैं, तब जूस में मिलाते हैं। स्क्वैश तैयार होने पर बोतल में 3 सेमी जगह छोड़कर भरते हैं और ढक्कन लगाकर सील कर देते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्य-साहित्य विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name काव्य-साहित्य विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्य-साहित्य विकास प्रमुख काव्यकृतियाँ और उनके रचनाकार

प्रायः परीक्षा में अतिलघु उत्तरीय अथक, बहुविकल्पीय प्रश्नों के रूप में प्रमुख काव्यकृतियों के नाम देकर उनके रचनाकार कवि का नाम पूछा जाता है अथवा किसी कवि का नाम देकर उसकी रचना का नाम पूछा जाता है। निम्नांकित तालिका विद्यार्थियों के लिए दोनों रूपों में सहायक सिद्ध होगी।
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