UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 6 न्यायिक सक्रियता (अनुभाग – दो)

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विरत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायिक सक्रियता से आप क्या समझते हैं ? न्यायिक सक्रियता का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :

न्यायिक सक्रियता

न्यायपालिका शासन का प्रमुख अंग है। शासन के प्रत्येक अंग की भाँति इसे भी कुछ निश्चित प्रक्रियाओं और कार्यपालिकाओं की सीमा के अन्तर्गत कार्य करना पड़ता है। आजकल न्यायपालिका पर चर्चा के दौरान ‘न्यायिक सक्रियता बहुचर्चित बहस है।।

न्यायिक सक्रियता क्या है ?

न्यायिक सक्रियता से तात्पर्य ऐसी प्रवृत्ति से है जिसमें देश की (UPBoardSolutions.com) न्यायपालिका सामाजिक और प्रशासनिक गतिविधियों को नियमित करने में शासन के अन्य अंगों-व्यवस्थापिका और कार्यपालिका से बढ़-चढ़कर भूमिका निभाने लगती है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों ने देश की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक-आर्थिक जीवन में फैली हुई सुस्ती, भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को निर्देशात्मक निर्णय दिये हैं। न्यायालय की इसी गतिविधि को न्यायिक सक्रियता कहते हैं।

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जनहित याचिका : आलोचना और मूल्यांकन

न्यायिक सक्रियता के महत्त्वपूर्ण साधन जनहित याचिका की आलोचनाएँ भी बहुत हैं। आलोचकों का मानना है कि जनहित याचिकाएँ सस्ती लोकप्रियता और समाचार-पत्रों में स्थान पाने के लिए प्रस्तुत की गयीं और की जाती हैं। आलोचकों का यह भी मानना है कि जनहित याचिकाओं ने न्यायपालिका के कार्यभार को पहले से ही बोझिल भार को और अधिक बढ़ा दिया है। न्यायालयों में सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे मामलों की संख्या लाखों में है। (UPBoardSolutions.com) आलोचकों का यह भी मानना है कि इन मुकदमों में न्यायालय द्वारा जारी किये गये निर्देश अव्यावहारिक हो सकते हैं, जिनका क्रियान्वयन कराना कार्यपालिका के लिए भी मुश्किल हो सकता है। इन आलोचनाओं के बावजूद जनहित याचिकाओं ने न्याय-व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। जनहित याचिकाओं के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय भारतीय राजव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

प्रश्न 2.
जनहित याचिकाओं का अर्थ क्या है ? इनके महत्त्व पर प्रकाश डांलिए।
उत्तर :

जनहित याचिकाएँ : अर्थ

भारत में न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन जनहित याचिका है। कानून की सामान्य प्रक्रिया में कोई भी व्यक्ति तब न्यायालय जा सकता है जब उसका कोई व्यक्तिगत नुकसान हुआ हो। सन् 1979 ई० में इस अवधारणा में बदलाव आया। सन् 1979 ई० में न्यायालय ने ऐसे मुकदमे की (UPBoardSolutions.com) सुनवाई करने का निर्णय लिया जिसे पीड़ित लोगों ने नहीं बल्कि उनकी ओर से दूसरों ने दाखिल किया था। चूंकि इस मामले में जनहित से सम्बन्धित एक मुकदमे पर विचार हो रहा था। अत: इसे और ऐसे ही मुकदमों को जनहित याचिका का नाम दिया गया।

कुछ मामलों में न्यायालय ने स्वयं ही समाचार-पत्र में प्रकाशित समाचार या विवरण आदि के आधार पर कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। जैसे-आगरा प्रोटेक्शन होम केस।

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जनहित याचिकाओं का आरम्भ
जनहित अभियोगों की शुरुआत संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने की थी। भारत में इसकी शुरुआत 1981 ई० से हुई। इन अभियोगों की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पी० एन० भगवती का विशेष योगदान रहा। इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) का पहला वाद भागलपुर (बिहार) जेल में बन्द विचाराधीन कैदियों का था। इसी प्रकार आगरा प्रोटेक्शन होम केस, मुम्बई के पटरीवालों की समस्या, तिलोनिया के श्रमिकों का केस, एशियाड श्रमिक केस प्रमुख जनहित के मुकदमे हैं।

जनहित याचिकाओं का महत्त्व
भारत में जनहित याचिकाओं का निम्नलिखित महत्त्व है

  • समाज के निर्धन व्यक्तियों और कमजोर वर्गों को न्याय दिलाने में सहायक।
  • कानूनी न्याय के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक न्याय पर बल।
  • शासन की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने में सहायक।
  • शासन को जनहित के प्रति उत्तरदायित्व निभाने को प्रेरित करने में सहायक।
  • न्यायपालिका को जनोन्मुखी स्वरूप प्रदान करने में सहायक।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायिक सक्रियता के लाभ लिखिए।
उत्तर :
न्यायिक सक्रियता के लाभ निम्नलिखित हैं

  • इससे न केवल व्यक्तियों बल्कि संस्थाओं, समूहों को भी न्यायालय जाने का अवसर मिला है।
  • न्यायिक सक्रियता ने न्याय व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाया और कार्यपालिका को जनता के प्रति उत्तरदाये।
  • न्यायिक सक्रियता ने शासन के अन्य अंगों को (UPBoardSolutions.com) अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाने को प्रेरित किया है।
  • न्यायिक सक्रियता ने भारतीय जनमानस का न्यायपालिका में अगाध विश्वास बढ़ाया है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायिक सक्रियता का महत्त्वपूर्ण साधन कौन है ?
उत्तर :
न्यायिक सक्रियता का महत्त्वपूर्ण साधन जनहित याचिका है।

प्रश्न 2.
भारत में जनहित अभियोगों को आरम्भ करने का श्रेय किसे प्राप्त है ?
उत्तर :
भारत में जनहित अभियोगों को प्रारम्भ करने का श्रेय सर्वोच्च न्यायालय के माननीय श्री पी० एन० भगवती को प्राप्त है।

प्रश्न 3.
लोकायुक्त किन दो राज्यों में है ?
उत्तर :
लोकायुक्त महाराष्ट्र तथा बिहार राज्यों में है।

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प्रश्न 4.
लोक-आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है? उसका कार्यकाल कितना होता है? (2017)
उत्तर :
लोक-आयुक्त की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल (UPBoardSolutions.com) द्वारा की जाती है। अधिकांश राज्यों में लोकायुक्तों का कार्यकाल पाँच वर्ष अथवा 65 वर्ष की उम्र तक, जो भी पहले हो, रखा गया है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. जनहित याचिका का पहला मुकदमा है|

(क) भागलपुर केस
(ख) एशियाड श्रमिक केस
(ग) तिलोनिया श्रमिक केस ।
(घ) मुम्बई के पटरीवालों का केस

2. सर्वप्रथम लोकायुक्त का गठन कहाँ हुआ?

(क) गुजरात में
(ख) महाराष्ट्र में
(ग) आंध्र प्रदेश में
(घ) उत्तर प्रदेश में

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3. जनहित याचिकाओं की शुरुआत हुई

(क) अमेरिका में
(ख) भारत में
(ग) द० अफ्रीका में
(घ) रूस में

उत्तरमाला

1. (क), 2. (ख), 3. (क)

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment (हमारा पर्यावरण)

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पाठगत हल प्रश्न

[NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खंड 15.1 ( पृष्ठ संख्या 289)

प्रश्न 1.
क्या कारण है कि कुछ पदार्थ जैव निम्नीकरणीय होते हैं और कुछ अजैव निम्नीकरणीय?
उत्तर
कुछ पदार्थों का जीवाणु अथवा दूसरे मृतजीवियों (saprophytes) द्वारा अपघटन हो जाता है परंतु कुछ पदार्थों का जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटन नहीं हो पाता है। अत: सब्ज़ियों के अपशिष्ट, जंतुओं के अपशिष्ट, पत्ते आदि जैव निम्नीकरणीय हैं क्योंकि जीवाणु (UPBoardSolutions.com) और कवक जैसे सूक्ष्मजीव इन्हें जटिल से सरल कार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। जबकि प्लास्टिक, पॉलीथीन आदि अजैव निम्नीकरणीय हैं क्योंकि इनका अपघटन नहीं हो पाता है।

प्रश्न 2.
ऐसे दो तरीके सुझाइए जिनमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर
जैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को निम्न दो तरीकों से प्रभावित करते हैं

  1. पौधों तथा जंतुओं के अवशेष के अपघटन (decomposition) से वातावरण दूषित होता है तथा दुर्गध (foul | smell) फैलती है, जिससे आस-पास रहने वाले लोगों को परेशानी होती है।
  2. कूड़े-कचरे के ढेर पर अनेक प्रकार की मक्खियाँ, मच्छर आदि पैदा होते हैं, जो कई प्रकार के रोगों के वाहक होते हैं।
  3. मिथेन गैस, हाइड्रोजन सल्फाइड गैस, CO2 गैस अपघटन प्रक्रम (UPBoardSolutions.com) में निकलते हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ता है।

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प्रश्न 3.
ऐसे दो तरीके बताइए जिनमें अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।
उत्तर

  1. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों; जैसे-प्लास्टिक, पॉलीथीन, पीड़कनाशक (DDT) एवं रसायन आदि का अपघटन नहीं होता। ये पदार्थ लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं तथा जल एवं मृदा प्रदूषण फैलाते हैं।
  2. अजैव निम्नीकरणीय रासायनिक उर्वरक के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी या तो अम्लीय या क्षारीय हो जाती है, जिससे उर्वरा शक्ति घट जाती है।
  3. DDT जैसे पीड़कनाशक खाद्यान्न, सब्जियों, फलों आदि के माध्यम से हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं तथा हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते हैं।

खंड 15.2 ( पृष्ठ संख्या 294)

प्रश्न 1.
पोषी स्तर क्या है? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए तथा इसमें विभिन्न पोषी स्तर बताइए।
उत्तर
पोषी स्तर-किसी आहार श्रृंखला के विभिन्न स्तरों (या चरणों) को (UPBoardSolutions.com) पोषी स्तर कहते हैं जिसमें प्रत्येक चरणों पर भोजन का स्थानांतरण होता है।
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प्रश्न 2.
पारितंत्र में अपमार्जकों (Decomposers) की क्या भूमिका है? ।
उत्तर

  1. जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्म जीव मृतजैव अवशेषों का अपमार्जन करके जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल कार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं ताकि पौधों द्वारा पुनः उपयोग में लाए जा सकें।
  2. मृत पौधे और जंतुओं के शरीर में स्थित विभिन्न तत्वों को मिट्टी, जल तथा वायु में पुनः वापस लाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है तथा प्रकृति में संतुलन बना रहता है। जैसे—मृत जीव को आमेनिया में बदलना।
  3. अपमार्जक पर्यावरण को साफ़ रखने में सहायता करता है।

खंड 15.3 ( पृष्ठ संख्या 296 )

प्रश्न 1.
ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है।
उत्तर
ऑक्सीजन के तीन परमाणु मिलकर ऑजोन (O3) के एक अणु का निर्माण करते हैं। वायुमंडल के उच्चतर स्तर पर पराबैंगनी (UV) विकिरण के कारण ऑक्सीजन (O2) अणुओं से ओजोन बनती है। उच्च ऊर्जा वाले पराबैंगनी विकिरण ऑक्सीजन अणुओं (02) को विघटित कर स्वतंत्र ऑक्सीजन (O) परमाणु मुक्त करते हैं। ऑक्सीजन के ये स्वतंत्र परमाणु संयुक्त होकर ओजोन बनाते हैं जैसा कि समीकरण में दिखाया गया है।
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment img-2
वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर ओजोन का आवरण सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती है। यह विकिरण जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक होता है। उदाहरण के लिए, यह विकिरण मानव में त्वचा का कैंसर उत्पन्न (UPBoardSolutions.com) करती है। अतः ओजोन पारितंत्र को नष्ट होने से बचाती है।

प्रश्न 2.
आप कचरा निपटाने की समस्या कम करने में क्या योगदान कर सकते हैं? किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कचरा निपटान की समस्या कम करने के तरीके निम्नलिखित हैं :

  1. कचरा फेंकने के पूर्व जैव निम्नीकरणीय तथा अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का पृथक (अलग) कर लीजिए।
  2. ऐसे सभी पदार्थों को अलग कर लीजिए जिनका पुनः चक्रण संभव है; जैसे–कागज़, शीशा, धातुएँ, रबर इत्यादि।
  3. हमें जैव निम्नीकरणीय पदार्थों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करना चाहिए।

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पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-से समूहों में केवल जैव निम्नीकरणीय पदार्थ हैं
(a) घास, पुष्प तथा चमड़ा
(b) घास, लकड़ी तथा प्लास्टिक
(c) फलों के छिलके, केक एवं नींबू का रस
(d) केक, लकड़ी एवं घास
उत्तर
(d), (c) तथा (d)

प्रश्न 2.
निम्न से कौन आहार श्रृंखला का निर्माण करते हैं-
(a) घास, गेहूँ तथा आम
(b) घासे, बकरी तथा मानव
(c) बकरी, गाय तथा हाथी
(d) घास, मछली तथा बकरी
उत्तर
(b) घास, बकरी तथा मानव

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन पर्यावरण-मित्र व्यवहार कहलाते हैं
(a) बाज़ार जाते समय सामान के लिए कपड़े का थैला ले जाना।।
(b) कार्य समाप्त हो जाने पर लाइट (बल्ब) तथा पंखे का स्विच बंद करना।
(c) माँ द्वारा स्कूटर से विद्यालय छोड़ने के बजाय तुम्हारा विद्यालय तक पैदल जाना
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर
(d) उपरोक्त सभी

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प्रश्न 4.
क्या होगा यदि हम एक पोषी स्तर के सभी जीवों को समाप्त कर दें (मार डालें)?
उत्तर
यदि एक पोषी स्तर के सभी जीवों को मार दिया जाए, तो इससे पहले वाले स्तर के जीवों की संख्या बहुत अधिक हो जाएगी। जिससे उनका भोजन तीव्रता से खत्म हो जाएगा, जबकि उससे बाद आने वाले पोषी स्तर को भोजन नहीं मिल पाएगा। अत: वे भोजन के अभाव में मर जाएँगे अथवा किसी अन्य स्थान पर चले जाएँगे। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। यदि सभी शाकाहारी जंतु; जैसे-हिरण, खरगोश आदि मर जाएँगे (UPBoardSolutions.com) तो अगले पोषी स्तर वाले जीव शेर, बाघ आदि को भोजन नहीं मिलेगा और वे या तो मर जाएँगे या गाँवों, शहरों की ओर पलायन करेंगे। इसी प्रकार हिरण, गाय, खरगोश आदि नहीं होने पर घास पौधे बहुत अधिक होंगे क्योंकि इसका भक्षण नहीं होगा।
इस तरह हम कह सकते हैं कि आहार श्रृंखला के टूटने से पारितंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा।

प्रश्न 5.
क्या किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव है?
उत्तर
(a)
हाँ, किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तर के लिए अलग-अलग होगा। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 15 Our Environment img-3
स्थिति I-यदि सभी हिरणों को हटा दें तो शेर भूख से मर जाएँगे तथा पादप (घास, पेड़, पौधों) की संख्या बढ़ेगी।
स्थिति II-यदि सभी शेरों को हटा दें तो हिरणों की संख्या बढ़ेगी, जिससे जंगल खत्म हो सकते हैं तथा रेगिस्तान में परिवर्तित हो सकते हैं।

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(b) नहीं, किसी पारितंत्र को क्षति पहुँचाए बिना (अर्थात् प्रभावित किए बिना) किसी पोषी स्तर के सभी जीवों को हटाना संभव नहीं है।

प्रश्न 6.
जैविक आवर्धन (biological magnificatation) क्या है? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होगा?
उत्तर
फसलों की सुरक्षा के लिए पीड़कनाशक एवं रसायन जैसे अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का उपयोग किया जाता है। यह प्रत्येक पोषी स्तर पर जीवों एवं पादपों के शरीर में संचित होते हैं, जिसे जैविक आवर्धन कहते हैं। भिन्न स्तरों पर जैविक आवर्धन (UPBoardSolutions.com) भिन्न-भिन्न होता है। स्तरों के ऊपर की तरफ़ बढ़ने पर आवर्धन बढ़ता जाता है। चूंकि आहार श्रृंखला में मनुष्य शीर्षस्थ है। अतः हमारे शरीर में इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है।

प्रश्न 7.
हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं?
उत्तर
अजैव निम्नीकरणीय कचरों से उत्पन्न होने वाली समस्याएँ निम्न हैं|

  1. चूँकि इनका विघटन नहीं हो पाता है इसलिए लंबे समय तक बने रहने के कारण काफ़ी मात्रा में एकत्र हो जाते हैं। तथा पारितंत्र में असंतुलन पैदा करते हैं तथा पर्यावरण के अन्य सदस्यों को हानि पहुँचाते हैं।
  2. पॉलीथीन की थैलियाँ कुछ पालतू जानवर खा लेते हैं, जिससे उनकी मृत्यु तक हो जाती है।
  3. नालियाँ जाम हो जाती हैं, जिससे मल-मूत्र आदि गंदे पदार्थों का वहन नहीं हो पाता है तथा गंदगी फैलती है और अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती हैं।
  4. प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बों आदि में जल जमा होने के कारण डेंगू, मलेरिया जैसे खतरनाक रोगों की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
  5. दवाइयों के स्ट्रिप्स बोतलों, कीटनाशी एवं रसायन आदि से जल एवं मृदा प्रदूषण होता है।
  6. मिट्टी के अंदर दबे रहने के कारण फसलों की वृद्धि में रुकावट होती है तथा उर्वरा शक्ति कम हो जाती है।
  7. इससे जैविक आवर्धन भी होता है।
  8. इसे जलाने पर हानिकारक गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण करता है।

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प्रश्न 8.
यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?
उत्तर
हाँ, यहाँ तक कि यदि उत्पादित सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तब भी इनका हमारे पर्यावरण पर प्रभाव पड़ेगा परंतु लंबे समय के लिए नहीं। अधिक मात्रा में कचरा होने के कारण सूक्ष्म जीव (बैक्टिरिया एवं कवक) सही समय पर इनका (UPBoardSolutions.com) विघटन नहीं कर पाएँगे, जिससे ये कचरा जमा हो जाएगा और मक्खियों, मच्छरों आदि को पनपने का अवसर मिलेगा, दुर्गंध फैलेगी, वायु प्रदूषण होगा, बीमारियाँ फैलेंगी, तथा आसपास के लोगों का रहना मुश्किल हो जाएगा। यदि इसका निपटान सही तरीके से होगा; जैसे-जैविक खाद बनाकर, तो कुछ ही समय में ये दुष्प्रभाव ख़त्म हो जाएँगे तथा पर्यावरण को कोई क्षति नहीं होगा।

प्रश्न 9.
ओजोन परत की क्षति हमारे लिए चिंता का विषय क्यों है? इस क्षति को सीमित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उत्तर
स्ट्राटोस्फेयर में ओजोन परत होती है, जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरण (UV) से पृथ्वी पर रहने वाले जीवों
को सुरक्षा प्रदान करती है। UV के कारण त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद (cataract), प्रति रक्षा-तंत्र की क्षति तथा पौधों को क्षति पहुँचाती है, जिसके कारण फसलों की उपज कम जो जाती है। क्लोरोफ्लुओरो कार्बन (CFCs) का प्रयोग अग्निशमन यंत्रों एवं रेफ्रीजरेटर (UPBoardSolutions.com) (शीतलन) में किया जाता है, जो ओजोन परत को क्षति पहुँचाते हैं। 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम [UNEP : United Nations Environment Programme] में सर्वानुमति बनी कि CFC के उत्पादन को 1986 के स्तर पर ही सीमित रखा जाए।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 (Section 2)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का गठन एवं कार्य (अनुभाग – दो)

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विर] उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का गठन कैसे होता है ? इसके प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। [2013, 14]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के कार्यों एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए। [2012]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के किन्हीं दो कार्यों को बताइए। [2010]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् के तीन प्रमुख कार्य लिखिए। [2015, 17]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद का गठन कैसे होता है? [2017]
उत्तर :
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति को उसके कार्यों के सम्पादन में सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होगी, जिसका अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होगा।

गठन– 
लोकसभा में जिस दल को बहुमत होता है उस दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है। प्रधानमन्त्री की सलाह से राष्ट्रपति अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनमें विभागों का वितरण करता है। मन्त्री तीन स्तर (UPBoardSolutions.com) के होते हैं-(1) कैबिनेट मन्त्री, (2) राज्य मन्त्री तथा (3) उपमन्त्री। जब लोकसभा में किसी भी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं होता तो राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग करके प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है।

मन्त्रियों की योग्यताएँ- 
प्रधानमन्त्री तथा अन्य मन्त्रियों के लिए संसद के किसी भी सदन का सदस्य होना आवश्यक है। यदि कोई मन्त्री सदस्य नहीं है तो उसे मन्त्री बनने के बाद 6 महीने के अन्दर किसी-न-किसी
सदन का सदस्य बन जाना चाहिए अन्यथा उसे मन्त्री-पद से त्याग-पत्र देना पड़ेगा।

मन्त्रियों द्वारा शपथ- प्रत्येक मन्त्री को अपना पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति के समक्ष संविधान और अपने पद के प्रति पूर्ण ईमानदार तथा निष्ठावान रहने, अपने कर्तव्यों का पालन करने तथा मन्त्रिपरिषद् की सभी नीतियों एवं कार्यवाहियों को गुप्त रखने की शपथ लेनी पड़ती है। राष्ट्रपति तथा मन्त्रियों के सरकारी रजिस्टर में हस्ताक्षर के बाद केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का गठन हो जाता है।

मन्त्रिपरिषद के कार्य
संविधान द्वारा राष्ट्रपति को शासन के संचालन के लिए जो अधिकार दिये गये हैं, उनका प्रयोग मन्त्रिपरिषद् ही करती है, वही राष्ट्रपति के नाम से देश का शासन चलाती है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मन्त्रिपरिषद् मुख्यतया निम्नलिखित कार्य करती है|

  • राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देना–संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् के गठन का उद्देश्य | राष्ट्रपति को उसके कार्यों के सम्पादन में सहायता एवं परामर्श देना है।
  • राष्ट्रीय नीति का निर्धारण-मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य शासन सम्बन्धी नीतियों का निर्धारण करना है। मन्त्रिपरिषद् ही देश तथा विदेश के लिए नीतियों का निर्धारण करती है।
  • अपने विभाग सम्बन्धी कार्य करना-केन्द्रीय प्रशासन अनेक विभागों में बँटा हुआ है और प्रत्येक मन्त्री अपने विभाग का प्रशासनिक कार्य करता है। संसद में पूछे गये प्रश्नों का उत्तर अधिकांशतया सम्बन्धित विभाग के मन्त्री ही देते हैं।
  • वित्तीय कार्य–मन्त्रिपरिषद् प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने से पूर्व देश का बजट तैयार कराकर संसद में प्रस्तुत करती है तथा उसे पारित कराती है। देश की आर्थिक नीति भी मन्त्रिपरिषद् ही निर्धारित करती है।
  • विधायन कार्य-प्रत्येक मन्त्री अपने विभाग सम्बन्धी विधेयक तैयार कराकर संसद में पेश करता है । तथा कानून बन जाने पर उसे लागू करता है।
  • संसद में सरकार का प्रतिनिधित्व-संसद की बैठकों में मन्त्रिगण सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं, सदस्यों के प्रश्नों तथा आलोचनाओं का उत्तर देते हैं और सरकार की नीति का समर्थन करते हैं।
  • संविधान में संशोधन-संविधान में संशोधन सम्बन्धी प्रस्ताव मन्त्रिपरिषद् द्वारा प्रस्तुत एवं पारित | कराये जाते हैं।
  • व्यवस्थापिका की कार्यवाही-लोकसभा तथा राज्यसभा की बैठकों की तिथि निश्चित करना, । बैठक के घण्टे तथा विधेयकों के पेश करने का क्रम निश्चित करना, प्रत्येक विधेयक पर विचार करने
    का समय निश्चित करना आदि कार्यों को मन्त्रिपरिषद् ही करती है।
  • नियुक्ति सम्बन्धी कार्य-संविधान ने राष्ट्रपति को जिन महत्त्वपूर्ण (UPBoardSolutions.com) पदों पर नियुक्ति का अधिकार दिया है, उन सभे पदों पर नियुक्ति राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् की सलाह से ही करता है।
  • सूचना देना–मन्त्रिपरिषद् अपनी नीतियों एवं कार्यों के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को नियमित रूप से सूचना देती रहती है। राष्ट्रपति मन्त्रिपरिषद् से कोई भी प्रशासनिक जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  • जनमत तैयार करना–मन्त्रिपरिषद् के सदस्य सरकारी नीतियों के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास करते हैं जिससे जनता में सरकार की लोकप्रियता बढ़े।
  • युद्ध अथवा शान्ति सम्बन्धी घोषणाएँ–मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही युद्ध और शान्ति सम्बन्धी घोषणाएँ की जाती हैं और यह निर्णय किया जाता है कि दूसरे देशों से किस प्रकार के सैनिक और व्यापारिक । सम्बन्ध स्थापित किये जाएँ।
  • अन्य कार्य–मन्त्रिपरिषद् अपराधियों को क्षमा करने के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को सलाह देती है। मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार ही राष्ट्रपति भारतरत्न, पद्मभूषण, पद्मश्री आदि उपाधियाँ प्रदान करता है।
    निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मन्टिअरिषद् के कार्य एवं शक्तियाँ बहुत अधिक व्यापक होती हैं। देश की समस्त राजनीतिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर उसका अधिकार होता है।

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प्रश्न 2.
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति कैसे होती है ? उसके अधिकारों एवं कार्यों (कर्तव्यों) का वर्णन | कीजिए। [2010, 14]
           या
प्रधानमन्त्री के किन्हीं दो कार्यों एवं शक्तियों का उल्लेख कीजिए। [2012]
           या
प्रधानमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है? भारतीय शासन में प्रधानमन्त्री की स्थिति की व्याख्या कीजिए। [2014, 18]
उत्तर :

प्रधानमन्त्री की नियुक्ति

प्रधानमन्त्री केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का मुखिया होता है । संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार, “प्रधानमन्त्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। किन्तु व्यवहार में राष्ट्रपति उस राजनीतिक दल के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है, जिसका (UPBoardSolutions.com) लोकसभा में बहुमत होता है। यदि लोकसभा में एक दल का बहुमत न होने पर दो या अधिक दल परस्पर अपना गठबन्धन बनाकर नेता चुन लेते हैं तो राष्ट्रपति ऐसे गठबन्धन के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है। यदि लोकसभा में किसी भी दल या दलों के गठबन्धन को बहुमत प्राप्त नहीं होता तो राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी भी व्यक्ति को प्रधानमन्त्री नियुक्त कर सकता है। जुलाई, 1979 ई० में चौ० चरण सिंह की प्रधानमन्त्री के रूप में नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने विवेक के प्रयोग का एक ज्वलन्त उदाहरण है।

प्रधानमन्त्री के कार्य (शक्तियाँ) तथा महत्त्व

प्रधानमन्त्री के निम्नलिखित कार्यों से उसकी शक्तियों तथा महत्त्व का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है

1. मन्त्रिपरिषद्को निर्माता- 
राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री को नियुक्त करता है तथा उसके बाद प्रधानमन्त्री की सलाह से अन्य मन्त्रियों तथा उनके विभागों का वितरण करता है। प्रधानमन्त्री किसी भी मन्त्री के विभाग में फेर-बदल कर सकता है।

2. मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष– 
प्रधानमन्त्री केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष तथा नेता होता है। वह मन्त्रिपरिषद् की बैठकों में अध्यक्षता करता है तथा उसकी कार्यवाही का संचालन भी करता है। मन्त्रिपरिषद् के सभी निर्णय उसकी इच्छा से प्रभावित होते हैं। (UPBoardSolutions.com) मन्त्रिपरिषद् यदि देश की नौका है तो प्रधानमन्त्री उसका नाविक। यदि किसी मन्त्री की राय प्रधानमन्त्री से नहीं मिलती है तो प्रधानमन्त्री ऐसे मन्त्री को त्याग-पत्र देने के लिए बाध्य कर सकता है अथवा उसे राष्ट्रपति द्वारा मन्त्रिपरिषद् से हटवा सकता है।

3. कार्यपालिका का प्रधान- 
राष्ट्रपति देश की कार्यपालिका का नाममात्र का प्रधान होता है। कार्यपालिका की वास्तविक शक्ति प्रधानमन्त्री में निहित होती है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से देश का मुख्य शासक प्रधानमन्त्री होता है।

4. शासन का प्रमुख प्रबन्धक- 
देश की शासन-व्यवस्था को विभिन्न विभागों तथा मन्त्रालयों में बाँटना, मन्त्रियों में विभागों का वितरण करना, मन्त्रालयों की नीतियाँ तय करना तथा उनमें समय-समय पर अपेक्षित परिवर्तन करना आदि कार्य प्रधानमन्त्री की इच्छा तथा निर्देश पर निर्भर होते हैं। इस प्रकार प्रधानमन्त्री ही देश के शासन का प्रमुख प्रबन्धक होता है।

5. लोकसभा का नेता- 
लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होने के कारण वह लोकसभा काअधिवेशन बुलाने, कार्यक्रम निश्चित करने तथा सत्र स्थगित करने का निर्णय लेती है। वह लोकसभा में अपने मन्त्रिमण्डल का नेतृत्व करता है तथा शासन सम्बन्धी नीतियों (UPBoardSolutions.com) की घोषणा करता है। वह राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने का भी परामर्श दे सकता है।

6. राष्ट्रपति एवं मन्त्रिपरिषद् तथा राष्ट्रपति एवं संसद के बीच की कड़ी– 
प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति और मन्त्रिपरिषद् के बीच की कड़ी का कार्य करता है। वह मन्त्रिमण्डल की नीतियों, निर्णयों आदि की। जानकारी राष्ट्रपति को देता है तथा राष्ट्रपति के निर्णयों से वह मन्त्रियों को अवगत कराता है। इसी प्रकार प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति तथा संसद के बीच की कड़ी के रूप में कार्य करता है। वह राष्ट्रपति को संसद की कार्यवाही से अवगत कराता है तथा राष्ट्रपति के सुझावों को संसद तक पहुँचाता है।

7. नियुक्तियाँ सम्बन्धी अधिकार- 
राष्ट्रपति के द्वारा मन्त्रियों, राज्यपालों, न्यायाधीशों, राजदूतों, विभिन्न आयोगों, लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य इत्यादि की जितनी भी नियुक्तियाँ की जाती
हैं, वे सभी प्रधानमन्त्री के परामर्श पर की जाती हैं।

8. अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व– 
अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारतीय प्रधानमन्त्री का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। चाहे विदेश विभाग प्रधानमन्त्री के हाथ में हो या नहीं, फिर भी अन्तिम रूप से | विदेश नीति का निर्णय प्रधानमन्त्री ही करता है। भारत की पुट-निरपेक्षता की विदेश नीति भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू जी की ही देन है।

9. शासन का प्रमुख प्रवक्ता– 
देश तथा विदेश में प्रधानमन्त्री ही शासन की नीति को प्रमुख तथा अधिकृत प्रवक्ता होता है। यदि कभी संसद में किन्हीं दो मन्त्रियों के आपसी विरोधी वक्तव्यों के कारण भ्रम और विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो प्रधानमन्त्री का वक्तव्य ही इस स्थिति को समाप्त कर सकता है।

10. देश का सर्वोच्च नेता तथा शासक- 
प्रधानमन्त्री देश का सर्वोच्च नेता तथा शासक होता है। देश का समस्त शासन उसी की इच्छानुसार संचालित होता है। यह व्यवस्थापिका से अपनी इच्छानुसार कानून
बनवा सकता है और संविधान में आवश्यक संशोधन भी करवा सकता है।

11. आम चुनाव प्रधानमन्त्री के नाम पर-
देश के आम चुनाव (सामान्य निर्वाचन) प्रधानमन्त्री के नाम पर ही कराये जाते हैं। आम चुनाव प्रधानमन्त्री का ही चुनाव होता है। इस प्रकार आम चुनाव | स्वाभाविक रूप से प्रधानमन्त्री की प्रतिष्ठा व शक्ति में बहुत वृद्धि कर देते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रधानमन्त्री (UPBoardSolutions.com) राष्ट्र का नेता होता है; क्योंकि देश के शासन की सम्पूर्ण बागडोर उसके हाथ में होती है। व्यावहारिक दृष्टि से देश का समस्त शासन उसी की इच्छानुसार संचालित होता है।

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प्रश्न 3.
भारतीय प्रधानमन्त्री के राष्ट्रपति और संसद से सम्बन्ध का वर्णन कीजिए।
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् तथा लोकसभा के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
संसदीय शासन-प्रणाली के अन्तर्गत मन्त्रिपरिषद् ही व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका की प्रधान होती है; क्योकि प्रधानमन्त्री मन्त्रिपरिषद् का प्रमुख होता है; अत: प्रधानमन्त्री का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। भारत में संसदीय प्रणाली होने के कारण, भारत के प्रधानमन्त्री का पद भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारत के राष्ट्रपति की स्थिति ग्रेट ब्रिटेन के राजा अथवा रानी के समान है। वह एक वैधानिक प्रधान- मात्र है।

डॉ० अम्बेडकर के अनुसार, “वह राष्ट्र का प्रमुख है, कार्यपालिका का प्रमुख नहीं।” राष्ट्रपति अपने में निहित सभी शक्तियों का प्रयोग, मन्त्रिपरिषद् के परामर्श के उपरान्त ही करता है। भारतीय व्यवस्था में संसद का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संसद ही सम्पूर्ण व्यवस्था के नियमन के लिए उत्तरदायी होती है। परन्तु भारत में संसद पूर्ण रूप से अप्रतिबन्धित नहीं है। इसका प्रमुख कारण प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिमण्डल का संसद पर दबाव बना रहना है।

प्रधानमन्त्री एवं राष्ट्रपति का सम्बन्ध– भारत में कार्यपालिका का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। सैद्धान्तिक दृष्टि से प्रधानमन्त्री की मन्त्रिपरिषद् का गठन उसको परामर्श देने के लिए किया जाता है; किन्तु वास्तविक स्थिति इसके विपरीत है। मन्त्रिपरिषद् के निर्णय एवं परामर्श राष्ट्रपति को मानने पड़ते हैं। यद्यपि राष्ट्रपति इनके सम्बन्ध में अपनी व्यक्तिगत असहमति प्रकट कर सकता है; किन्तु वह मन्त्रिपरिषद् के निर्णयों को मानने के लिए (UPBoardSolutions.com) अन्ततः बाध्य होता है। भारतीय संविधान में किये गये 42वें तथा 44वें संशोधन के पूर्व राष्ट्रपति अपनी मन्त्रिपरिषद् की राय मानने के लिए कानूनी दृष्टिकोण से बाध्य था। इन संशोधनों के उपरान्त व्यवस्था यह कर दी गयी है कि राष्ट्रपति को अपनी मन्त्रिपरिषद् की राय मानने के लिए विवश कर दिया गया है। वह केवल मन्त्रिमण्डल से पुनर्विचार के लिए आग्रह ही कर सकता है, किन्तु फिर भी वह मन्त्रिपरिषद् की नीतियों को प्रभावित कर सकता है, यह उसके व्यक्तित्व पर निर्भर है। मन्त्रिपरिषद् में लिये गये समस्त निर्णयों से राष्ट्रपति को अवगत कराया जाता है तथा राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल से किसी भी प्रकार की सूचना माँग सकता है। प्रधानमन्त्री की सलाह पर वह अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनको शपथ-ग्रहण कराता है। प्रधानमन्त्री के परामर्श पर वह किसी भी मन्त्री को पदच्युत कर सकता है।

प्रधानमन्त्री और संसद का सम्बन्ध– प्रधानमन्त्री और संसद के घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। प्रधानमन्त्री व उसकी मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा (संसद का प्रथम सदन) के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद प्रश्न, पूरक प्रश्न, निन्दा प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव आदि के द्वारा प्रधानमन्त्री एवं उसके मन्त्रिमण्डल पर नियन्त्रण रखती है। संविधान द्वारा भारत में संसदात्मक शासन-व्यवस्था अपनायी गयी है और संसदात्मक शासन में व्यवस्थापिका और (UPBoardSolutions.com) कार्यपालिका परस्पर सम्बन्धित होती हैं तथा कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। उत्तरदायित्व का अर्थ है कि प्रधानमन्त्री और उसकी मन्त्रिपरिषद् संसद (लोकसभा) के. अधीन है। वह उसकी इच्छानुसार ही कार्य करता है और उस समय तक ही अपने पद पर बना रह सकता है। जब तक कि उसे लोकसभा में बहुमत का विश्वास प्राप्त हो।

व्यावहारिक दृष्टि से संसद प्रधानमन्त्री और उसकी मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण नहीं रखती, क्योंकि प्रधानमन्त्री बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और उसके पीछे संसद का बहुमत साधारणतया सदैव रहता है। संसद पर प्रधानमन्त्री के नियन्त्रण का एक महत्त्वपूर्ण साधन प्रधानमन्त्री के हाथ में लोकसभा को भंग करने की संस्तुति का अधिकार है। राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री के परामर्श पर लोकसभा को भंग कर पुनः चुनाव करा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व का क्या अर्थ है ? [2012]
           या
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् किस प्रकार संसद के प्रति उत्तरदायी है ? [2013]
           या
मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है? [2014]
           या
मन्त्रियों के सामूहिक उत्तरदायित्व’ का क्या अर्थ है ? मन्त्रिपरिषद् किसके प्रति उत्तरदायी है ? [2013]
उत्तर :
भारत में संसदात्मक शासन-प्रणाली की व्यवस्था की गयी है और संसदात्मक शासन-प्रणाली में मन्त्रिपरिषद् को सामूहिक उत्तरदायित्व रहता है। सामूहिक उत्तरदायित्व से मतलब है कि मन्त्रिपरिषद् के सदस्य सभी मन्त्री अपने कार्यों के लिए संसद के प्रति व्यक्तिगत रूप से (UPBoardSolutions.com) तो उत्तरदायी होते ही हैं, सामूहिक रूप से भी प्रशासनिक नीति और समस्त प्रशासनिक कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सम्पूर्ण मन्त्रिपरिषद् एक इकाई के रूप में कार्य करती है, जिससे सभी मन्त्री एक-दूसरे के निर्णय और कार्य के लिए उत्तरदायी होते हैं। अतः कहा जा सकता है कि मन्त्रिमण्डल की सफलता या असफलता का भार एक मन्त्री पर नहीं पड़ता, वरन् सभी मन्त्रियों पर पड़ता है अर्थात् वे एक साथ तैरते हैं। और एक साथ ही डूबते हैं।

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प्रश्न 2.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद पर संसद किस प्रकार नियन्त्रण रखती है ?
           या
संसद मन्त्रिपरिषद् पर कैसे नियन्त्रण रखती है ? इसके द्वारा अपनाये जाने वाले किन्हीं तीन तरीकों का उल्लेख कीजिए। [2015]
उत्तर : केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् संसद के प्रति उत्तरदायी है; अत: संसद उस पर अग्रलिखित प्रकार से नियन्त्रण रखती है।

1. संसद-सदस्य मन्त्रिपरिषद् के कार्यों एवं नीतियों की आलोचना करते हैं।
2. मन्त्रिपरिषद् द्वारा पेश किये गये वित्तीय विधेयकों पर संसद (UPBoardSolutions.com) की पूर्ण नियन्त्रण रहता है।
3. मन्त्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति भी उत्तरदायी होती है, क्योंकि संसद में अविश्वास पारित होने पर । मन्त्रिपरिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है।
4. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, प्रश्नों तथा पूरक प्रश्नों द्वारा संसद मन्त्रिपरिषद् पर पूर्णत: नियन्त्रण रखती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के प्रथम प्रधानमंन्त्री का नाम बताइए। [2009, 11]
उत्तर :
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री-पं० जवाहरलाल नेहरू।

प्रश्न 2.
मन्त्रियों की कितनी श्रेणियाँ होती हैं ?
उत्तर :
मन्त्रियों की तीन श्रेणियाँ होती हैं।

प्रश्न 3.
कौन-से संविधान संशोधन द्वारा मन्त्रिपरिषद् में सदस्यों की संख्या सीमित कर दी गयी है?
उत्तर :
91वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा मन्त्रिपरिषद् में सदस्यों की संख्या सीमित कर दी गयी है।

प्रश्न 4.
संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य क्या है ?
उतर :
संविधान के अनुसार मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण कार्य देश तथा विदेश के लिए शासन सम्बन्धी नीतियों का निर्धारण करना है तथा राष्ट्रपति को परामर्श देना है।

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प्रश्न 5.
भारत में कुल कितने राज्य हैं ? हाल में ही नये बनाए गए राज्य की राजधानी का नाम लिखिए। (2015)
उत्तर :
भारत में कुल 29 राज्य हैं। हाल में ही नये बनाए गए राज्य की राजधानी हैदराबाद है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् में अधिक-से-अधिक कितने मंत्री हो सकते हैं ? उनकी नियुक्ति कौन करता है ? (2015)
उत्तर :
सरकार में जितने भी प्रकार के मन्त्री बनाये जाते हैं वे संयुक्त रूप से मन्त्रिपरिषद् का निर्माण करते हैं जिनका प्रधान प्रधानमंत्री होता है। मन्त्रिपरिषद् में तीन प्रकार के मन्त्री होते हैं-मन्त्रिमण्डल अथवा कैबिनेट स्तर के मन्त्री, राज्य (UPBoardSolutions.com) मन्त्री तथा उपमन्त्री।

मन्त्रिपरिषद् में मन्त्रियों की संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के अधिकतम 15% तक हो सकती है। इनकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री की सलाह पर राष्ट्रपति करता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. प्रधानमन्त्री की नियुक्ति करता है

(क) राष्ट्रपति
(ख) लोकसभा अध्यक्ष
(ग) उपराष्ट्रपति
(घ) जनता

2. मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है? (2014]

(क) लोकसभा के प्रति
(ख) प्रधानमन्त्री के प्रति
(ग) उपराष्ट्रपति के प्रति
(घ) इनमें से कोई नहीं

3. मन्त्रिपरिषद्का अध्यक्ष कौन होता है?

(क) राष्ट्रपति
(ख) उपराष्ट्रपति
(ग) प्रधानमन्त्री
(घ) लोकसभा अध्यक्ष

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4. यदि मन्त्रिपरिषद् की कोई सदस्य संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं है, तो वह . अधिकतम कितने दिनों तक मन्त्री रह सकता है?

(क) 2 माह
(ख) 6 माह
(ग) 10 माह
(घ) एक वर्ष

5. दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमन्त्री कौन थे ? (2014)

(क) लाल बहादुर शास्त्री
(ख) मोरारजी देसाई
(ग) चरण सिंह
(घ) गुलजारी लाल नन्दा

6. भारत का प्रधानमन्त्री किसके प्रति उत्तरदायी होता है? (2017)

(क) राष्ट्रपति के प्रति ।
(ख) राज्यसभा के प्रति
(ग) लोकसभा के प्रति
(घ) सर्वोच्च न्यायालय के प्रति

उत्तरमाला
1.
(क), 2. (क), 3. (ग), 4. (ख), 5. (ग)

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy (उर्जा के स्रोत)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy.

पाठगत हल प्रश्न

[NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खंड 14.1 (पृष्ठ संख्या 273)

प्रश्न 1.
ऊर्जा का उत्तम स्रोत किसे कहते हैं?
उत्तर
ऊर्जा का उत्तम स्रोत वह है, जो

  1. प्रति एकांक आयतन अथवा प्रति एकांक द्रव्यमान अधिक कार्य करे।
  2. जो आसानी से उपलब्ध हो।
  3. भंडारण तथा परिवहन में आसान हो।
  4. वह सस्ता हो।
  5. जलने पर प्रदूषण न फैलाए।

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प्रश्न 2.
उत्तम ईंधन किसे कहते हैं?
उत्तर
उत्तम ईंधन में निम्नलिखित गुण होने चाहिए-

  1. दहन के बाद प्रति एकांक द्रव्यमान से अधिक ऊष्मा मुक्त हो।
  2. यह आसानी से, सस्ती दर पर उपलब्ध हो।
  3. जलने पर अत्यधिक (UPBoardSolutions.com) धुआँ उत्पन्न न करे।
  4. इसका ज्वलन ताप उपयुक्त हो तथा ऊष्मीय मान उच्च हो।।

प्रश्न 3.
यदि आप अपने भोजन को गर्म करने के लिए किसी भी ऊर्जा-स्रोत का उपयोग कर सकते हैं, तो आप किसका उपयोग करेंगे और क्यों?
उत्तर
हम LPG गैस या विद्युतीय उपकरण का उपयोग करेंगे क्योंकि

  1. इससे अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है।
  2. इसके दहन से धुआँ नहीं निकलता है।
  3. यह आसानी से उपलब्ध है तथा इसका उपयोग सुगमतापूर्वक किसी भी समय किया जा सकता है।
  4. यह सस्ता है तथा इसका भंडारण एवं परिवहन आसानी से किया जा सकता है।
  5. इससे वांछित ऊर्जा आवश्यकतानुसार प्राप्त कर सकते हैं।

खण्ड 14.2 (पृष्ठ संख्या 279)

प्रश्न 1.
जीवाश्मी ईंधन की क्या हानियाँ हैं?
उत्तर
जीवाश्मी ईंधन के उपयोग से निम्नलिखित हानियाँ हैं

  1. जीवाश्मी ईंधन बनने में करोड़ों वर्ष लगते हैं तथा इनके भंडार सीमित हैं।
  2. जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत हैं।
  3. जीवाश्मी ईंधन जलने से वायु प्रदूषण होता है, जिसके फलस्वरूप कार्बन, नाइट्रोजन और सल्फर के अम्लीय आक्साइड; जैसे–CO2, NO2, SO2 आदि गैसें मुक्त होती हैं, जो अम्लीय वर्षा कराती हैं तथा जल (UPBoardSolutions.com) एवं मृदा के संसाधनों को प्रभावित करती हैं।
  4. अतिरिक्त CO2 के कारण ग्रीन हाउस प्रभाव होता है।
  5. वायु प्रदूषण के कारण श्वसन संबंधी रोग होते हैं।

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प्रश्न 2.
हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर क्यों ध्यान दे रहे हैं?
उत्तर
हम जानते हैं कि जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत हैं। अतः इन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। पृथ्वी के गर्भ में कोयले, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि ईंधन सीमित मात्रा में मौजूद हैं। यदि हम इनका उपयोग इसी प्रकार करते रहे तो ये शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे। अतः हमें ऊर्जा के संकट से निपटने हेतु वैकल्पिक स्रोतों की ओर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारी सुविधा के लिए पवन तथा जल ऊर्जा के पारंपरिक उपयोग में किस प्रकार के सुधार किए गए हैं?
उत्तर

  1. किसी एक पवन-चक्की द्वारा उत्पन्न विद्युत बहुत कम होती है जिसका व्यापारिक उपयोग नहीं हो सकता। अतः किसी विशाल क्षेत्र में बहुत-सी पवन चक्कियाँ लगाई जाती हैं तथा इन्हें युग्मित कर लिया जाता है, जिसके कारण प्राप्त कुल (नेट) ऊर्जा सभी पवन-चक्कियों द्वारा उत्पन्न विद्युत ऊर्जाओं के योग के तुल्य हो जाती है।
  2. जल विद्युत उत्पन्न करने हेतु नदियों के बहाव (UPBoardSolutions.com) को रोक कर बड़े जलाशयों (कृत्रिम झीलों) में जल एकत्र करने के लिए ऊँचे-ऊँचे बाँध बनाए जाते हैं। बाँध के ऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल, बाँध के आधार के पास स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिराया जाता है, फलस्वरूप टरबाइन के ब्लेड घूर्णन गति करते हैं और
    जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन होता है।

खंड 14.3 ( पृष्ठ संख्या 285)

प्रश्न 1.
सौर कुकर के लिए कौन-सा दर्पण-अवतल, उत्तल अथवा समतल-सर्वाधिक उपयुक्त होता है? क्यों?
उत्तर
सौर कुकर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दर्पण-अवतल दर्पण होता है, क्योंकि यह एक अभिसारी दर्पण (Converging mirror) | है, जो सूर्य की किरणों को एक बिंदु पर फोकसित करता है, जिसके कारण शीघ्र ही इसका ताप और बढ़ जाता है।

प्रश्न 2.
महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जाओं की क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर
महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊजाओं की निम्न सीमाएँ हैं

  1. ज्वारीय ऊर्जा का दोहन सागर से किसी संकीर्ण क्षेत्र पर बाँध का निर्माण करके किया जाता है, परंतु इस प्रकार के स्थान बहुत कम हैं, जहाँ बाँध बनाए जा सकते हैं।
  2. तरंग ऊर्जा का वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों।
  3. ऊर्जा संयंत्रों (plant) के निर्माण की लागत बहुत (UPBoardSolutions.com) अधिक है और इनके द्वारा ऊर्जा उत्पादन की दक्षता का मान बहुत कम है।
  4. समुद्र में या समुद्र के किनारे स्थित विद्युत ऊर्जा संयंत्र के रखरखाव उच्चस्तरीय होनी चाहिए अन्यथा इसके क्षरण की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।

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प्रश्न 3.
भूतापीय ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर
पृथ्वी के अंदर गहराइयों में ताप परिवर्तन के फलस्वरूप कुछ पिघली चट्टानें ऊपर धकेल दी जाती हैं, जो कुछ क्षेत्रों में एकत्र हो जाती हैं। इन क्षेत्रों को तप्त स्थल कहते हैं। जब भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपर्क में आता है, तो भाप उत्पन्न होती है। (UPBoardSolutions.com) इन तप्त स्थलों से प्राप्त ऊष्मा या ऊष्मीय ऊर्जा भूतापीय ऊर्जा कहलाती है। इसे पाइपों द्वारा भी बाहर निकाला जाता है तथा उच्चदाब पर निकली इस भाप से टरबाइनों को घुमाकर जनित्र द्वारा विद्युत उत्पन्न की जा सकती है।

प्रश्न 4.
नाभिकीय ऊर्जा का क्या महत्त्व है?
उत्तर
नाभिकीय ऊर्जा के निम्नलिखित महत्त्व होते हैं

  1. बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। उदाहरण के लिए, यूरेनियम के 1 परमाणु के विखंडन से जो ऊर्जा मुक्त होती है, वह कोयले के 1 कार्बन परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊर्जा की तुलना में 1 करोड़ गुनी अधिक होती है।
  2. इससे किसी प्रकार का धुआँ या हानिकारक गैसें नहीं निकलतीं, जिससे वायु प्रदूषण नहीं होता है।
  3. यह ऊर्जा का शक्तिशाली स्रोत है तथा इसके द्वारा ऊर्जा की आवश्यकता का बड़ा भाग प्राप्त किया जा | सकता है।
  4. नाभिकीय विद्युत संयंत्र किसी भी स्थान पर स्थापित किए जा सकते हैं।

खंड 14.4( पृष्ठ संख्या 285)

प्रश्न 1.
क्या कोई ऊर्जा स्रोत प्रदूषण मुक्त हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर
हाँ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, समुद्रों से प्राप्त ऊर्जा तथा जल ऊर्जा प्रदूषण मुक्त होते हैं परंतु पूर्णत: नहीं। उदाहरण के लिए सौर-सेल जैसी कुछ युक्तियों का वास्तविक प्रचालन प्रदूषण मुक्त होता है परंतु इस युक्ति के संयोजन में पर्यावरण (UPBoardSolutions.com) की क्षति होती है।

प्रश्न 2.
रॉकेट ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता रहा है? क्या आप इसे CNG की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन मानते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर
हाँ, हाइड्रोजन, CNG की तुलना में स्वच्छ ईंधन है क्योंकि (UPBoardSolutions.com) हाइड्रोजन के दहन से केवल जल उत्पन्न होता है जबकि CNG में उपस्थित मिथेन के दहन से CO2 जैसी ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं।

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खंड 14.5 ( पृष्ठ संख्या 286)

प्रश्न 1.
ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर
नवीकरणीय ऊर्जा के दो स्रोत निम्न हैं

  1. सौर ऊर्जा-सौर ऊर्जा एक अनवरत ऊर्जा स्रोत है जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तथा इसका भंडार कभी खत्म नहीं हो सकता।
  2. जल विद्युत ऊर्जा-सूर्य के ताप के कारण जल चक्र (UPBoardSolutions.com) सदैव चलता रहता है, जिससे विद्युत संयंत्रों के जलाशय में जल पुनः भर जाते हैं, अतः यह एक सदैव चलने वाली (अक्षय) ऊर्जा स्रोत है। साथ ही उपर्युक्त दोनों ऊर्जा स्रोतों से किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता है।

प्रश्न 2.
ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप समाप्य मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर
कोयला और पेट्रोलियम दो समाप्य (Exhaustible) ऊर्जा के स्रोतों के उदाहरण हैं। ये दोनों जीवाश्मी ईंधन हैं, जो करोड़ों वर्षों में बने हैं तथा केवल सीमित भंडार ही शेष हैं। जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत हैं, जिन्हें पुनः नहीं बनाया जा सकता है। यदि इसी तरह इनका उपयोग करते रहेंगे, तो इनके भंडार शीघ्र ही खत्म हो जाएँगे।

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पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

[NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्रश्न 1.
गर्म जल प्राप्त करने के लिए हम सौर जल तापक का उपयोग किस दिन नहीं कर सकते? |
(a) धूप वाले दिन ।
(b) बादलों वाले दिन
(c) गर्म दिन
(d) पवन (वायु) वाले दिन
उत्तर
(d) बादलों वाले दिन ।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत का उदाहरण नहीं है?
(a) लकड़ी
(b) गोबर गैस
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) कोयला
उत्तर
(c) नाभिकीय ऊर्जा

प्रश्न 3.
जितने ऊर्जा स्रोत हम उपयोग में लाते हैं, उनमें से अधिकांश सौर ऊर्जा को निरूपित करते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत अंतत: सौर ऊर्जा से व्युत्पन्न नहीं है?
(a) भूतापीय |
(b) पवन ऊर्जा
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) जैवमात्रा
उत्तर
(c) नाभिकीय ऊर्जा

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प्रश्न 4.
ऊर्जा स्रोत के रूम में जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy img-1

प्रश्न 5.
जैवमात्रा तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में जल वैद्युत की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 14 Sources of Energy img-2

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में ऊर्जा निष्कर्षित करने की सीमाएँ लिखिए
(a) पवनें
(b) तरंगें
(c) ज्वार-भाटा
उत्तर
(a) पवन ऊर्जा की सीमाएँ

  1. इसके संयंत्र केवल उसी स्थान पर स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ ज्यादातर सालभर तीव्र हवा चलती है।
  2. पवन ऊर्जा फार्म के लिए विशाल भूखंड तथा (UPBoardSolutions.com) अत्यधिक प्रारंभिक लागत की आवश्यकता होती है।
  3. टरबाइनों की गति बनाए रखने के लिए पवनों की न्यूनतम चाल 15mk/h से अधिक होनी चाहिए।
  4. इसके रखरखाव उच्चस्तरीय होना चाहिए, क्योंकि पवन चक्कियाँ धूप, वर्षा आदि से प्रभावित हो सकती हैं।
  5. इसकी दक्षता कम होती है।

(b) तरंग ऊर्जा की सीमाएँ

  1. तरंग ऊर्जा का सिर्फ वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें बहुत प्रबल हों।
  2. प्रारंभिक लागत, रखरखाव का खर्च अधिक है तथा तकनीकी दृष्टि से कठिन भी है।
  3. इससे लगातार एक-समान विद्युत शक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती है।
  4. इसकी दक्षता निम्न होती है।

(c) ज्वार-भाटा-

  1. ज्वारीय ऊर्जा का दोहन हम सागर के किसी संकीर्ण क्षेत्र पर बाँध का निर्माण करके कर सकते हैं। ऐसे बाँध सिर्फ सीमित स्थानों पर ही बनाए जा सकते हैं।
  2. इसकी दक्षता बहुत निम्न है।
  3. इसके प्लांट की लागत अधिक है।
  4. ज्वार आने की आवृत्ति कम है। अतः इस ऊर्जा का प्रयोग सीमित है।

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प्रश्न 7.
ऊर्जा स्रोतों का वर्गीकरण निम्नलिखित वर्गों में किस आधार पर करेंगे
(a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय
(b) समाप्य तथा अक्षय क्या
(c) तथा
(d) के विकल्प समान हैं?
उत्तर
(a) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत वे होते हैं, जिसका प्रयोग बार-बार करने के बाद भी स्रोत में कमी नहीं आए। वे पुनः प्राप्त हो जाते हैं तथा इसका भंडार अक्षय रहता है; जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा इत्यादि।

(b) ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत वे हैं, जिनको एक बार प्रयुक्त कर लेने पर पुनः तुरंत नहीं बनाया जा सकता इसे बनाने में करोड़ों वर्ष लग जाते हैं अर्थात् यदि इसी प्रकार तथा इसी दर से प्रयोग किया जाए, तो यह संभावना है कि निकट भविष्य (UPBoardSolutions.com) में कभी भी इसके भंडार समाप्त हो सकते हैं। ऐसे स्रोत जे खत्म हो सकते हैं समाप्य स्रोत कहलाते हैं। जैसे-जीवाश्मी ईंधन (कोयला, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस)। अतः (a) और (b) के विकल्प समान हैं क्योंकि ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत अक्षय हैं, परंतु अनवीकरणीय स्रोत समाप्य स्रोत हैं।

प्रश्न 8.
ऊर्जा के आदर्श स्रोत में क्या गुण होते हैं?
उत्तर
एक आदर्श स्रोत के निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  1. उस ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करने में सरलता हो।
  2. उस ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा, प्राप्त करना सस्ता हो।
  3. स्रोत से प्राप्त ऊर्जा का भंडारण और परिवहन आसानी से किया जा सके।
  4. इसका उच्च ऊष्मीय मान तथा उपयुक्त ज्वलन ताप होनी चाहिए।
  5. उस ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करने की दक्षता उच्च होनी चाहिए।
  6. इससे पर्यावरण को क्षति नहीं होनी चाहिए।
  7. दहन के बाद प्रति एकांक द्रव्यमान से अधिक ऊष्मा मुक्त हो।

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प्रश्न 9.
सौर कुकर का उपयोग करने के क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? क्या ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकरों की सीमित उपयोगिता है?
उत्तर
सौर कुकर के लाभ-

  1. सौर कुकर के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता है।
  2.  इसमें ईंधन की लागत शून्य है।
  3. खाना बनाने के बाद राख या अपशिष्ट नहीं बनता है।
  4. भोजन का पोषक तत्व नष्ट नहीं होता है।
  5. यह सस्ता है एवं इसका इस्तेमाल भी सरल है।
  6.  सौर कुकर में एक समय में (UPBoardSolutions.com) चार खाद्य पदार्थ पकाए जा सकते हैं।
  7. इसके रखरखाव पर कोई लागत नहीं आती।

सौर कुकर की सीमाएँ-

  1. सौर कुकर द्वारा रात के समय भोजन नहीं पकाया जा सकता।
  2. खराब मौसम में सौर कुकर में भोजन नहीं पकाया जा सकता है।
  3. इसमें खाना बनाने की प्रक्रिया धीमी है।
  4. यह हर प्रकार के भोजन बनाने के लिए उपयुक्त नहीं है।
  5. सिर्फ़ तेज धूप में ही इसका उपयोग किया जा सकता है।
  6. अधिक उच्च ताप पर खाना बनाना; जैसे-तलना इत्यादि संभव नहीं है।

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प्रश्न 10.
ऊर्जा की बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम क्या हैं? ऊर्जा की खपत को कम करने के उपाय लिखिए।
उत्तर
ऊर्जा की बढ़ती माँग की पूर्ति ज्यादातर जीवाश्म ईंधनों कोयला और पेट्रोलियम द्वारा पूरी की जाती है। परंतु ये स्रोत अनवीकरणीय एवं समाप्य हैं।

इसके दहन से वायुमंडल में प्रदूषण होता है। SO2, NO2 आदि गैसें मुक्त होती हैं, जिससे अम्लीय वर्षा होती है, जिसके कारण जल तथा मृदा के संसाधन प्रभावित होते हैं। इमारतों, लोहे की वस्तुओं, पुल इत्यादि को संक्षरित कर देते हैं। CO2 गैस (UPBoardSolutions.com) ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ जाता है तथा हिम के पिघलने पर समुद्र तल बढ़ता है। समुद्रीय तट पर स्थित क्षेत्र तथा टापुओं के डूबने का खतरा बढ़ जाता है। वायुमंडल में कोयले तथा पेट्रोलियम के दहन से अवांछनीय कण जैसे-शीशा (lead) धूल कण इत्यादि बढ़ जाते हैं। इस तरह हमारे परिस्थितिक तंत्र के नष्ट हो जाने का भय होता है।
ऊर्जा की खपत कम करने के उपाय-

  1. नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों का उपयोग अधिक-से-अधिक करना; जैसे-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा इत्यादि।
  2. कोयले के स्थान पर ग्रामीण क्षेत्रों में बायो गैस का प्रयोग करना।
  3. विद्युत उपकरणों को अनावश्यक रूप से नहीं चलाना चाहिए।
  4. सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का अधिक-से-अधिक उपयोग करना।
  5. वाहनों में CNG का प्रयोग करना।
  6. रेड लाइटों पर इंजन बंद कर देना।

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UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 16 Management of Natural Resources

UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 16 Management of Natural Resources (प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन)

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पाठगत हल प्रश्न [NCERT IN-TEXT QUESTIONS SOLVED]

खंड 16.1 (पृष्ठ संख्या 302)

प्र 1. पर्यावरण-मित्र बनने के लिए आप अपनी आदतों में कौन-से परिवर्तन ला सकते हैं?
उत्तर- निम्न आदतों में परिवर्तन लाकर हम पर्यावरण मित्र बन सकते हैं –

  • पॉलिथीन बैग के स्थान पर कपड़े या जूट के बैग का प्रयोग करके।
  • बिजली के पंखे, टी.वी. एवं बल्ब को अनावश्यक तरीके से उपयोग नहीं करके।
  • पेपर, प्लास्टिक, शीशा तथा धातुओं से बनी वस्तुओं को पुनः चक्रण के लिए भेज कर।
  • प्रतिवर्ष कुछ वृक्ष लगाने (UPBoardSolutions.com) का संकल्प लेकर।
  • वन्य जीवों से प्राप्त सामानों का बहिष्कार करके।
  • कम दूरी जैसे : स्कूल की स्थिति में पैदल चलकर/साइकिल का प्रयोग करके।
  • पानी के अनावश्यक बहाव तथा खर्च को कम करके।
  • कचरे को सड़क के किनारे न फेंककर।।

प्र 2. संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य के परियोजना के क्या लाभ हो सकते हैं?
उत्तर- संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि वाली परियोजनाएँ वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। इससे तत्काल भोजन, पानी तथा ऊर्जा की पूर्ति होती है, परंतु यह परियोजना पर्यावरण को क्षति पहुँचा सकती है।

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प्र 3. यह लाभ, लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजनाओं के लाभ से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर- लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजनाओं का उद्देश्य संपोषित विकास तथा पर्यावरण संरक्षण की संकल्पना पर आधारित है। संपोषित विकास में मनुष्य की वर्तमान आधारभूत आवश्यकताओं के साथ-साथ भावी संतति के लिए संसाधनों का संरक्षण भी निहित होता है। प्रदूषण नियंत्रण पर भी ध्यान रखा जाता है।

प्र० 4. क्या आपके विचार में संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए? संसाधनों के समान वितरण के विरुद्ध कौन-कौन सी ताकतें कार्य कर सकती हैं?
उत्तर- हाँ, संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए ताकि प्रत्येक व्यक्ति को इसका लाभ मिले, चाहे वे अमीर हों या गरीब। सभी को सस्ते तथा सुगम तरीके से संसाधन उपलब्ध हो सकें। संसाधनों के समान वितरण के विरुद्ध कुछ मुट्ठीभर अमीर (UPBoardSolutions.com) एवं ताकतवर लोग हैं, जो इसका दोहन अपने निजी लाभ के लिए करना चाहते हैं।

खंड 16.2 (पृष्ठ संख्या 306)

प्र 1. हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण क्यों करना चाहिए?
उत्तर- वनों का संरक्षण आवश्यक है क्योंकि यह हमारे लिए अनेक प्रकार से उपयोगी है

  • वनों से हमें इमारती लकड़ी (टिम्बर), गोंद, कागज़, लाख, दवाई तथा खेल के उद्योगों को कच्चे माल प्राप्त होते हैं।
  • वन मृदा अपरदन (soil erosion) तथा बाढ़ (flood) को रोकने में सहायता करता है।
  • जलचक्र बनाए रखने तथा वर्षा कराने में वन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
  • वन प्राकृतिक रूप से जंगली जानवरों, पक्षियों आदि को निवास स्थान (habital) प्रदान करता है।
  • जैव विविधता तथा पर्यावरण संतुलन के लिए वनों का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है।

वन्य जीव संरक्षण आवश्यक है क्योंकि-

  • पर्यावरण संतुलन कायम करता है।
  • जंगली मांसाहारी जानवर शाकाहारी जानवरों को खाते हैं, जिससे घास एवं छोटे पौधों का अस्तित्व कायम रहता है तथा वन एवं वनस्पति के रहने से पर्याप्त वर्षा होती है।
  • जंगलों को साफ़ रखने तथा बीजों को एक जगह (UPBoardSolutions.com) से दूसरी जगह तक ले जाने में सहायता करता है, जिससे नए पौधे वृद्धि करते हैं।
  • घास चरने से भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है।
  • विभिन्न स्पीशीज़ के जीव-जंतुओं से जैव विविधता आती है, जो पारिस्थितिक स्थायित्व के लिए जरूरी होता है।

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प्र 2. वनों के संरक्षण के लिए कुछ उपाय सुझाइए।
उत्तर- वनों के संरक्षण के कुछ उपाय निम्न हैं –

  • टिम्बर तथा जलावन की लकड़ी के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा देनी चाहिए तथा इसे एक दंडनीय अपराध के अंतर्गत लाना चाहिए।
  • जंगलों में लगने वाले आग को रोकने तथा नियंत्रित करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।
  • स्थानीय समुदायों को जंगलों के संरक्षण के लिए शामिल करना चाहिए। इससे उन्हें रोजगार भी मिलेगा तथा वनों का संरक्षण भी होगा।
  • स्टेकहोल्डरों (दावेदारों) को वनों के संरक्षण (UPBoardSolutions.com) के प्रति जिम्मेदारीपूर्वक आगे आना चाहिए।
  • राष्ट्रीय उद्यान एवं वनों में भेड़ एवं अन्य जानवरों को चराने (grazing) पर रोक लगानी चाहिए।
  • अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए।
  • जीवाश्म ईंधन का कम से कम उपयोग करें।

खंड 16.3 (पृष्ठ संख्या 310)

प्र 1. अपने निवास क्षेत्र के आस-पास जल संग्रहण की परंपरागत पद्धति का पता लगाइए।
उत्तर- भारत वर्ष के विभिन्न राज्यों में जल संग्रहण की पद्धति (तरीका) भिन्न-भिन्न होती है। यहाँ कुछ राज्यों की पद्धतियाँ निम्न हैं

  • महाराष्ट्र – बंधारस एवं ताल
  • कर्नाटक, – कट्टा
  • बिहार – अहार तथा पाइन
  • MP और UP – बंधिस
  • हिमाचल प्रदेश – कुल्ह
  • राजस्थान – खादिन, बड़े पात्र, एवं नाड़ी
  • दिल्ली – बावड़ी तथा तालाब
  • जम्मू के काँदी क्षेत्र में – तालाब
  • केरल – सुरंगम।
  • तमिलनाडु – एरिस (Tank)

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प्र० 2. इस पद्धति की पेय जल व्यवस्था (पर्वतीय क्षेत्रों में, मैदानी क्षेत्र अथवा पठार क्षेत्र) से तुलना कीजिए।
उत्तर- पर्वतीय क्षेत्रों में जल व्यवस्था मैदानी क्षेत्रों से बिलकुल भिन्न होती है। उदाहरण के लिए, हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में नहर सिंचाई की स्थानीय प्रणाली (व्यवस्था) का विकास हुआ जिसे कुल्ह कहा जाता है। झरनों से बहने वाले जल को मानव-निर्मित छोटी-छोटी नालियों से पहाड़ी पर स्थित निचले गाँवों तक ले जाया जाता है। कूल्हों में बहने वाले पानी का प्रबंधन गाँवों के निवासियों की आपसी सहमति से (UPBoardSolutions.com) किया जाता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत कृषि के मौसम में जल सबसे दूरस्थ गाँव को दिया जाता है। फिर उत्तरोत्तर ऊँचाई पर स्थित गाँव उस जल का उपयोग करते हैं। परंतु समतल (मैदानी) भूभाग में जल संग्रहण चेक डैम’ तलाबों, ताल तथा बंधिस में किया जाता है।

प्र० 3. अपने क्षेत्र में जल के स्रोत का पता लगाइए। क्या इस स्रोत से प्राप्त जल उस क्षेत्र के सभी निवासियों को उपलब्ध है?
उत्तर- हमारे क्षेत्र में जले के मुख्य स्रोत हैं
(i) भौमजल या भूमिगत जल
(ii) जल बोर्ड द्वारा आपूर्तित जल (ground water)
नहीं, गर्मी के दिनों में पानी की कमी हो जाती है तथा सभी लोगों को जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाता है, क्योंकि गर्मियों में भौमजल का स्तर नीचे खिसक जाता है तथा नदियाँ सूख जाती हैं। इन्हीं स्रोतों से जल बोर्डों को भी जल प्राप्त होते हैं।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न [NCERT TEXTBOOK QUESTIONS SOLVED]

प्र 1. अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए आप उसमें कौन-कौन से परिवर्तन सुझा सकते हैं?
उत्तर- अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए हम तीन R का प्रयोग करेंगे।

  1. कम उपयोग (Reduce) – इसका अर्थ है कि आपको कम से कम वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए; जैसे – बिजली के पंखे एवं बल्ब का स्विच बंद कर देना, खराब नल की मरम्मत करना, ताकि जल व्यर्थ न टपके आदि।
  2. पुनः चक्रण (Recycle) – इसका अर्थ है कि आपको प्लास्टिक, कागज़, काँच, धातु की वस्तुओं को कचरे के साथ नहीं फेंकना चाहिए, बल्कि पुनः चक्रण के लिए देना चाहिए।
  3. पुनः उपयोग (Reuse) – यह पुन:चक्रण से भी अच्छा तरीका है क्योंकि उसमें भी कुछ ऊर्जा व्यय होती है। यह एक तरीका है, जिसमें किसी वस्तु का उपयोग बार-बार किया जाता है। जैसे-लिफाफों को फेंकने की अपेक्षा फिर से उपयोग (UPBoardSolutions.com) करना, प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बों का उपयोग रसोई में करना, खराब बाल्टी से गमला बनाना, बोतलों तथा डिब्बों से कलमदान एवं सजावटी सामान बनाना इत्यादि।
    उपर्युक्त तरीकों के अलावा भी कुछ तरीके निम्न हैं

    • सौर ऊर्जा का उपयोग करना; जैसे-सौर जल ऊष्मक, सौर कुकर सौर पैनल इत्यादि।
    • बल्ब के स्थान पर CFLs का उपयोग करना।
    • अपने घर के आस-पास जल संग्रह नहीं होने दें तथा कूड़ा-कचरा सड़क के किनारे न फेकें।

प्र० 2. क्या आप अपने विद्यालय में कुछ परिवर्तन सुझा सकते हैं, जिनसे इसे पर्यानुकूलित बनाया जा सके?
उत्तर-

  • विद्यालय परिसर में अधिक से अधिक पेड़ लगाना चाहिए।
  • वर्षा जल संग्रहण (Rain water harvesting) करना।
  • स्कूल बस CNG से चलाना चाहिए न कि डीज़ल से।
  • विद्यालय परिसर में बागवानी को बढ़ावा देना चाहिए तथा वृक्ष से गिरी पत्तियों, भोजन के अपशिष्ट आदि से कम्पोस्ट बनाकर इस्तेमाल करना चाहिए।
  • छात्रों में 3R के प्रति जागरूकता लानी चाहिए, ताकि वे बिजली, (UPBoardSolutions.com) पानी का अनावश्यक उपयोग न करें। कागज़ को कूड़े में न फेंककर पुनः चक्रण के लिए एकत्र करना चाहिए।
  • जैव निम्नीकरणीय एवं अजैव निम्नीकरणीय कूड़े को अलग करना चाहिए तथा छात्रों को अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों को बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

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प्र० 3. इस अध्याय में हमने देखा कि जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने के अधिकार दिए जा सकते हैं? आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
उत्तर- वन एवं वन्य जंतुओं के चारों दावेदारों में से वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले स्थानीय लोग सर्वाधिक उपयुक्त हैं, क्योंकि वे सदियों से वनों का उपयोग संपोषित तरीकों से करते चले आ रहे हैं। वे वृक्षों के ऊपर चढ़कर कुछ शाखाएँ एवं पत्तियाँ (UPBoardSolutions.com) ही काटते हैं, जिससे समय के साथ-साथ उनका पुनः पूरण भी होता रहता है। इसके अनेक प्रमाण भी समाने आए हैं; जैसे-वनों के संरक्षण के लिए विश्नोई समुदाय का प्रयास, अराबाड़ी का सालवन समृद्ध हो गया तथा बेकार कहे जाने वाले वन का मूल्य 12.5 करोड़ आँका गया।

प्र० 4. अकेले व्यक्ति के रूप में आप निम्न के प्रबंधन में क्या योगदान दे सकते हैं।
(a) वन एवं वन्य जंतु
(b) जल संसाधन
(c) कोयला एवं पेट्रोलियम
उत्तर-
(a) वन एवं वन्य जंतु – कम से कम कागज का प्रयोग करके, कागज़ बर्बाद न करके, वनों एव वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए बने नियम का पालन करके, जानवरों के खाल (skin), हड्डियों (bons), सींग (horm), बाल (fur) तथा दाँतों (teeth) से बनी वस्तुओं को प्रयोग न करके इत्यादि।
(b) जल संसाधन – बहते हुए जल में मुँह धोना, स्नान करना आदि का परित्याग करके, स्नान करते समय फव्वारों की जगह बाल्टी या मग का प्रयोग करके, वाशिंग मशीन के जल का बाथरूम में प्रयोग करके, ख़राब नल को तुरंत ठीक करवा कर आदि।
(c) कोयला एवं पेट्रोलियम – बिजली के पंखे, बल्ब को अनावश्यक न चलने दें, स्विच ऑफ कर दें, कम दूरी के लिए स्कूटर, कार के स्थान पर साइकिल/पैदल का प्रयोग करके, CFLs (बल्ब की जगह) उपयोग करके, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों (UPBoardSolutions.com) का प्रयोग करके, रेड लाइट पर वाहनों को बंद करके, CNG का प्रयोग करके, निजी वाहनों के स्थान पर बसों, मेट्रो, रेल आदि का प्रयोग करके, AC तथा हीटर का प्रयोग कम करके इत्यादि।

प्र० 5. अकेले व्यक्ति के रूप में आप विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम करने के लिए क्या कर सकते हैं?
उत्तर- प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम निम्न तरीकों से की जा सकती है

  • बल्ब की जगह CFLs का प्रयोग कर (इससे कोयले की खपत कम होगी)।
  • अनावश्यक पंखे, बल्ब आदि का स्विच ऑफ करके, लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करके भी बिजली की खपत कम कर सकते हैं।
  • सौर कुकर, सौर जल ऊष्मक का प्रयोग करके कोयले, केरोसीन तथा LPG की बचत की जा सकती है।
  • छोटी दूरियों के लिए कार तथा स्कूटर की बजाय पैदल या साइकिल का उपयोग कर पेट्रोल की बचत की जा सकती है।
  • टपकने वाले नलों की मरम्मत कर हम पानी की बचत कर सकते हैं।
  • रेड लाइट पर कार या अन्य वाहनों को बंद करके पेट्रोल/डीजल की बचत की जा सकती है।
  • कागज, प्लास्टिक, धातुओं का पुनः चक्रण (Recyle) कर तथा पुन: उपयोग (Reuse) करके।

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प्र० 6. निम्न से संबंधित ऐसे पाँच कार्य लिखिए जो आपने पिछले एक सप्ताह में किए हैं
(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है।
उत्तर-
(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए मैंने निम्न कार्य किए

  • वृक्षारोपण पर ध्यान दिया।
  • विद्यालय जाने के लिए साइकिल (UPBoardSolutions.com) का प्रयोग किया या पैदल गया।
  • पानी, बिजली के अनावश्यक खपत को रोका।
  • कागज़ के लिफाफों, बोतलों, डिब्बों आदि का दोबारा प्रयोग किया।
  • पॉलीथीन बैग का प्रयोग बंद किया तथा पुन:चक्रण वाली वस्तुओं को एकत्र किया।

(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव निम्न तरीकों से बढ़ाया

  • स्नान करने के समय बाल्टी या मग के स्थान पर फव्वारे का इस्तेमाल।
  • ठंड के दिनों में कमरा गर्म रखने के लिए हीटर तथा गर्मी के दिनों में AC का प्रयोग करना न कि सौर ऊर्जा का।
  • स्कूल जाने के लिए स्कूटर या कार का उपयोग किया।
  • व्यर्थ पंखे, बल्ब, TV आदि चलते रहने के कारण।
  • अपने घर के आस-पास के पेड़-पौधों को काटकर।

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प्र 7. इस अध्याय में उठाई गई समस्याओं के आधार पर आप अपनी जीवन-शैली में क्या परिवर्तन लाना चाहेंगे, जिससे हमारे संसाधनों के संपोषण को प्रोत्साहन मिल सके?
उत्तर- हमें अवश्य ही अपनी जीवन-शैली में 3R की संकल्पना पर ध्यान देना होगा एवं लागू करना होगा। ये तीन R है

  • कम उपयोग (Reduce)
  • पुनः चक्रण (Recycle)
  • पुन: उपयोग (Reuse)

इसके आलावा भी कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाने की आवश्यकता है जो निम्न हैं

  • CNG का प्रयोग
  • CFLs का प्रयोग।
  • सौर ऊर्जा का प्रयोग
  • जानवरों की त्वचा, बाल एवं सींग (UPBoardSolutions.com) से बनी वस्तुओं का बहिष्कार
  • पॉलिथीन के स्थान पर जूट, कपड़े के बैग का इस्तेमाल
  • वृक्षारोपण पर बल देना इत्यादि।

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Science Chapter 16 are helpful to complete your homework.

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