UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name सूत-पुत्र
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
सूत-पुत्र’ नाटक की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2018, 16)
अथवा
‘सूत-पुत्र के प्रथम अंक का सारांश लिखिए। (2013, 12, 10)
उत्तर:
डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी’ द्वारा लिखित नाटक ‘सूत-पुत्र’ के प्रथम अंक का प्रारम्भ महर्षि परशुराम के आश्रम के दृश्य से होता है। धनुर्विद्या के आचार्य एवं श्रेष्ठ धनुर्धर परशुराम, उत्तराखण्ड में पर्वतों के बीच तपस्यालीन हैं।

परशुराम ने यह व्रत ले रखा है कि वे केवल ब्राह्मणों को ही धनुर्विद्या सिखाएँगे। सूत-पुत्र कर्ण की हार्दिक इच्छा है कि वह एक कुशल लक्ष्यवेधी धनुर्धारी बने। इसी उद्देश्य से वह परशुराम जी के आश्रम में पहुँचता है और स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशराम से धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त करने लगता है। इसी दौरान, एक दिन परशुराम कर्ण की अंधा पर सिर रखकर सोए रहते हैं, तभी एक कीड़ा कर्ण की जंघा को काटने लगता है, जिससे रक्तस्राव होता है। कर्ण उस दर्द को सहन करता है, क्योंकि वह अपने गुरु परशुराम की नींद नहीं तोड़ना चाहता। रक्तस्राव होने से परशुराम की नींद टूट जाती है और कर्ण की सहनशीलता को देखकर उन्हें उसके क्षत्रिय होने का सन्देह होता है। उनके पूछने पर कर्ण उन्हें सत्य बता देता है। परशुराम अत्यन्त क्रोधित होकर कर्ण को शाप देते हैं कि मेरे द्वारा सिखाई गई विद्या को तुम अन्तिम समय में भूल जाओगे और इसका प्रयोग नहीं कर पाओगे। कर्ण वहाँ से उदास मन से वापस चला आता है।

प्रश्न 2.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार संक्षेप में लिखिए। (2013, 12, 11, 10)
अथवा
द्रौपदी स्वयंवर की कथा ‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर लिखिए। (2013)
अथवा
द्रौपदी स्वयंवर की कथा ‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर लिखिए। (2013)
उत्तर:
‘सूत-पुत्र’ नाटक का द्वितीय अंक द्रौपदी के स्वयंवर से आरम्भ होता हैं। राजकुमार और दर्शक एक सुन्दर मण्डप के नीचे अपने-अपने आसनों पर विराजमान हैं। खौलते तेल के काहे के ऊपर एक खम्भे पर लगातार घूमने वाले चक्र पर एक मछली है। स्वयंवर में विजयी बनने के लिए तेल में देखकर उस मछली की आँख को बेधना है। अनेक राजकुमार लक्ष्य वेधने की कोशिश करते हैं और असफल होकर बैठ जाते हैं। प्रतियोगिता में कर्ण के भाग लेने पर राजा द्रुपद आपत्ति करते हैं और उसे अयोग्य घोषित कर देते हैं। दुर्योधन उसी समय कर्ण को अंग देश का राजा घोषित करता है।

इसके पश्चात् भी कर्ण का क्षत्रियत्व एवं उसकी पात्रता सिद्ध नहीं हो पाती और कर्ण निराश होकर बैठ जाता है। उसी समय ब्राह्मण वेश में अर्जुन एवं भीम सभा मण्डप में प्रवेश करते हैं। लक्ष्य बेध की अनुमति मिलने पर अर्जुन मछली की आँख वेध देते हैं तथा राजकुमारी द्रौपदी उन्हें वरमाला पहना देती हैं। अर्जुन द्रौपदी को लेकर चले जाते हैं। सूने सभा-मण्डप में दुर्योधन एवं कर्ण राह जाते हैं।

दुर्योधन कर्ण से द्रौपदी को बलपूर्वक छीनने के लिए कहता है, जिसे कर्ण नकार देता है। दुर्योधन ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन एवं भीम से संघर्ष करता है और उसे पता चल जाता है कि पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाकर मारने की उसकी योजना असफल हो गई है। कर्ण पाण्डवों को बड़ा भाग्यशाली बताता है। यहीं पर द्वितीय अंक समाप्त हो जाता हैं।

प्रश्न 3.
‘सूत-पुत्र’ नाटक में वर्णित कर्ण-कुन्ती संवाद का सारांश लिखिए। (2016)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए। (2011)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के तृतीय अंक में कर्ण-इन्द्र या कर्ण-कुन्ती संवाद का सारांश लिखिए। (2013, 12, 11, 10)
अथवा
सूतपुत्र’ नाटक के तीसरे अंक की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2018)
उत्तर:
अर्जुन एवं कर्ण दोनों देव-पुत्र हैं। दोनों के पिता क्रमशः इन्द्र एवं सूर्य को युद्ध के समय अपने-अपने पुत्रों के जीवन की रक्षा की चिन्ता हुई। तीसरे अंक की कथा इसी पर केन्द्रित है। यह अंक नदी के तट पर कर्ण की सूर्योपासना से प्रारम्भ होता है। कर्ण द्वारा सूर्य देव को पुष्पांजलि अर्पित करते समय सूर्य देव उसकी सुरक्षा के लिए उसे स्वर्ण के दिव्य कवच एवं कुण्डल प्रदान करते हैं। वे इन्द्र की भावी चाल से भी उसे सतर्क करते हैं तथा कर्ण को उसके पूर्व वृत्तान्त से परिचित कराते हैं, इसके अतिरिक्त वे कर्ण को उसकी माता का नाम नहीं बताते। कुछ समय पश्चात् इन्द्र अपने पुत्र अर्जुन की सुरक्षा हेतु ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण से उसका कवच-कुण्डल माँग लेते हैं। इसके बदले इंन्द्र कर्ण को एक अमोघ शक्ति वाला अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। इन्द्र के चले जाने के बाद गंगा तट पर कुन्ती आती है। वह कर्ण को बताती है कि वही उसका ज्येष्ठ पुत्र हैं। कर्ण कुन्ती को आश्वासन देता है कि वह अर्जुन के सिवा किसी अन्य पाण्डव को नहीं मारेगा। दुर्योधन का पक्ष छोड़ने सम्बन्धी कुन्ती के अनुरोध को कर्ण अस्वीकार कर देता है। कुन्ती कर्ण को आशीर्वाद देकर चली जाती है और इसी के साथ नाटक के तृतीय अंक का समापन हो जाता है।

प्रश्न 4.
सूत-पुत्र’ नाटक के अन्तिम (चतुर्थ) अंक की कथा संक्षेप में लिखिए। (2011)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ के चतुर्थ अंक के आधार पर सिद्ध कीजिए कि कर्ण युद्धवीर होने के साथ-साथ दानवीर भी था।
उत्तर:
डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी’ द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक के चौथे (अन्तिम) अंक की कथा का प्रारम्भ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से होता है। सर्वाधिक रोचक एवं प्रेरणादायक इस अंक में नाटक के नायक कर्ण की दानवीरता, वीरता, पराक्रम, दृढ़प्रतिज्ञ संकल्प जैसे गुणों का उद्घाटन होता है। अंक के प्रारम्भ में एक और श्रीकृष्ण एवं अर्जुन, तो दूसरी ओर कर्ण एवं शल्य हैं। शल्य एवं कर्ण में वाद विवाद होता है और शल्य कर्ण को प्रोत्साहित करने की अपेक्षा हतोत्साहित करता है। कर्ण एवं अर्जुन के बीच युद्ध शुरू होता है और कर्ण अपने बाणों से अर्जुन के रथ को पीछे धकेल देता है। श्रीकृष्ण कर्ण की वीरता एवं योग्यता की प्रशंसा करते हैं, जो अर्जुन को अच्छा नहीं लगता।।

कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फंस जाता है। जब वह पहिया निकालने की कोशिश करता है, तो श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण वर्षा प्रारम्भ कर देते हैं, जिससे कर्ण मर्मान्तक रूप से घायल हो जाता है और गिर पड़ता है। सन्ध्या हो जाने पर युद्ध बन्द हो जाता हैं। श्रीकृष्ण कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए युद्धभूमि में पड़े कर्ण से सोना माँगते हैं। कर्ण अपना सोने का दाँत तोड़कर और उसे जल से शुद्ध कर ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण को देता हैं। श्रीकृष्ण एवं अर्जुन अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण से लिपट जाते हैं और अर्जुन कर्ण का चरण-स्पर्श करते हैं। यहीं पर नाटक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 5.
नाट्य-कला की दृष्टि से ‘सूत-पुत्र’ नाटक की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
अपना नाट्य-कला की दृष्टि से सूत-पुत्र की समीक्षा कीजिए। (2011)
अथवा
नाट्य-कला की दृष्टि से ‘सूत-पुत्र’ नाटक की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2014, 13, 12, 11)
उत्तर:
नाटककार डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी’ ने ‘सूत पुत्र’ नाटक को कर्ण के जीवन चरित्र को आधार बनाकर लिखा है। नाट्य तत्त्वों के आधार पर इस नाटक की समीक्षा निम्न है- इस प्रश्न के उत्तर के लिए प्रश्न 7,8,9,10 को देखें।

प्रश्न 6.
‘सूत-पुत्र’ नाटक की कथावस्तु लिखिए। (2011, 10)
अथवा
‘सतूपुत्र’ नाटक के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि इसमें विभिन्न सामाजिक समस्याओं को उजागर किया गया है। (2018)
उत्तर:
‘महाभारत’ की कथा से सम्बन्धित प्रस्तुत नाटक एक ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें दानवीर कर्ण के जीवन काल की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित किया गया है। चार अंकों में विभाजित इस नाटक की कथा का आरम्भ कर्ण परशुराम संवाद से तथा कथा का विकास परशुराम द्वारा कर्ण को आश्रम से निकालने की घटना से होता हैं। इन्द्र द्वारा कवच-कुण्डल माँग लेने की घटना नाटक को चरम सीमा पर पहुंचाती है, जहाँ से कर्ण की पराजय निश्चित लगने लगती है। कुन्ती-कर्ण संवाद के समय नाटक अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुंचता है, जो विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ कर्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को प्रस्तुत करता है। कथानक सुसंगठित, लोक प्रसिद्ध एवं घटना प्रधान है। नाटक के सभी अंक एवं दृश्य एक-दूसरे से अच्छी तरह गुंथे हुए एक सूत्र में पिरोए गए हैं।

प्रस्तुत नाटक का कथानक हालाँकि महाभारत काल के ऐतिहासिक पात्रों एवं घटनाओं पर आधारित है, किन्तु लेखक ने इसे वर्तमान समाज में व्याप्त जाति एवं वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी कुरीतियों एवं विषमताओं को स्पष्ट रूप से सामने लाने का एक माध्यम बनाया है। नारी शिक्षा की समस्या, नारी की सामाजिक परिस्थिति में गिरावट, नारी समाज की विवशता एवं मजबूरियों आदि का चित्रण चमिान काल में भी विद्यमान समस्याओं की ओर ही इशारा करता है। ‘सूत पुत्र’ नाटक का देशकाल एवं वातावरण महाभारतकालीन है, जिसका चित्रण नाटककार ने अत्यन्त सफलतापूर्वक किया है। परशुराम को आश्रम, द्रुपद नरेश द्वारा आयोजितं स्वयंवर -सभा, युद्धभूमि आदि को तत्कालीन वातावरण के अनुरूप सृजित करने में नाटककार ने सफलता प्राप्त की है। नाटक में संवादों की योजना भी देशकाल एवं वातावरण को ध्यान में रखकर की गई हैं।

प्रश्न 7.
‘सूत-पुत्र’ नाटक की कथोपकथन/संवाद-योजना की दृष्टि से समीक्षा कीजिए। (2013)
उत्तर:
प्रस्तुत नाटक के कथोपकथन या संवाद पूर्णतः स्वाभाविक, सारगर्भित, बोधगम्य, सरल, स्पष्ट, मार्मिक एवं प्रवाहपूर्ण हैं। संवाद कहीं-कही संक्षिप्त हैं, तो कहीं कहीं लम्बे भी। नाटककार ने संवादों को पात्रानुकूल एवं आवश्यकतानुसार ही रखा है। अनावश्यक रूप से उनका कहीं भी विस्तार नहीं किया गया है। सरसता एवं भाव-अभिव्यंजना इस नाटक के संवादों के अन्य महत्त्वपूर्ण गुण हैं। संवाद तर्कप्रधान एवं पात्रों के चरित्र के विकास में सहायक हैं। प्रासंगिक कथाओं के चित्रण में नाटककार ने वार्तालाप का सहारा लेकर अपनी योग्यता, मौलिकता एवं कल्पना-शक्ति को अच्छा परिचय दिया है। नाटक में गीतों का प्रयोग भी हुआ है। स्वगत कथन अधिक हैं, जिससे नाटक के प्रवाह में कुछ रुकावट आती है। इसके अतिरिक्त नाटक के संवादों में कहीं भी शिथिलता नहीं है। इस तरह, संवाद योजना की दृष्टि से ‘सूत-पुत्र’ एक श्रेष्ठ नाटक है।

प्रश्न 8.
‘सूत-पुत्र’ नाटक की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। (2011)
उत्तर:
प्रस्तुत नाटक की भाषा सरल, स्वाभाविक एवं शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है। नाटक में हालाँकि संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है, किन्तु भाषा पाठकों के लिए कठिन एवं दुरूह नहीं है। पात्रों के अनुकूल नाटक की भाषा में चित्रात्मकता के दर्शन भी होते हैं। स्थान-स्थान पर सूक्ति, व्यंग्य एवं मुहावरों का प्रयोग मिलता है। शैली की दृष्टि से नाटक संवादात्मक एवं सम्भाषण प्रधान है। स्वगत शैली एवं काव्य शैली का प्रयोग भी हुआ है। प्रसाद तथा ओज गुण नाटक की शैली की विशेषता हैं। नाटक में वीर रस की प्रधानता है, इसलिए इसमें ओज गुण सर्वत्र द्रष्टव्य हैं। कहीं कहीं हास्य व्यंग्य का पुट भी परिलक्षित होता है। लक्ष्य बेधने में असफल एक राजा का स्वागत दर्शक इस प्रकार करते हैंपहला स्वर- विशालकाय जी! आप कड़ाहे तक गए, यही बहुत है। दूसरी स्वर- मोटे जी को कोई दु:ख नहीं है, अपनी असफलता की। नाटक की भाषा पूर्णतः सशक्त एवं प्रवाहमयी है।

प्रश्न 9.
अभिनय और रंगमंच की दृष्टि से ‘सूत-पुत्र’ की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
‘सूत-पुत्र’ नाटक अभिनय एवं रंगमंचीय दृष्टिकोण से अधिक श्रेष्ठ प्रतीत नहीं होता। यह नाटक चार अंकों में विभाजित है। चार अंकों का मंचन कुछ अधिक लम्बा हो जाता है। चौथे अंक में दृश्यों की संख्या तीन है। इस प्रकार मंच पर उसे अधिक सेट लगाने पड़ेंगे। इन कमियों के अतिरिक्त इसमें पात्रो, संवादों आदि के रंगमंचीय स्वरूप को ध्यान में रखा गया है। तकनीकी संवाद और संवाद सुबोधता का भी उचित ध्यान रखा गया हैं। पठनीयता की दृष्टि से यह नाटक अत्यधिक उपयुक्त है, लेकिन रंगमंचीयता की दृष्टि से लम्बे संवाद कहीं-कहीं असुविधाजनक हो गए हैं।

प्रश्न 10.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के उद्देश्य पर अपने विचार प्रकट कीजिए। (2015)
उत्तर:
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नाटककार का उद्देश्य महाभारतकालीन ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत करके वर्तमान भारतीय समाज की विसंगतियों की ओर पाठकों एवं दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करना है। नाटककार ने इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर नाटक में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अपनी कल्पना का सुन्दर समायोजन किया है, जिसे निम्न बिन्दुओं के रूप में समझा जा सकता है।

  1. जाति एवं वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी विसंगतियों को कर्ण-परशुराम संवाद द्वारा दर्शाया गया है।
  2. जाति-वर्ण व्यवस्था की विडम्बना को कर्ण-द्रुपद संवाद द्वारा भी दर्शाया गया है।
  3. नारी की सामाजिक स्थिति को कर्ण-कुन्ती संवाद से स्पष्ट किया गया है।
  4. उच्च वर्ण की मदान्धता को कर्ण-शल्य संवाद रेखांकित करता है।

इस प्रकार, प्रस्तुत नाटक के माध्यम से नाटककार ने सामाजिक विसंगतियों को रेखांकित कर, उन पर कुठाराघात करके उसकी अप्रासंगिकता को स्पष्ट किया है। महाभारतकालीन कथानक को लेकर लिखे गए इस नाटक के प्रमुख पात्रों में कर्ण, श्रीकृष्ण, अर्जुन, परशुराम, दुर्योधन आदि हैं, जबकि गौण पात्रों में भीम, कुन्ती, सूर्य, इन्द्र इत्यादि हैं। इसके अतिरिक्त कुछ पात्र ऐसे भी हैं, जिनका नाम मात्र का उल्लेख ही नाटक में किया गया है। प्रस्तुत नाटक मुख्य रूप से कर्ण के चरित्र को ही उभारता है। अन्य पात्रों को चयन कर्ण के चरित्र की विशेषताओं को ही प्रकट करने तथा उनकी सामाजिक-मानसिक को स्वर देने के लिए किया गया है।

प्रश्न 11.
‘सूत-पुत्र’ नाटक की विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। (2017, 16)
अथवा
‘सूतपुत्र’ नाटक की सामान्य विशेषताओं को लिखिए। (2018)
अथवा
‘सूतपुत्र’ नाटक की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा

सूतपुत्र नाटक की विशेषताएँ लिखिए। (2018)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक की मौलिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
‘सूत-पुत्र’ नाटक में नाटककार ने ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से सामाजिक, राजनैतिक, जातिगत आदि घटनाओं एवं व्यवस्थाओं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस आधार पर ‘सूत-पुत्र’ नाटक की विशेषताएँ निम्नलिखित है।

  1. ऐतिहासिकता नाटक के प्रारम्भ में ही नाटककार ने कर्ण एवं परशुराम संवाद को प्रस्तुत किया है। नाटक का कथानक ऐतिहासिक पात्रों एवं घटनाओं पर आधारित हैं। नाटककार ने इन ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से वर्तमान समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-व्यवस्था से सम्बन्धित विसंगतियों पर प्रहार किया है। प्रस्तुत नाटक में कर्ण के चरित्र की विशेषताएँ उसकी सामाजिक प्रताड़नाओं, मानसिक क्लेश, जाति एवं वर्ण आदि सामाजिक रूढ़ियों पर आधारित क्रूरता आदि को प्रदर्शित करते हुए अपने चमत्कर्ष पर पहुँचती हैं।
  2. गुरु-शिष्य के सम्बन्ध ‘सूत-पुत्र’ नाटक में नाटककार ने गुरु-शिष्य के सम्बन्धों को भी प्रस्तुत किया हैं। ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि आदर्श गुरु वह होता है, जो सभी प्रकार से अपने शिष्यों की सेवा करे, उसकी गलती पर उसे सचेत करे तथा शिष्य को भी सर्वथा यह ध्यान रखना चाहिए कि वह अपने गुरु का कभी तिरस्कार न करे। प्रस्तुत नाटक में नाटककार ने परशुराम और भीष्म के माध्यम से इसे स्पष्ट किया है।
  3. नारी के प्रति श्रद्धा भाव नाटककार ने कर्ण के माध्यम से नारी के प्रति अगाध श्रद्धा की भावना को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। ‘सूत-पुत्र’ नाटक में कर्ण जैसा पात्र नारी (अपनी माता) के द्वारा अपमान सहन करता है, परन्तु फिर भी कर्ण के हृदय में नारी के प्रति आदर, सम्मान व श्रद्धा का भाव बना रहता है।
  4. समाज में व्याप्त विसंगतियों का चित्रण ‘सूत-पुत्र’ नाटक में नाटककार ने अपने पात्रों के माध्यम से नारी की विवशता, वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था, नारी-शिक्षा, नैतिकता, असवर्गों के प्रति भेदभाव आदि विसंगतियों का चित्रण करके यह बताने का प्रयास किया है कि महाभारत काल में भी समाज ने जिन-जिन समस्याओं का सामना किया था, वे समस्याएँ आज भी व्याप्त हैं।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 12.
‘सुत-पुत्र’ नाटक के आधार पर उसके नायक (कर्ण) का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018)
अथवा
अपनी ‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कर्ण के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2018)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017, 16)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के प्रमुख पुरुष पात्र (नायक) कर्ण का चरित्र चित्रण कीजिए। (2015, 14, 13, 12, 11, 10)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के नायक के चरित्र पक्ष की विवेचना कीजिए। (2017)
उत्तर:
डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी’ द्वारा लिखित नाटक ‘सूतपुत्र’ के नायक कर्ण के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ निहित हैं

  1. गुरुभक्ति कर्ण सच्चा गुरुभक्त है। वह अपने गुरु के लिए सर्वस्व त्याग करने को तत्पर है। अत्यधिक कष्ट सहकर भी वह अपने गुरु परशुराम की निद्रा को बाधित नहीं होने देता है। गुरु द्वारा शाप दिए जाने के पश्चात् भी वह अपने गुरु की निन्दा सुनना पसन्द नहीं करता। द्रौपदी-स्वयंवर के समय उसकी गुरुभक्ति स्पष्ट रूप से दिखती है।
  2. प्रवीण धनुर्धारी कर्ण धुनर्विद्या में अत्यधिक प्रवीण है। वह अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी है, जिसके सामने अर्जुन को टिकना भी मुश्किल लगता है, इसलिए इन्द्र देवता ने अर्जुन की रक्षा के लिए कर्ण से ब्राह्मण वेश धारण कर कवच-कुण्डल माँग लिए।
  3. प्रबल नैतिकतावादी कर्ण उच्च स्तर के संस्कारों से युक्त है। वह नैतिकता को अपने जीवन में विशेष महत्त्व देता है। इसी नैतिकता के कारण वह द्रौपदी के अपहरण सम्बन्धी दुर्योधन के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है।
  4. श्रेष्ठ दानवीरता कर्ण अपने समय का सर्वश्रेष्ठ दानवीर था। उसकी दानवीरता अनुपम है। युद्ध में अर्जुन की विजय को सुनिश्चित करने के लिए इन्द्र ने कवच-कुण्डल माँगा, सारी वस्तुस्थिति समझते हुए भी कर्ण ने इसका दान दे दिया। इतना ही नहीं, युद्धभूमि में मृत्यु शय्या पर पड़े कर्ण ने श्रीकृष्ण द्वारा ब्राह्मण वेश में सोना दान में माँगने पर अपना सोने का दाँत उखाड़कर दे दिया।
  5. महान् योना कर्ण एक महान योद्धा है। वह एक सच्चा महारथी हैं। वह अर्जुन के रथ को अपनी बाण वर्षा से पीछे धकेल देता हैं, जिस रथ पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बैठे हुए थे।
  6. नारी के प्रति श्रद्धा भाव नारी जाति के प्रति कर्ण में गहरी निष्ठा एवं श्रद्धा है। वह नारी को विधाता का वरदान मानता है।
  7. सच्चा मित्र कर्ण अपने जीवन के अन्त समय तक अपने मित्र दुर्योधन के प्रति गहरी निष्ठा रखता है। दुर्योधन के प्रति उसकी मित्रता को कोई भी व्यक्ति कम नहीं कर सका इस प्रकार, कर्ण का व्यक्तित्व अनेक श्रेष्ठ मानवीय भावों से पूर्ण है।

प्रश्न 13.
सूत-पुत्र के आधार पर श्रीकृष्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। (2013, 12, 11)
अथवा
‘सूतपुत्र’ नाटक के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए। (2018)
उत्तर:
डॉ. गंगा सहाय ‘प्रेमी’ द्वारा लिखित ‘सूत-पुत्र’ में कर्ण के पश्चात् सबसे प्रभावशाली एवं केन्द्रीय चरित्र श्रीकृष्ण का है।
जिनके व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ द्रष्टव्य हैं।

  1. महाज्ञानी श्रीकृष्ण एक ज्ञानी पुरुष के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। युद्धभूमि में अर्जुन के व्याकुल होने पर वे उन्हें जीवन का सार एवं रहस्य समझाते हैं। वे तो स्वयं भगवान के ही रूप हैं। अतः संसार के बारे में उनसे अधिक ज्ञान और किसी को क्या हो सकता है।
  2. कुशल राजनीतिज्ञ श्रीकृष्ण का चरित्र एक ऐसे कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसके कारण अर्जुन महाभारत के युद्ध में विजयी बनने में सक्षम हो सके। कर्ण को इन्द्र से प्राप्त अमोघ अस्त्र को श्रीकृष्ण ने घटोत्कच पर चलवाकर अर्जुन की विजय सुनिश्चित कर दी।
  3. वीरता या उच्च कोटि के गुणों के प्रशंसक अर्जुन के पक्ष में शामिल होने के। पश्चात् भी श्रीकृष्ण कर्ण की वीरता की प्रशंसा किए बिना न रह सके। वे कर्ण की धनुर्विद्या की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करते हैं।
  4. कुशल वक्ता श्रीकृष्ण एक कुशल एवं चतुर वक्ता के रूप में सामने आते हैं। श्रीकृष्ण अपनी कुशल बातों से अर्जुन को हर समय प्रोत्साहित करते रहते हैं तथा अन्ततः युद्ध में उन्हें विजयी बनवाते हैं।
  5. अवसर का लाभ उठाने वाले वस्तुत: श्रीकृष्ण समय या अवसर के महत्त्व को पहचानते हैं। आया हुआ अवसर फिर लौटकर नहीं आता और उनकी रणनीति आए हुए प्रत्येक अवसर का भरपूर लाभ उठाने की रही है। वे अवसर को चूकते नहीं हैं। यही कारण है कि कर्ण पराजित हो जाता है और अर्जुन को विजय प्राप्त होती हैं।
  6. पश्चाताप की भावना श्रीकृष्ण भगवान का स्वरूप होते हुए भी मानवीय भावनाएँ रखते हैं, इसलिए उनमें पश्चाताप की भावनाएँ भी आती हैं। उन्हें इस बात का पश्चाताप है कि उन्होंने कर्ण के साथ न्यायोचित व्यवहार नहीं किया। निहत्थे कर्ण पर अर्जुन द्वारा बाण-वर्षा कराकर उन्होंने नैतिक रूप से उचित व्यवहार नहीं किया। उन्हें इस बात का गहरा पश्चाताप है, लेकिन कूटनीति एवं रणनीति इसी व्यवहार को उचित ठहराती है।

इस प्रकार, श्रीकृष्ण का चरित्र नाटक में कुछ समय के लिए ही सामने आता है, लेकिन वह अत्यन्त ही प्रभावशाली एवं सशक्त है, जो पाठकों एवं दर्शकों पर अपना गहरा प्रभाव डालता है।

प्रश्न 14.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2016)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के किसी एक स्त्री पात्र का चरित्र-चिरण कीजिए। (2016)
अथवा
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर कुन्ती की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी’ द्वारा रचित ‘सूत-पुत्र’ नाटक की प्रमुख नारी पात्र कुन्ती है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. तेजस्वी व्यक्तित्व प्रस्तुत नाटक के तीसरे अंक में कुन्ती के दर्शन होते हैं, जब वह कर्ण के पास जाती है, उस समय वह विधवा वेश में होती है। उसके बाल काले और लम्बे हैं। उसने शरीर पर श्वेत साड़ी धारण कर रखी है, वह अत्यन्त सुन्दर दिखाई देती है। उसका व्यक्तित्व भारतीय विधवा का पवित्र, मनोहारी एवं तेजस्वी व्यक्तित्व है।
  2. मातृभावना कुन्ती का हृदय मातृभावना से परिपूर्ण है। जैसे ही वह युद्ध का निश्चय सुनती है, वह अपने पुत्रों के लिए व्याकुल हो उठती है। उसने आज तक कर्ण को पुत्र रूप में स्वीकार नहीं किया था, किन्तु फिर भी अपने मातृत्व के बल पर वह उसके पास जाती है और उसके सामने सत्य को स्वीकार करती है कि वह उसकी पहली सन्तान है, जिसका उसने परित्याग कर दिया था।
  3. स्पष्टवादिता कुन्ती स्पष्टवाद है। माँ होकर भी वह कर्ण के सामने उसके जन्म और अपनी भूल की कथा को स्पष्ट कह देती है। कर्ण द्वारा यह पूछे जाने पर कि किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए तुमने सूर्यदेव से सम्पर्क स्थापित किया था? वह कहती हैं-“पुत्र! तुम्हारी माता के मन में वासना का भाव बिल्कुल नहीं था।”
  4. वाकपटु कुन्ती बातचीत में बहुत कुशल है। वह अपनी बात इतनी कुशलता से कहती है कि कर्ण एक माँ की विवशता को समझ कर तथा उसकी भूलों पर ध्यान न देकर उसकी बात मान ले। वह पहले कर्ण को पुत्र और बाद में कर्ण कहकर अपने मन के भावों को प्रकट करती हैं।
  5. सूक्ष्म द्रष्टा कुन्ती में प्रत्येक विषय को परखने और उसके अनुसार कार्य करने की सूक्ष्म दृष्टि थी। कर्ण जब उससे कहता है कि तुम यह कैसे जानती हो कि मैं तुम्हारा वही पुत्र हूँ जिसे तुमने गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया था वह कहती है “क्या तुम्हारे पैरों की उँगलियाँ मेरे पैरों की उँगलियों से मिलती-जुलती नहीं हैं?”
  6. कुशलनीतिज्ञ कुन्ती को राजनीति का सहज ज्ञान प्राप्त था। वह महाभारत युद्ध की समस्त राजनीति भली-भाँति समझ रही थी। वह कर्ण को अपने पक्ष में करना चाहती है, क्योंकि वह यह जानती है कि दुर्योधन की हठवादिता कर्ण के बल पर टिकी है और उसी के भरोसे वह पाण्डवों को नष्ट करना चाहता है। जब कर्ण यह कहता है कि पाण्डव यदि सार्वजनिक रूप से मुझे अपना भाई स्वीकार करें तो उनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य हो सकता है तो वह तत्काल कह देती है-“कर्ण तुम्हारे पाँचों भाई तुम्हें अपना अग्रज स्वीकार करने को प्रस्तुत है।” यद्यपि पाँचों पाण्डवों को तब तक यह पता भी नहीं था कि कर्ण उनके बड़े भाई हैं।

इस प्रकार नाटककार ने कुन्ती का चरित्र-चित्रण अत्यन्त कुशलता से किया है। उन्होंने थोड़े ही विवरण में कुन्ती के चरित्र को कुशलता से दर्शाया है।

प्रश्न 15.
‘सूत-पुत्र’ नाटक के आधार पर परशुराम के चरित्र पर प्रकाश डालिए। (2017, 12, 11, 10)
उत्तर:
सूत-पुत्र नाटक में श्री गंगासहाय ‘प्रेमी ने परशुराम को ब्राह्मणत्व एवं क्षत्रियत्व के गुणों से युक्त दर्शाया है। वे महान् तेजस्वी एवं दुर्धर्ष योद्धा हैं। परशुराम, कर्ण के गुरु हैं। इनके पिता का नाम जमदग्नि है। परशुराम उस समय के धनुर्विद्या में अद्वितीय ज्ञाता थे। सूत-पुत्र नाटक के आधार पर परशुराम की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. अतितीय धनुर्धर परशुराम उस समय के अद्वितीय धनुर्धर हैं। धनुष विद्या में वे प्रख्यात हैं। इसी कारण दूर के प्रदेशों से भी ब्राह्मण बालक इनके पास हिमालय की घाटी में स्थित आश्रम में शस्त्र विद्या सीखने के लिए आते हैं। इनके द्वारा जिनको उस समय दीक्षित किया जाता था, उन शिष्यों को अद्वितीय माना जाता था। भीष्म पितामह भी इन्हीं के शिष्य थे।
  2. मानवीय स्वभाव के ज्ञाता परशुराम मानवीय स्वभाव के भी जानकार थे। वे कर्ण के क्षत्रियोचित व्यवहार से जान जाते हैं कि यह ब्राह्मण नहीं है, अपितु क्षत्रिय है। वे उससे निस्संकोच कह भी देते हैं कि-“तुम क्षत्रिय हो कर्ण! तुम्हारे माता-पिता दोनों ही क्षत्रिय रहे हैं।”
  3. सहदय एवं आदर्श गुरु परशुराम सहृदय एवं आदर्श गुरु हैं। वे अपने सभी शिष्यों को समान दृष्टि से देखते हैं तथा पुत्र के समान प्रेम करते हैं और उनके कष्टों को दूर करने के लिए हर समय तैयार रहते हैं। एक दिन कर्ण की जंघा में कीड़ा काट लेता है और मांस में घुस जाता है, जिससे खून की धारा बह निकलती है। इससे परशुराम का हदय द्रवित हो जाता है। वे तुरन्त उसके घाव पर नखरचनी को लगा देते हैं और कर्ण को सान्तवना देते हैं। इस घटना से परशुराम के सहृदय होने का पता चलता है।
  4. श्रेष्ठ ब्राह्मण परशुराम एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हैं। वे ब्राह्मण का प्रमुख कार्य विद्या दान करना बताते हुए कहते हैं कि जो ब्राह्मण धन का लालची है, वह ब्राह्मण नहीं, वह अधम तथा नीच है। द्रोणाचार्य के विषय में उनकी धारणा है कि वे निम्न कोटि के ब्राह्मण हैं और उनके विषय में कहते हैं। कि-“द्रोणाचार्य तो पतित ब्राह्मण है। ब्राह्मण क्षत्रिय का गुरु हो सकता है, सेवक अथवा वृत्तिभोगी नहीं।”
  5.  निष्ठावान एवं दयालु परशुराम अपने कर्तव्य के प्रति पूर्णरूपेण निष्ठावान हैं। वे अपने कर्तव्य का पालन करने में वज्र के समान कठोर हैं, लेकिन दूसरों की दयनीय स्थिति को देखकर दया से द्रवित भी हो जाते हैं। इसी कारण वे कर्ण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं और दीक्षा देने लगते हैं।
  6.  क्रोधी एवं उदार परशुराम हृदय से उदार भी हैं। वे कर्ण की अत्यन्त दयनीय स्थिति को देखकर उन्हें अपना शिष्य बना लेते हैं, लेकिन ब्राह्मण का छद्म रूप धारण करने के कारण वे कर्ण को श्राप भी देते हैं, लेकिन जब कर्ण की दयनीय एवं दुःख से परिपूर्ण दशा को देखते हैं, तो उन्हें उस पर दया आ जाती है और वे कहते हैं कि-“जिस माता से तुम्हें ममता और वात्सल्य मिलना चाहिए था उसी ने तुम्हें श्राप दिया। उनके इस प्रकार कहने से उनके उदार होने का पता चलता है।
  7. ओजस्वी व्यक्तित्व परशुराम का व्यक्तित्व ओजस्यी है। नायक में लेखक ने उनके व्यक्तित्व का चित्रण ऐसे किया है-“परशुराम की अवस्था दो सौ वर्ष के लगभग है। वे हष्ट-पुष्ट शरीर वाले सुदृढ़ व्यक्ति हैं। चेहरे पर सफेद लम्बी-घनी दाढ़ी और शीश पर लम्बी-लम्बी श्वेत जटाएँ हैं।’

उपरोक्त चारित्रिक गुणों को दृष्टिगत रखते हुए हम कह सकते हैं कि परशुराम, कर्तव्यनिष्ठ, उदार, ओजस्वी मानव स्वभाव के ज्ञाता एवं महान् ब्राह्मण हैं। वे एक आदर्श शिक्षक है तथा उनमें ब्राह्मणत्व तथा क्षत्रियत्व दोनों ही गुणों का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 4 सूत-पुत्र drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आलोक-वृत्त
Number of Questions Solved 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘आलोक-वृत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना को संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
“आलोक-वृत्त खण्डकाव्य में स्वतन्त्रता संग्राम की झाँकी के दर्शन होते हैं।” स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ को कथासार अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्ड काव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। (2014)
अथवा
कथावस्तु की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ की समीक्षा कीजिए। (2013)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ के आधार पर वर्ष 1942 की जनक्रान्ति का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (2014, 13, 11, 10, 09, 08)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 14, 13)
उत्तर:
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की रचना कविवर गुलाब खण्डेलवाल द्वारा की गई है। इस खण्डकाव्य की कथा युगपुरुष महात्मा गाँधी के जीवन पर आधारित है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु निम्नलिखित है।

प्रथम सर्ग : भारत को स्वर्णिम अतीत

(2012, 11)

1869 ई. में महात्मा गाँधी का जन्म पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ था। गाँधीजी का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि समस्त दानवी एवं पाश्विक शक्तियाँ भी उनके सामने टिक न सकीं। ब्रिटिश शासन भयभीत हो गया।

गाँधीजी ने अपने साहस और शक्ति से शासन के क्वर अत्याचारों और दमनात्मक कार्यों से पीड़ित जनता को शक्ति प्रदान की। गाँधीजी के रूप में भारतीय जनता को नया जीवनस्रोत मिली।

द्वितीय सर्ग : गाँधीजी का प्रारम्भिक जीवन

(2017, 12)

‘आलोक-वृत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। (2018)

युवा होने पर गाँधीजी का विवाह कस्तूरबा के साथ हो गया। कुछ समय पश्चात् ही उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। उनकी मृत्यु के समय गाँधीजी अपने पिता के पास नहीं थे। फिर उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए वह इंग्लैण्ड चले गए। गाँधीजी की माताजी को यह डर सता रहा था कि उनका पुत्र विदेश में जाकर मांस-मदिरा का सेवन न करने लगे। अतः विदेश जाने से पहले उन्होंने अपने पुत्र से वचन लिया

मद्य मांस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर।
माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल-तिलक लगाकर।”

अपनी शिक्षा समाप्त कर जब गाँधीजी स्वदेश लौटे, तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी माताजी उन्हें छोड़कर स्वर्ग सिधार गई हैं। यह सुनकर उन्हें अत्यधिक कष्ट हुआ।

तृतीय सर्ग : गाँधीजी का अफ्रीका प्रवास (2012)

आलोक-वृत खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का कथानक संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ के तृतीय सर्ग में वर्णित गाँधीजी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए। (2014, 13)
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका में एक बार गाँधीजी रेल में प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे थे। एक गोरे ने उन्हें अपमानित करके गाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस नीति को देखकर वह बहुत दुःखी हुए। वह शान्त भाव से एकान्त में बैठे ठिठुरते रहे। वे वहाँ बैठे-बैठे भारतीयों की दुर्दशा पर चिन्तन करने लगे। उन्होंने अपनी जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर बैठकर मानवता के उद्धार का संकल्प लिया। सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया और संघर्ष में विजय प्राप्त की।

चतुर्थ सर्ग : गाँधीजी का भारत आगमन

‘आलोक-वृत’ के चतुर्थ सर्ग की घटना का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए है (2013, 14)
उत्तर:
गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आ जाते हैं। भारत आकर उन्होंने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, सरोजिनी नायडू, सुभाषचन्द्र बोस, मदनमोहन मालवीय आदि अनेक प्रमुख देशप्रेमी उनके अनुयायी बन गए।

गाँधीजी के आह्वान पर देश के महान् नेता एकजुट होकर सत्याग्रह की तैयारी में जुट गए। गाँधीजी ने चम्पारण में नील की खेती को लेकर आन्दोलन प्रारम्भ किया, जिसमें वे सफल रहे। उनके भाषण सुनकर विदेशी सरकार विषम स्थिति में पड़ जाती थी। इस आन्दोलन में सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व अच्छी तरह निखरकर सामने आया।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग (असहयोग आन्दोलन) की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए। (2011)
उत्तर:
गाँधीजी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेजों की दमन नीति भी बढ़ती गई। गाँधीजी के ओजस्वी भाषण ने भारतीयों में नई स्फूर्ति भर दी, लेकिन अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करों’ की नीति ने यत्र-तत्र साम्प्रदायिक दंगे करवा दिए। गाँधीजी को बन्दी बना लिया गया।

जेल में गाँधीजी अस्वस्थ हो गए। अतः उन्हें छोड़ दिया गया। जेल से आकर गाँधीजी हरिजनोद्धार, हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब मुक्ति, खादी प्रचार आदि के रचनात्मक कार्यों में लग गए।

हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए गाँधीजी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा-

“आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन यह, पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के, अनशन का संकल्प सुनाया।”

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

“आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग (नमक सत्याग्रह) का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। (2011)
उत्तर:
अंग्रेजों के द्वारा लगाए गए नमक कानून को तोड़ने के लिए गाँधीजी ने समुद्र तट पर बसे ‘डाण्डी’ नामक स्थान तक की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया।

तत्पश्चात् अंग्रेज शासकों ने ‘गोलमेज सम्मेलन’ बुलाया, जिसमें गाँधीजी को बुलाया गया। इस कॉन्फ्रेन्स के साथ-साथ कवि ने वर्ष 1937 के ‘प्रान्तीय स्वराज्य’ की स्थापना सम्बन्धी कार्यकलापों का सुन्दर वर्णन किया है।

सप्तम सर्ग : वर्ष 1942 की जनक्रान्ति’ (2013)

‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग में निरूपित वर्ष 1942 की जनक्रान्ति का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। (2017)
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज सरकार भारतीयों को सहयोग तो चाहती थी, परन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी।

क्रिप्स मिशन की असफलता के पश्चात् वर्ष 1942 में गाँधीजी ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ छेड़ दिया। सम्पूर्ण देश में विद्रोह की ज्वाला धधक उठी-

“थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे-
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुस्थल में थी ज्वाला घर-घर।”

कवि ने इस आन्दोलन का बड़ा ही ओजस्वी भाषा में वर्णन किया है। ‘बम्बई अधिवेशन’ के बाद गाँधीजी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिए गए। इस पर सम्पूर्ण भारत में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। कवि ने पूज्य बापू एवं कस्तूरबा के मध्य हुए वार्तालाप का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है।

अष्टम सर्ग : भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

देशवासियों के अथक प्रयासों और बलिदानों के फलस्वरूप भारत स्वतन्त्र हो । गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही देश में साम्प्रदायिक झगड़े आरम्भ हो गए। हिंसा की अग्नि चारों ओर भड़क उठी। इन सब को देखकर बापू अत्यन्त व्यथित हो गए।
वे कह उठे-

प्रभो! इस देश को सत्यपथ दिखाओ,
लगी जो आग भारत में, बुझाओ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दें ,
लपट में रोष की निज शीश धर दें।”

प्रश्न 2.
‘आलोक-वृत’ खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018, 17)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का निरूपण कीजिए। अथना कथानक की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए। (2018, 11, 10)
अथवा
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ का मूल्यांकन कीजिए। (2011)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2014)
उत्तर:
कवि गुलाब खण्डेलवाल द्वारा रचित ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के जीवन को चित्रित किया गया है।
इसका कथावस्तु सम्बन्धी विवेचन इस प्रकार है।

1. कथानक की व्यापकता ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य की कथानक महात्मा गाँधी के जीवन-वृत्त पर आधारित है। इसमें महात्मा गाँधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से प्रकाशित व्यक्तित्व को चित्रित किया गया है। उन्होने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सदगुणों एवं सदविचारों से प्रकाशित किया है। उन्होंने सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का प्रकाश फैलाया है। अत: इस जीवन-वृत्त को आलोक-वृत्त कहा जा सकता है। यह कथानक महात्मा गाँधी के जीवन-वृत्त पर आधारित है, पर साथ-ही-साथ इसमें पं. मोतीलाल नेहरू, पं. मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी की माता, उनकी पत्नी, सरदार वल्लभभाई पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि के जीवन को झाकियां भी सम्मिलित हैं।

2. कथा का संगठन ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य का आरम्भ भारत के गौरवमय अतीत से होता है। कथा का प्रारम्भ 1857 ई. के पश्चात् की दयनीय स्थिति के वर्णन से प्रारम्भ हुआ है तथा गाँधीजी की जन्म की घटना को भी इसमें दिखाया गया है। इसके साथ ही इसमें गाँधीजी के समय तत्कालीन भारत की दुर्दशा का भी वर्णन किया गया है। शिक्षा ग्रहण करने गांधीजी का इंग्लैण्ड जाना, वहाँ बैरिस्टर बनना, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करना तथा तत्पश्चात् कथा का उतार दर्शाया गया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सम्पूर्ण देश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के कारण गाँधीजी का दुःखी होना और ईश्वर से प्रार्थना करने के साथ ही इस खण्डकाव्य की समाप्ति होती जाती है।

3. संवाद योजना कथावस्तु के विस्तार के कारण इस खण्डकाव्य में संवाद योजना को प्रमुखता प्रदान नहीं की गई है। यह खण्डकाव्य प्रमुख रूप से वर्णनात्मक ही है, पर फिर भी विभिन्न स्थानों पर गाँधीजी के संक्षिप्त संवाद प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ अन्य पात्रों द्वारा भी संवादों का प्रयोग किया गया है, किन्तु इसे नगण्य ही कहा जाएगा। पात्र एवं चरित्र-चित्रण प्रस्तुत खण्डकाव्य में मुख्य चरित्र महात्मा गांधी का व्यक्तित्व है। उनका चरित्र एक धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें कुछ दुर्वलताएँ भी हैं, परन्तु अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, सरलता और लगन के बल पर वे अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे अपने प्रेम से शत्रुओं के हृदय को भी जीत लेते हैं। उनका अहिंसा का सिद्धान्त मानव हृदय की एकता और सभी के प्रति समानता के भाव पर आधारित है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में गाँधीजी को चरित्र नायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी प्रदान की गई है। कुछ अन्य महापुरुषों की झलकियों को भी पात्र रूप में समायोजित किया गया है, लेकिन वे केवल महात्मा गांधी के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु कथा में संगठित किए गए हैं।

4. पात्र एवं चरित्र-चित्रण प्रस्तुत खण्डकाव्य में मुख्य चरित्र महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व हैं। उनका चरित्र एक धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें कुछ दुर्बलताएं भी हैं, परन्तु अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, सरलता और लगन के बल पर वे अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। वे अपने प्रेम से शत्रुओं के हृदय को भी जीत लेते हैं। उनका अहिंसा का सिद्धान्त मानव हृदय की एकता और सभी के प्रति समानता के भाव पर आधारित है। प्रस्तुत खण्डकाव्य में गाँधीजी को चरित्र नायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी प्रदान की गई हैं। कुछ अन्य महापुरुषों की झलकियों को भी पात्र रूप में समायोजित किया गया है, लेकिन वे केवल महात्मा गाँधी के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु कथा में संगठित किए गए हैं।

5. उददेश्य इस कथा के संगठन का उद्देश्य राष्ट्रीयता, सत्य, अहिंसा, मानवीयता आदि सद्गुणों के प्रति भावनात्मक संवेग उत्पन्न करके समाज में उनका महत्त्व स्थापित करना है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आलोक वृत्त में गाँधीजी जैसे महानायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य की रचना की गई है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है।

प्रश्न 3.
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य में सत्य और अहिंसा का सुन्दर सन्देश दिया गया है। स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
“आलोक-वृत्त’ पीड़ित मानवता को सत्य और अहिंसा का सन्देश देता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के उद्देश्य (सन्देश) को स्पष्ट कीजिए। (2014, 13, 11, 10)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नामकरण की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। (2013)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ में निहित मानव कल्याण के सन्देश की विवेचना कीजिए।
अथवा
“आलोक-वृत्त खण्डकाव्य पीड़ित मानवता को सत्य एवं अहिंसा का शाश्वत सन्देश देता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। (2014, 13, 11)
उत्तर:

‘आलोक-वृत्त’ : शीर्षक की सार्थकता (2013)

कविवर गुलाब खण्डेलवाल ने ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व को चित्रित किया है। महात्मा गाँधी के चरित्र को हम प्रकाशस्वरूप कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने सद्गुणों एवं सद्विचारों से भारतीय संस्कृति की चेतना को प्रकाशित किया है। उन्होंने विश्व में सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि भावनाओं का प्रकाश फैलाया। इस दृष्टिकोण से यह शीर्षक उपयुक्त है। यह गाँधी जी के जीवन, उनके चरित्र, गुणों, सिद्धान्तों एवं दर्शन को पूर्णरूप से परिभाषित करता हुआ एक साहित्यिक एवं दार्शनिक शीर्षक है।

आलोक-वृत्त : उद्देश्य (सन्देश) श्री खण्डेलवाल की रचना ‘आलोक-वृत्त’ में उनके उद्देश्य इस प्रकार परिलक्षित होते हैं।

  1. देशप्रेम की भावना को जागृत करना इस खण्डकाव्य का सर्वप्रथम उद्देश्य देशवासियों में स्वदेश प्रेम की भावना जागृत करना है। यह खण्डकाव्य भारतीय जनों के हृदय में भारत के गौरवमय अतीत का वर्णन करके देशप्रेम की भावना जगाना चाहता है।
  2. सत्य और अहिंसा का महत्व इस खण्डकाव्य के माध्यम से कवि ने सत्य और अहिंसा के महत्त्व को दर्शाया है। कवि का मानना है कि सत्य और अहिंसा ऐसे अस्त्र हैं, जिनके बल पर हम विरोधियों को भी परास्त कर सकते हैं। कवि ने गाँधीजी के उदाहरण द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सत्य और अहिंसा के द्वारा हम प्रत्येक संकल्प को पूरा कर सकते हैं।
  3. त्याग और बलिदान की भावना का सन्देश महात्मा गाँधी ने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए महान् त्याग एवं अपना सर्वस्व बलिदान किया। वे अनेक बार जेल गए और उन्होंने अनेक कष्टों को सहन किया। इस प्रकार कवि गाँधीजी के उदाहरण को प्रस्तुत करके देश के युवकों को देश के लिए त्याग और बलिदान करने की प्रेरणा देता है।
  4. साधनों की पवित्रता में विश्वास गाँधीजी का विचार था कि मनुष्य को सदैव पवित्र आचरण अपनाना चाहिए और साधनों को भी पवित्र होना चाहिए अर्थात् वह जो भी साधन अपनाए, वे पवित्र होने चाहिए। उन्होंने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए छल-कपट और हिंसा का आश्रय कभी नहीं लिया। उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए प्रेम, सत्य, अहिंसा जैसे साधनों का प्रयोग किया, जिसमें वे सफल भी रहे।
  5. राष्ट्रीय एकता एवं सहयोग की भावना अंग्रेज शासकों ने हमारे देश में फूट के बीज बोकर परस्पर घृणा एवं हिंसा के भाव भर दिए थे। आज का भारत प्राचीन भारत के समान ही विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों का संगम हैं। हमारे देश को स्वतन्त्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब हम धर्म, सम्प्रदाय एवं जातिगत भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को बनाए रखें।

इसी को ध्यान में रखकर यह सन्देश दिया गया है कि हमें साम्प्रदायिक एवं प्रान्तीय भेद-भाव को भूलकर राष्ट्र की एकता बनाए रखनी चाहिए। इस प्रकार आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य गाँधीजी के जीवन चरित्र को माध्यम बनाकर लोगों को राष्ट्र प्रेम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, न्याय, सदाचार आदि की प्रेरणा देने के उद्देश्य में सफल रहा है।

प्रश्न 4.
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। (2015)
उत्तर:
कवि गुलाब खण्डेलवाल द्वारा रचित ‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली इस प्रकार है।

  1. भाषा-शैली ‘आलोक वृत्त की भाषा अत्यन्त सुन्दर और मन को छूने वाली है। भाषा विचारों और भावों के अनुरूप हैं। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक ओज गुण का निर्वाह हुआ है, परन्तु जिन प्रसंगों में माधुर्य की अपेक्षा है, वहाँ भाषा अत्यन्त मधुर रूप ग्रहण कर लेती है। प्रसाद गुण तो इसकी प्रत्येक पंक्ति में देखा जा सकता है। ‘आलोक-वृत्त’ की शैली प्रमुख रूप से वर्णनात्मक है। साथ ही संवादात्मक भी है, किन्तु शैली का स्वरूप वर्णनात्मक ही हैं। कथावस्तु के विस्तृत स्वरूप को देखते हुए कवि ने इस शैली को अपनाया है, किन्तु इस वर्णनात्मक शैली में भावात्मकता को स्थान देकर उन्होंने भावों को कुशल अभिव्यक्ति दी है।
  2. अलंकार-योजना ‘आलोक-वृत्त’ में अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है। कहीं पर भी वे सप्रयास लाए हुए प्रतीत नहीं होते। अलंकारों ने कहीं पर भी भाषा को बोझिल नहीं किया है।
  3. छन्द-योजना ‘आलोक-वृत्त’ में छन्दों की विविधता है। 16 मात्राओं के छोटे छन्द से लेकर 32 मात्राओं के लम्बे छन्दों का प्रयोग इसमें सफलतापूर्वक किया गया है। प्रथम सर्ग में मुक्त छन्द का प्रयोग हुआ हैं। सर्गों के मध्य में गीत-योजना भी की गई है, जिससे राष्ट्रीय भावनाओं की वृद्धि में सहयोग मिला है। इस प्रकार यह द्रष्टव्य है कि ‘आलोक-वृत्त’ में गाँधी जैसे महान् लोकनायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य-रचना की गई है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है, किन्तु कवि ने गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने हेतु आवश्यक प्रसंगों का चयन कर उसे इस प्रकार संगठित एवं विकसित किया है कि वह खण्डकाव्य के उपयुक्त बन गई है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है। आदर्शपूर्ण भावनाओं की स्थापना हेतु रचित इस काव्य-ग्रन्थ में यद्यपि रसों एवं छन्दों की विविधता है, तथापि इससे खण्डकाव्य के उद्देश्य एवं उसके विधा सम्बन्धी तत्त्वों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अत: इस काव्य-ग्रन्थ को एक सफल खण्डकाव्य कहना उपयुक्त होगा।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
‘आलोक-तृत’ खण्डकाव्य के आधार पर महात्मा गाँधी की चरित्रगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘आलोकवृत’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी के जीवन की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
आलोक-तृत खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए। (2018)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के ऐसे पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आपको अधिक प्रभावित किया हो। (2017)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण (चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए) कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2015)
अथवा
आलोक-वृत्त के नायक का चरित्रांकन कीजिए। धना ‘आलोक-तृत्त’ के आधार पर गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018, 14, 13, 12, 11, 10)
अथवा
“आलोक-वृत्त खण्डकाव्य में गाँधीजी का व्यक्तित्व सर्वोपरि है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2012)
अथवा
“आलोक-वृत्त में गाँधीजी का चरित्र धीरोदात्त नायक के रूप में प्रस्फुटित हुआ है।” इस कथन के आधार पर गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2013, 10)
अथवा
‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित गाँधीजी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए। (2013)
अथवा
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक की विशेषताएँ बताइए। (2017)
उत्तर:
‘आलोक-वृत्त’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए। उत्तर ‘आलोक वृत्त’ खण्डकाव्य के नायक महात्मा गाँधी हैं। कवि ने इन्हें एक लोकनायक के रूप में प्रस्तुत किया है। इनका जीवन एवं इनके कार्य हमारे लिए सदैव प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। गाँधीजी की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

1. देशप्रेमी गाँधीजी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता है—उनका देशप्रेमी होना। गाँधीजी अपने देश से इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ देश के लिए समर्पित कर दिया। वे अनेक बार कारागार में गए। अंग्रेजों के अपमान और अत्याचार सहे।

2. सत्य और अहिंसा के उपासक गाँधीजी देश की स्वतन्त्रता सत्य और अहिंसा के बल पर प्राप्त करना चाहते थे। वे अहिंसा को महान् शक्तिशाली अस्त्र मानते रहे। उन्होंने अपने जीवन में हिंसा न करने का दृढ़ निश्चय किया। कोई विरला व्यक्ति ही इस प्रकार अहिंसा का पूर्णरूप से पालन कर सकता है।

3. ईश्वर के प्रति आस्थावान गाँधीजी पुरुषार्थी तो हैं, पर ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्थावान भी हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में जो कुछ भी किया, ईश्वर को साक्षी मानकर ही किया। उनका मानना था कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम की इच्छा नहीं करनी चाहिए। परिणाम ईश्वर पर ही छोड़ देने चाहिए।

4. मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठावान गाँधीजी ने अपने जीवन में मानवीय मूल्यों एवं सदाचरण को सदैव बनाए रखा। वे मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते थे। वे समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उनके अनुसार जाति, धर्म, वर्ण एवं रूप के आधार पर भेदभाव करना अनुचित है। वे कहते थे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं।’

5 स्वतन्त्रता प्रेमी गाँधीजी के जीवन का मुख्य उद्देश्य देश को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारत माता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। वे देशवासियों को गुलामी की जंजीरों को काटने के लिए प्रेरित करते हैं।

6. हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक उन्होंने सदैव हिन्दू और मुसलमानों को एक साथ रहने की प्रेरणा दी। वे ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी देखना चाहते थे। वे जीवन भर जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए प्रयास करते रहे और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा देते रहे।

7. स्वदेशी वस्तु एवं खादी को महत्त्व गाँधीजी ने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की प्रेरणा दी और उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। जन-जन में खादी का प्रचार किया और उसे अपनाने की प्रेरणा दी।

8. आत्मविश्वासी गाँधीजी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। अपने जीवन में उन्होंने जो भी किया, पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी रहे।

9. सत्याग्रही गाँधीजी ने सत्य की शक्ति पर पूर्ण भरोसा किया। अपने सत्याग्रह के बल पर ही उन्होंने देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करवाया और भारत को आजादी दिलवाई।

अतः कहा जा सकता है कि गाँधीजी एक श्रेष्ठ मानव हैं। उनके निर्मल चरित्र पर उँगली उठाने का साहस किसी में भी नहीं हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोक-वृत्त, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name समसामयिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध

1. स्वच्छ भारत अभियान (2018)
प्रस्तावना यह सर्वविदित है कि 2 अक्टूबर भारतवासियों के लिए कितने महत्त्व का दिवस है। इस दिन हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्म हुआ था। इस युग-पुरुष ने भारत सहित पूरे विश्व को मानवता की नई राह दिखाई। हमारे देश में प्रत्येक वर्ष गाँधी जी का जन्मदिवस एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है और इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उनके प्रति हमारी श्रद्धा प्रतिवर्ष बढ़ती जाती है। इस बार (वर्ष 2014 में) भी 2 अक्टूबर को ससम्मान गाँधी जी को याद किया गया, लेकिन ‘स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत के कारण इस बार यह दिन और भी विशिष्ट रहा।

स्वच्छता अभियान से तात्पर्य ‘स्वच्छ भारत अभियान’ एक राष्ट्र स्तरीय अभियान है। गाँधी जी की 145वीं जयन्ती के अवसर पर माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस अभियान के आरम्भ की घोषणा की। यह अभियान प्रधानमन्त्री जी की महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। 2 अक्टूबर, 2014 को उन्होंने राजपथ पर जनसमूह को सम्बोधित करते हुए सभी राष्ट्रवासियों से स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेने और इसे सफल बनाने की अपील की। साफ-सफाई के सन्दर्भ में देखा जाए, तो यह अभियान अब तक का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान है।

स्वच्छता अभियान एक जन आन्दोलन साफ-सफाई को लेकर दुनियाभर में भारत की छवि बदलने के लिए प्रधानमन्त्री जी बहुत गम्भीर हैं। उनकी इच्छा स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आन्दोलन बनाकर देशवासियों को गम्भीरता से इससे जोड़ने की है। हमारे नवनिर्वाचित प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर के दिन सर्वप्रथम गाँधी जी को राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित की और फिर नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती में जाकर झाड़ लगाई। कहा जाता है कि वाल्मीकि बस्ती दिल्ली में गाँधी जी का सबसे प्रिय स्थान था। वे अक्सर यहाँ आकर ठहरते थे।

इसके बाद, मोदी जी ने जनपथ जाकर स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की। इस अवसर पर उन्होंने लगभग 40 मिनट का भाषण दिया और स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। अपने भाषण के दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी और लालबहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए बड़ी ही खूबसूरती से इन दोनों महापुरुषों को इस अभियान से जोड़ दिया, उन्होंने कहा-“गांधी जी ने आजादी से पहले नारा दिया था ‘क्विट इण्डिया क्लीन इण्डिया, आजादी की लड़ाई में उनका साथ देकर देशवासियों ने ‘क्विट इण्डिया’ के सपने को तो साकार कर दिया, लेकिन अभी उनका ‘क्लीन इण्डिया’ का सपना अधूरा ही है।।

अब समय आ गया है कि हम सवा सौ करोड़ भारतीय अपनी मातृभूमि को स्वच्छ बनाने का प्रण करें। क्या साफ-सफाई केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी हैं? क्या यह हम सभी की जिम्मेदारी नहीं हैं? हमें यह नज़रिया बदलना होगा। मैं जानता हूं कि इसे केवल एक अभियान बनाने से कुछ नहीं होगा। पुरानी आदतों को बदलने में समय लगता है। यह एक मुश्किल काम है, मैं जानता है, लेकिन हमारे पास वर्ष 2019 तक का समय है।”

प्रधानमन्त्री जी ने पाँच साल में देश को साफ-सुथरा बनाने के लिए लोगों को शपथ दिलाई कि न में गन्दगी करूगा और न ही गन्दगी करने दें। अपने अतिरिक्त मैं सौ अन्य लोगों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक करूगा और उन्हें सफाई की शपथ दिलवाऊँगा। उन्होने कहा कि हर व्यक्ति साल में 100 घण्टे का श्रमदान करने की शपथ ले और सप्ताह में कम-से-कम दो घण्टे सफाई के लिए निकाले। अपने भाषण में प्रधानमन्त्री ने स्कूलों और गांवों में शौचालय निर्माण की आवश्यकता पर भी बल दिया।

भारत को स्वच्छ बनाने में सरकार का योगदान केन्द्र सरकार और प्रधानमन्त्री की ‘गन्दगी मुक्त भारत’ की संकल्पना अच्छी है तथा इस दिशा में उनकी ओर से किए गए आरम्भिक प्रयास भी सराहनीय हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर क्या कारण है कि साफ-सफाई हम भारतवासियों के लिए कभी महत्त्व का विषय ही नहीं रहा? आखिर क्यों तमाम प्रयासों के बाद भी हम साफ-सुथरे नहीं रहते? हमारे गाँव गन्दगी के लिए बहुत पहले से बदनाम हैं, लेकिन प्यान दिया जाए, तो यह पता चलता है कि इस मामले में शहरों की स्थिति भी गाँवों से बहुत भिन्न नहीं है।

स्वच्छता अभियान की आवश्यकता आज पूरी दुनिया में भारत की छवि एक गन्दे देश की है। जब-जब भारत की अर्थव्यवस्था, तरक्को, ताकत और प्रतिभा की बात होती है, तब-तब इस बात की भी चर्चा होती है कि भारत एक गन्दा देश है। पिछले ही वर्ष हमारे पड़ोसी देश चीन के कई ब्लॉगों पर गंगा में तैरती लाशों और भारतीय सड़कों पर पड़े कूड़े के ढेर वाली तस्वीरें छाई रहीं।

कुछ साल पहले इण्टरनेशनल हाइजीन काउंसिल ने अपने एक सर्वे में यह कहा था कि औसत भारतीय घर बेहद गन्दे और अस्वास्थ्यकर होते हैं। इस सर्वे में काउंसिल ने कमरों, बाथरूम और रसोईघर की साफ-सफाई को आधार बनाया था। उसके द्वारा जारी गन्दे देशों की सूची में सबसे पहला स्थान मलेशिया और दूसरा स्थान भारत को मिला था। हद तो तब हो गई जब हमारे ही एक पूर्व केन्द्रीय मन्त्री ने यहाँ तक कह दिया कि यदि गन्दगी के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाता, तो वह शर्तिया भारत को ही मिलता।

ये सभी बाते और तथ्य हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम भारतीय साफ-सफाई के मामले में भी पिछड़े हुए क्यों हैं? जबकि हम उस समृद्ध एवं गौरवशाली भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य सदा ‘पवित्रता’ और ‘शुद्धि’ रहा है। वास्तव में, भारतीय जनमानस इसी अवधारणा के चलते एक उलझन में रहा है। उसने इसे सीमित अर्थों में ग्रहण करते हुए मन और अन्त:करण की शुचिता को ही सर्वोपरि माना है, इसलिए हमारे यहाँ कहा गया है।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा’

यह सही है कि चरित्र की शुद्धि और पवित्रता बहुत आवश्यक है, लेकिन बाहर की सफाई भी उतनी ही आवश्यक है। यदि हमारा आस-पास का परिवेश ही स्वच्छ नहीं होगा, तो मन भला किस प्रकार शुद्ध रह सकेगा? अस्वच्छ परिवेश का प्रतिकूल प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता है। जिस प्रकार एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है, उसी प्रकार एक स्वस्थ और शुद्ध व्यक्तित्व का विकास भी स्वच्छ और पवित्र परिवेश में ही सम्भव हैं।

अतः अन्त:करण की शुद्धि का मार्ग बाहरी जगत् की शुद्धि और स्वच्छता से होकर ही गुजरता है। साफ-सफाई के अभाव से हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य तो प्रभावित होते ही हैं, साथ ही हमारी आर्थिक प्रगति भी बाधित होती है। अपने भाषण में प्रधानमन्त्री जी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आकलन का हवाला देते हुए कहा है कि गन्दगी के कारण औसत रूप से प्रत्येक भारतीय को प्रतिवर्ष लगभग 6,500 का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। यदि उच्च वर्ग को इसमें शामिल न किया जाए, तो यह आँकड़ा 12 से 15 हजार तक पहुंच सकता हैं। इस तरह देखा जाए, तो हम स्वच्छ रहकर इस आर्थिक नुकसान से बच सकते हैं।

उपसंहार कुल मिलाकर सार यहीं है कि वर्तमान समय में स्वच्छता हमारे लिए एक बड़ी आवश्यकता है। यह समय भारतवर्ष के लिए बदलाव का समय है। बदलाव के इस दौर में यदि हम स्वच्छता के क्षेत्र में पीछे रह गए, तो आर्थिक उन्नति का कोई महत्व नहीं रहेगा। हाल ही में हमारे प्रधानमन्त्री ने 25 सितम्बर, 2014 को ‘मेक इन इण्डिया’ अभियान का भी शुभारम्भ किया है, जिसका लक्ष्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में अव्वल बनाना है। इस अभियान से आर्थिक गति तो अवश्य मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही हमें प्रदूषण’ के रूप में एक बड़ी चुनौती भी मिलने वाली है। अतः हमें अपने दैनिक जीवन में तो सफ़ाई को एक मुहिम की तरह शामिल करने की जरूरत है ही, साथ ही हमें इसे एक बड़े स्तर पर भी देखने की ज़रूरत है, ताकि हमारा पर्यावरण भी स्वच्छ रहे।

स्वच्छता समान रूप से हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी हैं। हर समय कोई सरकारी संस्था या बाहरी बल हमारे पीछे नहीं लगा रह सकता। हमें अपनी आदतों में सुधार करना होगा और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा. हालाँकि आदतों में बदलाव करना आसान नहीं होगा, लेकिन यह इतना मुश्किल भी नहीं है। प्रधानमन्त्री ने ठीक ही कहा है कि यदि हम कम-से-कम खर्च में अपनी पहली ही कोशिश में मंगल ग्रह पर पहुंच गए, तो क्या हम स्वच्छ भारत का निर्माण सफलतापूर्वक नहीं कर सकते? कहने का तात्पर्य है कि ‘क्लीन इण्डिया’ का सपना पूरा करना कठिन नहीं है। हमें हर हाल में इस लक्ष्य को वर्ष 2019 तक प्राप्त करना होगा, तभी हमारी ओर से राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को उनकी 150वीं जयन्ती पर सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकेगी।

2. आतंकवाद : समस्या और समाधान (2016, 13, 11, 10)
अन्य शीर्षक भारत में आतंकवाद की समस्या (2017), आतंकवाद की समस्या (2017), आतंकवाद और विश्व शान्ति (2014, 13, 11), आतंकवाद एक चुनौती, आतंकवाद और उसके दुष्परिणाम, आतंकवादः कारण एवं निवारण (2013), आतंकवाद और राष्ट्रीय एकता।

संकेत बिन्दु आतंकवाद का अर्थ, भारत में आतंकवाद के रूप में नक्सलवाद, आतंकवाद को पड़ोसी देशों का समर्थन, प्रगति में बाधक, वैश्विक समस्या, समाधान, उपसंहार।

आतंकवाद का अर्थ आतंक की कोई विचारधारा नहीं होती, इस कारण इसे ‘आतंकवाद’ कहना गैर-जरूरी है, किन्तु सामान्य बोलचाल तथा सम्प्रेषण के लिए इस शब्द का प्रयोग सर्वथा अनुचित नहीं है। हिंसा तथा आतंक के पीछे निहित स्वार्थ हो सकता है। यह उद्देश्य प्राप्ति या जनसामान्य के विकास के लक्ष्य से सम्बन्ध नहीं रखता, बल्कि यह वर्चस्ववाद की नीति का आयाम है।

आज हमारा देश आतंकवाद की समस्या से जूझ रहा है। वास्तव में, आतंकवाद वैश्विक रूप धारण कर चुका है। यह धर्म, सम्प्रदाय तथा समुदाय की आड़ में कतिपय कुत्सित विचार वाले लोगों की मानसिकता का परिणाम है।

भारत में आतंकवाद के रूप में नक्सलवाद ‘आतंकवाद’ भारत में कोई पुरानी समस्या नहीं है। आजादी के बाद लोकतन्त्र ने अभिव्यक्ति की जो परम्परा दी, उसमें अपनी जगह न बना पाने की जद्दोजहद में कुछ असामाजिक तत्वों ने आतंक का रास्ता अपना लिया। देश की राजनीतिक तथा सामाजिक प्रक्रिया भी इसमें जिम्मेदार रही है।

समाज की विषमता तथा आर्थिक विभाजन ने एक पूरे वर्ग को हिंसा का रास्ता अपनाने को विवश किया। किसान-मजदूरों की समस्या ने ‘नक्सलवाद’ को उभारा। आज ‘नक्सलवाद’ एक हिंसात्मक आन्दोलन की तरह फैल चुका है, किन्तु हम नक्सलवाद को सीधे तौर पर आतंकवाद नहीं कह सकते हैं।

यह एक उद्देश्य के लिए संघर्ष है। आज भारत में ‘नक्सलवाद’ को अधिक बड़ा खतरा मानकर उसके विरुद्ध बड़े-बड़े ऑपरेशन (अभियान) चलाए जा रहे हैं। हमारी सेना देश के बाहर जाकर भी नक्सलवादियों का सफाया कर रही है, किन्तु आतंकवाद की खतरनाक तथा विध्वंसक प्रक्रिया पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है।

आतंकवाद को पड़ोसी देशों का समर्थन भारत में आतंकवाद क्षेत्रीय तथा साम्प्रदायिक आधार ले चुका है। यह किसी विशेष उद्देश्य के अतिरिक्त देश को मात्र अस्थिर रखने की चाल के साथ संचालित है, जिसे हमारे पड़ोसी देशों का समर्थन प्राप्त है। कश्मीर, असम तथा अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई आतंकी गुट अपनी कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे हैं।

कश्मीर में इस्लामी कट्टरपन्थी आतंकी गुट सक्रिय हैं, जिन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी आई एस आई का समर्थन प्राप्त है। यह एजेन्सी आतंकवादियों को प्रशिक्षण तथा धन उपलब्ध कराती है। असम में सक्रिय ‘उल्फा’ जैसे आतंकी संगठन को बांग्लादेश के आतंकी गुटों का समर्थन प्राप्त है। उल्फा बांग्लादेश में अपने ठिकानों से ही कार्रवाई का संचालन कर रहा है।

प्रगति में बाधक आतंकवाद की समस्या भारत की प्रगति में बाधक है। यह लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती है। भारत के विभिन्न शहरों में हुई आतंकवादी घटनाएँ यह प्रमाणित कर चुकी हैं कि आतंकवादी कहीं भी, कभी भी अपने कुत्सित उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो सकते हैं।

मुम्बई में वर्ष 1993 का बम विस्फोट, होटल ताज पर हमला, दिल्ली में सीरियल विस्फोट, संसद पर हमला, वाराणसी के संकटमोचन मन्दिर परिसर में विस्फोट, वर्ष 2002 में गुजरात में अक्षरधाम मन्दिर पर आतंकियों का हमला, वर्ष 2015 में दोना नगर के गुरुदासपुर में हुआ आतंकी हमला तथा हाल ही में 2016 में पठानकोट में हुआ विस्फोट आदि घटनाएँ वास्तव में हमारी सुरक्षा प्रणाली के लिए चुनौती हैं। निर्दोष नागरिकों की जान लेने वाले केवल भय तथा अशान्ति की प्रक्रिया को अंजाम देना चाहते हैं। यह मानवीय क्रूरता का उदाहरण हैं। आज देश का कोई शहर आतंकवाद से सुरक्षित नहीं है।

वैश्विक समस्या आतंकवादियों ने देश के कोने-कोने में अपना नेटवर्क स्थापित कर लिया है। यदि सरकार आतंकवाद को समाप्त करने की किसी ठोस नीति को क्रियान्वित नहीं करती, तो इसे नियन्त्रित करना भी कठिन हो जाएगा। आज आतंकवाद न केवल भारत वरन् पूरे विश्व के लिए एक समस्या बन गया है। इसने दुनिया के लोगों में खौफ पैदा करने का अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है। इस वैश्विक समस्या से संघर्ष करने के लिए विभिन्न देशों के बीच आपसी समन्वय बनाने की आवश्यकता है।

समाधान आतंकवाद को नियन्त्रित करना कठिन नहीं है। इसके लिए ठोस कार्यनीति बनाकर उसके क्रियान्वयन की जरूरत है। धर्म तथा सम्प्रदाय के नाम पर आतंक फैलाने वाले गुटों को जवाब देने के लिए धार्मिक रूप से सहिष्णु लोगों को आगे आना होगा। शक्ति तथा संसाधनों के माध्यम से आतंकियों के इरादों को ध्वस्त किया जा सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय की भी आवश्यकता है।

उपसंहार महावीर, बुद्ध, गुरुनानक, महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों को जन्म देने वाली इस पुण्य भारत-भूमि पर आतंकवाद कलंक का टीका है। हम सभी भारतवासियों को इसे समूल नष्ट करने का संकल्प लेकर फिर से देश को सत्य, अहिंसा एवं शान्ति की तपोभूमि बनाना होगा, तभी भारत और विश्व का कल्याण सम्भव है।

3. बढ़ती जनसंख्या : बड़ी समस्या (2016, 15, 00)
अन्य शीर्षक जनसंख्या वृद्धि की समस्या (2012, 11, 10), भारत में जनसंख्या वृद्धि : कारण और निवारण, बढ़ती जनसंख्या : समस्या और समाधान (2018, 11, 12, 11, 10), जनसंख्या का विरफोट : एक समस्या (2011), बढ़ती जनसंख्या के कुप्रभाव (2017, 15)।।

संकेत बिन्दु भूमिका, जनसंख्या में दूसरा सबसे बड़ा देश, जनसंख्या वृद्धि के कारण, जनसंख्या वृद्धि का कुप्रभाव, नियन्त्रण के उपाय, उपसंहार।

भूमिका सुप्रसिद्ध विचारक गार्नर का कहना है कि जनसंख्या किसी भी राज्य के लिए उससे अधिक नहीं होनी चाहिए, जितनी साधन-सम्पन्नता राज्य के पास है अर्थात् जनसंख्या किसी भी देश के लिए वरदान होती हैं, परन्तु जब अधिकतम सीमा-रेखा को पार कर जाती है, तब वही अभिशाप बन जाती है।

जनसंख्या में दूसरा सबसे बड़ा देश वर्तमान में जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। हमारे सामने अभी जनसंख्या विस्फोट की समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की जनसंख्या मात्र 36 करोड़ थी, जो अब वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बढ़कर 121 करोड़ से भी अधिक हो गई है।

जनसंख्या वृद्धि के कारण जनसंख्या वृद्धि के विभिन्न महत्त्वपूर्ण कारणों में जन्म एवं मृत्यु दर के बीच अधिक दूरी, विवाह के समय कम आयु, अत्यधिक निरक्षरता, परिवार नियोजन के प्रति धार्मिक दृष्टिकोण, निर्धनता (अधिक हाथ अधिक आमदनी का सिद्धान्त), मनोरंजन के साधनों की कमी, संयुक्त परिवार, परिवारों में युवा दम्पतियों में अपने बच्चों के पालन पोषण के प्रति जिम्मेदारी में कमी तथा बन्ध्याकरण, ट्यूबेक्टॉमी एवं लूप के प्रभावों के विषय में गलत सूचना या । सूचना का अभाव आदि उल्लेखनीय हैं।

जनसंख्या वृद्धि का कुप्रभाव जनसंख्या वृद्धि का प्रत्यक्ष प्रभाव लोगों के जीवन-स्तर पर पड़ता है। यही कारण है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में चामत्कारिक प्रगति के बावजूद यहाँ प्रति व्यक्ति आय में सन्तोषजनक वृद्धि नहीं हो पाई हैं।

जनसंख्या वृद्धि एवं नियन्त्रण की सैद्धान्तिक व्याख्याओं के अन्तर्गत एक व्याख्या मानती है कि विकास जनन क्षमता (fertility) की दर को कम कर देता है। यह भी कहा जाता है कि विकास मृत्यु दर को जन्म दर की अपेक्षा अधिक कम करता है। जिसका परिणाम, जनसंख्या में वृद्धि का होना है।

नियन्त्रण के उपाय यदि देश लगभग 1.5 करोड़ व्यक्तियों की प्रतिवर्ष की वृद्धि से बचना चाहता है, तो केवल एक ही मार्ग शेष है कि आवश्यक परिवार नियोजन एवं जनसंख्या हतोत्साहन का कड़वा घूट लोगों को पिलाया जाए। इसके लिए एक उपयुक्त जनसंख्या नीति की आवश्यकता है। सबसे अधिक बल इस बात पर दिया जाना चाहिए कि परिवार नियोजन कार्यक्रम में अत्यधिक जोर बन्ध्याकरण पर देने की अपेक्षा ‘फासले’ की विधि को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे इसके अनुरूप जनांकिकीय प्रभाव प्राप्त किया जा सके। हमारे देश में लगभग पांच में से तीन (576) विवाहित स्त्रियाँ 30 वर्ष से कम आयु की हैं और दो या दो से अधिक बच्चों की माँ हैं। ‘बच्चियाँ ही बच्चे पैदा करे’ इस सच्चाई को बदलना होगा। यह केवल फासले की विधि तथा लड़कियों की अधिक विवाह-उम्र को प्रोत्साहन देने से ही सम्भव हो सकेगा।

भारत जैसे विकासशील देश में बढ़ती जनसंख्या पर नियन्त्रण पानी अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा इसके परिणामस्वरूप देश में अशिक्षा, गरीबी, बीमारी, भूखमरी, बेरोजगारी, आवासहीनता जैसी कई समस्याएँ उत्पन्न होगी और देश का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। अतः जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों के साथ-साथ देश के प्रत्येक नागरिक को इस विकट समस्या से लड़ना होगा। समाज-सेवी संस्थाओं की भी इस समस्या के समाधान हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।

जनसंख्या वृद्धि रोकने हेतु शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार अति आवश्यक है। महिलाओं के शिक्षित होने से विवाह की आयु बढ़ाई जा सकती है, प्रजनन आयु वाले दम्पतियों को गर्भ निरोध स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उन्हें छोटा परिवार सुखी परिवार की बात समझाई जा सकती है।

केन्द्रीय एवं राज्य स्तरों पर जनसंख्या परिषद् स्थापित करना भी इस समस्या का उपयुक्त उपाय हो सकता है, क्योंकि ऐसा करके न केवल विभिन्न स्तरों पर समन्वय का कार्य किया जा सकेगा, बल्कि अल्पकालीन व दीर्घकालीन योजनाओं का निर्धारण भी किया जा सकेगा। मीडिया को भी इस कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की आवश्यकता है। इन सब बातों पर ध्यान देकर जनसंख्या विस्फोट पर निश्चय ही नियन्त्रण पाया जा सकता हैं।

उपसंहार विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘स्टीफन हॉकिंग’ ने मानव को सावधान करते हुए कहा है-“हमारी जनसंख्या एवं हमारे द्वारा पृथ्वी के निश्चित संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण को स्वस्थ या बीमार करने वाली हमारी तकनीकी क्षमता के साथ घातीय रूप में बढ़ रहे हैं। आज प्रत्येक देशवासी को उनकी बातों से प्रेरणा लेकर देश को समृद्ध एवं विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लेना चाहिए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi समसामयिक निबन्ध, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name आर्थिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध

1. ग्रामीण रोजगार योजनाएँ (2016)
संकेत विन्दु भूमिका, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा बनाई गई नवीन योजनाएँ, उपसंहार।

भूमिका स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के सामने एक बड़ी चुनौती थीप्रामीणों की दशा सुधारने के लिए उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करना, क्योंकि किसानों को समृद्ध किए बिना देश की पूर्ण समृद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती थी। देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा है-“जब तक देश के किसान खुशहाल नहीं होंगे तब तक राष्ट्र एवं समाज का पूर्ण विकास नहीं हो सकता।” उस समय देश के लिए अन्न उपजाने वाले किसान कृषि कार्यों के लिए पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर थे। सूखा, अतिवृष्टि, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाएँ आने पर किसानों की दशा अति दयनीय हो जाती थी और उनके रोजगार ठप पड़ जाते थे।

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा बनाई गई नवीन योजनाएँ स्वतन्त्र भारत में किसानों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर कई रोजगार योजनाओं व कार्यक्रमों को मूर्त रूप दिया गया, जिनमें ग्रामीण मज़दूर रोजगार कार्यक्रम, मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, काम के बदले अनाज कार्यक्रम, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना आदि प्रमुख हैं। इन विकासोन्मुख योजनाओं व कार्यक्रमों के कारण देश के किसानों की दशा में पहले से बहुत सुधार आया है, परन्तु अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में काफी अधिक बेरोजगारी है, जिसका प्रमुख कारण है—देश की जनसंख्या का दिनों-दिन अत्यधिक तेज गति से बढ़ना।

प्रामीण क्षेत्रों में सरकार द्वारा किए गए महत्त्वपूर्ण प्रयास इस प्रकार है
(i) ग्रामीण मजदूरी रोजगार कार्यक्रम केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 1960-61 में ग्रामीण जनशक्ति कार्यक्रम के रूप में इस कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। उसके बाद वर्ष 1971-72 के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराए जाने हेतु ग्रामीण रोजगार क्रैश स्कौम, कृषि श्रमिक स्कीम, लघु कृषक विकास एजेन्सी, सूखा संवेदी क्षेत्र कार्यक्रम की आधारशिला रखी गई। वर्ष 1980 में इन सबको सम्मिलित रूप से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम और प्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम में और वर्ष 1993 में इन्हें पुनः विस्तारित कर जवाहर रोजगार योजना में परिवर्तित कर दिया गया। वर्ष 1999.2000 में जवाहर रोजगार योजना को जवाहर ग्राम समृद्धि योजना में शामिल कर लिया गया। वर्ष 2001-02 में इसे सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम एवं वर्ष 2005 में काम के बदले अनाज कार्यक्रम में विलय किया गया। केन्द्र सरकार द्वारा किए गए इन प्रयासों का ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान हैं।

(ii) मनरेगा महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम अर्थात् मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने का एक अधिकार सम्बद्ध कार्यक्रम है। इसका कार्यान्वयन वर्ष 2006 में देश के अत्यन्त पिछड़े 200 जिलों में किया गया। वर्ष 2007 एवं पुनः वर्ष 2008 में इसे विस्तारित कर देश के समस्त जिलों में प्रभावी कर दिया गया। मनरेगा का उद्देश्य इच्छुक बेरोजगार वयस्कों को वर्षभर में कम-से-कम 100 दिनों का निश्चित रोजगार प्रदान करना रखा गया। ग्रामीणों को जीविका प्रदान करने के साथ-साथ इसका उद्देश्य पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी हैं। इस कार्यक्रम के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति श्रम दिवस औसत मजदूरी में
81% की वृद्धि हुई है।

(iii) राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) ग्रामीण विकास मन्त्रालय का एक अति महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2021-22 तक देश के ग्रामीण क्षेत्रों के आठ से दस करोड़ निर्धन परिवारों को लाभ पहुँचाना है। पंचायती राज संस्थाओं को विशेष महत्त्व देने वाले इस मिशन को मार्च, 2014 तक देश के 27 राज्यों सहित पुदुचेरी संघ राज्य क्षेत्र में कार्यान्वित कर दिया गया। इस मिशन की सहायता से अब तक देश के डेढ़ लाख महिला श्रमिकों को लाभान्वित किया जा चुका है। (NRLM) के द्वारा वर्ष 2013-14 के दौरान लगभग तीन लाख स्व सहायता समूहों को मदद पहुँचाई गई और कुल 1,300 से भी अधिक ब्लॉकों को इसके अन्तर्गत लाया गया।

(iv) सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना देश में पूर्व से प्रभावी जवाहर ग्राम समृद्धि योजना और रोजगार आश्वासन योजना को सम्मिलित कर वर्ष 2001 में केन्द्र सरकार द्वारा सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना को कार्यरूप दिया गया। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में खाद्य सुरक्षा प्रदान करना तथा स्थायी परिसम्पत्तियों के माध्यम से रोजगार के अवसर का विस्तार करना है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे लोगों को इस योजना में प्राथमिकता दी गई है। इस योजना में व्यय की जाने वाली राशि को केन्द्र व राज्य सरकारों में 75; 25 में बाँटा गया हैं। वहीं जिला पंचायत, मध्यवर्ती पंचायत एवं ग्राम पंचायतों के मध्य संसाधनों का वितरण 20 : 30 : 50 के आधार पर किया गया है। वर्ष 2004 में सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना के द्वारा उपलब्ध किए जाने वाले संसाधनों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से काम के बदले अनाज कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। योजना आयोग द्वारा संचालित इस कार्यक्रम का लक्ष्य देश के सर्वाधिक पिछड़े 150 जिलों में खाद्य सुरक्षा व पूरक दैनिक मजदूरी रोजगार के क्षेत्र को विस्तार देना है।

(v) स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से ऊपर जीवन यापन करने वाले निर्धन लोगों को स्वरोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से इस योजना को वर्ष 1999 में प्रारम्भ किया गया। इस योजना के अन्तर्गत गैर-सरकारी संस्थाओं को सुविधा प्रदाता के रूप में सम्मिलित कर स्वयंसेवी सहायता समूहों के विकास एवं पोषण पर ध्यान दिया जाता है। इस योजना द्वारा सरकारी सब्सिडी एवं बैंक ऋण के माध्यम से ग्रामीणों तक सहायता पहुंचाई जाती हैं। कुल परियोजना लागत की 30% दर से दी जाने वाली सब्सिडी की अधिकतम सीमा ₹ 7,500 तक निर्धारित की गई है। सामान्यतः 10-20 सदस्यों के द्वारा स्वयं सहायता समूह का गठन किया जा सकता है। इस योजना के अन्तर्गत अब तक लगभग 22 लाख से भी अधिक स्वयं सहायता समूहों को गठित किया गया है। लाभान्वित होने वाले स्वरोजगारियों में लगभग 45% अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के लोग एवं लगभग 48% महिलाएँ हैं।

उपसंहार निश्चय ही देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के तमाम साधन उपलब्ध हैं और केन्द्र व राज्य की सरकारों द्वारा समय-समय पर चलाए गए विभिन्न रोजगार सम्बद्ध कार्यक्रमों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों को लाभ प्राप्त हुआ है, पर आज भी रोजगार के क्षेत्र में गाँवों की स्थिति दयनीय ही है। सरकारी स्तर पर और प्रभावी एवं लाभप्रद योजनाओं को मूर्त रूप देकर ग्रामीणों की दशा सुधारी जा सकती है, पर इसके लिए प्रामीणों में शिक्षा का विस्तार किया जाना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि बिना लोगों को जागरूक किए काम के प्रति लगन पैदा नहीं की जा सकती। सरकारी सुविधाओं का पूर्ण लाभ प्राप्त करने हेतु भी ग्रामीणों का शिक्षित होना अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए गाँवों में रोजगारमूलक शिक्षा का प्रचार प्रसार खूब जोर-शोर से करना चाहिए।

2. बेकारी/बेरोजगारी की समस्या एवं समाधान (2015, 14, 13, 12)
अन्य शीर्षक भारत में बेरोजगारी की समस्या (2013, 11, 07, 06, 05), शिक्षित बेरोजगारी की समस्या (2018, 11, 10)

संकेत बिन्दु बेरोजगारी का तात्पर्य, बेरोजगार युवा वर्ग, अनेक समस्याओं की जड़ बेरोजगारी, बेरोजगारी के कारण, बेरोजगारी दूर करने के उपाय, उपसंहार।

बेरोजगारी का तात्पर्य बेरोजगारी से अभिप्राय उस स्थिति से है, जब कोई योग्य तथा काम करने का इच्छुक व्यक्ति प्रचलित मजदूरी की दरों पर काम करने के लिए तैयार हो। बालक, वृद्ध, रोगी, अक्षम एवं अपंग व्यक्तियों को बेरोजगारों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। भारत में बेरोजगारी एक आर्थिक समस्या है।

यह एक ऐसी बुराई है, जिसके कारण केवल उत्पादक मानव शक्ति ही नष्ट नहीं होती, बल्कि देश का भावी विकास भी अवरुद्ध हो जाता है, जो श्रमिक अपने कार्य द्वारा देश के आर्थिक विकास में सक्रिय सहयोग दे सकते थे, ये कार्य के अभाव में बेरोजगार रह जाते हैं। यह स्थिति हमारे आर्थिक विकास में बाधक है।

बेरोजगार युवा वर्ग आज हमारे समाज में बेरोजगारी की समस्या में वृद्धि होती जा रही है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज का युवा वर्ग है। आज का नवयुवक जो विश्वविद्यालय से अच्छे अंक व डिग्री प्राप्त करके निकलता है, परन्तु वह रोजगार की तलाश में भटकता रहता है। बेरोजगारी के कारण नवयुवक प्रतिदिन रोजगार पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं तथा अखबारों, इण्टरनेट आदि में दिए गए विज्ञापनों के द्वारा अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी की खोज में लगे रहते हैं, परन्तु उन्हें रोजगार की प्राप्ति नहीं हो पाती, उन्हें केवल निराशा ही मिलती है।

अनेक समस्याओं की जड़ बेरोजगारी रोजगार न मिलने के कारण युवा वर्ग निराशावादी बन जाता है और आँसुओं के खारेपन को पीकर समाज को अपनी मौनव्यथा सुनाता है। बेरोजगारी किसी भी देश अथवा समाज के लिए अभिशाप है। इससे एक ओर निर्धनता, भुखमरी और मानसिक अशान्ति फैलती है, तो दूसरी ओर युवकों में आक्रोश तथा अनुशासनहीनता को भी प्रोत्साहन मिलता है। चोरी, डकैती, हिंसा, अपराघवृत्ति एवं आत्महत्या आदि समस्याओं के मूल में एक बड़ी सौमा तक बेरोजगारी ही विद्यमान है। बेरोजगारी एक ऐसा भयंकर विष है, जो सम्पूर्ण देश के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दूषित कर देता है।

बेरोजगारी के कारण हमारे देश में बेरोजगारी के निम्न कारण हैं-दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली, जनसंख्या में वृद्धि, कुटीर उद्योगों की उपेक्षा, औद्योगीकरण की उपेक्षा, औद्योगीकरण की मन्द प्रक्रिया, कृषि का पिछड़ापन, कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी। इसके अतिरिक्त मानसून की अनियमितता, भारी संख्या में शरणार्थियों का आगमन, अत्यधिक मशीनीकरण के फलस्वरूप होने वाली श्रमिकों की छंटनी, श्रम और माँग की पूर्ति में असन्तुलन, स्वरोजगार के साधनों की कमी इत्यादि इन कारणों से भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई हैं। देश को बेरोजगारी से उभारने के लिए इसका समुचित समाधान नितान्त आवश्यक है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय बेरोजगारी को दूर करने के लिए हमें जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण, शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन, कुटीर उद्योगों का विकास, औद्योगीकरण, सहकारी खेती, सहायक उद्योगों का विकास, राष्ट्र-निर्माण सम्बन्धी विभिन्न कार्य आदि का विस्तार करना चाहिए। बेरोजगारी की समस्या का समाधान तब ही सम्भव है, जब व्यावहारिक एवं व्यावसायिक रोजगारोन्मुखी शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर लोगों को स्वरोजगार अर्थात् निजी उद्यम और व्यवसाय प्रारम्भ करने के लिए प्रेरित किया जाए।

उपसंहार हमारी सरकार बेरोजगारी उन्मूलन के प्रति जागरूक है और इस दिशा में उसने महत्त्वपूर्ण कदम भी उठाए हैं। परिवार नियोजन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कच्चे मालों को एक स्थान-से-दूसरे स्थान पर ले जाने की सुविधा, कृषि-भूमि की चकबन्दी, नए-नए उद्योगों की स्थापना, अप्रेण्टिस (शिनु) योजना, प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना आदि अनेकानेक कार्य ऐसे हैं, जो बेरोजगारी दूर करने में एक सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं, परन्तु वर्तमान स्थिति को देखते हुए इनको और अधिक विस्तृत एवं प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi आर्थिक निबन्ध, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम्

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम् part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम्.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 11
Chapter Name दूत वाक्यम्
Number of Questions Solved 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम्

गद्यांशों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

गद्यांश ।
काञ्चुकीयः-भो भो; प्रतीहाराधिकृताः! महाराजो दुर्योधन: समाज्ञापयति- अद्य सर्वैः पार्थिवैः सह मन्त्रयितुम् इच्छामि! तदाहूयन्तां सर्वे राजानः इति। (परिक्रम्य अवलोक्य) अये! अयं महाराजो दुर्योधनः इत एवाभिवर्तते। (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टो दुर्योधनः)
काञ्चुकीयः-जयतु महाराजः! महाराजशासनात् समानीत सर्व राजमण्डलम्।
दुर्योधनः-सम्यक कृतम्! प्रविश त्वम् अवरोधम्।
काञ्चुकीयः-यदाज्ञापयति महाराजः। (निष्क्रान्तः, पुनः प्रविश्य)
काञ्चुकीयः-जयतु महाराजः एष खलु पाण्डवस्कन्धावारात् दौत्येनागतः पुरुषोत्तम: नारायणः।।
दुर्योधनः-मा तावद् भोः बादरायण! किं किं कंसभृत्यो दामोदरस्तय नारायणः। स गोपालकस्तव पुरुषोत्तमः ब्रार्हद्रथापहृतविजयकीर्तिभोगः तव पुरुषोत्तमः।
अहो! पार्थिवासन्नमाश्रितस्य भृत्यजनस्य समुदाचारः। क एष दूतः प्राप्तः।
सन्दर्भ प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘दूतवाक्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद
कांचुकीय-हे पहरेदारों! महाराज दुर्योधन आज्ञा देते हैं, “मैं आज सभी राजाओं के साथ मन्त्रणा (विचार-विमर्श करना चाहता हूँ, इसलिए सभी राजाओं को बुलाओ।” (घूमकर देखते हुए) “अरे! ये महाराज दुर्योधन तो इधर ही आ रहे हैं।” (तब जैसा कि निर्दिष्ट किया गया, दुर्योधन प्रवेश करता है)
कांचुकीय-महाराज की जय हो। महाराज की आज्ञा के अनुसार सम्पूर्ण राजमण्डल को बुला लिया गया है।
दुर्योधन–अच्छा किया। तुम रनिवास में जाओ।
कांचुकीय-जैसी आज्ञा महाराज। (निकलकर पुन: प्रवेश करता है)
कांघुकीय-महाराज की जय हो। निश्चय ही पाण्डव शिविर से दूतरूप में पुरुषोत्तम नारायण श्रीकृष्ण पधारे हैं।।

गद्यांश 2.
भो भोः राजानः!
दौत्येनागतस्य केशवस्य किं युक्तम्। किमाहुर्भवन्तः ‘अर्घ्यप्रदानेन पूजयितव्यः केशवः’ इति। न में रोचते। ग्रहणे अत्र अस्य हितं पश्यामि।
अपि च योऽत्र केशवस्य प्रत्युत्थास्यति स मया द्वादशसुवर्णभारेण दण्ड्यः
तदप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः। कोऽत्र भोः। (2014, 12, 11, 10)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद हे राजाओ! दूतरूप में आए केशव के लिए क्या उचित है?
आप लोगों का क्या कहना है? अर्घ्य अर्पित कर केशव को पूजना चाहिए। मुझे यह नहीं भाता। यहीं उसे पकड़ लेने (बन्दी बना लेने) में ही मुझे हित दिखता है। और, जो भी यहाँ केशव की ओर से खड़ा होगा, उसे मैं बारह स्वर्ण मुद्राओं से दण्डित करूँगा। अत: आप सब सावधान रहें। अरे! यहाँ कौन है?

गद्यांश 3
काञ्चुकीयः अथ किम् अथ किम्। प्रवेष्टुमर्हति पदमनाभः।
वासुदेव (प्रविश्य स्वगतम्) कथं कथं मां दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रिया:। (प्रकाशम्) अलमले सम्भ्रमेण, स्वैरमासतां भवन्तः।
दुर्योधनः कथं कथं केशवं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः सर्वे क्षत्रियाः। अलम् अलम् सम्भमेण। स्मरणीयः पूर्वमाश्रावितो दण्डः। ननु अहम् आज्ञप्ता।
वासुदेवः-भोः सुयोधन! कि भणसि।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद
कांचुकीय-निश्चय ही, निश्चय ही। श्रीकृष्ण! आप प्रवेश के अधिकारी हैं।
वासुदेव (प्रवेश करके मन-ही-मन में क्यों, मुझे देखकर सभी क्षत्रिय क्यों घबराए हुए हैं? (प्रकट रूप में) घबराएँ नहीं, आप सब निश्चिन्त होकर बैठे।
दुर्योधन-क्या, क्या, सभी क्षत्रिय केशव को देखकर घबरा उठे हैं। मत घबराएँ। पूर्व में सुनाए गए दण्ड को स्मरण रखें। नि:सन्देह, मैं माझा देने वाला हैं।
वासुदेव हे दुर्योधन! क्या कहते हो?

गद्यांश 4
वासुदेवः-भोः सुयोधन! किं न जानासि अर्जुनस्य पराक्रमम्।
दुर्योधनः न जानामि।
वासुदेवः-भोः श्रूयताम्, एकेनैव अर्जुनेन तदा विराटनगरे भीमादयो निर्जिताः। अपि च चित्रसेनेन नभस्तलं नीयमानस्त्वं फाल्गुनेनैव मोचितः।
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद
वासुदेव-हे दुर्योधन! क्या अर्जुन के पराक्रम को नहीं जानते?
दुर्योधन-नहीं जानता।
वासुदेव-हे दुर्योधन सुनो! विराट्नगर में अर्जुन ने अकेले ही भीष्म आदि को जीता था तथा अर्जुन ने ही तुम्हें आकाश में ले जाते हुए चित्रसेन से छुड़ाया था।

गद्यांश 5
वासुदेवः-भोः कुरुकुलकलङ्कभूत!
दुर्योधनः-भोः गोपालक!
वासुदेवः-भोः सुयोधन ! ननु क्षिपसि माम्।।
दुर्योधनः आः अनात्मज्ञस्त्वम्। अहं कथयामि यद् भवविधैः सह न भाषे।
वासुदेवःभोः शठ! त्वदर्थात् अयं कुरुवंशः अचिरान्नाशमेष्यति। भो भो राजानः! गच्छामस्तावत्।।
दुर्योधनः कथं यास्यति किल केशवः। भोः दुःशासन! दूतसमुदाचारमतिक्रान्तः केशवः बध्यताम्। मातुल! बध्यतामयं केशवः। कथं पराङ्मुखः पतति। भवतु अहमेव पाशैर्बध्नामि (उपसर्पति) ।।
वासुदेवः कथं बद्धकामो मां किल सुयोधनः। भवतु, सुयोधनस्य सामर्थ्य पश्यामि (विश्वरूपमास्थितः) ।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद
वासुदेव-है कुरुवंश के कलंक!
दुर्योधन-हे ग्वाले! वासुदेव-है दुर्योधन! मुझ पर आक्षेप करते हो।
दुर्योधन-अरे, तू स्वयं से अनभिज्ञ है। मैं कह देता हूँ कि तुझ जैसों से मैं नहीं बोलता।
वासुदेव-हे मूर्ख! तेरे कारण यह कुरुवंश शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। हे, हे राजाओ! हम जाते हैं।
दुर्योधन-केशव भला कैसे चला जाएगा। हे दुःशासन! दूत की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले केशव को बाँध दो। मामा! इस केशव को बाँध दो। अरे आप उल्टे मुँह क्यों गिर रहे हैं? अच्छा, इसे मैं ही बन्धन से बाँधता हूँ (समीप जाता है)।
वासुदेव-क्या, दुर्योधन मुझे बाँधना चाहता है? अच्छा, देखें दुर्योधन की सामर्थ्य (विरारूप धारण करते हैं।

गद्यांश 6
आः तिष्ठ इदानीम्। कथं न दृष्टः केशवः? अहो क्लस्यत्वं केशवस्य। आः तिष्ठ इदानीम् कथं न दृष्टः केशवः! अहो दीर्घत्वं केशवस्या कथं न दृष्टः केशवः! अयं केशवः। कथं सर्वत्र शालायां कैशवा एव केशवा: दृश्यन्ते! किम् इदानीं करिष्ये! भवतु, दृष्टम्। भो राजानः! एकेन एक: केशवः बध्यताम्। कथं स्वयमेव पाशैर्बद्धाः पतन्ति राजानः। (निष्क्रान्ताः सर्वे)। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद अरे! अब ठहर! क्यों नहीं दिख रहा कैशव? अरे! केशव की सूक्ष्मता! अरे! अब ठहर। केशव क्यों नहीं दिख रहा? अरे! केशव की विशालता। क्यों नहीं दिख रहा केशव? यह है केशव! क्या इस सभा में सर्वत्र केशव-ही-केशव दिख रहा है? अब मैं क्या करूं? अच्छा, समझा है राजाओं! (आप में से) प्रत्येक एक केशव को बाँधे। क्या बन्धन में बँधे राजागण स्वयं ही गिर रहे हैं! (सभी निकलते हैं)

श्लोकों का सन्दर्भ-सहित हिन्दी अनुवाद

श्लोक 1
ग्रहणमुपगते तु वासुदेवे हृतनयना इव पाण्डवा भवेयुः। गतिमतिरहितेषु पाण्डवेषु, क्षितिरखिलापि भवेन्ममासपत्ना।। (2012, 11)
सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘दूतवाक्यम् पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद वासुदेव को बन्दी बना लेने से पाण्डव नेत्रहीन हो जाएँगे। पाण्डवों के गतिविहीन एवं मतिविहीन हो जाने पर मेरे लिए सम्पूर्ण पृथ्वी शत्रु-रहित हो जाएगी।

श्लोक 2
प्राप्तः किलाद्य वचनादिह पाण्डवानां दौत्येन भृत्य इव कृष्णमतिः स कृष्णः। श्रोतुं सखे! त्वमपि सज्जय कर्ण कर्णी नारीमृदूनि वचनानि युधिष्ठिरस्य।।। (2017, 15, 11)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद निश्चय ही पाण्डवों के कहने पर कुटिल बुद्धि वाला कृष्ण आज दूत रूप में सेवक सदृश यहीं आया है। हे कर्ण युद्धितिर के नारी के सदृश कोमल वचन सुनने के लिए तुम भी अपने कानों को तैयार कर लो।।

श्लोक 3
दुष्टवादी गुणद्वेषी शठः स्वजननिर्दयः।।
सुयोधनो हि मां दृष्ट्वा नैव कार्य करिष्यति।।
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद बुरे वचन बोलने वाला, गुणों से द्वेष रखने वाला, दुष्ट और स्वजनों के प्रति निर्दयीं दुर्योधन मुझे देखकर कार्य नहीं करेगा।

श्लोक 4
अनुभूतं मददु:खं सम्पूर्णः सुम्यः स च।
अस्माकपि धर्म्यं यद् दायाचं तद् विभज्यताम्।। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद वासुदेव सब कुशलतापूर्वक हैं। आपके राज्य की कुशलता और शरीर के स्वास्थ्य को पूछकर निवेदन करते हैं हमने अत्यधिक कष्ट भोग लिया है। अब वह शर्त भी पूरी हो गई है। अतः धर्म के अनुसार जो भी देने योग्य हो, वह बाँट दीजिए।

श्लोक 5
राज्यं नाम नृपात्मजैस्सहृदयैर्जित्वा रिपून् भुज्यते।
तल्लोके न तु याच्यते न च पुनर्दीना वा दीयते।।
काङ्क्षा चेन्नृपतित्वमाप्तुमचिरात् कुर्वन्तु ते साहसम्।।
स्वैरं वा प्रविशन्तु शान्तमतिभिर्जुण्टं शुमायाश्रमत्।।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद सह्दय राजकुमारों के द्वारा राज्य तो शत्रुओं को जीतकर भौगा जाता है। वह न तो लोक (संसार) में माँगा जाता है तथा न ही किसी निर्धन व्यक्ति को प्रदान किया जाता है। यदि उन्हें (पाण्डवों को) राज़ पाने की चाह हो तो साहस करें, अन्यथा शान्ति हेतु शान्त चित्त वाले तपस्वियों से युक्त आश्रम में प्रवेश करें।

श्लोक 6
कर्तव्यो भ्रातृषु स्नेहो विस्मर्तव्या गुणेतराः।।
सम्बन्धो बन्धुभिः श्रेयान् लोकयोरुभयोरपि।। (2017)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद भाइयों से स्नेह करना कर्तव्य है। उनके अवगुणों को भुला देना चाहिए। भाइयों से मेल-मिलाप रखना दोनों ही लोकों में मंगलकारी होता है।

श्लोक 7
दातुमर्हसि मद्वाक्याद् राज्यार्द्ध धृतराष्ट्रज।
अन्यथा सागरान्तां ग हरिष्यन्ति हि पाण्डवाः।। (2018)
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद हे धृतराष्ट्रकुमार! तुम्हें मेरे कथन के अनुसार राज्य का आधा भाग दे देना चाहिए अन्यथा पाण्डव (निश्चय ही) समुद्र के अन्त तक की धरती तुमसे छीन लेंगे।

श्लोक 8
प्रहरति यदि युद्धे मारुतो भीमरूपी
प्रहरति यदि साक्षात्पर्थरूपेण शक्रः ।।
परुषवचनदक्ष! त्वद्वचोभिर्न दास्ये
तृणमपि पितृभुक्ते वीर्यगुप्ते स्वराज्ये।।
सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद कटुवचन बोलने में दक्ष हे कृष्ण! यदि युद्ध में स्वयं वायु देव भी भीम रूप में प्रहार करें तथा साक्षात् इन्द्र भी अर्जुन रूप में प्रहार करें, तो भी मैं तुम्हारे कहने से पिता द्वारा भोगे गए, पराक्रम से संरक्षित अपने राज्य का तिनका भी नहीं दूंगा।।

श्लोक 9
सृञ्जसि यदि सुमन्ताद् देवमायाः स्वमायाः
प्रहरसि यदि वा त्वं दुर्निवारैस्सुरास्त्रैः।
हयगजवृषभाणां पातनाज्जादपों ।
नरपतिगणमध्ये बध्यसे त्वं मुयाद्य।। (2010)
सन्दर्भ पूर्ववत्।।
अनुवाद यदि तुम चारों ओर अपनी देवमाया रच दो, यदि तुम अबाध दिव्यास्त्रों से प्रहार करो, घोड़े, हाथियों एवं बैलों को मारने से उत्पन्न घमण्ड वाले, आज मैं इन राजाओं के मध्य तुम्हें बॉधूंगा।

प्रश्न – उत्तर

प्रश्न-पत्र में संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठों (गद्य व पद्य) से चार अतिलघु उत्तरीय प्रश्न दिए जाएंगे, जिनमें से किन्हीं दो के उत्तर संस्कृत में लिखने होंगे, प्रत्येक प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

प्रश्न 1.
पाण्डवदूतः कः आसीत् (2014)
उत्तर:
पाण्डवदूतः श्रीकृष्णः आसीत्।

प्रश्न 2.
श्रीकृष्ण कस्य समीपे दौत्येन गतः? (2014, 13, 12, 11)
अथवा
श्रीकृष्णः दूतरूपेण कुत्र गतः?
उत्तर:
श्रीकृष्णः दुर्योधनस्य समीपे दौत्येन गतः।

प्रश्न 3.
वासुदेव कस्य दौत्येन कुत्र गतः? (2017)
उत्तर:
वासुदेव युधिष्ठिरस्य दौत्येन दुर्योधनस्य समीपे गतः

प्रश्न 4.
दुर्योधनः कर्णं किम् अवोचत्? (2014, 12)
उत्तर:
दुर्योधनः कर्णम् अवोचत् सखे कर्ण! त्वमपि युधिष्ठिरस्य नारीमृदूनि वचनानि श्रोतुं कणों सज्जय।

प्रश्न 5.
दुर्योधनः श्रीकृष्णं किम् अपृच्छत् ? (2016)
उत्तर:
दुर्योधनः श्रीकृष्णं अपृच्छत् यत् तस्थ भ्रातरः अपि कुशलिनः ?

प्रश्न 6.
दुर्योधनः कस्य पुत्रः आसीत्? (2018, 10)
उत्तर:
दुर्योधनः धृतराष्ट्रस्य पुत्रः आसीत्।

प्रश्न 7.
कः पाण्डवः दूतः अभवत् (2018)
उत्तर:
श्रीकृष्णः पाण्डवः दूतः अभवत्।।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम् help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 11 दूत वाक्यम्, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.