UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 उत्पादन एवं उपभोक्ता में सम्बन्ध (अनुभाग – चार)

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विस्तृत उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
विनिमय का अर्थ बताइए। इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं ? [2013]
           या
विनिमय के चार लक्षण (विशेषताएँ) बताइए।
           या
विनिमय को परिभाषित कीजिए एवं इसके दो लक्षणों की विवेचना कीजिए। [2018]
उत्तर :

विनिमय

सभ्यता के प्रारम्भ में मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित थीं। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं कर लेता था। मनुष्य आत्मनिर्भर था। ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताओं में वृद्धि होती चली गयी। इस प्रकार मनुष्य (UPBoardSolutions.com) को दूसरे मनुष्यों के सहयोग की आवश्यकता अनुभव हुई और विनिमय का प्रारम्भ हुआ। विनिमय क्रिया के अन्तर्गत एक मनुष्य अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ, सेवाएँ या धन दूसरे व्यक्तियों से प्राप्त करता है तथा दूसरे व्यक्तियों को बदले में उनकी आवश्यकता की वस्तुएँ, सेवाएँ या धन प्रदान करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि विनिमय क्रिया में दो पक्षों का पारस्परिक हित निहित होता

कुछ विद्वानों ने विनिमय की परिभाषा निम्नवत् दी है-
मार्शल के अनुसार, “दो पक्षों के बीच होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं
ए०ई० वाघ के अनुसार, “हम एक-दूसरे के पक्ष में स्वामित्व के दो ऐच्छिक हस्तान्तरणों को विनिमय के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।
इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वस्तुओं के आदान-प्रदान को विनिमय कहते हैं, परन्तु वस्तुओं के सभी ।
आदान-प्रदान को विनिमय नहीं कहा जा सकता। अर्थशास्त्र में केवल वही आदान-प्रदान विनिमय कहलाता है जो पारस्परिक, ऐच्छिक एवं वैधानिक हो।

लक्षण या विशेषताएँ
विनिमय क्रिया में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

  1. दो पक्ष – विनिमय क्रिया के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों या पक्षों का होना आवश्यक है। केवल एक पक्ष या एक व्यक्ति विनिमय प्रक्रिया को सम्पन्न नहीं कर सकता।
  2. वस्तु, सेवा या धन का हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में दोनों पक्षों के बीच सदैव वस्तु, सेवा या धन का हस्तान्तरण किया जाता है।
  3. वैधानिक हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में धन का वैधानिक हस्तान्तरण होता है, धन का अवैधानिक | हस्तान्तरण विनिमय नहीं है।
  4. ऐच्छिक हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में वस्तुओं व सेवाओं अर्थात् धन का हस्तान्तरण ऐच्छिक होता है। किसी भी प्रकार के दबाव के अन्तर्गत किया गया हस्तान्तरण विनिमय नहीं कहा जाएगा।
    इन विशेषताओं के आधार पर “दो पक्षों के बीच होने वाले धन व वस्तुओं के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण की क्रिया ही विनिमय कहलाती है।”

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प्रश्न 2.
वस्तु-विनिमय प्रणाली की प्रमुख कठिनाइयाँ क्या हैं ? [2009]
           या
अदला-बदली विनिमय की एक व्यवस्था है।” स्पष्ट कीजिए और उसकी कठिनाइयों का वर्णन कीजिए।
           या
वस्तु विनिमय से आप क्या समझते हैं ? इस प्रणाली की किन्हीं तीन असुविधाओं (कठिनाइयों) का उल्लेख कीजिए। [2011, 17, 18]
           या
वस्तु-विनिमय क्या है ? वस्तु-विनिमय के कोई चार दोष लिखिए। [2011]
           या
वस्तु-विनिमय प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसके किन्हीं चार गुणों की विवेचना कीजिए। [2013]
           या
वस्तु-विनिमय प्रणाली से क्या अभिप्राय है? वस्तु-विनिमय प्रणाली की दो प्रमुख कठिनाइयाँ क्या हैं? [2016, 18]
उत्तर:
साधारण भाषा में वस्तुओं के आदान-प्रदान (अदला-बदली) को विनिमय कहते हैं। दूसरे शब्दों में, “जब दो पक्षों के मध्य किसी वस्तु अथवा सेवा का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान होता है, तो उसे प्रत्यक्ष विनिमय अथवा वस्तु-विनिमय कहा जाता है।” (UPBoardSolutions.com) अर्थशास्त्र में विनिमय का आशय वस्तुओं और सेवाओं के पारस्परिक, ऐच्छिक तथा वैधानिक आदान-प्रदान से है। वस्तु-विनिमय की प्रमुख असुविधाएँ (कठिनाइयाँ अथवा दोष) निम्नलिखित हैं—

1. दोहरे संयोग का अभाव – वस्तु-विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कठिनाई दोहरे संयोग का अभाव है। इस प्रणाली में व्यक्तियों को ऐसे व्यक्ति की खोज में भटकना पड़ता है, जिसके पास उसकी आवश्यकता की वस्तु हो और वह व्यक्ति अपनी वस्तु के बदले में स्वयं उस मनुष्य की वस्तु लेने को
तैयार हो। ऐसा संयोग मिलना कठिन होता है। ।

2. मूल्य के सर्वमान्य माप का अभाव-वस्तु – विनिमय प्रणाली में मूल्य का कोई सर्वमान्य माप नहीं होता, जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु के मूल्य को विभिन्न वस्तुओं के सापेक्ष निश्चित किया जा सके। दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी वस्तु का अधिक मूल्य ऑकते हैं, जिससे वस्तु-विनिमय में कठिनाई होती है।

3. वस्तु के विभाजन में कठिनाई – कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका विभाजन नहीं किया जा सकता; जैसे—गाय, बैल, भेड़, बकरी, कुर्सी, मेज आदि; क्योंकि इनका विभाजन करने से इनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। अत: वस्तु-विनिमय प्रणाली में वस्तुओं की अविभाज्यता भी बहुधा कठिनाई का कारण बन जाती है।

4. मूल्य संचय की असुविधा–वस्तु – विनिमय प्रणाली में वस्तुओं को अधिक समय तक संचित करके नहीं रखा जा सकता, क्योंकि बहुधा वे नाशवान होती हैं तथा उन्हें सुरक्षित रखने के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता होती है।

5. मूल्य हस्तान्तरण की असुविधा – वस्तु-विनिमय प्रणाली में वस्तु के मूल्य को हस्तान्तरित करने में , कठिनाई होती है। उदाहरणत: यदि किसी व्यक्ति के पास नगर में कोई मकान है और वह गाँव में रहना चाहता है तो वह वस्तु-विनिमय प्रणाली द्वारा अपने मकान को बेचकर न तो धन प्राप्त कर सकता है। और न ही अपने मकान को साथ ले जा सकता है।

6. स्थगित भुगतानों में कठिनाई-वस्तु – विनिमय प्रणाली में वस्तु के मूल्य स्थिर नहीं होते तथा वस्तुएँ कुछ समय के पश्चात् नष्ट होनी प्रारम्भ हो जाती हैं। इस कारण उधार लेन-देन में असुविधा रहती है। यदि वस्तुओं के मूल्य का भुगतान कुछ समय बाद किया जाता है तो सर्वमान्य मूल्य मापक के अभाव के कारण समस्या पैदा हो जाती है। अतएव वस्तु-विनिमय प्रणाली आज के युग में पूर्णतः अव्यावहारिक तथा असफल है।
वस्तु-विनिमय प्रणाली के गुण-इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 3 देखें।

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प्रश्न 3.
वस्तु-विनिमय प्रणाली के प्रमुख गुण (विशेषताएँ) बताइए। इसके माध्यम से दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ किस प्रकार प्राप्त होता है ?
           या
वस्तु-विनिमय की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर:
वस्तु-विनियम प्रणाली के गुण वस्तु-विनिमय प्रणाली के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं

1. सरलता – वस्तु-विनिमय प्रणाली एक सरल प्रक्रिया है। अनपढ़ (UPBoardSolutions.com) लोग मुद्रा का ठीक-ठीक हिसाब नहीं लगा पाते हैं। ऐसी स्थिति में वे वस्तुओं का परस्पर आदान-प्रदान करके अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करते हैं।

2. पारस्परिक सहयोग – वस्तु-विनिमय प्रणाली सीमित क्षेत्र तक ही वहाँ उपयोग में लायी जा सकती है, जहाँ के निवासी एक-दूसरे की आवश्यकताओं से परिचित रहते हैं। वे आपस में वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान-प्रदान करके आवश्यकताओं की सन्तुष्टि सरलता से कर लेते हैं, जिससे उनमें पारस्परिक सहयोग की भावना बलवती होती है।

3. धन का विकेन्द्रीकरण – वस्तु-विनिमय प्रणाली सीमित क्षेत्र व न्यूनतम स्तर तक ही कार्य कर पाती है। व्यक्तियों को वस्तुओं के नष्ट होने का भय बना रहता है। इस कारण वे वस्तुओं का संग्रहण अधिक मात्रा में नहीं कर पाते। मुद्रा पद्धति के अभाव के कारण धन का केन्द्रीकरण कुछ ही हाथों में न होकर समाज के सीमित क्षेत्र के लोगों में बँट जाता है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए उपयुक्त – विभिन्न देशों की मुद्राओं में भिन्नता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भुगतान की समस्या बनी रहती है, परन्तु वस्तु-विनिमय द्वारा इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है, क्योंकि वस्तुओं के माध्यम से भुगतान सरलता से हो जाता है।

5. मौद्रिक पद्धति के दोषों से मुक्ति – मौद्रिक पद्धति में मुद्रा-प्रसार व मुद्रा-संकुचन की स्थिति उत्पन्न होती रहती है, परन्तु वस्तु-विनिमय प्रणाली में इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रकार वस्तु विनिमय प्रणाली मौद्रिक अवगुणों से मुक्त व्यवस्था है।

6. कार्यकुशलता में वृद्धि – वस्तु-विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता एवं दक्षता के अनुसार अधिक-से-अधिक मात्रा में उत्पादन करता है, जिससे उसकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

7. आय तथा सम्पत्ति का समान वितरण – वस्तु-विनिमय प्रणाली में मुट्ठीभर लोगों द्वारा आर्थिक शक्ति को संकेन्द्रण सम्भव नहीं है। इसका कारण यह है कि वस्तुएँ अपेक्षाकृत शीघ्र नाशवान होती हैं, जिससे उनका दीर्घकाल तक संचय नहीं किया जा सकता। परिणामत: यह व्यवस्था पूँजीवाद के दोषों से सर्वथा मुक्त रहती है।

8. आर्थिक असन्तुलन से मुक्त – मुद्रा के अभाव में वस्तु-विनिमय व्यवस्था, (UPBoardSolutions.com) मुद्रा-प्रसार व मुद्रा-संकुचन जैसी असाम्य की दशाओं से भी मुक्त रहती है। | दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ

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दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ

विनिमय क्रिया में प्रत्येक पक्ष कम आवश्यक वस्तु देकर अधिक आवश्यक वस्तु प्राप्त करता है अर्थात् एक पक्ष उस वस्तु को दूसरे व्यक्ति को देता है जो उसके पास आवश्यकता से अधिक है तथा जिसकी कम उपयोगिता है और बदले में उस वस्तु को लेता है जिसकी उसे अधिक आवश्यकता या तुष्टिगुण होता है। अत: विनिमय से दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ होता है। यदि किसी भी पक्ष को हानि होगी तब विनिमय सम्पन्न नहीं होगा।

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण – माना प्रिया व अरुणा के पास क्रमशः आम व सेब की कुछ इकाइयाँ हैं। वे परस्पर विनिमय करना चाहती हैं। दोनों को एक-दूसरे की वस्तु की आवश्यकता है। क्रमागत तुष्टिगुण ह्रास नियम के अनुसार, प्रिया व अरुणा की आम व सेब की इकाइयों का तुष्ट्रिगुण क्रमश: घटता जाता है, परन्तु जब विनिमय प्रक्रिया दोनों के मध्य प्रारम्भ होती है तब दोनों के पास आने वाली इकाइयों का तुष्टिगुण अधिक होता है तथा बदले में दोनों अपनी अतिरिक्त इकाइयों का त्याग करती हैं जिनका तुष्टिगुण अपेक्षाकृत कम होता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ मिलता रहता है।

उपर्युक्त तालिका के अनुसार प्रिया व अरुणा में विनिमय प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। प्रिया आम की एक इकाई देकर अरुणा से सेब की एक इकाई प्राप्त करती है। प्रिया को सेब की प्रथम इकाई से प्राप्त तुष्टिगुण अधिक होता है। उसे सेब की पहली इकाई से 25 इकाई तुष्टिगुण मिलता है। सेब के बदले में वह आम की अन्तिम इकाई, जिसको तुष्टिगुण 6 इकाई है, देती है। इस प्रकार उसे 25-6 = 19 तुष्टिगुण का लाभ होता है। इसी प्रकार अरुणा सेब की अन्तिम इकाई, जिसका तुष्टिगुण 4 है, को देकर आम की पहली इकाई जिससे उसे 20 तुष्टिगुण मिलता है, प्राप्त करती है। उसे 20-4 = 16 तुष्टिगुण के बराबर लाभ मिलता है। विनिमय की यह प्रक्रिया आम व सेब की तीसरी इकाई तक निरन्तर चलती रहती है, क्योंकि विनिमय प्रक्रिया से दोनों पक्षों को लाभ होता रहता है। परन्तु दोनों पक्ष चौथी इकाई के विनिमय हेतु तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि अब विनिमय-प्रक्रिया से उन्हें हानि होती है। इस प्रकार दोनों पक्ष उस सीमा तक ही विनिमय करते हैं, जब तक दोनों पक्षों को लाभ प्राप्त होता है। अत: यह कथन कि विनिमय से दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ प्राप्त होता है, सत्य है।

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प्रश्न 4.

वस्तु का मूल्य-निर्धारण किस प्रकार होता है ? तालिका एवं रेखाचित्र से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी भी वस्तु के मूल्य-निर्धारण के सम्बन्ध में अर्थशास्त्रियों में प्रायः मतभेद रहे हैं। एडम स्मिथ व रिकार्डो उत्पादन व्यय को मूल्य-निर्धारण का एकमात्र घटक मानते हैं, जब कि जेवेन्स व वालरस सीमान्त उपयोगिता को। प्रो० मार्शल ने इन दोनों विचारधाराओं में समन्वय स्थापित किया और बताया कि वस्तु का मूल्य न केवल उत्पादन लागत (पूर्ति पक्ष) द्वारा निर्धारित होता है और न सीमान्त उपयोगिता (माँग पक्ष) द्वारा ही, अपितु (UPBoardSolutions.com) दोनों ही शक्तियाँ (मॉग व पूर्ति) संयुक्त रूप से मूल्य का निर्धारण करती हैं। स्वयं प्रो० मार्शल के शब्दों में, “मूल्य उपयोगिता (माँग पक्ष) से तथा उत्पाद्न लागत (पूर्ति पक्ष) से निर्धारित होता है।

बाजार में किसी भी वस्तु का मूल्य उस बिन्दु पर निर्धारित होता है, जहाँ वस्तु की माँग और पूर्ति एक-दूसरे के बराबर हो जाती हैं। यह बिन्दु ‘साम्य बिन्दु’ कहलाता है तथा यह मूल्य ‘साम्य मूल्य’।

1. माँग शक्ति – वस्तु की माँग क्रेता वर्ग द्वारा की जाती है, क्योंकि वस्तु में निहित उपयोगिता की प्राप्ति । के लिए वह मूल्य देता है। क्रेता किसी वस्तु का अधिक-से-अधिक कितना मूल्य दे सकता है, यह वस्तु से प्राप्त होने वाली सीमान्त उपयोगिता के द्वारा निर्धारित होता है। इस प्रकार माँग पक्ष की ओर से किसी वस्तु का जो मूल्य निर्धारित होता है, वह वस्तु की सीमान्त उपयोगिता से अधिक नहीं हो सकता। इस प्रकार वस्तु की सीमान्त उपयोगिता ही वस्तु के लिए दी जाने वाली कीमत की उच्चतम सीमा निर्धारित करती है।

2. पूर्ति शक्ति – वस्तु की पूर्ति उत्पादक अथवा विक्रेता वर्ग द्वारा की जाती है। प्रत्येक उत्पादक अथवा विक्रेता अपनी वस्तु का कुछ-न-कुछ मूल्य अवश्य लेता है, क्योंकि वस्तु को बनाने में कुछ-न-कुछ। लागत अवश्य आती है। उत्पादक वस्तु का कम-से-कम कितना मूल्य लेना चाहेगा, यह भी वस्तु की सीमान्त उत्पादन लागत द्वारा निर्धारित होता है। इस प्रकार वस्तु की सीमान्त उत्पादन लागत वह न्यूनतम मूल्य है, जो उत्पादक अथवा विक्रेता को अवश्य प्राप्त होनी चाहिए।

मूल्य-निर्धारण बिन्दु

मूल्य के सामान्य सिद्धान्त के अनुसार, “वस्तु का मूल्य सीमान्त उपयोगिता तथा सीमान्त उत्पादन लागत के मध्य माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के द्वारा उस स्थान पर निर्धारित होता है, जहाँ वस्तु की पूर्ति उसकी माँग के बराबर होती है। (UPBoardSolutions.com) ” इस कथन का अभिप्राय यह है कि क्रेता की दृष्टि से मूल्य की अन्तिम सीमा वस्तु की सीमान्त उपयोगिता द्वारा निर्धारित होती है, जब कि विक्रेताओं की दृष्टि से सीमान्त लागत मूल्य की निम्नतम सीमा का निर्धारण करती है। प्रत्येक क्रेता वस्तु का कम-से-कम मूल्य देना चाहता है तथा विक्रेता वस्तु का अधिक-से-अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहता है। अत: दोनों पक्ष सौदेबाजी करते हैं और अन्त में वस्तु का मूल्य उस बिन्दु (जिसे साम्य अथवा सन्तुलन बिन्दु कहते हैं) पर निर्धारित होता है, जहाँ वस्तु की माँग वस्तु की पूर्ति के ठीक बराबर होती है। इसी बिन्दु को सन्तुलन मूल्य (Equilibrium Price) कहा जाता है। नीचे दी गयी सारणी से मूल्य-निर्धारण की प्रक्रिया को आसानी से समझा जा सकेगा –

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उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि जब ‘क’ वस्तु का मूल्य क्रमशः ₹ 1 व ₹ 2 प्रति किग्रा है, तो ‘क’ वस्तु की कुल माँग क्रमशः 1,000 व 800 किग्रा है, जबकि ‘क’ वस्तु की पूर्ति 200 व 400 किग्रा है अर्थात् माँग और पूर्ति में क्रमशः 800 व 400 किग्रा का अन्तर है

इसी प्रकार जब ‘क’ वस्तु का मूल्य क्रमशः ₹ 4.00 व ₹ 5.00 प्रति किग्रा है, तो ‘क’ की पूर्ति क्रमशः 800 व 1,000 किग्रा है, जबकि माँग क्रमश: 300 व 200 किग्रा है; अर्थात् पूर्ति व माँग के बीच क्रमशः 500 व 800 किग्रा का अन्तर है।

ये सभी अवस्थाएँ माँग व पूर्ति में असाम्य की अवस्थाएँ हैं। अत: इने पर किसी में भी मूल्य-निर्धारण नहीं होगा। मूल्य-निर्धारण ₹ 3 प्रति किग्रा पर होगा, क्योंकि इस अवस्था में माँग और पूर्ति दोनों 600 किग्रा हैं और यह ‘सन्तुलन मूल्य’ बिन्दु है।

रेखाचित्र में DD ‘क- वस्तु की मॉग-रेखा है तथा SS-‘क’ वस्तु की पूर्ति-रेखा है। माँग व पूर्ति की ये रेखाएँ , एक-दूसरे को साम्य बिन्दुE पर काटती हैं और यह साम्य ₹ 3 प्रति किग्रा मूल्य निर्धारित करता है। यही वस्तु का सन्तुलन मुल्य है।

संक्षेप में, किसी वस्तु का मूल्य माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है। मूल्य का यह निर्धारण उस साम्य बिन्दु पर होता है, जहाँ माँग व पूर्ति एक-दूसरे के बराबर हो जाती हैं।

प्रश्न 5.
विनिमय के प्रकार बताइए तथा वस्तु-विनिमय एवं क्रय-विक्रय को स्पष्ट कीजिए।
           या
वस्तु-विनिमय से क्या-क्या लाभ तथा हानियाँ हैं ?
           या
विनिमय के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। 
[2018]
उत्तर :
विनिमय दो प्रकार का होता है –

  1. प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय या अदल-बदले प्रणाली तथा
  2. अप्रत्यक्ष विनिमय अथवा द्रव्य द्वारा क्रय-विक्रय प्रणाली।

प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु-विनिमय प्रणाली – “जब दो व्यक्ति परस्पर अपनी वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान करते हैं, तब इस प्रकार की क्रिया को हम अर्थशास्त्र में वस्तु-विनिमय (Barter) कहते हैं। उदाहरणार्थ- एक (UPBoardSolutions.com) समय भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज देकर सब्जी प्राप्त की जाती थी तथा नाई, धोबी, बढ़ई आदि को सेवाओं के बदले में अनाज दिया जाता था।

अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली – जब विनिमय प्रक्रिया में मुद्रा (द्रव्य) का लेन-देन भी किया जाता है तो इस प्रणाली को क्रय-विक्रय अथवा अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति मुद्रा लेकर किसी वस्तु या सेवा को क्रय करता है या किसी वस्तु या सेवा को देकर मुद्रा प्राप्त करता है, तब इस क्रिया को अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय विक्रय प्रणाली कहते हैं।

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वस्तु-विनिमय से लाभ

वस्तु-विनिमय से निम्नलिखित लाभ दृष्टिगोचर होते हैं –

1. विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ होता है – दो व्यक्ति आपस में विनिमय तभी करते हैं जब दोनों को लाभ होता है। यदि इससे एक ही पक्ष लाभान्वित हो तो दूसरे पक्ष का मिलना असम्भव हो जाएगा, क्योकि दूसरा पक्ष बिना लाभ के ऐसा करने के लिए तैयार नहीं होगा।

2. आवश्यक वस्तुओं का मिलना – विनिमय के द्वारा अतिरिक्त पदार्थों के बदले अधिक आवश्यक वस्तुओं का मिलना सुलभ होगा। विनिमय के कारण हम उन वस्तुओं का भी उपभोग कर सकते हैं जो हम स्वयं उत्पन्न नहीं कर सकते। इस प्रकार विनिमय के द्वारा आवश्यक वस्तु सरलता से उपलब्ध हो ” जाती है।

3. अधिकतम उत्पादन – विनिमय क्रिया के द्वारा सभी लोगों को अपनी-अपनी वस्तु के बदले में उनकी आवश्यकता की सभी वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति या राष्ट्र उसी वस्तु को पैदा करता है, जिसके उत्पादन में वह दूसरों से अधिक श्रेष्ठ है और जिनके उत्पादन की उसे अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं।

4. बाजारों का क्षेत्र विस्तृत होना – विनिमय के द्वारा ही बड़े पैमाने का उत्पादन सम्भव हुआ। इसके द्वारा उत्पादन लागत घट गयी। बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन होने से बढ़े हुए उत्पादन को निर्यात करके बाजार का क्षेत्र विस्तृत किया जा सकता है।

5. देश के प्राकृतिक साधनों का पूर्ण प्रयोग – विनिमय प्रणाली के कारण ही प्रत्येक राष्ट्र अपने देश में उपलब्ध सभी प्राकृतिक साधनों का पूरा प्रयोग कर लेता है, क्योंकि यदि उसे केवल अपनी आवश्यकता के लिए ही उत्पादन करना होता तो उसे उन साधनों का थोड़ा प्रयोग करना पड़ता और शेष साधन बेकार पड़े रहते। अब उसे अपनी आवश्यकता के अतिरिक्त भी उत्पादन करना पड़ता है, तो देश में प्राप्त सभी प्राकृतिक साधनों का भरपूर प्रयोग किया जाता है।

6. कार्य-कुशलता में वृद्धि – विनिमय द्वारा लोगों की कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है। इसका मुख्य कारण आवश्यक वस्तुओं का सरलता से मिलना तथा उन वस्तुओं का उत्पादन करना है, जिनमें कोई व्यक्ति या राष्ट्र निपुणता प्राप्त कर लेता है। एक कार्य को निरन्तर करने से कार्य की निपुणता में वृद्धि होती है।

7. ज्ञान में वृद्धि – विनिमय द्वारा मनुष्यों का परस्पर सम्पर्क बढ़ता है, फलस्वरूप व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के धर्म, रहन-सहन, भाषा, रीति-रिवाजों आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार विनिमय द्वारा ज्ञान व सभ्यता में वृद्धि होती है।

8. राष्ट्रों में पारस्परिक मैत्री व सद्भावना – विनिमय के कारण ही वस्तुओं का आयात-निर्यात सम्भव हो सका है, फलस्वरूप विश्व के विभिन्न राष्ट्र परस्पर निकट आये हैं। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर वस्तुओं की प्राप्ति हेतु निर्भर हो गया है। परिणामस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों में मित्रता व संभावना बलवती हुई है।

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वस्तु-विनिमय से हानियाँ

वस्तु-विनिमय से कुछ हानियाँ भी होती हैं, जो निम्नलिखित हैं –

1. आत्मनिर्भरता की समाप्ति – विनिमय की सुविधा हो जाने से एक राष्ट्र कुछ ही वस्तुओं का उत्पादन करता है और अपनी आवश्यकता की शेष वस्तुएँ वह दूसरे देशों से मँगाता है। इसलिए एक देश कुछ अंश तक दूसरे देशों पर निर्भर रहने लगता है और उसकी आत्मनिर्भरता समाप्त हो जाती है। इस स्थिति में युद्ध या संकट के समय उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

2. प्राकृतिक साधनों का अनुचित शोषण – विनिमय के कारण विभिन्न वस्तुओं के बाजार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। फलस्वरूप देश अपने प्राकृतिक साधनों का बिना सोचे-समझे शोषण करने लगते हैं। अधिक उत्पादन के लालच में यदि किसी देश की खनिज सम्पत्ति समाप्त हो जाए तो उसका औद्योगिक भविष्य अन्धकारमय हो जाएगा।

3. देश का एकांगी विकास – विनिमय की सुविधा के कारण प्रत्येक देश केवल उन्हीं वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनमें वे अधिक दक्ष होते हैं। इसलिए देश में उन्हीं वस्तुओं से सम्बन्धित उद्योग-धन्धों का विकास होता है तथा अन्य उद्योग-धन्धों के विकास में वह देश शून्य हो जाता है। इससे देश का विकास एकांगी होता है।

4. राजनैतिक दासता – अत्यधिक उत्पादन के कारण शक्तिशाली (UPBoardSolutions.com) देश विनिमय के द्वारा दूसरे देशों के बाजारों पर नियन्त्रण कर लेते हैं तथा निर्बल देश को अपना दास बना लेते हैं।

5. पिछड़े राष्ट्रों को हानि – विनिमय प्रणाली में विकसित राष्ट्रों को तो अधिक लाभ प्राप्त होता है। लेकिन पिछड़े हुए राष्ट्रों को पर्याप्त हानि उठानी पड़ती है। पिछड़े राष्ट्रों का शोषण होता है और उनका विकास अवरुद्ध हो जाता है।

6. युद्ध की आशंका – कभी-कभी कुछ देश बाजार पर अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए अनुचित प्रतियोगिता करने लगते हैं। वे अपनी वस्तुओं को बहुत ही कम मूल्य पर दूसरे देशों में बेचने लगते हैं। इससे दूसरे देशों के उद्योग-धन्धों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जब वह देश इस अनुचित प्रतियोगिता को रोकना चाहता है तो संघर्ष की स्थिति आ जाती है।

7. अनुचित प्रतियोगिता – विनिमय के कारण ही विभिन्न उत्पादकों एवं राष्ट्रों में अपनी-अपनी वस्तुएँ। बेचने के लिए ऐसी प्रतियोगिता होती है कि सामान्य उत्पादकों को हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न 6.
बाजार शब्द का अर्थशास्त्र में क्या अर्थ है ? इसके आवश्यक तत्त्व (विशेषताएँ) कौन-कौन से हैं ? [2009]
           या
बाजार की तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2014]
           या
बाजार की दो विशेषताएँ बताइए। [2010]
           या
बाजार की परिभाषा लिखिए तथा बाजार की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2011]
           या
बाजार को परिभाषित कीजिए। बाजार के वर्गीकरण के किन्हीं दो आधारों की विवेचना कीजिए। [2015]
           या
प्रतियोगिता के आधार पर बाजार का वर्गीकरण कीजिए। [2016]
           या
बाजार से आप क्या समझते हैं? इंसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर :

बाजार का अर्थ एवं परिभाषाएँ

साधारण भाषा में ‘बाजार’ (Market) का अर्थ उस स्थान से लगाया जाता है, जहाँ भौतिक रूप से उपस्थित क्रेताओं और विक्रेताओं द्वारा वस्तुएँ खरीदीं और बेची जाती हैं; जैसे—सर्राफा बाजार, दालमण्डी आदि। किन्तु अर्थशास्त्र में बाजार शब्द का अर्थ अधिक व्यापक होता है। अर्थशास्त्र के अन्तर्गत बाजार शब्द से अभिप्राय उस समस्त क्षेत्र से लगाया जाता है, जहाँ किसी वस्तु के क्रेता-विक्रेता आपस में स्वतन्त्रतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करते हैं।

बाजार की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

कूनो के शब्दों में, “बाजार से तात्पर्य किसी स्थान-विशेष से नहीं होता जहाँ वस्तुएँ खरीदीं और बेची जाती । हैं, वरन् उस समस्त क्षेत्र से होता है जिसमें क्रेताओं और विक्रेताओं के बीच ऐसी स्वतन्त्र प्रतिस्पर्धा हो कि किसी वस्तु का मूल्य सहज ही समान होने की प्रवृत्ति रखता हो।”

प्रो० बेन्हम के शब्दों में, “बाजार वह क्षेत्र होता है जिसमें क्रेता (UPBoardSolutions.com) और विक्रेता एक-दूसरे के इतने निकट सम्पर्क में होते हैं कि एक भाग में प्रचलित कीमतों को प्रभाव दूसरे भाग में प्रचलित कीमतों पर पड़ता है।

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बाजार के आवश्यक तत्त्व अथवा विशेषताएँ

बाजार के आवश्यक तत्त्व निम्नलिखित हैं –

1. एक क्षेत्र – बाजार से अर्थ उस समस्त क्षेत्र से होता है जिसमें क्रेता व विक्रेता फैले रहते हैं तथा क्रय-विक्रय करते हैं।

2. एक वस्तु का होना – बाजार के लिए एक वस्तु का होना भी आवश्यक है; जिसका क्रय-विक्रय किया जा सकता है। अर्थशास्त्र में प्रत्येक वस्तु को बाजार अलग-अलग माना जाता है; जैसे-कपड़ा बाजार, नमक बाजार, सर्राफा बाजार, किराना बाजार, घी बाजार आदि।

3. क्रेताओं व विक्रेताओं का होना – विनिमय के सम्पन्न करने के लिए बाजार की आवश्यकता होती है। अत: बाजार में विनिमय के दोनों पक्षों (क्रेता व विक्रेता) का होना आवश्यक है। किसी एक भी पक्ष के न होने पर सम्बद्ध क्षेत्र बाजार नहीं कहलाएगा।

4. स्वतन्त्र व पूर्ण प्रतियोगिता – बाजार में क्रेता और विक्रेताओं में निकट का सम्पर्क होता है। इसका अर्थ है कि उनमें पूर्ण प्रतियोगिता रहती है तथा उन्हें बाजार का पूर्ण ज्ञान रहता है। इसके परिणामस्वरूप वस्तु की कीमत की प्रवृत्ति एक ही या एक समान होने की पायी जाती है। अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में कीमत-विभेद पाया जाता है।

5. क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार के सम्बन्ध में ज्ञान होता है।

बाजार का वर्गीकरण

बाजार का वर्गीकरण निम्नलिखित पाँच प्रकार से किया जाता है –

  1. क्षेत्र की दृष्टि से
  2. समय की दृष्टि से
  3. बिक्री की दृष्टि से
  4. प्रतियोगिता की दृष्टि से एवं
  5. वैधानिकता की दृष्टि से।

(i) क्षेत्र की दृष्टि से
क्षेत्र के आधार पर बाजार को निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

  1. स्थानीय बाजार – जब किसी वस्तु की माँग स्थानीय होती है और उसके क्रेता तथा विक्रेता एक स्थान-विशेष तक ही अपनी क्रियाएँ सीमित रखते हैं, तो वस्तु का बाजार स्थानीय कहलाता है। स्थानीय बाजार प्रायः शीघ्र नाशवान वस्तुओं (जैसे—दूध, फल, मछली आदि) तथा उन वस्तुओं का होता है, जो अपने मौद्रिक मूल्य की तुलना में अधिक स्थान घेरने वाली (जैसे-ईंट, पत्थर, रेत आदि) होती हैं।
  2. क्षेत्रीय (प्रादेशिक ) बाजार – जब किसी वस्तु की माँग किसी क्षेत्र-विशेष तक ही सीमित रहती है तो उस वस्तु का बाजार क्षेत्रीय बाजार कहलाती है; जैसे–लाख और हाथीदाँत की चूड़ियों का बाजार, क्योंकि इनका प्रचलन केवल राजस्थान (UPBoardSolutions.com) व उसके आस-पास ही पाया जाता है।
  3. राष्ट्रीय बाजार – ऐसी वस्तुओं, जिनके क्रेता-विक्रेता सम्पूर्ण राष्ट्र में बिखरे होते हैं, अर्थात् जिन वस्तुओं की माँग एवं पूर्ति राष्ट्रव्यापी होती है, उस वस्तु का बाजारे राष्ट्रीय बाजार कहलाता है;  जैसे – भारत में साड़ियों तथा चूड़ियों का बाजार।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय बाजार – जिस वस्तु की माँग विश्वव्यापी होती है, अर्थात् जिस वस्तु के क्रेता एवं विक्रेता समस्त विश्व में फैले होते हैं, उस वस्तु का बाजार अन्तर्राष्ट्रीय बाजार कहलाता है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार की प्रमुख वस्तुएँ हैं – सोना, चाँदी, गेहूं, चावल आदि।

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(ii) समय की दृष्टि से

समय के आधार पर बाजार को निम्नलिखित चार भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  1. दैनिक बाजार – जब किसी वस्तु की माँग में वृद्धि या कमी होने पर उसकी पूर्ति में वृद्धि या कमी न की जा सके तो उसे दैनिक बाजार या अति-अल्पकालीन बाजार कहते हैं। हरी सब्जी, मछली, दूध, बर्फ आदि का बाजार दैनिक बाजार होता है। दैनिक बाजार में वस्तु के मूल्य में पूर्ति की अपेक्षा माँग को प्रभाव अधिक पड़ता है।
  2. अल्पकालीन बाजार – अल्पकालीन बाजार में दैनिक बाजार की अपेक्षा इतना अधिक समय मिल जाता है कि माँग के अनुसार पूर्ति में कुछ सीमा तक समायोजन किया जा सके। अतः कीमत-निर्धारण में पूर्ति की अपेक्षा माँग का प्रभाव ही अधिक रहता है।
  3. दीर्घकालीन बाजार – दीर्घकालीन बाजार में माँग के अनुसार पूर्ति को पूर्णतया समायोजित किया जा सकता है, अर्थात् माँग के बढ़ने पर पूर्ति बढ़ाई जा सकती है तथा माँग के घटने पर पूर्ति घटाई जा सकती है। अत: इसमें मूल्य-निर्धारण में माँग की तुलना में पूर्ति का प्रभाव अधिक होता है।
  4. अति-दीर्घकालीन बाजार – अति दीर्घकालीन बाजार में उत्पादकों को पूर्ति बढ़ाने के लिए इतना लम्बा समय मिल जाता है कि उत्पादन-विधि तथा व्यवसाय की आन्तरिक व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये जा सकते हैं। इसमें समयावधि इतनी अधिक होती है कि उत्पादक उपभोक्ताओं के स्वभाव, रुचि, फैशन आदि के अनुसार वस्तु का उत्पादन कर सकता है। ऐसे बाजारों को काल-निरपेक्ष बाजार भी कहते हैं। सोना, चाँदी, मशीन आदि का बाजार अति-दीर्घकालीन बाजार होता है।

(iii) बिक्री की दृष्टि से

बिक्री के आधार पर बाजार को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. मिश्रित बाजार – जिन बाजारों में एक से अधिक प्रकार की अर्थात् विविध वस्तुओं का क्रय-विक्रय किया जाता है, वे मिश्रित बाजार कहलाते हैं। इन्हें सामान्य बाजार भी कहते हैं।
  2. विशिष्ट बाजार – विशिष्ट बाजारों में केवल एक ही वस्तु का क्रय-विक्रय होता है। ऐसे बाजार प्रायः बड़े-बड़े शहरों में पाये जाते हैं; जैसे—बजाजा, सर्राफा, दाल मण्डी, सब्जी मण्डी आदि।
  3. नमूने द्वारा बिक्री का बाजार – जिस बाजार में माल का क्रय-विक्रय केवल नमूने के आधार पर किया जाता है, उसे नमूने द्वारा बिक्री का बाजार कहते हैं; उदाहरण के लिए ऊनी वस्त्रों में पुस्तकों का विक्रय।
  4. ग्रेड द्वारा बिक्री का बाजार – इस बाजार से माल की बिक्री ग्रेडों द्वारा होती है। इसके अन्तर्गत वस्तु की विभिन्न किस्मों को कुछ ग्रेडों (वर्गों) में बाँट दिया जाता है और इन्हें अलग-अलग नाम दे दिया जाता है। उदाहरण के लिए-गेहूँ K-68, ऊषा मशीन, हमाम साबुन आदि।

(iv) प्रतियोगिता की दृष्टि से

प्रतियोगिता के आधार पर बाजार निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं –

  1. पूर्ण बाजार – पूर्ण बाजार उस बाजार को कहते हैं, जिसमें पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है। इस स्थिति में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है, कोई भी व्यक्तिगत रूप से वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। क्रेता और विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है, जिसके कारण वस्तु की बाजार में एक ही कीमत होने की प्रवृत्ति पाई जाती है। यह एक काल्पनिक बाजार होता है, जो व्यवहार में नहीं पाया जाता।
  2. अपूर्ण बाजार – जब किसी बाजार में प्रतियोगिता सीमित मात्रा में पायी जाती है, क्रेताओं और विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है, तब उसे अपूर्ण बाजार कहते हैं। इस बाजार में अपूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है, जिसके (UPBoardSolutions.com) परिणामस्वरूप बाजार कीमत में भिन्नता होती है। इनमें वस्तुओं का मूल्य भी एक समय पर एक नहीं होता है।
  3. एकाधिकारी बाजार – इस तरह के बाजार में प्रतियोगिता का अभाव होता है। बाजार में वस्तु का क्रेता या विक्रेता केवल एक ही होता है। एकाधिकारी का वस्तु की कीमत तथा पूर्ति पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। एकाधिकारी बाजार में वस्तु की भिन्न-भिन्न कीमतें निश्चित कर सकता है।

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(v) वैधानिकता की दृष्टि से
वैधानिकता की दृष्टि से बाजार निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं –

  1. अधिकृत या उचित बाजार – अधिकृत बाजार में सरकार द्वारा अधिकृत दुकानें होती हैं तथा वस्तुओं का क्रय-विक्रय नियन्त्रित मूल्यों पर होता है। युद्ध काल अथवा महँगाई के समय में सरकार आवश्यक वस्तुओं का मूल्य नियन्त्रित कर देती है और उनके उचित वितरण की व्यवस्था करती है।
  2. चोर बाजार – युद्ध काल अथवा महँगाई के समय में, वस्तुओं की कमी एवं अन्य कारणों से कुछ दुकानदार चोरी से सरकार द्वारा निश्चित मूल्य से अधिक मूल्य पर वस्तुएँ बेचते रहते हैं। अधिकांशतः ऐसा कार्य अनधिकृत दुकानदार ही करते हैं। ये बाजार अवैध होते हैं।
  3. खुला बाजार – जब बाजार में वस्तुओं के मूल्य पर सरकार द्वारा कोई नियन्त्रण नहीं होता तथा क्रेताओं और विक्रेताओं की परस्पर प्रतियोगिता के आधार पर वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण होता है। तब इस प्रकार के बाजार को खुला या स्वतन्त्र बाजार कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्रय-विक्रय प्रणाली के गुण-दोष लिखिए।
उत्तर:

क्रय-विक्रय प्रणाली के गुण

मुद्रा के प्रचलन से विनिमय की क्रिया अधिक सरल हो गयी। मुद्रा ने वस्तु विनिमय प्रणाली की समस्याओं को दूर कर दिया है। क्रय-विक्रय प्रणाली के गुण निम्नवत् हैं –

  1. मुद्रा के माध्यम से मूल्य का मापन आसान हो गया है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य मुद्रा में आँका जाने लगा है; जैसे – ₹ 5 की एक कलम, ₹ 15 प्रति एक किलो चावल इत्यादि।
  2. क्रय-विक्रय प्रणाली में मुद्रा के प्रयोग से दोहरे संयोग की समस्या समाप्त हो गयी है।
  3. इस प्रणाली में वस्तु विभाजन की समस्या नहीं रही। मुद्रा (UPBoardSolutions.com) की इकाइयों के माध्यम से वस्तुओं की छोटी-से-छोटी इकाइयाँ क्रय की जा सकती हैं।
  4. मूल्य का संचय मुद्रा के माध्यम से आसान हो गया है। मुद्रा वस्तुओं की तरह तुरन्त नष्ट नहीं होती। मुद्रा के माध्यम से लम्बे समय तक क्रयशक्ति संचित रखी जा सकती है।

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क्रय-विक्रय प्रणाली के दोष

विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा के प्रचलन से जहाँ एक ओर क्रय-विक्रय की प्रक्रिया आसान हुई है, वहीं कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मुद्रा आज की लगभग सभी बुराइयों की जड़ है। मुद्रा के कारण ही अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की समस्या खड़ी होती है, मुद्रास्फीति में सामान्य मूल्य-स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है। मुद्रास्फीति गरीबों को बुरी तरह प्रभावित करती है।

प्रश्न 2.
वस्तु-विनिमय से क्या तात्पर्य है ? सोदाहरण समझाइट। [2009]
उत्तर:
वस्तुओं या सेवाओं के प्रत्यक्ष आदान-प्रदान को वस्तु विनिमय कहते हैं। इसमें एक वस्तु का दूसरी वस्तु से बिना किसी माध्यम के प्रत्यक्ष विनिमय किया जाता है। दूसरे शब्दों में, मुद्रा के प्रयोग के बिना। कम उपयोगी वस्तु के बदले में अधिक उपयोगी वस्तु के आदान-प्रदान को वस्तु-विनिमय कहते हैं। टॉमस के अनुसार, “एक वस्तु से दूसरी वस्तु के प्रत्यक्ष विनिमय को ही वस्तु-विनिमय कहा जाता है।” डॉ० के०के० देवेट के अनुसार, “जब मुद्रा के हस्तक्षेप के बिना ही विनिमय कार्य किया जाता है, तब उसे हम वस्तु-विनिमय कहते हैं।”

उदाहरण – एक गाय देकर पाँच बकरियाँ लेना तथा एक किलो गेहूँ के बदले नाई से हजामत करवाना, वस्तु-विनिमय के उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.

आधुनिक युग में वस्तु-विनिमय प्रणाली क्यों प्रचलित नहीं है ?
           या
वस्तु-विनियम क्यों समाप्त हो गया ?

उत्तर:
आधुनिक युग में वस्तु-विनिमय प्रणाली का चलना कठिन है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. उत्पादन में निरन्तर वृद्धि।
  2. विश्व में आर्थिक विकास की तीव्र गति।
  3. परिवहन के साधनों का निरन्तर विकास।
  4. जीवन-स्तर को ऊँचा होना।।
  5. व्यापार का विस्तार।
  6. मुद्रा का प्रचलन।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आधुनिक युग में वस्तु-विनिमय प्रणाली का होना कठिन ही नहीं, वरन् असम्भव है।

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प्रश्न 4.

वस्तु-विनिमय एवं मुद्रा विनिमय प्रणाली को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

वस्तु-विनिमय एवं मुद्रा विनिमय प्रणाली

  • वस्तु विनिमय प्रणाली – वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान को वस्तु विनिमय प्रणाली कहते हैं। यह विनिमय का एक ऐसा रूप है जिसके अन्तर्गत बिना किसी माध्यम के दो पक्षों के बीच दो वस्तुओं/सेवाओं का आपस में (UPBoardSolutions.com) आदान-प्रदान न्याय की दृष्टि से किया जाता है।
  • मुद्रा विनिमय प्रणाली – मुद्रा विनिमय प्रणाली के विनिमय का कार्य अप्रत्यक्ष रूप से होता है। इसमें एक व्यक्ति अपनी वस्तु या सेवा को बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है और फिर उस मुद्रा से अपनी आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ। सेवाएँ प्राप्त करता है। इस प्रणाली में मुद्रा विनिमय के माध्यम’ का कार्य करती है।

प्रश्न 5.
वस्तु-विनिमय और क्रय-विक्रय प्रणाली में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
वस्तु-विनिमय और क्रय-विक्रय प्रणाली में निम्नलिखित अन्तर हैं –

प्रश्न 6.
विनिमय में विक्रेता और क्रेता की उपस्थिति के परिणामों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
विनिमय में विक्रेता और क्रेता की उपस्थिति से सर्वप्रथम उनमें परस्पर प्रतियोगिता होती है और एक मूल्य का निर्धारण होता है। इससे बाजार में अतिरेक उत्पादन बिकं जाता है और क्रेता अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएँ खरीद लेते हैं। विनिमय में विक्रेता और क्रेता की उपस्थिति के परिणाम , निम्नलिखित हैं –

  1. बाजार का अस्तित्व में आना – बाजार में विनिमय के दोनों पक्षों-क्रेता तथा विक्रेता-का होना आवश्यक है। एक भी पक्ष के न होने से बाजार अधूरा रहता है। अत: विनिमय में विक्रेता तथा क्रेता की उपस्थिति बाजार का निर्माण करती है।
  2. माँग-पूर्ति तथा मूल्य-निर्धारण पर प्रभाव – विनिमय में (UPBoardSolutions.com) विक्रेता तथा क्रेता की उपस्थिति बाजार में
    माँग-शक्ति तथा परिणामस्वरूप मूल्य-निर्धारण को प्रभावित करती है। यदि बाजार में क्रेता अधिक होंगे तथा विक्रेता कम, तो वस्तु की माँग पूर्ति की अपेक्षा अधिक हो जाने से उस वस्तु का बाजार मूल्य बढ़ जाएगा। इसकी विपरीत दशा में पूर्ति अधिक तथा माँग कम होने पर, वस्तु का मूल्य घट जाएगा।

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प्रश्न 7.
अर्थव्यवस्था की समस्याओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था की प्रमुख समस्याएँ अग्रलिखित हैं –

  1. कैसे उत्पादन किया जाए? – इंस समस्या का सम्बन्ध उत्पादन के लिए श्रम गहन विधि अथवा पूँजी गहन विधि में से किसी एक का चुनाव करने से है। इनमें वह तकनीक सर्वोत्तम मानी जाती है, जो सीमित साधनों की कम-से-कम मात्रा का उपयोग करे।
  2. क्या उत्पादन किया जाए? – अर्थव्यवस्था की सर्वाधिक प्रमुख समस्या यह है कि वह अपने सीमित साधनों से किन-किन वस्तुओं का और कितनी-कितनी मात्रा में उत्पादन करे उसी आधार पर उसे यह निर्णय लेना होता है कि वह किस वस्तु के उत्पादन में अपने सीमित साधनों की कितनी मात्रा लगाए।
  3. किसके लिए उत्पादन किया जाए ? – इस समस्या का सम्बन्ध देश के कुल राष्ट्रीय उत्पाद में उत्पादन के विभिन्न साधनों के हिस्से के निर्धारण से है। इस प्रकार यह समस्या मुख्य रूप से राष्ट्रीय उत्पादन के विभिन्न व्यक्तियों एवं वर्गों के बीच वितरण से सम्बन्धित समस्या है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विनिमय को परिभाषित कीजिए। [2018]
उत्तर :
दो पक्षों के बीच होने वाले वस्तुओं व सेवाओं के पारस्परिक, ऐच्छिक व वैधानिक हस्तान्तरण को विनिमय कहते हैं।

प्रश्न 2.
विनिमय कितने प्रकार का होता है ? [2018]
उत्तर :
विनिमय दो प्रकार का होता है –

  1. वस्तु विनिमय या प्रत्यक्ष विनिमय तथा
  2. अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय।

प्रश्न 3.
विनिमय की दो प्रमुख शर्ते लिखिए।
उत्तर :
विनिमय के दो प्रमुख लक्षण हैं –

  1. दो पक्षों का होना तथा
  2. दोनों पक्षों को लाभ होना।

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प्रश्न 4.
विनिमय के दो प्रमुख लाभ लिखिए। [2009, 12, 14]
उत्तर :
विनिमय के दो प्रमुख लाभ हैं –

  1. आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति तथा
  2. बाजार का विस्तार।

प्रश्न 5.
वस्तु-विनिमय प्रणाली से आप क्या समझते हैं ? [2010]
उत्तर :
वस्तु-विनिमय प्रणाली को प्रत्यक्ष विनिमय भी (UPBoardSolutions.com) कहते हैं। इसके अन्तर्गत वस्तु का आदानप्रदान वस्तु के बदले किया जाता है।

प्रश्न 6

क्रय-विक्रय से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
जब दो पक्षों में किसी वस्तु अथवा सेवा का आदान-प्रदान मुद्रा के माध्यम से होता है तो उसे क्रय-विक्रय कहते हैं।

प्रश्न 7.

अर्थशास्त्र में ‘बाजार’ से क्या तात्पर्य है ? [2010, 13]
उत्तर :
अर्थशास्त्र में बाजार से अभिप्राय उस समस्त क्षेत्र से है, जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों फैले हुए हों और उनके मध्य प्रतियोगिता विद्यमान हो।

प्रश्न 8.

समय की दृष्टि से बाजार को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर :
समय की दृष्टि से बाजार चार प्रकार के होते हैं –

  1. दैनिक बाजार
  2. अल्पकालीन बाजार
  3. दीर्घकालीन बाजार तथा
  4. अति-दीर्घकालीन बाजार।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

1. वस्तु-विनिमय प्रणाली को कहते हैं [2012]  

(क) प्रत्यक्ष विनिमय
(ख) अप्रत्यक्ष विनिमय
(ग) मौद्रिक विनिमय
(घ) क्रय-विक्रय

2. “वस्तुओं का आपस में अदल-बदल ही वस्तु-विनिमय है।” यह कथन किसका है?

(क) मार्शल का
(ख) ऐली का
(ग) जेवेन्स का
(घ) बेन्हम का

3. विनिमय की क्रिया के अन्तर्गत आता है|

(क) वस्तु-विनिमये ।
(ख) क्रय-विक्रय
(ग) (क) एवं
(ख) दोनों
(घ) दोनों गलत हैं।

4. वस्तुओं के अदल-बदल की प्रक्रिया कहलाती है –

(क) क्रय-विक्रय
(ख) वस्तु-विनिमय
(ग) मुद्रा विनिमय
(घ) इनमें से कोई नहीं

 

5. “दो पक्षों के मध्य होने वाले ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक धन का हस्तान्तरण ही विनिमय है।” यह परिभाषा किसने दी है?

(क) जेवेन्स ने
(ख) ऐली ने
(ग) मार्शल ने
(घ) कीन्स ने

6. विनिमय में कम-से-कम कितने लोगों की आवश्यकता होती है? [2015] 

(क) दो
(ख) एक
(ग) तीन
(घ) तीन से अधिक

7. निम्नलिखित में से कौन-सी क्रिया उत्पादन और उपभोग के बीच की कड़ी है?

(क) उपभोग
(ख) वितरण
(ग) विनिमय ।
(घ) मुद्रा

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8. दूध, फल और सब्जी का बाजार होता है-

(क) स्थानीय
(ख) राष्ट्रीय .
(ग) प्रादेशिक
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय

9. विनिमय क्रिया में वस्तुओं का हस्तान्तरण

(क) ऐच्छिक, वैधानिक एवं पारस्परिक होता है ।
(ख) वैधानिक, पारस्परिक एवं बलपूर्वक होता है।
(ग) ऐच्छिक, गैर-कानूनी एवं पारस्परिक होता है
(घ) केवल ऐच्छिक होता है ।

10. वस्तुओं को वस्तुओं के माध्यम से किया जाने वाला आदान-प्रदान अर्थशास्त्र के अन्तर्गत कहलाता है

(क) क्रय-विक्रय
(ख) वस्तु-विनिमय
(ग) क्रय-विक्रय और वस्तु-विनिमय
(घ) व्यापार

11. अर्थशास्त्र की दृष्टि से किसे बाजार के वर्गीकरण का मान्यता प्राप्त आधार माना जाता है?

(क) वस्तु की कीमत
(ख) क्षेत्र जहाँ वस्तु बिक सके
(ग) वस्तु का टिकाऊपन
(घ) शान्ति व सुरक्षा

12. पूर्ण बाजार में पाई जाती है

(क) पूर्ण प्रतियोगिता
(ख) अपूर्ण प्रतियोगिता
(ग) ‘एकाधिकारी प्रतियोगिता
(घ) ये सभी

13. ईंट का बाजार होता है [2017]

(क) स्थानीय (ख) प्रादेशिक
(ग) राष्ट्रीय
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय

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14. वस्तु-विनिमय सम्बन्धित है [2010, 11, 14, 15]

(क) वस्तुओं के उत्पादन से
(ख) मुद्रा से
(ग) मजदूरी-निर्धारण से
(घ) वस्तुओं के आपसी लेन-देन से

15. खनिज तेल का बाजार है [2013, 17]

(क) स्थानीय बाजार
(ख) प्रादेशिक बाजार
(ग) राष्ट्रीय बाजार
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय बाजार

16. निम्नलिखित में से कौन तथ्य वस्तु-विनिमय से सम्बन्धित है? [2013]

(क) राष्ट्रीय बाजार
(ख) अन्तर्राष्ट्रीय बाजार
(ग) वस्तुओं की अदला-बदली
(घ) मुद्रा का प्रयोग ।

17. निम्न में से कौन बाजार को प्रभावित करता है?[2014]

(क) शान्ति और सुरक्षा की स्थिति
(ख) बैंक की सुविधाएँ ।
(ग) व्यक्तियों की ईमानदारी ।
(घ) ये सभी

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18. निम्न में से कौन बाजार की विशेषता है? [2014] 

(क) एक वस्तु
(ख) क्रेता-विक्रेता
(ग) स्वतंत्र प्रतियोगिता
(घ) इनमें से सभी ।

19. चूड़ियों का बाजार है [2014, 18]

(क) प्रान्तीय
(ख) स्थानीय
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय
(घ) राष्ट्रीय

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 उत्पादन एवं उपभोक्ता में सम्बन्ध 1

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास (अनुभाग – एक)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास (अनुभाग – एक).

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रान्ति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों पर किस प्रकार पड़ा?
उत्तर
फ्रांस की क्रान्ति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों पर निम्नलिखित रूप में पड़ा

  1. इस क्रान्ति ने सदियों से चली आ रही यूरोप की पुरातन व्यवस्था (Ancient Regime) का अन्त कर दिया।
  2. इस क्रान्ति की महत्त्वपूर्ण देन मध्यकालीन समाज की सामन्ती व्यवस्था का अन्त करना था।
  3. फ्रांस के क्रान्तिकारियों द्वारा की गई ‘मानव अधिकारों की घोषणा’ (27 अगस्त, 1989 ई०), मानव जाति की स्वाधीनता के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण थी।
  4. इस क्रान्ति ने समस्त यूरोप में राष्ट्रीयता (UPBoardSolutions.com) की भावना का विकास और प्रसार किया। परिणामस्वरूप यूरोप के अनेक देशों में क्रान्तियों का सूत्रपात हुआ।
  5. फ्रांस की क्रान्ति ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को जन्म दिया।
  6. इस क्रान्ति ने लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  7. फ्रांसीसी क्रान्ति ने मानव जाति को स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व का नारा प्रदान किया।
  8. इस क्रान्ति ने इंग्लैंड, आयरलैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों की विदेश नीति को प्रभावित किया।
  9. कुछ विद्वानों के अनुसार फ्रांस की क्रान्ति समाजवादी विचारधारा का स्रोत थी, क्योंकि इसने समानता का सिद्धान्त प्रतिपादित कर समाजवादी व्यवस्था का मार्ग भी खोल दिया था।
  10. इस क्रान्ति के फलस्वरूप फ्रांस ने कृषि, उद्योग, कला, साहित्य, राष्ट्रीय शिक्षा तथा सैनिक गौरव के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की।

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प्रश्न 2.
जर्मनी का एकीकरण कैसे हुआ ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
सन् 1848 ई० के यूरोप में राष्ट्रवाद का स्वरूप बदलने लगा था और यह जनतन्त्र एवं क्रान्ति के सैलाब से दूर हो गया था। राज्य की सत्ता को बढ़ाने और पूरे यूरोप पर राजनीतिक प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए रूढ़िवादियों ने अकसर राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रयोग किया। उस समय जर्मनी तथा इटली के एकीकृत होने की प्रक्रिया जितनी कठिन थी उतनी ही भयावह भी थी। इस प्रक्रिया के बाद ही इटली तथा जर्मनी राष्ट्र-राज्य बन सके थे।

ज्ञातव्य है कि राष्ट्रवादी भावनाएँ मध्यमवर्गीय जर्मन लोगों में घर कर गयी थीं और उन्होंने सन् 1848 ई० में जर्मन महासंघ के विभिन्न भागों को जोड़कर एक निर्वाचित संसद द्वारा शासित राष्ट्र-राज्य बनाने का प्रयत्न किया था। मगर राष्ट्र-निर्माण की यह उदारवादी पहल राजशाही और फौज की शक्ति ने मिलकर दबा दी, जिनका प्रशा के बड़े भूस्वामियों (Junkers) ने भी समर्थन किया। उसके पश्चात् प्रशा ने राष्ट्रीय एकीकरण (UPBoardSolutions.com) के आन्दोलन की बागडोर सँभाली। उसका मन्त्री प्रमुख ऑटोवान बिस्मार्क इसे प्रक्रिया का जनक था, जिसने प्रशा की सेना और नौकरशाही की सहायता ली। सात वर्ष के दौरान ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस से तीन युद्धों में प्रशा को विजय प्राप्त हुई और एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई। जनवरी, 1871 में, वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।

जनवरी 18, 1871 ई० को प्रात: कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। ऐसे मौसम में; वर्साय का शीशमहल जो कि पहले से ही बेहद सर्द रहता था; जर्मन राजकुमारों, सेना के प्रतिनिधियों और मन्त्री प्रमुख ऑटोवान बिस्मार्क सहित प्रशा के महत्त्वपूर्ण मन्त्रियों ने एक सभा का आयोजन किया। सभा ने प्रशा के काइजर विलियम प्रथम के नेतृत्व में नये जर्मन साम्राज्य की घोषणा की। प्रशा राज्य की शक्ति के प्रभुत्व के दर्शन जर्मनी में उसके राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में हुए। नये राज्य ने जर्मनी की मुद्रा, बैंकिंग और कानूनी तथा न्यायिक व्यवस्थाओं के आधुनिकीकरण पर अधिक जोर दिया और प्रशा द्वारा उठाये गये कदम और उसकी कार्यवाहियाँ शेष जर्मनी के लिए एक मॉडल बने।

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प्रश्न 3.
इटली के एकीकरण हेतु क्या प्रयास किये गये ? विस्तार से लिखिए। या इटली के एकीकरण में मेत्सिनी, काबूर और गैरीबाल्डी के योगदान को वर्णन कीजिए। [2014]
           या
इटली के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तीन नेताओं के नाम लिखिए। [2018]
उत्तर
उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली सात राज्यों में विभक्त था। इसके निर्माण में भी जर्मनी की तरह बहुत-सी मुसीबतें उठायी गयीं। इसे भी राजनीतिक विखण्डन का एक लम्बा इतिहास देखना पड़ा था, जैसा कि जर्मनी में हुआ था। इटली कई वंशानुगत तथा बहुराष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य में बिखरा पड़ा था। इनमें से केवल सार्डिनिया-पीडमॉण्ट में एक इतालवी राजघराने का शासक था। उत्तरी भाग ऑस्ट्रियाई हैब्सबर्गों के अधीन था, मध्य इलाकों पर पोप का शासन था और दक्षिणी क्षेत्र स्पेन के बूबू राजाओं के अधीन थे। इतालवी भाषा ने भी साझा रूप प्राप्त नहीं किया था और अभी तक उसके विविध क्षेत्रीय और स्थानीय रूप उपस्थित थे।

इटली को एकीकृत कर गणराज्य बनाने में ज्युसेप मेसिनी; जो एक महान् क्रान्तिकारी भी था; ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उसने सन् 1830 ई० के दशक में एक सुविचारित कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसके लिए उसने एक गुप्त संगठन यंग इटली नाम से बनाया था। वह अपने विचारों को उक्त संगठन के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचाना चाहता था। सन् 1831 ई० और 1848 ई० में क्रान्तिकारी विद्रोह हुए जिनकी असफलता (UPBoardSolutions.com) के कारण इतालवी राज्यों को जोड़ने को उत्तरदायित्व सार्डिनिया-पीडमॉण्ट के शासक विक्टर इमैनुअल द्वितीय पर आ गया। इस क्षेत्र के अभिजात वर्ग की नजरों में एकीकृत इटली उनके लिए आर्थिक विकास और राजनीतिक प्रभुत्व की सम्भावनाएँ उत्पन्न करता था।

मन्त्री प्रमुख काबूर जिसने इटली को एकीकृत करने के लिए आन्दोलन का नेतृत्व किया था, वह न तो क्रान्तिकारी था और न ही जनतान्त्रिक। वह इटली के अन्य धनवान तथा शिक्षित लोगों की तरह फ्रेंच भाषी था। फ्रांस से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट की एक चालाक कूटनीतिक सन्धि; जिसके पीछे काबूर का हाथ था; से सार्डिनिया-पीडमॉण्ट 1859 ई० में ऑस्ट्रियाई ताकतों को हरा पाने में कामयाब हुआ।

नियमित सैनिकों के अतिरिक्त ज्युसेपे गैरीबाल्डी के नेतृत्व में भारी संख्या में सशस्त्र स्वयंसेवकों ने इस युद्ध में भाग लिया। सन् 1860 ई० में वे दक्षिण इटली और दो सिसलियों के राज्य में प्रवेश कर गये और स्पेनी शासकों को हटाने के लिए स्थानीय कृषकों का समर्थन प्राप्त करने में सफल रहे।

सन् 1861 ई० में इमैनुअल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया। मगर इटली के अधिकतर निवासी जिनमें निरक्षरता की दर पर्याप्त ऊँची थी, अभी भी उदारवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा से अनभिज्ञ थे।

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प्रश्न 4.
राष्ट्रवाद से क्या तात्पर्य है? यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय होने में कौन-सी परिस्थितियाँ सहायक हुईं? उनमें से किन्हीं दो को समझाकर लिखिए। [2018]
           या
राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय गौरव को किस प्रकार उत्तेजित किया ?
           या
यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय के क्या कारण थे ?
उत्तर
राष्ट्र की सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकती। राष्ट्र बहुत हद तक एक ऐसा समुदाय होता है जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास, भावनाओं, आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है। यह कुछ खास मान्यताओं (UPBoardSolutions.com) पर आधारित होता है जिन्हें लोग उस समुदाय के लिए गढ़ते हैं जिससे वे अपनी पहचान कायम करते हैं। राष्ट्र के प्रति यही भावना राष्ट्रवाद’ कहलाती है।
यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय ने जनता के हृदय में राष्ट्रीय भावनाएँ उत्पन्न कीं। वे भावनाएँ अग्रलिखित हैं –

1. पुनर्जागरण एवं धर्म-सुधार आन्दोलन – आधुनिक यूरोप के इतिहास में पुनर्जागरण एक युगान्तरकारी घटना थी। सोलहवीं शताब्दी तक समस्त यूरोप में सामन्ती व्यवस्था लागू होने से समस्त समाज त्राहि-त्राहि कर रहा था। रूढ़िवादियों का प्रबल जोर था। चर्च की अपनी राजनीतिक व्यवस्था अलग थी। इन सब दुष्प्रभावों से मानव-जीवन अभिशप्त हो गया था। मनुष्य एक विचारशील प्राणी होने के कारण सामन्तवाद तथा चर्च के बन्धनों से मुक्त होने के उपाय सोचने लगा। तुर्को की कुस्तुनतुनिया विजय ने दार्शनिकों एवं विचारकों को इटली में शरण लेने के लिए। बाध्य किया, जहाँ पर इन विद्वानों को भरपूर संरक्षण प्राप्त हुआ। इसी बौद्धिक वर्ग ने परलोकवाद तथा धर्मवाद के स्थान पर मानववाद का प्रचार किया, जिससे यूरोप में राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। यही परिवर्तन यूरोप में राष्ट्रवाद के उदय का कारण बने।

2. व्यापारिक पुनरुत्थान एवं भौगोलिक खोजें – नाविकों द्वारा नये-नये समुद्री मार्गों की खोज ने समस्त यूरोप में एक अप्रत्याशित क्रान्ति ला दी। इन मार्गों के खोज लेने से लोगों को एक-दूसरे के देश में जाने, वहाँ की सभ्यता एवं संस्कृति को समझने (UPBoardSolutions.com) के अवसर प्राप्त हुए। एक-दूसरे देश को आपस में व्यापार करने का अवसर प्राप्त हुआ। आर्थिक स्थिति में भी पर्याप्त सुधार हुआ। इस प्रकार नवीन भौगोलिक खोजों से यूरोपवासी अनेक उन्नत प्राचीन सभ्यताओं के सम्पर्क में आये, जिससे यूरोप में नवीन विचारों का उदय हुआ जो कि राष्ट्रवाद के उदय का एक प्रमुख कारण बना।

3. फ्रांस की क्रान्ति – सन् 1789 ई० में हुई फ्रांस की क्रान्ति विश्व की एक महानतम घटना है। इस क्रान्ति के समय फ्रांस की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा बड़ी दयनीय थी, जिस कारण देश में असन्तोष तथा अराजकता का वातावरण फैला हुआ था, जो शीघ्र ही क्रान्ति के रूप में फूट निकला। यह क्रान्ति एक ऐसी बाढ़ थी जो अपने साथ अनेक बुराइयों को बहाकर ले गयी। इस क्रान्ति ने यूरोप में राजनीतिक क्रान्ति के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक क्रान्ति को जन्म दिया। इस क्रान्ति ने पुरातन व्यवस्था का अन्त कर राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया। इसी से प्रेरित होकर जर्मनी, इटली एवं पोलैण्ड जैसे देशों में राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

4. नेपोलियन के प्रशासनिक सुधार – हालाँकि नेपोलियन बाद में फ्रांस का तानाशाह बन गया था। लेकिन प्रारम्भ में उसने फ्रांस का नक्शा ही बदलकर रख दिया। उसने प्रशासनिक क्षेत्र में क्रान्तिकारी सिद्धान्तों का समावेश किया, जिससे पूरी व्यवस्था अधिक तर्कसंगत एवं कुशल बन सके। सन् 1804 ई० की नागरिक संहिता; जिसे आमतौर पर नेपोलियन संहिता के नाम से जाना जाता था; ने जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिये थे। उसने कानून के समक्ष समानता और सम्पत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया। नेपोलियन ने सामन्ती व्यवस्था को समाप्त कर दिया, किसानों को भू-दासत्व और जागीरदारी शुल्कों से मुक्ति दिलायी। नेपोलियन के समय में ही कारीगरों पर श्रेणी-संघों के नियन्त्रणों को हटा दिया गया, यातायात और संचार-व्यवस्थाओं को सुधारा गया। इससे किसानों, कारीगरों, (UPBoardSolutions.com) मजदूरों और नये उद्योगपतियों ने नयी आजादी का आनन्द उठाया। नेपोलियन के प्रशासनिक सुधारों के कारण एकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। विदेशी शासन के विरुद्ध उसके राष्ट्रवादी एवं राष्ट्रव्यापी युद्धों का भी राष्ट्रवाद के उदय में विशेष योगदान है।

5. बौद्धिक क्रान्ति – अठारहवीं सदी की बौद्धिक क्रान्ति से भी राष्ट्रीयता की भावना को अत्यधिक बल मिला। इस काल में चिन्तन का केन्द्र मनुष्य था। मानववादी होने के कारण चिन्तनकर्ताओं ने मानव की गरिमा, उसके अधिकारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता दी। बौद्धिक क्रान्ति की जागृति उत्पन्न करने वालों में रूसो, मॉण्टेस्क्यू तथा वाल्टेयर जैसे महान् दार्शनिक तथा दिदरो एवं क्वेसेन जैसे महान् लेखक थे। इनके विचारों का यूरोप की जनता पर भारी प्रभाव पड़ा जो कि राष्ट्रवाद के उदय का एक प्रमुख कारण था।

6. औद्योगिक क्रान्ति – उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में औद्योगिक क्रान्ति के कारण पूँजीवाद का आधार तैयार हुआ। पूँजीवाद के विकास से यूरोपीय साम्राज्यवाद में बदलाव आया और अन्तत: राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों का उद्भव हुआ।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांसीसी क्रान्ति ने यूरोप में राष्ट्रवाद को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर
फ्रांसीसी क्रान्ति का यूरोप में राष्ट्रवाद पर प्रभाव

फ्रांस की क्रान्ति ने यूरोप में राजनीतिक क्रान्ति के साथ-साथ (UPBoardSolutions.com) सामाजिक एवं आर्थिक क्रान्ति को जन्म दिया। इस क्रान्ति ने प्राचीन व्यवस्था को समाप्त कर दिया और राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया। इसी से प्रेरित होकर जर्मनी, इटली और पोलैण्ड जैसे देशों में राष्ट्रवाद का विकास हुआ।

प्रश्न 2.
बौद्धिक क्रान्ति ने किस प्रकारे राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया?
उत्तर
बौद्धिक क्रान्ति से राष्ट्रवाद को बढ़ावा

18वीं सदी की बौद्धिक क्रान्ति से भी राष्ट्रवाद की भावना को अत्यधिक बल मिला। इस काल में चिन्तन का केन्द्र मनुष्य था। मानववादी होने के कारण चिन्तनकर्ताओं ने मानव की गरिमा, उसके अधिकारों एवं आदर्शों को प्राथमिकता दी।

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प्रश्न 3.
राष्ट्रवाद विश्व शान्ति के लिए किस प्रकार खतरा बन गया?
उत्तर
राष्ट्रवाद विश्व शान्ति के लिए खतरा

राष्ट्रवाद ने जर्मनी जैसे राष्ट्रों को अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी बना दिया। यह महत्त्वाकांक्षा विश्व शान्ति के लिए। खतरा बनती चली गई। प्रत्येक राष्ट्र के लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार को दूसरे राष्ट्र से अति श्रेष्ठ समझने लगे। विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र (UPBoardSolutions.com) छोटे-छोटे राज्यों पर हावी होने लगे। राष्ट्रवाद ने जर्मन, फ्रांस आदि देशों के अलावा बाल्कन व प्रायद्वीप के यूनान, सर्बिया आदि छोटे-छोटे देशों को भी प्रभावित किया। राष्ट्रवाद की इस लहर में दूसरे देशों के हितों का ध्यान नहीं रखा गया। विश्व के प्रत्येक राष्ट्र ने सिर्फ अपनी सम्पन्नता और शक्ति के बारे में ही सोचना शुरू कर दिया। इससे औपनिवेशिक प्रतियोगिता शुरू हो गई और यह औपनिवेशिक प्रतियोगिता विश्व शान्ति के लिए एक खतरा बन गई।

प्रश्न 4
फ्रांस और प्रशा के मध्य युद्ध का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2012]
उत्तर.
फ्रांस-प्रशा का युद्ध( 1870-71 ई०)-जर्मनी के एकीकरण का अन्तिम सोपान फ्रांस तथा प्रशा के मध्य युद्ध था। बिस्मार्क यह भली प्रकार समझ चुका था कि एक दिन प्रशो को फ्रांस के साथ अवश्य युद्ध करना पड़ेगा। इसीलिए उसने ऑस्ट्रिया के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार किया था। फ्रांस की प्रतिनिधि सभा ने 19 जुलाई, 1870 ई० को प्रशा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
युद्ध के परिणाम – इस युद्ध के निम्नलिखित परिणाम हुए

  1. इस युद्ध में फ्रांस की पराजय ने इटली के एकीकरण को पूर्ण कर दिया।
  2. इस युद्ध के परिणामस्वरूप नेपोलियन तृतीय के साम्राज्य का पतन हो गया और फ्रांस में तृतीय गणतन्त्र की स्थापना हुई।
  3. इस युद्ध का लाभ उठाकर रूस के जार ने काले सागर पर (UPBoardSolutions.com) अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
  4. प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी का एकीकरण पूरा हो गया और जर्मन साम्राज्य का सम्राट कैसर विलियम प्रथम को बनाया गया।
  5. जर्मन साम्राज्य के लिए एक नवीन संविधान का निर्माण किया गया, जिसमें दो सदनों वाली व्यवस्थापिका सभा की व्यवस्था की गई। इसका पहला सदन बुन्देसराट और दूसरा सदन ‘राईखस्टैग कहलाता था।
  6. इस युद्ध ने यूरोप की दीर्घकालीन क्रान्ति को भंग कर दिया और इसी युद्ध के कारण भविष्य में अनेक युद्धों की भूमिका तैयार हो गई।

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प्रश्न 5.
यूरोपीयन राष्ट्रवाद से आप क्या समझते हैं ? [2013]
उत्तर
राष्ट्रवाद एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भावना है जो लोगों को एकता के सूत्र में बाँधती है। यह एक ऐसी सामूहिक भावना है जो एक भूभाग में रहने वाले विभिन्न लोगों को एक राजनीतिक संगठन का सदस्य बने रहने की प्रेरणा देती है और अपने देश से प्रेम करना भी सिखाती है।

फ्रांस में नेपोलियन के पश्चात् यूरोपीय राजनीतिज्ञों ने राष्ट्रवाद की उपेक्षा की, किन्तु इस भावना को वे पूर्णत: दबा नहीं सके। कालान्तर में राष्ट्रीयता के आधार पर ही यूरोप में इटली तथा जर्मनी जैसे राष्ट्रवादी राज्यों का विकास हुआ। नेपोलियन पहला व्यक्ति था जिसने इटली तथा जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया था।

इन दोनों देशों में एक ही राष्ट्रीयता के लोग राजनीतिक (UPBoardSolutions.com) सीमाओं द्वारा विभाजित थे। यूरोप में शुरू होने के कारण ही इसे यूरोपीयन राष्ट्रवाद कहते हैं।

अविलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जर्मनी के एकीकरण का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर
जर्मनी के एकीकरण का नेतृत्व ऑटोवान बिस्मार्क ने किया।

प्रश्न 2.
फ्रांसीसी क्रान्ति के प्रमुखतम सुधार कौन-कौन से थे ?
उतर
फ्रांसीसी क्रान्ति के मुख्य सुधार निम्नलिखित थे –

  1. यूरोपीय देशों में लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों का प्रसार हुआ।
  2. इस क्रान्ति ने सदियों से चली (UPBoardSolutions.com) आ रही यूरोप की पुरातन सामन्ती व्यवस्था का अन्त कर दिया।

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प्रश्न 3.
बिस्मार्क कौन था? उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी? [2017]
उत्तर
बिस्मार्क एक महान कूटनीतिज्ञ था। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि जर्मनी का एकीकरण थी।

प्रश्न 4.
इटली के एकीकरण में किसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी ?
उत्तर
इटली के एकीकरण में ज्युसेपे मेत्सिनी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से अलग करने वाले प्रतीक हैं

(क) सीमा
(ख) भाषा
(ग) संस्कृति एवं सम्प्रभुता
(घ) ये सभी

2. राष्ट्रवादी भावना के विकास में सहायक तत्त्व थे

(क) औद्योगिक क्रान्ति
(ख) पुनर्जागरण
(ग) फ्रांस की क्रान्ति
(घ) ये सभी

3. जर्मनी के एकीकरण के बाद वहाँ का सम्राट बना,

(क) विलियम प्रथम
(ख) विलियम द्वितीय
(ग) विलियम तृतीय
(घ) विलियम चतुर्थ

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4. गैरीबाल्डी सम्बन्धित था? (2015, 16)

(क) इटली के एकीकरण से (UPBoardSolutions.com)
(ख) जर्मनी के एकीकरण से
(ग) अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम से
(घ) रूस की राज्य क्रान्ति से

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास 1

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त: चन्द्रशेखरः (संस्कृत-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त: चन्द्रशेखरः (संस्कृत-खण्ड)

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अवतरणों का सन्दर्भ हिन्दी अनुवाद

(प्रथमं दृश्यम्)

प्रश्न 1.
(स्थानम्-वाराणसी न्यायालयः। न्यायाधीशस्य पीठे एकः दुर्धर्षः पारसीकः तिष्ठति। आरक्षकाः चन्द्रशेखरं तस्य सम्मुखम् आनयन्ति। अभियोगः प्रारभते। चन्द्रशेखरः पुष्टाङ्गः गौरवर्णः षोडशवर्षीयः किशोरः।)
आरक्षकः- श्रीमान् ! अयम् अस्ति चन्द्रशेखरः। अयं राजद्रोही। गतदिने अनेनैव असहयोगिनां सभायां एकस्य आरेक्षकस्य दुर्जयसिंहस्य मस्तके प्रस्तरखण्डेन प्रहारः कृतः। येन दुर्जयसिंहः आहतः।।
न्यायाधीशः-(तं बालकं विस्मयेन विलोकयन्) रे बालक ! तव किं नाम ?
चन्द्रशेखरः-आजादः (स्थिरीभूय)।
न्यायाधीशः–तव पितुः किं नाम ?
चन्द्रशेखरः–स्वतन्त्रः।।
न्यायाधीशः-त्वं कुत्र निवसति ? तव गृहं कुत्रास्ति ?
चन्द्रशेखरः-कारागार एव मम गृहम् ।।
न्यायाधीशः-(स्वगतम्) कीदृशः प्रमत्तः स्वतन्त्रतायै अयम् ? (प्रकाशम्) अतीवधृष्ट: उद्दण्डश्चायं नवयुवकः। अहम् इमं पञ्चदश कशाघातान् दण्डयामि।
चन्द्रशेखरः-नास्ति चिन्ता। [2008, 17]
उत्तर
[ पीठेः = आसन पर। दुर्धर्षः = दुर्दमनीय। पारसीकः = पारसी। आरक्षकाः = सिपाही। आनयन्ति = ले आते हैं। अभियोगः = मुकदमा। पुष्टाङ्गः = हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला। षोडशवर्षीयः = सोलह वर्ष का। प्रस्तरखण्डेन = पत्थर के टुकड़े से। (UPBoardSolutions.com) आहतः = घायल हो गया। स्थिरीभूय = दृढ़ होकर। प्रमत्तः = पागल। कशाघातान् = कोड़ों से।] |

सन्दर्भ-प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘संस्कृत-खण्ड’ के ‘देशभक्तः चन्द्रशेखरः’ पाठ से उद्धृत है।

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प्रसंग-इसमें चन्द्रशेखर आजाद की वीरता, साहस और देशभक्ति का वर्णन किया गया है।

अनुवाद-(स्थान-वाराणसी न्यायालय। न्यायाधीश के आसन पर एक दुर्दमनीय पारसी बैठा हुआ है। सिपाही चन्द्रशेखर को उसके सामने लाते हैं। मुकदमा आरम्भ होता है। चन्द्रशेखर पुष्ट अंगों वाला, गोरे रंग का, सोलह वर्षीय एक किशोर है।)

सिपाही-श्रीमान् जी! यह चन्द्रशेखर है। यह राजद्रोही है। पिछले (UPBoardSolutions.com) दिन इसने ही असहयोग आन्दोलनकारियों की सभा में एक सिपाही दुर्जनसिंह के मस्तक पर पत्थर के टुकड़े से प्रहार किया था। उससे दुर्जनसिंह घायल हो गया था।

न्यायाधीश-(उस बालक को आश्चर्य से देखते हुए) अरे बालक! तुम्हारा क्या नाम है ?
चन्द्रशेखर--‘आजाद’ (दृढ़ता से)।
न्यायाधीश–तुम्हारे पिता का नाम क्या है ?
चन्द्रशेखर-‘स्वतन्त्र’।
न्यायाधीश-तुम कहाँ रहते हो ? तुम्हारा घर कहाँ है ?
चन्द्रशेखर-जेल ही मेरा घर है।
न्यायाधीश-(मन में) यह स्वतन्त्रता के लिए कैसा पागल है ? (प्रकट रूप में) यह नवयुवक अत्यन्त ढीठ और उद्दण्ड है। मैं इसे 15 कोड़े मारे जाने का दण्ड देता हूँ। चन्द्रशेखर-चिन्ता नहीं है।

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(द्वितीयं दृश्यम्)

प्रश्न 2.
(ततः दृष्टिगोचरौ भवतः–कौपीनमात्रावशेषः, फलकेन दृढं बद्धः चन्द्रशेखरः, कशाहस्तेन चाण्डालेन, अनुगम्यमानः कारावासाधिकारी गण्डासिंहश्च।)
गण्डासिंहः-(चाण्डाले प्रति) दुर्मुख ! मम आदेशसमकालमेव कशाघातः (UPBoardSolutions.com) कर्तव्यः। (चन्द्रशेखरं प्रति) रे दुर्विनीत युवक ! लभस्व इदानीं स्वाविनयस्य फलम्। कुरु राजद्रोहम्। दुर्मुख ! कशाघातः एकः (दुर्मुखः चन्द्रशेखरं कशया ताडयति।)
चन्द्रशेखरः-जयतु भारतम्।।
गण्डासिंहः-दुर्मुख ! द्वितीयः कशाघातः। (दुर्मुखः पुनः ताडयति)।
ताडित: चन्द्रशेखरः पुनः-पुनः “भारतं जयतु” इति वदति।
(एवं स पञ्चदशकशाघातैः ताडितः।)
उत्तर
[ दृष्टिगोचरौ भवतः = दिखाई देते हैं। कौपीनमीत्रावशेषः = लँगोटीमात्र पहने हुए। फलकेन दृढं बद्धः = हथकड़ी में कसकर बाँधा गया। कशाहस्तेन = हाथ में कोड़ा लिये हुए। कारावासाधिकारी = जेलर। आदेश-समकालमेव = आदेश पाते ही। कशाघीतः कर्त्तव्यः = कोड़े मारना। स्वाविनयस्य ( स्व + अविनयस्य) = अपनी धृष्टता का।]

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सन्दर्भ-प्रसंग-पूर्ववत्।
अनुवाद-(इसके पश्चात् लँगोटीमात्र पहने हुए, हथकड़ी से मजबूत बँधा हुआ चन्द्रशेखर और हाथ में कोड़ा लिये चाण्डाल से अनुगमित जेल अधिकारी गण्डासिंह दिखाई पड़ते हैं।)
गण्डासिंह-(जल्लाद से) दुर्मुख! मेरा आदेश पाते ही कोड़े लगाना। (चन्द्रशेखर से) अरे अविनयी युवक! अब तू अपनी अविनय का फल प्राप्त कर। राजद्रोह कर! दुर्मुख! एक कोड़े का प्रहार करो। (दुर्मुख चन्द्रशेखर को कोड़े से पीटता है।) ।
चन्द्रशेखर–भारतमाता की जय हो।
गण्डासिंह-दुर्मुख! कोड़े का दूसरा प्रहार (करो)। (दुर्मुख पुनः कोड़ा मारता है।) (UPBoardSolutions.com) पीटा गया चन्द्रशेखर बार-बार ‘भारतमाता की जय हो’ कहता है। (इस प्रकार वह पन्द्रह कोड़ों से पीटा जाता है।)

प्रश्न 3.
यदा चन्द्रशेखरः कारागारात् मुक्त: बहिः आगच्छति, तदैव सर्वे जनाः तं परित: वेष्टयन्ति, बहवः बालकाः तस्य पादयोः पतन्ति, तं मालाभिः अभिनन्दयन्ति च।
चन्द्रशेखरः–किमिदं क्रियते भवद्भिः ? वयं सर्वे भारतमातुः अनन्यभक्ताः तस्याः शत्रूणां कृते मदीया इमे रक्तबिन्दवः अग्निस्फुलिङ्गाः भविष्यन्ति।।
(जयतु भारतम्’ इति उच्चैः कथयन्तः सर्वे गच्छन्ति।)
उत्तर
[मुक्तः = छूटा हुआ। परितः वेष्टयन्ति = चारों ओर से घेर लेते हैं। (UPBoardSolutions.com) अभिनन्दयन्ति = अभिनन्दन करते हैं। मदीयाः = मेरी। अग्नि स्फुलिंगाः = अग्नि की चिंगारियाँ]

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सन्दर्भ-प्रसंग-पूर्ववत्।
अनुवाद-जब चन्द्रशेखर जेल से छूटकर बाहर आता है, तब सभी लोग उसे चारों ओर से घेर लेते हैं। बहुत-से बालक उसके पैरों में गिरते हैं और उसकी मालाओं से सम्मान करते हैं।
चन्द्रशेखर–आप लोग यह क्या कर रहे हैं ? हम सब भारतमाता के अनन्य भक्त हैं। उसके शत्रुओं के लिए हमारी ये खून की बूंदें अग्नि की चिंगारियाँ होंगी।
(‘भारतमाता की जय हो’ इस प्रकार जोर से कहते हुए सभी चले जाते हैं।)

अतिलघु-उत्तरीय संस्कृत प्रश्नोतर

प्रश्न 1
न्यायाधीशस्य पीठे (आसने) कः अतिष्ठत् ?
उत्तर
न्यायाधीशस्य पीठे (आसने) एकः पारसीकः अतिष्ठत्।।

प्रश्न 2
चन्द्रशेखरः कः आसीत् ? [2010, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]
उतर
चन्द्रशेखरः प्रसिद्धः क्रान्तिकारी (UPBoardSolutions.com) देशभक्तश्चासीत्।।

प्रश्न 3
चन्द्रशेखरः कथं बन्दीकृतः ?
उत्तर
चन्द्रशेखरः आङ्ग्लशासकै: राजद्रोही घोषितः; अत: बन्दीकृतः।

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प्रश्न 4
चन्द्रशेखरस्य कः अपराधः आसीत् ?
उत्तर
चन्द्रशेखरः एकस्य आरक्षकस्य मस्तके पाषाणखण्डेन प्राहरत्।

प्रश्न 5
चन्द्रशेखरः स्वनाम किम् अकथयत् ?
उत्तर
चन्द्रशेखरः स्वनाम ‘आजाद’ इति अकथ्यत्।

प्रश्न 6
चन्द्रशेखरः स्वगृहं किम् अवदत् ? [2016]
या
चन्द्रशेखरः स्वगृहं कुत्र किम् अवदत् ?
उत्तर
चन्द्रशेखर: स्वगृहं कारागारम् अवदत्।

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प्रश्न 7
न्यायाधीशः चन्द्रशेखरं कथम्/किम् अदण्डयत् ? [2014]
उत्तर
न्यायाधीश: चन्द्रशेखरं पञ्चदश (UPBoardSolutions.com) कशाघातान् अदण्डयत्।

प्रश्न 8
कशया ताडिते चन्द्रशेखरः किम् अकथयत् ?
या
कशया ताडितः चन्द्रशेखरः पुनः पुनः किम् अवदत् ? [2010, 17]
उत्तर
कशया ताडितः चन्द्रशेखरः पुनः पुनः ‘जयतु भारतम् इति’ अकथयत्।

प्रश्न 9
यदा चन्द्रशेखरः कारागारात् बहिः आगच्छति तदा बालकाः किं कुर्वन्ति ?
उत्तर
यदा चन्द्रशेखरः कारागारात् बहिः आगच्छति तदा बालकाः तस्य पादयोः पतन्ति, तं मालाभिः । अभिनन्दयन्ति च।।

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प्रश्न 10
“शत्रूणां कृते मदीयाः इमे रक्तबिन्दवः अग्निस्फुलिङ्गः भविष्यन्ति’, इदं कस्य कथनम् अस्ति ?
उत्तर
इदं चन्द्रशेखरस्य कथनम् अस्ति।।

प्रश्न 11
‘कारागार एवं मम गृहं इदं कथनम् कस्य के प्रति अस्ति ?
उत्तर
इदं चन्द्रशेखरस्य कथनं (UPBoardSolutions.com) न्यायाधीशं प्रति अस्ति।

प्रश्न 12
चन्द्रशेखरः स्व पितुः नाम किम् अळ्थत् ?’
उत्तर
चन्द्रशेखरः स्व पितुः नाम ‘स्वतन्त्र’ इति अकथयत्।

प्रश्न 13
‘कारागार एव मम गृहम्’ इति कः अवदत् ?
उत्तर
‘कारागार एवं मम गृहम्’ इति चन्द्रशेखरः अवदत्।

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प्रश्न 14
‘स्वतन्त्रः कस्य पितुः नाम ?
उत्तर
‘स्वतन्त्रः चन्द्रशेखरस्य पितुः नाम आसीत्।

प्रश्न 15
चन्द्रशेखरस्य रक्तबिन्दवः अग्निस्फुलिङ्गाः केषां कृते भविष्यन्ति ?
उत्तर
चन्द्रशेखरस्य रक्तबिन्दवः अग्निस्फुलिङ्गाः (UPBoardSolutions.com) शत्रूणां कृते भविष्यन्ति।

प्रश्न 16
दुर्मुखः कः आसीत् ? [2011, 13, 15]
उत्तर
दुर्मुखः चाण्डालः आसीत्।

प्रश्न 17
‘जयतु भारतम्’ इति कथनम् कस्य के प्रति च अस्ति ?
उत्तर
‘जयतु भारतम्’ इति कथनम् चन्द्रशेखरस्य गण्डासिंहं प्रति च अस्ति।

प्रश्न 18
आरक्षकस्य किं नाम आसीत् ?
उत्तर
आरक्षकस्य नाम दुर्जयसिंहः आसीत्।

प्रश्न 19
न्यायाधीशः कः आसीत् ? [2014]
उत्तर
न्यायाधीशः एकः दुर्धर्षः पारसीकः आसीत्।

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प्रश्न 20
प्रतिकशाघात पश्चात् चन्द्रशेखरः किम् अकथयत् ? [2011, 17]
उत्तर
प्रतिकशाघात् पश्चात् चन्द्रशेखरः (UPBoardSolutions.com) ‘जयतु भारतम्’ इति अकथयत्।

प्रश्न 21
केन कारणेन चन्द्रशेखरः न्यायालये आनीतः ? [2010]
उत्तर
आरक्षकस्य दुर्जयसिंहस्य मस्तके प्रस्तरखण्डेन प्रहारेण कारणेन चन्द्रशेखरः न्यायालये आनीतः।

प्रश्न 22
राष्ट्रभक्तः कः अस्ति ? [2011]
उत्तर
राष्ट्रभक्त: चन्द्रशेखरः अस्ति।

अनुवादात्मक

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए-
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त: चन्द्रशेखरः (संस्कृत-खण्ड) img-3

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व्याकरणत्मक

प्रश्न 1
‘युष्मद् के पञ्चमी में और ‘अस्मद् के सप्तमी विभक्ति में रूप लिखिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त चन्द्रशेखर (संस्कृत-खण्ड) img-1

प्रश्न 2
निम्नलिखित धातु रूपों के लकार, वचन तथा पुरुष बताइए-
आनयन्ति, अस्ति, निवससि, दण्डयामि, ताडयति, वदति, वेष्टयन्ति, आगच्छति, अभिनन्दयन्ति, भविष्यन्ति, तिष्ठति, लभस्व।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त: चन्द्रशेखरः (संस्कृत-खण्ड) img-4

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प्रश्न 3
निम्नलिखित शब्दों के सन्धि-विच्छेद कीजिए-
तदेव, नास्ति, स्वाविनयस्य।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त चन्द्रशेखर (संस्कृत-खण्ड) img-2

प्रश्न 4
निम्नलिखित शब्दों के वचन एवं विभक्ति बताइए-
भालाभिः, सर्वे, तस्याः।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त: चन्द्रशेखरः (संस्कृत-खण्ड) img-5

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प्रश्न 5
निम्नलिखित शब्दों के सविग्रह समास का नाम लिखिए-
कशाघातः, रक्तबिन्दवः।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 देशभक्त: चन्द्रशेखरः (संस्कृत-खण्ड) img-6

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन (अनुभाग – तीन).

विस्तृत उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
भारत में पायी जाने वाली मिट्टियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए तथा उनका आर्थिक महत्त्व लिखिए। [2011]
या

जलोढ़ मिट्टी वाले क्षेत्र में जनसंख्या के अधिक घनत्व के कारणों की व्याख्या कीजिए।
या
भारत में कितने प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं ? उनके क्षेत्र तथा महत्त्व बताइए।
या
मरुस्थलीय मिट्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
जलोढ़ मिट्टी और काली मिट्टी में अन्तर बताइए। [2011]
या

भारत में पायी जाने वाली दो मिट्टियों का नाम क्षेत्र सहित लिखिए। [2011]
या

मिट्टी के किन्हीं दो महत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2013]
या

जलोढ़ मिट्टी से आप क्या समझते हैं? इसके दो प्रमुख क्षेत्र तथा प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
या
काली मिट्टी की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2018]
या

भारत में पायी जाने वाली किसी एक प्रकार की मिट्टी का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) क्षेत्र, (ख) विशेषताएँ, (ग) उपयोगिता।
या
भारत की मिट्टियों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए तथा किसी एक मिट्टी की किन्हीं दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

भारतीय मिट्टियाँ, उनके क्षेत्र एवं आर्थिक महत्त्व

भारत में निम्नलिखित प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं—

1. पर्वतीय मिट्टी,
2. जलोढ़ मिट्टी,
3. काली अथवा रेगुर मिट्टी,
4. लाल मिट्टी,
5. लैटेराइट मिट्टी तथा
6. मरुस्थलीय मिट्टी।

1. पर्वतीय मिट्टियाँ- हिमालय पर्वतीय प्रदेश में नवीन, पथरीली, उथली तथा सरन्ध्र मिट्टियाँ पायी जाती हैं। इन मिट्टियों का विस्तार भारत में लगभग 2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल में है। हिमालय पर्वत के दक्षिणी भागों में कंकड़-पत्थर तथा मोटे कणों वाली बालूयुक्त मिट्टी पायी जाती है। नैनीताल, मसूरी तथा चकरौता क्षेत्र में चूने के अंशों की प्रधानता वाली मिट्टी पायी जाती है। हिमालय के कुछ क्षेत्रों में आग्नेय (UPBoardSolutions.com) शैलों के विखण्डन से निर्मित मिट्टियाँ पायी जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में काँगड़ा, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग तथा असम के पहाड़ी ढालों पर इसी मिट्टी की अधिकता मिलती है। चाय उत्पादन के लिए यह मिट्टी सर्वश्रेष्ठ है। इसी कारण इसे ‘चाय की मिट्टी’ के नाम से पुकारा जाता है।

2. जलोढ़ मिट्टी- भारत के विशाल उत्तरी मैदान में नदियों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों से बहाकर लाई गयी जीवांशों से युक्त उपजाऊ मिट्टी मिलती है, जिसे ‘काँप’ या ‘कछारी’ मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी का विस्तार देश के 40% क्षेत्रफल में है। यह मिट्टी हिमालय पर्वत से निकलने वाली तीन बड़ी नदियों सतलुज, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र तथा उनकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाई गयी है। जलोढ़ मिट्टी पूर्वी तटीय मैदानों, विशेष रूप से महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेश में भी सामान्य रूप से मिलती है। जिन क्षेत्रों में बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता, वहाँ पुरानी जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है, जिसे ‘बाँगर’ कहा जाता है। वास्तव में यह मिट्टी भी नदियों द्वारा बहाकर लाई गयी प्राचीन काँप मिट्टी ही होती है। जिन क्षेत्रों में नदियों ने नवीन काँप मिट्टी का जमाव किया है, उसे ‘खादर’ के नाम से पुकारा जाता है। नवीन जलोढ़ मिट्टियाँ प्राचीन जलोढ़ मिट्टियों की अपेक्षा अधिक उपजाऊ होती हैं। सामान्यतः जलोढ़ मिट्टियाँ सर्वाधिक उपजाऊ होती हैं।

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इनमें पोटाश, चूना तथा फॉस्फोरिक अम्ल पर्याप्त मात्रा में होता है, परन्तु नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है। शुष्क प्रदेशों की मिट्टियों में क्षारीय तत्त्व अधिक होते हैं। भारत की लगभग 50% जनसंख्या का भरण-पोषण इन्हीं मिट्टियों द्वारा होता है। इन मिट्टियों में गेहूँ, गन्ना, चावल, तिलहन, तम्बाकू, जूट आदि फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इन्हीं कारणों से यहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक है।

3. काली अथवा रेगुर मिट्टी- इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित लावा की शैलों के विखण्डन के फलस्वरूप हुआ है। इस मिट्टी का रंग काला होता है, जिस कारण इसे ‘काली मिट्टी’ अथवा ‘रेगुर मिट्टी’ भी कहा जाता है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसमें लोहांश, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम तथा जीवांशों की मात्रा अधिक पायी जाती है। वर्षा होने पर यह चिपचिपी-सी हो जाती है तथा सूखने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं। इस मिट्टी का विस्तार दकन ट्रैप के उत्तर-पश्चिमी भागों में लगभग 5.18 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल पर है। महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों (UPBoardSolutions.com) में यह मिट्टी विस्तृत है। इस मिट्टी का विस्तार दक्षिण में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों की घाटियों में भी है।
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन 1
इस मिट्टी में कपास का पर्याप्त मात्रा में उत्पादन होने के कारण इसे ‘कपास की काली मिट्टी के नाम से भी पुकारा जाता है। इसमें पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। कैल्सियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम कार्बोनेट, पोटाश और चूना इसके प्रमुख पोषक तत्त्व हैं। इस मिट्टी में फॉस्फोरिक तत्त्वों की कमी होती है। ग्रीष्म ऋतु में इस मिट्टी में गहरी दरारें पड़ जाती हैं। इस मिट्टी में कपास, गन्ना, मूंगफली, तिलहन, गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा, तम्बाकू, सोयाबीन आदि फसलों का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में किया जाता है।

4. लाल मिट्टी- यह मिट्टी लाल, पीले या भूरे रंग की होती है। इसमें लोहांश की मात्रा अधिक होने के कारण उनके ऑक्साइड में बदलने से इस मिट्टी का रंग ईंट के समाने लाल होता है। प्रायद्वीपीय पठार के दक्षिण-पूर्वी भागों पर लगभग 6 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में इस मिट्टी का विस्तार पाया जाता है। लाल मिट्टी ने काली मिट्टी के क्षेत्र को चारों ओर से घेर रखा है। भारत में इस मिट्टी का विस्तार कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्वी भाग, तमिलनाडु, ओडिशा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मेघालय तथा छोटा नागपुर के पठार पर है। लाल मिट्टी में फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक तथा नाइट्रोजन पदार्थों की कमी पायी जाती है। इस मिट्टी में मोटे अनाज; जैसे-ज्वार, बाजरा, गेहूँ, दलहन, तिलहन आदि फसलें उगायी जाती हैं।

5. लैटेराइट मिट्टी- उष्ण कटिबन्धीय भारी वर्षा के कारण होने वाली तीव्र निक्षालन की क्रिया के फलस्वरूप इस मिट्टी का निर्माण हुए है। इस मिट्टी का रंग गहरा पीला होता है, जिसमें सिलिका तथा लवणों की मात्रा अधिक होती है। इसमें मोटे कण, कंकड़-पत्थर की अधिकता तथा जीवांशों का अभाव पाया जाता है। भारत में यह मिट्टी 1.26 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल पर विस्तृत है। यह मिट्टी केरल, कर्नाटक, राजमहल की पहाड़ियों, ओडिशी, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पूर्वी बिहार, उत्तर-पूर्व में मेघालय तथा दक्षिण महाराष्ट्र में पायी जाती है। लैटेराइट मिट्टी कम उपजाऊ होती है। यह केवल घास तथा झाड़ियों को पैदा करने के लिए ही उपयुक्त है, परन्तु उर्वरकों की सहायता से इस मिट्टी में चावल, गन्ना, काजू, चाय, कहवा तथा रबड़ की कृषि की जाने लगी है।

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6. मरुस्थलीय मिट्टी- मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होने के कारण यहाँ ऊसर, धूर, राँकड़ तथा कल्लर जैसी मिट्टियाँ पायी जाती हैं। यह मिट्टी लवण एवं क्षारीय गुणों से युक्त होती है। इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम व मैग्नीशियम तत्त्वों की प्रधानता होती है, जिससे यह अनुपजाऊ हो गयी है। इसमें नमी एवं वनस्पति के अंश नहीं पाये जाते हैं। इसमें सिंचाई करके केवल मोटे अनाज ही उगाये जाते हैं। यह मिट्टी सरन्ध्र होती है तथा इसमें बालू के पर्याप्त कण दिखलायी पड़ते हैं। भारत में इस मिट्टी का विस्तार 1.5 लाख वर्ग हेक्टेयर क्षेत्रफल पर मिलता है। मरुस्थलीय मिट्टी पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, (UPBoardSolutions.com) पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब एवं हरियाणा राज्यों में पायी जाती है। बालू के मोटे कणों की प्रधानता होने के कारण इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता बहुत कम होने के साथ-साथ जीवांश तथा नाइट्रोजन की मात्रा भी कम होती है। आर्थिक दृष्टि से मरुस्थलीय मिट्टियाँ उपयोगी नहीं होतीं, परन्तु इनमें सिंचाई करके मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, मूंग तथा उड़द) उगाये जा सकते हैं।

प्रश्न 2.
‘भू-क्षरण’ या ‘मृदा-अपरदन’ से आप क्या समझते हैं ? इनके कारण तथा निवारण के उपायों पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
या
मृदा-अपरदन किसे कहते हैं ? मृदा-अपरदन के चार कारण लिखिए। [2009]
या

मृदा-संरक्षण के दो उपाय बताइए। [2013]
या

मृदा-संरक्षण नियन्त्रण हेतु चार सुझाव सुझाइए। [2016]
या

भूमि-क्षरण के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2013]
या

भारतीय मिट्टी के संरक्षण हेतु पाँच सुझाव दीजिए। [2011, 17]
या

मृदा संरक्षण से आप क्या समझते हैं। मृदा संरक्षण के कोई छः उपाय बताइए। [2016, 18]
उत्तर :

भू-क्षरण या मृदा-अपरदन

भू-क्षरण या मृदा-अपरदन से अभिप्राय प्राकृतिक साधनों (जल या वर्षा, पवन आदि) के द्वारा भूमि की ऊपरी परत या आवरण के नष्ट होने से है। भूमि-अपरदन से भौतिक हानि के अलावा आर्थिक हानि भी होती है, क्योंकि इससे भूमि की ऊपरी परत में मौजूद उर्वर (UPBoardSolutions.com) पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि अनुर्वर हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि भू-क्षरण वास्तव में मिट्टी के विनाश के लिए रेंगती हुई मृत्यु के समान है।

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भू-क्षरण के कारण
मृदा-अपरदन अथवा भू-क्षरण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. पवन-अपरदन- मरुस्थलों और अर्द्ध-मरुस्थलों में पवन मिट्टी के महीन कणों को उड़ाकर ले जाती . है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो जाती है।
  2. अत्यधिक चराई- पहाड़ी ढालों पर पशुओं और विशेषकर बकरियों द्वारा अत्यधिक चराई के फलस्वरूप मिट्टी का अपरदन होता है।
  3. प्राकृतिक वनस्पति का विनाश- वृक्षों की जड़ें मिट्टी के कणों को बाँधे रहती हैं और उन्हें बह जाने से रोकती हैं। किन्तु जिन स्थानों पर वृक्षों को अन्धाधुन्ध काट दिया जाता है, वहाँ पानी के बहाव की गति तेज हो जाती है और मिट्टी का अपरदन बढ़ जाता है।
  4. मूसलाधार वर्षा- मूसलाधार वर्षा अपने साथ मृदा को बहाकर ले जाती है, जिससे अत्यधिक भूमि-अपरदन होता है।
  5. मिट्टी के प्रकार- जिन क्षेत्रों में मिट्टी ढीली, असंगठित या तीव्र ढाल वाली होती है, वहाँ मिट्टी का अपरदन भी अधिक या शीघ्र होता है। अधिक तीव्र ढालों पर बहता हुआ जल अधिक अपरदन करता
    है, जिसे अवनालिका अपरदन कहते हैं।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत में भू-क्षरण के लिए तीव्र एवं मूसलाधार वर्षा का होना, नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ों का आना, वनों का अधिकाधिक विनाश, खेतों को खाली एवं परती छोड़ देना, तीव्र पवनप्रवाह का होना, कृषि-भूमि पर पशुओं की अनियमित एवं अनियन्त्रित चराई, खेतों की उचित मेड़बन्दी न किया जाना, भूमि का अधिक ढालूपन, जल निकास की उचित व्यवस्था का न होना आदि कारक उत्तरदायी हैं।

निवारण (मृदा संरक्षण) के उपाय
भू-क्षरण की समस्या के निवारण के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं

1. वृक्षारोपण- 
जिन प्रदेशों में बढ़े अधिक आती हैं, वहाँ जल की (UPBoardSolutions.com) गति को नियन्त्रित करने के लिए वृक्षारोपण किया जाना चाहिए। वृक्षों से गिरने वाली पत्तियाँ खेतों में जीवांश की वृद्धि कर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में भी कारगर सिद्ध होती हैं।

2. नदियों पर बाँधों का निर्माण- 
नदियों पर बाँधों का निर्माण कर दिये जाने से जल-गति नियन्त्रित होती है तथा बाढ़ के प्रकोप में भी कमी आती है। बाढ़ में कमी आने से भू-क्षरण भी स्वत: ही कम होता है।

3. खेतों की मेड़बन्दी करना- 
भू-क्षरण में कमी लाने के लिए खेतों में ऊँची-ऊँची मेड़बन्दी करना अति आवश्यक है।

4. पशुचारण पर नियन्त्रण- 
पशुओं द्वारा खाली या जोती हुई भूमि पर चराई नहीं करानी चाहिए, क्योंकि पशुओं के खुरों से मिट्टी टूटती है। अत: चरागाहों पर ही पशुचारण किया जाना उचित होता है।

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5. ढाल के विपरीत दिशा में जुताई करना- 
भू-क्षरण रोकने के लिए भूमि के ढाल की विपरीत दिशा में जुताई करनी चाहिए। इससे निर्मित नालियाँ जल की गति को कम कर भू-क्षरण को रोकने में कारगर सिद्ध हो सकती हैं।

6. जल के निकास की उचित व्यवस्था- 
ढालू खेतों में वर्षा के जल के निकास की उचित व्यवस्था कर भू-क्षरण को कुछ सीमा तक रोका जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेतों का ही निर्माण किया जाना चाहिए, अन्यथा भू-क्षरण अत्यधिक होगा।

7. खेतों में हरी खाद वाली फसलें उगाना- 
वर्षा ऋतु में खेतों को खुला नहीं छोड़ना चाहिए, वरन् उनमें हरी खाद वाली फसलें—लैंचा, सनई, मूंग नं० 1 आदि बोनी चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी को पोषक तत्त्वों की प्राप्ति होगी तथा भू-क्षरण भी रुक सकेगा।

8: नाली एवं गड्ढों को एक सम बनाना- 
वर्षा के आधिक्य के कारण जल-प्रवाह द्वारा निर्मित गड्ढों एवं नालियों को मिट्टी से भरकर भूमि को समतल बना देना चाहिए। इससे भूमि का कटाव स्वत: ही रुक जाएगा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार का ध्यान भू-क्षरण की ओर गया है तथा इस समस्या के निवारण हेतु सन् 1953 ई० में केन्द्रीय भू-क्षरण बोर्ड की स्थापना की गयी है, जिसका मुख्य कार्य सरकार को इस
समस्या के सम्बन्ध में सुझाव देना है। वर्तमान समय तक 180 लाख हेक्टेयर (UPBoardSolutions.com) कृषि- भूमि का संरक्षण किया जा चुका है तथा 110 लाख हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण का कार्य पूरा किया जा चुका है।

प्रश्न 3.
भारत में भूमि उपयोग की विभिन्न श्रेणियों की व्याख्या कीजिए।
या
किसी देश में भूमि के उपयोग के बारे में जानने की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? भारत में विभिन्न प्रकार की भूमि के उपयोग पर प्रकाश डालिए।
या
भारत में भूमि उपयोग का प्रारूप बताइए। [2013]
या
भूमि उपयोग से आप क्या समझते हैं ? भारत में भूमि उपयोग के प्रारूप पर प्रकाश डालिए। [2010]
उत्तर :

भूमि-उपयोग

किसी भी देश के आर्थिक विकास में संसाधनों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। संसाधन दो प्रकार के होते हैं–प्राकृतिक तथा मानव द्वारा निर्मित। प्राकृतिक संसाधनों में भूमि तथा खनिज, जल, वन तथा पशुधन आदि प्रमुख हैं। पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, जब कि जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। घने बसे देशों; जैसे-भारत में भूमि संसाधन दुर्लभ होते जा रहे हैं।

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बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवास, अन्न तथा वनों की लकड़ी उपलब्ध कराने के लिए भूमि संसाधन का विवेकपूर्ण उपयोग अति आवश्यक हो गया है। अतः यह जरूरी है कि बंजर तथा बेकार भूमि का पुनरुद्धार, राष्ट्रीय उद्यानों तथा अभयारण्यों की स्थापना, वनारोपण उपायों द्वारा भूमि संसाधने का संरक्षण किया जाए जिससे भावी पीढ़ियों के लिए यह सुरक्षित रह सके। भूमि उपयोग से यही अभिप्राय है कि हम भूमि संसाधन का विवेकपूर्ण दोहन करें, क्योंकि भूमि संसाधन की उपयोगिता पर ही किसी देश की आर्थिक समृद्धि निर्भर करती है। अफगानिस्तान की आर्थिक दुर्दशा का कारण भूमि-संसाधन का प्रयोग में न आना ही है। इसके विपरीत भारत 108 करोड़ से भी अधिक देशवासियों को अन्न देकर भी अन्न बचा रहा है।

भूमि-उपयोग के ज्ञान की आवश्यकता

भूमि किसी भी देश का सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है, क्योंकि भूमि पर ही कृषि, पशुपालन, खनन, उद्योग आदि व्यवसाय आधारित हैं। भूमि से ही किसी भी देश की जनसंख्या का पोषण होता है। मानव-मात्र की समस्त प्राथमिक आवश्यकताएँ (भोजन, वस्त्र, आवास) (UPBoardSolutions.com) भूमि से ही पूरी होती हैं। प्रत्येक देश में उपलब्ध भूमि संसाधनों की प्रकृति तथा स्वरूप भिन्न-भिन्न होते हैं। तदनुसार वहाँ भूमि का उपयोग किया जाता है। किसी भी देश के भूमि-उपयोग के बारे में जानना निम्नलिखित कारणों से आवश्यक होता है

  • इससे कुल प्राप्त भूमि संसाधनों के उचित उपयोग को नियोजित किया जा सकता है।
  • भूमि-उपयोग प्रारूप के ज्ञान से भूमि की विविध समस्याओं (जैसे-अपरदन, मरुस्थलीकरण, अनुर्वरता आदि) को नियन्त्रित किया जा सकता है।
  • बंजर भूमि तथा परती भूमि का उचित उपयोग किया जा सकता है।
  • आवश्यकतानुसार भूमि के उपयोग में परिवर्तन किया जा सकता है।

भारत में भूमि का उपयोग

भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 3287.3 लाख हेक्टेयर में से 92.2% भूमि का उपयोग होता है। इसमें 19.3% भाग वनों से आच्छादित है। भारतीय सांख्यिकीय रूपरेखा में देश की भूमि के उपयोग को निम्नवत् प्रदर्शित किया गया है–

1. कृषि-भूमि- 
नवपाषाण काल के भारतीयों ने देश में लगभग 14 हजार हेक्टेयर भूमि पर कृषि- कार्य आरम्भ कर दिया, जो वर्ष 1993-94 तक 1,86,420 हजार हेक्टेयर तक पहुंच चुका था। इस प्रकार देश की लगभग आधी से अधिक भूमि कृषि के अन्तर्गत आ चुकी थी।

2. वन-भूमि- 
भारत के कुल क्षेत्रफल के 68,830 हजार हेक्टेयर भूमि (1995-96) अर्थात् 21% क्षेत्र वनों के अन्तर्गत है। वन वर्षा के जल को मिट्टी के अन्दर रिसने में सहायक होते हैं। इससे जल का संरक्षण होता है। वन मृदा का भी संरक्षण करते हैं, जिससे बाढ़ों पर नियन्त्रण होता है।

3. चरागाह भूमि- 
हमारा देश कृषि प्रधान देश है और यहाँ पशुपालन कृषि के सहायक उद्योग के रूप में प्रचलित है। अधिकांशतः पशुओं को चारे की फसलों; पुआल, भूसा आदि; पर पाला जाता है। वर्ष 1993-94 में हमारे देश में 11,176 हजार हेक्टेयर भूमि अर्थात् देश के कुल क्षेत्र के लगभग 4% भाग पर स्थायी चरागाह थे।

4. बंजर भूमि- 
वह भूमि जिस पर कोई उपज पैदा नहीं होती, बंजर भूमि कहलाती है। अन्धाधुन्ध वृक्ष काटने, स्थानान्तरी कृषि तथा अत्यधिक नहरीय सिंचाई द्वारा भूमि बंजर हो जाती है। औद्योगिक कूड़ेकचरे को भूमि पर फेंकने से भी भूमि बंजर हो जाती है। (UPBoardSolutions.com) देश की लगभग 24% भूमि बंजर है, जिसके अन्तर्गत पर्वतीय, पठारी, हिमाच्छादित, मरुस्थलीय, दलदली तथा अन्य भूमि जो कृषि के लिए अनुपयुक्त है, सम्मिलित हैं।

5. परती भूमि- 
परती भूमि वह भूमि होती है, जिस पर प्रत्येक वर्ष खेती नहीं की जाती, अपितु दो या तीन वर्षों में एक बार फसल उगायी जाती है। यह सीमान्त भूमि होती है, जिसे उर्वरता बढ़ाने के लिए खाली छोड़ दिया जाता है। वर्तमान समय में देश का लगभग 7% क्षेत्र इस प्रकार की भूमि के अन्तर्गत

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय मिट्टियों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
भारतीय संसाधनों में मिट्टियों का भूमि संसाधन के रूप में बड़ा महत्त्व है, क्योंकि इन्हीं पर देश का सम्पूर्ण कृषि उत्पादन एवं जैव-जगत् निर्भर करता है। अमेरिकी भूमि विशेषज्ञ डॉ० बेनेट के अनुसार, ‘मिट्टी भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत है, जो मूल शैलों, जलवायु एवं जैव क्रिया से बनती है।” भारतीय मिट्टियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • पुरानी एवं परिपक्व- रचना की दृष्टि से अधिकांश भारतीय मिट्टियाँ बहुत (UPBoardSolutions.com) पुरानी और पूर्णत: परिपक्व हैं।
  • प्राचीन जलोढ़- भारत के मैदानी भागों की अधिकांश मिट्टियाँ प्राचीन जलोढ़ हैं, जो न केवल शैलों के विखण्डन से बनी हैं, वरन् उनके निर्माण में जलवायु सम्बन्धी कारकों का भी प्रमुख हाथ रहा है।
  • मिट्टियों में नाइट्रोजन, जीवांश, वनस्पति अंश और खनिज लवणों की कमी- भारत की प्रायः सभी मिट्टियों में इन उपयोगी तत्त्वों की कमी पायी जाती है।
  • ऊँचे तापमान- उपोष्ण कटिबन्धीय भारत में मिट्टियों के तापमान प्राय: ऊँचे पाये जाते हैं। इससे शैलों के टूटते ही उनका रासायनिक विघटन शीघ्र आरम्भ हो जाता है।
  • हल्का आवरण- पहाड़ी एवं पठारी भागों में मिट्टी का आवरण हल्का और फैला हुआ होता है, जबकि मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में यह गहरों और संगठित होता है।

प्रश्न 2.
काली मिट्टी (रेगुर) तथा लैटेराइट मिट्टी में दो अन्तर लिखिए।
या
काली मिट्टी तथा लैटेराइट मिट्टी में अन्तर बताइए।
उत्तर :
काली मिट्टी तथा लैटेराइट मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन 2

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प्रश्न 3.
खादर और बाँगर में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2011, 12, 16]
उत्तर :
बाँगर मिट्टी तथा खादर मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं
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प्रश्न 4.
जलोढ़ मिट्टी व लैटेराइट मिट्टी में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
जलोढ़ मिट्टी व लैटेराइट मिट्टी में निम्नलिखित प्रमुख अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भूमि संसाधन 4
प्रश्न 5.
बंजर भूमि किसे कहते हैं ? मनुष्य बंजर भूमि का क्षेत्र बढ़ाने में किस प्रकार सहायक है ? दो बिन्दु दीजिए।
उत्तर :
वह भूमि जिस पर कोई उपज पैदा नहीं होती, ‘बंजर भूमि’ कहलाती है। प्रायः उच्च पहाड़ी. चट्टानी, रेतीली तथा दलदली भूमियाँ बंजर होती हैं। बंजर भूमि के क्षेत्रफल की वृद्धि में मनुष्य की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसके दो बिन्दु अग्रलिखित हैं

  • अन्धाधुन्ध वृक्ष काटने, स्थानान्तरी कृषि तथा अत्यधिक नहरी सिंचाई द्वारा भूमि बंजर हो जाती है।
  • औद्योगिक कूड़े-कचरे को भूमि पर फेंकने से भी वह भूमि बंजर हो जाती है।

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प्रश्न 6.
भूमि संसाधन का क्या तात्पर्य है? भूमि संसाधन के कोई तीन महत्त्व लिखिए। [2011]
या
भूमि से आप क्या समझते हैं ? [2010]
उत्तर :
किसी देश या प्रदेश के अन्तर्गत सम्मिलित भूमि को भूमि संसाधन कहते हैं। इसके अन्तर्गत कृष्य भूमि, चरागाह भूमि, कृषि-योग्य भूमि, बेकार भूमि, वन भूमि, बंजर भूमि, परती भूमि आदि सम्मिलित की जाती हैं। मनुष्य इस उपलब्ध भूमि पर विविध प्रकार से क्रिया-कलाप करता है। कृषि, पशुपालन, वनोद्योग, खनन, निर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार, संचार आदि सभी का सम्बन्ध भूमि संसाधन से होता है। भूमि संसाधन जल-संसाधनों को आधार प्रदान करते हैं तथा मनुष्य विभिन्न रूपों में इनका उपयोग अपने क्रिया-कलापों की पूर्ति में करता है।

प्रश्न 7.
हमारे देश में वनों के क्षेत्र को बढ़ाना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
वन किसी भी राष्ट्र की प्राकृतिक सम्पदा होते हैं। देश के आर्थिक विकास तथा पारिस्थितिक सन्तुलन के लिए यह आवश्यक है कि देश में कम-से-कम एक-तिहाई क्षेत्र पर वनों का विस्तार हो। भारत में 20% से कम क्षेत्र पर ही वन उगे हुए हैं। देश की तेजी (UPBoardSolutions.com) से बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों का विस्तार करना आवश्यक है। वन प्राकृतिक सौन्दर्य में वृद्धि तो करते ही हैं, जीव-जन्तुओं और पक्षियों के अभयारण्य भी होते हैं। ये पारिस्थितिक सन्तुलन बनाने में भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। वन जलवायु के नियन्त्रक भी कहे जाते हैं तथा वर्षा कराने में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अतएव इनके क्षेत्र का विस्तार करना अत्यावश्यक है।

प्रश्न 8.
भारतीय काली मिट्टी को कपास की मिट्टी क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
इस मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित लावा की शैलों के विखण्डन के फलस्वरूप हुआ है। इस मिट्टी का रंग काला होता है, जिस कारण इसे ‘काली मिट्टी’ अथवा ‘रेगुर मिट्टी’ भी कहा जाता है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसमें लोहांश, मैग्नीशियम, चूना, ऐलुमिनियम तथा जीवांशों की मात्रा अधिक पायी जाती है। इस मिट्टी का विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल पर महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा तथा दक्षिणी मध्य प्रदेश के पठारी भागों में है। इसके अतिरिक्त दक्षिण में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों की घाटियों में भी यह मिट्टी पायी जाती है। इस मिट्टी में कपास का भारी मात्रा में उत्पादन होने (UPBoardSolutions.com) के कारण इसे ‘कपास की काली मिट्टी’ के नाम से भी पुकारा जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसे दो राज्यों के नाम लिखिए जहाँ काली मिट्टी पायी जाती है।
उत्तर :
महाराष्ट्र तथा गुजरात ऐसे दो राज्य हैं, जहाँ काली मिट्टी बहुतायत से पायी जाती है।

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प्रश्न 2.
लैटेराइट मिट्टियाँ कहाँ पायी जाती हैं ?
उत्तर :
भारत में पश्चिमी घाट, छोटा नागपुर के पठार, मेघालय तथा तमिलनाडु की पहाड़ियों, केरल तथा पूर्वी घाट के क्षेत्रों में लैटेराइट मिट्टियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 3.
मरुस्थलीय मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
मरुस्थलीय मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं|

  • मरुस्थलीय मिट्टी में आर्द्रता धारण करने की क्षमता कम होती है।
  • इनमें नाइट्रोजन तथा जीवांश की कमी होती है।

प्रश्न 4.
‘बाँगर’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
बाँगर एक प्रकार की मिट्टी है, जो उत्तरी मैदान में नदियों की पुरानी काँप द्वारा निर्मित होती है।

प्रश्न 5.
लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
लैटेराइट मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं

  • लैटेराइट मिट्टी सिलिका तथा लवण (नमक) के कणों से युक्त होती है, जिसमें मोटे-मोटे कण तथा कंकड़-पत्थर का बाहुल्य होता है।
  • शुष्क मौसम में लैटेराइट मिट्टी ईंट की भाँति सख्त हो जाती है। (UPBoardSolutions.com) इस मिट्टी में कैल्सियम, मैग्नीशियम तथा नाइट्रोजन की कमी तथा पोटाश का अभाव होता है।

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प्रश्न 6.
लाल-पीली मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
लाल-पीली मिट्टी के कम उपजाऊ होने के दो कारण निम्नलिखित हैं

  • प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों के विखण्डन से बनने के कारण ये छिद्रयुक्त होती हैं; अत: इनमें जलधारण की क्षमता कम होती है।
  • इनमें फॉस्फोरिक अम्ल, जैविक तथा नाइट्रोजन पदार्थ (ह्यूमस) की कमी होती है।

प्रश्न 7.
जलोढ़ मिट्टी की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं को लिखिए। [2016, 17]
उत्तर :
जलोढ़ मिट्टी की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • इसके कण सूक्ष्म होते हैं और इसमें जल देर तक ठहर सकता है।
  • इसमें पोटाश तथा चूने की पर्याप्त मात्रा होती है।

प्रश्न 8.
‘भू-क्षरण’ अथवा ‘भू-अपरदन’ के प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
‘भू-क्षरण’ अथवा ‘भू-अपरदन’ के प्रमुख कारक हैं—

  • पवन,
  • अत्यधिक पशुचारण,
  • मूसलाधार वृष्टि तथा
  • प्राकृतिक वनस्पति का विनाश।

प्रश्न 9.
‘भू-क्षरण के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सामान्यतया भू-क्षरण निम्नलिखित दो प्रकार का होता है

  • चादरी भू-क्षरण-जब पवन अथवा जल के द्वारा भूमि की ऊपरी कोमल सतह काटकर उड़ा दी जाती है अथवा बहा दी जाती है, तो उसे समतल अथवा चादरी भू-क्षरण कहते हैं।
  • नालीदार भू-क्षरण–तीव्र गति से बहता हुआ जल जब भूमि (UPBoardSolutions.com) में गहरी-गहरी नालियाँ बना देता है, तो उसे गहन अथवा नालीदार भू-क्षरण कहते हैं।

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प्रश्न 10.
चाय की खेती के लिए उपयोगी मिट्टी कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर :
मध्य हिमालय के पर्वतीय ढालों पर मिट्टी में वनस्पति अंशों की अधिकता होती है। इसमें लोहे की मात्रा अधिक तथा चूने का अंश कम होता है। यह मिट्टी चाय के उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। काँगड़ा, देहरादून, दार्जिलिंग तथा असोम के पहाड़ी ढालों पर यह मिट्टी अधिकता से पायी जाती है।

प्रश्न 11.
डेल्टाई काँप मिट्टी कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर :
डेल्टाई काँप मिट्टी नदियों के डेल्टा में पायी जाती है, जहाँ नदियाँ काँप मिट्टी का जमाव करती रहती हैं। यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है।

प्रश्न 12.
भारत की मिट्टी में किन तत्त्वों की कमी पायी जाती है ?
उत्तर :
भारत की मिट्टी में नाइट्रोजन, जीवांश, वनस्पति अंश और खनिज लवणों की कमी पायी जाती है।

प्रश्न 13.
समुचित भूमि उपयोग न करने के कौन-से दो दृष्परिणाम हो सकते हैं ?
उत्तर :
समुचित भूमि का उपयोग न करने के निम्नलिखित दो दुष्परिणाम हो सकते हैं|

  • कृषि-योग्य भूमि बंजर भूमि में बदल सकती है।
  • भूमि की उत्पादकता में कमी हो सकती है।

प्रश्न 14.
भारत में कहवा उत्पन्न करने वाले दो राज्यों के नाम लिखिए।
या
भारत में कहवा उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों के नाम बताइए।
उत्तर :
उर्वरकों की सहायता से लैटेराइट मिट्टी में कहवा की खेती कर्नाटक, (UPBoardSolutions.com) केरल, महाराष्ट्र के दक्षिणी भागों, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है।

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प्रश्न 15.
चाय की खेती के लिए दो उपयोगी भौगोलिक दशाओं को लिखिए।
उत्तर :
चाय की खेती के लिए उपयोगी दो भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित हैं

  • मिट्टी में वनस्पति के अंशों व लोहे के अंशों की अधिकता तथा चूने के अंश की न्यूनता।
  • आग्नेय शैलों के विखण्डन से निर्मित नवीन, पथरीली, दलदली तथा प्रवेश्य मिट्टियाँ।

प्रश्न 16.
कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मिट्टी कौन-सी है ? उसकी एक विशेषता को लिखिए। [2015]
उत्तर :
कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम मिट्टी ‘काली मिट्टी’ अथवा ‘रेगुर मिट्टी’ है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता पर्याप्त होती है तथा इसमें पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं।

प्रश्न 17.
लाल मिट्टी भारत में सबसे ज्यादा कहाँ पायी जाती है ?
उत्तर :
भारत में लाल मिट्टी कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्वी भागों, तमिलनाडु, मेघालय, ओडिशा में पायी जाती है।

प्रश्न 18.
मिट्टी का निर्माण करने वाले दो कारकों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • वायु तथा
  • जल

प्रश्न 19.
उत्तर प्रदेश के अधिकतर भागों में किस प्रकार की मिट्टी पायी जाती है ? [2010]
उत्तर :
उत्तर प्रदेश के अधिकतर भागों में (UPBoardSolutions.com) जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है।

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‘बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. कौन-सी मिट्टी वर्षा से चिपचिपी हो जाती है? ‘
(क) लाल
(ख) काली
(ग) जलोढ़
(घ) पर्वतीय

2. काली मिट्टी कौन-सी फसल के लिए उपयुक्त है? [2013]
(क) गेहूँ
(ख) चना
(ग) कपास
(घ) गन्ना

3. लैटेराइट मिट्टी किस राज्य में अधिक मिलती है?
(क) कर्नाटक में
(ख) असोम में
(ग) मेघालय में
(घ) उत्तर प्रदेश में

4. जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है [2012]
(क) पर्वतीय क्षेत्रों में
(ख) मैदानी क्षेत्रों में
(ग) पठारी क्षेत्रों में
(घ) रेगिस्तानी क्षेत्रों में

5. लैटेराइट मिट्टी का रंग होता है
(क) काला
(ख) पीला
(घ) लाल

6. निम्नलिखित में से कौन-सी मिट्टी कपास उत्पादन के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है? [2010]
या
कपास की खेती के लिए सबसे उत्तम मिट्टी है [2012, 13, 14]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) काली मिट्टी
(घ) लैटेराइट मिट्टी

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7. जलोढ़ मिट्टी का निर्माण मुख्यतः किसके द्वारा होता है? [2014, 16]
(क) ज्वालामुखी द्वारा
(ख) पवन द्वारा
(ग) हिमानी द्वारा
(घ) नदियों द्वारा

8. भारत के किस राज्य में काली मिट्टी का विस्तार सर्वाधिक है?
(क) महाराष्ट्र
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) असोम
(घ) राजस्थान

9. वन हमारी सहायता करते हैं
(क) मिट्टी का कटाव रोककर
(ख) बाढ़ रोककर
(ग) वर्षा की मात्रा बढ़ाकर
(घ) इन सभी प्रकार से

10. जलोढ़ मिट्टी किस फसल की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है? [2011]
(क) चाय
(ख) रबड़
(ग) कपास
(घ) गेहूँ

11. भारत की सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है [2016]
(क) जलोढ़ मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) लैटेराइट मिट्टी
(घ) पर्वतीय मिट्टी

12. निम्न में से कौन-सी मिट्टी चाय की खेती के लिए उपयुक्त है? [2017]
(क) पर्वतीय मिट्टी
(ख) काली मिट्टी
(ग) जलोढ़ मिट्टी
(घ) लाल मिट्टी

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13. काली मिट्टी का निर्माण होता है [2017]
(क) वायु से
(ख) ग्लेशियरों से
(ग) ज्वालामुखी विस्फोट से
(घ) नदियों से

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (ग), 3. (ग), 4. (ख), 5. (ख), 6. (ग), 7. (घ), 8. (क), 9. (घ), 10. (घ), 11. (क), 12. (क), 13. (ग)।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 जय सुभाष (खण्डकाव्य)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 जय सुभाष (खण्डकाव्य)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 4 जय सुभाष (खण्डकाव्य).

प्रश्न 1
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। [2012, 15 16]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य का सारांश लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 14, 15]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य की कथा संक्षेप में लिखिए। [2009, 11, 12, 13, 14, 15, 18]
या
“जय सुभाष’ का कथानक राष्ट्रभक्ति से पूर्ण है।” सोदाहरण समझाइए। “जय सुभाष’ खण्डकाव्य का कथानक स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य हमें राष्ट्रीयता की प्रेरणा देता है। कथन की पुष्टि कीजिए। [2014]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्रस्तुत खण्डकाव्य नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के व्यक्तित्व और आदर्श गुणों का परिचय प्रदान करने वाली एक सुन्दर रचना है। इस काव्य का सम्पूर्ण कथानक सात सर्गों में विभक्त है। इसका सर्गवार सारांश इस प्रकार है

सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 (UPBoardSolutions.com) ई० को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। इनके पिता को नाम ‘जानकीनाथ बोस’ और माता का नाम ‘प्रभावती देवी’ था।

बड़े होने पर सुभाष ने अपनी तीव्र बुद्धि का परिचय दिया। इन्होंने अपने परिश्रम एवं लगन से सभी शैक्षिक परीक्षाओं में उत्तम अंक प्राप्त किये। प्रेसीडेन्सी कॉलेज में पढ़ते समय ऑटेन नामक अंग्रेज प्रोफेसर द्वारा, भारतीयों की निन्दा सुनकर इन्होंने उसके गाल पर एक तमाचा मारकर स्वाभिमान, देशभक्ति एवं साहस का अद्भुत उदाहरण दिया। इन्होंने बी० ए० की परीक्षा तथा विदेश जाकर आई० सी० एस० की परीक्षा उत्तीर्ण की। महात्मा गाँधी और देशबन्धु चितरंजनदास से प्रभावित होकर सरकार द्वारा प्रदत्त आई० सी० एस० के उच्च पद को त्याग दिया और स्वतन्त्रता संग्राम में सम्मिलित हो गये।

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द्वितीय खण्डकाव्य के सर्ग में सुभाष के भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने का वर्णन है। सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन व्यापक रूप से चल रहा था। उन्हीं दिनों देशबन्धु जी ने एक नेशनल कॉलेज की स्थापना की, जिसका प्रधानाचार्य उन्होंने सुभाष को नियुक्त कर दिया। सुभाष ने छात्रों में देशप्रेम और स्वतन्त्रता की भावना जाग्रत की और राष्ट्र-भक्त स्वयंसेवकों की एक सेना तैयार की। ये पं० मोतीलाल नेहरू द्वारा स्थापित ‘स्वराज्य पार्टी के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने दल के कई प्रतिनिधियों को कौंसिल में प्रवेश कराया। इन्होंने कलकत्ता महापालिका का खूब विकास किया। सरकार ने इन्हें अकारण ही अलीपुर जेल में डाल दिया। इनका अधिकांश जीवन कारागार में ही व्यतीत हुआ।

खण्डकाव्य के तीसरे सर्ग की कथा सन् 1928 से आरम्भ होती है। सन् 1928 ई० में कलकत्ता के कांग्रेस के 46वें अधिवेशन में पं० मोतीलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाया गया। इसी समय लोगों को सुभाष की संगठन-कुशलता का परिचय मिला। इसके बाद सुभाष को कलकत्ता नगर का मेयर निर्वाचित किया गया। इन्होंने पुनः सभाओं में ओजस्वी भाषण दिये, जिनको सुनकर इन्हें सिवनी, भुवाली, अलीपुर और माण्डले जेल में भेजकर यातनाएँ दी गयीं, जिससे इनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। इन्हें स्वास्थ्य-लाभ के लिए पश्चिमी देशों में भेजा गया। इन्होंने वहाँ ‘द इण्डियन स्ट्रगल’ नामक पुस्तक लिखी। भारत लौटने पर अगले वर्ष हीरापुर के कांग्रेस अधिवेशन में इन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया।

चतुर्थ सर्ग में हीरापुर अधिवेशन से लेकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की (UPBoardSolutions.com) स्थापना तक का वर्णन है। ताप्ती नदी के तट पर बिठ्ठल नगर में कांग्रेस का इक्यावनवाँ अधिवेशन हुआ। इन्हें अधिवेशन का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया। इससे आजादी का आन्दोलन और अधिक तीव्र हो उठी।

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इसके बाद त्रिपुरा में कांग्रेस का अगला अधिवेशन हुआ। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष के चयन में दो नेताओं में मतभेद हो गया। उस समय कांग्रेस को विघटन से बचाने के लिए सुभाष ने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ (अप्रगामी दल) की स्थापना की। अब सुभाष सबकी श्रद्धा और आशा के केन्द्र बनकर सबके प्रिय नेताजी’ बन गये थे। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि अपनी मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेज सरकार की यातनाओं को निरन्तर सहन करते रहे।

पञ्चम सर्ग में सुभाष के छद्मवेश में घर से भाग जाने की कथा का वर्णन है। सुभाष जब घर में नजरबन्द थे, तब सरकार ने इनकी समस्त गतिविधियों पर कड़ा प्रतिबन्ध लगा रखा था। 15 जनवरी, 1941 ई० को जाड़े की अर्द्ध-रात्रि में दाढ़ी बढ़ाये हुए, ये एक मौलवी के वेश में पुलिस की आँखों में धूल झोंककर कल गये और फ्रण्टियर मेल से पेशावर पहुँच गये और वहाँ से बर्लिन। बर्लिन में इन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ की स्थापना की। दूर रहकर स्वतन्त्रता-संग्राम का नेतृत्व करना कठिन जानकर ये पनडुब्बी द्वारा टोकियो पहुँचे। जापानियों ने इन्हें पूरा सहयोग दिया। सहगल, शाहनवाज, ढिल्लन और लक्ष्मीबाई ने वीरता से इसे सेना का नेतृत्व किया। सुभाष ने दिल्ली चलो’ का नारा हर दिशा में गुंजित कर दिया। ‘आजाद हिन्द फौज’ का हर सैनिक स्वतन्त्रता संग्राम में जाने को उत्सुक था।

षष्ठ सर्ग में ‘आजाद हिन्द फौज के भारत पर आक्रमण तथा प्राप्त विजय का वर्णन है। सुभाष ने ‘आजाद हिन्द फौज के वीरों को दिल्ली चलो’ और ‘जय हिन्द’ के नारे दिये। इन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” कहकर युवकों का आह्वान किया। आजाद हिन्द सेना ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये और उनके शिविरों पर चढ़ाई करके कई मोर्चे परे उनको अविस्मरणीय करारी हार दी।

सप्तम सर्ग में द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी तथा जापान की पराजय की चर्चा की गयी है। संसार में सुख-दु:ख और जय-पराजय का चक्र चलता रहता है। अंग्रेजों का पलड़ा धीरे-धीरे भारी होने लगा। आजाद हिन्द फौज की भी जय के बाद पराजय होने लगी। अगस्त, 1945 ई० में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर अमेरिका द्वारा अणुबम गिरा दिया गया। जापान ने मानवता की रक्षा के लिए जनहित में आत्मसमर्पण कर दिया। 18 अगस्त, 1945 ई० को ताइहोक में इनका विमान आग लगने से दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सुभाष भी नहीं बच सके। जब तक सूर्य, चन्द्र और तारे रहेंगे, भारत के घर-घर में सुभाष अपने यश के रूप में अमर रहेंगे। उनकी यशोगाथा नवयुवकों को त्याग, देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा देती रहेगी।

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प्रश्न 2
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस के प्रारम्भिक जीवन (विद्यार्थी जीवन व बाल जीवन) पर प्रकाश डालिए। [2011]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए। [2010, 11, 14, 18]
उत्तर
सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 ई० को कटक (उड़ीसा) में हुआ था। इनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस’ और माता का नाम ‘प्रभावती देवी’ था। इनकी माताजी अत्यन्त विदुषी धार्मिक महिला थीं। इन्होंने बचपन में अपनी माताजी से राम, कृष्ण, अर्जुन, (UPBoardSolutions.com) बुद्ध, महावीर, शिवाजी, प्रताप आदि की कथाएँ सुनी थीं। बालक सुभाष पर उन्हीं के शील और शौर्य का प्रभाव पड़ा।

बड़े होने पर सुभाष ने अपनी तीव्र बुद्धि का परिचय दिया। इन्होंने अपने परिश्रम एवं लगन से सभी शैक्षिक परीक्षाओं में उत्तम अंक प्राप्त किये। विद्यालय में अपने गुरु बेनीमाधव जी के प्रभाव से, इनमें दीन-हीनों और दु:खी-दरिद्रों के प्रति प्रेम, करुणा एवं सेवाभाव जाग्रत हुआ। इन्होंने अपनी अल्प आयु में ही जाजपुर ग्राम में भयंकर बीमारी फैलने पर रोगियों की सेवा-सुश्रूषा की। प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करके इन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया तथा सुरेशचन्द्र बनर्जी से आजीवन अविवाहित रहने की प्रेरणा प्राप्त की। कलकत्ता में महर्षि विवेकानन्द का ओजस्वी भाषण सुनकर सत्य की खोज में मथुरा, हरिद्वार, वृन्दावन, काशी आदि तीर्थों एवं हिमालय की कन्दराओं में भ्रमण किया, परन्तु कहीं भी इन्हें शान्ति न मिली। इन्होंने पुन: पढ़ाई प्रारम्भ कर दी। प्रेसीडेन्सी कॉलेज में ऑटेन नामक अंग्रेज प्रोफेसर द्वारा, भारतीयों की निन्दा सुनकर देशापमान को सहन नहीं कर सकने के कारण इन्होंने उसके गाल पर एक तमाचा मारकर स्वाभिमान, देशभक्ति एवं साहस का अद्भुत उदाहरण दिया। इस अपराध के लिए इन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। अन्य कॉलेज में प्रवेश पाकर इन्होंने बी० ए० की परीक्षा तथा विदेश जाकर आई० सी० एस० की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्वदेश लौटने पर इन्होंने देश की दयनीय दशा देखी। महात्मा गाँधी और देशबन्धु चितरंजनदास से प्रभावित होकर सरकार द्वारा प्रदत्त आई० सी० एस० के उच्च पद को । (UPBoardSolutions.com) त्याग दिया और स्वतन्त्रता संग्राम में सम्मिलित हो गये।।

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प्रश्न 3
‘जय सुभाष के द्वितीय सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु, कथासार) अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 13, 14, 15, 17, 18]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में सुभाष के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर
खण्डकाव्य के इस सर्ग में सुभाष के भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने का वर्णन है। भारतवर्ष में अंग्रेजों के अत्याचार और अन्याय को देखकर भारतमाता को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए सुभाष ने अपना जीवन देश को अर्पित कर देने का निश्चय किया। सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन व्यापक रूप से चल रहा था। छात्रों ने विद्यालयों का एवं वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार करके आन्दोलन को तीव्र बनाया। बंगाल में देशबन्धु चितरंजनदास आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उन्हीं दिनों देशबन्धु जी ने एक नेशनल कॉलेज की स्थापना की, जिसका प्रधानाचार्य उन्होंने सुभाष को नियुक्त कर दिया। सुभाष ने छात्रों में देशप्रेम और स्वतन्त्रता की भावना जाग्रत की और राष्ट्र-भक्त स्वयंसेवकों की एक सेना तैयार की। इस सेना ने बंगाल के घर-घर में स्वतन्त्रता का सन्देश गुंजा दिया। इस सेना के भय से अंग्रेजी सत्ता डोल उठी, जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने देशबन्धु और सुभाष को जेल में बन्द कर दिया। जेल में जाकर (UPBoardSolutions.com) उनका साहस व शक्ति और बढ़ गये। जब ये जेल से मुक्त हुए, तब बंगाल भीषण बाढ़ से ग्रस्त था। सुभाष ने तन-मन-धन से बाढ़-पीड़ितों की सहायता की। ये पं० मोतीलाल नेहरू द्वारा स्थापित ‘स्वराज्य पार्टी के प्रबल समर्थक थे। इन्होंने दल के कई प्रतिनिधियों को कौंसिल में प्रवेश कराया। कलकत्ता महापालिका के चुनाव में सुभाष बहुमत से जीते। सुभाष को अधिशासी अधिकारी नियुक्त किया गया। इन्होंने १ 3,000 निर्धारित वेतन के बजाय केवल आधा वेतन लेकर महापालिका का खूब विकास किया। सरकार ने इनकी बढ़ती हुई लोकप्रियता से चिढ़कर इन्हें अकारण ही अलीपुर जेल में डाल दिया। वहाँ से बरहामपुर और माण्डले जेल में भेजकर इन्हें बड़ी यातनाएँ दी गयीं। इस कारण इनका स्वास्थ्य खराब हो गया। दृढ़ स्वर से जनता की माँग के कारण ये जेल से छोड़ दिये गये। कारागार से छूटते ही इन्होंने पुनः संघर्ष आरम्भ कर दिया। इनका अधिकांश जीवन कारागार में ही व्यतीत हुआ।

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प्रश्न 4
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु, कथासार) लिखिए। [2011, 13, 18]
या
‘जय सुभाष’ के आधार पर कलकत्ता में आयोजित 1928 ई० के कांग्रेस अधिवेशन का वर्णन कीजिए और बताइए कि इस अवसर पर सुभाष की क्या भूमिका रही ?
उत्तर
सन् 1928 ई० में कलकत्ता के कांग्रेस के 46वें अधिवेशन में पं० मोतीलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाया गया। उनके सम्मान में अड़तालीस घोड़ों के रथ में शोभा-यात्रा निकाली गयी, जिसमें स्वयंसेवकों के दल का नेतृत्व स्वयं सुभाष कर रहे थे। इसी समय लोगों को सुभाष की संगठन-कुशलता का परिचय मिला। पं० मोतीलाल नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में इनके उत्साह, कार्यकुशलता, देशप्रेम और कर्मठता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। |

इसके बाद सुभाष को कलकत्ता नगर का मेयर निर्वाचित किया गया। इनके कार्यकाल में ही स्वतन्त्रता-सेनानियों का एक जुलूस निकला, जिसका नेतृत्व स्वयं सुभाष कर रहे थे। इस जुलूस पर पुलिस ने लाठीचार्ज करके सुभाष को लाठियों से बहुत पीटा और नौ माह के लिए इन्हें अलीपुर जेल में डाल दिया। जेल से छूटने पर इन्होंने पुन: सभाओं में ओजस्वी भाषण दिये, जिनको सुनकर देशभक्त युवकों को खून खौल उठा, तब इन्हें सिवनी जेल में डाल दिया गया। वहाँ से भुवाली, अलीपुर और माण्डले जेल में भेजकर यातनाएँ दी गयीं, जिससे इनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। इन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए पश्चिमी देशों में भेजा (UPBoardSolutions.com) गया। वहाँ जाकर इन्होंने यूरोप के वैभव को देखा और भारत से उसकी तुलना की। इन्होंने अपने देश की दशा और जनता के आन्दोलन को यथार्थ चित्र पश्चिमी देशों के सम्मुख रखा। वहाँ से पिता की बीमारी को समाचार सुनकर भारत आये, परन्तु पिता के अन्तिम दर्शन न पा सके। महान् शोक के कारण, स्वास्थ्य लाभ के लिए इन्हें पुनः यूरोप जाना पड़ा। इन्होंने वहाँ ‘द इण्डियन स्ट्रगल’ नामक पुस्तक लिखकर देशप्रेम की भावना और भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का सजीव वर्णन किया। ये विदेशों में रहकर स्वदेश का सम्मान बढ़ाते रहे। सन् 1936 ई० में स्वदेश वापस आने पर इन्हें पुन: जेल भेज दिया गया। जेल में स्वास्थ्य खराब हो जाने के कारण इन्हें स्वास्थ्य-लाभ के लिए एक बार फिर यूरोप भेजा गया। कुछ समय बाद पं० जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लखनऊ में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में सभी नेताओं और जनता ने सुभाष के त्याग और बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। भारत लौटने पर अगले वर्ष हीरापुर के कांग्रेस अधिवेशन में इन्हें कांग्रेस को अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया।

प्रश्न 5
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर इसके चतुर्थ सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु) लिखिए। [2017]
उत्तर
इस सर्ग में हीरापुर अधिवेशन से लेकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना तक का वर्णन है। ताप्ती नदी के तट पर बिट्ठल नगर में कांग्रेस का इक्यावनवाँ अधिवेशन हुआ। इक्यावन पताकाओं से सुसज्जित, इक्यावन द्वारों से, इक्यावन बैलों के रथ में बैठाकर सुभास का भव्य एवागत किया गया और इन्हें अधिवेशन का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया। अध्यक्ष पद से इनके ओजस्वी भाषण को सुनकर नवयुवकों में देशप्रेम, एकता और बलिदान की भावना जाग उठी। इससे आजादी का आन्दोलन और अधिक तीव्र हो उठा।

इसके बाद त्रिपुरा में कांग्रेस का अगला अधिवेशन हुआ। इसमें कांग्रेस के दो नेताओं पट्टाभि । सीतारमैया और सुभाष में चुनाव हुआ, जिसमें सुभाष विजयी हुए। गाँधीजी क्योंकि पट्टाभि सीतारमैया का समर्थन कर रहे थे, इसीलिए उन्होंने पट्टाभि (UPBoardSolutions.com) सीतारमैया की हार को अपनी हार समझा। उस समय कांग्रेस को विघटन से बचाने के लिए सुभाष ने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ (अग्रगामी दल) की स्थापना की एवं सारे देश में घूम-घूमकर स्वतन्त्रता की ज्योति जगायी। अब सुभाष सबकी श्रद्धा और आशा के केन्द्र बनकर सबके प्रिय नेताजी’ बन गये थे। कलकत्ता में ‘ब्लैक हॉल’ संस्मारक; जिसके बारे में कहा जाता था कि यहाँ अनेक अंग्रेजों को सन् 1857 ई० में भारतीयों द्वारा जिन्दा जला दिया गया था; को हटाने के लिए आन्दोलन करते समय सरकार ने इन्हें फिर जेल में डाल दिया। इन्होंने जेल में भूख हड़ताल की। सरकार को इनके जेल में रहते ही संस्मारक हटाना पड़ा। जनता के प्रबल आग्रह करने पर इन्हें जेल से छोड़कर घर में नजरबन्द कर दिया गया। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि अपनी मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेज सरकार की यातनाओं को निरन्तर सहन करते रहे।

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प्रश्न 6
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर बताइए कि सुभाषचन्द्र बोस किन परिस्थितियों में वेश छोड़कर विदेश गये ? वहाँ जाकर उनके द्वारा भारत की स्वतन्त्रता के लिए किये गये प्रयत्नों का वर्णन कीजिए। [2009, 10]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के ‘पाँचवें सर्ग’ का सारांश (कथासार लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 16, 17]
[संकेत द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ सर्ग से परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए पाँचवें सर्ग का सारांश लिखिए।]
उत्तर
इस सर्ग में सुभाष के छद्मवेश में घर से भाग जाने की कथा का वर्णन है। सुभाष जब घर में नजरबन्द थे, तब सरकार ने इनकी समस्त गतिविधियों पर कड़ा प्रतिबन्ध लगा रखा था। गुप्तचरों की कड़ी नजर और पुलिस का पहरा रहने पर भी सुभाष 15 जनवरी, 1941 ई० को जाड़े की अर्द्ध-रात्रि में दाढ़ी बढ़ाये हुए, एक मौलवी के वेश में पुलिस की आँखों में धूल झोंककर निकल गये और फ्रण्टियर मेल से पेशावर पहुँच गये। वहाँ से उत्तमचन्द नाम के व्यक्ति के प्रयास से बर्लिन पहुँच गये। पेशावर से काबुल तक की इनकी यह यात्रा अति भयानक थी। इन्हें अनेक कष्ट सहते हुए अनेक छद्मवेश धारण (UPBoardSolutions.com) करने पड़े। बर्लिन में इन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ की स्थापना की। दूर रहकर स्वतन्त्रता-संग्राम का नेतृत्व करना कठिन जानकर ये पनडुब्बी द्वारा टोकियो पहुँचे। जापानियों ने इन्हें पूरा सहयोग दिया। वहाँ से रासबिहारी के साथ ये सिंगापुर आये। इनकी सेना में विदेशों में रहने वाले अनेक भारतीय भी सम्मिलित हो गये। इन्होंने तन-मनधन से सुभाष को पूरा सहयोग दिया। इन्होंने गाँधीजी, नेहरू, आजाद और बोस के नाम से चार ब्रिगेड तैयार किये जिनमें पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियाँ भी सम्मिलित थीं। सहगल, शाहनवाज, ढिल्लन और लक्ष्मीबाई ने वीरता से इंस सेना का नेतृत्व किया। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई सभी धर्मावलम्बी एकजुट होकर स्वतन्त्रता संग्राम के लिए तत्पर हो गये। सुभाष ने दिल्ली चलो’ का नारा हर दिशा में गुंजित कर दिया। ‘आजाद हिन्द फौज का हर सैनिक स्वतन्त्रता संग्राम में जाने को उत्सुक था।

प्रश्न 7
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग का सारांश लिखिए। [2009, 13, 17]
उत्तर
षष्ठ सर्ग में ‘आजाद हिन्द फौज के भारत पर आक्रमण तथा प्राप्त विजय का वर्णन है। सुभाष ने ‘जाद हिन्द फौज के वीरों को दिल्ली चलो’ और ‘जय हिन्द’ के नारे दिये। इन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” कहकर युवकों का आह्वान किया। इस प्रकार इन्होंने अपनी सेना के वीरों में देश की स्वतन्त्रता के लिए बलिदान देने की प्रबल भावना भर दी। सेना के वीर इनके ओजपूर्ण भाषणों को सुनकर शत्रु की विशाल सैन्य-शक्ति की परवाह न (UPBoardSolutions.com) करके, विजय प्राप्त करते हुए 18 मार्च, 1944 ई० को कोहिमा तक पहुँच गये। भयंकर गोलाबारी करके इन्होंने इम्फाल नगर को घेरकर शत्रु को पीछे भगा दिया। अराकान पर्वत-शिखर पर भी भारतीय तिरंगा लहराने लगा। आजाद हिन्द सेना ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये और उनके शिविरों पर चढ़ाई करके कई मोर्चे पर उनको अविस्मरणीय करारी हार दी।

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प्रश्न 8
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के सप्तम (अन्तिम) सर्ग की कथा लिखिए। [2012, 14]
उत्तर
सप्तम सर्ग में द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी तथा जापान की पराजय की चर्चा की गयी है। संसार में सुख-दु:ख और जय-पराजय का चक्र चलता रहता है। अंग्रेजों का पलड़ा धीरे-धीरे भारी होने लगा। आजाद हिन्द फौज की भी जय के बाद पराजय होने लगी। अंग्रेजों ने बर्मा (अब म्यांमार) में आकर अपना स्वत्व स्थापित कर लिया। अगस्त 1945 ई० में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर अमेरिका द्वारा अणुबम गिराकर सर्वनाश कर दिया गया। जापान ने मानवता की रक्षा के लिए जनहित में अमेरिका के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। सुभाष ने स्थिति अनुकूल न जानकर आजाद हिन्द फौज के आत्मसमर्पण करने का भी निर्णय किया। उन्होंने सेना के वीरों को बधाई देते हुए पुन: आकर उचित समय पर स्वतन्त्रता का बीड़ा उठाने का आश्वासन दिया। वे विमान द्वारा टोकियो में जापान के प्रधानमन्त्री (UPBoardSolutions.com) हिरोहितो से मिलने जाना चाहते थे। 18 अगस्त, 1945 ई० को ताइहोक में विमान आग लगने से दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सुभाष भी नहीं बच सके। इस दु:खद समाचार को सुनकर हर मनुष्य रो पड़ा। भारत में बहुतों के मन में अब तक यही धारणा है कि सुभाष आज भी जीवित हैं। जब तक सूर्य, चन्द्र और तारे रहेंगे, भारत के घर-घर में सुभाष अपने यश के रूप में अमर रहेंगे। उनकी यशोगाथा नवयुवकों को त्याग, देशप्रेम और बलिदान की प्रेरणा देती रहेगी।

प्रश्न 9
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक (प्रमुख पात्र) नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का चरित्र-चित्रण कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘सुभाष में अनेक गुणों का समावेश था।”जय सुभाष’ के आधार पर खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14]
या

‘जय सुभाष खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए, जो आपको अधिकाधिक प्रभावित करती हैं। [2009, 14]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सिद्ध कीजिए कि सुभाषचन्द्र त्याग, अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के प्रतीक हैं। [2010]
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। [2015, 17, 18]
उत्तर
श्री विनोदचन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ द्वारा रचित ‘जय सुभाष’ नामक खण्डकाव्य स्वतन्त्रता-संग्राम के महान् सेनानी सुभाषचन्द्र बोस के त्याग, देशभक्ति एवं बलिदानपूर्ण जीवन की गाथा प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत काव्य का उद्देश्य सुभाषचन्द्र बोस के व्यक्तित्व एवं गुणों को उजागर करना है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ही प्रस्तुत खण्डकाव्य के नायक हैं। इनके चारित्रिक गुण इस प्रकार हैं|

(1) कुशाग्र बुद्धि एवं प्रखर प्रतिभाशाली-सुभाष बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के और प्रतिभाशाली थे। इन्होंने मैट्रिक और इण्टर की परीक्षाएँ प्रथम स्थान प्राप्त करके उत्तीर्ण की थीं। विदेश जाकर इन्होंने आई० सी० एस० की परीक्षा उत्तीर्ण की। उस समय किसी (UPBoardSolutions.com) भारतीय के लिए यह परीक्षा उत्तीर्ण करना अत्यन्त गौरव की बात थी। आगे चलकर कलकत्ता अधिवेशन में इनकी प्रबन्ध-कुशलता, आजाद हिन्द फौज और फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना एवं पुलिस की आँखों में धूल झोंककर कड़ी निगरानी से निकल भागना इनकी विलक्षण प्रतिभा को सूचित करते हैं।

(2) समाजसेवी, अनुपम त्यागी एवं कष्टे-सहिष्णु–सुभाष मानवमात्र के सेवक थे। इन्होंने बंगाल में बाढ़ आने पर बाढ़-पीड़ितों की अपूर्व सहायता की। जाजपुर में महामारी के फैलने पर इन्होंने रोगियों की सेवा की। देश की स्वतन्त्रता के लिए आह्वान होने पर इन्होंने आई० सी० एस० जैसे उच्च पद को छोड़कर महान् त्याग का परिचय दिया। इन्होंने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए जैसी कठोर यातनाएँ सहीं, वे अवर्णनीय हैं। इनकी मानव-सेवा की भावना के विषय में पाण्डेय जी ने लिखा है –
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दुःखी जनों का कष्ट कभी वह, नहीं देख सकते थे।
दोस्तों की सेवा करने में, वह न कभी थकते थे।

(3) स्वाभिमानी, साहसी और निर्भीक–सुभाष में स्वाभिमान और निर्भीकता की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। ये किसी भी तरह अपने देश का अपमान नहीं सह सकते थे। छात्रावस्था में प्रोफेसर ऑटेन द्वारा भारतीयों की निन्दा सुनकर इन्होंने ऑटेन को तमाचा जड़कर अपने स्वाभिमान को परिचय दिया था। इन्होंने आई० सी० एस० का गौरवपूर्ण पद भी इसलिए त्याग दिया था कि अंग्रेजों की नौकरी करना इनके स्वाभिमान के अनुकूल नहीं था

स्वाभिमान का परिचय सबको, हो निर्भीक दिया था।
ले देशापमान का बदला, उत्तम कार्य किया था।

(4) महान् देशभक्त और स्वतन्त्रता-प्रेमी–सुभाष देश की स्वाधीनता के अद्वितीय (UPBoardSolutions.com) आराधक थे। इन्होंने गाँधीजी और देशबन्धु चितरंजनदास के आह्वान पर राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिए अपनी युवावस्था अर्पित कर दी

की सुभाष ने राष्ट्र-प्रेम हित अर्पित मस्त जवानी।
मुक्ति युद्ध के बने शीघ्र ही वे महान् सेनानी॥

उनके हृदय में आजादी की ज्वाला निरन्तर जलती रही। अनेक बार जेल-यातनाएँ सहने पर भी इन्होंने देश-सेवा का व्रत नहीं छोड़ा। अनेक बार अपने प्राणों को खतरे में डाला, शोषक अंग्रेजों से युद्ध किये और अन्त में बलिदान हो गये। इन्होंने अपने ओजस्वी भाषणों और कार्य-कलापों से समस्त देशवासियों के हृदय में स्वतन्त्रता की अग्नि प्रज्वलित कर दी।

(5) उत्साह की प्रतिमूर्ति–वीरता, उत्साह तथा साहस सुभाष के चरित्र के मुख्य गुण थे। उनके इन गुणों को देखकर जहाँ सामान्य जन प्रायः चकित रह जाते थे, वहीं अंग्रेज प्रायः भयभीत हो जाते थे। अंग्रेजी शासन इन्हें प्रायः कैद कर देता था, लेकिन ये इससे (UPBoardSolutions.com) हतोत्साहित नहीं होते थे। एक बार अंग्रेजों द्वारा घर में ही नजरबन्द कर दिये जाने पर ये अपनी बुद्धि, चतुरता तथा योजनाबद्धता द्वारा अंग्रेज सैनिकों की आँखों में धूल झोंककर भाग निकले और वेश बदलकर काबुल, जर्मनी तथा जापान पहुँच गये। विदेश में रहकर इन्होंने भारतीय युवकों को उत्साहित किया और आजाद हिन्द फौज का गठन किया। इनके भाषण उत्साह से परिपूरित होते थे। इनके उत्साह का ही प्रतिफल था कि आजाद हिन्द फौज को अंग्रेजी सेनाओं के विरुद्ध युद्ध में अनेक स्थानों पर सफलता प्राप्त हुई थी।

(6) जनता के प्रिय नेता–सुभाष सच्चे अर्थों में जनता के प्रिय नेता थे। अपने महान् गुणों एवं अनुपम देश-भक्ति के कारण वे करोड़ों देशवासियों के श्रद्धापात्र बन गये थे

वह थे कोटि-कोटि हृदयों के, एक महान् विजेता।
मातृभूमि के रत्न अलौकिक, जन-जन के प्रियनेता।

इनकी लोकप्रियता का प्रमाण यह है कि इन्होंने हीरापुर अधिवेशन में गाँधीजी द्वारा समर्थित ‘पट्टाभि सीतारमैया’ को चुनाव में पराजित कर दिया था। जिस मनोयोग और निष्ठा से इन्होंने स्वतन्त्रता-संग्राम का संचालन किया, उससे ये जनता के प्रिय नेता बन गये-

वह हो गये समस्त देश की, श्रद्धा के अधिकारी।
लेने लगे प्रेरणा उनसे, बाल-वृद्ध-नर-नारी॥

(7) ओजस्वी वक्ता–सुभाषचन्द्र बोस की वाणी बड़ी ओजपूर्ण थी। वे अपने ओजस्वी भाषणों द्वारा जनता में देशप्रेम, बलिदान और त्याग का मन्त्र फेंक देते थे। “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ की पुकार पर सहस्रों देशभक्त उनकी सेना में तन-मन-धन से सम्मिलित हो गये। उनकी ओजस्वी वाणी सुनकर, वीर पुरुष प्राण हथेली पर रखकर स्वतन्त्रता-संग्राम में कूद पड़े थे-

लगी गूंजने बंगभूमि में, उनकी प्रेरक वाणी।
मन्त्र मुग्ध होते थे सुनकर, उसको सारे प्राणी॥

उन्होंने अनेक सभाओं में एवं आजाद हिन्द फौज के सम्मुख जो भाषण दिये, वे अत्यन्त ओजस्वी और प्रेरणादायक थे।

(8) महान् सेनानी एवं योद्धा-सुभाष महान् सेनानी और अद्भुत योद्धा थे। ‘आजाद हिन्द फौज का संगठन और कुशल नेतृत्व करके उन्होंने एक श्रेष्ठ सेनापति होने की अपनी क्षमता सिद्ध कर दी थी। अंग्रेजों की विशाल सेना के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करके (UPBoardSolutions.com) उन्होंने अपने अदम्य साहस व बुद्धिमत्ता द्वारा उन्हें कई स्थानों पर पराजित किया तथा अनेक स्थानों पर भारतीय तिरंगा फहराकर अपने को महान् विजेता सिद्ध कर दिया-

सेनानी सुभाष ने भीषण, रण-दुन्दुभी बजाई।।
पाने हेतु स्वराज्य उन्होंने, छेड़ी विकट लड़ाई॥

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(9) युवा-आन्दोलन के प्रवर्तक-सुभाष युवा-आन्दोलन के प्रवर्तक तथा नवयुवकों के प्रेरणास्रोत थे। इन्होंने पूरे देश की युवक संस्थाओं को एक सूत्र में पिरोकर संगठित युवा-आन्दोलन के सूत्रपात का प्रशंसनीय कार्य किया था। इन्हीं के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भारत में नवजवान सभा की स्थापना हो सकी थी–

नवयुवकों के भी प्रयाण की, आयी है शुभ बेला।
हो सकती है नहीं कभी भी, तरुणों की अवहेला॥

(10) महान् साहित्य सेवी-श्री सुभाष ने अत्यधिक विपरीत परिस्थितियों में ‘द इण्डियन स्ट्रगल पुस्तक लिखकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया था। इनके भाषण भी साहित्य की अमूल्य निधि है-

लिख इण्डियन स्ट्रगल पुस्तक, ख्याति उन्होंने पायी।
प्रकट किये इसमें सुभाष ने, भाव प्रेरणादायी।

(11) स्वतन्त्रता के जन्मदाता–भारतवर्ष को स्वतन्त्र कराने में सुभाषचन्द्र बोस का योगदान स्तुत्य । है। अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़कर इन्होंने उन्हें भयाक्रान्त कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप वे भारत को स्वतन्त्रता प्रदान करने के लिए विवश हो गये थे-

मुक्त हुई उनके प्रयत्न से, अपनी भारतमाता।
दिन पन्द्रह अगस्त का अब भी, उनकी याद दिलाता॥

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इनके अतिरिक्त नेताजी में अन्य अनेक आदर्श गुण थे, जिनके आधार पर उनके महान् व्यक्तित्व और महान् चरित्र का परिचय मिलता है। इन्होंने जो उच्च आदर्श उपस्थित किया है, वह युग-युग तक संसार के अनेक व्यक्तियों को प्रेरणा प्रदान करता रहेगा। इनके (UPBoardSolutions.com) जीवन से मनुष्य कष्ट-सहने की शक्ति, त्याग-भावना एवं राष्ट्रीयता की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। इनके आदर्श जीवन से भारत के नवयुवकों को स्वतन्त्रता-प्रेम और त्याग की प्रेरणा मिलती रहेगी–

वीर सुभाष अनन्तकाल तक, शुभ आदर्श रहेंगे।
युग-युग तक भारत के वासी, उनकी कथा कहेंगे।

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