UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 मानवीय संसाधन : जनसंख्या (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 मानवीय संसाधन : जनसंख्या (अनुभाग – तीन).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या से उत्पन्न समस्याओं की विवेचना कीजिए। [2014]
या
भारत में बढ़ती जनसंख्या की किन्हीं तीन समस्याओं की विवेचना कीजिए। [2013, 17, 18]
या

तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण क्या-क्या समस्याएँ पैदा हो जाती हैं ?
या
भारत में जनसंख्या विस्फोट से उत्पन्न किन्हीं दो समस्याओं का वर्णन कीजिए।[2010]
या

तीव्र जनसंख्या वृद्धि के किन्हीं दो दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए। [2013]
या
भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के तीन प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :

जनसंख्या का आर्थिक विकास पर प्रभाव

जनसंख्या तथा आर्थिक विकास में घनिष्ठ सम्बन्ध है। किसी देश का आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों तथा जनसंख्या के आकार तथा उसकी कार्यक्षमता पर निर्भर करता है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। (UPBoardSolutions.com) भारत विश्व के 2.4% क्षेत्रफल पर विश्व की 1.5% आय के द्वारा 16.7% जनसंख्या का पालन-पोषण कर रहा है। ये आँकड़े बताते हैं कि हमारी आर्थिक प्रगति को ‘अत्यधिक जनसंख्या कैसे निष्प्रभावी बना रही है। गत 50 वर्षों में जनसंख्या में निरन्तर तीव्र वृद्धि के कारण जनसंख्या-विस्फोट की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। बढ़ती हुई जनसंख्या भारत के लिए अभिशाप सिद्ध हुई है, क्योंकि इसने देश में  निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न करके देश के आर्थिक विकास को ग्रहण लगा दिया है–

1. बेरोजगारी में वृद्धि – 
भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण बेरोजगारों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। देश में साधनों की कमी के कारण सभी को रोजगार नहीं दिलाया जा सकता। परिणामतः देश में शिक्षित बेरोजगारी तथा अल्प बेरोजगारी बड़े स्तर पर पायी जाती है।

2. प्रति व्यक्ति आय निम्न – 
पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत देश की राष्ट्रीय आय में निरन्तर वृद्धि हुई है। किन्तु बढ़ती जनसंख्या के कारण देश में प्रति व्यक्ति आय का स्तर अत्यन्त निम्न है। आज भी भारत में प्रति व्यक्ति आय विश्व के राष्ट्रों की तुलना में बहुत कम है।

3. निर्धनता में वृद्धि – भारत की लगभग 23.76 करोड़ जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे का जीवन व्यतीत कर रही है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था निर्धनता के दुश्चक्र में फंसी हुई है। जनसंख्या में तेजी से वृद्धि के कारण भारत में मकानों की समस्या गम्भीर रूप धारण करती जा रही है।

4. कीमतों में तीव्र वृद्धि – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि से वस्तुओं की माँग लगातार बढ़ी है, किन्तु उत्पादन में उसी गति से वृद्धि नहीं हो पायी है। परिणामस्वरूप कीमतों में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे सामान्य जनता को अनेक कष्ट उठाने पड़ रहे हैं।

5. कृषि विकास में बाधा – 
जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार और परिवारों के बड़े होने के कारण भूमि को उपविभाजन बढ़ता ही जा रहा है, जिससे खेतों का आकार छोटा तथा अनार्थिक होता जा रहा है। भूमिहीन किसानों की (UPBoardSolutions.com) संख्या बढ़ रही है। साथ ही कृषि में छिपी हुई बेरोजगारी की समस्या भी प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

6. बचत तथा पूँजी-निर्माण में कमी – 
जनसंख्या-वृद्धि के कारण बेरोजगार युवकों तथा बच्चों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कमाने वाले लोगों को अपनी आय का एक बड़ा भाग बच्चों के पालन-पोषण पर खर्च करना पड़ता है। इससे बचत घटती है, जिसका पूँजी-निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। फलतः पूँजी की कमी के कारण विकास-योजनाएँ भी पूरी नहीं हो पातीं।

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7. जनोपयोगी सेवाओं पर अधिक व्यय – 
जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण सरकार को उनकी आधारभूत आवश्यकताओं; जैसे–बिजली, परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा, जल-आपूर्ति, भवन-निर्माण आदि पर लगातार अधिक धनराशि व्यय करनी पड़ती है।

8. अपराधों में वृद्धि – 
बेरोजगार लोगों की वृद्धि के कारण देश में चोरी, डकैती, अपहरण, राहजनी, हत्या आदि अपराधों में वृद्धि हो जाती है। सरकार को समाज में कानून तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए सुरक्षा पर अधिक धनराशि व्यय करनी पड़ती है। इससे सरकार पर बोझ बढ़ जाता है।

9. शहरी समस्याओं में वृद्धि – 
जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण लोग रोजगार पाने के लिए गाँवों को छोड़कर शहरों में आ रहे हैं, जिससे शहरों की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। इससे शहरों में भीड़-भाड़, मकानों की कमी, गन्दगी व प्रदूषण, वेश्यावृत्ति आदि समस्याएँ तथा बुराइयाँ बढ़ती जा रही हैं।

प्रश्न 2.
भारत में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का उल्लेख कीजिए। [2011, 18]
या
भारत में जनसंख्या के असमान वितरण को प्रभावित करने वाले तीन कारणों का वर्णन कीजिए। [2013, 16]
या
भारत में जनसंख्या घनत्व को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
जनसंख्या के वितरण-घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व पर निम्नलिखित कारकों का प्रभाव पड़ता है

1. आवागमन के साधनों की सुविधा – 
जनाधिक्य के लिए आवागमन के साधने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; उदाहरणार्थ-गंगा के मैदान या तटीय मैदानों अथवा डेल्टा प्रदेशों में जहाँ नगरों, सड़कों , एवं रेलमार्गों का जाल-सी बिछा (UPBoardSolutions.com) होता है, वहाँ जनसंख्या अधिक होती है। पश्चिमी राजस्थान एवं दक्षिण प्रायद्वीप की उच्च भूमि पर आवागमन के साधनों की कमी के कारण जनसंख्या कम होती है।

2. स्वास्थ्यकर जलवायु – 
जनसंख्या वृद्धि के लिए किसी प्रदेश की जलवायु का स्वास्थ्यवर्द्धक होना अति आवश्यक है। यही कारण है कि जिन भागों में वर्षा अधिक होती है, वहाँ मलेरिया अथवा बुखार फैला रहता है; अत: वहाँ जनसंख्या बहुत ही कम निवास करती है।

3. सुरक्षा – 
जन-घनत्व जीवन तथा धन-सम्पत्ति की सुरक्षा पर भी निर्भर करता है। जिन क्षेत्रों में सघन वन हैं, जंगली-हिंसक पशु निवास करते हैं अथवा चोर-डाकुओं का भय बना रहता है, वहाँ पर बहुत कम लोग निवास करते हैं। इसके विपरीत जहाँ जान-माल की सुरक्षा होती है, वहाँ अधिक मानव निवास करना पसन्द करते हैं।

4. उपजाऊ भूमि – 
भारत में सबसे अधिक जनसंख्या उपजाऊ समतल मैदानों, नदियों की घाटियों या डेल्टाओं में निवास करती है; क्योंकि इन क्षेत्रों की उपजाऊ भूमि उन्हें पर्याप्त खाद्यान्न एवं जीविकोपार्जन के साधन प्रदान करती है। यही कारण है कि भारत में जनसंख्या का घनत्व उत्तर के विशाल मैदान और पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय मैदानों में अधिक पाया जाता है।

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5. तापमान – अत्यधिक गर्म या अत्यधिक शीतप्रधान क्षेत्रों में जनसंख्या कम निवास करना पसन्द करती है। यही कारण है कि भारत के सामान्य तापमान वाले प्रदेशों में घनी जनसंख्या निवास करती है। इसके विपरीत न्यून ताप वाले, उच्च ताप पर्वतीय भागों अथवा अत्यधिक ताप वाले थार के मरुस्थल में कम जनसंख्या निवास करती है।

6. उद्योग-धन्धे – 
उद्योग-धन्धे जनसंख्या के वितरण को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। उद्योग-धन्धों वाले क्षेत्रों में लोग रोजी-रोटी कमाने के उद्देश्य से दूर-दूर से आकर बस जाते हैं। फलत: इन क्षेत्रों में जनसंख्या को अत्यधिक केन्द्रीकरण होता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु राज्य उद्योग-धन्धों के कारण ही घने बसे हुए हैं।

7. खनिज पदार्थ – 
जिन राज्यों में कोयला, लोहा, ताँबा, सोना, खनिज तेल आदि उपयोगी एवं बहुमूल्य खनिज पदार्थ निकाले जाते हैं, वहाँ जनसंख्या का घनत्व भी अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। भारत में छोटा नागपुर का पठार, बिहार, ओडिशा तथा (UPBoardSolutions.com) तमिलनाडु राज्यों में जैसे-जैसे खनिज पदार्थों का खनन होता गया वैसे-वैसे जनसंख्या के घनत्व में निरन्तर वृद्धि होती गयी है।

8. धरातल – 
धरातलीय बनावट एवं उसकी प्रकृति भी जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करती है। ऊँचे, असमतल, पर्वतीय तथा पठारी क्षेत्रों की अपेक्षा मैदानी क्षेत्रों में घनी जनसंख्या पायी जाती है। यही कारण है कि प्रायद्वीपीय भारत की अपेक्षा उत्तर के विशाल मैदान में जनसंख्या का जमघट पाया जाता है। समतल मैदानी क्षेत्र जनसंख्या का पालना कहे जाते हैं।

9. वर्षा की मात्रा (जल-उपलब्धता) – 
भारत जैसे कृषिप्रधान देश में जनसंख्या का वितरण एवं घनत्व वर्षा की मात्रा अथवा जल उपलब्धता से भी प्रभावित होता है। यही कारण है कि 100 सेमी वर्षा रेखा के पश्चिमी भाग वर्षा की कमी के कारण कम घने हैं, जब कि इसके पूर्वी भाग कम वर्षा वाले होते हुए भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध रहने के कारण घने बसे हुए हैं।

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प्रश्न 3.
भारत में जनसंख्या की वृद्धि हेतु उत्तरदायी कारकों की व्याख्या कीजिए।
या
भारत में जनसंख्या वृद्धि के छः कारणों की विवेचना कीजिए। [2015, 16]
या

भारत में जनसंख्या-वृद्धि के कारण बताइट। [2010, 17]
या

भारत में जनसंख्या-वृद्धि के लिए उत्तरदायी किन्हीं दो प्रमुख कारकों को स्पष्ट कीजिए। [2010, 12, 13]
या

भारत में बढ़ती जनसंख्या के किन्हीं पाँच कारकों का उल्लेख कीजिए। [2011, 16]
उत्तर :

जनसंख्या विस्फोट

सन् 1951 ई० के पश्चात् भारत में जनसंख्या की वृद्धि-दर बहुत तीव्र हो गयी। सन् 1951-61 ई० के दौरान दशकीय वृद्धि की दर 21.5% थी, जो 1961-71 ई० में बढ़कर 24.8% हो गयी। सन् 1981-91 ई० के दशक में वृद्धि की दर कुछ घटकर 21.4% हो गयी। सन् 2011 ई० में भारत की जनसंख्या 121 करोड़ से अधिक तथा दशकीय वृद्धि दर 21.34% हो गयी है। इतनी विशाल जनसंख्या के पोषण के लिए देश में सीमित (UPBoardSolutions.com) साधन उपलब्ध हैं; अतः भारत में जनसंख्या की वृद्धि एक महा-विस्फोट के रूप में दिखायी दे रही है। इस प्रकार जनसंख्या का विस्फोट’ वह स्थिति है। जब जनसंख्या भरण-पोषण के साधनों की सीमा से अधिक हो जाए।

जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण

सन् 1951 ई० में भारत की जनसंख्या 36.11 करोड़ थी, जो वर्तमान समय में बढ़कर 121 करोड़ से अधिक हो गयी है। इस प्रकार गत 55 वर्षों में देश की जनसंख्या बढ़कर तीन गुनी से भी अधिक हो गयी है। भारत की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. गर्म जलवायु – 
भारत की जलवायु गर्म है। यहाँ लड़के-लड़कियाँ छोटी आयु में ही वयस्क हो जाते हैं तथा वे कम आयु में ही सन्तान को जन्म देने योग्य हो जाते हैं।

2. विवाह की अनिवार्यता – 
भारत में विवाह को एक सामाजिक अनिवार्यता समझा जाता है। अविवाहित व्यक्ति को सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति विवाह करता है। इससे भी जन्म-संख्या बढ़ती है।

3. कम आयु में विवाह – 
भारत में विवाह प्रायः बहुत कम आयु में कर दिये जाते हैं। 90 प्रतिशत लड़कियों का विवाह तो 20 वर्ष से कम की आयु में ही कर दिया जाता है। इससे स्त्रियों की प्रजनन-अवधि बढ़ जाती है।

4. सामाजिक एवं धार्मिक विचार – 
देश में कुछ धर्मों के लोग परिवार नियोजन को धर्म के विरुद्ध और सन्तान को ईश्वरीय देन मानते हैं। वंश चलाने के लिए भी पुत्र का होना आवश्यक माना जाता है। अत: लोग पुत्र-प्राप्ति इच्छा में कन्या सन्तति उत्पन्न करते जाते हैं। इस प्रकार के विचार तथा अन्धविश्वास जनसंख्या-वृद्धि में सहायक सिद्ध हुए हैं।

5. निरक्षरता – 
देश की अधिकांश जनसंख्या अशिक्षित है। इन अशिक्षित लोगों को परिवार नियोजन के महत्त्व का ज्ञान ही नहीं होता। परिवार नियोजन के उपायों के प्रति संकोच, लज्जा तथा निराधार शंकाओं के कारण भी अधिकांश दम्पति प्रजनन को नहीं रोकते।

6. मृत्यु – 
दर में कमी तथा औसत आयु में वृद्धि देश में शिक्षा, चिकित्सा तथा स्वच्छता सम्बन्धी सुविधाओं में वृद्धि होने से मृत्यु-दर में कमी हुई है। सन् 1951 ई० में मृत्यु-दर 27.4 थी, जो 2001 ई० में घटकर 8.7 तथा 2011 ई० में 6.4% हो गयी। सन् 1951 ई० में देश में औसत आयु 33 वर्ष थी, जो 2001 ई० में बढ़कर लगभग 61 वर्ष तथा 2011 ई० में 69.89 वर्ष हो गयी। निस्सन्देह मृत्यु-दर में कमी तथा औसत आयु में वृद्धि होना देश की उपलब्धियाँ हैं, किन्तु अभी तक जन्म-दर को नियन्त्रित नहीं किया जा सका है, जिससे जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है।

7. निर्धनता – 
निर्धन व्यक्तियों को बच्चों के पालन-पोषण पर बहुत कम खर्च करना पड़ता है। फिर उनके बच्चे कम आयु में ही छोटा-मोटा काम करके कुछ अर्जित करने लगते हैं। इसलिए वे अधिक बच्चों के जन्म की बुराइयों को समझ नहीं पाते और (UPBoardSolutions.com) सन्तानोत्पत्ति करते रहते हैं।

8. स्त्रियों की निम्न सामाजिक स्थिति – 
भारत में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यधिक निम्न है। इन्हें मुख्यतया सन्तान उत्पन्न करने का साधन माना जाता है।

9. सुरक्षा की भावना –
वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण लोग यह सोचकर अधिक सन्तान उत्पन्न करते हैं कि वृद्धावस्था में सन्तान उनकी सहायता करेगी।

10. शरणार्थियों का आगमन – 
पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से आये करोड़ों शरणार्थियों के कारण भी देश के ऊपर जनसंख्या का बोझ बढ़ा है। इसके अतिरिक्त, गत कुछ वर्षों में श्रीलंका, मलाया, अफगानिस्तान तथा म्यांमार से भी बड़ी संख्या में लोग भारत आये हैं।

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प्रश्न 4.
मानवीय संसाधन से आप क्या समझते हैं? यह देश के आर्थिक विकास में कैसे सहायक हो सकते हैं ? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर :

मानवीय संसाधन

प्रत्येक देश की सम्पदा मुख्यतया दो भागों में विभाजित की जाती है– (i) प्राकृतिक संसाधन; जैसे-भूमि, खनिज पदार्थ, जल, वन, पशु आदि तथा
(ii) मानवीय संसाधन अर्थात् जनसंख्या। मानवीय संसाधन का अर्थ किसी देश में निवास करने वाली जनसंख्या से लगाया जाता है। किसी देश के आर्थिक विकास में उसके मानवीय संसाधनों (जनसंख्या) की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मानवीय (UPBoardSolutions.com) संसाधन के अन्तर्गत देश की जनसंख्या के आकार के अतिरिक्त उसकी कुशलता, शिक्षा, उत्पादकता तथा दूरदर्शिता को सम्मिलित किया जाता है। नि:सन्देह जनसंख्या के आकार की दृष्टि से भारत एक सौभाग्यशाली देश है, किन्तु देश में कुशल, शिक्षित तथा प्रशिक्षित कार्यशील जनसंख्या की अत्यधिक कमी है। साथ ही देश में जनाधिक्य की समस्या भी विद्यमान है। इसीलिए भारतीय मानवीय संसाधन देश के आर्थिक विकास के लिए समुचित नहीं माने जाते।

मानव संसाधन और आर्थिक विकास

किसी देश की सम्पूर्ण जनसंख्या को मानव संसाधन नहीं कहा जाता, अपितु जनसंख्या के केवल उस भाग को मानव संसाधन कहा जाता है जो शिक्षित हो, कुशल हो तथा जिसमें अर्जन या उत्पादन करने की क्षमता हो। इस प्रकार मानव संसाधन वह मानव पूंजी है, जिसे प्राकृतिक साधनों में लगाकर देश को आर्थिक विकास किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यह भी कह सकते हैं कि देश के सम्पूर्ण मानव संसाधन को तो जनसंख्या कही जा सकता है, किन्तु पूरी जनसंख्या को मानव संसाधन नहीं कहा जा सकता।

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पर्यावरण या प्राकृतिक संसाधन से आशय उन सभी प्राकृतिक वस्तुओं से लिया जाता है, जो हमारे चारों ओर व्याप्त हैं। ये वस्तुएँ हैं-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति व जीव-जन्तु।

प्रकृति ने भारत को प्राकृतिक या पर्यावरणीय संसाधन उपहार के रूप में बड़ी उदारता से प्रदान किये हैं तथा इन पर्यावरणीय संसाधनों का सदुपयोग करने के लिए विशाल जनसंख्या भी दी है, किन्तु हमारी अधिकांश जनसंख्या मानव संसाधन के रूप में नहीं है। अत: हम अपने अपार पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग देश के विकास में उतना नहीं कर पा रहे हैं जितना कि करना चाहिए।

इसी प्रकार, यदि किसी देश के पास पर्यावरणीय या प्राकृतिक संसाधन तो हों, किन्तु उन संसाधनों का दोहन या उपयोग करने के लिए पर्याप्त मानवीय संसाधन; अर्थात् कुशल जनसंख्या न हो तो वह देश अपने प्राकृतिक संसाधनों से देश के आर्थिक विकास के लिए कोई लाभदायक कदम नहीं उठा सकता। अतः स्पष्ट है कि किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए केवल प्राकृतिक संसाधनों का होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उनके साथ-साथ मानवीय संसाधनों; अर्थात् कुशल जनसंख्या का होना भी जरूरी है।

प्रश्ग 5.
पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या में गिरावट के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
या
भारत में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या कम क्यों है ? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर :
जनसंख्या के दो विशिष्ट अंग हैं-स्त्री एवं पुरुष। दोनों के बीच संख्यात्मक अनुपात को ‘स्त्री-पुरुष अनुपात’ कहा जाता है। इसे प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है। जनसंख्या के अध्ययन में स्त्री-पुरुष के अनुपात (UPBoardSolutions.com) का अध्ययन अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके परिवर्तन से देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या लगातार घटती ही जा रही है। 2011 ई० की जनगणना के अनुसार भारत में 623,724,248 पुरुष तथा 586,469,174 स्त्रियाँ हैं।

नीचे दी गई तालिका में पिछले कुछ दशकों का लैंगिक अनुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या) दिखाया गया है
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 9 मानवीय संसाधन जनसंख्या 1
उपर्युक्त तालिका बताती है कि विगत 110 वर्षों में पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या न केवल कम रही है वरन् निरन्तर घटती ही जा रही है। इसके निम्नलिखित कारण रहे हैं

  • स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों की अधिक जन्म लेना।
  • बचपन में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की देखभाल कम होना।
  • बाल-विवाह होना और उसके कारण (UPBoardSolutions.com) छोटी आयु में प्रसव के कारण मृत्यु होना।
  • प्रसूतावस्था में समुचित देखभाल व चिकित्सा के अभाव से स्त्रियों की मृत्यु होना (विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों अथवा गरीब वर्गों में)।
  • गर्भावस्था में लैंगिक जाँच कराना तथा गर्भ में लड़की होने की स्थिति में गर्भपात करा देना।

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प्रश्न 6.
भारत में जनसंख्या नियन्त्रण हेतु किये गये उपायों का वर्णन कीजिए। [2017]
या
भारत में बढ़ती जनसंख्या नियन्त्रण के कोई छः उपाय सुझाइट। [2015, 16]
या

भारत में जनसंख्या नियन्त्रण के तीन उपाय बताइट। [2014, 18]
या

जनसंख्या वृद्धि नियन्त्रण पर टिप्पणी लिखिए। [2014]
या

भारत में जनसंख्या नियन्त्रण हेतु चार उपाय सुझाइट। [2011, 12, 13]
या
भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या के किन्हीं तीन प्रभावों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर :
जनसंख्या-वृद्धि कों नियन्त्रित करने के उपाय।
भारत में जनसंख्या-वृद्धि को रोकने के निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं
1. विवाह की आयु में वृद्धि करना – भारत में युवक-युवतियों के विवाह छोटी आयु में करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। दोनों के पूर्ण वयस्क हो जाने पर विवाह करने की छूट होनी चाहिए। विवाह जितनी अधिक आयु में किया जाएगा, बच्चे भी उतने ही कम उत्पन्न होंगे। अधिक आयु में विवाह करने के कारण युवतियाँ शिक्षा प्राप्त करेंगी या फिर उनकी रुचि सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यों के प्रति आकर्षित होगी। अभी भारत में विवाह की आयु 21 वर्ष और 18 वर्ष निश्चित है। इसे कम-से-कम पाँच वर्ष और बढ़ाया जाना चाहिए।
2. उत्पादन में वृद्धि करना – आर्थिक उत्पादन में वृद्धि करने से मानव की रुचि एवं भौतिक समृद्धि में वृद्धि के साथ-साथ रहन-सहन के स्तर में भी वृद्धि होती है। भारत के कृषि उत्पादन में वृद्धि होने की अभी पर्याप्त सम्भावनाएँ विद्यमान (UPBoardSolutions.com) हैं। अत: यदि देश में प्रति एकड़ उपज बढ़ा ली जाती है तो उससे बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है।
3. औद्योगीकरण का विकास – पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश में उद्योग-धन्धों का विकास किया जा रहा है। इससे बढ़ती हुई जनसंख्या को आजीविका के साधन प्राप्त होंगे तथा आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। इसके साथ-साथ परिवहन, संचार, व्यापार आदि कार्यों में भी विकास होगा।
4. शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार – शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी के अधिकाधिक प्रयोग से मानव का जीवन-स्तर उच्च हो सकेगा तथा शिक्षित जनसंख्या की मनोवृत्ति भी जनसंख्या-वृद्धि की ओर कम होगी।
5. परिवार-नियोजन एवं जन्म – दर पर नियन्त्रण – जनसंख्या वृद्धि का स्थायी समाधान तो परिवार नियोजन एवं जन्म-दर पर नियन्त्रण करना है। नसबन्दी, बन्ध्याकरण एवं गर्भनिरोधक गोलियों एवं औषधियों का प्रयोग इस दिशा में अधिक कारगर है। इन विधियों के प्रचार-प्रसार द्वारा भी जन्म-दर पर नियन्त्रण पाया जा सकता है और जनसंख्या वृद्धि को रोकने का स्थायी समाधान खोजा जा सकता
6. उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त देश में गरीबी को नियन्त्रित करके, लड़के-लड़कियों में समानता के व्यवहार द्वारा, सरकारी नीति और सन्तति सुधार कार्यक्रमों को लागू करके, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और सामाजिक सुरक्षा के विकास द्वारा भी जनसंख्या-वृद्धि को कुछ हद तक नियन्त्रित किया जा सकता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र कौन-कौन-से हैं ? उनके विरल होने के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
भारत में विरल जनसंख्या वाले क्षेत्र तथा उनके विरल होने के कारण निम्नलिखित हैं

1. उत्तरी पर्वतीय प्रदेश – 
विरल जनसंख्या का यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिम में जम्मू-कश्मीर राज्य से लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ है। इसकी विरल जनसंख्या के कारण -पर्वतीय भूमि, ऊबड़-खाबड़ धरातल, मिट्टी (UPBoardSolutions.com) की पतली परत के कारण कृषि-योग्य भूमि का अभाव तथा जलवायु का मानव के रहने के प्रतिकूल होना।

2. सघन वर्षा वाला उत्तर – 
पूर्वी प्रदेश–इस प्रदेश के अन्तर्गत नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा एवं मेघालय राज्य आते हैं। इसकी विरल जनसंख्या के कारण हैं-अत्यधिक वर्षा के कारण सदाबहार वनों का सघन आवरण, अनुपजाऊ लैटेराइट मिट्टी तथा सघन वनों के कारण कृषि, उद्योग, परिवहन तथा आजीविका के साधनों की कमी।

3. पश्चिमी राजस्थान – 
विरल जनसंख्या के कारण हैं-वर्षा की अत्यन्त कमी, कृषि एवं आजीविका साधनों का अभाव।

4. प्रायद्वीपीय पठार का वृष्टिछाया प्रदेश एवं कच्छ का रन – 
विरल जनसंख्या के कारण हैं—प्रायद्वीपीय पठार के वृष्टिछाया प्रदेश में वर्षा की कमी के कारण खाद्यान्नों की कम पैदावार, क्षारीय मिट्टी वाला एवं दलदली क्षेत्र कच्छ का रन।

प्रश्न 2.
1951 के पश्चात् भारत में जनसंख्या-वृद्धि की प्रवृत्ति का वर्णन कीजिए तथा वृद्धि का प्रमुख कारण भी लिखिए।
उत्तर :
सन् 1951 के पश्चात् भारत में जनसंख्या की वृद्धि तेज गति से हुई है। यहाँ सन् 1951 ई० में 36.1 करोड़ जनसंख्या निवास कर रही थी जो सन् 2011 ई० में बढ़कर 121.02 करोड़ हो गई। सन् 2001-2011 की अवधि में वार्षिक जनसंख्या-वृद्धि की औसत दर 1.90% रही है। जनसंख्या में इस तेज वृद्धि दर का प्रमुख कारण जन्म-दर और मृत्यु-दर एवं मृत्यु-दर के अन्तराल में वृद्धि का होना है। देश में मृत्यु-दर में हुई भारी कमी के कारण (UPBoardSolutions.com) जन्म-दर एवं मृत्य-दर के बीच का अन्तर बहुत बढ़ गया है, जिसके कारण जनसंख्या में तेज गति से वृद्धि हुई है।

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प्रश्न 3.
जनसंख्या-वृद्धि रोकने के किन्हीं दो सरकारी कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
जनसंख्या वृद्धि के नियन्त्रण के दो सरकारी कार्यक्रम निम्नलिखित हैं
1. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार – सरकार ने देशवासियों की आर्थिक क्षमता को बनाए रखने के लिए उनकी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया है तथा खण्ड विकास स्तर पर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा परिवार नियोजन केन्द्रों की स्थापना कर दी गई है। इन सुविधाओं का विस्तार ग्राम स्तर तक किया गया है जिससे देशवासियों को अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ मिल सकें। स्वास्थ्य सेवक एवं सेविकाएँ ग्राम-ग्राम जाकर विशेष रूप से महिलाओं में परिवार नियोजन सम्बन्धी कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करती हैं।

2. शिक्षा का प्रचार-प्रसार – 
परिवार के आकार को सीमित रखने के लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इससे मानव अत्यधिक उत्तरदायी एवं विवेकपूर्ण हो जाता है तथा जीवन के प्रति बुद्धिसंगत एवं तर्कपूर्ण दृष्टिकोण रखने लगता है। इसी कारण सरकार ने देश में अनिवार्य शिक्षा नीति, सर्वशिक्षा अभियान, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम तथा अन्य अनेक कार्यक्रम लागू किए हैं। इससे महिलाओं को आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त (UPBoardSolutions.com) होगी तथा वे परिवार कल्याण के प्रति स्वतः ही सजग हो सकती हैं। परन्तु अनेक कार्यक्रम लागू करने के उपरान्त भी देश में साक्षरता 74.04% (2011 ई०) ही हो पाई है जिसमें महिला साक्षरता का अनुपात 65.46% है। अतः देश में व्यापक स्तर पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना अति आवश्यक है तथा उसमें भी महिला साक्षरता में वृद्धि करना अनिवार्य है।

प्रश्न 4.
भारत के उस प्रदेश का नाम लिखिए, जहाँ जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक है। वहाँ घनत्व अधिक होने के तीन कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
दिल्ली भारत का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला प्रदेश है, जहाँ घनत्व 11,297 है। इसके पश्चात् सर्वाधिक जन-घनत्व वाला प्रदेश चण्डीगढ़ है, जहाँ घनत्व 9,252 है। केन्द्रशासित प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को छोड़कर भारत के सभी राज्यों में पश्चिम बंगाल सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है, जहाँ घनत्व 1,029 है। दोनों ही क्षेत्रों में अधिक घनत्व के तीन कारण निम्नलिखित हैं

  • परिवहन की सुविधाएँ,
  • उद्योग-धन्धों का विकास तथा
  • धरातल तथा वर्षा की मात्रा।

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प्रश्न 5.
भारत की जनसंख्या नीति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर :
जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए दो सरकारी कार्यक्रमों का विवरण निम्नवत् है
1. प्रजनन और बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम – दिनांक 10 अक्टूबर, 1997 को शुरू किये गये इस कार्यक्रम में जनन क्षमता के नियन्त्रण, सुरक्षित मातृत्व, बाल उत्तरजीविता और जननांग संक्रमण को सम्मिलित किया गया है। इस कार्यक्रम को मुख्यतया प्राथमिक स्वास्थ्य देख-रेख के आधारभूत ढॉचे। के द्वारा कार्यान्वित किया जाता है। स्वतन्त्र रूप से किये गये सर्वेक्षण से पता चलता है कि नवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि में इस (UPBoardSolutions.com) कार्यक्रम के कुछ पहलुओं के सम्बन्ध में निर्धारित लक्ष्यों को कुछ राज्यों ने प्राप्त कर लिया है।
2. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000 – जनसंख्या के इस कार्यक्रम में जनसंख्या के आकार को सीमित रखने के साथ ही जनसंख्या में गुणात्मक सुधार लाना आवश्यक समझा गया है। इस नीति में निम्नलिखित तीन उद्देश्यों को प्राथमिकता दी गयी है

  • तात्कालिक उद्देश्य अर्थात् गर्भनिरोधक तरीकों का विस्तार,
  • अल्पकालिक उद्देश्य अर्थात् सन् 2010 तक जन्म-दर में कमी करना तथा
  • दीर्घकालिक उद्देश्य अर्थात् सन् 2045 तक जनसंख्या-वृद्धि को स्थिर बिन्दु तक लाना, जिससे देश की आर्थिक विकास तेजी से किया जा सके।

प्रश्न 6.
भारत का जनसंख्या के आधार पर वर्गीकरण कीजिए तथा उनमें से किसी एक का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर :
भारत में जनसंख्या के वितरण को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • उच्च घनत्व के क्षेत्र (300 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से अधिक)।
  • मध्यम घनत्व के क्षेत्र (100-300 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी)।
  • कम घनत्व के क्षेत्र (100 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से कम)।

उच्च घनत्व के क्षेत्र – राज्यवार जनसंख्या के घनत्व की दृष्टि से पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडू, पंजाब, झारखण्ड, हरियाणा, त्रिपुरा, असोम, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा गोवा राज्य और दिल्ली, चण्डीगढ़, (UPBoardSolutions.com) लक्षद्वीप, पुदुचेरी, दमन एवं दीव, दादर एवं नगर हवेली के केन्द्रशासित क्षेत्र इस वर्ग में आते हैं। इन राज्यों तथा क्षेत्रों में अनेक प्रादेशिक तथा क्षेत्रीय विषमताएँ मिलती हैं। इस क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा, भूमिगत जल-संसाधन, उर्वर जलोढ़ समतल भूमि, उन्नत कृषि, औद्योगिक विकास तथा परिवहन जाल के कारण जनसंख्या का उच्च घनत्व पाया जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्त्री-पुरुष अनुपात से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
जनसंख्या के दो विशिष्ट अंग हैं-स्त्री एवं पुरुष। दोनों के बीच संख्यात्मक अनुपात को ‘स्त्री-पुरुष अनुपात’ कहा जाता है।

प्रश्न 2.
विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले दो देशों के नाम लिखिए।
उत्तर :
विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले दो देश हैं—

  • चीन तथा
  • भारत।

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प्रश्न 3.
अनुकूलतम जनसंख्या से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
जनसंख्या व संसाधनों के मध्य आदर्श स्थिति (UPBoardSolutions.com) को ‘अनुकूलतम जनसंख्या कहा जाता है।

प्रश्न 4.
कार्यशील जनसंख्या से आप क्या समझते हैं? [2013]
उत्तर :
कार्यशील जनसंख्या, जनसंख्या का वह भाग है जो कार्य करने में सक्षम है तथा कार्य करने का इच्छुक भी है। इसमें 14 वर्ष से 62 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति आते हैं।

प्रश्न 5.
मानव संसाधन से क्या तात्पर्य है? [2015, 17]
उत्तर :
किसी भी देश में पायी जाने वाली कुशल एवं शिक्षित जनसंख्या को मानव संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 6.
लिंगानुपात से आप क्या समझते हैं? भारत के किस राज्य में लिंगानुपात सबसे कम है? [2016]
उत्तर :
जनसंख्या के विशिष्ट अंग हैं-स्त्री एवं पुरुष। दोनों (UPBoardSolutions.com) के बीच संख्यात्मक अनुपात को स्त्री-पुरुष अनुपात या लिंगानुपात कहा जाता है। सबसे कम लिंगानुपात दमन और दीव में पाया जाता है।

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प्रश्न 7.
जनसंख्या घनत्व से आप क्या समझते हैं? सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या का घनत्व क्या है? [2014]
या

जनसंख्या के घनत्व से आप क्या समझते हैं? भारत के किस राज्य का जनसंख्या घनत्व सबसे कम है? [2016, 17]
या

जनसंख्या घनत्व का क्या अभिप्राय है? [2011, 17]
उतर :
किसी स्थान पर प्रति वर्ग किमी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों की संख्या को जनसंख्या का घनत्व कहते हैं। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या का घनत्व 382 प्रति वर्ग किमी है। अरुणाचल प्रदेश का जनसंख्या घनत्व सबसे कम है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य सबसे घना बसा है? [2012]

(क) केरल
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) महाराष्ट्र
(घ) बिहार

2. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता का प्रतिशत है [2012, 13]

(क) 54
(ख) 56
(ग) 60
(घ) 74.04

3. जननी सुरक्षा योजना का उद्देश्य है [2012]

(क) महिला सशक्तीकरण को प्रोत्साहन देना
(ख) महिला साक्षरता को प्रोत्साहन देना
(ग) महिलाओं में स्वयं सहायता समूह बनाना
(घ) सरकारी अस्पतालों में शिशु-जन्म को प्रोत्साहन देना

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4. सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य कौन-सा है? [2014]

(क) उत्तर प्रदेश
(ख) ओडिशा
(ग) बिहार
(घ) पश्चिम बंगाल

5. निम्न में से किस राज्य में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व पाया जाता है? [2014, 18]
या
निम्नलिखित राज्यों में से किस राज्य की जनसंख्या का घनत्व भारत की जनगणना 2011 के अनुसार सर्वाधिक है? [2016]

(क) सिक्किम
(ख) मिजोरम
(ग) अरुणाचल प्रदेश
(घ) पश्चिम बंगाल

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6. 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति एक हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या कितनी [2013]
या
की जनगणना के अनुसार भारत में लिंगानुपात है [2015]

(क) 931
(ख) 935
(ग) 940
(घ) 933

7. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी कितनी है?

(क) 101.7 करोड़
(ख) 121 करोड़
(ग) 100.8 करोड़
(घ) 102.8 करोड़

8. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में जनसंख्या का घनत्व क्या है?

(क) 327
(ख) 319
(ग) 324
(घ) 382

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9. जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण का सर्वोत्तम उपाय क्या है?

(क) परिवार नियोजन
(ख) औद्योगिक विकास
(ग) शिक्षा का प्रसार
(घ) गरीबी उन्मूलन

10. निम्नलिखित में से किस राज्य में जनसंख्या घनत्व न्यूनतम पाया जाता है? [2013]

(क) केरल
(ख) आन्ध्र प्रदेश
(ग) राजस्थान
(घ) बिहार

11. [2001] की जनगणना के अनुसार भारत में लिंगानुपात है [2013, 15, 18]

(क) 970
(ख) 890
(ग) 940
(घ) 933

12. जनगणना वर्ष 2011 के अनुसार भारत का जनघनत्व है [2014]

(क) 322
(ख) 382
(ग) 402
(घ) 198

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13. निम्न में से किस राज्य में सर्वाधिक महिला साक्षरता पायी जाती है? [2014, 15, 17]

(क) उत्तर प्रदेश
(ख) पंजाब
(ग) केरल
(घ) छत्तीसगढ़

14. कुल जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है? कान-सा स्थान है? [2015]

(क) पाँचवाँ
(ख) दूसरा
(ग) सातवाँ
(घ) नौवाँ

15. भारत की जनगणना, 2011 के अनुसार भारत की जनसंख्या है- [2016, 17, 18]

(क) 122, 09, 84, 212
(ख) 121, 01, 93, 422
(ग) 119, 01, 84, 822
(घ) 120, 19, 35, 822 :

उतारमला

1. (ख), 2. (घ), 3. (घ), 4. (क), 5. (घ), 6. (ग), 7. (ख), 8. (ग), 9. (क), 10. (ग), 11. (घ), 12. (ख), 13. (ग), 14. (ख) 15. (ख)।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 22 रोगी को स्पंज कराना गर्म सेंक, बफारा देना, बर्फ की टोपी का प्रयोग

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 22 रोगी को स्पंज कराना गर्म सेंक, बफारा देना, बर्फ की टोपी का प्रयोग

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
किसी रोगी को स्नान तथा स्पंज किस प्रकार कराया जाता है?
या
सविस्तार वर्णन कीजिए। या। स्पंज करना किसे कहते हैं? रोगी का कब और क्यों स्पंज किया जाता है? [2009, 13]
या
स्पंज करना क्या है? स्पंज करने की विधि लिखिए। [2009, 10, 12, 18]
या
स्पंज कराने से क्या तात्पर्य है? स्पंज कराते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2013, 16, 17]
या
किस प्रकार के रोगी को स्पंज कराते हैं? इसके लाभ लिखिए। [2010]
उत्तर:
रोगी को स्नान कराना

शरीर से पसीने आदि की दुर्गन्ध दूर करने के लिए त्वचा की सफाई करना (UPBoardSolutions.com) आवश्यक है। यदि रोगी चलने-फिरने योग्य है, तो उसके स्नानघर जाने से पूर्व निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना
आवश्यक है

  1.  रोगी को स्नान कराने से पूर्व चिकित्सक से परामर्श अवश्य ही कर लेना चाहिए।
  2. रोगी के वस्त्र, तौलिया, साबुन व तेल इत्यादि स्नानघर में तैयार रखे होने चाहिए।
  3. स्नानघर का दरवाजा अन्दर की ओर से बन्द नहीं किया जाना चाहिए।
  4.  रोगी को अधिक समय तक स्नान करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  5.  रोगी के स्नान करते समय परिचारिका को स्नानघर के पास ही रहना चाहिए।
  6. स्नान कराने से पूर्व ही परिचारिका को रोगी के दाँत व नाखून आदि साफ कर देने चाहिए।
  7. रोगी यदि स्नानघर में जाने योग्य न हो तो उसे कमरे में ही स्नान करा देना उचित रहता है।
  8. रोगी में यदि दुर्बलता अधिक है, तो परिचारिका को उसे स्नान कराने में सहायता करनी चाहिए।

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रोगी को स्पंज कराना

कुछ दशाओं में रोगग्रस्त अथवा दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को खुले पानी से स्नान कराना उचित नहीं माना जाता। इन दशाओं में व्यक्ति की शारीरिक सफाई के लिए स्नान के विकल्प के रूप में एक अन्य उपाय को अपनाया जाता है। शारीरिक सफाई के इस उपाय को स्पंज कराना कहा जाता है। इसके अतिरिक्त कभी-कभी तीव्र ज्वर की दशा में भी शरीर के तापमान को कम करने के लिए ठण्डे जल से स्पंज कराया जाता है। रोगी को स्पंज कराने का कार्य परिचारिका अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है। स्पंज कराने की विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. सामान्य विधि:
इसमें आवश्यकतानुसार ठण्डा या गर्म पानी प्रयोग में लाया जाता है। यदि साबुन का प्रयोग करना है, तो उसे रोगी के तौलिए पर ही लगाना होता है। स्पंज कराने के लिए तौलिए को पानी में भिगोकर निचोड़ लिया जाता है तथा इससे धीरे-धीरे रोगी के शरीर की सफाई की जाती है। स्पंज का प्रारम्भ रोगी के चेहरे से किया जाता है। बाद में गर्दन, बाँह, हाथ-पैर आदि को क्रमिक रूप से स्पंज करना चाहिए। इसके बाद रोगी के शरीर पर कोई अच्छा पाउडर छिड़ककर धुले हुए वस्त्र पहना देने चाहिए। स्पंज कराने के बाद रोगी का बिस्तर भली-भाँति साफ कर देना चाहिए। रोगी को
पीने के लिए कोई गर्म पेय देना चाहिए। स्पंज कराने के तुर’ बाद रोगी को कोई उपयुक्त कपड़ा ओढ़ाना चाहिए। अन्त में रोगी को आराम करने के लिए अथवा सो जाने के लिए निर्देश करना उपयुक्त रहता है।

2. ठण्डे पानी से स्पंज कराना:
यह विधि रोगी के शरीर का तापमान अधिक होने की अवस्था में प्रयोग में लाई जाती है। रोगी के शरीर का ताप कम करने के लिए उसके शरीर को ठण्डे पानी में भीगे तौलिए से कई बार पोंछा जाता है। इस कार्य को करते समय रोगी के नीचे रबर-शीट अथवा मोमजामे का टुकड़ा बिछाया जाता है। रोगी के लगभग सभी कपड़ों को उतारकर उसे कम्बल ओढ़ा दिया जाता है और तौलिए को भली-भाँति निचोड़कर रोगी के शरीर पर फैलाकर (UPBoardSolutions.com) ढक देना चाहिए। यह तौलिया थोड़ी देर में गर्म हो जाता है और फिर इसे उसी प्रकार ठण्डे पानी में भिगोकर तथा निचोड़कर यही क्रिया अपनानी चाहिए। यह क्रिया रोगी के शरीर का ताप सामान्य होने तक दोहराई जाती है। अब रोगी के शरीर को स्वच्छ एवं सूखे तौलिए से पोंछकर कम्बल से ढक देते हैं। अब बिस्तर को भली-भाँति साफ एवं व्यवस्थित कर रोगी को आराम करने एवं सोने का निर्देश देना चाहिए।

प्रश्न 2:
ठण्डी सेंक कब दी जाती है? ठण्डी सेंक देने की विधियाँ बताइए। [2008, 09, 10, 11, 16]
या
बर्फ की थैली क्या है? बर्फ की थैली का प्रयोग करते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए ? [2007]
या
बर्फ की टोपी का प्रयोग कब, क्यों और कैसे करते हैं? इससे किस प्रकार के रोगी को आराम मिलता है? समझाइए। [2007, 12, 13, 14, 15]
उत्तर:
ठण्डी सेंक व उसकी विधियाँ

तीव्र ज्वर की अवस्था में शरीर के तापमान को सामान्य स्तर पर लाने के दृष्टिकोण से ठण्डी सेंक का अत्यधिक महत्त्व है। इसके लिए ठण्डी पट्टियों एवं बर्फ की थैली का प्रयोग निम्नलिखित रूप से किया जाता है

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(1) ठण्डा स्पंज:
इसके लिए सामान्य रूप से ठण्डे पानी जिसका तापक्रम 10-12° सेण्टीग्रेड होता है, का प्रयोग किया जाता है। पट्टियों अथवा तौलिए को इस पानी में भिगोकर व निचोड़कर लगभग 20 मिनट तक रोगी का स्पंज किया जाता है। स्पंज करते समय रोगी की नाड़ी तथा तापमान का विशेष ध्यान रखा जाता है।

(2) ठण्डी पट्टी:
इस विधि में रोगी के शरीर के चारों ओर ठण्डे पानी में भिगोकर निचोड़ा हुआ कपड़ा लपेट दिया जाता है। चिकित्सक के परामर्श के अनुसार रोगी को इस अवस्था में 15 से 30 मिनट तक रखा जाता है। इसके बाद शीघ्र ही रोगी के शरीर को सुखाकर तथा उसे स्वच्छ कपड़े पहनाकर बिस्तर पर लिटा दिया जाता है। ठण्डी पट्टी के प्रयोग के पहले और बाद में शरीर का तापमान नोट कर लेना आवश्यक है।

(3) बर्फ की थैली:
इस थैली में बर्फ भरकर तथा उसका मुँह बन्द कर उसके अन्दर की हवा बाहर (UPBoardSolutions.com) निकाल दी जाती है। थैली में बर्फ को लगभग आधा भरकर उसमें एक चम्मच नमक मिला देने से बर्फ । अधिक देर में पिघलती है। थैली के बीच में लिण्ट का टुकड़ा रख देने पर यह नमी को सोखता रहता है।
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इससे ठण्ड से उत्पन्न हुई सनसनी कम हो जाती है। बर्फ के पूरी तरह से पिघलने के पूर्व ही थैली की बर्फ । बदल दी जाती है। बर्फ की थैली का प्रयोग प्रायः माथे वे सिर में ठण्डक पहुँचाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग आवश्यकतानुसार ही करना चाहिए, क्योंकि इसका अधिक समय तक प्रयोग स्नायुओं को हानि पहुँचा सकता है। कुछ दशाओं में शरीर से होने वाले रक्त स्राव को रोकने के लिए बर्फ की टोपी या थैली का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 3:
गर्म सेक से क्या लाभ होता है? गर्म सेंक की विधियाँ लिखिए। [2008, 09, 10, 11, 16]
या
गर्म पानी की बोतल के प्रयोग की विधि लिखिए।
या
सेंक से आप क्या समझते हैं? गर्म सेंक की विभिन्न विधियाँ लिखिए। [2008]
या
सेंक क्या है? इसका प्ररण कब और क्यों करते हैं? [2011]
या
गर्म पानी की थैली की उपयोगिता लिखिए। [2015]
उत्तर:
गर्म सेंक व उसकी विधियाँ

गर्म पानी की बोतल द्वारा सेंक अथवा शुष्क गर्म सेंक वात रोग, पेट, गले, दाँत आदि के दर्द तथा क्षय रोग में लाभप्रद रहती है। गर्म सेंक की प्रचलित विधियाँ निम्नलिखित हैं

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(1) गर्म पानी की सेक:
इस विधि में एक तौलिया, मलमल के टुकड़े, चिलमची व गर्म पानी की केतली आदि की आवश्यकता पड़ती है। कपड़े को तौलिये में लपेटकर चिलमची के ऊपर रख देते हैं और तौलिये पर गर्म पानी डालते हैं। अब तौलिये को दोनों सिरों से पकड़कर निचोड़ते हैं। अब मलमल के कपड़े को निकालकर हाथ पर रखकर उसकी गर्माहट का अनुमान लगाते हैं। अब इस कपड़े से किसी भी अंग की सिकाई की जा सकती है। यह सेंक रोगी को 10-15 मिनट तक दी (UPBoardSolutions.com) जा सकती है। सेंक देते समय रोगी की हवा से रक्षा करना अति आवश्यक है।
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(2) शुष्क सेंक देना:
यह निम्नलिखित विधियों द्वारा दी जा सकती है

(अ) गर्म पानी की बोतल द्वारा:
यह रबर की एक थैली होती है। सूजन आने, या पीड़ा होने पर गर्म पानी की बोतल द्वारा सिकाई करना प्राय: लाभदायक रहता है। बोतल में गर्म पानी भरकर उसकी हवा निकालकर उसका मुँह बन्द कर देते हैं। पानी अधिक गर्म होने पर बोतल के चारों ओर तौलिया लपेटकर सिकाई की जाती है। गर्म पानी की बोतल से सिकाई करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. गर्म पानी से बोतल का केवल दो-तिहाई भाग ही भरा जाना चाहिए।
  2. थैली का मुँह डाट द्वारा कसकर बन्द किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके खुल जाने से रोगी के जल जाने का भय रहता है।
  3. थैली के चारों ओर फलालेन का कपड़ा लपेट देने से यह अधिक समय तक गर्म बनी रहती है।
  4. किसी अंग पर बोतल को अधिक देर तक न रखकर इसे खिसकाते रहना चाहिए।

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(ब) रेत की थैली द्वारा:
रेत को ट्रे में रखकर आग पर गर्म किया जाता है। अब इसे थैली में भरकर किसी भी अंग की सिकाई की जा सकती है। रेत में गर्मी अधिक देर तक टिकती है; अतः इसका प्रयोग सूजन व दर्द दूर करने के लिए अधिक लाभकारी है।

(स) सामान्य शुष्क सेंक:
इस विधि में रूई यो तह किए कपड़े आदि को किसी तवे पर सीधे गर्म कर रोगी के पीड़ित अंगों की सिकाई की जाती है।

प्रश्न 4:
टिप्पणी लिखिए-बफारा या भाप लेना।
या
बफारा कब, कैसे और क्यों लेना चाहिए ? इससे किस प्रकार के रोगी को आराम मिलता है? [2009, 13]
उत्तर:
बफारा लेना:
बारा लेना, भाप से सिकाई करने का एक तरीका है। गले के रोग; जैसेगले का दर्द व टॉन्सिल्स: शरीर के रोग; जैसे—गठिया बाय आदि; में बफारा लेना लाभप्रद रहता है। इसके लिए अग्रलिखित विधियाँ अपनायी जाती हैं

  1. यदि बफारे में कोई औषधि मिलानी है, तो इसे खौलते जल में डाल दिया जाता है अन्यथा सादा बफारा ही लिया जाता है।
  2.  किसी छोटे मुँह के बर्तन में खौलता जल डालकर उसे किसी ऊँची मेज अथवा स्टूल पर रख बफारा लिया जाता है।
  3. सिर पर एक बड़ा तौलिः डाल दिया जाता है। यह रोगी के (UPBoardSolutions.com) सिर के साथ बर्तन इत्यादि को भी ढक लेता है।
  4. अब धीरे-धीरे श्वास लेने पर भाप श्वसन नली में प्रवेश करती रहती है तथा सेंक देती रहती है।
  5. इसी प्रकार अन्य अंगों यहाँ तक कि पूरे शरीर को भी बफारा दिया जा सकता है।

मुँह पर बफारा लेने के पश्चात् अथवा अन्य किसी अंग पर बफारा लेने के बाद मुंह अथवा अन्य अंग को कुछ समय तक ढककर रखना चाहिए जिससे कि इसे हवा न लगने पाए।

प्रश्न 5:
पुल्टिस किस काम आती है? पुल्टिस कितने प्रकार की होती है?
या
पुल्टिस क्या है ? दो प्रकार की पुल्टिस बनाने की विधि लिखिए। [2009, 12]
या
पुल्टिस का प्रयोग कब और क्यों करते हैं? दो प्रकार की पुल्टिस बनाने की विधियों का वर्णन कीजिए। [2011, 14, 16]
उत्तर:
पुल्टिस का प्रयोग

गर्म सेक को एक रूप या प्रकार पुल्टिस बांधना भी है। पुल्टिस के प्रयोग से गुम चोट व मोच की पीड़ा कम होती है तथा सूजन में लाभ होता है। कई बार फोड़े व फुन्सियों के समय पर न पकने से भयंकर पीड़ा होती है। पुल्टिस का प्रयोग करने पर फोड़े व फुन्सियाँ मुलायम हो जाती हैं, ठीक प्रकार से पक जाती हैं तथा उनके फूटकर पस निकल जाने पर पीड़ा दूर हो जाती है। इस प्रकार पुल्टिस घावों को भरने व फोड़े-फुन्सियों को पकाने के लिए अति उत्तम है।

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पुल्टिस के प्रकार
(1) आटे की पुल्टिस:
इसके लिए दो चम्मच आटा, दो चम्मच सरसों का तेल तथा दो चम्मच पानी की आवश्यकता होती है। पानी को एक चौड़े बर्तन में उबालकर उसमें आटे व तेल को डाल दिया जाता है। गाढ़ा होने तक इसे चम्मच से चलाते रहते हैं। गाढ़ा होने पर पुल्टिस तैयार हो जाती है। इसका निम्न प्रकार से प्रयोग किया जाता है

  1.  पुल्टिस लगाए जाने वाले अंग को भली प्रकार साफ कर लेना चाहिए।
  2. एक चौड़े कपड़े की पट्टी को समतल स्थान पर फैलाना चाहिए।
  3.  एक चम्मच द्वारा गर्म पुल्टिस पट्टी के बीच में फैलानी चाहिए।
  4. पट्टी का शेष भाग मोड़कर पुल्टिस को ढक देना चाहिए।
  5. पुल्टिस के उपयुक्त ताप का अनुमान लगाकर इसे प्रभावित अंग पर बाँध देना चाहिए।
  6.  ठण्डी पुल्टिस का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  7. एक बार प्रयोग में लाई गई पुल्टिस का दोबारा प्रयोग नहीं करना चाहिए।

(2) प्याज की पुल्टिस:
इसके लिए एक गाँठ प्याज, कुछ नमक व दो चम्मच सरसों के तेल की आवश्यकता होती है। प्याज को सिल पर महीन पीस लिया जाता है। सरसों के तेल को किसी चौड़े बर्तन में गर्म कर लेते हैं। इसमें पिसी हुई प्याज व नमक को मिला दिया जाता है। गाढ़ा होने तक तेल को गर्म करते हुए चम्मच से चलाते रहते हैं। इसके बाद इसे आग से उतारकर आटे की पुल्टिस की तरह रोगी के अंग पर सावधानीपूर्वक बाँध देते हैं। प्याज की पुल्टिस घावों को भरने व फोड़े-फुन्सियों को पकाने में प्रयुक्त की जाती है।

(3) राई की पुल्टिस:
इसका प्रयोग प्राय: वयस्कों के लिए किया जाता है। यह बहुत गर्म होती है तथा इससे फोड़े शीघ्र फूट जाते हैं। इसे बनाने के लिए प्रायः एक भाग राई, पाँच भाग अलसी का, आटा तथा दो बड़े चम्मच पानी की आवश्यकता पड़ती है। राई को पीसकर अलसी के आटे में मिला लें। अब उबलते पानी को इस पर धीरे-धीरे डालते हुए चम्मच से मिलाते रहें। गाढ़ा पेस्ट होने पर पुल्टिस तैयार हो जाती है। पुल्टिस को प्रयोग करते समय 5-10 मिनट के बाद पुल्टिस का (UPBoardSolutions.com) कोना उठाकर देख लेना चाहिए कि कहीं चमड़ी अधिक लाल तो नहीं हो गई है; यदि आवश्यक समझे तो पुल्टिस को हटा देना चाहिए। राई की पुल्टिस को चार-चार घण्टे बाद लगाना चाहिए। पुल्टिस के ठण्डी होने पर इसे हटाकर घाव को ऊन से ढक देते हैं।

(4) अलसी की पुल्टिस:
इसके लिए अलसी का आटा, जैतून का तेल, चिलमची, खौलते हुए पानी की केतली, पुरानी जाली का टुकड़ा, ग्रीस-प्रूफ कागज, रूई, पट्टी, बहुपुच्छ पट्टियाँ, मेज तथा दो गर्म की हुई तश्तरियों की आवश्यकता होती है।
खौलते पानी को गर्म की गयी एक तामचीनी की कटोरी में डालकर अलसी के आटे को इसमें धीरे-धीरे मिलाना चाहिए। मिलाते समय इसे चम्मच से हिलाते रहना चाहिए। गाढ़ा पेस्ट बन जाने पर इसे मेज पर रखे लिएट के कपड़े पर एक समान मोटी तह के रूप में बिछा देना चाहिए। लिण्ट के सिरों को अलसी की तह पर मोड़ देना चाहिए। इस पर अब थोड़ा-सा जैतून का तेल डाल देना चाहिए तथा पुल्टिस को दोहरा करके व गर्म तश्तरियों के बीच में रखकर रोगी के बिस्तर के पास ले जाना चाहिए। इस गर्म पुल्टिस को रोगी के प्रभावित अंग पर लगाया जाता है।

(5) रोटी की पुल्टिस:
रोटी के टुकड़े को थैली में रखकर उबलते हुए पानी के प्याले में डाल दिया जाता है। लगभग पन्द्रह मिनट पश्चात् थैली को चपटा फैलाकर तथा निचोड़कर घाव पर लगाते हैं।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
राई का पलस्तर कैसे बनता है? इसका क्या उपयोग है?
उत्तर:
राई का पलस्तर बनाने के लिए आटे व राई की कुचलन को समान मात्रा में लेकर (UPBoardSolutions.com) गर्म पानी में लेई के समान बना लिया जाता है। इसे किसी कपड़े या कागज के टुकड़े पर समान रूप से फैलाकर तह के रूप में बिछा दिया जाता है। इसे सूजन वाले भाग पर लगाने से सूजन कम हो जाती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
सामान्य दशाओं में स्पंज का उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर:
सामान्य दशाओं में स्पंज का उद्देश्य शरीर की सफाई होती है। जब रोगी को स्नान कराना सम्भव न हो, तब स्पंज किया जाता है।

प्रश्न 2:
स्पंज करने से क्या लाभ हैं? [2010]
उत्तर:
सामान्य रूप से स्पंज द्वारा शरीर की सफाई की जाती है। यदि तीव्र ज्वर हो, तो ठण्डे पानी से स्पंज करके ज्वर को नियन्त्रित किया जाता है।

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प्रश्न 3:
गर्म सेंक क्या है? यह कब दी जाती है? इसकी क्या उपयोगिता है? [2012, 14, 17]
उत्तर:
शरीर के किसी कष्ट के निवारण के लिए सम्बन्धित अंग को ताप प्रदान करना ही गर्म सेंक कहलाता है। वात रोग, पेट दर्द, गले में दर्द तथा दाँत में दर्द के निवारण में गर्म सेक उपयोगी होता है। इसके अतिरिक्त गुम चोट, मोच, सूजन तथा फोड़े-फुन्सी को पकाने में भी गर्म सेंक उपयोगी है।

प्रश्न 4:
गर्म सेंक की विभिन्न विधियाँ बताइए। [2009, 10, 11]
या
गर्म सेंक की दो विधियों का नाम लिखिए। [2009]
उत्तर:
गर्म सेंक की मुख्य विधियाँ हैं-शुष्क गर्म सेंक, पुल्टिस बाँधना, गर्म पानी की बोतल का प्रयोग करना, बफारा लेना तथा गरारे करना।

प्रश्न 5:
गरारा करने के लिए पानी में क्या विशेषताएँ होनी च.हिए?
उत्तर:
गरारा करने का पानी गर्म होना चाहिए तथा इसमें नमक या फिटकरी अथवा लाल दवा मिलाना प्रभावकारी रहता है।

प्रश्न 6:
गरारा करने से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
गरारा करने से गले में दर्द;-टॉन्सिल्स व जुकाम में लाभ होता है।

प्रश्न 7:
जलन में आराम पहुँचाने वाली औषधियाँ कौन-सी है।
उत्तर:
जलन दूर करने में प्रयुक्त होने वाली सामान्य औषधियाँ हैं

  1.  आयोडीन,
  2.  राई का पत्ता,
  3.  राई का पलस्तर तथा
  4.  मरहम

प्रश्न 8:
पुल्टिस की उपयोगिता लिखिए। या पुल्टिस का प्रयोग कब किया जाता है? [2018]
उत्तर:
शरीर के किसी अंग को गरम सेंक देने के लिए पुल्टिस का प्रयोग किया (UPBoardSolutions.com) जाता है। पुल्टिस बाँधने से दर्द में आराम मिलता है, सूजन घटती है तथा फोड़े-फुन्सी शीघ्र पक जाते हैं एवं मवाद निकल जाती है।

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प्रश्न 9:
पुल्टिस बनाने के लिए सामान्यतः किन-किन वस्तुओं को उपयोग में लाया जाता है?
उत्तर:
पुल्टिस बनाने के लिए प्रायः आटा, अलसी, राई, प्याज, सरसों का तेल, नमक व गर्म पानी इत्यादि वस्तुएँ काम में लाई जाती हैं।

प्रश्न 10:
बफारे का प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर:
बफारे का प्रयोग प्राय: गले में सूजन, दर्द, टॉन्सिल्स व श्वास मार्ग में बलगम जमा होने तथा गठिया आदि रोग में किया जाता है।

प्रश्न 11:
बर्फ की टोपी व गर्म पानी की बोतल किस पदार्थ की बनी होती हैं?
उत्तर:
ये दोनों वस्तुएँ प्रायः रबर की बनी होती हैं।

प्रश्न 12:
ठण्डी सेंक कब दी जाती है? [2008, 10, 11, 12]
या
ठण्डी सेंक कब दी जाती है? ठण्डी सेंक देने की विधियाँ भी बताइए।
उत्तर:
(1) तीव्र ज्वर की अवस्था में शरीर का तापमान सामान्य करने के ध्येय से।
(2) आन्तरिक रक्तस्राव को रोकने के लिए तथा माथे व सिर को ठण्डक पहुँचाने के लिए।
ठण्डी सेंक देने की विधियाँ-ठण्डा स्पंज, ठण्डी पट्टी और बर्फ की थैली।

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प्रश्न 13:
बर्फ की टोपी का प्रयोग कब किया जाता है? [2008, 09]
उत्तर:
तीव्र ज्वर की अवस्था में रुधिर का बहाव रोकने के लिए तथा सिर (UPBoardSolutions.com) में चोट लगने के समय बर्फ की टोपी का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 14:
रिंग कुशन क्या है? इसकी उपयोगिता लिखिए। [2015]
या
रिंग कुशन का प्रयोग कब करते हैं? [2009, 11, 13, 15]
या
रिंग कुशन का प्रयोग कब और कैसे करते हैं? [2010, 16]
उत्तर:
रिंग कुशन का प्रयोग शैय्याघाव की दशा में करते हैं। घाव वाले स्थान पर हवा भरकर रिंग कुशन रखते हैं। इससे घाव को बिस्तर की रगड़ नहीं लगती तथा वह धीरे-धीरे ठीक हो जाता है।

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प्रश्न 15:
ठण्डी और गर्म सेंक में अन्तर लिखिए। [2016]
उत्तर:
ठण्डी सेंक मुख्य रूप से रक्त-स्राव को रोकने, सूजन एवं दर्द को घटाने तथा तेज बुखार को कम करने में दी जाती है। जबकि गर्म सेंक वात रोग, पेट, गले, दाँत आदि के दर्द तथा रोग में दी जाती है। ठण्डी सेंक में बर्फ की थैली जबकि गर्म सेंक में रबड़ की बोतल (UPBoardSolutions.com) में गर्म पानी का प्रयोग किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. तीव्र ज्वर की अवस्था में रोगी को लाभप्रद रहती है
(क) ठण्डी सेक
(ख) गर्म सेक
(ग) बफारा
(घ) पुल्टिस

2. बर्फ की टोपी का प्रयोग किया जाता है [2009, 13, 14, 15]
(क) तीव्र ज्वर में
(ख) तीव्र दर्द में
(ग) अधिक रक्त दाब में
(घ) चाहे जब

3. बर्फ की टोपी में बर्फ को अधिक समय तक न पिघलने देने के लिए प्रयोग करते हैं
(क) नमक
(ख) सिरका
(ग) कपड़ा
(घ) लाल दवा

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4. सेंक करने से क्या लाभ होता है?
(क) ज्वर घटता है
(ख) सूजन घटती है
(ग) ठण्डक पहुँचती है
(घ) कोई लाभ नहीं होता

5. आन्तरिक रक्तस्राव में रोगी को क्या देते हैं?
(क) गर्म सेंक
(ख) ठण्डी सेंक
(ग) बफारा
(घ) ये तीनों

6. पुल्टिस लगाने से क्या लाभ होता है? [2011, 13]
(क) दर्द को कम करता है
(ख) सूजन बढ़ाता है
(ग) ठण्डक पहुँचाता है
(घ) इनमें से कोई नहीं

7. गुम चोट का दर्द कम करने के लिए बाँधी जाती है
(क) पट्टी
(ख) पुल्टिस
(ग) ठण्डी पट्टी
(घ) मोटा कपड़ा

8. गर्म सेंक किन अवस्थाओं में दी जाती है ?
(क) तीव्र दर्द में
(ख) तीव्र ज्वर में
(ग) स्पंज करते समय
(घ) इनमें से कोई नहीं

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उत्तर:
1. (क) ठण्डी सेक,
2. (क) तीव्र ज्वर में,
3. (क) नमक,
4. (ख) सूजन घटती है,
5. (ख) ठण्डी सेंक,
6. (क) दर्द को कम करता है,
7. (ख) पुल्टिस,
8. (क) तीव्र दर्द में

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 13 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 13 विकसित तथा विकासशील देश एवं उनकी विशेषताएँ (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 13 विकसित तथा विकासशील देश एवं उनकी विशेषताएँ (अनुभाग – तीन).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकसित देशों की प्रमुख विशेषताओं (लक्षणों) का वर्णन कीजिए।
या
विकसित देशों की किन्हीं तीन विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2010, 11, 12, 13, 15, 16, 17]
या
विकसित देशों में यातायात एवं संचार-व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

विकसित देशों की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण)

जिन राष्ट्रों ने प्राकृतिक संसाधनों तथा तकनीकी ज्ञान के बल पर पर्याप्त आर्थिक विकास कर लिया है, वे विकसित राष्ट्र कहलाते हैं; उदाहरणार्थ-ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान व जर्मनी। विकसित राष्ट्रों
की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. उन्नत विज्ञान तथा तकनीकी द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग – प्राकृतिक संसाधन किसी भी राष्ट्र के आर्थिक विकास की आधारशिला होते हैं। पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन राष्ट्र के आर्थिक विकास की कुंजी हैं। विकसित देश उन्नत विज्ञान तथा तकनीकी द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं। जापान तथा इंग्लैण्ड ने बड़ी मात्रा में कच्चे माले का आयात करके मात्र विज्ञान एवं उन्नत तकनीकी का समुचित उपयोग करके तीव्रता से विकास किया है।

2. वृहत् स्तर पर औद्योगीकरण – 
सभी विकसित राष्ट्रों ने आर्थिक स्तर को प्राप्त करने की दृष्टि से बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना विशाल स्तर पर कर ली है। ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, जर्मनी आदि देशों ने औद्योगीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया है। इन देशों में लोहा-इस्पात उद्योग, रसायन उद्योग, इन्जीनियरिंग उद्योग, मोटरगाड़ी निर्माण उद्योग, पोत व वायुयान निर्माण उद्योग आदि का तीव्र गति से विकास हुआ है।

3. कृषि का यन्त्रीकरण – 
विकसित देशों ने उद्योगों के लिए कृषि से कच्चे माल प्राप्त करने हेतु कृषि में मशीनों का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया है। बड़े पैमाने पर मशीनों से कृषि की जाती है। कृषि के यन्त्रीकरण ने विकसित देशों की प्रगति के द्वार खोल दिये हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, हॉलैण्ड आदि विकसित देशों में कृषि का यन्त्रीकरण हो चुका है। इन देशों में बड़े-बड़े फार्मों , (UPBoardSolutions.com) में मशीनों की सहायता से विस्तृत, सघन खेती की जाती है तथा बड़े स्तर पर व्यापारिक कृषि की जाती है तथा कृषि उत्पादन के पर्याप्त भाग का निर्यात कर दिया जाता है।

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4. व्यापारिक आधार पर उद्यानों का विकास – 
विकसित देशों में बड़े-बड़े महानगरीय क्षेत्रों में निवास करने वाली जनसंख्या के लिए फल एवं सब्जियों के उत्पादन हेतु व्यापारिक स्तर पर उद्यानों का विकास किया गया है। इस प्रकार की कृषि को बाजार के लिए बागवानी या फलों की कृषि कहते हैं। अमेरिका एवं यूरोप के बड़े-बड़े नगरों के चारों ओर ऐसे ही उद्यान स्थित हैं।

5. उन्नत स्तर पर पशुपालन तथा दुग्ध-व्यवसाय का विकास – 
शीतोष्ण जलवायु, उत्तम चरागाह तथा उत्तम नस्ल के पशुओं के कारण विकसित देशों में पशुपालन तथा दुग्ध-व्यवसाय बहुत प्रगति कर गया है। पशुओं से दूध, मांस, चमड़ा,ऊन आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं; अत: डेनमार्क, हॉलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका, न्यूजीलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिण अमेरिका के कई देशों में पशुपालन का खूब विकास हुआ है। दूध से मक्खन, पनीर, दुग्ध-चूर्ण (milk-powder) आदि वस्तुएँ तैयार की जाती हैं। कई देश इनका बड़ी मात्रा में निर्यात करते हैं।

6. अत्यधिक विकसित यातायात एवं संचार-व्यवस्था – 
विकसित देशों में यातायात एवं संचार-व्यवस्था का विकास उच्च स्तर पर कर लिया गया है। इन देशों में सड़क तथा वृहत् रेल-पथों का जाल बिछा है। ट्रान्स-साइबेरियन रेलमार्ग विश्व की सबसे लम्बा रेलमार्ग है। इन देशों में रेल तथा वायु परिवहन का भी विकास कर लिया गया है। जल परिवहन नदियों, झीलों तथा नहरों द्वारा सम्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त, इन देशों में (UPBoardSolutions.com) स्वचालित मोटरगाड़ियों, विद्युत रेलगाड़ियों, पनडुब्बियों, आधुनिक जलयानों तथा तीव्रगामी हवाई जहाजों ने भी इन देशों को एक-दूसरे के निकट ला दिया है। इन देशों में संचार साधनों का भी अत्यधिक विकास हुआ है।

7. अधिक प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय – 
विकसित राष्ट्रों में कृषि, उद्योग और व्यापार में वृद्धि होने के कारण प्रति व्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय अधिक होती है, जो कि इनकी सम्पन्नता के मापदण्ड हैं। इससे इन देशों के निवासियों का जीवन-स्तर ऊँचा होता है।

8. नारी की स्थिति – 
विकसित देशों में स्त्रियाँ शिक्षित तथा रोजगार में संलग्न हैं तथा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं। विकसित देशों में नारी का स्थान पुरुषों के बराबर समझा जाता है। इन देशों में नारी साक्षरता का प्रतिशत ऊँचा है। अधिकांश स्त्रियाँ स्वस्थ हैं तथा राष्ट्र के निर्माण व अभ्युन्नति में सक्रिय योगदान देती हैं।

9. अन्य विशेषताएँ–

  • वृहत् स्तर पर औद्योगीकरण के कारण विकसित देशों में नगरों तथा नगरीय जनसंख्या की अधिकता पायी जाती है।
  • विकसित देशों में उच्च साक्षरता पायी जाती है।
  • जनसंख्या में नियन्त्रित वृद्धि होती है।
  • विभिन्न आर्थिक क्रियाओं में आधुनिक तकनीकी ज्ञान ‘ तथा वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
विकासशील देशों की प्रमुख समस्याओं का उल्लेख करते हुए उनके समाधान के उपाय लिखिए।
या
विकासशील देशों की किन्हीं दो समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 14]
या
विकासशील देशों की प्रमुख तीन समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2014, 15, 18]
या

विकासशील देशों में तीव्र विकास हेतु कोई दो सुझाव लिखिए। [2010, 11]
या

विकासशील देशों की किन्हीं दो आर्थिक समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2015]
या

विकासशील देशों के आर्थिक विकास की छः समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :
विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएँ विकासशील देशों की समस्याएँ अनगिनत होती हैं, जिनके कारण इन देशों के विकास-मार्ग में अनेक बाधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन समस्याओं के उचित समाधान के बिना इनका आर्थिक विकास सम्भव नहीं है। विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं|
1. पूँजी की कमी – विकास-कार्यक्रमों को कार्यान्वित तथा पूर्ण करने (UPBoardSolutions.com) के लिए अधिक मात्रा में पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु विकासशील देशों में राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय के कम होने के कारण यथेष्ट मात्रा में बचत नहीं हो पाती, फलत: पूँजी-निर्माण नहीं हो पाता। इन देशों में कम आय, कम बचत तथा कम पूँजी का विषैला चक्र चलता रहता है। घरेलू पूँजी के अभाव में इन्हें विकसित देशों से पूँजी उधार लेनी पड़ती है। जो न तो सदैव उपलब्ध होती है और न ही उसकी ऋण शर्ते राष्ट्रहित में होती हैं।

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2. जनसंख्या की समस्या – 
अधिकांश विकासशील देशों की एक प्रमुख समस्या जनसंख्या की समस्या है। परिणामतः कई देशों में ‘जनसंख्या विस्फोट’ की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण विकासशील देशों में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं

  • गरीबी तथा भुखमरी की समस्या,
  • बेरोजगारी में वृद्धि,
  • कृषि-भूमि पर जनसंख्या-भार में निरन्तर वृद्धि,
  • विकासकार्यक्रमों हेतु पूँजी की कमी।

अतः राष्ट्र की पहली आवश्यकता जनसंख्या की आधारभूत एवं निर्वाह-मूल की आवश्यकताओं की पूर्ति बन जाती है। इससे विकास-कार्यक्रम गौण हो जाते हैं।

3. अल्प-विकसित यातायात तथा संचार-व्यवस्था – 
विकासशील देशों में, उनके क्षेत्रफल एवं जनसंख्या की आवश्यकता को देखते हुए, परिवहन के साधनों की कमी है। इन देशों में यातायात के साधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इन देशों के अनेक क्षेत्रों में सड़कें तथा रेलमार्ग ही नहीं हैं। लोग पैदल तथा पशुओं की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते हैं; उदाहरणार्थ-चीन, मनीला, फिलीपाइन्स आदि देशों में आज (UPBoardSolutions.com) भी अनेक पहाड़ी तथा जंगली क्षेत्र यातायात-साधनों से अछूते हैं। परिणामतः इन देशों में श्रम की गतिशीलता कम है तथा कृषि, उद्योग-धन्धों तथा व्यापार का विकास सीमित मात्रा में हो पाया है। आधुनिक वैज्ञानिक तथा तकनीकी – ज्ञान की कमी के कारण विकासशील देशों में कुशल संचार-व्यवस्था का भी अभाव है।

4. अविकसित उद्योग –
विकासशील देशों में उद्योग-धन्धों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इन देशों में आधारभूत तथा आधुनिक विशाल-स्तरीय उद्योगों का अभाव है। इनमें मुख्यतया कुटीर तथा लघु उद्योग पाये जाते हैं, जिनमें श्रम-शक्ति के अधिक प्रयोग किये जाने के कारण उत्पादन अपेक्षाकृत कम मात्रा में हो पाता है। अधिकांश उद्योगों में उपभोक्ता-वस्तुओं तथा कृषि सम्बन्धी वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। परिणामत: विश्व की 67% जनसंख्या वाले विकासशील देश विश्व के कुल औद्योगिक उत्पादन में केवल 20% का ही योगदान कर पाते हैं।

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5. नारी की दशा – 
विकासशील देशों में नारी की दशा शोचनीय है। रूढ़िवादी प्रवृत्तियों से ग्रस्त समाज में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को कम महत्त्व दिया जाता है, वरन् अधिकांश विकासशील देशों में पर्दा-प्रथा, निरक्षरता, बाल-विवाह, बहु-विवाह, दहेज-प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों ने स्त्रियों के जीवन को अत्यन्त दयनीय बना दिया है। यद्यपि इन देशों में स्त्री-पुरुष अनुपात लगभग बराबर है। तथापि कार्यशील जनसंख्या के रूप में नारी का प्रतिशत अपेक्षाकृत बहुत कम है।

6. पिछड़ा हुआ औद्योगिक ढाँचा – 
अधिकांश विकासशील देशों में आधुनिक तथा विशालस्तरीय उद्योगों का अभाव है, जिस कारण इन देशों में औद्योगिक उत्पादन बहुत कम हो पाता है। राष्ट्रीय आय में उद्योगों का योगदान बहुत कम है। उद्योगों की कमी के कारण इन देशों में मशीनों तथा अन्य पूँजीगत माल.को बहुत कम उत्पादन हो पाता है। आवश्यक मशीनों की प्राप्ति के लिए इन्हें विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

7. निम्नकोटि का परिवहन –
विकासशील देशों में उनके क्षेत्रफल एवं जनसंख्या की आवश्यकता को देखते हुए, परिवहन के साधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। द्रुतगामी परिवहन-साधनों के अभाव में उत्पादन के साधनों (कच्चा माल, मशीनरी, (UPBoardSolutions.com) श्रमिक आदि) को उत्पादन-क्षेत्रों तक पहुँचाने में समय एवं पूँजी का अपव्यय होता है। इसका विकास-प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

8. अल्प-साक्षरता तथा तकनीकी शिक्षा की कमी – 
अधिकांश विकासशील देश अनेक वर्षों तक विकसित देशों के उपनिवेश रहे हैं। इस कारण इन देशों में शिक्षा का विकास धीमी गति से हुआ है और तकनीकी शिक्षा का तो नितान्त अभाव रहा है। इसके परिणामस्वरूप इन देशों में कुशल एवं प्रशिक्षित
श्रमिकों, प्रबन्धकों तथा विशेषज्ञों की कमी रही है।

9. प्राकृतिक संसाधनों का कम उपयोग – 
अधिकांश विकासशील देशों में पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन पाये जाते हैं, किन्तु पूँजी व तकनीकी ज्ञान की कमी, कुशल एवं प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी, विशेषज्ञों के अभाव, परिवहन-साधनों की कमी आदि के कारण ये अपने प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं कर पाये हैं।

10. सामाजिक पिछड़ापन – 
अनेक विकासशील देशों में सामाजिक रूढ़ियाँ तथा अन्धविश्वास लोगों को इस प्रकार जकड़े हुए हैं कि वे नवीन परिस्थितियों, तकनीकी ज्ञान तथा आधुनिक उत्पादन- प्रणालियों को ग्रहण नहीं कर पाते। निरक्षरता तथा निर्धनता के कारण उत्पादन-कार्य प्राचीन विधियों से ही किया
जा रहा है। सामाजिक पिछड़ेपन के कारण इन देशों में श्रम की गतिशीलता की कमी है।

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11. कृषि का पिछड़ापन – 
यद्यपि अधिकांश विकासशील राष्ट्रों का प्रमुख व्यवसाय कृषि है तथापि यहाँ, कृषि अत्यन्त पिछड़ी हुई अवस्था में है। भूमि पर जनसंख्या का दबाव, कृषि-जोतों का उपविभाजन तथा विखण्डन, खेती की प्राचीन विधियों का प्रचलन, (UPBoardSolutions.com) साख-सुविधाओं की कमी, किसानों की रूढ़िवादिता व अन्धविश्वास, विपणन सुविधाओं का अभाव आदि ऐसी समस्याएँ हैं, जो कृषि को पिछड़ी अवस्था में रखे हुए हैं।

12. अन्य समस्याएँ–

  • बैंकिंग-सुविधाओं की कमी,
  • कुशल उद्यमियों का अभाव,
  • अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता,
  • जनता में राजनीतिक जागरूकता का अभाव,
  • ईमानदार तथा कुशल कर्मचारियों का अभाव,
  • विदेशी व्यापार में विकसित राष्ट्रों से प्रतिस्पर्धा आदि।

समस्याओं के समाधान के लिए उपाय (सुझाव)

विकासशील देश अपनी समस्याओं के समाधान के लिए निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं

  • अधिक पूंजी निर्माण के लिए बचतों में वृद्धि पर बल दिया जाए।
  • जनसंख्या में तीव्र वृद्धि पर रोक लगायी जाए।
  • सामाजिक कुरीतियों को दूर किया जाए।
  • शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।
  • विज्ञान एवं तकनीक का विकास किया जाए।
  • परिवहन तथा संचार के साधनों का (UPBoardSolutions.com) विकास तथा विस्तार किया जाए।
  • कृषि के समुचित विकास हेतु उन्नत बीज, रासायनिक खाद, आधुनिक यन्त्र, सिंचाई सुविधाओं आदि की व्यवस्था की जाए।
  • लघु व कुटीर उद्योग-धन्धों तथा ग्रामीण शिल्प-कला का विकास किया जाए।
  • अधिकाधिक बैंकों तथा साख-संस्थाओं की स्थापना की जाए।
  • नारी की स्थिति में सुधार करके उसे कार्यशील बनाया जाए तथा आर्थिक विकास में उसकी सहभागिता सुनिश्चित की जाए।
  • प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों के कुशलतम एवं अधिकतम दोहन पर बल दिया जाए।
  • योजनाबद्ध रूप में आर्थिक विकास को गतिशील बनाया जाए।
  • आजीविका के साधनों में अधिकाधिक वृद्धि की जाए।
  • निर्यात व्यापार को अधिक प्रोत्साहन दिया जाए तथा निर्यात में प्रसंस्कृत वस्तुओं के अंशदान पर बल दिया जाए।
  • सभी क्षेत्रों का सन्तुलित एवं सुनिश्चित विकास किया जाए।

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प्रश्न 3.
‘विकासशील देशों में आर्थिक विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :

विकासशील देशों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ।

आधुनिक विश्व में विकासशील राष्ट्रों के तीव्र आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ पहले की अपेक्षा बहुत अधिक हैं। वर्तमान अनुकूल अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए अब अल्प-विकसित राष्ट्रों के लिए विकास-मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना (UPBoardSolutions.com) अत्यन्त कठिन नहीं रहा है। निम्नलिखित तथ्य अल्प-विकसित राष्ट्रों में विकास की प्रबल सम्भावनाओं को प्रकट करते हैं
1. कृषि विकास की सम्भावना – विकासशील देशों में कृषि की उन्नति की पूरी सम्भावनाएँ हैं, क्योंकि, इनमें–

  • विशाल क्षेत्रों में उपजाऊ भूमि उपलब्ध है,
  • कृषि के लिए उपयुक्त जलवायु-दशाएँ पायी जाती हैं,
  • मैदानी भागों में सिंचाई-सुविधाओं के विकास के लिए पर्याप्त जल-साधन उपलब्ध हैं,
  • पर्याप्त मात्रा में कृषि श्रम उपलब्ध हैं आदि।

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विकासशील देशों में अभी तक समस्त कृषि-योग्य भूमि का उपयोग नहीं हो पाया है। अनेक देशों में लाखों एकड़ भूमि वनों तथा दलदलों से ढकी है और बेकार पड़ी है। इस समस्त भूमि का समुचित उपयोग करके इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है। उन्नत बीज व रासायनिक खाद का प्रयोग, सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि, साख-सुविधाओं में वृद्धि, आधुनिक विधियों तथा कृषि-यन्त्रों का प्रयोग आदि उपायों के द्वारा ये राष्ट्र कृषि के क्षेत्र में तीव्रता से विकास कर सकते हैं।

2. उद्योगों के विकास की सम्भावना – 
उद्योग-धन्धों का विकास मूलतः खनिज पदार्थों, शक्ति के साधनों, श्रम-शक्ति, पूँजी की उपलब्धता आदि बातों पर निर्भर करता है। अधिकांश विकासशील देश प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से धनी हैं। चीन, भारत, मिस्र तथा ब्राजील में कोयले और लौह-अयस्क के विशाल भण्डार हैं। इराक, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब, मिस्र, नाइजीरिया तथा चीन में खनिज तेल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। (UPBoardSolutions.com) इन देशों में यदि आधारभूत तथा अन्य उद्योगों का विकास कर लिया जाए तो इनके विकास की गति तीव्र हो सकती है। अब अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। अब ये देश अपने साधनों का योजनाबद्ध ढंग से उपयोग करके तीव्रता से अपना औद्योगिक विकास कर सकते हैं।

3. विकसित राष्ट्रों के अनुभव से शिक्षा – 
अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जापान जो आज अत्यधिक विकसित राष्ट्र हैं, भ में अविकसित थे या उनके सामने भी अनगिनत समस्याएँ थीं। अपनी समस्याओं का दृढ़तापूर्वक समाधान करके अब जापान भी विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है। जापान की असाधारण सफलता से शिक्षा ग्रहण करके विकासशील राष्ट्र भी विकास-मार्ग पर तीव्रता से अग्रसर हो सकते हैं।

4. प्राकृतिक संसाधनों का कुशलतम उपयोग – 
वर्तमान युग में साधनों की बहुलता इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उनका समुचित उपयोग। विश्व के कुछ राष्ट्रों ने प्राकृतिक साधनों के अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद तीव्रता से आर्थिक विकास किया है। जापान तथा इजराइल इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। अधिकांश अल्प-विकसित राष्ट्रों में तो प्राकृतिक साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिनका कुशलतम उपयोग न कर पाने के कारण ये राष्ट्र अपना समुचित विकास नहीं कर सके हैं। ये राष्ट्र श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि, परिवहन एवं बैंकिंग सुविधाओं का विकास एवं विस्तार तथा तकनीकी ज्ञान में वृद्धि करके प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन कर सकते हैं।

5. विदेशी सहायता – आजकल विकसित राष्ट्र अल्प-विकसित राष्ट्रों के विकास हेतु उन्हें पूँजी, तकनीकी ज्ञान, विशेषज्ञों की सेवाएँ आदि के रूप में सहायता प्रदान कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक आदि अन्तर्राष्ट्रीय (UPBoardSolutions.com) संस्थाएँ विकासशील राष्ट्रों को बड़ी मात्रा में ऋण प्रदान कर रही हैं। अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग ने विकासशील देशों की विकास सम्भावनाओं में पर्याप्त वृद्धि कर दी है।

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प्रश्न 4.
विकासशील देशों में जनसंख्या की समस्या पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

विकासशील देशों में जनसंख्या की समस्या

अधिकांश विकासशील देशों में जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि की समस्या विद्यमान है। जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में चीन का प्रथम तथा भारत का द्वितीय स्थान है। विकासशील देशों में जनसंख्या-वृद्धि की दर 2 से 3% वार्षिक है, जब कि विकसित देशों में वृद्धि-दर केवल 1% ही है। विकासशील देशों में जनसंख्या सम्बन्धी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं–
1. जनाधिक्य की स्थिति – विकासशील देशों में विश्व की लगभग 67% (UPBoardSolutions.com) जनसंख्या निवास करती है। अनेक देशों में जनसंख्या में निरन्तर तीव्र वृद्धि के कारण जनाधिक्य की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। इन देशों में शिक्षा तथा चिकित्सा सुविधाओं में सुधार होने से मृत्यु दर में कमी तथा औसत आयु में वृद्धि हो गयी है, किन्तु जन्म-दर में कोई विशेष कमी नहीं हो पायी हैं। परिणामत: जनसंख्या-वृद्धि की दर बढ़ती गयी है।

2. कार्यशील जनसंख्या का अभाव – 
अधिकांश विकासशील देशों की समस्त जनसंख्या में 35-40% तक बच्चे हैं, जब कि विकसित देशों में 20-25% ही बच्चे हैं। परिणामतः विकासशील देशों में जनसंख्या का एक बड़ा भाग कार्यशील जनसंख्या पर भार बना हुआ है।

3. भूमि पर भार में वृद्धि – 
जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ता गया है। परिवार के सदस्यों में वृद्धि से भूमि का उपविभाजन तथा विखण्डन बढ़ता जा रहा है और खेतों का आकार छोटा तथा अनार्थिक होता जा रहा है।

4. जनोपयोगी सेवाओं पर अधिक व्यय – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण इन देशों की सरकारों को परिवहन, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा, भवन-निर्माण, जल-आपूर्ति आदि जनोपयोगी सेवाओं पर लगातार अधिकाधिक धनराशि व्यय करनी पड़ती है। इससे पूँजी की कमी के कारण विकास-योजनाओं को पूर्ण करने में कठिनाई आती है।

5. बेरोजगारी – जनाधिक्य की स्थिति के कारण अनेक अल्पविकसित देशों में (UPBoardSolutions.com) बेरोजगारी तथा अर्द्ध-बेरोजगारी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। कृषि में छिपी हुई बेरोजगारी की समस्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

6. निम्न औसत आयु – अधिकांश विकासशील देशों में औसत आयु 35 से 45 वर्ष है, जबकि विकसित देशों में औसत आयु 65 से 75 वर्ष तक है।

7. शहरी जनसंख्या तथा समस्याओं में वृद्धि – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण लोग रोजगार के लिए गाँवों को छोड़कर शहरों में आ रहे हैं, जिससे शहरों की जनसंख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई है। इससे शहरों में भीड़-भाड़, मकानों की कमी, गन्दगी व प्रदूषण, गन्दी बस्तियों में वृद्धि, अपराधों में वृद्धि आदि समस्याएँ तथा बुराइयाँ बढ़ती जा रही हैं।

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प्रश्न 5.
विकासशील देशों में उन्नत कृषि की सम्भावनाओं पर विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर :

विकासशील देशों में उन्नत कृषि की सम्भावनाएँ

विश्व के लगभग सभी विकासशील देशों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। इन देशों की लगभग 60% जनसंख्या कृषि-कार्यों में संलग्न है, किन्तु फिर भी इन देशों में कृषि पिछड़ी हुई अवस्था में है। इन देशों में कृषि के विकास की पूरी सम्भावनाएँ हैं; जैसा कि निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट है

  1. इन देशों में बड़ी मात्रा में उपजाऊ भूमि उपलब्ध है।
  2. कृषि के लिए उपयुक्त जलवायु-दशाएँ पायी जाती हैं।
  3. मैदानी भागों में सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं, क्योंकि ये राष्ट्र अपने जल-साधनों का समुचित उपयोग नहीं कर पाये हैं।
  4. इन देशों में प्रचुर मात्रा में कृषि श्रम उपलब्ध है।
  5. अनेक देशों में लाखों एकड़ भूमि वनों तथा दलदल से ढकी है। आधुनिक वैज्ञानिक विधियों द्वारा इस भूमि को कृषि-योग्य बनाया जा सकता है।
  6. विकसित देशों में कृषि का यन्त्रीकरण किया जा चुका (UPBoardSolutions.com) है तथा कृषि-उत्पादन व्यापारिक आधार पर किया जाता है। इसके विपरीत, विकासशील देशों में जीवन-निर्वाह के आधार पर खेती की जाती है।
  7. अनेक विकासशील देशों में आज भी प्राचीन विधियों तथा यन्त्रों से खेती की जा रही है, जिस कारण भूमि की उर्वरा शक्ति का पूर्ण उपयोग नहीं किया जा सका है।

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विकासशील राष्ट्र निम्नलिखित उपायों के द्वारा अपने कृषि व्यवसाय का विकास करके इसे उन्नत स्वरूप प्रदान कर सकते हैं

  1. सिंचाई-सुविधाओं का विकास तथा विस्तार किया जाए।
  2. उन्नत बीजों तथा रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाए।
  3. कृषि का यन्त्रीकरण किया जाए।
  4. किसानों को कृषि की आधुनिक विधियों का ज्ञान कराया जाए।
  5. सरकार तथा वित्तीय संस्थाओं द्वारा किसानों को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
  6. भूमि-सुधारों को भली-भाँति लागू किया जाए।
  7. भूमि-कटाव को रोकने के लिए गम्भीर प्रयास किये जाएँ।
  8. बेकार पड़ी भूमि को कृषि-योग्य बनाया जाए।
  9. पौध संरक्षण पर समुचित ध्यान दिया जाए।
  10. कृषि-उपज की बिक्री व्यवस्था में सुधार किया जाए।
  11. व्यापारिक आधार पर बागानी कृषि की जाए।

प्रश्न 6.
विकासशील देशों की विशेषताएँ क्या हैं ?  भारत को छोड़कर विश्व के किसी एक विकासशील देश का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए
(क) स्थिति तथा (ख) कृषि-विकास।
या
विकासशील देशों की किन्हीं पाँच विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
विकासशील देशों की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2015, 16, 17]
या

किसी एक विकासशील देश का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर :

विकासशील देशों की विशेषताएँ (लक्षण)

जो राष्ट्र आर्थिक विकास की प्रक्रिया में विकसित देशों की तुलना में पिछड़े हुए हैं, विकासशील राष्ट्र कहे जाते हैं। विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ, परन्तु विकास की मन्द गति होने के कारण इन्हें विकासशील राष्ट्र कहा जाता है। विकासशील राष्ट्रों की प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित हैं
1. उन्नत कृषि की सम्भावनाएँ – विश्व के लगभग सभी (UPBoardSolutions.com) विकासशील देशों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। इन देशों में कृषि के विकास की पूरी सम्भावनाएँ हैं। इन देशों में बड़ी मात्रा में उपजाऊ भूमि उपलब्ध है। तथा कृषि के लिए उपयुक्त जलवायु-दशाएँ पायी जाती हैं। मैदानी भागों में सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं, परन्तु ये राष्ट्र अपने संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं कर पाये हैं। इसी कारण इनके विकास की गति धीमी है। अनेक विकासशील देशों में आज भी प्राचीन विधियों तथा यन्त्रों से खेती की जा रही हैं, जिस कारण भूमि की उर्वरा शक्ति का पूर्ण उपयोग नहीं किया जा सका है।

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2. उद्योगों में कम उत्पादन – 
विकासशील राष्ट्रों में औद्योगिक उत्पादन भी कम होता है। पूँजी का अभाव, पुरानी उत्पादन विधियाँ, घटिया मशीनें तथा छोटे पैमाने के उद्योग कम उत्पादन का कारण हैं। अशिक्षा, राजनीतिक अस्थिरता तथा निम्नस्तरीय आर्थिक नियोजन भी कम उत्पादन के कारण हैं।

3. अविकसित यातायात एवं संचार-व्यवस्था – 
परिवहन व्यवस्था पर राष्ट्र का आर्थिक विकास टिका होता है। विकासशील राष्ट्रों में उसका समुचित विकास नहीं हो पाया है। इस प्रकार अविकसित यातायात एवं संचार-व्यवस्था विकासशील राष्ट्रों की मुख्य कमजोरी है। इनके अभाव में कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भली प्रकार नहीं हो पाया है।

4. अल्प-विकसित प्राकृतिक संसाधन –
विकासशील देशों की प्रमुख समस्या प्राकृतिक संसाधनों का अल्प-विकास है। पूँजी, तकनीक तथा परिवहन के साधनों के अंभाव में यहाँ प्राकृतिक संसाधन अल्प-विकसित अवस्था में पड़े हैं। निरर्थक रूप में पड़े प्राकृतिक संसाधन आर्थिक विकास में सहयोगी नहीं हो पा रहे हैं।

5. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि – 
सभी विकासशील राष्ट्र जनसंख्या की तीव्र वृद्धि की गम्भीर समस्या से ग्रसित हैं। उत्पादन पर बढ़ती हुई जनसंख्या का दबाव इतना अधिक होता है कि सरकार को बढ़ी हुई जनसंख्या के पोषण के लिए प्रति वर्ष (UPBoardSolutions.com) अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती है। जनसंख्या विस्फोट विकासशील राष्ट्रों की प्रमुख विशेषता है।

6. साक्षरता एवं तकनीकी का निम्न स्तर – 
विकासशील राष्ट्रों में साक्षरता और तकनीकी का स्तर भी नीचा पाया जाता है। ये राष्ट्र इन क्षेत्रों में प्रगति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

7. नारी की हीन दशा – 
विकासशील राष्ट्रों में नारी की हीने स्थिति देखने को मिलती है। अशिक्षा, अज्ञानता, रूढ़ियाँ तथा अधिक बच्चों को जन्म देने के कारण यहाँ नारी की स्थिति खराब है। पुरुष-प्रधान समाज तथा आर्थिक परतन्त्रता ने यहाँ नारी की दशा को और भी बिगाड़ दिया है। धीरे-धीरे नारी को आर्थिक विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा रहा है।
भारत और ब्राजील दो विकासशील देशों के उदाहरण हैं। दोनों ही राष्ट्र विकास के स्तर को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं।

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मिस्र : एक विकासशील देश के रूप में
स्थिति –मिस्र विश्व की आदि सभ्यता वाला अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित एक प्रमुख विकासशील देश है। इसका कुल क्षेत्रफल 9,97,667 वर्ग किमी है। मिस्र की राजभाषा अरबी है तथा 94% जनसंख्या मुस्लिम है। मिस्र की जनसंख्या लगभग 5.10 करोड़ है। काहिरा मिस्र की राजधानी है। मिस्र को ‘नील

नदी का वरदान’ कहा जाता है, क्योंकि इस देश की अर्थव्यवस्था में नील नदी का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

कृषि-विकास- मिस्र एक कृषिप्रधान देश है, जहाँ पूर्णतः नील नदी द्वारा सिंचाई के सहारे कृषि फसलों को उत्पादन किया जाता है। नील नदी पर कई स्थानों पर बाँध बनाकर जलविद्युत उत्पादन किया जाता है। राष्ट्रीय आय का 45% भाग कृषि-उत्पादों से प्राप्त होता है। यहाँ की लगभग 50% जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न है। गेहूं, चावल, मोटे अनाज तथा कपास यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। विश्व में कपास उत्पादन में मिस्र का प्रमुख स्थान है।

खनिज पदार्थों की दृष्टि से मिस्र एक धनी राष्ट्र है। यहाँ लौह-अयस्क, फॉस्फेट, सोना, सल्फेट, मैग्नीशियम, कोयला तथा खनिज तेल के पर्याप्त भण्डार हैं। फलस्वरूप योजनाबद्ध रूप से मिस्र ने अपने संसाधनों का दोहन किया है, इसलिए यहाँ सूती वस्त्र, सीमेण्ट, काँच, रासायनिक उर्वरक, कागज, सिगरेट, पेट्रोलियम परिष्करण, विद्युत उपकरण, चीनी, टायर, रेफ्रीजरेटर, वातानुकूलित उपकरण तथा दूरसंचार के उपकरणों के उत्पादन में (UPBoardSolutions.com) तीव्र गति से वृद्धि हुई है। औद्योगीकरण के साथ-साथ यहाँ यातायात के क्षेत्रों में भी तीव्र गति से विकास किया जा रहा है। स्वेज नहर, जो विश्व की सबसे बड़ी जहाजी नहर है, मिस्र के ही अधिकार में है। यह लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है। इस प्रकार मिस्र का स्वेज पत्तन पूर्व से पश्चिम को जोड़ने वाली एक कड़ी के रूप में विकसित हुआ है।

प्रश्न 7.
ब्राजील को विकासशील देश क्यों कहा जाता है ? किन्हीं पाँच कारणों द्वारा अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
उत्तर :
जो देश विकास की प्रक्रिया में विकसित देशों की तुलना में पिछड़े हुए हैं, विकासशील देश कहे जाते हैं। इन देशों में विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ होती हैं, परन्तु विकास की गति मन्द होती है। ब्राजील, भारत की तरह एक विकासशील देश है। ब्राजील को विकासशील देश कहे जाने के पाँच कारण निम्नलिखित हैं
1. उद्योगों का धीमा विकास – ब्राजील में औद्योगिक विकास हो रहा है, यद्यपि विकास की गति धीमी है। औद्योगिक विकास की मन्द गति इस तथ्य से जानी जा सकती है कि 1960 ई० तक ब्राजील अनेक वस्तुओं; जैसे–स्टील, भारी मशीनरी, पेट्रो-केमिकल्स, हथियार आदि का आयात करता था, जबकि अब ये सभी चीजों का अपने यहाँ निर्माण करता है। आज ब्राजील के बने वायुयान अमेरिका में उड़ते हैं, तो यहाँ बने कम्प्यूटर्स चीन में प्रयोग किये जा रहे हैं। एक समय था जब ब्राजील की अर्थव्यवस्था का आधार उसके कृषि-उत्पादों का निर्यात था, परन्तु अब स्थिति बदल रही है और ब्राजील की अर्थव्यवस्था में उद्योगों ने प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया है।

2. पूँजी की कमी तथा विदेशी कर्ज – 
अधिकतर विकासशील देशों के समान ब्राजील को भी अपने औद्योगिक विकास के लिए विश्व के अन्य देशों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका से, आर्थिक ऋण लेने पड़े। आज ब्राजील विश्व के सबसे अधिक कर्जदार देशों में से एक है। उस पर कर्ज की राशि इतनी अधिक है कि ब्राजील की निर्यात आय इस कर्ज का ब्याज चुकाने में ही लग जाती है। ब्राजील की धीमी गति के विकास का यह मुख्य कारण है।

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3. अल्प-विकसित प्राकृतिक संसाधन – 
ब्राजील में खनिज पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं, जिनमें अभ्रक, मैंगनीज, सोना, टिन, गैस एवं खनिज तेल मुख्य हैं। ब्राजील अपनी प्राकृतिक खनिज सम्पदा के बल पर विकास की ओर अग्रसर है।

4. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था – 
ब्राजील की अर्थव्यवस्था अभी भी कृषि (UPBoardSolutions.com) पर आधारित है। यहाँ से कॉफी, सोयाबीन, सन्तरा, चीनी तथा सन्तरे का जूस पर्याप्त मात्रा में निर्यात किये जाते हैं।

5. साक्षरता एवं तकनीकी का निम्न स्तर – 
ब्राजील में साक्षरता की दर अभी भी वांछित स्तर नहीं प्राप्त कर पायी है। इसी प्रकार तकनीकी दृष्टि से भी अभी यह देश उन्नत स्थिति में नहीं आ पाया है। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि दोनों ही क्षेत्रों में विकास के लिए, ब्राजील प्रयत्नशील है। साक्षरता दर 82% से ऊपर पहुँच चुकी है। तकनीकी ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है, जिसके कारण वायुयान और कम्प्यूटर जैसी चीजें अब वहाँ भी बन रही हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकासशील देशों में उद्योग-धन्धों के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं ?
उत्तर :
विकासशील देशों में उद्योग-धन्धों के पिछड़ेपन के निम्नलिखित कारण हैं

  • दीर्घ अवधि तक विदेशी शासन के अधीन रहने के कारण अधिकांश विकासशील देशों में औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थापना नहीं हो पायी है।
  • पूँजी एवं तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण इन देशों में औद्योगीकरण की गति अत्यन्त मन्द रही है।
  • इन देशों में उद्योग-धन्धे कृषि पर आधारित हैं; अतः यहाँ वृहत् उद्योगों के स्थान पर लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धों का विकास अधिक हुआ है।
  • आर्थिक नियोजन के अभाव में भी विकासशील देशों में उद्योगों के विकास की गति मन्द रही है तथा इनमें कम उत्पादन होता है।

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प्रश्न 2.
विकासशील एवं विकसित देशों में नारी की दशा का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
विकासशील एवं विकसित देशों में नारी की स्थिति का तुलनात्मक विवरण अग्रलिखित है–
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 13 विकसित तथा विकासशील देश एवं उनकी विशेषताएँ 1
प्रश्न 3.
विकसित देशों में कृषि के यन्त्रीकरण के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
विकसित देशों में हरित क्रान्ति के आलोक में कृषि के यन्त्रीकरण को ग्रहण किया गया है। कृषि के यन्त्रीकरण से आशय पशु एवं मानव शक्ति के स्थान पर यन्त्रों के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन से लगाया जाता है। विकसित देशों में बड़े पैमाने पर कृषि का (UPBoardSolutions.com) यन्त्रीकरण किया गया है। इससे इन देशों को निम्नलिखित लाभ हुए हैं

  • कृषि यन्त्रीकरण के कारण विकसित देशों के कृषि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई है।
  • कृषि यन्त्रीकरण के कारण विकसित देशों के उद्योगों को कच्चे माल सुलभ हो गये हैं।
  • कृषि उत्पादन बढ़ने से इन राष्ट्रों में प्रति व्यक्ति और राष्ट्रीय आय में अत्यधिक वृद्धि हुई है।
  • कृषि यन्त्रीकरण के फलस्वरूप विकसित देशों के निर्यातों में भारी वृद्धि हो गयी है।

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प्रश्न 4.
विकासशील देश किसे कहते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जो देश आर्थिक विकास का उच्च स्तर पाने के लिए प्रयत्नशील हैं, विकासशील देश कहलाते हैं। पारम्परिक विकास का मार्ग छोड़कर द्रुतगति से औद्योगिक तथा कृषि उपज बढ़ाना ही इनको विकासशील देश की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है। प्राय: इन देशों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होने के कारण इनका सार्थक विकास दृष्टिगोचर नहीं होता। चीन, भारत, मिस्र, ब्राजील, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि विकासशील देश हैं, जब कि जापान विकसित देश है।

प्रश्न 5.
‘जायरे को विकासशील देश कहा जाता है। क्यों ? कोई दो कारण दीजिए।
उत्तर :
जो देश आर्थिक विकास का उच्च स्तर पाने के लिए प्रयत्नशील है, विकासशील देश कहे जाते हैं। जायरे एक अफ्रीकी देश है, जो विकासशील देशों की श्रेणी में आता है। इसको विकासशील देश स्वीकार करने के दो मुख्य कारण निम्नवत् हैं

  1. जल-विद्युत उत्पादन की अनन्त क्षमता-जायरे नदी और उसकी सहायक नदियाँ, जायरे में जल-विद्युत उत्पादन की अनन्त क्षमताएँ उपलब्ध कराती हैं, जो संसार के किसी अन्य देश में उपलब्ध नहीं हैं।
  2. खनिज के अनन्त भण्डारजायरे कॉपर, कोबाल्ट एवं औद्योगिक हीरे के उत्पादन में विश्व का अग्रणी देश है। दक्षिणी जायरे में लिथियम, चाँदी, सोना, टिन तथा मैंगनीज के अपार भण्डार उपलब्ध

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उपर्युक्त दोनों उपलब्ध संसाधन किसी भी देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए वांछित ही नहीं महत्त्वपूर्ण रूप से सहायक भी हैं।

प्रश्न 6.
क्या कारण है कि जापान को पूर्व का ब्रिटेन कहते हैं ?
या
आप कैसे कह सकते हैं कि जापान एक विकसित देश है ? इसके चार प्रमुख लक्षण/कारण बताइए।
उत्तर :
औद्योगिक दृष्टि से जापान विश्व का एक अग्रणी देश है और एशिया में तो उसका प्रथम स्थान है। इस क्षेत्र में इसने यूरोप को भी पीछे छोड़ दिया है। केवल ब्रिटेन ही इसका समकक्ष प्रतीत होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् मात्र पच्चीस वर्षों में इसने इतनी प्रगति की कि सारा विश्व आश्चर्यचकित रह गया। इसका कारण यहाँ के लोगों के द्वारा रात-दिन परिश्रम, ईमानदारी और लगन से काम में लगे रहना ही रहा है। (UPBoardSolutions.com) तकनीकी प्रगति के फलस्वरूप इसके उत्पाद इतनी उच्च श्रेणी के तथा सस्ते होते हैं कि इसका कोई मुकाबला नहीं कर पाता। दुनिया के कार-बाजार तथा इलेक्ट्रॉनिक बाजार पर तो यह छाया हुआ है। यहाँ के प्रसिद्ध उद्योग हैं-इलेक्ट्रॉनिक सामान, रसायन, कपड़ा, लौह-इस्पात।

अपनी औद्योगिक प्रगति के कारण ही यह विकसित देश कहलाता है। यहाँ पर याकोहामा, ओसाका, नगोया तथा नागासाकी सघन औद्योगिक क्षेत्र हैं, जहाँ जाकर लगता है कि हम किसी दूसरी दुनिया में ही पहुँच गये हों। पश्चिम के ब्रिटेन जैसी उन्नति करने के कारण ही जापान को ‘पूर्व का ब्रिटेन’ भी कहा जाता है। प्रमुख लक्षण/कारण

  • जापान में उच्च कोटि का औद्योगीकरण हो गया है।
  • जापान उन्नत यातायात एवं संचार व्यवस्था की दृष्टि से एक मजबूत देश है।
  • जापान में व्यापारिक स्तर पर विभिन्न उद्यमों का विकास बहुत तेजी से हुआ है।
  • जापान आर्थिक क्षेत्र में सम्पन्नता एवं आत्मनिर्भरता के बहुत ऊँचे शिखर पर है।
  • जापान में प्रति व्यक्ति आय बहुत अच्छी है।

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प्रश्न 7.
विकासशील देश प्राकृतिक साधनों के होते हुए भी गरीब हैं। क्यों ?
या
प्रचुर संसाधनों के बावजूद विकासशील देश अधिक पिछड़े हैं; क्यों ? चार कारण बताइए।
या
विकासशील देशों में पर्याप्त संसाधन होते हुए भी प्रगति धीमी है। कारण सहित लिखिए।
उत्तर :
अधिकांश विकासशील देशों में प्राकृतिक तथा मानवीय (UPBoardSolutions.com) संसाधनों की प्रचुरता है, फिर भी इन , देशों में गरीबी व्याप्त है। इन देशों की गरीबी के लिए मुख्यतया निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं—

  • जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि।
  • पूँजी का अभाव।
  • सामान्य तथा तकनीकी शिक्षा की कमी।
  • कुशल श्रमिकों, प्रबन्धकों तथा उद्यमियों की कमी।
  • आधुनिक तकनीकी ज्ञान की कमी।
  • परिवहन तथा संचार के साधनों का अपर्याप्त विकास।
  • कृषि-जोतों का उपविभाजन तथा विखण्डन।
  • दोषपूर्ण आर्थिक नियोजन।
  • सामाजिक पिछड़ापन (जाति-प्रथा, रूढ़िवादिता, प्राचीन रीति-रिवाज व परम्पराएँ, अन्ध- विश्वास आदि।)
  • अनेक देशों पर दीर्घकाल तक विदेशी शासन का बने रहना।
  • सरकारी तन्त्र की अकुशलता।

प्रश्न 8.
संयुक्त राज्य अमेरिका को विकसित देश क्यों कहा जाता है ? इसके चार कारण लिखिए।
उत्तर :
विकसित देशों की श्रेणी में संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इटली आदि देशों को रखा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका को विकसित देश कहे जाने के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. वृहत् स्तर पर औद्योगीकरण – वैसे तो सभी विकसित राष्ट्रों ने अपना विकास करने के लिए बड़े .. पैमाने पर उद्योग-धन्धों की स्थापना की है, परन्तु संयुक्त राज्य अमेरिका ने औद्योगीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। यहाँ पर लोहा-इस्पात उद्योग, रसायन उद्योग (विश्व में प्रथम स्थान), इन्जीनियरिंग उद्योग, मोटरगाड़ी-निर्माण उद्योग (विश्व में प्रथम स्थान), पोत व वायुयान-निर्माण उद्योग का तीव्र गति से विकास हुआ है।
2. कृषि का यन्त्रीकरण – संयुक्त राज्य अमेरिका में कृषि का पूर्ण यन्त्रीकरण हो चुका है। यहाँ बड़े-बड़े फार्मों में मशीनों की सहायता से विस्तृत तथा सघन खेती की जाती है। बड़े स्तर पर व्यापारिक खेती की जाती है तथा कृषि उत्पादन के पर्याप्त (UPBoardSolutions.com) भाग का निर्यात किया जाता है।
3. यातायात के विकसित साधन – संयुक्त राज्य अमेरिका में तीनों साधनों-स्थल, जल एवं वायु का तीव्र गति से विकास हुआ है। इस देश में सड़कों तथा रेलमार्गों का जाल बिछा हुआ है। जल परिवहन नदियों, नहरों तथा झीलों द्वारा सम्पन्न होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के बीच जल यातायात सुपीरियर, मिशिगन, घूरने तथा ओण्टेरियो झीलों द्वारा सम्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त यहाँ स्वचालित गाड़ियों, विद्युत रेलगाड़ियों, स्वचालित पनडुब्बियों, तीव्रगामी हवाई जहाजों व जलयानों का आविष्कार किया गया है।

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4. विकसित संचार-व्यवस्था – इस देश में संचार के साधनों का भी अत्यधिक विकास हुआ है। विश्व में सर्वाधिक टेलीफोन, तार सेवाएँ आदि का प्रयोग संयुक्त राज्य अमेरिका करता है। यहाँ टेलीविजन व्यवस्था अत्यधिक विकसित है।

प्रश्न 9.
विकसित एवं विकासशील देशों के अन्तर को स्पष्ट कीजिए। [2018]
या
विकसित एवं विकासशील देशों में कोई दो अन्तर लिखिए।[2010]
उत्तर :

विकसित तथा विकासशील देशों में अन्तर

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 13 विकसित तथा विकासशील देश एवं उनकी विशेषताएँ 3

प्रश्न 10.
कनाडा को विकसित देश कहा जाता है ?  इसके दो प्रमुख कारण लिखिए।  कनाडा एक विकसित देश है। क्यों ? दो कारण लिखिए। [2011]
उत्तर :
विकसित देशों की श्रेणी में वे ही देश आते हैं जिनकी प्रति व्यक्ति आय अधिक हो, जहाँ औद्योगीकरण का स्तर ऊँचा हो, जहाँ विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान का विकास हो चुका हो तथा अन्य ऐसी ही विशेषताएँ विद्यमान हों। कनाडा को एक विकसित देश कहे जाने के कई कारण हैं, जिनमें से मुख्य दो निम्नलिखित हैं
1. कृषि का यन्त्रीकरण – कनाडा में कृषि का यन्त्रीकरण हो चुका है। इस देश के प्रेयरी प्रदेश में विशाल फार्म देखने को मिलते हैं, जहाँ बड़ी-बड़ी मशीनों की सहायता से विस्तृत तथा सघन खेती की जाती है। यहाँ बड़े स्तर पर व्यापारिक कृषि की जाती है (UPBoardSolutions.com) तथा कृषि उत्पाद के पर्याप्त भाग का निर्यात किया जाता है।
2. प्रति व्यक्ति आय – कनाडा की प्रति व्यक्ति आय लगभग 34,000 डॉलर है। केवल संयुक्त राज्य, अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय ही इससे अधिक है। एशिया के एकमात्र विकसित देश की प्रति व्यक्ति आय लगभग 31,500 डॉलर है।

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प्रश्न 11.
इंग्लैण्ड को विकसित देश क्यों कहा जाता है ? दो कारण लिखिए।
उत्तर :
विकसित देशों की श्रेणी में संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इटली आदि देशों को रखा जाता है। निम्नलिखित दो विशेषताओं के आधार पर इंग्लैण्ड को विकसित देश कहा जाता है

  1. प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग–इंग्लैण्ड ने विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की है। उसने नवीनतम उत्पादन विधियों तथा यन्त्रों के प्रयोग द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का समुचित प्रयोग करके तीव्र गति से आर्थिक विकास किया है। इंग्लैण्ड ने बड़ी मात्रा में कच्चे माल (कपास, लौह-अयस्क आदि) का आयात करके अपनी कुशल श्रम-शक्ति द्वारा उसका समुचित – उपयोग करके तीव्रता से विकास किया है।
  2. बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण-इंग्लैण्ड ने औद्योगीकरण पर (UPBoardSolutions.com) विशेष ध्यान देकर, पूरे विश्व को एक दिशा प्रदान की है। यहाँ लोहा-इस्पात उद्योग, वायुयान-निर्माण उद्योग, कपड़ा उद्योग, रसायन उद्योग सुदृढ़ अवस्था में हैं, जो इंग्लैण्ड को एक मजबूत आर्थिक आधार प्रदान करते हैं।

प्रश्न 12.
मिस्र को नील नदी का वरदान क्यों कहा जाता है ? कारण लिखिए। [2010]
या
किस देश को नील नदी का उपहार कहा जाता है ?
उत्तर :
मिस्र विश्व की आदि सभ्यता वाला अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित एक प्रमुख विकासशील देश है। मिस्र देश की अर्थव्यवस्था में नील नदी का महत्त्वपूर्ण स्थान है, इसी कारण मिस्र को ‘नील नदी का वरदान’ कहा जाता है। मिस्र को ‘नील नदी का वरदान’ कहे जाने के अन्य कारण निम्नलिखित हैं

  • मिस्र का अधिकतर भाग मरुस्थलीय एवं पठारी है, जो कृषि एवं मानव निवास के प्रतिकूल है, परन्तु नील नदी ने कृषि-सिंचाई में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। यहाँ नील नदी ही कृषि-सिंचाई का एकमात्र साधन है।
  • नील नदी मिस्र के लगभग मध्य से होकर बहती है। अत: नील नदी पर अनेक बाँध बनाकर जलविद्युत का उत्पादन किया जाता है। इस प्रकार नील नदी मिस्र को जलविद्युत की सुविधा भी प्रदान करती है।
  • नील नदी सदानीरा है; अत: यह परिवहन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।। इस प्रकार नील नदी मिस्र की सम्पूर्ण आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अत: मिस्र को नील नदी का वरदान उचित ही कहा गया है।

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प्रश्न 13.
भारत को विकासशील देश क्यों कहा जाता है ? कोई चार कारण लिखिए। [2014]
उत्तर :
विकसित देश, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, कनाडा (UPBoardSolutions.com) आदि देशों की अपेक्षा भारत में प्रति व्यक्ति आय कम है तथा जनसंख्या का जीवन-स्तर निम्न है। अत: इसे विकासशील देश कहा जाता है। इस देश को विकासशील देश मानने के चार प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं–

  • जन्म-दर, मृत्यु-दर की अपेक्षा अधिक होने के कारण जनसंख्या वृद्धि-दर अधिक है।
  • कृषि अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है।
  • औद्योगिक विकास का स्तर निम्न है।
  • आर्थिक विकास की दर निम्न है।

प्रश्न 14.
विकासशील देशों में कृषि की नीची उत्पादकता के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
विकासशील देशों में कृषि की नीची (निम्न) उत्पादकता के दो कारण निम्नलिखित हैं

  1. विकासशील देशों की जनसंख्या प्रायः अधिक होती है, जिसके कारण कृषि-जोतों का उपविभाजन और विखण्डन लगातार होता रहता है। इसके कारण कृषि भूमि पर अत्याधुनिक यान्त्रिक विधियों द्वारा खेती नहीं की जा पाती। परिणामस्वरूप उत्पादकता निम्न रह जाती है।
  2. विकासशील देशों के किसान मुख्य रूप से निर्धन होते हैं। (UPBoardSolutions.com) कृषि की उत्पादकता में वृद्धि करने वाले उन्नत बीज, उर्वरक, अच्छी सिंचाई आदि तत्त्वों का; धन व साख-सुविधाओं की कमी के कारण; प्रयोग नहीं कर पाते। इसके परिणामस्वरूप उत्पादकता कम रह जाती है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विश्व के किन्हीं चार विकसित देशों के नाम लिखिए।
उत्तर :
कनाडा, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान विकसित देश हैं।

प्रश्न 2.
विश्व के पाँच विकासशील देशों के नाम लिखिए। [2018]
उत्तर :
विश्व के पाँच विकासशील देश हैं-भारत, चीन, मिस्र, ब्राजील तथा जायरे।

प्रश्न 3.
विकासशील देशों की आजीविका का साधन लिखिए।
उत्तर :
विकासशील देशों की आजीविका का साधन कृषि है।

प्रश्न 4.
विकासशील देश किसे कहते हैं? विश्व के किन्हीं दो विकासशील देशों के नाम लिखिए। [2010, 11]
उत्तर :
जो देश आर्थिक विकास का उच्च स्तर पाने के लिए (UPBoardSolutions.com) प्रयत्नशील होते हैं, विकासशील देश कहलाते हैं। भारत और ब्राजील विकासशील देश हैं।

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प्रश्न 5.
विकासशील देशों की प्रमुख खाद्य फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर :
गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार और बाजरा विकासशील देशों की प्रमुख खाद्य फसलें हैं।

प्रश्न 6.
विकासशील देशों की प्रमुख व्यापारिक फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर :
चाय, कपास, कहवा, जूट, तम्बाकू, रबड़ तथा काजू विकासशील देशों की प्रमुख व्यापारिक फसलें हैं।

प्रश्न 7.
विकासशील देशों में पेट्रोलियम किन-किन देशों में प्राप्त होता है ?
उत्तर :
ईरान, इराक, अरब, कुवैत, ब्राजील, चीन (UPBoardSolutions.com) आदि विकासशील देशों में पेट्रोलियम प्राप्त होता है।

प्रश्न 8.
विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला देश कौन-सा है ?
उत्तर :
विश्व में सर्वाधिक आबादी वाला देश चीन है।

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प्रश्न 9.
चार विकसित देशों के नाम उस महाद्वीप के नाम सहित लिखिए जिसमें वे स्थित हैं।
उत्तर :
चार विकसित देशों के नाम उसके महाद्वीपों के साथ हैं—

  • जापान (एशिया),
  • संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तरी अमेरिका),
  • ब्रिटेन (यूरोप) तथा
  • ऑस्ट्रेलिया (ऑस्ट्रेलिया)।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. विकसित देशों में नारी की स्थिति कैसी है?
(क) पुरुषों से उत्तम
(ख) पुरुषों से निम्न
(ग) पुरुषों के समान
(घ) इनमें से कोई नहीं

2. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता विकासशील देशों की नहीं है?
(क) अल्प-विकसित यातायात
(ख) निम्नकोटि का औद्योगीकरण
(ग) अत्यधिक जनसंख्या
(घ) नारी की उन्नत दशा

3. विकासशील देशों का प्रधान व्यवसाय है
(क) कृषि
(ख) उद्योग
(ग) व्यापार
(घ) पशुपालन

4. विकासशील देशों में सबसे गम्भीर समस्या है|
(क) पूँजी का अभाव
(ख) तीव्र जनसंख्या-वृद्धि
(ग) कृषि की हीन दशा
(घ) निम्न स्तर का औद्योगीकरण

5. विकासशील देशों में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है
(क) भारत
(ख) जापान
(ग) चीन
(घ) इण्डोनेशिया

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6. कौन-सा देश विकासशील देशों की श्रेणी में नहीं आता है? [2011]
(क) भारत
(ख) चीन
(ग) जापान
(घ) ब्राजील

7. निम्नलिखित देशों में से कौन-सा देश विकासशील देश है? [2014]
(क) कनाडा
(ख) चिली
(ग) जर्मनी
(घ) जापान

8. निम्नलिखित देशों में से कौन-सा विकसित देश है?
(क) भारत
(ख) ब्राजील
(ग) कनाडा
(घ) चीन

9. निम्नलिखित में से विकसित देश की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता कौन-सी है?
(क) मुख्य व्यवसाय कृषि
(ख) मुख्य व्यवसाय उद्योग-धन्धे
(ग) प्रति व्यक्ति आय अधिक
(घ) अत्यधिक जनसंख्या

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10. निम्नलिखित में से कौन-सा देश विकासशील देश है? [2016]
(क) सं०रा०अमेरिका
(ख) जापान
(ग) मिस्र
(घ) कनाडा

11. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता विकसित देशों की नहीं है? [2013]
(क) प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम एवं कुशलतम उपयोग
(ख) प्रति व्यक्ति उच्च आय
(ग) जनसंख्या की अधिकता ।
(घ) उच्च प्राविधिकी का प्रयोग

12. निम्नलिखित में से कौन विकासशील देश है? [2013]
(क) फ्रांस
(ख) कनाडा
(ग) बांग्लादेश
(घ) जापान

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13. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता विकासशील देशों की नहीं है? [2013]
(क) उच्च प्रौद्योगिकी का प्रयोग
(ख) प्रति व्यक्ति आय का निम्न स्तर
(ग) निम्न कृषि उत्पादकता स्तर
(घ) जनाधिक्य

14. निम्नलिखित में से कौन विकसित देश नहीं है? [2013]
(क) जापान
(ख) सं० रा० अमेरिका
(ग) भारत
(घ) फ्रांस

15. निम्न में से कौन विकासशील देश है? [2014]
(क) दक्षिणी कोरिया
(ख) जापान
(ग) जर्मनी
(घ) सं० रा० अमेरिका

16. निम्नलिखित में से कौन-सा देश विकसित देश है? [2016]
(क) चीन
(ख) श्रीलंका
(ग) फ्रांस
(घ) मिस्र

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17. निम्नलिखित में से कौन एक विकसित देश नहीं है? [2018]
(क) नार्वे
(ख) ब्राजील
(ग) कनाडा
(घ) फ्रांस

18. निम्न देशों में से कौन विकसित देश है? [2018]
(क) जायरे
(ख) भारत
(ग) चीन
(घ) जापान

19. विकसित देश नहीं है
(क) जापान
(ख) चीन
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) कनाडा

उत्तरमाला

1. (ग), 2. (घ), 3. (क), 4. (ख), 5. (ग), 6. (ग), 7. (ख), 8. (ग), 9. (ख), 10. (ग), 11. (ग), 12. (ग), 13. (क), 14. (ग), 15. (क) 16. (ग), 17. (क), 18. (घ), 19. (ख)।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 1 शिक्षिका द्वारा प्रतिदर्श बजट का प्रदर्शन

UP Board Solutions for Class 10 Home Science  Chapter 1 शिक्षिका द्वारा प्रतिदर्श बजट का प्रदर्शन

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पारिवारिक बजट से आप क्या समझती हैं? पारिवारिक बजट के मुख्य उद्देश्यों का भी उल्लेख कीजिए। [2007, 09, 11, 12, 14, 15]
या
पारिवारिक बजट बनाने का अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2007, 08, 09, 12, 17]
या
बजट बनाने के उद्देश्य  लिखिए। [2016]
उत्तर:
पारिवारिक बजट का अर्थ एवं परिभाषाएँ । परिवार एक ऐसा केन्द्र है जहाँ व्यक्ति की सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यथा-सम्भव प्रयास किए जाते हैं। प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ-न-कुछ धन अवश्य व्यय (UPBoardSolutions.com) करना पड़ता है। प्रत्येक व्यय परिवार की आय में से ही किया जाता है।
परिवार में होने वाले इस आय-व्यय को सुनियोजित ढंग से लिखित रूप प्रदान करना ही पारिवारिक बजट बनाना कहलाता है।

पारिवारिक बजट में परिवार की आय को ध्यान में रखते हुए समस्त नियमित एवं सम्भावित व्ययों को नियोजित रूप से लिख लिया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि परिवार में चलने वाली आय-व्यय की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप में अंकित कर देने वाला प्रपत्र ही पारिवारिक बजट कहलाता है।
यह आय-व्यय विवरण-प्रपत्र एक निश्चित अवधि के लिए होता है। यह अवधि सामान्य रूप से एक माह या एक वर्ष हुआ करती है।

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इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक बजट का अर्थ इन शब्दों में स्पष्ट किया जा सकता है, “पारिवारिक बजट किसी निश्चित अवधि में परिवार के होने वाले आय-व्यय को दर्शाने वाला प्रपत्र होता है। पारिवारिक बजट में आगामी माह या आगामी वर्ष के लिए प्रस्तावित आय-व्यय का अनुमानित प्रारूप भी समाविष्ट होता है।

बजट के सामान्य अर्थ को जान लेने के उपरान्त इस अवधारणा की व्यवस्थित परिभाषा का उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है। बजट की कुछ मुख्य परिभाषाएँ निम्नवर्णित हैं

(1) वेबर द्वारा प्रतिपादित परिभाषा-“पारिवारिक बजट पारिवारिक आय को व्यवस्थित रूप से ऐसी बातों के लिए व्यय करने का तरीका है, जिससे कि अधिक-से-अधिक सदस्यों के सुख व कल्याण में वृद्धि हो सके। पारिवारिक बजट असावधानीपूर्वक तथा अव्यवस्थित रूप से व्यय करने के तरीके के स्थान पर योजनाबद्ध तथा विवेकपूर्ण व्यय को प्रतिस्थापित करने का तरीका है।”

(2) क्रेग तथा रश द्वारा प्रतिपादित परिभाषा-“बजट भूत के व्यय, भविष्य के अनुमानित व्यय और वर्तमान समय की मदों पर निश्चित व्यय का लेखा-जोखा है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा पारिवारिक बजट का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। बजट वास्तव में वह अनुमानित व्यय विवरण है, जो किसी परिवार द्वारा एक निश्चित आगामी अवधि के लिए पर्याप्त सूझबूझ एवं उपलब्ध आर्थिक आँकड़ों को ध्यान में रखकर तैयार (UPBoardSolutions.com) किया जाता है। पारिवारिक आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति तथा गृह-अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए पारिवारिक बजट का बनाना तथा उसका पालन करना आवश्यक माना जाता है।

पारिवारिक बजट के मुख्य उद्देश्य
पारिवारिक बजट परिवार की अर्थव्यवस्था का सुनियोजित विवरण होता है। अत: प्रत्येक परिवार में इसका बुद्धिमत्तापूर्ण निर्माण अत्यन्त आवश्यक है। इसके निर्माण के मुख्य उद्देश्य अग्रलिखित हैं

  1. परिवार के सदस्यों की संख्या एवं उनकी कुल आय का सही विवरण रखना।
  2. सभी प्रकार के व्ययों का क्रमिक ज्ञान प्राप्त करना।
  3. पारिवारिक आवश्यकताओं एवं रहन-सहन के स्तर का ध्यान रखना।
  4. आकस्मिक कार्यों के लिए बचत का प्रावधान रखना।
  5. पारिवारिक आय में वृद्धि करने के लिए परिजनों को प्रेरित करना।
  6.  परिवार के सदस्यों द्वारा किए जाने वाले अनावश्यक व्यय को नियन्त्रित करना।
  7. उपर्युक्त विवरण से पारिवारिक बजट का अर्थ एवं मूल उद्देश्य सुस्पष्ट हैं। अतः प्रत्येक गृहिणी । को पारिवारिक आय-व्यय को बजट अवश्य ही बनाना चाहिए तथा उसी के अनुसार व्यय तथा बचत को नियमित करना चाहिए।

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प्रश्न 2.
पारिवारिक बजट के निर्माण एवं उसके क्रियान्वयन में मुख्य रूप से किन-किन सिद्धान्तों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है? स्पष्ट कीजिए। पारिवारिक बजट के निर्माणक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए [2007] पारिवारिक बजट के मुख्य सिद्धान्त कौन-कौन से होते हैं? [2007] पारिवारिक बजट तैयार करते समय किन-किन सिद्धान्तों को ध्यान में रखना आवश्यक है? [2018]
उत्तर:
पारिवारिक बजट के मूल सिद्धान्त पारिवारिक बजट का निर्माण स्वयं में एक (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण एवं व्यवस्थित कार्य है। पारिवारिक बजट बनाने तथा उसकी सफलता के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित सिद्धान्तों को ध्यान में रखना आवश्यक है-

  1.  कुल आय का ज्ञान-पारिवारिक आय प्रायः वेतन, व्यवसाय, ब्याज, सम्पत्ति का किराया आदि के रूप में प्राप्त होती है। बजट बनाने का पहला कदम परिवार की कुल आय का ज्ञान होना है। सैद्धान्तिक रूप से परिवार की सम्पूर्ण आय को जान लेने के उपरान्त ही बजट बनाने की प्रक्रिया प्रारम्भ की जानी चाहिए। पारिवारिक बजेट की सफलता के लिए आवश्यक है कि परिवार के सभी सदस्यों द्वारा अपनी-अपनी आय का सही विवरण प्रस्तुत किया जाए।
  2.  मूल आवश्यकताओं की जानकारी गृहिणी को परिवार की सम्भावित मूल आवश्यकताओं की जानकारी होनी चाहिए और आय का अधिकतर भाग इन पर ही व्यय करना चाहिए। यदि आय कम हो, तो मूल आवश्यकताओं की पूर्ति उनकी प्राथमिकता के क्रम में की जानी चाहिए।
  3. बचत की व्यवस्था सम्बन्धी सिद्धान्त-सैद्धान्तिक रूप से पारिवारिक बजट बनाते समय बचत का प्रावधान अवश्य रखना चाहिए। पारिवारिक अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए बचत महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक होती है। बचत की दर का निर्धारण (UPBoardSolutions.com) आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सूझबूझपूर्वक होना चाहिए।
  4.  लचीला बजट-किसी भी परिवार में आय-व्यय का कठोरतापूर्वक संचालन, सदस्यों में असन्तोष एवं कलह का वातावरण उत्पन्न कर सकता है। अतः सैद्धान्तिक रूप से पारिवारिक बजट लचीला होना चाहिए, जिससे अनुमानों में यदि कुछ परिवर्तन भी करना पड़े, तो कोई विशेष कठिनाई न हो |
  5. आकस्मिक आवश्यकताओं के लिए व्यवस्था—पारिवारिक बजट बनाने की एक सैद्धान्तिक मान्यता यह है कि बजट में भी परिवार की कुछ आकस्मिक आवश्यकताओं तथा उनकी पूर्ति के लिए व्यय का प्रावधान रखा जाए। आकस्मिक आवश्यकताओं पर होने वाले व्यय का निर्धारण अनुमान द्वारा तथा विगत कुछ माह तक हुए आकस्मिक व्यय के विश्लेषण द्वारा किया जा सकता है।
  6. बजट का निरीक्षण एवं विश्लेषण–पारिवारिक आय प्रायः घटती-बढ़ती रहती है। इसी प्रकार विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों में भी समय-समय पर गिरावट एवं वृद्धि होती रहती है। अत: बजट बनाते समय इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। गत बजट अथवा बजटों का निरीक्षण एवं विश्लेषण करने पर गृहिणी को विभिन्न आवश्यकताओं की सन्तुष्टि पर हुए उचित अथवा अनुचित, कम अथवा अधिक व्यय के विषय में प्रामाणिक जानकारी मिलती है। इसका उपयोग गृहिणी भविष्य में बनाए जाने वाले बजट में कर सकती है।
  7.  मासिक बजट का निर्माण वार्षिक बजट की पृष्ठभूमि में हो-पारिवारिक मासिक बजट को वार्षिक बजट की पृष्ठभूमि में ही तैयार करना चाहिए। इसका कारण यह है कि प्रत्येक परिवार में कुछ ऐसे व्यय होते हैं जो वर्ष के प्रत्येक माह में समान रूप से नहीं होते।
    किसी माह में कम होते हैं, तो किसी माह में अधिक। इसके अतिरिक्त यह भी सत्य है कि वर्ष के प्रत्येक माह में परिवार की आय भी समान नहीं होती। आय-व्यय सम्बन्धी इस अन्तर के ही कारण कहा जाता है कि पारिवारिक मासिक बजट वार्षिक बजट की पृष्ठभूमि में ही तैयार किया जाना चाहिए।
    उपर्युक्त विवरण द्वारा पारिवारिक बजट के निर्माण की प्रक्रिया के सैद्धान्तिक पक्ष का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार की आर्थिक परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं की प्राथमिकता भिन्न-भिन्न होती है। अतः पारिवारिक बजट को व्यावहारिक बनाने तथा उसको सफलतापूर्वक क्रियान्वित करने के लिए, विशेष सूझ-बूझ एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होता है।

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प्रश्न 3.
पारिवारिक बजट का क्या महत्त्व है? इससे परिवार को होने वाले लाभों का भी वर्णन कीजिए। [2018]
या
स्पष्ट कीजिए कि “बजट से न केवल गृहिणियाँ ही लाभान्वित होती हैं, बल्कि इससे अर्थशास्त्रियों, समाज-सुधारकों तथा सरकार को भी लाभ होता है।”
या
पारिवारिक बजट से गृहिणियों को क्या लाभ होता है? [2009, 10, 12, 13, 15, 17]
या
बजट बनाने से परिवार को होने वाले लाभों का वर्णन कीजिए। (2017)
या
“पारिवारिक बजट गृहिणी के आय-व्यय को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक है।” स्पष्ट कीजिए।[2009, 12, 13, 14]
या
घर का बजट बनाने के क्या लाभ हैं? एन्जिल के बजट बनाने के सिद्धान्त को विस्तारपूर्वक लिखिए।[ 2008, 11 ]
या
बजट बनाने के लाभ लिखिए। [2007, 11, 13, 14, 16, 17]
उत्तर:
पारिवारिक बजट का महत्त्व या लाभ पारिवारिक बजट परिवार की आर्थिक दशा का वह विवरण है जिसकी सहायता से गृहिणी परिवार के आय-व्यय के सन्तुलन को बनाये रख सकती है। पारिवारिक बजट से न केवल गृहिणियाँ ही लाभान्वित होती हैं, (UPBoardSolutions.com) बल्कि इससे अर्थशास्त्रियों, समाज-सुधारकों तथा सरकार को भी लाभ होता है।
पारिवारिक बजट बनाने के अनेक लाभ हैं। कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं
(क) गृहिणियों तथा परिवार को लाभ
पारिवारिक बजट से सर्वाधिक लाभ गृहिणियों तथा परिवार को ही होता है। पारिवारिक बजट से गृहिणियों को प्राप्त होने वाले लाभ का विवरण अग्रलिखित है

  1. अनावश्यक व्यय के नियन्त्रण में सहायक-पारिवारिक समृद्धि के लिए अनिवार्य है कि अनावश्यक पारिवारिक व्यय को नियन्त्रित किया जाए। यदि सूझ-बूझपूर्वक पारिवारिक बजट तैयार करके उसके अनुसार ही व्यय किया जाता है तो अनावश्यक पारिवारिक व्यय स्वत: ही नियन्त्रित हो जाता है।
  2. आय–व्यय में सन्तुलन बनाये रखने में सहायक-पारिवारिक बजट में पारिवारिक आय को ध्यान में रखकर ही व्यय का प्रावधान किया जाता है। इस व्यवस्था के कारण पारिवारिक आय तथा व्यय में परस्पर सन्तुलन बना रहता है तथा गृह अर्थव्यवस्था सुचारु ढंग से चलती रहती है।
  3.  मितव्ययिता की आदत के विकास में सहायक–यदि गृहिणियाँ पूर्व-निर्धारित बजट के अनुसार ही व्यय करती हैं तो व्यय की सीमाओं का ध्यान रखना पड़ता है। इससे मितव्ययिता की आदत विकसित हो जाती है। मितव्ययिता स्वयं ही एक आर्थिक सद्गुण है तथा इससे अनेक लाभ होते हैं।
  4.  पारिवारिक ऋण से बचाने में सहायक–पारिवारिक बजट के बनाने तथा उसके पालन की दशा में गृहिणियाँ अपने व्यय को निर्धारित सीमा में ही रखती हैं। इससे गृह-अर्थव्यवस्था के बिगड़ने तथा ऋणग्रस्तता के अवसर नहीं आते।
  5.  परिजनों की आवश्यकता-पूर्ति में सहायक–गृहिणी का कर्तव्य है कि वह परिवार के सभी सदस्यों की मुख्य आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति का ध्यान रखे। पारिवारिक बजट गृहिणी के अपने इस कर्तव्य की पूर्ति में सहायक होता है। वास्तव में पारिवारिक बजट में परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता के आधार पर स्वीकार किया जाता है तथा उनकी पूर्ति के लिए व्यय का प्रावधान रखा जाता है।
  6. पारिवारिक बचत में सहायक-कुशल गृहिणियाँ पारिवारिक बचत को आवश्यक मानती हैं। उत्तम पारिवारिक बजट में बचत का अनिवार्य रूप से प्रावधान होता है। इस प्रकार बजट का पालन करके गृहिणियाँ बचत करने में सफल हो जाती हैं।
  7.  रहन-सहन के स्तर को उन्नत बनाने में सहायक-पारिवारिक बजट बनाकर गृहिणियाँ अपने पारिवारिक व्यय को व्यवस्थित बना लेती हैं तथा उसके आधार पर सूझ-बूझपूर्वक आय को इस ढंग से व्यय करती हैं, जिससे परिवार के रहन-सहन का स्तर उन्नत बना रहता है।
  8.  पारिवारिक सुख-शान्ति एवं समृद्धि में सहायक-सभी गृहिणियाँ चाहती हैं कि (UPBoardSolutions.com) उनके परिवार में सुख-शान्ति एवं समृद्धि का वातावरण बना रहे। पारिवारिक बजट का निर्माण तथा उसका पालन इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होता है। पारिवारिक बजट परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होता है तथा नियमित बचत के अवसर भी प्रदान करता है। इससे परिवार की अर्थव्यवस्था सुचारु बनी रहती है तथा परिणामस्वरूप पारिवारिक सुख-शान्ति एवं समृद्धि में वृद्धि होती है।

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(ख) अर्थशास्त्रियों को लाभ देश के अर्थशास्त्री भी पारिवारिक बजट से लाभान्वित होते हैं। विभिन्न परिवारों द्वारा बनाये जाने वाले पारिवारिक बजटों का व्यवस्थित अध्ययन एवं विश्लेषण अर्थशास्त्रियों द्वारा किया जाता है। इस अध्ययन द्वारा उन्हें समाज में प्रचलित आय-व्यय के प्रतिमानों की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।
इस प्रकार की जानकारी विभिन्न प्रकार की नीतियों के निर्धारण में सहायक हो सकती है। अर्थशास्त्री इसी प्रकार की जानकारी के आधार पर आय-कर अथवा व्यय-कर सम्बन्धी नीतियों के विषय में सुझाव दे सकते हैं। पारिवारिक बजट के अध्ययन के आधार पर ही विभिन्न वर्गों के परिवारों को अपने रहन-सहन के स्तर को उन्नत बनाने के लिए उपयोगी सुझाव दिए जा सकते हैं।

(ग) समाज-सुधारकों को लाभ समाज-सुधारकों को मुख्य कार्य है समाज में व्याप्त समस्याओं के समाधान ढूँढ़ना। विभिन्न सामाजिक समस्याओं का सीधा सम्बन्ध समाज के परिवारों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति से होता है।
उदाहरण के लिए-गरीबी, ऋणग्रस्तता, नशाखोरी, भिक्षावृत्ति आदि समस्याएँ परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं के कारणों को जानने के लिए सम्बन्धित वर्ग के परिवारों के पारिवारिक बजट का अध्ययन करना अति आवश्यक होता है। समाज-सुधारक व्यवस्थित अध्ययन द्वारा समस्याओं के कारण एवं उनके हल ढूंढ़ा करते हैं।

(घ) शासन को लाभ पारिवारिक बजट के अध्ययन से शासन को भी लाभ होता है। देश की आर्थिक दशा को समझने के लिए, नागरिकों की समस्याओं को जानने के लिए तथा कर एवं बचत योजनाओं को लागू करने के लिए पारिवारिक बजटों से पर्याप्त सहायता मिलती है।
उदाहरण के लिए यदि किसी देश में प्रसाधन, दिखावे आदि पर अनावश्यक व्यय बढ़ रहा हो तो वहाँ शासन द्वारा इस प्रकार के व्यय को नियन्त्रित करने के लिए सम्बन्धित वस्तुओं पर कर में वृद्धि की जा सकती है।
उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि पारिवारिक बजट से अन्य पक्षों की तुलना में सर्वाधिक लाभ गहिणियों को ही प्राप्त होता है।

विशेष-‘एन्जिल द्वारा प्रतिपादित पारिवारिक बजट के सिद्धान्त के लिए विस्तृत (UPBoardSolutions.com) उत्तरीय प्रश्न 4 के अन्तर्गत ‘एन्जिल का सिद्धान्त’ देखें।

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प्रश्न 4.
एन्जिल द्वारा प्रतिपादित पारिवारिक बजट के सिद्धान्त का आलोचनात्मक विवरण । प्रस्तुत कीजिए। [2008, 09]
या
बजट बनाने हेतु एन्जिल के सिद्धान्त को स्पष्ट कीजिए। [2014]
उत्तर:
एन्जिल का सिद्धान्त
जर्मनी के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ० अर्नेस्ट एन्जिल (Dr. Earnest Engel) ने सन् 1857 में व्यय के विभिन्न मदों को भोजन, वस्त्र, आवास, ईंधन, प्रकाश, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आदि में बाँटकर अपना नियम बनाया, जो कि उपभोग का नियम’ कहलाता है। इसे ही ‘एन्जिल द्वारा प्रतिपादित पारिवारिक बजट का सिद्धान्त’ भी कहा जाता है। इसके अनुसार

  1. आय में वृद्धि के साथ भोजन पर व्यय होने वाला प्रतिशत कम होता जाता है।
  2. आय में परिवर्तन होने पर वस्त्रों पर होने वाला व्यय लगभग (UPBoardSolutions.com) समान रहता है।
  3. आय घटने या बढ़ने पर आवास, प्रकाश व ईंधन पर व्यय का प्रतिशत लगभग स्थिर रहता है।
  4. आय बढ़ने पर शिक्षा, मनोरंजन, स्वास्थ्य एवं व्यक्तिगत सेवाओं पर प्रतिशत व्यय में वृद्धि होती जाती है।

उपर्युक्त नियमों के अनुसार यह निष्कर्ष निकलता है कि आय की वृद्धि मौलिक आवश्यकताओं पर होने वाले व्यय के प्रतिशत को प्रभावित नहीं करती, परन्तु विलासितापूर्ण आवश्यकताओं पर आय की वृद्धि के साथ व्यय का प्रतिशत बढ़ जाता है।
डॉ० एन्जिल ने परिवारों को निम्न, मध्यम तथा धनी वर्गों में बाँटकर इस बात का अध्ययन किया कि प्रत्येक वर्ग का मुख्य आवश्यकताओं पर हुआ व्यय उनकी आय का कितना प्रतिशत होता है। उनकी खोज के परिणाम निम्नवत् हैं
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एन्जिल द्वारा प्रतिपादित पारिवारिक बजट के सिद्धान्त का स्पष्टीकरण निम्नांकित रेखाचित्र के माध्यम से भी हो सकता है
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सिद्धान्त की अव्यावहारिकता अथवा आलोचना

सामान्य रूप से एन्जिल द्वारा प्रतिपादित पारिवारिक बजट का सिद्धान्त पर्याप्त लोकप्रिय रहा है, परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में इस सिद्धान्त को व्यावहारिक तथा सैद्धान्तिक दोनों ही रूपों में दोषपूर्ण माना जाने लगा है। इस सिद्धान्त की अव्यावहारिकता अथवा कमियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

  1. भोजन के सम्बन्ध में-मध्यम व धनी वर्ग को भोजन के लिए अधिक धन दिया गया है।
  2.  आवासीय व्यवस्था-धनी व मध्यम वर्ग का आवासीय किराया आधुनिक युग के अनुरूप नहीं है। यह अपेक्षाकृत कम है। आधुनिक नगरीय क्षेत्रों में आवासीय किराए बहुत अधिक हो गए हैं।
  3.  शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन–प्रायः धनी व मध्यम वर्ग इन मदों (UPBoardSolutions.com) पर अधिक धन व्यय करते हैं।
  4. काश व्यवस्था-प्रकाश व्यवस्था पर होने वाले व्यय के प्रतिशत में वृद्धि, आय की वृद्धि के साथ-साथ ही होती है।
  5.  पारिवारिक बचत की अवहेलना-एन्जिल के बजट में बचत का कोई प्रावधान नहीं है। आधुनिक संघर्षमय युग में पारिवारिक बचत को अनिवार्य माना जाता है।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान परिस्थितियों में एन्जिल का बजट सम्बन्धी सिद्धान्त पूर्णतया प्रासंगिक नहीं है। वास्तव में भिन्न-भिन्न आय वर्गों के लिए आवश्यक मदों पर व्यय के प्रतिशत को निर्धारित करना कठिन है।
उदाहरण के लिए वर्तमान परिस्थितियों में एक मध्यमवर्गीय परिवार द्वारा अपनी आय के 12% में आवास सुविधा उपलब्ध करनी सम्भव नहीं है। इसी प्रकार धनी वर्ग द्वारा भोजन पर आय का 50% व्यय नहीं होता। इसी प्रकार शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन आदि के लिए निर्धारित प्रतिशत व्यय अपर्याप्त है। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान परिस्थितियों में एन्जिल के बजट सम्बन्धी सिद्धान्त में अभीष्ट परिवर्तन अनिवार्य है।

प्रश्न 5.
पारिवारिक आय और व्यय का लेखा रखना क्यों आवश्यक है? सामान्य रूपरेखा भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
परिवार का मासिक बजट बनाने के लिए वार्षिक आय-व्यय का लेखा अथवा चार्ट बनाना आवश्यक है। इसकी रूपरेखा निम्नलिखित है
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प्रायः कम आय अथवा धन के अपव्यय के कारण पूर्वानुमान वास्तविक व्यय से बहुत कम होता है। अत: मासिक बजट में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इनके निराकरण के निम्नलिखित उपाय सम्भव हो सकते हैं

  1. बजट की कुछ मदें; जैसे कि समाचार-पत्र, आवासीय किराया आदि; ऐसी हैं जिन पर होने वाले व्यय को कम नहीं किया जा सकता।
  2.  वस्त्र, उपहार, दान, मनोरंजन इत्यादि ऐसी मदें हैं जिन पर होने वाले व्यय को कम किया जा सकता है।
  3.  मितव्ययिता के आवश्यक तत्त्वों का पालन कर धने का कम-से-कम (UPBoardSolutions.com) व्यय कर अधिक आवश्यक मदों की पूर्ति की जा सकती है।
  4. परन्तु उपर्युक्त सभी उपाय तभी सम्भव हैं, जब कि पारिवारिक आय एवं व्यय का लेखा रखा जाए।

प्रश्न 6.
प्रतिदर्श बजट से आप क्या समझती हैं? 4800 मासिक आय वाले एक ऐसे परिवार का अनुमानित बजट बनाइए जो किराये के मकान में रहता है तथा उसमें पति-पत्नी के
अतिरिक्त दो बच्चे हैं।
या
एक मध्यम वर्ग के परिवार के बजट का नमूना बनाइए। , [2008, 11, 12, 14]
उत्तर:
प्रतिदर्श बजट मॉडल अथवा आदर्श बजट को प्रतिदर्श बजट कहते हैं। यह किसी विशिष्ट परिवार का बजट न होकर एक अनुमानित तथा सामान्य बजट होता है। प्रतिदर्श बजट के आधार पर किसी भी विशिष्ट परिवार का बजट बनाया जा सकता है। प्रतिदर्श बजट-निर्माण के निम्नलिखित चरण होते हैं

(1) प्रारम्भिक विभाग–यह सूचना-प्रधान चरण है। इसमें

  1. परिवार के सदस्यों की संख्या,
  2.  विभिन्न स्रोतों से होने वाली पारिवारिक आय,
  3.  बजट की अवधि (मासिक अथवा वार्षिक) इत्यादि सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं।

(2) अनुमान विभाग–इस चरण में उपभोग एवं व्यय के विषय में अनुमान लगाया जाता है; जैसे कि

  1. परिवार विशेष के व्यय की विभिन्न मदों का अनुमान,
  2.  उपभोग में आने वाली वस्तुओं की संख्या और मात्रा,
  3. वस्तुओं का मूल्य तथा उन पर व्यय किये जाने वाले कुल धन का पता लगाना।

(3) सारांश विभाग–बजट-निर्माण के तृतीय चरण में निम्नलिखित दो उप-चरण होते हैं|

  1. व्यय की विभिन्न मदों पर कुल आय का कितना प्रतिशत धन व्यय हुआ।
  2.  बजट के अन्त में कितनी बचत हो पाई अथवा धन की यदि (UPBoardSolutions.com) कमी हुई तो उसकी पूर्ति किस प्रकार की गई।

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संकेत-इसी आधार पर है 7200 अथवा १ 9600 मासिक आय वाले मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बजट बनाया जा सकता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“पारिवारिक बजट गृहिणी के व्यय को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक है।” स्पष्ट कीजिए। [2012, 13, 14, 15]
या ।
आय और व्यय में सन्तुलन बनाए रखने के लिए आप क्या उपाय करेंगी? सोदाहरण समझाइए। [2016 ]
उत्तर:
पारिवारिक बजट द्वारा गृहिणी के व्यय का नियन्त्रण घरेलू एवं पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व सामान्यतया गृहिणी का ही होता है। इसके लिए गृहिणी को व्यय करना होता है। आवश्यकताएँ असीमित जब कि आय सीमित होती है। इस स्थिति में परिवार के सदस्यों की अधिक-से-अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विशेष सूझ-बूझपूर्वक तथा व्यवस्थित ढंग से व्यय करना आवश्यक होता है।
पारिवारिक व्यय को आय की सीमाओं में रखने के लिए आवश्यक है कि सम्पूर्ण अनुमानित व्यय को लिख लिया जाए तथा उसका लेखा-जोखा पारिवारिक आय के अनुरूप तैयार किया जाए। इस प्रक्रिया को ही पारिवारिक बजट बनाना कहते हैं। पारिवारिक बजट (UPBoardSolutions.com) बनाते समय आय को ध्यान में रखकर कुछ कम महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति को छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार आय के अनुसार व्यय को निर्धारित करके बनाए गए बजट का पालन करके व्यय को नियन्त्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
पारिवारिक बजट के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए। आप किस प्रकार के बजट को उत्तम मानती हैं और क्यों? [2008, 15]
या ।
पारिवारिक बजट के प्रकार बताइए। [2010, 13, 14, 17]
या
आय-व्यय में सन्तुलन रखने के लिए कौन-सा बजट उत्तम होगा? [2008]
उत्तर:
पारिवारिक बजट के प्रकार । पारिवारिक बजट में मुख्य रूप से तीन तत्त्व होते हैं-आय, व्यय तथा बचत। इन तीनों तत्त्वों का समुचित ध्यान रखते हुए निम्नलिखित तीन प्रकार के पारिवारिक बजटों का निर्धारण किया जा सकता है

  1.  सन्तुलित बजट-इस प्रकार के बजट में अनुमानित आय के बराबर ही प्रस्तावित व्यय होता है। इसमें न बचत दिखाई जाती है और न ही घाटा दिखाया जाता है। सन्तुलित बजट में ऋण लेने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रकार के पारिवारिक बजट को उत्तम बजट नहीं माना जा सकता। यह एक प्रकार से कामचलाऊ बजट होता है।
  2.  घाटे का बजट-इस प्रकार के बजट में अनुमानित आय की अपेक्षा प्रस्तावित व्यय अधिक होता है, जिसके कारण संचित धन का उपयोग करना पड़ता है या फिर ऋण लेना पड़ता है अथवा पारिवारिक आय को अन्य साधनों द्वारा बढ़ाना पड़ता है या वस्तुओं को बेचना पड़ता है। इस प्रकार का पारिवारिक बजट केवल मजबूरी में ही अल्प अवधि के लिए बनाया जाना चाहिए तथा पुनः परिस्थितियाँ अनुकूल हो जाने पर इसे छोड़ दिया जाना चाहिए। इस प्रकार के बजट को अच्छा नहीं माना जाता।
  3. बचत का बजट-इस प्रकार के बजट में अनुमानित आय की अपेक्षा प्रस्तावित व्यय सदैव कम होती है, (UPBoardSolutions.com) जिससे कुछ धनराशि भविष्य की आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बची रहती है। इस प्रकार के बजट पारिवारिक आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से बहुत लाभप्रद होते हैं।
    उपर्युक्त विवरण द्वारा पारिवारिक बजट के तीनों प्रकारों के गुण-दोषों की जानकारी प्राप्त हो जाती है। इस विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि ‘बचत का बजट’ सर्वोत्तम पारिवारिक बजट होता है।

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प्रश्न 3
पारिवारिक बजट के प्रमुख मद कौन-कौन से होते हैं? [2008, 10, 12, 13, 15, 17]
या
पारिवारिक बजट को प्रभावित करने वाले मद कौन-कौन से हैं? [2017]
या
घर के बजट की मुख्य मदों की सूची बनाइए। [2018, 18 ]
उत्तर:
पारिवारिक बजट में परिवार के सभी सदस्यों की अधिक-से-अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति को ध्यान में रखा जाता है; अतः पारिवारिक बजट का निर्माण करते समय विभिन्न मदों को उसमें सम्मिलित किया जाता है। इस स्थिति में पारिवारिक बजट में मुख्य रूप से निम्नवर्णित मदों को प्राथमिकता दी जाती है

  1. आहार एवं सम्बन्धित सामग्री
  2.  वस्त्र एवं परिधान सम्बन्धी मद
  3.  आवास सम्बन्धी मद,
  4. बच्चों की शिक्षा सम्बन्धित मद
  5.  स्वास्थ्य तथा चिकित्सा सम्बन्धी मद
  6. यातायात एवं वाहन सम्बन्धी व्यय का मद
  7. अन्य घरेलू व्यय सम्बन्धी मद
  8.  व्यक्तिगत व्यय सम्बन्धी मद तथा
  9. पारिवारिक बचत सम्बन्धी मद।। पारिवारिक बजट में इन मदों की प्राथमिकता (UPBoardSolutions.com) का निर्धारण परिवार की पारिवारिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है। ये सभी मद पारिवारिक बजट को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 4.
बजट में बचत करना क्यों आवश्यक है? समझाइए। या बजट में बचत का क्या महत्त्व है? [2008]
उत्तर:
एक आदर्श बजट में बचत का प्रावधान सदैव ही रखा जाता है। परिवार के भविष्य की सुरक्षा एवं आकस्मिक कार्यों के लिए बचत ही एकमात्र विकल्प है। उदाहरण के लिए-आकस्मिक रोगों के उपचार के लिए आवश्यक धन बचत की मद से ही उपलब्ध होता है। इसी प्रकार (UPBoardSolutions.com) परिवार में विवाह आदि पर होने वाले व्यय, भवन-निर्माण एवं वृद्धावस्था में आत्मनिर्भरता इत्यादि महत्त्वपूर्ण कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए बचत द्वारा अर्जित किया धन उपयोग में आता है।

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प्रश्न 5
पारिवारिक बजट बनाने के मार्ग में आने वाली मुख्य बाधाओं का वर्णन कीजिए। या पारिवारिक बजट के निर्माण एवं सफलता के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं?[2014]
उत्तर:
पारिवारिक बजट के महत्त्व को हर कोई स्वीकार करता है, परन्तु व्यवहार में बहुत कम परिवार ही नियमित रूप से पारिवारिक बजट का निर्माण तथा उसका पालन करते हैं। पारिवारिक बजट के निर्माण एवं उसकी सफलता के मार्ग में मुख्य रूप से निम्नलिखित बाधाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं

(1) अशिक्षा तथा अज्ञानता–हमारे समाज में सामान्य शिक्षा तथा ज्ञान की कमी है। अधिकांश गृहिणियाँ समुचित रूप से शिक्षित नहीं हैं। ऐसी स्थिति में व्यवस्थित पारिवारिक बजट बनाना तथा उसका पालन करना प्रायः सम्भव नहीं होता। अधिकांश गृहिणियाँ बजट के लाभ से भी परिचित नहीं हैं।

(2) बजट के प्रति उदासीनता-समाज में बहुत-सी गृहिणियाँ ऐसी भी हैं जो पारिवारिक बजट बना सकती हैं तथा यदा-कदा इसके लिए प्रयास भी करती हैं, परन्तु विभिन्न कारणों से वे पारिवारिक बजट के प्रति पूरी तरह से ईमानदार नहीं रह पातीं। वे शीघ्र ही पारिवारिक बजट को एक झंझट मानकर छोड़ देती हैं। गृहिणियों की बजट के प्रति यह उदासीनता भी पारिवारिक बजट की सफलता में बाधक होती है।

(3) समाज में प्रचलित कुप्रथाएँ-हमारे देश में पारिवारिक बजट-व्यवस्था की असफलता का एक कारण समाज में प्रचलित विभिन्न प्रकार की कुप्रथाएँ भी हैं। समाज में प्रचलित कुप्रथाएँ पारिवारिक बजट को दो प्रकार से प्रभावित करती हैं। अनेक परिवारों में गृहिणियों को अर्थव्यवस्था में अपना परामर्श एवं सक्रिय योगदान देने से वंचित रखने की प्रथा है। इस स्थिति में गृहिणियाँ पारिवारिक बजट का अनुपालन कैसे कर सकती हैं? इसके अतिरिक्त समाज में प्रचलित कुछ प्रथाएँ लोगों को अनावश्यक व्यय करने के लिए बाध्य कर देती हैं। नामकरण, कर्ण-छेदन, विवाह तथा अन्त्येष्टि आदि संस्कारों पर अनावश्यक व्यय के परिणामस्वरूप पारिवारिक बजट प्रायः असफल हो जाता है तथा सामाजिक प्रतिष्ठा आदि के लिए परिवार ऋणभार से दब जाते हैं।

प्रश्न 6
उच्च एवं निम्न वर्गों के बजट में क्या अन्तर है? समझाइए।
उत्तर:
उच्च एवं निम्न वर्गों के पारिवारिक बजटों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। ये अन्तर निम्नलिखित हैं|

  1. भोजन व प्रतिशत व्यय-उच्च वर्ग के परिवार का भोजन पर प्रतिशत व्यय निम्न वर्ग के प्रतिशत व्यय से अपेक्षाकृत कम होता है।
  2.  शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन पर प्रतिशत व्यय-उच्च वर्ग के परिवार को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन की मदों पर प्रतिशत व्यय निम्न वर्ग के प्रतिशत व्यय से अपेक्षाकृत अधिक होता है।
  3.  बचत की राशि-उच्च वर्ग को परिवार निम्न वर्ग के परिवार की अपेक्षा बचत करने की अधिक क्षमता रखता है। अतः उच्च वर्ग का परिवार अपेक्षाकृत अधिक बचत कर सकता है।
    उपर्युक्त अन्तर के अतिरिक्त उच्च वर्ग तथा निम्न वर्ग के बजटों में प्राय: वस्त्रों, आवास, (UPBoardSolutions.com) ईंधन एवं प्रकाश पर प्रतिशत व्यय में भी अन्तर हो सकता है।

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प्रश्न 7
पारिवारिक दैनिक व्यय लिखने की विधि उदाहरण सहित प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
पारिवारिक बजट को सफलतापवूक लागू करने के लिए आवश्यक है कि पारिवारिक दैनिक व्यय को हाथ के हाथ व्यवस्थित ढंग से लिख लिया जाए। इससे किसी प्रकार की भूल होने की आशंका नहीं रहती तथा पारिवारिक खर्चे का आसानी से विश्लेषण भी किया जा सकता है। पारिवारिक दैनिक व्यय को किसी कॉपी या डायरी में लिखना चाहिए। इस प्रकार के हिसाब-किताब को एक दैनिक उदाहरण निम्नवर्णित है
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प्रश्न 8.
मितव्ययिता का क्या अर्थ है? गृहिणी मितव्ययिता में किस प्रकार सहायता कर सकती है?
मितव्ययिता से आप क्या समझती हैं? गृह-व्यय में मितव्ययिता के लिए उपयोगी सुझाव दीजिए। या ।
मितव्ययिता किसे कहते हैं? घर के खर्च में मितव्ययिता के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? 2017
उत्तर:
मितव्ययिता का अर्थ
सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था तथा पारिवारिक बजट की सफलता के लिए सर्वाधिक आवश्यक उपाय है-गृह-व्यय में मितव्ययिता को अपनाना। यहाँ यह बता देना उपयुक्त होगा कि मितव्ययिता कंजूसी नहीं है। यह अपव्यय से बचने का साधन है। मितव्ययिता में परिवार (UPBoardSolutions.com) की आवश्यकताओं की या नितान्त अवहेलना नहीं की जाती, बल्कि उन्हें सूझ-बूझ द्वारा रूपान्तरित किया जाता है। इस प्रकार मितव्ययिता के अन्तर्गत कंजूसी तथा फिजूलखर्ची दोनों से ही बचा जा सकता है।
मितव्ययिता के लिए उपयोगी सुझाव गृह व्यय में मितव्ययिता के लिए निम्नलिखित बातों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए.

  1.  केवल आवश्यकता की वस्तुएँ ही खरीदें। अनावश्यक अथवा आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ कदापि न खरीदें।
  2.  वस्तुओं का सदैव नकद भुगतान करें। उधार लेने पर सदैव हानि होती है।
  3. आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ सदैव विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें।
  4.  सदैव गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री ही खरीदें।
  5.  गेहूं, चावल आदि खाद्यान्न फसल के समय वर्ष भर की आवश्यकता के अनुरूप एक साथ खरीद लें।
  6. खाद्य-सामग्री के संरक्षण द्वारा भी मितव्ययिता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
  7.  यदि कोई मजबूरी न हो तो गृह-कार्यों आदि के लिए कोई नौकर न रखें।
  8.  बच्चों को पढ़ाने का कार्य जहाँ तक सम्भव हो स्वयं ही करें।
  9.  घर की सभी वस्तुओं की देखभाल नियमित रूप से करें तथा आवश्यकता पड़ने पर उनकी मरम्मत भी करवा लें।
  10.  मितव्ययिता के लिए पानी, ईंधन व प्रकाश (विद्युत) का केवल आवश्यकतानुसार ही प्रयोग करें।

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प्रश्न 9.
पिछले माह के बजट का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है? या माह के बजट का मूल्यांकन क्यों आवश्यक है? । 2017
उत्तर:
यह सत्य है कि पारिवारिक बजट पर्याप्त सूझ-बूझपूर्वक बनाया जाता है, परन्तु व्यवहार में इस बात की पर्याप्त सम्भावना होती है कि गृहिणी द्वारा तैयार किया गया बजट कुछ त्रुटियों से परिपूर्ण हो तथा यथार्थ में सफल बजट न हो। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सैद्धान्तिक रूप से यह सुझाव दिया जाता है कि आगामी माह का बजट तैयार करते समय गत माह के बजट का समुचित मूल्यांकन कर लिया जाए।

इस मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य यह जानना होता है कि हमारे पारिवारिक बजट में किसी अनावश्यक या कम महत्त्वपूर्ण व्यय को तो सम्मिलित नहीं किया गया अथवा किसी आवश्यक मद की अवहेलना तो नहीं हुई। इसके अतिरिक्त इस प्रकार के मूल्यांकन से यह भी ज्ञात (UPBoardSolutions.com) हो जाता है कि गत माह के बजट में परिवार के सभी सदस्यों की किसी अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति को ध्यान में नहीं रखा गया अथवा किसी प्रकार की फिजूलखर्ची तो नहीं हुई।
इसके साथ-साथ यह भी ज्ञात हो जाता है कि गत माह में परिवार द्वारा कुछ बचत की गयी है या नहीं। यदि बचत की गयी है तो कितनी बचत की गयी है? गत माह के बजट के समुचित मूल्यांकन से प्राप्त जानकारी आगामी माह के बजट के निर्धारण में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही गत माह के बजट में मूल्यांकन के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पारिवारिक बजट की संक्षिप्त परिभाषा लिखिए। [2008, 18 ]
पारिवारिक बजट क्या है? [2008, 10, 17 ]
या
पारिवारिक बजट किसे कहते हैं ? [2009, 11]
उत्तर:
“पारिवारिक बजट किसी निश्चित अवधि में परिवार के होने वाले आय-व्यय को दर्शाने वाला प्रपत्र होता है।”

प्रश्न 2.
बजट बनाना क्यों आवश्यक है? दो लाभ लिखिए। [2007, 11, 13, 14, 17}
उत्तर:
आय-व्यय एवं बचत की ठीक जानकारी के लिए तथा गृह-अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए बजट बनाना आवश्यक है।

प्रश्न 3.
प्राथमिकता के आधार पर पारिवारिक बजट के तीन मदों का उल्लेख कीजिए। या बजट के प्रमुख मद कौन-कौन से हैं? [2009
उत्तर:
पारिवारिक बजट के प्रमुख मद हैं

  1.  भोजन,
  2. वस्त्र,
  3.  आवास,
  4. शिक्षा एवं स्वास्थ्य

प्रश्न 4.
एक अच्छे बजट की दो विशेषताएँ लिखिए।2018
उत्तर:

  1. यह अनावश्यक व्यय को नियन्त्रित करता है तथा
  2. प्राथमिकता के आधार पर अधिक से अधिक (UPBoardSolutions.com) आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

प्रश्न 5.
आय-व्यय में सन्तुलन बनाये रखने का सरल उपाय क्या है?[2018]
उत्तर:
आय-व्यय में सन्तुलन बनाये रखने का सरल उपाय है उसका अनुमानित बजट बनाकर उसी के अनुसार व्यय करना तथा व्यय का विधिवत् लेखा रखना।

प्रश्न 6.
पारिवारिक बजट का क्या अर्थ है? बजट निर्माण के विभिन्न सोपान बताइए।
उत्तर:
पारिवारिक बजट किसी निश्चित अवधि में परिवार के होने वाले आय-व्यय को दर्शाने वाला प्रपत्र होता है। इसके विभिन्न सोपान हैं— भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य

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प्रश्न 7.
पारिवारिक बजट का सर्वोत्तम प्रकार कौन-सा माना जाता है?
उत्तर:
‘बचत का बजट’ सर्वोत्तम प्रकार का पारिवारिक बजट माना जाता है।

प्रश्न 8.
किस प्रकार के बजट से सदैव बचना चाहिए?
उत्तर:
‘घाटे के बजट’ से सदैव बचना चाहिए।

प्रश्न 9.
पारिवारिक बजट में आय से अधिक व्यय के प्रावधान वाले बजट को कैसा बजट कहते हैं?
उत्तर:
घाटे का बजट।

प्रश्न 10.
‘एन्जिल का सिद्धान्त’ क्या है? [2008, 10, 14]
उत्तर:
जर्मनी के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ० अर्नेस्ट एन्जिल ने सन् 1857 में व्यय की विभिन्न मदों को भोजन, वस्त्र, आवास, ईंधन, प्रकाश, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आदि में बाँटकर अपना नियम बनाया, जो कि ‘उपभोग का नियम’ कहलाती है। यही एन्जिल द्वारा प्रतिपादित ‘पारिवारिक (UPBoardSolutions.com) बजट का सिद्धान्त’ भी कहलाता है।

प्रश्न 11.
एन्जिल ने बजट के अध्ययन के लिए परिवारों को कौन-कौन सी श्रेणियों में विभाजित किया था?
उत्तर:
एन्जिल ने परिवारों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया था

  1.  निम्न वर्ग,
  2. मध्यम वर्ग तथा
  3.  उच्च वर्ग।

प्रश्न 12.
पारिवारिक बजट बनाने में उत्पन्न होने वाली कोई दो बाधाएँ लिखिए।
उत्तर:
पारिवारिक बजट बनाने में अक्सर उत्पन्न होने वाली दो बाधाएँ हैं

  1. अज्ञानता या शिक्षा की कमी तथा
  2. बजट के प्रति उदासीनता।

प्रश्न 13.
मितव्ययिता का क्या अर्थ है? [2009, 10]
या
बजट में मितव्ययिता क्या है? [2010, 13]
उत्तर:
मितव्ययिता के अन्तर्गत कंजूसी तथा फिजूलखर्ची दोनों से ही बचते हुए परिवार की अधिक से-अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयास किया जाता है।

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बहुविकल्पीय प्रश्न/ प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
एक निश्चित अवधि के लिए पारिवारिक आय-व्यय के पूर्वानुमान को कहते है
(क) आय का विवरण
(ख) व्यय का विवरण
(ग) पारिवारिक बजेट
(घ) घरेलू हिसाब-किताब

प्रश्न 2.
आय-व्यय का सन्तुलन बनाए रखने के लिए किसकी आवश्यकता पड़ती है? (2010]
(क) बचत
(ख) बजट
(ग) ब्याज
(घ) बैंक

प्रश्न 3.
पारिवारिक बजट का कौन-सा मुख्य मद नहीं है? (2009, 10, 11]
या
कौन-सा बजट का मुख्य मद नहीं है? । [2009, 10, 11, 13, 14]
(क) मकान
(ख) भोजन
(ग) वस्त्र/शिक्षा
(घ) दुकान/फैशन

प्रश्न 4.
पारिवारिक बजट का मुख्य मद है [2018]
(क) भोजन
(ख) दुकान
(ग) मनोरंजन
(घ) फर्नीचर

प्रश्न 5.
मासिक बजट बनाना आवश्यक है [2015, 18]
(क) आय-व्यय में सन्तुलन बनाए रखने के लिए
(ख) आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
(ग) बच्चों की पढ़ाई के लिए
(घ) उपहार देने के लिए

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प्रश्न 6.
पारिवारिक बजट बनाने का उद्देश्य है [2011, 12, 14, 15, 16, 17, 18
(क) बचत करना
(ख) व्यय पर नियन्त्रण
(ग) आय का ज्ञान
(घ) ये सभी

प्रश्न 7.
पारिवारिक बजट बनाने के लिए सबसे आवश्यक है
(क) आय में वृद्धि
(ख) व्यय पर नियन्त्रण
(ग) ऋण की व्यवस्था
(घ) आय-व्यय का पूर्वानुमान

प्रश्न 8.
गृह-अर्थव्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए आवश्यक हैया घर की आर्थिक व्यवस्था को ठीक रखने के लिए आवश्यक है [2013]
(क) पारिवारिक आय में वृद्धि
(ख) साधन सम्पन्न होना।
(ग) आय के अनुसार व्यय का बजट बनाना तथा उसका पालन करना
(घ) अधिक-से-अधिक कंजूसी करना

प्रश्न 9.
पारिवारिक बजट महत्त्वपूर्ण होता है
(क) गृहिणी एवं पूरे परिवार के लिए
(ख) अर्थशास्त्रियों के लिए
(ग) समाज-सुधारकों के लिए
(घ) इन सभी के लिए

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प्रश्न 10.
लोकप्रिय पारिवारिक बजट का सिद्धान्त प्रस्तुत किया- [2012, 16, 17] [2012, 16, 17] |
(क) माक्र्स ने
(ख) एन्जिल ने
(ग) टॉलस्टॉय ने
(घ) माइकेल एन्जिलो ने

प्रश्न 11.
पारिवारिक बजट द्वारा अनावश्यक व्यय को
(क) सहायता प्रदान की जाती है
(ख) प्रोत्साहन दिया जाता है।
(ग) नियन्त्रित किया जाता है।
(घ) स्वीकृति प्रदान की जाती है।

प्रश्न 12.
पारिवारिक बजट के मार्ग में मुख्य बाधाएँ हैं
(क) अज्ञानता तथा अशिक्षा
(ख) बजट के प्रति उदासीनता
(ग) समाज में प्रचलित कुप्रथाएँ।
(घ) ये सभी

प्रश्न 13.
आदर्श बजट माना जाता है [2008] या सर्वोत्तम (आदर्श) पारिवारिक बजट किसे माना जाता है? [2007, 08, 14]

(क) घाटे का बजट
(ख) सन्तुलित बजट
(ग) बचत का बजट
(घ) दैनिक बजट

प्रश्न 14.
एन्जिल के अनुसार कम आय वर्ग के परिवार की आय का अधिकांश प्रतिशत व्यय इस मद पर होता है
(क) वस्त्र
(ख) भोजन
(ग) आवास
(घ) ईंधन

प्रश्न 15.
बजट बनाने से पहले आवश्यक है 2014
(क) आय का पूर्वानुमान
(ख) आय पर नियन्त्रण
(ग) व्यय पर नियन्त्रण
(घ) ये सभी

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प्रश्न 16.
आय-व्यय में सन्तुलन हेतु कौन-सा साधन उपयुक्त होगा? 2015
(क) वार्षिक बजट
(ख) मासिक बजट
(ग) साप्ताहिक बजट
(घ) दैनिक बजट

उत्तर:

  1. (ग) पारिवारिक बजट
  2.  (ख) बजट
  3.  (घ) दुकान/फैशन
  4.  (क) भोजन
  5. (क) आय-व्यय में सन्तुलन बनाये रखने के लिए
  6.  (घ) ये सभी
  7. (घ) आय-व्यय का पूर्वानुमान
  8.  (ग) आय के अनुसार व्यय का बजट बनाना तथा उसका पालन करना
  9. (घ) इन सभी के लिए
  10. (ख) एन्जिल ने
  11.  (ग) नियन्त्रित किया जाता है
  12.  (घ) ये सभी
  13.  (ग) बचत को बजट
  14.  (ख) भोजन
  15. (क) आय का पूर्वानुमान
  16. (ख) मासिक बजट।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 23 नाड़ी, श्वास-गति और ताप का चार्ट बनाना

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 23 नाड़ी, श्वास-गति और ताप का चार्ट बनाना

These Solutions are part of UP Board Solutions for  Class 10 Home Science Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science गृह विज्ञान Chapter 23 नाड़ी, श्वास-गति और ताप का चार्ट बनाना.

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य के शरीर की तापमान ज्ञात करने के उपकरण एवं उनका प्रयोग करने की विधि का वर्णन कीजिए। चित्र की सहायता से थर्मामीटर के बारे में लिखिए। [2011]
                                                                                  या
थर्मामीटर से तापक्रम नापने की विधि लिखिए। थर्मामीटर का प्रयोग करते समय आप क्या सावधानियाँ रखेंगी? [2010, 13, 14, 16]
                                                                                  या
रोगी के तापक्रम चार्ट का क्या महत्त्व है? टाइफाइड तथा मलेरिया रोग के तापमान अंकन चार्ट का नमूना बनाइए। [2008]
                                                                                  या
तापक्रम चार्ट कैसे और क्यों बनाया जाता है ? किन रोगों में इसका बनाना अति आवश्यक है ? [2009]
                                                                                  या
रोगी का तापमान लेते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2012, 13, 14, 15]
                                                                                  या
थर्मामीटर से आप क्या समझती हैं? थर्मामीटर का प्रयोग करते समय ध्यान में रखने योग्य तथ्य क्या हैं? [2012, 13, 14, 15, 16]
                                                                                  या
तापमान चार्ट में आप क्या-क्या लिखेंगी ? [2016]
उत्तर:
क्लीनिकल थर्मामीटर व्यक्ति के स्वास्थ्य के मूल्यांकन के लिए उसके शरीर के तापमान को जानना आवश्यक होता है। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का सामान्य तापक्रम 98.4° फारेनहाइट होता है। शरीर के तापमान को मापने वाले उपकरण को क्लीनिकल थर्मामीटर कहा जाता है। (UPBoardSolutions.com) यह एक विशेष प्रकार का उपकरण है जिससे किसी भी व्यक्ति के शरीर का तापमान ज्ञात किया जा सकता है। यह एक काँच की बनी नली होती है जिसके बीच में एक सँकरी नली  के समान रिक्त स्थान होता है। इसके एक सिरे : पर एकै घुण्डी के अन्दर पारा भरा होता है।
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घुण्डी को उच्च ताप पर रखने पर पारा सँकरे रिक्त स्थान में ऊपर की ओर बढ़ने लगता है। थर्मामीटर लम्बाई में चिह्नांकित रहता है। प्रायः दो प्रकार के थर्मामीटर प्रयोग में लाए जाते हैं। एक प्रकार का थर्मामीटर शरीर का ताप फारेनहाइट में नापता है। इसमें सामान्यतः 95° फारेनहाइट से 110° फारेनहाइट तक चिह्न लगे होते हैं। दूसरे प्रकार के थर्मामीटर से शरीर का ताप सेल्सियस में नापा जाता है तथा इस पर 35° सेण्टीग्रेड से 43° सेण्टीग्रेड तक चिह्न लगे होते हैं। प्रथम प्रकार के थर्मामीटर में 98.4° फारेनहाइट पर तथा दूसरे प्रकार के थर्मामीटर में 36° सेण्टीग्रेड पर तीर को लाल चिह्न बना होता है, जो कि एक स्वस्थ मनुष्य के शारीरिक ताप का द्योतक होता है।

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थर्मामीटर का प्रयोग-
प्रयोग करने से पूर्व थर्मामीटर को स्वच्छ पानी से भली प्रकार साफ कर लेना चाहिए। चिकित्सालय में थर्मामीटर अनेक व्यक्तियों का ताप ज्ञात करने के लिए प्रयुक्त होता है। अत: प्रत्येक बार प्रयोग में लाने के लिए इसे स्प्रिट द्वारा साफ कर रोगाणुरहित किया जाता है। तत्पश्चात् थर्मामीटर को झटककर इसके पारे को सबसे नीचे के चिह्न परे उतार लेते हैं। अब इसे घुण्डी (बल्ब) की ओर से रोगी के मुँह (जीभ के नीचे) लगा दिया जाता है। दो-तीन मिनट बाद थर्मामीटर को रोगी (UPBoardSolutions.com) के मुंह से निकालकर देखा जाता है कि इसमें पारा किस चिह्न तक चढ़ा है। यह चिह्न रोगी के शारीरिक ताप को प्रदर्शित करता है। छोटी आयु के बच्चों का शारीरिक ताप ज्ञात करने के लिए थर्मामीटर को उनकी बगल में लगाया जाता है। थर्मामीटर का प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए-

  1. थर्मामीटर का प्रयोग करने से पूर्व उसे भली प्रकार से साफ कर लेना चाहिए। प्रत्येक बार प्रयोग में लाने से पहले किसी नि:संक्रामक घोल (प्राय: स्प्रिट) से इसे धो लेना चाहिए।
  2. रोगी यदि अचेतावस्था में हो, तो उसके मुँह में थर्मामीटर नहीं लगाना चाहिए।
  3. रोगी को यदि पसीना आ रहा हो तो उसे पोंछकर तथा कुछ देर रुककर ही उसका तापमान लेना चाहिए।
  4. थर्मामीटर लगाते व निकालते समय शीघ्रता नहीं करनी चाहिए।
  5. तापमान लेने के पश्चात् थर्मामीटर को साफ कर सुरक्षित स्थान पर रख देना चाहिए।

मलेरिया का ताप-चार्ट बनाना –
मलेरिया में ताप में अधिक उतार-चढ़ाव की प्रवृत्ति पायी जाती है। यदि मलेरिया तीसरे दिन आता है तो पहले दिन ताप । अत्यधिक होगी एवं दूसरे दिन सामान्य होकर तीसरे दिन पुनः अत्यधिक हो जाएगी। परन्तु आन्त्र ज्वर । (typhoid) में ताप रोग के प्रथम सप्ताह में उच्च, दूसरे सप्ताह में अत्यन्त स्थिर तथा तीसरे सप्ताह में धीरे-धीरे नीचा होकर सामान्य हो जाता है। यद्यपि आजकल ओषधियों द्वारा ताप की इस सामान्य प्रवृत्ति को डॉक्टरों द्वारा परिवर्तित कर दिया जाता है।
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रोगी के ताप का चार्ट बनाना –
तीव्र ज्वर या अधिक समय तक रहने वाले ज्वर से पीड़ित रोगियों के तापमान का चार्ट बनाना आवश्यक होता है, क्योंकि इसके आधार पर चिकित्सक को ओषधियों के उचित प्रयोग की सुविधा हो जाती है। तापमान का चार्ट बनाने के लिए रोगी को प्रत्येक दो अथवा चार घण्टे बाद ताप (UPBoardSolutions.com) लेकर निम्न प्रकार से तालिका बनानी चाहिए-
रोगी का नाम  ………………..
आयु  ………………..
सम्भावित रोग ………………..
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प्रश्न 2.
मनुष्य में नाड़ी की गति का परीक्षण किस प्रकार किया जाता है? तपेदिक के रोगी की अवस्था को ग्राफ द्वारा आप किस प्रकार प्रदर्शित करेंगी?
उत्तर:
नाड़ी की गति मनुष्य के शरीर में रक्त प्रवाह की क्रिया हर समय चलती रहती है। इस क्रिया में फेफड़ों द्वारा शुद्ध किया गया रक्त हृदय द्वारा सारे शरीर में वितरित किया जाता है तथा शरीर के सभी अंगों से अशुद्ध रक्त हृदय तक जाता है।
जहाँ से यह फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए भेज दिया जाता ताप सु-शः सुशा- सुश है। इन सब कार्यों को करने के लिए एक विशेष, निश्चित 106° तथा नियमित गति से हृदय में हर समय सिकुड़न और शिथिलन होता रहता है। जब यह सिकुड़ता है, तो रुधिर दबाव के साथ धमनियों में (UPBoardSolutions.com) पहुँचता है, जोकि रुधिर के
अधिक दबाव के कारण फैल जाती हैं। जब हृदय फैलता है, तो धमनियों में रुधिर का दबाव कम हो जाता है तथा वे पूर्वावस्था में आ जाती हैं। इस प्रकार हृदय के साथ-साथ धमनियों में भी धड़कन होती है, जिसे हम नाड़ी की गति कहते हैं।
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सामान्यत: स्वस्थ व्यक्ति को हृदय प्रति मिनट 72  बार फैलता व सिकुड़ता है। इसके साथ ही उसकी धमनियाँ भी धड़कती हैं। इनको कुछ स्थानों पर अनुभव किया जा सकता है, विशेषकर उन स्थानों पर जहाँ इन धमनियों को आगे बढ़ने के लिए किसी हड्डी के ऊपर से (UPBoardSolutions.com) गुजरना पड़ता है। इन स्थानों पर उँगली रखने पर धमनी की धड़कन को स्पष्टतः अनुभव किया जा सकता है। अतः हम इसकी संख्या घड़ी देखकर प्रति मिनट ज्ञात कर सकते सुबह तथा शाम को ताप लेकर हैं। यह नाड़ी की गति का परीक्षण कहलाता है। प्राय: एक सामान्य व्यक्ति के लिए नाड़ी की गति 70-80 बार प्रति मिनट होती है। आयु के अनुसार इसमें कुछ अन्तर होते हैं, जिन्हें निम्नांकित सारणी में प्रदर्शित किया गया है-

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नाड़ी की गति शरीर में अनेक स्थानों पर अनुभव की जा सकती है। उदाहरण के लिए-गर्दन पर, पैर पर, कलाई पर व पेट के मध्य में आदि-आदि। किन्तु सामान्यत: सबसे अधिक सुविधाजनक स्थान कलाई के पास अँगूठे की दिशा में पहुँचने पर होता है जहाँ यह सहज ही अनुभव (UPBoardSolutions.com) की जा सकती है। नाड़ी देखते समय घड़ी भी देखनी आवश्यक है, जिससे कि नाड़ी की गति का आकलन प्रति मिनट किया जा सके। चिकित्सक को सूचित करने के लिए नाड़ी के गुण देखना भी आवश्यक है; जैसे-

  1. नाड़ी कमजोर चलती है या तेज,
  2. निश्चित समय पर चलती है अथवा रुक-रुक कर,
  3. निश्चित गति जानने के लिए प्रत्येक पन्द्रह मिनट बाद नाड़ी की गति को गिनना चाहिए। यदि एक ही गति आती है, तो गति को स्थिर व निश्चित माना जाता है अन्यथा अनिश्चित व अस्थिर माना जाएगा।

तपेदिक के रोगी की अवस्था का ग्राफ – रोगी की अवस्था का ग्राफ बनाने के लिए उसके तापमान, नाड़ी की गति, श्वास की गति, मल-मूत्र आदि की स्थिति को ग्राफ पेपर पर अंकित किया जाता है। ग्राफ कागज पर रोगी का नाम, आयु, रोग का नाम व रोग के प्रारम्भ एवं मुक्ति की तिथि अंकित कर दी जाती है।

प्रत्येक दिन प्रात: और सायंकाल का ताप लेकर निर्धारित तिथि व समय के नीचे ग्राफ पेपर पर नीचे से ऊपर की ओर (ऊर्ध्वतल में) निर्धारित स्थान पर बिन्दु लगाकर अंकित कर दिया जाता है। बाद में बिन्दुओं को मिलाकर ग्राफ बना दिया जाता है। नाड़ी की गति के अंकन के लिए ग्राफ पेपर के आधार के साथ तापक्रम के समान बिन्दु लगाये जाते हैं। इसके लिए पहले खाने में जो दस खाने हैं उन्हें एक के बराबर माना जाएगा। इस प्रकार नाड़ी गति की विभिन्न संख्याओं को अंकित कर दिया जाएगा। इसके नीचे श्वास गति व मल-मूत्र की अवस्था भी अंकित की जाती है।

प्रश्न 3.
रोगी को मल-मूत्र कराते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है? एनिमा का प्रयोग आप किस प्रकार करेंगी?
उत्तर:
रोगी को मल-मूत्र विसर्जन कराना वह रोगी जिसको चलने-फिरने की अनुमति प्राप्त है, सामान्य व्यक्ति की तरह से परिचारिका की देख-रेख में मल-त्याग कर सकता है। परन्तु यदि रोगी सम्पूर्ण समय बिस्तर पर ही रहता है और चल-फिर सकने की क्षमता नहीं रखता अथवा उसे चलने-फिरने की अनुमति नहीं है, तो उसे परिचारिका की सहायता से बिस्तर में लेटी हुई दशा में ही मल-त्याग करना होता है। इसके लिए उसे एक विशेष प्रकार के मल-पात्र (बेड-पैन) की आवश्यकता होती है। परिचारिका को इस प्रकार के रोगी का मल-मूत्र विसर्जन कराते समय निम्नलिखित विधि एवं सावधानी अपनानी चाहिए-

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  1. मल-मूत्र त्याग के समय रोगी के बिस्तर पर रबर-शीट डालनी चाहिए।
  2. रोगी को सीधे लिटाकर, उसके घुटने मुड़वा देने चाहिए।
  3. रोगी के बिस्तर के कपड़ों को मोड़ देना चाहिए।
  4. साफ, साबुत मल-पात्र (बेड-पैन) रोगी की कमर के नीचे लगा देना चाहिए। यह अधिक ठण्डा नहीं होना चाहिए।
  5. मल-पात्र (बेड-पैन) रखने के बाद रोगी को सहारा देने के लिए तकिया लगा देना चाहिए।
  6. ओढ़ने की चादर को गन्दा होने से बचाने के लिए इसके नीचे कोई पुराना अखबार लगा देना चाहिए।
  7. मल-त्याग के उपरान्त रोगी के मल-पात्र को धीरे से एक हाथ से उठा देना चाहिए।
  8. मल-त्याग के बाद रोगी की गुदा को गीली रूई या टॉयलेट-पेपर अथवा जल से धोकर भली-भाँति साफ कर देना चाहिए।
  9. मल-पात्र को हटाते ही ढक देना चाहिए तथा उसे कमरे से बाहर कर देना चाहिए।
  10. यदि रोगी बार-बार मल-त्याग करता है, तो सुरक्षात्मक-पैडों का प्रयोग करना चाहिए।
  11. यदि रोगी को केवल मूत्र-त्याग करना है, तो मूत्र-पात्र (UPBoardSolutions.com) का प्रयोग करना चाहिए।
  12. प्रयोग के बाद रोगी के मल-मूत्र पात्र को खौलते पानी से साफ कर व कपड़े से पोंछसुखाकर रखना चाहिए।

मल-विसर्जन के समय ध्यान देने योग्य बातें-

  1. रोगी ने दिन में कितनी बार मल-मूत्र त्याग किया ?
  2. मल का रंग कैसा रहा? स्वस्थ अवस्था में यह भूरा होता है। ऐसा न होने की दशा में चिकित्सक को अवगत कराना चाहिए।
  3. मल किस तरह का है? गाँठदार, पतला, रक्तयुक्त अथवा कीड़े होने की दशा में चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करना चाहिए।
  4. प्राकृतिक रूप से मल-त्याग न होने पर भी चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

एनिमा का प्रयोग। रोगी को यदि प्राकृतिक रूप से मल-त्याग नहीं हो रहा है, तो उसे आवश्यकतानुसार चिकित्सक से परामर्श प्राप्त कर एनिमा देना उचित रहता है। एनिमा आवश्यकतानुसार कई प्रकार के होते हैं और उन्हें अलग-अलग प्रकार के उपकरणों द्वारा रोगी को दिया जा सकता है।

कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकार के एनिमा, उनके उपकरणों तथा उनको लगाने की विधि निम्नलिखित है-
(1) साबुन के घोल का एनिमा – इसके लिए एक निश्चित पात्र होता है जिसमें एक ओर तले के पास एक टोंटी या नली लगी होती है जिससे रबर की एक लम्बी व पतली नली लगी होती है। रबर की नली के सिरे पर एक प्लास्टिक की लम्बी नली लगी होती है। इस नली को रोगी की गुदा में 10-12 सेमी अन्दर तक डाला जाता है। ऊपर के पात्र में साबुन का पानी भर दिया जाता है। साबुन का घोल बनाने के लिए 15 ग्राम साबुन को पाँच लीटर गर्म जल में घोला जाता है। यह घोल अधिक गर्म नहीं होना चाहिए। एनिमा पात्र की ऊँचाई रोगी के बिस्तर से न्यूनतम आधा मीटर होनी चाहिए। अब टोंटी खोल देने पर साबुन का घोल । रोगी की बड़ी (UPBoardSolutions.com) आंत में प्रवेश करने लगता है। इस समय रोगी को लम्बे-लम्बे श्वास दिलाने चाहिए। जब पर्याप्त घोल पेट में पहुँच जाए, तो नोजल को धीरे-धीरे रोगी की गुदा से निकालकर रोगी को सीधा कर देना चाहिए।

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(2) नमक के पानी का एनिमा – इस एनिमा को प्रयोग करने के लिए उपर्युक्त उपकरण की ही आवश्यकता होती है। आधा लीटर जल में आधा चम्मच नमक डाल दिया जाता है। पानी हल्का गर्म ही होना चाहिए। इसे उपर्युक्त विधि द्वारा ही लगाया जाता है। यह एनिमा रोगी के कमजोर होने या कोई आघात पहुंचने पर लगाया जाता है। यदि अधिक दुर्बलता के कारण रोगी जल इत्यादि लेने में असमर्थ हो तो नमक के घोल में थोड़ा ग्लूकोज भी मिला देते हैं।

(3) अरण्डी के तेल का एनिमा – इसके लिए एक विशेष प्रकार के उपकरण की आवश्यकता होती है। अरण्डी के तेल को जल-ऊष्मक में गर्म करते हैं। इसके लिए एक बर्तन में जल गर्म , करते हैं तथा एक अन्य छोटे बर्तन में तेल रख देते हैं। जल के गर्म होने पर तेल भी गर्म हो जाता है। अब 200 मिली तेल एनिमा के उपकरण में भर लेते हैं। अरण्डी के तेल का एनिमा उन रोगियों को दिया जाता है जिनको मल की गाँठे बन गई हैं।
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(4) ग्लिसरीन का एनिमा – यह प्राय: बच्चों को दिया जाता है। इसे देने के लिए एक विशेष प्रकार की सिरिंज की आवश्यकता पड़ती है। दो चम्मच ग्लिसरीन को एक शीशी में डालकर जल-ऊष्मक में हल्का गर्म कर लिया जाता है। अब इसे पिचकारी में भरकर एनिमा लगाते हैं।
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 
किसी रोगी की श्वास की गति का निरीक्षण आप किस प्रकार करेंगी? या श्वसन-क्रिया की दर से क्या तात्पर्य है? [2018]
उत्तर:
सामान्य अवस्था में एक स्वस्थ मनुष्य निश्चित गति से श्वास लेता है। यदि इस गति में तेजी अथवा कमी आती है तो उसके स्वास्थ्य में अवश्य ही कोई कमी है। मनुष्य में श्वसन-क्रिया नि:श्वसन (श्वास बाहर छोड़ना) व प्र:श्वसन (श्वास भीतर लेना) के दो पदों में सम्पूर्ण होती है। एक (UPBoardSolutions.com) मिनट में होने वाली श्वसन क्रिया को श्वसन की दर माना जाता है। एक स्वस्थ मनुष्य में यह प्रक्रिया एक मिनट में लगभग 15 से 18 बार दोहराई जाती है। एक शिशु में यह गति अधिक तेज होती है। श्वास की गति को भी ताप या नाड़ी की गति के अनुसार ही तालिका या ग्राफ पर अंकित किया जाता है। किसी व्यक्ति की श्वास की गति का निरीक्षण करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाता है-

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  1. श्वास हल्का है अथवा गहरा,
  2. श्वास लेते समय कोई कठिनाई अथवा कष्ट तो नहीं है,
  3. श्वास लेते समय किसी प्रकार की आवाज तो नहीं होती है,
  4. श्वास क्रिया नियमित है अथवा अनियमित।

प्रश्न 2. 
नाड़ी, श्वास-गति तथा तापमान मनुष्य के स्वास्थ्य से किस प्रकार जुड़े रहते हैं?
उत्तर:
नाड़ी, श्वास-गति तथा तापमान का मनुष्य के स्वास्थ्य से सीधा सम्बन्ध है। सामान्यतः नाड़ी तथा श्वास की गति का 4 और 1 अनुपात होता है। नाड़ी की गति सामान्यतया शरीर का ताप 1° फारेनहाइट बढ़ने पर 10 बार बढ़ जाती है। अत: श्वास की गति भी उपर्युक्त अनुपात के अनुसार बढ़ जाएगी। इस प्रकार नाड़ी, श्वास की गति और तापमान भी परस्पर सम्बन्धित होते हैं तथा किसी व्यक्ति के तापमान को देखकर उसकी नाड़ी की गति एवं श्वास की गति का अनुमान लगाया जा सकता है, परन्तु यह तब ही सम्भव हो सकता है, जबकि उस व्यक्ति की सामान्य अवस्था में हमें उसकी नाड़ी व श्वास की गति का पूर्ण ज्ञान हो।

प्रश्न 3.
रोगी को मल-मूत्र विसर्जन कराते समय चिकित्सक की सूचनार्थ आप किन-किन बातों का लिखित विवरण तैयार करेंगी?
उत्तर:
रोगी के मल-मूत्र विसर्जन के सम्बन्ध में चिकित्सक को प्राय: निम्नलिखित सूचनाएँ देनी होती हैं-

  1. मल-मूत्र का रंग और बनावट कैसी है?
  2. मल-मूत्र से किस प्रकार की दुर्गन्ध आती है?
  3. रोगी को मल-मूत्र विसर्जन में किस प्रकार का कष्ट होता है?
  4. रोगी मल-मूत्र त्यागते समय किसी प्रकार की रुकावट की अनुभूति तो नहीं करता?
  5. रोगी कितनी बार और किस-किस समय मल-मूत्र त्याग करता है?
  6. रोगी के मल-मूत्र की जाँच की विभिन्न रिपोर्ट।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शरीर का ताप ज्ञात करने के लिए किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है। [2008, 10]
उत्तर:
उक्ट शरीर का ताप लेने के लिए क्लीनिकल थर्मामीटर प्रयुक्त किया जाता है।

प्रश्न 2.
थर्मामीटर की उपयोगिता बताइए। [2012]
उत्तर:
थर्मामीटर से व्यक्ति के शरीर का तापमान मापा जाता है। इससे ज्वर का निर्धारण किया जाता है।

प्रश्न 3.
शरीर का तापक्रम मापने के लिए किन इकाइयों का प्रयोग किया जाता है? [2007]
उत्तर:
शरीर का तापक्रम मापने के लिए प्रायः डिग्री फारेनहाइट नामक इकाई का प्रयोग किया जाता है। किन्तु कुछ थर्मामीटर डिग्री सेण्टीग्रेड में भी होते हैं। अतः डिग्री सेण्टीग्रेड भी शरीर का ताप मापने की एक प्रचलित इकाई है।

प्रश्न 4.
थर्मामीटर में कौन-सा पदार्थ भरा जाता है और क्यों?
उत्तर:
थर्मामीटर में पारा भरा जाता है। यह चमकदार होता है तथा थर्मामीटर की दीवारों (UPBoardSolutions.com) से चिकता भी नहीं है। ताप पाकर इसका विस्तार समान रूप में होता है।

प्रश्न 5.
एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का ताप कितना होता है?
                                          या
थर्मामीटर (तापमापक यन्त्र) में न्यूनतम तापमान कितना होता है? [2008 ]
उत्तर:
एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का ताप प्रायः 98.4° फारेनहाइट होता है।

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प्रश्न 6.
तापक्रम चार्ट बनाने से क्या लाभ हैं? [2009, 11, 12]
                                       या
रोग का तापक्रम चार्ट बनाना क्यों आवश्यक है? [2007, 09, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
उत्तर:
तापक्रम चार्ट बनाने से यह लाभ होता है कि चिकित्सक उसको देखकर आसानी से रोगी के स्वास्थ्य में हो रहे परिवर्तनों तथा रोगी की दशा आदि का उचित ज्ञान प्राप्त कर सकता है और तद्नुसार दवा आदि में तत्काल परिवर्तन भी कर सकता है।

प्रश्न 7.
शरीर का ताप बढ़ने पर किसी व्यक्ति की नाड़ी की गति में क्या परिवर्तन होता है?
उत्तर:
शरीर का ताप बढ़ने पर (प्राय: ज्वर आदि में) नाड़ी की गति प्रति डिग्री फारेनहाइट पर दस बार बढ़ जाती है।

प्रश्न 8.
ऐसे रोगी, जिन्हें श्वास लेने में कठिनाई हो, को तत्काल किस प्रकार की सहायता दी जानी चाहिए?
उत्तर:
श्वास लेने में कठिनाई महसूस करने वाले रोगी को तत्काल ऑक्सीजन दी जानी चाहिए।

प्रश्न 9.
सामान्यतः श्वास की गति कितनी होती है?
                                  या
एक स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में कितनी बार श्वास लेता है?
उत्तर:
सामान्यतः एक स्वस्थ व्यक्ति एक मिनट में 15-18 बार श्वास लेता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए-

1. एक सामान्य स्त्री की नाड़ी की गति प्रति मिनट होती है-
(क) 72-80
(ख) 77-85
(ग) 80-90
(घ) 90-100

2. स्वस्थ मनुष्य की नाड़ी एक मिनट में कितनी बार चलती है?
(क) 20-30
(ख) 40-50
(ग) 60-70
(घ) 72-80

3. शरीर का तापमान कब लेना चाहिए?
(क) खाना खाने के 15 मिनट बाद
(ख) खाना खाने के तुरन्त बाद
(ग) कुछ भी खाने-पीने के 15 मिनट बाद
(घ) पेय पदार्थ लेने के तुरन्त बाद

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4. एक स्वस्थ मनुष्य एक मिनट में कितनी बार साँस लेता है ? [2009]
(क) 14 से 15 बार
(ख) 15 से 16 बार
(ग) 17 से 18 बार
(घ) 18 से 20 बार

5. मानव शरीर का सामान्य तापक्रम कितना होता है? [2010, 15, 16, 17]
(क) 98.4° फारेनहाइट
(ख) 99° फारेनहाइट
(ग) 97.6° फारेनहाईट
(घ) 100° फारेनहाइट

6. शरीर का तापमान देखने का अल्पतम समय है
(क) 13 से 2 मिनट
(ख) 2 से 3 मिनट
(ग) 3 से 4 मिनट
(घ) 5 मिनट

7. थर्मामीटर द्वारा ज्ञात करते हैं [2010, 13, 14, 17]
(क) नाड़ी की गति
(ख) श्वसन की दर
(ग) रुधिर का दाबे
(घ) शरीर का तापमान

8. श्वसन तन्त्र का मुख्य अंग होता है [2009]
(क) फेफड़े
(ख) अग्न्याशय
(ग) यकृत
(घ) आमाशय

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9. शरीर का तापमान नापने के लिए प्रयुक्त किया जाता है- [2008, 10]
(क) लैक्टोमीटर
(ख) थर्मामीटर
(ग) बैरोमीटर
(घ) हाइड्रोमीटर

10. एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय एक मिनट में कितनी बार धड़कता है ? [2016, 17]
(क) 72
(ख) 80
(ग) 100
(घ) 200

11. नाड़ी दर का सम्बन्ध होता है [2015, 18]
(क) मानव हृदय की धड़कन से
(ख) भोजन पाचने से।
(ग) श्वास लेने से
(घ) इनमें से कोई नहीं

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उत्तर:

  1. (ख) 77-85,
  2. (घ) 72-80,
  3. (ग) कुछ भी खाने-पीने के 15 मिनट बाद,
  4. (ख) 15 से 16 बार,
  5. (क) 98.4° फारेनहाइट,
  6. (ख) 2 से 3 मिनट,
  7. (घ) शरीर का तापमान,
  8. (क) फेफड़े,
  9. (ख) थर्मामीटर,
  10. (क) 72,
  11. (क) मानव हृदय की धड़कन से।

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