UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 भारत का विदेशी व्यापार (अनुभाग – चार)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 भारत का विदेशी व्यापार (अनुभाग – चार)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
भारत में निर्यात व्यापार की तीन विशेषताएँ बताइट। [2012]
उत्तर :
भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषताएँ भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. अधिकांश भारतीय विदेशी व्यापार (लगभग 90%) समुद्री मार्गों द्वारा किया जाता है। हिमालय पर्वतीय अवरोध के कारण समीपवर्ती देशों एवं भारत के मध्य धरातलीय आवागमन की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसी कारण देश का अधिकांश व्यापारे पत्तनों द्वारा अर्थात् समुद्री मार्गों द्वारा ही किया जाता है।

2. भारत का निर्यात व्यापार 27% पश्चिमी यूरोपीय देशों, 20% उत्तरी अमेरिकी देशों, 51% एशियाई एवं ऑस्ट्रेलियाई देशों तथा 20% अफ्रीकी एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों से किया जाता है। कुल निर्यात व्यापार का 61.1% भाग विकसित देशों (UPBoardSolutions.com) (सं० रा० अमेरिका 17.4%, जापान 7.2%, जर्मनी 6.8% एवं ब्रिटेन 5.8%) को किया जाता है। इसी प्रकार आयात व्यापार 26% पश्चिमी यूरोपीय देशों, 39% एशियाई एवं ऑस्ट्रेलियाई देशों, 13% उत्तरी अमेरिकी देशों तथा 7% अफ्रीकी देशों से किया जाता है।

3. यद्यपि भारत में विश्व की लगभग 17% जनसंख्या निवास करती है, परन्तु विश्व व्यापार में भारत का भाग 0.5% से भी कम है, जबकि अन्य विकसित एवं विकासशील देशों का भाग इससे कहीं अधिक है। इस प्रकार देश के प्रति व्यक्ति विदेशी व्यापार का औसत अन्य देशों से बहुत कम है।

4. भारत के विदेशी व्यापार का भुगतान सन्तुलन स्वतन्त्रता के बाद से ही हमारे पक्ष में नहीं रहा है। सन् 1960-61 ई० का तथा 1970-71 ई० में भुगतान सन्तुलन हमारे पक्ष में रहा है। सन् 1980-81 ई० में घाटा ₹ 5,838 करोड़ था, 1990-91 ई० में यह घाटा ₹ 10,635 करोड़ तक पहुँच गया। वर्ष 1999-2000 में व्यापार घाटा १ 55,675 करोड़ हो गया। परन्तु 2000-2001 ई० में इस घाटे में कुछ गिरावट आई और यह घटकर ₹ 27,302 करोड़ हो गया है। तत्पश्चात् पुन: इस घाटे में वृद्धि होनी शुरू हो गयी। वर्ष 2005-06 के आँकड़ों के मुताबिक इस घाटे के ₹ 1,75,727 करोड़ होने का ” अनुमान है। वर्ष 2006-07 में विदेशी व्यापार में घाटा 56 अरब डॉलर से अधिक का रहा। 2011-12 में व्यापार घाटा बढ़कर 8,85,492 करोड़ हो गया। अमेरिकी डॉलर के हिसाब से 184.5 बिलियन डॉलर का हो गया। घाटे में वृद्धि का प्रमुख कारण आयात में भारी वृद्धि का होना है। आयात में भारी वृद्धि पेट्रोलियम पदार्थों के आयात के कारण हुई है।

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5. देश का अधिकांश विदेशी व्यापार लगभग 35 देशों के मध्य होता है, जो विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर किया जाता है।

6. विगत दो दशकों में भारत के आयातों की प्रकृति में भारी परिवर्तन हुए हैं। पहले भारत निर्मित माल का अधिक आयात करता था, किन्तु अब खाद्य तेल, पेट्रोलियम तथा उसके उत्पाद, स्नेहक पदार्थ, उर्वरक, कच्चे माल तथा पूँजीगत वस्तुओं का भी आयात करने लगा है।

7. निर्यातों की प्रकृति में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। पहले भारत के निर्यात पदार्थों में कृषि तथा खनन-आधारित कच्चे मालों की प्रधानता थी, अब भारत सूती वस्त्र, सिले-सिलाये वस्त्र, जूट का ग़मान, चमड़ा निर्मित सामान, अभ्रक, मैंगनीज, लौह-अयस्क, मशीनरी, साइकिल, पंखे, फर्नीचर, रेल के इंजन तथा उपकरण, सीमेण्ट, हौजरी, हस्त निर्मित वस्तुएँ, रत्न-जवाहरात, आभूषण आदि का निर्यात करता है।

8. 31 अगस्त, 2004 ई० में भारत ने नई निर्यात नीति लागू कर दी है। इस नीति के तहत निर्यात क्षेत्र को सेवा कर से मुक्त कर दिया गया है तथा लघुत्तर व कुटीर उद्योगों हेतु निर्यात संवर्द्धन पूँजीगत सामान योजना के तहत निर्यात दायित्व पूरा करने की (UPBoardSolutions.com) समय सीमा को आठ वर्षों की बजाय 12 वर्ष किया गया है।

प्रश्न 2.
भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार के महत्त्व तथा भारतीय निर्यातों और आयातों की दिशा पर प्रकाश डालिए। [2017]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार के महत्त्व पर एक नोट लिखिए।
या
भारत के विदेशी व्यापार की दिशा लिखिए। किसी देश के लिए विदेशी व्यापार का महत्त्व समझाइए। [2010]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में निर्यात व्यापार के तीन महत्त्व लिखिए। [2013]
उत्तर :

भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार का महत्त्व

किसी भी देश का विदेशी व्यापार उसके आर्थिक विकास का दर्पण होता है। विदेशी व्यापार के दो घटक होते हैं –

  1. आयात तथा
  2. निर्यात। विदेशी व्यापार से प्रत्येक देश लाभान्वित होता है।

निम्नलिखित तथ्यों से भारत के विदेशी व्यापार का महत्त्व स्पष्ट होता है –

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1. प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग – एक देश ऐसे उद्योगों की स्थापना एवं संचालन करता है, जिनसे उसे अधिकतम तुलनात्मक लाभ प्राप्त होता है और वह उस बाजार (देश) में अपनी उत्पादित वस्तुओं को बेचता है, जहाँ उसे वस्तुओं का सर्वाधिक मूल्य मिलता है। फलत: वह उपलब्ध प्राकृतिक ‘ संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करता है।

2. औद्योगीकरण को प्रोत्साहन – विदेशी व्यापार के माध्यम से देश में (UPBoardSolutions.com) उद्योग-धन्धों को विकसित करने के लिए आवश्यक उपकरण, कच्चा माल व तकनीकी ज्ञान सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं। फलतः देश में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

3. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सद्भावना में वृद्धि – विदेशी व्यापार के फलस्वरूप विभिन्न देशों के नागरिक एक-दूसरे के निकट सम्पर्क में आते हैं और एक-दूसरे के विचारों एवं दृष्टिकोणों से परिचित होते हैं। फलस्वरूप सांस्कृतिक सहयोग एवं परस्पर विश्वास में वृद्धि होती है।

4. सस्ती वस्तुओं की उपलब्धि – विदेशी व्यापार के फलस्वरूप विदेशों से सस्ती एवं उत्तम वस्तुएँ उपलब्ध होने लगती हैं। इन वस्तुओं के उपभोग से लोगों के जीवन-स्तर एवं आर्थिक कल्याण में वृद्धि होती है।

5. भौगोलिक श्रम-विभाजन – विदेशी व्यापार के स्वतन्त्र होने पर प्रत्येक देश उन वस्तुओं का उत्पादन करता है, जिनसे उसे सर्वाधिक प्राकृतिक लाभ प्राप्त होता है अथवा जिनकी उत्पादन-लागत न्यूनतम होती है। इस प्रकार विदेशी व्यापार की क्रियाएँ भौगोलिक श्रम-विभाजन को सम्भव बनाती हैं।

6. उपभोक्ताओं को लाभ – उत्पादन अनुकूलतम परिस्थितियों में होने के कारण वस्तु की उत्पादन लागत कम हो जाती है, जिससे उपभोक्ताओं को उत्तम वस्तुएँ कम कीमत पर देश में ही उपलब्ध हो जाती हैं। इससे उनके जीवन-स्तर में वृद्धि होती है।

7. उत्पादन व तकनीकी क्षमता में सुधार – विदेशी व्यापार के कारण देश के उद्योगपतियों को सदैव विदेशी प्रतियोगिता का भय बना रहता है। वे जानते हैं कि यदि वे उच्चकोटि का उत्पादन कम लागत पर न कर सके तो उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं की माँग कम हो जाएगी। अतः वे अपनी कार्यकुशलता एवं उत्पादन तकनीकी में सुधार करते रहते हैं।

8. एकाधिकारी प्रवृत्ति पर अंकुश – विदेशी प्रतियोगिता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में एकाधिकारी प्रवृत्ति पर अंकुश लगा रहता है, जिससे उपभोक्ता की एकाधिकारात्मक शोषण से रक्षा होती है।

9. कच्चे माल की उपलब्धि – विदेशी व्यापार के कारण विभिन्न देशों को आवश्यक कच्चा माल सरलता से उपलब्ध हो जाता है, जिससे देश के औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिलता है।

10. मूल्य-स्तर में समानता की प्रवृत्ति – विदेशी व्यापार के कारण विश्व के प्राय: सभी देशों में वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में समानता की प्रवृत्ति पायी जाती है।

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11. विदेशी विनिमय की उपलब्धि – विदेशी व्यापार विदेशी विनिमय को अर्जित करने का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन है।

12. आय की प्राप्ति – विदेशी व्यापार के कारण सरकार को भारी मात्रा में आयात व निर्यात कर लगाकर आय की प्राप्ति होती है।

भारत के विदेशी व्यापार (आयात-निर्यात) की दिशा

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के विदेशी व्यापार के स्वरूप में निम्नलिखित परिवर्तन हुए हैं –

  1. भारत का विदेशी व्यापार कॉमनवेल्थ देशों तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी हो गया है।
  2. स्वतन्त्रता के पूर्व भारत कच्चे पदार्थों (कृषि तथा खनिजों) का (UPBoardSolutions.com) निर्यातक देश था, किन्तु स्वतन्त्रता के बाद उसके निर्यातों में तैयार माल सम्मिलित हुए तथा उनमें विविधता आ गयी।
  3. स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में पर्याप्त अन्नोत्पादन होता था, किन्तु देश के विभाजन के बाद गेहूँ तथा चावल के बड़े उत्पादक क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाने से भारत को अन्न का आयात करना पड़ा।
  4. खाद्य एवं कृषिगत पदार्थ भारत के परम्परागत निर्यात पदार्थ रहे हैं, किन्तु अब भारत मशीनरी, सूती वस्त्र, सिले-सिलाये वस्त्र, हस्तनिर्मित वस्तुओं आदि का भी निर्यात करने लगा है।

भारतीय निर्यातों का आधे से अधिक भाग पश्चिमी यूरोप के विकसित देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान को, लगभग एक-तिहाई भाग पूर्वी यूरोप तथा अन्य विकासशील देशों को और केवल एक छोटा-सा भाग मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों को जाता है। भारत के निर्यातों में रूस और जापान का महत्त्व बढ़ा है तथा ब्रिटेन का एकाधिकार समाप्त हो गया है। भारत का अपने पड़ोसी देशों से व्यापार कम होता जा रहा है तथा पूर्व साम्यवादी देशों-पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया व रूस से बढ़ा है। भारत जिन देशों को निर्यात करता है, क्रमानुसार उनके नाम हैं—सं० रा० अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, इटली, सऊदी अरब, इराक, कुवैत, हॉलैण्ड, ईरान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया आदि।

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भारतीय आयातों का आधे से अधिक भाग विकसित देशों से होता है। एक-चौथाई भाग पूर्वी यूरोपीय देशों एवं अन्य विकसित देशों से और एक बहुत बड़ा भाग (20%) मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों से होता है। भारत के आयात में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, पश्चिमी जर्मनी, कनाडा तथा जापान से होने वाले आयातों में विशेष वृद्धि हुई है। भारत के आयातों में ब्रिटेन का एकाधिकार समाप्त हो गया है और कुछ नये देशों; जैसे-ईरान और अन्य पूर्व (UPBoardSolutions.com) साम्यवादी देशों के साथ व्यापार बढ़ा है। भारत जिन देशों से आयात करता है, क्रमानुसार उनके नाम हैं—सं० रा० अमेरिका, जापान, सऊदी अरब, इराक, रूस, जर्मनी, ईरान, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, कुवैत आदि।

प्रश्न 3.
भारत के प्रमुख आयातों का उल्लेख कीजिए। [2018]
या
भारत के आयात की चार प्रमुख मदें लिखिए।
उत्तर :

भारत के प्रमुख आयात

भारत विश्व के 140 देशों से 6,000 से अधिक वस्तुओं का आयात करता है। देश की विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकता के अनुरूप आयातों में भी भारी वृद्धि दर्ज हुई है। देश में आयात किये जाने वाले प्रमुख पदार्थ निम्नलिखित हैं –

1. पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पाद – भारत के आयात में पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पादों का विशिष्ट स्थान है। यह आयात बहरीन, फ्रांस, इटली, अरब, सिंगापुर, संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरान, इण्डोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, मैक्सिको, अल्जीरिया, म्यांमार, इराक, रूस आदि देशों से किया जाता है।

2. मशीनें – देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए भारी मात्रा में मशीनों का आयात किया जा रहा है। इनमें विद्युत मशीनों का आयात सबसे अधिक किया जाता है। इसके अतिरिक्त सूती वस्त्र उद्योग, कृषि, बुल्डोजर, शीत भण्डारण, चमड़ा, चाय एवं चीनी उद्योग, वायु-सम्पीडक, खनिज आदि अनेक प्रकार के उद्योगों से सम्बन्धित मशीनों का आयात ब्रिटेन, जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम, फ्रांस, जापान, कनाडा, चेक तथा स्लोवाक गणतन्त्र देशों से किया जाता है।

3. कपास एवं रद्दी रुई – भारत में उत्तम सूती वस्त्र तैयार करने के लिए लम्बे रेशे वाली कपास तथा विभिन्न प्रकार के कपड़ों के लिए रद्दी रुई विदेशों से आयात की जाती है। यह कपास एवं रुई मित्र, संयुक्त राज्य अमेरिका, तंजानिया, कीनिया, सूडान, पीरू, (UPBoardSolutions.com) पाकिस्तान आदि देशों से मँगवायी जाती है।

4. अलौह धातुएँ, लोहे तथा इस्पात का सामान – इन वस्तुओं का कुल आयातित माल में दूसरा स्थान है। ऐलुमिनियम, पीतल, ताँबा, काँसा, सीसा, जस्ता, टिन आदि धातुएँ विदेशों से अधिक मात्रा में मँगवायी जाती हैं। इन वस्तुओं का आयात प्रायः ब्रिटेन, कनाडा, स्विट्जरलैण्ड, स्वीडन, संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम, कांगो गणतन्त्र, मोजाम्बिक, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, रोडेशिया, जापान आदि देशों से किया जाता है।

5. उर्वरक एवं रसायन – अनेक रासायनिक उद्योगों के लिए रासायनिक कच्चे माल तथा उर्वरक आयात, किये जाते हैं। भारत में कृषि के विकास के लिए उर्वरकों की बहुत आवश्यकता है; क्योंकि देश में इनका उत्पादन यथेष्ट मात्रा में नहीं होता है। भारत इनको आयात संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, कनाडा आदि देशों से करता है।

6. खाद्यान्न एवं अन्य उत्पाद – अतिशय जनसंख्या तथा कुछ वर्षों में प्रतिकूल मौसम के कारण देश में खाद्यान्नों की कमी हो गयी है, जिससे देश को भारी मात्रा में इनका आयात करना पड़ा है। अमेरिका, कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया खाद्यान्नों (मुख्यतः गेहूँ) के आयात के प्रमुख स्रोत हैं। खाद्यान्नों के अतिरिक्त भारत के द्वारा विदेशों से मोती तथा मूल्यवान व विकल्प रत्न भी मँगवाये जाते हैं एवं खाद्य तेल, कागज व गत्ता या लुगदी, कृत्रिम रेशे तथा औषधियों का आयात किया जाता है।

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प्रश्न 4.
भारत के प्रमुख निर्यातों का उल्लेख कीजिए। [2017, 18]
या
भारत से निर्यात की जाने वाली किन्हीं तीन प्रमुख वस्तुओं का उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर :

भारत के प्रमुख निर्यात

भारत एक विकासशील देश है। इसके निर्यातों में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह 190 देशों को 7,500 वस्तुओं का निर्यात करता है, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं –

1. जूट का सामान – भारत के निर्यात व्यापार में जूट का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि इसके निर्यात से विदेशी मुद्रा का 35% भाग प्राप्त होता है। इससे निर्मित बोरे, टाट, मोटे कालीन, फर्श, गलीचे, रस्से, तिरपाल आदि निर्यात किये जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, (UPBoardSolutions.com) ब्रिटेन, अर्जेण्टाइना, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, अरब गणराज्य इसके मुख्य ग्राहक हैं। पच्चीस वर्ष पूर्व तक इसी के निर्यात को प्रथम स्थान प्राप्त था, किन्तु अब दूसरी वस्तुओं का निर्यात अधिक होने लगा है।

2. चाय – भारत द्वारा अपनी कुल चाय का 59% भाग ब्रिटेन को निर्यात किया जाता हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका (4%), रूस (12%), कनाडा (3%), ईरान (1%), अरब गणराज्य (6%), नीदरलैण्ड (2%) तथा सूडान एवं जर्मनी इसके अन्य प्रमुख ग्राहक हैं।

3. खालें, चमड़ा व चमड़े की वस्तुएँ – भारतीय चमड़े की माँग मुख्यत: ब्रिटेन (45%), जर्मनी (10%), फ्रांस (7%) एवं संयुक्त राज्य अमेरिका (9%) देशों में रहती है। अन्य ग्राहकों. में इटली, जापान, बेल्जियम और यूगोस्लाविया आदि देश हैं। भारत के निर्यात व्यापार की यह भी एक महत्त्वपूर्ण मंद है।

4. तम्बाकू – भारत द्वारा ब्रिटेन, जापान, पाकिस्तान, अदन, चीन, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों को तम्बाकू को निर्यात किया जाता है। भारत तम्बाकू के निर्यात से लगभग ₹ 1,000 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त करता है।

5. रसायन, मछली एवं समुद्री उत्पाद – भारत अमेरिका आदि देशों को प्रॉन, श्रिम्प आदि लोकप्रिय मछली किस्मों तथा अन्य समुद्री उत्पादों का निर्यात करता है। इनके अतिरिक्त भारत द्वारा रसायन, उससे सम्बद्ध उत्पाद, भेषज व प्रसाधन सामग्री का भी निर्यात किया जाता है।

6. खनिज पदार्थ – भारत अभ्रक, मैंगनीज तथा लौह-अयस्क का निर्यात करता है। अमेरिका तथा जर्मनी भारतीय अभ्रक के प्रमुख ग्राहक हैं। लौह धातु का निर्यात मुख्यतः जापान को किया जाता है।

7. सूती वस्त्र – भारत अपने सूती वस्त्रों का निर्यात इंग्लैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, मलाया, म्यांमार, अदन, इथोपिया, सूडान, अफगानिस्तान, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों को करता है। इस क्षेत्र में जापान एवं चीन भारत से प्रतिस्पर्धा करने वाले देश हैं। अत: इसके निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार ने निर्यात प्रोत्साहन परिषद् की स्थापना की है।

8. इंजीनियरिंग का सामान – भारत ने इंजीनियरिंग के सामान का निर्यात करना भी प्रारम्भ कर दिया है। इसके अन्तर्गत मोटरें, रेल के डिब्बे, बिजली के पंखे, सिलाई की मशीनें, टेलीफोन, विद्युत उपकरण आदि प्रमुख हैं। भारत इन वस्तुओं का निर्यात-रूस, (UPBoardSolutions.com) अमेरिका, हंगरी, श्रीलंका, इराक आदि देशों को करता है।

9. मसाले – भारत अमेरिका तथा यूरोपीय देशों को मसाले का निर्यात करता है।

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10. आभूषण, रत्न एवं जवाहरात – भारत से स्वर्ण आभूषण, रत्नों तथा जवाहरातों के निर्यात भी किये जाते हैं।

प्रश्न 5.
व्यापार से क्या आशय है? ये कितने प्रकार के होते हैं? भारत के विदेशी व्यापार की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
भारत के विदेशी व्यापार की किन्हीं दो अभिवन प्रवृत्तियों की व्याख्या कीजिए। [2018]
उत्तर :
दो पक्षों के मध्य वस्तुओं के ऐच्छिक, पारस्परिक एवं वैधानिक लेन-देन को व्यापार कहते हैं। एक देश के व्यापार को दो भागों में बाँटा जा सकता है-घरेलू व विदेशी। जब किसी देश के विभिन्न स्थानों, प्रदेशों अथवा क्षेत्रों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय होता है, तो इसे आन्तरिक, घरेलू अथवा अन्तक्षेत्रीय व्यापार कहते हैं और जब विभिन्न राष्ट्रों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय होता है, तो इसे विदेशी, बाह्य अथवा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं। इस प्रकार विदेशी व्यापार से हमारा अभिप्राय विभिन्न राष्ट्रों के मध्य होने वाले व्यापार से है।

विदेशी व्यापार की विशेषताएँ – [संकेत-इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।

प्रश्न 6.
भारत की आयात-निर्यात नीति पर एक लेख लिखिए।
या
भारत की नवीन आयात-निर्यात नीति की चार विशेषताएँ लिखिए।
या
भारत के निर्यात में वृद्धि कैसे की जा सकती है? कोई दो सुझाव दीजिए। [2013]
या
भारत के विदेशी व्यापार की किन्हीं दो अभिनव प्रवृत्तियों की व्याख्यान कीजिए। [2018]
उत्तर :
भारत का आयात दो वित्तीय वर्षों को छोड़कर सदैव निर्यात से अधिक रहा है। इसलिए भारत का विदेशी व्यापार सन्तुलन भी प्रतिकूल ही रहा है। इस प्रतिकूलता को कम करने के लिए ही सरकार आयात-निर्यात नीति की घोषणा करती है, जिसका उद्देश्य आयातों को नियन्त्रित करना और निर्यातों को प्रोत्साहित करना होता है। आयात-निर्यात नीति, 1997-2002 ई० का उद्देश्य गत नीतियों की उपलब्धियों को सुदृढ़ करना और उदारीकरण की प्रक्रिया को आगे ले जाना था। कार्य-प्रणाली को सुचारु और सरल बनाने, परिमाणात्मक प्रतिबन्धों को चरणबद्ध तरीके से हटाने और निर्यातक समुदाय के लिए अनुकूल (UPBoardSolutions.com) वातावरण तैयार करने हेतु ठोस उपाय अपनाये गये तथा सभी मामलों में निर्यात सम्बन्धी अनिवार्यता को पूरा करने की अवधि बढ़ाकर 8 वर्ष कर दी गयी।

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शुल्क में छूट दिये जाने की योजना का विस्तार किया गया है जिससे इसमें निर्यात पश्चात् निःशुल्क पुन:पूर्ति लाइसेन्स-योजना को सम्मिलित किया जा सके। निर्यात पूर्व डी०ई०पी०बी० योजना समाप्त कर दी गयी है। निर्यात पश्चात् डी०ई०पी०बी० योजना अभी चल रही है, किन्तु इसकी दरों को युक्तिसंगत बनाया गया है। इसी प्रकार विश्वसनीय निर्यात लाभों को भी युक्तिसंगत बनाया गया है। निर्यातों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रतिबन्धों में ढील दी गयी है, बुनियादी सुविधाओं में सुधार लाने की घोषणा की गयी है तथा सभी निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों को मुक्त व्यापार क्षेत्र में बदल दिया गया है। इस प्रकार भारत की आयात-निर्यात नीति में निरन्तर संशोधन किये जा रहे हैं। इसी प्रकार अब पूँजीगत सामान, कच्चा माल, मध्यवर्ती माले, घटक सामान, उपभोज्य वस्तुएँ, कलपुर्जे, सहायक पुजें, औजार और अन्य सामान बिना किसी प्रतिबन्ध के आयात किये जा सकते हैं, बशर्ते कि ऐसा सामान आयात निषेध सूची में सम्मिलित न हो।

भारत ने 1 अप्रैल, 2001 ई० को अपनी नयी विदेशी व्यापार नीति की घोषणा की। नयी व्यापार नीति का उद्देश्य है कि निर्यातक लोग लालफीताशाही, जटिल प्रक्रियाओं और मनमाने निर्णयों से मुक्त होकर उत्पादन, निर्यात वृद्धि, बाजार और व्यापार पर ध्यान दें।

नयी विदेशी व्यापार नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं –

सरकार ने निर्यात की मात्रा में 20% वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया है। सात सौ चौदह वस्तुओं के आयात को अप्रैल, 2000 से तथा 715 वस्तुओं के आयात को अप्रैल, 2001 से कोटा पाबन्दी से मुक्त कर दिया है। निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 5 हजार से अधिक वस्तुओं को निर्यात-शुल्क से मुक्त करने और उनके लिए निर्यात लाइसेन्स खत्म करने का निश्चय किया है। सरकार का कहना है कि चीन की तरह उदार निवेश की व्यवस्था वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र देश में स्थापित किये जाएँगे तथा रत्न, आभूषण, कृषि रसायनों, जैव औषधियों, चमड़ा, सिले हुए वस्त्रों, रेशम और ग्रेनाइट क्षेत्र में निर्यात को बढ़ावा देने के विशेष प्रयास किये जाएँगे। तटकर आयोग को मजबूत बनाया जाएगा।

नयी विदेश व्यापार-नीति देश को उदारीकरण और बाजार-व्यवस्था के लिए (UPBoardSolutions.com) तैयार कर देश को आर्थिक मजबूती प्रदान करेगी।

प्रश्न 7.
भारत के विदेशी व्यापार की संरचना लिखिए।
उत्तर :

विदेशी व्यापार की संरचना

(i) आयात संरचना – भारत की आयात संरचना में तीन प्रकार की वस्तुएँ सम्मिलित हैं –

  1. पूँजी वस्तुएँ; जैसे—मशीन, धातुएँ, अलौह धातुएँ, परिवहन साधन।
  2. कच्चा माल; जैसे-खनिज तेल, कपास, जूट तथा रासायनिक पदार्थ।
  3. उपभोक्ता वस्तुएँ; जैसे-खाद्यान्न, विद्युत उपकरण, औषधियाँ, वस्त्र, कागज आदि।

योजनाकाल में आयात संरचना में निम्नलिखित परिवर्तन हुए हैं –

  1. इस्पात, खनिज तेल वे रासायनिक पदार्थों के आयात में तेजी से वृद्धि हुई है।
  2. मशीनों के आयात में वृद्धि-दर बढ़ी है।
  3. खाद्यान्नों के आयात में कमी हुई है।

(ii) निर्यात संरचना – भारत की निर्यात संरचना में चार प्रकार की वस्तुएँ सम्मिलित हैं –

  1. खाद्यान्न; जैसे—अनाज, चाय, तम्बाकू, कॉफी, मसाले, काजू आदि।
  2. कच्चा माल जैसे—खालें, चमड़ा, ऊन, रुई, कच्चा लोहा, मैंगनीज, खनिज पदार्थ, हीरे-जवाहरात आदि।
  3. निर्मित वस्तुएँ; जैसे-जूट का सामान, कपड़ा, चमड़े का सामान, रेशम के वस्त्र, तैयार कपड़े, सीमेण्ट, रसायन, खेल का सामान, जूते आदि।
  4. पूँजीगत वस्तुएँ; जैसे-मशीनें, परिवहन उपकरण, लोहा-इस्पात, इन्जीनियरिंग वस्तुएँ, सिलाई मशीन आदि।

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योजनाकाल में निर्यात संरचना में निम्नलिखित परिवर्तन हुए हैं

  1. पटसन, वस्त्र, चाय, कच्ची धातु, काजू तथा तम्बाकू आदि परम्परागत वस्तुओं के निर्यात में निरन्तर वृद्धि हुई है।
  2. तम्बाकू, मसाले, अभ्रक, आदि के निर्यात में कमी हुई है।
  3. वनस्पति तेल, गोंद तथा रुई आदि के निर्यात में कमी हुई है।
  4. चमड़ा और चमड़े से बनी वस्तुएँ, खेल का सामान और परियोजनागत सामान के निर्यात की प्रगति में कमी आई है।
  5. गत कुछ वर्षों में निर्मित वस्तुओं के निर्यात में आशातीत वृद्धि हुई है। (UPBoardSolutions.com) इनमें चमड़ा तथा उससे बने माल लोहा और इस्पात, रसायन और इन्जीनियरिंग का समान, शक्कर और हस्तशिल्प का सामान मुख्य हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेशी व्यापार से आप क्या समझते हैं? इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।
या
विदेशी व्यापार से होने वाले चार लाभ बताइए।
या
भारत के आर्थिक विकास में विदेशी व्यापार के कोई दो योगदान बताइए।
उत्तर :

विदेशी व्यापार

व्यापार मुख्यत: दो प्रकार का होता है—(1) देशी व्यापार तथा (2) विदेशी व्यापार। विदेशी व्यापार का अर्थ उस व्यापार से है, जिसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक राष्ट्रों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय किया जाता है; उदाहरणार्थ, यदि हम इंग्लैण्ड से मशीनें आयात करें या ऑस्ट्रेलिया को खेल का सामान निर्यात करें, तो इन दोनों को ही विदेशी व्यापार कहा जाएगा।
[संकेत – विदेशी व्यापार के महत्त्व के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 2 देखें।]

प्रश्न 2.
आयात-निर्यात को स्पष्ट कीजिए तथा उनके एक-एक उदाहरण भारतीय सन्दर्भ में लिखिए।
उत्तर :
देश की आर्थिक समृद्धि एवं विकास आयात-निर्यात पर निर्भर करता है। जब दों या अधिक देश पारस्परिक रूप से वस्तुओं का आयात-निर्यात करते हैं तो इसे विदेशी व्यापार कहते हैं। आयात एवं निर्यात को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है –

आयात – जब कोई देश अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ अन्य देश से मँगाता है, तो इसे आयात कहा जाता है। इस प्रकार कोई भी देश किसी वस्तु का आयात इसलिए करता है कि या तो अमुक वस्तु का उत्पादन उस देश में नहीं किया जाता अथवा उसकी उत्पादन (UPBoardSolutions.com) लागत उसके आयात मूल्य से अधिक पड़ती है। उदाहरण के लिए–भारत विदेशों से पेट्रोलियम का आयात करता है।

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निर्यात – ज़ब कोई देश अपने अधिकतम उत्पादन को अन्य देश को भेजता है, तो उसे निर्यात कहा जाता है। इस प्रकार किसी वस्तु का निर्यात इसलिए किया जाता है कि उस देश में उत्पन्न की गयी उस अतिरिक्त उत्पादित वस्तु की माँग विदेशों में है तथा उसे निर्यात करके विदेशी मुद्रा प्राप्त की जा सकती है। उदाहरण के लिए-भारत द्वारा चाय विदेशों को भेजना निर्यात है।

स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारत का विदेशी व्यापार परम्परागत तथा कृषि प्रधान देश की भाँति था। परन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् हुए औद्योगिक विकास ने भारत के विदेशी व्यापार के स्वरूप को काफी हद तक प्रभावित किया है। वर्तमान में भारत की निर्यात-सूची में 500 से अधिक वस्तुएँ हैं।

देश की औद्योगिक विकास की गति तीव्र होने से आयातों में भारी वृद्धि हुई है। साथ ही आयातों की प्रकृति भी बदलती है। अब मुख्य रूप से मशीनों, दुर्लभ कच्चे माल, तेल, रासायनिक पदार्थ आदि वस्तुओं का आयात होता है। निर्यात की तुलना में आयात अधिक होने के कारण भारत का व्यापार-सन्तुलन प्रतिकूल रहता है।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता के बाद भारत में निर्यात की प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के निर्यातों में वृद्धि हुई है, किन्तु आयातों की तुलना में वृद्धि की दर धीमी रही है। निर्यात की मुख्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. योजना काल में निर्यातों में भारी वृद्धि हुई है और विविधता आयी है।
  2. हमारे निर्यातों में परम्परागत वस्तुओं व कच्चे माल के स्थान पर निर्मित वस्तुओं का निर्यात बढ़ा है।
  3. निर्यात की जाने वाली मुख्य वस्तुएँ हैं-जूट का सामान, सूती वस्त्र, चाय, (UPBoardSolutions.com) खनिज पदार्थ, तम्बाकू, खाल और चमड़ा, तिलहन, चीनी, मसाले व इंजीनियरिंग का सामान।
  4. सर्वाधिक निर्यात एशिया व ओसोनिया देशों को किये जाते हैं।

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प्रश्न 4
अन्तर्राष्ट्रीय एवं देशीय व्यापार के दो अन्तरों को स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
विदेशी व्यापार और आन्तरिक व्यापार में अन्तर बताइए। [2010, 11]
या
राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अन्तर बताइट। [2016]
उत्तर :
अन्तर्राष्ट्रीय और देशीय व्यापार के दो अन्तर निम्नलिखित हैं –

  • जब किसी देश के विभिन्न स्थानों, प्रदेशों अथवा क्षेत्रों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय होता है तो उसे देशीय व्यापार कहते हैं और जब विभिन्न राष्ट्रों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय होता है तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहते हैं।
  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के दो अंग हैं—आयात और निर्यात। आयात के लिए विदेशी मुद्रा प्रदान करनी होती है और निर्यात करने पर विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है; जब कि देशीय व्यापार में अपने देश की मुद्रा ही प्रयुक्त होती है। इसमें विदेशी मुद्रा का कोई लेन-देन नहीं होता।

प्रश्न 5.
भारत के विदेशी व्यापार की दिशा में क्या मुख्य परिवर्तन हुए हैं?
या
स्वाधीनता के बाद भारत के विदेशी व्यापार के स्वरूप में होने वाले परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर :
स्वतन्त्रता के बाद भारत के विदेशी व्यापार के स्वरूप में निम्नलिखित परिवर्तन हुए हैं –

  1. भारत का विदेशी व्यापार कॉमनवेल्थ देशों तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी हो गया है।
  2. स्वतन्त्रता के पूर्व भारत कच्चे पदार्थों (कृषि तथा खनिजों) का निर्यातक देश था, किन्तु स्वतन्त्रता के बाद उसके निर्यातों में तैयार माल सम्मिलित हुए तथा उनमें विविधता आ गई।
  3. स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में पर्याप्त अन्नोत्पादन होता था, किन्तु (UPBoardSolutions.com) देश के विभाजन के बाद गेहूँ तथा चावल के बड़े उत्पादक क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाने से भारत को अन्न का आयात करना पड़ा।
  4. खाद्य एवं कृषिगत पदार्थ भारत के परम्परागत निर्यात पदार्थ रहे हैं, किन्तु अब भारत मशीनरी, सूती – वस्त्र, सिले-सिलाये वस्त्र, हस्तनिर्मित वस्तुओं आदि का भी निर्यात करने लगा है।

भारतीय निर्यातों का आधे से अधिक भाग पश्चिमी यूरोप के विकसित देशों संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जापान को, लगभग एक-तिहाई भाग पूर्वी यूरोप तथा अन्य विकासशील देशों को और केवल एक छोटा-सा भाग मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों को जाता है। भारत के निर्यातों में रूस और जापान का महत्त्व बढ़ा है तथा ब्रिटेन का एकाधिकार समाप्त हो गया है। भारत का अपने पड़ोसी देशों से व्यापार कम होता जा रहा है तथा पूर्व साम्यवादी देशों-पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया व रूस से बढ़ा है। भारत जिन देशों को निर्यात करता है, क्रमानुसार उनके नाम हैं—सं० रा० अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, इटली, सऊदी अरब, इराक, कुवैत, हॉलैण्ड, ईरान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया आदि।

प्रश्न 6.
विदेशी व्यापार के अनुकूल प्रभाव क्या होते हैं ?
उत्तर :
विदेशी व्यापार के प्रमुख अनुकूल प्रभाव निम्नवत् हैं –

  1. विदेशी व्यापार भारत के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करता है, जो विदेशों से लिये हुए ऋणों तथा ब्याजों की अदायगी में काम आती है।
  2. विदेशी व्यापार से भारतीयों के जीवन-स्तर में वृद्धि होती है।
  3. भारत शेष संसार से लाभदायक ढंग से उन वस्तुओं को खरीद सकता है जिनका अपने ही देश में उत्पादन करने पर लागत अधिक आती है, उसकी तुलना में वे विश्व व्यापार में सस्ती उपलब्ध रहती हैं। इन वस्तुओं के उपभोग से लोगों के जीवन-स्तर एवं आर्थिक कल्याण में वृद्धि होती है।
  4. भारत शेष संसार को उन वस्तुओं की बिक्री कर सकता है, जिनका वह (UPBoardSolutions.com) अधिक सफलता से अर्थात् दूसरे देशों की तुलना में सस्ता उत्पादन कर सकता है। इस प्रकार विदेशी व्यापार की क्रियाएँ भौगोलिक श्रम-विभाजन को सम्भव बनाती हैं।
  5. आयातों के द्वारा भारत अनिवार्य वस्तुओं की किसी भी कमी को पूरा कर सकता है।
  6. भारत दूसरे देशों से उन पूँजीगत वस्तुओं को मँगवा सकता है जिन वस्तुओं का वह बिल्कुल उत्पादन नहीं कर सकता अथवा बहुत कुशलता से उत्पादन नहीं कर सकता।

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प्रश्न 7.
भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार का क्या महत्त्व या लाभ है?
उत्तर :
भारत के लिए विदेशी व्यापार के महत्त्व या लाभ निम्नलिखित हैं –

1. प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग – एक देश ऐसे उद्योगों की स्थापना एवं संचालन करता है, जिनसे उसे अधिकतम तुलनात्मक लाभ प्राप्त होता है और उस बाजार (देश) में वह अपनी उत्पादित वस्तुओं को बेचता है, जहाँ उसे वस्तुओं का सबसे अधिक मूल्य मिलता है। फलस्वरूप वह उपलब्ध प्राकृतिक संसाधानों को सर्वोत्तम उपयोग करता है।

2. औद्योगीकरण को प्रोत्साहन – विदेशी व्यापार के माध्यम से देश में उद्योग-धन्धों को विकसित करने के लिए आवश्यक उपकरण, कच्चा माल व तकनीकी ज्ञान सरलता से उपलब्ध हो जाते हैं। फलतः देश में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

3. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग एवं सदभावना में वृद्धि – विदेश व्यापार के (UPBoardSolutions.com) फलस्वरूप विभिन्न देशों के नागरिक एक-दूसरे के निकट सम्पर्क में आते हैं और एक-दूसरे के विचारों एवं दृष्टिकोणों से परिचित होते हैं। फलस्वरूप सांस्कृतिक सहयोग एवं परस्पर विश्वास में वृद्धि होती है।

प्रश्न 8.
निर्यात व्यापार से आप क्या समझते हैं? भारत की चार प्रमुख निर्यात की वस्तुओं का उल्लेख कीजिए। [2014, 18]
उत्तर :
निर्यात व्यापार–किसी देश द्वारा अपने देश से दूसरे देशों को वस्तुएँ बेचने का व्यापार निर्यात व्यापार कहलाता है।

भारत देश की चार प्रमुख निर्यात की वस्तुएँ निम्नवत् हैं –

  1. चाय
  2. तम्बाकू
  3. सूती वस्त्र
  4. चमड़ा व चमड़े से बनी वस्तुएँ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेशी व्यापार का क्या अर्थ है ? [2014]
या
विदेशी व्यापार से आप क्या समझते हैं ? [2010, 11, 18]
या
विदेशी व्यापार को स्पष्ट कीजिए। [2015]
उत्तर :
जब दो या दो से अधिक देश परस्पर एक-दूसरे की वस्तुओं या सेवाओं का क्रय-विक्रय करते हैं तब इसे विदेशी व्यापार कहते हैं।

प्रश्न 2.
व्यापार सन्तुलन का क्या अर्थ है?
उत्तर :
यदि निर्यात आयातों से अधिक होते हैं तो देश का व्यापार-शेष ‘अनुकूल’ होता है। यदि आयात निर्यातों से अधिक होते हैं तो व्यापार-शेष प्रतिकूल’ होता है। यदि निर्यात और आयात बराबर होते हैं तो व्यापार-शेष सन्तुलित होता है। इसी को (UPBoardSolutions.com) व्यापार सन्तुलन भी कहते हैं।

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प्रश्न 3.
भारत के आयात की किन्हीं चार वस्तुओं के नामों का उल्लेख कीजिए। [2010, 11, 14, 16, 18]
उत्तर :
भारत के आयात की चार वस्तुओं के नाम हैं –

  1. खनिज तेल
  2. उर्वरक एवं रसायन
  3. मशीनें तथा
  4. धातुएँ; जैसे-टिन, पीतल, ताँबा।

प्रश्न 4.
भारत के विदेशी व्यापार को अनुकूल बनाने हेतु दो सुझाव दीजिए।
उत्तर :
भारत के विदेशी व्यापार को अनुकूल बनाने हेतु दो सुझाव इस प्रकार हैं-

  1. अधिकतम निर्यात किया जाना चाहिए तथा
  2. न्यूनतम आयात किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
भारत में निर्यात-वृद्धि के लिए दो सुझाव दीजिए। [2013]
उत्तर :
भारत में निर्यात वृद्धि के लिए दो सुझाव निम्नवत् हैं –

  1. प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति बढ़ाने के लिए (UPBoardSolutions.com) उत्पादन लागत घटायी जानी चाहिए।
  2. निर्यात वस्तुओं की किस्म में सुधार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 6.
आन्तरिक व्यापार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
जंब किसी देश के विभिन्न स्थानों, प्रदेशों अथवा क्षेत्रों के बीच वस्तुओं व सेवाओं का क्रय-विक्रय होता है, तो उसे आन्तरिक व्यापार करते हैं।

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प्रश्न 7.
विदेशी व्यापार के दो उद्देश्य लिखिए।
या
विदेशी व्यापार की आवश्यकताओं पर प्रकाश डालिए। [2015]
उत्तर :
विदेशी व्यापार के दो उद्देश्य निम्नवत् हैं –

  1. औद्योगीकरण को प्रोत्साहन देना।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग व सद्भावना में वृद्धि करना।

प्रश्न 8.
आयात एतं निर्यात का अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2015, 16]
उत्तर :
“आयात’ का अर्थ है-विदेशों से माल अपने देश (UPBoardSolutions.com) में मँगाना तथा “निर्यात का अर्थ है–विदेशों में अपने देश का माल भेजना।

प्रश्न 9.
भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार के दो लाभ लिखिए।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी व्यापार के दो लाभ इस प्रकार हैं –

  1. भारत की राष्ट्रीय आय और पूँजी–निर्माण में वृद्धि होती है तथा
  2. देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 10.
भारत से निर्यात की जाने वाली दो वस्तुओं के नाम लिखिए। [2010, 11, 16, 17]
उत्तर :
भारत से निर्यात की जाने वाली दो वस्तुएँ हैं –

  1. चाय तथा
  2. जूट का सामान।

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प्रश्न 11.
भारत के निर्यात व्यापार की दो समस्याएँ लिखिए।
उत्तर :

  1. कच्चे माल की अनुपलब्धता।
  2. हिमालय पर्वतीय अवरोध के समीपवर्ती (UPBoardSolutions.com) देशों एवं भारत के मध्य धरातलीय आवागमन की सुविधा उपलब्ध नहीं है।

प्रश्न 12.
भारत की दो निर्यात की जाने वाली परम्परागत तथा दो गैर-परम्परागत वस्तुओं के नाम लिखिए।
या
भारतीय निर्यात की किन्हीं दो प्रमुख वस्तुओं का उल्लेख कीजिए। [2010, 11, 16]
या
भारत के किन्हीं दो आयात तथा दो निर्यात वस्तुओं का उल्लेख कीजिए। [2015, 16]
उत्तर :
परम्परागत निर्यातक वस्तुएँ – चाय और जूट।
गैर-परम्परागत निर्यातक वस्तुएँ (UPBoardSolutions.com) – सिले वस्त्र, इंजीनियरिंग का सामान।

प्रश्न 13.
भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के नाम लिखिये।
उत्तर :
भारत से जूट का सामान, चाय, तम्बाकू, सूती वस्त्र, चमड़ा व चमड़े से बनी वस्तुएँ आदि निर्यात की जाती हैं।

प्रश्न 14.
भारत में आयात की जाने वाली मुख्य वस्तुएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :
भारत में पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पाद, मशीनें, कपास एवं रद्दी रुई, अलौह धातुएँ, लोहे तथा इस्पात का सामान आयात किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. कौन-सा ग्रुप भारत के आयात व्यापार को दर्शाता है?

(क) चाय, खाद्य तेल, तम्बाकू, पेट्रोलियम
(ख) पेट्रोलियम, जूट की वस्तुएँ, कपास, खाद्य तेल
(ग) रसायन, मशीनें, खाद्य तेल, पेट्रोलियम
(घ) रसायन, कपड़े की वस्तुएँ, जूट की वस्तुएँ, कपास

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2. भारत की प्रमुख आयातित वस्तु है।

(क) ऊनी मशीनें
(ख) सूती वस्त्र
(ग) खनिज तेल
(घ) जूट उत्पाद

3. वर्तमान में भारत के निर्यातों का अकेला सबसे बड़ा खरीदार है –

(क) सं० रा० अमेरिका
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) अफ्रीकी देश
(घ) तेल उत्पादक देश

4. व्यापार सन्तुलन किसे कहते हैं?

(क) आयात अधिक हो
(ख) निर्यात अधिक हो
(ग) आयात व निर्यात बराबर हों
(घ) आयात व निर्यात न हों।

5. निम्नलिखित में से कौन-से देश-समूह भारत के आयात में प्रमुख हिस्सा रखते हैं?

(क) अफ्रीकी देश
(ख) विकसित देश
(ग) दक्षिणी अमेरिका के देश
(घ) दक्षिण-पश्चिमी एशिया के देश

6. भारत के निर्यात व्यापार में कितने प्रतिशत हिस्सा विकसित देशों का है?

(क) 4%
(ख) 6%
(ग) 61%
(घ) 59%

7. विश्व व्यापार में भारत का कितना अंश है?

(क) 3.6%
(ख) 2.6%
(ग) 1.6%
(घ) 0.6%

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8. निम्नलिखित में से भारत की प्रमुख निर्यात वस्तु कौन-सी है? [2012]

(क) कागज
(ख) खनिज तेल
(ग) खाद्य तेल
(घ) जवाहरात व आभूषण

9. भारत का सर्वाधिक विदेशी व्यापार निम्नलिखित में से किस देश के साथ होता है?

(क) जापान
(ख) रूस
(ग) ब्रिटेन
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका

10. कौन-सा समूह भारत के निर्यात व्यापार को दर्शाता है? [2017]

(क) खनिज तेल, चाय, अभ्रक, खाद्य तेल
(ख) चाय, मशीनरी, खाद्य तेल, लौह-अयस्क
(ग) चाय, लौह-अयस्क, चमड़े की वस्तुएँ, अभ्रक
(घ) लौह-अयस्क, चाय, खनिज-तेल, मशीनरी

11. कौन-सा समूह भारत के आयात व्यापार को दर्शाता है?

(क) खनिज तेल, कच्चा जूट, चाय, लौह-अयस्क
(ख) अभ्रक, चाय, कच्चा जूट, खनिज तेल
(ग) चाय, लौह-अयस्क, खनिज तेल, खाद्य तेल
(घ) खनिज तेल, खाद्य तेल, कच्चा जूट, मशीनरी

12. निम्नलिखित में से भारत के आयातों में सर्वाधिक मूल्य किस वस्तु का है? [2017]

(क) कृषि पदार्थ
(ख) धातु एवं खनिज
(ग) विनिर्मित सामान
(घ) अशुद्ध तेल एवं उत्पाद

13. निम्नलिखित में से कौन-सी वस्तु भारत के निर्यात की वस्तु है? [2009, 13, 18]

(क) खनिज तेल
(ख) जूट निर्मित वस्तुएँ।
(ग) मशीनें
(घ) मशीनों के पुर्जे

14. अपने देश की सीमा के अन्दर व्यापार कहलाता है

(क) आन्तरिक व्यापार
(ख) विदेशी व्यापार
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं

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15. व्यापार घाटे को कम करने का उपाय है

(क) निर्यातों को बढ़ाना
(ख) आयातों को कम करना
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं

16. विदेशी व्यापार नीति लागू की गयी

(क) 1 अप्रैल, 2001 से
(ख) 1 अप्रैल, 2003 से
(ग) 1 अप्रैल, 1951 से
(घ) 1 अप्रैल, 2002 से

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17. भारत में निम्नलिखित वस्तुओं में से सबसे अधिक किस वस्तु का निर्यात किया जाता है? [2014, 17]

(क) मशीनरी
(ख) चाय
(ग) उर्वरक
(घ) खनिज तेल

18. निम्नलिखित में से किसका आयात भारत में किया जाता है? [2016]

(क) चाय
(ख) कॉफी
(ग) पेट्रोलियम
(घ) लौह-अयस्क

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 (Section 4)

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 8 are helpful to complete your homework.

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi सांस्कृतिक निबन्ध : राष्ट्रीय भावना

UP Board Solutions for Class 10 Hindi सांस्कृतिक निबन्ध : राष्ट्रीय भावना

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सांस्कृतिक निबन्ध : राष्ट्रीय भावना

1. स्वदेश-प्रेम [2010, 11, 12, 13, 14, 15, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी [2010]
  • देश-भक्ति/देश-प्रेम। [2011, 14]
  • जननी-जन्मभूमि प्रिय अपनी
  • राष्ट्र-प्रेम का महत्त्व [2016]
  • राष्ट्र की सुरक्षा में नवयुवकों का योगदान
  • हमारा प्यारा भारतवर्ष [2012, 13]
  • सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा [2016]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. देश-प्रेम की स्वाभाविकता,
  3. देश-प्रेम का अर्थ,
  4. देश-प्रेम का क्षेत्र,
  5. देश के प्रति हमारे कर्तव्य,
  6. भारतीयों को देश-प्रेम,
  7. उपसंहार।

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प्रस्तावना—ईश्वर द्वारा बनायी गयी सर्वाधिक अद्भुत रचना है ‘जननी’, जो नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतीक है, प्रेम का ही पर्याय है, स्नेह की मधुर बयार है, सुरक्षा का अटूट कवच है, संस्कारों के पौधों को ममता के जल से सींचने वाली चतुर (UPBoardSolutions.com) उद्यान-रक्षिका है, जिसका नाम प्रत्येक शीश को नमन के लिए झुक जाने को प्रेरित कर देता है। यही बात जन्मभूमि के विषय में भी सत्य है। इन दोनों का दुलार जिसने पा लिया उसे स्वर्ग का पूरा-पूरा अनुभव धरा पर ही हो गया। इसीलिए जननी और जन्मभूमि की महिमा को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया गया हैं।

देश-प्रेम की स्वाभाविकता–प्रत्येक देशवासी को अपने देश से अनुपम प्रेम होता है। अपना देश चाहे बर्फ से ढका हुआ हो, चाहे गर्म रेत से भरा हुआ हो, चाहे ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा हुआ हो, वह सबके लिए प्रिय होता है। इस सम्बन्ध में रामनरेश त्रिपाठी की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं

विषुवत रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।।
रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृभूमि पर ॥
ध्रुववासी जो हिम में तम में, जी लेता है काँप-काँप कर।।
वह भी अपनी मातृभूमि पर, कर देता है प्राण निछावर ॥

प्रात:काल के समय पक्षी भोजन-पानी के लिए कलरव करते हुए दूर स्थानों पर चले तो जाते हैं, परन्तु सायंकाल होते ही एक विशेष उमंग और उत्साह के साथ अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं। जब पशु-पक्षियों को अपने घर से, अपनी मातृभूमि से इतना प्यार हो सकता है तो भला मानव को अपनी जन्मभूमि से, अपने देश से क्यों प्यार नहीं होगा? कहा भी गया है कि माता और जन्मभूमि की तुलना में स्वर्ग का सुख भी तुच्छ है

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

देश-प्रेम को अर्थ-देश-प्रेम का तात्पर्य है-देश में रहने वाले जड़-चेतन सभी से प्रेम, देश की सभी संस्थाओं से प्रेम, देश के रहन-सहन, रीति-रिवाज, वेशभूषा से प्रेम, देश के सभी धर्मों, मतों, भूमि, पर्वत, नदी, वन, तृण, लता सभी से प्रेम और अपनत्व रखना, उन सबके प्रति गर्व की अनुभूति करना। सच्चे देश-प्रेमी के लिए देश का कण-कण पावन और पूज्य होता है

सच्चा प्रेम वही है, जिसकी तृप्ति आत्मबलि पर हो निर्भर।
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर ॥
देश-प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित।
आत्मा के विकास से, जिसमें मानवता होती है विकसित ॥

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सच्चा देश-प्रेमी वही होता है, जो देश के लिए नि:स्वार्थ भावना से बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकता है। स्वदेशी वस्तुओं का स्वयं उपयोग करता है और दूसरों को उनके उपयोग के लिए प्रेरित करता है। सच्चा देशभक्त उत्साही, सत्यवादी, महत्त्वाकांक्षी (UPBoardSolutions.com) और कर्तव्य की भावना से प्रेरित होता है।

देश-प्रेम का क्षेत्र-देश-प्रेम का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति देशभक्ति की भावना प्रदर्शित कर सकता है। सैनिक युद्ध-भूमि में प्राणों की बाजी लगाकर, राज-नेता राष्ट्र के उत्थान का मार्ग प्रशस्त कर, समाज-सुधारक समाज का नवनिर्माण करके, धार्मिक नेता मानव-धर्म का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके, साहित्यकार राष्ट्रीय चेतना और जन-जागरण का स्वर फेंककर, कर्मचारी, श्रमिक एवं किसान निष्ठापूर्वक अपने दायित्व का निर्वाह करके, व्यापारी मुनाफाखोरी व तस्करी का त्याग कर अपनी देशभक्ति की भावना को प्रदर्शित कर सकता है।

देश के प्रति हमारे कर्तव्य-जिस देश में हमने जन्म लिया है, जिसका अन्न खाकर और अमृत के समान जल पीकर, सुखद वायु का सेवन कर हम बलवान् हुए हैं, जिसकी मिट्टी में खेल-कूदकर हमने पुष्ट शरीर प्राप्त किया है, उस देश के प्रति हमारे अनन्त कर्तव्य हैं। हमें अपने प्रिय देश के लिए कर्तव्यपालन और त्याग की भावना से श्रद्धा, सेवा एवं प्रेम रखना चाहिए। हमें अपने देश की एक इंच भूमि के लिए तथा उसके सम्मान और गौरव के लिए प्राणों की बाजी लगा देनी चाहिए। यह सब करने पर भी जन्मभूमि या अपने देश के ऋण से हम कभी भी उऋण नहीं हो सकते।

भारतीयों का देश-प्रेम-भारत माँ ने ऐसे असंख्य नर-रत्नों को जन्म दिया है, जिन्होंने असीम त्याग-भावना से प्रेरित होकर हँसते-हँसते मातृभूमि पर अपने प्राण अर्पित कर दिये। अनेकानेक वीरों ने अपने अद्भुत शौर्य से शत्रुओं के दाँत खट्टे किये हैं। वन-वन भटकने वाले महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, परन्तु मातृभूमि के शत्रुओं के सामने कभी मस्तक नहीं झुकाया। शिवाजी ने देश और मातृभूमि की सुरक्षा के लिए गुफाओं में छिपकर शत्रु से टक्कर ली और रानी लक्ष्मीबाई ने महलों के सुखों को त्यागकर शत्रुओं से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त की। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक उल्ला खाँ (UPBoardSolutions.com) आदि न जाने कितने देशभक्तों ने विदेशियों की अनेक यातनाएँ सहते हुए, मुख से ‘वन्देमातरम्’ कहते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को चूम लिया।

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उपसंहार-खेद का विषय है कि आज हमारे नागरिकों में देश-प्रेम की भावना अत्यन्त दुर्लभ होती जा रही है। हमारी पुस्तकें भले ही राष्ट्र प्रेम की गाथाएँ पाठ्य-सामग्री में सँजोये रहें, परन्तु वास्तव में नागरिकों के हृदय में गहरा व सच्चा राष्ट्र-प्रेम ढूंढ़ने पर भी उपलब्ध नहीं होता।

प्रत्येक देशवासी को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके देश भारत की देशरूपी बगिया में राज्यरूपी अनेक क्यारियाँ हैं। जिस प्रकार एक माली अपने उपवन की सभी क्यारियों की देखभाल समान भाव से करता है उसी प्रकार हमें भी देश के सर्वांगीण विकास का प्रयास करना चाहिए।

स्वदेश-प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। इसे संकुचित रूप में ग्रहण न कर व्यापक रूप में ग्रहण करना चाहिए। संकुचित रूप में ग्रहण करने से विश्व-शान्ति को खतरा हो सकता है। हमें स्वदेश-प्रेम की । भावना के साथ-साथ समग्र मानवता के (UPBoardSolutions.com) कल्याण को भी ध्यान में रखना चाहिए।

2. हमारा राष्ट्रीय पर्व : स्वाधीनता दिवस

सम्बद्ध शीर्षक

  • स्वतन्त्रता दिवस |
  • विद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय पर्व

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. स्वतन्त्रता दिवस का महत्त्व,
  3. विभिन्न समारोह मनाये जाने के कारण,
  4. राष्ट्रीय, प्रान्तीय और स्थानीय स्तरों पर कार्यक्रमों का आयोजन,
  5. हमारे विद्यालय में स्वतन्त्रता दिवस समारोह,
  6. उपसंहार।

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प्रस्तावना–भारतवर्ष में जिस प्रकार सामाजिक और धार्मिक पर्व (त्योहार) बहुत धूमधाम से मनाये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ राष्ट्रीय पर्वो को भी विशेष महत्त्व है। स्वतन्त्रता दिवस एक राष्ट्रीय पर्व है, जिसे प्रतिवर्ष 15 अगस्त को सम्पूर्ण भारत में बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों के द्वारा बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण दिन है। इस दिन हमारा देश सैकड़ों वर्षों की विदेशी दासता से मुक्त हुआ था। (UPBoardSolutions.com) हम सब इस दिन को एक ऐतिहासिक दिन के रूप में मनाते हैं। स्वतन्त्रता के पुनीत पर्व पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी स्वतन्त्रता को अमर बनाये रखेंगे और स्वतन्त्रतासेनानियों के अधूरे स्वप्नों को साकार कर दिखाएँगे। कृतज्ञ राष्ट्र की उन अमर शहीदों को यही सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी।

स्वतन्त्रता दिवस का महत्त्व-स्वतन्त्रता दिवस का हम सबके लिए बहुत महत्त्व है; क्योंकि देश को स्वतन्त्र कराने के लिए हमारे देश के न जाने कितने वीर जवानों ने अपने प्राणों की बलि दी है, कितनी माताओं ने अपने होनहार पुत्रों को खोया है, कितनी बहनों के भाई उनसे बिछुड़ गये, कितनी सुहागिनों की माँगें सूनी हो गयीं। अनेक नेताओं ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए वर्षों जेलों की यातनाएँ भोगी हैं। वे अंग्रेजों द्वारा दी गयी यातनाओं से डिगे नहीं, वरन् जी-जान से अपनी कोशिश में जुटे रहे। उन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए भारतीय जनता को उत्साहित किया। कहने का तात्पर्य यह है कि कड़ी मेहनत और बलिदानों के बाद हमारा देश स्वतन्त्र हो सका है। जो वस्तु जितनी अधिक मेहनत और बलिदानों से प्राप्त की जाती है, उसका महत्त्व उतना ही अधिक बढ़ जाता है।

विभिन्न समारोह मनाये जाने के कारण–स्वतन्त्रता दिवस के दिन हम विभिन्न समारोहों का आयोजन करके उन शहीदों की याद को तरोताजा करते हैं, जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी और अमर हो गये। उनकी याद प्रत्येक भारतवासी को देश के लिए निछावर हो जाने की प्रेरणा देती है। इन समारोहों से देश के भावी कर्णधारों के हृदय में राष्ट्रभक्ति के बीज अंकुरित हो जाते हैं तथा जनजन के मन में राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ उद्वेलित हो जाती हैं। साथ ही सैकड़ों वर्षों की दासता से मुक्ति मिलने के कारण इस दिन को याद रखना और उत्सव मनाना एक स्वाभाविक बात हो जाती है।

राष्ट्रीय, प्रान्तीय और स्थानीय स्तरों पर कार्यक्रमों का आयोजन-खुशी के कारण ही स्वतन्त्रता दिवस सभी स्तरों-राष्ट्रीय, प्रान्तीय और स्थानीय–पर बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम अपना सन्देश प्रसारित करते हैं। दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले प्रधानमन्त्री सेना की तीनों टुकड़ियों, अन्य सुरक्षा बलों, स्काउटों आदि का निरीक्षण कर सलामी लेते हैं। फिर लाल किले के मुख्य द्वार पर पहुँचकर राष्ट्रीय ध्वज फहराकर उसे सलामी देते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इस सम्बोधन में पिछले वर्ष सरकार द्वारा किये गये कार्यों का लेखाजोखा, अनेक नवीन योजनाओं तथा देश-विदेश से सम्बन्ध रखने वाली नीतियों के बारे में उद्घोषणा की जाती है। अन्त में राष्ट्रीय गान के साथ यह मुख्य समारोह समाप्त हो जाता है। रात्रि में दीपों की जगमगाहट से विशेषकर संसद भवन व राष्ट्रपति भवन की सजावट देखते ही बनती है। राज्यों की राजधानी में भी यह उत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। राज्यों के मुख्यमन्त्री प्रदेश की जनता को (UPBoardSolutions.com) सम्बोधित कर उसे प्रदेश की प्रगति की योजनाओं से अवगत कराते हैं। छोटे-बड़े सभी नगरों में इस अवसर पर अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, जिनमें ध्वजारोहण, राष्ट्रगान और उत्साहवर्द्धक भाषण होते हैं। सर्वत्र प्रभातफेरी का भी आयोजन किया जाता है।

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हमारे विद्यालय में स्वतन्त्रता दिवस समारोह हमारे विद्यालय में भी स्वतन्त्रता दिवस प्रत्येक वर्ष बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष भी प्रात:काल 8 बजे विद्यालय के प्रांगण में प्रधानाचार्य, अध्यापक और सभी विद्यार्थी उपस्थित हो गये। ध्वजारोहण के साथ उत्सव आरम्भ हुआ। प्रधानाचार्य महोदय ने तिरंगा झण्डा फहराया। एन० सी० सी० कैडेटों ने झण्डे को सलामी दी और स्काउट ने बैण्ड बजाया। सभी ने मिलकर राष्ट्रगान गाया। फिर प्रधानाचार्य, सभी अध्यापक और विद्यार्थी अपने-अपने स्थान पर बैठ गये। सर्वप्रथम कुछ विद्यार्थी बारी-बारी से मंच पर आये और उन्होंने देशभक्ति के गीत सुनाये तथा कविताओं के अलावा ओजपूर्ण भाषण भी दिये। विद्यार्थियों के पश्चात् कुछ अध्यापकों ने भी भाषण दिये। किसी ने स्वतन्त्रता का अर्थ और महत्त्व समझाया तो किसी ने भारतीय संस्कृति और उसके गौरवमय इतिहास पर प्रकाश डाला। अन्त में हमारे प्रधानाचार्य महोदय ने अपना ओजस्वी भाषण दिया तथा विद्यार्थियों को अपने कर्तव्य को ईमानदारी और सच्चाई से पालन करने की शिक्षा दी।

उपसंहार-यह उत्सव देश में सभी स्थानों पर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। यह हमें इस बात की याद दिलाता है कि इस दिन हम अंग्रेजों की परतन्त्रता की यातनामयी बेड़ियों से बड़ी कठिनाई से मुक्त हुए थे। देश की स्वतन्त्रता के लिए हमारे वीरों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी; अतः हमें इसकी

तन-मन-धन से रक्षा करनी चाहिए और अवसर पड़ने (UPBoardSolutions.com) पर भारत की एकता और अखण्डता के लिए अपना बलिदान देने हेतु तैयार रहना चाहिए। स्वतन्त्रता के पुनीत पर्व पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी स्वतन्त्रता को अमर रखेंगे तथा स्वतन्त्रता-सेनानियों के अधूरे सपनों को साकार करेंगे। उन अमर शहीदों के लिए कृतज्ञ राष्ट्र की यही सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी।

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3. हमारे राष्ट्रीय पर्व [2015]

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत के राष्ट्रीय त्योहार

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. गणतन्त्र दिवस,
  3. स्वतन्त्रता दिवस,
  4. गाँधी जयन्ती,
  5. राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–भारतवर्ष को यदि विविध प्रकार के त्योहारों का देश कह दिया जाए तो कुछ अनुचित न होगा। इस धरा-धाम पर इतनी जातियाँ, धर्म और सम्प्रदायों के लोग निवास करते हैं कि उनके सभी त्योहारों को एक-एक दिन में दो-दो त्योहार मनाकर भी वर्ष भर में पूरा नहीं किया जा सकता। पर्वो का मानव-जीवन व राष्ट्र के जीवन में विशेष महत्त्व होता है। इनसे नयी प्रेरणा मिलती है, जीवन की नीरसता दूर होती है तथा रोचकता और आनन्द में वृद्धि होती है। जिन पर्वो का सम्बन्ध किसी व्यक्ति, जाति या धर्म के मानने वालों से न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र से होता है तथा जो पूरे देश में सभी नागरिकों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाये जाते (UPBoardSolutions.com) हैं, उन्हें . राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। गणतन्त्र दिवस, स्वतन्त्रता दिवस एवं गाँधी जयन्ती हमारे राष्ट्रीय पर्व हैं। ये उन अमर शहीदों व देशभक्तों का स्मरण कराते हैं, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतन्त्रता, गौरव व इसकी प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए अपने प्राणों को भी सहर्ष निछावर कर दिया।

गणतन्त्र दिवस-गणतन्त्र दिवस हमारा एक राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष 26 जनवरी को समस्त देशवासियों द्वारा मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 ई० में हमारे देश में अपना संविधान लागू हुआ था। इसी दिन हमारा राष्ट्र पूर्ण स्वायत्त गणतन्त्र राज्य बना; अर्थात् भारत को पूर्ण प्रभुसत्तासम्पन्न गणराज्य घोषित किया गया। यही दिन हमें 26 जनवरी, 1930 का भी स्मरण कराता है, जब जवाहरलाल नेहरू जी की अध्यक्षता में कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया था।

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गणतन्त्र दिवस का त्योहार बड़ी धूमधाम से यों तो देश के प्रत्येक भाग में मनाया जाता है, पर इसका मुख्य आयोजन देश की राजधानी दिल्ली में ही किया जाता है। इस दिन सबसे पहले देश के प्रधानमन्त्री इण्डिया गेट पर शहीद जवानों की याद में प्रज्वलित की गयी जवान ज्योति पर सारे राष्ट्र की ओर से सलामी देते हैं। उसके बाद अपने मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति महोदय की अगवानी करते हैं। राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित विजय चौक में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ ही मुख्य पर्व मनाया जाना आरम्भ होता है। इस दिन विजय चौक से प्रारम्भ होकर लाल किले तक जाने वाली परेड समारोह का प्रमुख आकर्षण होती है। क्रम से तीनों सेनाओं (जल, थल, वायु), सीमा सुरक्षा बल, अन्य सभी प्रकार के बलों, पुलिस आदि की टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को सलामी देती हैं। एन० सी० सी०, एन० (UPBoardSolutions.com) एस० एस० तथा स्काउट, स्कूलों के बच्चे सलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए गुजरते हैं। इसके उपरान्त सभी प्रदेशों की झाँकियाँ आदि प्रस्तुत की जाती हैं तथा शस्त्रास्त्रों का भी प्रदर्शन किया जाता है। राष्ट्रपति को तोपों की सलामी दी जाती है तथा परेड, झाँकियों आदि पर हेलीकॉप्टरों-हवाई जहाजों से पुष्प वर्षा की जाती है। ”

स्वतन्त्रता दिवस-पन्द्रह अगस्त के दिन मनाया जाने वाला स्वतन्त्रता दिवस का त्योहार दूसरा मुख्य राष्ट्रीय त्योहार माना गया है। इसके आकर्षण और मनाने का मुख्य केन्द्र दिल्ली स्थित लाल किला है। यों सारे नगर और सारे देश में भी अपने-अपने ढंग से इसे मनाने की परम्परा है। स्वतन्त्रता दिवस प्रत्येक वर्ष अगस्त मास की पन्द्रहवीं तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन लगभग दो सौ वर्षों के अंग्रेजी दासत्व के बाद हमारा देश स्वतन्त्र हुआ था। इसी दिन ऐतिहासिक लाल किले पर हमारा तिरंगा झण्डा फहराया गया था। यह स्वतन्त्रता राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के भगीरथ प्रयासों व अनेक महान् नेताओं तथा देशभक्तों के बलिदान की गाथा है। यह स्वतन्त्रता इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसे बन्दूकों, तोपों जैसे अस्त्र-शस्त्रों से नहीं वरन् सत्य, अहिंसा जैसे शस्त्रास्त्रों से प्राप्त किया गया था। इस दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम अपना सन्देश प्रसारित करते हैं। दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले प्रधानमन्त्री सेना की तीनों टुकड़ियों, अन्य सुरक्षा बलों, स्काउटों आदि का निरीक्षण कर सलामी लेते हैं। फिर लाल किले के मुख्य द्वार पर पहुँचकर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर उसे सलामी देते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इसे सम्बोधन में पिछले वर्ष सरकार द्वारा किये गये कार्यों का लेखा-जोखा, अनेक नवीन योजनाओं तथा देश-विदेश से सम्बन्ध रखने वाली नीतियों के बारे में उद्घोषणा की जाती है। अन्त में, राष्ट्रीय गान के साथ यह मुख्य समारोह समाप्त हो जाता है।

गाँधी जयन्ती-गाँधी जयन्ती भी हमारा एक राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष गाँधीजी के जन्म-दिवस की शुभ स्मृति में 2 अक्टूबर को देश भर में मनाया जाता है। स्वाधीनता आन्दोलन में गाँधीजी ने अहिंसात्मक रूप से देश का नेतृत्व किया और देश को स्वतन्त्र कराने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग
आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन से शक्तिशाली अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर । विवश कर दिया। गाँधीजी ने राष्ट्र एवं दीन-हीनों की सेवा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। प्रतिवर्ष सारा देश उनके त्याग, (UPBoardSolutions.com) तपस्या एवं बलिदान के लिए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उनके बताये गये रास्ते पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

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राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व-इन तीन मुख्य पर्वो के अतिरिक्त अन्य कई पर्व भी भारत में मनाये जाते हैं और उनका भी राष्ट्रीय महत्त्व स्वीकारा जाता है। ईद, होली, वसन्त पंचमी, बुद्ध पंचमी, वाल्मीकि प्राकट्योत्सव, विजयादशमी, दीपावली आदि इसी प्रकार के पर्व माने जाते हैं। हमारी राष्ट्रीय अस्मिता किसी-न-किसी रूप में इन सभी पर्वो के साथ जुड़ी हुई है, फिर भी मुख्य महत्त्व उपर्युक्त तीन पर्वो का ही

उपसंहार-त्योहार तीन हों या अधिक, सभी का महत्त्व मानवीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता को उजागर करना ही होता है। मानव-जीवन में जो एक आनन्दप्रियता, उत्सवप्रियता की भावना और वृत्ति छिपी रहती है, उनका भी इस प्रकार से प्रकटीकरण और स्थापन हो जाया करता है।
हमारे राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीय एकता के प्रेरणास्रोत हैं। ये पर्व सभी भारतीयों के मन में हर्ष, उल्लास और नवीन राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। साथ ही देशवासियों को यह संकल्प लेने हेतु भी प्रेरित करते हैं कि वे अमर शहीदों के बलिदानों को व्यर्थ नहीं जाने देंगे तथा अपने देश की रक्षा, (UPBoardSolutions.com) गौरव व इसके उत्थान के लिए सदैव समर्पित रहेंगे।

4. राष्ट्रीय एकता [2009, 10, 15]

सम्बद्ध शीर्षक

  • राष्ट्रीय सुरक्षा एवं एकता
  • राष्ट्रीय एकता एवं राष्ट्र-प्रेम

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रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय,
  2. भारत में अनेकता के विविध रूप,
  3. राष्ट्रीय एकता का आधार,
  4. राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता,
  5. राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ,
  6. राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय-‘एकता’ एक भावात्मक शब्द है, जिसका अर्थ है‘एक होने की भाव’। इस प्रकार ‘राष्ट्रीय एकता’ का अभिप्राय है देश का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, धार्मिक और साहित्यिक दृष्टि से एक होना। इन दृष्टिकोणों से भारत में अनेकता दृष्टिगोचर होती है, किन्तु बाह्य रूप से दिखाई देने वाली इस अनेकता के मूल में वैचारिक एकता , निहित है। अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है। किसी भी राष्ट्र की एकता उसके राष्ट्रीय गौरव की प्रतीक होती है और जिस व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय गौरव पर अभिमान नहीं होता, वह मनुष्य नहीं है

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नरपशु है निरा और मृतक समान है।

भारत में अनेकता के विविध रूप-भारत एक विशाल देश है। उसमें अनेकता होनी स्वाभाविक ही , है। धर्म के क्षेत्र में हिन्दू , मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि विविध धर्मावलम्बी यहाँ निवास करते हैं। इतना ही नहीं, एक-एक धर्म में भी कई अवान्तर भेद हैं। सामाजिक दृष्टि से विभिन्न जातियाँ, उपजातियाँ, गोत्र, प्रवर आदि विविधता के सूचक हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, पूजा-पाठ आदि की भिन्नता ‘अनेकता’ (UPBoardSolutions.com) की द्योतक है। राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद, गाँधीवाद आदि अनेक वाद राजनीतिक विचार-भिन्नता का संकेत करते हैं। आर्थिक दृष्टि से पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि विचारधाराएँ भिन्नता दर्शाती हैं। इसी प्रकार भारत की प्राकृतिक शोभा, भौगोलिक स्थिति, ऋतु-परिवर्तन आदि में भी पर्याप्त भिन्नता दृष्टिगोचर होती है।

राष्ट्रीय एकता का आधार हमारे देश की एकता के आधार दर्शन (Philosophy) और साहित्य (Literature) हैं। ये सभी प्रकार की भिन्नताओं और असमानताओं को समाप्त करने वाले हैं। भारतीय दर्शन सर्व-समन्वय की भावना का पोषक है। यह किसी एक भाषा में नहीं लिखा गया है, अपितु यह देश की विभिन्न भाषाओं में लिखा गया है। इसी प्रकार हमारे देश का साहित्य भी विभिन्न क्षेत्र के निवासियों द्वारा लिखे जाने के बावजूद क्षेत्रवादिता या प्रान्तीयता के भावों को उत्पन्न नहीं करता, वरन् सबके लिए भाईचारे, मेल-मिलाप और सद्भाव का सन्देश देता हुआ देशभक्ति के भावों को जगाता है।

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता–राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति, सुव्यवस्था और बाह्य सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता है। भारत के सन्तों ने तो प्रारम्भ से ही मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई अन्तर नहीं माना, वे तो सम्पूर्ण मनुष्य-जाति को एक सूत्र में बाँधने के पक्षधर रहे।

राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था, “जब-जब भी हम असंगठित हुए, हमें आर्थिक और राजनीतिक रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी।” अत: देश की स्वतन्त्रता की रक्षा और राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता का होना परम आवश्यक है।

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राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ-उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अनेक समाज-सुधारकों और दूरदर्शी राजपुरुषों के सत्प्रयत्नों से यह आन्तरिक एकता मजबूत हुई। लेकिन स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद अनेक तत्त्व इसको खण्डित करने में सक्रिय रहे हैं, जो निम्नवत् हैं

(क) साम्प्रदायिकता–साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार के विविध धर्मों में जितनी बातें बतायी मयी हैं, उनमें से अधिकांश बातें समान हैं; जैसे–प्रेम,
सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा, पवित्रता आदि। सच्चा धर्म कभी भी दूसरे से घृणा करना नहीं सिखाता। वह तो सभी से प्रेम करना, सभी की सहायता करना, सभी को समान समझना सिखाता है।

(ख) क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता-अंग्रेज शासकों ने न केवल धर्म, वरन् प्रान्तीयता की अलगाववादी भावना को भी भड़काया है। इसीलिए जब-तब राष्ट्रीय भावना के स्थान पर हमें पृथक् अस्तित्व (राष्ट्र) और पृथक् क्षेत्रीय शासन स्थापित करने की माँगें (UPBoardSolutions.com) सुनाई पड़ती हैं। इस प्रकार क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता की भावना भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत बड़ी बाधा है। ।

(ग) भाषावाद–भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। यहाँ अनेक भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। प्रत्येक भाषा-भाषी अपनी मातृभाषा को दूसरों से बढ़कर मानता है। फलत: विद्वेष और घृणा का प्रचार होता है और अन्ततः राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है।

(घ) जातिवाद-मध्यकाल में भारत के जातिवादी स्वरूप में जो कट्टरता आयी थी, उसने अन्य जातियों के प्रति घृणा और विद्वेष का भाव विकसित कर दिया। पुराकाल की कर्म पर आधारित वर्णव्यवस्था ने वर्तमान में जन्म पर आधारित कट्टर जाति-प्रथा का रूप ले लिया, जिसने भी भारत की एकता को बुरी तरह प्रभावित किया।

राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय–वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रस्तुत हैं

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(क) सर्वधर्म समभाव-विभिन्न धर्मों में जितनी भी अच्छी बातें हैं, यदि उनकी तुलना अन्य धर्मों । की बातों से की जाए तो उनमें एक अद्भुत समानता दिखाई देगी; अतः हमें सभी धर्मों का समान आदर करना चाहिए। धार्मिक या साम्प्रदायिक आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा समझना अनुचित है।

(ख) समष्टि-हित की भावना–यदि हमें अपनी स्वार्थ-भावना को त्यागकर समष्टि-हित का भाव विकसित कर लें तथा धर्म, क्षेत्र, भाषा और जाति के नाम पर न सोचकर समूचे राष्ट्र के नाम पर सोचे तो अलगाववादी भावना के स्थान पर एकता की भावना सुदृढ़ होगी।

(ग) एकता का विश्वास–भारत में जो दृश्यमान अनेकता है, उसके अन्दर ही एकता का भी निवास है–इस बात का प्रचार समुचित ढंग से किया जाए, जिससे सभी नागरिकों को अनेकता में अन्तर्निहित एकता का विश्वास हो सके। वे पारस्परिक प्रेम और सद्भाव द्वारा एक-दूसरे में अपने प्रति विश्वास जगा सकें।

(घ) शिक्षा को प्रसार–छोटी-छोटी व्यक्तिगत द्वेष की भावनाएँ राष्ट्र को कमजोर बनाती हैं। शिक्षा का सच्चा अर्थ एक व्यापक अन्तर्दृष्टि व विवेक है। इसलिए शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी की संकुचित भावनाएँ शिथिल हों।

(ङ) राजनीतिक छल-छद्मों का अन्त–आजकल स्वार्थी राजनेता साम्प्रदायिक अथवा जातीय विद्वेष, घृणा और हिंसा भड़काते हैं और सम्प्रदाय विशेष का मसीहा बनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इस प्रकार के राजनीतिक छल-छद्मों का अन्त और राजनीतिक वातावरण (UPBoardSolutions.com) के स्वच्छ होने से भी एकता का भाव सुदृढ़ होगा।

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उपसंहार-राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है और इस भावना को उत्पन्न करने के लिए हमें स्वयं को सबसे पहले मनुष्य समझना होगा, क्योंकि मनुष्य एवं मनुष्य में असमानता की भावना ही संसार में समस्त विद्वेष एवं विवाद का कारण है। इसीलिए जब तक हममें मानवीयता की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय एकता का भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। यह भाव उपदेशों, भाषणों और राष्ट्रीय गीत के माध्यम से सम्भव नहीं।

5. राष्ट्रभाषा हिन्दी [2014]

सम्बद्ध शीर्षक

  • राष्ट्रीय एकता में हिन्दी का योगदान
  • राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसकी समस्याएँ
  • देश की सम्पर्क भाषा : हिन्दी

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. स्वतन्त्रता से पूर्व हिन्दी,
  3. सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी,
  4. हिन्दी : एक सक्षम भाषा,
  5. हिन्दी के विकास में बाधाएँ,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–स्वतन्त्रता से पूर्व देश अंग्रेजी शासन के अधीन था। अंग्रेजों को अपना राज-काज चलाने के लिए कुछ ऐसे पढ़े-लिखे भारतीय और लिपिकों की आवश्यकता थी, जो स्वयं को भाषा के ज्ञान के कारण अन्य भारतीयों से श्रेष्ठ समझते हों। दुर्भाग्यवश उन्हें ऐसे लोगों का पूरा वर्ग ही मिल गया। देश की परतन्त्रता तक तो दूसरी बात थी, लेकिन देश के स्वतन्त्र होने के बाद भी इस वर्ग का चरित्र नहीं बदला और वह इस प्रयास में लगा रहा कि किसी भी (UPBoardSolutions.com) तरह अंग्रेज़ी ही देश की कामकाजी भाषा बनी रहे। उसे अपने प्रयास में सफलता भी मिली, जब हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किये जाने के बावजूद भारतीय संविधान में यह व्यवस्था की गयी कि आगामी 15 वर्ष तक हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा भी सरकारी काम-काज की भाषा बनी रहेगी। तब से अब तक पैंसठ से भी अधिक वर्ष बीत गए, लेकिन सरकारी काम-काज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व आज भी बना हुआ है।

स्वतन्त्रता से पूर्व हिन्दी-भारत में अंग्रेजों के पैर पसारने और जमाने से पूर्व हिन्दी ही जनभाषा थी। देश में अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार होने से पूर्व शताब्दियों तक हिन्दी देश को भावनात्मक एकता के सूत्र में बाँधे रही। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में हिन्दी भाषी लोगों के अलावा अनेक अहिन्दी भाषी लेखकों, सन्तों और नेताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जिनमें महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, बंकिमचन्द्र चटर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी-आज पंजाब से लेकर असोम तक तथा जम्मू-कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र-आन्ध्र प्रदेश तक बोली और समझी जाने वाली एकमात्र भाषा हिन्दी ही है। इसी भाषा के द्वारा , विभिन्न प्रदेशों के निवासी अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अमृतसर से चलकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल को पार करके अंसोम के गुवाहाटी नगर तक पहुँचने वाला ट्रक ड्राइवर रास्ते भर जिस भाषा का प्रयोग करता है, वह हिन्दी ही है। इस प्रकार हिन्दी भारत के जन-सामान्य की सम्पर्क भाषा बन गयी है। यह वह भाषा है, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने का काम करती है और हमारी राष्ट्रीय एकता को मजबूत भी करती है।

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हिन्दी : एक सक्षम भाषा–आज हिन्दी एक सक्षम भाषा बन चुकी है। स्वतन्त्रता के समय हिन्दी पर यह आरोप लगाया जाता था कि इसमें वैज्ञानिक और गम्भीर विवेचनात्मक विषयों के लिए अनुकूल शब्दावली का अभाव है, लेकिन स्वतन्त्रता के बाद इस ओर गम्भीर प्रयास किये गये हैं। तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में नये-नये शब्दों को गढ़ लिया गया है। नये होने के कारण ये शब्द थोड़े कठिन प्रतीत होते हैं। इसी को आधार बनाकर अंग्रेजी प्रेमी हिन्दी पर यह आरोप लगाते हैं कि इसकी शब्दावली कठिन है। लेकिन यह ध्यान रखने की बात है कि कोई भी नई बात शुरू में कठिन ही लगा करती है। भाषा कोई भी हो, उसे सीखने में (UPBoardSolutions.com) परिश्रम और समय तो लगता ही है। अतः अपने राष्ट्र और भाषा के गौरव की रक्षा के लिए हमें अपनी भाषा को सीखने में थोड़ा परिश्रम तो करना ही चाहिए।

हिन्दी के विकास में बाधाएँ-हिन्दी के विकास में कुछ प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं
(i) राजनीतिक कारणों ने अहिन्दी भाषी लोगों के मन में यह बात बैठा दी है कि यदि अंग्रेजी न रही, तो प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों का वर्चस्व हो जाएगा और अहिन्दी भाषी दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रह जाएंगे।
(ii) सरकार और प्रशासन में कतिपय महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन कुछ स्वार्थी लोग यह समझते हैं कि यदि अंग्रेजी का स्थान हिन्दी ने ले लिया, तो उनका वर्चस्व समाप्त हो जाएगा और एक गरीब मजदूर का बेटा भी उनसे स्पर्धा करने की स्थिति में आ जाएगा।
(iii) कुछ स्वार्थी लोग प्रादेशिक भाषाओं के विकास की बात करके हिन्दी को उनका प्रतिद्वन्द्वी बताते हैं, जबकि हिन्दी का प्रादेशिक भाषाओं से कोई बैर नहीं। हिन्दी के विकास-मार्ग में यदि कोई भाषा बाधा है, तो वह अंग्रेजी है। अंग्रेजी ही हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषाओं की जीवन-शक्ति को चूसकर स्वयं पोषित होती रही है।
उपसंहार–राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था

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है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी।
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी॥

वास्तविकता यह है कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो भारत की सबसे सम्पन्न भाषा है। यही सम्पूर्ण देश की सम्पर्क भाषा आज भी बनी हुई है। अपनी सरलता, स्पष्टता, समर्थता और बोधगम्यता के कारण यह राष्ट्रभाषा का गौरव पाने की अधिकारिणी (UPBoardSolutions.com) है। प्रत्येक भारतवासी का यह कर्तव्य है कि वह अपने दैनिक जीवन में हिन्दी का अधिक-से-अधिक प्रयोग करे और हिन्दी में बोलने में गर्व का अनुभव करे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने भी उचित ही लिखा है–

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल।

6. देश की प्रगति में विद्यार्थियों की भूमिका (2015)

सम्बद्ध शीर्षक

  • देशोन्नति में छात्रों का योगदान [2012]
  • छात्र जीवन/विद्यार्थी जीवन [2014]
  • राष्ट्र की सुरक्षा में नवयुवकों का योगदान ।
  • विद्यार्थी और देश-प्रेम

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रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. विद्यार्थी जीवन का महत्त्व,
  3. कुप्रथाओं का उन्मूलन एवं ग्रामोत्थान,
  4. भ्रष्टाचार व दुराचार को उन्मूलन,
  5. काले धन की समाप्ति हेतु प्रयास,
  6. चरित्र-निर्माण से ही देश की उन्नति सम्भव,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना–विद्यार्थी राष्ट्र का भावी नेता और शासक है। देश की उन्नति और भावी विकास का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व उसके सबल कन्धों पर आने वाला है। वास्तव में राष्ट्र की उन्नति और प्रगति के लिए । वह मुख्य धुरी का काम कर सकता है। जिस देश का विद्यार्थी सतत जागरूक, सतर्क और सावधान होता है, वह देश प्रगति की दौड़ में कभी पीछे नहीं रह सकता। विद्यार्थी एक नवजीवन का सशक्त संवाहक होता है। उसमें रूढ़ियों और (UPBoardSolutions.com) परम्पराओं के अटकाव नहीं होते, पूर्वाग्रह से उसकी दृष्टि धूमिल नहीं होती, वरन् वह नये विचारों एवं योजनाओं को क्रियान्वित करने की भरपूर क्षमता से ओतप्रोत होता है।

विद्यार्थी जीवन का महत्त्व-‘विद्यार्थी’ शब्द की संरचना है-‘विद्या +अर्थी’ अर्थात् जो विद्यार्जन में सदा संलग्न रहने वाला हो। विद्या प्राप्त करने के लिए परिश्रम और लगन की आवश्यकता होती है। आचार्य चाणक्य ने ठीक ही कहा है, “सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ ? सुख चाहने वाला विद्या को छोड़ दे और विद्या चाहने वाला सुख को छोड़ दे।’ शास्त्रों में आदर्श विद्यार्थी को एकाग्रचित्त, सजग, चुस्त, कम भोजन करने वाला और चरित्र-सम्पन्न बताया गया है

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काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पाहारी सदाचारी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम् ॥

एक अच्छा विद्यार्थी देशवासियों में देशभक्ति की भावना उजागर कर सकता है। देश की एकता व संगठन की भावना को सवल बनाकर भावात्मक एकता को पुष्ट कर सकता है।

कुप्रथाओं का उन्मूलन एवं ग्रामोत्थाने–आज देश में कई अन्धविश्वास, अशिक्षा, अज्ञान, रूढ़ियाँ तथा कुप्रथाएँ प्रचलित हैं। इससे देश की यथोचित प्रगति नहीं हो पा रही है। विद्यार्थियों को इन रूढ़ियों और कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए बीड़ा उठाना होगा। आज भी गाँवों में लोग ऋणग्रस्त और शोषण के शिकार हैं। विद्यार्थियों को गाँवों में जाकर साक्षरता, सहकारिता आदि कार्यक्रमों को चलाने में सहयोग करना चाहिए। गाँवों में लघु और कुटीर उद्योगों के प्रचलन के महत्त्व को समझाकर उनके विकास के लिए उन्हें पर्याप्त प्रशंसा, प्रोत्साहन व सम्मान भी देना चाहिए।

भ्रष्टाचार व दुराचार का उन्मूलन–आज देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है। कोई भी कार्य रिश्वत के बिना नहीं चलता। पुलिस व न्यायालय-कर्मचारी खुले रूप से रिश्वत माँगते हैं। रक्षक ही भक्षक बन गये हैं। मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इस भ्रष्टाचार से लड़ना कोई सामान्य बात नहीं है। इसके लिए निर्भीक विद्यार्थियों को आगे आकर इस भ्रष्टाचाररूपी दानव से लड़ना होगा। जब तक देश से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा, देश की प्रगति होना मुमकिन नहीं है।

देश में दुराचार की विभीषिका भी बढ़ती जा रही है। लूटपाट, हत्याएँ और बलात्कार की घटनाओं से समाचार-पत्रों के पृष्ठ-के-पृष्ठ रँगे रहते हैं। देश में प्रचलित शासन-व्यवस्था भले और ईमानदार आदमियों के हाथों में न रहकर भ्रष्ट, बदमाश, सफेदपोश लोगों के हाथों में चली गयी है। इस अभाव की पूर्ति विद्यार्थी वर्ग ही कर सकता है। उसे इस महामारी से लड़कर इसका उन्मूलन करना होगा।

काले धन की समाप्ति हेतु प्रयास-काला धन अथवा कालाबाजार रूपी महादानव भी बड़ा शक्तिशाली, दुर्धर्ष और महा भयंकर है। जनता किसी ऐसे सहयोग व नेतृत्व की आकांक्षा रखती है जो इस विषम स्थिति से देश की रक्षा कर सके। इससे लोहा लेने (UPBoardSolutions.com) के लिए भी विद्यार्थी वर्ग ही तत्पर हो सकता है।

चरित्र-निर्माण से ही देश की उन्नति सम्भव—बड़े-बड़े कल-कारखाने खोलने से तथा बड़े-बड़े बाँध बनाने से राष्ट्र सच्चे अर्थों में विकास नहीं कर सकता। हमें आने वाली पीढ़ियों के चरित्र-निर्माण की ओर विशेष ध्यान देना है। चरित्र-निर्माण ही शिक्षा का मुख्य व पवित्र उद्देश्य होना चाहिए। जिस देश में चरित्रवान् लोग रहते हैं, उस देश का सिर गौरव से सदा ऊँचा रहता है।

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उपसंहार–किसी देश की वास्तविक उन्नति उसके परिश्रमी, लगनशील, पुरुषार्थी और चरित्रवान् पुरुषों से ही सम्भव है। भारत के विद्यार्थी भी चरित्रवान् बनकर देश के अन्दर वर्तमान में व्याप्त सभी बुराइयों का उन्मूलन कर देश की प्रगति में सच्चा योगदान कर सकते हैं। आज का विद्यार्थी वर्ग राजनीतिक पार्टियों के चक्कर में उलझकर अपने भविष्य को अन्धकारमय बना रहा है। आज के विद्यार्थी को इन सबसे अलग रहकर अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। उसकी भावना राष्ट्र को उन्नति की ओर अग्रसर करने की होनी चाहिए।

7. भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. संस्कृति क्या है?,
  3. भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना–हजारों वर्षों की परम्पराओं से पुष्ट भारतवर्ष किसी समय विश्व गुरु कहलाता था। जिस । समय आज के उन्नत एवं सभ्य कहे जाने वाले राष्ट्र अस्तित्वहीन थे या जंगली अवस्था में थे, उस समय । भारत-भूमि पर वैदिक ऋचाएँ लिखी जा रही थीं, वैदिक (UPBoardSolutions.com) मन्त्रों के गान पूँज रहे थे और यज्ञों की पवित्र ज्वालाओं का सुगन्धित धुआँ पूरे वातावरण को आनन्दमय बना रहा था। भारतवर्ष की सभ्यता और संस्कृति महान् है। कविवर इकबाल ने लिखा है कि

यूनान मिस्र रोमाँ, सब मिट गए जहाँ से,
लेकिन बचा है अब तक, नामो-निशां हमारा।

निश्चय ही उनका संकेत भारत की महान् संस्कृति की ओर ही था। हजारों वर्ष की पराधीनता का अन्धकार भी हमें हमारी प्राचीन विरासत से वंचित नहीं कर पाया। रामायण, महाभारत, वेद-पुराण आज भी हमारे पूज्य ग्रन्थ हैं और आज भी गंगा, नर्मदा, कावेरी हमारे लिए पवित्र हैं। भारतीय संस्कृति अजर-अमर है। क्योंकि यह समय के साथ बदलती रही है। इसमें मानव-मात्र की रक्षा का भाव निहित है।

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संस्कृति क्या है ?–संस्कृति वह है जो श्रेष्ठ कृति अर्थात् कर्म के रूप में व्यक्त होती है। कर्म निश्चय ही विचार पर आधारित होता है। जो ज्ञान एवं भाव-सम्पदा हमारे कर्मों को श्रेष्ठ बनाती है वही संस्कृति है। मनुष्य में पशुता और देवत्व का वास साथ-साथ रहता है। जो भाव या विचार हमें पशुत्व से देवत्व की ओर ले जाते है, उन्हें संस्कृति का अंग माना जाना चाहिए।

मनुष्य, जब जन्म लेता है, तब वह प्राकृतिक अवस्था में होता है। समाज के प्रभाव एवं उसके अपने अनुभव उसे प्रकृति में विकृति की ओर ले जा सकते हैं और सृकृति की ओर भी। सुकृति अर्थात् अच्छे कार्यों की ओर ले जाना ही संस्कृति का कार्य है। दूध यदि विकृति की ओर जाएगा तो वह फट जाएगा। यदि सुकृति की ओर जाएगा तो दही, मक्खन आदि पदार्थों का निर्माण होगा और उसकी कीमत भी अधिक बढ़ जाएगी। इसी प्रकार मनुष्य यदि पशुत्व अथवा दानवत्व की ओर जाएगा तो उसकी हत्या करनी पड़ेगी और यदि वह देवत्व की ओर जाएगा, तो उसकी पूजा होगी। भारतीय संस्कृति ने सदा ही अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रार्थना की है; यथा–तमसो मा ज्योतिर्गमय। संस्कृति हमारे भौतिक जीवन को सुधारती है और हमारे ऐन्द्रिक जगत् को परिष्कृत करती है। विचारों एवं भावों का परिष्कार भी संस्कृति का ही कार्य है। संस्कृति यह कार्य साहित्य, विज्ञान एवं कलाओं का प्रचार-प्रसार करके करती है।

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ-भारतीय संस्कृति की एक विशेषता यह है कि यह किसी एक जाति अथवा राष्ट्र तक सीमित नहीं। वैदिक ऋषि सारे विश्व को आर्य अर्थात् श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। वे अपने मन्त्रों में सम्पूर्ण सृष्टि के लिए मंगल-कामना करते हैं तथा मानव-मात्र को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने का प्रण दोहराते हैं।

भारतीय संस्कृति अध्यात्म प्रधान संस्कृति है। भौतिक उन्नति को हम भारतवासियों ने त्याज्य नहीं माना परन्तु उसे आत्मिक जीवन से ज्यादा महत्त्व भी नहीं दिया। साधु-महात्माओं की पर्ण कुटियों पर सम्राटों ने सदा ही सिर झुकाये हैं, सन्तोष एवं संयम को यहाँ सदा सम्मान मिला है। ईश्वर में अटल विश्वास रखने वाले अधनंगे फकीरों ने यहाँ के जन-जीवन को सम्राटों की अपेक्षा अधिक प्रभावित किया है। त्याग हमारी भारतीय संस्कृति में सदा से (UPBoardSolutions.com) ही सम्मान पाता रहा है।

भारतीय संस्कृति में नारी सदा ही सम्मान एवं पूजा की अधिकारिणी रही है। कृष्ण से पहले राधा और राम से पहले सीता का नाम केवल यहीं लिया जाता है। इसी देश में नारी को शक्ति के रूप में, ज्ञान के प्रकाश के रूप में, लक्ष्मी की उज्ज्वलता के रूप में देखा जा सकता है। विश्व की अन्य किसी भी संस्कृति में नारी-शक्ति को ऐसा गौरवपूर्ण स्थान नहीं मिला है।

भारतीय संस्कृति उदार, ग्रहणशील एवं समय के साथ परिवर्तनशील रही है। अनेक विदेशी संस्कृतियाँ इससे टकराकर नष्ट हो गयीं या इसी का अंग बन गयीं। यहाँ पर शक, कुषाण, हूण, पठान, मुसलमान, पारसी, यहूदी, ईसाई सभी आये और सभी ने यहाँ की संस्कृति को पुष्ट किया और इसी संस्कृति में धीरे-धीरे विलीन हो गये। भारतीय संस्कृति इस अर्थ में समन्वय प्रधान संस्कृति है। यह सुन्दर फूलों के एक ऐसे गुलदस्ते के समान है, जिसमें विभिन्न रंगों-वर्णो के फूल हैं।

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उपसंहार–सार रूप में हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति सही अर्थों में मानव-संस्कृति है, उदार संस्कृति है, अध्यात्म-प्रधान और आदर्श-परक संस्कृति है तथा मनुष्य में ईश्वरत्व की प्रतिष्ठा करने वाली संस्कृति है।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 आर्थिक विकास में राज्य की भूमिका (अनुभाग – चार)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 आर्थिक विकास में राज्य की भूमिका (अनुभाग – चार)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को निर्धारित करने वाले तत्वों की विवेचना कीजिए।
या
किसी अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास में राज्य का महत्त्वपूर्ण योगदान है। स्पष्ट कीजिए।
या
आर्थिक विकास में राज्य की क्या भूमिका होती है?
उत्तर :

अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को निर्धारित करने वाले तत्त्व

विकासशील देश में अनेक आर्थिक अवरोध आर्थिक विकास की गति को अवरुद्ध करते हैं। देश में पूँजी का अभाव, प्राकृतिक साधनों का अल्प दोहन, बचत एवं विनियोग की कमी, औद्योगीकरण का अभाव, पूँजी निर्माण की कमी, बढ़ती बेरोजगारी आदि अनेक समस्याएँ विकासशील देशों में आर्थिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में अवरोध खड़े करती हैं; अत: इन विकासशील देशों में सरकार का दायित्व होता है कि वह देश के प्राकृतिक साधनों का उचित दोहन सुनिश्चित करने के लिए पूँजी, कुशल श्रमिक; उद्यमता, तकनीकी ज्ञान, परिवहन एवं संचार के साधन, शक्ति एवं ऊर्जा के साधन आदि (UPBoardSolutions.com) उपलब्ध कराये। सरकार इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेक नीतिगत उपयोग; जैसे—राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति, औद्योगिक नीति, श्रम नीति आदि से आर्थिक विकास  हेतु अनुकूल वातावरण बनाने में अपना योगदान देती है। देश में बचत-विनियोग को प्रोत्साहित करने व औद्योगीकरण को बढ़ावा देने, कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने आदि सभी कार्यों में सरकार निर्णायक भूमिका निभाती है। इस प्रकार आर्थिक विकास के लिए एक योजनाबद्ध रणनीति बनाने और उसका क्रियान्वयन करके आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करने में सरकार का महत्त्वपूर्ण योगदान है। राज्य के नियन्त्रण के अभाव में सुनियोजित आर्थिक विकास सम्भव ही नहीं है। हमारे संविधान में राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी तत्त्वों को प्रमुख स्थान दिया गया है। ये तत्त्व प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था के संचालन में सरकार की जिम्मेदारी की सीमा को निश्चित करते हैं। संविधान में वर्णित महत्त्वपूर्ण नीति-निदेशक सिद्धान्त जो हमारे आर्थिक जीवन को प्रभावित करते हैं, निम्नलिखित हैं –

  1. सभी नागरिकों के लिए जीविका के पर्याप्त साधन जुटाना।
  2. सामान्य हित के लिए समाज के भौतिक साधनों का उचित वितरण।
  3. एक उचित सीमा से अधिक धन के केन्द्रीकरण पर रोक।
  4. स्त्रियों और पुरुषों दोनों के समान काम के लिए समान वेतन।
  5. श्रमिकों की शक्ति व स्वास्थ्य की रक्षा तथा श्रमिकों को (UPBoardSolutions.com) उनकी अपनी आयु एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत अधिक खतरनाक कार्यों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करने वाली परिस्थितियों को हटाना।
  6. बच्चों की शोषण से रक्षा करना।
  7. काम और शिक्षा का अधिकार तथा बेकारी, बीमारी और वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराना।
  8. काम के उचित वातावरण को सुरक्षित बनाना।
  9. रोजगार और जीवन को उचित स्तर दिलाना।
  10. कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लोगों के आर्थिक हितों को प्रोत्साहन देना।
  11. वैज्ञानिक आधार पर कृषि एवं पशुपालन को संगठित करना।

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प्रश्न 2.
आर्थिक विकास प्रक्रिया में राजकीय हस्तक्षेप एवं विधियों की विस्तृत विवेचना कीजिए।
या
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सफल क्रियान्वयन हेतु क्या कदम उठाने चाहिए? कोई दो सुझाव दीजिए। (2013)
या
औद्योगिक लाइसेन्सिग व्यवस्था को समझाइए तथा इसके उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए। मौद्रिक नीति का अर्थ एवं उद्देश्य लिखिए।
या
विकासशील देशों के आर्थिक विकास के लिए दो उपाय सुझाइए। [2010]
या
राजकोषीय नीति से आप क्या समझते हैं? अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए करारोपण के महत्त्व को लिखिए।
या
सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाने में सरकार द्वारा किए गए प्रयास लिखिए। भारतीय रिजर्व बैंक के किन्हीं चार प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए। [2013]
या
उत्पादन और वितरण पर नियन्त्रण हेतु राज्य कौन-से उपाय करता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

राज्य द्वारा हस्तक्षेप : हस्तक्षेप के प्रकार एवं विधियाँ

भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है। यहाँ सार्वजनिक क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र दोनों ही साथ-साथ कार्य करते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र को उद्देश्य ‘सामाजिक हित में वृद्धि करना है, किन्तु निजी क्षेत्र का उद्देश्य ‘अधिकतम लाभ अर्जित करना है। इस (UPBoardSolutions.com) उद्देश्य की पूर्ति हेतु निजी उत्पादक उपभोक्ताओं व श्रमिकों का अनेक प्रकार से शोषण करते हैं। राज्य का दायित्व समाज को उनके शोषण से बचाना है। इसके लिए सरकार आर्थिक क्रियाओं में हस्तक्षेप करती है। यह हस्तक्षेप निम्नलिखित तीन विधियों द्वारा किया जाता है

  • राजकोषीय नीति
  • मौद्रिक नीति एवं
  • उत्पादन एवं वितरण पर भौतिक नियन्त्रण।

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1. राजकोषीय नीति

सामान्यतः राजकोषीय नीति से अभिप्राय सार्वजनिक व्यय व सार्वजनिक ऋण से सम्बन्धित नीतियों से लगाया जाता है। प्रो० आर्थर स्मिथीज के शब्दों में, ‘राजकोषीय नीति वह नीति है, जिसमें सरकार अपने व्यय तथा आगम के कार्यक्रम को राष्ट्रीय (UPBoardSolutions.com) आय, उत्पादन अथवा रोजगार पर वांछित प्रभाव डालने और अवांछित प्रभावों को रोकने के लिए प्रयुक्त करती है।’ राजकोषीय नीति आर्थिक नीति का एक प्रभावशाली यन्त्र है और आर्थिक स्थायित्व का एक सशक्त साधन है।

इस प्रकार राजकोषीय नीति के अन्तर्गत सरकार सार्वजनिक आय (करारोपण), सार्वजनिक व्यय तथा सार्वजनिक ऋण के द्वारा अर्थव्यवस्था पर वांछित प्रभाव डालने का प्रयास करती है। राजकोषीय नीति के प्रमुख उपकरण निम्नलिखित हैं –

(i) करारोपण कर – एक अनिवार्य अंशदान है, जिसे प्रत्येक करदाता के अनिवार्य रूप से सरकार के कर विभाग को देना होता है। एक नीति के उपकरण के रूप में कर अर्थव्यवस्था को निम्न प्रकार प्रभावित करते हैं –

  1. अमीर व्यक्तियों की आय पर अपेक्षाकृत अधिक कर लगाकर आय एवं धन के वितरण की, विषमताएँ कम की जा सकती हैं।
  2. ऐसा कर-ढाँचा, जिसमें कर की दरें क्रमशः बढ़ती जाती हैं (प्रगतिशील कर-प्रणाली), एक न्यूनतम आय के स्तर को करमुक्त रखते हुए, आय की असमानता को कम रखने में सहायक है।
  3. विलासिता की वस्तुओं पर ऊँचे कर लगाकर आय की असमानता को कम किया जा सकता है।
  4. ऊँचे प्रत्यक्ष कर आयातों को हतोत्साहित करते हैं।
  5. अप्रत्यक्ष करों में कमी औद्योगिक विकास को गति प्रदान करती है।
  6. कर विकास के लिए आवश्यक पूँजी जुटाते हैं।
  7. करों द्वारा प्राप्त आय के परिणामस्वरूप सार्वजनिक (UPBoardSolutions.com) निवेश में वृद्धि आर्थिक एवं सामाजिक आधारिक संरचना के विकास में सहायक है।

(ii) सार्वजनिक व्यय – केन्द्र, राज्य व स्थानीय संस्थाओं द्वारा किए गए व्यय को सार्वजनिक व्यय कहते हैं। आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक व्यय का निम्नलिखित प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है

  1. सार्वजनिक व्यय द्वारा उपभोग स्तर, जीवन स्तर, कार्यक्षमता का स्तर और अन्तत: उत्पादकता के स्तर में वृद्धि की जा सकती है।
  2. सार्वजनिक व्यय आर्थिक साधनों के स्थानान्तरण को प्रभावित करता है।
  3. प्रगतिशील सार्वजनिक व्यय की पद्धति अपनाकर आर्थिक विषमताओं को कम किया जा सकता है।
  4. सार्वजनिक व्यय द्वारा सार्वजनिक निर्माण कार्य की योजनाओं को आरम्भ करके रोजगार में वृद्धि की जा सकती है।
  5. सार्वजनिक व्यय द्वारा आर्थिक विकास को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

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(iii) सार्वजनिक ऋण – जब सरकार अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को अपनी आय की सामान्य मदों से पूरा नहीं कर पाती, तो उसे सार्वजनिक ऋण का सहारा लेना पड़ता है। इस प्रकार सार्वजनिक ऋण सरकार के व्ययों की पूर्ति करने (UPBoardSolutions.com) का एक साधन है। अत: सरकार द्वारा लिया गया ऋण सार्वजनिक ऋण कहलाता है। यह ऋण अपने ही देश में अथवा विदेश से लिया जा सकता है। सार्वजनिक ऋण अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव डालते हैं –

  1. उत्पादक कार्यों पर व्यय किया गया सार्वजनिक ऋण उत्पादन शक्ति में वृद्धि करता है।
  2. सरकारी ऋण सुरक्षित व सुविधाजनक होते हैं। अतः ये बचत को प्रोत्साहित करते हैं।
  3. यदि ऋण निर्धन व्यक्तियों के लाभार्थ व्यय किया जा सकता है तो इससे आर्थिक असमानताएँ कम होती हैं।
  4. ऋण वर्तमान में उपभोग को घटाते हैं।
  5. ऋण द्वारा उद्योग और व्यापार में वांछनीय परिवर्तन लाए जा सकते हैं।

2. मौद्रिक नीति

सामान्यतया मौद्रिक नीति से आशय सरकार अथवा केन्द्रीय बैंक की उस नियन्त्रण नीति से लगाया जाता है, जिसके अन्तर्गत कुछ निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मुद्रा की मात्रा, उसकी लागत (ब्याज दर) तथा उसके उपयोग को नियन्त्रित करने के उपाय किए जाते हैं। प्रो० हैरी जी० जॉन्सन के शब्दों में, “मौद्रिक नीति का अर्थ केन्द्रीय बैंक की उस नियन्त्रण नीति से है, जिसके द्वारा केन्द्रीय बैंक सामान्य आर्थिक नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से मुद्रा की पूर्ति पर नियन्त्रण करता है।

मौद्रिक नीति साख की पूर्ति और उसके उपयोग को प्रभावित करके, स्फीति का मुकाबला करके तथा भुगतान सन्तुलन के साम्य को स्थापित करके आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने में सहायक होती है। इसके माध्यम से निजी उपयोग अथवा सरकारी व्यय के साधनों के प्रवाह को घटाया-बढ़ाया जा सकता है तथा विनियोग और पूँजी-निर्माण के लिए उपलब्ध साधनों की मात्रा में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है (UPBoardSolutions.com) और इस प्रकार कृषि व उद्योगों की मुद्रा एवं साख की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। किसी भी देश की एक उपयुक्त मौद्रिक नीति बचत व विनियोग के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करती है, साख की लागत को कम करके बचत व विनियोग को प्रोत्साहित करती है, मौद्रिक संस्थाओं की स्थापना करके निष्क्रिय साधनों को गतिशील बनाती है, स्फीति के दबाव को नियन्त्रित करके अतिरिक्त विनियोग के लिए उपयुक्त वातावरण पैदा करती है और हीनार्थ प्रबन्ध द्वारा विकासात्मक विनियोग के लिए अतिरिक्त । साधन उपलब्ध कर सकती है।

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भारत में मौद्रिक नीति का संचालक-भारतीय रिजर्व बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक भारत का केन्द्रीय बैंक है। इसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 ई० को की गई थी। 1 अप्रैल, 1949 ई० को इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। यह बैंक मुख्यतः निम्नलिखित कार्यों को सम्पन्न करता है –

  1. पत्र मुद्रा का निर्गमन करना।
  2. बैंकों के बैंक का कार्य करना।
  3. सरकार के बैंकर, एजेण्ट तथा सलाहकार के रूप में कार्य करना।
  4. विनियम दर को स्थिर बनाए रखना।
  5. कृषि व उद्योग की साख की व्यवस्था करना।
  6. आँकड़े संकलित करना तथा इन्हें प्रकाशित करना।
  7. मुद्रा व साख पर नियन्त्रण रखना।

3. उत्पादन एवं वितरण पर भौतिक नियन्त्रण

सरकार उत्पादन एवं वितरण के क्षेत्रों में भौतिक हस्तक्षेप के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण लगाती है।

(i) उत्पादन के क्षेत्र में नियन्त्रण – सरकार औद्योगिक नीति व लाइसेन्सिंग प्रक्रिया के माध्यम से अर्थव्यवस्था के औद्योगिक क्षेत्र को नियन्त्रित करती है।

औद्योगिक लाइसेन्सिंग – सरकार आर्थिक क्रियाओं पर आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप करती है उत्पादन के क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप का प्रथम स्वरूप औद्योगिक लाइसेन्स रहा है। भारतीय संसद ने ‘औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1948’ के बाद 1951 ई०  में औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम लागू किया था। इसके अन्तर्गत भारत में समस्त विनिर्माण इकाइयों को सरकार के पास पंजीकृत कराना अनिवार्य था। वर्तमान औद्योगिक नीति (1991 ई०) के प्रस्तावों के अनुसार, अब कुछ इकाइयों को छोड़कर जो सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, अन्यों को पंजीकृत कराना अनिवार्य नहीं है।

पुरानी व्यवस्था में लाइसेन्सिग नियमों को निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए अपनाया गया था –

  1. उद्योगों का सन्तुलित क्षेत्रीय विकास।
  2. बड़े व्यावसायिक घरानों की और अधिक वृद्धि पर रोक।
  3. नए उद्योगों को संरक्षण।
  4. लघु उद्योगों के लिए कुछ क्षेत्रों को रिजर्व करना।

कठोर नियमों एवं प्रशासनिक नियन्त्रणों में वृद्धि के कारण निजी क्षेत्र हतोत्साहित हो रहा था। अब इस नीति में उदारता औद्योगिक विकास की ओर एक सराहनीय कदम है।

1991 ई० में घोषित उदारवादी औद्योगिक नीति एवं बाद में किए गए संशोधनों (UPBoardSolutions.com) के अन्तर्गत, अब केवल 5 उद्योगों के लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य है, विदेशी पूँजी विनियोग को प्रोत्साहन दिया गया है, विदेशी तकनीक के अनेक समझौतों के स्वत: अनुमोदन की व्यवस्था की गई है और निजी क्षेत्र के विस्तार को प्रोत्साहित किया गया है।

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(ii) सार्वजनिक वितरण प्रणाली – अर्थव्यवस्था पर सरकार का भौतिक नियन्त्रण सार्वजनिक वितरण और राशनिंग प्रणाली के रूप में भी होता है। जैसा कि हम जानते हैं, माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा निर्धारित मूल्य सामाजिक दृष्टि से सदैव वांछनीय नहीं होते। वस्तुओं की पूर्ति के कम होते ही, उनके मूल्य तेजी से बढ़ने लगते हैं। हमारे देश में अनिवार्य वस्तुओं की प्रायः कमी रहती है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं –

  1. हम खाद्यान्नों जैसी अनिवार्य एवं विपणन योग्य वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर पाते।
  2. उत्पादित माल के भण्डारण एवं विपणन में पर्याप्त दोष हैं।
  3. बड़े व्यवसायी सट्टा बाजारी के लिए खाद्यान्नों का संग्रह कर लेते हैं।

माँग पक्ष की दृष्टि से भारतीय उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति में बहुत असमानताएँ हैं। निर्धन लोगों के पास क्रय-शक्ति का अभाव रहता है। अत: यदि खाद्यान्नों को माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के सहारे छोड़ दिया जाए तो क्रय-शक्ति के अभाव के कारण हमारी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग इन्हें खरीद नहीं पाएगा। फलस्वरूप एक ओर तो कुपोषण एवं भुखमरी होगी और दूसरी ओर अपव्यय एवं अति उपभोग की स्थिति होगी। अत: यह आवश्यक है कि सरकार खाद्यान्न, मिट्टी का तेल और इसी प्रकार की अन्य अनिवार्य वस्तुओं की वसूली, कीमत-निर्धारण और वितरण इस प्रकार करे कि उसकी माँग और पूर्ति के दबावों से रक्षा की जा सके। इसके लिए सरकार तीन कदम उठा सकती है –

1. प्राथमिक उत्पादक को उसकी उपज की पर्याप्त कीमत अवश्य दी जानी चाहिए, अन्यथा वह उत्पादन बढ़ाने में हिचकिचाएगा। अतः सरकार को एक ऐसी कीमत की घोषणा के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए, जिस पर वह सार्वजनिक वसूली के माध्यम से किसान के अतिरिक्त माल को खरीद सके। हमारे देश में केन्द्र सरकार कृषि मूल्य आयोग के सुझावों के आधार पर कृषि वस्तुओं के वसूली मूल्य की घोषणा करके कृषि को खरीदती है।

2. वसूल किए गए स्टॉक के लिए पर्याप्त भण्डारण सुविधाओं का निर्माण किया जाना चाहिए। इससे सरकार के पास बड़ा सुरक्षित भण्डार भौजूदं रहेगा, बाजार में कीमत-स्थिरता बनी रहेगी और सट्टे बाजारी की प्रवृत्ति हतोत्साहित होगी। सार्वजनिक वितरण-प्रणाली (UPBoardSolutions.com) के माध्यम से बनी वस्तुओं का विक्रय किया जाता है।

3. सम्पूर्ण देश में सरकरी नियन्त्रण वाले वितरण केन्द्रों अथवा ‘उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से अनिवार्य वस्तुओं की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाया जाता है।

भारत में खाद्यान्न, चीनी, मिट्टी का तेल आदि का वितरण ‘उचित मूल्य की दुकानों से होता है। नियन्त्रित वस्तुओं की बिक्री उपभोक्ता सहाकरी समितियों के माध्यम से की जाती है। खाद्यान्नों एवं चीनी की सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था आंशिक राशनिंग की योजना के माध्यम से उचित मूल्य की दुकानों द्वारा की जाती है। उपभोक्ताओं के लिए प्रति व्यक्ति कोटा निर्धारित कर दिया जाता है। इस प्रकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से अल्प आय या निम्न वर्ग के उपभोक्ताओं को उपभोग संरक्षण देना है।

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प्रश्न 3.
‘वैट’ (मूल्यवर्द्धित कर) से आप क्या समझते हैं? भारत में वैट की आवश्यकता बताइए।
उत्तर :

मूल्यवर्द्धित कर

जिस कर की वसूली मूल्यवृद्धि के प्रत्येक चरण (उत्पादन या वितरण) द्वारा की जाती है, उसे मूल्यवर्द्धित कर (VAT) कहते हैं। जैसाकि इसके नाम से भी स्पष्ट होता है कि यह मूल्यवर्धन (value addition) पर लगाया गया कर है, जो भारत में राज्यों द्वारा लगाया जाता है।

कर लगाने की ‘वैट’ विधि एक बेहतर कर-व्यवस्था है; क्योंकि इसमें कर की वसूली मूल्यवर्धन के प्रत्येक स्तर पर की जाती है, इस कारण इसे ‘बहु-बिन्दु कर’ (multi-point tax) व्यवस्था भी कहते हैं। इसके विपरीत गैट-वैट विधि में ‘एकल-बिंदु कर’ (single-point tax) व्यवस्था होती है जिससे ‘कर पर कर (tax upon tax) लगने लगता है तथा मुद्रास्फीति पर इसका ‘क्रमपाती प्रभाव’ (Cascading Effect) पड़ता है और इस कारण महँगाई बढ़ती है। भारत जैसे देश में, जहाँ एक बहुत बड़ी जनसंख्या क्रयशक्ति निम्न होने के कारण बेहतर जीवन-स्तर से नीचे गुजर-बसर करती है, कर वसूलने (UPBoardSolutions.com) की व्यवस्था वैट पद्धति (VAT Method) पर होना अति तर्कसंगत है। यह कर प्रणाली बिना ‘धनी-विरोधी’ (anti-ich) होते हुए भी ‘गरीबी-मित्रवत् (prop-poor) है।

भारत में वैट’ की आवश्यकता

विश्व के 150 से अधिक देश अपने अप्रत्यक्ष करों का संग्रहण मूल्यवर्धित कर (वैट) पद्धति पर ही करते हैं। जिससे वैश्वीकरण की प्रक्रिया में हो रही अर्थव्यवस्थाओं की समेकन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए भी भारत को इस प्रणाली को अपनाने की जरूरत प्रतीत हो रही थी। भारत में भी अप्रत्यक्ष करों की वसूली के लिए वैट’ विधि को अपनाना आवश्यक है। इसे हम निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं –

(i) चूंकि गैर-वैट पद्धति में कर की वसूली.एक ही बिन्दु पर की जाती है जिस कारण कर पर कर लगाने से मूल्य वृद्धि होती जाती है, जो गरीब-विरोधी (anti-poor) है। अतः वैट को अपनाने से यह मूल्य-वृद्धि नहीं होगी जिससे गरीबों की भी क्रयशक्ति बढ़ेगी तथा उनके जीवन-स्तर में सुधार होगा।

(ii) भारत एक संघीय राजव्यवस्था है, जहाँ केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों द्वारा भी कई प्रकार के अप्रत्यक्ष करों की वसूली की जाती है। यद्यपि केन्द्र द्वारा आरोपित अप्रत्यक्ष कर पूरे देश में एकसमान हैं, लेकिन राज्यों के अप्रत्यक्ष करों (उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, मनोरंजन कर इत्यादि) में हमेशा से ही भिन्नता रही है। इस प्रकार भारत के अलग-अलग राज्यों में अप्रत्यक्ष करों का भार भी अलग-अलग है। अर्थात् यह कह सकते हैं कि भारत का बाजार एकीकृत (unified) नहीं है जिससे भारत में उत्पादन और व्यापार करना काफी मुश्किल कार्य रहा है। यही कारण था कि ‘वैट’ के माध्यम से राज्यों के अप्रत्यक्ष कर में समानता लाने के लिए राज्य वैट’ (वैट) (UPBoardSolutions.com) की शुरुआत की गयी जिसने राज्यों के बिक्री करों का स्थान लिया तथा इसकी वसूली मूल्यवर्द्धित पद्धति पर प्रारंभ हुई। इस प्रक्रिया को ही ‘समरूप वैट’ (Uniform VAT) की शुरुआत भी कहते हैं।

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(iii) इसके अलावा आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया के फलीभूत होने के लिए भारत के बाजार को एकरूप या समरूप करना आवश्यक था जिसकी शुरुआत ‘वैट’ से की गयी।

(iv) भारतीय संघीय व्यवस्था में आर्थिक रूप से मजबूत संघ एवं कमजोर राज्यों का उद्भव हुआ, इस | कारण राज्य जिस स्थानीय विकास कार्य के प्रति उत्तरदायी थे, उसमें निरंतर ह्रास हुआ। चूंकि वैट विधि में राज्यों की कर वसूली बढ़ती है; अत: भारत में इस प्रणाली को अपनाना आवश्यक है।

(v) हालाँकि भारत में अप्रत्यक्ष करों की भारी चोरी होती रही है, परन्तु वैट विधि के लागू होने से कर चोरी घटी है; क्योंकि इस विधि में किसी भी स्तर पर किए गए मूल्यवर्द्धन की पुष्टि के लिए पूर्व में की गयी खरीद की रसीद दिखलाना आवश्यक है। इस विधि द्वारा करों की दोहरी संवीक्षा’ (double check) संभव है और कर की चोरी रोकना स्वतः संभव हो जाता है।

(vi) ‘राज्य वैट में राज्यों के अन्य अप्रत्यक्ष करों एवं केन्द्र के कई अप्रत्यक्ष करों को शामिल कर दिया जाए तो कर की व्यवस्था काफी सरल’ (Simple) और ‘दक्ष’ (Efficient) भी हो जाएगी। ऐसे ही भविष्य के कर को ‘एकल वैट’ (Single VAT) कहा जाएगा जिसकी कोशिश ‘वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax-GST) द्वारा करने की कोशिश की गई है। इस प्रकार, इन सभी बातों को ध्यान में रखकर कर सुधार (चेलिया कमेटी एवं केलकर कमेटी) (UPBoardSolutions.com) शुरू किए गए जिनमें एक सीमा तक सफलता भी मिली है और इन्हें आगे जारी रखने का प्रोत्साहन मिला है। विदित हो कि वर्ष 1996 में केन्द्र सरकार ने वैट पद्धति से उत्पाद शुल्क वसूलना शुरू किया था और इस कर को एक नया नाम सेनवैट (CENVAT’) दिया गया था।

हालाँकि कमेटी का एक अन्य प्रस्ताव राज्यों के उत्पाद शुल्क एवं बिक्री कर को एक कर, राज्य वैट (State VAT) अथवा वैट को मिला देने का था, लेकिन राज्यों की इच्छाशक्ति के अभाव में यह संभव नहीं हो सका। अन्ततः राज्यों के केवल बिक्री कर का नाम बदलकर वैट कर दिया गया और इसकी वसूली वैट पद्धति पर की जाने लगी। कुछ राज्यों ने इसे लागू नहीं किया, जबकि कुछ ने बाद में लागू किया, यद्यपि इसका अनुभव उत्साहजनक रहा।

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प्रश्न 4.
सेवा कर क्या है? वस्तु एवं सेवाकर का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

सेवा कर

पिछले दशक में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ती रही है। वर्ष 1994-95 में भारत सरकार ने सेवा कर लागू किया जिससे उसके कर राजस्व में वृद्धि होती रही है। सेवा कर एक प्रकार को अप्रत्यक्ष कर है; क्योंकि इसमें सेवा प्रदाता कर देता है और वह इसकी प्रतिपूर्ति करयोग्य वस्तुओं को खरीदने वालों या प्राप्तकर्ताओं से करता है।

वर्ष 1994 में केवल तीन सेवाओं से शुरू होकर आज सेवाकर 100 से अधिक सेवाओं पर लागू है। संघीय बजट 2015-16 में सेवा कर को बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया जिसमें शिक्षा उपकर भी शामिल है, जबकि पहले यह शिक्षा उपकर सहित 12.36 प्रतिशत था, (UPBoardSolutions.com) परन्तु 15 नवम्बर, 2015 को सेवा कर की दर को स्वच्छ भारत उपकर जोड़कर 14.5% कर दिया गया। इसके बाद 1 जून, 2016 से सभी करयोग्य सेवाओं पर 0.5 कृषि कल्याण उपकर लगाया गया है जिससे सेवा कर की दर बढ़कर 15% हो गयी है। यह परिवर्तन केन्द्र एवं राज्यों दोनों स्तरों पर सेवाओं पर करारोपण को सुगम बनाने के लिए किया गया।

वस्तु एवं सेवा कर

वस्तु एवं सेवाकर (जी०एस०टी०) एक ऐसा कर है, जो राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी वस्तु या सेवा के निर्माण, बिक्री और प्रयोग पर लगाया जाता है। इस कर व्यवस्था के लागू होने के बाद उत्पाद शुल्क, केन्द्रीय बिक्री कर, सेवा कर जैसे केन्द्रीय कर तथा राज्य स्तर के बिक्री कर या वैट, एण्ट्री टैक्स, लॉटरी टैक्स, स्टॉम्प ड्यूटी, टेलीकॉम लाइसेन्स फीस, टर्नओवर टैक्स इत्यादि समाप्त हो जाएँगे। इस कर व्यवस्था में वस्तु एवं सेवा की खरीद पर दिए गए कर को उनकी सप्लाई के (UPBoardSolutions.com) समय दिए जाने वाले कर के मुकाबले समायोजित कर दिया जाता है, हालाँकि यह कर भी अन्त में ग्राहक को ही देना होता है; क्योंकि वही सप्लाई चेन में खड़ा अन्तिम व्यक्ति होता है।

सर्वप्रथम अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में सुधारों की शुरुआत वर्ष 2003 में केलकर समिति ने की थी, इसके बाद संप्रग सरकार ने वर्ष 2006 में जी०एस०टी० विधेयक प्रस्तावित किया था तथा पहली बार यह विधेयक वर्ष 2011 में लाया गया था। जी०एस०टी० व्यवस्था विश्व के 140 देशों में लागू है। वर्ष 1954 में जी०एस०टी० लागू करने वाला फ्रांस विश्व का पहला देश है। भारत की तरह की दोहरी जी०एस०टी० व्यवस्था ब्राजील और कनाडा में भी है। वर्ष 2000 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने जी०एस०टी० पर विचार के लिए विशेष अधिकारप्राप्त समिति का गठन किया था तथा समिति का अध्यक्ष पश्चिम बंगाल के तत्कालीन वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता को बनाया तथा असीम दासगुप्ता समिति को जी०एस०टी० के लिए मॉडल तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

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वर्ष 2005 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आम बजट में जी०एस०टी० के विचार को सार्वजनिक तौर पर सामने रखा था। इसके अलावा वर्ष 2009 में जी०एस०टी० के बारे में एक विमर्श-पत्र रखा गया तथा बाद में सरकार ने राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक अधिकारसम्पन्न समिति बनाई थी। हालाँकि वर्ष 2014 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने इससे सम्बन्धित विधेयक तैयार किया था, किन्तु लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। वर्तमान सरकार इसे लोकसभा में लेकर आई और इसे स्थायी समिति में भेजा गया।

वस्तु एवं सेवा कर (जी०एस०टी०) से सम्बन्धित संविधान संशोधन (122वाँ) विधेयक 8 अगस्त, 2016 को लोकसभा में पारित हो गया तथा सभी सदस्यों ने इस बिल के पक्ष में मतदान किया। हालाँकि राज्यसभा ने 3 अगस्त, 2016 को जी०एस०टी० विधेयक को सर्वसम्मति के साथ पारित कर दिया था। इस संविधान संशोधन विधेयक का राष्ट्रपति की स्वीकृति से पूर्व आधे से अधिक राज्यों के विधानमण्डलों द्वारा समर्थन किया जाना था, इसी क्रम में असम देश का पहला राज्य था जिसकी विधानसभा ने सर्वप्रथम इस विधेयक का समर्थन किया। तत्पश्चात् बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली, नागालैण्ड, महाराष्ट्र, हरियाणा, सिक्किम, मिजोरम, तेलंगाना, गोवा, ओडिशा, राजस्थान, अरुणाचल प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश राज्यों की विधानसभाओं द्वारा इस विधेयक को पारित किए (UPBoardSolutions.com) जाने के बाद 8 सितम्बर, 2016 को राष्ट्रपति द्वारा इस विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इसी के साथ संविधान संशोधन (101वाँ) अधिनियम, 2016 लागू हुआ। इस अधिनियम का क्रियान्वयन 1 जुलाई, 2017 से प्रारम्भ किया गया जिसमें वस्तु एवं सेवाकर की दरों को चार स्तरों में बाँटा गया है, जो क्रमश: 5%, 12%, 18% तथा 28% हैं।

इस कर व्यवस्था में केन्द्र और राज्यों, दोनों के कर केवल बिक्री के समय वसूले जाएँगे, साथ ही ये दोनों ही कर निर्माण लागत (मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट) के आधार पर तय होंगे जिससे वस्तु और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम उपभोक्ताओं को लाभ होगा।

गरीबों के लिए जरूरी चीजों को जी०एस०टी० के दायरे से बाहर रखा गया है, इससे गरीबी दूर करने में भी मदद मिलेगी, बैंकों में भी पारदर्शिता आएगी। छोटे उद्यमियों को भी उनके रिकॉर्ड के हिसाब से आसानी से कर्ज मिल सकेगा जिससे उनके व्यापार में भी आशातीत वृद्धि हो सकेगी। इसके अन्तर्गत भारत सरकार द्वारा कुछ केन्द्रीय एवं कुछ राज्य के अप्रत्यक्ष करों को समाहित किया गया है जिनका विवरण निम्नलिखित है –

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 4)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था में राज्य का हस्तक्षेप क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
अर्थव्यवस्था के संचालन में राज्य की निर्णायक भूमिका होती है। राज्य के नियन्त्रण के बिना सुनियोजित आर्थिक विकास सम्भव नहीं है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था पायी जाती है, जिसमें निजी तथा सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्र साथ-साथ विद्यमान हैं। भारतीय संविधान में राज्य का एक प्रमुख उद्देश्य ‘समाजवादी’ गणतन्त्र की स्थापना करना है, यह तभी सम्भव है जब अर्थव्यवस्था पर राज्य का सम्पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हो।

पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का बाजार तन्त्र सामाजिक उद्देश्यों की अवहेलना करता है और केवल स्व-लाभ की भावना से प्रेरित होकर उत्पादन क्रिया सम्पादित करता है। अर्थव्यवस्था में बढ़ते धन और आय के वितरण की असमानताओं को कम करने (UPBoardSolutions.com) और समाज़ में अधिकतम लोक-कल्याण की दृष्टि से सरकार अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार के नियन्त्रण लगाकर हस्तक्षेप करती है। इस प्रकार अर्थव्यवस्था में आवश्यकतानुसार नियन्त्रण उपायों को अपनाना सरकारी हस्तक्षेप कहलाता है। कराधान, मौद्रिक नीति, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राशनिंग आदि सरकारी हस्तक्षेप के उदाहरण हैं।

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अर्थव्यवस्था में राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता एक अन्य कारण से भी है। देश के आर्थिक विकास हेतु आवश्यक निवेश के लिए राज्य को साधन जुटाने की आवश्यकता होती है। शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, ऊर्जा आदि सामाजिक तथा आर्थिक सेवाओं को प्रदान करने के लिए राज्य को धन की आवश्यकता होती है। इसलिए राज्य को अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करना आवश्यक होता है। यह कार्य राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति तथा उत्पादन एवं वितरण पर भौतिक नियन्त्रण द्वारा सम्पादित किया जाता है। इस प्रकार राज्य के हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य आर्थिक असमानता को समाप्त करना तथा आर्थिक न्याय की स्थापना करना है।

प्रश्न 2.
देश में मौद्रिक नियन्त्रण स्थापित करने वाली किन्हीं दो संस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मौद्रिक नीति का अभिप्राय ऐसी नीति से है जिसे मौद्रिक अधिकारी द्वारा देश में साख और मुद्रा की मात्रा को नियमित एवं नियन्त्रित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। देश का केन्द्रीय बैंक मौद्रिक नीति लागू करने के लिए अधिकृत होता है। भारत में देश का केन्द्रीय बैंक ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ मौद्रिक नीति का नियमन करता है। भारतीय रिजर्व बैंक अनेक उपायों द्वारा देश में साख-मुद्रा की पूर्ति को नियन्त्रित करता है। इन उपायों में प्रमुख हैं –

1. बैंक दर नीति – वह ब्याज की दर, जिस पर केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बैकों को ऋण प्रदान करता है, बैंक दर कहलाती है। यदि बैंक दर अधिक होती है, तो व्यापारिक बैंक भी ऊँची ब्याज की दर पर रुपया उधार देंगे। यदि बैंक दर नीची होगी, तो व्यापारिक बैंक व्यापारियों को कम ब्याज की दर पर रुपया उधार देंगे। इस प्रकार बैंक दर और ब्याज दरे में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। बैंक दर में वृद्धि से साख की मात्रा कम होती है और बैंक दर में कमी से साख की मात्रा बढ़ती है।

2. खुले बाजार की कार्यवाही – खुले बाजार की कार्यवाही से तात्पर्य, केन्द्रीय बैंक द्वारा प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय करना है। जब केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियों को खरीदता है, तो इससे व्यापारिक बैंकों के जमा कोष बढ़ते हैं और इससे अधिक साख का सृजन किया जा सकता है। जब साख की मात्रा में विस्तार करना होता है, तो केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियों को खरीदता है। साख की मात्रा को कम करने के लिए केन्द्रीय बैंक खुले बाजार में प्रतिभूतियों को बेचता है।

प्रश्न 3.
राजकोषीय नीति तथा मौद्रिक नीति में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
राजकोषीय नीति – राजकोषीय नीति से अभिप्राय सरकार द्वारा अपने बजट, कराधान, व्यय तथा ऋण नीति की ऐसी व्यवस्था से है, जिसका उद्देश्य सरकार द्वारा आर्थिक विकास प्राप्त करना है।
मौद्रिक नीति – मौद्रिक नीति से अभिप्राय ऐसी नीति से है, जिसे मौद्रिक अधिकारी द्वारा देश में मुद्रा तथा साख की मात्रा को नियमित एवं नियन्त्रित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

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प्रश्न 4.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली क्या है ? इसके दो महत्त्व/लाभ बताइए। [2009]
या
सार्वजनिक वितरण प्रणाली का क्या तात्पर्य है? इसके दो लाभों को-उल्लेख कीजिए। [2014]
या
भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दो उद्देश्यों/लाभ का वर्णन कीजिए। [2017]
या
भारत में राशनिंग व्यवस्था के दो महत्त्व बताइए।
या
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के किन्हीं तीन महत्त्वों को बताइट। [2015]
उत्तर :
माँग और आपूर्ति की शक्तियाँ अर्थव्यवस्था में उत्पादन व वितरण के प्रश्नों का हमेशा ही सामाजिक दृष्टि से एक वांछनीय हल प्रस्तुत नहीं कर पातीं। हमारे देश में भोजन, ईंधन और कपड़े जैसी अनिवार्य वस्तुओं की माँग और पूर्ति के मामले में दोष व्याप्त हैं।

पूर्ति की ओर से समस्या वस्तु की दुर्लभता की है। इस दुर्लभता के कारण-अपर्याप्त उत्पादन, उत्पादन के भण्डारण व विपणन में कमियाँ तथा सट्टे एवं कालाबाजारी के लाभों के लिए जमाखोरी की प्रवृत्ति हो सकते हैं।

माँग की ओर से समस्या गरीबी और उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति में पर्याप्त असमानताओं की है। उदाहरण के लिए, यदि खाद्यान्नों को; माँग और पूर्ति की मुक्त शक्तियों द्वारा; निर्धारित कीमतों पर बेचने दिया जाए तो वे व्यावहारिक रूप में हमारी जनसंख्या के एक बहुत (UPBoardSolutions.com) बड़े भाग की पहुँच से बाहर हो जाएँगे। ऐसे में एक ओर तो कुपोषण एवं भुखमरी की स्थिति होगी तथा दूसरी ओर अपव्यय एवं अति उपभोग की।

इस समस्या से निबटने के तीन प्रभावी उपायों में से एक है—सार्वजनिक वितरण प्रणाली। इसके अन्तर्गत समूचे देश में सरकारी नियन्त्रण वाले वितरण केन्द्रों अथवा उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से अनिवार्य वस्तुओं का वितरण किया जाता है। भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली खाद्यान्न और चीनी की बिक्री करने वाली उचित मूल्य की दुकानों के तन्त्र के माध्यम से सफलतापूर्वक काम करती है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का प्रथम उद्देश्य माँग और पूर्ति के मध्य की खाई को पाटना है। इसका दूसरी उद्देश्य यह है कि इसने अनिवार्य खाद्य और अनिवार्य वस्तुओं की जमाखोरी को दूर करने में अहम् भूमिका निभाई है।

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प्रश्न 5.
आर्थिक विकास हेतु सरकार को कर लगाने चाहिए। इसके पक्ष में कोई दो तर्क लिखिए।
उत्तर :
आर्थिक विकास हेतु सरकार को कर लगाने चाहिए, इसके पक्ष में दो तर्क हैं –

  1. विकास के लिए आवश्यक पूँजी जुटाने का कार्य सरकार करों द्वारा ही करती है।
  2. करों द्वारा प्राप्त आय के परिणामस्वरूप सार्वजनिक निवेश में वृद्धि आर्थिक एवं सामाजिक आधारिक संरचना के विकास में सहायक है।

प्रश्न 6.
मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है ? इसके उद्देश्य लिखिए।
या
भारत की मौद्रिक नीति के किन्हीं दो उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। [2009]
उत्तर :
मौद्रिक नीति का अभिप्राय ऐसी नीति से है, जिसे मौद्रिक अधिकारी द्वारा देश में साख और मुद्रा की मात्रा को नियमित एवं नियन्त्रित करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. बचत व विनियोग के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करना।
  2. साख की लागत को कम करके बचत व विनियोग को प्रोत्साहित करना।
  3. मौद्रिक संस्थाओं की स्थापना करके निष्क्रिय साधनों को गतिशील बनाना।
  4. स्फीति के दबाव को नियन्त्रित करके अतिरिक्त विनियोग के लिए उपयुक्त वातावरण पैदा करना।
  5. हीनार्थ प्रबन्धन द्वारा विकासात्मक विनियोग के लिए अतिरिक्त साधन उपलब्ध करना।

प्रश्न 7.
जी०एस०टी० के लाभ बताइए।
उत्तर :
जी०एस०टी० के लाभ (Benefits of GST)-जी०एस०टी० एक अधिक सटीक कर पद्धति है जिसका अनुपालन निष्पक्ष तथा वितरण अधिक आकर्षक है। जी०एस०टी० मौजूदा टैक्स ढाँचे की तरह कई स्थानों पर न लगकर केवल गन्तव्य स्थान (Destination Point) पर लगेगा। मौजूदा व्यवस्था के अनुसार किसी सामान पर फैक्टरी से निकलते समय टैक्स लगता है और फिर खुदरा स्थान पर भी, जब वह बिकता है तो वहाँ भी उस पर टैक्स जोड़ा जाता है। (UPBoardSolutions.com) जानकारों का मानना है कि इस नई व्यवस्था से जहाँ भ्रष्टाचार में कमी आएगी, वहीं लाल फीताशाही भी कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी, पूरा देश एक साझा व्यापार बढ़ाने में सहायक होगा।

सरकार को लाभ-जी०एस०टी० के तहत कर संरचना आसान होगी और ‘कर-आधार’ बढ़ेगा। इसके दायरे से बहुत कम सामान और सेवाएँ बच पाएँगे। एक अनुमान के अनुसार, जी०एस०टी० व्यवस्था लागू होने के बाद निर्यात, रोजगार और आर्थिक विकास में बढ़ोतरी होगी, इससे देश को सालाना के ₹ 15 अरब की अतिरिक्त आमदनी होगी।

कम्पनियों को लाभ-वस्तुओं और सेवाओं के दाम कम होने से उनकी खपत बढ़ेगी, इससे कम्पनियों का लाभ बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त उन पर टैक्स का औसत बोझ कम होगा। कर केवल बिक्री के स्थान पर लगने से उत्पादन लागत (प्रोडक्शन कॉस्ट) कम होगी जिससे निर्यात बाजार में कम्पनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ेगी।

जनता को लाभ-इस कर व्यवस्था में केन्द्र और राज्यों दोनों के कर केवल बिक्री के समय वसूले (UPBoardSolutions.com) जाएँगे। साथ ही ये दोनों ही कर निर्माण लागत (मैन्यूफैक्चरिंग कॉस्ट) के आधार पर तय होंगे, इससे वस्तु और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम उपभोक्ताओं को लाभ होगा।

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गरीबों के लिए जरूरी चीजों को जी०एस०टी० के दायरे से बाहर रखा गया है। इससे गरीबी दूर करने में भी मदद मिलेगी। बैंकों में भी पारदर्शिता आएगी, वे गरीबों को कर्ज देने में आनाकानी नहीं करेंगे। छोटे उद्यमियों को भी उनके रिकॉर्ड के हिसाब से आसानी से कर्ज मिलेगा; क्योंकि अब सब कुछ ऑनलाईन होगा।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका किन बातों पर निर्भर करती है ?
उत्तर :
अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है

  1. राज्य द्वारा स्वीकृत सिद्धान्त तथा
  2. अर्थव्यवस्था में निर्णय लेने वाले व्यक्ति।

प्रश्न 2.
मिश्रित अर्थव्यवस्था को परिभाषित कीजिए। [2010]
उत्तर :
श्री दूधनाथ चतुर्वेदी के अनुसार, “मिश्रित अर्थव्यवस्था एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसमें निजी क्षेत्र तथा सार्वजनिक क्षेत्र, दोनों का पर्याप्त मात्रा में सह-अस्तित्व होता है। दोनों के कार्यों का क्षेत्र निर्धारित कर दिया जाता है, परन्तु निजी क्षेत्र की प्रमुखता रहती है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में इस प्रकार कार्य करते हैं कि बिना शोषण के देश के सभी वर्गों के आर्थिक कल्याण में वृद्धि हो तथा तीव्र आर्थिक विकास प्राप्त हो सके।

प्रश्न 3.
एक पूर्णतया समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुख्य निर्णयकर्ता कौन होता है ?
उत्तर :
एक पूर्णतया समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुख्य निर्णयकर्ता राज्य होता है।

प्रश्न 4.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बिक्री की जाने वाली किन्हीं दो प्रमुख वस्तुओं के नाम लिखिए।
उत्तर :
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत बिक्री की जाने वाली दो प्रमुख वस्तुओं के नाम हैं

  1. चीनी तथा
  2. मिट्टी का तेल।

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प्रश्न 5.
उन तीन विधियों का नाम लिखिए जिनके द्वारा राज्य एक मिश्रित अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करता है।
या
आर्थिक क्रियाओं में राज्य सरकार के हस्तक्षेप की किन्हीं दो विधियों के नाम लिखिए। [2011]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था के किन्हीं तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए जिनमें राज्य हस्तक्षेप करता है। [2015]
उत्तर :

  1. राजकोषीय नीति द्वारा
  2. मौद्रिक नीति द्वारा
  3. उत्पादन एवं वितरण पर भौतिक नियन्त्रण द्वारा।

प्रश्न 6.
भारत में आवश्यक वस्तुओं की कमी के क्या कारण हैं ?
उत्तर :
भारत में आवश्यक वस्तुओं की कमी के मुख्य दो कारण निम्नलिखित हैं –

  1. उत्पादन का अपर्याप्त होना तथा
  2. भण्डारण एवं विपणन सुविधाओं में कमी।

प्रश्न 7.
बाजार में माँग और पूर्ति की शक्तियाँ किसके पक्ष में होती हैं ?
उत्तर :
बाजार में माँग और पूर्ति की शक्तियाँ उन्हीं के पक्ष में (UPBoardSolutions.com) होती हैं जो अधिक खर्च करने की स्थिति में होते हैं।

प्रश्न 8.
व्यावसायिक बैंकों को दिशा देना एवं नियन्त्रित करना किसका काम है ?
उत्तर :
व्यावसायिक बैंकों को दिशा देने और नियन्त्रित करने का काम भारतीय रिजर्व बैंक का है।

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प्रश्न 9.
भारतीय रिजर्व बैंक के चार प्रमुख कार्य लिखिए। [2014, 15]
उत्तर :
भारतीय रिजर्व बैंक के तीन प्रमुख कार्य हैं—

  1. पत्र-मुद्रा का निर्गमन
  2. विनिमय दर को स्थिर बनाये रखना
  3. सरकार के बैंकर का कार्य तथा
  4. बैंकों का बैंक।

प्रश्न 10.
विदेशी विनिमय की खरीद व बिक्री को कौन-सी संस्था नियन्त्रित करती है ?
उत्तर :
भारतीय रिजर्व बैंक।

प्रश्न 11.
भारत के केन्द्रीय बैंक का नाम बताइए। इसकी स्थापना व राष्ट्रीयकरण कब-कब किया गया ?
उत्तर :
भारत के केन्द्रीय बैंक का नाम भारतीय रिजर्व बैंक (रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया) है। इसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 ई० को हुई थी और 1 अप्रैल, 1949 ई० को इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

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प्रश्न 12.
भारत में मौद्रिक नीति का नियन्त्रण कौन करता है ?
उत्तर :
रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया।

प्रश्न 13.
राशनिंग का एक महत्त्व लिखिए। [2009]
उत्तर :
इससे वस्तु की कीमतें स्थिर रहती हैं तथा सट्टे, कालाबाजारी व जमाखोरी की भी रोकथाम हो जाती है।

प्रश्न 14.
आर्थिक विकास से क्या आशय है?
उत्तर :
आर्थिक विकास एक निरन्तर चलती रहने वाली प्रक्रिया है, (UPBoardSolutions.com) जिससे वास्तविक राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में दीर्घकालीन वृद्धि होती है।

प्रश्न 15.
सरकारी हस्तक्षेप से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
अर्थव्यवस्था में बढ़ते धन और आय के वितरण की असमानताओं को कम करने, विकास की दृष्टि से आवश्यक निवेशों के लिए साधन जुटाने और समाज में अधिकतम लोक-कल्याण की दृष्टि से सरकार अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार के नियन्त्रण लगाकर हस्तक्षेप करती है। (UPBoardSolutions.com) इस प्रकार अर्थव्यवस्था में आवश्यकतानुसार नियन्त्रण उपायों को अपनाना सरकारी हस्तक्षेप कहलाता है।

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प्रश्न 16.
अर्थव्यवस्था में राज्य किन तरीकों से हस्तक्षेप करता है ?
उत्तर :
अर्थव्यवस्था में राज्य निम्नलिखित तरीकों से हस्तक्षेप कर सकता है –

  1. कराधान
  2. मौद्रिक नीति तथा
  3. सार्वजनिक वितरण एवं राशनिंग।

प्रश्न 17.
राशनिंग व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
राशनिंग से आशय है-सरकारी नियन्त्रण की दुकानों द्वारा उचित मूल्य पर खाद्यान्न व आवश्यक वस्तुओं का प्रति व्यक्ति निर्धारित कोटा उपलब्ध कराना।

प्रश्न 18.
औद्योगिक लाइसेन्सिग का क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
औद्योगिक लाइसेन्स प्रणाली के अन्तर्गत औद्योगिक विकास एवं नियमन (UPBoardSolutions.com) अधिनियम (1951) लागू किया गया, जिसके अधीन भारत की सभी विनिर्माण औद्योगिक इकाइयों को पंजीकृत करवाना अनिवार्य किया गया।

प्रश्न 19.
औद्योगिक लाइसेन्सिग के दो प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उतर :

  1. उद्योगों का क्षेत्रीय स्तर पर सन्तुलित विकास करना।
  2. नव-संचालित उद्योगों का संरक्षण करना।

प्रश्न 20.
पंजीकरण औद्योगिक लाइसेन्सिंग का क्या अभिप्राय है ? [2010]
उत्तर :
भारतीय संसद ने ‘औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948’ के बाद 1951 ई० में औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम” लागू किया। इसी को पंजीकरण औद्योगिक लाइसेन्सिग प्रणाली का नाम दिया गया।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

1. हमारी (भारतीय) अर्थव्यवस्था है [2009, 16]

(क) पूँजीवादी
(ख) समाजवादी
(ग) मिश्रित
(घ) साम्यवादी

2. औद्योगिक लाइसेन्स आवश्यक नहीं है

(क) लघु उद्योगों की स्थापना के लिए।
(ख) कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए।
(ग) उद्योगों के विस्तार के लिए
(घ) नयी इकाई लगाने के लिए।

3. मौद्रिक नियन्त्रण किया जाता है [2014]
या
भारत में मौद्रिक नीति कौन नियन्त्रित करता है? [2013, 16]

(क) रिजर्व बैंक द्वारा।
(ख) वित्तीय संस्थाओं द्वारा
(ग) राज्य सरकार द्वारा
(घ) केन्द्र सरकार द्वारा।

4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का क्या उद्देश्य है?

(क) उत्पादन संरक्षण
(ख) विदेशी विनिमय संरक्षण
(ग) मजदूरी संरक्षण
(घ) उपभोक्ता संरक्षण

5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सम्मिलित नहीं है

(क) खाद्यान्न
(ख) चीनी
(ग) मिट्टी का तेल
(घ) डीजल

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6. निम्नलिखित में से भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्य कार्य कौन-सा है?

(क) केवल मुद्रा का लेन-देन करना
(ख) केवल ऋण सुविधा उपलब्ध कराना।
(ग) केवल विदेशी विनिमय एवं क्रय-विक्रय का नियन्त्रण
(घ) केवल आयात-निर्यात पर नियन्त्रण करना।

7. भारत में विदेशी विनिमय की खरीद एवं बिक्री पर नियन्त्रण कौन-सा बैंक करता है? [2009]
या
भारत में विदेशी विनिमय को नियन्त्रित करने वाला निम्नलिखित में से कौन है? [2013, 16]

(क) स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया
(ख) रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया
(ग) सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
(घ) यूनियन बैंक ऑफ इण्डिया

8. भारत में मौद्रिक नीति का संचालन व नियन्त्रण कौन-सा बैंक करता है? [2009,14]

(क) स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया
(ख) रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया
(ग) सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
(घ) बैंक ऑफ इण्डिया

9. निम्नलिखित में से भारत का केन्द्रीय बैंक कौन है? [2015, 18]

(क) पंजाब नेशनल बैंक
(ख) पंजाब एण्ड सिन्ध बैंक
(ग) भारतीय रिजर्व बैंक
(घ) सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया

10. सरकारी हस्तक्षेप का उदाहरण है

(क) राजकोषीय नीति
(ख) मौद्रिक नीति
(ग) सरकारी नियन्त्रण
(घ) ये सभी

11. नई औद्योगिक नीति की घोषणा हुई थी

(क) 1950 में
(ख) 1982 में
(ग) 1986 में
(घ) 1991 में

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12. भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई थी [2011, 15, 17]

(क) 1935 में
(ख) 1940 में
(ग) 1945 में
(घ) 1950 में

13. भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कब हुआ? [2017]

(क) 1 अप्रैल, 1949
(ख) 26 जनवरी, 1950
(ग) 1 अप्रैल, 1951
(घ) 1 जनवरी, 1948

14. भारत में आर्थिक उदारीकरण की नीति कब आरम्भ हुई? [2017, 18]

(क) 1981 ई० में
(ख) 1998 ई० में
(ग) 1991 ई० में।
(घ) 1988 ई० में

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 7 (Section 4)

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 14 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 14 विकसित देश के रूप में उभरता भारत (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 14 विकसित देश के रूप में उभरता भारत (अनुभाग – तीन).

विस्तुत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास के क्षेत्र में भारत की बदलती स्थिति पर निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत व्याख्या कीजिए [2015]
(क) कृषि, (ख) उद्योग-धन्धे, (ग) जनसंख्या
या
भारत में औद्योगिक उत्पादन की वर्तमान स्थिति क्या है ?
या
कृषि में खाद्यान्न उत्पादन की बदलती स्थिति का वर्णन कीजिए।
या
भारत में शिक्षा के बदलते स्वरूप का वर्णन कीजिए।
या
भारत में प्रौढ़ शिक्षा की व्यापकता का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
भारत शिक्षा कोष के विषय में आप क्या जानते हैं ?
या
विकसित देश के रूप में उभरते हुए भारत की कृषि के क्षेत्र में किन्हीं तीन उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :

विसव में भारत की बदलती स्थिति

स्वतन्त्रता से पूर्व भारत की स्थिति एक पिछड़े हुए देश जैसी थी। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में यह बहुत पीछे था। अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति के कारण भारत के प्राचीन लघु तथा कुटीर उद्योग नष्ट हो चुके थे और हमें छोटी-छोटी चीजों के लिए भी विदेशों का मुँह ताकना पड़ता था। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत ने अपने प्राकृतिक संसाधनों को मानवीय साधनों द्वारा आर्थिक साधनों में बदलना प्रारम्भ किया और (UPBoardSolutions.com) तेजी से आर्थिक विकास की ओर बढ़ने लगा। निश्चय ही आज भारत वैसा नहीं है, जैसा वह स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय था। अन्य विकासशील देशों की तुलना में वह आज निरन्तर तीव्रगति से विकास की दिशा में बढ़ रहा है। जीवन के विविध क्षेत्रों में उसने अनेक विशिष्ट परिवर्तन किये हैं तथा परिवर्तन की यह प्रक्रिया निरन्तर आगे बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप, आज भारत की गणना उन्नत देशों की श्रेणी में होने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब भारत विकसित देशों की पंक्ति में आ जाएगा।

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कृषि
कृषि में खाद्यान्न उत्पादन की बदलती स्थिति – भारत जो कुछ दशक पूर्व विश्व के प्रमुख खाद्यान्न आयातक राष्ट्रों में सम्मिलित था, अब इनके प्रमुख निर्यातक देशों में आ गया है। यह उपलब्धि भारत को चावल व गेहूँ के निर्यात से प्राप्त हुई है। भारत से चावल का निर्यात नवम्बर, 2000 ई० में तथा गेहूं का निर्यात अप्रैल, 2001 ई० में शुरू किया गया था। तीन वर्षों में ही चावल निर्यात में भारत ने विश्व में दूसरा तथा गेहूँ, निर्यात में आठवाँ स्थान प्राप्त कर लिया है। इन तीन वर्षों में भारत ने 30 देशों को गेहूँ का व 54 देशों को चावल का निर्यात किया है। वाणिज्य मन्त्रालय के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2002-03 की अवधि में भारत से ३ 1,700.18 करोड़ मूल्य का 35.70 लाख टन गेहूं का निर्यात किया गया, जबकि वर्ष 2001-02 में यह निर्यात मात्र १ 1,330.21 करोड़ का था। इस प्रकार गेहूं के निर्यात में एक वर्ष में लगभग ३ 370 करोड़ की वृद्धि हुई। इसी प्रकार वर्ष 2002-03 की अवधि में बासमती चावल का निर्यात १ 1,729.54 करोड़ तथा अन्य प्रकार के चावल का निर्यात १ 3,634.08 करोड़ था, जबकि वर्ष 2001-02 ई० में अन्य प्रकार के चावल का निर्यात मात्र १ 1,331.37 करोड़ था। इस प्रकार चावल के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि वर्ष 2002-03 में दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार दोनों ही प्रकार के चावल के निर्यात में एक वर्ष में लगभग * 4,000 करोड़ की वृद्धि हुई। सन् 1965 ई० में खाद्यान्नों का आयात 1.03 करोड़ टने था, जो वर्ष 1983-84 में मात्र (UPBoardSolutions.com) 24 लाख टन रह गया। वर्ष 2000-01 में खाद्यान्नों के आयात की कोई आवश्यकता ही न रही और देश निर्यात करने की स्थिति में पहुँच गया। यह स्थिति भारतीय कृषि के बदलते स्वरूप को दर्शाती

उद्योग – धन्धे
औद्योगिक उत्पादन की वर्तमान स्थिति – नियोजन-काल की अवधि में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में औद्योगिक क्षेत्र के हिस्से में पर्याप्त वृद्धि हुई है।औद्योगिक क्षेत्र का GDP में हिस्सा जो वर्ष 1950-51 में 1993-94 ई० की कीमतों पर 13.3% था, वह रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2002-03 में बढ़कर 21.8% हो गया है। विश्वव्यापी मन्दी के चलते वित्तीय वर्ष 2002-03 की अवधि में भारत में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि की दर 5.8% रही, जब कि पूर्व वित्तीय वर्ष 2001-02 में यह दर 2.7% थी।

उद्योगों के उपयोग पर आधारित वर्गीकरण के अन्तर्गत वर्ष 2002-03 की अवधि में पूँजीगत उत्पादों में 10.4% की वृद्धि दर्ज की गयी थी। इसी प्रकार आधारभूत वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि की दर 4.8%, मध्यवर्ती उत्पादों के लिए 3.8% तथा उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में भी उत्पादन में वृद्धि की दर 6.4% रही थी। छ: आधारभूत उद्योगों-बिजली, कोयला, इस्पात, कच्चा पेट्रोलियम, पेट्रोलियम रिफायनरी उत्पाद तथा सीमेण्ट के निष्पादन में वर्ष 2002-03 की अवधि में क्रमश: 3.1, 4.3, 8.7,3.3, 4.9 तथा 8.8% वृद्धि की दर रही थी। इन छ: उद्योगों की समग्र वृद्धि दर वर्ष 2002-03 की अवधि में 5.2% रही थी। यह स्थिति भारतीय उद्योग-धन्धों के बदलते स्वरूप को दर्शाती है।

जनसंख्या
भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल विश्व का लगभग 2.4% है, किन्तु यहाँ विश्व की 17.5% जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। भारत में जनसंख्या सम्बन्धी विभिन्न आँकड़ों की जानकारी नियमित रूप से होने वाली दस-वर्षीय जनगणना से प्राप्त होती है। भारत में पहली विश्वसनीय जनगणना 1881 ई० में हुई। उस समय भारत की जनसंख्या 23.7 करोड़ थी, जो 1991 ई० में बढ़कर 84.63 करोड़ हो गयी।, 11 मई, 2000 ई० को भारत की जनसंख्या 100 करोड़ और मई, 2011 ई० की जनगणना के अनुसार, 1,210,193,422 थी। (स्रोत: इण्टरनेट)। भारत में अब (UPBoardSolutions.com) जनसंख्या वृद्धि की समस्या भयावह हो उठी है, जिसे विद्वानों ने ‘जनंसख्या विस्फोट’ की संज्ञा दी है।

वर्ष 2011 ई० की आधिकारिक जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.02 करोड़, जिसमें ग्रामीण जनसंख्या लगभग 83.3 करोड़ (68.84%) तथा शहरी जनसंख्या 37.7 करोड़ (31.16%) है। पुरुषों की संख्या 62.37 करोड़ (51.54%) तथा महिलाओं की जनसंख्या 58.64 करोड़ (48.46%) रही है। भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात 940 : 1000 है। सर्वाधिक स्त्री-पुरुष अनुपात केरल में 1034 : 1000 तथा सबसे कम बिहार राज्य में 877 : 1000 रहा है।

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पिछले दस वर्षों (2001-2011) की अवधि में जनसंख्या में कुल वृद्धि 17.64% अंकित की गयी है। वर्ष 2001-2011 की जनगणना में शहरी और ग्रामीण जनसंख्या वृद्धि दर क्रमशः 31.80% और 12.18% है। ग्रामीण जनसंख्या वद्धि दर बिहार में सबसे अधिक (23.90%) ऑकी गई है। हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात सर्वाधिक (89.6%) है, जबकि शहरी जनसंख्या का अनुपात दिल्ली में सर्वाधिक (97.50%) है। भारत में सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश है तथा सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम है।

शिक्षा
लोकतन्त्र की सफलता तथा समाज-देश दोनों के विकास के लिए शिक्षा का विशेष महत्त्व है। यह केवल व्यक्ति की उत्पादक क्षमता में ही वृद्धि नहीं करती, वरन् देश में अर्जित सम्पदा के समान एवं निष्पक्ष वितरण को सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाती है।

शिक्षा पर बढ़ता व्यय – शिक्षा मानव-पूँजी में निवेश किया जाने वाला महत्त्वपूर्ण साधन है। पहली पंचवर्षीय योजना से ही शिक्षा पर किये जाने वाले योजनागत व्यय में तेजी से बढ़ोतरी की गयी है। दसवीं पंचवर्षीय योजना में इस क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता (UPBoardSolutions.com) प्रदान की गयी तथा इसके लिए ३ 43,825 करोड़ का प्रावधान रखा गया, जब कि नवीं योजना में यह प्रावधान है 24,908 करोड़ का ही था। इस प्रकार इसमें 76% की वृद्धि की गयी थी। भारत शिक्षा कोष-शिक्षा क्षेत्र के लिए सभी से समर्थन प्राप्त करने तथा अतिरिक्त बजटीय संसाधनों को जुटाने के लिए एक पंजीकृत संस्था

भारत शिक्षा कोष – की स्थापना की गयी है, जिसका कार्य व्यक्तियों, केन्द्र तथा राज्य सरकारों, अप्रवासी भारतीयों तथा भारतीय मूल के व्यक्तियों से शिक्षा की विभिन्न परियोजनाओं हेतु अंशदान, चन्दा अथवा दान प्राप्त करना है।

शिक्षा : एक मौलिक अधिकार – संसद के दोनों सदनों द्वारा 93वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित हो चुका है। इसके द्वारा 6 से 14 वर्ष के आयु समूह वाले सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर सभी के लिए शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु किया गया यह एक महत्त्वपूर्ण उपाय है।

साक्षरता-दर में वृद्धि – पिछले कुछ दशकों के दौरान साक्षरता-दर में पर्याप्त सुधार आया है। कुल साक्षरता-दर जो कि सन् 1951 में मात्र 18.33% थी, 1991 ई० में बढ़कर 52.21%, 2001 ई० में 65.4% तथा 2011 ई० में 74.04% हो गयी। भारत की जनगणना 2001 ई० के अनुसार पुरुषों की साक्षरता-दर 75.85% तथा महिलाओं की 54.16% हो गयी है। पिछले दशक में महिला साक्षरता दर में कहीं अधिक वृद्धि हुई है, जो पुरुषों की 11.72% की तुलना में 14.87% बढ़ी तथा इस प्रकार पुरुष-महिला साक्षरता-दर का अन्तर वर्ष 1991 की 24.84% से घटकर वर्ष 2001 में 21.7% हो गया है। यह एक अनुकूल प्रवृत्ति (UPBoardSolutions.com) है, जो भारत के विकास की ओर इंगित करती है। वर्ष 2000-01 में 6 से 14 वर्ष के आयु-समूह की लगभग 193 मिलियन की जनसंख्या में से लगभग 81% बच्चे विद्यालय में उपस्थित रहे। भारत की जनगणना 2011 ई० के अनुसार पुरुषों की साक्षरता-दर 82.14% तथा महिलाओं की 65.46% हो गयी। पिछले दशक में महिला साक्षरता दर में कहीं अधिक वृद्धि हुई है।

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तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा – देश में तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा ने गुणवत्तापूर्ण मानव-शक्ति उत्पन्न कर आर्थिक एवं तकनीकी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। वर्तमान में डिग्री स्तर के 1,200 से अधिक तथा डिप्लोमा स्तर के भी 1,200 मान्यता प्राप्त इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। इनमें भारतीय I.I.Tई. का विश्व में एक उच्च स्थान है। इसके अतिरिक्त 1,000 से अधिक संस्थान मास्टर ऑफ कम्प्यूटर एप्लीकेशन (MCA) पाठ्यक्रम की शिक्षा प्रदान करते हैं। एम०बी०ए० पाठ्यक्रम की शिक्षा प्रदान करने वाले 930 मान्यताप्राप्त प्रबन्धन संस्थान हैं।

शैक्षिक कार्यक्रम – भारत में साक्षरता-दर में वृद्धि के लिए अनेक शैक्षिक कार्यक्रम चलाये गये हैं, जिनमें अनौपचारिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, अल्पसंख्यकों को शिक्षा तथा सर्वशिक्षा अभियान आदि प्रमुख हैं। छ: से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्रारम्भिक शिक्षा को एक मूलभूत अधिकार बनाने के लिए संसद ने संविधान अधिनियम, 2002 पारित किया है। इस अधिनियम को लागू करने के लिए ‘सर्व शिक्षा अभियान’ योजना विकसित की गयी है। इसे नवम्बर, 2002 ई० से आरम्भ किया गया है। इस अभियान के निम्नलिखित लक्ष्य हैं(1) छ: से चौदह वर्ष तक की आयु के सभी बच्चे स्कूल/शिक्षा गारण्टी योजना केन्द्र/ब्रिज कोर्स में जाएँ। (2) सन् 2007 तक सभी बच्चों की 5 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा तथा सन् 2010 तक 8 वर्ष की स्कूली शिक्षा पूर्ण हो जाए। (UPBoardSolutions.com) (3) जीवन के लिए शिक्षा पर बल देते हुए प्राथमिक शिक्षा पर बल दिया जाए। (4) सन् 2007 तक प्राथमिक स्तर पर सभी लड़के-लड़कियों और सामाजिक वर्ग के अन्तरों को तथा प्रारम्भिक शिक्षा-स्तर पर 2010 ई० तक समाप्त किया जाए और (5) सन् 2010 तक बीच में पढ़ाई छोड़ने वालों की संख्या को शून्य किया जाए।

प्रौढ़ शिक्षा – देश के 600 जिलों में से 587 जिलों को अब प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों में सम्मिलित कर लिया गया है। इस समय 174 जिलों में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान, 212 जिलों में साक्षरता पश्चात् कार्यक्रम और 201 जिलों में अनवरत शिक्षा कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह स्थिति भारतीय शिक्षा के बदलते स्वरूप की परिचायक है।

प्रश्न 2.
भारत के कपड़ा उद्योग तथा लौह-इस्पात उद्योग का वर्णन कीजिए।
या
भारत में कपड़ा उद्योग की बदलती स्थिति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2009]
या
भारत में बढ़ते हुए उद्योगों की स्थिति पर निम्नलिखित शीर्षकों पर निबन्ध लिखिए
(क) वस्त्रोद्योग, (ख) लोहा एवं इस्पात उद्योग, (ग) पेट्रोलियम उद्योग, (घ) रसायन उद्योग।
उत्तर :
कपड़ा उद्योग/वस्त्रोद्योग – 
कपड़ा उद्योग भारत का सबसे बड़ा, संगठित एवं व्यापक उद्योग है। यह देश के औद्योगिक उत्पादन का 14%, सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2.4%, कुल विनिर्मित औद्योगिक उत्पादन का 20% व कुल निर्यात के 23% की आपूर्ति करता है। भारत इस क्षेत्र में चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ प्रतियोगिता रखता है।

पंचवर्षीय योजनाएँ इस उद्योग के लिए वरदान सिद्ध हुईं, जिनके फलस्वरूप न केवल इस उद्योग का पर्याप्त विकास हुआ, अपितु अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भी यह अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा। सरकार ने ‘कपड़ा
आदेश’, 1993 ई० के माध्यम से इस उद्योग को लाइसेन्स मुक्त कर दिया। 31 मार्च, 1999 ई० को देश में 1,824 सूत/कृत्रिम धागों की मिलें थीं, जिनमें से अधिकतर मिलें महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा गुजरात में हैं। भारत का वस्त्रोद्योग मुख्यतः सूत पर आधारित रहा है तथा देश में कपड़े की खपत का 58% भाग सूत से ही सम्बद्ध है। भारत का वस्त्र उद्योग अब पटसन एवं सूती वस्त्रों के अतिरिक्त कृत्रिम रेशों से पर्याप्त मात्रा में वस्त्र तैयार (UPBoardSolutions.com) करता है तथा सिले-सिलाये वस्त्रों को विदेशों को निर्यात कर रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत के सिले वस्त्रों की बड़ी माँग है तथा उसे इससे १ 51 हजार करोड़ से भी अधिक मूल्य की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

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लोहा एवं इस्पात उद्योग – आज भारत विश्व का नौवाँ सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश है। इस उद्योग में । 90,000 करोड़ की पूँजी लगी हुई है और पाँच लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। बड़े पैमाने पर इस्पात का उत्पादन 1907 ई० में जमशेदपुर में टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (TISCO) की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ। सन् 1974 में सरकार ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लि० (SAIL) की स्थापना की।

दूसरी पंचवर्षीय योजना में 10-10 लाख टन इस्पात पिण्डों की क्षमता की सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाएँ भिलाई (छत्तीसगढ़) में सोवियत संघ के सहयोग से, दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) में ग्रेट ब्रिटेन के सहयोग से
और राउरकेला (ओडिशा) में जर्मनी के सहयोग से स्थापित की गयी।

तीसरी पंचवर्षीय योजना में सोवियत संघ के सहयोग से बोकारो (बिहार) में एक और इस्पात कारखाने की स्थापना की गयी। विगत कुछ वर्षों में इस्पात उद्योग के उत्पादन का स्वरूप सन्तोषप्रद रहा है। वर्ष 2002-03 में इस्पात की खपत 29.01 मिलियन टन थी, जब कि वर्ष 2001-02 में यह 27.35 मिलियन टन थी। वर्ष 2001-02 में तैयार इस्पात का निर्यात 1.27 मिलियन टन था जो वर्ष 2002-03 में 1.5 मिलियन टन हो गया। लोहे और इस्पात से बनी सभी वस्तुओं के आयात और निर्यात की वर्तमान में पूरी छूट है। वर्ष 2001-02 में परिष्कृत इस्पात का निर्यात 2.98 मिलियन टन था, जो वर्ष 2002-03 में बढ़कर 4.2 मिलियन टन हो गया। यह स्थिति लोहे और इस्पात उद्योग में भारत की परिवर्तित होती स्थिति को प्रदर्शित करती है।

पेट्रोलियम उद्योग – पेट्रोलियम के सम्बन्ध में भारत की स्थिति अब पहले की अपेक्षा अच्छी हुई है। द्वितीय पंचवर्षीय योजना के आरम्भ तक देश में केवल डिगबोई (असोम) के आस-पास के क्षेत्र में तेल निकाला जाता था। अब देश के कई भागों से तेल निकाला जाने लगा है। भारत के तेल-क्षेत्र असोम, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, मुम्बई, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल के (UPBoardSolutions.com) तटीय प्रदेशों तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में स्थित हैं। देश में तेल का कुल भण्डार 13 करोड़ टन अनुमानित किया गया है।

वर्ष 1950-51 में देश में कच्चे तेल का उत्पादन केवल 2.5 लाख टन था, जब कि वर्ष 2002-03 की अवधि में उत्पादन 33.05 मिलियन टन रहा। खाद्यान्न व दूध के उत्पादन में आत्मनिर्भरता के पश्चात् अब खनिज तेल की दिशा में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के लिए कृष्ण क्रान्ति (Black Revolution) की सरकार की योजना है। इसके लिए एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाकर पेट्रोल में इसका मिश्रण 10% तक बढ़ाने तथा बायो-डीजल का उत्पादन करने की सरकार की योजना है। यह स्थिति पेट्रोलियम उद्योग में भारत की परिवर्तित होती स्थिति को प्रदर्शित करती है।

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उल्लेखनीय है कि फरवरी, 2003 ई० में देश में कच्चे तेल के दो विशाल भण्डारों की खोज अलग-अलग कम्पनियों ने की थी। ये भण्डार बाड़मेर (राजस्थान) जिले में व मुम्बई के तटवर्ती क्षेत्र में खोजे गये हैं। कृष्णा-गोदावरी बेसिन में प्राकृतिक गैस के बड़े भण्डार की खोज के पश्चात् रिलायन्स इण्डस्ट्रीज लि० ने।

प्रकृतिक गैस के एक और भण्डार की खोज करने में सफलता प्राप्त की है। यह खोज मध्य प्रदेश में शहडोल. * कोलबेड मीथेन के सुहागपुर पश्चिम व सुहागपुर पूर्व अन्वेषण खण्ड में की गयी है।

रसायन उद्योग-रसायन उद्योग में मुख्य रसायन तथा इसके उत्पादों, पेट्रोकेमिकल्स, फर्टिलाइजर्स, पेंट तथा वार्निश, गैस, साबुन, इत्र, प्रसाधन सामग्री और फार्मस्युटिकल्स को शामिल किया जाता है। रसायन 5 के उत्पादन विभिन्न उद्योगों में प्रयुक्त होते हैं। इस प्रकार इस उद्योग का व्यावसायिक महत्त्व बहुत अ िहै। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में भी इसका काफी योगदान है। देश की जी०डी०पी० में इसका योगदान 3 प्रतिशत (UPBoardSolutions.com) है। 11वीं योजना में पेट्रोरसायन और रसायनों की वृद्धि 12.6 प्रतिशत और 8 प्रतिशत होने का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (यूनिडो) के अनुसार भारतीय रसायन उद्योग का विश्व में 6वाँ और एशिया में तीसरा स्थान है। 2010 में रसायन उद्योग 108.4 बिलियन डालर का रहा। रसायन उद्योग भारत के प्राचीनतम उद्योगों में से एक है जो देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है।

यह अत्यन्त विज्ञान आधारित है और विभिन्न लक्षित उत्पादों जैसे वस्त्र, कागज, पेंट एवं वार्निश, चमड़ा आदि के लिए मूल्यवान रसायन उपलब्ध कराता है, जिनकी जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यकता होती है। भारतीय रसायन उद्योग भारत की औद्योगिक एवं कृषिगत विकास के रीढ़ का निर्माण करता है और अनुप्रवाही उद्योगों के लिए घटकों को प्रदान करता है। भारतीय रसायन उद्योग में लघु एवं वृहद् स्तर की इकाइयाँ दोनों ही शामिल हैं। अस्सी के दशक के मध्य में लघु क्षेत्र को प्रदान किए गए वित्तीय रियायतों ने लघु स्तरीय उद्योगों (एसएसआई) के क्षेत्र में वृहद संख्या में इकाइयों को स्थापित करने के लिए बाध्य किया। वर्तमान में, भारतीय रसायन उद्योग क्रमिक रूप से व्यापक ग्राहकोन्मुखीकरण की ओर बढ़ रहा है। भारत को आधारभूत कच्चे माल की प्रचुरता का लाभ है, इसे वैश्विक प्रतियोगिता का सामना करने और निर्यात में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए तकनीकी सेवाओं और व्यापारिक क्षमताओं का निर्माण करना होगा।

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भारतीय अर्थव्यवस्था नब्बे के दशक के प्रारंभ तक एक संरक्षित अर्थव्यवस्था थी। रसायन उद्योग द्वारा बौद्धिक संपदा के सृजन के लिए व्यापक स्तर के शोध एवं विकास के लिए बहुत कम कार्य किए गए थे। इसलिए उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय रसायन उद्योग की प्रतियोगिता का सफलतापूर्वक मुकाबला करने के लिए शोध एवं विकास में व्यापक निवेश करना होगा। विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों के साथ, देश की शक्ति दूसरे उच्च स्तरीय प्रशिक्षित वैज्ञानिक जनशक्ति पर निर्भर रहती है। भारत वृहद् संख्या में उत्कृष्ट एवं विशेषीकृत रसायनों का भी उत्पादन करता है जिनके विशिष्ट प्रयोग हैं जिनका खाद्य संयोजक, चमड़ा रंगाई, (UPBoardSolutions.com) बहुलक संयोजक, रबड़ उद्योग में प्रति-उपयामक आदि में व्यापक प्रयोग होता है। रसायन क्षेत्र में, 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति है। रासायनिक उत्पादों, साथ-ही-साथ कार्बनिक/अकार्बनिक रंग-सामग्री और कीटनाशक के ज्यादातर निर्माता लाइसेंसमुक्त हैं। उद्यमियों को केवल आई ई एम को औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग के नियमों के अनुकूल काम करना होता है। बशर्ते कि स्थानीयता दृष्टिकोण लागू न हो। केवल निम्नलिखित वस्तुएँ ही अपनी खतरनाक प्रकृति के कारण आवश्यक लाइसेंसिंग सूची में शामिल हैं

  • हाइड्रोरासायनिक अम्ल एवं इसके संजात,
  • फॉस्जीन एवं इसके संजात तथा
  • हाइड्रोकार्बन के आइसोसाइनेट्स एवं डीआइसोसाइनेट्स।

प्रश्न 3.
भारत में परिवहन एवं दूरसंचार के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
या
राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम के घटकों का उल्लेख कीजिए।
या
इलेक्ट्रॉनिक मेल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

परिवहन

देश के निरन्तर विकास में सुचारु व समन्वित परिवहन-प्रणाली की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वर्तमान प्रणाली में यातायात के अनेक साधन; जैसे–रेल, सड़क, तटवर्ती नौ-संचालन, वायु-परिवहन इत्यादि पम्मिलित हैं। विगत वर्षों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास के साथ विस्तार भी हुआ है और क्षमता भी बढ़ी है, जिसका विवरण निम्नवत् है–

रेल–देश में माल ढोने और यात्री परिवहन का मुख्य साधन रेले हैं। आज देश भर में रेलों का एक व्यापक जाल बिछा हुआ है। रेलमार्ग की कुल लम्बाई 63,140 किमी है। 31 मार्च, 2002 ई० तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, भारतीय रेलवे के पास (UPBoardSolutions.com) 7,739 इंजन, 39,236 यात्री डिब्बे व 2,16,717 माल डिब्बे थे तथा 31 मार्च, 2011 ई० तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, भारतीय रेलवे के पास 9,213 इंजन, 53,220 यात्री गाड़ियाँ व 6,493 अन्य सवारी गाड़ियों और 2,19,381 रेल के डिब्बे हैं।

वर्तमान में लगभग 25% रेलमार्ग व 36% कुल रेल पटरी का विद्युतीकरण हो चुका है। भारतीय रेलवे एशिया की सबसे बड़ी और संसार की चौथे नम्बर की रेलवे व्यवस्था है। वर्ष 1950-51 में रेल-यात्रियों की संख्या लगगे 13 करोड़ थी, जो वर्ष 2005-06 में बढ़कर 512 करोड़ हो गयी थी।

सड़क-भारत का सड़क नेटवर्क विश्व का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। भारत के सड़क यातायात में प्रति वर्ष 10% की वृद्धि हो रही है। भारत में लगभग 33 लाख किलोमीटर लम्बा सड़क नेटवर्क है। वर्ष 1950-51 में यह नेटवर्क मात्र 4 लाख किलोमीटर था, जो अब 8 गुना से भी अधिक बढ़ गया है।

नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) के अन्तर्गत देश में सड़के नेटवर्क के समन्वित और सन्तुलित विकास पर बल दिया गया था। इस अवधि में सरकार ने व्यापक राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम (NHDP) भी आरम्भ किया, जिसमें पर्याप्त प्रगति हुई। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) के दौरान सड़कों के विकास को देश की समग्र परिवहन-प्रणाली का अभिन्न अंग समझा गया, जिसमें तीन कार्यात्मक समूहों को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया गया। ये थे—प्राथमिक प्रणाली (राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेस मार्ग), अनुषंगी प्रणाली (राजमार्ग और प्रमुख जिला सड़कें) और ग्रामीण सड़कें।

दसवीं पंचवर्षीय योजना में केन्द्र क्षेत्र के सड़क कार्यक्रम के लिए है 59,490 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया था। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम के निम्नलिखित दो घटक हैं—

  1. चार महानगरों को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों से सम्बद्ध स्वर्ण चतुर्भुज योजना। इस घटक के अन्तर्गत कुल 5,846 किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय राजमार्ग सम्मिलित हैं।
  2. उत्तर-दक्षिण मार्ग (कॉरिडोर), जिसमें कोच्चि-सलेम स्पर मार्ग (UPBoardSolutions.com) सहित श्रीनगर को कन्याकुमारी से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग और सिलचर को पोरबन्दर से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग सम्मिलित है। इन राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लम्बाई 7,300 किलोमीटर है। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत 4/6 लेन का निर्माण करके राजमार्गों की वहन क्षमता बढ़ाने के अलावा सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहन चलाने की दृष्टि से उनकी गुणवत्ता में सुधार के लिए कार्यक्रम शुरू किया है। इनके बन जाने से भारत के विशाल महानगरों के बीच समय एवं दूरी बहुत घट जाएगी।

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दूरसंचार

दूरसंचार क्षेत्र में भारत की बदलती स्थिति सर्वविदित सराहनीय एवं सन्तोषप्रद है। दूरसंचार नेटवर्क के मामले में भारत का विश्व शीर्षस्थ देशों में स्थान हो गया है। नये दूरभाष कनेक्शनों में पर्याप्त वृद्धि हुई तथा राष्ट्रीय लम्बी दूरी और अन्तर्राष्ट्रीय लम्बी दूरी के दूरभाष टैरिफों में तथा सेल्युलर-से-सेल्युलर कालों पर राष्ट्रीय लम्बी दूरी के टैरिफ में अत्यधिक गिरावट आयी।

दूरसंचार क्षेत्र में निजी कम्पनियों के प्रवेश तथा इन कम्पनियों की गहन विपणन नीतियों के चलते देश में दूरभाष सेवा का तेजी से विकास हुआ है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार बीते वर्ष 2006 के अन्त में देश में दूरभाष उपभोक्ताओं की कुल संख्या लगभग 20 करोड़ थी। ऐसा माना जाता है कि अब भारत में हर छठे व्यक्ति के पास एक फोन है। देश के 20 करोड़ दूरभाष उपभोक्ताओं में 15 करोड़ उपभोक्ता मोबाइल दूरभाष के हैं। रिलायन्स इन्फो, टाटा इण्डिकॉम, एयरटेल, बी०एस०एन०एल०, आइडिया, वोडाफोन आदि कम्पनियाँ देश को मोबाइल फोन सेवाएँ उपलब्ध कराने में एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर कार्य कर रही हैं। भारत सदृश विकासशील देश में दूरदर्शन प्रसारण का विशेष महत्त्व है। भारत की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा विश्व के सबसे बड़े स्थानीय प्रसारण संगठमों में से एक है। देश में आज स्थलीय एवं उपग्रह, दोनों ही प्रसारण . सेवाएँ विद्यमान हैं।

दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितम्बर, 1959 ई० को किया गया था। सन् 1975 तक दूरदर्शन केवल कुछ नगरों तक ही सीमित था। आज देश के लगभग 8.2 करोड़ परिवारों में टेलीविजन उपलब्ध है। इसके 51% परिवार उपग्रहों से प्रसारित कार्यक्रमों को देखते हैं। संख्या की दृष्टि से राष्ट्रीय चैनल के दर्शकों की संख्या केबल दर्शकों से कहीं अधिक है।

भारत में अब दूरसंचार क्षेत्र के दो महत्त्वपूर्ण लक्ष्य हैं-यथासम्भव अधिकाधिक लोगों को निम्न लागत दर पर दूरभाष सेवा प्रदान करना तथा अधिकाधिक फर्मों को निम्न लागत वाली हाई स्पीड कम्प्यूटर नेटवर्क सेवा प्रदान करना। कम्प्यूटरों (UPBoardSolutions.com) का उपयोग आज अनेक प्रकार से किया जा रहा है तथा समाज में इसकी भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

इलेक्ट्रॉनिक मेल – इलेक्ट्रॉनिक मेल सेवा, कम्प्यूटर आधारित ‘स्टोर एण्ड फॉरवर्ड’ सन्देश प्रणाली है। इसमें प्रेषक और प्रेषित दोनों को एक साथ उपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं होती। यह सेवा डाटा संचार नेटवर्क के माध्यम से विभिन्न प्रकार के पत्रों का संचारण करती है। इस सेवा में कोई भी पत्र, स्मरण-पत्र, टेण्डर या विज्ञापन आदि टंकित कर उसे किसी भी व्यक्ति को उसके निर्धारित पते पर भेजा जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि पत्र भेजने तथा प्राप्त करने वाले दोनों नेटवर्क से जुड़े हों। ई-मेल वन-वे पद्धति है। यह दूरभाष की तरह दोनों ओर से वार्तालाप नहीं करा सकती, लेकिन उससे भी तीव्र गति से सूचना प्रदान करती है। अब यह सुविधा हिन्दी में भी उपलब्ध है। ‘वेब दुनिया के नाम से हिन्दी का पोर्टल भी इण्टरनेट पर आ चुका है और ई-पत्र की सहायता से हिन्दी भाषा में डाक भेजी व प्राप्त की जा सकती है।

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प्रश्न 4.
भारत में शिक्षा के बदलते स्वरूप का वर्णन निम्न शीर्षकों में कीजिए
(क) प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा, (ख) उच्च शिक्षा, (ग) तकनीकी शिक्षा।
या
भारत में शिक्षा के प्रसार पर स्वातन्त्र्योत्तर काल शिक्षा के वर्तमान स्वरूप पर एक लेख लिखिए।
उत्तर :

(क) प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है जिस पर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। हाल के वर्षों में भारत ने प्राथमिक शिक्षा में नामांकन, छात्रों की संख्या बरकरार रखने, उनकी नियमित उपस्थिति दर. और साक्षरता के प्रसार के (UPBoardSolutions.com) संदर्भ में काफी प्रगति की है। जहाँ भारत की उन्नत शिक्षा पद्धति को भारत के आर्थिक विकास का मुख्य योगदानकर्ता तत्त्व माना जाता है, वहीं भारत में आधारभूत शिक्षा की गुणवत्ता, काफी चिन्ता का विषय है।

भारत में 14 साल की उम्र तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना सांवैधानिक प्रतिबद्धता है। देश की संसद ने वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ पारित किया है जिसके द्वारा 6 से 14 साल के सभी बच्चों के लिए शिक्षा एक मौलिक अधिकार हो गई है। हालांकि देश में अभी भी आधारभूत शिक्षा को सार्वभौम नहीं बनाया जा सका है। इसका अर्थ है–बच्चों का स्कूलों में सौ फीसदी नामांकन और स्कूलिंग सुविधाओं से लैस हर अधिवास में उनकी संख्या को बरकरार रखना। इसी कमी को पूरा करने हेतु सरकार ने वर्ष 2001 में सर्व शिक्षा अभियान योजना की शुरुआत की, जो अपनी तरह की दुनिया में सबसे बड़ी योजना है।

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में सूचना व संचार प्रौद्योगिकी शिक्षा क्षेत्र में वंचित और सम्पन्न समुदायों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, के बीच की दूरी पाटने का कार्य कर रहा है। भारत विकास प्रवेशद्वार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भारत में मौलिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण हेतु प्रचुर सामग्रियों को उपलब्ध कराकर छात्रों तथा शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने की पहल की है।

माध्यमिक शिक्षा
प्रारम्भिक शिक्षा को सर्वव्यापी करना एक संवैधानिक अधिदेश बन गया है इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है। कि इस अभिकल्पना को माध्यमिक शिक्षा के सर्वव्यापी बनाने की ओर बढ़ाने की आवश्यकता है, जिसे कि बड़ी संख्या में विकसित देशों तथा कई विकासशील देशों में पहले ही हासिल कर लिया गया है। सभी युवा व्यक्तियों को अच्छी गुणवत्तायुक्त माध्यमिक शिक्षा सुलभ कराने तथा कम मूल्य पर उपलब्ध कराने की । केन्द्र सरकार की वचनबद्धता के भाग के रूप में भारत सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान माध्यमिक स्तर पर शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने तथा गुणवत्ता-सुधार हेतु राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आर०एम०एस०ए०) नामक एक केन्द्रीय प्रायोजित स्कीम शुरू की गई। इस स्कीम का उद्देश्य प्रत्येक आवास से उचित दूरी के भीतर माध्यमिक स्कूल उपलब्ध (UPBoardSolutions.com) कराकर 5 वर्ष के भीतर कक्षा में नामांकन हेतु नामांकन अनुपात को 75 प्रतिशत करने, सभी माध्यमिक स्कूलों द्वारा निर्धारित मानदण्डों के अनुपालन को | सुनिश्चित करके माध्यमिक स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, महिला-पुरुष सामाजिक-आर्थिक तथा विकलांगता-आधारित बाधाओं को दूर करना वर्ष 2017 अर्थात् 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक माध्यमिक स्तर की शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने और वर्ष 2020 तक सभी बच्चों को विद्यालयों में बनाए रखना है। मुख्य रूप से भौतिक लक्ष्यों में 5 वर्षों के भीतर कक्षा IX.X हेतु नामांकन अनुपात को वर्ष 2005-06 के 52.26 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत करना, वर्ष 2011-12 तक अनुमानित 32.20 लाख : छात्रों के अतिरिक्त नामांकन हेतु सुविधाएँ उपलब्ध कराना, 44,000 मौजूदा माध्यमिक स्कूलों का सुदृढ़ीकरण, 11000 नए माध्यमिक स्कूल खोलना, 1.79 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति तथा 80,500 अतिरिक्त कक्षा-कक्षों का निर्माण शामिल था। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान परियोजना लागत का 75 प्रतिशत केन्द्र सरकार द्वारा वहन करने तथा शेष 25 प्रतिशत का वहन राज्य सरकारों द्वारा किये जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए हिस्सेदारी पैटर्न 50 : 50 होगा। 11वीं तथा 12वीं योजनाओं दोनों के लिए पूर्वोत्तर राज्य हेतु निधियम पैटर्न (UPBoardSolutions.com) 90 : 10 रखा गया। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान इस स्कीम हेतु 20,120 करोड़ आबंटित किए गए थे। वर्ष 2010-11, जो इस कार्यक्रम का दूसरा वर्ष था, में 34 राज्यों/संघराज्य क्षेत्रों से वार्षिक योजना प्रस्ताव प्राप्त हुए।

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(ख) उच्च शिक्षा
आजादी के बाद के वर्षों में उच्च शिक्षा क्षेत्र की संस्थागत क्षमता में अत्यधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 1950 में विश्वविद्यालयों/विश्वविद्यालय स्तरीय संस्थाओं की संख्या 27 थी जो 18 गुणा बढ़कर वर्ष 2009 में 504 हो गई है। इस क्षेत्र में 42 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 243 राज्य विश्वविद्यालय, 53 राज्य निजी विश्वविद्यालय, 130 समविश्वविद्यालय, 33 राष्ट्रीय महत्त्व की संस्थाएँ (संसद के अधिनियमों के तहत स्थापित) और पाँच संस्थाएँ (विभिन्न राज्य विधानों के अंतर्गत स्थापित) शामिल हैं। कॉलेजों की संख्या में भी कई गुणा वृद्धि दर्ज की गई है जो 1950 में केवल 578 थे, 2011 में 30,000 से भी अधिक हो गए हैं।

उच्चतर शिक्षा क्षेत्र में हुई वृद्धि में विश्वविद्यालय बहुत तेजी से बढ़े हैं जो अध्ययन का सर्वोच्च स्तर है। यूनिवर्सिटी शब्द लैटिन के “युनिवर्सिटाज’ से लिया गया है, जिसका आशय है, “छात्रों और शिक्षकों के बीच विशेष समझौते।’ इस लैटिन शब्द का अभिप्राय अध्ययन की संस्थाओं से है जो अपने छात्रों को डिग्रियाँ प्रदान करते हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालय प्राचीन संस्थाओं से ज्यादा अलग नहीं हैं, इस बात को छोड़कर कि आजकल विश्वविद्यालये पढ़ाए गए विषयों और छात्रों दोनों के मामले में अपेक्षाकृत बड़े हैं। भारत में विश्वविद्यालय का आशय किसी केन्द्रीय अधिनियम, किसी प्रांतीय अधिनियम अथवा किसी राज्य अधिनियम के द्वारा स्थापित अथवा निगमित विश्वविद्यालय से है जिसमें इस अधिनियम के तहत इस संबंध में बनाए गए विनियमों के अनुसार उस सम्बद्ध विश्वविद्यालय के (UPBoardSolutions.com) परामर्श से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाएँ शामिल हैं। प्रतिवर्ष देश-विदेश के लाखों छात्र मुख्यतः अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए इनमें दाखिला लेते हैं जबकि लाखों छात्र बाहरी दुनिया में कार्य करने के लिए इन संस्थाओं को छोड़ते हैं। उच्च शिक्षा केन्द्र और राज्य दोनों की साझा जिम्मेदारी है। संस्थाओं में मानकों का समन्वय और निर्धारण केन्द्र सरकार का संवैधानिक दायित्व है। केन्द्र सरकार यूजीसी को अनुदान देती है और देश में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना करती है। केन्द्र सरकार ही यूजीसी की सिफारिश पर शैक्षिक संस्थाओं को समविश्वविद्यालय घोषित करती है। वर्तमान में, विश्वविद्यालयों/विश्वविद्यालय स्तरीय संस्थाओं के मुख्य घटक हैं—केन्द्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, समविश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तरीय संस्थाएँ।

इनका वर्णन नीचे दिया गया है
केन्द्रीय विश्वविद्यालय :

  • केन्द्रीय अधिनियम द्वारा अथवा निगमित विश्वविद्यालय।

राज्य विश्वविद्यालय :

  • प्रांतीय अधिनियम द्वारा अथवा राज्य अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा निगमित विश्वविद्यालय।

निजी विश्वविद्यालय :

  • ऐसा विश्वविद्यालय जो किसी राज्य/केन्द्रीय अधिनियम के माध्यम से किसी प्रायोजक निकाय, अर्थात् सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 अथवा राज्य में उस समय लागू किसी अन्य संबंधित कानून के तहत पंजीकृत सोसायटी अथवा सार्वजनिक न्यास अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत पंजीकृत कंपनी द्वारा स्थापित किया गया है।

समविश्वविद्यालय :

  • विश्वविद्यालयवते संस्था, जिसे सामान्यतः समविश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, का आशय एक ऐसी उच्च-निष्पादने करने वाली संस्था से है जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अधिनियम, 1956 की धारा 3 के अंतर्गत केन्द्र (UPBoardSolutions.com) सरकार द्वारा उस रूप में घोषित किया है।

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राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था :

  • संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित और राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था के रूप में घोषित संस्था।

राज्य विधानमंडल अधिनियम :

  • किसी राज्य विधानमंडल अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा के अंतर्गत संस्था निगमित कोई संस्था।

(ग) तकनीकी शिक्षा

भारत में तकनीकी शिक्षा का संचालन अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (All India Council for Technical Education/AICTE) द्वारा किया जाता है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् भारत में नई तकनीकी संस्थाएँ शुरू करने, नए पाठ्यक्रम शुरू करने और तकनीकी संस्थाओं में प्रवेश-क्षमता में फेरबदल करने हेतु अनुमोदन देती है। यह ऐसी संस्थाओं के लिए मानदंड भी निर्धारित करती है। इसकी स्थापना 1945 में सलाहकार निकाय के रूप में की गई थी और बाद में संसद के अधिनियम द्वारा 1987 में इसे सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया।

इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है, जहाँ इसके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सचिव के कार्यालय हैं। कोलकाता, चेन्नई, कानपुर, मुम्बई, चण्डीगढ़, भोपाल और बंगलुरु में इसके 7 क्षेत्रीय कार्यालय स्थित हैं। हैदराबाद में एक नया क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित किया गया है। यह तकनीकी संस्थाओं के प्रत्यायन या कार्यक्रमों के माध्यम से तकनीकी शिक्षा के गुणवत्ता विकास को भी सुनिश्चित करती है। अपनी विनियामक भूमिका के अलावा अखिल भारतीय तकनीकी (UPBoardSolutions.com) शिक्षा परिषद् की एक बढ़ावा देने की भी भूमिका है जिसे यह तकनीकी संस्थाओं को अनुदान देकर महिलाओं, विकलांगों और समाज के कमजोर वर्गों के लिए तकनीकी शिक्षा का विकास, नवाचारी, संकाय, अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने संबंधी योजनाओं के माध्यम से कार्यान्वित करती है। परिषद् 21 सदस्यों वाली कार्यकारी समिति के माध्यम से अपना कार्य करती है। 10 सांविधिक अध्ययन बोर्ड द्वारा सहायता प्राप्त है जो नामतः इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी में अवर स्नातक अध्ययन, इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर और अनुसंधान, प्रबंध अध्ययन, व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, फार्मास्युटिकल शिक्षा, वास्तुशास्त्र, होटल प्रबंधन और कैटरिंग प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, टाउन एवं कंट्री पलैनिंग परिषद् की सहायता करते हैं।

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प्रश्न 5.
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भारतीय कृषि में कौन-कौन-से बदलाव आये हैं? उक्ट स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय कृषि में तकनीकी परिवर्तन 1960 के दशक में प्रारम्भ हुए, जब भारतीय कृषकों ने बीजों की अधिक उपज देने वाली किस्मों, रासायनिक खादों, मशीनीकरण, ऋण एवं विपणन सुविधाओं का उपयोग करना आरम्भ किया। केन्द्र सरकार ने सन् 1960 ई० में गहन क्षेत्र विकास कार्यक्रम आरम्भ किया। मैक्सिको में विकसित (UPBoardSolutions.com) अधिक पैदावार देने वाले गेहूं के बीज तथा फिलीपीन्स में विकसित पान के बीज भारत लाए गए थे। अधिक उपज देने वाले बीजों के अतिरिक्त रासायनिक खादों और कीटनाशकों का उपयोग भी आरम्भ किया गया तथा सिंचाई की सुविधाओं में सुधार एवं विस्तार किया गया। इस प्रकार स्वतन्त्रता के बाद भारतीय कृषि में परिवर्तनों को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है

1. भूमि उपयोग में सुधार – देश के कुल 32.87 करोड़ हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में से 92.6% भूमि उपयोग के आँकड़े उपलब्ध हैं। राज्यों से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2000-01 में कुल 7.52% करोड़ हेक्टेयर (कुल क्षेत्रफल का 22.9%) में वन क्षेत्र था जबकि वर्ष 1950-51 में यह क्षेत्र 4.05 करोड़ हेक्टेयर था। इसी अवधि में बोई गई शुद्ध भूमि का क्षेत्र 11.9 करोड़ हेक्टेयर से बढ़कर 14.6 करोड़ हेक्टेयर हो गया था। फसलों के मोटे प्रारूप (UPBoardSolutions.com) से संकेत मिलता है कि कुल फसल क्षेत्र में खाद्यान्न अन्य फसलों की तुलना में सबसे अधिक बोया जाता है, फिर भी वर्ष 1950-51 की अपेक्षा वर्ष 2000-01 में इसका तुलनात्मक भाग 76.7% से गिरकर 67.2% रह गया था। इसके साथ ही भूमि-सुधार हेतु खेतों की चकबन्दी की गई है जिससे कृषकों की भूमि को एक ही स्थान पर इकट्ठा करने के प्रयास किए गए हैं।

2. रासायनिक खादों की खपत तथा सिंचाई से वृद्धि – सिंचित क्षेत्र में वृद्धि और अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग बढ़ने के साथ-साथ रासायनिक खादों का उपयोग भी बढ़ रहा है। इनका उपयोग वर्ष 1950-51 के 69 हजार टन से बढ़कर वर्ष 2005-06 में 20.34 मीट्रिक टन हो गया है। इसी अवधि में रासायनिक खादों का प्रति हेक्टेयर उपभोग 2 किग्रा से बढ़कर 82 किग्रा हो गया है। कृषि विकास की नई नीति में सिंचाई सुविधाओं को प्राथमिकता दी गई है।

3. प्रमाणीकृत बीजों के वितरण में वृद्धि – सरकार ने बहुत पहले ही उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराने के महत्त्व को पहचान लिया था। सन् 1963 में उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराने की आवश्यकता को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय बीज निगम’ की स्थापना की गई है। पिछले कुछ वर्षों में देश भर में बीज प्रमाणीकरण संस्थाओं और बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं का जाल-सा बिछ गया है। प्रमाणीकृत बीजों के वितरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय बीज निगम के अतिरिक्त विश्व बैंक की सहायता से सन् 1969 ई० में स्थापित तराई विकास निगम ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास कर अपना योगदान दिया है।

4. जल प्रबन्धन – एक नई पहल के अन्तर्गत मार्च, 2002 से पूर्वी भारत में फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए खेत में जल का प्रबन्ध करने और उस पर केन्द्र द्वारा एक योजना आरम्भ की गई है। इस योजना का उद्देश्य भूमि के नीचे या भूमि की सतह पर मिलने वाले (UPBoardSolutions.com) जल का दोहन और उस जल का समुचित उपयोग पूर्वी भारत में फसल की पैदावार बढ़ाने में करना है। यह योजना असोम, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मणिपुर, मिजोरम, ओडिशा व पश्चिम बंगाल के 9 जिलों और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 35 जिलों में लागू की गई है।

5. कृषि अनुसन्धानों का विस्तार – भारत के कृषि मन्त्रालय के अन्तर्गत कृषि अनुसन्धान और शिक्षा विभाग कृषि, पशुपालन एवं मछली पालन के क्षेत्र में अनुसन्धान और शैक्षिक गतिविधियाँ संचालित करने के लिए उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त इनसे सम्बन्धित क्षेत्रों में कार्यरत राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों के विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने में भी सहायता करता है। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् कृषि प्रौद्योगिकी के विकास, निवेश सामग्री तथा खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता लाने के लिए प्रमुख वैज्ञानिक जानकारियों को सामान्य जनता तक पहुँचाने में प्रमुख भूमिका निभायी है। यह परिषद् राष्ट्रीय स्तर की एक स्वायत्तशासी संस्था है। यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों के क्षेत्र में कृषि अनुसन्धान, शिक्षा एवं विस्तार शिक्षा को प्रोत्साहन देती है। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबन्धन, फसलों, पशुओं, मछली उत्पादन आदि में आ रही समस्याओं का समाधान करने के लिए पारम्परिक एवं अग्रणी क्षेत्रों में बुनियादी एवं व्यावहारिक खोजों व अनुसन्धानों में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेती है।

6. कृषि-साख और विभिन्न निगमों की स्थापना – कृषि क्षेत्र के लिए सरकार (UPBoardSolutions.com) ने पर्याप्त मात्रा में कृषि ऋणों को उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किए हैं। इस दिशा में सहकारी समितियों, कृषि पुनर्वित्त निगम तथा कृषि वित्त निगम प्रयास कर रहे हैं। अब इस दिशा में सभी कार्य नाबार्ड (NABARD)–राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक को सौंप दिए गए हैं। सरकार ने सीमान्त एवं छोटे कृषकों के 10 हजार तक के ऋण माफ कर दिए हैं। कृषि विकास की नई नीति के अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों में निगमों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक विकास में कृषि का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :

औद्योगिक विकास में कृषि का योगदान

राष्ट्रीय आय में अंश – भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान पहले बहुत अधिक था, किन्तु वह धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। यह प्रवृत्ति इस बात की सूचक है कि भारत विकास की ओर अग्रसर है। वर्ष 1950-51 में यह योगदान (UPBoardSolutions.com) 55.40% था, जो 2001-02 ई० में घटकर 26.1% रह गया।

रोजगार की दृष्टि से कृषि – देश की कुल श्रम-शक्ति का लगभग दो-तिहाई (64%) भाग कृषि एवं इससे सम्बन्धित उद्योग-धन्धों से अपनी आजीविका कमाता था। सी०डी०एस० आधार पर कृषि उद्योग में 1983 ई० में 5.135 करोड़ श्रमिक लगे हुए थे, जब कि वर्ष 1999-2000 में इन श्रमिकों की संख्या बढ़कर 19.072 करोड़ हो गयी।

औद्योगिक विकास में कृषि – भारत के प्रमुख उद्योगों को कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है। सूती और पटसन वस्त्र उद्योग, चीनी, वनस्पति, बागान आदि उद्योग प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। हथकरघा, बुनाई, तेल निकालना, चावल कूटना आदि बहुत-से लघु और कुटीर उद्योगों को भी कच्चा माल. कृषि से ही उपलब्ध होता है। अत: देश के औद्योगिक विकास में कृषि महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में कृषि – भारत के विदेशी व्यापार का अधिकांश भाग कृषि से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2002-03 में देश के निर्यात में कृषि वस्तुओं का अनुपात 11.9% था और कृषि से बनी हुई वस्तुओं; जैसे—निर्मित पटसन एवं कपड़ा; का अनुपात लगभग 25%। इस प्रकार भारत के कुल निर्यात में कृषि और उससे सम्बन्धित वस्तुओं का अनुपात लगभग 37% था। भारत के कृषि निर्यात में चावल और समुद्री उत्पाद का महत्त्व बढ़ रहा है। वर्ष 2002-03 में कृषि निर्यात में अकेले समुद्री उत्पाद का अंश 23.4% रहा है, जब कि चावल का अंश 13.6%। काजू का निर्यात-अंश 9.2% भी सराहनीय है।

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प्रश्न 2.
भारत में चीनी उद्योग का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
चीनी उद्योग देश के प्रमुख कृषि पर आधारित उद्योगों में से एक है। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग के बाद चीनी उद्योग द्वितीय वृहत्तम उद्योग है। वर्ष 1950-51 में देश में चीनी मिलों की संख्या 138 थी, जो वर्ष 2000-01 में 493 तक पहुँच चुकी थी।

भारत विश्व में चीनी उत्पादन एवं उसकी खपत करने वाला सबसे बड़ा देश है। चीनी उत्पादन में अकेले महाराष्ट्र राज्य का योगदान एक-तिहाई से अधिक है। चीनी मिल की स्थापना के लिए पहले सरकार से लाइसेन्स प्राप्त करना अनिवार्य था, किन्तु 20 अगस्त, 1998 ई० को सरकार ने इस उद्योग को लाइसेन्स मुक्त करने की घोषणा कर दी। वर्तमान में भारत के पास लाखों टन चीनी का बफर स्टॉक उपलब्ध है। सरकार ने हाल ही में चीनी के निर्यात को डिकैनेलाइज़ (Decanalise) करने का निर्णय लिया है। इसके परिणामस्वरूप चीनी मिलें सीधे ही चीनी का निर्यात कर सकेंगी। पहले इसका निर्यात केवल इण्डियन शुगर ऐण्ड जनरल इण्डस्ट्री एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कॉपरिशन (ISGIEIC) के माध्यम से ही होता था। यह स्थिति चीनी उद्योग में भारत की वैश्विक सन्दर्भ में परिवर्तित होती स्थिति को प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 3.
मोबाइल दूरभाष पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
देश के 20 करोड़ दूरभाष उपभोक्ताओं में 15 करोड़ उपभोक्ता मोबाइल दूरभाष के हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2006 के अन्त में देश में मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 15 करोड़ थी, जो अब दिन दोगुनी तथा रात चौगुनी बढ़ रही है। रिलायन्स इन्फो, (UPBoardSolutions.com) टाटा इण्डिकॉम, एयरटेल, बी०एस० एन०एल०, भारती, बी०पी०एल०, आइडिया, वोडाफोन, एस्सार आदि कम्पनियाँ देश को मोबाइल फोन सेवाएँ उपलब्ध कराने में एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर कार्य कर रही हैं।

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प्रश्न 4.
भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित है

  • भारतीय अर्थव्यवस्था मिश्रित प्रकृति वाली अर्थव्यवस्था है, जिसमें सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र को एक-दूसरे से अलग रखा गया है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था है, जिसमें कुल श्रम शक्ति का लगभग 70% भाग लगी हुआ है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था असन्तुलित अर्थव्यवस्था है। यह वर्ष 2004 की ‘विश्व विकास रिपोर्ट में कहा गया है। क्योंकि 70% कृषि पर आधारित कार्यशील जनसंख्या की तुलना में केवल 16% व्यक्ति ही उद्योग-धन्धों में तथा शेष 14% व्यक्ति व्यापार, परिवहन, संचार तथा अन्य कार्यों में लगे हुए हैं।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था निर्धनता वाली अर्थव्यवस्था है (UPBoardSolutions.com) जिसकी कुल जनसंख्या का 26.1% भाग (2003-04) अभी भी निर्धनता रेखा के नीचे है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजी का अभाव पाया जाता है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आय कम होने के . कारण वास्तविक आय भी कम हो जाती है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था में औद्योगीकरण का अभाव अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास में एक बड़ी बाधा है।
  • भारत में प्रति व्यक्ति आय अत्यधिक निम्न (अमेरिका के प्रति व्यक्ति आय का 1/75वाँ भाग) है।
  • भारत में धन एवं आय के वितरण में उल्लेखनीय असमानता पायी जाती है। धनवानों और निर्धनों में अन्तराल बढ़ता ही जा रहा है।
  • भारत में जनाधिक्य की समस्या आर्थिक विकास में एक बहुत बड़ी बाधा है, क्योंकि संसाधन उस अनुपात में नहीं बढ़ पा रहे हैं।
  • भारत में बाजार की अपूर्णताएँ भी स्पष्ट रूप में देखी जाती हैं। यहाँ व्यावसायिक गतिशीलता का अभाव है तथा आर्थिक क्रियाओं में आशातीत विशिष्टीकरण भी नहीं हो पा रहा है।
  • भारत में बहुत-से व्यक्ति अपनी आय को सामाजिक कुरीतियों पर ही व्यय कर देते हैं जिससे अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • भारत में आवागमन तथा संचार के साधनों का यथोचित विकास नहीं हो पाने के कारण आर्थिक असन्तुलन यथावत् बना हुआ है।

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प्रश्न 5.
नयी औद्योगिक नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
सन् 1991 ई० की नवीन औद्योगिक नीति से उदारीकरण के अनेक उपायों की घोषणा की गई। इस नीति के अनुसार आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के काल में औद्योगिक क्रियाकलापों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बहुत प्रोत्साहन दिया गया। उदारीकरण की नीति के प्रमुख उपाय थे—निवेश सम्बन्धी बाधाएँ हटा दी गईं, व्यापार को बन्धनमुक्त कर दिया गया, कुछ क्षेत्रों में विदेशी प्रौद्योगिकी आयात करने की छूट दी गई, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (विनियोग) की अनुमति दी गई, पूँजी बाजार में पहुँच की बाधाओं को हटा दिया गया, औद्योगिक लाइसेंस पद्धति को सरल एवं नियन्त्रण मुक्त कर दिया गया, (UPBoardSolutions.com) सार्वजनिक क्षेत्र के सुरक्षित क्षेत्र को घटा दिया गया तथा सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ चुने हुए उपक्रमों का विनिवेशीकरण किया गया अर्थात् इन्हें निजी कम्पनियों को बेच दिया गया। दसवीं योजना (2002-07) में औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ग्यारहवीं योजना (2007-12) में औद्योगिक विकास का लक्ष्य 9% रखा गया। यह योजना मार्च, 2012 को समाप्त हो गई। वर्ष 2012-17 के लिए 1 अप्रैल, 2012 से 12वीं पंचवर्षीय योजना प्रारम्भ हुई। इसमें औद्योगिक विकास का लक्ष्य 9.6 प्रतिशत रखा गया है।

प्रश्न 6.
भारत में ‘बौद्धिक सम्पदा के क्षेत्र में की गयी प्रगति का वर्णन कीजिए।
या
‘बौद्धिक सम्पदा’ से आप क्या समझते हैं ? इस पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर :
क्ति का सर्वांगीण विकास अर्थात् शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक विकास पर्याप्त सीमा तक तकनीकी शिक्षा पर आधारित है। व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तब ही पूर्ण माना जाता है जब उसमें जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास करने की क्षमता उत्पन्न हो जाए। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा व्यक्ति को प्रत्येक क्षेत्र में विकसित होने का अवसर प्रदान करती है। यह शारीरिक श्रम के माध्यम से मानसिक शक्तियों का विकास करते हुए व्यक्ति को चिन्तन, मनन, सत्यापन आदि के अवसर प्रदान करती है, जिससे उसका बौद्धिक विकास होता है। उदाहरण के लिए किसी विद्यार्थी में योग्यता एवं तकनीकी कौशल का विकास होने पर उसमें आत्मनिर्भरता की शक्ति भी पैदा होती है।

आज भारत ने ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति कर देश में उपलब्ध संसाधनों का भरपूर उपयोग किया है। जैव प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं यन्त्रीकरण, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य देखभाल, दूर संवेदी उपग्रह प्रणाली, सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों के विकास में भारत अपनी बौद्धिक सम्पदा के बल पर ही आगे कदम बढ़ा रहा है। इण्टरनेट अत्यन्त उच्च तकनीक वाला उद्योग है, जिसमें नयी उपलब्धियों का प्रयोग और पुरानी का लोप दोनों ही बड़ी तेज रफ्तार से होता है। इससे कुछ नयी परिस्थितियाँ भी जन्मी हैं। इनमें पहली पेटेण्ट और बौद्धिक सम्पदा के अधिकारों से सम्बन्धित है। सॉफ्टवेयर चुम्बकीय माध्यम में अंकित रहता है और इसीलिए इसका हस्तान्तरण तथा नकल बड़ी आसानी से हो जाता है। इस कारण पेटेण्ट और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की रक्षा का काम बेहद कठिन हो गया है। नवीं पंचवर्षीय योजना अवधि में दो नयी योजनाएँ अर्थात्

  • बौद्धिक सम्पदा अधिकार अध्ययन के बारे में वित्तीय सहायता योजना और
  • कॉपीराइट मामलों पर संगोष्ठी तथा कार्यशाला आयोजन आरम्भ की गयी। बौद्धिक सम्पदा अधिकार अध्ययन की वित्तीय सहायता योजना का उद्देश्य बौद्धिक सम्पदा अधिकार

सम्बन्धी मामले के बारे में शिक्षाविद् समुदाय में सामान्य जागरूकता उत्पन्न करना और विश्व विद्यालय तथा अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के बारे में अध्ययनों को प्रोत्साहित करना है। भारत विश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन का सदस्य है, जो (UPBoardSolutions.com) कॉपीराइट तथा अन्य बौद्धिक सम्पदा अधिकारों से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशिष्ट एजेन्सी है। भारत इनकी सभी चर्चाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था किस पर आधारित है ?
उत्तर :
वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था ‘वैश्वीकरण’ या उदारीकरण’ की प्रक्रिया पर आधारित है।

प्रश्न 2.
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि के घटते योगदान से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता हैं ?
उत्तर :
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि के (UPBoardSolutions.com) घटते योगदान से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत विकास की ओर अग्रसर है।

प्रश्न 3.
भारत में कृषि की महत्त्वपूर्ण क्रान्तियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
हरित क्रान्ति तथा पीली क्रान्ति।

प्रश्न 4.
छः आधारभूत उद्योगों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
छ: आधारभूत उद्योग इस प्रकार हैं-बिजली, कोयला, इस्पात, कच्चा पेट्रोलियम, पेट्रोलियम रिफाइनरी तथा सीमेण्ट।

प्रश्न 5.
सरकार ने कपड़ा उद्योग को कब लाइसेन्स मुक्त किया था ?
उत्तर :
सरकार ने कपड़ा उद्योग को वर्ष 1993 ई० में लाइसेन्स मुक्त किया था।

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प्रश्न 6.
लोहा व इस्पात उद्योग में कितनी पूँजी लगी हुई है तथा कितने लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है ?
उत्तर :
लोहा व इस्पात उद्योग में है 90,000 करोड़ की पूँजी (UPBoardSolutions.com) लगी हुई है तथा 5 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है।

प्रश्न 7.
भारतीय कोयला उद्योग का संचालन एवं नियन्त्रण करने वाले संस्थानों के नाम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय कोयला उद्योग को संचालन एवं नियन्त्रण सार्वजनिक क्षेत्र के दो प्रमुख संस्थानों-कोल इण्डिया लि० (CIL) तथा सिंगरैनी कोइलरीज द्वारा किया जा रहा है।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण का क्या अर्थ है ? [2010]
उत्तर :
किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ समन्वय ही वैश्वीकरण कहलाता है। इसे भूमण्डलीकरण या विश्वव्यापीकरण भी कहा जाता है। यह द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यापार एवं वित्तीय समझौते से भिन्न ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के द्वारा विश्व स्तर पर उपलब्ध आर्थिक अवसरों से लाभान्वित होने का विचार अन्तर्निहित है।

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प्रश्न 9.
भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया कब आरम्भ हुई ?
उत्तर :
भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया सन् 1991 ई० में आरम्भ हुई। इस प्रक्रिया को तत्कालीन प्रधानमन्त्री पी०वी० नरसिंहराव तथा वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में क्रियान्वित किया गया।

प्रश्न 10.
वैश्वीकरण से होने वाले दो लाभ लिखिए।
उत्तर :
वैश्वीकरण से होने वाले दो लाभ निम्नलिखित हैं

  • वैश्वीकरण या उदारीकरण से उठाए गए कदमों के कारण संचार के क्षेत्र में कम दामों में उत्तम सेवाएँ प्राप्त हुईं।
  • इसमें औद्योगिक क्षेत्र में, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में, (UPBoardSolutions.com) कम्प्यूटर एवं खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में भारी सफलता देश को प्राप्त हुई।

बहुविकल्पीय प्रश्

1. भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था में स्थान है
(क) पहला
(ख) चौथा।
(ग) सातवाँ
(घ) तीसरा

2. ‘कृष्ण क्रान्ति सम्बन्धित है
(क) तेल उत्पादन से
(ख) केरोसिन उत्पादन से
(ग) पेट्रोल उत्पादन से
(घ) खनिज तेल उत्पादन से

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3. ‘शिक्षा-एक मौलिक अधिकार को किस संशोधन द्वारा पारित किया गया?
(क) 93वाँ संशोधन
(ख) 92वाँ संशोधन
(ग) 85वाँ संशोधन
(घ) 91वाँ संशोधन

4. देश के सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का योगदान कितना प्रतिशत है?
(क) 24%
(ख) 25%
(ग) 26%
(घ) 27%

5. भारत का कितना प्रतिशत कृषि क्षेत्रफल वर्षा पर निर्भर करता है?
(क) 50%
(ख) 55%
(ग) 60%
(घ) 65%

6. भारत की राष्ट्रीय आय का कितना प्रतिशत कृषि से प्राप्त होता है?
(क) 25%
(ख) 28%
(ग) 30%
(घ) 33%

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7. भारत में रॉकेट प्रक्षेपण का केन्द्र है
(क) पोखरन
(ख) ट्रॉम्बे
(ग) मुम्बई
(घ) श्रीहरिकोटा

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (घ), 3. (क), 4. (ग), 5. (ग), 6. (क), 7. (क)।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित

UP Board Solutions for Class 10 Hindi गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित.

गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित

निबन्ध

प्रश्न 1
निबन्ध किसे कहते हैं ?
उत्तर
निबन्ध उस गद्य-विधा को कहते हैं, जिसमें किसी विषय पर सभी दृष्टियों से प्रस्तुत किये गये विचारों का मौलिक और स्वतन्त्र रूप में विवेचन; विचारपूर्ण, विवरणात्मक और विस्तृत रूप में किया गया हो। इसमें लेखक स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचारों तथा भावों को प्रकट करता है।

प्रश्न 2
हिन्दी निबन्ध-लेखन की विभिन्न शैलियों का उल्लेख कीजिए।
या
विषय एवं शैली के अनुसार निबन्ध के दो भेदों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
हिन्दी निबन्ध-लेखन में वर्णनात्मक, (UPBoardSolutions.com) विवरणात्मक, विचारात्मक तथा भावात्मक शैलियों को अपनाया गया है।

प्रश्न 3
विचारात्मक निबन्ध और वर्णनात्मक निबन्ध में अन्तर बताइए।
उत्तर
विचारात्मक निबन्ध में तर्कपूर्ण विवेचन, विश्लेषण एवं खोजपूर्ण अध्ययन की प्रधानता होती है, किन्तु वर्णनात्मक निबन्ध का लेखक किसी वस्तु, घटना या दृश्य का वर्णन निरीक्षण के आधार पर करता है।

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प्रश्न 4
‘वर्णनात्मक’ एवं ‘विवरणात्मक निबन्ध का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
वर्णनात्मक निबन्धों में किसी भी वर्णनीय वस्तु, स्थान, व्यक्ति, दृश्य आदि का निरीक्षण के आधार पर आकर्षक, सरस तथा रमणीय रूप में वर्णन होता है; जब कि विवरणात्मक निबन्धों में प्रायः ऐतिहासिक तथा सामाजिक घटनाओं, स्थानों, दृश्यों, पात्रों तथा जीवन के अन्य विविध क्रियाकलापों का विवरण दिया जाता है।

प्रश्न 5
हिन्दी के प्रमुख ललित निबन्धकारों के नाम बताइए।
उत्तर
हिन्दी के प्रमुख ललित निबन्धकार निम्नवत् हैं

  1. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी,
  2. शिवप्रसाद सिंह,
  3. रामवृक्ष बेनीपुरी,
  4. कुबेरनाथ राय,
  5. विद्यानिवास मिश्र,
  6. वासुदेवशरण अग्रवाल,
  7. जगदीशचन्द्र माथुर,
  8. धर्मवीर भारती एवं
  9. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी।।

प्रश्न 6
विचारात्मक और भावात्मक निबन्ध में क्या अन्तर है ?
उत्तर
विचारात्मक निबन्ध में बुद्धि-तत्त्व की तथा भावात्मक निबन्ध में हृदय-तत्त्व की प्रधानता होती है।

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प्रश्न 7
भावात्मक निबन्धों की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भावात्मक निबन्धों की दो विशेषताएँ हैं—

  1. भावात्मक तन्त्र की प्रधानता और
  2. सरल एवं सरस भाषा का प्रयोग।

प्रश्न 8
एक-एक विचारात्मक तथा भावात्मक निबन्ध-लेखकों का नाम लिखिए।
उत्तर

  1. रामचन्द्र शुक्ल-विचारात्मक निबन्ध-लेखक।
  2. वियोगी हरि-भावात्मक (UPBoardSolutions.com) निबन्ध-लेखक।

प्रश्न 9
हिन्दी के दो प्रसिद्ध निबन्धकारों का उल्लेख कीजिए। [2009]
या
किसी एक निबन्धकार का नाम लिखिए। [2017]
या
निबन्ध के विकास में सहायक किन्हीं दो निबन्धकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
निबन्ध के विकास में सहायक दो प्रसिद्ध निबन्धकार हैं–

  1. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा
  2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल।।

प्रश्न 10
कुछ प्रगतिवादी निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
डॉ० धर्मवीर भारती, डॉ० रांगेय राघव, डॉ० रामविलास शर्मा, डॉ० नामवर सिंह, डॉ० शिवप्रसाद सिंह, राजेन्द्र यादव आदि प्रगतिवादी निबन्धकारों के नाम हैं।

प्रश्न 11
हिन्दी-साहित्य के दो विचारात्मक निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. बाबू श्यामसुन्दर दास तथा
  2. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी-साहित्य के दो विचारात्मक निबन्धकार हैं।

प्रश्न 12
भारतेन्दु युग के किन्हीं दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
भारतेन्दु युग के दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम हैं—

  1. बालकृष्ण भट्ट और
  2. प्रतापनारायण मिश्र।

प्रश्न 13
शुक्लोत्तर युग के किन्हीं दो निबन्धकारों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम हैं—

  1. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा
  2. श्री विद्यानिवास मिश्र।

प्रश्न 14
शुक्ल युग के किन्हीं दो निबन्धकारों का नामोल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर
शुक्ल युग के दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम हैं—

  1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा
  2. बाबू गुलाबराय।

प्रश्न 15
‘नर से नारायण’ और ‘अजन्ता’ निबन्धों के लेखकों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
‘नर से नारायण’ के लेखक गुलाबराय तथा ‘अजन्ता’ के लेखक डॉ० भगवतशरण उपाध्याय हैं।

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प्रश्न 16
‘पानी में चन्दा और चाँद पर आदमी’ निबन्ध की भाषा-शैली की दो विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए।
उत्तर

  1. इस निबन्ध की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और बोधगम्य है।
  2. वर्णनात्मक शैली में लिखा गया यह एक श्रेष्ठ निबन्ध है। इस निबन्ध में कहीं-कहीं चित्रात्मक शैली भी दृष्टिगत होती है।

प्रश्न 17
‘भारतीय संस्कृति’ नामक निबन्ध कहाँ से उद्धृत है ? इसकी मूल भावना को एक वाक्य में व्यक्त कीजिए।
उत्तर
यह निबन्ध डॉ० राजेन्द्रप्रसाद के भाषण का एक अंश है। इसमें भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता की भावना को व्यक्त किया गया है।

प्रश्न 18
‘ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से’ निबन्ध रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की किस रचना से संकलित है ?
उत्तर
‘ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से’ निबन्ध रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की रचना अर्द्धनारीश्वर से संकलित है।

प्रश्न 19
भारतीय संस्कृति एवं साहित्य पर लेखन करने वाले एक गद्यकार का नाम बताइट।
उत्तर
भारतीय संस्कृति एवं साहित्य पर लेखन करने (UPBoardSolutions.com) वाले गद्यकार हैं–डॉ० भगवतशरण उपाध्याय।

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प्रश्न 20
‘अजन्ता’ कैसा लेख है और इसकी शैली कैसी है ?
उत्तर
‘अजन्ता’ पुरातत्त्व सम्बन्धी लेख है। इसकी शैली वर्णनात्मक व मनोरम है।

नाटक

प्रश्न 1
नाटक किसे कहते हैं ?
उत्तर
नाटक साहित्य की एक से अधिक अंकों वाली वह दृश्यात्मक गद्य-विधा है, जो रंगमंच पर अभिनय द्वारा प्रस्तुत करने की दृष्टि से लिखी जाती है तथा पात्रों एवं उनके संवादों पर आधारित होती है।

प्रश्न 2
भारतीय आचार्यों द्वारा बताये गये नाटक के तत्त्व लिखिए।
उत्तर
भारतीय आचार्यों ने नाटक के पाँच तत्त्व बताये हैं—

  1. कथावस्तु,
  2. नायक,
  3. रस,
  4. अभिनय एवं
  5. वृत्ति।।

प्रश्न 3
पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि से नाटक के तत्त्व बताइए।
उत्तर
पाश्चात्य विद्वानों ने नाटक के छ: तत्त्व स्वीकार किये हैं–

  1. कथावस्तु,
  2. पात्र,
  3. संवाद अथवा कथोपकथन,
  4. देश-काल,
  5. भाषा-शैली एवं
  6. उद्देश्य।

प्रश्न 4
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के चार नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. भारत दुर्दशा,
  2. सत्य हरिश्चन्द्र,
  3. अंधेर नगरी एवं
  4. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।

प्रश्न 5
भारतेन्दु के पश्चात् नाटक के क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान किसका रहा ?
उत्तर
भारतेन्दु के पश्चात् नाटक के क्षेत्र में (UPBoardSolutions.com) सर्वाधिक योगदान जयशंकर प्रसाद का रहा।

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प्रश्न 6
भारतेन्दु के बाद के प्रमुख ऐतिहासिक नाटककार का नाम लिखिए।
या
किसी एक नाटककार का नाम लिखिए। [2016, 18]
उत्तर
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बाद के प्रमुख ऐतिहासिक नाटककार हैं-श्री जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 7
हिन्दी के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
या
उदयशंकर भट्ट किस गद्य-विधा के प्रमुख लेखक हैं ? [2012]
उत्तर

  1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,
  2. जयशंकर प्रसाद,
  3. वृन्दावनलाल वर्मा,
  4. लक्ष्मीनारायण मिश्र,
  5. सेठ गोविन्ददास,
  6. विष्णु प्रभाकर,
  7. हरिकृष्ण प्रेमी,
  8. उदयशंकर भट्ट,
  9. उपेन्द्रनाथ अश्क आदि हिन्दी के प्रमुख नाटककार हैं।

प्रश्न 8
शुक्ल युग के दो नाटककारों के नाम लिखिए।
या
प्रसाद युग के किसी एक नाटककार का नाम लिखिए। [2012]
उत्तर

  1. जयशंकर प्रसाद और
  2. हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ शुक्ल युग के दो नाटककार हैं।

प्रश्न 9
प्रसादोत्तर काल के चार नाटककारों तथा उनके एक-एक नाटक का नाम लिखिए।
या
शुक्लोत्तर युग (प्रसाद के परवर्ती) के दो प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए। [2011, 14]
उत्तर

  1. लक्ष्मीनारायण मिश्र–सिन्दूर की होली,
  2. विष्णु प्रभाकर टूटते परिवेश,
  3. धर्मवीर भारती–अन्धा युग तथा
  4. मोहन राकेश-लहरों के राजहंस।

प्रश्न 10
शुक्ल युग के उस सुप्रसिद्ध नाटककार का नाम लिखिए, जो अपने युग के सुप्रतिष्ठित कहानीकार होने के साथ-साथ श्रेष्ठ कवि भी हैं।
उत्तर
जयशंकर प्रसाद शुक्ल युग के सुप्रसिद्ध (UPBoardSolutions.com) नाटककार हैं, जो सुप्रतिष्ठित कहानीकार और श्रेष्ठ कवि भी हैं।

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प्रश्न 11
हिन्दी नाटक के विकास में किस नाटककार का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है ? उसके द्वारा लिखित दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी नाटक के विकास में श्री जयशंकर प्रसाद का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके द्वारा लिखित दो नाटक हैं-‘अजातशत्रु’ और ‘ध्रुवस्वामिनी’।

प्रश्न 12
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक किन विषयों पर आधारित हैं ?
उत्तर
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटक राष्ट्र-प्रेम, धर्म, राजनीति, समाज-सुधार, प्रेम आदि विषयों पर आधारित हैं। इनके नाटकों में प्रेम-तत्त्व की प्रमुखता है।

प्रश्न 13
जयशंकर प्रसाद के नाटकों के क्या विषय हैं ?
उत्तर
प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति का समन्वय, देशप्रेम, आधुनिक युग की समस्याएँ, मानव-मन का अन्तर्द्वन्द्व आदि जयशंकर प्रसाद के नाटकों के प्रमुख विषय हैं।

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प्रश्न 14
छायावादी युग के दो नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जयशंकर प्रसाद तथा
  2. डॉ० रामकुमार वर्मा।

प्रश्न 15
जयशंकर प्रसाद के दो ऐतिहासिक नाटकों के नाम लिखिए।
या
जयशंकर प्रसाद के किन्हीं दो नाटकों के नाम लिखिए। [2009]
या
जयशंकर प्रसाद के एक नाटक का नाम लिखिए। [2012, 14]
उत्तर

  1. चन्द्रगुप्त और
  2. स्कन्दगुप्त जयशंकर प्रसाद के दो ऐतिहासिक नाटक हैं।

प्रश्न 16
जयशंकर प्रसाद के परवर्ती (बाद के) नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. लक्ष्मीनारायण मिश्र,
  2. हरिकृष्ण प्रेमी’,
  3. रामकुमार वर्मा,
  4. सेठ गोविन्ददास,
  5. उदयशंकर भट्ट,
  6.  गोविन्दबल्लभ पन्त और
  7.  उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ जयशंकर प्रसाद के बाद के नाटककार हैं।

प्रश्न 17
माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित किसी एक नाटक का नाम बताइए।
उत्तर
श्री माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित (UPBoardSolutions.com) नाटक ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ है।

प्रश्न 18
कुछ प्रमुख रेडियो-नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. श्री सुमित्रानन्दन पन्त,
  2. श्री उदयशंकर भट्ट,
  3. श्री विष्णु प्रभाकर,
  4. श्री अमृतलाल नागर,
  5. श्री उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’,
  6. श्री सत्येन्द्र शरत् आदि प्रसिद्ध रेडियो-नाटककार हैं।

प्रश्न 19
हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककारों तथा उनके द्वारा लिखित एक-एक नाटक का नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार तथा उनके द्वारा लिखित एक-एक नाटक के नाम हैं—

  1. श्री जयशंकर प्रसाद : अजातशत्रु,
  2. श्री उपेन्द्रनाथ अश्क’ : जय-पराजय,
  3. श्री उदयशंकर भट्ट : मुक्ति-पथ,
  4. श्री सेठ गोविन्ददास : हर्ष,
  5. श्री व्यथित हृदय : राजमुकुट,
  6. श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी : आन का मान,
  7. श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र : गरुड़ध्वज,
  8. श्री जगदीशचन्द्र माथुर : कोणार्क आदि।

प्रश्न 20
हिन्दी के प्रथम नाटक और उसके नाटककार का नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी के प्रथम नाटक का नाम ‘नहुष’ है, जिसकी रचना गोपालचन्द्र गिरधरदास (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पिता) द्वारा की गयी।

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प्रश्न 21
सेठ गोविन्ददास किस विधा के प्रमुख लेखक हैं ? [2011]
उत्तर
सेठ गोविन्ददास ‘नाटक’ विधा के प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 22
भुवनेश्वर गद्य की किस विधा-विशेष के लिए प्रसिद्ध हैं? [2011]
उत्तर
भुवनेश्वर नाटक और एकांकी गद्य-विधाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा रचित एक नाटक का नाम ‘स्ट्राइक’ है।

कहानी

प्रश्न 1
कहानी किसे कहते हैं ?
उत्तर
कहानी गद्य की वह विधा है, जो छोटी होती हुई भी बड़े-से-बड़े भाव की व्यंजना करने में समर्थ होती है। इसका आरम्भ तथा अन्त कलात्मक व प्रभावपूर्ण होता है। यह गद्य-विधा पाठकों को अपनी यथार्थपरता और मनोवैज्ञानिकता के कारण प्रभावित करती है।

प्रश्न 2
आधुनिक साहित्य की सबसे अधिक लोकप्रिय विधाको नाम लिखिए।
उत्तर
आधुनिक साहित्य की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा का नाम ‘कहानी’ है।

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प्रश्न 3
आधुनिक कहानी किस उद्देश्य से लिखी जाती है ?
उत्तर
आधुनिक कहानी के लिखे जाने को मुख्य उद्देश्य (UPBoardSolutions.com) पाठकों के मनोरंजन के साथ-साथ किसी पात्र, घटना, भाव या संवेदना की मार्मिक अभिव्यंजना करना है।

प्रश्न 4
“आधुनिक कहानी साहित्य की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा है।” ऐसा क्यों कहा जाता है ?
उत्तर
आधुनिक कहानी

  1. रोचकता,
  2. कलात्मकता,
  3. संवेदनशीलता,
  4. संक्षिप्तता,
  5. प्रभावोत्पादकता,
  6. भावात्मकता आदि गुणों के कारण साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा मानी जाती है।

प्रश्न 5
विषय की प्रधानता के आधार पर कहानी कितने प्रकार की होती है. ?
उत्तर
विषय की प्रधानता के आधार पर कहानी चार प्रकार की होती है—

  1. घटनाप्रधान,
  2. चरित्रप्रधान,
  3. भावप्रधान तथा
  4. वातावरणप्रधान।

प्रश्न 6
विषय-वस्तु के आधार पर कहानी कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर
विषय-वस्तु के आधार पर कहानी के सात प्रकार होते हैं—

  1. ऐतिहासिक,
  2. सामाजिक,
  3. यथार्थवादी,
  4. दार्शनिक,
  5. मनोवैज्ञानिक,
  6. हास्य-व्यंग्यप्रधान,
  7. प्रतीकवादी आदि।

प्रश्न 7
द्विवेदी युग के चार प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम लिखिए। [2017]
उत्तर

  1. प्रेमचन्द,
  2. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’,
  3. जयशंकर प्रसाद,
  4. विश्वम्भरनाथ ‘कौशिक द्विवेदी युग के चार प्रसिद्ध कहानीकार हैं।

प्रश्न 8
प्रेमचन्द की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए। या मुंशी प्रेमचन्द की किसी एक प्रसिद्ध कहानी का नाम लिखिए। [2011]
उत्तर
ईदगाह, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, बड़े भाई (UPBoardSolutions.com) साहब, कफन, मन्त्र, पंच परमेश्वर आदि प्रेमचन्द की प्रमुख कहानियाँ हैं।

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प्रश्न 9
प्रेमचन्द के समकालीन किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
या
हिन्दी के दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. जयशंकर प्रसाद तथा
  2. सुदर्शन; प्रेमचन्द के समकालीन हिन्दी के दो प्रसिद्ध कहानीकार

प्रश्न 10
प्रेमचन्दोत्तर युग के किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2. यशपाल, प्रेमचन्द के बाद के दो कहानीकार हैं।

प्रश्न 11
हिन्दी के किन्हीं दो बड़े कहानीकारों तथा उनकी एक-एक कहानी का नाम लिखिए।
या
किसी एक कहानीकार का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर

  1. प्रेमचन्द-पंच परमेश्वर तथा
  2. जयशंकर प्रसाद-ममता।।

प्रश्न 12
उपन्यास और कहानी-लेखन के क्षेत्र में प्रेमचन्दोत्तर लेखकों में से कुछ के नाम लिखिए।
उत्तर
उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में प्रेमचन्द के बाद आने वाले लेखकों में से उल्लेखनीय हैंजैनेन्द्र कुमार, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, भगवतीचरण वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, इलाचन्द्र जोशी, नागार्जुन, अमृतलाल नागर आदि।

प्रश्न 13
शुक्ल युग के दो प्रसिद्ध कहानी-लेखकों के नाम लिखिए। [2009]
या
शुक्ल युग के दो प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए। [2015]
उत्तर

  1. श्री भगवतीचरण वर्मा तथा
  2. आचार्य चतुरसेन शास्त्री शुक्ल युग के दो प्रसिद्ध कहानी-लेखक हैं।

प्रश्न 14
शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. श्री इलाचन्द्र जोशी तथा
  2. श्री मोहन राकेश शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख कहानीकार हैं।

प्रश्न 15
आपको किस कहानी ने सबसे अधिक प्रभावित किया है ?
या
‘उसने कहा था’ के लेखक का नाम लिखिए। [2013]
उत्तर
श्री चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था’ ने (UPBoardSolutions.com) अपनी संवेदनशीलता के कारण हमें सर्वाधिक प्रभावित किया है।

प्रश्न 16
हिन्दी कथा-साहित्य में युगान्तर उपस्थित करने वाले कथाकार कौन थे ? ‘मानसरोवर’ में किस कहानीकार की कहानियाँ संकलित हुई हैं ? ।
उत्तर
हिन्दी कथा-साहित्य में युगान्तर उपस्थित करने वाले कथाकार प्रेमचन्द थे। मानसरोवर (आठ भाग) में प्रेमचन्द की ही कहानियाँ संकलित हुई हैं।

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प्रश्न 17
भारतेन्दु युग के दो कहानीकार और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
भारतेन्दु युग के दो कहानीकार और उनकी रचनाओं के नाम हैं–

  1. अम्बिकादत्त व्यास– कथा-कुसुम-कलिका तथा
  2. चण्डी प्रसाद सिंह-हास्य रतन।।

उपन्यास

प्रश्न 1
उपन्यास का व्युत्पत्तिपरक अर्थ बताइए।
उत्तर
‘उपन्यास’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘उपन्यस्त’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है-‘सामने रखा हुआ’। इस प्रकार मानव-जीवन, समाज या इतिहास के यथार्थ सत्य को संवाद एवं दृश्यात्मक घटनाओं पर आधारित चित्रण के माध्यम से पाठकों के सम्मुख यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने वाली विधा ही उपन्यास कहलाती है।

प्रश्न 2
उपन्यास की परिभाषा लिखिए।
उत्तर
उपन्यास गद्य की वह कलात्मक लोकप्रिय विधा है, जिसमें मानव के सम्पूर्ण और वास्तविक जीवन का काल्पनिक एवं विशद चित्रण होता है। प्रेमचन्द ने उपन्यास को ‘मानव-जीवन’ को चित्र कहा है।

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प्रश्न 3
उपन्यास के मूल उद्देश्य बताइट।
उत्तर
मानव-चित्रण पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना उपन्यास के मूल उद्देश्य होते

प्रश्न 4
उपन्यास के कौन-कौन से प्रमुख तत्त्व हैं ?
उत्तर

  1. कथावस्तु,
  2. चरित्र-चित्रण,
  3. कथोपकथने या संवाद,
  4. भाषा-शैली,
  5. देशकाल अथवा वातावरण तथा
  6.  उद्देश्य; उपन्यास के छ: प्रमुख तत्त्व हैं।

प्रश्न 5
विषय के आधार पर हिन्दी उपन्यास कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर
विषय के आधार पर हिन्दी उपन्यासों को–

  1. सामाजिक,
  2. ऐतिहासिक,
  3. आंचलिक,
  4. मनोवैज्ञानिक,
  5. पौराणिक,
  6. राजनीतिक,
  7.  रहस्यात्मक आदि भागों में विभक्त किया जा सकता है।

प्रश्न 6
द्विवेदी युग के तीन प्रसिद्ध उपन्यासकारों के नाम लिखिए। [2017]
या
किसी एक प्रसिद्ध उपन्यास लेखक का नाम लिखिए। [2014]
उत्तर

  1. प्रेमचन्द,
  2. वृन्दावनलाल वर्मा तथा
  3. किशोरीलाल गोस्वामी; द्विवेदी युग के तीन प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 7
प्रेमचन्द के चार उपन्यासों के नाम बताइए।
या
प्रेमचन्द के दो उपन्यासों के नाम लिखिए। [2010]
उत्तर
प्रेमचन्द द्वारा लिखित चार प्रमुख उपन्यास हैं—

  1. गोदान,
  2. गबन,
  3. सेवासदन तथा
  4. निर्मला।

प्रश्न 8
प्रेमचन्द के उपन्यास किन-किन विषयों पर आधारित हैं ?
उत्तर
प्रेमचन्द के उपन्यास-दीन-हीन, किसान-मजदूरों, नारी-उद्धार, (UPBoardSolutions.com) समाज-सुधार, राष्ट्रीयचेतना आदि विषयों पर आधारित हैं।

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प्रश्न 9
प्रेमचन्द युग के चार उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. आचार्य चतुरसेन शास्त्री,
  2. विश्वम्भरनाथ ‘कौशिक,
  3. भगवतीप्रसाद वाजपेयी तथा
  4. वृन्दावनलाल वर्मा; प्रेमचन्द युग के चार उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 10
शुक्ल युग के दो प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. प्रेमचन्द तथा
  2. आचार्य चतुरसेन शास्त्री; शुक्ल युग के दो उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 11
शुक्ल युग के प्रसिद्ध उपन्यास लेखक और उनके एक अति प्रसिद्ध उपन्यास का नाम लिखिए।
उत्तर
उपन्यासकार-प्रेमचन्द। प्रमुख उपन्यास-गोदान।

प्रश्न 12
प्रेमचन्दोत्तर युग के तीन उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
या
प्रेमचन्दोत्तर काल के उपन्यासकारों में से किन्हीं दो के नाम लिखिए। [2009]
उत्तर

  1. जैनेन्द्र कुमार,
  2. अमृतलाल नागर तथा
  3.  सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रेमचन्दोत्तर युग के तीन उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 13
जयशंकर प्रसाद के दो उपन्यासों के नाम लिखिए।
या
जयशंकर प्रसाद की किसी एक कृति का नाम लिखिए। [2011]
उत्तर

  1. तितली और
  2. कंकाल।।

प्रश्न 14
‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ उपन्यास के लेखक का नामोल्लेख कीजिए। [2012]
या
देवकीनन्दन खत्री के किसी एक तिलिस्मी उपन्यास का नाम लिखिए, साथ ही उनके युग का उल्लेख भी कीजिए।
उत्तर
लेखक-देवकीनन्दन खत्री। युग-द्विवेदी युग। देवकीनन्दन (UPBoardSolutions.com) खत्री के तिलिस्मी उपन्यास—चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता-सन्तति, भूतनाथ आदि।

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प्रश्न 15
हिन्दी के प्रमुख सामाजिक उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, वृन्दावनलाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, विश्वम्भरनाथ ‘कौशिक’ आदि हिन्दी के प्रमुख सामाजिक उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 16
द्विवेदी युग में प्रायः किस प्रकार के उपन्यास लिखे गये ?
उत्तर
द्विवेदी युग में प्राय: तिलिस्मी, जासूसी, सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, चरित्रप्रधान तथा भावप्रधान उपन्यास लिखे गये।

प्रश्न 17
हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास और उसके लेखक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्रथम मौलिक उपन्यास-परीक्षागुरु। लेखक-श्रीनिवासदास।

प्रश्न 18
उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में प्रेमचन्द का उत्तराधिकार जिन लेखकों ने सफलतापूर्वक वहन किया उनमें से किन्हीं दो लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर
उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में प्रेमचन्द का उत्तराधिकार वहन करने वाले दो लेखक हैं

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2. आचार्य चतुरसेन शास्त्री।

प्रश्न 19
हिन्दी के प्रथम सामाजिक उपन्यास का नाम बताइट।
उत्तर
सन् 1887 ई० में श्री श्रद्धाराम फुल्लौरी द्वारा रचित ‘भाग्यवती’ को हिन्दी को प्रथम सामाजिक उपन्यास माना जाता है।

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प्रश्न 20
शुक्लोत्तर युग के दो उपन्यासकारों के नाम लिखिए तथा उनके एक-एक उपन्यास का उल्लेख कीजिए।
या
यशपाल की किसी एक रचना का नाम लिखिए। [2016]
उत्तर
शुक्लोत्तर युग के दो उपन्यासकार यशपाल और भगवतीचरण (UPBoardSolutions.com) वर्मा हैं। इनके द्वारा लिखित एक-एक उपन्यास के नाम (क्रमश:) हैं-झूठा सच और भूले बिसरे चित्र।

प्रश्न 21
प्रमुख आंचलिक उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर
प्रमुख आंचलिक उपन्यासकार हैं—

  1. फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (परती परिकथा),
  2. नागार्जुन (बाबा बटेसरनाथ),
  3. देवेन्द्र सत्यार्थी (रथ के पहिए),
  4. रांगेय राघव (कब तक पुकारू),
  5. उदयशंकर भट्ट (सागर, लहरें और मनुष्य) आदि।

प्रश्न 22
प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों और उनके एक-एक प्रमुख उपन्यास का नाम लिखिए।
उम्र
प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार और उनके उपन्यास हैं—

  1. जैनेन्द्र कुमार (परख),
  2. इलाचन्द्र जोशी (लज्जा),
  3. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (अपने-अपने अजनबी),
  4. डॉ० देवराज (पथ की खोज),
  5. डॉ० धर्मवीर भारती (गुनाहों के देवता) आदि।

प्रश्न 23
प्रमुख सामाजिक उपन्यासकारों और उनकी एक-एक कृतियों का नाम लिखिए।
उत्तर
प्रमुख सामाजिक उपन्यासकार और उनके उपन्यास हैं—

  1. आचार्य चतुरसेन शास्त्री (शुभदा),
  2. पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ (सरकार तुम्हारी आँखों में),
  3. श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ (अप्सरा),
  4. अमृतलाल नागर (शतरंज के मोहरे),
  5. मोहन राकेश (अँधेरे बन्द कमरे) आदि।

प्रश्न 24
प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यासकार और उनकी एक-एक औपन्यासिक कृति का नाम लिखिए।
या
राहुल सांकृत्यायन की एक रचना का नाम लिखिए। [2012]
उत्तर

  1. वृन्दावनलाल वर्मा (मृगनयनी),
  2. आचार्य चतुरसेन शास्त्री (वैशाली की नगरवधू),
  3. राहुल सांकृत्यायन (जय यौधेय),
  4. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (चारुचन्द्रलेख),
  5. रांगेय राघव (महायात्रा गाथा) आदि प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यासकार और उनकी औपन्यासिक कृतियाँ हैं।

अन्य गद्य-विधाएँ

प्रश्न 1
अच्छी जीवनी की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर

  1. प्रामाणिकता,
  2. तथ्यपूर्ण साहित्यिक विवरण,
  3. आत्मीयता,
  4. प्रेरणादायक स्थलों पर बल तथा
  5. रोचकता; अच्छी जीवनी की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

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प्रश्न 2
जीवनी-साहित्य को समृद्ध बनाने वाले किन्हीं दो प्रसिद्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. बाबू गुलाबराय तथा
  2. श्री रामनाथ सुमन; जीवनी-साहित्य को समृद्ध बनाने वाले दो प्रसिद्ध लेखक हैं।।

प्रश्न 3
शुक्ल युग के एक प्रमुख जीवनी-लेखक एवं उनकी कृति का उल्लेख कीजिए।
या
किसी एक जीवनी-लेखक का नाम लिखिए। [2013]
उत्तर
शुक्ल युग के प्रमुख जीवनी-लेखक और उनकी कृति है—बाबू गुलाबराय-गाँधी की देन।

प्रश्न 4
‘कलम का सिपाही’ किस साहित्यकार की जीवनी है?
उत्तर
‘कलम का सिपाही’ प्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार प्रेमचन्द की जीवनी है।

प्रश्न 5
शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख जीवनी-लेखकों एवं उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख जीवनी-लेखक और उनकी कृतियाँ हैं—

  1.  विष्णु प्रभाकर आवारा मसीहा तथा
  2. रामविलास शर्मा–निराला की साहित्य-साधना।

प्रश्न 6
आत्मकथा से आप क्या समझते हैं? किन्हीं दो आत्मकथा-लेखकों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
लेखक जब स्वयं अपने जीवन की कथा को पाठकों के समक्ष पूर्ण आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता है तो उसे आत्मकथा कहते हैं। बाबू गुलाबराय और पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हिन्दी के प्रसिद्ध आत्मकथा-लेखक हैं और उनकी आत्मकथा का नाम क्रमश: ‘मेरी असफलताएँ’ और ‘अपनी खबर है।

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प्रश्न 7
जीवनी और आत्मकथा में क्या अन्तर है ?
उत्तर
जीवनी में लेखक के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के जीवन की घटनाओं का वर्णन किया जाता है, जब कि आत्मकथा में लेखक स्वयं अपने जीवन की कथा पाठकों के समक्ष आत्मीयता के साथ प्रस्तुत करता

प्रश्न 8
आत्मकथा की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. आत्मकथाएँ मार्गदर्शक और प्रेरक होती हैं तथा
  2. आत्मकथाओं में लेखक के अन्तरंग जीवन का पूर्ण आत्मीयता के साथ रोचक शैली में प्रस्तुतीकरण होता है। ये ही आत्मकथा की दो विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 9
हिन्दी के प्रमुख आत्मकथा-लेखकों के नाम लिखिए।
या
हिन्दी के किन्हीं दो प्रमुख आत्मकथा-लेखकों के नाम लिखिए। [2010]
या
किसी एक आत्मकथा-लेखक का नाम लिखिए। [2013]
उत्तर
श्यामसुन्दर दास, वियोगी हरि, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, बाबू गुलाबराय, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, हरिवंशराय बच्चन आदि श्रेष्ठ आत्मकथा-लेखक हैं। डॉ० हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा चार खण्डों में विभक्त है–

  1. क्या भूलें क्या याद करू,
  2. नीड़ का निर्माण फिर,
  3. बसेरे से दूर,
  4.  प्रवास की डायरी।

प्रश्न 10
हिन्दी की किसी प्रेरणाप्रद आत्मकथा का नाम लिखिए।
उत्तर
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद द्वारा लिखित मेरी आत्मकथा हिन्दी की एक प्रेरणाप्रद आत्मकथा है।

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प्रश्न 11
हिन्दी की किन्हीं दो साहित्यिक आत्मकथाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ तथा
  2. हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा ‘क्या भूलें क्या (UPBoardSolutions.com) याद करू” हिन्दी की दो साहित्यिक आत्मकथाएँ हैं।

प्रश्न 12
हिन्दी के प्रमुख संस्मरण लेखकों के नाम बताइट। या हिन्दी के दो संस्मरण लेखकों के नाम लिखिए। [2014, 16]
या
किसी एक संस्मरण लेखक का नाम लिखिए। [2011, 13, 14, 15, 17, 18]
उत्तर
बनारसीदास चतुर्वेदी, पद्मसिंह शर्मा, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, श्रीनारायण चतुर्वेदी आदि हिन्दी के प्रमुख संस्मरण लेखक हैं।

प्रश्न 13
‘संस्मरण’ विधा का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर
जब लेखक अपने निकट सम्पर्क में आने वाले किसी विशिष्ट, विचित्र, प्रिय और आकर्षक व्यक्ति को अपनी स्मृति के आधार परे शब्दों द्वारा आत्मीयता से वर्णन करता है, तब उसे ‘संस्मरण कहते हैं।

प्रश्न 14
‘रेखाचित्र’ किसे कहते हैं ?
उत्तर
रेखाचित्र उस गद्यात्मक साहित्य को कहते हैं, जिसमें किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा घटना का कम-से-कम शब्दों में यथावत् चित्रण किया जाता है।

प्रश्न 15
‘रेखाचित्र’ की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
रेखाचित्र की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. यह सांकेतिक एवं व्यंजक होता है तथा
  2. पूर्व स्मृति पर आधारित किसी मूर्त कल्पना का शब्द-चित्र प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 16
प्रमुख रेखाचित्र-लेखकों के नाम लिखिए।
या
‘रेखाचित्र’ विधा के एक प्रमुख लेखक का नाम लिखिए। [2011, 15]
उत्तर

  1. श्रीमती महादेवी वर्मा,
  2. बनारसीदास चतुर्वेदी,
  3. डॉ० नगेन्द्र,
  4. विष्णु प्रभाकर,
  5. रामवृक्ष बेनीपुरी,
  6.  कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आदि प्रमुख रेखाचित्र-लेखक हैं।

प्रश्न 17
रेखाचित्र और संस्मरण विधाओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2009]
उत्तर
रेखाचित्र में व्यक्ति विशेष के जीवन सम्बन्धी स्मृति-चित्र अधूरे भी हो सकते हैं, पर संस्मरण . में वह पूर्ण होता है। रेखाचित्र में कल्पना का महत्त्व होता है, जबकि संस्मरण में यथार्थ को।

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प्रश्न 18
रेखाचित्र तथा संस्मरण विधाओं के लिए प्रसिद्ध एक-एक रचनाकार का नाम लिखिए।
उत्तर
रेखाचित्र–श्रीमती महादेवी वर्मा। संस्मरण-कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’।

प्रश्न 19
यात्रा-साहित्य का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
उत्तर
यात्रा-साहित्य का मुख्य उद्देश्य किसी यात्रा के अनुभव को सरल और रोचक ढंग से जीवन्त रूप में प्रस्तुत करना है।

प्रश्न 20
यात्रा-साहित्य और रिपोर्ताज के एक-एक लेखक का नामोल्लेख कीजिए।
या
यात्रा-साहित्य के लेखकों में से किन्हीं दो के नाम लिखिए। [2010]
या
किसी एक रिपोर्ताज लेखक का नाम लिखिए। [2011, 12, 14, 18]
या
रिपोर्ताज विधा के किसी एक लेखक का नाम लिखिए। [2018]
उत्तर
यात्रा-साहित्य के लेखक–

  1. राहुल सांकृत्यायन तथा
  2. देवेन्द्र सत्यार्थी।

रिपोर्ताज के लेखक–

  1. विष्णु प्रभाकर तथा
  2. प्रभाकर माचवे।

प्रश्न 21
‘यात्रा-साहित्य’ किसे कहते हैं ?
उत्तर
जिस रचना में रचनाकार किसी यात्रा के अनुभव का यथावत् तथा कलात्मक वर्णन करता है, उसे ‘यात्रा-साहित्य’ कहते हैं।

प्रश्न 22
‘रिपोर्ताज’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जिस गद्य-साहित्य में किसी घटना या घटना-स्थल का (UPBoardSolutions.com) आँखों देखा हाल जब साहित्यिक और कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, तो उसे रिपोर्ताज’ कहते हैं ।

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प्रश्न 23
रिपोर्ताज की विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर
विशेषताएँ-

  1. रिपोर्ताज ऑखों देखा वर्णन जैसा प्रतीत होता है।
  2. इसमें सम-सामयिक घटनाओं को वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
  3. इसमें निजी-सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण होता है।
  4. इसकी शैली विवरणात्मक तथा वर्णनात्मक होती है।
  5. यह पत्रकारिता के गुणों से सम्पन्न होता है।

प्रश्न 24
हिन्दी की साहित्यिक शैली में वैज्ञानिक लेख लिखने के लिए प्रसिद्ध एक लेखक का नाम बताइए।
उत्तर
साहित्यिक शैली में वैज्ञानिक लेख लिखने के लिए प्रसिद्ध लेखक जयप्रकाश भारती हैं।

प्रश्न 25
यात्रा-साहित्य के किसी एक प्रमुख लेखक तथा उनके एक यात्रा-वृत्तान्त का नामोल्लेख | कीजिए। [2012]
या
यात्रा-साहित्य की एक प्रमुख रचना का उल्लेख कीजिए। [2012]
उत्तर
यात्रा-साहित्य के लेखकों में श्री विनयमोहन शर्मा का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने ‘दक्षिण भारत की एक झलक’ शीर्षक यात्रा-वृत्तान्त लिखा है।

प्रश्न 26
एक सफल रेखाचित्र की रचना के लिए किन गुणों की आवश्यकता होती है ?
उतर
एक सफल रेखाचित्र की रचना के लिए यथार्थ चित्रण, चित्रात्मक शैली का प्रभावपूर्ण प्रयोग तथा रेखाचित्र से सम्बन्धित वस्तु या व्यक्ति के प्रति लेखक के भावात्मक सम्बन्ध की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 27
एकांकी का अर्थ बताइए।
उत्तर
एक अंक में समाप्त हो जाने वाले नाटक को एकांकी कहते हैं।

प्रश्न 28
नाटक और एकांकी में दो प्रमुख अन्तर बताइए।
उत्तर
नाटक और एकांकी में निम्नलिखित दो प्रमुख अन्तर हैं—

  1. नाटक में एक मुख्य-कथा तथा कुछ अन्तर्कथाएँ होती हैं, जबकि एकांकी एक ही घटना पर आधारित होता है।
  2. नाटक में अधिक पात्र होते हैं तथा देशकाल विस्तृत होता है, जबकि एकांकी में कम पात्र होते हैं तथा देशकाल सीमित होता है।

प्रश्न 29
हिन्दी के दो प्रमुख एकांकीकार और उनके द्वारा लिखित एक-एक एकांकी का नाम बताइए।
या
किसी एक ‘एकांकी’ लेखक का नाम लिखिए।[2013, 14, 16, 17]
या
डॉ० रामकुमार वर्मा के प्रसिद्ध एकांकी का नाम लिखिए। [2014]
या
‘दीपदान’ एकांकी के लेखक का नाम लिखिए। [2015, 17]
उत्तर

  1. डॉ० रामकुमार वर्मा (दीपदान) तथा
  2. उपेन्द्रनाथ अश्क’ (तौलिए)-दो प्रमुख एकांकीकार और उनकी एकांकी रचनाएँ हैं।

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प्रश्न 30
विषय की दृष्टि से हिन्दी-एकांकी के भेद बताइए।
उत्तर
विषय के आधार पर एकांकी के सात भेद हैं—

  1. पौराणिक,
  2. राजनीतिक,
  3. सांस्कृतिक,
  4. ऐतिहासिक,
  5. सामाजिक,
  6. चारित्रिक और
  7. तथ्यपरक।

प्रश्न 31
द्विवेदी युग के प्रमुख एकांकीकारों और उनके द्वारा लिखित एक-एक एकांकी का नाम बताइट।
उत्तर
द्विवेदीयुगीन हिन्दी के प्रमुख एकांकीकार (UPBoardSolutions.com) और उनके द्वारा लिखित एक-एक एकांकी के नाम हैं–

  1. बदरीनारायण भट्ट : चुंगी की उम्मीदवारी,
  2. रामसिंह वर्मा : रेशमी रूमाल,
  3. रूपनारायण पाण्डेय : मूर्ख मण्डली,
  4. मंगलाप्रसाद विश्वकर्मा : शेर सिंह।

प्रश्न 32
डायरी की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
डायरी की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. दैनिक घटनाओं का कलात्मक प्रस्तुतीकरण,
  2. अन्तरंग क्षणों का चित्रण,
  3. संक्षिप्तता,
  4. स्पष्ट अभिव्यक्ति आदि।

प्रश्न 33
हिन्दी के दो प्रमुख डायरी लेखक और उनके द्वारा लिखित डायरी का नाम बताइए। [2009]
या
किसी एक डायरी लेखक का नाम लिखिए। [2015]
या
‘मेरी कॉलेज डायरी’ के लेखक का नाम लिखिए। [2015, 17]
या
डायरी विधा के लेखकों में से किसी एक लेखक का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर
नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ को प्रथम डायरी लेखक माना जाता है। इनकी रचना का नाम “नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ की जेल डायरी’ है। डॉ० धीरेन्द्र वर्मा द्वारा लिखित ‘‘मेरी कॉलेज डायरी’ इसी विधा की अन्य महत्त्वपूर्ण रचना है।

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प्रश्न 34
गद्य-काव्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए। यो गद्य-काव्य की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. गद्य-काव्य, गद्य तथा काव्य के बीच की विधा है।
  2. इसमें गद्य के माध्यम से किसी भावपूर्ण विषय की काव्यात्मक अभिव्यक्ति होती है।

प्रश्न 35
हिन्दी गद्य-काव्य लेखकों में से किन्हीं दो लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. वियोगी हरि और
  2. श्री रामवृक्ष बेनीपुरी।

प्रश्न 36
हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा अनूदित ‘मेरी जीवनी’ और ‘कांग्रेस का इतिहास के मूल-लेखको के नाम लिखिए।
उत्तर
मेरी जीवनी–पं० जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस का इतिहास-सीतारमैया।।

प्रश्न 37
हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा अनूदित एक रचना तथा उनके द्वारा रचित दो मौलिक रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
अनूदित रचना-मेरी जीवनी।। मौलिक रचना-‘स्वतन्त्रता की ओर’ और ‘हमारा कर्तव्य’।

प्रश्न 38
बाबू गुलाबराय के साहित्यिक कृतित्व के रूपों का नामोल्लेख कीजिए।
उतर
गुलाबराय के साहित्यिक कृतित्व के रूप इस प्रकार हैं–काव्यशास्त्रकार, व्यावहारिक आलोचक, ललित और गम्भीर निबन्धकार तथा शास्त्रमर्मज्ञ।

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प्रश्न 39
नामवर सिंह किस विधा के प्रमुख लेखक हैं ? [2012]
उत्तर
नामवर सिंह ‘आलोचना’ विधा के प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 40
महादेवी वर्मा की किसी एक रेखाचित्र विधा का नाम लिखिए। [2015]
उत्तर
स्मृति की रेखाएँ।

प्रश्न 41
‘लद्दाख की यात्रा’ किस विधा पर आधारित रचना है? [2016]
उत्तर
यात्रावृत्त पर।

प्रश्न 42
‘किन्नर देश में रचना किस विधा पर आधारित है? [2016]
उत्तर
यात्रावृत्त पर।

प्रश्न 43
‘किन्नर देश में कृति के लेखक का नाम लिखिए। [2016, 17]
उत्तर
‘राहुल सांकृत्यायन।

प्रश्न 44
‘गिरती दीवारें किस विधा की रचना है? [2017]
उत्तर
‘गिरती दीवारें” नाटक विधा की रचना है।

प्रश्न 45
‘क्या भूलें क्या याद करूँ किस विधा पर आधारित रचना है? [2017]
उत्तर
आत्मकथा पर।

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प्रश्न 46
‘प्रायश्चित’ के लेखक का नामोल्लेख कीजिए। [2017]
उत्तर
भगवती चन्द्र वर्मा।

प्रश्न 47
किसी एक यात्रावृत्त’ लेखक का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर
राहुल सांकृत्यायन।।

प्रश्न 48
‘कलम का सिपाही’ लेखक का नाम लिखिए। [2016]
उत्तर
अमृत राय।

प्रश्न 49
‘चतुर चंचला’ कृति के लेखक का नाम लिखिए। [2018]
उत्तर
बाबू गोपालराम (गहमरी)।

प्रश्न 50
‘राज्यश्री’ कृति के लेखक का नाम लिखिए। [2018]
उत्तर
जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 51
‘तुम चन्दन हम पानी’ कृति के लेखक का नाम लिखिए। [2018]
उत्तर
सन्त रैदास।

प्रश्न 52
प्रतिध्वनि’ कृति के लेखक का नाम लिखिए। [2018]
उत्तर
जयशंकर प्रसाद।

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प्रश्न 53
निम्नलिखित गद्य-विधाओं में से किसी एक विधा के प्रसिद्ध लेखक का नाम लिखकर उसकी एक कृति का उल्लेख कीजिए।
या
राहुल सांकृत्यायन की एक रचना का नाम लिखिए। [2011]
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित img-1

प्रश्न 54
निम्नलिखित रचनाएँ आधुनिक काल के किस-किस युग में लिखी गयीं ? किन्हीं दो के उत्तर लिखिए-
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित img-2
प्रश्न 55
निम्नलिखित रचनाओं में से किन्हीं दो की विधा एवं रचनाकार का उल्लेख कीजिए
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi गद्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित img-3

पत्र-पत्रिकाएँ और उनके सम्पादक

प्रश्न 1
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएँ ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ और ‘कविवचन सुधा’ हैं।

प्रश्न 2
‘बालाबोधिनी’ पत्रिका के सम्पादक का नाम लिखिए। [2012]
उत्तर
‘बालाबोधिनी’ पत्रिका के सम्पादक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे।

प्रश्न 3
भारतेन्दु युग की प्रमुख पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. ब्राह्मण-श्री प्रतापनारायण मिश्र द्वारा सम्पादित।
  2. हिन्दी प्रदीप-श्री बालकृष्ण भट्ट द्वारा सम्पादित।
  3. आनन्द कादम्बिनी-श्री बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ द्वारा सम्पादित।

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प्रश्न 4
द्विवेदी युग की प्रमुख पत्रिकाओं के नाम बताइए। [2009]
या
द्विवेदी युग की किन्हीं दो पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
या
हिन्दी की उन पत्रिकाओं के नाम लिखिए, जिनसे हिन्दी साहित्य के विकास में बहुत सहायता मिली।
उत्तर

  1. सरस्वती,
  2. नागरी ‘प्रचारिणी पत्रिका,
  3. इन्दु,
  4. माधुरी,
  5. मर्यादा,
  6. सुधा,
  7. जागरण,
  8. हंस,
  9. प्रभा,
  10. कर्मवीर,
  11. विशाल भारत।

प्रश्न 5
‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक का नाम लिखिए।
या
महावीरप्रसाद द्विवेदी किस प्रसिद्ध हिन्दी-पत्रिका का सम्पादन करते थे ?
या
द्विवेदी युग की प्रमुख पत्रिका और उसके सम्पादक का नाम लिखिए।
या
‘सरस्वती’ पत्रिका किस युग में प्रकाशित हुई ? [2013]
या
‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक का नाम लिखिए। [2016]
उत्तर
‘सरस्वती’ का प्रकाशनारम्भ सन् 1900 ई० में हुआ था उस समय ‘सरस्वती’ का एक सम्पादक मण्डल था, जिसमें पाँच सदस्य थे। इनमें एक सदस्य श्यामसुन्दर दास थे। इस सम्पादक मण्डल ने एक वर्ष तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन किया। (UPBoardSolutions.com) इसके पश्चात् दो वर्षों तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन श्यामसुन्दर दास ने किया। तत्पश्चात् सन् 1903 से 1920 ई० तक ‘सरस्वती’ का सम्पादन महावीरप्रसाद द्विवेदी ने किया था।

प्रश्न 6
‘सरस्वती’ पत्रिका के सर्वाधिक प्रसिद्ध सम्पादक का नाम लिखिए।
उत्तर
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

प्रश्न 7
हिन्दी की किन्हीं दो प्रसिद्ध पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
या
हिन्दी के सर्वतोमुखी विकास में योगदान देने वाली दो प्रमुख (प्रसिद्ध) पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
हिन्दी-साहित्य के सर्वतोमुखी विकास में योगदान देने वाली दो प्रमुख पत्रिकाओं के नाम हैं—

  1. सरस्वती तथा
  2. हिन्दी प्रदीप।

प्रश्न 8
हरिभाऊ उपाध्याय ने गाँधी जी के सम्पर्क में आने पर किस पत्र का सम्पादन-कार्य कुशलतापूर्वक किया ?
उत्तर
‘हिन्दी नवजीवन’।

प्रश्न 9
‘सरस्वती’ का बख्शी जी के साहित्यिक जीवन में क्या योगदान है ?
उत्तर
बख्शी जी की रचनाएँ सर्वप्रथम ‘सरस्वती’ में ही प्रकाशित होनी आरम्भ हुईं, जिनसे इनकी साहित्यिक पहचान बनी।।

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प्रश्न 10
‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने कब-से-कब तक किया ? इसके अतिरिक्त इन्होंने किस पत्रिका का सम्पादन किया ?
उत्तर
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने सन् 1920 से 1927 ई० तक सरस्वती का सम्पादन किया। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘छाया’ मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया।

प्रश्न 11
शुक्ल युग की दो प्रमुख (प्रसिद्ध) पत्रिकाओं के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर
शुक्ल युग की दो प्रमुख पत्रिकाएँ हैं—

  1. हंस तथा
  2. साहित्य-सन्देश।

प्रश्न 12
शुक्लोत्तरयुगीन दो प्रमुख पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. कादम्बिनी तथा
  2. सारिक़ा।

प्रश्न 13
शुक्लोत्तर युग की हिन्दी पत्रिका के किसी एक सम्पादक का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर
राजेन्द्र अवस्थी।

प्रश्न 14
‘साहित्य सन्देश’ किस प्रकार की पत्रिका थी ? इसके किसी एक सम्पादक का नाम लिखिए।
उत्तर
‘साहित्य-सन्देश’ आलोचनात्मक मासिक पत्रिका थी। इसके एक सम्पादक बाबू गुलाबराय थे।

प्रश्न 15
‘संगम’ साप्ताहिक पत्र कहाँ से निकलता है ?
उत्तर
इलाहाबाद से।।

प्रश्न 16
‘धर्मयुग’ के सम्पादक का नाम बताइए।
उत्तर
डॉ० धर्मवीर भारती।

प्रश्न 17
‘देश’ पत्रिका के सम्पादक का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर
‘देश’ पत्रिका के वर्तमान सम्पादक हर्ष दत्ता हैं।

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प्रश्न 18
‘नन्दन कैसी और कहाँ से प्रकाशित पत्रिका है ? आपकी पाठ्य-पुस्तक में संकलित लेखकों में से कौन इसके सम्पादक थे ?
उत्तर
नन्दन’ दिल्ली से प्रकाशित बाल-पत्रिका है। हमारी पाठ्य-पुस्तक (UPBoardSolutions.com) में संकलित लेखकों में से श्री जयप्रकाश भारती इसके सम्पादक थे।

प्रश्न 19
सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ के सम्पादकों में से एक का नाम लिखिए।
उत्तर
माखनलाल चतुर्वेदी सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘प्रभा’ के सम्पादकों में से एक हैं।

प्रश्न 20
‘प्रताप’ के सहकारी सम्पादक का नाम लिखिए।
उत्तर
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ प्रताप के सहकारी सम्पादक रहे हैं।

प्रश्न 21
माखनलाल चतुर्वेदी के अतिरिक्त प्रभा’ के एक और सम्पादक का नाम बताइट।
उत्तर
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने माखनलाल चतुर्वेदी के अतिरिक्त प्रभा’ का सम्पादन किया।

प्रश्न 22
वर्तमान समय में प्रकाशित हो रही कुछ प्रमुख पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
वर्तमान समय में प्रकाशित कुछ (UPBoardSolutions.com) प्रमुख पत्रिकाएँ हैं–

  1. कादम्बिनी,
  2. सरिता,
  3. मुक्ता,
  4. माया,
  5. नवनीत,
  6. हंस,
  7. इंडिया टुडे,
  8. आउटलुक आदि।

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प्रश्न 23
हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं और उनके सम्पादकों के नाम बताइट।
उत्तर
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