UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 कृषि तथा उद्योगों की पारस्परिक अनुपूरकता एवं औद्योगिक ढाँचा (अनुभाग – चार)

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विरत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बड़े पैमाने के उद्योगों से आप क्या समझते हैं ? बड़े पैमाने के उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए भारत में कौन-से कदम उठाये जा रहे हैं ?
उत्तर :

बड़े पैमाने के उद्योग

‘बड़े पैमाने के उद्योग से आशय ऐसे उद्योगों से है, जिनमें बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। इन उद्योगों में बहुत अधिक पूँजी का निवेश होता है तथा बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है। भारतीय उद्योगों में निवेश की गयी स्थिर पूँजी का अधिकांश भाग बड़े पैमाने के उद्योगों में लगा हुआ है। ये उद्योग संकल औद्योगिक उत्पादन के सबसे बड़े भाग का उत्पादन करते हैं। ये उद्योग सामाजिक और आर्थिक न्याय के साथ विकास को सम्भव बनाते हैं। सूती वस्त्र उद्योग तथा लोहा-इस्पात उद्योग इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रोत्साहन के लिए उठाये गये कदम

छोटे पैमाने के उद्योग अधिकांशतः उपभोक्ता वस्तुओं को छोटे पैमाने पर उत्पादन करते हैं। वे पूँजीगत एवं उपभोक्ता वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग को पूरा नहीं कर सकते। दूसरे, उनकी गुणवत्ता भी उतनी उच्चकोटि की नहीं हो पाती है। अत: बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की गयी। इन उद्योगों की स्थापना अधिकांशतः सार्वजनिक क्षेत्र में की गयी है, जिनमें बड़ी मात्रा में पूँजी का निवेश किया गया है तथा बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार दिया गया है। इन उद्योगों के विकास के लिए सरकार ने निम्नलिखित उपाय किये हैं –

1. आधारिक संरचना का विस्तार – सरकार ने देश में परिवहन व संचार सुविधाओं के विकास में बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश किया है।

2. सार्वजनिक उद्योगों का विस्तार – नियोजन काल (UPBoardSolutions.com) में भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े उद्योगों की स्थापना की है; जैसे-दुर्गापुर, भिलाई, राउरकेला के स्टील प्लाण्ट, भारतीय तेल निगम आदि।

3. वित्तीय संस्थाओं की स्थापना – बड़े उद्योगों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकार ने अनेक वित्तीय संस्थाओं; जैसे-भारतीय औद्योगिक विकास बैंक आदि की स्थापना की है।

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4. विदेशी सहयोग – योजना काल में विदेशी पूँजी एवं विदेशी तकनीक की सहायता से अनेक उद्योगों की स्थापना की गयी है।

5. उत्पादन तकनीक में सुधार – बड़े उद्योगों की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए सरकार ने अनुसन्धान एवं शोध-कार्यों को प्रोत्साहित किया है तथा अनेक संस्थाओं की स्थापना की है।

6. कर एवं अन्य रियायतें – सरकार ने बड़े उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए करों में छूट, ऋण सुविधा आदि के अतिरिक्त अनेक प्रकार के राजकोषीय परामर्श तथा वित्तीय सुविधाएँ प्रदान की हैं।

7, औद्योगिक नीति का उदारीकरण – वर्ष 1991 की नयी नीति के अनुसार इन उद्योगों की स्थापना तथा विस्तार के लिए इन्हें लाइसेंसमुक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग को उदार बनाया गया है।

8. सरकार ने प्रौद्योगिकी में सुधार तथा यन्त्रों – उपकरणों के आधुनिकीकरण के लिए दो वित्तीय सहायता कोषों-‘प्रौद्योगिकी सुधार कोष तथा पूँजी आधुनिकीकरण कोष’ की स्थापना की है।

प्रश्न 2.
सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में अन्तर स्पष्ट कीजिए तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के चार दोषों का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
उत्तर :
सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के उद्योगों में मूल अन्तर स्वामित्व का होता है। वे उपक्रम जिन पर सरकारी विभागों अथवा केन्द्र या राज्यों द्वारा स्थापित संस्थाओं का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम कहलाते हैं; जैसे-भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लि०, (UPBoardSolutions.com) भिलाई इस्पात लि० आदि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम हैं। इसके विपरीत वे उद्योग जिनका स्वामित्व कुछ व्यक्तियों या कम्पनियों के पास होता है, निजी क्षेत्र के उद्यम कहलाते हैं; जैसे-टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी।

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के दोष

यद्यपि सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उद्यमों की प्रगति एवं कार्य सन्तोषजनक है; जैसे – भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, भारतीय जीवन बीमा निगम आदि; तथापि इस क्षेत्र के अधिकांश उद्यमों का कार्य सन्तोषजनक नहीं है। वे अनेक दोषों से ग्रस्त हैं, जिनमें से चार का विवरण निम्नलिखित हैं –

1. भ्रष्टाचार – सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के उच्च अधिकारी अपने कर्तव्य को सार्वजनिक हित में न लेकर, एक स्व-हितकारी व्यवसाय के रूप में लेते हैं। वे व्यक्तिगत आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं तथा अपने सार्वजनिक या जन-सामान्य के हितों की अवहेलना करते हैं। इसका सीधा असर उस उद्यम की वित्त-व्यवस्था पर पड़ता है, जो निरन्तर घाटे की ओर बढ़ती चली जाती है।

2. दक्षता एवं कार्यकुशलता का अभाव – सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में शीर्ष स्थान पर बहुधा प्रशासनिक अधिकारी बैठे होते हैं, जिनको उस उद्यम का तकनीकी ज्ञान नहीं होता। परिणामस्वरूप, वे उद्यमकर्मियों का सही मार्गदर्शन करने में असमर्थ होते हैं। यह अभाव भी इन उद्यमों में गिरती कार्यकुशलता एवं दक्षता के लिए जिम्मेदार है।

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3. सुधार व अनुसन्धानिक दृष्टि का अभाव – सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सुधार व अनुसन्धान कार्यों के लिए एक लम्बी व उबाऊ प्रक्रिया अपनायी जाती है। लालफीताशाही, जिम्मेदारी की कमी, व्यक्तिगत आर्थिक हितों के लिए प्राथमिकता तथा दकियानूसी सोच के कारण इन उद्यमों में सुधार कछुवा- गति से होते हैं।

4. प्रतिस्पर्धात्मक सोच का अभाव – आज का युग कड़ी प्रतिस्पर्धा का युग है। निजी क्षेत्र इस प्रतिस्पर्धा में जी-जान से लगते हैं। विभिन्न माध्यमों से वे विज्ञापनों का सहारा लेकर अपने उत्पादनों की खपत बढ़ाने तथा उसका बाजार हथियाने में लगे हैं। इसके विपरीत, (UPBoardSolutions.com) सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उद्यम इसे प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गये हैं। नियोजक के हितों की अपेक्षा निजी आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना भी प्रतिस्पर्धात्मक सोच को आगे नहीं बढ़ने देता।

प्रश्न 3.
औद्योगिक उत्पादकता का वर्णन कीजिए। इसमें कार्यकुशलता का क्या महत्त्व है? या औद्योगिक उत्पादकता का क्या अर्थ है ? [2010]
उत्तर :

औद्योगिक उत्पादकता

उत्पादन-प्रक्रिया उत्पत्ति के विभिन्न साधनों के सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है। उत्पादन में इन साधनों के आनुपातिक भाग को ‘साधन उत्पादकता’ कहते हैं। उद्योग की उत्पादकता के अर्थ को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है –

एक उद्योग की प्रदा (Output) और उसकी आदाओं (Inputs) के आनुपातिक भाग को उस उद्योग की उत्पादकता कहते हैं। सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से उत्पादकता का आशय देश के सम्भाव्य प्रसाधनों से समस्त उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं के अनुपात से है। एम० बनर्जी (UPBoardSolutions.com) के शब्दों में, “उत्पादकता से आशय प्राय: उस अनुपात से लिया जाता है, जो कि वस्तुओं और सेवाओं के रूप में धनोत्पादन और ऐसे उत्पादन में लगे हुए उत्पत्ति के साधनों के बीच विद्यमान हो।” औद्योगिक उत्पादकता को उद्योग में लगी पूँजी और उसके द्वारा उत्पादन में वृद्धि के रूप में मापा जा सकता है। इसे वर्द्धमान पूँजी उत्पाद’ अनुपात के नाम से भी जाना जाता है।

कार्यकुशलता का महत्त्व

किसी भी उद्योग की उत्पादकता, दक्षता एवं यापारिक लाभ उसकी कार्यकुशलता पर निर्भर करते हैं। कार्यकुशलता के मुख्य घटक हैं—मानव श्रम तथा वित्तीय एवं भौतिक संसाधनों का उपयुक्त एवं अधिकतम उपयोग। जिन उद्योगों में मानव-श्रम तथा वित्तीय (UPBoardSolutions.com) एवं भौतिक संसाधनों का उपयुक्त उपयोग किया जाता है, वहाँ कुशलता व्याप्त होती है तथा ऐसे उद्योग उद्यमी को लाभ कमा कर देते हैं। टाटा आयरन एण्ड स्टील कं० तथा मारुति कार उद्योग कार्यकुशलता युक्त उद्योगों के उदाहरण हैं। इसके विपरीत जिन उद्योगों में मानव श्रम तथा वित्तीय एवं भौतिक संसाधनों का उपयुक्त उपयोग नहीं हो पाता, वहाँ कार्यकुशलता में कमी व्याप्त रहती है तथा वे निरन्तर घाटे में रहते हैं।

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मानव श्रम – आर्थिक सुधारों की गति को देखते हुए योजना आयोग का मानना है कि दस वर्षों में भारत के प्रति व्यक्ति की औसत आय दुगुनी हो जाएगी। भारत में जनसंख्या की वृद्धि 1.5% वार्षिक है। भारत की आर्थिक संवृद्धि की दर त्वरित होने की आशा के पीछे एक बड़ा कारण यह है हमारा ‘निर्भरता-अनुपात अर्थात् काम करने की उम्र वालों की संख्या की तुलना में निर्भर जनसंख्या पश्चिमी देशों की तुलना में कम है। दूसरे शब्दों में, बच्चों और बूढ़ों की संख्या की तुलना में हमारे यहाँ काम करने वालों की संख्या पश्चिमी देशों की अपेक्षा बहुत ऊँची है। अत: उपलब्ध पर्याप्त मानव-श्रम हमारी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

वित्तीय संसाधन – विदेशी प्रत्यक्ष निवेश देश में लगातार बढ़ता ही जा रहा है। वर्ष 1990-91 में इसकी निवल राशि 9 करोड़ 60 लाख डॉलर थी, जो वर्ष 1998-99 में बढ़कर 2 अरब 38 करोड़ डॉलर हो गयी। वर्ष 2004-05 में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की कुल निवल राशि 3 अरब 24 करोड़ डॉलर थी। योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार दिसम्बर, 2005 ई० तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश लगभग 5 अरब डॉलर तक पहुँच गया था।

निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि आज भारत कार्यकुशलता की दृष्टि से अन्य विकासशील देशों की तुलना में बहुत आगे और विकसित देशों के समीप पहुँचने की स्थिति में है।

प्रश्न 4.
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु और कुटीर उद्योगों का महत्त्व बताइए। [2010, 13]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर उद्योग के तीन लाभ लिखिए। [2014]
या
कुटीर उद्योग का आर्थिक विकास में क्या महत्त्व है? [2015]
या
भारत के कुटीर उद्योगों के किन्हीं छः आर्थिक महत्त्वों पर प्रकाश डालिए।
या
कुटीर उद्योग को परिभाषित कीजिए। इसके दो महत्त्वों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर :

लघु एवं कुटीर उद्योग

लघु उद्योगों को परिभाषित करने में मशीन व संयन्त्रों में किये गये विनियोगों को आधार माना गया है। वर्तमान में लघु उद्योगों में निवेश की सीमा ₹ 1 करोड़ है। ये उद्योग घर के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर स्थापित किये जाते हैं तथा यान्त्रिक व (UPBoardSolutions.com) शक्ति के साधनों का उपयोग करते हैं; जैसे-मिक्सी उद्योग।

कुटीर उद्योगों से अभिप्राय ऐसे उद्योगों से है, जिसमें किसी परम्परागत वस्तु का उत्पादन परिवार के सदस्यों तथा कुछ वैतनिक श्रमिकों (9 से कम) की सहायता से स्वयं इसके मालिक (प्रायः कारीगर) द्वारा किया। जाता है। सभी कुटीर उद्योगों में यान्त्रिक व शक्ति के साधनों का उपयोग नहीं होता; जैसे- लोहा-इस्पात उद्योग।

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भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों का महत्त्व (लाभ) निम्नलिखित है –

  1. कुटीर उद्योगों का विकास बेरोजगारी की समस्या का अच्छा समाधान है।
  2. कुटीर उद्योग खेतिहर श्रमिकों को अतिरिक्त आय का साधन प्रदान करते हैं।
  3. कुटीर उद्योग कृषि भूमि पर जनसंख्या के भार को कम करने में सहायक हैं।
  4. इन्हें सरलतापूर्वक स्थापित किया जा सकता है, क्योंकि इन उद्योगों को चलाने के लिए थोड़ी पूँजी, बहुत कम प्रशिक्षण तथा हल्के औजारों की आवश्यकता होती है।
  5. भारत में पूँजी का अभाव व श्रम-शक्ति की बहुतायत है। ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए लघु उद्योग अत्यधिक उपयुक्त हैं।
  6. इन उद्योगों के विकास से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। राष्ट्रीय आय-समिति के (UPBoardSolutions.com) अनुसार, “भारत की | राष्ट्रीय आय में कुटीर एवं लघु स्तरीय उद्योगों का योगदान विशाल स्तरीय उद्योगों के योगदान की तुलना में अधिक होता है।”
  7. कुटीर एवं लघु उद्योग देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हैं।
  8. ये उद्योग निर्धन वर्ग की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
  9. कुटीर व लघु उद्योगों के विकास से आर्थिक विषमता का अन्त होता है।
  10. कुटीर व लघु उद्योगों का विकास देश के सन्तुलित एवं बहुमुखी विकास के लिए अति आवश्यक है।
  11. कुटीर व लघु उद्योगों के विकास से औद्योगीकरण के दोष उत्पन्न नहीं हो पाते हैं।
  12. कुटीर उद्योगों के विकास से अनेक मानवीय प्रवृत्तियों का जन्म होता है; जैसे—सहयोग, सहानुभूति, समानता, सहकारिता, पारस्परिक साहचर्य आदि।
  13. कुटीर व लघु उद्योगों में निर्मित अनेक पदार्थ; जैसे-रेशमी-कलापूर्ण वस्त्र, चन्दन व हाथीदाँत की वस्तुएँ, चमड़े के जूते, पत्थर व धातु की मूर्तियाँ, दरियाँ-कालीन, ताँबे-पीतल के बर्तन आदि विदेशों को निर्यात किये जाते हैं, जिससे प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था में कुटीर व लघु उद्योगों का योगदान इस प्रकार है-राष्ट्रीय उत्पादन में 12%, देश के निर्यात में 20%, रोजगार में 27% तथा औद्योगिक उत्पाद में 41%

उत्तर प्रदेश कुटीर उद्योग उपसमिति 1947′ का मत था-“बेरोजगारी के दानव से लोहा लेने के लिए व कृषि क्षेत्र में पूर्ण एवं आंशिक रूप से बेकार पड़ी हुई जनशक्ति का उपयोग करने का एकमात्र उपाय कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास में निहित है।”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि कुटीर व लघु उद्योगों का भविष्य सामान्यतः उज्ज्वल है, किन्तु अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की नीति के कारण विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बड़ी मात्रा में प्रवेश भारत के कुटीर व लघु उद्योगों के लिए खतरा बन चुके हैं, (UPBoardSolutions.com) क्योंकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की विकसित तकनीक के कारण भारतीय लघु व कुटीर उद्योग प्रतियोगिता में टिक नहीं सकते। फलतः अब इनका भविष्य उज्ज्वल नहीं है।

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प्रश्न 5.
अकुशलता एवं अल्प-उत्पादकता के कारणों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के प्रमुख कारण क्या हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। [2010]
या
उद्योगों की निम्न उत्पादकता के कोई दो कारण बताइट। [2010]
या
भारत में निम्न औद्योगिक उत्पादकता के तीन कारण बताइए तथा उसके उत्पादकता बढ़ाने के तीन उपाय समझाइए। [2015]
या
भारत में औद्योगिक उत्पादकता बढ़ाने के लिए छः सुझाव दीजिए। [2016]
या
भारत के उद्योगों के पिछड़ेपन के छः कारणों की विवेचना कीजिए। [2017]
उत्तर :

अकुशलता एवं अल्प-उत्पादकता के कारण

भारतीय उद्योग विकसित देशों के उद्योगों की तुलना में अत्यधिक अकुशल तथा पिछड़े हुए हैं। उनमें उत्पादकता स्तर भी निम्न है। इस अकुशलता एवं अल्प-उत्पादकता के निम्नलिखित कारण हैं –

1. पूँजी का अभाव – उद्योगों की स्थापना में पर्याप्त पूँजी की आवश्यकता होती है, जिसका भारत में सदा ही अभाव रहा है। यहाँ के लोगों का जीवन-स्तर व प्रति व्यक्ति आय निम्न होने के कारण बचत और निवेश की मात्रा बहुत ही कम है; अतः पूँजी के अभाव में (UPBoardSolutions.com) भारतीय उद्योग पिछड़े हुए हैं।

2. शक्ति के साधनों की कमी – भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण शक्ति के साधनों की अपर्याप्तता है। शक्ति के तीन प्रमुख साधन माने जाते हैं-कोयला, पेट्रोलियम तथा जल-विद्युत। भारत में उच्चकोटि के कोयले का अभाव है और यहाँ जल-संसाधनों का भी समुचित उपयोग नहीं हो पाया है। जल विद्युत की कमी तथा पेट्रोलियम पदार्थों का विदेशों से आयात भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के लिए पर्याप्त सीमा तक उत्तरदायी हैं।

3. आधुनिक मशीनों का अभाव – भारत में आधुनिक मशीनों का अभाव है और पुरानी मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो पाता है। इससे भी उद्योगों में गिरावट आयी है।

4. तकनीकी कर्मचारियों की कमी – भारत में आज भी उच्चकोटि के तकनीकी प्रशिक्षण की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। अतः प्रशिक्षण के लिए तकनीकी विशेषज्ञों को विदेशों में भेजा जाता है, जिनमें से बहुत कम ही विशेषज्ञ तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौटते हैं। इस कारण तकनीकी विशेषज्ञों की कमी भी उद्योगों को विकसित नहीं होने देती।

5. समर्थ साहसियों का अभाव – भारत में औद्योगिक विकास तथा उद्योगों के पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी कारणों में प्रमुख कारण समर्थ साहसियों का अभाव भी रहा है। आज भी देश में कुछ गिने-चुने पूँजीपति ही ऐसे हैं, जो बड़े उद्योगों को चला रहे हैं।

6. परिवहन व संचार के साधनों का अविकसित होना – अन्य देशों की तुलना में अविकसित परिवहन व संचार के साधनों ने भी भारतीय उद्योगों के स्तर को निम्न बना रखा है।

7. औद्योगिक रुग्णता – भारत में औद्योगिक क्षेत्र की समस्याओं में एक प्रमुख समस्या औद्योगिक रुग्णता की समस्या है। रुग्ण इकाइयों में होने वाले निरन्तर वित्तीय प्रवाह से बैंकिंग संसाधनों के दुरुपयोग के साथ-साथ सरकार के व्यय में भी वृद्धि होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च, 2000 के अन्त में देश में तीन लाख से अधिक लघु औद्योगिक इकाइयाँ रुग्णता का शिकार थीं, जिनमें सर्वाधिक 27,000 बिहार में तथा लगभग (UPBoardSolutions.com) 21,000 उत्तर प्रदेश में थीं।

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8. विदेशी शासन – भारत के औद्योगिक दृष्टि में पिछड़े होने का मुख्य कारण विदेशी शासन का लम्बे समय तक बने रहना है। विदेशी शासन का मुख्य उद्देश्य भारत को कच्चे माल का निर्यात एवं निर्मित माल का आयात करने वाले देश के रूप में विकसित करना था। यही कारण था कि अंग्रेजों ने अपने देश के उद्योगों को संरक्षण देने के लिए विभेदात्मक संरक्षण की नीति अपनायी और भारत के औद्योगिक विकास को अवरुद्ध किया।

9. प्रतिकूल सामाजिक वातावरण – भारत में औद्योगिक पिछड़ेपन का एक कारण प्रतिकूल सामाजिक वातावरण भी है। यहाँ जाति-प्रथा, संयुक्त परिवार-प्रणाली तथा धार्मिक अन्धविश्वास, जो कि सामाजिक वातावरण के अंग हैं, औद्योगिक विकास में सदा ही बाधक रहे हैं। संयुक्त परिवार- प्रणाली ने व्यक्तिगत प्रेरणा को सदा ही हतोत्साहित किया है और आगे बढ़ने से रोका है। इसी प्रकार जाति-प्रथा एवं संयुक्त परिवार-प्रणाली ने श्रम की गतिशीलता में बाधाएँ डाली हैं। उत्तराधिकार नियमों के अन्तर्गत बँटवारे की प्रथा ने पूँजी–साधनों को छोटे-छोटे खण्डों में बाँटकर पूँजी को एकत्रित करने में कठिनाई पैदा की है।

10. उद्योगों को असन्तुलित विकास – भारत के सभी राज्यों में तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का विकास सन्तुलित और समानुपातिक रूप में नहीं हो पाया। इस कारण भी उद्योगों में कार्यक्षमता और उत्पादकता का स्तर कम हुआ है।
[उत्पादकता बढ़ाने के उपाय – इसके लिए विस्तृत उत्तरीय संख्या 7 के अन्तर्गत देखें।

प्रश्न 6.
भारत में औद्योगिक विकास की प्रमुख समस्याओं के बारे में विस्तार से लिखिए।
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के विकास में आने वाली किन्हीं चार बाधाओं की विवेचना कीजिए। [2013]
उत्तर :
स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में अपेक्षित औद्योगिक विकास नहीं हो सका था। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की भारत पर थोपी गई दोषपूर्ण आर्थिक नीति थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। सन् 1948 में संसद में भारत सरकार की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा की गई,जिसमें समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61 ई०) में भारत में विशालस्तरीय एवं आधारभूत (UPBoardSolutions.com) उद्योगों की स्थापना पर विशेष बल दिया गया। 60 वर्षों से निरन्तर औद्योगिक विकास पर बल देते रहने के बावजूद भारत आज भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

1. प्रौद्योगिकी सुधार के लिए प्रेरणाओं का अभाव – भारतीय उत्पादन तकनीक अभी भी पिछड़ी हुई है। भारतीय उद्यमी नवीनतम तकनीक को अपनाने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं हो पाते। इसका कारण अभी भी पर्याप्त नियन्त्रणों का पाया जाना है।

2. स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना – अनेक उद्योग अपनी स्थापित क्षमता के 50 प्रतिशत भाग का भी उपयोग नहीं कर पाते हैं, इससे अपव्यय बढ़ जाते हैं।

3. पूँजीगत व्ययों में वृद्धि – भारतीय उद्योगों में पूँजीगत व्यये अत्यधिक ऊँचे हैं, जिसके कारण इन उद्योगों की लाभदायकता का स्तर नीचे गिर गया है।

4. अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रमों का अभाव – उद्योगों का आकार छोटा होने तथा वित्तीय सुविधाओं की कमी के कारण इन उद्योगों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम नहीं हो पाते हैं।

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5. अनुत्पादक व्ययों की अधिकता – भारतीय उद्योगों में अनुत्पादक व्यय सामान्य से अधिक रहे हैं, जिसका प्रभाव लागत में वृद्धि व उत्पादकता की कमी के रूप में पड़ा है।

6. उपक्रमों के निर्माण में देरी – देश में उद्योगों की स्थापना में निर्धारित समय से अधिक समय लगता है। इससे इने उद्योगों की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इनकी निर्माण लागत भी बढ़ जाती है।

7. वित्तीय सुविधाओं का अपर्याप्त होना – भारत में औद्योगिक बैंकों की पर्याप्त संख्या में स्थापना न हो पाने से भी उद्योगों को समय पर वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती।

8. श्रम प्रबन्ध संघर्ष – भारत में औद्योगिक सम्बन्ध मधुर नहीं रहे हैं और आए दिन हड़ताल व तालाबन्दी होती रहती है। इसका औद्योगिक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 7.
लघु उद्योग से आप क्या समझते हैं ? भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों की किन्हीं चार समस्याओं की विवेचना कीजिए। [2013, 17]
या
लघु उद्योग किसे कहते हैं? उनके विकास के लिए चार सुझाव दीजिए। [2013]
या
लघु उद्योग को परिभाषित कीजिए। [2016]
उत्तर :

लघु उद्योग

लघु उद्योग को परिभाषित करने में मशीन व संयंत्रों में किये गये विनियोगों को आधार माना गया है। ₹ 25 लाख तक की लागत (संयंत्र तथा मशीनरी) वाले उद्योग लघु पैमाने के उद्योग कहलाते थे। सन् 1991 में लघु उद्योग में विनियोग-सीमा ₹ 60 लाख, सहायक उद्योगों में ₹ 75 लाख और अतिलघु इकाइयों में ₹ 5 लाख रखी गयी थी। बाद में लघु उद्योगों व सहायक उद्योगों की विनियोग-सीमा बढ़ाकर ₹ 3 करोड़ तथा अतिलघु इकाइयों की विनियोग-सीमा को बढ़ाकर ₹ 25 लाख कर दिया गया। वर्तमान में लघु उद्योगों में निवेश की सीमा ₹ 1 करोड़ है।

ये उद्योगों में यान्त्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं तथा बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाते हैं। ये घर पर नहीं, वरन् अन्य स्थानों पर स्थापित किये जाते हैं। ये पूर्णकालिक व्यवसाय के रूप में चलाये जाते हैं। इन उद्योगों में वैतनिक मजदूर लगाये जाते हैं। लघु उद्योग व्यापक क्षेत्रों की (UPBoardSolutions.com) माँग को पूरा करने के लिए उत्पादन करते हैं। उदाहरण के लिए-इनमें आधुनिक वस्तुएँ; जैसे-मिक्सी, ट्रांजिस्टर, खिलौने आदि तैयार किये जाते हैं।

लघु उद्योगों की चार समस्याएँ

लघु उद्योगों की चार समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

1. कच्चे माल का अभाव – इन उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध नहीं हो पाता और जो माल इन्हें प्राप्त होता है, वह भी अच्छी किस्म का नहीं होता।

2. वित्त की समस्या – भारतीय शिल्पकार अत्यधिक निर्धन हैं और अपनी निर्धनता के कारण वे आवश्यक पूँजी नहीं जुटा पाते। साहूकार व महाजन इनका मनचाहा शोषण करते हैं।

3. परम्परागत उपकरण व उत्पादन विधियाँ – अधिकांश शिल्पी उत्पादन कार्य में परम्परागत उपकरणों एवं पुरानी उत्पादन पद्धतियों का ही प्रयोग करते हैं। इसके फलस्वरूप एक ओर तो उत्पादन कम होता है और दूसरी ओर उत्पादित क्स्तु घटिया किस्म की होती है।

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4. विक्रय सम्बन्धी समस्याएँ – इन उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ एक तो प्रायः समरूप नहीं होतीं। मध्यस्थों के कारण इन शिल्पकारों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता और तीसरे लागत अधिक आने के कारण इन वस्तुओं का विक्रय मूल्य अधिक होता है, जिसके कारण (UPBoardSolutions.com) ये प्रतियोगिता में नहीं ठहर पातीं।

समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव

भारत में लघु एवं कुटीर उद्योगों की समस्याओं के समाधान के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं –

  1. शिल्पकारों को सहकारिता के आधार पर संगठित किया जाए, जिससे उनकी सामूहिक क्रय-शक्ति में वृद्धि हो सके।
  2. विभिन्न स्रोतों से कच्चे माल को खरीदने के लिए पर्याप्त मात्रा में साख-सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  3. माल के क्रय-विक्रय में इन उद्योगों को प्राथमिकता दी जाए।
  4. सहकारी विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
  5. उत्पादन लागत में कमी तथा उत्पादित वस्तु की किस्म में सुधार के लिए प्रयास किये जायें।
  6. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान की सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
  7. उत्पादकों को नवीन उपकरण प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  8. इन उद्योगों पर से कर-भार घटाया जाए।
  9. कुटीर उद्योगों के विकास की सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए व्यापक रूप से सर्वेक्षण कराये जाएँ।
  10. इन उद्योगों के लिए आरक्षित मदों की सूची का प्रति वर्ष निरीक्षण किया जाए।

वस्तुतः यदि हमें तीव्र गति से आर्थिक विकास करना है और अपनी निरन्तर बढ़ती हुई श्रम-शक्ति को लाभप्रद रोजगार प्रदान करना है तो हमें अपने भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री वी० वी० गिरीके ‘घर-घर में गृह उद्योग’ के नारे को सार्थक करना होगा।

प्रश्न 8.
लघु उद्योग एवं भारी उद्योग में अन्तर स्पष्ट कीजिए तथा भारत में किसी एक भारी उद्योग के महत्त्व को लिखिए। [2010]
या
किसी एक बड़े पैमाने के उद्योग की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

लघु उद्योग एवं भारी उद्योग में अन्तर

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 (Section 4)

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भारी उद्योग का महत्त्व (उपयोगिता)-सीमेण्ट उद्योग

भारत में निर्माण कार्य प्रगति पर है। चारों ओर भवन-निर्माण, बाँध, पुल, उद्योग-धन्धे तथा सड़क बनाने के कार्य किए जा रहे हैं जिनमें सीमेण्ट की भारी आवश्यकता होती है। देश में तीव्र गति से विकास कार्य किए जा रहे हैं। अतः सीमेण्ट की मॉग भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है। भवन निर्माण के लिए उपयोग किए जाने वाले पदार्थों में सीमेण्ट सबसे अधिक आवश्यक पदार्थ है। लोहे के साथ सीमेण्ट का प्रयोग करने से भवन टिकाऊ (UPBoardSolutions.com) एवं मजबूत बनते हैं। इसी कारण सीमेण्ट उद्योग आज भारत का एक विकसित तथा महत्त्वपूर्ण उद्योग बन गया है। सीमेण्ट का भारत के नव-निर्माण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह अनेक उद्योगों के विकास की कुंजी है। इसका उत्पादन एवं उपयोग देश के विकास का मापदण्ड है। वर्ष 2010-11 के दौरान सीमेण्ट उत्पादन (अप्रैल, 2011 से मार्च, 2012 तक) 224.49 मिलियन टन हुआ और 2010-11 की इसी अवधि तुलना में 6.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। भारत में सीमेण्ट उद्योग के विकास के निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे हैं –

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  1. देश में सीमेण्ट उद्योग के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल उपलब्ध है।
  2. सीमेण्ट उद्योग में उपयोग में आने वाली मशीनों का निर्माण देश में ही किया जाने लगा है।
  3. देश में बढ़ते हुए निर्माण कार्यों (सड़कों, बाँधों, भवनों व उद्योगों आदि) में इस्पात और सीमेण्ट की माँग में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है।
  4. विदेशी से सीमेण्ट आयात करने में खर्च होने वाली दुर्लभ विदेशी मुद्रा को बचाने के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाना अति आवश्यक है।
  5. देश में सीमेण्ट उद्योग की स्थापना के लिए पर्याप्त पूँजीगत संसाधन उपलब्ध हैं।
  6. सरकार की उदार औद्योगिक नीति के कारण सीमेण्ट उत्पादन में लघु संयन्त्रों की स्थापना कोप्रोत्साहन दिया गया है क्योंकि इन संयन्त्रों को मध्यम आर्थिक स्थिति वाले पूँजीपति भी संचालित कर सकते हैं।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारत में सीमेण्ट उद्योग का भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि देश में नव-निर्माण का कार्य तेज गति से किया जा रहा है।

प्रश्न 9.
कृषि तथा उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता का वर्णन कीजिए। [2013, 16]
उत्तर :

कृषि और उद्योग की पारस्परिक निर्भरता

कृषि और उद्योग किसी भी देश के आर्थिक विकास के दो अनिवार्य क्षेत्र हैं। देश की आर्थिक प्रगति तभी सम्भव है, जबकि कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्र सापेक्षिक रूप से विकसित हों। इसका प्रमुख कारण यह है। कि कृषि और उद्योग परस्पर अनुपूरकं हैं, अर्थात् कृषि की उन्नति (UPBoardSolutions.com) उद्योगों के विकास में सहायक होती है और औद्योगिक प्रगति कृषि को विकास के चरम शिखर पर पहुँचाने में सहायता देती है। पं० जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, “बिना कृषि विकास के औद्योगिक प्रगति नहीं की जा सकती।……………वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।”

कृषि एवं उद्योग दोनों ही व्यवसाय की श्रेणी में आते हैं। कृषि एक प्राथमिक व्यवसाय है, जिसमें प्राकृतिक साधनों से उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त की जाती हैं। उद्योग द्वितीयक व्यवसाय है, जिसमें प्राकृतिक साधनों को विज्ञान एवं तकनीक के द्वारा आर्थिक साधनों में बदला जाता है। उद्योग और कृषि दोनों ही भारतीय अर्थव्यवस्था के आधार-स्तम्भ हैं। यही कारण है कि जहाँ प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्राथमिकता दी गयी वहीं दूसरी पंचवर्षीय योजना में उद्योगों को प्राथमिकता दी गई। उद्योग और कृषि अर्थव्यवस्था रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं। जिस प्रकार एक पहिये पर गाड़ी नहीं चल सकती, उसी प्रकार केवल कृषि यो केवल उद्योग के आधार पर अर्थव्यवस्था की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती।

कृषि व उद्योग एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी नहीं वरन् एक-दूसरे के पूरक हैं। कृषि में प्राकृतिक साधनों से वस्तुएँ प्राप्त की जाती हैं और उद्योगों द्वारा उन्हें उपयोगी वस्तुओं में बदल दिया जाता है। उदाहरण के लिए-कृषि से कपास की प्राप्ति होती है और सूती वस्त्र उद्योग द्वारा (UPBoardSolutions.com) इस कपास से विभिन्न प्रकार के सूती वस्त्र बना दिये जाते हैं।

कृषि अनेक तरह से उद्योगों पर निर्भर करती है। कृषि के आधुनिकीकरण के लिए अनेक प्रकार के यन्त्रों, मशीनों व साधनों की आवश्यकता होती है। कृषि को ये यन्त्र ट्रैक्टर, मशीनें इंजीनियरिंग उद्योग से मिलते हैं। यदि इंजीनियरिंग उद्योग न होता तो सम्भवतः कृषि का आधुनिकीकरण ही न हो पाता। कृषि का उत्पादन बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के खादों की आवश्यकता होती है। यद्यपि प्राकृतिक खादें भी कृषि में प्रयोग की जाती हैं; किन्तु आधुनिक समय में उत्पादन को बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग बहुतायत से होता है। कृषि को ये खायें उर्वरक उद्योग से ही प्राप्त होती हैं।

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कृषि भी उद्योगों के लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि कृषि के लिए उद्योग। कृषि उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करती है। उदाहरण के लिए कृषि से कपास मिलती है तो उद्योग द्वारा उसके सूती वस्त्र बनाये जाते हैं। कृषि से गन्ने की प्राप्ति होती है तो उद्योगों द्वारा उसकी चीनी बनायी जाती है। इसी प्रकार कृषि से जूट मिलता है तो उद्योग द्वारा उस जूट से अनेक प्रकार की वस्तुएँ बनायी जाती हैं। आज भारत का सूती वस्त्र उद्योग, चीनी उद्योग और जूट उद्योग पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। कृषि के बिना इन उद्योगों के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं, उद्योगों के स्थानीयकरण में भी कृषि की महत्त्वपूर्ण (UPBoardSolutions.com) भूमिका होती है। उदाहरण के लिए-कपास की अधिकता के कारण महाराष्ट्र और गुजरात में सूती वस्त्रे उद्योग का, गन्ने की अधिकता के कारण उत्तर प्रदेश में चीनी उद्योग का और जूट की अधिकता के कारण पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग का स्थानीयकरण हो गया है।

आज कृषि की अनेक शाखाएँ उद्योगों का रूप लेती जा रही हैं। उदाहरण के लिए-दुग्ध उद्योग, मत्स्य पालन उद्योग, मुर्गी पालन उद्योग आदि। भारत में कृषि और उद्योग दोनों के महत्त्व को देखते हुए दोनों के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। कृषि में एक निश्चित सीमा तक भारत ने आत्मनिर्भरता पा ली है और उद्योगों में भी भारत आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में वर्तमान औद्योगिक ढाँचे के गठन का वर्णन कीजिए।
या
औद्योगिक ढाँचे से क्या आशय है ?
उत्तर :
औद्योगिक ढाँचे से आशय यह जानने से है कि देश में किस प्रकार के उद्योग स्थापित हैं। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था प्रचलित है। यहाँ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ पाये जाते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण होता है। इनका उद्देश्य लाभ कमाना न होकर अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना व सामाजिक हित होता है। निजी क्षेत्र के उद्योगों पर निजी व्यक्तियों या समूहों का नियन्त्रण होता है और वे निजी हित के लिए काम करते हैं। इनका उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है।

भारत में औद्योगिक ढाँचे का निर्माण 1956 ई० में नवीन औद्योगिक नीति के अनुसार किया गया था। इसके अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र में 17 आधारभूत और भारी उद्योग सम्मिलित थे; जैसे—हथियार और गोला-बारूद, अणुशक्ति, लोहा और इस्पात, भारी मशीनरी, भारी बिजली-संयन्त्र, कोयला, खनिज तेल, खनिज लोहा, वायुयान, वायु सेवा, रेलवे, जहाज-निर्माण, टेलीफोन और तार आदि। इन सभी पर सरकार का नियन्त्रण है। 26 मार्च, 1993 ई० से 13 उद्योगों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त कर दिया गया है। वर्तमान में केवल 4 उद्योगों पर ही सरकार का नियन्त्रण है।

दूसरी श्रेणी में 12 उद्योग आते हैं, जिन्हें संयुक्त क्षेत्र के उद्योग कहा जाता है। इन पर राज्य और निजी फर्मों का साझा नियन्त्रण रहता है। उपर्युक्त उद्योगों के अतिरिक्त शेष सभी उद्योग निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिये गये हैं। निजी क्षेत्र की यह जिम्मेदारी है कि वह सरकार के इस कार्य में सहायता करे। इस श्रेणी में मशीन-टूल, उर्वरक, सड़क यातायात, समुद्री यातायात, ऐलुमिनियम, कृत्रिम रबड़ आदि उद्योग सम्मिलित हैं। उद्योगों की उन्नति में तेजी लाने के लिए (UPBoardSolutions.com) सरकार निजी क्षेत्र को सहायता प्रदान करती है और दिशा-निर्देश भी जारी करती है। भारतीय उद्योगों को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है–

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  1. बड़े पैमाने के उद्योग
  2. लघु पैमाने के उद्योग तथा
  3. कुटीर या घरेलू उद्योग।

प्रश्न 2.
बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए। प्रत्येक के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर :
बड़े पैमाने के उद्योगों को वस्तुओं की प्रकृति के अनुसार निम्नलिखित चार भागों में बाँटा जा सकता है –

1. आधारभूत उद्योग – आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं, जो अर्थव्यवस्था के सभी महत्त्वपूर्ण उद्योगों तथा कृषि को आवश्यक आगत (input) प्रदान करते हैं। ये अन्य उद्योगों और कृषि में काम आने वाली वस्तुओं का निर्माण करते हैं; जैसे-कोयला, कच्चा लोहा, इस्पात, उर्वरक, कास्टिक सोडा, सीमेण्ट, स्टील, ऐलुमिनियम, बिजली आदि।

2. पूँजीगत वस्तु उद्योग – इन उद्योगों के अधीन उन वस्तुओं का निर्माण किया जाता है, जो अन्य वस्तुओं के निर्माण में सहायक सिद्ध होती हैं; जैसे—मशीनें और अन्य संयन्त्र आदि। ये उद्योग निजी क्षेत्र में हैं। इन उद्योगों में मशीनी औजार, ट्रैक्टर, बिजली के ट्रान्सफॉर्मर, (UPBoardSolutions.com) मोटर-वाहन आदि सम्मिलित हैं।

3. मध्यवर्ती वस्तु उद्योग – ये उद्योग ऐसी वस्तुओं के निर्माण में सहायता देते हैं या उन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जो किन्हीं दूसरे उद्योगों की उत्पादन-प्रक्रिया में प्रयुक्त की जाती हैं अथवा उद्योगों में पूँजी वस्तुओं के सहायक उपकरणों में प्रयोग की जाती हैं-ऑटोमोबाइल टायर्स और पेट्रोलियम रिफाइनरी उद्योग।

4. उपभोक्ता वस्तु उद्योग – इन उद्योगों में उपभोक्ताओं द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं का निर्माण किया जाता है; जैसे–कपड़ा, चीनी, कागज, रेडियो, टी० वी० आदि।

प्रश्न 3.
आधारभूत उद्योग किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए। [2009]
उत्तर :
आधारभूत उद्योग बड़े पैमाने के वे उद्योग हैं, जो सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को आवश्यक निविष्टियाँ प्रदान करते हैं; जैसे—कोयला, लोहा, सीमेण्ट तथा स्टील।

कोयला उद्योग अन्य उद्योगों; जैसे—इस्पात उद्योग, विद्युत उत्पादन, रेल इंजन तथा शक्ति साधन के रूप में आधारभूत उद्योग की भूमिका निभाता है। इसी प्रकार मशीनरी उद्योग, रेल उद्योग, मोटरकार उद्योग आदि लोहा उद्योग पर आधारित हैं। सीमेण्ट उद्योग भी भवन-निर्माण उद्योग, सड़क निर्माण आदि को आधार प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
भारत में लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता किन कारणों से है ?
उत्तर :
एक करोड़ रुपये तक की लागत (संयन्त्र तथा मशीनरी) वाले उद्योग लघु पैमाने के उद्योग कहलाते हैं। भारत में इन उद्योगों को विकसित करने के लिए प्रोत्साहन देने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है –

  1. छोटे पैमाने के उद्योग कम पूँजी से लग जाते हैं और इनमें बहुत-से लोगों को रोजी भी मिल जाती है।
  2. छोटे पैमाने के उद्योगों द्वारा धन का थोड़े-से आदमियों के हाथ में केन्द्रीकरण नहीं होता और साथ में औद्योगिक शक्ति अनेक हाथों में बँटी रहती है।
  3. छोटे पैमाने के उद्योगों को पिछड़े इलाकों के लिए विशेष महत्त्व होता है। (UPBoardSolutions.com) ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे उद्योगों को स्थापित करना आसान रहता है। इन उद्योगों द्वारा जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों का विकास होता है, वहाँ ग्रामीण लोगों को रोजगार पाने के लिए अपना स्थान छोड़कर शहरों की ओर भागना नहीं पड़ती।

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प्रश्न 5.
लघु उद्योगों के विकास हेतु कोई दो सुझाव दीजिए।
उत्तर :
योजनाकाल में कुटीर उद्योगों के विकास के लिए निम्नलिखित कदम उठाये गये –

1. मण्डलों तथा निगमों की स्थापना – कुटीर उद्योगों के विकास के लिए कई अखिल भारतीय मण्डलों की स्थापना की गयी; जैसे–केन्द्रीय रेशम मण्डल (1949), अखिल भारतीय कुटीर उद्योग मण्डल (1950), अखिल भारतीय दस्तकारी मण्डल (1952), अखिल भारतीय करघा मण्डल (1952), अखिल भारतीय खादी तथा ग्रामोद्योग मण्डल (1953) आदि। इसी प्रकार अनेक निगम भी स्थापित किये गये; जैसे-राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (1955), भारतीय दस्तकारी विकास निगम । (1958), दस्तकारी और हथकरघा निगम आदि।

2. वित्तीय सहायता – लघु उद्योगों को राजकीय सहायता अधिनियम के अन्तर्गत (UPBoardSolutions.com) ऋण दिया जाता है। इसके अतिरिक्त भारतीय स्टेट बैंक, राज्य वित्त निगम, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों द्वारा कुटीर व लघु उद्योगों को ऋण दिया जाता है।

प्रश्न 6.
भारत में कुटीर उद्योगों को विकसित करने की आवश्यकता क्यों है ?
या
कुटीर उद्योग द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कैसे सुधारा जा सकता है? [2016, 17, 18]
या
कुटीर उद्योग के विकास के लिए सुझाव दीजिए। [2018]
उत्तर :
कुटीर उद्योगों द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित रूप में सुधारा जा सकता है। अतः उनका विकास किये जाने की आवश्यकता है –

  • कुटीर उद्योग ग्रामीण जनता के एक बड़े वर्ग को उन्हीं के अपने गाँव में ही उद्योग-धन्धे उपलब्ध करवाते हैं। ऐसे में ग्रामीण लोगों को अपना निजी स्थान छोड़कर नये क्षेत्रों में भटकना नहीं पड़ता।
  • इसके अलावा खेती में लगे बहुत-से मजदूरों को, जब उनके पास खेती को कोई कार्य नहीं होता, ये कुटीर उद्योग उनकी आय का मुख्य साधन बन सकते हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में पैदा होने वाला बहुत-सा कच्चा माल कुटीर उद्योगों के प्रयोग में आ जाता है, जिनको बाहर भेजने पर कुछ भी मूल्य प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 7.
सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के उद्योग परस्पर किस प्रकार सहयोगी हैं ?
उत्तर :
भारत जैसे मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र का सह-अस्तित्व है। भारतीय अर्थव्यवस्था में यद्यपि सार्वजनिक एवं निजी उद्योगों के लिए अलग-अलग कार्य-क्षेत्र निर्धारित हैं, तथापि सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र आपस में एक-दूसरे के लिए पूरक एवं सहयोगी भी हैं। सरकार अपने अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से निजी क्षेत्र के उद्योगों को विभिन्न सुविधाएँ प्रदान करती है, जिससे इस क्षेत्र का तेजी से विकास हो सके। रेल, सड़क परिवहन, बन्दरगाह, विद्युत व्यवस्था, सिंचाई व्यवस्था आदि अनेक सुविधाएँ देकर सरकार निजी क्षेत्र के उद्योगों के विकास में सहायता प्रदान करती है। इसी प्रकार निजी क्षेत्र अपनी (UPBoardSolutions.com) उत्पादकता द्वारा देश में पूँजी-निर्माण की गति को बढ़ाने में सहायता देते हैं, जिससे सरकार नये-नये सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना एवं विकास करने में सफल होती है।

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प्रश्न 8.
बड़े पैमाने के उद्योग, कुटीर उद्योगों से किस प्रकार भिन्न हैं ?
उत्तर :
बड़े पैमाने के उद्योग और कुटीर उद्योगों में निम्नलिखित भिन्नताएँ हैं –
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प्रश्न 9.
भारत सरकार औद्योगिक नियन्त्रण हेतु क्या उपाय करती है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भारत सरकार प्रमुख रूप से औद्योगिक नियन्त्रण के लिए निम्नलिखित उपाय करती है –

1. लाइसेंस प्रणाली – सन् 1948 ई० की औद्योगिक नीति के अन्तर्गत अधिकतर उद्योगों को लगाने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य था। इस नीति में 30 अप्रैल, 1956 ई० को परिवर्तन किये गये। 24 जुलाई, 1991 ई० को, सरकार ने औद्योगिक नीति में व्यापक परिवर्तन किया तथा 13 प्रमुख उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों को लाइसेंस की आवश्यकता से मुक्त कर दिया गया। वर्तमान में इन उद्योगों की संख्या मात्र 5 रह गयी है, जिनमें ऐल्कोहल युक्त पेय, सिगरेट-सिगार, रक्षा उपकरण, डिटोनेटिंग फ्यूज व खतरनाक रसायन सम्मिलित हैं।

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2. MRTP अधिनियम, 1969 ई० – इस अधिनियम के द्वारा दो उद्देश्यों की पूर्ति की गयी –
(क) आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण को रोकना तथा एकाधिकार पर नियन्त्रण रखना एवं
(ख) प्रतिबन्धात्मक एवं अनुचित व्यापार की रोकथाम करना।

3. लघु उद्योगों के लिए उत्पादों का आरक्षण – वर्ष 2006-07 के बजट के बाद, लघु उद्योग क्षेत्र के लिए 239 उत्पाद आरक्षित कर दिये गये। इन उत्पादों में बड़े पैमाने के उद्योग प्रवेश नहीं कर सकते।

प्रश्न 10.
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के योगदान की विवेचना कीजिए| [2015]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के किन्हीं छः योगदानों का वर्णन कीजिए। [2016]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के किन्हीं तीन योगदानों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना से देश में बड़े उद्योगों की स्थापना का सूत्रपात किया गया। भारतीय अर्थव्यवस्था में उत्तरोत्तर उद्योगों का विकास हुआ है। बढ़ते औद्योगीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था में (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के कुछ प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं –

  1. देश की राष्ट्रीय आय, बचत एवं पूँजी-निर्माण को बढ़ाने में सहायता की है।
  2. देश में प्रति व्यक्ति उत्पादन एवं प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाने में सहायता की है।
  3. देश में अतिरिक्त रोजगार के अवसरों का सृजन हुआ है।
  4. आयातों को कम करके आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में सहायता मिली है।
  5. भारत विश्व के लगभग सभी देशों तक निर्यात बढ़ाने में सफल हुआ है।
  6. कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण सम्भव हुआ, कृषि उत्पादकता बढ़ी और खाद्यान्नों के आयात लगभग समाप्त हो चुके हैं।
  7. अर्थव्यवस्था में आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिला है।
  8. देश के उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग सम्भव हो सका है।
  9. यातायात तथा संचार के क्षेत्र में भी अद्भुत उन्नति हुई है। परिवहन तथा संचार के तीव्रगामी साधने विकसित हुए हैं।

उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि औद्योगीकरण के कारण भारत आज विश्व का एक अग्रणी विकासशील देश बन चुका है।

प्रश्न 11.
भारतीय उद्योगों की भावी सम्भावनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

औद्योगिक विकास की सम्भावनाएँ

यद्यपि स्वतन्त्रता के बाद औद्योगिक विकास हेतु गम्भीर प्रयास किये गये एवं अनेक उपलब्धियाँ अर्जित की गयी हैं, किन्तु अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। औद्योगिक विकास का लाभ अभी तक सभी लोगों के पास नहीं पहुँच पाया है। इसके लिए आवश्यक है कि औद्योगिक उत्पादन को और अधिक बढ़ाया जाय ताकि आम आदमी को औद्योगिक वस्तुएँ सस्ती कीमतों पर उपलब्ध हो सकें। आज भी देश के बहुत-से क्षेत्र औद्योगिक विकास से वंचित हैं, जिसके कारण इन क्षेत्रों में सामान्य जीवन-स्तर निम्न है। इन क्षेत्रों का समुचित औद्योगिक विकास कर इनके पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है। इसी प्रकार कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों; जैसे-खाद्यान्न, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण आदि के विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं।

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प्रश्न 12.
सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में दो अन्तर बताइए। [2010]
उत्तर :
सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में दो अन्तर निम्नलिखित हैं –

  • सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के उद्योगों में मूल अन्तर स्वामित्व का होता है। वे उपक्रम जिन पर सरकारी विभागों अथवा केन्द्र या राज्यों द्वारा स्थापित संस्थाओं का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम । कहलाते हैं; जैसे—भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लि०, भिलाई इस्पात लि० आदि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम हैं। इसके विपरीत वे उद्योग जिनका स्वामित्व कुछ व्यक्तियों या कम्पनियों के पास होता है, निजी क्षेत्र के उद्यम कहलाते हैं; जैसे-टाटा आयरन ऐण्ड स्टील कम्पनी।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण होता है। इनका (UPBoardSolutions.com) उद्देश्य लाभ कमाना न होकर अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना व सामाजिक हित होता है। निजी क्षेत्र के उद्योगों पर निजी व्यक्तियों या समूहों का नियन्त्रण होता है और वे निजी हित के लिए काम करते हैं। इनका उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है।

प्रश्न 13.
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों की पाँच उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए। [2011]
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में हुई औद्योगिक उपलब्धियों को निम्नलिखित रूप में रखा जा सकता है –

  1. भारतीय अर्थव्यवस्था में आधुनिक एवं सुदृढ़ अवसंरचना का तेजी से निर्माण हुआ है।
  2. औद्योगिक क्षेत्र में सार्वजनिक उपक्रमों का विस्तार तेजी से हुआ है।
  3. पूँजीगत भारी उद्योगों में निवेश का विस्तार हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप इंजीनियरिंग वस्तुओं, खनन, लोहा, इस्पात, उर्वरक जैसे उत्पादन-क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सकी है।
  4. पूँजीगत क्षेत्र में आयातों पर निर्भरता घटी है।
  5. गैर-परम्परागत वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि हुई है।
  6. औद्योगिक क्षेत्र में तकनीकी एवं प्रबन्धकीय सेवा का विस्तार हुआ है।
  7. औद्योगिक सरंचना में विविधता आयी है तथा आधुनिक उद्योगों का विस्तार सम्भव हुआ है।

प्रश्न 14.
कुटीर एवं लघु उद्योग में क्या अन्तर है? [2014, 15, 16, 17, 18]
उत्तर :

कुटीर व लघु उद्योगों में अन्तर

कुटीर व लघु उद्योगों में मुख्य रूप से निम्नलिखित अन्तर हैं –

  1. कुटीर उद्योग मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बद्ध होते हैं, जबकि लघु उद्योग ग्रामीण व नगरीय दोनों क्षेत्रों में स्थापित किये जा सकते हैं।
  2. कुटीर उद्योगों में अधिकांश कार्य मानवीय श्रम द्वारा किया जाता है, जबकि लघु उद्योगों में मशीनों का प्रयोग भी किया जाता है।
  3. कुटीर उद्योगों में कार्य करने वाले अधिकांश व्यक्ति परिवार से ही सम्बद्ध होते हैं, जबकि लघु उद्योगों में मजदूरी पर श्रमिक रखे जाते हैं।
  4. कुटीर उद्योगों में बहुत कम विनियोग की आवश्यकता होती है, जबकि 1 करोड़ तक निवेशित उद्योग ‘लघु उद्योग’ कहलाते हैं।
  5. कुटीर उद्योग सामान्यत: कृषि व्यवसाय से सम्बद्ध होते हैं, जबकि लघु उद्योगों के साथ ऐसा नहीं है।
  6. कुटीर उद्योग सहायक उद्योग के रूप में चलते हैं, किन्तु लघु उद्योग मुख्य उद्योग के रूप में संचालित किये जाते हैं।
  7. कुटीर उद्योगों में कच्चा माल तथा तकनीकी कुशलता स्थानीय होती है, किन्तु लघु उद्योगों में ये सब बाहर से मँगाये जाते हैं।

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प्रश्न 15.
भारत में औद्योगिक विकास के लिए तीन सुझाव दीजिए। [2014]
उत्तर :
भारत में औद्योगिक विकास के लिए सुझाव अग्रवत् हैं –

1. प्राकृतिक संसाधनों का सर्वेक्षण एवं दहन – किसी भी देश के उद्योगों को आधार उस देश के प्राकृतिक संसाधन होते हैं; अत: उद्योगों के विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सर्वेक्षण तथा ज्ञात प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए। इससे औद्योगिक विकास सम्भव हो सकेगा।

2. कुशल उद्यमियों को प्रोत्साहन – भारत जैसे विकासशील देश में आज भी योग्य उद्यमियों का अभाव है; क्योंकि भारत मे उद्यमी जोखिम वहन करने से बचते हैं। अतः भारतीय उद्यमियों को उद्योगों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा उनके लिए बीमे की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे वे जोखिम वहन करने के लिए तैयार हो जाएँ।

3. वित्तीय सुविधाओं की व्यवस्था – उद्योगों की स्थापना और विकास में पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि उद्यमियों के लिए पर्याप्त एवं सस्ते ब्याज पर पूंजी की सुविधाजनक व्यवस्था हो।

प्रश्न 16.
औद्योगिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
उद्योग किसी देश की अर्थव्यवस्था के आधार होते हैं। अत: प्रत्येक सरकार का परम कर्तव्य है। कि उद्योगों को प्रोत्साहित करें। किसी भी देश में तीव्र सन्तुलित एवं व्यापक औद्योगिक विकास के लिए एक उचित एवं प्रगतिशील औद्योगिक नीति की आवश्यकता होती है। स्वतन्त्रता के पश्चात् समय-समय पर । औद्योगिक नीतियाँ घोषित की गयीं, जिनमें से 1948, 1956 व 1991 की औद्योगिक नीतियाँ विशेष महत्त्व की हैं।

1956 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रधानता दी गयी, जिसमें औद्योगिक (UPBoardSolutions.com) विकास हेतु सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमी को अग्रणी भूमिका निभानी थी। 1991 की नयी औद्योगिक नीति में उदारीकरण की प्रक्रिया चलायी गयी जिसके अन्तर्गत निजी क्षेत्र को अधिक स्वतन्त्र और महत्त्वपूर्ण भूमिका दी गयी हैं। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को सीमित किया गया है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उद्योगों में हमारी प्राथप्छिता क्या है ?
उत्तर :
उद्योगों में हमारी प्राथमिकता त्यनिर्भरता प्राप्त करना तथा कम लागत पर उच्चकोटि का उत्पादन करना है।

प्रश्न 2.
संयुक्त क्षेत्र का क्या अर्थ है ? [2009, 10]
उत्तर :
संयुक्त क्षेत्र वह है जिस पर निजी तथा सार्वजनिक दोनों को स्वामित्व होता है।

प्रश्न 3.
भारत में कुटीर उद्योगों की दो समस्याएँ लिखिए।
उत्तर :
भारत में कुटीर उद्योगों की दो समस्याएँ हैं—

  1. कच्चे माल की कमी तथा
  2. तैयार माल के विपणन की कठिनाई।

प्रश्न 4.
कुटीर उद्योग से आप क्या समझते हैं ? [2010, 16]
उतर :
कुटीर उद्योग में किसी परम्परागत वस्तु का उत्पादन परिवार के सदस्यों तथा कुछ वैतनिक ” श्रमिकों की सहायता से स्वयं इसके मालिक-कारीगर द्वारा किया जाता है; किन्तु इन सबकी संख्या 9 से अधिक नहीं होती।

प्रश्न 5.
औद्योगिक कार्यकुशलता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
औद्योगिक कार्यकुशलता से तात्पर्य उस स्थिति से है जब उद्योग में उपलब्ध साधनों से अधिकतम उत्पादन किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
बड़े पैमाने के उद्योग की एक मुख्य विशेषता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बड़े पैमाने के उद्योग में कार्य बड़ी-बड़ी मशीनों से किया (UPBoardSolutions.com) जाता है, जो यान्त्रिक व विद्युत शक्ति से चालित होते हैं।

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प्रश्न 7.
कुटीर उद्योगों की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
कुटीर उद्योगों की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. कुटीर उद्योग खेतिहर श्रमिकों को अतिरिक्त आय का साधन प्रदान करते हैं।
  2. कुटीर उद्योग कृषि भूमि पर जनसंख्या के भार को कम करने में सहायक हैं।

प्रश्न 8.
भारत में पशुओं पर आधारित किन्हीं दो उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत में पशुओं पर आधारित दो उद्योग हैं—

  1. दुग्ध उद्योग तथा
  2. चमड़ा उद्योग।

प्रश्न 9.
कुटीर उद्योग-धन्धों के विकास हेतु कोई दो उपाय लिखिए। [2014]
उत्तर :
कुटीर उद्योग-धन्धों के विकास हेतु दो उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. सरकार द्वारा संवर्द्धनात्मक सहायता दी जानी चाहिए।
  2. संस्थागत व संरक्षणात्मक सहायता (UPBoardSolutions.com) प्रदान की जानी चाहिए।

प्रश्न 10.
स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों को किन दो भागों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर :
स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग; जैसे—भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड।
  2. निजी क्षेत्र के उद्योग; जैसे-टाटा आयरन ऐण्ड स्टील कं०॥

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प्रश्न 11.
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
वे उद्यम जिन पर सरकारी विभागों अथवा केन्द्र या राज्य द्वारा स्थापित (UPBoardSolutions.com) संस्थाओं का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कहलाते हैं।

प्रश्न 12.
उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
आज के औद्योगिक जगत में विशेषीकरण का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। उदाहरण के लिएकार बनाने वाला कारखाना, टायर-ट्यूब, क्लच, ब्रेक इकाई आदि स्वयं उत्पादित नहीं करता। इनके लिए वह दूसरे उद्योगों पर निर्भर करता है। इसी को उद्योगों की पारस्परिक निर्भरता कहते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत में तीव्र औद्योगीकरण की आवश्यकता क्यों है?

(क) जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण
(ख) आर्थिक विकास की दर के लिए
(ग) कृषि को विकसित करने के लिए
(घ) नगरीकरण में वृद्धि के लिए

2. औद्योगीकरण का प्रभाव नहीं है

(क) रोजगार के अवसरों में वृद्धि
(ख) नगरीकरण में वृद्धि
(ग) बेरोजगारी में वृद्धि
(घ) आर्थिक विकास में वृद्धि

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3. औद्योगिक असन्तुलन दूर करने के लिए

(क) पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित होने चाहिए
(ख) उपभोक्ता वस्तु उद्योग लगाने चाहिए।
(ग) पूँजी वस्तु उद्योग लगाने चाहिए
(घ) आधारभूत उद्योग लगाने चाहिए

4. निम्न में से कौन कुटीर उद्योग है? [2012, 16]

(क) हथकरघा उद्योग
(ख) सीमेण्ट उद्योग
(ग) कागज उद्योग
(घ) काँच उद्योग

5. निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग आधारभूत उद्योग है?

(क) सूती वस्त्र उद्योग
(ख) कागज उद्योग
(ग) लोहा-इस्पात उद्योग
(घ) चीनी उद्योग

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6. भारत में औद्योगीकरण की गति किस राज्य में सर्वाधिक है?

(क) बिहार में
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) महाराष्ट्र में
(घ) मध्य प्रदेश में

7. टाटा आयरन व स्टील कम्पनी (इस्पात कारखाना) किस क्षेत्र में है?

(क) निजी
(ख) संयुक्त
(ग) सार्वजनिक
(घ) स्पष्ट नहीं

8. भारत को आर्थिक विकास निर्भर करता है [2013, 15]

(क) केवल कुटीर उद्योगों पर
(ख) केवल छोटे पैमाने के उद्योगों पर
(ग) केवल बड़े पैमाने के उद्योगों पर
(घ) सभी प्रकार के उद्योगों पर

9. हथकरघा उद्योग निम्नलिखित में से किस श्रेणी से सम्बन्धित है? [2011]

(क) लघु उद्योग
(ख) कुटीर उद्योग
(ग) भारी उद्योग
(घ) आधारभूत उद्योग

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10. निम्नलिखित में से भारत का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान कौन-सा है?

(क) वायु परिवहन
(ख) सड़क परिवहन
(ग) रेल परिवहन
(घ) जल परिवहन

11. निम्नलिखित में से कौन-सा इस्पात कारखाना सार्वजनिक क्षेत्र से सम्बन्धित है?

(क) जमशेदपुर
(ख) बर्नपुर
(ग) दुर्गापुर
(घ) भद्रावती

12. ऐसे सभी उपक्रम जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था और निजी उद्यम का संयुक्त स्वामित्व होता है, कहलाते हैं

(क) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम
(ख) निजी क्षेत्र के उपक्रम
(ग) संयुक्त क्षेत्र के उपक्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

13. कृषि और उद्योग एक-दूसरे के

(क) परस्पर पूरक हैं।
(ख) परस्पर प्रतियोगी हैं।
(ग) परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं।
(घ) इनमें से कोई नहीं

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14. 1991 की औद्योगिक नीति में निम्न में से किसे अधिक महत्त्व दिया गया? [2014]

(क) उदारीकरण को
(ख) कुटीर उद्योगों को
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र को
(घ) इनमें से कोई नहीं

15. निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग कृषि आधारित नहीं है? (2015)

(क) चीनी उद्योग
(ख) जूट उद्योग
(ग) सीमेण्ट उद्योग
(घ) सूती उद्योग

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 (Section 4)

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 5 are helpful to complete your homework.

If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you.

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य).

प्रोजेक्ट कार्य-1

समस्या कथन
किसी राष्ट्रीयकृत अथवा प्राइवेट बैंक की शाखा में जाकर बचत खाते में लगने वाले साधारण ब्याज के आगणन की जानकारी प्राप्त करना।

प्रस्तावना

जब हम अपने बचत खाते में धनराशि जमा करते हैं तो उस राशि को बैंक या तो जनसाधारण को लोन के रूप में देता है या सरकार उस राशि का प्रयोग सार्वजनिक कार्यों के लिए करती है। बैंक खाताधारकों के धन का प्रयोग करने के प्रतिफल में खाताधारक को एक निर्धारित दर से ब्याज प्रदान करते हैं। यह प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार है, जब कोई व्यक्ति किसी महाजन या बैंकर से कुछ धन उधार लेता है। तो वह उधार लिया (UPBoardSolutions.com) मूलधन निश्चित समय एवं ब्याज की अतिरिक्त राशि के साथ देता है। इस प्रकार, यह अतिरिक्त धन ही ब्याज है। मूलधन और ब्याज के योग को मिश्रधन कहते हैं। बैंक बचत खाते में जितने वर्ष, माह, दिन के लिए खाताधारकों की धनराशि को जमा रखता है, उसके अनुसार ब्याज की राशि खाताधारक के खाते में निश्चित समय-अन्तराल पर जमा करता है। बैंकों में यह एक साधारण प्रक्रिया है, जो सभी खाताधारकों को सामान्य रूप से प्रदान की जाती है।
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)
पहले बैंक बचत खाते में जमा धनराशि के लिए ब्याज माह के हिसाब से प्रदान करते थे जिसकी गणना के लिए उसे वर्ष में बदलने के लिए 12 से भाग देना पड़ता था, लेकिन वर्तमान में बैंक प्रतिदिन के हिसाब से बचत खाते की शेष धनराशि पर ब्याज की गणना करते हैं जिसकी गणना के लिए दिनों को वर्ष में बदलने हेतु 365 से भाग देना पड़ता है। इस क्रिया में जिस दिन धन दिया जाता है, उसे छोड़ दिया जाता है और जिस दिन धन जमा किया जाता है, उसे सम्मिलित कर लिया जाता है। इस प्रकार बचत खाते में जमा धनराशि पर ब्याज की गणना निम्नलिखित सूत्र के माध्यम से की जाती है
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)
वर्तमान में ब्याज की गणना बैंक कम्प्यूटर के माध्यम से करते हैं और त्रैमासिक रूप से ब्याज की धनराशि खाताधारक के खाते में क्रेडिट कर दी जाती है।

लक्ष्य, उद्देश्य एवं कार्य-प्रणाली
प्रस्तुत परियोजना कार्य का मुख्य उद्देश्य बैंकों द्वारा की जाने वाली ब्याज की गणना का मूल्यांकन कर उस विधि का अध्ययन करना है। इसका मुख्य लक्ष्य विद्यार्थियों को बैंक द्वारा दिए जाने वाले ब्याज आगणन की प्रक्रिया से अवगत कराना है। इस परियोजना कार्य के लक्ष्य एवं उद्देश्य की पूर्ति हेतु आनुभाविक शोध प्रणाली (Empirical Research Method) का प्रयोग किया जाता है।

बैंक की ब्याज नीति का निर्धारण
1 अप्रैल, 2010 से देश के करीब 62 करोड़ बचत खाताधारकों के लिए बैंक द्वारा एक नई शुरुआत की गयी। इस दिन से सभी खाताधारकों को बचत खाते में जमा राशि पर प्रतिदिन के हिसाब से ब्याज प्रदान किया जा रहा है। ब्याज की दर तो 4% ही रखी गयी, लेकिन (UPBoardSolutions.com) नई गणना से ब्याज से प्राप्त होने वाली आय पर काफी फर्क पड़ा है।

इस नियम की घोषणा 21 अप्रैल, 2009 को वित्त वर्ष 2009-10 की वार्षिक मौद्रिक नीति पेश करते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ० डी० सुब्बाराव ने की थी, लेकिन बैंकों के शीर्ष संगठन इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) का कहना था कि रोजाना के आधार पर ब्याज की गणना तभी संभव है जब वाणिज्यिक बैंकों की सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण पूरा हो जाए। इसलिए सभी वाणिज्यिक बैंकों के बचत खातों पर ब्याज की गणना 1 अप्रैल, 2010 से प्रतिदिन के आधार पर करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

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यह भी ध्यान देने योग्य है कि बैंक चालू खाते में ओवरड्राफ्ट पर अपने ब्याज की गणना प्रतिदिन के आधार पर करते हैं, इसलिए बचत खाते में प्रतिदिन की गणना से ही खाताधारक को ब्याज दिया जाना चाहिए। वास्तव में चालू और बचत खाते बैंकों के लिए फंड जुटाने का सबसे सरल एवं सुलभ माध्यम हैं।

बैंक द्वारा बचत खाते में की जाने वाली साधारण ब्याज की गणना
बैंक की पास बुक में से ली गयी प्रविष्टियों में ब्याज आगणन की प्रक्रिया का वर्णन निम्नलिखित है
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प्रतिदिन के आधार पर ब्याज की गणना
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)
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उपर्युक्त प्रविष्टियों में बचत खाते में जमा राशि की प्रतिदिन की शेष राशि पर ब्याज की गणना की गयी है। बैंक द्वारा त्रैमासिक रूप से ब्याज की धनराशि खाते में समायोजित की जाती है। उपरोक्त गणना में 4 प्रतिशत की दर से प्रतिदिन के शेष पर ब्याज (UPBoardSolutions.com) अभिकलित किया गया है। अभीष्ट ब्याज की गणना हेतु निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया गया है

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)
अतः 1 जनवरी से 31 जनवरी तक कुल ब्याज = 14.465 +37260 = ₹ 51.725
इसी प्रकार फरवरी और मार्च माह के ब्याज की गणना कर तीनों माह के योग 162.96 अर्थात् 163 को खाते में समायोजित किया गया है।
ब्याज की गणना इस प्रकार संयुक्त रूप से भी की जा सकती है
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निष्कर्ष
प्रस्तुत परियोजना के माध्यम से हमने बैंक की शाखा में जाकर बचत खाते पर मिलने वाले ब्याज की दर ज्ञात की तथा उसकी गणना के बारे में बैंक अधिकारियों से विस्तारपूर्वक चर्चा की। इसके अलावा उनके द्वारा बताई गई आगणन विधि से तीन माह की प्रविष्टियों पर दिए गए ब्याज की गणना की। बैंक की पासबुक में मुद्रित प्रविष्टियों के अनुसार सत्यापन कर हमने बचत खाते पर प्रतिदिन के आधार पर मिलने वाले ब्याज की धनराशि का (UPBoardSolutions.com) आगणन करना सीखा और पासबुक में की गयी प्रविष्टियों का गहन अध्ययन किया। प्रस्तुत परियोजना कार्य से हमारे ज्ञान में वृद्धि होने के साथ-साथ हमें नवीन जानकारियाँ प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ।

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प्रोजेक्ट कार्य-2

समस्या कथन
स्थायी खाता संख्या (PAN) कार्ड बनवाने हेतु आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त करना।

प्रस्तावना
पैन कार्ड एक विशिष्ट पहचान कार्ड है जिसे स्थायी खाता संख्या (Permanent Account Number) कहा जाता है, जो किसी भी तरह के आर्थिक लेन-देन के लिए आवश्यक है। पैन कार्ड में एक अल्फान्यूमेरिक 10 अंकों की संख्या होती है, जो आयकर (UPBoardSolutions.com) विभाग द्वारा निर्धारित की जाती है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के अन्तर्गत आती है। इसके अलावा यह भी उल्लेखनीय है कि पैन कार्ड आयकर अधिनियम 139A के तहत जारी किए जाते हैं। पैन कार्ड के अल्फान्यूमेरिक अंकों के प्रत्येक शब्द का अर्थ निम्नलिखित होता है
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पैन का उपयोग
पैन का उपयोग इन कार्यों के लिए अनिवार्य रूप से किया जाता है

  • आयकर (आईटी) रिटर्न दाखिल करने के लिए।
  • शेयरों की खरीद-बिक्री हेतु डीमैट खाता खुलवाने के लिए।
  • एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में है 50,000 या उससे अधिक की राशि निकालने अथवा जमा करने अथवा हस्तांतरित करने पर।
  • टीडीएस (टैक्स डिडक्शन एट सोर्स) जमा करने एवं वापस पाने के लिए।

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प्राप्त करने की पात्रता
कोई भी व्यक्ति, फर्म या संयुक्त उपक्रम पैन कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इसके लिए कोई न्यूनतम अथवा अधिकतम उम्र सीमा नहीं है।

पैन हेतु आवेदन करने के लिए जरूरी दस्तावेज

  • अच्छी गुणवत्ता वाली पासपोर्ट आकार की दो रंगीन फोटो।
  • शुल्क के रूप में है 107 का डिमांड ड्राफ्ट या चेक एवं विदेश (UPBoardSolutions.com) के दिये गये पते पर बनवाने के लिए ₹ 994 का ड्राफ्ट बनवाना जरूरी है।
  • व्यक्तिगत पहचान के प्रमाण की छायाप्रति।
  • आवासीय पते के प्रमाण की छायाप्रति।
  • व्यक्तिगत पहचान व आवासीय पता पहचान दोनों सूची में से अलग-अलग दो दस्तावेज जमा करें।

व्यक्तिगत पहचान के लिए प्रमाण – (निम्न में से कोई भी एक प्रमाण-पत्र)

  1. विद्यालय परित्याग प्रमाण-पत्र
  2. मैट्रिक का प्रमाण-पत्र
  3. मान्यताप्राप्त शिक्षण संस्थान की डिग्री
  4. डिपोजिटरी खाता विवरण
  5. क्रेडिट कार्ड का विवरण
  6. बैंक खाते का विवरण/बैंक पासबुक
  7. पानी का बिल
  8. राशन कार्ड
  9. सम्पत्ति का मूल्यांकन आदेश
  10. पासपोर्ट
  11. मतदाता पहचान-पत्र
  12. ड्राइविंग लाइसेंस
  13. सांसद/विधायक/नगरपालिका पार्षद अथवा किसी (UPBoardSolutions.com) राजपत्रित अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाण-पत्र।

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आवासीय पते के प्रमाण के लिए – (निम्न में से कोई भी एक प्रमाण-पत्र)

  1. बिजली बिल
  2. टेलीफोन बिल
  3. डिपोजिटरी खाता विवरण
  4. क्रेडिट कार्ड का विवरण
  5. बैंक खाता विवरण/बैंक पासबुक
  6. घर किराये की रसीद
  7. नियोक्ता का प्रमाण-पत्र
  8. पासपोर्ट
  9. मतदाता पहचान-पत्र
  10. सम्पत्ति का मूल्यांकन आदेश
  11. ड्राइविंग लाइसेंस
  12. राशन कार्ड
  13. सांसद/विधायक/नगरपालिका पार्षद अथवा (UPBoardSolutions.com) किसी राजपत्रित अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित पहचान प्रमाण-पत्र।

ध्यान दें – यदि आवासीय पते के प्रमाण के लिए क्रम संख्या 1 से 7 तक में उल्लिखित दस्तावेज का उपयोग किया जा रहा हो तो वह जमा करने की तिथि से एक माह से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए।

पैन कार्ड के लिए शुल्क भुगतान की प्रक्रिया

  • पैन आवेदन के लिए शुल्क ₹ 107 है (93.00 + 15% सेवा शुल्क)
  • शुल्क का भुगतान डिमांड ड्राफ्ट, चेक अथवा क्रेडिट कार्ड द्वारा किया जा सकता है।
  • डिमांड ड्राफ्ट या चेक NSDL-PAN के नाम से बना होना चाहिए।  डिमांड ड्राफ्ट मुम्बई में भुगतेय होना चाहिए और डिमांड ड्राफ्ट के पीछे आवेदक को नाम तथा पावती संख्या लिखी होनी चाहिए।
  • चेक द्वारा शुल्क का भुगतान करने वाले आवेदक देशभर में एचडीएफसी बैंक की किसी भी शाखा पर भुगतान कर सकते हैं। आवेदक को जमा पर्ची पर NSDLPAN का उल्लेख करना चाहिए।

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पैन कार्ड के लिए आवेदन प्रपत्र 49A भरने की प्रक्रिया
पैन कार्ड हेतु आवेदन करने के लिए फॉर्म 49A भरकर निर्धारित शुल्क व आवश्यक दस्तावेजों के साथ प्रेषित किया जाता है। आवेदन-पत्र की प्रविष्टियाँ निम्नलिखित क्रम में स्पष्ट रूप से भरनी चाहिए तथा फॉर्म के दोनों ओर फोटो लगाकर हस्ताक्षर (UPBoardSolutions.com) करने के स्थान पर हस्ताक्षर करने चाहिए।

कॉलम-1 :

  • इस कॉलम में आवेदक का पूरा नाम अंग्रेजी के कैपिटल अक्षरों में भरा जाता है।

कॉलम-2 :

  • इस कॉलम में आवेदक अपने नाम के पदबंध (Abbreviation) का संक्षिप्त रूप दर्ज कर सकता है।

कॉलम-3 :

  • इस कॉलम में यदि आवेदक को किसी अन्य नाम से भी जाना जाता है तो उसकी सूचना दर्ज करनी चाहिए। नाम को पहला, मध्य व अन्तिम अक्षर स्पष्ट रूप से लिखना चाहिए।

कॉलम-4 :

  • इस कॉलम में आवेदक अपना लैंगिक विभेद पुरुष/महिला पर निशान लगाकर स्पष्ट करता है।

कॉलम-5 :

  • इस कॉलम में अर्विदक को अपनी जन्मतिथि तथा कम्पनी, ट्रस्ट फर्म आदि की स्थापना तिथि दर्ज करनी चाहिए।

कॉलम-6 :

  • इस कॉलम में आवेदक के पिता का नाम लिखने के लिए स्थान दिया जाता है।

कॉलम-7 :

  • इस कॉलम में आवेदक का पूरा पता तथा उसके कार्यालय का पूरा पता दर्ज करने के लिए मकान नं०, भवन का नाम, पोस्ट ऑफिस, मोहल्ले का नाम, शहर व प्रदेश का नाम, पिन नम्बर तथा राष्ट्र के नाम के लिए पृथक्-पृथक् स्थान दिया होता हे।

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कॉलम-8 :

  • इस कॉलम में संचार के लिए प्रयुक्त होने वाला पता; यथा-निवास अथवा कार्यालयी दोनों में से किसी एक पर सही () का निशान लगाकर सहमति प्रकट करनी होती है।

कॉलम-9 :

  • इस कॉलम में आवेदक का फोन नम्बर, मोबाइल नम्बर व ईमेल एड्रेस लिखने का स्थान होता है।

कॉलम-10 :

  • इस कॉलम में आवेदक के स्तर; यथा-व्यक्तिगत, (UPBoardSolutions.com) कम्पनी, सरकारी, ट्रस्ट आदि में उपयुक्त कॉलम पर सही (V) का निशान लगाना होता है।

कॉलम-11 :

  • इस कॉलम में यदि आवेदन किसी कम्पनी या फर्म की ओर से किया जा रहा हो तो उसकी पंजीकरण संख्या दर्ज करनी चाहिए।

कॉलम-12 :

  • इस कॉलम में यदि आवेदक भारत का नागरिक है तो उसका आधार नम्बर निर्धारित स्थान पर लिखना चाहिए।

कॉलम-13 :

  • इस कॉलम में आवेदक की आय के स्रोत; जैसे-वेतन, व्यवसाय, किराया, कैपिटल गेन या अन्य स्रोतों से होने वाली आय का विवरण दर्ज किया जाता

कॉलम-14 :

  • इस कॉलम में ऐसे प्रतिनिधि का नाम वे पूरा पता दर्ज किया जाता है, जो आवेदक की अनुपस्थिति में आयकर निर्धारण हेतु आवेदक के प्रतिनिधि के रूप में भूमिका निभायेगा।

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कॉलम-15 :

  • इस कॉलम में पहचान-पत्र एवं निवास प्रमाण-पत्र के सन्दर्भ में सूचना दर्ज की जाती है जो कि इस आवेदन-पत्र के साथ संलग्न किए जा रहे हों।

कॉलम-16 :

  • इस कॉलम में आवेदक द्वारा घोषणा कथन पर हस्ताक्षर कर स्पष्ट किया जाता है कि उसके द्वारा दर्ज की गयी सभी जानकारियाँ पूर्ण सत्य हैं।

अन्त में स्थान, दिनांक व हस्ताक्षर करने हेतु बने कॉलमों में प्रविष्टियाँ करके फॉर्म को पूर्ण किया जाता है तथा पैन आवेदन संग्रह केन्द्र के कार्यालय में प्रेषित किया जाता है।

निष्कर्ष
प्रस्तुत परियोजना के माध्यम से हमने पैन कार्ड आदि के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। इसके अतिरिक्त पैन कार्ड के आवेदन हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले फॉर्म सं० 49 A के प्रत्येक कॉलम को भरने एवं उसके सम्बन्ध में पूरी जानकारी का अध्ययन किया। (UPBoardSolutions.com) परियोजना कार्य हेतु संगृहीत की गयी जानकारी वास्तव में अत्यन्त बोधगम्य एवं रोचक सिद्ध हुई।

प्रोजेक्ट कार्य-3

समस्या कथन
आधार कार्ड बनवाने हेतु आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त करना।

प्रस्तावना
आधार कार्ड भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को जारी किया जाने वाला एक पहचान-पत्र है। इसमें 12 अंकों की एक विशिष्ट संख्या मुद्रित होती है जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (भा०वि०प०प्रा०) जारी करती है। यह संख्या भारत में कहीं भी व्यक्ति की पहचान और पते का प्रमाण होता है। भारतीय डाक द्वारा प्राप्त और यू०आई०डी०ए०आई० की वेबसाइट से डाउनलोड किया गया ई-आधार दोनों ही समान रूप से मान्य हैं। (UPBoardSolutions.com) कोई भी व्यक्ति आधार के लिए नामांकन करा सकता है बशर्ते वह भारत का निवासी हो और यू०आई०डी०ए०आई० द्वारा निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया को पूरा करती हो, चाहे उसकी उम्र और लिंग (जेण्डर) कुछ भी हो। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक बार नामांकन करा सकता है। इसका नामांकन निशुल्क है तथा यह नागरिकता का प्रमाण-पत्र न होकर एक पहचान-पत्र मात्र है। UIDAI की प्रथम अध्यक्षा नंदन नीलेकणि हैं। UIDAI का लक्ष्य आगामी वर्षों में सम्पूर्ण भारतवर्ष के लोगों को आधार नम्बर जारी करने का है।

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लक्ष्य, उद्देश्य एवं कार्य-प्रणाली
प्रस्तुत परियोजना कार्य का मुख्य उद्देश्य आधार कार्ड की आवेदन प्रक्रिया का अध्ययन करना है। इसका मुख्य लक्ष्य आधार कार्ड की आवश्यकता, लाभ व उपयोगिता की जानकारी प्राप्त करना है। इसके उद्देश्य एवं लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आनुभाविक शोध विधि का प्रयोग किया गया है और जनसेवा केन्द्र पर जाकर आधार कार्ड का आवेदन-पत्र प्राप्त करके, उसे भरने एवं संलग्न होने वाले दस्तावेजों, डेमोग्राफिक
और बायोमैट्रिक सूचनाओं के संकलन की जानकारी प्राप्त कर इस परियोजना कार्य को पूर्ण करने का प्रयास किया गया है।

आधार कार्ड के लाभ
आधार कार्ड के लाभों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

  1. आधार एक 12 अंकों की प्रत्येक भारतीय की एक विशिष्ट पहचान है।
  2. आधार कार्ड भारत के प्रत्येक निवासी के पहचान-पत्र के रूप में प्रमाण है।
  3. आधार कार्ड डेमोग्राफिक और बायोमैट्रिक आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट पहचान सिद्ध करता है।
  4. यह एक स्वैच्छिक सेवा है जिसका प्रत्येक निवासी लाभ उठा सकता है, चाहे वर्तमान में उसके पास कोई भी दस्तावेज हो।
  5. आधार कार्ड के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक ही विशिष्ट (UPBoardSolutions.com) पहचान आधार नम्बर दिया जाता है।
  6. आधार वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर पहचान प्रदान करता है, जो कि राशन कार्ड, पासपोर्ट आदि जैसी पहचान आधारित ऐप्लिकेशन द्वारा भी प्रयोग में लाया जा सकता है।
  7. यू०आई०डी०ए०आई० किसी भी तरह के पहचान प्रमाणीकरण से सम्बन्धित प्रश्नों के हाँ/नहीं में उत्तर प्रदान करेगा।
  8. आधार संख्या को बैंकिंग, मोबाइल फोन कनेक्शन और सरकारी व गैर-सरकारी सेवाओं की सुविधाएँ प्राप्त करने में प्रयोग किया जा सकता है।

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आधार कार्ड की आवश्यकता और उपयोग
आधार कार्ड पहचान-पत्र तथा निवास प्रमाण-पत्र के रूप में सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी विभागों में जरूरी हो गया है; क्योंकि पहचान के लिए हर जगह आधार कार्ड माँगा जाता है। आधार कार्ड के महत्त्व को बढ़ाते हुए भारत सरकार ने भी बड़े फैसले लिए हैं जिसमें निम्नलिखित कार्यों के लिए आधार संख्या दर्ज कराना अनिवार्य कर दिया गया है

  1. पासपोर्ट जारी करने के लिए आधार को अनिवार्य कर दिया गया है।
  2. बैंक में जनधन खाता खोलने के लिए
  3. एलपीजी की सब्सिडी पाने के लिए।
  4. ट्रेन टिकट में छूट पाने के लिए।
  5. परीक्षाओं में बैठने के लिए (जैसे—आईआईटी जेईई के लिए)
  6. बच्चों को नर्सरी कक्षा में प्रवेश दिलाने के लिए।
  7. डिजिटल जीवन प्रमाण-पत्र (UPBoardSolutions.com) (लाइफ सर्टिफिकेट) के लिए
  8. प्रॉविडेंट फंड के भुगतान के आवेदन हेतु
  9. डिजिटल लॉकर के लिए।
  10. सम्पत्ति के रजिस्ट्रेशन के लिए
  11. छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति को बैंक में जमा कराने हेतु
  12. सिम कार्ड खरीदने के लिए।
  13. आयकर रिटर्न हेतु। आयकर विभाग करदाताओं को आधार कार्ड के जरिए आयकर रिटर्न की ई-जाँच करने की सुविधा प्रदान करता है।

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आधार कार्ड के आवेदन की प्रक्रिया
आधार कार्ड के आवेदन प्रपत्र में निम्नलिखित सूचनाएँ संदर्भित विषय-वस्तु के अनुसार भरी जाती हैं

कॉलम-1 :

  • इस कॉलम में नामांकन संख्या उपलब्ध हो तो अवश्य भरनी चाहिए।

कॉलम-2 :

  • इस कॉलम में राष्ट्रीय रजिस्टर का रसीद (UPBoardSolutions.com) नम्बरे अथवा टिन नम्बर भरना चाहिए।

कॉलम-3 :

  • इस कॉलम में दिए गए स्थान पर आवेदक को पूरा पता लिखना चाहिए।

कॉलम-4 :

  • इस कॉलम में लैंगिक विभेद अर्थात् पुरुष/स्त्री व अन्य में से उपयुक्त स्थान पर सही (V) का निशान लगाना चाहिए।

कॉलम-5 :

  • इस कॉलम में जन्मतिथि का विवरण भरना चाहिए।

कॉलम-6 :

  • इस कॉलम में पते से सम्बन्धित विवरण दर्ज करना चाहिए।

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कॉलम-7 :

  • इस कॉलम में माता, पिता, पति, पत्नी आदि से सम्बन्धित जानकारी; यथा–नाम व आधार नम्बर, जन्मतिथि आदि का विवरण दर्ज करना चाहिए।

कॉलम-8 :

  • इस कॉलम में अनापत्ति कथन पर सही (V) अथवा गलत (४) का निशान ” लगाकर सहमति/असहमति प्रकट करनी चाहिए।

कॉलम-9 :

  • इस कॉलम में आधार संख्या को अन्य सरकारी विभागों; जैसे—बैंक, (UPBoardSolutions.com) आदि से जोड़ने के लिए अनापत्ति कथन हेतु सहमति प्रकट करना और बैंक का नाम, खाता संख्या आदि दर्ज करना चाहिए।

कॉलम-10 :

  • इस कॉलम में संलग्न किए जाने वाले दस्तावेजों; जैसे-पहचान पत्र, निवास प्रमाण-पत्र, सम्बन्ध प्रमाण-पत्र तथा जन्म प्रमाण-पत्र आदि पर सही (V) का निशान लगाकर उस आवेदन-पत्र के साथ संलग्न करना चाहिए।

कॉलम-11 :

  • इस कॉलम में पहचान आधारित विवरण भरना चाहिए जिसमें माता, पिता, पति, पत्नी, अभिभावक आदि की जानकारी दर्ज की जाती है जिसमें मुख्य रूप से उनकी आधार संख्या दर्ज करनी चाहिए।

अन्त में, आवेदन पत्र में भरी गयी जानकारियों के सत्यापन के लिए मुद्रित कथन के नीचे हस्ताक्षर करके तथा पहचानकर्ता को नाम लिखकर एवं हस्ताक्षर कराकर जनसेवा केन्द्र या डाक घर में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर आधार कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं। सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत होकर बायामैट्रिक माध्यम से अपने हाथों की अँगुलियों की छाप, आँखों के इम्प्रेशन तथा फोटो खिंचवाने की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद सक्षम अधिकारी अगली कार्यवाही के लिए फॉर्म को अग्रसारित करते हैं तथा एक से दो सप्ताह के भीतर डाक के माध्यम से आधार कार्ड दिए गए पते पर पहुँच जाता है।

निष्कर्ष
प्रस्तुत परियोजना कार्य के माध्यम से हमने जनसेवा केन्द्र पर जाकर आधार कार्ड के आवेदन से सम्बन्धित पूर्ण जानकारी का अध्ययन किया और आवेदन प्रपत्र भरने, आधार कार्ड के लाभों, आवश्यकता और उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी अर्जित की। इस परियोजना कार्य से यह भी ज्ञात हुआ कि आधार कार्ड प्रत्येक भारतीय को पहचान प्रदान करने वाला महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है तथा इसे 12 अंकों की विशिष्ट संख्या द्वारा अनुमोदित (UPBoardSolutions.com) किया जाता है। आधार कार्ड को भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा जारी किया जाता है; अतः हमें इस परियोजना कार्य के माध्मय से ही आधार कार्ड सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारियों को प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

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प्रोजेक्ट कार्य-4

समस्या कथन
व्यक्तिगत आयकर किस प्रपत्र पर और कैसे भरा जाता है? इसकी जानकारी प्राप्त करना।

प्रस्तावना
सरकार को अपने कर्तव्य निभाने के लिए बहुत-से कार्य; जैसे देश की सुरक्षा करना, कानून व्यवस्था बनाये रखना, स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधा देना, न्याय-पद्धति को चलाना, बेरोजगारी एवं गरीबी का उन्मूलन करना, आदि करने होते हैं। इन सभी पर सरकार को बहुत अधिक धन व्यय करना पड़ता है।

देश के विकास के लिए और इन सभी कार्यों को करने के लिए इतनी मात्रा में धन सरकार अनेक साधनों से जुटाती है, इनमें से एक महत्त्वपूर्ण साधने को कर प्रणाली (Taxation) कहा जाता है। आयकर, सेवाकर, बिक्री कर, सम्पत्ति कर, मनोरंजन कर, चुंगी शुल्क, सीमा शुल्क आदि सरकार की आय के विभिन्न स्रोत हैं। केन्द्रीय सरकार प्रदेश सरकार अथवा स्थानीय संस्थाएँ किस क्षेत्र में कर लगा सकती है, इसका निर्धारण पहले से ही रहता है। केन्द्र सरकार इन करों का अधिक भाग प्राप्त करती है, इसलिए उसे इन साधनों का कुछ अंश प्रदेश सरकारों या संघीय क्षेत्रों को देना होता है, ताकि वे भी विकास के लिए और दूसरे खर्च करने के लिए इसका उपयोग कर सकें; अतः आयकर सरकार की आय का सबसे बड़ा स्रोत है।

लक्ष्य एवं उद्देश्य
प्रस्तुत परियोजना कार्य का मुख्य उद्देश्य आयकर की जानकारी प्राप्त करना है तथा इसका लक्ष्य आयकर जमा करने की प्रक्रिया से अवगत कराना है जिसके कि विद्यार्थी आयकर के महत्त्व, प्रक्रिया एवं दरों का विधिवत अध्ययन कर सकें।

भारत में आयकर का स्वरूप
आयकर विभाग ने देयकर्ता के लिए टैक्स स्लैब में अनेक परिवर्तन किए हैं, जो वित्तीय वर्ष (2017-18) तथा आकलन वर्ष 2018-19 के लिए हैं। भारत में जहाँ पहले ₹ 2.5 लाख से लेकर ₹ 5 लाख तक की सालाना आय पर 10 फीसदी टैक्स लगता था, अब यह टैक्स (UPBoardSolutions.com) 5 फीसदी लगेगा, वहीं ₹ 2.5 लाख तक आय पूरी तरह से टैक्स मुक्त है। इसके अलावा सरकार ने 50 लाख से लेकर 1 करोड़ तक की आय वालों पर 10 फीसदी की सरचार्ज लगाया है, जो अब तक नहीं था। आयकर के नए नियमों के अनुसार इसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

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सामान्य वर्ग के लोगों हेतु आयकर के प्रावधान – 60 वर्ष तक आयु वाले किसी भी व्यक्ति की वार्षिक आय यदि ₹ 2.5 लाख से अधिक है, तब वह टैक्स छूट के दायरे से बाहर माना जाएगा, यानी केवल ₹ 2.5 लाख तक की आय ही करमुक्त है। इसके बाद ₹ 5 लाख तक की सालाना आय वाले व्यक्ति को 5 फीसदी टैक्स का होगा, साथ ही र 5 लाख तक की करयोग्य आय पर पहले ₹ 5 हजार की छूट मिलती थी जोकि अब घटाकर ₹ 2500 कर दी गयी है और यह ₹ 3.5 लाख तक की करयोग्य आय पर मिलेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी व्यक्ति की वार्षिक आय ₹ 3 लाख थी तो उसकी टैक्स भुगतान की जिम्मेदारी नहीं थी। आयकर के नए नियमों के अनुसार आयकर का वर्णन निम्नलिखित हैं

₹ 2.5 लाख  तक                                     शून्य
₹ 2.5 लाख 1 से ₹ 5 लाख तक     ……… 5%
₹ 5 लाख 1 से 10 लाख तक          ……… 20%
₹ 10 लाख से अधिव                     ……… 30%

₹ 5 लाख से है 10 लाख की आय पर 20 प्रतिशत आयकर होगा और ₹ 10 लाख से अधिक की आय पर 30 प्रतिशत आयकर लागू होगा, लेकिन यदि आय ₹ 50 लाख से ज्यादा है (सालाना) तथा ₹ 1 करोड़ है, तब सरचार्ज बढ़कर 15 प्रतिशत हो जाएगा। यह बढ़ा हुआ 5 फीसदी सरचार्ज एजुकेशन सेस और हायर एजुकेशन सेस है।

वरिष्ठ नागरिक (60 से 80 आयु वर्ष के लोगों के लिए ) – वरिष्ठ नागरिक जो कि 0 से ₹ 3 लाख सालाना आय के दायरे में आते हैं, उन पर कोई आयकर देनदारी नहीं आती। ₹ 3 से 5 लाख तक की आय पर 5 प्रतिशत की दर से कर लागू होगा। ₹ 5 लाख से ₹ 10 लाख तक की आय और के 10 लाख से अधिक की आय पर सामान्य श्रेणी के लिए लागू कर की दर और सरचार्ज वरिष्ठ नागरिकों पर भी लागू होंगे।

₹ 3 लाख तक                                     …… शून्य
₹ 3 लाख 1 से ₹ 5 लाख तक               …… 5%
₹ 5 लाख 1 से ₹ 10 लाख तक             …… 20%
₹ 10 लाख से अधिक                          …… 30%

अति वरिष्ठ नागरिक ( 80 वर्ष की आयु से अधिक के लोगों के लिए)-वे वरिष्ठ नागरिक जिनकी आयु 80 वर्ष से अधिक है, वे इस श्रेणी में आते हैं। उनके लिए ₹ 5 लाख तक की आय पूरी तरह से कर-मुक्त होगी, परन्तु शेष सभी कर स्लैब वही लागू होंगे जो कि (UPBoardSolutions.com) सामान्य श्रेणी पर लागू हैं।

₹ 5 लाख तक                                        ……. शून्य
₹ 5 लाख 1 से ₹ 10 लाख तक                ……. 20
₹ 10 लाख से अधिक                              ……. 30%

आयकर की दरों का सिंहावलोकन
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Project Work (प्रोजेक्ट कार्य)

प्रत्येक वर्ष वित्तीय वर्ष समाप्त होने के बाद वे सभी व्यक्ति आयकर देने के लिए बाध्य हैं, जो आयकर द्वारा निर्धारित कर सीमा के अन्तर्गत आते हैं। आयकर के भुगतान के लिए आयकर विभाग द्वारा पृथक्-पृथक् फॉर्मों के माध्यम से आयकर जमा करने हेतु आवेदन पत्र बनाए गए हैं। इन फॉर्मों के माध्यम से व्यक्ति यह घोषित करता है कि विगत वर्ष में उसे कितनी आय हुई तथा उस आय के लिए कितने कर का भुगतान किया। यही प्रक्रिया इनकम (UPBoardSolutions.com) टैक्स रिटर्न कहलाती है। वित्तीय वर्ष समाप्त होने के पश्चात आयकर विभाग, आयकर जमा करने के लिए एक अन्तिम तिथि का निर्धारण करता है। वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए आयकर जमा करने की अन्तिम तिथि 31 जुलाई निर्धारित की गयी है।

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व्यक्तिगत आयकर जमा करने के फॉर्म
व्यक्तिगत रूप से आयकर जमा करने के लिए निम्नलिखित फॉर्मों को उनकी श्रेणी के आधार पर भरा जाता है, जिनका वर्णन निम्नलिखित है

ITR-1 :

  • इस फॉर्म को सहज फॉर्म भी कहा जाता है जिनकी आय के साधन उनका वेतन, पेंशन या ब्याज है तथा जिस व्यक्ति के पास अपना घरे हो और उसने हाउसिंग लोन लिया हो, उसे भी यह फॉर्म भरना होता है।

IRT-2 :

  • यह फॉर्म हिन्दू अविभाजित परिवार (HUF) के लिए आयकर जमा करने हेतु भरा जाता है। इसके अतिरिक्त यदि किसी व्यक्ति के आय के साधन वेतन, पेंशन तथा ब्याज के अतिरिक्त एक से ज्यादा घर से आने वाली किराये की धनराशि, कैपिटल गेन या (UPBoardSolutions.com) डिविडेंड से प्राप्त होने वाली आमदनी है तो ऐसे लोगों को भी इसी फॉर्म के माध्यम से आयकर जमा करने का प्रावधान है।

TTR-3 :

  • यह फॉर्म उन लोगों के लिए होता है, जो किसी व्यवसाय में साझेदार (Partner) हैं तथा उनकी आय का स्रोत केवल यही है।

ITR-4 :

  • इस फॉर्म को सुगम फॉर्म कहा जाता है। यह फॉर्म सभी प्रकार के प्रोफेशनल्स; जैसे-डॉक्टर, वकील, सी०ए० आदि के लिए होता है। इसके अतिरिक्त वह व्यक्ति जो किसी व्यवसाय में साझेदार होने के साथ-साथ प्रोफेशनल इनकम भी अर्जित करता है, उसके लिए भी यही फॉर्म भरने का प्रावधान है। सुगम फॉर्म के माध्यम से आयकर अधिनियम के सेक्शन 44AD, 44ADA तथा 44AE के अन्तर्गत आयकर जमा कराया जाता है।

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ITR-4s :

  • यह फॉर्म उन छोटे व्यापारियों के लिए है जिनकी वार्षिक आय ₹ 60 लाख से कम है तथा ऐसे प्रोफेशनल व्यक्ति जिनकी आय ₹ 60 लाख से कम है, उन्हें भी यही फॉर्म भरना होता है। इन लोगों को अपने खातों को अंकेक्षण (Audit) कराने की आवश्यकता नहीं होती है।

वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर प्रत्येक व्यक्ति को उपरोक्त वर्णित फॉर्मों में से उस फॉर्म को भरना होता है जिसके लिए वह पात्र होता है। इस फॉर्म के द्वारा व्यक्ति अपनी वार्षिक आय पर उचित कर का भुगतान करता है। यह कर प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है; जैसे-वेतन से प्राप्त आय तथा व्यक्तिगत व्यापार करने वालों के लिए अलग। जो व्यक्ति वेतनभोगी हैं, उनके लिए फॉर्म-16 प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। इसमें उस व्यक्ति (UPBoardSolutions.com) की सालाना आय बताई जाती है तथा उसके द्वारा किये गये पूँजी सम्बन्धी निवेश पर छूट दी जाती है। यही सब जोड़-घटाकर जो भी शेष राशि होती है, उस पर आयकर का भुगतान किया जाता है। इसी प्रकार, प्रोफेशनले व्यक्ति तथा व्यापारी भी अपने आय-व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं तथा आर्थिक चिट्ठा बनाकर अपने लाभ-हानि की घोषणा करते हैं। इसी आधार पर वह आयकर का भुगतान करते हैं।

आयकर जमा करने हेतु ITR-1 (सहज) फॉर्म भरने की प्रक्रिया
आयकर का सहज फॉर्म (ITR-1) क्रमशः पाँच खण्डों एवं दो प्रकार की अनुसूचियों से मिलकर बना है। प्रत्येक खण्ड एवं अनुसूची को भरने का वर्णन अग्रलिखित है

1. खण्ड-A : सामान्य जानकारी-सहज फॉर्म के इस भाग में आयकरदाता का पैन, आधार कार्ड नम्बर, मोबाइल नम्बर, ई-मेल, पूरा पता, निवास की स्थिति, सम्बद्धता; यथा–सरकारी कर्मचारी, पी०एस०यू० या अन्य, आयकर भरने की मूल तिथि, यदि फॉर्म में संशोधन हो तो उसकी फॉर्म संख्या, या किसी प्रकार के नोटिस का सन्दर्भ हो तो नोटिस संख्या भरने के लिए नियत स्थान एवं कॉलमों में जानकारी भरनी चाहिए।

2. खण्ड-B:
सकल कुल आय-इस खण्ड में कुल आय के स्रोतों की जानकारी भरनी होती है; जैसे-वेतन, पेंशन, एक गृह सम्पत्ति से आय, अन्य स्रोतों से आय यदि हो तो इनमें से जिस भी स्रोत से आय हो उसके वर्षभर का योग निर्धारित कॉलम में लिखना चाहिए तथा अन्त में कुल योग करना चाहिए।

3. खण्ड-c :
करयोग्य कुल आय में से कटौतियाँ—इस खण्ड में करयोग्य कुल आय में से वित्तीय वर्ष में किए गए ऐसे निवेशों को घटाया जा सकता है, जो आयकर की धारा 80C, 80D, 80G या 80 TTA में करमुक्त हैं। ऐसे निवेशों की जानकारी अथवा धनराशि निर्धारित कॉलम में लिखनी चाहिए जिससे आयकर में छूट प्राप्त की जा सके।

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4. खण्ड-D :
देयकर की गणना-इस खण्ड में देय योग्य कर की गणना की जाती है। इसके कॉलम D1 में कुल आय पर देय कर की संख्या लिखी जाती है। कॉलम D2 में सेक्शन 87A में कर से छूट, यदि कोई हो तो उसकी संख्या लिखी जाती है। D3 कॉलम में छूट प्राप्ति के बाद कुल कर योग्य धनराशि लिखी जाती है। कॉलम D4 में उपकर या सेस की धनराशि का वर्णन किया जाता है तथा Ds कॉलम में कर एवं सेस का कुल योग लिखा जाता है। कॉलम D6 में सेक्शन 89(1) के अन्तर्गत प्रदान की जाने वाली कर राहत का ब्यौरा होता है। कॉलम D7, Da एवं Dj में कर पर ब्याज की गणना लिखी जाती है। D10 कॉलम में कुल कर एवं ब्याज को जोड़कर लिखा जाता है। कॉलम D11 में कुल देय कर धनराशि वर्णित की जाती है। D12 कॉलम में D13 कॉलम में यदि किसी प्रकार का कोई प्रतिदेय (Refund) हो तो उसका वर्णन होता है। इस खण्ड के अन्त में करमुक्त आय की सूचना देने के लिए निर्दिष्ट कॉलम होते हैं; जैसे-सेक्शन 10(38), 10 (34), कृषि आय या अन्य आदि।

5. खण्ड-E :
अन्य जानकारी-इस खण्ड में बैंक से सम्बन्धित जानकारियों का वर्णन होता है; जैसे—बैंक का नाम, खाता संख्या, IFSC कोड, खाते में नकद जमा का कुल योग आदि का ब्यौरा दिया जाता है।

6. अग्रिम कर अनुसूची – 
इस अनुसूची में यदि करदाता ने कोई अग्रिम आयकर जमा कराया हो तो उसका विवरण भरना होता है। इसमें बी०एस०आर० कोड, अग्रिम कर जमा करने की तिथि, चालान नम्बर तथा जमा किए गए कर की धनराशि आदि दर्ज करने के (UPBoardSolutions.com) पृथक्-पृथक् कॉलमों में सभी विवरण भरा जाता है।

7. टी०डी०एस०/टी०सी०एस० विवरण अनुसूची – 
इस अनुसूची में करदाता यदि वित्तीय वर्ष में किसी से भी भुगतान प्राप्त करते समय टी०डी०एस० कटवा चुका है तो उसका प्रमाण-पत्र प्राप्त करे उसका विवरण यहाँ प्रस्तुत करना चाहिए। इसमें प्रथम कॉलम में टी०डी०एस० काटने वाले का TAN नम्बर भरा जाता है, दूसरे कॉलम में उसका नाम तथा तीसरे कॉलम में जिस राशि पर कर काटा गया है, उसका ब्यौरा लिखा जाता है। चौथे कॉलम में वर्ष तथा पाँचवें कॉलम में उस धनराशि को लिखा जाता है। कि जिसके लिए हमें उस वित्तीय वर्ष क्लेम करना चाहते हैं। सातवें कॉलम में वह राशि लिखी जाती है। जिसका क्लेम आयकरदाता अपने स्वयं के लिए न करके अपनी पत्नी/पति (spouse) के लिए करता है। यह सेक्शन 5A के अन्तर्गत आता है।

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8. सत्यापन – 
इसे फॉर्म के अन्त में आयकरदाता द्वारा उपरोक्त जानकारी का सत्यापन किया जाता है जिसके अन्तर्गत आयकरदाता अपना नाम, पिता का नाम लिखकर यह घोषणा करता है कि उपरोक्त सभी जानकारियाँ उसके ज्ञान और विश्वास के अनुरूप सत्य एवं सही हैं तथा आयकर अधिनियम, 1961 के सभी प्रावधानों के अनुरूप हैं। इस प्रकार सत्यापन कथन के नीचे आयकरदाता अपने हस्ताक्षर कर इसे प्रमाणित एवं सत्यापित करता है।

9. फॉर्म प्राप्ति की रसीद – 
इस.फॉर्म के बाएँ ओर कार्यालय प्रयोग हेतु एक बॉक्स होता है जिसमें प्राप्ति संख्या, दिनांक, प्राप्त करने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर तथा मोहर लगाने हेतु स्थान होता है। इस फॉर्म को आयकर कार्यालय में जमा करने के उपरान्त आयकरदाता को इसकी प्राप्ति की रसीद प्रदान की। जाती है।

निष्कर्ष
प्रस्तुत परियोजना के माध्यम से हमने आयकर के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की तथा व्यक्तिगत रूप से व्यक्ति को कितनी आय पर कितने कर का भुगतान करना पड़ता है, उन सभी नियमों का अवलोकन किया। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत आयकर प्रपत्र (ITR-1) सहज फॉर्म किस प्रकार भरा जाता है तथा उसमें क्या-क्या विवरण होता है, इसकी भी जानकारी प्राप्ति की। इस परियोजना कार्य से हम भारत की प्रगतिशील कर नीति, कुशल एवं दक्ष प्रशासन (UPBoardSolutions.com) तथा बेहतर स्वैच्छिक अनुपालन के द्वारा आने वाले राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड).

कवि परिचय

प्रश्न 1.
सुमित्रानन्दन पन्त का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए। [2009, 10]
या
सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी किसी एक रचना का नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
श्री सुमित्रानन्दन पन्त का सम्पूर्ण काव्य आधुनिक काव्य-चेतना का प्रतीक है। ये ऐसे कवि हैं। जो हिन्दी-साहित्य-कानन को झरने के समान कल-कल निनाद से मुखरित कर नवजीवन प्रदान करते हैं। इन्होंने अपने काव्य की लय-ताल में मानव-जीवन की (UPBoardSolutions.com) लय-ताल को निबद्ध करने का प्रयास किया है। इनके काव्य में धर्म, दर्शन, नैतिक एवं सामाजिक मूल्य, प्रकृति की सुकुमारता-उद्दण्डता आदि एक साथ देखी जा सकती है। वास्तव में इनका काव्य; काव्य-रसिकों के गले को कण्ठहार है। |

जीवन-परिचय–सुकुमार भावनाओं के कवि और प्रकृति के चतुर-चितेरे श्री सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म 20 मई, सन् 1900 ई० को प्रकृति की सुरम्य गोद में अल्मोड़ा के निकट कौसानी नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पं० गंगादत्त पन्त था। इनके जन्म के छः घण्टे के बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया था; अतः इनका लालन-पालन पिता और दादी के वात्सल्यं की छाया में हुआ। पन्त जी ने अपनी शिक्षा का प्रारम्भिक चरण अल्मोड़ा में पूरा किया। यहीं पर इन्होंने अपना नाम गुसाईंदत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन रखा। इसके बाद वाराणसी के जयनारायण हाईस्कूल से स्कूल-लीविंग की परीक्षा उत्तीर्ण की और जुलाई, 1919 ई० में इलाहाबाद आये और म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के आह्वान पर असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर इन्होंने बी० ए० की परीक्षा दिये बिना ही कॉलेज त्याग दिया था। इन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला और हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। प्रकृति की गोद में पलने के कारण इन्होंने अपनी सुकुमार भावना को प्रकृति के चित्रण में व्यक्त किया। इन्होंने प्रगतिशील विचारों की पत्रिका रूपाभा’ का प्रकाशन किया। सन् 1942 ई० में भारत छोड़ो आन्दोलन से प्रेरित होकर ‘लोकायन’ नामक सांस्कृतिक पीठ की स्थापना की और भारत-भ्रमण हेतु निकल पड़े। सन् 1950 ई० में ये ऑल इण्डिया रेडियो के परामर्शदाता पद पर नियुक्त हुए और सन् 1976 ई० में भारत सरकार ने इनकी साहित्य-सेवाओं को ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया। इनकी कृति ‘चिदम्बरा’ पर इनको ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 28 दिसम्बर, सन् 1977 ई० को इस महान् । साहित्यकार ने इस भौतिक संसार से सदैव के लिए विदा ले ली और चिरनिद्रा में लीन हो गये।

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रचनाएँ-पेन्त जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने कविता के अतिरिक्त नाटक, उपन्यास और कहानियों की भी रचना की है, परन्तु काव्य ही इनका प्रधान क्षेत्र रहा है। अपने दीर्घकालिक काव्य-जीवन में इन्होंने हिन्दी काव्य-जगत को अनेक कृतियों प्रदान की हैं जो निम्नलिखित हैं

(1) वीणा—यह पन्त जी की प्रथम काव्य-पुस्तक है। इसमें प्रकृति-निरीक्षण, अनुभूति और कल्पनाओं का सुन्दर रूप दिखाई देता है।
(2) ग्रन्थि-यह असफल प्रेम की दुःखपूर्ण गाथा का काव्य है। इसमें वियोग श्रृंगार की प्रधानता है।
(3) पल्लव–यह कल्पना-प्रधान काव्य है। इसमें प्रकृति-निरीक्षण और ऊँची कल्पनाओं के दर्शन । होते हैं। इसमें ‘वसन्तश्री’,’परिवर्तन’; ‘मौन-निमन्त्रण’, ‘बादल’ आदि श्रेष्ठ कविताएँ संकलित हैं।
(4) गुंजन-इसमें कवि का मन प्रकृति से हटकर आत्मचित्रण की ओर लग (UPBoardSolutions.com) गया है। नौकाविहार’ इस संकलन की श्रेष्ठ कविता है।
(5) युगान्त,
(6) युगवाणी,
(7) ग्राम्या—इन काव्यों में कवि पर गाँधीवाद और समाजवाद का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है।
(8) लोकायतन-इस महाकाव्य में कवि की सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारधारा व्यक्त हुई है। इसमें ग्राम्य-जीवन और जनभावना को स्वर प्रदान किया गया है।
पन्त जी की अन्य रचनाएँ हैं—पल्लविनी, अतिमा, युगपथ, ऋता, स्वर्णकिरण, चिदम्बरा, उत्तरा, कला और बूढ़ा चाँद, शिल्पी, स्वर्णधूलि आदि।

साहित्य में स्थान-सुन्दर, सुकुमार भावों के चतुर-चितेरे पन्त ने खड़ी बोली को ब्रजभाषा जैसा माधुर्य एवं सरसता प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। पन्त जी गम्भीर विचारक, उत्कृष्ट कवि और मानवता के सहज आस्थावान् कुशल शिल्पी हैं, जिन्होंने नवीन सृष्टि के अभ्युदय की कल्पना की है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि “पन्त जी हिन्दी कविता के श्रृंगार हैं, जिन्हें पाकर माँ-भारती कृतार्थ हुई।

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पद्यांशों की सन्दर्भ व्याख्या चींटी

प्रश्न 1.
चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे-सी जो हिल-डुल,
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल
वह है पिपीलिका पाँति !
देखो ना, किस भाँति ।
काम करती वह सतत !
कन-कन करके चुनती अविरत ! [2012]
गाय चराती,
धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना सँवारती,
घर आँगन, जनपथ बुहारती ।
उत्तर
[विरल = जो घंनी न हो। तम = अन्धकार। लघुपद = छोटे-छोटे पैरों से। पल-पल = थोड़ी-थोड़ी देर में। पिपीलिका = चींटी। सतत = निरन्तर। अविरत = बिना रुके। अरि = शत्रु। बुहारती = साफ करती।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत पद्यावतरण प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन (UPBoardSolutions.com) पन्त द्वारा रचित ‘युगवाणी’ । काव्य-संग्रह की चींटी’ शीर्षक कविता से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित ” किया गया है।

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प्रसंग-इस अवतरण में कवि ने चींटी जैसे लघु प्राणी की परिश्रमशीलता का वर्णन करके मनुष्य को उससे प्रेरणा प्राप्त करने का सन्देश दिया है।

व्याख्या-कवि प्रश्न करता है कि क्या तुमने कभी चींटी को ध्यानपूर्वक देखा है? चीटियों की पंक्ति एक सरल (सीधी) काली और विरल रेखा के समान प्रतीत होती है। वह अपने छोटे-छोटे पैरों से प्रति क्षण चलती रहती है। चींटियाँ जब मिलकर चलती हैं तो ऐसा मालूम पड़ता है जैसे कोई पतलां काला धागा हिल-डुल रहा हो। कवि आगे कहता है कि वह चींटियों की पंक्ति (कतार) है। तुम ध्यान से देखो कि वह किस प्रकार निरन्तर चलती रहती है। वह निरन्तर अपने काम में जुटी रहती है और अपने व अपने परिवार के लिए छोटे-छोटे उपयोगी कणों को बिना रुके लगातार चुनती रहती है।

इतना ही नहीं, उसका भी घर-समाज है। यह गाय चराती है और उन्हें धूप खिलाती है। प्राणिशास्त्रियों के अनुसार चींटियों में भी गायें होती हैं। वे अपने बच्चों की देखभाल करती हैं, अपने शत्रुओं से निर्भय होकर लड़ती हैं, अपनी सेना सजाती हैं तथा घर, (UPBoardSolutions.com) आँगन और रास्ते को साफ करती प्रतीत होती हैं।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. इन पंक्तियों में चींटी की श्रमशीलता (कर्मठता) पर प्रकाश डाला गया है।
  2. कवि चींटी के माध्यम से मनुष्य को सतत कर्म करने की प्रेरणा दे रहा है। कवि के अनुसार चीटियों का लघु स्वरूप और मिल-जुलकर कार्य करने की प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि शारीरिक लघुता व्यक्ति की कार्य-क्षमता पर अधिक प्रभावी नहीं हो सकती है।
  3. भाषा-सरल साहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैलीवर्णनात्मक।
  5. रस-वीर रस (कर्मवीरता के कारण)।
  6. गुण-ओज।
  7. अलंकार-तम के तागेसी जो हिल-डुल’ में उपमा और अनुप्रास; ‘कन-कन’ में पुनरुक्तिप्रकाश।
  8. भावसाम्य–जिस प्रकार पन्त ने चींटी के माध्यम से (UPBoardSolutions.com) सदैव कर्मरत रहने की प्रेरणा दी है, वैसे ही राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी सतत कर्मशील बने रहने पर बल दिया है

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नर हो, न निराश करो मन को।
कुछ काम करो, कुछ काम करो,
जग में रहकर कुछ नाम करो।

प्रश्न 2.
चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक !
देखा चींटी को ?
उसके जी को ?
भूरे बालों की सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भय
विचरण करती, श्रम में तन्मय,
वह जीवन की चिनगी अक्षय।
वह भी क्या देही है, तिल-सी ?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी !
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती।
उत्तर
[ श्रमजीवी = श्रम करके जीने वाली। चिनगी (UPBoardSolutions.com) = चिंगारी। अक्षय = कभी नष्ट न होने वाली। अथक = बिना थके।]।

सन्दर्भ--पूर्ववत्।।

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने चींटी के गुणों और उसकी क्रियाशीलता का वर्णन किया है।

व्याख्या-चींटी एक सामाजिक प्राणी है। चींटी का अपना एक समाज होता है और उसी के साथ वह हिल-मिलकर नियमपूर्वक रहती है। वह कठोर परिश्रमी जीव है और उसमें एक अच्छे नागरिक के सभी गुण विद्यमान हैं।

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कवि कहता है कि तुमने चींटी को ध्यान से देखा होगा। वह अत्यधिक लघु प्राणी है, परन्तु उसका । हृदय एवं आत्मबल अत्यन्त विशाल है। चींटियों की पंक्ति भूरे बालों की कतरन के समान दिखाई देती है। उसकी लघुता को सभी जानते हैं, लेकिन उसके हृदय में असीम साहस है। वह सारी पृथ्वी पर, जहाँ चाहती है, निर्भय होकर विचरण करती है। उसे किसी भी स्थान पर घूमने में भय नहीं लगता है। वह लगातार अपने श्रम से, (UPBoardSolutions.com) भोजन को एकत्र करने के काम में तल्लीन होकर जुटी रहती है। चींटी श्रम की साकार मूर्ति है। वह जीवन की कभी नष्ट न होने वाली चिंगारी है। चींटी एक अतिलघु प्राणी है, परन्तु उसमें जीवन की सम्पूर्ण ज्योति जगमगाती है।

कवि कहता है कि उसका शरीर बड़ा नहीं, अपितु वह तिल के समान अत्यन्त छोटा है। इतनी छोटी होते हुए भी चींटी शक्ति से भरी हुई इधर-उधर घूमती रहती है। दिनभर में वह कई मील की लम्बी यात्रा पूरी करती है, फिर भी वह कभी थकती नहीं है और निरन्तर अपने काम में जुटी रहती है। धूप, छाँव, शीत, वर्षा में भी वह अपना कार्य करने से नहीं चूकती है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. पन्त जी ने चींटी जैसे लघु प्राणी में भी आदर्श सामाजिक प्राणी के गुण देखे हैं।
  2. कवि तुच्छ दिखने वाले जीवन में भी महानता के तत्त्व हूँढ़ने में सक्षम है।
  3. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैली-वर्णनात्मक।
  5. रस-वीर रस (कर्मवीरता के कारण)।
  6. अलंकार-‘भूरे बालों की सी कतरन’ में उपमा, ‘रिलमिल-झिलमिल’ में अनुप्रास।
  7. गुण-ओजमिश्रित प्रसाद।
  8. भावसाम्य-जिस प्रकार चींटी धूप-छाँव, शीत-वर्षा की चिन्ता किये बिना (UPBoardSolutions.com) आजीवन श्रमशील बने रहने की प्रेरणा देती है, उसी प्रकार रामनरेश त्रिपाठी भी मृत्युपर्यन्त कर्म करने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं

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कर्म तुम्हारा धर्म अटल हो,
कर्म तुम्हारी भाषा।
हो सकर्म ही मृत्यु तुम्हारे
जीवन की अभिलाषा।

चंद्रलोक में प्रथम बार
प्रश्न 1.
चंद्रलोक में प्रथम बार,
मानव ने किया पदार्पण,
छिन्न हुए लो, देश काल के,
दुर्जय बाधा बंधन।
दिग-विजयी मनु-सुत, निश्चय,
यह महत् ऐतिहासिक क्षण,
भू-विरोध हो शांत,
निकट आये सब देशों के जन। [2015]
युग-युग का पौराणिक स्वप्न
हुआ मानव का संभव,
समारंभ शुभ नए चन्द्र-युग का
भू को दे गौरव।।
उत्तर
[पदार्पण = पैर रखना। दुर्जय = कठिनाई से जीते जा सकने वाले। बाधा = रुकावट, अड़चन। दिग्-विजयी = दिशाओं को जीतने वाला। मनु-सुत = मनुष्य। महत् = बड़ा। भू-विरोध = पृथ्वी पर दिखाई देने वाले झगड़े। पौराणिक = पुराना। समारंभ = प्रारम्भ।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘ऋता’ (UPBoardSolutions.com) नामक काव्य-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित ‘चंद्रलोक में प्रथम बार’ शीर्षक कविता से अवतरित हैं।

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[विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी पद्यांशों की व्याख्या में यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने मानव के चन्द्रमा पर पहुँचने की ऐतिहासिक घटना के महत्त्व को। व्यक्त किया है। यहाँ कवि ने उन सम्भावनाओं का भी वर्णन किया है, जो मानव के चन्द्रमा पर पैर रखने से साकार होती प्रतीत हो रही हैं।

व्याख्या-कवि कहता है कि जब चन्द्रमा पर प्रथम बार मानव ने अपने कदम रखे तो ऐसा करके उसने देश-काल के उन सारे बन्धनों, जिन पर विजय पाना कठिन माना जाता था, छिन्न-भिन्न कर दिया। मनुष्य को यह आशा बँध गयी कि इस ब्रह्माण्ड में कोई भी (UPBoardSolutions.com) देश और ग्रह-नक्षत्र अब दूर नहीं हैं। यह निश्चय ही मनु के पुत्रों (मनुष्यों) की दिग्विजय है। यह ऐसा महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण है कि अब सभी देशों के निवासी मानवों को परस्पर विरोध समाप्त करके एक-दूसरे के निकट आना चाहिए और प्रेम से रहना चाहिए। यह सम्पूर्ण विश्व ही अब एक देश में परिवर्तित हो गया है। सभी देशों के मनुष्य अब एक-दूसरे के। निकट आएँ, यही कवि की आकांक्षा है।

मनुष्य का युगों-युगों से चन्द्रमा के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। चन्द्र-विजय से युगों-युगों का पौराणिक स्वप्न अब सम्भव हो गया है। चन्द्रमा के सम्बन्ध में की जाने वाली मानव की मनोरम कल्पनाएँ अब साकार हो उठी हैं। पृथ्वीवासियों को गौरवान्वित करके अब नये चन्द्र युग का कल्याणकारी आरम्भ हुआ है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत कविता में कवि ने दार्शनिक विचारों की प्रस्तुति वैज्ञानिक पृष्ठभूमि में की है।
  2. भाषा–साहित्यिक खड़ी बोली
  3. शैली–प्रतीकात्मक
  4. रस-वीर।
  5. छन्द– तुकान्त-मुक्त।
  6. गुण-ओज।
  7. अलंकार–अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश।
  8. भावसाम्यसंस्कृत के अधोलिखित श्लोक जैसी भावना ही कवि ने इन पंक्तियों में व्यक्त की है-

अयं निजः परोवेति, गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु, वसुधैव कुटुम्बकम्॥

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प्रश्न 2.
फहराए ग्रह-उपग्रह में
धरती का श्यामल-अंचल,
सुख संपद् संपन्न जगत् में
बरसे जीवन-मंगल।
अमरीका सोवियत बने ।
नव दिक् रचना के वाहन
जीवन पद्धतियों के भेद ।
समन्वित हों, विस्तृत मन।
उत्तर
[ ग्रह = सूर्य की परिक्रमा करने वाले तारे। इनके नाम हैं-पृथ्वी, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, प्लूटो, नेप्च्यून, यूरेनस। (प्रस्तुत कविता के अनुसार नौ ग्रह हैं; परन्तु वर्तमान में केवल आठ ग्रह माने गये हैं। प्लूटो को क्षुद्र ग्रह माना गया है)। उपग्रह = किसी बड़े ग्रह के चारों ओर घूमने वाले छोटे ग्रह; जैसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा। श्यामल = हरा-भरा। संपद् = सम्पत्ति, वैभव। मंगल = कल्याण। नव दिक् = नयी दिशाएँ। रचना = सृजन, निर्माण। पद्धति = रास्ता। समन्वित = मिले हुए। विस्तृत = विशाल।]

व्याख्या-कवि का कथन है कि मैं अब यह चाहता हूँ कि ब्रह्माण्ड के ग्रहों-उपग्रहों में इस पृथ्वी का श्यामलं अंचल फहराने लगे। तात्पर्य यह है कि मनुष्य अन्य ग्रहों पर भी पहुँचकर वहाँ पृथ्वी जैसी हरियाली और जीवन का संचार कर दे। सुख और वैभव से (UPBoardSolutions.com) युक्त इस संसार में मानव-जीवन के कल्याण की वर्षा हो; अर्थात् सम्पूर्ण संसार में कहीं भी दु:ख और दैन्य दिखाई न पड़े।

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अमेरिका और सोवियत रूस नयी दिशाओं की रचना करें, क्योंकि अन्तरिक्ष विज्ञान में यही देश सर्वाधिक प्रगति पर हैं। कवि का कहना है कि विश्व में प्रत्येक देश की संस्कृति और सभ्यता भिन्न-भिन्न है। तथा अलग-अलग जीवन-पद्धतियाँ हैं। इनकी भिन्नता समाप्त होनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि सभी जीवन-पद्धतियाँ आपस में मिलकर एक हो जाएँ और मन की संकुचित भावना का अन्त कर लोग उदारचेता बने तथा विश्व-मानव में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का विकास हो।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि चारों ओर कल्याणमय जीवन के प्रसार की कामना करता है।
  2. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली
  3. शैली–प्रतीकात्मक।
  4. रस-वीर।
  5. छन्द-तुकान्तमुक्त।
  6. गुण-ओज।
  7. अलंकार-‘फहराये ग्रह-उपग्रह में धरती का श्यामल अंचल में रूपक तथा अनुप्रास।

प्रश्न 3.
अणु-युग बने धरा जीवन हित
स्वर्ण-सृजन को साधन,
मानवता ही विश्व सत्य
भू राष्ट्र करें आत्मार्पण।
धरा चन्द्र की प्रीति परस्पर
जगत प्रसिद्ध, पुरातन,
हृदय-सिन्धु में उठता।
स्वर्गिक ज्वार देख चन्द्रानन । [2012, 16]
उत्तर
[ धरा = पृथ्वी। सृजन = निर्माण। आत्मार्पण = आत्म-समर्पण। चन्द्रानन = चन्द्रमा का मुख।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में यह कामना की गयी है कि अणु-शक्ति की परख और प्रयोग करने वाला यह वैज्ञानिक युग, मानव-जीवन के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो।। |

व्याख्या-कवि का कहना है कि विज्ञान का सम्पूर्ण विकास मानव-जीवन के कल्याण के लिए ही होना चाहिए। परमाणु-शक्ति मानव-जीवन के विनाश का साधन न होकर पृथ्वी पर स्वर्ग के निर्माण का साधन बननी चाहिए। विश्व का एकमात्र सत्य है—मानवता (UPBoardSolutions.com) की भावना। इसके समक्ष समग्र पृथ्वी के राष्ट्र को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए; अर्थात् सम्पूर्ण विश्व एक राष्ट्र बने और सम्पूर्ण देश मानवता की ही बात सोचें। वे अणुशक्ति से एक-दूसरे के विनाश की बात न सोचें, वरन् उसे मानवता के हित में लगाएँ।

चन्द्रमा और पृथ्वी का प्रेम जगत् प्रसिद्ध है और बहुत पुराना है; क्योंकि चन्द्रमा पृथ्वी का ही एक अंग है। इसीलिए पृथ्वी के सागर रूपी हृदय में चन्द्रमा के मुख को देखकर ज्वार उठा करता है। तात्पर्य यह है। कि चन्द्रविजये की सार्थकता तभी है जब वैज्ञानिक उपलब्धियों को मानव-हित में लगाया जाए।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. कवि विज्ञान की उन्नति को मानवता के विकास के लिए उपयोगी मानता है।
  2. पूर्णमासी के दिन चन्द्रमा पृथ्वी के निकट आ जाता है तो समुद्र का पानी चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से ऊपर को उठ जाया करता है। यही ज्वार कहलाता है। कवि ने इस भौगोलिक सत्य की अति उत्कृष्ट साहित्यिक अभिव्यक्ति की है।
  3. भाषा-साहित्यिक खड़ी बोली।
  4. शैली–प्रतीकात्मक एवं भावात्मक।
  5. रस-शान्त।
  6. छन्द-तुकान्त-मुक्त।
  7. गुण–प्रसाद।
  8. अलंकार-स्वर्ग-सृजन का साधन में अनुप्रास तथा हृदय-सिन्धु’ में रूपका
  9. भावसाम्य-विज्ञान की शक्ति मनुष्य द्वारा नियन्त्रित (UPBoardSolutions.com) है और मनुष्य अपनी इच्छानुसार इसका उपयोग कर सकता है; यह भाव अन्यत्र भी व्यक्त किया गया है

शक्ति शक्ति है बुरी या अच्छी कभी नहीं होती है।
एक नियन्त्रक मानव, इसके ही विचार ढोती है।

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है?
(क) तम के तागे सी जो हिल-डुल
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल ।
(ख) भूरे बालों की सी कतरन,
छिपां नहीं उसका छोटापन,
(ग) सुख संपद् सम्पन्न जगत् में
बरसे जीवन-मंगल ।
उत्तर
(क) उपमा, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश,
(ख) उपमा,
(ग) अनुप्रास।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों से उपसर्ग और शब्द को पृथक्-पृथक् करके लिखिए-
सुनागरिक, अक्षय, समारम्भ, उपग्रह।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड) img-1

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पदों में से प्रत्ययों को अलग करके लिखिए-
सामाजिक, छोटापन, पौराणिक।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड) img-2

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 सुमित्रानन्दन पन्त (काव्य-खण्ड), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 17 (Section 1)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 17 मानचित्र कार्य (अनुभाग – एक)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 17 मानचित्र कार्य (अनुभाग – एक)

मानचित्र, इतिहास का आवश्यक अंग तथा उपकरण है। इसके माध्यम से ऐतिहासिक साम्राज्यों के विस्तार, ऐतिहासिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक महत्त्व के केन्द्रों को स्पष्ट किया जाता है। सामाजिक विज्ञान के अनुभाग’एक’: सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत हेतु छात्रों को ऐतिहासिक महत्त्व के मानचित्रों का अभ्यास करना अभीष्ट है। मानचित्र अभ्यास के साथ-साथ प्रश्न का सही उत्तर देने के भी आधे अंक होते हैं; उदाहरणार्थ-‘वह स्थान जहाँ सूर्य मन्दिर स्थित है के लिए उत्तर लिखना होगा। ‘कोणार्क’ तथा साथ ही कोणार्क को मानचित्र में भी अंकित करना होगा।

मानचित्रांकन हेतु आवश्यक निर्देश

  • परीक्षा भवन में प्रश्न-पत्र तथा उत्तर-पुस्तिका के साथ ही मानचित्र भी दिया जाएगा। अतः परीक्षार्थी को उत्तर-पुस्तिका में मानचित्र खींचने की आवश्यकता नहीं है।
  • परीक्षार्थियों को भारत और विश्व के मानचित्रों पर (UPBoardSolutions.com) इतिहास से सम्बन्धित घटनाओं तथा स्थानों को अंकित करने का अभ्यास करते रहना चाहिए।
  • मानचित्र में नगरों का प्रदर्शन काले बिन्दु से करना चाहिए।
  • मानचित्र में अंकित विवरण जितना स्पष्ट तथा ठीक होगा, परीक्षार्थी को उतने ही अधिक अंक प्राप्त हो सकेंगे।
  • मानचित्र में विवरण अंकित करने के बाद मानचित्र को उत्तर-पुस्तिका के साथ बाँध देना चाहिए।

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अभ्यास-प्रश्न

(1) दिये गये मानचित्र में निम्नलिखित को चिह्न द्वारा नाम सहित दिखाइए –

  1. मेरठ, नागपुर, मैसूर, अमृतसर, झाँसी, मुम्बई।
  2. मेरठ, बोधगया, अमृतसर, हैदराबाद, माउण्ट आबू, मथुरा।
  3. जयपुर, कोणार्क, झाँसी, इलाहाबाद, मथुरा, अमृतसर।
  4. मेरठ, मुम्बई, प्रयाग, दिल्ली, सारनाथ, (UPBoardSolutions.com) पाटलिपुत्र।
  5. दिल्ली, इलाहाबाद, फतेहपुर सीकरी, झाँसी, मुम्बई, कोलकाता।
  6. कोलकाता, कानपुर, कोणार्क, पुणे, जयपुर, दिल्ली।

(2) भारत के रेखा-मानचित्र में निम्नलिखित तथ्यों से सम्बन्धित स्थानों को नाम सहित चिह्न द्वारा दर्शाइए –

1. वह स्थान जहाँ ताजमहल स्थित है। (2009, 11, 13, 15, 17, 18)
उत्तर : आगरा

2. वह स्थान जहाँ भारत का सर्वोच्च न्यायालय स्थित है। (2010, 11, 13, 14, 17)
उत्तर : दिल्ली

3. वह स्थान जहाँ पर मंगल पाण्डे को फाँसी दी गयी थी।
उत्तर : बैरकपुर

4. वह स्थान जहाँ 1857 ई० में प्रार्थना समाज की स्थापना हुई। (2011, 13)
उत्तर : मुम्बई

5. वह स्थान जहाँ भारत के नौसैनिकों ने 1946 ई० में क्रान्ति की थी।
उत्तर : मुम्बई (UPBoardSolutions.com)

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6. वह स्थान जहाँ सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की गयी थी। (2015, 17)
उत्तर : वाराणसी

7. वह स्थान जहाँ महात्मा गांधी का जन्म हुआ था। (2009, 11, 12, 14, 15, 16, 17, 18)
उत्तर : पोरबन्दर

8. वह नगर जहाँ 1817 ई० में हिन्दू कॉलेज की स्थापना हुई थी। (2018)
उत्तर : कोलकाता

9. वह नगर जहाँ वास्को-डि-गामा 1498 ई० में भारत पहुँचा।
उत्तर : कालीकट

10. वह नगर जहाँ उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय स्थित है। (2011, 12, 18)
उत्तर : इलाहाबाद

11. वह स्थान जहाँ कोणार्क का सूर्य मन्दिर है। (2013, 14, 15, 16, 18)
उत्तर : ओडिशा

12. वह स्थान जहाँ अटाला मस्जिद है।
उत्तर : जौनपुर

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13. सन् 1911 ई० तक अंग्रेजों के शासनकाल में भारत की राजधानी कहाँ थी ? (2010, 17)
उत्तर : कोलकाता

14. वह स्थान जहाँ उत्तर प्रदेश की राजधानी है। (2013, 14)
उत्तर : लखनऊ

15. वह स्थान जहाँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 1907 ई० में विभाजन हुआ था। (2011, 14, 16)
उत्तर : सूरत

16. वह नगर जहाँ अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ के मध्य शिखर वार्ता हुई।
उत्तर : आगरा

17. वह नगर जो भारत की राजधानी है। (2015)
उत्तर : नई दिल्ली (UPBoardSolutions.com)

18. वह स्थान जहाँ थियोसॉफिकल सोसायटी की भारत में स्थापना हुई थी। (2015, 16, 17)
उत्तर : चेन्नई

19. वह स्थान जहाँ आर्य समाज की स्थापना हुई। (2013, 17)
उत्तर : मुम्बई

20. वह स्थान जहाँ एनी बेसेण्ट ने होमरूल लीग की स्थापना की। (2016)
उत्तर : चेन्नई

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21. वह स्थान जहाँ चन्द्रशेखर आजाद शहीद हुए। (2010, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17)
उत्तर : इलाहाबाद

22. वह नगर जहाँ सिक्खों का स्वर्ण मन्दिर है। (2010, 11, 13, 14, 15, 16, 17)
उत्तर : अमृतसर

23. वह नगर जहाँ खुसरो बाग स्थित है। (20 13, 17)
उत्तर : लाहौर

24. वह नगर जहाँ बेगम हजरत महल ने क्रान्तिकारियों का नेतृत्व किया। (2010, 11, 12)
उत्तर : लखनऊ, अवध

25. वह नगर जहाँ मोहम्मडन एंग्लो ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना हुई। (2011, 12, 13)
उत्तर : अलीगढ़

26. वह स्थान जहाँ मुस्लिम विश्वविद्यालय स्थित है। (2012)
उत्तर : अलीगढ़

27. वह स्थान जहाँ छत्तीसगढ़ की राजधानी स्थित है। (2014)
उत्तर : रायपुर (UPBoardSolutions.com)

28. वह स्थान जहाँ पश्चिमी नौसेना कमाण्ड का मुख्यालय है। (2016)
उत्तर : मुम्बई

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29. वह नगर जहाँ संविधान सभा की बैठकें हुआ करती थीं। (2014)
उत्तर : संसद भवन, नयी दिल्ली

30. वह नगर जहाँ जनसमूह द्वारा पुलिस स्टेशन में आग लगा देने के कारण गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित कर दिया था।
उत्तर : चौरी-चौरा, गोरखपुर

31. वह नगर जहाँ जवाहरलाल नेहरू ने जन्म लिया। (2011, 13)
उत्तर : इलाहाबाद

32. वह स्थान जहाँ स्वामी दयानन्द का जन्म हुआ था। (2012,14)
उत्तर : काठियावाड़, गुजरात

33. वह स्थान जहाँ झारखण्ड राज्य की राजधानी स्थित है। (2013)
उत्तर : राँची

34. वह नगर जहाँ उत्तर प्रदेश की विधानसभा स्थित है। (2018)
उत्तर : लखनऊ

35. वह नगर जो भारतीय थल सेना का मुख्यालय है। (2018)
उत्तर : दिल्ली

36. वह स्थान जहाँ उत्तराखण्ड की राजधानी स्थित है। (2010, 13)
उत्तर : देहरादून

37. वह स्थान जहाँ ‘गेटवे ऑफ इण्डिया’ स्थित है। (2009, 10, 18)
उत्तर : मुम्बई (UPBoardSolutions.com)

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38. वह नगर जो ब्रह्म समाज का मुख्य केन्द्र रहा है। (2012, 16)
उत्तर : कोलकाता

39. वह नगर जहाँ से 1865 ई० में पायनियर’ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ।
उत्तर : कोलकाता

40. वह नगर जहाँ जनरल डायर ने सैकड़ों भारतीयों को गोलियों से भून दिया था। (2011)
            या
वह नगर जहाँ जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ। (2016)
उत्तर : अमृतसर

41. वह नगर जहाँ समुद्री यात्रा करके पहला पुर्तगाली भारतभूमि पर उतरा।
उत्तर : कालीकट

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42. वह नगर जहाँ गांधी जी और डॉ० अम्बेडकर में समझौता हुआ था। (2018)
उत्तर : पुणे

43. वह नगर (अकबर के शासन काल में) जो दिल्ली से पहले भारत की राजधानी था। (2015)
उत्तर : आगरा

44. वह स्थान जहाँ गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियों का संगम है।
उत्तर : इलाहाबाद

45. वह स्थान जहाँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ था। (2010, 15, 17)
उत्तर : मुम्बई

46. वह नगर जो शीतकाल में जम्मू-कश्मीर की राजधानी रहता है।
उत्तर : जम्मू

47. उत्तराखण्ड का वह नगर जहाँ कुम्भ-मेला लगता है। (2014, 15, 17)
उत्तर : हरिद्वार

48. वह स्थान जो हिमाचल प्रदेश की राजधानी है।
उत्तर : शिमला

49. वह स्थान जहाँ गुप्तकालीन लौह-स्तम्भ स्थित है।
उत्तर : महरौली, दिल्ली (UPBoardSolutions.com)

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50. वह स्थान जहाँ ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह स्थित है। (2009, 15, 18)
उत्तर : अजमेर

51. वह स्थान जहाँ जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ। (2010, 11, 14, 15)
उत्तर : अमृतसर

52. वह स्थान जिसे ‘गुलाबी नगर’ (पिंक सिटी) के नाम से जाना जाता है। (2016, 18)
उत्तर : जयपुर

53. वह स्थान जहाँ ब्रह्म समाज एवं प्रार्थना समाज की स्थापना हुई। (2006, 12, 16)
उत्तर : मुम्बई

54. वह स्थान जहाँ विवेकानन्द शिला स्मारक स्थित है।
उत्तर : रामेश्वरम्, तमिलनाडु

55. वह नगर जहाँ तमिलनाडु एवं पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) का सम्मिलित उच्च न्यायालय है।
उत्तर : चेन्नई

56. वह स्थान जहाँ पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। (2007, 11, 13)
उत्तर : मुम्बई

57. वह स्थान जहाँ प्रथम स्वाधीनता संग्राम का आरम्भ हुआ। (2013, 15, 17)
उत्तर : मेरठ

58. वह स्थान जहाँ स्वामी विवेकानन्द का जन्म हुआ था। (2011, 16)
उत्तर : कोलकाता

59. वह स्थान जहाँ आनन्द भवन स्थित हैं। (2010, 12, 15, 16)
उत्तर : इलाहाबाद

60. वह स्थान जहाँ ईस्ट इण्डिया कम्पनी की राजधानी थी।
            या
वह स्थान जहाँ दिल्ली से पहले ब्रिटिश की भारत में राजधानी थी। (2018)
उत्तर : कोलकाता

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61. वह नगर जहाँ कांग्रेस ने सन् 1942 में भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया। (2017)
उत्तर : मुम्बई

62. वह स्थान जहाँ महात्मा गांधी ने नमक कानून भंग किया। (2016)
उत्तर : डाण्डी

63. वह स्थान जहाँ भारतीय नौसेना का मुख्यालय स्थित है। (2013)
उत्तर : दिल्ली

64. वह स्थान जहाँ भारतीय वायुसेना का मुख्यालय है। (2009, 15, 16)
उत्तर : दिल्ली

65. वह स्थान जो श्रीमती इन्दिरा गाँधी की जन्मभूमि है। (2009, 15)
उत्तर : प्रयाग

66. वह स्थान जहाँ ज़लियाँवाला बाग स्थित है। (2009, 14)
उत्तर : अमृतसर

67. वह स्थान जहाँ के राजा कुंवर सिंह थे। (2010)
उत्तर : अमृतसर

68. वह स्थान जो रानी लक्ष्मीबाई के राज्य की राजधानी था। (2010, 18)
            या
वह स्थान जहाँ से रानी लक्ष्मीबाई शासन चलाती थीं। (2016)
उत्तर : झाँसी (UPBoardSolutions.com)

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69. वह स्थान जहाँ गांधीजी की मृत्यु हुई थी। (2010, 15, 17)
उत्तर : दिल्ली

70. वह स्थान जहाँ गुरु नानक का जन्म हुआ था। (2010)
उत्तर : तलवंडी

71. वह स्थान जहाँ ‘विक्टोरिया मेमोरियल’ स्थित है। (2010, 11)
उत्तर : कोलकाता

72. वह स्थान जहाँ कुतुबमीनार स्थित है। (2014, 15, 16)
उत्तर : दिल्ली

73. हड़प्पाकालीन एक भारतीय स्थान
उत्तर : रोपड़

74. वह स्थान जहाँ तिलक ने होमरूल लीग की स्थापना की। (2011, 12)
उत्तर : पुणे, महाराष्ट्र

75. वह स्थान जहाँ गौतम बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया। (2015, 17)
उत्तर : सारनाथ

76. वह स्थान जहाँ बुलन्द दरवाजा स्थित है। (2015, 16)
उत्तर : फतेहपुर सीकरी

77. वह नगर जहाँ स्थित लाल किले पर प्रति वर्ष स्वतन्त्रता दिवस पर प्रधानमन्त्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। (2011)
उत्तर : दिल्ली

78. वह स्थान जहाँ पल्लवों की राजधानी थी। (2011, 12)
उत्तर : काँचीपुरम

79. वह स्थान जहाँ चन्देलों ने मन्दिर बनवाए थे। (2011)
उत्तर : खजुराहो

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80. वह स्थान जहाँ अकबर तथा हेमू के मध्य युद्ध हुआ था। (2011, 16)
उत्तर : पानीपत

81. वह स्थान जहाँ स्वामी महावीर का जन्म हुआ था। (2011)
उत्तर : वैशाली

82. वह स्थान जहाँ बुद्ध पैदा हुए थे। (2011, 16)
उत्तर : लुम्बिनी

83. वह स्थान जहाँ महाराष्ट्र की राजधानी है। (2011, 15)
उत्तर : मुम्बई (UPBoardSolutions.com)

84. वह नगर जहाँ संसद भवन स्थित है। (2011)
उत्तर : नयी दिल्ली

85. वह नगर जहाँ महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम की स्थापना की। (2011)
उत्तर : अहमदाबाद

86. वह स्थान जहाँ कन्दरिया महादेव मंदिर स्थित है। (2012)
उत्तर : खजुराहो

87. वह स्थान जहाँ लालकिला है। (2012, 14, 16, 17, 18 )
उत्तर : दिल्ली

88. वह स्थान जहाँ मौर्य साम्राज्य की राजधानी थी। (2012, 17)
उत्तर : पाटलिपुत्र

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89. वह नगर जहाँ रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु हुई थी। (2012)
उत्तर : ग्वालियर

90. वह नगर जहाँ गांधीजी 15 अगस्त, 1947 को शान्ति स्थापित करने में व्यस्त थे। (2012)
उत्तर : कोलकाता

91. उस द्वीप समूह की राजधानी जहाँ देश के अनेक क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता सेनानी ब्रिटिश सरकार द्वारा आजीवन कारावास के लिए भेजे जाते थे। (2012)
उत्तर : पोर्ट ब्लेयर

92. वह नगर जहाँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्डपीठ स्थित है। (2012, 15)
उत्तर : लखनऊ

93. दशावतार का मन्दिर किस स्थान पर स्थित है? (2013)
उत्तर : देवगढ़, ललितपुर

94. वह नगर जो पंजाब और हरियाणा दोनों की ही राजधानी है। (2013)
उत्तर : चण्डीगढ़

95. राजस्थान में वह स्थान जहाँ जैन मन्दिर हैं। (2014, 16)
उत्तर : माउण्ट आबू

96. वह नगर जहाँ मध्य प्रदेश का उच्च-न्यायालय स्थित है। (2014)
उत्तर : जबलपुर

97. वह नगर जहाँ मदन मोहन मालवीय ने विश्वविद्यालय स्थापित किया था। (2014)
उत्तर : वाराणसी

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98. वह स्थान जहाँ लिंगराज मन्दिर स्थित है। (2014)
उत्तर : भुवनेश्वर

99. वह स्थान जहाँ गुजरात की राजधानी स्थित है। (2014)
उत्तर : गांधीनगर

100. वह स्थान जहाँ कांग्रेस और मुस्लिम लीग का 1916 में समझौता हुआ था। (2014)
उत्तर : लखनऊ

101. वह नगर जहाँ मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था। (2014, 15)
उत्तर : नई दिल्ली (UPBoardSolutions.com)

102. वह नगर जहाँ महाकालेश्वर को मन्दिर है। (2014)
उत्तर : उज्जैन

103. वह नगर जो दो राज्यों की राजधानी है। (2014)
उत्तर : चण्डीगढ़

104. वह स्थान जो अपने गुफा चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। (2015)
उत्तर : अजन्ता

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105. वह स्थान जहाँ 1857 ई० की क्रान्ति का आरम्भ हुआ। (2015, 16)
उत्तर : मेरठ

106. वह स्थान जहाँ गोपालकृष्ण गोखले ने ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इण्डिया सोसाइटी’ स्थापित की थी। (2015, 17)
उत्तर : पुणे, महाराष्ट्र

107. वह स्थान जहाँ राजा जयचन्द राज्य करते थे। (2015)
उत्तर : कन्नौज

108. वह स्थान जहाँ सन् 1927 ई० में साइमन कमीशन का विरोध प्रस्ताव पारित हुआ था। (2015)
उत्तर : चेन्नई

109. वह स्थान जो टीपू सुल्तान की राजधानी था। (2015)
उत्तर : श्रीरंगपट्टनम

110. वह नगर जहाँ 1765 में मुगल सम्राट शाहआलम और अंग्रेजों की कम्पनी के बीच सन्धि हुई थी। (2016, 17)
उत्तर : इलाहाबाद

111. वह नगर जहाँ पुर्तगाल के अल्बुकर्क ने 1503 ई० में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। (2016)
उत्तर : गोवा

112. वह नगर जहाँ पण्डित मदनमोहन मालवीय का जन्म हुआ था। (2018)
उत्तर : इलाहाबाद

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113. वह नगर जहाँ रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई थी। (2018)
उत्तर : वेल्लूर

114. वह नगर जहाँ इन्दिरा गाँधी की हत्या हुई थी। (2017)
उत्तर : दिल्ली (UPBoardSolutions.com)

मानचित्र – 1

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 17 मानचित्र कार्य 1

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मानचित्र – 2

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मानचित्र – 3

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मानचित्र – 4

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मानचित्र – 5

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल)

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पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल)

अतिलघु उत्तरीय प्रज

प्रश्न 1
भक्तिकाल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर
इस काल की रचनाओं में भक्ति-भावना की अधिकता होने के कारण इसका नाम ‘भक्तिकाल रखा गया, जो सर्वथा उपयुक्त है। भक्तिकाल में कबीर, जायसी, सूर, तुलसी जैसे भक्त कवियों ने भक्ति काव्यों की (UPBoardSolutions.com) रचना की।

प्रश्न 2
भक्तिकाल के चार प्रमुख कवियों और उनकी मुख्य रचनाओं के नाम लिखिए।
या
भक्तिकाल के दो प्रमुख कवियों और उनकी प्रसिद्ध कृति का नाम लिखिए। [2009]
या
भक्तिकाल के किसी एक कवि का नाम लिखिए। [2017]
उत्तर
भक्तिकाल के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ हैं—

  1. कबीरदास-बीजक,
  2. जायसी–पद्मावत,
  3. सूरदास—सूरसागर तथा
  4. तुलसीदास–श्रीरामचरितमानसः ।

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प्रश्न 3.
भक्तिकाल की दो शाखाओं का नामोल्लेख कीजिए तथा बताइए कि ‘श्रीरामचरितमानस की रचना में रचनाकार का क्या उद्देश्य निहित, था ?
उत्तर
भक्तिकाल की दो शाखाएँ थीं—

  1.  निर्गुण-भक्ति शाखा तथा
  2.  सगुण-भक्ति शाखा।
    ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना में तुलसीदास जी का (UPBoardSolutions.com) उद्देश्य था-मर्यादापुरुषोत्तम राम के शील, शक्ति और सौन्दर्य समन्वित स्वरूप के प्रस्तुतीकरण द्वारा लोक-मंगल की साधना।

प्रश्न 4
भक्तिकाल की चारों काव्यधाराओं के नाम लिखिए।
उत्तर
भक्तिकाल की काव्यधारा चार रूपों में प्रवाहित हुई—

  1. ज्ञानमार्गी या सन्त-काव्यधारा,
  2. प्रेममार्गी या सूफी-काव्यधारा,
  3.  रामभक्ति-काव्यधारा तथा
  4.  कृष्णभक्ति-काव्यधारा।।

प्रश्न 5
भक्तिकाल की प्रमुख शाखाओं का नामोल्लेख कर किसी एक शाखा की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
भक्तिकाल की प्रमुख शाखाएँ हैं–

  1. सगुण-भक्ति शाखा तथा
  2. निर्गुण-भक्ति शाखा

सगुण-भक्ति शाखा की विशेषताएँ–

  1. राम तथा कृष्ण की पूर्ण ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठा तथा
  2. लोकमंगल की भावना।

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प्रश्न 6
निर्गुण-भक्ति शाखा की दो विशेषताएँ लिखते हुए इसी शाखा के दो कवियों के नाम उनकी एक-एक रचना सहित लिखिए।
उत्तर
निर्गुण-भक्ति शाखा की विशेषताएँ–

  1. इसमें ईश्वर के निराकार स्वरूप की उपासना हुई तथा
  2. आन्तरिक साधना (UPBoardSolutions.com) पर बल दिया गया।

कवि तथा उनकी रचना

  1. कबीरदास-बीजक तथा
  2. मलिक मुहम्मद जायसी-पद्मावत।

प्रश्न 7
पूर्व मध्यकाल की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और इस काल के दो कवियों के नाम बताइए।
उत्तर
विशेषताएँ–

  1. ईश्वर में सहज विश्वास तथा
  2. गुरु-महिमा का वर्णन।

दो कवि–

  1. कबीरदास तथा
  2. तुलसीदास।।

प्रश्न 8
निर्गुण-भक्ति काव्यधारा की कौन-सी दो उपशाखाएँ हैं ?
उत्तर
निर्गुण-भक्ति काव्यधारा की दो उपशाखाएँ हैं—

  1. ज्ञानाश्रयी या सन्त-काव्यधारा तथा
  2. प्रेमाश्रयी या सूफी-काव्यधारा।

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प्रश्न 9
सन्त-काव्यधारा (ज्ञानाश्रयी शाखा) के प्रतिनिधि कवि कौन थे ?
उत्तर
सन्त-काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि सन्त कबीरदास थे।

प्रश्न 10
कबीर के अतिरिक्त किन्हीं दो प्रमुख सन्त कवियों के नाम लिखिए।
उत्तर
सन्त-काव्यधारा में कबीर के अतिरिक्त (UPBoardSolutions.com) रैदास, मलूकदास, नानक तथा दादूदयाल प्रमुख कवि ।।

प्रश्न 11
सूफी-काव्यधारा (प्रेमाश्रयी शाखा) के प्रतिनिधि कवि का नाम बताइट।
उत्तर
सूफी-काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं।

प्रश्न 12
सूफी-काव्यधारा के प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
सूफी-काव्यधारा के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ निम्नवत् हैं–

  1. मलिक मुहम्मद जायसी-पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम।
  2. कुतुबन-मृगावती।
  3. मंझन–मधुमालती।
  4. उसमान—चित्राक्ली।।

प्रश्न 13
सूफी कवियों ने अपनी काव्य-रचनाओं में किस शैली को अपनाया ?
उत्तर
सूफी कवियों ने अपनी काव्य-रचनाओं में फारसी की मसनवी शैली को अपनाया।

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प्रश्न 14
प्रेमाश्रयी या सूफी-काव्यधारा की पाँच विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
सूफी-काव्यधारा की प्रमुख पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. प्रेमतत्त्व का निरूपण,
  2. मसनवी शैली,
  3. श्रृंगार रस की प्रधानता,
  4.  हिन्दू संस्कृति व लोकजीवन का चित्रण तथा
  5. लौकिक प्रेम के द्वारा अलौकिक प्रेम (परमात्म-प्रेम) की व्यंजना।।

प्रश्न 15
सगुणमार्गी कृष्णभक्ति शाखा का सर्वश्रेष्ठ कवि कहलाने का गौरव किसे प्राप्त है ?
उत्तर
सगुणमार्गी कृष्णभक्ति शाखा का सर्वश्रेष्ठ (UPBoardSolutions.com) कवि कहलाने का गौरव सूरदास को प्राप्त है।

प्रश्न 16
कृष्णभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि का नाम लिखिए।
उत्तर
कृष्णभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि सूरदास हैं।

प्रश्न 17
कृष्णभक्ति काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
या
सूरदास के काव्य के आधार पर भक्तिकाल की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइट।
उत्तर
कृष्णभक्ति काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं–

  1. कृष्ण की लीलाओं का गान,
  2. सखाभाव की भक्ति,
  3. श्रृंगार और वात्सल्य रस की प्रधानता,
  4. सगुण रूप की प्रधानता,
  5. प्रकृति का उद्दीपन रूप में वर्णन तथा
  6. ब्रजभाषा में मुक्तक-गेय पदों की रचना।

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प्रश्न 18
सूरसागर में कितने पद थे ?
उत्तर
सूरसागर में लगभग सवा लाख पद थे।

प्रश्न 19
सूरदास की भक्ति किस प्रकार की है ?
उत्तर
सूरदास की भक्ति सख्य भाव की है।

प्रश्न 20
सगुणोपासक रामभक्ति शाखा का सर्वश्रेष्ठ कवि किसे माना जाता है ?
उत्तर
सगुणोपासक रामभक्ति शाखा का (UPBoardSolutions.com) सर्वश्रेष्ठ कवि तुलसीदास को माना जाता है।

प्रश्न 21
रामभक्ति काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि कौन हैं ?
उत्तर
रामभक्ति काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं, जिन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस की रचना करके समाज का पथ-प्रदर्शन किया।

प्रश्न 22
राम को मर्यादा-पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले प्रसिद्ध ग्रन्थ का नाम लिखिए।
उत्तर
राम को मर्यादा-पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले ग्रन्थ का नाम श्रीरामचरितमानस है।

प्रश्न 23
तुलसीकृत अवधी और ब्रजभाषा की एक-एक रचना का नाम बताइट।
उत्तर
अवधी भाषा-‘श्रीरामचरितमानस’ तथा ब्रजभाषा-‘विनयपत्रिका’।

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प्रश्न 24
तुलसी ने अपने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना किस मुख्य छन्द में की है ?
उत्तर
तुलसी ने ‘श्रीरामचरितमानस की रचना मुख्य रूप से दोहा-चौपाई छन्द में की है।

प्रश्न 25
रामभक्ति काव्यधारा की दो प्रमुख रचनाओं और उनके रचयिताओं के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. श्रीरामचरितमानस तथा
  2. रामचन्द्रिका। इनके लेखक क्रमश: तुलसीदास और केशवदास

प्रश्न 26
रामभक्ति काव्य की रचना किन भाषाओं में हुई ?
उत्तर
रामभक्ति काव्य की रचना अवधी और ब्रजभाषा में हुई।

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लघु उत्तरीय प्रण।

प्रश्न 1
भक्तिकाल की विविध काव्यधाराओं का संक्षेप में परिचय दीजिए।
भक्तिकाल की दो प्रमुख धाराओं का नामोल्लेख कीजिए तथा उनके एक-एक प्रतिनिधि कवि का नाम भी बताइट।
उत्तर
भक्तिकाल के साहित्य में चार प्रकार की काव्यधाराएँ मिलती हैं, जिनका विभाजन निम्नवत् है|

(1) निर्गुण-भक्ति काव्यधारा–ईश्वर के निर्गुण रूप की उपासना करने वाले भक्त कवियों ने ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग ज्ञान और प्रेम बताया। इस आधार पर निर्गुण-भक्ति काव्यधारा दो शाखाओं में प्रस्फुटित हुई

  1.  ज्ञान को ईश्वर की प्राप्ति का साधन मानने के आधार पर ज्ञानमार्गी या सन्त-काव्यधारा प्रस्फुटित हुई। इसके प्रतिनिधि कवि कबीरदास हैं।
  2. प्रेम को ईश्वर की प्राप्ति का साधन मानने के आधार (UPBoardSolutions.com) पर प्रेममार्गी या सूफी-काव्यधारा प्रस्फुटित हुई। इसके प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं।

(2) सगुण-भक्ति काव्यधारा–ईश्वर के साकार रूप को आधार मानकर उपासना करने वाले कवियों ने राम और कृष्ण को इष्टदेव मानकर भक्ति-काव्यों की रचना की। इस आधार पर सगुण-भक्ति काव्यधारा भी दो शाखाओं में प्रस्फुटित हुई|

  1. कृष्ण के साकार रूप का आधार लेकर कृष्णभक्ति काव्यधारा विकसित हुई। इसके प्रतिनिधि कवि सूरदास हैं।
  2. राम के साकार रूप का आधार लेकर रामभक्ति काव्यधारा विकसित हुई। इसके प्रतिनिधि कवि तुलसीदास हैं।

प्रश्न 2
भक्तिकाल का समय कब से कब तक माना जाता है ? इस काल के साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) बताइए।
या
भक्तिकाल की दो सामान्य प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सन् 1343 से 1643 ई० तक का समय हिन्दी-साहित्य में भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है। भक्तिकाल के साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. भक्ति-भावना,
  2.  गुरु की महिमा,
  3. सुधारवादी दृष्टिकोण एवं समन्वय की भावना,
  4. रहस्य की भावना,
  5. अहंकार का त्याग और लोकमंगल की भावना,
  6. काव्य का उत्कर्ष एवं
  7. जीवन की नश्वरता और ईश्वर के नाम-स्मरण की महत्ता।

प्रश्न 3
भक्तिकाल को हिन्दी-साहित्य का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
हिन्दी पद्य-साहित्य को भक्तिकाल की क्या देन है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भक्तिकाल में भाव, भाषा एवं शिल्प की दृष्टि से हिन्दी-साहित्य का उत्कर्ष हुआ। भावपक्ष तथा कलापक्ष के उत्कृष्ट रूप के कारण ही भक्तिकाल को हिन्दी-साहित्य का स्वर्ण युग कहते हैं। इसी समय कबीर, जायसी, सूर तथा तुलसी जैसे रससिद्ध (UPBoardSolutions.com) कवियों की दिव्य वाणी उनके अन्त:करण से निकलकर देश के कोने-कोने में फैली थी। यही सार्वभौम और सार्वकालिक साहित्य भक्तिकाल की अनुपम देन है।

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प्रश्न 4
सन्त-काव्यधारा (ज्ञानाश्रयी शाखा) की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
सन्त-काव्यधारा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ इस प्रकार हैं–

  1. गुरु की महिमा का गान,
  2. निर्गुण ब्रह्म की उपासना,
  3. बाह्य आडम्बरों का विरोध और समाज-सुधार,
  4. हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल,
  5. एकेश्वरवाद में विश्वास,
  6. रहस्यवादी भावना,
  7. नाम के स्मरण को महत्त्व,
  8. मायारूपी महाठगिनी की निन्दा,
  9. मिश्रित या सधुक्कड़ी भाषा।।

प्रश्न 5
कृष्णभक्ति काव्यधारा (कृष्णाश्रयी शाखा) का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
या
अष्टछाप का संगठन किसने किया ? इसमें कितने कवियों को सम्मिलित किया गया ?
उत्तर
सगुण-भक्ति काव्य में कृष्णभक्ति के प्रवर्तन का श्रेय स्वामी वल्लभाचार्य को है। गोस्वामी बिट्ठलनाथ ने कृष्णभक्ति की धारा को आगे बढ़ाया। इन्होंने आठ कृष्णभक्त कवियों को चुनकर ‘अष्टछाप’ की स्थापना की, जिसमें सूरदास प्रमुख थे। इस शाखा के सभी (UPBoardSolutions.com) कवियों ने कृष्ण के लोकरंजक स्वरूप को अपनाया। इन्होंने कृष्ण के बाल और किशोर रूप का ही अधिक चित्रण किया तथा गोपियों के साथ की गयी क्रीड़ाओं को भी अपने काव्य का विषय बनाया। इसी कारण कृष्णभक्ति काव्य में वात्सल्य, माधुर्य एवं श्रृंगार भाव के दर्शन होते हैं।

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प्रश्न 6
कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवियों के नाम एवं रचनाएँ निम्नलिखित हैं
(क) अष्टछाप के कवि-

  1. सूरदास—सूरसागर, सूर सारावली, साहित्य लहरी;
  2. नन्ददास-रास पंचाध्यायी, भ्रमरगीत;
  3. कृष्णदास-भ्रमरगीत, प्रेम-तत्त्व निरूपण;
  4. परमानन्ददास-परमानन्द सागर;
  5. कुम्भनदास-फुटकर पद;
  6. चतुर्भुजदास,
  7. छीतस्वामी एवं
  8. गोविन्द स्वामी।।

(ख) अन्य प्रमुख कवि–

  1.  हित हरिवंश-हित चौरासी;
  2. मीराबाई—मीराबाई पदावली;
  3. रसखान-सुजान-रसखान, प्रेमवाटिका तथा
  4. नरोत्तमदास-सुदामाचरित।

प्रश्न 7
भ्रमरगीत का परिचय दीजिए।
उत्तर
सूरसागर का एक प्रसंग भ्रमरगीत कहलाता है। इस प्रसंग में गोपियों के प्रेमावेश ने ज्ञानी उद्धव को भी प्रेमी एवं भक्त बना दिया था।

प्रश्न 8
रामभक्ति काव्यधारा (रामाश्रयी शाखा) का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर
राम को आराध्य मानकर जिस लोक-मंगलकारी काव्य की रचना की गयी, वह रामभक्ति काव्य के नाम से जाना जाता है। रामभक्ति काव्यधारा के भक्त कवियों के प्रेरक स्वामी रामानन्द रहे हैं। स्वामी रामानन्द ने जनता के बीच रामभक्ति का प्रचार (UPBoardSolutions.com) किया। उन्हीं की शिष्य-परम्परा में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना करके भारतीय जनता में रामभक्ति की पावन गंगा को प्रवाहित किया।

प्रश्न 9
रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवियों एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
या
राम काव्यधारा (रामाश्रयी शाखा) के प्रमुख कवि और उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नवत् हैं

  1. तुलसीदास-श्रीरामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, बरवै रामायण आदि।
  2. प्राणचन्द-रामायण महानाटक।
  3. हृदयराम-हिन्दी हनुमन्नाटक।
  4. केशवदास–रामचन्द्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया।
  5. नाभादास-भक्तमाल।।

प्रश्न 10
रामभक्ति शाखा की प्रमुख प्रवृत्तियों (विशेषताओं) पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
तुलसी के पद्यों के आधार पर भक्तिकाल की दो प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
रामभक्ति काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) इस प्रकार हैं—

  1. राम को अपना इष्टदेव मानकर उनके लोकरक्षक एवं लोकरंजक रूप में रामचरित का गायन,
  2. दास्य-भाव की भक्ति,
  3. चातक-प्रेम के आदर्श पर आधारित अनन्य भक्ति-भावना,
  4. वर्णाश्रम धर्म से समर्थित सामाजिक व्यवस्था को श्रेष्ठ मानते हुए लोक-मर्यादा की प्रतिष्ठा,
    लोक-मंगल की भावना,
  5. विभिन्न मत-मतान्तरों, सम्प्रदायों तथा काव्य-शैलियों में समन्वय की चेष्टा,
  6. अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं में (UPBoardSolutions.com) अधिकारपूर्वक काव्य-रचना एवं
  7. प्रबन्ध व मुक्तक दोनों काव्य रूपों में रचना।

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प्रश्न 11
तुलसी और सूर की भक्ति में मूलभूत अन्तर क्या है ?
उत्तर
तुलसी और सूर की भक्ति में मूलभूत अन्तर यह है कि तुलसी की (UPBoardSolutions.com) भक्ति दास्य-भाव की है। और सूर की सख्य-भाव की; अर्थात् तुलसीदास स्वयं को भगवान् का दास मानकर उनकी उपासना करते हैं, जब कि सूरदास स्वयं को भगवान् का सखा मानकर उनसे याचना करते हैं।

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