UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 21 व्यय एवं बचत

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Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 21
Chapter Name व्यय एवं बचत
Number of Questions Solved 23
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 21 व्यय एवं बचत

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
“आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आये का उपयोग करना ही व्यय कहलाता है।” यह कथन है।
(a) प्रो. बसु का
(b) प्रो. केन्ज का
(c) प्रो. पेन्सन का
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) प्रो. बसु का

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से व्यक्तिगत व्यय कौन-कौन से है?
(a) भोजन पर व्यय
(b) स्वास्थ्य पर व्यय
(c) बच्चों की शिक्षा पर व्यय
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
सम्पत्ति का जो भाग उत्पादन में लगाया जाता है, उसे कहते हैं (2012)
(a) बचत
(b) संचय
(c) पूँजी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) बचत

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प्रश्न 4.
पूँजी का निर्माण निर्भर करता है
(a) व्यय पर
(b) आय पर
(c) बचत पर
(d) ये सभी
उत्तर:
(c) बेचत पर

प्रश्न 5.
अधिक बचत करने से आय
(a) बढ़ती है
(b) घटती है
(c) सामान्य रहती है
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) बढ़ती है

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
व्यय से वर्तमान/भावी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है।
उत्तर:
वर्तमान

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प्रश्न 2.
क्या व्यय आवश्यकता की सन्तुष्टि प्रत्यक्ष रूप से करता है।
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 3.
क्या व्यय तथा बचत दोनों आय के भाग होते हैं।
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 4.
क्या बैंक में धन को जमा करना बचत कहलाता है।
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 5.
क्या बचत समाज के लिए लाभदायक होती है।
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 6.
बचत करने से पूँजी में कमी/वृद्धि होती है।
उत्तर:
वृद्धि होती है

प्रश्न 7.
बचत से रहन-सहन का स्तर घटता/बढ़ता है।
उत्तर:
बढ़ती है

प्रश्न 8.
क्या निःसंचय का पूँजी के निर्माण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
हाँ

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प्रश्न 9.
व्यय तथा बचत दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं,नहीं होते हैं।
उत्तर:
होते हैं।

प्रश्न 10.
अधिक बचत से देश में पूँजी का निर्माण होता है/नहीं होता है।
उत्तर:
होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
व्यय कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
व्यय निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

  1. व्यक्तिगत व्यय
  2. सामाजिक व्यय

प्रश्न 2.
बचत का सामाजिक महत्त्व बताइए। (2017)
अथवा
समाज में बचत के महत्व का वर्णन कीजिए। (2015, 11, 09, 08)
उत्तर:
बचत (संचय) करने वाले व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठित (UPBoardSolutions.com) व्यक्ति माने जाते हैं। निरन्तर बचत (संचय) करने से व्यक्ति को संकट के समय समाज में किसी दूसरे व्यक्ति के सामने अपनी व्यथा रखने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे  उसको एक सकारात्मक परिणाम मिलता है तथा उसकी प्रतिष्ठा समाज में बनी रहती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाज में बचत का अत्यधिक महत्त्व है।

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प्रश्न 3.
बचत से होने वाली दो हानियाँ बताइए।
उत्तर:
बचत से होने वाली दो हानियाँ निम्नलिखित हैं

  1. पैतृक रूप में मिली सम्पत्ति भावी पीढ़ी को निकम्मा बना देती है।
  2. भविष्य के लिए अधिक धन बचाने के स्वार्थ में वर्तमान की आवश्यकता सन्तुष्ट नहीं हो पाती है, जिससे व्यक्ति के जीवन-स्तर में विकास नहीं हो पाता है।

प्रश्न 4.
बचत एवं निःसंचय में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2016)

बचत एवं नि:संचय में अन्तर

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 21 व्यय एवं बचत

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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
व्यय किसे कहते हैं? व्यय कितने प्रकार के होते हैं? (2007)
उत्तर:
व्यय से आशय व्यय, आय का वह भाग होता है, जिसे मनुष्य अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपयोग में लेता है। सरल शब्दों में, आय का वह भाग, जो तात्कालिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपभोग में लिया जाता है, व्यय (Expenditure) (UPBoardSolutions.com) कहलाता है। प्रो. बसु के अनुसार, “आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आय का उपभोग करना ही ‘व्यय’ कहलाता है।”
व्यय के प्रकार व्यय के निम्नलिखित प्रकार होते हैं

1. व्यक्तिगत या निजी व्यय आय का वह हिस्सा, जिसे मनुष्य द्वारा अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए प्रयोग में लिया जाता है, ‘व्यक्तिगत व्यय’ या ‘निजी व्यय’ (Personal Expenses) कहलाता है, जैसे-बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, मकान का किराया, आदि पर किया जाने वाला व्यय।

2. सामाजिक व्यय मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज में रहकर कुछ सुविधाएँ व संम्मान प्राप्त करता है। मनुष्य की आय का वह भाग, जो सामाजिक आवश्यकताओं या समाज के ऊपर खर्च किया जाता है, ‘सामाजिक व्यय’ (Social Expenses) कहलाता है।
सामाजिक व्यय निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

  • अनिवार्य सामाजिक व्यय मनुष्य की आय का वह भाग, जिसे समाज के लिए अनिवार्य रूप से खर्च करना पड़ता है, ‘अनिवार्य सामाजिक व्यंय’ कहलाते हैं। इन व्ययों से समाज का हित होता है; जैसे-केन्द्रीय या प्रादेशिक कर।
  • ऐच्छिक सामाजिक व्यय मनुष्य की आय का वह भाग, जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से समाज के लिए खर्च करता है, ‘ऐच्छिक सामाजिक व्यय कहलाते हैं; जैसे–मन्दिर, अस्पताल या धार्मिक संस्थाओं को चन्दा देना।

प्रश्न 2.
व्यय क्या है? व्यय और बचत के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए। (2014)
अथवा
व्यय से क्या आशय है? व्यय का बचत से क्या सम्बन्ध है? (2006)
अथवा
व्यय और बचत में क्या सम्बन्ध है? (2018)
उत्तर:
व्यय से आशय व्यय, आय का वह भाग होता है, जिसे मनुष्य अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपयोग में लेता है। सरल शब्दों में, आय का वह भाग, जो तात्कालिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपभोग में लिया जाता है, व्यय (Expenditure) (UPBoardSolutions.com) कहलाता है। प्रो. बसु के अनुसार, “आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आय का उपभोग करना ही ‘व्यय’ कहलाता है।”
व्यय के प्रकार व्यय के निम्नलिखित प्रकार होते हैं

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1. व्यक्तिगत या निजी व्यय आय का वह हिस्सा, जिसे मनुष्य द्वारा अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए प्रयोग में लिया जाता है, ‘व्यक्तिगत व्यय’ या ‘निजी व्यय’ (Personal Expenses) कहलाता है, जैसे-बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, मकान का किराया, आदि पर किया जाने वाला व्यय।

2. सामाजिक व्यय मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज में रहकर कुछ सुविधाएँ व संम्मान प्राप्त करता है। मनुष्य की आय का वह भाग, जो सामाजिक आवश्यकताओं या समाज के ऊपर खर्च किया जाता है, ‘सामाजिक व्यय’ (Social Expenses) कहलाता है।
सामाजिक व्यय निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

  • अनिवार्य सामाजिक व्यय मनुष्य की आय का वह भाग, जिसे समाज के लिए अनिवार्य रूप से खर्च करना पड़ता है, ‘अनिवार्य सामाजिक व्यंय’ कहलाते हैं। इन व्ययों से समाज का हित होता है; जैसे-केन्द्रीय या प्रादेशिक कर।
  • ऐच्छिक सामाजिक व्यय मनुष्य की आय का वह भाग, जिसे मनुष्य अपनी इच्छा (UPBoardSolutions.com) से समाज के लिए खर्च करता है, ‘ऐच्छिक सामाजिक व्यय कहलाते हैं; जैसे–मन्दिर, अस्पताल या धार्मिक संस्थाओं को चन्दा देना।

व्यय और बचत को पारस्परिक सम्बन्ध व्यय और बचत दोनों हमारे जीवन के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। इन दोनों में परस्पर गहरा सम्बन्ध होता है। व्यय के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है, जबकि बचत में परोक्ष रूप से धन का प्रयोग किया जाता है। व्यय में धन के द्वारा वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्राप्त करके आवश्यकताओं की सन्तुष्टि प्रत्यक्ष रूप से की जाती है, जबकि बचत में धन के द्वारा वस्तुओं व सेवाओं की प्राप्ति धन उत्पादन के लिए की जाती है। मार्शल ने व्यय और बचत की कैंची के दो फलकों से तुलना की है। जिस प्रकार कपड़े काटने के लिए कैंची के दो फलकों की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार समाज की उन्नति के लिए व्यय और बचत दोनों ही आवश्यक होते हैं। ये एक-दूसरे के विरोधी न होकर पूरक होते हैं। प्रो. मेन्सन के अनुसार, “व्यय तथा बचत दोनों ही मनुष्य की (UPBoardSolutions.com) आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।”

प्रश्न 3.
व्यय और बचत में अन्तर बताइए। (2016)
उत्तर:
व्यय और बचत में अन्तर

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 21 व्यय एवं बचत

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
व्यय तथा बचत से आप क्या समझते हैं? व्यय व बचत के महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2015)
अथवा
व्यय से क्या आशय है? आर्थिक विकास में व्यय के महत्व का वर्णन कीजिए। (2007)
उत्तर:
व्यय से आशय व्यय, आय का वह भाग होता है, जिसे मनुष्य अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपयोग में लेता है। सरल शब्दों में, आ का वह भाग, जो तत्कालिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपभोग में लिया जाता है, व्यय (Expenditure) कहलाता है। प्रो. बसु के अनुसार, “आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आय का उपभोग करना ही ‘व्यय’ कहलाता है।”

व्यय का महत्त्व मनुष्य को आय कमाने की अपेक्षा व्यय करना कठिन होता है। मनुष्य को अपनी आय सोच-समझकर खर्च करनी चाहिए। व्यय के महत्त्व निम्नलिखित हैं

1. जीवन-स्तर में वृद्धि व्यय करने से मनुष्य के उपभोग स्तर में वृद्धि होती है, जिससे लोगों का जीवन-स्तर उच्च होता है। उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। इससे देश का आर्थिक विकास होता है।
2. रोजगार के अवसरों में वृद्धि अधिक उत्पादन किए जाने से रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सकती है, इससे बेरोजगारी की समस्या का अन्त किया जा सकता है।
3. वस्तुओं की माँग में वृद्धि अधिक व्यय किए जाने से उपभोग स्तर में वृद्धि होती है, फलस्वरूप वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है, जिनके लिए अधिक धनोत्पादन किया जाता है।
4. आय में वृद्धि व्यय से देश के प्रत्येक क्षेत्र की आर्थिक प्रगति होती है व साथ ही (UPBoardSolutions.com) समाज के सभी वर्गों की आय में भी वृद्धि होती है।
5. आर्थिक विकास में सहायक व्यय के कारण व्यक्ति का उपभोग स्तर ऊँचा होता है, जिससे माँग में वृद्धि के फलस्वरूप उद्योगों की स्थापना होती है, जो देश के सर्वांगीण आर्थिक विकास में सहायक है।

बचत से आशय प्रत्येक व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण आय को वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करने में व्यय नहीं करता है। वह अपनी आय का कुछ भाग भविष्य की आवश्यकताओं के आकस्मिक व्ययों के लिए बचाकर रखता है, जिसे बचत (Savings) कहते हैं अर्थात् मनुष्य की आय का वह भाग जो भावी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रखा जाता है, बचत कहलाता है। इसे बैंक या डाकघर में जमा करा सकते हैं या इससे किसी कम्पनी के अंश या ऋणपत्र क्रय कर सकते हैं। केन्ज के अनुसार, “बचत एक निश्चित समय की आय में से उसी समय होने वाले व्यय का अन्तर होता है।” डॉ. बसु के अनुसार, “उत्पादन कार्यों के लिए धन का पूँजी में परिवर्तन करना बचत कहलाता है।

बचत का महत्त्व बचत के महत्त्व को दो दृष्टिकोणों में विभक्त किया जा सकता है

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1. व्यक्तिगत दृष्टिकोण व्यक्तिगत दृष्टिकोण से बचत निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है

  • आय वृद्धि के लिए बचत करने से व्यक्ति की आय बढ़ती है। बचत के पुरस्कार के रूप में ब्याज, लाभांश, आदि की प्राप्ति होती है।
  • पारिवारिक दायित्वों को निभाने के लिए बचत के द्वारा ही पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया जा सकता है; जैसे-बच्चों की शिक्षा, सामाजिक कार्य, आदि।
  • मितव्ययिता के लिए बचत करने से व्यक्ति में मितव्ययिता की भावना उत्पन्न होती है। बचत करने से अनावश्यक व्ययों पर नियन्त्रण किया जा सकता है। इससे अपव्ययिता पर रोक लगती है।
  • सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए बचत करने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, जिससे व्यक्ति समाज के विकास के लिए योगदान दे सकता है। इससे व्यक्ति का समाज में सम्मान प्रतिष्ठा बनी रहती है।
  • वृद्धावस्था के लिए वृद्धावस्था के समय व्यक्ति के लिए बचत ही सबसे (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण सहारा होती है। पर्याप्त बचत होने पर व्यक्ति वृद्धावस्था में सरलता से जीवन-निर्वाह कर सकता है।
  • आकस्मिक अवसर के लिए मनुष्य के जीवन में अनेक ऐसे आकस्मिक अवसर आते हैं, जब सामान्य व्यय से अतिरिक्त आवश्यक व्यय की आवश्यकता होती है; जैसे-बीमारी, बेरोजगारी, मृत्यु, विवाह, आदि।

2. सामाजिक दृष्टिकोण सामाजिक दृष्टिकोण से बचत निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है

  • बैंकिंग व बीमा व्यवसाय का विकास बचत की राशि को लोग बैंकों में जमा कराते हैं या बीमा व्यवसाय में इसका निवेश करते हैं। इससे देश में बैंकिंग व बीमा व्यवसाय का विकास एवं विस्तार होता है।
  • देश की आर्थिक विकास बचत से पूँजी का संचय होता है, जिससे औद्योगिक विकास, जन-जीवन का विकास, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, सामाजिक क्षेत्र का विकास (रेल, तार, सड़कें, स्कूल, अस्पताल, आदि का निर्माण) होता है। इससे देश के आर्थिक विकास में वृद्धि होती है।
  • पूँजी में वृद्धि पूँजी, बचत का ही परिणाम है। जितनी अधिक बचत होगी, उतनी ही पूँजी में वृद्धि होती है। अधिक पूँजी होने पर बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है।
  • जीवन-स्तर में वृद्धि बचत करने से पूँजी का निर्माण होता है। पूँजी निर्माण से उत्पादन कार्यों में वृद्धि होती है। इससे लोगों को रोजगार मिलता है व प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होती है और लोगों के रहन-सहने का स्तर भी ऊँचा होता है।
  • राष्ट्र का शक्तिशाली होना बचत के द्वारा देश के आर्थिक विकास को गति मिलती है। इससे देश की राजनीतिक व सैनिक शक्ति में वृद्धि होती है। वर्तमान में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश को शक्तिशाली राष्ट्र माना जाता है। आर्थिक दृष्टिकोण से देश की रक्षा-शक्ति भी बढ़ती है।

प्रश्न 2.
व्यय क्या है? बचत के सामाजिक महत्त्व का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2013)
अथवा
समाज में बचत के महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2011)
अथवा
बचत से क्या आशय है? बचत के सामाजिक महत्त्व पर प्रकाश डालिए। (2010)
अथवा
बचत क्या है? बचत के सामाजिक महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2009)
अथवा
बचत का क्या अर्थ है? बचत के सामाजिक महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2008)
अथवा
व्यय और बचत से आप क्या समझते हैं? बचत के सामाजिक महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2006)
उत्तर:
व्यय से आशय व्यय, आय का वह भाग होता है, जिसे मनुष्य अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपयोग में लेता है। सरल शब्दों में, आ का वह भाग, जो तत्कालिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उपभोग में लिया जाता है, व्यय (Expenditure) (UPBoardSolutions.com) कहलाता है। प्रो. बसु के अनुसार, “आवश्यकताओं को प्रत्यक्ष रूप से सन्तुष्ट करने के लिए आय का उपभोग करना ही ‘व्यय’ कहलाता है।”

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व्यय का महत्त्व मनुष्य को आय कमाने की अपेक्षा व्यय करना कठिन होता है। मनुष्य को अपनी आय सोच-समझकर खर्च करनी चाहिए। व्यय के महत्त्व निम्नलिखित हैं

1. जीवन-स्तर में वृद्धि व्यय करने से मनुष्य के उपभोग स्तर में वृद्धि होती है, जिससे लोगों का जीवन-स्तर उच्च होता है। उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। इससे देश का आर्थिक विकास होता है।
2. रोजगार के अवसरों में वृद्धि अधिक उत्पादन किए जाने से रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सकती है, इससे बेरोजगारी की समस्या का अन्त किया जा सकता है।
3. वस्तुओं की माँग में वृद्धि अधिक व्यय किए जाने से उपभोग स्तर में वृद्धि होती है, फलस्वरूप वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है, जिनके लिए अधिक धनोत्पादन किया जाता है।
4. आय में वृद्धि व्यय से देश के प्रत्येक क्षेत्र की आर्थिक प्रगति होती है व साथ ही समाज के सभी वर्गों की आय में भी वृद्धि होती है।
5. आर्थिक विकास में सहायक व्यय के कारण व्यक्ति का उपभोग स्तर ऊँचा होता है, जिससे माँग में वृद्धि के फलस्वरूप उद्योगों की स्थापना होती है, जो देश के सर्वांगीण आर्थिक विकास में सहायक है।

बचत से आशय प्रत्येक व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण आय को वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करने में व्यय नहीं करता है। वह अपनी आय का कुछ भाग भविष्य की आवश्यकताओं के आकस्मिक व्ययों के लिए बचाकर रखता है, जिसे बचत (Savings) कहते हैं (UPBoardSolutions.com) अर्थात् मनुष्य की आय का वह भाग जो भावी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रखा जाता है, बचत कहलाता है। इसे बैंक या डाकघर में जमा करा सकते हैं या इससे किसी कम्पनी के अंश या ऋणपत्र क्रय कर सकते हैं। केन्ज के अनुसार, “बचत एक निश्चित समय की आय में से उसी समय होने वाले व्यय का अन्तर होता है।” डॉ. बसु के अनुसार, “उत्पादन कार्यों के लिए धन का पूँजी में परिवर्तन करना बचत कहलाता है।

बचत का सामाजिक महत्त्व

बचत का महत्त्व बचत के महत्त्व को दो दृष्टिकोणों में विभक्त किया जा सकता है

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1. व्यक्तिगत दृष्टिकोण व्यक्तिगत दृष्टिकोण से बचत निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है

  • आय वृद्धि के लिए बचत करने से व्यक्ति की आय बढ़ती है। बचत के पुरस्कार के रूप में ब्याज, लाभांश, आदि की प्राप्ति होती है।
  • पारिवारिक दायित्वों को निभाने के लिए बचत के द्वारा ही पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया जा सकता है; जैसे-बच्चों की शिक्षा, सामाजिक कार्य, आदि।
  • मितव्ययिता के लिए बचत करने से व्यक्ति में मितव्ययिता की भावना उत्पन्न होती है। बचत करने से अनावश्यक व्ययों पर नियन्त्रण किया जा सकता है। इससे अपव्ययिता पर रोक लगती है।
  • सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए बचत करने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, जिससे व्यक्ति समाज के विकास के लिए योगदान दे सकता है। इससे व्यक्ति का समाज में सम्मान प्रतिष्ठा बनी रहती है।
  • वृद्धावस्था के लिए वृद्धावस्था के समय व्यक्ति के लिए बचत ही सबसे महत्त्वपूर्ण सहारा होती है। पर्याप्त बचत होने पर व्यक्ति वृद्धावस्था में सरलता से जीवन-निर्वाह कर सकता है।
  • आकस्मिक अवसर के लिए मनुष्य के जीवन में अनेक ऐसे आकस्मिक (UPBoardSolutions.com) अवसर आते हैं, जब सामान्य व्यय से अतिरिक्त आवश्यक व्यय की आवश्यकता होती है; जैसे-बीमारी, बेरोजगारी, मृत्यु, विवाह, आदि।

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2. सामाजिक दृष्टिकोण सामाजिक दृष्टिकोण से बचत निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है

  • बैंकिंग व बीमा व्यवसाय का विकास बचत की राशि को लोग बैंकों में जमा कराते हैं या बीमा व्यवसाय में इसका निवेश करते हैं। इससे देश में बैंकिंग व बीमा व्यवसाय का विकास एवं विस्तार होता है।
  • देश की आर्थिक विकास बचत से पूँजी का संचय होता है, जिससे औद्योगिक विकास, जन-जीवन का विकास, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, सामाजिक क्षेत्र का विकास (रेल, तार, सड़कें, स्कूल, अस्पताल, आदि का निर्माण) होता है। इससे देश के आर्थिक विकास में वृद्धि होती है।
  • पूँजी में वृद्धि पूँजी, बचत का ही परिणाम है। जितनी अधिक बचत होगी, उतनी ही पूँजी में वृद्धि होती है। अधिक पूँजी होने पर बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है।
  • जीवन-स्तर में वृद्धि बचत करने से पूँजी का निर्माण होता है। पूँजी निर्माण से उत्पादन कार्यों में वृद्धि होती है। इससे लोगों को रोजगार मिलता है व प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होती है और लोगों के रहन-सहने का स्तर भी ऊँचा होता है।
  • राष्ट्र का शक्तिशाली होना बचत के द्वारा देश के आर्थिक विकास को (UPBoardSolutions.com) गति मिलती है। इससे देश की राजनीतिक व सैनिक शक्ति में वृद्धि होती है। वर्तमान में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश को शक्तिशाली राष्ट्र माना जाता है। आर्थिक दृष्टिकोण से देश की रक्षा-शक्ति भी बढ़ती है।

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 25 पूँजी

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Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 25
Chapter Name पूँजी
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 25 पूँजी

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
सम्पत्ति का जो भाग उत्पादन में लगाया जाता है, उसे कहते हैं (2012)
(a) बचत
(b) संचय
(C) पूँजी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) पूँजी

प्रश्न 2.
पूँजी उत्पत्ति का :साधन होती है।
(a) सक्रिय
(b) अनिवार्य
(C) गतिशील
(d) अनुत्पादक
उत्तर:
(c) गतिशील

प्रश्न 3.
पूँजी में शुद्ध लाभ दिखाया जाता है।
(a) जोड़कर
(b) घटाकर
(c) जोड़कर या घटाकर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जोड़कर

प्रश्न 4.
पूँजी संचय के लिए ……… आवश्यक है।
(a) बचत
(b) संचय बाजारे
(C) व्यय
(d) ये सभी
उत्तर:
(b) संचय बाजार

UP Board Solutions

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक )

प्रश्न 1.
क्या समस्त धन पूँजी है? (2017)
उत्तर:
नहीं

प्रश्न 2.
समस्त सम्पत्ति पूँजी है/नहीं है।
उत्तर:
पूँजी नहीं है।

प्रश्न 3.
गड़ा हुआ धन पूँजी है/नहीं है।
उत्तर:
नहीं है।

प्रश्न 4.
पूँजी उत्पादन का सक्रिय/निष्क्रिय साधन है।
उत्तर:
निष्क्रिय साधन है।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
पूँजी सदैव उत्पादक होती है/नहीं होती है।
उत्तर:
उत्पादक होती है।

प्रश्न 6.
पूँजी नाशवान/अविनाशी होती है। (2010)
उत्तर:
नाशवान होती है।

प्रश्न 7.
पूँजी गतिशील/अगतिशील होती है।
उत्तर:
गतिशील होती है।

प्रश्न 8.
पूँजी उत्पादन का अनिवार्य/गौण साधन है।
उत्तर:
अनिवार्य साधन है।

UP Board Solutions

प्रश्न 9.
पूँजी का निर्माण व्यय/बचत पर निर्भर करता है।
उत्तर:
बचत पर निर्भर करता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
प्रो. टॉमस द्वारा दी गई पूँजी की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
प्रो. टॉमस के अनुसार, “पूँजी, भूमि को छोड़कर, व्यक्ति और समाज की सम्पत्ति का वह भाग है, जिसका प्रयोग और अधिक धन उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।”

प्रश्न 2.
उत्पादन के साधन के रूप में पूँजी की चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर:
उत्पादन के साधन के रूप में पूजी की चार विशेषताएँ निम्नलिखित

  1. पूँजी उत्पत्ति का निष्क्रिय साधन होती है। सम्पत्ति का वह भाग, जो उत्पादन के कार्य में सहयोग देता है, पूँजी कहलाता है।
  2. पूँजी मानव-निर्मित साधन है। यह मानव (UPBoardSolutions.com) द्वारा संचित किए गए श्रम का परिणाम होती है।
  3. पूँजी का प्रयोग करके अधिक मात्रा में उत्पादन किया जा सकता है। अत: पूँजी में उत्पादकता होती है।
  4. पूँजी को शीघ्र नष्ट नहीं किया जा सकता है। यह नाशवान प्रकृति की होती है।

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प्रश्न 3.
पूँजी की कार्यक्षमता का अर्थ बताइए। इसे प्रभावित करने वाले तीन घटक लिखिए।
उत्तर:
पूँजी की कार्यक्षमता (Efficiency of Capital) से आशय न्यूनतम पूँजी के उपयोग से अधिकतम तथा उच्च-स्तर के माल का निर्माण करना है। पूंजी की कार्यक्षमता को निम्न घटक प्रभावित करते हैं

  1. देश में शान्ति एवं सुरक्षा की स्थिति पूँजी की कार्यक्षमता को बढ़ाती है।
  2. किसी उत्पादन कार्य को करने के लिए लगाई गई पूँजी की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए।
  3. उत्पादन की अच्छी व आधुनिक व्यवस्था पूँजी की कार्यक्षमता को बढ़ाती है।

प्रश्न 4.
उत्पादन तथा उपभोग पूँजी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2014)
उत्तर:
जिन वस्तुओं का प्रयोग उत्पादन कार्य में प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है, उन्हें उत्पादन पूँजी में सम्मिलित किया जाता है; जैसे-कच्चा माल, औजार, आदि तथा जिस पूँजी का प्रयोग मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए किया जाता है, (UPBoardSolutions.com) उसे उपभोग पूँजी कहते हैं; जैसे-भोजन, वस्त्र, आदि पर किया गया व्यय।

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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
पूँजी क्या है? सम्पत्ति व पूँजी में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2008)
उत्तर:
पूँजी से आशय साधारण बोलचाल में, पूँजी (Capital) का अर्थ ‘रुपये-पैसे’ या ‘धन-सम्पत्ति’ से लगाया जाता है। अर्थशास्त्र में मनुष्य द्वारा उत्पादित धन के उस भाग को पूँजी कहते हैं, जो अधिक धन उत्पादन के लिए। प्रयुक्त किया जाता है।

सम्पत्ति व पूँजी में अन्तर

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 25 पूँजी

प्रश्न 2.
पूँजी की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पूँजी की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. पूँजी उत्पत्ति का निष्क्रिय साधन है भूमि की तरह पूँजी भी स्वयं उत्पादन करने में सक्षम नहीं होती है। पूँजी श्रम के सहयोग से ही उत्पादन क्रिया में भागीदार बनती है।

2. पूँजी मानव-निर्मित साधन है पूँजी उत्पादन का मानव-निर्मित साधन है। पूँजी का संचय बचत के साधन से होता है। बचत मनुष्यों द्वारा की जाती है। अतः यह संचित श्रम का परिणाम होती है।

3. पूँजी में उत्पादकता होती है पूँजी उत्पादक होती है। पूँजी का प्रयोग करके श्रमिक अधिक मात्रा में उत्पादन कर सकता है। उद्योगपतियों द्वारा पूँजी की उत्पादकता के कारण ही इसकी माँग की जाती है।

4. पूँजी नाशवान है भूमि के समान पूँजी भी उत्पादन का स्थायी साधन नहीं है। मशीन, औजार, इत्यादि निरन्तर प्रयोग के कारण नष्ट हो जाते हैं। अत: इसे नई पूँजी से प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

5. पूँजी की पूर्ति में शीघ्र परिवर्तन सम्भव है पूँजी की पूर्ति में शीघ्र परिवर्तन किया जा (UPBoardSolutions.com) सकता है। व्यक्तिगत व सामाजिक बचतों में वृद्धि करके पूँजी की पूर्ति को शीघ्र बढ़ाया जा सकता है।

6. पूँजी अत्यन्त गतिशील होती है पूँजी को सरलता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया व ले जाया जा सकता है।

7. पूँजी उत्पादन का महत्त्वपूर्ण व अनिवार्य साधन है प्रत्येक उत्पादन कार्य के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। जितने बड़े स्तर पर उत्पादन होता है, उतनी ही अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।

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8. पूँजी बचत का परिणाम है मानव अपने द्वारा कमाए गए पूरे धन को व्यय नहीं करता, वरन् कुछ धन को बचाकर रखता है। इस बचत को मानव द्वारा विनियोग किया जाता है तथा इनसे पूँजी का निर्माण होता है।

9. पूँजी आय का स्रोत मानी जाती है पूँजी का संचय या बचत इसलिए की जाती है, ताकि भविष्य में उससे और अधिक आय प्राप्त हो सके।

10. पूँजी अस्थायी होती है पूँजी को समय-समय पर पुनरुत्पादित करना पड़ता है।

प्रश्न 3.
श्रम व पूँजी में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2008)
उत्तर:
श्रम और पूँजी में अन्तर

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 25 पूँजी

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
पूँजी क्यों है? व्यवसाय में पूँजी के महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2012, 10)
अथवा
उत्पादन के साधन के रूप में पूँजी के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। (2007, 06)
अथवा
पूँजी क्या है? अन्य उत्पादन के साधनों की तुलना में पूँजी अधिक महत्त्वपूर्ण है। विवेचना कीजिए। (2006)
उत्तर:
पूँजी से आशय साधारण बोलचाल में, पूँजी का अर्थ ‘रुपये-पैसे’ या ‘धन-सम्पत्ति से लगाया जाता है। अर्थशास्त्र में मनुष्य द्वारा उत्पादित धन के उस भाग को पूँजी कहते हैं, जो अधिक धन उत्पादन के लिए प्रयुक्त किया जाता है। सामान्यतः ‘पूँजी’ शब्द का अर्थ धन, (UPBoardSolutions.com) द्रव्य या सम्पत्ति से लगाया जा सकता है। प्रो. मार्शल के अनुसार, “प्रकृति की नि:शुल्क देन के अतिरिक्त वह सब सम्पत्ति, जिससे आय प्राप्त होती है, पूँजी कहलाती है।”

प्रो. चैपमैन के अनुसार, “पूँजी वह धन है, जिससे आय प्राप्त होती है अथवा जो आय का उत्पादन करने में सहायक होती है।” प्रो. टॉमस के अनुसार, “पूँजी, भूमि को छोड़कर, व्यक्ति और समाज की सम्पत्ति का वह भाग है, जिसका प्रयोग और अधिक धन उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।” एडम स्मिथ के अनुसार, “पूँजी, किसी मनुष्य के भण्डार का वह भाग है, जिससे वह आय प्राप्त करने की आशा करता है।”

पूँजी के कार्य एवं महत्त्व वर्तमान में पूँजी का अत्यधिक महत्त्व है। इसकी सहायता से ही बड़े पैमाने पर उत्पादन यातायात व संचार के साधनों का विकास, उच्च जीवन-स्तर, देश को आर्थिक विकास, नई मशीनों व यन्त्रों का निर्माण, आदि किया जा सकता है। इससे राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होती है।

अन्य साधनों की तुलना में पूंजी के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है

1. बिक्री की व्यवस्था करना उत्पादक को अपनी वस्तुएँ बेचने के लिए विज्ञापन के विभिन्न साधनों का सहारा लेना पड़ता है; जैसे-रेडियो, टेलीफोन, समाचार-पत्र या पत्रिकाएँ, टेलीविजन, आदि। इन सभी प्रकार के विज्ञापनों के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है।

2. उत्पादन में निरन्तरता बनाए रखना पर्याप्त पूँजी के उपलब्ध होने पर उत्पादन लगातार चलता रहता है। अतः उत्पादन की निरन्तरता में पूँजी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

3. जीवन-निर्वाह की व्यवस्था करना पूँजी के द्वारा ही श्रमिकों को भोजन, कपड़ा व आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। श्रमिक अपने जीवन का निर्वाह पूँजी के माध्यम से ही करता है। मजदूरी के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है।

4. कच्चे माल की व्यवस्था करना पूँजी के द्वारा ही उद्योग को संचालित करने के लिए कच्चा माल, कोयला, लोहा, बिजली, आदि की व्यवस्था करनी पड़ती है। अतः पूँजी का कच्चे माल की व्यवस्था करने में अत्यन्त महत्त्व होता है।

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5. देश के आर्थिक विकास में सहायक पूँजी की पर्याप्त मात्रा होने से उत्पादन शक्ति (UPBoardSolutions.com) में वृद्धि होती है, जिससे प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। अतः पूँजी राष्ट्र के आर्थिक विकास में सहायक होती है।

6. मशीन, यन्त्र, आदि की व्यवस्था करना पूँजी के द्वारा ही आधुनिक मशीनों व यन्त्रों को खरीदा जा सकता है।

7. श्रम की उत्पादकता में वृद्धि करना श्रम की उत्पादकता बढ़ाने में पूँजी को महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। पूँजी के द्वारा क्रय किए गए यन्त्रों एवं औजारों के प्रयोग से श्रमिक की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।

8. साख की व्यवस्था करना वर्तमान युग साख का युग है। आजकल उद्योग व व्यापार के क्षेत्र में हर जगह उधार लेन-देन की आवश्यकता होती है। व्यापारियों में अधिकांश लेन-देन उधार ही होते हैं। पूँजी के बल पर ही सभी उधार लेन-देन किए जाते हैं। पूँजी निर्माण से ही साख निर्माण होता है।

9. प्राकृतिक संसाधनों के उचित उपयोग में सहायक पूँजी के द्वारा ही किसी राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है; जैसे–सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, खनिज उद्योग का विस्तार, आदि पूँजी के द्वारा ही सम्भव होते हैं।

10. आर्थिक ढाँचे को सुदृढ़ बनाने में सहायक पूँजी के द्वारा ही किसी देश की ऊर्जा के स्रोतों; जैसे-बिजली, पेट्रोलियम, अणु शक्ति, जल शक्ति, आदि का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है। पूँजी से परिवहन व संचार के साधनों का भी विकास किया जा सकता है। अतः पूँजी किसी राष्ट्र के आर्थिक ढाँचे को मजबूत बनाने में सहायक होती है।

प्रश्न 2.
पूँजी निर्माण से आप क्या समझते हैं? यह किन तत्त्वों पर निर्भर है? (2016)
अथवा
पूँजी संचय क्या है? पूँजी संचय के प्रमुख तत्त्वों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
अथवा
पूँजी निर्माण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पूँजी निर्माण से आशय पूँजी संचय या निर्माण (Accumulation of Capital) बचत के द्वारा ही किया जाता है। बचत आय के उस भाग को कहा जाता है, जिसे भविष्य की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए बचाकर रखा जाता है। बचत का वह भाग, (UPBoardSolutions.com) जिसका प्रयोग और अधिक धन-उत्पादन के लिए किया जाता है, उसे पूँजी कहा जाता है। पूँजी संचय का निर्माण बचतों को

संग्रह करके किया जाता है। पूँजी संचय के लिए निम्नलिखित दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं

  1. धन की बचत
  2. उत्पादन कार्य में निवेश करना

पूँजी संचय को प्रभावित करने वाले तत्त्व पूँजी संचय के निम्नलिखित तीन प्रमुख तत्त्व या आधार हैं

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1. संचय करने की शक्ति मनुष्य द्वारा बचत को संचय करने की शक्ति निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती है

  • धन का वितरण देश में धन को समान वितरण होने से पूँजी संचय किया जा सकता है।
  • प्राकृतिक साधन प्राकृतिक साधनों की पर्याप्त मात्रा होने पर आय बढ़ती है और आय बढ़ने पर बचत भी की जा सकती है।
  • आर्थिक विकास की स्थिति किसी राष्ट्र को आर्थिक विकास अधिक होने पर उसकी राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि होती है, फलस्वरूप पूँजी संचय का निर्माण होता है।
  • व्यय करने की सूझ-बूझ पूँजी संचय करने के लिए व्यय सूझ-बूझ व सोच-समझकर करना चाहिए।
  • आय की मात्रा बचत किसी व्यक्ति की आय पर निर्भर करती है। जिस व्यक्ति की जितनी अधिक आय होगी, वह उतनी ही ज्यादा बचत करेगा।

2. संचय करने की इच्छा पूँजी संचय करने की इच्छा निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है|

  • सामाजिक प्रतिष्ठा की इच्छा समाज में प्रतिष्ठा व सम्मान प्राप्त करने के लिए पूँजी संचय किया जाता है, इससे मनुष्य को समाज में सम्मान मिलता है।
  • दूरदर्शिता मनुष्य भविष्य में होने वाले कार्यों; जैसे-बच्चों की शिक्षा, (UPBoardSolutions.com) बीमारी, लड़कियों का विवाह, बेरोजगारी, आदि के लिए भी पूँजी संचय करता है।
  • पारिवारिक प्रेम मनुष्य अपने परिवार की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए या उन्हें सुखी रखने के लिए पूँजी संचय करता है।
  • धार्मिक प्रवृत्ति मनुष्य धार्मिक प्रवृत्ति के लिए; जैसे–मन्दिर, धर्मशाला, गौशाला, आदि में दान करने के लिए पूँजी संचय करता है।
  • सामाजिक सुरक्षा पूँजी संचय से सामाजिक सुरक्षा प्राप्त हो जाती है।

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3. संचय करने की सुविधाएँ पूँजी संचय के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ होना आवश्यक है

  • व्यापारियों या उद्योगपतियों की योग्यता कुशल व योग्य व्यापारियों द्वारा व्यवसाय संचालन करने पर अधिक मात्रा में पूँजी संचय किया जा सकता है।
  • शान्ति व सुरक्षा देश में शान्ति व सुरक्षा की व्यवस्था स्थापित करने के लिए पूँजी संचय करना चाहिए।
  • मूल्यों में स्थिरता देश में मुद्रा के मूल्य में स्थायित्व रखने पर भी पूँजी संचय किया जा सकता है।
  • पूँजी-विनियोग की सुविधाएँ धन जमा कराने की संस्थाएँ; जैसे-डाकखाने, बैंक या बीमा (UPBoardSolutions.com) कम्पनियों की अधिक मात्रा में स्थापना करने पर पूँजी संचय अधिक मात्रा में किया जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 10 English Monthly Test Paper-3

UP Board Solutions for Class 10 English Monthly Test Paper-3 are part of UP Board Solutions for Class 10 English. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 English Monthly Test Paper-3.

Board UP Board
Class Class 10
Subject English
Test Paper Name Monthly Test Paper-3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 English Monthly Test Paper-3

Time : 1 Hour]
[Max. Marks : 10]

1. Essay/Story: Write a short essay on any one of the following topics:
(i) A Pet Animal
(ii) Your School
(iii) A Flower of Your Liking
(iv) Any Festival
Or
Complete the following story :
Two neighbors on a journey ……… pass (UPBoardSolutions.com) through a jungle ……… suddenly appearance of a bear ……… the clever one ……… a tree ……… the other the ground …….. dead ………. the bear smells and goes away ……… the clever one inquires about …….. what the bear told him ……… the other ……… don’t trust a deserter.

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2. Life history/Letter writing
Write what type of life was Yudhishthira passing with his brothers and where?
What sad incident happened with his brothers? How did he solve it?
Or
Write a letter to your friend describing how you enjoyed your visit to a historical place.

3. Unseen :
Read the following passage carefully and answer any two of the questions given below it :
Subhash Chandra Bose was a great leader of India. His countrymen called him ‘Netaji’ because he led them on the right path. He was imprisoned many times. But he soon found out that more efforts should (UPBoardSolutions.com) be made to make India free. The British power was getting weaker in the Second World War. He thought of shaking it from all sides.
One day, he escaped from Calcutta in the guise of a ‘Pathan’ and went to Germany via Peshawar. From Germany, he went to Japan. He organised the Indian National Army that fought many battles against the British forces. He said to his countrymen, “Give me blood and I will give you freedom.”

Questions :

  1. Who was called ‘Netaji’?
  2. What was the condition of the British power in the Second World War?
  3. How did Subhash Chandra Bose escape from India?
  4. What did he say to countrymen?

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Solution

1. Your School
Its name and situation: I study in D.A.V. Inter college, Dehradun. It is a model college of Uttarakhand. It is situated on the D.L. Road, Dehradun.
Its building: The building of our college is grand and double storeyed. There are about fifty rooms and a big hall in it. There is a big courtyard. There are beautiful flower beds on all sides. There is a big library having thousands of books on every subject.
Its principal and member of the staff: Its principal Mr (UPBoardSolutions.com) Om Prakash Sharma is a noble man. He has made the college what it is today. All the teachers of the college are highly qualified and experienced. They teach us with love and care.
Its students: There are about three thousand students in this college. The students of this college are honest, hard working and obedient. They are disciplined.
Discipline and results: Our college is well-known for good results. The pass percentage of High School and Inter classes is always 60 to 70 per cent.

Any Festival (Diwali)
Introduction: Diwali is a very important festival of the Hindus. It is celebrated throughout the country with great pomp and show. This festival is known as the festival of lights.
When and why is it celebrated ? : It is celebrated in the month of Kartika on the Amavasya day. Some people believe that Shri Ramchandraji returned to Ayodhya after killing the wicked Ravana on this day. Some believe that Lord Krishna killed the demon Narkasur. The Jains believe that Lord Mahavira got salvation on this day.

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How I celebrated Diwali this year ? : This year, I celebrated Diwali with great joy. I cleaned my house and got it whitewashed. Then I decorated it with balloons, beautiful pictures and paper flowers. (UPBoardSolutions.com) At about eight o’clock in the night I worshiped Lakshmi, the goddess of wealth. I lighted and burst fire crackers too.
Conclusion : Diwali is a very good festival. But some people drink and gamble on this day. We should remove these evils.
Or
Completion of story
Once two neighbors went on a journey. They had to pass through a jungle. Suddenly they saw a bear and they were very frightened. One of them was very clever. So he climbed upon a tree. The other thought out a trick. He laid down on the ground as if he was dead. The bear come near him, smelled him and went away. The bear does not eat dead. Then the clever one (UPBoardSolutions.com) came down from the tree and inquired him what the bear had told him in his ear. The other man said, “The bear told me not to trust a deserter.” At this the first man was much ashamed.

2. Yudhishthira was passing a hard life with his brothers in exile. His brothers went in search of drinking water and reached a pool which belonged to Yama. They ignored the warning of Yama and began to drink water. Yama cursed them and so they died. Tired of waiting for them, Yudhishthira started in search of them and reached the same pool. Same warning came from Yama. But Yudhishthira answered all the questions of Yama very wisely. The Yama was pleased with Yudhishthira’s impartiality. Being satisfied with his answers, Yama made his brothers alive and disappeared.
Or
70, Arya Nagar,
Moradabad.
Dated: …..
Dear Mahesh,
I am quite well here and hope you are also having a good time there. You will be glad to know that this year I passed my summer vacation in my father’s company at Agra. We stayed there in a hotel. First of all, we went to see the Taj in the evening. It was a full moon night. Seeing the Taj in full moon night was really wonderful. It seemed like a dream in marble. (UPBoardSolutions.com) It is made of pure white marble. It was built by emperor Shahjahan in the memory of his beloved wife Mumtaz Mahal. It is really a piece of art. Next day we went to see the Red Fort, the Radha Swami Temple and many other important buildings which were also beautiful.
Please let me know how you enjoyed your summer vacation. Rest is OK. With best regards to elders and love to others.
Yours sincerely
XXX

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3. 1. Subhash Chandra Bose, a great leader of India was called Netaji.
2. The British power was getting weaker in the Second World War.
3. Subhash Chandra Bose escaped from India in the guise (UPBoardSolutions.com) of a ‘Pathan’ and went to Germany.
4. He said to his countrymen, “Give me blood and I will give you freedom.”

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 24 श्रम

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 24 श्रम are the part of UP Board Solutions for Class 10 Commerce. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 24 श्रम.

Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 24
Chapter Name श्रम
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 24 श्रम

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-सी क्रिया अर्थशास्त्र की दृष्टि से श्रम है? (2016)
(a) तस्करी,
(b) भीख माँगना
(c) अध्यापक द्वारा अपने पुत्र को पढ़ाना
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सी क्रिया अर्थशास्त्र की दृष्टि से ‘श्रम’ है? (2017)
(a) डकैती
(b) तस्करी
(c) चैन खींचना
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

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प्रश्न 3.
श्रम के अन्तर्गत सम्मिलित हैं।
(a) मानवीय क्रियाएँ
(b) वैधानिक क्रियाएँ
(c) मानसिक व शारीरिक दोनों क्रियाएँ
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) मानसिक व शारीरिक दोनों क्रियाएँ

प्रश्न 4.
श्रम उत्पत्ति का ……….. साधन होता है।
(a) सक्रिय
(b) निष्क्रिय
(c) शारीरिक
(d) मानसिक
उत्तर:
(a) सक्रिय

प्रश्न 5.
श्रम उत्पादन का
(a) साधन है
(b) साध्य है
(c) साधन व साध्य दोनों है
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) साधन व साध्य दोनों है

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निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
माता द्वारा बच्चे का पालन-पोषण अर्थशास्त्र में श्रम है/नहीं है।
उत्तर:
नहीं है।

प्रश्न 2.
पूँजी की अपेक्षा श्रम अधिक गतिशील होता है।नहीं होता है।
उत्तर:
नहीं होता है।

प्रश्न 3.
श्रम उत्पादन का सक्रिय साधन है/सक्रिय साधन नहीं है।
उत्तर:
सक्रिय साधन है।

प्रश्न 4.
श्रम नाशवान है/नहीं है।
उत्तर:
नाशवान है।

प्रश्न 5.
श्रम में पूँजी का विनियोग किया जा सकता है/नहीं किया जा सकता है।
उत्तर:
किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
श्रम उत्पादन का गौण/अनिवार्य उपादान है।
उत्तर:
अनिवार्य उपादान है।

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प्रश्न 7.
श्रम उत्पादक एवं अनुत्पादक दोनों होता है/दोनों नहीं होता है।
उत्तर:
दोनों होता है।

प्रश्न 8.
अध्यापक का श्रम अनुत्पादक है/नहीं है।
उत्तर:
नहीं है।

प्रश्न 9.
इंजीनियर का कार्य मानसिक/शारीरिक श्रम है।
उत्तर:
मानसिक श्रम है।

प्रश्न 10.
श्रम की माँग प्रत्यक्ष/परोक्ष होती है।
उत्तर:
परोक्ष होती है।

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प्रश्न 11.
श्रमिकों की कार्यक्षमता पर जलवायु व प्राकृतिक वातावरण का प्रभाव पड़ता है/नहीं पड़ता।
उत्तर:
पड़ता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
श्रम की दो मर्यादाएँ या मूल तत्त्वों को लिखिए।
उत्तर:
श्रम की दो प्रमुख मर्यादाएँ या मूल तत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. धनोपार्जन के उद्देश्य से की जाने (UPBoardSolutions.com) वाली समस्त क्रियाओं को श्रम में सम्मिलित किया जाता है।
  2. श्रम में केवल मानवीय प्रयत्नों को ही सम्मिलित किया जाता है, मशीनी कार्य को नहीं।

प्रश्न 2.
उत्पादन के साधन के रूप में श्रम की दो विशेषताएँ लिखिए। (2016)
उत्तर:
उत्पादन के साधन के रूप में श्रम की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. श्रम उत्पत्ति को सक्रिय साधन है श्रम उत्पत्ति का सक्रिय साधन है, जबकि भूमि और पूँजी उत्पत्ति के निष्क्रिय साधन हैं। श्रम के अभाव में पूँजी और भूमि कोई उत्पत्ति नहीं कर सकती है।
  2. श्रम नाशवान है श्रम की सबसे बड़ी विशेषता श्रम का नाशवान होना है। यदि किसी दिन श्रमिक कार्य नहीं करता, तो उसका उस दिन का श्रम हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 3.
श्रम के प्रकार बताइए।
उत्तर:
श्रम का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जा सकता है

  1. कुशल व अकुशल श्रम
  2. उत्पादक एवं अनुत्पादक श्रम
  3. शारीरिक व मानसिक श्रम

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प्रश्न 4.
भारतीय श्रमिकों की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व लिखिए।
उत्तर:
भारतीय श्रमिकों की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले दो तत्त्व निम्न प्रकार हैं

  1. पुरस्कार व उन्नति की आशा यदि श्रमिक को कार्य करने से उचित मजदूरी, पुरस्कार या पदोन्नति मिलती है, तो श्रमिक अधिक कुशलता से कार्य को सम्पन्न करते हैं। कम मजदूरी पाने वाले श्रमिकों में कुशलता की कमी होती है।

  2. शिक्षा तथा प्रशिक्षण एक शिक्षित व विशेष प्रशिक्षण प्राप्त श्रमिक, (UPBoardSolutions.com) अप्रशिक्षित श्रमिक की तुलना में अधिक कुशलता से कार्य करता है। प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति कार्य को शीघ्र समझकर सम्पन्न कर देता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
अम क्या है? भूमि व श्रम में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
श्रम से आशय साधारण भाषा में ‘श्रम’ शब्द का अर्थ शारीरिक परिश्रम अथवा किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए किए गए प्रयत्न से होता है, किन्तु अर्थशास्त्र में श्रम का तात्पर्य उन मानसिक व शारीरिक प्रयत्नों से होता है, जो आर्थिक प्रतिफल के उद्देश्य से किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, डॉक्टर, वकील, मजदूर, प्रबन्धक, मन्त्री या सरकारी कर्मचारी (चाहे वे किसी भी स्तर के हों), इन सभी के प्रयत्न श्रम की श्रेणी में आते हैं।

भूमि व श्रम में अन्तर

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प्रश्न 2.
उत्पादन में श्रम का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
किसी भी कार्य को करने में श्रम का जो महत्त्व होता है, उसे निम्न बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

  1. उत्पादन को सम्भव बनाना श्रम के बिना किसी भी वस्तु या सेवा का उत्पादन असम्भव है। अत: श्रम के द्वारा ही उत्पादन के अन्य उपादानों को क्रियाशील बनाया जाता है।
  2. आर्थिक विकास में सहयोगी श्रम के अभाव में कोई देश आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता। किसी भी देश में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का मानवीय संसाधनों (श्रम) द्वारा कुशलतम उपयोग करके देश का आर्थिक विकास किया जाता है।
  3. औद्योगिक विकास में महत्त्व औद्योगिक विकास हेतु नई-नई उत्पादन (UPBoardSolutions.com) विधियों तथा मशीनों के निर्माण में भी श्रम का अत्यधिक महत्त्व है। एक कुशल श्रमिक द्वारा ही उद्योगों के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार किए जाते हैं।
  4. वस्तुओं के उपभोग में महत्त्व श्रमिक द्वारा उत्पादित की गई वस्तुओं के उपभोग करने में भी श्रमिक का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि उत्पादित वस्तु का उपभोग भी मानवीय श्रम द्वारा ही किया जाता है।
  5. वितरण के अध्ययन में महत्त्व वितरण का अध्ययन करने में भी श्रम का अत्यधिक महत्त्व है, क्योंकि राष्ट्रीय आय के बढ़ने से भूमि के लगान तथा पूँजी के ब्याज में जो वृद्धि होती है, वह मानवीय श्रम के सहयोग द्वारा ही सम्भव है।
  6. वस्तुओं के विनिमय में महत्त्व वर्तमान युग में बाजारों में वस्तुओं तथा सेवाओं का विनिमय तभी सम्भव है, जब कृषक या श्रमिकों द्वारा उचित व अच्छी किस्म की फसल का उत्पादन किया जाए। अतः श्रम विनिमय के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
श्रम क्या है? उत्पादन के साधन के रूप में श्रम के प्रमुख लक्षणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2014)
अथवा
श्रम से आप क्या समझते हैं? श्रम की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्रम से आशय
श्रम से आशय साधारण भाषा में ‘श्रम’ शब्द का अर्थ शारीरिक परिश्रम अथवा किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए किए गए प्रयत्न से होता है, किन्तु अर्थशास्त्र में श्रम का तात्पर्य उन मानसिक व शारीरिक प्रयत्नों से होता है, जो आर्थिक प्रतिफल के उद्देश्य से किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, डॉक्टर, वकील, मजदूर, प्रबन्धक, मन्त्री या सरकारी कर्मचारी (चाहे वे किसी भी स्तर के हों), इन सभी के प्रयत्न श्रम की श्रेणी में आते हैं।

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भूमि व श्रम में अन्तर
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श्रम के लक्षण या विशेषताएँ श्रम के प्रमुख लक्षणे या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. श्रम उत्पत्ति का सक्रिय साधन है श्रम उत्पत्ति का सक्रिय साधन है, जबकि भूमि और पूँजी उत्पत्ति के निष्क्रिय साधन हैं श्रम के अभाव में पूँजी और भूमि कोई उत्पत्ति नहीं कर सकती है। प्रबन्ध और संगठन भी श्रम के ही विशिष्ट रूप हैं।

2. श्रम नाशवान है श्रम की सबसे बड़ी विशेषता श्रम का नाशवान होना है। यदि किसी दिन श्रमिक कार्य नहीं करता, तो उसका उस दिन का श्रम हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है।

3. श्रमिक अपने श्रम को बेचता है स्वयं को नहीं श्रमिक को वहाँ उपस्थित रहना पड़ता है, जहाँ श्रम करना है। अतः श्रमिकों को अपना श्रम बेचते समय कार्य करने की जगह, कार्य की प्रकृति, भौतिक वातावरण, मालिकों के स्वभाव, आदि पर ध्यान देना आवश्यक होता है।

4. श्रमिक की मोल-भाव करने की क्षमता कम होती है श्रम के नाशवान होने तथा श्रम को श्रमिक से अलग न किए जा सकने के कारण श्रमिकों की मोल-भाव (सौदा) करने की शक्ति कमजोर होती है। श्रमिकों की दरिद्रता, अकुशलता तथा वैकल्पिक रोजगार के अभाव में भी वे मालिकों की तुलना में कमजोर रह जाते हैं।

5. श्रम साधन और साध्य दोनों है श्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि श्रम न केवल उत्पत्ति का एक सक्रिय साधन है, वरन् उपभोक्ता के रूप में सम्पूर्ण आर्थिक क्रियाओं का साध्य भी है। समस्त आर्थिक कार्यों का अन्तिम लक्ष्य अधिकतम मानव कल्याण होता है।

6. श्रम अपनी बुद्धि, तर्क व निर्णय शक्ति का प्रयोग करता है श्रमिक (UPBoardSolutions.com) किसी कार्य को सम्पन्न करने में अपनी बुद्धि, तर्क व निर्णय शक्ति का प्रयोग करता है, जिससे आविष्कार, अनुसन्धान व नई तकनीकों का विकास होता है। विभिन्न यन्त्रों का संचालन करने हेतु श्रमिकों को अपनी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता को उपयोग में लाना पड़ता है।

7. श्रम को श्रमिक से अलग नहीं किया जा सकता है श्रम को श्रमिक से अलग नहीं किया जा सकता है। श्रमिक श्रम का स्वामी है और जब वह उसे बेचता है, तो श्रम प्रदान करने के स्थान पर श्रमिक का उपस्थित रहना  अनिवार्य होता है।

8. श्रम की पूर्ति में परिवर्तन धीमी गति से होता है श्रम की पूर्ति को अल्पकाल में बढ़ाना कठिन है। दीर्घकाल में श्रम की पूर्ति धीमी गति से बढ़ाई जा सकती है। श्रम की पूर्ति दो बातों पर निर्भर रहती है|

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  • श्रम की कार्यकुशलता,
  • जनसंख्या

9. श्रम में पूँजी का विनियोग किया जा सकता है श्रम उत्पत्ति का एक सजीव व सक्रिय साधन है। प्रशिक्षण, शिक्षा, अच्छे पोषण, उच्च जीवन-स्तर, आदि से श्रम की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों में वृद्धि की जा सकती है।

10. श्रम उत्पत्ति का गतिशील साधन है श्रम में भूमि की अपेक्षा अधिक गतिशीलता होती है। श्रम एक स्थान से दूसरे स्थान पर, एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय में और एक उद्योग से दूसरे उद्योग में गतिशील रहता है।

11. श्रम उत्पत्ति का आवश्यक साधन है श्रम के बिना उत्पादन बिल्कुल असम्भव है, क्योंकि उत्पत्ति के अन्य साधन-भूमि एवं पूँजी उत्पत्ति के निष्क्रिय साधन हैं। उनमें उत्पादन करने के लिए श्रम जैसे सक्रिय साधन की अनिवार्यता होती है। इसी कारण श्रम की उत्पत्ति के अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्व है।

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प्रश्न 2.
श्रम की विशेषताएँ बताइटे। श्रम कितने प्रकार का होता है? (2017)
उत्तर:
श्रम की विशेषताएँ

1. श्रम उत्पत्ति का सक्रिय साधन है श्रम उत्पत्ति का सक्रिय साधन है, जबकि भूमि और पूँजी उत्पत्ति के निष्क्रिय साधन हैं श्रम के अभाव में पूँजी और भूमि कोई उत्पत्ति नहीं कर सकती है। प्रबन्ध और संगठन भी श्रम के ही विशिष्ट रूप हैं।

2. श्रम नाशवान है श्रम की सबसे बड़ी विशेषता श्रम का नाशवान होना है। यदि किसी दिन श्रमिक कार्य नहीं करता, तो उसका उस दिन का श्रम हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है।

3. श्रमिक अपने श्रम को बेचता है स्वयं को नहीं श्रमिक को वहाँ उपस्थित रहना पड़ता है, जहाँ श्रम करना है। अतः श्रमिकों को अपना श्रम बेचते समय कार्य करने की जगह, कार्य की प्रकृति, भौतिक वातावरण, मालिकों के स्वभाव, आदि पर ध्यान देना आवश्यक होता है।

4. श्रमिक की मोल-भाव करने की क्षमता कम होती है श्रम के नाशवान होने तथा श्रम को श्रमिक से अलग न किए जा सकने के कारण श्रमिकों की मोल-भाव (सौदा) करने की शक्ति कमजोर होती है। श्रमिकों की दरिद्रता, अकुशलता तथा वैकल्पिक रोजगार के अभाव में भी वे मालिकों की तुलना में कमजोर रह जाते हैं।

5. श्रम साधन और साध्य दोनों है श्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि (UPBoardSolutions.com) श्रम न केवल उत्पत्ति का एक सक्रिय साधन है, वरन् उपभोक्ता के रूप में सम्पूर्ण आर्थिक क्रियाओं का साध्य भी है। समस्त आर्थिक कार्यों का अन्तिम लक्ष्य अधिकतम मानव कल्याण होता है।

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6. श्रम अपनी बुद्धि, तर्क व निर्णय शक्ति का प्रयोग करता है श्रमिक किसी कार्य को सम्पन्न करने में अपनी बुद्धि, तर्क व निर्णय शक्ति का प्रयोग करता है, जिससे आविष्कार, अनुसन्धान व नई तकनीकों का विकास होता है। विभिन्न यन्त्रों का संचालन करने हेतु श्रमिकों को अपनी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता को उपयोग में लाना पड़ता है।

7. श्रम को श्रमिक से अलग नहीं किया जा सकता है श्रम को श्रमिक से अलग नहीं किया जा सकता है। श्रमिक श्रम का स्वामी है और जब वह उसे बेचता है, तो श्रम प्रदान करने के स्थान पर श्रमिक का उपस्थित रहना  अनिवार्य होता है।

8. श्रम की पूर्ति में परिवर्तन धीमी गति से होता है श्रम की पूर्ति को अल्पकाल में बढ़ाना कठिन है। दीर्घकाल में श्रम की पूर्ति धीमी गति से बढ़ाई जा सकती है। श्रम की पूर्ति दो बातों पर निर्भर रहती है|

  • श्रम की कार्यकुशलता,
  • जनसंख्या

9. श्रम में पूँजी का विनियोग किया जा सकता है श्रम उत्पत्ति का एक सजीव व सक्रिय साधन है। प्रशिक्षण, शिक्षा, अच्छे पोषण, उच्च जीवन-स्तर, आदि से श्रम की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों में वृद्धि की जा सकती है।

10. श्रम उत्पत्ति का गतिशील साधन है श्रम में भूमि की अपेक्षा अधिक गतिशीलता होती है। श्रम एक स्थान से दूसरे स्थान पर, एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय में और एक उद्योग से दूसरे उद्योग में गतिशील रहता है।

11. श्रम उत्पत्ति का आवश्यक साधन है श्रम के बिना उत्पादन बिल्कुल असम्भव है, क्योंकि उत्पत्ति के अन्य साधन-भूमि एवं पूँजी उत्पत्ति के निष्क्रिय साधन हैं। उनमें उत्पादन करने के लिए श्रम जैसे सक्रिय साधन की अनिवार्यता होती है। इसी कारण श्रम की उत्पत्ति के अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्व है।

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श्रम के प्रकार श्रम को निम्नलिखित तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता

1. कुशल एवं अकुशल श्रम वह कार्य, जिसे करने से पूर्व किसी विशेष शिक्षा, ज्ञान अथवा प्रशिक्षण, आदि की आवश्यकता होती है, वह ‘कुशल श्रम’ कहलाता है; जैसे-वकील, इंजीनियर, डॉक्टर, अध्यापक, आदि के कार्य। इसके विपरीत ऐसा कार्य, जिसे करने से पूर्व किसी विशेष प्रकार की शिक्षा या प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती, वह ‘अकुशल श्रम’ कहलाता है; जैसे-कुली, चौकीदारे तथा चपरासी, आदि का श्रम्।

2. उत्पादक एवं अनुत्पादक श्रम मनुष्य के जिस प्रयत्न से उपयोगिता का सृजन होता है तथा उसे उसके उद्देश्य में सफलता प्राप्त होती है, उसे ‘उत्पादक श्रम’ कहते हैं; जैसे- यदि एक बढ़ई कुर्सी बनाने में लगा है। और कुर्सी बनकर तैयार हो जाती है, तो यह (UPBoardSolutions.com) श्रम उत्पादक श्रम है। इसके विपरीत, मनुष्य द्वारा किए गए ऐसे प्रयास जिनसे उपयोगिता का सृजन नहीं होता तथा उसके उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती, उसे ‘अनुत्पादक श्रम’ कहते हैं; जैसे-बढ़ई द्वारा कुर्सी बनाने के लिए काटी गई लकड़ी के गलत कट जाने से कुर्सी नहीं बन पाती, तो यह श्रम अनुत्पादक श्रम है।

3. मानसिक एवं शारीरिक श्रम जिस कार्य को करने में मानसिक शक्ति का उपयोग शारीरिक शक्ति की अपेक्षा अधिक होता है, उस कार्य में लगा श्रम ‘मानसिक श्रम’ कहलाता है; जैसे-डॉक्टर, वकील, अध्यापक, आदि का श्रम मानसिक श्रम है। इसके विपरीत, जब किसी कार्य को करने में मानसिक शक्ति की अपेक्षा शारीरिक शक्ति का अधिक उपयोग होता है, तो उस कार्य में लगा श्रम ‘शारीरिक श्रम’ कहलाता है; जैसे—कुली, मजदूर, लुहार, आदि का श्रम
शारीरिक श्रम है।

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प्रश्न 3.
श्रम की कार्यक्षमता से आप क्या समझते हैं? यह किन घटकों पर निर्भर होती है? (2016)
अथवा
‘श्रम की कार्यक्षमता से आप क्यों समझते हैं? श्रम की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिए। (2018)
उत्तर:
श्रम की कार्यक्षमता से आशय कार्यक्षमता का शाब्दिक अर्थ ‘कार्य करने की शक्ति से होता है। श्रम की कार्यक्षमता (Efficiency of Labour) से तात्पर्य किसी श्रमिक की कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक कार्य करने की योग्यती या क्षमता से होता है। श्रम की कार्यक्षमता सापेक्षित होती है। श्रम की माँग परोक्ष होती है। कार्यक्षमता का अनुमान दो व्यक्तियों की तुलना करके लगाया जा सकता है।

मौरलैण्ड के अनुसार, “श्रम की कार्यक्षमता से हमारा अभिप्राय किसी निश्चित मात्रा में लगाए गए श्रम की अपेक्षा उत्पादित सम्पत्ति के अधीन होने से है।” प्रो. निर्वान एवं शर्मा के अनुसार, “श्रम की कार्यक्षमता का अर्थ किसी श्रमिक की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह अधिक उत्तम वस्तु की, अधिक मात्रा में वस्तु का या दोनों का उत्पादन करता है।”

श्रम की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व/घटक श्रम की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व/घटक निम्नलिखित हैं-

 1. पुरस्कार व उन्नति की आशा यदि श्रमिक को कार्य करने से उचित मजदूरी, पुरस्कार या पदोन्नति मिलती है, तो श्रमिक अधिक कुशलता से कार्य को सम्पन्न करते हैं। कम मजदूरी पाने वाले श्रमिकों में कुशलता की कमी होती है।

2. शिक्षा तथा प्रशिक्षण एक शिक्षित व विशेष प्रशिक्षण प्राप्त श्रमिक, अप्रशिक्षित श्रमिक की तुलना में अधिक कुशलता से कार्य करता है। प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति कार्य को शीघ्र समझकर सम्पन्न कर देता है।

3. प्रबन्धकों की योग्यता व व्यवहार प्रबन्धकों की व्यवहार कुशलता व योग्यता का श्रमिकों की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। प्रबन्धकों के अच्छे व्यवहार से श्रमिक योग्यतानुसार नवीन तकनीकी कार्यों को उचित रूप से पूर्ण कर सकते हैं।

4. पैतृक व जातीय गुण श्रमिकों की कार्यकुशलता पर उसके पैतृक गुणों व जातीय गुणों का भी प्रभाव पड़ता है। इन गुणों का उनकी कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चे पैतृक गुणों को शीघ्र ही सीख लेते हैं।

5. नैतिक गुण श्रमिकों में नैतिक गुणों से कर्तव्यनिष्ठा का भाव उत्पन्न होता है, इससे श्रमिक अपने कर्तव्य का समय से निर्वहन करता है। ऐसे श्रमिक ईमानदार, सच्चे व कर्त्तव्यपरायण होते हैं।

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6. सामान्य बुद्धिमत्ता श्रमिक की सामान्य बुद्धि का भी कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। सामान्य बुद्धि वाले श्रमिक कम बुद्धि वाले श्रमिक की तुलना में अधिक कार्यकुशल होते हैं। सामान्य बुद्धि के व्यक्ति या श्रमिक कार्य को समय पर निष्पादित करते हैं।

7. काम करने की दशाएँ जिन कारखानों में श्रमिकों के लिए स्वस्थ वातावरण व उसके परिवार के लिए शिक्षा, मनोरंजन, खेलकद, रोशनी, स्वच्छ पानी, आदि अनिवार्यताओं की व्यवस्था होती है, वहाँ श्रमिकों की कार्यक्षमता अधिक होती है। ऐसी व्यवस्था उपलब्ध नहीं होने से श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी होती है।

8. जलवायु तथा प्राकृतिक दशाएँ श्रमिकों की कार्यकुशलता पर जलवायु व प्राकृतिक वातावरण का भी अधिक प्रभाव पड़ता है। अधिक सर्द व अधिक गर्म जलवायु में अधिक देर तक कार्य नहीं किया जा सकता है, जबकि शीतोष्ण जलवायु में श्रमिक अधिक देर तक कार्य कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
श्रम की कार्यक्षमता से आप क्या समझते हैं? भारतीय श्रमिकों की कार्यक्षमता कम होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
श्रम की कार्यक्षमता
श्रम की कार्यक्षमता से आशय कार्यक्षमता का शाब्दिक अर्थ ‘कार्य करने की शक्ति से होता है। श्रम की कार्यक्षमता (Efficiency of Labour) से तात्पर्य किसी श्रमिक की कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक कार्य करने की योग्यती या क्षमता से होता है। श्रम की कार्यक्षमता सापेक्षित होती है। श्रम की माँग परोक्ष होती है। कार्यक्षमता का अनुमान दो व्यक्तियों की तुलना करके लगाया जा सकता है।

मौरलैण्ड के अनुसार, “श्रम की कार्यक्षमता से हमारा अभिप्राय किसी निश्चित मात्रा (UPBoardSolutions.com) में लगाए गए श्रम की अपेक्षा उत्पादित सम्पत्ति के अधीन होने से है।” प्रो. निर्वान एवं शर्मा के अनुसार, “श्रम की कार्यक्षमता का अर्थ किसी श्रमिक की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह अधिक उत्तम वस्तु की, अधिक मात्रा में वस्तु का या दोनों का उत्पादन करता है।”

श्रम की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व/घटक श्रम की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व/घटक निम्नलिखित हैं-

1. पुरस्कार व उन्नति की आशा यदि श्रमिक को कार्य करने से उचित मजदूरी, पुरस्कार या पदोन्नति मिलती है, तो श्रमिक अधिक कुशलता से कार्य को सम्पन्न करते हैं। कम मजदूरी पाने वाले श्रमिकों में कुशलता की कमी होती है।

2. शिक्षा तथा प्रशिक्षण एक शिक्षित व विशेष प्रशिक्षण प्राप्त श्रमिक, अप्रशिक्षित श्रमिक की तुलना में अधिक कुशलता से कार्य करता है। प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति कार्य को शीघ्र समझकर सम्पन्न कर देता है।

3. प्रबन्धकों की योग्यता व व्यवहार प्रबन्धकों की व्यवहार कुशलता व योग्यता का श्रमिकों की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। प्रबन्धकों के अच्छे व्यवहार से श्रमिक योग्यतानुसार नवीन तकनीकी कार्यों को उचित रूप से पूर्ण कर सकते हैं।

4. पैतृक व जातीय गुण श्रमिकों की कार्यकुशलता पर उसके पैतृक गुणों व जातीय गुणों का भी प्रभाव पड़ता है। इन गुणों का उनकी कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चे पैतृक गुणों को शीघ्र ही सीख लेते हैं।

5. नैतिक गुण श्रमिकों में नैतिक गुणों से कर्तव्यनिष्ठा का भाव उत्पन्न होता है, इससे श्रमिक अपने कर्तव्य का समय से निर्वहन करता है। ऐसे श्रमिक ईमानदार, सच्चे व कर्त्तव्यपरायण होते हैं।

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6. सामान्य बुद्धिमत्ता श्रमिक की सामान्य बुद्धि का भी कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। सामान्य बुद्धि वाले श्रमिक कम बुद्धि वाले श्रमिक की तुलना में अधिक कार्यकुशल होते हैं। सामान्य बुद्धि के व्यक्ति या श्रमिक कार्य को समय पर निष्पादित करते हैं।

7. काम करने की दशाएँ जिन कारखानों में श्रमिकों के लिए स्वस्थ वातावरण व (UPBoardSolutions.com) उसके परिवार के लिए शिक्षा, मनोरंजन, खेलकद, रोशनी, स्वच्छ पानी, आदि अनिवार्यताओं की व्यवस्था होती है, वहाँ श्रमिकों की कार्यक्षमता अधिक होती है। ऐसी व्यवस्था उपलब्ध नहीं होने से श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी होती है।

8. जलवायु तथा प्राकृतिक दशाएँ श्रमिकों की कार्यकुशलता पर जलवायु व प्राकृतिक वातावरण का भी अधिक प्रभाव पड़ता है। अधिक सर्द व अधिक गर्म जलवायु में अधिक देर तक कार्य नहीं किया जा सकता है, जबकि शीतोष्ण जलवायु में श्रमिक अधिक देर तक कार्य कर सकते हैं।

भारतीय श्रमिकों की अकुशलता या कार्यक्षमता कम होने के कारण भारतीय श्रमिकों की अकुशलता या कार्यक्षमता कम होने के कारण निम्नलिखित

1. शारीरिक दुर्बलता भारतीय श्रमिकों का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य कमजोर होने से ये कठिन परिश्रम नहीं कर पाते हैं, इससे उनकी कार्यक्षमता में कमी आती है।

2. गर्म जलवायु भारत में गर्म जलवायु होने के कारण श्रमिकों की कार्यकुशलता |में कमी होती है, इसलिए भारतीय श्रमिक अकुशल होते हैं।

3. भर्ती की दोषपूर्ण प्रणाली भारत में श्रमिकों की अधिकांश भर्तियाँ ठेकेदारों के माध्यम से होती हैं। ठेकेदार इसके लिए कमीशन या दस्तूरी लेते हैं। ऐसा करने से ठेकेदार अपने स्वार्थ के लिए पुराने अनुभवी श्रमिकों को निकाल देते हैं एवं नए श्रमिकों को भर्ती करते रहते हैं, जिससे कार्यकुशलता में कमी आती है।

4. नैतिकता का अभाव भारतीय श्रमिकों में कर्तव्यनिष्ठा का अभाव होने के कारण इनकी कार्यक्षमता में कमी होती है।

5. निर्धनता व निम्न स्तर का रहन-सहन भारतीय श्रमिकों के गरीब होने के कारण उन्हें भरपेट भोजन व अन्य पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिल पाती हैं। इससे श्रमिकों की कार्यकुशलता में कमी आती है।

6. प्रवासी प्रवृत्ति भारतीय श्रमिक कारखानों में स्थायी रूप से कार्य नहीं करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण श्रमिक फसल के समय व विशेष उत्सवों व त्यौहार पर अपने गाँव चले जाते हैं। इससे श्रमिकों की कार्यकुशलता में कमी आती है।

7. श्रमिकों को संघर्ष भारत में आए दिन पूँजीपति व श्रमिकों में संघर्ष चलता रहता है, जिससे तालाबन्दी वे हड़ताल जैसी घटनाएँ जन्म ले लेती हैं। ऐसे में संघर्ष कर रहे श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी होना स्वाभाविक है।

8. प्रशिक्षण का अभाव भारत में तकनीकी शिक्षा का अभाव होने के कारण श्रमिकों की कार्यकुशलता में कमी होती है।

9. काम करने की दशाएँ भारत में अधिकांश कारखानों में दूषित वातावरण होता है, जिससे हवा, पानी व रोशनी की उचित व्यवस्था नहीं होती है। मजदूरों के लिए मशीन पर कार्य करने की सुरक्षा भी नहीं होती है। इससे श्रमिकों की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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10. स्वतन्त्रता व.पदोन्नति का अभाव भारतीय श्रमिकों में स्वतन्त्रता का अभाव होता है वे इनकी समय पर पदोन्नति भी नहीं की जाती है। इससे श्रमिकों में निराशाजनक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है और उनकी कार्यक्षमता में कमी आती है।

11. काम करने की समयावधि भारत में गर्म जलवायु होने पर भी कार्य करने (UPBoardSolutions.com) के घण्टे 8 या 9 हैं, जबकि अमेरिका व यूरोप में कार्य करने के घण्टे 6 या 7 हैं। भारत में ‘कारखाना अधिनियम द्वारा निर्धारित किए गए कार्य के घण्टे भी अधिक हैं। इसी कारण भारतीय श्रमिकों की कार्यक्षमता कम है।

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 23 भूमि

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 23 भूमि are the part of UP Board Solutions for Class 10 Commerce. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 23 भूमि.

Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 23
Chapter Name भूमि
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 23 भूमि

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
प्रकृति द्वारा प्रदत्त निःशुल्क उपहार है।
(a) श्रम
(b) धन
(c) भूमि
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) भूमि

प्रश्न 2.
भूमि उत्पादन का…….साधन है।
(a) सक्रिय
(b) निष्क्रिये
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों :
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) निष्क्रिय

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प्रश्न 3.
भूमि की विशेषता है। (2018)
(a) असीमित भूमि
(b) सक्रिय साधन
(c) अनाशवान
(d) गतिशील
उत्तर:
(c) अनाशवान

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
क्या भूमि को भू-स्वामी से पृथक् नहीं किया जा सकता है?
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 2.
क्या भूमि का आशय प्रकृति-प्रदत्त सभी निःशुल्क उपहारों से है। (2014)
उत्तर:
हाँ

प्रश्न 3.
भूमि उत्पादन का साधन है/नहीं है। (2007)
उत्तर:
साधन है।

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प्रश्न 4.
भूमि उत्पादन का सक्रिय साधन है/नहीं है। (2008)
उत्तर:
नहीं है।

प्रश्न 5.
भूमि उत्पादन का अनिवार्य/गौण उपादान है।
उत्तर:
अनिवार्य उपादान है।

प्रश्न 6.
भूमि उत्पादन का असीमित/सीमित साधन है। (2012)
उत्तर:
सीमित

प्रश्न 7.
क्या भूमि साधन एवं साध्य दोनों है?
उत्तर:
नहीं

प्रश्न 8.
क्या भूमि का मूल्य उसकी स्थिति पर निर्भर करता है?
उत्तर:
हाँ।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
भूमि से आप क्या समझते हैं? (2012)
अथवा
अर्थशास्त्र में भूमि का क्या अर्थ है? (2012)
उत्तर:
भूमि (Land) उत्पादन का सबसे अनिवार्य, महत्त्वपूर्ण (UPBoardSolutions.com) तथा निष्क्रिय साधन है। सामान्य भाषा में भूमि का अभिप्राय केवल भूमि की ऊपरी सतह से होता है, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अभिप्राय उन समस्त प्राकृतिक उपहारों से है, जिसके अन्तर्गत भूमि की सतह, वायु, प्रकाश, खनिज, जल, आदि प्रकृति-प्रदत्त पदार्थ सम्मिलित होते हैं।

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प्रश्न 2.
भूमि की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भूमि की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. भूमि प्रकृति का निःशुल्क उपहार है भूमि को प्रकृति का एक नि:शुल्क उपहार बताया गया है। भूमि के अन्तर्गत भूमि की सतह, जंगल, पहाड़, पठार, नदी-नाले, खनिज, समुद्र, आदि प्रकृति से प्राप्त पदार्थ सम्मिलित हैं, जो हमें निःशुल्क प्राप्त होते हैं।

2. भूमि निष्क्रिय होती है भूमि उत्पत्ति का एक अनिवार्य साधन है, परन्तु यह एक निर्जीव साधन है। भूमि उत्पत्ति की क्रिया में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेती है। इसमें किसी व्यक्ति द्वारा श्रम लगाकर उत्पादन कार्य किया जा सकता है। मनुष्य द्वारा (UPBoardSolutions.com) भूमि पर श्रम करके उत्पादन सम्भव हो पाता है।

प्रश्न 3.
भूमि के मूल तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मार्शल के अनुसार, भूमि में निम्न तत्त्वों को सम्मिलित किया जाता है-

  1. भूमि की ऊपरी सतह जिस पर मनुष्य चलता-फिरता है, घूमता है तथा कार्य करता है, उसे पृथ्वी की ऊपरी सतह कहते हैं। इसमें पर्वत, नदियाँ, जंगल, मैदान, पठार, झील, प्राकृतिक बन्दरगाह, आदि तथा प्राकृतिक वनस्पतियाँ; जैसे-वन, पेड़-पौधे, घास, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, आदि आते हैं।
  2. भूमि की सतह के नीचे इसमें लौहा, कोयला, सोना, तेल, ताँबा, (UPBoardSolutions.com) अभ्रक, आदि खनिज पदार्थ आते हैं।
  3. भूमि की सतह के ऊपर इसमें जलवायु, धूप, वर्षा, पानी, सर्दी-गर्मी, आदि आते हैं।

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प्रश्न 4.
भूमि के दो महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
भूमि के दो महत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. यातायात के साधनों के विकास का आधार किसी देश के यातायात व संचार के साधनों का विकास उस देश की भूमि के स्वरूप पर आधारित होता है।
  2. कृषि का आधार भूमि कृषि का आधार है। कृषि कार्य भूमि के बिना नहीं किया जा सकता है। सभी प्रकार के भोज्य-पदार्थ भूमि से ही प्राप्त होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
भूमि की कार्यक्षमता से क्या आशय है? इसको प्रभावित करने वाले तत्वों को लिखिए।
उत्तर:
भूमि की कार्यक्षमता भूमि का प्रयोग जिस कार्य के लिए होता है, उसके लिए भूमि की उपयुक्तता को भूमि की कार्यक्षमता’ (Efficiency of Land)
कहते हैं; जैसे- उपजाऊ मैदानों में बहने वाली नदियाँ बिजली उत्पादन के लिए उपयुक्त होती हैं। भूमि की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व भूमि की कार्यक्षमता निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती है

1. भूमि सम्बन्धी कानून भूमि के सम्बन्ध में सरकार की नीति एवं भूमि सम्बन्धी कानून का भी भूमि की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है। जहाँ किसानों का भूमि पर पूर्ण स्वामित्व सम्बन्धी कानून होता है, वहाँ किसान | भूमि पर अथक परिश्रम करके भूमि (UPBoardSolutions.com) की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।

2. भूमि की स्थिति भूमि की स्थिति से भी भूमि की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। शहर से दूर या मुख्य मार्ग से हटकर स्थित भूमि शहर के निकट की भूमि से कम कार्यक्षमता वाली मानी जाती है। शहर के मुख्य मार्ग की भूमि मकान के लिए तथा अल्पविकसित या ग्रामीण क्षेत्रों की भूमि कृषि के लिए उत्तम होती है। ऐसी स्थिति में यातायात व्यय भी कम होते हैं।

3. प्राकृतिक तत्त्व भूमि के प्राकृतिक गुण; जैसे-उर्वरा शक्ति, जलवायु, सर्य का प्रकाश, मिटटी, वर्षा, भमि की सतह की बनावट आदि से भमि की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। जो भमि जिस कार्य के लिए उपयोगी होती है, उस भूमि पर वही कार्य किया जाए, तो उससे भूमि की कार्यक्षमता अधिक बनी रहती है; जैसे-काली मिट्टी में कपास और भुरभुरी मिट्टी में गेहूं बोने पर भूमि की उत्पादकता में वृद्धि होती है। भूमि की उत्पादन शक्ति प्राकृतिक तत्त्वों पर भी निर्भर करती है।

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4. आर्थिक तत्त्व भूमि की कार्यक्षमता पूँजी की मात्रा, भूमि को स्वामित्व, संगठन की योग्यता, कुशलता, आदि से भी प्रभावित होती है।

5. मानवीय प्रयास द्वारा किया गया भूमि सुधार भूमि पर कार्य करने वाले मनुष्यों के प्रयत्नों का भूमि की कार्यक्षमता पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए उर्वरकों का प्रयोग करते हैं तथा सिंचाई के साधनों का विकास करके भूमि के प्रति (UPBoardSolutions.com) सुधारात्मक कार्य करते हैं, परन्तु ये कार्य भूमि की उपजाऊ शक्ति को कम करते हैं तथा भूमि का कटाव करते हैं।

6. भूमि को उपजाऊपन भूमि की कार्यक्षमता भूमि की उर्वरा शक्ति से भी प्रभावित होती है।

7. संगठनकर्ता की योग्यता भूमि की कार्यक्षमता एक कुशल संगठनकर्ता पर भी निर्भर करती है। किस भूमि के लिए किस अनुपात में बीज तथा खाद या उर्वरक का प्रयोग किया जाना चाहिए, यह संगठनकर्ता की योग्यता पर ही निर्भर करता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
भूमि क्या है? उत्पादन के साधन के रूप में भूमि के प्रमुख लक्षणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2013, 08)
उत्तर:
भूमि का अर्थ भूमि उत्पादन का सबसे अनिवार्य व महत्त्वपूर्ण साधन है। साधारण भाषा में, भूमि का अभिप्राय केवल भूमि की ऊपरी सतह से होता है, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अभिप्राय उन समस्त प्राकृतिक उपहारों से है जिसके अन्तर्गत भूमि की सतह, वायु, प्रकाश, खनिज, जल, आदि प्रकृति-प्रदत्त पदार्थ सम्मिलित होते हैं। मार्शल के अनुसार, “भूमि का अर्थ केवल भूमि की ऊपरी सतह से नहीं है, वरन् उन समस्त भौतिक पदार्थों एवं शक्तियों से है, जो प्रकृति ने मनुष्य की सहायतार्थ नि:शुल्क रूप से जल, वायु और प्रकाश के रूप में प्रदान की हैं।”

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स्मिथ एवं पैटरसन के अनुसार, “प्रकृति की कोई भी भेट, जिसे हम आवश्यकता की सन्तुष्टि के लिए प्रयोग में लाते हैं, प्राकृतिक साधन या भूमि एस. के. रुद्र के अनुसार, “भूमि में वे समस्त शक्तियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें प्रकृति निःशुल्क उपहारों के रूप में प्रदान करती है।” भूमि की विशेषताएँ या लक्षण भूमि की विशेषताएँ या लक्षण निम्नलिखित

  1. भूमि प्रकृति का निःशुल्क उपहार है भूमि को प्रकृति का एक नि:शुल्क उपहार बताया गया है। भूमि के अन्तर्गत भूमि की सतह, जंगल, पहाड़, पठार, नदी-नाले, खनिज, समुद्र, आदि प्रकृति से प्राप्त पदार्थ सम्मिलित हैं, जो हमें नि:शुल्क प्राप्त होते हैं।
  2. भूमि निष्क्रिय होती है भूमि उत्पत्ति का एक अनिवार्य साधन है। लेकिन यह एक निर्जीव साधन है। भूमि उत्पत्ति की क्रिया में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेती है। इसमें किसी व्यक्ति द्वारा श्रम लगाकर उत्पादन कार्य किया जा सकता है। मनुष्य द्वारा भूमि पर श्रम करके उत्पादन सम्भव किया जाता है।
  3. भूमि में विविधता पाई जाती है प्रत्येक स्थान का भू-तले अपनी स्थिति व उर्वरा शक्ति के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है; जैसे-कहीं पर उपजाऊ भूमि पाई जाती है, तो कही पर बंजर, कहीं पर लाल मिट्टी पाई जाती है, तो कहीं पर काली मिट्टी।
  4. भूमि सीमित है भूमि की पूर्ति सीमित होती है तथा इसे बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता है। केवल भूमि पर गहन कृषि कार्य करके प्रभावी पूर्ति को बढ़ाया जा सकता है।
  5. भूमि स्थिर है भूमि अपने स्थान पर स्थिर रहती है। यह अपने (UPBoardSolutions.com) स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती है; जैसे-हिमालय पर्वत को उठाकर अमेरिका नहीं ले जाया जा सकता है।
  6. भूमि नाशवान नहीं है निरन्तर खेती करने से भूमि की उर्वरा शक्ति कम होती है, परन्तु भूमि नष्ट नहीं हो सकती है।
  7. भूमि के विभिन्न उपयोग भूमि के विभिन्न उपयोग; जैसे-खेती, मकान बनाना, कारखाने लगाना, सड़कें बनाना, आदि हो सकते हैं।
  8. भूमि उत्पादन का अनिवार्य साधन भूमि उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण व अनिवार्य साधन है। इसके बिना उत्पादन कार्य करना सम्भव नहीं होता है।
  9. भूमि का मूल्य उसकी स्थिति पर निर्भर करता है भूमि का मूल्य उसकी स्थिति अर्थात् शहर से दूरी, उपजाऊपन, दुर्गम या सुगम स्थान, आदि पर निर्भर करता है; जैसे-शहर के निकट वाली भूमि का मूल्य अधिक होगा, जबकि शहर से दूर स्थित भूमि का मूल्य कम होगा।
  10. भूमि जीवन का आधार भूमि मानव जीवन का आधार है। मानव इसका विभिन्न रूपों में प्रयोग करके अपने जीवन का निर्वाह करता है। जीवन-स्तर की विभिन्न क्रियाओं का आधार ही भूमि है।

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प्रश्न 2.
उत्पादन में भूमि का क्या महत्त्व है? भूमि की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2008)
उत्तर:
भूमि का महत्त्व उत्पत्ति के अनिवार्य साधन में भूमि का महत्त्व निम्नलिखित है-

  1. यातायात के साधनों के विकास का आधार किसी देश के यातायात व संचार के साधनों का विकास उस देश की भूमि के स्वरूप पर आधारित होता है। समतल भूमि पर परिवहन के साधनों का तेजी से विकास किया जा सकता है।
  2. कृषि का आधार भूमि कृषि का आधार है। कृषि कार्य भूमि के बिना नहीं किया जा सकता है। सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ भूमि से ही प्राप्त होते हैं।
  3. जीवित रहने का आधार मनुष्य भूमि पर चलता-फिरता है, काम करता है, मकान बनाता है, खेती करता है, कारखानों की स्थापना करता है। इस प्रकार, मनुष्य भूमि के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता है।
  4. औद्योगिक विकास का आधार किसी देश का औद्योगिक विकास भूमि पर ही निर्भर करता है, क्योंकि कारखानों के लिए कच्चा माल, खनिज पदार्थ, जल शक्ति, वायु शक्ति, कोयला, आदि की पूर्ति भूमि के द्वारा ही पूर्ण की जाती है।
  5. प्राथमिक उद्योगों का विकास सभी प्रकार के प्राथमिक उद्योग; जैसे कृषि व खनिज व्यवसाय, मछली व्यवसाय, वन व्यवसाय, आदि भूमि पर ही निर्भर होते हैं। सभी प्रकार के खनिज पदार्थ भी भूमि से ही प्राप्त किए जाते हैं।
  6. आर्थिक सम्पन्नता का सूचक भूमि आर्थिक सम्पन्नता का सूचक होती है। (UPBoardSolutions.com) जिस देश के पास जितनी अधिक प्राकृतिक सम्पदा या भूमि होती है, उस देश को उतना ही अधिक सम्पन्न माना जाता है।
  7. रोजगार का आधार भूमि मनुष्य को रोजगार प्रदान करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। कृषि-प्रधान राष्ट्रों में भूमि का महत्त्व अधिक होता है।
  8. भूमि सम्पूर्ण उत्पादन कार्यों को आधार है भूमि के बिना किसी भी प्रकार का उत्पादन करना असम्भव है। अत: भूमि प्रत्येक प्रकार की उत्पादन गतिविधियों के लिए अनिवार्य है।
  9. विभिन्न वैज्ञानिक कार्यों का आधार मनुष्य भूमि से प्राप्त खनिजों, जल, वायु, आदि को विभिन्न अनुपातों में मिलाकर उससे उपयोगी वस्तुएँ; जैसे दवाइयाँ, मशीनरी, यन्त्र व अन्य वैज्ञानिक विकास की वस्तुएँ बनाता है।
  10. भूमि के द्वारा आय प्राप्ति भूमि के द्वारा आय प्राप्त की जा सकती है। भूमि | के प्रयोगों का विस्तार करके अधिक उत्पादन किया जा सकता है तथा भूमि के वैकल्पिक प्रयोगों द्वारा आय का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।

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भूमि की विशेषताएँ
भूमि का अर्थ भूमि उत्पादन का सबसे अनिवार्य व महत्त्वपूर्ण साधन है। साधारण भाषा में, भूमि का अभिप्राय केवल भूमि की ऊपरी सतह से होता है, परन्तु अर्थशास्त्र में भूमि का अभिप्राय उन समस्त प्राकृतिक उपहारों से है जिसके अन्तर्गत भूमि की सतह, वायु, प्रकाश, खनिज, जल, आदि प्रकृति-प्रदत्त पदार्थ सम्मिलित होते हैं। मार्शल के अनुसार, “भूमि का अर्थ केवल भूमि की ऊपरी सतह से नहीं है, वरन् उन समस्त भौतिक पदार्थों एवं शक्तियों से है, जो प्रकृति ने मनुष्य की सहायतार्थ नि:शुल्क रूप से जल, वायु और प्रकाश के रूप में प्रदान की हैं।”

स्मिथ एवं पैटरसन के अनुसार, “प्रकृति की कोई भी भेट, जिसे हम आवश्यकता की सन्तुष्टि के लिए प्रयोग में लाते हैं, प्राकृतिक साधन या भूमि एस. के. रुद्र के अनुसार, “भूमि में वे समस्त शक्तियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें प्रकृति निःशुल्क उपहारों के रूप में प्रदान करती है।” (UPBoardSolutions.com) भूमि की विशेषताएँ या लक्षण भूमि की विशेषताएँ या लक्षण निम्नलिखित

  1. भूमि प्रकृति का निःशुल्क उपहार है भूमि को प्रकृति का एक नि:शुल्क उपहार बताया गया है। भूमि के अन्तर्गत भूमि की सतह, जंगल, पहाड़, पठार, नदी-नाले, खनिज, समुद्र, आदि प्रकृति से प्राप्त पदार्थ सम्मिलित हैं, जो हमें नि:शुल्क प्राप्त होते हैं।
  2. भूमि निष्क्रिय होती है भूमि उत्पत्ति का एक अनिवार्य साधन है। लेकिन यह एक निर्जीव साधन है। भूमि उत्पत्ति की क्रिया में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेती है। इसमें किसी व्यक्ति द्वारा श्रम लगाकर उत्पादन कार्य किया जा सकता है। मनुष्य द्वारा भूमि पर श्रम करके उत्पादन सम्भव किया जाता है।
  3. भूमि में विविधता पाई जाती है प्रत्येक स्थान का भू-तले अपनी स्थिति व उर्वरा शक्ति के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है; जैसे-कहीं पर उपजाऊ भूमि पाई जाती है, तो कही पर बंजर, कहीं पर लाल मिट्टी पाई जाती है, तो कहीं पर काली मिट्टी।
  4. भूमि सीमित है भूमि की पूर्ति सीमित होती है तथा इसे बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता है। केवल भूमि पर गहन कृषि कार्य करके प्रभावी पूर्ति को बढ़ाया जा सकता है।
  5. भूमि स्थिर है भूमि अपने स्थान पर स्थिर रहती है। यह अपने स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती है; जैसे-हिमालय पर्वत को उठाकर अमेरिका नहीं ले जाया जा सकता है।
  6. भूमि नाशवान नहीं है निरन्तर खेती करने से भूमि की उर्वरा शक्ति कम होती है, परन्तु भूमि नष्ट नहीं हो सकती है।
  7. भूमि के विभिन्न उपयोग भूमि के विभिन्न उपयोग; जैसे-खेती, मकान बनाना, कारखाने लगाना, सड़कें बनाना, आदि हो सकते हैं।
  8. भूमि उत्पादन का अनिवार्य साधन भूमि उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण व अनिवार्य साधन है। इसके बिना उत्पादन कार्य करना सम्भव नहीं होता है।
  9. भूमि का मूल्य उसकी स्थिति पर निर्भर करता है भूमि का मूल्य उसकी स्थिति अर्थात् शहर से दूरी, उपजाऊपन, दुर्गम या सुगम स्थान, आदि पर निर्भर करता है; जैसे-शहर के निकट वाली भूमि का मूल्य अधिक होगा, जबकि शहर से दूर स्थित भूमि का मूल्य कम होगा।
  10. भूमि जीवन का आधार भूमि मानव जीवन का आधार है। मानव इसका विभिन्न रूपों में प्रयोग करके अपने जीवन का निर्वाह करता है। जीवन-स्तर की विभिन्न क्रियाओं का आधार ही भूमि है।

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प्रश्न 3.
भूमि की उत्पादकता से क्या आशय है? भूमि की उत्पादकता को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
भूमि की उत्पादकता/कार्यक्षमता

भूमि की कार्यक्षमता भूमि का प्रयोग जिस कार्य के लिए होता है, उसके लिए भूमि की उपयुक्तता को भूमि की कार्यक्षमता’ (Efficiency of Land)
कहते हैं; जैसे- उपजाऊ मैदानों में बहने वाली नदियाँ बिजली उत्पादन के लिए उपयुक्त होती हैं। भूमि की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व भूमि की कार्यक्षमता निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती है

1. भूमि सम्बन्धी कानून भूमि के सम्बन्ध में सरकार की नीति एवं भूमि सम्बन्धी कानून का भी भूमि की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है। जहाँ किसानों का भूमि पर पूर्ण स्वामित्व सम्बन्धी कानून होता है, वहाँ किसान | भूमि पर अथक परिश्रम करके भूमि की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।

2. भूमि की स्थिति भूमि की स्थिति से भी भूमि की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है। शहर से दूर या मुख्य मार्ग से हटकर स्थित भूमि शहर के निकट की भूमि से कम कार्यक्षमता वाली मानी जाती है। शहर के मुख्य मार्ग की भूमि मकान के लिए तथा अल्पविकसित या ग्रामीण (UPBoardSolutions.com) क्षेत्रों की भूमि कृषि के लिए उत्तम होती है। ऐसी स्थिति में यातायात व्यय भी कम होते हैं।

3. प्राकृतिक तत्त्व भूमि के प्राकृतिक गुण; जैसे-उर्वरा शक्ति, जलवायु, सर्य का प्रकाश, मिटटी, वर्षा, भमि की सतह की बनावट आदि से भमि की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। जो भमि जिस कार्य के लिए उपयोगी होती है, उस भूमि पर वही कार्य किया जाए, तो उससे भूमि की कार्यक्षमता अधिक बनी रहती है; जैसे-काली मिट्टी में कपास और भुरभुरी मिट्टी में गेहूं बोने पर भूमि की उत्पादकता में वृद्धि होती है। भूमि की उत्पादन शक्ति प्राकृतिक तत्त्वों पर भी निर्भर करती है।

4. आर्थिक तत्त्व भूमि की कार्यक्षमता पूँजी की मात्रा, भूमि को स्वामित्व, संगठन की योग्यता, कुशलता, आदि से भी प्रभावित होती है।

5. मानवीय प्रयास द्वारा किया गया भूमि सुधार भूमि पर कार्य करने वाले मनुष्यों के प्रयत्नों का भूमि की कार्यक्षमता पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए उर्वरकों का प्रयोग करते हैं तथा सिंचाई के साधनों का विकास करके भूमि के प्रति सुधारात्मक कार्य करते हैं, परन्तु ये कार्य भूमि की उपजाऊ शक्ति को कम करते हैं तथा भूमि का कटाव करते हैं।

6. भूमि को उपजाऊपन भूमि की कार्यक्षमता भूमि की उर्वरा शक्ति से भी प्रभावित होती है।

7. संगठनकर्ता की योग्यता भूमि की कार्यक्षमता एक कुशल संगठनकर्ता पर भी निर्भर करती है। किस भूमि के लिए किस अनुपात में बीज तथा खाद या उर्वरक का प्रयोग किया जाना चाहिए, यह संगठनकर्ता की योग्यता पर ही निर्भर करता है।

भूमि की उत्पादकता को प्रभावित करने वाले तत्त्वं भूमि की उत्पादकता को निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं-

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1. सरकारी नीति सरकार द्वारा उचित नीतियाँ अपनाकर भी भूमि की कार्यक्षमता को बढ़ाया जा सकता है। सरकार द्वारा किसानों को साख-सुविधाएँ, सिंचाई सुविधाएँ, आदि प्रदान की जाती हैं, जिससे किसान उन्नत खाद-बीज खरीदकर भूमि की उत्पादकता को बढ़ाता है।

2. सामाजिक तथा राजनीतिक तत्त्व देश की सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ भी भूमि की उत्पादकता पर अपना प्रभाव डालती हैं। भारत में भूमि का उपविभाजन, उपखण्डन की समस्याएँ उत्तराधिकार के नियमों के चलते पनप रही हैं, जिससे भूमि की उत्पादकता घट रही है। साथ ही राजनीतिक अस्थिरता भी भूमि की उत्पादन क्षमता पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

3. उन्नत तकनीक उत्पादन में वैज्ञानिक तथा आधुनिक तकनीकों (UPBoardSolutions.com) का प्रयोग कर उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। अत: भूमि की उत्पादन-क्षमता पर उन्नत तकनीकों का प्रयोग अपना प्रभाव डालता है।

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