UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 3 Interior of the Earth

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 3 Interior of the Earth (पृथ्वी की आंतरिक संरचना)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (1) निम्नलिखित में से कौन भू-गर्भ की जानकारी का प्रत्यक्ष साधन है?
(क) भूकम्पीय तरंगें
(ख) गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) ज्वालामुखी
(घ) पृथ्वी का चुम्बकत्व
उत्तर- (ग) ज्वावालामुखी।

प्रश्न (ii) दक्कन ट्रैप की शैल समूह किस प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार का परिणाम है?
(क) शील्ड
(ख) मिश्र
(ग) प्रवाह
(घ) कुण्ड
उत्तर- (ग) प्रवाह।

प्रश्न (iii) निम्नलिखित में से कौन-सा स्थलमण्डल को वर्णित करता है?
(क) ऊपरी व निचले मैंटल
(ख) भूपटल व क्रोड
(ग) भूपटल व ऊपरी मैंटले
(घ) मैंटल व क्रोड
उत्तर- (ग) भूपटल व ऊपरी मैंटल।

प्रश्न (iv) निम्न में से कौन-सी भूकम्प तरंगें चट्टानों में संकुचन व फैलाव लाती हैं?
(क) ‘P’ तरंगें
(ख) ‘s’ तरंगें
(ग) धरातलीय तरंगें।
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर- (क) ‘P’ तरंगें।.

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) भूगर्भीय तरंगें क्या हैं?
उत्तर- भूगर्भीय तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा मुक्त होने के दौरान पैदा होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं, इसलिए इन्हें भूगर्भिक तरंगें कहा जाता है। भूगर्भीय तरंगें दो प्रकार की होती हैं। इन्हें ‘P’ तरंगें व ‘S’ तरंगें कहा जाता है।

(ii) भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों के नाम बताइए।
उत्तर- भूगर्भ की जानकारी के लिए प्रत्यक्ष साधनों में धरातलीय चट्टानें हैं अथवा वे चट्टाने हैं जो हम खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हैं। खनन के अतिरिक्त वैज्ञानिक विभिन्न परियोजनाओं के अंतर्गत पृथ्वी की आंतरिक स्थिति को जानने के लिए पर्पटी में गहराई तक छानबीन कर रहे हैं। संसार भर के वैज्ञानिक दो मुख्य परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। ज्वालामुखी उद्गार प्रत्यक्ष जानकारी का एक अन्य स्रोत हैं। जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के धरातल पर आता है, यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध होता है।

(iii) भूकंपीय तरंगें छाया क्षेत्र कैसे बनाती हैं?
उत्तर- जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अभिलेखित नहीं होती। ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र दोनों प्रकार की तरंगों के लिए छाया क्षेत्र है। एक भूकंप का छाया क्षेत्र दूसरे भूकंप के छाया क्षेत्र से भिन्न होता है। 105° के परे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं। ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘P’ तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत है। भूकंप अधिकेंद्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है। ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है।

(iv) भूकंपीय गतिविधियों के अतिरिक्त भूगर्भ की जानकारी संबंधी अप्रत्यक्ष साधनों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर- पदार्थ के गुणधर्म के विश्लेषण से पृथ्वी के आंतरिक
भाग की अप्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। खनन क्रिया से हमें पता चलता है कि पृथ्वी के धरातल में गहराई बढ़ने के साथ-साथ पदार्थ का घनत्व भी बढ़ता है। पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का दूसरा अप्रत्यक्ष स्रोत उल्काएँ हैं जो कभी-कभी धरती तक पहुँचती हैं। उल्काएँ वैसे ही ठोस पदार्थ से बनी हैं, जिनसे हमारा ग्रह पृथ्वी बना है। अतः पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के लिए उल्काओं का अध्ययन एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अन्य अप्रत्यक्ष स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण तथा चुंबकीय क्षेत्र शामिल हैं। पृथ्वी के केंद्र से दूरी के कारण गुरुत्वाकर्षण बल ध्रुवों पर अधिक और भूमध्यरेखा पर कम होता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
(i) भूकंपीय तरंगों के संचरण का उन चट्टानों पर प्रभाव बताएँ, जिनसे होकरे ये तरंगें गुजरती हैं।
उत्तर- भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की होती हैं। इन्हें ‘P’ तरंगें व ‘S’ तरंगें कहा जाता है। ‘P’ तरंगें तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं। ‘P’ तरंगें गैस, तरल व ठोस तीनों प्रकार के पदार्थों से गुजर सकती हैं। ‘S’ तरंगों के विषय में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये केवल ठोस पदार्थों के ही माध्यम से चलती हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे ही ये संचरित होती हैं। वैसे ही शैलों में कंपन पैदा होता है। ‘P’ तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती हैं। यह संचरण गति की दिशा में ही पदार्थ पर दबाव डालती हैं। इसके दबाव के फलस्वरूप पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन व फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है। अन्य तीन तरह की तरंगें संचरण गति के समकोण दिशा में कंपन पैदा करती हैं। ‘S’ तरंगें ऊर्ध्वाधर तल में तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। अतः ये जिस पदार्थ से गुजरती हैं, उसमें उभार व गर्त बनाती हैं। धरातलीय तरंगें सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।

(ii) अंतर्वेधी आकृतियों से आप क्या समझते हैं? विभिन्न अंतर्वेधी आकृतियों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर- जब मैग्मा भूपटल के भीतर ही ठंडा हो जाता है। तो कई आकृतियाँ बनती हैं। ये आकृतियाँ अंतर्वेधी आकृतियाँ कहलाती हैं। अंतर्वेधी आकृतियों में बैथोलिथ, लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ व सिल प्रमुख हैं।
(i) बैथोलिथ – ग्रेनाइट के बने मैग्मा का बड़ा पिण्ड भूपर्पटी में अधिक गहराई पर ठंडा हो जाए तो यह एक गुंबद के आकार में विकसित हो जाता है। इसे बैथोलिथ कहा जाता है।
(ii) लैकोलिथ – ये गुम्बदनुमा विशाल अंतर्वेधी चट्टानें हैं, जिनका तल समतल व एक पाइप रूपी वाहक नली से नीचे से जुड़ा होता है तथा गहराई में पाया जाता है, इन्हें लैकोलिथ कहा जाता है।
(iii) लैपोलिथ – ऊपर उठते मैग्मा का कुछ भाग क्षैतिज दिशा में पाए जाने वाले कमजोर धरातल में चला जाता है। यहाँ यह अलग-अलग आकृतियों में जम जाता है। यदि यह तश्तरी के आकार में जम जाए तो यह लैपोलिथ कहलाता
(iv) फैकोलिथ – कई बार अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों की मोड़दार अवस्था में अपनति के ऊपर व अभिनति के तल में मैग्मा का जमाव पाया जाता है। ये परतनुमा चट्टानें एक निश्चित वाहक नली से मैग्मा भंडारों से जुड़ी होती हैं। यही फैकोलिथ कहलाते हैं।
(v) सिल – अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानों का क्षैतिज तल में एक चादर के रूप में ठंडा होना सिल कहलाता है। इसके जमाव की मोटाई अधिक होती है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन करने वाला यन्त्र है
(क) बैरोमीटर
(ख) थर्मामीटर
(ग) वायुदाबमापी
(घ) सीस्मोग्राफ
उत्तर- (घ) सीस्मोग्राफ।

प्रश्न 2. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की ऊपरी परत कौन-सी है ?
(क) निफे
(ख) सियाल
(ग) सिमा
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर- (ख) सियाल।

प्रश्न 3. पृथ्वी की आन्तरिक परत निफे में किन तत्त्वों की प्रधानता है?
(क) सिलिका व ऐलुमिनियम
(ख) सिलिका व मैग्नीशियम
(ग) बैसाल्ट व सिलिका
(घ) निकिल व लोहा
उत्तर- (घ) निकिले व लोहा। ।

प्रश्न 4. निम्नलिखित में कौन पृथ्वी का सबसे आन्तरिक का भाग है?
(क) सियाले
(ख) निफे।
(ग) सिमा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (ख) निफे।

प्रश्न 5. भूकम्प की उत्पत्ति के केन्द्र को कहते हैं
(क) अधिकेन्द्र
(ख) उद्गम केन्द्र
(ग) (क) व (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (ख) उद्गम केन्द्र।

प्रश्न 6. सर्वाधिक भूकम्प किस पेटी में आते हैं?
(क) प्रशान्त महासागरीय पेटी में
(ख) मध्य महाद्वीपीय पेटी में
(ग) मध्य अटलांटिक पेटी में
(घ) बिखरे क्षेत्रों में
उत्तर- (क) प्रशान्त महासागरीय पेटी में।

प्रश्न 7. धरातल पर जिस छिद्र से ज्वालामुखी का उद्गार होता है, उसे कहते हैं
(क) ज्वालामुखी
(ख) ज्वालामुख (क्रेटर)
(ग) काल्डेरा।
(घ) ज्वालामुखी शंकु
उत्तर- (क) ज्वालामुखी।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूपृष्ठ के दो भाग कौन-कौन से हैं। इनकी औसत मोटाई बताइए।
उत्तर- भूपृष्ठ के दो भाग एवं इनकी औसत मोटाई निम्नलिखित हैं

  • महाद्वीपीय भूपृष्ठ-औसत मोटाई 30 किमी।
  • महासागरीय भूपृष्ठ-औसत मोटाई 5 किमी।

प्रश्न 2. स्वेस ने पृथ्वी को कितनी परतों में बाँटा है?
उत्तर- स्वेस ने पृथ्वी को तीन परतों में बाँटा है, जो क्रमश: सियाल, सिमा तथा निफे कहलाती हैं।

प्रश्न 3. सिमा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- सिमा परत सिलिका तथा मैग्नीशियम से निर्मित परत है। इसमें बैसाल्ट की अधिकता होती है।

प्रश्न 4. निफे से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- निफे परत पृथ्वी की सबसे गहराई में स्थित परत है, जो निकिल तथा फेरम जैसे सघन धात्विक पदार्थों से निर्मित है।

प्रश्न 5. पृथ्वी के अभ्यन्तर की दो परतों के नाम बताइए।
उत्तर- सिमा तथा निफे।

प्रश्न 6. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी देने वाले साधनों के नाम बताइए।
उत्तर- पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी देने वाले साधन निम्नलिखित हैं–

  1. अप्राकृतिक साधन,
  2. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सिद्धान्तों के साक्ष्य तथा
  3. प्राकृतिक साधन।.

प्रश्न 7. ज्वालामुखी क्रिया को पृथ्वी की कौन-सी परत जन्म देती है।
उत्तर- सिमा की परत ज्वालामुखी क्रिया को जन्म देती है।

प्रश्न 8. पृथ्वी की कौन-सी परत में चुम्बकीय गुण विद्यमान है और क्यों?
उत्तर- पृथ्वी की निफे परत में चुम्बकीय गुण विद्यमान है, क्योंकि इस आन्तरिक भाग में लौह-पदार्थों की अधिकता है।

प्रश्न 9. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के अध्ययन का सबसे अधिक विश्वसनीय साधन कौन-सा
उत्तर- ‘भूकम्प विज्ञान’ पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के अध्ययन का सबसे अधिक विश्वसनीय साधन है।

प्रश्न 10. सौरमण्डल के दो ग्रहों के नाम बताइए।
उत्तर- सौरमण्डल के दो ग्रहों के नाम हैं-

  1. पृथ्वी तथा
  2. मंगल।

प्रश्न 11. पृथ्वी के चुम्बकीय गुण इसकी आन्तरिक संरचना की क्या जानकारी देते हैं?
उत्तर- पृथ्वी में चुम्बकीय गुण विद्यमान है। यह गुण पृथ्वी के केन्द्र (अन्तरतम) में सबसे अधिक पाया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का अन्तरतम आन्तरिक भाग लोहे, निकिल जैसे भारी धात्विक पदार्थों से बना है।

प्रश्न 12. एस्थोनेस्फीयर क्या है?
उत्तर- भूपृष्ठ से निचली सतह अर्थात् मैंटले की ऊपरी पर्त जो 400 किमी तक पाई जाती है, एस्थोनेस्फीयर कहलाती है। इसे दुर्बलता मण्डल भी कहते हैं। ज्वालामुखी उद्गार के समय जो लावा धरातल पर पहुँचता है उसका मुख्य स्रोत यही है।

प्रश्न 13. सिस्फोग्राफ क्या हैं? इसका उपयोग बताइए।
उत्तर- यह सूक्ष्मग्राही यन्त्र है जिसका उपयोग भूकम्प झटकों द्वारा उत्पन्न तरंगों का आलेख ग्राफ बनाने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 14. भूकम्प तरंगों के तीन प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर- भूकम्प तरंगों के तीन मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

  1. P तरंगें या प्राथमिक तरंगें।
  2. S तरंगें या गौण तरंगें।।
  3. L तरंगें यो धरातलीय तरंगें।

प्रश्न 15. पृथ्वी की ऊष्मा के क्या स्रोत हैं? धात्विक क्रोड का तापमान बताइए।
उत्तर- पृथ्वी की ऊष्मा के तीन स्रोत हैं—

  • रेडियोधर्मिता,
  • तलवृद्धि ऊष्मा तथा
  • पृथ्वी के निर्माणकारी पदार्थों की ऊष्मा।। धात्विक क्रोड का तापमान 2000° से है।

प्रश्न 16. मोहोरोविसिस विसंगति/असम्बद्धता क्या है?
उत्तर- भूपृष्ठ के निचले आधार पर भूकम्पीय लहरों की गति में अचानक वृद्धि हो जाती है, इसलिए निचले भूपृष्ठ तथा ऊपरी मैंटल के मध्य एक विसंगति या असम्बद्धता उत्पन्न हो जाती है। इस तथ्य की खोज सर्वप्रथम ए० मोहोरोविसिस ने 1909 में की थी, इसीलिए यह मोहोरोविसिस विसंगति कहलाती है।

प्रश्न 17. निम्नलिखित के लिए एक पारिभाषिक शब्द दीजिए

  1. भूगर्भ का वह भाग जो अत्यधिक तापमान के बावजूद ठोस की तरह आचरण करता है।
  2. महाद्वीपीय के नीचे की परत का रासायनिक संघटन।
  3. भूगर्भ का वह भाग जो मिश्रित धातुओं और सिलिकेट से बना है।
  4. वह भूकम्पीय तरंग जो पृथ्वी के धात्विक क्रोड से गुजर सकती है।
  5. महासागरों के नीचे की परत की रासायनिक संरचना।

उत्तर-

  1. आन्तरिक धात्विक क्रोड (गुरुमण्डल),
  2. सियाल (सिलिका + ऐलुमिनियम),
  3. मैंटल,
  4. P तरंगें,
  5. सिमा (सिलिकेट + मैग्नेशियम)।

प्रश्न 18. प्रसुप्त ज्वालामुखी किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- प्रसुप्त ज्वालामुखी वे ज्वालामुखी हैं जो सक्रिय होने के बाद काफी समय तक शान्त रहते हैं तथा पुनः सक्रिय हो जाते हैं। उदाहरण-इटली का विसूवियस ज्वालामुखी।

प्रश्न 19. जाग्रत (सक्रिय) ज्वालामुखी का अर्थ बताते हुए इसका एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- जाग्रत ज्वालामुखी वे हैं जिनमें सदैव उद्गार होता रहता है। इटली का एटना ज्वालामुखी ऐसा ही

प्रश्न 20. निष्क्रिय या शान्त ज्वालामुखी की परिभाषा तथा एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- निष्क्रिय ज्वालामुखी वे हैं जिनसे प्राचीन काल में उद्गार हुआ था, किन्तु अब वे शान्त हो चुके हैं। तथा भविष्य में भी उनमें उद्गार की कोई सम्भावना नहीं है। ईरान का कोहे-सुल्तान एक शान्त ज्वालामुखी है।

प्रश्न 21. प्रसुप्त एवं शान्त ज्वालामुखियों में अन्तर बताइए।
उत्तर- प्रसुप्त ज्वालामुखी एक बार उद्गार के बाद बीच-बीच में शान्त रहते हैं तथा कुछ समय बाद उद्गार प्रारम्भ कर देते हैं। इसके विपरीत शान्त ज्वालामुखियों में एक बार उद्गार के बाद फिर कभी उद्गार नहीं होता।

प्रश्न 22. ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर- ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ हैं-गैस, जलवाष्प, विखण्डित पदार्थ; जैसे-शैलों के टुकड़े, मैग्मा या लावा पदार्थ।

प्रश्न 23. ज्वालामुखी उपजाऊ मिट्टी का निर्माण कैसे करते हैं?
उत्तर- ज्वालामुखी से निकले लावा के फैलकर सूखने से उपजाऊ काली मिट्टी का निर्माण होता है। यह उपजाऊ मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर होती है। दक्षिण भारत में काली मिट्टी का क्षेत्र ज्वालामुखी उद्गारों की देन है।

प्रश्न 24. विश्व में सर्वाधिक भूकम्प कहाँ आते हैं?
उत्तर- विश्व में सर्वाधिक भूकम्प जापान में आते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूपर्पटी तथा धात्विक क्रोड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूपर्पटी तथा धात्विक क्रोड में अन्तर
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प्रश्न 2. दिए गए भूकम्प छाया चित्र के आधार पर P तथा S भूकम्प तरंगों के छाया क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
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उत्तर- भूकम्प छाया क्षेत्र के चित्र 3.3 से प्रकट होता है कि ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘s’ तरंगों के छाया क्षेत्र से छोटा है अर्थात् S तरंगों का छाया क्षेत्र विस्तृत है। भूकम्प अधिकेन्द्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी (Band) के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है। ‘s’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवुल विस्तृत है बल्कि यह पृथ्वी के 40% से भी अधिक भाग को घेरे हुए है।

प्रश्न 3. भूकम्प विज्ञान से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में क्या जानकारी मिलती है ?
या भूकम्पीय लहरों से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना पर क्या प्रकाश पड़ा है?
उत्तर- भूकम्प विज्ञान (Seismology) में भूकम्प की तरंगों का अध्ययन किया जाता है। इन तरंगों के अध्ययन से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। ध्वनि तरंगों के समान ही भूकम्पीय तरंगें ठोस पदार्थ के भीतर तीव्र गति से चलती हैं एवं तरल माध्यम से गुजरते हुए उनकी गति कम हो जाती है। गौण तरंगें (S-waves) तरल पदार्थ को बिल्कुल पार नहीं कर पातीं। यदि भूगर्भ की रचना सर्वत्र समान पदार्थ से होती तो भूकम्प की तरंगों के पथ में भिन्नता न होती। भूगर्भ में जहाँ कहीं भी दो भिन्न घनत्व के स्तर मिलते हैं, वहाँ इन तरंगों में अपवर्तन (Refraction) तथा परावर्तन (Reflection) हो जाता है। भूकम्पीय तरंगों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तरंगों की गति गहराई के अनुसार बढ़ती है। भूपटल से लगभग 2,900 किमी की गहराई तक लहरों की गति लगातार बढ़ती है, इसके आगे एकाएक परिवर्तन होते हैं। आड़ी तरंगें (S-waves) यहाँ पहुँचकर समाप्त हो जाती ‘, हैं। आड़ी तरंगें द्रव पदार्थ में प्रवेश नहीं कर पाती हैं; अतः यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी को केन्द्रीय पिण्ड तरल अवस्था में है। प्रधान तरंगें (P-waves) पृथ्वी के केन्द्र तक पहुँचती हैं, किन्तु केन्द्रीय पिण्ड में ये कम वेग से तथा मुड़कर चलती हैं। धरातलीय तरंगें (L-waves) महाद्वीपों की अपेक्षा सागरीय तल के नीचे तेजी से चलती हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि महासागरीय तल भारी या सघन पदार्थों से निर्मित है।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर विद्वानों ने दो निष्कर्ष निकाले-(1) 2,900 किमी से अधिक गहराई पर भूगर्भ की रचना अधिक सघन पदार्थ से हुई है। S-तरंगों के स्वभाव के आधार पर अन्तरतम (Core) अधिक सघन किन्तु लचीली व तरल शैलों से निर्मित है। (2) अन्तरतम (Core) में केवल P-तरंगें ही प्रवेश कर पाती हैं, s-तरंगें प्रविष्ट नहीं होतीं; अत: मध्यवर्ती लौह-अन्तरतम तरल होना चाहिए। भूकम्प विज्ञान के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है

1. ऊपरी परत- यह पृथ्वी का सबसे बाह्य ठोस भाग है। इसकी औसत मोटाई 33 किमी है। इसको निर्माण परतदार व ग्रेनाइट चट्टानों से हुआ है। इस भाग की चट्टानों का औसत घनत्व 2.7 है। यही :- कारण है कि ऊपरी परत में इन लहरों की गति अति मन्द होती है।

2. मध्यवर्ती परत- यह पृथ्वी को मध्य भाग है जिसकी गहराई 33 किमी से 2,900 किमी तक है। गहराई के साथ-ही-साथ यहाँ की चट्टानों का घनत्व भी क्रमशः बढ़ता जाता है। यह भी पृथ्वी का कठोर भाग है। इसकी संरचना डेली तथा जैफ़े ने ग्लासी बैसाल्ट से निर्मित मानी है।

3. निचली परत- भूगर्भ में 2,900 किमी की गहराई से पृथ्वी के केन्द्र तक का भाग ‘क्रोड कहलाता है। इसका ऊपरी भाग तरल अवस्था में है, परन्तु अनुमान है कि आन्तरिक भाग ठोस है। इस भाग का औसत घनत्व 11 माना गया है जिसमें लौह तत्त्वों की अधिकता है। नॉट ने बताया है। कि पृथ्वी के अन्तरतम का घनत्व चाहे अधिक हो, परन्तु वहाँ की चट्टानें द्रवित अवस्था में हैं।

प्रश्न 4. पृथ्वी के आन्तरिक भाग की भौतिक अवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जाने पर प्रारम्भ में प्रति 32 मीटर की गहराई पर 1° सेग्रे तापक्रम की वृद्धि होती है। इस प्रकार पृथ्वी के आन्तरिक भाग में 20 से 30 किलोमीटर जाने पर तापक्रम की वृद्धि के कारण कोई चट्टान अपनी मौलिक अवस्था में नहीं रह सकेगी और इसे ताप आधिक्य के कारण चट्टानें द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाएँगी। ज्वालामुखी विस्फोट के समय निकला लावा इनका प्रमाण है। महाद्वीपों और महासागरों की उत्पत्ति के सिद्धान्त भी आन्तरिक भाग की द्रव अवस्था में होने की सम्भावना व्यक्त करते हैं, किन्तु वहाँ की चट्टानों पर ऊपरी तल का भारी दबाव उन्हें द्रव जैसा नहीं बनने देता। अत: वहाँ की सारी स्थिति बड़ी जटिल है। यदि पृथ्वी को आन्तरिक भाग द्रव होता तो स्थल भाग भी ज्वार शक्तियों के प्रभाव से प्रभावित होता। चन्द्रमा और सूर्य की आकर्षण शक्तियों से अप्रभावित रहने और पृथ्वी के ठोस पिण्ड के समान व्यवहार के कारण अनेक वैज्ञानिक पृथ्वी को ठोस ही मानते हैं, परन्तु भूकम्प लहरों के आधार पर पृथ्वी को पूर्ण रूप से ठोस भी नहीं कहा जा सकता और उसके आन्तरिक भाग को पूर्ण रूप से द्रव अवस्था में भी नहीं माना जा सकता। अतः पृथ्वी के आन्तरिक भाग की भौतिक अवस्था के सम्बन्ध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकते हैं

  • पृथ्वी, ज्वार शक्तियों के प्रभाव के समय ठोस आकृति की भाँति व्यवहार करती है।
  • आन्तरिक चट्टानें उपयुक्त अवसर पर या दबाव घटने पर ही गाढ़े द्रव का रूप धारण कर लेती हैं।
  • आन्तरिक चट्टानें दबावमुक्त होने पर या स्थानीय रूप से विशेष तापवृद्धि के कारण ही द्रव अवस्था में आ सकती हैं।

प्रश्न 5. P तथा S तरंगों में अन्तर बताइए।
उत्तर- P तरंगें इन्हें प्राथमिक तरंग कहते हैं। ये ध्वनि की तरह होती हैं जो ठोस, तरह तथा गैस तीनों ही माध्यमों से गुजरती हैं। ये तीव्र गति से चलने वाली होती हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं। S तरंगें इन्हें द्वितीयक तरंग कहते हैं। ये केवल ठोस पदार्थों के माध्यम से ही चलती हैं। ये तरंगें अधिक . विनाशकारी होती हैं। इनसे चट्टानें विस्थापित हो जाती हैं तथा इमारतें गिर जाती हैं। इन तरंगों की गति धीमी होती है तथा ये दोलन की दिशा में समकोण बनाती हुई चलती हैं।

प्रश्न 6. सामान्यतः भूकम्प कितने प्रकार के होते हैं? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर- सामान्यतः भूकम्प निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं

1. विवर्तनिक (Tectonic) भूकम्प- ये भूकम्प भ्रंशतल के किनारे चट्टानों के सरक जाने के कारण उत्पन्न होते हैं। सामान्यतः अधिकांश प्राकृतिक भूकम्प विवर्तनिक ही होते हैं।

2. ज्वालामुखीजन्य (Volcanic) भूकम्प- एक विशिष्ट वर्ग के विवर्तनिक भूकम्प को ही ज्वालामुखीजन्य भूकम्प समझा जाता है। ये भूकम्प अधिकांशत सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र तक सीमित रहते हैं।

3. निंपात (Collapse) भूकम्प-खनन क्षेत्रों में कभी- कभी अत्यधिक खनन कार्य से भूमिगत खानों की छत ढह जाती है, जिससे हल्के झटके महसूस होते हैं। इस प्रकार के भूकम्प को निपात भूकम्प कहा जाता है।

4. रासायनिक विस्फोट (Explosion) जनित भूकम्प- जब कभी परमाणु या रासायनिक विस्फोट के कारण झटकों का अनुभव होता है तो उन्हें रासायनिक या परमाणु विस्फोटजनित भूकम्प कहते हैं।

5. बाँधजनित (Reservoir Induced) भूकम्प- जो भूकम्प बड़े बाँध वाले क्षेत्रों में आते हैं उन्हें बॉधजनित कहते हैं।

प्रश्न 7. भूकम्पों की माप से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूकम्पीय तीव्रता को माप को ‘रिक्टर स्केल’ (Richter Scale) या ‘भूकम्पीय तीव्रता की मापनी कहते हैं। इस मापनी के आधार पर भूकम्प तीव्रता या भूकम्प के आघात का मापन किया जाता है। इस मापनी के अनुसार भूकम्प की तीव्रता 0 से 10 तक होती है। भूकम्प आघात की तीव्रता/गहनता को इटली के भूकम्प वैज्ञानिक मरकैली के नाम पर भी जाना जाता है। यह झटकों से हुई प्रत्यक्ष हानि द्वारा निर्धारित की जाती हैं। इसकी गहनता 1 से 12 तक होती है।

प्रश्न 8. भूकम्प के विभिन्न प्रभाव बताइए।
उत्तर- भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है। इसका प्रभाव मानव के लिए सदा ही एक विपत्ति के रूप में देखा जाता है। भूकम्प के प्रमुख प्रकोप या प्रभाव निम्नलिखित हैं(i) भूमि का हिलना, (ii) धरातलीय विसंगति, (iii) भू-स्खलन/पंकस्खलन, (iv) मृदा द्रवण, (v) धरातलीय चट्टानों का एक ओर झुकना या मुड़ना, (vi) हिमस्खलन, (vii) धरातलीय विस्थापन, (viii) बॉध व तटबन्ध का टूटना, (ix) आग लगना, (x) इमारतों का टूटना, (xii) सुनामी। भूकम्प के उपर्युक्त सूचीबद्ध प्रभावों में से पहले छ: का प्रभाव स्थलरूपों पर देखा जा सकता है जबकि अन्य प्रभाव को उस क्षेत्र में होने वाले जन-धन की क्षति से समझा जा सकता है।

प्रश्न 9. पृथ्वी की रासायनिक संरचना बताइए।
उत्तर- स्वेस महोदय ने पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को रासायनिक तत्त्वों के आधार पर निम्नलिखित तीन परतों में विभाजित किया है–
1. सिायल- पृथ्वी की ऊपरी पतली परत जो भूपर्पटी के नीचे पाई जाती है, सिलिका (Si) तथा ऐलुमिनियम (Al) की अधिकता से बनी है। इन पदार्थों के मिश्रण के कारण इसे सियाल कहा जाता है। इस परत में अम्लीय पदार्थों की प्रधानता पाई जाती है।

2. सिमा- सियाल के नीचे ‘सिमा’ परत पाई जाती है। इस परत में सिलिका (Si) तथा मैग्नीशियम (Mg) तत्त्वों की अधिकता होती है, इसी कारण इस परत को सिमा कहा जाता है। यही वह परत है. जो ज्वालामुखी क्रिया को जन्म देती है। इस परत में क्षारीय पदार्थों की प्रधानता होती है। इस परत में कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा सिलिकेट भी अधिक उपलब्ध होते हैं। सीमा का घनत्व 2.9 से 4.7 तक पाया जाता है।

3. निफे- यह ‘सिमा’ के नीचे की अन्तिम परत है। इसका निर्माण कठोर धात्विक पदार्थों मुख्यतः निकिल (Ni) तथा फेरस (Fe) तत्त्वों से जुड़ा हुआ है अतः इन्हीं रासायनिक संरचना संघुटन के कारण यह निफे कहलाती है। इस परत को औसत घनत्व 11 है।

प्रश्न 10. पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तापक्रम विभिन्नता को समझाइए।
उतर- भूपृष्ठ पर ज्वालामुखी उद्गार तथा गर्म जल के कुण्डों से यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में उच्च तापमान है। सामान्यत: 32 मीटर की गहराई में जाने पर ताप में क्रमश: 1° सेल्सियम की देर से वृद्धि होती है परन्तु इस तापमान में सर्वत्र समानता नहीं मिलती है। प्रायः 100 किमी की गहराई तक तापमान 12° प्रति किमी की औसत दर से बढ़ता है, जबकि 100 से 300 किमी की गहराई तक 2° से० तथा 300 किमी से अधिक गहराई पर तापमान 1° से० प्रति किमी की दर से बढ़ता है। अतः इसी कारण पृथ्वी के आन्तरिक भाग के तापमान में सर्वत्र समानता नहीं पाई जाती है।

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का वर्णन कीजिए तथा उससे सम्बन्धित किन्हीं दो प्रमाणों का उल्लेख कीजिए। या पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में जानकारी देने वाले कौन-कौन से साधन हैं? ।
उत्तर- पृथ्वी (भूगर्भ) की आन्तरिक संरचना
प्राचीन काल से ही मानव्र पृथ्वी की उत्पत्ति, आयु, आन्तरिक रचना आदि के रहस्यों को जानने के लिए प्रयत्नशील रहा है। आज से लगभग 2,000 वर्ष पूर्व यूनानी विद्वानों ने उष्ण जल-स्रोतों, पातालतोड़ कुओं एवं सक्रिय ज्वालामुखियों के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जल, वायु एवं अग्नि के भण्डारों की सम्भावना व्यक्त की थी। लगभग 200 वर्ष पूर्व बाफर नामक फ्रेंच वैज्ञानिक ने पृथ्वी के आन्तरिक भाग को पर्वतों से अधिक सघने बताया तथा यह सिद्ध किया कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग रिक्त, वायव्य या जलपूर्ण नहीं है। अनेक विद्वानों ने ज्वालामुखी क्रिया के आधार पर पृथ्वी के आन्तरिक भाग को उष्ण तथा तरल बताया। लाप्लास ने पृथ्वी की उत्पत्ति की व्याख्या करते हुए उसे आरम्भ में उष्ण तथा गैसीय बताया।

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की जानकारी के साधन

पृथ्वी की आन्तरिक संरचना पर प्रकाश डालने में एक बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य का भूगर्भ सम्बन्धी व्यावहारिक ज्ञान धरातल से मात्र 5 या 6 किलोमीटर की गहराई तक सीमित है। किन्तु तापमान, घनत्व, दबाव, ज्वालामुखी क्रिया तथा भूकम्प के परोक्ष साक्ष्यों के आधार पर पृथ्वी की आन्तरिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। इन साधनों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है–
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1. अप्राकृतिक साधन
(i) घनत्व (Density)- पृथ्वी के घनत्व के सम्बन्ध में पहले अनुमानों का प्रयोग किया जाता था, परन्तु आज वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से इसका पता लगाया गया है कि भूगर्भ का घनत्व सर्वाधिक है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि पृथ्वी की ऊपरी सतह मोटी परतदार चट्टानों से बनी है, जिसकी मोटाई 750 मीटर तक है; परन्तु कहीं-कहीं पर यह अधिक भी हो सकती है। सन् 1774 ई० में न्यूटन नामक वैज्ञानिक ने समस्त पृथ्वी का घनत्व 5.5 बताया था तथा इसकी ऊपरी परत का घनत्व 3.0 है। कहीं-कहीं पर यह 3.5 तक भी है। परतदार शैलों के नीचे रवेदार या स्फटकीय शैलों का जमाव मिलता है। अतः इस परत को घनत्व 5.5 से भी अधिक होना चाहिए। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में केन्द्र के निकट निकिल, लोहा जैसी भारी धातुएँ अधिक मात्रा में पायी जाती हैं। इस आधार पर भूगर्भ के अन्तरतम के घनत्व की अन्तिम सीमा 11.0 मानी गयी है, क्योंकि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में अत्यधिक भारी पदार्थ विद्यमान हैं। इससे ज्ञात होता है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग तरलावस्था में है।

(ii) दबाव (Pressure)- पदार्थों के ऊपर अन्य वस्तुओं का बढ़ता हुआ भार दबाव कहलाता है। पृथ्वी की ऊपरी सतह से भूगर्भ में अन्तरतम की ओर जाते ही चट्टानों का भार बढ़ने लगता है। दबाव में वृद्धि के साथ ही शैलों का घनत्व भी बढ़ जाता है। इस प्रकार दबाव के कारण बहुत-सी चट्टानें पिघलकर द्रव रूप धारण कर लेती हैं तथा उनमें गर्मी धारण करने की अपार क्षमता उत्पन्न हो जाती है। अत्यधिक मात्रा में पिघली हुई शैलें पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी को तोड़कर बड़ी तेजी से ऊपर की ओर निकल आती हैं, जिसका वर्तमान स्वरूप हमें ज्वालामुखी-लावा के रूप में दिखलाई पड़ता है। वर्तमान समय में वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि प्रत्येक शैल में एक ऐसी अन्तिम सीमा होती है जिससे आगे उसके घनत्व में वृद्धि नहीं हो पाती, चाहे उसका दबाव कितना ही अधिक बढ़ जाए। अनेक प्रयोगों तथा पर्यवेक्षणों के द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि पृथ्वी को आन्तरिक भाग निकिल तथा लोहे द्वारा निर्मित है। इनसे पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति का पता चलता है। दबाव के आधार पर स्पष्ट होता है कि पृथ्वी को आन्तरिक भाग ठोस तथा द्रव अवस्था में विद्यमान है।

(iii) तापमान (Temperature)- तापमान तथा दबाव का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहाँ तापमान में वृद्धि होती है, वहाँ दबाव भी बढ़ जाता है। आग्नेय चट्टानों, ज्वालामुखी पर्वत, गर्म जल-स्रोतों, खानों में उष्णता के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाने पर तापमान में वृद्धि होती जाती है। यह अनुमान है कि प्रति 32 मीटर गहराई पर 1° सेग्रे तापमान में वृद्धि हो जाती है। इस आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भूगर्भ का आन्तरिक भाग इतना अधिक गर्म होगा कि प्रत्येक कठोर-से-कठोर वस्तु भी तरल अवस्था में परिणत हो जाएगी। केलविन महोदय ने परिकलन कर भूगर्भ का तापमान 4000° सेग्रे बताया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भूगर्भ की चट्टानें अत्यधिक ताप के कारण पिघल जाएँगी एवं पृथ्वी को आन्तरिक भाग तरलावस्था में होगा।

परन्तु आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध होता है कि चट्टानों के दबाव के साथ-साथ उनका द्रवणांक बिन्दु भी बढ़ जाता है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में जाने से यदि तापमान में वृद्धि होती है तो दबाव में वृद्धि के साथ-साथ चट्टानें नहीं पिघल सकतीं। इस आधार पर पृथ्वी को आन्तरिक भाग ठोस अवस्था में होना चाहिए।

वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक शैल में एक ऐसी अन्तिम सीमा होती है। कि दबाव जितना अधिक बढ़ जाए, परन्तु वह किसी भी अवस्था में शैलों को ठोस नहीं रख सकता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि पृथ्वी का अन्तरतम ठोस अवस्था में न हो तो यह वायव्य अवस्था में होना चाहिए। यदि भूगर्भ वायव्य अवस्था में है तो इससे अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यदि किसी कारणवश पृथ्वी की वायु बाहर निकल जाए तो पृथ्वी पिचक सकती है, परन्तु वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के घनत्व, दबाव एवं तापमान के आधार पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिया जा सकता कि पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सके। वूलरिज तथा मोरगन नामक विद्वानों ने पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में निम्नलिखित तीन निष्कर्ष निकाले हैं

  1. पृथ्वी एक ठोस गेंद के रूप में स्थित है।
  2. इसका अधिकांश ऊपरी भाग चिपचिपे तरल पदार्थों जैसा व्यवहार कर सकता है।
  3. भूगर्भ लगातार चट्टानों के दबाव के कारण तरलावस्था में हो सकता है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया का आविर्भाव हो सकता है।

2. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सिद्धान्तों के साक्ष्य ।
पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित साक्ष्यों से यह समझना कठिन हो जाता है कि पृथ्वी की संरचना किस प्रकार हुई है? पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सभी सिद्धान्त एकरूप नहीं हैं। विभिन्न विद्वानों ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के निराकरण के लिए उसे ठोस, तरल एवं वायव्य अवस्था में होना बताया है। चैम्बरलिन एवं मोल्टन की ‘ग्रहाणु परिकल्पना’ के अनुसार पृथ्वी का निर्माण ठोस ग्रहाणुओं के – एकत्रीकरण के फलस्वरूप हुआ। अतएव सम्पूर्ण पृथ्वी ठोस अवस्था में होनी चाहिए, परन्तु जीन्स एवं ‘ जैफ्रे की ‘ज्वारीय परिकल्पना’ इसकी पूर्णरूप से विरोधाभासी है। उनके अनुसार पृथ्वी का अभ्यान्तर तरलोवस्था में होना चाहिए, परन्तु ऐसा भी नहीं है। लाप्लास महोदय की निहारिका परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति गैसीय निहारिका द्वारा हुई है। अतः पृथ्वी का आन्तरिक भाग वायव्य अवस्था में होना चाहिए, जबकि ऐसा भी नहीं है। इन साक्ष्यों से पृथ्वी की आन्तरिक संरचना का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता; अत: इसे सम्बन्ध में और अधिक अध्ययन किये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

3.-प्राकृतिक साधन ।
(i) ज्वालामुखी उद्गार- ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा से यह सिद्ध होता है कि पृथ्वी का आन्तरिक भाग तरल लावे द्वारा निर्मित है। पृथ्वीतल पर अनेक ज्वालामुखी उद्गार हुए हैं। -: अधिकांश ज्वालामुखी समुद्रतटवर्ती भागों में विस्तृत हैं। पूर्वी एशिया में प्रशान्त महासागर के सहारे-सहारे उत्तर से दक्षिण तक ज्वालामुखी एक मेखला में विस्तृत है। यही क्रम उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर प्रशान्त महासागर के सहारे-सहारे मिलता है। तीसरी पेटी ‘मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों में विस्तृत है, जो यूरोप महाद्वीप के पश्चिम से लेकर एशिया महाद्वीप के पूर्वी भागों तक फैली है। अधिकांश ज्वालामुखी समुद्रतटीय भागों में पाये जाते हैं। चट्टानों का दबाव कम होने से लावा की उत्पत्ति मानी जा सकती है। यह पिघला हुआ लावा ही उद्गार के समय बाहर आता है। इस प्रकार ज्वालामुखी उद्गार के द्वारा भी पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में कोई निश्चित जानकारी | प्राप्त नहीं हो पाती।

(ii) भूकम्प- जब पृथ्वी का कोई भाग अचानक कम्पन करने लगता है तो वह ‘भूकम्प’ कहलाता है। भूकम्प झटकों के रूप में आता है, जिन्हें भूकम्पीय लहरें कहते हैं। भूकम्पीय लहरों का अंकन सीस्मोग्राफ नामक यन्त्र में होता है। भूकम्प विज्ञान एक ऐसा प्रत्यक्ष साक्ष्य है जिससे पृथ्वी की आन्तरिक संरचना के विषय में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो सकती है। जिस स्थान से भूकम्प का कम्पन प्रारम्भ होता है, उसे ‘भूकम्प मूल’ (Focus) कहते हैं। जिस स्थान पर भूकम्पीय लहरों का अनुभव सबसे पहले किया जाता है, उसे ‘भूकम्प केन्द्र’ (Epicentre) कहते हैं। मूल बिन्दु से भूकम्पीय लहरें जिन भागों में पहुँचती हैं, उसे भूकम्प क्षेत्र (Area of Earthquake) कहते हैं। भूकम्पीय क्रिया में निम्नलिखित तीन प्रकार की लहरें जन्म लेती हैं–(अ) प्राथमिक अथवा लम्बी लहरें (P), (ब) गौण अथवा तिरछी लहरें (S), (स) धरातलीय लहरें (L)।

सबसे पहले लघु कम्पन होता है जिसे प्राथमिक कम्पन कहते हैं, जिसमें लहरें कुछ लम्बी होती हैं। कुछ अन्तराल के पश्चात् दूसरा अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली कम्पन होता है जिसे द्वितीय कम्पन या गौण कम्पन कहते हैं, जिसमें लहरें तिरछी प्रवाहित होती हैं। इसके बाद अधिक अवधि वाला मुख्य कम्पन होता है, जिसे धरातलीय कम्पन कहते हैं। इस प्रकार ये तीनों भूकम्पीय कम्पन क्रमशः अंग्रेजी के P, S तथा L लहरों द्वारा प्रकट किये जाते हैं। भूकम्पीय लहरों का यही क्रम होता है, जिन्हें अग्रांकित चित्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है

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भूकम्पीय लहरें भूगर्भ की आन्तरिक संरचना के वास्तविक स्वरूप का अंकन करती हैं। इन तरंगों की गति तथा भ्रमण-पथ के आधार पर भूगर्भ की आन्तरिक संरचना के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। भूकम्पीय लहरें प्रायः ठोस भाग से होकर गुजरती हैं जो सीधी रेखा में प्रवाहित होती हैं। परन्तु जब ठोस भाग के घनत्व में अन्तर आता है, तब ये वक्राकार मार्ग का अनुसरण करने लगती हैं। इस प्रकार यदि पृथ्वी एक ही प्रकार के ठोस घनत्व वाली चट्टानों से निर्मित होती तो ये लहरें वक्राक़ार मार्ग का अनुसरण करतीं। s लहरें कभी भी तरल भागों से नहीं गुजरती हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग के घनत्व में भारी अन्तर है जिससे ये लहरें परिवर्तित हो जाती हैं।

उपर्युक्त आधार पर यह स्पष्ट एवं प्रमाणित हो जाता है कि पृथ्वी के आन्तरिक भाग में तरलावस्था में एक केन्द्र है जो 2,900 किमी से भी अधिक गहराई पर केन्द्र के चारों ओर विस्तृत है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वी के अन्तरतम भाग का लोहा तथा निकिल तरलावस्था में हैं। P तरंगें पृथ्वी के ठोस भाग से गुजरती हैं जिससे पता चलता है कि पृथ्वी की ऊपरी परत परतदार चट्टानों द्वारा निर्मित है। मध्यवर्ती परत बेसाल्ट पदार्थों द्वारा बनी है जिसकी मोटाई 20 से 30 किमी तक है। अतः उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि पृथ्वी की ऊपरी परत ठोस पदार्थों द्वारा निर्मित है, जबकि उसका अन्तरतम तरल पदार्थों द्वारा निर्मित है।

प्रश्न 2. उद्गार की प्रवृत्ति और धरातल पर विकसित आकृतियों के आधार पर ज्वालामुखियों का वर्गीकरण कीजिए और प्रत्येक का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- ज्वालामुखियों को उनकी उद्गार प्रवृत्ति और धरातल पर इनके द्वारा विकसित आकृतियों के आधार पर निम्नलिखित चार प्रकारों में विभाजित किया जाता है–

1. शील्ड ज्वालामुखी- ये सबसे विशाल ज्वालामुखी होते हैं। इनका निर्माण मुख्यतः बेसाल्ट से निर्मित लावा के ठण्डे होने से होता है। उद्गार के समय यह लावा अत्यन्त तरल होता है, इसलिए इन ज्वालामुखियों का ढाल तीव्र नहीं होता। इनसे लावा फव्वारे के रूप में बाहर आता है और निकास पर एक शंकु बनता है जो सिंडर शंकु के रूप में विकसित होता है। ये ज्वालामुखी सामान्यत: कम विस्फोटक होते हैं किन्तु यदि किसी तरह निकास नलिका से पानी भीतर चला जाए तो ये ज्वालामुखी पिस्फोटक भी हो जाते हैं।

2. मिश्रित ज्वालामुखी- प्रायः ये ज्वालामुखी भीषण विस्फोटक होते हैं। इनसे गाढ़ा या चिपचिपा लावा उद्गार होता है। लावा के साथ भारी मात्रा में ज्वलखण्डाश्मि पदार्थ (लावा के जमे टुकड़े, मलबा, राख आदि) भी धरातल पर पहुँचते हैं। यह पदार्थ निकासनली के आस-पास परतों के रूप में जमा हो जाते हैं जिनके जमाव से मिश्रित ज्वालामुखी का विकास होता है।

3. ज्वालामुखी कुण्ड- ये पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अधिक विस्फोटक ज्वालामुखी हैं। इनका विस्फोटक इतना भीषण होता है कि इनसे ऊँचा ढाँची बनने के स्थान पर धरातल स्वयं नीचे पॅस जाता है। इस धंसे हुए विध्वंस गर्त को ही ज्वालमुखी कुण्ड कहते हैं। इनके द्वारा निर्मित पहाड़ी मिश्रित ज्वालामुखी की तरह प्रतीत होती है।

4. बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र- ये ज्वालामुखी अत्यधिक तरल लावा उगलते हैं, जो बहुत दूर तक फैल जाता है। इनमें लावा प्रवाह क्रमानुसार होता है और कुछ प्रवाह 50 मीटर से भी अधिक मोटे हो जाते हैं। भारत का दक्कन ट्रैप वृहत बेसाल्ट प्रवाह ज्वालामुखी का अच्छा उदाहरण है।

प्रश्न 3. भूकम्पों के कारणों की विवेचना कीजिए। विश्व में उनकी पेटियों का विवरण दीजिए।
या भूकम्प किसे कहते हैं? ये किस प्रकार उत्पन्न होते हैं? विश्व के भूकम्प क्षेत्रों तथा उनके प्रभाव का वर्णन कीजिए।
या भूकम्प से आप क्या समझते हैं। विश्व में इससे प्रभावित क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
या भूकम्प से आप क्या समझते हैं। उसके विश्व-वितरण का वर्णन कीजिए।
या भूकम्प से आप क्या समझते हैं? विश्व में भूकंप के प्रमुख क्षेत्र एवं उनके प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूकम्प का अर्थ एवं परिभाषाएँ
भूकम्प भूतल की आन्तरिक शक्तियों में से एक है। साधारणतः भूकम्प एक प्राकृतिक घटना है जो भूपटल में हलचल पैदा कर देती है। इन हलचलों के कारण पृथ्वी अनायास ही वेग से काँपने लगती है, जिसे भूचाल या भूकम्प कहते हैं। इस प्रकार यह एक आकस्मिक घटना है।।

आर्थर होम्स के अनुसार, “भूकम्प धरातल के ऊपरी भाग का वह कम्पन है जो कि धरातल के ऊपर अथवा नीचे चट्टानों के लचीलेपन एवं गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में न्यून अवस्था से प्रारम्भ होता है।” सैलिसंबरी ने भूकम्प की परिभाषा इस प्रकार दी है, “भूकम्प धरातल के वे कम्पन हैं जो व्यक्ति से असम्बन्धित क्रियाओं के परिणामस्वरूप होते हैं।”

भूकम्प की उत्पत्ति

भूगर्भ में भूकम्पीय लहरें चलती रहती हैं। जिस स्थान से इन लहरों का प्रारम्भ होता है, उसे भूकम्प मूल (Focus) कहते हैं। भूपटल पर जिस स्थान पर भूकम्पीय लहरों का अनुभव सर्वप्रथम किया जाता है, भूकम्प का अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं। अधिकेन्द्र से लहरें जितने बड़े क्षेत्र को प्रभावित करती हैं, उसे भूकम्प क्षेत्र कहते हैं। इन लहरों की तीव्रता एवं प्रकृति की जानकारी भूकम्पमापी (Seismograph) द्वारा ज्ञात की जाती है। भूकम्प एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिससे बचाव का कोई समाधान आज तक नहीं खोजा जा सका है। भूकम्प के उद्गम का क्षेत्र धरातल से 250 किमी से 750 किमी नीचे तक रहता है। भूकम्प तेरंगों को मिलाने वाली रेखाएँ समभूकम्प रेखाएँ (Isoseismal Lines) कहलाती हैं।

भूकम्पों की उत्पत्ति के कारण

वर्तमान वैज्ञानिक युग में भूकम्पों की उत्पत्ति के कारणों का पता लगाने का प्रयास किया गया है। भूगर्भशास्त्रियों ने स्पष्ट किया है कि भूकम्प और ज्वालामुखी दोनों ही क्रियाओं के लगभग एक से ही कारण, तथ्य एवं दिशाएँ हैं। भूगर्भवेत्ताओं ने भूकम्पों की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण स्पष्ट किये हैं
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1. ज्वालामुखी उद्गार- जिन क्षेत्रों में ज्वालामुखी उद्गार होते हैं, वहाँ भूकम्प अवश्य ही आते हैं। जब विवर्तनिक हलचलों के कारण भूगर्भ से गैसयुक्त द्रवित लत्वा भूपटल की ओर प्रवाहित होता है तो उसके दबाव से भूपटल की शैलें हिल उठती हैं। यदि लावा के मार्ग में कोई भारी चट्टान आ जाए तो प्रवाहशील लावा दबाव की शक्ति का पुनः संचय कर उस चट्टान को वेग से ढकेलता है, जिससे भूकम्प आ जाता है। लावा का तीव्र वेग भी पृथ्वी को कँपा देता है।

2. भंशन- तनाव अथवा दबाव की क्रिया से भूपटल में भ्रंशें पड़ जाती हैं। भ्रंश के सहारे शैलखण्ड ऊपर अथवा नीचे की ओर खिसकने लगता है, जिससे पृथ्वी हिल उठती है।

3. भू-सन्तुलन में अव्यवस्था- भूपटल पर विभिन्न बल समतल समायोजन में लगे रहते हैं जिससे ऊँचे भाग नीचे हो जाते हैं तथा नीचे के भागों में शैल-चूर्ण जमा हो जाता है। इस प्रक्रिया में विभिन्न क्षेत्रों का भार घटता-बढ़ता रहता है जिससे भूगर्भ की सियाल एवं सिमा की परतों में परिवर्तन होते रहते हैं। यह प्रक्रिया बहुत धीरे-धीरे होती है। परन्तु यदि यह क्रिया कहीं पर एकाएक प्रारम्भ हो जाए तो पृथ्वी का कम्पन प्रारम्भ हो जाता है तथा उस क्षेत्र में भूकम्प के झटके आने प्रारम्भ हो जाते हैं।

4. भूपटल की प्लेटों का खिसकना- नवीनतम खोजों द्वारा ज्ञात किया गया है कि भूकम्पों की उत्पत्ति का मुख्य कारण भूपटल की प्लेटों का खिसकना है। भूगोलविदों का मत है कि भूपटल पर एक दर्जन . बड़ी-बड़ी प्लेटें हैं। ये कम घनत्व की होने के कारण शैलों की परतों पर तैरती रहती हैं तथा जैसे ही एक प्लेट खिसकती है वह भूकम्पों को जन्म देती है। भारत में उत्तरकाशी तथा गुजरात में लाटूर क्षेत्र में इसी प्रकार भूकम्प उत्पन्न हुए थे।

5. जलीय भार- धरातल के जिन भागों में, झीलें, तालाब, जलाशय आदि हैं, उनके नीचे की चट्टानों में भार एवं दबाव के कारण हेर-फेर होने लगता है। यदि यह परिवर्तन अचानक हो जाए तो भूकम्प आ जाता है। यह स्थिति स्थायी जल क्षेत्रों में नहीं होती, क्योंकि वहाँ पर सन्तुलन स्थापित हो जाता है। यह स्थिति तो मानव द्वारा बनाये गये बाँध आदि द्वारा भी उत्पन्न हो सकती है। 11 दिसम्बर, 1967 ई० को कोयना (महाराष्ट्र) में भूकम्प कोयना जलाशय में जल भर जाने के कारण आया था।

6. भूपटल में सिकुड़न- डाना एवं बरमाण्ट नामक भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, भूगर्भ की गर्मी विकिरण के माध्यम से धीरे-धीरे कम होती रहती हैं। ताप की कमी से पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी में सिकुड़न है। भूपटल की सिकुड़न पर्वत निर्माणकारी क्रिया को जन्म देती है। जब यह प्रक्रिया तीव्रता से होती है तो भूपटल में कम्पन प्रारम्भ हो जाता है।

7. गैसों का फैलाव- जब भूगर्भ में किसी कारणवश जल प्रवेश करता है तो भूगर्भ में ताप के कारण ‘जल’ गैस अथवा वाष्प में परिणत हो जाता है। कम दबाव के कारण यह गैस ऊपर की ओर निकलने का प्रयास करती है। गैस का बार-बार यह प्रयास भूपटल में कम्पन पैदा कर देता है।

भूकम्पों का मानव-जीवन पर प्रभाव

भूकम्प मानव-हृदय को कँपा देने वाली सबसे घातक एवं विनाशकारी प्राकृतिक घटना है। इनके द्वारा पृथ्वी पर विनाशकारी तथा रचनात्मक, दोनों प्रकार के कार्य सम्पन्न होते हैं

(अ) विनाशकारी प्रभाव या भूकम्प से हानियाँ
भूकम्पों का कुप्रभाव मानव तथा प्रकृति-प्रदत्त सभी वस्तुओं पर पड़ता है। जिस समय मानव को भूकम्प आने की सूचना मिलती है, उसके हृदय में भयानक आशंकाएँ जन्म ले लेती हैं। इससे होने वाले विनाशकारी प्रभाव निम्नलिखित हैं

1. सांस्कृतिक पर्यावरण का विनाश- भूकम्पों के प्रहार से मानव-रचित प्राचीनतम एवं नवीनतम * रचनाएँ नष्ट हो जाती हैं। मानव द्वारा निर्मित इमारतें, रेल की पटरियाँ, अन्य ऐतिहासिक इमारतें ध्वस्त हो जाती हैं; अर्थात् मानवकृत सांस्कृतिक भूदृश्य विनष्ट हो जाता है। उदाहरण के लिए, 1923 ई० में जापान में सगामी खाड़ी में आये भूकम्प से 5 लाख घरों की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल पाया था। सन् 2001 में गुजरात के भुज क्षेत्र में आये भूकम्प से कच्छ प्रदेश तथा अनेक नगरों में भवनों की क्षति हुई तथा 20 हजार से अधिक व्यक्ति मारे गये। 25 अप्रैल, 2015 को नेपाल में 7.8 तीव्रता का भूकम्प आया था। इस भूकम्प में भारत, चीन तथा बांग्लादेश भी प्रभावित हुए। इस भूकम्प से नेपाल में 8,800 से अधिक, भारत में 78, चीन में 27 तथा
बांग्लादेश में 4 लोगों की मृत्यु हो गई।

2. बाढ़ का प्रकोप- भूकम्प आने से नदियों में बाढ़ आ जाती हैं, क्योंकि उनसे नदियों के प्रवाह मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। उदाहरणार्थ-1950 ई० में असम (अब असोम) के भूकम्प से ब्रह्मपुत्र तथा इसकी सहायक नदी दिहांग का मार्ग रुक गया था एवं बाढ़ आ गयी थी।

3. भूस्खलन- भूकम्पों के प्रभाव से नदी-घाटियों तथा पर्वतीय घाटियों में पर्वतों के बड़े-बड़े शिलाखण्ड टूटकर गिर जाते हैं। इसके अतिरिक्त हिमानियाँ भी टूटकर गिर जाती हैं जिससे भूमि का एक बड़ा भाग टूट जाता है। हिमानी के टूटने से सागरों में जलयानों को अत्यधिक हानि होती

4. भूतल में दरारों का पड़ना- विश्व के किसी भाग में जब भूकम्प आता है तो उस क्षेत्र के 90% भूभाग में दरारें पड़ जाती हैं। ये दरारें इतनी भयानक होती हैं कि कभी-कभी इनमें झीलें तक विकसित हो जाती हैं। सन् 1897 में असम में आये भूकम्प से 12 मील लम्बी तथा 35 फीट चौड़ी दरार पड़ गयी थी।

5. भू-असन्तुलन- भूकम्पों के प्रभाव से धरातल में उभार एवं धंसाव की क्रिया होती है जिससे भू-असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है। उदाहरण के लिए, 1819 ई० में सिन्धु नदी के डेल्टा में आये भूकम्प से 4,500 वर्ग किमी का क्षेत्र नीचे धंस गया था, जिसने सागर का रूप ले लिया था।

6. आग लगना- प्रायः देखा जाता है कि भूकम्प तरंगों तथा तीव्र वायु के वेग के आवेश से विद्युत आवेश बनता है तथा अग्नि का जन्म होता है जिससे अपार धन-जन की हानि होती है। 1923 ई० में जापान की सगामी खाड़ी में आये भूकम्प से आग लगने के कारण याकोहामा तथा टोकियो नगरों की 2 अरब 50 करोड़ डॉलर की सम्पत्ति जलकर रख हो गयी थी।

7. सुनामिस तरंगों की उत्पत्ति- जिन सागरों में या सागर-तटों के पास भूकम्प आते हैं, वहाँ जल की ऊँची तरंगें (सुनामिस) ज्वार के साथ तेजी से ऊपर उठती हैं जो समीपवर्ती बस्तियों के लिए बहुत हानिकारक होती हैं। 16 जून, 1819 में कच्छ की खाड़ी में आये भूकम्प ने सागर जल की तरंगों को इतना ऊँचे उछाल दिया था कि वहाँ उपस्थित जलयानों तथा बसाव-क्षेत्र में अपार धन-जन की हानि हुई थी। दिसम्बर, 2004 में इण्डोनेशिया के समीप सागर से उठी सुनामिस तरंगों ने इण्डोनेशिया, थाइलैण्ड, जावा, सुमात्रा, श्रीलंका एवं भारत के समुद्री तटों पर भयंकर तबाही की, जिसमें लगभग दो लाख व्यक्ति मारे गये तथा अपार क्षति हुई।

8. कृषि-योग्य उपजाऊ भूमि में कमी- भूकम्पों के कारण कृषि-योग्य उपजाऊ भूमि में दरारें पड़ जाती हैं। भूगर्भ के आन्तरिक भागों की कीचड़युक्त अवसाद इस उपजाऊ भूमि पर फैल जाती है। तथा उसे कृषि के अयोग्य बना देती है।

(ब) भूकम्पों का रचनात्मक प्रभाव या लाभ
भूकम्पों से जितना विनाश होता है उसका 1% भी लाभ नहीं हो पाता। कुछ लाभ अप्रत्यक्ष रूप से होते हैं, जो निम्नलिखित हैं

1. उपजाऊ कृषि-योग्य भूमि का निर्माण- भूकम्पों द्वारा भूस्खलन क्रिया होती है जो कि अपक्षय में सहायक है। किसी भाग की उपजाऊ मिट्टी किसी ऊसर भूमि में पहुँच जाती है तो उस क्षेत्र की मिट्टी को कृषि के योग्य बना देती है।

2. शैलों में अंश उत्पन्न होना- भूकम्पों के द्वारा अचानक चट्टानों में वलन, भ्रंशन एवं दरारें पड़ जाती हैं। इनके कारण जल-स्रोतों का जन्म होता है जो कि मानव के लिए बहुत ही उपयोगी हैं।

3. प्राकृतिक भूदृश्यों का निर्माण- भूकम्पों द्वारा किसी स्थलखण्ड में अचानक उभार आ जाता है। तथा कहीं पर गहरी झील का निर्माण हो जाता है जो बाद में मानव के लिए प्राकृतिक भूदृश्य बन जाते हैं तथा पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित होते हैं।

4. खनिज पदार्थों की प्राप्ति- भूकम्प से धरातल में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ जाती हैं। इसी कारण बहुत-से खनिज ऊपर की ओर आ जाते हैं, जिन्हें सरलता से निकाल लिया जाता है।

5. भूगर्भ की आन्तरिक रचना की जानकारी- भूकम्प के द्वारा जब कोई भूभाग विशेष रूप से ऊबड़-खाबड़ हो जाता है तो उसमें भूगर्भ की बहुत-सी परतें स्पष्ट देखी जा सकती हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से भूगर्भ की आन्तरिक रचना के ज्ञान में वृद्धि करती हैं।

6. नवीन स्थलाकृतियों का उदय- भूकम्पों के कारण धरातल पर नवीन पर्वत, पठार, मैदान, द्वीप तथा झीलें आदि उदित हो जाती हैं, जो अनेक प्रकार से मानव के लिए कल्याणकारी हैं।

7. नवीन पत्तनों का उदय- भूकम्पों के प्रभाव से जलमग्न तटों का विस्तार हो जाता है जिससे वहाँ गहरी खाड़ियाँ विकसित हो जाती हैं। यहाँ सुरक्षित तथा प्राकृतिक पत्तनों का विकास हो जाता है, जो व्यापार में सहायक होते हैं।

8. नवीन जल-स्रोतों का उदय- भूकम्पीय क्रिया से धरातल में दरारें पड़ जाने के फलस्वरूप नवीन जल-स्रोतों का उदय हो जाता है जो मानव के लिए बहुत ही उपयोगी होते हैं। अधिकांश स्रोतों में गन्धक आदि रासायनिक खनिज पदार्थ मिले होने के कारण ये चर्म रोगों से मुक्ति दिलाते हैं।

भूकम्प मानव के लिए कल्याणकारी और विनाशकारी दोनों होते हैं। एक ओर ये मानव के विनाश का प्रलयकारी दृश्य उपस्थित करते हैं तो दूसरी ओर मानव-कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं। फिर भी विनाश का पक्ष ही अधिक प्रभावशाली प्रतीत ह्येता है।

भूकम्पों का विश्व-वितरण (पेटियाँ)

साधारणतया भूकम्प धरातल के कमजोर भागों में पाये जाते हैं। विश्व में जहाँ नवीन मोड़दार पर्वत-श्रेणियाँ पायी जाती हैं, वहाँ विश्व के लगभग 50% भूकम्पीय क्षेत्र स्थापित हैं; क्योंकि पर्वत निर्माणकारी घटनाएँ भूतल में हलचल पैदा कर देती हैं। महाद्वीपों एवं महासागरों के मिलन स्थलों पर जल रिस-रिसकर भूमि में आसानी से पहुँचता रहता है। तापमान की अधिकता के कारण यह जल जलवाष्प एवं गैस में बदलती रहता है जिससे भूकम्प की स्थिति बन जाती है। विश्व के 40% भूकम्प ऐसे ही क्षेत्रों में पाये जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहाँ पर भूपटल-भ्रंशन की क्रियाएँ क्रियाशील रहती हैं, वहाँ प्रायः भूकम्प आते हैं। इस आधार पर विश्व में भूकम्पीय क्षेत्रों को निम्नलिखित पेटियों में विभाजित किया जा सकता है

1. प्रशान्त महासागरीय तटीय पेटी–विश्व के 68% भूकम्प इसी क्षेत्र में आते हैं। क्षेत्रफल के | दृष्टिकोण से यह विश्व की सबसे बड़ी पेटी है। यहाँ भूकम्प आने की तीन दशाएँ उपलब्ध हैं—

  • महाद्वीपों एवं महासागरों के मिलन बिन्दु,
  • नवीन मोड़दार पर्वतों के क्षेत्र एवं
  • ज्वालामुखी के विस्तृत क्षेत्र।।

प्रशान्त महासागर के पूर्वी भाग में विस्तृत भूकम्प पेटी कमचटका प्रायद्वीप से प्रारम्भ होकर तट के सहारे-सहारे क्यूराइल द्वीप, जापान, फारमूसा, फिलीपाइन, इण्डोनेशिया, मलेशिया तथा ऑस्ट्रेलिया के पूरब में न्यूजीलैण्ड तक विस्तृत है। जापान में प्रतिवर्ष 1,500 भूकम्प आते हैं। जापान में अभी तक विनाशकारी भूकम्पों की संख्या 223 रही है तथा साथ ही प्रतिदिन 4 भूकम्पों का औसत रहा है। टोकियो में प्रति तीसरे दिन बड़ा भूकम्प आता है। दूसरी पेटी उत्तरी अमेरिका के पश्चिम में अलास्का से लेकर दक्षिण में चिली, रॉकी तथा एण्डीज नवीन मोड़दार पर्वतों तक विस्तृत है।

2. मध्य महाद्वीपीय पेटी- इसे भूमध्यसागरीय पेटी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर विश्व के 21 प्रतिशत भूकम्प आते हैं। इस पेटी में भ्रंशन एवं सन्तुलनमूलक भूकम्प ही अधिक आते हैं। यह पेटी यूरोप के आल्प्स पर्वत से लेकर एशिया में हिमालय पर्वत एवं म्यांमार की अराकानयोमा पहाड़ियों तक विस्तृत है। भूमध्य सागर के समीपवर्ती क्षेत्रों में केपवढे द्वीप, पुर्तगाल आदि क्षेत्रों में इस पेटी का विस्तार है। पामीर की गाँठ से जैसे-जैसे मोड़दार पर्वत-श्रेणियाँ फैली हैं, वैसे ही यह भूकम्प पेटी विस्तृत है। पूर्व में यह पेटी पूर्वी द्वीप समूह की भूकम्प पेटी से मिल जाती है। भारतीय भूकम्प पेटी को भी इसमें शामिल किया जाता है। हिमालय पर्वत-श्रेणी के सहारे-सहारे यह पेटी स्थित है। इसकी एक उपशाखा असम से बंगाल की खाड़ी होती हुई कन्याकुमारी तक विस्तृत है। प्रायद्वीपीय भारत एक कठोर भूखण्ड है, परन्तु 11 दिसम्बर, 1967 में महाराष्ट्र के कोयना नगर में आये भूकम्प ने इसमें सन्देह पैदा कर दिया है। 30 सितम्बर, 1993 को महाराष्ट्र राज्य के किल्लारी, लातूर व उस्मानाबाद क्षेत्रों में आये भूकम्प ने सबका दिल दहला दिया, फिर भी यह एक न्यूनतम भूकम्प प्रभावित क्षेत्र है। इसमें केवल सामान्य भूकम्प ही आते हैं, जिन्हें संवेदनात्मक भूकम्प कह सकते हैं।

3. मध्य अन्ध महासागरीय पेटी- भूकम्पों के दृष्टिकोण से यह पेटी बहुत प्रसिद्ध है, परन्तु क्षेत्रफल में महत्त्वपूर्ण नहीं है। अन्ध महासागर के मध्य में जो ऊँची उठी हुई कटक (Ridge) उत्तर से दक्षिण को फैली है, उसके सहारे-सहारे इस पेटी का विस्तार है। इस पेटी में भूकम्पों की भरमार

4. अन्य क्षेत्र- उपर्युक्त पेटियों के अतिरिक्त कुछ अन्य क्षेत्र भी भूकम्पों से प्रभावित हैं। यह क्षेत्र मुख्य रूप से अफ्रीका के पूर्वी भाग में दक्षिण तक फैला हुआ है। पूर्वी अफ्रीका की दरार घाटी इसी भूकम्पीय क्षेत्र में स्थित है। अदन की खाड़ी से एक अन्य उपशाखा अरब सागर में प्रवेश करती है। हिन्द महासागर में आने वाले भूकम्प इसी क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents (महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की सम्भावना व्यक्त की?
(क) अल्फ्रेड वेगनर
(ख) अब्राहमें आरटेलियस
(ग) एनटोनियो पेलेग्रिनी
(घ) एडमण्ड हैस।
उत्तर- (ग) एनटोनियो पेलेग्रिनी।

प्रश्न (ii) पोलर फ्लीइंग बल (Polar fleeing Force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(क) पृथ्वी का परिक्रमण
(ख) पृथ्वी को घूर्णन
(ग) गुरुत्वाकर्षण
(घ) ज्वारीय बल
उत्तर- (ख) पृथ्वी का घूर्णन।

प्रश्न (iii) इनमें से कौन-सी लघु (Minor) प्लेन नहीं है?
(क) नजका
(ख) फ़िलिपीन
(ग) अरब
(घ) अण्टार्कटिक
उत्तर- (घ) अण्टार्कटिक।

प्रश्न (iv) सागरीय अधःस्तल विस्तार सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए हैस ने निम्न में से किस अवधारणा पर विचार नहीं किया?
(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ
(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना
(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण
(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु ।
उत्तर- (ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण।

प्रश्न (v) हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?
(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण
(ख) अपसारी सीमा
(ग) रूपान्तरण सीमा
(घ) महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण
उत्तर- (घ) महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने किन बलों का उल्लेख किया?
उत्तर- वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के लिए निम्नलिखित दो बलों का उल्लेख किया है

  1. पोलर या ध्रुवीय फ्लीइंग बल (Polar feeling force) तथा
  2. ज्वारीय बल (Tidal force)।

ध्रुवीय फ्लीइंग बल पृथ्वी के घूर्णन से सम्बन्धित है। वास्तव में पृथ्वी की आकृति एक सम्पूर्ण गोले जैसी नहीं है, वरन् यह भूमध्य रेखा पर उभरी हुई है। यह उभार पृथ्वी के घूर्णन के कारण है। दूसरा ज्वारीय बल सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है, जिससे महासागर में ज्वार पैदा होता है। वेगनर का मानना था कि करोड़ों वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली होकर विस्थापन के लिए सक्षम हुए।

प्रश्न (ii) मैंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?
उत्तर- 1930 के दशक में आर्थर होम्स ने मैंटल भाग में संवहन धाराओं के प्रभाव की सम्भावना व्यक्त की थी। संवहन धाराएँ रेडियोएक्टिव तत्त्वों से ताप भिन्नता के कारण मैंटल में उत्पन्न होती हैं। ये धाराएँ रेडियोएक्टिव तत्त्वों की उपलब्धता के कारण ही मैंटल में बनी रहती हैं तथा इन्हीं तत्त्वों से संवहनीय धाराएँ आरम्भ होकर चक्रीय रूप में प्रवाहित होती रहती हैं।

प्रश्न (iii) प्लेट की रूपान्तर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमा में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर- प्लेट की रूपान्तर सीमा में पर्पटी का न तो निर्माण होता है और न ही विनाश। जबकि अभिसरण सीमा में पर्पटी का विनाश होता है तथा अपसारी सीमा में पर्पटी का निर्माण होता है। अत: रूपान्तर, अभिसरण और अपसारी सीमा में मुख्य अन्तर पर्पटी के निर्माण, विनाश और दिशा संचालन के कारण है।

प्रश्न (iv) दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?
उत्तर- आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय स्थलखण्ड सुदूर दक्षिण में 50° दक्षिणी अक्षांश पर स्थित था। भारतीय उपमहाद्वीप व यूरेशियन प्लेट को टैथीज सागर अलग करता था और तिब्बती खण्ड एशियाई खण्ड के करीब था। इण्डियन प्लेट के एशियाई प्लेट की तरफ प्रवाह के दौरान एक प्रमुख घटना लावा प्रवाह के कारण दक्कन टैप का निर्माण हुआ। अत: भारतीय स्थलखण्ड दक्कन टैप निर्माण के समय भूमध्य रेखा के निकट स्थित था।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
(i) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिए गए प्रमाणों का वर्णन करें।
उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के तहत वेगनर ने कहा है कि 20 करोड़ वर्ष पहले सभी महाद्वीप आज की तरह अलग-अलग नहीं थे, बल्कि पैंजिया के ही भाग थे। इसको प्रमाणित करने के लिए वेगनर ने कई साक्ष्य दिए हैं
(क) भूवैज्ञानिक क्रियाओं के फलस्वरूप 47 करोड़ से 35 करोड़ वर्ष पुरानी पर्वत पट्टी का निर्माण एक अविच्छिन्न कटिबंध के रूप में हुआ था। ये पर्वत अब अटलांटिक महासागर द्वारा पृथक कर दिए गए हैं।
(ख) कुछ जीवाश्म भी यह बताते हैं कि समस्त महाद्वीप कभी परस्पर जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, ग्लोसोप्टेरिस नामक पौधे तथा मेसोसौरस एवं लिस्ट्रोसौरस नामक जंतुओं के जीवाश्म गोंडवानालैंड के सभी महाद्वीपों में मिलते हैं जबकि आज ये महाद्वीप एक-दूसरे से काफी दूर हैं।
(ग) अफ्रीका के घाना तट पर सोने का निक्षेप पाया जाता है जबकि 5000 कि०मी० चौड़े महासागर के पार दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील के तटवर्ती भाग में भी सोने का निक्षेप पाया जाता है।
(घ) पर्मोकार्बनी काल में मोटे हिमानी निक्षेप उरुग्वे, ब्राजील, अफ्रीका, दक्षिणी भारत, दक्षिणी आस्ट्रेलिया तथा तस्मानिया के धरातल पर दिखाई देते थे। इन अवसादों की प्रकृति में एकरूपता यह सिद्ध करती है कि भूवैज्ञानिक अतीत काल में समस्त महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े हुए थे तथा यहाँ एक जैसी जलवायविक दशाएँ थीं।
(ङ) महाद्वीपों का विस्थापन अभी भी जारी है। अटलांटिक महासागर की चौड़ाई प्रतिवर्ष कई सेंटीमीटर के हिसाब से बढ़ रही है जबकि प्रशांत महासागर छोटा हो रहा है। लाल सागर भूपर्पटी में एक दरार का हिस्सा है जो भविष्य में करोड़ों वर्ष पश्चात एक नए महासागर की रचना करेगा। दक्षिणी अटलांटिक महासागर के चौड़ा होने से अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिकी एक-दूसरे से अलग हो गए हैं।

(ii) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत में मूलभूत अंतर बताइए।
उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत की आधारभूत संरचना यह थी कि सभी महाद्वीप पहले एक ही भूखंड के भागे थे, जिसे पैंजिया नाम दिया गया था। ये भूखंड एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था। वेगनर के अनुसार, लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले पैंजिया का विभाजन आरंभ हुआ। पैंजिया पहले दो बड़े भूखंड लारेशिया और गोंडवानालैंड के रूप में विभक्त हुआ। इसके बाद लारेशिया व गोंडवानालैंड धीरे-धीरे अनेक छोटे-छोटे हिस्सों में बँट गए जो आज के वर्तमान महाद्वीप के रूप में हैं। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी के स्थलमंडल को सात मुख्य प्लेटों व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त किया जाता है। नवीन वलित पर्वतश्रेणियाँ, खाइयाँ और भ्रंश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं। महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट गतिमान है। वेगनर की संकल्पना कि केवल महाद्वीप ही गतिमान है, सही नहीं है।

(iii) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरांत की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर व महाद्वीप वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?
उत्तर- महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के द्वारा वेगनर ने ज जानकारी प्रस्तुत की थी, वह पुराने तर्क पर आधारित थी। वर्तमान में जानकारी के जो स्रोत हैं, वे वेगनर के समय में उपलब्ध नहीं थे। चट्टानों के चुंबकीय अध्ययन और महासागरीय तल के मानचित्रण ने विशेष रूप से निम्न तथ्यों को उजागर किया
(क) यह देखा गया कि मध्य-महासागरीय कटकों के साथ-साथ ज्वालामुखी उद्गार सामान्य क्रिया है और ये उद्गार इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में लावा निकालते हैं।
(ख) महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरफ समान दूरी पर पाई जाने वाली चट्टानों के निर्माण का समय, संरचना, संघटन और चुंबकीय गुणों में समानता पाई जाती है। महासागरीय कटकों के समीप की चट्टानों में सामान्य चुंबकत्व ध्रुवण पाई जाती है तथा ये चट्टानें नवीनतम हैं। कटकों के शीर्ष से दूर चट्टानों की आयु भी अधिक है।
(ग) महासागरीय पर्पटी की चट्टानें महाद्वीपीय पर्पटी की चट्टानों की अपेक्षा अधिक नई हैं। महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कहीं भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं। महाद्वीपीय पर्पटी के भूकंप उद्गम केंद्र अधिक गहराई पर हैं जबकि मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र के भूकंप उद्गम केंद्र कम गहराई पर विद्यमान हैं।
(घ) गहरी खाइयों में भूकंप उद्गम केंद्र अधिक गहराई पर हैं जबकि मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र के भूकंप उद्गम केंद्र कम गहराई पर विद्यमान हैं।

सागरीय अधःस्तल परिकल्पना

चुम्बकीय गुणों के आधार पर हैस ने 1961 में एक परिकल्पना प्रस्तुत की जिसे ‘सागरीय अध:स्तल विस्तार के नाम से जाना जाता है। हैस के तर्कानुसार महासागरीय कटकों के शीर्ष पर लगातार ज्वालामुखी उद्भेदन से महासागरीय पर्पटी में विभेदन हुआ और नया लावा इस दरार को भरकर महासागरीय पर्पटी के दोनों तरफ धकेल रहा है। इस प्रकार महासागरीय अध:स्तल का विस्तार हो रही है। इसके साथ ही दूसरे महासागर के न सिकुड़ने पर हैस ने महासागरीय पर्पटी के क्षेपण की बात कही है। अत: एक ओर महासागरों में पर्पटी का निर्माण होता है तो दूसरी तरफ महासागरीय गर्गों में इसका विनाश भी होता है। (देखिए चित्र 4.1)।

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प्लेट विवर्तनिक संकल्पना

हैस की परिकल्पना के उपरान्त विद्वानों की महासागरों वे महाद्वीपों के वितरण के अध्ययन में फिर से रुचि उत्पन्न हुई। सन् 1967 में मैकेन्जी, पारकर और मोरगन ने स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर अध्ययन प्रस्तुत किया, जिसे प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कहा गया। एक विवर्तनिक प्लेट ठोस चट्टान का विशाल व अनियमित आकार का खण्ड है, जो महाद्वीप व महासागर स्थलमण्डलों के संयोग से बना है (चित्र 4.2)। ये प्लेटें दुर्बलतामण्डल पर दृढ़ इकाई के रूप में संवहन धाराओं के प्रभाव से चलायमान हैं। इन प्लेटों द्वारा ही महाद्वीप व महासागरों का वितरण, निर्माण तथा अन्य भूगर्भीय घटनाएँ निर्धारित होती हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन के लिए कितने बलों का उल्लेख किया है?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर- (ख) दो।

प्रश्न 2. आर्थर होम्स ने मैंटल भाग में संवहन धाराओं के प्रभाव की सम्भावना व्यक्त की थी
(क) 1910 के दशक में
(ख) 1920 के दशक में
(ग) 1930 के दशक में
(घ) 1940 के दशक में
उत्तर- (ग) 1930 के दशक में।

प्रश्न 3. मैकेन्जी और पारकर ने प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त कब प्रतिपादित किया?
(क) 1966 में
(ख) 1967 में
(ग) 1968 में
(घ) 1969 में
उत्तर- (ख)1967 में।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. पैजिया क्या है?
उत्तर- 150 मिलियन वर्ष पूर्व एक विशाल महाद्वीप जिसमें वर्तमान सभी महाद्वीप एक साथ जुड़े हुए थे, पैंजिया कहलाता था। वेगनर ने अपने ‘महाद्वीप विस्थापन सिद्धान्त’ के अन्तर्गत इसी पैंजिया के विखण्डन से वर्तमान महाद्वीपों की उत्पत्ति और वितरण की व्याख्या की है।

प्रश्न 2. प्लेट के संचरण के लिए कौन-सा बल कार्य करता है?
उत्तर- संवहन धाराएँ तथा तापीय संवहन की प्रक्रिया प्लेट को खिसकाने में बल का कार्य करती हैं। गर्म धाराएँ जैसे ही धरातल के पास पहुँचती हैं, ठण्डी हो जाती हैं। उसी समय ठण्डी धाराएँ नीचे जाती हैं। यही संवाहनिक संचरण धरातलीय प्लेट को खिसकाता है।

प्रश्न 3. पैंथालासा क्या हैं?
उत्तर- पैंथालासा का सामान्य अर्थ जल-क्षेत्र है। वैज्ञानिकों का मत है कि पूर्वकाल में सभी महासागर एक सम्बद्ध जल-क्षेत्र था पैंथालासा कहा जाता था। पैंजिया स्थल क्षेत्र इसी जल-क्षेत्र के लगभग मध्य में स्थित था जिसके विखण्डन से महाद्वीपों का निर्माण हुआ है।

प्रश्न 4. पैजिया का प्रारम्भिक विखण्डन कब व कितने खण्डों में हुआ था?
उत्तर- वेगनर के अनुसार लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व पैंजिया का विभाजन आरम्भ हुआ। इस समय पैंजिया के निम्नलिखित दो खण्ड हुए–

  • लारेशिया जिससे उत्तरी महाद्वीप बने तथा
  • गोंडवानालैण्ड जिसमें दक्षिण महाद्वीप सम्मिलित थे।

प्रश्न 5. पोलर वेण्डरिंग क्या है?
उत्तर- भूगर्भिक परिवर्तन की प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत ध्रुवों (Poles) की स्थिति बदल गई, पोलर वेण्डरिंग कहलाता है।

प्रश्न 6. कौन-सी प्लेट महासागरीय धरातल से बनी है?
उत्तर- प्रशान्त प्लेट महासागरीय धरातल से बनी है।

प्रश्न 7. रूपान्तरण सीमा क्या है?
उत्तर- प्लेट संचलन की वह सीमा जहाँ न तो कोई नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पर्पटी का विनाश होता है, रूपान्तरण सीमा कहलाती है।

प्रश्न 8. अभिसरण के प्रकार बताइए।
उत्तर- अभिसरण के निम्नलिखित तीन प्रकार हो सकते हैं

  • महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के मध्य अभिसरण।
  • महासागरीय प्लेटों के मध्य अभिसरण।
  • दो महाद्वीपीय प्लेटों के मध्य अभिसरण।

प्रश्न 9. अपसारी सीमा क्या है? इसका एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर- जब दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है तो उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। अपसारी सीमा का सबसे अच्छा उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है।

प्रश्न 10. प्रविष्ठन (Subduction) क्षेत्र क्या होता है?
उत्तर- अभिसरण सीमा पर जहाँ भू-प्लेट धंसती है, उस क्षेत्र को प्रविष्ठन क्षेत्र कहते हैं। हिमालय पर्वतीय क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारतीय प्लेट की अवस्थिति एवं विस्तार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- भारतीय प्लेट में प्रायद्वीप भारत और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप सम्मिलित हैं। इसकी उत्तरी सीमा हिमालय पर्वत श्रेणियों में स्थित प्रविष्ठन क्षेत्र द्वारा निर्धारित होती है, जो पूर्व दिशा में म्यांमार के राकिन्योमा पर्वत से होते हुए एक चाप के रूप में जावा खाई तक विस्तृत है। भारतीय प्लेट की पूर्वी सीमा विस्तारित तल के रूप में तथा पश्चिमी सीमा पाकिस्तान की किरथर श्रेणियों का अनुसरण करती हुई मकरान तट के साथ-साथ लाल सागर द्रोणी तक स्थित है। यह प्लेट महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण के रूप में अर्थात् दो महाद्वीपों से प्लेटों की सीमा निश्चित होती है। वर्तमान में इस प्लेट की अवस्थिति का विश्लेषण नागपुर क्षेत्र में पाई जाने वाली चट्टानों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 2. विवर्तनिक प्लेटों को संचालित करने वाले कौन-से बल हैं, वर्णन कीजिए।
उत्तर- जिस समय वेगनर ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त प्रस्तुत किया था, उस समय यह माना जाता था कि पृथ्वी एक ठोस गतिरहित पिण्ड है। किन्तु सागरीय अध:स्तल विस्तार और प्लेट विवर्तनिक दोनों सिद्धान्तों से यह सिद्ध हो गया है कि पृथ्वी का धरातल एवं भूगर्भ दोनों ही स्थिर न होकर गतिमान हैं। प्लेट चलायमान है, आज यह निर्विवाद तथ्य है। ऐसा माना जाता है कि दृढ़ प्लेट के नीचे चलायमान चट्टानें वृत्ताकार रूप में चल रही हैं। उष्ण पदार्थ धरातल पर पहुँचता है, फैलता है और धीरे-धीरे ठण्डा होता है, फिर गहराई में जाकर नष्ट हो जाता है। यही चक्र बारम्बार दोहराया जाता है। वैज्ञानिक इसे संवहन प्रवाह (Convection Flow) कहते हैं। इस विचार को सर्वप्रथम 1930 में होम्स ने प्रतिपादित किया था। इनके आधार पर वर्तमान में यही माना जाता है कि मैंटल में स्थित रेडियोधर्मी तत्त्वों के क्षय से उत्पन्न बल ही संवहनीय धाराओं के रूप में प्लेट को संचलित करने के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 3. प्लेट प्रवाह दरें कैसे निर्धारित होती हैं? प्लेट प्रवाह की न्यूनतम एवं वृहदतम् दरें बताइए।
उत्तर- सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकीय क्षेत्र पट्टियाँ जो मध्य महासागरीय कटक के समानान्तर हैं, प्लेट प्रवाह की दर को समझने में वैज्ञानिकों के लिए सहायक सिद्ध हुई हैं। प्लेट प्रवाह की दरों में विभिन्नताएँ मिलती हैं। स्थलमण्डलीय प्लेटों में आर्कटिक कटक की प्रवाह दर सबसे कम (2.5 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष से भी कम) है, जबकि पूर्वी द्वीप के निकट पूर्वी प्रशान्त महासागरीय उभार, जो चिली से 3400 किमी पश्चिम की ओर दक्षिण प्रशान्त महासागर में है, इसकी प्रवाह दर सर्वाधिक (5 सेमी प्रतिवर्ष से भी अधिक) है।

प्रश्न 4, पृथ्वी के स्थलमण्डल की सात मुख्य प्लेटों के नाम लिखिए।
उत्तर- प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी का स्थलमण्डल सात मुख्य प्लेटों व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त है। सात मुख्य प्लेटों के नाम निम्नलिखित हैं(1) अंटार्कटिक प्लेट (जिसमें अंटार्कटिक से घिरा महासागर भी सम्मिलित है), (2) उत्तरी अमेरिकी प्लेट, (3) दक्षिणी अमेरिकी प्लेट, (4) प्रशान्त महासागरीय प्लेट, (5) इंडो-ऑस्ट्रेलियन-न्यूजीलैण्ड प्लेट, (6) अफ्रीकी प्लेट, (7) यूरेशियाई प्लेट (जिसमें पूर्वी अटलांटिक महासागरीय तल भी सम्मिलित है)।

प्रश्न 5. स्थलमण्डल की महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटों के नाम लिखिए तथा इनकी स्थिति बताइए।
उत्तर- स्थलमण्डल की महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटों के नाम निम्नलिखित हैं

  1. कोकोस प्लेट- यह प्लेट मध्यवर्ती अमेरिका और प्रशान्त महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  2.  नफ्रका प्लेट- यह दक्षिण अमेरिका व प्रशान्त महासागरीय प्लेट के मध्य है।
  3. अरेबियन प्लेट- इसमें अधिकतर अरब प्रायद्वीप का भूभाग स्थित है।
  4. फिलिपीन प्लेट- यह एशिया महाद्वीप और प्रशान्त महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  5. कैरोलिन प्लेट- यह न्यूगिनी के उत्तर में फिलिपियन व इण्डियन प्लेट के बीच स्थित है।
  6. फ्यूजी प्लेट- यह ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में स्थित है।

प्रश्न 6. संवहन धारा सिद्धान्त क्या है?
उत्तर- पृथ्वी के मैंटल में स्थित रेडियोएक्टिव तत्त्वों में ताप-भिन्नता के कारण संवहन धाराएँ प्रवाहित होती रहती हैं। 1930 के दशक में आर्थर होम्स ने सबसे पहले इन संवहन धाराओं की उपस्थिति तथा इनके चक्रीय प्रवाह की सम्भावनाएँ व्यक्त की थीं। होम्स ने ही महाद्वीप व महासागरों के वितरण और पर्वतों के निर्माण के सम्बन्ध में संवहन धारा सिद्धान्त को प्रतिपादन किया था। यह सिद्धान्त पर्वतों, महाद्वीप तथा महासागरों की उत्पत्ति एवं इनके वितरण की वैज्ञानिक व्याख्या करता है तथा अपने से पूर्व के सभी सिद्धान्तों से अधिक मान्य है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का वर्णन कीजिए तथा प्लेटों की प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।’
उत्तर- प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त
महाद्वीपीय विस्थापन एवं सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् महाद्वीप, महासागर एवं पर्वतों का निर्माण तथा वितरण सम्बन्धी समस्याओं के समाधान हेतु सन् 1967 में मैकेन्जी (Mekenzie), पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त को प्रस्तुत किया है। यह सिद्धान्त भूगर्भ एवं भूपटल से सम्बन्धित विभिन्न जटिल प्रश्नों; जैसे—भूकम्प आने का क्या कारण है, ज्वालामुखी विस्फोट क्यों होते हैं महाद्वीप एवं महासागरों की उत्पत्ति कैसे हुई, इनके वितरण का क्या आधार है? आदि का समुचित समाधान करने में अभी तक की सबसे अधिक मान्य एवं वैज्ञानिक व्याख्या है।

एक विवर्तनिक प्लेट (जिसे स्थलमण्डल प्लेट भी कहा जाता है) ठोस चट्टान का विशाल व अनियमित आकार का खण्ड है। अतएव स्थलमण्डल अनेक प्लेटों में विभक्त है। प्रत्येक प्लेट स्वतन्त्र रूप से दुर्बलतामण्डल से संचलन करती रहती है महाद्वीप एवं महासागरों की सतह को संचलने इन प्लेटों के माध्यम से ही होता है। स्थलमण्डल की ये 7 बड़ी एवं छोटी कठोर प्लेटें हैं (चित्र 4.2)। इन भू-प्लूटों पर स्थलाकृतियों का निर्माण, भ्रंशन तथा विस्थापन क्रियाओं द्वारा होता है जिन्हें विवर्तनिकी कहते हैं।
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प्लेट विवर्तनिकी प्रक्रिया

संवहनीय धाराओं के आधार पर भू-प्लेटों की प्रक्रिया, विस्तार एवं क्षेत्र निम्नलिखित प्रकार से सम्पन्न होता है–
1. अपसारी क्षेत्र (प्लेट)-जब दो प्लेट एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है, उन्हें अपसारी प्लेट कहते हैं। वह स्थान जहाँ से प्लेट एक-दूसरे से दूर हटती हैं, प्रसारी स्थान (Spreading Site) या अपसारी क्षेत्र कहलाता है।

2. अभिसारी क्षेत्र (प्लेट)-जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है और जहाँ भूपर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण क्षेत्र या सीमा कहलाता है। इस प्रक्रिया में जब दो भिन्न दिशाओं में प्लेटें एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाती हैं तो संपीडन के कारण पर्वत, खाइयाँ आदि स्थल-रूप निर्मित होते हैं।

3. रूपान्तर क्षेत्र (प्लेट)-इन किनारों पर न तो नये पदार्थ का निर्माण होता है और न विनाश होता | है। ऐसी स्थिति महासागरीय कटक के पास होती है।

प्रश्न 2. वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- महाद्वीपीय प्रवाह (विस्थापन) सिद्धान्त
महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त जर्मन मौसमविद् अल्फ्रेड वेगनर (Alfred wegner) द्वारा सन् 1912 में प्रस्तावित किया था। यह सिद्धान्त महाद्वीप एवं महासागरों के वितरण से सम्बन्धित है। इस सिद्धान्त की आधारभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप पूर्वकाल में परस्पर जुड़े हुए थे जिसे पैंजिया कहा जाता है। इसके चारों तरफ महासागर था, जिसे पैन्थालासा कहा जाता है पैंजिया सियाल निर्मित था जो सघन सीमा पर तैर रहा था। पैंजिया के मध्य में टैथिज उथला सागर था। इस सागर को उत्तरी भाग अंगारालैण्ड तथा दक्षिणी भाग गोंडवानालैण्ड था। अंगारालैण्ड में उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया संलग्न थे। गोंडवानालैण्ड में दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका प्रायद्वीपीय भारत तथा अंटार्कटिका आदि परस्पर संलंग्न थे। कार्बोनिफेरस युग के अन्त में पैंजिया टूट गया। पैंजिया के विखण्डित भाग उत्तर में भूमध्यरेखा तथा पश्चिमी की ओर विस्थापित हुए। भूमध्यरेखा की ओर विस्थापन का कारण वेगनर गुरुत्वाकर्षण एवं प्लवनशीलता बल को तथा पश्चिम की ओर विस्थापकों का कारण ज्वारीय बल को मानते हैं। वेगनर इसी विस्थापन को महाद्वीप एवं महासागर के वर्तमान क्रम के लिए उत्तरदायी मानते हैं।

प्रश्न 3. वेगनर के महाद्वीपीय सिद्धान्त एवं प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर- वास्तव में वेगनर ने अपने सिद्धान्त में युग तथा दिशा को सही ढंग से समझाने का प्रयास नहीं किया है। धरातल पर कई प्रकार के परिवर्तन हुए हैं। पृथ्वी का भू-वैज्ञानिक इतिहास इसका साक्षी है। महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त यद्यपि विभिन्न भूगर्भिक समस्याओं की विवेचना करता है, फलस्वरूप इसे एक अच्छा सिद्धान्त तो माना जाता है, परन्तु इसे सत्य सिद्धान्त नहीं कहा जा सकता है। वेगनर के सिद्धान्त के अनुसार केवल महाद्वीप गतिमान है, सही नहीं है। वास्तव में महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट गतिमान है। यह निर्विवाद तथ्य है कि भूवैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेट गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी। चित्र 4.3 में विभिन्न कालों में महाद्वीपीय भागों की स्थिति को दर्शाया गया है। पुराचुम्बकीय आँकड़ों के केवल महाद्वीप गतिमान है, सही नहीं है। वास्तव में महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट गतिमान है। यह निर्विवाद तथ्य है कि भूवैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेट गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी। चित्र 4.3 में विभिन्न कालों में महाद्वीपीय भागों की स्थिति को दर्शाया गया है। पुराचुम्बकीय आँकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने विभिन्न भूकालों में प्रत्येक महाद्वीपीय खण्ड की अवस्थिति निर्धारित की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि महाद्वीपीय पिण्ड जो प्लेट के ऊपर स्थित है भू-वैज्ञानिक कालपर्यन्त चलायमान थे और पैंजिया अलग-अलग महाद्वीपीय खण्डों के अभिसरण से बना था, जो कभी एक या किसी दूसरी प्लेट के हिस्से थे। अत: महासागरों एवं महाद्वीपों की उत्पत्ति एवं वर्तमान क्रम महाद्वपीय विस्थापन से नहीं बल्कि प्लेट विवर्तन प्रक्रिया के परिणामस्वरूप है।
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प्रश्न 4. महासागरीय अधःस्तल की बनावट का वर्णन कीजिए।
उत्तर- महासागरीय अध:स्तल की बनावट महाद्वीप एवं महासागरों के वितरण को समझने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। गहराई एवं उच्चावच के आधार पर महासागरीय तल को (चित्र 4.4) निम्नलिखित तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है–

1. महाद्वीपीय सीमा-महाद्वीपीय सीमा महाद्वीपीय किनारों और गहरे समुद्री बेसिन के बीच का भाग है। इसके अन्तर्गत महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, महाद्वीपीय उभार और गहरी महासागरीय खाइयाँ आदि सम्मिलित हैं। महासागरों व महाद्वीपों के वितरण को समझने में गहरी महासागरीय खाइयों का विशेष महत्त्व है।
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2. वितलीय मैदान-महाद्वीपीय तट एवं मध्य महासागरीय कटकों के बीच स्थित लगभग समतल क्षेत्र को वितलीय मैदान कहते हैं। इनका निर्माण महाद्वीपों से बहाकर लाए गए अवसादों द्वारा महासागरों के तटों से दूर निक्षेपण से होता है।

3. मध्य महासागरीय कटक-मध्य महासागरीय कटक परस्पर संलग्न पर्वतों की एक श्रृंखला है। यह महासागरीय जल में डूबी हुई पृथ्वी के धरातल पर पाई जाने वाली सम्भवतः सबसे लम्बी पर्वत श्रृंखला मानी जाती है। यह वास्तव में सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र ही नहीं बल्कि विवर्तनिकी का मुख्य क्षेत्र है जो महाद्वीप एवं महासागरों के निर्माण एवं वितरण में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

प्रश्न 5. भारतीय प्लेट संचलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारतीय प्लेट का संचलन पूर्व में भारत एक वृहत् द्वीप था, जो ऑस्ट्रेलियाई तट से दूर एक विशाल महासागर में स्थित थी। लगभग 22.5 करोड़ वर्ष पहले तक टेथीस सागर इसे एशिया महाद्वीप से अलग करता था। ऐसा माना जाता है। कि लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले, जब पैंजिया विभक्त हुआ तब भारत ने उत्तर दिशा की ओर खिसकना आरम्भ किया। लगभग 4 से 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारत एशिया से टकराया परिणामस्वरूप हिमालय पर्वत का उत्थान हुआ। 7.1 करोड़ वर्ष पूर्व भारत की स्थिति मानचित्र 4.5 में दर्शाई गई है। इस चित्र में भारतीय उपमहाद्वीप व यूरेशियन प्लेट की स्थिति भी दर्शाई गई है।
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आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप सुदूर दक्षिण में 50° दक्षिणी अक्षांश पर स्थित था। इन दो प्रमुख प्लेटों को टेथीस सागर अलग करता था। और तिब्बतीय खण्ड, एशियाई स्थलखण्ड के निकट था। भारतीय प्लेट के एशियाई प्लेट की ओर प्रवाह के समय दक्षिण में लावा प्रवाह से दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ, जिसे एक विशेष घटना माना जाता है। यह घटना लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व से आरम्भ होकर लम्बे समय तक जारी रही। भारतीय प्लेट प्रवाह के सम्बन्ध में उल्लेखनीय बिन्दु, यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप तब भी भूमध्य रेखा के निकट था और वर्तमान में भी भूमध्य रेखा के निकट हैं। (देखिए चित्र 4.5)।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health (मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health (मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 9
Chapter Name Mental Hygiene and Mental Health
(मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य)
Number of Questions Solved 47
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 9 Mental Hygiene and Mental Health (मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान तथा मानसिक स्वास्थ्य)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान (Mental Hygiene) से आप क्या समझते हैं? मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के महत्व को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भौतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों से समायोजन स्थापित करने की दृष्टि से मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का विचार अत्यन्त महत्त्व रखता है। मानसिक स्वास्थ्य तथा सन्तुलन बनाये रखने के लिए एक विज्ञान की उत्पत्ति हुई, जिसका नाम ‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान (Mental Hygiene) है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के जन्मदाता डब्लयू० बीयर नामक मनोवैज्ञानिक हैं, जिन्होंने व्यक्तित्व सम्बन्धी विकारों के निवारण तथा उनके दुष्प्रभावों से बचने के लिए कुछ नियमों का प्रतिपादन किया। बीयर के सत्प्रयासों से 1908 ई० में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति की स्थापना हुई जिसके बाद इसी सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय परिषद् का निर्माण हुआ। आगे चलकर एक आन्दोलन के रूप में यह पूरे यूरोप में फैल गया 1911 ई० में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर 1930 ई० में इसका प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन वाशिंगटन में हुआ। शनैः-शनै: मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का प्रचार विश्व के सभी प्रगतिशील देशों में हो गया।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ
(Meaning of Mental Hygiene)

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित एक विज्ञान है। यह विज्ञान व्यक्तित्व के सन्तुलित विकास का अध्ययन करता है, क्योंकि सन्तुलित व्यक्तित्व वाला मनुष्य ही स्वयं को सम-विषम परिस्थितियों के अनुरूप समायोजित करके मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन प्रकार के कार्यों को सम्मिलित किया जाता है –

  1. मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा – व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने से सम्बन्धित सभी सामान्य कार्य इस पक्ष के अन्तर्गत सम्मिलित हैं।
  2. मानसिक रोगों की रोकथाम – मानसिक रोगों से व्यक्ति को बचाना ताकि वे दशाएँ या परिस्थितियाँ उत्पन्न न हों जो मानसिक रोग पैदा कर सकती हैं।
  3. मानसिक रोगों का प्रारम्भिक उपचार – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति के प्रारम्भिक मानसिक रोगों का उपचार किया जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उपर्युक्त तीनों कार्यों को सम्पन्न करता है। इन कार्यों को दो पहलुओं के रूप में अभिव्यक्त कर सकते हैं –

(i) विधेयात्मक पहलू (Positive Aspect) – इसमें उन नियमों, सिद्धान्तों तथा तरीकों की जाँच व खोज की जाती है जिनमें व्यक्ति का सन्तुलन स्थापित हो सके। वह अपने को वातावरण की परिस्थितियों से अधिकाधिक समायोजित कर सके तथा अपने मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सके।

(ii) निषेधात्मक पहलू (Negative Aspect) – यह व्यक्ति को मानसिक अस्वस्थता से बचाता है, जिसके परिणामतः उसमें संघर्ष, मानसिक विकार तथा समायोजन के दोष उत्पन्न नहीं हो पाते। दूसरे शब्दों में, यह मानसिक रोगों की रोकथाम तथा प्रारम्भिक उपचार से सम्बन्धित पहलू है।

इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान (Mental Hygiene) वह विज्ञान है जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, उसे मानसिक रोगों से मुक्त रखता है तथा यदि व्यक्ति मानसिक विकार/रोग अथवा समायोजन के दोषों से ग्रस्त हो जाता है तो उसके कारणों का निदान करके समुचित उपचार की व्यवस्था का प्रयास करता है।

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की परिभाषा
(Definition of Mental Hygiene)

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की प्रमुख परिभाषाएँ अग्रलिखित हैं –

  1. हैडफील्ड के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध मानसिक स्वास्थ्य बनाये | रखने तथा मानसिक अस्वस्थता रोकने से हैं।”
  2. ड्रेवर के कथनानुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है-मानसिक स्वास्थ्य के नियमों की खोज करना और उसको सुरक्षित रखने के उपाय करना
  3. भाटिया के शब्दों में, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान मानसिक रोगों से बचने और मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने का विज्ञान और कला है। यह कुसमायोजनों के सुधारों से सम्बन्धित है। इस कार्य में यह आवश्यक रूप से कारणों के निर्धारण का कार्य भी करता है।”

मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व या उपयोगिता
(Importance or Utility of Mental Hygiene)

मानसिक स्वास्थ्य का एक लक्ष्य है जिसकी पूर्ति के लिए मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता लेनी पड़ती है। यह विज्ञान मानसिक रोगियों की समस्याओं का समाधान करने तथा उनके उपचार करने की दशा में एक वैज्ञानिक प्रयास है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की आधुनिक दृष्टिकोण सहानुभूति, सहृदयतापूर्ण और सुधारवादी है। पेरिस के प्रसिद्ध कारागार चिकित्सक पिने (Phillipe Pinel) ने सर्वप्रथम इन रोगियों को सुधारने के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार तथा नैतिक उपचार का मार्ग सुझाया। उसने मानसिक रोगियों की जंजीरें खुलवा दी और उन्हें घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता प्रदान की है। इसके परिणामस्वरूप बहुत-से रोगी अधिक सहयोगी व आज्ञाकारी बन गये और दूसरों के बेहतर उपचार को मार्ग प्रशस्त हुआ। इसका समस्त श्रेय मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की विचारधारा को ही जाता है। वर्तमान समय में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व निम्नलिखित है –

(1) सन्तुलित व्यक्तित्व (Balanced Personality) – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान हमारे व्यक्तित्व के विभिन्नु पक्षों-शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा सांवेगिक आदि को सन्तुलित रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान करता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता से मानसिक संघर्ष कम होता है तथा भावना ग्रन्थियाँ नहीं पनपने पातीं।

(2) सुसमायोजित जीवन (Well-adjusted Life) – मनुष्य का सन्तुलित व्यक्तित्व उसे सन्तुलित जीवन जीने में सहायता देता है। इससे व्यक्ति को सम-विषम परिस्थितियों का अनुकूलन स्थापित करने में सहायता मिलती है। सन्तुलित जीवन के अवसर मिलने का अर्थ है–सुखी और सुसमायोजित जीवन-यापन का सौभाग्य प्राप्त होना।।

(3) स्वस्थ सामाजिक जीवन (Healthy Social Life) – व्यक्ति समाज की इकाई है और व्यक्तियों के समूह से समाज बनता है। समाज के सभी व्यक्तियों का सन्तुलित व्यक्तित्व तथा समायोजित जीवन सामाजिक जीवन को साम्य एवं स्वस्थ बनाता है। ऐसे सन्तुलित समाज में सामाजिक विषमता और संघर्ष नहीं होंगे। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान, सामाजिक जीवन को स्वस्थ और सुन्दर बनाता है।

(4) स्वस्थ पारिवारिक वातावरण (Healthy Environment of the Family) – स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण से पारिवारिक सन्तुलन, सुसमायोजन, शान्ति, व्यवस्था और सुख में वृद्धि होती है। परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम और सौहार्दपूर्ण व्यवहार से हर प्रकार के आनन्द तथा स्वस्थ वातावरण का सृजन होता है।

(5) शिशुओं का उचित पालन-पोषण (Well_Rearing of the Infants) – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के माध्यम से शिशुओं के माता-पिता एवं परिवारजन भली प्रकार यह समझ सकते हैं। कि नवजात शिशुओं की देखभाल किस प्रकार की जाए। इससे शिशुओं की उचित सेवा सुश्रूषा हो सकेगी तथा उनका विकास भी पूर्ण रूप से हो सकेगा। यह पारिवारिक सन्तुलन की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

(6) शैक्षिक प्रगति (Educational Progress) – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के नियम और सिद्धान्त बालकों के स्वस्थ संवेगात्मक विकास में सहायक होते हैं। भावना ग्रन्थियों तथा मानसिक संघर्ष से मुक्त रहकर वे पास-पड़ोस तथा विद्यालय से समायोजन स्थापित कर सकते हैं। शिक्षा के मार्य में बाधक मानसिक रोग ग्रन्थियाँ हटने से शैक्षिक प्रगति सम्भव होती है।

(7) उपचारात्मक महत्त्व (Treatmentative Importance) – व्यावसायिक स्वास्थ्य विज्ञान मात्र स्वस्थ रहने और समायोजित जीवन व्यतीत करने सम्बन्धी नियम एवं सिद्धान्त ही निर्धारित नहीं करता अपितु उपचार लेकर मानव-समाज की सेवा में उपस्थित होता है। रोकथाम और बचाव के साधन प्रयोग में लाने पर भी यदि कोई व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है तो मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उसके प्रारम्भिक उपचार की व्यवस्था करता है।

(8) व्यावसायिक सफलता (Vocational Progress) – व्यावसायिक सफलता के लिए व्यक्ति का जीवन सन्तुलित एवं समायोजित होना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सन्तुलित व्यक्तित्व का सृजन करके व्यक्ति की व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि करता है।

(9) राष्ट्रीयता की भावना एवं सांवेगिक एकता (Feeling of Nationality and Emotional Integration) – विषमता और विघटनकारी प्रवृत्तियों के प्रभाव से वर्तमान परिस्थितियों में हमारा राष्ट्र सम्प्रदायवाद, भाषावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि दूषित विचारधाराओं से जूझ रहा है। इससे बचाव के लिए देश के नागरिकों में संवेगात्मक एकता का संचार करना होगा। यह कार्य मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सक्रियता के अभाव में नहीं हो सकता।

(10) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सहयोग (International Peace and Cooperation) – अन्तर्राष्ट्रीय (विश्व) शान्ति के लिए आवश्यक है कि दुनिया के सभी देशों के नेतागण, चिन्तक, विचारक, समाज-सुधारक तथा नागरिक सन्तुलित और समायोजित व्यक्तित्व वाले हों। यदि देश के कर्णधारों का मानसिक स्वास्थ्य खराब होगा तो विभिन्न देशों के बीच तनाव और संघर्ष निश्चित रूप से होगा। प्रायः एक ही व्यक्ति को असन्तुलित मस्तिष्क समूची मानव-संसृति को युद्ध एवं विनाश की अग्नि में झोंक देगा। उस असन्तुलित मस्तिष्क के उपचार का दायित्व मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान पर है। इससे विश्व-स्तर पर उत्पन्न तनाव और संघर्ष समाप्त होगा और विरोधी विचारधारा वाले देश निकट आकर मित्रता में बंध जाएँगे।

उपर्युक्त विवेचैन से स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का महत्त्व व्यक्ति के निजी जीवन से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक समान रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है। मनुष्य और उसके समाज से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की उपयोगिता एकमत से स्वीकार की जाती है।

प्रश्न 2.
मानसिक स्वास्थ्य क्या है? मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की क्या विशेषताएँ होती हैं?
या
मानसिक स्वास्थ्य का मनोवैज्ञानिक अर्थ क्या है? मानसिक रूप से स्वस्थ एक 18 वर्षीय किशोर के मानसिक लक्षणों का वर्णन कीजिए।
या
मानसिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है? उन प्रमुख लक्षणों की विवेचना कीजिए जिन्हें आप अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का द्योतक मानते हैं?
उत्तर :
प्राचीन काल के समाजों में व्यक्ति का जीवन सरल तथा साधारण था और आवश्यकताएँ बहुत सीमित थीं। मानव सभ्यता के बढ़ते कदम ज्ञान, विज्ञान और तकनीकी की उपलब्धियों के साक्षी हैं, किन्तु इससे मानव का जीवन जटिल हो गया। भौतिकवादी उन्माद ने बड़ी-बड़ी महत्त्वाकांक्षाओं को जन्म दिया जिनकी असफलता ने मनुष्य के मन को निराशा, असन्तोष तथा चिन्ताओं से भर दिया। परिणामत: उसे अपने समाज के साथ समायोजन स्थापित करने में कठिनाइयों का अनुभव होने लगा। दुःख, चिन्ता और तनाव लम्बे समय तक सहन नहीं किये जा सकते। इन्हीं परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में व्यक्ति के लिए मानसिक सुख और शान्ति प्राप्त कर समाज का सुसमायोजित प्राणी बनने हेतु मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का अध्ययन परमावश्यक है।

मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ
(Meaning of Mental Health)

मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य व्यक्ति की उस योग्यता से है जिसके माध्यम से वह अपनी कठिनाइयों को दूर कर हर परिस्थिति में अपने को समायोजित कर लेता है। सुखी जीवन के लिए जितना शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है, उसना ही मानसिक स्वास्थ्य भी। चिकित्साशास्त्रियों के अनुसार सामान्य शारीरिक व्याधियाँ; यथा–रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग आदि मानसिक कारकों से उत्पन्न होती हैं। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति चिन्तारहित, पूर्णत: समायोजित, आत्मनियन्त्रित, आत्मविश्वासी तथा संवेगात्मक रूप से स्थिर व्यक्ति होता है। उसके व्यवहार में सन्तुलन रहता है तथा वह अधिक समय तक मानसिक तनाव की स्थिति में नहीं रहता। वह प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को शीघ्र ही समायोजित कर लेता है। वर्तमान परिस्थितियों में, पूरे समाज में, उसके विभिन्न अंगों में तथा उसके नागरिकों के बीच अच्छे से अच्छा समायोजन समष्टिगत कल्याण का द्योतक है, जिसके लिए मानसिक स्वास्थ्य एक पूर्व आवश्यकता है।

मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा
(Definition of Mental Health)

विभिन्न विद्वानों ने मानसिक स्वास्थ्य की अनेक परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) हैडफील्ड के अनुसार, “सम्पूर्ण व्यक्तित्व की पूर्ण एवं सन्तुलित क्रियाशीलता को मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं।’

(2) मैनिंजर के अनुसार, “हम मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा अधिकतम प्रभावोत्पादकता और आनन्द के साथ मानव-प्राणियों का संसार से और परस्पर समंजन के रूप में कर सकते हैं। यह एक सम स्वभाव, एक जागरूक बुद्धि, सामाजिक रूप से सन्तुलित व्यवहार और एक स्वस्थ स्नायु-विन्यास बनाये रखने की योग्यता है।”

(3) लैडल के शब्दों में, “मानसिक स्वास्थ्य से अभिप्राय वास्तविक आधार पर वातावरण से पर्याप्त समायोजन करने की योग्यता है।”

(4) प्रो० एम० आर० भाटिया ने मानसिक स्वास्थ्य के अर्थ को इन शब्दों में स्पष्ट किया है, मानसिक स्वास्थ्य यह बताता है कि कोई व्यक्ति जीवन की माँगों और अवसरों के प्रति कितनी अच्छी तरह समायोजित है।

उपर्युक्त वर्णिते. परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि मानसिक स्वास्थ्य से आशय व्यक्ति की उस दशा या योग्यता से है जिसके आधार पर वह जीवन में समायोजित रहता है। मानसिक स्वास्थ्य का व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक महत्त्व है तथा इससे व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रभावित होता है।

मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण
(Symptoms of Mentally Healthy Person)

जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य को कुछ विशिष्ट लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है, उसी प्रकार से मानसिक स्वास्थ्य की भी कुछ लक्षणों के आधार पर पहचान सम्भव है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य एक कल्पनामात्र है और कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ नहीं होता। तथापि मानसिक स्वास्थ्य से सम्पन्न व्यक्ति के विशिष्ट लक्षण अवश्य हैं। इनमें सर्वप्रथम (A) हैडफील्ड के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य की नितान्त आवश्यकताओं का उल्लेख किया जाएगा और इसके बाद (B) अन्य प्रमुख लक्षणों का विवेचन किया जाएगा। ये निम्नलिखित हैं –

(A) मानसिक स्वास्थ्य की नितान्त आवश्यकताएँ या प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण)
हैडफील्ड के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य की निम्नलिखित तीन नितान्त आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें प्रमुख विशेषताएँ या लक्षण भी कहा जा सकता है

(1) पूर्ण अभिव्यक्ति (Full Expression) – व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य उसकी मूलप्रवृत्तियों, इच्छाओं व शक्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति पर निर्भर है। इनके अवदमन से वृत्तियाँ दमित व कुण्ठित होकर व्यक्तित्व में मानसिक विकारों तथा कुसमायोजन का कारण बनती हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

(2) सन्तुलन (Harmonization) – व्यक्ति को भावना ग्रन्थियों के निर्माण, प्रतिरोध व मानसिक द्वन्द्व जैसे दोषों से बचाने के लिए आवश्यक है कि उसकी मूल प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं तथा समस्त क्षमताओं के बीच आपसी सन्तुलन व वातावरण से समायोजन बना रहे। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सन्तुलन और समायोजन परमावश्यक है।

(3) सामान्य लक्ष्य (Common End) – विभिन्न क्षमताओं, इच्छाओं व प्रवृत्तियों के बीच सन्तुलन व समन्वय तथा उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति सिर्फ तभी सम्भव है जब वे एक सामान्य एवं व्यापक लक्ष्य की ओर उन्मुख हों। ये लक्ष्य मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से निर्धारित किये जाने चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से सम्बन्धित है जिसके लिए व्यक्तित्व के गुणों की पूर्ण अभिव्यक्ति, उनकी सन्तुलित क्रियाशीलता तथा सामान्य एवं व्यापक लक्ष्य आवश्यक हैं।

(B) अन्य प्रमुख लक्षण

मानसिक स्वास्थ्य को कुछ अन्य प्रमुख लक्षणों के आधार पर भी पहचाना जाता है, जो निम्नलिखित रूप में वर्णित हैं

(1) अन्तर्दृष्टि एवं आत्म-मूल्यांकन – जिस व्यक्ति में स्वयं के समायोजन सम्बन्धी समस्याओं की अन्तर्दृष्टि होती है, वह अपनी सामर्थ्य की अधिकतम और निम्नतम दोनों सीमाओं से भली-भाँति परिचित होता है। ऐसा व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार कर या तो उन्हें दूर करने की चेष्टा करता है या उनसे समझौता कर लेता है। वह आत्म-दर्शन तथा आत्म-विश्लेषण की क्रिया द्वारा अपनी उलझनों, तनावों, पूर्वाग्रहों, अन्तर्द्वन्द्वों तथा विषमताओं का सहज समाधान खोजकर उन्हें समाप्त या कम करने की कोशिश करता है। वह अपनी इच्छाओं, क्षमताओं तथा शक्तियों का वास्तविक मूल्यांकन करके उन्हें सही दिशा प्रदान कर सकता है।

(2) समायोजनशीलता – मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के लचीलेपन के गुण के कारण, नवीन एवं परिवर्तित परिस्थितियों से शीघ्र एवं उचित समायोजन स्थापित करने में सफल रहता है। वह विषम परिस्थितियों से भय खाकर या घबराकर उससे पलायन नहीं करता, अपितु उनका दृढ़ता से सामना करता है और उनके बीच से ही अपना मार्ग खोज लेता है। समायोजनशीलता के अन्तर्गत दोनों ही बातें सम्मिलित हैं–(i) परिस्थितियों को अपने अनुसार ढाल लेना या (ii) स्वयं परिस्थितियों के अनुसार ढल जाना। स्वस्थ व्यक्ति समाज के परिवर्तनशील नियमों तथा रीति-रिवाजों से परिचित होने के कारण उनसे उचित सामंजस्य स्थापित कर लेता है।

(3) बौद्धिक तथा सांवेगिक परिपक्वता – मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बौद्धिक एवं सांवेगिक परिपक्वता की नितान्त आवश्यकता है। बौद्धिक परिपक्वता से युक्त मनुष्य अपने ज्ञान का विस्तार करता है, उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है तथा अपना निर्माण स्वयं करने के लिए प्रयासशील रहता है। प्रखर बुद्धि से अहं भाव तथा मन्द बुद्धि से हीनभावना को जन्म हो सकता है; अतः बौद्धिक स्वास्थ्य की दृष्टि से इनके प्रति सतर्कता की आवश्यकता है। सांवेगिक रूप से परिपक्व व्यक्ति अपने संवेगों तथा भावों पर उचित नियन्त्रण रखता है। वह सांवेगिक ग्रन्थियों (यथा ईष्र्या, उन्माद आदि) से पूर्णतया मुक्त होता है। स्पष्टतः मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में बौद्धिक एवं सांवेगिक परिपक्वता आवश्यक है।

(4) यथार्थ दृष्टिकोण एवं स्वस्थ अभिवृत्ति – मानसिक स्वास्थ्य से युक्त व्यक्ति जीवन के प्रति यथार्थ दृष्टिकोण तथा स्वस्थ अभिवृत्ति अपनाता है। ऐसे व्यक्ति के विचारों, वृत्तियों, आकांक्षाओं तथा कार्य-पद्धति के बीच उचित सन्तुलन रहने से वह कल्पना-प्रधान, अतिशयवादी या कोरा स्वप्नदृष्टा नहीं होता, वरन् उच्च एवं हीन-भावना ग्रन्थियों के विचार से मुक्त होकर स्वविवेक के आधार पर कार्य करता है। उसकी प्रवृत्तियों तथा अभिवृत्तियों के बीच विरोधाभास दिखाई नहीं देता। वह जो कुछ है। उसका यथार्थ मूल्यांकन करता है और तद्नुसार ही कार्य में रत हो जाता है। उसकी कथनी-करनी में भेद नहीं रहता। इस प्रकार वह अपने जीवन के विषय में वास्तविक दृष्टि एवं श्रेष्ठ अभिवृत्तियाँ अपनाकर सन्तुलित एवं संयमित जीवन व्यतीत करता है।

(5) व्यावसायिक सन्तुष्टि – मानसिकै स्वास्थ्य की एक प्रमुख विशेषता अपने व्यवसाय अथवा कार्य के प्रति पूर्ण सन्तुष्टि की अनुभूति भी है। अपने कार्य से सन्तुष्ट व्यक्ति मन लगाकर कार्य करता है और श्रम से पीछे नहीं हटता। उसकी कार्यक्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि उसे अपने व्यावसायिक उद्देश्यों के प्रति सुनिश्चित एवं दृढ़ बनाती है। परिणामतः वह व्यावसायिक सफलता प्राप्त कर सुखी-सम्पन्न जीवन बिताता है। इसके विरुद्ध व्यावसायिक दृष्टि से असन्तुष्ट व्यक्ति आर्थिक विपन्नता, निराशा, चिन्ता तथा तनावों से ग्रस्त रहते हैं। वे मानसिक रोगी हो जाते हैं।

(6) सामाजिक सामंजस्य – व्यक्ति अपने समाज का एक अविभाज्य अंग है और उसकी एक इकाई है। उसकी अपूर्ण सत्ता समाज की पूर्णता में समाहित होकर परिपूर्ण होती है; अत: उसका समाज के साथ समायोजन, अनुकूलन तथा समन्वय सर्वथा प्राकृतिक एवं अनिवार्य कहा जाएगा। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज के साथ सामंजस्य बनाकर रखता है। वह सदैव समाज की समस्याओं और मर्यादाओं का ध्यान रखता है। वह केवल अपने सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए ही प्रयास नहीं करता, अपितु समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति भी करता है। वह स्व-हित और पर-हित के मध्य सन्तुलन बनाकर चलता है। समाज के साथ प्रतिकूल एवं तनावपूर्ण सम्बन्ध मानसिक अस्वस्थता के परिचायक हैं।

उपर्युक्त लक्षणों के अतिरिक्त, मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति नियमित जीवन बिताने वाला, आत्मविश्वासी, सहनशील, धैर्यवान तथा सन्तोषी मनुष्य होता है। उसकी इच्छाएँ तथा आवश्यकताएँ सामाजिक मान्यताओं की सीमाओं में और उसकी आदतें समाज के लिए हितकारी होती हैं।

प्रश्न 3.
मानसिक अस्वस्थता से आप क्या समझते हैं? मानसिक अस्वस्थता के कुछ लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता का अर्थ
(Meaning of Mental III-health)

‘मानसिक स्वास्थ्य की पूर्णता’ एक आदर्श किन्तु काल्पनिक अवस्था है। यही कारण है कि आधुनिक युग की जटिल परिस्थितियों में मानसिक अस्वस्थता किसी-न-किसी अंश में प्रत्येक व्यक्ति में घर कर गयी है। मानसिक अस्वस्थता और कुछ नहीं, मानसिक स्वास्थ्य की एक विपरीत अवस्था है।

जब कोई मनुष्य अपने कार्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने में असमर्थ रहता है, अथवा उन बाधाओं से उचित समायोजन स्थापित नहीं कर पाता तो उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। और उसमें ‘मानसिक अस्वस्थता’ पैदा हो जाती है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति स्वयं को अपने वातावरण की परिस्थितियों के साथ समायोजित न करने के कारण सांवेगिक दृष्टि से अस्थिर हो जाता है, उसके आत्मविश्वास में कमी आ जाती है, मानसिक उलझनों, तनावों, हताशाओं वे चिन्ताओं के कारण उसमें भावना ग्रन्थियाँ बन जाती हैं तथा वह व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेकानेक अव्यवस्थाओं का शिकार हो जाता है।

इस प्रकार, मानसिक अस्वस्थता वह स्थिति है जिसमें जीवन की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने में व्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है तथा संवेगात्मक असन्तुलन का शिकार हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में बहुत-सी मानसिक विकृतियाँ या व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कहा जाता है।

मानसिक अस्वस्थता के लक्षण
(Symptoms of Mental III-health)

मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति में उन सभी लक्षणों का अभाव रहता है जिनका मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों के रूप में अध्ययन किया गया है। व्यक्ति के असामान्य व्यवहार से लेकर उसके पागलपन की स्थिति के बीच अनेकानेक स्तर या सोपान दृष्टिगोचर होते हैं, तथापि मानसिक अस्वस्थता के प्रमुख लक्षणों का सोदाहरण किन्तु संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित है –

(1) साधारण समायोजन दोष (Minor Mal-adjustment) – साधारण समायोजन सम्बन्धी दोष के लक्षण प्राय: प्रत्येक व्यक्ति में पाये जाते हैं। इसे मानसिक अस्वस्थता का एक सामान्य रूप कहा जा सकता है। प्राय: देखने में आता है कि कोई बाधा या अवरोध उत्पन्न होने के कारण अपने कार्य की सम्पन्नता में असफल रहने वाला व्यक्ति अतिशय संवेदनशील, हठी, चिड़चिड़ा या आक्रामक हो जाता है। यह मानसिक अस्वस्थता की शुरुआत है।

(2) मनोरुग्णता (Psychopathic Personalities) – सामान्य जीवन जीने वाले कुछ लोगों में भी मानसिक अस्वस्थता के संकेत दिखाई पड़ते हैं। लिखने-पढ़ने, बोलने या अन्य क्रिया-कलापों में प्रायः लोगों से भूल होना स्वाभाविक ही है और इसे मानसिक अस्वस्थता का नाम नहीं दिया जा सकता, किन्तु यदि इन भूलों की आवृत्ति बढ़ जाए और असामान्य-सी प्रतीत हो तो इसे मनोविकृति कहा जाएगा। तुतलाना, हकलाना, क्रम बिगाड़कर वाक्य बोलना, बेढंगे तथा अप्रचलित वस्त्र धारण करना, चलने-फिरने में असामान्य लगना, अजीब-अजीब हरकतें करना, चोरी करना, धोखा देना आदि मानसिक अस्वस्थता के लक्षण हैं।

(3) मनोदैहिक रोग (Psychosomatic Illness) – मनोदैहिक रोगों का कारण व्यक्ति के शरीर में निहित होता है। उदाहरण के लिए-शरीर के किसी संवदेनशील भाग में चोट या आघात के कारण स्थायी दोष पैदा हो जाते हैं और व्यक्ति को जीवन-भर कष्ट देते हैं। सिगरेट, तम्बाकू, अफीम, चरस, गाँजा या शराब आदि पीने से भी अनेक मानसिक विकार उत्पन्न होते. हैं। दमा-खाँसी से चिड़चिड़ापन, निम्न या उच्च रक्तचाप के कारण मानसिक असन्तुलन तथा यकृत एवं पाचन सम्बन्धी व्याधियों में बहुत-से मानसिक विकारों का जन्म होता है। इसी के साथ-साथ किसी प्रवृत्ति का बलपूर्वक दमन करने से रक्त की संरचना, साँस की प्रक्रिया तथा हृदय की धड़कनों में परिवर्तन आता है, जिसके परिणामतः व्यक्ति का शरीर सदा के लिए रोगी हो जाता है। इस प्रकार से शरीर और मन दोनों ही मानसिक अस्वस्थता से प्रभावित होते हैं।

(4) मनस्ताप (Psychoneurosis) – मनस्ताप का जन्म समायोजन-दोषों की गम्भीरता के परिणामस्वरूप होता है। ये व्यक्तित्व के ऐसे आंशिक दोष हैं जिनमें यथार्थता से सम्बन्ध विच्छेद नहीं हो पाता। इसके अन्तर्गत (i) स्नायु दौर्बल्य तथा (ii) मनोदौर्बल्य रोग सम्मिलित हैं

(i) स्नायु दौर्बल्य (Neurasthania) – इसमें व्यक्ति अकारण ही थकावट अनुभव करता है। इससे उसमें अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, विभिन्न अंगों में दर्द, काम के प्रति अनिच्छा, मंदाग्नि, दिल धड़कना तथा हमेशा अपने स्वास्थ्य की चिन्ता के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। ऐसा व्यक्ति किसी एक डॉक्टर के पास नहीं टिकता और अपनी व्यथा कहने के लिए बेचैन रहता है।

(ii) मनोदौर्बल्य (Psychosthenia) – मनोदौर्बल्य में ये मानसिक विकार आते हैं

(a) कल्पना गृह या विश्वासबाध्यता (Obsession) के रोगी के मन में निराधार व असंगत विचार, विश्वास और कल्पनाएँ आती रहती हैं।

(b) हठ प्रवृत्ति (Compulsion) से पीड़ित व्यक्ति कामों की निरर्थकता से परिचित होते हुए भी उन्हें हठपूर्वक करता रहता है और बाद में दुःख भी पाता है।

(c) भीतियाँ (Phobias) के अन्तर्गत व्यक्ति विशेष प्रकार की वस्तुओं, दृश्यों तथा विचारों से अकारण ही भयभीत रहता है; जैसे—खुली हवा से डरना, भीड़, पानी आदि से डरना।

(d) शरीरोन्माद (Hysteria) में व्यक्ति के अहम द्वारा दमित कामेच्छाओं का शारीरिक दोषों के रूप में प्रकटीकरण होता है; जैसे-हँसना, रोना, हाथ-पैर पटकना, मांसपेशियों का जकड़ना, मूच्र्छा आदि।

(e) चिन्ता रोग (Anxiety Neurosis) में अकारण ही भविष्य सम्बन्धी चिन्ताएँ लगी रहती हैं।

(f) क्षति क्रमबाध्यता (Mania) से ग्रस्त व्यक्ति अकारण ही ऐसे काम कर बैठता है जिससे दूसरों को हानि हो; जैसे—मारना-पीटना, हत्या या दूसरे के घर में आग लगा देना। इस रोग का सबसे अच्छा उदाहरण ‘कनपटीमार’ या ‘सीरियल किलर’ व्यक्ति का आतंक है जो कनपटी पर मारकर अकारण ही लोगों की हत्या कर देता था।

(5) मनोविकृति (Psychosis)–यह गम्भीर मानसिक रोग है जिसके उपचार हेतु मानसिकें चिकित्सालय में दाखिल होना पड़ता है। मनोविकृति से पीड़ित व्यक्तियों को यथार्थ से पूरी तरह सम्बन्ध टूट जाता है। वे अनेक प्रकार के भ्रमों व भ्रान्तियों के शिकार हो जाते हैं और उन्हें सत्य समझने लगते हैं। मनोविकृति के अन्तर्गत ये रोग आते हैं—स्थिर भ्रम (Paranoia) से ग्रसित किसी व्यक्ति को पीड़ा भ्रम (Delusion of Persecution) रहने के कारण वह स्वयं को पीड़ित समझ बैठता है तो किसी व्यक्ति में ऐश्वर्य भ्रम (Delusion of Prosperity) पैदा होने के कारण वह स्वयं को ऐश्वर्यशाली या महान् समझता है। उत्साह-विषादचक्र मनोदशा (Manic Depressive Psychosis) का रोगी कभी अत्यधिक प्रसन्न दिखाई पड़ता है तो कभी अत्यधिक उदास।।

(6) यौन विकृतियाँ (Sexual Perversions)-मानसिक रोगी का यौन सम्बन्धी का लैंगिक जीवन सामान्य नहीं होता। यौन विकृतियाँ मानसिक अस्वस्थता की परिचायक हैं और अस्वस्थता में वृद्धि करती हैं। इनके प्रमुख लक्षण ये हैं–विपरीत लिंग के वस्त्र पहनना, स्पर्श से यौन सुख प्राप्त करना, स्वयं को या दूसरे को पीड़ा पहुँचाकर काम सुख प्राप्त करना, बालकों-पशुओं-समलिगियों तथा शव से यौन क्रियाएँ करना, हस्तमैथुन, गुदामैथुन आदि।

उपर्युक्त वर्णित विभिन्न मनोरोगों को उनके सम्बन्धित लक्षणों के साथ वर्णन किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति में ये सभी लक्षण दिखाई पड़े, इनमें से कोई एक लक्षण भी मानसिक अस्वस्थता का संकेत देता है। व्यक्ति में इन लक्षणों के प्रकट होते ही उनका मानसिक उपचार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
मानसिक अस्वस्थता के विभिन्न कारणों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता के कारण
(Causes of Mental III-health)

वर्तमान युग की जटिलताओं ने किसी-न-किसी अंश में प्रत्येक व्यक्ति को मानसिक अस्वस्थता का शिकार बनाया है। मानसिक अस्वस्थता के भिन्न-भिन्न प्रकारों के लिए विभिन्न प्रकार के कारण जिम्मेदार हैं। इन कारणों का निम्नलिखित वर्गों के अन्तर्गत इस प्रकार विवेचन किया जा सकता है –

(1) प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले कारण (Predisposing Causes)
प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है –

(i) शारीरिक कारण (Bodily Causes)-कभी-कभी मानसिक अस्वस्थता के मूल में शारीरिक कारण निहित होते हैं। प्रायः क्षय, संग्रहणी, कैन्सर आदि असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की शारीरिक शक्ति काफी घट जाती है तथा उन्हें शीघ्र ही थकान का अनुभव होने लगता है। ऐसे व्यक्ति स्वभाव से चिड़चिड़े और दु:खी होते हैं, क्योंकि उनमें जीवन के प्रति निराशा छा जाती है।

(ii) वंशानुक्रमणीय कारण (Hereditary Causes)-कुछ मनुष्य वंशानुक्रम में ऐसी विशेषताएँ लेकर अवतीर्ण होते हैं जिनके कारण वे सामान्य प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानसिक विकारों से ग्रस्त हो जाते हैं वंशानुक्रमणीय विशेषताओं के कारण ही मनोविकृति का रोग एक पीढ़ी से दूसरे फेढ़ी में संक्रमित होता रहता है।

(iii) संवेगात्मक कारण (Emotional Causes)-मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि संवेग मानसिक रोगों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। व्यक्ति की विभिन्न मूल प्रवृत्तियाँ किसी-न-किसी संवेग से सम्बन्धित हैं। इनमें से क्रोध, भय तथा कामवासना की प्रवृत्तियाँ और संवेग अत्यधिक प्रबल हैं। जिनके दमन से या केन्द्रीकरण से मानसिक असन्तुलन पैदा होता है। वस्तुतः मानसिक स्वास्थ्य की समस्या मूल प्रवृत्ति-संवेग (Instinct-emotion) की समस्या है। जब व्यक्ति में कोई प्रवृत्ति जाग्रत होती है तो उससे सम्बन्धित संवेग भी जाग जाता है। उदाहरणार्थ-आत्मस्थापन के साथ गर्व का, पलायन के साथ भय का तथा कामवृत्ति के साथ वासना का संवेग जाग्रत होता है। जाग्रत संवेग की असन्तुष्टि ही मानसिक रोग को जन्म देती है।

(iv) पारिवारिक कारण (Familial Causes)—कुछ घरों में माता या पिता अथवा दोनों के अभाव से अथवा विमाता व विपिता के होने से बच्चे का पूरा पालन-पोषण, सुरक्षापूर्ण बर्ताव या स्नेह नहीं मिलता। ऐसे बच्चों की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं और अभावग्रस्त बने रहते हैं। कहीं-कहीं माता-पिता के लड़ाई-झगड़े के कारण कलह को वातावरण रहता है जिसकी वजह से बालक को मानसिक घुटने अनुभव होती है और वह घर से दूर भागता है। इस प्रकार ‘भग्न परिवार’ (Broken House) मानसिक अस्वास्थ्य का मुख्य कारण बनता है।

(v) विद्यालयी कारण (Causes related to School)—बालकों का मानसिक स्वास्थ्य खराब रहने का एक प्रमुख कारण विद्यालय भी है। जिन विद्यालयों में बच्चों पर कठोरतम अनुशासन थोपा जाता है, बच्चों को अकारण डाँट-फटकार या कठोर दण्ड सहने पड़ते हैं, अध्यापकों का स्नेह नहीं मिल पाता, पाठ्य-विषये अनुपयुक्त होते हैं तथा बालकों को अमनोवैज्ञानिक विधियों से पढ़ाया जाता है, अध्यापक या प्रबन्धक बच्चों को अपनी स्वार्थसिद्धि में भड़काकर आपस में अध्यापकों से लड़वा देते हैं। ऐसे विद्यलियों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

(vi) सामाजिक कारण (Social Causes)-कभी-कभी कुछ समाज विरोधी तत्त्व व्यक्ति के मन पर भारी आघात पहुँचाकर उसे मानसिक दृष्टि से असन्तुलित कर देते हैं। यदि व्यक्ति के कार्यों व विचारों का व्यर्थ ही विरोध किया जाए तो उसके मित्रों-पड़ोसियों तथा अन्य लोगों द्वारा उसे समाज में उचित मान्यता, स्थान ये प्रतिष्ठा प्राप्त न हो, तो उसमें प्राय: हीनता की ग्रन्थियाँ पड़ जाती हैं। उनका व्यक्तित्व कुण्ठा और तनाव का शिकार हो जाता है। आत्मस्थापन की प्रवृत्ति के सन्तुष्ट न होने के कारण भी व्यक्ति दु:खी और खिन्न हो जाते हैं।

(vii) जीवन की विषम परिस्थितियाँ (Adverse Conditions of Life)—हर एक व्यक्ति को अपने जीवन में कभी-न-कभी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ये परिस्थितियाँ निराशा और असफललाओं के कारण जन्म ले सकती हैं। आर्थिक संकट, व्यवसाय या परीक्षा या प्रेम में असफलता तथा सामाजिक स्थिति के प्रति असन्तोष—इनमें सम्बन्धित प्रतिकूल एवं विषम परिस्थितियाँ मानव मन पर बुरा असर छोड़ती हैं। विषम परिस्थितियों के कारण समायोजन के दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे मानसिक अस्वस्थता सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं।

(viii) आर्थिक कारण (Economic Causes)-आर्थिक तंगी के कारण व्यक्ति की आवश्यकताएँ तथा ईच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं और उसे अपनी इच्छाओं का दमन करना पड़ता है। दमित इच्छाएँ नाना प्रकार के अपराध तथा समाज विरोधी व्यवहार को जन्म देती हैं। धन की कमी से बाध्य होकर व्यक्ति को अथक एवं अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ता है जिससे उनका मन दुःखी मन मानसिक विकारों को पैदा करता है। अत्यधिक धन के कारण भी जुआ, शराब तथा वेश्यागमन की लत पड़ जाती है जिससे मानसिक असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

(ix) भौगोलिक कारण (Geographical Causes)-भौगोलिक कारण अप्रत्यक्ष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं। अधिक गर्मी या सर्दी के कारण लोगों का समायोजन बिगड़ जाता है, शारीरिक दशा गिरने लगती है, उनके अभाव में चिड़चिड़ापन या तनाव पैदा होता है, जिससे मानसिक असन्तुलन उत्पन्न होता है।

(x) सांस्कृतिक कारण (Cultural Causes)-यदा-कदा सांस्कृतिक परम्पराएँ व्यक्ति की भावनाओं तथा इच्छाओं की पृर्ति के मार्ग में बाधक बनती हैं। प्रायः व्यक्ति को अपनी प्रवृत्तियों का दमन कर कुछ कार्य विवशतावश करने पड़ते हैं जिससे मानसिक असन्तोष तथा कुण्ठा उत्पन्न होते हैं। एक संस्कृति में जन्मी तथा पलो हुआ व्यक्ति जब किसी दूसरी संस्कृति में कदम रखता है तो उसे मानसिक संघर्ष का सामना करना पड़ता है जिससे असमायोजन के दोष उत्पन्न होते हैं। अतः सांस्कृतिक कारणों से भी मनोविकार उत्पन्न होते हैं।

(2) उत्तेजक अथवा तात्कालिक कारण (Exciting or Direct Causes)

मानसिक रोगों के तात्कालिक कारण निम्नलिखित हैं –

(i) तीव्र मानसिक संघर्ष (Intense Mental Conflict)-जब व्यक्ति के जीवन मूल्य और आदर्श संसार की यथार्थ परिस्थितियों या प्रचलित व्यवहार से टकराते हैं तो मानसिक संघर्ष का जन्म होता है। यह व्यक्ति के मन में अन्तर्द्वन्द्व के रूप में उभरता है। मानसिक संघर्ष अपनी सामान्य अवस्था में उल्लेखनीय नहीं होते, किन्तु इनकी तीव्रता से व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खोकर मनोविकार के शिकार हो जाते हैं।

(ii) अत्यधिक मानसिक दबाव (Stress Conditions)-आज की भौतिकवादी परिस्थितियों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिद्वन्द्विता एवं प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है। सीमित सामर्थ्य के साथ व्यक्ति अपनी और अपने परिवार की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाता। इसके परिणामस्वरूप उसमें अधिक चिन्ता और उद्विग्नता भर जाती है जिससे उसकी उपलब्धियों के स्तर में निरन्तर गिरावट आती है। यह गिरावट और ज्यादा निराशा, उद्विग्नता तथा मानसिक दबाव पैदा करती है। स्पष्टत: अत्यधिक मानसिक दबाव का यह दुश्चक्र ही मानसिक अस्वस्थता के लिए जिम्मेदार होता है।

(iii) मानसिक तनाव (Mental Tension)-समान आकर्षण वाले लक्ष्य विपरीत दिशा में खींचकर व्यक्ति में संवेगात्मक तनाव उत्पन्न करते हैं। इन संवेगात्मक तनावों के कारण व्यक्ति क्षुब्ध और पीड़ित होते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्तित्व के टूटने की स्थिति भी आ सकती है। इसके अतिरिक्त मानसिक आघात; जैसे-माँ से बच्चे का बिछुड़ना तथा किसी प्रियजन की आकस्मिक मृत्यु; मानसिक असन्तुलन के कारण बनते हैं।

(iv) दमित भावना ग्रन्थियाँ (Complexes)-कभी-कभी व्यक्ति में असामान्य भावनाओं का जमाव देखा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भावनाएँ एक-दूसरे से उलझकर ग्रन्थियों बना देती हैं। इन ग्रन्थियों के निर्माण का व्यक्ति को पता नहीं रहता, किन्तु इनसे हीनता की भावना (Inferiority Complex), उच्चता की भावना (Superiority Complex), अपराध भावना (Guilty Complex) आदि भावनाएँ पैदा हो जाती हैं। इस प्रकार से दमित भावना ग्रन्थियाँ मानसिक विकार उत्पन्न कर सकती हैं।

(v) यौन हताशाएँ (Sexual Frustrations)-प्रसिद्ध मनोविश्लेषणवादी फ्रायड के अनुसार, अधिकांश मानसिक रौगो का मूल कारण यौन हताशा है। यदि व्यक्ति की यौन इच्छाओं की तृप्ति न हो और उनका बलात् दमन कर दिया जाए तो इससे मानसिक संघर्ष पैदा होता हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

(3) समूचित समायोजन सम्बन्धी बाधाएँ (Factors Thwarting Adjustment)

वस्तुतः समुचित समायोजन ही मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। समायोजन में बाधाएँ आने पर मानसिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ये बाधक कारक निम्नलिखित हैं –

(i) परिवेशजनित कारक (Environmental Factors)–अनेक बार बाह्य परिवेश के साथ समायोजन में बाधा उपस्थित होने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। आजादी मिलने के समय भारत और पाकिस्तान को बँटवारा हुआ और उसमें साम्प्रदायिक हिंसा के नंगे नाच ने न जाने कितने परिवारों को नष्ट कर डाला। इसका सम्बन्धित लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल, गहरा एवं स्थायी प्रभाव पड़ा।

(ii) मनोजनित कारक (Psychic Factors)–मनोजनित कारक मन से उत्पन्न होते हैं। जब व्यक्तित्व, रुचि, अभिरुचि, स्वभाव, आदर्श तथा मूल्य का उसकी योग्यता से तालमेल नहीं बैठता तो असमायोजन उत्पन्न होता है। कुछ लोग बड़े धन्धे के योग्य नहीं होते तथा छोटे धन्धे को अपनाना नहीं चाहते, वे ऐसी दशा में मानसिक असन्तुलन के शिकार होते हैं।

(iii) समाज व संस्कृति से उत्पन्न कारक (Factors Originated from Society and Culture)-समाज में जाति-प्रथा के दोष, रुग्ण प्रथाएँ व परम्पराएँ, नये व पुराने आदर्शों के बीच संघर्ष, प्राथमिकताओं के प्रति अज्ञानता तथा भटकाव व्यक्तित्व के समायोजन में बाधा उत्पन्न करते हैं। अनेक मानसिक विकारों का जन्म सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से होता है।

प्रश्न 5.
साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार की मुख्य विधियों या उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता साधारण भी हो सकती है तथा गम्भीर भी। साधारण तथा गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अलग-अलग विधियों को अपनाया जाता है। साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ या उपाय हैं-सुझाव, उन्नयन, निद्रा, विश्राम, पुनर्शिक्षण, मनो-अभिनय, सम्मोहन, मनोविश्लेषण विधि, खेल एवं संगीत, व्यावसायिक चिकित्सा तथा सामूहिक चिकित्सा विधि। इन उपायों द्वारा साधारण मानसिक अस्वस्थता का सफल उपचार किया जा सकता है।

साधारण मानसिक अस्वस्थता के उपचार में आवश्यकतानुसार निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है

(1) सुझाव – मानसिक रोगी को सीधे-सीधे सुझाव देकर समझाया जाए कि उसे अपनी अस्वस्थता के विषय में क्या सोचना व करना है। उसके भ्रम व भ्रान्तियों का भी निवारण किया जाए। इस प्रकार के सुझाव से सामान्य रूप से साधारण मानसिक अस्वस्थता का सफलतापूर्वक उपचार किया जा सकता है। मानसिक अस्वस्थता में आत्म-सुझाव का भी विशेष महत्त्व होता है।

(2) उन्नयन – इस विधि में यह जाँच की जाती है कि मानसिक रोग का किस प्रवृत्ति या संवेग से सम्बन्ध है। फिर उसी प्रवृत्ति/संवेग का स्तर उन्नत करके उसे किसी उच्च लक्ष्य के साथ जोड़ दिया जाता है।

(3) निद्रा – अचानक आघात या दुर्घटना के कारण यदि कोई व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा हो तो रोगी को औषधि देकर कई दिनों तक निद्रा में रखा जाता है। शरीर की ताकत को बनाये रखने की दृष्टि से ताकत के इन्जेक्शन दिये जाते हैं।

(4) विश्राम – अधिक कार्यभार, थकावट, तनाव तथा मानसिक उलझनों और कुपोषण के कारण अक्सर मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। ऐसे रोगियों को शान्त वातावरण में विश्राम करने दिया जाता है और उन्हें पौष्टिक भोजन खिलाया जाता है।

(5) पुनशिक्षण – इसके अन्तर्गत मानसिक रोगी में व्यावहारिक शिक्षा, संसूचन तथा उपदेश के माध्यम से आत्मविश्वास व आत्म-नियन्त्रण पैदा किया जाता है। इसके लिए अन्य व्यक्ति, समूह या दैवी-शक्तियों में विश्वास के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है। इसी सिद्धि की सफलता रोगी द्वारा दिये गये सहयोग पर निर्भर करती है। कमजोर तथा कोमल भावनाओं वाले व्यक्तियों की इस विधि से चिकित्सा की जा सकती है।

(6) ग्रन्थ-अध्ययन विधि – पढ़े-लिखे विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगियों के लिए ऐसे विशिष्ट ग्रन्थों की रचना की गयी हैं जिनके पढ़ने से मानसिक तनाव व असन्तुलन घटता है। रोग के अनुसार चिकित्सक सम्बन्धित ग्रन्थ पढ़ने के लिए देता है और इसके पश्चात् उचित निर्देशन प्रदान कर रोग का पूर्ण उचारे कर देता है।

(7) व्यावसायिक चिकित्सा – खाली मस्तिष्क शैतान का घर है, किन्तु कार्य में रत व्यक्ति में कई विशिष्ट गुण उत्पन्न होते हैं; जैसे—सहयोग, प्रेम, सहनशीलता, धैर्य और मैत्री। इन गुणों से। मानसिक उलझन और तनाव में कमी आती है। इसी सिद्धान्त को आधार बनाकर रोगियों को उनके पसन्द के कार्यों (जैसे—चित्रकारी, चटाई-कपड़ा-निवाड़ बुनना, टोकरी बनाना आदि) में लगा दिया जाता है। धीरे-धीरे उनका मानसिक सन्तुलन सुधर जाता है।

(8) सामूहिक चिकित्सा – सामूहिक चिकित्सा विधि में दस से लेकर एक तक एक ही प्रकार के रोगियों की एक साथ चिकित्सा की जाती है। चिकित्सक समूह के सभी रोगियों को इस प्रकार प्रेरित करता है कि वे एक-दूसरे से अपनी समस्याएँ कहें तथा दूसरों की समस्याएँ खुद सुनें। एक-दूसरे को । समस्या कहने-सुनने से पारस्परिक सहानुभूति उत्पन्न होती है। रोगी जब अपने जैसे अन्य पीड़ित व्यक्तियों को अपने साथ पाता है तो उसे सन्तोष अनुभव होता है। धीरे-धीरे चिकित्सक के दिशा निर्देशन में सभी रोगी मिलकर समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते हैं और मानसिक सन्तुलन की अवस्था प्राप्त करते हैं।

(9) मनो-अभिनय – मनो-अभिनय विधि (Psychodrama), सामूहिक विधि से मिलती-जुलती विधि है। इसमें समूह के रोगी आपस में समस्या की व्याख्या नहीं करते बल्कि अभिनय के माध्यम से अपनी समस्या का स्वतन्त्र रूप से अभि-प्रकाशन करते हैं। इससे समस्या का रेचन हो जाता है। मनो-अभिनय चिकित्सक के निर्देशन में किया जाना चाहिए।

(10) सम्मोहन – सम्मोहन (Hypnosis), अल्पकालीन प्रभाव वाली एक मनोवैज्ञानिक विधि है। जिससे मनोरोग के लक्षण दूर होते हैं, रोग दूर नहीं होता। सम्मोहन क्रिया में चिकित्सक मानसिक रोगी । को कुछ समय के लिए अचेत कर देता है और उसे एक आरामकुर्सी पर विश्रामपूर्वक बैठाता है। अब उसे किसी ध्वन्यात्मक या दृष्टात्मक उत्तेजना पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा जाता है। संसूचनाओं के माध्यम से उसे सचेत ही रखा जाता है। रोगी को निर्देश दिया जाता है कि वे अपनी स्मृति से लुप्त हो चुकी अनुभूतियों को कहे। अनुभूति के स्मरण-मात्र से ही रोगी का रोग दूर हो जाता है।

(11) मनोविश्लेषण विधि–फ्रायड नामक विख्यात मनोवैज्ञानिक ने सम्मोहन विधि की कमियों को ध्यानावस्थित रखते हुए ‘मनोविश्लेषण विधि’ (Psycho-analysis) की खोज की। रोगी को एक अर्द्धप्रकाशित कक्ष में आरामकुर्सी पर इस प्रकार विश्रामपूर्वक बैठाया जाता है कि मनोविश्लेषक तो रोगी की क्रियाओं का पूर्णरूपेण अध्ययन के निरीक्षण कर पाये लेकिन रोगी उसे न देख सके। अब मनोविश्लेषक के व्यवहार से प्रेरित् व सन्तुष्ट व्यक्ति उस पर पूरी तरह विश्वास प्रदर्शित करता है। यद्यपि शुरू में प्रतिरोध की अवस्था के कारण रोगी कुछ व्यक्त करना नहीं चाहता, किन्तु उत्तेजक शब्दों के प्रयोग से उसे पूर्व-अनुभव दोहराने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बाद स्थानान्तरण की अवस्था के अन्तर्गत दो बातें होती हैं –
(i) रोगी चिकित्सक को भला-बुरा कहता या गाली बकता है अथवा
(ii) रोगी मनोविश्लेषक पर मुग्ध हो जाता है और उसकी हर एक बात मानता है। शनैः-शनैः रोगी अपनी समस्त बातों की जानकारी मनोविश्लेषक को दे देता है जिससे उसकी उलझनें समाप्त हो जाती हैं और वह सामान्य व समायोजित हो जाता है।

(12) खेल और संगीत – बालकों तथा दीर्घकाल तक दबाव महसूस करने वाले व्यक्तियों के लिए खेल विधि उपयोगी है। रोगी को स्वेच्छा से स्वतन्त्रतापूर्वक नाना प्रकार के खेल खेलने के अवसर प्रदान किये जाते हैं। खेल खेलने से उसकी विचार की दिशा बदलती है तथा खेल जीतने से उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है। इसी प्रकार संगीत भी मानसिक उलझनों को तथा तनावों को दूर करने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी है। रुचि का संगीत सुनने से उत्तेजना का अन्त होकर पाचन क्रिया तथा रक्तचाप सामान्य हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान’ अपने आप में एक व्यवस्थित विज्ञान है। इसका अध्ययन-क्षेत्र पर्याप्त विस्तृत है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध सम्पूर्ण मानव-जीवन से है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

(1) सामान्य व्यक्तियों का अध्ययन – सामान्य रूप से माना जाता है कि मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान द्वारा केवल मानसिक रोगियों अथवा असामान्य व्यक्तियों का ही अध्ययन किया जाता है, परन्तु यह धारणा भ्रामक है। वास्तव में, मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सामान्य व्यक्तियों के लिए भी आवश्यक एवं उपयोगी है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान व्यक्तियों के अन्तर्गत मानसिक स्वास्थ्य के नियमों तथा उपायों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन से समस्त सामान्य व्यक्ति लाभान्वित होते

(2) मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। मानसिक अस्वस्थता के विभिन्न प्रकारों, उनके कारणों, लक्षणों तथा रोकथाम एवं उपचार के उपायों का अध्ययन मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तर्गत ही किया जाता है।

(3) सम्पूर्ण समाज का अध्ययन – मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्पूर्ण समाज का अध्ययन करता है तथा उसे लाभ पहुँचाता है। मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्पूर्ण समाज को मानसिक रूप से स्वस्थ बनाये रखने में सहायता पहुँचाती है।

प्रश्न 2.
फ्रायड के अनुसार मन के गत्यात्मक पक्ष की व्याख्या करें।
या
फ्रायड के अनुसार इड, इगो (अहम) तथा सुपर इगो का समुचित विवेचन कीजिए।
उत्तर :
फ्रायड ने मन के गत्यात्मक पक्ष की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि मन के गत्यात्मक पक्ष के तीन अंग होते हैं जिन्हें फ्रायड ने क्रमशः इदम्, (Id), अहम् (Ego) तथा परम अहम् (Super Ego) कहा है। मन के गत्यात्मक पक्ष के इन तीनों भागों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है

(अ) इदम्-फ्रायड के अनुसार, मन के गत्यात्मक पक्ष का एक मुख्य भाग इदम् या इड है। अर्थात् व्यक्ति की सम्पूर्ण मनोजैविक शक्तिस्रोत मन का यही भाग अर्थात् इड ही है। इसे व्यक्ति की जीवन मूल प्रवृत्ति तथा मृत्यु मूल प्रवृत्ति का केन्द्र माना गया है। इड का सम्बन्ध व्यक्ति के आन्तरिक जगत से होता है, इसलिए इस वास्तविक मानसिक सत्यता माना गया है। इड के माध्यम से ही व्यक्ति का सम्बन्ध बाहरी विश्व से स्थापित होता है। व्यक्ति के इड का संचालन सुखवादी सिद्धान्त होता है।

(ब) अहम – फ्रायड के अनुसार, मन के गत्यात्मक पक्ष का दूसरा भाग अहम् है। अहम् के माध्यम से व्यक्ति का बाहरी जगत से सम्पर्क स्थापित होता है। मन का अहम् नामक भाग व्यवस्थित भाग है। इसका सम्बन्ध इड से भी होता है। इड द्वारा इच्छाएँ उत्पन्न की जाती हैं; इन इच्छाओं की सामाजिक और बाहरी जगत की अर्थात् भौतिक जगत की वास्तविकताओं के सन्दर्भ में अहम् द्वारा सन्तुष्टि की जाती है। अहम् में समायोजन का गुण होता है। यह इड तथा बाहरी जगत की वास्तविकताओं में समायोजन स्थापित करता है। अहम् का निर्देशन वास्तविकता के सिद्धान्त से होता है। इसलिए अहम् को समय तथा स्थान का पूर्ण ध्यान रहता है। अहम् अपनी की जाने वाली समस्त क्रियाओं के विषय में परिणामों का भी विचार करता है। जहाँ तक नैतिक-अनैतिक का प्रश्न है, उसका विचार अहम् नहीं करता परन्तु वह अवसर का विचार अवश्य करता है। अवसर उपलब्ध होने पर वह अनैतिक तथा असमाजिक कार्यों को भी सम्पन्न कर देता है।

(स) परम अहम् या सुपर इगो – मन के गत्यात्मक पक्ष का जो भाग नैतिकता तथा आदर्शों से सम्बन्धित होता है, उसे फ्रायड ने परम अहम् या सुपर इगो कहा है। व्यक्ति के व्यक्तित्व में इस भाग का विकास इड तथा इगो के बाद ही होता है। सुपर इगो का उद्देश्य व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करना होता है। परम अहम् का सम्बन्ध मुख्य रूप से नैतिकता, धर्म, संस्कृति एवं सभ्यता से होता है। परम अहम् के कुछ विशिष्ट कार्य हैं इसका एक कार्य मूल प्रवृत्तियों की सन्तुष्टि को रोकना है। यह रोक समाज के उच्च आदर्शों तथा मानदण्डों के आधार पर होती है। व्यक्ति का परम अहम् अपने अहम् के प्रति उसी प्रकार का व्यवहार करता है जिस प्रकार का व्यवहार माता-पिता अपने बच्चों के प्रति करते हैं। परम अहम् व्यक्ति के इड को पूरी तरह से प्रतिबन्धित करने का प्रयास करता है क्योंकि इड द्वारा उत्पन्न कामुक इच्छाएँ एवं आक्रामक आवेग पूर्ण रूप से आदर्शों के विरुद्ध होते हैं।

प्रश्न 3.
मानसिक स्वास्थ्य के संवर्द्धन में परिवार की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका परिवार की होती है। व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में परिवार की भूमिका का विवरण निम्नलिखित है

(1) प्रारम्भिक विकास और सुरक्षा – मानव-जीवन के प्रारम्भिक 5-6 वर्षों में बालक का सर्वाधिक विकास हो जाता है। यह बालक की कलिकावस्था है जिसे उचित सुरक्षा प्राप्त होनी चाहिए। परिवार का इसमें विशेष दायित्व है-उसे शिशु की देख-रेख तथा रोगी से रक्षा करनी चाहिए। शिशु को सन्तुलित आहार दिया जाना चाहिए तथा उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जानी चाहिए। कुपोषण और असुरक्षा की भावना से बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

(2) माता-पिता का स्नेह – बालक के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए उसे माता-पिता का प्रेम, स्नेह तथा लगाव चाहिए। प्रायः देखा गया है कि जिन बच्चों को माता-पिता का भरपूर स्नेह नहीं मिलता, वे स्वयं को अकेला महसूस करते हैं तथा असुरक्षा की भावना से भय खाकर मानसिक ग्रन्थियों के शिकार हो जाते हैं। ये ग्रन्थियाँ स्थायी हो जाती हैं और उसे जीवन-पर्यन्त असन्तुलित रखती हैं।

(3) परिवार के सदस्यों का व्यवहारे – परिवार के सदस्यों; खासतौर से माता-पिता को व्यवहार सभी बालकों के साथ एक समान होना चाहिए। उनके बीच पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना अनुचित है। उनकी असफलताओं के लिए भी बार-बार दोषारोपण नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है और वे कुसमायोजन के शिकार हो जाते हैं।

(4) उत्तम वातावरण – परिवार का उत्तम एवं मधुर वातावरण बालक के मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि करता है। परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्यार, सहयोग की भावना, सम्मान की भावना व प्रतिष्ठा, एकमत्य, माता-पिता के मधुर सम्बन्ध तथा परिवार का स्वतन्त्र वातावरण मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा रखने में योग देते हैं। इसके अलावा बालक की भावनाओं व विचारों को उचित आदर, मान्यता व स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए।

(5) संवेगात्मक विकास – बालक का संवेगात्मक विकास भी ठीक ढंग से होना चाहिए। परिवार में यथोचित सुरक्षा, स्वतन्त्रता, स्वीकृति, मान्यता तथा स्नेह रहने से संवेगात्मक विकास स्वस्थ रूप से होता है तथा नये विश्वासों तथा आशाओं का जन्म होता है।

(6) खेलकूद और घूमना – मानसिक स्वास्थ्य का शारीरिक स्वास्थ्य के साथ गहरा सम्बन्ध है। परिवार को चाहिए कि बालकों के लिए खेलकूद का पर्याप्त प्रबन्ध किया जाए। उन्हें दर्शनीय स्थल दिखाने, पिकनिक पर ले जाने, ऐतिहासिक स्थलों पर घुमाने तथा भाँति-भाँति की वस्तुओं का निरीक्षण कराने का प्रयास भी किया जाना चाहिए।

(7) अनुशासन और अनुकरण – बालक अधिकांश बातें अनुकरण के माध्यम से सीखते हैं। अनुकरण आदर्श वस्तु या विचार का होता है; अत: माता-पिता का जीवन अनुशासित एवं आदर्श जीवन होना चाहिए। परिवार में आत्मानुशासन की शिक्षा प्रदान की जाए।

प्रश्न 4.
मानसिक स्वास्थ्य के संवर्द्धन में पाठशाला या विद्यालय की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पाठशाला तथा मानसिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन

बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर परिवार के बाद सर्वाधिक प्रभाव पाठशाला या विद्यालय का पड़ता है। बालक के मानसिक स्वास्थ्य में विद्यालय या पाठशाला की भूमिका का विवरण निम्नलिखित

(1) पाठशाला का वातावरण – पाठशाला का सम्पूर्ण वातावरण शान्ति, सहयोग और प्रेम पर आधारित तथा उत्तम होना चाहिए। अध्यापक का विद्यार्थी के प्रति प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, विद्यार्थी के मन में अध्यापक के प्रति रुचि और आदर उत्पन्न करता है। इससे बालक स्वतन्त्रता तथा प्रसन्नता का अनुभव करते हैं जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक बना रहता है। विद्यार्थियों के प्रति बालक का भेदभावपूर्ण बर्ताव बालकों के मन में अनादर और खीझ को जन्म देता है जिसके परिणामस्वरूप अध्यापक के निर्देशों की अवहेलना हो सकती है और परस्पर कुसमयोजन पैदा हो सकता है। इसके अलावा, पाठशाला में किसी प्रकार की राजनीति, गुटबाजी, साम्प्रदायिक भेदभाव नहीं रहना चाहिए। इससे मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(2) श्रेष्ठ अनुशासन – पाठशाला में अनुशासन का उद्देश्य बालकों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा करना है, न कि उनके मन और जीवन को पीड़ा देना है। अनुशासन सम्बन्धी नियम कठोर न हों, उनसे बालकों में विरोध की भावना उत्पन्न न हो तथा पालन सुगमता से कराया जा सके। बालकों को आत्मानुशासन के महत्त्व से परिचित कराया जाए। उन्हें अनुशासन समिति में स्थान देकर कार्य सौंपे जाएँ ताकि उनमें उत्तरदायित्व की भावना का विकास हो सके। इससे बालक का व्यक्तित्व विकसित व समायोजित होता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य में योगदान मिलता है।

(3) सन्तुलित पाठ्यक्रम – बालकों के ज्ञान में अपेक्षित वृद्धि तथा उनके बौद्धिक उन्नयन के लिए पाठ्यक्रम का सन्तुलित होना आवश्यक है। पाठ्यक्रम लचीला और बच्चों की रुचि के अनुरूप होना चाहिए। रुचिजन्य अध्ययन से विद्यार्थियों को मानसिक थकान नहीं होती और उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है। इसके विपरीत, असन्तुलित पाठ्यक्रम के बोझ से बालक मानसिक थकान महसूस करते हैं, अध्ययन में रुचि लेते हैं तथा पढ़ने-लिखने से जी चुराते हैं। अतः असन्तुलित पाठ्यक्रम मानसिक सन्तुलन एवं स्वास्थ्य में सहायक हैं।

(4) पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ – पाठशाला में समय-समय पर पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए। इनसे बालक के व्यक्तित्व का विकास होता है तथा उसकी रुचियों का उचित अभि-प्रकाशन होता है। खेलकूद और मनोरंजन द्वारा मस्तिष्क में दमित भावनाओं को मार्ग मिलता है तथा मानसिक स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

(5) उपयुक्त शिक्षण विधियाँ – पाठशाला में अध्यापक को चाहिए कि वह विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए उपयुक्त विधियों का प्रयोग करे। नीरस शिक्षण से बालकों में अरुचि तथा थकान पैदा होती हैं, जिससे उनमें कक्षा से पलायन की प्रवृत्ति उभरती है तथा अनुशासनहीनता के अंकुर विकसित होते हैं।

(6) शैक्षिक, व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत निर्देशन – विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखकर उनकी मानसिक योग्यता तथा रुचि के अनुसार ही विषय दिये जाने चाहिए। इसके लिए कुशल मनोवैज्ञानिक द्वारा शैक्षिक निर्देशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके अलावा उनके भावी जीवन को ध्यान में रखकर उन्हें उचित व्यवसाय चुनने हेतु भी परामर्श व दिशा निर्देश दिये जाएँ। व्यक्तिगत निर्देशन् की सहायता से उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, जिससे मानसिक ग्रन्थियाँ समाप्त हो जाती हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है।

प्रश्न 5.
गम्भीर सोनसिक अस्वस्थता के उपचार का विधियों की उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
कुछ मानसिक विकार काफी गम्भीर होते हैं तथा उनका उपचार साधारण उपायों द्वारा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के मानसिक रोगियों का उपचार कुशल मनोचिकित्सकों द्वारा ही किया जा सकता है। इन रोगियों की प्राय: मनोरोग चिकित्सालयों में भर्ती भी करना पड़ता है। इन गम्भीर मानसिक रोगों के उपचार के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है –

(1) आघात विधि – पहले कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन के मिश्रण को सुंघाकर रोगी के मस्तिष्क को आघात (Shock) दिया जाता था जिससे क्षणिक लाभ होता था। इसके बाद अधिक मात्रा में इन्सुलिन या कपूर या मेट्राजॉल के द्वारा आघात दिया जाने लगा। रोगी को 15 से 60 तक आघात पहुँचाये जाते थे। आजकल रोगी के मस्तिष्क पर बिजली के हल्के आघात देकर मानसिक रोग ठीक किये जाते हैं।

(2) रासायनिक विधि – रासायनिक विधि (Chemo Therapy) में कुछ विशेष प्रकार की ओषधियों या रसायनों का प्रयोग करके रोगी की चिन्ता तथा बेचैनी कम की जाती है। भारत में आजकल सर्पगन्धा (Rauwolia) नामक ओषधि काफी प्रचलित वै लाभदायक सिद्ध हुई है।

(3) मनोशल्य चिकित्सा – मनोशल्य चिकित्सा (Psycho-Surgery) के अन्तर्गत मस्तिष्क का ऑपरेशन करके थैलेमस व फ्रण्टल लोब का सम्बन्ध विच्छेद कर दिया जाता है। इससे मानसिक उन्माद और विकृतियाँ ठीक हो जाती हैं। यह देखा गया है कि इस ऑपरेशन के बाद दूसरी मानसिक असमानताएँ पैदा हो जाती हैं। इस प्रकार, यह विधि सुधार की दृष्टि से तो उपयुक्त कही जा सकती है। किन्तु इससे पूर्ण उपचार नहीं हो सकता।

प्रश्न 6.
मनोरचनाएँ समायोजन में सहायक हैं।” इस कथन की विवेचना दीजिए।
उत्तर :
व्यक्ति के जीवन तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए समायोजन का विशेष महत्त्व है। समायोजन के लिए निरन्तर प्रयास एवं उपाय करने आवश्यक होते हैं। समायोजन के लिए किये जाने वाले उपायों में मनोरंजनों (Mental Mechanisms) का विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। मनोरचनाएँ कुछ ऐसी प्रक्रियाएँ होती हैं, और चेतन भी होती हैं तथा अचेतन भी। मनोरचनाओं के द्वारा व्यक्ति अपने अन्तर्द्वन्द्वों से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयास करता है। मनोरचनाओं के माध्यम से व्यक्ति विभिन्न चिन्ताओं से भी अपना बचाव करता है। मनोरचनाएँ चिन्ता से केवल रक्षा ही नहीं करतीं बल्कि यह उन विधियों की ओर संकेत भी करता हैं जिनसे चिन्ता उत्पन्न करने वाले आवेगों की दिशा भी बदली जा सकती है। इस प्रकार मनोरचनाएँ अन्तर्द्वन्द्वों को समाप्त करके तथा चिन्ताओं से मुक्ति दिलाकर व्यक्ति के जीवन में समायोजन बनाये रखने में सहायक सिद्ध होती हैं। मैक्डूगल के अनुसार, “अधिक सामान्य जैविक दृष्टि से मनोरचनाएँ व्यक्ति की अपने वातावरण से समायोजन स्थापित करने में सहायता करती हैं।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-मानसिक अस्वस्थता का निदान।
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता के व्यवस्थित अध्ययन एवं उपचार के लिए मानसिक अस्वस्थता का समुचित निदान आवश्यक होता है।

निदान के अन्तर्गत मानसिक अस्वस्थता के कारणों का पता लगाने के लिए रोगी के व्यक्तित्व सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को प्राप्त करना आवश्यक है। ये सूचनाएँ इन बिन्दुओं से सम्बन्धित होती हैं –

  1. शारीरिक दशा
  2. पारिवारिक दशा
  3. शैक्षणिक दशा
  4. सामाजिक दशा
  5. आर्थिक दशा
  6. व्यावहारिक दशा
  7. व्यक्त्वि सम्बन्धी लक्षण तथा
  8. मानसिक तत्त्व।

इन सूचनाओं को निम्नलिखित विधियों की सहायता से उपलब्ध कराया जाता है –

  1. प्रश्नावली
  2. साक्षात्कार
  3. निरीक्षण
  4. जीवन-वृत्त
  5. व्यक्तित्व परिसूची
  6. डॉक्टरी जाँच
  7. विभिन्न मनोवैज्ञानिक (बुद्धि, रुचि, अभिरुचि तथा मानसिक योग्यता सम्बन्धी) परीक्षण
  8. विद्यालय का संचित आलेख
  9. प्रक्षेपण विधियाँ तथा
  10. प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक विधियाँ

प्रश्न 2.
टिप्पणी लिखिए-मानसिक अस्वस्थता के उपचार की विधि : सम्मोहन।
उत्तर :
सम्मोहन (Hypnosis), अल्पकालीन प्रभाव वाली एक मनोवैज्ञानिक विधि है जिससे मनोरोग के लक्षण दूर होते हैं, रोग दूर नहीं होता। सम्मोहन क्रिया में चिकित्सक मानसिक रोगी को कुछ समय के लिए अचेत कर देता है और उसे एक आरामकुर्सी पर विश्रामपूर्वक बैठाता है। अब उसे किसी ध्वन्यात्मक या दृष्टात्मक उत्तेजना पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा जाता है। संसूचनाओं के माध्यम से उसे अचेत ही रखा जाता है। रोगी को निर्देश दिया जाता है कि वह अपनी स्मृति से लुप्त हो चुकी अनुभूतियों को कहे। अनुभूति के स्मरण-मात्र से ही रोगी का रोग दूर हो जाता है।

प्रश्न 3.
मनोविश्लेषण विधि का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
फ्रायड नामक विख्यात मनोवैज्ञानिक ने सम्मोहन विधि की कमियों को ध्यानावस्थित रखते हुए मनोविश्लेषण विधि’ (Psycho-analysis) की खोज की। रोगी को एक अर्द्ध-प्रकाशित कक्ष में आरामकुर्सी पर इस प्रकार विश्रामपूर्वक बैठाया जाता है कि मनोविश्लेषक तो रोगी की क्रियाओं का पूर्णरूपेण अध्ययन व निरीक्षण कर पाये लेकिन रोगी उसे न देख सके। अब मनोविश्लेषक के व्यवहार से प्रेरित व सन्तुष्ट व्यक्ति उस पर पूरी तरह विश्वास प्रदर्शित करता है। यद्यपि शुरू में प्रतिरोध की अवस्था के कारण रोगी कुछ व्यक्त करना नहीं चाहता, किन्तु उत्तेजक शब्दों के प्रयोग से उसे पूर्व-अनुभव दोहराने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके बाद स्थानान्तरण की अवस्था के अन्तर्गत दो बातें होती हैं-(i) रोगी चिकित्सक को भला-बुरा कहता या गाली बकता है अथवा (ii) रोगी मनोविश्लेषक पर मुग्ध हो जाता है और उसकी हर एक बात मानता है। शनैः-शनै: रोगी अपनी समस्त बातों की जानकारी मनोविश्लेषक को दे देता है, जिससे उसकी उलझनें समाप्त हो जाती हैं और वह सामन्य व समायोजित हो जाता है।

प्रश्न 4.
किन्हीं दो मनोरक्षा युक्तियों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बनाये रखने का एक उपाय मनोरक्षा युक्तियाँ (Defence Mechanisms) भी हैं। मनोरक्षा युक्तियाँ वे चेतन और अचेतन प्रक्रियाएँ हैं जिनसे आन्तरिक अन्तर्द्वन्द्व कम होता है अथवा समाप्त हो जाता है। दो मुख्य मनोरक्षा युक्तियों का सामान्य विवस्ण निम्नलिखित है –

(1) दमन (Repression) – दमन एक मुख्य एवं प्रधान मनोरक्षा युक्ति है। इस मनोरक्षा युक्ति के माध्यम से सम्बन्धित व्यक्ति अपनी अप्रिय एवं समाज-विरोधी इच्छाओं, कटुस्मृतियों एवं घटनाओं को मन के चेतन स्तर से हटाकर अचेतन स्तर पर भेज देता हैं दमन से कुछ हद तक मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा में सहायता प्राप्त होती है, परन्तु निरन्तर दमन की मनोरक्षा युक्ति को अपनाने से कुछ प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

(2) प्रक्षेपण (Projection) – प्रेक्षपण भी एक सामान्य रूप से पायी जाने वाली मनोरक्षा युक्ति है। व्यवहार में देखा जा सकता है कि कभी-कभी व्यक्ति में कुछ दोष या कमियाँ होती हैं, परन्तु वह इन दोषों की जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता। ऐसे में वह अपने आप को दोष-रहित समझने के लिए अपने दोषों या कमियों को अन्य व्यक्तियों पर थोपता या आरोपित करता है। इस प्रकार के दोषारोपण से वह सन्तुष्टि महसूस करता है। यही प्रक्षेपण है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.

निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. मानसिक स्वास्थ्य एवं सन्तुलन बनाये रखने में सहायक विज्ञान को ……………….. के नाम से जाना जाता है।
  2. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का जन्मदाता ……………….. नामक मनोवैज्ञानिक को माना जाता है।
  3. शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य में ……………….. है।
  4. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति बौद्धिक एवं संवेगात्मक रूप में ……………….. होता है।
  5. जीवन की वास्तविकताओं को स्वीकार कर उनका सामना करना ……………….. का लक्षण है।
  6. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का जीवन के प्रति ……………….. दृष्टिकोण होता है।
  7. नवीन परिस्थितियों में समायोजन की योग्यता ……………….. कहलाती है।
  8. मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने व्यवसाय से ……………….. होता है।
  9. मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के जीवन में ……………….. की कमी होती है।
  10. व्यक्ति में अतिशयता की उपस्थिति-मानसिक ……………….. का लक्षण है।
  11. मन के तीन पक्षों, इड, इगों एवं सुपर-इगो में ……………….. व्यक्तित्व का तार्किक, व्यवस्थित एवं विवेकपूर्ण भाग है।
  12. शारीरिक विकलांगता तथा दीर्घकालिक रोगों का मानसिक स्वास्थ्य पर ……………….. प्रभाव पड़ता है।
  13. अत्यधिक मानसिक दबाव, मानसिक तनाव तथा दमित भावना ग्रन्थियाँ भी मानसिक स्वास्थ्य पर। ……………….. प्रभाव डालती हैं।
  14. सुझाव, निद्रा तथा समुचित विश्राम का मानसिक स्वास्थ्य पर ……………….. प्रभाव पड़ता है।
  15. उदात्तीकरण एक ……………….. है।
  16. सिगमण्ड फ्रायड द्वारा दी गई मानसिक अस्वस्थता के उपचार की विधि को ……………….. कहते हैं।
  17. मनोविश्लेषण का व्यापक प्रयोग ……………….. ने किया है।

उत्तर :

  1. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान
  2. डब्ल्यू० बीयर
  3. घनिष्ठ सम्बन्ध
  4. परिपक्व
  5. उत्तम मानसिक स्वास्थ्य
  6. यथार्थ
  7. समायोजन शीलता
  8. सन्तुष्टे
  9. समायोजन
  10. अस्वस्थता
  11. सुपर इगो
  12. प्रतिकूल
  13. प्रतिकूल
  14. अनुकूल
  15. मनोरक्षा युक्ति
  16. मनोविश्लेषण
  17. सिगमण्ड फ्रायड

प्रश्न II.

निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान से क्या आशय है?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान वह विज्ञान है जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, उसे मानसिक रोगों से मुक्त रखता है। तथा व्यक्ति मानसिक विकार/रोग अथवा समायोजन के दोषों से ग्रस्त हो जाता है तो उसके कारणों का निदान करके समुचित उपचार की व्यवस्था का प्रयास करता है।

प्रश्न 2.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति की सर्वप्रथम स्थापना किसने तथा कब की थी?
उत्तर :
‘मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान समिति की स्थापना 1908 ई० में डब्ल्यू बीयर नामक मनोवैज्ञानिक ने की थी।

प्रश्न 3.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के तीन मुख्य कार्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान के तीन मुख्य कार्य हैं –

  1. मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा
  2. मानसिक रोगों की रोकथाम तथा
  3. मानसिक रोगों को प्रारम्भिक उपचार।

प्रश्न 4.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की ड्रेवर द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
ड्रेवर के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का अर्थ है-मानसिक स्वास्थ्य के नियमों की खोज करना और उसको सुरक्षित रखने के उपाय करना।”

प्रश्न 5.
मानसिक स्वास्थ्य की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
एच० आर० भाटिया के अनुसार, “मानसिक स्वास्थ्य यह बताता है कि कोई व्यक्ति जीवन की माँगों और अवसरों के प्रति कितनी अच्छी तरह से समायोजित है।”

प्रश्न 6.
मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति का एक मुख्य लक्षण बताइए।
उत्तर :
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समय-समय पर आत्म-निरीक्षण करता है।

प्रश्न 7.
मानसिक अस्वस्थता से क्या आशय है?
उत्तर :
मानसिक अस्वस्थता वह स्थिति है जिसमें जीवन की आवश्यकताओं को। सन्तुष्ट करने में व्यक्ति स्वयं को असमर्थ पाता है तथा संवेगात्मक असन्तुलन का शिकार हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में बहुत-सी मानसिक विकृतियाँ या व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कहा जाता है।

प्रश्न 8.
मानसिक अस्वस्थता के चार मुख्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. साधारण समायोजन का दोष
  2. मनोरुग्णतो
  3. मनोदैहिक रोग तथा
  4. मनस्ताप।

प्रश्न 9.
मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न करने वाले चार प्रत्यक्ष कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. अत्यधिक थकान एवं परिश्रम
  2. संवेगात्मक असन्तुलन
  3. मानसिक दौर्बल्य तथा
  4. यौन-हताशाएँ।

प्रश्न 10.
मानसिक स्वास्थ्य पर किस मनोवैज्ञानिक कारक का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
प्रबल मानसिक संघर्ष का मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 11.
गम्भीर मानसिक अस्वस्थता के उपचार के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. आघात चिकित्सा विधि
  2. रासायनिक विधि तथा
  3. मनोशल्य चिकित्सा।

प्रश्न 12.
बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वाधिक प्रभाव किस संस्था का पड़ता है?
उत्तर :
बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वाधिक प्रभाव परिवार नामक संस्था का पड़ता है।

प्रश्न 13.
परिवार के बाद बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर किस संस्था का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
परिवार के बाद बालक के मानसिक स्वास्थ्य पर विद्यालय का प्रभाव पड़ता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए 

प्रश्न 1.
“मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का सम्बन्ध मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने तथा मानसिक अस्वस्थता को रोकने से है।” यह परिभाषा प्रतिपादित की है –
(क) फ्रायड ने
(ख) हैडफील्ड ने
(ग) ड्रेवर ने।
(घ) भाटिया ने

प्रश्न 2.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान उपयोगी एवं आवश्यक है –
(क) केवल गम्भीर मानसिक रोगियों के लिए
(ख) केवल पथभ्रष्ट व्यक्तियों के लिए।
(ग) सभी व्यक्तियों के लिए।
(घ) किसी के लिए भी नहीं

प्रश्न 3.
मानसिक स्वास्थ्य पर किस कारक का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
(क) उत्तम पोषण का
(ख) शारीरिक सौन्दर्य का
(ग) शारीरिक विकलांगता का
(घ) इन सभी कारकों का

प्रश्न 4.
मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने के नियम तथा उपाय बताने वाले विज्ञान को कहते हैं –
(क) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(ख) प्राकृतिक चिकित्साशास्त्र
(ग) मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान का जीवन के किस क्षेत्र में महत्त्व है?
(क) जीवन के असामान्य क्षेत्रों में
(ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
(ग) जीवन के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में
(घ) जीवन के किसी भी क्षेत्र में नहीं

प्रश्न 6.
पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक है
(क) मानसिक रूप से स्वस्थ होना
(ख) शारीरिक रूप से स्वस्थ होना
(ग) संवेगात्मक रूप से स्वस्थ होना
(घ) ये सभी

प्रश्न 7.
मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में पाये जाने वाले लक्षण हैं
(क) व्यवहार में परिपक्वता तथा सर्वांग जीवन
(ख) समुचित आत्म-निरीक्षण
(ग) सम्मोहन पद्धति
(घ) उपर्युक्त सभी लक्षण

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन मानसिक स्वास्थ्य का सूचक नहीं है?
(क) वास्तविकता से समायोजन
(ख) सन्तुलित क्रियाशीलता
(ग) वास्तविकता को स्वीकार करना
(घ) आत्मविश्वास की कमी

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का लक्षण है?
(क) संवेगात्मक अस्थिरता
(ख) अतिशयता की उपस्थिति
(ग) आत्मविश्वास की कमी
(घ) नियमित जीवन

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन मानसिक अस्वस्थता से सम्बन्धित है?
(क) दिमागी बुखार
(ख) कैंसर
(ग) तपेदिक
(घ) असंगत भय

प्रश्न 11.
मानसिक अस्वस्थता की रोकथाम के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है –
(क) समय पर डॉक्टरी जाँच
(ख) आत्मसम्मान की, सन्तुष्टि
(ग) बालक का उचित लालन-पालन
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 12.
मानसिक उपचार की वह पद्धति क्या कहलाती है, जिसके अन्तर्गत सम्बन्धित मानसिक रोगी को अचेतनावस्था में ले जाकर आवश्यक निर्देश दिये जाते हैं
(क) सुझाव एवं संकेत पद्धति
(ख) आघात चिकित्सा पद्धति
(ग) सम्मोहन पद्धति
(घ) मनोविश्लेषण पद्धति

प्रश्न 13.
मनोविश्लेषण विधि की खोज किस मनोवैज्ञानिक द्वारा की गयी थी?
(क) सिगमण्ड फ्रॉयड
(ख) थॉर्नडाइक
(ग) गार्डनर मर्फी
(घ) पैवलोव

प्रश्न 14.
इड, इगो तथा सुपर इगो का वर्णन किसने किया है?
(क) युंग ने
(ख) बिने ने।
(ग) फ्रॉयड ने
(घ) एडलर ने

प्रश्न 15.
मन के तीन गत्यात्मक पक्षों इड, ईगो और सुपर इगो के सम्बोधन का वर्णन किया है –
(क) फ्रॉयड ने
(ख) जोन्स ने
(ग) मैक्डूगल ने।
(घ) तुष्ट ने

प्रश्न 16.
सामाजिक नैतिकता से संचालित होता है।
(क) इदम्
(ख) अहम्
(ग) पराहं।
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 17.
प्रसिद्ध कहावत “अंगूर खट्टे हैं” किस मानसिक मनोरंजन से सम्बंधित है?
(क) दमन
(ख) प्रतिक्रिया निर्माण
(ग) विस्थापन
(घ) युक्तिकरण

प्रश्न 18.
अहम् की रक्षा के लिए प्रयोग की जाने वाली रक्षा-युक्ति है –
(क) कुण्ठा
(ख) अन्तर्द्वन्द्व
(ग) दमन
(घ) दुश्चिन्ता

उतर :

  1. (ख) हैडफील्ड ने
  2. (ग) सभी व्यक्तियों के लिए
  3. (ग) शारीरिक विकलांगता का
  4. (ग) मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान)
  5. (ख) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
  6. (घ) ये सभी
  7. (घ) उपर्युक्त सभी लक्षण
  8. (घ) आत्मविश्वास की कमी
  9. (घ) नियमित जीवन
  10. (घ) असंगत भय
  11. (ग) बालक का उचित लालन-पालन
  12. (ग) सम्मोहन पद्धति
  13. (क) सिगमण्ड फ्रॉयड
  14. (ग) फ्रायडने
  15. (क) फ्रायड ने
  16. (ग) पराहं
  17. (ख) प्रतिक्रिया निर्माण
  18. (ग) दमन।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Psychological Experiments
(मनोवैज्ञानिक प्रयोग)
Number of Questions Solved 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments (मनोवैज्ञानिक प्रयोग)

नोट – कक्षा 11 के नवीनतम पाठ्यक्रम में दो प्रयोगों को लिखने का प्रावधान है। ये प्रयोग हैं –

  1. प्रत्यक्षीकरण में तत्परता तथा
  2. अवधान विस्तार। दोनों प्रयोगों का प्रारूप निम्नवर्णित है।

प्रश्न 1.
‘प्रत्यक्षीकरण में तत्परता सम्बन्धी प्रयोग का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
प्रयोग – प्रत्यक्षीकरण में तत्परता

  1. प्रयोग का शीर्षक – प्रत्यक्षीकरण में तत्परता
  2. दिनांक – 02.01.2018
  3. वार या दिन – सोमवार
  4. समय – 10:45 प्रातः
  5. स्थान – कानपुर
  6. प्रयोज्य या विषय-पात्र का नाम – कु० अनिता गर्ग
  7. विषय-पात्र की आयु – 17 वर्ष
  8. प्रयोगकर्ता – रघुबीर शर्मा
  9. विषय-पात्र की शारीरिक एवं मानसिक दशा – सामान्य रूप से स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त।

प्रयोग की निर्धारित समस्या – प्रत्यक्षीकरण पर व्यक्ति की तत्परता के प्रभाव को ज्ञात करना या जानना।

प्रयोग की ओवश्यक सामग्री – स्टॉप वाच, दो भिन्न शब्द-सूचियाँ, जिनमें भिन्न-भिन्न दस-दस शब्द हैं। इन शब्द-सूचियों को तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होता है कि प्रत्येक शब्द में कुल पाँच अक्षर ही हैं। इस प्रकार से चुने हुए शब्दों के अक्षरों को आगे-पीछे करके अव्यवस्थित रूप में लिख लिया जाता है। दोनों शब्द-सूचियों को अलग-अलग कागजों पर अव्यवस्थित रूप में लिख लिया जाता है। इसके अतिरिक्त कागज की एक अन्य शीट भी ली जाती है। जिसमें एक खिड़की कटी होती है, जिसमें से केवल एक ही शब्द दिखाई देता है।

चुने गये शब्दों की प्रथम सूची – प्रयोग के लिए पाँच अक्षर वाले शब्दों की प्रथम सूची में निम्नलिखित दस शब्दों को सम्मिलित किया जा सकता है। ये शब्द परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, बल्कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं –

  1. NRATT (Train)
  2. URGAS (Sugar)
  3. RHMAC (March)
  4. TVOES (Stove)
  5. NEGER (Green)
  6. NEFIK (Knife)
  7. LUCOD (Cloud)
  8. OTOTH (Tooth)
  9. MPSAT (Stamp)
  10. GLVEO (Glove)

चुने गये शब्दों की द्वितीय सूची – प्रयोग के लिए पाँच अक्षर वाले शब्दों की द्वितीय सूची में केवल उन्हीं शब्दों को सम्मिलित किया गया है जिनका सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में विद्यालय से है। इस वर्ग के दस शब्द निम्नलिखित हो सकते हैं –

  1. CHIDL (Child)
  2. LOSOT (Stool)
  3. SCSLA (Class)
  4. HNBEC (Bench)
  5. HCKLA (Chalk)
  6. ICAHR (Chair)
  7. RDOBA (Board)
  8. LETAB (Table)
  9. PREPA (Paper)
  10. ELRCK (Clerk)

प्रयोग-विधि – प्रयोग प्रारम्भ करते हुए पहले चुने गये अव्यवस्थित शब्दों की प्रथम सूची को लिया जाता है। इसके साथ ही कागज की उस शीट को भी लिया जाता है जिसमें एक शब्द दिखाने वाली खिड़की कटी हुई है। शब्द सूची के ऊपर खिड़की वाली शीट को रखकर विषय-पात्र के सामने रखा जाता है तथा उसे खिड़की में से किसी एक अव्यवस्थित शब्द को दिखाया जाता है तथा उसे निर्देश दिया जाता है कि वह उस शब्द को व्यवस्थित रूप में बताये। विषय-पात्र को अपना उत्तर मौखिक रूप में ही देना होता है। प्रत्येक शब्द को केवल 30 सेकण्ड के लिए ही दिखाया जाता है। समय की सीमा निर्धारित करने के लिए स्टॉप वाच का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार एक-एक करके सभी दस शब्दों को विषय-पात्र को दिखाया जाता है तथा प्रत्येक बार विषय-पात्र द्वारा दिये गये उत्तर को नोट कर लिया जाता है। शब्दों की प्रथम सूची पूरी हो जाने के उपरान्त विषय-पात्र को कुछ विश्राम दिया जाता है। विश्राम के उपरान्त विषय-पात्र के सम्मुख चुने गये शब्दों की द्वितीय सूची को क्रमश: प्रस्तुत किया जाता है। इस सूची के शब्दों को दिखाने से पहले विषय-पात्र को सूचित कर दिया जाता है कि इस सूची में सम्मिलित सभी शब्द किसी-न-किसी रूप में विद्यालय के वातावरण से लिए गये हैं। इस सूचना को देने के उपरान्त प्रथम सूची के ही समान विषय-पात्र के सम्मुख एक-एक करके सभी दस शब्द 30-30 सेकण्ड के लिए प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रत्येक उत्तर को नोट कर लिया जाता है। तथा उत्तर देने में लगे समय अर्थात् प्रतिक्रिया-काल को भी नोट कर लिया जाता है। यदि विषय-पात्र किसी शब्द का उत्तर नहीं दे पाता तो उसको प्रतिक्रिया काल 30 सेकण्ड ही मान लिया जाता है।

प्रदत्त निरूपण – उपर्युक्त प्रयोग से प्राप्त सभी परिणामों को निम्नलिखित तालिका में व्यवस्थित ढंग से लिख लिया जाता है –UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 1

सावधानियाँ – प्रयोग में निम्नलिखित सावधानियों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है –

  1. विषय-पात्र को एक समय में केवल एक ही शब्द दिखाया जाना चाहिए।
  2. प्रयोग-स्थल का वातावरण पूर्ण रूप से शान्त तथा सुविधाजनक होना चाहिए।
  3. प्रतिक्रिया काल का मापन शुद्ध होना चाहिए।

परिणाम एवं निष्कर्ष – अव्यवस्थित शब्दों की दोनों सूचियों के प्रतिक्रिया काल का औसत मान ज्ञात किया तथा उनकी तुलना की गयी। इस तुलना से ज्ञात हुआ कि प्रथम सूची के शब्दों को व्यवस्थित करने में दूसरी सूची की तुलना में लगभग दो गुना समय लगा। इस परिणाम के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षीकरण मर विषय-पात्र की तत्परता का प्रभाव अनिवार्य रूप से, पड़ता है।

प्रश्न 2.
पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार के प्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रयोग-पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार

  1. प्रयोगकर्ता का नाम – महेन्द्र
  2. प्रयोज्य का नाम – राकेश
  3. प्रयोज्य की आयु – 20 वर्ष
  4. प्रयोज्य की शारीरिक एवं मानसिक अवस्था – सामान्य
  5. दिनांक – 03.01.2018
  6. दिन – मंगलवार
  7. समय – प्रात: 9 बजे

प्रयोग की पृष्ठभूमि – एक साथ एक दृष्टि में व्यक्ति जितने अक्षर देख लेता है, वह उसका ‘पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण’ या ‘अवधान-विस्तार’ कहलाता है। एक दृष्टि में जो व्यक्ति अधिक शब्द पढ़ लेता है उसकी पढ़ने की गति तीव्र होती है तथा जो कम शब्द पढ़ता है उसकी गति मन्द होती है। एक दृष्टि में व्यक्ति जितने निरर्थक अक्षर और सार्थक शब्दों को देख सकता है या पढ़ सकता है, उसे नापा जा सकता है। पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार के मापन के लिए टेचिस्टोस्कोप का निर्माण हैमिल्टन (Hamilton) ने किया तथा प्रयोग कैटेल (Cattle) ने 1885 ई० में किया।

समस्या – इंस प्रयोग में प्रयोगकर्ता के समक्ष निम्नलिखित समस्याएँ थीं –

  1. प्रयोज्य की, प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया को समझना।
  2. प्रयोज्य के सार्थक और निरर्थक शब्दों को पढ़ने की योग्यता की जाँच करना।
  3. प्रयोज्य के सार्थक और निरर्थक शब्दों के बोध विस्तार का निर्धारण करना।।

परिकल्पना – निरर्थक शब्दों की अपेक्षा सार्थक शब्दों को पढ़ने की क्षमता और बोध-स्तर अधिक होता है।

यन्त्र एवं उपकरण – टेचिस्टास्कोप, निरर्थक शब्दों की तीन सूचियाँ, सार्थक शब्दों की तीन सूचियाँ, कागज, पेन्सिल आदि।

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 2UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 3

तैयारी – प्रयोज्य को टेचिस्टास्कोप से इतनी दूरी पर बैठाया कि कार्ड पर दिखाये जाने वाले अक्षरों को वह आसानी से पढ़ सके। टेचिस्टोस्कोप में दो अक्षरों वाले सार्थक कार्ड को सबसे पहले लगाया।

निर्देश – सभी तैयारी करने के बाद प्रयोगकर्ता ने प्रयोज्य को निम्नलिखित निर्देश दिये

  1. सर्वप्रथम मैं आपसे सावधान कहूँगा’, ‘सावधान’ कहते ही आप अपना ध्यान यन्त्र की खिड़की पर लगाना और आरम्भ कहते ही एक कार्ड आपको खिड़की पर दिखाया जाएगा, जिस पर कुछ अक्षर लिखे होंगे, इन अक्षरों को आपको पढ़ना होगा।
  2. जब आप पहले कार्ड के अक्षरों को पढ़ लोगे तो उससे अधिक अक्षरों वाले कार्ड बारी-बारी से दिखाये जाएँगे।
  3. जब किसी कार्ड के अक्षर आप एक बार में सही नहीं पढ़ पाओगे तो उतने ही अक्षरों वाला। दूसरा कार्ड आपको दिखाया जाएगा। केवल तीन बार ही एक कार्ड दिखाया जा सकता है।
  4. जब आप एक ही तरह के तीन कार्ड नहीं पढ़ पाओगे तो प्रयोग समाप्त हो जाएगा। अन्त में आपसे अन्तर्दर्शन रिपोर्ट ली जाएगी।

वास्तविक प्रयोग – निर्देश देने के पश्चात् प्रयोगकर्ता ने प्रयोग प्रारम्भ किया। ‘प्रारम्भ’ कहते ही दो अक्षरों वाले सार्थक शब्द के कार्ड को टेचिस्टास्कोप की खिड़की में से दिखाया। प्रयोज्य ने उसे ठीक पढ़ दिया। इसके बाद क्रमश: एक-एक करके सभी कार्ड उसी प्रकार खिड़की में से दिखाये गये और प्रयोज्य ने उन्हें सही-सही पढ़ दिया। अन्त में आठ अक्षरों वाला सार्थक शब्द का कार्ड प्रयोज्य जब तीन बार में भी नहीं पढ़ सका तो यहीं पर प्रयोग रोक दिया।

इसके बाद प्रयोग का दूसरा भाग शुरू किया। अब पहले दो अक्षरों वाले निरर्थक शब्द का कार्ड लगाया। इसमें प्रयोज्य ने केवल पाँच कार्ड सही रूप से पढ़े। छठे कार्ड को प्रयोज्य नहीं पढ़ सका; अत: प्रयोग यहीं पर समाप्त कर दिया।

सावधानियाँ – प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखी गयीं –

  1. टेचिस्टास्कोप को इतना ऊँचा रखा गया जिससे प्रयोज्य ठीक से कार्ड को देख सके।
  2. टेचिस्टास्कोप की खिड़की पर उचित प्रकाश की व्यवस्था की गयी।
  3. वातावरण शान्त रखा गया।

परिणाम – प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम इस प्रकार प्राप्त हुए—प्रयोज्य ने सार्थक शब्दों में से सात अक्षरों वाले शब्दों को पढ़ा और निरर्थक शब्दों में वह पाँच अक्षर वाले शब्दों तक ही पढ़ सका। इस प्रकार प्रयोग के परिणाम से स्पष्ट है कि सार्थक शब्दों का उसका अवधान-विस्तार सात है और “निरर्थक शब्दों का अवधान विस्तार पाँच है।

अन्तर्दर्शन रिपोर्ट – प्रयोग समाप्त होते ही प्रयोज्य ने अपनी अन्तर्दर्शन रिपोर्ट में इस प्रकार कहा, “प्रारम्भ में मुझे काफी कठिनाई का अनुभव हो रहा था लेकिन कार्ड पर लिखे गये अक्षरों की संख्या कम होने के कारण मुझे पढ़ने में आसानी हुई। निरर्थक शब्दों को पढ़ने में सार्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक कठिनाई का अनुभव हुआ।

निष्कर्ष – इस प्रयोग के आधार पर प्रयोगकर्ता ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले –

  1. निरर्थक शब्दों को पढ़ने में सार्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक कठिनाई होती है।
  2. सार्थक शब्दों का अवधान-विस्तार, निरर्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक होता है।
  3. इस प्रयोग में गैस्टाल्टवादियों द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्षीकरण में समग्रता का नियम प्रभावित करता है। इसी कारण प्रयोज्य गलती को नहीं समझ पाता।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline (भूगोल एक विषय के रूप में)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्नलिखित में से किस विद्वान ने भूगोल (Geography) शब्द (Term) का प्रयोग किया?
(क) हेरोडटस
(ख) गैलिलियो
(ग) इरैटोस्थेनीज
(घ) अरस्तू
उत्तर- (ग) इरैटोस्थेनीज।

प्रश्न (i) निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?
(क) पत्तन
(ख) मैदान
(ग) सड़क
(घ) जल उद्यान
उत्तर- (ख) मैदान।

प्रश्न (ii) स्तम्भ I एवं II के अन्तर्गत लिखे गए विषयों को पढ़िए
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 1
सही मेल को चिह्नांकित कीजिए
(क) 1 ब, 2 स, 3 अ, 4 द
(ख) 1 द, 2 ब, 3 स, 4 अ
(ग) 1 अ, 2 द, 3 ब, 4 स
(घ) 1 स, 2 अ, 3 द, 4 ब
उत्तर- (घ) 1 स, 2 अ, 3 द, 4 ब।

प्रश्न (iv) निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण संबंध से जुड़ा हुआ है?
(क) क्यों
(ख) क्या
(ग) कहाँ
(घ) कब
उत्तर- (ख) क्या।

प्रश्न (v) निम्नलिखित में से कौन-सा विषय कालिक संश्लेषण करता है?
(क) समाजशास्त्र
(ख) मानवशास्त्र
(ग) इतिहास
(घ) भूगोल
उत्तर- (ग) इतिहास।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर- सांस्कृतिक लक्षणों में वे सभी भूदृश्य सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मनुष्य अपनी-विन्नि प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं। ग्राम, नगर, सड़कें, रेल, बन्दरगाह, बाजार, खेत, कारखाने, इमारतें आदि, सांस्कृतिक भूदृश्यों के ही लक्षण हैं। हम विद्यालय जाते समय इन लक्षणों को पर्यवेक्षण करते हैं। ये लक्षण समय के साथ-साथ असमान होते हैं। इन लक्षणों को भगोल के अध्ययन में सम्मिलित किया जाता है, क्योंकि इनके द्वारा ही सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण होता है, जिसका भौतिक पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है। भौतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण का समग्र अध्ययन ही भूगोल की प्रमुख विषय-वस्तु है। इसलिए सांस्कृतिक लक्षणों को भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

प्रश्न (ii) आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना है?
उत्तर- टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी में से पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती आकृति वाली वस्तु संतरा है। संतरा पृथ्वी की आकृति के समान ही सिरों पर चपटा है। इसलिए पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए इसका चुनाव तर्कसंगत है।

प्रश्न (iii) क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधारोपण क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थैतिक संतुलन बनाए रखते हैं?
उत्तर- विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन किया जाता है। वन मनुष्य के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं, इनके अनेक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ हैं, इसलिए पौधारोपण का कार्य किया जाता है। पौधारोपण से वृक्षों के क्षेत्र का विस्तार होता है, वृक्ष या वन क्षेत्र के विस्तार से पारिस्थैतिक तंत्र संतुलित रहता है। वृक्ष भूमि एवं मिट्टी अपरदन और भू-क्षरण को ही नहीं रोकते बल्कि वन्य जीवों को आवास भी प्रदान करते हैं तथा जलवायु चक्र को सन्तुलित रखते हुए हरित गृह प्रभाव को नियन्त्रित करते हैं।

प्रश्न (iv) आपने हाथी, हिरण, केंचुए, वृक्ष एवं घास देखे हैं। वे कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मंडल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मंडल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?
उत्तर- हमने हाथी, हिरण, केंचुए वृक्ष एवं घास देखे हैं। ये सभी जीव मंडल में रहते हैं। जीवों का यह आवास स्थल जैवमंडल कहलाता है। इस मंडल की सीमा जल, वायु एवं स्थलमंडल के सम्पर्क क्षेत्र में उसी सीमा तक विस्तृत होती है जहाँ जीवों के विकास की अनुकूल दशाएँ विद्यमान रहती हैं। विभिन्न प्रकार के जीव इसी मंडल में उत्पन्न होते हैं तथा निवास करते हुए अपना विकास करते हैं, क्योंकि इस मंडल से जीवों के जीवन एवं विकास की सभी आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।

प्रश्न (v) आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुँचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी को क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान या, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते हैं?
उत्तर- अपने निवास से विद्यालय जाने में आधे घंटे का समय लगता है। यदि विद्यालय हमारे घर की सड़क के उस पार होता तो विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता। आने-जाने के समय पर दूरी का प्रभाव पड़ता है। अधिक दूरी होने पर समय अधिक तथा कम दूरी होने पर समय कम लगता है। समय को स्थान या इसके विपरीत स्थान को समय में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए-अपने निवास स्थान से विद्यालय तक की दूरी पैदल पूरी करने पर समय अधिक लगेगा परन्तु किसी वाहन द्वारा दूरी को कम समय में पूरा किया जा सकता है। अतः समय को स्थान या इसके विपरीत स्थान को समय में इस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है कि विद्यालय निवास से 3 किमी या 30 मिनट दूर है जिसे वाहन द्वारा पहुँचकर 10 मिनट दूर कहा जा सकता है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) आप अपने परिस्थान (surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं, कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तथ्यों में भिन्नता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पशु एवं पक्षी जिसे आप देखते हैं भिन्न-भिन्न होते हैं। ये सभी भिन्न तत्व धरातल पर पाए जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं। कि भूगोल प्रादेशिक/क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है?
उत्तर- क्षेत्रीय विभिन्नता
प्राचीन काल से ही मानव अपने निकटवर्ती क्षेत्र (परिवेश) के विषय में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु एवं प्रयत्नशील रहा है। इन जिज्ञासाओं को पूरा करने के लिए ही उसने विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक जानकारियाँ प्राप्त की हैं, जिसके अन्तर्गत उसे विविधताओं के दर्शन हुए हैं। वह जान सका है कि एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र से भिन्न है। अत: हमें पृथ्वी पर भौतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में अनेक प्रकार की भिन्नताएँ दिखाई देती हैं। इसलिए भूगोल को क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन करने वाला विषय मानना तर्कसंगत लगता है।

क्षेत्रीय विभिन्नता का अर्थ-18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में जब भूगोल को विज्ञान के रूप में स्वीकार कर लिया गया तब से ही प्राकृतिक वातावरण एवं मानव के सम्बन्धों के अध्ययन भूगोल की प्रमुख विषय-वस्तु रहे हैं। पहले प्रकृतिवादियों ने मानव को प्रकृति का दास के रूप में सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, तो बाद में विद्वानों ने प्रकृति के ऊपर मानवीय वर्चस्व की मान्यता को स्थापित करने का प्रयास किया है। दोनों विश्वयुद्धों के मध्य में प्रकृति एवं मानव के बीच एक सन्तुलित स्थिति के अध्ययन की मान्यता विकसित हुई। इसी क्रम में प्रादेशिक/क्षेत्रीय अध्ययन की परम्परा स्थापित हुई जिसका मुख्य उद्देश्य प्रादेशिक या क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन हो गया, तभी से क्षेत्रीय विभिन्नता भौगोलिक अध्ययन की एक महत्त्वपूर्ण संकल्पना के रूप में विकसित होती गई है।

क्षेत्रीय विभिन्नता की विचारधारा को विकसित एवं प्रचलित करने का मुख्य श्रेय जर्मन भूगोलवेत्ता अल्फ्रेड हेटनर को है। हेटनर ने ही 1905 ई० में बताया कि भूगोल पृथ्वी के क्षेत्रों या स्थानों का क्षेत्र विवरण सम्बन्धी विज्ञान है। इससे क्षेत्रों की विभिन्नताओं के विशिष्ट संबंधों का अध्ययन किया जाता है। क्षेत्रीय विभिन्नता की विशेषता–क्षेत्रीय विभिन्नता की प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत किसी भी क्षेत्र के विषय में जो भौगोलिक अध्ययन किया जाता है उसमें समरूपता एवं विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं अर्थात् किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में प्रथम दृष्टया भौगोलिक कारकों की समरूपता पाई जाती है, किन्तु यह समरूपता सूक्ष्म स्तर पर ही परिलक्षित होती है, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न होती है। व्यापक रूप में भौगोलिक परिदृश्यों में कुछ ही अंतराल पर विभिन्नताएँ प्रकट होने लगती हैं। भौगोलिक तत्त्वों की समानता में विभिन्नता की इसी सच्चाई के कारण सम्पूर्ण स्थलमंडल को अनेकानेक वृहत् एवं सूक्ष्म क्षेत्रों या प्रदेशों में विभाजित किया जाता है। इसी के आधार पर भूगोल में प्रादेशीकरण या प्रादेशिक भूगोल का सूत्रपात हुआ है।

अतएव पृथ्वी पर भौतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण के अनेक तत्त्वों में समानताएँ और विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। भूगोलवेत्ता इन विभिन्नताओं की पहचान करता है और इनके कारणों की खोज करता है जिससे दो तत्त्वों या एक से अधिक तत्त्वों के मध्य कार्यकारण संबंधों को ज्ञात किया जा सके।

प्रश्न (ii) आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।
उत्तर- भूगोल एक समाकलित विषय भूगोल एक संश्लेषणात्मक (Synthesis) विषय है। इसको अंतरापृष्ठ (Interface) संबंध सभी प्राकृतिक (भौतिक) एवं सामाजिक विज्ञानों से है। प्राकृतिक विज्ञानों से अंतरापृष्ठ संबंध के रूप में परंपरागत भौतिक भूगोल-भौमिकी, मौसम विज्ञान, जल विज्ञान, मृदा विज्ञान, भू-आकृति विज्ञान, खगोल विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा प्राणि विज्ञान आदि से निकट का संबंध रखता है। जबकि सामाजिक विज्ञान के सभी विषय, यथा—इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, जनांकिकी आदि भी भूगोल से सम्बन्धित हैं।
निम्न चित्र 1.1 अन्य विज्ञानों से अंतरापृष्ठ संबंध दर्शाता है जिससे भूगोल के समाकलन विषय का स्वरूप स्पष्ट होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 2
वस्तुतः विज्ञान से संबंधित सभी विषय भूगोल से जुड़े हैं। क्योंकि उनके कई तत्त्व क्षेत्रीय संदर्भ में भिन्न-भिन्न होते हुए भी यथार्थता को समग्रता से समझने में सहायक हैं। सभी प्राकृतिक या सामाजिक विज्ञानों का एक मूल उद्देश्य यथार्थती को ज्ञात करना है। भूगोल यथार्थता से जुड़े तथ्यों के साहचर्य को बोधगम्य बनाता है। अत: भूगोल स्थानिक संदर्भ में यथार्थता को समग्रता से समझने में ही सहायक नहीं है अपितु यह सभी विषयों को समाकलित भी करता है। इसके उपागम की प्रकृति समग्रात्मक (Holistic) होती है। यह विषय इस तथ्य को मानता है कि विश्व एक परस्पर निर्भर तन्त्र है। आज वर्तमान विश्व से एक वैश्विक ग्राम का बोध होता है जिसमें परिवहन एवं सूचना तकनीकी साधनों ने स्थानिक दूरी को न्यूनतम करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे स्थानिक विशेषताओं को और अधिक स्पष्टता प्राप्त हुई है। इस प्रकार भूगोल अब पहले से भी अधिक समग्रता के आधार पर अन्य विज्ञानों से अंतरापृष्ठ रूप से संबंधित विषय माना जाता है जिसके द्वारा इसके समाकलित दर्शन का बोध होता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. “भूगोल एक क्षेत्रीय विवरण विज्ञान है।” यह कथन है
(क) हार्टशोर्न का
(ख) हैटनर का
(ग) कार्ल रिटर का
(घ) हम्बोल्ट का
उत्तर- (ख) हैटनर का।

प्रश्न 2. भौतिक भूगोल के अन्तर्गत हम अध्ययन करते हैं
(क) भूगणितीय भूगोल’का
(ख) ऋतुविज्ञान एवं जलवायु विज्ञान का
(ग) समुद्र विज्ञान का
(घ) इन सभी का ।
उत्तर- (घ) इन सभी का।।

प्रश्न 3. जर्मन विद्वान रैटजेल प्रतिपादक थे
(क) क्षेत्रीय भिन्नता की संकल्पना के
(ख) पार्थिव एकता की संकल्पना के
(ग) कालगत परिवर्तन की संकल्पना के
(घ) भौगोलिक वितरण की संकल्पना के
उत्तर- (ख) पार्थिव एकता की संकल्पना के।

प्रश्न 4. निम्नलिखित में कौन-सी भौतिक भूगोल की शाखा नहीं है?
(क) मृदा विज्ञान
(ख) जैव भूगोल
(ग) पारिस्थितिकी भूगोल
(घ) भू-आकृति विज्ञान
उत्तर- (ग) पारिस्थितिकी भूगोल।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन-सी शाखा मानव भूगोल की शाखा है?
(क) जलवायु विज्ञान
(ख) क्यूरोसिवो भूगोल
(ग) राजनैतिक भूगोल
(घ) अधिवास भूगोल
उत्तर- (ग) राजनैतिक भूगोल।।

प्रश्न 6. “भूगोल एक अन्तर्सम्बन्धित विज्ञान है।” यह कथन निम्नलिखित में से किस विद्वान से सम्बन्धित है?
(क) हम्बोल्ट
(ख) रिटर
(ग) काण्ट
(घ) हार्टशोर्न
उत्तर- (ख) रिटर।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूगोल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर- अमेरिकन शब्दकोष के अनुसार भूगोल भूतले की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन है, जिसमें धरातल के सभी प्रमुख तत्त्वों; जैसे-जलवायु, वनस्पति, जनसंख्या, भूमि-उपयोग, उद्योग आदि का वर्णन किया जाता है।

प्रश्न 2. भूगोल की विषय-वस्तु के अन्तर्गत कौन-कौन से विषय सम्मिलित है।
उत्तर- भूगोल की विषय-वस्तु के अन्तर्गत स्थलमण्डल, वायुमण्डल, जलमण्डल, पृथ्वी की सूर्य से सापेक्ष स्थिति तथा भूतल के सांस्कृतिक तथ्य आदि विषय सम्मिलित हैं।

प्रश्न 3. भूगोल के अध्ययन के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर- 1. विश्व ज्ञान में वृद्धि करना तथा 2. पृथ्वीतल का अध्ययन मानव-संसार के रूप में करते हुए क्षेत्रों तथा स्थानों की विभिन्नताओं को समझना।

प्रश्न 4. भूगोल के अध्ययन के दो उपागम कौन-से हैं?
उत्तर- भूगोल के अध्ययन के दो उपागम हैं-

  • क्रमबद्ध उपागम तथा
  • प्रादेशिक उपागम।

प्रश्न 5. भौगोलिक अध्ययन के क्रमबद्ध उपागम का वर्णन कीजिए।
उत्तर- इस उपागम के अन्तर्गत भूगोल के विभिन्न पक्षों या प्रकरणों; यथा–भू-आकृति, जलवायु, अपवाह प्रणाली, मिट्टी, वनस्पति, जीव-जन्तु, खनिज सम्पदा, जनसंख्या, आर्थिक व्यवसाय, परिवहन, व्यापार आदि तथ्यों का अध्ययन समस्त भूतल के सन्दर्भ में पृथक्-पृथक् शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाता है।

प्रश्न 6. भूगोल की दो महत्त्वपूर्ण शाखाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर- भूगोल की दो महत्त्वपूर्ण शाखाएँ हैं—

  • भौतिक भूगोल तथा
  • मानव भूगोल।

प्रश्न 7. भूगोल के आधनिक स्वरूप के जनक कौन है?
उत्तर– भूगोल के आधुनिक स्वरूप के जनक जर्मन विद्वान हम्बोल्ट एवं रिटर हैं।

प्रश्न 8. किस यूनानी विद्वान को भूगोल का संस्थापक कहा जाता है?
उत्तर- यूनानी विद्वान इरैस्टास्थेनीज को भूगोल को संस्थापक कहा जाता है।

प्रश्न 9. विद्यालयों में भूगोल कब व क्यों लोकप्रिय हुआ?
उत्तर- विद्यालयों में भूगोल अठारहवीं शताब्दी में लोकप्रिय हुआ। इस शताब्दी में ही नए मार्गों तथा भू-भागों की खोज हुई जिसका राजनैतिक महत्त्व होने के कारण भूगोल को एक विषय के रूप में लोकप्रियता प्राप्त हुई।

प्रश्न 10, बीसवीं शताब्दी के भूगोल का क्या स्वरूप था।
उत्तर- बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भूगोल की परिभाषा परिवर्तित हो गई। वाल्टर इजार्ड के नेतृत्व में भूगोलविदों एवं अर्थशास्त्रियों ने इस विषय को विकास से सम्बन्धित स्वरूप प्रदान कर प्रादेशिक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित किया है। अब इसे प्रादेशिक विकास एवं नियोजन विषय ही नहीं बल्कि मानवीय कल्याण का विषय माना जाता है।

प्रश्न 11. भौगोलिक अध्ययन के दो आधुनिक आधार कौन-से हैं?
उत्तर- भौगोलिक अध्ययन के दो आधुनिक आधार हैं-

  1. भौगोलिक सूचना तन्त्र तथा
  2. हवाई छायाचित्र।।

प्रश्न 12. भौगोलिक अध्ययन की पद्धति एवं तकनीक बताइए।
उत्तर- वस्तुतः भूगोल एक विज्ञान है अतः इसके अध्ययन की पद्धति भी वैज्ञानिक होती है। इस विषय के अन्तर्गत क्रमबद्ध ढंग से महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक एवं मानवीय तथ्यों को एकत्रित कर समानता के आधार पर उन्हें वर्गीकृत किया जाता है। तत्पश्चात् इन्हें मात्रात्मक एवं मानचित्र तकनीकियों द्वारा विश्लेषित करके तर्क एवं अर्थपूर्ण निष्कर्षों की व्याख्या की जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. “भूगोल सभी विज्ञानों की जननी है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर- वास्तव में यह कथन सत्य है कि भूगोल सभी विज्ञानों की जननी है। भूगोल की विषय-वस्तु इतनी व्यापक है कि इसमें प्राय: सभी सामाजिक एवं भौतिक (प्राकृतिक) विज्ञानों का सामान्य अध्ययन आवश्यक समझा जाता है। वस्तुतः विभिन्न क्रमबद्ध विज्ञानों की विषय-सामग्री प्राकृतिक या मानवीय तत्त्वों से सम्बन्धित होती है। जैसे-वनस्पति विज्ञान की विषय-वस्तु विभिन्न प्रकार की वनस्पति, जीव विज्ञान की विषय-वस्तु विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु तथा समाजशास्त्र की विषय-वस्तु व्यक्ति एवं समाज आदि को मना जाता है। भूगोल के अन्तर्गत इन विभिन्न प्राकृतिक तत्त्वों वनस्पति, जीव-जन्तु जलवायु, मिट्टी, खनिज एवं मानवीय तत्त्व-मनुष्य, समाज, जाति, प्रजाति, पूँजी आदि सभी तत्वों को विषय-वस्तु में सम्मिलित किया जाता है। इसीलिए भूगोल को सभी विज्ञानों की जननी कहा जाता है।

प्रश्न 2. भूगोल का क्षेत्र बताइए।
उत्तर- वर्तमान भौगोलिक विचारधारा के अनुसार भूगोल एक मौलिक विषय के रूप में विकसित हुआ है। इस विचारधारा में भूगोल को चतुर्दिक माना है। संक्षेप में, भौगोलिक क्षेत्र को निम्नांकित सूत्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
भौगोलिक क्षेत्र = L³ TM
इसमें, L³ = लम्बाई, चौड़ाई एवं ऊँचाई ।
T = समय,
तथा M = मनुष्य द्वारा बाधित स्थानीय वातावरण है।

प्रश्न 3. भूगोल के अध्ययन का उद्देश्य लिखिए।
उत्तर- सामान्यत: भूगोल के अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं–

  1. पृथ्वी तल के विभिन्न स्वरूपों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करना,
  2. पर्यावरण एवं मानव-वर्गों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करना,
  3. पृथ्वी तल पर विभिन्न संसाधनों, मानव समुदायों और अधिवासों के वितरण की विवेचना करना।
  4. विभिन्न प्रदेशों के पार्थिव घटनाक्रम को समझना।।
  5. किसी प्रदेश के पर्यावरणीय तत्त्वों और मानव वर्गों के बीच जैविक सम्बन्धों को समझने के लिए पारिस्थितिक विश्लेषण करना।।
  6. मानव कल्याण के लिए भौतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों के अनुकूलतम प्रयोग हेतु प्रादेशिक संगठन और योजना में योगदान देना।
    इस प्रकार पृथ्वी को मानवीय संसार के रूप में वैज्ञानिक रीति से वर्णन करना तथा क्षेत्रीय विकास योजनाओं में योगदान करना ही भूगोल का मुख्य उद्देश्य है।

प्रश्न 4. भूगोल के अध्ययन के क्रमबद्ध उपागम की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर- क्रमबद्ध या वर्गीकृत उपागम का अर्थ, भूगोल का अध्ययन प्रकरण विधि से करना है। इसमें भूगोल का अध्ययन पृथक्-पृथक् तत्त्वों के माध्यम से किया जाता है। इस उपागम की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. क्रमबद्ध उपागम के माध्यम से भूगोल के गम्भीर तथ्यों को भी सुगमतापूर्वक समझा जा सकता है। अत: भूगोल के अध्ययन की यह उत्तम विधि सिद्ध हुई है; क्योंकि क्रमबद्ध या प्रकरण अथवा
वर्गीकृत विधि में विभिन्न तत्त्वों का पृथक्-पृथक् अध्ययन किया जाता है।

2. इस उपागम में भू-आकृति, जलवायु, मिट्टियों, वनस्पतियों, खनिज पदार्थ, कृषि, जनसंख्या, उद्योग, व्यापार, परिवहन आदि के पृथक्-पृथक् शीर्षकों के माध्यम से सम्पूर्ण पृथ्वी का सुगमतापूर्वक
अध्ययन सम्भव हो जाता है।

3. क्रमबद्ध उपागम के अन्तर्गत प्रत्येक तत्त्व का पृथक्-पृथक् विश्लेषण करके उनके गुणों एवं लक्षणों के अनुरूप निष्कर्ष निकालकर सम्पूर्ण क्षेत्र, प्रदेश या पृथ्वी का अध्ययन सम्भव है।

4. क्रमबद्ध अध्ययन के आधार पर वितरण मानचित्र एवं सांख्यिकीय आरेख तथा लेखाचित्र तैयार करके इनका वर्गीकरण भौतिक तत्त्वों की भिन्नता के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार क्रमबद्ध उपागमों से भूगोल विषय में पृथ्वी तल के प्राकृतिक तथा मानवीय तथ्यों का अध्ययन अलग-अलग प्रकरणों में विभक्त करके किया जाता है। अत: भौगोलिक अध्ययन की यह विधि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 5. भूगोल की प्राचीन शाखाओं के नाम बताते हुए उनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर- प्राचीनकाल में भूगोल विषय को निम्नलिखित पाँच शाखाओं में विभक्त किया गया था—

1. खगोलीय भूगोल-प्राचीन खगोलीय भूगोल शाखा में पृथ्वी का सूर्य और चन्द्रमा से सम्बन्ध, चन्द्रग्रहण, दिन और रात आदि का अध्ययन किया जाता था।

2. यात्रा भूगोल-प्रारम्भिक दिनों में यात्राएँ; व्यापार, दूसरे देशों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने तथा साम्राज्य के विस्तार के लिए की जाती थीं। आरम्भ में यह यात्राएँ स्थलमार्ग से होती थीं, बाद में नदियों और सागरीय मार्गों से होने लगीं। अपनी इन यात्राओं का वर्णन अनेक यात्रियों ने लिखा है। जो भूगोल की धरोहर है।

3. संसाधन भूगोल-मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खनिज पदार्थों, उत्तम चरागाह और कृषि प्रदेशों की खोज में प्रारम्भ से ही उद्यत रहा है जिससे अनेक संस्कृतियों का विकास हुआ।

4. मानचित्रांकन-प्राचीन काल में मनुष्यों ने अपनी यात्राओं, संसाधन की खोज आदि के लिए | विश्व मानचित्रों का निर्माण किया। टॉलेमी ने सर्वप्रथम विश्व का मानचित्र तैयार किया था। उसके
बाद अरबवासियों ने भूगोल के विकास में इन मानचित्रों का निर्माण कर योगदान दिया।

5. गणितीय भूगोल-अरब और मिस्र में गणितीय भूगोल का विकास हुआ जिसके अन्तर्गत स्थानों की दूरी, दिन और रात की अवधि, अक्षांश तथा देशान्तर रेखाएँ आदि का अध्ययन गणितीय भूगोल के अन्तर्गत किया जाता था।

प्रश्न 6. वर्तमान भूगोल की प्रमुख शाखाओं एवं उनकी उपशाखाओं को बताइए।
उत्तर- आज विश्व के सभी देशों में भूगोल के अध्ययन की दो प्रमुख शाखाएँ निम्नवत् हैं

  • भौतिक भूगोल और
  • मानव भूगोल।

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इन्हें अनेक उपशाखाओं में बाँटा गया है, जिनके नाम निम्नवत् हैं
भौतिक भूगोल की उपशाखाएँ इस प्रकार हैं–

  1. भू-आकृति विज्ञान,
  2. भूविज्ञान,
  3. मृदा विज्ञान,
  4. ऋतु विज्ञान,
  5. समुद्र विज्ञान,
  6. जल विज्ञान तथा
  7. जैव भूगोल।

मानव भूगोल की उपशाखाएँ इस प्रकार हैं-

  1. आर्थिक भूगोल,
  2. सांस्कृतिक भूगोल,
  3. जनसंख्या भूगोल,
  4. सामाजिक भूगोल,
  5. राजनीतिक भूगोल,
  6. पारिस्थितिकी भूगोल,
  7. ऐतिहासिक भूगोल,
  8. ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल,
  9. मानचित्र भूगोल एवं
  10. प्रादेशिक भूगोल।

प्रश्न 7. भूगोल का भौमिकी से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भौमिकी (Geology) में धरातल की बनावट, चट्टानें, उनकी उत्पत्ति एवं वितरण, पृथ्वी को भू-वैज्ञानिक कालक्रम, चट्टानों में पाये जाने वाले खनिज, पृथ्वी की आन्तरिक संरचना आदि का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में भी पृथ्वी के धरातल का अध्ययन किया जाता है जिसका सम्बन्ध पृथ्वी की आन्तरिक अवस्था से है। पर्वत, पठार, मैदान, वलन, भ्रंशन आदि का सम्बन्ध भी पृथ्वी की आन्तरिक अवस्था से है। चट्टानों में जो खनिज पाये जाते हैं, वे भूगोल के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। खनिजों एवं चट्टानों का निर्माण भूगर्भशास्त्र का भी अध्ययन क्षेत्र है; अत: भूगोल और भौमिकी में निकट का सम्बन्ध है।

प्रश्न 8. भौतिक एवं मानव भूगोल में विभेद कीजिए।
उत्तर- भौतिक एवं मानव भूगोल में विभेद
UP Board Solutions for Class 11 Geography Chapter 1 Fundamentals of Physical Geography Chapter 1 Geography as a Discipline img 3

प्रश्न 9. क्या भूगोल अध्ययन के उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं?
उत्तरं- वास्तव में भूगोल के अध्ययन में कोई भी एक उपागम अपने में पूर्ण सक्षम नहीं है। जैसे काटने के लिए कैंची के दोनों फलक आवश्यक होते हैं, उसी प्रकार भूगोल के अध्ययन के लिए दोनों उपागमों का होना अति आवश्यक है। भूगोल का उचित ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें प्रादेशिक उपागम के साथ-साथ क्रमबद्ध उपागम की भी आवश्यकता होती है। दोनों उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं। भूगल की ये झेनों । विधियाँ एक-दूसरे में ऐसे ही समाविष्ट हैं जैसे किसी कपड़े में ‘ताना’ और ‘बाना’ समाविष्ट होता है। उसी प्रकार ‘क्रमबद्ध’ और ‘प्रादेशिक दोनों उपागमों का उपयोग भौगोलिक अध्ययन के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 10. भूगोल का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूगोल एवं अर्थशास्त्र दोनों ही सामाजिक विज्ञान हैं, अत: परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। भूगोल मनुष्य के प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है, जबकि अर्थशास्त्र मानव की आर्थिक क्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इस प्रकार दोनों के अध्ययन का केन्द्रबिन्दु मनुष्य ही है। अत: अर्थशास्त्र के बिना भूगोल तथा भूगोल के बिना अर्थशास्त्र का अध्ययन अधूरा है। मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का अधिकाधिक संदोहन कर विभिन्न आर्थिक व्यवसाय अपनाए हैं। इनका अध्ययन आर्थिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है। कृषि, पशुपालन, वन, खनिज, परिवहन, व्यापार आदि का अध्ययन भूगोल एवं अर्थशास्त्र दोनों ही विषयों में होता है। अतः दोनों ही विषय घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

प्रश्न 11. भूगोल का इतिहास से सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूगोल और इतिहास एक-दूसरे के जुड़वाँ हैं। वर्तमान भौगोलिक घटनाएँ ही अतीत के गर्भ में इतिहास बनकर प्रकट होती हैं। इतिहास मानव की भूतकालीन घटनाओं का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। यह वर्तमान भूगोल की झलक अतीत की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करता है। भूगोल की पृष्ठभूमि में जो घटनाएँ जन्म लेती हैं, वे ही आगे चलकर इतिहास को सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं। इस प्रकार प्राचीन इतिहास वर्तमान भूगोल है, जबकि बीता हुआ भूगोल, इतिहास है। आज का भूगोल ही कालान्तर में इतिहास का रूप धारण करता है। भूगोल की एक शाखा ऐतिहासिक भूगोल भी है, जिससे यह प्रकट होता है कि भूगोल और इतिहास परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूगोल का अर्थ बताइए तथा इसकी विषय-वस्तु का वर्णन कीजिए।
या भूगोल की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विषय-वस्तु बताइए।
या भूगोल की परिभाषा दीजिए तथा इसके अध्ययन-क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर- भूगोल का अर्थ
भूगोल एक अति प्राचीन सामाजिक विज्ञान है। इसके उद्भव का इतिहास मानव के चिन्तन से जुड़ा हुआ है। मानव ने जिस समय से चिन्तन आरम्भ किया और अपने परिवेश को समझा, तभी से भूगोल विषय का श्रीगणेश हो गया था। किन्तु इसे एक व्यवस्थित सामाजिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का श्रेय यूनानी विद्वानों को जाता है। यूनानी विद्वान् इरैटॉस्थेनीज (Eratosthenes) ने सर्वप्रथम ‘Geography शब्द का प्रयोग किया था, इसलिए इन्हें भूगोल का जनक (Father of Geography) कहा जाता है। भूगोल का अंग्रेजी रूपान्तर Geography है, जो यूनानी (Greek) भाषा दो शब्दों ‘Geo’ के तथा ‘graphe’ से मिलकर बना है। ‘Geo’ शब्द का अर्थ है ‘पृथ्वी’ तथा ‘graphe’ शब्द का अर्थ है ‘वर्णन करना। इस प्रकार Geography का अर्थ है-‘पृथ्वी का वर्णन करना।
हिन्दी भाषा में भी भूगोल शब्द दो पदों से मिलकर बना है-‘भू’ तथा ‘गोल’। इस प्रकार भूगोल का आशय ‘गोल पृथ्वी के वर्णन से है। वास्तव में भूगोल का अर्थ पृथ्वी का वर्णनमात्र ही नहीं, अपितु इसके व्यापक अर्थ हैं।

भूगोल की परिभाषाएँ

पृथ्वी का अध्ययन किस दृष्टिकोण से किया जाए? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। विभिन्न विद्वानों ने भूगोल की व्याख्या अपने-अपने दृष्टिकोण से की है, जो निम्नलिखित परिभाषाओं से स्पष्ट है”भूगोल में पृथ्वीतल का अध्ययन मानवीय विकास के रूप में क्षेत्रीय भिन्नताओं के आधार पर किया जाता है।” –मोंकहाउस

मोंकहाउस के अनुसार, भूगोल वह विज्ञान है जो पृथ्वी का अध्ययन मानव के निवासस्थान के रूप में करता है। यह निवासस्थान अनेक क्षेत्रीय विभिन्नताओं से युक्त है। इन विभिन्नताओं के अनुरूप ही मानव अपना जीवनयापन करता है। किन्तु मोंकहाउस की यह परिभाषा अत्यन्त संकुचित है।

“भूगोल क्षेत्रीय विज्ञान है जिसमें पृथ्वीतल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा स्थानिक सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।”

हैटनर हैटनर ने भूगोल को क्षेत्रीय विज्ञान माना है जिसमें पृथ्वीतल के क्षेत्रों का अध्ययन उनकी भिन्नताओं तथा विभिन्न स्थानों के मध्य सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में किया जाता है।

“भूगोले वह विज्ञान है जो पृथ्वीतल पर समस्त मानव-जाति और उसके प्राकृतिक वातावरण की पारस्परिक क्रियाशील विस्तृत प्रणाली का अध्ययन करता है।”

एकरमैन एकरमैन ने भूगोल को एक नये दृष्टिकोण से परिभाषित किया है। उनके अनुसार, भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो परिवर्तनशील पर्यावरण में क्रियाशील मानव के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। उनके अनुसार, पर्यावरण और मानव के सम्बन्ध अटूट तथा शृंखलाबद्ध हैं।

“भूगोल भूतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं का अध्ययन है। यहाँ पर क्षेत्रों की लक्षण व्यवस्था के अन्तर्सम्बन्धों में ऐसी अनेक विभिन्नताएँ दिखाई देती हैं। धरातल पर पाये जाने वाले प्रमुख तत्त्वों; जैसे-जलवायु, वनस्पति, जनसंख्या, भूमि-उपयोग, उद्योग आदि का इसमें वर्णन किया जाता है तथा इन तत्वों की जटिलताओं से निर्मित इकाई व क्षेत्रों का विस्तार से अध्ययन इसमें सम्मिलित है।” – अमेरिकन शब्दकोश

अमेरिकन शब्दकोश की उपर्युक्त परिभाषा सर्वांगीण कही जा सकती है। इस परिभाषा में भूगोल को एक परिपूर्ण विज्ञान माना गया है, जिसमें पृथ्वीतल की समस्त जटिलताओं का अध्ययन एक इकाई के रूप में किया जाता है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि भूगोल पृथ्वीतल पर निवास करने वाले मानव का विज्ञान है। यह पृथ्वी को मानव का निवासगृह मानकर उसकी व्याख्या करता है। दूसरे शब्दों में, भूगोल भूक्षेत्र और उसके निवासियों का वर्णन करने वाला विज्ञान है। भूगोल में हम पृथ्वीतल के विभिन्न क्षेत्रों में पायी जाने वाली विभिन्नताओं का अध्ययन मनुष्य के सन्दर्भ में करते हैं। टॉलेमी ने भूगोल को एक आभामय विज्ञान, जो स्वर्ग में पृथ्वी का प्रतिबिम्ब देखता है’ कहा था। वास्तव में भूगोल पृथ्वी का विज्ञान है जो मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन करता है। पृथ्वी और मानव दोनों ही परिवर्तनशील हैं; अत: भूगोल एक प्रगतिशील विज्ञान है। यही नहीं, भूगोल ‘समस्त विज्ञानों की जननी’ (Mother of all sciences) है। अपने गतिशील स्वरूप के कारण ही भूगोल का विकास विभिन्न शाखाओं और उपशाखाओं के रूप में हो सका है तथा उनका अध्ययन क्रमबद्ध रूप में किया जाने लगा है। भूगोल की विभिन्न परिभाषाओं का सार निम्नलिखित है

  1. भूगोल का सम्बन्ध उस पृथ्वीतल से है जिस पर मानव निवास करता है।
  2. भूगोल में पृथ्वीतल पर पाये जाने वाले सभी प्राकृतिक तथा मानवीय तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है।
  3. भूगोल में पृथ्वीतल के प्राकृतिक तत्त्वों के क्षेत्रीय वितरण तथा मानवीय तत्त्वों के साथ उनके पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन सम्मिलित है।
  4. भूगोल का अध्ययन वैज्ञानिक तथा क्रमबद्ध विधि से किया जाता है, जिसमें कार्य तथा कारण के बीच सम्बन्धों को स्थापित किया जाता है।

भूगोल की विषय-वस्तु या अध्ययन-क्षेत्र

भूगोल की विषय-वस्तु या अध्ययन-क्षेत्र से तात्पर्य उस सामग्री से है जिसका अध्ययन भूगोल में किया जाता है। भूगोल एक विशद विषय है; अतः इसकी विषय-वस्तु या अध्ययन-क्षेत्र भी विशाल है। वस्तुतः भूतल पर दो मुख्य प्रकार के भूदृश्य मिलते हैं-भौतिक तथा सांस्कृतिक। भौतिक भूदृश्यों को प्राकृतिक भूदृश्य भी कहते हैं। इनका अध्ययन भौतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। सांस्कृतिक भूदृश्य मानव के द्वारा निर्मित होते हैं। इनका अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

भूगोल का अध्ययन-क्षेत्र भूतल का वह कटिबन्ध है जहाँ स्थलमण्डल, जलमण्ड़ल और वायु- मण्डल परस्पर सम्बद्ध होते हैं तथा जहाँ जैवमण्डल का विस्तार पाया जाता है। ये सभी मण्डल भूगोल की विषय-वस्तु हैं।

भूगोल की विषय-वस्तु के अन्तर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं
1. स्थलमण्डल- स्थलमण्डल के अन्तर्गत पृथ्वी के प्रथम श्रेणी के उच्चावच लक्षण (महाद्वीप), द्वितीय श्रेणी के उच्चावच लक्षण या प्रमुख स्थलरूप (पर्वत, पठार, मैदान) तथा तृतीय श्रेणी के उच्चावच लक्षण (घाटियाँ, ढाल, अपरदन के साधनों से निर्मित अनेक प्रकार के आकार, आन्तरिक शक्तियों से उत्पन्न आकार आदि) का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी की आन्तरिक रचना, ज्वालामुखी, चट्टानों, मिट्टियों, भूमिगत जल, खनिज भण्डारों आदि का भी अध्ययन स्थलमण्डल के अन्तर्गत किया जाता है।

2. वायुमण्डल- पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए गैसों का एक विशाल आवरण है जिसे वायुमण्डल कहा जाता है। इसकी निचली परत को क्षोभमण्डल कहते हैं जिसमें मौसम तथा जलवायु सम्बन्धी सभी परिवर्तन तथा परिघटनाएँ होती हैं। मौसम के तत्त्व (तापमान, वर्षा, पवन, आर्द्रता आदि) पृथ्वी की भौतिक दशाओं तथा मानव पर गहरा प्रभाव डालते हैं। पृथ्वीतल तथा वायुमण्डल के बीच ऊष्मा तथा आर्द्रता का सदैव आदान-प्रदान होता रहता है। अतएव वायुमण्डल भूगोल के अध्ययन में विशिष्ट स्थान रखता है।

3. जलमण्डल- पृथ्वी पर जल का व्यापक विस्तार पाया जाता है। पृथ्वी के कुल क्षेत्र का लगभग 71% महासागरों तथा सागरों के नीचे है। महासागरीय तल का उच्चावच, जल का परिसंचार, तापमान- लवणता, निक्षेप आदि का अध्ययन भूगोल की विशिष्ट विषय-वस्तु है।

4. पृथ्वी की सूर्य से सापेक्ष स्थिति- इसके अन्तर्गत पृथ्वी के आकार, अक्षीय झुकाव, परिक्रमण, परिभ्रमण, दिन-रात की अवधि, सूर्यातप, ऋतु-परिवर्तन आदि का अध्ययन किया जाता है।

5. भूतल के सांस्कृतिक तथ्य- इसमें मानवीय बस्तियों, जनसंख्या वितरण, कृषि, उद्योग, परिवहन एवं संचार के साधनों, व्यापार आदि का अध्ययन सम्मिलित है।

इस प्रकार पृथ्वी के सभी भौतिक तथा सांस्कृतिक पक्षों का अध्ययन भूगोल की विषय-वस्तु है। भूगोल की विषय-वस्तु पर प्रकाश डालते हुए कार्ल रिटर ने लिखा है-“भूगोल में भूमण्डल के सभी लक्षणों, घटनाओं और उनके सम्बन्धों का, पृथ्वी को स्वतन्त्र मानते हुए अध्ययन किया जाता है। इसकी समग्र एकता में मानव और जगतपिता से सम्बन्ध दिखाई पड़ते हैं।”

निष्कर्ष यह है कि भूगोल का अध्ययन-क्षेत्र पर्यावरण और मानव के अन्तर्सम्बन्धों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

प्रश्न 2. भूगोल की प्रकृति तथा अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
या भूगोल की संकल्पनाओं को स्पष्ट करते हुए भूगोल के अध्ययन के उद्देश्य बताइए।
उत्तर- भूगोल की प्रकृति
भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जिसमें प्राकृतिक तथा सामाजिक दोनों प्रकार के विज्ञानों का समन्वय पाया जाता है। यह जानने के लिए कि इसका स्वरूप कैसा है, इसकी प्रकृति को समझना आवश्यक है। भूगोल की प्रकृति से आशय है कि भूगोल विज्ञान है या कला, या दोनों।

भूगोल एक विज्ञान है-भूगोल को एक विज्ञान के रूप में परखने के लिए इसे विज्ञान की कसौटी पर कसना आवश्यक होगा। विज्ञान किसी विषय के क्रमबद्ध विशेष विवरण को कहा जाता है जिसे विशेष परीक्षण, निरीक्षण, विश्लेषण और वर्गीकरण द्वारा प्राप्त किया जाता है। इस कसौटी पर भूगोल एक विज्ञान के रूप में खरा उतरता है, क्योंकि इसमें पृथ्वी का क्रमबद्ध तथा विशेष विवरण; परीक्षण, निरीक्षण तथा विश्लेषण के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। अग्रलिखित तर्कों के आधार पर भूगोल को विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है

1. भूगोल के नियम सार्वभौम हैं- अन्य भौतिक (प्राकृतिक) विज्ञानों की भाँति भूगोल के नियम भी सभी कालों में सत्य तथा व्यापक हैं। उदाहरणार्थ-पृथ्वी का परिभ्रमण तथा परिक्रमण, गुरुत्वाकर्षण, ज्वार-भाटे का सिद्धान्त, वायु-संचरण के सिद्धान्त, जल-परिसंचरण के सिद्धान्त, फैरल का नियम, बाइज बैलट का नियम आदि सभी सार्वभौम हैं। ये नियम निश्चित तथा सत्यपरक हैं, अतः भूगोल को एक विज्ञान मानना उचित है।

2. भूगोल की अध्ययन विधि वैज्ञानिक है- भूगोल के अध्ययन में क्रमबद्ध (व्यवस्थित) तथा प्रादेशिक दो प्रकार के उपागम (विधियाँ) प्रचलित हैं। ये दोनों विधियाँ विज्ञान पर आधारित हैं। भूगोल के अध्ययन में परीक्षण, निरीक्षण, विश्लेषण, वर्गीकरण आदि वैज्ञानिक चरणों का उपयोग होता है। कार्ल पियर्सन के अनुसार, “विज्ञान की एकमात्र पहचान उसकी अध्ययन पद्धति से होती है न कि उसकी अध्ययन सामग्री से।” इस दृष्टि से भूगोल एक विज्ञान है।।

3. भूगोल कार्य और कारण की व्याख्या करता है- भूगोल में अन्य भौतिक विज्ञानों की भाँति ‘कार्य-कारण सम्बन्ध पाया जाता है। उदाहरणार्थ-भू-परिक्रमण ऋतु-परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। पृथ्वी और चन्द्रमा की परिभ्रमण गतियों के कारण सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होते हैं। ज्वार-भाटा आने का कारण चन्द्रमा और सूर्य की पृथ्वी पर पड़ने वाली गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। भूगोल एक विज्ञान के रूप में इन्हीं कार्य और कारणों की व्याख्या करता है।

4. मानवीय क्रियाकलापों का अध्ययन- भूगोल में प्राकृतिक पर्यावरण के साथ-साथ मानव और उसके क्रियाकलापों का भी अध्ययन किया जाता है। अत: भूगोल एक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित है। टॉलेमी, वारेनियस, हम्बोल्ट, रिटर, रैटजेल, ब्लाश आदि विद्वानों ने भूगोल को एक विज्ञान की संज्ञा दी है।

भूगोल एक कला है—ज्ञान को प्राप्त कर उसे वास्तविक जीवन में उतारने के कौशल को कला कहते हैं। कला जीवन का ढंग है। प्रश्न उठता है कि क्या भूगोल एक कला है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए भूगोल को कला की कसौटी पर परखना होगा। भूगोल को कला मानने के सम्बन्ध में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. भूगोल एक व्यावहारिक शास्त्र (विज्ञान) है- प्रतिष्ठित भौतिक नियमों तथा उनके तथ्यों का अनुप्रयोग (व्यवहार में उपयोग करना) भूगोल का एक विशिष्ट अंग है। उदाहरण के लिए, ‘मानव- कल्याण के लिए जल संसाधनों का क्या उपयोग होना चाहिए ? ‘भूगोल उत्तर देता है कि नदियों पर बाँध बनाकर योजनाबद्ध ढंग से जल संसाधनों का दोहन किया जाना चाहिए। इस दृष्टि से भूगोल एक कला है।

2. भूगोल कल्याण की राह दिखाता है- भूगोल एक ऐसा पथ-प्रदर्शक शास्त्र है, जो हमें योजनाबद्ध ढंग से प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करना सिखाता है। इस प्रकार वह मानव-कल्याण का पथ-प्रशस्त करता है। भूगोल हमें सिखाता है कि वनों का संरक्षण करके पर्यावरण विघटन को रोका जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण लगाकर राष्ट्र को समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है।

निष्कर्ष यह निकलता है कि भूगोल में विज्ञान तथा कला दोनों के गुण विद्यमान हैं। सिद्धान्त रूप से यह विज्ञान है तथा व्यवहार में कला है। यह विज्ञान के समान खोज और अनुसन्धान करता है और कला के अनुसार उन तथ्यों को मानव-कल्याण के लिए प्रयुक्त करने की राह दिखाता है।

भूगोल की अवधारणा या संकल्पना

अवधारणा या संकल्पना से आशय किसी विषय की उन मौलिक विचारधाराओं या सिद्धान्तों से है जिनके आधार पर उस विषय का विकास तथा संवर्द्धन होता है। इन संकल्पनाओं के अभाव में भूगोलवेत्ता अधूरा ही रहता है। संकल्पनाएँ ऐसे निर्देशक सिद्धान्त हैं जिनके माध्यम से विषय का पूर्ण विश्लेषण सम्भव होता है। अतएव भूगोलवेत्ताओं को इन संकल्पनाओं का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। भूगोल की महत्त्वपूर्ण संकल्पनाएँ अग्रलिखित हैं

1. स्थान की संकल्पना- भूगोल में स्थान का आशय भूतल के एक टुकड़े से है। भूतल में समस्त स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल के सम्पर्क से निर्मित सम्पूर्ण कटिबन्ध सम्मिलित हैं, जिसमें सौर ऊर्जा की प्राप्ति होती है तथा पृथ्वी की आन्तरिक और बाह्य शक्तियों से विभिन्न घटनाएँ घटित होती हैं। भूतल से ही खनिज, मिट्टी, जल, ऊर्जा तथा वनस्पतियाँ प्राप्त होत्री हैं। जैवमण्डल इसी भूतल की देन है। भूतल ही समस्त मानवीय क्रियाओं का केन्द्र है।

2. अवस्थिति की संकल्पना- भूगोल में अवस्थिति की अवधारणा विभिन्न स्थानों की अक्षांशीय तथा देशान्तरीय स्थिति से सम्बन्धित है। किसी स्थान की अवस्थिति से ही उसकी जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टियों आदि का बोध होता है। इसके अतिरिक्त, भौगोलिक अवस्थिति से संसार के प्रमुख परिवहन तथा संचार के साधनों की सापेक्ष स्थिति का भी ज्ञान होता है। इस प्रकार, भौगोलिक अध्ययनों में अवस्थिति की संकल्पना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

3. भौगोलिक वितरण की संकल्पना- भूतल पर प्राकृतिक संसाधनों; जैसे—वनस्पति, जल, मिट्टी, खनिज, कृषि आदि का वितरण असमान है। भूगोल इन्हीं संसाधनों के भौगोलिक वितरण की व्याख्या करता है तथा उनकी प्रभावी पर्यावरणीय दशाओं पर भी प्रकाश डालता है। इस हेतु वह वितरण मानचित्रों का निर्माण करता है तथा क्षेत्रों की पारस्परिक निर्भरता का बोध कराता है। उदाहरणार्थ-चावल या जूट का भौगोलिक वितरण उष्णार्द्र जलवायु, चिकनी मिट्टी, पर्याप्त वर्षा एवं श्रम की उपलब्धता का द्योतक है। इस प्रकार भौगोलिक वितरण की संकल्पना पर्यावरणीय दशाओं के स्थानीय अन्तर को स्पष्ट करती है।

4. स्थानिक अन्तःक्रिया की संकल्पना- भूतल पर पायी जाने वाली विभिन्नताओं के कारण एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र से सहयोग प्राप्त करता है। यह परस्पर सहयोग ही अन्त:क्रिया कहलाता है। क्षेत्रीय विभिन्नताएँ ही घटनाओं की अन्त:क्रिया को जन्म देती हैं। इनसे क्षेत्रीय सहयोग तथा क्षेत्रीय विकास में बहुत सहायता मिलती है। वस्तुओं तथा सेवाओं के विनिमय में स्थानिक अन्त:क्रियाओं की संकल्पना की प्रमुख भूमिका होती है, जो जीवन के अस्तित्व के लिए नितान्त आवश्यक है। विभिन्न स्थानों के मध्य वस्तुओं, विचारों तथा मानव की गतिशीलता को ही स्थानिक अन्त:क्रिया की संकल्पना कहा जाता है।

5. प्रादेशीकरण की संकल्पना- सम्पूर्ण पृथ्वी का अध्ययन उसे कुछ प्रदेशों में बाँटकर किया जाता है। प्रदेशों का निर्धारण तथा सीमांकन भूतल पर पायी जाने वाली भौतिक तथा सांस्कृतिक समानताओं के आधार पर किया जाता है। किसी प्रदेश की जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, धरातल, कृषि तथा अन्य आर्थिक एवं मानवीय क्रियाकलापों को जानने का आधार प्रादेशीकरण की संकल्पना ही है।

6. क्षेत्रीय भिन्नता की संकल्पना- हैटनर के अनुसार, भूगोल स्थानों का विज्ञान है और स्थानों में विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारणों की व्याख्या करते हैं। इस प्रकार क्षेत्रीय भिन्नता की संकल्पना भौगोलिक अध्ययन में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

7. पार्थिव एकता की संकल्पना- इस संकल्पना के प्रतिपादक जर्मन विद्वान् रैटजेल थे। उनके अनुसार, सम्पूर्ण पृथ्वी एक इकाई है। पृथ्वी पर पायी जाने वाली विभिन्नताएँ तो केवल बाह्य हैं। वस्तुत: भूतल का प्रत्येक भाग एक-दूसरे से संयुक्त है तथा उसमें एक सार्वभौमिक एकता पायी जाती है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर एक जैसे भौतिक नियम तथा प्रक्रम कार्य करते हैं। पार्थिव एकता की संकल्पना भूगोल में बहुत लोकप्रिय रही है।

8. कालगत परिवर्तन की संकल्पना- भूतल के सभी तत्त्व चाहे वे भौतिक हों या सांस्कृतिक; परिवर्तनशील हैं। समय के साथ उनमें परिवर्तन आता है और वे एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करते हैं। सभी भौगोलिक अध्ययनों में परिवर्तनकारी क्रियाओं की प्रकृति, दिशा और परिवर्तन की दर को ध्यान में रखना आवश्यक है।

9. सांस्कृतिक प्रदेशों की संकल्पना- भूतल पर भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति के संयोग से। सांस्कृतिक प्रदेश बनते हैं। प्रादेशिक विकास की दृष्टि से सांस्कृतिक प्रदेशों का अध्ययन बहुत लाभकारी होता है। सांस्कृतिक मूल्यों तथा विकास की प्रवृत्तियों के द्वारा एक प्रदेश को दूसरे प्रदेश से पृथक् किया जा सकता है। सांस्कृतिक प्रदेशों के अध्ययन से समस्त ग्लोब के सांस्कृतिक पर्यावरण का समुचित ज्ञान सम्भव है।

भूगोल के अध्ययन के उद्देश्य

भूगोल एक निरन्तर प्रगतिशील विज्ञान है। इसके क्रमश: विकास से उसके अध्ययन के उद्देश्य का भी विस्तार हो रहा है। भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी के साथ मानवीय क्रियाओं के सम्बन्धों की व्याख्यामात्र ही नहीं, अपितु निरन्तर विकासोन्मुख तथा परिवर्तनीय प्राकृतिक घटनाओं के साथ क्रियाशील एवं प्रगतिपथ पर अग्रसर मानव के साथ सम्बन्धों को समझना है। यह राष्ट्रीय विकास और जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। ब्रोइक महोदय ने भूगोल के अध्ययन के निम्नलिखित तीन प्रमुख उद्देश्य निर्धारित किये हैं

  1. विश्व-ज्ञान में वृद्धि करना।।
  2. पृथ्वीतल का अध्ययन मानव-निवास के रूप में करते हुए क्षेत्रों तथा स्थानों की विभिन्नताओं को समझना।
  3. मानवीय समृद्धि के लिए प्रादेशिक संसाधनों का अध्ययन करना तथा उनके प्रयोग में सक्रिय सहयोग देते हुए पृथ्वी पर प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय विकास के लिए योजनाएँ बनाना। यथार्थ में, भूगोल का उद्देश्य भूमि और मानव की वास्तविक पृष्ठभूमि का अध्ययन कर स्थानिक संगठन की व्याख्या करना है।

हार्टशोर्न के शब्दों में, “पृथ्वी का मानवीय संसार के रूप में वैज्ञानिक रीति से वर्णन करना ही भूगोल का उद्देश्य है।”

कार्ल रिटर ने भूगोल के उद्देश्यों की व्याख्या करते हुए लिखा है, “भूगोल का उद्देश्य है कि सम्पूर्ण पृथ्वीतल पर प्राकृतिक एवं मानवीय दशाओं का सजीव चित्रण ऐसी शैली में किया जाए कि मनुष्य एवं प्रकृति के बीच महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध स्वत: ही स्पष्ट हो जाएँ।”

राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (1965) ने अपनी एक रिपोर्ट में भूगोल के उद्देश्य स्पष्ट करते हुए व्यक्त किया, “स्थानिक वितरणों, स्थानिक सम्बन्धों के दृष्टिकोण से मानव-वातावरण की प्रणाली का अध्ययन करना भूगोल का प्रमुख उद्देश्य है।”

वर्तमान समय में पर्यावरण और परिस्थितियों का अध्ययन विश्व के सभी देशों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया है। विकास और प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण का संरक्षण भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। अतएव भूगोल के अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  • पृथ्वीतल के विभिन्न स्वरूपों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन करना,
  • पर्यावरण और मानव वर्गों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करना,
  • विभिन्न वितरणों की विवेचना करना,
  • विकास योजनाओं में सहयोग देना,
  • पारिस्थितिकी विश्लेषण करना,
  • प्रकृति की एकता को प्रदर्शित करना तथा
  • विभिन्न प्रदेशों के पार्थिव घटनाक्रम को समझना।।

प्रश्न 3. भूगोल की मुख्य शाखाएँ कौन-सी हैं? किसी एक शाखा की विषय-वस्तु की विवेचना कीजिए।
या भूगोल की दो प्रमुख शाखाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भूगोल की शाखाएँ
भूगोल एक ऐसा प्राचीन विज्ञान है जिसका अंकुरण ईसा से पूर्व ही यूनान की उर्वरा भूमि में हो गया था। तब से आज तक भूगोल एक विशाल वृक्ष बन चुका है। प्राचीन काल में भूगोल का अध्ययन एक मिश्रित सामाजिक विज्ञान के रूप में किया जाता था। जैसे-जैसे ज्ञान में वृद्धि होती गयी, भूगोल की शाखाओं-उपशाखाओं का विकास होता गया। प्रारम्भ में भूगोल की दो प्रमुख शाखाएँ भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल के रूप में विकसित हुईं। भूगोल में विशेषीकरण की प्रवृत्ति के साथ ही इन दोनों शाखाओं की अनेक उपशाखाएँ बन गयीं। वर्तमान समय में भूगोल की प्रमुख शाखाएँ अग्रवत् हैं

I. भौतिक भूगोल
भौतिक भूगोल भूगोलरूपी वृक्ष की प्रमुख शाखा है। इसके अन्तर्गत पृथ्वी की उत्पत्ति, आन्तरिक संरचना, शैल (चट्टानें), ज्वालामुखी क्रिया, भूकम्प, स्थलमण्डल के विविध स्थलरूपों एवं स्थलाकृतियों, अपक्षय एवं अपरदन, मिट्टियाँ, खनिज, वनस्पति, जलवायु आदि की दशाओं का अध्ययन किया जाता है। जलमण्डल, वायुमण्डल एवं जैवमण्डल का अध्ययन भी भौतिक भूगोल के अभिन्न अंग हैं। प्रारम्भ में । खगोल विज्ञान (Astronomy) का अध्ययन भी भौतिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता था। भौतिक भूगोल की शाखाएँ निम्नलिखित हैं

1. भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology)- भू-आकृति विज्ञान के अन्तर्गत धरातल के उच्चावच तथा भूपटल के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है।
2. भू-विज्ञान (Geology)- भू-विज्ञान के अन्तर्गत पृथ्वी की उत्पत्ति, संरचना, खनिज तथा शैलों का अध्ययन किया जाता है।
3. मृदा विज्ञान (Pedology)- मृदा विज्ञान में मिट्टियों की उत्पत्ति, संरचना, वितरण तथा उपयोगिता का अध्ययन किया जाता है।
4. ऋतु विज्ञान (Meteorology)- मौसम और जलवायु के तत्त्वों में वायुमण्डल की दशाओं, पृथ्वी पर तापमान के वितरण, पवन संचरण तथा वर्षा के वितरण से लेकर जलवायु प्रदेशों का ज्ञान देने वाला शास्त्र ऋतु विज्ञान कहलाता है। इसमें मानवीय जीवन तथा क्रियाकलापों पर पड़ने वाले जलवायु प्रभावों का भी अध्ययन किया जाता है।
5. समुद्र विज्ञान (Oceanography)- पृथ्वी के तल पर 70% जल का विस्तार है। जल के विशाल खण्डों को समुद्र कहा जाता है। महासागरों के वितरण, गतियों, तापमान, लवणता और सागरीय निक्षेपों का विस्तृत विवरण देने वाला शास्त्र समुद्र विज्ञान कहलाता है।
6. जल विज्ञान (Hydrological Science)- जल विज्ञान में जलराशियों के वितरण-जलचक्र, भूमिगत जल, जल प्रवाह, गतियों तथा स्थितियों का अध्ययन किया जाता है।
7. जैव भूगोल (Bio-Geography)- जैव भूगोल के अन्तर्गत जन्तु जगत तथा पादप तन्त्र का अध्ययन किया जाता है। इसमें वनस्पतियों तथा जन्तुओं के वितरण तथा पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

II. मानव भूगोल
मानव की आर्थिक और सांस्कृतिक क्रियाओं के अध्ययन करने वाले विज्ञान को मानव भूगोल कहा जाता है। इसके अन्तर्गत मनुष्य की जातियों, प्रजातियों, शारीरिक गठन तथा आर्थिक क्रियाकलापों का अध्ययन किया जाता है। मानव भूगोल प्राकृतिक वातावरण एवं मानव के सम्बन्धों का अध्ययन प्रस्तुत करता है। मानव तथा पर्यावरण दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। मानव भूगोल इन दोनों के अन्त:सम्बन्धों की व्याख्या करता है। मानव भूगोल का अध्ययन-क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसकी प्रमुख शाखाएँ तथा उपशाखाएँ निम्नलिखित हैं

1. आर्थिक भूगोल (Economic Geography)- आर्थिक भूगोल मानव भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है। मनुष्य अपने जीवनयापन के लिए प्रकृति का दोहन करता है; अत: मानव के आर्थिक विकास की कहानी प्रकृति के साथ संघर्ष की कहानी है। मनुष्य अपने जीवनयापन के लिए जो प्राथमिक तथा द्वितीयक व्यवसाय अपनाता है, उन सभी का विवरण आर्थिक भूगोल में है। प्रो० बुकानन के शब्दों में, “आर्थिक भूगोल मानव भूगोल की वह शाखा है जिसमें मानव के आर्थिक प्रयत्नों का उसके निवासस्थान के सन्दर्भ में अध्ययन किया जाता है। आर्थिक भूगोल की प्रशाखाएँ निम्नलिखित हैं

  • कृषि भूगोल (Agricultural Geography)।
  • परिवहन भूगोल (Transportation Geography)।
  • वाणिज्य भूगोल (Commercial Geography)।
  • औद्योगिक भूगोल (Industrial Geography)।
  • संसाधन भूगोल (Resource Geography)।।

2. सांस्कृतिक भूगोल (Cultural Geography)- संस्कृति मानव-जीवन का आवश्यक और अभिन्न अंग है। संस्कृति सीखे हुए व्यवहार को कहा जाता है। जिस विज्ञान में किसी क्षेत्र के सांस्कृतिक प्रतिरूपों, रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों तथा परम्पराओं का अध्ययन किया जाता है, उसे सांस्कृतिक भूगोल की संज्ञा दी जाती है। मानव विज्ञान भी सांस्कृतिक भूगोल की ही एक
प्रशाखा है।

3. जनसंख्या भूगोल (Population Geography)- जनसंख्या भूगोल में भूतल के जनसांख्यिकीय पक्ष, जनसंख्या वितरण, घनत्व, वृद्धि-दर, लिंग अनुपात, साक्षरता तथा जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं का विवरण दिया जाता है। आवासीय भूगोल भी जनसंख्या भूगोल की प्रमुख शाखा है।

4. सामाजिक भूगोल (Social Geography)- सामाजिक भूगोल में मनुष्य के सामाजिक जीवन का विवरण दिया जाता है। इसमें समुदायों, संस्थाओं, वर्गों और उनके कार्यों व सम्बन्धों को अध्ययन किया जाता है। सामाजिक प्रवृत्तियों के मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना सामाजिक भूगोल का मुख्य विषय है।।

5. राजनीतिक भूगोल (Political Geography)- राजनीतिक भूगोल में राजनीतिक इकाइयों, प्रादेशिक क्षेत्रों, सीमाओं, राजधानियों, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों से सम्बन्धित बातों का भौगोलिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया जाता है। उपनिवेशों तथा साम्राज्यों का अध्ययन भी राजनीतिक भूगोल का ही विषय है।

6. पारिस्थितिकी भूगोल (Ecological Geography)- मनुष्य जिस प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण में रहता है वह उसकी पारिस्थितिकी कहलाती है। पारिस्थितिकी भूगोल में पर्यावरण एवं मानव के सह-सम्बन्धों एवं प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

7. ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography)- भूतकालीन भौगोलिक घटनाएँ ही इतिहास बन जाती हैं। ऐतिहासिक भूगोल के अन्तर्गत हम राष्ट्र के इतिहास पर उसकी भौगोलिक पृष्ठभूमि का प्रभाव, स्थिति, उच्चावच, सुविधाओं और बाधाओं का अध्ययन करते हैं। अत: ऐतिहासिक भूगोल भी भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है।

8. ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल (Rural and Urban Geography)- ग्रामीण तथा नगरीय भूगोल में वहाँ की अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक संसाधन, उत्पत्ति तथा विकास, आकारिकी आदि का अध्ययन किया जाता है।

9. मानचित्र भूगोल (Cartography)- मानचित्र भूगोल, भूगोल के अध्ययन के आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण उपकरण हैं। मानचित्र भूगोल में उनकी रचना, प्रकार, मापक, प्रक्षेप, उच्चावच प्रदर्शन तथा भूमापन आदि का अध्ययन किया जाता है। अतः यह भी भूगोल की एक महत्त्वपूर्ण शाखा बन गया है।

10. प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography)- प्रादेशिक भूगोल में प्रदेशीकरण, उसके आकार तथा प्रदेशों के भौगोलिक एवं मानवीय सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 4. भूगोल का अन्य विषयों के साथ सम्बन्ध की विवेचना कीजिए।
या भूगोल और इतिहास के मध्य सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
या भूगोल तथा अर्थशास्त्र के सम्बन्ध की विवेचना कीजिए।
या भूगोल तथा राजनीतिशास्त्र के बीच सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-भूगोल का अन्य विषयों से सम्बन्ध
भूगोल एक समाकलित विज्ञान है जो सभी प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों से किसी-न-किसी रूप में सम्बन्ध रखता है। भूगोल की विषय-वस्तु में भौतिक एवं मानवीय तथ्य सम्मिलित हैं। अत: भूगोल का इन दोनों ही विज्ञानों से सम्बन्धं पाया जाता है।

भूगोल का प्राकृतिक विज्ञानों से सम्बन्ध
1. भूगोल एवं खगोल विज्ञान- ब्रह्माण्ड में सौरमण्डल के सदस्य के रूप में पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य आदि की स्थिति का सापेक्ष अध्ययन भूगोल तथा खगोल विज्ञान दोनों में ही किया जाता है, यद्यपि दोनों के अध्ययन के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हैं। पृथ्वी, सूर्य तथा चन्द्रमा की सापेक्ष स्थितियों के प्रभाव अनेक रूपों में देखे जाते हैं; जैसे–दिन-रात का होना, ऋतु-परिवर्तन, सूर्यातप की प्राप्ति, चन्द्रमा की कलाएँ इत्यादि। ये सभी भूगोल तथा खगोल विज्ञान के अध्ययन के विषय हैं। अत: दोनों विषय एक-दूसरे के बहुत निकट हैं।

2. भूगोल एवं गणित- गणित का भौगोलिक अध्ययनों में प्राचीन काल से ही गहरा प्रभाव रहा है। देशों व प्रदेशों की अक्षांशीय व देशान्तरीय स्थितियाँ तथा उनकी आकृतियाँ व क्षेत्रफल आदि का भूगोल के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन गणित के सहयोग के बिना सम्भव नहीं है। आधुनिक काल में गणित की शाखा सांख्यिकी के उपयोग से भूगोल के विभिन्न अध्ययनों में मात्राकरण इतना महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है कि गणितीय भूगोल का भूगोल की एक प्रमुख शाखा के रूप में विकास हो रहा है।

3. भूगोल एवं भूगर्भ विज्ञान- भूगर्भ विज्ञान पृथ्वी के आन्तरिक अध्ययन से सम्बन्धित है। भूगोल में भी पृथ्वी की आन्तरिक रचना, चट्टानों आदि का अध्ययन किया जाता है; क्योंकि इसी अध्ययन से मिट्टियों, खनिज पदार्थों, भू-आकृतियों के स्वरूपों और भूमिगत जल का अध्ययन जुड़ा हुआ है। इस प्रकार भूगोल और भूगर्भ विज्ञान का एक-दूसरे से गहरा सम्बन्ध है।

4. भूगोल एवं जलवायु विज्ञान- जलवायु विज्ञान में मौसम के तत्त्वों के विभिन्न संयोगों से उत्पन्न जलवायवीय दशाओं का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में भौतिक पर्यावरण के अध्ययन में जलवायु को विशेष महत्त्व दिया जाता है जो धरातलीय परिघटनाओं को प्रभावित करती है। इसलिए भूगोल को जलवायु विज्ञान से गहरा सम्बन्ध है।

5. भूगोल एवं मृदा विज्ञान- विश्व में खाद्यान्नों की प्राप्ति कृषि-कार्यों से होती है। कृषि-फसलों के पर्याप्त उत्पादन हेतु उपजाऊ मिट्टी का होना अति आवश्यक है। शाकाहारी लोगों का भोजन कृषि-उपजों से प्राप्त होता है, जबकि मांसाहारी लोगों का भोजन पशुओं से प्राप्त होता है, जो घास एवं वनस्पति पर निर्भर रहते हैं। अत: खाद्य पदार्थों की प्राप्ति प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मिट्टी से ही होती है। खाद्यान्न तथा अन्य कच्चे पदार्थों का उत्पादन करने वाली मिट्टियों का अध्ययन भूगोल तथा मृदा विज्ञान का प्रमुख विषय है। इस प्रकार भूगोल और मृदा विज्ञान परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

6. भूगोल एवं वनस्पति विज्ञान- वृक्षों का मानव-जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनसे अनेक उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति होती है। वन बाढ़ों एवं भूक्षरण को रोकने में सहायक होते हैं। अतः ये एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। भूगोल में वनस्पति का अध्ययन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अतः भूगोल का सम्बन्ध वनस्पति विज्ञान से अत्यधिक गहरा है।

7. भूगोल एवं जन्तु विज्ञान- पशुधन से मानव का गहरा सम्बन्ध है। पशुओं से मानव को दूध, मांस, ऊन, चमड़ा आदि अनेक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। अनेक पशुओं का उपयोग कृषि-कार्यों, बोझा ढोने एवं यात्रा करने में किया जाता है। इस प्रकार आदिकाल से ही मानव का सम्बन्ध पशुओं से रहा है। इसी कारण भूगोल का सम्बन्ध जन्तु विज्ञान से भी है।

भूगोल का सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध
1. भूगोल और अर्थशास्त्र- भूगोल और अर्थशास्त्र दोनों ही सामाजिक विज्ञान हैं तथा एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। भूगोल मनुष्य के प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अध्ययन करता है, जबकि अर्थशास्त्र मानव की आर्थिक क्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इस प्रकार दोनों के अध्ययन का केन्द्र-बिन्दु मनुष्य ही है। प्राकृतिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव मानव-जीवन पर पड़ता है। भूगोल में दोनों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। प्रादेशिक स्तर पर प्राकृतिक पर्यावरण ही मानव के आर्थिक क्रियाकलापों का निर्धारण करता है। उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्रों में लोग कृषि कर सकते हैं, जबकि घास के क्षेत्रों में पशुचारण प्रमुख व्यवसाय है। समुद्रतटीय भागों में मत्स्य उद्योग तथा वन-प्रधान क्षेत्रों में लोगों का प्रधान व्यवसाय लकड़ी काटना होता है। भूगोल के अध्ययनमात्र से ही हमें ज्ञात हो जाता है कि उस क्षेत्र में मानव की आजीविका के साधन क्या होंगे। सभी प्राकृतिक परिस्थितियाँ; जैसे-भूमि, नदी, पर्वत, मैदान तथा वनस्पतियाँ; मनुष्य के आर्थिक विकास के स्तर का निर्धारण करती हैं। कनाडा में लकड़ी काटना, टैगा में समूर एकत्र करना, कांगो बेसिन में जंगली रबड़ एकत्र करना तथा मलाया में रबड़ का उत्पादन वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की ही देन है। मनुष्य अपनी आजीविका के लिए प्रकृति के साथ कठोर संघर्ष करता है। उसके इसी संघर्ष का अध्ययन आर्थिक भूगोल में होता है। अर्थशास्त्र में भी मानव के व्यवसायों; यथा-कृषि, उद्योग, परिवहन के साधनों तथा व्यापार का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार अर्थशास्त्र और आर्थिक भूगोल में गहरा सम्बन्ध है।

2. भूगोल और इतिहास- इतिहास भूतकालीन घटनाओं का वर्णन करने वाला शास्त्र है। वर्तमान की भौगोलिक घटनाएँ ही भविष्य में इतिहास बन जाती हैं। इतिहास वर्तमान भौगोलिक घटनाओं को अतीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के फ्रेम में व्यवस्थित करता है। किसी देश के इतिहास के निर्माण में वहाँ की भौगोलिक दशाओं का अभूतपूर्व योग रहता है। बकल महोदय के शब्दों में, “विश्व का सम्पूर्ण इतिहास मनुष्य एवं प्रकृति की क्रिया-प्रतिक्रिया से ओत-प्रोत है। मानव सभ्यता के विकास का इतिहास इने सम्बन्धों से पृथक् नहीं किया जा सकता।’ ऐतिहासिक घटनाओं की समग्र पृष्ठभूमि भूगोल द्वारा ही तैयार की जाती है। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना का एक विशिष्ट वातावरण होता है, जबकि भौगोलिक घटनाओं का भी एक निश्चित इतिहास होता है। भारत में उत्तर का विशाल मैदान कैसे बना, इसकी एक निश्चित ऐतिहासिक श्रृंखला है। इस क्षेत्र के इतिहास के निर्माण में किन-किन भौगोलिक दशाओं का योग रहा, यह भी इतना ही महत्त्वपूर्ण है। आज का भूगोल कल का इतिहास है, जबकि कल का इतिहास आज का भूगोल बन जाता है। कुमारी सैम्पुल के शब्दों में, “वास्तव में आज जो भूगोल है, कल वही काल के अन्तर में इतिहास बन जाता है।” उच्चावच स्थिति, जलवायु, प्रादेशिक विस्तार तथा अन्य भौगोलिक दशाएँ राष्ट्र के ऐतिहासिक स्वरूप का निर्माण करती हैं। मिस्र में नील घाटी की सभ्यता, एशिया में मेसोपोटामिया की सभ्यता, चीन में ह्वांगहो घाटी की सभ्यता वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की ही देन रही हैं। यूनान, इंग्लैण्ड, फ्रांस और जापान देशों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के निर्माण में वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों का विशेष योगदान रहा है। सिकन्दर और नेपोलियन के उत्थान और पतन के पीछे भी वहाँ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों का ही विशेष हाथ रहा है। भूगोल को इतिहास की सहायता से तथा इतिहास को भूगोल की सहायता से भली प्रकार समझा जा सकता है। इस प्रकार इतिहास और
भूगोल एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

3. भूगोल और समाजशास्त्र- समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विज्ञान है। यह सामाजिक पृष्ठभूमि में मानव के सामाजिक क्रियाकलापों का विवरण प्रस्तुत करता है। यह मनुष्य की भौतिक-अभौतिक संस्कृति का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र सामाजिक पृष्ठभूमि के सन्दर्भ में सामाजिक मानव का गहन अध्ययन करता है। सामाजिक परिवेश के निर्माण में प्राकृतिक पर्यावरण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मानव भूगोल का लक्ष्य मानव के सामाजिक और आर्थिक पहलू का अध्ययन करना है। इन दोनों पहलुओं के निर्माण में भौगोलिक दशाओं का विशेष हाथ रहता है। समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, परम्पराएँ, धर्म, नैतिकता, भाषा एवं संस्कृति का निर्धारण प्राकृतिक पर्यावरण द्वारा ही किया जाता है। समाजशास्त्र में इन्हीं सभी प्रतिमानों का अध्ययन किया जाता है। समाज के स्वरूप, संस्थाओं और उनके ढाँचे के निर्माण में भौगोलिक दशाओं का ही हाथ रहता है। अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही यूनान के लोग वीर और दार्शनिक तथा ब्रिटेन के लोग बुद्धिमान हो गये। मानसूनी जलवायु की अनिश्चितता के कारण ही वहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं, जबकि भूमध्यरेखीय प्रदेशों में आज भी जनमानस में जादू-टोने का प्रचलन है। इस सामाजिक परिवेश का रूप भौगोलिक पर्यावरण की प्रत्यक्ष देन है। अतः हम कह सकते हैं कि भूगोल और समाजशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।

4. भूगोल और राजनीतिशास्त्र- राजनीतिशास्त्र वह विज्ञान है जिसमें राज्य की उत्पत्ति, विकास, प्रभुसत्ता, कानून और सरकारों का अध्ययन किया जाता है। भूगोल में मानव की विभिन्न दशाओं का अध्ययन किया जाता है। भौगोलिक दशाएँ ही राज्य के स्वरूप तथा सरकारों के ढाँचों का निर्माण करती हैं। मैदानी तथा उपजाऊ क्षेत्रों में सदैव राजनीतिक उथल-पुथल तथा युद्ध लगे रहते हैं। सरकार, कानून, प्रशासन और समुदायों का निर्माण भौगोलिक परिवेश की देन है। इन्हीं सबका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रजातन्त्र और पूँजीवाद, रूस और चीन में साम्यवाद और समाजवाद घहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों की ही देन हैं। एशिया महाद्वीप के पृथक्-पृथक् देशों में प्रचलित विभिन्न प्रशासनिक प्रारूप यहाँ की विविध जलवायु की ही देने हैं। ब्रिटेन की द्वीपीय स्थिति के कारण वहाँ जहाजी बेड़ा शक्तिशाली बन सका। उसी के बल पर उसने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित कर साम्राज्यवाद का पोषण किया। भूगोल में भूराजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। वर्तमान समय में विश्व में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन भौगोलिक परिस्थितियों की ही उपज है। पर्यावरण-प्रदूषण के बढ़ते खतरों को देखकर ही महाशक्तियाँ आणविक शक्ति प्रसार को तत्पर हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिशास्त्र और भूगोल परस्पर सम्बद्ध हैं।

प्रश्न 5. भूगोल के अध्ययन की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
या भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम कौन-से हैं? किसी एक उपागम की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या भूगोल के अध्ययन में प्रादेशिक उपागम का क्या महत्त्व है?
या ‘क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भूगोल के अध्ययन की विधियाँ या उपागम
प्रत्येक विज्ञान के अध्ययन की एक पद्धति, विधि या प्रणाली होती है। इन विधियों के द्वारा विषय की जटिलताओं को दूर करके उसे सरल बनाया जाता है। भूगोल में मात्रात्मक विश्लेषणों और पर्यावरणीय समस्याओं के रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए जिन साधनों का सहारा लिया जाता है, उन्हें भूगोल के अध्ययन की विधियाँ या उपागम कहते हैं। भूपटल के अध्ययन को वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित करने के उद्देश्य से इसके अध्ययन के लिए निम्नलिखित दो उपागम (विधियाँ) प्रयोग में लाये जीते हैं

1. क्रमबद्ध या वर्गीकृत उपागम ।
इसे प्रकरण उपागम (Topical Approach) भी कहा जाता है। इसके अन्तर्गत भूगोल के सभी तथ्यों का पृथक्-पृथक् अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार के भूगोल को क्रमबद्ध या वर्गीकृत भूगोल (Systematic Geography) कहते हैं। इस उपागम के अन्तर्गत भूगोल के विभिन्न पक्षों या प्रकरणों (Topics); यथा- भू-आकृति, जलवायु, अपवाह प्रणाली, मिट्टी, वनस्पति, ज़ीव-जन्तु, खनिज सम्पदा, जनसंख्या, आर्थिक व्यवसाय (कृषि, उद्योग), परिवहन-व्यापार आदि तथ्यों का अध्ययन समस्त भूतल के सन्दर्भ में पृथक्-पृथक् शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाता है। इसमें प्रत्येक भौगोलिक तत्त्व को विश्लेषण एवं विश्व में उनके वितरण का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ-प्राकृतिक वनस्पति को वन, घास, कंटीली झाड़ियों आदि के वर्गों में बाँटकर उनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया जाता है। इसी प्रकार भौतिक, रासायनिक तथा जैविक विशेषताओं के आधार पर मिट्टियों का वर्गीकरण करके विश्व में उनके वितरण का अध्ययन किया जाता है। जलवायु के भी विभिन्न प्रकारों का अध्ययन किया जाता है। कृषि-फसलों के वितरण के अध्ययन में विभिन्न फसलों के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं (तापमान, वर्षा, मिट्टियाँ, सिंचाई, मानवीय श्रम आदि) का वर्णन किया जाता है, तत्पश्चात् विश्व में उनके वितरण के प्रारूपों का उल्लेख किया जाता है। अन्य भौगोलिक तत्त्वों; जैसे—खनिज पदार्थों, विनिर्माणी उद्योगों, जनसंख्या, परिवहन के साधनों, व्यापार आदि का भी अध्ययन क्रमबद्ध रूप में किया जाता है।

2. प्रादेशिक उपागम
पृथ्वी का आकार बहुत विशाल है; अतः इसका समग्र रूप में अध्ययन करना सरल नहीं है। अतः इसे एकसमान विशेषताओं के आधार पर विभिन्न प्रदेशों में बाँटकर उनका पृथक्-पृथक् विश्लेषण किया जाता है। इस विधि को हो प्रादेशिक उपागम कहते हैं। भौगोलिक अध्ययन के इस पक्ष को प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) कहा जाता है।

समान भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर विश्व को विभिन्न प्रदेशों में विभाजित करना ही प्रादेशिक उपागम है। इस प्रकार सीमांकित प्रदेशों में समान भौगोलिक विशेषताओं के साथ-साथ किसी-न-किसी प्रकार की आन्तरिक सम्बद्धता पायी जाती है। इसके पश्चात् उस प्रदेश के भौगोलिक तथ्यों; जैसे-भू-आकृति, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, जल संसाधन, मिट्टी, जीव-जन्तु, खनिज सम्पदा, जनसंख्या, आर्थिक व्यवसायों आदि का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ-गंगा के मैदान के प्रादेशिक अध्ययन में उसके अध्ययन के प्रकरणों का अध्ययन (वर्णन) किया जाता है; जैसे—(i) धरातलीय संरचना, (ii) अपवाह प्रणाली, (iii) जलवायु की दशाएँ, (iv) मिट्टियाँ, (v) प्राकृतिक वनस्पति, (vi) जीव- जन्तु, (vii) जनसंख्या, (viii) आर्थिक व्यवसाय, (ix) परिवहन एवं व्यापार, (x) बस्तियों के प्रकार आदि। इसी भाँति अन्य भौगोलिक प्रदेशों; जैसे-गंगा की निचली घाटी, छोटा नागपुर का पठार, मालवा का पठार, गोदावरी बेसिन, मालाबार तट, कोंकण तट, ब्रह्मपुत्रे घाटी आदि का भी वर्णन किया जाता है। इन प्रदेशों का आकार सूक्ष्म या वृहद् हो सकता है।

प्रादेशिक अध्ययन के लिए विश्व के किसी भी भू-क्षेत्र का चुनाव किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, डेन्यूब बेसिन, यूराल प्रदेश, वोल्गा बेसिन, मिसीसिपी डेल्टा, कैलीफोर्निया की घाटी, यांगटिसी बेसिन आदि क्षेत्र हो सकते हैं।

यहाँ यह बताना आवश्यक है कि प्रदेशों के सीमांकन का आधार भौगोलिक समानता अथवा राजनीतिक इकाई कुछ भी हो सकता है। दोनों प्रकार के प्रदेशों में मौलिक अन्तर पाया जाता है। भौगोलिक प्रदेशों में जहाँ भौगोलिक समानता पायी जाती है, वहीं राजनीतिक प्रदेशों में समानता के बजाय विषमता अधिक दृष्टिगोचर होती है। एक राजनीतिक इकाई में अनेक प्रकार के भौगोलिक प्रदेश हो सकते हैं। उदाहरणार्थ-भारत एक राजनीतिक इकाई है, इसमें अनेक प्रकार के भौगोलिक प्रदेश मिलते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश एक राजनीतिक इकाई है जिसमें अधिक भौगोलिक प्रदेश मिलते हैं; यथा-गंगा का ऊपरी मैदान, गंगा का मध्यवर्ती मैदान, बुन्देलखण्ड का पठार, बघेलखण्ड का पठार आदि।।

क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक उपागम की सम्बद्धता ।

क्रमबद्ध एवं प्रादेशिक भूगोल एक-दूसरे से इस प्रकार सम्बद्ध हैं जैसे एक सिक्के के दो पहलू हों। दोनों उपागम एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि क्रमबद्ध या वर्गीकरण भूगोल में प्रत्येक तत्त्व की विशेषताओं के विश्लेषण के बाद सम्पूर्ण ग्लोब पर उसके वितरण-क्षेत्रों का सीमांकन किया जाता है, जबकि प्रादेशिक भूगोल में छाँटे गये प्रदेश के समस्त भौगोलिक तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है।

भूगोल के अध्ययन के लिए दोनों उपागम (विधियाँ) आवश्यक हैं। इन दोनों का तालमेल ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार वस्त्र में ताना-बाना मिला रहता है। वस्तुत: भूगोल के तथ्यों को समझने के लिए दोनों ही उपागम आवश्यक होते हैं। क्रमबद्ध तथा प्रादेशिक उपागम एक-दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं। कि इन्हें एक-दूसरे का पूरक कहा जा सकता है। क्षेत्रीय भूगोल के अध्ययन की निरन्तरता तथा क्रमबद्धता क्रमबद्ध उपागम को जन्म देती है। दोनों उपागम अन्योन्याश्रित हैं। भौगोलिक घटनाओं के ठीक से अध्ययन के लिए प्रादेशिक उपागम के साथ क्रमबद्ध उपागम का होना नितान्त आवश्यक हो जाता है।

क्रमबद्ध तथा प्रादेशिक उपागम में अन्तर

जहाँ वर्गीकृत तथा प्रादेशिक उपागमों में प्रतिबद्धता पायी जाती है, वहीं दोनों में निम्नलिखित अन्तर भी पाये जाते हैं
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निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि दोनों विधियों में अन्तर नाममात्र के हैं। दोनों विधियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं।

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