UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 2 Freedom

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 2 Freedom (स्वतंत्रता)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता से क्या आशय है? क्या व्यक्ति के लिए स्वतन्त्रता और राष्ट्र के लिए स्वतन्त्रता में कोई सम्बन्ध है?
उत्तर-
व्यक्ति पर बाहरी प्रतिबन्धों का अभाव ही स्वतन्त्रता है। बाहरी प्रतिबन्धों का अभाव और ऐसी स्थितियों का होना जिसमें लोग अपनी प्रतिभा का विकास कर सकें, स्वतन्त्रता के ये दोनों ही पहलू महत्त्वपूर्ण हैं। एक स्वतन्त्र समाज वह होगा, जो अपने सदस्यों को न्यूनतम सामाजिक अवरोधों के साथ अपनी सम्भावनाओं के विकास में समर्थ बनाएगा।

राष्ट्र की स्वतन्त्रता और व्यक्ति की स्वतन्त्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि राष्ट्र स्वतन्त्र नहीं होगा तो व्यक्ति की स्वतन्त्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। स्वतन्त्र राष्ट्र में ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास और उत्तरदायित्वों का निर्वाह भली-भाँति कर सकता है।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता की नकारात्मक और सकारात्मक अवधारणा में क्या अन्तर है?
उत्तर-
सकारात्मक स्वतन्त्रता के पक्षधरों का मानना है कि व्यक्ति केवल समाज में ही स्वतन्त्र हो सकता है, समाज से बाहर नहीं और इसीलिए वह इस समाज को ऐसा बनाने का प्रयास करते हैं, जो व्यक्ति के विकास का मार्ग प्रशस्त करे। दूसरी ओर नकारात्मक स्वतन्त्रता का सम्बन्ध अहस्तक्षेप के अनुलंघनीय क्षेत्र से है, इस क्षेत्र से बाहर समाज की स्थितियों से नहीं। नकारात्मक स्वतन्त्रता अहस्तक्षेप के इस छोटे क्षेत्र का अधिकतम विस्तार करना चाहेगी। साधारणतया दोनों प्रकार की स्वतन्त्रताएँ साथ-साथ चलती हैं और एक-दूसरे का समर्थन करती हैं।

प्रश्न 3.
सामाजिक प्रतिबन्धों से क्या आशय है? क्या किसी भी प्रकार के प्रतिबन्ध स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक हैं?
उत्तर-
सामाजिक प्रतिबन्धों से आशय है; वे प्रतिबन्ध जिनसे समाज की व्यवस्था भंग न हो और समाज निरन्तर गतिशील रहे।
स्वतन्त्रता मानव समाज के केन्द्र में है और गरिमापूर्ण मानव-जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसलिए स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध विशेष परिस्थितियों में ही लगाए जा सकते हैं। प्रतिबन्ध स्वतन्त्रता के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। बिना प्रतिबन्धों के स्वतन्त्रता उद्दण्डता में बदल जाएगी।

प्रश्न 4.
नागरिकों की स्वतन्त्रता को बनाए रखने में राज्य की क्या भूमिका है?
उत्तर-
नागरिकों की स्वतन्त्रता बनाए रखने में राज्य की भूमिका को निम्नलिखित बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है-

  • यदि नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा करनी है तो राज्य द्वारा नागरिकों के कार्यों पर नियन्त्रण किया जाना चाहिए। राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति को ऐसे कार्यों को करने से रोक दे जो दूसरों के हितों का उल्लघंन करते हैं।
  • राज्य न्यायालयों के माध्यम से व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करते हैं।
  • राज्य में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली की स्थापना से नागरिकों को अनेक स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हो जाती हैं।
  • राज्य व्यक्तियों को विभिन्न अधिकार प्रदान कर उनकी स्वतन्त्रता को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 5.
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का क्या अर्थ है? आपकी राय में इस स्वतन्त्रता पर समुचित प्रतिबन्ध क्या होंगे? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर-
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से आशय यह है कि प्रत्येक नागरिक को विचाराभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है, परन्तु शर्त यह है कि अभिव्यक्ति समाज में अव्यवस्था उत्पन्न न करे। अपने विचार पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में प्रकाशित करने और करवाने की दृष्टि से लेखक और प्रकाशक दोनों स्वतन्त्र हैं, लेकिन ये विचार अश्लील और विघटनकारी नहीं होने चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता के नकारात्मक पहलू का विचारक था
(क) ग्रीन
(ख) गांधी जी
(ग) लॉस्की
(घ) रूसो
उत्तर-
(घ) रूसो।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता के सकारात्मक (वास्तविक) पहलू का विचारक था
(क) हॉब्स
(ख) सीले
(ग) कोल
(घ) मैकेंजी
उत्तर-
(घ) मैकेंजी।

प्रश्न 3.
“स्वतन्त्रता तथा समानता परस्पर विरोधी हैं।” इस विचारधारा का समर्थक था
(क) लॉस्की
(ख) सी० ई० एम० जोड
(ग) क्रोचे
(घ) पोलार्ड
उत्तर-
(ग) क्रोचे।

प्रश्न 4.
“स्वतन्त्रता एवं समानता एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस विचारधारा का समर्थक है-
(क) डी० टॉकविले
(ख) लॉर्ड एक्टन
(ग) क्रोचे
(घ) लॉस्की
उत्तर-
(घ) लॉस्की।

प्रश्न 5.
“आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता एक भ्रम है।” यह कथन किसका है?
(क) लॉस्की को
(ख) प्रो० जोड का
(ग) रूसो को
(घ) क्रोचे का
उत्तर-
(ख) प्रो० जोड का।

प्रश्न 6.
नागरिक स्वतन्त्रता निम्नलिखित में से किसे कहते हैं?
(क) रोजगार पाने की स्वतन्त्रता
(ख) कानून के समक्ष समानता
(ग) चुनाव लड़ने की स्वतन्त्रता
(घ) राजकीय सेवा प्राप्त करने की स्वतन्त्रता
उत्तर-
(ख) कानून के समक्ष समानता।

प्रश्न 7.
‘लिबर्टी’ (स्वतन्त्रता) की व्युत्पत्ति लिबर’ शब्द से हुई है, जो शब्द है
(क) संस्कृत भाषा का
(ख) लैटिन भाषा का
(ग) फ्रांसीसी भाषा का
(घ) हिब्रू भाषा का
उत्तर-
(ख) लैटिन भाषा का।

प्रश्न 8.
“स्वतन्त्रता अति-शासन की विरोधी है।” यह कथन किसका है?
(क) कोल
(ख) सीले
(ग) लॉस्की
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(ख) सीले।

प्रश्न 9.
यदि किसी व्यक्ति को आवागमन की स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त है, तो उसे निम्नांकित में से किस
स्वतन्त्रता से वंचित किया जा सकता है?
(क) नागरिक स्वतन्त्रता
(ख) प्राकृतिक स्वतन्त्रता
(ग) आर्थिक स्वतन्त्रता
(घ) धार्मिक स्वतन्त्रता
उत्तर-
(ख) प्राकृतिक स्वतन्त्रता।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ क्या है?
उत्तर–
अनुचित बन्धनों के स्थान पर उचित बन्धनों की व्यवस्था ही स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ है।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता की एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
बार्कर के अनुसार, “स्वतन्त्रता प्रतिबन्धों का अभाव नहीं, वरन् वह ऐसे नियन्त्रणों का अभाव है, जो मनुष्य के विकास में बाधक हों।”

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता के दो प्रकार लिखिए।
उत्तर-
(i)राजनीतिक स्वतन्त्रता- राज्य के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने की शक्ति ही राजनीतिक स्वतन्त्रता है।
(ii)आर्थिक स्वतन्त्रता- प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार व अपने श्रम का पारिश्रमिक प्राप्त करने की स्वतन्त्रता।

प्रश्न 4.
“स्वतन्त्रता और कानून एक-दूसरे के पूरक हैं।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–
स्वतन्त्रता और कानून एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि कानूनों के पालन में ही मनुष्य की स्वतन्त्रता सुरक्षित रहती है।

प्रश्न 5.
“जहाँ कानून नहीं है, वहाँ स्वतन्त्रता नहीं हो सकती।” यह मत किस विद्वान् का है।
उत्तर—
यह मत उदारवादी विचारक लॉक का है।

प्रश्न 6.
कानून किस प्रकार स्वतन्त्रता का रक्षक है?
उत्तर-
कानून स्वतन्त्रता को जन्म देते हैं और उन्हें मर्यादित करते हैं।

प्रश्न 7.
‘ऑन लिबर्टी’ (स्वतन्त्रता) नामक ग्रन्थ किसने लिखा?
उत्तर-
‘ऑन लिबर्टी’ (स्वतन्त्रता) नामक ग्रन्थ जे०एस० मिल ने लिखा।

प्रश्न 8.
नकारात्मक स्वतन्त्रता का समर्थक विचारक कौन है?
उत्तर–
जे०एस० मिला।

प्रश्न 9.
प्राकृतिक स्वतन्त्रता का समर्थक कौन था? ।
उत्तर-
रूसो।

प्रश्न 10.
“स्वतन्त्रता अति शासन की विरोधी है।” यह मत किसने व्यक्त किया है।
उत्तर–
सीले ने।

प्रश्न 11.
नेल्सन मण्डेला की आत्मकथा का शीर्षक क्या है?
उत्तर–
नेल्सन मण्डेला की आत्मकथा का शीर्षक ‘लाँग वाक टू फ्रीडम’ (स्वतन्त्रता के लिए लम्बी यात्रा) है।

प्रश्न 12.
आँग सान सू कौन है?
उत्तर–
आँग सान सू म्यांमार की राष्ट्रवादी नेता हैं। उन्हें म्यांमार सरकार ने नजरबन्द कर रखा है।

प्रश्न 13.
आँग सान सू की पुस्तक का शीर्षक क्या है?
उत्तर-
आँग सान सू की पुस्तक का शीर्ष ‘फ्रीडम फ्रॉम फीयर (भय की मुक्ति) है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता के मार्क्सवादी दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर—
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार स्वतन्त्रता ऐसी स्थिति नहीं है जिसमें व्यक्ति को अकेला छोड़ दिया जाए। इसके विपरीत, स्वतन्त्रता की स्थितियाँ सामाजिक-आर्थिक सन्दर्भो से सम्बद्ध होती हैं। मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार तर्कसंगत उत्पादन प्रणाली के अन्तर्गत ही व्यक्ति सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र हो सकते हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में उत्पादन के प्रमुख साधनों पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व होगा, कोई किसी का शोषण नहीं करेगा और उत्पादन की शक्तियाँ इतनी विकसित हो जाएँगी कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा और आवश्यकता की पूर्ति आसानी से कर सकेगा। माक्र्सवाद के अनुसार व्यक्ति के लिए स्वतन्त्रता का सच्चा अर्थ तो उस समय सम्भव हो सकता है जब वह अभावों से मुक्त हो। उसे आत्मविश्वास के लिए जिन चीजों की जरूरत हो वे सब भरपूर मात्रा में उपलब्ध हों। मार्क्स नकारात्मक स्वतन्त्रता का विरोधी व सकारात्मकं स्वतन्त्रता का समर्थक है।

प्रश्न 2.
नागरिक स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
नागरिक स्वतन्त्रता
समाज को सदस्य होने के कारण व्यक्ति को जो स्वतन्त्रता प्राप्त होती है, उसको नागरिक स्वतन्त्रता की उपमा दी जाती है। नागरिक स्वतन्त्रता की रक्षा राज्य करता है। इसमें नागरिकों की निजी स्वतन्त्रता, धार्मिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति का अधिकार, विचार-अभिव्यक्ति करने की स्वतन्त्रता, इकड़े होने तथा संघ इत्यादि बनाने की स्वतन्त्रता सम्मिलित हैं। गैटिल ने नागरिक स्वतन्त्रता का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि “नागरिक स्वतन्त्रता का तात्पर्य उन अधिकारों एवं विशेषाधिकारों से है जिन्हें राज्य अपनी प्रजा हेतु उत्पन्न करता है तथा उन्हें सुरेक्षा प्रदान करता है।”
नागरिक स्वतन्त्रता विभिन्न राज्यों में अलग-अलग होती है। जहाँ लोकतन्त्रीय राज्यों में यह स्वतन्त्रता अधिक होती है, वहीं तानाशाही राज्यों में कम। भारत के संविधान में नागरिक स्वतन्त्रता का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 3.
आर्थिक स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
आर्थिक स्वतन्त्रता
आर्थिक स्वतन्त्रता से आशय आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी उस स्थिति से है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपना जीवन-यापन कर सके। लॉस्की के शब्दों में, आर्थिक स्वतन्त्रता का यह अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका अर्जित करने की समुचित सुरक्षा तथा सुविधा प्राप्त हो।”
जिस राज्य में भूख, गरीबी, दीनता, नग्नता तथा आर्थिक अन्याय होगा वहाँ व्यक्ति कभी भी स्वतन्त्र नहीं होगा। व्यक्ति को पेट की भूख, अपने बच्चों की भूख तथा भविष्य में दिखाई देने वाली आवश्यकताएँ प्रत्येक पल दु:खी करती रहेंगी। व्यक्ति कभी भी स्वयं को स्वतन्त्र अनुभव नहीं करेगा तथा न ही वह नागरिक एवं राजनीतिक स्वतन्त्रता का भली-भाँति उपभोग कर सकेगा। अत: राजनीतिक एवं नागरिक स्वतन्त्रता को हासिल करने के लिए आर्थिक स्वतन्त्रता का होना परमावश्यक है। लेनिन ने उचित ही कहा है कि “आर्थिक स्वतन्त्रता के अभाव में राजनीतिक अथवा नागरिक स्वतन्त्रता अर्थहीन है।”

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता और सत्ता के पारस्परिक सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
कतिपय विद्वानों का विचार है कि राजनीतिक स्वतन्त्रता एवं सत्ता परस्पर विरोधी हैं। प्रभुसत्ता असीम है परन्तु स्वतन्त्रता पर कोई अंकुश नहीं होना चाहिए। सत्ता एवं स्वतन्त्रता साथ-साथ नहीं रह सकती हैं। वास्तव में न तो प्रभुसत्ता असीमित होती है और न ही स्वतन्त्रता अप्रतिबन्धित होती है। राज्य की प्रभुसत्ता के ऊपर अनेक प्रतिबन्ध होते हैं। स्वतन्त्रता की प्रकृति में ही प्रतिबन्ध निहित है, अन्यथा स्वतन्त्रता उच्छंखलता में परिवर्तित हो जाएगी। स्वतन्त्रता के ऊपर अंकुश इसलिए जरूरी है कि अन्य नागरिकों को समान अवसर प्राप्त हों और सबल वर्ग समाज के विरुद्ध आचरण न कर सके। गैटिल ने इस सम्बन्ध में कहा है, “बिना प्रतिबन्धों के प्रभुसत्ता निरंकुश बन जाती है और बिना सत्ता के स्वतन्त्रता अराजकता को जन्म देती है।”

प्रश्न 5.
संक्षेप में स्वतन्त्रता के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
यदि यह सत्य है कि बिना सत्ता के सामाजिक शक्ति और व्यवस्था नहीं रह सकतीं, तो यह भी उतना ही आवश्यक है कि सत्ता द्वारा स्थापित इस व्यवस्था के अन्तर्गत नागरिकों को अपने व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए स्वतन्त्रता उपलब्ध हो। मानव के व्यक्तित्व के विकास में स्वतन्त्रता एक अनमोल निधि है। वैयक्तिक व राष्ट्रीय स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए हजारों लोगों के अनेक प्रकार की यातनाएँ हँसते हुए झेली हैं। बर्टेण्ड रसेल के अनुसार, “स्वतन्त्रता की इच्छा व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रकृति है और इसी के आधार पर सामाजिक जीवन का निर्माण सम्भव है।” प्रसिद्ध विधिवेत्ता पालकीवाला के शब्दों में, “मनुष्य सदा ही स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर सर्वाधिक बहुमूल्य बलिदान देते रहे हैं। वे भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा आत्मा व धर्म की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राण तक देते रहे हैं।” संक्षेप में, स्वतन्त्रता यदि मानव-जाति का अन्तिम लक्ष्य नहीं, तब उसकी प्रेरणा का अन्तिम स्रोत तो सदा ही रही है।

प्रश्न 6.
उदारवाद क्या है?
उत्तर-
एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में उदारवाद को सहनशीलता के मूल्य के साथ जोड़कर देखा जाता है। उदारवादी चाहे किसी व्यक्ति से असहमत हों, तब भी वे उसके विचार और विश्वास रखने और व्यक्त करने के अधिकार का पक्ष लेते हैं। लेकिन उदारवाद इतना भर नहीं है और न ही उदारवाद एकमात्र आधुनिक विचारधारा है जो सहिष्णुता का समर्थन करती है। आधुनिक उदारवाद की विशेषता यह है कि इसमें केन्द्र बिन्दु व्यक्ति है। उदारवाद के लिए परिवार, समाज या समुदाय जैसी इकाइयों का स्वयं में कोई महत्त्व नहीं है। उनके लिए इन इकाइयों का महत्त्व तभी है, जब व्यक्ति इन्हें महत्त्व दे। उदाहरण के लिए, उदारवादी कहेंगे कि किसी से विवाह करने का निर्णय व्यक्ति को लेना चाहिए, परिवार, जाति या समुदाय को नहीं। उदारवादी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को समानता जैसे अन्य मूल्यों से अधिक वरीयता देते हैं। वे साधारणतया राजनीतिक सत्ता को भी संदेह की दृष्टि से देखते हैं।

प्रश्न 7.
स्वराज से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
भारतीय राजनीतिक विचारों में स्वतन्त्रता की समानार्थी अवधारणा ‘स्वराज’ है। स्वराज का अर्थ ‘स्व’ का शासन भी हो सकता है और ‘स्व’ के ऊपर शासन भी। भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष के सन्दर्भ में ‘स्वराज’ राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर स्वतन्त्रता की माँग है और सामाजिक स्तर पर यह एक मूल्य है। इसीलिए स्वराज स्वतन्त्रता आन्दोलन में एक महत्त्वपूर्ण नारा बन गया जिसने तिलक के प्रसिद्ध कथन “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” को प्रेरित किया।

प्रश्न 8.
प्रतिबन्धों के स्रोत क्या हैं?
उत्तर–
व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध प्रभुत्व और बाहरी नियन्त्रण से लग सकते हैं। ये प्रतिबन्ध . बलपूर्वक या सरकार द्वारा ऐसे कानून की सहायता से लगाए जा सकते हैं, जो शासकों की ताकत का । प्रतिनिधित्व करें। ऐसे प्रतिबन्ध उपनिवेशवादी शासकों ने या दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की व्यवस्था ले लगाए। सरकार की कोई-न-कोई जरूरत हो सकती है, लेकिन सरकार लोकतान्त्रिक हो तो राज्य के नागरिकों का अपने शासकों पर कुछ नियन्त्रण हो सकता है। इसलिए लोकतान्त्रिक सरकार लोगों की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए एक आवश्यक माध्यम मानी गई है।

प्रश्न 9.
जे०एस० मिल ने ‘स्वसम्बद्ध’ और ‘परसम्बद्ध’ कार्यों में क्या अन्तर बताया है?
उत्तर–
पाश्चात्य विचारक जे०एस० मिल ने ‘स्वसम्बद्ध’ और ‘परसम्बद्ध कार्यों में अन्तर बताया है। स्वसम्बद्ध वे कार्य हैं, जिनके प्रभाव केवल इन कार्यों को करने वाले व्यक्ति पर पड़ते हैं जबकि परसम्बद्ध वे कार्य हैं जो कर्ता के अलावा शेष लोगों पर भी प्रभाव डालते हैं। मिल का तर्क है कि स्वसम्बद्ध कार्य और निर्णयों के मामले में राज्य या किसी बाहरी सत्ता को कोई हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो, स्वसम्बद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में कहा जा सके कि ये मेरा काम है, मैं इसे वैसे करूंगा, जैसा मेरा मन होगा।’ परसम्बद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में कहा जा सके कि अगर तुम्हारी गतिविधियों से मुझे कुछ नुकसान होता है तो किसी-न-किसी बाहरी सत्ता को चाहिए कि मुझे इन नुकसानों से बचाए।”

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“स्वतन्त्रता और कानून की घनिष्ठता के कारण इन्हें एक-दूसरे का पूरक कहा जाता है।” इस कथन पर टिप्पणी लिखिए।
या कानून तथा स्वतन्त्रता के मध्य सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
स्वतन्त्रता के सकारात्मक स्वरूप का तात्पर्य है- व्यक्ति को व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना। कानून व्यक्तियों के व्यक्तित्व के विकास की सुविधाएँ प्रदान करते हुए उन्हें वास्तविक स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं। वर्तमान समय में लगभग सभी राज्यों द्वारा जनकल्याणकारी राज्य के विचार को अपना लिया गया है और राज्य कानूनों के माध्यम से एक ऐसे वातावरण के निर्माण में संलग्न है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके। राज्य के द्वारा की गयी अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था, अधिकतम श्रम और न्यूनतम वेतन के सम्बन्ध में कानूनी व्यवस्था, जनस्वास्थ्य का प्रबन्ध आदि कार्यों द्वारा नागरिकों को व्यक्तित्व के विकास की सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं और इस प्रकार राज्य नागरिकों को वास्तविक स्वतन्त्रता प्रदान कर रहा है। यदि राज्य सड़क पर चलने के सम्बन्ध में किसी प्रकार के नियमों का निर्माण करता है, मद्यपान पर रोक लगाता है या टीके की व्यवस्था करता है तो राज्य के इन कार्यों से व्यक्तियों की स्वतन्त्रता सीमित नहीं होती, वरन् उसमें वृद्धि ही होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि साधारण रूप से राज्य के कानून व्यक्तियों की स्वतन्त्रता की रक्षा और उसमें वृद्धि करते हैं।
स्वतन्त्रता और कानून के इस घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही रैम्जे म्योर ने लिखा है कि “कानून और स्वतन्त्रता इस प्रकार अन्योन्याश्रित और एक-दूसरे के पूरक हैं।”

प्रश्न 2.
“स्वतन्त्रता व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए आवश्यक है।” विवेचना कीजिए।
उत्तर–
स्वतन्त्रता अमूल्य वस्तु है और उसका मानवीय जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है। स्वतन्त्रता का मूल्य व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर समान है। स्वतन्त्रता का महत्त्व न होता तो विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों द्वारा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान न दिया जाता। मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकारों का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है और इन विविध अधिकारों में स्वतन्त्रता का स्थान निश्चित रूप से सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य का सम्पूर्ण भौतिक, मानसिक एवं नैतिक विकास स्वतन्त्रता के वातावरण में ही सम्भव है। स्वतन्त्रता की व्याख्या करते हुए लास्की ने भी कहा है कि “स्वतन्त्रता उस वातावरण को बनाए रखना है जिसमें व्यक्ति को जीवन का सर्वोत्तम विकास करने की सुविधा प्राप्त हो।’ इस प्रकार स्वतन्त्रता का । तात्पर्य ऐसे वातावरण और परिस्थितियों की विद्यमानता से है जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके। स्वतन्त्रता निम्नलिखित आदर्श दशाएँ प्रस्तुत करती हैं

  1.  न्यूनतम प्रतिबन्ध– स्वतन्त्रता का प्रथम तत्त्व यह है कि व्यक्ति के जीवन पर शासन और समाज के दूसरे सदस्यों की ओर से न्यूनतम प्रतिबन्ध होने चाहिए, जिससे व्यक्ति अपने विचार और कार्य-व्यवहार में अधिकाधिक स्वतन्त्रता का उपभोग कर सके तथा अपना विकास सुनिश्चित कर सके।
  2.  व्यक्तित्व विकास हेतु सुविधाएँ– स्वतन्त्रता का दूसरा तत्त्व यह है कि समाज और राज्य द्वारा व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व के विकास हेतु अधिकाधिक सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए। इस प्रकार स्वतन्त्रता जीवन की ऐसी अवस्था का नाम है जिसमें व्यक्ति के जीवन पर न्यूनतम प्रतिबन्ध हों और व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु अधिकतम सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।

प्रश्न 3.
“स्वतन्त्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं।” इस विचार को मान्यता प्रदान करने वालों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
कुछ विद्वानों का विचार है कि स्वतन्त्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं, क्योंकि कानून स्वतन्त्रता पर अनेक प्रकार के बन्धन लगाता है। इस विचार को मान्यता देने वालों में व्यक्तिवाद, अराजकतावादी, श्रम संघवादी तथा कुछ अन्य विद्वान् हैं। इस मत के अलग-अलग विचार निम्नलिखित हैं

  1. व्यक्तिवादियों के विचार- व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में है। व्यक्तिवादियों के अनुसार, “वही शासन-प्रणाली श्रेष्ठ है जो सबसे कम शासन करती है।’ जितने कम कानून होंगे, उतनी ही अधिक स्वतन्त्रता होगी।
  2.  अराजकतावादियों के विचार- अराजकतावादियों की मान्यता है कि राज्य अपनी शक्ति के प्रयोग से व्यक्ति की स्वतन्त्रता को नष्ट करता है। इसीलिए अराजकतावादी राज्य को समाप्त कर देने के समर्थक हैं। अराजकतावादी विचारक विलियम गॉडविन के मतानुसार, “कानून सर्वाधिक घातक प्रकृति की संस्था है।”‘राज्य का कानून, दमन तथा उत्पीड़न का एक नवीन यन्त्र है।”
  3.  श्रम संघवादियों के विचार- मजदूर संघवादियों की मान्यता है कि राज्य के कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को सीमित करते हैं। इन कानूनों का प्रयोग सदैव ही पूँजीपतियों के हितों को बढ़ावा देने हेतु किया गया, है। इससे मजदूरों की स्वतन्त्रता नष्ट होती है। चूंकि राज्य के कानून मजदूरों के हितों का विरोध कर पूँजीपतियों का समर्थन करते हैं, इसलिए मजदूर संघवादी भी राज्य को समाप्त करने के पक्षधर हैं।
  4.  बहुलवादियों के विचार–बहुलवादियों की मान्यता है कि राज्य के पास जितनी अधिक सत्ता होगी, व्यक्ति को उतनी ही कम स्वतन्त्रता होगी। इसलिए राज्य-सत्ता को अलग-अलग समूहों में विभाजित कर दिया जाना चाहिए।
    उपर्युक्त विभिन्न विचारों के अध्ययनोपरान्त हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कानून एवं स्वतन्त्रता में कोई सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् ये परस्पर विरोधी हैं।

प्रश्न 4.
‘लाँग वाक टू फ्रीडम’ पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
20वीं शताब्दी के एक महानतम व्यक्ति नेल्सन मण्डेला की आत्मकथा को शीर्षक ‘लाँग वाक टू फ्रीडम’ (स्वतन्त्रता के लिए लम्बी यात्रा) है। इस पुस्तक में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी शासन के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व संघर्ष, गोरे लोगों के शासन की अलगाववादी नीतियों के विरुद्ध लोगों के प्रतिरोध और दक्षिण अफ्रीका के काले लोगों द्वारा झेले गए अपमान, कठिनाइयों और पुलिस अत्याचार के विषय में बातें की हैं। इन अलगाववादी नीतियों में एक शहर में घेराबन्दी किए जाने और देश में मुक्त आवागमन पर रोक लगाने से लेकर विवाह करने में मुक्त चयन तक पर प्रतिबन्ध लगाना । शामिल है। सामूहिक रूप से इन सभी प्रतिबन्धों को नस्ल के आधार पर भेदभाव करने वाली रंगभेदी सरकार ने जबरदस्ती लागू किया था। मण्डेला और उनके साथियों के लिए इन्हीं अन्यायपूर्ण प्रतिबन्धों और स्वतन्तत्रा के रास्ते की बाधाओं को दूर करने का संघर्ष ‘लाँग वाक टू फ्रीडम’ (स्वतन्त्रता के लिए लम्बी यात्रा) था। विशेष बात यह कि मण्डेला का संघर्ष केवल काले या अन्य लोगों के लिए ही नहीं वरन् श्वेत लोगों के लिए भी था।

प्रश्न 5.
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर राजनीतिक विचारक मिल के विचार लिखिए।
उत्तर-
19वीं सदी के ब्रिटेन के एक राजनीतिक विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने अभिव्यक्ति तथा विचार और विवाद की स्वतन्त्रता का बहुत ही भावपूर्ण पक्ष प्रस्तुत किया है। अपनी पुस्तक ‘ऑन लिबर्टी’ में उसने केवल चार कारण प्रस्तुत किए हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता उन्हें भी होनी चाहिए जिनके विचार आज की स्थितियों में गलत या भ्रामक लग रहे हों।
प्रथम कारण तो यह कि कोई भी विचार पूर्ण रूप से गलत नहीं होता। जो हमें गलत लगता है उसमें सच्चाई को तत्त्व होता है। अगर हम गलत विचार को प्रतिबन्धित कर देंगे तो इसमें छिपे सच्चाई के अंश को भी खो देंगे।
द्वितीय कारण पहले कारण से सम्बन्धित है। सत्य स्वयं में उत्पन्न नहीं होता। सत्य विरोधी विचारों के टकराव से उत्पन्न होता है। जो विचार आज गलत प्रतीत होता है, वह सही तरह के विचारों के उदय में बहुमूल्य हो सकती है।
तृतीय, विचारों का यह संघर्ष केवल अतीत में ही मूल्यवान नहीं था, बल्कि हर समय इसका सतत महत्त्व है। सत्य के विषय में यह खतरा हमेशा होता है कि वह एक विचारहीन और रूढ़ उक्ति में परिवर्तित हो जाए। जब हम इसे विरोधी विचार के समक्ष रखते हैं तभी इस विचार का विश्वसनीय होना। सिद्ध होता है।
अन्तिम बात यह है कि हम इस बात को लेकर भी निश्चित नहीं हो सकते कि जिसे हम सत्य समझते हैं। वही सत्य है। कई बार जिन विचारों को किसी समय पूरे समाज ने गलत समझा और दबाया था, बाद में सत्य पाए गए। कुछ समाज ऐसे विचारों का दमन करते हैं जो आज उनके लिए स्वीकार्य नहीं हैं, लेकिन ये विचार आने वाले समय में बहुत मूल्यवान ज्ञान में बदल सकते हैं। दमनकारी समाज ऐसे सम्भावनाशील ज्ञान के लाभों से वंचित रह जाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता से आप क्या समझते हैं? स्वतन्त्रता कितने प्रकार की होती है? विवेचना कीजिए।
या स्वतन्त्रता की परिभाषा देते हुए इसके विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
या स्वतन्त्रता क्यों आवश्यक है? सकारात्मक स्वतन्त्रता तथा नकारात्मक स्वतन्त्रता की ‘ अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
या स्वतन्त्रता से आप क्या समझते हैं। नागरिकों को प्राप्त विभिन्न स्वतन्त्रताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
स्वतन्त्रता जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार है। बर्स के अनुसार-“स्वतन्त्रता न केवल सभ्य जीवन का आधार है, वरन् सभ्यता का विकास भी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर ही निर्भर करता है।’ स्वतन्त्रता मानव की सर्वप्रिय वस्तु है। व्यक्ति स्वभाव से स्वतन्त्रता चाहता है क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए स्वतन्त्रता सबसे आवश्यक तत्त्व है। मानव के समस्त अधिकारों में स्वतन्त्रता का अधिकार सबसे महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके अभाव में अन्य अधिकारों का उपयोग नहीं हो सकता है।

स्वतन्त्रता का अर्थ

स्वतन्त्रता का अर्थ दो रूपों में स्पष्ट किया जाता है

1. स्वतन्त्रता का निषेधात्मक अर्थ- 
‘स्वतन्त्रता’ शब्द अंग्रेजी भाषा के लिबर्टी’ (Liberty) शब्द का हिन्दी अनुवाद है। ‘लिबर्टी’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘लिबर’ (Liber) शब्द से हुई। ‘लिबर’ का अर्थ ‘बन्धनों का न होना’ होता है। अतः स्वतन्त्रता का शाब्दिक अर्थ ‘बन्धनों से मुक्ति’ है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी बन्धन के अपनी इच्छानुसार सभी कार्यों को करने की सुविधा प्राप्त होना ही ‘स्वतन्त्रता है।
वस्तुत: स्वतन्त्रता का यह अर्थ अनुचित है क्योंकि यदि हम कहें कि कोई भी व्यक्ति किसी की हत्या करने के लिए स्वतन्त्र है, तो यह स्वतन्त्रता न होकर अराजकता है। इस दृष्टि से मैकेंजी ने ठीक ही लिखा है, “पूर्ण स्वतन्त्रता जंगली गधे की आवारागर्दी की स्वतन्त्रता है।” इस सम्बन्ध में बार्कर (Barker) का मत है-“कुरूपता के अभाव को सौन्दर्य नहीं कहते, इसी प्रकार बन्धनों के अंभाव को स्वतन्त्रता नहीं कहते, अपितु अवसरों की प्राप्ति को स्वतन्त्रता कहते हैं।”

2. स्वतन्त्रता का सकारात्मक अर्थ-
स्वतन्त्रता को वास्तविक अर्थ मनुष्य के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा तथा ऐसे बन्धनों का अभाव है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में बाधक हों। स्वतन्त्रता के सकारात्मक पक्ष को स्पष्ट करते हुए ग्रीन ने लिखा है, ‘योग्य कार्य करने अथवा उसके उपयोग करने की सकारात्मक शक्ति को स्वतन्त्रता कहते हैं। इसी प्रकार सकारात्मक पक्ष के सम्बन्ध में लॉस्की का कथन है, “स्वतन्त्रता से अभिप्राय ऐसे वातावरण को बनाए रखना है, जिसमें कि व्यक्ति को अपना पूर्ण विकास करने का अवसर मिले। स्वतन्त्रता का उदय अधिकारों से होता है। स्वतन्त्रता पर विवेकपूर्ण प्रतिबन्ध आरोपित करने का पक्षधर है।

स्वतन्त्रता की परिभाषाएँ

स्वतन्त्रता की कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं का विवेचन निम्नलिखित है

  1. लॉस्की के अनुसार- “स्वतन्त्रता का वास्तविक अर्थ राज्य की ओर से ऐसे वातावरण का निर्माण करना है, जिसमें कि व्यक्ति आदर्श नागरिक जीवन व्यतीत करने योग्य बन सके तथा अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके।
  2.  मैकेंजी के अनुसार- “स्वतन्त्रता सब प्रकार के बन्धनों का अभाव नहीं, अपितु तर्करहित प्रतिबन्धों के स्थान पर तर्कसंगत प्रतिबन्धों की स्थापना है।’
  3.  बार्कर के अनुसार – स्वतन्त्रता प्रतिबन्धों का अभाव नहीं, परन्तु वह ऐसे नियन्त्रणों का अभाव है, जो मनुष्य के विकास में बाधक हो।”
  4.  हरबर्ट स्पेंसर के अनुसार- “प्रत्येक व्यक्ति जो चाहता है, वह करने के लिए स्वतन्त्र है, बशर्ते। |, कि वह किसी अन्य व्यक्ति की समान स्वतन्त्रता का अतिक्रमण न करे।”
  5.  रूसो के अनुसार- “उन कानूनों का पालन करना जिन्हें हम अपने लिए निर्धारित करते हैं, स्वतन्त्रता है।”
  6.  मॉण्टेस्क्यू के अनुसार- “स्वतन्त्रता उन सब कार्यों को करने का अधिकार है जिनकी स्वीकृति कानून देता है।”
  7.  ग्रीन के अनुसार- “स्वतन्त्रता उन कार्यों को करने अथवा उन वस्तुओं के उपभोग करने की
    शक्ति है जो करने या उपभोग के योग्य हैं।”
    उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि स्वतन्त्रता स्वेच्छाचारिता का नाम नहीं है आप वहीं तक स्वतन्त्र हैं जहाँ तक दूसरे की स्वतन्त्रता बाधित नहीं होती। ऐसी स्थिति में सामान्य मानदण्डों का ध्यान रखना पड़ता है।

स्वतन्त्रता के प्रकार (रूप)

स्वतन्त्रता के विभिन्न रूप तथा उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है
1. प्राकृतिक स्वतन्त्रता- इस प्रकार की स्वतन्त्रता के तीन अर्थ लगाए जाते हैं। पहला अर्थ यह है।
कि स्वतन्त्रता प्राकृतिक होती है। वह प्रकृति की देन है तथा मनुष्य जन्म से ही स्वतन्त्र होता है। इसी विचार को व्यक्त करते हुए रूसो ने लिखा है, “मनुष्य स्वतन्त्र उत्पन्न होता है; किन्तु वह सर्वत्र बन्धनों में जकड़ा हुआ है।” (Man is born free but everywhere he is in chains.) इस प्रकार प्राकृतिक स्वतन्त्रता का अर्थ मनुष्यों की अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता है। दूसरे अर्थ के अनुसार, मनुष्य को वही स्वतन्त्रता प्राप्त हो, जो उसे प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त थी। तीसरे अर्थ के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः यह अनुभव करता है कि स्वतन्त्रता का विचार इस रूप में मान्य है कि सभी समान हैं और उन्हें व्यक्तित्व के विकास हेतु समान
सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए।

2. नागरिक स्वतन्त्रता- नागरिक स्वतन्त्रता का अभिप्राय व्यक्ति की उन स्वतन्त्रताओं से है। जिनको एक व्यक्ति समाज या राज्य का सदस्य होने के नाते प्राप्त करता है। गैटिल के शब्दों में, “नागरिक स्वतन्त्रता उन अधिकारों एवं विशेषाधिकारों को कहते हैं, जिनकी सृष्टि राज्य अपने नागरिकों के लिए करता है। सम्पत्ति अर्जित करने और उसे सुरक्षित रखने की स्वतन्त्रता, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा कानून के समक्ष समानता आदि
स्वतन्त्रताएँ नागरिक स्वतन्त्रता के अन्तर्गत ही सम्मिलित की जाती है।

3. राजनीतिक स्वतन्त्रता- इस स्वतन्त्रता के अनुसार प्रत्येक नागरिक बिना किसी वर्णगत, लिंगगत, वंशगत, जातिगत, धर्मगत भेदभाव के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से शासन-कार्यों में भाग ले सकता है। इस स्वतन्त्रता की व्याख्या करते हुए लॉस्की ने लिखा है, “राज्य के कार्यों में सक्रिय भाग लने की शक्ति ही राजनीतिक स्वतन्त्रता है।” राजनीतिक स्वतन्त्रता के अन्तर्गत मताधिकार, निर्वाचित होने का अधिकार तथा सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार, राजनीतिक दलों तथा दबाव-समूहों के निर्माण आदि सम्मिलित किए जाते हैं। शान्तिपूर्ण साधनों के आधार पर सरकार का विरोध करने का अधिकार भी राजनीतिक स्वतन्त्रता में सम्मिलित किया जाता है।

4. आर्थिक स्वतन्त्रता- आर्थिक स्वतन्त्रता का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार अथवा अपने श्रम के अनुसार पारिश्रमिक प्राप्त करने की स्वतन्त्रता है। आर्थिक स्वतन्त्रता की परिभाषा देते हुए लॉस्की ने लिखा है, “आर्थिक स्वतन्त्रता से मेरा अभिप्राय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रतिदिन की जीविका उपार्जित करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। वस्तुत: यह स्वतन्त्रता रोजगार प्राप्त करने की स्वतन्त्रता है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार या अपने श्रम के अनुसार पारिश्रमिक प्राप्त करने की स्वतन्त्रता प्राप्त हो तथा किसी प्रकार भी उसके श्रम को दूसरे के द्वारा शोषण न किया जा सके।

5. धार्मिक स्वतन्त्रता- प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की सुविधा ही धार्मिक स्वतन्त्रता कहलाती है। इस प्रकार की स्वतन्त्रता के लिए यह आवश्यक है कि राज्य किसी धर्म-विशेष के साथ पक्षपात न करके सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करे। साथ ही किसी व्यक्ति को बलपूर्वक धर्म परिवर्तन हेतु प्रेरित न किया जाए और न ही उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई जाए।

6. नैतिक स्वतन्त्रता- व्यक्ति को अपनी अन्तरात्मा के अनुसार व्यवहार करने की पूरी सुविधा प्राप्त होना ही नैतिक स्वतन्त्रता है। काण्ट, हीगल, ग्रीन आदि विद्वानों ने नैतिक स्वतन्त्रता का प्रबल समर्थन किया है।

7. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता- व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अर्थ है कि व्यक्ति के उन कार्यों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए, जिनका सम्बन्ध केवल उसके व्यक्तित्व से ही हो। इस प्रकार के कार्यों में भोजन, वस्त्र, धर्म तथा पारिवारिक जीवन को सम्मिलित किया जा सकता है।

8. सामाजिक स्वतन्त्रता- सभी व्यक्तियों को समाज में अपना विकास करने की सुविधा प्राप्त होना ही सामाजिक स्वतन्त्रता है। समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक क्रिया-कलापों आदि में बिना किसी भेदभाव के सम्मिलित होने के लिए स्वतन्त्र है।

9. राष्ट्रीय स्वतन्त्रता- राष्ट्रीय स्वतन्त्रता; राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा आत्म-निर्णय के अधिकार से सम्बन्धित है। इस प्रकार की स्वतन्त्रता के अन्तर्गत राष्ट्र को भी स्वतन्त्र होने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक विधियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या “स्वतन्त्रता का मूल्य निरन्तर सतर्कता है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने की विधियाँ नागरिकों की स्वतन्त्रता की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया गया है

1. विशेषाधिकार- विहीन समाज की स्थापना–स्वतन्त्रता की सुरक्षा उसी समय सम्भव है। जबकि समाज में कोई वर्ग अथवा समूह विशेषाधिकारों से युक्त नहीं होता है तथा सभी व्यक्ति एक-दूसरे के विचारों का आदर तथा सम्मान करते हैं। व्यक्तियों में ऊँच-नीच की भावना स्वतन्त्रता का हनन करती है। यदि समाज में कोई विशेषाधिकारयुक्त वर्ग होता है तो वह अन्य वर्गों के विकास में बाधक बन जाता है तथा दूसरे वर्ग अपनी सामाजिक व राजनीतिक स्वतन्त्रता का उपभोग नहीं कर सकते हैं।

2. अधिकारों की समानता- अधिकार व्यक्ति की स्वतन्त्रता के द्योतक हैं। जिस समाज में व्यक्तियों को सामाजिक व राजनीतिक अधिकार प्रदान नहीं किए जाते हैं, उस समाज के नागरिक स्वतन्त्रता का वास्तविक उपभोग नहीं कर पाते हैं। यदि अधिकारों में समानता नहीं होगी
तो स्वतन्त्रता का उपभोग नागरिक नहीं कर सकेंगे।

3. राज्य द्वारा कार्यों पर नियन्त्रण– यदि नागरिकों की स्वतन्त्रता की सुरक्षा करनी है तो राज्य द्वारा नागरिकों के कार्यों पर नियन्त्रण किया जाना चाहिए। राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्ति को ऐसे कार्यों को करने से रोक दे जो दूसरों के हितों का उल्लंघन करते हैं।

4. लोक- हितकारी कानूनों का निर्माण-कभी- कभी सरकार वर्ग-विशेष के हितों का ध्यान रखकर कानून का निर्माण करती है। उस परिस्थिति में सरकार द्वारा निर्मित कानून आलोचना का विषय बन जाते हैं और समाज में असन्तोष व्याप्त हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता का उपभोग करने से वंचित हो जाते हैं। इस विषम परिस्थिति पर नियन्त्रण करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार जो भी कानून बनाए वह लोकहित का ध्यान रखकर ही बनाए। लोकहित के आधार पर निर्मित कानून समाज में समानता व स्वतन्त्रता की सुरक्षा • करते हैं।

5. मौलिक अधिकारों को मान्यता–  विभिन्न प्रकार के अधिकारों के उपभोग की सुविधा का होना ही स्वतन्त्रता मानी जाती है, अतएव विद्वानों का मत है कि मौलिक अधिकारों को संवैधानिक मान्यता होनी चाहिए। मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करने वालों को न्यायालय द्वारा दण्डित किए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि मौलिक अधिकारों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जाती है तो स्वतन्त्रता की सुरक्षा स्वयं ही हो जाएगी।

6. लोकतन्त्रात्मक शासन- प्रणाली की स्थापना-लोकतन्त्रात्मक शासन- प्रणाली में नागरिकों को भाषण, भ्रमण तथा विचार व्यक्त करने की पूर्ण स्वतन्त्रता मिलती है, अतएव लोकतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली की स्थापना करके हम नागरिकों की स्वतन्त्रता की रक्षा कर सकते हैं।

7. निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र न्यायालये-  न्याय नागरिकों की स्वतन्त्रता की सुरक्षा की प्रथम दशा है। यदि नागरिकों को निष्पक्ष व स्वतन्त्र न्याय मिलने में बाधा आएगी तो वे निराश हो जाएँगे, उनके व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध हो जाएगा अतएव व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए
यह आवश्यक है कि स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना की जाए।

8. स्थानीय स्वशासन की स्थापना- नागरिकों के राजनीतिक ज्ञान की वृद्धि उसी समय सम्भव है। जबकि नागरिक स्वतन्त्र रूप से शासन के कार्यों में भाग लें और शासन-सम्बन्धी नीतियों से परिचित हों। इस प्रकार की व्यवस्था करने का एकमात्र उपाय शक्तियों का विकेन्द्रीकरण और
स्थानीय स्वशासन की स्थापना करना है।

9. नागरिक चेतना- नागरिक अपनी स्वतन्त्रता समाप्त कर सकते हैं, यदि वे उसके प्रति जागरूक न रहें। शिथिलता व उदासीनता आने पर नागरिक अपनी स्वतन्त्रता समाप्त कर देते हैं इसलिए स्वतन्त्रता की सुरक्षा के लिए यह अनिवार्य है कि नागरिक शासन की निरंकुशता के प्रति जागरूक रहें।

10. राजनीतिक दलों को सुदृढ़ संगठन– राजनीतिक दल शासन की नीति के आलोचक होते हैं।
यदि सरकार नागरिकों की स्वतन्त्रता पर कुठाराघात करती है तो राजनीतिक दल सरकार के विरुद्ध जन-क्रान्ति कराकर शासन सत्ता को परिवर्तित करते हैं। इस सम्बन्ध में लॉस्की का कथन है, “राजनीतिक दल देश में सीजरशाही से हमारी रक्षा करने के सर्वोत्तम साधन हैं।”

11. प्रचार के साधनों की प्रचुरता- स्वतन्त्रता के प्रति नागरिकों को जागरूक बनाए रखने के लिए देश में प्रचार तथा प्रसार के साधनों की प्रचुरता होना आवश्यक है। इनके माध्यम से नागरिकों को राजनीतिक क्षेत्र में जाग्रत रखा जा सकता है। स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष प्रेस के माध्यम से नागरिकों में स्वतन्त्रता के प्रति चेतना अथवा जागरूकता उत्पन्न की जा सकती है।

12. संवैधानिक उपचारों की व्यवस्था– यदि राज्य या कोई व्यक्ति नागरिक के अधिकारों का अतिक्रमण करे तो न्यायालय को हस्तक्षेप करके नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करनी चाहिए। इसी को संवैधानिक उपचार भी कहा जाता है।

13. आर्थिक असमानता का अन्त– स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए आर्थिक असमानता का अन्त
करके आर्थिक समानता की व्यवस्था करनी चाहिए।

14. शक्ति-पृथक्करण तथा अवरोध और सन्तुलन– स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए कुछ सीमा तक शक्ति-पृथक्करण तथा कुछ सीमा तक अवरोध एवं सन्तुलन के सिद्धान्त को अपनाना आवश्यक है।
स्वतन्त्रता को स्थिर एवं सुदृढ़ बनाने के लिए उपर्युक्त साधनों का होना अनिवार्य है। लोकतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली में ये व्यवस्थाएँ सम्भव हो सकती हैं क्योंकि इस प्रणाली में वास्तविक सत्ता का केन्द्र जनता ही होती है। कोई भी सरकार जनता की इच्छाओं, भावनाओं तथा आकांक्षाओं की अवहेलना करके अधिक समय तक सत्ता में कायम नहीं रह सकती है। अतः लोकतन्त्रात्मक शासन-प्रणाली में नागरिकों की स्वतन्त्रता पूर्ण रूप से सुरक्षित रहती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 1 Political Theory : An Introduction

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 1 Political Theory : An Introduction (राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक सिद्धान्त के बारे में नीचे लिखे कौन-से कथन सही हैं और कौन-से गलत?
(क) राजनीतिक सिद्धान्त उन विचारों पर चर्चा करते हैं जिनके आधार पर राजनीतिक संस्थाएँ बनती हैं।
(ख) राजनीतिक सिद्धान्त विभिन्न धर्मों के अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या करते हैं।
(ग) ये समानता और स्वतन्तत्रा जैसी अवधारणाओं के अर्थ की व्याख्या करते हैं।
(घ) ये राजनीतिक दलों के प्रदर्शन की भविष्यवाणी करते हैं।
उत्तर-
(क) सही, (ख) गलत, (ग) सही, (घ) गलत।

प्रश्न 2.
‘राजनीति उस सबसे बढ़कर है, जो राजनेता करते हैं।’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर-
‘राजनीति उस सबसे बढ़कर है, जो राजनेता करते हैं।’ हम इस कथन से सहमत हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीति का सम्बन्ध किसी भी तरीके से निजी स्वार्थ साधने के धन्धे से जुड़ गया है। राजनीति किसी भी समाज का महत्त्वपूर्ण और अविभाज्य अंग है। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था, राजनीति ने हमें साँप की कुण्डली की तरह जकड़ रखा है और इससे जूझने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है।” राजनीतिक संगठन और सामूहिक निर्णय के किसी ढाँचे के बिना कोई भी समाज जिन्दा नहीं रह सकता। जो समाज अपने अस्तित्व को बचाए रखना चाहता है, उसके लिए अपने सदस्यों की विभिन्न आवश्यकताओं और हितों का ध्यान रखना अनिवार्य होता है। परिवार, जनजाति और आर्थिक संस्थाओं जैसी अनेक सामाजिक संस्थाएँ लोगों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायता करने के लिए पनपी हैं। ऐसी संस्थाएँ हमें साथ रहने के उपाय खोजने और एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने में सहायता करती हैं। इन संस्थाओं के साथ सरकारें भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्रश्न 3.
लोकतन्त्र के सफल संचालन के लिए नागरिकों को जागरूक होना जरूरी है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
लोकतान्त्रिक राज्य में नागरिक के रूप में, हम किसी संगीत कार्यक्रम के श्रोता जैसे होते हैं। हम गीत और लय की व्याख्या करने वाले मुख्य कलाकार नहीं होते। लेकिन हम कार्यक्रम तय करते हैं, प्रस्तुति का रसास्वादन करते हैं और नए अनुरोध करते हैं। संगीतकार तब और बेहतर प्रदर्शन करते हैं। जब उन्हें श्रोताओं के जानकार और क्रददान होने का पता रहता है। इसी तरह जागरूक नागरिक भी लोकतन्त्र के सफल संचालन के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न 4.
राजनीतिक सिद्धान्त को अध्ययन हमारे लिए किन रूपों में उपयोगी है? ऐसे चार तरीकों की पहचान करें जिनमें राजनीतिक सिद्धान्त हमारे लिए उपयोगी हों?
उत्तर-
राजनीतिक सिद्धान्त का अध्ययन हमारे लिए अग्रलिखित रूपों में उपयोगी है-
1. अधिकार सम्पन्न नागरिक – हम सभी मत देने और अन्य मामलों के फैसले करने के लिए अधिकार सम्पन्न नागरिक हैं। दायित्वपूर्ण कार्य निर्वहन के लिए राजनीतिक सिद्धान्तों की जानकारी हमारे लिए उपयोगी होती है।
2. पीड़ा निवारण हेतु – हम समाज में रहकर अपने से भिन्न लोगों से पूर्वाग्रह रखते हैं, चाहे वे अलग जाति के हों, अलग धर्म के अथवा लिंग या वर्ग के। यदि हम उत्पीड़न अनुभव करते हैं, तो हम पीड़ा का निवारण चाहते हैं और यह राजनीतिक सिद्धान्त का अध्ययन करने से ही दूर होती है।
3. विचारों और भावनाओं का परीक्षण – राजनीतिक सिद्धान्त हमें राजनीतिक चीजों के बारे में अपने विचारों और भावनाओं के परीक्षण के लिए प्रोत्साहित करता है। थोड़ा अधिक सतर्कता से देखने पर हम अपने विचारों और भावनाओं के प्रति उदार होते जाते हैं।
4. सही गलत की पहचान – छात्र के रूप में हम बहस और भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। हमारी अपनी राय होती है, क्या सही है क्या गलत, क्या उचित है क्या अनुचित, पर यह हम नहीं जानते कि वे तर्क-संगत हैं या नहीं। यही बात हमें राजनीतिक सिद्धान्त के अध्ययन से पता चलती है।

प्रश्न 5.
क्या एक अच्छा/प्रभावपूर्ण तर्क दूसरों को आपकी बात सुनने के लिए बाध्य कर सकता है?
उत्तर-
तर्क-संगत ढंग से बहस करने और प्रभावी तरीके से सम्प्रेषण करने से हम दूसरों को अपनी बात सुनने के लिए बाध्य कर सकते हैं। ये सम्प्रेषण कौशल वैश्विक सूचना व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण गुण साबित होते हैं।

प्रश्न 6.
क्या राजनीतिक सिद्धान्त पढ़ना, गणित पढ़ने के समान है। अपने उत्तर के पक्ष में कारण दीजिए।
उत्तर-
हाँ, राजनीतिक सिद्धान्तं पढ़ना गणित पढ़ने के समान है। जिस प्रकार प्रत्येक गणित पढ़ने वाला व्यक्ति गणितज्ञ या इंजीनियर नहीं बनता परन्तु जीवन में गणित अवश्य उपयोग में आता रहता है। इसी प्रकार राजनीतिक सिद्धान्त भी जीवन में बहुपयोगी होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
सरकारें कैसे बनती हैं और कैसे कार्य करती हैं, यह स्पष्ट होता है
(क) राजनीति से
(ख) दर्शन से
(ग) इतिहास से
(घ) भूगोल से
उत्तर-
(क) राजनीति से।

प्रश्न 2.
आधुनिककाल में सर्वप्रथम यह किसने सिद्ध किया कि स्वतन्त्रता मानव मात्र का मौलिक अधिकार है।
(क) रूसो
(ख) अरस्तू
(ग) गांधी
(घ) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर-
(क) रूसो।

प्रश्न 3.
‘हिन्द स्वराज किसकी रचना है?
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गांधी
(ग) स्वराज पॉल
(घ) अरस्तू।
उत्तर-
(ख) महात्मा गांधी।

प्रश्न 4.
अंग्रेजी में इण्टरनेट का उपयोग करने वालों को कहा जाता है।
(क) नेटिजन
(ख) सिटीजन
(ग) इंटरनेटी
(घ) नेटीवैल
उत्तर-
(क) नेटिजन।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य किन मामलों में अन्य प्राणियों से अद्वितीय होता है?
उत्तर-
मनुष्य दो मामलों में अद्वितीय है-प्रथम उसके पास विवेक होता है, दूसरे उसके पास भाषा का प्रयोग और एक-दूसरे से संवाद करने की क्षमता होती है।

प्रश्न 2.
राजनीतिक सिद्धान्त क्या बताते हैं?
उत्तर–
राजनीतिक सिद्धान्त उन विचारों और नीतियों को व्यवस्थित रूप से प्रतिबिम्बित करते हैं। जिनसे हमारे सामाजिक जीवन, सरकार और संविधान ने आकार ग्रहण किया है।

प्रश्न 3.
प्लेटो किसका शिष्य था?
उत्तर–
पाश्चात्य विचारक प्लेटो सुकरात का शिष्य था।

प्रश्न 4.
‘दि रिपब्लिक किसकी रचना है?
उत्तर-
‘दि रिपब्लिक’ प्लेटो की रचना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक सिद्धान्त हमारे जीवन में क्या भूमिका निभाता है?
उत्तर-
राजनीतिक सिद्धान्त उन विचारों और नीतियों को व्यवस्थित रूप से प्रतितिम्बित करता है, जिनसे हमारे सामाजिक जीवन, सरकार और संविधान ने आकार ग्रहण किया है। यह स्वतन्त्रता, समानता, न्याय, लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता जैसी अवधारणाओं का अर्थ स्पष्ट करता है। यह कानून को राज, अधिकारों का बँटवारा और न्यायिक पुनरावलोकन जैसी नीतियों की सार्थकता की जाँच करता है। यह इस काम को विभिन्न विचारकों द्वारा इन अवधारणाओं के बचाव में विकसित युक्तियों की जाँच-पड़ताल के माध्यम से करता है। हालाँकि रूसो, माक्र्स या गांधी जी राजनेता नहीं बन पाए लेकिन उनके विचारों ने हर जगह पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजनेताओं को प्रभावित किया। साथ ही ऐसे बहुत से समकालीन विचारक हैं, जो अपने समय में लोकतन्त्र या स्वतन्तत्रा के बचाव के लिए उनसे प्रेरणा लेते हैं। विभिन्न तर्को की जाँच-पड़ताल के अलावा राजनीतिक सिद्धान्तकार मानव के नवीन राजनीतिक अनुभवों की छानबीन करते हैं और भावी रुझानों तथा सम्भावनाओं को चिह्नित भी करते हैं।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक सिद्धान्त का विषय-क्षेत्र और उद्देश्य लिखिए।
उत्तर-
मनुष्य दो मामलों में अद्वितीय है-उसके पास विवेक होता है और उसमें गतिविधियों द्वारा उसे व्यक्त करने की योग्यता होती है। मनुष्य के पास भाषा का प्रयोग और एक-दूसरे से संवाद करने की क्षमता भी होती है। अन्य प्राणियों से अलग मनुष्य अपनी अन्तरतम भावनाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त कर सकता है; वह जिन्हें अच्छा और वांछनीय मानता है, अपने उन विचारों को वह दूसरों के साथ बाँट सकता है और उन पर चर्चा कर सकता है। राजनीतिक सिद्धान्त की जड़े मानव अस्मिता के इन जुड़वाँ पहलुओं में होती है। यह कुछ विशिष्ट बुनियादी प्रश्नों का विश्लेषण करता है; जैसेसमाज को किस प्रकार संगठित होना चाहिए? हमें सरकार की आवश्यकता क्यों है? सरकार का सर्वश्रेष्ठ रूप कौन-सा है? क्या कानून व्यक्ति की आजादी को सीमित करता है? राजसत्ता की अपने नागरिकों के प्रति क्या देनदारी होती है? नागरिक के रूप में एक-दूसरे के प्रति हमारी क्या देनदारी होती है?

राजनीतिक सिद्धान्त इस तरह के प्रश्नों की जाँच करता है और राजनीतिक जीवन को अनुप्राणित करने वाले स्वतन्त्रता, समानता और न्याय जैसे मूल्यों के विषय में सुव्यवस्थित रूप में विचार करता है। यह इनके और अन्य सम्बद्ध अवधारणाओं के अर्थ और महत्त्व की विवेचना भी करता है। यह अतीत और वर्तमान के कुछ प्रमुख राजनीतिक चिन्तकों को केन्द्र में रखकर इन अवधारणाओं की वर्तमान परिभाषाओं को स्पष्ट करता है। यह विद्यालय, दुकान, बस, ट्रेन या सरकारी कार्यालय जैसे दैनिक जीवन से जुड़ी संस्थाओं में स्वतन्त्रता या समानता के विस्तार की वास्तविकता की जाँच भी करता है। और आगे जाकर, यह देखता है कि वर्तमान परिभाषाएँ कितनी उपयुक्त हैं और कैसे वर्तमान संस्थाओं (सरकार, नौकरशाही) और नीतियों के अनुपालन को अधिक लोकतान्त्रिक बनाने के लिए उनका परिमार्जन किया जा सकता है। राजनीतिक सिद्धान्त का उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नों के बारे में तर्कसंगत ढंग से सोचने और सामयिक राजनीतिक घटनाओं को सही तरीके से आँकने का प्रशिक्षण देना है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति क्या है? आधुनिक सन्दर्भो में तर्कपूर्ण ढंग से समझाइए।
उत्तर-
भारतीय समाज में लोग राजनीति के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। राजनेता और चुनाव लड़ने वाले लोग अथवा राजनीतिक पदाधिकारी कह सकते हैं कि राजनीति एक प्रकार की जनसेवा है। राजनीति से जुड़े अन्य लोग राजनीति को दावँ-पेंच मानते हैं तथा आवश्यकताओं और महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के कुचक्र में फंसे रहते हैं। कई अन्य के लिए राजनीति वही है, जो राजनेता करते हैं। अगर वे राजनेताओं को दल-बदल करते, झूठे वायदे और बढ़-चढ़े दावे करते, समाज के विभिन्न वर्गों से जोड़-तोड़ करते, निजी या सामूहिक स्वार्थों में निष्ठुरता से रत और घृणित रूप में हिंसा पर उतारू होता देखते हैं तो वे राजनीति का सम्बन्ध ‘घोटालों से जोड़ने लगते हैं। इस तरह की सोच इतनी प्रचलित है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जब हम हर सम्भव तरीके से अपने स्वार्थ को साधने में लगे लोगों देखते हैं, तो हम कहते हैं कि वे राजनीति कर रहे हैं।

यदि हम एक क्रिकेटर को टीम में बने रहने के लिए जोड़-तोड़ करते या किसी सहपाठी को अपने पिता की हैसियत का उपयोग करते अथवी कार्यालय में किसी सहकर्मी को बिना सोचे-समझे बॉस की हाँ में हाँ मिलाते देखते हैं, तो हम कहते हैं कि वह ‘गन्दी राजनीति कर रहा है। स्वार्थपरता के ऐसे कार्यों से मोहभंग होने पर हम राजनीति से विरक्त हो जाते हैं। हम कहने लगते हैं-“मुझे राजनीति में रुचि नहीं है या मैं राजनीति से दूर रहता हूँ।” केवल साधारण लोग ही राजनीति से निराश नहीं हैं। बल्कि इससे लाभ प्राप्त करने वाले और विभिन्न दलों को चन्दा देने वाले व्यवसायी और उद्यमी भी अपनी मुसीबतों के लिए आये दिन राजनीति को ही कोसते रहते हैं।

प्रतिदिन हमारा सामना राजनीति की इसी प्रकार की परस्पर विरोधी छवियों से होता रहता है। क्या राजनीति अवांछनीय गतिविधि है, जिससे हमें अलग रहना चाहिए, और पीछा छुड़ाना चाहिए? या यह इतनी उपयोगी गतिविधि है कि विकसित विश्व बनाने के लिए हमें इसमें निश्चित ही शामिल होना चाहिए?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीति का सम्बन्ध किसी भी तरीके से निजी स्वार्थ साधने के धन्धे से जुड़ गया है। हमें यह समझना चाहिए कि राजनीति किसी भी समाज का महत्त्वपूर्ण और अविभाज्य अंग है। राजनीतिक संगठन और सामूहिक निर्णय के किसी ढाँचे के बगैर कोई भी समाज जीवित नहीं रहू सकता। जो समाज अपने अस्तित्व को बचाए रखना चाहता है, उसके लिए अपने सदस्यों की विविध जरूरतों और हितों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। परिवार, जनजाति और आर्थिक संस्थाओं जैसी अनेक सामाजिक संस्थाएँ लोगों की जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायता करने के विकसित हुई हैं। ऐसी संस्थाएँ हमें साथ रहने के उपाय खोजने और एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों को स्वीकार करने में सहायता करती हैं। इन संस्थाओं के साथ सरकारें भी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं। सरकारें कैसे बनती हैं और कैसे कार्य करती हैं, यह राजनीति में दर्शाने वाली महत्त्वपूर्ण बातें हैं।

लेकिन राजनीति सरकार के कार्य-कलापों तक ही सीमित नहीं होती है। वास्तव में, सरकारें जो भी कार्य करती हैं वह प्रासंगिक होता है क्योंकि वह कार्य लोगों के जीवन को भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रभावित करता है। हम देखते हैं कि सरकारें हमारी आर्थिक नीति, विदेश नीति और शिक्षा नीति को निर्धारित करती हैं। ये नीतियाँ लोगों के जीवन को उन्नत करने में सहायता कर सकती हैं, लेकिन एक अकुशल और भ्रष्ट सरकार लोगों के जीवन और सुरक्षा को संकट में भी डाल सकती है। अगर सत्तारूढ़ सरकार जातीय और साम्प्रदायिक संघर्ष को बढ़ावा देती है तो बाजार और स्कूल बन्द हो जाते हैं। इससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है, हम अत्यन्त आवश्यक वस्तुएँ भी नहीं खरीद सकते, बीमार लोग अस्पताल नहीं पहुँच सकते, स्कूल की समय-सारणी भी प्रभावित हो जाती है, पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता। दूसरी ओर, सरकार अगर साक्षरता और रोजगार बढ़ाने की नीतियाँ बनाती हैं, तो हमें अच्छे स्कूल में जाने और बेहतर रोजगार पाने के अवसर प्राप्त हो सकते हैं।

चूंकि सरकार की कार्यवाहियों का जनसामान्य पर गहरा असर पड़ता है, जनता सरकार के कामों में रुचि लेती है। जब जनता सरकार की नीतियों से असहमत होती है तो उसका विरोध करती है और वर्तमान कानून को बदलने के लिए अपनी सरकारों को राजी करने के लिए प्रदर्शन आयोजित करती है। निष्कर्ष यह है कि राजनीति का जन्म इस तथ्य से होता है कि हमारे और हमारे समाज के लिए क्या उचित एवं वांछनीय है और क्या नहीं। इस बारे में हमारी दृष्टि अलग-अलग होती है। इसमें समाज में चलने वाली बहुविध वार्ताएँ शामिल हैं, जिनके माध्यम से सामूहिक निर्णय किए जाते हैं। एक स्तर से इन वार्ताओं में सरकारों के कार्य और इन कार्यों का जनता से जुड़ा होना शामिल होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 10 The Philosophy of Constitution

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 10 The Philosophy of Constitution (संविधान का राजनीतिक दर्शन)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे कुछ कानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अन्तर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ।
(क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा।
(ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के ब्रिकी-कर का सीमांकन अलग-अलग होगा।
(ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
(घ) ‘बेगार’ अथवा बँधुआ मजदूरी नहीं कराई जा सकती।
उत्तर-
(क) वाक्य में समानता का मूल्य छिपा है क्योंकि पारिवारिक सम्पत्ति में बेटा-बेटी को समानता के आधार पर समान समझा गया है।
(ख) गुण के अनुसार कीमत और उसके अनुरूप कर का ढाँचा समानता का दिग्दर्शक है।
(ग) इस वाक्य में धर्म-निरपेक्षता के मूल्य का बोध है क्योंकि इसमें राज्य व धर्म को अलग-अलग रखने की बात कही गई है।
(घ) मानवीय गरिमों व मानव-मानव में ऊँच-नीच की समानता का बोध है।

प्रश्न 2.
नीचे कुछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इसमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता?
लोकतांत्रिक देश को संविधान की जरूरत ……..।
(क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है।
(ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है।
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।
(घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी लक्ष्यों में कहीं विचलित न हो जाएँ।
(ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है।
उत्तर-
(ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए लिए होती है।

प्रश्न 3.
संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं-
(अ) इनमें से कौन-सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं है?
(ब) इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों?
(क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती है। आम जनता इन बहसों की कानूनी भाषा को नहीं समझ सकती।
(ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियों और स्थितियों से अलग हैं। संविधान निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और अपने नए जमाने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है।
(ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है।
संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्त्वपूर्ण हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्को को न जानना संवैधानिक-व्यवहारों में सभा में हुई। वार्ता की आज भी उपयोगिता है।
उत्तर-
1. (क) व (ख) वाक्यों में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि संविधान सभा में हुई। वार्ता व बहस की आज की परिस्थितियों के आधार पर कोई उपयोगिता नहीं है जबकि (ग) वाक्य में संविधान सभा में हुई वार्ता की आज भी उपयोगिता है।
2. (क) वाक्य में यह कहा गया है कि साधारण व्यक्ति संविधान में हुई बहस की भाषा को समझने में असमर्थ है व आज किसी को भी उसमें रुचि नहीं है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आजीविका कमाने में लगा है।
3. हम यह समझते हैं कि संविधान सभा में भारत की सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक समस्याओं पर चर्चा हुई जिनकी उपयोगिता आज की समस्याओं के सन्दर्भ में भी है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अन्तर स्पष्ट करें-
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ
(ख) अनुच्छेद 370 और 371
(ग) सकारात्मक कार्य-योजना या अफरमेटिव एक्शन
(घ) सार्वभौम वयस्क मताधिकार।
उत्तर-
(क) भारत की धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है। पश्चिमी दृष्टिकोण का मत है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में धर्म व राज्य का पूर्णतया पृथक्करण होना चाहिए। धर्म लोगों का व्यक्तिगत मामला होना चाहिए परन्तु भारतीय दृष्टिकोण के अनुसा राज्य धर्म के मामले में हस्तक्षेप कर सकता है।

(ख) अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को विशिष्ट दर्जा देता है। अनुच्छेद 371 पूर्वी राज्यों के विकास के बारे में है। ऐसी असमानता पश्चिमी देशों में नहीं है।

(ग) भारत में समाज के कमजोर व पिछड़े वर्ग के लोगों के विकास के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है जिसका उद्देश्य सकारात्मक कार्य से समानता स्थापित करना है ऐसी योजनाएँ पश्चिमी देशों में भी हैं।

(घ) भारत और अधिकांश पश्चिमी देशों ने वयस्क मताधिकार को स्वीकार किया है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धान्त भारत के संविधान में अपनाया गया है।
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।
(ख) राज्य का धर्म से नजदीकी रिश्ता है।
(ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है।
(घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा।
(ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।
उत्तर-
(क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें-
(क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादी – (i) आधारभूत महत्त्व की उपलब्धि
(ख) संविधान-सभा में फैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना। – (ii) प्रक्रियागत उपलब्धि
(ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्त्व को स्वीकार करना। – (iii) लैंगिक-न्याय की उपेक्षा
(घ) अनुच्छेद 370 और 371 – (iv) उदारवादी व्यक्तिवाद
(ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान अधिकार। – (v) धर्म-विशेष की जरूरतों के प्रति ध्यान देना।
उत्तर-
(क) (i), (ख) (ii), (ग) (iv), (घ) (v), (ङ) (iii)

प्रश्न 7.
यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तर्को को पढे और बताएँ कि आप इनमें से किससे सहमत हैं और क्यों?
जएश – मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज है।
सबा – क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? कया
मूल्यों और विचारों पर हम ‘भारतीय’ अथवा ‘पश्चिमी’ जैसा लेबल चिपको सकते हैं? महिलाओं और पुरुषों की समानता का ही मामला लो। इसमें पश्चिमी’ कहने जैसी क्या है? और, अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे महज पश्चिमी होने के कारण खारिज कर
जएश – मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय शासन की व्यवस्था नहीं अपनाई?
नेहा – तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेजों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ थे। अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते हैं उसको अपनाने में कोई लेना-देना नहीं, चाहे यह जहाँ से भी आई हो।
उत्तर-
उपर्युक्त वाक्यों में प्रस्तुत जएश व नेह्य के मध्य के विचार-विमर्श का अध्ययन करने के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि दोनों ही ठीक हैं। जएश का कथन यही है कि हमारा संविधान उधार का दस्तावेज है क्योंकि हमने अनेक बातें विदेशी संविधानों से ली थीं। सबा का कथन भी सही है कि भारतीय संविधान में सभी कुछ विदेशी नहीं है। इसमें हमारी प्रथाओं, परम्पराओं व इतिहास का प्रभाव है।

प्रश्न 8.
ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर के कारण बताएँ।
उत्तर-
भारतीय संविधान सभा के विषय में कहा जाता है कि भारतीय संविधान सभा प्रतिनिधिमूलक नहीं थी। यह कथन कुछ सीमा तक उचित है क्योंकि इसका चुनाव प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया गया था। यह सन् 1946 के चुनाव पर गठित विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से गठित की गई थी। इस चुनाव में वयस्क मताधिकार भी नहीं दिया गया था। उस समय सीमित मताधिकार प्रचलित था। इसमें अनेक लोगों को मनोमीत किया गया था। इसलिए भारतीय संविधान बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की एक सीमा यह है कि इसमें लैगिक-न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। आप इस आरोप की पुष्टि में कौन-से प्रमाण देंगे? यदि आज आप संविधान लिख रहे होते, तो इस कमी को दूर करने के लिए उपाय के रूप में किन प्रावधानों की सिफारिश करते?
उत्तर-
भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से लैंगिक-न्याय का कोई उल्लेख नहीं है, इसी कारण समाज में अनेक रूपों में लैंगिक-अन्याय दिखाई देता है। यद्यपि संविधान के मौलिक अधिकार के भाग में अनुच्छेद 14, 15 व 16 में उल्लेख है कि लिंग के आधार पर कानून के समक्ष, सार्वजनिक स्थान पर व रोजगार के क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा। राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के अध्याय में महिलाओं के सामाजिक व आर्थिक न्यायोचित विकास की व्यवस्था की गई है। समान कार्य के लिए समान वेतन की भी व्यवस्था है।

प्रश्न 10.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि-एक गरीब और विकासशील देश में कुछ एक बुनियादी सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों की केंद्रीय विशेषता के रूप में दर्ज करने के बजाय राज्य की नीति-निदेशक तत्त्वों वाले खण्ड में क्यों रख दिए गए- यह स्पष्ट नहीं है। आपके जानते सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नीति-निदेशक तत्त्व वाले खण्ड में रखने के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर-
आलोचकों का कथन है कि भारत एक गरीब देश है और यहाँ बेरोजगार, बेकार तथा निर्धन लोगों की संख्या अधिक है। इसके साथ ही संविधान बेरोजगारी को दूर करने, आर्थिक विषमता को कम करने, सामाजिक-आर्थिक न्याय को लागू करने के लिए वचनबद्ध है। फिर ऐसे क्या कारण थे कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की प्राप्ति के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक अधिकारों; जैसे कार्य का अधिकार, शिक्षा का अधिकार आदि मौलिक अधिकारों की सूची में नहीं रखे गए, बल्कि उन्हें राज्य नीति के निदेशक सिद्धान्तों के अध्याय में रखा गया।

इसके कुछ कारण थे। संविधान निर्माताओं ने राजनीतिक प्रकृति के अधिकारों को मूल अधिकारों की सूची में रखा क्योंकि इससे राज्य पर वित्तीय भार पड़ने की सम्भावना नहीं थी। जब, देश स्वतन्त्र हुआ तो भारत एक गरीब देश था और अंग्रेजों ने इसे जब छोड़ा तो इसकी वित्तीय दशा अच्छी नहीं थी। यदि सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को मूल-अधिकारों की सूची में रखा जाता तो राज्य द्वारा उन्हें लागम करने में काफी धन व्यय करना पड़ती जो उसके लिए सम्भव और व्यावहारिक नहीं था। इन पर होने वाले व्यय से देश की आर्थिक दशा और अधिक खराब हो जाती।

सामाजिक- आर्थिक विकास की आवश्यकता भी तुरन्त थी। विकास कार्यों के लिए भी धन की आवश्यकता थी। यदि आर्थिक आधारों को मौलिक अधिकारों का रूप दिया जाता तो , सामाजिक-आर्थिक विकास योजनाओं को लागू करना सम्भव नहीं होता और इससे सामाजिक-आर्थिक विकास रुक जाता। इन बातों को देखते हुए महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को राज्य की नीति के निदेशक सिद्धान्तों के अध्याय में रखा गया और आशा की गई कि वित्तीय दशा में सुधार होने के साथ-साथ उन्हें भी लागू किया जाता रहेगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अनुच्छेद 370 किस राज्य को विशिष्ट दर्जा देता है?
(क) जम्मू-कश्मीर
(ख) पंजाब
(ग) मिजोरम
(घ) मेघालय
उत्तर :
(क) जम्मू-कश्मीर।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान में कितने अनुच्छेद हैं।
(क) 395
(ख) 397
(ग) 387
(घ) 378
उत्तर :
(क) 395

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान में कितनी अनुसूचियाँ हैं?
(क) 14
(ख) 16
(ग) 12
(घ) 20
उत्तर :
(ग) 12

प्रश्न 4.
भारत के संविधान द्वारा कितनी भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है।
(क) 24
(ख) 22
(ग) 23
(घ) 21
उत्तर :
(ख) 22

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान का वैचारिक व दार्शनिक आधार है –
(क) उदारवाद
(ख) साम्यवाद
(ग) राष्ट्रवाद
(घ) उपभोक्तावाद
उत्तर :
(क) उदारवाद

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान का आधार राजनीतिक दर्शन होता है। समझाइए।
उत्तर :
किसी देश का संविधान एक सजीव व संवेदनशील ग्रन्थ होता है। यह व्यक्तियों के लक्ष्यों, प्राथमिकता, मूल्यों को प्रकट करता है। अतः संविधान के लिए एक नैतिक आधार की आवश्यकता होती है जो एक निश्चित राजनीतिक दर्शन व सोच द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान के दर्शन के मुख्य तत्त्व कौन-से हैं?
उत्तर :

  1. उदारवाद
  2. समानता पर आधारित समाज का निर्माण
  3. सामाजिक न्याय
  4. धर्मनिरपेक्षता
  5. संघात्मकता।

प्रश्न 3.
‘धर्मनिरपेक्ष का क्या अर्थ है?
उत्तर :
‘धर्मनिरपेक्ष’ का अर्थ है–भारत में सभी धर्म समान हैं, राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और सभी नागरिकों को धर्म की स्वतन्त्रता है।

प्रश्न 4.
संविधान की प्रस्तावना के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
संविधान की प्रस्तावना संविधान का प्रारम्भिक भाग है, इसमें संविधान में दिए गए सरकार के स्वरूप, समाज के मूल्यों, दर्शन व लक्ष्यों को दर्शाया गया है।

प्रश्न 5.
व्यक्तिगत गरिमा का क्या अर्थ है?
उत्तर :
व्यक्तिगत गरिमा का अर्थ मानवीय क्षमताओं, मानवीय विवेक, मानवीय प्रवृत्ति और मानवीय भावनाओं वे इच्छाओं का सम्मान करना है।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत किस प्रकार का राज्य है?
उत्तर :
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं –

  1. लिखित संविधान तथा
  2. विशाल संविधान।

प्रश्न 8.
भारत के संविधान का निर्माण किसके द्वारा किया गया?
उत्तर :
भारत के संविधान का निर्माण एक निर्वाचित संविधान सभा द्वारा किया गया।

प्रश्न 9.
उदारवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
उदारवाद भारतीय संविधान का प्रमुख वैचारिक व दार्शनिक आधार है जिसका उद्देश्य भारतीय समाज को नकारात्मक रूढ़ियों व अन्धविश्वासों से मुक्त करना है।

प्रश्न 10.
संघीय समाज से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
संघीय समाज वह होता है जिसमें विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति व भौगोलिकता के लोग रहते हैं।

लघु उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-समाजवादी पंथनिरपेक्ष राज्य।
उत्तर :
पंथनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है तथा राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म का पालन करने का अधिकार होगा। राज्य, धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा तथा धार्मिक मामलों में विवेकपूर्ण निर्णय लेगा। इसके अतिरिक्त, राजय द्वारा सभी व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को सुनिश्चित एवं सुरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। राज्य धार्मिक मामलों में किसी प्रकार को हस्तक्षेप नहीं करेगा, वरन् धार्मिक सहिष्णुता एवं धार्मिक समभाव की नीति को प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा। धर्म के सम्बन्ध में राज्य सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करेगा। इस प्रकार की पंथनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता का पालन करने वाले शासन को पंथनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं।

प्रश्न 2.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए–’प्रभुतासम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य।
उत्तर :
‘प्रभुत्तासम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य से आशय यह है कि देश का शासन जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा होगा। इस प्रकार शासन की सत्ता जनता में निहित होगी। निर्वाचन के आधार पर जनता अपने द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों को देश की सत्ता पाँच वर्षों के लिए सौंप देगी तथा जनप्रतिनिधि अपने समस्त कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होंगे। गणराज्य से आशय यह है कि वंश-परम्परा के आधार पर कोई भी राज्याध्यक्ष राज्य या सम्राट नहीं होगा, वरन् वह जनता द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होगा। राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अर्थात् जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों सांसदों व विधायकों द्वारा किया जाता है। इसी आधार पर हमने 26 जनवरी, 1950 को अपना संविधान लागू करके गणतन्त्र दिवस मनाना प्रारम्भ किया था।

प्रश्न 3.
भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य क्यों कहा गया है?
उत्तर :
भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य इसलिए कहा गया है क्योंकि भारत अब आन्तरिक एवं बाह्य क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ताधारी है। आन्तरिक क्षेत्र में प्रभुत्वसम्पन्नता का आशय यह है कि भारत अब आन्तरिक क्षेत्र में सभी व्यक्तियों एवं समुदायों से उच्चतर है और संसद द्वारा निर्मित कानून भारत की सीमा में रहने वाले सभी व्यक्तियों पर अनिवार्य रूप से लागू किए जाते हैं तथा बाह्य क्षेत्र में सम्प्रभुता का तात्पर्य यह है कि भारत अब अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में पूर्ण स्वतन्त्र है, क्योंकि किसी बाह्य सत्ता का उस पर नियन्त्रण नहीं है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि वर्ष 1947 के पहले भारत सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न नहीं था क्योंकि उस पर ब्रिटिश सत्ता का नियन्त्रण था। वर्तमान में भारत की स्वतन्त्र विदेश नीति है।

प्रश्न 4.
भारतीय समाज द्वारा समाजवाद के आदर्श को प्राप्त करने के लिए किन्हीं तीन उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. सामाजिक विभेद को समाप्त किया जाए। समाज के उच्च जाति तथा निम्न जाति वर्ग अथवा अछूत आदि में कोई भेद-भाव नहीं होना चाहिए।
  2. पूँजीपतियों तथा श्रमिकों के बीच उत्पन्न अन्तर को समाप्त किया जाना चाहिए तथा श्रमिकों को मिलों अथवा कारखानों की प्रबन्ध-व्यवस्था में सहभागिता प्राप्त होनी चाहिए।
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के वितरण को इस प्रकार से सुनिश्चित किया जाना चाहिए जिससे कि भूमिहीनों को भी कुछ भूमि प्राप्त हो सके। बेगार, बंधुआ मजदूरी तथा कृषकों के शोषण जैसी बुराइयों को समाप्त करना चाहिए।

प्रश्न 5.
संविधान द्वारा धर्मनिरपेक्षता (पंथनिरपेक्षता) पर अत्यधिक बल क्यों दिया गया है?
उत्तर :

  1. भारत में अनेक धर्मों को मानने वाले व्यक्ति निवास करते हैं। अत: यहाँ पंथनिरपेक्षता की नीति के आधार पर धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार को प्रदान किया जा सकता है।
  2. एक नागरिक तथा दूसरे नागरिक में धर्म के आधार पर विभेद करना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता
  3. राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा सुदृढ़ता के लिए पंथनिरपेक्षता को अपनाना बहुत आवश्यक है।
  4. सभी नागरिकों से एक-जैसा न्याय करने के उद्देश्य से भी पंथनिरपेक्षता की नीति तर्कसंगत है।

प्रश्न 6.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-कल्याणकारी राज्य।
उत्तर :
लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ‘पुलिस राज्य के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न हुई। लोक-कल्याणकारी राज्य में राज्य का अधिकार-क्षेत्र बहुत व्यापक हो जाता है; क्योंकि राज्य द्वारा व्यक्ति के चहुंमुखी विकास के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में सुख तथा सुविधाएँ उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है। भारत के संविधान में नीति-निदेशक, सिद्धान्तों को अपनाकर लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने का प्रयास किया गया है। भारतीय संविधान में ऐसे अनेक अनुच्छेदों का प्रावधान किया गया है जो समाज के पिछड़े वर्गों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और आर्थिक रूप से गरीब वर्गों के कल्याण पर अधिक बल देते हैं।

दीर्घ लनु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
भारत में पंथनिरपेक्षता की नीति अपनाए जाने के दो कारण लिखिए।
उत्तर :
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों का जन्म तथा विकास हुआ। यहाँ विदेशी शासकों के राज्य भी स्थापित हुए और उनके विभिन्न धर्मों का आगमन भी हुआ। इन विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों की अन्त:क्रिया से विभिन्न धार्मिक समुदायों का अभ्युदय हुआ। इन धार्मिक समुदायों में परस्पर प्रतिस्पर्धा एवं वैमनस्यता को समाप्त करके सहिष्णुता एवं सामंजस्य स्थापित करने के लिए भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतन्त्रता को स्थान दिया गया। बयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान की प्रस्तावना में स्थान दिया गया। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा इसका अभिप्राय यह है कि –

  1. भारत किसी भी धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं करेगा।
  2. संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार सभी व्यक्ति कानून की दृष्टि में समान होंगे। भारत सरकार सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करेगी तथा उन्हें पल्लवित एवं विकसित होने में बाधा उत्पन्न नहीं करेगी।
  3. सरकार सभी व्यक्तियों के धार्मिक अधिकारों को सुनिश्चित एवं सुरक्षित करने का प्रयास करेगी।
  4. भारतीय सरकार धार्मिक विषयों के सम्बन्ध में विवेकपूर्ण निर्णय लेगी।

संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को भारत में अपने धर्म के सम्बन्ध में दो प्रकार की स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं-अन्तःकरण की स्वतन्त्रता तथा अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतन्त्रता।

अनुच्छेद 26 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है जिसके अन्तर्गत उसे धार्मिक प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की घोषणाएँ, अपने धर्म सम्बन्धी कार्यों के प्रबन्ध, सम्पत्ति के अर्जन और स्वामित्व तथा सम्पत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन का अधिकार है।

अनुच्छेद 28 के अनुसार, राज्य पोषित शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या उपासना का प्रतिषेध किया गया है।

उपर्युक्त तथ्यों से सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। वास्तविक स्थिति भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। भारत में धर्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता। देश के सर्वोच्च पद को डॉ० जाकिर हुसैन तथा श्री एपीजे अब्दुल कलाम सुशोभित कर चुके हैं। अखिल भारतीय सेवाएँ हों या अन्य सेवाएँ सभी धर्मावलम्बियों को इनमें भर्ती की समान सुविधाएँ प्राप्त हैं। सभी भारतीय विभिन्न धर्मानुयायी होते हुए भी अपने-अपने त्योहार निर्विघ्न रूप से मनाते हैं। भारत वास्तविक अर्थ में एक ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य है।

प्रश्न 2.
संविधान की प्रस्तावना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर :

संविधान की प्रस्तावना का महत्त्व

प्रत्येक राष्ट्र के संविधान में प्रस्तावना की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है यह संविधान का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। विद्वानों के विचार में इस बिन्दु पर मतभेद पाया जाता है कि प्रस्तावना संविधान का कानूनी भाग है अथवा नहीं। विद्वानों का यह मत है कि संसद संविधान की प्रस्तावना में भी संविधान के अन्य अनुच्छेदों के समान ही अनुच्छेद 356 द्वारा संशोधन कर सकती है, इस स्थिति में प्रस्तावना संविधान का एक कानूनी भाग है। भारत में संविधान की प्रस्तावना को बहुत सोच-विचार के उपरान्त ही बनाया गया था। भारत के संविधान की प्रस्तावना विश्व के अन्य सभी संविधानों की प्रस्तावना से श्रेष्ठ है। क्योंकि इसमें सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक मूल्यों को प्राप्त करने का संकल्प व्यक्त किया गया है। संविधान की प्रस्तावना के महत्त्व को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –

  1. यह राष्ट्र की सरकार को नीति-निर्माण हेतु मार्ग दिखाती है।
  2. प्रस्तावना भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने की घोषणा करती है।
  3. यह नागरिकों को प्रत्येक प्रकार की स्वतन्त्रता; जैसे-विचार-अभिव्यक्ति, विश्वास तथा धर्म एवं उपासना की स्वतन्त्रता प्रदान करने का लक्ष्य घोषित करती है।
  4. यह व्यक्ति की गरिमा तथा प्रतिष्ठा को बनाए रखने का आह्वान करती है।
  5. यह भारत के समस्त नागरिकों में पारस्परिक भाई-चारे एवं बन्धुत्व बढ़ाने का आदर्श उपस्थित करती है।
  6. यह राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता को बनाए रखने की आशा अभिव्यक्त करती है।
  7. यह प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करने तथा सम्मान को बनाए रखने में विश्वास प्रकट करती है।
  8. प्रस्तावना लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था के आदर्शों को अपनाने पर बल देती है।
  9. प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी’ शब्दों को सम्मिलित करने पर इसका महत्त्व और भी बढ़ गया है।
  10. प्रस्तावना में इस तथ्य को पूर्णतया स्पष्ट किया गया है कि भारत का संविधान भारतीयों द्वारा निर्मित किया गया है तथा उसे पालन करने की वचनबद्धता संविधान निर्माताओं ने व्यक्त की है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय संविधान की उन विशेषताओं का परीक्षण कीजिए जो संसदीय शासन प्रणाली का समर्थन करती हैं?
या
“भारत का वर्तमान संविधान 1935 के अधिनियम का वृहद् संस्करण नहीं है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
किसी भी देश की राजनीतिक गतिविधियों का परिचय उसके संविधान से ही मिलता है। उसका निर्माण उस देश की भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है। भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) लिखित एवं विस्तृत संविधान – भारत का संविधान संसार का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। इस संविधान में 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियाँ थीं और यह 22 भागों में विभक्त था। 1993 ई० के 73वें तथा 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियमों के बाद अब इसमें 444 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हैं। संविधान की विशालता का मूल कारण यह है कि संविधान निर्माताओं ने शासन के समस्त प्रमुख अंगों का वर्णन करने के बाद शासन की अनेक सूक्ष्मतम बातों का उल्लेख भी किया है।

(2) सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य – संविधान का उद्देश्य समस्त भारत में प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्र की स्थापना करना है। प्रभुत्वसम्पन्न का अर्थ यह है कि भारत अपने आन्तरिक और विदेशी मामलों में पूर्ण स्वतन्त्र है।

(3) संघात्मक व एकात्मक व्यवस्था का मिश्रण – भारतीय संविधान द्वारा संघात्मक ढाँचे को स्वीकार किया गया है। अनेक संविधान संशोधनों के उपरान्त वर्तमान में भारतीय संविधान में 444 धाराएँ (अनुच्छेद) हैं। संविधान द्वारा राज्य व केन्द्र के मध्य शक्तियों का पृथक्करण किया गया है। संविधान द्वारा संघात्मक शासन की अन्य विशेषताओं को स्वीकार करते हुए संविधान की सर्वोच्चता व सर्वोच्च न्यायपालिका की व्यवस्था भी की गयी है। इसके अतिरिक्त इकहरी नागरिकता, सम्पूर्ण देश के लिए एक ही संविधान, अखिल भारतीय सेवाएँ व राष्ट्रपति के संकटकालीन अधिकार आदि व्यवस्थाएँ एकात्मक शासन का समर्थन करती हैं। इस प्रकार भारतीय संविधान में संघात्मक व एकात्मक दोनों शासन-व्यवस्थाओं के गुणों को समाविष्ट किया गया है।

(4) शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना – भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है कि इसके द्वारा केन्द्र को राज्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। केन्द्र को शक्तिशाली बनाने के लिए मुख्यत: तीन उपाय काम में लाये गये हैं। प्रथम, आपातकालीन स्थिति में संघ सरकार को राज्य के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का पूर्ण अधिकार प्रदान किया गया है। दूसरे, केन्द्र और राज्यों की शक्तियों का विभाजन होने पर भी विशेष परिस्थिति में केन्द्र को राज्य सूची के अन्तर्गत आने वाले विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया है। तीसरे, समवर्ती सूची के अन्तर्गत आने वाले विषयों पर संघ सरकार द्वारा बनाये गये नियमों को प्राथमिकता दी गयी है। इन तीनों उपायों के अतिरिक्त न्यायपालिका के संगठन, राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति और अखिल भारतीय सेवाओं के संगठन आदि के सम्बन्ध में भी केन्द्र को विस्तृत अधिकार प्रदान करके अत्यन्त शक्तिशाली बनाया गया है।

(5) संसदीय शासन पद्धति – भारतीय संविधान देश में संसदीय प्रणाली की स्थापना करता है। संसदीय प्रणाली में राज्य का प्रधान नाममात्र का होता है और वास्तविक कार्यपालिका की शक्ति मन्त्रिमण्डल में निहित होती है। मन्त्रिमण्डल सामूहिक रूप से व्यवस्थापिका के निम्न सदन (लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होता है। भारत का राष्ट्रपति नाममात्र का प्रधान है तथा शासन की वास्तविक शक्ति मन्त्रिमण्डल में है, जो प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है।

(6) मौलिक अधिकारों की व्यवस्था – भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों की स्वतन्त्रता व अधिकारों की रक्षा के लिए छः मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गयी है, जिनका उपभोग कर भारत को प्रत्येक नागरिक अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकता है।

(7) नीति-निदेशक तत्त्व – भारतीय संविधान के चतुर्थ अध्याय में शासन-संचालन हेतु सरकार के लिए जिन मूलभूत सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है उन्हीं सिद्धान्तों को नीति-निदेशक तत्त्व कहा जाता है। आयरलैण्ड के संविधान से प्रेरित होकर लिये गये इन सिद्धान्तों को उद्देश्य भारत को एक लोक कल्याणकारी स्वरूप प्रदान करना है।

(8) नागरिकों के मूल कर्त्तव्य – भारतीय संविधान में 42वें संवैधानिक संशोधन, 1976 ई० के द्वारा नागरिकों के लिए 11 मूल कर्तव्यों को सम्मिलित किया गया है।

(9) लोकतन्त्रात्मक गणराज्य – भारत एक लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है, अर्थात् भारत में प्रभुसत्ता जनता में निहित है तथा जनता को अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार-निर्माण का अधिकार प्रदान किया गया है। गणराज्य से आशय यह है कि भारत का सर्वोच्च प्रधान वंशानुगत न होकर जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए चुना गया प्रधान होगा।

(10) कठोर व लचीला संविधान – भारतीय संविधान कठोर व लचीले दोनों प्रकार के संविधानों का मिश्रण है। संविधान में जहाँ कुछ विषयों में संशोधन साधारण प्रक्रिया द्वारा किये जाते हैं, वहीं कुछ विषयों में संशोधन की जटिल प्रक्रिया को स्वीकार किया गया है। उदाहरणार्थ–राष्ट्रपति के निर्वाचन की विधि, केन्द्र व राज्यों के मध्य शक्ति-विभाजन, राज्यों के संसद में प्रतिनिधि आदि विषयों पर संशोधन करने के लिए संसद के समस्त सदस्यों के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत के अतिरिक्त कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों के अनुसमर्थन को अनिवार्य घोषित किया गया है।

(11) धर्मनिरपेक्ष राज्य – संविधान में 42वें संविधान संशोधन द्वारा भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है, अर्थात् भारत राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा, अपितु उसके द्वारा देश में निवास करने वाले सभी धर्मों व जाति के लोगों के साथ समानता का व्यवहार किया जाएगा।

(12) इकहरी नागरिकता – संविधान निर्माताओं द्वारा भारत की एकता व अखण्डता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए भारत के समस्त नागरिकों के लिए इकहरी नागरिकता का प्रावधान किया गया है।

(13) अस्पृश्यता का अन्त – भारतीय संविधान की एक अन्य विशेषता अस्पृश्यता का अन्त करना है। संविधान के भाग 3 तथा 17वें अनुच्छेद में कहा गया है कि अस्पृश्यता का अन्त किया जाता है और इसका किसी भी रूप में आचरण दण्डनीय अपराध माना जाएगा।

(14) वयस्क मताधिकार – भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, 18 वर्ष की अवस्था पूरी कर चुका हो, धर्म, लिंग अथवा जाति के भेदभाव के बिना मतदान का अधिकार प्रदान किया गया है।

(15) स्वतन्त्र और इकहरी न्यायपालिका की स्थापना – भारतीय संविधान ने देश के लिए स्वतन्त्र और इकहरी न्यायपालिका की व्यवस्था की है। संविधान में इस बात का पूरा-पूरा प्रबन्ध किया गया है कि न्यायपालिका निष्पक्ष रूप से बिना किसी हस्तक्षेप के अपने कर्तव्य का पालन कर सके।

(16) विश्व-शान्ति व मैत्री का पोषक – भारतीय संविधान ने सदैव विश्व-शान्ति एवं विश्व बन्धुत्व का समर्थन किया है। संविधान की 51वीं धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है भारत संसार के राष्ट्रों के साथ सह-अस्तित्व रखते हुए विश्व-शान्ति और सुरक्षा में अपना पूरा सहयोग देगा। साथ-ही-साथ वह सभी विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने का प्रयास भी करेगा।”

(17) एक राष्ट्रभाषा की व्यवस्था – सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए भारतीय संविधान में एक ही राष्ट्रभाषा की ‘ व्यवस्था की गयी है और वह है हिन्दी भाषा। संविधान की धारा 343 में कहा गया है कि संघ की अधिकृत भाषा देवनागरी लिपि में लिखी हुई हिन्दी होगी।

(18) विधि का शासन – भारतीय संविधान में ब्रिटेन के संविधान की भाँति समस्त नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्रदान किया गया है, अर्थात् कानून के द्वारा किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग व अन्य किसी कारण कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

(19) द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका – भारतीय संविधान के अन्तर्गत द्वि–सदनात्मक व्यवस्थापिका की स्थापना की गयी है। इस व्यवस्था में संसद के दो सदन राज्यसभा व लोकसभा हैं, जिनमें राज्यसभा उच्च सदन व लोकसभा निम्न परन्तु लोकप्रिय सदन है।

निष्कर्ष – डॉ० अम्बेडकर के शब्दों में, “मैं महसूस करता हूँ कि भारतीय संविधान व्यावहारिक है। और इसमें शान्ति व युद्धकाल दोनों में देश को बनाये रखने की सामर्थ्य है। वास्तव में मैं यह कहना। चाहूँगा कि यदि नवीन संविधान के अन्तर्गत स्थिति खराब होती है तो इसका कारण यह नहीं होगा कि संविधान खराब है बल्कि हमें यह कहना होगा कि भारतीय ही खराब हैं।”

प्रश्न 2.
“भारत एक सम्प्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मुख्य बिन्दुओं की प्रकृति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
“भारत एक सम्प्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य है। इसे निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता है –

(1) सम्प्रभुतासम्पन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य – भारतीय संविधान का उद्देश्य समस्त भारत में सम्प्रभुतासम्पन्न लोकतन्त्र की स्थापना करना है। सम्प्रभुतासम्पन्न का अर्थ यह है कि भारत अपने आन्तरिक और विदेशी मामलों में पूर्ण स्वतन्त्र है। आन्तरिक क्षेत्र में राज्य सर्वोपरि है। उसकी आज्ञाओं का पालन देश के सभी व्यक्तियों एवं संस्थाओं को करना पड़ता है। विदेशी मामलों की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि भारत पर किसी विदेशी शक्ति का नियन्त्रण नहीं है। वह अपनी इच्छा से दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है। भारत एक “सार्वभौम, लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी गणराज्य है। यह बात संविधान की प्रस्तावना से भली-भाँति स्पष्ट है। सार्वभौमिकता का अर्थ है कि शासन-सत्ती का अन्तिम स्रोत भारतीय जनता है। संविधान की प्रस्तावना में लिखे शब्द “हम भारत के लोग भारतीय जनता की सार्वभौमिकता की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। लोकतन्त्र का अर्थ है कि शासन की अन्तिम सत्ता जनता के हाथ में है, परन्तु यह कार्य जनता प्रत्यक्ष रूप से न करके अपने प्रतिनिधियों के द्वारा ही कर पाती है। इसीलिए भारत में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र की नहीं, बल्कि प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र (Representative Democracy) की स्थापना की गयी है, जिसके लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा निर्वाचन-प्रणाली को अपनाया गया है।

(2) समाजवादी राज्य – 42वें संविधान संशोधन द्वारा ‘समाजवादी’ शब्द संविधान की प्रस्तावना में जोड़कर समाजवाद को देश के सामान्य जीवन में स्वीकार किया गया है। इससे प्रस्तावना में दी गयी आर्थिक न्याय की भावना को भी बल मिला है। समाजवाद एक सार्वजनिक क्षेत्र की माँग करता है तथा लाभों को व्यापक रूप से समाज में वितरित करने की बात करता है। भारत एक गणराज्य है। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे यहाँ राज्याध्यक्ष वंशानुगत राजा नहीं, बल्कि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि सभी सार्वजनिक पद बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए खुले हैं तथा किसी भी वर्ग को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है।

(3) धर्मनिरपेक्ष राज्य – संविधान द्वारा भारत में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State) की स्थापना की गयी है। 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द को जोड़कर भारतीय संसद ने धर्मनिरपेक्षता पर मुहर लगा दी है। संविधान की प्रस्तावना में वर्णित ये घोषणाएँ कि संविधाने नागरिकों के लिए विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता” व “प्रतिष्ठा और अवसर की समानता’ की व्यवस्था करता है, भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाती हैं। धर्म के आधार पर राज्य नागरिकों में भेदभाव नहीं करता है, बल्कि वह सभी धर्मों को बराबर सम्मान देता है। धर्मनिरपेक्षता को और अधिक स्पष्ट करते हुए अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धर्म के अनुकरण की स्वतन्त्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। इसी प्रकार अनुच्छेद 29 सभी नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि भारत एक सम्प्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय एकता में सहायक तत्त्वों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :

राष्ट्रीय एकता में सहायक तत्त्व

देश की राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक विकास व आर्थिक समृद्धि के लिए राष्ट्रीय एकता एक अनिवार्य तत्त्व है। अतः राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन देने के लिए औपचारिक एवं अनौपचारिक रूप से निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है –

1. इकहरी नागरिकता – भारतीय संविधान ने समस्त भारतवासियों को इकरही नागरिकता प्रदान करके क्षेत्रवाद जैसी संकीर्ण भावनाओं को दूर करने का प्रयास किया है।

2. संविधान द्वारा भाषाओं को मान्यता – भाषावाद की समस्या का समाधान करने के उद्देश्य से संविधान की आठवीं अनुसूची में विभिन्न भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है। आरम्भ में इस सूची में सम्मिलित भाषाओं की संख्या चौदह थी। संविधान संशोधन 21 व संविधान संशोधन 71 तथा संविधान संशोधन 92 के पश्चात् सिन्धी, नेपाली, कोंकणी, मणिपुरी, डोगरी, बोडो, मैथिली और संथाली भाषा के जुड़ जाने से अब इस सूची में सम्मिलित भाषाओं की संख्या 22 हो गई है। इस प्रकार अब आठवीं अनुसूची में कुल 22 भाषाएँ हो गई हैं।

3. राष्ट्रभाषा – संविधान ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का गौरव प्रदान किया और संविधान में यह व्यवस्था की थी कि वर्ष 1965 ई० तक अंग्रेजी को सहभाषा की स्थिति प्राप्त रहेगी। परन्तु भाषा की राजनीति के कारण सरकार ने अनिश्चित काल तक अंग्रेजी को सहभाषा के रूप में बने रहने की स्थिति प्रदान कर दी। वस्तुतः एक राष्ट्रवाद से सम्पूर्ण राष्ट्र में एक मानसिकता विकसित होती है। भाषायी विवादों से बचने के लिए किसी भी राज्य के ऊपर हिन्दी को थोपा नहीं गया है।

4. राष्ट्रचिह्न – भारत का राष्ट्रचिह्न सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तम्भ की अनुकृति है। यह भी राष्ट्रीय एकता को प्रकट करता है।

5. राष्ट्रीय त्योहार – 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर (क्रमशः स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस और गांधी जयन्ती) को राष्ट्रीय त्योहार माना गया है और सम्पूर्ण देश में इन्हें बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

6. सामाजिक समानता – देश में सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए अस्पृश्यता समाप्ति की दिशा में विशेष प्रयास किए गए हैं। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों को संविधान द्वारा विशेष सुविधाएँ भी प्रदान की गई हैं।

7. धर्मनिरपेक्ष स्वरूप – साम्प्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए भारत गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप स्वीकार किया गया है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। धर्मनिरपेक्ष शब्द को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया है।

8. समाजवाद की स्थापना – भारतीय संविधान ने समाजवाद की स्थापना पर बल दिया है जिससे समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को समाप्त किया जा सके जोकि समाज में क्रान्ति तथा संघर्ष का कारण है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 9 Constitution as a Living Document

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 9 Constitution as a Living Document (संविधान : एक जीवन्त दस्तावेज)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य सही है?
संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है; क्योंकि
(क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
(ख) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता
(ग) हर पीढ़ी के पास अपनी पसन्द का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
(घ) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिम्बित होना चाहिए।
उत्तर-
(क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/गलत का निशान लगाएँ-
(क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
(ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है।
(ग) न्यायपालिका संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती परन्तु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या द्वारा वह संविधान को काफी हद तक बदल सकती है।
(घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।
उत्तर-
(क) (✓) सही
(ख) (✗) गलत
(ग) (✓) सही
(घ) (✓) सही

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं?
इस प्रक्रिया में ये कैसे शामिल होते हैं?
(क) मतदाता
(ख) भारत का राष्ट्रपति
(ग) राज्य की विधानसभाएँ
(घ) संसद
(ङ) राज्यपाल
(च) न्यायपालिका।
उत्तर-
(क) मतदाता लोकसभा व विधानसभाओं में अपने चुने हुए प्रतिनिधि भेजता है। ये चुने हुए प्रतिनिधि ही मतदाता की राय को संसद में या विधानसभा में व्यक्त करते हैं। इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से मतदाता ही संविधान में भाग लेता है।
(ख) कोई भी संविधान संशोधन बिल राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही प्रभावी माना जाता है।
(ग) राज्य विधानमण्डलों को भी संविधान संशोधनों में भागीदारी दी गई है। बहुत-सी धाराओं में संशोधन का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में 2/3 बहुमत से पास होकर राज्यों के पास जाना आवश्यक है और कम-से-कम आधे राज्यों में विधानमण्डल द्वारा साधारण बहुमत से सहमति मिलने पर ही वह प्रस्ताव संशोधन कानून का रूप ले लेता है।
(घ) संसद को ही संविधान में संशोधन प्रस्तावित कानूनी अधिकार है और कुछ धाराएँ तो संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से पारित प्रस्ताव में संशोधित हो सकती है।
(ङ) राज्यपाल की संविधान संशोधन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं है।
(च) न्यायपालिका की संविधान संशोधन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं है।

प्रश्न 4.
इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे?
(क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
(ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
(ग) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
(घ) संशोध्न के कुछ उपबन्ध विवादास्पद थे।
उत्तर-
(क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
(घ) संशोधन के कुछ उपबन्ध विवादास्पद थे।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के सम्बन्ध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता?
(क) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है।
(ख) खंडन-मंडन/बहस और मदभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं।
(ग) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज्यादा महत्त्व दिया गया है। कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्याख्या की गई है।
(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
(ङ) न्यायपालिका केवल किसी कानून की संवैधानिकता के बारे में फैसला दे सकती है। वह ऐसे कानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।
उत्तर-
(घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।

प्रश्न 6.
बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिह्नित करें। गलत वाक्य को सही करें।
(क) संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है।
(ख) बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर, सकती है।
(ग) न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढाँचे के अन्तर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है।
(घ) यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है।
(ङ) इस सिद्धांत से न्यापालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं। सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।
उत्तर-
उपर्युक्त सभी कथन सही हैं।

प्रश्न 7.
सन् 2000-2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर आप निम्नलिखित में से कौन-सा निष्कर्ष निकालेंगे?
(क) इस काल के दौरान किए गए संशोधन में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
(ख) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
(ग) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
(घ) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अन्तर नहीं रह गया था।
(ङ) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।
उत्तर-
(i) इस काल के दौरान किए गए संशोधन में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
(ii) इस काल में किए गए संविधान संशोधन विवादरहित थे, सभी राजनीतिक दल संशोधनों के विषयों पर सहमत थे।

प्रश्न 8.
संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।
उत्तर-
संविधान संशोधन प्रक्रिया को कठिन बनाने के लिए विशेष बहुमत का प्रावधान रखा गया है। जिससे संशोधन की सुविधा का दुरुपयोग न किया जा सके।
विशेष बहुमत में सर्वप्रथम संशोधन बिल के प्रवेश पर सदन की कुल संख्या के बहुमत के सदस्यों द्वारा वह बिल पारित होना चाहिए। इसके अलावा उपस्थित व वोट करने वाले सदन के सदस्यों के 2/3 बहुमत से बिल पास होना चाहिए। इस प्रकार से संविधान बिल दोनों सदनों में अलग-अलग पारित होना चाहिए। इस प्रावधान का यह लाभ है कि बिल को पारित करने के लिए आवश्यक बहुमत होता है।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर-
यह बिल्कुल सत्य है कि संविधान में अनेक संशोधन इस कारण से किए गए कि निश्चित विषय पर न्यायपालिका ने संविधान की व्याख्या करते हुए संसद से अलग दृष्टिकोण रखा। जब भी किसी विषय पर संसद को न्यायालय का कोई निर्णय राजनीतिक दृष्टि से अनुकूल नहीं लगा तो उसे निरस्त करने के लिए संविधान में संशोधन कर दिया।

गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि संसद को मूल अधिकारों में कटौती करने का अधिकार नहीं है और इस बात का निर्णय करने का अधिकार न्यायालय को है कि मूल अधिकारों में कटौती की है, अथवा नहीं। इसी न्यायालय ने शंकरप्रसाद बनाम भारत सरकार के मुकदमे में यह निर्णय दिया है कि संविधान में परिवर्तन एक विधायी प्रक्रिया है और संसद द्वारा साधारण विधायी प्रक्रिया के लिए अनुच्छेद 118 के अन्तर्गत बनाए गए नियम संविधान में संशोधन के विधेयकों के लिए भी लागू किए जाएँ। इन सबको संसद ने बाद में बदल दिया।

प्रश्न 10.
अगर संशोधन की शक्ति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है तो न्यायपालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या आप इस बात से सहमत हैं? 100 शब्दों में व्याख्या करें।
उत्तर-
नहीं, हम इस बात से सहमत नहीं हैं। न्यापालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। हमारे यहाँ सर्वोच्च न्यायालय संविधान की सर्वोच्चता एवं पवित्रता की सुरक्षा करता है; अत: संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के संरक्षण का कार्य भी प्रदान किया गया है, जिसका अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय को संसद अथवा राज्य विधानमण्डलों द्वारा निर्मित कानून की वैधानिकता की जाँच कराने का अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 131 और 132 सर्वोच्च न्यायालय को संघीय तथा राज्य सरकारों द्वारा निर्मित विधियों के पुनरावलोकन का अधिकार प्रदान करते हैं; अतः यदि संसद अथवा राज्य विधानमण्डल, संविधान का अतिक्रमण करते हैं या संविधान के विरुद्ध विधि का निर्माण करते हैं, तो संसद या राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित ऐसी प्रत्येक विधि को सर्वोच्च न्यायालय अवैधानिक घोषित कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की इस शक्ति को ‘न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति (Power of Judicial Review) कहा जाता है। इसी प्रकार, वह संघ सरकार अथवा राज्य सरकार के संविधान का अतिक्रमण करने वाले समस्त कार्यपालिका आदेशों को भी अवैध घोषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या करने वाला (Interpreter) अन्तिम न्यायालय है। उसे यह घोषित करना पड़ता है कि किसी विशेष अनुच्छेद का क्या अर्थ है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय की भाँति कानून की उचित प्रक्रिया (Due Process of the Law) के आधार पर न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति का प्रयोग न कर कानून के द्वारा स्थापितं प्रक्रिया (Procedure Established by the Law) के आधार पर करता है। इस दृष्टि से भारत का सर्वोच्च न्यायालय केवल संवैधानिक आधारों पर ही संसद अथवा विधानमण्डल के द्वारा पारित कानूनों को अवैध घोषित कर सकता है। इस दृष्टिकोण से भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थिति अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से कमजोर है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति के आधार पर संसद का तीसरा सदन नहीं कहा जा सकता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान की पवित्रता की सुरक्षा कौन करता है?
(क) उच्चतम न्यायालय
(ख) राष्ट्रपति
(ग) संसद
(घ) प्रधानमन्त्री
उत्तर :
(क) उच्चतम न्यायालय।

प्रश्न 2.
न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति निम्नलिखित में से किसके पास है?
(क) राष्ट्रपति
(ख) उच्चतम न्यायालय
(ग) संसद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) उच्चतम न्यायालय।

प्रश्न 3.
73वाँ तथा 74वाँ संविधान संशोधन किससे सम्बन्धित था?
(क) स्थानीय संस्थाएँ
(ख) राजनीतिक दल
(ग) दल-बदल
(घ) प्रत्याशी जमानत राशि
उत्तर :
(क) स्थानीय संस्थाएँ।

प्रश्न 4.
73वाँ तथा 74वाँ संविधान संशोधन किस वर्ष पारित हुआ?
(क) 1992
(ख) 1991
(ग) 1993
(घ) 1994
उत्तर :
(ख) 1991

प्रश्न 5.
केशवानन्द मामले में उच्चतम न्यायालय ने किस वर्ष निर्णय दिया?
(क) 1973
(ख) 1974
(ग) 1957
(घ) 1975
उत्तर :
(क) 1973

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान संशोधन से क्या आशय है?
उत्तर :
संविधान में परिस्थितियों व समय की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन कर नए प्रावधानों को शामिल करने व ढालने की प्रक्रिया को संविधान संशोधन कहते हैं।

प्रश्न 2.
लचीला संविधान क्या है?
उत्तर :
लचीला संविधान वह होता है जिसमें आसानी से संशोधन किया जा सके।

प्रश्न 3.
संविधान संशोधन प्रक्रिया में कौन-सी संस्थाएँ सम्मिलित होती हैं?
उत्तर :
संविधान संशोधन की प्रक्रिया एक लम्बी प्रक्रिया है जिसमें निम्नलिखित संस्थाएँ सम्मिलित होती हैं –

  1. संसद
  2. राज्यों के विधानमण्डल
  3. राष्ट्रपति।

प्रश्न 4.
अनुच्छेद 368 क्या है?
उत्तर :
अनुच्छेद 368 संविधान का वह प्रमुख अनुच्छेद है जिसमें संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया दी गई है, जिसका प्रयोग करके संसद साधारण बहुमत व विशेष बहुमत के आधार पर संविधान में संशोधन कर सकती है।

प्रश्न 5.
संविधान संशोधन में राष्ट्रपति की क्या भूमिका है?
उत्तर :
संविधान संशोधन बिल दोनों सदनों से अलग-अलग पास होने पर राष्ट्रपति के पास भेजा। जाता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर संशोधन प्रभावी हो जाता है।

प्रश्न 6.
52वाँ संविधान संशोधन किससे सम्बन्धित था?
उत्तर :
52वाँ संविधान संशोधन दल-बदल से सम्बन्धित था।

प्रश्न 7.
यदि किसी संशोधन प्रस्ताव को लोकसभा पास कर दे और राज्यसभा उससे सहमत न हो तो उसका समाधान कैसे होता है?
उत्तर :
संविधान संशोधन बिलों पर संसद के दोनों सदनों का समान अधिकार है। यदि संशोधन बिल एक सदन से पास होने के बाद दूसरे सदन की सहमति प्राप्त नहीं करता तो वह रद्द हो जाता है।

प्रश्न 8.
क्या राष्ट्रपति संशोधन बिल को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है?
उत्तर :
संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद अथवा आधे राज्यों के अनुसमर्थन की प्राप्ति के बाद संशोधन बिल राष्ट्रपति के पास उसकी स्वीकृति हेतु भेजा जाता है। साधारण बिल को तो राष्ट्रपति एक बार पुनर्विचार हेतु वापस भेज सकता है, परन्तु संशोधन बिल पर वह ऐसा नहीं कर सकता और उसे स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
73वें व 74वें संविधान संशोधन का क्या उद्देश्य था?
उत्तर :
स्वतन्त्रता के पश्चात् बलवन्त मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर स्थानीय संस्थाओं का ग्रामीण क्षेत्र में गठन तो किया गया परन्तु अधिकांश समय तक ये संस्थाएँ अनेक कारणों से क्रियाहीन ही रहीं। इनके पास न पर्याप्त साधन थे न अधिकार। चुनाव प्रक्रिया नियमित न थी। कमजोर वर्गों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त न था। सन् 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार ने इन संस्थाओं (ग्रामीण व शहरी स्तर पर) को संगठनात्मक रूप से सुदृढ़ करने व शक्तिशाली बनाने के उद्देश्यों से 73वाँ वे 74वाँ संविधान संशोधन पारित किया। 73वाँ संविधान संशोधन ग्रामीण क्षेत्र की स्थानीय संस्थाओं से सम्बन्धित है तथा 74वाँ संविधान संशोधन शहरी क्षेत्र की स्थानीय संस्थाओं से सम्बन्धित है। इन संशाधनों के माध्यम से स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं व अनुसूचित जाति के लोगों को अलग-अलग 33% आरक्षण दिया गया है।

प्रश्न 2.
विश्व के आधुनिकतम संविधानों में संशोधन की प्रक्रिया में कौन-से सिद्धान्त प्रयुक्त किए जाते हैं?
उत्तर :
विश्व के आधुनिकतम संविधानों में संशोधन की विभिन्न प्रक्रियाओं में दो सिद्धान्त अधिक अहम भूमिका का निर्वाह करते हैं –

(1) एक सिद्धान्त है विशेष बहुमत का। उदाहरण के लिए; अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, रूस आदि के संविधानों में इस सिद्धान्त का समावेश किया गया है। अमेरिका में दो-तिहाई बहुमत का सिद्धान्त लागू है, जबकि दक्षिण अफ्रीका और रूस जैसे देशों में तीन-चौथाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

(2) दूसरा सिद्धान्त है संशोधन की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी का। यह सिद्धान्त कई आधुनिक संविधानों में अपनाया गया है। स्विट्जरलैण्ड में तो जनता को संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने तक का अधिकार है। रूस और इटली अन्य ऐसे देश हैं जहाँ जनता को संविधान में संशोधन करने या संशोधन के अनुमोदन का अधिकार दिया गया है।

प्रश्न 3.
संविधान की मूल संरचना का सिद्धान्त क्या है?
उत्तर :
भारतीय संविधान के विकास को जिस बात से बहुत दूर तक प्रभावित किया है वह है संविधान की मूल संरचना का सिद्धान्त। इस सिद्धान्त को न्यापालिका ने केशवानन्द भारती के प्रसिद्ध मामले में प्रतिपादित किया था। इस निर्णय ने संविधान के विकास में निम्नलिखित सहयोग दिया –

  1. इस निर्णय द्वारा संसद की संविधान में संशोधन करने की शक्तियों की सीमाएँ निर्धारित की गईं।
  2. यह संविधान के किसी या सभी भागों के सम्पूर्ण संशोधन (निर्धारित सीमाओं के अन्दर) की अनुमति देता है।
  3. संविधान की मूल संरचना या उसके बुनियादी तत्त्व का उल्लंघन करने वाले किसी संशोधन के विषय में न्यायपालिका का निर्णय अन्तिम होगा-केशवानन्द भारती के मामले में यह बात स्पष्ट की गई थी।

उच्चतम न्यायालय ने केशवानन्द के मामले में 1973 में निर्णय दिया था। बाद के तीन दशकों में संविधान की सभा व्यवस्थाएँ इसे ध्यान में रखकर की गईं।

प्रश्न 4.
भारत की संविधान संशोधन प्रक्रिया में क्या कमियाँ हैं?
उत्तर :
भारत की संविधान संशोधन प्रक्रिया में निम्नलिखित दोष हैं –

  1. भारतीय संघ की इकाइयों अथवा राज्यों को संविधान में संशोधन प्रस्ताव पेश करने का अधिकार नहीं है और यह तथ्य उन्हें केन्द्रीय सरकार से निम्न स्तर की ओर ले जाता है। वे इस दृष्टि से समान भागीदारी नहीं हैं जो पूर्व संघीय व्यवस्था के सिद्धान्तों के विरुद्ध है।
  2. संविधान संशोधन बिल पर संसद तथा संसद व राज्यों से पारित होने के बाद जनमत संग्रह करवाए जाने की व्यवस्था नहीं है और यह तथ्य जन-प्रभुसत्ता के सिद्धान्त का विरोध करता है।
  3. संविधान संशोधन प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में यदि मतभेद उत्पन्न हो जाए तो उसके समाधान के लिए किसी प्रकार का तरीका निश्चित नहीं है, वह रद्द हो जाता है। संसद द्वारा पारित संविधान संशोधन प्रस्ताव पर राज्य विधानमण्डलों के अनुसमर्थन की समय-सीमा निश्चित नहीं है। इससे राज्य संविधान में अनावश्यक देरी कर सकते हैं।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान संशोधन 52 के मुख्य प्रावधान क्या थे?
उत्तर :
52वाँ संविधान संशोधन एक महत्त्वपूर्ण व प्रभावकारी संविधान संशोधन था। इसे सभी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त था। इसे सन् 1985 में पारित किया गया था। इसके निम्नलिखित प्रमुख प्रावधान थे –

  1. अगर कोई सदस्य किसी पार्टी के टिकट पर जीतने के बाद उस पार्टी को छोड़ता है तो उसकी सदन की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
  2. अगर कोई निर्दलीय सदस्य चुनाव जीतने के बाद किसी दल में सम्मिलित होता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
  3. अगर कोई सनोनीत सदस्य किसी दल में शामिल हो जाता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
  4. विघटन व विलय की स्थिति में यह कानून लागू नहीं होगा। (5) संशोधन के कानून के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय अध्यक्ष का होगा।

प्रश्न 2.
संविधान संशोधन प्रक्रिया की सामान्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में दी गई संशोधन विधि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. संविधान में संशोधन के कार्य के लिए किसी अलग संस्था की व्यवस्था नहीं की गई। यह शक्ति केन्द्रीय संसद को सौंप दी गई है।
  2. राज्यों के विधानमण्डलों को संशोधन बिल आरम्भ करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  3. संविधान की धारा 368 में लिखे गए विशेष उपबन्धों के अतिरिक्त संशोधन बिल साधारण बिल की भाँति संसद द्वारा ही पास किए जाते हैं। इसके लिए दोनों सदनों का आवश्यक बहुमत प्राप्त हो जाने पर राष्ट्रपति की स्वीकृति ली जाती है। इसके लिए जनमत संग्रह की कोई व्यवस्था नहीं की गई, जबकि स्विट्जरलैण्ड, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया आदि देशों के कुछ विशेष राज्यों में इस प्रकार की व्यवस्था की गई है।
  4. संसद में संशोधन बिल पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व-अनुमति अनिवार्य नहीं है।
  5. संविधान में कुछ विशेष संशोधनों के लिए कम-से-कम आधे राज्यों की स्वीकृति आवश्यक है, जबकि अमेरिकी संविधान में कम-से-कम तीन-चौथाई राज्यों की स्वीकृति आवश्यक है।
  6. संविधान की समस्त धाराओं को संशोधित किया जा सकता है, यहाँ तक कि संविधान का संशोधन करने की धारा 368 का भी संशोधन किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल तथा राज्यसभा द्वारा संविधान संशोधन किस प्रकार सम्भव
उतर :

1. राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल द्वारा संविधान संशोधन – राष्ट्रपति तथा राज्यपाल कुछ धाराओं का प्रयोग करके संविधान में आगामी परिवर्तन कर सकते हैं, उदाहरणतया राष्ट्रपति, धारा 331 के अन्तर्गत दो एंग्लो-इण्डियनों को लोकसभा में मनोनीत कर सकता है, यदि वह अनुभव करे। कि ऐंग्लो-इण्डियन समुदाय को लोकसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ है। राष्ट्रपति द्वारा इस शक्ति के प्रयोग को धारा 81 में निश्चित लोकसभा की संख्या पर प्रभाव पड़ सकता है। राज्यपाल को भी राष्ट्रपति को इस तरह इस शक्ति प्रयोग करके विधानसभा की सदस्य-संख्या में परिवर्तन करने का अधिकार प्राप्त है। राज्यपाल को एंग्लो-इण्डियन को नियुक्त करने का अधिकार संविधान की धारा 333 के अन्तर्गत प्राप्त है। असम का राज्यपाल छठी अनुसूची में दी गई कबाइली प्रदेशों की सूची में स्वयं परिवर्तन कर सकता है। राज्य की भाषा निश्चित करने का अधिकार विधानमण्डल को प्राप्त है। परन्तु यदि राष्ट्रपति को विश्वास हो जाए कि राज्य की जनसंक्ष्या का एक प्रमुख भाग निश्चित भाषा का । प्रयोग करता है तो वह उस भाषा को भी सरकारी रूप से प्रयोग किए जाने का आदेश जारी कर सकता है। राष्ट्रपति धारा 356 का प्रयोग करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है।

2. राज्यसभा द्वारा संशोधन – संविधान की धारा 249 के अन्तर्गत यदि राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास कर दे कि राज्य सूची के अमुक विषय पर संसद द्वारा कानून का बनाया जाना राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक अथवा लाभदायक है तो संसद को राज्य सूची के उस विषय पर समस्त भारत या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है, परन्तु संसद को यह अधिकार एक वर्ष के लिए ही प्राप्त होता है। संविधान के इस परिवर्तन को हम संशोधन नहीं कह सकते, क्योंकि यह परिवर्तन स्थायी न होकर अस्थायी होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
संविधान में विभिन्न अनुच्छेदों का संशोधन करने के लिए निम्नलिखित तीन विधियाँ व्यवहार में लाई जाती हैं –

(1) अनुच्छेद 4 तथा 11 के अनुसार इस संविधान के कुछ भागों में संशोधन संसद के दोनों सदनों के साधारण बहुमत से किया जाता है, परन्तु इस प्रकार के अनुच्छेद बहुत थोड़े हैं। नए राज्यों को बनाने, पुराने राज्यों के पुनर्गठन, भारतीय नागरिकों की योग्यता परिवर्तन, राज्यों में द्वितीय सदन का बनाना अथवा उसे समाप्त करना, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित क्षेत्रों सम्बन्धी व्यवस्था में परिवर्तन के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है। यह उल्लेखनीय है कि इन मामलों का सम्बन्ध यद्यपि संविधान की व्यवस्थाओं से है तथापि वास्तव में इन्हें संविधान के संशोधन नहीं माना जाता।

(2) संविधान के अनुच्छेद 368 के अधीन इसके कुछ भागों में परिवर्तन संसद के प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों के साधारण बहुमत, परन्तु उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से किया जाता है परन्तु आधे राज्यों के विधानमण्डलों का समर्थन आवश्यक है। राष्ट्रपति के चुनाव की विधि, राज्यों तथा केन्द्र की शक्तियों, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों सम्बन्धी व्यवस्था, संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व सम्बन्धी परिवर्तन के लिए इस प्रक्रिया को अपनाया गया है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में इसके लिए कांग्रेस के उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत तथा तीन-चौथाई राज्यों के समर्थन की आवश्यकता है। परन्तु वह समर्थन राज्य सरकारों का है, विधानमण्डलों का नहीं।

(3) संविधान के अन्य अनुच्छेदों का परिवर्तन संसद प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों के साधारण बहुमत परन्तु मतदान के समय उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से कर सकती है। उल्लेखनीय है कि मौलिक अधिकारों में परिवर्तन यद्यपि इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत है। गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि संसद को मूल अधिकारों में कटौती करने का अधिकार नहीं है और इस बात का निर्णय करने का अधिकार न्यायालय को है कि मूल अधिकारों में कटौती की है, अथवा नहीं। इसी न्यायालय ने शंकरप्रसाद बनाम भारत सरकार के मुकदमे में यह निर्णय दिया है कि संविधान में परिवर्तन एक विधायी प्रक्रिया है और संसद द्वारा साधारण विधायी प्रक्रिया के लिए अनुच्छेद 118 के अन्तर्गत बनाए गए नियम संविधान में संशोधन के विधेयकों के लिए भी लागू किए जाएँ। संविधान की धारा 368 में किए गए संशोधनों की विधि के अतिरिक्त कुछ अन्य धाराओं के अन्तर्गत भी परिवर्तन किया जा सकता है और शासन प्रणाली को प्रभावित किया जा सकता है। यह बात अलग है कि हम इन परिवर्तनों को संशोधन का नाम नहीं दे सकते, क्योंकि ये धारा 368 में नहीं आते हैं।

प्रश्न 2.
भारत की संविधान संशोधन प्रक्रिया के दोष लिखिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में संशोधन की विधि में बहुत दोष हैं, क्योंकि संशोधन विधि में बहुत-सी बातें स्पष्ट नहीं हैं, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं –

1. सभी धाराओं में संशोधन करने के लिए राज्यों की स्वीकृति नहीं ली जाती – संविधान की सभी धाराओं में संशोधन करने के लिए राज्यों की स्वीकृति नहीं ली जाती, बल्कि कुछ ही धाराओं पर राज्यों की स्वीकृति ली जाती है। संविधान का अधिकांश हिस्सा ऐसा है, जिसमें संसद स्वयं ही संशोधन कर सकती है।

2. राज्यों के अनुसमर्थन के लिए समय निश्चित नहीं – संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह संविधान में किए जाने वाले संशोधन को राज्यों द्वारा समर्थन अथवा अस्वीकृत के लिए भारतीय संविधान में कोई भी समय निश्चित नहीं किया गया है। भारत में अभी तक इस दोष को अनुभव नहीं किया गया, क्योंकि प्रायः एक ही दल का शासन केन्द्र तथा राज्यों में रहा है और आधे राज्यों का अनुसमर्थन आसानी से प्राप्त हो जाता है। परन्तु आज जिस प्रकार की स्थिति है, उससे यह दोष स्पष्ट हो जाता है।

3. संशोधन विधेयक को राज्यों के पास भेजने की भ्रमपूर्ण स्थिति – संविधान में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या संविधान में संशोधनों के विधेयकों को सभी राज्यों को भेजा जाना आवश्यक है अथवा उसे उनमें से कुछ एक राज्यों को भेजा जाना पर्याप्त है। संविधान में संशोधन के तीसरे विधेयक को कुछ राज्यों की राय जानने से पूर्व ही पास कर दिया गया था। और मैसूर की विधानसभा ने इसके विरुद्ध आपत्ति की थी।

4. संशोधन प्रस्ताव पर राष्ट्रपति की स्वीकृति – संविधान के अनुच्छेद 368 के खण्ड 2 में कहा गया है कि जब किसी विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया जाए, तो उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा उसके पश्चात् राष्ट्रपति विधेयक को अपनी सहमति प्रदान कर हस्ताक्षर कर देगा और तब संविधान संशोधन लागू माना जाएगा।

5. राज्यों को संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं – उल्लेखनीय है कि संविधान में संशोधन का प्रस्ताव केवल संघीय विधानमण्डलों अर्थात् संसद में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। कोई भी राज्य विधानमण्डल ऐसा प्रस्ताव केवल उस अवस्था में कर सकता है, जब वह अनुच्छेद 169 के अन्तर्गत विधानपरिषद् को समाप्त करना अथवा उसकी स्थापना करना चाहता हो।

6. अनेक अनुच्छेदों का साधारण प्रक्रिया के द्वारा संशोधन सम्भव – संविधान की धाराएँ ऐसी हैं, जिनके लिए संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं थी और संसद के साधारण बहुमत से संशोधन किए जाने से किसी प्रकार की हानि की सम्भावना नहीं थी। उदाहरण के लिए; धारा 224 द्वारा सेवानिवृत्त न्यायाधीश को न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर कार्य करने का अधिकार दिया गया है। इस धारा को बदलने के लिए किसी विशेष तरीके को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

7. जनमत संग्रह की व्यवस्था नहीं – भारत में संविधान संशोधन की विधि ऐसी है, जिसमें जनता की अवहेलना हो सकती है, क्योंकि इसमें जनता की राय जानने की कोई व्यवस्था नहीं है। 44वें संशोधन विधेयक के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई है कि संविधान की मूल विशेषताओं को जनमत संग्रह द्वारा ही बदला जा सकता है। इस संशोधन को लोकसभा ने पारित कर दिया, परन्तु राज्यसभा ने इस संशोधन विधेयक की जनमत संग्रह की धारा को पास नहीं किया। राज्यसभा को यह विचार है कि भारत जैसे देश के लिए जनमत संग्रह करवाना बहुत कठिन है। और अव्यावहारिक भी है।

उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया इतनी जटिल नहीं है जितनी कि अमेरिका तथा स्विट्जरलैण्ड के संविधानों की है और न ही ब्रिटेन के संविधान के समान इतनी सरल है कि इसे साधारण प्रक्रिया से संशोधित किया जा सके। इस दृष्टिकोण से भारत के संविधान संशोधन की प्रक्रिया सरल तथा जटिल दोनों प्रकार की है। संशोधन की इस प्रक्रिया के कारण ही भारत का संविधान सामाजिक तथा आर्थिक विकास का सूत्रधार बना।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 8 Local Governments (स्थानीय शासन)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत का संविधान ग्राम पंचायत को स्व-शासन की इकाई के रूप में देखता है। नीचे कुछ स्थितियों का वर्णन किया गया है। इन पर विचार कीजिए और बताइए कि स्व-शासन की इकाई बनने के क्रम में पंचायत के लिए ये स्थितियाँ सहायक हैं या बाधक?

(क) प्रदेश की सरकार ने एक बड़ी कम्पनी को विशाल इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति दी है। इस्पात संयंत्र लगाने से बहुत-से गाँवों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। दुष्प्रभाव की चपेट में आने वाले गाँवों में से एक की ग्राम सभा ने यह प्रस्ताव पारित किया कि क्षेत्र में कोई भी बड़ा उद्योग लगाने से पहले गाँववासियों की राय ली जानी चाहिए और उनकी शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए।

(ख) सरकार का फैसला है कि उसके कुल खर्चे का 20 प्रतिशत पंचायतों के माध्यम से व्यय होगा।

(ग) ग्राम पंचायत विद्यालय का भवन बनाने के लिए लगातार धन माँग रही है, लेकिन सरकारी अधिकारियों ने माँग को यह कहकर ठुकरा दिया है कि धन का आवंटन कुछ दूसरी योजनाओं के लिए हुआ है और धन को अलग मद में खर्च नहीं किया जा सकता।

(घ) सरकार ने डूंगरपुर नामक गाँव को दो हिस्सों में बाँट दिया है और गाँव के एक हिस्से को जमुना तथा दूसरे को सोहना नाम दिया है। अब डूंगरपुर गाँव सरकारी खाते में मौजूद नहीं है।

(ङ) एक ग्राम पंचायत ने पाया कि उसके इलाके में पानी के स्रोत तेजी से कम हो रहे हैं। ग्राम पंचायतों ने फैसला किया कि गाँव के नौजवान श्रमदान करें और गाँव के पुराने तालाब तथा कुएँ को फिर से काम में आने लायक बनाएँ।
उत्तर-
(क) यह स्थिति ग्राम पंचायत में बाधक है क्योंकि यहाँ पर सरकार ने ग्राम पंचायत से परामर्श किए बिना एक बड़ा इस्पात संयंत्र लगाने का फैसला किया जिससे ग्राम के गरीब लोगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

(ख) यह स्थिति भी ग्राम पंचायत के लिए बाधक है क्योंकि इससे ग्राम पंचायत पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।

(ग) तीसरी स्थिीत में भी ग्राम पंचातय की विद्यालय भवन-निर्माण के लिए की जा रही धन की माँग को ठुकरा दिया गया है जिससे ग्राम पंचायत की स्थिति कमजोर होती है।

(घ) यहाँ ग्राम के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया गया है; अतः ग्राम पंचायत होगी ही नहीं।

(ङ) ग्राम पंचायत के लिए यह स्थिति सहायक है। इसमें पानी की कमी को दूर करने के लिए ग्राम के नौजवानों का सहयोग लेकर पुराने कुओं और तालाबों को कामयाब बनाने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 2.
मान लीजिए कि आपको किसी प्रदेश की तरफ से स्थानीय शासन की कोई योजना बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ग्राम पंचायत स्व-शासन की इकाई के रूप में काम करे, इसके लिए आप उसे कौन-सी शक्तियाँ देना चाहेंगे? ऐसी पाँच शक्तियों का उल्लेख करें और प्रत्येक शक्ति के बारे में दो-दो पंक्तियों में यह भी बताएँ कि ऐसा करना क्यों जरूरी है।
उत्तर-
ग्राम पंचायतों को योजना की सफलता के लिए निम्नलिखित शक्तियाँ प्रदान की जा सकती हैं-
1. शिक्षा के विकास के क्षेत्र में – शिक्षा का विकास ग्रामीण क्षेत्र के लिए अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षा-प्राप्ति के पश्चात् ही नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों को जान सकेंगे तथा अपनी भागीदारी को निश्चित करेंगे।
2. स्वास्थ्य के विकास के क्षेत्र में – ग्रामों में स्वास्थ्य शिक्षा का व स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रायः अभाव रहता है; अत: इस क्षेत्र में ग्राम पंचायत की महत्त्वपूर्ण भूमिका अपेक्षित है।
3. कृषि के विकास के क्षेत्र में – कृषि का विकास ग्रामीण क्षेत्र की प्रमुख आवश्यकता है, क्योंकि ग्रामीण जीवन कृषि पर ही निर्भर करता है। ग्राम पंचायत, ग्राम व सरकार के बीच कड़ी है। अत: इस क्षेत्र में ग्राम पंचायत को विशेष कार्य करना चाहिए।
4. खेतों में उत्पन्न फसल को बाजार तक ले जाने के बारे में जानकारी देना – ग्रामीणों को खेतों में उपजे अन्न को ग्राम में ही बेचना पड़ता है, जिसके कारण उन्हें पैदावार का उचित लाभ नहीं मिल पाता। अतः यह आवश्यक है कि पैदावार सही समय पर बाजार में पहुंचाई जाए।
5. पंचायतों के वित्तीय स्रोतों को एकत्र करना – ग्राम की आर्थिक दशा हमेशा कमजोर रहती है; अत: ग्राम के सभी स्रोतों का समुचित उपयोग करना चाहिए और ग्राम पंचायत को सरकार से ग्रामीण विकास के लिए आवश्यक धन लेना चाहिए।

प्रश्न 3.
सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए संविधान के 73वें संशोधन में आरक्षण के क्या प्रावधान हैं? इन प्रावधानों से ग्रामीण स्तर के नेतृत्व का खाका किस तरह बदलता है?
उत्तर-
संविधान के 73 वें संशोधन से अनुसूचित जाति के लोगों के लिए व महिलाओं के लिए कुछ सीटों में से प्रत्येक वर्ग के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। यह आरक्षण ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों व जिला परिषदों में सदस्यों व पदों में किया गया है। इस आरक्षण से महिलाओं की व अनुसूचित जाति के लोगों की स्थिति में सम्मानजनक परिवर्तन हुआ है। इससे पहले इन वर्गों की स्थानीय संस्थाओं में पर्याप्त भागीदारी नहीं हुआ करती थी। परन्तु अब यह भागीदारी निश्चित हो गई है। जिससे इनमें एक विश्वास उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न 4.
संविधान के 73 वें संशोधन से पहले और संशोधन के बाद स्थानीय शासन के बीच मुख्य भेद बताएँ।
उत्तर-

  1. 73वें संविधान संशोधन से पूर्व ग्राम पंचायतें सरकारी आदेशों के अनुसार गठित की जाती थीं परन्तु 73वें संशोधन के पश्चात् से इनका संवैधानिक आधार हो गया है।
  2. 73वें संविधान संशोधन से पूर्व इन संस्थाओं के चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से हुआ करते थे परन्तु 73 वें संशोधन के बाद से चुनाव प्रत्यक्ष होते हैं।
  3. 73वें संविधान संशोधन से पहले अनुसूचित जाति व महिलाओं के लिए स्थानों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं थी परन्तु 73वें संविधान संशोधन के पश्चात् महिलाओं व अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण दिया गया है।
  4. पहले इन संस्थाओं के कार्यकाल अनिश्चित थे परन्तु अब निश्चित कर दिए गए हैं।
  5. 73वें संविधान संशोधन से पूर्व ये संस्थाएँ आर्थिक रूप से कमजोर थीं परन्तु अब आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं।

प्रश्न 5.
नीचे लिखी बातचीत पढे। इस बातचीत में जो मुद्दे उठाए गए हैं उसके बारे में अपना मत दो सौ शब्दों में लिखें।

आलोक – हमारे संविधान में स्त्री और पुरुष को बराबरी का दर्जा दिया गया है। स्थानीय निकायों से स्त्रियों को आरक्षण देने से सत्ता में उनकी बराबर की भागीदारी सुनिश्चित हुई है।

नेहा – लेकिन, महिलाओं को सिर्फ सत्ता के पद पर काबिज होना ही काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि स्थानीय निकायों के बजट में महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान हो।

जएश – मुझे आरक्षण का यह गोरखधन्धा पसन्द नहीं। स्थानीय निकाय को चाहिए कि वह गाँव के सभी लोगों का खयाल रखे और ऐसा करने पर महिलाओं और उनके हितों की देखभाल अपने आप हो जाएगी।
उत्तर-
विगत 60 वर्षों की स्थानीय संस्थाओं की कार्यशैली व ग्रामीण वातावरण के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इन स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं का व अनुसूचित जाति के लोगों का इनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं हुआ। जो प्रतिनिधित्व था वह बहुत कम था। 73वें तथा 74वें संविधान संशोधन के आधार पर महिलाओं व अनुसूचित जाति के लोगों को ग्रामीण व नगरीय स्थानीय संस्थाओं में प्रत्येक को कुल स्थानों का एक-तिहाई आरक्षण दिया गया है जिससे महिलाओं की व अनुसूचित जाति के लोगों की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया है वे इनमें एक विश्वास उत्पन्न हुआ है। इस आरक्षण से इन वर्गों की स्थानीय संस्थाओं में भागीदारी सुनिश्चित हुई है।

स्थानीय संस्थाएँ प्रशासन की इकाई हैं जिन्हें आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए स्थानीय स्रोतों का उपभोग करने के साथ-साथ प्रान्तीय सरकारों के केन्द्र सरकारों को भी इन स्थानीय संस्थाओं की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए।

साथ ही महिलाओं के लिए भी बजट में अलग प्रावधान होना चाहिए। साथ ही यह भी सत्य है कि केवल आरक्षण ही काफी नहीं है, स्थानीय निकाय को चाहिए कि वे गाँव के सभी लोगों के लिए विकास कार्यों का ध्यान रखें।

प्रश्न 6.
73 वें संशोधन के प्रावधानों को पढे। यह संशोधन निम्नलिखित सरोकारों में से किससे ताल्लुक रखता है?
(क) पद से हटा दिए जाने का भय जन-प्रतिनिधियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
(ख) भूस्वामी सामन्त और ताकतवर जातियों का स्थानीय निकायों में दबदबा रहता है।
(ग) ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता बहुत ज्यादा है। निरक्षर लोगों गाँव के विकास के बारे में फैसला नहीं ले सकते हैं।
(घ) प्रभावकारी साबित होने के लिए ग्राम पंचायतों के पास गाँव की विकास योजना बनाने की शक्ति और संसाधन का होना जरूरी है।
उत्तर-
(घ) प्रभावकारी साबित होने के लिए ग्राम पंचायतों के पास गाँव की विकास योजना बनाने की शक्ति और संसाधन को होना जरूरी है।

प्रश्न 7.
नीचे स्थानीय शासन के पक्ष में कुछ तर्क दिए गए हैं। इन तर्को को आप अपनी पसंद से वरीयता क्रम में सजाएँ और बताएँ कि किसी एक तर्क की अपेक्षा दूसरे को आपने ज्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों माना है? आपके जानते वेगवसल गाँव की ग्राम पंचायत का फैसला निम्नलिखित कारणों में से किस पर और कैसे आधारित था?
(क) सरकार स्थानीय समुदाय को शामिल कर अपनी परियोजना कम लागत में पूरी कर सकती है।
(ख) स्थानीय जनता द्वारा बनायी गई विकास योजना सरकारी अधिकारियों द्वारा बनायी गई विकास योजना से ज्यादा स्वीकृत होती है।
(ग) लोग अपने इलाके की जरूरत, समस्याओं और प्राथमिकताओं को जानते हैं। सामुदायिक भागीदारी द्वारा उन्हें विचार-विमर्श करके अपने जीवन के बारे में फैसला लेना चाहिए।
(घ) आम जनता के लिए अपने प्रदेश अथवा राष्ट्रीय विधायिका के जन-प्रतिनिधियों से संपर्क कर पाना मुश्किल होता है।
उत्तर-
उपर्युक्त को वरीयता क्रम निम्नवत् होगा-
(1) ग (2) क (3) खे (4) घ।
बैंगेवसल गाँव की पंचायत का फैसला ‘ग’ उदाहरण पर आधारित है जिसमें यह व्यक्त किया गया है। कि स्थानीय लोग अपनी समस्याओं, हितों व प्राथमिकताओं को बेहतर समझते हैं। अत: उन्हें अपने बारे में निर्णय लेने का स्वयं अधिकार प्रदान करना चाहिए।

प्रश्न 8.
आपके अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा विकेंद्रीकरण का साधन है? शेष को विकेंद्रीकरण के साधन के रूप में आप पर्याप्त विकल्प क्यों नहीं मानते?
(क) ग्राम पंचायत का चुनाव होगा।
(ख) गाँव के निवासी खुद तय करें कि कौन-सी नीति और योजना गाँव के लिए उपयोगी है।
(ग) ग्राम सभा की बैठक बुलाने की ताकत।
(घ) प्रदेश सरकार ने ग्रामीण विकास की एक योजना चला रखी है। प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) ग्राम पंचायत के सामने एक रिपोर्ट पेश करता है कि इस योजना में कहाँ तक प्रगति हुई है।
उत्तर-
(ख) उदाहरण में शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की स्थिति है जिसमें ग्राम के लोग स्वयं यह निश्चित करते हैं कि कौन-सी परियोजना उनके लिए उपयोगी है। अन्य उदाहरणों में विकेन्द्रीकरण की स्थितिं निम्नलिखित कारणों से प्रतीत नहीं होती-
(क) ग्राम पंचायतों के चुनाव से सम्बद्ध है।
(ग) ग्राम सभा की बैठक बुलाने की बात कही गई है।
(घ) बीडीओ ग्राम पंचायत के समक्ष रिपोर्ट पेश करता है।

प्रश्न 9.
दिल्ली विश्वविद्यालय का एक छात्र प्राथमिक शिक्षा के निर्णय लेने में विकेन्द्रीकरण की भूमिका का अध्ययन करना चाहता था। उसने गाँववासियों से कुछ सवाल पूछे। ये सवाल नीचे लिखे हैं। यदि गाँववासियों में आप शामिल होते तो निम्नलिखित प्रश्नों के क्या उत्तर देते?
गाँव का हर बालक/बालिका विद्यालय जाए, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कौन-से कदम उठाए जाने चाहिए-इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए ग्राम सभा की बैठक बुलाई जानी है।

(क) बैठक के लिए उचित दिन कौन-सा होगा, इसका फैसला आप कैसे करेंगे? सोचिए कि आपके चुने हुए दिन में कौन बैठक में आ सकता है और कौन नहीं?
(अ) प्रखण्ड विकास अधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा तय किया हुआ कोई दिन।
(ब) गाँव का बाजार जिस दिन लगता है।
(स) रविवार।
(द) नाग पंचमी/संक्रांति

(ख) बैठक के लिए उचित स्थान क्या होगा? कारण भी बताएँ।
(अ) जिला-कलेक्टर के परिपत्र में बताई गई जगह।
(ब) गाँव का कोई धार्मिक स्थान।
(स) दलित मोहल्ला।
(द) ऊँची जाति के लोगों का टोला।
(ध) गाँव का स्कूल।

(ग) ग्राम सभा की बैठक में पहले जिला-समाहर्ता (कलेक्टर) द्वारा भेजा गया परिपत्र पढ़ा गया। परिपत्र में बताया गया था कि शैक्षिक रैली को आयोजित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएँ और रैली किस रास्ते होकर गुजरे। बैठक में उन बच्चों के बारे में चर्चा नहीं हुई जो कभी स्कूल नहीं आते। बैठक में बालिकाओं की शिक्षा के बारे में, विद्यालय भवन की दशा के बारे में और विद्यालय के खुलने-बंद होने के समय के बारे में भी चर्चा नहीं हुई। बैठक रविवार के दिन हुई इसलिए कोई महिला शिक्षक इस बैठक में नहीं आ सकी। लोगों की भागीदारी के लिहाज से इसको आप अच्छा कहेंगे या बुरा? कारण भी बताएँ।।

(घ) अपनी कक्षा की कल्पना ग्राम सभा के रूप में करें। जिस मुद्दे पर बैठक में चर्चा होनी थी उस पर कक्षा में बातचीत करें और लक्ष्य को पूरा करने के लिए कुछ उपाय सुझाएँ।
उत्तर-
(क) प्रखण्ड विकास अधिकारी अथवा कलेक्टर द्वारा निश्चित किया हुआ कोई दिन।
(ख) गाँव का स्कूल बैठक के लिए उचित स्थान रहेगा क्योकि यहाँ पर गाँव के सभी लोग आते हैं। वे इस स्थान से भली-भाँति परिचित हैं।
(ग) उपर्युक्त स्थिति में स्पष्ट किया गया है कि स्थानीय सरकारों की वास्तविक स्थिति क्या है तथा स्थानीय संस्थाओं की बैठकों में स्थानीय लोगों की भागीदारी कितनी कम होती है। इन संस्थाओं की बैठकें केवल औपचारिकताएँ होती हैं तथा स्थानीय लोगों को निर्णयों की सूचना दे दी जाती है। महिलाओं की अनुपस्थिति इन बैठकों में लगभग ने
के बराबर ही होती है तथा उनके विचारों पर कोई ध्यान नहीं देती।
(घ) अगर हमारी कक्षा एक ग्राम सभा में परिवर्तित हो जाए और उसमें चर्चा का विषय, स्थानीय लोगों का कल्याण व भागीदारी हो तो इस बात का सर्वसम्मति से निर्णय करने का प्रयाय किया जाएगा कि शक्तियों के विकेन्द्रीकरण के उद्देश्य को प्राप्त किया जाए। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-

  • ग्राम विकास में स्थानीय लोगों की भागीदारी होनी चहिए।
  • शक्तियों का अधिक-से-अधिक विकेन्द्रीकरण हो।
  • महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • कमजोर वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।
  • सरकार की ग्रामों तक सीधी पहुँच हो।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायत समिति का क्षेत्र है –
(क) ग्राम
(ख) जिला
(ग) विकास खण्ड
(घ) नगर
उत्तर :
(क) ग्राम

प्रश्न 2.
पंचायती राज-व्यवस्था में एकरूपता संविधान के किस संशोधन द्वारा लाई गई?
(क) 42वें संशोधन द्वारा
(ख) 73वें संशोधन द्वारा
(ग) 46वें संशोधन द्वारा
(घ) 44वें संशोधन द्वारा
उत्तर :
(ख) 73वें संशोधन द्वारा

प्रश्न 3.
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई है –
(क) ग्राम
(ख) जिला
(ग) प्रदेश
(घ) नगर
उत्तर :
(ख) जिला

प्रश्न 4.
पंचायती राज का सबसे निचला स्तर है –
(क) ग्राम पंचायत
(ख) ग्राम सभा
(ग) पंचायत समिति
(घ) न्याय पंचायत
उत्तर :
(क) ग्राम पंचायत।

प्रश्न 5.
न्याय पंचायत के कार्य-क्षेत्र में सम्मिलित नहीं है
(क) छोटे दीवानी मामलों का निपटारा
(ख) मुजरिमों पर जुर्माना
(ग) मुजरिमों को जेल भेजना
(घ) छोटे फौजदारी मामलों का निपटारा
उत्तर : 
(ग) मुजरिमों को जेल भेजना।

प्रश्न 6.
जिला परिषद् के सदस्यों में सम्मिलित नहीं है –
(क) जिलाधिकारी
(ख) पंचायत समितियों के प्रधान
(ग) कुछ विशेषज्ञ
(घ) न्यायाधीश
उत्तर :
(घ) न्यायाधीश।

प्रश्न 7.
ग्राम पंचायत की बैठक होनी आवश्यक है –
(क) एक सप्ताह में एक
(ख) एक माह में एक
(ग) एक वर्ष में दो
(घ) एक वर्ष में चार
उत्तर :
(ख) एक माह में एक।

प्रश्न 8.
नगरपालिका के अध्यक्ष का चुनाव होता है –
(क) एक वर्ष के लिए
(ख) पाँच वर्ष के लिए
(ग) चार वर्ष के लिए
(घ) तीन वर्ष के लिए
उत्तर :
(ख) पाँच वर्ष के लिए।

प्रश्न 9.
नगरपालिका परिषद् का ऐच्छिक कार्य है
(क) नगरों में रोशनी का प्रबन्ध करना
(ख) नगरों में पेयजल की व्यवस्था करना
(ग) नगरों की स्वच्छता का प्रबन्ध करना
(घ) प्रारम्भिक शिक्षा से ऊपर शिक्षा की व्यवस्था करना
उत्तर :
(घ) प्रारम्भिक शिक्षा से ऊपर शिक्षा की व्यवस्था करना।

प्रश्न 10.
जिला परिषद की आय का साधन है –
(क) भूमि पर लगान
(ख) चुंगी कर
(ग) हैसियत एवं सम्पत्ति कर
(घ) आयकर
उत्तर :
(ग) हैसियत एवं सम्पत्ति कर।

प्रश्न 11.
जिला पंचायत कार्य नहीं करती
(क) जन-स्वास्थ्य के लिए रोगों की रोकथाम करना
(ख) सार्वजनिक पुलों तथा सड़कों का निर्माण करना
(ग) प्रारम्भिक स्तर से ऊपर की शिक्षा का प्रबन्ध करना
(घ) यातायात का प्रबन्ध करना
उत्तर :
(घ) यातायात का प्रबन्ध करना

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य नगरपालिका परिषद् नहीं करती ?
(क) पीने के पानी की आपूर्ति
(ख) रोशनी की व्यवस्था
(ग) उच्च शिक्षा का संगठन
(घ) जन्म-मृत्यु का लेखा
उत्तर :
(ग) उच्च शिक्षा का संगठन।

प्रश्न 13.
जनपद का सर्वोच्च अधिकारी है –
(क) मुख्यमन्त्री
(ख) जिलाधिकारी
(ग) पुलिस अधीक्षक
(घ) जिला प्रमुख
उत्तर :
(ख) जिलाधिकारी।

प्रश्न 14.
जिले के शिक्षा विभाग का प्रमुख अधिकारी है –
(क) जिला विद्यालय निरीक्षक
(ख) बेसिक शिक्षा अधिकारी
(ग) राजकीय विद्यालय क़ा प्रधानाचार्य
(घ) माध्यमिक शिक्षा परिषद् का क्षेत्रीय अध्यक्ष
उत्तर :
(क) जिला विद्यालय निरीक्षक।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय स्वशासन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
स्थानीय स्वशासन से आशय है-किसी स्थान विशेष के शासन का प्रबन्ध उसी स्थान के लोगों द्वारा किया जाना तथा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजना।।

प्रश्न 2.
स्थानीय शासन तथा स्थानीय स्वशासन में दो भेद बताइए।
उत्तर :

  1. स्थानीय शासन उतना लोकतान्त्रिक नहीं होता जितना स्थानीय स्वशासन होता है।
  2. स्थानीय शासन स्थानीय स्वशासन की अपेक्षा कम कुशल होता है।

प्रश्न 3.
क्या पंचायती राज-व्यवस्था अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हो सकी है ?
उत्तर :
यद्यपि कहीं-कहीं पर पंचायती राज व्यवस्था ने कुछ अच्छे कार्य किये हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि पंचायती राज व्यवस्था अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल कम ही हुई है।

प्रश्न 4.
पंचायती राज की तीन स्तरीय व्यवस्था क्या है ?
उत्तर :
पंचायती राज की तीन स्तरीय व्यवस्था के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तीन इकाइयों का प्रावधान किया गया है –

  1. ग्राम पंचायत
  2. पंचायत समिति तथा
  3. जिला परिषद्।

प्रश्न 5.
पंचायती राज को सफल बनाने के लिए किन शर्तों का होना आवश्यक है ?
उत्तर :
पंचायती राज को सफल बनाने के लिए इन शर्तों का होना आवश्यक है –

  1. लोगों का शिक्षित होना
  2. स्थानीय मामलों में लोगों की रुचि
  3. कम-से-कम सरकारी हस्तक्षेप तथा
  4. पर्याप्त आर्थिक संसाधन।

प्रश्न 6.
जिला प्रशासन के दो मुख्य अधिकारियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जिला प्रशासन के दो मुख्य अधिकारी हैं –

  1. जिलाधीश तथा
  2. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एस०एस०पी०)।

प्रश्न 7.
जिला पंचायत के चार अनिवार्य कार्य बताइए।
उत्तर :
जिला पंचायत के चार अनिवार्य कार्य हैं :

  1. पीने के पानी की व्यवस्था करना
  2. प्राथमिक स्तर से ऊपर की शिक्षा का प्रबन्ध करना
  3. जन-स्वास्थ्य के लिए महामारियों की रोकथाम तथा
  4. जन्म-मृत्यु का हिसाब रखना।

प्रश्न 8.
जिला पंचायत की दो प्रमुख समितियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जिला पंचायत की दो प्रमुख समितियाँ हैं :

  1. वित्त समिति तथा
  2. शिक्षा एवं जनस्वास्थ्य समिति।

प्रश्न 9.
क्षेत्र पंचायत का सबसे बड़ा वैतनिक अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
क्षेत्र पंचायत का सर्वोच्च वैतनिक अधिकारी क्षेत्र विकास अधिकारी होता है।

प्रश्न 10.
ग्राम सभा के सदस्य कौन होते हैं ?
उत्तर :
ग्राम की निर्वाचक सूची में सम्मिलित प्रत्येक ग्रामवासी ग्राम सभा का सदस्य होता है।

प्रश्न 11.
अपने राज्य के ग्रामीण स्थानीय स्वायत्त शासन की दो संस्थाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :
ग्रामीण स्वायत्त शासन की दो संस्थाओं के नाम हैं –

  1. ग्राम सभा तथा
  2. ग्राम पंचायत।

प्रश्न 12.
ग्राम पंचायत के अधिकारियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
ग्राम पंचायत के अधिकारी हैं –

  1. प्रधान तथा
  2. उप-प्रधान।

प्रश्न 13.
ग्राम पंचायत के चार कार्य बताइए।
उत्तर :
ग्राम पंचायत के चार कार्य हैं –

  1. ग्राम की सम्पत्ति तथा इमारतों की रक्षा करना
  2. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना
  3. कृषि और बागवानी का विकास करना तथा
  4. लघु सिंचाई परियोजनाओं से जल-वितरण का प्रबन्ध करना।

प्रश्न 14.
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल क्या है ?
उत्तर :
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। विशेष परिस्थितियों में सरकार इसे कम भी कर सकती है।

प्रश्न 15.
न्याय पंचायत के पंचों की नियुक्ति किस प्रकार होती है ?
उत्तर :
ग्राम पंचायत के सदस्यों में से विहित प्राधिकारी न्याय पंचायत के उतने ही पंच नियुक्त करता है जितने कि नियत किये जाएँ। ऐसे नियुक्त किये गये व्यक्ति ग्राम पंचायत के सदस्य नहीं रहेंगे।

प्रश्न 16.
पंचायती राज की तीन स्तर वाली व्यवस्था की संस्तुति करने वाली समिति का नाम लिखिए।
उत्तर :
बलवन्त राय मेहता समिति।

प्रश्न 17.
किन संविधान संशोधनों द्वारा पंचायतों और नगरपालिकाओं से सम्बन्धित उपबन्धों का संविधान में उल्लेख किया गया ?
उत्तर :

  1. उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 द्वारा जिला पंचायत की व्यवस्था।
  2. उत्तर प्रदेश नगर स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 द्वारा नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासने की व्यवस्था।

प्रश्न 18.
नगर स्वायत्त संस्थाओं के नाम बताइए।
उत्तर :

  1. नगर-निगम तथा महानगर निगम
  2. नगरपालिका परिषद् तथा
  3. नगर पंचायत।

प्रश्न 19.
नगर-निगम किन नगरों में स्थापित की जाती है ? उत्तर प्रदेश में नगर-निगम का गंठन किन-किन स्थानों पर किया गया है ?
उत्तर :
पाँच लाख से दस लाख तक जनसंख्या वाले नगरों में नगर-निगम स्थापित की जाती है। उत्तर प्रदेश के आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद, बरेली, मेरठ, अलीगढ़, मुरादाबाद, गाजियाबाद, गोरखपुर आदि में नगर-निगम कार्यरत हैं। कानपुर तथा लखनऊ में महानगर निगम स्थापित हैं।

प्रश्न 20.
नगर-निगम के दो कार्य बताइए।
उत्तर :
नगर निगम के दो कार्य हैं –

  1. नगर में सफाई व्यवस्था करना तथा
  2. सड़कों व गलियों में प्रकाश की व्यवस्था करना।

प्रश्न 21.
नगर-निगम की दो प्रमुख समितियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
नगर-निगम की दो प्रमुख समितियाँ हैं –

  1. कार्यकारिणी समिति तथा
  2. विकास समिति।

प्रश्न 22.
नगर-निगम का अध्यक्ष कौन होता है ?
उत्तर :
नगर-निगम का अध्यक्ष नगर प्रमुख (मेयर) होता है।

प्रश्न 23.
नगर-निगम में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कितनी होती है ?
उत्तर :
नगर-निगम के निर्वाचित सदस्यों (सभासदों) की संख्या सरकारी गजट में दी गयी विज्ञप्ति के आधार पर निश्चित की जाती है। यह संख्या कम-से-कम 60 और अधिक-से-अधिक 110 होती है।

प्रश्न 24.
उत्तर प्रदेश में नगरपालिका परिषद का गठन किन स्थानों के लिए किया जाएगा ?
उत्तर :
नगरपालिका परिषद् का गठन 1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या वाले ‘लघुतर नगरीय क्षेत्रों में किया जाता है।

प्रश्न 25.
जिले (जनपद) का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी कौन है ?
उत्तर :
जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी जिलाधिकारी (उपायुक्त) होता है।

प्रश्न 26.
जिलाधिकारी का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन-सा है ?
उत्तर :
जिले में शान्ति-व्यवस्था की स्थापना करना जिलाधिकारी का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है।

प्रश्न 27.
जिलाधिकारी की नियुक्ति कौन करता है ?
उत्तर :
जिलाधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।

प्रश्न 28.
जिले में शिक्षा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
जिले में शिक्षा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक होता है।

प्रश्न 29.
जिले के विकास-कार्यों से सम्बन्धित जिला स्तरीय अधिकारी का पद नाम लिखिए।
उत्तर :
मुख्य विकास अधिकारी।

प्रश्न 30.
जिले में पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी कौन होता है ?
उत्तर :
जिले में पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (S.S.P) होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय स्वशासन से आप क्या समझते हैं ? इस प्रदेश में कौन-कौन-सी स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ कार्य कर रही हैं ?
उत्तर :
केन्द्र व राज्य सरकारों के अतिरिक्त, तीसरे स्तर पर एक ऐसी सरकार है, जिसके सम्पर्क में नगरों और ग्रामों के निवासी आते हैं। इस स्तर की सरकार को स्थानीय स्वशासन कहा जाता है, क्योंकि यह व्यवस्था स्थानीय निवासियों को अपना शासन-प्रबन्ध करने का अवसर प्रदान करती है। इसके अन्तर्गत मुख्यतया ग्रामवासियों के लिए पंचायत और नगरवासियों के लिए नगरपालिका उल्लेखनीय हैं। इन संस्थाओं द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान के प्रयास किये जाते हैं।

  • नगरीय क्षेत्र – नगर-निगम या नगर महापालिका, नगरपालिका परिषद् और नगर पंचायत।
  • ग्रामीण क्षेत्र – ग्राम पंचायत, न्याय पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत।।

प्रश्न 2.
भारत में स्थानीय संस्थाओं का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में स्थानीय स्वशासी संस्थाओं का देश की राजनीति और प्रशासन में विशेष महत्त्व है। किसी भी गाँव या कस्बे की समस्याओं का सबसे अच्छा ज्ञान उस गाँव या कस्बे के निवासियों को ही होता है। इसलिए वे अपनी छोटी सरकार का संचालन करने में समर्थ तथा सर्वोच्च होते हैं। इन संस्थाओं का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है –

  1. इनके द्वारा गाँव तथा नगर के निवासियों की प्रशासन में भागीदारी सम्भव होती है।
  2. ये संस्थाएँ प्रशासन तथा जनता के मध्य अधिकाधिक सम्पर्क बनाये रखने में सहायक होती हैं। इसके फलस्वरूप जिला प्रशासन को अपना कार्य करने में आसानी होती है।
  3. स्थानीय विकास तथा नियोजन की प्रक्रियाओं में भी ये संस्थाएँ सहायक सिद्ध होती हैं।

प्रश्न 3.
ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत में निम्नलिखित अन्तर हैं –

  1. ग्राम पंचायत, ग्राम सभा से सम्बन्धित होती है तथा ग्राम सभा के कार्यों का सम्पादन ग्राम पंचायत के द्वारा किया जाता है। इस प्रकार ग्राम पंचायत, ग्राम सभा की कार्यकारिणी होती है। ग्राम पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन ग्राम सभा के सदस्य ही करते हैं।
  2. ग्राम सभा का प्रमुख कार्य क्षेत्रीय विकास के लिए योजनाएँ बनाना और ग्राम पंचायत का कार्य उन योजनाओं को व्यावहारिक रूप प्रदान करना है।
  3. ग्राम सभा की वर्ष में दो बार तथा ग्राम पंचायत की माह में एक बार बैठक होना आवश्यक है।
  4. कर लगाने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है न कि ग्राम पंचायत को।
  5. ग्राम सभा एक बड़ा निकाय है, जबकि ग्राम पंचायत उसकी एक छोटी संस्था है।
  6. ग्राम सभा का निर्वाचन नहीं होता है, जबकि ग्राम पंचायत, ग्राम सभा द्वारा निर्वाचित संस्था होती है।

दीर्घ लघु उरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायती राज के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
या
भारत में पंचायती राज-व्यवस्था का प्रादुर्भाव किस प्रकार हुआ ?
उत्तर :
पंचायती राज’ का अर्थ है-ऐसा राज्य जो पंचायत के माध्यम से कार्य करता है। ऐसे शासन के अन्तर्गत ग्रामवासी अपने में से वयोवृद्ध व्यक्तियों को चुनते हैं, जो उनके विभिन्न झगड़ों का निपटारा करते हैं। इस प्रकार के शासन में ग्रामवासियों को अपनी व्यवस्था के प्रबन्ध में प्रायः पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। इस प्रकार पंचायती राज स्वशासन का ही एक रूप है।

यद्यपि भारत के ग्रामों में पंचायतें बहुत पुराने समय में भी विद्यमान थीं, परन्तु वर्तमान समय में पंचायती राज-व्यवस्था का जन्म स्वतन्त्रता के पश्चात् ही हुआ। पंचायती राज की वर्तमान व्यवस्था का सुझाव बलवन्त राय मेहता समिति ने दिया था। देश में पंचायती राज-व्यवस्था सर्वप्रथम राजस्थान में लागू की गयी, बाद में मैसूर (वर्तमान कर्नाटक), तमिलनाडु, उड़ीसा, असम, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में भी यह व्यवस्था लागू की गयी। बलवन्त राय मेहता की मूल योजना के अनुसार पंचायतों का गठन तीन स्तरों पर किया गया –

  1. ग्राम स्तर पर पंचायतें
  2. विकास खण्ड स्तर पर पंचायत समितियाँ तथा
  3. जिला स्तर पर जिला परिषद्।

संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1993 द्वारा पूरे प्रदेश में इस व्यवस्था के स्वरूप में एकरूपता लायी गयी है।

प्रश्न 2.
पंचायती राज के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

पंचायती राज की उपलब्धियाँ (गुण) –

  1. पंचायती राज पद्धति के फलस्वरूप ग्रामीण भारत में जागृति आयी है।
  2. पंचायतों द्वारा गाँवों में कल्याणकारी कार्यों के कारण गाँवों की हालत सुधरी है।
  3. पंचायतों द्वारा संचालित प्राथमिक और वयस्क विद्यालयों के फलस्वरूप गाँवों में साक्षरता और शिक्षा का प्रसार हुआ है।
  4. पंचायतों ने सफलतापूर्वक अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं की ओर अधिकारियों का ध्यान खींचा है।

पंचायती राज के दोष – पंचायती राज पद्धति के कारण गाँवों के जीवन में कई बुराइयाँ भी आयी हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. पंचायतों के लिए होने वाले चुनावों में हिंसा, भ्रष्टाचार और जातिवाद का बोलबाला रहता है। यहाँ तक कि निर्वाचित प्रतिनिधि भी इससे परे नहीं होते।
  2. यह भी कहा जाता है कि पंचायती राज के सदस्य चुने जाने के पश्चात् लोग अपने कर्तव्यों को ठीक प्रकार से नहीं करते।
  3. यहाँ रिश्वतखोरी चलती है और धन का बोलबाला रहता है। धनी आदमी पंचों को खरीद लेते
  4. स्वयं पंच लोग अनपढ़ होते हैं, इसलिए वे विभिन्न समस्याओं को सुलझाने की योग्यता ही नहीं रखते।
  5. पंच लोग पार्टी-लाइनों पर चुने जाते हैं, इसलिए वे सभी लोगों को निष्पक्ष होकर न्याय नहीं दे सकते। संक्षेप में, भारत में पंचायती राज एक मिश्रित वरदान है।

प्रश्न 3.
ग्राम पंचायत के संगठन, पदाधिकारी, कार्यकाल एवं इसके पाँच कार्यों का विवरण दीजिए।
उत्तर :

संगठन – ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधान के अतिरिक्त 9 से 15 तक सदस्य होते हैं। इसमें 1,000 की जनसंख्या पर 9 सदस्य; 1,000-2,000 की जनसंख्या तक 11 सदस्य; 2,000 3,000 की। जनसंख्या तक 13 सदस्य तथा 3,000 से ऊपर की जनसंख्या पर सदस्यों की संख्या 15 होती है। ग्राम पंचायत के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है। ग्राम पंचायत में नियमानुसार सभी वर्गों तथा महिलाओं को आरक्षण प्रदान किया गया है।

कार्यकाल – ग्राम पंचायत का निर्वाचन 5 वर्ष के लिए होता है, किन्तु विशेष परिस्थितियों में सरकार इसे समय से पूर्व भी विघटित कर सकती है।

पदाधिकारी – ग्राम पंचायत का प्रमुख अधिकारी ग्राम प्रधान’ कहलाता है। प्रधान की सहायता के लिए उप-प्रधान’ की व्यवस्था होती है। प्रधान का निर्वाचन ग्राम सभा के सदस्य पाँच वर्ष की अवधि के लिए करते हैं। उप-प्रधान का निर्वाचन पंचायत के सदस्य पाँच वर्ष के लिए करते हैं।

ग्राम पंचायत

पाँच कार्य – ग्राम पंचायत के कार्य इस प्रकार हैं –

  1. कृषि और बागवानी का विकास तथा उन्नति, बंजर भूमि और चरागाह भूमि का विकास तथा उनके अनधिकृत अधिग्रहण एवं प्रयोग की रोकथाम करना।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार और भूमि संरक्षण में सरकार तथा अन्य एजेन्सियों की सहायता करना, भूमि चकबन्दी में सहायता करना।
  3. लघु सिंचाई परियोजनाओं से जल वितरण में प्रबन्ध और सहायता करना; लघु सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण, मरम्मत और रक्षा तथा सिंचाई के उद्देश्य से जलापूर्ति का विनियमन।
  4. पशुपालन, दुग्ध उद्योग, मुर्गी-पालन की उन्नति तथा अन्य पशुओं की नस्लों का सुधार करना।
  5. गाँव में मत्स्य पालन का विकास।

प्रश्न 4.
नगरपालिका परिषद् के पाँच प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर :
नगरपालिका परिषद् के पाँच प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

(1) सफाई की व्यवस्था – सम्पूर्ण नगर को स्वच्छ एवं सुन्दर रखने का दायित्व नगरपालिका का ही होता है। यह सड़कों, नालियों और अन्य सार्वजनिक स्थानों की सफाई कराती है तथा नगर को स्वच्छ रखने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय एवं मूत्रालयों का निर्माण कराती है।

(2) पानी की व्यवस्था – नगरवासियों के लिए पीने योग्य स्वच्छ जल का प्रबन्ध नगरपालिका परिषद् ही करती है।

(3) शिक्षा का प्रबन्ध – अपने नगरवासियों की शैक्षिक स्थिति को सुधारने के लिए नगरपालिका परिषदें प्राइमरी स्कूल खोलती हैं। ये लड़कियों एवं अशिक्षित लोगों की शिक्षा का विशेष रूप से प्रबन्ध करती हैं।

(4) निर्माण सम्बन्धी कार्य – नगरपालिका परिषदें नगर में नालियाँ, सड़कें, पुल आदि बनवाने की व्यवस्था करती हैं। सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष एवं पार्क बनवाना भी इनके प्रमुख कार्य हैं। कुछ समृद्ध नगरपालिका परिषदें यात्रियों के लिए होटल, सरायों एवं धर्मशालाओं की भी व्यवस्था करती हैं। निर्माण सम्बन्धी ये कार्य नगरपालिका की ‘निर्माण समिति’ करती है।

(5) रोशनी की व्यवस्था – सड़कों, गलियों एवं सभी सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश का समुचित प्रबन्ध भी नगरपालिका परिषद् ही करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्नं 1.
स्थानीय स्वशासन का क्या अर्थ है ? स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता तथा महत्त्व बताइए।
या
भारत में स्थानीय स्वशासन के अर्थ, आवश्यकता और उसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में केन्द्र व राज्य सरकारों के अतिरिक्त, तीसरे स्तर पर एक ऐसी सरकार है जिसके सम्पर्क में नगरों और ग्रामों के निवासी आते हैं। इस स्तर की सरकार को स्थानीय स्वशासन कहा जाता है, क्योंकि यह व्यवस्था स्थानीय निवासियों को अपना शासन-प्रबन्ध करने का अवसर प्रदान करती है। इसके अन्तर्गत मुख्यतया ग्रामवासियों के लिए ग्राम पंचायत और नगरवासियों के लिए नगरपालिका उल्लेखनीय हैं। इन संस्थाओं द्वारा स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान के प्रयास किये जाते हैं। व्यावहारिक रूप में वे सभी कार्य जिनका सम्पादन वर्तमान समय में ग्राम पंचायतों, जिला पंचायतों, नगरपालिकाओं, नगर निगम आदि के द्वारा किया जाता है, वे स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत आते हैं।

स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता एवं महत्त्व

स्थानीय स्वशासन की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है –

(1) लोकतान्त्रिक परम्पराओं को स्थापित करने में सहायक – भारत में स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्पराओं को स्थापित करने के लिए स्थानीय स्वशासन व्यवस्था ठोस आधार प्रदान करती है। उसके माध्यम से शासन-सत्ता वास्तविक रूप से जनता के हाथ में चली जाती है। इसके अतिरिक्त स्थानीय स्वशासन-व्यवस्था, स्थानीय निवासियों में लोकतान्त्रिक संगठनों के प्रति रुचि उत्पन्न करती है।

(2) भावी नेतृत्व का निर्माण – स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ भारत के भावी नेतृत्व को तैयार करती हैं। ये विधायकों और मन्त्रियों को प्राथमिक अनुभव एवं प्रशिक्षण प्रदान करती हैं, जिससे वे भारत की ग्रामीण समस्याओं से अवगत होते हैं। इस प्रकार ग्रामों में उचित नेतृत्व का निर्माण करने एवं विकास कार्यों में जनता की रुचि बढ़ाने में स्थानीय स्वशासन की महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है।

(3) जनता और सरकार के पारस्परिक सम्बन्ध – भारत की जनता स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के माध्यम से शासन के बहुत निकट पहुँच जाती है। इससे जनता और सरकार में एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझने की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त दोनों में सहयोग भी बढ़ता है, जो ग्रामीण उत्थान एवं विकास के लिए आवश्यक है।

(4) स्थानीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच की कड़ी – ग्राम पंचायतों के कार्यकर्ता और पदाधिकारी स्थानीय समाज और राजनीतिक व्यवस्था के बीच की कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। इन स्थानीय पदाधिकारियों के सहयोग के अभाव में न तो राष्ट्र के निर्माण का कार्य सम्भव हो पाता है और न ही सरकारी कर्मचारी अपने दायित्व का समुचित रूप से पालन कर पाते हैं।

(5) प्रशासकीय शक्तियों का विकेन्द्रीकरण – स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ केन्द्रीय व राज्य सरकारों को स्थानीय समस्याओं के भार से मुक्त करती हैं। स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के माध्यम से ही शासकीय शक्सियों एवं कार्यों का विकेन्द्रीकरण किया जा सकता है। लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण की इस प्रक्रिया में शासन-सत्ता कुछ निर्धारित संस्थाओं में निहित होने के स्थान पर, गाँव की पंचायत के कार्यकर्ताओं के हाथों में पहुँच जाती है। भारत में इस व्यवस्था से प्रशासन की कार्यकुशलता में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

(6) नागरिकों को निरन्तर जागरूक बनाये रखने में सहायक – स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ लोकतन्त्र की प्रयोगशालाएँ हैं। ये भारतीय नागरिकों को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रयोग की शिक्षा तो देती ही हैं, साथ ही उनमें नागरिकता के गुणों का विकास करने में भी सहायक होती हैं।

(7) लोकतान्त्रिक परम्पराओं के अनुरूप – लोकतन्त्र का आधारभूत तथा मौलिक सिद्धान्त यह है। कि सत्ता का अधिक-से-अधिक विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। स्थानीय स्वशासन की इकाइयाँ इस सिद्धान्त के अनुरूप हैं।

(8) नौकरशाही की बुराइयों की समाप्ति – स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी से प्रशासन में नौकरशाही, लालफीताशाही तथा भ्रष्टाचार जैसी बुराइयाँ उत्पन्न नहीं होती हैं।

(9) प्रशासनिक अधिकारियों की जागरूकता – स्थानीय लोगों की शासन में भागीदारी के कारण प्रशासन उस क्षेत्र की आवश्यकताओं के प्रति अधिक सजग तथा संवेदनशील हो जाता है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि स्थानीय स्वशासन लोकतन्त्र का आधार है। यह लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण (Democratic Decentralisation) की प्रक्रिया पर आधारित है। यदि प्रशासन को जागरूक तथा अधिक कार्यकुशल बनाना है तो उसका प्रबन्ध एवं संचालन स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय संस्थाओं के द्वारा ही सम्पन्न किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
पंचायती राज-व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? ग्राम पंचायत के कार्यों तथा शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत गाँवों का देश है। ब्रिटिश राज में गाँवों की आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था शोचनीय हो गयी थी; अतः स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद देश में पंचायती राज-व्यवस्था द्वारा गाँवों में राजनीतिक तथा आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण का प्रयास किया गया। बलवन्त राय मेहता -मिति ने पंचायती राज-व्यवस्था के लिए त्रि-स्तरीय योजना का परामर्श दिया। इस योजना में स. निचले स्तर पर ग्राम सभा और ग्राम पंचायतें हैं। मध्य स्तर पर क्षेत्र समितियाँ तथा उच्च स्तर पर जिला परिषदों की व्यवस्था की गयी थी।

भारतीय गाँवों में बहुत पहले से ही ग्राम पंचायतों की व्यवस्था रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने संयुक्त प्रान्तीय पंचायत राज कानून बनाकर पंचायतों के संगठन सम्बन्धी उल्लेखनीय कार्य को किया था। सन् 1947 ई० के इस कानून के अनुसार ग्राम पंचायत के स्थान पर ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और न्याय पंचायत की व्यवस्था की गयी थी। अब उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 के अनुसार भी ग्राम सभा, ग्राम पंचायत तथा न्याय पंचायत की ही व्यवस्था को रखा गया है।

ग्राम पंचायत के कार्य तथा शक्तियाँ

ग्राम सभा के निर्देशन तथा मार्गदर्शन में कार्य करती हुई ग्राम पंचायत, पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी आधारभूत इकाई है। यह ग्राम पंचायत सरकार की कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है। ग्राम पंचायत के कार्यों तथा शक्तियों की विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है –

ग्राम पंचायत के कार्य

ग्राम पंचायत के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं –

  1. गाँव की सफाई-व्यवस्था करना
  2. रोशनी का प्रबन्ध करना
  3. संक्रामक रोगों की रोकथाम करना
  4. गाँव एवं गाँव की इमारतों की रक्षा करना
  5. जन्म-मरण का लेखा-जोखा रखना
  6. बालक एवं बालिकाओं की शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना
  7. खेलकूद की व्यवस्था करना
  8. कृषि की उन्नति का प्रयत्न करना
  9. श्मशान भूमि की व्यवस्था करना
  10. सार्वजनिक चरागाहों की व्यवस्था करना
  11. आग बुझाने का प्रबन्ध करना
  12. जनगणना और पशुगणना करना
  13. प्राथमिक चिकित्सा का प्रबन्ध करना
  14. खाद एकत्र करने के लिए स्थान निश्चित करना
  15. जल-मार्गों की सुरक्षा का प्रबन्ध करना
  16. प्रसूति-गृह खोलना
  17. सरकार द्वारा सौंपे गये अन्य कार्य करना
  18. आदर्श नागरिकता की भावना को प्रोत्साहन देना
  19. ग्रामीण जनता को शासन-व्यवस्था से परिचित कराना
  20. अस्पताल खुलवाना
  21. पुस्तकालय एवं वाचनालयों की व्यवस्था करना
  22. पार्क बनवाना
  23. गृहउद्योगों को उन्नत करने का प्रयत्न करना
  24. पशुओं की नस्ल सुधारना
  25. स्वयंसेवक दल का संगठन करना
  26. सहकारी समितियों का गठन करना
  27. सहकारी ऋण प्राप्त करने में किसानों की सहायता करना
  28. अकाल या अन्य विपत्ति के समय गाँव वालों की सहायता करना तथा
  29. सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाना आदि कार्य सम्मिलित होते हैं।

ग्राम पंचायत की शक्तियाँ

ग्राम पंचायत के कुछ सदस्य न्याय पंचायत के रूप में कार्य करते हुए अपने गाँव के छोटे-छोटे झगड़ों का निपटारा भी करते हैं। दीवानी के मामलों में ये ₹ 500 के मूल्य तक की सम्पत्ति के मामलों की सुनवाई कर सकते हैं तथा फौजदारी के मुकदमों में इसे ₹ 250 तक का जुर्माना करने का अधिकार प्राप्त है।

भारतीय संविधान में किये गये 73वें संशोधन के द्वारा ग्राम पंचायत को व्यापक अधिकार एवं शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं। साथ ही ग्राम पंचायत के कार्य-क्षेत्र को भी व्यापक बनाया गया है जिसके अन्तर्गत 29 नियमों से युक्त एक विस्तृत सूची को रखा गया है।

प्रश्न 3.
क्षेत्र पंचायत किस प्रकार संगठित की जाती है ? यह अपने क्षेत्र के विकास के लिए कौन-कौन-से कार्य करती है ?
या
क्षेत्र पंचायत (पंचायत समिति) के संगठन, कार्यों तथा शक्तियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश रायत (संशोधन) अधिनियम, 1994′ के सेक्शन 7 (1) के द्वारा क्षेत्र समिति का नाम बदलकर क्षेत्र पंचायत कर दिया गया है। यह ग्राम पंचायत के ऊपर के स्तर की इकाई होती है। राज्य सरकार गजट में अधिसूचना द्वारा प्रत्येक खण्ड के लिए एक क्षेत्र पंचायत स्थापित करेगी। पंचायत का नाम खण्ड के नाम पर होगा।

संगठन – क्षेत्र पंचायत एक प्रमुख और निम्नलिखित प्रकार के सदस्यों से मिलकर बनती है –

  1. खण्ड की सभी ग्राम पंचायतों के प्रधान।
  2. निर्वाचित सदस्य – ये पंचायती क्षेत्र के 2000 जनसंख्या वाले प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
  3. लोकसभा और विधानसभा के ऐसे सदस्य, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पूर्णत: अथवा अंशत: उस खण्ड में सम्मिलित हैं।
  4. राज्यसभा तथा विधान परिषद् के ऐसे सदस्य, जो खण्ड के अन्तर्गत निर्वाचको के रूप में पंजीकृत हैं।

उपर्युक्त सदस्यों में केवल निर्वाचित सदस्यों को ही प्रमुख अथवा उप-प्रमुख के निर्वाचन तथा उनके विरुद्ध अविश्वास के मामलों में मत देने का अधिकार होता है।

योग्यता – क्षेत्र पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए प्रत्याशी में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं –

  1. उसका नाम क्षेत्र पंचायत की प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में हो।
  2. वह विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  3. उसकी आयु 21 वर्ष हो।
  4. वह किसी लाभ के सरकारी पद पर न हो।

स्थानों को आरक्षण – प्रत्येक क्षेत्र पंचायत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे। क्षेत्र पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में आरक्षित स्थानों का अनुपात यथासम्भव वही होगा जो उस खण्ड में अनुसूचित जातियों अथवा जनजातियों की या पिछड़े वर्गों की जनसंख्या का अनुपात उस खण्ड की कुल जनसंख्या में है। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27% से अधिक नहीं होगा।

अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे। क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित स्थानों की कुल संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे।

पदाधिकारी – क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही एक प्रमुख, एक ज्येष्ठ उप-प्रमुख तथा एक कनिष्ठ उप-प्रमुख चुने जाते हैं। राज्य में क्षेत्र पंचायतों के प्रमुखों के पद अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिए आरक्षित किये गये हैं।

कार्यकाल – क्षेत्र पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु राज्य सरकार 5 वर्ष की अवधि से पहले भी क्षेत्र पंचायत को विघटित कर सकती है। प्रमुख, उप-प्रमुख अथवा क्षेत्र पंचायत का कोई भी सदस्य 5 वर्ष की अवधि से पूर्व भी त्यागपत्र देकर अपना पद त्याग सकता है। प्रमुख तथा उप-प्रमुख के द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन न करने की स्थिति में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उन्हें पदच्युत किया जा सकता है। क्षेत्र पंचायत के विघटन के छ: माह की अवधि के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।

अधिकारी – क्षेत्र पंचायत का सबसे प्रमुख अधिकारी ‘खण्ड विकास अधिकारी (Block Development Officer) होता है। इस पर समस्त प्रशासन का उत्तरदायित्व होता है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अधिकारी भी होते हैं।

अधिकार और कार्य – क्षेत्र पंचायत के प्रमुख अधिकार और कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. कृषि, भूमि विकास, भूमि सुधार और लघु सिंचाई सम्बन्धी कार्यों को करना।
  2. सार्वजनिक निर्माण सम्बन्धी कार्य करना।
  3. कुटीर और ग्राम उद्योगों तथा लघु उद्योगों का विकास करना।
  4. पशुपालन तथा पशु सेवाओं में वृद्धि करना।
  5. स्वास्थ्य तथा सफाई सम्बन्धी कार्यों की देखभाल करना।
  6. शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास से सम्बद्ध कार्य कराना।
  7. पेयजल, ईंधन और चारे की व्यवस्था करना।
  8. ग्रामीण आवास की व्यवस्था करना।
  9. चिकित्सा तथा परिवार कल्याण सम्बन्धी कार्यों की देखभाल करना।
  10. बाजार तथा मेलों की व्यवस्था करना।
  11. प्राकृतिक आपदाओं में सहायता प्रदान करना।
  12. ग्राम सभाओं का निरीक्षण करना तथा खण्ड विकास योजनाएँ लागू करना।

प्रश्न 4.
न्याय पंचायत का संगठन किस प्रकार होता है ? इसके प्रमुख अधिकार क्या हैं ?
उत्तर :
प्रत्येक ग्राम सभा न्याय पंचायत के लिए पंचों का निर्वाचन करती है। इन निर्वाचित सदस्यों में से सरकारी अधिकारी शिक्षा, प्रतिष्ठा, अनुभव एवं योग्यता के आधार पर पंच मनोनीत करता है। प्रत्येक न्याय पंचायत में सदस्यों की संख्या इस प्रकार होती है कि वह पाँच से पूरी-पूरी विभक्त हो जाए। 1 से 6 गाँव सभाओं वाली न्याय पंचायत के पंचों की संख्या 15, 7 से 9 तक 20 तथा 9 से अधिक होने पर 25 होगी।

न्याय पंचायत के सदस्य अपने मध्य से एक सरपंच तथा एक सहायक सरपंच चुनते हैं। इस पद पर उन्हीं पढ़े-लिखे व्यक्तियों को निर्वाचित किया जाता है जो कार्यवाही लिख सकें।

प्रमुख अधिकार

न्याय पंचायत को दीवानी, फौजदारी तथा माल के मुकदमे देखने का अधिकार प्राप्त है। न्याय पंचायतों को ₹ 500 की मालियत के मुकदमे सुनने का अधिकार दिया गया है। फौजदारी के मुकदमों में वह ₹ 250 तक जुर्माना कर सकती है। यह किसी को कारावास या शारीरिक दण्ड नहीं दे सकती। यदि कोई गवाह उपस्थित नहीं होता है तो यह है 25 का जमानती वारण्ट जारी कर सकती है। यदि न्याय पंचायत यह समझ ले कि किसी व्यक्ति से शान्ति भंग होने की आशंका है तो वह उससे 15 दिन तक के लिए ₹ 100 का मुचलका ले सकती है।

न्याय पंचायत को न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं। न्याय पंचायत का अनादर करने वाले व्यक्ति को न्याय ५ पंचायत मानहानि का अपराधी बनाकर उस पर ₹ 5 जुर्माना कर सकती है। न्याय पंचायत के निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती। चोरी, अश्लीलता, गाली-गलौज, स्त्री की लज्जा, अपहरण आदि के मुकदमो की सुनवाई न्याय पंचायत करती है। इन मुकदमों में वकीलों को पेश होने का प्रावधान नहीं रखा गया है। किसी मुकदमे में अन्याय होने पर न्याय पंचायत के दीवानी के मुकदमे की निगरानी मुंसिफ के यहाँ तथा माल के मुकदमे की निगरानी हाकिम परगना के यहाँ हो सकती है। राज्य सरकार न्याय पंचायतों के कार्यों पर नियन्त्रण रखती है, जिससे निर्णयों में कोई पक्षपात न हो सके तथा न्याय पंचायतें सही रूप से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें।

प्रश्न 5.
जिला पंचायत का गठन किस प्रकार होता है ? इसके प्रमुख कार्य तथा आय के साधन लिखिए।
उत्तर :
त्रि-स्तरीय पंचायती राज-व्यवस्था की सर्वोच्च इकाई जिला पंचायत होती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 पारित करके जिला परिषद् का नाम बदलकर जिला पंचायत कर दिया है।

गठन – जिला पंचायत के गठन में निम्नलिखित दो प्रकार के सदस्य होते हैं –

(क) निर्वाचित सदस्य – निर्वाचित सदस्यों की सदस्य-संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाती है। साधारणतया 50,000 से अधिक की जनसंख्या पर एक सदस्य निर्वाचित किया जाता है। यह निर्वाचन वयस्क मतदान द्वारा होता है।

(ख) अन्य सदस्य – अन्य सदस्यों में कुछ पदेन सदस्य होते हैं, जो कि निम्नवत् हैं –

  1. जनपद की सभी क्षेत्र पंचायतों के प्रमुख।
  2. लोकसभा तथा विधानसभा के वे सदस्य जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें जिला पंचायत क्षेत्र का कोई भाग समाविष्ट है।
  3. राज्यसभा तथा विधान परिषद् के वे सदस्य जो उस जिला पंचायत क्षेत्र में मतदाताओं के रूप में पंजीकृत हैं।

आरक्षण – प्रत्येक जिला पंचायत में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए नियमानुसार स्थान आरक्षित रहेंगे। आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, जिला अनुपात में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होगा, जो अनुपात इन जातियों एवं वर्गों की जनसंख्या का जिला पंचायत क्षेत्र की समस्त जनसंख्या में है। संशोधित प्रावधानों के अन्तर्गत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल निर्वाचित स्थानों की संख्या के 27% से अधिक नहीं होगा। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान; इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे। प्रत्येक जिला पंचायत में निर्वाचित स्थानों की कुल संख्या के कम-से-कम एक-तिहाई स्थान; महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे।

योग्यता – जिला पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ अपेक्षित हैं –

  1. ऐसे सभी व्यक्ति, जिनका नाम उस जिला पंचायत के किसी प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में सम्मिलित है।
  2. जो राज्य विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की आयु-सीमा के अतिरिक्त अन्य सभी योग्यताएँ रखता है।
  3. जिसने 21 वर्ष की आयु पूरी कर ली है।

अधिकारी – प्रत्येक जिला पंचायत में दो अधिकारी होते हैं-अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, जिनका चुनाव निर्वाचित सदस्यों द्वारा गुप्त मतदान प्रणाली के आधार पर होता है। अध्यक्ष बनने के लिए यह आवश्यक है कि वह जिले में रहता हो, उसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो तथा उसका नाम मतदाता सूची में हो। इन दोनों का निर्वाचन पाँच वर्ष के लिए किया जाता है। राज्य सरकार पाँच वर्ष की अवधि, से पूर्व भी इन्हें पदच्युत कर सकती है। ये पद भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित होते हैं। अध्यक्ष पंचायतों की बैठकों का सभापतित्व करता है, पंचायत के कार्यों का निरीक्षण करता है एवं कर्मचारियों पर नियन्त्रण रखता है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसका पदभार उपाध्यक्ष सँभालता है।

इन अधिकारियों के अतिरिक्त छोटे-बड़े, स्थायी-अस्थायी अनेक वैतनिक कर्मचारी भी होते हैं, जो इन अधिकारियों के प्रति जिम्मेदार होते हैं तथा जिला पंचायत का कार्य निष्पादित करते हैं।

कार्य – जिले के समस्त ग्रामीण क्षेत्र की व्यवस्था तथा विकास का उत्तरदायित्व जिला पंचायत पर है। इस दायित्व को पूरा करने के लिए जिला परिषद् निम्नलिखित कार्य करती है

  1. सार्वजनिक सङ्कों, पुलों तथा निरीक्षण-गृहों का निर्माण एवं मरम्मत करवाना।
  2. प्रबन्ध हेतु सड़कों का ग्राम सड़कों, अन्तग्रम ग्राम सड़कों तथा जिला सड़कों में वर्गीकरण करना।
  3. तालाब, नाले आदि बनवाना।
  4. पीने के पानी की व्यवस्था करना।
  5. रोशनी का प्रबन्ध करना।
  6. जनस्वास्थ्य के लिए महामारियों और संक्रामक रोगों की रोकथाम की व्यवस्था करना।
  7. अकाल के दौरान सहायता हेतु राहत कार्य चलाना।
  8. क्षेत्र समिति एवं ग्राम पंचायत के कार्यों में तालमेल स्थापित करना।
  9. ग्राम पंचायतों तथा क्षेत्र समितियों के कार्यों का निरीक्षण करना।
  10. प्राइमरी स्तर से ऊपर की शिक्षा का प्रबन्ध करना।
  11. सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाना।
  12. कांजी हाउस तथा पशु चिकित्सालय की व्यवस्था करना।
  13. जन्म-मृत्यु का हिसाब रखना।
  14. परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू करना।
  15. अस्पताल खोलना तथा मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था करना।
  16. पुस्तकालय-वाचनालय का निर्माण एवं उनका अनुरक्षण करना।
  17. कृषि की उन्नति के लिए उचित प्रबन्ध करना।
  18. खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकना आदि।

आय के साधन – जिला पंचायत अपने कार्यों को पूर्ण करने के लिए निम्नलिखित साधनों से आय प्राप्त करती है –

  1. हैसियत एवं सम्पत्ति कर
  2. स्कूलों से प्राप्त फीस
  3. अचल सम्पत्ति से कर
  4. लाइसेन्स कर
  5. नदियों के पुलों तथा घाटों से प्राप्त उतराई कर
  6. कांजी हाउसों से प्राप्त आय
  7. मेलों, हाटों एवं प्रदर्शनियों से प्राप्त आय तथा
  8. राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान।

प्रश्न 6.
अपने प्रदेश में नगरपालिका परिषद का गठन किस प्रकार होता है ? नगर के विकास के लिए वे कौन-कौन-से कार्य करती हैं ?
उत्तर :
उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1994 ई०’ के अनुसार 1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या वाले नगर को ‘लघुतर नगरीय क्षेत्र का नाम दिया गया है तथा इनके प्रबन्ध के लिए नगरपालिका परिषद् की व्यवस्था का निर्णय लिया गया है।

गठन – नगरपालिका परिषद् में एक अध्यक्ष और तीन प्रकार के सदस्य होंगे। ये तीन प्रकार के सदस्य निम्नलिखित हैं –

(1) निर्वाचित सदस्य – नगरपालिका परिषद् में जनसंख्या के आधार पर निर्वाचित सदस्यों की संख्या 25 से कम और 55 से अधिक नहीं होगी। राज्य सरकार सदस्यों की यह संख्या निश्चित करके सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा प्रकाशित करेगी।

(2) पदेन सदस्य – (i) इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभा के ऐसे समस्त सदस्य सम्मिलित होते हैं, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें पूर्णतया अथवा अंशतः वे नगरपालिका क्षेत्र सम्मिलित होते हैं।
(ii) इसमें राज्यसभा और विधान परिषद् के ऐसे समस्त सदस्य सम्मिलित होते हैं, जो उस नगरपालिका क्षेत्र के अन्तर्गत निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हैं।

(3) मनोनीत सदस्य – प्रत्येक नगरपालिका परिषद् में राज्य सरकार द्वारा ऐसे सदस्यों को मनोनीत किया जाएगा, जिन्हें नगरपालिका प्रशासन का विशेष ज्ञान अथवा अनुभव हो। ऐसे सदस्यों की संख्या 3 से कम और 5 से अधिक नहीं होगी। इन मनोनीत सदस्यों को नगरपालिका परिषद् की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होगा। नगर निगम के निर्वाचित सदस्यों के समान (सभासद) नगरपालिका परिषद् के सदस्यों को भी सभासद’ ही कहा जाएगा।

पदाधिकारी – प्रत्येक नगरपालिका परिषद् में एक ‘अध्यक्ष और एक ‘उपाध्यक्ष होगा। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में या पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष के द्वारा अध्यक्ष के रूप में कार्य किया जाता है। अध्यक्ष का निर्वाचन 5 वर्ष के लिए समस्त मतदाताओं द्वारा वयस्क मताधिकार तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता है। उपाध्यक्ष का निर्वाचन नगरपालिका परिषद् के सभासदों द्वारा एक वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है।

अधिकारी और कर्मचारी – उपर्युक्त के अतिरिक्त परिषद् के कुछ वैतनिक अधिकारी व कर्मचारी भी होते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी’ (Executive Officer) होता है। जिन परिषदों में ‘प्रशासनिक अधिकारी न हों, वहाँ परिषद् विशेष प्रस्ताव द्वारा एक या एक से अधिक सचिव नियुक्त करती है।

कार्य – नगरपालिका अपनी समितियों के माध्यम से नगरों के विकास के लिए निम्नलिखित कार्य करती है –

(I) अनिवार्य कार्य – नगरपालिका परिषद् को निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं –

  1. सड़कों का निर्माण तथा उनकी मरम्मत व सफाई करवाना।
  2. नगरों में जल की व्यवस्था करना।
  3. नगरों में प्रकाश की व्यवस्था करना।
  4. सड़कों के किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाना।
  5. नगर की सफाई का प्रबन्ध करना।
  6. औषधालयों का प्रबन्ध करना तथा संक्रामक रोगों से बचने के लिए टीके लगवाना।
  7. शवों को जलाने एवं दफनाने की उचित व्यवस्था करना।
  8. जन्म एवं मृत्यु का विवरण रखना।
  9. नगरों में शिक्षा की व्यवस्था करना।
  10. आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की व्यवस्था करना।
  11. सड़कों तथा मोहल्लों का नाम रखना व मकानों पर नम्बर डलवाना।
  12. बूचड़खाने बनवाना तथा उनकी व्यवस्था करना।
  13. अकाल के समय लोगों की सहायता करना।

(II) ऐच्छिक कार्य – नगरपालिका परिषद् निम्नलिखित कार्यों को भी पूरा करती है –

  1. नगर को सुन्दर तथा स्वच्छ बनाये रखना।
  2. पुस्तकालय, वाचनालय, अजायबघर व विश्राम-गृहों की स्थापना करना।
  3. प्रारम्भिक शिक्षा से ऊपर की शिक्षा की व्यवस्था करना।
  4. पागलखाना और कोढ़ियों के रखने के स्थानों आदि की व्यवस्था करना।
  5. बाजार तथा पैंठ की व्यवस्था करना।
  6. पागल तथा आवारा कुत्तों को पकड़वाना।
  7. अनाथों के रहने तथा बेकारों के लिए रोजी का प्रबन्ध करना।
  8. नगर में नगर-बस सेवा चलवाना।
  9. नगर में नये-नये उद्योग-धन्धे विकसित करने के लिए सुविधाएँ प्रदान करना।

प्रश्न 7.
नगर-निगम की रचना और उसके कार्यों पर प्रकाश डालिए।
या
उच्चर प्रद्वेश के नगर-निगम के संगठन व कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन-विधि (संशोधन), 1994 के अन्तर्गत 5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक नगर को ‘वृहत्तर नगरीय क्षेत्र घोषित कर दिया गया है तथा ऐसे प्रत्येक नगर में स्वायत्त शासन के अन्तर्गत नगर-निगम की स्थापना का प्रावधान किया गया है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, आगरा, वाराणसी, मेरठ, इलाहाबाद, गोरखपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़, गाजियाबाद, बरेली तथा सहारनपुर नगरों में नगर-निगम स्थापित कर दिये गये हैं। उत्तर प्रदेश के दो नगरों-कानपुर और लखनऊ-की जनसंख्या 10 लाख से अधिक है, अत: इन्हें महानगर तथा इनका प्रबन्ध करने वाली संस्था को ‘महानगर निगम की संज्ञा दी गयी है। वर्तमान में कुछ और नगर-आगरा, वाराणसी, मेरठे—भी ‘महानगर निगम’ बनाये जाने के लिए प्रस्तावित हैं।

गठन – नगर-निगम के गठन हेतु नगर प्रमुख, उपनगर प्रमुख व तीन प्रकार के सदस्य क्रमशः निर्वाचित सदस्य, मनोनीत सदस्य व पदेन सदस्यों का प्रावधान किया गया है। ये तीन प्रकार के सदस्य इस प्रकार हैं –

(1) निर्वाचित सदस्य – नगर-निगम के निर्वाचित सदस्यों को सभासद कहा जाता है। सभासदों की संख्या कम-से-कम 60 व अधिक-से-अधिक 110 निर्धारित की गयी है। यह संख्या राज्य सरकार द्वारा सरकारी गजट में दी गयी विज्ञप्ति के आधार पर निश्चित की जाती है।

योग्यता – नगर-निगम के सभासद के निर्वाचन में भाग लेने हेतु निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए –

  1. सभासद के निर्वाचन में भाग लेने के लिए नगर-निगम क्षेत्र की मतदाता सूची (निर्वाचन सूची) में उसका नाम अंकित होना चाहिए।
  2. आयु 21 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।
  3. वह व्यक्ति राज्य विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने की सभी योग्यताएँ व उपबन्ध पूर्ण करता हो।

विशेष – जो स्थान आरक्षित श्रेणियों के लिए आरक्षित किये गये हैं, उन पर आरक्षित वर्ग का व्यक्ति ही निर्वाचन में भाग ले सकेगा।

सभासदों का निर्वाचन – नगर-निगम के सभासदों का चुनाव नगर के वयस्क नागरिकों द्वारा होता है। चुनाव के लिए नगर को अनेक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है, जिन्हें कक्ष’ (Ward) कहा जाता है। प्रत्येक कक्ष से संयुक्त निर्वाचन पद्धति के आधार पर एक सभासद का चुनाव होता है। इस पद हेतु नगर का कोई भी ऐसा नागरिक प्रत्याशी हो सकता है, जिसकी आयु 21 वर्ष हो और जो निवास सम्बन्धी समस्त शर्ते पूरी करता हो।

स्थानों का आरक्षण – प्रत्येक निगम में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित किये जाएँगे। इस प्रकार से आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात; निगम में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में यथासम्भव वही होगा, जो अनुपात नगर-निगम क्षेत्र की कुल जनसंख्या में इन जातियों का है। प्रत्येक नगर-निगम में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले स्थानों का 27 प्रतिशत स्थान पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित किया जाएगा। इन आरक्षित स्थानों में कम-से-कम एक-तिहाई स्थान इन जातियों और वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे। इन महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों को सम्मिलित करते हुए, प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या के कम-से-कम एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे।

(2) मनोनीत सदस्य – नगर-निगम में राज्य सरकार द्वारा ऐसे सदस्यों को मनोनीत किया जाएगा जिन्हें नगर-निगम प्रशासन का विशेष ज्ञान व अनुभव हो। इन सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाएगी। मनोनीत सदस्यों को नगर निगम की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होगा। इनकी संख्या 5 व 10 के मध्य होगी।

(3) पदेन सदस्य –

  1. लोकसभा और राज्य विधानसभा के वे सदस्य जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें नगर पूर्णतः अथवा अंशत: समाविष्ट हैं।
  2. राज्यसभा और विधान परिषद् के वे सदस्य, जो उस नगर में निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हैं।
  3. उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 ई० के अधीन स्थापित समितियों के वे अध्यक्ष जो नगर-निगम के सदस्य नहीं हैं।

कार्यकाल – नगर-निगम का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु राज्य सरकार धारा 538 के अन्तर्गत निगम को इसके पूर्व भी विघटित कर सकती है।

समितियाँ – नगर-निगम की दो प्रमुख समितियाँ होंगी – (1) कार्यकारिणी समिति तथा (2) विकास समिति। इसके अतिरिक्त नगर-निगम में निगम विद्युत समिति, नगर परिवहन समिति और इसी प्रकार की अन्य समितियाँ भी गठित की जा सकती हैं; परन्तु इन समितियों की संख्या 12 से अधिक नहीं होनी चाहिए। अधिनियम, 1994 के अन्तर्गत नगर-निगम को नगर-निगम क्षेत्र में वे ही कार्य करने का निर्देश दिया गया है जो कार्य नगरपालिका परिषद् को नगरपालिका क्षेत्र में करने का निर्देश है।

कार्य

नगर – निगम का कार्य-क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। उत्तर प्रदेश के निगमों को 41 अनिवार्य और 43 ऐच्छिक कार्य करने होते हैं; यथा –

अनिवार्य कार्य – इन कार्यों के अन्तर्गत नगर में सफाई की व्यवस्था करना, सड़कों एवं गलियों में प्रकाश की व्यवस्था करना, अस्पतालों एवं औषधालयों का प्रबन्ध करना, इमारतों की देखभाल करना, पेयजल का प्रबन्ध करना, संक्रामक रोगों की रोकथाम की व्यवस्था करना, जन्म-मृत्यु का लेखा रखना, प्राथमिक एवं नर्सरी शिक्षा का प्रबन्ध करना, नगर नियोजन एवं नगर सुधार कार्यों की व्यवस्था करना आदि विभिन्न कार्य सम्मिलित किये गये हैं।

ऐच्छिक कार्य – इन कार्यों के अन्तर्गत निगम को पुस्तकालय, वाचनालय, अजायबघर आदि की व्यवस्था के साथ-साथ समय-समय पर लगने वाले मेलों और प्रदर्शनियों की व्यवस्था भी करनी होती है। इन ऐच्छिक कार्यों में ट्रक, बस आदि चलाना एवं कुटीर उद्योगों का विकास करना आदि भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार नगर-निगम लगभग उन्हीं समस्त कार्यों को बड़े पैमाने पर सम्पादित करता है, जो छोटे नगरों में नगरपालिका करती है।

पदाधिकारी – प्रत्येक नगर-निगम में एक नगर प्रमुख तथा एक उप-नगर प्रमुख होगा। नगर प्रमुख का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इस अवधि से पहले अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा नगर प्रमुख को पद से हटाया जा सकता है।

नगर-निगम में दो प्रकार के अधिकारी होते हैं – निर्वाचित एवं स्थायी। निर्वाचित अधिकारी अवैतनिक तथा स्थायी अधिकारी वैतनिक होते हैं।

(I) निर्वाचित अधिकारी – निर्वाचित अधिकारी मुख्य रूप से इस प्रकार होते हैं –

नगर प्रमुख – प्रत्येक नगर-निगम में एक नगर प्रमुख होता है। नगर प्रमुख के पद के लिए वही व्यक्ति प्रत्याशी हो सकता है, जो नगर का निवासी हो और उसकी आयु कम-से-कम 30 वर्ष हो। नगर प्रमुख का पद अवैतनिक होता है; उसका निर्वाचन नगर के समस्त मतदाताओं द्वारा वयस्क मताधिकार तथा प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होता है।

उप-नगर प्रमुख – प्रत्येक नगर-निगम में एक ‘उप-नगर प्रमुख भी होता है। नगर प्रमुख की अनुपस्थिति अथवा पद रिक्त होने पर उप-नगर प्रमुख ही नगर प्रमुख के कार्यों का सम्पादन करता है। इसका चुनाव एक वर्ष के लिए सभासद करते हैं।

(II) स्थायी अधिकारी – ये अधिकारी इस प्रकार हैं –

मुख्य नगर अधिकारी – प्रत्येक नगर-निगम का एक मुख्य नगर अधिकारी होता है। यह अखिल भारतीय शासकीय सेवा (I.A.S.) का उच्च अधिकारी होता है। राज्य सरकार इसी अधिकारी के माध्यम से नगर-निगम पर नियन्त्रण रखती है।

अन्य अधिकारी – मुख्य नगर अधिकारी के अतिरिक्त एक या अधिक ‘अपर मुख्य नगर अधिकारी भी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ प्रमुख अधिकारी भी होते हैं; जैसे—मुख्य अभियन्ता, नगर स्वास्थ्य अधिकारी, मुख्य नगर लेखा-परीक्षक आदि।

प्रश्न 8.
नगर पंचायत के संगठन और उसके कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
नगर पंचायत की रचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश नगरीय स्वायत्त शासन विधि (संशोधन),1994 के अनुसार 30 हजार से 1 लाख की जनसंख्या वाले क्षेत्र को ‘संक्रमणशील क्षेत्र घोषित किया गया है, अर्थात् जिन स्थानों पर ‘टाउन एरिया कमेटी’ थी, उन स्थानों को अब ‘टाउन एरिया’ नाम के स्थान पर नगर पंचायत’ नाम दिया गया है। ये स्थान ऐसे हैं जो ग्राम के स्थान पर नगर बनने की ओर अग्रसर हैं।

संरचना – प्रत्येक नगर पंचायत में एक अध्यक्ष व तीन प्रकार के सदस्य होंगे। सदस्य क्रमश: इस प्रकार होंगे –

  1. निर्वाचित सदस्य
  2. पदेन सदस्य तथा
  3. मनोनीत सदस्य।

(1) निर्वाचित सदस्य – नगर पंचायतों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कम-से-कम 10 और अधिक-से-अधिक 24 होगी। नगर पंचायत के सदस्यों की संख्या राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाएगी तथा यह संख्या सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा प्रकाशित की जाएगी। निर्वाचित सदस्यों को सभासद कहा जाएगा। सभासद के निर्वाचन के लिए नगर को लगभग समान जनसंख्या वाले क्षेत्रों (वार्ड) में विभक्त किया जाएगा। वार्ड एक सदस्यीय होगा। प्रत्येक सभासद को निर्वाचन वार्ड के वयस्क मताधिकार प्राप्त नागरिकों के द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति के आधार पर किया जाएगा।

सभासद की योग्यता –

  1. सभासद का नाम नगर की मतदाता सूची में पंजीकृत होना चाहिए।
  2. उसकी आयु कम-से-कम 21 वर्ष होनी चाहिए।
  3. वह राज्य विधानमण्डल का सदस्य निर्वाचित होने के सभी उपबन्ध पूरे करता हो।
  4. जो स्थान आरक्षित हैं, उन स्थानों से आरक्षित वर्ग का स्त्री/पुरुष ही चुनाव लड़ सकता है।

आरक्षण – जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए वार्ड का आरक्षण होगा। पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत वार्ड आरक्षित होंगे, जिनमें अनुसूचित जाति जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के आरक्षण की एक-तिहाई महिलाएँ सम्मिलित होंगी।

(2) पदेन सदस्य – लोकसभा व विधानसभा के वे सभी सदस्य पदेन सदस्य होंगे, जो उन निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें पूर्णतया या अंशतया वह नगर पंचायत क्षेत्र सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त राज्यसभा व विधान-परिषद् के ऐसे सभी सदस्य, जो उस नगर पंचायत क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में पंजीकृत हैं, पदेन सदस्य होंगे।

(3) मनोनीत सदस्य – प्रत्येक नगर पंचायत में राज्य सरकार द्वारा ऐसे 2 या 3 सदस्यों को मनोनीत किया जाएगा, जिन्हें नगरपालिका प्रशासन का विशेष ज्ञान व अनुभव होगा। ये मनोनीत सदस्य नगर पंचायत की बैठकों में मत नहीं दे सकेंगे।

कार्यकाल – नगर पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा। राज्य सरकार नगर पंचायत का विघटन भी कर सकती है, परन्तु नगर पंचायत के विघटन के दिनांक से 6 माह की अवधि के अन्दर पुनः चुनाव कराना अनिवार्य होगा।

कार्य – नगर पंचायत मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य करेगी –

(1) सर्वसाधारण की सुविधा से सम्बन्धित कार्य करना – इनमें सड़कें बनवाना, वृक्ष लगवाना, सार्वजनिक स्थानों का निर्माण कराना, अकाल, बाढ़ या अन्य विपत्ति के समय जनता की सहायता करना आदि प्रमुख हैं।

(2) स्वास्थ्य-रक्षा सम्बन्धी कार्य करना – इनमें संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीके लगवाना, खाद्य-पदार्थों का निरीक्षण करना, अस्पताल, ओषधियों तथा स्वच्छ जल की व्यवस्था करना आदि प्रमुख हैं।

(3) शिक्षा सम्बन्धी कार्य करना – इनमें प्रारम्भिक-शिक्षा के लिए पाठशालाओं की व्यवस्था करना, वाचनालय और पुस्तकालय बनवाना तथा ज्ञानक्र्द्धन के लिए प्रदर्शनी लगाना आदि प्रमुख हैं।

(4) आर्थिक कार्य करना – इनमें जल और विद्युत की पूर्ति करना, यातायात के लिए बसों की तथा मनोरंजन के लिए सिनेमा-गृहों (छवि-गृहों) या मेलों आदि की व्यवस्था करना प्रमुख हैं।

(5) सफाई सम्बन्धी कार्य करना – इनमें सड़कों, गलियों तथा नालियों की सफाई कराना, सड़कों पर पानी का छिड़काव कराना आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 9.
जिला प्रशासन में जिलाधिकारी का क्या महत्त्व है ? जिलाधिकारी के कार्यों का वर्णन कीजिए।
या
जिले के शासन में जिलाधिकारी का क्या स्थान है ? उसके अधिकार एवं कर्तव्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

जिलाधिकारी का महत्त्व

प्रो० प्लाण्डे का यह कथन कि “जिलाधीश राज्य सरकार की आँख, कान, मुँह और भुजाओं के समान है”, जिलाधिकारी के महत्त्व को भली-भाँति बताता है। इस पद पर अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित अनुभवी अधिकारी की ही नियुक्ति की जाती है। जिले में शान्ति-व्यवस्था बनाकर उसका समुचित विकास करना जिलाधिकारी का मुख्य कार्य होता है राज्य सरकार की आय के साधन तो पूरे राज्य में बिखरे पड़े होते हैं। जिलाधिकारी का एक मुख्य कार्य यह भी है कि राज्य-कोष में उसके जिले का अधिकतम योगदान हो। इसके अतिरिक्त यह राज्य सरकार एवं जिले की जनता के बीच एक सेतु का कार्य भी करता है। वह जन-भावनाओं और राज्य सरकार की अपेक्षाओं को इधर से उधर पहुँचाता है जिलाधिकारी के पास अनेक शक्तियाँ होती हैं। वह शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए सेना की सहायता तक ले सकता है। अतः कहा जा सकता है कि जिलाधिकारी का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

जिलाधिकारी के अधिकार एवं कार्य (कर्तव्य)

(1) प्रशासन सम्बन्धी अधिकार – जिले में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने का पूर्ण उत्तरदायित्व जिलाधिकारी पर होता है। इसका यह कार्य सबसे महत्त्वपूर्ण होता है, इसलिए पुलिस विभाग उसके नियन्त्रण में रहकर ही कार्य करता है। जिले की सम्पूर्ण सूचना जिलाधिकारी ही राज्य सरकार के पास भेजता है। जिले में किसी भी प्रकार का झगड़ा होने या शान्ति भंग होने की आशंका होने पर वह सभाओं व जुलूसों पर प्रतिबन्ध लगा सकता है, सेना की सहायता भी ले सकता है तथा गोली चलाने की आज्ञा भी दे सकता है। इसके अतिरिक्त वह प्राकृतिक प्रकोपों के आने पर या महामारियाँ फैलने पर राज्य सरकार से सहायता प्राप्त करके जनता की सहायता भी करता है।

(2) न्याय सम्बन्धी अधिकार – जिलाधिकारी को राजस्व सम्बन्धी तथा किराया नियन्त्रण कानून के अन्तर्गत शहरी सम्पत्ति के विवादों के निपटारे से सम्बद्ध न्यायिक कार्य भी करना होता है। इसी कारण उसे जिलाधीश भी कहा जाता है। अपने अधीनस्थ अधिकारियों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकारी भी जिलाधीश को प्राप्त है।

(3) मालगुजारी (राजस्व) सम्बन्धी अधिकार – जिलाधिकारी सम्पूर्ण जिले की मालगुजारी वसूल करता है तथा इससे सम्बन्धित बड़े-बड़े झगड़ों का समाधान भी करता है। इस कार्य में इसकी सहायता के लिए इसके अधीन डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल आदि होते हैं। जिले का सरकारी कोष इसी के अधिकार में रहता है।

(4) निरीक्षण सम्बन्धी अधिकार – सम्पूर्ण जिले की शान्ति एवं व्यवस्था का भार जिलाधिकारी पर होता है। इसलिए इसे प्रत्येक विभाग के निरीक्षण करने का अधिकार दिया गया है। जिलाधिकारी जिले के लगभग सभी विभागों का समय-समय पर निरीक्षण करता है और उन पर अपना नियन्त्रण भी रखता है।

(5) विकास सम्बन्धी अधिकार – यद्यपि जिले में विकास सम्बन्धी कार्यों की देख-रेख के लिए एक मुख्य विकास अधिकारी की नियुक्ति की जाती है, तथापि जिले के विकास का उत्तरदायित्व जिलाधिकारी पर ही होता है। जिले के विकास के लिए विभिन्न विकास योजनाएँ बनाना, उनका क्रियान्वयन कराना तथा उन पर नियन्त्रण रखना भी जिलाधिकारी का ही कार्य है।

(6) जनता व सरकार के मध्य सम्बन्ध – जिलाधिकारी ही जनता और सरकार के मध्य एक कड़ी, के रूप में काम करता है तथा तहसील दिवस आदि के सदृश आयोजनों में वह जनता की समस्याओं को सुनकर उनका समाधान भी करता है।

(7) अन्य कार्य – जिले की समस्त स्थानीय संस्थाओं पर पूर्ण नियन्त्रण रखने के साथ-साथ विभिन्न आग्नेयास्त्रों (राइफल, बन्दूक, पिस्तौल आदि) के लाइसेन्स देने का अधिकार भी जिलाधिकारी को ही होता है। वह जिले में अनेक छोटे-छोटे कर्मचारियों की नियुक्ति का कार्य भी करता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जिले का सर्वोच्च पदाधिकारी होने के कारण जिलाधिकारी को प्रशासन एवं विकास-सम्बन्धी अनेक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना पड़ता है। वस्तुत: जिलाधिकारी के अधिकार तथा शक्तियाँ व्यापक हैं।

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