UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 5 Minerals and Rocks (खनिज एवं शैल)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्न में से कौन ग्रेनाइट के दो प्रमुख घटक हैं?
(क) लौह एवं निकिल ।
(ख) सिलिका एवं ऐलुमिनियम
(ग) लौह एवं चाँदी ।
(घ) लौह ऑक्साइड एवं पोटैशियम
उत्तर-(ग) लौह एवं चाँदी।।

प्रश्न (ii) निम्न में से कौन-सा कायान्तरित शैलों का प्रमुख लक्षण है?
(क) परिवर्तनीय
(ख) क्रिस्टलीय
(ग) शान्त
(घ) पत्रण
उत्तर-(क) परिवर्तनीय।

प्रश्न (iii) निम्न में से कौन-सा एकमात्र तत्त्व वाला खनिज नहीं है?
(क) स्वर्ण
(ख) माइका ।
(ग) चाँदी
(घ) ग्रेफाइट
उत्तर-(घ) ग्रेफाइट।

प्रश्न (iv) निम्न में से कौन-सा कठोरतम खनिज है?
(क) टोपाज
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) हीरा
(घ) फेल्सफर
उत्तर-(ग) हीरा

प्रश्न (v) निम्न में से कौन-सी शैल अवसादी नहीं है?
(क) टायलाइट
(ख) ब्रेशिया
(ग) बोरॅक्स
(घ) संगमरमर
उत्तर-(घ) संगमरमर।।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
(i) शैल से आप क्या समझते हैं? शैल के तीन प्रमुख वर्गों के नाम बताएँ।
उत्तर- पृथ्वी की पर्पटी चट्टानों से बनी है। चट्टान का निर्माण एक या एक से अधिक खनिजों से मिलकर होता है। चट्टानें कठोर या नरम तथा विभिन्न रंगों की हो सकती हैं। जैसे ग्रेनाइट कठोर तथा सोपस्टोन नरम है। गैब्रो काला तथा क्वार्टज़ाइट दूधिया श्वेत हो सकता है। शैलों में खनिज घटकों का कोई निश्चित संघटक नहीं होता है। शैलों में सामान्यतः पाए जाने वाले खनिज पदार्थ फेल्डस्पर तथा क्वार्ट्ज हैं। शैलों को निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया गया है-
(i) आग्नेय शैल
(ii) अवसादी शैल
(iii) कायांतरित शैल।

(ii) आग्नेय शैल क्या हैं? आग्नेय शैल के निर्माण की पद्धति एवं लक्षण बताएँ।
उत्तर- आग्नेय शैलों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग के मैग्मा से होता है, अतः इनको प्राथमिक शैल भी कहते हैं। मैग्मा के ठंडे होकर घनीभूत हो जाने पर आग्नेय शैलों का निर्माण होता है। मैग्मा ठंडा होकर ठोस बन जाता है तो यह आग्नेय शैल कहलाता है। इसकी बनावट इसके कणों के आकार एवं व्यवस्था अथवा पदार्थ की भौतिक अवस्था पर निर्भर करती है। यदि पिघले हुए पदार्थ धीरे-धीरे गहराई तक ठंडे होते हैं। तो खनिज के कण पर्याप्त बड़े हो सकते हैं। सतह पर हुई आकस्मिक शीतलता के कारण छोटे एवं चिकने कण बनते हैं। शीतलता की मध्यम परिस्थितियाँ होने पर आग्नेय चट्टान को बनाने वाले कण मध्यम आकार के हो सकते हैं। ग्रेनाइट, बेसाल्ट, वोल्केनिक ब्रेशिया तथा टफ़ आग्नेय शैल के उदाहरण हैं।

(iii) अवसादी शैल का क्या अर्थ है? अवसादी शैल के निर्माण की पद्धति बताएँ।
उत्तर- अवसादी अर्थात् सेडीमेंटरी शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सेडिमेंट्स से हुई है, जिसका अर्थ है-व्यवस्थित होना। पृथ्वी की सतह की शैलें अपक्षयकारी कारकों के प्रति अनावृत होती हैं, जो विभिन्न आकार के विखंडों में विभाजित होती हैं। ऐसे उपखंडों को विभिन्न बहिर्जनित कारकों के द्वारा संवहन एवं निक्षेपण होता है। सघनता के द्वारा ये संचित पदार्थ शैलों में परिणत हो जाते हैं। यह प्रक्रिया शिलीभवन कहलाती है। बहुत-सी अवसादी शैलों में निक्षेपित परतें शिलीभवन के बाद भी अपनी विशेषताएँ बनाए रखती हैं। इसी कारणवश बालुकाश्म, शैल जैसी अवसादी शैलों में विविध सांद्रता वाली अनेक सतहें होती हैं।

(iv) शैली चक्र के अनुसार प्रमुख प्रकार की शैलों के मध्य क्या संबंध होता है?
उत्तर- शैली चक्र एक सतत प्रक्रिया होती है, जिसमें पुरानी चट्टानें परिवर्तित होकर नवीन रूप लेती हैं। आग्नेय चट्टानें तथा अन्य (अवसादी एवं कायांतरित) चट्टानें इन प्राथमिक चट्टानों से निर्मित होती हैं। आग्नेय चट्टानों को कायांतरित चट्टानों में परिवर्तित किया जा सकता है। आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों से प्राप्त अंशों से अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है। अवसादी चट्टानें अपखंडों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा ये अपखंड अवसादी चट्टानों के निर्माण का एक स्रोत हो सकते हैं।

विभिन्न प्रकार की चट्टानों की प्रकृति एवं अन्तर

1. आग्नेय चट्टान-आग्नेय चट्टानें कलेर, रवेदार एवं अप्रवेश्य होती हैं। इनमें जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं।
2. परतदार चट्टान-परतदार चट्टानें कोमल, प्रवेश्य, जीवाश्मयुक्त होती हैं। इनमें कणों के स्थान पर | परत पाई जाती हैं।
3. कायान्तरित चट्टान-ये चट्टानें कठोर होती हैं। टूटने पर इनके कण बिखर जाते हैं। इनकी उत्पत्ति धरातल से हजारों मीटर की गहराई पर होती है। ये चट्टानें विभिन्न रंगों वाली होती हैं।

प्रश्न (iii) कायान्तरित शैल क्या है? इनके प्रकार एवं निर्माण की पद्धति का वर्णन करें।
उत्तर-कायान्तरित का अर्थ हैं—रूप में परिवर्तन; अत: ऐसी आग्नेय एवं परतदार चट्टानें जिनका धरातल के नीचे ताप या दाब वृद्धि के कारण रूप बदल जाता है, कायान्तरित शैलें कहलाती हैं। इस प्रकार कायान्तरित चट्टानों का निर्माण पूर्व चट्टान के आयतन, दाब व तापमान में परिवर्तन के कारण होता है। उदाहरण के लिए, आग्नेय और तलछटी शैलों का उष्मा, संपीडन और विलियन द्वारा परिवर्तन होता है। संगमरमर, स्लेट और ग्रेफाइट इसी के द्वारा उत्पन्न कायान्तरित चट्टानें हैं। इन चट्टानों के रूप, रंग और। आकार में इतना परितर्वन हो जाता है कि इनके मूल रूप की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कायान्तरित चट्टानों के प्रकार

कायान्तरित चट्टानें रूप-परिवर्तन के परिणामस्वरूप निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं
1. गतिक कायान्तरित शैल-जब मूल चट्टान अत्यधिक दाब के कारण रूपान्तरित हो जाती है तो उसे गति कायान्तरित शैल कहते हैं। इस प्रकार से निर्मित कायान्तरित शैलों में ग्रेनाइट से नाईस तथा मिट्टी से शैल, शिष्ट आदि प्रमुख चट्टानें हैं।

2. तापीय कायान्तरित शैल-जब भूपर्पटी में अत्यधिक उष्मा के प्रभाव से अवसादी अथवा आग्नेय चट्टानों के खनिजों में रवों का पुनर्निर्माण या रूप परिवर्तन होता है तो उसे तापीय कायान्तरित शैल कहते हैं। इसे स्पर्श रूपान्तरित शैल भी कहते हैं। इस रूपान्तरण से चूना-पत्थर संगमरमर में, बालू क्वार्ट्जाइट में तथा चिकनी मिट्टी स्लेट में और कोयला ग्रेफाइट में बदल जाता

3. क्षेत्रीय/प्रादेशिक कायान्तरित शैल-इस स्थिति में बहुत गहराई पर ताप में हुई वृद्धि और भूसंचरण का दाब एक साथ मिलकर किसी बड़े क्षेत्र पर एक साथ कार्य करता है तो पूरे क्षेत्र की चट्टानों का रूपान्तरण हो जाता है। इसी से क्षेत्रीय अथवा प्रादेशिक कायान्तरित शैल बनती हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. “चट्टानें अधिकतर विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों का संयोग होती हैं।” यह कथन है|
(क) टॉर एवं मार्टिन का
(ख) सर आर्थर होम्स का।
(ग) कुमारी सैम्पुल का
(घ) गुटेनबर्ग का
उत्तर-(ख) सर आर्थर होम्स का।

प्रश्न 2. कायान्तरण या रूप-परिवर्तन के कारण हैं
(क) तापमान
(ख) सम्पीडन एवं दबाव
(ग) घोलन-शक्ति
(घ) ये सभी
उत्तर-(घ) ये सभी।

प्रश्न 3. जिप्सम है|
(क) अवसादी चट्टाने
(ख) आग्नेय चट्टान
(ग) रूपान्तरित चट्टान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) अवसादी चट्टान।।

प्रश्न 4. बेसाल्ट है
(क) अवसादी चट्टान
(ख) आग्नेय चट्टान
(ग) कायान्तरित चट्टान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(ख) आग्नेय चट्टान।

प्रश्न 5. निम्नांकित में से कौन-सी चट्टान कायान्तरित नहीं है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) नीस
(ग) शिस्ट (घ) संगमरमर
उत्तर-(क) ग्रेनाइट।

प्रश्न 6. सम्पीडन एवं दबाव किन शैलों के निर्माण में सहायक होते हैं?
या पृथ्वी के आन्तरिक भाग में कौन-सी चट्टान अधिक गर्मी व दबाव से बनी है?
(क) अवसादी शैलों के
(ख) आग्नेय शैलों के
(ग) कायान्तरित शैलों के
(घ) इनमें से किसी के भी नहीं
उत्तर-(ग) कायान्तरित शैलों के।

प्रश्न 7. निम्नलिखित में से कौन एक कायान्तरित चट्टान है?
(क) बालुका पत्थर
(ख) बेसाल्ट
(ग) संगमरमर
(घ) ग्रेनाइट
उत्तर-(ग) संगमरमर। ।

प्रश्न 8. निम्नलिखित में से कौन आग्नेय चट्टान है?
(क) बालुका पत्थर
(ख) स्लेट
(ग) बेसाल्ट
(घ) शैल
उत्तर-(ग) बेसाल्ट।

प्रश्न 9. निम्नलिखित में से कौन-सी कायान्तरित शैल है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) शैल
(ग) चूना-पत्थर
(घ) स्लेट
उत्तर-(घ) स्लेट।।

प्रश्न 10. निम्नलिखित में से कौन-सी आग्नेय चट्टान है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) चूना-पत्थर
(ग) शैल
(घ) स्लेट
उत्तर-(क) ग्रेनाइट।

प्रश्न 11. निम्नलिखित में से कौन-सी कायान्तरित चट्टान है?
(क) बेसाल्ट
(ख) क्वार्ट्जाइट
(ग) ग्रेनाइट
(घ) बालुका पत्थर
उत्तर-(ख) क्वार्ट्जाइट।

प्रश्न 12. रूपान्तरण क्रिया की सरल ऊर्जा है
(क) चट्टानों का विघटन
(ख) चट्टानों का वियोजन
(ग) चट्टानों का रूप परिवर्तन
(घ) चट्टानों की स्थिति में परिवर्तन
उत्तर-(ग) चट्टानों का रूप परिवर्तन।

प्रश्न 13. निम्नलिखित में से कौन परतदार चट्टान है?
(क) संगमरमर
(ख) स्लेट
(ग) चूने का पत्थर
(घ) बेसाल्ट
उत्तर-(ग) चूने का पत्थर।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. शैल या चट्टान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-भूपटल पर पाये जाने वाले वे समस्त पदार्थ जो धातुएँ नहीं हैं, चाहे वे चीका मिट्टी की तरह मुलायम हों या ग्रेनाइट की भाँति कठोर हों, चट्टान कहलाते हैं।

प्रश्न 2. आग्नेय चट्टानें कैसे बनती हैं?
उत्तर-पृथ्वी के भीतरी भागों से आन्तरिक क्रिया द्वारा पृथ्वी के ऊपरी धरातल पर जब पिघला हुआ पदार्थ ठोस रूप धारण करता है, तो आग्नेय चट्टानें बनती हैं।

प्रश्न 3. कायान्तरित या रूपान्तरित चट्टानें किन्हें कहते हैं?
उत्तर-जिन चट्टानों में दबाव, गर्मी एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनकी बनावट, रूप तथा खनिजों का पूरी तरह कायापलट हो जाता है, उन्हें कायान्तरित या रूपान्तरित चट्टानें कहते हैं।

प्रश्न 4. कायान्तरित या रूपान्तरित शैलों का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर-कायान्तरित या रूपान्तरित शैलों का निर्माण आग्नेय तथा अवसादी शैलों पर अत्यधिक दबाव तथा अधिक तापमानों के प्रभाव से उनके रूपान्तर द्वारा होता है।

प्रश्न 5. अवसादी शैलें कैसे बनती हैं?
उत्तर-अपक्षय और अपरदन के विभिन्न साधनों द्वारा धरातल, झीलों, सागरों एवं महासागरों में लगातार मलबा जमा होता रहता है। यह मलबा परतों के रूप में जमा होता रहता है। इस प्रकार लगातार मलबे की परत के ऊपर परत जमा होती रहती है। ऊपरी दबाव के कारण नीचे वाली परतें कुछ कठोर हो जाती हैं। ये परतें ही कठोर होकर अवसादी शैलें बन जाती हैं।

प्रश्न 6. आग्नेय शैलों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-आग्नेय शैलों की दो विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  • ये अत्यन्त कठोर होती हैं; अतः इनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता।
  • इन शैलों का निर्माण ज्वालामुखी से निकले गर्म एवं तप्त मैग्मा द्वारा होता है।

प्रश्न 7. प्रमुख कायान्तरित चट्टानों के नाम लिखिए।
उत्तर-प्रमुख कायान्तरित चट्टानें हैं—स्लेट, ग्रेफाइट, संगमरमर, हीरा, नीस आदि।

प्रश्न 8. पातालीय आग्नेय चट्टानें क्या हैं? उदाहरण देकर बताइए।
उत्तर-भूगर्भ का जो मैग्मा धरातल पर न आकर भीतरी भागों में बहुत अधिक गहराई पर ठण्डा होकर जम जाता है और उससे जो चट्टानें बनती हैं, वे पातालीय चट्टानें कहलाती हैं; जैसे-ग्रेनाइट और ग्रैबो।।

प्रश्न 9. कायान्तरित एवं आग्नेय चट्टानों के चार-चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर-कायान्तरित चट्टानें—(1) स्लेट, (2) नीस, (3) हीरा तथा (4) संगमरमर। | आग्नेय चट्टानें-(1) गैब्रो, (2) बेसाल्ट, (3) ग्रेनाइट तथा (4) सिल।।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए-चट्टानें खनिजों का समूह हैं।
उत्तर-कुछ चट्टानें एक ही खनिज से निर्मित होती हैं; जैसे—बलुआ पत्थर, चूना-पत्थर, संगमरमर आदि, किन्तु कुछ चट्टानें एक से अधिक खनिजों के सम्मिश्रण से बनी होती हैं; जैसे—ग्रेनाइट, स्फटिक, फेल्सफर और अभ्रक, जो तीन या चार खनिजों से मिलकर बनते हैं। कुछ अन्य अनेक प्रकार की धातु एवं अधातु खनिजों के जटिल मिश्रण से भी बनती हैं; जैसे-ऐलुमिना, कांग्लोमरेट, लिमोनाइट अयस्क आदि। भूवैज्ञानिकों द्वारा अब तक लगभग 2,000 खनिजों का पता लगाया जा चुका है, किन्तु भूपटल के निर्माण में इनमें से केवल 20 खनिज ही महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। खनिज विशेष प्रकार के गुणों वाला मूल-तत्त्वों का रासायनिक यौगिक (Chemical Compound) होता है। अभी तक 115 मूल तत्त्वों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकी है, किन्तु भू-पृष्ठ के निर्माण में इसमें से केवल 8 ही प्रमुख माने गये हैं। इस प्रकार भू-पृष्ठ का 98.59 प्रतिशत भाग केवल 8 खनिजों ऑक्सीजन (46.8), सिलिकन (27.7), ऐलुमिनियम (8.13), लोहा (5.0), कैल्सियम (3.63), सोडियम (2.83), पोटैशियम (2.49) और मैग्नीशियम (2.09) प्रतिशत से निर्मित है। पृथ्वी के शेष 1.41 प्रतिशत भाग की रचना टाइटैनियम, हाइड्रोजन फॉस्फोरस, कार्बन, मैंगनीज, गन्धक, बोरियम, क्लोरीन, सोना, चाँदी, ताँबा, पारा, सीसा आदि शेष सभी तत्त्वों से हुई है। इस प्रकार चट्टानें खनिजों का समूह हैं।

प्रश्न 2. शैलों के तापीय और गत्यात्मक कायान्तरण का अन्तर बताइए।
उत्तर-शैलों का तापीय कायान्तरण ज्वालामुखी क्रिया के द्वारा होता है। ज्वालामुखी क्रिया के दौरान उष्ण मैग्मा के मार्ग में पड़ने वाली शैलें अत्यधिक ताप के कारण परिवर्तित हो जाती हैं। इसे तापीय कायान्तरण कहते हैं। इसके विपरीत, गत्यात्मक कायान्तरण का कारण भूगर्भ की पर्वत निर्माणकारी हलचलें हैं। इन हलचलों के कारण शैलों में गतिशीलता उत्पन्न होती है। परिणामतः वे काफी गहराई पर पहुँच जाती हैं। अत्यधिक दबाव, भिंचाव तथा उष्णता के कारण उनमें कायान्तरण होता है।

प्रश्न 3. रूपान्तरण के मुख्य प्रकार बताइए।
उत्तर-रूपान्तरण के प्रभाव-क्षेत्र एवं उसके अभिकर्ताओं के अनुसार प्रमुख प्रकार निम्नवत् हैं–
1. संस्पर्शीय रूपान्तरण अथवा तापीय रूपान्तरण-जब तप्त मैग्मा के सम्पर्क में आकर शैल का रूप बदल जाता है तो उसे संस्पर्शीय या तापीय रूपान्तरण कहते हैं। भूगर्भ में बैथोलिथ सिल, डाइक आदि का निर्माण मैग्मा क्षेत्रों के निकटवर्ती भागों में शैलों के रूपान्तरण द्वारा इसी प्रकार : होता है। बलुआ-पत्थर से क्वार्ट्ज़ाइट और चूना पत्थर से संगमरमर इसी प्रकार बनी रूपान्तरित
शैलें हैं।

2. प्रादेशिक रूपान्तरण-जब रूपान्तरण की क्रिया अत्यधिक ताप एवं दबाव के कारण एक विस्तृत क्षेत्र में घटित होती है तो उसे प्रादेशिक रूपान्तरण कहते हैं। ऐसा रूपान्तरण प्रायः नवीन | पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यहाँ संगमरमर, स्लेट, सिस्ट, क्वार्ट्जाइट, नीस आदि रूपान्तरित शैलें व्यापक स्तर पर मिलती हैं।

प्रश्न 4. शैलों को वर्गीकृत कीजिए।
या शैल या चट्टान कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर-भू-पटल पर पाई जाने वाली शैलों को उनकी संरचना एवं गुणों के आधार पर निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है

1. आग्नेय या प्राथमिक शैल-यह शैल पृथ्वी के तरल मैग्मा के शीतल होने से सर्वप्रथम निर्मित हुई थी, इसलिए इसे प्राथमिक शैल कहते है।

2. परतदार या अवसादी शैल-जल भागों में अवसादों एवं जीवावशेषों के जमाव से निर्मित शैलें अवसादी शैलें कहलाती हैं। इनका निर्माण विभिन्न अपरदन कारकों जल, वायु, हिमानी आदि से होता है।

3. रूपान्तरित या कायान्तरित शैल-दाब एवं ताप के कारण अवसादी या आग्नेय शैलों के रूप परिवर्तन के फलस्वरूप कायान्तरित शैलों का निर्माण होता है।

प्रश्न 5. आग्नेय शैलों का रासायनिक संरचना के आधार पर वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-रासायनिक संरचना के आधार पर आग्नेयशैलों का वर्गीकरण-आग्नेय शैलों की संरचना में सिलिका प्रमुख घटक होता है। सिलिका की मात्रा के आधार पर इन्हें निम्नलिखित चार भागों में बाँटा गया हैं

  1. अधिसिलिका या अम्लप्रधान चट्टानें–इनका उदाहरण ग्रेनाइट और आब्सीडियन चट्टानें हैं। जिनमें सिलिका की मात्रा 65% से अधिक होती है। इन चट्टानों का रंग हल्का होता है।
  2. मध्यसिलिका चट्टानें-डायोराइट और एण्डोजाइट इसी प्रकार की चट्टानें हैं जिनमें सिलिका की मात्रा 55% से 65% तक होती है।
  3. अल्पसिलिका या बेसिक चट्टानें-इनमें सिलिका 45% से 55% तक पाया जाता है। इनका रंग गहरा होता है। बेसाल्ट और गैब्रो इनके उदाहरण हैं।
  4. अत्यल्प सिलिका या बेसिक चट्टानें-इनमें सिलिका की मात्रा 45% से भी कम होती है। पेरिडोटाइट इसी प्रकार की चट्टान है जो बहुत भारी होती है।

प्रश्न 6. कायान्तरित शैलों की मुख्य विशेषता एवं आर्थिक महत्त्व बताइए।
उत्तर-कायान्तरित शैलों की विशेषताएँ
कायान्तरित शैलों में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं

  • इन चट्टानों में रवे तो पाए जाते हैं, परन्तु परतों का प्रायः अभाव पाया जाता है। शैलों का कायान्तरण हो जाने के फलस्वरूप उनके जीवाश्म नष्ट हो जाते हैं।
  • ये शैलें संगठित तथा कठोर होती हैं: अतः इन पर ऋतु-अपक्षय एवं अपरदन की क्रियाओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • ये शैलें अरन्ध्र होती हैं, अतः इनमें जल प्रवेश नहीं कर पाता। इनका अपरदन तथा अपक्षये भी कठिनाई से होता है।
  • यद्यपि इन शैलों का निर्माण आग्नेय तथा परतदार शैलों के रूप-परिवर्तन से होता है, फिर भी इनमें मूल चट्टान का कोई लक्षण नहीं पाया जाता है।

कायान्तरित शैलों का आर्थिक महत्त्व

कायान्तरित शैलें आर्थिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती हैं। इन्हीं शैलों में सोना, हीरा, संगमरमर, चाँदी, ग्रेफाइट तथा चुम्बकीय लोहा जैसे मूल्यवान खनिज पाए जाते हैं, जिनका उपयोग उद्योगों तथा भवन-निर्माण के लिए किया जाता है। सोना, चाँदी तथा हीरा बहुमूल्य खनिज हैं। इन शैलों में गन्धक-मिश्रित जल के स्रोत पाए जाते हैं, जिनमें स्नान करने से त्वचा के रोग नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 7. प्रमुख कायान्तरित शैल एवं उनके मौलिक रूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- प्रमुख कायान्तरित शैलें तथा उनके मौलिक रूप
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प्रश्न 8. खनिज एवं चट्टान में अन्तर बताइए।
उत्तर-खनिज एवं चट्टान में अन्तर
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प्रश्न 9. रूपान्तरित एवं अवसादी शैलों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-रूपान्तरित एवं अवसादी शैलों में अन्तर
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प्रश्न 10. फोलिएशन (Foliation) एवं लिनिएशन (Lineation) में भेद कीजिए।
उत्तर-फोलिएशन (पत्रण)—जब रूपान्तरित शैल के कण कुछ परत के रूप में समान्तर अवस्था में पाए। जाते हैं तो इस प्रकार की कायान्तरित शैलों की बनावट फोलिएशन या पत्रण कहलाती है।
लिनिएशन—यह भी रूपान्तरित चट्टानों की एक विशेष बनावट है जिसके अन्तर्गत खनिजों के कण लम्बे, पतले तथा पेन्सिल के रूप में पाए जाते हैं।

प्रश्न 11. खनिजों का सामान्य वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-सामान्यतः खनिजों का वर्गीकरण धात्विक खनिज एवं अधात्विक खनिजों के रूप में किया जाता है
(क) धात्विक खनिज-इनमें धातु तत्त्वों की प्रधानता होती है। इन्हें तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है

  1. बहुमूल्य धातु खनिज-स्वर्ण, चाँदी, प्लेटिनम आदि।
  2. लौह धातु खनिज-लौह एवं स्टील के निर्माण के लिए प्रयुक्त खनिज; जैसे—मैंगनीज आदि।
  3. अलौहिक धातु खनिज-इनमें ताम्र, सीसा, जिंक, टिन, ऐलुमिनियम आदि धातुएँ सम्मिलित हैं।

(ख) अधात्विक खनिज-इसमें धातु के अंश उपस्थित नहीं होते हैं। गन्धक, फॉस्फेट तथा नाइट्रेट आदि अधात्विक खनिज के मुख्य उदाहरण हैं। सीमेण्ट अधात्विक खनिजों का मिश्रित पदार्थ है।

प्रश्न 12. निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी चट्टानों के तीन मुख्य प्रकार उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर–निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी शैलों के तीन मुख्य वर्ग निम्नलिखित हैं

  1. यांत्रिकी रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ; बालुकाश्म, पिण्डशिला, चूना प्रस्तर, शैल विमृदा आदि।
  2. कार्बनिक रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ, गीजराइट, खड़िया, चूना-पत्थर, कोयला आदि।
  3. रासायनिक रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ; श्रृंगार प्रस्तर, चूना-पत्थर, हेलाइट, पोटाश आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. खनिज को परिभाषित कीजिए तथा भौतिक विशेषताओं और स्वभाव के आधार पर खनिजों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-खनिज की परिभाषा
पृथ्वी से प्राप्त वे पदार्थ जिनकी साधारणतः एक विशेष प्रकार की रासायनिक संरचना होती है तथा जिसमें विशेष रासायनिक और भौतिक गुण पाए जाते हैं, उन्हें खनिज कहते हैं। खनिज प्राय: दो या दो से अधिक पदार्थों के मिश्रण से बनते हैं, परन्तु कुछ खनिज ऐसे भी हैं जो केवल एक ही पदार्थ से बनते हैं। जैसे–सल्फर, ग्रेफाइट, सोना आदि।।

भौतिक विशेषताएँ

  1. क्रिस्टल-खनिजों के कणों का ब्राह्यरूप अणुओं की आन्तरिक व्यवस्था द्वारा निश्चित होता है। खनिजों के कण घनाकार, अष्ट्भुजाकार या षट्भुजाकार भी हो सकते हैं।
  2. विदलन-खनिजों में विदलन प्रकृति दिशा द्वारा निश्चित होती है। खनिज एक या अनेक दिशाओं में एक-दूसरे से कोई भी कोण बनाकर टूट सकते हैं।
  3. विभंजन-खनिजों के अणुओं की आन्तरिक व्यवस्था अत्यन्त जटिल होती है। इसलिए इनमें विभाजन अनियमित होता है।
  4. चमक-प्रत्येक खनिज की अपनी चमक होती है; जैसे—मेटैलिक, रेशमी, ग्लॉसी आदि।
  5. रंग-खनिजों के रंग उनकी परमाणविक संरचना से तथा कुछ में अशुद्धियों के कारण निर्धारित होते हैं। मैलाकाइट, एजुराइट, कैल्सोपाइराट आदि परमाणविक संरचना के तथा अशुद्धियों के कारण क्वार्ट्ज का रंग श्वेत, हरा, लाल व पीला होना इसके मुख्य उदाहरण हैं।
  6. धारियाँ-खनिजों में विभिन्न रंगों के मिश्रण के कारण धारियाँ होती हैं।
  7. पारदर्शिता-खनिजों में पारदर्शिता के कारण प्रकाश की किरणें आर-पार हो जाती हैं। कुछ खनिज अपारदर्शी भी होते हैं।
  8. संरचना-प्रत्येक खनिज की संरचना भिन्न-भिन्न होती है, इसका निर्धारण क्रिस्टल की व्यवस्था पर निर्भर होता है।
  9. कठोरता-खनिज कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार के होते हैं, किन्तु अधिकांश खनिज कठोर ही होते हैं।

प्रश्न 2. शैल या चट्टान से आप क्या समझते हैं? चट्टानों का वर्गीकरण कीजिए तथा उनका आर्थिक महत्त्व बताइए।
या परतदार या अवसादी चट्टानों की उत्पत्ति, विशेषताओं एवं आर्थिक महत्त्व की विवेचना कीजिए।
या शैलों को वर्गीकृत कीजिए तथा आग्नेय शैलों की विशेषताएँ एवं आर्थिक महत्त्व बताइए।
या अवसादी शैलों का वर्गीकरण कीजिए एवं प्रत्येक की विशेषताएँ बताइए।
या आग्नेय शैलों की उत्पत्ति, विशेषताओं एवं आर्थिक महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर-शैल या चट्टान का अर्थ एवं परिभाषा
सामान्य रूप से भूतल की रचना जिन पदार्थों से हुई है, उन्हें चट्टान या शैल के नाम से पुकारते हैं। चट्टानें अनेक खनिज पदार्थों का सम्मिश्रण होती हैं। खनिज पदार्थों का यह सम्मिश्रण रासायनिक तत्त्वों का योग होता है। वर्तमान वैज्ञानिक युग में 115 मूल तत्त्वों की खोज कर ली गयी है। उपर्युक्त तत्त्वों में धरातलीय संरचना का लगभग 98% भाग केवल आठ तत्त्वों-ऑक्सीजन, सिलिकन, ऐलुमिनियम, लोहा, कैल्सियम, सोडियम, पोटैशियम एवं मैग्नीशियम द्वारा निर्मित है। शेष 2% भाग 98 तत्त्वों के योग से बना है। इसके अतिरिक्त प्रकृति द्वारा प्रदत्त अन्य तत्त्वे भी धरातलीय निर्माण में सहायक हुए हैं।

‘चट्टान’ शब्द का शाब्दिक अर्थ किसी दृढ़ एवं कठोर स्थलखण्ड से लिया जाता है, परन्तु भूतल की ऊपरी पपड़ी में मिले हुए सभी पदार्थ, चाहे वे ग्रेनाइट की भाँति कठोर हों या चीका की भाँति कोमल, चट्टान कहलाते हैं। आर्थर होम्स का मत है कि “शैल अथवा चट्टानों का अधिकतम भाग खनिज पदार्थों कां सम्मिश्रण होता है।” खनिज पदार्थों के सम्मिश्रण चाहे चीका के समान कोमल हों या क्वार्ट्जाइट के समान ठोस या बालू के समान ढीले तथा मोटे कण वाले हों, सभी चट्टान कहलाते हैं। इस आधार पर चट्टान की परिभाषा इन शब्दों में व्यक्त की जा सकती है-“चट्टान अपनी भौतिक स्थिति का वह पिण्ड है जिसके द्वारा धरातल का ठोस रूप परिणत हुआ है।” वास्तव में भूपटल के निर्माण में सहयोग देने वाले सभी तत्त्व शैल या चट्टान कहलाते हैं।

चट्टानों का वर्गीकरण

सामान्य रूप से चट्टानों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

  • आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks),
  • अवसादी या परतदार चट्टानें (Sedimentary Rocks) एवं
  • कायान्तरित या रूपान्तरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)।

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)-‘आग्नेय’ शब्द लैटिन भाषा के Igneous शब्द का रूपान्तरण है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अग्नि’ से होता है। भूगोलवेत्ताओं का विचार है कि प्रारम्भ में सम्पूर्ण पृथ्वी आग की तपता हुआ एक गोला थी, जो धीरे-धीरे ठण्डी होकर द्रव अवस्था में परिणत हुई है। द्रव अवस्था से ठोस तथा इस ठोस अवस्था से अधिकांशत: आग्नेय चट्टानें बनी हैं। वारसेस्टर नामक भूगोलवेत्ता का कथन है कि “द्रव अवस्था वाली चट्टानें जब ठण्डी होकर ठोस अवस्था में परिवर्तित हुईं, वे ही आग्नेय चट्टानें बनीं।” जब भूगर्भ का गर्म एवं द्रवित लावा । ज्वालामुखी क्रिया द्वारा धरातल पर फैलने से ठण्डा होकर ठोस बनने लगा, तभी आग्नेय चट्टानों को निर्माण हुआ। ज्वालामुखी क्रिया द्वारा इन चट्टानों का निर्माण आज भी होता रहता है, क्योंकि ये प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अन्य चट्टानों को भी जन्म देती हैं।

आग्नेय चट्टानों की विशेषताएँ–

  1. इन चट्टानों का निर्माण ज्वालामुखी से निकले गर्म एवं तप्त मैग्मा द्वारा होता है।
  2. ये अत्यन्त कठोर होती हैं और इनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता। जल का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ती है, परन्तु ये विखण्डन के कारण टूट जाती हैं।
  3. इन चट्टानों के रवे बड़े ही महीन होते हैं। इन रवों को कोई आकार तथा क्रम नहीं होता।
  4. इन चट्टानों का स्वरूप कभी गोलाकार स्थिति में नहीं मिलता है।
  5. ये चट्टानें सघन होती हैं। इनमें परतों का अस्तित्व देखने को भी नहीं मिलता, परन्तु ज्वालामुखी उद्गार के क्रमशः होते रहने से परतों की भ्रान्ति हो सकती है। इन चट्टानों के वर्गाकार जोड़ों पर ही ऋतु-अपक्षय का प्रभाव पड़ता है।
  6. इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) नहीं पाये जाते हैं, क्योंकि तप्त एवं तरल लावा इन्हें | नष्ट कर देता है। यह इन शैलों की सबसे बड़ी विशेषता है।
  7. आग्नेय चट्टानों में अनेक खनिज पाये जाते हैं।

आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण- विश्व में प्राचीनतम आग्नेय चट्टानों की आयु लगभग 15 अरब वर्ष ऑकी गयी है। इस प्रकार की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत में अधिक पायी जाती हैं। राजस्थान का अरावली पर्वत, छोटा नागपुर की गुम्बदनुमा पहाड़ियाँ, राजमहल की श्रेणी और रॉची का पठार इस प्रकार की चट्टानों के बने हैं। अजन्ता की गुफाएँ इन्हीं चट्टानों को काटकर बनाई गयी हैं। स्थिति के अनुसार आग्नेय चट्टानों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है(अ) आभ्यन्तरिक या आन्तरिक आग्नेय चट्टानें (Intrusive Rocks) एवं (ब) बाह्य आग्नेय चट्टानें (Extrusive Rocks)।
(अ) आभ्यन्तरिक या आन्तरिक आग्नेय चट्टानें (Intrusive Rocks)-जब गर्म एवं तप्त लावा अत्यधिक ताप एवं एकत्रित गैस के माध्यम से भूगर्भ की चट्टानों को तोड़कर ऊपर आने का प्रयास करता है तो लावे का अधिकांश भाग भूगर्भ में नीचे की परतों में ही रह जाता है। यह लावा वहीं ठण्डा होकर आग्नेय चट्टानों में परिवर्तित हो जाता है, जिन्हें आभ्यन्तरिक या आन्तरिक चट्टानें कहते हैं। लावे के शीतल होने की अवधि के आधार पर इन चट्टानों को निम्नलिखित उप-विभागों में बाँटा जा सकता है

(i) पातालीय आग्नेय चट्टानें (Plutonic lgneous Rocks)-जब भूगर्भ का गर्म एवं तप्त लावा बाहर न निकलकर अन्दर ही अन्दर जमकर ठोस हो जाता है, तो पातालीय आग्नेय शैल का निर्माण होता है। इनमें मोटे रवे पाये जाते हैं। ग्रेनाइट शैल इसका प्रमुख उदाहरण है।

(ii) अर्द्ध-पातालीय आग्नेय चट्टानें (Hypabyssal-Igneous Rocks)-इन्हें मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें या अधिवितलीय आग्नेय चट्टानें भी कहते हैं। जब भूगर्भ का गर्म एवं तप्त लावा पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी पर आने में असमर्थ रहता है तथा मार्ग में पड़ने वाली सन्धियों एवं दरारों में पहुँचकर जम जाता है, तब यही लावा बाद में ठण्डा होकर चट्टानों को रूप धारण कर लेता है। इन्हें अर्द्ध-पातालीय आग्नेय चट्टानों के नाम से पुकारते हैं। इनमें रवे छोटे आकार के होते हैं। लैकोलिथ, लैपोलिथ, फैकोलिथ, सिल, डाइक आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(ब) बाह्य आग्नेय चट्टानें (Extrusive Igneous Rocks)-जब भूगर्भ का तप्त एवं तरल लावा किसी कारणवश ज्वालामुखी उद्गार द्वारा धरातल के ऊपर ठोस रूप में जम जाता है। तो वह चट्टान का रूप धारण कर लेता है। इससे जिन चट्टानों का निर्माण होता है, उन्हें बाह्य आग्नेय चट्टानें कहते हैं। इनमें रवे नहीं होते। गैब्रो तथा बेसाल्ट ऐसी ही शैलें हैं।

आग्नेय चट्टानों का आर्थिक उपयोग (लाभ)-आग्नेय चट्टानों में विभिन्न प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। अधिकांश खनिज व धातु-अयस्क इसी प्रकार की चट्टानों में पाये जाते हैं। लौह-अयस्क,सोना, चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा, मैंगनीज आदि महत्त्वपूर्ण धातु खनिज आग्नेय चट्टानों में पाये जाते हैं।

ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों का उपयोग भवन-निर्माण में व उसके सजाने में किया जाता है। भारत के छोटा नागपुर, ब्राजील का मध्य पठारी भाग, संयुक्त राज्य अमेरिका व कनाडा के लोरेंशियन शील्ड के भागों में आग्नेय चट्टानों में अधिकांश खनिज पाये जाते हैं।

2. अवसादी या परतदार चट्टानें (Sedimentary Rocks)-भूतल के 75% भाग पर अवसादी या परतदार चट्टानों का विस्तार है, शेष 25% भाग में आग्नेय एवं कायान्तरित चट्टानें विस्तृत हैं। इन चट्टानों का निर्माण अवसादों के एकत्रीकरण से हुआ है। अपक्षय एवं अपरदन के विभिन्न साधनों द्वारा धरातल, झीलों, सागरों एवं महासागरों में लगातार मलबा (Debris) जमा होता रहता है। यह मलबा परतों के रूप में जमा होता रहता है। इस प्रकार लगातार मलबे की परत के ऊपर परत जमा होती रहती है। अत: ऊपरी दबाव के कारण नीचे वाली परतें कुछ कठोर हो जाती हैं। इन परतों के विषय में पी० जी० वारसेस्टर ने कहा है कि ‘अवसादी चट्टानों का अर्थ होता है–धरातलीय चट्टानों के टूटे मलबे तथा खनिज पदार्थ किसी स्थान पर एकत्र होते रहते हैं, जो धीरे-धीरे एक परत का रूप ले लेते हैं।” यही परतें कठोर होकर पंरतदार शैलें बन जाती हैं। इन चट्टानों में कणों के जमने का क्रम भी एक निश्चित गति से होता है। पहले मोटे कण जमा होते हैं तथा बाद में उनके ऊपर छोटे-छोटे कण जमा होते जाते हैं तथा इनके ऊपर एक महीन एवं बारीक कणों की परत जमा हो जाती है। इस प्रकार कणों का जमाव अपरदन के साधनों के ऊपर निर्भर करता है। बाद में ये चट्टानें संगठित हो जाती हैं। अवसादों के जल-क्षेत्रों में जमाव के कारण इन चट्टानों में जीवाश्म पाये जाते हैं। आरम्भिक अवस्था में इन चट्टानों का निर्माण समतल भूमि एवं जल-क्षेत्रों में होता है, परन्तु कालान्तर में इन्हीं चट्टानों द्वारा ऊँचे-ऊँचे वलित पर्वतों का निर्माण भी ‘होता है। इन चट्टानों को जोड़ने वाले मुख्य तत्त्व कैलसाइट, लौह-मिश्रण तथा सिलिका आदि हैं। भारत में इनके क्षेत्र गंगा, यमुना, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, ताप्ती, महानदी, दामोदर, कृष्णा, गोदावरी आदि नदी-घाटियाँ हैं।

अवसादी चट्टानों की विशेषताएँ—अवसादी चट्टानों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  1. अवसादी चट्टानों में जीवावशेष पाये जाते हैं। इन अवशेषों से इन चट्टानों के समय तथा स्थान का भूतकालीन परिचय प्राप्त हो जाता है।
  2. ये चट्टानें कोमल तथा रवेविहीन होती हैं।
  3. इन चट्टानों की निर्माण-प्रक्रिया में छोटे-बड़े सभी प्रकार के कणों का योग होता है, जिससे इनके आकार में भी भिन्नता रहती है।
  4. इन चट्टानों में परतें पायी जाती हैं जो स्तरों के रूप में एक-दूसरी पर समतल रूप में फैल जाती हैं।
  5. सागरीय जल में बनने वाली चट्टानों में धाराओं तथा लहरों के चिह्न स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
  6. इन चट्टानों को चाकू अथवा किसी लोहे की छड़ से खुरचने पर धारियाँ स्पष्ट रूप से बन जाती हैं। इन खुरचे हुए पदार्थों के विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें विभिन्न खनिज पदार्थों का मिश्रण होता है।
  7. ये चट्टानें सरन्ध्र अर्थात् प्रवेश्य होती हैं। जल इन चट्टानों में शीघ्रता से प्रवेश कर जाता है।
  8. नदियों की बाढ़ द्वारा लाई गयी कांप मिट्टी पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो उष्णता के कारण इनमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे पंक-फटन कहते हैं।
  9. परतदार चट्टानों में जोड़ तथा सन्धियाँ पायी जाती हैं।
  10. कोयला, पेट्रोल, जिप्सम, डोलोमाइट व नमक जैसे खनिज अवसादी शैलों में ही पाये जाते हैं।
  11. कृषि-कार्य, सिंचाई के साधनों का विकास करने तथा भवन निर्माण में अवसादी शैलों का अधिक महत्त्व है।

अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण—(क) निर्माण में प्रयुक्त साधन के अनुसार अवसादी शैलों का वर्गीकरण-अवसादी चट्टानों की निर्माण-प्रक्रिया के साधनों या, कारकों के आधार पर इन्हें ‘निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है

(i) जल-निर्मित (जलज) चट्टानें-अवसादी शैलों के निर्माण में जल का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। पृथ्वीतल पर अधिकांश अवसादी चट्टानें जल द्वारा ही निर्मित हुई हैं। इनमें भी सबसे अधिक योगदान नदियों का रहा है। इन चट्टानों का निर्माण जलीय क्षेत्रों में होता है; अतः इन्हें जलज चट्टानें भी कहते हैं। जल द्वारा निर्मित अवसादी चट्टानों को निम्नलिखित तीन उपविभागों में बाँटा जा सकता है—(अ) नदीकृत चट्टानें, (ब) समुद्रकृत चट्टानें तथा (स) झीलकृत चट्टानें।

(ii) वायु-निर्मित चट्टानें-उष्ण एवं शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्रों की चट्टानों में यान्त्रिक अपक्षय तथा अपघटन जारी रहता है। इसलिए बहुत-सा मलबा चूर्ण एवं कणों के आकार में बिखरा पड़ा रहता है। वायु इस मलबे को समय-समय पर विभिन्न स्थानों पर लगातार परतों के रूप में जमा करती रहती है। बाद में इस जमा हुए मलबे से अवसादी चट्टानों का निर्माण हो जाता है। लोयस के जमाव इसी प्रकार होते हैं।

(iii) हिमानी-निर्मित चट्टानें-उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हिमानियाँ अपरदन एवं निक्षेपण की क्रियाएँ करती हैं। निक्षेपण की क्रिया से हिमानीकृत जो अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है, उन्हें ‘हिमोढ़’ अथवा ‘मोरेन’ कहा जाता है।

(ख) निर्माण प्रक्रिया के अनुसार अवसादी शैलों का वर्गीकरण-निर्माण-प्रक्रिया के अनुसार अवसादी शैलों का वर्गीकरण निम्नवत् है–
(i) बलकृत या यन्त्रीकृत अवसादी शैलें-अपरदन के साधनों; जैसे–बहते हुए जल, हिम, पवन, लहरों के द्वारा विभिन्न आकारों में अवसाद जमा किये जाते हैं। इन अवसादों से शैलें बनती हैं। कणों की मोटाई के आधार पर चीका मिट्टी (सूक्ष्म कण), बलुआ पत्थर (मध्यम कण) तथा कांग्लोमरेट या गोलाश्म बलकृत अवसादी शैलों के उदाहरण हैं।

(ii) जैविक तत्त्वों से निर्मित चट्टानें-वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं आदि के अवशेष भूतल में दब जाने से काफी समय बाद कार्बनिक चट्टानों के रूप में परिणत हो जाते हैं। दबाव की क्रिया के फलस्वरूप ये कठोर रूप धारण कर लेते हैं। इस क्रिया में निर्मित चट्टानों में कोयला, मूंगे की चट्टान, चूने का पत्थर एवं पीट आदि का , महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(iii) रासायनिक तत्त्वों से निर्मित चट्टानें-इन चट्टानों का निर्माण चूने एवं जीव-जन्तुओं के अवशेषों का जल में घुलकर होने से हुआ है। अधिकांशतः इन चट्टानों के जमाव समुद्री भागों में मिलते हैं। जब चट्टानों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैसें प्रवेश करती हैं तो वे चट्टानों के रासायनिक संगठन को परिवर्तित कर देती हैं। खड़िया, सेलखड़ी, डोलोमाइट, जिप्सम, नमक आदि इसी प्रकार की चट्टानें हैं। इन चट्टानों पर अपक्षय की क्रियाओं का प्रभाव शीघ्रता से पड़ता है।

अवसादी चट्टानों का आर्थिक उपयोग (लाभ)-अवसादी चट्टाने अनेक प्रकार से उपयोगी हैं। वर्तमान में सभी देशों में नदियों द्वारा निर्मित समतल अवसादी मैदान, बालू के महीन जमाव के लोयस के मैदान आदि विश्व के सबसे उपजाऊ एवं सघन क्रियाकलाप एवं सघन बसाव के प्रदेश हैं। विश्व की सभ्यता के विकास का निर्माण इन्हीं उपजाऊ एवं सघन मैदानों में किया जाता रहा है। बलुआ पत्थर, चूने के पत्थर आदि का उपयोग भवन-निर्माण में किया जाता है। चूना एवं डोलोमाइट व अन्य मिट्टियाँ इस्पात उद्योग में काम आती हैं। अवसादी चट्टानों से प्राप्त चूने के पत्थर का उपयोग सीमेण्ट बनाने में किया जाता है। सीमेण्ट उद्योग आज विश्व के प्रमुख उद्योगों में गिना जाता है।

जिप्सम का उपयोग विविध प्रकार के उद्योगों—चीनी मिट्टी के बर्तन, सीमेण्ट आदि में किया जाता है।

अनेक प्रकार के क्षार, रसायन, पोटाश एवं नमक जो कि अवसादी चट्टानों से प्राप्त होते हैं— विभिन्न रासायनिक उद्योगों के आधार हैं। कोयला एवं खनिज तेल भी अवसादी चट्टानों से प्राप्त होते हैं। ये शक्ति के प्रमुख स्रोत हैं। आज का औद्योगिक विकास कोयले के कारण ही सम्भव हो सका है।

3. कायान्तरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)–इन्हें रूपान्तरित चट्टानों के नाम से भी पुकारा जाता है। अंग्रेजी भाषा का मेटामोरफिक’ शब्द मेटा एवं मार्फे शब्दों के सम्मिलन से बना है। अतः मेटा का अर्थ परिवर्तन तथा मार्फे का अर्थ रूप से है अर्थात् ”जिन चट्टानों में दबाव, गर्मी एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा उनकी बनावट, रूप तथा खनिजों का पूर्णरूपेण कायापलट हो जाता है, कायान्तरित चट्टानें कहलाती हैं।” विश्व के प्राय: सभी प्राचीन पठारों पर कायान्तरित चट्टानें मिलती हैं। भारत में ऐसी चट्टानें दक्षिण के प्रायद्वीप, दक्षिण अफ्रीका के पठारे और दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील के पठार, उत्तरी कनाडा, स्कैण्डेनेविया, अरब, उत्तरी रूस और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पठार पर पायी जाती हैं।

चट्टानों का कायान्तरण भौतिक तथा रासायनिक दोनों ही क्रियाओं से सम्पन्न होता है। इसमें चट्टान एवं खनिज का रूप पूरी तरह से परिवर्तित हो जाता है। इन चट्टानों में भूगर्भ के ताप, दबाव, जलवाष्प, भूकम्प आदि कारणों से उनके मूल गुणों में परिवर्तन आ जाता है। रूप-परिवर्तन के बाद इनकी प्रारम्भिक स्थिति भी नहीं बतायी जा सकती। मूल चट्टान के रूपान्तरण से उसके रूप, रंग,
आकार तथा गुण आदि में पूर्ण परिवर्तन हो जाता है तथा वह अपने प्रारम्भिक रूप को खो देती है, जिससे मूल चट्टान में कठोरता आ जाती है। कभी-कभी एक ही चट्टान कई रूप धारण कर लेती है। चूना-पत्थर के रूपान्तरण से संगमरमर नामक पत्थर को निर्माण होता है। यह रूपान्तरण आग्नेय एवं अवसादी, दोनों ही चट्टानों का हो सकता है।

कायान्तरण अथवा रूप-परिवर्तन के कारण—चट्टानों का कायान्तरण निम्नलिखित कारणों के फलस्वरूप होता है–
1. तापमान-कायान्तरण का एक प्रमुख कारण तापक्रम है। भूगर्भ का अत्यधिक तापमान ज्वालामुखी उद्गार एवं पर्वत निर्माणकारी हलचलों को जन्म देता है जिससे चट्टानों का रूप-परिवर्तन हो जाता है।

2. सम्पीडन एवं दबाव-कायान्तरण में महाद्वीपों पर पर्वत–निर्माणकारी बलों एवं भूकम्प आदि से चट्टानों पर भारी दबाव पड़ता है जिससे चट्टानें टूटती ही नहीं, बल्कि उनका रूपान्तरण अथवा कायान्तरण हो जाता है।

3. घोलन शक्ति-सामान्यतया जल सभी पदार्थों को अपने में घोलने की शक्ति रखता है, परन्तु जब इस जल में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें मिलती हैं तो इसकी घुलन-शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। वर्षा का जल इसका प्रमुख उदाहरण है। वर्षा का जल चट्टानों के साथ मिलकर रासायनिक अपरदन का कार्य करता है जिससे वह चट्टानों को अपने में घोल लेता है। इससे चट्टानों की संरचना में रासायनिक रूपान्तरण हो जाता है।

इस प्रकार आग्नेय चट्टानें शिस्ट में, शैल स्लेट में, ग्रेनाइट नीस में, बलुआ पत्थर क्वार्ट्जाइट में, बिटुमिनस एन्थ्रेसाइट में तथा चूना-पत्थर संगमरमर में रूपान्तरित हो जाती हैं। कायान्तरित चट्टानों की विशेषताएँ—कायान्तरित चट्टानों में अग्रलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  • ये चट्टानें संगठित हो जाने से कठोर हो जाती हैं; अतः इन पर अपक्षय एवं अपरदन क्रियाओं का प्रभाव बहुत ही कम पड़ता है।
  • इन चट्टानों की संरचना अरन्ध्र होती है; अतः इनमें जल प्रवेश नहीं कर सकता।
  • ये चट्टानें रवेदार होती हैं, परन्तु इनमें परतें नहीं पायी जातीं।
  • कायान्तरण की क्रिया के कारण इन चट्टानों में जीवाश्म नहीं पाये जाते हैं।
  • कायान्तरण आग्नेय एवं अवसादी चट्टानों का होता है, परन्तु बाद में इनमें मूल अर्थात् प्रारम्भिक चट्टान की कोई लक्षण नहीं पाया जाता।
  • इन चट्टानों में सोना, हीरा, संगमरमर, चाँदी आदि बहुमूल्य खनिज पाये जाते हैं।

कायान्तरित चट्टानों का आर्थिक उपयोग (लाभ)-कायान्तरित चट्टानों में अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण धातु खनिज पाये जाते हैं जो मानव के लिए अनेक प्रकार से उपयोगी हैं। अधिकांश बहुमूल्य खनिज (संगमरमर, सोना, चाँदी और हीरा) कायान्तरित चट्टानों से ही प्राप्त होते हैं। संगमरमर, जो एक प्रमुख कायान्तरित चट्टान है, भवन निर्माण में प्रयोग होता है। विश्वप्रसिद्ध ताजमहल एवं अनेक महत्त्वपूर्ण मन्दिर इसी प्रकार की चट्टान (संगमरमर) से निर्मित हैं। एन्थेसाइट कोयला, ग्रेनाइट एवं हीरा भी बहु-उपयोगी कायान्तरित चट्टानें हैं। अभ्रक जैसे खनिज भी बार-बार अवसादी चट्टानों के कायान्तरण होने से बनते हैं। कठोर क्वार्ट्जाइट का निर्माण भी अवसादी चट्टान के कायान्तरण से हुआ है एवं इसका उपयोग सुरक्षा एवं अन्य विशेष धातु उद्योग में अधिक होता है।

चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

चट्टानें मानवीय जीवन के लिए अति महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी होती हैं। मानव को लगभग 2,000 वस्तुएँ चट्टानों एवं इनके माध्यम से प्राप्त होती हैं। पर्वत निर्माणकारी घटनाएँ, भूकम्प आदि विस्तृत वन क्षेत्रों को मिट्टी में दबा देती हैं, कालान्तर में ये कोयले में परिणत हो जाते हैं। कोयले की निर्माण प्रक्रिया में भी चट्टानों का अधिक हाथ रहता है। इमारती पत्थर, औद्योगिक खनिज-लोहा, कोयला एवं खनिज तेल तथा कीमती धातुएँ–सोना, चाँदी, टिन आदि इन्हीं चट्टानों से प्राप्त होती हैं। समस्त पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी जिस पर मानव एवं जीव-जगत बसा हुआ है, चट्टानों के बारीक चूर्ण से ही निर्मित हुई है। चट्टानों के आर्थिक महत्त्व को निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है–

1. कृषि के क्षेत्र में-उपजाऊ मिट्टी कृषि का आधार है। उपजाऊ मिट्टी के निर्माण में शैलों का विशेष महत्त्व रहता है। शैल चूर्ण जमकर ही उपजाऊ मिट्टी को जन्म देते हैं। अन्न, फल, शाक, भाजी, कपास, गन्ना, रबड़, नारियल, चाय, कहवा तथा गरम मसाले सभी मिट्टी में ही उगाये जाते हैं।

2. चरागाहों के क्षेत्र में-हरी घास के विस्तृत क्षेत्र चरागाह कहलाते हैं। हरी घास पशुओं को पौष्टिक चारा उपलब्ध कराती है। चरागाह पशुपालन के आदर्श क्षेत्र माने जाते हैं। हरी घास शैलों में ही उगा करती है; अत: पशुचारण और पशुपालन में भी शैलों की उपयोगिता अद्वितीय मानी गयी है।

3. भवन-निर्माण के क्षेत्र में-पत्श्रर भवन-निर्माण की प्रमुख सामग्री है। स्लेट, चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर तथा संगमरमर भवन-निर्माण में सहयोग देते हैं। भवन-निर्माण का सस्ता और टिकाऊ मसाला चट्टानों से प्राप्त पदार्थों से ही बनाया जाता है। संगमरमर तथा ग्रेनाइट पत्थर भवनों को सुन्दर तथा भव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।

4. खनिज उत्पादन के क्षेत्र में-खनिज पदार्थों का जन्म भूगर्भ में शैलों द्वारा ही होता है। शैलें सोना,चाँदी, ताँबा, लोहा, कोयला, मैंगनीज तथा अभ्रक आदि उपयोगी खनिजों को जन्म देकर जहाँ मानव के कल्याण की राह खोलती हैं, वहीं कोयला तथा खनिज तेल देकर ऊर्जा तथा तापमान के स्रोत बन जाती हैं।

5. उद्योगों को कच्चे माल प्रदान करने के क्षेत्र में- कृषिगत उपजों, वन्य पदार्थों तथा खनिज पदार्थों पर अनेक उद्योग-धन्धे निर्भर होते हैं। चट्टानें एक ओर तो उद्योगों को कच्चे माल देकर उनका पोषण करती हैं और दूसरी ओर शक्ति के साधनों की आपूर्ति करके उन्हें ऊर्जा तथा चालक-शक्ति प्रदान करती हैं। राष्ट्र का आर्थिक विकास जहाँ उद्योग-धन्धों पर निर्भर है, वहीं उद्योग-धन्धों का विकास शैलों से प्राप्त कच्चे मालों पर निर्भर करता है।

6. मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के क्षेत्र में- शैलें मानव को उसकी तीनों प्रथमिक आवश्यकताओं-भोजन, वस्त्र और मकान की आपूर्ति कराती हैं। मानव के पोषण में शैलों की विशेष सहयोग रहता है।

7. पेयजल स्रोतों के रूप में- पृथ्वी पर मानव के लिए पेयजल भूस्तरीय जल के अतिरिक्त भूगर्भीय जल भी होता है। भूगर्भीय जल चट्टानों में स्वस्थ और सुरक्षित रहता है। भूस्तरीय जल नदियों, झरनों और झीलों के रूप में तथा भूगर्भीय जल हैण्डपम्पों, पम्पसेटों तथा नलकूपों के द्वारा प्राप्त होता है।

8. मानवीय सभ्यता के गणक के रूप में-मानव सभ्यता का ज्ञान प्रदान कराने में चट्टानों का विशेष , योगदान रहता है। पृथ्वी की आयु व आन्तरिक संरचना चट्टानों की निर्माण-प्रक्रिया को आधार मानकर ही ज्ञात की जाती है।

शैलों की रचना तथा निर्माण प्रक्रिया के अध्ययन से भूविज्ञान तथा भूगर्भ विज्ञान के अध्ययन में बहुत सहायता मिलती है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि शैलें मानव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं तथा उसे अधिक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराती हैं। वर्तमान विश्व का सम्पूर्ण औद्योगिक ढाँचा तथा प्रौद्योगिकी तन्त्र शैलों से ही अनुप्रमाणित है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship (नागरिकता)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में नागरिकता में अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। समकालीन लोकतान्त्रिक राज्यों में नागरिक किन अधिकारों के उपभोग की अपेक्षा कर सकते हैं? नागरिकों के राज्य और अन्य नागरिकों के प्रति क्या
दायित्व हैं?
उत्तर-
समकालीन विश्व में राष्ट्रों ने अपने सदस्यों को एक सामूहिक राजनीतिक पहचान के साथ-साथ कुछ अधिकार भी प्रदान किए हैं। नागरिकों को प्रदत्त अधिकारों की सुस्पष्ट प्रकृति विभिन्न राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न हो सकती है, लेकिन अधिकतर लोकतान्त्रिक देशों ने आज उनमें कुछ राजनीतिक अधिकार शामिल किए हैं। उदाहरणस्वरूप, मतदान अभिव्यक्ति या आस्था की आजादी जैसे नागरिक अधिकार और न्यूनतम मजदूरी या शिक्षा पाने से जुड़े कुछ सामाजिक-आर्थिक अधिकार अधिकारों और प्रतिष्ठा की समानता नागरिकता के बुनियादी अधिकारों में से एक है।

प्रश्न 2.
सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए तो जा सकते हैं लेकिन हो सकता है कि वे इन अधिकारों का प्रयोग समानता से न कर सकें। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देने पर विचार करना और सुनिश्चित करना किसी सरकार के लिए सरल नहीं होता। विभिन्न समूह के लोगों की आवश्यकताएँ और समस्याएँ अलग-अलग हो सकती हैं और एक समूह के अधिकार दूसरे समूह के अधिकारों के प्रतिकूल हो सकते हैं। नागरिकों के लिए समान अधिकार का आशय यह नहीं होता कि सभी लोगों पर समान नीतियाँ लागू की दी जाएँ, क्योंकि विभिन्न समूह के लोगों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। अगर उद्देश्य केवल ऐसी नीति बनाना नहीं है जो सभी लोगों पर एक तरह से लागू हों बल्कि लोगों को अधिक बराबरी पर लाना है तो नीतियों का निर्माण करते समय विभिन्न आवश्यकताओं और दावों का ध्यान रखना होगा।

प्रश्न 3.
भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हाल के वर्षों में किए गए किन्हीं दो संघर्षों पर टिप्पणी लिखिए। इन संघर्षों में किन अधिकारों की मॉग की गई थी?
उत्तर-
झोपड़पट्टी वाली का आन्दोलन – भारत के प्रत्येक शहर में एक बड़ी जनसंख्या झोपड़पट्टियों और अवैध कब्जे की जमीन पर बसे लोगों की हैं। यद्यपि ये लोग अपरिहार्य और उपयोगी काम अक्सर कम मजदूरी पर करते हैं फिर भी शहर की शेष जनसंख्या उन्हें अवांछनीय अतिथि के रूप में देखती है। उन पर शहर के संसाधनों पर बोझ बनने या अपराध करने का आरोप लगाया जाता हैं।

गन्दी बस्तियों की दशा अत्यन्त दयनीय होती है। छोटे-छोटे कमरों में बहुत-से लोग हुँसे रहते हैं। यहाँ न निजी शौचालय होता है, न जलापूर्ति और न सफाई व्यवस्था। गन्दी बस्तियों में जीवन और सम्पत्ति असुरक्षित होते हैं। झोपड़ी-पट्टियों के निवासी अपने श्रम से अर्थव्यव्सथा में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। अन्य व्यवसायों के बीच ये फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफाई कर्मी या घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री होते हैं। झोपड़-पट्टियों में बेत-बुनाई या कपड़ा-हँगाई-छपाई या सिलाई जैसे छोटे व्यवसाय भी चलते हैं।

झोपड़-पटिटय अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित हो रही हैं। उन्होंने इसके लिए आन्दोलन भी चलाए और अदालतों में दस्तक भी दी है। उनके लिए वोट देने जैसे बुनियादी राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करना भी कठिन हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने मुम्बई की झोपड़-पट्टियों में रहने वालों के अधिकारों के बारे में समाजकर्मी ओल्गा टेलिस की जनहित याचिका (ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम) पर 1985 में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया। याचिका में कार्यस्थल के निकट रहने की वैकल्पिक जगह उपलब्ध नहीं होने के कारण फुटपाथ या झोपड़-पट्टियों में रहने के अधिकार का दावा किया गया था। अगर यहाँ रहने वालों को हटने के लिए मजबूर किया गया तो उन्हें आजीविका भी गॅवानी पड़ेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान की धारा 21 में जीने के अधिकार की गारण्टी दी गई है, जिसमें आजीविका का अधिकार शामिल है। इसलिए अगर फुटपाथवासियों को बेदखल करना हो तो उन्हें आश्रय के अधिकार के अन्तर्गत पहले वैकल्पिक जगह उपलब्ध करानी होगी।

टिहरी विस्थापितों का आन्दोलन – टिहरी गढ़वाल में टिहरी बाँध के बनने से टिहरी शहर डूब गया। इसके विस्थापितों के लिए सरकार ने जो व्यवस्थाएँ की थीं वे अपर्याप्त थीं। उचित मुआवजे की माँग और उचित आवास की माँग ने जीने के अधिकार का रूप धारण कर लिया। एक बड़ा आन्दोलन चला। अन्तत: सरकार ने सभी को उनके अधिकारों के अन्तर्गत राहत प्रदान की।

प्रश्न 4.
शरणार्थियों की समस्याएँ क्या हैं? वैश्विक नागरिकता की अवधारणा किस प्रकार उनकी सहायता कर सकती है?
उत्तर-
जब हम शरणार्थियों या अवैध अप्रवासियों के विषय में सोचते हैं तो मन में अनेक छवियाँ उभरती हैं। उसमें एशिया या अफ्रीका के ऐसे लोगों की छवि हो सकती है जिन्होंने यूरोप या अमेरिका में चोरी-छिपे घुसने के लिए दलाल को पैसे का भुगतान किया हो। इसमें जोखिम बहुत है लेकिन वे प्रयास में तत्पर दिखते हैं। एक अन्य छवि युद्ध या अकाल से विस्थापित लोगों की हो सकती है। इस प्रकार के बहुत से दृश्य हमें दूरदर्शन पर दिखाई दे जाते हैं। सूडान डरफर क्षेत्र के शरणार्थी, फिलीस्तीनी, बर्मी या बंगलादेशी शरणार्थी जैसे कई उदाहरण हैं। ये सभी ऐसे लोग हैं जो अपने ही देश या पड़ोसी देश में शरणार्थी बनने के लिए मजबूर किए गए हैं।

हम यह मान लेते हैं कि किसी देश की पूर्ण सदस्यता उन सबको उपलब्ध होनी चाहिए, जो सामान्यतया उस देश में रहते और काम करते हैं या जो नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं। वैसे अनेक देश वैश्विक और समावेशी नागरिकता को समर्थन करते हैं लेकिन नागरिकता देने की शर्ते भी निर्धारित करते हैं। ये शर्ते साधारणतया देश के संविधान और कानूनों में लिखी होती हैं। अवांछित आगंतुकों को नागरिकता से बाहर रखने के लिए राज्य सत्ताएँ शक्ति का प्रयोग करती हैं।

अनेक प्रतिबन्ध, दीवार और बाड़ लगाने के बाद आज भी दुनिया में बड़े पैमाने पर लोगों का देशान्तरण होता है। अगर कोई देश स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता और वे घर नहीं लौट सकते तो वे राज्यविहीन और शरणार्थी हो जाते हैं। वे शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने के लिए विवश किए जाते हैं। अक्सर वे कानूनी रूप से काम नहीं कर सकते या अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते या सम्पत्ति अर्जित नहीं कर सकते। शरणार्थियों की समस्या इतनी गम्भीर है कि संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थियों की जाँच करने और सहायता करने के लिए उच्चायुक्त नियुक्त किया हुआ है।

विश्व नागरिकता की अवधारणा अभी साकार नहीं हुई है। फिर भी इसके आकर्षणों में से एक यह है कि इससे राष्ट्रीय सीमाओं के दोनों ओर की उन समस्याओं का मुकाबला करना सरल हो सकता है। जिसमें कई देशों की सरकारों और लोगों की संयुक्त कार्यवाही आवश्यक होती है। इससे शरणार्थियों की समस्या का सर्वमान्य समाधान पाना सरल हो सकता है या कम-से-कम उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है चाहे वे किसी भी देश में रहते हों।

प्रश्न 5.
देश के अन्दर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लोगों के आप्रवासन का आमतौर पर स्थानीय लोग विरोध करते हैं। प्रवासी लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान दे सकते हैं?
उत्तर-
प्रवासी लोग अपने श्रम से अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। अन्य व्यवसायों के बीच ये प्रवासी फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफाईकर्मी या घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री होते हैं। प्रवासी लोग अपने रहने के स्थान पर बेत-बुनाई या कपड़ा-हँगाई-छपाई, कपड़ों की सिलाई जैसे छोटे कारोबार भी चलाते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 1
यदि ये प्रवासी लोग किसी नगर के जीवन से चले जाएँ या अपनी सभी आर्थिक गतिविधियाँ बन्द कर दें तो लोगों की क्या दशा होगी उसे उपर्युक्त चित्र के माध्यम से भली-भाँति समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
भारत जैसे समान नागरिकता देने वाले देशों में भी लोकतान्त्रिक नागरिकता एक पूर्ण स्थापित तथ्य नहीं वरन एक परियोजना है। नागरिकता से जुड़े उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो आजकल भारत में उठाये जा रहे हैं?
उत्तर-
भारत स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राष्ट्र राज्य कहता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन का आधार व्यापक था और विभिन्न धर्म, क्षेत्र और संस्कृति के लोगों को आपस में जोड़ने के कृत संकल्प प्रयास किए गए। यह सही है कि जब मुस्लिम लीग से विवाद नहीं सुलझाया जा सका, तब 1947 ई० में देश का विभाजन हुआ। लेकिन इसने उस राष्ट्र राज्य के धर्मनिरपेक्ष ओर समावेशी चरित्र को बनाए रखने के भारतीय राष्ट्रीय नेताओं के निश्चय को और सुदृढ़ ही किया जिसके निर्माण के लिए वे प्रतिबद्ध थे। यह निश्चय संविधान में सम्मिलित किया गया।

भारतीय संविधान ने बहुत ही विविधतापूर्ण समाज को समायोजित करने का प्रयास किया है। इन विविधताओं में से कुछ उल्लेखनीय हैं-
इसने अनुसूचित्र जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे भिन्न-भिन्न समुदायों, पूर्व में समान अधिकार से वंचित रही महिलाएँ, आधुनिक सभ्यता के साथ मामूली सम्पर्क रखने वाले अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुछ सुदूरवर्ती समुदायों और कई अन्य समुदायों को पूर्ण और समान नागरिकता देने का प्रयास किया।
इसने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित विभिन्न भाषाओं, धर्म और रिवाजों की पहचान बनाए रखने का प्रयास किया। इसे लागों को उनकी निजी आस्था, भाषा या सांस्कृतिक रिवाजों को छोड़ने के लिए बाध्य किए बिना सभी को समान अधिकार उपलब्ध कराना था। संविधान के जरिए आरम्भ किया गया यह अद्वितीय प्रयोग था दिल्ली में गणतन्त्र दिवस परेड में विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति और धर्म के लोगों को सम्मिलित करने के राजसत्ता के प्रयास को प्रतिबिम्बित करता है।

नागरिकता से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख संविधान के तीसरे भाग और संसद द्वारा बाद में पारित कानूनों में हुआ है। संविधान ने नागरिकता की लोकतान्त्रिक और समावेशी धारणा को अपनाया है। भारत में जन्म, वंश परम्परा, पंजीकरण, देशीकरण या किसी भू-क्षेत्र के राज क्षेत्र शामिल होने से नागरिकता प्राप्त की जा सकती है। संविधान में नागरिकों के अधिकार और दायित्वों का उल्लेख है। यह प्रावधान भी है कि राज्य को नस्ल/जाति/लिंग/जन्मस्थल में से किसी भी आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को भी संरक्षित किया गया है। इस प्रकार के समावेशी प्रवाधानों ने संघर्ष और विवादों को जन्म दिया है। महिला आन्दोलन, दलित आन्दोलन या विकास योजनाओं से विस्थापित लोगों का संघर्ष ऐसे लोगों द्वारा चलाए जा रहे संघर्षों के कुछ उदाहरण हैं, जो मानते हैं कि उनकी नागरिकता को पूर्ण अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। भारत के अनुभवों से संकेत प्राप्त होते हैं कि किसी देश में लोकतान्त्रिक नागरिकता एक परियोजना या लक्ष्यसिद्धि का एक आदर्श है। जैसे-जैसे समाज बदल रहे हैं, वैसे-वैसे नित-नए मुद्दे भी समाने आ रहे हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘कर्तव्य के उचित क्रम-निर्धारण का नाम ही नागरिकता है।’ यह कथन किसका है।
(क) ए० के० सीयू को
(ख) सुकरात का
(ग) प्लेटो का
(घ) डॉ० विलियम बॉयड का
उत्तर-
(घ) डॉ० विलियम बॉयड का।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से नागरिक का सामाजिक अधिकार चुनिए
(क) मताधिकार
(ख) शिक्षा का अधिकार
(ग) चुनाव लड़ने का अधिकार
(घ) न्याय प्राप्त करने का अधिकार
उत्तर-
(ख) शिक्षा का अधिकार।

प्रश्न 3.
निम्नांकित में कौन विदेशी है?
(क) राजनीतिक अधिकार प्राप्त
(ख) सैनिक
(ग) राजदूत
(घ) राज्य का सदस्य
उत्तर-
(ग) राजदूत।

प्रश्न 4.
किन देशों में सम्पत्ति खरीदने पर वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो जाती है?
(क) भारत
(ख) बांग्लादेश
(ग) दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश
(घ) पाकिस्तान
उत्तर-
(ग) दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश।

प्रश्न 5.
आदर्श नागरिकता का तत्त्व नहीं है
(क) कर्तव्यपरायणता
(ख) जागरूकता
(ग) शिक्षा
(घ) साम्प्रदायिकता
उत्तर-
(घ) साम्प्रदायिकता।

प्रश्न 6.
“शिक्षा, जो आत्मा का भोजन है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है।” यह कथन किसका है?
(क) अब्राहम लिंकन का
(ख) सुकरात का
(ग) बाल गंगाधर तिलक को
(घ) महात्मा गांधी का
उत्तर-
(घ) महात्मा गांधी का।

प्रश्न 7.
आदर्श नागरिक के मार्ग में बाधा है
(क) अशिक्षा व अज्ञानता
(ख) अच्छा स्वास्थ्य
(ग) संयुक्त परिवार
(घ) निर्धन मित्र
उत्तर-
(क) अशिक्षा व अज्ञानता।

प्रश्न 8.
आदर्श नागरिक का गुण नहीं है
(क) सच्चरित्रता
(ख) आत्म-संयम
(ग) उग्र-राष्ट्रीयता
(घ) अधिकार-कर्तव्य का ज्ञान
उत्तर-
(ग) उग्र-राष्ट्रीयता।

प्रश्न 9.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में बाधा नहीं है
(क) साम्प्रदायिकता
(ख) अशिक्षा
(ग) निर्धनता
(घ) राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना
उत्तर-
(घ) राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व आदर्श नागरिकता के मार्ग में बाधक नहीं है।
(क) निर्धनता
(ख) अनुशासन
(ग) अशिक्षा
(घ) स्वार्थपरता
उत्तर-
(ख) अनुशासन।

प्रश्न 11.
किसी राज्य में निवास करने वाले विदेशी के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(क) वह राज्य में भूमि का क्रय नहीं कर सकता
(ख) उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए राज्य उत्तरदायी नहीं है।
(ग) राज्य उसे अल्पकाल के लिए निवास करने की अनुमति दे सकता है।
(घ) वह अपने राज्य के प्रति निष्ठा रखता है।
उत्तर-
(ख) उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए राज्य उत्तरदायी नहीं है।

प्रश्न 12.
किसी देश में विदेशी को निम्नलिखित में से कौन-से अधिकार प्राप्त नहीं हैं ?
(क) राजनीतिक अधिकार
(ख) सामाजिक अधिकार
(ग) धार्मिक अधिकार
(घ) व्यापारिक अधिकार
उत्तर-
(क) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 13.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में प्रमुख बाधा क्या है ?
(क) औद्योगीकरण
(ख) शहरीकरण
(ग) साक्षरता
(घ) निर्धनता
उत्तर-
(घ) निर्धनता।

प्रश्न 14.
संसद में भारतीय नागरिकता अधिनियम कब पारित हुआ ?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1955 ई० में
(घ) 1960 ई० में
उत्तर-
(ग) 1955 ई० में।

प्रश्न 15.
“दि फिलॉस्फी ऑफ सिटिजनशिप” नामक पुस्तक के लेखक हैं
(क) एफ० जी० गोल्ड
(ख) अल्फ्रेड जे० शॉ
(ग) डॉ० ई० एम० ह्वाइट
(घ) वार्ड
उत्तर-
(ग) डॉ० ई० एम० ह्वाइट।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता प्राप्त करने के दो तरीके बताइए।
या नागरिकता प्राप्त होने की कोई दो स्थितियाँ बताइए।
उत्तर-
1. जन्म द्वारा तथा
2. देशीयकरण द्वारा।

प्रश्न 2.
भारत में नागरिकता के लोप होने के कोई दो कारण लिखिए।
या नागरिकता खोने के दो आधार बताइए।
उत्तर-

  1.  विदेश में सरकारी नौकरी करने पर तथा
  2.  सेना से भागने पर।

प्रश्न 3.
आदर्श नागरिक के विषय में लॉर्ड ब्राइस की परिभाषा लिखिए।
उत्तर–
“एक लोकतन्त्रीय (आदर्श) नागरिक में बुद्धि, आत्म-संयम तथा उत्तरदायित्व होना चाहिए।’

प्रश्न 4.
कोई दो स्थितियाँ बताइए जिनमें केन्द्रीय सरकार नागरिक की नागरिकता समाप्त कर | सकती है।
या एक भारतीय स्त्री की नागरिकता का लोप हो गया है। इसके दो सम्भावित कारणों का |’ उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1.  देशद्रोह करने पर तथा
  2.  लम्बे समय तक देश से अनुपस्थित रहने पर।

प्रश्न 5.
आदर्श नागरिकता के चार तत्त्व बताइए।
उत्तर–
आदर्श नागरिकता के चार तत्त्व हैं—

  1.  कर्तव्यपरायणता,
  2.  प्रगतिशीलता,
  3.  व्यापक दृष्टिकोण तथा
  4.  जागरूकता।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान में समस्त नागरिकों के लिए कैसी नागरिकता की व्यवस्था की गयी है?
उत्तर-
भारतीय संविधान में समस्त नागरिकों के लिए इकहरी नागरिकता की व्यवस्था की गयी है।

प्रश्न 7.
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्य हैं—

  1.  राज्य के प्रति भक्ति एवं
  2.  राज्य के कानूनों का पालन करना।

प्रश्न 8.
विदेशी किसे कहते हैं ?
उत्तर–
विदेशी वह व्यक्ति है जो अपना देश छोड़कर किसी कारणवश अन्य देश में रहने लगा हो। उसे उस देश के सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।

प्रश्न 9.
विदेशियों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर–
विदेशियों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1.  स्थायी विदेशी,
  2.  अस्थायी विदेशी तथा
  3.  राजदूत।

प्रश्न 10.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में सहायक दो प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग में सहायक दो प्रमुख तत्त्व हैं-

  1.  स्वतन्त्र प्रेस तथा
  2.  स्वस्थ राजनीतिक दल।

प्रश्न 11.
“शिक्षा श्रेष्ठ नागरिक जीवन के वृत्त-खण्ड की आधारशिला है।” यह कथन किस विद्वान् का है ?
उत्तर-
यह कथन डॉ० बेनी प्रसाद नामक विद्वान् का है।

प्रश्न 12.
नागरिकों के कौन-से दो मुख्य प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
नागरिकों के दो मुख्य प्रकार हैं-

  1.  जन्मजात नागरिक तथा
  2.  देशीयकरण से नागरिकता प्राप्त नागरिक।

प्रश्न 13.
भारत में नागरिकता अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर-
भारत में नागरिकता अधिनियम 1955 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 14.
भारत का प्रथम नागरिक कौन है?
उत्तर-
भारत का राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिक की विभिन्न परिभाषाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
‘नागरिक’ की परिभाषाएँ
प्राचीन यूनानी विचारक अरस्तु ने नागरिक की परिभाषा इन शब्दों में की थी, “एक नागरिक वह है, जिसने राज्य के शासन में कुछ भाग लिया हो और जो राज्य द्वारा प्रदान किए गए सम्मान का उपभोग कर सके।”
भले ही तत्कालीन परिस्थितियों में अरस्तु की उपर्युक्त परिभाषा सटीक रही हो, लेकिन अरस्तू की यह परिभाषा आधुनिक काल में अपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि आज नगर-राज्यों का स्थान विशाल राज्यों ने ले लिया है। फलतः ‘नागरिक’ शब्द का अर्थ भी बहुत अधिक व्यापक हो गया है। आधुनिक विद्वानों ने ‘नागरिक’ शब्द की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार से दी है ।
लॉस्की के अनुसार, “नागरिक केवल समाज का एक सदस्य ही नहीं है, वरन् वह कुछ कर्तव्यों का यान्त्रिक रूप से पालनकर्ता तथा आदेशों का बौद्धिक रूप से ग्रहणकर्ता भी है।”
गैटिल के अनुसार, “नागरिक समाज के वे सदस्य हैं, जो कुछ कर्तव्यों द्वारा समाज से बँधे रहते हैं, जो उसके प्रभुत्व को मानते हैं और उससे समान रूप से लाभ उठाते हैं।”
सीले के अनुसार, “नागरिक उस व्यक्ति को कहते हैं, जो राज्य के प्रति भक्ति रखता हो, उसे सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों और जन-सेवा की भावना से प्रेरित हो।”

प्रश्न 2.
किसी देश के नागरिक को कितनी श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
किसी देश के नागरिक को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं

1. अल्प-वयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु से कम आयु के व्यक्ति होते हैं। ऐसे नागरिकों को समस्त प्रकार के अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन निर्धारित आयु के पूर्व वे अपने राजनीतिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते। भारत में 18 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति इस श्रेणी
में आते हैं।

2. मताधिकार रहित वयस्क नागरिक- ये वे नागरिक होते हैं जो निर्धारित आयु पूर्ण करने के बाद | भी शारीरिक एवं मानसिक अयोग्यताओं के कारण मत देने के अधिकार से वंचित कर दिये जाते हैं। उदाहरणार्थ-कोढ़ी, पागल, दिवालिया व देशद्रोही इत्यादि। इन्हें सिर्फ सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

3. मताधिकार प्राप्त वयस्क नागरिक- इस श्रेणी में वे नागरिक आते हैं जो चारों शर्तों को पूरा करते हों, अर्थात् वे राज्य के सदस्य हों, उन्हें सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों, उन्हें मताधिकार प्राप्त हो तथा उनमें राज्य के प्रति भक्ति-प्रदर्शन की भावना हो।

4.  देशीयकृत नागरिक- इस श्रेणी में वे नागरिक आते हैं जो पूर्व में किसी अन्य देश अथवा राज्य के नागरिक थे, लेकिन किसी देश में बहुत दिनों तक रहने एवं कुछ शर्तों को पूरा करने पर राज्य की ओर से उन्हें राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकार दे दिये गये हों।

प्रश्न 3.
‘विदेशी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
विदेशी वह व्यक्ति है जो अस्थायी रूप से उस राज्य में निवास करता है जिसका वह सदस्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी देश में विदेशी उस समय कहा जा सकता है जब वह अल्पावधि हेतु किसी कार्यवश अपना देश छोड़कर दूसरे देश में रहने के लिए आया हो। कोई व्यक्ति व्यापार करने, शिक्षा प्राप्त करने अथवा घूमने के लिए दूसरे देश में आता है और जितने समय तक अपना देश छोड़कर बाहर रहता है, उतने समय तक उस राज्य में विदेशी कहा जाता है। उसे उस देश के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते तथा न ही वह उस राज्य के प्रति भक्तिभाव रखता है। वह उस राज्य के प्रति भक्तिभाव रखता है जिसका वह सदस्य है। इस प्रकार विदेशी वह व्यक्ति है जो सिर्फ सामाजिक अधिकारों का उपयोग करता है। एक विदेशी को जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा एवं कुछ सामान्य सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन अन्य सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते। इन अधिकारों की प्राप्ति के बदले विदेशियों को सम्बन्धित देश के कानून का पूर्णतया पालन करना होता है।

प्रश्न 4.
नागरिकता प्राप्त करने के सन्दर्भ में जन्म-स्थान के सिद्धान्त का विवरण दीजिए।
उत्तर-
इस सिद्धान्त के अनुसार बालक की नागरिकता उसके जन्मस्थान के आधार पर निश्चित की जाती है। उदाहरणार्थ, यदि भारत के किसी नागरिक का बच्चा अर्जेण्टाइना की भूमि पर जन्म लेता है। तो वह बच्चा वहाँ का नागरिक माना जाएगा। लेकिन इसके विपरीत, यदि अर्जेण्टाइन के नागरिक का बच्चा भारत- भूमि पर अथवा अन्य किसी राज्य में जन्म लेता है तो वह स्वदेश की नागरिकता से वंचित रह जाएगा। यद्यपि यह सिद्धान्त अर्जेण्टाइना में प्रचलित है, लेकिन वहाँ की अपेक्षा यह इंग्लैण्ड में अधिक व्यापक है। वहाँ तो कोई बच्चा यदि इंग्लैण्ड के जहाज में भी पैदा होता है तो वह इंग्लैण्ड का नागरिक माना जाता है।
इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा दोष यह है कि कोई दम्पति विश्व-भ्रमण के लिए निकले तो हो सकता है। कि उसकी एक सन्तान जापान में हो, दूसरी भारत में तथा तीसरी संयुक्त राज्य अमेरिका में। ऐसी दशा में जन्म-स्थान नियम के अनुसार तीनों बच्चे अलग-अलग देशों के नागरिक होंगे तथा उन्हें अपने माता-पिता के देश की नागरिकता प्राप्त नहीं होगी।

प्रश्न 5.
नागरिकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
नागरिकता वह भावना है जो नागरिक में निवास करती है। यह भावना नागरिक में देशभक्ति को जाग्रत करती है और नागरिक को उसके कर्तव्य-पालन तथा उत्तरदायित्व निभाने के लिए सजग करती है। लॉस्की के कथनानुसार, “अपनी प्रशिक्षित वृद्धि को लोकहित के लिए प्रयोग करना ही नागरिकता , है।’ गैटिल के विचारानुसार, “नागरिकता किसी व्यक्ति की उस स्थिति को कहते हैं, जिसके अनुसार वह अपने राज्य में सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों का उपभोग कर सकता है तथा कर्तव्यों का पालन करने के लिए तत्पर रहता है।”

विलियम बॉयड के अनुसार, “भक्ति भावना का उचित क्रम-निर्धारण ही नागरिकता है।” डॉ० आशीर्वादी लाल के अनुसार, नागरिकता केवल राजनीतिक कार्य ही नहीं, वरन् एक सामाजिक एवं नैतिक कर्तव्य भी है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नागरिक होने की दशा का नाम ही नागरिकता है। दूसरे शब्दों में, “जीवन की वह स्थिति, जिसमें व्यक्ति किसी राज्य का सदस्य होने के नाते समस्त प्रकार के सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है, ‘नागरिकता (Citizenship) कहलाती है।”

प्रश्न 6.
स्थायी विदेशी तथा अस्थायी विदेशी में अन्तर बताइए।
उत्तर-
स्थायी विदेशी-ऐसे विदेशी जो अपना पूर्व देश छोड़कर किसी ऐसे देश में आ गये हों जहाँ वे स्थायी रूप से रहना चाहते हों तथा नागरिकता-प्राप्ति की शर्तों को पूरा कर रहे हों, स्थायी विदेशी कहलाते हैं। नागरिकता-प्राप्ति की प्रक्रिया द्वारा ये विदेशी उस देश के नागरिक बन जाते हैं। अस्थायी विदेशी–अस्थायी विदेशी विशेष कारण से अपना देश छोड़कर अल्पावधि हेतु दूसरे देश में आकर रहते हैं तथा अपना कार्य पूर्ण करके स्वदेश लौट जाते हैं। सामान्यतया इनका उद्देश्य शिक्षा, भ्रमण अथवा व्यापार होता है।

प्रश्न 7.
नागरिक तथा मतदाता में भेद बताइए।
उत्तर-
एक राज्य के अन्तर्गत नागरिक तथा मतदाता में भेद (अन्तर) होता है। एक राज्य के समस्त नागरिक मतदाता नहीं होते हैं। मतदाता कौन हो सकता है; यह राज्य के कानूनों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। किसी भी देश के अन्तर्गत अवयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। इसके अलावा, कतिपय राज्यों में धर्म, सम्पत्ति, लिंग एवं शिक्षा के आधार पर भी कुछ नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जाता है। किन्तु आधुनिक समय की प्रवृत्ति इस प्रकार के प्रतिबन्धों के प्रतिकूल है। संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, इंग्लैण्ड, पाकिस्तान, फ्रांस इत्यादि संसार के अधिकांश राज्यों में समस्त वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 8.
नागरिकता की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
नागरिकता की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. राज्य की सदस्यता- नागरिकता की सर्वप्रथम विशेषता राज्य की सदस्यता है।
  2. सर्वव्यापकता- नागरिकता प्रत्येक उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो कि राज्य का निवासी हो, भले ही वह शहर में निवास करता हो अथवा किसी ग्राम में।
  3. राज्य के प्रति निष्ठा- नागरिकता में देशभक्ति का गुण होना परम आवश्यक है।
  4. अधिकारों का प्रयोग- नागरिकता व्यक्ति को राज्य की तरफ से अधिकार प्रदान करती है।

प्रश्न 9.
देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की चार शर्ते बताइए।
या भारतीय नागरिकता को प्राप्त करने की दो शर्ते बताइए।
उत्तर-
देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की चार शर्ते निम्नलिखित हैं

  1.  विदेशी ऐसे राज्य का नागरिक न हो जहाँ भारतीयों पर वहाँ की नागरिकता ग्रहण करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया हो।
  2.  वह प्रार्थना-पत्र देने की तिथि से पूर्व न्यूनतम एक वर्ष से लगातार भारत में निवास कर रहा हो।
  3.  वह एक वर्ष से पूर्व, न्यूनतम 5 वर्षों तक भारत में रह चुका हो अथवा भारत सरकार की नौकरी में । रह चुका हो अथवा दोनों मिलाकर 7 वर्ष का समय हो, लेकिन किसी भी परिस्थिति में 4 वर्ष से कम समय न हो।
  4.  उसका आचरण अच्छा हो।

प्रश्न 10.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में अशिक्षा कैसे बाधक है?
उत्तर-
शिक्षा तथा ज्ञान के अभाव में आदर्श नागरिकता की कल्पना करना व्यर्थ है। अशिक्षित एवं अज्ञानी व्यक्ति उचित व अनुचित में अन्तर नहीं कर पाते। वे अपने उत्तरदायित्व के बोध से अपरिचित रहते हैं। ऐसे व्यक्ति राजनीतिक तथा सार्वजनिक कर्तव्यों का निष्पादन अपनी समझ-बूझ के आधार पर न करके अन्य व्यक्तियों के बहकावे में आकर करते हैं। शिक्षा तथा ज्ञान के बिना व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकता है। मैकम ने तो यहाँ तक कहा है कि शिक्षा के बिना नागरिक अपूर्ण है।”

प्रश्न 11.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में साम्प्रदायिकता कैसे बाधक है?
उत्तर-
साम्प्रदायिकता को आदर्श नागरिक की प्रबलतम शत्रु माना गया है। साम्प्रदायिकता की भावना से ही सामाजिक जीवन में कटुता पैदा हो जाती है तथा शान्ति नष्ट हो जाती है। कभी-कभी इसके वशीभूत होकर व्यक्ति अपने धार्मिक एवं राजनीतिक समुदायों को इतना अधिक महत्त्व देते हैं कि वे समाज एवं राज्य के हितों की अपेक्षा हेतु तत्पर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में आदर्श नागरिकता की प्राप्ति असम्भव हो जाती है।

प्रश्न 12.
नागरिकता का लोप होने की किन्हीं पाँच स्थितियों का विवेचन कीजिए।
उत्तर-
नागरिकता का लोप
सामान्यतया निम्नलिखित स्थितियों में नागरिकता का लोप हो जाता है अथवा किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त हो जाती है-

  1. विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर- यदि कोई व्यक्ति विदेश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी अपने देश की नागरिकता स्वत: ही समाप्त हो जाती है।
  2. विवाह द्वारा- यदि कोई महिला विदेशी पुरुष से विवाह कर लेती है, तो वह अपने देश की नागरिकता खो देती है।
  3. अनुपस्थिति के कारण- यदि कोई व्यक्ति अपने देश से लम्बी अवधि तक अनुपस्थित रहता | है, तो उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  4. सेना से भागने पर- सेना से भागे सैनिक, देशद्रोही तथा घोर अपराधी भी नागरिकता से वंचित कर दिए जाते हैं।
  5. विदेशों में नौकरी करने से- यदि कोई व्यक्ति विदेश में नौकरी कर लेता है अथवा विदेशी नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो वह अपने देश की नागरिकता खो देता है।

प्रश्न 13.
सत्रहवीं से बीसवीं सदी के बीच यूरोप के गोरे लोगों ने दक्षिण अफ्रीका के लोगों पर अपना शासन कायम रखा। 1994 तक दक्षिण अफ्रीका में अपनाई गई नीतियों के बारे में नीचे दिए गए ब्योरे को पढिए।
श्वेत लोगों को मत देने, चुनाव लड़ने और सरकार को चुनने का अधिकार था। वे सम्पत्ति खरीदने और देश में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतन्त्र थे। काले लोगों को ऐसे अधिकार नहीं थे। काले और गोरे लोगों के लिए पृथक मोहल्ले और कालोनियाँ बसाई गई थीं। काले लोगों को अपने पड़ोस की गोरे लोगों की बस्ती में काम करने के लिए ‘पास लेने पड़ते थे। उन्हें गोरों के इलाके में अपने परिवार रखने की अनुमति नहीं थी। अलग-अलग रंग के लोगों के लिए विद्यालय भी अलग-अलग थे।
(i) क्या अश्वेत लोगों की दक्षिण अफ्रीका में पूर्ण और समान सदस्यता मिली हुई थी? कारण सहित बताइए।
(ii) ऊपर दिया गया ब्योरा हमें दक्षिण अफ्रीका में भिन्न समूहों के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में क्या बताता है?
उत्तर-
(i) नहीं, अश्वेत लोगों को दक्षिण अफ्रीका में पूर्ण समान सदस्यता प्राप्त नहीं थी। वहाँ रंगभेद नीति इसका प्रमुख कारण था।
(ii) दक्षिण अफ्रीका में भिन्न समूह (गोर-काले) के अन्तर्सम्बन्ध ठीक नहीं थे। दोनों में आपस में गहरे मतभेद थे।

प्रश्न 14.
नागरिक के लक्षणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर-
नागरिक के निम्नलिखित लक्षण या विशेषताएँ होती हैं

  1.  वह राज्य का सदस्य हो।
  2.  वह राज्य की सीमा के अन्दर रहता हो, चाहे वह नगर-निवासी हो अथवा ग्रामवासी।
  3.  उसे सभी सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों।
  4.  वह राज्य की सम्प्रभुता को स्वीकार करता हो और राज्य में पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति रखता हो।
  5.  उसे मताधिकार प्राप्त हो।
  6.  उसमें कर्तव्यपरायणता की भावना निहित हो।
  7.  वह राष्ट्र तथा समाज के प्रति पूर्ण निष्ठा तथा भक्ति की भावना से ओतप्रोत हो।

प्रश्न 15.
विश्व नागरिकता की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर-
विश्व नागरिकता की अवधारणा आधुनिक विचारकों की देन है। जिस प्रकार विश्व-राज्य व विश्व-बन्धुत्व की कल्पना की गई है, उसी प्रकार विश्व-नागरिकता का विचार भी विकसित हुआ है। विश्व-बन्धुत्व की कल्पना को साकार बनाकर विश्व नागरिकता के विचार को व्यावहारिक रूप प्रदान किया जा सकता है, परन्तु यह काल्पनिक अवधारणा यथार्थ के धरातल पर असम्भव ही प्रतीत होती है। विश्व नागरिकता का आशय ऐसी नागरिकता से है, जो सभी राष्ट्रों द्वारा मान्य हो। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ विश्व नागरिकता की अवधारणा को व्यावहारिक रूप दे सकती हैं। राजनीतिक सम्बन्ध, शान्ति की इच्छा, आवागमन के साधनों का विकास, सांस्कृतिक एकता, विश्व-बन्धुत्व की भावना व मानवाधिकार, अन्तर्राष्ट्रीय कानून और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से विश्व नागरिकता के आदर्श को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जा सकती है। नेहरू जी विश्व नागरिकता के प्रबल समर्थक थे।

प्रश्न 16.
आदर्श नागरिकता के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
किसी भी देश की प्रगति का आधार वहाँ के नागरिक होते हैं। जिस देश के नागरिक आदर्श नागरिकता के गुणों से परिपूर्ण होते हैं, वह देश शीघ्र ही उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है। अरस्तू का कथन है, “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं; अतः राज्य के नागरिक आदर्श होने चाहिए।” वास्तव में आदर्श नागरिकता ही राज्य के विकास का आधार बन सकती है। डॉ० आशीर्वादी के अनुसार, “नागरिकता का सम्बन्ध केवल राजनीतिक जीवन से ही नहीं है, वरन् । सामाजिक और नैतिक जीवन से भी है।”
एक आदर्श नागरिक के गुणों को व्यक्त करते हुए लॉर्ड ब्राइस ने लिखा है, “एक लोकतन्त्रीय नागरिक में बुद्धि, आत्म-संयम तथा उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए।
इसी प्रकार डॉ० ह्वाइट ने लिखा है, “आदर्श नागरिक में तीन गुण; व्यावहारिक बुद्धि, ज्ञान और भक्ति; आवश्यक हैं।”

प्रश्न 17.
आदर्श नागरिकता की किन्हीं चार बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग की चार मुख्य बाधाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  आदर्श नागरिकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अशिक्षा तथा निरक्षरता है।
  2.  संकीर्ण धार्मिक भावनाएँ तथा साम्प्रदायिकता की मनोदशा आदर्श नागरिकता के मार्ग को अवरुद्ध कर देती हैं।
  3.  संकीर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित दलीय राजनीति भी आदर्श नागरिकता को कुंठित कर देती है।
  4.  पूँजीवाद के अनियन्त्रित विकास ने भी समाज को निर्धन तथा अमीर दो वर्गों में विभाजित कर दिया है। अतः निर्धनता भी आदर्श नागरिकता के लिए अभिशाप है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता का समानता और अधिकार से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
नागरिकता केवल एक कानूनी अवधारणा नहीं है। इसका समानता और अधिकारों के व्यापक उद्देश्यों से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का सर्वसम्मत सूत्रीकरण अंग्रेज समाजशास्त्री टी० एच० मार्शल (1893-1981) ने किया है। अपनी पुस्तक ‘नागरिकता और सामाजिक वर्ग में मार्शल ने नागरिकता को किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को प्रदत्त प्रतिष्ठा के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रतिष्ठा को ग्रहण करने वाले सभी लोग प्रतिष्ठा में अन्तर्भूत अधिकारों और कर्तव्यों के मामले में समान होते हैं।

नागरिकता की मार्शल द्वारा प्रदत्त कुँजी धारणा में मूल संकल्पना ‘समानता’ की है। इसमें दो बातें अन्तर्निहित हैं। पहली यह कि प्रदत्त अधिकार और कर्तव्यों की गुणवत्ता बढ़े। दूसरी यह कि उन लोगों की संख्या बढ़े जिन्हें वे दिए गए हैं।
मार्शल नागरिकता में तीन प्रकार के अधिकारों को शामिल मानते हैं–नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार।
नागरिक अधिकार व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। राजनीतिक अधिकार व्यक्ति को शासन प्रक्रिया में सहभागी बनने की शक्ति प्रदान करते हैं। सामाजिक अधिकार व्यक्ति के लिए शिक्षा और रोजगार को सुलभ बनाते हैं। कुल मिलाकर ये अधिकार नागरिक के लिए सम्मान के साथ जीवन-बसर करना सम्भव बनाते हैं।

मार्शल ने सामाजिक वर्ग को ‘असमानता की व्यवस्था के रूप में चिह्नित किया। नागरिकता वर्ग पदानुक्रम के विभाजक परिणामों का प्रतिकार कर समानता सुनिश्चित करती है। इस प्रकार यह बेहतर सुबद्ध और समरस समाज रचना को सुसाध्य बनाता है।

प्रश्न 2.
भारतीय नागरिकता किन आधारों पर लुप्त हो सकती है? कोई दो प्रकार बताइए।
उत्तर-
भारतीय नागरिक अधिनियम, 1955 नागरिकता के लोप के विषय में भी व्यवस्था करता है, चाहे वह भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत प्राप्त की गई हो या संविधान के उपबन्धों के अनुसार प्राप्त की गई हो। इस अधिनियम के अनुसार नागरिकता का लोप निम्न प्रकार से हो सकता है

1. नागरिकता का परित्याग- कोई भी वयस्क भारतीय नागरिक जो किसी दूसरे देश का भी ‘ नागरिक है, भारतीय नागरिकता को त्याग सकता है। इसके लिए उसे एक घोषणा करनी होगी और उस घोषणा का पंजीकरण हो जाने पर उसकी भारतीय नागरिकता लुप्त हो जाएगी, किन्तु यदि ऐसी घोषणा किसी ऐसे युद्धकाल में की जाती है, जिसमें भारत एक पक्षकार हो, तो पंजीकरण को तब तक रोका जा सकता है, जब तक भारत सरकार उचित समझे। यह उल्लेखनीय है कि जब कोई पुरुष भारतीय नागरिकता का त्याग करता है, तो उसके साथ-साथ उसके अवयस्क बच्चे भी भारतीय नागरिकता खो देते हैं।

2. अन्य देशों की नागरिकता स्वीकार करने पर- यदि कोई भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से  किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता लुप्त हो जाती है। यह नियम उन नागरिकों के सम्बन्ध में लागू नहीं होता है, जो किसी ऐसे युद्धकाल में,
जिसमें भारत एक पक्षकार हो, स्वेच्छा से दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेते हैं।

प्रश्न 3.
नागरिक और विदेशी में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
नागरिक और विदेशी में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 2
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 3

प्रश्न 4.
नागरिक और राष्ट्र के सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्र राज्य की अवधारणा आधुनिक काल में विकसित हुई। राष्ट्र राज्य की सम्प्रभुता और नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का दावा सर्वप्रथम 1789 में फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने किया था। राष्ट्र राज्यों का दावा है कि उनकी सीमाएँ केवल राज्यक्षेत्र को नहीं बल्कि एक अनोखी संस्कृति और साझा इतिहास को भी परिभाषित करती हैं। राष्ट्रीय पहचान को एक झण्डा, राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा या कुछ विशिष्ट उत्सवों के आयोजन जैसे प्रतीकों से व्यक्त किया जा सकता है।
अधिकतर आधुनिक राज्य स्वयं विभिन्न धर्मों, भाषा और सांस्कृतिक परम्पराओं के लोगों को सम्मिलित करते हैं।

लेकिन एक लोकतान्त्रिक राज्य की राष्ट्रीय पहचान में नागरिकों को ऐसी राजनीतिक पहचान देने की कल्पना होती है, जिसमें राज्य के सभी सदस्य भागीदार हो सकें। लोकतान्त्रिक देश साधारणतया अपनी पहचान इस प्रकार परिभाषित करने प्रयास करते हैं कि वह यथासम्भव समावेशी हो अर्थात् जो सभी नागरिकों को राष्ट्र के अंग के रूप में स्वयं को पहचानने की अनुमति देता हो। लेकिन व्यवहार में अधिकतर देश अपनी पहचान को इस प्रकार परिभाषित करने की ओर अग्रसर हैं, जो कुछ नागरिकों के लिए राष्ट्र के साथ अपनी पहचान व सम्बन्ध बनाए रखना अन्यों की तुलना में आसान बनाता है। यह राजसत्ता के लिए भी अन्यों की तुलना में कुछ लोगों को नागरिकता देना सरल कर देता है। यह अप्रवासियों का देश होने पर गौरवान्वित होने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में भी वैसे ही सच है जैसे कि किसी अन्य देश के बारे में।

प्रश्न 5.
नागरिक अधिकार आन्दोलन के लिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
1950 का दशक संयुक्त राज्य अमेरिका के अनेक दक्षिणी राज्यों में काली और गोरी जनसंख्या के बीच व्याप्त विषमताओं के विरुद्ध नागरिक अधिकार आन्दोलन के उत्थान का साक्षी रहा है। इस प्रकार की विषमताएँ इन राज्यों द्वारा पृथक्करण कानून के नाम से विख्यात ऐसे कानूनों द्वारा पोषित होती थीं, जिनसे काले लोगों को अनेक नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया जाता था। उन कानूनों ने विभिन्न नागरिक सुविधाओं; जैसे-रेल, बस, रंगशाला, आवास, होटल, रेस्टोरेण्ट आदि में गोरे और काले लोगों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित कर रखे थे। इन कानूनों के कारण काले और गोरे बच्चों के स्कूल भी अलग-अलग थे।

इन कानूनों के विरुद्ध हुए आन्दोलन में मार्टिन लूथर किंग जूनियर अग्रणी काले नेता थे। उन्होंने इनके विरुद्ध अनेक अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए। पहला, आत्म गौरव व आत्म-सम्मान के मामले में विश्व की प्रत्येक जाति या वर्ण का मनुष्य बराबर है। दूसरा, किंग ने कहा कि पृथक्करण राजनीति के चेहरे पर ‘सामाजिक कोढ़’ की तरह है क्योंकि यह उन लोगों को गहरे मनोवैज्ञानिक घाव देता है, जो ऐसे काननों के शिकार हैं।

किंग के तर्क दिया कि पृथक्करण की प्रथा गोरे समुदाय के जीवन की गुणवत्ता भी कम करती है। किंग इसे उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करते हैं। गोरे समुदाय ने अदालत के निर्देशानुसार कुछ सामुदायिक उद्यानों में काले लोगों को प्रवेश की आज्ञा देने के बजाय उन्हें बन्द करने का फैसला किया। इसी प्रकार कुछ बेसबॉल टीमें टूट गईं क्योंकि अधिकारी काले खिलाड़ियों को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। तीसरे, पृथक्करण कानून लोगों के बीच कृत्रिम सीमाएँ खींचते हैं और उन्हें देश के व्यापक हित के लिए एक-दूसरे का सहयोग करने से रोकते हैं। इन कारणों से किंग ने बहस छेड़ी कि उन कानूनों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने पृथक्करण कानूनों के विरुद्ध शान्तिपूर्ण और अहिंसक प्रतिरोध का आह्वान किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता की परिभाषा देते हुए, नागरिक के प्रकार लिखिए।
या नागरिकता से आप क्या समझते हैं? नागरिक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
नागरिकता की परिभाषा
नागरिकता उस स्थिति का नाम है, जिसके अन्तर्गत राज्य द्वारा व्यक्ति को नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं और व्यक्ति राज्य के प्रति विशेष निष्ठा रखता है। नागरिकता को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है
लॉस्की के अनुसार, “अपनी प्रशिक्षित बुद्धि को लोकहित के लिए प्रयोग करना ही नागरिकता है।”
गैटिल के अनुसार, “नागरिकता व्यक्ति की वह स्थिति है, जिसके कारण वह कुछ सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है।
विलियम बॉयड के अनुसार, “भक्ति-भावना का उचित क्रम-निर्धारण ही नागरिकता है।’ नागरिकता की उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट होता है कि नागरिकता जीवन की वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति किसी राज्य का सदस्य होने के नाते सभी प्रकार के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है तथा राज्य के प्रति उसके अपने कुछ कर्तव्य भी सुनिश्चित होते हैं। इस प्रकार नागरिक होने की दशा का नाम ही नागरिकता है।

नागरिक के प्रकार
प्रत्येक राज्य में दो प्रकार के व्यक्ति निवास करते हैं
1. नागरिक (Citizen) और
2. विदेशी (Alien)

1. नागरिक
किसी राज्य में चार प्रकार के नागरिक होते हैं-

  • अल्पवयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु से कम के व्यक्ति होते हैं और इन्हें मताधिकार प्राप्त नहीं होता है। भारत में 18 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति इस श्रेणी में आते हैं।
  • वयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु प्राप्त व्यक्ति होते हैं। भारत में यह आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है तथा इन्हें मताधिकार प्राप्त होता है।
  • नागरिकता-प्राप्त विदेशी- ये विदेशी होते हैं, परन्तु उन्हें कुछ शर्ते पूरी करने के पश्चात् नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • मताधिकार-रहित वयस्क नागरिक- इस वर्ग के अन्तर्गत ऐसे व्यक्ति सम्मिलित किए जाते हैं, जिनकी आयु नागरिकता प्राप्त करने की निश्चित आयु अधिक होती है, परन्तु किन्हीं विशेष कारणों से इन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

2. विदेशी
विदेशी वे होते हैं, जो किसी अन्य देश के मूल निवासी होते हैं और कुछ विशेष कारणों से कुछ समय के लिए दूसरे राज्य में निवास करते हैं। विदेशी निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

  • स्थायी विदेशी- ऐसे विदेशी, जो अपना देश छोड़कर अन्य देशों में जाकर बस जाते हैं और उसी देश की नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं, ‘स्थायी विदेशी’ कहलाते हैं।
  • अस्थायी विदेशी अथवा विदेशी पर्यटक- ऐसे विदेशी, जो किसी विशेष कार्य के लिए कुछ समय के लिए दूसरे देश में जाते हैं और अपना कार्य पूरा करके स्वदेश लौट आते हैं, ‘अस्थायी विदेशी’ अथवा ‘विदेशी पर्यटक’ कहलाते हैं।
  • राजदूत एवं राजनयिक- ये विदेशी होते हैं, तथापि इन्हें अन्य विदेशियों की अपेक्षा अधिक | सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। किसी अन्य देश में ये अपने देश का कूटनीतिक एवं राजनयिक प्रतिनिधित्व करते हैं।
    सम्बन्धों के आधार पर विदेशी निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-
  • विदेशी शत्रु- शत्रु देशों में चोरी-छिपे घुसपैठ करने वाले विदेशी, विदेशी शत्रु’ कहलाते हैं। प्रायः शत्रु देशों से आने वाले विदेशियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाती है और उन पर अनेक प्रतिबन्ध भी लगा दिए जाते हैं।
  • विदेशी मित्र- मित्र राष्ट्रों से आने वाले विदेशी, विदेशी मित्र’ कहलाते हैं। ये विदेशी अतिथि के रूप में आते हैं।

प्रश्न 2.
नागरिकता को परिभाषित कीजिए। नागरिकता कैसे प्राप्त होती है तथा इसका किस प्रकार विलोपन होता है?
या नागरिकता की परिभाषा दीजिए और भारत में नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ बताइए।
या नागरिकता समाप्त होने की किन्हीं चार परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नागरिकता का तात्पर्य किसी राज्य में व्यक्ति का नागरिक होने की स्थिति से है। यह उस वैधानिक या कानूनी सम्बन्ध का नाम है जो व्यक्ति को उस राज्य के साथ, जिसका वह सदस्य है, सम्बद्ध करता है।
1. लॉस्की के शब्दों में, “अपनी प्रशिक्षित बुद्धि का लोकहित में प्रयोग ही नागरिकता है।”
2. गैटिल के अनुसार, “नागरिकता व्यक्ति की उस अवस्था को कहते हैं जिसके कारण वह अपने राज्य में राष्ट्रीय और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग कर सकता है और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए तैयार रहता है।
इस प्रकार किसी राज्य और उसके नागरिकों के उन आपसी सम्बन्धों को ही ‘नागरिकता’ कहा जाता है जिससे नागरिकों को राज्य की ओर से सामाजिक और राजनीतिक अधिकार मिलते हैं। तथा वे राज्य के प्रति कुछ कर्तव्यों का पालन करते हैं।

नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ
नागरिकता प्राप्त करने की विधियों को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया जा सकता है
1. जन्मजात नागरिकता की प्राप्ति तथा
2. राज्यकृत नागरिकता की प्राप्ति।

1. जन्मजात नागरिकता की प्राप्ति
जन्मजात नागरिकता निम्नलिखित तरीकों से प्राप्त होती है-

  • रक्त अथवा वंश सम्बन्धी सिद्धान्त- जन्मजात नागरिकता प्राप्त करने की प्रथम विधि रक्त सम्बन्ध है। इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे को जन्म किसी भी स्थान पर क्यों न हो, उसे अपने पिता की नागरिकता प्राप्त होती है। फ्रांस, इटली एवं स्विट्जरलैण्ड में इस सिद्धान्त को अपनाया गया है। यह सिद्धान्त न्यायसंगत और विवेकयुक्त है।
  • जन्म-स्थान सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे की नागरिकता का निर्णय उसके जन्म-स्थान के आधार पर किया जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे को उसी देश की नागरिकता प्राप्त होती है, जिस देश की भूमि पर उसका जन्म होता है। अर्जेण्टाइना, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका में नागरिकता का यह सिद्धान्त लागू है। यह सिद्धान्त नागरिकता का निर्णय करने में तो बहुत सरल है, किन्तु तर्कसंगत नहीं है।
  • दोहरा नियम- कई देशों में दोनों सिद्धान्तों को अपनाया गया है। इंग्लैण्ड, फ्रांस एवं अमेरिका में रक्त-सम्बन्धी सिद्धान्त तथा जन्म-स्थान सिद्धान्त दोनों प्रचलित हैं। दोहरे नियम के सिद्धान्त के अनुसार जो बच्चा अंग्रेज दम्पती से उत्पन्न हुआ हो, चाहे बच्चे का जन्म भारत में हो, अंग्रेज कहलाता है। उसे अपने पिता की नागरिकता प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त यदि किसी विदेशी की इंग्लैण्ड में सन्तान पैदा होती है, तो उसे इंग्लैण्ड की भी नागरिकता प्राप्त होगी।
    इस सिद्धान्त में यह दोष है कि एक बच्चा एक समय में दो देशों का नागरिक बन सकता है, किन्तु वयस्क होने पर वह यह निर्णय कर सकता है कि वह किस देश की नागरिकता को अपनाये और किसका परित्याग करे।

2. राज्यकृत नागरिकता की प्राप्ति
राज्यकृत नागरिकता नियमानुसार विदेशियों को प्रदान की जाती है। ऐसे व्यक्ति जिन्हें नागरिकता जन्मजात सिद्धान्त से प्राप्त नहीं होती, वरन् उस राज्य की ओर से प्राप्त होती है, जिसके कि वे मूल नागरिक नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने देश को छोड़कर किसी दूसरे देश में बस जाती है और कुछ समय पश्चात् उस देश की नागरिकताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्ति को राज्यकृत नागरिकं कहीं जाता है। नागरिकता देना अथवा न देना राज्य पर निर्भर करती है।
इस सिद्धान्त के अनुसार नागरिकता की प्राप्ति निम्नलिखित रूपों में की जाती है

  • निश्चित समय के लिए- यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश में जाकर एक निश्चित अवधि तक निवास करे तो वह प्रार्थना-पत्र देकर वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर सकता है। इंग्लैण्डे और अमेरिका में निवास की अवधि 5 वर्ष है, जब कि फ्रांस में 10 वर्ष। भारत में निवास की अवधि 4 वर्ष है।
  • विवाह- यदि कोई स्त्री किसी दूसरे देश के नागरिक से विवाह कर लेती है तो उसे अपने पति के देश की नागरिकता प्राप्त हो जाती है। भारत का नागरिक पुरुष यदि इंग्लैण्ड की नागरिक महिला के साथ विवाह कर लेता है तो उस महिला को भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाती है। जापान में इसके विपरीत नियम है। यदि कोई विदेशी व्यक्ति जापान की नागरिक महिला से विवाह कर लेता है तो उस व्यक्ति को जापान की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • सम्पत्ति खरीदना- सम्पत्ति खरीदने से भी नागरिकता प्राप्त हो जाती है। ब्राजील, पीरू और
    मैक्सिको में यह नियम प्रचलित है। यदि कोई विदेशी पीरू में सम्पत्ति खरीद लेता है तो उसे वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • गोद लेना- जब एक देश का नागरिक व्यक्ति किसी दूसरे देश के नागरिक बच्चे को गोद ले | लेता है तो गोद लिये जाने वाले बच्चे को अपने पिता के देश की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • सरकारी नौकरी- कई देशों में यह नियम है कि यदि कोई विदेशी वहाँ सरकारी नौकरी कर ले तो उसे वहाँ की नागरिकता मिल जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई भारतीय इंग्लैण्ड में सरकारी नौकरी कर लेता है तो उसे इंग्लैण्ड की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • विद्वत्ता द्वारा- कई देशों में विदेशी विद्वानों को नागरिक बनने के लिए विशेष सुविधाएँ दी | जाती हैं। विदेशी विद्वानों के निवास की अवधि दूसरे विदेशियों के निवास की अवधि से कम | होती है। फ्रांस में वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के लिए वहाँ की नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक वर्ष का निवास हीं पर्याप्त है।
  • दोबारा नागरिकता की प्राप्ति- यदि कोई नागरिक अपने देश की नागरिकता छोड़कर दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है तो उसे दूसरे देश का नागरिक माना जाता है, परन्तु यदि वह चाहे तो कुछ शर्ते पूरी करके पुन: अपने देश की नागरिकता भी प्राप्त कर सकता है।

भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ
निम्नलिखित विधियों में से किसी एक आधार पर भारतीय नागरिकता प्राप्त की जा सकती है

1. जन्म या वंश के आधार पर- 1992 ई० में संसद ने सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित कर ‘भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955′ को संशोधित किया है। 1992 ई० के पूर्व भारत के बाहर जन्मे किसी व्यक्ति को रक्त-सम्बन्ध या वंश के आधार पर भारत की नागरिकता तभी प्राप्त होती थी, जब कि उसका पिता भारत का नागरिक हो। अब व्यवस्था यह की गयी है कि भारत से बाहर जन्मे ऐसे किसी भी व्यक्ति को भारत की नागरिकता प्राप्त होगी; जिसका पिता या माता, उसके जन्म के समय भारत के नागरिक हों। इस प्रकार अब नागरिकता के प्रसंग में बच्चे की माता को पिता के ‘समकक्ष स्थिति प्रदान कर दी गयी है।
2. पंजीकरण द्वारा- निम्नलिखित श्रेणी के व्यक्ति पंजीकरण के आधार पर नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं-

  •  जो व्यक्ति पंजीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें अब भारत में कम-से-कम 5 वर्ष निवास करना होगा। पहले यह अवधि 6 माह थी।
  •  ऐसे भारतीय जो विदेशों में जाकर बस गये हैं, भारतीय दूतावासों में आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  •  विदेशी स्त्रियाँ, जिन्होंने भारतीय नागरिक से विवाह कर लिया हो, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगी।
  •  राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिक, यदि वे भारत में ही रहते हों या भारत सरकार की नौकरी , कर रहे हों, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।

3. देशीयकरण द्वारा- देशीयकरण द्वारा नागरिकता तभी प्रदान की जाती है, जब कि सम्बन्धित व्यक्ति कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत में रह चुका हो। पहले यह अवधि 5 वर्ष थी। ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986′ जम्मू-कश्मीर तथा असम सहित भारत के सभी राज्यों पर लागू होता है।

4. भूमि विस्तार द्वारा- यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहाँ की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे 1961 ई० में गोआ तथा 1975 ई० में सिक्किम को भारत में सम्मिलित किये जाने पर वहाँ की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गयी।

नागरिकता का लोप
जिस तरह नागरिकता को प्राप्त किया जा सकता है, उसी तरह कुछ स्थितियों में नागरिकता को खोया भी जा सकता है। निम्नलिखित स्थितियों में प्रायः नागरिकता का लोप हो जाता है

  1. लम्बे समय तक अनुपस्थिति- कई देशों में यह नियम है कि यदि वहाँ का नागरिक लम्बे समय तक देश से बाहर रहे तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई फ्रांसीसी नागरिक लगातार 10 वर्ष की अवधि से अधिक फ्रांस से बाहर रहे तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।
  2. विवाह- महिलाएँ विदेशी नागरिकों से विवाह करके अपने देश की नागरिकता खो देती हैं।
  3. विदेश में सरकारी नौकरी- यदि एक देश का नागरिक अपने देश की सरकार की आज्ञा प्राप्त | किये बिना किसी दूसरे देश में सरकारी नौकरी कर लेता है तो उसे अपने देश की नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
  4. स्वेच्छा से नागरिकता का त्याग- कई देशों की सरकारें अपने नागरिकों को उनकी इच्छा के अनुसार किसी देश का नागरिक बनने की आज्ञा प्रदान कर देती हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अपनी जन्मजात नागरिकता त्यागकर अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं।
  5. सेना से भाग जाने पर- यदि कोई नागरिक सेना से भागकर दूसरे देश में चला जाता है तो | उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  6. दोहरी नागरिकता प्राप्त हो जाने पर- जब किसी व्यक्ति को दो राज्यों की नागरिकता प्राप्त हो जाती है तब उसे एक राज्य की नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
  7. देश-द्रोह- जब कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध विद्रोह अथवा क्रान्ति करता है तो उसकी नागरिकता छीन ली जाती है, परन्तु देश-द्रोह के आधार पर उन्हीं नागरिकों की नागरिकता को छीना जा सकता है जो राज्यकृत नागरिक हों।
  8. गोद लेना- यदि कोई बच्चा किसी विदेशी द्वारा गोद ले लिया जाए तो बच्चे की अपने देश की नागरिकता समाप्त हो जाती है और वह अपने नये माता-पिता के देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है।
  9. विदेशी सरकार से सम्मान प्राप्त करना- यदि कोई नागरिक अपने देश की आज्ञा के बिना किसी विदेशी सरकार द्वारा दिये गये सम्मान को स्वीकार कर लेता है तो उसे उसकी मूल नागरिकता से वंचित कर दिया जाता है।
  10. पागल, दिवालिया अथवा साधु- संन्यासी होने पर- यदि कोई व्यक्ति पागल, दिवालिया अथवा साधु-संन्यासी हो जाता है तो उसका नागरिकता का अधिकार समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘विश्व नागरिकता की अवधारणा क्या है? इसके समर्थन में क्या तर्क प्रस्तुत किए जाते है?
उत्तर-
हम आज एक ऐसे विश्व में रहते हैं जो आपस में जुड़ा हुआ है। संचार के इण्टरनेट, टेलीविजन, सेलफोन और सैटेलाइट फोन जैसे नए साधनों ने उन तरीकों में भारी बदलाव कर दिया है, . जिनसे हम अपने विश्व को समझते हैं। पहले विश्व के एक हिस्से की गतिविधियों की खबर अन्य हिस्सों तक पहुँचने में महीनों लग जाते थे। लेकिन संचार के नये तरीकों ने विश्व के विभिन्न भागों में घट रही घटनाओं को हमारे तत्काल सम्पर्क की सीमाओं में ला दिया है। हम अपने टेलीविजन के पर्दे पर विनाश और युद्धों को होते देख सकते हैं, इससे विश्व के विभिन्न देशों के लोगों में साझे सरोकार और सहानुभूति विकसित होने में सहायता मिली है।

विश्व नागरिकता के समर्थक तर्क प्रस्तुत करते हैं कि चाहे विश्व-कुटुम्ब और वैश्विक समाज अभी विद्यमान नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार लोग आज एक-दूसरे से जुड़ाव अनुभव करते हैं। उदाहरणार्थ-एशिया की सुनामी या अन्य बड़ी दैवी आपदाओं के पीड़ितों की सहायता के लिए विश्व के सभी हिस्सों से उमड़ा भावोद्गार विश्व-समाज की ओर उभार का संकेत है। हमें इस भावना को मजबूत करना चाहिए और एक विश्व नागरिकता की अवधारणा की दिशा में सक्रिय होना चाहिए। राष्ट्रीय नागरिकता की अवधारणा यह मानती है कि हमारी राज्यसत्ता हमें वह सुरक्षा और अधिकार दे सकती है जिनकी हमें आज विश्व में गरिमा के साथ जीने के लिए आवश्यकता है। लेकिन राजसत्ताओं के समक्ष आज अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिनका मुकाबला वे अपने बल पर नहीं कर सकतीं।

विश्व नागरिकता की अवधारणा के आकर्षणों में से एक यह है कि इससे राष्ट्रीय सीमाओं के दोनों ओर की उन समस्याओं का समाधान करना आसान हो सकता है जिसमें कई देशों की सरकारों और लोगों की संयुक्त कार्यवाही आवश्यक होती है। उदाहरण के लिए, इससे प्रवासी और राज्यहीन लोगों की समस्या का सर्वमान्य समाधान पाना आसान हो सकता है या कम-से-कम उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है चाहे वे जिस किसी देश में रहते हों।

हम अध्ययन कर चुके हैं कि एक देश के भीतर की समान नागरिकता को सामाजिक-आर्थिक असमानता या अन्य समस्याओं से खतरा हो सकता है। इन समस्याओं का समाधान अन्ततः सम्बन्धित समाज की सरकार और जनता ही कर सकती है। इसलिए लोगों के लिए आज एक राज्य की पूर्ण और समान सदस्यता महत्त्वपूर्ण है। लेकिन विश्व नागरिकता की अवधारणा हमें याद दिलाती है कि राष्ट्रीय नागरिकता को समझदारी से जोड़ने की आवश्यकता है कि हम आज अन्तर्समबद्ध विश्व में रहते हैं। और हमारे लिए यह भी आवश्यक है कि हम विश्व के विभिन्न हिस्सों के लोगों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करें और राष्ट्रीय सीमाओं के पार के लोगों और सरकारों के साथ काम करने के लिए तैयार हों।

प्रश्न 4.
आदर्श नागरिक के गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिक के गुण
महान् दार्शनिक अरस्तू का मत है कि “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं, इसलिए राज्य के नागरिक आदर्श होने चाहिए।” आज का युग प्रजातन्त्र का युग है, जिसमें शासन का दायित्व वहाँ के नागरिकों पर होता है। अत: आदर्श नागरिकता ही राज्य के विकास का आधार है। एक आदर्श नागरिक में अग्रलिखित गुणों का होना आवश्यक है-

  1. उत्तम स्वास्थ्य- आदर्श नागरिक में उत्तम स्वास्थ्य का होना अनिवार्य है। अस्वस्थ व्यक्ति समाज पर भार स्वरूप होता है। वह न तो अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों और न ही समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है।
  2. सच्चरित्रता- मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सच्चरित्रता का बहुत अधिक महत्त्व है। चरित्रवान् व्यक्ति ही आदर्श नागरिक बन सकता है, क्योंकि चरित्र द्वारा ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का सर्वोत्तम विकास कर सकता है।
  3. शिक्षा- शिक्षा आदर्श नागरिक जीवन की नींव है। गांधी जी ने कहा था कि “शिक्षा, जो आत्मा का भोजन है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है। शिक्षा ही अज्ञान के अन्धकार का विनाश कर ज्ञान का प्रकाश करती है। अशिक्षित नागरिक कभी भी आदर्श नागरिक नहीं बन सकता।
  4. विवेक और आत्म-संयम- लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “विवेक आदर्श नागरिक का पहला गुण है।’ विवेक के आधार पर नागरिक अच्छे-बुरे का ज्ञान प्राप्त करता है तथा अपने कर्तव्यों और अधिकारों को भली प्रकारे समझ सकता है। आदर्श नागरिक का दूसरा गुण आत्म-संयम है, अर्थात् नागरिक में अपने हितों का परित्याग कर देने की स्थिति में आत्म-संयम की भावना होनी चाहिए।
  5. परिश्रमशीलता- परिश्रमशीलता वैयक्तिक विकास और सामाजिक प्रगति की आधारशिला है। इससे व्यक्ति में स्वावलम्बन की भावना उत्पन्न होती है। परिश्रमी व्यक्ति ही आदर्श नागरिक बनकर अपना, समाज का और देश का कल्याण कर सकता है।
  6. कर्तव्यपरायणता- श्रेष्ठ सामाजिक जीवन के लिए कर्तव्यपरायणता की भावना बहुत महत्त्वपूर्ण है। कर्तव्यपरायणता आदर्श नागरिक जीवन की कुंजी है।
  7. परोपकारिता- आदर्श नागरिक में परोपकार की भावना होनी आवश्यक है। समाज के असहाय, दीन-दुःखियों तथा अपाहिजों पर उपकार करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक कर्तव्य है।
  8. सहानुभूति और दया- सहानुभूति और दया की भावना भी आदर्श नागरिक के अनिवार्य गुण | हैं। ये ही व्यक्ति को दूसरों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते हैं।
  9. मितव्ययिता- आवश्यक व्यय करना आदर्श नागरिक का एक महान् गुण होता है। जो व्यक्ति फिजूलखर्जी करता है, उसे अपने जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनावश्यक खर्च करने वाला व्यक्ति स्वयं तो कष्ट उठाता ही है, साथ ही परिवार, समाज व राष्ट्र को भी हानि पहुँचाता है; अतः आदर्श नागरिक में मितव्ययिता का गुण होना आवश्यक है।
  10. आज्ञापालन तथा अनुशासन- एक आदर्श नागरिक में आज्ञापालन और अनुशासन की भावना | होनी अनिवार्य है, तभी वह राज्य द्वारा बनाये गये कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन कर सकेगा। और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे सकेगा।
  11. जागरूकता- आदर्श नागरिक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अधिकारों के कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहे। आदर्श नागरिक को अपने परिवार, ग्राम, प्रान्त तथा राष्ट्र के हितों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  12. प्रगतिशीलता- आधुनिक युग लोकतन्त्र का युग है; अत: यह आवश्यक है कि आदर्श नागरिक रूढ़ियों एवं कुरीतियों की उपेक्षा कर प्रगतिशील विचारों के अनुकूल आचरण करे।
  13. नि:स्वार्थता- आदर्श नागरिक को स्वार्थपरता से दूर रहना चाहिए तथा उसका अन्त:करण जन-कल्याण के उच्च आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।
  14. मताधिकार का उचित प्रयोग- आधुनिक प्रजातान्त्रिक युग में सभी वयस्क स्त्री-पुरुषों को मताधिकार प्राप्त है। इस अधिकार का उचित प्रयोग निष्पक्षता के साथ करना प्रत्येक आदर्श नागरिक का प्रथम कर्तव्य है। इस अधिकार के अनुचित प्रयोग से शासन में भ्रष्टाचार फैल सकता है और शासन-सत्ता अयोग्य व्यक्तियों के हाथ में पहुँच सकती है।
  15. देशभक्ति- आदर्श नागरिक का सर्वोच्च गुण देशभक्ति है। प्रत्येक आदर्श नागरिक में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी होनी चाहिए। संकट के समय देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर नागरिक अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आदर्श नागरिक में उपर्युक्त गुणों का होना आवश्यक है, क्योंकि आदर्श नागरिक ही समाज और देश को उन्नति के चरम शिखर पर पहुंचा सकते हैं।

प्रश्न 5.
भारतीय नागरिकता पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
या भारतीय नागरिकता अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारतीय नागरिकता
स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व भारत के नागरिक ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक कहलाते थे। लेकिन उन्हें वे सब अधिकार प्राप्त नहीं थे, जो उस समय एक अंग्रेज को प्राप्त थे। ब्रिटिश सरकार की अधीनता में भारतीयों को अनेक कठिनाइयों तथा असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों के साथ बड़ा अमानुषिक व्यवहार करते थे। भारतीयों की भाषण एवं प्रेस की स्वतन्त्रता पर भी अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए थे। लेकिन 15 अगस्त, 1947 ई० के बाद भारतीयों को नागरिकता सम्बन्धी वे सभी अधिकार मिल गए जिनके माध्यम से वे देश के शासन प्रबन्ध में निर्णायक भूमिका निभाने लगे।

इकहरी नागरिकता
विश्व के सभी संघीय संविधानों में नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होती है-एक संघ सरकार की नागरिकता और दूसरी उस इकाई या राज्य (प्रान्त) की नागरिकता, जिसमें वह निवास करता है। लेकिन स्वतन्त्र भारत का संविधान संघात्मक होते हुए भी भारतीयों को इकहरी नागरिकता प्रदान करता है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक भारतीय केवल भारत संघ का नागरिक, उस राज्य का नहीं जिसमें वह निवास करता है। भारतीय संविधान ने देश की अखण्डता को कायम रखने के लिए इकहरी नागरिकता की व्यवस्था को अपनाया है।

भारत का नागरिक होने का हकदार
भारतीय संविधान-निर्माताओं ने यह निश्चित नहीं किया था कि भविष्य में भारतीय नागरिकता किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है तथा उसका लोप किस प्रकार सम्भव है। भारतीय संविधान में केवल यह वर्णित है कि 27 जनवरी, 1950 ई० को भारत के नागरिक कौन हैं। नागरिकता की प्राप्ति तथा उसके निर्णय और लुप्त होने के सम्बन्ध में संविधान ने भारतीय संसद को पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिए हैं। इस प्रकार संविधान ने नागरिकता सम्बन्धी नियमों के निर्माण का एकाधिकार भारतीय संसद को सौंप दिया है।
भारतीय संविधान के लागू होने के समय नागरिकता सम्बन्धी सिद्धान्त निम्नवत् निर्धारित किए गए थे

  1. जन्म- भारत राज्य क्षेत्र में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को भारत संघ की नागरिकता प्राप्त होगी।
  2. वंश- वे सभी व्यक्ति भारत संघ के नागरिक माने जाएँगे, जिनके माता-पिता में से किसी एक ने भारत राज्य क्षेत्र में जन्म लिया है।
  3. निवास- वे सभी व्यक्ति भारत संघ के नागरिक होंगे, जो संविधान लागू होने के पाँच वर्ष पूर्व से भारत राज्य क्षेत्र के सामान्य निवासी थे।
  4. शरणार्थी- पाकिस्तान से भारत आने वाले व्यक्तियों में से वे व्यक्ति भारत संघ के नागरिक माने जाएँगे-(अ) जो 19 जुलाई, 1948 ई० से पूर्व भारत चले आए थे और जिनके माता या पिता का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था। (ब) जो 19 जुलाई, 1948 ई० के बाद भारत
    आए हों और तत्कालीन भारत सरकार द्वारा पंजीकृत कर लिए गए हों।
  5. भारतीय विदेशी- भारत के संविधान में ऐसे भारतीयों को भी नागरिकों की श्रेणी में पंजीकृत करने का उल्लेख है जो भारत राज्य क्षेत्र के बाहर किसी अन्य देश में निवास करते हों। उनके लिए निम्नलिखित दो शर्ते हैं-(अ) वे या उनके माता-पिता अथवा पितामह-पितामही में से कोई एक अविभाजित भारत में जन्में हों। (ब) उन्होंने अमुक देश में रहने वाले भारतीय राजदूत के पास भारत संघ का नागरिक बनने के लिए आवेदन-पत्र दे दिया हो और उन्हें भारतीय नागरिक पंजीकृत कर दिया गया हो।

भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955
भारतीय संसद ने सन् 1955 में भारतीय नागरिकता अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम में भारतीय नागरिकता की प्राप्ति और उसके विलोपन के प्रकार को बताया गया है। इस अधिनियम के प्रावधान निम्नलिखित हैं–

भारतीय नागरिकता की प्राप्ति

  1. जन्म- उने सभी व्यक्तियों को भारत संघ की नागरिकता प्राप्त होगी, जिनका जन्म 26 जनवरी, 1950 ई० के बाद भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में हुआ हो।
  2. पाकिस्तान से आगमन या प्रव्रजन- उन सभी व्यक्तियों को, जो 26 जुलाई, 1949 ई० के बाद भारते आए हों, भारत संघ की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी, बशर्ते वे भारतीय नागरिकों के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करा लें और कम-से-कम एक वर्ष से भारत में अवश्य निवास | करते हों।
  3. पंजीकरण- विदेशों में निवास करने वाले भारतीय भारत सरकार के दूतावास में अपना नाम |पंजीकृत कराकर भारतीय संघ की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।
  4. विवाह- उन सभी विदेशी स्त्रियों को, जिन्होंने भारतीयों से विवाह किया है, भारत संघ की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी।
  5. आवेदन-पत्र- कोई भी विदेशी व्यक्ति आवेदन-पत्र देकर भारत संघ का नागरिक बन सकता है, लेकिन शर्त यह है कि वह अच्छे आचरण का हो, संविधान में वर्णित किसी एक भाषा का ज्ञाता हो, भारत में स्थायी रूप से निवास करने की इच्छा रखता हो और कम-से-कम एक वर्ष | से भारत में लगातार रह रहा हो।
  6. निवास अथवा नौकरी- राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों के वे नागरिक जो भारत में रहते हों या भारत में नौकरी करते हों, तो वे प्रार्थना-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  7. भूमि विस्तार- यदि किसी नए प्रदेश को भारत में मिला लिया जाता है, तो वहाँ के निवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी।

भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 तथा 1992
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों की सरलता का लाभ उठाकर जम्मू-कश्मीर, पंजाब और असम जैसे राज्यों में लाखों विदेशियों ने अनधिकृत रूप से भारत में प्रवेश कर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर ली। अतः केन्द्र सरकार ने भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 पारित करके नागरिकता सम्बन्धी प्रावधानों को कठोर बना दिया।

सन 1986 के संशोधन अधिनियम के अनुसार कोई भी विदेशी जब तक कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत ‘राज्य-क्षेत्र का निवासी नहीं रहा होगा, भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकेगा। भारतीय नागरिकता सम्बन्धी प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर तथा असम राज्यों पर भी लागू किया गया। इस संशोधन अधिनियम में यह शर्त भी जोड़ दी गई है कि भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को भारतीय नागरिकता तभी प्राप्त होगी, जबकि उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक होगा।

सन् 1992 में भारतीय संसद ने नागरिकता से सम्बन्धित दूसरा संशोधन अधिनियम पारित होगा। इस संशोधन अधिनियम के अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि विदेश में निवास कर रहे किसी भारतीय दम्पती के यदि कोई सन्तान उत्पन्न होती है, तो वह भारतीय नागरिक मानी जाएगी, बशर्ते कि दम्पती में से किस एक (पति या पत्नी) ने पहले से ही भारतीय नागरिकता प्राप्त कर रखी हो। इससे पूर्व केवल पति का ही भारतीय नागरिक होना अनिवार्य था।

प्रश्न 6.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिए तथा उन्हें दूर करने के सुझाव दीजिए।
या
आदर्श नागरिकता प्राप्त करने के मार्ग में कौन-कौन-सी बाधाएँ हैं? विवेचना कीजिए।
या
आदर्श नागरिकता के मार्ग की बाधाओं के निवारण के उपायों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली बाधाएँ 
कोई भी नागरिक जन्म से ही एक आदर्श नागरिक के गुणों को लेकर पैदा नहीं होता, अपितु वह बड़ा होकर अपने जीवन में इन गुणों को विकसित करता है। परिवार, समुदाय, समाज और राज्य उसके लिए उन सुविधाओं को जुटाते हैं जिनसे वह एक आदर्श नागरिक बन सकता है। किन्तु कभी-कभी आदर्श नागरिक बनने के मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप वह आदर्श नागरिक के गुणों से वंचित रह जाता है। ये बाधाएँ अग्रलिखित हैं

1. अशिक्षा और अज्ञानता- अशिक्षा ही अज्ञानता की जड़ है। अज्ञानी व्यक्ति में उचित और अनुचित का अन्तर कर पाने का विवेक नहीं होता। अशिक्षित व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र की सेवा। अतः अशिक्षा व अज्ञानता व्यक्ति के आदर्श
नागरिक बनने के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं।

2. व्यक्तिगत स्वार्थ- यह आदर्श नागरिक के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। स्वार्थी व्यक्ति अपने | स्वार्थ को सर्वोपरि मानता है और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए समाज तथा राष्ट्र के हितों का भी बलिदान कर देता है। वह केवल अपने विषय में सोचता, कार्य करता और जीवित रहता है तथा किसी भी तरह अपने स्वार्थों की पूर्ति कर लेना ही सब कुछ मान लेता है; उदाहरणार्थ-व्यापारी के रूप में कालाबाजारी, सरकारी अधिकारी के रूप में रिश्वतखोरी
आदि। निजी स्वार्थों की प्रबलता ही कुछ मुद्राओं के लिए राष्ट्रीय हितों का सौदा कर लेती है।

3. निर्धनता अथवा आर्थिक विषमता- आदर्श नागरिकता के मार्ग में आर्थिक बाधाएँ प्रबल होती हैं। आर्थिक बाधाओं में दरिद्रता, बेरोजगारी तथा आर्थिक विषमता मुख्य हैं। भूखे व्यक्ति की नैतिकता और ईमान केवल रोटी बन जाती है। गम्भीर आर्थिक विषमताएँ उनमें वर्ग-संघर्ष की भावना उत्पन्न करती हैं, जिससे व्यक्ति अपने वर्ग के हित के लिए समाज के हित को अनदेखा कर देता है।

4. अकर्मण्यता- अकर्मण्यता अथवा आलस्य व्यक्ति को कार्य करने के प्रति उदासीन बना देता है। ऐसा व्यक्ति किसी प्रकार के कार्य करने में रुचि नहीं लेता और अपने कर्तव्य-पालन से दूर रहना चाहता है। इस प्रकारे अकर्मण्यता आदर्श नागरिकता की उपलब्धि में महान् दुर्गुण है।

5. साम्प्रदायिकता एवं जातीयता- अनेक बार व्यक्ति अपने सम्प्रदाय अथवा जातिगत स्वार्थों के वशीभूत होकर समाज और राज्य के हितों की भी अवहेलना करने लगता है। इसी भावना के कारण देश के अनेक भागों में भीषण रक्तपात तथा आत्मदाह जैसी घटनाएँ घटित हुई हैं। इस प्रकार की संकुचित भावनाएँ मनुष्य को आदर्श नागरिक नहीं बनने देतीं।

6. अनुचित दलबन्दी- आधुनिक प्रजातन्त्र का आधार दलीय व्यवस्था है। स्वस्थ दलीय परम्परा प्रजातन्त्रीय शासन की सफलता में सहायक होती है तथा जनसाधारण में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करती है; किन्तु अनुचित दलबन्दी सारे वातावरण को विषाक्त कर देती है। यहाँ तक कि विभिन्न राजनीतिक दल अपने लाभ के लिए जातीय और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काकर दंगे भी कराते हैं। ऐसे दूषित वातावरण में आदर्श नागरिकता की कल्पना भी असम्भव है।

7. सामाजिक कुप्रथाएँ और रूढ़िवादिता- कुछ सामाजिक कुप्रथाएँ भी आदर्श नागरिकता के मार्ग | में बाधा बन जाती हैं। भारतीय समाज में छुआछूत, जाति-पाँति का भेद, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, सती- प्रथा, विधवा-विवाह आदि ऐसी ही सामाजिक कुप्रथाएँ हैं।

8. उग्र-राष्ट्रीयता और साम्राज्यवाद- उग्र-राष्ट्रीयता के कारण नागरिक अपने राष्ट्र को ऊँचा समझते हैं तथा दूसरे राष्ट्रों से घृणा करते हैं। वे अपने राष्ट्र के क्षुद्र स्वार्थ के लिए पड़ोसी राष्ट्रों में साम्प्रदायिक वैमनस्य और आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त साम्राज्यवादी प्रवृत्ति भी आदर्श नागरिक जीवन की प्रबल शत्रु है। साम्राज्यवादी देश छोटे राज्यों को पराधीन कर लेते । हैं, जिसके कारण युद्ध होते हैं; उदाहरणार्थ-इराक की साम्राज्यवादी कार्यवाही के कारण इराक व बहुराष्ट्रीय सेनाओं में हुआ भीषण युद्ध।

आदर्श नागरिकता की बाधाओं को दूर करने के उपाय

आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं को निम्नलिखित उपायों द्वारा समाप्त किया जा सकता है

1. उचित शिक्षा को प्रसार- शिक्षा के प्रसार से व्यक्ति की बौद्धिक और सांस्कृतिक उन्नति होती है, अज्ञानता समाप्त होती है और उसमें विवेक जाग्रत होता है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहता है। इसलिए शिक्षा के अधिकाधिक विकास से अज्ञानता को ।
दूर करके व्यक्ति को आदर्श नागरिक बनने में सहायता की जा सकती है।

2. निर्धनता का विनाश- ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे सभी व्यक्ति अपने भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। ऐसा होने पर ही | वे अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का सम्पादन कर सकते हैं। अतः आर्थिक विषमताओं का अन्त । | करके अधिकाधिके रूप में आर्थिक समानता स्थापित की जानी चाहिए।

3. नैतिकता का उत्थान- नागरिकों को उत्तम चरित्र ही राष्ट्र की अमूल्य निधि है। जिस देश के नागरिकों में नैतिक मूल्यों का समावेश होगा, उस देश का सर्वांगीण विकास होगा। व्यक्ति को निजी स्वार्थों का त्याग करके जनहित को सर्वोपरि मानना चाहिए।

4. समाज- सुधार और रूढ़िवादिता का अन्त-समाज में प्रचलित कुप्रथाओं को सरकार द्वारा . समाज-सुधारकों की सहायता से समाप्त किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही आदर्श नागरिकता का विकास सम्भव है।

5. स्वतन्त्र और शक्तिशाली प्रेस- आदर्श नागरिकता के विकास के लिए स्वतन्त्र और शक्तिशाली प्रेस का होना बहुत आवश्यक है। विभिन्न घटनाओं और गतिविधियों की सही जानकारी नागरिकों को स्वतन्त्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करती है, किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब प्रेस सरकारी नियन्त्रण से मुक्त हो।

6. स्वस्थ राजनीतिक दलों की स्थापना- देश में राजनीतिक दलों को संगठन विशुद्ध राजनीतिक व आर्थिक आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसा होने पर राजनीतिक दल समाज व राष्ट्र के हितों को दृष्टि में रखकर काम करेंगे। ऐसे राजनीतिक दल ही नागरिकों को प्रत्येक विषय पर सार्वजनिक हित की दृष्टि से सोचने की दिशा में अग्रसर करेंगे।

7. विश्व-बन्धुत्व की भावना उग्र- राष्ट्रीयता तथा साम्राज्यवाद के दोषों से बचने के लिए विश्व बन्धुत्व की भावना को अपनाना अत्यन्त आवश्यक है। ‘जीओ और जीने दो’ तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ आदर्श नागरिकता के महान् सन्देश हैं, जो परस्पर सहयोग और सह-अस्तित्व की धारणा पर अवलम्बित हैं। इस भावना को अपनाकर एक आदर्श नागरिक अपने देश के विकास के लिए इस प्रकार कार्य करता है कि वह अन्य देशों की प्रगति में बाधक न हो।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अधिकार क्या हैं और वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकते हैं?
उत्तर-
‘अधिकार’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के दो शब्दों ‘अधि’ और ‘कार’ से मिलकर हुई है। जिनका क्रमशः अर्थ है ‘प्रभुत्व’ और ‘कार्य’। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में अधिकार का अभिप्राय उस कार्य से है, जिस पर व्यक्ति का प्रभुत्व है। मानव एक सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के अन्तर्गत ही व्यक्तित्व के विकास के लिए उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग करता है। इन सुविधाओं अथवा अधिकारों के उपयोग से ही व्यक्ति, अपने शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक विकास का अवसर प्राप्त करता है। संक्षेप में, अधिकार मनुष्य के जीवन की यह अनिवार्य परिस्थिति है, जो विकास के लिए आवश्यक है तथा जिसे राज्य और समाज द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है।
अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार निम्नलिखित हो सकते हैं-

  1. सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन बसर करने के लिए अधिकारों का दावा किया जा सकता है।
  2. अधिकारों की दावेदारी का दूसरा आधार यह है कि वे हमारी बेहतरी के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न 2.
किन आधारों पर यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?
उत्तर-
17 वीं और 18वीं सदी में राजनीतिक सिद्धान्तकार तर्क प्रस्तुत करते थे कि हमारे लिए अधिकार प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त हैं। हमें जन्म से वे अधिकार प्राप्त हैं। परिणामस्वरूप कोई व्यक्ति या शासक उन्हें हमसे छीन नहीं सकता। उन्होंने मनुष्य के तीन प्राकृतिक अधिकार चिह्नित किए। थे-जीवन को अधिकार, स्वतन्त्रता का अधिकार और सम्पत्ति का अधिकार। अन्य विभिन्न अधिकार इन बुनियादी अधिकारों से ही निकले हैं। हम इन अधिकारों का दावा करें या न करें, व्यक्ति होने के कारण हमें यह प्राप्त हैं। यह विचार कि हमें जन्म से ही कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं, बहुत शक्तिशाली अवधारणा है, क्योंकि इसका अर्थ है जो ईश्वर प्रदत्त है और उन्हें कोई मानव शासक या राज्य हमसे छीन नहीं सकता।

प्रश्न 3.
संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, आदिवासियों के अपने रहवास और जीन के तरीके को संरक्षित रखने तथा बच्चों के बँधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार जैसे नए अधिकारों को लिया जा सकता है।
उत्तर-
वर्तमान में कुछ नए अधिकारों की चर्चा होने लगी है। उनमें प्रमुख हैं-
1. अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार – यह अधिकार सांस्कृतिक अधिकारों के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अब विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों में यह माँग उठने लगी है कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाए, क्योंकि मातृभाषा को सीखने और उसके माध्यम से शिक्षा पाने का उन्हें पूर्ण अधिकार है।
2. अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएँ खोलने का अधिकार – अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा और उसके विकास के लिए कुछ अल्पसंख्यक इस प्रकार की शिक्षण संस्थाओं को प्रारम्भ करने के लिए इसे अधिकार के रूप में मानने लगे हैं। भारत में यह सुविधा प्रदान की गई है।

प्रश्न 4.
राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर बताइए। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights 4

प्रश्न 5.
अधिकार राज्य की सत्ता पर, कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
अधिकार राज्य को कुछ विशिष्ट तरीकों से कार्य करने के लिए वैधानिक दायित्व सौंपते हैं। प्रत्येक अधिकार निर्देशित करता है कि राज्य के लिए क्या करने योग्य है और क्या नहीं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के जीवन जीने का अधिकार राज्य को ऐसे कानून बनाने के लिए बाध्य करता है। जो दूसरों के द्वारा क्षति पहुँचाने से उसे बचा सके। यह अधिकार राज्य से माँग करता है कि वह व्यक्ति को चोट या नुकसान पहुँचाने वालों को दण्डित करे। यदि कोई समाज अनुभव करता है कि जीने के अधिकार को आशय अच्छे स्तर के जीवन का अधिकार है, तो वह राज्य से ऐसी नीतियों के अनुपालन की अपेक्षा करता है, जो स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ पर्यावरण और अन्य आवश्यक निर्धारकों का प्रावधान करे।

अधिकार केवल यह ही नहीं बताते कि राज्य को क्या करना है, वे यह भी बताते हैं कि राज्य को क्या कुछ नहीं करना है। उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार कहता है कि राज्य केवल । अपनी मर्जी से उसे गिरफ्तार नहीं कर सकता। अगर वह गिरफ्तार करना चाहता है तो उसे इस । कार्यवाही को उचित ठहराना पड़ेगा, उसे किसी न्यायालय के समक्ष इस व्यक्ति की स्वतन्त्रता में कटौती करने का कारण स्पष्ट करना होगा। इसलिए किसी व्यक्ति को पकड़ने के लिए पहले गिरफ्तारी का वारण्ट दिखाना पुलिस के लिए आवश्यक होता है, इस प्रकार अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं।

दूसरों शब्दों में, कहा जाए तो हमारे अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की सत्ता वैयक्तिक जीवन और स्वतन्त्रता की मर्यादा का उल्लंघन किए बिना काम करे। राज्य सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न सत्ता हो सकता है, उसके द्वारा निर्मित कानून बलपूर्वक लागू किए जा सकते हैं, लेकिन सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य का अस्तित्व अपने लिए नहीं बल्कि व्यक्ति के हित के लिए होता है। इसमें जनता का ही अधिक महत्त्व है औ सत्तात्मक सरकार को उसके ही कल्याण के लिए काम करना होता है। शासक अपनी कार्यवाहियों के लिए जबावदेह है और उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून लोगों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए ही होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है। यह कथन किसका है?
(क) हॉलैण्ड
(ख) बोसांके
(ग) वाइल्ड
(घ) ऑस्टिन
उत्तर-
(ख) बोसांके।

प्रश्न 2.
“अधिकार कुछ विशेष कार्यों को करने की स्वतन्त्रता की उचित माँग है।” यह कथन किसका है?
(क) वाइल्ड
(ख) बेनीप्रसाद
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(क) वाइल्ड।

प्रश्न 3.
अधिकारों की उत्पत्ति के प्राकृतिक सिद्धान्त के समर्थकों में कौन नहीं है?
(क) हॉब्स
(ख) बर्क
(ग) रूसो
(घ) लॉक
उत्तर-
(ख) बर्क।

प्रश्न 4.
अधिकारों के सामाजिक कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त के समर्थक कौन हैं?
(क) बेन्थम
(ख) रूसो
(ग) रिची
(घ) लॉस्की
उत्तर-
(क) बेन्थम।

प्रश्न 5.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त के समर्थक हैं
(क) गिलक्राइस्ट
(ख) अरस्तू
(ग) हॉलैण्ड
(घ) जैफरसन
उत्तर-
(ग) हॉलैण्ड। .

प्रश्न 6.
“अपने कर्तव्य का पालन करो, अधिकार स्वतः तुम्हें प्राप्त हो जाएँगे।” यह किसका कथन |
(क) महात्मा गांधी
(ख) बेनीप्रसाद
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(क) महात्मा गांधी।

प्रश्न 7.
लॉस्की के अधिकार सम्बन्धी विचार उनकी किस कृति में मिलते हैं?
(क) दि ग्रामर ऑफ दि पॉलिटिक्स
(ख) पॉलिटिक्स
(ग) रिपब्लिक
(घ) लॉज
उत्तर-
(क) दि ग्रामर ऑफ दि पॉलिटिक्स। |

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार किसे कहते हैं?
उत्तर–
अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य क्रियान्वित करता है।

प्रश्न 2.
अधिकारों की एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “अधिकार वे सामाजिक दशाएँ हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

प्रश्न 3.
अधिकारों के दो भेद बताइए।
उत्तर-
(i)सामाजिक अधिकार,
(ii) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 4.
दो मूल अधिकारों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) समानता का अधिकार,
(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार।

प्रश्न 5.
अधिकार के किन्हीं दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
अधिकार के दो तत्त्व निम्नवत् है।
(i) सार्वभौमिकता और
(ii) राज्य का सरंक्षण।

प्रश्न 6.
अधिकारों का कौन-सा सिद्धान्त सर्वाधिक सन्तोषप्रद है?
उत्तर-
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त सर्वाधिक सन्तोषप्रद है।

प्रश्न 7.
दो मानवाधिकारों को लिखिए।
उत्तर-
(i) स्वतन्त्रता का अधिकार
(ii) समानता का अधिकार।

प्रश्न 8.
नागरिक का एक राजनीतिक अधिकार बताइए।
उत्तर–
नागरिक का एक राजनीतिक अधिकार है-मतदान का अधिकार।

प्रश्न 9.
कानूनी अधिकार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
कानूनी अधिकार दो प्रकार के होते है।
(i) सामाजिक अधिकार तथा
(ii) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 10.
कानूनी अधिकार के सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) बेन्थम,
(ii) ऑस्टिन।

प्रश्न 11.
लॉक द्वारा बताए गए किन्हीं दो प्राकृतिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
(i) स्वतन्त्रता का अधिकार,
(ii) सम्पत्ति का अधिकार।

प्रश्न 12.
विदेशियों को राज्य में प्राप्त होने वाले कोई दो अधिकार लिखिए।
उत्तर-
(i) जीवन रक्षा का अधिकार,
(ii) पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार।

प्रश्न 13.
नागरिक के दो प्राकृतिक अधिकार बताइए।
उत्तर-
(i) जीवन का अधिकार,
(ii) सम्पत्ति का अधिकार।

प्रश्न 14.
अधिकारों के समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थन किस विचारक ने किया है?
उत्तर–
अधिकारों के समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थन लॉस्की ने किया है।

प्रश्न 15.
अधिकारों के आदर्शवादी सिद्धान्त के समर्थक किन्हीं दो विचारकों के नाम बताइए।
उत्तर-
थॉमस हिल ग्रीन एवं बोसांके।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
व्यक्ति के चार महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  जीवन-सुरक्षा का अधिकार- प्रत्येक मनुष्य को जीवन का अधिकार है। यह अधिकार | मौलिक तथा आधारभूत है, क्योंकि इसके अभाव में अन्य अधिकारों का अस्तित्व महत्त्वहीन है।
  2.  समानता का अधिकार- समानता का तात्पर्य है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति के रूप में व्यक्ति का समान रूप से सम्मान किया जाए तथा उसे उन्नति के समान अवसर प्रदान किए जाएँ।
  3.  स्वतन्त्रता का अधिकार- स्वतन्त्रता का अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में अपरिहार्य है। स्वतन्त्रता के अधिकार के आधार पर व्यक्ति अपनी इच्छा से बिना किसी बाह्य बन्धन के अपने जीवन के विकास का ढंग निर्धारित कर सकता है।
  4.  सम्पत्ति का अधिकार- समाज में व्यक्ति वैध तरीकों से सम्पत्ति का अर्जन करता है। अत: उसे यह अधिकार होना चाहिए कि वह स्वतन्त्र रूप से अर्जित किए हुए धने का उपयोग स्वेच्छा से अपने व्यक्तित्व विकास के लिए कर सके।

प्रश्न 2.
अधिकारों के महत्त्व की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर–
अधिकारों का महत्त्व निम्नलिखित दृष्टियों से है

  1.  व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकार बहुत ही आवश्यक हैं।
  2.  अधिकार समाज और राष्ट्र की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  3.  अधिकार प्रजातन्त्र का आधार हैं। प्रो० बार्कर के अनुसार, “व्यक्ति के अधिकारों के स्पष्ट दर्शन से ही स्वतन्त्रता का विचार एक वास्तविक अर्थ प्राप्त करता है। उसके अभाव में स्वतन्त्रता एक खोखली या निरर्थक एवं व्यक्तिवाद एक काल्पनिक वस्तु रह जाता है।”
  4.  अधिकार सुदृढ़ एवं कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक हैं।
  5.  सच्चे अर्थों में किसी नागरिक से अधिकारों के अभाव में आदर्शवादिता की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

प्रश्न 3.
अधिकारों के अस्तित्व के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
यह बात सर्वमान्य है कि व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग सामाजिक पृष्ठभूमि में करता है। अधिकारों की अवधारणा के मूल में यह बात स्पष्टयता परिलक्षित होती है कि व्यक्ति अधिकारों का प्रयोग अपने हित में करने के साथ-साथ सामाजिक हितों में भी करे। जब तक कोई अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है, तब तक वह अस्तित्वहीन ही रहता है; उदाहरणार्थ-नागरिक को अपनी इच्छानुसार जीवन-यापन करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन साथ-ही-साथ उसका यह कर्तव्य भी बन जाता है कि उसकी यह स्वेच्छा सामाजिक एवं नैतिक मानदण्डों को पूरा करती है कि नहीं। यदि आपके अधिकार सामाजिक व नैतिक मर्यादा का उल्लंघन करते हैं, तो इन्हें सामाजिक स्वीकृति नहीं दी जा सकती। इस पर अधिकारों के अस्तित्व के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। समाज कभी भी व्यक्ति के जुआ खेलने, मद्यपान करने, वेश्यावृत्ति करने तथा दूसरे का अहित करने के अधिकार को मान्यता प्रदान नहीं करता है। समाज केवल उन्हीं अधिकारों को स्वीकृति प्रदान करता है जो समाज में सहयोग, भाई-चारे तथा सामंजस्य की भावना को सुदृढ़ करते हैं।

प्रश्न 4.
मानव गरिमा पर काण्ट के क्या विचार थे?
उत्तर–
अन्य प्राणियों से अलग मनुष्य की एक गरिमा होती है। इस कारण वे अपने आप में बहुमूल्य हैं। 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल काण्ट के लिए इस साधारण विचार का गहन अर्थ था। • उनके लिए इसका आशये था कि प्रत्येक मनुष्य की गरिमा है और मनुष्य होने के नाते उसके साथ इसी के अनुकूल व्यवहार किया जाना चाहिए। मनुष्य अशिक्षित हो सकता है, गरीब या शक्तिहीन हो सकता है। वह बेईमान अथवा अनैतिक भी हो सकता है फिर भी वह एक मनुष्य है और न्यूनतम ही सही, प्रतिष्ठा पाने का अधिकारी है। काण्ट के लिए लोगों के साथ गरिमामय बरताव करने का अर्थ था उनके साथ नैतिकता से पेश आना। यह विचार उन लोगों के लिए एक सम्बल था जो लोग सामाजिक ऊँच-नीच के विरुद्ध मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं चार राजनीतिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नागरिकों के चार प्रमुख राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  मतदान का अधिकार- लोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था में नागरिकों को प्रदत्त मतदान का अधिकार अन्य अधिकारों में सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस अधिकार द्वारा नागरिक अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करके विधायिकाओं में भेजते हैं।
  2.  निर्वाचित होने का अधिकार– प्रत्येक नागरिक को निर्वाचित होने का अधिकार प्राप्त होता है। जब तक नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक वे शासन-संचालन में भाग नहीं ले सकते हैं। इस अधिकार की प्राप्ति की लिंग, जाति, सम्प्रदाय, धर्म आदि का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  3.  सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार-  प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता, क्षमता तथा अनुभव के आधार पर सरकारी पद प्राप्त करने का समान अवसर एवं अधिकार होना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  4.  प्रार्थना-पत्र देने का अधिकार- इस अधिकार के आधार पर नागरिक असुविधा, कष्ट अथवा असामान्य परिस्थितियों में प्रार्थना-पत्र द्वारा राज्य का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकृष्ट कर सकते हैं।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकार क्या हैं? मौलिक अधिकारों का महत्त्व लिखिए।
उत्तर–
वे अधिकार, जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा आवश्यक हैं तथा जिन्हें संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किया जाता हैं तथा संविधान में प्रदत्त प्रावधानों के अन्तर्गत इनकी सुरक्षा की भी व्यवस्था होती है, ‘मौलिक अधिकार’ कहलाते हैं।

मौलिक अधिकारों का महत्त्व

  1.  मौलिक अधिकार प्रजातन्त्र के आधार स्तम्भ हैं। ये व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक तथा नागरिक जीवन के प्रभावात्मक उपयोग के एकमात्र साधन हैं। मौलिक अधिकारों द्वारा उन आधारभूत स्वतन्त्रताओं तथा स्थितियों की व्यवस्था की जाती है जिसके अभाव में व्यक्ति उचित रूप से अपना जीवनयापन नहीं कर सकता है।
  2.  मौलिक अधिकार किसी व्यक्ति विशेष, वर्ग अथवा दल की तानाशाही को रोकने का प्रमुख साधन हैं। मौलिक अधिकार सरकार एवं बहुमत के अत्याचारों से व्यक्ति की, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की रक्षा करते हैं।
  3.  मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा सामाजिक नियन्त्रण के मध्य उचित सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
  4.  मौलिक अधिकार नागरिकों को न्याय तथा उचित व्यवहार की सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये राज्य के बढ़ते हुए हस्तक्षेप तथा व्यक्ति की स्वतन्त्रता के मध्य उचित सन्तुलन स्थापित करते हैं।

प्रश्न 3.
राजनीतिक अधिकारों से क्या तात्पर्य है? प्रमुख राजनीतिक अधिकार कौन-से हैं?
उत्तर-
राजनीतिक अधिकार
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “राजनीतिक अधिकारों का तात्पर्य उन व्यवस्थाओं से है, जिनमें नागरिकों को शासन कार्य में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है अथवा नागरिक शासन प्रबन्ध को प्रभावित कर सकते हैं।” राजनीतिक अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों की गणना की जा सकती है|

  1.  मत देने का अधिकार- अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन के अधिकार को ही मताधिकार कहते हैं। यह अधिकार लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली के अन्तर्गत प्राप्त होने वाला महत्त्वपूर्ण अधिकार है। और इस अधिकार का प्रयोग करके नागरिक अप्रत्यक्ष रूप से शासन प्रबन्ध में भाग लेते हैं। आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों में विक्षिप्त, दिवालिये और अपराधियों को छोड़कर अन्य वयस्क नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है। सामान्यतया 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके भारतीय नागरिकों को मताधिकार प्राप्त है।
  2.  निर्वाचित होने का अधिकार- मताधिकार की पूर्णता के लिए प्रत्येक नागरिक को निर्वाचित होने का अधिकार भी प्राप्त होता है। निर्धारित अर्हताओं को पूरा करने पर कोई भी नागरिक किसी भी राजनीतिक संस्था के निर्वाचित होने के लिए चुनाव लड़ सकता है।
  3.  सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार- व्यक्ति का तीसरा राजनीतिक अधिकार सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार है। राज्य की ओर से नागरिकों को योग्यतानुसार उच्च सरकारी पद प्राप्त करने की सुविधा होनी चाहिए। इस अधिकार के अन्तर्गत किसी भी नागरिक को धर्म, वर्ण तथा जाति के आधार पर सरकारी पदों से वंचित नहीं किया जाएगा। डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “इस अधिकार का यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को सरकारी पद प्राप्त हो। जाएगा, वरन् इसका यह अर्थ है कि उन सभी व्यक्तियों को सरकारी पद की प्राप्ति होगी, जो उस पद को पाने की योग्यता रखते हैं।”
  4.  आवेदन-पत्र देने का अधिकार- प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए कि | वह आवेदन-पत्र देकर सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित कर सके।
  5.  विदेशों में सुरक्षा का अधिकार- राज्य को चाहिए कि वह अपने उन नागरिकों, जो विदेशों में जाते हैं, की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करे।

प्रश्न 4.
अधिकारों के तत्त्व अथवा लक्षणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अधिकार के तत्त्व अथवा लक्षण
अधिकार के अनिवार्य तत्त्वों, लक्षणों अथवा विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित हैं

  1.  अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं- अधिकार के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। जब किसी माँग को समाज स्वीकार कर लेता है, तब वह अधिकार बन जाती है। प्रो० आशीर्वादी लाल के अनुसार, “प्रत्येक अधिकार के लिए समाज की स्वीकृति अनिवार्य होती है। ऐसी स्वीकृति के अभाव में अधिकार केवल कोरे दावे रह जाते हैं।”
  2.  सार्वभौमिक– अधिकार सार्वभौमिक होते हैं अर्थात् अधिकार समाज के सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्रदान किए जाते हैं। अधिकारों की सार्वभौमिकता ही कर्तव्यों को जन्म देती है।
  3.  राज्य का संरक्षण- अधिकारों को राज्य का संरक्षण मिलना भी अनिवार्य है। राज्य के संरक्षण में ही व्यक्ति अपने अधिकारों का समुचित उपभोग कर सकता है। बार्कर के शब्दों में, “मानव चेतना स्वतन्त्रता चाहती है, स्वतन्त्रता में अधिकार निहित हैं तथा अधिकार राज्य की माँग करते हैं।”
  4.  अधिकारों में सामाजिक हित की भावना निहित होती है— अधिकारों में व्यक्तिगत स्वार्थ के साथ-साथ सार्वजनिक हित की भावना भी विद्यमान होती है।
  5.  कल्याणकारी स्वरूप- अधिकारों का सम्बन्ध मुख्यतः व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास से होता है। इस कारण अधिकार के रूप में केवल वे ही स्वतन्त्रताएँ और सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक होती हैं। इस प्रकार अधिकारों का स्वरूप कल्याणकारी होता है।
  6. समाज की स्वीकृति- अधिकार उन कार्यों की स्वतन्त्रता का बोध कराता है जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए उपयोगी होते हैं। समाज की स्वीकृति का यह अभिप्राय है कि व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग समाज के अहित में नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अधिकार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार
राज्य के प्रति निष्ठा एवं भक्ति रखना और राज्य की आज्ञाओं का पालन करना व्यक्ति का कानूनी दायित्व होता है। अतः व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का कानूनी अधिकार तो प्राप्त हो ही नहीं सकता, परन्तु व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नैतिक अधिकार अवश्य प्राप्त होता है। शासन के अस्तित्व का उद्देश्य सामान्य जनता का हित सम्पादित करना होता है। जब शासन जनता के हित में कार्य न करे, तब व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का केवल नैतिक अधिकार ही प्राप्त नहीं है, वरन् । यह उसका नैतिक कर्त्तव्य भी है। इस सम्बन्ध में सुकरात का मत था कि यदि व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने का अधिकार है तो राज्य द्वारा प्रदान किए गए दण्ड को भी स्वीकार करना उसका कर्तव्य है। व्यक्तिवादी तथा अराजकतावादी विचारकों ने व्यक्ति द्वारा राज्य का विरोध करने के अधिकार का समर्थन किया है। गांधी जी के अनुसार, “व्यक्ति का सर्वोच्च कर्तव्य अपनी अन्तरात्मा के प्रति होता है।” अत: अन्तरात्मा की आवाज पर राज्य का विरोध भी किया जा सकता है। राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के सम्बन्ध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस अधिकार का प्रयोग राज्य एवं समाज के हित से सम्बन्धित सभी बातों पर विचार करके तथा विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। लोकतान्त्रिक राज्यों में नागरिकों को शासन की आलोचना करने एवं अपना दल बनाने का भी अधिकार होता है। लोकतान्त्रिक देशों में राज्य के प्रति विरोध का अधिकार जनता की इस भावना से परिलक्षित होता है कि वह राज्य के प्रति अपना दायित्व निष्ठापूर्वक न निभा रहे प्रतिनिधियों को आगे सत्ती का अवसर प्रदान नहीं करती।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार की परिभाषा देते हुए उसका वर्गीकरण कीजिए।
या
अधिकार से क्या तात्पर्य है? अधिकार के प्रकार लिखिए।
उत्तर-
अधिकार मुख्यतया हकदारी अथवा ऐसा दावा है जिसका औचित्य सिद्ध हो। अधिकार की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
ऑस्टिन के अनुसार, “अधिकार व्यक्ति की वह क्षमता है, जिसके द्वारा वह अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों से कुछ विशेष प्रकार के कार्य करा लेता है।”
ग्रीन के अनुसार, “अधिकार मानव-जीवन की वे शक्तियाँ हैं, जो नैतिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति को अपना कार्य पूरा करने के लिए आवश्यक हैं।”
बोसांके के अनुसार, “अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य क्रियान्वित करता है।”
हॉलैण्ड के अनुसार, “अधिकार किसी व्यक्ति की वह क्षमता है, जिससे वह अपने बल पर नहीं, अपितु समाज के बल से दूसरों के कार्यों को प्रभावित कर सकता है।”
प्रो० लॉस्की के अनुसार, “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने उच्चतम स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकता।”
गार्नर के अनुसार, “नैतिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के व्यवसाय की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्तियों को अधिकार कहा जाता है।”
श्रीनिवास शास्त्री के अनुसार, “अधिकार समुदाय के कानून द्वारा स्वीकृत वह व्यवस्था, नियम या रीति है, जो नागरिक के सर्वोच्च नैतिक कल्याण में सहायक हो।”
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “अधिकार वे सामाजिक दशाएँ हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि-

  1.  अधिकार सामाजिक दशाएँ हैं।
  2.  अधिकार व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक तत्त्व हैं।
  3.  अधिकारों द्वारा ही व्यक्तिगत और सामाजिक प्रगति सम्भव है।
  4.  अधिकारों को समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है।

अधिकारों का वर्गीकरण (रूप अथवा प्रकार)

साधारण रूप से अधिकारों को निम्नलिखित रूपों अथवा प्रकारों के अन्तर्गत वर्गीकृत किया गया है

  1.  प्राकृतिक अधिकार- प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं, जो प्राकृतिक अवस्था में मनुष्यों को प्राप्त थे। परन्तु ग्रीन ने प्राकृतिक अधिकारों को आदर्श अधिकारों के रूप में माना है। उसके | अनुसार, ये वे अधिकार हैं, जो व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए आवश्यक हैं और जिनकी प्राप्ति समाज में ही सम्भव है।
  2.  नैतिक अधिकार- ये वे अधिकार हैं, जिनका सम्बन्ध मानव के नैतिक आचरण से होता है। इनका स्वरूप अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्य-पालन में अधिक निहित होता है।
  3.  कानूनी अधिकार- कानूनी अधिकार वे हैं, जिनकी व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती है और जिनका उल्लंघन कानून द्वारा दण्डनीय होता है। लीकॉक के अनुसार, “कानूनी अधिकार के विशेषाधिकार हैं, जो एक नागरिक को अन्य नागरिकों के विरुद्ध प्राप्त होते हैं तथा जो राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा प्रदान किए जाते हैं और (उसी के द्वारा) रक्षित होते हैं।”

कानूनी अधिकार दो प्रकार के लेते हैं
(i) सामाजिक या नागरिक अधिकार (social or Civil Rights) तथा
(ii) राजनीतिक अधिकार (Political Rights)।

प्रश्न 2.
सामाजिक या नागरिक अधिकारों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
सामाजिक या नागरिक अधिकार
सामाजिक या नागरिक अधिकार राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होते हैं। मुख्य सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  जीवन-रक्षा का अधिकार- प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की सुरक्षा चाहता है। यदि व्यक्ति को जीने का अधिकार प्राप्त न हो या उसके जीवन की सुरक्षा न हो, तो उस दशा में उसका सामाजिक जीवन कष्टदायी हो जाएगा। वह प्रत्येक क्षण अपने जीवन की सुरक्षा के लिए चिन्तित रहेगा और समाज के किसी भी कार्य में अपना योगदान नहीं कर सकेगा। भारत के परिप्रेक्ष्य में इस अधिकार को मौलिक अधिकारों (अनु० 21) के अन्तर्गत विशेष महत्त्व की स्थिति प्रदान की गई है।
  2.  सम्पत्ति का अधिकार- सम्पत्ति व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति का एक प्रमुख साधन है, . | इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार उसका उपभोग करने का अधिकार प्राप्त होना। चाहिए। इस अधिकार के अन्तर्गत व्यक्ति को सम्पत्ति अर्जित करने, खरीदने, बेचने और उसका उपभोग करने का अधिकार है। यूनानी विचारक अरस्तू का मत था कि सम्पत्ति व्यक्ति के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि परिवार या कुटुम्ब की आवश्यकता। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मत है कि सम्पत्ति ही सब कष्टों की जननी है। उनके अनुसार सम्पत्ति पूँजीवादी व्यवस्था को जन्म देती है और समाज में वर्ग-संघर्ष उत्पन्न करती है। अत: समाज में सम्पत्ति का न्यायपूर्ण वितरण होना आवश्यक है। सम्भवतः इसी दृष्टिकोण को देखते हुए भारत के संविधान में सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की श्रेणी से पृथक् कर दिया गया है।
  3.  शिक्षा का अधिकार- शिक्षा मानवे व्यक्तित्व के विकास की आधारशिला है। समाज और राष्ट्र का विकास शिक्षित व्यक्तियों पर ही आधारित है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए।
  4.  धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति के लिए धर्म जीवन का एक अनिवार्य तत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी धर्म का अनुयायी होता है। अतः राज्य को धर्मनिरपेक्ष रहकर प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान करना चाहिए। जैसा कि रूसो को कथन है, “जब तक उनके सिद्धान्त नागरिकता के कर्तव्यों के प्रतिकूल न हों, व्यक्ति को उन सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, जो दूसरों के प्रति सहिष्णु है।”
  5.  लेखन एवं विचाराभिव्यक्ति को अधिकार- राज्य को चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति को लेखन, भाषण और विचाराभिव्यक्ति का अधिकार प्रदान करे। इस अधिकार द्वारा व्यक्ति का मानसिक विकास सम्भव होता है, लेकिन मनुष्य को यह अधिकार कानून की सीमा के अन्तर्गत ही प्रदान किया जाना चाहिए।
  6.  सभा करने व संगठन बनाने का अधिकार- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह एकाकी जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है; अतः उसे सभा करने या समुदाय बनाने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। लेकिन इस अधिकार का उपभोग राज्य के कानूनों की सीमा के अन्तर्गत ही होना चाहिए।
  7.  आवागमन का अधिकार- इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को राज्य की सीमा के अन्तर्गत स्वतन्त्रतापूर्वक ऐक स्थान से दूसरे स्थान को जाने की सुविधा प्राप्त होनी चाहिए। गिलक्राइस्ट के अनुसार, स्वतन्त्रतापूर्वक घूमने के अधिकार के अभाव में जीवन का कोई भी अर्थ नहीं है।
  8.  पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार- परिवार सामाजिक जीवन की आधारशिला है; अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार पारिवारिक जीवन व्यतीत करने को अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए। परन्तु इस अधिकार का यह अर्थ कदापि नहीं है। कि परिवार समाज की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन करे और परिवार के सदस्यों को दुराचार की शिक्षा दे। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी राज्य द्वारा हस्तक्षेप किया जा सकता है।
  9.  मनोरंजन का अधिकार- प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक श्रम करने के उपरान्त मनोरंजन की आवश्यकता होती है। अत: व्यक्ति को अवकाश के समय मनोरंजन का अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए।
  10.  सांस्कृतिक अधिकार- इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी भाषा एवं साहित्य को अध्ययन व विकास कर सके। अल्पसंख्यकों के लिए यह अधिकार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
  11.  व्यवसाय की स्वतन्त्रता का अधिकार- व्यवसाय की स्वतन्त्रता का अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की स्वतन्त्रता हो कि वह अपनी इच्छा तथा योग्यतानुसार व्यवसाय का चयन कर सके।

प्रश्न 3.
अधिकारों से सम्बन्धित प्राकृतिक सिद्धान्त और वैधानिक सिद्धान्त के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
अधिकारों को प्राकृतिक सिद्धान्त
हॉब्स, लॉक तथा रूसो आदि विद्वानों ने अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त का समर्थन किया है। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है। इसके अनुसार अधिकार प्रकृति-प्रदत्त हैं और वे व्यक्ति को जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाते हैं। व्यक्ति प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग राज्य के उदय के पूर्व से ही करता आ रहा है। राज्य इन अधिकारों को न तो छीन सकता है और न ही वह इनका जन्मदाता है। टॉमस पेन के अनुसार, “प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं, जो मनुष्य के अस्तित्व को स्थायित्व प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।” इस दृष्टिकोण से अधिकार असीमित, निरपेक्ष तथा स्वयंसिद्ध हैं। राज्य इन अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  1.  यह सिद्धान्त अनैतिहासिक है, क्योंकि जिस प्राकृतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इन अधिकारों के प्राप्त होने का उल्लेख किया गया है, वह काल्पनिक है।
  2.  ग्रीन का मत है कि समाज से प्रथक् कोई भी अधिकार सम्भव नहीं है।
  3.  यह सिद्धान्त राज्य को कृत्रिम संस्था मानता है, जो अनुचित है।
  4.  प्राकृतिक अधिकारों में परस्पर विरोधाभास पाया जाता है।
  5.  यह सिद्धान्त कर्तव्यों के प्रति मौन है, जबकि कर्त्तव्य के अभाव में अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

अधिकारों का कानूनी या वैधानिक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रवर्तक बेन्थम, हॉलैण्ड ऑस्टिन आदि विचारक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार राज्य की इच्छा का परिणाम है और राज्य ही अधिकारों का जन्मदाता है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के विपरीत है। व्यक्ति राज्य के सरंक्षण में रहकर ही अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। राज्य ही कानून द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करता है, जहाँ कि व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग कर सके। राज्य ही अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अधिकारों का अस्तित्व केवल राज्य के अन्तर्गत ही सम्भव है।
आलोचना—इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  1.  इस सिद्धान्त से राज्य की निरंकुशता का समर्थन होता है।
  2.  राज्य नैतिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
  3.  अधिकारों में स्थायित्व नहीं रहता है।

प्रश्न 4.
अधिकारों के ऐतिहासिक और समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों की उत्पत्ति प्राचीन रीति-रिवाजों के परिणामस्वरूप होती है। जिन रीति-रिवाजों को समाज स्वीकृति दे देता है, वे अधिकार का रूप धारण कर लेते हैं। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार, अधिकार परम्परागत हैं तथा सतत् विकास के परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त इनका आधार ऐतिहासिक है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में परम्परागत अधिकारों का बहुत अधिक महत्त्व रहा है।
आलोचना- इस सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि अधिकारों का आधार केवल रीति-रिवाज तथा परम्पराएँ नहीं हो सकतीं, क्योंकि कुछ परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज समाज के कल्याण में बाधक होते हैं। अत: इस दृष्टि से यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है।

अधिकारों का समाज-कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त
जे०एस० मिल, जेरमी बेन्थम, पाउण्ड तथा लॉस्की आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त का प्रमुख लक्ष्य उपयोगिता या समाज-कल्याण है। प्रो० लॉस्की के अनुसार, “अधिकारों का औचित्य उनकी उपयोगिता के आधार पर आँकना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार वे साधन हैं, जिनसे समाज का कल्याण होता है। लॉस्की का मत है, “लोक-कल्याण के विरुद्ध मेरे अधिकार नहीं हो सकते; क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है। जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ तथा अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”
इस सिद्धान्त की निम्नलिखित मान्यताएँ हैं

  1.  अधिकार समाज की देन हैं, प्रकृति की नहीं।
  2.  अधिकारों का अस्तित्व समाज-कल्याण पर आधारित है।
  3.  व्यक्ति केवल उन्हीं अधिकारों का प्रयोग का सकता है, जो समाज के हित में हों।
  4.  कानून, रीति-रिवाज तथा अधिकार सभी का उद्देश्य समाज-कल्याण है।
    आलोचना- यह सिद्धान्त तर्कसंगत और उपयोगी तो है, किन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि यह सिद्धान्त समाज-कल्याण की ओट में राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता का अपहरण करने का अवसर प्रदान करती है, लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से यह दोष महत्त्वहीन है।

प्रश्न 5.
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त
इसे सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार वे बाह्य साधन तथा दशाएँ हैं, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होती हैं। इस सिद्धान्त का समर्थन थॉमस हिल ग्रीन, बैडले, बोसांके आदि विचारक ने किया है।
इस सिद्धान्त की अग्रलिखित मान्यताएँ हैं

  1. अधिकार व्यक्ति की माँग है।
  2.  यह माँग समाज द्वारा स्वीकृत होती है।
  3.  अधिकारों का स्वरूप नैतिक होता है।
  4.  अधिकारों का उद्देश्य समाज का वास्तविक हित है।
  5.  अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक साधन हैं।

आलोचना- इस सिद्धान्त के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं

  1.  यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है; क्योंकि व्यक्तित्व का विकासे व्यक्तिगत पहलू है तथा राज्य एवं समाज जैसी संस्थाओं के लिए यह जानना बहुत कठिन है कि किसके विकास के लिए क्या आवश्यक है।
  2.  यह व्यक्ति के हितों पर अधिक बल देता है तथा समाज का स्थान गौण रखता है। अतः व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए समाज के हितों के विरुद्ध कार्य कर सकता है।
  3.  मानव-जीवन के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं, इनका निर्णय कौन करेगा तथा ये किस-किस प्रकार उपलब्ध होंगी-इन बातों का स्पष्टीकरण नहीं होता है। अतः इस सिद्धान्त की आधारशिला ही अवैज्ञानिक है।
    निष्कर्ष- अध्ययनोपरान्त हम कह सकते हैं कि अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त ही सर्वोपयुक्त है, क्योंकि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व | के सर्वांगीण विकास के लिए है। राज्य तथा समाज तो केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यवस्था करने के साधन मात्र हैं। व्यक्ति समाज के कल्याण में ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 6.
मानवाधिकार क्या है? मानवाधिकार प्राप्ति की दिशा में क्या कार्य हो रहे हैं?
उत्तर-
विगत कुछ वर्षों से प्राकृतिक अधिकार शब्द से अधिक मानवाधिकार शब्द का प्रयोग हो रहा है। मानवाधिकारों के पीछे मूल मान्यता यह है कि सभी लोग मनुष्य होने मात्र से कुछ चीजों को पाने के अधिकारी हैं। एक मानव के रूप में प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट और समान महत्त्व का है। इसका अर्थ यह है कि आन्तरिक दृष्टि से सभी समान हैं। सभी एक आन्तरिक मूल्य से सम्पन्न होते हैं और उन्हें स्वतन्त्र रहने तथा अपनी पूरी सम्भावना को साकार करने का अवसर मिलना चाहिए। इस विचार का प्रयोग नस्ल, जाति, धर्म और लिंग पर आधारित वर्तमान असमानताओं को चुनौती देने के लिए किया जाता रहा है।
अधिकारों की इसी समझदारी पर मानव अधिकार सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र बना है। यह उन दावों को मान्यता देने का प्रयास करता है, जिन्हें विश्व समुदाय सामूहिक रूप से गरिमा और आत्म-सम्मान परिपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक मानता है।

सम्पूर्ण विश्व के उत्पीड़ित जन सार्वभौम मानवाधिकार की अवधारणा का प्रयोग उन कानूनों को चुनौती देने के लिए कर रहे हैं, जो उन्हें पृथक् करने वाले और समान अवसरों तथा अधिकारों से वंचित करते हैं। वे मानवता की अवधारणा की पुनर्व्याख्या के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे वे स्वयं को इसमें सम्मिलित कर सकें।

कुछ संघर्ष सफल भी हुए हैं, जैसे दास प्रथा का उन्मूलन हुआ। लेकिन कुछ अन्य संघर्षों में अभी तक सीमित सफलता ही प्राप्त हो सकी है। लेकिन आज भी अनेक ऐसे समुदाय हैं, जो मानवता को इस प्रकार परिभाषित करने के संघर्ष में लगे हैं जो उन्हें भी सम्मिलित करे।
विविध समाजों में जैसे-जैसे नए खतरे और चुनौतियाँ उभरती आई हैं, वैसे-वैसे ही उन मानवाधिकारों की सूची निरन्तर बढ़ती गई है जिनका लोगों ने दावा किया है। उदाहरणार्थ, हम आज प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता के प्रति बहुत सचेत हैं और इसने स्वच्छ हवा, शुद्ध जल, सुदृढ़ विकास जैसे अधिकारों की माँगें पैदा की हैं। यद्ध अथवा प्राकृतिक संकट के समय अनेक लोग विशेषकर महिलाएँ, बच्चे या बीमार जिन परिवर्तनों का सामना करते हैं उनके विषय में नई जागरूकता ने आजीविका के अधिकार, बच्चों के अधिकार और ऐसे अन्य अधिकारों की माँग भी पैदा की है। ऐसे दावे मानव गरिमा के अतिक्रमण के प्रति नैतिक आक्रोश का भाव प्रकट करते हैं और वे समस्त मानव समुदाय के लिए अधिकारों के प्रयोग और विस्तार के लिए एकजुट होने का आह्वान करते हैं।

प्रश्न 7.
अधिकार जनसाधारण पर क्या जिम्मेदारियाँ डालते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकार न केवल राज्य पर यह जिम्मेदारी डालते हैं कि वह विशिष्ट प्रकार से काम करे बल्कि जनसाधारण पर भी जिम्मेदारी डालते हैं। उदाहरण के लिए, टिकाऊ विकास का मामला लें। हमारे अधिकार हमें याद दिलाते हैं कि इसके लिए न केवल राज्य को कुछ कदम उठाने हैं, बल्कि हमें भी इस दिशा में प्रयास करने हैं। अधिकार हमें बाध्य करते हैं कि हम अपनी निजी आवश्यकताओं और हितों के विषय में ही न सोचें, वरन कुछ ऐसी चीजों की भी रक्षा करें, जो हम सबके लिए लाभदायक हैं। ओजोन परत की रक्षा करना, वायु और जल प्रदूषण कम-से-कम करना, नए वृक्ष लगाकर और जंगलों की कटाई रोककर हरियाली बनाए रखना, पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना आदि ऐसी चीजें हैं, जो हम सबके लिए अनिवार्य हैं। ये जनसाधारण के लाभ की बातें हैं, जिनका पालने हमें अपनी और भावी पीढ़ियों की रक्षा के लिए भी अवश्य करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को भी । सुरक्षित और स्वच्छ दुनिया प्राप्त करने का अधिकार है, इसके बिना वे बेहतर जीवन नहीं जी सकतीं।

अधिकार यह भी जिम्मेदारी डालते हैं कि हम अन्य लोगों के अधिकारों का भी सम्मान करें। टकराव की स्थिति में जनसाधारण को अधिकारों को सन्तुलित करना होता है। उदाहरणार्थ, अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार किसी को भी तस्वीर लेने की अनुमति देता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपने घर में नहाते हुए किसी व्यक्ति की उसकी अनुमति के बिना तस्वीर ले ले और उसे इण्टरनेट में डाल दे, तो यह गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
नागरिकों को अपने अधिकारों पर लगाए जाने वाले नियन्त्रणों के बारे में भी ध्यान देना होगा। अद्यतन एक विषय जिस पर बहुत अधिक चर्चा हो रही है। यह बढ़ते प्रतिबन्धों से सम्बन्धित है। ये प्रतिबन्ध कई सरकारे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोगों की नागरिक स्वतन्त्रताओं पर लगा रही हैं। नागरिकों के अधिकारों और भलाई की रक्षा के लिए आवश्यक मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने का समर्थन किया जा सकता है।

लेकिन किसी बिन्दु पर सुरक्षा के लिए आवश्यक मानकर थोपे गए प्रतिबन्ध अपने-आप में लोगों में अधिकारों के लिए खतरा बन जाएँ तो? क्या आतंकी बमबारी की धमकी का सामना करते राष्ट्र को अपने नागरिकों की आजादी छीन लेने की आज्ञा दी जा सकती है? क्या उसे केवल सन्देह के आधार पर किसी को गिरफ्तार करने की अनुमति मिलनी चाहिए? क्या उसे लोगों की चिट्ठियाँ देखने यो फोन टेप करने की छूट दी जा सकती है? क्या सच कबूल करवाने के लिए उसे यातना देने का सहारा लेने दिया जाना चाहिए? ऐसी स्थितियों में यह सवाल उत्पन्न होता है कि सम्बद्ध व्यक्ति समाज के लिए खतरा तो नहीं पैदा कर रहा? गिरफ्तार लोगों को भी कानूनी सलाह प्राप्त करने का आज्ञा और दण्डाधिकारी या न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। नागरिक स्वतन्त्रता में कटौती करने के प्रश्न पर अत्यन्त सावधान होने की आवश्यकता है क्योंकि इनका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है। सरकारें निरकुंश हो सकती हैं और वे उन उद्देश्यों की ही जड़ खोद सकती हैं जिनके लिए सरकारें बनती हैं—यानी लोगों के कल्याण की। इसलिए यह मानते हुए भी कि अधिकार कभी सम्पूर्ण-सर्वोच्च नहीं हो सकते, हमें अपने एवं दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने में चौकस रहने की आवश्यकता है क्योकि ये लोकतान्त्रिक समाज की बुनियाद का निर्माण करते

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth (पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करती है?
(क) 46 लाख वर्ष
(ख) 460 करोड़ वर्ष
(ग) 13.7 अरब वर्ष
(घ) 13.7 खबर वर्ष
उत्तर- (ख) 460 करोड़ वर्ष।

प्रश्न (ii) निम्न में कौन-सी अवधि सबसे लम्बी है?
(क) इओन (Eons)
(ख) महाकल्प (Era)
(ग) कल्प (Period)
(घ) युग (Epoch)
उत्तर- (क) इओन (Eons)

प्रश्न (iii) निम्न में कौन-सा तत्त्व वर्तमान वायुमण्डल के निर्माण व संशोधन में सहायक नहीं है?
(क) सौर पवन
(ख) गैस उत्सर्जन
(ग) विभेदने
(घ) प्रकाश संश्लेषण
उत्तर- (क) सौर पवन।

प्रश्न (iv) निम्नलिखित में से भीतरी ग्रह कौन-से हैं?
(क) पृथ्वी व सूर्य के बीच पाए जाने वाले ग्रह
(ख) सूर्य व छुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह
(ग) वे ग्रह जो गैसीय हैं।
(घ) बिना उपग्रह वाले ग्रह।
उत्तर- (ख) सूर्य व छुद्र ग्रहाके की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

प्रश्न (v) पृथ्वी पर जीवन निम्नलिखित में से लगभग कितने वर्षों पहले आरम्भ हुआ?
(क) 1 अरब 37 करोड़ वर्ष पहले
(ख) 460 करोड़ वर्ष पहले
(ग) 38 लाख वर्ष पहले
(घ) 3 अरब 80 करोड़ वर्ष पहले
उत्तर- (ख) 460 करोड़ वर्ष पहले।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?
उत्तर- सौरमण्डल के पार्थिव या भीतरी ग्रह चट्टानी हैं जबकि जोवियन ग्रह या अन्य अधिकांश ग्रह गैसीय हैं। इसके मुख्य कारण अग्रलिखित हैं

  1. पार्थिव ग्रह चट्टानी हैं क्योंकि ये जनक तारे के बहुत ही समीप बने जहाँ अत्यधिक ताप के कारण गैस संघनित एवं घनीभूत नहीं हो सकी।
  2. पार्थिव ग्रह छोटे हैं। इनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी अपेक्षाकृत कम है: अत: इनसे निकली हुई गैस इन पर रुक नहीं सकी इसलिए भी पार्थिव ग्रह चट्टानी ग्रह हैं।
  3. सौर वायु पार्थिव ग्रहों से गैस एवं धूलकणों को बड़ी मात्रा में अपने साथ उड़ा ले गई, अत: पार्थिव ग्रहों की रचना चट्टानी हो गई।

प्रश्न (ii) पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी दिए गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिकों के मूलभूत अन्तर बताएँ
(क) काण्ट व लाप्लास
(ख) चैम्बरलेन व मोल्टन।
उत्तर- चैम्बरलेन वे मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना कान्ट व लाप्लास की निहारिका परिकल्पना के विपरीत हैं। इनके अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति दो बड़े तारों सूर्य तथा उसके साथी तारे के सहयोग से हुई है। जबकि काण्ट व लाप्लास की परिकल्पना का आधार केवल एक तारा अर्थात् सूर्य है जिसके सहयोग से नीहारिका द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है। इसी कारण काण्ट एवं लाप्लास की परिकल्पना एकतारक तथा चैम्बरलेन व मोल्टन की परिकल्पना द्वैतारक परिकल्पना कहलाती है।

प्रश्न (iii) विभेदन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति में स्थलमण्डल निर्माण अवस्था के अन्तर्गत हल्के व भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक् होने की प्रक्रिया विभेदन (Differentiation) कहलाती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत भारी पदार्थ पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह पर ऊपरी भाग की तरफ आ गए। समय के साथ-साथ यह अधिक ठण्डे और ठोस होकर छोटे आकार में परिवर्तित हो गए। विभेदन की इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पृथ्वी का पदार्थ अनेक परतों में विभाजित हो गया तथा क्रोड तक कई परतों का निर्माण हुआ।

प्रश्न (iv) प्रारम्भिक काल में पृथ्वी के धरातल का स्वरूप क्या था?
उत्तर- प्रारम्भिक काल में पृथ्वी को धरातल चट्टानी एवं तप्त तथा। सम्पूर्ण पृथ्वी वीरान थी। यहाँ वायुमण्डल अत्यन्त विरल था जो हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसों द्वारा बना था। पृथ्वी का यह वायुमण्डल आज के वायुमण्डल से बिल्कुल भिन्न था। लगभग आज से 460 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी एवं इसके वायुमण्डल में जीवन के अनुकूल परिवर्तन आए जिससे जीवन का विकास हुआ।

प्रश्न (v) पृथ्वी के वायुमण्डल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन-सी थीं।
उत्तर- पृथ्वी के वायुमण्डल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें हाइड्रोजन और हीलियम थीं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) बिग बैंग सिद्धान्त का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर-बिग बैंग सिद्धान्त
ब्रह्माण्ड और सौरमण्डल की उत्पत्ति के सम्बन्ध में आधुनिक समय में सर्वमान्य सिद्धान्त बिग बैंग है। इसे विस्तृत ब्रह्माण्ड परिकल्पना भी कहा जाता है। इस सिद्धान्त की पृष्ठभूमि 1920 में एडविन हब्बल द्वारा तैयार की गई थी। एडविन हब्बल ने प्रमाण दिए थे कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। कालान्तर में आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से अलग ही नहीं हो रही हैं बल्कि इनकी दूरी में भी वृद्धि हो रही है। इसी के परिणामस्वरूप ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में वृद्धि हो रही है। परन्तु प्रेक्षण आकाशगंगाओं के विस्तार को सिद्ध नहीं करते हैं। बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड का विस्तार निम्नलिखित अवस्थाओं में हुआ है–
1. प्रारम्भ में वे सभी पदार्थ जिनसे ब्राह्मण्ड की उत्पत्ति हुई अतिलघु गोलकों के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। इन लघु गोलकों (एकाकी परमाणु) का आयतन अत्यन्त सूक्ष्म एवं तापमान और घनत्व अनन्त था।

2. बिग बैंग प्रक्रिया में इन लघु गोलकों में भीषण विस्फोट हुआ। विस्फोट की प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ। ब्रह्माण्ड का विस्तार आज भी जारी है। प्रारम्भिक विस्फोट (Bang) के बाद एक सेकण्ड के अल्पांश के अन्तर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई।

3. ब्रह्माण्ड में इसी प्रक्रिया से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड का आकार छोटा था। फैलाव एवं आन्तरिक गति के कारण इसका आकार विशाल होता गया। आकाशगंगा अनन्त तारों के समूह से निर्मित है और अनन्त आकाशगंगाओं के समूह से ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है। प्रारम्भ में आकाशगंगा पास-पास थी। बाद में विस्तार के कारण इनकी दूरी बढ़ गई। आकाशगंगा के तारों को शीतलन हो रहा था। (बिग बैंग से 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान लगभग 4500 केल्विन तक गिर गया।)
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आन्तरिक क्रिया के कारण इन तारों में विस्फोट हो गया। विस्फोट से नि:सृत पदार्थों के समूहन से अनेक छोटे-छोटे पिण्डों का निर्माण हुआ। इन पिण्डों पर विस्फोट से बिखरे पदार्थों का निरन्तर जमाव चलता रहा। फलस्वरूप पदार्थों के समूहन से ग्रहों का निर्माण हुआ। यही क्रिया ग्रहों पर पुनः हुई जिससे उपग्रहों का निर्माण हुआ।

अतः बिग-बैंग सिद्धान्त के अनुसार, ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम विशाल पिण्ड के विस्फोट से गैलेक्सी का निर्माण हुआ था जिसकी संख्या अनन्त थी। पदार्थों के पुंजीभूत होने तथा इन पदार्थों के समूहन से । चित्र 2.1 : विचित्रता (एकाकी परमाणु) प्रत्येक गैलेक्सी के तारों का निर्माण हुआ। तारों के विस्फोट तथा पदार्थों के समूहन से ग्रहों का निर्माण हुआ। यही क्रिया ग्रहों पर होने से
उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् सौरमण्डल तथा पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।

प्रश्न (ii) पृथ्वी की विकास सम्बन्धी अवस्थाओं को बताते हुए हर अवस्था/चरण को संक्षेप में वर्णित करें।
उत्तर- पृथ्वी का उद्भव
प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी तप्त चट्टानी एवं वीरान थी। इसका वायुमण्डल विरल था जो हाइड्रोजन एवं हीलियम गैसों द्वारा निर्मित था। यह वायुमण्डल वर्तमान वायुमण्डल से अत्यन्त भिन्न था। अत: कुछ ऐसी घटनाएँ एवं क्रियाएँ हुईं जिनके परिणामस्वरूप यह तप्त चट्टानी एवं वीरान पृथ्वी एक सुन्दर ग्रह के रूप में परिवर्तित हो गई। वर्तमान पृथ्वी की संरचना परतों के रूप में है, वायुमण्डल के बाहरी छोर से पृथ्वी के क्रोड तक जो पदार्थ हैं वे भी समान नहीं हैं। पृथ्वी की भू-पर्पटी या सतह से केन्द्र तक अनेक मण्डल हैं और प्रत्येक मण्डल एवं इसके पदार्थ की अपनी अलग विशेषताएँ हैं। पृथ्वी के विकास की अवस्थाओं का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षक के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. स्थलमण्डल का विकास- पृथ्वी के विकास की अवस्था के प्रारम्भिक चरण में स्थलमण्डल का निर्माण हुआ। स्थलमण्डल अर्थातृ पृथ्वी ग्रह की रचना ग्रहाणु व दूसरे खगोलीय पिण्डों के घने एवं हल्के पदार्थों के मिश्रण से हुई है। उल्काओं के अध्ययन से पता चलता है कि बहुत से ग्रहाणुओं के एकत्रण से ग्रह बने हैं। पृथ्वी की रचना भी इसी प्रक्रम द्वारा हुई है। जब पदार्थ गुरुत्व बल के कारण संहत (इकट्टा) हो रहा था तो पिण्डों ने पदार्थ को प्रभावित किया। इससे अत्यधिक मात्रा में उष्मा उत्पन्न हुई और पदार्थ द्रव अवस्थाओं में परिवर्तित होने लगा। अत्यधिक ताप के कारण पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई और तापमान की अधिकता के कारण हल्के और भारी घनत्व के पदार्थ अलग होने आरम्भ हो गए। इसी अलगाव से भारी पदार्थ जैसे लोहा आदि केन्द्र में एकत्र हो गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की ऊपरी सतह अर्थात् भू-पर्पटी के रूप में विकसित हो गए।

हल्के एवं भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है। चन्द्रमा की उत्पत्ति के समय भीषण संघटन (Giant Impact) के कारण पृथ्वी का तापमान पुनः बढ़ा या फिर ऊर्जा, उत्पन्न हुई यह विभेदन का दूसरा चरण था। पृथ्वी के विकास के इस दूसरे चरण में पृथ्वी का पदार्थ अनेक परतों में पृथक् हो गया जैसे–पर्पटी (Crust) प्रावार (Mantle), बाह्य क्रोड (Outer Core) और आन्तरिक क्रोड (Inner Core) आदि बने जिसे सामूहिक रूप से स्थलमण्डल कहा जाता है।

2. वायुमण्डल एवं जलमण्डल का विकास-पृथ्वी के ठण्डा होने एवं विभेदन के समय पृथ्वी के आन्तरिक भाग से बहुत-सी गैसें एवं जलवाष्प बाहर निकले। इसी से वर्तमान वायुमण्डल का उद्भव हुआ। प्रारम्भ में वायुमण्डल में जलवाष्प, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन व अमोनिया अधिक मात्रा में और स्वतन्त्र ऑक्सीजन अत्यन्त कम मात्रा में थी। लगातार ज्वालामुखी विस्फोट से वायुमण्डल में जलवाष्प वे गैस बढ़ने लगी। पृथ्वी के ठण्डा होने के साथ-साथ जलवाष्प को संघटन शुरू हो गया। वायुमण्डल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड के वर्षा पानी में घुलने से तापमान में और अधिक कमी आई। फलस्वरूप अधिक संघनन से अत्यधिक वर्षा हुई जिससे पृथ्वी की गर्तों में वर्षा का जल एकत्र होने लगा और इस प्रक्रिया से महासागरों की उत्पत्ति हुई।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. सौरमण्डल में ग्रहों की संख्या है
(क) 8
(ख) 9
(ग) 7
(घ) 6
उत्तर- (क) 8

प्रश्न 2. प्रकाश की गति है
(क) 1 लाख किमी/सेकण्ड
(ख) 2 लाख किमी/सेकण्ड
(ग) 3 लाख किमी/सेकण्ड
(घ) 5 लाख किमी/सेकण्ड
उत्तर- (ग) 3 लाख किमी/सेकण्ड।

प्रश्न 3. पृथ्वी की उत्पत्ति हुई
(क) नैबुला गैसीय पिण्ड द्वारा
(ख) आकाशगंगा द्वारा
(ग) मंगल द्वारा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (क) नैबुला गैसीय पिण्ड द्वारा।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सौरमण्डल में कितने ग्रह हैं?
उत्तर- सौरमण्डल में 8 ग्रह हैं।

प्रश्न 2. टकराव एवं विस्फोट की विचारधारा का सम्बन्ध किससे है? इसके प्रतिपादक कौन हैं?
उत्तर- टकराव एवं विस्फोट की विचारधारा को सम्बन्ध पृथ्वीं/सौरमण्डल की उत्पत्ति से है। इसके प्रतिपादक जेम्स जीन्स एवं हॅरोल्ड जैफरी हैं।

प्रश्न 3. प्रकाश वर्ष से आप क्या समझते हैं?
उत्तर- प्रकाश वर्ष समय का नहीं दूरी का माप है। प्रकाश की गति 3 लाख किमी प्रति सेकण्ड है। एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है, वह एक प्रकाश वर्ष कहलाता है। यह दूरी 9.461 x 1012 किमी के बराबर है।

प्रश्न 4. प्रोटोस्टार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- सौरमण्डल की उत्पत्ति के समय अवशेष पदार्थ द्वारा निर्मित सूर्य ही प्रोटोस्टार कहलाता है।

प्रश्न 5. नैबुला या नीहारिका का क्या अर्थ हैं?
उत्तर- धूल एवं गैसों का विशालकाय बादल जो भंवर के समान गति से अन्तरिक्ष में घूम रहा था तथा जिससे सौरमण्डल की उत्पत्ति हुई, नैबुला या नीहारिका कहलाता है। इसे विशाल तारा भी कहा जाता है।

प्रश्न 6. सौरमण्डल के विशिष्ट ग्रह की क्या विशेषता है?
उत्तर- पृथ्वी सौरमण्डल का विशिष्ट ग्रह कहलाता है। जीवन का उद्भव एवं विकास ही इसकी विशिष्टता है। क्योंकि केवल इसी ग्रह पर वायुमण्डल पाया जाता है जो जीवन के विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 7. अन्तरिक्ष से पृथ्वी किस रंग में दिखाई देती है?
उत्तर- अन्तरिक्ष से पृथ्वी का रंग नीला दिखाई देता है।

प्रश्न 8. नीहारिका परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति की धारणा सर्वप्रथम किसके द्वारा प्रतिपादित की गई?
उत्तर- नीहारिका परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति की अवधारणा सर्वप्रथम जर्मन विद्वान इमैनुअल काण्ट द्वारा प्रतिपादित की गई थी।

प्रश्न 9. हमारे नक्षत्र पुंज का क्या नाम है?
उत्तर- हमारे नक्षत्र पुंज का नाम मिल्की वे (आकाशगंगा) है।

प्रश्न 10. पृथ्वी की उत्पत्ति किस गैसीय पिण्ड द्वारा कब हुई?
उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति नैबुला गैसीय पिण्ड द्वारा 4600 मिलियन वर्ष पूर्व हुई थी।

प्रश्न 11. सौरमण्डल के सभी ग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर- सौरमण्डल के मुख्यत: आठ ग्रह माने जाते हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेप्च्यून।

प्रश्न 12. सौरमण्डल के भीतरी (Inner) या पार्थिव ग्रहों के नाम बताइए।
उत्तर- सूर्य एवं छुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच स्थित ग्रहों को भीतरी या पार्थिव ग्रह कहते हैं। बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल ऐसे ही भीतरी ग्रह हैं।

प्रश्न 13. जोवियन ग्रह क्या हैं? इनके नाम लिखिए।
उत्तर- सौरमण्डल के बाहरी ग्रहों को जोवियन ग्रह कहते हैं। ये भीतरी ग्रहों की अपेक्षा अधिक विशालकाय हैं। इनकी रचना पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से हुई है। ये अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। इनके नाम हैं—बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं नेप्च्यून। .

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. सौर परिवार के विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- सौर परिवार के अन्तर्गत सूर्य, ग्रह, उपग्रह, उल्को तथा असंख्य तारे सम्मिलित हैं। सौर परिवार का निर्माण भी पृथ्वी के निर्माण एवं विकास के समान ही हुआ है। हमारा नक्षत्र पुंज जिसे आकाशगंगा (Milky Way) कहते हैं सौर परिवार का घर है। जिस प्रकार नीहारिका द्वारा पृथ्वी का निर्माण हुआ है उसी प्रकार अन्य ग्रह एवं उपग्रहों का भी निर्माण हुआ है। इसी नीहारिका के अवशेष भाग से सूर्य का विकास हुआ है। इसी को ‘प्रोटोस्टार’ भी कहते हैं।

प्रश्न 2. पृथ्वी की उत्पत्ति का वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई निश्चित मत अभी तक प्रतिपादित नहीं हुआ है। फिर भी एक सामान्य परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति एक नैबुला (तारा) या नीहारिका के परिणामस्वरूप हुई है। ऐसा विश्वास है कि प्रारम्भ में एक धधकता हुआ गैस का पिण्ड था। यह पिण्ड भंवर के समान तीव्र गति से भ्रमण कर रहा था। तेज गति से घूमने के कारण इसके ऊपरी भाग की गर्मी आकाश में फैलने लगी और ऊपरी भाग शीतल होकर संकुचित होने लगा। ठण्डा होने एवं सिकुड़ने के कारण इस गैसीय पिण्ड की गति में और अधिक वृद्धि हुई। ऊपरी भाग घनीभूत होने तथा भीतरी भाग गैसीय एवं गर्म होने के कारण एक साथ नहीं दौड़ सके। अतः एक समय ऐसा आया जब ऊपरी भाग छल्ले के रूप में अलग होकर तेजी से घूमने लगा और इस छल्लेरूपी भाग से अलग-अलग छल्ले बने। यही छल्ले ग्रह कहलाए। पृथ्वी इन्हीं में से एक ग्रह है।

प्रश्न 3. पृथ्वी पर जीवन के विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति का अन्तिम चरण जीवन की उत्पत्ति व विकास का है। आधुनिक वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति को रासायनिक प्रतिक्रिया मानते हैं। इसमें पहले जटिल जैव (कार्बनिक अणु) बने और उनका समूहन हुआ। यह समूहन ऐसा था जो अपने आपको दोहराता था और निर्जीव पदार्थ को जीवित तत्त्व में परिवर्तित करता था। पृथ्वी पर जीवन के चिह अलग-अलग समय की चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्मों से ज्ञात होता है कि जीवन का विकास 460 करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हो गया था। इसका संक्षिप्त सार हमें भूवैज्ञानिक काल मापक्रम से प्राप्त होता है जिसमें आधुनिक मानव अभिनव युग में उत्पन्न हुआ बताया जाता है।

प्रश्न 4. चन्द्रमा की उत्पत्ति को समझाइए।
उत्तर- ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी के उपग्रह के रूप में चन्द्रमा की उत्पस्थित एक बड़े टकराव का परिणाम है जिसे ‘द बिग स्प्लैट’ (The big splat) कहा गया है। ऐसा मानना है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के कुछ समय बाद ही मंगल ग्रह के 1 से 3 गुणा बड़े आकार का पिण्ड पृथ्वी से टकराया। इस टकराव से पृथ्वी का एक हिस्सा टूटकर अन्तरिक्ष में बिखर गया। टकराव से पृथक् हुआ यही पदार्थ फिर पृथ्वी के कक्ष में घूमने लगा और क्रमश: वर्तमान चन्द्रमा के रूप में परिवर्तित हो गया। ऐसा माना जाता है कि यह घटना या चन्द्रमा की उत्पत्ति लगभग 4.44 अरब वर्ष पहले हुई थी।

प्रश्न 5. ग्रहों की निर्माण की अवस्थाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर- ग्रहों के निर्माण की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ हैं
1. तारे नीहारिका के अन्दर गैस के गुन्थित झुण्डों के रूप में विद्यमान रहते हैं। इन गुन्थित झुण्डों में . गुरुत्वाकर्षण बल से गैसीय बादल में क्रोड का निर्माण होता है। इस क्रोड के चारों ओर गैस एवं धूलकणों की घूमती हुई एक तश्तरी विकसित हुई।

2. द्वितीय अवस्था में गैसीय बादलों का संघनेन आरम्भ होता है। ये संघनित बादल क्रोड को ढक लेते हैं तथा छोटे-छोटे गोले के रूप में विकसित होते हैं। इन छोटे-छोटे गोल पदार्थों में आकर्षण प्रक्रिया से ग्रहाणुओं का विकास होता है। (छोटे पिण्डों की अधिक संख्या ही ग्रहाणु कहलाती है। फलस्वरूप संघटन की क्रिया द्वारा बड़े पिण्ड बनने शुरू हुए और गुरुत्वाकर्षण बल के कारण परस्पर जुड़ गए।

3. अन्तिम अवस्था में इन जुड़े हुए छोटे ग्रहाणुओं के बड़े आकार में परिवर्तित होने से ही बड़े पिण्डों का विकास हुआ जो ग्रह कहलाए।

प्रश्न 6. सौरमण्डल के आठ ग्रहों की सूर्य से दूरी, इन का अर्द्धव्यास, घनत्व एवं प्रत्येक उपग्रहों की संख्या का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर- हमारे सौरमण्डल में आठ ग्रह हैं। इसके अतिरिक्त 63 उपग्रह, लाखों छोटे-छोटे पिण्ड, धूमकेतु एवं वृहत् मात्रा में धूल कण व गैसें हैं। सौरमण्डल के आठ ग्रहों के संक्षिप्त परिचय सम्बन्धी तथ्य तालिका 2.1 के रूप में अग्र प्रकार हैं

तालिका 2.1: सौरमण्डल के आठ ग्रहों का संक्षिप्त परिचय (दूरी, घनत्व, अर्द्धव्यास)
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth 2
* सूर्य से दूरी खगोलीय एकक में है। अर्थात् अगर पृथ्वी की मध्यमान दूरी 14 करोड़ 95 लाख 98 हजार किमी ” एक एकक के बराबर है।
** अर्द्धव्यास : अगर भूमध्यरेखीय अर्द्धव्यास 6378.137 किमी = 1 है।.

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ग्रहों (पृथ्वी की) उत्पत्ति के विषय में लाप्लास के सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर- लाप्लास का नीहारिका सिद्धान्त/परिकल्पना ।
लाप्लास के अनुसार, ब्रह्माण्ड में तृप्त आकाशीय पिण्ड भ्रमणशील अवस्था में था। निरन्तर भ्रमणशीलता के कारण ताप विकिरण होता गया तथा नीहारिका (Nabula) की ऊपरी सतह शीतल होने लगी एवं उसका तल संकुचित हो गया। इससे नीहारिका के आयतन में कमी तथा गति में वृद्धि होने लगी। गति बढ़ने से इस नीहारिका के मध्यवर्ती भाग में अनुप्रसारी बल में वृद्धि हुई एवं इसका मध्यवर्ती भाग हल्का होकर बाहर की ओर उभरने लगा। इससे ऊपरी उभार एवं निचले मुख्य भाग के बीच गतियों में भिन्नता आने लगी। ऐसी प्रक्रिया के कारण अन्ततः उभार वाला ऊपरी भाग एक बड़े छल्ले के रूप में ठण्डा होकर पृथक् हो गया।
लाप्लास के अनुसार, नीहारिका से एक विशाल भाग छल्ले की आकृति में बाहर निकला और धीरे-धीरे छल्लों में विभाजित होता गया। कालान्तर में इनके मध्य शीतल एवं संकुचन के कारण अन्तर बढ़ता गया जिसमें प्रत्येक वलय के बीच की दूरी बढ़ती हुई। वलयों का गैसमय पदार्थ पृथक्-पृथक् वलयों के रूप में संघनित हो गया जिससे ग्रहों का निर्माण हुआ।
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नीहारिका से निकले सभी छल्लों का आकार समान नहीं था, मध्यवर्ती छल्ले कुछ बड़े आकार के थे। धीरे-धीरे प्रत्येक छल्ला सिकुड़कर एक गाँठ बनकर अन्ततः ग्रह के रूप में परिवर्तित हो गया। इस गाँठ को लाप्लास ने उष्ण गैसीय पुंज या ग्रन्थि कहा है। इसके ठण्डा होकर ठोस बनने से ही ग्रह बने। इस प्रकार लाप्लास के नीहारिका सिद्धान्त के अनुसार पहले आठ ग्रह बने और ग्रहों से भी इसी विधि के अनुसार उपग्रहों की उत्पत्ति हुई तथा नीहारिको का शेष बचा भाग ही सूर्य है।

प्रश्न 2. जेम्स जीन्स के सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर- जेम्स जीन्स की ज्वारीय सिद्धान्त/परिकल्पना ।
पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में जेम्स जीन्स ने 1919 में द्वैतारकवादी परिकल्पना प्रस्तुत की थी। यह परिकल्पना ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के नाम से प्रसिद्ध है। ज्वारीय परिकल्पना पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धान्तों . में से एक है जिसे अन्य सिद्धान्तों की अपेक्षा मान्यता प्राप्त है। ज्वारीय परिकल्पना निम्नलिखित अभिकल्पों का आधारित है

  1. पृथ्वी सहित सौरमण्डल की उत्पत्ति सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुई है।
  2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बड़ा गोला था।
  3. सूर्य के साथ ही ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा भी था।
  4. सूर्य अपनी निश्चित जगह अपनी कक्षा में ही घूम रहा था।
  5. एक विशालकाय तारा घूमता हुआ सूर्य के निकट आ रहा था।
  6. विशालकाय तारा आकार और आयतन में सूर्य से बहुत अधिक बड़ा था।
  7. निकट आते हुए विशालकाय तारे की ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के बाह्य भाग पर पड़ रहा था।

UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth 4
ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार जब विशालकाय तारा सूर्य के समीप से गुजरा तब उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य के तल पर ज्वार उठा। जब यह तारा अपने पथ पर आगे बढ़ गया तो सूर्य के धरातल से उठी ज्वार एक विशाल सिगार (Filament) के रूप में सूर्य से अलग हो गई। परन्तु यह सिगारनुमा-आकृति विशालं तारे के साथ न जा सकी। विशालकाय तारा अपने मार्ग पर दूर निकल गया और सिगारनुमा-आकृति सूर्य की परिक्रमा करने लगी। कालान्तर में यही सिगारनुमा-आकृति कई खण्डों में विभक्त हो गई जिससे ग्रहों व उपग्रहों का निर्माण हुआ।
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प्रश्न 3. पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित मुख्य सिद्धान्त कौन-से हैं? किसी एक सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी सिद्धान्त/परिकल्पनाएँ
पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में दो मत प्रचलित हैं-धार्मिक तथा वैज्ञानिक। आधुनिक युग में धार्मिक मत को मान्यता नहीं है, क्योंकि वे तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, वे पूर्णत: कल्पना पर आधारित हैं। पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सर्वप्रथम तर्कपूर्ण व वैज्ञानिक परिकल्पना का प्रतिपादन 1749 ई० में फ्रांसीसी विद्वान कास्ते-दे-बफन द्वारा किया गया था। इसके बाद अनेक विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किए। परिणामतः अब तक अनेक परिकल्पनाओं तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जा चुका है। पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में वैज्ञानिक मतों के दो वर्ग हैं
(A) अद्वैतवादी या एकतारकवादी परिकल्पना (Monistic Hypothesis),
(B) द्वैतवादी या द्वितारकवादी परिकल्पना (Dualistic Hypothesis)।

(A) अद्वैतवादी परिकल्पना-इस परिकल्पना में पृथ्वी की उत्पत्ति एक तारे से मानी जाती है। इस परिकल्पना के आधार पर कास्ते-दे-बफन, इमैनुअल काण्ट, लाप्लास, रोशे व लॉकियर ने अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए।

(B) द्वैतवादी परिकल्पना-एकतारक परिकल्पना के विपरीत इस विचारधारा के अनुसार ग्रहों या पृथ्वी की उत्पत्ति एक या अधिक विशेषकर दो तारों के संयोग से मानी जाती है। इसी कारण इस संकल्पना को ‘Bi-parental Concept’ भी कहते हैं। इस परिकल्पना के अन्तर्गत निम्नलिखित विद्वानों ने अपने-अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है–

  • चैम्बरलेन की ग्रहाणु परिकल्पना।
  • जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना।
  • रसेल की द्वितारक परिकल्पना।।
  • होयल तथा लिटिलटने का सिद्धान्त।
  • ओटोश्मिड की अन्तरतारक धूल परिकल्पना।
  • बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त। नोट—किसी एक सिद्धान्त के वर्णन हेतु दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 1 का अवलोकन करें।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 8 Composition and Structure of Atmosphere

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 8 Composition and Structure of Atmosphere (वायुमंडल का संघटन तथा संरचना)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?
(क) ऑक्सीजन
(ख) आर्गन
(ग) नाइट्रोजन
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर-(ग) नाइट्रोजन।

प्रश्न (ii) वह वायुमण्डलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है
(क) समतापमण्डल
(ख) क्षोभमण्डल
(ग) मध्यमण्डल
(घ) आयनमण्डल
उत्तर-(ख) क्षोभमण्डल।

प्रश्न (iii) समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी किससे सम्बन्धित हैं?
(क) गैस
(ख) जलवाष्प
(ग) धूलकण
(घ) उल्कापात
उत्तर-(ग) धूलकण।

प्रश्न (iv) निम्नलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?
(क) 90 किमी
(ख) 100 किमी
(ग) 120 किमी
(घ) 150 किमी
उत्तर-(ग) 120 किमी।

प्रश्न (v) निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी?
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन
(ग) हीलियम
(घ) कार्बन-डाइ-ऑक्साइड
उत्तर-(घ) कार्बन डाइऑक्साइड।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) वायुमण्डल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर–पृथ्वी के चारों ओर वायु के आवरण को वायुमण्डल कहा जाता है। वायुमण्डल’ शब्द दो शब्दों के संयोग से बना है-वायु + मण्डल अर्थात् वायु का विशाल आवरण, जो पृथ्वी को चारों ओर से एक खोल की भाँति घेरे हुए है। इसका न कोई रंग है, न स्वाद और न ही गन्ध, परन्तु इसकी उपस्थिति का अनुभव इसके विभिन्न तत्त्वों द्वारा होता है। यदि पृथ्वी पर वायुमण्डल न होता तो किसी भी प्रकार के जीवधारी या वनस्पति की कल्पना करना भी व्यर्थ था। फिंच और ट्रिवार्था के शब्दों में, “वायुमण्डल विभिन्न गैसों का आवरण है, जो धरातल से सैकड़ों मील की ऊँचाई तक विस्तृत है तथा पृथ्वी का अभिन्न अंग है।”

प्रश्न (ii) मौमस एवं जलवायु के तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर–ताप, दाब, हवा, आर्द्रता और वर्षण मौसम और जलवायु के तत्त्व हैं जो वायुमण्डल की निचली परत क्षोभमण्डल में उत्पन्न होकर पृथ्वी और मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न (iii) वायुमण्डल की संरचना के बारे में लिखें।
उत्तर–वायुमण्डल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाली विभिन्न परतों से बना है। वायुमण्डल में पृथ्वी की सतह के पास घनत्व अधिक होता है, जबकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ यह घटता जाता है। तापमान की। स्थिति के अनुसार वायुमण्डल को पाँच विभिन्न संस्तरों में विभक्त किया जाता है—(i) क्षोभमंडल, (ii) समतापमण्डल, (iii) मध्यमण्डल, (iv) आयनमण्डल, (v) बहिर्मण्डल।

प्रश्न (iv) वायुमण्डल के सभी संस्तरों में क्षोभमण्डल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर-क्षोभमण्डल (Troposphere) वायुमण्डल का सबसे नीचे का संस्तर है। इसकी ऊँचाई सतह से लगभग 13 किमी है तथा यह ध्रुव के निकट 8 किमी एवं विषुवत् वृत्त पर 18 किमी की ऊँचाई तक है। क्षोभमण्डल की मोटाई विषुवत् वृत्त पर सबसे अधिक है। वायुमण्डल के इस संस्तर में धूलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता जाता है। अपनी मौसम एवं जलवायु सम्बन्धी विशिष्टता के कारण यह संस्तर मानव, जीव-जन्तु और पृथ्वी सभी के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। एक प्रकार से पृथ्वी की सजीवता के लिए वायुमण्डल का यही संस्तर उत्तरदायी है।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) वायुमण्डल के संघटन की व्याख्या करें।
उत्तर-वायुमण्डल विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण है। इसमें ठोस व तरल पदार्थों के कण असमान मात्रा में तैरते रहते हैं। इसका संघटन सामान्यतः तीन प्रकार के पदार्थों के संयोग से हुआ है–
1. गैस–वायुमण्डल की संरचना में गैसों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शुष्क वायु में प्रमुखत: नाइट्रोजन 78.8% ऑक्सीजन 20.95% तथा आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड व हाइड्रोजन आदि लगभग 0.25% जैसी भारी गैसें पाई जाती हैं। प्रायः धरातल के निकट भारी एवं सघन गैसें तथा ऊपरी भाग में नियॉन, हीलियम व ओजोन जैसी कई हल्की गैसें होती हैं।

2. जलवाष्प-जलवाष्प वायुमण्डल का सर्वाधिक परिवर्तनशील तत्त्व है। वायु में इसकी अधिकतम मात्रा 5% तक होती है। वायुमण्डल को जलवाष्प की प्राप्ति झीलों, सागरों, महासागरों आदि से वाष्पीकरण क्रिया द्वारा होती है। यह क्रिया तापमान पर निर्भर होती है।

3. धूलकण-वायुमण्डल के निचले भाग में अनेक अशुद्धियाँ देखने को मिलती हैं जो धूलकणों के कारण होती हैं। इनकी उत्पत्ति बालू, मिट्टी उड़ने, समुद्री लवण, ज्वालामुखी, राख, उल्कापात तथा धुएँ के कणों से होती है धूल के ये कण आर्द्रताग्राही होते हैं; अत: संघनन में इनका बहुत योगदान होता है। कोहरे व मेघों का निर्माण इनके ही सहयोग से होता है। यह वायुमण्डल की पारदर्शिता को भी प्रभावित करते हैं।

प्रश्न (ii) वायुमण्डल की संरचना का चित्र खींचें और व्याख्या करें।
उत्तर-वायुमण्डल की संरचना के खींचे गए चित्र 8.1 में वायुमण्डल को पाँच निम्नलिखित संस्तरों में विभक्त दिखाया गया है– (1) क्षोभमण्डल (Troposphere), (2): समतापमण्डल (Stratosphere), (3) मध्यमण्डल (Mesosphere), (4) आयनमण्डल (Ionosphere), (5) बाह्यमण्डल (Exosphere)। क्षोभमण्डल वायुमण्डल का सबसे निचला संस्तर है। मौसम एवं जलवायु सम्बन्धी सभी परिवर्तन इसी संस्तर में होते हैं। पृथ्वी की सजीवता इसी मण्डल के कारण है। समतापमण्डल जो वायुमण्डल की दूसरी परत है, क्षोभमण्डल से 50 किमी की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका महत्त्वपूर्ण लक्षण है कि तापमान स्थिर रहता है तथा इसमें ओजोन परत पाई जाती है। मध्यमण्डल समतापमण्डल के ठीक ऊपर 80 किमी की ऊँचाई तक फैला है। इसकी ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में कमी होने लगती है। आयनमण्डल मध्यमण्डल के ऊपर 80 से 400 किमी के मध्य स्थित है। इसमें विद्युत आवेशित कण पाए जाते हैं,जिन्हें आयन कहते हैं इसीलिए इसका नाम आयनमण्डल है। पृथ्वी के द्वारा भेजी गई रेडियो तरंगें इसी। संस्तर द्वारा वापस पृथ्वी पर लौट जाती हैं। यहाँ ऊँचाई बढ़ने के साथ ही तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है। वायुमण्डल का सबसे ऊपरी संस्तर बाह्यमण्डल है। यह सबसे ऊँचा संस्तर है तथा इसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. विक्षोभमण्डल, समतापमण्डल, ओजोनमण्डल और बहिर्मण्डल विभाग हैं
(क) स्थलमण्डल के
(ख) जलमण्डल के
(ग) वायुमण्डल के
(घ) इनमें से किसी के नहीं
उत्तर-(ग) वायुमण्डल के।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से कौन पृथ्वी के वायुमण्डल की सबसे निचली परत है?
(क) आयनमण्डल
(ख) समतापमण्डल
(ग) क्षोभमण्डल
(घ) ओजोनमण्डल
उत्तर-(ग) क्षोभमण्डल।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से वायुमण्डल के सबसे निचले भाग में कौन पाया जाता है?
(क). क्षोभमण्डल
(ख) ट्रोपोपॉज
(ग) समतापमण्डल
(घ) ओजोनमण्डल
उत्तर-(क) क्षोभमण्डल।

प्रश्न 4. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा में पायी जाती है?
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड
(घ) जलवाष्पे
उत्तर-(ख) नाइट्रोजन।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से किसमें वायुमण्डल का सर्वाधिक भाग स्थित है?
(क) समतापमण्डल
(ख) परिवर्तनमण्डल
(ग) आयनमण्डल
(घ) ओजोनमण्डल ।
उत्तर-(ख) परिवर्तनमण्डल।।

प्रश्न 6. निम्नलिखित में से कौन पृथ्वी के वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत है?
(क) समतापमण्डल ।
(ख) तापमण्डल
(ग) क्षोभमण्डल ।
(घ) बाह्यमण्डल
उत्तर-(घ) बाह्यमण्डल।

प्रश्न 7. क्षोभमण्डल में ऊँचाई के साथ तापमान
(क) घटता है।
(ख) घटता है फिर बढ़ता है। |
(ग) बढ़ता है।
(घ) स्थिर रहता है।
उत्तर-(क) घटता है।।

प्रश्न 8. निम्नलिखित वायुमण्डलीय परतों में से किसमें ओजोन गैस का सर्वाधिक संकेन्द्रण है? ।।
(क) क्षोभमण्डल
(ख) समतापमण्डल
(ग) मध्यमण्डल
(घ) तापमण्डल
उत्तर-(घ) तापमण्डल।।

प्रश्न 9. पृथ्वी के वायुमण्डल की निम्नलिखित परतों में से किस एक में जलवाष्प का सर्वाधिक संक्रेन्द्रण पाया जाता है?
(क) बहिर्मण्डल
(ख) आयनमण्डल
(ग) समतापमण्डल
(घ) क्षोभमण्डल
उत्तर-(घ) क्षोभमण्डल।। ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. वायुमण्डल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-पृथ्वी के चारों ओर परिवेष्ठित वायु के आवरण को ‘वायुमण्डल’ कहा जाता है। वायुमण्डल शब्द दो शब्दों के संयोग से बना है-वायु + मण्डल अर्थात् वायु का विशाल आवरण, जो पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए हैं। फिंच और ट्विार्था के शब्दों में, वायुमण्डल विभिन्न गैसों का आवरण है, जो धरातले से सैकड़ों मील की ऊँचाई तक विस्तृत है तथा पृथ्वी का अभिन्न अंग है।”

प्रश्न 2. वायुमण्डल की रचना किन तत्त्वों (पदार्थों) से हुई है?
उत्तर-वायुमण्डल की रचना गैसों, जलवाष्प तथा धूल-कणों से हुई है।

प्रश्न 3. वायुमण्डल के संघटन में कौन-कौन-सी भारी गैसें सम्मिलित हैं?
उत्तर-वायुमण्डल के संघटन में भारी गैसों में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, ऑर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा हाइँड्रोजन सम्मिलित हैं।

प्रश्न 4. वायुमण्डल के संघटन में कौन-कौन-सी हल्की गैसें सम्मिलित हैं?
उत्तर-वायुमण्डल के संघटन में हल्की गैसों में हीलियम, नियॉन, क्रिप्टॉन, जेनॉन, ओजोन आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5. उस विरल गैस का नाम बताइए जो सूर्य के पराबैंगनी विकिरण का अवशोषण करती है।
उत्तर-ओजोन गैस।

प्रश्न 6. वायुमण्डल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस का क्या महत्त्व है?
उत्तर-यह गैस पेड़-पौधों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 7. क्षोभ सीमा या मध्य स्तर का महत्त्व बताइए।
उत्तर-यह एक शान्त पेटी है। इस स्तर पर परिवर्तन की कोई घटना नहीं होती।

प्रश्न 8. समतापमण्डल का महत्त्व बताइए।
उत्तर-यह मण्डल संवहन क्रिया से रहित है तथा इसमें बादल भी नहीं बनते। इस परत का महत्त्व वायुयानों के लिए अधिक है।

प्रश्न 9. आयनमण्डल का हमारे लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर-यह मण्डल रेडियो तरंगों को पृथ्वी की ओर लौटा देता है। इस मण्डल की स्थिति के कारण ही रेडियो तरंगें पृथ्वी पर एक वक्राकार मार्ग का अनुसरण करती हैं। इस परत का महत्त्व दूरसंचार के लिए अधिक है।

प्रश्न 10. परिवर्तनमण्डल क्या है? इसका महत्त्व बताइए।
उत्तर-वायुमण्डल की निचली परत को परिवर्तनमण्डल या क्षोभमण्डल कहते हैं। मौसम सम्बन्धी विभिन्न घटनाएँ मेघ गर्जन, ऑधी-तूफान, वर्षा, ओस, तुषार, पाला, कुहरा आदि के लिए इस मण्डल का महत्त्व है।

प्रश्न 11, मानव एवं जीव-जन्तु के लिए ओजोनमण्डल को वरदान कहा जाता है। क्यों?
उत्तर-ओजोनमण्डल में ओजोन गैस पाई जाती है। यही गैस सूर्य से निकलने वाली घातक एवं तीक्ष्ण पराबैंगनी किरणों का अधिकांश भाग अवशोषित करके जीवधारियों को सुरक्षा कवच प्रदान करती है।

प्रश्न 12. मनुष्य के जीव-जन्तु के लिए वायुमण्डल का क्या महत्त्व है?
उत्तर-वायुमण्डल में मनुष्य, जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे के जीवन संचार की क्षमता है। इसमें मानव व जीव-जन्तु के लिए ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड गैस और जलवाष्प विद्यमान है।

प्रश्न 13, पृथ्वी पर जैविक विविधता का क्या कारण है?
उत्तर-पृथ्वी पर वायुमण्डलीय कारकों ने जलवायु की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को जन्म दिया है। यह जलवायु विभिन्नता ही जैविक विविधता का महत्त्वपूर्ण कारण है।

प्रश्न 14. ऊँचाई के साथ वायुमण्डल के तापमान में क्या परिवर्तन होते हैं?
उत्तर-ऊँचाई के साथ वायुमण्डल के तापमान में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं

  • लगभग 15 किमी तक तापमान धीरे-धीरे ऊँचाई के साथ-साथ कम होता जाता है।
  • 15 किमी और 80 किमी के मध्य तापमान प्रायः स्थिर रहता है।
  • 80 किमी से ऊपर जाने पर तापमान ऊँचाई के साथ-साथ बढ़ने लगता है।

प्रश्न 15. वायुमण्डल की किस परत में वायुयानों के परिवहन की आदर्श दशाएँ उपलब्ध हैं ?
उत्तर-वायुमण्डल की समताप परत में वायुयानों की उड़ान के लिए आदर्श दशाएँ पाई जाती हैं। इसमें मेघ, धूलकण तथा संवहन धाराओं का अभाव होता है।

प्रश्न 16. हाइड्रोजन किस प्रकार की गैस है? वायुमण्डल में इसकी स्थिति बताइए।
उत्तर-हाइड्रोजन सबसे हल्की गैस है जो वायुमण्डल में सभी गैसों के ऊपर लगभग 1100 किमी की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह गैस वायुमण्डल की गैसों का केवल 0.01% भाग है।

प्रश्न 17. वायुमण्डल में कौन-सी गैस रासायनिक प्रक्रिया में भाग नहीं लेती है?
उत्तर-क्रिप्टॉन, नियोन तथा ऑर्गन गैसें रासायनिक प्रक्रिया में भाग नहीं लेती हैं।

प्रश्न 18. एयरोसोल्स क्या हैं?
उत्तर-वायुमण्डल में जलकर्ण, कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, जीनान, क्रिप्टॉन, नियोन, ऑर्गन तथा बड़े ठोस कण सम्मिलित रूप से एयरोसोल्स कहलाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. वायुमण्डल संरचना से आप क्या समझते हैं? वायुमण्डल के स्तरों के नाम लिखिए।
उत्तर-वायुमण्डल की संरचना
वायुमण्डल की संरचना अथवा वायुमण्डल के स्तरों से तात्पर्य वायुदाब, तापमान एवं घनत्व आदि के परिवर्तन के फलस्वरूप वायुमण्डल की विभिन्न परतों से है, क्योंकि वायुमण्डल में धरातल से अन्तरिक्ष की ओर बढ़ने पर लम्बवत् व क्षैतिज रूप में परिवर्तन देखने को मिलते हैं। वायुमण्डल में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, हीलियम, नियोन सहित ओजोने आदि गैसें पाई जाती हैं। भारी एवं सघन गैसें; यथा–नाइट्रोजन व ऑक्सीजन धरातल के समीप तथा हल्की गैसें वायुमण्डल के ऊपरी भाग में पाई जाती हैं। यही कारण है कि 6 किमी से अधिक ऊँचाई पर हमें साँस लेने में कठिनाई होती है।

वायुमण्डल के स्तर

वायुमण्डल को आधार मानकर सामान्यत: निम्नलिखित पाँच मण्डलों या स्तरों अथवा परतों में बाँटा गया है–

  1. क्षोभमण्डल या परिवर्तनमण्डल अथवा अधोमण्डल (Troposphere),
  2. समतापमण्डल (Stratosphere),
  3. ओजोनमण्डल (Ozonosphere),
  4. आयनमण्डल (Ionosphere),
  5. बहिर्मण्डल (Exosphere)।

प्रश्न 2. वायुमण्डल की चौथी परत की विशेषता एवं उपयोगिता समझाइए।
उत्तर-वायुमण्डल की चौथी परत को आयनमण्डल कहते हैं। आयनमण्डल ओजोनमण्डल के ऊपर स्थित है। इसका विस्तार 80-640 किमी तक विस्तृत है। वैज्ञानिकों को इस मण्डल के सन्दर्भ में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त हो रही है। आयनमंण्डल का आभास सर्वप्रथम रेडियो तरंगों द्वारा ज्ञात हुआ था। ध्वनि तरंगों एवं स्पूतनिकों (Rockets) द्वारा इसके सम्बन्ध में और अधिक जानकारी प्राप्त हुई है। इस स्तर पर वायुमण्डल का आयनन आरम्भ हो जाता है। ओजोनमण्डल की समाप्ति पर तापमान पुनः ऊपर की ओर नीचे गिरने लगता है तथा 80 किमी की ऊँचाई पर घटकर -100° सेल्सियस के समीप पहुँच जाता है। इसके बाद एक बार फिर तापमान बढ़ने लगता है क्योंकि वहाँ लघु तरंगी सौर विकिरण को अवशोषण ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणुओं पर पराबैंगनी फोटोन्स की प्रतिक्रिया होने से ताप 1000° सेल्सियस तक बढ़ जाता है। आयनमण्डल रेडियो तरंगों को पृथ्वी की ओर लौटा देता है। अनेक वैज्ञानिक रेडियो एवं ध्वनि तरंगों के माध्यम से इस परत के अन्वेषण में लगे हुए हैं। पृथ्वी पर संचार साधनों का संचालन इसी परत के द्वारा सम्भव होता है। इस दृष्टि से यह मण्डल मानव के लिए विशेष उपयोगी है।

प्रश्न 3. वायुमण्डल की अन्तिम परत पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-वायुमण्डल की अन्तिम परत बहिर्मण्डल कहलाती है। बहिर्मण्डल को विशेष अध्ययन स्पिटजर नामक वैज्ञानिक द्वारा किया गया है। इसकी ऊँचाई 500 से 1000 किमी तक बताई गई है। इतनी अधिक ऊँचाई पर वायुमण्डल एक निहारिका के रूप में दिखलाई पड़ता है। इस मण्डल में हाइड्रोजन तथा हीलियम सदृश हल्की गैसों की प्रधानता होती है। वायुमण्डल की बाह्य सीमा पर गतिक (Kinetic) तापमान बहुत अधिक होता है, परन्तु यह तापमान धरातलीय तापमान से सर्वथा भिन्न होता है। यदि अन्तरिक्ष यात्री इतने अधिक तापमान में यान से अपना हाथ बाहर निकालें तो शायद उन्हें गर्म भी। नहीं लगेगा। वास्तव में वर्तमान तक इस मण्डल के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हुई है; अतः। इसकी खोज जारी है।

प्रश्न 4. वायुमण्डल का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-वायुमण्डल का महत्त्व मानव एवं पृथ्वी पर विभिन्न क्रियाओं के लिए अक्षुण्ण है। वायुमण्डल के अस्तित्व के फलस्वरूप ही पृथ्वी पर पेड़-पौधे तथा जीवधारियों का अस्तित्व पाया जाता है। पृथ्वी पर वायु संचरण, वर्षा, आँधी-तूफान, बादल तथा हिमपात आदि घटनाएँ वायुमण्डल के कारण ही सम्भव होती हैं। वायुमण्डल पृथ्वी को कवच की भाँति सुरक्षा प्रदान करता है। यह पृथ्वी को अधिक गर्म होने से रोकता है। तथा दूसरी ओर तापमान के विकिरण में बाधक बन जाता है। यह तापमान के विकिरण और प्रकाश के वितरण में सहायक होकर जीवधारियों का कल्याण करता है। वायुमण्डल की ऊपरी परतें (विशेष रूप से ओजोन परत) पराबैंगनी किरणों को रोककर जीवधारियों को उनके प्राणघातक प्रभाव से बचाती है। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व वायुमण्डल के कारण ही सम्भव हो पाया है। वायुमण्डल जीवधारियों को प्राणदायिनी वायु के रूप में ऑक्सीजन गैस प्रदान करता है। वायुमण्डल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी सौर-मण्डल का एक अनोखा ग्रह माना जाता है।

प्रश्न 5. वायुमण्डल की संरचना में गैसों का क्या योगदान है?
उत्तर-वायुमण्डल की संरचना में गैसों का स्थान सर्वोपरि है। शुष्क वायु में प्रमुखत: नाइट्रोजन (8%), ऑक्सीजन 21%) जैसी भारी एवं सघन गैसें तथा आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड व हाइड्रोजन आदि (लगभग 1%) जैसी हल्की गैसें पाई जाती हैं। प्रायः धरातल के निकटवर्ती भागों में भारी गैसें तथा ऊपरी भागों में नियोन, हीलियम व ओजोन जैसी कई हल्की गैसें मिलती हैं। वायुमण्डल के सबसे निचले भागों में 20 किमी की ऊँचाई तक भरी गैसें व अन्य पदार्थ मिलते हैं। 100 किमी की ऊँचाई तक ऑक्सीजन व नाइट्रोजन गैसें पाई जाती हैं तथा 125 किमी की ऊँचाई तक हाइड्रोजन गैस मिलती है।

प्रश्न 6. जलवाष्प तथा धूलकण मौसम तथा जलवायु की विभिन्नता के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर-जलवाष्प एवं धूलकण वायुमण्डल के महत्त्वपूर्ण संघटक हैं। ये मौसम तथा जलवायु के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। धूलकण प्रत्येक प्रकार के संघनन के लिए उत्तरदायी होते हैं। ये आर्द्रताग्राही होते हैं, इनके द्वारा ही वायुमण्डल में कुहारा, मेघ आदि बनते हैं और वर्षा की परिस्थिति उत्पन्न होती है। जलवाष्प वायुमण्डल के तापमान और वर्षा को प्रभावित करती है। जलवाष्प की उपस्थिति वायुमण्डल में वाष्पीकरण क्रिया द्वारा निर्धारित होती है। इसकी मात्रा सभी स्थानों पर समान नहीं होती है। भूमध्य रेखा के निकट सर्वाधिक एवं ध्रुवों पर सबसे कम जलवाष्प पाई जाती है। वायुमण्डल में घटित होने वाली सभी घटनाएँ मेघ, तुषार, हिमपात, ओस, पाला, झंझावात, चक्रवात आदि जलवाष्प पर आधारित होती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. वायुमण्डल किसे कहते हैं? वायुमण्डल का संघटन (संरचना) समझाइए तथा इसका महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-वायुमण्डल का अर्थ
ट्विार्था के अनुसार, “पृथ्वी को परिवेष्टित करने वाला गैसों का एक विशाल आवरण जो पृथ्वी का अभिन्न अंग है, वायुमण्डल कहलाता है। इस प्रकार वायुमण्डल वायु का एक विशाल आवरण है जो पृथ्वी को चारों ओर से एक खोल की भाँति घेरे हुए है। यह आवरण भूतल से 1,000 किमी से भी अधिक ऊँचाई तक व्याप्त है। वायुमण्डल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी ग्रह सौरमण्डल का अनूठा ग्रह है, जिस पर जीवन पाया जाता है। यह वायुमण्डल प्राणिमात्र के लिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसी के कारण पृथ्वी पर जीवन सम्भव हुआ है। वायुमण्डल में ही मौसम की परिघटनाएँ होती हैं।

वायुमण्डल का संघटन या संरचना

वायुमण्डल का संघटन विभिन्न गैसों, जलवाष्प एवं धूल-कणों आदि से मिलकर हुआ है। इसमें सम्मिलित पदार्थों का विवरण निम्नलिखित है–
1. गैसें (Gases)-वायुमण्डल की संरचना में विभिन्न गैसों का योगदान रहता है। यद्यपि वायु कई गैसों का मिश्रण है, परन्तु मुख्य रूप से इसमें दो ही गैसें नाइट्रोजन 78% और ऑक्सीजन 21% मिश्रित रहती हैं जो सम्पूर्ण वायुमण्डल का 99 प्रतिशत भाग है। शेष 1 प्रतिशत में अन्य गैसे सम्मिलित हैं। संलग्न तालिका वायुमण्डल में पायी जाने वाली गैसों की मात्रा प्रकट करती है। वायुमण्डल के निचले भाग में भारी गैसें कार्बन डाइऑक्साइंड 20 किमी तक, ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन 100 किमी तक और हाइड्रोजन 125 किमी की ऊँचाई तक पायी जाती हैं। इनके अतिरिक्त अधिक हल्की गैसें; जैसे-हीलियम, नियॉन, क्रिप्टॉन, जेनॉन, ओजोन आदि 125 किमी से अधिक ऊँचाई पर पायी जाती हैं।

2. जलवाष्प (Water Vapour)-जलवाष्प का वायुमण्डल में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इसकी अधिकतम मात्रा 5% तक होती है। जलवाष्प की यह मात्रा धरातल के विभिन्न भागों; जैसे–महासागरों, सागरों, झीलों, जलाशयों, मिट्टियों, वनस्पति आदि के वाष्पीकरण द्वारा वायुमण्डल में विलीन होती रहती है।
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ऑक्सीजन वाष्पीकरण का कम या अधिक होना तापमान की कमी या वृद्धि के ऊपर निर्भर करता है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि सूर्याभिताप प्रति सेकण्ड 1.6 करोड़ टन जल का वाष्पीकरण कर उसे जलवाष्प में बदल देता है। यदि वायुमण्डल में उपस्थित समस्त जलवाष्प को धरातल पर गिरा दिया जाए तो धरातलीय सतह पर 2.5 सेण्टीमीटर जल एकत्र हो जाएगा। वायुमण्डल की निचली परत में जलवाष्प की मात्रा प्रत्येक भाग में कम या अधिक अवश्य ही मिलती है। वायुमण्डल की ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है अर्थात् 7.5 किमी की ऊँचाई पर वायुमण्डल में जलवाष्प नहीं पायी जाती। विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है। उदाहरण के लिए-शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में 50° अक्षांश पर जलवाष्प की मात्रा 2.6 प्रतिशत, 70° अक्षांश पर 0.9 प्रतिशत और इससे अधिक ऊँचाई वाले अक्षांशों पर केवल 0.2 प्रतिशत ही रह जाती है। वायुमण्डलीय घटनाएँ-बादल, वर्षा, तुषार, हिमपात, ओस, ओला, पाला आदि जलवाष्प पर ही आधारित हैं। जलवाष्प की यह मात्रा सौर्यिक विकिरण के लिए पारदर्शक शीशे की भाँति कार्य करती है।

3. धूल-कण (Dust Particles)-सूर्य के प्रकाश में देखने से मालूम होता है कि वायुमण्डल में धूल के ठोस तथा सूक्ष्म कण स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करते रहते हैं। ये धूल-कण भूतल से अधिक ऊँचाई पर नहीं जा पाते। भूपृष्ठ की मिट्टी के अतिरिक्त ये धूल-कण धुआँ, ज्वालामुखी की धूल तथा समुद्री लवण से भी उत्पन्न होते हैं। ये धूल-कण जलवाष्प को अपने में सोख लेते हैं। वर्षा कराने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। वर्षा के समय इन धूल-कणों पर जमी जल की बूंदें चमकते मोती के समान दिखलाई पड़ती हैं। सूर्य की किरणों का वायुमण्डल में बिखराव इन्हीं | धूल-कणों के द्वारा होता है। इन्हीं के कारण आकाश में विभिन्न रंग दिखाई पड़ते हैं।

वायुमण्डल का महत्त्व

वायु केवल मानव के लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु जल, थल तथा वायुमण्डलों में निवास करने वाले सभी प्राणिमात्र, जीव-जन्तु, पेड़-पौधों आदि सभी के लिए अनिवार्य है। वायु के अभाव में प्राणिमात्र एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। वायु द्वारा ही सभी वायुमण्डलीय प्रक्रियाएँ-ताप, वायुदाब, वर्षा, तुषार, कोहरा, पाला, विद्युत चमक, ऋतु-परिवर्तन आदि निर्धारित होते हैं।

जलवायु का निर्धारण भी वायुमण्डल द्वारा ही किया जाता है। इसके अतिरिक्त कृषि-क्रियाओं पर वायुमण्डल का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। पूर्वी एशियाई कृषि-प्रधान देशों में वायुमण्डलीय क्रियाओं से भारी धन-जन की हानि होती है। वास्तव में कृषक का भाग्य ही इस वायुमण्डल से जुड़ा हुआ है। पश्चिमी यूरोपीय देशों में फलों की कृषि वायुमण्डलीय दशाओं पर निर्भर करती है। यही नहीं, उद्योग-धन्धे भी इन्हीं क्रियाओं से ही जुड़े हुए हैं।

वायुमण्डल में पायी जाने वाली कार्बन डाइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन का प्रभाव वनस्पति तथा जीव-जन्तुओं पर अधिक पड़ता है। पश्चिमी देशों में कृषक अपनी कृषि भूमि में नाइट्रोजन की पूर्ति अन्य विधियों से कर लेते हैं तथा अधिक उत्पादन प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत भारतीय कृषि में कम उत्पादन का कारण नाइट्रोजन की पूर्ति न कर पाना है। कार्बन डाइऑक्साइड गैस से वनस्पति जगत की श्वसन क्रिया चलती है। यही कारण है कि विषुवतरेखीय प्रदेशों में इस गैस की अधिकता के कारण ही सघन वनस्पति का आवरण छाया हुआ है, जबकि टुण्ड्रा एवं टैगा प्रदेशों में इस गैस की कमी मिलती है; अतः ।

यहाँ वनस्पति भी विरल रूप में ही पायी जाती है। वायुमण्डल में व्याप्त अन्य गैसें-हाइड्रोजन, हीलियम, नियॉन, क्रिप्टॉन, ऑर्गन, ओजोन, जेनॉन आदि–भी प्राणिमात्र के लिए किसी-न-किसी रूप में लाभ पहुँचाती हैं। उदाहरण के लिए वायुमण्डल की ओजोन गैस का आवरण सूर्य की तीक्ष्ण पराबैंगनी किरणों को अपने में सोख लेता है। यदि यह गैस न होती तो पृथ्वी पर जीव-जगत न होता अर्थात् प्राणिमात्र तीक्ष्ण गर्मी से झुलस जाता और धरा जीवनशून्य हो जाती।

प्रश्न 2. वायुमण्डल की परतों पर प्रकाश डालिए और प्रत्येक का महत्त्व भी बताइए। |
या वायुमण्डल की किन्हीं पाँच परतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-वायुमण्डल की परतें।
वायुमण्डल की परतों को सामान्यत: निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है
1. वायुमण्डल का रासायनिक स्तरीकरण
वायुमण्डल के रासायनिक स्तरीकरण को दो निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है

(i) सममण्डल (Homosphere)–तापमानं परिवर्तन को देखते हुए सममण्डल को तीन उप मण्डलों में विभाजित किया जाता है–(अ) परिवर्तनमण्डल या अधोमण्डल या क्षोभमण्डले (Troposphere), (ब) समतापमण्डल (Stratosphere) एवं (स) मध्यमण्डल (Mesosphere)। इन तीनों मण्डलों में रासायनिक दृष्टिकोण से गैसों की मात्रा में कोई परिवर्तन दिखलाई नहीं पड़ता। समुद्र-तल से इसकी ऊँचाई 90 किमी तक आँकी गयी है। रचना के दृष्टिकोण से सममण्डल में मुख्य गैसें ऑक्सीजन 20.946% तथा नाइट्रोजन 78.054% अर्थात् 99% भाग घेरे हुए हैं। शेष गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, ऑर्गन, हीलियम, क्रिप्टॉन, जेनॉन तथा हाइड्रोजन प्रमुख हैं।

महत्त्व-सममण्डल में अधोमण्डल या क्षोभमण्डल सबसे महत्त्वपूर्ण परत है, क्योंकि यह वायुमण्डल की सबसे निचली परत है तथा मानव का इससे सीधा सम्पर्क है। पर्यावरण के सभी तत्त्व इसी मण्डल में पाये जाते हैं। धूल-कण भी इसी मण्डल में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं। भारी कण निचली सतह में तथा हल्के कण ऊपरी भागों में पाये जाते हैं। अधोमण्डल के ऊपर धूल-कणों का अभाव पाया जाता है।

(ii) विषममण्डल (Heterosphere)-इस मण्डल की ऊँचाई 90 किमी से 10,000 किमी तक ऑकी गयी है। इस ऊँचाई पर स्थित गैसों के आधार पर विषममण्डल को चार उपविभागों में बाँटा गया है—(अ) आणविक नाइट्रोजन परत (Atomic Nitrogen Layer), (ब) आणविक ऑक्सीजन परत (Atomic Oxygen Layer), (स) हीलियम परत (Helium Layer) तथा (द) आणविक हाइड्रोजन परत (Atomic Hydrogen Layer)।

गैसों की प्रधानता के आधार पर इनका नामकरण किया गया है। 90 से 125 किमी की ऊँचाई तक आणविक नाइट्रोजन गैस, 125 से 700 किमी की ऊँचाई तक आणविक ऑक्सीजन गैस, 700 से 1100 किमी की ऊँचाई तक हीलियम गैस तथा 1,100 से 10,000 किमी की ऊँचाई तक आणविक हाइड्रोजन परेंत की स्थिति आँकी गयी है, परन्तु विषममण्डल की अन्तिम सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। हाइड्रोजन गैस सबसे हल्की होने के कारण वायुमण्डल के सबसे ऊपरी भाग में विस्तृत है।

2. वायुमण्डल का सामान्य स्तरीकरण
वर्तमान समय में वैज्ञानिक आधार पर वायुमण्डल की अनेक परतों का अध्ययन किया गया है, परन्तु वायुदाब को आधार मानकर सामान्य रूप से वायुमण्डल को छः स्तरों में विभाजित किया गया है

(i) परिवर्तनमण्डल या क्षोभमण्डल-इसे अधोमण्डल भी कहते हैं। इसकी औसत ऊँचाई 11 किमी है। विषुवत रेखा पर इसकी औसत ऊँचाई 16 किमी तथा ध्रुवों पर केवल 6-7किमी रह जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर जाने में इसकी ऊँचाई कम होती जाती है। इसी मण्डल में प्राणिमात्र निवास करते हैं। इस मण्डल का पर्यावरण कुछ गरम होता है जिसका
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मुख्य कारण सूर्यताप की प्राप्ति का होना है। इस मण्डल में जलवाष्प, जल-कण एवं धूल-कण विद्यमान हैं। यह मण्डल संवाहन, संचालन एवं विकिरण की क्रिया द्वारा क्रमशः गर्म तथा ठण्डा होता रहता है।

इस मण्डल में वायुमण्डलीय घटनाएँ घटित होती रहती हैं। इसीलिए इसे परिवर्तनमण्डल का नाम दिया गया है। ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायुमण्डल में ताप एवं दबाव कम होता जाता है। इस मण्डल में प्रति 300 मीटर की ऊँचाई पर 1.8° सेग्रे ताप कम हो जाता है। अधोमण्डल की अन्तिम सीमा पर वायुदाब घटकरे धरातल की अपेक्षा एक-चौथाई रह जाता है।

महत्त्व-इस मण्डल में वायु वेग एवं दिशा, तापमान, वर्षा, आर्द्रता, आँधी, तूफान, बादलों की गर्जना, विद्युत चमक आदि सभी वायुमण्डलीय घटनाएँ घटित होती रहती हैं।

(ii) क्षोभ सीमा या मध्य-स्तर- अधोमण्डल की समाप्ति एवं समतापमण्डल के आरम्भ वाले मध्य भाग को मध्य-स्तर का नाम दिया गया है। इसे संक्रमण स्तर भी कहते हैं। इसकी चौड़ाई 1.5 किमी है।

महत्त्व—यह एक शान्त पेटी है। इस स्तर में परिवर्तन की कोई घटना घटित नहीं होती।

(iii) समतापमण्डल-मध्य-स्तर के बाद समतापमण्डल प्रारम्भ होता है जिसकी ऊँचाई 16 किमी से 80 किमी तक है। इस मण्डल में ताप एक-सा रहता है, इसी कारण इसे समतापमण्डल का नाम दिया गया है, परन्तु इसकी ऊँचाई अक्षांश एवं ऋतुओं के अनुसार परिवर्तित होती रहती है अर्थात् ग्रीष्मकाल में वायुमण्डलीय घटनाएँ अधिक होने के कारण इसकी ऊँचाई में वृद्धि हो जाती है तथा शीतकाल में घट जाती है, जबकि वायुमण्डलीय घटनाएँ इस मण्डल में घटित नहीं होतीं।

महत्त्व-यह मण्डल संवाहन प्रक्रिया से रहित है तथा इसमें बादल भी नहीं बनते। इस परत का महत्त्व वायुयानों के लिए अधिक है।

(iv) ओजोनमण्डल-वायुमण्डल में इस परत की ऊँचाई समतापमण्डल के ऊपर 32 किमी से 80 किमी तक है। इसमें ओजोन गैस की अधिकता के कारण इसे ओजोनमण्डल नाम दिया गया है। वर्तमान समय में वायुमण्डल के इस छतरी रूपी आवरण में दो छेद हो गये हैं जिसका मुख्य कारण धरातल पर प्रदूषणों में वृद्धि होना है। वैज्ञानिकों को ध्यान इस ओर गया है तथा प्रदूषण एवं आणविक अस्त्र-शस्त्रों की होड़ को रोकने के प्रयास किये जा रहे हैं, जिससे जीवमण्डल के इस सुरक्षा कवच की रक्षा की जा सके। इस घटना के कारण ही पृथ्वी के औसत तापमान में 0.5° सेग्रे की वृद्धि हो गयी है; अतः सभी मानव-समुदाय को इसकी रक्षा के प्रयास करने चाहिए।

महत्त्व-इस परत का महत्त्व मानवमात्र के लिए है, क्योंकि इसी परत में सूर्य की विषैली पराबैंगनी किरणों का अवशोषण होता है। यह परत न होती तो कदाचित् पृथ्वी पर किसी प्रकार का जीवन सम्भव नहीं होता।

(v) आयनमण्डल-वायुमण्डल में इस परत की ऊँचाई 80 किमी से 640 किमी तक है, जो | ओजोनमण्डल के ठीक ऊपर है। कुछ वैज्ञानिक इसकी अन्तिम सीमा हजारों किमी तक मानते हैं। यह मण्डल रेडियो तरंगों को पृथ्वी की ओर लौटा देता है। यदि यह मण्डल न होता तो रेडियो तरंगें असीम आकाश में चली जातीं और कभी भूतल पर वापस न लौटतीं। इस मण्डल की स्थिति के कारण ही रेडियो तरंगें पृथ्वी पर एक वक्राकार मार्ग का अनुसरण करती हैं। ध्वनि तरंगों तथा रॉकेटों द्वारा भी इस मण्डल के विषय में अनेक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं, परन्तु अभी तक पूर्ण खोज नहीं हो पायी है। ओजोन की समाप्ति पर तापमान गिरने लगता है जो 30 किमी ऊँचाई पर -38° सेग्रे हो जाता है। इसके बाद तापमान में वृद्धि होती है तथा 95 किमी की ऊँचाई पर 10° सेग्रे तापमान हो जाता है। आकाश का नीला रंग, विद्युत चमक तथा ब्रह्माण्ड किरणें इस परत की विशेषताएँ हैं।

महत्त्व-इस परत का महत्त्व दूरसंचार के लिए अधिक है।

(vi) बहिर्मण्डल-ऊँचाई के आधार पर यह वायुमण्डल की सबसे ऊँची तथा अन्तिम परत हैं। इस परत की ऊँचाई 640 किमी से 690 किमी तक मानी गयी है अथवा इससे भी कहीं अधिक हो सकती है। वायुमण्डल की बाह्य सीमा पर 5568° सेग्रे ताप हो जाता है, परन्तु यह तापमान धरातलीय तापमान से भिन्न होता है। इसमें हीलियम तथा हाइड्रोजन जैसी अत्यधिक हल्की गैसों का आधिक्य है। वैज्ञानिक इस मण्डल की खोज में जुटे हुए हैं।

महत्त्व-भू-भौतिकी वैज्ञानिकों एवं जलवायुवेत्ताओं ने इससे ऊपर चुम्बकीय मण्डले की परिकल्पना की है, जिसकी जानकारी उपग्रहों द्वारा प्राप्त हुई है। इसकी ऊँचाई का निर्धारण 80,000 किमी तक किया गया है। इसे ऊँचाई पर पृथ्वी के वायुमण्डल का समापन सूर्य की परिधि में हो जाता है।

प्रश्न 3. वायुमण्डल के प्रथम संस्तर तथा इसकी सीमा का वर्णन कीजिए। |
या वायुमण्डल की निचली परत को क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है? इसकी विशेषता बताइए।
उत्तर-वायुमण्डल के प्रथम संस्तर को क्षोभमण्डल या परिवर्तनमण्डल कहते हैं जबकि इसकी सीमा क्षोभ सीमा या मध्यस्तर कहलाती (चित्र 8.2) है। इन दोनों का वर्णन इस प्रकार है
क्षोभमण्डल या परिवर्तनमण्डल अथवा अधोमण्डल—यह वायुमण्डल को प्रथम संस्तर या सबसे निचली एवं सघन परत है जिसमें वायुमण्डल के सम्पूर्ण भार का 75% भाग संकेन्द्रित है। धरातल से इस परत की औसत ऊँचाई लगभग 14 किमी मानी जाती है। यह विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर पतली होती जाती है। विषुवत् रेखा पर इसकी ऊँचाई 18 किमी तथा ध्रुवों पर केवल 8 किमी होती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि ज्यो-ज्यों विषुवत् रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, क्षोभ सीमा पृथ्वी के निकट आती-जाती है, जिसमें ऊँचाई के साथ ताप कम होना बंद हो जाता है। क्षोभमण्डल की ऊँचाई जाड़ों की अपेक्षा गर्मियों में अधिक हो जाती है। (चित्र 8.3)।
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जलवायु विज्ञान की दृष्टि से इस परत का विशेष महत्त्व है, क्योंकि सभी मौसमी घटनाएँ इसी मण्डल में घटित होती हैं। ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ तापमान में गिरावट इस परत की सबसे बड़ी विशेषता है। ताप की यह कमी 6.5° सेल्सियस प्रति किलोमीटर होती है। इसे सामान्य ताप ह्रास दर (Normal Lapse Rate of Temperature) कहते हैं।

इस मण्डल में वायु कभी शान्त नहीं रहती है, कुछ-न-कुछ परिवर्तनों की क्रिया सदैव जारी रहती है। इस कारण इसे परिवर्तनमण्डल का नाम भी दिया गया है। वायुमण्डल की यह निचली परत ही भूतल और उस पर स्थित जैवमण्डल में सम्पर्क में रहती है जिस कारण यहाँ मेघ गर्जन, आँधी व तूफान आदि वायुमण्डलीय क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। मौसम सम्बन्धी सभी घटनाएँ इसी मण्डल में घटित होती हैं।

क्षोभ सीमा या मध्य स्तर-क्षोभमण्डल एवं समतापमण्डल के मध्य क्षोभ सीमा अथवा मध्य स्तर स्थित है। यह इन दोनों मण्डलों के मध्य संक्रमण क्षेत्र है। इस पेटी की चौड़ाई लगभग 3 किमी तक है। मध्य अक्षांशों में जेट स्ट्रीम के कारण कभी-कभी इस स्तर की ऊँचाई में अन्तर पड़ जाता है। विषुवत् । रेखा पर इसकी ऊँचाई 18 से 20 किमी तथा ध्रुवों पर 8 से 10 किमी तक होती है।

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