UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 3 Election and Representation

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 3 Election and Representation (चुनाव और प्रतिनिधित्व)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नजदीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में होने वाली चर्चा
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन
(घ) मीडिया द्वारा करवाए गए जनमत-संग्रह
उत्तर-
(घ) मीडिया द्वारा करवाए गए जनमत संग्रह।

प्रश्न 2.
इनमें कौन-सा कार्य चुनाव आयोग नहीं करता?
(क) मतदाता सूची तैयार करना
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन
(ग) मतदान-केन्द्रों की स्थापना
(घ) आचार-संहिता लागू करना।
(ङ) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण
उत्तर-
(ङ) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन-सी राज्यसभा और लोकसभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली के समान है?
(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है।
(ख) विभिन्न प्रत्याशियों के बारे में मतदाता अपनी पसंद को वरीयता क्रम में रख सकता है।
(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है।
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होने चाहिए।
उत्तर-
(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है।

प्रश्न 4.
फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो
(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है।
(ख) देश में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो।
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।
उत्तर-
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।

प्रश्न 5.
पृथक् निर्वाचन-मण्डल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र के बीच क्या अंतर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मण्डल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर-
स्वतन्त्रता से पूर्व अंग्रेजों की नीति थी-फूट डालो तथा शासन करो। इस नीति के अनुसार अंग्रेजों ने निर्वाचन हेतु मतदाताओं को विभिन्न श्रेणियों और वर्गों में विभाजित कर रखा था, किन्तु हमारे संविधान-निर्माताओं ने पृथक् निर्वाचन-मण्डल का अन्त कर दिया क्योंकि यह प्रणाली समाज को बाँटने का काम करती थी। भारत के संविधान में कमजोर वर्गों का विधायी संस्थाओं (संसद व विधान पालिकाएँ) ने प्रतिनिधित्व को निश्चित करने के लिए आरक्षण का रास्ता चुना जिसके तहत संसद में तथा राज्यों की विधानसभाओं में इन्हें आरक्षण प्रदान किया गया है। भारत में यह आरक्षण 2010 तक के लिए लागू किया गया है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नए क्रम में सजाकर इसे सही करें-
(क) एक फर्स्ट-पोस्ट-द-पोस्ट प्रणाली (‘सबसे आगे वाला जीते प्रणाली’) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।
(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर-
(क) एक फस्र्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली (सबसे आगे वाला जीते प्रणाली’) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है। यह कथन गलत है। सही स्थिति यह है कि इस प्रणाली का प्रयोग भारत में कुछ पदों के निर्वाचन में ही होता है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा इसी प्रणाली से होता है। अन्य चुनावों में फर्स्ट-पोस्ट-द-पोस्ट प्रणाली का पालन नहीं होता है।
(ख) यह कथन सही है।
(ग) यह कथन सही है।
(घ) यह कथन सही है।

प्रश्न 7.
भारत की चुनाव-प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना है। लेकिन अभी तक हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या 10 प्रतिशत भी नहीं पहुँचती। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?
उत्तर-
सन् 1992 में पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित किए जाने के लिए प्रयास चल रहे हैं। इसके लिए निम्नलिखित सुझाव हैं-

  1. भारत में मतदाताओं का लगभग 50 प्रतिशत भाग महिलाएँ हैं; अतः इनकी संख्या बढ़ाने के लिए इनमें जागरूकता उत्पन्न की जाए।
  2. संविधान के समक्ष पुरुष और स्त्री समान हैं और स्त्रियों पर भी सभी कानून समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए कानून के निर्माण में इनकी भागीदारी पर्याप्त होनी चाहिए।

प्रश्न 8.
एक नए देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि उनके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली) उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?
(क) लोगों को इस बात की साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है। ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सकें।
(ख) हमारे देश में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं और देशभर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।
(ग) विभिन्न दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं रखनी चाहिए।
(घ) लोग किसी अच्छे प्रत्याशी को चुनने में समर्थ होने चाहिए भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों।
उत्तर-
(क) जनसाधारण की इच्छाओं को अधिक प्रभावी रूप से व्यक्त करने के लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट मत प्रणाली सर्वाधिक उपयुक्त रहेगी क्योंकि इसमें नागरिकों व प्रतिनिधियों का सीधा सम्पर्क रहता है तथा नागरिक अपने प्रतिनिधियों को सीधे ही जिम्मेवार ठहराकर उन्हें आगामी चुनाव में सत्ता से हटा सकते हैं। इस प्रणाली में नागरिक को अपनी पसन्द का प्रतिनिधि चुनने का मौका मिलता है।

(ख) देश के सभी अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के आधार पर उसी अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आनुपातिक मत प्रणाली का कोई एक तरीका प्रयोग में लाना चाहिए जिससे सभी अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। देश में अनेक धार्मिक, जातीय, भाषायी व सांस्कृतिक अल्पसंख्यक पाए जाते हैं, जिनके उचित प्रतिनिधित्व के लिए आनुपातिक मत प्रणाली अधिक उपयुक्त है।

(ग) इस वर्ग के लोगों की इच्छा पूर्ति के लिए आनुपातिक मत प्रणाली का एक प्रकार—लिस्ट प्रणाली-प्रयोग में ला सकते हैं, जिसके अनुसार राजनीतिक दलों को मिलने वाले वोटों व उनके द्वारा प्राप्त सीटों में एक निश्चित अनुपात पाया जा सकता है।

(घ) फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में नागरिक अपनी पसन्द का उम्मीदवार चुन सकते हैं, भले ही वे उस उम्मीदवार के राजनीतिक दल को पसन्द न करते हों।

प्रश्न 9.
एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आए। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की सम्भावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?
उत्तर-
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त सेवानिवृत्त होने के बाद किसी भी दल का सदस्य बन सकता है। और उस दल के टिकट पर चुनाव भी लड़ सकता है। श्री टी० एन० शेषन ने सेवानिवृत्त होने के बाद ऐसा किया था। इसमें कोई दोष नहीं है। किसी राजनीतिक दल के सदस्य को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करना उचित नहीं है क्योंकि ऐसे व्यक्ति से निष्पक्षता से निर्णय लेने और कार्य करने की आशा नहीं की जा सकती। परन्तु सेवानिवृत्ति के बाद अपने विचार प्रकट करना, किसी दल को अपनाना, चुनाव लड़ना उसका अधिकार भी है और इससे चुनावों की स्वतन्त्रता तथा निष्पक्षता पर कोई आँच नहीं आती। सेवानिवृत्त होने के बाद भारत का मुख्य न्यायाधीश भी ऐसा कर सकता है।

प्रश्न 10.
“भारत का लोकतंत्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है” क्या आप इस कथन से सहमत हैं। इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर-
भारत में समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली के विपक्ष में तर्क – प्रायः सभी देशों में संसद के लिए प्रत्यक्ष चुनावों में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली अपनाई गई है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बड़ी जटिल है और इसके अन्तर्गत दूसरी तीसरी पसन्द के अनुसार मतों का हस्तान्तरण सामान्य व्यक्ति की समझ में सरलतापूर्वक नहीं आता। इसमें मतगणना में काफी समय लगता है। इसमें मतदाताओं के लिए विभिन्न पसन्दों का अंकित करना भी आसान काम नहीं है। इसके अतिरिक्त आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली में मतदाता और प्रतिनिधि के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित नहीं होते और प्रतिनिधि भी अपने को चुनाव-क्षेत्र के लिए उत्तरदायी नहीं समझते।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सीमित मताधिकार विचारधारा के समर्थक हैं –
(क) बार्कर
(ख) जे० एस० मिल
(ग) डॉ० गार्नर
(घ) प्लेटो
उत्तर :
(ख) जे० एस० मिल।

प्रश्न 2.
वयस्क मताधिकार विचारधारा के समर्थक हैं –
(क) ब्लण्टशली
(ख) बेन्थम
(ग) सर हेनरीमैन
(घ) जॉन स्टुअर्ट मिले
उत्तर :
(घ) जॉन स्टुअर्ट मिल।

प्रश्न 3.
“वयस्क मताधिकार का कोई विकल्प नहीं है।” यह किसका कथन है?
(क) लॉस्की
(ख) ब्राइस
(ग) ब्लण्टशली
(घ) अरस्तू
उत्तर :
(क) लॉस्की।

प्रश्न 4.
किसने कहा-“मत देने का अधिकार उन्हीं को प्राप्त होना चाहिए जिनमें बौद्धिक योग्यता की एक सुनिश्चित मात्रा विद्यमान हो, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष।”
(क) अब्राहम लिंकम।
(ख) जवाहरलाल नेहरू
(ग) टी० एच० ग्रीन
(घ) जे० एस० मिल।
उत्तर :
(क) अब्राहम लिंकन।

प्रश्न 5.
“सर्वजनीन मताधिकार का कोई विकल्प नहीं है।” यह किसका कथन है?
(क) अरस्तू
(ख) ब्राइस
(ग) लॉस्की
(घ) गार्नर
उत्तर :
(ग) लॉस्की

प्रश्न 6.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति का प्रतिपादन किसके द्वारा किया गया है।
(क) थॉमस हेयर
(ख) जे० एस० मिल
(ग) सर हेनरी मेन
(घ) ब्राइस
उत्तर :
(क) थॉमस हेयर।

प्रश्न 7.
थॉमस हेयर का नाम किस निर्वाचन प्रणाली से सम्बन्धित है?
(क) प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली
(ख) अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली
(ग) सीमित मतदान प्रणाली
(घ) आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
उत्तर :
(घ) आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली।

प्रश्न 8.
भारत में प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति को सबसे पहले कब लागू किया गया?
(क) सन् 1909
(ख) सन् 1919
(ग) सन् 1935
(घ) सन् 1950
उत्तर :
(ग) सन् 1935

प्रश्न 9.
नागरिकों द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया कहलाती है –
(क) निर्वाचन
(ख) मनोनयन
(ग) संगठन
(घ) आवंटन
उत्तर :
(क) निर्वाचन।

प्रश्न 10.
लोकसभा में निर्वाचन में किस प्रणाली को अपनाया जाता है?
(क) बहुमत प्रणाली
(ख) द्वितीय मतपत्र प्रणाली
(ग) सीमित मत प्रणाली
(घ) साम्प्रदायिक मत प्रणाली
उत्तर :
(क) बहुमत प्रणाली।

प्रश्न 11.
अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा किस संस्था का निर्वाचन होता है?
(क) लोकसंभ
(ख) विधानसभा
(ग) राज्यसभा
(घ) किसी को नहीं
उत्तर :
(ग) राज्यसभा।

प्रश्न 12.
चुनावी दौड़ में जो प्रत्याशी अन्य प्रत्याशियों के मुकाबले सबसे आगे निकल जाता है। वही विजयी होता है। इसे कहते हैं –
(क) फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम
(ख) एकदलीय व्यवस्था
(ग) प्रत्यक्ष व्यवस्था
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम।

प्रश्न 13.
वर्तमान में लोकसभा की कितनी निर्वाचित सीटें हैं –
(क) 543
(ख) 545
(ग) 546
(घ) 548
उत्तर :
(क) 543.

प्रश्न 14.
लोकसभा की 543 सीटों में से अनुसूचित जाति के लिए कितनी सीटें आरक्षित है?
(क) 79
(ख) 76
(ग) 73
(घ) 74
उत्तर :
(क) 79.

प्रश्न 15.
कौन-से निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित होंगे, यह कौन तय करता है?
(क) चुनाव आयोग
(ख) परिसीमन आयोग
(ग) मानवाधिकार आयोग
(घ) जनसंख्या आयोग
उत्तर :
(क) चुनाव आयोग।

प्रश्न 16.
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है?
(क) उपराष्ट्रपति
(ख) प्रधानमन्त्री
(ग) मुख्य न्यायाधीश
(घ) राष्ट्रपति
उत्तर :
(घ) राष्ट्रपति।

प्रश्न 17.
निर्वाचन प्रक्रिया का सर्वप्रथम चरण कौन-सा है?
(क) मतदाता सूची तैयार करना
(ख) निर्वाचन की घोषणा
(ग) प्रत्याशियों का नामांकन
(घ) निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति
उत्तर :
(क) मतदाता सूची तैयार करना।

प्रश्न 18.
निर्वाचन आयोग का गठन संविधान की किस धारा के अन्तर्गत किया जाता है?
(क) धारा 370
(ख) धारा 226
(ग) धारा 324
(घ) धारा 371
उत्तर :
(ग) धारा 324

प्रश्न 19.
चुनाव चिह्नों का आवंटन करता है –
(क) राष्ट्रपति
(ख) प्रधानमंत्री
(ग) निर्वाचन आयोग
(घ) उच्चतम न्यायालय
उत्तर :
(ग) निर्वाचन आयोग।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर :

  1. अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित होना तथा
  2. लोकमत की वास्तविक अभिव्यक्ति होना।

प्रश्न 2.
वयस्क मताधिकार के दो दोष लिखिए।
उत्तर :

  1. शासनाधिकार अशिक्षित व्यक्तियों के हाथ में होना तथा
  2. भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन।

प्रश्न 3.
निर्वाचन पद्धति कितने प्रकार की होती है?
या
निर्वाचन की कोई एक प्रणाली बताइए।
उत्तर :
निर्वाचन पद्धति दो प्रकार की होती है –

  1. प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति तथा
  2. अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति।

प्रश्न 4.
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की दो पद्धतियों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति तथा
  2. सीमित मत-प्रणाली।

प्रश्न 5.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व के दो प्रकार बताइए।
उत्तर :

  1. एकल संक्रमणीय प्रणाली तथा
  2. सूची-प्रणाली।

प्रश्न 6.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के दो गुण लिखिए।
उत्तर :

  1. प्रत्येक वर्ग या दल को उचित प्रतिनिधित्व तथा
  2. अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा।

प्रश्न 7.
वयस्क मताधिकार के दो’गुण बताइए।
उत्तर :

  1. राष्ट्रीय एकीकरण में वृद्धि तथा
  2. जनसाधारण को शासकों के चयन का अधिकार।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष निर्वाचन के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  1. सरलता तथा
  2. लोकतान्त्रिक धारणा के अनुकूल।

प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष निर्वाचन के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  1. अपव्ययी व्यवस्था तथा
  2. प्रतिभावान व्यक्तियों की निर्वाचन से दूरी।

प्रश्न 10.
अप्रत्यक्ष निर्वाचन के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  1. योग्य व्यक्तियों के निर्वाचन की अधिक सम्भाक्ना तथा
  2. पेशेवर राजनीतिज्ञों का अभाव।

प्रश्न 11.
अप्रत्यक्ष निर्वाचन के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  1. भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन तथा
  2. दल-प्रणाली के कुप्रभाव।

प्रश्न 12.
आदर्श निर्वाचन-प्रणाली का एक प्रमुख तत्त्व क्या है?
उत्तर :
गुप्त मतदान की व्यवस्था आदर्श निर्वाचन-प्रणाली का एक प्रमुख तत्त्व है।

प्रश्न 13.
भारत में वयस्क मताधिकार की न्यूनतम आयु क्या है?
उत्तर :
भारत में वयस्क मताधिकार की आयु 18 वर्ष है।

प्रश्न 14.
स्विट्जरलैण्ड में वयस्क होने की आयु क्या है?
उत्तर :
स्विट्जरलैण्ड में वयस्क होने की आयु 20 वर्ष है।

प्रश्न 15.
वयस्क मताधिकार क्या है?
उत्तर :
निश्चित आयु प्राप्त करने के बाद सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार प्राप्त होना ही वयस्क मताधिकार है।

प्रश्न 16.
वयस्क मताधिकार के विपक्ष में कोई एक तर्क दीजिए।
उत्तर :
वयस्क मताधिकार से भ्रष्टाचार में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 17.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व का एक दोष लिखिए।
उत्तर :
यह अत्यधिक जटिलनिर्वाचन प्रणाली है।

प्रश्न 18.
एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के किसी एक गुण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 19.
बहुमत प्रणाली का एक दोष लिखिए।
उत्तर :
बहुमत प्रणाली में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं होता है।

प्रश्न 20.
चुनाव से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र में नागरिकों द्वारा अपने प्रतिनिधियों के चुनने की प्रक्रिया को चुनाव कहते

प्रश्न 21.
चुनाव आयोग क्या है?
उत्तर :
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसका कार्य चुनाव की प्रक्रिया को विभिन्न स्तरों पर शान्तिपूर्ण तरीके से व सुचारु रूप से सम्पन्न करना है।

प्रश्न 22.
भारतीय चुनाव प्रणाली के पाँच दोष लिखिए।
उत्तर :

  1. अल्पमत को बहुसंख्या पर शासन
  2. राजनीति को अपराधीकरण
  3. मतदान केन्द्र पर कब्जा
  4. चुनाव में काले धन का प्रयोग
  5. एक-दूसरे के स्थान पर मत प्रयोग की प्रवृत्ति।

प्रश्न 23.
चुनाव आयोग का स्वरूप क्या है?
उत्तर :
भारत का चुनाव आयोग तीन सदस्यीय है। इसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद है और दो अन्य आयुक्त हैं।

प्रश्नं 24.
मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल कितना होता है।
उत्तर :
संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी प्रथम अद्यतन हो, होता है।

प्रश्न 25.
चुनाव आयोग के दो कार्य लिखिए।
उत्तर :

  1. राष्ट्र में विद्यमान निर्वाचक दलों को मान्यता प्रदान करना।
  2. निर्वाचन में प्रत्याशियों द्वारा किए गए व्यय की जाँच करना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार क्या है?
या
सार्वभौमिक मताधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

वयस्क या सार्वभौमिक मताधिकार

वयस्क मताधिकार से तात्पर्य है कि मतदान का अधिकर एक निश्चित आयु के नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होना चाहिए। वयस्क मताधिकार की आयु का निर्धारण प्रत्येक देश में वहाँ के नागरिक के वयस्क होने की आयु पर निर्भर करता है। भारत में वयस्क होने की आयु 18 वर्ष है। अतः भारत में मताधिकार की आयु भी 18 वर्ष है। वयस्क मताधिकार से तात्पर्य है कि दिवालिए, पागल व अन्य किसी प्रकार की अयोग्यता वाले नागरिकों को छोड़कर अन्य सभी वयस्क नागरिकों को मताधिकार प्राप्त होना चाहिए। मताधिकार में सम्पत्ति, लिंग अथवा शिक्षा जैसा कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। मॉण्टेस्क्यू, रूसो, टॉमस पेन इत्यादि विचारक वयस्क मताधिकार के समर्थक हैं। वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था है।

प्रश्न 2.
महिला.(स्त्री) मताधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

स्त्री-मताधिकार

स्त्रियों के लिए मताधिकार प्राप्त करने की माँग प्रजातन्त्र के विकास तथा विस्तार के साथ ही प्रारम्भ हुई। यदि मताधिकार प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है, तो स्त्रियों को भी यह अधिकार प्राप्त होना चाहिए। 19वीं शताब्दी में बेन्थम, डेविड हेयर, सिजविक, ऐस्मीन तथा जे०एस० मिल ने स्त्री मताधिकार का समर्थन किया। इंग्लैण्ड में 1918 ई० में सार्वभौमिक मताधिकार अधिनियम पारित करके 30 वर्ष की आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्रदान किया गया। 10 वर्ष बाद यह आयु-सीमा घटाकर 21 वर्ष कर दी गई। सन् 1920 में संयुक्त राज्य अमेरिका में पुरुषों के समान स्त्रियों को भी समान अधिकार प्रदान किया गया। भारतीय संविधान में प्रारम्भ से ही स्त्रियों को पुरुषों के समान मताधिकार दिया गया है।

प्रश्न 3.
मताधिकार का महत्त्व बताते हुए दो तर्क दीजिए।
उत्तर :
मताधिकार का महत्त्व बताते हुए दो तर्क निम्नवत् हैं –

1. नितान्त औचित्यपूर्ण  – राज्य के कानूनों और कार्यों का प्रभाव समाज के केवल कुछ ही व्यक्तियों पर नहीं, वरन् सब व्यक्तियों पर पड़ता है; अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपना मत देने और शासन की नीति का निश्चय करने का अधिकार होना चाहिए। जॉन स्टुअर्ट मिल ने इसी आधार पर वयस्क मताधिकार को नितान्त औचित्यपूर्ण बताया है।

2. लोकसत्ता की वास्तविक अभिव्यक्ति – लोकसत्ता बीसवीं सदी का सबसे महत्त्वपूर्ण विचार है और आधुनिक प्रजातन्त्रवादियों का कथन है कि अन्तिम सत्ता जनता में ही निहित है। डॉ० गार्नर के शब्दों में, “ऐसी सत्ता की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति सार्वजनिक मताधिकार में ही हो सकती है।”

प्रश्न 4.
चुनाव से आप क्या समझते हैं? चुनाव की आवश्यकताएँ क्या हैं?
उत्तर :
ज़नसामान्य द्वारा निश्चित अवधि पर अपने प्रतिनिधियों को चुनने की प्रक्रिया को चुनाव कहते हैं। एक लोकतान्त्रिक देश में कोई भी निर्णय लेने में सभी नागरिक प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले सकते। अतः लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इसलिए चुनाव की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 5.
भारत में चुनाव लड़ने की क्या योग्यताएँ हैं।
उत्तर :
भारत में विभिन्न प्रतिनिधि सभाओं के चुनाव लड़ने के लिए भी योग्यताएँ निश्चित हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 25 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो। राज्यसभा तथा राज्य विधानपरिषद् के लिए यह आयु 30 वर्ष निश्चित है जबकि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के लिए 35 वर्ष है।
  3. वह पागल तथा दिवालिया न हो।
  4. वह किसी न्यायालय द्वारा किसी गम्भीर अपराध के कारण चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित न किया गया हो।
  5. वह संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएँ रखता हो।

प्रश्न 6.
भारत में निर्वाचन कराने के लिए सर्वोच्च अधिकार किसके पास हैं? स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन लोकतन्त्र के लिए क्यों आवश्यक है? इसे सुनिश्चित करने के किन्हीं तीन उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में निर्वाचन कराने सम्बन्धी सर्वोच्च अधिकार निर्वाचन आयोग के पास है। इस आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा दो आयुक्त होते हैं। आयोग के कार्यों में सहायता देने के लिए राष्ट्रपति प्रादेशिक आयुक्तों को नियुक्त करता है। देश में निष्पक्ष निर्वाचन कराना निर्वाचन आयोग का दायित्व है।

स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन ही लोकतन्त्र को सुरक्षित रख सकते हैं। इसके अभाव में लोकतन्त्र की कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन देश की वर्तमान परिस्थितियों में स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन कराना निर्वाचन आयोग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है।

स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन कराने के लिए निम्नलिखित तीन उपाय प्रभावकारी हो सकते हैं –

  1. मतदाताओं के लिए परिचय-पत्र रखना अनिवार्य कर दिया जाए जिससे गलत मतदान पर रोक लग सके।
  2. निर्वाचन को आपराधिक तत्त्वों के प्रभाव से बिल्कुल पृथक् रखा जाए, जिससे चुनाव प्रक्रिया शान्तिपूर्वक और बिना किसी पक्षपात के सम्पन्न हो सके।
  3. निर्वाचन आयोग द्वारा प्रत्येक निर्वाचन में पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जाती है जो चुनाव से सम्बन्धित सभी प्रकार की जानकारियों की रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को देते हैं।

प्रश्न 7.
राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जाने का क्या महत्त्व है? इन चिह्नों का आवंटन कौन करता है?
उत्तर :
किसी भी देश की जनता, पूर्णतया साक्षर न होने पर मतपत्र पर अंकित प्रत्याशियों के नाम नहीं पढ़ सकती है; अत: चुनाव चिह्नों के माध्यम से वही अपनी रुचि के प्रत्याशी को मतदान देती है। इसका भेद यहीं से स्पष्ट हो जाता है कि स्नातकीय निर्वाचन क्षेत्र (विधानपरिषद्) में मतदाता पढ़े-लिखे होते हैं; अत: वहाँ चुनाव चिह्नों की व्यवस्था नहीं होती। निर्वाचन के समय प्रत्येक मतदाता के लिए एक चुनाव चिह्न की आवश्यकता होती है। निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न आवंटित करता है। चुनाव चिह्न से राजनीतिक दल की पहचान होती है तथा मतदाता चुनाव चिह्न के आधार पर ही उस राजनीतिक दल के उम्मीदवार को अपना मत प्रदान करते हैं। राजनीतिक दल इस प्रकार के चुनाव चिह्नों को लेना पसन्द करते हैं, जो मतदाताओं को मनोवैज्ञानिक तथा मानसिक रूप से प्रभावित कर सकें। चुनाव चिह्नों को आवंटित करने अथवा उनके बारे में विवादों को निपटाने की शक्ति निर्वाचन आयोग, को प्राप्त है। निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान चुनाव चिह्न इतने प्रचलित हो जाते हैं कि मतदाता इनको देखकर ही सम्बन्धित दल अथवा उससे सम्बन्धित प्रत्याशियों को पहचान लेते हैं।

प्रश्न 8.
निष्पक्ष निर्वाचन कराने के लिए संविधान में उल्लिखित किन्हीं दो प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
निष्पक्ष निर्वाचन कराने के लिए संविधान में निम्नलिखित दो प्रावधान किए गए हैं –

1. स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था – संविधान द्वारा सम्पूर्ण भारतवर्ष में निष्पक्ष निर्वाचन कराने के लिए निर्वाचन आयोग की स्थापना की गई है। निर्वाचन आयोग के सदस्यों को स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष रूप से कार्य कराने के लिए इनकी सेवा-शर्तों को निश्चित किया गया है तथा उनको उपदस्थ करने के लिए एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया को अपनाना आवश्यक बनाया गया है।

2. निर्वाचन बूथों पर पर्याप्त सुरक्षा-व्यवस्था – मतदाता स्वतन्त्र रूप से अपने मत का प्रयोग कर सकें, इसके लिए निर्वाचन बूथों पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। इस दृष्टि से पुलिस की समुचित व्यवस्था की जाती है। मतदान के समय मतदाताओं की अंगुलियों पर निशान बनाया जाता है। शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव प्रारम्भ होने से पूर्व ही धारा 144 लगा दी जाती है। असामाजिक अथवा अपराधी प्रकृति के व्यक्तियों पर प्रशासन कड़ी नजर रखता है।

प्रश्न 9.
देश में चुनावों में सीटों का आरक्षण क्यों आवश्यक है?
उत्तर :
भारतीय समाज दीर्घकाल से सामाजिक व आर्थिक असमानताओं और विषमताओं का शिकार है। समाज के कई वर्ग-विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोग और महिलाएँ सामाजिक, आर्थिक वराजनीतिक रूप से उपेक्षित रहे हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान के बनाने वालों ने इन वर्गों के राजनीतिक विकास के उद्देश्य से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए संसद व राज्यों की विधानसभाओं में निश्चित सीटों का आरक्षण किया ताकि राजनीतिक संस्थाओं और निर्णय प्रणाली में इनकी भागीदारी को निश्चित किया जा सके अन्यथा यह कठिन कार्य था। सभी वर्गों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने के लिए पिछड़े वर्गों व महिलाओं के लिए आरक्षण आवश्यक है।

प्रश्न 10.
चुनाव के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार किसे है?
उत्तर :
संविधान के अनुसार निर्वाचन सम्बन्धी कानून बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त है। संसद विधानमण्डलों के निर्वाचन के लिए मतदाताओं की सूचियाँ तैयार करने, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन तथा अन्य समस्त समस्याओं से सम्बन्धित कानून बना सकती है। इस अधिकार के अन्तर्गत निर्वाचन की व्याख्या के लिए संसद ने दो मुख्य अधिनियम बनाए हैं –
(1) जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950
(2) जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951। प्रथम अधिनियम द्वारा निर्वाचन क्षेत्र का परिसीमन करने की विधि, संसद के विभिन्न राज्यों के स्थानों की संख्या तथा प्रत्येक राज्य के विधानमण्डल में सदस्यों की संख्या निश्चित की गई है। दूसरे अधिनियम द्वारा निर्वाचनों का संचालन तथा प्रबन्ध करने की प्रशासनिक व्यवस्था, मतदान, उप-निर्वाचन आदि विषयों का समुचित प्रबन्ध किया गया है। इन अधिनियमों में समय-समय पर परिवर्तन किए जा चुके हैं।

प्रश्न 11.
चुनाव सुधार हेतु प्रमुख सुझाव क्या हैं?
उत्तर :
चुनाव सुधार हेतु प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. देश की चुनाव व्यवस्था को सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली के स्थान पर किसी प्रकार की समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को लागू करना चाहिए। इससे राजनीतिक दलों को उसी अनुपात में सीटें मिलेंगी जिस अनुपात में उन्हें वोट मिलेंगे।
  2. संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटों पर महिलाओं को चुनने के लिए विशेष प्रावधान बनाए जाएँ।
  3. चुनावी राजनीति में धन में प्रभाव को नियन्त्रित करने के लिए और अधिक कठोर प्रावधान होने चाहिए।
  4. जिस उम्मीदवार के विरुद्ध फौजदारी का मुकदमा हो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिए, भले ही उसने इसके विरुद्ध न्यायालय में अपील कर रखी हो।
  5. चुनाव प्रचार में जाति और धर्म के आधार पर की जाने वाली किसी भी अपील को पूरी तरह से प्रतिबन्धित कर देना चाहिए।
  6. राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली को नियन्त्रित करने के लिए तथा उनकी कार्यविधि को और अधिक पारदर्शी तथा लोकतान्त्रिक बनाने के लिए एक कानून होना चाहिए।

प्रश्न 12.
निर्वाचन आयोग के संगठन का वर्णन कीजिए।
या
“निर्वाचन आयोग एक स्वतन्त्र संवैधानिक निकाय है।” इस कथन को समझाइए।
उत्तर :
संविधान-निर्माताओं ने संविधान की धारा (अनु०) 324(2) के अन्तर्गत प्रावधान किया है कि समय की माँग के अनुरूप निर्वाचन आयोग एक-सदस्यीय अथवा बहुसदस्यीय निकाय हो सकता है। भारत में केन्द्र तथा राज्यों के लिए एक ही निर्वाचन आयोग है।

  1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त कार्यकाल – संविधान के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी प्रथम अद्यतन हो, होता है।
  2. पद की स्थिति – मुख्य निर्वाचन आयुक्त एक सांविधानिक पद है। यह पद उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संसद के प्रत्येक सदन द्वारा विशेष बहुमत से और साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ही हटाया जा सकता है।
  3. अन्य आयुक्तों की स्थिति – अन्य आयुक्तों को राष्ट्रपति मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही हटा सकता है।
  4. निर्वाचन की सेवा-शर्ते – निर्वाचन आयोग की सेवा की शर्ते और पदावधि वह होगी जो संसद विधि द्वारा मान्य होगी।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गुप्त मतदान तथा द्वितीय मत-प्रणाली पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

गुप्त मतदान

1. गुप्त मतदान जब मतदाता इस प्रकार गोपनीय विधि से मत देता है कि उसे कोई अन्य व्यक्ति नहीं जान सके कि उसने किसे मत दिया है तो इसे गुप्त मतदान कहते हैं। इस प्रकार मतदाता स्वतन्त्रतापूर्वक अपने मतदान का प्रयोग कर सकते हैं और उन पर किसी के दबाव की आशंका नहीं रहती। हेरिंग्टन तथा काउण्ट अण्डरेसी ने गुप्त मतदान का प्रबल समर्थन किया है। आजकल विश्व के सभी लोकतान्त्रिक देशों में गुप्त मतदान-प्रणाली द्वारा ही चुनाव होते हैं। आदर्श रूप में प्रकट मतदान की प्रणाली अच्छी हो सकती है, किन्तु व्यवहार में गुप्त मतदान की प्रणाली ही सर्वश्रेष्ठ है।

2. द्वितीय मत-प्रणाली – मतदाताओं के व्यापक प्रतिनिधित्व के लिए द्वितीय मतदान-प्रणाली अपनायी जाती है। इस प्रणाली में प्रत्याशी को विजयी होने के लिए डाले गये मतों का 50 प्रतिशत से अधिक भागे प्राप्त होना आवश्यक होता है। जब एक ही स्थान के लिए दो से अधिक प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं और किसी भी प्रत्याशी को मतदान में पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं। होता तो अधिक मत प्राप्त करने वाले दो प्रत्याशियों के बीच दुबारा मतदान होता है और जिस प्रत्याशी को निरपेक्ष बहुमत प्राप्त हो जाता है वह विजयी घोषित कर दिया जाता है। फ्रांस के राष्ट्रपति के निर्वाचन में इस प्रणाली को अपनाया जाता है।

प्रश्न 2.
लोकतन्त्र में चुनावों का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
लोकतन्त्र में चुनावों का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। आज का लोकतन्त्र अप्रत्यक्ष या प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र है और जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ही शासन में भाग लेती है तथा अपनी प्रभुसत्ता का उपयोग करती है। आज के राष्ट्र-राज्यों में निर्वाचनों के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है जिसके माध्यम से जनता शासन में भाग ले सके। चुनावों से लोगों को राजनीतिक शिक्षा भी मिलती रहती है और इन्हें देश के सामने आने वाली तात्कालिक समस्याओं तथा विभिन्न राजनीतिक दलों की नीतियों तथा कार्यक्रमों का निरन्तर ब्यौरा प्राप्त होता रहता है। चुनावों के कारण जनता के प्रतिनिधि भी अपने उत्तरदायित्व को अनुभव करते हैं और कोई कार्य जनमत के विरुद्ध करने की हिम्मत नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें शीघ्र ही चुनावों के दिनों में जनता के सामने वोट माँगने जानी पड़ता है। उन्हें यह भय बना रहता है कि यदि उन्होंने जनमत की अवहेलना की तो उन्हें दुबारा चुने जाने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। इस प्रकार प्रतिनिधि उत्तरदायी बने रहते हैं और मनमानी नहीं कर सकते। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि लोकतन्त्र में चुनावों का अत्यधिक महत्त्व है। हम चुनाव के बिना लोकतन्त्र की कल्पना भी नहीं कर सकते।

प्रश्न 3.
साधारण बहुमत तथा पूर्ण बहुमत में क्या अन्तर है?
उत्तर :

साधारण बहुमत तथा पूर्ण बहुमत में अन्तर

चुनावों में किसी उम्मीदवार के चुने जाने के लिए प्रायः साधारण बहुमत का तरीका अपनाया जाता है। इसमें सभी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों की गणना एक साथ की जाती है तथा सर्वाधिक मत प्राप्त उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाता है; जैसे—लोकसभा, विधानसभा, नगरपालिका व पंचायतों के चुनावों में। परन्तु निर्वाचन के लिए पूर्ण बहुमत अथवा स्पष्ट बहुमत का तरीका भी अपनाया जा सकता है। इसमें कुल डाले गए मतों को 50% +1 मत को प्राप्त करना अनिवार्य होता है; जैसे–भारत के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव में इस प्रणाली को अपनाया जाता है। दोनों प्रकार के बहुमत में । निम्नलिखित अन्तर हैं –

(1) साधारण बहुमत में सभी उम्मीदवारों में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। परन्तु पूर्ण बहुमत में ऐसा नहीं होता। पूर्ण बहुमत प्रणाली के अन्तर्गत निर्वाचित होने के लिए उम्मीदवारों को कुल डाले गए मतों का स्पष्ट बहुमत अर्थात् उन मतों के 50 प्रतिशत से एक मत अधिक (50% + 1) प्राप्त करना आवश्यक है।

(2) साधारण बहुमत के अन्तर्गत निर्वाचित प्रतिनिधि कुल मतों का थोड़ा-सा प्रतिशत जैसे कि 20% मत लेकर भी चुना जा सकता है। यदि उम्मीदवारों की संख्या 18 है और एक को 20% मत मिले और अन्य को इससे भी कम तो 20% मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार चुना जा सकता है। परन्तु पूर्ण बहुमत के अन्तर्गत ऐसा नहीं हो सकता।

(3) साधारण बहुमत का तरीका सरल है। इसमें केवल एक ही बार चुनाव तथा वोटों की गिनती | होती है। परन्तु पूर्ण बहुमत के अन्तर्गत, किसी भी उम्मीदवार द्वारा पूर्ण बहुमत प्राप्त न करने पर पुनः चुनाव करवाया जाता है या एकल संक्रमणीय मत प्रणाली को अपनाया जाता है।

(4) पूर्ण बहुमत का तरीका जटिल है और इसे संसद अथवा विधानसभा के चुनावों में प्रायः नहीं अपनाया जाता। उच्च पदों के लिए प्रायः पूर्ण बहुमत का तरीका अपनाया जाता है।

प्रश्न 4.
निर्वाचन सम्बन्धी व्ययों को कम करने की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर :
वर्तमान में निर्वाचनों पर अत्यधिक धन व्यय किया जाता है। ऐसी स्थिति में गरीब परन्तु प्रतिभावान् व्यक्ति निर्वाचन में खड़ा होने का विचार मन में नहीं ला सकता है। निर्वाचनों में भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण, अत्यधिक धनराशि को खर्च करना है। अत: यह आवश्यक ही नहीं, वरन् अपरिहार्य है कि कानून द्वारा धन निर्धारित सीमा का कठोरता से पालन किया जाए तथा जो व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करता है, उसे कड़ी-से-कड़ी सजा मिलनी चाहिए। राजनीतिक दलों तथा संस्थाओं द्वारा चुनाव-प्रचार पर किए गए व्यय का हिसाब रखने तथा उसे निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रस्तुत करने का भी प्रावधान होना चाहिए। सरकार को इस विषय पर भी कानून का निर्माण करना चाहिए कि राजनीतिक दल व्यक्तियों तथा संस्थाओं से चन्दे से कितनी धनराशि प्राप्त करे।

27 नवम्बर, 1974 ई० को काँग्रेस संसदीय दल की बैठक में निर्वाचन पर व्यय की जाने वाली धनराशि को कम करने के सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिए गए –

  1. सरकार को धन से उम्मीदवारों की सहायता करनी चाहिए।
  2. सरकार की तरफ से उम्मीदवारों को मतदाता सूची प्राप्त होनी चाहिए।
  3. सरकार सार्वजनिक बैठक के लिए एक स्थान निश्चित करे तथा सभी उम्मीदवार उसी प्लेटफार्म से भाषण दें।
  4. चुनाव अभियान का समय कम किया जाए।

इस सम्बन्ध में निर्वाचन आयोग ने व्यवस्था दी है कि निर्वाचन के सम्पन्न हो जाने के पश्चात् चुनाव व्यय का गलत ब्यौरा देने वाले उम्मीदवार को जुर्माने के साथ 6 महीने से 1 वर्ष का ” कारावास दिया जाना चाहिए। साथ ही प्रत्येक चुनाव के प्रत्याशी हेतु खर्च की सीमा भी तय कर दी गई है।

प्रश्न 5.
मताधिकार सम्बन्धी सिद्धान्तों को समझाइए।
उत्तर :

मताधिकार सम्बन्धी सिद्धान्त

मताधिकार दिए जाने के सम्बन्ध में विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इससे सम्बन्धित कुछ प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

1. प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार मताधिकार एक प्राकृतिक अधिकार है तथा सभी व्यक्तियों को समान रूप से इसे प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त है इस सिद्धान्त के अनुसार मत देने का अधिकार स्वाभाविक है और यह अधिकार मनुष्य को प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक मॉण्टेस्क्यू, टामस पेन तथा रूसो हैं।

2. वैधानिक अथवा कानूनी सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार मताधिकार प्राकृतिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह राज्य द्वारा प्रदान किया गया अधिकार है। कानूनी सिद्धान्त के अन्तर्गत नागरिक द्वारा मताधिकार का दावा नहीं किया जा सकता है।

3. नैतिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार मताधिकार नैतिक मान्यताओं पर आधारित होता है। यह राजनीतिक मामलों में व्यक्ति द्वारा अपने विचारों को अभिव्यक्ति करने का एक माध्यम मात्र है। मताधिकार व्यक्ति का नैतिक और आध्यात्मिक विकास करता है तथा यह मानव के व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है।

4. सामुदायिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार मताधिकार सामुदायिक जीवन का एक प्रमुख अंग है, इसलिए सीमित क्षेत्र में मताधिकार मिलना चाहिए। यह सिद्धान्त इटली और जर्मनी की देन है।

5. सामन्तवादी सिद्धान्त – यह सिद्धान्त मध्य युग में प्रचलित हुआ। इस सिद्धान्त के अनुसार मताधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को प्राप्त होना चाहिए, जिनका समाज में उच्च स्तर हो तथा जो सम्पत्ति के स्वामी हों।

6. सार्वजनिक कर्तव्य का सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार मतदान एक सार्वजनिक कर्तव्य है। अत: मतदान अनिवार्य होना चाहिए। बेल्जियम, नीदरलैण्ड्स, चेक गणराज्य व स्लोवाकिया देशों में मतदान अनिवार्य है। इन देशों में मताधिकार का प्रयोग न करना। दण्डनीय माना गया है।

प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष निर्वाचन-प्रणालियों के बारे में बताइए।
उत्तर :
सामान्यतया निर्वाचन की दो प्रणालियाँ हैं-प्रत्यक्ष निर्वाचन और अप्रत्यक्ष निर्वाचन।

प्रत्यक्ष निर्वाचन – प्रत्यक्ष निर्वाचन-प्रणाली से तात्पर्य ऐसी निर्वाचन प्रणाली से है जिसमें मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। प्रत्यक्ष निर्वाचन में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि ही व्यवस्थापिका के सदस्य और मुख्य कार्यपालिका के अंग बनते हैं। यह बहुत सरल विधि है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक मतदाता मतदान-केन्द्र पर विभिन्न प्रत्याशियों में से किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करता है और जिस प्रत्याशी को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। यह प्रणाली सर्वाधिक लोकप्रिय प्रणाली है। सामान्यत: विश्व के प्रत्येक प्रजातान्त्रिक देश में व्यवस्थापिका के निम्न सदन के सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा ही चुने जाते हैं।

अप्रत्यक्ष निर्वाचन – इस प्रणाली के अन्तर्गत मतदाता सीधे अपने प्रतिनिधि नहीं चुनते हैं वरन् वे पहले एक निर्वाचक-मण्डल को चुनते हैं। यह निर्वाचक-मण्डल बाद में अन्य प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इस प्रकार जनता प्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधियों का निर्वाचन नहीं करती है; अतः इसे अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली कहा जाता है। भारत के राष्ट्रपति तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति दोनों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है। भारत, फ्रांस आदि देशों में व्यवस्थापिका के द्वितीय सदन का निर्वाचन भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 7.
आदर्श प्रतिनिधित्व प्रणाली की विशेषताएँ बताइए।
या
आदर्श निर्वाचन-प्रणाली के चार प्रमुख तत्वों को बताइए।
उत्तर :
आदर्श निर्वाचन-प्रणाली के लिए अनेक बातें आवश्यक हैं, जिनमें से निम्न चार प्रमुख हैं –

1. प्रतिनिधि के कार्यकाल का उचित निर्धारण – आदर्श निर्वाचन-प्रणाली में प्रतिनिधियों का कार्यकाल न बहुत अधिक और न बहुत कम होना चाहिए। 3 से 5 वर्ष तक के कार्यकाल को प्रायः उचित कहा जा सकता है।

2. अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की उचित व्यवस्था – अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा न होने से अल्पसंख्यक वर्गों के व्यक्तियों की निष्ठ्ठा देश के प्रति नहीं होगी तथा उनके हितों को भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। इस सम्बन्ध में अल्पसंख्यक वर्गों के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था को अपनाया जा सकता है। इसके साथ-साथ पृथक् निर्वाचन-प्रणाली न अपनाकर संयुक्त निर्वाचन-प्रणाली को ग्रहण किया जाना। चाहिए।

3. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार – लोकतन्त्र के मूल सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त समानता है। और सभी नागरिकों को समान राजनीतिक शक्ति वयस्क मताधिकार की व्यवस्था के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। इसलिए सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी प्रकार के भेदभाव के मताधिकार प्राप्त होना चाहिए।

4. गुप्त मतदान की व्यवस्था – आदर्श निर्वाचन प्रणाली में मतदान गुप्त विधि से होना चाहिए, जिससे मत की गोपनीयता बनी रहे और मतदाता स्वतन्त्र होकर अपनी इच्छानुसार मताधिकार का प्रयोग कर सकें।

प्रश्न 8.
निर्वाचन आयोग के कार्य संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
संविधान की धारा (अनु०) 324 में निर्वाचन आयोग के कार्यों को स्पष्टतः उल्लेख किया गया है। इस प्रकार निर्वाचन आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. निर्वाचन की तिथि घोषित हो जाने के पश्चात् निर्वाचन-क्षेत्रों का सीमांकन करना।
  2. मतदान हेतु सम्पूर्ण राष्ट्र के मतदाताओं की सूची तैयार करना।
  3. राष्ट्र में विद्यमान विभिन्न राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना। राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर प्रदान करना भी निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में है।
  4. राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने हेतु चुनाव-चिह्न प्रदान करना। यदि चुनाव चिह्न से सम्बन्धित कोई विवाद है तो उसका समाधान करना। चुनाव चिह्न के आवंटन के अधिकार को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  5. राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सामान्य निर्वाचन, संसद, विधानमण्डलों के उप-चुनाव करना।
  6. निर्वाचन आयोग निर्वाचन करवाने के लिए रिटर्निग अफसरों तथा सहायक रिटर्निंग अफसरों को नियुक्त करता है।
  7. निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल को किसी संसद सदस्य या राज्य विधानमण्डल के सदस्य की अयोग्यता के विषय में परामर्श देता है।
  8. निर्वाचन आयोग संसद तथा राज्य विधानसभाओं के रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए उप-चुनाव करवाता है।
  9. यदि कोई राजनीतिक दल अथवा उसके प्रत्याशी आयोग द्वारा निश्चित किए गए व्यवहार के आदर्श नियमों का पालन नहीं करते तो निर्वाचन आयोग उनकी मान्यता रद्द कर सकता है।
  10. निर्वाचन आयोग समय-समय पर निर्वाचन में सुधार करने के सम्बन्ध में सुझाव देता है।
  11. निर्वाचन में यदि किसी कारणवश अनियमितताएँ हो जाती हैं तो उनके विरुद्ध याचिकाओं को आमन्त्रित करना और उनकी सुनवाई के लिए न्यायाधिकारियों की नियुक्ति करना।
  12. निर्वाचन में प्रत्याशियों द्वारा किए गए व्यय की जाँच करना।
  13. लोकसभा तथा विधानसभा के निर्वाचनों में निर्वाचन क्षेत्रों में पर्यवेक्षकों की नियुक्ति करना। पर्यवेक्षकों के प्रतिवेदन के आधार पर सम्पूर्ण निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचन को रद्द कर देना अथवा उसके कुछ मतदान केन्द्रों पर पुनर्मतदान का आदेश देना।
  14. संविधान द्वारा आयोग को कुछ अर्द्ध-न्यायिक कार्य भी सौंपे गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 103 के अन्तर्गत राष्ट्रपति संसद के सदस्यों की अयोग्यताओं के सम्बन्ध में तथा 192 अनुच्छेद के अनुसार, राज्यपाल विधानमण्डल के सदस्यों के सम्बन्ध में आयोग से परामर्श कर सकते हैं।
  15. आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता तैयार की जाती है।
  16. राजनीतिक दलों को आकाशवाणी पर चुनाव प्रचार की सुविधाओं की व्यवस्था कराना।
  17. मतदाताओं को राजनीतिक प्रशिक्षण देना।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार से आप क्या समझते हैं? इसके गुण तथा दोषों की विवेचना कीजिए।
या
मताधिकार का क्या अर्थ है? मताधिकार के प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
या
सार्वभौमिक मताधिकार के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
या
वयस्क मताधिकार से आप क्या समझते हैं। इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
या
वयस्क मताधिकार का अर्थ बताइए तथा वर्तमान समय में इसकी आवश्यकता के पक्ष में तर्क दीजिए।
या
वयस्क मताधिकार के समर्थन का मुख्य आधार क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
या
लोकतान्त्रिक शासन में वयस्क मताधिकार का महत्त्व समझाइए।
उत्तर :

मताधिकार का अर्थ एवं परिभाषा

‘मताधिकार’ शब्द में दो शब्द सम्मिलित हैं-‘मत’ और ‘अधिकार’। इसका आशय है—राय या मत प्रकट करने का अधिकार। नागरिकशास्त्र के अन्तर्गत मताधिकार का अपना विशिष्ट अर्थ है। इसके अनुसार देश के नागरिकों को शासन संचालन हेतु अपने उम्मीदवारों को चुनने का जो अधिकार प्राप्त होता है, उसे ही ‘मताधिकार’ कहते हैं। यह अधिकार नागरिक को मौलिक अधिकार माना गया है। केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही नागरिक को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है। मताधिकार की परिभाषा देते हुए गार्नर ने लिखा है-“मताधिकार वह अधिकार है जिसे राज्य देश के हित-साधक योग्य व्यक्तियों को प्रदान करता है।” मताधिकार की प्राप्ति के लिए आयु, नागरिकता, निवासस्थान आदि योग्यताएँ महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। कुछ देशों में लिंग व शिक्षा को भी मताधिकार की शर्त माना गया है।

मताधिकार के प्रकार

मताधिकार दो प्रकार का हो सकता है –

  1. सीमित मताधिकार तथा
  2. वयस्क मताधिकार।

1. सीमित मताधिकार

सीमित मताधिकार का अर्थ है कि सम्पूर्ण समाज के कल्याण को ध्यान में रखकर यह अधिकार केवल ऐसे लोगों को ही दिया जाना चाहिए, जिनमें इसके प्रयोग की योग्यता व क्षमता हो। यह मताधिकार शिक्षा, सम्पत्ति या पुरुषों को प्रदान करने तक सीमित किया जा सकता है। ब्लण्टशली, मिल, हेनरीमैन, सिजविक, लैकी इसी विचार के समर्थक हैं। इन विचारकों का मत है कि सम्पूर्ण समाज के हित को ध्यान में रखते हुए मताधिकार केवल ऐसे लोगों को दिया जाना चाहिए, जो मतदान के महत्त्व को समझते हों तथा मतदान करते समय योग्य तथा सक्षम उम्मीदवार की पहचान कर सकें। ये विचारक सम्पत्ति, शिक्षा अथवा लिंग को ही आधार मानकर मतदान को सीमित करना चाहते हैं, इसलिए इसे ‘सीमित मताधिकार’ कहा जाता है। सीमित मताधिकार के समर्थक निम्नलिखित आधारों पर मतदान को सीमित करना चाहते हैं –

(अ) सम्पत्ति का आधार – सम्पत्ति को मताधिकार का आधार मानने वाले विचारक कहते हैं कि मताधिकार केवल उन नागरिकों को ही प्राप्त होना चाहिए, जिनके पास कुछ सम्पत्ति हो तथा जो कर देते हों। यदि सम्पत्तिविहीन या कर न देने वालों को यह अधिकार दिया गया तो वे ऐसे व्यक्तियों को चुनेंगे जो कानूनों द्वारा धनिकों की सम्पत्ति का अधिग्रहण करने का प्रयास करेंगे तथा उन पर अधिक-से-अधिक कर लगाएँगे।

(ब) शिक्षा का आधार – शिक्षा के समर्थक मानते हैं कि निरक्षर अथवा अशिक्षित व्यक्तियों को मताधिकार नहीं दिया जाना चाहिएः निरक्षर व्यक्तियों में समझदारी नहीं होती है तथा वे राजनीति को नहीं समझते हैं। वे जाति, धर्म व सम्बन्धों से प्रभावित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे गलत निर्णय भी ले सकते हैं।

2. वयस्क या सार्वभौमिक मताधिकार

कुछ विद्वानों ने मताधिकार को प्रत्येक नागरिक का प्राकृतिक अधिकार स्वीकार किया है तथा शिक्षा, लिंग, सम्पत्ति एवं अन्य किसी भेदभाव के बिना एक निश्चित आयु तक के सभी व्यक्तियों को मताधिकार प्राप्त होने का विचार प्रतिपादित किया है। मत की इस व्यवस्था को ही वयस्क मताधिकार कहते हैं। वयस्क मताधिकार क्योंकि सभी वयस्क स्त्री-पुरुषों को प्राप्त रहता है, इसलिए इसे सार्वभौम मताधिकार भी कहा जाता है।

विभिन्न राज्यों में वयस्क होने की आयु अलग-अलग है। उदाहरणार्थ-भारत, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका में 18 वर्ष पर, स्विट्जरलैण्ड में 20 वर्ष पर, नार्वे में 23 वर्ष पर और हॉलैण्ड में 25 वर्ष पर व्यक्ति वयस्क माना जाता है। साधारणतया पागल, दिवालिये, अपराधी तथा विदेशी मताधिकार से वंचित रखे जाते हैं।

वयस्क मताधिकार के गुण (पक्ष में तर्क)

संसार के अधिकाश देशों में वयस्क मताधिकार प्रचलित है। वयस्क मताधिकार के निम्नलिखित गुणों के कारण इसको मान्यता प्रदान की गयी है –

1. सभी के हितों की रक्षा – वयस्क मताधिकार द्वारा सभी वर्गों के हितों की रक्षा होती है। यह लोक-सत्ता की वास्तविक अभिव्यक्ति है। गार्नर के अनुसार, “ऐसी सत्ता की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति मताधिकार में ही हो सकती है।”

2. विकास के समान अवसर – मिल ने कहा है कि “प्रजातन्त्र मनुष्य की समानता को स्वीकार करता है और राजनीतिक समानता तभी हो सकती है जब सभी नागरिकों को मताधिकार दे दिया जाये।”

3. राजनीतिक शिक्षा – वयस्क मताफ्रिकार समस्त नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के राजनीतिक जागृति तथा सार्वजनिक शिक्षा प्रदान करता है।

4. सभी प्रकार के अधिकार व सम्मान की सुरक्षा – मताधिकार के बिना न तो नागरिकों को अन्य अधिकार प्राप्त होंगे और न उनका सम्मान ही सुरक्षित रहेगा। मताधिकार मिलने से नागरिकों को अन्य नागरिक अधिकार भी स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं।

5. शासन-कार्यों में रुचि – मताधिकार प्राप्त होने से नागरिक शासनं-कार्यों में रुचि लेते हैं, जिससे राष्ट्र शक्तिशाली बनता है और नागरिकों में स्वदेश-प्रेम की भावना उत्पन्न होती है।

6. लोकतन्त्र का आधार – वयस्क मताधिकार को लोकतन्त्र की नींव तथा आधार कहा जाता है, क्योंकि प्रजातान्त्रिक शासन में राज्य की वास्तविक प्रभुसत्ता मतदाताओं के हाथ में ही होती है।

7. अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व – सभी नागरिकों को मताधिकार प्राप्त होने से समाज के बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक सभी वर्गों को शासन में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है; अतः समाज के सभी वर्ग सन्तुष्ट रहते हैं।

8. निरंकुशता पर रोक – वयस्क मताधिकार शासन की निरंकुशता को रोकने के लिए अवरोध का कामे करता है।

वयस्क मताधिकार के दोष (विपक्ष में तर्क)

कुछ विद्वानों ने वयस्क मताधिकार की निम्नलिखित दोषों के आधार पर आलोचना की है –

1. मताधिकार का दुरुपयोग सम्भव – विद्वानों का तर्क है कि मात्र वयस्कता के आधार पर सभी लोगों को मताधिकार देने से इस अधिकार के दुरुपयोग की सम्भावना बढ़ जाती है।

2. अयोग्य व्यक्तियों का चुनाव सम्भव – लॉवेल के शब्दों में, “अज्ञानियों को मताधिकार दो, आज ही उनमें अराजकता फैल जाएगी और कल ही उन पर निरंकुश शासन होने लगेगा।” वयस्क मताधिकार प्रणाली में यदि मतदाता अशिक्षित व अज्ञानी हों तो यही सम्भावना बलवती हो जाती है कि वे अयोग्य व्यक्तियों का चुनाव करेंगे, जो प्रजातन्त्र के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

3. धनी वर्ग के हित असुरक्षित – वयस्क मताधिकार की दशा में बहुसंख्यक निर्धन तथा मजदूर जनता प्रतिशोध की भावना से ऐसे प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जिनसे धनिकों व पूँजीपतियों के हितों को हानि पहुँचने की सम्भावना रहती है।

4. वोटों की खरीद – वयस्क मताधिकार का एक बहुत बड़ा दोष यह है कि जनता की निर्धनता तथा अज्ञानता का लाभ उठाकर अनेक प्रत्याशी उनके वोटों को धन या अन्य सुविधाओं का लालच देकर खरीद लेते हैं।

5. चुनाव में भ्रष्टाचार – वयस्क मताधिकार की स्थिति में मतदाताओं की संख्या इतनी अधिक होती है कि चुनाव में लोग अनेक प्रकार के भ्रष्ट साधन अपनाने लगते हैं; जैसे-कुछ कमजोर वर्ग के लोगों को वोट डालने से बलपूर्वक रोकना, मतदाताओं के फर्जी नाम दर्ज कराना, किसी के नाम का वोट किसी अन्य के द्वारा डाल देना आदि।

6. रूढ़िवादिता – सामान्य जनता में रूढ़िवादी व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है। ये लोग सुधारों तथा प्रगतिशील विचारों का विरोध करते हैं। अत: यदि वयस्क मताधिकार दिया गया तो शासन रूढ़िवादी तथा प्रगतिशील विचारों के विरोधी व्यक्तियों का केन्द्र बन जाएगा। इसीलिए हेनरीमैन ने कहा कि “वयस्क मताधिकार सम्पूर्ण प्रगति का अन्त कर देगा।”

हालाँकि वयस्क मताधिकार के विरोध में कतिपय तर्क दिये गये हैं, परन्तु ये तर्क इसके समर्थन में दिये गये तर्को की तुलना में गौण और महत्त्वहीन हैं। व्यावहारिक अनुभव यह है कि अनेक बार अशिक्षित व्यक्तियों ने भी अपने मताधिकार का प्रयोग अत्यन्त बुद्धिमान व्यक्ति की तुलना में अधिक विवेक के साथ किया है; अतः शिक्षा के आधार पर मताधिकार को सीमित किया जाना ठीक नहीं है। वयस्क मताधिकार का सर्वत्र अपनाया जाना इस बात का प्रमाण है कि वह प्रजातन्त्र की भावनाओं के सर्वथा अनुकूल और अनिवार्य है। लॉस्की के इस कथन में सत्य निहित है, “वयस्क मताधिकार का कोई विकल्प नहीं है।”

प्रश्न 2.
स्त्री-मताधिकार के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दीजिए।
या
महिला मताधिकार के पक्ष और विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए।
उत्तर :
कुछ विद्वानों का विचार है कि मताधिकार स्त्री-पुरुष दोनों को मिलना चाहिए, जब कि अनेक लोग स्त्री-मताधिकार के विरोधी हैं। ऐसे लोग स्त्री-मताधिकार के विपक्ष में विभिन्न तर्क प्रस्तुत करते हैं

स्त्री-मताधिकार के विपक्ष में तर्क

सामान्यतः स्त्री-मताधिकार के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं –

1. पारिवारिक जीवन पर कुप्रभाव – स्त्री-मताधिकार से स्त्रियों का कार्यक्षेत्र बढ़ जाता है, फलस्वरूप वे परिवारिक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाती हैं। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

2. मत की मात्र पुनरावृत्ति – ऐसा देखा गया है कि स्त्रियाँ अपने पति के परामर्शानुसार ही अपना मत प्रयोग करती हैं। वे स्वविवेक से अपने मत का प्रयोग नहीं करतीं।

3. राजनीति के प्रति उदासीनता – प्रायः स्त्रियाँ राजनीति के प्रति उदासीन रहती हैं। उनकी तरफ से भले ही कोई ग दल शासन करे, इससे उन्हें अधिक सरोकार नहीं होता।

4. शारीरिक दुर्बलता – ऐसा माना जाता है कि स्त्रियाँ शारीरिक रूप से पुरुष की अपेक्षा कम शक्तिशाली होती हैं। उन्हें मताधिकार प्रदान करने का कोई लाभ नहीं। वे कदम-से-कदम मिलाकर पुरुष का साथ नहीं दे सकतीं।

5. आत्मविश्वास की कमी – परम्परा से स्त्रियाँ पुरुषों पर निर्भर रहती आयी हैं। उनमें आत्म निर्भरता तथा आत्मविश्वास का अभाव होता है।

6. भावुक प्रवृत्ति – स्त्रियाँ प्राय: भावुक होती हैं। भावुकता की यह प्रवृत्ति राजनीतिक व्यवहार के लिए उपयुक्त स्थिति नहीं है।

7. भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन – आज की दलगत राजनीति में भ्रष्ट उपायों का प्रयोग बढ़ जाने से स्त्रियों के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त नहीं रह गया है।

स्त्री-मताधिकार के पक्ष में तर्क

उपर्युक्त तर्कों के बावजूद स्त्री-मताधिकार के विरोध में आज बहुत कम लोग हैं। लगभग सभी देशों ने आज स्त्री-मताधिकार प्रदान किया हुआ है। स्त्री-मताधिकार के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं –

1. मताधिकार के सम्बन्धं में लिंग-भेद अनुचित – लिंग-भेद एक प्राकृतिक स्थिति है। इस आधार को मताधिकार का आधार बनाना नितान्त अनुचित है। स्त्रियाँ भी पुरुषों के समान स्वतन्त्र, बुद्धिमान व नैतिक गुणों से श्रेष्ठ होती हैं। अतः मात्र स्त्री होने के कारण उन्हें ‘ मताधिकार से वंचित करना अनुचित ही नहीं, वरन् अन्यायपूर्ण भी है।

2. पारिवारिक जीवन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं – स्त्री-मताधिकार से पारिवारिक जीवन पर कुप्रभाव पड़ता है, इसे मत में कोई औचित्य नहीं। वास्तविकता यह है कि स्त्री मताधिकार से स्त्रियों की दृष्टिकोण व्यापक होता है, उनमें विद्यमान संकुचित विचारधारा का अन्त होता है। उनका वैचारिक क्षेत्र पारिवारिक स्तर से उठकर राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ जाता है।

3. राजनीति पर स्वस्थ प्रभाव – यह कहना सर्वथा अनुचित है कि स्त्रियाँ राजनीति के प्रति उदासीन होती हैं। सच तो यह है कि उनके राजनीतिक क्षेत्र में उतरे आने से राजनीति में स्वस्थ परम्पराओं का उदय होता है। स्त्रियाँ स्वभावतः शान्ति-प्रिय, व्यवस्था-प्रिय, दयालु तथा सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखने वाली होती हैं। स्त्रियों के इन मानवीय गुणों के कारण राजनीति में व्याप्त कठोरता, निर्दयता, बेईमानी, चालबाजी आदि में ह्रास होगा तथा राजनीति में नये आयाम स्थापित होंगे।

4. स्त्रियों को दुर्बल मानना अतार्किक – स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा निर्बल होती हैं, इस तर्क में अधिक तथ्य नहीं है। आज प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियाँ न केवल पुरुष के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर चल रही हैं, वरन् वे पुरुषों से आगे निकलने के प्रयास में हैं। अतः स्त्रियों को निर्बल मानकर उन्हें मताधिकार से वंचित कर देने का समर्थन करने वाले मिथ्या भ्रम के शिकार हैं।

5. शासन प्रबन्ध हेतु पूर्ण सक्षम – यह मत कि स्त्रियाँ अपने राजनीतिक अधिकारों का सदुपयोग नहीं कर सकतीं और उन्हें मताधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, सर्वथा हास्यास्पद है। इतिहास साक्षी है। कि स्त्रियों ने सफल शासिका होने के प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। कैथरीन, एलिजाबेथ विक्टोरिया, इन्दिरा गाँधी, मारग्रेट थैचर, भण्डारनायके, बेनजीर भुट्टो, एक्विनो, बेगम खालिदा जिया जयललिता आदि महिलाओं ने न केवल शासन किया है, वरन् यह सिद्ध कर दिया है कि नारी होना किसी भी प्रकार से कोई दोष नहीं है। नारी प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष की समानता कर सकती है। अतः स्त्री-मताधिकार का विरोधी मत रखना भ्रामक है।

6. आज के युग के सर्वथा अनुकूल – स्त्री-मताधिकार वर्तमान परिस्थितियों में नितान्त आवश्यक हो गया है। आज स्त्रियाँ जीवन के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में पदार्पण कर चुकी हैं। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में तो स्त्री-मताधिकार अपरिहार्य ही है। स्त्रियों का कार्यक्षेत्र बढ़ गया है। ऐसा भी नहीं है। कि स्त्री-मताधिकार प्रदान कर देने से उनके प्राकृतिक कार्यों में कोई रुकावट आती हो। यदि कोई महिला किसी देश की प्रधानमन्त्री है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका कोई पारिवारिक जीवन ही नहीं। घर में वह पत्नी, माता, बहन, पुत्री आदि रूपों में अपनी पारम्परिक महत्ता बनाये हुए है। अत: इस आधार पर उनको मताधिकार से वंचित करना गलत होगा।

उपर्युक्त पक्ष – विपक्षीय मतों का विवेचन करने पर एक बात जो विशेष रूप से स्पष्ट होती है, वह यह है कि स्त्री-मताधिकार के विपक्ष में दिये गये लगभग सभी तर्क अतार्किक, भ्रामक व पक्षपातपूर्ण हैं। आज स्त्री-मताधिकार लाभप्रद ही नहीं, वरन् परमावश्यक भी है, तभी लोकतन्त्र सुरक्षित रह सकता है। इसी कारण आज लगभग सभी देशों ने स्त्री-मताधिकार प्रदान किया हुआ है।

प्रश्न 3.
प्रतिनिधित्व के विभिन्न तरीकों का परीक्षण कीजिए।
या
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से आप क्या समझते हैं? इसकी विभिन्न प्रणालियों की व्याख्या कीजिए।
यो
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के गुणों एवं दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र में प्रतिनिधित्व की विभिन्न प्रणालियों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। सम्पूर्ण प्रणालियों में बहुमत प्रणाली को आशातीत समर्थन प्राप्त हुआ है। परन्तु इसमें सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें अल्पसंख्यकों की समुचित प्रतिनिधित्व की स्थिति का अभाव पाया जाता है। इस दोष को दूर करने के उद्देश्य से ही अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए अन्य प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है।

प्रतिनिधित्व की प्रणालियाँ

आधुनिक काल में अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए निम्नलिखित प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है –

  1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली।
  2. सीमित मत प्रणाली।
  3. संचित मत प्रणाली।
  4. एकल मत प्रणाली।
  5. पृथक् निर्वाचन प्रणाली।
  6. सुरक्षित स्थानयुक्त संयुक्त प्रणाली।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व

अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए जिन उपायों का साधारणतः प्रयोग किया जाता है। उनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध उपाय आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) प्रणाली है। इस प्रणाली का मूल उद्देश्य राज्य के सभी राजनीतिक दलों के हितों का ध्यान रखना एवं उन्हें न्याय प्रदान करना है, जिससे प्रत्येक दल को व्यवस्थापिका में आनुपातिक दृष्टि से लगभग उतना प्रतिनिधित्व अवश्य प्राप्त हो सके, जितना कि न्यूनतम उस वर्ग के लिए युक्तिसंगत हो। प्रतिनिधित्व की इस योजना को जन्म देने वाले 19वीं शताब्दी के एक अंग्रेज विद्वान थॉमस हेयर (Thomas Haire) थे। उन्होंने सन् 1831 ई० में इस प्रणाली का सूत्रपात किया इसीलिए इसे ‘हेयर प्रणाली’ भी कहते हैं। वर्तमान काल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का प्रयोग अनेक रूपों में किया जा रहा है। प्रो० सी० एफ० स्ट्राँग के शब्दों में—“आनुपातिक प्रतिनिधित्व का पृथक् रूप में कोई भी अर्थ नहीं है क्योंकि इसके अनेक प्रकार हैं। वास्तव में इतने अधिक, जितने राज्यों ने उसे अपनाया है और सिद्धान्त रूप में उससे भी अधिका” आनुपातिक प्रतिनिधित्व के ये सभी प्रकार इन दो रूपों में विभक्त किए जा सकते हैं –

  1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System)
  2. सूची प्रणाली (List System)।

1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली – इस प्रणाली में बहुसदस्यीय निर्वाचन-क्षेत्रों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से तीन या इससे अधिक प्रतिनिधि चुने जा सकते हैं एक निर्वाचन-क्षेत्र से चाहे कितने ही प्रतिनिधि चुने जाने हों किन्तु प्रत्येक मतदाता को केवल एक ही । मत देने का अधिकार होता है। परन्तु वह मत-पत्र पर अपनी पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी और इससे अधिक पसन्द का उल्लेख उतनी संख्या में करता है, जितने उम्मीदवार चुने जाने होते हैं। मतदान समाप्त हो जाने पर यह देखा जाता है कि निर्वाचन-क्षेत्र में कुल कितने मत डाले गए और यह संख्या ज्ञात हो जाने पर निश्चित निर्वाचक अंक (Electoral Quota) निकाला जाता है। निश्चित मत-संख्या मतों की वह संख्या है जो उम्मीदार को विजयी घोषित किए जाने के लिए आवश्यक है। निश्चित मत-संख्या ज्ञात करने का सूत्र इस प्रकार है –
कोटा = कुल डाले गए मतों की संख्या / पदों की संख्या +1 (+1)

निश्चित मत संख्या निकाल लेने के बाद सब मतदाताओं की पहली पसन्द (First Preference) के मतपत्र (Ballot-papers) गिन लिए जाते हैं। जिन उम्मीदवारों को निश्चित संख्या के बराबर या उससे अधिक पहली पसन्द के मत प्राप्त होते हैं, वे निर्वाचित घोषित कर दिए जाते हैं। परन्तु यदि इस प्रकार सब स्थानों की पूर्ति नहीं हो पाती है, तो सफल उम्मीदवारों के अतिरिक्त मत (Surplus Votes) अन्य उम्मीदवारों को हस्तान्तरित कर दिए जाते हैं और उन पर अंकित दूसरी पसन्द (Second Preference) के अनुसार विभाजित किए जाते हैं। यदि इस पर भी सब स्थानों की पूर्ति नहीं होती है तो सफल उम्मीदवारों की तीसरी, चौथी, पाँचवीं पसन्द भी इसी प्रकार हस्तान्तरित की जाती है और यदि उसके बाद भी कुछ स्थान रिक्त रह जाते हैं तो जिन उम्मीदवारों को सबसे कम मत प्राप्त हुए हैं, वे बारी-बारी से पराजित घोषित कर दिए जाते हैं और उनके प्राप्त-मत दूसरी, तीसरी, चौथी इत्यादि पसन्द के अनुसार हस्तान्तरित कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया उस समय तक चलती रहती है, जब तक कि रिक्त स्थानों की पूर्ति न हो जाए।

इस प्रणाली का स्पष्ट उद्देश्य यही है कि एक भी मत व्यर्थ न जाए। यह प्रणाली अत्यन्त जटिल है। इसीलिए इसका प्रयोग बहुत कम देशों में होता है, तथापि स्वीडन, फिनलैंड, नार्वे, डेनमार्क आदि देशों में यही प्रणाली प्रचलित है।

2. सूची प्रणाली – सूची प्रणाली आनुपातिक प्रतिनिधित्व का दूसरा रूप है। इस प्रणाली के अन्तर्गत सभी प्रत्याशी अपने-अपने राजनीतिक दलों के अनुसार अलग-अलग सूचियों में सूचीबद्ध किए जाते हैं और प्रत्येक दल अपने उम्मीदवारों की सूची प्रस्तुत करता है, जिसमें दिए गए नामों की संख्या उस निर्वाचन-क्षेत्र से चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या से अधिक नही हो सकती है। मतदाता अपने मत अलग-अलग उम्मीदवारों को नहीं, अपितु किसी भी दल की पूरी-की-पूरी सूची के पक्ष में देते हैं। इसके बाद डाले गए मतों की कुल संख्या को निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या से भाग देकर निर्वाचक अंक (Electoral Quota) निकाल लिया जाता है। तदुपरान्त एक दल द्वारा प्राप्त मतों की संख्या को निर्वाचक अंक से भाग दिया जाता है और इस प्रकार यह निश्चय किया जाता है कि उसे दल को कितने स्थान मिलने चाहिए। उदाहरणार्थ, किसी राज्य से 50 प्रतिनिधि चुने जाते हैं और कुल वैध मतों की संख्या 2.00,000 है, तो 2,00,000/50 = 4,000 निर्वाचन अंक हुआ। ऐसी स्थिति में किसी राजनीतिक दल ‘अ ब स’ को 21,000 मत प्राप्त हुए हैं, तब (21,000/4,000 = 5.25) उस दल के 5 प्रत्याशी विजयी घोषित होंगे। सभी सूची प्रणालियों का आधारभूत सिद्धान्त यही है, परन्तु विभिन्न देशों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन अथवा संशोधन करके इसे नए-नए रूप दिए गए हैं और इस प्रकार आज सूची प्रणाली के अनेक प्रकार पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में सूची प्रणाली का कोई सार्वभौमिक सिद्धान्त नहीं है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के गुण

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली व्यवस्थापक-मण्डल में अल्पमतों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने का एक सरल उपाय है। इस प्रणाली के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

1. यह प्रणाली अल्पसंख्यक दल को उसकी शक्ति के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान करती है। जिसके फलस्वरूप यह व्यवस्थापिका का यथार्थ प्रतिबिम्ब बन जाती है तथा प्रत्येक अल्पसंख्यक वर्ग सन्तुष्ट हो जाता है।

2. आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अन्तर्गत व्यवस्थापिका में साधारणतया किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो पाता है। इस प्रकार यह प्रणाली अल्पमत दलों को बहुमत दल की स्वेच्छाचारिता से बचाकर शासन में उचित भागीदारी का अवसर प्रदान करती है।

3. आनुपातिक प्रतिनिधित्व के परिणामस्वरूप एक प्रकार की राजनीतिक शिक्षा भी प्राप्त होती है। क्योंकि मतदाताओं के लिए अपना मत देने से पहले विभिन्न उम्मीदवारों तथा विभिन्न दलों की नीतियों के सम्बन्ध में विचार करना आवश्यक हो जाता है।

4. यह प्रणाली मताधिकार को सार्थक एवं व्यावहारिक बनाती है क्योंकि इसमें प्रत्येक मतदाता को अनेक उम्मीदवारों में से चुनाव की स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। इसमें किसी मतदाता का मत व्यर्थ नहीं जाता है, उससे किसी-न-किसी उम्मीदवार के निर्वाचन में सहायता अवश्य मिलती है। शुल्ज (Schulz) का मत है- “एकल संक्रमणीय मत पद्धति निर्वाचकों को अपनी पसन्द के उम्मीदवार चुनने में सबसे अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करती है।”

5. आनुपातिक प्रणाली में उच्च व्यवस्थापिका स्तर की सम्भावना बनी रहती है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के दोष

यदि निर्वाचन का एकमात्र उद्देश्य केवल न्याय अथवा चुनाव लड़ने वाले दलों के बीच अनुपात की स्थापना है तो यह प्रणाली वास्तव में निर्वाचन की आदर्श प्रणाली कही जा सकती है। परन्तु व्यवस्थापिका को केवल विभिन्न दलों तथा वर्गों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करना चाहिए, अपितु अपने कर्तव्यों का भी सुचारु रूप से पालन करना चाहिए। इस दृष्टिकोण से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के विरुद्ध अनेक तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनमें से कतिपय विशेष महत्त्वपूर्ण तर्क निम्नलिखित हैं –

1. यह प्रणाली विशाल राजनीतिक दलों की एकता को नष्ट कर देती है तथा इससे अनेक छोटे-छोटे दलों और गुटों का जन्म होता है। इसके परिणामस्वरूप सभी समस्याओं पर राष्ट्रीय हित की दृष्टि से नहीं, वरन् वर्गीय हित की दृष्टि से विचार किया जाता है। सिजविंक के शब्दों में -“वर्गीय प्रतिनिधित्व आवश्यक रूप से दूषित वर्गीय व्यवस्थापन को प्रोत्साहित करता है।

2. आनुपातिक प्रतिनिधित्व ‘अल्पमत विचारधारा’ को प्रोत्साहन देता है, जिसके परिणामस्वरूप वर्ग-विशेष के हितों और स्वार्थों का उदय होता है। इसके अन्तर्गत व्यवस्थापिका में किसी एक दल का स्पष्ट बहुमत नहीं होता है और मिश्रित मन्त्रिपरिषद् के निर्माण में छोटे-छोटे दलों की स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वे अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए स्वार्थपूर्ण वर्गहित के पक्ष में अपना समर्थन बेच देते हैं, परिणामतः सार्वजनिक जीवन की पवित्रता नष्ट हो जाती है। फाइनर के अनुसार-“इस प्रणाली को अपनाने से प्रतिनिधि द्वारा अपने क्षेत्र की देखभाल प्रायः समाप्त हो जाती है।”

3. यह प्रणाली व्यावहारिक रूप में बहुत जटिल है। इसकी सफलता के लिए मतदाताओं और उनमें भी अधिक निर्वाचन अधिकारियों को उच्च कोटि की राजनीतिक शिक्षा प्राप्त करनी आवश्यक होती है। मतदाताओं को इसके नियम समझने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। साथ ही मतगणना अत्यन्त जटिल होती है, जिसमें भूल होने की अनेक सम्भावनाएँ रहती

4. उपचुनावों में जहाँ केवल एक प्रतिनिधि का चुनाव करना होता है, इस प्रणाली का प्रयोग किया जाना सम्भव नहीं होता है।

5. आनुपातिक प्रणाली में, विशेषतया सूची प्रणाली में, दलों का संगठन तथा नेताओं का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है और साधारण सदस्यों की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है क्योंकि मतदान का आधार राजनीतिक दल होता है।

6. अनेक दलों के अस्तित्व के परिणामस्वरूप कोई भी दल अकेले ही सरकार निर्माण की स्थिति में नहीं होता है। अत: संयुक्त मन्त्रिपरिषदों का निर्माण होता है और प्रायः सरकारें अस्थायी होती हैं।

7. दलीय वर्चस्व होने के कारण मतदाता प्रायः अपने-अपने राजनीतिक दलों को मत देते हैं, अतः इस प्रणाली में निर्वाचकों और प्रतिनिधियों में कोई सम्पर्क नहीं होता है।

8. इस प्रणाली में समय और धन दोनों का अपव्यय होता है।

विश्लेषणात्मक समीक्षा – उपर्युक्त दोषों के कारण ही अनेक राजनीतिक विद्वान् आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अनुपयोगी और जटिल निर्वाचन प्रणाली कहते हैं। वास्तव में राष्ट्रीय निर्वाचकों में आनुपातिक प्रणाली को अपनाना एक प्रकार से अव्यवस्था उत्पन्न करना है क्योंकि यह व्यवस्थापिका की सत्ता को निर्बल बना देती है। यह प्रणाली मन्त्रिपरिषदों के स्थायित्व तथा एकरूपता को नष्ट कर संसदीय शासन को असम्भव बना देती है।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का औचित्य निर्धारण एवं उपयोगिता

प्रथम महायुद्ध के उपरान्त फ्रांस, जर्मनी, आयरलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, पोलैण्ड आदि अनेक यूरोपीय देशों ने इस प्रणाली को अपनाया था, परन्तु अब इसकी उपयोगिता कम होती जा रही है और अनेक देशों ने तो इस परित्याग तक कर दिया है। ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत तथा अन्य अनेक देशों ने अपने साधारण निर्वाचनों के लिए कभी इस प्रणाली को अपनाया ही नहीं, यद्यपि आजकल ब्रिटेन तथा अमेरिका में आनुपातिक प्रतिनिधित्व संस्थाएँ इस प्रणाली को लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रही हैं।

संसदीय निर्वाचनों में तो बहुत कम देश ही इस प्रणाली का प्रयोग करते हैं, परन्तु व्यवस्थापक मण्डलों, स्थानीय निकायों और गैर-सरकारी समुदायों की विभिन्न समितियों का निर्वाचन साधारणतया इस प्रणाली के अनुसार ही होता है। हमारी संविधान सभा का निर्वाचन भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार ही हुआ था। नए संविधान के अन्तर्गत राज्यसभा के सदस्य राज्यों की विधानसभाओं द्वारा इसी प्रणाली के आधार पर निर्वाचित होते हैं और राज्यों के उच्च सदनों जैसे भारत में विधान परिक्दों और व्यवस्थापक-मण्डल की समितियों के निर्माण में भी इसी निर्वाचन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन भी आधुनिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की एकल-संक्रमणीय मत प्रणाली के आधार पर होता है।

प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष निर्वाचन के गुणों और दोषों का मूल्यांकन कीजिए।
या
प्रत्यक्ष निर्वाचन के चार मुण बताइए।
उत्तर :

प्रत्यक्ष निर्वाचन

यदि निर्वाचक प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करें, तो उसे प्रत्यक्ष निर्वाचन कहा जाता है। यह बिल्कुल सरल विधि है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक मतदाता निर्वाचन स्थान पर विभिन्न उम्मीदवारों में से किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करता है और जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं. उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। भारत, इंग्लैण्ड, अमेरिका, कनाडा, स्विट्जरलैण्ड आदि देशों में व्यवस्थापिका के प्रथम सदन के निर्माण हेतु यही पद्धति अपनायी गयी है।

प्रत्यक्ष निर्वाचन के गुण

1. प्रजातन्त्रात्मक धारणा के अनुकूल – यह जनता को प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधि निर्वाचित करने का अवसर देती है; अतः स्वाभाविक रूप से यह पद्धति प्रजातन्त्रीय व्यवस्था के अनुकूल

2. मतदाता और प्रतिनिधि के मध्य सम्पर्क – इस पद्धति में जनता अपने प्रतिनिधि को प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित करती है; अत: जनता और उसके प्रतिनिधि के बीच उचित सम्पर्क बना रहता है। और दोनों एक-दूसरे की भावनाओं से परिचित रहते हैं। इसके अन्तर्गत जनता अपने प्रतिनिधियों के कार्य पर निगरानी और नियन्त्रण भी रख सकती है।

3. राजनीतिक शिक्षा – जब जनता अपने प्रतिनिधि को प्रत्यक्ष रूप से चुनती है तो विभिन्न दल और उनके उम्मीदवार अपनी नीति और कार्यक्रम जनता के सामने रखते हैं, जिससे जनता को बड़ी राजनीतिक शिक्षा मिलती है और उनमें राजनीतिक जागरूकता की भावना का उदय होता है। इससे सामान्य जनता को अपने अधिकार और कर्तव्यों का अधिक अच्छे प्रकार से ज्ञान भी हो जाता है।

4. राजनीतिक अधिकार का प्रयोग – प्रत्यक्ष निर्वाचन जनता को अपने राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करने का अवसर प्रदान करता है।

प्रत्यक्ष निर्वाचन के दोष

1. सामान्य निर्वाचकों का मत त्रुटिपूर्ण – आलोचकों का कथन है कि जनता में अपने मत का उचित प्रयोग करने की क्षमता नहीं होती। मतदाता अधिक योग्य और शिक्षित न होने के कारण नेताओं के झूठे प्रचार और जोशीले भाषणों के प्रभाव में बह जाते हैं और निकम्मे, स्वार्थी और चालाक उम्मीदवारों को चुन लेते हैं।

2. सार्वजनिक शिक्षा का तर्क त्रुटिपूर्ण – प्रत्यक्ष निर्वाचन के अन्तर्गत किया जाने वाला चुनाव अभियान शिक्षा अभियान नहीं होता, अपितु यह तो निन्दा, कलंक और झूठ का अभियान होता है। चुनाव में उम्मीदवारों और उनकी नीतियों को ठीक प्रकार से समझाने के बजाय उनके सामने व्यक्तियों और समस्याओं का विकृत चित्र प्रस्तुत किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मतदाता गुमराह हो जाता है।

3. बुद्धिमन व्यक्ति निर्वाचन से दूर – प्रत्यक्ष निर्वाचन में चुनाव अभियान नैतिकता के निम्नतम स्तर तक गिर जाने के कारण बुद्धिमान एवं निष्कपट व्यक्ति निर्वाचन से दूर भागते हैं जब ऐसे व्यक्ति उम्मीदवार के रूप में आगे नहीं आते, तो देश को स्वभावतः हानि पहुँचती है।

4. अपव्ययी और अव्यवस्थाजनक – इस प्रकार के चुनाव पर बहुत अधिक खर्च आता है और बड़े पैमाने पर इसका प्रबन्ध करना होता है। अत्यधिक जोश-खरोश के कारण अनेक बार दंगे-फसाद भी हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
मताधिकार की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष अथवा प्रतिनिध्यात्मक लोकतन्त्र ही लोकतान्त्रिक शासन का एकमात्र व्यावहारिक रूप है। इस व्यवस्था में सामान्य जनता प्रतिनिधि चुनती है और ये प्रतिनिधि शासन का संचालन करते हैं। प्रतिनिधियों को चुनने के इस अधिकार को ही सामान्यतः मताधिकार अथवा निर्वाचन का अधिकार कहा जाता है, जो कि लोकतन्त्र का आधार है। इसकी महत्ता अग्रलिखित बातों से स्पष्ट हो जाती है –

1. नितान्त औचित्यपूर्ण – राज्य के कानूनों और कार्यों का प्रभाव समाज के केवल कुछ ही। व्यक्तियों पर नहीं, वरन् सबै व्यक्तियों पर पड़ता है; अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपना मत देने और शासन की नीति का निश्चय करने का अधिकार होना चाहिए। जॉन स्टुअर्ट मिल ने इसी आधार पर वयस्क मताधिकार को नितान्त औचित्यपूर्ण बताया है।

2. लोकसत्ता की वास्तविक अभिव्यक्ति – लोकसत्ता बीसवीं सदी का सबसे महत्त्वपूर्ण विचार है और आधुनिक प्रजातन्त्रवादियों का कथन है कि अन्तिम सत्ता जनता में ही निहित है डॉ० गार्नर के शब्दों में, “ऐसी सत्ता की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति सार्वजनिक मताधिकार में ही हो सकती है।”

3. अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित – वयस्क मताधिकार अल्पसंख्यकों को अपने प्रतिनिधियों द्वारा अपने हितों की रक्षा का पूरा अवसर देता है। ये प्रतिनिधि व्यवस्थापिका में विधेयकों के सम्बन्ध में अल्पसंख्यकों को दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं और इस प्रकार अल्पसंख्यक अपने हितों की रक्षा में विधिकर्ताओं की सहायता ले सकते हैं।

4. राष्ट्रीय एकीकरण का साधन – इस प्रणाली के अन्तर्गत राष्ट्र की शक्ति एवं एकता में वृद्धि होती है। अपने ही प्रतिनिधियों द्वारा बनाये गये कानूनों का पालन लोगों को एक-दूसरे के निकट लाता है और राष्ट्रीय एकीकरण में सहायक होता है। वयस्क मताधिकार को अपनाने पर जनता में क्रान्ति की सम्भावना कम हो जाती है, क्योकि जनता स्वयं द्वारा निर्मित सरकार को पूर्ण सहयोग देती है।

5. सार्वजनिक शिक्षा का साधन – वयस्क मताधिकार सार्वजनिक शिक्षा और राजनीतिक जागृति का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण साधन है। मताधिकार व्यक्ति की राजनीतिक उदासीनता दूर कर देता है और उसको यह अनुभव कराता है कि राज्य शासन में उसका भी हाथ है। ऐसी स्थिति में वह देश के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में अधिक रुचि लेना प्रारम्भ कर देता है।

6. आत्मसम्मान में वृद्धि – सार्वजनिक मताधिकार नागरिकों में आत्मसम्मान की भावना पैदा करता है। मताधिकार का जनता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और जनता यह महसूस करती है कि राज्य की अन्तिम शक्ति उसी के हाथ में है। इससे उनके आत्मसम्मान में वृद्धि होती है। और जैसा कि ब्राइस कहते हैं, “इससे उनके नैतिक चरित्र का उत्थान होता है।”

7. सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति रुचि में वृद्धि – वयस्क मताधिकार की व्यवस्था में जब नागरिकों को मताधिकार का प्रयोग करना होता है तो स्वाभाविक रूप में उनके द्वारा सार्वजनिक समस्याओं पर विचार किया जाता है और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति उनकी रुचि में वृद्धि होती

8. देशभक्ति की भावना में वृद्धि – वयस्क मताधिकार के परिणामस्वरूप नागरिक राज्य और शासन के प्रति अपनत्व की भावना अनुभव करते हैं और उनमें देशभक्ति की भावना बढ़ती है। ऐसी स्थिति में वे देश के लिए बड़े-से-बड़ा बलिदान करने को तत्पर हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
प्रादेशिक अथवा भौगोलिक प्रतिनिधित्व प्रथा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

प्रादेशिक अथवा भौगोलिक प्रतिनिधित्व प्रथा

आधुनिक लोकतन्त्रात्मक शासन में निर्वाचन हेतु देश को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित कर, सरकार के गठन के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता है। समस्त देश को भौगोलिक भागों (क्षेत्रों) में विभाजित कर दिया जाता है। निर्वाचन क्षेत्र एकसदस्यीय अथवा बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र हो सकता है। एक प्रतिनिधि उस निर्वाचन क्षेत्र में रहने वाले सभी निर्वाचकों का प्रतिनिधित्व करता है, चाहे वह कोई भी व्यवसाय करता हो। इस प्रथा को प्रादेशिक अथवा भौगोलिक प्रतिनिधित्व प्रथा’ कहते हैं, किन्तु इस प्रथा का घोर विरोध किया गया। प्रादेशिक अथवा भौगोलिक प्रतिनिधित्व प्रथा के आलोचकों का कथन है कि प्रतिनिधित्व का आधार क्षेत्रीय न होकर कार्य-विशेष से सम्बन्धित होना चाहिए। इसको व्यावसायिक प्रतिनिधित्व नाम भी दिया गया है। डिग्बी ने व्यावसायिक प्रतिनिधित्व का समर्थन करते हुए कहा है, “व्यवसाय, वाणिज्य, उद्योग-धन्धे यहाँ तक कि विज्ञान, धर्म आदि राष्ट्रीय जीवन की बड़ी शक्तियों को प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाना चाहिए।” इमैनुअल ऐबीसीएज का मत है-“समाज के उद्योगों एवं व्यवसायों का व्यवस्थापिका में विशेष रूप से प्रतिनिधित्व होना चाहिए।’ व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के पक्ष में कहा जाता है कि यह जनतन्त्रात्मक आदर्शों के अनुकूल प्रतिनिधित्व की एकमात्र वास्तविक प्रणाली है। इसके समर्थकों का दृष्टिकोण है कि निर्वाचन क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों की विभिन्न आवश्यकताएँ तथा इच्छाएँ होती हैं। व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व केवल व्यवसायों तथा आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व ही कर सकता है। व्यावसायिक प्रतिनिधित्व के कारण निर्वाचित प्रतिनिधि का ध्यान अपने सभी कार्यकर्ताओं के हितों पर अधिक रहता है। औद्योगीकरण के साथ व्यावसायिक प्रतिनिधित्व की माँग तीव्र हुई है साम्यवादियों तथा बहुलवादियों ने भी इस प्रतिनिधित्व का पूर्ण समर्थन किया है। इसे “कार्य-विशेष सम्बन्धी प्रतिनिधित्व प्रणाली” भी कहते

प्रश्न 7.
सूची प्रणाली से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :

सूची प्रणाली

सूची प्रणाली आनुपातिक प्रतिनिधित्व का दूसरा रूप है। इस प्रणाली के अन्तर्गत सभी प्रत्याशी अपने-अपने राजनीतिक दलों के अनुसार अलग-अलग सूचियों में सूचीबद्ध किए जाते हैं और प्रत्येक दल अपने उम्मीदवारों की सूची प्रस्तुत करता है, जिसमें दिए गए नामों की संख्या उस निर्वाचन-क्षेत्र से चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या से अधिक नहीं हो सकती। मतदाता अपने मत अलग-अलग उम्मीदवारों को नहीं, अपितु किसी भी दल की पूरी-की-पूरी सूची के पक्ष में देते हैं। इसके बाद डाले गए मतों की कुल संख्या को निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधियों की संख्या से भाग देकर निर्वाचक अंक (Electoral Quota) निकाल लिया जाता है। तदुपरान्त एक दल द्वारा प्राप्त मतों की संख्या को निर्वाचक अंक से भाग दिया जाता है और इस प्रकार यह निश्चय किया जाता है कि उस दल को कितने स्थान मिलने चाहिए; उदाहरणार्थ-किसी राज्य से 50 प्रतिनिधि चुने जाते हैं और कुल वैध मतों की संख्या 2,00,000 है तो 2,00,000/50 = 4,000 निर्वाचन अंक हुआ। ऐसी स्थिति में किसी राजनीतिक दल ‘अ ब स’ को 21,000 मत प्राप्त हुए हैं, तब (21,000/4, 000=5.25) उस दल के 5 प्रत्याशी विजयी घोषित होंगे। सभी सूची प्रणालियों का आधारभूत सिद्धान्त यही है, परन्तु विभिन्न देशों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन अथवा संशोधन करके इसे नए-नए रूप दिए गए हैं और इस प्रकार आज सूची प्रणाली के अनेक प्रकार पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में सूची प्रणाली का कोई सार्वभौमिक सिद्धान्त नहीं है।

प्रश्न 8.
बहुमत प्रणाली की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर :

बहुमत प्रणाली

बहुमत प्रणाली निर्वाचन की एक महत्त्वपूर्ण प्रणाली है। इस प्रणाली द्वारा विश्व के अनेक राष्ट्रों की संसद के लोकप्रिय सदन का निर्वाचन किया जाता है। भारत में लोकसभा तथा विधानसभा के सदस्यों का निर्वाचन इस पद्धति द्वारा ही किया जाता है।

इस प्रणाली में एक-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। सम्पूर्ण देश को विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है। इन निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। एक निश्चित क्षेत्र से एक प्रतिनिधि का निर्वाचन किया जाता है। निर्वाचन के लिए अनेक प्रत्याशी चुनाव मैदान में खड़े हो सकते हैं परन्तु मतदाता को केवल एक मत प्रदान करने का अधिकार होता है। निर्वाचन में डाले गए मतों में जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त हो जाते हैं उसको निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है।

बहुमत प्रणाली की आलोचना

बहुमत प्रणाली की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है –

(1) बहुमत प्रणाली यद्यपि सैद्धान्तिक रूप में स्वीकार की जाती है परन्तु व्यवहार में यह अल्पमत प्रणाली के रूप में कार्य करती है; उदाहरण के लिए यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में कुल डाले गए मतों की संख्या 100 है तथा 5 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं और मतों का विभाजन पाँच उम्मीदवारों में क्रमशः 30, 20, 15, 10 तथा 25 प्रतिशत है तो इस निर्वाचन में वह उम्मीदवार विजयी घोषित कर दिया जाएगा जिसे 30 प्रतिशत मत प्राप्त होते हैं। इस प्रकार से 30 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाला व्यक्ति कुल मतों का केवल 30% मत ही प्राप्त कर पाता है तथा यह 70% ऐसे व्यक्तियों पर शासन करता है जिन्होंने इस व्यक्ति के विरोध में अपना मत दिया था।

(2) इस प्रणाली में केवल एक ही स्थिति उत्पन्न होती है, या तो मत 100% सफल हो जाता है। अथवा वह 100% व्यर्थ हो जाता है। इसका अन्य कोई विकल्प नहीं होता है।

(3) इस प्रणाली में अल्पसंख्यक समुदायों के व्यक्तियों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हो पाता है। क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र में जिस समुदाय के व्यक्तियों की संख्या अधिक होगी वे अपने समुदाय (जाति) के व्यक्ति को विजयी बनाने में सफल हो जाएँगे।

(4) इस प्रणाली द्वारा क्षेत्रीय एवं जातीय भावनाओं को बहुत प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है जो संकीर्ण राजनीति को जन्म देता है। बहुमत प्रणाली के दोषों को दूर करने के उद्देश्य से ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अस्तित्व में आई है।

प्रश्न 9.
भारतीय निर्वाचन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
भारतीय निर्वाचन प्रणाली की प्रमुख विशेषतएँ भारतीय निर्वाचन प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. वयस्क मताधिकार – वयस्क मताधिकार भारतीय निर्वाचन प्रणाली की प्रमुख विशेषता है। यह लोकतन्त्र का आधार स्तम्भ है। संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा तथा राज्य विधानमण्डलों के निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर किए जाएँगे। वयस्क मताधिकार की व्यवस्था करते हुए संविधान में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो भारत का नागरिक है। तथा जो कानून के अन्तर्गत किसी निर्धारित तिथि पर 18 वर्ष का है तथा संविधान अथवा कानून के अन्तर्गत निर्वाचन हेतु किसी भी दृष्टि से अयोग्य नहीं है, को निर्वाचन में मतदाता के रूप में भाग लेने के पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं।

2. संयुक्त निर्वाचन पद्धति – देश में संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को अपनाया गया है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र हेतु एक ही मतदाता सूची होती है, जिसमें उस क्षेत्र के सभी मतदाताओं के नाम होते हैं तथा वे सभी मिलकर एक प्रतिनिधि का निर्वाचन करते हैं। धारा 325 के अनुसार प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन हेतु संसद एवं राज्य विधानसभा के सदस्य चुनने हेतु सामान्य मतदाता सूची होगी तथा कोई भी भारतीय धर्म, जाति एवं लिंग के आधार पर सूची में नाम लिखाने के अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

3. अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों हेतु सुरक्षित स्थान – संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के होने पर भी हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों हेतु विधायिकाओं में स्थान आरक्षित कर दिए हैं।

4. प्रत्यक्ष निर्वाचन – लोकसभा, राज्यों की विधानसभाओं, नगरपालिकाओं, पंचायतों आदि के निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होते हैं, जबकि राज्यसभा, राज्य विधानपरिषदों, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति आदि के निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होते हैं।

5. स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन – भारतीय निर्वाचन प्रणाली की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष निर्वाचन है। स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन ही सच्चे लोकतन्त्र की कसौटी है। संविधान-निर्माताओं ने निर्वाचन स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष करवाने हेतु निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की है।

6. गुप्त मतदान – निर्वाचन की एक अन्य विशेषता यह है कि मतदान गुप्त होता है। गुप्त मतदान स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन हेतु आवश्यक है। मतदान करने वालों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को यह नहीं मालूम होगा कि उसने किसके पक्ष में मतदान किया है।

7. एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र – निर्वाचन प्रणाली की अन्य विशेषता यह है कि यहाँ पर एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था को अपनाया गया है। जिस प्रान्त से जितने विधायक निर्वाचित होने होते हैं, उस प्रान्त को उतने निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक ही प्रतिनिधि चुना जाता है।

8. जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन – भारत में संसद तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन हेतु निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था जनसंख्या के आधार पर की जाती है। राज्य विधानसभा के सदस्यों की संख्या के अनुसार राज्यों को उतने ही निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।

9. निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन – लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं हेतु निर्वाचन क्षेत्रों को परिसीमन इस प्रकार किया जाता है कि विधानसभा का कोई भी निर्वाचन क्षेत्र एक ही संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में स्थित हो।

10. ऐच्छिक मतदान – निर्वाचन में मतदान करना अथवा न करना, मतदाता की स्वेच्छा पर निर्भर करता है।

11. निर्वाचन याचिका – निर्वाचन सम्बन्धी विवादों हेतु निर्वाचन याचिका की भी व्यवस्था है। पहले निर्वाचन याचिकाएँ आयोग के पास आती थीं तथा वह किसी न्यायाधीश को इन्हें सुनने हेतु नियुक्त करता था किन्तु अब सभी याचिकाएँ उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय के पास जाती हैं।

12. निर्वाचन आयोग – निर्वाचन का प्रबन्ध निर्वाचन आयोग के नियन्त्रण के अधीन होता है। भारतीय संविधान में निर्वाचन प्रक्रिया के प्रबन्ध हेतु एक निर्वाचन आयोग गठित किया गया है। निर्वाचन आयोग में आजकल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा दो निर्वाचन आयुक्त हैं।

13. निर्वाचन के सम्बन्ध में संसद को कानून बनाने का अधिकार – संविधान के अनुसार निर्वाचन सम्बन्धी कानून बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त है। संसद के विधानमण्डलों के निर्वाचन हेतु मतदाताओं की सूचियाँ तैयार करने, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन तथा अन्य समस्त समस्याओं से सम्बन्धित कानून बना सकती है।

प्रश्न 10.
देश में निर्वाचन की प्रक्रिया किस प्रकार सम्पन्न होती है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :

भारत में निर्वाचन की प्रक्रिया

भारत में निर्वाचन प्रायः निम्नलिखित प्रक्रिया के आधार पर सम्पन्न किए जाते हैं –

1. निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था – निर्वाचन की व्यवस्था में सर्वप्रथम कार्य निर्वाचन क्षेत्र को निश्चित करना है। लोकसभा में जितने सदस्य चुने जाते हैं, लगभग समान जनसंख्या वाले उतने ही क्षेत्रों में समस्त भारत को विभाजित कर दिया जाता है। इस प्रकार विधानसभाओं के निर्वाचन में राज्य को समान जनसंख्या वाले निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित कर दिया जाता है तथा प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य चुन लिया जाता है।

2. मतदाताओं की सूची – सर्वप्रथम मतदाताओं की अस्थायी सूची तैयार की जाती है। इन सूचियों को कुछ विशेष स्थानों पर जनता के देखने हेतु रख दिया जाता है। यदि किसी सूची में किसी का नाम लिखने से रह गया हो अथवा किसी का नाम भूल से लिख गया हो तो उसको एक निश्चित तिथि तक संशोधन करवाने हेतु प्रार्थना-पत्र देना होता है, फिर संशोधित सूचियाँ तैयार की जाती हैं।

3. निर्वाचन तिथि की घोषणा – निर्वाचन आयोग निर्वाचन-तिथि की घोषणा करता है। निर्वाचन आयोग तिथि की घोषणा करने से पहले केन्द्रीय सरकार तथा राज्यों की सरकारों से विचार-विमर्श करता है।

4. निर्वाचन अधिकारियों की नियुक्ति – निर्वाचन आयोग प्रत्येक राज्य में मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा प्रत्येक क्षेत्र हेतु एक निर्वाचन अधिकारी, पर्यवेक्षक व अन्य अनेक कर्मचारी नियुक्त करता है।

5. नामांकन-पत्र दाखिल करना – इसके पश्चात् निर्वाचन में भाग लेने वाले व्यक्ति के नाम का प्रस्ताव एक निश्चित तिथि के अन्दर छपे फॉर्म पर जिसका नामांकन पत्र है, किसी एक मतदाता द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। दूसरा मतदाता उसका अनुमोदन करता है। इच्छुक व्यक्ति (उम्मीदवार) भी उस पर स्वीकृति देता है। प्रार्थना-पत्र के साथ जमानत की निश्चित राशि जमा करवानी पड़ती है।

6. नाम की वापसी – यदि उम्मीदवार किसी कारण से अपना नाम वापस लेना चाहे तो एक निश्चित तिथि तक उसको ऐसा करने का अधिकार होता है। वह अपना नाम वापस ले सकता है। तथा नाम वापस लेने पर जमानत की राशि उसे वापस मिल जाती है।

7. जाँच तथा आपत्तियाँ – एक निश्चित तिथि को आवेदन-पत्रों की जाँच की जाती है। यदि किसी प्रार्थना-पत्र में कोई अशुद्धि रह गई हो तो ऐसे आवेदन-पत्र को अस्वीकार कर दिया जाता है। यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके आवेदन-पत्र के सम्बन्ध में आपत्ति करना चाहे तो ऐसा करने का अधिकार दिया जाता है। यदि आपत्ति उचित सिद्ध हो जाए तो उम्मीदवार का आवेदन-पत्र अस्वीकार कर दिया जाता है।

8. निर्वाचन अभियान – साधारणतया निर्वाचन की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार आरम्भ कर देते हैं, किन्तु वास्तव में निर्वाचन में तेजी नामांकन पत्रों की जाँच-पड़ताल के पश्चात् आती है। राजनीतिक दल का निर्वाचन घोषणा-पत्र जारी करते हैं। राजनीतिक दल सभाएँ करके, पोस्टरों द्वारा, रेडियो, दूरदर्शन आदि द्वारा अपनी नीतियों का प्रचार करते हैं।

9. मतदान एवं परिणाम – मतदान अब वोटिंग मशीन सिस्टम के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। मतदाता इच्छित उम्मीदवार के नाम के सामने वाला बटन दबाकर अपने मत की अभिव्यक्ति कर देता है। इन मशीनों द्वारा मतों की गणना बहुत जल्दी हो जाती है जो उम्मीदवार कुल मतों का 1/10 भाग प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है उसकी जमानत जब्त हो जाती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 2 Rights in the Indian Constitution

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 2 Rights in the Indian Constitution (भारतीय संविधान में अधिकार)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि वह सही है या गलत
(क) अधिकार-पत्र में किसी देश की जनता को हासिल अधिकारों का वर्णन रहता है।
(ख) अधिकार-पत्र व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।
(ग) विश्व के हर देश में अधिकार-पत्र होता है।
उत्तर-
(क) सही, (ख) सही, (ग) गलत।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन मौलिक अधिकारों का सबसे सटीक वर्णन है?
(क) किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार।
(ख) कानून द्वारा नागरिक को प्रदत्त समस्त अधिकार।
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित समस्त अधिकार।
(घ) संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जिन पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।
उत्तर-
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित समस्त अधिकार।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित स्थितियों को पढ़ें। प्रत्येक स्थिति के बारे में बताएँ कि किस मौलिक अधिकार का उपयोग या उल्लंघन हो रहा है और कैसे?
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल (Cabin-Crew) के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज्यादा है नौकरी में तरक्की दी गई लेकिन उनकी ऐसी महिला-सहकर्मियों को दण्डित किया गया जिनका वजन बढ़ गया था।
(ख) एक निर्देशक एक डॉक्यूमेण्ट्री फिल्म बनाता है जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है।
(ग) एक बड़े बाँध के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकालते हैं।
(घ) आन्ध्र-सोसायटी आन्ध्र प्रदेश के बाहर तेलुगु माध्यम के विद्यालय चलाती है।
उत्तर-
(क) महिला सहकर्मियों को दण्डित करना उनके समानता का अधिकार का उल्लंघन करना है। पुरुषों को पदोन्नति दी गई जबकि महिलाओं को दण्डित किया गया। यह लिंग के आधार पर भेदभाव है। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।
(ख) इस घटना में मौलिक अधिकार का उपभोग किया जा रहा है। इसमें निर्देशक द्वारा स्वयं को व्यक्त करने के अधिकार (Right of Expression) का प्रयोग किया जा रहा है जिसका उल्लेख संविधान के 19वें अनुच्छेद में है।
(ग) इस घटना में भी मौलिक अधिकार का उपयोग किया जा रहा है। अनुच्छेद 19 में उल्लिखित अधिकार किसी उद्देश्य के लिए संगठित होने का उपयोग करके विस्थापित जन संगठित होकर रैली निकाल रहे हैं।
(घ) इसमें शिक्षा व संस्कृति के अधिकार (अनुच्छेद 29 व 30) का उपयोग किया जा रहा है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में कौन सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या है?
(क) शैक्षिक-संस्था खोलने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के ही बच्चे इस संस्थान में पढ़ाई कर सकते हैं।
(ख) सरकार विद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अल्पसंख्यक-वर्ग के बच्चों को उनकी संस्कृति और धर्म-विश्वासों से परिचित कराया जाए।
(ग) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।
(घ) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक यह माँग कर सकते हैं कि उनके बच्चे उनके द्वारा और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।
उत्तर-
(ग) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।

प्रश्न 5.
इनमें कौन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और क्यों?
(क) न्यूनतम देय मजदूरी नहीं देना।
(ख) किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाना।
(ग) 9 बजे रात के बाद लाउडस्पीकर बजाने पर रोक लगाना।
(घ) भाषा तैयार करना।
उत्तर-
(क) किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाना मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। इसमें अनुच्छेद 19 का उल्लंघन हो रहा है।

प्रश्न 6.
गरीबों के बीच काम कर रहे एक कार्यकर्ता का कहना है कि गरीबों को मौलिक अधिकारों की जरूरत नहीं है। उनके लिए जरूरी यह है कि नीति-निदेशक सिद्धांतों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बना दिया जाए। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर-
मैं इस कथन से सहमत नहीं हैं, क्योंकि नागरिकों के लिए मौलिक अधिकार नीति-निदेशक तत्त्वों से अधिक आवश्यक हैं। नीति-निदेशक तत्त्वों को बाध्यकारी (न्यायसंगत) नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि हमारे पास सभी को नीति-निदेशक तत्त्वों में दी गई सुविधाओं को प्रदान करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं।

प्रश्न 7.
अनेक रिपोर्टों से पता चलता है कि जो जातियाँ पहले झाड़ देने के काम में लगी थीं उन्हें मजबूरन यही काम करना पड़ रहा है। जो लोग अधिकार-पद पर बैठे हैं वे इन्हें कोई और काम नहीं देते। इनके बच्चों को पढ़ाई-लिखाई करने पर हतोत्साहित किया जाता है। इस उदाहरण में किस मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है?
उत्तर-
इसमें काम के क्षेत्र में दिए गए समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।

प्रश्न 8.
एक मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत का ध्यान देश में मौजूद भूखमरी की स्थिति की तरफ खींचा। भारतीय खाद्य-निगम के गोदामों में 5 करोड़ टन से ज्यादा अनाज भरा हुआ था। शोध से पता चलता है कि अधिकांश राशनं-कार्डधारी यह नहीं जानते कि उचित-मूल्य की दुकानों से कितनी मात्रा में वे अनाज खरीद सकते हैं। मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत से निवेदन किया कि वह सरकार को सार्वजनिक-वितरण प्रणाली में सुधार करने का आदेश दे।
(क) इस मामले में कौन-कौन से अधिकार शामिल हैं? ये अधिकार आपस में किस तरह जुड़े हैं?
(ख) क्या ये अधिकार जीवन के अधिकार का एक अंग हैं?
उत्तर-
(क) इस मामले में कानून के समक्ष समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) और भेदभाव की मनाही (अनुच्छेद 15) शामिल हैं। दोनों अधिकार आपस में एक ही बिन्दु ‘समानता’ को लेकर सम्बन्धित हैं।
(ख) ये अधिकारे जीवन के अधिकार का ही एक अंग हैं।

प्रश्न 9.
इस अध्याय में उद्धृत सोमनाथ लाहिड़ी द्वारा संविधान-सभा में दिए गए वक्तव्य को पढ़ें। क्या आप उनके कथन से सहमत हैं? यदि हाँ, तो इसकी पुष्टि में कुछ उदाहरण दें। यदि नहीं, तो उनके कथन के विरुद्ध तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर
सोमनाथ लाहिड़ी के प्रस्तुत कथन से हम कम ही सहमत हैं क्योंकि अधिकारों में जो दिया गया है उसे वापस भी ले लिया गया है। प्रत्येक अधिकार के बाद एक उपबन्ध शामिल कर दिया गया है जो अधिकार को वापस ले लेता है; जैसे-अनुच्छेद 19 में दिए गए अधिकार में जितनी स्वतन्त्रताएँ दी गई हैं उतने ही बन्धन भी लगा दिए गए हैं। परन्तु इसका आशय यह नहीं है कि संविधान को एक सिपाही का भी निर्वाह करना है। प्रस्तुत अध्याय में नागरिकों के अधिकार दिए गए हैं जिनसे उनका सामाजिक, राजनीतिक, नागरिक, सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकार सम्भव हुआ है। हाँ, भारतीय नागरिकों को प्रदान किए गए अधिकार निरपेक्ष अर्थात् नियन्त्रणहीन (Absolute) नहीं हैं क्योंकि हमारा देश अभी विकासशील देश है, कुछ बन्धनों के साथ ही अधिकार सम्भव हैं।

प्रश्न 10.
आपके अनुसार कौन-सा मौलिक अधिकार सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को संक्षेप में लिखें और तर्क देकर बताएँ कि यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
संवैधानिक उपचारों का अधिकार अन्तिम और सबसे महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकार है; क्योंकि इसके अस्तित्व पर ही समस्त अधिकारों का अस्तित्व आधारित है। इस अधिकार द्वारा नागरिक उच्चतम न्यायालय से अपने अधिकारों की सुरक्षा करा सकते हैं। संविधान के 32 वें अनुच्छेद की प्रशंसा करते हुए डॉ बी० आर० अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था, “यदि मुझसे पूछा जाए कि संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद कौन-सा है, जिसके बिना संविधान शून्य रह जाएगा तो मैं इस अनुच्छेद के अतिरिक्त और किसी दूसरे अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं करूंगा। यह संविधान की आत्मा, उसका हृदय है।” नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा निम्नलिखित पाँच प्रकार के लेख जारी किए जा सकते हैं-

1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) – इसका अर्थ बन्दी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना है। यह उस व्यक्ति की प्रार्थना पर जारी किया जाता है, जो यह समझता है कि उसे अवैधानिक रूप से बन्दी बनाया गया है। इसके द्वारा न्यायालय तुरन्त उस व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित करने का आदेश देता है और उसे अवैधानिक रूप से बन्दी बनाए जाने की स्थिति का सही मूल्यांकन करता है। इसके अतिरिक्त बन्दी बनाने के ढंग का अवलोकन भी करता है और अवैधानिक ढंग से बन्दी बनाए गए व्यक्ति को तुरन्त छोड़ने का आदेश देता है।
2. परमादेश (Mandamus) – जब कोई संस्था या अधिकारी कर्तव्यों का पालन नहीं करता है, जिसके फलस्वरूप किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तब न्यायपालिका
‘परमादेश’ द्वारा उस संस्था या अधिकारी को कर्तव्यों को पूरा करने का आदेश देती है।
3. प्रतिषेध (Prohibition) – यह किसी व्यक्ति या संस्था को उस कार्य से रोकने के लिए जारी किया जाता है, जो अधिकार-क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं है। यदि अध.नस्थ न्यायालय अथवा अर्द्ध-न्यायालय का कोई न्यायाधीश ‘प्रतिषेध’ लेख की उपेक्षा करके कोई अभियोग सुनता है तो उसके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा चलाया जा सकता है।
4. अधिकार-पुच्छा (Quo-warranto) – यदि कोई नागरिक कोई पद या अधिकार अवैधानिक | ढंग से प्राप्त कर लेता है तो उसकी जॉच हेतु यह अधिकार-पृच्छा’ लेख जारी किया जाता है।
5. उत्प्रेषण (Certiorari) – यह लेख उच्च न्यायालयों द्वारा उस समय जारी किया जाता है, जबकि अधीनस्थ न्यायालय का न्यायाधीश किसी ऐसे विवाद की सुनवाई कर रहा है, जो वास्तव में उसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर है। इस लेख द्वारा उनके फैसले को रद्द कर दिया जाता है और उस मुकदमे से सम्बन्धित कागजात अधीनस्थ न्यायालय को उच्चतम न्यायालय को भेजने की आज्ञा दी जाती है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकारों की संख्या है –
(क) सात
(ख) दस
(ग) छः
(घ) पाँच
उत्तर :
(ग) छः

प्रश्न 2.
संविधान के द्वारा किसको वरीयता प्रदान की गयी है?
(क) मौलिक अधिकारों को
(ख) नीति-निदेशक तत्त्वों को
(ग) मौलिक कर्तव्यों को
(घ) मौलिक अधिकारों तथा कर्तव्यों को।
उत्तर :
(क) मौलिक अधिकारों को।

प्रश्न 3.
सम्पत्ति के मौलिक अधिकार को किस संवैधानिक संशोधन के द्वारा समाप्त किया गया है?
(क) 24वें
(ख) 42वें
(ग) 44वें
(घ) 73वें
उत्तर :
(ग) 44वें।

प्रश्न 4.
सम्पत्ति का अधिकार अब रह गया है –
(क) संवैधानिक अधिकार
(ख) मौलिक अधिकार
(ग) कानूनी अधिकार
(घ) प्राकृतिक अधिकार
उत्तर :
(ग) कानूनी अधिकार।

प्रश्न 5.
मौलिक अधिकारों को स्थगित करने का अधिकार है –
(क) राष्ट्रपति को
(ख) प्रधानमन्त्री को
(ग) मन्त्रिमण्डल को।
(घ) लोकसभा के अध्यक्ष को
उत्तर :
(क) राष्ट्रपति को।

प्रश्न 6.
आपातकाल में अब मौलिक अधिकार के किस अनुच्छेद को स्थगित नहीं किया जा सकता है?
(क) अनुच्छेद 14 को
(ख) अनुच्छेद 19 को
(ग) अनुच्छेद 32 को
(घ) अनुच्छेद 21 को
उत्तर :
(घ) अनुच्छेद 21 को।

प्रश्न 7.
छुआछूत का अन्त संविधान के किस अनुच्छेद के द्वारा किया गया ?
(क) अनुच्छेद 14
(ख) अनुच्छेद 19
(ग) अनुच्छेद 21
(घ) अनुच्छेद 17
उत्तर :
(घ) अनुच्छेद 17.

प्रश्न 8.
भारत के संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्यों को किस संवैधानिक संशोधन के द्वारा संविधान के भाग 3 में जोड़ा गया ?
(क) 44वें
(ख) 42वें
(ग) 52वें
(घ) 74वें
उत्तर :
(ख) 42वें।

प्रश्न 9.
मौलिक कर्तव्यों में कितने कर्तव्यों को सम्मिलित किया गया है ?
(क) आठ
(ख) ग्यारह
(ग) पाँच
(घ) बारह
उत्तर :
(ख) ग्यारह।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान में नीति-निदेशक तत्त्वों को किस देश के संविधान से लिया गया है?
(क) कनाडा
(ख) आयरलैण्ड
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) ब्रिटेन
उत्तर :
(ख) आयरलैण्ड।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में नीति-निदेशक सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है ?
(क) 36 से 51 तक
(ख) 52 से 63 तक
(ग) 60 से 71 तक
(घ) 33 से 35 तक
उत्तर :
(क) 36 से 51 तक।

प्रश्न 12.
मोतीलाल नेहरू समिति ने सर्वप्रथम किस वर्ष ‘अधिकारों के एक घोषणा-पत्र की माँग उठाई थी?
(क) 1928
(ख) 1936
(ग) 1931
(घ) 1937
उत्तर :
(क) 1928

प्रश्न 13.
मौलिक अधिकारों की गारण्टी और उनकी सुरक्षा कौन करता है?
(क) राज्यपाल
(ख) राष्ट्रपति
(ग) संविधान
(घ) पुलिस
उत्तर :
(ग) संविधान।

प्रश्न 14.
मूल अधिकारों का वर्णन संविधान के किस भाग में है?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर :
(ख) तीन।

प्रश्न 15.
किस वर्ष भारतीय संविधान में मूल कर्तव्यों का समावेश किया गया?
(क) 1972 ई० में
(ख) 1976 ई० में
(ग) 1977 ई० में
(घ) 1980 ई० में
उत्तर :
(ख) 1976 ई० में।

प्रश्न 16.
“नीति-निदेशक तत्त्व ऐसे चैक के समान हैं, जिसका भुगतान बैंक की पवित्र इच्छा पर निर्भर है।” यह कथन किसका है?
(क) के० टी० शाह
(ख) श्रीनिवासन
(ग) ग्रेनविल ऑस्टिन
(घ) जी० एन० सिंह।
उत्तर :
(क) के० टी० शाह।

प्रश्न 17.
निम्नांकित में से कौन-सा नागरिकों का मूल अधिकार नहीं है?
(क) स्वतन्त्रता का अधिकार
(ख) दान देने का अधिकार
(ग) समानता का अधिकार
(घ) शोषण के विरुद्ध अधिकार
उत्तर :
(ख) दान देने का अधिकार।

प्रश्न 18.
निम्नांकित में कौन-सा मूल अधिकार सबसे महत्त्वपूर्ण है?
(क) समानता का अधिकार
(ख) संवैधानिक उपचारों का अधिकार
(ग) स्वतन्त्रता का अधिकार
(घ) शोषण के विरुद्ध अधिकार
उत्तर :
(ख) संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

प्रश्न 19.
“राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व राष्ट्रीय चेतना के आधारभूत स्तर का निर्माण करते हैं।” यह कथन किसका है?
(क) दुर्गादास बसु
(ख) एम० सी० छागला
(ग) एम० वी० पायली
(घ) पतंजलि शास्त्री
उत्तर :
(ग) एम० वी० पायली।

प्रश्न 20.
“नीति-निदेशक तत्त्व नववर्ष के बधाई सन्देशों के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं।” यह कथन किसका है?
(क) नासिरुद्दीन
(ख) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(ग) पं० नेहरू
(घ) के० टी० शाह
उत्तर :
(क) नासिरुद्दीन।

प्रश्न 21.
“मूल अधिकारों के स्थगन की व्यवस्था अत्यन्त आवश्यक है। यही व्यवस्था संविधान का जीवन होगी। इससे प्रजातन्त्र की हत्या नहीं, वरन रक्षा होगी।” यह कथन किसका
(क) अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर
(ख) डॉ० अम्बेडकर
(ग) के० एम० मुंशी
(घ) आयंगर
उत्तर :
(क) अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर।

प्रश्न 22.
“राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व न्यायालय के लिए प्रकाश-स्तम्भ की भाँति हैं।” यह कथन किसका है?
(क) पतंजलि शास्त्री
(ख) एम० सी० सीतलवाड
(ग) एम० वी० पायली
(घ) पं० नेहरू
उत्तर :
(ख) एम० सी० सीतलवाड।

प्रश्न 23.
दक्षिण अफ्रीका का संविधान किस वर्ष लागू हुआ?
(क) सन् 1996
(ख) सन् 1997
(ग) सन् 1999
(घ) सन् 1967
उत्तर :
(क) सन् 1996.

प्रश्न 24.
निवारक नजरबन्दी की अधिकतम अवधि क्या है?
(क) 3 महीने
(ख) 6 महीने
(ग) 4 महीने
(घ) 2 महीने
उत्तर :
(क) 3 महीने।

प्रश्न 25.
भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन कब किया गया?
(क) सन् 1947
(ख) सन् 2000
(ग) सन् 2001
(घ) सन् 2002
उत्तर :
(ख) सन् 2000.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकार क्या हैं?
उत्तर :
मौलिक अधिकार वे सुविधाएँ, माँगें, अपेक्षाएँ व दावे हैं जिन्हें राज्य ने अपने नागरिकों के विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक मानकर अपने संविधान में स्थान दिया है।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकार आवश्यक क्यों हैं?
उत्तर :
नागरिकों के पूर्ण विकास के लिए मौलिक अधिकार आवश्यक हैं।

प्रश्न 3.
मौलिक अधिकारों की रक्षा किस अधिकार से होती है ?
उत्तर :
मौलिक अधिकारों की रक्षा संवैधानिक उपचार के अधिकार द्वारा होती है।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में कौन-सी मूल अधिकार निरस्त कर दिया गया है ?
उत्तर :
भारतीय संविधान में सम्पत्ति का मूल अधिकार निरस्त कर दिया गया है।

प्रश्न 5.
संवैधानिक उपचारों के अधिकार के अन्तर्गत जारी किये जाने वाले दो लेखों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. परमादेश तथा
  2. प्रतिषेध, संवैधानिक उपचारों के अधिकार के अन्तर्गत जारी किये जाने वाले लेख हैं।

प्रश्न 6.
कानूनी अधिकार क्या हैं?
उत्तर :
कानूनी अधिकार नागरिकों की वे सुविधाएँ हैं जिन्हें राज्य स्वीकृत करता है और जिन्हें कानून द्वारा निश्चित किया जाता है।

प्रश्न 7.
स्वतन्त्रता के अधिकार के अन्तर्गत आने वाली दो स्वतन्त्रताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा
  2. संघ-निर्माण की स्वतन्त्रता।

प्रश्न 8.
संविधान के किस भाग में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर :
संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है।

प्रश्न 9.
‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है।’ दो तर्क दीजिए।
उत्तर :

  1. सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार है।
  2. सरकार द्वारा किसी विशिष्ट धर्म को आश्रय नहीं दिया जाता, वह धर्मनिरपेक्ष है।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में मूल कर्त्तव्य दिए गए हैं?
उत्तर :
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (क) में मूल कर्त्तव्य दिए गए हैं।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान में कितने मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है?
उत्तर :
भारतीय संविधान में 11 मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है।

प्रश्न 12.
राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों का वर्णन संविधान के किस भाग में किया गया है?
उत्तर :
राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का वर्णन संविधान के भाग IV में किया गया है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान के अनुसार किन्हीं दो निदेशक सिद्धान्तों (तत्त्वों) को लिखिए।
उत्तर :

  1. आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी तत्त्व
  2. सामाजिक प्रगति सम्बन्धी तत्त्व।

प्रश्न 14.
राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों की विधि अथवा वैज्ञानिक स्थिति क्या है?
उत्तर :
नीति-निदेशक सिद्धान्तों की सुरक्षा की माँग न्यायालय से नहीं की जा सकती, क्योंकि इनके पीछे बाध्यकारी कानूनी शक्ति नहीं है।

प्रश्न 15.
भारतीय संविधान के नीति-निदेशक तत्त्व किस देश के संविधान से लिये गए हैं?
उत्तर :
भारतीय संविधान के नीति-निदेशक तत्त्व आयरलैण्ड के संविधान से लिए गए हैं।

प्रश्न 16.
शोषण के विरुद्ध अधिकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
शोषण के विरुद्ध अधिकार का अर्थ है –

  1. कोई भी व्यक्ति किसी से बलात् श्रम नहीं करवा सकता।
  2. स्त्रियों तथा बच्चों का क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 17.
संविधान के किस संशोधन के द्वारा मूल कर्तव्यों का प्रावधान किया गया है ?
उत्तर :
संविधान के-42वें संशोधन (1976) के द्वारा मूल कर्तव्यों का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 18.
संविधान में वर्णित भारतीय नागरिकों का एक कर्तव्य लिखिए।
उत्तर :
संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का आदर करना भारतीय नागरिकों का एक कर्तव्य है।

प्रश्न 19.
संविधान द्वारा मूल अधिकारों का संरक्षक किसे बनाया गया है ?
उत्तर :
संविधान द्वारा मूल अधिकारों का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय को बनाया गया है।

प्रश्न 20.
मूल अधिकारों का स्थगन कैसे किया जा सकता है ?
या
मौलिक अधिकार कब स्थगित किये जा सकते हैं ?
उत्तर :

  1. संकटकाल की घोषणा की स्थिति में
  2. सेना में अनुशासन बनाये रखने के लिए तथा
  3. मार्शल लॉ लागू होने पर मौलिक अधिकार स्थगित किये जा सकते हैं।

प्रश्न 21.
भारतीय नागरिकों के दो मूल कर्त्तव्य लिखिए।
उत्तर :
भारतीय नागरिकों के दो मूल कर्तव्य हैं –

  1. संविधान का पालन करना, राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रकट करना।
  2. भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करना।

प्रश्न 22.
भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में नीति-निदेशक सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है ?
उत्तर :
नीति-निदेशक सिद्धान्तों का वर्णन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51 तक में किया गया है।

प्रश्न 23.
किन्हीं दो नीति-निदेशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. राज्य प्रत्येक स्त्री और पुरुष को समान रूप से जीविका के साधन प्रदान करने का प्रयत्न करेगा।
  2. राज्य 14 वर्ष तक के बालकों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करेगा।

प्रश्न 24.
नीति-निदेशक सिद्धान्त का कोई एक महत्त्व लिखिए।
उत्तर :
नीति-निदेशक सिद्धान्त सत्तारूढ़ दल के लिए आचार-संहिता का कार्य करते हैं।

प्रश्न 25.
नीति-निदेशक सिद्धान्तों की आलोचना का एक प्रमुख आधार लिखिए।
उत्तर :
नीति-निदेशक सिद्धान्तों के पीछे वैधानिक शक्ति का अभाव है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकारों का अर्थ और परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
वे अधिकार, जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाते हैं, ‘मौलिक अधिकार’ कहलाते हैं। व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका द्वारा इनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। देश की न्यायपालिका एक प्रहरी की भाँति इन अधिकारों की सुरक्षा करती है। राज्य का मुख्य उद्देश्य नागरिकों का चहुंमुखी विकास व उनका कल्याण करना है। इसलिए संविधान द्वारा नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय संविधान द्वारा भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। जी० एन० जोशी का कथन है, “मौलिक अधिकार ही ऐसा साधन है, जिसके द्वारा एक स्वतन्त्र लोकराज्य के नागरिक अपने सामाजिक, धार्मिक तथा नागरिक जीवन का आनन्द उठा सकते हैं। इनके बिना लोकतन्त्रीय शासन सफलतापूर्वक नहीं चल सकता और बहुमत की ओर से अत्याचारों का खतरा बना रहता है।”

प्रश्न 2.
बन्दी प्रत्यक्षीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
बन्दी प्रत्यक्षीकरण एक प्रकार का न्यायालयीय आदेश होता है। न्यायालय बन्दी बनाये गये व्यक्ति अथवा उसके सम्बन्धी की प्रार्थना पर यह आदेश दे सकता है कि बन्दी व्यक्ति को उसके सामने उपस्थित किया जाए। तत्पश्चात् न्यायालय यह जाँच कर सकता है कि बन्दी की गिरफ्तारी कानून के अनुसार वैध है अथवा नहीं। यह अधिकार नागरिक की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।

प्रश्न 3.
भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों पर किन परिस्थितियों में प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है ?
उत्तर :
भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। इन पर राष्ट्र की एकता, अखण्डता, शान्ति एवं सुरक्षा तथा अन्य राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के आधार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। संविधान द्वारा अग्रलिखित परिस्थितियों में नागरिकों के मौलिक (मूल) अधिकारों पर प्रतिबन्ध लगाये जाने की व्यवस्था की गयी है –

  1. आपातकालीन स्थिति में नागरिकों के मूल अधिकार स्थगित किये जा सकते हैं।
  2. संविधान में संशोधन करके नागरिकों के मूल अधिकार कम या समाप्त किये जा सकते हैं।
  3. सेना में अनुशासन बनाये रखने की दृष्टि से भी इन्हें सीमित या नियन्त्रित किया जा सकता है।
  4. जिन क्षेत्रों में मार्शल लॉ (सैनिक कानून) लागू होता है वहाँ भी मूल अधिकार स्थगित हो जाते
  5. नागरिकों द्वारा मूल अधिकारों का दुरुपयोग करने पर सरकार इन्हें निलम्बित कर सकती है।

प्रश्न 4.
मौलिक अधिकारों तथा नीति-निदेशक तत्त्वों में क्या अन्तर है?
उत्तर :
मौलिक अधिकारों तथा नीति-निदेशक तत्त्वों में अन्तर निम्नवत् हैं –

  1. मौलिक अधिकार, भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिये गये हैं। नीति-निदेशक तत्त्व केन्द्र तथा राज्य सरकारों के मार्गदर्शन के लिए निर्देश मात्र हैं।
  2. मौलिक अधिकारों का हनन होने पर न्यायालय की शरण ली जा सकती है। नीति-निदेशक तत्त्वों की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण नहीं ली जा सकती।
  3. मौलिक अधिकारों का उद्देश्य राजनीतिक लोकतन्त्र की स्थापना करना होता है। नीति-निदेशक तत्त्वों का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है।
  4. मौलिक अधिकार नागरिक के व्यक्तिगत विकास तथा स्वतन्त्रता पर अधिक बल देते हैं। नीति-निदेशक तत्त्व आर्थिक और सामाजिक स्वतन्त्रता पर अधिक बल देते हैं।
  5. मौलिक अधिकार निषेधात्मक आदेश हैं। नीति-निदेशक तत्त्व सकारात्मक निर्देश मात्र हैं।
  6. मौलिक अधिकारों के पीछे न्यायिक शक्ति होती है। नीति-निदेशक तत्त्वों के पीछे जनमत की शक्ति होती है।

प्रश्न 5.
नीति-निदेशक तत्त्वों को संविधान में समाविष्ट करने का क्या उद्देश्य है ?
उत्तर :
भारतीय संविधान में केन्द्र तथा राज्य सरकारों के मार्गदर्शन के लिए कुछ सिद्धान्त दिये गये हैं, जिन्हें राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्त या तत्त्व कहा जाता है। संविधान में इन तत्त्वों का समावेश करने का प्रमुख उद्देश्य भारत में वास्तविक लोकतन्त्र और समाजवादी एवं कल्याणकारी शासन की स्थापना करना है। इसके अतिरिक्त, सामाजिक पुनर्निर्माण, आर्थिक विकास, सांस्कृतिक प्रगति तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना भी नीति-निदेशक तत्त्वों के उद्देश्य हैं।

प्रश्न 6.
नीति-निदेशक सिद्धान्तों की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
नीति-निदेशक तत्त्वों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

(1) संविधान का उद्देश्य – संविधान की प्रस्तावना में संविधान का उद्देश्य लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना बताया गया है। नीति-निदेशक तत्त्व इस उद्देश्य को साकार रूप देते हैं। राज्य अधिक-से-अधिक प्रभावी रूप में, ऐसी सामाजिक व्यवस्था तथा सुरक्षा द्वारा जिसमें आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक न्याय भी प्राप्त हो, जनता के हित के विकास को प्रयत्न करेगा और राष्ट्रीय जीवन की प्रत्येक संस्था को इस सम्बन्ध में सूचित करेगा। इस प्रकार नीति-निदेशक तत्त्व आर्थिक तथा सामाजिक प्रजातन्त्र की स्थापना कर एक समाजवादी पद्धति के समाज की स्थापना करना चाहते हैं।

(2) अनुदेश पत्र – राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व ऐसे निर्देश हैं, जिनका पालन राज्य की व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका को करना चाहिए।

(3) वैधानिक बल का अभाव – नीति-निदेशक तत्त्व यद्यपि संविधान के अंग हैं, फिर भी उन्हें 1किसी न्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता।

(4) देश के शासन के आधारभूत सिद्धान्त – ये सिद्धान्त मूलभूत सिद्धान्त माने जाएँगे। राज्य का यह कर्त्तव्य होगा कि कानून का निर्माण करते समय वह इन सिद्धान्तों को ध्यान में रखे। प्रशासकों के लिए ये सिद्धान्त एक आचरण संहिता हैं, जिनका अनुपालन वे अपने दायित्वों को | निभाते समय करेंगे। न्यायालय भी न्याय करते समय इन सिद्धान्तों को प्राथमिकता प्रदान करेंगे।

प्रश्न 7.
नीति-निदेशक तत्त्वों की आलोचना का आधार बताइए।
उत्तर :
नीति-निदेशक तत्त्वों की आलोचना के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

(1) कानूनी शक्ति का अभाव – कुछ आलोचक इने तत्त्वों को किसी भी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं मानते। उनका यह तर्क है कि जब सरकार इन्हें मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य ही नहीं है, तो इनका कोई महत्त्व नहीं है। इन सिद्धान्तों पर व्यंग्य करते हुए प्रो० के० टी० शाह ने लिखा है। कि, “ये सिद्धान्त उस चेक के समान हैं, जिसका भुगतान बैंक केवल समर्थ होने की स्थिति में ही कर सकता है।”

(2) निदेशक तत्त्व काल्पनिक आदर्श मात्र – आलोचकों के अनुसार नीति-निदेशक तत्त्व व्यावहारिकता से कोसों दूर केवल एक कल्पना मात्र हैं। इन्हें क्रियान्वित करना बहुत दूर की बात है। एन० आर० राघवाचारी के शब्दों में, “नीति-निदेशक तत्त्वों का उद्देश्य जनता को मूर्ख बनाना वे बहकाना ही है।”

(3) संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न होने का भय – इन सिद्धान्तों से संवैधानिक गतिरोध भी उत्पन्न हो सकता है। राज्य जब इन तत्त्वों के अनुरूप अपनी नीतियों का निर्माण करेगा तो ऐसी स्थिति में मौलिक अधिकारों के अतिक्रमण की सम्भावना बढ़ जाएगी।

(4) सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य में अस्वाभाविक – ये तत्त्व एक सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य में अस्वाभाविक तथा अप्राकृतिक हैं। विद्वानों ने नीति-निदेशक तत्त्वों की अनेक दृष्टिकोणों के आधार पर आलोचना की है, परन्तु इन आलोचनाओं के द्वारा इन तत्त्वों का महत्त्व कम नहीं हो जाता। ये हमारे आर्थिक लोकतन्त्र के आधार-स्तम्भ हैं।

प्रश्न 8.
मौलिक अधिकारों की संक्षेप में आलोचना कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है –

  1. इनमें शिक्षा प्राप्त करने, काम पाने, आराम करने तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक महत्त्वपूर्ण अधिकारों का अभाव देखने को मिलता है।
  2. मौलिक अधिकारों पर इतने अधिक प्रतिबन्ध लगा दिए गए हैं कि उनके स्वतन्त्र उपभोग पर स्वयमेव प्रश्न-चिह्न लग जाता है। अत: कुछ आलोचकों ने यहाँ तक कह दिया है कि भाग चार का शीर्षक नीति-निदेशक तत्त्वों के स्थान पर ‘नीति-निदेशक तत्त्व तथा उनके ऊपर प्रतिबन्ध ज्यादा उपयुक्त प्रतीत होता है।
  3. शासन द्वारा मौलिक अधिकारों के स्थगन की व्यवस्था दोषपूर्ण है।
  4. निवारक-निरोध द्वारा स्वतन्त्रता के अधिकार को सीमित कर दिया गया है।
  5. संकटकाल में कार्यपालिका को असीमित शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 9.
मौलिक अधिकारों के स्थगन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मौलिक अधिकारों में विशेष परिस्थितियों के निमित्त संविधान में संशोधन द्वारा संसद अधिकार अस्थायी रूप से भी स्थगित किए जा सकते हैं या काफी सीमा तक सीमित किए जा सकते हैं। इसलिए आलोचकों का विचार है कि संविधान के इस अनुच्छेद का लाभ उठाकर देश में कभी भी सरकार तानाशाह बन सकती है। किन्तु ऐसा सोचना या कहना गलत है; क्योंकि ऐसा सरकार अपने हित में नहीं, वरन् लोकहित में करती है। असाधारण परिस्थितियों में देश और राष्ट्र का हित व्यक्तिगत हित से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, इसीलिए विशेष परिस्थितियों में ही मौलिक अधिकारों को स्थगित या सीमित किया जाता है। अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर के शब्दों में, “यह व्यवस्था अत्यन्त आवश्यक है। यही व्यवस्था संविधान का जीवन होगी। इससे प्रजातन्त्र की हत्या नहीं, वरन् सुरक्षा होगी।”

प्रश्न 10.
नीति-निदेशक तत्त्वों के दोषों का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
नीति-निदेशक तत्त्वों के निम्नलिखित दोष हैं –

  1. इन तत्त्वों के पीछे कोई संवैधानिक शक्ति नहीं है। अतः निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि राज्य इनका पालन करेगा भी या नहीं और यदि करेगा तो किस सीमा तक।
  2. ये तत्त्व काल्पनिक आदर्श मात्र हैं। कैम्पसन के अनुसार, “जो लक्ष्य निश्चित किए गए हैं, उनमें से कुछ का तो सम्भावित कार्यक्रम की वास्तविकता से बहुत ही थोड़ा सम्बन्ध है।”
  3. नीति-निदेशक तत्त्व एक सम्प्रभु राज्य में अप्राकृतिक प्रतीत होते हैं।
  4. संवैधानिक विधिवेत्ताओं ने आशंका व्यक्त की है कि ये तत्त्व संवैधानिक द्वन्द्व और गतिरोध के कारण भी बन सकते हैं।
  5. इन तत्त्वों में अनेक सिद्धान्त अस्पष्ट तथा तर्कहीन हैं। इन तत्त्वों में एक ही बात को बार-बार दोहराया गया है।
  6. इन तत्त्वों की व्यावहारिकता व औचित्य को भी कुछ आलोचकों के द्वारा चुनौती दी गई है।
  7. एक प्रभुतासम्पन्न राज्य में इस प्रकार के सिद्धान्त को ग्रहण करना अस्वाभाविक ही प्रतीत होता है। विधि-विशेषज्ञों के दृष्टिकोण के अनुसार एक प्रभुतासम्पन्न राज्य के लिए इस प्रकार के आदेशों का कोई औचित्य नहीं है।

प्रश्न 11.
अधिकार-पत्र किसे कहते हैं? क्या प्रत्येक देश में अधिकार-पत्र का होना आवश्यक है?
उत्तर :

अधिकार-पत्र से आशय

जब किसी देश के नागरिकों को दिए जाने वाले अधिकारों की संवैधानिक घोषणा की जाती है अर्थात् नागरिकों के अधिकारों को संविधान में अंकित किया जाता है तो उसे ‘अधिकार पत्र’ कहते हैं। सर्वप्रथम अमेरिका के संविधान में अधिकार-पत्र की व्यवस्था की गई थी। संविधान के विभिन्न संशोधनों द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई और उन्हें अधिकार-पत्र नाम दिया गया। अब अधिकतर देशों में अधिकार-पत्र की व्यवस्था है। भारत में नागरिकों के अधिकारों को अधिकार-पत्र का नाम न देकर मौलिक अधिकारों का नाम दिया गया है।

प्रत्येक देश में अधिकार-पत्र की व्यवस्था आवश्यक नहीं-यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक देश में अधिकार-पत्र की व्यवस्था हो। इंग्लैण्ड के संविधान में अधिकार-पत्र की कोई व्यवस्था नहीं है। यह भी आवश्यक नहीं है कि इसकी व्यवस्था लोकतान्त्रिक देश में ही होती है। चीन में अधिकार-पत्र की व्यवस्था है। वह गणतान्त्रिक देश है।

प्रश्न 12.
मौलिक अधिकारों की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
मौलिक अधिकारों की विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मौलिक अधिकारों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मौलिक अधिकार देश के सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त हैं।
  2. इन अधिकारों का संरक्षक न्यायपालिका को बनाया गया है।
  3. राष्ट्र की सुरक्षा तथा समाज के हित में इन अधिकारों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।
  4. इन अधिकारों द्वारा सरकार की निरंकुशता पर अंकुश लगाया गया है।
  5. केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार ऐसे कानूनों का निर्माण नहीं करेगी जो मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हों।
  6. मौलिक अधिकार न्याययुक्त होते हैं।
  7. मौलिक अधिकारों की प्रकृति सकारात्मक होती है।

प्रश्न 13.
संवैधानिक उपचारों के अधिकार को स्पष्ट कीजिए।
या
संवैधानिक उपचारों के अधिकार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु भारतीय नागरिकों को संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्रदान किया गया है। इस अधिकार का तात्पर्य यह है कि यदि राज्य या केन्द्र सरकार नागरिकों को दिये गये मौलिक अधिकारों को किसी भी प्रकार से नियन्त्रित करने का प्रयास करती है या उनका हनन करती है, तो उसके लिए उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में सरकार की नीतियों अथवा कानूनों के विरुद्ध अपील की जा सकती है।

दीर्घ लनु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौलिक अधिकारों का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
प्रजातन्त्र में नागरिकों को उनके सर्वांगीण विकास के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण सुविधाएँ तथा स्वतन्त्रताएँ प्रदान की जाती हैं। इन्हीं सुविधाओं तथा स्वतन्त्रताओं को मूल या मौलिक अधिकार कहा जाता है। ‘मूल’ का अर्थ होता है-जड़। वृक्ष के लिए जो महत्त्व जड़ का होता है, वही महत्त्व नागरिकों के लिए इन अधिकारों का है। जिस प्रकार जड़ के बिना वृक्ष का अस्तित्व सम्भव नहीं है, उसी प्रकार मौलिक अधिकारों के बिना नागरिकों का शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास सम्भव नहीं है। प्रजातन्त्रीय देशों में इनका उल्लेख संविधान में कर दिया जाता है, जिससे सरकार आसानी से इन्हें संशोधित या समाप्त न कर सके।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को स्पष्ट उल्लेख किया गया है जिससे सत्तारूढ़ दल मनमानी न कर सके। सरकार की निरंकुशता के विरुद्ध मौलिक अधिकार प्रतिरोध का कार्य करते हैं। विधानमण्डल द्वारा निर्मित कोई भी कानून जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है, न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा सकता है। भारत में मौलिक अधिकारों का महत्त्व डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है, “मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद के बिना संविधान अधूरा रह जाएगा। ये संविधान की आत्मा और हृदय हैं।”

प्रश्न 2.
धार्मिक स्वतन्त्रता को अधिकार क्या है ?
उत्तर :
संविधान ने प्रत्येक नागरिक को धर्म के सन्दर्भ में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की है। व्यक्ति को धर्म के क्षेत्र में पूर्ण स्वतन्त्रता इस दृष्टि से प्रदान की गयी है कि वह अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को स्वीकार करे तथा अपने ढंग से अपने इष्ट की आराधना करे। व्यक्तियों को यह भी स्वतन्त्रता है कि वह अपनी रुचि के अनुसार धार्मिक संस्थाओं का निर्माण एवं अपने धर्म का प्रचार करे। इस प्रकार सभी धार्मिक सन्दर्भो में प्रत्येक नागरिक पूर्ण स्वतन्त्र है। ऐसा करने में संविधान का मुख्य उद्देश्य धर्म के नाम पर होने वाले विवादों का अन्त करना था। अनुच्छेद 25 के अनुसार, सभी व्यक्तियों को, चाहे वे नागरिक हों या विदेशी, अन्त:करण की स्वतन्त्रता तथा किसी भी धर्म को स्वीकार करने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतन्त्रता है अनुच्छेद 26 के अनुसार, धार्मिक मामलों के प्रबन्ध की भी स्वतन्त्रता है। अनुच्छेद 47 के आधार पर, धार्मिक कार्यों के लिए व्यय की जाने वाली राशि को कर से मुक्त किया गया है अनुच्छेद 28 के अनुसार, राजकीय निधि से चलने वाली किसी भी शिक्षण-संस्था में किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।

प्रतिबन्ध – किन्हीं विशेष कारणों या परिस्थितियोंवश किसी विशेष धर्म के प्रचार या धार्मिक संस्थान पर सरकार को प्रतिबन्ध लगाने का पूर्ण अधिकार है।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान में वर्णित नागरिकों के मौलिक कर्तव्य लिखिए।
उत्तर :

नागरिकों के मौलिक कर्तव्य

भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान का निर्माण करते समय मौलिक कर्तव्यों को संविधान में सम्मिलित नहीं किया था, परन्तु 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्यों को संविधान में सम्मिलित किया गया जिनकी संख्या 10 थी, लेकिन 86वें संविधान संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा इसमें एक और बिन्दु जोड़ा गया। अतः अब इनकी संख्या 11 हो गई है

  1. संविधान, राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रगान का सम्मान करना।
  2. राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के उद्देश्यों का आदर करना और उनका अनुगमन करना।
  3. भारत की प्रभुसत्ता, एकता और अखण्डता का समर्थन व सुरक्षा करना।
  4. देश की रक्षा करना तथा राष्ट्रीय सेवाओं में आवश्यकता के समय भाग लेना।
  5. भारत में सभी नागरिकों में भ्रातृत्व-भावना विकसित करना।
  6. प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को सुरक्षित रखना।
  7. वनों, झीलों व जंगली जानवरों की सुरक्षा तथा उनकी उन्नति के लिए प्रयत्न करना।
  8. वैज्ञानिक तथा मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाना।
  9. हिंसा को रोकना तथा सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना।
  10. व्यक्तिगत तथा सामूहिक प्रयासों के द्वारा उच्च राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना।
  11. 6 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के बच्चे के माता-पिता को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने के लिए अवसर उपलब्ध कराना।

प्रश्न 4.
नीति-निदेशक तत्त्वों को सरकार ने किस सीमा तक लागू किया है?
उत्तर :
सरकार द्वारा नीति-निदेशक तत्त्वों को लागू करने के बावजूद विगत वर्षों में लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना तो सम्भव नहीं हो सकी, परन्तु इस दिशा में प्रगति अवश्य हुई। है। नीति-निदेशक तत्त्वों को लागू करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम सराहनीय हैं; यथा –

(i) पंचवर्षीय योजनाओं के आधार पर कृषि और उद्योगों की उन्नति, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं का प्रसार, सरकारी सेवाओं पर आर्थिक संसाधनों, साधनों में वृद्धि, राष्ट्रीय आय व लोगों के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने के प्रयत्न किए गए हैं।

(ii) युवा वर्ग और बच्चों के शोषण से सुरक्षा करने के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। बीमारी और दुर्घटना के विरुद्ध सुरक्षा के लिए मजदूर वर्ग में बीमा योजनाएँ लागू की गई हैं व बेरोजगारी बीमा योजना को लागू करने और रोजगार की सुविधाएँ बढ़ाने के प्रयत्न किए जा रहे हैं।

(iii) ‘हिन्दू कोड बिल’ के कई अंशों; जैसे- ‘हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955′, ‘हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम, 1956’ आदि; को पारित करके देश के सभी वर्गों के लिए समान विधि संहिता लागू करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं।

(iv) अस्पृश्यता निवारण के लिए तथा अनुसूचित व पिछड़ी जातियों के बच्चों को उदारतापूर्वक छात्रवृत्ति और अन्य सुविधाओं द्वारा शिक्षा प्रदान करने के मार्ग में अभूतपूर्व प्रगति हुई है।

(v) यद्यपि अब भी नि:शुल्क और अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा सबके लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा का प्रबन्ध अपूर्ण है, तथापि इन दिशाओं में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है। लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण और सामुदायिक विकास योजनाओं द्वारा ग्राम पंचायतों और पंचायत राज को भी अधिक सशक्त बना दिया गया है। संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक आधार प्रदान किया गया है। महिलाओं की सहभागिता को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उनके लिए 33.33 प्रतिशत आरक्षण की पंचायती राज संस्थाओं में व्यवस्था की गई है तथा संसद एवं विधानमण्डलों में भी प्रावधान पर विचार चल रहा है। पंचायतों की शक्तियों, अधिकारों तथा कार्यों में भी वृद्धि की गई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान में वर्णित नागरिकों के मौलिक अधिकारों में समानता के अधिकार का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिये गये मूल अधिकारों में स्वतन्त्रता के अधिकार का सविस्तार वर्णन कीजिए।
या
मौलिक अधिकार क्या हैं ? भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
संविधान में वर्णित नागरिकों के मौलिक अधिकारों में संवैधानिक उपचारों के अधिकार का वर्णन कीजिए और इनका महत्त्व बताइए।
उत्तर :
वे अधिकार, जो मानव-जीवन के लिए आवश्यक एवं अपरिहार्य हैं तथा संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। इन अधिकारों का व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका द्वारा भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका ऐसे समस्त कानूनों को अवैध घोषित कर सकती है, जो संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन अथवा अतिक्रमण करते हैं। मौलिक अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व से सम्बद्ध रहते हैं। अत: राज्य द्वारा निर्मित किसी भी कानून से ऊपर होते हैं। इनमें किसी प्रकार का संशोधन केवल संविधान संशोधन के आधार पर ही किया जा सकता है। भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार एक विस्तृत अधिकार-पत्र के रूप में हैं। मौलिक अधिकार संविधान के भाग 3 में वर्णित किये गये हैं। भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का विशिष्ट विवेचन किया गया है। इसके द्वारा भारतीय नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किये गये थे, किन्तु 44वें संवैधानिक संशोधन (1979) द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में समाप्त कर दिया गया है। अब सम्पत्ति का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार के रूप में है।

मौलिक अधिकारों के प्रकार

भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित छ: मौलिक अधिकार प्राप्त हैं –

(i) समानता का अधिकार
संविधान द्वारा निम्नलिखित पाँच प्रकार की समानताएँ प्रदान की गयी हैं –

(1) कानून के क्षेत्र में समानता(अनुच्छेद 14) – संविधान में, कानून के क्षेत्र में सभी नागरिकों को समान अधिकार दिये गये हैं। कानून की दृष्टि में न कोई छोटा है न बड़ा। वह निर्धन को हीन दृष्टि से नहीं देखता और धनवान को भी विशेष महत्त्व नहीं देता। तात्पर्य यह है कि वह सभी को समान दृष्टि से देखता है। धर्म-लिंग के आधार पर भी किसी से किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता।

(2) सार्वजनिक स्थानों के उपभोग में समानता (अनुच्छेद 15) – संविधान में यह स्पष्ट लिखा है कि सार्वजनिक स्थानों; जैसे – तालाबों, नहरों, पार्को आदि सभी का, सभी नागरिक बिना किसी भेदभाव के उपभोग करने के समान अधिकारी हैं।

(3) सरकारी नौकरियों में समानता (अनुच्छेद 16) – सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के समय किसी के साथ धर्म, लिंग, जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा और नियुक्ति या पदोन्नति का आधार केवल योग्यता को माना जाएगा। इस अधिकार का अपवाद यह है कि अनुसूचित जाति- जनजातियों के लिए नौकरियों में कुछ स्थान सुरक्षित कर दिये गये हैं। राज्य पिछड़े वर्गों के लिए भी स्थानों का आरक्षण कर सकता है। इसके अतिरिक्त राज्य कुछ पदों के लिए आवास की योग्यता भी निर्धारित कर सकता है।

(4) अस्पृश्यता का अन्त (अनुच्छेद 17) – अनुसूचित जातियों के उत्थान और उनमें स्वाभिमान की भावना जगाने तथा उनका विकास करने के उद्देश्य से अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया गया है।

(5) उपाधियों का अन्त (अनुच्छेद 18) – व्यक्तियों में पारस्परिक भेदभाव, ऊँच-नीच की भावना को समाप्त कर, समाज में समानता स्थापित करने के उद्देश्य से, संविधान ने अंग्रेजी शासन द्वारा दी जाने वाली सभी उपाधियों को निरस्त कर दिया है। अब केवल शैक्षिक और सैनिक उपाधियाँ ही दी जाती हैं।

अपवाद – उपर्युक्त क्षेत्रों में समानता का सिद्धान्त लागू किया गया है, फिर भी मानव-हितों और उनके उत्थान को ध्यान में रखकर सरकार कुछ क्षेत्रों में इन नियमों की अवहेलना भी कर सकती है।

(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार

(1) अनुच्छेद 19 द्वारा इस अधिकार से सम्बन्धित निम्नलिखित छः स्वतन्त्रताएँ नागरिकों को प्राप्त हैं –

  1. भाषण द्वारा विचाराभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता-संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को भाषण के रूप में अपने विचार व्यक्त करने एवं अपने विचारों को पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराने की स्वतन्त्रता प्रदान की है।
  2. सभा करने की स्वतन्त्रता संविधान ने नागरिकों को शान्तिपूर्वक सभा व सम्मेलन करने की भी स्वतन्त्रता प्रदान की है।
  3. व्यवसाय की स्वतन्त्रता–प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार व्यवसाय करने के लिए स्वतन्त्र है।
  4. संघ या समुदाय के निर्माण की स्वतन्त्रता-नागरिकों को मानव-हितों के लिए समुदायों अथवा संघों के निर्माण की स्वतन्त्रता है।
  5. भ्रमण की स्वतन्त्रता-संविधान ने नागरिकों को देश की सीमाओं के अन्दर स्वतन्त्रतापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने की पूर्ण स्वतन्त्रता दी है।
  6. आवास की स्वतन्त्रता प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की स्वतन्त्रता दी गयी है कि वह अपनी स्थिति के अनुसार किसी भी स्थान पर रहे।

अपवाद – समाज तथा राष्ट्र के हित में सरकार के द्वारा स्वतन्त्रता के अधिकार पर भी विवेकपूर्ण प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं।

(2) अपराधों की दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण – अनुच्छेद 20 के अनुसार

(क) किसी व्यक्ति को उस समय तक दण्ड नहीं दिया जा सकता, जब तक कि उसने किसी प्रचलित कानून को न तोड़ा हो तथा
(ख) उसे स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं किया जा सकता।

(3) जीवन और शरीर-रक्षण का अधिकार अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति की प्राण अथवा दैहिक स्वतन्त्रता को केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर, अन्य किसी प्रकार से वंचित नहीं किया जाएगा।

(4) बन्दीकरण के संरक्षण की स्वतन्त्रता-अनुच्छेद 22 के अनुसार

(क) प्रत्येक बन्दी को बन्दी होने का कारण जानने का अधिकार दिया गया है तथा
(ख) किसी को बन्दी बनाने के बाद उसे 24 घण्टे के अन्दर ही किसी न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित करना आवश्यक है।

(iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार

संविधान में अनुच्छेद 23 व 24 को सम्मिलित करने का उद्देश्य यह था कि कोई किसी का शोषण ने कर सके। अतः संविधान द्वारा यह घोषणा की गयी है कि –

  1. किसी व्यक्ति से बेगार और बलपूर्वक काम नहीं लिया जाएगा।
  2. चौदह वर्ष से कम आयु के बालक-बालिकाओं से खानों, कारखानों तथा स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालने वाले स्थानों पर काम नहीं लिया जाएगा।
  3. स्त्रियों व बच्चों का क्रय-विक्रय करना अपराध है। अपवाद-राज्य सार्वजनिक कार्यों के लिए नागरिकों की अनिवार्य सेवाएँ प्राप्त कर सकता है।

(iv) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार

संविधान ने भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करने के उद्देश्य से प्रत्येक नागरिक को पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की है अर्थात् प्रत्येक नागरिक अपनी अन्तरात्मा के अनुसार कोई भी धर्म स्वीकार कर सकता है, अपने धर्म की प्रथा के अनुसार आराधना कर सकता है तथा अपने धर्म का प्रचार-प्रसार कर सकता है (अनुच्छेद 25)। सभी व्यक्तियों को धार्मिक मामलों एवं संस्थाओं का प्रबन्ध करने की भी स्वतन्त्रता है (अनुच्छेद 26)। राज्य किसी भी धर्म के साथ पक्षपात नहीं करेगा। इसका आशय यह है कि राज्य धार्मिक मामलों में पूर्णरूप से तटस्थ है और धर्म, व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसके अतिरिक्त, नागरिकों पर किसी प्रकार का धार्मिक कर नहीं लगाया जाएगा (अनुच्छेद 27)। यह भी घोषणा की गयी है कि सरकारी अथवा सरकारी सहायता या मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्था में किसी धर्म-विशेष की शिक्षा नहीं दी जा सकती है (अनुच्छेद 28)। इसके अतिरिक्त 42वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘पन्थनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया है।

अपवाद – अन्य अधिकारों की भाँति इस अधिकार पर भी कुछ प्रतिबन्ध हैं। सरकार किसी भी ऐसे धार्मिक आचरण पर कानून बनाकर रोक लगा सकती है, जिससे सामाजिक या राष्ट्रीय हितों को कोई खतरा पहुँचता हो।

(v) सांस्कृतिक व शिक्षा-सम्बन्धी अधिकार

  1. अनुच्छेद 29 के अनुसार प्रत्येक भाषा-भाषी को अपनी संस्कृति, भाषा और लिपि को सुरक्षित रखने का अधिकार है।
  2. प्रत्येक व्यक्ति को राज्य द्वारा स्थापित या राज्य द्वारा दी गयी आर्थिक सहायता से चल रहे शिक्षण संस्थान में प्रवेश लेने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या वर्ग से सम्बन्ध रखता हो।
  3. अनुच्छेद 30 के अनुसार प्रत्येक वर्ग के व्यक्तियों को अपनी इच्छानुसार शिक्षण संस्थाएँ खोलने का अधिकार दिया गया है।
  4. संविधान संशोधन, 93 (2001) के अनुसार 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार दिया गया है।

(vi) संवैधानिके उपचारों का अधिकार

उपर्युक्त मूल अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान में अनुच्छेद 32 के अनुसार संवैधानिक उपचारों का अधिकार भी सम्मिलित किया गया है। इस अधिकार का तात्पर्य यह है कि यदि राज्य या सरकार, नागरिक को दिये गये मूल अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध लगाती है या उनका अतिक्रमण करती है तो वे उसके लिए उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं। नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित पाँच प्रकार के लेख जारी किये जाते हैं –

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  2. परमादेश (Mandamus)
  3. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto)
  4. प्रतिषेध (Prohibition)
  5. उत्प्रेषण लेख (Certiorari)।

अपवाद – व्यक्तियों के द्वारा साधारण परिस्थितियों में ही न्यायालय की शरण लेकर अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। आपातकाल में कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय में प्रार्थना नहीं कर सकता।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि नागरिकों को संविधान के द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। मौलिक अधिकार व्यक्ति-स्वातन्त्र्य तथा अधिकारों के हित में राज्य की शक्ति पर प्रतिबन्ध लगाने के श्रेष्ठ उपाय हैं। भारत ही नहीं वरन् विश्व के अधिकांश राष्ट्रों में वर्तमान समय में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था ने एक सर्वमान्य अवधारणा का रूप धारण कर लिया है।

मौलिक अधिकारों का महत्त्व

मूल अधिकार लोकतन्त्र के आधार-स्तम्भ हैं। मूल’ का अर्थ होता है-जड़। वृक्ष के लिए जो महत्त्व जड़ का होता है, वही महत्त्व नागरिकों के लिए इन अधिकारों का है। जिस प्रकार जड़ के बिना वृक्ष का अस्तित्व सम्भव नहीं है, उसी प्रकार मौलिक अधिकारों के बिना नागरिकों का शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास सम्भव नहीं है। ये जनता के जीवन के रक्षक हैं। ये बहुमत की तानाशाही पर अंकुश लगाते हैं और मानव की स्वतन्त्रता तथा सामाजिक नियन्त्रण में समन्वय स्थापित करते हैं।

संविधान में मौलिक अधिकारों का बहुत महत्त्व है, जो निम्नलिखित है –

(1) मौलिक अधिकार प्रजातन्त्र के आधार-स्तम्भ हैं – मूल अधिकार प्रजातन्त्र के लिए अनिवार्य हैं। इनके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास की सुरक्षा प्रदान की जाती है।

(2) बहुमत की तानाशाही को रोकते हैं – मौलिक अधिकार एक देश के राजनीतिक जीवन में एक दल विशेष की तानाशाही स्थापित होने से रोकने के लिए अनिवार्य हैं। मौलिक अधिकार शासकीय और बहुमत वर्ग के अत्याचारों से व्यक्ति की रक्षा करते हैं।

(3) व्यक्ति की स्वतन्त्रता और सामाजिक नियन्त्रण में समन्वय – मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतन्त्रता और सामाजिक नियन्त्रण के उचित सामंजस्य की स्थापना करते हैं।

मौलिक अधिकारों का संविधान में उल्लेख कर देने से उनके महत्त्व और सम्मान में वृद्धि होती है। इससे उन्हें साधारण कानून से अधिक उच्च स्थान और पवित्रता प्राप्त हो जाती है। इससे वे अनुल्लंघनीय होते हैं। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के लिए उनका पालन आवश्यक हो जाता है।

डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने मौलिक अधिकारों का महत्त्व व्यक्त करते हुए कहा है कि, “मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद के बिना संविधान अधूरा रह जाएगा। ये संविधान की आत्मा और हृदय हैं।”

प्रश्न 2.
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में अधिकारों की घोषणा-पत्र किस रूप में सम्मिलित किया गया है?
उत्तर :
दक्षिण अफ्रीका के संविधान में अधिकारों की घोषणा-पत्र दक्षिण अफ्रीका का संविधान दिसम्बर, 1996 में लागू हुआ। इसे तब बनाया और लागू किया गया जब रंगभेद वाली सरकार के हटने के बाद दक्षिण अफ्रीका गृहयुद्ध के खतरे से जूझ रहा था। दक्षिण अफ्रीका के संविधान के अनुसार “उसके अधिकारों की घोषणा-पत्र दक्षिण अफ्रीका में प्रजातन्त्र की आधारशिला है।” यह नस्ल, लिंग, गर्भधारण, वैवाहिक स्थिति, जातीय या सामाजिक मूल, रंग, आयु, अपंगता, धर्म, अन्तरात्मा, आस्था, संस्कृति, भाषा और जन्म के आधार पर भेदभाव वर्जित करता है। यह नागरिकों को सम्भवतः सबसे ज्यादा व्यापक अधिकार देता है। संवैधानिक अधिकारों को एक विशेष संवैधानिक न्यायालय लागू करता है।

दक्षिण अफ्रीका के संविधान में सम्मिलित कुछ प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. गरिमा का अधिकार
  2. निजता का अधिकार
  3. श्रम-सम्बन्धी समुचित व्यवहार का अधिकार
  4. स्वस्थ पर्यावरण और पर्यावरण संरक्षण का अधिकार
  5. समुचित आवास का अधिकार
  6. स्वास्थ्य सुविधाएँ, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
  7. बाल-अधिकार
  8. बुनियादी और उच्च शिक्षा का अधिकार
  9. सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई समुदायों का अधिकार
  10. सूचना प्राप्त करने का अधिकार।

प्रश्न 3.
भारतीय नागरिकों के मूल कर्तव्यों पर एक लेख लिखिए।
या
मौलिक कर्तव्यों से आप क्या समझते हैं ? इनका क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
भारतीय संविधान में मूल कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं था; अत: यह अनुभव किया गया कि मूल अधिकारों के साथ-साथ मूल कर्तव्यों की भी व्यवस्था आवश्यक है। इस कमी को 1976 में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा दूर किया गया और संविधान में एक नया अनुच्छेद 51 (क) ‘मौलिक कर्तव्य’ जोड़ा गया। संविधान के 86वें संशोधन अधिनियम 2002 के अन्तर्गत एक कर्तव्य और जोड़ा गया। नागरिकों के ग्यारह कर्तव्यों का वर्णन निम्नवत् है –

  1. संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज का आदर करना।
  2. देश के स्वतन्त्रता संग्राम में जो उच्च आदर्श रखे गये थे, उनका पालन करना व उनके प्रति हृदय में आदर बनाये रखना।
  3. भारत की प्रभुसत्ता, एकता तथा अखण्डता का समर्थन और रक्षा करना।
  4. देश की रक्षा के लिए हर समय तैयार रहना तथा आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवाओं में भाग लेना।
  5. भारत के सभी नागरिकों में भ्रातृत्व की भावना विकसित करना, विभिन्न प्रकार की भिन्नताओं के बीच एकता की स्थापना करना और स्त्रियों के प्रति आदरभाव रखना।
  6. हमारी प्राचीन संस्कृति और उसकी देनों को तथा उसकी गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझना और उसकी सुरक्षा करना।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण को दूषित होने से बचाना एवं वनों, झीलों, नदियों की रक्षा और संवर्धन करना तथा वन्य प्राणियों के प्रति दयाभाव रखना।
  8. वैज्ञानिक तथा मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना।
  9. सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना तथा हिंसा को रोकना।
  10. व्यक्तिगत तथा सामूहिक प्रयत्नों के द्वारा सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठता प्राप्त करने का प्रयास करना।
  11. छः से चौदह वर्ष तक के बालकों को उनके माता-पिता या संरक्षक द्वारा अनिवार्य शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना।

मौलिक कर्तव्यों का महत्त्व

मौलिक कर्तव्य हमारे लोकतन्त्र को सशक्त बनाने में सहायक होंगे। इनमें कहा गया है कि नागरिक लोकतान्त्रिक संस्थाओं के प्रति आदर का भाव रखें। देश की सम्प्रभुता, एकता एवं अखण्डता की रक्षा करें। सार्वजनिक सम्पत्ति को अपनी निजी सम्पत्ति समझकर उसे नष्ट होने से बचायें। इस प्रकार का दृष्टिकोण लोकतन्त्र की सफलता के लिए अनिवार्य है।

इनके द्वारा विघटनकारी शक्तियों पर रोक लगेगी और देश में एकता-अखण्डता की भावना का विकास होगा। भौतिक वातावरण दूषित होने से बचेगा और स्वास्थ्यवर्द्धक वातावरण का निर्माण होगा। राष्ट्रीय जीवन से अयोग्यता एवं अक्षमता को दूर करने में सहायता प्राप्त होगी। देश-प्रेम की भावना बलवती होगी और देश की गौरवशाली परम्परागत संस्कृति को सुरक्षित रखने में सहायता मिलेगी।

मौलिक कर्तव्यों के पीछे कोई कानूनी शक्ति नहीं है। इनका स्वरूप नैतिक माना जाता है और यही विशेष महत्त्व रखता है। राष्ट्र और समाज-विरोधी कार्यवाहियाँ करने वाले व्यक्तियों को संविधान में उल्लिखित ये कर्तव्य उन्हें ऐसा न करने के लिए नैतिक प्रेरणा देते हैं। वास्तव में अधिकारों से भी अधिक महत्त्व कर्तव्यों को दिया जाना चाहिए, क्योंकि कर्तव्यपालन से ही अधिकार प्राप्त हो सकते हैं।

मौलिक कर्तव्यों की आलोचना

मौलिक कर्तव्यों की विभिन्न विद्वानों ने कई प्रकार से आलोचना की है तथा उनमें कमियाँ बतायी हैं जो कि निम्नलिखित हैं –

(1) मूल कर्तव्य आदर्शवादी हैं, उन्हें लागू करना कठिन है। इस कारण व्यावहारिक जीवन में इनकी कोई उपयोगिता नहीं है; जैसे – राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रेरक आदर्शों को पालन करना अथवा वैज्ञानिक तथा मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना।

(2) मूल कर्तव्यों का उल्लंघन किये जाने पर दण्ड की व्यवस्था नहीं की गयी है। ऐसी स्थिति में यह कैसे विश्वास किया जा सकता है कि नागरिक इन कर्तव्यों का पालन अवश्य ही करेंगे।

(3) कुछ मूल कर्तव्यों की भाषा अस्पष्ट है; जैसे-मानववाद, सुधार की भावना का विकास और सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता के प्रयास आदि ऐसी बातें हैं जिनकी व्याख्या विभिन्न व्यक्ति अपने अपने दृष्टिकोण के अनुसार मनमाने रूप से कर सकते हैं। साधारण नागरिक के लिए तो इनका समझना कठिन है। जब इनका समझना ही कठिन है तो इनका पालन करना तो और भी कठिन हो जाएगा।

निष्कर्ष – नि:सन्देह मौलिक कर्तव्यों की आलोचना की गयी है, लेकिन इससे इन कर्तव्यों का महत्त्व कम नहीं हो जाता। संविधान में मौलिक कर्तव्यों के अंकित किये जाने से ये नागरिकों को सदैव याद । दिलाते रहेंगे कि नागरिकों के अधिकारों के साथ कर्तव्य भी हैं। एक प्रसिद्ध विद्वान् का कथन है, “अधिकारों का अस्तित्व केवल कर्तव्यों के संसार में ही होता है।”

प्रश्न 4.
“अधिकार एवं कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
“अधिकार और कर्तव्य परस्पर सम्बन्धित हैं।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अधिकार और कर्तव्य एक प्राण और दो शरीर के समान हैं। एक के समाप्त होते ही दूसरा स्वयं ही समाप्त हो जाता है। एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे का कर्तव्य बन जाता है। जहाँ एक व्यक्ति को सुरक्षित जीवन का अधिकार होता है, वहीं दूसरे व्यक्ति का कर्तव्य बन जाता है कि वे उसके जीवन को नष्ट न करे।

महात्मा गांधी के अनुसार, “कर्तव्य का पालन कीजिए; अधिकार स्वत: ही आपको मिल जाएँगे।”

प्रो० एच० जे लॉस्की के अनुसार, “मेरा अधिकार तुम्हारा कर्तव्य है। अधिकार में यह कर्तव्य निहित है कि मैं तुम्हारे अधिकार को स्वीकार करूं। मुझे अपने अधिकारों का प्रयोग सामाजिक हित में वृद्धि करने की दृष्टि से करना चाहिए, क्योंकि राज्य मेरे अधिकारों को सुरक्षित रखता है; अत: राज्य की सहायता करना मेरा कर्तव्य है।”

अधिकारों और कर्तव्यों की पूरकता (सम्बन्ध) को निम्नवत् दर्शाया जा सकता है –

(1) समाज-कल्याण तथा अधिकार – अधिकार सामाजिक वस्तु है। इसका अस्तित्व तथा भोग समाज में ही सम्भव है। इसलिए प्रत्येक अधिकार के पीछे एक आधारभूत कर्तव्य होता है कि मनुष्य अपने अधिकारों का भोग इस प्रकार करे कि समाज का अहित न हो। समाज व्यक्ति को इसी विश्वास के साथ अधिकार प्रदान करता है कि वह अपने अधिकारों का प्रयोग सार्वजनिक हित में करेगा।

(2) अधिकार और कर्तव्य : जीवन के दो पक्ष – अधिकार भौतिक है और कर्तव्य नैतिक। अधिकार भौतिक वस्तुओं-भोजन, वस्त्र, भवन-की पूर्ति करता है, किन्तु कर्त्तव्य से परमानन्द की प्राप्ति होती है। अतः अधिकार एवं कर्तव्य जीवन के दो पक्ष हैं।

(3) कर्त्तव्यपालन तथा अधिकारों का उपभोग – कर्तव्यपालन में ही अधिकारों के उपभोग का रहस्य छिपा हुआ है; जैसे कोई व्यक्ति जीवन और सम्पत्ति के अधिकार का भोग बिना बाधा के करना चाहता है, तो इसके लिए अनिवार्य है कि वह अन्य व्यक्तियों के जीवन तथा सम्पत्ति के संरक्षण में बाधक न बने। अधिकारों का सदुपयोग ही कर्तव्य है।

(4) अधिकार और कर्त्तव्य : एक-दूसरे के पूरक-प्रो० श्रीनिवास शास्त्री के अनुसार, अधिकार और कर्तव्य दो भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से देखे जाने के कारण एक ही वस्तु के दो नाम हैं।” बिना कर्तव्यों के अधिकारों का उपयोग असम्भव है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। दोनों की उत्पत्ति एवं अन्त साथ-साथ होता है।

(5) अधिकार तथा कर्त्तव्य : एक सिक्के के दो पहलू – व्यक्ति के अधिकारों को नियमित बनाने के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। यही स्वीकृति देना समाज का कर्तव्य है और समाज के जो अधिकार होते हैं वे व्यक्ति के कर्तव्य बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि मेरा अधिकार है कि मैं स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचारों को व्यक्त कर सकें तो इस अधिकार के कारण अन्य व्यक्तियों का भी यह कर्तव्य है कि वे मेरे विचारों की अभिव्यक्ति में बाधा न डालें। इसी प्रकार यदि अन्य व्यक्तियों का यह अधिकार है कि वे अपनी इच्छानुसार अपने धर्म का पालन करें, तो मेरा यह कर्तव्य हो जाता है कि मैं उनके विश्वास में बाधा न डालें।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अधिकारों और कर्तव्यों को एक-दूसरे से पृथक् करके कल्पना ही नहीं की जा सकती। अधिकार कर्तव्य की तथा कर्तव्य अधिकार की छाया मात्र होता है। एक के हट जाने से दोनों का अस्तित्व नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 5.
राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों से आप क्या समझते हैं ? संविधान में वर्णित प्रमुख नीति-निदेशक तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
‘राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व’ वे सिद्धान्त हैं, जो राज्य की नीति का निर्देशन करते हैं। दूसरे शब्दों में, राज्य जिन सिद्धान्तों को अपनी शासन-नीति का आधार बनाता है, वे ही राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व या सिद्धान्त कहे जाते हैं। ये तत्त्व राज्य के प्रशासन के पथ-प्रदर्शक हैं। राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के अन्तर्गत उन आदेशों एवं निर्देशों का समावेश है, जो भारतीय संविधान ने भारत-राज्य तथा विभिन्न राज्यों को अपनी सामाजिक तथा आर्थिक नीति का निर्धारण करने के लिए दिये हैं। एल० जी० खेडेकर के शब्दों में, “राज्य के नीति निदेशक तत्त्व वे आदर्श हैं, सरकार जिनकी पूर्ति का प्रयत्न करेगी।”

राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के पीछे कोई कानूनी सत्ता नहीं है। यह राज्य की इच्छा पर निर्भर है कि वह इनका पालन करे या न करे, फिर भी इनका पालन करना सरकार का नैतिक कर्तव्य है। ये नीति-निदेशक तत्त्व राज्य के लिए नैतिकता के सूत्र हैं तथा देश में स्वस्थ एवं वास्तविक प्रजातन्त्र की स्थापना की दिशा में प्रेरणा देने वाले हैं।

प्रमुख नीति-निदेशक तत्त्व

भारत के संविधान में राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों का उल्लेख निम्नलिखित रूप में किया गया है –

(i) आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी तत्त्व – आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी नीति-निदेशक तत्त्वों के अन्तर्गत राज्य इस प्रकार की व्यवस्था करेगा, जिससे निम्नलिखित लक्ष्यों की पूर्ति हो सके –

  1. प्रत्येक स्त्री और पुरुष को समान रूप से जीविका के साधन उपलब्ध हों।
  2. धन तथा उत्पादन के साधन कुछ थोड़े से व्यक्तियों के हाथों में इकट्टे न हो जाएँ।
  3. प्रत्येक स्त्री तथा पुरुष को समान कार्य के लिए समान वेतन प्राप्त करने का अधिकार होगा। स्त्रियों को प्रसूति काल में कुछ विशेष सुविधाएँ भी प्राप्त होंगी।
  4. पुरुषों तथा स्त्रियों के स्वास्थ्य एवं शक्ति तथा बच्चों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो तथा आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसा कार्य न करना पड़े, जो उनकी आयु-शक्ति या अवस्था के प्रतिकूल हो।
  5. राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के अन्तर्गत काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी तथा अन्य कारणों से जीविका कमाने में असमर्थ व्यक्तियों को आर्थिक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबन्ध करेगा।
  6. गाँवों में निजी तथा सहकारी आधार, पर संचालित उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  7. कृषि तथा उद्योगों में लगे श्रमिकों को उचित वेतन मिल सके तथा उनका जीवन-स्तर ऊँचा हो।
  8. कृषि तथा पशुपालन व्यवस्था को आधुनिक एवं वैज्ञानिक ढंग से संगठित तथा विकसित किया जा सके।
  9. भौतिक साधनों को न्यायपूर्ण वितरण हो।
  10. औद्योगिक संस्थानों के प्रबन्ध में कर्मचारियों की भी भागीदारी हो।
  11. कानूनी व्यवस्था का संचालन समान अवसर तथा न्याय-प्राप्ति में सहायक है। समाज के कमजोर वर्गों के लिए नि:शुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था, जिससे कोई व्यक्ति न्याय पाने से वंचित न रहे।

(ii) सामाजिक व्यवस्था सम्बन्धी तत्व – नागरिकों के सामाजिक उत्थान के लिए राज्य निम्नलिखित व्यवस्थाएँ करेगा –

  1. समाज के विभिन्न वर्गों विशेषकर अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़ी जातियों की सुरक्षा एवं उत्थान के साथ-साथ सामाजिक अन्याय व इसी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा हो सके।
  2. लोगों के जीवन-स्तर तथा स्वास्थ्य में सुधार हो सके। मानव-जीवन के कल्याण हेतु राज्य को नशीली वस्तुओं, मद्यपान तथा अन्य मादक पदार्थों पर रोक लगानी चाहिए।
  3. देश के प्रत्येक नागरिक को साक्षर बनाने के लिए राज्य सभी बालकों को 14 वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए प्रावधान करने का प्रयास करेगा।
  4. बयालीसवें संविधान संशोधन के अनुसार राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवन की रक्षा का प्रयास करेगा।
  5. राज्य विशिष्टतया आय की असमानता को कम करने तथा विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों के मध्य प्रतिष्ठा, सुविधाओं की प्राप्ति तथा अवसर की असमानताओं को समाप्त करने का प्रयास करेगा।

(iii) सांस्कृविक विकास सम्बन्धी तत्त्व – सांस्कृतिक क्षेत्र में नागरिकों के विकास हेतु राज्य निम्नलिखित नीतियों का पालन करने का प्रयत्न करेगा

  1. संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार दलित वर्ग का आर्थिक और शैक्षिक विकास करना राज्य का कर्तव्य होगा।
  2. राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों, भवनों, स्थानों तथा वस्तुओं की देखभाल तथा संरक्षण की व्यवस्था राज्य अनिवार्य रूप से करेगा।

(iv) न्याय सम्बन्धी तत्त्व – न्यायिक क्षेत्र में सुधार लाने के लिए राज्य निम्नलिखित सिद्धान्तों का अनुसरण करेगा –

  1. राज्य देश के समस्त नागरिकों के लिए समस्त राज्य-क्षेत्र में एक समान कानून तथा न्यायालय की व्यवस्था करेगा।
  2. देश के सभी गाँवों में राज्य के द्वारा ग्राम पंचायतों की स्थापना की जाएगी तथा राज्य उन्हें ऐसे अधिकार प्रदान करेगा, जिससे देश में स्वायत्त शासन की स्थापना हो सके।

(v) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा सम्बन्धी तत्त्व – इस सम्बन्ध में राज्य निम्नलिखित सिद्धान्तों का पालन करेगा –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा के प्रयासों को प्रोत्साहन देगा।
  2. अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने के कार्य को प्रोत्साहन देगा।
  3. विभिन्न राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत एवं सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाने की दिशा में कार्य करेगा।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों तथा सन्धियों के प्रति आदरभाव रखेगा।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नीति-निदेशक तत्त्वों के माध्यम से भारत में आर्थिक प्रजातन्त्र की स्थापना हो सकेगी और भारत एक कल्याणकारी राज्य बन सकेगा।

प्रश्न 6.
निवारक निरोध से क्या तात्पर्य है? निवारक निरोध का महत्त्व लिखिए।
उत्तर :

निवारक निरोध

अनुच्छेद 22 के खण्ड 4 में निवारक निरोध (Preventive Detention) का उल्लेख किया गया है। निवारक निरोध का तात्पर्य वास्तव में किसी प्रकार का अपराध किए जाने के पूर्व और बिना किसी प्रकार की न्यायिक प्रक्रिया के ही किसी को नजरबन्द करना है। निवारक निरोध के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को तीन माह तक नजरबन्द रखा जा सकता है। इससे अधिक यह अवधि परामर्शदात्री परिषद् की सिफारिश पर बढ़ाई जा सकती है। निवारक निरोध अधिनियम, 1947 ई० में पारित किया गया था। समय-समय पर इसकी अवधि बढ़ाई जाती रही और वह 1969 ई० तक चलता रहा। 1971 ई० में इसका स्थान ‘आन्तरिक सुरक्षा अधिनियम’ (Maintenence of Internal Security Act, 1971) ने ले लिया। इस कानून को बोलचाल की भाषा में ‘मीसा’ (MISA) के नाम से जाना जाता है। इसके पश्चात् 1981 ई० में इसके स्थान पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ (National Security Act) पारित किया गया। तत्पश्चात् टाडा कानून’ (Terrorist and Disruptive Activities Act) लागू किया गया। वर्तमान में यह भी समाप्त कर दिया गया है और इसके स्थान पर पोटा (Prevention of Terrorist Act) का निर्माण किया गया है। अब इसे भी संशोधित करने की प्रक्रिया चल रही है।

निवारक निरोध कानून की आलोचना और उसका महत्त्व

स्वतन्त्रता के अधिकार पर लगे प्रतिबन्धों को देखकर अनेक विद्वानों ने इसकी आलोचना की है। निवारक निरोध कानून के विषय में टेकचन्द बख्शी ने कहा था कि यह दमन तथा निरंकुशता का पत्र है। इसी प्रकार सोमनाथ लाहिड़ी ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था, “मूल अधिकारों का निर्माण पुलिस के सिपाही के दृष्टिकोण से किया गया है, स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने वाले राष्ट्र के दृष्टिकोण से नहीं।” परन्तु निवारक निरोध अथवा मीसा की आलोचना के बावजूद भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान परिस्थितियों में यह व्यवस्था कुछ सीमा तक आवश्यक और उपयोगी है। न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री के अनुसार, “इस भयावह उपकरण की व्यवस्था ……………. उन समाज-विरोधी और विध्वंसकारी तत्त्वों के विरुद्ध की गई है, जिनसे नवविकसित प्रजातन्त्र के राष्ट्रीय हितों को खतरा है।” वस्तुत: निवारक निरोध की व्यवस्था एक ‘भरी हुई बन्दूक’ के समान है और उसका प्रयोग बहुत सावधानी से तथा विवेकपूर्ण ही किया जाना चाहिए।

प्रश्न 7.
मानवाधिकार आयोग के विषय में आप क्या जानते हैं? इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर :
किसी भी संविधान द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों की वास्तविक पहचान तब होती है जब उन्हें लागू किया जाता है। समाज के गरीब, अशिक्षित और कमजोर वर्ग के लोगों को अपने अधिकारों का प्रयोग करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पी०यू०सी०एल०) या पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पी०यू०डी०आर०) जैसी संस्थाएँ अधिकारों के हनन पर दृष्टि रखती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2000 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में उच्चतम न्यायालय का एक पूर्व न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा मानवाधिकारों के सम्बन्ध में ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले दो और सदस्य होते हैं।

मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें मिलने पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वयं अपनी पहल पर या किसी पीड़ित व्यक्ति की याचिका पर जाँच कर सकता है। जेलों में बन्दियों की स्थिति का अध्ययन करने जा सकता है, मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कर सकता है या शोध को प्रोत्साहित कर सकता है। आयोग को प्रतिवर्ष हजारों शिकायतें प्राप्त होती हैं। इनमें से अधिकतर हिरासत में मृत्यु, हिरासत के दौरान बलात्कार, लोगों के गायब होने, पुलिस की ज्यादतियों, कार्यवाही न किए जाने, महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार आदि से सम्बन्धित होती हैं। मानवाधिकार आयोग का सर्वाधिक प्रभावी हस्तक्षेप पंजाब में युवकों के गायब होने तथा गुजरात-दंगों के मामले में जाँच के रूप में रहा। आयोग को स्वयं मुकदमा सुनने का अधिकार नहीं है। यह सरकार या न्यायालय को अपनी जाँच के आधार पर मुकदमे चलाने की सिफारिश कर सकता है।

प्रश्न 8.
राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों के क्रियान्वयन के विषय में आप क्या जानते हैं। इन्हें वादयोग्य क्यों नहीं बनाया गया?
उत्तर :
भारतीय लोकतन्त्र की सफलता नीति-निदेशक तत्त्वों के लागू करने में निहित है। भारत सरकार ने पिछले 57 वर्षों में निदेशक तत्त्वों को प्रभावी बनाने के लिए अनेक कानून व योजनाएँ लागू की हैं। आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं को अपनाया गया ताकि निदेशक तत्त्वों में निहित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। गरीबी और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए 20-सूत्री कार्यक्रम लागू किया गया। ग्रामीण अंचलों में शिक्षा व स्वास्थ्य का प्रसार किया गया है। विश्व शान्ति व अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया गया है। इन समस्त नीतियों का उद्देश्य निदेशक तत्त्वों द्वारा घोषित लक्ष्य लोक-कल्याणकारी राज्य की प्राप्ति है।

लेकिन इन नीतियों से किस सीमा तक नीति-निदेशक तत्त्व प्राप्त हो पाए हैं? यह तथ्य केवल एक ही ओर संकेत करता है कि अभी यथार्थ में नीति-निदेशक तत्त्वों को प्राप्त नहीं किया जा सका है। आर्थिक क्षेत्र में पंचवर्षीय योजनाओं को अपनाने के बावजूद भी भौतिक साधनों पर केन्द्रीकरण कम नहीं हुआ। है। अमीर अधिक अमीर हुआ है तथा गरीब और अधिक गरीब निःशुल्क शिक्षा, समान आचार संहिता के निदेशक तत्त्व मृग मरीचिका बन चुके हैं। मुफ्त कानूनी सहायता के निदेशक तत्त्व के बावजूद न्याय-प्रणाली बहुत महँगी है। कुटीर उद्योग-धन्धों को बड़े औद्योगिक कारखानों ने वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर निगल लिया है। मद्यनिषेध को राजस्व-प्राप्ति हेतु बलि का बकरा बना दिया गया है।

राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्तों को न्याययोग्य या वादयोग्य क्यों नहीं पाया गया – प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जब राज्य-नीति के निदेशक सिद्धान्त भारतीय नागरिकों के जीवन के विकास तथा लोकतन्त्र की सफलता के लिए इतने महत्त्वपूर्ण हैं तो इन्हें भी मौलिक अधिकारों की तरह वादयोग्य क्यों नहीं बनाया गया? ऐसा होने पर कोई भी सरकार इन्हें अनदेखा नहीं कर सकती थी। परन्तु ऐसा करना सम्भव नहीं था क्योंकि इन्हें लागू करने में धन की बड़ी आवश्यकता थी और देश जब स्वतन्त्र हुआ तो आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी। इसलिए यह बात सरकार पर ही छोड़ दी गई कि जैसे-जैसे सरकार के पास धन तथा दूसरे साधन उपलब्ध होते जाएँ, वह इन्हें थोड़ा-थोड़ा करके लागू करती जाए। मौलिक अधिकारों की तरह इन निदेशक सिद्धान्तों को पूर्ण रूप से उस समय लागू करना व्यावहारिक कदम नहीं था।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 1 Constitution: Why and How?

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Indian Constitution at Work Chapter 1 Constitution: Why and How? (संविधान : क्यों और कैसे?)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारण्टी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन | करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आएँ।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर-
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आएँ।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की एक बेहतर दलील है कि संविधान की प्रमाणिकता संसद से ज्यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता :संसद के सदस्यों से कहीं ज्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनाई जाए और इसे कौन-कौन सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर-
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनाई जाए और इसे कौन-कौन सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।

प्रश्न 3.
बताएँ कि संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत-
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज है।
(ख) संविधान सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में होता है और उसकी जरूरत ऐसे ही देशों में होती है।
(ग) संविधान के कानूनी दस्तावेज हैं और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।

उत्तर-
(क) सही, (ख) गलत, (ग) सही, (घ) सही।

प्रश्न 4.
बताएँ कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सहीं हैं या नहीं? अपने उत्तर का कारण बताएँ-
(क) संविधान सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।
(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।
(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।
उत्तर-
(क) भारतीय संविधान की रचना करने वाली संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव समाज के सभी वर्गों के लोगों के बीच से नहीं हुआ था, किन्तु उसमें अधिक-से-अधिक वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया था। भारत के विभाजन के बाद संविधान सभा के सदस्यों में कांग्रेस के सर्वाधिक 82 प्रतिशत सदस्य थे। ये सदस्य सभी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। अतः यह कहना किसी भी दृष्टि से सही नहीं होगा कि संविधान सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई और इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।

(ख) यह कथन भी सही नहीं है कि संविधान सभा के सदस्यों में प्रत्येक विषय पर आम सहमति थी और संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया। भारतीय संविधान का केवल एक विषय ऐसा था जिस पर संविधान सभा के सदस्यों में आम सहमति थी और वह विषय था-“मताधिकार किसे प्राप्त हो?” इस विषय के अतिरिक्त संविधान के सभी विषयों पर संविधान सभा के सदस्यों के बीच गहन विचार-विमर्श और वाद-विवाद हुआ।

संविधान के विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श के लिए आठ कमेटियों का गठन किया गया था। सामान्यतया पं० जवाहरलाल नेहरू, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुलकलाम आजाद तथा डॉ० भीमराव अम्बेडकर इन कमेटियों के अध्यक्ष पद पर पदस्थ थे। ये सभी लोग ऐसे विचारक थे जिनके विचार विभिन्न विषयों पर कभी एकसमान नहीं होते थे। डॉ० अम्बेडकर तो कांग्रेस और महात्मा गांधी के कट्टर विरोधी थे। उनका आरोप था कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने कभी अनुसूचित जातियों की उन्नति के लिए गम्भीर प्रयास नहीं किए। पं० जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच भी अनेक विषयों पर गम्भीर मतभेद थे। किन्तु फिर भी सबने एक साथ मिलकर काम किया। कई विषयों पर फैसले मत-विभाजन द्वारा भी लिए गए। अतः यह कहना गलत है कि संविधान सभा के सदस्यों में प्रत्येक विषय पर आम सहमति थी।
यह कथन भी गलत है कि संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया। निम्नांकित महत्त्वपूर्ण और बड़े फैसले संविधान सभा द्वारा ही लिए गए-

  • भारत में शासन प्रणाली केन्द्रीकृत होनी चाहिए अथवा विकेन्द्रीकृत।
  • केन्द्र व राज्यों के बीच कैसे सम्बन्ध होने चाहिए।
  • राज्यों के बीच कैसे सम्बन्ध होने चाहिए।
  • न्यायपालिका की क्या शक्तियाँ होनी चाहिए।
  • क्या संविधान को सम्पत्ति के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। उपर्युक्त के अतिरिक्त अनेक ऐसे महत्त्वपूर्ण और बड़े फैसले संविधान सभा द्वारा ही लिए गए जो भारत की शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था का मूल आधार हैं।

(ग) यह कथन भी गलत है कि भारतीय संविधान मौलिक नहीं है, क्योकि इसकी अधिकांश भाग विश्व के अन्य देशों के संविधान से ग्रहण किया गया है। सही अर्थों में संविधान सभा के सदस्यों ने अन्य देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं के स्वस्थ प्रावधानों को लेने में कोई संकोच नहीं किया। किन्तु इसे नकल करने की मानसिकता भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि संविधान निर्माताओं ने ग्रहण किए गए प्रावधानों को अपने देश की व्यवस्थाओं के अनुकूल बना लिया। अतः भारतीय संविधान की मौलिकता पर कोई प्रश्न चिह्न लगाना नितान्त गलत है।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें-
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। इसके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तियों का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केन्द्र है।
उत्तर-
(क) संविधान की रचना उस संविधान सभा द्वारा की गई जिसके सदस्यों में जनता का अटूट विश्वास था। संविधान सभा के अधिकांश बड़े नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया था। देश की तत्कालीन जनता इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थी कि इन बड़े नेताओं द्वारा किए गए अथक संघर्ष और परिश्रम के परिणामस्वरूप ही देश को आजादी प्राप्त हुई है। अतः सभी नेताओं के प्रति हृदय में विश्वास होना स्वाभाविक बात थी। ये नेता भारतीय समाज के सभी अंगों, सभी जातियों और समुदायों, सभी धर्मों का प्रतिनिधित्व करते थे। संविधान सभा के सदस्य के रूप में इन नेताओं ने संविधान की रचना करते समय जनता की आशाओं और आकांक्षाओं का पूरा ध्यान रखा। इसीलिए जनता के मन में इन नेताओं के प्रति आदर को भाव था।

(ख) संविधान सभा ने संविधान की रचना करते समय विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों पर बँटवारा इस प्रकार किया ताकि सरकार के तीनों अंग अपना-अपना कार्य सुचारु रूप से कर सकें। तीनों अंगों के बीच शक्तियों के वितरण की व्यवस्था करते समय संविधान निर्माताओं ने ‘नियंत्रण एवं सन्तुलन’ (Checks and Balances) के सिद्धान्त को अपनी कार्यविधि का आधार बनाया है। तीनों में से कोई भी अंग एक-दूसरे के कार्य में किसी प्रकार का अनुचित हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कार्यपालिका की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली पर संसद का नियन्त्रण रहता है। न्यायिक पुनरावलोकन की प्रक्रिया से संसद एवं मन्त्रिमण्डल के कार्यों पर टीका-टिप्पणी की जा सकती है। संविधान-निर्माताओं ने ऐसा प्रावधान किया है कि कोई भी अंग अपने स्वार्थ के लिए संविधान को नष्ट नहीं कर सकता।

(ग) संविधान सभा द्वारा बनाया गया भारत का संविधान देश की जनता की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप है। संविधान का कार्य यही है कि वह सरकार को ऐसी क्षमता प्रदान करे जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थितियों का निर्माण कर सके। देश की जनता के कल्याण के लिए जहाँ भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की गई है, वहीं राज्य नीति के निदेशक सिद्धान्तों का भी प्रावधान किया गया है। इन सिद्धान्तों का उद्देश्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सामाजिक, कानूनी और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है। मौलिक अधिकारों और राज्य नीति के निदेशक सिद्धान्तों के अतिरिक्त भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, वयस्क मताधिकार, अनुसूचित जातियों व जनजातियों के कल्याण के प्रति विशेष ध्यान रखा गया है। देश में निवास कर रहे प्रत्येक धर्म के लोगों को अपने-अपने धर्म पर चलने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। देश के प्रत्येक नागरिक को कानून के सम्मुख समानता का अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा और सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता तथा संघ और समुदाय बनाने का अधिकार प्रदान किया गया है। इस प्रकार भारत का संविधान देश की जनता की आशाओं व आकांक्षाओं के अनुरूप है।

प्रश्न 6.
किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण क्यों जरूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो, तो क्या होगा?
उत्तर-
प्रत्येक देश के संविधान में ऐसी संस्थाओं का प्रावधान किया जाता है जो देश का शासन चलाने में सरकार की सहायता करती हैं। इन संस्थाओं को कुछ शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ भी सौंपी जाती हैं और यह अपेक्षा की जाती है कि ये संस्थाएँ सीमा में रहकर अपनी शक्तियों का प्रयोग करें और जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से करें। यदि कोई अपनी निर्धारित शक्ति से बाहर जाकर अपने कार्य का संचालन करती है तो यह माना जाता है कि वह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर रही है। और संविधान को नष्ट कर रही है। इसीलिए प्रत्येक देश के संविधान में संस्थाओं के गठन के साथ ही उनकी शक्तियों और सीमाओं का विवेचन स्पष्ट रूप से कर दिया जाता है ताकि संस्थाएँ शक्तियों के पालन में तानाशाह न बन जाएँ। इस व्यवस्था को न्यायसंगत बनाने के लिए यह भी आवश्यक है कि संविधान में प्रत्येक संस्था को प्रदान की गई शक्तियों का सीमांकन इस प्रकार किया जाए कि कोई भी संस्था संविधान को नष्ट करने का प्रयास न कर सके। संविधान की रूपरेखा बनाते समय शक्तियों का बँटवारा इतनी बुद्धिमत्ता से किया जाना चाहिए कि कोई भी संस्था एकाधिकार स्थापित न कर सके। ऐसा करने के लिए यह भी आवश्यक है कि शक्तियों का बँटवारा विभिन्न संस्थाओं के बीच उनकी जिम्मेदारियों को देखकर किया जाए।

उदाहरणार्थ, भारत के संविधान में शक्तियों का विभाजन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच किया गया है, साथ ही निर्वाचन आयोग जैसी स्वतन्त्र संस्था को शक्तियाँ व जिम्मेदारियाँ अलग से सौंपी गई हैं। केन्द्र और राज्यों के बीच भी शक्तियों का निर्धारण किया गया है। इस शक्ति-सीमांकन से यह निश्चित हो जाता है कि यदि कोई संस्था शक्तियों का गलत उपयोग करके संवैधानिक व्यवस्थाओं का हनन करने का प्रयास करती है तो अन्य संस्थाएँ उसे ऐसा करने से रोक सकती हैं। भारतीय संविधान में नियंत्रण व सन्तुलन’ (Checks and Balances) के सिद्धान्त का प्रतिपादन शक्तियों के सीमांकन के लिए ही किया गया है। यदि विधायिका कोई ऐसा कानून बनाती है। जो देश की जनता के मौलिक अधिकारों का हनन करता हो तो न्यायपालिका ऐसे कानून को अमल में लाने पर रोक लगा सकती है और कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। आपात्काल के दौरान बनाए गए अनेक कानूनों को उच्चतम न्यायालय द्वारा बाद में असंवैधानिक घोषित किया गया। कार्यपालिका की शक्तियों को सीमा में बाँधने के लिए विधायिका उस पर अनेक प्रकार के अंकुश लगाती है। संसद में सदस्य प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव आदि प्रस्तुत कर कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखते हैं। इस प्रकार विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का सीमांकन संविधान की रचना करते समय ही कर दिया जाता है और ये सभी संस्थाएँ अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से अपनी सीमाओं का ध्यान रखते हुए कार्य करती रहती हैं।

प्रश्न 7.
शासकों की सीमा का निर्धारण संविधान के लिए क्यों जरूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे?
उत्तर-
संविधान का एक कांम यह है कि वह सरकार या शासकों द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किए। जाने वाले कानूनों पर कुछ सीमाएँ लगाए। ये सीमाएँ इस रूप में मौलिक होती हैं कि सरकार उनका कभी उल्लंघन नहीं कर सकती।

संविधान द्वारा सरकार या शासकों की शक्तियों पर सीमाएँ लगाना इसलिए आवश्यक है ताकि वे अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न कर सकें और जनता के हितों को नुकसान न पहुँचा सकें। संसद नागरिकों के लिए कानून बनाती है, कार्यपालिका कानूनों को जनता द्वारा अमल में लाने का कार्य करती है और यदि कोई कानून जनता की भावनाओं और हितों के अनुरूप नहीं होता तो न्यायपालिका ऐसे कानून को अमल में लाने से रोक देती है अथवा उस पर प्रतिबन्ध लगा देती है।

भारतीय संविधान में संशोधन करने के लिए संसद को न्यायपालिका ने यह निर्देश दे दिया है कि संसद संविधान के मूल स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। संविधान सरकार अथवा शासकों की शक्तियों को कई प्रकार से सीमा में बाँधता है। उदाहरणार्थ, संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की विवेचना की गई है। इन मौलिक अधिकारों का हनन कोई भी सरकार नहीं कर सकती। नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना किसी कारण के बन्दी नहीं बनाया जा सकता। यही सरकार अथवा शासक की। शक्तियों पर एक सीमा या बन्धन कहलाती है।

देश का प्रत्येक नागरिक अपनी रुचि और इच्छा के अनुसार कोई भी व्यवसाय करने के लिए स्वतन्त्र है। इस स्वतन्त्रता पर सरकार कोई प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती। नागरिकों को मूल रूप से जो स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं; जैसे-अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, देश के किसी भी भाग में स्वतन्त्रतापूर्वक घूमने की स्वतन्त्रता, संगठन बनाने की स्वतन्त्रता आदि पर सरकार सामान्य परिस्थिति में कोई प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती। कोई भी सरकार स्वयं किसी व्यक्ति से बेगार नहीं ले सकती और न ही किसी व्यक्ति को यह छूट दे सकती है कि वह किसी भी रूप में किसी व्यक्ति का शोषण करे अथवा उसे बन्धुआ मजदूर बनाकर रखे। इस प्रकार सरकार के कार्यों पर सीमाएँ लगाई जाती हैं। अधिकांश देशों के संविधानों में कुछ मौलिक अधिकारों का प्रावधान अवश्य किया जाता है। अधिकारों के बिना मनुष्य का जीवन निरर्थक है।

प्रश्न 8.
जब-जापान का संविधान बना तब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना असम्भव था, जो अमेरिकी सेना को पसन्द न हो। क्या आपको लगता है कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर-
जापान का संविधान उस समय बनाया गया था जब वह अमेरिकी सेना के कब्जे में था। अतः जापान के संविधान में की गई व्यवस्थाएँ अमेरिकी सरकार की इच्छाओं को ध्यान में रखकर की गई थीं। जापान तत्कालीन परिस्थितियों में अमेरिकी सरकार की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता था। इसका मूल कारण यह था कि अधिकांश देशों के संविधान लिखित थे। इन लिखित संविधानों में राज्य से सम्बद्ध विषयों पर अनेक प्रावधान किए जाते थे जो यह निर्देशित करते थे कि राज्य किन सिद्धान्तों का पालन करते हुए सरकार चलाएगा। सरकार कौन-सी विचारधारा अपनाएगी। किन्तु जब किसी देश पर कोई दूसरा देश कब्जा कर लेता है तो उस देश के संविधान में शासक देश की इच्छाओं के विपरीत कोई प्रावधान नहीं किया जा सकता। अतः यहाँ निष्कर्ष रूप में कहना होगा कि जापान के तत्कालीन संविधान में अमेरिकी शासकों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया होगा।

भारत की स्थिति जापान की स्थिति के ठीक विपरीत थी। भारत अपनी स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए अन्तिम लड़ाई लड़ रहा था और यह लगभग निश्चित हो चुका था देश को आजादी अवश्य प्राप्त होगी। भारतीय संविधान की रचना पर औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने दिसम्बर, 1946 में विचार करना शूरू किया था; अर्थात् आजादी प्राप्त होने से केवल नौ माह पूर्व भारत के लिए एक संविधान बनाने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी। भारत पर अंग्रेजों का नियन्त्रण लगभग समाप्ति के कगार पर था; अतः भारतीय संविधान में अंग्रेजों के दबाव के कारण कोई प्रावधान स्वीकार करना असम्भव था।

भारत ने लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था को अपनाया। उसने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दिनों में जिन समस्याओं का अनुभव किया था, उनके समाधान का मार्ग ढूंढ़ने का प्रयास किया। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि भारतीय संविधान बनाने वाली संविधान सभा ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के लम्बे समय तक चले संघर्ष से काफी प्रेरणा ली। संविधान सभा के सदस्यों को समाज के सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त था। इसीलिए देश में भारतीय संविधान को अत्यधिक सम्मान प्राप्त हुआ। संविधान की प्रस्तावना के प्रारम्भिक शब्द हैं “हम, भारत के लोग ……….|” ये शब्द यह घोषित करते हैं कि भारत के लोग संविधान के निर्माता हैं। यह ब्रिटेन की संसद का उपहार नहीं है। इसे भारत के लोगों ने अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से पारित किया था। संविधान सभा में सभी प्रकार के विचारों वाले लोग थे। इस संविधान सभा का गठन उन लोगों के द्वारा हुआ था जिनके प्रति लोगों की अत्यधिक विश्वसनीयता थी। इस प्रकार भारत में संविधान बनाने का अनुभव बिल्कुल अलग है।

प्रश्न 9.
रजत ने अपने शिक्षक से पूछा–“संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज है और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बताएँ कि मैं इस दस्तावेज की बातों का पालन क्यों करू?” अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर-
यदि मैं रजत का शिक्षक होता तो उसके प्रश्न का संक्षेप में निम्नलिखित उत्तर देता भारत का संविधान एक गतिशील जीवन्त दस्तावेज है। भारत ने जो संविधान अपनाया है, वह 57 वर्षों से भी अधिक समय से अस्तित्व में है। इस अवधि में हम भारत के लोग अनेक दबावों और तनावों से गुजरे हैं। जून, 1975 में आपात्काल की घोषणा एक दुःखद घटना थी। ऐसी घटना एक लोकतान्त्रिक देश में कभी नहीं घटनी चाहिए थी। संसद सर्वोच्च है या न्यायपालिका-इस विषय पर एक तीखा विवाद उठाा था। किन्तु समय के साथ-साथ कठिन परिस्थितियाँ अपने आप सुलझती चली गईं। संविधान आज भी सजीव और सशक्त है।”

भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था। तब से लेकर सन् 2007 तक इसमें 93 संशोधन किए जा चुके हैं। इतनी बड़ी संख्या में संशोधनों के बाद भी यह संविधान 57 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में है। अतः इस संविधान को 50 साल से भी अधिक पुरानी दस्तावेज कहना गलत है। इस संविधान को बीते दिनों की पुस्तक इसलिए भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह कठोर होने के साथ-साथ पर्याप्त रूप से लचीला भी है। देश में सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाने के लिए इसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है। संविधान में प्रस्तुत किए गए अधिकांश प्रावधानों की प्रकृति इस प्रकार की है कि उन्हें कभी पुराना नहीं कहा जा सकता।

इस संविधान की रचना उस संविधान सभा द्वारा की गई है जिसमें 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस के प्रतिनिधि थे और कांग्रेस देश के सभी वर्गों, धर्मों, विचारधाराओं और जातियों का प्रतिनिधित्व करती थी। ये सभी व्यक्ति अत्यधिक योग्य और अनुभवी थे। अतः यह कथन भी तर्कसंगत नहीं है कि संविधान निर्माताओं द्वारा आपसे राय नहीं ली गई। जो संविधान सभा संविधान निर्माण का कार्य कर रही थी—वह सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी-अर्थात् वह आपका भी प्रतिनिधित्व कर रही थी। भारतीय संविधान का प्रारूप देश की बदलती परिस्थितियों के कारण पैदा होने वाली चुनौतियों का मुकाबला करने में पूरी तरह से सक्षम है।

प्रश्न 10.
संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष दिए-
(क) हरबंस – भारतीय संविधान एक लोकतान्त्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।
(ख) नेहा – संविधान में स्वतन्त्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है।
चूंकि यह वादा पूरा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।
(ग) नाजिमा – संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया।
क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बताएँ।
उत्तर-
(क) हरबंस का कथन सही है। भारत का संविधान एक लोकतान्त्रिक ढाँचा देने में सफल रहा है। संविधान में यह घोषणा की गई है कि प्रभुत्व शक्ति’ जनता में निहित है। संविधान की प्रस्तावना के प्रारम्भिक शब्द हैं- “हम, भारत के लोग “……….।” ये शब्द यह उद्घोषणा करते हैं। कि भारत के लोग’ संविधान के निर्माता हैं। लोकतन्त्र का अर्थ है-थोड़े-थोड़े समय के बाद शासकों का चयन। नए संविधान के अन्तर्गत अब तक देश में चौदह आम चुनाव कराए जा चुके हैं। भारत एक गणतन्त्र भी है। यहाँ किसी पुश्तैनी शासक को मान्यता नहीं दी गई है। राष्ट्रपति भारतीय गणतन्त्र का मुखिया है जिसे पाँच वर्ष के कार्यकाल के लिए चुना जाता है।

भारत में प्रत्येक वयस्क व्यक्ति मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है, बशर्ते वह पागल न हो और अपराध या अवैध गतिविधियों के कारण अयोग्य घोषित न किया गया हो। संविधान द्वारा देश के प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, सभा और सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता तथा संघ और समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है। भारतीय संविधान का उदारवादी लोकतान्त्रिक स्वरूप इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि यह भारत में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को अवैधानिक गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान करता है। सभी नागरिकों को प्राप्त अन्य अधिकारों में धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार और कानून के समक्ष समानता का अधिकार भी शामिल है।

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सरकारी कार्यालयों या उपक्रमों में रोजगार देने के लिए उपयुक्त व्यवस्थाएँ की गई हैं। उनके लिए लोकसभा और राज्य विधानमण्डलों में भी सीटें आरक्षित की गई हैं। सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को भी आरक्षण प्रदान किया गया है। व्यक्ति की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए मौलिक अधिकार, न्यायालय की स्वतन्त्रता, विधि का शासन आदि को अपनाया गया है। इस प्रकार भारत में लोकतन्त्र की नींव रखी गई है और इसे शक्तिशाली बनाने के हर सम्भव प्रयास किए गए हैं। अत: हरबंस को कथन पूरी तरह सही है कि भारत का संविधान एक लोकतान्त्रिक ढाँचा देने में सफल रहा है।

(ख) नेहा का कथन भी सही है। उसका कथन है कि संविधान में स्वतन्त्रता, समानता और भाईचारा सुनिश्चित करने का वादा किया है, किन्तु वादा पूरा नहीं हुआ है इसलिए संविधान असफल है। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार देश की सरकार नागरिकों की स्वतन्त्रता पर विशेष अवसरों पर प्रतिबन्ध लगा सकती है। समानता के अधिकार का क्रियान्वयन आज भी सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। समाज के दबे-कुचले वर्ग को आज भी शोषण का शिकार होना पड़ रहा है। कृषि-भूमि के अधिकांश भाग पर दबंग और सम्पन्न लोगों का कब्जा है। ग्रामीण लोगों को आज भी इनके खेतों पर मजदूरों के रूप में कठोर परिश्रम करना पड़ता है और मजदूरों को पारिश्रमिक के रूप में मिलती हैं गालियाँ, मारपीट और अभद्र व्यवहार। देश में भाईचारे का घोर अभाव है। देश के विभिन्न भागों में होने वाले साम्प्रदायिक दंगे इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण हैं। देश के नेता अपने वोटों के लिए साम्प्रदायिक दंगे कराने की साजिश रचते हैं और देश को मार-काट की आग में झोंक देते हैं। अत: उपर्युक्त संक्षिप्त विवेचन के आधार पर हम नेहा के कथन को पूरी तरह सही मानते हैं।

(ग) नाजिमा का कथन है कि संविधान स्वयं असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया है। अनेक बार हमारे नेताओं ने संविधान के मूल स्वरूप को बदलने का प्रयास तक किया है, किन्तु सजग न्यायपालिका के कारण वह ऐसा करने में सफल नहीं किया जाता; जैसे–नागरिकों को काम का अधिकार, सबको शिक्षा का अधिकार, महिला और पुरुष को समान काम के लिए समान वेतन के प्रावधानों के लिए आज भी जनता को संघर्ष करना पड़ रहा है। देश के बहुत बड़े वर्ग को दो वक्त का भोजन और पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। इस वर्ग के पास तन ढकने के लिए वस्त्र नहीं हैं। इन सारी स्थितियों के लिए संविधान नहीं, हम स्वयं जिम्मेदार हैं। देश के बड़े नेता इस निम्न वर्ग को मात्र अपने वोट का साधन समझते हैं, उसकी सुख-सुविधाओं और भू-प्यास से उनका कोई सरोकार नहीं है।

किन्तु नाजिमा के कथन को शत-प्रतिशत सही मान लेना न्यायसंगत नहीं होगा, क्योंकि संविधान के प्रावधानों के अन्तर्गत देश में हो रहे विकास की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा भारत में विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है। भारत सभी विकासशील देशों में अग्रणी है। विश्व राजनीति में उसकी आवाज को सुना जाता है। निचले स्तर पर भी पर्याप्त विकास हुआ है, किन्तु विकास का लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक नहीं पहुंच पा रहा है। अतः इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान कब लागू हुआ ?
या
भारत में गणराज्य की स्थापना कब हुई?
(क) 26 जनवरी, 1949 ई० को
(ख) 26 जनवरी, 1950 ई० को
(ग) 30 अक्टूबर, 1950 ई० को
(घ) 20 नवम्बर, 1950 ई० को
उत्तर :
(ख) 26 जनवरी, 1950 ई० को।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान का स्वरूप है –
(क) संघात्मक
(ख) एकात्मक
(ग) अर्द्ध-संघात्मक
(घ) एकात्मक व संघात्मक दोनों
उत्तर :
(घ) एकात्मक व संघात्मक दोनों।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान का निर्माण किसने किया?
(क) संविधान सभा
(ख) डॉ० बी० आर० अम्बेडकर
(ग) सी० राजगोपालाचारी
(घ) पं० जवाहरलाल नेहरू
उत्तर :
(क) संविधान सभा।

प्रश्न 4.
संविधान सभा की प्रथम बैठक कब आयोजित की गई?
(क) 9 दिसम्बर, 1946 को
(ख) 7 दिसम्बर, 1947 को
(ग) 14 अगस्त, 1947 को।
(घ) 15 अगस्त, 1947 को
उत्तर :
(क) 9 दिसम्बर, 1946 को।

प्रश्न 5.
भारत विभाजन के परिणामस्वरूप संविधान सभा के सदस्यों की संख्या घटकर कितनी रह गई?
(क) 260
(ख) 271
(ग) 299
(घ) 265
उत्तर :
(ग) 299.

प्रश्न 6.
संविधान सभा में अनुसूचित वर्ग के कितने सदस्य थे?
(क) 34
(ख) 36
(ग) 26
(घ) 42
उत्तर :
(ग) 26.

प्रश्न 7.
संविधान सभा में किस राजनीतिक दल का वर्चस्व था?
(क) मुस्लिम लीग
(ख) हिन्दू महासभा
(ग) कांग्रेस
(घ) जनसंघ
उत्तर :
(ग) कांग्रेस।

प्रश्न 8.
संविधान के विषयों पर विचार-विमर्श हेतु कितनी समितियों का गठन किया गया?
(क) 7
(ख) 6
(ग) 8
(घ) 10
उत्तर :
(ग) 8.

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान की एक सरल परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
संविधान कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धान्तों का समूह है जिसके आधार पर राज्य का निर्माण किया जाता है और उसका शासन चलाया जाता है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान का निर्माण किसके द्वारा हुआ ?
उत्तर :
भारतीय संविधान का निर्माण संविधान सभा के द्वारा किया गया।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान सभा का गठन कब हुआ ?
उत्तर :
भारतीय संविधान सभा का गठन 1946 ई० में किया गया था।

प्रश्न 4.
संविधान सभा के अध्यक्ष का नाम लिखिए।
उत्तर :
डॉ० राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे।

प्रश्न 5.
प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर :
प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ० भीमराव अम्बेडकर थे।

प्रश्न 6.
भारत का संविधान कितने समय में तैयार हुआ ?
उत्तर :
भारतीय संविधान 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन की अवधि में बनकर तैयार हुआ।

प्रश्न 7.
भारत के संविधान में कितने अनुच्छेद, अनुसूचियाँ और परिशिष्ट हैं ?
उत्तर :
भारतीय संविधान में 395 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ और 9 परिशिष्ट हैं।

प्रश्न 8.
भारतीय संविधान के दो प्रमुख स्रोत क्या हैं ?
उत्तर :
भारतीय संविधान के दो प्रमुख स्रोत हैं –

  1. अमेरिका का संविधान तथा
  2. ऑस्ट्रेलिया का संविधान।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत तथा लिखित संविधान है
  2. संविधान में स्वतन्त्र न्यायपालिका का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 10.
भारतीय संविधान के दो संघात्मक तत्त्व लिखिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान के दो संघात्मक तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. संविधान को सर्वोच्चता प्रदान की गयी है।
  2. केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच अधिकारों तथा कार्यों को स्पष्ट विभाजन किया गया है।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान के दो एकात्मक तत्त्व लिखिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान के दो एकात्मक तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. संविधान में इकहरी नागरिकता का प्रावधान किया गया है।
  2. संविधान द्वारा एक ही न्याय-व्यवस्था की स्थापना की गयी है।

प्रश्न 12.
संविधान सभा का गठन किस मिशन के अनुसार किया गया था?
उत्तर :
संविधान सभा का गठन सन् 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार किया गया था।

प्रश्न 13.
संविधान सभा के लिए सदस्यों की संख्या कितनी निर्धारित की गई थी?
उत्तर :
जिस समय संविधान सभा के गठन का कार्य हुआ उस समय तक भारत का विभाजन नहीं हुआ था; अतः अविभाजित भारत के लिए संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 385 निर्धारित की गई थी।

प्रश्न 14.
अविभाजित भारत में संविधान सभा के लिए सदस्यों की संख्या का चयन कितना-कितना निर्धारित किया गया था?
उत्तर :
अविभाजित भारत में संविधान सभा के सदस्यों के चयन के लिए प्रान्तों को 292 सदस्यों का चुनाव करने का निर्देश दिया गया था और देसी रियासतों को 93 स्थान आवंटित किए गए थे।

प्रश्न 15.
भारत के विभाजन के पश्चात् संविधान सभा के सदस्यों की संख्या घटकर कितनी रह गई?
उत्तर :
भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप संविधान सभा के वास्तविक सदस्यों की संख्या घटकर 299 रह गई।

प्रश्न 16.
संविधान सभा ने औपचारिक रूप से भारतीय संविधान की रचना किस अवधि में की?
उत्तर :
संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान औपचारिक रूप से दिसम्बर, 1946 और नवम्बर, 1949 के मध्य बनाया गया।

प्रश्न 17.
संविधान सभा की पहली बैठक किस तिथि को हुई थी?
उत्तर :
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई थी। इस बैठक का आयोजन अविभाजित भारत में किया गया था।

प्रश्न 18.
विभाजित भारत में संविधान सभा की बैठक किस तिथि को हुई?
उत्तर :
14 अगस्त, 1947 को विभाजित भारत में संविधान सभा की बैठक हुई।

प्रश्न 19.
संविधान सभा का चुनाव किस प्रकार हुआ?
उत्तर :
सन् 1935 में स्थापित प्रान्तीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव हुआ।

प्रश्न 20.
26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा की आयोजित बैठक में कितने सदस्य थे?
उत्तर :
26 नवम्बर, 1949 को आयोजित बैठक में कुल 284 सदस्य उपस्थित थे। इन सदस्यों ने ही अन्तिम रूप से पारित संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए।

प्रश्न 21.
संविधान सभा में अनुसूचित वर्गों के कितने सदस्य थे?
उत्तर :
संविधान सभा में अनुसूचित वर्गों के 26 सदस्य थे।

प्रश्न 22.
संविधान सभा ने कितनी अवधि और कितनी बैठकों में संविधान पारित किया?
उत्तर :
दो वर्ष और ग्यारह माह की अवधि में आयोजित 166 बैठकों में संविधान सभा ने भारतीय संविधान को अन्तिम रूप दिया।

प्रश्न 23.
संविधान सभा ने संविधान की रचना के लिए कितनी समितियों का गठन किया था?
उत्तर :
संविधान सभा ने भारतीय संविधान की रचना के लिए आठ समितियों का गठन किया था।

प्रश्न 24.
संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव किस नेता द्वारा किस सन में प्रस्तुत किया गया था?
उत्तर :
संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव सन् 1946 में पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत किया गया था।

प्रश्न 25.
किस देश का संविधान लिखित दस्तावेज के रूप में नहीं है?
उत्तर :
इंग्लैण्ड के पास ऐसा कोई लिखित दस्तावेज नहीं है जिसे संविधान कही जा सके। उसके पास दस्तावेजों और निर्णयों की एक सूची है जिसे सामूहिक रूप से संविधान कहा जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान सभा की रचना ब्रिटिश मंत्रिमण्डल की एक समिति कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के अनुरूप हुई थी। ये प्रस्ताव क्या थे? संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर :
कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव निम्नांकित थे –

  1. प्रत्येक प्रान्त, देशी रियासत या रियासतों के समूह को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें दी गई थीं। सामान्य तौर पर दस लाख की जनसंख्या पर एक सीट का अनुपात रखा गया था। इस व्यवस्था के अन्तर्गत ब्रिटिश सरकार के प्रत्यक्ष शासन वाले प्रान्तों को 292 सदस्य तथा देशी रियासतों के न्यूनतम 93 सीटें आवंटित की गई थीं।
  2. प्रत्येक प्रान्त की सीटों को दो प्रमुख समुदायों-मुसलमान और सामान्य में उनकी जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया था। पंजाब में यह बँटवारा सिख, मुसलमान और सामान्य के रूप में किया गया था।
  3. प्रान्तीय विधान समस्याओं में प्रत्येक समुदाय के सदस्यों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना और इसके लिए उन्होंने समानुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमण मत पद्धति का प्रयोग किया।
  4. देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व के चुनाव का तरीका उनके परामर्श से तय किया गया।

प्रश्न 2.
‘संविधान की प्रस्तावना’ का क्या अर्थ है ? इसका महत्त्व लिखिए।
उत्तर :
संविधान की प्रस्तावना किसी पुस्तक की भूमिका की तरह है। यह संविधान की भावना को परिलक्षित करती है। यह उस खिड़की की भॉति है जिसमें झाँककर संविधान निर्माताओं के मन्तव्य को पढ़ा तथा समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, प्रस्तावना में संविधान के आधारभूत आदर्शों तथा सिद्धान्तों की चर्चा की गयी है। यह उल्लेखनीय है कि प्रस्तावना संविधान का आरम्भिक अंग होते हुए भी कानूनी तौर पर उसका भाग नहीं होती। यद्यपि प्रस्तावना की अवहेलना होती है तो उसकी रक्षा के लिए हम अदालत की शरण में नहीं जा सकते, तथापि यह बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि –

  1. यह संकेत करती है कि देश की सरकार कैसे चलायी जाए।
  2. इसमें सरकार के सम्मुख नये समाज के निर्माण हेतु उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया है।
  3. इससे यह पता चलता है कि संविधान देश में किस प्रकार की शासन-व्यवस्था स्थापित करना चाहता है।

प्रश्न 3.
सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न संविधान से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न संविधान से अभिप्राय यह है कि भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य है, अर्थात् भारत अपने आन्तरिक तथा बाह्य मामलों में स्वतन्त्र है। किसी बाह्य सत्ता को उस पर कोई नियन्त्रण नहीं है तथा भारत राज्य की सभी शक्तियाँ संघ के पास हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत अपनी इच्छानुसार आचरण करने के लिए स्वतन्त्र है तथा वह किसी भी विदेशी समझौते या सन्धि को मानने के लिए बाध्य नहीं है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान के प्रमुख स्रोतों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय संविधान के निर्माण में विभिन्न स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय संविधान का निर्माण बहुत सोच-समझकर और विचार-विमर्श के उपरान्त किया गया। भारतीय संविधान में विश्व के संविधान में निहित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संविधान के अधिकांश (लगभग 200) प्रावधान 1935 ई० के अधिनियम से लिये गये हैं। इसलिए इसको ‘1935 ई० के अधिनियम की कार्बन कॉपी’ भी कहा जाता है। भारतीय संविधान में संसदात्मक प्रणाली को ब्रिटेन से; संविधान की प्रस्तावना, नागरिकों के मूल अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना, न्यायिक पुनरावलोकन आदि अमेरिका के संविधान से; राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व, राष्ट्रपति का निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचन, राज्यसभा में योग्यतम व्यक्तियों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत करना आदि आयरलैण्ड के संविधान से; संघात्मक शासन-व्यवस्था को कनाडा के संविधान से; संविधान की प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची तथा केन्द्र व राज्यों के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों को तय करने की प्रणाली ऑस्ट्रेलिया के संविधान से; संविधान में संशोधन की प्रणाली दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से; राष्ट्रपति को प्रदत्त आपातकालीन शक्तियों के कुछ प्रावधान जर्मनी के संविधान से; कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया को जापान के संविधान से तथा संविधान में निहित मौलिक कर्तव्यों को रूस के संविधान से लिया गया है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान में संशोधन किस प्रकार होता है ?
उत्तर :
भारत के संविधान निर्माताओं ने ऐसा संविधान बनाया है, जो देश की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित किया जा सके। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेदों को संशोधन के लिए निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –

(1) संसद के साधारण बहुमत द्वारा – संविधान के 22 अनुच्छेद ऐसे हैं जिनका संशोधन संसद उसी प्रक्रिया से कर सकती है, जिससे वह साधारण कानून को पारित करती है। इस प्रकार के कुछ अनुच्छेद हैं-नागरिक से सम्बन्धित प्रावधान, नये राज्यों की रचना तथा वर्तमान राज्यों का पुनर्गठन, राज्यों के द्वितीय सदनों का निर्माण तथा उन्मूलन।

(2) संसद के विशिष्ट बहुमत द्वारा – संविधान में संशोधन के लिए विधेयक संसद के किसी भी सदन में पहले प्रस्तुत किया जा सकता है और जब वह विधेयक प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों के बहुमत से तथा सदन में उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति दे देता है।

(3) संसद के विशिष्ट बहुमत और विधानमण्डलों की स्वीकृति से – संविधान के कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं जिनमें संशोधन के लिए संसद के विशिष्ट बहुमत तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से विधेयक पारित हो जाना चाहिए तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए जाने से पूर्व उसे राज्यों के विधानमण्डलों में से कम-से-कम आधे विधानमण्डलों का समर्थन प्राप्त होना आवश्यक है। ये अनुच्छेद हैं-राष्ट्रपति का चुनाव, केन्द्रीय कार्यपालिका की । शक्तियों की सीमा, राज्य की कार्यपालिका की शक्तियाँ, केन्द्र द्वारा शासित क्षेत्रों में उच्च न्यायालय की व्यवस्था और राज्यों के उच्च न्यायालय आदि।

उपर्युक्त संशोधन प्रक्रिया से यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान में लचीलापन तथा कठोरता दोनों तत्त्वों का अद्भुत सम्मिश्रण है। यही कारण है कि 26 जनवरी, 1950 ई० को संविधान लागू किये जाने के समय से लेकर दिसम्बर, 2005 ई० तक संविधान में 93 संशोधन हो चुके हैं।

प्रश्न 3.
“भारत का संविधान एक सन्तुलित दस्तावेज है।” इस कथन को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर :
भारत का संविधान एक सन्तुलित दस्तावेज है। सरकार के तीन मुख्य अंग विधायिका कार्यपालिका तथा न्यायपालिका संसद, मंत्रिगण तथा सर्वोच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों को सौंपे गए हैं। साथ ही केंद्रीय मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। राष्ट्रपति सामान्यत: प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा भंग करते हैं। भारत में न्यायपालिका को विधायिता और कार्यपालिका के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त रखा गया है। इस प्रकार सरकार का कोई भी अंग यह दावा नहीं कर सकता कि उसके पास सत्ता का असीकित अधिकार है।

संविधान ने विशिष्ट मामलों के समाधान के लिए कुछ स्वतंत्र प्राधिकरणों की स्थापना भी की है। भारत का नियंत्रक और महालेखा परीक्षक एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है। इस प्राधिकरण का मुख्य कार्य केंद्र व राज्यों की आय और व्यय की जाँच करना है। निर्वाचन आयोग की स्थापना भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के उद्देश्य से की गई है। संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करे। संघ लोक सेवा आयोग अखिल भारतीय सेमें भर्ती के लिए परीक्षाएँ आयोजित करता है। संविधान द्वारा राज्यों में पृथक रूप से लोक सेवा आयोगों की स्थापना की गई है।

उपर्युक्त संवैधानिक प्राधिकरण यह सुनिश्चित करते हैं कि शासन के विधायी और कार्यकारी अग पूरी तरह नियंत्रण में रहे ताकि शक्ति संतुलन बना रहे। इस प्रकार सशासन की कोई एक शाखा संविधान के लोकतान्त्रिक स्वरूप को नष्ट नहीं कर सकती।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान से आप क्या समझते हैं ? किसी देश के लिए इसकी आवश्यकता और महत्त्व का वर्णन कीजिए।
या
संविधान किसे कहते हैं ? किसी देश के लिए यह क्यों महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर :
संविधान शब्द अंग्रेजी के ‘constitution’ शब्द का ही हिन्दी रूप है। ‘कॉन्स्टीट्यूशन’ का शाब्दिक अर्थ है-‘गठन’। दैनिक बोलचाल में ‘गठन’ शब्द का अर्थ मनुष्य के शारीरिक ढाँचे के गठन से लिया जाता है, किन्तु नागरिकशास्त्र में कॉन्स्टीट्यूशन’ शब्द का अर्थ ‘राज्य के शारीरिक ढाँचे के गठन’ से लिया जाता है।

अन्य शब्दों में, राज्यों की शासन-व्यवस्था के ढाँचे का निर्धारण करने तथा उसके समुचित संचालन के लिए प्रत्येक राज्य में कुछ लिखित या अलिखित नियम होते हैं, जिनके अनुसार ही सरकार देश में शासन का कार्य चलाती है। इन नियमों को ही कानूनी भाषा में राज्य का संविधान (Constitution) कहा जाता है।

परन्तु यहाँ यह बात ध्यान देने की है कि राज्य द्वारा बनाये गये सभी नियमों व कानूनों के समूह को संविधान नहीं कहा जाता, वरन् संविधान के अन्तर्गत केवल वे नियम व कानून सम्मिलित होते हैं। जिनके द्वारा शासन के संगठन एवं उसके ढाँचे का निर्धारण किया जाता है और शासन के विभिन्न अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों का, उनके अधिकारों व कर्तव्यों का तथा शासन वे नागरिकों के मध्य के सम्बन्धों का निर्धारण किया जाता है।

संविधान की आवश्यकता तथा महत्त्व आधुनिक

लोकतन्त्रीय युग में, जब कि शासन-व्यवस्था गाँव के एक लेखपाल से लेकर राष्ट्रपति तक सैकड़ों सरकारी पदों में बिखरी हुई है, यह अत्यन्त आवश्यक है कि शासन-कार्य को ठीक प्रकार से चलाने तथा सरकारी पदाधिकारियों एवं जनता के अधिकारों का निर्धारण करने के लिए राज्य का एक संविधान हो। वर्तमान समय में तो किसी भी देश के लिए निम्नलिखित कारणों से संविधान बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है –

(1) संविधान के अभाव में जनता को यह पता नहीं होगा कि सरकारी शासन के किस-किस अंग के क्या अधिकार हैं और राज्य तथा जनता के बीच क्या सम्बन्ध है। ऐसा करने का उद्देश्य यह होता है कि सरकार के विभिन्न अंगों की कार्यप्रणाली के सम्बन्ध में किसी प्रकार की भ्रान्ति या विवाद की सम्भावना कम-से-कम हो।

(2) संविधान के अभाव में देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। निश्चित नियमों के न होने से सरकारी कर्मचारी मनमानी करने लगेंगे और राज्य एक निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासन में परिवर्तित हो जाएगा, जिससे अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाएगी।

(3) राज्य का संविधान होने से शासन के प्रत्येक अंग को अपने कार्य-क्षेत्र का ज्ञान होगा। उन्हें यह भी पता होगा कि उनके क्या-क्या अधिकार हैं और जनता के प्रति उन्हें किन-किन कर्तव्यों का पालन करना है।

(4) नागरिक भी अपनी स्वतन्त्रता तथा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान का संरक्षण प्राप्त कर सकते हैं।

(5) संविधान राज्य तथा जनता दोनों के लिए ही एक प्रकाश-स्तम्भ के रूप में मार्गदर्शन का कार्य करता है। बिना संविधान के यह निश्चित है कि शासन तथा जनता दोनों ही अपने मार्ग से भटक जाएँगे। अतः किसी भी राज्य के अस्तित्व एवं प्रजा के सुखमय जीवन के निर्माण के लिए राज्य का एक संविधान होना अत्यन्त आवश्यक है और कोई भी राज्य संविधान के महत्त्व की उपेक्षा करके अपने अस्तित्व को खतरे में नहीं डाल सकता। अतः संविधान राज्य की नींव है।

जेलिनेक का यह कथन ठीक ही है – “उस राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जिसका अपना संविधान न हो। संविधानविहीन राज्य में अराजकता की स्थिति होगी।”

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान का निर्माण कब और कैसे हुआ ? संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर :
भारतीयों के लिए 26 जनवरी, 1950 ई० का दिन अत्यन्त गौरवपूर्ण है, क्योंकि इस दिन स्वतन्त्र भारत में स्वयं भारतवासियों द्वारा निर्मित संविधान लागू हुआ था और भारतवासियों ने पूर्ण स्वतन्त्रता का अनुभव किया। इसी दिन भारत को एक गणराज्य भी घोषित किया गया।

संविधान सभा का गठन एवं कार्य

भारत के स्वतन्त्र होने से पूर्व ही भारतीय नेताओं ने 1939 ई० में अंग्रेजों से संविधान सभा के द्वारा संविधान का निर्माण करने की माँग की थी, परन्तु उस समय भारतीयों की इस माँग को स्वीकार नहीं किया गया। कालान्तर में परिस्थितियोंवश 16 मई, 1946 ई० को कैबिनेट मिशन की योजना में इस बात पर अंग्रेजों ने अवश्य विचार किया कि भारतीयों को भारतीय संविधान के निर्माण की स्वतन्त्रता दी। जानी चाहिए, क्योंकि वे ही अपने देश की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार संविधान का निर्माण कर सकते हैं।

फलस्वरूप शीघ्र ही संविधान सभा का गठन करने के उद्देश्य से जनसंख्या के आधार पर (लगभग दस लाख पर एक) प्रतिनिधि निर्धारित किये गये। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल मत-संक्रमण प्रणाली द्वारा हुए। निर्वाचन के आधार पर संविधान सभा के कुल 389 सदस्य चुने गये। बाद में पाकिस्तान के अलग होने पर 389 सदस्यों में से 79 सदस्य अलग हो गये। इन सदस्यों के पृथक् होने के पश्चात् संविधान सभा में 310 सदस्य शेष बचे। इन्हीं सदस्यों को संविधान निर्माण का कार्य सौंपा गया।

संविधान सभा को प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 ई० को डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा की अस्थायी अध्यक्षता में प्रारम्भ हुआ। इसमें मुस्लिम लीग के सदस्यों ने भाग नहीं लिया। बाद में, 11 दिसम्बर, 1946 ई० को डॉ० राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गये।

संविधान सभा की समितियाँ – संविधान सभा के अन्तर्गत विभिन्न समितियों का गठन किया गया; जैसे—प्रक्रिया समिति, वार्ता समिति, संचालन समिति, कार्य समिति, अनुवाद समिति, सलाहकार समिति, संघ समिति, वित्तीय मामलों की समिति, झण्डा समिति, भाषा समिति, प्रारूप समिति आदि। इन समितियों में सबसे महत्त्वपूर्ण समिति प्रारूप समिति (Draft Committee) थी जिसने संविधान का प्रारूप तैयार किया था।

संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए जिस प्रारूप समिति (Draft Committee) का गठन किया गया उसके अध्यक्ष डॉ० भीमराव अम्बेडकर और अन्य सदस्य श्री के० एम० मुन्शी, श्री टी० टी० कृष्णमाचारी, श्री गोपाल स्वामी आयंगर, श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, श्री मुहम्मद सादुल्ला खाँ, श्री माधव राव और श्री डी० पी० खेतान थे। इस प्रारूप को तैयार करने में 141 दिन का समय लगा। प्रारूप समिति ने संविधान का जो प्रारूप बनाया, उसको कुछ संशोधन के साथ 26 नवम्बर, 1949 ई० को स्वीकार कर लिया गया। इसके उपरान्त संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के इस पर हस्ताक्षर हुए। इसके निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने तथा 18 दिन लगे थे और इस पर १ 63,96,729 व्यय हुए। इसमें 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियाँ थीं। बाद में इसमें चार अनुसूचियाँ और जोड़ दी गयीं (9वीं अनुसूची प्रथम संवैधानिक संशोधन में सन् 1951 ई० में, 10वीं अनुसूची 35वें संवैधानिक संशोधन में सन् 1975 ई० में, 11वीं अनुसूची 73वें संवैधानिक संशोधन में अप्रैल में व 12वीं अनुसूची 74वें संवैधानिक संशोधनों के आधार पर जून 1993 ई० में)। पश्चात्वर्ती संशोधनों के बाद 2000 को यथाविद्यमान संविधान में 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हैं। दिसम्बर 2014 तक संविधान का 99 बार संशोधन हो चुका है।

भारत के संविधान को 26 जनवरी, 1950 ई० को विधिवत् लागू कर दिया गया। इसके साथ ही भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न गणराज्य बन गया। 26 जनवरी, 1950 ई० को संविधान लागू करने का वास्तविक कारण यह था कि 26 जनवरी, 1929 ई० को भारत के निवासियों ने रावी नदी के तट पर कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में पंडित नेहरू की अध्यक्षता में यह प्रतिज्ञा की थी कि वे देश को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र कराएँगे। संविधान के लागू होने से भारतवर्ष एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न गणराज्य बन गया।

संविधान की प्रस्तावना

सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की प्रस्तावना को स्पष्ट करते हुए एक विवाद में कहा है कि, ‘प्रस्तावना संविधान के निर्माताओं के आशय को स्पष्ट करने वाली कुंजी है।

संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि, “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष ,लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचाराभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा व अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् 2006 विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

प्रस्तावना में समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ व ‘अखण्डता’ शब्द संविधान के 42 वें संशोधन द्वारा जोड़े गये हैं।

1. (स्रोत–इण्टरनेट पर भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट)।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना भारत के लोगों तथा यहाँ के पदाधिकारियों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इससे सभी पदाधिकारियों को संविधान के उद्देश्यों का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिए कहा गया है कि प्रस्तावना संविधान का मूल अंग, उसकी कुंजी तथा आत्मा है। डॉ० सुभाष कश्यप के अनुसार, प्रस्तावना में निहित पावन आदर्श हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य हैं और जहाँ वे एक ओर हमें अपने गौरवमय अतीत से जोड़ते हैं, वहाँ उस भविष्य की आशंका को भी सँजोते हैं।”

प्रश्न 3.
“भारतीय संविधान संघात्मक है, परन्तु उसमें एकात्मकता के लक्षण भी विद्यमान हैं।” विवेचना कीजिए।
या
भारतीय संविधान की संघात्मक व एकात्मक विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
भारतीय संविधान में संघात्मक और एकात्मक दोनों प्रकार के संविधानों के लक्षण पाये जाते हैं। भारत का संविधान एकात्मकता की ओर झुकता हुआ संघात्मक संविधान है। एक विद्वान्के  शब्दों में, “भारतीय संविधान की प्रकृति संघीय है, किन्तु आत्मा एकात्मक।”

संघात्मक विशेषताएँ

भारतीय संविधान में संघात्मक संविधान की निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

(1) लिखित तथा स्पष्ट – भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है जिसमें सरल तथा स्पष्ट अर्थों वाली शब्दावली का प्रयोग किया गया है। इसे संविधान सभा ने तैयार किया था।

(2) सर्वोच्च तथा कठोर – भारतीय संविधान को देश के सर्वोच्च कानून की स्थिति प्राप्त है। कोई भी सरकार इसका उल्लंघन नहीं कर सकती। यह कठोर इसलिए है, क्योंकि इसमें संशोधन की प्रक्रिया को बहुत जटिल रखा गया है। राज्यों के अधिकार-क्षेत्र के सम्बन्ध में तो अकेले केन्द्रीय संसद कोई संशोधन कर ही नहीं सकती।

(3) शक्तियों का विभाजन – भारतीय संविधान के अन्तर्गत केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है तथा सभी विषयों को तीन सूचियों में बाँट दिया गया है-

  1. संघ सुंची
  2. राज्य सूची तथा
  3. समवर्ती सूची।

संघ सूची पर केन्द्रीय सरकार को तथा राज्य सूची पर राज्यों की सरकारों को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। समवर्ती सूची पर केन्द्र तथा राज्यों की सरकारें कानून बना सकती हैं, किन्तु सर्वोच्चता केन्द्रीय सरकार को प्राप्त है। अवशिष्ट विषय केन्द्रीय सरकार के अधीन हैं। संघ, राज्य और समवर्ती सूची के विषयों की संख्या क्रमशः 97, 66 तथा 47 है।

(4) स्वतन्त्र न्यायपालिका – भारतीय संविधान में एक स्वतन्त्र तथा शक्तिशाली न्यायपालिका की व्यवस्था की गयी है। देश का सर्वोच्च न्यायालय केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों के नियन्त्रण से मुक्त है। यह संसद तथा राज्य सरकारों द्वारा निर्मित कानूनों को अवैध घोषित कर सकता है। इसे संविधान की रक्षा का कार्यभार सौंपा गया है।

(5) द्विसदनीय व्यवस्थापिका – भारतीय संसद का उच्च सदन अर्थात् राज्यसभा राज्यों को सदन है, जो राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है तथा निम्न सदन अर्थात् लोकसभा जनता का प्रतिनिधित्व करता है।

(6) संशोधन प्रणाली – भारतीय संविधान में संशोधन की प्रणाली पूर्ण रूप से संघात्मक शासन के अनुरूप है।

एकात्मक विशेषताएँ भारतीय संविधान में एकात्मक संविधान की निम्नांकित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

(1) इकहरी नागरिकता – संविधान में देश के नागरिकों को केवल भारतीय नागरिकता प्रदान की गयी है। इसमें राज्यों की पृथक् नागरिकता की कोई व्यवस्था नहीं है।

(2) राष्ट्रपति की सर्वोच्च शक्तियाँ – संविधान के अनुसार संकट या आपात्काल में देश की शासन सम्बन्धी सम्पूर्ण शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में आ जाती हैं। राज्यों की सरकारों को राष्ट्रपति की इच्छानुसार अपने राज्यों को शासन चलाना पड़ता है।

(3) सीमाओं में परिवर्तन – संसद को राज्यों की सीमाओं तथा नाम में परिवर्तन करने का अधिकार है।

(4) सेना भेजना – केन्द्रीय सरकार प्रान्तीय सरकार के परामर्श के बिना भी राज्य में सेना को भेज सकती है।

(5) राज्यपाल को पद राज्यपाल प्रान्तीय शासन का अध्यक्ष होता है। राज्यपाल की नियुक्ति, स्थानान्तरण तथा पदच्युति का अधिकार राष्ट्रपति को है। वस्तुतः राज्यपाल प्रान्तों में केन्द्रीय सरकार के एजेण्ट के रूप में कार्य करती है।

(6) वित्तीय निर्भरता – प्रान्तीय सरकारें अपने विकासशील कार्यों हेतु केन्द्रीय अनुदानों (Grants) तथा ऋण पर निर्भर करती हैं।

(7) राज्य सूची पर कानून – निर्माण–भारतीय संविधान के अन्तर्गत सामान्य तथा आपातकालीन परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची में दिये गये विषयों पर कानून-निर्माण का अधिकार प्राप्त

(8) समान न्याय-व्यवस्था – एकात्मक संविधान की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि सम्पूर्ण देश में समान न्यायव्यवस्था पायी जाती है। भारतीय संविधान में यह विशेषता भी विद्यमान है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्यों के न्यायालयों में दीवानी तथा फौजदारी मुकदमों के लिए एक जैसे कानून बनाये गये हैं। साथ ही राज्यों के उच्च न्यायालयों को उच्चतम (सर्वोच्च) न्यायालय के अधीन रखा गया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारत का संविधान न तो पूर्णतया संघात्मक है और न ही पूर्णतया एकात्मक, वरन् इसमें दोनों ही प्रकार की विशेषताओं का समावेश है।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 3 Aims of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 3
Chapter Name Aims of Education (शिक्षा के उद्देश्य)
Number of Questions Solved 59
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 3 Aims of Education (शिक्षा के उद्देश्य)

विरतृत उत्तरीय प्रज

प्रश्न 1.
“शिक्षा एक सोद्देश्य प्रक्रिया है।” इस कथन की पुष्टि विभिन्न विचारकों के मत से कीजिए।
या
शिक्षा के उद्देश्य निर्धारण की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए। शिक्षा के कौन-कौन-से उद्देश्य हैं ? वर्णन कीजिए।
या
शिक्षा के उद्देश्य-निर्धारण की आवश्यकता क्यों है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के उद्देश्य निर्धारण की आवश्यकता
(Need for Determining the Aims of Education)

शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण एवं व्यापक प्रक्रिया है जो मानव के सर्वांगीण विकास तथा समाज के निर्माण से जुड़ी हुई है। उद्देश्यहीन शिक्षा एक दिशाहीन तथा निष्फल प्रयास है। इस विषय में डॉ० बी० डी० भाटिया का कथन उल्लेखनीय है, “उद्देश्य के बिना शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपना लक्ष्य नहीं जानता तथा शिक्षार्थी उस पतवारविहीन नौका के समान है जो तट से दूर कहीं बही जा रही है। शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण किए बिना शिक्षण-कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। बालक के सर्वांगीण विकास हेतु उसमें वांछित परिवर्तन लाने की दृष्टि से शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों का निर्धारित होना अनिवार्य है।

शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य निर्धारित होने पर मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया तीव्र होती है। स्वभावत: उद्देश्यों का ज्ञान होने पर ही उनकी प्राप्ति के उपाय आसानी से खोजे जा सकते हैं और साधनों पर भली-भाँति विचार किया जा सकता है। शैक्षिक गतिविधियों एवं क्रियाकलापों को सम्पादित करने की दृष्टि से पाठ्यक्रम, पाठ-योजना, शिक्षण-विधि, शिक्षक-प्रशिक्षण तथा अभिप्रेरणा के साधनों का उचित संगठन और व्यवस्था का तभी करना सम्भव है जब कि शैक्षिक उद्देश्य सुस्पष्ट हों।

उद्देश्य का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति ही न्यूनतम समय एवं शक्ति लगाकरं जीवन में विषम परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक सामना कर सकता है। जिस शिक्षक को अपने उद्देश्यों का ज्ञान नहीं होता, उसे कभी भी शिक्षण-कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। उसकी निरुद्देश्य क्रियाएँ अबोध शिक्षार्थियों को भटकाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्र का भविष्य अँधेरे में खो जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली की उद्देश्यहीनता ने युवाओं को दिशाहीन, उत्साहहीन, अनुशासनहीन तथा विद्रोही बना दिया है। राष्ट्र को एक सुन्दर एवं कल्याणकारी शिक्षा-व्यवस्था प्रदान करने के लिए शिक्षा को आदर्श उद्देश्यों से युक्त करना होगा।

शिक्षा के उद्देश्य सम्बन्धी शिक्षाशास्त्रियों के विचार
(Views of Educationists Regarding the Aims of Education)

शिक्षा के उद्देश्य प्रतिपादित करने के विषय में विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं, जो निम्न प्रकार हैं|

  1. सुकरात के अनुसार, “शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सत्य समझाना तथा तदनुसार व्यवहार सिखाना
  2. प्लेटो के अनुसार, “वह शिक्षा अनुदार है जिसका उद्देश्य बुद्धि और न्याय की ओर ध्यान न देकर केवल धन या शारीरिक बल की प्राप्ति है।”
  3. अरस्तू का कथन है, “शिक्षा का उद्देश्य सुख प्राप्त करना है।”
  4. मिल्टन के मतानुसार, “शिक्षा का उद्देश्य शान्ति और युद्ध के काल में निजी तथा सार्वजनिक कार्यों को उचित प्रकार से करने हेतु व्यक्ति को तैयार करना है।”
  5. हरबर्ट स्पेन्सर का मत है, “जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना हमारी शिक्षा का आवश्यक अंग
  6. दी० रेमण्ट का कथन है, “अन्ततोगत्वा शिक्षा का उद्देश्य न तो शारीरिक शक्ति उत्पन्न करना है, न ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करना, न विचारधारा का शुद्धीकरण, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र को शक्तिशाली तथा उज्ज्व ल बनाना है।”
  7. हरबर्ट के अनुसार, “शिक्षा की सभी समस्याओं का समाधान नैतिकता’ के अन्तर्गत सीमित है। इसी शब्द से शिक्षा के सभी उद्देश्य व्यक्त होते हैं।’
  8. जॉन डीवी के मतानुसार, “शिक्षा का उद्देश्य इस तरह का वातावरण उत्पन्न करना है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति मानव-जाति की सामाजिक जागृति में सफलता से भाग ले सके।”
  9. टी० पी० नन ने लिखा है, “शिक्षा को ऐसी दशाएँ उत्पन्न करनी चाहिए जिनसे वैयक्तिकता का पूर्ण विकास हो और व्यक्ति मानव-जीवन को अपना मौलिक योग दे सके।”
  10. रॉस के शब्दों में, “वास्तव में, जीवन और शिक्षा के उद्देश्यों के रूप में आत्मानुभूति तथा समाज-सेवा में कोई भेद नहीं है, क्योंकि दोनों एक ही हैं।”
  11. अरविन्द घोष ने लिखा है, “शिक्षा का उद्देश्य विकसित होने वाली आत्मा को सर्वोत्तम प्रकार से विकास करने में सहायता देना और श्रेष्ठ कार्य के लिए पूर्ण बनाना होना चाहिए।”
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  12. माध्यमिक शिक्षा आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, “छात्रों को इस प्रकार का चारित्रिक प्रशिक्षण दिया जाए कि वे नागरिकों के रूप में भावी प्रजातान्त्रिक, सामाजिक व्यवस्था में रचनात्मक ढंग से भाग ले सकें और उनकी व्यावहारिक व व्यावसायिक कुशलता में उन्नति की जाए ताकि वे अपने देश की आर्थिक प्रगति करने में अपना योग दे सकें।”
  13. रिऑर्गेनाइजेशन ऑफ सेकेण्डरी स्कूल-रिपोर्ट (यू० एस० ए०)–“शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति के ज्ञान, रुचियों, आदर्शों, आदतों और शक्तियों का विकास करना है ताकि उसे अपना उचित स्थान मिल सके। और वह उस स्थान का प्रयोग स्वयं तथा समाज को उच्च उद्देश्यों की ओर ले जाने के लिए कर सके।” विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों के विचार, विद्वानों के मत एवं वैयक्तिक-सामाजिक जीवन-दर्शन शिक्षा के विविध उद्देश्य निर्धारित करने की प्रेरणा देते हैं जिनमें से कुछ प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं–
    • वैयक्तिक उद्देश्य,
    • सामाजिक उद्देश्य,
    • व्यावसायिक उद्देश्य,
    • चरित्र-निर्माण का उद्देश्य,
    • ज्ञानार्जन का उद्देश्य,
    • शारीरिक विकास का उद्देश्य,
    • सांस्कृतिक उद्देश्य,
    • जीवन को पूर्णता प्रदान करने का उद्देश्य,
    • सर्वांगीण विकास का उद्देश्य,
    • वातावरण से अनुकूलन का उद्देश्य तथा
    • अवकाश-काल के सदुपयोग का उद्देश्य।

वास्तव में शिक्षा एक प्रयोजन मूलक प्रक्रिया है। निश्चित उद्देश्यों को ध्यान में रखकर दी जाने वाली शिक्षा ही शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों में चेतना जगा सकती है। ऊपर हमने शिक्षा के अनेक उद्देश्यों का उल्लेख किया है। जो प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अपूर्ण तथा एकांगी हैं। इनमें से कोई भी एक उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करने में सक्षम नहीं है। वास्तव में, शिक्षा का वही उद्देश्य पूर्ण कहा जाएगा जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के हित में हो तथा जो शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास की सतत प्रक्रिया का प्रेरक बन सके।

प्रश्न 2.
शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों का विवाद क्या है? शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य 
का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके पक्ष तथा विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा के वैयक्तिक विकास के उद्देश्य से आप क्या समझते हैं। शिक्षा के वैयक्तिक विकास के उद्देश्य से आप क्या समझते हैं ?
या
इस परिप्रेक्ष्य में व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए विकास के किन पक्षों पर बल दिया जाता है ?
उत्तर:

शिक्षा के वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्य का विवाद
(Dispute of the Individual and Social Aims of Education)

व्यक्ति और समाज का एक-दूसरे से अटूट सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और इस प्रकार एक-दूसरे के पूरक भी हैं। व्यक्तियों द्वारा समाज निर्मित होता है और समाज से पृथक् होकर व्यक्ति स्वयं को एकाकी, अशक्त, अयोग्य तथा निष्क्रिय अनुभव करता है। व्यक्ति और समाज के सापेक्षिक महत्त्व के विषय में काफी पहले से ही विभिन्न वैयक्तिक तथा सामाजिक समस्याओं पर विचार-विनिमय एवं वाद-विवाद चला आ रहा है। यह तर्क-वितर्क शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं को लेकर भी रहता है कि शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति है अथवा उसका समाज। शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों के सम्बन्ध में कुछ प्रश्नों को लेकर भारी मतभेद हैं; जैसे—शिक्षा पर पहला अधिकार व्यक्ति का है या समाज का? शिक्षा को व्यक्ति की आवश्यकताएँ पूरी करनी चाहिए या समाज की? शिक्षा व्यक्तियों के निर्माण की प्रक्रिया है या समाज के निर्माण की? आधुनिक विचारधारा शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों का समन्वय प्रस्तुत करती है। इस विचारधारा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का विकास इस भाँति होना चाहिए कि वह समाज के हित में अधिक-से-अधिक सहयोग दे सके।

शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों में विरोध है अथवा समन्वय–इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए। हमें वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों का अलग-अलग अध्ययन करना होगा।

वैयक्तिक उद्देश्य
(Individual Aim)

वैयक्तिक उद्देश्य का अर्थ- शिक्षा एक व्यक्तिगत प्रयास है। व्यक्ति को केन्द्र मानकर दी जाने वाली शिक्षा ही वास्तविक एवं वैज्ञानिक शिक्षा है। शिक्षा के माध्यम से बालक के अन्तर्निहित गुणों का विकास होता है। और बालकों का सर्वांगीण विकास समाज की प्रगति का द्योतक है। अत: शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य बालक को स्वतन्त्र रूप से अपनी प्रगति का अवसर देना है। शिक्षा के माध्यम से बालकों की रुचियों, क्षमताओं, प्रवृत्तियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ऐसी परिस्थिति पैदा की जानी चाहिए ताकि उनकी वैयक्तिकता का पूर्ण विकास हो और वह भविष्य में सुखमय जीवन बिता सके। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री सुबोध अदावल का कथन इस मत की पुष्टि करता है, “बालक का निजत्व ही उसका जीवन है और वही न रहा तो उसका समूचा जीवन केवल यन्त्र बनकर रह जाएगा।” क्योंकि सृष्टि की समस्त रचनाओं में व्यक्ति ही सर्वश्रेष्ठ एवं प्रधान है; अतः शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तिगत’ ही होना अभीष्ट है।

शिक्षा की प्राचीन विचारधारा शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य की पक्षधर रही है। भारतीय मनीषियों ने व्यक्ति के विकास एवं हित में ही सम्पूर्ण समाज का कल्याण अनुभव किया। यूनान के सोफिस्टों (Sophists) ने भी शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का ही समर्थन किया। आधुनिक समय में रूसो, फ्रॉबेल, पेस्टालॉजी तथा टी० पी० नन आदि विचारकों ने शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य पर बल दिया है। रूसो ने व्यक्तिगत गुणों को शिक्षा को आधार मानते हुए बालक को केन्द्र मानकर शिक्षा की योजना बनाई। पेस्टालॉजी ने बालक को मनोवैज्ञानिक अध्ययन का विषय बनाकर उसकी नैसर्गिक प्रवृत्तियों पर आधारित शिक्षा-व्यवस्था दी। टी० पी० नन के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य बालक के जन्मजात गुणों का अभिप्रकाशन है। उनकी दृष्टि में शिक्षा की वही योजना उत्तम है जो व्यक्ति की उन्नति में सहयोग देती है। नन लिखते हैं, “वैयक्तिकता ही जीवन का आदर्श है। एक शिक्षा की योजना का मूल्यांकन इस बात पर निर्भर करता है कि उससे किसी व्यक्ति को चरम सीमा की कुशलता प्राप्त करने में कितनी सफलता मिली है?”

यूकेन (Eucken) ने वैयक्तिकता को आध्यात्मिक अर्थ देते हुए कहा है, “वैयक्तिक का अर्थ आध्यात्मिक वैयक्तिकता होना चाहिए, जिसे मनुष्य अपने सामने उपस्थित अन्तर्जगत द्वारा अपनी आन्तरिक शक्ति में वृद्धि कर प्राप्त करता है।

वैयक्तिक उद्देश्य का अर्थ समझाते हुए रॉस ने लिखा है, “शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का अर्थ जो हमारे स्वीकार करने योग्य है, वह केवल यह है-महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व और आध्यात्मिक वैयक्तिकता का विकास।”

वैयक्तिक उद्देश्य को अर्थ स्पष्ट करने वाले विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों के विचार उसी शिक्षा को उचित एवं लाभकारी बताते हैं जो बालक के व्यक्तिगत विकास को ध्यान में रखकर प्रदान की जाती है। आधुनिक समय में मनोवैज्ञानिक शोधों के निष्कर्ष व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर आधारित शिक्षा का सशक्त समर्थन करते हैं। अतः कहा जा सकता है कि वैयक्तिक उद्देश्य ही शिक्षा का मौलिक एवं प्रमुख उद्देश्य है।

वैयक्तिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क
(Arguments in Favour and Against the Individual Aim)

वैयक्तिक उद्देश्य के समर्थक तथा विरोधी विचारकों ने इसके पक्ष एवं विपक्ष में अपने-अपने तर्क दिए हैं, जो निम्न प्रकार प्रस्तुत हैं–
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प्रश्न 3.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य से क्या आशय है? शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तक का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दीजिए।
या
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

सामाजिक उद्देश्य का अर्थ
(Meaning of Social Aims)

प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री रेमण्ट ने लिखा है, “समाजविहीन व्यक्ति कोरी कल्पना है। इसमें सन्देह नहीं कि व्यक्ति समाज के बीच रहकर ही अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है तथा अपना बहुमुखी विकास । कर प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। समाज के हित में ही व्यक्ति का सभी भाँति हित है और अलग से उसका कोई अस्तित्व भी नहीं है। व्यक्ति और समाज का यह अटूट सम्बन्ध ऐसी शिक्षा का समर्थन करता है। जो समाज का अधिकतम हित कर सके, क्योंकि समाज का विकसित एवं कल्याणकारी स्वरूप स्वयमेव ही व्यक्ति का उत्थान कर देगा। इसके अतिरिक्त समाज अथवा राज्य का स्थान व्यक्ति से कहीं ऊँचा है। इस दृष्टि से शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक कल्याण हेतु व्यक्ति को प्रशिक्षित करना है। यही शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य है, जिसे नागरिकता का उद्देश्य (Citizenship Aim) भी कहा जाता है।

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य व्यक्ति को, आवश्यकता पड़ने पर, समाज के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा देता है। विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के अन्तर्गत शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों को राज्य के हित में अपना सब कुछ न्योछावर करने की भावना पैदा करना था। हीगल तथा काण्ट जैसे विद्वानों ने भी इसी विचारधारा का प्रबल समर्थन किया है।

आधुनिक समय में जॉन डीवी तथा बागले आदि शिक्षाशास्त्रियों के मतानुसार, सामाजिक उद्देश्य को अर्थ सामाजिक कुशलता की प्राप्ति है और तंदनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक रूप से कुशल तथा दक्ष बनाना ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। सामाजिक रूप से कुशल व्यक्ति में स्वयं अपनी आजीविका चलाने की सामर्थ्य होती है तथा वह आत्मनिर्भर होता है। एक श्रेष्ठ नागरिक के रूप में उसे व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा सामाजिक समस्याओं की गहरी समझ होती है और वह राज्य एवं उसके नागरिकों की इच्छाओं व आवश्यकताओं का पूरा सम्मान करता है। जैसा कि स्मिथ ने कहा है, “विद्यालय को विस्तृत कार्य सँभालना चाहिए तथा उसे निश्चित रूप से ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे सामाजिक कृतज्ञता एवं सामुदायिक भक्ति के उत्पन्न और पोषित किए जाने का कार्य हो सके।

शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क
(Arguments in Favour and Against the Social Aim of Education)

शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के पक्षधर तथा विपक्षी विद्वानों ने इसके समर्थन तथा विरोध में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए हैं–
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प्रश्न 4.
“शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
“शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्य एक-दूसरे के पूरक हैं।” कैसे ?
उत्तर:

वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्य : एक-दूसरे के पूरक
(Individual and Social Aims : Complementary to Each Other)

शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की आधारभूत मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि ये दोनों ही उद्देश्य अपनी-अपनी विशिष्टताओं से युक्त होते हुए भी अनेक परिसीमाओं में बँधे हैं। दोनों के ही अपने-अपने गुण तथा दोष हैं। वास्तव में, व्यक्ति और समाज को एक-दूसरे का विरोधी मानने वाले सभी शिक्षाशास्त्रियों ने अपने मत प्रतिपादित करते समय व्यक्ति और समाज को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दे डाला। इसका अच्छा परिणाम नहीं निकला और अन्तत: व्यक्ति एवं समाज दोनों ही पक्षों की पर्याप्त हानि हुई। इस हानि को रोकने की दृष्टि से एक समन्वित विचारधारा के अन्तर्गत अग्रलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना उपयोगी है–

1. वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यः एक-दूसरे के पूरक व्यक्ति एवं समाज तथा इन पर आधारित. शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों में से कौन-सा प्रमुख है? इसे लेकर पुराना विवाद है। इस विवाद की समाप्ति के लिए हमें एक मध्य मार्ग चुन लेना चाहिए और दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे के समीप लाने का प्रयास करना चाहिए। किसी एक को प्रधानता देकर दूसरे की उपेक्षा करना उचित नहीं है। दोनों को ही समान महत्त्व है। व्यक्तियों के मिलने से समाज बनता है और सामाजिक परम्परा व्यक्ति का निर्माण करती है। दोनों का कहीं कोई विरोध नहीं, अपितु दोनों एक-दूसरे को पूर्ण करने वाली धारणाएँ हैं। मैकाइवर का कथन है, समाजीकरण तथा वैयक्तीकरण एक ही प्रक्रिया के दो पक्ष हैं।” जिस भाँति व्यक्ति’ और ‘समाज’ अपनी प्रगति के लिए एक-दूसरे का सहारा चाहते हैं और एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, ठीक वैसे ही शिक्षा के वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्य भी एक-दूसरे के पूरक हैं।

2. वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय-व्यक्ति और समाज की पारस्परिक घनिष्ठता इतनी है कि उनके बीच कोई सीमा-रेखा नहीं खींची जा सकती। फूलों की माला के विभिन्न फूलों को एक-दूसरे से या अपने ही समूह से कैसे अलग किया जा सकता है? माला तो सभी फूलों का एक समन्वित रूप है। प्रसिद्ध विचारक रॉस (Ross) तथा टी० पी० नन (Nunn) ने वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय स्थापित किया है। उनकी दृष्टि में व्यक्ति समाज में रहकर समाज-सेवा द्वारा आत्मानुभूति प्राप्त करता है। उसके व्यक्तित्व का विकास, प्रकाशन एवं मूल्यांकन भी समाज में रहकर ही होता है। रॉस ने व्यक्ति के लिए समाज का महत्त्व बताते हुए लिखा है, “वैयक्तिकता का विकास केवल सामाजिक वातावरण में होता है, जहाँ सामान्य रुचियों और सामान्य क्रियाओं से उसका पोषण हो सकता है। यह भी सच है कि अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्र वातावरण मिलना चाहिए ताकि वह स्वयं को अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित कर सके, क्योंकि व्यक्ति और उसका समाज एक-दूसरे के सहयोग से अपना विकास कर सकते हैं। अत: वैयक्तिक एवं सामाजिक उद्देश्यों को समन्वयात्मक दृष्टि से व्यावहारिक बनाना उपयुक्त है। पुनः रॉस के ही शब्दों में, “वस्तुतः इस बात में कोई पारस्परिक विरोध नहीं है कि

आत्मानुभूति और समाज-सेवा ये दोनों जीवन तथा शिक्षा के उद्देश्य हैं, क्योंकि वे एक ही हैं।” इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता हैं, कि शिक्षा के वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों में कोई विरोध नहीं है। वे एक-दूसरे के पूरक और समन्वग्नक हैं। इस समन्वयवादी विचारधारा के अन्तर्गत शिक्षा की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें न तो समाजव्यक्ति को अपना दास बना पाए और न व्यक्ति ही इतना स्वतन्त्र हो जाए कि वह सामाजिक विधि-विधानों को ठुकराकर अपनी मनमानी करने लगे। व्यक्ति और समाज की स्वतन्त्रता अपनी परिसीमाओं में उचित है ताकि दोनों का विकास तथा कल्याण हो सके।

प्रश्न 5.
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए। शिक्षा के इस उद्देश्य के पक्ष तथा 
विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तक का भी उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य से क्या तात्पर्य है ? व्यक्ति और समाज की दृष्टि से इस उद्देश्य की उपयोगिता बताइए।
उत्तर:

शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का अर्थ
(Meaning of the Vocational Aim of Education)

रोटी, कपड़ा, घर, चिकित्सा और शिक्षा- प्रत्येक व्यक्ति की ये पाँच आधारभूत आवश्यकताएँ हैं जो उसके जन्म से प्रारम्भ होकर मृत्यु तक बनी रहती हैं। स्वयं अपने तथा अपने आश्रितों के लिए इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु व्यक्ति को निश्चय ही कोई-न-कोई व्यवसाय करना पड़ता है। जीविकोपार्जन एवं व्यवसाय की दृष्टि से शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि शिक्षा बालकों को जीविकोपार्जन के लिए सुन्दर, योजनाबद्ध, व्यवस्थित एवं मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करती है। यही कारण है कि आज के इस आर्थिक युग में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक युग की औद्योगिक क्रान्ति ने तो व्यावसायिक अथवा जीविकोपार्जन के उद्देश्य को सर्वाधिक श्रेष्ठ एवं उपयोगी बना दिया है।

जॉन डीवी का मत है, “यदि व्यक्ति अपनी जीविका स्वयं नहीं कमा सको तो वह दूसरों के काम पर जीवित रहने वाला अर्थात् परजीवी है और जीवन के बहुमूल्य अनुभव खो रहा है। यही कारण है कि मनुष्य के भौतिक, मानसिक, सांवेगिक, नैतिक तथा चारित्रिक विकास के लिए पर्याप्त धनोपार्जन अनिवार्य है। विशेषकर इस भौतिकवादी समय में व्यक्ति की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति उसके जीवन की पहली शर्त है, जिसे पूरा करने

के लिए मनुष्य को उचित ‘आजीविका या व्यवसाय उपलब्ध कराया जाना चाहिए। टी० रेमण्ट ने लिखा है, प्रत्येक नागरिक को स्वयं और अपने आश्रितों का भरण-पोषण करना आवश्यक है। इस कार्य में शिक्षा मनुष्य की सर्वाधिक सहायता करती है।” हरबर्ट स्पेन्सर ने ठीक ही कहा है, “जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना हमारी शिक्षा का आवश्यक अंग है।”

शिक्षा में व्यावसायिक उद्देश्य से अभिप्राय है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जीवन-यापन के लिए किसी विशेष व्यवसाय का प्रशिक्षण प्रदान किया जाए। ताकि वह उस व्यवसाय में दक्षता एवं कुशलता प्राप्त कर धनोपार्जन कर सके। ऑ० जाकिर हुसैन के शब्द व्यावसायिक उद्देश्य स्पष्ट करते हैं, “राज्य का पहला कार्य यह होना चाहिए कि वह नागरिक को किसी लाभप्रद कार्य के लिए वे समाज में किसी निश्चित कार्य के लिए शिक्षित करना अपनी उद्देश्य बनाए।’ शिक्षा में व्यावसायिक उद्देश्य को मान्यता देने का अर्थ समाज (या राज्य) के बालकों को उनकी आवश्यकताओं, रुचियों, अभिरुचियों, योग्यताओं तथा क्षमताओं के अनुसार किसी व्यवसाय या उत्पादन कार्य को सिखाकर इस योग्य बना देने से है ताकि वे अपनी जीविकोपार्जन भली प्रकार कर सकें। व्यावसायिक उद्देश्य बालक को आजीविका की दृष्टि से आत्मनिर्भर तथा स्वावलम्बी बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक प्रयास है। अत: इसे जीविकोपार्जन या उपयोगिता का उद्देश्य भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों ने इसे दाल-रोटी का उद्देश्य, ह्वाइट-कॉलर उद्देश्य (White-Collar Aim) या ब्लू जैकिट उद्देश्य (Blue Jacket Aim) का नाम दिया है।

व्यावसायिक उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क
(Arguments in Favour and Against the Vocational Aim)

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व्यावसायिक उद्देश्य की समीक्षा
(Evaluation of Vocational Aim)

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शिक्षा के व्यावसायिक या जीविकोपार्जन उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में विभिन्न विचारों का अध्ययन हमें इस सुनिश्चित निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि यह उद्देश्य स्वयं में महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी होते हुए भी शिक्षा का , एकमात्र उद्देश्य नहीं है। व्यावसायिक उद्देश्य का दृष्टिकोण किसी प्रकार भी उदार एवं व्यापक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इसके अन्तर्गत मानव-जीवन के मानसिक, सांवेगिक, नैतिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की अवहेलना की जाती है। इस भाँति, कुल मिलाकर मनुष्य का सर्वांगीण विकास बाधित होता है।

यद्यपि व्यावसायिक उद्देश्य व्यक्ति को भौतिक सम्पन्नता प्रदान करता है, किन्तु यह उसे न तो जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने में सहायता देता है और न पूर्ण जीवन के लिए तैयार ही करता है। व्यक्ति के जीने के लिए रोटी आवश्यक है, लेकिन व्यक्ति सिर्फ रोटी के लिए ही नहीं जीता। उसे जीवन की कोमल भावनाओं तथा मानवीय गुणों; जैसे—प्रेम, दया, करुणा, सद्भाव, भ्रातृत्व-भाव, सेवा तथा त्याग की वास्तविक अनुभूति भी होनी चाहिए, तभी वह आत्मानुभूति के माध्यम से जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सकेगा। इसके विपरीत, व्यावसायिक शिक्षा मनुष्य को प्राकृतिक वातावरण से परे कृत्रिम एवं नीरस वातावरण में ले जाती

मानव इस सृष्टि की उत्कृष्ट रचना है। यदि शिक्षा मानव-जीवन को यथार्थ, सुन्दर तथा कल्याणकारी बनाने के लिए है तो मानव को किसी व्यवसाय या सिर्फ जीविकोपार्जन के लिए तैयार करना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं हो सकता। शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन के साथ ही व्यक्ति में मानवीय एवं दिव्य गुणों का विकास करना है और यही अभिव्यक्ति हमें स्पेंस रिपोर्ट के इन शब्दों से भी मिलती है, “जीविकोपार्जन की तैयारी हमारी शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।”

प्रश्न 6.
“मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा रक्षक चरित्र है, शिक्षा नहीं।” हरबर्ट 
स्पेन्सर के इस कथन की आलोचना कीजिए।
या
“शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य चरित्र का निर्माण है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
शिक्षा के अन्तर्गत चरित्र-निर्माण का उद्देश्य क्यों आवश्यक है?
उत्तर:

मानव-जीवन में चरित्र का महत्त्व
(Importance of Character in Human Life)

एक प्राचीन प्रचलित कहावत् है, ‘यदि धन नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट नहीं हुआ, यदि स्वास्थ्य नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट हो गया, किन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो सभी कुछ नष्ट हो गया।’ (If wealth is lost nothing is lost. If health is lost something is lost. If character is lost everything is lost.) अभिप्राय यह है कि चरित्र व्यक्ति की सर्वाधिक मूल्यवान् वस्तु है। आज व्यक्तिगत, सामूहिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय मूल्यों का तेजी से पतन हो रहा है, जिससे समाज में दु:ख, तनाव तथा कष्ट बढ़ रहे हैं। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि चरित्र एवं नैतिक मूल्यों की वृद्धि में आधुनिक शिक्षा प्रणाली का योगदान नगण्य है।

डॉ० राधाकृष्णन का कहना है, “भारत सहित सारे संसार के कष्टों का कारण यह है कि शिक्षा का सम्बन्ध नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति से न रहकर, केवल मस्तिष्क के विकास से रह गया है। वास्तव में राष्ट्र का निर्माण पत्थर की निर्जीव मूर्तियों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के दृढ़ चरित्र से होता है। चरित्रहीन एवं अनैतिक लोगों की भीड़ आदर्श समाज का निर्माण नहीं कर सकती। वास्तव में, शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक व बौद्धिक शक्तियों का विकास ही नहीं है, वरन् उत्तम चरित्र तथा आध्यात्मिकता में प्रतिष्ठित नैतिकता का सृजन करना है। अतः बालकों में समुचित नैतिक आदर्शों का विकास करने की दृष्टि से चरित्र-प्रधान शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।

शिक्षा का चरित्र-निर्माण का उद्देश्य
(Character-Formation-An Aim of Education)

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक के चरित्र का निर्माण बताया है। इस मान्यता के अनुसार बालकों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जो उनके चरित्र को सुदृढ़ तथा पवित्र बनाने में सहायक हो और इस भाँति उनका आचरण श्रेष्ठ बन सके। शिक्षा में चरित्र-निर्माण के उद्देश्य का विवेचन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. चरित्र की महत्ता एवं अपरिहार्यता- विश्वभर में प्राचीनकाल से आज तक मानव व्यक्तित्व के विविध पक्षों के अन्तर्गत चरित्र की प्रतिष्ठा एवं महत्ता सर्वोपरि तथा अक्षुण्ण है। भारतीय धर्मशास्त्रों में कहा गया है—’वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्तमेति च यातिच’ अर्थात् चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक की जानी चाहिए। धन तो आता है और चला जाता है, किन्तु उत्तम चरित्र मनुष्य का जीवन भर साथ देता है। पाश्चात्य विद्वान् वूल्जे ने कहा है-“संसार में न तो धन का प्रभुत्व है और न बुद्धि का, प्रभुत्व होता है चरित्र और बुद्धि के साथ-साथ उच्च पवित्रता का प्रसिद्ध विचारक बारतोल की दृष्टि में, “सभी धर्म परस्पर भिन्न हैं, क्योंकि उनका निर्माता मनुष्य है; किन्तु चरित्र की महत्ता सर्वत्र एकसमान है, क्योंकि चरित्र ईश्वर बनाता है। वस्तुत: चरित्र उन प्रधान सद्गुणों में से है जिनकी वजह से मानव पशु से श्रेष्ठ समझा जाता है। चरित्रहीन मानव-जीवन पशु से भी अधम जीवन है। अतः मनुष्य के जीवन में चरित्र न केवल महत्त्वपूर्ण, बल्कि अपरिहार्य है।

2. चरित्र क्या है?- चरित्र की महत्ता एवं अपरिहार्यता निश्चय ही यह जिज्ञासा उत्पन्न करती है कि . ‘चरित्र’ क्या है ? बारतोल ने चरित्र की तुलना उस हीरे से की है जो सभी पत्थरों में अधिक मूल्यवान है, किन्तु चरित्र का प्रत्यक्ष सम्बन्ध क्योंकि मानव से है और मानव एक गतिशील, विवेकशील तथा सामाजिक प्राणी है; अत: यहाँ हम चरित्र के दार्शनिक एवं शैक्षिक पक्ष से सम्बन्धित हैं।

कुछ शिक्षाशास्त्री चरित्र का अर्थ आन्तरिक दृढ़ता और व्यक्तित्व की एकता से लगाते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि चरित्रवान् मनुष्य किसी बाहरी दबाव से भयभीत हुए बिना अपने सिद्धान्तों तथा आदर्शों के अनुरूप कार्य करता है, लेकिन उसके सिद्धान्त नैतिक और अनैतिक दोनों ही हो सकते हैं। अत: मात्र चरित्र ही पर्याप्त नहीं है, चरित्र को अनिवार्य रूप से नैतिक होना चाहिए। इस सन्दर्भ में हैण्डरसन लिखते हैं, “इसकी अर्थ यह है कि मनुष्यों को उन सिद्धान्तों के अनुसार काम करना सीखना चाहिए, जिनसे उनमें सर्वोत्तम व्यक्तित्व का विकास हो।” कुछ दार्शनिकों के अनुसार, चरित्र के दो मुख्य आधार-स्तम्भ हैं—नैतिकता एवं आध्यात्मिकता। नैतिक गुणों के अन्तर्गत सत्य, न्याय, ईमानदारी, दया, करुणा, सहानुभूति तथा प्रेम-भावना आदि आते हैं, जिनके समुचित विकास से व्यक्ति श्रेष्ठ एवं नैतिक आचरण करता हुआ सच्चरित्र बनता है। स्पष्टतः चरित्र-निर्माण के उद्देश्य में उत्तम नैतिकता का विकास भी समाहित है। इन समस्त गुणों को, सहज एवं स्वाभाविक रूप से, शैक्षिक प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध किया जा सकता है।

3. नैतिक चरित्र- निर्माण में शिक्षा की उपयोगिता : सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दृष्टि-नैतिक चरित्र’ मानव का वास्तविक आभूषण है और शिक्षा समाज के लिए सभ्य एवं सुसंस्कृत नागरिक बनाने की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। अत: शिक्षा की प्रक्रिया में व्यक्ति के नैतिक चरित्र-निर्माण का उद्देश्य सहज रूप से समाविष्ट है। शिक्षा के माध्यम से नैतिक एवं चरित्रवान् व्यक्तियों का निर्माण कैसे हो ? यहाँ हम इस विचार-बिन्दु के सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पक्ष का संक्षिप्त उल्लेख करेंगे

(i) वैदिक शिक्षा और चरित्र-निर्माण-वैदिक काल में शिक्षा का प्रधान उद्देश्य शिक्षार्थियों का चरित्र-निर्माण करना था। मनुस्मृति में सच्चरित्र व्यक्ति को विद्वान् से ऊँचा माना गया है-“उस वेदों के विद्वान् से जिसका जीवन पवित्र नहीं है, वह व्यक्ति कहीं अच्छा है जो सच्चरित्र है, किन्तु वेदों का कम ज्ञान रखता है।”

(ii) गुरुकुलों में चरित्र-निर्माण–प्राचीन समय में गुरुकुलों में चरित्र-निर्माण हेतु छात्रों में नैतिक प्रवृत्तियों का विकास, सदाचार का उपदेश, सद्पुरुषों के महान् आदर्शों का प्रस्तुतीकरण, आत्मसंयम व आत्मनियन्त्रण पर बल, शिक्षालयों का सरल एवं पवित्र वातावरण और कठोर अनुशासन में बँधी दिनचर्या का अभ्यास आदि के माध्यम से 25 वर्ष की अवस्था तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कराया जाता था।

(iii) भारतीय एवं पाश्चात्य शिक्षाशास्त्रियों का मत- आधुनिक भारत के यशस्वी विचारक स्वामी विवेकानन्द ने उत्तम चरित्र को शिक्षा का मुख्य मानदण्ड मानते हुए कहा है-“यदि आपने स्वच्छ विचारों को ग्रहण कर लिया है, उन्हें अपने जीवन और चरित्र का आधार बना लिया है तो आपने उस व्यक्ति से अधिक शिक्षा ग्रहण कर ली है जिसने सम्पूर्ण पुस्तकालय को कण्ठाग्र कर लिया है। पाश्चात्य जगत् के महान् विचारकों तथा दार्शनिकों ने भी बालक में सच्चरित्रता के विकास को सर्वोच्च महत्ता प्रदान की है। अरस्तू ने शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण बताया था। जॉन डीवी के अनुसार, “समस्त शिक्षा मानसिक और नैतिक चरित्र से सम्बन्धित है।’

(iv) विचारों का परिष्कार- व्यावहारिक दृष्टि से व्यक्ति का आचरण उसकी रुचियों द्वारा निर्धारित होता है और रुचियों का आधार व्यक्ति के अपने विचार होते हैं। बालक का सदाचरणं उसके विचारों की शुद्धता में निहित है। उत्तम चरित्र एवं आचरण का निर्माण विचारों में परिष्कार (सुधार) द्वारा सम्भव है, जिसके लिए अभीष्ट शिक्षा-प्रणाली की आवश्यकता है।

(v) पाठ्यक्रम द्वारा सदाचार की शिक्षा- विचारों में परिष्कार या सुधार लाने के लिए आवश्यक है कि विद्यालयों के पाठ्यक्रम में अच्छे संस्कार उपजाने वाले विषयों का समावेश किया जाए। धर्मशास्त्र, नैतिक शिक्षा, साहित्य, ललित कलाएँ तथा इतिहास आदि विभिन्न विषयों का ज्ञान बालकों के चरित्र-निर्माण में अधिक सहायक हो सकता है। ऐतिहासिक तथा धार्मिक चरित्रों; यथा-शिव, कृष्ण, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, शिवाजी, राजा हरिश्चन्द्र, श्रवण तथा सुभाषचन्द्र बोस का आदर्श प्रस्तुत कर बालक-बालिकाओं को सदाचारी बनने की प्रेरणा दी जा सकती है।

(vi) शिक्षक का आदर्श चरित्र-शिक्षक का व्यक्तित्व एवं चरित्र शिक्षार्थियों के लिए सबसे अधिक अनुकरणीय तथा प्रभावोत्पादक होता है। कक्षागत परिस्थितियों में शिक्षक-छात्र की अन्त:क्रियाएँ एक-दूसरे को अनेक प्रकार से प्रभावित करती हैं। अत: अनिवार्य रूप से शिक्षक को विषय का ज्ञाता, सरल-उदार एवं आदर्श चरित्र वाला तथा मानव-प्रेमी होना चाहिए।

शिक्षाविद् टी० रेमण्ट ने उचित ही कहा है, “अन्ततोगत्वा शिक्षा का उद्देश्य न तो शारीरिक शक्ति उत्पन्न करना है, न ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करना, न विचारधारा का शुद्धीकरण, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र को शक्तिशाली एवं उज्ज्वल बनाना है।”

शिक्षा के चरित्र-निर्माण के उद्देश्य की समीक्षा
(Evaluation of the Aim of Character-Formation by Education)

विभिन्न विद्वानों ने शिक्षा के चरित्र-निर्माण के उद्देश्य के पक्ष एवं विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए विश्व के प्राय: सभी दार्शनिकों, विचारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत चरित्र-निर्माण तथा नैतिक विकास के उद्देश्य को एकमत से स्वीकार किया है। जहाँ एक ओर चरित्र-निर्माण के उद्देश्य के समर्थकों ने इसकी महत्ता तथा उपयोगिता की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है, वहीं दूसरी ओर इसके आलोचकों ने इसे अपूर्ण, अव्यावहारिक, विवादास्पद, एकांगी तथा अमनोवैज्ञानिक सिद्ध किया है। यह सच है कि मात्र चरित्र-निर्माण की शिक्षा के बल पर ही मानवता का हित नहीं किया जा सकता। व्यक्ति एवं समाज के हित में चरित्र-निर्माण शिक्षा का एक अनुपम आदर्श अवश्य है, किन्तु शिक्षा का परम उद्देश्य नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधुनिक युग में व्यावसायिक उद्देश्य की उपयोगिता एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य शिक्षित बेरोजगारी को किस प्रकार समाप्त कर सकेगा ?
या
“शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य पर बल देने की आज देशहित में सख्त जरूरत है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
भारत के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य’ अत्यधिक महत्त्व रखता है। स्पष्ट कीजिए।
या
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य की उपयोगिता बताइट।
या
“शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए है।” इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्क सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
या
“देश के वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।” स्पष्ट कीजिए।
या
शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य जीविकोपार्जन होना चाहिए।” क्यों?
उत्तर:

आधुनिक युग में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य की उपयोगिता एवं महत्त्व
(Utility and Importance of Vocational Aims of Education in Modern Age)

आधुनिक युग में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य की अत्यधिक उपयोगिता एवं महत्त्व है। अब यह माना जाने लगा है कि शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए ही है। शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य के अनुसार, शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से होनी चाहिए कि उसे प्राप्त करके व्यक्ति समाज द्वारा मान्यता प्राप्त किसी व्यवसाय का वरण कर सके। शिक्षा के व्यावसायिक अथवा जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य के महत्त्व एवं आवश्यकता का विवरण निम्नवत् है

  1. आधुनिक युग भौतिकवादी प्रतिस्पर्धा का युग है। आवश्यकताओं की कोई सीमा नहीं है और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधन चाहिए। इसीलिए समूचा विश्व अधिक-से-अधिक भौतिक संसाधनों को इकट्ठा करने की होड़ में एक अन्तहीन दौड़, दौड़ रहा है। इस स्थिति में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का विशेष महत्त्व है।
  2. इस दौड़ में सफल होने के लिए वर्तमान और भावी पीढ़ियों को पर्याप्त शक्ति, स्फूर्ति, जागरूकता एवं प्रशिक्षण की जरूरत है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भरता एवं कार्यकुशलता विकसित करने की दृष्टि से अभीष्ट उत्पादन कार्य से जुड़ना होगा।
  3. देश के बालकों को उत्पादकता से जोड़ने का तात्पर्य उन्हें शिक्षा-प्रक्रिया के अन्तर्गत किसी उपयुक्त एवं अनुकूल उद्योग-धन्धे में प्रशिक्षण देने से है और यही शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य है।
  4. जब व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त कर देश का प्रत्येक नागरिक आजीविका के क्षेत्र में आत्मनिर्भर • बनेगा तो उसके व्यक्तिगत जीवन का सुख एवं शान्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज तथा राष्ट्र की प्रगति में अवश्य ही सहयोग प्रदान करेंगे। इस प्रकार व्यावसायिक उद्देश्य देश की प्रगति का निर्धारक है।
  5. इस उद्देश्य को स्वीकार कर राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी की ज्वलन्त समस्या का भी समाधान होगा। उल्लेखनीय रूप से बेरोजगारी, निर्धनता तथा भुखमरी आदि के कारण समाज में अनैतिक कार्य बढ़ते हैं, जिनका अन्त व्यावसायिक शिक्षा द्वारा ही हो सकता है। स्पष्टतः आधुनिक भारत की वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का वैयक्तिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्त्व है। वर्तमान समय में हमारे देश में शिक्षित बेरोजगारी की जो गम्भीर समस्या है उस समस्या के निवारण के लिए शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को प्राथमिकता देनी होगी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अब सामान्य रूप से यह माना जाने लगा है कि शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए ही है।

प्रश्न 2.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य
(Aim of Completion in Education Life)

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य का अर्थ यह है कि शिक्षा के माध्यम से जीवन के सभी अंगों या पक्षों का विकास किया जाए ताकि व्यक्ति का जीवन पूर्णता की ओर बढ़ सके। व्यक्ति का सर्वांगीण विकासे उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और परिस्थिति के लिए तैयार कर देता है। इस भाँति, जीवन के विविध पक्षों से ।। सम्बन्धित ज्ञान से युक्त मानव समाज में अपने अधिकार और कर्तव्यों के प्रति सजग हो जाता है। वह भली प्रकार जानता है कि उसे स्वयं अपने लिए, मित्रों, समुदाय तथा राष्ट्र के लिए क्या-क्या कार्य करने हैं। शिक्षा उसे जीवन के समस्त क्रिया-कलापों को सफलतापूर्वक करने के लिए पूरी तरह तैयार कर देती है। इस उद्देश्य के प्रणेता एवं प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबर्ट स्पेन्सर का कथन है, “शिक्षा को हमें पूर्ण जीवन के नियमों और ढंगों से परिचित कराना चाहिए। शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हमें जीवन के लिए इस प्रकार तैयार करना है कि हम उचित प्रकार का व्यवहार कर सकें और शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का सदुपयोग कर सकें।”

शिक्षा की प्रक्रिया के अन्तर्गत जीवन की पूर्णता के उद्देश्य की पर्याप्त आलोचना-प्रत्यालोचना हुई है। इसके समर्थन एवं विरोध में विद्वानों ने अनेकानेक तर्क प्रस्तुत किए हैं। उद्देश्य के पक्षधरों की दृष्टि में यह शिक्षा का एक सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है, जब कि आलोचकों ने इसे संकीर्ण, अमनोवैज्ञानिक, अपूर्ण तथा अव्यावहारिक उद्देश्य बताया है। आलोचकों का एक प्रमुख तर्क यह भी है कि शिक्षा में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की अवहेलना कर मानव-निर्माण की बात करना एकांगी तथा निर्मूल विचार है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि हरबर्ट स्पेन्सर महोदय ने पूर्ण जीवन के उद्देश्य का प्रतिपादन करते समय कहीं भी बालक के चारित्रिक एवं आध्यात्मिक पक्षों के विकास का विरोध नहीं किया है। निष्कर्षत: जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के अन्तर्गत यदि हम मानव-जीवन के सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक पक्षों को भी सम्मिलित कर लें तो शिक्षा का पाठ्यक्रम सर्वांगी तथा सर्वोत्कृष्ट बन जाएगा।

प्रश्न 3.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य’ के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of Aims of Completion in Education Life)

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के पक्ष में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं–

  1. सर्वांगीण एवं व्यापक उद्देश्य- जीवन की पूर्णता का उद्देश्य स्वयं में जीवन के सभी पक्षों को समाहित किए हुए है। यह एकांगी व संकीर्ण न होकर सर्वांगीण व्यापक उद्देश्य है तथा हर प्रकार से श्रेष्ठ है।
  2. समूचे व्यक्तित्व का विकास- इस उद्देश्य के अन्तर्गत मानव व्यक्तित्व के सभी पक्षों का विकास निहित है।
  3. हर परिस्थिति के लिए उपयुक्त-मनुष्य को जीवन में अनेक प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। यह उद्देश्य उसे हर परिस्थिति में जीने के लिए तैयार करता है तथा सभी कार्यों हेतु उपयुक्त बनाता है। स्वयं स्पेन्सर ने लिखा है, “जिस प्रकार एक घोड़ा अपनी आदतों, माँग, शक्ति और गति के अनुसार कभी गाड़ी खींचने के लिए और कभी दौड़ में दौड़ने के लिए प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार मानव-शक्तियों को सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार पूर्ण रूप से उपयोगी बनाया जाना चाहिए।’
  4. प्राथमिक आवश्यकताओं पर बल-जीवन की पूर्णता का उद्देश्य मानव-जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने पर बल देता है। इस विषय में ग्रीब्ज़ कहते हैं, “हरबर्ट स्पेन्सर विज्ञानों और जीवन की एक नई योजना की सिफारिश करती है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सम्बन्धित मूल्यों के अनुसार सब प्रकार के लाभों का आनन्द लेता है।”
  5. मूल्यवान् तत्त्वों पर ध्यान इस उद्देश्य से प्रेरित शिक्षा-पद्धति में वैज्ञानिकता, उपयोगिता तथा सामाजिकता आदि सभी मूल्यवान् तत्त्वों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।
  6. जीवनोपयोगी विषयों का समावेश- इस उद्देश्य के अन्तर्गत मानव-जीवन के लिए उपयोगी प्रायः सभी विषयों; जैसे—साहित्य, सामाजिक शास्त्र, मनोविज्ञान, गृहशास्त्र, विज्ञान तथा कलाओं का समावेश किया गया है।
  7. सभी उद्देश्यों की पूर्ति- जीवन की पूर्णता का उद्देश्य शिक्षा के अन्य सभी उद्देश्यों की पूर्ति कर देता है। उद्देश्य के समर्थन में शेरवुड ऐंडरसन ने लिखा है, “व्यक्ति को जीवन की विभिन्न समस्याओं के लिए तैयार करना शिक्षा का पूर्ण उद्देश्य है या होना चाहिए।”

प्रश्न 4.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क
(Arguments Against Aims of Completion in Education Life)

शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के विपक्ष में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं—

  1. अनिश्चित एवं विवादग्रस्त- यह निश्चित करना ही कठिन है कि जीवन की पूर्णता क्या है ? विभिन्न विचारकों और दार्शनिकों ने जीवन की पूर्णता के विषय में विभिन्न मत प्रतिपादित किए हैं। ऐसे गम्भीर विषय को अनिश्चित एवं विवादग्रस्त विचारों, अनुमानों या अटकलबाजियों द्वारा भली प्रकार नहीं समझा जा सकता।
  2. अध्यात्म एवं नैतिकता की उपेक्षा- यह उद्देश्य पूरी तरह से लौकिक है, क्योंकि हरबर्ट स्पेन्सर ने इसमें अध्यात्म तथा नैतिकता को कोई स्थान नहीं दिया है। अध्यात्म एवं नैतिकता मानव की भावनाओं से जुड़े जीवन के अति महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं, जिनकी किसी भी प्रकार उपेक्षा नहीं की जा सकती। नैतिकता एवं अध्यात्म में प्रतिष्ठित व्यक्ति का जीवन ही भीतर से पवित्र एवं समृद्ध हो सकता है और ऐसा जीवन ही वास्तव में पूर्णता को प्राप्त होता है।
  3. अमनोवैज्ञानिक पाठ्यक्रम- जीवन की पूर्णता के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सुनिश्चित पाठ्यक्रम अमनोवैज्ञानिक है। विषयों के चुनाव को क्रम सर्वथा मानव-मन के प्रतिकूल है। इसके अलावा पाठ्यक्रम के अध्ययन विषय भी बालकों की स्वतन्त्र रुचियों तथा प्रवृत्तियों से मेल नहीं खाते।
  4. बालक के भविष्य की चिन्ता नहीं-हरबर्ट स्पेन्सर द्वारा प्रतिपादित इस उद्देश्य में सिर्फ वर्तमान को ही ध्यान में रखा गया और बालक के भविष्य की चिन्ता नहीं की गई है। सच तो यह है कि मानव-जीवन का वास्तविक एवं एकमात्र उद्देश्य सांसारिक सुखों को प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि दूसरे अर्थात् पारलौकिक जीवन के लिए तैयार होना भी है।
  5. सीमित एवं संकीर्ण-अनेक विद्वानों ने जीवन की पूर्णता के उद्देश्य को शिक्षा के अभीष्ट एवं व्यापक लक्ष्य से हटकर अपूर्ण, सीमित एवं संकीर्ण मनोवृत्ति का द्योतक बताया है।
  6. शैक्षिक आदर्श के प्रतिकूल-जीवन की पूर्णता का उद्देश्य शिक्षा के उच्च एवं सर्वमान्य आदर्शों के इसलिए प्रतिकूल है, क्योंकि इसके अन्तर्गत शिक्षा-योजना में दूसरे विषयों की अपेक्षा कला एवं साहित्य को गौण स्थान दिया गया। साहित्य, कला एवं संगीत की शिक्षा मानव को सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाती है, जिसके अभाव में मनुष्य जंगली हो जाएगा।
  7. अव्यावहारिक तथा भ्रामक बालक के वर्तमान तथा आभ्यन्तर की उपेक्षा करने वाली शिक्षा कभी सम्मान के योग्य नहीं हो सकती। यह कथन सर्वथा भ्रामक, अव्यावहारिक तथा असंगत है कि इस उद्देश्य के माध्यम से समस्त उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकती है।

प्रश्न 5.
शिक्षा के ‘शारीरिक विकास के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य’ का अर्थ
(Meaning of ‘Physical Development’s Aims of Education)

मनुष्य के जीवन के तीन विशिष्ट पक्ष हैं- शरीर, मन और आत्मा। शरीर, मन एवं आत्मा का आधार है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है; अत: प्रत्येक देश और काल के अन्तर्गत शारीरिक विकास को शिक्षा का अनिवार्य तथा श्रेष्ठ उद्देश्य माना गया है। शारीरिक विकास के उद्देश्य के पक्षधरों ने ऐसी शिक्षा-व्यवस्था का समर्थन किया है जो बालक को शरीर स्वस्थ, सुन्दर तथा बलशाली बनाने पर विशेष ध्यान देती है।

प्राचीन समय से ही, बहुत-से देशों में, शारीरिक विकास पर पर्याप्त बल दिया गया। लोग आज भी यूनान स्थित स्पार्टा राज्य के वीरों की शौर्य गाथाएँ चाव से सुनते-सुनाते हैं, क्योंकि उस काल में शारीरिक विकास ही शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था। विश्व प्रसिद्ध विचारक प्लेटो तथा रूसो ने अपनी शिक्षा-योजना में शारीरिक विकास को मुख्य स्थान दिया। रूसो का कथन है, शारीरिक शक्ति से ही व्यक्ति स्फूर्तिवान् और क्रियाशील बनता है। मनुष्य स्वस्थ शरीर लेकर ही अपने जीवन, परिवार एवं समाज की आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है। निर्बल शरीर वाला व्यक्ति न तो अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है और न दूसरों की ही। इसके अतिरिक्त, वही राष्ट्र शक्तिशाली कहा जाता है जिसके नागरिक शारीरिक रूप से बलवान् होते हैं। शारीरिक विकास के समर्थन में रेबेले ने ठीक ही कहा है, “स्वास्थ्य के बिना जीवन, जीवन नहीं है। यह केवल स्फूर्तिहीनता तथा वेदना की दशा है, मृत्यु का प्रतिरूप है।”

प्रश्न 6.
शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य’ के पक्ष में तर्क :
(Arguments in Favour of ‘Physical Development’s Aims of Education)

शारीरिक विकास के उद्देश्य के समर्थन में विभिन्न विचारकों द्वास निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं

  1. सफलता की कुंजी-स्वस्थ शरीर में मानव-जीवन की सफलता का रहस्य निहित है। शारीरिक शक्ति से मनुष्य स्फूर्तिमान, उत्साही एवं क्रियाशील बना रहता है। वह लगातार काम करने की क्षमता रखता है। और अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। शारीरिक विकास का उद्देश्य सफल जीवन की कुंजी है।
  2. मानसिक विकास का आधार- शारीरिक विकास, मानसिक विकास का आधार है। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि कमजोर शरीर मानसिक रोगों को घर बन जाता है। कहते हैं। दुर्बलता दुष्टता को जन्म देती है।” अत: चिन्तन, कल्पना, स्मरण तथा सृजन आदि मानसिक शक्तियों के विकास हेतु स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट शरीर एक पूर्व आवश्यकता है।
  3. सामाजिक गुणों की अभिवृद्धि- उत्तम स्वास्थ्य से युक्त व्यक्ति सद्गुणों को प्राप्त करता है। स्वस्थ शरीर चारित्रिक, नैतिक एवं सामाजिक गुणों की अभिवृद्धि में सहायक है। डॉ० जानसन कहते हैं, “स्वास्थ्य को बनाए रखना नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है, क्योंकि स्वास्थ्य ही सब सामाजिक गुणों का आधार है।” इसलिए शारीरिक विकास का उद्देश्य प्रशंसनीय है।
  4. वैयक्तिक एवं राष्ट्र का हित- इस उद्देश्य में व्यक्ति एवं राष्ट्र, दोनों का हित समाहित है। शारीरिक विकास से व्यक्ति में शक्ति का संचार होता है और व्यक्तियों की शक्ति से राष्ट्र बलशाली होता है। अतः वैयक्तिक एवं राष्ट्रीय उत्थान की दृष्टि से शारीरिक विकास का उद्देश्य सर्वमान्य है।

प्रश्न 7.
शिक्षा के ‘शारीरिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क
(Arguments Against ‘Physical Developments Aims’ of Education)

कुछ विद्वानों ने शारीरिक विकास के उद्देश्ये, की निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर आलोचना की है

  1. एकांगी उद्देश्य- शारीरिक विकास को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मानकर चलने से शिक्षा का स्वरूप एकांगी हो जाएगा और इससे बालक के सर्वांगीण विकास में बाधा पहुँचेगी।
  2. पाशविक प्रवृत्तियों को बल- शारीरिक शक्ति पर आवश्यकता से अधिक जोर देने के भयंकर दुष्परिणाम देखने में आए हैं। इस उद्देश्य के अन्तर्गत बालक की पाशविक प्रवृत्तियाँ बलशाली हो उठती हैं, जिससे चारित्रिक, नैतिक एवं मानवीय गुणों का विकास बाधित होता है। इस दृष्टि से शारीरिक उद्देश्य अनुचित है।।
  3. संकीर्ण एवं अपूर्ण उद्देश्य- शिक्षा में शारीरिक विकास का उद्देश्य एक संकीर्ण अधूरा उद्देश्य है। सिर्फ शारीरिक शक्ति, पौरुष एवं बल अर्जित करना ही मानव-जीवन का ध्येय नहीं है। मानव-जीवन का चरम लक्ष्य एवं आदर्श तो जनसेवा के माध्यम से मोक्ष या विमुक्ति है। उपर्युक्त तर्कों के आधार पर विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य को एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लेना उचित नहीं है।

प्रश्न 8.
शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य का अर्थ
(Meaning of Cultural Development of Education)

विश्व के अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य का विशेष महत्त्व प्रतिपादित किया है। सांस्कृतिक उद्देश्य के समर्थकों के मतानुसार, शिक्षा मानव और उसके समाज के सांस्कृतिक उत्थान की सतत प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत मानव साहित्यिक, कलात्मक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त करता हुआ अपने समुदाय का सभ्य एवं सुसंस्कृत नागरिक बनता है। जो देश, समाज या जाति सांस्कृतिक रूप से जितना उन्नत होती है, जीवन की दौड़ में वह उतना ही आगे बढ़ जाती है।

शिक्षा के सांस्कृतिक उद्देश्य का अर्थ भली प्रकार से समझने के लिए संस्कृति शब्द पर ध्यान देना आवश्यक है। संस्कृति से अभिप्राय है-‘सुधरा हुआ’, ‘परिमार्जित’ या ‘परिष्कृत’। संस्कृति व्यक्ति के ज्ञान, आस्था, विश्वास, रीति-रिवाज, परम्परा, विचारधारा, व्यवहार, रहन-सहन, जीवन-मूल्य एवं आदर्श, साहित्य, कला और भौतिक उपलब्धियों आदि का ऐसा सुन्दर व सन्तुलित समाहार है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होता रहता है। ई० बी० टायलर के अनुसार, संस्कृति वेह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, प्रथा तथा अन्य योग्यताएँ व आदतें सम्मिलित होती हैं, जिनको मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है। शिक्षा का कार्य व्यक्ति का विकास करना है, ताकि वह अपने चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार को परिमार्जित और परिष्कृत कर सके। इस सन्दर्भ में ओटावे का कथन है, “शिक्षा का एक कार्य समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और व्यवहार के प्रतिमानों को अपने तरुण व शक्तिशाली सदस्यों को प्रदान करना है।” बालक पर अच्छे संस्कारों का प्रभाव उसके जीवन को अद्भुते, तेजवान् और कल्याणमय बनाता है।

प्रश्न 9.
शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of ‘Cultural Development’s Aims’ of Education)

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं

  1. सन्तुलित शिक्षा- संस्कृति मानव-जीवन के बाह्य (भौतिक) तथा आन्तरिक (आध्यात्मिक) दोनों ही पक्षों को प्रेरित एवं विकसित करती है। भौतिक दृष्टि से यह मनुष्य के उच्च विचारों, रुचियों, सौन्दर्यानुभूति तथा कलात्मक शक्तियों को प्रेरणा देती है।
  2. अनुभवों से ज्ञान- संस्कृति के अन्तर्गत वे सभी अनुभवं सम्मिलित होते हैं जो मनुष्य जाति ने आदिकाल से अब तक प्राप्त किए हैं। शिक्षा प्रक्रिया के माध्यम से इन अनुभवों को न केवल सुरक्षा मिलती है, बल्कि इनका अधिकतम उपयोग भी होता है। शिक्षा का यह उद्देश्य अनुभवों द्वारा ज्ञान देने का प्रबल पक्षधर
  3. पाशविक वृत्तियों का शोधन- संस्कृति का अर्थ ही परिष्कार या शोधन है। संस्कृति द्वारा मनुष्य की पाशविक वृत्तियों का दमन व शोधन होता है और इस प्रकार उसमें दिव्य मानवीय गुणों का विकास होता है।
  4. जीवनोपयोगी उद्देश्य- शिक्षा के अन्तर्गत सांस्कृतिक विकास का उद्देश्य जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी विचार है। विभिन्न विद्वानों ने इसका समर्थन किया है। महात्मा गांधी के अनुसार, संस्कृति ही मानव-जीवन की आधारशिला एवं प्रमुख वस्तु है। यह आपके आचरण और व्यक्तिगत व्यवहार की छोटी-से-छोटी बात में व्यक्त होनी चाहिए।’ संस्कृति के उपर्युक्त महत्त्वों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक विकास होना चाहिए।

प्रश्न 10.
शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्कों का उल्लेख 
कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के सांस्कृतिक विकास के उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्क
(Arguments Against ‘Cultural Development Aims’ of Education)

इसके विपक्ष में मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं—

  1. भ्रामक एवं अक्षम उद्देश्य-संस्कृति’ शब्द आज भी इतना अस्पष्ट, भ्रामक तथा जटिल है कि इसके उपादानों के बारे में कोई सुनिश्चित विचार प्रकट करना प्रायः असम्भव है। उधर समाज में सबसे अधिक सांस्कृतिक रूप से विकसित लोग भी चिन्ताओं, तनावों तथा सन्देहों के शिकार हैं। सच तो यह है कि संस्कृति मानव-मात्र को जीवन के चरम आदर्श एवं मूल्यों को उपलब्ध कराने में पूरी तरह असक्षम रही है। अतः सांस्कृतिक विकास को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं बनाया जा सकता।
  2. अमनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक उद्देश्य से प्रेरित शिक्षा- प्रणाली बालक की रुचियों, अभिरुचियों, आदतों तथा भावनाओं का दमन करके उसे केवल सांस्कृतिक प्रतिमानों के अनुसार कार्य करने के लिए। विवश करती है। यह उद्देश्य बालक के स्वतन्त्र विकास में बाधक है और पूर्णत: अमनोवैज्ञानिक है। टी० पी० नन कहते हैं, “राष्ट्रीय रीति-रिवाजों का स्थायीपन वैयक्तिक जीवन को एक तुच्छ वस्तु बना देता है।”
  3. रचनात्मक शक्तियाँ कुण्ठित- बालक की रचनात्मक शक्तियाँ ही उसकी उन्नति की वास्तविक आधारशिला हैं। शिक्षा का सांस्कृतिक पक्ष अपने पुरातन एकरूप तथा स्थायी स्वरूप के कारण शिक्षार्थी की रचनात्मक प्रवृत्तियों को कुण्ठित कर देता है। इसके परिणामस्वरूप बालक अपनी रचनात्मक क्षमताओं का उपयोग भविष्य के निर्माण में नहीं कर पाता।।
  4. संकुचित दृष्टिकोण- शिक्षा का सांस्कृतिक उद्देश्य बार-बार अपने अतीत को दोहराकर कोई विस्तृत एवं सन्तुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं करता। इसके साथ ही वर्तमान में नव-स्फूर्ति उत्पन्न करने के बजाय यह बीते समय की अरुचिकर एवं अर्थहीन बातों पर ध्यान देता है। स्पष्टतः यह एक संकुचित दृष्टिकोण है।
  5. भावी जीवन की तैयारी नहीं- सांस्कृतिक उद्देश्य बालक को भावी जीवन के लिए तैयार करने में असमर्थ है। संगीत, साहित्य, कला, धर्म, प्रथाओं तथा रीति-रिवाजों की शिक्षा से रोटी-रोजी की समस्या हल नहीं होती। इस तरह यह आजीविका की समस्या का कोई समाधान नहीं करती। वस्तुत: शिक्षा के उद्देश्य द्वारा बालक में वे समस्त क्षमताएँ विकसित की जानी चाहिए जो उसे जीवन के संघर्षों से लोहा लेने की शक्ति तथा साहस दे सकें।

प्रश्न 11.
शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य से क्या आशय है ?
उत्तर:

शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य’ का अर्थ
(Meaning of ‘Aims of Good use of Vacations’ of Education)

मनुष्य के जीवन में अवकाश का विशेष महत्त्व है। अवकाश के सदुपयोग से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा स्वयं को खाली समय में किसी सुरुचिपूर्ण कार्य में व्यस्त रखना है ताकि उसे आनन्द, शक्ति एवं उत्साह मिल सके। इस उद्देश्य के समर्थक विद्वान् मानते हैं कि प्रत्येक मनुष्य चाहे वह बच्चा हो, युवक-युवती, प्रौढ़ अथवा वृद्ध हो अपने दैनिक कार्यों के बाद पर्याप्त अवकाश (खाली समय) रखता है। इस समय का सदुपयोग करने की दृष्टि से शिक्षा की आवश्यकता होती है। इधर आधुनिक युग में विज्ञान एवं तकनीकी की प्रगति ने मनुष्यों के अवकाश की अवधि बढ़ा दी है। आज कम्प्यूटर तथा रोबोट का समय है। प्रायः सभी मशीनें पूर्णत: स्वचालित हैं, जो न्यूनतम समय में अधिकतम उत्पादन कर काफी समय बचाती हैं। शिक्षा इस खाली समय को काटने का एक सशक्त साधन है। यही कारण है कि अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘व्यक्ति को समय का सदुपयोग सिखाना’ स्वीकार किया है।

प्रश्न 12.
शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तक का उल्लेख 
कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य’ के पक्ष में तर्क
(Arguments in Favour of ‘Aim of Good Use of Vacation’ Education)

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा को अवकाश के सदुपयोग से जोड़ते हुए इस उद्देश्य के समर्थन में अपने विचार प्रकट किए हैं। ये विचार इस प्रकार हैं

  1. समय का सदुपयोग कहते हैं ‘खाली मस्तिष्क शैतान का घर है। यदि व्यक्ति अवकाश-काल में मस्तिष्क का उपयोग स्वस्थ एवं उपयोगी कार्यों में नहीं करेगा, तो निश्चय ही वह उसे लड़ाई-झगड़ों, मद-व्यसन तथा समाज-विरोधी कार्यों में व्यतीत करेगा। इस उद्देश्य का सबसे पहला कर्तव्य शिक्षा द्वारा व्यक्ति को समय का सदुपयोग सिखाना है।
  2. सृजनात्मक शक्ति का विकास-इस उद्देश्य से अभिप्रेरित लोग अवकाश के समय सृजनात्मक कार्यों में लगे रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर व्यक्तियों की रचनात्मक शक्ति का विकास होता .. है, वहीं दूसरी ओर समाज की भी प्रगति होती है।
  3. स्वास्थ्य एवं स्फूर्ति-कार्यरत व्यक्ति का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है। अवकाश के सदुपयोग से मनुष्य के जीवन में स्फूर्ति, शक्ति व गतिशीलता बनी रहती है।
  4. शिक्षण के साथ मनोरंजन भी- शिक्षा से लोगों का समय बरबाद नहीं होता। खाली समय को रुचिपूर्ण पढ़ाई-लिखाई में व्यतीत कर वे शिक्षण के साथ-साथ अपना मनोरंजन भी करते हैं।
  5. कला एवं सौन्दर्यानुभूति का विकास- शिक्षा का यह उद्देश्य जीवन में कलाओं को प्रोत्साहित करता है, जिसके साथ मनुष्य में सौन्दर्यानुभूति को विकास भी होता है। साहित्य, संगीत, ललित कलाएँ तथा प्रकृति-प्रेम द्वारा मस्तिष्क ताजा एवं सक्रिय होता है। अतः सभी प्रकार से अवकाश के सदुपयोग का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण तथा लाभकारी है।

प्रश्न 13.
शिक्षा के अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्को का उल्लेख 
कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के ‘अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य के विपक्ष में तर्क
(Arguments Against ‘Aims of Good Use of Vacation of Education)

शिक्षा के अवकाश के सदुपयोग सम्बन्धी उद्देश्य के विपक्ष में प्रस्तुत किए गए मुख्य तर्क निम्नलिखित

  1. संकुचित उद्देश्य- शिक्षा का यह उद्देश्य संकुचित है। आलोचकों के अनुसार शिक्षा की आवश्यकता सिर्फ उन लोगों को है जिनके पास खाली समय होता है। इस दृष्टि से निरन्तर काम में व्यस्त रहने वाले लोगों को शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं है।
  2. धनी एवं विशेष वर्ग तक सीमित-इस उद्देश्य के अनुसार, शिक्षा समाज के धनी और विशिष्ट वर्ग तक ही सीमित रह जाएगी। किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
  3. शिक्षा सभी कार्यों के लिए शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक बालक को जीवन के लिए उपयोगी तथा सभी कार्यों के लिए योग्य बनाना है। यह एकमात्र अवकाश काल के लिए ही नहीं है।
  4. अवकाश का उपयोग सन्देहास्पद-शिक्षा के अन्तर्गत अवकाश हेतु प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति अवकाश का सदुपयोग करेगा भी या नहीं, यह एकदम सन्देहास्पद है। उपर्युक्त तक के आधार पर कहा गया है कि अवकाश के सदुपयोग के उद्देश्य’ को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य निर्धारित करना उचित नहीं है।

अतिलघु उत्तरीय प्रत

प्रश्न 1.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्यों के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य समाज के हितों के अनुकूल होते हैं। इन उद्देश्यों के अनुसार की गई शिक्षा-व्यवस्था के परिणामस्वरूप व्यक्ति सामाजिक मान्यताओं, आदर्शों एवं सद्गुणों को आत्मसात कर लेता है तथा समाज के अधिकतम उत्थान एवं विकास के लिए कार्य करता है। इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त । व्यक्ति राष्ट्रहितों को सर्वोपरि मानता है।

प्रश्न 2.
स्पष्ट कीजिए कि शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य साहित्य एवं कलाओं के विकास में बाधक है।
उत्तर:
मानव समाज में साहित्य एवं विभिन्न ललित कलाओं का विशेष महत्त्व है, परन्तु यदि शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य की अवहेलना करके उसके सामाजिक उद्देश्य को प्राथमिकता दी जाए तो उस स्थिति में साहित्य एवं अन्य कलाओं का समुचित विकास नहीं हो पाता। शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के अन्तर्गत व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, इच्छाओं एवं भावनाओं की उपेक्षा होने के कारण व्यक्तिगत प्रयासों पर ध्यान नहीं 
दिया जाता। साहित्य, कला तथा संगीत आदि का विकास तभी सम्भव है जब व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त करने में स्वतन्त्र हो और उसे व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से अनवरत अभ्यास करने की पूरी छूट हो। शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के अन्तर्गत यह छूट प्राय: उपलब्ध नहीं होती; अत: हम कह सकते हैं कि शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य साहित्य एवं कलाओं के विकास में बाधक है।

प्रश्न 3.
शिक्षा के व्यक्तिगत उद्देश्य से आप क्या समझते हैं?
या
टिप्पणी लिखिए-शिक्षा का वैयक्तिक उद्देश्य।
उत्तर:
शिक्षा के उस उद्देश्य को शिक्षा का व्यक्तिगत उद्देश्य माना जाता है, जिसमें शिक्षा की व्यवस्था इस ढंग से की जाती है कि उससे व्यक्ति की वैयक्तिकता का अधिक-से-अधिक विकास सम्भव है। इस उद्देश्य के अन्तर्गत बालक को स्वतन्त्र रूप से अपने सर्वांगीण विकास के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

प्रश्न 4.
आपके विचार से क्या शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना जा सकता है ?
उत्तर:
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य के अन्तर्गत व्यक्ति के विकास को प्राथमिकता दी जाती है तथा समाज के विकास की ओर प्राय: कोई ध्यान नहीं दिया जाता; अर्थात् उसकी अवहेलना ही की जाती है। शिक्षा के इस उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लेने की स्थिति में व्यक्ति में अहम् भाव का आवश्यकता से अधिक विकास हो जाने की आशंका रहती है। इस दशा में यह आशंका रहती है कि बालक उद्दण्ड न बन जाए। इन परिस्थितियों में कुछ बालक समाज-विरोधी कार्य भी कर सकते हैं। हमारा विचार है। कि यदि शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लिया जाए तो बच्चों में सामाजिक सद्गुणों (अर्थात् सहयोग, सहानुभूति तथा सामाजिक एकता आदि) का समुचित विकास नहीं हो पाता। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 5.
आपके विचार से क्या शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य माना जा 
सकता है ?
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य की मान्यता शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य के विपरीत है। शिक्षा के इस उद्देश्य के अन्तर्गत समाज के अधिक-से-अधिक विकास को शिक्षा का लक्ष्य माना जाता है। इसके विपरीत, व्यक्ति के विकास को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। इसे सैद्धान्तिक मान्यता को स्वीकार कर लेने पर बालकों के कुण्ठाग्रस्त हो जाने की आशंका रहती है। शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को प्राथमिकता प्रदान करने की स्थिति में संकीर्ण राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हो जाती है तथा व्यापक मानवता की अवहेलना हो जाती है। यही नहीं, शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को अनावश्यक महत्त्व देने की स्थिति में व्यक्ति के जीवन में संस्कृति, सौन्दर्य, कला, धर्म आदि का महत्त्व घट जाता है तथा इन महत्त्वपूर्ण मूल्यों की अवहेलना होने लगती है। इन समस्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 6.
शिक्षा के शारीरिक विकास के उद्देश्य का तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शक्ति को मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों से अधिक मूल्य देने से समाज में बलशाली व्यक्तियों का एकाधिकार हो जाएगा। शरीर से कमजोर लोगों पर अत्याचार होंगे और उन्हें अमानवीय यातनाओं व शोषण के दुष्चक्र से गुजरना होगा। निश्चय ही शिक्षा का यह उद्देश्य इस आधुनिक, सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज को उस जंगली एवं पाषाण काल में पहुँचा देगा जहाँ से वर्तमान तक आने में कई युग लगे हैं। शरीर के साथ मनुष्य की बुद्धि, चरित्र, नैतिकता, आचरण एवं आत्मा का विकास भी होना चाहिए। डियो लेविस कहते हैं, “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण सबसे बड़ी सांसारिक समस्या और मानव-जाति की सबसे बड़ी आशा है। इस स्थिति में हम कह सकते हैं कि शारीरिक विकास भी शिक्षा का एक उद्देश्य होना चाहिए, परन्तु शारीरिक विकास को ही शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 7.
“शिक्षा आत्मानुभूति है।” यदि ऐसा है, तो इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का समर्थन करने वाले विद्वानों ने शिक्षा के अर्थ एवं स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है, शिक्षा आत्मानुभूति है। शिक्षा के इस स्वरूप को स्वीकार कर लेने पर व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से अपनी निजी विशेषताओं का समुचित विकास कर सकता है। व्यक्ति की मुख्य निजी विशेषताएँ हैं-व्यक्ति की रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ तथा विभिन्न आन्तरिक गुण। यदि व्यक्ति अपनी निजी विशेषताओं का समुचित विकास कर लेता है तो वह एक अच्छा नागरिक तथा अच्छा व्यक्ति बन सकता है। यही शिक्षा का प्रमुख लाभ होगा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“शिक्षा अर्थपूर्ण और नैतिक क्रिया है। अतः यह कल्पना ही नहीं की जा सकती कि यह उद्देश्यहीन है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
रिवलिन का।

प्रश्न 2.
“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मंजिल को नहीं जानता और बालक उस पतवारविहीन नौका के समान है जो तट से दूर कहीं बही जा रही है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
बी० डी० भाटिया का।

प्रश्न 3.
आपके अनुसार शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य पूर्ण कहा जाएगा ?
उत्तर:
वास्तव में, शिक्षा का वही उद्देश्य पूर्ण कहा जाएगा जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के हित में शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास की सतत प्रक्रिया का प्रेरक बन सके।

प्रश्न 4.
आधुनिक युग में मुख्य रूप से किन शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य कासमर्थन किया है ?
उत्तर:
आधुनिक युग में रूसो, फ्रॉबेल, पेस्टालॉजी तथा टी० पी० नन आदि शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का समर्थन किया है।

प्रश्न 5 शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य की प्रमुख मान्यता क्या है ?
उत्तर:
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का प्रमुख कार्य व्यक्ति की निजी विशेषताओं का अधिकतम विकास करना प्रतिपादित किया गया है।

प्रश्न 6.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के मुख्य प्रतिपादक कौन-कौन-से शिक्षाशास्त्री हैं?
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के मुख्य प्रतिपादक शिक्षाशास्त्री हैं-हरबर्ट स्पेन्सर, जॉन डीवी, टी० रेमण्ट, प्रो० जेम्स तथा स्मिथ।

प्रश्न 7.
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य की प्रमुख मान्यता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का प्रमुख कार्य समाज का अधिकतम उत्थान एवं विकास करना प्रतिपादित किया गया है।

प्रश्न 8.
आपके विचार से वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य अधिक लोकप्रिय है?
उत्तर:
वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा का जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य अधिक लोकप्रिय है।

प्रश्न 9.
शिक्षा के व्यावसायिक अथवा जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य से क्या आशय है?
उत्तर:
शिक्षा के जीविकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से होनी चाहिए कि उसे प्राप्त करके व्यक्ति समाज द्वारा मान्यता प्राप्त किसी व्यवसाय का वरण कर सके।

प्रश्न 10.
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को समाज एवं राष्ट्र के लिए क्यों लाभकारी माना जाता है?
उत्तर:
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को समाज एवं राष्ट्र के लिए लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इस प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था से समाज एवं राष्ट्र प्रगति के र्ग पर अग्रसर होता है।

प्रश्न 11.
देश में बेरोजगारी की समस्या किस प्रकार की शिक्षा द्वारा हल हो सकती है?
उतर:
देश में बेरोजगारी की समस्या को व्यावसायिक शिक्षा के द्वारा हल किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
यदि शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को अधिक महत्त्व दिया जाता है तो समाज के अधिकांश 
व्यक्तियों का दृष्टिकोण कैसा हो जाता है?
उत्तर:
शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को अधिक महत्त्व देने से अधिकांश व्यक्तियों को दृष्टिकोण क्रमशः भौतिकवादी बन जाता है।

प्रश्न 13.
“मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा रक्षक चरित्र है, शिक्षा नहीं।” यह कथन किस विद्वान् का है ?
उत्तर:
यह कथन हरबर्ट स्पेन्सर का है।

प्रश्न 14.
शिक्षा के चरित्र-निर्माण सम्बन्धी उद्देश्य के विषय में आपका क्या विचार है ?
उत्तर:
व्यक्ति एवं समाज के हित में चरित्र-निर्माण शिक्षा का एक अनुपम उद्देश्य अवश्य है, किन्तु इसे शिक्षा का मुख्य एवं एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 15.
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य का मुख्य रूप से प्रतिपादन किसने किया है ?
उत्तर:
शिक्षा के जीवन की पूर्णता के उद्देश्य के मुख्य प्रतिपादक हैं-हरबर्ट स्पेन्सर।

प्रश्न 16.
शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य सामाजिक कार्यक्षमता को सर्वाधिक महत्त्व देता है ?
उत्तर:
शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य सामाजिक कार्यक्षमता को सर्वाधिक महत्त्व देता है।

प्रश्न 17.
शिक्षा के ज्ञानार्जन सम्बन्धी उद्देश्य का समर्थन मुख्य रूप से किन विद्वानों ने किया है ?
उत्तर:
शिक्षा के ज्ञानार्जन सम्बन्धी उद्देश्य का समर्थन करने वाले मुख्य विद्वान् हैं—सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, दान्ते तथा बेकन।

प्रश्न 18.
शिक्षा का कौन-सा उद्देश्य स्व-अनुभूति पर बहुत जोर देता है ?
उत्तर:
सामाजिक उद्देश्य।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य–

  1. सुकरात ने शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को ही शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य माना था।
  2. शिक्षा के व्यक्तिगत विकास और सामाजिक विकास के उद्देश्य परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।
  3. प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य भौतिक सुखों की प्राप्ति था।
  4. समाज में भौतिकवादी दृष्टिकोण के विकास के परिणामस्वरूप शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य का महत्त्व समाप्त हो गया है।
  5. यदि जीविकोपार्जन को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य स्वीकार कर लिया जाए तो उस दशा में शिक्षा साधन बन जाती है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

‘बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
“शिक्षा को उद्देश्य सुख प्राप्त करना है।” यह कथन किसका है?
(क) सुकरात को
(ख) प्लेटो का
(ग) अरस्तू का
(घ) मिल्टन का

प्रश्न 2.
प्राचीन भारत में शिक्षा को उद्देश्य क्या था ?
(क) भौतिक उन्नति
(ख) आध्यात्मिक उन्नति
(ग) राष्ट्रीय सेवा की प्राप्ति
(घ) नागरिकता का विकास

प्रश्न 3.
आधुनिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है:
(क) अवकाश का सदुपयोग
(ख) रोजगार की प्राप्ति।
(ग) सांस्कृतिक विकास
(घ) आध्यात्मिक विकास

प्रश्न 4.
शिक्षा के वैयक्तिक उद्देश्य का प्रमुख गुण है
(क) व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन।
(ख) पौरिवारिक संगठन को प्रोत्साहन
(ग) समाजवाद को बढ़ावा।
(घ) छात्रों के व्यक्तित्व का विकास

प्रश्न 5.
“समाजविहीन व्यक्ति कोरी कल्पना है।” यह कथन किसका है?
(क) हार्नी को
(ख) टी० रेमण्ट का
(ग) टी० पी० नन का
(घ) हरबर्ट स्पेन्सर का

प्रश्न 6.
शिक्षा के उद्देश्यों के सन्दर्भ में कौन-सा कथन सत्य है
(क) व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण है।
(ख) शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य अधिक महत्त्वपूर्ण है।
(ग) शिक्षा के व्यक्तिगत और सामाजिक उद्देश्य परस्पर विरोधी हैं।
(घ) शिक्षा के व्यक्तिगत एवं सामाजिक उद्देश्य परस्पर पूरक हैं।

प्रश्न 7.
शिक्षा के किस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा का मुख्य कार्य व्यक्ति को उचित व्यवसाय के वरण के योग्य बनाना है?
(क) शिक्षा का ज्ञानार्जन सम्बन्धी उद्देश्य
(ख) शिक्षा का जीवन की पूर्णता सम्बन्धी उद्देश्य
(ग) शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य
(घ) शिक्षा का शारीरिक विकास सम्बन्धी उद्देश्य

प्रश्न 8.
“यदि व्यक्ति अपनी जीविका स्वयं नहीं कमा सकता तो वह दूसरों के काम पर जीवित रहने वाला अर्थात् परजीवी है और जीवन के बहुमूल्य अनुभव खो रहा है।”यह कथन किस शिक्षाशास्त्री का है?
(क) जॉन डीवी का
(ख) फ्रॉबेल का
(ग) मैडम मॉण्टेसरी को
(घ) महात्मा गांधी का

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन सामाजिक उद्देश्यों से सम्बन्धित नहीं है?
(क) परिवार
(ख) समाज
(ग) धर्म
(घ) राष्ट्र

प्रश्न 10.
शिंक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मान लेने पर क्या लाभ है?
(क) समाज एवं राष्ट्र प्रगति कर सकता है।
(ख) व्यक्ति के लिए व्यवसाय का वरण सरल हो जाता है।
(ग) व्यक्ति सामान्य रूप से सक्रिय रहता है।
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ हैं

प्रश्न 11.
शिक्षा के ‘शारीरिक विकास सम्बन्धी उद्देश्य’ को एकमात्र उद्देश्य मान लेने से क्या हानियाँ हैं?
(क) व्यक्ति की जीविकोपार्जन सम्बन्धी समस्या प्रबल रहती है।
(ख) व्यक्ति के चारित्रिक तथा आध्यात्मिक विकास की अवहेलना होती है।
(ग) व्यक्ति के कुछ महत्त्वपूर्ण पक्षों के विकास की अवहेलना होती है।
(घ) उपर्युक्त सभी हानियाँ हो सकती हैं।

प्रश्न 12.
शिक्षा में सामाजिक दक्षता का उद्देश्य किसने दिया है? या सामाजिक दक्षता का शैक्षिक उद्देश्य किसने दिया है?
(क) प्लेटो ने
(ख) सुकरात ने
(ग) रूसो ने
(घ) डीवी ने

प्रश्न 13.
शिक्षा के वैयक्तिक विकास के उद्देश्य के दो पक्ष हैं।
(क) आत्मानुभूति एवं आत्माभिव्यक्ति
(ख) आत्माभिव्यक्ति एवं आत्म-सम्मान
(ग) आत्मानुभूति एवं आत्मप्रधानता
(घ) आत्माभिव्यक्ति एवं आत्मप्रशंसा
उत्तर:

  1. (ग) अरस्तू का,
  2. (ख) आध्यात्मिक उन्नति,
  3. (ख) रोजगार की प्राप्ति,
  4. (घ) छात्रों के व्यक्तित्व का विकास,
  5. (ख) रेमण्ट का,
  6. (घ) शिक्षा के व्यक्तिगत एवं सामाजिक उद्देश्य परस्पर पूरक हैं,
  7. (ग) शिक्षा का व्यावसायिक उद्देश्य,
  8. (क) जॉन डीवी का,
  9. (क) परिवार,
  10. (घ) उपर्युक्त सभी लाभ हैं,
  11. (घ) उपर्युक्त सभी हानियाँ हो सकती हैं,
  12. (घ) डीवी ने,
  13. (क) आत्मानुभूति एवं आत्माभिव्यक्ति।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 16 Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 16 Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology (शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, क्षेत्र, उपयोगिता एवं महत्त्व) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given Chapter 16 Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology (शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, क्षेत्र, उपयोगिता एवं महत्त्व).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 16
Chapter Name Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology (शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, क्षेत्र, उपयोगिता एवं महत्त्व)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 16 Meaning, Scope, Utility and Importance of Educational Psychology (शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, क्षेत्र, उपयोगिता एवं महत्त्व)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए एवं उसकी उपयोगिता की सविस्तार वर्णन कीजिए।
या
एक उपयुक्त परिभाषा द्वारा शिक्षा मनोविज्ञान के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
या
“मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” कैसे?
या
शिक्षा मनोविज्ञान का वास्तविक अर्थ प्रकट कीजिए।
या
मनोविज्ञान का अर्थ संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान को अलग से एक विषय स्वीकार किया जा चुका है। शिक्षा मनोविज्ञान’ वास्तव में शिक्षा तथा मनोविज्ञान विषयों का एक सम्मिलित रूप है। अतः शिक्षा मनोविज्ञान की एक परिभाषा निर्धारित करने के लिए शिक्षा तथा मनोविज्ञान के अर्थ को अलग-अलग स्पष्ट करना प्रासंगिक ही है।

शिक्षा का अर्थ
(Meaning of Education)

1. शिक्षा का शाब्दिक अर्थ- शिक्षा के लिए अंग्रेजी में ‘Education’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह शब्द लैटिन भाषा के ‘Educatum’ नामक शब्द से बना है। यह शब्द ‘E’ और ‘Duco’ से मिलकर बना है। ई (E) का अर्थ है-‘अन्दर से’ तथा ड्यूको (Duco) का अर्थ है-आगे बढ़ना या अग्रसर करना। इस प्रकार एजूकेशन का शाब्दिक अर्थ व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों को बाहर की ओर अग्रसर करना हुआ। हिन्दी भाषा के ‘शिक्षा’ शब्द की उत्पत्ति ‘शिक्ष्’ धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है-‘ज्ञानार्जन करना’ या ‘प्रकाशित करना। इस प्रकार शिक्षा मनुष्य के मस्तिष्क को प्रकाशित करती है।
उपर्युक्त शाब्दिक अर्थों से स्पष्ट है कि शिक्षा का अर्थ बालक के मस्तिष्क में बाहर से कुछ भरना नहीं है, वरन् उसमें जो शक्ति पहले से ही निहित है, उसी का अधिक विकास करना है।

2. शिक्षा का संकुचित अर्थ- संकुचित अर्थ में शिक्षा एक निश्चित स्थान, विद्यालय, कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रदान की जाती है। इस प्रकार संकुचित शिक्षा नियमित होती है तथा यह विद्यालय में सम्पन्न होती है। यह शिक्षा एक प्रकार से पुस्तक-प्रधान होती है।

3. शिक्षा का व्यापक अर्थ- डम्बिल ने विस्तृत शिक्षा की व्याख्या करते हुए लिखा है-“शिक्षा के व्यापक अर्थ में वे सभी कारक सम्मिलित किये जाते हैं, जो व्यक्ति पर उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभाव डालते हैं।” महात्मा गाँधी के अनुसार, शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा में निहित सर्वोत्तम शक्तियों का सर्वांगीण उद्घाटन है। इस प्रकार व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवनभर चलने ” वाली प्रक्रिया है। समस्त विश्व ही शिक्षा संस्था है और बालक, किशोर, युवा तथा वृद्ध सभी विद्यार्थी हैं, जो जीवनभर कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं।

मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Psychology)

‘मनोविज्ञान’ शब्द को अंग्रेजी में साइकोलॉजी (Psychology) कहते हैं। यह शब्द यूनानी भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है–‘साइके’ (Psyche) तथा लोगास’ (Logas)। साइके का अर्थ है-“आत्मा’ तथा लोगास का अर्थ है-‘विज्ञान’। इस प्रकार ‘साइकोलॉजी’ का अर्थ हुआ ‘आत्मा का विज्ञान’ (Science of Soul) या’ आत्मा का अध्ययन’। परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को अब स्वीकार नहीं किया जाता है। मनोविज्ञान के अर्थ और स्वरूप में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है। मनोविज्ञान के अर्थ को भली प्रकार समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि इसके रूप में किस प्रकार परिवर्तन हुआ। ये परिवर्तन निम्नलिखित शीर्षकों में वर्णित किये जा सकते हैं|

1. मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान- प्रारम्भ में मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना जाता था। प्लेटो और अरस्तू भी मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान मानते थे, परन्तु कोई दार्शनिक इस बात का उत्तर न दे सका कि आत्मा का स्वरूप क्या है? अत: सोलहवीं शताब्दी में मनोविज्ञान के इस अर्थ को अस्वीकार कर दिया गया।

2. मनोविज्ञान मन का विज्ञान- ‘आत्मा का विज्ञान की परिभाषा को अमान्य समझने के पश्चात् मनोविज्ञान को ‘मन या मस्तिष्क का विज्ञान’ (Science of Mind) समझा जाने लगा, परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को स्वीकार करने में भी कठिनाइयाँ आयीं। कोई भी विद्वान मन की प्रकृति और स्वरूप को निश्चित नहीं कर सका। दूसरे शब्दों में, कोई भी यह नहीं बता सका कि मन क्या है? उसका वैज्ञानिक अध्ययन किस प्रकार किया जा सकता है? अतः अस्पष्टता के कारण इस परिभाषा को भी स्वीकार नहीं किया गया।

3. मनोविज्ञान चेतना का विज्ञान- उन्नीसवीं शताब्दी में मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान’ कहकर परिभाषित किया। जब वातावरण में कोई उत्तेजना उपस्थित होती है, तो प्राणी उसके प्रति अवश्य प्रतिक्रिया करता है। इस प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप मन में चेतना अथवा अनुभूति भी होती है। अतः मनोवैज्ञानिकों ने यह मत व्यक्त किया कि मन के अध्ययन के स्थान पर इसी अनुभूति या चेतना को ही मनोविज्ञान का विषय-क्षेत्र होना चाहिए। वुण्ट (Woudt), जेम्स (James) आदि मनोवैज्ञानिक इस मत के प्रतिपादक थे। परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को भी स्वीकार नहीं किया जा सका, क्योंकि मनोविश्लेषणवादियों ने यह सिद्ध कर दिया कि चेतना का व्यवहार पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। दूसरे, मानव-व्यवहार को प्रभावित करने वाले चेतन मन के अतिरिक्त अचेतन मन तथा अर्द्धचेतन मन भी हैं। तीसरे, मनोविज्ञान का विषय-क्षेत्र चेतना का अध्ययन मान लेने पर पशु-पक्षियों, बालकों तथा विक्षिप्तों की चेतना अथवा आन्तरिक अनुभूति को अध्ययन सम्भव नहीं हो सकता।

4. मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान- मनोवैज्ञानिकों ने इस बात का अनुभव किया कि मानसिक अनुभूतियों का अध्ययन केवल अन्तर्निरीक्षण द्वारा सम्भव है। किसी भी प्राणी की अनुभूति का अध्ययन उसे छोड़कर अन्य के द्वारा सम्भव नहीं है। एक तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनुभूतियों का अध्ययन नहीं कर सकता और कर भी सकता है तो उसके अध्ययन में आत्मगत दोष आ सकता है। वास्तव में मनोवैज्ञानिक विधियों से प्राणी के व्यवहार का वस्तुनिष्ठता के साथ अध्ययन किया जा सकता है। किसी भी प्राणी के व्यवहार का निरीक्षण अन्य किसी भी व्यक्ति के द्वारा किया जा सकता है। इस कारण ही बीसवीं शताब्दी में मनोविज्ञान को ‘व्यवहार का विज्ञान’ स्वीकार किया जाने लगा। ई० वाटसन (E. Watson) के अनुसार, “मनोविज्ञान व्यवहार को विशुद्ध विज्ञान है।” उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि मनोविज्ञान को सर्वप्रथम ‘आत्मा का विज्ञान’ (Science of Soul), फिर ‘मन को विज्ञान’ (Science of Mind) और इसके पश्चात् ‘चेतना का विज्ञान (Science of Consciousness) माना गया। वर्तमान में मनोविज्ञान को ‘व्यवहार का विज्ञान (Science of Behaviour) माना जाता है।

शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा और मनोविज्ञान’ दो शब्दों के योग से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है-‘शिक्षा सम्बन्धी मनोविज्ञान। वास्तव में शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का व्यावहारिक रूप है। दूसरे शब्दों में, मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का शिक्षा में निरूपित होना ही शिक्षा मनोविज्ञान है। शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ कब से हुआ, इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। कालसनिक के अनुसार, शिक्षा मनोविज्ञान का विकास प्लेटो (Plato) के समय से ही प्रारम्भ हो गया था। प्लेटो के अनुसार, सीखने की क्रिया एक प्रकार से विचारों का विकास है। उसने अपनी शिक्षण विधि में प्रश्नोत्तर तथा वाद-विवाद को विशेष महत्त्व दिया।

प्लेटो के समान अरस्तू (Aristotle) ने भी शिक्षा में मचोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग किया। उसने ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति पर विशेष बल दिया तथा ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया, परन्तु वास्तव में शिक्षा मनोविज्ञान का सूत्रपात कमेनियस, जॉन लॉक, रूसो, पेस्टालॉजी, हरबर्ट आदि के प्रयासों से हुआ। थॉर्नडाइक (Thorndyke), जुड (Judd), टरमन (Terman) आदि ने भी शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया। इन शिक्षाशास्त्रियों के प्रयोगों के फलस्वरूप ही सन् , 1920 तक शिक्षा मनोविज्ञान का स्वरूप पूर्णतया स्पष्ट हो सका। अब शिक्षा मनोविज्ञान को एक स्वतन्त्र विषय के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इस स्थिति में आकर शैक्षिक परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन को ही शिक्षा मनोविज्ञान माना जाने लगा।

शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषाएँ
(Definitions of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. स्किनर के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान को सम्बन्ध उन मानवीय व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है जिनका उत्थान, विकास और निर्देशन शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया के द्वारा होता है।”
  2. क्रो एवं क्रो के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से वृद्धावस्था तक सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”
  3. जे० एम० स्टीफन के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षणिक विकास का क्रमिक अध्ययन है।”
  4. कालसनिक के अनुसार, शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के सिद्धान्तों और अनुसन्धाने का शिक्षा में प्रयोग है।”
  5. ट्रो के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो शैक्षणिक परिस्थितियों का मनोवैज्ञानिक रूप से अध्ययन करता है।”
  6. जुड के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान जन्म से लेकर परिपक्वावस्था तक विभिन्न परिस्थितियों में गुजरते हुए व्यक्तियों में होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या करता है।” विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाओं के विश्लेषण द्वारा शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। हम कह सकते हैं कि शिक्षा सम्बन्धी विभिन्न पक्षों का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया गया अध्ययन ही शिक्षा मनोविज्ञान है। वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान को अलग से एक व्यावहारिक एवं उपयोगी विज्ञान के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इस तथ्य को ही स्वीकार करते हुए भारतीय शिक्षा शास्त्री प्रो० एच० आर० भाटिया ने स्पष्ट रूप से कहा है, “हम शिक्षा मनोविज्ञान को शैक्षिक वातावरण में शिक्षार्थी या मनुष्य के व्यवहार के अध्ययन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।’

(नोट-शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता का विवरण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 3 में दिया गया है।)

प्रश्न 2
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन-क्षेत्र का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र निर्धारित कीजिए तथा शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता भी बताइए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान की विषय-सामग्री पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र
(Scope of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र को निर्धारित करते हुए चार्ल्स स्किनर ने लिखा है कि “शिक्षा मनोविज्ञान मानव-व्यवहार का शैक्षिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। इसका सम्बन्ध उन मानव-व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है, जिनका उत्थान, विकास और मार्ग-प्रदर्शन शिक्षा की प्रक्रिया द्वारा होता है।

इसी प्रकार डगलस और हालैण्ड ने लिखा है, “शिक्षा मनोविज्ञान की विषय-सामग्री शिक्षा की प्रक्रियाओं में रुचि लेने से व्यक्ति की प्रकृति, मानसिक जीवन और व्यवहार है।” इन मतों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान में निम्नलिखित बातों का अध्ययन किया जाता है

1. बाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन- शिक्षा मनोविज्ञान में बालकों के व्यवहार को समझने के लिए उनके विकास की विभिन्न अवस्थाओं और उनकी शारीरिक क्रियाओं का विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है।
2. बालकों की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन- शिक्षा | शिक्षा मनोविज्ञान में स्मृति, कल्पना, निर्णयशक्ति, संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, अवधान आदि मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
3. वंशानुक्रम और वातावरण का अध्ययन- बालक को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले तत्त्व वंशानुक्रम और वातावरण हैं। अत: इनका अध्ययन भी शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत अनिवार्य रूप से किया जाता है।
4. बालक की संवेगात्मक क्रियाओं का अध्ययन- बालकों के सन्तुलित विकास के लिए भय, क्रोध, हर्ष आदि संवेगों का विस्तार से अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। बालकों की अभिरुचियों का
5. बालों की अभिरुचियों का अध्ययन- यह जानने के लिए कि बालकों की रुचि या अभिरुचि किस विषय में है, शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत उनकी अभिरुचियों का अध्ययन किया जाता है।
6. शिक्षण विधियों का अध्ययन- शिक्षण को प्रभावशाली और उपयोगी बनाने के लिए विभिन्न विधियों का ज्ञान परम आवश्यक है।
7. अधिगम या सीखना- बालक के सीखने की क्रियाओं का अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत ही किया जाता है। सीखने के नियम, सीखने के सिद्धान्त तथा सीखने का स्थानान्तरण आदि इसी के अन्तर्गत आते हैं।
8, अचेतन मन की क्रियाओं का अध्ययन- बालकों की मानसिक ग्रन्थियों को नष्ट करने के लिए अचेतन मन की क्रियाओं का अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान में किया जाता है।
9. व्यक्तिगत विभिन्नताओं का अध्ययन- प्रत्येक बालक दूसरे बालक से भिन्नता रखता है। शिक्षा मनोविज्ञान बताता है बालकों में परस्पर भिन्नता क्यों होती है तथा किस प्रकार के बालकों को किस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए?
10. बालक में विभिन्न प्रकार के विकास का अध्ययन- बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को समझने के लिए शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत बालक के शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक विकास का अध्ययन किया जाता है।
11. बाल-अपराध का अध्ययन- विद्यालय में अनेक छात्र अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं। शिक्षा-मनोविज्ञान के अन्तर्गत इस प्रकार के बालकों का विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है।
12. पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धान्तों का अध्ययन- समस्त बालकों के लिए एक-सा पाठ्यक्रम निर्धारित करना उचित नहीं है। पाठ्यक्रम का निर्माण बालकों की रुचियों, आयु, क्षमताओं आदि को ध्यान मेंरखकर करना आवश्यक है। इस कारण आधुनिक युग में पाठ्यक्रम को निर्धारित करते समय मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जाता है।
13. मापन एवं मूल्यांकन का अध्ययन- इसके अन्तर्गत मापन और मूल्यांकन के सिद्धान्त, बुद्धि और उसका मापन तथा मूल्यांकन से होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।
14. अनुशासन सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन- विद्यालय में अनुशासन का विशेष महत्त्व होता है। अत: छात्रों में अनुशासन की स्थापना किस प्रकार हो, इसका अध्ययन भी शिक्षा मनोविज्ञान में ही किया जाता है।
15. शैक्षिक परिस्थितियों का अध्ययन- शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत उन शैक्षिक परिस्थितियों का अध्ययन किया जाता है, जिसके अन्दर शिक्षक छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। इसके अन्तर्गत विद्यालय का भवन, शिक्षण-कक्ष, खेलकूद के मैदाने, मनोरंजन, शिक्षक की योग्यताएँ, पाठ्यक्रम, पुस्तकें, शिक्षण-सामग्री आदि बातें आती हैं।
16. मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन- बालकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए शिक्षा मनोविज्ञान में मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान सम्बन्धी बातों का भी विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3
शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता तथा महत्त्व का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
कक्षा-शिक्षण में शिक्षा मनोविज्ञान की क्या उपयोगिता है?
या
“शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा को नवीन दृष्टिकोण प्रदान करता है।” इसको ध्यान में रखते हुए। शिक्षा मनोविज्ञान के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान से शिक्षा जगत में क्रान्ति आई है, कैसे?
या
शिक्षा मनोविज्ञान के महत्त्व का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या
“शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक एवं छात्र के लिए महत्त्वपूर्ण है।” स्पष्ट कीजिए।
या
एक अध्यापक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की सम्यक् जानकारी की क्या उपयोगिता है?
या
एक शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान क्यों उपयोगी है?
या
“शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा शिक्षक को समुचित निर्णय लेने में मदद मिलती है।” इस कथन के सन्दर्भ में शिक्षक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा का प्रमुख आधार मनोविज्ञान या शिक्षा मनोविज्ञान है। शिक्षण में सफलता प्राप्त करने के लिए अध्यापक के लिए शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान परम आवश्यक है। शिक्षा मनोविज्ञान ही अध्यापक को बताता है कि सीखने की सर्वश्रेष्ठ विधि कौन-सी है? बालक को चारित्रिक और मानसिक विकास किस प्रकार हो सकता है तथा बालक को किस अवस्था में किस प्रकार की शिक्षा मिलनी चाहिए?

शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता तथा महत्त्व
(Utility and Importance of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता और महत्त्व को निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है|

1. अध्यापक को स्वयं का ज्ञान- शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को अपने स्वभाव, बुद्धि-स्तर, व्यवहारकुशलता आदि को ज्ञान कराने में सहायक होता है। जब अध्यापक को अपनी कमियों का ज्ञान हो जाता है तो वह उनको सरलता से दूर कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह ज्ञान उनके शिक्षण को प्रभावशाली बनाने में भी परम सहायक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता से अध्यापक अपने पाठ की तैयारी भी सुव्यवस्थित ढंग से कर सकता है।

2. बाल- विकास का ज्ञान शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा अध्यापक बाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करता है। इन अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करके वह पाठ्य-सामग्री का चयन करता है। तथा अवस्थाओं के अनुकूल उसका प्रतिपादन करता है।

3. बालक की मूल-प्रवृत्तियों का ज्ञान- मूल-प्रवृत्तियों के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए रॉस (Ross) ने लिखा है-“मूल-प्रवृत्तियाँ वे हैं, जिनसे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण किया जाता है। शिक्षा मनोविज्ञान
अध्यापक को बताता है कि बालक की मूल-प्रवृत्तियों में किस प्रकार संशोधन और परिवर्तन किया जा सकता। है। मूल-प्रवृत्तियों के विषय में ज्ञान प्राप्त कर बालक के चरित्र का विकास सरलता से किया जा सकता है।

4. बालक की क्षमताओं का ज्ञान- शिक्षा मनोविज्ञान बालक की क्षमताओं का ज्ञान कराने में सहायक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता से अध्यापक को यह ज्ञाने हो जाता है कि बालक किस सीमा तक ज्ञानार्जन की क्षमता रखता है तथा किस सीमा तक उसके सामाजिक व्यवहार को सुधारा जा सकता है।

5. बालक की विभिन्न आवश्यकताओं का ज्ञान- शिक्षा प्राप्त करने वाले बालकों की विभिन्न होती है। ये प्रमुख आवश्यकताएँ हैं-स्नेह, आत्मसम्मान, सहयोग, मार्गदर्शन आदि। यदि ये आवश्यकताएँ उचित ढंग से सन्तुष्ट हो जाती हैं तो बालकों का विकास भी स्वाभाविक ढंग से होता है। शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को बालक की विभिन्न आवश्यकताओं का ज्ञान कराता है।

6. बाल-व्यवहार का ज्ञान- शिक्षण के कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए बालक के व्यवहार को समझना परम आवश्यक है। शिक्षा मनोविज्ञान इस क्षेत्र में अध्यापक की विशेष सहायता करता है। इस सम्बन्ध में रायबर्न (Ryburn). ने लिखा है-“हमें बाल-स्वभाव और व्यवहार का जितना अधिक ज्ञान होता है, उतना ही प्रभावशाली हमारा बालक से सम्बन्ध होता है। मनोविज्ञान हमें यह ज्ञान कराने में विशेष सहायक सिद्ध हो सकता है।”

7. बालकों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक- शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालकों के व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास करना है। शिक्षा के इस उद्देश्य को प्राप्त करने में शिक्षा मनोविज्ञान विशेष रूप से सहायक होता है। शिक्षा मनोविज्ञान बालक के केवल ज्ञानात्मक विकास की ओर ही बल नहीं देता, वरन् वह अध्यापक को उन विधियों से परिचित भी कराता है, जिनको अपनाकर बालक का सर्वांगीण विकास किया। जा सकता है।

8. बालक की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का ज्ञान- आधुनिक मनोवैज्ञानिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बालकों की रुचियों, योग्यर्ताओं तथा क्षमताओं आदि में भिन्नताएँ पायी जाती हैं। अत: उनकी व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझना अध्यापक के लिए परम आवश्यक है। मनोविज्ञान द्वारा हमें छात्रों की । व्यक्तिगत भिन्नता, मानसिक स्थितियों, स्वभावों तथा विभिन्न अवस्थाओं में उनकी आवश्यकताओं का ज्ञान होता है। व्यक्तिगत भिन्नताओं की जानकारी प्राप्त करके विभिन्न प्रकार के उपयोगी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर विभिन्न वर्ग के विद्यार्थियों के लिए उनके अनुकूल उपयोगी शिक्षा-व्यवस्था के आयोजन का अवसर प्राप्त होता है।

9. सामग्री के चयन में सहायक- चेस्टर एण्डरसन के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को पाठ्य-सामग्री के उचित चयन तथा उसे व्यवस्थित करने का ज्ञान प्रदान करता है।” पाठ्य-सामग्री के उचित चयन से शिक्षण प्रभावशाली और रोचक हो जाता है।

10. पाठ्यक्रम के निर्धारण में सहायक- शिक्षा मनोविज्ञान उचित पाठ्यक्रम के निर्धारण में विशेष रूप से सहायक होता है, क्योंकि मनोविज्ञान की सहायता से विभिन्न अवस्थाओं के छात्रों की मानसिक क्षमताओं, रुचियों तथा प्रवृत्तियों आदि के विषय में जानकारी हो जाती है। यह जानकारी उपयोगी पाठ्यक्रम के निर्धारण में विशेष रूप से सहायक होती है। स्किनर के अनुसार, “उपयोगी पाठ्यक्रम बालकों के विकास, व्यक्तिगत विभिन्नताओं, प्रेरणाओं, मूल्यों एवं सीखने के सिद्धान्तों के अनुसार मनोविज्ञान पर आधारित होना आवश्यक है।”

11. प्रभावशाली शिक्षण- विधियों का ज्ञान शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को शिक्षण की विभिन्न विधियों का ज्ञान कराता है। यह बताता है कि कौन-सी शिक्षण-विधि कहाँ और किस स्तर पर उपयुक्त होती है। स्किनर (Skinner) के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षक को शिक्षण विधियों का चुनाव करने में सहायता देने के लिए सीखने के अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।”

12. कक्षा की समस्याओं के समाधान में सहायक- कक्षा में शिक्षण करते समय शिक्षक के सामने अनेक समस्याएँ आती हैं। कुछ बालकों का ध्यान पढ़ने-लिखने की ओर नहीं जाता, वे केवल बातों में ही दिलचस्पी लेते हैं। शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को इस प्रकार की समस्याओं का हल सुझाता है। मनोविज्ञान का ज्ञाता अध्यापक शरारती और पिछड़े बालकों के व्यवहार को भली प्रकार समझकर ही उनका मनोवैज्ञानिक निदान करता है।

13. अनुशासन की स्थापना में सहायक- शिक्षा मनोविज्ञान अनुशासन सम्बन्धी दृष्टिकोण में परिवर्तन उत्पन्न करता है। शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक को बताता है कि बात-बात पर छात्रों को मारने-पीटने से वास्तविक-अनुशासन की स्थापना नहीं होती। शिक्षा मनोविज्ञान शारीरिक दण्ड के स्थान पर प्रेम, सहानुभूति तथा स्वशासन द्वारा अनुशासन स्थापित करने का पक्षधर है। यह बताता है कि शिक्षण-विधियों में सुधार करके अनुशासन की समस्या को किस भाँति हल किया जा सकता है।

14. मापन और मूल्यांकन का ज्ञान- शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान की प्रमुख देन ‘मापन और मूल्यांकन विधियों का प्रयोग है। इन विधियों के द्वारा बालकों की योग्यताओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाता है। मापन और मूल्यांकन ने अपव्यय तथा अवरोधन को समाप्त करने में विशेष योगदान दिया है। इसके साथ ही बालकों की रुचि, योग्यता तथा आत्मसम्मान आदि का मापन करके उनके व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

15. शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक- शिक्षा मनोविज्ञान की सहायता के बिना शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं की जा सकती। स्किनर के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान आजकल के शिक्षक के जीवन को ज्ञान से समृद्ध कर उसकी शिक्षण-विधि को उन्नत बनाकर उसे उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता पहुँचाता है।” निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में हम कह सकते हैं कि अध्यापक की सफलता किसी बड़ी सीमा तक शिक्षा मनोविज्ञान के ज्ञान पर निर्भर करती है। बिना शिक्षा मनोविज्ञान के ज्ञान के अध्यापक न तो छात्रों का बौद्धिक विकास कर सकता है और न ही वह प्रतिदिन अध्यापन करते समय आने वाली विभिन्न समस्याओं का हल निकाल सकता है।

वास्तव में, छात्रों की प्रकृति को समझने एवं उनके व्यवहार में परिवर्तन के लिए। शिक्षा मनोविज्ञान से शक्ति मिलती है। जैसा कि डेविस (Davis) कहते हैं-“शिक्षा मनोविज्ञान ने शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इसका माध्यम रहे हैं—अनेक मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात छात्रों की क्षमताएँ तथा व्यक्तिगत भेद। इसने छात्रों के ज्ञान, विकास तथा परिपक्वता को समझने में भी योग दिया है।” इसी प्रकार ब्लेयर (Blair) ने लिखा है-“आधुनिक अध्यापक को सफलता प्राप्त करने के लिए ऐसा विशेषज्ञ होना चाहिए जो बालकों को समझे-वे कैसे विकसित होते हैं, सीखते एवं समायोजित होते हैं। कोई अपरिचित या मनोवैज्ञानिक विधियों से अनभिज्ञ व्यक्ति अध्यापक के दायित्व कार्य को पूरा नहीं कर सकता है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा और मनोविज्ञान के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा और मनोविज्ञान का सम्बन्ध
(Relation between Education and Psychology)

शिक्षा द्वारा व्यक्ति के व्यवहारों में परिवर्तन आता है तथा मनोविज्ञान का भी सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार से होता है। अतः शिक्षा और मनोविज्ञान दोनों ही मानव-व्यवहार से सम्बन्धित हैं। अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया है कि शिक्षा का मुख्य आधार मनोविज्ञान होना चाहिए। यहाँ हम प्रमुख शिक्षाशास्त्रियों के मतों का उल्लेख करेंगे|

  1. आर० ए० डेविस के अनुसार, “मनोविज्ञान ने छात्रों की क्षमताओं तथा विभिन्नताओं का विश्लेषण करके शिक्षा को विशिष्ट योगदान दिया है। इसने विद्यालयी जीवन में छात्रों के विकास तथा परिपक्वता का ज्ञान प्राप्ति में भी प्रत्यक्ष योगदान दिया है।”
  2. ईवर के अनुसार, “मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। बिना मनोविज्ञान की सहायता के हम शिक्षा की समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं।”
  3. पेस्टालॉजी के अनुसार, “अध्यापक को बालक के मस्तिष्क का अच्छा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।”
  4. स्किनर के अनुसार, “शिक्षा का प्रमुख आधारभूत विज्ञान, मनोविज्ञान है।”
  5. मॉण्टेसरी के अनुसार, “शिक्षक जितना अधिक प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का ज्ञान रखता है, उतना अधिक वह जानता है कि कैसे पढ़ाया जाए।
    उपर्युक्त मतों से स्पष्ट होता है कि शिक्षा का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है, जो कि मनोविज्ञान के प्रभाव से वंचित रहा हो और जिसे स्पष्ट करने में मनोविज्ञान ने कोई विशेष योगदान न दिया हो। स्पष्ट है कि शिक्षा तथा मनोविज्ञान का घनिष्ठ पारस्परिक सम्बन्ध है।

प्रश्न 2
शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
या
आधुनिक शिक्षा में मनोविज्ञान की क्या देन है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता
(Need of Study of Psychology for Education)

शिक्षा तथा मनोविज्ञान का घनिष्ठ सम्बन्ध है। शिक्षा अपने आप में एक व्यापक प्रक्रिया है। इस उपयोगी प्रक्रिया के सुचारु संचालन के लिए मनोविज्ञान का ज्ञान एवं अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी एवं आवश्यक होता है। मनोविज्ञान के सैद्धान्तिक ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा के क्षेत्र में अनेक तथ्यों का निर्धारण किया जाता है। शिक्षा के लिए मनोविज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं-

  1. मनोवैज्ञानिक- ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है तथा शिक्षा के निर्धारित उद्देश्यों की प्रप्ति के लिए भी मनोविज्ञान का समुचित ज्ञान आवश्यक होता है।
  2. बाल- मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त होने वाले नवीन ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा को नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया जा सकता है अर्थात् शिक्षा को नयी शिक्षा एवं स्वरूप प्रदान करने के लिए मनोवैज्ञानिक ज्ञान सहायक होता है।
  3. बाल- मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार पर ही शिक्षा के क्षेत्र में अनुशासन की सुव्यवस्था की जा सकती है, अर्थात् अनुशासन की समस्या के समाधान में मनोविज्ञान का ज्ञान सहायक होता है।
  4. मनोविज्ञान का ज्ञान ही शिक्षा की नवीन शिक्षण- णालियों को खोजने में सहायक होता है।
  5. मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार पर ही व्यक्तिगत भेदों को ध्यान में रखकर शिक्षा की व्यवस्था की जाती
  6. मनोवैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर ही बाल- विकास की अवस्थाओं के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था की जाती है।
  7. मनोवैज्ञानिक ज्ञान ही बाल- केन्द्रित शिक्षा को लागू करने में सहायक होता है।

प्रश्न 3
शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान में अन्तर
(Distinction between Educational Psychology and Psychology)

निस्सन्देह शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान में घनिष्ठ सम्बन्ध तथा पर्याप्त समानता है, परन्तु वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत इन दोनों के अलग-अलग विषय-क्षेत्र के रूप में भी स्वीकार किया जा चुका है। शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान के अन्तर को हम निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं

1.अध्ययन-विषय का अन्तर- भले ही शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान दोनों ही मानवीय व्यवहारों का व्यवस्थित अध्ययन करने वाले शास्त्र हैं, परन्तु इन दोनों शास्त्रों में व्यवहार के अध्ययन की परिस्थितियों का स्पष्ट अन्तर है। शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा केवल शैक्षिक परिस्थितियों में ही सम्पन्न होने वाले व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इससे भिन्न मनोविज्ञान द्वारा सामान्य वातावरण में सम्पन्न होने वाले मानवीय व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।

2. अध्ययन के उद्देश्य का अन्तर- शिक्षा मनोविज्ञान तथा मनोविज्ञान का एक अन्तर उनके अध्ययनउद्देश्य से सम्बन्धित भी है। शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का उद्देश्य शैक्षिक परिस्थितियों में व्यक्ति के होने वाले व्यवहार का अध्ययन करना तथा शिक्षा की प्रक्रिया को सफल बनाना है। इससे भिन्न मनोविज्ञान के अध्ययनों का मुख्य उद्देश्य व्यवहार सम्बन्धी सिद्धान्तों को खोजना एवं प्रतिपादित करना तथा उनके आधार पर मानवीय व्यवहार के विषय में भविष्यवाणी करना है।

3. क्षेत्र की व्यापकता का अन्तर- शिक्षा मनोविज्ञान केवल शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार का अध्ययन करता है; अत: शिक्षा मनोविज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र सीमित है। इससे भिन्न मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का सामान्य वातावरण में अध्ययन करता है। अत: मनोविज्ञान का अध्ययन क्षेत्र पर्याप्त व्यापक है।

प्रश्न 4
शिक्षा मनोविज्ञान के उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का मूल उद्देश्य शिक्षा की प्रक्रिया को अच्छे ढंग से परिचालित करना है। इसके लिए शिक्षा मनोविज्ञान जहाँ एक ओर बालक के व्यक्तित्व के समुचित विकास में सहायता प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर शिक्षक को शिक्षण कार्य को उत्तम ढंग से करने में सहायता प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा मनोविज्ञान के कुछ अन्य उद्देश्य भी महत्त्वपूर्ण हैं; जैसे कि

  1. शिक्षकों में छात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण तथा पक्षपातरहित दृष्टिकोण विकसित करना।
  2. सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूप तथा महत्त्व को सही रूप में समझने में सहायता प्रदान करना।
  3. शिक्षकों में इस प्रकार की समझ या अन्तर्दृष्टि विकसित करना जिसके द्वारा वे अपने अध्ययन के परिणामों तथा अन्य शक्तियों के शिक्षा-विषयक अभ्यासों को अच्छी तरह से समझ सकें।
  4. शिक्षा मनोविज्ञान का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उद्देश्य अपने तथा अन्य व्यक्तियों के व्यवहार के विश्लेषण तथा व्यवस्थापन के लिए शिक्षकों को सामान्य व्यवस्थापन में सहायक तथ्यों एवं विधियों की जानकारी प्रदान करना है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्किनर के अनुसार शिक्षा मनोविज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  1. शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान का व्यावहारिक रूप है।
  2. यह शैक्षिक परिस्थितियों में मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।
  3. इसका प्रमुख केन्द्र मानव-व्यवहार है।
  4. शिक्षा मनोविज्ञान अपनी खोजों के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करता है।
  5. यह प्राप्त निष्कर्षों का प्रयोग शिक्षा की समस्याओं के समाधान के लिए करता है।
  6. शिक्षा मनोविज्ञान यह भविष्यवाणी करता है कि विद्यार्थी में ज्ञान प्राप्त करने

प्रश्न 2
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत शैक्षिक परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार का तटस्थ अध्ययन किया जाता है। यह मनोविज्ञान से सम्बद्ध है। इस स्थिति में शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति को हम वैज्ञानिक कह सकते हैं अर्थात् शिक्षा मनोविज्ञान एक-क्झिान है। अब हमें यह जानना आवश्यक है कि शिक्षा मनोविज्ञान कैसा विज्ञान है? इसके उत्तर में हम कह सकते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान, एक विधायक सामाजिक विज्ञान है। यह सत्य है कि शिक्षा मनोविज्ञान अन्य भौतिक विज्ञानों के समान यथार्थ विज्ञान नहीं है। परन्तु जैसे-जैसे इस विज्ञान का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे इसकी यथार्थता में वृद्धि हो रही है।

प्रश्न 3
स्पष्ट कीजिए कि मनोविज्ञान ने शिक्षा को नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया है?
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि मनोविज्ञान ने शिक्षा को एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। वर्तमान मान्यताओं से पूर्व शिक्षा के क्षेत्र में बालक की अर्जित उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल पाठ्यक्रम के अध्ययन तथा परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर ही किया जाता था। परन्तु अब स्थिति बदल गयी है। वर्तमान मान्यताओं के अनुसार छात्रों की शैक्षिक उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए बालक की समस्त गतिविधियों, व्यक्तित्व के विकास तथा विकसित हुई क्षमताओं को भी ध्यान में रखा जाता है। आज कुछ छात्र भले ही पाठ्य-पुस्तकों में अधिक रुचि नहीं लेते, परन्तु वे क्राफ्ट आदि कार्यों को अधिक कुशलतापूर्वक करते हैं। इन बालकों की योग्यता का मूल्यांकन उनकी इस क्षमता के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 4
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की आत्म-निरीक्षण विधि का वर्णन कीजिए।
या
शिक्षा मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शन विधि क्या है?
या
शिक्षा मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शन विधि के अर्थ एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययनों में प्राय: आत्म-निरीक्षण या आत्मदर्शन को भी अपनाया जाता है। अन्तर्दर्शन विधि का अर्थ है, व्यक्ति द्वारा अपने मन की कार्य-पद्धतियों की ओर व्यवस्थित ढंग से ध्यान देना ही अन्तर्दर्शन है। हम जानते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययनों में बालक की कुछ मानसिक क्रियाओं को भी जानना अति आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए—कल्पना, चिन्तन, रुचि, ध्यान तथा स्मृति आदि मानसिक क्रियाओं को केवल अन्तर्दर्शन द्वारा ही जाना जा सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि अन्तर्दर्शन भी शिक्षा मनोविज्ञान की एक अध्ययन विधि है। अन्तर्दर्शन विधि कोई शुद्ध वैज्ञानिक विधि नहीं है, अतः इस विधि को अन्य वैज्ञानिक विधियों की सहयोगी विधि के रूप में अपनाया जाता है।

प्रश्न 5
शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषा लिखिए एवं उसके क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषा–‘शिक्षा मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान का सम्बन्ध उन मानवीय व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है जिनका उत्थान, विकास और निर्देशन शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया के द्वारा होता है।” शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र–शिक्षा मनोविज्ञान में निम्नलिखित क्षेत्रों में अध्ययन किया जाता हैबाल-विकास की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन, बालकों की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन, वंशानुक्रम और वातावरण का अध्ययन, बालक की संवेगात्मक क्रियाओं का अध्ययन, बालकों की अभिरुचिओं का अध्ययन, शिक्षण विधियों का अध्ययन तथा अधिगम (सीखना) आदि।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्लेटो, अरस्तू आदि यूनानी दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को किस रूप में स्वीकार किया है?
उत्तर:
प्लेटो, अरस्तू आदि यूनानी दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को आत्मा के दर्शन के रूप में स्वीकार किया है।

प्रश्न 2
वाटसन, वुडवर्थ, स्किनर आदि मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को किस रूप में स्वीकार किया
उत्तर:
वाटसन, वुडवर्थ, स्किनर आदि मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को व्यवहार के विज्ञान के रूप में स्वीकार किया है।

प्रश्न 3
‘शिक्षा मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
‘शिक्षा मनोविज्ञान’ का शाब्दिक अर्थ है–शिक्षा सम्बन्धी मनोविज्ञान।

प्रश्न 4
‘शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक है।

प्रश्न 5
‘शिक्षा मनोविज्ञान’ की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“शिक्षा मनोविज्ञान मानवीय व्यवहार का शैक्षणिक परिस्थितियों में अध्ययन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान का सम्बन्ध उंन मानवीय व्यवहारों और व्यक्तित्व के अध्ययन से है, जिनका उत्थान, विकास और निर्देशन शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया द्वारा होता है।”

प्रश्न 6
शिक्षा मनोविज्ञान किस विज्ञान की शाखा है?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान मनोविज्ञान की शाखा है।

प्रश्न 7
कोई ऐसा कथन लिखिए जो शिक्षा के क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्व को स्पष्ट करता हो।
उत्तर:
“मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। बिना मनोविज्ञान की सहायता से हम शिक्षा की समस्याओं को हल नहीं कर सकते हैं।” जेम्स ड्रेक्ट

प्रश्न 8
शिक्षा मनोविज्ञान किस प्रकार का विज्ञान है?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान व्यावहारिक एवं उपयोगी विधायक विज्ञान है।

प्रश्न 9
शिक्षा मनोविज्ञान की उपयोगिता के चार मुख्य बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. पाठ्यक्रम निर्धारण में उपयोगी,
  2. शिक्षा-विधियों के चुनाव में उपयोगी,
  3. अनुशासन स्थापित करने में उपयोगी तथा
  4. बालकों के व्यक्तित्व के विकास में सहायक।

प्रश्न 10
“मनोविज्ञान व्यवहार और अनुभव का विज्ञान है।” ऐसा किसने कहा है?
उत्तर:
एन० एल० मन ने।

प्रश्न 11
मनोविज्ञान की परिभाषाओं के विकासात्मक चरण बताइट।
उत्तर:
मनोविज्ञान को क्रमश:

  1. आत्मा के विज्ञान,
  2. मन के विज्ञान
  3. चेतना के विज्ञान तथा
  4. व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया गया।

प्रश्न 12
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति क्या है ?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक है।

प्रश्न 13
“शिक्षा मनोविज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है।” यह कथन सत्य है या असत्य।
उत्तर:
सत्य है।

प्रश्न 14
“मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का शैक्षिक परिस्थितियों में उपयोग ही शिक्षा है।” यह कथन सत्य है या असत्य।
उत्तर:
असत्य है।

प्रश्न 15
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की आत्मनिष्ठ विधि कौन-सी है ?
उत्तर:
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन की आत्मनिष्ठ विधि हैअन्तर्दर्शन विधि।

प्रश्न 16
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. शिक्षा मनोविज्ञान कोई स्वतन्त्र विषय नहीं है, यह तो मनोविज्ञान की एक शाखा मात्र है।
  2. शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा पारिवारिक परिस्थितियों में व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
  3. शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा शैक्षणिक परिस्थितियों में मानवीय व्यवहार का अध्ययन किया जाता
  4. शिक्षा तथा मनोविज्ञान का कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है।
  5. प्रत्येक शिक्षक के लिए बाल मनोविज्ञान का ज्ञान आवश्यक होता है।
  6. कक्षा-शिक्षण में मनोविज्ञान का ज्ञान अनावश्यक एवं व्यर्थ है।
  7. मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का शैक्षिक परिस्थितियों में उपयोग ही शिक्षा है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. असत्य
  5. सत्य
  6. असत्य
  7. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।” यह कथन सम्बन्धित है
(क) पेस्टालॉजी से
(ख) टी० रेमाण्ट से
(ग) प्लेटो से
(घ) इनमें से किसी से नहीं ”

प्रश्न 2.
“बालक एक ऐसी पुस्तक के समान है, जिसे शिक्षक भली-भाँति पढ़ता है।” यह किसका कथन
(क) मैजिनी का
(ख) पेस्टालॉजी का
(ग) हरबर्ट का
(घ) रूसो का

प्रश्न 3.
“शिक्षा को मनोविज्ञान ने बाँध दिया है। मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की उपयोगिता को जाँचने के लिए सबसे अच्छा स्थान विद्यालय है।” यह कथन है
(क) जॉन एडम्स का
(ख) फ्रॉबेल का
(ग) जॉन डीवी का
(घ) कमेनियस का

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान के अनुसार, शिक्षा के क्षेत्र में मुख्य स्थान है
(क) बालक का
(ख) अध्यापक का
(ग) अभिभावक का
(घ) प्रशासक का

प्रश्न 5.
शिक्षा मनोविज्ञान
(क) आत्मा का विज्ञान है :
(ख) मन का विज्ञान है
(ग) चेतना का विज्ञान है
(घ) शैक्षिक विकास का क्रमिक अध्ययन है

प्रश्न 6.
शिक्षा को मनोवैज्ञानिक आधार की आवश्यकता है
(क) शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के लिए
(ख) पाठ्य-पुस्तक लेखन के लिए
(ग) अनुशासनहीनता को दूर करने के लिए
(घ) बालक की योग्यताओं का पता लगाने के लिए

प्रश्न 7.
“शिक्षा मनोविज्ञान सीखने के ‘क्यों’ तथा ‘कब’ से सम्बन्धित है।” यह मत किसका है?
(क) बी० एन० झा का
(ख) क्रो एवं क्रो का
(ग) रायबर्न का
(घ) जॉन एडम्स का

प्रश्न 8.
“शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों के निर्माण की आधारशिला है।” यह किसका कथन है?
(क) चार्ल्स स्किनर का
(ख) कुप्पूस्वामी का
(ग) पेस्टालॉजी का
(घ) मॉण्टेसरी का

प्रश्न 9.
“मनोविज्ञान शिक्षा का आधारभूत विज्ञान है।” यह कथन है
(क) हरबर्ट को
(ख) जॉन डीवी को
(ग) स्किनर का
(घ) थॉर्नडाइक का

प्रश्न 10.
“शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक की शिक्षण-विधि का चुनाव करने में सहायता देने के लिए सीखने के अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है।” यह कथन किसका है?
(क) चार्ल्स स्किनर का
(ख) क्रो एवं क्रो का
(ग) द्रो का
(घ) बी० एन० झा का

प्रश्न 11.
शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन नहीं किया जाता
(क) शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार का
(ख) मानसिक स्वास्थ्य का
(ग) औद्योगिक गतिविधियों का
(घ) सीखने की प्रक्रिया का

प्रश्न 12.
शिक्षा मनोविज्ञान का कार्य नहीं है
(क) बालक के स्वरूप का ज्ञान देना।
(ख) अधिगम और शिक्षण के लिए सिद्धान्तों और तकनीकों को प्रस्तुत करना
(ग) बच्चों की अभिवृद्धि और विकास का ज्ञान देना,
(घ) शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करना

प्रश्न 13.
आधुनिक शिक्षा की प्रमुख मनोवैज्ञानिक विशेषता क्या है?
(क) बालकेन्द्रित शिक्षा
(ख) पुस्तकीय ज्ञान
(ग) पर्यावरण का ज्ञान
(घ) खेलों का महत्त्व

प्रश्न 14.
शिक्षा मनोविज्ञान की आत्मनिष्ठ विधि है
(क) प्रयोगात्मक विधि
(ख) प्रश्नावली विधि
(ग) अन्तर्दर्शन विधि
(घ) जीवन इतिहास विधि

प्रश्न 15.
शिक्षा मनोविज्ञान की लोकप्रिय विधि है
(क) परीक्षण विधि
(ख) सांख्यिकी विधि
(ग) तुलनात्मक विधि
(घ) प्रयोगात्मक विधि

प्रश्न 16.
मनोविज्ञान व्यवहार और अनुभव का विज्ञान है।” यह कथन है
(क) प्लेटो का
(ख) स्किनर को
(ग) थॉर्नडाइक का
(घ) क्रो एण्ड क्रो का

प्रश्न 17.
किसने ‘मनोविज्ञान को व्यवहार, के विज्ञान के रूप में स्वीकार नहीं किया ?
(क) वाटसन
(ख) वुडवर्थ
(ग) स्किनर
(घ) विलियम वुण्ड

प्रश्न 18.
“मनोविज्ञान मानव-प्रकृति का अध्ययन करता है।” यह परिभाषा है
(क) जेम्स की
(ख) स्किनर की
(ग) वाटसन की
(घ) बोरिंग की

प्रश्न 19.
“मनोविज्ञान व्यवहार का निश्चयात्मक विज्ञान है।” यह परिभाषा है
(क) स्किनर की
(ख) जेम्स की
(ग) वाटसन की
(घ) गैरेट की

प्रश्न 20.
शिक्षा-मनोविज्ञान किस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है?
(क) शिक्षार्थी
(ख) शिक्षक एवं शिक्षा व्यवस्था
(ग) अधिगम परिस्थिति का
(घ) ये सभी

प्रश्न 21.
मनोविज्ञान के क्षेत्र के अन्तर्गत अचेतन मस्तिष्क की खोज का श्रेय किसको जाता है?
(क) ऑलपोर्ट को
ख) युंग को
(ग) वाटसन को
(घ) फ्रॉयड को

प्रश्न 22.
मनोविज्ञान के अनुसार शिक्षा होनी चाहिए
(क) बालकेन्द्रित
(ख) अध्यापककेन्द्रित
(ग) राज्यकेन्द्रित
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 23.
शिक्षा मनोविज्ञान का केन्द्रबिन्दु है
(क) शिक्षक
(ख) बालक
(ग) पाठ्यक्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 24.
भारतीय मनोवैज्ञानिक हैं
(क) कुप्पूस्वामी
(ख) राधाकृष्णन
(ग) टरमैन
(घ) सी०वी० रमन

प्रश्न 25.
शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है
(क) अधिगमकर्ता का
(ख) अधिगम प्रक्रिया का
(ग) अधिगम परिस्थिति का
(घ) इन सभी का

प्रश्न 26.
“शैक्षिक परिस्थितियों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन शिक्षा-मनोविज्ञान है।” ऐसा किसने कहा है ?
(क) डॉ० एस०एस० माथुर ने
(ख) डब्ल्यू०जी० ट्रे ने
(ग) स्किनर ने
(घ) क्रो एण्ड क्रो ने

प्रश्न 27.
‘शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार काअध्ययन करता है”किसने कहा?
(क) क्रो एण्ड क्रो
(ख) टेलफोर्ड
(ग) कुप्पूस्वामी
(घ) स्किनर

प्रश्न 28.
बालक की शिक्षा को प्रभावकारी बनाने की दृष्टि से शिक्षा मनोविज्ञान बल देती है
(क) बालकों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझना
(ख) सीखने की एक आनन्दप्रद क्रिया बनाना
(ग) स्कूल में पारिवारिक वातावरण बनाना
(घ) उपर्युक्त सभी

उत्तर:

  1. (ग) प्लेटो से
  2. (घ) रूसो का
  3. (क) जॉन एडम्स का
  4. (क) बालक का
  5. (घ) शैक्षिक विकास का क्रमिक अध्ययन है
  6. (घ) बालक की योग्यताओं का पता लगाने के लिए
  7. (ख) क्रो एवं क्रो का
  8. (क) चार्ल्स स्किनर का
  9. (ग)  थॉर्नडाइक का
  10. (क) चार्ल्स स्किनर का
  11. (ग) औद्योगिक गतिविधियों का
  12. (घ) शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करना
  13. (क) बालकेन्द्रित शिक्षा
  14. (ग) अन्तर्दर्शन विधि
  15. (घ) प्रयोगात्मक विधि
  16. (ख) स्किनर का
  17. (घ) विलियम वुण्ड
  18. (घ) बोरिंग की
  19. वाटसन की
  20. (घ) ये सभी
  21. (घ) फ्रॉयड को
  22. (क) बालकेन्द्रित
  23. (ख) बालक
  24. (क) कुप्पूस्वामी
  25. (घ) इन सभी का
  26. (ख) डब्ल्यू०जी० ट्रे ने
  27. (घ) स्किनर
  28. (घ) उपर्युक्त सभी

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