UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry (रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ)

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पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के लिए मोलर द्रव्यमान का परिकलन कीजिए-
(i) H20
(ii) CO2
(iii) CH4
उत्तर
(i) H20 का मोलर द्रव्यमान = (2×1.008) + (1600) = 18.016 amu
(ii) CO2 का मोलर द्रव्यमान = 12.01+ (2×1600)= 44.01 amu
(iii) CH4, का मोलर द्रव्यमाने = 12.01+ (4×1.008)= 16.042 amu

प्रश्न 2.
सोडियम सल्फेट (Na2SO4) में उपस्थित विभिन्न तत्वों के द्रव्यमान प्रतिशत का परिकलन कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 3.
आयरन के उस ऑक्साइड का मूलनुपाती सूत्र ज्ञात कीजिए जिसमें द्रव्यमान द्वारा 69.9% आयरन और 30.1% ऑक्सीजन है।
उत्तर
>UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-2

∴ मूलानुपाती सूत्रे =Fe203

प्रश्न 4.
प्राप्त कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा का परिकलन कीजिए। जब-
(i) 1 मोल कार्बन को हवा में जलाया जाता है और
(ii) 1 मोल कार्बन को 16 g ऑक्सीजन में जलाया जाता है।
उत्तर
ऑक्सीजन/वायु में कार्बन निम्न प्रकार से जलता ह-
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(i) हवा में ऑक्सीजन की प्रचुर मात्रा है। इस कारण से ज्वलन पूर्ण होता है। अतः 1 मोल कार्बन | के दहन से उत्पन्न CO2 = 44 g
(ii) इस स्थिति में ऑक्सीजन एक सीमांत अभिकर्मक है। केवल 0.5 मोल कार्बन के जलेंगे।
∴ 32 g ऑक्सीजन से उत्पन्न CO2 = 44g
∴ 16 g ऑक्सीजन से उत्पन्न CO2= [latex]\frac { 44 }{ 32 } \times 16[/latex]= 22 g

प्रश्न 5.
सोडियम ऐसीटेट (CH3COONa) का 500 mL, 0.375 मोलर जलीय विलयन बनाने के लिए उसके कितने द्रव्यमान की आवश्यकता होगी? सोडियम ऐसीटेट का मोलर द्रव्यमान 82.0245 g mol-1 है।
उत्तर
जलीय विलयन की मोलरता निम्न समीकरण से व्यक्त की जा सकती है-
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अत: सोडियम ऐसीटेट के द्रव्यमान की आवश्यक मात्रा = 15.38 g

प्रश्न 6.
सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के उस प्रतिदर्श का मोल प्रति लीटर में सान्द्रता का परिकलन कीजिए जिसमें उसका द्रव्यमान प्रतिशत 69% हो और जिसका घनत्व 1.41 g mL-1 हो।।
उत्तर
दिया गया प्रतिदर्श 69% है अर्थात् 100 g विलयन में केवल 69 g नाइट्रिक अम्ल है। नाइट्रिक अम्ल का मोलर द्रव्यमान =1+14+ (3×16) = 63g mol-1
∴ 69 g शुद्ध नाइट्रिक अम्ल (जो विलयन के 100 g में उपस्थित है) में उपस्थित मोलों की संख्या = [latex]\frac { 69 }{ 63 } =1.095[/latex]
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प्रश्न 7.
100 g कॉपर सल्फेट (CuSO4) से कितना कॉपर प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर
CuSO4 का मोलर द्रव्यमान = 63.5 + 32+ (4×16)= 1595 g mol-1
1 मोल (159.5 g) CuSO4 में Cu का 1 ग्राम परमाणु (63.5 g) उपस्थित रहता है
∴ 100 g कॉपर सल्फेट से प्राप्त कॉपर की मात्रा = [latex]\frac { 63.5 }{ 159.5 } \times 100[/latex]= 39.81 g .

प्रश्न 8.
आयरन के ऑक्साइड का आण्विक सूत्र ज्ञात कीजिए जिसमें आयरन तथा ऑक्सीजन का द्रव्यमान प्रतिशत क्रमशः 69.9 g तथा 30.1 g है।
हल
मूलानुपाती सूत्र की गणना के लिए प्रश्न 3 का हल देखिये।।
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प्रश्न 9.
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर क्लोरीन के औसत परमाणु द्रव्यमान का परिकलन कीजिए-
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उत्तर
क्लोरीन का औसत परमाणु द्रव्यमान
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प्रश्न 10.
एथेन (C2H6) के तीन मोलों में निम्नलिखित का परिकलन कीजिए-
(i) कार्बन परमाणुओं के मोलों की संख्या
(ii) हाइड्रोजन परमाणुओं के मोलों की संख्या
(iii) एथेन के अणुओं की संख्या।
उत्तर

  1. 1 मोल एथेन में कार्बन परमाणुओं के 2 मोल हैं।
    ∴ 3 मोल एथेन में उपस्थित कार्बन परमाणुओं के मोलों की संख्या = 3×2=6
  2.  1 मोल एथेन में हाइड्रोजन परमाणुओं के 6 मोल हैं।
    ∴ 3 मोल एथेन में उपस्थित हाइड्रोजन परमाणुओं के मोलों की संख्या =3×6=18
  3. 1 मोल एथेन में उपस्थित अणु = 6.022×1023 (आवोगाद्रो संख्या)
    ∴ 3 मोल एथेन में उपस्थित अणुओं की संख्या = 3x 6.022x 1023 = 18.066×1023

प्रश्न 11.
यदि 20 g चीनी (C2H22O11) को जल की पर्याप्त मात्रा में घोलने पर उसका आयतन 2L हो जाए तो चीनी के इस विलयन की सान्द्रता क्या होगी?
उत्तर
चीनी का मोलर द्रव्यमान = (12×12)+ (1×22) + (11×16) = 342 g mol-1
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प्रश्न 12.
यदि मेथेनॉल का घनत्व 0.793 kgL-1हो तो इसके 0.25 M के 2.5L विलयन को बनाने के लिए कितने आयतन की आवश्यकता होगी?
उत्तर
मेथेनॉल का मोलर द्रव्यमान (CH3OH)= 32 g mol-1
दिये गये विलयन को तैयार करने के लिए आवश्यक मेथेनॉल का भार, जो निम्नवत् है-
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अतः आवश्यक मेथेनॉल प्रतिदर्श का आयतन = 25.22 mL

प्रश्न 13.
दाब को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले बल के रूप में परिभाषित किया जाता है। दाब का S.I. मात्रक पास्कल नीचे दिया गया है-
1 Pa=1Nm-2
यदि समुद्रतल पर हवा का द्रव्यमान 1034 g cm-2हो तो पास्कल में दाब का परिकलन कीजिए।
उत्तर
दाब को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले बल के रूप में परिभाषित किया गया है।
समुद्रतल पर हवा का भार = mXg = 1034×98 = 10.1332 kg ms-2
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प्रश्न 14.
द्रव्यमान का S.I. मात्रक क्या है? इसे किस प्रकार परिभाषित किया जाता है?
उत्तर
द्रव्यमान का S.I. मात्रक किलोग्राम (kg) है। पेरिस के निकट सैवरेस में 0°C पर रखी प्लैटिनम-इरीडियम मिश्र-धातु की एक विशेष छड़ अथवा टुकड़े का द्रव्यमान 1 मानक किलोग्राम माना गया है।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित पूर्व-लग्नों को उनके गुणांकों के साथ मिलाइए-
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उत्तर

  1. माइक्रो-10-6,
  2. डेका-10,
  3. मेगा–10°,
  4.  गीगा–10,
  5. फेम्टो-10-15

प्रश्न 16.
सार्थक अंकों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
उन अंकों की संख्या को, जिनके द्वारा किसी राशि को निश्चित रूप से व्यक्त किया जाता है. सार्थक अंक कहते हैं।

प्रश्न 17.
पेय जल के नमूने में क्लोरोफॉर्म, जो कैन्सरजन्य है, से अत्यधिक संदूषित पाया गया। संदूषण का स्तर 15 Ppm (द्रव्यमान के रूप में था।
(i) इसे द्रव्यमान प्रतिशतता में दर्शाइए।
(ii) जल के नमूने में क्लोरोफॉर्म की मोललता ज्ञात कीजिए।
उत्तर
(i) 15 ppm (द्रव्यमान द्वारा) का अर्थ है कि क्लोरोफॉर्म के 15 भाग (द्रव्यमान से) पानी के 106 भाग (द्रव्यमान से) में उपस्थित हैं।
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प्रश्न 18.
निम्नलिखित को वैज्ञानिक संकेतन में लिखिए-
(i) 0.0048
(ii) 234.000
(iii) 8008
(iv) 500.0
(v) 6.0012
उत्तर
(i) 4.8×10-3,
(ii) 234×105,
(iii) 8.008×103,
(iv) 5.000×102,
(v) 60012×100

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में सार्थक अंकों की संख्या बताइए-
(i) 0.0025
(ii) 208
(iii) 5005
(iv) 126,000
(v) 500.00
(vi) 2.0034
उत्तर
(i) 2,
(ii) 3,
(iii) 4,
(iv) 6,
(v) 3,
(vi) 5

प्रश्न 20.
निम्नलिखित को तीन सार्थक अंकों तक निकटित कीजिए-
(i) 34.216
(ii) 10.4107
(iii) 0.04597
(iv) 2808
उत्तर
(i) 34.2,
(ii) 10.4,
(iii) 0.0460,
(iv) 2810

प्रश्न 21.
(क) जब डाइनाइट्रोजन और डाइऑक्सीजन अभिक्रिया द्वारा भिन्न यौगिक बनाती हैं। तो निम्नलिखित आँकड़े प्राप्त होते हैं-
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ये प्रायोगिक आँकड़े रासायनिक संयोजन के किस नियम के अनुरूप हैं? बताइए।
(ख) निम्नलिखित में रिक्त स्थान को भरिए-
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उत्तर
(क) यदि नाइट्रोजन का द्रव्यमान 28 g स्थिर माना जाये तो इन चारों स्थितियों में ऑक्सीजन का द्रव्यमान क्रमशः 32 g, 64 g, 32 g और 80 g प्राप्त होता है, जो सरल पूर्ण संख्या अनुपात । 2 : 4 : 2 : 5 में हैं। अतः दिये गये आँकड़े गुणित अनुपात के नियम का पालन करते हैं।
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प्रश्न 22.
यदि प्रकाश का वेग 3.00 x 108 ms-1 हो तो 2.00 ns में प्रकाश कितनी दूरी तय करेगा?
उत्तर
तय दूरी = वेग x समय = 30×108 ms-1x200 ns
= 3.0×108 ms-1x200nsx[latex]\frac { { 10 }^{ -9 }s }{ 1ns } [/latex]= 6.00×10-1m=0.600 m

प्रश्न 23.
किसी अभिक्रिया A+B2→AB, में निम्नलिखित अभिक्रिया मिश्रणों में सीमान्त अभिकर्मक, (यदि कोई हो तो) ज्ञात कीजिए-
(i) A के 300 परमाणु + B के 200 अणु
(ii) 2 मोल A+3 मोल B
(iii) A के 100 परमाणु + B के 100 अणु
(iv) A के 5 मोल + B के 2-5 मोल
(v) A के 25 मोल+ B के 5 मोल
उत्तर

  1. दी गई अभिक्रिया के अनुसार, A + B2 → AB2 A का एक परमाणु AB के एक अणु से अभिक्रिया करता है।
    ∴ पूर्ण अभिक्रिया में A के 300 परमाणुओं के लिए, B के 300 अणुओं की आवश्यकता होगी। क्योंकि B के केवल 200 अणु उपस्थित हैं, अतः 100 अणुओं की कमी है। इस प्रकार A अधिकता में है। इसलिए B एक सीमान्त अभिकर्मक है।
  2. A के 1 मोल, B के 1 मोल से अभिक्रिया करते हैं।
    ∴ A के 2 मोल, B के 2 मोल से अभिक्रिया करेंगे B के 3 मोल उपस्थित हैं जो अधिकता में हैं। इस प्रकार A एक सीमान्त अभिकर्मक है।
  3. A के 100 परमाणु B के 100 अणुओं से पूरी तरह अभिक्रिया करेंगे। इस प्रकार दोनों प्रयुक्त हो जायेंगे। अत: इस स्थिति में कोई सीमान्त अभिकर्मक नहीं होगा।
  4. B के 2.5 मोल, A के 2.5 मोल के साथ अभिक्रिया करेंगे। इस प्रकार A अधिकता में बचा रहेगा। अतः, B एक सीमान्त अभिकर्मक है।
  5. A के 2.5 मोल B के 2.5 मोल के साथ अभिक्रिया करेंगे। इस प्रकारे B अधिकता में बचा रहेगा। अतः A एक सीमान्त अभिकर्मक है।

प्रश्न 24.
डाइनाइट्रोजन और डाइहाइड्रोजन निम्नलिखित रासायनिक समीकरण के अनुसार अमोनिया बनाती हैं-
N2(g) + 3H2(g) → 2NH3(g)
(i) यदि 2-00×103g डाइनाइट्रोजन 1-00×103 g डाइहाइड्रोजन के साथ अभिक्रिया करती है तो प्राप्त अमोनिया के द्रव्यमान का परिकलन कीजिए।
(ii) क्या दोनों में से कोई अभिकर्मक शेष बचेगा?
(iii) यदि हाँ, तो कौन-सा उसका द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर
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स्पष्ट है, डाइहाइड्रोजन अधिकता में है तथा डाइनाइट्रोजन एक सीमान्त अभिकर्मक है।
∵ 28 g डाइनाइट्रोजन से उत्पन्न अमोनिया = 34g
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(ii) डाइहाइड्रोजन शेष बचेगा।
(iii) शेष H, का द्रव्यमान = 1.00×10-3 – 428.57=571.43 g

प्रश्न 25.
0.5 मोल Na2CO3और 0.50 M Na2CO3 में क्या अन्तर है?
उत्तर
Na2CO3 का मोलर द्रव्यमान = (2×23) +12+ (3×16)= 106
0.5 मोल Na2CO3 से तात्पर्य है-
05×106= 53g Na2CO3
यह केवल द्रव्यमान को सन्दर्भित करता है।
0.50 M Na2CO3 से तात्पर्य है 0.50 मोलर, अर्थात् Na2CO3 के 53 gm 1 लीटर विलयन में उपस्थित हैं। इस प्रकार यह विलयन के सान्द्रण को बताता है।

प्रश्न 26.
यदि डाइहाइड्रोजन गैस के 10 आयतन डाइऑक्सीजन गैस के 5 आयतनों के साथ अभिक्रिया करें तो जलवाष्प के कितने आयतन प्राप्त होंगे?
उत्तर
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हाइड्रोजन (H2) के दो आयतन ऑक्सीजन (O2) के एक आयतन के साथ अभिक्रिया करके जल वाष्प (H20) के दो आयतन उत्पन्न करते हैं।

इस प्रकार H2 के 10 आयतन पूर्णत: O2, के 5 आयतन के साथ अभिक्रिया करके जलवाष्प के 10 आयतन उत्पन्न करेंगे।

प्रश्न 27.
निम्नलिखित को मूल मात्रकों में परिवर्तित कीजिए-
(i) 28.7 pm
(ii) 15.15 us
(iii) 25365 mg
उत्तर
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प्रश्न 28.
निम्नलिखित में से किसमें परमाणुओं की संख्या सबसे अधिक होगी?
(i) 1g Au(s)
(ii) 1 g Na(s)
(iii) 1g Li(s)
(iv) 1 g Cl2(g)
उत्तर
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इस प्रकार एक ग्राम लीथियम में परमाणुओं की संख्या सबसे अधिक है।

प्रश्न 29.
एथेनॉल के ऐसे जलीय विलयन की मोलरता ज्ञात कीजिए जिसमें एथेनॉल का मोल-अंश 0.040 है।
उत्तर
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इस प्रकार एक लीटर विलयन में एथेनॉल के 2.314 मोल उपस्थित हैं। अत: दिये गये विलयन की मोलरता = 2.314 M

प्रश्न 30.
एक 12c कार्बन परमाणु का ग्राम (g) में द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर
12c के एक मोल अर्थात् 6.022×1023 परमाणुओं का द्रव्यमान 12g होता है।
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प्रश्न 31.
निम्नलिखित परिकलनों के उत्तर में कितने सार्थक अंक होने चाहिए?
(i) [latex]\frac { 0.02856\times 298.15\times 0.112 }{ 0.5785 } [/latex]
(ii) 5×5.364
(iii) 0.0125 + 0.7864 + 0.0215
उत्तर
(i) न्यूनतम यथार्थ परक संख्या (0.112) में तीन सार्थक अंक हैं। अत: उत्तर में तीन सार्थक अंक होने चाहिए।
(ii) पाँच पूर्ण संख्या हैं। दूसरी संख्या अर्थात् 5.364 में 4 सार्थक अंक है। अत: उत्तर में चार सार्थक अंक होने चाहिए।
(iii) उत्तर में चार सार्थक अंक होने चाहिए क्योंकि दशमलव स्थानों की न्यूनतम संख्या 4 है।

प्रश्न 32.
प्रकृति में उपलब्ध ऑर्गन के मोलर द्रव्यमान की गणना के लिए निम्नलिखित तालिका में-
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उत्तर
ऑर्गन का औसत मोलर द्रव्यमान
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प्रश्न 33.
निम्नलिखित में से प्रत्येक में परमाणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए-
(i) 52 मोल Ar
(ii) 52u He
(iii) 52 g He
उत्तर
(i) ऑर्गन का 1 मोल = 6.022×1023परमाणु
∴ ऑर्गन के 52 मोल = 52x 6.022×1023 परमाणु = 3.131×1025 परमाणु
(ii) He के 4u = He का एक परमाणु
∴ He के 52u = [latex]\frac { 52 }{ 4 } [/latex] = 13 परमाणु
(iii) He के एक मोल अर्थात् इसके 4 g में 6.022×103 परमाणु उपस्थित होते हैं।
अतः 52 g He में उपस्थित परमाणुओं की संख्या = [latex]\frac { 6.022\times { 10 }^{ 23 } }{ 4 } \times 52[/latex]
= 3.131×1025 परमाणु

प्रश्न 34.
एक वेल्डिंग ईंधन गैस में केवल कार्बन और हाइड्रोजन उपस्थित हैं। इसके नमूने की कुछ मात्रा ऑक्सीजन से जलाने पर 3.38 g कार्बन डाइऑक्साइड, 0.690 g जल के अतिरिक्त और कोई उत्पाद नहीं बनाती। इस गैस के 10.0L (STP पर मापित) आयतन का द्रव्यमान 11.69 g पाया गया। इसके-
(i) मूलानुपाती सूत्र
(ii) अणु द्रव्यमान और
(iii) अणुसूत्र की गणना कीजिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-27

प्रश्न 35.
CaCO3 जलीय HCI के साथ निम्नलिखित अभिक्रिया कर CaCI2 और C02 बनाता है।
CaC03(s) + 2HCI(g) → CaCl2(aq) + C02(g) + H2O(l) 0.75 M-HCI के 25 mL के साथ पूर्णतः अभिक्रिया करने के लिए CaCO3 की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी?
उत्तर
विलयन की मोलरता (M) निम्न सम्बन्ध से प्राप्त की जा सकती है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-28

प्रश्न 36.
प्रयोगशाला में क्लोरीन का विरचन मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) की जलीय HCI विलयन के साथ अभिक्रिया द्वारा निम्नलिखित समीकरण के अनुसार किया जाता है| 4HCI(aq) + MnO2(s) → 2H20(l) + MnCl2(aq) + Cl2(g)
5.0 g मैंगनीज डाइऑक्साइड के साथ HCI के कितने ग्राम अभिक्रिया करेंगे?
उत्तर
दी गई समीकरण निम्नवत् है-
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जल तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड निम्नलिखित में कौन-सा नियम दर्शाते हैं?
(i) स्थिर अनुपात का नियम
(ii) व्युत्क्रमानुपाती नियम ।
(iii) रासायनिक तुल्यता का नियम
(iv) गुणित अनुपात का नियम
उत्तर
(iv) गुणित अनुपात का नियम

प्रश्न 2.
आवोगाद्रो संख्या अणुओं की वह संख्या है जो उपस्थित रहती है।
(i) NTP पर 22.4 ली गैस में
(ii) किसी पदार्थ के 1 मोल में
(iii) पदार्थ के 1 ग्राम अणुभार
(iv) ये सभी
उत्तर
(iv) ये सभी

प्रश्न 3.
1 परमाण्विक द्रव्यमान इकाई (amu) का मान होता है।
(i)127 MeV
(ii) 9310 MeV
(iii) 931 MeV
(iv) 937 MeV
उत्तर
(iii) 931 Mev

प्रश्न 4.
1.12 लीटर नाइट्रोजन का STP पर लगभग द्रव्यमान है।
(i) 0.7 ग्राम
(ii) 2.8 ग्राम
(iii) 1.4 ग्राम
(iv) 3.0 ग्राम
उत्तर
(iii) 1.4 ग्राम

प्रश्न 5.
ऑक्सीजन के एक परमाणु का भार होगा
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उत्तर
(ii) [latex]\frac { 16 }{ 6.023\times { 10 }^{ 23 } } [/latex] ग्राम

प्रश्न 6.
किसी गैस के 0.1 ग्राम का NTP पर आयतन 28 मिली है। इस गैस का अणुभार है
(i) 56
(ii) 40
(iii) 80
(iv) 60
उत्तर
(iii) 80

प्रश्न 7.
7.1 ग्राम क्लोरीन गैस में क्लोरीन के मोलों की संख्या है।
(i) 0.01
(ii) 0.1
(iii) 0.05
(iv) 0.5
उत्तर
(ii) 0.1

प्रश्न 8.
निम्न में से सबसे अधिक नाइंट्रोजन परमाणुओं की संख्या किसमें है?
(i) NH4CI का 1 मोल,
(ii) 2M NH3 का 500 मिली।
(iii) NO2 के 6023 X 1023 अणु
(iv) NTP पर 22.4 लीटर N2 गैस
उत्तर
(iv) NTP पर 22.4 लीटर N2 गैस

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में अधिकतम अणुओं की संख्या किसमें है?
(i) 44 ग्राम CO2 में
(ii) 48 ग्राम O3 में
(iii) 8 ग्राम H2 में
(iv) 64 ग्राम SO2 में
उत्तर
(iii) 8 ग्राम H2 में

प्रश्न 10.
अणुओं की संख्या सर्वाधिक है।
(i) STP पर 15 लीटर H2 गैस में
(ii) STP पर 5 लीटर N2 गैस में
(iii) 0.5 ग्राम H2 गैस में,
(iv) 10 ग्राम O2 गैस में
उत्तर
(i) STP पर 15 लीटर H2 गैस में

प्रश्न 11.
10 M-HCI के 100 मिली को 10 M- Na2CO3 के 75 मिली के साथ मिलाया गया।
परिणामी विलयन होगा
(i) अम्लीय
(ii) क्षारीय
(iii) उभयधर्मी
(iv) उदासीन
उत्तर
(ii) क्षारीय

प्रश्न 12.
पानी में H :0 को भारात्मक अनुपात है।
(i) 1:1
(ii) 1:2
(iii) 1 : 8
(iv) 1: 16
उत्तर
(iii) 1 : 18

प्रश्न 13.
आसुत (distilled) जल की मोलरता है
(i) 55.56
(ii) 18.00
(iii) 49.87
(iv) 81.00
उत्तर
(i) 55.56

प्रश्न 14.
यूरिया के जलीय विलयन की मोललता 4.44 मोल/किग्रा है। विलयन में यूरिया का मोल प्रभाज है।
(i) 0.074
(ii) 0.00133
(iii) 0.008
(iv) 0.0044
उत्तर
(i) 0.074

प्रश्न 15.
H3PO4 के 1 M विलयन की नॉर्मलता है।
(i) 0.5 N
(ii) 1N
(iii) 2 N
(iv) 3 N
उत्तर
(iv) 3 N

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दो तत्वों के नाम लिखिए जो उपधातुओं के रूप में कार्य करते हैं।
उत्तर
आर्सेनिक व ऐण्टीमनी।

प्रश्न 2.
सेल्सियस तथा फारेनहाइट में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर
सेल्सियस तथा फारेनहाइट में सम्बन्ध इस प्रकार है : °F = [latex]\frac { 9 }{ 5 } [/latex](°C)+32

प्रश्न 3.
स्थिर अनुपात का नियम किस वैज्ञानिक ने दिया था?
उत्तर
स्थिर अनुपात का नियम फ्रांसीसी रसायनज्ञ जोसफ प्राउस्ट ने सन् 1779 में दिया था।

प्रश्न 4.
कौन-सा नियम गैसीय अभिकारकों तथा गैसीय उत्पादों के अनुपात से सम्बन्धित है?
उत्तर
गै-लुसैक का नियम गैसीय अभिकारकों तथा गैसीय उत्पादों के अनुपात से सम्बन्धित है।

प्रश्न 5.
1 मोल पदार्थ को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
मोल पदार्थ की मात्रा का मात्रक है। 1 मोल पदार्थ की वह मात्रा है जिसमें उतने ही मूल कण होते हैं जितने की 0.012 किग्रा कार्बन-12 में परमाणु होते हैं।

प्रश्न 6.
CaCO3 के 20 ग्राम में मोलों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-31

प्रश्न 7.
4.4 ग्राम CO2 में ऑक्सीजन परमाणुओं की संख्या क्या होगी?
उत्तर
4.4 ग्राम CO2 में मोलों की संख्या = [latex]\frac { 4.4 }{ 44 } [/latex] = 0.1 मोल
0.1 मोल CO2 में ऑक्सीजन परमाणुओं की संख्या
= 01x2xN = 01x2x 6023×1023
=1.2046×1023

प्रश्न 8.
C12 के 12 ग्राम में परमाणुओं की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर
C12 के मोलों की संख्या =[latex]\frac { 12 }{ 12 } [/latex]=1 मोल
अतः 1 मोल C12 में परमाणुओं की संख्या = 6.023×1023 C12 परमाणु

प्रश्न 9.
CaCl2.2H2O का प्रतिशत संघटन निकालिए।
[Ca = 40, CI= 35.5, H = 1, 0 = 16]
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-32

प्रश्न 10.
मूलानुपाती सूत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
वह सूत्र जो किसी यौगिक के अणु में उपस्थित विभिन्न परमाणुओं के सरलतम पूर्ण संख्या अनुपात को दर्शाता है, यौगिक का मूलानुपाती सूत्र कहलाता है।

प्रश्न 11.
मूलानुपाती सूत्र तथा आणविक सूत्र में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर
आणविक सूत्र = nx मूलानुपाती सूत्र (जहाँ ॥ = 1, 2, 3, 4, 5,……..)

प्रश्न 12.
स्टॉइकियोमीट्रिक (रससमीकरणमिती) गुणांक क्या है?
2KCIO3 → 2KCl+3O2
अभिक्रिया के लिए स्टॉइकियोमीट्रिक गुणांक लिखिए।
उत्तर
स्टॉइकियोमीट्रिक गुणांक सन्तुलित रासायनिक समीकरण में अभिकारकों तथा उत्पादों के मोलों की संख्या को स्टॉइकियोमीट्रिक गुणांक कहते हैं।

2KCIO3 → 2KCl+3O2

उपर्युक्त अभिक्रिया में KCIO3 के 2 मोल गर्म करने पर 2 मोल KCI तथा 3 मोल 0, उत्पन्न हो रहा है। अतः उपर्युक्त अभिक्रिया का स्टॉइकियोमीट्रिक गुणांक 2, 2 व 3 है।

प्रश्न 13.
स्टॉइकियोमीट्रिक तथा अन-स्टॉइकियोमीट्रिक यौगिकों में अन्तर बताइए।
उत्तर
वे यौगिक जिनमें विद्यमान तत्वों का संघटन निश्चित होता है, स्टॉइकियोमीट्रिक कहलाते हैं; जैसे-H20, NH3 CH4, CO2 आदि। जबकि वे यौगिक जिनमें विद्यमान तत्वों का संघटन संयोग करने वाले अवयवों की संयोजकताओं के अनुरूप नहीं होता है तथा परिवर्तनीय होता है, जैसे-अन-स्टॉइकियोमीट्रिक कहलाते हैं; Fe0.98O, Cu1.7S आदि।

प्रश्न 14.
रासायनिक अभिक्रिया की परिभाषा एवं प्रकार लिखिए।
उत्तर
रासायनिक अभिक्रिया रसायन विज्ञान में विभिन्न रसायनों की एक-दूसरे से होने वाली अभिक्रिया रासायनिक अभिक्रिया कहलाती है। किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेने वाले पदार्थों को अभिकारक तथा उस अभिक्रिया में बनने वाले पदार्थों को उत्पाद कहते हैं। रासायनिक अभिक्रियाएँ मुख्यतः निम्न प्रकार की होती हैं।

  1. अम्ल-क्षार अभिक्रियाएँ
  2. ऑक्सीकारक-अपचयन अभिक्रियाएँ
  3. अवक्षेपण अभिक्रियाएँ

प्रश्न 15.
मोल प्रभाज को संक्षेप में परिभाषित कीजिए।
उत्तर
मोल प्रभाज “विलयन में उपस्थित किसी एक अवयव का मोल प्रभाज उस विलयन में उपस्थित उस अवंयव के मोलों (ग्राम-अणुओं) की संख्या तथा विलयन में उपस्थित इन सभी अवयवों के मोलों की कुल संख्या का अनुपात होता है।”
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-33

[नोट : विलयन में उपस्थित सभी अवयवों के मोल प्रभाज का योग सदैव एक होता है तथा अवयवों के मोल प्रभाज ताप परिवर्तन पर अपरिवर्तित रहते हैं।

प्रश्न 16.
विलयन की मोलरता क्या व्यक्त करती है?
उत्तर
किसी विलयन के एक लीटर आयतन में उपस्थित विलेय पदार्थ के मोलों की संख्या को उस विलयन की मोलरता कहते हैं। इस प्रकार यह विलयन के प्रति लीटर में विलेय की सान्द्रता व्यक्त करती है।

प्रश्न 17.
मोललता की परिभाषा लिखिए तथा इसकी इकाई भी बताइए।
उत्तर
किसी विलायक के 1 किग्रा में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या मोललता कहलाती है। इसे m से निरूपित करते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-34
इसकी इकाई (मात्रक) मोल/किग्रा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित को परिभाषित कीजिए
(i) द्रव्य,
(ii) तत्त्व,
(iii) यौगिक,
(iv) मिश्रण,
(v) परमाणु तथा
(vi) अणु
उत्तर

  1. द्रव्य-वह पदार्थ जो स्थान घेरता है, जिसमें भार होता है तथा जिसका ज्ञान हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कर सकते हैं, द्रव्य कहलाता है।
  2. तत्त्व-ऐसे द्रव्य जिनको किसी भी विधि द्वारा दो या दो से अधिक विभिन्न द्रव्यों में अपघटित न किया जा सके, तत्त्व कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-लोहा, ताँबा, चाँदी आदि।
  3. यौगिक–शुद्ध समांगी द्रव्य (पदार्थ) जो दो या दो से अधिक तत्त्वों के निश्चित अनुपात में पारस्परिक रासायनिक संयोग से बनता है, यौगिक कहलाता है। उदाहरणार्थ-सोडियम क्लोराइड, चीनी, जल आदि।
  4.  मिश्रण–वे द्रव्य जो दो या दो से अधिक पदार्थों (तत्त्वों अथवा यौगिकों) को किसी भी अनुपात में मिला देने पर बनते हैं, मिश्रण कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-चीनी और रेत का मिश्रण, चीनी का जल में मिश्रण आदि।
  5. परमाणु-तत्त्व का वह सूक्ष्मतम कण जो रासायनिक अभिक्रिया में भाग ले सकता है, परमाणु कहलाता है।
  6. अणु-किसी पदार्थ (तत्त्व अथवा यौगिक) का वह सूक्ष्मतम कण जो स्वतन्त्र रूप में रह सकता है, अणु कहलाता है।

प्रश्न 2.
मिश्रण और यौगिक में अन्तर बताइए।
उत्तर
मिश्रण और यौगिक में अन्तर निम्नलिखित हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-35
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-36

प्रश्न 3.
द्रव्य की कणिक प्रकृति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
हम जानते हैं कि सभी भौतिक वस्तुएँ द्रव्य से बनी हुई हैं परन्तु द्रव्य किससे बना हुआ है? इस प्रश्न का उत्तर मानव प्राचीनकाल से ही खोजता आया है। ईसा से 500 वर्ष पूर्व भारतीय महर्षि कणाद ने यह विचार व्यक्त किया था कि द्रव्य असतत हैं अर्थात् द्रव्य अतिसूक्ष्म अभिकारक कणों से बना हुआ है। ईसा से पूर्व पाँचवीं शताब्दी में यूनानी दार्शनिक डेमोक्रेटस ने तथा ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी में रोम के दार्शनिक ल्यूक्रिटस ने भी यही विचार व्यक्त किये थे कि द्रव्य अतिसूक्ष्म अविभाज्य कणों से बना हुआ है। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि द्रव्य की प्रकृति कणिक होती है। 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में भी कुछ रसायनशास्त्रियों ने द्रव्य की कणिक प्रकृति सम्बन्धी परिकल्पनाएँ दी। परन्तु 19 वीं शताब्दी से पूर्व तक द्रव्य की रचना के सम्बन्ध में व्यक्त किये गये विचार केवल सपना मात्र थे। सन् 1803 में जॉन डॉल्टन ने सर्वप्रथम परमाणु परिकल्पना के आधार पर द्रव्य की कणिक प्रकृति को सिद्ध किया। अभी यह परमाणु परिकल्पना प्रयोगों और प्रेक्षणों के परिणामों पर आधारित थी। इस प्रकार सिद्ध हुआ कि द्रव्य की प्रकृति कृणिक होती है अर्थात् यह अविन्यास कणों (परमाणुओं) से निर्मित होता है।

प्रश्न 4.
S.I. पद्धति के मूल मात्रक कौन-कौन से हैं? ये किन भौतिक राशियों से सम्बन्धित हैं?
उत्तर
S.I. पद्धति के मूल मात्रक, उनसे संम्बन्धित भौतिक राशियों तथा उनके प्रतीकों को निम्नांकित सारणी में दर्शाया गया है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-37

प्रश्न 5.
द्रव्यमान संरक्षण का नियम क्या है? एक प्रयोग द्वारा दर्शाइए कि रासायनिक परिवर्तन के लिए भी यह नियम सत्य है।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, “किसी रासायनिक अथवा भौतिक परिवर्तन में, उत्पादों का कुल द्रव्यमान अभिकारकों के कुल द्रव्यमान के बराबर होता है। प्रयोग जब 100 ग्राम मरक्यूरिक ऑक्साइड को एक बन्द नली में लेकर गर्म किया जाता है तो 92.6 ग्राम मरक्यूरी और 7.4 ग्राम ऑक्सीजन प्राप्त होती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-38

यहाँ उत्पादों का कुल द्रव्यमान (92.6 ग्राम + 7.4 ग्राम = 100 ग्राम) अभिकारक के द्रव्यमान (100 ग्राम) के बराबर है।।

प्रश्न 6.
स्थिर अनुपात के नियम को एक उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, “एक रासायनिक यौगिक में एक ही प्रकार के तत्त्व भारानुसार एक निश्चित अनुपात में जुड़े रहते हैं।’ उदाहरणार्थ— कार्बन डाइऑक्साइड किसी भी विधि से बनाई जाए (वायु में कोयले को गर्म करके, सोडियम बाइकार्बोनेट को गर्म करके अथवा कैल्सियम कार्बोनेट को गर्म करके) उसमें सदैव 1 कार्बन परमाणु और 2 ऑक्सीजन परमाणु होते हैं तथा ये दोनों सदैव भारानुसार 12 : 32 अथवा 3: 8 के अनुपात में जुड़े रहते हैं।

प्रश्न 7.
गुणित अनुपात के नियम को एक उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, “जब दो तत्त्वे परस्पर संयोग करके एक से अधिक यौगिक बनाते हैं, तब उनमें एक तत्त्व के विभिन्न भार जो दूसरे तत्त्व के एक निश्चित भार से संयोग करते हैं परस्पर सरल अनुपात में होते हैं। उदाहरणार्थ-सल्फर, ऑक्सीजन के साथ संयोग करके दो यौगिक सल्फर डाइऑक्साइड और सल्फर ट्राइऑक्साइड बनाता है। सल्फर डाइऑक्साइड में सल्फर के 32 भाग, ऑक्सीजन के 32 भागों (भारानुसार) से संयोग करते हैं जबकि सल्फर ट्राइऑक्साइड में सल्फर के 32 भाग ऑक्सीजन के 48 भागों (भारानुसार) से संयोग करते हैं। ऑक्सीजन के विभिन्न भारों, जो सल्फर के निश्चित भार (32 भाग) से संयोग करते हैं, का अनुपात 32:48 अथवा 2:3 हैं जो कि एक सरल अनुपात हैं।

प्रश्न 8.
व्युत्क्रम अनुपात के नियम को एक उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, “जब दो तत्त्व किसी तीसरे तत्त्व के निश्चित भार से संयोग करते हैं, तो उनके भारों का अनुपात या तो वही रहता है या उन भारों के अनुपात का अपवर्त्य होता है जिसमें वे आपस में संयोग करते हैं। उदाहरणार्थ-कार्बन, सल्फर और ऑक्सीजन तीन तत्त्व हैं। कार्बन और सल्फर ऑक्सीजन से अलग-अलग संयोग करके क्रमशः कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड बनाते हैं। सल्फर और कार्बन आपस में संयोग करके कार्बन डाइसल्फाइड बनाते हैं। कांर्बन डाइऑक्साइड (CO, ) में कार्बन के 12 भाग ऑक्सीजन के 32 भागों से संयोग (भारानुसार) करते हैं जबकि सल्फर डाइऑक्साइड (SO,) में सल्फर के 32 भाग ऑक्सीजन के 32 भागों से संयोग (भारानुसार) करते हैं। अब ऑक्सीजन के निश्चित भार (32 भाग) से संयोग करने वाले कार्बन और सल्फर के भारों में अनुपात 12 : 32 अथवा 3 : 8 कार्बन डाइसल्फाइड (Cs,) में कार्बन के 12 भाग सल्फर के 64 भागों से संयोग (भारानुसार) करते हैं। CS, में कार्बन और सल्फर के भारों में अनुपात 12:64 अथवा 3 : 16

ऊपर दिए गए अनुपातों में अनुपात [latex]\frac { 3 }{ 8 } :\frac { 3 }{ 16 } [/latex] अथवा 2 : 1.

अत: ऑक्सीजन के निश्चित भार के साथ संयोग करने वाले कार्बन और सल्फर के भारों में अनुपात, भारों के उस अनुपात का सरल अपवर्त्य होता है जिसमें कार्बन और सल्फर आपस में संयोग करते हैं। इस प्रकार यह उदाहरण व्युत्क्रम अनुपात के नियम की पुष्टि करता है।

प्रश्न 9.
गै-लुसैक के नियम को एक उदाहरण द्वारा समझाइए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, “जब दो गैसें परस्पर संयोग या रासायनिक अभिक्रिया करती हैं, तो समान ताप व दाब पर अभिकारक तथा उत्पाद गैसों के आयतन सरल अनुपात में होते हैं।’
उदाहरणार्थ -एक आयतन हाइड्रोजन (H2), एक आयतन क्लोरीन (Cl2) के साथ संयोग करके 2 आयतन हाइड्रोजन क्लोराइड गैस (HCI) देती है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-39
अत: अभिकारक तथा उत्पाद गैसों का अनुपात 1: 1 : 2 है।

प्रश्न 10.
42.47 ग्राम सिल्वर नाइट्रेट प्रति लीटर वाले विलयन के 10 मिली से कितने ग्राम सिल्वर क्लोराइड प्राप्त होगी? (Ag = 108, N=14, 0 = 16, Cl= 35.5, H = 1)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-40

प्रश्न 11.
सामान्य ताप एवं दाब पर 2.4 लीटर ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए कितना KCIO3 आवश्यक है? (K= 39, Cl= 35.5)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-41

प्रश्न 12.
1.7 ग्राम अमोनिया (अणुभार = 17) में मोलों और अणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-42

प्रश्न 13.
1 ग्राम हीलियम (He) में परमाणुओं की संख्या और NTP पर आयतन की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-43

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव जीवन में रसायन विज्ञान के महत्व एवं विस्तार का वर्णन कीजिए।
उत्तर
आधुनिक जीवन में रसायन विज्ञान का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह लगभग सभी क्षेत्रों में मानव-समाज की सेवा कर रहा है और मानव जीवन को सुखी, स्वस्थ, सुरक्षित एवं समृद्ध बना रहा है। राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था में भी रसायन विज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान है। देश की विकास योजनाओं की सफलत बहुत कुछ रसायन-विज्ञान के अनुप्रयोग पर निर्भर करती है। सभी लघु और बड़े उद्योगों में रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। अम्ल, क्षार और लवणों का उपयोग धातु-निष्कर्षण, धातु-शोधन, पेट्रोलियम शोधन तथा काँच, साबुन, कागज, कपड़ा, उर्वरक, विस्फोटक, रंजक, औषधियों आदि के उत्पादन में होता है। सल्फ्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, अमोनिया, कॉस्टिक सोडा और क्लोरीन उद्योगों के स्तम्भ हैं। लोहा, ताँबा, ऐलुमिनियम, जिंक, निकिल आदि धातुओं, पीतल तथा स्टील अनेक प्रकार की मिश्र-धातुओं का उपयोग उद्योग-धन्धों और दैनिक जीवन की अनेकों वस्तुएँ बनाने में होता है। प्लास्टिक, टेफ्लॉन, पॉलिथीन, कृत्रिम रबर व अन्य बउत्तरकों से अनेक प्रकार की उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। कृत्रिम रेशम, ऊन तथा धागों से वस्त्र बनाए जाते हैं। कीटनाशी, पीड़कनाशी आदि रसायन फसल की रक्षा करते हैं। औषधियाँ स्वास्थ्य तथा जीवन की रक्षा करती हैं। तेल, वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लवण और विटामिन हमारे भोजन के आवश्यक अंग हैं। संक्षेप में रसायन विज्ञान के महत्त्व को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 1 Some Basic Concepts of Chemistry img-44

प्रश्न 2.
डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त क्या है? इसके प्रमुख बिन्दु लिखिए। इसके दोषों का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर
डोल्टन का परमाणु सिद्धान्त-एक अंग्रेज अध्यापक जॉन डाल्टन ने सन् 1808 में द्रव्य की रचना के सम्बन्ध में एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसे डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त कहते हैं। इस परमाणु सिद्धान्त के प्रमुख बिन्दु निम्नवत् हैं-

  1. द्रव्य अत्यन्त सूक्ष्म अविभाज्य कणों का बना होता है जिन्हें परमाणु (atoms) कहते हैं।
  2. एक ही तत्त्व के परमाणु सभी प्रकार से समान होते हैं अर्थात् उनका भार, आकृति आदि समान होते हैं।
  3. विभिन्न तत्त्वों के परमाणुओं के आकार, भार, रासायनिक गुण आदि भिन्न-भिन्न होते हैं।
  4. परमाणु न तो नष्ट किए जा सकते हैं और न ही उत्पन्न अर्थात् ये अविनाशी होते हैं।
  5. एक परमाणु वह सूक्ष्मतम कण है जो रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेता है अर्थात् पूर्ण परमाणु न कि उनके भिन्न (fractions) रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेते हैं।
  6. एक ही अथवा विभिन्न तत्त्वों के परमाणु संयुक्त होकर यौगिक परमाणु (compound atoms) बनाते हैं जिन्हें अब अणु (molecules) कहा जाता है।
  7. जब परमाणु संयुक्त होकर यौगिक परमाणु बनाते हैं तो उनकी संख्याओं में सरल पूर्ण संख्या अनुपात (1 : 1, 1 : 2, 2 : 1, 2: 3) होता है।
  8. दो तत्त्वों के परमाणु विभिन्न अनुपातों में संयोग करके एक से अधिक यौगिक बना सकते हैं।
    उदाहरणार्थ-सल्फर ऑक्सीजन से संयोग करके सल्फर डाइऑक्साइड (SO,) और सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO) बनाता है जिनमें सल्फर और ऑक्सीजन का अनुपात क्रमशः 1:2 और 1: 3 होता है।
  9. परमाणु रासायनिक परिवर्तन में अपनी निजी सत्ता (individuality) बनाए रखते हैं।

डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त के दोष
डाल्टन के परमाणु सिद्धान्तं ने द्रव्य की आंतरिक रचना के बारे में काफी सटीक और सही जानकारी दी। साथ ही उससे रासायनिक संयोजन के नियमों की भी सही व्याख्या हुई परन्तु इस सिद्धान्त के कुछ दोष भी पाए गए जो निम्नवत् हैं-

  1. यह बता नहीं सका कि विभिन्न तत्त्वों के परमाणु किस प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होते हैं अर्थात् उसने परमाणु की आंतरिक संरचना के बारे में कुछ नहीं बताया।
  2. यह गे-लुसैक के गैसीय आयतन के नियम की व्याख्या करने में असफल रहा।
  3. यह स्पष्ट नहीं कर सका कि परमाणु क्यों और कैसे जुड़कर यौगिक परमाणु बनाते हैं।
  4. यह अणु में परमाणुओं को बाँधे रखने वाले बल की प्रकृति के विषय में कुछ नहीं बता सका।
  5. यह अभिक्रिया में भाग लेने वाले तत्त्व के मूल कण (परमाणु) और स्वतन्त्र अवस्था में पाए जा सकने वाले मूल कण (अणु) में विभेद नहीं कर सका।

Grams to moles calculator is the best mole weight calculator.

प्रश्न 3.
मोल संकल्पना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
परमाणुओं के निरपेक्ष द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए यह अनिवार्य है कि हमें पदार्थ की निश्चित मात्रा में उपस्थित परमाणुओं अथवा अणुओं की संख्या ज्ञात हो। अध्ययन से यह पता चला है कि किसी भी तत्त्व के एक ग्राम परमाणु में समान संख्या में परमाणु होते हैं। इसी प्रकार किसी भी पदार्थ के एक ग्राम अणु में समान संख्या में अणु होते हैं। प्रयोगों द्वारा यह संख्या 6023×1023 ज्ञात हुई है। इस संख्या को ‘आवोगाद्रो संख्या’ या ‘आवोगाद्रो स्थिरांक’ कहते हैं तथा इसे NA द्वारा प्रदर्शित करते। हैं। किसी पदार्थ की वह मात्रा जिसमें 6023×1023 तात्विक कण पाये जाते हैं, एक मोल (mole) कहलाती है। दूसरे शब्दों में, एक मोल पदार्थ की वह मात्रा है जिसमें उतने ही तात्विक कण पाये जाते हैं जितने कि कार्बन-12 के 12 g(0.012 kg) में होते हैं। ‘मोल’ पद का प्रयोग परमाणु, अणु, आयन, इलेक्ट्रॉन आदि किसी के लिए भी किया जा सकता है। मोल परमाणुओं, अणुओं, आयनों आदि को गिनने का एक मात्रक है। जिस प्रकार एक दर्जन का तात्पर्य 12 वस्तुओं और एक स्कोर का तात्पर्य 20 वस्तुओं से है, ठीक उसी प्रकार मोल का तात्पर्य 6023×1023 कणों से है। इसका कणों की प्रकृति से कोई सम्बन्ध नहीं है।
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किसी पदार्थ के एक मोल के ग्राम में व्यक्त द्रव्यमान को उसका मोलर द्रव्यमान (molar mass) कहते हैं। परमाणुओं की स्थिति में यह ग्राम परमाणु द्रव्यमान (gram atomic mass) और अणुओं की स्थिति में यह ग्राम आणविक द्रव्यमान (gram molecular mass) के समान होता है। इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि किसी तत्त्व के 6023×1023 परमाणुओं का ग्राम में व्यक्त द्रव्यमान उसके ग्राम परमाणु द्रव्यमान अथवा एक ग्राम परमाणु के समान होता है। इसी प्रकार किसी तत्त्व अथवा यौगिक के 6023×1023 अणुओं का ग्राम में व्यक्त द्रव्यमान उसके ग्राम आणविक द्रव्यमान अथवा एक ग्राम अणु के समान होता है।

उदाहरणार्थ-6023×1023 ऑक्सीजन परमाणुओं का द्रव्यमान = 16 g
6023×1023 ऑक्सीजन अणुओं का द्रव्यमान = 32 g
6023×1023 जल अणुओं का द्रव्यमान = 18 g

यदि पदार्थ परमाणवीय (atomic) है तो मोलर द्रव्यमान 6023×1023 (आवोगाद्रो संख्या) परमाणुओं को द्रव्यमान होता है। ऐसे में हम मोलर द्रव्यमान को आवोगाद्रो संख्या से भाग देकर एक परमाणु का निरपेक्ष द्रव्यमान (absolute mass) ज्ञात कर सकते हैं। इसी प्रकार हम आणविक पदार्थों के एक अणु का निरपेक्ष द्रव्यमान भी ज्ञात कर सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 1 भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?

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Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 1 भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

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साहित्य में स्थान:
नि:सन्देह हिन्दी-साहित्याकाश के प्रभामण्डित इन्दु भारतेन्दु जी हिन्दी गद्य-साहित्य के जन्मदाता थे। आज भी साहित्य का यह इन्दु अपनी रचना-सम्पदा के माध्यम से हिन्दी-साहित्य गगन से अमृत-वृष्टि कर रहा है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 7 सड़क सुरक्षा एवं यातायात साधन

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 7 सड़क सुरक्षा एवं यातायात साधन (केवल पढ़ने के लिए)

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 22 Emotional Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 22
Chapter Name Emotional Development (संवेगात्मक विकास)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 22 Emotional Development (संवेगात्मक विकास)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संवेग का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। संवेगों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

संवेग का अर्थ
(Meaning of Emotion)

‘संवेग’ को अंग्रेजी में ‘Emotion’ कहते हैं। Emotion शब्द ‘Emovre’ से बना है, जिसका अर्थ है-उत्तेजित होना’। इस प्रकार संवेग की स्थिति में व्यक्ति उत्तेजित हो जाता है और उसका व्यवहार असामान्य हो जाता है। संवेग व्यक्ति के वैयक्तिक तथा आन्तरिक अनुभव हैं। प्रत्येक व्यक्ति सुख, दु:ख, पीड़ा तथा क्रोध का अनुभव करता है। जब तक ये अनुभव अपने साधारण रूप में रहते हैं, तब इन्हें राग या भाव (feeling) कहा जाता है, परन्तु जब किसी विशेष कारण या घटना से राग या भाव उग्र रूप धारण कर लेते हैं, तो उन्हें संवेग कहा जाता है।

संवेग की परिभाषा
(Definition of Emotion)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने संवेगों को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है

1. किम्बाल यंग के अनुसार, “संवेग प्राणी की उत्तेजित, मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक दशा है, जिसमें शारीरिक क्रियाएँ तथा भावनाएँ एक निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए स्पष्ट रूप से बढ़ जाती हैं।

2. टी० पी० नन के अनुसार, संवेग सम्पूर्ण प्राणी का वह मूलत: मनोवैज्ञानिक तीव्र विघ्न डालने वाला व्यवहार है, जिसमें चेतना, अनुभूति, व्यवहार तथा अन्तरावयव की क्रियाएँ शामिल रहती हैं।”

3. वुडवर्थ के अनुसार, “संवेग, प्राणी की उत्तेजित अथवा उद्वेग अवस्था है। यह अनुभूति की उस रूप में उत्तेजित अवस्था है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अनुभव करता है। यह पेशीय तथा ग्रन्थीय क्रिया की गड़बड़ी है, जैसा कि बाहर से प्रतीत होता है।”

4. जेम्स ईवर के अनुसार, “संवेग शरीर की जटिल अवस्था है, जिसमें श्वास लेना नाड़ी, ग्रन्थियाँ, उत्तेजना, मानसिक दशा तथा अवरोध आदि का अनुभूति पर प्रभाव पड़ता है एवं मांसपेशियाँ एक विशेष व्यवहार करने लगती हैं।”

5. जर्सिल्ड के अनुसार, “संवेग शब्द किसी भी प्रकार से आवेग में आने, भड़क उठने अथवा उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।”

संवेग की विशेषताएँ (लक्षण)
(Characteristics of Emotion)

संवेग की विभिन्न परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर संवेग की निम्नांकित विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता

1. भावनाओं से सम्बन्धित- डॉ० जायसवाल के अनुसार, “संवेगों का सम्बन्ध भावनाओं और वृत्तियों से होता है। बिना भावना के संवेग सम्भव नहीं है। भावनाएँ एक प्रकार से संवेगों की पृष्ठभूमि है अथवा संवेगों के गर्भ में भावनाओं का ही बल है। वास्तव में भावात्मक प्रवृत्ति का बढ़ा हुआ रूप ही संवेग है।

2. वैयक्तिकता- संवेग की अन्य विशेषता उसका वैयक्तिक होना है। एक ही परिवेश में दो व्यक्ति भिन्न-भिन्न संवेगों का अनुभव करते हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए-एक रोती हुई महिला को देखकर एक व्यक्ति दया से द्रवित हो जाता है, तो दूसरा व्यक्ति उसे ढोंगी समझकर उससे घृणा करने लगता है।

3. तीव्रता- संवेग की अनुभूति अत्यन्त तीव्र होती है। संवेग को यदि एक प्रकार का उद्वेग कहा जाए तो अनुचित नहीं है। वे व्यक्ति की मन:स्थिति को तीव्रता के कारण अस्त-व्यस्त कर देते हैं, परन्तु इनकी तीव्रता में अन्तर भी होता है। एक शिक्षित व्यक्ति में अशिक्षित व्यक्ति की अपेक्षा संवेग की तीव्रता कम होती है, क्योंकि शिक्षित व्यक्ति अपने संवेगों पर नियन्त्रण करना सीख जाता है।

4. व्यापकता- संवेग वैयक्तिक होते हुए भी सर्वानुभूति और सर्वव्यापक होते हैं। संवेगों का अनुभव समस्त प्राणी करते हैं। स्टाउट के अनुसार, “निम्न श्रेणी के प्राणियों से लेकर उच्चतर प्राणियों तक एक ही प्रकार के संवेग पाये जाते हैं।” अन्तर केवल मात्रा का होता है। किसी को क्रोध अधिक आता है और किसी को कम।

5. स्थानान्तरण- प्रायः संवेग स्थानान्तरित हो जाते हैं। यदि कोई अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी पर क्रोधित हो जाता है और उसी दशा में यदि कर्मचारी का कोई साथी उसे छेड़ दे तो वह अपने साथी पर क्रोधित होने लगता है।

6. संवेगात्मक सम्बन्ध- संवेग का सम्बन्ध किसी व्यक्ति, वस्तु या विचार से सम्बद्ध होता है। हम किसी व्यक्ति या विचार के प्रति ही क्रोध या घृणा करते हैं। दूसरे शब्दों में, संवेग का कोई-न-कोई आधार अवश्य होता है।

7. सुख और दुःख की भावना- संवेग में किसी-न-किसी रूप में सुख या दु:ख का भाव निहित रहता है। जब हम किसी वस्तु को देखकर भयभीत होते हैं तो उसमें दु:ख का भाव निहित होता है। जब हम आशा करते हैं तो उसमें सुख की अनुभूति रहती है। स्टाउट के अनुसार, “अपनी विशेष भावना के अतिरिक्त संवेग में नि:सन्देह रूप से सुख या दु:ख की भांघना होती है।”

8. बाह्यशारीरिक परिवर्तन- संवेगात्मक अवस्था में हमारे शरीर में जो बाह्य परिवर्तन होते हैं, वे इस प्रकार हैं-भय या क्रोध में शरीर का काँपना, पसीना आना, रोंगटे खड़े होना, आँखों में लाली छाना या आँसू निकलना, प्रसन्नता में मुस्कराना या हँसना आश्चर्य के समय आँखों का खुला रह जाना।

9. आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन- संवेगात्मक अनुभूति के समय शरीर में आन्तरिक परिवर्तन भी होते हैं; जैसे-हृदय की धड़कन तीव्र होना, क्रोध की दशा में, पेट में पाचक रस निकलना बन्द होना तथा भोजन की पाचन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का अस्त-व्यस्त हो जाना।

10. व्यवहार में परिवर्तन- संवेगात्मक दशा में व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। क्रोध से ओत-प्रोत व्यक्ति का व्यवहार उसके सामान्य व्यवहार से पूर्णतया भिन्न हो जाता है।

11. मानसिक तनाव- संवेग की अवस्था में हम एक प्रकार की उत्तेजना, आवेग और मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं।

12. चिन्तन- शक्ति का लोप-संवेग के कारण हमारी चिन्तन-शक्ति का लोप हो जाता है और संवेगात्मक अवस्था में अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं रहता। उदाहरण के लिए-क्रोध के वशीभूत होकर व्यक्ति हत्या तक कर देता है।

13. स्थिरता की प्रवृत्ति- संवेग की प्रवृत्ति में स्थिरता होती है। अपने प्रिय की मृत्यु का दु:ख पर्याप्त काल तक हमारे मन में रहता है। इसी प्रकार जब हम किसी पर क्रोधित होते हैं तो पर्याप्त काल तक उसका प्रभाव हमारे मन पर छाया रहता है। उसके सामने आने पर हमारा क्रोध फिर भड़क उठता है।

14. क्रियात्मक प्रवृत्ति का होना- जिस समय हम संवेग का अनुभव करते हैं, तो उस समय कुछ-न-कुछ क्रिया अवश्य होती है। उदाहरण के लिए-जब हम कोई घृणास्पद वस्तु को देखते हैं तो तुरन्त ही हम अपना मुख उसकी ओर से फेर लेते हैं। इसी प्रकार क्रोधित होने पर हम अपने हाथ मलने या दाँत किटकिटाने लगते हैं।

प्रश्न 2
संवेगात्मक विकास से क्या आशय है? संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को उल्लेख कीजिए।
या
उन कारकों का उल्लेख कीजिए,जो संवेगात्मक विकास पर प्रभाव डालते हैं।
उत्तर:

संवेगात्मक विकास का आशय
(Meaning of Emotional Development)

शिशु जन्म के उपरान्त क्रमश: संवेगों को प्रकट करना प्रारम्भ करता है। इस प्रकार से संवेगों के क्रमश: होने वाले विकास को ही संवेगात्मक विकास कहा जाता है। संवेगात्मक विकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत व्यक्ति के संवेगों का स्वरूप क्रमश: सरल से जटिल की ओर अग्रसर होता है। संवेगात्मक विकास के अन्तर्गत ही संवेगों को नियन्त्रित करना भी सीखा जाता है। जैसे-जैसे बालक का संवेगात्मक विकास होता है, वैसे-वैसे उसके संवेगों में क्रमशः स्थिरता आने लगती है। संवेगात्मक विकास के ही परिणामस्वरूप व्यक्ति के संवेग उसकी आयु तथा सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप स्वरूप ग्रहण करते हैं। व्यक्तित्व के सुचारु विकास के लिए संवेगात्मक विकास का सामान्य होना अनिवार्य है।

संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing Emotional Development)

बालक के संवेगात्मक विकास को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं|

1.शारीरिक स्वास्थ्य- शारीरिक स्वास्थ्य का संवेगों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जो बालक सबल और स्वस्थ होते हैं, उनमें संवेगात्मक स्थिरता निर्बल और अस्वस्थ बालकों की अपेक्षा अधिक होती है। क्रो एवं क्रो के अनुसार, “बालक के स्वास्थ्य का उसकी संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।”

2. मानसिक विकास- जिन बालकों का मानसिक विकास पर्याप्त हो जाता है, उनमें संवेगात्मक स्थिरता पायी जाती है। निम्न मानसिक विकास विकास के बालक की अपेक्षा प्रतिभाशाली बालक अपने संवेगों पर सफलता से नियन्त्रण स्थापित कर लेता है।

3. थकान- थकान का संवेगात्मक विकास पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जब बालक थका हुआ होता है तो वह शीघ्र क्रोध और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाता है।

4. परिवार का वातावरण- जिस परिवार के सदस्य अत्यधिक, आर्थिक संवेदनशील होते हैं, उस परिवार के बालक भी उसी प्रकार से, संवेदनशील हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि परिवार का वातावरण उल्लासमय, सुखद तथा शान्तिपूर्ण रहता है, तो बालक पूर्ण सुरक्षा का अनुभव करता है और उसका संवेगात्मक विकास सन्तुलित रूप से होता है।

5. माता-पिता के आचरण और व्यवहार- माता-पिता के आचरण तथा व्यवहार का बालक के संवेगात्मक विकास पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। जो माता-पिता अपने बालकों की उपेक्षा करते हैं या आवश्यकता से अधिक उनको लाड़-प्यार करते हैं तथा उन्हें इच्छानुसार कार्य करने कीस्वतन्त्रता नहीं देते, उनका यह आचरण बालकों के अवांछनीय संवेगात्मक विकास में योग प्रदान करता है।

6. सामाजिक मान्यता- क्रो एवं क्रो के अनुसार, “यदि बालक को अपने कार्यों की सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं होती तो उनके संवेगात्मक व्यवहार में उत्तेजना या शिथिलता आ जाती है। उदाहरण के लिए–यदि एक बालक स्वयं करि बनाता है, परन्तु उस कविता को जन-समुदाय पसन्द नहीं करता तो बालक निराशा और कुण्ठा से ग्रसित हो जाता है।

7. आर्थिक स्थिति- आर्थिक स्थिति बालकों के संवेगों को प्रभावित करती है। एक निर्धन बालक में अनेक अवांछनीय संवेग स्थायी हो जाते हैं। धनी परिवारों के बालक की वेशभूषा तथा रहन-सहन देखकर निर्धन परिवार के बालक में द्वेष और ईर्ष्या के संवेग प्रबल रूप धारण कर लेते हैं।

8. अभिलाषा- प्रत्येक बालक कोई-न-कोई अभिलाषा रखता है। कोई महान् कवि बनना चाहता है तो । कोई डॉक्टर या इंजीनियर। परन्तु जब परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती हैं और बालक की अभिलाषाएँ पूरी नहीं हो पाती हैं, तो वह निराशा में डूब जाता है। यह निराशा संवेगात्मक तनाव की जनक होती है।

9. विद्यालय का वातावरण- परिवार के पश्चात् विद्यालय ही वह स्थान है, जो बालकों की भावनाओं को सबसे अधिक प्रभावित करता है। बालक विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से संवेगों की अभिव्यंजना करता है। यदि विद्यालय में विभिन्न क्रियाओं का आयोजन इस ढंग से किया जाता है कि बालक अपनी अभिव्यक्ति, इच्छा और रुचियों के अनुकूल कर सके, तो उन्हें आनन्द और उल्लास का अनुभव होता है। परिणामस्वरूप उनके संवेगों का स्वस्थ विकास होता है। इसके विपरीत यदि विद्यालय में आतंक, भय तथा पक्षपात का वातावरण होता है, तो बालक उत्तेजना, क्रोध तथा घृणा से ग्रसित हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शैशवावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

शैशवावस्था में संवेगात्मक विकास
(Emotional Development in Infancy)

शिशु के संवेगात्मक विकास के सम्बन्ध में स्किनर तथा हैरीमन ने लिखा है कि “शिशु का संवेगात्मक व्यवहार क्रमशः अधिक स्पष्ट और निश्चित होता जाता है। उसके व्यवहार के विकास की सामान्य दिशा अनिश्चित और अस्पष्ट से विशिष्ट की ओर होती है।” एक शिशु के संवेगात्मक विकास की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं|

  1. जन्म के समय शिशु में कोई विशेष संवेग नहीं होता। वह केवल उत्तेजना का अनुभव करता है। शिशु को रोना, चिल्लाना और हाथ-पैर पटकना उत्तेजना का परिणाम है।
  2. तीन मास का शिशु उत्तेजना के साथ-साथ कष्ट और प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है। छ: मास तक वह भय, घृणा तथा क्रोध भी प्रकट करने लग जाता है।
  3. एक वर्ष का शिशु आनन्द और स्नेहका अनुभव करने लग जाता है। दो वर्ष तक बालक के प्रायः सभी संवेग विकसित हो जाते हैं और पाँच वर्ष की आयु में बालक के संवेगों पर उसके वातावरण का प्रभाव पड़ना आरम्भ हो जाता है।
  4. शिशु का संवेगात्मक व्यवहार अत्यन्त अस्थिर होता है। यदि रोते हुए बालक को चॉकलेट दी जाए तो वह तुरन्त चुप हो जाता है। आयु के विकास के साथ-साथ शिशु के संवेगात्मक व्यवहार में स्थिरता आती जाती
  5. शिशु के संवेगों में प्रारम्भ में तीव्रता होती है धीरे-धीरे वह तीव्रता समाप्त हो जाती है।
  6. शिशु के संवेग प्रारम्भ में अस्पष्ट होते हैं, परन्तु धीरे-धीरे उनमें स्पष्टता आती जाती है।

प्रश्न 2
बाल्यावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

बाल्यावस्था में संवेगात्मक विकास
(Emotional Development in Childhood)

बाल्यावस्था में प्रवेश करते-करते बालक के संवेगों में पर्याप्त स्थिरता आ जाती है। शैशवकाल में विकसित संवेगों की अभिव्यक्ति बाल्यावस्था में ही होती है। बालक में सामूहिकता का विकास हो जाता है और वह अपने मित्रों के प्रति प्रेम, घृणा, द्वेष तथा प्रतियोगिता की भावना का प्रकटीकरण करने लग जाता है। वह शैशवकाल के समान शीघ्र उत्तेजित नहीं होता, भय और क्रोध पर वह पर्याप्त नियन्त्रण स्थापित कर लेता है। इस अवस्था में बालक के संवेगात्मक विकास पर विद्यालय के वातावरण का विशेष प्रभाव पड़ता है। जिन विद्यालयों में पर्याप्त स्वतन्त्रता तथा स्वस्थ परम्पराओं का वातावरण होता है, वहाँ बालकों का संवेगात्मक विकास उचित दिशा में होता है। इसके विपरीत दमन, आतंक तथा कठोरता के वातावरण में ऐसा नहीं होता। इस अवस्था में बालक के संवेगों में पर्याप्त शिष्टता आ जाती है। वह अपने अध्यापक तथा अभिभावकों के आगे उन संवेगों को प्रकट नहीं होने देता, जिनको वे उचित नहीं समझते।

प्रश्न 3
किशोरावस्था में होने वाले संवेगात्मक विकास का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

किशोरावस्था में संवेगात्मक विकास
(Emotional Development in Adolescence)

किशोरावस्था में संवेगों में तीव्रता से परिवर्तन होते हैं। एक किशोर के लिए अपने संवेगों पर नियन्त्रण करना अत्यन्त कठिन होता है। उसमें प्रेम, दया, क्रोध तथा सहानुभूति आदि संवेग स्थायित्व धारण कर लेते हैं। किसी को दु:खी देखकर वह अत्यन्त भावुक हो उठता है तथा अत्याचार को देखकर एकदम क्रोधित हो उठता है। इस अवस्था में किशोर न तो बालक होता है और न प्रौढ़। ऐसी दशा में उसके अपने संवेगात्मक जीवन में वातावरण से अनुकूलन करने में विशेष कठिनाई होती है। वातावरण में अनुकूलन की असफलता से उसे निराशा होती है।

यह निराशा उसे कभी घर से भागने के लिए प्रेरित करती है तो कभी आत्महत्या के लिए। इस अवस्था के किशोर-किशोरियों में काम-प्रवृत्ति का तीव्र विकास होता है, जिसके कारण उनके संवेगात्मक व्यवहार पर विशेष प्रभाव पड़ता है। वे दिवास्वप्न देखने लगते हैं तथा उनका अधिकांश समय कल्पना लोक में विचरण करने में व्यतीत होता है। प्रत्येक लड़का किसी लड़की के सम्पर्क में आकर भावुक हो उठता है। किशोर का संवेगात्मक विकास बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अनुकूल परिस्थितियाँ उसे प्रोत्साहित करती हैं तथा प्रतिकूल परिस्थितियाँ उसे निराश करती हैं।

प्रश्न 4
बालक के सुचारु संवेगात्मक विकास के लिए शिक्षक के कर्तव्यों एवं भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

बालक के संवेगात्मक विकास में शिक्षक की भूमिका
(Role of Teacher in Emotional Development of Children)

बालक के संवेगात्मक विकास में विद्यालय की महत्त्वपूर्ण भूमिका एवं योगदान होता है। विद्यालय में भी शिक्षक या अध्यापक का सर्वाधिक महत्त्व होता है। बालक के उचित संवेगात्मक विकास के लिए अध्यापक को निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए

  1. बालकों में उत्तम रुचियाँ उत्पन्न करने के लिए अध्यापक को स्वस्थ सदों का सहारा लेना चाहिए, जैसे-आशा, हर्ष तथा उल्लास आदि।
  2. अध्यापक का कर्तव्य है कि अवांछित संवेगों; जैसे-भय, क्रोध, घृणा आदि का मार्गान्तीकरण या शोधन कर उन्हें उत्तम कार्यों के लिए प्रेरित करे।
  3. पाठ्यक्रम निर्धारण में भी बालकों के संवेगों को उचित स्थान दिया जाए।
  4. अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों को संवेगों पर नियन्त्रण रखने का प्रशिक्षण दें।
  5. वांछनीय संवेगों का यथासम्भव विकास करके बालकों में श्रेष्ठ विचारों, आदर्शों तथा उत्तम आदतों का निर्माण किया जाए।
  6. बालकों को संवेगों के आधार पर महान् तथा साहित्यिक कार्यों के लिए प्रेरित किया जाए।
  7. अध्यापक को चाहिए कि बालकों के संवेगों को इस तरीके से परिष्कृत करे कि उनका आचरण समाज के अनुकूल हो सके।
  8. वांछनीय संवेगों के माध्यम से छात्रों में साहित्य, कला तथा देशभक्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न किया जा सकता है।
  9. संवेग द्वारा अध्यापक बालकों को स्वाध्याय के लिए प्रेरित करके उनके मानसिक विकास में भी योग प्रदान कर सकता है।
  10. अध्यापक को सदा छात्रों के साथ प्रेम एवं मित्रता का व्यवहार करना चाए।
  11. अध्यापक को स्वयं संवेगात्मक सन्तुलन बनाये रखना चाहिए संक्षेप में, अध्यापकों का कर्तव्य है कि वे संवेगों के स्वरूप और विकास से भली-भाँति परिचित हों तथा शिक्षण कार्य द्वारा बालक में उचित संवेगों का विकास करें। प्रत्येक अध्यापक को यह ध्यान में रखना चाहिए कि संवेग विचार एवं व्यवहार के प्रमुख चालक अथवा प्रेरित शक्तियाँ हैं और उनका प्रशिक्षण एवं नियन्त्रण आवश्यक है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
बालकों के संवेगों एवं संवेगात्मक व्यवहार की मुख्य विशेषताएँ क्या होती हैं ?
उत्तर:
प्रौढ़ व्यक्तियों तथा बालकों के संवेगों में पर्याप्त अन्तर होता है। बालकों के संवेगों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं

  1. बालकों द्वारा प्रकट किये जाने वाले संवेग प्राय: सरल, सीधे-सादे तथा क्षणिक होते हैं।
  2. बालकों के संवेग स्थायी नहीं होते बल्कि वे शीघ्र ही परिवर्तित होते रहते हैं।
  3. भिन्न-भिन्न बालकों द्वारा समान दशाओं में भी भिन्न-भिन्न संवेगात्मक प्रतिक्रियाएँ प्रकट की जाती हैं। ऐसा देखा जा सकता है कि डर की दशा में कोई बालक रोता है, कोई चिल्लाता है तथा कोई दुबक जाता है।

प्रश्न 2
संवेगों के नियन्त्रण के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संवेगात्मक विकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत कुछ संवेगों को नियन्त्रित करना भी आवश्यक होता है। संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित विधियों को अपनाया जाता है

  1. दमन या विरोध- इस विधि के अन्तर्गत अवांछित संवेगों को दबा या रोक देने की व्यवस्था होती है। प्रबल संवेगों का दमन प्रायः हानिकारक माना जाता है।
  2. अध्यवसाय- संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए आवश्यक है कि बालकों को सदैव ही किसी-न-किसी कार्य में व्यस्त रखा जाए। इससे उनका व्यवहार सामान्य रहता है।
  3. रेचन- संवेगों को नियन्त्रित रखने का एक उपाय रेचन भी है। रेचन के अन्तर्गत बालकों को अपने संवेगों को प्रकट करने का पर्याप्त अवसर दिया जाता है। इससे उनकी मन की भड़ास निकल जाती है और वे सामान्य हो जाते हैं।
  4. मार्गान्तीकरण- संवेगों को नियन्त्रित करने के लिए मार्गान्तीकरण के उपाय को भी अपनाया जाता है। इस उपाय के अन्तर्गत संवेगों की अभिव्यक्ति के मार्ग को परिवर्तित कर दिया जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
संवेग से क्या आशय है ?
उत्तर:
संवेग एक प्रकार की भावात्मक स्थिति होती है, जिसमें व्यक्ति को मन:शारीरिक सन्तुलन पूर्ण रूप से अस्त-व्यस्त हो जाता है।

प्रश्न 2
‘संवेग’ की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“संवेग शब्द किसी भी प्रकार से आवेग में आने, भड़क उठने अथवा उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है।”

प्रश्न 3
मुख्य रूप से किन कारणों से संवेगों की उत्पत्ति होती है ?
उत्तर:
संवेगों की उत्पत्ति मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक कारणों से ही होती है।

प्रश्न 4
छोटे शिशुओं द्वारा किस प्रकार के संवेग अभिव्यक्त किये जाते हैं ?
उत्तर:
छोटे शिशुओं द्वारा सरल तथा अस्पष्ट संवेग अभिव्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 5
शिशुओं द्वारा मुख्य रूप से कौन-कौन से संवेग अभिव्यक्त किये जाते हैं ?
उत्तर:
शिशुओं द्वारा मुख्य रूप से भय, क्रोध तथा प्रेम नामक संवेग ही अभिव्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 6
किशोरों द्वारा अभिव्यक्त किये जाने वाले संवेग कैसे होते हैं ?
उत्तर:
किशोरों द्वारा अभिव्यक्त किये जाने वाले संवेग प्रबल तथा अनियन्त्रित होते हैं।

प्रश्न 7
संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. शारीरिक स्वास्थ्य
  2. बौद्धिक स्तर
  3. घर एवं समाज का वातावरण
  4. लिंग-भेद

प्रश्न 8
संवेगों के अत्यधिक दमन का बालक के व्यक्तित्व पर कैसा प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
संवेगों के अत्यधिक दमन का बालक के व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. व्यक्ति के जीवन में संवेगों का कोई महत्त्व नहीं है
  2. संवेगावस्था में व्यक्ति का चिन्तन एवं निर्णय लेने की क्षमता अत्यधिक उत्तम एवं दोष रहित हो जाती है
  3. बाल्यावस्था में संवेगों को नियन्त्रित करने के उपाय किये जाने चाहिए।
  4. संवेगों की उत्पत्ति सदैव आर्थिक कारकों से होती है
  5. संवेगों को नियन्त्रित करने का एक उत्तम उपाय उनका शोधने है

उत्तर:

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. अस्त्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1.
संवेग के विषय में सत्य है
(क) प्रसन्न होना तथा हँसना
(ख) आवेश में आ जाना, भड़क उठना तथा उत्तेजित हो जाना
(ग) कष्ट अनुभव करना
(घ) अन्य व्यक्तियों की सहानुभूति की आशा करना

प्रश्न 2.
संवेगावस्था की पहचान का सही उपाय है-
(क) विचार-प्रक्रिया का तीव्र होना
(ख) भाषा का दोषपूर्ण होना
(ग) मुखाभिव्यक्ति
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3.
प्रबल संवेगावस्था में व्यक्ति का चिन्तन
(क) सुव्यवस्थित हो जाता है
(ख) प्रबल हो जाता है
(ग) अस्त-व्यस्त हो जाता है
(घ) उत्तम हो जाता है

प्रश्न 4.
बाल्यावस्था में अभिव्यक्त होने वाले संवेग-
(क) स्थायी होते हैं
(ख) प्रबल होते हैं
(ग) शीघ्र परिवर्तनीय होते हैं
(घ) असहनीय होते हैं

प्रश्न 5.
संवेगों को नियन्त्रित करने का उपाय है
(क) दमन
(ख) रेचन
(ग) मार्गान्तीकरण एवं शोधन
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
संवेग की अभिव्यक्ति होती है
(क) भाषा
(ख) इंगित चेष्टा
(ग) चेहरे का प्रदर्शन
(घ) ये सभी

उत्तर:

  1. (ख) आवेश में आ जाना, भड़क उठना तथा उत्तेजित हो जाना,
  2. (ग) मुखाभिव्यक्ति
  3. (ग) अस्त-व्यस्त हो जाता है
  4. (ग) शीघ्र परिवर्तनीय होते हैं
  5. (घ) ये सभी
  6. (घ) ये सभी

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development

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Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 17
Chapter Name Process of Development (विकास की प्रक्रिया)
Number of Questions Solved 26
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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development (विकास की प्रक्रिया)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘विकास’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विकास में होने वाले परिवर्तनों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास का अर्थ
(Meaning of Development)

प्रायः विकास का अर्थ आयु में बड़े होने या कद में बड़े होने से लगाया जाता है, परन्तु विकास का यह अर्थ भ्रामक है। विकास का अर्थ है-“वे व्यवस्थित तथा समानुगत परिवर्तन, जो परिपक्वता की प्राप्ति में सहायक होते हैं। यहाँ पर व्यवस्थित का अर्थ है-क्रमबद्धता, अर्थात् शारीरिक और मानसिक परिवर्तन में कोई-न-कोई क्रम अवश्य होता है और प्रत्येक परिवर्तन अपने पूर्व परिवर्तन पर निर्भर रहता है। समुनगत शब्द का अर्थ है, इन परिवर्तनों में परस्पर सामंजस्य होता है अर्थात् ये परिवर्तन सम्बन्धविहीन नहीं होते। कुछ विद्वान् विकास को एक अवधारणा मानते हैं, परन्तु गैसल (Gassel) के अनुसार विकास एक अवधारणा मात्र नहीं है, वरन् विकास एक अवधारणा से कहीं अधिक है। विकास का निरीक्षण किया जा सकता है तथा उसका मूल्यांकन भी किया जा सकता है। विकास व्यक्ति में नवीन योग्यताएँ उत्पन्न करता है, जिससे उसमें नवीन विशेषताओं का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में, विकास निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जन्म से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है।

विकास की परिभाषाएँ
(Definitions of Development)

विकास की कुछ प्रमुख परिभाषाओं का विवरण इस प्रकार है-

  1. जेम्स ड्रेवर (James Drever) के अनुसार, “विकास वह दशा है, जो प्रगतिशील परिवर्तन के रूप में व्यक्ति में निरन्तर प्रकट होती है अर्थात् यह प्रगतिशील परिवर्तन किसी भी व्यक्ति में भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक चलता है और विकासतन्त्र को नियन्त्रण में रखता है। यह दशा प्रगति का मापदण्ड होती है तथा इसका प्रारम्भ शून्य से होता है।”
  2. मुनरो (Munro) के अनुसार, “परिवर्तन श्रृंखला की वह व्यवस्था, जिसमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास के नाम से जानी जाती है।”
  3. हरलॉक (Hurlock) के अनुसार, “विकास अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है। इसके बजाय उनमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन मान्यताएँ होती हैं।”
  4. इंगलिश (English) के अनुसार, “विकास प्राणी की शरीर अवस्था में एक लम्बे समय तक होने वाले लगातार परिवर्तन का एक क्रम है। यह विशेषतया ऐसा परिवर्तन है, जिसके कारण जन्म से लेकर परिपक्वता और मृत्यु तक प्राणी में स्थायी परिवर्तन होते हैं।’

विकास में परिवर्तन के रूप
(Types of Changes in Development)

विकास में मुख्यतया चार प्रकार के परिवर्तन होते हैं|

1. आकार में परिवर्तन- आयु-वृद्धि के साथ-साथ बालकों के शारीरिक पक्ष में पर्याप्त परिवर्तन दिखलाई पड़ने लगता है। आकार में यह परिवर्तन परिपक्वता तक चलता रहता है। जन्म लेने के पश्चात् आयु के बढ़ने के साथ-साथ बालक की लम्बाई, भार, आकार आदि में भी वृद्धि होने लगती है। इसी प्रकार शरीर के आन्तरिक भाग में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। उदाहरण के लिए-फेफड़े, हृदय तथा आँतों के आकार में वृद्धि हो जाती है। बालक नवीन शब्दों को सीखते हैं, जिससे उनके शब्दकोश का विस्तार होता है। धीरे-धीरे उनमें तर्कशक्ति का भी विकास होता जाता है।

2. अनुपात में परिवर्तन- विकास की प्रक्रिया में बालक के शारीरिक विकास में आनुपातिक परिवर्तन होता है। बालक को एक प्रौढ़ के रूप में समझना भारी भूल है, क्योंकि बालक तथा प्रौढ़ दोनों के शरीर में अनुपात सम्बन्धी विभिन्नता पायी जाती है। लगभग 14 वर्ष की आयु (किशोरावस्था) में जाकर बालक और प्रौढ़ के अनुपात के पुराने लक्षणों की समाप्ति में शारीरिक समानता आने लगती है। प्रारम्भ में शारीरिक विकास के अनुपात में इस प्रकार परिवर्तन होते हैं–सिर के अनुपात में दूनी, शरीर के अनुपात में तीन-गुनी तथा मस्तिष्क और शरीर के ऊपरी अंगों में चार-गुनी वृद्धि हो जाती है।

अनुपात सम्बन्धी परिवर्तन मानसिक रूप से भी दृष्टिगोचर होते हैं। छोटे बालक कल्पना तो करते हैं, परन्तु उनकी कल्पना लक्ष्यहीन होती है। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है, उसकी कल्पना में वास्तविकता का अंश आने लगता है। इसी प्रकार आयु के साथ-साथ बालक की रुचियों में भी परिवर्तन होता है। प्रारम्भ में बालक स्वयं अपने में तथा अपने खिलौनों में रुचि लेता है। जब वह पर्याप्त बड़ा हो जाता है, तब वह आस-पास के साथी बालकों के साथ खेलने में रुचि लेने लगता है।

3. पुराने लक्षणों की समाप्ति- जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है, वैसे-ही-वैसे उसके पुराने लक्षण लुप्त होते जाते हैं। उदाहरणार्थ–एक छोटा शिशु प्रारम्भ में हाथ-पैर चलाता है, सरक-सरक कर चलता है तथा तुतला कर बोलता है, परन्तु वर्ष भर के बाद इनमें से अभिकांश लक्षणों का लोप हो जाता है। इसी प्रकार आयु-वृद्धि के साथ शरीर के अन्दर थाईमस ग्लैण्ड (Thymus Gland) का लोप हो जाता है। दूध के दाँत, जो जन्म के पश्चात् निकलते हैं, कुछ वर्ष बाद गिर जाते हैं और उनके स्थान पर स्थायी दाँत निकल आते हैं।

4. नवीन विशेषताओं की प्राप्ति- विकास क्रम में जहाँ पुराने लक्षणों का लोप हो जाता है, वहीं बालक का शरीर नवीन रूपरेखा ग्रहण करने लगता है। उदाहरण के लिए-तुतलाहट के स्थान पर बालक स्पष्ट बोलने लगता है। किशोरावस्था में तो अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन होते हैं। बालकों के दाढ़ी-मूंछ निकलने लगती है। उनकी आवाज में भारीपन आ जाता है। बालिकाओं के स्तनों में उभार आ जाता है। इन शारीरिक परिवर्तनों के कारण किशोर-किशोरियों की मानसिक क्रियाओं तथा सांवेगिक प्रतिक्रियाओं में पर्याप्त परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। दोनों वर्गों के सदस्यों में परस्पर आकर्षण तथा रुचि अत्यधिक तीव्रता से बढ़ने लगती है।

प्रश्न 2
विकास के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
या
विकास के प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए तथा उनका शैक्षिक महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विकास के सिद्धान्त
(Theories of Development)

विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का व्यक्ति के जीवन में सर्वाधिक महत्त्व है। विकास की प्रक्रिया की समुचित व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए विभिन्न सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। विकास सम्बन्धी मुख्य सिद्धान्तों का विवरण निम्नवर्णित है –

1. निरन्तर विकास का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार, बालक का विकास तभी से प्रारम्भ हो जाता है, जब वह गर्भावस्था में होता है। विकास की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। दूसरे शब्दों में, विकास अचानक नहीं होता, वरन् उसमें निरन्तरता रहती है। स्किनर के अनुसार, “विकास प्रक्रियाओं की निरन्तरता का सिद्धान्त केवल इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति में कोई अचानक परिवर्तन नहीं होता।”

2. सामान्य से विशिष्ट की ओर का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार, बालक का विकास सामान्य प्रक्रियाओं से विशिष्ट प्रक्रियाओं की ओर होता है। उदाहरण के लिए प्रारम्भ में बालक अपने सम्पूर्ण हाथ का संचालन करता है, तत्पश्चात् धीरे-धीरे वह अपनी उँगलियों पर नियन्त्रण स्थापित करता है। विकास की समस्त अवस्थाओं में बालक की प्रक्रियाएँ विशिष्ट बनने से पूर्व सामान्य होती हैं।

3. विकास की विभिन्न गति का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार एक ही मापदण्ड से समस्त बालकों के विकास का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। विभिन्न बालकों के विकास की गति में भिन्नता पायी जाती है और यह भिन्नता अन्त तक बनी रहती है।

4. समान प्रतिमान का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार समान प्रजाति (Race) में विकास की गति समान प्रतिमानों से प्रभावित होती है। हरलॉक के अनुसार, “प्रत्येक प्रजाति, वह चाहे मानव जाति हो या पशु जाति, अपनी जाति के अनुरूप विकास का अनुकरण करती है।” मनुष्य चाहे अमेरिका में पैदा हो या भारत में, उसका मानसिक, शारीरिक तथा संवेगात्मक विकास समान रूप से होता है।

5. विकास क्रम का सिद्धान्त- शिरले (Shirley) तथा गैसिल (Gassal) आदि ने परीक्षण करके यह सिद्ध कर दिया है कि बालक का गामक (Motor) तथा भाषा (Language) सम्बन्धी विकास एक निश्चित क्रम में होता है। प्रत्येक बालक जन्म के समय केवल रोना जानता है। तीन माह के पश्चात् वह ध्वनि निकालने लगता है। सात माह के पश्चात् वह मा, मी, पा, पा आदि शब्दों का उच्चारण करने लगता है।

6. विकास दिशा का सिद्धान्त- कुछ विद्वानों के अनुसार बालक के विकास की प्रक्रिया सिर से पैर की दिशा की ओर चलती है। प्रारम्भ में बालक केवल अपना सिर उठा पाता है। तीन माह के बाद वह अपने नेत्रों की गति पर नियन्त्रण कर लेता है। छह माह में उसका अपने हाथों की गतियों पर नियन्त्रण हो जाता है। नौ माह में वह सहारे से बैठने लगता है तथा एक वर्ष में लड़खड़ा कर चलने लगती है।

7. परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार विभिन्न अंगों के विकास में सामंजस्य और परस्पर सम्बन्ध रहता है। दूसरों शब्दों में, बालक के शारीरिक विकास, मानसिक और संवेगात्मक पक्षों के विकास में परस्पर सम्बन्ध रहता है। जब बालक का शारीरिक विकास होता है तो उसके साथ-साथ उसकी ध्यान केन्द्रित करने की शक्तियों, रुचियों तथा संवेदनाओं में भी परिवर्तन होता रहता है।

8. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त- प्रत्येक बालक के विकास का अपना निजी स्वरूप होता है। ऐसी दशा में वैयक्तिक भिन्नताओं का होना स्वाभाविक है। सम आयु के दो बालकों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि पक्षों के विकास में वैयक्तिक विभिन्नताओं के दर्शन होते हैं।

9. वंशानुक्रमण तथा वातावरण की अन्तःक्रिया का सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बालक का विकास वंशानुक्रमण तथा वातावरण की अन्त:क्रिया द्वारा होता है। यदि यह कहा जाए कि केवल वंशानुक्रमण ही बालक के विकास में योग देता है, तो यह बात सर्वथा गलत है। यही बात वातावरण के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।

विकास के सिद्धान्त का शैक्षिक महत्त्व
(Educational Importance of Principle of Development)

विकास की प्रक्रिया का बालक एवं व्यक्ति के जीवन के सभी पक्षों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि विकास के सिद्धान्तों का विशेष शैक्षिक महत्त्व भी है। वास्तव में शिक्षा की प्रक्रिया का विकास की प्रक्रिया से घनिष्ठ एवं अटूट सम्बन्ध है। शिक्षा की प्रक्रिया सदैव विकास की प्रक्रिया के साथ-साथ चलती है। विकास की प्रक्रिया के सुचारु होने की दशा में शिक्षा की प्रक्रिया भी सामान्य एवं सुचारु रूप से चलती है। विकास की प्रक्रिया का मूल्यांकन विकास के सिद्धान्तों के आधार पर ही किया जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विकास के सिद्धान्तों का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3
विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। या विकास को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास को प्रभावित करने वाले कारक
(Factors Influencing the Development)

यह सत्य है कि विकास की प्रक्रिया में एक प्रकार की समरूपता पायी जाती है, परन्तु इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है कि विकास एवं व्यक्तिगत प्रक्रिया भी है। प्रत्येक व्यक्ति का विकास उसके अपने ही ढंग से होता है। इस भिन्नता का मूल कारण यह है कि व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया पर विभिन्न कारक अपना-अपना विशिष्ट प्रभाव डालते हैं। इस स्थिति में विकास को प्रभावित करने वाले कारकों को जानना भी आवश्यक है। विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

1. बुद्धि- बालकों के विकास पर प्रभाव डालने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक बुद्धि है। प्रायः तीव्र बुद्धि के बालकों का विकास तेजी से होता है और मन्द बुद्धि के बालकों का धीमी गति से। टरमन (Turman) के अनुसार, कुशाग्र बुद्धि के बालक 13 माह की आयु में चलना सीख जाते हैं, सामान्य बुद्धि के 14 माह में, मूर्ख बालक 22 माह की आयु में तथा मूढ़ बालक 30 माह की आयु में चलना सीखते हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि बुद्धि और विकास में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है।

2. प्रजाति- प्रजातीय भिन्नता बालक के विकास को भी प्रभावित करती है। विभिन्न प्रजातियों की विकास दरें एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। आर्य, द्रविड़, मंगोल आदि के मानसिक तथा शारीरिक विकास में पर्याप्त भिन्नता मिलती है।

3. संस्कृति- जंग (Jung) के अनुसार, “व्यक्ति के विकास में संस्कृति की स्थिति की भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। बालक का विकास जातीय संस्कृति के अनुरूप ही होता है। जो संस्कृति जितनी अधिक उन्नत होगी, बालक उससे उसी मात्रा में गुणों का अर्जन करेगा।” विभिन्न संस्कृतियों के बालकों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सोमान्य.सहज प्रवृत्तियाँ प्रत्येक संस्कृति में पायी जाती हैं, परन्तु उनको अभिव्यक्त करने के ढंग अलग-अलग हैं।

4. यौन- भिन्नता–इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिल चुके हैं कि यौन-भेद बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास में एक विशिष्ट भूमिका रखते हैं। लड़के और लड़कियों के शारीरिक विकास में पर्याप्त अन्तर होता है। लड़के जन्म से लड़कियों से कुछ बड़े होते हैं, परन्तु विकास लड़कियों का अधिक तीव्रता से होता है। वे लड़कों की अपेक्षा पहले युवा हो जाती हैं। इसी प्रकार लड़कियों के मानसिक विकास में भी तीव्रता होती है। लड़कों की अपेक्षा वे शीघ्र बोलना सीख जाती हैं।

5. अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ- अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ भी बालक के विकास को प्रभावित करती हैं। इनका प्रभाव मुख्य रूप से बालक के मानसिक विकास पर पड़ता है। इन ग्रन्थियों का अभाव मांसपेशियों में पर्याप्त उत्तेजना उत्पन्न करता है तथा अस्थियों का विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। गल ग्रन्थियों से निकलने वाला रस सबसे अधिक बालक के शारीरिक तथा मानसिक विकास को प्रभावित करता है। इसकी न्यूनता से बालक को शारीरिक तथा मानसिक विकास रुक जाता है।

6. पौष्टिक भोजन- पौष्टिक आहार का प्रत्येक अवस्था में महत्त्व होता है, परन्तु सबसे अधिक महत्त्व बाल्यावस्था में होता है। यदि बालक को बाल्यावस्था में ही पौष्टिक भोजन मिलना आरम्भ हो जाता है तो उसका विकास उचित दिशा में होता है। भोजन की मात्रा की अपेक्षा खाद्य सामग्री का विटामिन युक्त होना आवश्यक है। जिन बालकों को उचित मात्रा में पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, उनका शारीरिक विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता तथा वे विभिन्न रोगों से भी ग्रस्त हो जाते हैं। अत: बालकों के उचित विकास के लिए सन्तुलित भोजन का विशेष महत्त्व है।

7. शुद्ध वायु और प्रकाश- शुद्ध वायु तथा प्रकाश बालक के कद, परिपक्वता तथा सामान्य स्वास्थ्य को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। जिन बालकों का पालन-पोषण पर्याप्त एवं शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश में होता है, उनका शारीरिक विकास उन बालकों की अपेक्षा उत्तम होता है, जो प्रकाशहीन तथा अशुद्ध वायु से परिपूर्ण वातावरण में रहते हैं।

8. रोग तथा चोट- यदि बालक के सिर तथा अन्य कोमल अंगों में चोट लग जाती है तो उसका भी शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार विषैली ओषधियों का भी विकास पर कुप्रभाव पड़ता है।

9. परिवार की स्थिति- परिवार की स्थिति भी बालक के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यदि परिवार में तीन बालक हैं तो उनकी विकास प्रक्रिया में अन्तर मिलेगा। पहले बालक की अपेक्षा तीसरे बालक का विकास अपेक्षाकृत शीघ्र होता है, क्योंकि उसे अपने भाई-बहनों के अनुकरण के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। इसी प्रकार जिन बालकों का परिवार में लाड़-प्यार अधिक होता है, उनका विकास उन बालकों से भिन्न होता है, जिसके साथ डाँट-फटकार तथा उपेक्षा का व्यवहार किया जाता है। उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि विकास की प्रक्रिया को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। सन्तुलित विकास के लिए पौष्टिक भोजन तथा स्वास्थ्यवर्द्धक परिस्थितियाँ अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विकास के मुख्य कारण
(Main Causes of Development)

विकास की प्रक्रिया के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. परिपक्वीकरण- परिपक्वीकरण का अर्थ होता है-स्वाभाविक विकास। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को वंशानुगत रूप से प्राप्त शील गुणों को, जो उसके अन्दर विद्यमान हैं, का विकास ही परिपक्वता है। प्रायः यह देखा गया है कि परिपक्वता के आधार पर बालक में एकाएक शील गुण प्रकट होते हैं। हरलॉक ने परिपक्वता की परिभाषा देते हुए लिखा है-”परिपक्वता से तात्पर्य वंशानुक्रम के प्रभाव के कारण व्यक्ति में शील गुणों के प्रभावी विकास से है, जिनकी व्यक्ति में जन्म के समय क्षमता होती है।” संक्षेप में, बालक के शील गुणों का स्पष्टीकरण ही परिपक्वता है। यह मानव के विकास की अनवरत प्रक्रिया है। आयु के विकास के साथ-साथ जैसे-जैसे बालक परिपक्व होता जाता है, वैसे ही उसमें कुछ विशेषताएँ स्पष्ट होती जाती हैं तथा परिपक्वता के साथ-साथ शरीर में विभिन्न क्रियाओं के लिए क्षमता भी उत्पन्न होती जाती है।

2. सीखना- सीखने को अधिगम (Learning) भी कहा जाता है। जन्म लेने के पश्चात् बालक अपने को एक विशेष प्रकार के भौतिक तथा सामाजिक वातावरण से घिरा पाता है। बालक की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति इस भौतिक और सामाजिक वातावरण के अन्दर ही होती है, परन्तु इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति को अपने वातावरण में कुछ-न-कुछ संघर्ष अथवा अनुकूलन करना पड़ता है। इस प्रकार के अनुकूलन के लिए वह गत अनुभवों की सहायता से अपने व्यवहार में परिवर्तन लाता है और इस प्रकार सीख जाता है। गेट्स (Gates) के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।’ अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इससे लाभ ” उठाकर व्यक्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है। सीखना एक विकास भी है, जिसका कभी अन्त नहीं होता। जीवन-पथ के प्रत्येक कदम पर व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है।

प्रश्न 2
विकास तथा वृद्धि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विकास तथा वृद्धि में अन्तर
(Difference between Development and Growth)

सामान्य अर्थ में विकास और वृद्धि समानार्थी है, परन्तु वास्तविकता यह है कि विकास और वृद्धि में पर्याप्त अन्तर है। शरीर के अंगों में बढ़ोतरी वृद्धि कहलाती है और इस वृद्धि का मापन तथा मूल्यांकन भी किया जा सकता है। इसके विपरीत विकास शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तन का बोध कराता है। उदाहरण के लिए-आयु-वृद्धि के साथ बालक की हड्डियों में वृद्धि होती जाती है तथा इनमें कठोरता और मजबूती आती जाती है। इस प्रकार वृद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यतः शरीर तथा उसके अंगों के भार अथवा आकार में बढ़ोतरी के लिए किया जाता है। इस वृद्धि का मापन व मूल्यांकन किया जा सकता है, जबकि विकास प्रमुखतया शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तनों को प्रकट करता है। इस प्रकार वृद्धि के बाद विकास होता है। वृद्धि आकार में परिवर्तन है, जबकि विकास गुणों में परिवर्तन है। वृद्धि एक निश्चित आयु आने पर रुक जाती है, किन्तु विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।
संक्षेप में विकास और वृद्धि में अन्तर निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है-
UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 17 Process of Development 1

प्रश्न 3
विकास के मुख्य रूपों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:

विकास के मुख्य रूप
(Main Kinds of Development)

व्यक्ति का विकास अपने आप में समग्रता का विकास है। उसके भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले विकास को विकास के विभिन्न रूप कहा जाता है। विकास के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं|

  1. शारीरिक विकास- शरीर सम्बन्धी विकास को शारीरिक विकास कहा जाता है। विकास के इस रूप के अन्तर्गत मुख्य रूप से शरीर के अंगों में आने वाली परिपक्वता का अध्ययन किया जाता है। शरीर के अंगों में परिपक्वता आने के साथ-ही-साथ उनकी क्रियाशीलता में भी वृद्धि होती है।
  2. मानसिक विकास- व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं में होने वाले विकास को मानसिक विकास के रूप में जाना जाता है।
  3. संवेगात्मक विकास- व्यक्ति के संवेगों में स्थिरता एवं परिपक्वता के गुण के विकास को संवेगात्मक विकास के रूप में जाना जाता है।
  4. सामाजिक विकास-व्यक्ति के समाजीकरण के परिणामस्वरूप कुछ सामाजिक सद्गुणों का आविर्भाव होता है। सामाजिक गुणों के इस विकास को ही सामाजिक विकास के रूप में जाना जाता है।
  5. नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास- नैतिक गुणों के प्रति सचेत होना तथा चरित्र को दृढ़ता प्राप्त होना ही नैतिक एवं चरित्र सम्बन्धी विकास कहलाता है।
  6. भाषागत विकास- भाषा के सीखने, बोलने आदि को भाषागत विकास कहा जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है। विकास की मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित हैं

  1. विकास का तात्पर्य केवल बढ़ने से नहीं है।
  2. विकास- बालक की अवस्था में दीर्घकाल तक होने वाले निरन्तर परिवर्तनों का एक क्रम है।
  3. विकास में परिवर्तन एक दिशा में होते हैं।
  4. यह परिवर्तन आगे की ओर होता है, पीछे की ओर नहीं।
  5. विकास में पूर्व स्तर का आने वाले स्तर से सम्बन्ध होता है।
  6. विकास में निरन्तरता का गुण होता है।
  7. विकास अपने आप में एक संगठित प्रक्रिया है।

प्रश्न 2
स्पष्ट कीजिए कि विकास की प्रक्रिया पर पोषण का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक मुख्य तत्त्व या कारक पोषण है। पोषण का आशय है–सन्तुलित एवं पौष्टिक आहार ग्रहण करना। वास्तव में बालक के सामान्य एवं सुचारु विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित आहार आवश्यक होता है। उचित पोषण से व्यक्ति का शारीरिक तथा मानसिक विकास भी सामान्य रूप से होता है। उचित पोषण के अभाव में बालक का विकास अवरुद्ध हो जाता है।

प्रश्न 3
स्पष्ट कीजिए कि विकास जीवन भर चलता रहता है।
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया जीवन भर किसी-न-किसी रूप में अवश्य चलती रहती है। शरीर में परिपक्वता आती है, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास भी सदैव होता रहता है। व्यक्ति के विचारों में जो परिपक्वता प्रौढ़ावस्था के उपरान्त आती है वह बाल्यावस्था अथवा युवावस्था में नहीं होती है। इसी प्रकार वृद्धावस्था में बालों का सफेद होना तथा त्वचा का कठोर होना आदि भी विकास के ही प्रमाण ।

प्रश्न 4
अभिवृद्धि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जीवित प्राणियों के शरीर के अंगों में होने वाली बढ़ोतरी को वृद्धि या अभिवृद्धि (Growth) कहा जाता है। उदाहरण के रूप में शरीर का वजन तथा लम्बाई का बढ़ना वृद्धि कहलाता है। शारीरिक वृद्धि का निर्धारित इकाइयों में मापन एवं मूल्यांकन किया जा सकता है। वृद्धि का सीधा सम्बन्ध आकार से होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विकास से क्या आशय है?
उत्तर:
विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इसके माध्यम से बालक अथवा व्यक्ति की निहित शक्तियाँ एवं गुण क्रमश: प्रकट होते हैं।

प्रश्न 2
विकास की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“परिवर्तन श्रृंखला की वह व्यवस्था जिसमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है। विकास के नाम से जानी जाती है।”

प्रश्न 3
विकास की प्रक्रिया व्यक्ति के जीवन में कब तक चलती है?
उत्तर:
विकास की प्रक्रिया व्यक्ति में किसी-न-किसी रूप में जीवन भर चलती रहती है।

प्रश्न 4
क्या बालक एवं बालिकाओं के विकास की प्रक्रिया पूर्ण रूप से एकसमान होती है?
उत्तर:
नहीं, बालक एवं बालिकाओं के विकास की प्रक्रिया में उल्लेखनीय अन्तर होता है।

प्रश्न 5
क्या ‘वृद्धि एवं विकास’ एक ही हैं?
उत्तर:
नहीं, वृद्धि एवं विकास में स्पष्ट अन्तर है।

प्रश्न 6
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. वृद्धि
  2. प्रजाति
  3. यौन-भिन्नता तथा
  4. अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ

प्रश्न 7
बालक के विकास पर वंशानुक्रमण तथा पर्यावरण में से किस कारक का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बालक के विकास पर वंशानुक्रमण तथा पर्यावरण दोनों ही कारकों का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 8
विकास के अन्तर्गत किस प्रकार के परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
विकास के अन्तर्गत गुणात्मक परिवर्तन होते हैं, जैसे कि हड्डियों तथा माँसपेशियों में क्रमश: कठोरता एवं पुष्टता आना।

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विकास तथा वृद्धि में कोई अन्तर नहीं है
  2. वृद्धि परिपक्वता तथा विकास परस्पर सम्बन्धित हैं
  3. विकास की प्रक्रिया का बालक की शिक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
  4. युवावस्था में आकर विकास की प्रक्रिया रुक जाती है
  5. पोषण का विकास की प्रक्रिया पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
विकास की प्रक्रिया है
(क) एक सरल प्रक्रिया
(ख) एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया
(ग) एक अस्पष्ट प्रक्रिया
(घ) एक कृत्रिम प्रक्रिया

प्रश्न 2.
“विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन योग्यताएँ प्रकट होती है।” यह कथन किसका है?
(क) डगलस का
(ख) हरलॉक का
(ग) टरमन का
(घ) गेस्टालर का

प्रश्न 3.
बालक के विकास तथा उसकी शिक्षा के सम्बन्ध में सत्य है
(क) विकास तथा शिक्षा में कोई सम्बन्ध नहीं है
(ख) विकास शिक्षा को प्रभावित नहीं करता
(ग) शिक्षा से विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(घ) विकास तथा शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध है

प्रश्न 4.
बालक के विकास तथा उसकी आयु में क्या सम्बन्ध है?
(क) विकास सदैव आयु के अनुसार होता है
(ख) विकास पर आयु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
(ग) आयु विकास की प्रक्रिया में बाधक है
(घ) उपर्युक्त सभी कथन असत्य हैं

प्रश्न 5.
विकास को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है
(क) वृद्धि
(ख) प्रजाति
(ग) उपलब्धि
(घ) संस्कृति

प्रश्न 6.
विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कारक है
(क) वृद्धि
(ख) आयु
(ग) पोषण
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
विकास की प्रक्रिया की विशेषता नहीं है
(क) विकास की प्रक्रिया जीवन भर चलती है
(ख) विकास की निश्चित रूप से नाप-तौल की जा सकती है
(ग) विकास में समग्रता का गुण होता है
(घ) अन्तर्निहित गुणों का प्रस्फुटन होता है

उत्तर:

  1. (ख) एक जटिल एवं बहुपक्षीय प्रक्रिया
  2. (ख) हरलॉक का
  3. (घ) विकास तथा शिक्षा में घनिष्ठ सम्बन्ध है
  4. (क) विकास सदैव आयु के अनुसार होता है
  5. (ग) उपलब्धि
  6. (घ) उपर्युक्त सभी
  7. (ख) विकास की निश्चित रूप से नाप-तौल की जा सकती है

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