UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi स्वास्थ्यपरक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 9
Chapter Name स्वास्थ्यपरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi स्वास्थ्यपरक निबन्ध

स्वास्थ्यपरक निबन्ध

जीवन में खेलकूद की आवश्यकता और स्वरूप

सम्बद्ध शीर्षक

  • स्वस्थ तन, स्वस्थ मन
  • जीवन में खेलों का महत्त्व
  • विद्यालयों में खेल की उपादेयता
  • व्यायाम और योगासन का महत्त्व
  • स्वास्थ्य शिक्षा एवं योगासन
  • विद्यालयों में स्वास्थ्य-शिक्षा का अद्यतन रूप
  • विद्यालयों में शारीरिक-शिक्षा का वर्तमान स्वरूप

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  स्वास्थ्य : जीवन का आधार,
  3.  शिक्षा तथा खेलकूद,
  4. खेलकूद के विविध रूप,
  5. शिक्षा में खेलकूद का महत्त्व,
  6.  शिक्षा और खेलकूद में सन्तुलन,
  7.  उपसंहार।

प्रस्तावना –  शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए जीवन की आधारशिला है। व्यक्ति के प्रकृत रूप से सच्चे मानवीय रूप में विकास ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। शिक्षा मस्तिष्क को स्वस्थ बनाती है। इस प्रकार शिक्षा की सार्थकता व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक विकास में निहित है। सर्वविदित है कि स्वस्थ मस्तिष्क स्वस्थ शरीर में ही निवास करता है। स्वस्थ शरीर तभी सम्भव है, जब यह गतिशील रहे; खेलकूद, व्यायाम आदि से इसे पुष्ट बनाया जाए। इसीलिए विश्व के लगभग प्रत्येक देश में स्वाभाविक रूप से खेलकूद और व्यायाम पाये जाते हैं।

स्वास्थ्य : जीवन का आधार – मानव-जीवन के समस्त कार्यों का संचालन शरीर से ही होता है। हमारे यहाँ तो कहा भी गया है-‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।’ सच ही है – शरीर के होने पर ही व्यक्ति सभी प्रकार से साधनसम्पन्न हो सकता है। जान है तो जहान है। यहाँ पर जान से तात्पर्य है स्वस्थ शरीर। इसलिए प्रत्येक काल में, हर देश, हर समाज में स्वास्थ्य की महत्ता पर बल दिया गया है। इसे जीवन का सबसे बड़ा सुख मानते हुए कहा गया है- पहला सुख निरोगी काया।’ इसी सुख की प्राप्ति खेलकूद और व्यायाम से होती है।

शिक्षा तथा खेलकूद – शिक्षा तथा खेलकूद का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। शिक्षा मनुष्य को सर्वांगीण विकास करती है। शारीरिक विकास इस विकास का पहला रूप है, जो खेलकूद में गतिशील रहने से ही सम्भव है। मस्तिष्क भी एक शारीरिक अवयव है; अत: खेलकूद को अनिवार्य रूप से अपनाने पर मस्तिष्क भी परिपक्व होता है और वह शिक्षा में भी आगे बढ़ता है। इस प्रकार खेलकूद मानसिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक विकास से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। शिक्षा से खेलकूद की इस घनिष्ठता को दृष्टिगत रखकर ही प्रत्येक विद्यालय में खेलकूद की व्यवस्था की जाती है और इनसे सम्बद्ध व्यवस्था पर पर्याप्त धनराशि व्यय की जाती है।

खेलकूद के विविध रूप – कुछ नियमों के अनुसार शरीर को पुष्ट और स्फूर्तिमय तथा मन को प्रफुल्लित बनाने के लिए जो शारीरिक गति की जाती है, उसे ही खेलकूद और व्यायाम कहते हैं। खेलकूद और व्यायाम का क्षेत्र बहुत व्यापक है तथा इसके अनेकानेक रूप हैं। रस्साकशी, कबड्डी, खो-खो, ऊंची कूद, लम्बी कूद, तैराकी, हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, बैडमिण्टन, जिमनास्टिक, लोहे का गोला उछालना, टेनिस, स्केटिंग आदि खेलकूद के ही विविध रूप हैं। इनसे शरीर में रक्त का संचार तीव्र होता है और अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति के कारण प्राणशक्ति बढ़ती है। इसीलिए खेलकूद हमारे शरीर को पुष्ट बनाते हैं। सभी लोग सभी स्थानों पर नियमित रूप से सुविधापूर्वक खेलकूद नहीं कर सकते, इसीलिए शरीर और मन को पुष्ट बनाने के लिए व्यायाम करते हैं।

शिक्षा में खेलकूद का महत्त्व – केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करके मानसिक विकास कर लेने मात्र को ही शिक्षा मानना नितान्त भ्रम है। सच्ची शिक्षा मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक, चारित्रिक, और आध्यात्मिक विकास में सहायक होती है, जिससे मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता है। शिक्षा के क्षेत्र में खेलकूद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मानसिक विकास की दृष्टि से भी खेलकूद बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। खेलकूद से पुष्ट और स्फूर्तिमय शरीर ही मन को स्वस्थ बनाता है। अंग्रेजी की यह कहावत “There is a sound mind in a sound body.” अर्थात् स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है, बिल्कुल सत्य है। रुग्ण और दुर्बल शरीर व्यक्ति को चिड़चिड़ा, असहिष्णु और स्मृति-क्षीण बनाते हैं, जिससे वह शिक्षा ग्रहण करने योग्य नहीं रह जाता। खेलकूद हमारे मन के प्रफुल्लित और उत्साहित बनाये रखते हैं। खेलों से नियम-पालन का स्वभाव विकसित होता है और मन एकाग्र होता है। शिक्षा-प्राप्ति में ये तत्त्व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, परन्तु आज के वातावरण में अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों के केवल अक्षर-ज्ञान पर ही विशेष बल दे रहे हैं। परीक्षा में अधिक अंकों सहित उत्तीर्ण होना तथा किसी-न-किसी प्रकार अच्छी नौकरी को प्राप्त करना ही उनका उद्देश्य होता है।

खेलकूद चारित्रिक विकास में भी योगदान देते हैं। खेलकूद से सहिष्णुता, धैर्य और साहस का विकास होता है। तथा सामूहिक सद्भाव और भाईचारे की भावना पनपती है। इन चारित्रिक गुणों से एक मनुष्य सही अर्थों में शिक्षित और श्रेष्ठ नागरिक बनता है। शिक्षा-प्राप्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को भी हम खेल में आने वाले अवरोधों की भाँति हँसते-हँसते पार कर लेते हैं और सफलता की मंजिल तक पहुँच जाते हैं। इस प्रकार जीवन की अनेक घटनाओं को हम खिलाड़ी की भावना से ग्रहण करने के अभ्यस्त हो जाते हैं।

खेलकूद के सम्मिलन से शिक्षा में सरलता, सरसता और रोचकता आ जाती है। शिक्षाशास्त्रियों के अनुसार, खेल के रूप में दी गयी शिक्षा तीव्रगामी, सरल और अधिक प्रभावी होती है। इसे ‘शिक्षा की खेल-पद्धति’ कहते हैं। मॉण्टेसरी और किण्डरगार्टन आदि की शिक्षा-पद्धतियाँ इसी मान्यता पर आधारित हैं। इससे स्पष्ट है कि शिक्षा में खेलकूद का अत्यधिक महत्त्व है और बिना खेलकूद के शिक्षा सारहीन रह जाती है।

शिक्षा और खेलकूद में सन्तुलन –  शिक्षा में खेलकूद बहुत उपयोगी है; किन्तु यदि कोई खेलकूद पर ही बल दे और शिक्षा के अन्य पक्षों की उपेक्षा कर दे तो यह भी अहितकर होगा। विद्यार्थी का जीवन तो अध्ययनशील, कार्यशील व व्यस्त होना चाहिए, जिसमें एक क्षण का समय भी प्रदूषित वातावरण में व्यतीत नहीं होना चाहिए। हमें बुद्धिजीवी होने के साथ ही श्रमजीवी भी होना चाहिए। पढ़ते समय हम केवल पढ़ाई को ध्यान रखें और खेलकूद के समय एकाग्रचित्त होकर खेलें। यही प्रसन्नता और आनन्द का मार्ग है।

उपसंहार – खेलकूद से क्षमता, उल्लास और स्फूर्ति मिलती है। इससे जीवन रसमय बन जाता है। जीवन-रस से विहीन शिक्षा निरर्थक है; अत: शिक्षा को जीवन्त और सार्थक बनाये रखने के लिए तथा विद्यार्थी के व्यक्तित्व के सम्पूर्ण और समग्र विकास के लिए खेलकूद महत्त्वपूर्ण हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आवश्यक परिवर्तन कर खेलों को उसके पाठ्यक्रम की अनिवार्य अंग बनाने की भी आवश्यकता है। इनकी परीक्षा की भी उचित प्रणाली और प्रक्रिया विकसित की जानी चाहिए। बस्तियों के शोर-शराबे और घुटनभरे माहौल से शिक्षालयों को दूर, साफ-सुथरे, शान्त और स्वस्थ वातावरण में ले जाए जाने की भी बहुत बड़ी आवश्यकता है। व्यक्तित्व के सम्पूर्ण एवं समग्र विकास का शिक्षा का जो दायित्व है, उसकी पूर्ति तभी सम्भव हो सकेगी। समस्त विश्व ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया है तथा प्रत्येक देश में खेलकूद शिक्षा का अनिवार्य अंग बन गये हैं। हमारे देश में इस दिशा में कार्य बहुत कम हुआ है। बाल-विद्यालयों में भी खेलकूद की व्यवस्था का अभाव है। देश की भावी पीढ़ी को सुयोग्य, सुशिक्षित और विकासोन्मुख बनाने के लिए शिक्षा और खेलकूद में समन्वय का होना अत्यावश्यक है।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology (मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology (मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र).

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Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 1
Chapter Name Meaning, Definition and Scope of Psychology
(मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र)
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं। इसके आधुनिक स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए इसकी उपयुक्त परिभाषा निर्धारित कीजिए।
या
“मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसकी आधुनिक परिभाषा का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
प्राणी कोई व्यवहार कब, क्यों और कैसे करता है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए ही मनोविज्ञान का जन्म हुआ। मनोविज्ञान के अध्ययन की परम्परा के साथ ही इसकी परिभाषा का प्रश्न उत्पन्न हुआ, क्योंकि परिभाषा के अभाव में किसी विषय का समुचित ज्ञान हो पाना सम्भव नहीं है। लेकिन मनोविज्ञान के अर्थ की परिभाषा को लेकर एक लम्बे समय तक विवाद चलता रहा है। मनोविज्ञान के विकास-क्रम में भिन्न-भिन्न स्तरों पर इसके अर्थ में परिवर्तन किया जाता रहा है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मनोविज्ञान (Psychology) के शाब्दिक अर्थ तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सामान्य विवरण निम्नलिखित है–

मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Psychology)

‘मनोविज्ञान’ शब्द को अंग्रेजी में साइकॉलाजी (Psychology) कहते हैं, जो यूनानी भाषा के दो शब्दों साइके (Psyche) तथा लोगेस (Logas) से मिलकर बना है। साइके का अर्थ है-‘आत्मा’ (Soul) तथा लोगेस का अर्थ है-‘विज्ञान’ (Science)। इस प्रकार साइकॉलाजी का अर्थ हुआ आत्मा का विज्ञान (Science of soul), परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को अब स्वीकार नहीं किया जाता है।

मनोविज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(Historical Background of Psychology)

आधुनिक मनोविज्ञान के विकास से पूर्व इस विषय का अध्ययन दर्शनशास्त्र के ही अन्तर्गत किया जाता था। 16वीं शताब्दी के दार्शनिकों ने इसे मन का विज्ञान स्वीकार किया और इसके बाद शनैः-शनैः यह विषय दर्शनशास्त्र से अलग हो गया।

लिपजिंग विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला की स्थापना के साथ-साथ यह विषय प्रयोगात्मक विज्ञान की श्रेणी में आ गया और चेतना का विज्ञान स्वीकार किया गया। इस अर्थ में मनोविज्ञान की विषय-वस्तु चेतना की क्रियाओं का अध्ययन करना था। 1913 ई० में वाटसन द्वारा व्यवहारवाद की स्थापना के साथ ही मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान कहा जाने लगा। इस प्रकार समय में परिवर्तन के साथ-साथ मनोविज्ञान का अर्थ भी परिवर्तित होता गया।

मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र 9 मनोविज्ञान के प्रारम्भिक अर्थ से इसके आधुनिक एवं प्रचलित अर्थ तक पहुँचने में निम्नलिखित सोपान प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करते हैं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

प्रथम चरण: आत्म-दर्शन-ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व, प्रारम्भिक काल में मनोविज्ञान का अध्ययने दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत किया जाता था। यूनानी दार्शनिकों ने इस शास्त्र को ‘आत्म-दर्शन’ या ‘मानसिक दर्शन’ कहकर पुकारा था। प्लेटो ने मन और विचार को एक समझा तथा अरस्तू ने इसे ‘मानव की आत्मा का अध्ययन स्वीकार किया। इस प्रकार अपने प्रारम्भिक चरण में मनोविज्ञान का अर्थ ‘मानव की आत्मा के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था।

द्वितीय चरण : मानसिक व्यापार–सत्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य चिन्तन की क्रियाओं का क्षेत्र विकसित हुआ जिसने साहचर्यवाद की विचारधारा को पुष्ट किया। अब मानसिक रोगियों तथा अपराधियों का अध्ययन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से होने लगा था। इस चरण के प्रमुख विचारकों में रेन डेकार्ते, लाइबनीज, स्पीनोजा, बर्कले तथा डेविड ह्यूम का नाम प्रमुख है। अब मनोविज्ञान का अर्थ प्राणियों के मानसिक व्यापार तथा अनुभवों की ओर केन्द्रित होता जा रहा था।

तृतीय चरण : वैज्ञानिक प्रकृति-उन्नीसवीं शताब्दी के आस-पास मनोविज्ञान में जीव विज्ञान तथा भौतिक विज्ञान के नियमों के प्रवेश से मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक समझी जाने लगी। वुण्ट के प्रयासों से लिपजिग (जर्मनी) में मनोविज्ञान की प्रयोगशाला सबसे पहले स्थापित हुई और मेन अथवा चेतना के अनुभवों का मापन प्रयोगों की मदद से सम्भव हो सका। फलत: मनोविज्ञान का अर्थ मानव चेतना से मानव व्यवहार की ओर खिसकने लगा। इस चरण के विचारकों में वुण्ट के अलावा वेबर, गाल्टन, फेकनर, कैटल, जेम्स तथा ऐबिंगहास के नाम मुख्य हैं।

चतुर्थ चरण : व्यवहारवादी दृष्टिकोण–पावलोव के प्रतिबद्ध अनुक्रिया सिद्धान्त से प्रभावित वाटसन ने मनोविज्ञान को व्यवहार का नया अर्थ प्रदान किया। मैक्डूगल ने मनोविज्ञान को जीवित वस्तुओं के व्यवहार का विधायक विज्ञान बताया। मनोविश्लेषक फ्रायड ने अतृप्त इच्छाओं, कर्टलीविन ने ‘मनोवैज्ञानिक क्षेत्र की परिकल्पना’ तथा वर्दाईमर, कोहलर व कोफ्का ने ‘गेस्टाल्टवाद’ की क्विारधारा के माध्यम से मानव-व्यवहार को समझाया। स्पष्टत: बीसवीं शताब्दी के इस चरण में मनोविज्ञान को व्यवहारवादी दृष्टि से युक्त एक नया अर्थ मिला।।

मनोविज्ञान के ऐतिहासिक अध्ययन पर आधारित उपर्युक्त चारों सोपान स्पष्ट करते हैं कि आत्मा, मन और चेतना-सम्बन्धी अर्थ बदलता हुआ मनोविज्ञान धीरे-धीरे व्यवहार के विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। इस सन्दर्भ में मनोविज्ञान की बदलती हुई परिभाषाओं का विवरण निम्नवर्णित है

मनोविज्ञान की परिभाषा
(Definition of Psychology)

मनोविज्ञान की विषय-वस्तु को स्पष्ट करने के लिए इनमें मनोवैज्ञानिकों ने समय-समय पर मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। कुछ प्रमुख परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है –

(1) मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है (Psychology is the Science of Soul) – सर्वप्रथम प्लेटो ने मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान बताया। बाद में अरस्तू ने भी इसकी पुष्टि की।
आलोचना–लेकिन आत्मा का स्वरूप निर्धारित न होने के कारण यह परिभाषा मान्य न हो सकी। लोगों को आत्मा के अस्तित्व के विषय में नाना प्रकार की शंकाएँ होने लगीं। मनोवैज्ञानिकों ने आत्मा को मनोविज्ञान की खोज स्वीकार नहीं किया। इसके प्रमुख कारण निम्नवर्णित हैं –
(i) आत्मा एवं शरीर के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट नहीं किया गया था;
(ii) आत्मा के स्वरूप को वैज्ञानिक दृष्टि से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता था; और
(iii) इस विचारधारा के समर्थकों ने आत्मा के विविध अर्थ बताये; अत: विज्ञान की कसौटी पर मनोविज्ञान का आत्मा-विषयक अर्थ खरा नहीं उतर सका। फलतः अपने अस्थिर स्वरूप के कारण आत्मा की विज्ञान सम्बन्धी परिभाषा को मनोविज्ञान की विषय-वस्तु से निकाल दिया गया। विलियम जेम्स का कथन है, “मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ है—आत्मा का विज्ञान, किन्तु यह परिभाषौ अस्पष्ट है; क्योंकि आत्मा क्या है ? इस प्रश्न का हम सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सकते।”

(2) मनोविज्ञान सन का विज्ञान है (Psychology is the Science of Mind) –‘आत्मा का विज्ञान की परिभाषा अस्पष्ट होने के कारण विद्वानों ने मनोविज्ञान को ‘मन का विज्ञान’ कहकर परिभाषित किया। उनके अनुसार मनोविज्ञान ‘मन’ या ‘मस्तिष्क से सम्बन्धित क्रियाओं का अध्ययन है। यद्यपि इस परिभाषा के आधार पर मनोविज्ञान की विषय-सामग्री को बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक समझाया जाता रहा, किन्तु आत्मा के सदृश मन की यह परिभाषा भी लोकप्रिय न हो सकी।

आलोचना – आलोचकों ने मनोविज्ञान को मन का विज्ञान मानने वालों के विरुद्ध ये तर्क प्रस्तुत किये –

  1. यह स्पष्ट नहीं है कि मन और उसका स्वरूप क्या है ?
  2. मनोविज्ञान में केवल मानसिक प्रक्रियाओं (Mental Processes) अथवा वृत्तियों (Modes) का ही अध्ययन किया जाता है।
  3. इस परिभाषा से मनोविज्ञान की प्रकृति स्पष्ट नहीं होती, क्योंकि परिभाषा यह अभिव्यक्त नहीं कर पाती कि मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है या नियामक विज्ञान।
  4. इस परिभाषा में मनुष्यों और पशुओं के बाह्य व्यवहार को सम्मिलित नहीं किया गया जिसका इस शास्त्र में सबसे अधिक अध्ययन किया जाता है।
  5. मनोविज्ञान को मन का विज्ञान बताने वाले विद्वान् स्वयं ही उसके एक सर्वमान्य अर्थ का निर्धारण नहीं कर सके।

(3) मनोविज्ञान चेतना का विज्ञान है (Psychology is the Science of Consciousness) – मनोविज्ञान के विकास की प्रक्रिया ने विद्वानों को मानव-व्यवहार को गहराई से अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। फलस्वरूप चेतना के अनुभवों को व्यवहारों का आधार माना जाने लगा। विलहेम वुर्पट, विलियम जेम्स तथा जेम्स सली ने कहा कि मनोविज्ञान चेतना से सम्बन्धित विज्ञान है। विलियम जेम्स ने लिखा, ‘मनोविज्ञान की सर्वोत्तम परिभाषा ‘चेतना की दशाओं का वर्णन और व्याख्या के रूप में दी जा सकती है।’

आलोचना – ईस परिभाषा की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है –

  1. मनोविज्ञान का प्रचलित अर्थ चेतना’ जैसे किसी तत्त्व को स्वीकार नहीं करता, न ही चेतना कोई बाह्य पदार्थ है। आधुनिक मनोविज्ञान तो चेतन प्रक्रियाओं को मानता है।
  2. विद्वानों ने चेतना के अलग-अलग अर्थ बताये। कुछ विद्वान् इसे विशिष्ट द्रव्य मानते हैं, तो कुछ इसे धारा के रूप में स्वीकार करते हैं, तो कुछ चेतना की प्रक्रिया मानते हैं। वस्तुतः स्वयं इस मत के अनुयायी भी चेतना’ को एक निश्चित अर्थ प्रदान नहीं कर सके।
  3. मनोविज्ञान की परिभाषा भी यह स्पष्ट नहीं कर पायी कि मनोविज्ञान को विधायक विज्ञान कहा जाए या कि नियामक विज्ञान।
  4. चेतना के माध्यम से मानव-स्वभाव के सभी पक्षों को नहीं समझाया जा सकता। इसके लिए तो हमें मनुष्य के अचेतन, अर्द्धचेतन तथा अवचेतन सभी पक्षों को समझना होगा।
  5. चेतना सम्बन्धी यह परिभाषा मनुष्य के व्यवहार की व्याख्या करने में भी असमर्थ रही। मैक्डूगल ने तो यहाँ तक कहा, “चेतना मूल रूप से एक बुरा शब्द है। यह मनोविज्ञान के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा है कि यह शब्द सामान्य प्रयोग में आ गया।”

(4) मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है (Psychology is the Science of Behaviour) – बीसवीं शताब्दी के व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक जे० बी० वाटसन ने मनोविज्ञान को व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषित करते हुए लिखा, “एक ऐसा मनोविज्ञान लिखना सम्भव है …………… जिसकी ‘व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषा की जा सके।” विलियम मैक्डूगल के अनुसार, “मनोविज्ञान एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहारों का अध्ययन होता है।” वुडवर्थ ने भी इस विचारधारा को सहमति प्रदान करते हुए कहा है, “सर्वप्रथम मनोविज्ञान ने अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर उसने अपने मस्तिष्क का त्याग किया, तत्पश्चात् उसने अपनी चेतना का परित्याग किया, अब वह व्यवहार की विधि को अपनाता है।”

आलोचना – मनोविज्ञान की उपर्युक्त परिभाषाएँ भी आलोचनाओं से नहीं बच सकीं। इनकी परिसीमाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान बताने वाली इस परिभाषा में ‘व्यवहार’ शब्द का व्यापक अर्थ में प्रयोग नहीं किया। इसे अत्यन्त संकुचित अर्थों में प्रयोग किया गया है।
  2. इस विचारधारा के अनुसार व्यवहार का अर्थ वातावरण में उपस्थित उत्तेजना के प्रति प्राणी की अनुक्रिया है। इस भाँति मनोविज्ञान उत्तेजना-अनुक्रिया (Stimulus-Response) का अध्ययन कहा जा सकता है, जबकि इसमें आन्तरिक प्रक्रियाएँ भी सम्मिलित की जानी आवश्यक हैं।
  3. यह परिभाषा मनोविज्ञान की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करती; अर्थात् मनोविज्ञान को कैसा विज्ञान समझा जाए–नियामक विज्ञान अथवा विधायक विज्ञान।

मनोविज्ञान की आधुनिक परिभाषाएँ
(Modern Definitions of Psychology)

मनोविज्ञान की कुछ अन्य प्रमुख आधुनिक परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं –

  1. मैक्डूगल के अनुसार, “मनोविज्ञान एक ऐसा विधेयक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहार का अध्ययन होता है।”
  2. मर्फी के अनुसार, “मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो उन अनुक्रियाओं का अध्ययन करता है जिन्हें जीवित व्यक्ति अपने वातावरण के प्रति करते हैं।’
  3. चार्ल्स ई स्किनर के अनुसार, “मनोविज्ञान जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के प्रति प्राणी की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है। प्रतिक्रियाओं अथवा व्यवहार से तात्पर्य प्राणी की सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं, समायोजन, कार्य-व्यापारों तथा अनुभवों से है।”
  4. जलोटा का मत है, “मनोविज्ञान मानसिक क्रियाओं का अध्ययन है, जिनका प्रदर्शन शारीरिक व्यवहारों में होता है और प्रत्यक्ष अनुभवों द्वारा उनका निरीक्षण होता है।”
  5. थाउलैस के अनुसार, “मनोविज्ञान मानव के अनुभव एवं व्यवहार का यथार्थ विज्ञान है।”

निष्कर्ष – उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने पर मनोविज्ञान की निम्नलिखित विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता है.

  1. मनोविज्ञान मानव और पशु दोनों के व्यवहार का अध्ययन करने वाला एक विधायक विज्ञान है।
  2. मनोविज्ञान मानव को मनः शारीरिक प्राणी अर्थात् मन और शरीर से युक्त प्राणी मानता है।
  3. प्रत्येक मानव एक वातावरण में रहता है और उसमें उपस्थित विभिन्न तत्त्वों से क्रिया-प्रतिक्रिया करता है, जिसे ‘मानव-व्यवहार’ कहते हैं। मनोविज्ञान इसी मानव-व्यवहार के भिन्न-भिन्न पक्षों का क्रमबद्ध अध्ययन करता है।
  4. मनोविज्ञान प्राणी के व्यवहार पर वातावरण के भौतिक तथा अभौतिक प्रभावों का अध्ययन करता है तथा अन्तिम रूप से प्राणियों की ज्ञानात्मक, क्रियात्मक तथा संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है।

मनोविज्ञान की उपयुक्त परिभाषा – मनोविज्ञान की उपयुक्त परिभाषाओं की समीक्षा करने से यह ज्ञात होता है कि इनमें से कोई भी परिभाषा सर्वमान्य कहलाने की अधिकारी नहीं है। प्रत्येक परिभाषा में कुछ-न-कुछ दोष अवश्य है। अत: यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि एक आदर्श परिभाषा की कसौटी पर किस परिभाषा को खरा समझा जाए। यद्यपि मैक्डूगल और वुडवर्थ की परिभाषाएँ एक ही सीमा तक तर्क संगत समझी जाती हैं, तथापि उसके आधार पर यह जोड़ना उचित होगा कि “मनोविज्ञान प्राणियों के व्यवहार का विधायक विज्ञान है और वातावरण के प्रति उन समस्त अनुक्रियाओं का क्रमबद्ध अध्ययन करता है जो उसके परिवेश के साथ समायोजन में सहायक होते हैं।”

प्रश्न 2.
आधुनिक मनोविज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में क्यों रखा जाता है ?
या
आप किस प्रकार सिद्ध करेंगे कि मनोविज्ञान एक विज्ञान है ?
या
मनोविज्ञान की प्रकृति का उल्लेख करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।”
उत्तर :
मनोविज्ञान की प्रकृति
(Nature of Psychology)

प्रायः मनोविज्ञान की प्रकृति के विषय में यह प्रश्न किया जाता है कि इसे ‘विज्ञान’ कहा जाये या ‘कला’ और यदि यह एक विज्ञान है तो किस प्रकार का विज्ञान है ? विज्ञान का शाब्दिक अर्थ है-‘विशिष्ट ज्ञान अथवा किसी वस्तु या क्षेत्र के बारे में क्रमबद्ध ज्ञान। मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों के अनुरूप ही सभी विशेषताएँ पायी जाती हैं और यह अपनी विषय-वस्तु का क्रमबद्ध अध्ययन विशेष वैज्ञानिक तथा प्रयोगात्मक विधि के माध्यम से करता है।

आधुनिक मनोविज्ञान एक विज्ञान है।
(Modern Psychology is a Science)

आधुनिक मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह उच्च वैज्ञानिक, सांख्यिकीय तथा गणितीय विधियों का प्रयोग किया जाता है। रॉबिन्सन, मॉर्गन तथा किंग आदि विद्वानों ने चार ऐसी विशेषताओं का वर्णन किया है जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान एक विज्ञान है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) आनुभविक अध्ययन – मनोविज्ञान में प्राणी के व्यवहारों एवं मानसिक क्रियाओं का अध्ययन प्रयोग, तथा निरीक्षण विधि के द्वारा किया जाता है। अध्ययन के परिणाम वस्तुनिष्ठ और पूर्णतया विश्वसनीय होते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रयोग के परिणामों की वैधता की जाँच प्रयोग की पुनरावृत्ति द्वारा कर सकते हैं। इसी भाँति आँकड़ों की जॉच भी की जा सकती है। विषय-वस्तु का ऐसा आनुभविक अध्ययुन विज्ञान के अन्तर्गत ही सम्भव है। इस तरह मनोविज्ञान एक विज्ञान की श्रेणी में आ जाता है।

(2) क्रमबद्ध दृष्टिकोण का सिद्धान्त – मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनुष्य तथा पशु के व्यवहारों के विषय में प्रयोग एवं निरीक्षण विधि द्वारा जो आँकड़े प्राप्त किये जाते हैं, उन्हें अलग-अलग बिखरे हुए नहीं छोड़ा जाता, अपितु उन्हें क्रमबद्ध रूप से सारणियों में व्यवस्थित किया जाता है। अन्य प्राकृतिक विज्ञानों के समान, मनोवैज्ञानिक सांख्यिकीय एवं गणितीय विधियों के आधार पर सिद्धान्तों को प्रतिपादन करते हैं जिससे मनुष्य एवं पशु के व्यवहारों के बारे में भविष्यवाणी करने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, थॉर्नडाइक ने बिल्ली पर प्रयोग करके उसके व्यवहार सम्बन्धी आँकड़ों को क्रमबद्ध किया और मनोविज्ञान का एक प्रमुख सिद्धान्त ‘प्रयत्न एवं भूल का सिद्धान्त’ (Trial and Error Theory) प्रतिपादित किया।

(3) मापन की सुविधा – यथार्थ मापन की सुविधाएँ होने पर ही किसी विषय को विज्ञान कहा जा सकता है। मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह मापन की सुविधा उपलब्ध है। मनोवैज्ञानिकों ने प्राणियों के व्यवहार तथा मानसिक प्रक्रियाओं को मापने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रविधियाँ विकसित की हैं, जिन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Test) कहा जाता है। इस प्रकार से विषय-वस्तु का मापन एक विज्ञान के अन्तर्गत ही सम्भव है।

(4) पदों की परिभाषा – किसी विज्ञान का मनुष्य गुण यह भी है कि उसके पद (Terms) तथा सम्प्रत्यय (Concepts) सही ढंग से परिभाषित होते हैं। मनोविज्ञान के प्रमुख पद; जैसे-प्रेरणा, संवेदना, चिन्तन, अधिगम तथा बुद्धि आदि संक्रियात्मक एवं वैज्ञानिक ढंग से परिभाषित किये गये हैं। इसका यह लाभ है कि मनोविज्ञान की विषय-वस्तु को यथार्थ मापन सम्भव हो जाता है, उसका अध्ययन वस्तुनिष्ठ हो जाता है तथा पूर्वकथन भी सही होता है।

उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर निर्विरोध कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान का अध्ययन आनुभविक है। इसकी विषय-वस्तु से सम्बन्धित सभी तथ्य क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित हैं जिनके आधार पर किसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया ज़ सकता है। इसमें वैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा व्यवहार एवं मानसिक क्रियाओं का मापन किया जा सकता है तथा इसके समस्त पद भली प्रकार परिभाषित हैं और इसी कारण मनोविज्ञान भी एक विज्ञान है।

मनोविज्ञान की वैज्ञानिकता की विशेषताएँ
(Characteristics of Psychology as a Science)

मनोविज्ञान को विज्ञान सिद्ध करने वाली कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) वैज्ञानिक पद्धति – मनोविज्ञान के अन्तर्गत किये जाने वाले सभी अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होते हैं। विज्ञान की प्रयोग विधि में प्रयोगशाला, यन्त्र तथा उपकरणों का अधिकाधिक उपयोग किया जाता है एवं वांछित परिस्थितियों को नियन्त्रित किया जा सकता है। आजकल मनोवैज्ञानिक अध्ययन में प्रयोग विधि की इन सभी शर्तों का पालन किया जाता है। अत: मनोविज्ञान की वैज्ञानिक पद्धति स्पष्ट एवं निश्चित कही जा सकती है।

(2) व्यापकता – मनोविज्ञान एक व्यापक अध्ययन है, जिसमें मनुष्य से लेकर पशु तक के व्यवहारों को सम्मिलित किया गया है। मनोविज्ञान मानव तथा पशु-समाज के अन्तर्गत आने वाली समस्त इकाइयों का पृथक् तथा समूहगत दोनों प्रकार से अध्ययन करता है। इतना ही नहीं, यह तो गर्भ में पल रहे शिशु से लेकर प्रौढ़ मनुष्य तक की समस्त अवस्थाओं में उसके विकास तथा क्रियाओं का भी अध्ययन करता है।

(3) विधायक विज्ञान या तथ्यात्मकता – मनोविज्ञान की एक विशेषता तथ्यात्मकता है। यह एक विधायक विज्ञान है जो प्रत्येक वस्तु का अध्ययन तथ्य के रूप में करता है। इसका अर्थ यह है कि यह ‘क्या है ?’ का अध्ययन करता है। इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि क्या होना चाहिए ? विधायक विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान का एक गुण तटस्थता भी है, क्योंकि तथ्यात्मक अध्ययन के परिणाम न तो किसी के पक्ष में होते हैं और न किसी के विपक्ष में। वे तो केवल तथ्य को प्रकट करते हैं।

(4) सार्वभौमिकता – मनोविज्ञान के सिद्धान्त सार्वभौमिक (universal) होते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों पर देश, काल एवं पात्र की भिन्नता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि परिस्थितियाँ एकसमान हैं तो प्रत्येक समय में, प्रत्येक स्थान पर मनोविज्ञान के सिद्धान्तों को सदा ही प्रमाणित किया जा सकता है।

(5) कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन – प्रत्येक क्रिया अथवा प्रघटना का कुछ-न-कुछ कारण अवश्य होता है। इसी प्रकार प्रत्येक मानव-व्यवहार के पीछे भी कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। मनोविज्ञान इस बात का विश्लेषण करती है कि विशिष्ट व्यवहार का क्या कारण है एवं किस विशिष्ट व्यवहार से प्रभावित होकर मनुष्य क्या व्यवहार करेगा ? कार्य-कारण सम्बन्धों के अध्ययन से मनोविज्ञान व्यवहार के सामान्य नियम निर्धारित करता है। ये नियम और सिद्धान्त सही तथा निश्चित होते हैं।

(6) पूर्वानुमान या भविष्यवाणी – मनोवैज्ञानिक पूर्वानुमान या भविष्यवाणियाँ कार्य-कारण सम्बन्ध पर आधारित होती हैं। यदि हम एक घटना (अर्थात् कारण) को जानते हैं तो हम दूसरी घटना (अर्थात् परिणाम) की भविष्यवाणी कर सकते हैं। आधुनिक समय में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से मानव व्यवहार के सम्बन्ध में पूर्वानुमान किये जा सकते हैं। पूर्वानुमान उचित व्यवसाय के लिए उचित व्यक्ति का चुनाव करने में मदद करते हैं।

निष्कर्षतः मनोविज्ञान की ये विशेषताएँ; यथा—वैज्ञानिक पद्धति, व्यापकता, तथ्यात्मकता, सार्वभौमिकता, कार्य-कारण सम्बन्ध तथा पूर्वानुमान; इसे पूरी तरह विज्ञान बना देते हैं। हाँ, मनोविज्ञान तथा प्राकृतिक विज्ञानों के बीच एक आधारभूत अन्तर अवश्य है। मनोविज्ञान प्राणियों के व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है, जबकि प्राकृतिक विज्ञान स्थूल तत्त्वों से सम्बन्ध रखते हैं।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान का क्षेत्र बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि इसका क्षेत्र दिनो-दिन बढ़ता जा रहा या मनोविज्ञान के बढ़ते हुए क्षेत्र पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
या
‘बाल मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं? ।
उत्तर :
मनोविज्ञानं का क्षेत्र
(Scope of Psychology)

मनोविज्ञान का क्षेत्र जीवन की विविध परिस्थितियों में मानव के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है। मनोविज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में उन समस्त विषय-सामग्रियों को शामिल किया जाता है जो मानव-जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित हैं तथा मानव-कल्याण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इस भाँति, मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है जिसका सम्पूर्ण एवं विशद वर्णन करना यहाँ प्रायः असम्भव है। अत: हम मनोविज्ञान से सम्बन्धित उन प्रमुख शाखाओं का विवरण प्रस्तुत करेंगे जिनमें इसकी अध्ययन-सामग्री को विभाजित किया गया है –

(1) सामान्य मनोविज्ञान – सामान्य मनोविज्ञान मानव-व्यवहार के सामान्य पक्षों तथा उसके सैद्धान्तिक स्वरूपों का अध्ययन करता है। यह मनोविज्ञान का एक व्यापक क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा, अध्ययन की विधियाँ, संवेग, प्रेरणा, प्रत्यक्षीकरण, सीखना, स्मृति, अवधान, चिन्तन एवं कल्पना, बुद्धि एवं व्यक्तित्व और संवेदना आदि का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान के गहन अध्ययन से पूर्व यह आवश्यक समझा जाता है कि मनोविज्ञान के समस्त क्षेत्रों के सामान्य सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाए।

(2) वैयक्तिक मनोविज्ञान – वैयक्तिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर व्यक्ति-विशेष के मनोविज्ञान का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। हम जानते हैं कि विश्व के कोई भी दो व्यक्ति सभी लक्षणों में एकसमान नहीं हो सकते। इसी आधार पर व्यक्तित्व के भी विभिन्न प्रकार हैं। पी० टी० यंग (Young) ने मानव व्यक्तित्व को तीन भागों में बाँटा है–अन्तर्मुखी, बहिर्मुखी तथा उभयमुखी। वैयक्तिक मनोविज्ञान इन तीनों ही प्रकार के व्यक्तित्वों का व्यापक अध्ययन करता है।

(3) वैयक्तिक भिन्नता का मनोविज्ञान – अध्ययन बताते हैं कि व्यक्तियों में वैयक्तिक भिन्नता शारीरिक के साथ-ही-साथ मानसिक स्तर पर भी होती है। मनोविज्ञान की यह शाखा इन भिन्नताओं को समझने में हमारी सहायता करती है। मनोवैज्ञानिक, भिन्नताओं का कारण जानने के अतिरिक्त उनका मापन भी करते हैं। मापन के लिए मानसिक परीक्षणों का सहारा लिया जाता है। वैयक्तिक भिन्नताओं को मापने के लिए अनेक परीक्षणों का निर्माण किया गया है; जैसे-व्यक्तित्व प्रश्नावली, उपलब्धि परीक्षण, विशेष योग्यता परीक्षण तथा बुद्धि परीक्षण आदि। परीक्षणों का निर्माण करते समय वस्तुनिष्ठ मापन को महत्त्व प्रदान किया जाता है।

(4) समाज मनोविज्ञान – व्यक्तियों से मिलकर समाज बनता है। समाज का वास्तविक विकास तभी सम्भव है जब व्यक्ति’ और ‘समूह’ के मनोविज्ञान में सुन्दर सामंजस्य हो; अतः समाज मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में करता है। मनोविज्ञान की यह शाखा सामाजिक परिवर्तनों के साथ-ही-साथ भीड़, श्रोता समूह, प्रचार, विज्ञापन आदि का मनोवैज्ञानिक अध्ययनं करती है। समाज मनोवैज्ञानिक सामाजिक क्षेत्रों में व्याप्त तनावों, संघर्षों, अपराधों तथा पूर्वाग्रहों का अध्ययन कर उनके निदान तथा उपचार-सम्बन्धी सुझाव देता है।

(5) बाल मनोविज्ञान – बाल मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है। इसमें गर्भस्थ शिशु से लेकर बारह वर्ष तक की आयु के बालक-बालिकाओं के विकास का क्रमिक रूप से अध्ययन किया जाता है। बाल्यावस्था में शरीर और मन का तेजी से विकास होता है। इस अवस्था में बालक नवीन प्रत्ययों को तेजी से सीखता है तथा इस काल के प्रभाव एवं आदतें स्थायी होती हैं। यही कारण है। कि बालक के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा, शिक्षा की व्यवस्था, व्यवहार संशोधन तथा सामंजस्य से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में बाल मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

(6) किशोर मनोविज्ञान – किशोरवस्था मानव-जीवन का एक नाजुक तथा महत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवस्था में मानव-व्यवहार का विशिष्ट अध्ययन करने के लिए मनोविज्ञान की एक पृथक् शाखा का विकास हुआ जिसे किशोर-मनोविज्ञान कहा जाता है। यह शाखा तेरह वर्ष से लेकर उन्नीस वर्ष तक की आयु के बालक-बालिकाओं के विकास का क्रमबद्ध अध्ययन करती है। किशोरावस्था में आने वाले परिवर्तनों के कारणों का विश्लेषण कर मनोवैज्ञानिक उनके नियन्त्रण के उपाय बताते हैं जिससे व्यक्तित्व के सन्तुलित विकास तथा भावी समायोजन में सहायता मिलती है। इस भाँति किशोर मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के अध्ययन का अत्यन्त उपयोगी क्षेत्र है।

(7) उत्पत्तिमूलक मनोविज्ञान – व्यक्ति, जाति, प्रजाति तथा जातीय नस्लों की उत्पत्ति तथा उनके क्रमिक विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा में किया जाता है. उसे उत्पत्तिमूलक मनोविज्ञान कहते हैं। इस शाखा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है, क्योंकि इसके अन्तर्गत शिशु, बालक, किशोर और प्रौढ़ आदि समस्त वर्गों का सामूहिक अध्ययन किया जाता है।

(8) विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान – मनोविज्ञान की इस शाखा के अन्तर्गत मानव-व्यवहार से सम्बन्धित स्वाभाविक क्रियाओं का विश्लेषण किया जाता है। इससे व्यवहार का अध्ययन व्यवस्थित और सुविधाजनक बन जाता है। इस प्रकार के अध्ययन में मस्तिष्क की जटिल क्रियाओं को उनके भिन्न-भिन्न भागों में बाँट दिया जाता है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत प्रयोग की जाने वाली विधियों में अन्तर्दर्शन, निरीक्षण तथा प्रयोग विधि मुख्य हैं।

(9) मनो-भौतिक मनोविज्ञान – मनोविज्ञान की इस आधुनिक एवं महत्त्वपूर्ण शाखा को विकसित करने का श्रेय वेबर तथा फिचनर को दिया जाता है। इसमें मानसिक क्रियाओं, संवेदनाओं तथा भौतिक उद्दीपनों के मध्य परिमाणात्मक सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं। उदाहरणार्थ, मनो-भौतिक मनोविज्ञान के नियम बताते हैं कि प्रकाश के उद्दीपनों की प्रबलता का प्रकाश की संवेदना पर क्या प्रभाव पड़ता है तथा दो उद्दीपनों को अलग-अलग पहचानने के लिए कितना न्यूनतम अन्तर होना चाहिए।

(10) मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान – आधुनिक मनोविज्ञान की अत्यधिक महत्त्वपूर्ण शाखा सिगमण्ड फ्रॉयड द्वारा प्रतिपादित मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान है। फ्रॉयड ने अचेतन मन में निहित इच्छाओं को ज्ञात करके उनके कारणों का पता विश्लेषण के द्वारा लगाया। फ्रॉयड ने स्वप्न, दिवास्वप्न, हास्य-विनोद, भूलना, लिखने-बोलने तथा कार्य करने सम्बन्धी त्रुटियों के अलावा कला एवं धर्म आदि का भी विश्लेषण करके उनके अचेतन कारणों का पता लगाया। इससे न केवल मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक विशाल एवं रोचक साहित्य का सृजन हुआ, अपितु मानसिक रोगियों के लिए मनोचिकित्सा पद्धति का भी विकास हुआ।

(11) प्रेरणात्मक मनोविज्ञान – मनोविश्लेषणात्मक तथा असामान्य मनोविज्ञान से विकसित ज्ञान की इस शाखा का एक नाम ‘सामान्य प्रेरणा का मनोविज्ञान’ भी है। इसके अन्तर्गत प्राणी की उन आन्तरिक क्रियाओं की व्याख्या की जाती है जिन्हें वह बाह्य जगत में सन्तुष्ट करना चाहता है। प्रायः देखने में आता है कि मनुष्य की इच्छाओं के सन्तुष्ट न हो पाने के कारण उसके व्यक्तित्व का सन्तुलन और सामाजिक समायोजन बिगड़ने लगता है—मनुष्य की ऐसी उलझनों, आदतों तथा इच्छाओं का अध्ययन और व्यवहार के विविध ढंगों की खोज प्रेरणात्मक मनोविज्ञान के अन्तर्गत की जाती है।

(12) लोक मनोविज्ञान – लोक मनोविज्ञान, आधुनिक मनोविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है। जिसमें आदिवासी जातियों के क्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान की यह शाखा इन जातियों में पाए जाने वाले अन्धविश्वासों, पौराणिक कथाओं, धर्म, संगीत तथा कला आदि में निहित मनोवैज्ञानिक तथ्यों की विवेचना करती है और उनकी तुलना आधुनिक समाजों से करती है।

(13) पशु-मनोविज्ञान – पशु मनोविज्ञान का विकास पशुओं और मनुष्यों की समानता के आधार पर हुआ। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से सम्बन्धित ऐसे अनेक प्रयोग हैं जिन्हें सीधे मनुष्यों पर आरोपित नहीं किया जा सकता; जैसे–मस्तिष्क के किसी भाग को निकालकर उसका प्रभाव देखना तथा आनुवंशिकता सम्बन्धी प्रयोग। ऐसे परीक्षण पशुओं पर सरलता से किये जा सकते हैं तथा उनके निष्कर्षों की तुलना मानव से सम्बन्धित तथ्यों से की जा सकती है। इस प्रकार के अध्ययनों में पशुओं की मूल प्रवृत्तियाँ तथा उनके सीखने के ढंग शामिल हैं।

(14) शारीरिक मनोविज्ञान – यद्यपि मनोविज्ञान मानसिक क्रियाओं का अध्ययन है, किन्तु मन का शरीर से अटूट सम्बन्ध है। मानव-व्यवहार तथा स्वभाव को समझने के लिए विविध शारीरिक अंगों की संरचना तथा उनकी क्रियाओं का अध्ययन अपरिहार्य है। यही कारण है कि मनोविज्ञान की यह शाखा मस्तिष्क, स्नायु मण्डल, संग्राहकों, प्रभावकों तथा मांसपेशियों का विधिवत् अध्ययन करती है। और प्राप्त ज्ञान का उपयोग मानव-व्यवहार की व्याख्या के लिए करती है।

(15) परा-मनोविज्ञान – मनुष्य के विलक्षण व्यवहारों को ‘अलौकिक घटना या परा-सामान्य घटना कहा जाता है; जैसे–स्वप्न में किसी व्यक्ति को देखकर अगले दिन उससे आश्चर्यजनक भेट हो जाना, किसी सफर में चलने से पूर्व न जाने की अप्रकट चेतावनी मिलना और सफर में दुर्घटना का होना, किसी दूर के प्रियजन का विचार मन में आना और अप्रत्याशित रूप से उसका आ जाना। इन अलौकिक या परा-सामान्य घटनाओं का अध्ययन मनोविज्ञान की जो शाखा करती है उसे परामनोविज्ञान कहा जाता है।

(16) प्रयोगात्मक मनोविज्ञान – प्रयोगात्मक मनोविज्ञान आधुनिक मनोविज्ञान का सबसे प्रमुख क्षेत्र है जो प्रयोगों की सहायता से मानसिक क्रियाओं यथा-स्मृति, बुद्धि, सीखना, संवेग, संवेदना आदि प्रत्ययों का अध्ययन करता है और इस भाँति मनोविज्ञान को विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करता है। मनोविज्ञान की इस शाखा के विकास का श्रेय विलहेम वुण्ट, कैटेल तथा फ्रांसिस गाल्टन जैसे मनोवैज्ञानिकों को जाता है।

(17) असामान्य मनोविज्ञान – मनोविज्ञान में प्राणी के सामान्य व्यवहार के अतिरिक्त उसके असामान्य व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान की यह शाखा मन की असामान्य अवस्थाओं तथा स्थायी एवं अस्थायी मनोविकृतियों का अध्ययन करती है। इसके अन्तर्गत सनकीपन, भ्रान्तियाँ, अन्धापन, वातरोग, वातोन्माद (हिस्टीरिया), आतंक (फोबिया), हकलाना, चरित्र-विकार, असामाजिक व्यक्तित्व, स्नायु रोग, मानसिक दुर्बलता तथा विविध प्रकार के उन्माद शामिल किये जाते हैं। उपचार की व्यवस्था के कारण असामान्य मनोविज्ञान ने एक नयी शाखा ‘चिकित्सा मनोविज्ञान को भी जन्म दिया है।

(18) व्यावहारिक मनोविज्ञान – यदि सामान्य मनोविज्ञान मानव के स्वभाव तथा व्यवहार के सैद्धान्तिक पक्षों का अध्ययन करता है तो व्यावहारिक मनोविज्ञान इन सिद्धान्तों अथवा नियमों की मानव-जीवन में उपयोगिता खोजता है। व्यावहारिक मनोविज्ञान का अध्ययन मानव एवं उसके समाज की समस्याओं के समाधान से सीधा सम्बन्ध रखता है और इस प्रकार एक अत्यन्त उपयोगी क्षेत्र समझा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण, शिक्षा एवं व्यवसाय के लिए निर्देशन, मानसिक स्वास्थ्य, अपराध, सामूहिक तनाव, प्रचार एवं विज्ञापन, औद्योगिक तथा कानूनी मनोविज्ञान विशेष रूप से सम्मिलित हैं।

(19) शिक्षा-मनोविज्ञान – शिक्षा के क्षेत्र की अनेक समस्याओं का समाधान सामान्य मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर किया जाता है। इनमें मुख्य समस्याएँ बच्चों के शिक्षण, अधिगम, योग्यताओं, अभिप्रेरणा, आकांक्षा-स्तर, पाठ्यक्रम, परीक्षा, उपलब्धि तथा भविष्य योजनाओं से सम्बन्धित होती हैं। शिक्षा-मनोविज्ञान इन सभी समस्याओं का अध्ययन कर उचित समाधान प्रस्तुत करता है।

(20) पर्यावरणीय-मनोविज्ञान – पर्यावरणीय-मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की आधुनिकतम (Recent) शाखाओं में से एक है। इस विज्ञान की विषय-वस्तु मौसम, जलवायु, मृदा तथा भौगोलिक दृश्य-इन चारों क्षेत्रों से सम्बन्धित है। मनोविज्ञान की इस शाखा के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण को मानव-व्यवहार एवं उसकी मानसिक अवस्थाओं से सम्बद्ध करके अध्ययन किया जाता है।

मनोविज्ञान का क्षेत्र एवं विषय-विस्तार दिन-प्रतिदिन वृद्धि कर रहा है। आधुनिक युग में जीवन का कोई भी क्षेत्र एवं पक्ष ऐसा नहीं है जो मनोविज्ञान के अध्ययन-क्षेत्र से बाहर हो। सच तो यह है कि मनोविज्ञान की विस्तृत होती जा रही परिधि को संक्षिप्त विवरण में सीमित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 4
मानव-जीवन में मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
विभिन्न उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए कि मानव-जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में मनोविज्ञान उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर :
मनोविज्ञान का मूल्य अथवा उपयोगिता एवं महत्त्व
(Value or Utility and Importance of Psychology)

मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान ने मूल्यवान योगदान प्रदान किया है। मनोविज्ञान के अध्ययन ने मानव-जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है जिसके परिणामस्वरूप मानव के दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तनों का जन्म हुआ। इस शास्त्र के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान ने मानव की व्यक्तिगत तथा सामूहिक समस्याओं का समाधान खोजने में पर्याप्त सहायता दी है। इस भाँति मनोविज्ञान को मनुष्य के दैनिक जीवन में विशेष महत्त्व है। मानव-जीवन को सुखमय बनाने में | मनोविज्ञान की उपयोगिता निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णित है

(1) व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में मनोविज्ञान की उपयोगिता – आधुनिक मानव स्वयं को गम्भीर समस्याओं से घिरा पाता है। ये समस्याएँ जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित हैं और मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक एवं आध्यात्मिक विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं। मनोविज्ञान का ज्ञान इन अवरोधों को हटाने में हमारी पर्याप्त सहायता करता है। बहुत-सी शारीरिक समस्याओं का समाधान मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा सम्भव है। अनुकूलन की समस्या भी मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा हल होती है। मनोविज्ञान के ज्ञान से विभिन्न मानसिक रोगों तथा समस्याओं को दूर करने में सहायता मिलती है। मानव व्यक्तित्व के सन्तुलन तथा विकास में मनोवैज्ञानिक निर्देशन की विशिष्ट भूमिका है। अच्छी आदतों तथा उत्तम चरित्र के निर्माण में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होते हैं। इस भाँति मनुष्य की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में मनोविज्ञान के ज्ञान की अनिवार्यता निर्विवाद है।

(2) शिक्षा के क्षेच्च में मनोविज्ञान की उपयोगिता – मनोविज्ञान ने शिक्षा के क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों को जन्म दिया है। मनोविज्ञान से सम्बन्धित खोजों ने सम्पूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया का दृष्टिकोण ही बदल दिया है। आधुनिक शिक्षा का केन्द्र-बिन्दु शिक्षक से हटकर ‘बालक’ हो गया है अर्थात् शिक्षा ‘बाल केन्द्रित हो गयी है। बालक को दण्ड का भय दिखाकर सीखने के लिए बाध्य नहीं किया जाता; अपितु उसकी भावनाओं को समझकर उसमें अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाये जाते हैं। बालक को मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर सीखने एवं शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। मनोविज्ञान ने शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों में क्रान्तिकारी परिवर्तन उपस्थित किये हैं–पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियाँ, शिक्षण-सहायक सामग्री, अभिप्रेरणा के तरीकों तथा सीखने के सिद्धान्तों में मनोविज्ञान का अपूर्व योगदान स्पष्ट है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं का समाधान सरल हो गया है।

(3) अपराधियों के सुधार तथा अपराधों के नियन्त्रण में मनोविज्ञान की उपयोगिता – मनोविज्ञान के ज्ञान ने अपराध जगत् को एक अभूतपूर्व सकारात्मक दिशा प्रदान की है। पहले अपराधियों को शारीरिक यन्त्रणाओं के माध्यम से सुधारने के प्रयास किये जाते थे, किन्तु आज मनोविज्ञान ने इस धारणा को मूलतः बदल दिया है। मनोविज्ञान की मान्यता है कि मनुष्य जन्म से अपराधी नहीं होता, अपितु समाज की परिस्थितियाँ उसे अपराधी बना देती हैं। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों तथा कारणों का विश्लेषण कर अपराधी में सुधार हेतु प्रयास किये जाने चाहिए। अतः दण्ड के स्थान पर सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए तथा परिस्थितियों में सुधार का प्रयास किया जाना चाहिए। इसी कारण से आजकल सुधार-गृहों, खुले जेलखानों, बोस्टेल स्कूलों एवं प्रोबेशन की व्यवस्था की गयी है। मनोविज्ञान ने बाल-अपराधियों के लिए भी उदारवादी एवं सुधारात्मक समाधान प्रस्तुत किये हैं। मनोविज्ञान का ज्ञान समाज में अपराधों को नियन्त्रित करने में भी सहायक सिद्ध होता है। यदि पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में सुधार कर लिया जाये तो निश्चित रूप से क्रमश: बाल-अपराधों एवं अपराधों में कमी आ सकती है।

(4) चिकित्सा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व –  शिक्षा एवं अपराध के अतिरिक्त-मभोविज्ञान का चिकित्सा के क्षेत्र में भी विशेष महत्त्व है। दुर्भाग्य से, पहले मन्द बुद्धि वाले व्यक्तियों तथा मानसिक रोगियों के साथ समाज का व्यवहार अच्छा नहीं था। विक्षिप्त अथवा पागल व्यक्तियों के रोग को भूत-प्रेत आदि की आपदाओं का शिकार माना जाता था। उन्हें जंजीरों से बाँधकर रखा जाता था और उन पर अमानवीय अत्याचार किये जाते थे। इस प्रकार के अन्धविश्वासों का खण्डन करके मनोविज्ञान ने इस प्रकार के रोगों के कारणों का पता लगाकर समुचित चिकित्सा की पद्धति विकसित की है। इस भाँति, मनोविज्ञान मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता से मनोरोगियों के उपचार की व्यवस्था करता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार कुछ शारीरिक रोगों का कारण भी मनोवैज्ञानिक ही होता है तथा उनका उपचार भी मनोवैज्ञानिक उपायों द्वारा किया जा सकता है।

(5) उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र में उपयोगिता – मनोविज्ञान ने उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र को नये आयाम दिये हैं। औद्योगिक मनोविज्ञान’ नामक मनोविज्ञान की एक शाखा तो विशेषत: औद्योगिक क्षेत्र की समस्याओं का अध्ययन करती है तथा उनका समाधान प्रस्तुत करती है। उद्योगों में हड़ताल तथा तालाबन्दी की समस्याएँ, मजदूर तथा मिल-मालिकों के आपसी सम्बन्ध, कर्मचारियों के कार्य की दशाओं में सुधार और कर्मचारियों की भर्ती सम्बन्धी समस्याएँ आदि ऐसे विषय हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक आधार की आवश्यकता है। मनोविज्ञान ने मानवीय क्षमताओं तथा कौशल के आधार पर श्रम विभाजन का विचार किया, जिससे कम श्रम तथा समय में बेहतर उत्पादन की युक्तियाँ विकसित की गईं। मनोवैज्ञानिक खोजों ने प्रचार तथा विज्ञापन के क्षेत्र को अत्याधुनिक और सर्वाधिक उपयोगी बना दिया है।

(6) मनोविज्ञान स्वयं तथा दूसरों को समझने में सहायक – मनोविज्ञान का अध्ययन मनुष्य के निजी व्यक्तित्व को समझने में सहायता देता है। मनोविज्ञान के ज्ञान से व्यक्ति अपनी शक्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों तथा स्वभाव से परिचित होता है और उनके समुचित विकास हेतु प्रयास करता है। मनोविज्ञान के अध्ययन से व्यक्ति अपने व्यवहार-सम्बन्धी कमियों का ज्ञान प्राप्त कर उनमें संशोधन करने की चेष्टा करता है। इस भाँति वह स्वयं को सहज ही वातावरण से समायोजित कर लेता है। इसके अतिरिक्त मनोविज्ञान के जोन से दूसरे लोगों से भिन्न व्यवहार के कारणों तथा स्वभाव का पता चलता है जिससे उनके साथ समायोजन में सहायता मिलती है। इस प्रकार से मनोविज्ञान का अध्ययन मात्र स्वयं को समझने में ही सहायक नहीं है बल्कि इससे दूसरों को समझने में भी सहायता मिलती है।

(7) राजनीतिक क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – आधुनिक राजनीति में मनोविज्ञान का सक्रिय योगदान है। जनता की इच्छा के विरुद्ध चलने वाली सरकारें स्थायी नहीं होतीं तथा थोड़े समय में ही गिर जाती हैं। चुनाव के दौरान प्रत्याशियों को अपने प्रचार में मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाने होते हैं। चुनाव-प्रचार जितना अधिक मनोवैज्ञानिक होगा, चुनाव में उतनी ही अधिक सफलता प्राप्त होगी। प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत शासन प्रबन्ध चलाने, कानून बनाने तथा सुधारवादी प्रस्तावों के लिए भी मनोवैज्ञानिक समझ होनी चाहिए। देश के नेतागण अपने पद तथा राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा हेतु मनोविज्ञान का सहारा लेते हैं। वे जनता के प्रति मनोवैज्ञानिक ढंग से अपना प्रेम, सहानुभूति, सम्मान या अपनी उपलब्धियाँ प्रस्तुत करते हैं। जनक्रान्ति को रोकने तथा जनसमूह पर नियन्त्रण रखने के लिए भी मनोविज्ञान का ज्ञान आवश्यक है। इस प्रकार, राजनीतिक क्षेत्र में मनोविज्ञान का अध्ययन मूल्यवान समझा जाता है। आज वही नेता लोकप्रिय हो सकता है जो जन-साधारण के मनोविज्ञान का ज्ञाता है।

(8) सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु मनोविज्ञान की उपयोगिता – प्रत्येक सामाजिक समस्या का अपना मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। आज भारतीय समाज विभिन्न कुरीतियों, विषमताओं तथा समस्याओं का शिकार है; उदाहरण के लिए-दहेज-प्रथा, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद, बेरोजगारी तथा हिंसा की प्रवृत्तियाँ। इन समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास करते समय उनके मनोवैज्ञानिक पक्ष की अनदेखी नहीं की जा सकती। ये समस्याएँ समाज के व्यक्तियों से सम्बन्ध रखती हैं। और समाज के व्यक्तियों की भावनाओं, रुचियों, अभिरुचियों, प्रथाओं एवं परम्पराओं का अध्ययन करके ही उनकी मनोवृत्तियों में परिवर्तन सम्भव है। समाज मनोविज्ञान, सामाजिक समस्याओं के मनोवैज्ञानिक पक्ष को समझकर उनके समाधान का प्रयास करता है। इस प्रकार सामाजिक समस्याओं को हल करने में मनोविज्ञान के अध्ययन की अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है।

(9) युद्धकाल में मनोविज्ञान की उपयोगिता – भले ही युद्ध एक बुराई तथा सभ्य मानव समाज के लिए कलंक है, परन्तु प्रत्येक देश-काल में युद्ध होते रहे हैं तथा भविष्य में भी होते रहेंगे। इस स्थिति में प्रत्येक देश सम्भावित युद्धों में विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। युद्धों में सफलता के दृष्टिकोण से भी मनोविज्ञान का ज्ञान उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है। मनोविज्ञान के ज्ञान ने युद्ध-कार्यों में भारी सहायता प्रदान की है। शीत-युद्ध मनोवैज्ञानिक प्रचार पर आधारित होते हैं। जल, स्थल और वायु सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए आवश्यक है कि उनका चुनाव वांछित योग्यतानुसार किया जाये। भर्ती से पूर्व उन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षाएँ देनी होती हैं। जो अभ्यर्थी इन परीक्षणों में सफलता प्राप्त कर लेते हैं उन्हें सेवाओं में प्रवेश मिल जाता है। युद्धकाल में आक्रमण से पूर्व तथा युद्ध घोषित होने के पश्चात् जनता की प्रतिक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। सैनिकों को प्रेरित करने की दृष्टि से देश के नेतागण सीमा पर जाते हैं। इससे सैनिकों का हौसला बढ़ता है और वे बड़े-से-बड़े बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। इसके विपरीत, विभिन्न मनोवैज्ञानिक उपायों द्वारा शत्रुपक्ष की सेना के मनोबल को गिराने का भी प्रयास किया जाता है। यदि शत्रुपक्ष की सेना का मनोबल टूट जाए तो युद्ध में अनिवार्य रूप से विजय प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि युद्धकाल में मनोविज्ञान का महत्त्व सर्वाधिक रूप से सिद्ध होता है।

(10) विश्व-शान्ति की स्थापना में मनोविज्ञान का योगदान – विश्व-शान्ति की स्थापना हेतु मानव सम्बन्धों में उचित सामंजस्य की आवश्यकता है। मनोविज्ञान के अध्ययन से ही सामंजस्य या अनुकूलन की समस्या का समाधान सम्भव है। वैयक्तिक भिन्नता की जानकारी प्राप्त करके ही विभिन्न राष्ट्रों के मध्य पारस्परिक तनाव कम किया जा सकता है। विश्व-स्तर पर तनाव एवं अशान्ति के कारणों को खोजकर उनको मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है तथा पहले से ही इस प्रकार के संघर्ष का निवारण सम्भव हो जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय तनाव तथा राष्ट्रों की आक्रमणकारी प्रवृत्तियों को अन्तर्राष्ट्रीय खेलकूद, व्यापार एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से कम किया जा सकता है। इस प्रकार मनोविज्ञान का ज्ञान वसुधैव कुटुम्बकम् एवं विश्व-बन्धुत्व की भावना को जाग्रत करता है, जिससे विश्व-शान्ति की स्थापना सम्भव है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मानव-जीवन के प्रत्येक पक्ष में मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व स्वयंसिद्ध है। मनोविज्ञान का ज्ञान मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं में बहुमूल्य योगदान प्रदान कर रहा है। आधुनिक युग में मनोविज्ञान के अध्ययन की महती आवश्यकता है और इसकी उपेक्षा करके जन-कल्याण का लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान एक नव-विकसित विज्ञान है। विकास-क्रम में मनोविज्ञान को भिन्न-भिन्न रूप में प्रतिपादित किया जाता रहा है, परन्तु अब इसका अर्थ एवं क्षेत्र आदि निर्धारित हो गया है। वर्तमान मान्यताओं के अनुसार मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. मनोविज्ञान मनाव और पशु दोनों के व्यवहार का अध्ययन करने वाला एक विधायक विज्ञान है।
  2. मनोविज्ञान मनुष्य को एक मन:शारीरिक प्राणी मानकर उसका अध्ययन करता है।
  3. मनोविज्ञान मानव-व्यवहार के भिन्न-भिन्न पक्षों का क्रमबद्ध अध्ययन करता है। वास्तव में मनुष्य जिस वातावरण में रहता है, उसमें उपस्थित विभिन्न तत्त्वों से वह क्रिया करता है। इसी को मानव व्यवहार कहते हैं।
  4. मनोविज्ञान प्राणियों के व्यवहार पर वातावरण के भौतिक तथा अभौतिक प्रभाव का अध्ययन करता है तथा अन्तिम रूप से प्राणियों की ज्ञानात्मक तथा संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है।

प्रश्न 2.
“मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान की वैज्ञानिक प्रकृति को निर्धारित करते हुए यह कहा जाता है कि मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान (Positive Science) है। विज्ञानों की प्रकृति को ध्यान में रखकर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत विज्ञान के दो मुख्य प्रकार निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश: ‘विधायक विज्ञान तथा नियामक विज्ञान’ कहा गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत विधायक विज्ञान उन विज्ञानों को कहा जाता है जो केवल तथ्यों का अध्ययन करते हैं तथा अपने अध्ययन के आधार पर तथ्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार विधायक विज्ञान क्या है की बात करते हैं। जहाँ तक नियामक विज्ञानों का प्रश्न है, वे मूल्यों एवं आदर्शों का अध्ययन एवं विवेचन करते हैं। ये विज्ञान अपने अध्ययन के आधार पर मूल्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। नियामक विज्ञान सदैव ‘क्या होना चाहिए’ की बात करते हैं। अब प्रश्न उठता है कि मनोविज्ञान के अध्ययन किस प्रकार के होते हैं? मनोविज्ञान के समस्त अध्ययन तथ्यों से सम्बन्धित होते हैं। मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित निष्कर्ष भी तथ्यात्मक होते हैं। मनोविज्ञान को मूल्यों एवं आदर्शों से कोई सरोकार नहीं होता। मनोविज्ञान के इस दृष्टिकोण को ही ध्यान में रखते हुए इसे एक विधायक विज्ञान स्वीकार किया गया है।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान की मुख्य शाखाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान व्यवहार का विधायक विज्ञान है। व्यवहार के अनेक पक्ष एवं रूप हैं; अतः मनोविज्ञान का अध्ययन क्षेत्र भी अत्यधिक व्यापक है। अध्ययन की सुविधा के लिए मनोविज्ञान की विभिन्न शाखाएँ निर्धारित की गयी हैं। मनोविज्ञान की मुख्य शाखाएँ हैं –

  1. सामान्य मनोविज्ञान
  2. वैयक्तिक मनोविज्ञान
  3. वैयक्तिक विभिन्नता का मनोविज्ञान
  4. समाज मनोविज्ञान
  5. बाल मनोविज्ञान
  6. किशोर मनोविज्ञान
  7. उत्पत्तिमूलक मनोविज्ञान
  8. विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान
  9. मनो-भौतिक मनोविज्ञान
  10. मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान
  11. प्रेरणात्मक मनोविज्ञान
  12. लोकमनोविज्ञान
  13. पशु मनोविज्ञान
  14. शारीरिक मनोविज्ञान
  15. परा-मनोविज्ञान
  16. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान
  17. असामान्य मनोविज्ञान
  18. व्यावहारिक मनोविज्ञान
  19. शिक्षा मनोविज्ञान
  20. पर्यावरणीय मनोविज्ञान।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान की कोई आधुनिक परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान की एक आधुनिक परिभाषा मैक्डूगल ने इन शब्दों में प्रतिपादित की है, मनोविज्ञान एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहार का अध्ययन होता है।”

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त किस प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
प्रत्येक विज्ञान अपने व्यवस्थित अध्ययन के आधार पर कुछ सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त सामान्य रूप से सार्वभौमिक (Universal) होते हैं। सार्वभौमिक सिद्धान्त उन सिद्धान्त को माना जाता है जिन पर देश-काल या पात्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मनोविज्ञान के सिद्धान्त भी देश-काल के प्रभाव से मुक्त हैं। समान परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न देश-काल में मनोविज्ञान के सिद्धान्त पूर्ण रूप से प्रामाणिक सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 3
क्या मनोविज्ञान द्वारा पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करना सम्भव है?
उत्तर :
विज्ञान की एक अनिवार्य विशेषता है-अपने क्षेत्र में पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करना। मनोविज्ञान भी एक विज्ञान होने के नाते अपने अध्ययन क्षेत्र से सम्बन्धित पूर्वानुमान या भविष्यवाणी प्रस्तुत करता है। मनोविज्ञान द्वारा विभिन्न परीक्षणों के आधार पर मानव-व्यवहार एवं व्यक्तित्व के विषय में पूर्वानुमान प्रस्तुत किये जाते हैं। इस प्रकार के पूर्वानुमान व्यावसायिक वरण एवं निर्देशन आदि के क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व के मुख्य क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मानव-जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व को स्वीकार किया जा चुका है। मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता के मुख्य क्षेत्र हैं –

  1. व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान का क्षेत्र
  2. शिक्षा का क्षेत्र
  3. अपराध नियन्त्रण एवं अपराधियों के सुधार का क्षेत्र
  4. चिकित्सा का क्षेत्र
  5. उद्योग तथा व्यापार का क्षेत्र
  6. राजनीति का क्षेत्र
  7. व्यक्तित्व के अध्ययन का क्षेत्र
  8. सामाजिक समस्याओं के समाधान का क्षेत्र तथा
  9. युद्ध एवं विश्व-शान्ति का क्षेत्र।

प्रश्न 5.
उद्योग मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है। औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।

क्रिश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. साइकोलॉजी (Psychology) का शाब्दिक अर्थ है ………………………. |
  2. मनोविज्ञान को प्रारम्भिक अर्थ ………………………. था।
  3. प्रारम्भिक काल में मनोविज्ञान का अध्ययन ………………………. के अन्तर्गत किया जाता था।
  4. अरस्तू ने मनोविज्ञान को ………………………. के रूप में प्रतिपादित किया था।
  5. सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दी में मनोविज्ञान को ………………………. माना जाता था।
  6. विलियम जेम्स के अनुसार मनोविज्ञान ………………………. का विज्ञान है।
  7. प्राणी के व्यवहार का अध्ययन ………………………. विषय के अन्तर्गत किया जाता है।
  8. मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान मानने वाले विद्वानों को ………………………. कहते हैं।
  9. मनोविज्ञान ………………………. का वैज्ञानिक अध्ययन है।
  10. मनोविज्ञान व्यवहार का ………………………. विज्ञान है।
  11. मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो विभिन्न परिस्थितियों में प्राणी के ………………………. का अध्ययन करता है।
  12. जब मनुष्य का व्यवहार सामान्य नहीं होता है तो उसे ………………………. व्यवहार कहा जाता है।
  13. एडविन जी० बोरिंग के अनुसार मनोविज्ञान ………………………. का अध्ययन है।
  14. मनोविज्ञान की एक विशेषता तथ्यात्मकता है और यह ………………………. कहलाता है।
  15. मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित समस्त सिद्धान्त ………………………. आधारित होते हैं।
  16. मनोविज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र ………………………. है।
  17. मनोविज्ञान न केवल सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से बल्कि ………………………. दृष्टिकोण से भी उपयोगी है।
  18. मनोविज्ञान द्वारा व्यक्ति के सामान्य तथा ………………………. दोनों प्रकार के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
  19. मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना ………………………. ने की थी।
  20. विलियम वुण्ट के प्रयासों से विश्व में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला ………………………. में स्थापित की गयी थी।
  21. बच्चों की समस्याओं तथा व्यवहार के अध्ययन से सम्बन्धित मनोविज्ञान का क्षेत्र है ………………………. |

उत्तर :

  1. आत्मा का विज्ञान
  2. आत्मा का ज्ञान
  3. दर्शनशास्त्र
  4. आत्मा के ज्ञान
  5. मन का विज्ञान
  6. चेतना
  7. मनोविज्ञान
  8. व्यवहारवादी
  9. व्यवहार
  10. विधायक
  11. व्यवहार
  12. असामान्य
  13. मानव स्वभाव
  14. विधायक विज्ञान
  15. तथ्यों पर
  16. व्यापक
  17. व्यावहारिक
  18. असामान्य
  19. विलियम वष्ट
  20. लिपजिग
  21. बाल मनोविज्ञाना

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
प्राचीन यूनानी विद्वान मनोविज्ञान को किस रूप में प्रतिपादित करते थे?
उत्तर :
प्राचीन यूनानी विद्वान मनोविज्ञान को ‘आत्म-दर्शन’ अथवा ‘मानसिक दर्शन के रूप में प्रतिपादित करते थे।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान को मन का विज्ञान मानना क्यों छोड़ दिया गया?
उत्तर :
मन के स्वरूप के स्पष्ट न हो पाने के कारण ही मनोविज्ञान को मन का विज्ञान मानना छोड़ दिया गया।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान मानने वाले मुख्य विद्वानों के नाम लिखिए।
उत्तर :
विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स तथा जेम्स सली।

प्रश्न 4.
व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक वाटसन द्वारा प्रतिपादित मनोविज्ञान की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
“एक ऐसी मनोविज्ञान लिखना सम्भव है …… जिसकी ‘व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषा की जा सके।

प्रश्न 5.
मनोविज्ञान किस प्रकार का विज्ञान है?
उत्तर :
मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है।

प्रश्न 6.
मनोविज्ञान की उस शाखा को क्या कहते हैं जिसके अन्तर्गत व्यवहार के सामान्य पक्षों तथा उसके सैद्धान्तिक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर :
उक्त सामान्य मनोविज्ञान।

प्रश्न 7.
मनोविज्ञान की किस शाखा के अन्तर्गत व्यक्ति के असामान्य व्यवहार का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर :
असामान्य मनोविज्ञान।

प्रश्न 8.

मानव-जीवन में मनोविज्ञान की उपयोगिता को निर्धारित करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को क्या कहते हैं?
उत्तर :
व्यावहारिक मनोविज्ञान।

प्रश्न 9.
‘मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान का संस्थापक कौन था?
उत्तर :
फ्रॉयड।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए 

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान के विकास-क्रम के प्रथम चरण में इसे माना जाता था
(क) स्वभाव का विज्ञान
(ख)चेतना का विज्ञान
(ग) आत्मा की ज्ञान
(घ) मन का विज्ञान

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान को आत्मा का ज्ञान नहीं कहा जा सकता, क्योंकि
(क) आत्मा का स्वरूप स्पष्ट नहीं है।
(ख) आत्मा तथा शरीर का सम्बन्ध स्पष्ट नहीं है।
(ग) आत्मा के विभिन्न अर्थ प्रतिपादित किये जाते थे
(घ) इन सभी कारणों से

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान वैज्ञानिक अध्ययन है
(क) व्यवहार को
(ख) मन का
(ग) आत्मा का
(घ) पदार्थ को

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान एक विज्ञान है, क्योकि
(क) यह वैज्ञानिक पद्धति को अपनाता है।
(ख) इसका अध्ययन तथ्यात्मक है।
(ग) यह कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन करता है ।
(घ) उपर्युक्त सभी कारणों से

प्रश्न 5.
मनोविज्ञान अपने आप में एक
(क) रोचक विज्ञान है।
(ख) आदर्श विज्ञान है ।
(ग) भौतिक विज्ञान है।
(घ) विधायक विज्ञान है।

प्रश्न 6.
“मनोविज्ञान एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहारों का अध्ययन होता है।” इस परिभाषा के प्रतिपादक हैं
(क) विलियम जेम्स।
(ख) विलियम मैक्डूगल
(ग) विलियम वुण्ट
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7.
शैक्षिक परिस्थितियों में मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को कहते हैं
(क) बाल मनोविज्ञान
(ख) शिक्षा मनोविज्ञान
(ग) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(घ) सामान्य मनोविज्ञान

प्रश्न 8.
मनोविज्ञान द्वारा किस प्रकार के मानव-व्यवहार का अध्ययन किया जाता है?
(क) केवल सामान्य व्यवहार का
(ख) केवल असामान्य व्यवहार का
(ग) सामान्य तथा असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार का
(घ) शिष्ट व्यवहार का

प्रश्न 9.
मनोविज्ञान का ज्ञान उपयोगी नहीं है
(क) शिक्षा के क्षेत्र में
(ख) उद्योग एवं व्यापार के क्षेत्र में
(ग) चिकित्सा के क्षेत्र में
(घ) नैतिकता का पाठ पढ़ाने में

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान की किस शाखा को सम्बन्ध मानसिक समस्याओं के निदान से है?
(क) विकासात्मक मनोविज्ञान
(ख) वैयक्तिक मनोविज्ञान
(ग) नैदानिक मनोविज्ञान
(घ) तुलनात्मक मनोविज्ञान

प्रश्न 11.
प्रमुख व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक का नाम है
(क) पावलोव
(ख) वाटसन
(ग) होल
(घ) एडलर

उत्तर :

  1. (ग) आत्मा का ज्ञान
  2. (घ) इन सभी कारणों से
  3. (क) व्यवहार का
  4. (घ) उपर्युक्त सभी कारणों से
  5. (घ) विधायन विज्ञान है
  6. मिलियने मैक्डूगल
  7. (ख) शिक्षा मनोविज्ञान
  8. (ग) सामान्य तथा असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार का
  9. (घ) नैतिकता का पाठ पढाने मे
  10. (ग) नैदानिक मनोविज्ञान
  11. (ख) वाटसन

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 2 Methods of the Study of Psychology

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 2
Chapter Name Methods of the Study of Psychology
(मनोविज्ञान के अध्ययन की पद्धतियाँ)
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 2 Methods of the Study of Psychology मनोविज्ञान के अध्ययन की पद्धतियाँ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली अन्तर्दर्शन विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का भी उल्लेख कीजिए।
या
अन्तर्दर्शन विधि द्वारा अध्ययन करते समय प्रस्तुत होने वाली कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए तथा स्पष्ट कीजिए कि इन कठिनाइयों को किस प्रकार दूर किया जा सकता है।
या
मनोविज्ञान की अध्ययन विधियों से आप क्या समझते हैं? अन्तर्दर्शन विधि के गुण अथवा दोष बताइए।
या
अन्तर्दर्शन विधि का विस्तार से वर्णन कीजिए तथा वर्तमान में इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान के अध्ययन की प्रमुख पद्धतियाँ
(Main Methods of the Study of Psychology)

मनोविज्ञान एके क्रमबद्ध विज्ञान है जिसके अन्तर्गत मानव-व्यवहार को अध्ययन वैज्ञानिक विधियों के आधार पर किया जाता है। गार्डनर मर्फी ने उचित ही कहा है, “मनोविज्ञान अपने अध्ययन (विकास) के लिए बहुत-सी विधियों का प्रयोग करता है।”

आधुनिक मनोविज्ञान अपनी विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार तथा मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के लिए जिन प्रमुख विधियों को अपनाता है, उनमें से चार प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार हैं

  1. अन्तर्दर्शन विधि (Introspection Method)
  2. निरीक्षण विधि (Observation Method)
  3. प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) तथा
  4. नैदानिक विधि (Clinical Method)

अन्तर्दर्शन विधि
(Introspection Method)

अन्तर्दर्शन विधि, मनोवैज्ञानिक अध्ययन की सबसे प्राचीन एवं विशिष्ट विधि है, जिसे ‘अन्तर्निरीक्षण’ या ‘आन्तरिक प्रत्यक्षीकरण के नाम से भी जाना जाता है। इस विधि का प्रयोग प्रारम्भ में मनोवैज्ञानिकों द्वारा किसी नयी मनोवैज्ञानिक घटना की खोज के लिए किया जाता था।

अन्तर्दर्शन का अर्थ – अन्तर्दर्शन का अर्थ है-‘अपने अन्दर झाँककर देखना’ या अपनी मन:-स्थिति को गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करना।’ अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से कोई व्यक्ति स्वयं की मानसिक क्रियाओं, अनुभवों अथवा व्यवहारों का आत्म-निरीक्षण कर सकता है तथा उनका वर्णन प्रस्तुत कर सकता है। उदाहरण के लिए—कोई व्यक्ति चिन्ता या शंकाग्रस्त है या आनन्द का अनुभव कर रहा है, इन तथ्यों का विवरण व्यक्ति स्वयं अन्तर्दर्शन द्वारा ही प्रस्तुत करता है।

अन्तर्दर्शन की परिभाषा – मनोवैज्ञानिकों द्वारा अन्तर्दर्शन को अग्र प्रकार परिभाषित किया गया है –
(1) टिचनर के मतानुसार, “अन्तर्दर्शन अन्दर झाँकना है।”
(2) मैक्डूगल के शब्दों में, “अन्तर्दर्शन करने का अर्थ है-क्रमबद्ध रूप से अपने मन की कार्य-प्रणाली का सुव्यवस्थित अध्ययन करना।”
(3) स्टाउट ने लिखा है, “क्रमबद्ध रीति से अपने मस्तिष्क के कार्य व्यापारों का निरीक्षण करना ही अन्तर्निरीक्षण (अन्तर्दर्शन) है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि अन्तर्दर्शन विधि में व्यक्ति अपने अन्दर की क्रियाओं का स्वयं ही निरीक्षण करता है। निरीक्षण के उपरान्त वह क्रिया-प्रतिक्रिया की अनुभूति का प्रकटीकरण भी स्वयं ही करता है। अन्तर्दर्शन विधि का एक सही अर्थ विस्तारपूर्वक वुडवर्थ ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है-“जब कोई व्यक्ति हमें अपने विचारों, भावनाओं तथा उद्देश्यों के विषय में आन्तरिक सूचना प्रदान करती है कि वह क्या देखता है, सुनता है। जानती है तो वह अपनी प्रतिक्रियाओं का अन्तर्दर्शन कर रहा होता है।” स्पष्ट है कि अन्तर्दर्शन विधि में किसी बाहरी अध्ययनकर्ता या उपकरण आदि की आवश्यकता नहीं होती है।

अन्तर्दर्शन विधि के गुण या लाभ
(Merits of Introspection Method)

मनोवैज्ञानिक अध्ययन की पद्धतियों में अन्तर्दर्शन विधि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक विधि है। इस विधि के गुण अथवा लाभों को निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) मानसिक क्रियाओं के ज्ञान में सहायक – मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए पात्र (व्यक्ति) की मानसिक क्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। पात्र की विभिन्न मानसिक क्रियाओं; जैसे– कल्पना, स्मृति, अवंधान एवं चिन्तन का सुव्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने में अन्तर्दर्शन विधि ही सर्वाधिक उपयुक्त विधि मानी जाती है।

(2) अनुभवों तथा भावनाओं के ज्ञान में सहायक – किसी व्यक्ति के अनुभवों तथा भावनाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्तर्दर्शन विधि का सहारा लिया जाता है। मनुष्य के जीवन से जुड़ी अनेक समस्याओं के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तथा समाधान तक पहुँचने के लिए उसके निजी अनुभवों तथा भावनाओं को जानना आवश्यक है। निजी अनुभव तथा भाव नितान्त व्यक्तिगत एवं आन्तरिक तथ्य हैं। जिन्हें निरीक्षण अथवा प्रयोग विधि के माध्यम से ज्ञात नहीं किया जा सकता, केवल अन्तर्दर्शन विधि ही इन्हें जानने की एकमात्र उपयुक्त उपाय है।

(3) अतृप्त इच्छाओं तथा कुण्ठाओं के ज्ञान में सहायक – मनुष्य की इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है और इच्छाओं की सन्तुष्टि के साधन सीमित हैं। इस प्रकारे मनुष्य की कुछ इच्छाएँ सन्तुष्ट हो जाती हैं तो बहुत-सी इच्छाएँ अतृप्त रह जाती हैं। इन अतृप्त इच्छाओं या दमित इच्छाओं का ज्ञान अन्तर्दर्शन विधि के द्वारा ही सम्भव है। ठीक उसी प्रकार अन्तर्दर्शन की सहायता से विषयपात्र में पायी जाने वाली कुण्ठाओं को भी ज्ञान हो जाता है।

(4) मितव्ययी, सरल तथा परीक्षणहीन विधि – अन्तर्दर्शन विधि मितव्ययी समझी जाती है, क्योकि इस विधि में निरीक्षक, अध्ययन-सामग्री या किसी बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अतिरिक्त इस विधि के द्वारा अध्ययन हेतु किसी विशेष परीक्षण की भी आवश्यकता नहीं होती। इसका प्रयोग भी सरलता से किया जा सकता है।

(5) तुलनात्मक अध्ययन एवं सामान्यीकरण के लिए उपयोगी – अन्तर्दर्शन विधि के माध्यम से किसी विशिष्ट समस्या का तुलनात्मक अध्ययन सम्भव है। साथ-ही-साथ, यदि दो प्रणालियों को अध्ययन करके उनसे प्राप्त परिणामों की तुलना की जाए तो प्रयोगकर्ता एक विश्वसनीय सामान्यीकरण पर पहुँच सकता है। सामान्यीकरण की प्रक्रिया हमें मनोविज्ञान के सर्वमान्य नियम यो सिद्धान्त प्रदान करती है।

(6) मौलिक एवं अपरिहार्य विधि – अन्तर्दर्शन विधि मनोविज्ञान की एक मौलिक विधि है। इसमें निहित विशिष्टताएँ अन्य पद्धतियों में दृष्टिगोचर नहीं होतीं। आलोचकों द्वारा अन्तर्दर्शन विधि की भले ही कितनी भी आलोचनाएँ प्रस्तुत की गयी हों, किन्तु अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपरिहार्य है और इसे नकारा नहीं जा सकता।

अन्तर्दर्शन विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ तथा उनके निवारण के उपाय
(Demerits of Introspection Method and their Remedies)

नि:सन्देह अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक एवं विशिष्ट विधि है, परन्तु व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए इस विधि को अपनाते समय कुछ कठिनाइयों का सामना अवश्य करना पड़ता है। अन्तर्दर्शन विधि की इन कठिनाइयों को इस विधि के दोष भी कहा जाता है। विभिन्न विद्वानों ने अन्तर्दर्शन विधि की कठिनाइयों के निवारण के उपायों का भी उल्लेख किया है। अन्तर्दर्शन विधि की मुख्य कठिनाइयों तथा उनके निवारण के उपायों का विवरण निम्नलिखित है –

(1) मानसिक क्रियाओं पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं किया जा सकता – मानव-मन को किसी एक बिन्दु या लक्ष्य पर केन्द्रित करना अत्यन्त कठिन कार्य है। परिवर्तनशील एवं गतिमान मन की क्रियाएँ भी अपनी प्रकृति के कारण नितान्त परिवर्तनशील, अमूर्त तथा अप्रत्यक्ष होती हैं। मन की क्रियाओं को स्वरूप जड़ वस्तुओं या प्रघटनाओं से सर्वथा भिन्न होता है। अत: मानसिक क्रियाओं के अध्ययन करने वाले के लिए यह सम्भव नहीं होता कि वह अपना ध्यान पूर्ण रूप से केन्द्रित रख सके। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन विधि द्वारा मानसिक क्रियाओं का अध्ययन एक बहुत ही कठिन कार्य समझा जाता है।

कठिनाई निवारण के उपाय – निरन्तर अभ्यास के माध्यम से उपर्युक्त कठिनाई को दूर किया जा सकता है। अन्तर्दर्शन विधि की सफलता पर्याप्त प्रशिक्षण पर निर्भर करती है। निरन्तर अभ्यास एवं प्रशिक्षण से अमूर्तकरण की क्षमता में वृद्धि होगी और इस भाँति मन की एकाग्रता उत्तरोत्तर बढ़ती जायेगी। मन की अधिकाधिक एकाग्रता मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में सहायक होगी।

(2) मानसिक प्रक्रियाओं की प्रकृति गत्यात्मक एवं चंचल होती है – मानव की अनुभूतियाँ, मनोवृत्तियाँ, भावनाएँ, विचार एवं इच्छाएँ हर समय एकसमान नहीं रहतीं। इन प्रक्रियाओं की तीव्रता में लगातार उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। निरीक्षण के लिए निरीक्षण के विषय का स्थिर होना पहली और आवश्यक शर्त है। हम अपने चारों ओर विभिन्न स्थिर वस्तुएँ पाते हैं जिनका निरीक्षण सहज रूप से सम्भव है। किन्तु मानसिक प्रक्रियाएँ तो निरन्तर बदलती रहती हैं, जिनका निरीक्षण एक दुष्कर कार्य है। और इनका अन्तर्दर्शन के माध्यम से ज्ञान भी पर्याप्त रूप से कठिन है। उदाहरण के लिए माना एक व्यक्ति किसी कारणवश भयभीत हो उठा। मनोवैज्ञानिक उस व्यक्ति के भय की दशा का ज्ञान अन्तर्दर्शन विधि से करना चाहेंगे, परन्तु यह एक कठिन कार्य है। क्योंकि व्यक्ति का भय के कारण पर नियन्त्रण नहीं था; अत: एक तो वह चाहकर भी पुन: उसी कारण से भयभीत नहीं हो सकता और दूसरे भय की यह दशा हमेशा बनी नहीं रह सकती। इसलिए सम्भव है कि निरीक्षण करते-करते भय की अवस्था ही समाप्त हो जाए अथवा उसकी तीव्रता में हास आ जाए। भय की ऐसी परिवर्तनशील अवस्था में कोई उचित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस भाँति चंचल एवं परिवर्तनशील मानसिक प्रक्रियाओं का अन्तर्दर्शनएक कठिन समस्या है।

कठिनाई निवारण के उपाय – अन्तर्दर्शन विधि में मानसिक प्रक्रियाओं की चंचल प्रकृति सम्बन्धी कठिनाई पर स्मृति के माध्यम से अंकुश लगाया जा सकता है। स्मृति की मदद से किसी समय-विशेष की मानसिक दशा का विश्लेषण करना सम्भव होता है। इसके अतिरिक्त; अभ्यास, प्रशिक्षण, मानसिक सावधानी तथा विविध अभिलेखों की तुलना द्वारा अन्तर्दर्शन के अन्तर्गत मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

(3) अन्तर्दर्शन में मन विभाजित हो जाता है – मनुष्य एक ‘मनप्रधान प्राणी है और मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक मन की क्रियाओं का अध्ययन करते हैं। किन्तु यदि मन ही विभाजित हो गया हो तो क्या ऐसे विभाजित मन द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव है-यह आरोप अन्तर्दर्शन विधि के विरुद्ध लगाया जाता है। सच तो यह है कि अन्तर्दर्शन’ विधि में मन अपनी क्रियाओं का निरीक्षण स्वयं ही करता है। इस प्रकार कार्य करने के कारण वह दो भागों में बँट जाता है – एक मन जो निरीक्षण कार्य करता है तथा दूसरो मन जिसका निरीक्षण किया जाता है। किसी विशिष्ट समर्थ में एक ही मन ज्ञाता और ज्ञेय’ दोनों नहीं हो सकता। इस स्थिति में अन्तर्दर्शन विधि द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन कैसे सम्भव हो सकता है?

कठिनाई निवारण के उपाय – व्यावहारिक दृष्टि से उपर्युक्त कठिनाई का निराकरण भी सम्भव है। अवधान को इस प्रकार अभ्यस्त एवं प्रशिक्षित बनाया जा सकता है कि मनुष्य बाह्य वस्तुओं के अनुरूप अपनी आन्तरिक प्रवृत्तियों का भी सही-सही निरीक्षण कर सके। मन एक साक्षी सत्ता है। और यह साक्षी सत्ता विभक्त होते हुए भी सुख-दुःख, प्रेम-घृणा, काम और क्रोध आदि भावनाओं का अनुभव कर सकती है। प्रत्येक मनुष्य का मन अपने ही अन्दर इस प्रकार की भावनाओं का अनुभव करता है। फलतः वह ज्ञाता भी बनता है और ज्ञेय भी।

(4) कई मनोवैज्ञानिक एक ही मानसिक प्रक्रिया का अध्ययन नहीं कर सकते – वैज्ञानिक अध्ययन की एक आधारभूत मान्यता यह है कि सम्बन्धित विषय अथवा घटना का एक से अधिक वैज्ञानिकों द्वारा एक ही समय में अवलोकन किया जाए। मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शने विधि इस शर्त को पूरा नहीं करती, क्योंकि किसी व्यक्ति की आन्तरिक दशाओं का अध्ययन अन्य व्यक्तियों द्वारा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अन्तर्दर्शन विधि पर अवैज्ञानिकता का आरोप लगाया जाता है।

कठिनाई निवारण के उपाय – अन्तर्दर्शन, विधि के विरुद्ध यह आरोप निराधार है। उक्त कठिनाई के निराकरण के लिए मनोवैज्ञानिकों को चाहिए कि वे परस्पर सहयोग से कार्य करें। सर्वप्रथम, प्रत्येक मनोवैज्ञानिक किसी मानसिक प्रक्रिया का अलग से अध्ययन करेगा और फिर इस सन्दर्भ में अपने अनुभवों को एक-दूसरे से कहेगा। जब कई मनोवैज्ञानिक अपने-अपने अनुभवों की परस्पर तुलना करेंगे तो वे इस भाँति प्राप्त निष्कर्षों से एक सामान्य नियम तक पहुँच सकते हैं। सामान्यीकरण की पद्धति पर आधारित ऐसे नियम सार्वभौमिक (Universal) होते हैं।

(5) मनोदशा और वस्तु का एक साथ निरीक्षण नहीं किया जा सकता – यदि अन्तर्दर्शन में किसी ऐसी मानसिक अवस्था या वृत्ति पर ध्यान केन्द्रित करना पड़े जो किसी बाह्य वस्तु के कारण उत्पन्न हुई हो तो उस परिस्थिति में अन्तर्दर्शन सम्भव नहीं होता। इसका कारण यह है कि व्यक्ति द्वारा मनोदशा पर ध्यान लगने से उसका ध्यान वस्तु से हट जाता है। यदि वह वस्तु पर ध्यान लगाता है तो उसका ध्यान मनोदशा से हट जाता है। फलतः दोनों पर एक साथ ध्यान नहीं लग पाता। व्यक्ति का ध्यान एक समय में एक ही स्थान पर केन्द्रित हो सकता है।

कठिनाई निवारण के उपाय – इस कठिनाई पर अभ्यास के माध्यम से विजय प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए ध्यान के अभ्यास एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। कुछ देर तक वस्तु पर तथा कुछ देर तक मानसिक क्रिया पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। अभ्यास का यह कार्य बारी-बारी से लगातार करने पर वस्तु और उससे उत्पन्न मनोदशा का एक साथ निरीक्षण करना सम्भव हो सकता है।

(6) अन्तर्दर्शन द्वारा प्राप्त ज्ञान आत्मगत एवं व्यक्तिगत होता है – अन्तर्दर्शन में एक कठिनाई यह है कि इस विधि के द्वारा जो भी अध्ययन किये जाते हैं वे नितान्त व्यक्तिगत तथा आत्मगत (Subjective) होते हैं, वस्तुनिष्ठ (Objective) नहीं। यही कारण है कि अन्तर्दर्शन से प्राप्त परिणामों में वैज्ञानिकता तथा विश्वसनीयता का प्रायः अभाव रहता है; अतः इस विधि के माध्यम से सामान्य निष्कर्ष निकालना कठिन है।

कठिनाई निवारण के उपाय – इसके लिए परामर्श दिया जाता है कि अन्तर्दर्शन को अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्यम से अधिकाधिक वस्तुनिष्ठ बनाया जाये ताकि इसके ज्ञान पर आधारित कुछ सामान्य नियम प्रतिपादित हो सकें। इसके अतिरिक्त विभिन्न मनोवैज्ञानिकों के अनुभवों की तुलना करके सामान्यीकरण की विधि से सर्वमान्य सिद्धान्त भी बनाये जा सकें।

(7) अन्तर्दर्शन में तथ्यों को छिपाने की सम्भावना है – अन्तर्दर्शन विधि में एक मुख्य कठिनाई यह आती है कि विषय-पात्र उन तथ्यों को सरलता से छिपा सकता है जो सच्चाई के अधिक निकट होते हैं, क्योंकि प्रयोगकर्ता के पास विषय-पात्र के अतिरिक्त कोई अन्य ऐसा स्रोत नहीं होता जिससे तथ्यों की प्रामाणिकता सिद्ध हो सके; अत: इस पद्धति के माध्यम से सत्यान्वेषण का कार्य नहीं हो सकता।

कठिनाई निवारण के उपाय – विषय-पात्र को यह विश्वास दिलाकर कि उससे प्राप्त सूचनाओं को गुप्त रखा जाएगा, यथार्थ स्थिति का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के अन्तर्दर्शनं विवरण से मिलान करके ही तथ्यों की प्रामाणिकता पुष्ट की जानी चाहिए।

प्रश्न 2.
निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? निरीक्षण विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
या
निरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख करते हुए तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।
या
आधुनिक मनोविज्ञान के विकास में निरीक्षण विधि की भूमिका का विवेचन इसके गुण-दोषों के आलोक में कीजिए।
उत्तर :
निरीक्षण विधि
(Observation Method)

निरीक्षण का अर्थ – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली एक मुख्य विधि निरीक्षण विधि (Observation Method) भी है। यह विधि मनोविज्ञान एक महत्त्वपूर्ण विधि है। निरीक्षण का अर्थ है-“घटनाओं का बारीकी और क्रमबद्ध तरीके से अवलोकन करना।” अन्य शब्दों में; देखकर तथा सुनकर काम करने अथवा किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की विधि को निरीक्षण कहते हैं। निरीक्षण विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा किसी अन्य प्राणी के व्यवहार का ज्ञान केवल उसके बाहरी क्रियाकलापों को देखकर ही प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-यदि रमेश की आँखें लाल हैं, भौंहें तनी हैं, चेहरा तमतमा रहा है, शरीर काँप रहा है तथा वह चीख-चीखकर हाथों को इधर-उधर फेंक रहा है तो यह देखकर हम समझ जाते हैं कि रमेश क्रोधित है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि जब प्राणी (जैसे शिशु, असामान्य व्यक्ति या पशु) न तो अपने अनुभवों को प्रकट कर सके और उस पर प्रयोग करना भी कठिन हो तो उसके विषय में तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरीक्षण विधि ही सर्वोत्तम है।

निरीक्षण की परिभाषा – निरीक्षण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –

  1. ऑक्सफोर्ड कन्साइज डिक्शनरी (Oxford Concise Dictionary) के अनुसार, निरीक्षण से अभिप्राय प्रघटनाओं के, जिस प्रकार कि वे प्रकृति में पाई जाती हैं, कार्य एवं कारण या आपसी सम्बन्ध की दृष्टि से अवलोकन तथा लिख लेने से है।”
  2. गुडे तथा हाट के अनुसार, “विज्ञान निरीक्षण से प्रारम्भ होता है और अपने तथ्यों की पुष्टि के लिए अन्त में निरीक्षण का ही सहारा लेता है।’
  3. पी० बी० यंग का मत है, “निरीक्षण स्वाभाविक घटनाओं का, उनके घटित होने के समय, नेत्र के माध्यम से क्रमबद्ध तथा विचारपूर्ण अध्ययन है।”

उपर्युक्त वर्णित परिभाषाओं द्वारा निरीक्षण विधि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इस विधि के अन्तर्गत व्यक्ति अथवा प्राणी के व्यवहार का अध्ययन मुख्य रूप से देखकर ही किया जाता है। वैसे तो इस विधि को -हर प्रकार के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनाया जा सकता है परन्तु बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशु के व्यवहार के अध्ययन के लिए निरीक्षण विधि को अधिक उपयोगी माना जाता है। निरीक्षण विधि अपने आप में एक व्यवस्थित विधि है जिसके कुछ निश्चित एवं निर्धारित चरण हैं। सर्वप्रथम अध्ययन की निश्चित योजना तैयार की जाती है। इसके उपरान्त योजनानुसार व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन किया जाता है। अवलोकित व्यवहार को साथ-साथ नोट कर लिया जाता है। इसके उपरान्त नोट किये गये व्यवहार का विश्लेषण करके उसकी समुचित व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। इस समस्त अध्ययन के आधार पर ही अभीष्ट सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाते हैं।

निरीक्षण विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)
(Merits of Observation Method)

निरीक्षण विधि एक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी विधि है। इस विधि के गुणों अथवा लाभ का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है –

(1) विषय के व्यवहार का दूर से अध्ययन – निरीक्षण विधि में विषय (अर्थात् या श्रेणी जिसका अध्ययन किया जाना है) के व्यवहार का पृथक् एवं दूर से अध्ययन किया जाता है। इस विधि के माध्यम से कोई भी प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों और मानसिक क्रियाओं का सरलता से अध्ययन कर सकता है।

(2) नवजात शिशुओं, पशुओं, मूक तथा पागल लोगों का अध्ययन – नवजात शिशु, पशु, मूक तथा पागल अपने विचारों या अनुभवों को व्यक्त करने में असमर्थ रहते हैं। इनकी क्रियाओं एवं व्यवहार का अध्ययन केवल निरीक्षण विधि के माध्यम से ही सम्भव है।

(3) विविध आन्तरिक दशाओं का ज्ञान – विभिन्न प्रकार की अच्छी या बुरी आन्तरिक दशाओं तथा गुण-दोषों का ज्ञान निरीक्षण विधि के माध्यम से किया जा सकता है। सुख-दु:ख, राग-द्वेष, प्रसन्नता-क्रोध, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे तथा अपने-पराए का ज्ञान सूक्ष्म एवं प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से ही किया जा सकता है।

(4) मानव स्वभाव एवं व्यवहार पर प्रभाव का ज्ञान – मनुष्य के मनोविज्ञान पर पर्यावरण का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। जलवायु, पर्यावरण, भौतिक तथा प्राकृतिक घटनाएँ मानव स्वभाव एवं व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इनके ज्ञान हेतु अध्ययन की निरीक्षण विधि अत्यन्त उपयोगी समझी जाती है।

(5) लोक जीवन के लिए उपयोगी – निरीक्षण विधि की सहायता से लोक जीवन का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। लोक गीत, लोक नृत्य, लोक कथाओं, चित्रकला, ललित कलाओं तथा संगीत से सम्बन्धित अध्ययन में मात्र निरीक्षण विधि ही सहायक सिद्ध होती है।

(6) सामूहिक घटनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का ज्ञान – समाज के अन्तर्गत घटित होने वाली घटनाओं तथा प्रतिक्रियाओं का अध्ययन निरीक्षण विधि के बिना सम्भव नहीं है। सामूहिक एवं साम्प्रदायिक तनाव, भीड़ का व्यवहार, समूह का स्वभाव; कक्षागत परिस्थितियों में छात्रों का स्वभाव, परीक्षा के दौरान छात्रों का व्यवहार तथा आन्दोलनकारियों की प्रतिक्रियाएँ निरीक्षण विधि द्वारा ज्ञात की जाती हैं।

(7) वस्तुनिष्ठ निरीक्षण – मनोविज्ञान एक विज्ञान है; अतः समस्त मनोवैज्ञानिक अध्ययन वस्तुनिष्ठ होने चाहिए। वस्तुनिष्ठ निरीक्षण से प्राप्त सूचनाएँ विश्वसनीय होती हैं जिनकी जाँच किसी भी विशेषज्ञ के द्वारा कराई जा सकती है। इस भाँति प्राप्त सूचनाओं को वैज्ञानिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में प्रयोग किया जा सकता है।

निरीक्षण विधि के दोष एवं कठिनाइयाँ
(Demerits of Observation Method)

अनेक गुणों से ओत-प्रोत होते हुए भी निरीक्षण विधि दोष या कठिनाइयों से अछूती नहीं है। इसके प्रमुख दोष इस प्रकार हैं

(1) क्रमबद्धता का अभाव – निरीक्षण विधि में घटनाओं की क्रमबद्धता का अभाव पाया जाता है। अध्ययनकर्ता को घटनाओं के घटित होने के क्रम में निरन्तर रूप से अवलोकन करना पड़ता है। यदि एक बार घटनाओं का प्राकृतिक क्रम टूट जाए तो पुनः घटना का शुद्ध निरीक्षण नहीं हो सकता, न ही वह घटना दोबारा उसी प्रकार घटित हो सकती है।

(2) घटनाओं पर नियन्त्रण नहीं – जिन घटनाओं का अवलोकन किया जाना है, उन पर निरीक्षणकर्ता का कोई नियन्त्रण नहीं होता। वस्तुतः, घटनाएँ तो अपने स्वाभाविक ढंग में घटित होती हैं। जिनके अज्ञात कारणों का पता लगाना कठिन हो जाता है।

(3) पक्षपात की सम्भावना – प्रत्येक निरीक्षणकर्ता किन्हीं पूर्वाग्रहों से ग्रसित होता है जिनके कारण वह किसी विशेष घटना के प्रति आत्मगत (Subjective) हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में पक्षपात की सम्भावना अधिक होती है।

(4) निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचि – निरीक्षणकर्ता की कुछ विशेष रुचियाँ हो सकती हैं। जिनसे सम्बन्धित बातों पर वह अवलोकन के समय अधिक ध्यान दे सकता है। फलस्वरूप कुछ आवश्यक एवं वांछित तथ्यों की अवलोकन के दौरान उपेक्षा कर दी जाती है। इससे अध्ययन की वस्तुनिष्ठता तथा विश्वसनीयता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः किसी भी वैज्ञानिक प्रयोग में तटस्थता (निष्पक्षता) संर्वोपरि मानी जाती है जिस पर निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचि का गहरा प्रभाव पड़ता है।

(5) प्रशिक्षण एवं अभ्यास का अभाव – साधारणतया निरीक्षण विधि के अन्तर्गत प्रयोगकर्ता न तो पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित होते हैं और न ही उन्हें निरीक्षण के विभिन्न पदों का समुचित अभ्यास ही होता है। सही निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए निरीक्षणकर्ता को अनिवार्य रूप से प्रशिक्षित, अभ्यासी एवं कुशल निरीक्षक होना चाहिए।

(6) अप्राकृतिक व्यवहार – जब निरीक्षण के लिए चुने गए प्राणियों को यह जानकारी हो जाती है कि उनका अवलोकन या निरीक्षण किया जा रहा है तो उनका व्यवहार प्राकृतिक नहीं रह जाता है। इस प्रकार के अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा निरीक्षण विधि के अर्थ एवं गुण-दोषों का सामान्य परिचय प्राप्त हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि निरीक्षण विधि मनोविज्ञान की एक उपयोगी विधि है। यदि इस विधि को सावधानीपूर्वक कुशल एवं प्रशिक्षित अध्ययनकर्ताओं द्वारा अपनाया जाए तो निश्चित रूप से पर्याप्त प्रामाणिक निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं।

प्रश्न 3.
प्रयोगात्मक विधि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
या
प्रयोग विधि के प्रमुख चरण क्या हैं? उदाहरण देकर लिखिए।
या
प्रयोगात्मक विधि के गुण-दोषों का विवेचन कीजिए।
या
मनोविज्ञान में प्रयोग विधि का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
या
स्वतंत्र चर और आश्रित चर का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रयोगात्मक विधि
(Experimental Method)

आधुनिक मनोविज्ञान की मुख्य अध्ययन विधि प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) है। अब प्रयोगात्मक विधि को मनोविज्ञान की सर्वाधिक उपयोगी, महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोत्तम अध्ययन विधि माना जाता है। प्रयोगात्मक विधि प्रयोगशाला में आयोजित प्रयोग के माध्यम से कार्य करती है।

प्रयोगात्मक विधि अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि से अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक है। प्रयोग के समय प्रयोगकर्ता का दशाओं या घटनाओं पर नियन्त्रण रहता है, जबकि निरीक्षण के अन्तर्गत ऐसा नहीं होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में वुण्ट नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना के साथ प्रयोग विधि का श्रीगणेश हुआ था।

प्रयोग का अर्थ-वुडवर्थ के अनुसार प्रयोग का पहला अर्थ है- प्रकृति से प्रश्न करना। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोग करने वाले व्यक्ति के सामने एक स्पष्ट प्रश्न या समस्या होती है, जिसका उचित उत्तर पाने के लिए वह प्रकृति के सामने प्रयोग का आयोजन करता है। यह प्रश्न या समस्या किसी युक्ति से निकली उपकल्पना (सम्भावित उत्तर) पर आधारित होती है। इस उपकल्पना को प्रयोग के माध्यम से सिद्ध अथवा असिद्ध करना होता है। प्रयोग करते समय वस्तुओं को एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है जिससे प्राप्त परिणाम उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसे प्रकृति से पूछा गया था।

अपने दूसरे अर्थ में प्रयोग नियन्त्रित वातावरण में किया गया निरीक्षण है। प्रयोग की आवश्यक शर्त के अनुसार नियन्त्रित एवं उपयुक्त परिस्थितियों में प्राणी की मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है तथा परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराने पर भी प्रयोग के परिणाम पहले के समान ही प्राप्त होते हैं। इस प्रकार नियन्त्रित निरीक्षण ही प्रयोग कहलाता है।

प्रयोग की परिभाषा – प्रयोग को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –

  1. गैरेट के मतानुसार, “प्रकृति से पूछा गया प्रश्न प्रयोग है।”
  2. जहोदा के अनुसार, “प्रयोग परिकल्पना के परीक्षण की एक विधि है।”
  3. जे० सी० टाउनशैण्ड के अनुसार, “नियन्त्रित दशाओं में किये गये निरीक्षण को प्रयोग कहा जाता है।”
  4. फेस्टिगर के मतानुसार, “प्रयोग का मूल आधार स्वतन्त्र चर में परिवर्तन करने से परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है।”

प्रयोगात्मक विधि के चरण
(Steps of Experimental Method)

प्रयोगात्मक विधि अपने आप में एक व्यवस्थित अध्ययन विधि है। इस विधि के कुछ निश्चित चरण हैं जो निम्नलिखित हैं

(1) समस्या का निर्धारण – प्रयोगात्मक विधि का प्रथम चरण अध्ययन की समस्या का निर्धारण है। प्रयोग आरम्भ करने से पहले प्रयोगकर्ता समस्या का निर्धारण करता है। इसके लिए वह किसी उपयुक्त मनोवैज्ञानिक समस्या का चुनाव करता है। उदाहरण के लिए, समाज में नशे का व्यसन । बुरा समझा जाता है। प्रायः देखने में आता है कि अधिकांश ट्रक-ड्राइवर नशाखोरी करते हैं। माना जाता है कि नशा न करने वाले ड्राइवर, नशा करने वाले ड्राइवरों से सन्तुलित, विश्वसनीय एवं अच्छी गाड़ी चलाते हैं अथवा नशा करने से चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोगों का कहना है कि नशा करने से ध्यान एकाग्र होता है और इससे गाड़ी चलाने में मदद मिलती है। जो लोग न तो नशाखोरी के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष में, उनके अनुसार असन्तुलित एवं अविश्वसनीय गाड़ी चलाने का कारण नशे की आदत न होकर ड्राइवर का व्यक्तित्व है। उच्च जीवन-स्तर यापन करने वाले बहुत-से लोग नशा करते हैं। ये सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित हैं, चरित्रवान समझे जाते हैं और आर्थिक रूप से भी सम्पन्न हैं। इस तर्क-वितर्क से इस समस्या का जन्म होता है कि शारीरिक या मानसिक क्षमता पर नशाखोरी का क्या प्रभाव पड़ता है।

(2) परिकल्पनाका निर्माण – समस्या का निर्धारण करने के उपरान्त प्रयोगकर्ता परिकल्पना (Hypothesis) का निर्माण करता है। परिकल्पना चुनी गयी समस्या का सम्भावित समाधान होता है, जिसकी रचना से प्रयोग को कार्य निश्चित और नियन्त्रित दशाओं में होता है। उपर्युक्त प्रस्तुत किये गये उदाहरण में, शारीरिक तथा मानसिक क्षमता पर नशाखोरी के प्रभाव की समस्या को परिकल्पना के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-“नशा (अफीम का सेवन) करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है।” इस परिकल्पना को प्रयोगों के आधार पर सिद्ध या असिद्ध किया जाएगा।

(3) स्वतन्त्र तथा आश्रित चरों को पृथक करना – किसी प्रयोग में दो या उससे अधिक ‘चर’ या परिवर्त्य (Variables) हो सकते हैं। ये चर दो प्रकार से वर्णित हैं—स्वतन्त्र चर तथा आश्रित चर। स्वतन्त्र चर (Independent Variable) को सामान्यत: ‘उद्दीपन कहा जाता है और आश्रित चर (Dependent Variable) को प्रतिक्रियाएँ कहा जाता है। स्वतन्त्र चर को प्रयोगकर्ता नियन्त्रित करके प्रस्तुत करता है। इन्हें बिना किसी अन्य चर पर प्रभाव डाले घटाया-बढ़ाया जा सकता है। आश्रित चर स्वतन्त्र ज्वरों के बदले जाने पर बदल जाते हैं और प्रयोगात्मक परिस्थितियों पर आश्रित होते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में, नशाखोरी स्वतन्त्र चर है, क्योंकि प्रयाग में नशा करने और न करने के प्रभाव की परीक्षा की जाती है। शारीरिक और मानसिक क्षमता आश्रित चर है क्योंकि यह नशाखोरी की उपस्थिति या अनुपस्थिति के अनुसार परिवर्तित होगा।

(4) परिस्थितियों पर नियन्त्रण – मनोवैज्ञानिक प्रयोग में परिस्थितियों (दशाओं) पर नियन्त्रण एक आवश्यक तत्त्व है। इसके लिए प्रयोगकर्ता को सभी सम्भावित चरों का ज्ञान होना चाहिए। उसे उन अवांछित चरों या उद्दीपनों पर नियन्त्रण रखना पड़ता है जो वातावरण में उत्पन्न हो जाते हैं। और जिनकी प्रयोगकर्ता को आवश्यकता नहीं होती है। प्रस्तुत उदाहरण में सम्भव है कि प्रयोग का पात्र व्यक्ति यह सिद्ध करने की चेष्टा करे कि नशा करने से उसकी शारीरिक-मानसिक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। यह एक अवांछित सम्भावना है जिसे निर्मूल करने के लिए प्रयोग में परिस्थिति पर नियन्त्रण रखना आवश्यक है।

(5) प्रयोगफल का विश्लेषण – प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणामों का विश्लेषण प्रयोगात्मक विधि का पाँचवाँ एवं महत्त्वपूर्ण चरण है। विश्लेषण के लिए सांख्यिकीय प्रविधियों का प्रयोग किया जा सकता है। प्रयोग के दौरान अधिक पात्र होने पर उन्हें दो समूहों में विभाजित किया जा सकता है(i) प्रायोगिक समूह (Experimental Group) तथा (ii) नियन्त्रित समूह (Controlled Group)। अक्सर स्वतन्त्र चर, प्रायोगिक समूह कहलाता है और आश्रित चर, नियन्त्रित समूह। इस प्रयोग में नशे की वस्तु (माना अफीम) स्वतन्त्र चर है जिसके प्रयोग से प्राप्त परिणामों की तुलना अफीमरहित परिणामों के साथ की जाएगी।

(6) परिकल्पना की जाँच – प्रयोग के परिणाम यदि निर्माण की गयी परिकल्पना के पक्ष में होते हैं तो परिकल्पना सिद्ध मान ली जाती है, किन्तु विपरीत परिणामों की स्थिति में परिकल्पना को रद्द या अस्वीकृत घोषित कर दिया जाता है तब नयी परिकल्पना का निर्माण किया जाता है। प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम यदि परिकल्पना अर्थात् “नशा (अफीम का सेवन करने से शारीरिक तथा मानसिक क्षमता का ह्रास होता है”–के पक्ष में जाते हैं तो हमारी परिकल्पना सिद्ध मानी जाएगी। स्पष्टत: इस दशा में अफीम का सेवन ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता में ह्रास लाएगा। यदि परिणामों से यह ज्ञात हो कि अफीम के सेवन से ड्राइवरों की शारीरिक-मानसिक क्षमता पर धनात्मक (अच्छा) प्रभाव पड़ा तो हमारी परिकल्पना रद्द समझी जाएगी।

(7) सामान्यीकरण – एकसमान परिस्थितियों में तथा निरन्तर प्रयोगों के माध्यम से स्वतन्त्र चर का आश्रित चर पर प्रभाव देखकर जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनके विश्लेषण एवं व्याख्या के आधार पर सामान्य नियम निकाले जाते हैं। यही सामान्यीकरण है जो प्रयोगात्मक विधि का अन्तिम चरण है।

प्रयोगात्मक विधि के गुण या लाभ (महत्त्व)
(Merits of Experimental Method)

प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है जिसके द्वारा सुचारु रूप से अध्ययन किये जा सकते हैं। और निश्चित पेरिणामों तक पहुँचा जा सकता है। ये परिणाम अधिक शुद्ध और विश्वसनीय होते हैं। इसके अन्य गुणों (विशेषताएँ) या लाभ निम्नलिखित हैं –

(1) परिस्थिति सम्बन्धी आत्म-निर्भरता – प्रयोगात्मक विधि में, निरीक्षण विधि की तरह, प्रयोगकर्ता प्राकृतिक परिस्थितियों पर आश्रित नहीं रहता। वह आवश्यकतानुसार कृत्रिम परिस्थितियों का निर्माण कर प्रयोग कर लेता है जिससे समय और शक्ति की बचत होती है।

(2) पूर्ण वैज्ञानिक विधि – यह एक पूर्ण वैज्ञानिक विधि है जिसके अन्तर्गत नियन्त्रित परिस्थितियों में प्रयोग के माध्यम से वांछित परिणाम एवं निष्कर्ष निकाले जाते हैं। अन्य विधियों की तुलना में इस विधि के निष्कर्ष अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं।

(3) नियन्त्रित परिस्थितियाँ – इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें प्रयोग की परिस्थितियाँ (दशाएँ) पूरी तरह प्रयोगकर्ता के नियन्त्रण में रहती हैं। प्रयोगशाला में परिस्थितियों पर नियन्त्रण रखकर ही सही निष्कर्ष प्राप्त किये जा सकते हैं।

(4) दोहराना – प्रयाग की एक विशेषता यह है कि इसको सुविधानुसार दोहराया जा सकता है। प्रयोगकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार पूरी घटना को दोहरा सकता है या घटना के किसी एक पक्ष की पुनरावृत्ति भी कर सकता है।

(5) उद्देश्यानुसार एवं समुचित प्रयोग योजना – प्रयोगात्मक विधि में प्रयोगकर्ता निर्धारित उद्देश्य के अनुसार आसान प्रयोग योजना तैयार कर सकता है। वह उसमें वांछित परिवर्तन भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, समुचित प्रयोग योजना के माध्यम से मानव स्वभाव के विविध पक्षों का अध्ययन सम्भव है।

(6) पशुओं पर प्रयोग सम्भव – सभी प्रकार के प्रयोगों को मानव-स्वभाव पर लागू करके निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते। पशुओं पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग करने में प्रयोग विधि हमारी अत्यधिक सहायता करती है। इससे प्राप्त परिणामों को लागू करने से पूर्व इनकी मानव-स्वभाव से तुलना करके देखा जाता है।

(7) कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन – प्रयोग विधि के माध्यम से कार्य और कारण सम्बन्धों का शुद्धतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत समस्या से सम्बन्धित विभिन्न कारकों के प्रभाव को पृथक् से भी जाना जा सकता है। प्रयोग में हम जिस कारक के प्रभाव की जाँच करना चाहते हैं, उसके अतिरिक्त अन्य कारकों को नियन्त्रित रखकर प्रभाव का स्पष्ट एवं शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

(8) वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं सम्पूर्ण विधि – प्रयोगात्मक विधि से प्राप्त निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय, वैध तथा सार्वभौमिक होते हैं। एक ओर जहाँ अन्तर्दर्शन विधि केवल आन्तरिक दशाओं का अध्ययन करती है और निरीक्षण विधि व्यवहार की बाह्य दशाओं का, वहीं दूसरी ओर प्रयोग विधि प्राणी के आन्तरिक एवं बाह्य दोनों पक्षों का अध्ययन करती है। इस प्रकार यह मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक सम्पूर्ण विधि है।

प्रयोगात्मक विधि के दोष अथवा कठिनाइयाँ (कमियाँ)
(Demerits of Experimental Method)

भले ही प्रयोगात्मक विधि को मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए सर्वोत्तम विधि माना जाता है, परन्तु अन्य विधियों के ही समान इस विधि में भी कुछ दोष या कमियाँ हैं, जिनका सामान्य विवरण निम्नवत् है –

(1) प्रयोगशाला की कृत्रिम परिस्थिति – प्रयोग किसी विशेष अध्ययन के लिए प्रयोगशाला की विशिष्ट परिस्थितियों में आयोजित किये जाते हैं। ये विशिष्ट परिस्थितियाँ प्राकृतिक परिस्थितियों के समान न होकर कृत्रिम होती हैं और कृत्रिम व्यवहार से शुद्ध परिणाम प्राप्त करना कठिन है। नियन्त्रित एवं बनावटी परिस्थितियों में कोई भी प्रयोज्य (Subject) या व्यक्ति स्वाभाविक व्यवहार प्रदर्शित नहीं कर सकता। इससे प्रयोग के मध्य त्रुटियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।

(2) विषय-पान्न की रुचियों पर नियन्त्रण कठिन – मानव की मन:स्थिति तथा उसकी रुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं जिन पर नियन्त्रण यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। प्रयोग के दौरान ज्यादातर विषय-पात्र अपनी-अपनी मन:स्थिति या रुचियों से प्रेरित होकर ही व्यवहार करते हैं। इससे प्रयोग के परिणाम पक्षपातपूर्ण एवं भ्रामक प्राप्त होते हैं।

(3) विषय-पात्र के सहयोग की समस्या  प्रयोगात्मक पद्धति में विषय-पात्र जब तक प्रयोगकर्ता को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान नहीं करता, तब तक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। असहयोग की अवस्था में न केवल अवरोध उत्पन्न होता है, वरन् प्रयोग ही व्यर्थ हो जाता है। यदि किसी प्रयोग में व्यक्ति के व्यक्तित्व का अध्ययन किया जा रहा है तो वह व्यक्ति कभी-कभी ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करने लगता है कि उसके व्यक्तित्व का नितान्त त्रुटिपूर्ण स्वरूप प्रस्तुत हो जाता है। कभी-कभी प्रयोगकर्ता पात्र की प्रक्रियाओं की प्रतीक्षा ही करता रह जाता है। इससे समय और शक्ति की हानि होती है।

(4) संदिग्ध परिणाम – यदि प्रयोगकर्ता प्रशिक्षित नहीं है तो वह प्रयोग सम्बन्धी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठता नहीं ला सकता जिससे परिणाम की शुद्धता संदिग्ध हो जाती है।

(5) सामाजिक घटनाओं सम्बन्धी समस्या – समाज का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है; अत: सामाजिक घटनाओं को अध्ययन हेतु किसी प्रयोगशाला में उपस्थित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः सामाजिक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अध्ययन करने के लिए प्रयोगकर्ता को समाज की वास्तविक परिस्थितियों में रहकर काम करना होगा। इन परिस्थितियों में प्रयोगशाला एवं उसके उपकरण व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं।

(6) सीमित क्षेत्र की कठिनाई – प्रयोगात्मक विधि का कार्य-क्षेत्र अत्यन्त सीमित है। इस विधि का प्रयोग हम उन सभी दशाओं में नहीं कर सकते जिनमें हम करना चाहते हैं। अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रयोग द्वारा नहीं किये जा सकते। उदाहरण के लिए-स्मृति पर शराब के प्रभाव को समझने के लिए बालकों, स्त्रियों या दूसरे पात्रों को शराब नहीं पिलायी जा सकती है। इसी प्रकार प्रेम, घृणा तथा यौन क्रियाओं सम्बन्धी क्रियाकलापों पर न तो नियन्त्रण रखा जा सकता है और न ही इन्हें प्रयोगशाला में समुचित रूप में आयोजित किया जा सकता है।

मूल्यांकन – वस्तुत: प्रयोगात्मक विधि की उपर्युक्त सीमाओं के ज्ञान से उसके महत्त्व को कम नहीं आँका जा सकता। टी० जी० एण्ड्यू ज का कथन है, “प्रयोग ही मनोविज्ञान का केन्द्रीय आधार है। इस पद्धति की वैज्ञानिकता के परिणामस्वरूप ही मनोविज्ञान एक शुद्ध विज्ञान बन सका है। प्रयोगों की सफलता एवं उपयोगिता ने आधुनिक मनोविज्ञान को ‘परीक्षणशाला मनोविज्ञान का नाम प्रदान कर दिया।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अन्तर्दर्शन विधि को तटस्थ मूल्यांकन प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अन्तर्दर्शन विधि मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक मौलिक विधि है। भले ही इस विधि की कुछ सीमाएँ एवं कमियाँ हैं, परन्तु इन कमियों को अभ्यास, स्मृति एवं प्रशिक्षण के माध्यम से कम किया जा सकता है तथा इस विधि को अधिक विश्वसनीय, वैज्ञानिक एवं लाभप्रद बनाया जा सकता है। इस विधि के माध्यम से पशुओं, बालकों और असामान्य तथा मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। इस विधि के माध्यम से प्राप्त होने वाले निष्कर्ष आत्मगत होते हैं; अतः इस विधि द्वारा किये गये अध्ययन को कम वस्तुनिष्ठ तथा कम तथ्यात्मक माना जाता है। यही कारण है। कि मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में अन्तर्दर्शन विधि की तुलना में निरीक्षण तथा प्रयोगात्मक विधियों को अधिक विश्वसनीय माना जाता है। वैसे यह सत्य है कि मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में अन्तर्दर्शन विधि का सैद्धान्तिक महत्त्व है तथा व्यवहार में इसे एक पूरक विधि के रूप में अपनाया जाता है।

प्रश्न 2.
निरीक्षण विधि की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली निरीक्षण विधि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. निरीक्षण विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित विषय, व्यवहार या घटना का अध्ययन पूर्ण सावधानीपूर्वक किया जाता है।
  2. इस विधि में अध्ययनकर्ता नेत्रों का पूर्णरूपेण उपयोग करता है और अध्ययन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेता है।
  3. निरीक्षण विधि की सहायता से प्रायः मनोविज्ञान की अनेक समस्याओं को प्राथमिक निरीक्षण के आधार पर चुन लिया जाता है।
  4. व्यक्तिगत व्यवहार के अतिरिक्त सामाजिक विकास तथा सामूहिक व्यवहार का भी अध्ययन किया जा सकता है।
  5. यह विधि अकेली स्वतन्त्र विधि के रूप में प्रयुक्त होती है और सहायक विधि के रूप में भी।
  6. इस विधि के माध्यम से अध्ययन की प्राथमिक सामग्री तथा महत्त्वपूर्ण आँकड़े एकत्र किये जा सकते हैं।

प्रश्न 3.
निरीक्षण विधि के मुख्य चरणों अथवा पदों का उल्लेख कीजिए।
या
निरीक्षण विधि के चरणों को सोदाहरण समझाइए।
उत्तर :
निरीक्षण विधि के प्रमुख चरण अथवा पद निम्नलिखित हैं

(1) उपयुक्त योजना को निर्माण – अध्ययन को उद्देश्यपूर्ण बनाने की दृष्टि से अध्ययनकर्ता को सबसे पहले समस्या के सम्बन्ध में उपयुक्त योजना बना लेनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि किन व्यक्तियों के किस प्रकार के व्यवहार का निरीक्षण किया जाना है। अध्ययन का समय, आवश्यक यन्त्र तथा क्षेत्र आदि का निश्चय भी पहले से ही कर लेना चाहिए।

(2) व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन – निरीक्षण विधि के अन्तर्गत व्यवहार का प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन किया जाना चाहिए। अध्ययनकर्ता समस्या से सम्बन्धित प्रत्येक पक्ष का सूक्ष्म एवं प्रत्यक्ष अध्ययन करता है। यह अध्ययन उसी स्थान पर किया जाता है जहाँ व्यवहार स्वाभाविक रूप में विद्यमान है।

(3) व्यवहार का लेखन – व्यवहार का अवलोकन करते समय उसे नोट करते जाना चाहिए; अन्यथा अध्ययनकर्ता तत्सम्बन्धी तथ्यों को या तो बाद में भूल जायेगा या उन्हें यथार्थ से भिन्न करके याद रख पायेगा। व्यवहार को संचित करने के लिए टेपरिकॉर्डर या मूवी कैमरा जैसे उपकरणों का भी प्रयोग किया जा सकता है। व्यवहार को नोट करते समय उन पक्षों पर अधिकाधिक ध्यान रखा जाना चाहिए जिनका सम्बन्ध उस समस्या से होता है।

(4) व्यवहार का विश्लेषण एवं व्याख्या – व्यवहार को नोट करने के पश्चात् उसका विश्लेषण किया जाता है। सुविधा की दृष्टि से लिखित व्यवहार को अंकों (Scores) में बदल लेना चाहिए तथा उनका सारणीयन (Tabulation) करके सांख्यिकीय विधियों की सहायता से विश्लेषण करना चाहिए। विश्लेषण कार्य से प्राप्त परिणामों की व्याख्या के उपरान्त जो सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं, उन्हें वर्ग विशेष या जाति विशेष की समस्त जनसंख्या के लिए सामान्यीकृत कर दिया जाता है। इसका अर्थ यह है कि इन्हें ऐसे सामान्य सिद्धान्तों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो सामान्य रूप से सही स्वीकार कर लिये गये हों। मनोविज्ञान के नियम सामान्यीकृत होते हैं।

प्रश्न 4.
निरीक्षण विधि के दोषों का निवारण किस प्रकार किया जा सकता है?
उत्तर :
भले ही निरीक्षण विधि को मनोवैज्ञानिक अध्ययन की एक उत्तम विधि माना जाता है, परन्तु अन्य विधियों के ही समान इस विधि में भी कुछ दोष हैं; जैसे—कि घटनाओं की क्रमबद्धता का अभाव, घटनाओं का नियन्त्रित न होना, पक्षपात की आशंका, निरीक्षणकर्ता की व्यक्तिगत रुचियों का प्रभाव, निरीक्षणकर्ता का प्रशिक्षित न होना तथा सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार का अस्वाभाविक होना। निरीक्षण विधि के इन मुख्य दोषों के निवारण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

  1. निरीक्षण कार्य करते समय प्रयोगकर्ता को चाहिए कि वह अपनी व्यक्तिगत भावनाओं पर नियन्त्रण रखे ताकि तथ्य आत्मगत अवलोकन से दूषित न हों तथा अध्ययन की वस्तुनिष्ठता बनी रहे।
  2. निरीक्षण प्रक्रिया का पर्याप्त प्रशिक्षण तथा अनुभव प्रदान करने के उपरान्त ही निरीक्षणकर्ता को क्षेत्रीय निरीक्षण के लिए भेजना चाहिए।
  3. निरीक्षणकर्ता अपनी कल्पना अथवा अनुभव का समावेश कर तथ्यों को अविश्वसनीय ने बना दे; अत: वह जैसा अवलोकन करे वैसा ही लिखे भी—इससे निरीक्षण वैज्ञानिकप्रकृति का बन सकेगा।
  4. प्रयोग से पहले अपनी पूर्वधारणाओं, राग-द्वेष, पक्षपातों तथा अन्य व्यक्तिगत प्रवृत्तियों को प्रभाव न्यूनतम करने की दृष्टि से निरीक्षक को अपनी मनोवृत्तियों का विश्लेषण कर लेना चाहिए।
  5. निरीक्षण विधि से प्राप्त परिणामों की तुलना अन्तर्दर्शन एवं प्रयोगात्मक विधि से प्राप्त परिणामों से करना अपेक्षाकृत लाभकारी सिद्ध होगा।

प्रश्न 5.
नैदानिक विधि अथवा नैदानिक निरीक्षण (Clincial Observation) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
हम जानते हैं कि मनोविज्ञान द्वारा सामान्य तथा असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली एक मुख्य विधि को नैदानिक विधि अथवा नैदानिक निरीक्षण कहा जाता है। इस विधि को सामान्य रूप से सम्बन्धित व्यक्ति के असामान्य व्यवहार या मानसिक रोग के निदान के लिए अपनाया जाता है। इस विधि को मुख्य रूप से मनोविकारों की चिकित्सा के क्षेत्र में अपनाया जाता है। इस विधि को अपनाने का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के मनोविकारों के निहित कारणों को ज्ञात करना होता है। नैदानिक निरीक्षण के अर्थ को जी० मर्फी ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “नैदानिक विधि व्यक्ति के उस मनोवैज्ञानिक पक्ष का अध्ययन करती है जिसमें उसके जीवन की प्रसन्नता एवं उसके प्रभावपूर्ण सामंजस्य का कार्य निर्भर करता है; यह विधि उसकी क्षमताओं तथा परिसीमाओं, सफलता और असफलता के कारण तथा जीवन की समस्याओं का अध्ययन करती है। इस विधि में उन कारणों का अध्ययन सम्मिलित है जो व्यक्ति के जीवन का निर्माण करते हैं या उसे बिगाड़ देते हैं।”

प्रश्न 6.
नैदानिक विधि के गुण-दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अपनायी जाने वाली नैदानिक विधि के मुख्य गुण-दोषों का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है –

गुण – मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में नैदानिक विधि का विशेष महत्त्व है। इस विधि को मुख्य रूप से व्यक्ति के असामान्य व्यवहार अथवा मनोविकारों के अध्ययन के लिए अपनाया जाता है। सामान्य रूप से व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के कारणों के निदान के लिए इस विधि को अपनाया जाता है। एक बार असामान्य व्यवहार के कारण ज्ञात हो जाने पर उसका उपचार सरल हो जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि नैदानिक विधि मनोचिकित्सा के क्षेत्र में विशेष उपयोगी है। हम कह सकते हैं कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से नैदानिक विधि का अधिक महत्त्व है।

दोष – नैदानिक विधि का मुख्य दोष यह है कि यह विधि एक अत्यधिक जटिल विधि है तथा इस विधि के माध्यम से अध्ययन करने के लिए पर्याप्त अनुभवी, धैर्यवान तथा विशेषज्ञ अध्ययनकर्ता की आवश्यकता होती है। यदि नैदानिक विधि के प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाती है तो इसके गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।

प्रश्न 7.
मनोविज्ञान द्वारा अपनायी जाने वाली निरीक्षण विधि तथा नैदानिक निरीक्षण विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली दो मुख्य विधियाँ हैं–निरीक्षण विधि तथा नैदानिक निरीक्षण विधि। ये दोनों दो भिन्न विधियाँ हैं तथा इनमें स्पष्ट अन्तर है। किसी व्यक्ति के किसी सामान्य व्यवहार के अध्ययन के लिए सामान्य निरीक्षण विधि को अपनाया जाता है। इस प्रकार से निरीक्षण विधि मनोविज्ञान की एक सामान्य अध्ययन विधि है। इससे भिन्न नैदानिक निरीक्षण विधि को मुख्य रूप से मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनाया जाता है। इस विधि के माध्यम से व्यक्ति के असामान्य व्यवृहार के कारणों को जानने का प्रयास किया जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि नैदानिक निरीक्षण विधि को अध्ययन-क्षेत्र सामान्य निरीक्षण विधि की तुलना में सीमित है। निरीक्षण विधि तथा नैदानिक निरीक्षण विधि में एक अन्य अन्तर भी है। निरीक्षण विधि को केवल सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनाया जाता है। इससे भिन्न नैदानिक निरीक्षण विधि द्वारा सम्बन्धित व्यक्ति के असामान्य व्यवहार के कारणों को ज्ञात किया जाता है तथा साथ ही उस असामान्य व्यवहार के उपचार के उपाय भी सुझाये जाते हैं। इस प्रकार निरीक्षण विधि सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है, जबकि नैदानिक निरीक्षण विधि सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों दृष्टिकोणों से महत्त्वपूर्ण है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अन्तर्दर्शन विधि एक वैज्ञानिक विधि क्यों नहीं है?
उत्तर :
यह सत्य है कि अन्तर्दर्शन विधि मनोविज्ञान की एक पुरानी तथा मौलिक अध्ययन विधि है, परन्तु आधुनिक मान्यताओं के अनुसार, अन्तर्दर्शन विधि को अवैज्ञानिक विधि माना जाता है। इनका मुख्य कारण यह है कि इस विधि के माध्यम से एक समय में एक से अधिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा वस्तुनिष्ठ ढंग से अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अन्तर्दर्शन विधि एक व्यक्तिगत अध्ययन विधि है। इससे प्राप्त होने वाला ज्ञान आत्मगत तथा व्यक्तिनिष्ठ होता है। वैज्ञानिक ज्ञान का वस्तुनिष्ठ होना आवश्यक है। अतः अन्तर्दर्शन विधि को वैज्ञानिक विधि मानना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 2.
निरीक्षण विधि के कोई दो गुण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(i) निरीक्षण विधि में पर्याप्त वस्तुनिष्ठता पायी जाती है तथा इसके माध्यम से व्यापक क्षेत्र में अध्ययन किया जा सकता है। इसके साथ इस विधि के माध्यम से स्वाभाविक परिस्थितियों में अध्ययन किया जाता है।
(ii) मनोविज्ञान सामान्य व्यक्तियों के साथ-ही-साथ असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार का भी अध्ययन करता है। यह अध्ययन निरीक्षण विधि द्वारा ही किया जा सकता है। इसी प्रकार पशु व्यवहार का अध्ययन भी निरीक्षण विधि द्वारा ही किया जाता है।

प्रश्न 3.
नैदानिक विधि की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनायी जाने वाली मुख्य अध्ययन विधि नैदानिक विधि है। इसे नैदानिक निरीक्षण विधि भी कहते हैं। इस विधि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. नैदानिक विधि मानसिक रोगियों तथा असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार के अध्ययन के लिए अपनायी जाने वाली विधि है।
  2. इस विधि के माध्यम से एक समय में केवल एक व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
  3. नैदानिक विधि द्वारा होने वाले अध्ययन का उद्देश्य मनोविकार के कारणों को जानना तथा उसके उपचार के उपाय सुझाना होता है।

प्रश्न 4
अन्तर्दर्शन विधि तथा निरीक्षण विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अन्तर्दर्शन तथा निरीक्षण विधि में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 2 Methods of the Study of Psychology 1
प्रश्न 5.
निरीक्षण विधि तथा प्रयोग विधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
निरीक्षण विधि तथा प्रयोग विधि में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 2 Methods of the Study of Psychology 2
प्रश्न 6.
शैक्षिक समस्या के निदान के लिए आप किस विधि का उपयोग उचित समझते हैं? समझाइए।
उत्तर :
शैक्षिक समस्या से आशय है किसी बालक के शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार की असामान्यता; जैसे—बालक का प्रतिदिन स्कूल से भाग जाना या गृह-कार्य को बिल्कुल नहीं करना। इस प्रकार के असामान्य व्यवहार अर्थात् शैक्षिक समस्या के निदान के लिए नैदानिक निरीक्षण विधि को उपयोग में लाना उचित होता है। नैदानिक निरीक्षण द्वारा असामान्य व्यवहार का उचित निदान हो जाता है तथा इस निदान के आधार पर ही उस असामान्य व्यवहार का सुधार भी किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
सामान्यतः पशु-व्यवहार का अध्ययन आप किस विधि से करेंगे और क्यों?
उत्तर :
व्यवहार के अध्ययन के लिए मुख्य रूप से अन्तर्दर्शन विधि, निरीक्षण विधि तथा प्रयोग विधि को अपनाया जाता है। पशु-व्यवहार के अध्ययन के लिए सामान्यत: इनमें से निरीक्षण विधि को ही अपनाया जाता है। वास्तव में, अन्तर्दर्शन विधि द्वारा पशु-व्यवहार के अध्ययन का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि पशुओं द्वारा अपनी मनोस्थिति को प्रकट नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त प्रयोग विधि द्वारा पशु-व्यवहार का अध्ययन तो किया जा सकता है, परन्तु प्रयोगशाला में पशुओं का व्यवहार स्वाभाविक न रहकर कृत्रिम हो जाता है; अत: यह अध्ययन भी कुछ हद तक अयथार्थ ही होता है। इस स्थिति में स्वाभाविक पशु-व्यवहार के अध्ययन के लिए उनके मुक्त वातावरण में निरीक्षण विधि को ही अपनाना सर्वोत्तम माना जाता है।

निश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. मनोविज्ञान के विकास के प्रथम चरण में अध्ययन की मुख्य विधि …………………. ही थी।
  2. जब व्यक्ति अपनी मानसिक क्रियाओं को स्वयं अनुभव एवं विश्लेषण करता है, तो अध्ययन की यह विधि …………………. कहलाती है।
  3. मनोविज्ञान की अन्तर्दर्शन विधि को …………………. भी कहा जाता है।
  4. …………………. अध्ययन विधि का प्रमुख दोष आत्मगत परिणाम का होना है।
  5. अन्तर्दर्शन विधि को …………………. नहीं माना जा सकता।
  6. अन्तर्दर्शन विधि द्वारा प्राप्त होने वाली जानकारी सदैव …………………. ही होती है।
  7. एक अबोध बालक के व्यवहार के अध्ययन के लिए …………………. को नहीं अपनाया जा सकता।
  8. सम्बन्धित व्यक्ति के व्यवहार का प्रत्यक्ष अध्ययन करने वाली विधि को …………………. कहते हैं।
  9. छोटे बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए …………………. ही सर्वोत्तम घिधि मानी जाती है।
  10. सामान्य रूप से …………………. परिस्थितियों में निरीक्षण विधि द्वारा अध्ययन किया जाता है।
  11. निरीक्षणकर्ता की …………………. से निरीक्षण विधि द्वारा प्राप्त निष्कर्षों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  12. निरीक्षणकर्ता के पूर्वाग्रह निरीक्षण विधि द्वारा किये गये अध्ययन के निष्कर्षों पर …………………. प्रभाव डालते हैं।
  13. मनोविज्ञान के आधुनिक विद्वानों के अनुसार मनोविज्ञान की सर्वोत्तम अध्ययन विधि …………………. है।
  14. मनोविज्ञान की अध्ययन विधियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक …………………. विधि है।
  15. मनोविज्ञान को विज्ञान का दर्जा दिलाने का श्रेय इसकी …………………. अध्ययन विधि का है।
  16. सामान्यत: चर …………………. और …………………. प्रकार के होते हैं।
  17. प्रहस्तन द्वारा जिस चर को घटा-बढ़ाकर व्यवहार पर उसका प्रभाव ज्ञात किया जाता है, उसे …………………. चर कहते हैं।
  18. मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला …………………. विश्वविद्यालय में …………………. द्वारा स्थापित की गई।
  19. 1879 में लिपजिंग में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना …………………. ने की थी।
  20. प्रयोग विधि के माध्यम से अध्ययन करने के लिए सर्वप्रथम एक …………………. का निर्माण किया जाता है।
  21. असामान्य व्यवहार तथा मनोविकारों के कारणों को जानने के लिए …………………. विधि को अपनाया जाता है।
  22. निरीक्षण विधि की तुलना में नैदानिक विधि का क्षेत्र …………………. है।
  23. प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है तथा अन्तर्दर्शन विधि …………………. है।

उत्तर :

  1. अन्तर्दर्शन विधि
  2. अन्तर्दर्शन विधि
  3. आन्तरिक निरीक्षण
  4. अन्तर्दर्शन
  5. वैज्ञानिक विधि
  6. व्यक्तिनिष्ठ
  7. अन्तर्दर्शन विधि
  8. निरीक्षण विधि
  9. निरीक्षण विधि
  10. स्वाभाविक
  11. रुचियों
  12. प्रतिकूल
  13. प्रयोगात्मक विधि
  14. प्रयोग
  15. प्रयोगात्मक
  16. स्वतन्त्र, अग्रित
  17. स्वतन्त्र
  18. लिपजिंग,विलियम वुण्ट,
  19. वुण्ट
  20. उपकल्पना
  21. नैदानिक विधि
  22. सीमित
  23. अवैज्ञानिक।

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए 

प्रश्न II.

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए मुख्य रूप से कौन-कौन सी विधियाँ अपनायी जाती हैं?
उत्तर :

  1. अन्तर्दर्शन विधि
  2. निरीक्षण विधि तथा
  3. प्रयोगात्मक विधि।

प्रश्न 2.
अन्तर्दर्शन विधि द्वारा किस प्रकार की जानकारी प्राप्त होती है?
उत्तर :
अन्तर्दर्शन विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति के आत्म-निरीक्षण के माध्यम से ही उसकी मानसिक क्रियाओं तथा अनुभवों आदि की जानकारी प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 3.
किन-किन विषय पात्रों का अध्ययन अन्तर्दर्शन विधि द्वारा नहीं किया जा सकता?
उत्तर :
अबोध बालकों, असामान्य व्यक्तियों, मानसिक रोगियों तथा पशुओं के व्यवहार का अध्ययन अन्तर्दर्शन विधि द्वारा नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 4.
निरीक्षण विधि द्वारा किन-किन विषय-पात्रों के व्यवहार का अध्ययन सफलतापूर्वक किया जा सकता है?
उत्तर :
अबोध बालकों, असामान्य व्यक्तियों, मानसिक रोगियों तथा पशुओं के व्यवहार का अध्ययन निरीक्षण विधि द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
निरीक्षण विधि के मुख्य चरण अथवा पद कौन-कौन से हैं?
उत्तर :

  1. उपयुक्त योजना का निर्माण
  2. व्यवहार का प्रत्यक्ष अवलोकन
  3. व्यवहार का लेखन
  4. व्यवहार का विश्लेषण एवं व्याख्या तथा
  5. सामान्यीकरण।

प्रश्न 6.
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयोग विधि को सर्वप्रथम किसने और कब अपनाया था?
उत्तर :
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयोग विधि को 1879 ई० में वुण्ट ने अपनाया था।

प्रश्न 7.
निरीक्षण विधि तथा अन्तर्दर्शन विधि में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर :
निरीक्षण विधि एक वस्तुनिष्ठ विधि है, जबकि अन्तर्दर्शन विधि एक व्यक्तिनिष्ठ विधि है।

प्रश्न 8.
प्रयोग विधि तथा निरीक्षण विधि में विद्यमान एक मुख्य अन्तर बताइए।
उत्तर :
प्रयोग विधि में एक उपकल्पना का निर्माण किया जाता है, जबकि निरीक्षण विधि में उपकल्पना का निर्माण नहीं किया जाता।

प्रश्न 9.
नैदानिक विधि को अपनाने का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
उत्तर :
नैदानिक विधि को अपनाने को मुख्य उद्देश्य किसी असामान्य व्यवहार के कारणों को जानना होता है।

प्रश्न 10.
नैदानिक विधि को मुख्य रूप से किस क्षेत्र में अपनाया जाता है?
उत्तर :
नैदानिक विधि को मुख्य रूप से मनोचिकित्सा के क्षेत्र में अपनाया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
मनोवैज्ञानिक अध्ययन की किस विधि के अन्तर्गत विषय-पात्र स्वयं अपनी मनोदशा आदि का विवरण प्रस्तुत करता है?
(क) निरीक्षण विधि
(ख) अन्तर्दर्शन विधि
(ग) प्रयोग विधि
(घ) ये सभी विधियाँ

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किस मनोवैज्ञानिक पद्धति में सबसे कम वस्तुनिष्ठता पायी जाती है?
(क) निरीक्षण
(ख) नैदानिक निरीक्षण
(ग) प्रयोग
(घ) अन्तर्दर्शन

प्रश्न 3.
किस विधि से व्यक्ति स्वयं की मानसिक क्रियाओं और अनुभवों का अध्ययन कर सकता है?
(क) अन्तर्दर्शन
(ख) निरीक्षण
(ग) नैदानिक निरीक्षण,
(घ) प्रयोगात्मक

प्रश्न 4.
अन्तर्दर्शन विधि को इस्तेमाल नहीं किया जा सकता
(क) किसी भी व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन के लिए
(ख) महिलाओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए।
(ग) बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए
(घ) बौद्धिक व्यक्तियों के व्यवहार के अध्ययन के लिए

प्रश्न 5.
किस अध्ययन विधि में बालक व पशु के व्यवहार का अध्ययन सम्भव नहीं होता?
(क) अन्तर्दर्शन विधि में
(ख) नैदानिक निरीक्षण विधि में
(ग) सामान्य निरीक्षण में
(घ) प्रयोग विधि में

प्रश्न 6.
“अन्तर्दर्शन करने का अर्थ है–क्रमबद्धे रूप से अपने मन की कार्यप्रणाली का सुव्यवस्थित अध्ययन करना।”—यह परिभाषा किस मनोवैज्ञानिक ने दी है?
(क) टिचनर
(ख) मैक्डूगल
(ग) स्टाउट
(घ) गार्डनर मर्फी

प्रश्न 7.
निरीक्षण विधि द्वारा व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है
(क) स्वाभाविक परिस्थितियों में
(ख) कृत्रिम परिस्थितियों में
(ग) नियन्त्रित परिस्थितियों में
(घ) हर प्रकार की परिस्थितियों में

प्रश्न 8.
निरीक्षण विधि के गुण हैं
(क) अध्ययन में पर्याप्त वस्तुनिष्ठता
(ख) व्यवहार का स्वाभाविक परिस्थितियों में अध्ययन
(ग) बच्चों तथा असामान्य व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
(घ) उपर्युक्त सभी गुण

प्रश्न 9.
निरीक्षण विधि को नहीं अपनाया जा सकता
(क) व्यक्ति के व्यवहार सम्बन्धी किसी तथ्य को जानने के लिए
(ख) सम्बन्धित व्यक्ति की सामाजिक गतिविधियों को जानने के लिए
(ग) किसी व्यक्ति के मन में निहित प्रेम, ईर्ष्या तथा द्वेष आदि आन्तरिक भावों को जानने के लिए
(घ) व्यक्ति के क्रियाकलापों को जानने के लिए

प्रश्न 10.
निरीक्षण विधि का दोष है
(क) घटनाओं का अनियन्त्रित होना
(ख) पक्षपात एवं निरीक्षणकर्ता की रुचियों का प्रभाव
(ग) प्रशिक्षण एवं अभ्यास का अभाव
(घ) उपर्युक्त सभी दोष

प्रश्न 11.
नियन्त्रित परिस्थिति में किये गये निरीक्षण को कहते हैं
(क) नैदानिक निरीक्षण
(ख) प्रयोग
(ग) आत्म-निरीक्षण
(घ) मूल्यांकन

प्रश्न 12.
किस विधि के द्वारा स्वाभाविक परिस्थिति में व्यवहार का अध्ययन सम्भव है?
(क) अन्तर्दर्शन
(ख) निरीक्षण
(ग) नैदानिक निरीक्षण
(घ) प्रयोगात्मक

प्रश्न 13.
प्रयोग विधि द्वारा अध्ययन करने के लिए आवश्यक है
(क) वातावरण तैयार करना
(ख) उपकल्पना का निर्माण
(ग) अनुमान लगाना
(घ) ये सभी

प्रश्न 14.
मनोवैज्ञानिक अध्ययन की प्रयोग विधि की विशेषता है
(क) शुद्ध वैज्ञानिक विधि है
(ख) अध्ययन को दोहराना सम्भव है।
(ग) वस्तुनिष्ठ, विश्वसनीय एवं सम्पूर्ण विधि है।
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 15.
नैदानिक निरीक्षण सम्बन्धित है –
(क) स्वयं को समझने से
(ख) समस्यात्मक लोगों के अध्ययन से
(ग) नियन्त्रित दशा में किये गये निरीक्षण से
(घ) व्यक्ति को शिक्षित करने से

प्रश्न 16.
विद्यार्थी की व्यक्तिगत समस्या समाधान के लिए उनका अध्ययन करेंगे
(क) अन्तर्दर्शन विधि से
(ख) निरीक्षण विधि से
(ग) प्रयोगात्मक विधि से
(घ) नैदानिक विधि से

प्रश्न 17.
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में नैदानिक विधि द्वारा अध्ययन किया जाता है
(क) व्यक्ति के दैनिक क्रियाकलापों का
(ख) परिवार के सदस्यों के आपसी व्यवहार का
(ग) असामान्य व्यवहार या मानसिक रोग के निदान के लिए व्यवहार को
(घ) हर प्रकार के व्यवहार का

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से किस स्थिति में नैदानिक विधि को अपनाया जाएगा?
(क) सामान्य रूप से झूठ बोलने अथवा चोरी करने वाले छात्र के अध्ययन के लिए
(ख) क्रीड़ा-स्थल पर बच्चों के व्यवहार को जानने के लिए।
(ग) परीक्षा में उत्तम अंक प्राप्त करने वाले छात्र के व्यवहार को जानने के लिए
(घ) उपर्युक्त सभी प्रकार के अध्ययनों के लिए

प्रश्न 19.
मनोविज्ञान को विज्ञान का दर्जा दिये जाने का श्रेय किस विधि को दिया जाता है?
(क) अन्तर्दर्शन विधि
(ख) निरीक्षण विधि
(ग) नैदानिक निरीक्षण विधि
(घ) प्रयोग विधि

प्रश्न 20.
कौन मनोवैज्ञानिक मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला से सम्बन्धित है?
(क) फ्रायड
(ख) वाटसन
(ग) वुण्ट
(घ) टिचनर

प्रश्न 21.
1879 में लिपजिंग में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला किसने स्थापित की?
(क) मन
(ख) टिचनर
(ग) विलियम वुण्ट
(घ) ऐबिंगहास

प्रश्न 22.
मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला स्थापित की गई थी
(क) इंग्लैण्ड में
(ख) वियना में
(ग) जर्मनी में
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर :

  1. (ख) अन्तर्दर्शन विधि
  2. (घ) अन्तर्दर्शन
  3. (क) अन्तर्दर्शन
  4. (ग) बच्चों, असामान्य व्यक्तियों तथा पशुओं के व्यवहार के अध्ययन के लिए
  5. (क) अन्तर्दर्शन विधि में,
  6. (ख) मैक्डूगल
  7. (क) स्वाभाविक परिस्थितियों में
  8. (घ) उपर्युक्त सभी गुण
  9. (ग) किसी व्यक्ति के मन में निहित प्रेम, ईष्र्या तथा द्वेष आदि आन्तरिक भावों को जानने के लिए
  10. (घ) उपर्युक्त सभी दोष
  11. (ख) प्रयोग
  12. (घ) प्रयोगात्मक
  13. (ख) उपकल्पना का निर्माण
  14. (घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ
  15. (ख) समस्यात्मक लोगों के अध्ययन से
  16. (घ) नैदानिक विधि से
  17. (ग) असामान्य व्यवहार या मानसिक रोग के निदान के लिए व्यवहार का
  18. (क) सामान्य रूप से झूठ बोलने अथवा चोरी करने वाले छात्र के अध्ययन के लिए
  19. (घ) प्रयोग विधि
  20. (ग) वुण्ट
  21. (ग) विलियम वुण्ट
  22. (ग) जर्मनी में।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 8 विश्ववन्द्याः कवयः

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name विश्ववन्द्याः कवयः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 8 विश्ववन्द्याः कवयः

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

वाल्मीकिः

(1) कवीन्दं नौमि ……………………… कोविदाः।।

[ कवीन्दु (कवि +इन्दुम्) = कविरूपी चन्द्रमा क़ो। नौमि – नमस्कार करता हूँ। चन्द्रिकामिव (चन्द्रिकाम् + इव) = चाँदनी के सदृश। चिन्वन्ति = चुनते हैं, चुगते हैं। कोविदाः = विद्वान् लोग।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘विश्ववन्द्याः कवयः’ नामक पाठ के ‘वाल्मीकिः’ शीर्षक से उधृत है। इसमें आदिकवि वाल्मीकि की वन्दना की गयी है।

[विशेष – इस पाठ के ‘वाल्मीकिः’ शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – मैं कवियों में चन्द्रमा के सदृश वाल्मीकि को नमस्कार करता हूँ, जिनकी रामायण की कथा का विद्वान् लोग उसी प्रकार रसपान करते हैं, जैसे चकोर चाँदनी का (रसपान) करते हैं।

(2) वाल्मीकिकविसिंहस्य ………………………. पदम् ।।

[ कवितावनचारिणः = कवितारूपी वन में विचरण करने वाले (सिंह)। शृण्वन् = सुनते हुए। याति = प्राप्त होता है। परं पदम् = मोक्ष को।]

अनुवाद – कवितारूपी वन में विचरण करने वाले कवि वाल्मीकिरूपी सिंह की रामकथारूपी गर्जन (घोष) को सुनकर कौन (ऐसा व्यक्ति है, जो) मोक्ष प्राप्त नहीं करता (अर्थात् रामकथा सुनकर सभी लोग मोक्ष के अधिकारी बन जाते हैं)।

(3) कूजन्तं ………………………. वाल्मीकिकोकिलम् ।।

[कूजन्तम = कूजते (बोलते) हुए। रामरामेति (राम-राम +इति) = राम-राम यह (कूजते हुए)| आरुह्य = चढ़कर। कोकिल = पुस्कोकिल (नर कोयल, इसी का कण्ठ मधुर होता है, मादा का नहीं। मादा को
‘कोकिला’ कहते हैं।)]

अनुवाद – कवितारूपी शाखा (डाली) पर चढ़कर मधुर-मधुर अक्षरों में (मधुर ध्वनि से) ‘राम-राम’ शब्द का कूजन करते हुए वाल्मीकिरूपी कोकिल (नर कोयल) की मैं वन्दना करता हूँ।

विशेष – आशय यह है कि महर्षि वाल्मीकि-रचित ‘रामायण’ कोकिल स्वर के समान मधुर है, जिसमें ‘श्रीराम के नाम-स्मरणपूर्वक उनके सुन्दर चरित्र का गायन किया गया है (कोकिल जिस प्रकार वृक्ष की शाखा पर बैठकर पंचम स्वर में बोलता है, वैसे ही वाल्मीकि ने कवितारूपी शाखा पर बैठकर कूजन किया।)

व्यासः

(1) श्रवणाञ्जलिपुटपेयं ………………………. वन्दे।।

[ श्रवणाञ्जलिपुटपेयम् (श्रवण +अञ्जलिपुट +पेयम्) = कानरूपी अंजलिपुट (दोनों हाथों को मिलाकर बड़े दोने के आकार का रूप देना, जिससे जल आदि पीते हैं) से पीने योग्य विरचितवान् = रचा। भारताख्यममृतम् (भारत + आख्यम् + अमृतम्) – महाभारत नामक अमृता तमहमरागमकृष्णम् (तम् +अहम् +अरागम् +अकृष्णम्) =राग (आसक्ति) और कल्मष या पाप (कृष्णम्) से रहित उन (व्यास) को मैं।]

सन्दर्भ – यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘विश्ववन्द्याः कवयः’ नामक पाठ के ‘व्यासः’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें कृष्णद्वैपायन व्यास की वन्दना की गयी है।

अनुवाद – मैं उन कृष्णद्वैपायन (व्यासदेव) की वन्दना करता हूँ, जो राग (द्वेष) और पाप से रहित हैं तथा जिन्होंने कानरूपी अञ्जलि द्वारा पीये जाने योग्य महाभारत नामक अमृत की सृष्टि की है। (आशय यह है कि जिस प्रकार प्यासा आदमी अंजलि से पानी पीकर पूर्ण तृप्त हो जाता है, उसी प्रकार निष्पाप व्यास जी द्वारा रचित महाभारत भी ऐसा अमृतमय है कि उसे कानों से मन भरकर सुनने से हृदय परम तृप्ति का अनुभव करता है।)

विशेष – कवि ने ‘अकृष्णं कृष्णद्वैपायनं’ में जो कृष्ण (काला या कल्मषयुक्त) नहीं है, फिर भी कृष्ण नामधारी है, में विरोधाभास का चमत्कार प्रदर्शित किया है।

(2) नमः सर्वविदे तस्मै …………………… भारतम्।।

[सर्वविदे = सब कुछ जानने वाले (सर्वज्ञ) को। कविवेधसे = कविरूपी ब्रह्मा को (वेधस् = ब्रह्मा)। सरस्वत्या = वाणी द्वारा, सरस्वती नदी द्वारा (सरस्वती नदी का वेदों में उत्कृष्ट वर्णन है। वह अतीव पुण्यमयी मानी गयी है)। वर्षमिव (वर्षम् +इव) = भारतवर्ष के सदृश। भारतम् = महाभारत को।]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।।

अनुवाद – मैं उन सर्वज्ञ कवि ब्रह्मा श्री व्यास जी को नमने करता हूँ, जिन्होंने अपनी वाणी से पुण्यतम ‘महाभारत’ की रचना उसी प्रकार की है, जिस प्रकार ब्रह्मा ने सरस्वती नदी द्वारा भारत को पुण्यभूमि बना दिया है। ( भाव यहें है कि ब्रह्माजी ने जिस प्रकार पुण्यतोया सरस्वती की सृष्टि द्वारा भारत देश को पुण्यभूमि बना दिया, उसी प्रकार व्यास जी ने भी अपनी वाणी के बल पर महाभारत काव्य को पुण्यमय बना दिया।)

विशेष – महर्षि वेदव्यास ने ‘महाभारत’ में धर्म के सच्चे स्वरूप का उद्घाटन किया है, जिसे पढ़कर लोग धर्माचरण करना सीखें और पुण्यसंचय द्वारा मोक्ष प्राप्त करें।

(3) नमोस्तु ते ……………………… प्रदीपः।।

[फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्रः (फुल्ल +अरविन्द +आयत +पत्रनेत्रः) = खिले हुए कमल की चौड़ी पंखुड़ी के सदृश (विशाल) नेत्र वाले (हे व्यासदेव)! भारत= महाभारत प्रज्वालितः = जलाया। ज्ञानमयः = ज्ञान से परिपूर्ण।]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

अनुवाद – खिले हुए कमल की चौड़ी पंखुड़ियों के सदृश (विशाल) नेत्र वाले विराट् बुद्धि वाले हे व्यासदेव! आपको नमस्कार है, जिन आपने ‘महाभारत’ रूपी तेल से पूर्ण ज्ञानमय दीपक जलाया है। (आशय यह है कि दीपक जिस प्रकार अन्धकार को दूर करके मनुष्य को रास्ता दिखाता है, दीपक में भरा तेल ही उस दीपक द्वारा प्रकाश देता है, उसी प्रकार महाभारत में ज्ञानरूपी तेल है, जो लोगों का हमेशा मार्गदर्शन करता रहेगा। उसी प्रकार बुद्धि वाले श्री व्यासदेव ने ‘महाभारत’ के रूप में सदा तेल से भरे रहने वाले ऐसे दीपक को जलाया है, जो मनुष्यों के अज्ञानान्धकार को दूर कर उन्हें निरन्तर ज्ञानरूपी प्रकाश देता रहेगा)।

विशेष – ‘महाभारत’ एक ऐसे विशाल महासागर के समान है, जिसमें विश्व का सारा ज्ञान भर दिया गया है, इसीलिए इसके विषय में कहा गया है कि यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्’ (जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं है), अर्थात् संसार में जो कुछ भी जानने योग्य है, वह सब इसमें है। यह दावा विश्व के किसी भी अन्य ग्रन्थ के लिए नहीं किया जा सकता।

कालिदासः

(1) पुरा कवीनां ………………………… बभूव ।।

[पुरा = प्राचीनकाल में। कवीनां गणनाप्रसङ्ग – कवियों की गिनती के प्रसंग में (अर्थात् कौन कवि सर्वश्रेष्ठ है और कौन द्वितीय स्थान पर है, कौन तृतीय स्थान पर-इस प्रकार की गणना या कवियों के वरिष्ठता-क्रम को तय करने के अवसर पर)। कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः (कनिष्ठिका +अधिष्ठित +कालिदासः) = सबसे छोटी अँगुली पर कालिदास का नाम रखा गया (किसी वस्तु की गणना करते समय सबसे पहली गिनती सबसे छोटी अँगुली पर अँगूठा रखकर ही होती है कि पहला अमुक और तब दूसरे स्थान के लिए अनामिका पर अँगूठा छुआया जाता है। तीसरे के लिए मध्यमा और चौथे के लिए तर्जनी का प्रयोग किया जाता है। यह लोक-व्यवहार से सिद्ध है)। अद्यापि (अद्य + अपि) = आज तक भी। ततुल्यकवेरभावादनामिका (तत् +तुल्य कवेः +अभावात् +अनामिका) =उसके (कालिदास के) तुल्य (बराबरी के) कवि के अभाव के कारण (कनिष्ठिका से अगली अँगुली का नाम) अनामिका (अर्थात् बिना नाम वाली)। सार्थवती = सार्थक। बभूव = हुआ।]

सन्दर्भ – यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के विश्ववन्द्याः कवयः’ नामक पाठ के ‘कालिदासः’ शीर्षक खण्ड से उद्धृत है। इसमें कालिदास की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है।

अनुवाद – (कभी) प्राचीनकाल में कवियों की ( श्रेष्ठता की) गणना के अवसर पर (सबसे पहले) कनिष्ठिका पर कालिदास का नाम गिना गया। आज तक उनके जोड़ के दूसरे कवि के अभाव के कारण (कनिष्ठिका से अगली अँगुली का नाम) अनामिका (बिना नाम वाली) पड़ना सार्थक हुआ अर्थात् आज भी कालिदास के समान दूसरा कवि नहीं है।

विशेष – कनिष्ठिका से अगली अँगुली का नाम ‘अनामिका’ तो प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। कवि की सूझ इसमें है कि उसने कालिदास की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए कवियों की गणना के प्रसंग में इस अँगुली का नाम ‘अनामिका’ पड़ने की कल्पना की। यह हेतूत्प्रेक्षा का चमत्कार है।

(2) कालिदासगिरां …………………….. मादृशाः ।।

[कालिदासगिराम = कालिदास की वाणी (या कविता) को। विदुः = जानते हैं। नान्ये (न +अन्ये) = दूसरे नहीं। मादृशाः = मुझ सदृश (अल्पज्ञ)। ]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

अनुवाद – कालिदास की वाणी के सारे (अर्थात् मर्म) को या तो स्वयं कालिदास जानते हैं या (भगवती) सरस्वती या चतुर्मुख (चार मुख वाले) ब्रह्मा। मुझ जैसे अन्य (अल्पज्ञ) नहीं जानते।

विशेष – कालिदास इतनी अलौकिक प्रतिभा से सम्पन्न कवि थे कि उनकी सरल-सी दिखाई पड़ने वाली कविता भी इतने गूढ़ और नित्य नवीन अर्थों की व्यंजना करती है कि उसके मर्म को (अर्थात् कवि के मन्तव्य को) स्वयं कालिदास अथवा सरस्वती या ब्रह्मा ही समझ सकते हैं। वह अन्य किसी के सामर्थ्य की बात नहीं।

(3) निर्गतासु …………………….. जायते।।

[ मधुरसान्द्रासु-मधुर (प्रिय लगने वाली) और सान्द्र (मृदु, कोमल)। मञ्जरीष्विव (मञ्जरीषु +इव)= आम्रमंजरियों के सदृश। सूक्तिषु = सुन्दर वचनों के निर्गतासु = निकलने पर, उच्चरित होने पर।
कस्य वा प्रीतिः न जायते = भला किसको आह्लाद उत्पन्न नहीं होता ? (अर्थात् सभी को होता है।)]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

अनुवाद – नयी निकली हुई (निर्गताः) मधुर (मकरन्द से पूरित) और सान्द्र (घनी सुगन्ध वाली) आम्रमंजरियों के सदृश कालिदास की मधुर (कर्णप्रिय) और सान्द्र (सरस) सूक्तियाँ उच्चारणमात्र से (निर्गतासु) किसे आनन्दित नहीं करतीं। जिस प्रकार सुगन्धित मंजरियाँ; मधुर मकरन्द से पूरित होकर निकलते ही सर्वत्र सुगन्धि फैला देती हैं, वैसे ही कालिदास की मधुर सूक्तियों के उच्चारणमात्र से ही जनसामान्य आनन्दित हो उठता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 लोभ: पापस्य कारणम्

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name लोभ: पापस्य कारणम्
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 लोभ: पापस्य कारणम्

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) एको …………………………. पश्यति।।
[ सरस्तीरे (सरः +तीरे) = सरोवर के किनारे बूतेकह रहा था। लोभाकृष्टेन (लोभ +आकृष्टेन) = लोभ से आकृष्ट (पथिक) द्वारा। पान्येनालोचितम (पान्थेन + आलोचितम्) = पथिक ने सोचा। संशयमनारुह्य (संशयम् +अनारुह्य) = सन्देह पर चढ़े बिना (सन्देह किये बिना)। पुनरारुह्य (पुनः + आरुह्य) = फिर चढ़कर।]

सन्दर्भ – यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘लोभः पापस्य कारणम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[विशेष – इस पाठ के अन्तर्गत आने वाले समस्त अनुच्छेदों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

अनुवाद – एक बूढ़ा बाघ स्नान करके, कुश हाथ में लेकर, तालाब के किनारे कह रहा था, “अरे, अरे पथिको! यह सोने का कंगन लो।’ तब लोभ से खिंचकर किसी राहगीर ने सोचा, ‘भाग्य से ही ऐसा सम्भव होता है (ऐसा सुअवसर हाथ आता है), किन्तु इस (जैसे) सन्देहास्पद विषय में प्रवृत्त होना ठीक नहीं (अर्थात् जहाँ संकट की आशंका हो, ऐसे कार्य से विरत होना ही अच्छा), फिर भी (कहा गया है कि)संशय (सन्देह) का आश्रय लिये बिना व्यक्ति कल्याण (हित) को प्राप्त नहीं करता, पर सन्देह का आश्रय लेने पर यदि जीवित बच जाता है तो ( भलाई) देखता है (प्राप्त करता है)।

(2) सः आह ………………… लोकप्रवादो दुर्निवारः।।
व्याघ्र उवाच ……………… दातुमिच्छामि।
स आह ………………………. विश्वासभूमिः।

[मारात्मके= हिंसक (जीवघाती) पर। यौवनदशायाम् अतीव = यौवन में बहुत अधिक बधान्मे (बधात् + में) = वध से मरे। दाराश्च (दाराः +च) = पत्नी भी। वंशहनश्चाहम (वंशहीना +च+अहम्) – और मैं वंशहीन (हो गया)| धार्मिकणाहमादिष्टः (धार्मिकण+अहम् +आदिष्टः)- किसी धर्मात्मा ने मुझे उपदेश दिया। तदुपदेशादिदानीमहं (तत् +उपदेशात् +इदानीम् + अहम्) -उस उपदेश से मैं अब। विश्वासभूमिः = विश्वासपात्र। चैतावान् (च + एतावान्) = और (मैं) इतना।]

अनुवाद – वह (पथिक) बोला–“तेरा कंगन कहाँ है ?” बाघ ने हाथ फैलाकर दिखाया। पथिक बोला, “तुझे हिंसक (जीवघाती) पर कैसे विश्वास करू ?’ बाघ बोला – “सुन रे पथिक! पहले ही युवावस्था में मैं बड़ा पापी (दुराचारी) था। अनेक गायों और मनुष्यों को मारने से मेरे पुत्र और पत्नी मर गये और मैं वंशहीन हो गया। तब किसी धर्मात्मा ने मुझे उपदेश दिया–“आप कुछ दान, धर्म आदि कीजिए।” उस उपदेश से नहाने वाला, दान देने वाला, बूढ़ा, टूटे नाखून और दाँतों वाला मैं भला विश्वास योग्य क्यों नहीं हूँ? मैं तो इतना लोभरहित हो गया हूँ कि अपने हाथ से स्वर्णकंकण (सोने का कंगन) को भी जिस किसी को (किसी को भी) देना चाहता हूँ, तो भी बाघ मनुष्य को खाता है, यह लोकनिन्दा दूर करना कठिन है” (अर्थात् लोगों के मन में बाघ के हिंसक होने की धारणा इतने गहरे तक बैठी है कि उसका निराकरण सम्भव नहीं, चाहे मैं कितना ही धर्मात्मा क्यों न हो जाऊँ)।

(3) मया च धर्मशास्त्राणि ……………………… पण्डितः।।
मरुस्थल्यां यथा ………………………….. पाण्डुनन्दन।। 

अधीतानि = पढे हैं। पाण्डुनन्दन = पाण्डव (यहाँ युधिष्ठिर)। लोष्ठवत् = मिट्टी के ढेले के सदृश।]

अनुवाद-और मैंने धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं—हे युधिष्ठिर! मरुभूमि (रेगिस्तान) में जैसे वर्षा और जैसे भूखे को दिया भोजन सफल होता है, वैसे ही दरिद्र को दिया दान भी सफल होता है। जो व्यक्ति दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान तथा समस्त प्राणियों को अपने समान देखती है (समझता है), वह पण्डित (सच्चा ज्ञानी) है।

(4) त्वं चातीव ……………………… किमौषधैः ।।

[ प्रयच्छेश्वरे (प्रचच्छ+ईश्वरे) = समर्थ को दो। नीरुजस्य = निरोगी की।]

अनुवाद – और तुम बहुत दरिद्र हो, इसलिए तुम्हें यह सोने का कंगन देने को प्रयत्नशील (सचेष्ट) हूँ; क्योंकि-हे कौन्तेय (कुन्ती पुत्र)! दरिद्रों का भरण (पालन-पोषण) करो, धनवान् को धन मत दो। औषध रोगी के लिए है, जो नीरोगी (स्वस्थ) है, उसे औषध से क्या (लाभ) ? (धनवानों के पास तो धन है ही, धन की आवश्यकता उसी को है, जिसके पास धन नहीं है।)

(5) तदत्र …………………………. भक्षितः।।

[ तदत्र (तत् +अत्र) = तो यहाँ (इस)| सरसि = सरोवर में। तदवचः प्रतीतः = उसकी बात पर विश्वास करके। महापङ्के – अत्यधिक कीचड़ में। पलायितुमक्षमः – भागने में असमर्थ। अतस्त्वामहमुत्थापयामि (अतः + त्वाम् +अहम् +उत्थापयामि) = इसलिए तुम्हें मैं निकालता हूँ। शनैः शनैरुपगम्य (शनैः शनैः +उपगम्य) = धीरे-धीरे पास जाकर।]

अनुवाद – तो यहाँ (इस) सरोवर में स्नान करके सोने का कंगन लो। तब जब वह उसकी बात पर विश्वास कर लालच में (पड़कर) सरोवर में स्नान करने के लिए घुसा तो गहरी कीचड़ (दलदल) में फंसकर भागने में असमर्थ हो गया। उसे कीचड़ में पड़ा (फैसा) देख बाघ बोला, ‘ओहो, दलदल में फंस गये। तो तुम्हें निकालता हूँ यह कहकर धीरे-धीरे पास पहुँचकर बाघ ने उसे खा लिया।

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