UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name विभक्ति-प्रकरण
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विभक्ति-प्रकरण

विभक्ति-प्रकरण

नवीनतम पाठ्यक्रम में कुछ उपपद विभक्ति के नियम निर्धारित है। इसके अन्तर्गत 2 अके प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में रखाकित शब्दों में लगी विभक्ति तथा उससे सम्बन्धित सूत्र का उल्लेख करने को कहा जाता है। कभी सूत्र की व्याख्या कर उदाहरण देने को भी कहा जाता है। नीचे निर्धारित नियम दिये जा रहे हैं। इन्हीं नियमों के आधार पर अनुवाद के वाक्य भी पूछे जाएंगे।
ध्यान दे – तारांकित (*) सूत्र नवीनतम पाठ्यक्रम में निर्धारित नहीं हैं। पारस्परिक सम्बद्धता के कारण इनसे भी प्रश्न पूछ लिये जाते हैं। अत: यहां दिये जा रहे हैं।

(अ) सूत्र – अभितः परितः समया निकषा हा प्रतियोगेऽपि।
अभितः (चारों ओर या सभी ओर), परितः (सभी ओर), समया (समीप), निकष (समीप), हा (शोक के । लिए प्रयुक्त शब्द), प्रति (ओर, तरफ) शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
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(ब) सूत्र – येनाङ्गविकारः।
जिस अंग में विकार होने से शरीर विकृत दिखाई दे, उस विकारयुक्त अंग में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
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(स) सूत्र – सहयुक्तेऽप्रधाने।
साथ अर्थ वाले सह, साकम्, सार्धम्, समम् शब्दों के योग में अप्रधान (जिसके साथ जाने वाला जाए) में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
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(द) सूत्र – साधकतमं करणम्।
जिसकी सहायता से कार्य पूर्ण होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
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(य) सूत्र – नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषट्योगाच्च। नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (आहुति), स्वधा (बलि), अलं (समर्थ, पर्याप्त), वषट्। (आहुति)-इन शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
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(र) सूत्र – ध्रुवमपायेऽपादानम्।
स्वयं से अलग करने वाले अर्थात् ध्रुव (मूल) में पञ्चमी विभक्ति होती है; जैसे-वृक्ष से पत्ते गिरते हैं। इस वाक्य में पत्तों को स्वयं से अलग करने वाला वृक्ष है; अतः वृक्ष में पञ्चमी विभक्ति होगी।
उदाहरण:
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(ल) सूत्र – आख्यातोपयोगे।
नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करने में जिससे विद्या ग्रहण की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: उपाध्यायात् अधीते।                 उपाध्याय से पढ़ता है।

(व) सूत्र – भीत्रार्थानां भयहेतुः।
‘भय’ तथा ‘रक्षा’ अर्थ वाली धातुओं के योग में जिससे डरा जाता है या जिससे रक्षा की जाती है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: सिंहात् बिभेति।                     सिंह से डरता है।

(श) सूत्र – षष्ठी शेषे।
छ: कारकों के अतिरिक्त सम्बन्ध अर्थ शेष बचता है। सम्बन्ध अर्थ में षष्ठी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
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(व) सूत्र – यतश्च निर्धारणम्।
जहाँ बहुतों में से किसी एक को छाँटा जाए, वहाँ जिसमें से छाँटा जाये, उसमें षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं।
उदाहरण:
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण

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Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name प्रत्यय-प्रकरण
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi प्रत्यय-प्रकरण

प्रत्यय-प्रकरण

संस्कृत में धातु या शब्दों के बाद प्रत्यय जोड़कर नये शब्दों का निर्माण होता है। प्रत्यय मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
(अ) कृत् प्रत्यय तथा
(ब) तद्धित प्रत्यय।

(अ) कृत् प्रत्यय

जिस प्रत्यय को धातु से जोड़कर संज्ञा, विशेषण अथवा अव्यय बनाया जाता है, उसको कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्यय के योग से बनने वाले शब्दों को कृदन्त (अर्थात् जिनके अन्त में कृत् प्रत्यय है) कहते हैं; जैसे – ‘कृ’ धातु में तृच् प्रत्यय जोड़ने से ‘कर्तृ’ शब्द बनता है, यह कृदन्त है। यह संज्ञा शब्द है और इसके रूप अन्य संज्ञाओं की तरह विभिन्न विभक्तियों में चलेंगे (जैसे – प्रथमा विभक्ति में कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः आदि)। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि जो कृदन्त शब्द संज्ञा या विशेषण होते हैं, उनके रूप तो चलते हैं, पर अव्यय सदा एक रूप रहते हैं (उनके रूप नहीं चलते)।

(क) क्त (तु) – भूतकालिक क्रिया और विशेषण शब्द बनाने के लिए ‘क्त’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। ‘क्त’ प्रत्यय का प्रयोग कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में किया जाता है। इसका प्रयोग करते समय कर्ता में तृतीया विभक्ति तथा कर्म में प्रथमा विभक्ति रखी जाती है। ‘क्त’ प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग कर्म के लिङ्ग, विभक्ति और वचनों के अनुसार होता है। कर्ता के लिङ्ग और वचन का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; जैसे

  1. रामेण पुस्तकं पठितम्।
  2. सीतया ग्रन्थः पठितः।
  3. मया पुस्तिका पठिता।

‘क्त’ प्रत्यय से बने क्रिया-रूपों के कुछ उदाहरण ।
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(ख) क्त्वा (त्वा) – जब किसी क्रिया के हो जाने पर दूसरी क्रिया आरम्भ होती है, तब सम्पन्न हुई क्रिया को , ‘पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। हिन्दी में इसका बोध करके’ लगाकर होता है। पूर्वकालिक क्रिया का बोध कराने के . लिए संस्कृत में धातु के आगे क्त्वा (त्वा) प्रत्यय जोड़ा जाता है। क्त्वा (त्वा) प्रत्ययान्त धातुओं के रूप नहीं चलते।

‘क्त्वा’ (त्वा) प्रत्यय लगाकर धातुओं के रूप
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(ग) तव्यत् (तव्य), अनीयर् (अनीय) – सामान्यत: क्रिया में विधिलिङ् लकार चाहिए’ के अर्थ में तव्यत् और अनीयर् प्रत्ययों का प्रयोग होता है। इन शब्दों का प्रयोग सकर्मक धातुओं के कर्मवाच्य में तथा अकर्मक धातुओं के भाववाच्य में होता है। कर्तृवाच्य में इनका प्रयोग नहीं होता। ये शब्द योग्य के अर्थ में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे

पठ् + तव्यत् (तव्य) = पठितव्य (पढ़नी चाहिए)।
पठ् + अनीयर् (अनीय) = पठनीय (पढ़नी चाहिए या पढ़ने योग्य)।
मया पुस्तकं पठितव्यम् (पठनीयम्) = मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए (या, मुझे पुस्तक पढ़नी चाहिए)। इन प्रत्ययों से बने शब्दों का प्रयोग लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार किया जाता है। इनके रूप पुंल्लिङ्ग में ‘बालक’, नपुंसकलिङ्ग में ‘फल और स्त्रीलिङ्ग में ‘बाला’ के समान बनेंगे।
तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय से निर्मित उदाहरण
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(घ) क्तवतु (तवत्) – ‘क्त’ प्रत्ययान्त शब्दों के परिवर्तनों के अनुसार ही ‘क्तवतु’ प्रत्ययान्त शब्दों के रूपों में भी परिवर्तन होते हैं। केवल उनके अन्त में ‘वत्’ और जोड़ दिया जाता है, क्योंकि इस प्रत्यय का प्रारम्भिक अक्षर भी ‘क्त ही है। ‘क्तवतु’ प्रत्यय का भी उन्हीं धातुओं के साथ प्रयोग होता है, जिनके साथ ‘क्त का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय से निर्मित शब्दों का प्रयोग भूतकालिक क्रिया की भाँति ‘कर्तृवाच्य में होता है। इस प्रत्यय से निर्मित शब्दों के रूप पुंल्लिग में ‘श्रीमत् के समान, स्त्रीलिंग में नदी के समान तथा नपुंसकलिंग में जगत् के समान होते हैं।

“क्तवतु’ प्रत्यय से बने क्रिया-रूपों के कुछ उदाहरण
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(ब) तद्धित प्रत्यय

तद्धित प्रत्यय सदा किसी सिद्ध (अर्थात् बनाये हुए) संज्ञा, विशेषण, अव्यय या क्रिया के अनन्तर जोड़कर उससे अन्य संज्ञा, विशेषण, अव्यय, क्रिया आदि बनाने में प्रयुक्त होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि कृत् प्रत्यय सदा धातु में ही जोड़े जाते हैं, किसी सिद्ध शब्द में नहीं।

(क) मतुप् , वतुप् – संज्ञा से ‘वाला’, ‘वाली’ (गाड़ी वाला, बुद्धि वाली आदि) अर्थ प्रकट करने के लिए ‘मतुप्’ (मत्) तथा वतुप् (वत्) प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। जिन शब्दों के अन्त में ‘अ’ या ‘आ’ होता है, उनमें ‘वत्’ तथा जिन शब्दों के अन्त में ह्रस्व अथवा दीर्घ ‘ई’, ‘उ’, ‘ऋ’ होता है, उनमें ‘मत्’ जुड़ता है। किन्तु यदि अन्त में आने वाले ‘इ’, उ’ व्यंजन ‘म’ में लगे हों तो ‘वत्’ ही जुड़ता है। ‘मतुप्’ या ‘वतुप्’ प्रत्ययान्त शब्दों के रूप पुंल्लिङ्ग में ‘भवत्’ के समान, स्त्रीलिङ्ग में नदी के समान और नपुंसकलिङ्ग में ‘जगत् के समान होते हैं; जैसे
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ये शब्द विशेषण होते हैं, इसलिए ये अपने विशेष्य के अनुसार ही लिङ्ग, वचन और विभक्ति ग्रहण करते हैं। उदाहरणार्थ, ‘श्रीमत् के पुंल्लिङ्ग में प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों के रूप इस प्रकार होंगे

श्रीमान्          श्रीमन्तौ          श्रीमन्तः।

(ख) त्व, तल् प्रत्यय – संज्ञा और विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए त्व’ और ‘तलु’ प्रत्ययों का प्रयोग होता है। ‘त्व’ प्रत्ययान्त शब्द नपुंसकलिङ्ग तथा ‘तल्’ प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं। इनके रूप भी क्रमशः ‘फलम्’ और ‘बाला’ के समान चलते हैं।
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प्रथम – दिये गये पदों में से किन्हीं दो के सम्बन्ध में स्पष्ट कीजिए कि वे किस धातु अथवा शब्द में किस प्रत्यय के योग से बने हैं – गतः, पठनीयम्, बुद्धिमान्।
उत्तर:
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द्वितीय – दिये गये पदों में से किन्हीं दो धातु में ‘क्त’ या ‘क्तवतु’ प्रत्यय लगाकर उसके प्रथमा पुंल्लिङ्ग एकवचन और द्विवचन के रूप लिखिए-पठ्, गम्, दा, प्रेष्।
उत्तर:
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तृतीय – दिये गये शब्दों में से किसी एक शब्द में उसके सामने लिखा प्रत्यय जोड़कर शब्द का यथानिर्दिष्ट रूप लिखिए-धन + मतुप् (पुंल्लिङ्ग रूप), पठ् + अनीयर् (नपुंसकलिङ्ग रूप)
उत्तर:
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पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में आये प्रत्यययुक्त शब्द

पाठ 2:
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पाठ 3:
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पाठ 4:
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पाठ 6:
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पाठ 7:
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पाठ 9:
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पाठ 10:
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

विज्ञान सम्बन्धी निबन्ध

 विज्ञान : वरदान या अभिशाप

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञान की उपलब्धियाँ
  • विज्ञान के बढ़ते कदम
  • विज्ञान : वरदान या अभिशाप | विज्ञान के चमत्कार
  • विज्ञान के वरदान
  • विज्ञान : हमारा मित्र एवं शत्रु
  • जीवन में विज्ञान को महत्त्व
  • विज्ञान की प्रगति और विश्वशक्ति

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  विज्ञान : वरदान के रूप में
    (क) यातायात के क्षेत्र में;
    (ख) संचार के क्षेत्र में;
    (ग) दैनन्दिन जीवन में;
    (घ) स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में;
    (ङ) औद्योगिक क्षेत्र में;
    (च) कृषि के क्षेत्र में;
    (छ) शिक्षा के क्षेत्र में;
    (ज) मनोरंजन के क्षेत्र में,
  3. विज्ञान : अभिशाप के रूप में,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना – आज का युग वैज्ञानिक चमत्कारों का युग है। मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आज विज्ञान ने आश्चर्यजनक क्रान्ति ला दी है। मानव-समाज की सारी गतिविधियाँ आज विज्ञान से परिचालित हैं। दुर्जेय प्रकृति पर विजय प्राप्त कर आज विज्ञान मानव का भाग्यविधाता बन बैठा है। अज्ञात रहस्यों की खोज में उसने आकाश की ऊँचाइयों से लेकर पाताल की गहराइयाँ तक नाप दी हैं। उसने हमारे जीवन को सभी ओर से इतना प्रभावित कर दिया है कि विज्ञान-शून्य विश्व की आज कोई कल्पना तक नहीं कर सकता, किन्तु दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं कि अनियन्त्रित वैज्ञानिक प्रगति ने मानव के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस स्थिति में हमें सोचना पड़ता है कि विज्ञान को वरदान समझा जाए या अभिशाप। अतः इन दोनों पक्षों पर समन्वित दृष्टि से विचार करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित होगा।

विज्ञान : वरदान के रूप में – आधुनिक मानव का सम्पूर्ण पर्यावरण विज्ञान के वरदानों के आलोक से आलोकित है। प्रातः जागरण से लेकर रात के सोने तक के सभी क्रिया-कलाप विज्ञान द्वारा प्रदत्त साधनों के सहारे ही संचालित होते हैं। प्रकाश, पंखा, पानी, साबु न, गैस स्टोव, फ्रीज, कूलर, हीटर और यहाँ तक कि शीशा, कंघी से लेकर रिक्शा, साइकिल, स्कूटर, बस, कार, रेल, हवाई जहाज, टी०वी०, सिनेमा, रेडियो आदि जितने भी साधनों का हम अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं, वे सब विज्ञान के ही वरदान हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि आज का अभिनव मनुष्य विज्ञान के माध्यम से प्रकृति पर विजय पा चुका है ।

आज की दुनिया विचित्र नवीन,
प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन।
हैं बँधे नर के करों में वारि-विद्युत भाप,
हुक्म पर चढ़ता उतरता है पवन का ताप।
है नहीं बाकी कहीं व्यवधान,
लाँघ सकता नर सरित-गिरि-सिन्धु एक समान॥

विज्ञान के इन विविध वरदानों की उपयोगिता कुछ प्रमुख क्षेत्रों में निम्नलिखित है

(क) यातायात के क्षेत्र में – प्राचीन काल में मनुष्य को लम्बी यात्रा तय करने में बरसों लग जाते थे, किन्तु आज रेल, मोटर, जलपोत, वायुयान आदि के आविष्कार से दूर-से-दूर स्थानों पर बहुत शीघ्र पहुँचा जा सकता है। यातायात और परिवहन की उन्नति से व्यापार की भी कायापलट हो गयी है। मानव केवल धरती ही नहीं, अपितु चन्द्रमा और मंगल जैसे दूरस्थ ग्रहों तक भी पहुँच गया है। अकाल, बाढ़, सूखा आदि प्राकृतिक विपत्तियों से पीड़ित व्यक्तियों की सहायता के लिए भी ये साधन बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इन्हीं के चलते आज सम्पूर्ण विश्व एक बाजार बन गया है।

(ख) संचार के क्षेत्र में – बेतार के तौर ने संचार के क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है। आकाशवाणी, दूरदर्शन, तार, दूरभाष (टेलीफोन, मोबाइल फोन), दूरमुद्रक (टेलीप्रिण्टर, फैक्स) आदि की सहायता से कोई भी समाचार क्षण भर में विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाया जा सकता है। कृत्रिम उपग्रहों ने इस दिशा में और भी चमत्कार कर दिखाया है।

(ग) दैनन्दिन जीवन में – विद्युत् के आविष्कार ने मनुष्य की दैनन्दिन सुख-सुविधाओं को बहुत बढ़ा दिया है। वह हमारे कपड़े धोती है, उन पर प्रेस करती है, खाना पकाती है, सर्दियों में गर्म जल और गर्मियों में शीतल जल उपलब्ध कराती है, गर्मी-सर्दी दोनों से समान रूप से हमारी रक्षा करती है। आज की समस्त औद्योगिक प्रगति इसी पर निर्भर है।

(घ) स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में – मानव को भयानक और संक्रामक रोगों से पर्याप्त सीमा तक बचाने का श्रेय विज्ञान को ही है। कैंसर, क्षय (टी० बी०), हृदय रोग एवं अनेक जटिल रोगों का इलाज विज्ञान द्वारा ही सम्भव हुआ है। एक्स-रे एवं अल्ट्रासाउण्ड टेस्ट, ऐन्जियोग्राफी, कैट स्कैन आदि परीक्षणों के माध्यम से शरीर के अन्दर के रोगों का पता सरलतापूर्वक लगाया जा सकता है। भीषण रोगों के लिए आविष्कृत टीकों से इन रोगों की रोकथाम सम्भव हुई है। प्लास्टिक सर्जरी, ऑपरेशन, कृत्रिम अंगों को प्रत्यारोपण आदि उपायों से अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलायी जा रही है। यही नहीं, इससे नेत्रहीनों को नेत्र, कर्णहीनों को कान और अंगहीनों को अंग देना सम्भव हो सका है।

(ङ) औद्योगिक क्षेत्र में – भारी मशीनों के निर्माण ने बड़े-बड़े कल-कारखानों को जन्म दिया है, जिससे श्रम, समय और धन की बचत के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में उत्पादन सम्भव हुआ है। इससे विशाल जनसमूह को
आवश्यक वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करायी जा सकी हैं।

(च) कृषि के क्षेत्र में – 121.02 करोड़ से ऊपर की जनसंख्या वाला हमारा देश आज यदि कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सका है तो यह भी विज्ञान की ही देन है। विज्ञान ने किसान को उत्तम बीज, प्रौढ़ एवं विकसित तकनीक, रासायनिक खादे, कीटनाशक, ट्रैक्टर, ट्यूबवेल और बिजली प्रदान की है। छोटे-बड़े बाँधों का निर्माण कर नहरें निकालना भी विज्ञान से ही सम्भव हुआ है।

(छ) शिक्षा के क्षेत्र में मुद्रण – यन्त्रों के आविष्कार ने बड़ी संख्या में पुस्तकों का प्रकाशन सम्भव बनाया है, जिससे पुस्तकें सस्ते मूल्य पर मिल सकी हैं। इसके अतिरिक्त समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएँ आदि भी मुद्रण-क्षेत्र में हुई क्रान्ति के फलस्वरूप घर-घर पहुँचकर लोगों का ज्ञानवर्द्धन कर रही हैं। आकाशवाणी दूरदर्शन आदि की सहायता से शिक्षा के प्रसार में बड़ी सहायता मिली है। कम्प्यूटर के विकास ने तो इस क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है।

(ज) मनोरंजन के क्षेत्र में – चलचित्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि के आविष्कार ने मनोरंजन को सस्ता और सुलभ बना दिया है। टेपरिकॉर्डर, वी० सी० आर०, वी० सी० डी०, डी० वी० डी० आदि ने इस दिशा में क्रान्ति ला दी है और मनुष्य को उच्चकोटि का मनोरंजन सुलभ कराया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मानव-जीवन के लिए विज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई वरदान नहीं है।

विज्ञान : अभिशाप के रूप में –  विज्ञान का एक और पक्ष भी है। विज्ञान एक असीम शक्ति प्रदान करने वाला तटस्थ साधन है। मानव चाहे जैसे इसका इस्तेमाल कर सकता है। सभी जानते हैं कि मनुष्य में दैवी प्रवृत्ति भी है। और आसुरी प्रवृत्ति भी। सामान्य रूप से जब मनुष्य की दैवी प्रवृत्ति प्रबल रहती है तो वह मानव-कल्याण से कार्य किया करता है, परन्तु किसी भी समय मनुष्य की आसुरी प्रवृत्ति प्रबल होते ही कल्याणकारी विज्ञान एकाएक प्रबलतम विध्वंस एवं संहारक शक्ति का रूप ग्रहण कर सकता है। इसका उदाहरण गत विश्वयुद्ध का वह दुर्भाग्यपूर्ण पल है, जब हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम-बम गिराया गया था। स्पष्ट है कि विज्ञान मानवमात्र के लिए सबसे बुरा अभिशाप भी सिद्ध हो सकता है। गत विश्वयुद्ध से लेकर अब तक मानव ने विज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की है; अतः कहा जा सकता है कि आज विज्ञान की विध्वंसक शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गयी है।

विध्वंसक साधनों के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार से भी विज्ञान ने मानव का अहित किया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथ्यात्मक होता है। इस दृष्टिकोण के विकसित हो जाने के परिणामस्वरूप मानव हृदय की कोमल भावनाओं एवं अटूट आस्थाओं को ठेस पहुंची है। विज्ञान ने भौतिकवादी प्रवृत्ति को प्रेरणा दी है, जिसके परिणामस्वरूप धर्म एवं अध्यात्म से सम्बन्धित विश्वास थोथे प्रतीत होने लगे हैं। मानव-जीवन के पारस्परिक सम्बन्ध भी कमजोर होने लगे हैं। अब मानव भौतिक लाभ के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों को विकसित करता है।

जहाँ एक ओर विज्ञान ने मानव-जीवन को अनेक प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं वहीं दूसरी ओर विज्ञान के ही कारण मानव-जीवन अत्यधिक खतरों से परिपूर्ण तथा असुरक्षित भी हो गया है। कम्प्यूटर तथा दूसरी मशीनों ने यदि मानव को सुविधा के साधन उपलब्ध कराये हैं तो साथ-साथ रोजगार के अवसर भी छीन लिये हैं। विद्युत् विज्ञान द्वारा प्रदत्त एक महान् देन है, परन्तु विद्युत् को एक मामूली झटका ही व्यक्ति की इहलीला समाप्त कर सकता है। विज्ञान ने तरह-तरह के तीव्र गति वाले वाहन मानव को दिये हैं। इन्हीं वाहनों की आपसी टक्कर से प्रतिदिन हजारों व्यक्ति सड़क पर ही अपनी जान गॅवा देते हैं। विज्ञान के दिन-प्रतिदिन होते जा रहे नवीन आविष्कारों के कारण मानव पर्यावरण असन्तुलन के दुष्चक्र में भी फंस चुका है।

अधिक सुख-सुविधाओं के कारण मनुष्य आलसी और आरामतलब बनता जा रहा है, जिससे उसकी शारीरिक शक्ति का ह्रास हो रहा है और अनेक नये-नये रोग भी उत्पन्न हो रहे हैं। मानव में सर्दी और गर्मी सहने की क्षमता घट गयी है।
वाहनों की बढ़ती संख्या से सड़कें पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो रही हैं तो उनसे निकलने वाले ध्वनि प्रदूषक मनुष्य को स्नायु रोग वितरित कर रहे हैं। सड़क दुर्घटनाएँ तो मानो दिनचर्या का एक अंग हो चली हैं। विज्ञापनों ने प्राकृतिक सौन्दर्य को कुचल डाला है। चारों ओर का कृत्रिम आडम्बरयुक्त जीवन इस विज्ञान की ही देन है। औद्योगिक प्रगति ने पर्यावरण-प्रदूषण की विकट समस्या खड़ी कर दी है। साथ ही गैसों के रिसाव से अनेक व्यक्तियों के प्राण भी जा चुके हैं। विज्ञान के इसी विनाशकारी रूप को दृष्टि में रखकर महाकवि दिनकर मानव को चेतावनी देते हुए कहते हैं

सावधान, मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार।
तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार॥
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार ।
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार॥

उपसंहार – विज्ञान सचमुच तलवार है, जिससे व्यक्ति आत्मरक्षा भी कर सकता है और अनाड़ीपन में अपने अंग भी काट सकता है। इसमें दोष तलवार का नहीं, उसके प्रयोक्ती का है। विज्ञान ने मानव के सम्मुख असीमित विकास का मार्ग खोल दिया है, जिससे मनुष्य संसार से बेरोजगारी, भुखमरी, महामारी आदि को समूल नष्ट कर विश्व को अभूतपूर्व सुख-समृद्धि की ओर ले जा सकता है। अणु-शक्ति का कल्याणकारी कार्यों में उपयोग असीमित सम्भावनाओं का द्वार उन्मुक्त कर सकता है। बड़े-बड़े रेगिस्तानों को लहराते खेतों में बदलना, दुर्लंघ्य पर्वतों पर मार्ग बनाकर दूरस्थ अंचलों में बसे लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, विशाल बाँधों को निर्माण एवं विद्युत् उत्पादन आदि अगणित कार्यों में इसका उपयोग हो सकता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब मनुष्य में आध्यात्मिक दृष्टि का विकास हो, मानव-कल्याण की सात्त्विक भावना जगे। अतः स्वयं मानव को ही यह निर्णय करना है कि वह विज्ञान को वरदान रहने दे या अभिशाप बना दे।

आधुनिक यन्त्र-पुरुष : कम्प्यूटर

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत में कम्प्यूटर का प्रयोग
  • कम्प्यूटर की उपयोगिता
  • लैपटॉप की शैक्षिक उपयोगिता

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : कम्प्यूटर क्या है?
  2.  कम्प्यूटर के उपयोग
    (क) प्रकाशन के क्षेत्र में;
    (ख) बैंकों में;
    (ग) सूचनाओं के आदान-प्रदान में;
    (घ) आरक्षण के क्षेत्र में;
    (ङ) कम्प्यूटर ग्राफिक्स में,
    (च) कला के क्षेत्र में;
    (छ) संगीत के क्षेत्र में,
    (ज) खगोल-विज्ञान के क्षेत्र में;
    (झ) चुनावों में;
    (त्र) उद्योग-धन्धों में;
    (ट) सैनिक कार्यों में;
    (ठ) अपराध-निवारण में,
  3. कम्प्यूटर तकनीक से हानियां,
  4. कम्प्यूटर और मानव मस्तिष्क,
  5.  उपसंहार।

प्रस्तावना : कम्प्यूटर क्या है? – कम्प्यूटर असीमित क्षमताओं वाला वर्तमान युग का एक क्रान्तिकारी साधन है। यह एक ऐसा यन्त्र-पुरुष है, जिसमें यान्त्रिक मस्तिष्कों का रूपात्मक और समन्वयात्मक योग तथा गुणात्मक घनत्व पाया जाता है। इसके परिणामस्वरूप यह कम-से-कम समय में तीव्रगति से त्रुटिहीन गणनाएँ कर लेता है। आरम्भ में, गणित की जटिल गणनाएँ करने के लिए ही कम्प्यूटर का आविष्कार किया गया था। आधुनिक कम्प्यूटर के प्रथम सिद्धान्तकार चार्ल्स बैबेज (सन् 1792-1871 ई०) ने गणित और खगोल-विज्ञान की सूक्ष्म सारणियाँ तैयार करने के लिए ही एक भव्य कम्प्यूटर की योजना तैयार की थी। पिछली सदी के अन्तिम दशक में अमेरिकी इंजीनियर हरमन होलेरिथ ने जनगणना से सम्बन्धित आँकड़ों का विश्लेषण करने के लिए पंचका पर आधारित कम्प्यूटर का प्रयोग किया था। दूसरे महायुद्ध के दौरान पहली बार बिजली से चलने वाले कम्प्यूटर बने। इनका उपयोग भी गणनाओं के लिए ही हुआ। आज के कम्प्यूटर केवल गणनाएँ करने तक ही सीमित नहीं रह गये हैं। वरन् अक्षरों, शब्दों, आकृतियों और कथनों को ग्रहण करने में अथवा इससे भी अधिक अनेकानेक कार्य करने में समर्थ हैं। आज कम्प्यूटरों का मानव-जीवन के अधिकाधिक क्षेत्रों में उपयोग करना सम्भव हुआ है। अब कम्प्यूटर संचार और नियन्त्रण के भी शक्तिशाली साधन बन गये हैं। कम्प्यूटर के उपयोग-आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटरों के व्यापक उपयोग हो रहे हैं

(क) प्रकाशन के क्षेत्र में –  सन् 1971 ई० में माइक्रोप्रॉसेसर का आविष्कार हुआ। इस आविष्कार ने कम्प्यूटरों को छोटा, सस्ता और कई गुना शक्तिशाली बना दिया। माइक्रोप्रॉसेसर के आविष्कार के बाद कम्प्यूटर का अनेक कार्यों में उपयोग सम्भव हुआ। शब्द-संसाधक (वर्ड प्रॉसेसर) कम्प्यूटरों के साथ स्क्रीन व प्रिण्टर जुड़ जाने से इनकी उपयोगिता का खूब विस्तार हुआ है। सर्वप्रथम एक लेख सम्पादित होकर कम्प्यूटर में संचित होता है। टंकित मैटर को कम्प्यूटर की स्क्रीन पर देखा जा सकता है और उसमें संशोधन भी किया जा सकता है। इसके बाद मशीनों से छपाई होती है। अब तो अतिविकसित देशों (ब्रिटेन आदि) में बड़े समाचार-पत्रों में सम्पादकीय विभाग में एक सिरे पर कम्प्यूटरों में मैटर भरा जाता है तथा दूसरे सिरे पर तेज रफ्तार से इलेक्ट्रॉनिक प्रिण्टर समाचार-पत्र छापकर निकाल देते हैं।

(ख) बैंकों में  – कम्प्यूटर का उपयोग बैंकों में किया जाने लगा है। कई राष्ट्रीयकृत बैंकों ने चुम्बकीय संख्याओं वाली चेक-बुक भी जारी कर दी हैं। खातों के संचालन और लेन-देन का हिसाब रखने वाले कम्प्यूटर भी बैंकों में स्थापित हो रहे हैं। आज कम्प्यूटर के द्वारा ही बैंकों में 24 घण्टे पैसों के लेन-देन की ए० टी० एम० (Automated Teller Machine) जैसी सेवाएँ सम्भव हो सकी हैं। यूरोप और अमेरिका में ही नहीं अब भारत में भी ऐसी व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आ गयी हैं कि घर के निजी कम्प्यूटरों के जरिये बैंकों से भी लेन-देन का व्यवहार सम्भव हुआ है।

(ग) सूचनाओं के आदान – प्रदान में प्रारम्भ में कम्प्यूटर की गतिविधियाँ वातानुकूलित कक्षों तक ही सीमित थीं, किन्तु अब एक कम्प्यूटर हजारों किलोमीटर दूर के दूसरे कम्प्यूटरों के साथ बातचीत कर सकता है तथा उसे सूचनाएँ भेज सकता है। दो कम्प्यूटरों के बीच यह सम्बन्ध तारों, माइक्रोवेव तथा उपग्रहों के जरिये स्थापित होता है। सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए देश के सभी प्रमुख छोटे-बड़े शहरों को कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिये एक-दूसरे से जोड़ने की प्रक्रिया शीघ्र ही पूर्ण होने वाली है। इण्टरनेट जैसी सुविधा से आज देश का प्रत्येक नगर सम्पूर्ण विश्व से जुड़ गया है।

(घ) आरक्षण के क्षेत्र में –  कम्प्यूटर नेटवर्क की अनेक व्यवस्थाएँ अब हमारे देश में स्थापित हो गयी हैं। सभी प्रमुख एयरलाइन्स की हवाई यात्राओं के आरक्षण के लिए अब ऐसी व्यवस्था है कि भारत के किसी भी शहर से आपकी समूची हवाई-यात्रा के आरक्षण के साथ-साथ विदेशों में आपकी इच्छानुसार होटल भी आरक्षित हो जाएगा। कम्प्यूटर नेटवर्क से अब देश के सभी प्रमुख शहरों में रेल-यात्रा के आरक्षण की व्यवस्था भी अस्तित्व में आ गयी है।

(ङ) कम्प्यूटर ग्राफिक्स में  – कम्प्यूटर केवल अंकों और अक्षरों को ही नहीं, वरन् रेखाओं और आकृतियों को भी सँभाल सकते हैं। कम्प्यूटर ग्राफिक्स की इस व्यवस्था के अनेक उपयोग हैं। भवनों, मोटरगाड़ियों, हवाईजहाजों आदि के डिज़ाइन तैयार करने में कम्प्यूटर ग्राफिक्स का व्यापक उपयोग हो रहा है। वास्तुशिल्पी अब अपने डिज़ाइन कम्प्यूटर स्क्रीन पर तैयार करते हैं और संलग्न प्रिण्टर से इनके प्रिण्ट भी प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ तक कि कम्प्यूटर चिप्स के सर्किटों के डिज़ाइन भी अब कम्प्यूटर ग्राफिक्स की मदद से तैयार होने लगे हैं। वैज्ञानिक अनुसन्धान भी कम्प्यूटर के स्क्रीन पर किये जा रहे हैं।

(च) कला के क्षेत्र में  – कम्प्यूटर अब चित्रकार की भूमिका भी निभाने लगे हैं। चित्र तैयार करने के लिए अब रंगों, तूलिकाओं, रंग-पट्टिका और कैनवास की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है। चित्रकार अब कम्प्यूटर के सामने बैठता है और अपने नियोजित प्रोग्राम की मदद से अपनी इच्छा के अनुसार स्क्रीन पर रंगीन रेखाएँ प्रस्तुत कर देता है। रेखांकनों से स्क्रीन पर निर्मित कोई भी चित्र ‘प्रिण्ट’ की कुञ्जी दबाते ही, अपने समूचे रंगों के साथ कम्प्यूटर से संलग्न प्रिण्टर द्वारा कागज पर छाप दिया जाता है।

(छ) संगीत के क्षेत्र में – कम्प्यूटर अब सुर सजाने का काम भी करने लगे हैं। पाश्चात्य संगीत के स्वरांकन को कम्प्यूटर स्क्रीन पर प्रस्तुत करने में कोई कठिनाई. नहीं होती, परन्तु वीणा जैसे भारतीय वाद्य की स्वरलिपि तैयार करने में कठिनाइयाँ आ रही हैं, परन्तु वह दिन दूर नहीं है जब भारतीय संगीत की स्वर-लहरियों को कम्प्यूटर स्क्रीन पर उभारकर उनका विश्लेषण किया जाएगा और संगीत-शिक्षा की नयी तकनीक विकसित की जा सकेगी।

(ज) खगोल-विज्ञान के क्षेत्र में –  कम्प्यूटरों ने वैज्ञानिक अनुसन्धान के अनेक क्षेत्रों का समूचा ढाँचा ही बदल दिया है। पहले खगोलविद् दूरबीनों पर रात-रातभर आँखें गड़ाकर आकाश के पिण्डों का अवलोकन करते थे, किन्तु अब किरणों की मात्रा के अनुसार ठीक-ठीक चित्र उतारने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपलब्ध हो गये हैं। इन चित्रों में निहित जानकारी का व्यापक विश्लेषण अब कम्प्यूटरों से होता है।

(झ) चुनावों में – इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन भी एक सरल कम्प्यूटर ही है। मतदान के लिए ऐसी वोटिंग मशीनों का उपयोग सीमित पैमाने पर ही सही अब हमारे देश में भी हो रहा है।

(ञ) उद्योग-धन्धों में –  कम्प्यूटर उद्योग-नियन्त्रण के भी शक्तिशाली साधन हैं। बड़े-बड़े कारखानों के संचालन का काम अब कम्प्यूटर सँभालने लगे हैं। कम्प्यूटरों से जुड़कर रोबोट अनेक किस्म के औद्योगिक उत्पादनों को सँभाल सकते हैं। कम्प्यूटर भयंकर गर्मी और ठिठुरती सर्दी में भी यथावत् कार्य करते हैं। इनका उस पर कोई असुर नहीं पड़ता। हमारे देश में अब अधिकांश निजी व्यवसायों में कम्प्यूटर का प्रयोग होने लगा है।

(ट) सैनिक कार्यों में –  आज प्रमुख रूप से महायुद्ध की तैयारी के लिए नये-नये शक्तिशाली सुपर कम्प्यूटरों का विकास किया जा रहा है। महाशक्तियों की ‘स्टार वार्स की योजना कम्प्यूटरों के नियन्त्रण पर आधारित है। पहले भारी कीमत देकर हमारे देश में सुपर कम्प्यूटर आयात किये जा रहे थे; परन्तु अब इन सुपर कम्प्यूटरों का निर्माण हमारे देश में भी किया जा रहा है।

(ठ) अपराध-निवारण में – अपराधों के निवारण में भी कम्प्यूटर की अत्यधिक उपयोगिता है। पश्चिम के कई देशों में सभी अधिकृत वाहन मालिकों, चालकों, अपराधियों का रिकॉर्ड पुलिस के एक विशाल कम्प्यूटर में संरक्षित होता है। कम्प्यूटर द्वारा क्षण मात्र में अपेक्षित जानकारी उपलब्ध हो जाती है, जो कि अपराधियों के पकड़ने में सहायक सिद्ध होती है। यही नहीं, किसी भी अपराध से सन्दर्भित अनेकानेक तथ्यों में से विश्लेषण द्वारा कम्प्यूटर नये तथ्य हूँढ़ लेता है तथा किसी अपराधी को कैसा भी चित्र उपलब्ध होने पर वह उसकी सहायता से अपराधी के किसी भी उम्र और स्वरूप की तस्वीर प्रस्तुत कर सकता है।

कम्प्यूटर तकनीक से हानियाँ – जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कम्प्यूटर तकनीकी के निरन्तर बढ़ते जा रहे . व्यापक उपयोगों ने जहाँ एक ओर इसकी उपयोगिता दर्शायी है, वहीं दूसरी ओर इसके भयावह परिणामों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट प्रतीत हो रही है कि कम्प्यूटर प्रत्येक क्षेत्र में मानव-श्रम को नगण्य बना देगा, जिससे भारत सदृश जनसंख्या बाहुल्य देशों में बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। विभिन्न विभागों में इसकी स्थापना से कर्मचारी भविष्य के प्रति अनाश्वस्त हो गये हैं। बैंकों आदि में इस व्यवस्था के कुछ दुष्परिणाम भी सामने आये हैं। दूसरों के खातों के कोड नम्बर जानकर प्रति वर्ष करोड़ों रुपयों से बैंकों को ठगना सामान्य बात हो गयी है। ज्योतिष के क्षेत्र में भी कम्प्यूटर के परिणाम शत-प्रतिशत सही नहीं निकलते हैं।

कम्प्यूटर और मानव-मस्तिष्क – कम्प्यूटर के सन्दर्भ में ढेर सारी भ्रान्तियाँ जन-सामान्य के मस्तिष्क में छायी हुई हैं। कुछ लोग इसे सुपर पावर समझ बैठे हैं, जिसमें सब कुछ करने की क्षमता है। किन्तु उनकी धारणाएँ पूर्णरूपेण निराधार हैं। वास्तविकता तो यह है कि कम्प्यूटर एकत्रित आँकड़ों का इलेक्ट्रॉनिक विश्लेषण प्रस्तुत करने वाली एक मशीन मात्र है। यह केवल वही काम कर सकता है, जिसके लिए इसे निर्देशित किया गया हो। यह कोई निर्णय स्वयं नहीं ले सकता और न ही कोई नवीन बात सोच सकता है। यह मानवीय संवेदनाओं, अभिरुचियों, भावनाओं और चित्त से रहित मात्र एक यन्त्र-पुरुष है, जिसकी बुद्धि-लब्धि (Intelligence Quotient : I.O.) मात्र एक मक्खी के बराबर होती है, यानि बुद्धिमत्ता में कम्प्यूटर मनुष्य से कई हजार गुना पीछे है।।

उपसंहार – निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी के भी दो पक्ष हैं। इसको सोच-समझकर उपयोग किया जाए तो यह वरदान सिद्ध हो सकता है, अन्यथा यह मानव-जाति की तबाही का साधन भी बन सकता है। इसीलिए कम्प्यूटर की क्षमताओं को ठीक से समझना जरूरी है। इलेक्ट्रॉनिकी शिक्षा एवं साधन कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी की उपेक्षा नहीं कर सकते, लेकिन इनके लिए यदि बुनियादी शिक्षा की समुचित व्यवस्था की जाती, देश में टेक्नोलॉजी के साधन जुटाये जाते और पाश्चात्य संस्कृति में विकसित हुई इस टेक्नोलॉजी को देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर धीरे-धीरे अपनाया जाता तो अच्छा होता।

 इण्टरनेट

सम्बद्ध शीर्षक

  • इण्टरनेट का विकास और उपलब्ध सेवाएँ
  • भारत में इण्टरनेट का विकास
  • जनसंचार के बढ़ते चरण
  • वर्तमान युग में जनसंचार का महत्त्व

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  भूमिका,
  2.  इतिहास और विकास,
  3. इण्टरनेट सम्पर्क,
  4.  इण्टरनेट सेवाएँ,
  5.  भारत में इण्टरनेट,
  6. भविष्य की दिशाएँ,
  7.  उपसंहार।

भूमिका – इण्टरनेट ने विश्व में जैसा क्रान्तिकारी परिवर्तन किया, वैसा किसी भी दूसरी टेक्नोलॉजी ने नहीं किया। नेट के नाम से लोकप्रिय इण्टरनेट अपने उपभोक्ताओं के लिए बहुआयामी साधन प्रणाली है। यह दूर बैठे उपभोक्ताओं के मध्य अन्तर-संवाद का माध्यम है; सूचना या जानकारी में भागीदारी और सामूहिक रूप से काम करने का तरीका है; सूचना को विश्व स्तर पर प्रकाशित करने का जरिया है और सूचनाओं का अपार सागर है। इसके माध्यम से इधर-उधर फैली तमाम सूचनाएँ प्रसंस्करण के बाद ज्ञान में परिवर्तित हो रही हैं। इसने विश्व-नागरिकों के बहुत ही सुघड़ और घनिष्ठ समुदाय का विकास किया है। इण्टरनेट विभिन्न टेक्नोलॉजियों के संयुक्त रूप से कार्य का उपयुक्त उदाहरण है। कम्प्यूटरों के बड़े पैमाने पर उत्पादन, कम्प्यूटर सम्पर्क-जाल का विकास, दूर-संचार सेवाओं की बढ़ती उपलब्धता और घटता खर्च तथा आँकड़ों के भण्डारण और सम्प्रेषण में आयी नवीनता ने नेट के कल्पनातीत विकास और उपयोगिता को बहुमुखी प्रगति प्रदान की है। आज किसी समाज के लिए इण्टरनेट वैसी ही ढाँचागत आवश्यकता है जैसे कि सड़कें, टेलीफोन या विद्युत् ऊर्जा।

इतिहास और विकास – इण्टरनेट का इतिहास पेचीदा है। इसका पहला दृष्टान्त सन् 1962 ई० में मैसाचुसेट्स टेक्नोलॉजी संस्थान के जे० सी० आर० लिकप्लाइडर द्वारा लिखे गये कई ज्ञापनों के रूप में सामने आया था। उन्होंने कम्प्यूटर की ऐसी विश्वव्यापी अन्तर्सम्बन्धित श्रृंखला की कल्पना की थी जिसके जरिये वर्तमान इण्टरनेट की तरह ही आँकड़ों और कार्यक्रमों को तत्काल प्राप्त किया जा सकता था। इस प्रकार के नेटवर्क में सहायक बनी तकनीकी सफलता पहली बार इसी संस्थान के लियोनार्ड क्लिनरोक ने सुझायी थी।

इण्टरनेट के इतिहास में 1973 का वर्ष ऐसा था जिसने अनेक मील के पत्थर जोड़े और इस प्रकार अधिक विश्वसनीय और स्वतन्त्र नेटवर्क की शुरुआत हुई। इसी वर्ष में इण्टरनेट ऐक्टिविटीज बोर्ड की स्थापना की गयी। इस वर्ष के नवम्बर महीने में डोमेन नेमिंग सर्विस (डीएनएस) का पहला विवरण जारी किया गया और वर्ष की आखिरी महत्त्वपूर्ण घटना इण्टरनेट का सेना और आम लोगों के लिए उपयोग के वर्गीकरण द्वारा सार्वजनिक नेटवर्क के उदय के रूप में सामने आया तथा इसी के साथ आज प्रचलित इण्टरनेट ने जन्म लिया। इण्टरनेट का बाद का इतिहास मुख्यतः बहुविध उपयोग का है, जो नेटवर्क की आधारभूत संरचना से ही सम्भव हो सका। बहुविध उपयोग की दिशा में पहला कदम फाइल ट्रांसफर प्रणाली का विकास था। इससे दूर-दराज के कम्प्यूटरों के बीच फाइलों का आदान-प्रदान सम्भव हो सका। सन् 1984 ई० में इण्टरनेट से जुड़े कम्प्यूटरों की संख्या 1000 थी जो सन् 1989 ई० में एक लाख के ऊपर पहुँच चुकी थी। सन् 1990 ई० में ही टिम बर्नर-ली ने वर्ल्ड वाइड वेब (www) का आविष्कार करके सूचना प्रस्तुति का एक नया तरीका सामने रखा, जो सरलता से इस्तेमाल योग्य सिद्ध हुआ।

सन् 1993 ई० में ट्रैफिकल वेब ब्राउजर का आविष्कार इण्टरनेट के क्षेत्र में एक बड़ी घटना थी। इससे न केवल विवरण वरन् चित्रों का भी दिग्दर्शन सम्भव हो गया। इस वेब ब्राउजर को मोजाइक कहा गया। इस समय तक इण्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 20 लाख से अधिक हो गयी थी और आज प्रचलित इण्टरनेट आकार ले चुका था।

इण्टरनेट सम्पर्क – इण्टरनेट का आधार राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सूचना इन्फ्रास्ट्रक्चर होता है जो सामान्यतः हाइबैण्ड विड्थ टूक लाइनों से बना होता है और जहाँ से विभिन्न सम्पर्क लाइनें कम्प्यूटरों को जोड़ती हैं जिन्हें आश्रयदाता (होस्ट) कम्प्यूटर कहते हैं। ये आश्रयदाता कम्प्यूटर प्रायः बड़े संस्थानों; जैसे—विश्वविद्यालयों, बड़े उद्यमों और इण्टरनेट कम्पनियों से जुड़े होते हैं और इन्हें इण्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) कहा जाता है। आश्रयदाता कम्प्यूटर चौबीसों घण्टे काम करते हैं और अपने उपभोक्ताओं को सेवा प्रदान करते हैं। ये कम्प्यूटर विशेष संचार लाइनों के जरिये इण्टरनेट से जुड़े रहते हैं। इनके उपभोक्ताओं/व्यक्तियों के पीसी (पर्सनल कम्प्यूटर) साधारण टेलीफोन लाइन और मोडेम के जरिए इण्टरनेट से जुड़े रहते हैं। एक सामान्य उपभोक्ता एक निश्चित राशि का भुगतान करके आईएसपी से अपना इण्टरनेट खाता प्राप्त कर लेता है। आईएसपी लॉगइन नेम, पासवर्ड (जिसे उपभोक्ता बदल भी सकता है) और नेट से जुड़ने के लिए कुछ एक जानकारियाँ उपलब्ध करा देता है। एक बार इण्टरनेट से जुड़ जाने पर उपभोक्ता इण्टरनेट की तमाम सेवाओं तक अपनी पहुँच बना सकता है। इसके लिए उसे सही कार्यक्रम का चयन करना होता है। ज्यादातर इण्टरनेट सेवाएँ उपभोक्ता-सर्वर रूपाकार पर काम करती हैं। इनमें सर्वर वे कम्प्यूटर हैं जो नेट से जुड़े हुए व्यक्तिगत कम्प्यूटर उपभोक्ताओं को एक या अधिक सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं। इस सेवा के वास्तविक प्रयोग के लिए उपभोक्ता को उस विशेष सेवा के लिए आश्रित (क्लाइण्ट) सॉफ्टवेयर की जरूरत होती है।

इण्टरनेट सेवाएँ – इण्टरनेट की उपयोगिता उपभोक्ता को उपलब्ध सेवाओं से निर्धारित होती है। इसके उपभोक्ता को निम्नलिखित सेवाएँ उपलब्ध हैं

(क) ई-मेल – ई-मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल इण्टरनेट का सबसे लोकप्रिय उपयोग है। संवाद के अन्य माध्यमों की तुलना में सस्ता, तेज और अधिक सुविधाजनक होने के कारण इसने दुनिया भर के घरों और कार्यालयों में अपनी जगह बना ली है। इसके द्वारा पहले भाषायी पाठ ही प्रेषित किया जा सकती थी, लेकिन अब सन्देश, चित्र, अनुकृति, ध्वनि, आँकड़े आदि भी प्रेषित किये जा सकते हैं।

(ख) टेलनेट – टेलनेट एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से उपभोक्ता को किसी दूर स्थित कम्प्यूटर से स्वयं को जोड़ने की सुविधा प्राप्त हो जाती है।

(ग) इण्टरनेट चर्चा (चैट) – नयी पीढ़ी में इण्टरनेट रिले चैट यो चर्चा व्यापक रूप से लोकप्रिय है। यह ऐसी गतिविधि है, जिसमें भौगोलिक रूप से दूर स्थित व्यक्ति एक ही चैट सर्वर पर लॉग करके की-बोर्ड के जरिये एक-दूसरे से चर्चा कर सकते हैं। इसके लिए एक वांछित व्यक्ति की आवश्यकता होती है, जो निश्चित समय पर उस लाइन पर सुविधापूर्वक उपलब्ध हो।

(घ) वर्ल्ड वाइड वेब – यह सुविधा इण्टरनेट के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित उपयोगों में से एक है। यह इतनी आसान है कि इसके प्रयोग में बच्चों को भी कठिनाई नहीं होती। यह मनचाही संख्या वाले अन्तर्सम्बन्धित डॉक्युमेण्ट का समूह है, जिसमें से प्रत्येक डॉक्युमेण्ट की पहचान उसके विशेष पते से की जा सकती है। इस पर उपलब्ध सबसे महत्त्वपूर्ण सेवाओं में से एक सचिंग है। इण्टरनेट में शताधिक सर्च-इंजन कार्यरत हैं जिनमें गूगल सर्वाधिक लोकप्रिय है।

(ङ) ई-कॉमर्स – इण्टरनेट की प्रगति की ही एक परिणति ई-कॉमर्स है। किसी भी प्रकार के व्यवसाय को संचालित करने के लिए इण्टरनेट पर की जाने वाली कार्यवाही को ई-कॉमर्स कहते हैं। इसके अन्तर्गत वस्तुओं का क्रय-विक्रय, विभिन्न व्यक्तियों या कम्पनियों के मध्य सेवा या सूचना आते हैं। इन मुख्य सेवाओं के अतिरिक्त इण्टरनेट द्वारा और भी अनेक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जिनके असीमित उपयोग हैं।

भारत में इण्टरनेट – भारत में इण्टरनेट का आरम्भ आठवें दशक के अन्तिम वर्षों में अनेट (शिक्षा और अनुसन्धान नेटवर्क) के रूप में हुआ था। इसके लिए भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक विभाग और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी थी। इस परियोजना में पाँच प्रमुख संस्थान, पाँचों भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और इलेक्ट्रॉनिक निदेशालय सम्मिलित थे। अनेंट का आज व्यापक प्रसार हो चुका है और वह शिक्षा और शोध समुदाय को देशव्यापी सेवा दे रहा है। एक अन्य प्रमुख नेटवर्क नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेण्टर (एनआईसी) के रूप में सामने आया, जिसने प्रायः सभी जनपद मुख्यालयों को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ दिया। आज देश के विभिन्न भागों में यह 1400 से भी अधिक स्थलों को अपने नेटवर्क के जरिये जोड़े हुए है। आम आदमी के लिए भारत में इण्टरनेट का आगमन 15 अगस्त, 1995 ई० को हो गया था, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड ने देश में अपनी सेवाओं का आरम्भ किया। प्रारम्भ के कुछ वर्षों तक इण्टरनेट की पहुँच काफी धीमी रही, लेकिन हाल के वर्षों में इसके उपभोक्ता की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है। सन् 1999 ई० में । टेलीकॉम क्षेत्र निजी कम्पनियों के लिए खोल दिये जाने के परिणामस्वरूप अनेक नये सेवा प्रदाता बेहद प्रतिस्पर्धी विकल्पों के साथ सामने आए। भारत में, इण्टरनेट का उपयोग करने वाले विश्व की तुलना में चौथे स्थान पर हैं। सरकारी एजेंसियाँ इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि आईटी का लाभ सामान्य जन तक पहुँचाया जा सके। भारतीय रेल द्वारा कम्प्यूटरीकृत आरक्षण, आन्ध्र प्रदेश सरकार द्वारा शहरों के मध्य सूचना प्रणाली की स्थापना तथा केरल सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा फास्ट रिलायबिल इन्स्टेण्ट एफीशिएण्ट नेटवर्क फॉर डिस्बर्समेण्ट ऑफ सर्विसेज (फ्रेण्ड्स) जैसी पेशकशों ने इस दिशा में देश के आम नागरिकों की अपेक्षाओं को बहुत बढ़ा दिया है।

भविष्य की दिशाएँ – भविष्य के प्रति इण्टरनेट बहुत ही आश्वस्तकारी दिखाई दे रहा है और आज के आधार पर कहीं अधिक प्रगतिशाली सेवाएँ प्रदान करने वाला होगी। भविष्य के नेटवर्क जिन उपकरणों और साधनों को जोड़ेंगे, वे मात्र कम्प्यूटर नहीं होंगे, वरन् माइक्रोचिप से संचालित होने के कारण तकनीकी अर्थों में कम्प्यूटर जैसे होंगे। आने वाले समय में केवल कार्यालय ही नहीं निवास, स्कूल, अस्पताल और हवाई अड्डे एक-दूसरे से जुड़े हुए होंगे। इण्टरनेट व्यक्तियों और समुदायों को परस्पर घनिष्ठ रूप से काम करने के लिए सक्षम बना देगा और भौगोलिक दूरी के कारण आने वाली बाधाओं को समाप्त कर देगा। कम्प्यूटर रचित समुदायों का उदय हो जाएगा और तब दमनकारी शासकों के लिए विश्व में अपनी लोकप्रियता को सुरक्षित रख पाना सम्भव नहीं रह जाएगा। भविष्य में टेक्नोलॉजी का उपयोग संस्कृति, भाषा और विरासत की विविधता की रक्षा के लिए किया जाएगा तथा भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था भी इस सबसे अछूती नहीं रहेगी।

उपसंहार – टेक्नोलॉजियों के लोकप्रिय होते ही सामान्य शिक्षित नागरिकों के लिए भी यह पूरी तरह आसान हो जाएगा कि वह कानून-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी कर सकें। इसके फलस्वरूप कहीं अधिक समर्थ लोकतन्त्र सम्भव हो सकेगा जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के उत्तरदायित्व कुछ अलग प्रकार के होंगे। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती इण्टरनेट टेक्नोलॉजी के दोहन की है जिससे समाज के हर वर्ग तक उसके फायदों की पहुँच सम्भव बनायी जा सके। किसी भी टेक्नोलॉजी का उपयोग हमेशा समूचे समाज के लिए होना चाहिए न कि उसको समाज के कुछ वर्गों को वंचित करने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। एक बार यह उपलब्धि हासिल की जा सके तो वास्तव में सम्भावनाओं की कोई सीमा ही नहीं है। संक्षेप में, क्रान्ति तो अभी आरम्भ ही हुई है।

भारत की वैज्ञानिक प्रगति

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञान की उपलब्धियाँ
  • राष्ट्रीय विकास में विज्ञान का योगदान

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की स्थिति,
  3.  विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना – सामान्य मनुष्य की मान्यता है कि सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान ईश्वर है, जो इस संसार का निर्माता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। आज विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि वह ईश्वर के प्रतिरूप ब्रह्मा (निर्मात्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) को चुनौती देता प्रतीत हो रहा है। कृत्रिम गर्भाधान से परखनली शिशु उत्पन्न करके उसने ब्रह्मा की सत्ता को ललकारा है, बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना कर और लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार देकर उसने विष्णु को चुनौती दी है तथा सर्व-विनाश के लिए परमाणु बम का निर्माण कर उसने शिव को चकित कर दिया है।

विज्ञान का अर्थ है किसी भी विषय में विशेष ज्ञान। विज्ञान मानव के लिए कामधेनु की तरह है जो उसकी सभी कामनाओं की पूर्ति करती है तथा उसकी कल्पनाओं को साकार रूप देता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान प्रवेश कर चुका है चाहे वह कला का क्षेत्र हो या संगीत और राजनीति का। विज्ञान ने समस्त पृथ्वी और अन्तरिक्ष को विष्णु के वामनावतार की भाँति तीन डगों में नाप डाला है।

स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात् की स्थिति – बीसवीं शताब्दी को विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ हासिल करने के कारण विज्ञान को युग कहा गया है। आज संसार ने ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत अधिक प्रगति कर ली है। भारत भी इस क्षेत्र में किसी अन्य वैज्ञानिक दृष्टि से उन्नत कहे जाने वाले देशों से यदि आगे नहीं, तो बहुत पीछे या कम भी नहीं है। 15 अगस्त, सन् 1947 में जब अंग्रेजों की गुलामी का जुआ उतार कर भारत स्वतन्त्र हुआ था, तब तक कहा जा सकता है कि भारत वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर शून्य से अधिक कुछ भी नहीं था। सूई तक का आयात इंग्लैण्ड आदि देशों से करना पड़ता था। लेकिन आज सूई से लेकर हवाई जहाज, जलयान, सुपर कम्प्यूटर, उपग्रह तक अपनी तकनीक और बहुत कुछ अपने साधनों से इस देश में ही बनने लगे हैं। लगभग पाँच दशकों में इतनी अधिक वैज्ञानिक प्रगति एवं विकास करके भारत ने केवल . विकासोन्मुख राष्ट्रों को ही नहीं, वरन् उन्नत एवं विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों को भी चकित कर दिया है। भारतीय प्रतिभा का लोहा आज सम्पूर्ण विश्व मानने लगा है।

विभिन्न क्षेत्रों में हुई वैज्ञानिक प्रगति – डाक-तार के उपकरण, तरह-तरह के घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामान, रेडियो-टेलीविजन, कारें, मोटर गाड़ियाँ, ट्रक, रेलवे इंजन और यात्री तथा अन्य प्रकार के डिब्बे, कल-कारखानों में काम आने वाली छोटी-बड़ी मशीनें, कार्यालयों में काम आने वाले सभी प्रकार के सामान, रबर-प्लास्टिक के सभी प्रकार के उन्नत उपकरण, कृषि कार्य करने वाले ट्रैक्टर, पम्पिंग सेट तथा अन्य कटाई-धुनाई–पिसाई की मशीनें आदि सभी प्रकार के आधुनिक विज्ञान की देन माने जाने वाले साधन आज भारत में ही बनने लगे हैं। कम्प्यूटर, छपाई की नवीनतम तकनीक की मशीनें आदि भी आज भारत बनाने लगा है। इतना ही नहीं, आज भारत में अणु शक्ति से चालित धमन भट्टियाँ, बिजली घर, कल-कारखाने आदि भी चलने लगे हैं तथा अणु-शक्ति का उपयोग अनेक शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए होने लगा है। पोखरण में भूमिगत अणु-विस्फोट करने की बात तो अब बहुत पुरानी हो चुकी है।

आज भारतीय वैज्ञानिक अपने उपग्रह तक अन्तरिक्ष में उड़ाने तथा कक्षा में स्थापित करने में सफल हो चुके हैं। आवश्यकता होने पर संघातक अणु, कोबॉल्ट और हाइड्रोजन जैसे बम बनाने की दक्षता भी भारतीय वैज्ञानिकों ने हासिल कर ली है। विज्ञान-साधित उपकरणों, शस्त्रास्त्रों का आज सैनिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्त्व बढ़ . गया है। अपने घर बैठकर शत्रु देश के दूर-दराज के इलाकों पर आक्रमण कर पाने की वैज्ञानिक विधियाँ और शस्त्रास्त्र आज विशेष महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। धरती से धरती तक, धरती से आकाश तक मार कर सकने वाली कई तरह की मिसाइलें भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा बनायी गयी हैं जो आज भारतीय सेना के पास हैं और अन्य अनेकों को विकास कार्यक्रम अनवरत चल रहा है। युद्धक टैंक, विमान, दूर-दूर तक मार करने वाली तोपें आदि भारत में ही बन रही हैं। कहा जा सकता है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सहायता से विश्व के सैन्य अभियान जिस दिशा में चल रहे हैं, भारत भी उस दिशा में किसी से पीछे नहीं है। गणतन्त्र दिवस की परेड के अवसर पर प्रदर्शित उपकरणों से यह स्पष्ट हो जाता है। फिर भी भारत को इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना है।

विज्ञान ने भारतीयों के रहन-सहन और चिन्तन-शक्ति को पूर्णरूपेण बदल डाला है। भारत हवाई जहाज, समुद्र के वक्षस्थल को चीरने वाले जहाज, आकाश का सीना चीर कर निकल जाने वाले रॉकेट, कृत्रिम उपग्रह आदि के निर्माण में अपना अग्रणी स्थान रखता है। 19 अप्रैल, 1975 को सोवियत प्रक्षेपण केन्द्र से ‘आर्यभट्ट’ नामक उघग्रह का सफल प्रक्षेपण कर भारत ने अन्तरिक्ष युग में प्रवेश किया और तब से आज तक उसने मुड़कर पीछे नहीं देखा। स्क्वैडून लीडर राकेश शर्मा 1984 ई० में रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों के साथ अन्तरिक्ष यात्रा भी कर चुके हैं। भास्कर, ऐपल, इन्सेट, रोहिणी जैसे अनेक उपग्रह अन्तरिक्ष में स्थापित कर भारत विश्व की महाशक्तियों के समकक्ष खड़ा है। इन उपग्रहों से हमें मौसम सम्बन्धी जानकारी मिलती है तथा संचार व्यवस्था भी सुदृढ़ हुई है।

आधुनिक विज्ञान की सहायता से आज भारत ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है। एक्स-रे, लेज़र किरणें आदि की सहायता से अब भारत में ही असाध्य समझे जाने वाले अनेक रोगों के उपचार होने लगे हैं। हृदय-प्रत्यारोपण, गुर्दे का प्रत्यारोपण, जैसे कठिन-से-कठिन माने जाने वाले ऑपरेशन आज भारतीय शल्य-चिकित्सकों द्वारा सफलतापूर्वक सम्पादित किये जा रहे हैं। सभी प्रकार की बहुमूल्य प्राण-रक्षक ओषधियों का निर्माण भी यहाँ होने लगा है।

ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारतीय वैज्ञानिकों की प्रगति सराहनीय है। इन्होंने नदियों की मदमस्त चाल को बाँधकर उनके जल का उपयोग सिंचाई और विद्युत निर्माण में किया। सौर ऊर्जा, पवनचक्कियाँ, ताप बिजलीघर, परमाणु बिजलीघर आदि ऊर्जा के क्षेत्र में हमारी प्रगति को दर्शाते हैं। महानगरों में गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण, सड़कें, फ्लाई ओवर, सब-वे आदि हमारी अभियान्त्रिकीय प्रगति को दर्शाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के भीतर से जल, अनेक खनिज और समुद्र को चीर कर तेल के कुएँ भी खोज निकाले हैं। बॉम्बे हाई से तेल का उत्खनन इसका जीता-जागता उदाहरण है।

कुछ एक अपवादों को छोड़कर, भारत में अधिकांश कार्य हाथों के स्थान पर मशीनों से हो सकने सम्भव हो गये । हैं। मानव का कार्य अब इतना ही रह गया है कि वह इन मशीनों पर नियन्त्रण रखे। आटा पीसने से लेकर पूँधने तक, फसल बोने से लेकर अनाज को बोरियों में भरने, वृक्ष काटने से लेकर फर्नीचर बनाने तक सभी कार्य भारत में निर्मित मशीनों द्वारा सम्पन्न होने लगे हैं। विज्ञान ने मानव के दैनिक जीवन के लिए भी अनेक क्रान्तिकारी सुविधाएँ जुटायी हैं। रेडियो, फैक्स, रंगीन टेलीविजन, टेपरिकॉर्डर, वी० सी० आर०, सी० डी० प्लेयर, डी०वी०डी० प्लेयर, दूरभाष, कपड़े धोने की मशीन, धूल-मिट्टी हटाने की मशीन, कूलर, पंखा, फ्रिज, एयरकण्डीशनर, हीटर आदि आरामदायक मशीनें भारत में ही बनने लगी हैं, जिनके अभाव में मानव-जीवन नीरस प्रतीत होता है। घरों में लकड़ी-कोयले से जलने वाली अँगीठी का स्थान कुकिंग गैस ने और गाँवों में उपलों से जलने वाले चूल्हों का स्थान गोबर गैस संयन्त्र ने ले लिया है। चलचित्रों के क्षेत्र में हमारी प्रगति सराहनीय है। कम्प्यूटर को प्रवेश और उसका विस्तार हमारी तकनीकी प्रगति की ओर इंगित करते हैं।

उपसंहार – घर-बाहर, दफ्तर-दुकान, शिक्षा-व्यवसाय, आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ विज्ञान का प्रवेश न हुओं हो। भारत का होनहार वैज्ञानिक प्रत्येक दिशा, स्थल और क्षेत्र में सक्रिय रहकर अपनी निर्माण एवं नव-नव अनुसन्धान-प्रतिभा का परिचय दे रहा है। इतना ही नहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने विदेशों में भी भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभा की धूम मचा रखी है। आज भारत में जो कृषि या हरित क्रान्ति, श्वेत क्रान्ति आदि सम्भव हो पायी है, उन सभी को कारण विज्ञान और उसके द्वारा प्रदत्त नये-नये उपकरण तथा ढंग ही हैं। आज हम जो कुछ भी खाते-पीते और पहनते हैं, सभी के पीछे किसी-न-किसी रूप में विज्ञान को कार्यरत पाते हैं। विज्ञान को कार्यरत करने वाले कोई विदेशी नहीं, वरन् भारतीय वैज्ञानिक ही हैं। उन्हीं की लगन, परिश्रम और कार्य-साधना से हमारा देश भारत आज इतनी अधिक वैज्ञानिक प्रगति कर सका है। भविष्य में यह और भी अधिक, सारे संसार से बढ़करे वैज्ञानिक प्रगति कर पाएगा इस बात में कतई कोई सन्देह नहीं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi समस्यापरक निबन्ध

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name समस्यापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi समस्यापरक निबन्ध

समस्यापरक निबन्ध

भारत में जनसंख्या-वृद्धि की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • जनसंख्या-विस्फोट और निदान
  • जनसंख्या-वृद्धि : कारण और निवारण
  • बढ़ती जनसंख्या : एक गम्भीर समस्या
  • छोटा परिवार सुखी परिवार
  • बढ़ती जनसंख्या के कुप्रभाव
  • जनसंख्या : एक विकट समस्या
  • बढ़ती जनसंख्या : समस्या व समाधान
  • जनसंख्या वृद्धि और बेरोजगारी
  • जनसंख्या वृद्धि तथा खाद्य समस्या

प्रमुख विचार-बिन्द 

  1.  प्रस्तावना,
  2.  जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ,
  3.  जनसंख्या वृद्धि के कारण,
  4.  जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने के उपाय,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना – जनसंख्या वृद्धि की समस्या भारत के सामने विकराल रूप धारण करती जा रही है। सन् 1930-31 ई० में अविभाजित भारत की जनसंख्या 20 करोड़ थी, जो अब केवल भारत में 121.02 करोड़ से ऊपर पहुँच चुकी है। जनसंख्या की इस अनियन्त्रित वृद्धि के साथ दो समस्याएँ मुख्य रूप से जुड़ी हुई हैं- (1) सीमित भूमि तथा (2) सीमित आर्थिक संसाधन। अनेक अन्य समस्याएँ भी इसी समस्या से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हैं; जैसे – समस्त नागरिकों की शिक्षा, स्वच्छता, चिकित्सा एवं अच्छा वातावरण उपलब्ध कराने की समस्या। इन समस्याओं का निदान न होने के कारण भारत क्रमशः एक अजायबघर बनता जा रहा है जहाँ चारों ओर व्याप्त अभावग्रस्त, अस्वच्छ एवं अशिष्ट परिवेश से किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विरक्ति हो उठती है। और मातृभूमि की यह दशा लज्जा का विषय बन जाती है।

जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ-आचार्य विनोबा भावे जी ने कहा था, “जो बच्चा एक मुँह लेकर पैदा होता है, वह दो हाथ लेकर आता है।” आशय यह है कि दो हाथों से पुरुषार्थ करके व्यक्ति अपना एक मुँह तो भर ही सकता है। पर यह बात देश के औद्योगिक विकास से जुड़ी है। यदि देश की अर्थव्यवस्था बहुत सुनियोजित हो तो वहाँ रोजगार के अवसरों की कमी नहीं रहती। लघु उद्योगों से करोड़ों लोगों का पेट भरता था। अब बड़ी मशीनों और उनसे अधिक शक्तिशाली कम्प्यूटरों के कारण लाखों लोग बेरोजगार हो गये और अधिकाधिक होते जा रहे हैं। आजीविका की समस्या के अतिरिक्त जनसंख्या-वृद्धि के साथ एक ऐसी समस्या भी जुड़ी हुई है, जिसका समाधान किसी के पास नहीं; वह है सीमित भूमि की समस्या। भारत का क्षेत्रफल विश्व का कुल 2.4 प्रतिशत ही है, जब कि यहाँ की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की लगभग 17.5 प्रतिशत है; अतः कृषि के लिए भूमि का अभाव हो गया है। इसके परिणामस्वरूप भारत की सुख-समृद्धि में योगदान करने वाले अमूल्य जंगलों को काटकर लोग उससे प्राप्त भूमि पर खेती करते जा रहे हैं, जिससे अमूल्य वन-सम्पदा का विनाश, दुर्लभ वनस्पतियों को अभाव, पर्यावरण प्रदूषण की समस्या, वर्षा पर कुप्रभाव एवं अमूल्य जंगली जानवरों के वंशलोप का भय उत्पन्न हो गया है। उधर हस्त-शिल्प और कुटीर उद्योगों के चौपट हो जाने से लोग आजीविका की खोज में, ग्रामों से भागकर शहरों में बसते जा रहे हैं, जिससे कुपोषण, अपराध, आवास आदि की विकट समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।

जनसंख्या वृद्धि का सबसे बड़ा अभिशाप है – किसी देश के विकास को अवरुद्ध कर देना; क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्यान्न और रोजगार जुटाने में ही देश की समस्त शक्ति लग जाती है, जिससे अन्य किसी दिशा में सोचने का अवकाश नहीं रहता। ये समस्याएँ भी सुलझाना आसान नहीं; क्योंकि कृषि-भूमि सीमित है और औद्योगिक विकास भी एक सीमा तक ही सम्भव हैं। प्रत्येक देश तेजी से औद्योगिक उन्नति कर रहा है और अपने देश में तैयार माल को दूसरे देशों के बाजारों में खपाना चाहता है। फलतः औद्योगिक क्षेत्र में भयंकर स्पर्धा चल पड़ी है, जो राजनीति को भी गहराई तक प्रभावित कर रही है।।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण – प्राचीन, भारत में आश्रम-व्यवस्था द्वारा मनुष्य के व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन को नियन्त्रित कर व्यवस्थित किया गया था। सौ वर्ष की सम्भावित आयु का केवल चौथाई भाग (25 वर्ष) ही गृहस्थाश्रम के लिए था। व्यक्ति का शेष जीवन शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों के विकास तथा समाज-सेवा में ही बीतता था। गृहस्थ जीवन में भी संयम पर बल दिया जाता था। इस प्रकार प्राचीन भारत का जीवन मुख्यतः आध्यात्मिक और सामाजिक था, जिसमें व्यक्तिगत सुख-भोग की गुंजाइश कम थी। आध्यात्मिक वातावरण की चतुर्दिक व्याप्ति के कारण लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति ब्रह्मचर्य, संयम और सादे जीवन की ओर थी। फिर उस समय विशाल भू-भाग में जंगल फैले हुए थे, नगर कम थे। अधिकांश लोग ग्रामों में या ऋषियों के आश्रमों में रहते थे, जहाँ प्रकृति के निकट-सम्पर्क से उनमें सात्त्विक भावों का संचार होता था। आज परिस्थिति उल्टी है। आश्रम-व्यवस्था के नष्ट हो जाने के कारण लोग युवावस्था से लेकर मृत्युपर्यन्त गृहस्थ ही बने रहते हैं, जिससे सन्तानोत्पत्ति में निरन्तर वृद्धि हुई है। दूसरे, हिन्दू धर्म में पुत्र-प्राप्ति को मोक्ष या मुक्ति में सहायक माना गया है। इसलिए पुत्र न होने पर सन्तानोत्पत्ति का क्रम जारी रहता है तथा अनेक पुत्रियों का जन्म हो जाता है।

ग्रामों में कृषि-योग्य भूमि सीमित है। सरकार द्वारा भारी उद्योगों को बढ़ावा दिये जाने से हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग चौपट हो गये हैं, जिससे गाँवों का आर्थिक ढाँचा लड़खड़ा गया है। इस प्रकार सरकार द्वारा गाँवों की लगातार उपेक्षा के कारण वहाँ विकास के अवसर अनुपलब्ध होते जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण युवक नगरों की ओर भाग रहे हैं, जिससे ग्राम-प्रधान भारत शहरीकरण का कारण बनता जा रहा है। उधर शहरों में स्वस्थ मनोरंजन के साधन स्वल्प होने से अपेक्षाकृत सम्पन्न वर्ग को प्रायः सिनेमा या दूरदर्शन पर ही निर्भर रहना पड़ता है, जो कृत्रिम पाश्चात्य जीवन-पद्धति का प्रचार कर वासनाओं को उभारता है। दूसरी ओर अपर्याप्त आय वालों को ये साधन भी उपलब्ध न होने से ये प्रायः स्त्री-संग को ही दिल बहलाव का एकमात्र साधन मान लेते हैं, जिससे उनके सन्तानें बहुत होती हैं। आँकड़े सिद्ध करते हैं कि उन्नत जीवन-स्तर वालों की अपेक्षा निम्न जीवन-स्तर वालों की सन्तानें कहीं अधिक होती हैं। इसके अतिरिक्त बाल-विवाह, गर्म जलवायु, रूढ़िवादिता, चिकित्सा-सुविधाओं के कारण मृत्यु दर में कमी आदि भी जनसंख्या वृद्धि की समस्या को क्स्फिोटक बनाने में सहायक हुए हैं।

जनसंख्या-वृद्धि को नियन्त्रित करने के उपाय – जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने का सबसे स्वाभाविक और कारगर उपाय तो संयम या ब्रह्मचर्य ही है। इससे नर, नारी, समाज और देश सभी का कल्याण है, किन्तु वर्तमान भौतिकवादी युग में जहाँ अर्थ और काम ही जीवन का लक्ष्य बन गये हैं, वहाँ ब्रह्मचर्य-पालनं आकाश-कुसुम हो गया है। फिर सिनेमा, पत्र-पत्रिकाएँ, दूरदर्शन आदि प्रचार के माध्यम भी वासना को उद्दीप्त करके पैसा कमाने में लगे हैं। उधर अशिक्षा और बेरोजगारी इसे हवा दे रही है। फलत: सबसे पहले आवश्यकता यह है कि भारत अपने प्राचीन स्वरूप को पहचानकर अपनी प्राचीन संस्कृति को उज्जीवित करे। प्राचीन भारतीय संस्कृति, जो अध्यात्म-प्रधान है, के उज्जीवन से लोगों में संयम की ओर स्वाभाविक प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिससे नैतिकता को बल मिलेगा और समाज में विकराल रूप धारण करती आपराधिक प्रवृत्तियों पर स्वाभाविक अंकुश लगेगा; क्योंकि कितनी ही वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याएँ व्यक्ति के चरित्रोन्नयन से हल हो सकती हैं। भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए अंग्रेजी की शिक्षा को बहुत सीमित करके संस्कृत और भारतीय भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन पर विशेष बल देना होगा। इसके अतिरिक्त पश्चिमी देशों की होड़ में सम्मिलित होने का मोह त्यागकर अपने देशी उद्योग-धन्धों, हस्तशिल्प आदि को पुनः जीवनदान देना होगा। भारी उद्योग उन्हीं देशों के लिए उपयोगी हैं, जिनकी जनसंख्या बहुत कम है; अतः कम हाथों से अधिक उत्पादन के लिए भारी उद्योगों की स्थापना की जाती है। भारत जैसे विपुल जनसंख्या वाले देश में लघु-कुटीर उद्योगों के प्रोत्साहन की आवश्यकता है, जिससे अधिकाधिक लोगों को रोजगार मिल सके और हाथ के कारीगरों को अपनी प्रतिभा के प्रकटीकरण एवं विकास का अवसर मिल सके, जिसके लिए भारत किसी समय विश्वविख्यात था। इससे लोगों की आय बढ़ने के साथ-साथ उनका जीवन-स्तर भी सुधरेगा और सन्तानोत्पत्ति में निश्चय ही पर्याप्त कमी आएगी। जनसंख्या-वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए लड़के-लड़कियों की विवाह-योग्य आयु बढ़ाना भी उपयोगी रहेगा। साथ ही समाज में पुत्र और पुत्री के सामाजिक भेदभाव को कम करना होगा। पुत्र-प्राप्ति के लिए सन्तानोत्पत्ति का क्रम बनाये रखने की अपेक्षा छोटे परिवार को ही सुखी जीवन का आधार बनाया जाना चाहिए तथा सरकार की ओर से सन्तति निरोध का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त प्रचार-माध्यमों पर प्रभावी नियन्त्रण के द्वारा सात्त्विक, शिक्षाप्रद एवं नैतिकता के पोषक मनोरंजन उपलब्ध कराये जाने चाहिए। ग्रामों में सस्ते-स्वस्थ मनोरंजन के रूप में लोक-गीतों, लोक-नाट्यों (नौटंकी, रास, रामलीला, स्वांग आदि), कुश्ती, खो-खो आदि की पुरानी परम्परा को नये स्वरूप प्रदान करने की आवश्यकता है। साथ ही जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों से भी ग्रामीण और अशिक्षित जनता को भली-भाँति अवगत कराया जाना चाहिए।

जहाँ तक परिवार-नियोजन के कृत्रिम उपायों के अवलम्बन का प्रश्न है, उनका भी सीमित उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान युग में जनसंख्या की अति त्वरित-वृद्धि पर तत्काल प्रभावी नियन्त्रण के लिए गर्भ निरोधक ओषधियों एवं उपकरणों का प्रयोग आवश्यक हो गया है। परिवार-नियोजन में देशी जड़ी-बूटियों के उपयोग पर भी अनुसन्धान चल रहा है। सरकार ने अस्पतालों और चिकित्सालयों में नसबन्दी की व्यवस्था की है तथा परिवार-नियोजन से सम्बद्ध कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए केन्द्र एवं राज्य स्तर पर अनेक प्रशिक्षण संस्थान भी खोले हैं।

उपसंहार – जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने का वास्तविक स्थायी उपाय तो सरल और सात्त्विक जीवन-पद्धति अपनाने में ही निहित है, जिसे प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को ग्रामों के आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे ग्रामीणों का आजीविका की खोज में शहरों की ओर पलायन रुक सके। वस्तुतः ग्रामों के सहज प्राकृतिक वातावरण में संयम जितना सरल है, उतना शहरों के घुटन भरे आडम्बरयुक्त जीवन में नहीं। शहरों में भी प्रचार-माध्यमों द्वारा प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रचार एवं स्वदेशी भाषाओं की शिक्षा पर ध्यान देने के साथ-साथ ही परिवार-नियोजन के कृत्रिम उपायों—विशेषत: आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के प्रयोग पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। समान नागरिक आचारसंहिता प्राथमिक आवश्यकता है, जिसे विरोध के बावजूद अविलम्ब लागू किया जाना चाहिए। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकती है कि जनसंख्या-वृद्धि की दर घटाना आज के युग की सर्वाधिक जोरदार माँग है, जिसकी उपेक्षा आत्मघाती होगी।

कश्मीर समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत-पाक मैत्री की दशा एवं दिशा

प्रमुख विचार विन्द

  1.  प्रस्तावना
  2.  कश्मीर का भारत में विलय और कश्मीर की रक्षा
  3.  संयुक्त राष्ट्र संघ का हस्तक्षेप,
  4. समस्या की जड़,
  5. वर्तमान स्थिति,
  6.  भारतीय नेतृत्व का पक्ष,
  7.  उपसंहार।

प्रस्तावना –  स्वतन्त्रता-प्राप्ति के सढ़सठ वर्षों और अप्रतिम धनराशि व्यय करने के बाद कश्मीर आज भी भारत के गले, की हड्डी बना हुआ है। हमें स्वतन्त्रता तो मिली, लेकिन जाते-जाते भी अंग्रेज हमारे लिए समस्याओं का एक पहाड़ खड़ा कर गये, जिसमें एक तो भारत-विभाजन से उत्पन्न कुपरिणाम तथा दूसरे देशी राज्यों को स्वतन्त्रता प्रदान करने की समस्याएँ प्रमुख थीं।
भारत-विभाजन का कुफल भारत को आज भी भोगना पड़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप आज भी लाखों शरणार्थी निराधार-निराश्रित होकर देश पर भार बने हुए हैं। देशी राज्यों की समस्या का समाधान तो भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की गृहनीति ने कर दिया और लगभग 600 से अधिक देशी राज्यों ने भारत में विलय स्वीकार कर लिया। केवल हैदराबाद तथा कश्मीर दो देशी राज्यों को लेकर कठिनाई उपस्थित हुई। इनमें से पहले के निपटारे के लिए राष्ट्र को थोड़ी-सी सैनिक कार्यवाही करनी पड़ी, फिर रह गयी कश्मीर की समस्या जो वहाँ के शासक हरिसिंह की ढुलमुल नीति के कारण उत्पन्न हुई और आज भी दिन-प्रतिदिन विकट होती जा रही है। इन वर्षों में पाकिस्तान ने विदेशों से प्राप्त गोला-बारूद से न जाने कितना रक्त बहाया है। भारत; जिसे धर्म-जाति निरपेक्षता और जनतन्त्र की सच्ची कसौटी कहा जाता है; की वह परीक्षा-स्थली जिसके बारे में शाहजहाँ ने कहा था कि “यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है’, निरीह मानवता के रक्त से दूषित हुई जा रही है।

कश्मीर का भारत में विलय और कश्मीर की रक्षा – कश्मीर के तत्कालीन शासक हरिसिंह की ढुलमुल नीति से उत्पन्न परिस्थिति का लाभ उठाकर 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तानी सैनिकों ने कबाइलियों के वेष में सहस्रों कबाइलियों को साथ लेकर इस पर आक्रमण कर दिया और वायु वेग से राजधानी श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे। रियासती सेना इनका मुकाबला न कर सकी। कबाइली पठानों ने कश्मीर में नाना प्रकार के नृशंस अत्याचार किये। ये हिन्दू जनता की बुरी दशा कर रहे थे। जब ये श्रीनगर से केवल 20 मील दूर रह गये और हरिसिंह को अपने बचाव को कोई मार्ग न सूझा तो उसने शेख अब्दुल्ला को भारत सरकार के पास सहायता प्राप्त करने के लिए भेजा। किन्तु कश्मीर को सैनिक सहायता देने से पहले उसका भारत में विलय होना आवश्यक था। शेख अब्दुल्ला विलय-पत्र पर रातों-रात राजा हरिसिंह का हस्ताक्षर कराकर लौटे। अब क्या था, सात वीर सैनिकों का पहला दल कश्मीर में जा पहुँचा। इन वीर सैनिकों ने श्रीनगर के हवाई अड्डे पर भारतीय पताका फहरायी और तोपें लगा दीं। इस समय तक लुटेरे सैनिक श्रीनगर से केवल दो मील दूर रह गये थे। इन्होंने धुआँधार गोले बरसाकर उनका बढ़ना रोक दिया। इसके बाद भारत की सेनाएँ मोर्चे पर पहुँचने लगीं। प्रत्येक मिनट पर एक हवाई जहाज सैनिकों को लेकर श्रीनगर के हवाई अड्डे पर पहुँचता था। भारत के वीर सैनिकों ने शत्रुओं को खदेड़ना शुरू किया। एक के पश्चात् एक स्थान उनके हाथ से छीना जाने लगा। जम्मू शत्रुओं से खाली हो गया। यह देखकर पाकिस्तान अपने अनेक सैनिकों और अफसरों को छद्मवेष में उनका साथ देने के लिए भेजने लगा, किन्तु भारतीय सैनिकों की अपूर्व वीरता के सम्मुख उनकी दाल न गली।

संयुक्त राष्ट्र संघ का हस्तक्षेप – आज कश्मीर की समस्या भारत के सीने का नासूर बन चुकी है। यदि उसी समय हमारे उदारवादी और महान् नेता पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपने वरिष्ठ सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल का सुझाव मान लिया होता, तो उसी समय कश्मीर समस्या का समाधान निकल आता। दुर्भाग्य ! पं० जवाहरलाल नेहरू ने भारत-विभाजन के लिए जिम्मेदार माउण्टबेटन की सलाह पर कश्मीर की समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख उपस्थित की और वहाँ से पाकिस्तानियों को हटाने की माँग की। किन्तु पाकिस्तान ने अपनी सेना के कश्मीर में होने से अस्वीकार किया। इस पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने कमीशन नियुक्त किया, जिससे पाकिस्तान का भण्डा फूट गया और उसको बाध्य होकर स्वीकार करना पड़ा कि उसकी सेना कश्मीर में लड़ रही है। इसके बाद उसने कश्मीर के मुस्लिम बहुल होने के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ से उसे पाकिस्तान में मिला देने की माँग की। यदि संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ का प्रतिनिधित्व न होता तो पूर्ण कश्मीर कब का पाकिस्तान के जबड़ों में समा चुका होता। संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ ने भारत के पक्ष का जोरदार समर्थन किया। परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ में दो प्रस्ताव पारित किये गये-एक तो यह कि पहले पाकिस्तान कश्मीर का अधिकृत क्षेत्र खाली कर दे और दूसरे वहाँ पर जनमत संग्रह करा लिया जाए। कश्मीर की जनता भारत-पाक जिसके पक्ष में मत दे, कश्मीर को उसी देश का अंग बना दिया जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयत्न से कश्मीर में युद्ध-विराम सन्धि हो गयी।

समस्या की जड़ – 1 जनवरी, 1949 को रात्रि के ठीक 12 बजे भारत और पाकिस्तान दोनों सेनाओं ने युद्ध बन्द कर दिया और उसी समय से दोनों पक्षों की सेना मोर्चे बनाकर बैठी हुई हैं। युद्ध-विराम सन्धि के समय, कश्मीर का तिहाई भाग पाकिस्तान के अधीन रह गया था जो आज तक वापस नहीं मिल सका है और वहाँ तथाकथित आजाद कश्मीर सरकार शासन कर रही है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व उल्लिखित दोनों प्रस्ताव मानने के लिए तैयार हो गया था, जबकि आज जहाँ-तहाँ और यहाँ तक कि हवा की ओर मुंह करके भी जनमत संग्रह कराने की माँग करने वाले पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ के दोनों प्रस्ताव मानने से इन्कार कर दिया था।

वर्तमान स्थिति – सन् 1949 से अब तक दो-तिहाई कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा, जहाँ पर लगातार विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव होते रहे। पिछले सढ़सठ वर्षों से पाकिस्तान ने भारत के सीमावर्ती भागों के साथ-साथ कश्मीर को हथियाने के अनेक सैन्य प्रयास किये, जब कि भारत इस सम्बन्ध में आज तक उदारवादी नीति अपनाता चला आ रहा है। सन् 1948, 1965, 1971 और 1998 के युद्ध और अक्सर छिट-पुट होने वाली अघोषित युद्ध जैसी स्थिति पाकिस्तान की मानसिकता का स्पष्ट प्रमाण देती हैं। लेकिन 1989 के बाद से पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए सक्रिय रूप से वहाँ के युवकों को भड़काना तथा आतंकवादी गतिविधियाँ प्रारम्भ कर दीं। युवकों को सीमा-पार ले जाकर उन्हें विधिवत् शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण देकर आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराये जिससे वे भारत में आतंक फैलाकर कश्मीर राज्य छीन सकें। भारत की सरकार ने वहाँ सेना की नियुक्ति कर कुछ हद तक काबू पाया, लेकिन अभी तक आतंकवादियों का पूरा सफाया नहीं हो सका। एक दृढ़ कूटनीतिक चाल के अन्तर्गत आतंकवाद के माध्यम से पाकिस्तान कश्मीर से हिन्दुओं को हटाने का प्रयास करता रहा है। अब तक कई लाख कश्मीरी पण्डित अपनी जमीन-जायदाद, रोजगार छोड़कर कश्मीर से भाग खड़े हुए हैं। अब कश्मीर में आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है तथा आतंकवादी विमान अपहरण जैसी घटना को कामयाबी से अंजाम दे रहे हैं।

भारतीय नेतृत्व का पक्ष – सभी भारतीय प्रधानमन्त्री हमेशा स्पष्ट रूप से घोषणा करते रहे हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और भारत का ही रहेगा, विश्व की कोई भी शक्ति हमें इससे विचलित नहीं कर सकती। यदि कोई राष्ट्र कश्मीर पर आक्रमण करता है तो इसे भारत पर आक्रमण माना जाएगा। लेकिन पाकिस्तान द्वारा की गयी सैन्य कार्यवाहियों के बावजूद भारत ने कोई भी सैन्य कार्यवाही नहीं की। भारत इस प्रकार की कार्यवाही से इसलिए पीछे हटता है क्योंकि अनेक पश्चिमी देश; मुख्य रूप से अमेरिका, जिस पर हमारी अनेक निर्भरताएँ हैं, तुरन्त पाकिस्तान के बचाव में खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान पर आक्रमण करना एक बड़ा संकट मोल लेने वाली बात होगी। यही कारण था कि 13 दिसम्बर, 2002 को संसद पर हुए। आतंकवादी हमले और उसमें पाकिस्तान का हाथ होने की पुष्टि के बाद भी भारत पाकिस्तान पर हमला करने से स्वंयं को रोक गया।

उपसंहार – परन्तु, इस समस्या का निष्कर्ष क्या है? क्या इसी प्रकार हम अपने निर्दोष नागरिकों एवं सैन्यकर्मियों की बलि देते रहेंगे? अनेक स्तरों पर हुई वार्ताओं के भी कोई सार्थक परिणाम नहीं निकले। निश्चय ही इसके लिए एक दृढ़ सैन्य कार्यवाही की आवश्यकता है, जैसी एक समय हैदराबाद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा की गयी थी। कश्मीर समस्या का यह हल अतिवादी अवश्य प्रतीत होता है, लेकिन इसका वास्तविक हल यही है। किसी मनीषी का कथन है कि “यदि हम शान्ति चाहते हैं तो हमें युद्ध के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। इसके लिए भारत को इतनी शक्ति अर्जित करनी होगी कि उसे न तो चीन का भय रहे और न ही अमेरिका का। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में हमने स्वयं को विश्व के समक्ष एक महाशक्ति बनाकर प्रस्तुत किया है। ऐसा ही हमें रक्षा-अनुसन्धान एवं विकास के क्षेत्र में करना होगा, खाद्यान्न एवं आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना होगा, जिससे दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता समाप्त हो और अपने निर्णय हम स्वयं ले सकें। जिस दिन हम ऐसा कर पाने में सफल होंगे, कश्मीर समस्या का हल हमें अपने सम्मुख मिलेगा।

 महँगाई की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  •  बढ़ती महँगाई : एक समस्या
  • महँगाई : समस्या और समाधान
  • मूल्य वृद्धि : कारण, परिणाम और निदान
  • भारतीय आर्थिक समस्याएँ

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  महँगाई के कारण
    (क) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि;
    (ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि,
    (ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी;
    (घ) मुद्रा-प्रसार;
    (ङ) प्रशासन में शिथिलता;
    (च) घाटे का बजट,
    (छ) असंगठित उपभोक्ता;
    (ज) धन का असमान वितरण
  3. महँगाई के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों,
  4.  महंगाई को दूर करने के लिए सुझाव,
  5.  उपसंहार।

प्रस्तावना – भारत की आर्थिक समस्याओं के अन्तर्गत महँगाई की समस्या एक प्रमुख समस्या है। वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि का क्रम इतना तीव्र है कि जब आप किसी वस्तु को दोबारा खरीदने जाते हैं तो वस्तु का मूल्य पहले से अधिक बढ़ा हुआ होता है। दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती इस महँगाई की मार का वास्तविक चित्रण प्रसिद्ध हास्य कवि काका हाथरसी की निम्नलिखित पंक्तियों में हुआ है

पाकिट में पीड़ा भरी कौन सुने फरियाद?
यह महँगाई देखकर वे दिन आते याद॥
वे दिन आते याद, जेब में पैसे रखकर,
सौदा लाते थे बाजार से थैला भरक॥
धक्का मारा युग ने मुद्रा की क्रेडिट ने,
थैले में रुपये हैं, सौदा है पाकिट में॥

महँगाई के कारण – वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि अर्थात् महँगाई के बहुत-से कारण हैं। इन कारणों में अधिकांश कारण आर्थिक हैं तथा कुछ कारण ऐसे भी हैं, जो सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था से सम्बन्धित हैं। इन कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

(क) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि – भारत में जनसंख्या-विस्फोट ने वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाने की दृष्टि से बहुत अधिक सहयोग दिया है। जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उतनी तेजी से वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो रहा है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि हुई है।

(ख) कृषि उत्पादन – व्यय में वृद्धि हमारा देश कृषि-प्रधान है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। गत वर्षों से कृषि में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों, उर्वरकों आदि के मूल्यों में बहुत अधिक वृद्धि हुई है; परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश वस्तुओं के मूल्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पदार्थों के मूल्यों से सम्बद्ध होते हैं। इस कारण जब कृषि-मूल्य में वृद्धि हो जाती है। तो देश में अधिकांशतः वस्तुओं के मूल्य अवश्यमेव प्रभावित होते हैं।

(ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी – वस्तुओं का मूल्य मॉग और पूर्ति पर आधारित होता है। जब बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है तो उनके मूल्य बढ़ जाते हैं। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से भी व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा कर देते हैं, जिसके कारण महँगाई बढ़ जाती है।

(घ) मुद्रा-प्रसार – जैसे-जैसे देश में मुद्रा – प्रसार बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ही महँगाई बढ़ती जाती है। तृतीय पंचवर्षीय योजना के समय से ही हमारे देश में मुद्रा-प्रसार की स्थिति रही है, परिणामतः वस्तुओं के मूल्य बढ़ते ही जा रहे हैं। कभी जो वस्तु एक रुपये में मिला करती थी उसके लिए अब लगभग सौ रुपये तक खर्च करने पड़ जाते हैं।

(ङ) प्रशासन में शिथिलती – सामान्यतः प्रशासन के स्वरूप पर ही देश की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। यदि प्रशासन शिथिल पड़ जाता है तो मूल्य बढ़ते जाते हैं, क्योंकि कमजोर शासन व्यापारी-वर्ग पर नियन्त्रण नहीं रख पाता। ऐसी स्थिति में वस्तुओं के मूल्यों में अनियन्त्रित और निरन्तर वृद्धि होती रहती है।

(च) घाटे का बजट – विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु सरकार को बहुत अधिक मात्रा में पूंजी की व्यवस्था करनी पड़ती है। पूँजी की व्यवस्था करने के लिए सरकार अन्य उपायों के अतिरिक्त घाटे की बजट प्रणाली को भी अपनाती है। घाटे की यह पूर्ति नये नोट छापकर की जाती है, परिणामतः देश में मुद्रा की पूर्ति आवश्यकता से अधिक हो जाती है। जब ये नोट बाजार में पहुँचते हैं तो वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि करते हैं।

(छ) असंगठित उपभोक्ता – वस्तुओं का क्रय करने वाला उपभोक्ता वर्ग प्रायः असंगठित होता है, जबकि विक्रेता या व्यापारिक संस्थाएँ अपना संगठन बना लेती हैं। ये संगठन इस बात का निर्णय करते हैं कि वस्तुओं का मूल्य क्या रखा जाए और उन्हें कितनी मात्रा में बेचा जाए। जब सभी सदस्य इन नीतियों का पालन करते हैं। तो वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने लगती है। वस्तुओं के मूल्यों में होने वाली इस वृद्धि से उपभोक्ताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

(ज) धन का असमान वितरण – हमारे देश में धन का असमान वितरण महँगाई का मुख्य कारण है। जिनके पास पर्याप्त धन है, वे लोग अधिक पैसा देकर साधनों और सेवाओं को खरीद लेते हैं। व्यापारी धनवानों की इस प्रवृत्ति का लाभ उठाते हैं और महँगाई बढ़ती जाती है। वस्तुतः विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विषमताओं एवं समाज में व्याप्त अशान्ति पूर्ण वातावरण का अन्त करने के लिए धन का समान वितरण होना आवश्यक है। कविवर दिनकर के शब्दों में भी

शान्ति नहीं तब तक, जब तक
सुख भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो
नहीं किसी को कम हो।।

महँगाई के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ-महँगाई नागरिकों के लिए अभिशाप स्वरूप है। हमारा देश एक गरीब देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या के आय के साधन सीमित हैं। इस कारण साधारण नागरिक और कमजोर वर्ग के व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। बेरोजगारी इस कठिनाई को और भी अधिक जटिल बना देती है। व्यापारी अपनी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव कर देते हैं। इसके कारण वस्तुओं के मूल्य में अनियन्त्रित वृद्धि हो जाती है। परिणामतः कम आय वाले व्यक्ति बहुत-सी वस्तुओं और सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। महँगाई के बढ़ने से कालाबाजारी को प्रोत्साहन मिलता है। व्यापारी अधिक लाभ कमाने के लिए वस्तुओं को अपने गोदामों में छिपा देते हैं। महँगाई बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाती है।

महँगाई को दूर करने के लिए सुझाव – यदि महँगाई इसी दर से ही बढ़ती रही तो देश के आर्थिक विकास में बहुत-सी बाधाएँ उपस्थित हो जाएंगी। इससे अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ भी जन्म लेंगी; अत: महँगाई के इस दानव को समाप्त करना परम आवश्यक है। महँगाई को दूर करने के लिए सरकार को समयबद्ध कार्यक्रम बनाने होंगे। किसानों को सस्ते मूल्य पर खाद, बीज और उपकरण आदि उपलब्ध कराने होंगे, जिसमें कृषि उत्पादनों के मूल्य कम हो सकें। मुद्रा-प्रसार को रोकने के लिए घाटे के बजट की व्यवस्था समाप्त करनी होगी अथवा घाटे को पूरा करने के लिए नये नोट छपवाने की प्रणाली को बन्द करना होगा। जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए अनवरत प्रयास करने होंगे। सरकार को इस बात का भी प्रयास करना होगा कि शक्ति और साधन कुछ विशेष लोगों तक सीमित न रह जाएँ और धन का उचित रूप में बँटवारा हो सके। सहकारी वितरण संस्थाएँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इन सभी के लिए प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त और कर्मचारियों को पूरी निष्ठा तथा कर्तव्यपरायणता के साथ कार्य करना होगा।

उपसंहार – महँगाई की वृद्धि के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की जटिलताएँ उत्पन्न हो गयी हैं। घाटे की अर्थव्यवस्था ने इस कठिनाई को और अधिक बढ़ा दिया है। यद्यपि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किये जाने वाले प्रयासों द्वारा महँगाई की इस प्रवृत्ति को रोकने का निरन्तर प्रयास किया जा रहा है, तथापि इस दिशा में अभी तक पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी है।
यदि समय रहते महँगाई के इस दानव को वश में नहीं किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और हमारी प्रगति के समस्त मार्ग बन्द हो जाएँगे, भ्रष्टाचार अपनी जड़े जमा लेगा और नैतिक मूल्य पूर्णतया समाप्त हो जाएँगे।

 भारत में भ्रष्टाचार की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • भ्रष्टाचार : एक अभिशाप
  • भ्रष्टाचार : समस्या और निराकरण
  • भ्रष्टाचार : कारण और निवारण
  • भारत में भ्रष्टाचार
  • भ्रष्टाचार से निपटने के उपाय
  • भ्रष्टाचार : एक राष्ट्रीय समस्या
  • देश में भ्रष्टाचार के बढ़ते कदम
  • भ्रष्टाचार उन्मूलन : एक बड़ी समस्या

प्रमुख विचार-बिन्दु 

  1.  प्रस्तावना,
  2. भ्रष्टाचार के विविध रूप
    (क) राजनीतिक भ्रष्टाचार
    (ख) प्रशासनिक अष्टाचार;
    (ग) व्यावसायिक भ्रष्टाचार;
    (घ) शैक्षणिक भ्रष्टाचार,
  3.  भ्रष्टाचार के कारण,
  4.  भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय
    (क) प्राचीन भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहन;
    (ख) चुनाव-प्रक्रिया में परिवर्तन;
    (ग) अस्वाभाविक प्रतिबन्थों की समाप्ति;
    (घ) कर-प्रणाली का सरलीकरण;
    (ङ) शासन और प्रशासन व्यय में कटौती;
    (च) देशभक्ति की प्रेरणा देना;
    (छ) कानून को अधिक कठोर बनाना;
    (ज) भ्रष्ट व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार,
  5.  उपसंहार।

प्रस्तावना – भ्रष्टाचार देश की सम्पत्ति का आपराधिक दुरुपयोग है। ‘भ्रष्टाचार का अर्थ है-‘भ्रष्ट आचरण अर्थात् नैतिकता और कानून के विरुद्ध आचरण। जब व्यक्ति को न तो अन्दर की लज्जा या धर्माधर्म का ज्ञान रहता है (जो अनैतिकता है) और न बाहर का डर रहता है (जो कानून की अवहेलना है) तो वह संसार में जघन्य-से-जघन्य पाप कर सकता है, अपने देश, जाति व समाज को बड़ी-से-बड़ी हानि पहुँचा सकता है, यहाँ तक कि मानवता को भी कलंकित कर सकता है। दुर्भाग्य से आज भारत इस भ्रष्टाचाररूपी सहस्रों मुख वाले दानव के जबड़ों में फंसकर तेजी से विनाश की ओर बढ़ता जा रहा है। अतः इस दारुण समस्या के कारणों एवं समाधान पर विचार करना आवश्यक है।

भ्रष्टाचार के विविध रूप – पहले किसी घोटाले की बात सुनकर देशवासी चौंक जाते थे, आज नहीं चौंकते। पहले घोटालों के आरोपी लोक-लज्जा के कारण अपना पद छोड़ देते थे, पर आज पकड़े जाने पर भी कुछ राजनेता इस शान से जेल जाते हैं, जैसे-वे किसी राष्ट्र-सेवा के मिशन पर जा रहे हों। इसीलिए समूचे प्रशासन-तन्त्र में भ्रष्ट आचरण धीरे-धीरे सामान्य बनता जा रहा है। आज भारतीय जीवन का कोई भी क्षेत्र सरकारी या गैर-सरकारी, सार्वजनिक या निजी-ऐसा नहीं, जो भ्रष्टाचार से अछूता हो। इसीलिए भ्रष्टाचार इतने अगणित रूपों में मिलता है कि उसे वर्गीकृत करना सरल नहीं है। फिर भी उसे मुख्यत: चार वर्गों में बाँटा जा सकता है – (क) राजनीतिक, (ख) प्रशासनिक, (ग) व्यावसायिक तथा (घ) शैक्षणिक।

(क) राजनीतिक भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार का सबसे प्रमुख रूप यही है जिसकी छत्रछाया में भ्रष्टाचार के शेष सारे रूप पनपते और संरक्षण पाते हैं। इसके अन्तर्गत मुख्यत: लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव जीतने के लिए अपनाया गया भ्रष्ट आचरण आता है। संसार में ऐसा कोई भी कुकृत्य, अनाचार या हथकण्डा नहीं है जो भारतवर्ष में चुनाव जीतने के लिए न अपनाया जाता हो। कारण यह है कि चुनावों में विजयी दल ही सरकार बनाता है, जिससे केन्द्र और प्रदेशों की सारी राजसत्ता उसी के हाथ में आ जाती है। इसलिए येन केन प्रकारेण अपने दल को विजयी बनाना ही राजनीतिज्ञों का एकमात्र लक्ष्य बन गया है। इन राजनेताओं की शनि-दृष्टि ही देश में जातीय प्रवृत्तियों को उभारती एवं देशद्रोहियों को पनपाती है। देश की वर्तमान दुरावस्था के लिए ये भ्रष्ट राजनेता ही दोषी हैं। इनके कारण देश में अनेकानेक घोटाले हुए हैं।

(ख) प्रशासनिक भ्रष्टाचार – इसके अन्तर्गत सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं, संस्थानों, प्रतिष्ठानों या सेवाओं (नौकरियों) में बैठे वे सारे अधिकारी आते हैं जो जातिवाद, भाई-भतीजावाद, किसी प्रकार के दबाव या कामिनी-कांचन के लोभ या अन्यान्य किसी कारण से अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्तियाँ करते हैं, उन्हें पदोन्नत करते हैं, स्वयं अपने कर्तव्य की अवहेलना करते हैं और ऐसा करने वाले अधीनस्थ कर्मचारियों को प्रश्रय देते हैं या अपने किसी भी कार्य या आचरण से देश को किसी मोर्चे पर कमजोर बनाते हैं। चाहे वह गलत कोटा-परमिट देने वाला अफसर हो या सेना के रहस्य विदेशों के हाथ बेचने वाला सेनाधिकारी या ठेकेदारों से रिश्वत खाकर शीघ्र ढह जाने वाले पुल, सरकारी भवनों आदि का निर्माण करने वाला इंजीनियर या अन्यायपूर्ण फैसले करने वाला न्यायाधीश या अपराधी को प्रश्रय देने वाला पुलिस अफसर, भी इसी प्रकार के भ्रष्टचार के अन्तर्गत आते हैं।

(ग) व्यावसायिक भ्रष्टाचार – इसके अन्तर्गत विभिन्न पदार्थों में मिलावट करने वाले, घटिया माल तैयार करके बढ़िया के मोल बेचने वाले, निर्धारित दर से अधिक मूल्य वसूलने वाले, वस्तु-विशेष का कृत्रिम अभाव पैदा करके जनता को दोनों हाथों से लूटने वाले, कर चोरी करने वाले तथा अन्यान्य भ्रष्ट तौर-तरीके अपनाकर देश और समाज को कमजोर बनाने वाले व्यवसायी आते हैं।

(घ) शैक्षणिक भ्रष्टाचार – शिक्षा जैसा पवित्र क्षेत्र भी भ्रष्टाचार के संक्रमण से अछूता नहीं रहा। अत: आज डिग्री से अधिक सिफारिश, योग्यता से अधिक चापलूसी का बोलबाला है। परिश्रम से अधिक बल धन में होने के कारण शिक्षा का निरन्तर पतन हो रहा है।

भ्रष्टाचार के कारण – भ्रष्टाचार की गति नीचे से ऊपर को न होकर ऊपर से नीचे को होती है अर्थात् भ्रष्टाचार सबसे पहले उच्चतम स्तर पर पनपता है और तब क्रमशः नीचे की ओर फैलता जाता है। कहावत है–’यथा राजा तथा प्रजा’ । इसकी यह आशय कदापि नहीं कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति भ्रष्टाचारी है। पर इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि भ्रष्टाचार से मुक्त व्यक्ति इस देश में अपवादस्वरूप ही मिलते हैं। कारण है वह भौतिकवादी जीवन-दर्शन, जो अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से पश्चिम से आया है। यह जीवन-पद्धति विशुद्ध भोगवादी है-‘खाओ, पिओ और मौज करो’ ही इसका मूलमन्त्र है। यह परम्परागत भारतीय जीवन-दर्शन के पूरी तरह विपरीत है। भारतीय मनीषियों ने चार पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को ही मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। मानव धर्मपूर्वक अर्थ और काम का सेवन करते हुए मोक्ष का अधिकारी बनता है। पश्चिम में धर्म और मोक्ष को कोई जानता तक नहीं। वहाँ तो बस अर्थ (धन-वैभव) और काम (सांसारिक सुख-भोग या विषय-वासनाओं की तृप्ति) ही जीवन का परम पुरुषार्थ माना जाता है। पश्चिम में जितनी भी वैज्ञानिक प्रगति हुई है, उसे सबका लक्ष्य भी मनुष्य के लिए सांसारिक सुख-भोग के साधनों का अधिकाधिक विकास ही है।

भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय – भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाये जाने चाहिए

(क) प्राचीन भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहन – जब तक अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भोगवादी पाश्चात्य संस्कृति प्रचारित होती रहेगी, भ्रष्टाचार कम नहीं हो सकता। अत: सबसे पहले देशी भाषाओं, विशेषत: संस्कृत, की शिक्षा अनिवार्य करनी होगी। भारतीय भाषाएँ जीवन-मूल्यों की प्रचारक और पृष्ठपोषक हैं। उनसे भारतीयों में धर्म का भाव सुदृढ़ होगा और लोग धर्मभीरु बनेंगे।

(ख) चुनाव-प्रक्रिया में परिवर्तनवर्तमान चुनाव – पद्धति के स्थान पर ऐसी पद्धति अपनानी पड़ेगी, जिसमें जनता स्वयं अपनी इच्छा से भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रति समर्पित ईमानदार व्यक्तियों को खड़ा करके बिना धन व्यय के चुन सके। ऐसे लोग जब विधायक या संसद-सदस्य बनेंगे तो ईमानदारी और देशभक्ति का आदर्श जनता के सामने रखकर स्वच्छ शासन-प्रशासन दे सकेंगे। अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और जो विधायक या सांसद अवसरवादिता के कारण दल बदलें, उनकी सदस्यता समाप्त कर पुनः चुनाव में खड़े होने की व्यवस्था पर रोक लगानी होगी। जाति और धर्म के नाम का सहारा लेकर वोट माँगने वालों को चुनाव-प्रक्रिया से ही प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिए। जब चपरासी और चौकीदारों के लिए भी योग्यता निर्धारित होती है, तब विधायकों और सांसदों के लिए क्यों नहीं?

(ग) अस्वाभाविक प्रतिबन्धों की समाप्ति सरकार ने कोटा – परमिट आदि के जो हजारों प्रतिबन्ध लगा रखे हैं, उनसे व्यापार बहुत कुप्रभावित हुआ है। फलतः व्यापारियों को विभिन्न विभागों में बैठे अफसरों को खुश करने के लिए भाँति-भाँति के भ्रष्ट हथकण्डे अपनाने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में भले और ईमानदार लोग व्यापार की ओर उन्मुख नहीं हो पाते। इन प्रतिबन्धों की समाप्ति से व्यापार में योग्य लोग आगे आएँगे, जिससे स्वस्थ प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलेगा और जनता को अच्छा माल सस्ती दर पर मिल सकेगा।

(घ) कर-प्रणाली का सरलीकरण – सरकार ने हजारों प्रकार के कर लगा रखे हैं, जिनके बोझ से व्यापार पनप नहीं पाता। फलतः व्यापारी को अनैतिक हथकण्डे अपनाने को विवश होना पड़ता है; अतः सरकार को सैकड़ों करों को समाप्त करके कुछ गिने-चुने कर ही लगाने चाहिए। इन करों की वसूली प्रक्रिया भी इतनी सरल और निर्धान्त हो कि अशिक्षित या अल्पशिक्षित व्यक्ति भी अपना कर सुविधापूर्वक जमा कर सके और भ्रष्ट तरीके अपनाने को बाध्य न हो। इसके लिए देशी भाषाओं का प्रत्येक स्तर पर प्रयोग नितान्त वांछनीय है।

(ङ) शासन और प्रशासन व्यय में कटौती – आज देश के शासन और प्रशासन (जिसमें विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास भी सम्मिलित हैं), पर इतना अन्धाधुन्ध व्यय हो रहा है कि जनता की कमर टूटती जा रही है। इस व्यय में तत्काल बहुत अधिक कटौती करके सर्वत्र सादगी का आदर्श सामने रखा जाना चाहिए, जो प्राचीनकाल से ही भारतीय जीवन-पद्धति की विशेषता रही है। साथ ही केन्द्रीय और प्रादेशिक सचिवालयों तथा देश-भर के प्रशासनिक तन्त्र के बेहद भारी-भरकम ढाँचे को छाँटकर छोटा किया जाना चाहिए।

(च) देशभक्ति की प्रेरणा देना – सबसे महत्त्वपूर्ण है कि वर्तमान शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन कर उसे देशभक्ति को केन्द्र में रखकर पुनर्गठित किया जाए। विद्यार्थी को, चाहे वह किसी भी धर्म, मत या सम्प्रदाय का अनुयायी हो, आरम्भ से ही देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाए। इसके लिए प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति, भारतीय महापुरुषों के जीवनचरित आदि पाठ्यक्रम में रखकर विद्यार्थी को अपने देश की मिट्टी, इसकी परम्पराओं, मान्यताओं एवं संस्कृति पर गर्व करना सिखाया जाना चाहिए।

(छ) कानून को अधिक कठोर बनाना – भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून को भी अधिक कठोर बनाया जाए। इसके लिए वर्षों से चर्चा का विषय बने ‘लोकपाल विधेयक’ को यद्यपि पास किया जा चुका है तथापि भारत जैसे देश; जहाँ प्रत्येक स्तरों पर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी ही व्याप्त हैं; के लिए यह अभी भी नाकाफी है।

(ज) भ्रष्ट व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार – भ्रष्टाचार से किसी भी रूप में सम्बद्ध व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए, अर्थात् लोग उनसे किसी भी प्रकार का सम्बन्ध न रखें। यह उपाय भ्रष्टाचार रोकने में बहुत सहायक सिद्ध होगा।

उपसंहार – भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे को आता है, इसलिए जब तक राजनेता देशभक्त और सदाचारी ने होंगे, भ्रष्टाचार का उन्मूलन असम्भव है। उपयुक्त राजनेताओं के चुने जाने के बाद ही पूर्वोक्त सारे उपाय अपनाये जा सकते हैं, जो भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने में पूर्णतः प्रभावी सिद्ध होंगे। आज प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर एक ही प्रश्न है कि क्या होगा इस महान्–सनातन राष्ट्र का? कैसे मिटेगा यह भ्रष्टाचार, अत्याचार और दुराचार? यह तभी सम्भव है, जब चरित्रवान् तथा सर्वस्व-त्याग और देश-सेवा की भावना से भरे लोग राजनीति में आएँगे और लोकचेतना के साथ जीवन को जोड़ेगे।

आतंकवाद : समस्या एवं समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • आतंकवाद और राष्ट्रीय एकता
  • भारत में आतंकवाद की समस्या
  • आतंकवाद : एक चुनौती
  • बढ़ता आतंकवाद एवं भारत की सुरक्षा
  • विश्व और आतंकवाद
  • आतंकवाद और उसके दुष्परिणाम
  • आतंकवाद का समाधान
  • आतंकवाद और विश्व-शान्ति
  • आतंकवाद : कारण और निवारण

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2.  आतंकवाद का अर्थ,
  3. आतंकवाद : एक विश्वव्यापी समस्या,
  4.  भारत में आतंकवाद,
  5.  जिम्मेदार कौन?
  6.  आतंकवाद के विविध रूप,
  7.  आतंकवाद का समाधान,
  8.  उपसंहार।

प्रस्तावना – मनुष्य भय से निष्क्रिय और पलायनवादी बन जाता है। इसीलिए लोगों में भय उत्पन्न करके कुछ असामाजिक तत्त्व अपने नीच स्वार्थों की पूर्ति करने का प्रयास केंरने लगते हैं। इस कार्य के लिए वे हिंसापूर्ण साधनों का प्रयोग करते हैं। ऐसी स्थितियाँ ही आतंकवाद का आधार हैं। आतंक फैलाने वाले आतंकवादी कहलाते हैं। ये कहीं से बनकर नहीं आते। ये भी समाज के एक ऐसे अंग हैं जिनका काम आतंकवाद के माध्यम से किसी धर्म, समाज अथवा राजनीति का समर्थन कराना होता है। ये शासन का विरोध करने में बिलकुल नहीं हिचकते तथा जनता को अपनी बात मनवाने के लिए विवश करते रहते हैं।

आतंकवाद का अर्थ – आतंक + वाद’ से बने इस शब्द का सामान्य अर्थ हैं – आतंक का सिद्धान्त। यह अंग्रेजी के टेररिज्म शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। ‘आतंक का अर्थ होता है-पीड़ा, डर, आशंका। इस प्रकार आतंकवाद एक ऐसी विचारधारा है, जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बल-प्रयोग में विश्वास रखती है। ऐसा बल-प्रयोग प्रायः विरोधी वर्ग, समुदाय या सम्प्रदाय को भयभीत करने और उस पर अपनी प्रभुता स्थापित करने की दृष्टि से किया जाता है। आतंक, मौत, त्रास ही इनके लिए सब कुछ होता है। आतंकवादी यह नहीं जानते कि

कौन कहता है कि मौत को अंजाम होना चाहिए।
जिन्दगी को जिन्दगी का पैगाम होना चाहिए।

आतंकवाद : एक विश्वव्यापी समस्या – आज लगभग समस्त विश्व में आतंकवाद सक्रिय है। ये आतंकवादी समस्त विश्व में राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सार्वजनिक हिंसा और हत्याओं का सहारा ले रहे हैं। भौतिक दृष्टि से विकसित देशों में तो आतंकवाद की इस प्रवृत्ति ने विकराल रूप ले लिया है। कुछ आतंकवादी गुटों ने तो अपने अन्तर्राष्ट्रीय संगठन बना लिये हैं। जे० सी० स्मिथ अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘लीगल कण्ट्रोल ऑफ इण्टरनेशनल टेररिज्म’ में लिखते हैं कि इस समय संसार में जैसा तनावपूर्व वातावरण बना हुआ है, उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भविष्य में अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद में और तेजी आएगी। किसी देश द्वारा अन्य देश में आतंकवादी गुटों को समर्थन देने की घटनाएँ बढ़ेगी; राजनयिकों की हत्याएँ, विमान-अपहरण की घटनाएँ बढ़ेगी और रासायनिक हथियारों का प्रयोग अधिक तेज होगा। श्रीलंका में तमिलों, जापान में रेड आर्मी, भारत में सिख-होमलैण्ड और स्वतन्त्र कश्मीर चाहने वालों आदि के हिंसात्मक संघर्ष आतंकवाद की श्रेणी में आते हैं।

भारत में आतंकवाद – स्वाधीनता के पश्चात् भारत के विभिन्न भागों में अनेक आतंकवादी संगठनों द्वारा आतंकवादी हिंसा फैलायी गयी। इन्होंने बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया और इतना आतंक फैलाया कि अनेक अधिकारियों ने सेवा से त्याग-पत्र दे दिये। भारत के पूर्वी राज्यों नागालैण्ड, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और असम में भी अनेक बार उग्र आतंकवादी हिंसा फैली, किन्तु अब यहाँ असम के बोडो आतंकवाद को छोड़कर शेष सभी शान्त हैं। बंगाल के नक्सलवाड़ी से जो नक्सलवादी आतंकवाद पनपा था, वह बंगाल से बाहर भी खूब फैला। बिहार तथा आन्ध्र प्रदेश अभी भी उसकी भयंकर आग से झुलस रहे हैं।

कश्मीर घाटी में भी पाकिस्तानी तत्त्वों द्वारा प्रेरित आतंकवादी प्रायः राष्ट्रीय पर्वो पर भयंकर हत्याकाण्ड कर अपने अस्तित्व की घोषणा करते रहते हैं। इन्होंने कश्मीर की सुकोमल घाटी को अपनी आतंकवादी गतिविधियों का केन्द्र बनाया हुआ है। आये दिन निर्दोष लोगों की हत्याएँ की जा रही हैं और उन्हें आतंकित किया जा रहा है, जिससे वे अपने घर, दुकानें और कारखाने छोड़कर भाग खड़े हों। ऐसा कोई भी दिन नहीं बीतता जिस दिन समाचार-पत्रों में किसी आतंकवादी घटना में दस-पॉच लोगों के मारे जाने की खबर न छपी हो। स्वातन्त्र्योत्तर आतंकवादी गतिविधियों में सबसे भयंकर रहा पंजाब का आतंकवाद। बीसवीं शताब्दी की नवी दशाब्दी में पंजाब में जो कुछ हुआ, उससे पूरा देश विक्षुब्ध और हतप्रभ रह गया।

पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमा-पार से कश्मीर और अब देश के अन्य भागों में बरपायी जाने वाली और दिल दहला देने वाली घटनाएँ आतंकवाद का सबसे घिनौना रूप हैं। सीमा पार के आतंकवादी हमलों में अब तक एक लाख से भी अधिक लोगों की जाने जा चुकी हैं। हाल के वर्षों में संसद भवन पर हमला हुआ, इण्डियन एयर लाइन्स के विमान 814 का अपहरण कर उसे कन्धार ले जाया गया, फिर चिट्टी सिंहपुरा में सिक्खों का कत्लेआम किया गया तथा अमरनाथ यात्रियों पर हमले किये गये।

जिम्मेदार कौन? – आतंकवादी गतिविधियों को गुप्त और अप्रत्यक्ष रूप से प्रश्रय देने वाला अमेरिका भी अन्ततः अपने खोदे हुए गड्ढे में खुद ही गिर गया। राजनैतिक मुखौटों में छिपी उसकी काली करतूतें अविश्वसनीय रूप से उजागर हो गयीं। जब उसके प्रसिद्ध शहर न्यूयॉर्क में 11 सितम्बर, 2001 को ‘वर्ल्ड ट्रेड टॉवर पर आतंकवादी हमला हुआ। अन्य देशों पर हमले करवाने में अग्रगण्य इस देश पर हुए इस वज्रपात पर सारा संसार अचम्भित रह गया। ‘ओसामा बिन लादेन’ नामक हमले के उत्तरदायी आतंकवादी को ढूँढ़ने में अमेरिकी सरकार ने जो सरगर्मियाँ दिखायीं उसने सिद्ध कर दिया कि जब तक कोई देश स्वयं नहीं झेलता तब तक उसे पराये की पीड़ा का अनुभव नहीं हो सकता। भारत वर्षों से चीख-चीख कर सम्पूर्ण विश्व के सामने यह अनुरोध करता आया था कि पाकिस्तान अमेरिका द्वारा दी गयी आर्थिक और अस्त्र-शस्त्र सम्बन्धी सहायता का उपयोग भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए कर रहा है, अत: अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करे और उसे किसी भी किस्म की सहायता देना बन्द करे; किन्तु भारतीयों की मृत्यु के लिए अमेरिका के पास उत्तर था

खत्म होगा न जिन्दगी का सफर
मौत बस रास्ता बदलती है।

जैसे भारतीयों पर होने वाले इस प्रकार के हमले कोई मायने ही नहीं रखते। यदि किसी मायूस बच्चे से भी पूछे तो अनवरत आतंकवादी गतिविधियों के शिकार-क्षेत्र का वह निवासी बस यूँ ही कुछ कह सकेगा

वैसे तो तजुर्बे की खातिर, नाकाफी है यह उम्र मगर
हमने तो जरा से अरसे में, मत पूछिए क्या-क्या देखा है।

आतंकवाद के विविध रूप – भारत के आतंकवादी गतिविधि निरोधक कानून 1985 में आतंकवाद पर विस्तार से विचार किया गया है और आतंकवाद को अग्रलिखित तीन भागों में बाँटा गया है

  1.  समाज के एक वर्ग विशेष को अन्य वर्गों से अलग-थलग करने और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच व्याप्त आपसी सौहार्द को खत्म करने के लिए की गयी हिंसा।
  2. ऐसा कोई कार्य, जिसमें ज्वलनशील, बम तथा आग्नेयास्त्रों का प्रयोग किया गया हो।
  3.  ऐसी हिंसात्मक कार्यवाही, जिसमें एक या उससे अधिक व्यक्ति मारे गये हों या घायल हुए हों, आवश्यक सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो तथा सम्पत्ति को हानि पहुँची हो। इसके अन्तर्गत प्रमुख व्यक्तियों का अपहरण या हत्या या उन्हें छोड़ने के लिए सरकार के सामने उचित-अनुचित माँगें रखना, वायुयानों का अपहरण, बैंक डकैतियाँ आदि सम्मिलित हैं।

आतंकवाद का समाधान – भारत में विषमतम स्थिति तक पहुँचे आतंकवाद के समाधान पर सम्पूर्ण देश के विचारकों और चिन्तकों ने अनेक सुझाव रखे, किन्तु यह समस्या अभी भी अनसुलझी ही है। इस समस्या का वास्तविक हल ढूंढ़ने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि साम्प्रदायिकता का लाभ उठाने वाले सभी राजनीतिक दलों की गतिविधियों में परिवर्तन हो। साम्प्रदायिकता के इस दोष से आज भारत के सभी राजनीतिक दल न्यूनाधिक रूप में दूषित अवश्य हैं।

दूसरे, सीमा पार से प्रशिक्षित आतंकवादियों के प्रवेश और वहाँ से भेजे जाने वाले हथियारों व विस्फोटक पदार्थों पर कड़ी चौकसी रखनी होगी तथा सुरक्षा बलों को आतंकवादियों की अपेक्षा अधिक अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस करना होगा। तीसरे, आतंकवाद को महिमामण्डित करने वाली युवकों की मानसिकता बदलने के लिए आर्थिक सुधार करने होंगे।

चौथे, राष्ट्र की मुख्यधारा के अन्तर्गत संविधान का पूर्णतः पालन करते हुए पारस्परिक विचार-विमर्श से सिक्खों, कश्मीरियों और असमियों की माँगों का न्यायोचित समाधान करना होगा तथा तुष्टीकरण की नीति को त्यागकर समग्र राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता की भावना को जाग्रत करना होगा। पाँचवें कश्मीर के आतंकवाद को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सख्ती से कुचलना होगा। इसके लिए सभी राजनैतिक दलों को सार्थक पहल करनी होगी। यदि सम्बन्धित पक्ष इन सभी बातों का ईमानदारी से पालन करें तो इस महारोग से मुक्ति सम्भव है।

उपसंहार – यह एक विडम्बना ही है कि महावीर, बुद्ध, गुरु नानक और महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों की जन्मभूमि पिछले कुछ दशकों से सबसे अधिक अशान्त हो गयी है। देश की 115 करोड़ जनता ने हिंसा की सत्ता को स्वीकार करते हुए इसे अपने दैनिक जीवन का अंग मान लिया है। भारत के विभिन्न भागों में हो रही आतंकवादी गतिविधियों ने देश की एकता और अखण्डता के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है। आतंकवाद का समूल नाश ही इस समस्या का समाधान है। टाडा के स्थान पर भारत सरकार द्वारा एक नया आतंकवाद निरोधक कानून लाया गया है। लेकिन ये सख्त और व्यापक कानून भी आतंकवाद को समाप्त करने की गारण्टी नहीं है। आतंकवाद पर सम्पूर्णता से अंकुश लगाने की इच्छुक सरकार को अपने उस प्रशासनिक तन्त्र को भी बदलने पर विचार करना चाहिए, जो इन कानूनों पर अमल करता है, तब ही इस समस्या का स्थायी समाधान निकल पाएगा।

पर्यावरण प्रदूषण कि समस्या और समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • पर्यावरण और प्रदूषण
  • बढ़ता प्रदूषण और उसके कारण
  • बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण
  • प्रदूषण का मानव-जीवन पर प्रभाव
  • पर्यावरण पर प्रदूषण का प्रभाव
  • पर्यावरण शुद्धि के उपाय
  • पर्यावरण प्रदूषण से हानियाँ
  • जीवन-रक्षा : पर्यावरण की सुरक्षा

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. प्रदूषण का अर्थ,
  3. प्रदूषण के प्रकार
    (क) वायु प्रदूषण;
    (ख) जल-प्रदूषण;
    (ग) ध्वनि प्रदूषण;
    (घ) रेडियोधर्मी प्रदूषण;
    (ङ) रासायनिक प्रदूषण,
  4. प्रदूषण की समस्या तथा उससे हानियाँ,
  5. समस्या का समाधान,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना – जो हमें चारों ओर से परिवृत किये हुए है, वही हमारा पर्यावरण है। इस पर्यावरण के प्रति जागरूकता आज की प्रमुख आवश्यकता है; क्योंकि यह प्रदूषित हो रहा है। प्रदूषण की समस्या प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के लिए अज्ञात थी। यह वर्तमान युग में हुई औद्योगिक प्रगति एवं शस्त्रास्त्रों के निर्माण के फलस्वरूप उत्पन्न हुई है। आज इसने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि इससे मानवता के विनाश का संकट उत्पन्न हो गया है। मानव-जीवन मुख्यत: स्वच्छ वायु और जल पर निर्भर है, किन्तु यदि ये दोनों ही चीजें दूषित हो जाएँ तो मानव के अस्तित्व को ही भय पैदा होना स्वाभाविक है; अतः इस भयंकर समस्या के कारणों एवं उनके निराकरण के उपायों पर विचार करना मानवमात्र के हित में है। ध्वनि-प्रदूषण पर अपने विचार व्यक्त . करते हुएँ नोबेल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट कोच ने कहा था, “एक दिन ऐसा आएगा जब मनुष्य को स्वास्थ्य के सबसे बड़े शत्रु के रूप में निर्दयी शोर से संघर्ष करना पड़ेगा।” लगता है कि वह दु:खद दिन अब आ गया है।

प्रदूषण का अर्थ – स्वच्छ वातावरण में ही जीवन का विकास सम्भव है। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति के द्वारा किया गया है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त पर्यावरण जीवधारियों के अनुकूल होता है। जब इस पर्यावरण में किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है, जिसका जीवधारियों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। यह प्रदूषित वातावरण जीवधारियों के लिए अनेक प्रकार से हानिकारक होता है। जनसंख्या की असाधारण वृद्धि एवं औद्योगिक प्रगति ने प्रदूषण की समस्या को जन्म दिया है। और आज इसने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि इससे मानवता के विनाश का संकट उत्पन्न हो गया है। औद्योगिक तथा रासायनिक कूड़े-कचरे के ढेर से पृथ्वी, वायु तथा जल प्रदूषित हो रहे हैं।

प्रदूषण के प्रकार – आज के वातावरण में प्रदूषण निम्नलिखित रूपों में दिखाई पड़ता है

(क)वायु-प्रदूषण – वायु जीवन का अनिवार्य स्रोत है। प्रत्येक प्राणी को स्वस्थ रूप से जीने के लिए शुद्ध वायु की आवश्यकता होती है, जिस कारण वायुमण्डल में इसका विशेष अनुपात होना आवश्यक है। जीवधारी साँस द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करता है और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। पेड़-पौधे कार्बन डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करते हैं और हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। इससे वायुमण्डल में शुद्धता बनी रहती है, परन्तु मनुष्य की अज्ञानता और स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण आज वृक्षों का अत्यधिक कटाव हो रहा है। घने जंगलों से ढके पहाड़ आज नंगे दीख पड़ते हैं। इससे ऑक्सीजन को सन्तुलन बिगड़ गया है और वायु अनेक हानिकारक गैसों से प्रदूषित हो गयी है। इसके अलावा कोयला, तेल, धातुकणों तथा कारखानों की चिमनियों के धुएँ से वायु में अनेक हानिकारक गैसें भर गयी हैं, जो फेफड़ों के लिए अत्यन्त घातक हैं।

(ख) जल-प्रदूषण – जीवन के अनिवार्य स्रोत के रूप में वायु के बाद प्रथम आवश्यकता जल की ही होती है। जल को जीवन कहा जाता है। जले का शुद्ध होना स्वस्थ जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। देश के प्रमुख नगरों के जल का स्रोत हमारी सदानीरा नदियाँ हैं, फिर भी हम देखते हैं कि बड़े-बड़े नगरों के गन्दे नाले तथा सीवरों को नदियों से जोड़ दिया जाता है। विभिन्न औद्योगिक व घरेलू स्रोतों से नदियों व अन्य जल-स्रोतों में दिनों-दिन प्रदूषण पनपता जा रहा है। तालाबों, पोखरों व नदियों में जानवरों को नहलाना, मनुष्यों एवं जानवरों के मृत शरीर को जल में प्रवाहित करना आदि ने जल-प्रदूषण में बेतहाशा वृद्धि की है। कानपुर, आगरा, मुम्बई, अलीगढ़ और न जाने कितने नगरों के कल-कारखानों का कचरा गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों को प्रदूषित करता हुआ सागर तक पहुँच रहा है।

(ग) ध्वनि-प्रदूषण – ध्वनि प्रदूषण आज की एक नयी समस्या है। इसे वैज्ञानिक प्रगति ने पैदा किया है। मोटरकार, ट्रैक्टर, जेट विमान, कारखानों के सायरन, मशीनें, लाउडस्पीकर आदि ध्वनि के सन्तुलन को बिगाड़कर ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। तेज ध्वनि से श्रवण-शक्ति का ह्रास तो होता ही है साथ ही कार्य करने की क्षमता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। अत्यधिक ध्वनि-प्रदूषण से मानसिक विकृति तक हो सकती है।

(घ) रेडियोधर्मी प्रदूषण – आज के युग में वैज्ञानिक परीक्षणों का जोर है। परमाणु परीक्षण निरन्तर होते ही रहते हैं। इनके विस्फोट से रेडियोधर्मी पदार्थ वायुमण्डल में फैल जाते हैं और अनेक प्रकार से जीवन को क्षति पहुँचाते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के समय हिरोशिमा और नागासाकी में जो परमाणु बम गिराये गये थे, उनसे लाखों लोग अपंग हो गये थे और आने वाली पीढ़ी भी इसके हानिकारक प्रभाव से अभी भी अपने को बचा नहीं पायी है।

(ङ) रासायनिक प्रदूषण – कारखानों से बहते हुए अवशिष्ट द्रव्यों के अतिरिक्त उपज में वृद्धि की दृष्टि से प्रयुक्त कीटनाशक दवाइयों और रासायनिक खादों से भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ये पदार्थ जल के साथ बहकर नदियों, तालाबों और अन्ततः समुद्र में पहुँच जाते हैं और जीवन को अनेक प्रकार से हानि पहुँचाते हैं।

प्रदूषण की समस्या तथा उससे हानियाँ – निरन्तर बढ़ती हुई मानव-जनसंख्या, रेगिस्तान का बढ़ते जाना, भूमि का कटाव, ओजोन की परत का सिकुड़ना, धरती के तापमान में वृद्धि, वनों के विनाश तथा औद्योगीकरण ने विश्व के सम्मुख प्रदूषण की समस्या पैदा कर दी है। कारखानों के धुएँ से, विषैले कचरे के बहाव से तथा जहरीली गैसों के रिसाव से आज मानव-जीवन समस्याग्रस्त हो गया है। आज तकनीकी ज्ञान के बल पर मानव विकास की दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में लगा हुआ है। इस होड़ में वह तकनीकी ज्ञान का ऐसा गलत उपयोग कर रहा है, जो सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए विनाश का कारण बन सकता है। युद्ध में आधुनिक तकनीकों पर आधारित मिसाइलों और प्रक्षेपास्त्रों ने जन-धन की अपार क्षति तो की ही है साथ ही पर्यावरण पर भी घातक प्रभाव डाला है, जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य में गिरावट, उत्पादन में कमी और विकास प्रक्रिया में बाधा आयी है। वायु प्रदूषण का गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। सिरदर्द, आँखें दुखना, खाँसी, दमा, हृदय रोग आदि किसी-न-किसी रूप में वायु-प्रदूषण से जुड़े हुए हैं। प्रदूषित जल के सेवन से मुख्य रूप से पाचन-तन्त्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति वर्ष लाखों बच्चे दूषित जल पीने के परिणामस्वरूप उत्पन्न रोगों से मर जाते हैं। ध्वनि-प्रदूषण के भी गम्भीर और घातक प्रभाव पड़ते हैं। ध्वनि-प्रदूषण (शोर) के कारण शारीरिक और मानसिक तनाव तो बढ़ता ही है, साथ ही श्वसन-गति और नाड़ी-गति में उतार-चढ़ाव, जठरान्त्र की गतिशीलता में कमी तथा रुधिर परिसंचरण एवं हृदय पेशी के गुणों में भी परिवर्तन हो जाता है तथा प्रदूषण जन्य अनेकानेक बीमारियों से पीड़ित मनुष्य समय से पूर्व ही मृत्यु का ग्रास बन जाता है।

समस्या का समाधान – महान् शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने इस समस्या की ओर गम्भीरता से ध्यान दिया है। आज विश्व का प्रत्येक देश इस ओर सजग है। वातावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए वृक्षारोपण सर्वश्रेष्ठ साधन है। मानव को चाहिए कि वह वृक्षों और वनों को कुल्हाड़ियों का निशाना बनाने के बजाय उन्हें फलते-फूलते देखे तथा सुन्दर पशु-पक्षियों को अपना भोजन बनाने के बजाय उनकी सुरक्षा करे। साथ ही भविष्य के प्रति आशंकित, आतंकित होने से बचने के लिए सबको देश की असीमित बढ़ती जनसंख्या को सीमित करना होगा, जिससे उनके आवास के लिए खेतों और वनों को कम न करना पड़े। कारखाने और मशीनें लगाने की अनुमति उन्हीं व्यक्तियों को दी जानी चाहिए, जो औद्योगिक कचरे और मशीनों के धुएँ को बाहर निकालने की समुचित व्यवस्था कर सकें। संयुक्त राष्ट्र संघ को चाहिए कि वह परमाणु परीक्षणों को नियन्त्रित करने की दिशा में कदम उठाए। तकनीकी ज्ञान का उपयोग खोये हुए पर्यावरण को फिर से प्राप्त करने पर बल देने के लिए किया जाना चाहिए। वायु-प्रदूषण से बचने के लिए प्रत्येक प्रकार की गन्दगी एवं कचरे को विधिवत् समाप्त करने के उपाय निरन्तर किये जाने चाहिए। जल-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए औद्योगिक संस्थानों में ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि व्यर्थ पदार्थों एवं जल को उपचारित करके ही बाहर निकाला जाए तथा इनको जल-स्रोतों से मिलने से रोका जाना चाहिए। ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए भी प्रभावी उपाय किये जाने चाहिए। सार्वजनिक रूप से लाउडस्पीकरों आदि के प्रयोग को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।

उपसंहार – पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को रोकने व उसके समुचित संरक्षण के लिए समस्त विश्व में एक नुयी चेतना उत्पन्न हुई है। हम सभी का उत्तरदायित्व है कि चारों ओर बढ़ते इस प्रदूषित वातावरण के खतरों के प्रति सचेत हों तथा पूर्ण मनोयोग से सम्पूर्ण परिवेश को स्वच्छ व सुन्दर बनाने का यत्न करें। वृक्षारोपण का कार्यक्रम सरकारी स्तर पर जोर-शोर से चलाया जा रहा है तथा वनों की अनियन्त्रित कटाई को रोकने के लिए भी कठोर नियम बनाये गये हैं। इस बात के भी प्रयास किये जा रहे हैं कि नये वन-क्षेत्र बनाये जाएँ और जन-सामान्य को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इधर न्यायालय द्वारा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को महानगरों से बाहर ले जाने के आदेश दिये गये हैं तथा नये उद्योगों को लाइसेन्स दिये जाने से पूर्व उन्हें औद्योगिक कचरे के निस्तारण की समुचित व्यवस्था कर पर्यावरण विशेषज्ञों से स्वीकृति प्राप्त करने को अनिवार्य कर दिया गया है। यदि जनता भी अपने ढंग से इन कार्यक्रमों में सक्रिय सहयोग दे और यह संकल्प ले कि जीवन में आने वाले प्रत्येक शुभ अवसर पर कम-से-कम एक वृक्ष अवश्य लगाएगी तो निश्चित ही हमें प्रदूषण के दुष्परिणामों से बच सकेंगे और आने वाली पीढ़ी को भी इसकी काली छाया से बचाने में समर्थ हो सकेंगे।

भारत में बेरोजगारी की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • बेरोजगारी : समस्या और समाधान
  • शिक्षित बेरोजगारों की समस्या व समाधान
  • बेरोजगारी की विकराल समस्या
  • बेरोजगारी की समस्या
  • बेरोजगारी दूर करने के उपाय

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2.  प्राचीन भारत की स्थिति,
  3.  वर्तमान स्थिति,
  4.  बेरोजगारी से अभिप्राय,
  5. भारत में बेरोजगारी का स्वरूप,
  6. बेरोजगारी के कारण,
  7. समस्या का समाधान,
  8.  उपसंहार।

प्रस्तावना – मनुष्य की सारी गरिमा, जीवन का उत्साह, आत्म-विश्वास व आत्म-सम्मान उसकी आजीविका पर निर्भर करता है। बेकार या बेरोजगार व्यक्ति से बढ़कर दयनीय, दुर्बल तथा दुर्भाग्यशाली कौन होगा?

परिवार के लिए वह बोझ होता है तथा समाज के लिए कलंक। उसके समस्त गुण, अवगुण कहलाते हैं और उसकी सामान्य भूलें अपराध घोषित की जाती हैं। इस प्रकार वर्तमान समय में भारत के सामने सबसे विकराल और विस्फोटक समस्या बेकारी की है; क्योंकि पेट की ज्वाला से पीड़ित व्यक्ति कोई भी पाप कर सकता है-‘बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।’ हमारा देश ऐसे ही युवकों की पीड़ा से सन्तप्त है।

प्राचीन भारत की स्थिति – प्राचीन भारत अनेक राज्यों में विभक्त था। राजागण स्वेच्छाचारी न थे। वे मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से कार्य करते हुए प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते थे। राजदरबार से हजारों लोगों की आजीविका चलती थी, अनेक उद्योग-धन्धे फलते-फूलते थे। प्राचीन भारत में यद्यपि बड़े-बड़े नगर भी थे, पर प्रधानता ग्रामों की ही थी। ग्रामों में कृषि योग्य भूमि का अभाव न था। सिंचाई की समुचित व्यवस्था थी। फलतः भूमि सच्चे अर्थों में शस्यश्यामला (अनाज से भरपूर) थी। इन ग्रामों में कृषि से सम्बद्ध अनेक हस्तशिल्पी काम करते थे; जैसे–बढ़ई, खरादी, लुहार, सिकलीगर, कुम्हार, कलयीगर आदि। साथ ही प्रत्येक घर में कोई-न-कोई लघु उद्योग चलता था; जैसे–सूत कातना, कपड़ा बुनना, इत्र-तेल का उत्पादन करना, खिलौने बनाना, कागज बनाना, चित्रकारी करना, रँगाई का काम करना, गुड़-खाँड बनाना आदि।

उस समय भारत का निर्यात व्यापार बहुत बढ़ा-चढ़ा था। यहाँ से अधिकतर रेशम, मलमल आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्र और मणि, मोती, हीरे, मसाले, मोरपंख, हाथीदाँत आदि बड़ी मात्रा में विदेशों में भेजे जाते थे। दक्षिण भारत गर्म मसालों के लिए विश्वभर में विख्यात था। यहाँ काँच का काम भी बहुत उत्तम होता था। हाथीदाँत और शंख की अत्युत्तम चूड़ियाँ बनती थीं, जिन पर बारीक कारीगरी होती थी। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल की असाधारण समृद्धि का मुख्य आधार कृषि ही नहीं, अपितु अगणित लघु उद्योग-धन्धे एवं निर्यात-व्यापार था। इन उद्योग-धन्धों का संचालन बड़े-बड़े पूंजीपतियों के हाथों में न होकर गणसंस्थाओं (व्यापार संघों) द्वारा होता था। यही कारण था कि प्राचीन भारत में बेकारी का नाम भी कोई नहीं जानता था।

प्राचीन भारत के इस आर्थिक सर्वेक्षण से तीन निष्कर्ष निकलते हैं – (1) देश की अधिकांश जनता किसी-न-किसी उद्योग-धन्धे, हस्तशिल्प या वाणिज्य-व्यवसाय में लगी थी। (2) भारत में निम्नतम स्तर तक स्वायत्तशासी या लोकतान्त्रिक संस्थाओं का जाल बिछा था। (3) सम्पूर्ण देश में एक प्रकार का आर्थिक साम्यवाद विद्यमान था अर्थात् धन कुछ ही हाथों या स्थानों में केन्द्रित न होकर न्यूनाधिक मात्रा में सम्पूर्ण देश में फैला हुआ था।

वर्तमान स्थिति – जब सन् 1947 ई० में देश लम्बी पराधीनता के बाद स्वतन्त्र हुआ तो आशा हुई कि प्राचीन भारतीय अर्थतन्त्र की सुदृढ़ता की आधारभूत ग्राम-पंचायतों एवं लघु उद्योग-धन्धों को उज्जीवित कर देश को पुनः समृद्धि की ओर बढ़ाने हेतु योग्य दिशा मिलेगी, पर दुर्भाग्यवश देश का शासनतन्त्र अंग्रेजों के मानस-पुत्रों के हाथों में चला गया, जो अंग्रेजों से भी ज्यादा अंग्रेजियत में रंगे हुए थे। परिणाम यह हुआ कि देश में बेरोजगारी बढ़ती ही गयी। इस समय भारत की जनसंख्या 121 करोड़ के ऊपर है जिसमें 10% अर्थात् 12.1 करोड़ से भी अधिक लोग पूर्णतया बेरोजगार हैं।

बेरोजगारी से अभिप्राय – बेरोजगार, सामान्य अर्थ में, उस व्यक्ति को कहते हैं जो शारीरिक रूप से कार्य करने के लिए असमर्थ न हो तथा कार्य करने का इच्छुक होने पर भी उसे प्रचलित मजदूरी की दर पर कोई कार्य न मिलता हो। बेकारी को हम तीन वंगों में बाँट सकते हैं-अनैच्छिक बेकारी, गुप्त व आंशिक बेकारी तथा संघर्षात्मक बेकारी। अनैच्छिक बेरोजगारी से अभिप्राय यह है कि व्यक्ति प्रचलित वास्तविक मजदूरी पर कार्य करने को तैयार है, परन्तु उसे रोजगार प्राप्त नहीं होता। गुप्त व आंशिक बेरोजगारी से आशय किसी भी व्यवसाय में आवश्यकता से अधिक व्यक्तियों के कार्य पर लगने से है। संघर्षात्मक बेरोजगारी से अभिप्राय यह है कि बेरोजगारी श्रम की माँग में सामयिक परिवर्तनों के कारण होती है और अधिक समय तक नहीं रहती। साधारणतया किसी भी अधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र में तीनों प्रकार की बेरोजगारी पायी जाती है।

भारत में बेरोजगारी का स्वरूप – जनसंख्या के दृष्टिकोण से भारत का स्थान विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में चीन के पश्चात् है। यद्यपि वहाँ पर अनैच्छिक बेरोजगारी पायी जाती है, तथापि भारत में बेरोजगारी का स्वरूप अन्य देशों की अपेक्षा कुछ भिन्न है। यहाँ पर संघर्षात्मक बेरोजगारी भीषण रूप से फैली हुई है। प्राय: नगरों में अनैच्छिक बेरोजगारी और ग्रामों में गुप्त बेरोजगारी का स्वरूप देखने में आता है। शहरों में बेरोजगारी के दो रूप देखने में आते हैं-औद्योगिक श्रमिकों की बेकारी तथा दूसरे, शिक्षित वर्ग में बेकारी। भारत एक कृषिप्रधान देश है और यहाँ की लगभग 70% जनता गाँव में निवास करती है जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि में मौसमी अथवा सामयिक रोजगार प्राप्त होता है; अत: कृषि व्यवसाय में संलग्न जनसंख्या का अधिकांश भाग चार से छ: मास तक बेकार रहता है। इस प्रकार भारतीय ग्रामों में संघर्षात्मक बेरोजगारी अपने भीषण रूप में विद्यमान है।

बेरोजगारी के कारण – हमारे देश में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कारणों का उल्लेख निम्नलिखित है

  1.  जनसंख्या – बेरोजगारी का प्रमुख कारण है – जनसंख्या में तीव्रगति से वृद्धि। विगत कुछ दशकों में भारत में जनसंख्या का विस्फोट हुआ है। हमारे देश की जनसंख्या में प्रति वर्ष लगभग 2% की वृद्धि हो जाती है; जब कि इस दर से बढ़ रहे व्यक्तियों के लिए हमारे देश में रोजगार की व्यवस्था नहीं है।
  2.  शिक्षा-प्रणाली – भारतीय शिक्षा सैद्धान्तिक अधिक है। इसमें पुस्तकीय ज्ञान पर ही विशेष ध्यान दिया जाता है; फलत: यहाँ के स्कूल-कॉलेजों से निकलने वाले छात्र निजी उद्योग-धन्धे स्थापित करने योग्य नहीं बन पाते।
  3.  कुटीर उद्योगों की उपेक्षा – ब्रिटिश सरकार की कुटीर उद्योग विरोधी नीति के कारण देश में कुटीर उद्योग-धन्धों का पतन हो गया; फलस्वरूप अनेक कारीगर बेकार हो गये। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भी कुटीर उद्योगों के विकास की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया; अतः बेरोजगारी में निरन्तर वृद्धि होती गयी।
  4.  औद्योगीकरण की मन्द प्रक्रिया – पंचवर्षीय योजनाओं में देश के औद्योगिक विकास के लिए जो कदम उठाये गये उनसे समुचित रूप से देश का औद्योगीकरण नहीं किया जा सका है। फलतः बेकार व्यक्तियों के लिए रोजगार के साधन नहीं जुटाये जा सके हैं।
  5. कृषि का पिछड़ापन – भारत की लगभग दो-तिहाई जनता कृषि पर निर्भर है। कृषि की पिछड़ी हुई दशा में होने के कारण कृषि बेरोजगार की समस्या व्यापक हो गयी है।
  6. कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी – हमारे देश में कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी है। अतः उद्योगों के सफल संचालन के लिए विदेशों से प्रशिक्षित कर्मचारी बुलाने पड़ते हैं। इस कारण से देश के कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों के बेकार हो जाने की भी समस्या हो जाती है। इनके अतिरिक्त मानसून की अनियमितता, भारी संख्या में शरणार्थियों का आगमन, मशीनीकरण के फलस्वरूप होने वाली श्रमिकों की छंटनी, श्रम की माँग एवं पूर्ति में असन्तुलन, आर्थिक संसाधनों की कमी आदि से भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। देश को बेरोजगारी से उबारने के लिए इनका समुचित समाधान नितान्त आवश्यक है।

समस्या का समाधान

  1.  सबसे पहली आवश्यकता है हस्तोद्योगों को बढ़ावा देने की। इससे स्थानीय प्रतिभा को उभरने का सुअवसर मिलेगा। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए लघु उद्योग-धन्धे ही ठीक हैं, जिनमें अधिक-से-अधिक लोगों को काम मिल सके। मशीनीकरण उन्हीं देशों के लिए उपयुक्त होता है, जहाँ कम जनसंख्या के कारण कम हाथों से अधिक काम लेना हो।
  2. दूसरी आवश्यकता है मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा देने की, जिससे विद्यार्थी शीघ्र ही शिक्षित होकर अपनी प्रतिभा का उपयोग कर सकें। साथ ही आज स्कूल-कॉलेजों में दी जाने वाली अव्यावहारिक शिक्षा के स्थान पर शिल्प-कला, उद्योग-धन्धों आदि से सम्बद्ध शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे कि पढ़ाई समाप्त कर विद्यार्थी तत्काल रोजी-रोटी कमाने योग्य हो जाए।
  3.  बड़ी-बड़ी मिलें और फैक्ट्रियाँ, सैनिक शस्त्रास्त्र तथा ऐसी ही दूसरी बड़ी चीजें बनाने तक सीमित कर दी जाएँ। अधिकांश जीवनोपयोगी वस्तुओं का उत्पादन घरेलु उद्योगों से ही हो।
  4.  पश्चिमी शिक्षा ने शिक्षितों में हाथ के काम को नीचा समझने की जो मनोवृत्ति पैदा कर दी है, उसे ‘श्रम के गौरव’ (Dignity of Labour) की भावना पैदा करके दूर किया जाना चाहिए।
  5. लघु उद्योग-धन्धों के विकास से शिक्षितों में नौकरियों के पीछे भागने की प्रवृत्ति घटेगी; क्योंकि नौकरियों में देश की जनता का एक बहुत सीमित भाग ही खप सकता है। लोगों को प्रोत्साहन देकर हस्त-उद्योगों एवं वाणिज्य-व्यवसाय की ओर उन्मुख किया जाना चाहिए। ऐसे लघु उद्योगों में रेशम के कीड़े पालना, मधुमक्खी-पालन, सूत कातना, कपड़ा बुनना, बागवानी, साबुन बनाना, खिलौने, चटाइयाँ, कागज, तेल-इत्र
    आदि न जाने कितनी वस्तुओं का निर्माण सम्भव है। इसके लिए प्रत्येक जिले में जो सरकारी लघु-उद्योग कार्यालय हैं; वे अधिक प्रभावी ढंग से काम करें। वे इच्छुक लोगों को सही उद्योग चुनने की सलाह दें, उन्हें ऋण उपलब्ध कराएँ तथा आवश्यकतानुसार कुछ तकनीकी शिक्षा दिलवाने की भी व्यवस्था करें। इसके साथ ही इनके उत्पादों की बिक्री की भी व्यवस्था कराएँ। यह सर्वाधिक आवश्यक है; क्योंकि इसके बिना शेष सारी व्यवस्था बेकार साबित होगी। सरकार के लिए ऐसी व्यवस्था करना कठिन नहीं है; क्योंकि वह स्थान-स्थान पर बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियाँ आयोजित करके तैयार माल बिकवा सकती है, जब कि व्यक्ति के लिए, विशेषत: नये व्यक्ति के लिए, यह सम्भव नहीं।
  6. इसके साथ ही देश की तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या पर भी रोक लगाना अत्यावश्यक हो गया है। उपसंहार–सारांश यह है कि देश के स्वायत्तशासी ढाँचे और लघु उद्योग-धन्धों के प्रोत्साहन से ही बेरोजगारी की समस्या का स्थायी समाधान सम्भव है। हमारी सरकार भी बेरोजगारी की समस्या के उन्मूलन के लिए जागरूक है और उसके द्वारा इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम भी उठाये गये हैं। परिवार नियोजन (कल्याण), बैंकों का राष्ट्रीयकरण, एक स्थान से दूसरे स्थान पर कच्चा माल ले जाने की सुविधा, कृषि- भूमि की चकबन्दी, नये-नये उद्योगों की स्थापना, प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना आदि अनेकानेक ऐसे कार्य हैं, जो बेरोजगारी को दूर करने में एक सीमा तक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। इन कार्यक्रमों को और अधिक विस्तृत, प्रभावकारी और ईमानदारी से कार्यान्वित किये जाने की आवश्यकता है।

 दहेज-प्रथा : एक सामाजिक अभिशाप

सम्बद्ध शीर्षक

  • दहेज : समस्या और समाधान
  • हमारे समाज का कोढ़ : दहेज-प्रथा
  • दहेज का दानव

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1.  प्रस्तावना,
  2. दहेज प्रथा का स्वरूप,
  3.  दहेज प्रथा की विकृति के कारण
    (क) भौतिकवादी जीवन-दृष्टि;
    (ख) वर-चयन का क्षेत्र सीमित;
    (ग) विवाह की अनिवार्यता;
    (घ) स्पर्धा की भावना;
    (ङ) रिश्वतखोरी,
  4.  दहेज प्रथा से हानियाँ
    (क) नवयुवतियों को प्राण-नाश;
    (ख) ऋणग्रस्तता;
    (ग) भ्रष्टाचार को बढ़ावा;
    (घ) अविवाहित रहने की विवशता;
    (ङ) अनैतिकता को प्रोत्साहन;
    (च) अनमेल विवाह;
    (छ) अयोग्य बच्चों का जन्म,
  5.  दहेज-प्रथा को समाप्त करने के उपाय
    (क) जीवन के भौतिकवादी दृष्टिकोण में परिवर्तन;
    (ख) नारी सम्मान की भावना का पुनर्जागरणः
    (ग) कन्या को स्वावलम्बी बनाना;
    (घ) नवयुवकों को स्वावलम्बी बनाना;
    (ङ) वर-चयन में यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना;
    (च) विवाह-विच्छेद के नियम अधिक उदार बनाना;
    (छ) कठोर दण्ड और सामाजिक बहिष्कार;
    (ज) दहेज विरोधी कानून का कड़ाई से पालन,
  6. उपसंहार।।

प्रस्तावना – दहेज-प्रथा यद्यपि प्राचीनकाल से चली आ रही है, परन्तु वर्तमान काल में इसने जैसा विकृत रूप धारण कर लिया है, उसकी कल्पना भी किसी ने न की थी। हिन्दू समाज के लिए आज यह एक अभिशाप बन गया है, जो समाज को अन्दर से खोखला करता जा रहा है। अतः इस समस्या के स्वरूप, कारणों एवं समाधान पर विचार करना नितान्त आवश्यक है।

दहेज-प्रथा का स्वरूप – कन्या के विवाह के अवसर पर कन्या के माता-पिता वर-पक्ष के सम्मानार्थ जो दान-दक्षिणी भेंटस्वरूप देते हैं, वह दहेज कहलाता है। यह प्रथा बहुत प्राचीन है। श्रीरामचरितमानस के अनुसार जानकी जी को विदा करते समय महाराज जनक ने प्रचुर दहेज दिया था, जिसमें धन-सम्पत्ति, हाथी-घोड़े, खाद्य-पदार्थ आदि के साथ दास-दासियाँ भी थीं। यही दहेज का वास्तविक स्वरूप है, अर्थात् इसे स्वेच्छा से दिया जाना चाहिए।
कुछ वर्ष पहले तक यही स्थिति थी, किन्तु आज इसका स्वरूप अत्यधिक विकृत हो चुका है। आज वर-पक्ष अपनी माँगों की लम्बी सूची कन्या-पक्ष के सामने रखता है, जिसके पूरी न होने पर विवाह टूट जाता है। इस प्रकार यह लड़के का विवाह नहीं, उसकी नीलामी है, जो ऊँची-से-ऊँची बोली बोलने वाले के पक्ष में छूटती है। विवाह का अर्थ है-दो समान गुण, शील, कुले वाले वर-कन्या का गृहस्थ-जीवन की सफलता के लिए परस्पर सम्मान और विश्वासपूर्वक एक सूत्र में बँधना। इसी कारण पहले के लोग कुल-शील को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। फलतः 98 प्रतिशत विवाह सफल होते थे, किन्तु आज तो स्थिति यहाँ तक विकृत हो चुकी है कि इच्छित दहेज पाकर भी कई पति अपनी पत्नियों को प्रताड़ित करते हैं और उसे आत्महत्या तक के लिए विवश कर देते हैं या स्वयं मार डालते हैं।

दहेज-प्रथा की विकृति के कारण – दहेज-प्रथा का जो विकृततम रूपे आज दीख पड़ता है उसके कई कारण हैं, जिनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं

(क) भौतिकवादी जीवन-दृष्टि – अंग्रेजी शिक्षा के अन्धाधुन्ध प्रचार के फलस्वरूप लोगों का जीवन पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर घोर भौतिकवादी बन गया है, जिनमें अर्थ (धन) और काम (सांसारिक सुख-भोग) की ही प्रधानता हो गयी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने यहाँ अधिक-से-अधिक शान-शौकत की चीजें रखना चाहता है और इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेता है। यही दहेज-प्रथा की विकृति का सबसे प्रमुख कारण है।

(ख) वर-चयन का क्षेत्र सीमिते – हिन्दुओं में विवाह अपनी ही जाति में करने की प्रथा है और जाति के अन्तर्गत भी कुलीनता-अकुलीनता का विचार होता है। फलत: वर-चयन का क्षेत्र बहुत सीमित हो जाता है। अपनी कन्या के लिए अधिकाधिक योग्य वर प्राप्त करने की चाहत लड़के वालों को दहेज माँगने हेतु प्रेरित करती है।

(ग) विवाह की अनिवार्यता – हिन्दू-समाज में कन्या का विवाह माता-पिता का पवित्र दायित्व माना जाता है। यदि कन्या अधिक आयु तक अविवाहित रहे तो समाज माता-पिता की निन्दा करने लगता है। फलत: कन्या के हाथ पीले करने की चिन्ता वर-पक्ष द्वारा उनके शोषण के रूप में सामने आती है।

(घ) स्पर्धा की भावना – रिश्तेदार या पास-पड़ोस की कन्या की अपेक्षा अपनी कन्या को मालदार या उच्चपदस्थ वर के साथ ब्याहने के लिए लगी होड़ का परिणाम भी माता-पिता के लिए घातक सिद्ध होता है। कई कन्या-पक्ष वाले वर-पक्ष वालों से अपनी कन्या के लिए अच्छे वस्त्राभूषण एवं बारात को तड़क-भड़क से लाने की माँग केवल अपनी झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से कर देते हैं, जिससे वर-पक्ष वाले अधिक दहेज की माँग करते हैं।

(ङ) रिश्वतखोरी – अधिक धन कमाने की लालसा में विभिन्न पदों पर बैठे लोग अनुचित साधनों द्वारा पर्याप्त धन कमाते हैं। इसका विकृत स्वरूप दहेज के रूप में कम आय वाले परिवारों को प्रभावित करता है।

दहेज-प्रथा से हानियाँ – दहेज-प्रथा की विकृति के कारण आज सारे समाज में एक भूचाल-सा आ गया है। इससे समाज को भीषण आघात पहुँच रहा है। कुछ प्रमुख हानियाँ निम्नलिखित हैं

(क) नवयुवतियों का प्राण-नाश – समाचार-पत्रों में प्रायः प्रतिदिन ही दहेज के कारण किसी-न-किसी नवविवाहिता को जीवित जला डालने अथवा मार डालने के एकाधिक लोमहर्षक एवं हृदयविदारक समाचार निकलते ही रहते हैं, जो अत्यधिक शोचनीय है।

(ख) ऋणग्रस्तता – दहेज जुटाने की विवशता के कारण कितने ही माता-पिताओं की कमर आर्थिक दृष्टि से टूट जाती है, उनके रहने के मकान बिक जाते हैं या वे ऋणग्रस्त हो जाते हैं और इस प्रकार कितने ही सुखी परिवारों की सुख-शान्ति सदा के लिए नष्ट हो जाती है। फलतः कन्या का जन्म आजकल एक अभिशाप माना जाने लगा है।

(ग) भ्रष्टाचार को बढ़ावा – इस प्रथा के कारण भ्रष्टाचार को भी प्रोत्साहन मिला है। कन्या के दहेज के लिए अधिक धन जुटाने की विवशता में पिता भ्रष्टाचार का आश्रय लेता है। कभी-कभी इसके कारण वह अपनी नौकरी से हाथ धोकर जेल भी जाता है या दर-दर का भिखारी बन जाता है।

(घ) अविवाहित रहने की विवशता – दहेज रूपी दानव के कारण कितनी ही सुयोग्य लड़कियाँ अविवाहित जीवन बिताने को विवश हो जाती हैं। कुछ भावुक युवतियाँ स्वेच्छा से अविवाहित रह जाती हैं और कुछ विवाहिता युवतियों के साथ घटित होने वाली ऐसी घटनाओं से आतंकित होकर अविवाहित रह जाना पसन्द करती हैं।

(ङ) अनैतिकता को प्रोत्साहन – अधिक आयु तक कुंआरी रह जाने वाली युवतियों में से कुछ तो किसी युवक से अवैध सम्बन्ध स्थापित कर अनैतिक जीवन जीने को बाध्य होती हैं और कुछ यौवन-सुलभ वासना के वशीभूत होकर गलत लोगों के जाल में फँस जाती हैं, जिससे समाज में अगणित विकृतियाँ एवं विश्रृंखलताएँ उत्पन्न हो रही हैं।

(च) अनमेल विवाह – इस प्रथा के कारण अक्सर माता-पिता को अपनी सुयोग्य-सुशिक्षिता कन्या को किसी अल्पशिक्षित युवक से ब्याहना पड़ता है या किसी सुन्दर युवती को किसी कुरूप या अधिक आयु वाले को पति रूप में सहन करना पड़ता है, जिससे उसका जीवन नीरस हो जाता है।

(छ) अयोग्य बच्चों का जन्म – जहाँ अनमेल विवाह हो रहे हैं, वहाँ योग्य सन्तान की अपेक्षा आकाश-कुसुम के समान है। सन्तान का उत्तम होना तभी सम्भव है, जब कि माता और पिता दोनों में पारस्परिक सामंजस्य हो। सारांश यह है कि दहेज-प्रथा के कारण समाज में अत्यधिक अव्यवस्था और अशान्ति उत्पन्न हो गयी है तथा गृहस्थ-जीवन इस प्रकार लांछित हो रहा है कि सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है।

दहेज-प्रथा को समाप्त करने के उपाय – दहेज स्वयं अपने में गर्हित वस्तु नहीं, यदि वह स्वेच्छया प्रदत्त हो, पर आज जो उसका विकृत रूप दीख पड़ता है, वह अत्यधिक निन्दनीय है। इसे मिटाने के लिए निम्नलिखित उपाय उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं

(क)जीवन के भौतिकवादी दृष्टिकोण में परिवर्तन – जीवन का घोर भौतिकवादी दृष्टिकोण, जिसमें केवल अर्थ और काम ही प्रधान है, बदलना होगा। जीवन में अपरिग्रह और त्याग की भावना पैदा करनी होगी। इसके लिए हम बंगाल, महाराष्ट्र एवं दक्षिण का उदाहरण ले सकते हैं। ऐसी घटनाएँ इन प्रदेशों में प्रायः सुनने को नहीं मिलतीं, जब कि हिन्दी-प्रदेश में इनकी बाढ़ आयी हुई है। यह स्वाभिमान की भी माँग है कि कन्या-पक्ष वालों
के सामने हाथ न फैलाया जाए और सन्तोषपूर्वक अपनी चादर की लम्बाई के अनुपात में पैर फैलाये जाएँ।

(ख) नारी-सम्मान की भावना का पुनर्जागरण – हमारे यहाँ प्राचीनकाल में नारी को गृहलक्ष्मी माना जाता था और उसे बड़ा सम्मान दिया जाता था। प्राचीन ग्रन्थों में कहा गया है-यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। सचमुच सुगृहिणी गृहस्थ-जीवन की धुरी है, उसकी शोभा है तथा सम्मति देने वाली मित्र और एकान्त की सखी है। यह भावना समाज में जगनी चाहिए और बिना भारतीय संस्कृति को उज्जीवित किये यह सम्भव नहीं।।

(ग) कन्या को स्वावलम्बी बनाना – वर्तमान भौतिकवादी परिस्थिति में कन्या को उचित शिक्षा देकर आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाना भी नितान्त प्रयोजनीय है। इससे यदि उसे योग्य वर नहीं मिल पाता तो वह अविवाहित रहकर भी स्वाभिमानपूर्वक अपना जीवनयापन कर सकती है। साथ ही लड़की को अपने मनोनुकूल वर चुनने की स्वतन्त्रता भी मिलनी चाहिए।

(घ) नवयुवकों को स्वावलम्बी बनाना – दहेज की माँग प्रायः युवक के माता-पिता करते हैं। युवक यदि आर्थिक दृष्टि से माँ-बाप पर निर्भर हो तो उसे उनके सामने झुकना ही पड़ता है। इसलिए युवक को स्वावलम्बी बनने की प्रेरणा देकर उनमें आदर्शवाद जगाया जा सकता है, इससे वधू के मन में भी अपने पति के लिए सम्मान पैदा होगा।

(ङ) वर-चयन में यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना – कन्याओं के माता-पिताओं को भी चाहिए कि वे अपनी कन्या के रूप, गुण, शिक्षा, समता एवं अपनी आर्थिक स्थिति का सम्यक् विचार करके ही वर का चुनाव करें। प्रत्येक व्यक्ति यदि ऊँचे-से-ऊँचा वर खोजने निकलेगा तो परिणाम दु:खद ही होगा।

(च) विवाह-विच्छेद के नियम अधिक उदार बनाना – हिन्दू-विवाह के विच्छेद का कानून पर्याप्त जटिल और समयसाध्य है, जिससे कई युवक या उसके माता-पिता वधू को मार डालते हैं; अत: नियम इतने सरल होने चाहिए कि पति-पत्नी में तालमेल न बैठने की स्थिति में दोनों का सम्बन्ध विच्छेद सुविधापूर्वक हो सके।

(छ) कठोर दण्ड और सामाजिक बहिष्कार – अक्सर देखने में आता है कि दहेज के अपराधी कानूनी जटिलताओं के कारण साफ बच जाते हैं, जिससे दूसरों को भी ऐसे दुष्कृत्यों की प्रेरणा मिलती है। अत: समाज को भी इतना जागरूक बनना पड़ेगा कि जिस घर में बहू की हत्या की गयी हो उसका पूर्ण सामाजिक बहिष्कार करके कोई भी व्यक्ति अपनी कन्या वहाँ न ब्याहे।

(ज) दहेज विरोधी कानून का कड़ाई से पालन – जहाँ कहीं भी दहेज का आदान-प्रदान हो, वहाँ प्रशासन का हस्तक्षेप परमावश्यक है। ऐसे लोगों को तुरन्त पुलिस के हवाले कर देना चाहिए।

उपसंहार – सारांश यह है कि दहेज-प्रथा एक अभिशाप है, जिसे मिटाने के लिए समाज और शासन के साथ-साथ प्रत्येक युवक और युवती को भी कटिबद्ध होना पड़ेगा। जब तक समाज में जागृति नहीं होगी, दहेज-प्रथा के दैत्य से मुक्ति पाना कठिन है। राजनेताओं, समाज-सुधारकों तथा युवक-युवतियों सभी के सहयोग से दहेज-प्रथा का अन्त हो सकता है। सम्प्रति, समाज में नव-जागृति आयी है और इस दिशा में सक्रिय कदम उठाये जा रहे हैं।

22. आरक्षण की नीति एवं राजनीति

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. भूमिका,
  2. आरक्षण का इतिहास,
  3.  आरक्षण के लिए संवैधानिक प्रावधान,
  4. आरक्षण के लिए आधार,
  5.  अखिल भारतीय स्तर पर आरक्षण,
  6.  आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता,
  7.  उपसंहारी

भूमिका – किसी सामाजिक समस्या के समाधान को जब राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बना लिया जाता है, तब क्या होता है, इसका उदाहरण आरक्षण के रूप में हमारे सामने है। लगभग पन्द्रह वर्ष पूर्व देश के तत्कालीन प्रधानमन्त्री ने देश के पिछड़े वर्गों के बारे में मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की थी। तब राजनीति के मण्डलीकरण ने सारे भारतीय समाज में हलचल मचा दी थी और देश दो वर्गों – अगड़े और पिछड़े – में बँट गया था। यह खाई इतने वर्षों में कुछ पटी थी कि अब केन्द्रीय मानव संसाधन मन्त्रालय के मुखिया द्वारा पुन: आरक्षण लागू करने को संकेत देकर इस खाई को और चौड़ा कर दिया है। अब वैसा ही एक बँटवारा पुनः दस्तक दे रहा है।

आरक्षण का इतिहास – सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था स्वतन्त्र भारत में नहीं, अपितु स्वतन्त्रता से पूर्व भी लागू थी। सन् 1919 के भारत सरकार अधिनियम लागू होने के बाद भारत के मुसलमानों ने सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की माँग की। माँग के इस दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने सरकारी नौकरियों में 33% प्रतिशत स्थाने अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षित कर दिये तथा इस व्यवस्था को 4 जुलाई, 1934 ई० को एक प्रस्ताव द्वारा निश्चित आकार प्रदान किया।

संविधान निर्माताओं ने सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था के लिए संस्तुति की। इस सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़े वर्गों में अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ और पिछड़ी जातियाँ सम्मिलित हैं। राष्ट्रपति ने सन् 1950 ई० में एक सांविधानिक आदेश जारी करके राज्यों एवं संघीय क्षेत्रों में रहने वाली इस प्रकार की जातियों की एक अनुसूची जारी की। इन अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रारम्भ में सरकारी नौकरियों में और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में (ऐंग्लो-इण्डियन के लिए भी) प्रारम्भिक रूप से दस वर्ष के लिए आरक्षण प्रदान किया गया जिसे समय-समय पर निरन्तर रूप से आठवें (1950), तेइसवें (1970), पैंतालीसवें (1980), बासठवें (1989) एवं उन्नासीवें (1999) संविधान संशोधनों द्वारा 10-10 वर्ष के लिए बढ़ाया जाता रहा। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आरक्षण तत्कालीन भारतीय समाज की एक आवश्यकता था। सदियों से दबाये-कुचले गये दलित वर्ग को शेष समाज के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण की बैसाखी आवश्यक थी। अब भी अन्य पिछड़े वर्गों को आगे लाने के लिए उन्हें कोई-न-कोई सहारा देना आवश्यक है।

आरक्षण के लिए संवैधानिक प्रावधान – भारत के संविधान में समानता के मौलिक अधिकार के अन्तर्गत लोक-नियोजन में व्यक्ति को अवसर की समानता प्रदान की गयी है। अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बन्धित विषयों में सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के अवसर की समानता प्रदान की गयी है, लेकिन राज्य को यह अधिकार दिया गया है कि वह राज्य के पिछड़े हुए (पिछड़े वर्ग का तात्पर्य यहाँ सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए वर्ग से है) नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में आरक्षण के लिए व्यवस्था कर सकता है। सतहत्तरवें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16 में 4 (क) जोड़ा गया, जिसके द्वारा अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के पक्ष में राज्य के अधीन सेवाओं में प्रोन्नति के लिए प्रावधान करने का अधिकार राज्य को प्रदान किया गया है। अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध किया गया है। अनुच्छेद 15 (4) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष उपबन्ध करने का अधिकार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 341 और 342 राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वह सम्बन्धित राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में तत्सम्बन्धित राज्यपाल या उपराज्यपाल या प्रशासक से परामर्श करके लोक अधिसूचना द्वारा उन जातियों, मूलवंशों या जनजातियों अथवा जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनके समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में उस राज्य के लिए विनिर्दिष्ट कर सकेगा। इसी प्रकार राष्ट्रपति अनुसूचित जनजातियों या जनजातीय समुदायों या उनके कुछ भागों अथवा समूहों को तत्सम्बन्धित राज्य या संघ राज्य-क्षेत्र के लिए अनुसूचित जनजातियों के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकता है। इस अनुसूची में संसद किसी को सम्मिलित या निष्कासित कर सकती है।

आरक्षण के लिए आधार – किसी वर्ग को आरक्षण प्रदान करने के लिए आवश्यक है कि

  1. वह वर्ग सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ा हो,
  2.  इस वर्ग को राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिल सका हो,
  3. कोई जाति इस वर्ग में आ सकती है यदि उस ‘जाति’ के 90% लोग सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हो।

इस विवाद का प्रमुख विषय यह रहा है कि कुल कितने प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जा सकता है। संविधान में इस विषय पर कुछ नहीं लिखा गया है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने सन् 1963 में यह निर्णय दिया कि कुल आरक्षण कुल रिक्तियों के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। मण्डल आयोग की संस्तुतियों को सन् 1991 में लागू करने पर इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी। उच्चतम न्यायालय की विशेष संविधान पीठ ने उस समय भी यह निर्णय दिया कि कुल आरक्षण कुल रिक्तियों के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

अखिल भारतीय स्तर पर आरक्षण – अखिल भारतीय स्तर पर खुली प्रतियोगिता परीक्षा के द्वारा सीधी भर्ती से भरे जाने वाले पदों में अनुसूचित जातियों के लिए 15% अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5% और पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था है। खुली प्रतियोगिता को छोड़कर अन्य तरीके से अखिल भारतीय स्तर पर सीधी भर्ती से भरे जाने वाले पदों में अनुसूचित जातियों के लिए नुसूचित जनजातियों के लिए 7.5%, तथा पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान है।

आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता – आरक्षण देने के पीछे मूल भावना का दुरुपयोग यदि राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है तब इस विषय पर गम्भीर चिन्तन-मनन की आवश्यकता है। सामाजिक न्याय करते-करते अन्य वर्गों के साथ अन्याय न होता चला जाए, इसको ध्यान रखना भी अनिवार्य है। केवल आरक्षण ही सामाजिक न्याय दिला सकता है, यह सोचना गलत है। अतः आरक्षण के अतिरिक्त और कोई अन्य विकल्प खोजा जाना चाहिए जो सभी वर्गों की उन्नति करे और उन्हें न्याय प्रदान करे।

आरक्षण की व्यवस्था हमारी सामाजिक आवश्यकता थी और एक सीमा तक अब भी है, लेकिन हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि आरक्षण एक बैसाखी है, पाँव नहीं। यदि अपंगता स्थायी न हो तो डॉक्टर यथाशीघ्र बैसाखी का उपयोग बन्द करने की सलाह देते हैं और बैसाखी का उपयोग करने वाला भी यही चाहता है कि उसकी अपंगता का यह प्रतीक जल्दी-से-जल्दी छूटे।।

पिछड़ी जातियों का हमदर्द होना कतई गलत नहीं है, सामाजिक समरसता की एक बड़ी जरूरत है यह। लेकिन हमदर्द होने और हमदर्द दिखाई देने में अन्तर होता है। सभी राजनीतिक दल आज पिछड़ी जातियों को यह समझाने में लगे हुए हैं कि केवल उन्हें ही उनके विकास की चिन्ता है, जब कि वास्तविकता यह है कि उनकी (राजनीतिक दलों) चिन्ता उनका (पिछड़ी जातियों) समर्थन जुटाने की है न कि उनका विकास करने की या न उनका हमदर्द बनने की। वास्तविक विकास तो सदैव अपने पैरों पर खड़ा होने-चलने-दौड़ने से होता है, न कि बैसाखी के सहारे घिसटने से।

उपसंहार – यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि जिनके हाथों में हमने देश की बागडोर सौंपी, उन्होंने पिछड़ी। जातियों की शिक्षा और समाज को बेहतर बनाने की दिशा में कभी सोचा ही नहीं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि पिछली आधी सदी में उन्होंने इस बारे में क्या कोशिश की? ऐसी किसी कोशिश का न होना एक अपराध है, जो हमारे नेतृत्व ने आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के प्रति किया है। इसमें सन्देह नहीं कि इस काम में आपराधिक देरी हुई है, पर यह काम आज भी शुरू हो सकता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि पिछली आधी सदी में समाज को जोड़ने की ईमानदार कोशिश नहीं हुई। सत्ता की राजनीति का खेल खेलने वालों के पास निर्माण की राजनीति के लिए कभी समय ही नहीं रहा। धर्म, जाति, वर्ग सब उनकी सत्ता की राजनीति का हथियार बन कर रह गये।

आज आरक्षण से समाज के बँटने के खतरे बताये जा रहे हैं। समाज को तो हमने जातियों, वर्गों में पहले ही बॉट रखी है। समाज को जोड़ने का एक ही तरीका है, विकास की राह पर सब कदम मिलाकर चलें। विकास में सबकी समान भागीदारी हो। आरक्षण की व्यवस्था का विवेकशील क्रियान्वयन इस समान भागीदारी का एक माध्यम बन सकता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आरक्षण निश्चित रूप से हमारी एक सामाजिक आवश्यकता है। कोई भी सभ्य समाज अपने पिछड़े साथियों को आगे लाने के लिए, विकास की दौड़ में सहभागी बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था का समर्थन ही करेगा; क्योंकि यह पिछड़े लोगों का अधिकार है और उन्नत लोगों का दायित्व। हाँ, यह भी जरूरी है कि बैसाखी को यथासमय फेंक देने की बात भी सबके दिमाग में रहे।

प्राकृतिक आपदाएँ

सम्बद्ध शीर्षक

  • मनुष्य और प्रकृति

प्रमुख विचार-बिन्दु 

  1. भूमिका,
  2. आपदा का अर्थ,
  3. प्रमुख प्राकृतिक आपदाएँ : कारण और निवारण,
  4. आपदा प्रबन्धन हेतु संस्थानिक तन्त्र,
  5. उपसंहार।

भूमिका – पृथ्वी की उत्पत्ति होने के साथ मानव सभ्यता के विकास के समान प्राकृतिक आपदाओं का इतिहास भी बहुत पुराना है। मनुष्य को अनादि काल से ही प्राकृतिक प्रकोपों का सामना करना पड़ा है। ये प्रकोप भूकम्प, ज्वालामुखीय उद्गार, चक्रवात, सूखा (अकाल), बाढ़, भू-स्खलन, हिम-स्खलन आदि विभिन्न रूपों में प्रकट होते रहे हैं तथा मानव-बस्तियों के विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करते रहे हैं। इनसे हजारों-लाखों लोगों की जानें चली जाती हैं तथा उनके मकान, सम्पत्ति आदि को पर्याप्त क्षति पहुँचती है। सम्पूर्ण विश्व में प्राकृतिक आपदाओं के कारण समाज के कमजोर वर्ग के लोग बड़ी संख्या में हताहत हो रहे हैं। आज हम वैज्ञानिक रूप से कितने ही उन्नत क्यों न हो गये हों, प्रकृति के विविध प्रकोप हमें बार-बार यह स्मरण कराते हैं कि उनके समक्ष मानव कितना असहाय है।

आपदा को अर्थ – प्राकृतिक प्रकोप मनुष्यों पर संकट बनकर आते हैं। इस प्रकार संकट प्राकृतिक या मानवजनित वह भयानक घटना है, जिसमें शारीरिक चोट, मानव-जीवन की क्षति, सम्पत्ति की क्षति, दूषित वातावरण, आजीविका की हानि होती है। इसे मनुष्य द्वारा संकट, विपत्ति, विपदा, आपदा आदि अनेक रूपों में जाना जाता है। आपदा का सामान्य अर्थ संकट या विपत्ति है, जिसका अंग्रेजी पर्याय ‘disaster’ है। किसी निश्चित स्थान पर भौतिक घटना का घटित होना, जिसके कारण हानि की सम्भावना हो, प्राकृतिक खतरे के रूप में जाना जाता है। ये घटनाएँ सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचों एवं विद्यमान व्यवस्था को ध्वस्त कर देती हैं जिनकी पूर्ति के लिए बाहरी सहायता की आवश्यकता होती है।

प्रमुख प्राकृतिक आपदाएँ : कारण और निवारण–प्राकृतिक आपदाएँ अनेक हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं

(1) भूकम्प – भूकम्प भूतल की आन्तरिक शक्तियों में से एक है। भूगर्भ में प्रतिदिन कम्पन होते हैं; लेकिन जब ये कम्पन अत्यधिक तीव्र होते हैं तो ये भूकम्प कहलाते हैं। साधारणतया भूकम्प एक प्राकृतिक एवं आकस्मिक घटना है, जो भू–पटल में हलचल अथवा लहर पैदा कर देती है। इन हलचलों के कारण पृथ्वी अनायास ही वेग से काँपने लगती है।

भूगर्भशास्त्रियों ने ज्वालामुखीय उद्गार, भू-सन्तुलन में अव्यवस्था, जलीय भार, भू-पटल में सिकुड़न, प्लेट विवर्तनिकी आदि को भूकम्प आने के कारण बताये हैं। भूकम्प ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसे रोक पाना मनुष्य के वश में नहीं है। मनुष्य केवल भूकम्पों की भविष्यवाणी करने में कुछ अंशों तक सफल हुआ है। साथ-साथ भूकम्प के कारण सम्पत्ति को होने वाली क्षति को कम करने के कुछ उपाय भी उसने ढूंढ़ निकाले हैं।

(2) ज्वालामुखी – ज्वालामुखी एक आश्चर्यजनक व विध्वंसकारी प्राकृतिक घटना है। यह भूपृष्ठ पर प्रकट होने वाली एक ऐसी विवर (क्रेटर या छिद्र) है जिसका सम्बन्ध भूगर्भ से होता है। इससे तप्त लावा, पिघली हुई शैलें तथा अत्यन्त तप्त गैसें समय-समय पर निकलती रहती हैं। इससे निकलने वाले पदार्थ भूतल पर शंकु (cone) के रूप में एकत्र होते हैं, जिन्हें ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं। इसे ज्वालामुखीय उद्गार कहते हैं। ज्वालामुखी एक आकस्मिक तथा प्राकृतिक घटना है जिसकी रोकथाम करना अभी मानव के वश में नहीं है।

(3) भू-स्खलन – भूमि के एक सम्पूर्ण भाग अथवा उसके विखण्डित एवं विच्छेदित खण्डों के रूप में खिसक जाने अथवा गिर जाने को भू-स्खलन कहते हैं। यह भी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में, भू-स्खलन एक व्यापक प्राकृतिक आपदा है जिससे बारह महीने जान और मोल का नुकसान होता है। भू-स्खलन अनेक प्राकृतिक और मानवजनित कारकों के परस्पर मेल के परिणामस्वरूप होता है। वर्षा की तीव्रता, खड़ी ढलाने, ढलानों का कड़ापन, अत्यधिक कटी-फटी चट्टानों की परतें, भूकम्पीय गतिविधि, दोषपूर्ण जल-निकासी आदि प्राकृतिक कारण हैं तथा वनों की अन्धाधुन्ध कटाई, अकुशल खुदाई, खनन तथा उत्खनन, पहाड़ियों पर अत्यधिक भवन-निर्माण आदि मानवजनित।। भू-स्खलन एक प्राकृतिक आपदा है, तथापि वानस्पतिक आवरण में वृद्धि इसको नियन्त्रित करने का सर्वाधिक प्रभावशाली, सस्ता व उपयोगी साधन है, क्योंकि यह मृदा अपरदन को रोकता है।

(4) चक्रवात – चक्रवात भी एक वायुमण्डलीय विक्षोभ है। चक्रवात का शाब्दिक अर्थ है-चक्राकार हवाएँ। वायुदाब की भिन्नता से वायुमण्डल में गति उत्पन्न होती है। अधिक गति होने पर वायुमण्डल की दशा अस्थिर हो जाती है और उसमें विक्षोभ उत्पन्न होता है। चक्रवातों का मूल कारण वायुमण्डल में ताप और वायुदाब की भिन्नता है। अधिक वायुदाब क्षेत्रों से ठण्डी चक्करदार हवाएँ निम्न दाब की ओर चलती हैं और चक्रवात का रूप धारण कर लेती हैं। चक्रवात मौसम से जुड़ी आपदा है। इसकी चेतावनी के उपरान्त लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा सकता है। चक्रवातों के वेग को बाधित करने के लिए, उनके आने के मार्ग में ऐसे वृक्ष लगाये जाने चाहिए जिनकी जड़े मजबूत हों तथा पत्तियाँ नुकीली व पतली हों।

(5) बाढ़ – वर्षाकाल में अधिक वर्षा होने पर प्रायः नदियों को जल तटबन्धों को तोड़कर आस-पास के निचले क्षेत्रों में फैल जाता है, जिससे वे क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं, इसी को बाढ़ कहते हैं। बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है। किन्तु जब यह मानव-जीवन व सम्पत्ति को क्षति पहुँचाती है तो यह प्राकृतिक आपदा कहलाती है। बाढ़ की स्थिति से बचाव के लिए जल-मार्गों को यथासम्भव सीधा रखना चाहिए तथा बाढ़ सम्भावित क्षेत्रों में जल के मार्ग को मोड़ने के लिए कृत्रिम ढाँचे बनाये जाने चाहिए। सम्भावित क्षेत्रों में कृत्रिम जलाशयों तथा आबादी वाले क्षेत्रों में बाँध का निर्माण किया जाना चाहिए।

(6) सूखा – सूखा वह स्थिति है जिसमें किसी स्थान पर अपेक्षित तथा सामान्य वर्षा से कम वर्षा होती है। यह गर्मियों में भयंकर रूप धारण कर लेता है। यह एक मौसम सम्बन्धी आपदा है जो किसी अन्य विपत्ति की अपेक्षा धीमी गति से आता है।
प्रकृति तथा मनुष्य दोनों ही सूखे के मूल कारणों में हैं। अत्यधिक चराई तथा जंगलों की कटाई, ग्लोबल वार्मिंग, कृषियोग्य समस्त भूमि का अत्यधिक उपयोग तथा वर्षा के असमान वितरण के कारण सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है। हरित पट्टियों के निर्माण के लिए भूमि का आरक्षण, कृत्रिम उपायों द्वारा जल संचय, विभिन्न नदियों को आपस में जोड़ना आदि सूखे के निवारण के प्रमुख उपाय हैं।

(7) समुद्री लहरें – समुद्री लहरें कभी-कभी विनाशकारी रूप धारण कर लेती हैं और इनकी ऊँचाई कभी कभी 15 मीटर तथा इससे भी अधिक तक होती है। ये तट के आस-पास की बस्तियों को तबाह कर देती हैं। तटवर्ती मैदानी इलाकों में इनकी रफ्तार 50 किमी प्रति घण्टा तक हो सकती है। इन विनाशकारी समुद्री लहरों को ‘सूनामी’ कहा जाता है।

समुद्र तल के पास या उसके नीचे भूकम्प आने पर समुद्र में हलचल पैदा होती है और यही हलचल विनाशकारी सूनामी का रूप धारण कर लेती है। दक्षिण पूर्व एशिया में आयी विनाशकारी सूनामी लहरें भूकम्प का ही परिणाम थीं। समुद्र की तलहटी में भू-स्खलन के कारण भी ऐसी लहरें उत्पन्न होती हैं।

आपदा प्रबन्धन हेतु संस्थानिक तन्त्र – प्राकृतिक आपदाओं को रोक पाना सम्भव नहीं है, परन्तु जोखिम को । कम करने वाले कार्यक्रमों के संचालन हेतु संस्थानिक तन्त्र की आवश्यकता व कुशल संचालन के लिए सन् 2004 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन नीति’ बनायी गयी है जिसके अन्तर्गत केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आपात स्थिति प्रबन्धन प्राधिकरण’ का गठन किया जा रहा है तथा सभी राज्यों में राज्य स्तरीय आपात स्थिति प्रबन्ध प्राधिकरण’ का गठन प्रस्तावित है। ये प्राधिकरण केन्द्र व राज्य स्तर पर आपदा प्रबन्धन हेतु समस्त कार्यों की दृष्टि से शीर्ष संस्था होंगे। ‘राष्ट्रीय संकट प्रबन्धन संस्थान, दिल्ली भारत सरकार का एक संस्थान है, जो सरकारी अफसरों, पुलिसकर्मियों, विकास एजेन्सियों, जन-प्रतिनिधियों तथा अन्य व्यक्तियों को संकट प्रबन्धन हेतु प्रशिक्षण प्रदान करता है। राज्य स्तर पर स्टेट इन्स्टीट्यूट्स ऑफ रूरल डेवलपमेण्ट, ऐडमिनिस्ट्रेटिव ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट्स, विश्वविद्यालयों आदि को यह उत्तरदायित्व सौंपा गया है। इंजीनियरिंग संस्थान; जैसे-इण्डियन इन्स्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी, रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, स्कूल्स ऑफ आर्किटेक्चर आदि भी इंजीनियरों को आपदा प्रबन्धन का प्रशिक्षण देते हैं।

उपसंहार – ‘विद्यार्थियों को आपदा प्रबन्धन का ज्ञान दिया जाना चाहिए इस विचार के अन्तर्गत सभी पाठ्यक्रमों में आपदा प्रबन्धन को सम्मिलित किया जा रहा है। यह प्रयास है कि पारिस्थितिकी के अनुकूल आपदा प्रबन्धन में विद्यार्थियों का ज्ञानवर्धन होता रहे; क्योंकि आपदा प्रबन्धन के लिए विद्यार्थी उत्तम एवं प्रभावी यन्त्र है, जिसका योगदान आपदा प्रबन्धन के विभिन्न चरणों; यथा – आपदा से पूर्व, आपदा के समय एवं आपदा के बाद; की गतिविधियों में लिया जा सकता है। इसके लिए विद्यार्थियों को जागरूक एवं संवेदनशील बनाना चाहिए।

आपदाओं को ‘दैविक घटना’ या ‘दैविक आपदा के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि इन पर मनुष्य को कोई वश नहीं है। इन आपदाओं को समझने के लिए केवल वैज्ञानिकों पर ही नहीं छोड़ देना चाहिए। हमें जिम्मेदार नागरिक की भाँति इनके बारे में सोचना चाहिए तथा अपने कल को इनसे सुरक्षित बनाने के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। पाठ्यक्रमों में अद्यार्थियों को आपदआपदा प्रबन्धन कारीजनल इंजीनियरिंगापा गया है। इंजीनियर

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व रस्

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name संस्कृत दिग्दर्शिका काव्य सौन्दर्य के तत्त्व रस्
Number of Questions 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व रस्

काव्य सौन्दर्य के तत्त्व

रस

प्रश्न 1:
रस क्या है? उसके अंगों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
श्रव्य काव्य पढ़ने या दृश्य काव्य देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक को जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, उसे ‘रस’ कहते हैं। विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (या संचारी) भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति (अभिव्यक्ति) होती है। मनुष्य के हृदय में रति, शोक आदि कुछ भाव हर समय सुप्तावस्था में रहते हैं, जिन्हें स्थायी भाव कहते हैं। ये स्थायी भाव अनुकूल परिस्थिति या दृश्य उपस्थित होने पर जाग्रत हो जाते हैं। सफल कवि द्वारा वर्णित वृत्तान्त को पढ़ या सुनकर काव्य के पाठक या श्रोता को एक ऐसे अलौकिक आनन्द का अनुभव होती है कि वह स्वयं को भूलकर आनन्दमय हो जाता है। यही आनन्द काव्यशास्त्र में रस कहलाता है।

रस के अंग

रस के प्रमुख चार अवयव (अंग) हैं – (1) स्थायी भाव, (2) विभाव, (3) अनुभाव, (4) संचारी भाव। इन अंगों को परिचय निम्नलिखित है

(1) स्थायी भाव
रति (प्रेम), जुगुप्सा (घृणा), अमर्ष (क्रोध) आदि भाव मनुष्य के मन में स्वाभाविक रूप से सदा विद्यमान रहते हैं, इन्हें स्थायी भाव कहते हैं। ये नौ हैं और इसी कारण इनसे सम्बन्धित रस भी नौ ही हैं

स्थायी भाव                                                 रस
(1) रति                                                         शृंगार
(2) हास                                                        हास्य
(3) शोक                                                       करुण
(4) उत्साह                                                      वीर
(5) अमर्ष (क्रोध)                                            रौद्र
(6) भय                                                         भयानक
(7) जुगुप्सा (घृणा)                                         वीभत्स
(8) विस्मय (आश्चर्य)                                      अद्भुत
(9) निर्वेद (उदासीनता)                                  शान्त

रति नामक स्थायी भाव के प्राचीन ग्रन्थों में तीन भेद किये गये हैं–(i) कान्ताविषयक रति (नर-नारी को पारस्परिक प्रेम), (i) सन्ततिविषयक रति और (iii) देवताविषयक रति। अपत्य (सन्तान) विषयक रति की रस-रूप में परिणति करके सूर ने दिखा दी; अतः अब वात्सल्य रस को एक स्वतन्त्र रस की मान्यता प्राप्त हो गयी है। इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी के काव्य-कौशल के फलस्वरूप देवताविषयक रति की भक्ति रस में परिणति होने से भक्ति रस भी एक स्वतन्त्र रस माना जाने लगी है; अतः अब रसों की संख्या ग्यारह हो गयी है–उपर्युक्त नौ तथा
(10) वात्सल्य रसवत्सलता (स्थायी भाव) तथा
(11) भक्ति रस देवताविषयक रति (स्थायी भाव)।

(2) विभाव
स्थायी भाव सामान्यत: सुषुप्तावस्था में रहते हैं, इन्हें जाग्रत एवं उद्दीप्त करने वाले कारणों को विभाव कहते हैं। विभाव निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं

(1) आलम्बन विभाव – जो स्थायी भाव को उद्बुद्ध (जाग्रत) करे वह आलम्बन विभाव कहलाता है। इसके निम्नलिखित दो अंग होते हैं

  • आश्रय – जिस व्यक्ति के हृदय में स्थायी भाव जाग्रत होता है, उसे आश्रय कहते हैं।
  • विषय – जिस वस्तु या व्यक्ति के कारण आश्रय के हृदय में रति आदि स्थायी भाव जाग्रत होते हैं, उसे विषय कहते हैं।

(2) उद्दीपन विभाव – जो जाग्रत हुए स्थायी भाव को उद्दीप्त करे अर्थात् अधिक प्रबल बनाये, वह उद्दीपन विभाव कहलाता है।

उदाहरणार्थ – श्रृंगार रस में प्रायः नायक-नायिका एक-दूसरे के लिए आलम्बन हैं और वने, उपवन, चाँदनी, पुष्प आदि प्राकृतिक दृश्य या आलम्बन के हाव-भाव उद्दीपन विभाव हैं। भिन्न-भिन्न रसों में आलम्बन और उद्दीपन भी बदलते रहते हैं; जैसे—युद्धयात्रा पर जाते हुए वीर के लिए उसका शत्रु ही आलम्बन है; क्योंकि उसके कारण ही वीर के मन में उत्साह नामक स्थायी भाव जगता है और उसके आस-पास बजते बाजे, वीरों की हुंकार आदि उद्दीपन हैं; क्योंकि इनसे उसका उत्साह और बढ़ता है।

(3) अनुभाव
आलम्बन तथा उद्दीपन के द्वारा आश्रय के हृदय में स्थायी भाव के जाग्रत तथा उद्दीप्त होने पर आश्रय में जो चेष्टाएँ होती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं। अनुभाव दो प्रकार के होते हैं – (i) सात्त्विक और (ii) कायिक।

(i) सात्त्विक अनुभाव – जो शारीरिक विकार बिना आश्रय के प्रयास के स्वतः ही उत्पन्न होते हैं, वे सात्त्विक अनुभाव कहलाते हैं। ये आठ होते हैं

  1. स्तम्भ,
  2. स्वेद,
  3.  रोमांच,
  4.  स्वरभंग,
  5. कम्प,
  6.  वैवर्य,
  7. अश्रु एवं
  8. प्रलय (सुध-बुध खोना)।।

(ii) कायिक अनुभाव – इनका सम्बन्ध शरीर से होता है। जो चेष्टाएँ आश्रये अपनी इच्छानुसार जान-बूझकर प्रयत्नपूर्वक करता है, उन्हें कायिक अनुभाव कहते हैं; जैसे – क्रोध में कठोर शब्द कहना, उत्साह में पैर पटकना, कूदना आदि।

(4) संचारी (या व्यभिचारी) भाव
जो भाव स्थायी भावों से उद्बुद्ध (जाग्रत) होने पर इन्हें पुष्ट करने में सहायता पहुँचाने तथा इनके अनुकूल कार्य करने के लिए उत्पन्न होते हैं, उन्हें संचारी (या व्यभिचारी) भाव कहते हैं; क्योंकि ये अपना काम करके तुरन्त स्थायी भावों में ही विलीन हो जाते हैं (संचरण करते रहने के कारण इन्हें संचारी और स्थिर न रहने के कारण व्यभिचारी कहते हैं)।

प्रमुख संचारी भावों की संख्या तैतीस मानी गयी है

  1. निर्वेद (उदासीनता)
  2.  आवेग
  3. दैन्य (दीनता)
  4. श्रम
  5.  मद
  6.  जड़ता।
  7.  औग्य (उग्रता)
  8.  मोह
  9. विबोध (अनुभूति)
  10.  स्वप्न
  11.  अपस्मार (मूच्र्छा)
  12. गर्व
  13. मरण
  14.  आलस्य
  15.  अमर्ष (क्षोभ)
  16.  निद्रा
  17.  अवहित्था (भावगोपन)
  18. औत्सुक्य (उत्सुकता)
  19.  उन्माद
  20.  शंका
  21.  स्मृति
  22.  मति
  23.  व्याधि
  24.  सन्त्रास
  25.  लज्जा
  26.  हर्ष
  27.  असूया (जलन)
  28. विषाद
  29.  धृति (धैर्य)
  30. चपलता
  31. ग्लानि
  32. चिन्ता
  33. वितर्क

संचारी भावों की संख्या असंख्य भी हो सकती है। ये स्थायी भावों को गति प्रदान करते हैं तथा उसे व्यापक रूप देते हैं। स्थायी भावों को पुष्ट करके ये स्वयं समाप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 2:
रस कितने होते हैं? किसी एक रस का लक्षण उदाहरणसहित लिखिए।
उत्तर:
शास्त्रीय रूप से रस निम्नलिखित नौ प्रकार के होते हैं

(1) श्रृंगार रस

(क) परिभाषा – जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से ‘रति’ नामक स्थायी भाव रस रूप में परिणत होता है तो उसे श्रृंगार रस कहते हैं।

(ख) श्रृंगार रस के अवयव

स्थायी भाव – रति।।
आलम्बन (विभाव) – नायक या नायिका।
उद्दीपन (विभाव) – सुन्दर प्राकृतिक दृश्य तथा नायक-नायिका की वेशभूषा, विविध आंगिक चेष्टाएँ (हाव-भाव) आदि।
संचारी ( भाव) – पूर्वोक्त तैतीस में से अधिकांश।
अनुभाव – आश्रय की प्रेमपूर्ण वार्ता, अवलोकन, स्पर्श, आलिंगन, चुम्बन, कटाक्ष, अश्रु, वैवर्य आदि।

(ग) श्रृंगार रस के भेद – श्रृंगार के दो भेद हैं – संयोग और विप्रलम्भ (वियोग)।

संयोग श्रृंगार
संयोगकाल में नायक और नायिका की पारस्परिक रति को संयोग श्रृंगार कहते हैं। संयोग से आशय है – सुख को प्राप्त करना।

उदाहरण –                               राम कौ रूप निहारति जानकी, कंगन के नग की परछाहीं ।
                                                यातें सबे सुधि भूलि गयी, कर टेकि रहीं पल टारति नाहीं ॥       ( तुलसीदास)

स्पष्टीकरण – यहाँ सीताजी अपने कंगन के नग में पड़ रहे राम के प्रतिबिम्ब को निहारते हुए अपनी सुध-बुध भूल गयीं और हाथ को टेके हुए जड़वत् हो गयीं। इसमें जानकी आश्रये और राम आलम्बन हैं। राम का नग में पड़ने वाला प्रतिबिम्ब उद्दीपन है। रूप को निहारना, हाथ टेकना अनुभाव और हर्ष तथा जड़ता संचारी भाव है।
इस प्रकार विभाव, संचारी भाव और अनुभावों से पुष्ट रति नामक स्थायी भाव संयोग श्रृंगार की अवस्था को प्राप्त हुआ है।

वियोग श्रृंगार

प्रेम में अनुरक्त नायक और नायिका के परस्पर मिलन का अभाव वियोग श्रृंगार कहलाता है।

उदाहरण-                                                    हे खग-मृग, हे मधुकर त्रेनी,
                                                                      तुम देखी सीता मृग नैनी?                                    ( तुलसीदास)

स्पष्टीकरण – यहाँ श्रीराम आश्रय हैं और सीताजी आलम्बन, सूनी कुटिया और वन का सूनापन उद्दीपन हैं। सीताजी की स्मृति, आवेग, विषाद, शंका, दैन्य, मोह आदि संचारी भाव हैं। इस प्रकार विभावानुभावसंचारीभाव के संयोग से रति नामक स्थायी भाव पुष्ट होकर विप्रलम्भ श्रृंगार की रसावस्था को प्राप्त हुआ है।

(2) हास्ये रस

(क) परिभाषा – जब किसी वस्तु या व्यक्ति के विकृत आकार, वेशभूषा, वाणी, चेष्टा आदि से व्यक्ति को बरबस हँसी आ जाए तो वहाँ हास्य रस है।

(ख) हास्य रस के अवयव
स्थायी भाव – हास।
आलम्बन (विभाव) – विचित्र-विकृत चेष्टाएँ, आकार, वेशभूषा।
उद्दीपन (विभाव)—आलम्बन की अनोखी बातचीत, आकृति।
अनुभाव – आश्रय की मुस्कान, अट्टहास।।
संचारी भाव – हर्ष, चपलता, उत्सुकता आदि।

उदाहरण

नाना वाहन नाना वेषा। बिहँसे सिव समाज निज देखा ॥
कोउ मुख-हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद-कर कोउ बहु पद-बाहू ॥     

 ( तुलसीदास)

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में स्थायी भाव हास के आलम्बन-शिव समाज, आश्रय-शिव, उद्दीपन-विचित्र वेशभूषा, अनुभाव-शिवजी का हँसना तथा संचारी भाव-रोमांच, हर्ष, चापल्य आदि। इनसे पुष्ट हुआ हास नामक स्थायी भाव हास्य-रसावस्था को प्राप्त हुआ है।

(3) करुण रस

(क) परिभाषा – किसी प्रिय वस्तु या वस्तु के विनाश से या अनिष्ट की प्राप्ति से करुण रस की निष्पत्ति होती

(ख) करुण रस के अवयव
स्थायी भाव – शोक।
आलम्बन (विभाव) – विनष्ट वस्तु या व्यक्ति।
उद्दीपन (विभाव)-इष्ट के गुण तथा उनसे सम्बन्धित वस्तुएँ।
अनुभाव – रुदने, प्रलाप, मूच्र्छा, छाती पीटना, नि:श्वास, उन्माद आदि।
संचारी भाव – स्मृति, मोह, विषाद , जड़ता, ग्लानि, निर्वेद आदि।
उदाहरण

जो भूरि भाग्य भरी विदित थी निरुपमेय सुहागिनी।
हे हृदयवल्लभ ! हूँ वही अब मैं महा हतभागिनी ॥
जो साथिनी होकर तुम्हारी थी अतीव सनाथिनी।।
है अब उसी मुझ-सी जगत् में और कौन अनाथिनी ॥             

( जयद्रथ-वध)

स्पष्टीकरण – अभिमन्यु की मृत्यु पर उत्तरा के इस विलाप में उत्तरा–आश्रय और अभिमन्यु की मृत्यु-आलम्बन है, पति के वीरत्व आदि गुणों का स्मरण-उद्दीपन है। अपने विगत सौभाग्य की स्मृति एवं दैन्य-संचारी भाव तथा (उत्तरा का) क्रन्दन–अनुभाव है। इनसे पुष्ट हुआ शोक नामक स्थायी भाव केरुण-रसावस्था को प्राप्त हुआ है।

वियोग श्रृंगार तथा करुण रस में अन्तर – वियोग श्रृंगार तथा करुण रस में मुख्य अन्तर प्रियजन के वियोग को होता है। वियोग श्रृंगार में बिछुड़े हुए प्रियजन से पुनः मिलन की आशा बनी रहती है; परन्तु करुण रस में इस प्रकार के मिलन की कोई सम्भावना नहीं होती।

(4) वीर रस

(क) परिभाषा – शत्रु की उन्नति, दीनों पर अत्याचार या धर्म की दुर्गति को मिटाने जैसे किसी विकट या दुष्कर कार्य को करने का जो उत्साह मन में उमड़ता है, वही वीर रस का स्थायी भाव है, जिसकी पुष्टि होने पर वीर रस की सिद्धि होती है।

(ख) वीर रस के अवयव

स्थायी भाव – उत्साह।
आलम्बन (विभाव) – अत्याचारी शत्रु।
उद्दीपन (विभाव) – शत्रु का अहंकार, रणवाद्य, यश की इच्छा आदि।
अनुभाव – गर्वपूर्ण उक्ति, प्रहार करना, रोमांच आदि।
संचारी भाव – आवेग, उग्रता, गर्व, औत्सुक्य, चपलता आदि।।

उदाहरण

मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे।
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा मानो मुझे ॥
है और की तो बात क्या, गर्व मैं करता नहीं।
मामा तथा निज तात से भी युद्ध में डरता नहीं ।। (मैथिलीशरण गुप्त)

स्पष्टीकरण – अभिमन्यु का यह कथन अपने सारथी के प्रति है। इसमें कौरव-आलम्बन, अभिमन्यु–आश्रय, चक्रव्यूह की रचना–उद्दीपन तथा अभिमन्यु के वाक्य–अनुभाव हैं। गर्व, औत्सुक्य, हर्ष आदि संचारी भाव हैं। इन सभी के संयोग से वीर रस की निष्पत्ति हुई है।

(5) रौद्र रस

(क) परिभाषा – अपना अपमान, बड़ों की निन्दा या उनका अपकार, शत्रु की चेष्टाओं तथा शत्रु या किसी दुष्ट अत्याचारी द्वारा किये गये अत्याचारों को देखकर अथवा गुरुजनों की निन्दा आदि सुनकर उत्पन्न हुए अमर्ष (क्रोध) के पुष्ट होने पर रौद्र रस की सिद्धि होती है।

(ख) रौद्र रस के अवयव
स्थायी भाव – क्रोध।।
आलम्बन (विभाव) – अनुचित व्यवहार करने वाला, विपक्षी।
उद्दीपन (विभाव) – विपक्षी की अनुचित बात और कार्य।
अनुभाव – दाँत पीसना, भौंहें चढ़ाना, मुख लाल होना, गर्जन, कम्प आदि।
संचारी भाव – उग्रता, मद, आवेग, अमर्ष, उद्वेग आदि।

उदाहरण (1) –  भाखे लखनु कुटिल भई भौंहें। रदपट फरकट नयन रिसौहें।
स्पष्टीकरण – इसमें सीता स्वयंवर में जनक के अपमानजनक कटु वचन–उद्दीपन, अमर्ष-संचारी तथा लक्ष्मण की भौंहें टेढ़ी होना, होंठ फड़कना, आँखें लाल होना–अनुभाव हैं। इनसे पुष्ट अमर्ष नामक स्थायी भाव रौद्र-रसावस्था को प्राप्त हुआ है।

उदाहरण (2) – उस काल मारे क्रोध के, तन काँपने उनका लगा।
मानो हवा के वेग से, सोता हुआ सागर जगा ।।

स्पष्टीकरण – प्रस्तुत पद्यांश में अभिमन्यु के वध का समाचार सुनकर अर्जुन के क्रोध का वर्णन किया गया है। इसमें स्थायी भाव-क्रोध, आश्रय–अर्जुन, विभाव–अभिमन्यु का वध, अनुभाव – मुख लाल होना एवं शरीर काँपना तथा संचारी भाव-उग्रता से पुष्ट रौद्र रस की अभिव्यक्ति हुई है।

(6) भयानक रस

(क) परिभाषा – किसी भयजनक वस्तु को देखने, घोर अपराध करने पर दण्डित होने के विचार, शक्तिशाली शत्रु या विरोधी के सामना होने की आशंका से उत्पन्न भय के पुष्ट होने पर भयानक रस की सिद्धि होती है।

(ख) भयानक रस के अवयव

भाव – भय।।
आलम्बन (विभाव) – शेर, सर्प, चोर, शून्य स्थान, भयंकर वस्तु आदि।।
उद्दीपन (विभाव) – भयंकर दृश्य, निर्जनता, हिंसक जीवों की भयानक चेष्टाएँ आदि।
अनुभाव – कम्पन, रोमांच, मूच्र्छा, पलायन, पसीना छूटना आदि।
संचारी भाव – चिन्ता, सम्भ्रम, दैन्य, त्रास, सम्मोह।

उदाहरण – लंका की सेना तो कपि के गर्जन-रव से काँप गयी।
हनूमान् के भीषण दर्शन से विनाश ही भाँप गयी।
उस कंपित शंकित सेना पर कपि नाहर की मार पड़ी।
त्राहि-त्राहि शिव त्राहि-त्राहि की चारो ओर पुकार पड़ी।

स्पष्टीकरण – यहाँ स्थायी भाव भय है। लंका की सेना – आश्रय और हनुमान्-आलम्बन हैं। गर्जन-रव और भीषण दर्शन – उद्दीपन हैं। काँपना तथा त्राहि-त्राहि करना-अनुभाव हैं। शंका, चिन्ता, सन्त्रास आदि संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट भय नामक स्थायी भाव भयानक रस की अवस्था को प्राप्त हुआ है।

(7) वीभत्स रस

(क) परिभाषा – गन्दी, घोर अरुचिकर, घृणित वस्तुओं; जैसे-पीव, हड्डी, रक्त, चर्बी, मांस, उनकी दुर्गन्ध आदि के वर्णन से मन में जो जुगुप्सा (घृणा) जगती है, वही पुष्ट होकर वीभत्स रस की स्थिति प्राप्त करती है।।

(ख) वीभत्स रस के अवयव
स्थायी भाव – जुगुप्सा या घृणा।
आलम्बन (विभाव) – घृणित व्यक्ति या दृश्य। उद्दीपन (विभाव)-कुरूपती, दुर्गन्ध, जानवरों द्वारा खाल खींचना, घायलों का कराहना आदि।
अनुभाव – नाक सिकोड़ना, मुंह फेर लेना, आँख बन्द कर लेना आदि।
संचारी भाव – ग्लानि, आवेग, व्याधि, चिन्ता, शंका, जड़ता आदि।

उदाहरण – सिर पर बैठ्यौ काग, आँखि दोउ खात निकारत।
खींचत जीवहिं स्यार, अतिहि आनँद उर धारत ॥
गिद्ध जाँघ कोह खोदि-खोदि कै मांस उपारत।
स्वान आँगुरिन काटि-कोटि कै खात बिदारत ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ श्मशान का दृश्य-आलम्बन और जुगुप्सा स्थायी भाव का आश्रय पाठक है। कौवे, सियार, गिद्ध और कुत्ते द्वारा शव को खाया जाना – उद्दीपन है। यहाँ अनुभाव-विभावादि से पुष्ट जुगुप्सा
नामक स्थायी भाव की वीभत्स रस में व्यंजना हुई है।

(8) अदभुत रस

(क) परिभाषा – किसी असाधारण वस्तु या कार्य को देखकर हमारे मन में जो विस्मय होता है, वही पुष्ट होकर अदभुत रस में परिणत हो जाता है।

(ख) अद्भुत रस के अवयव
स्थायी भाव – विस्मय।
आलम्बन (विभाव) – आश्चर्ययुक्त अलौकिक वस्तु या व्यक्ति।
उद्दीपन (विभाव) – आश्चर्ययुक्त वस्तु या व्यक्ति के दर्शन या श्रवण।
अनुभाव – विस्मय से आँख फाड़कर देखना, दाँतों तले अँगुली दबाना, गद्गद होना, रोमांच, कम्प, स्वेद।
संचारी भाव – उत्सुकता, आवेग, हर्ष, जड़ता, मोह।

उदाहरण – बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु कर्म करै बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।

स्पष्टीकरण – यहाँ स्थायी भाव-विस्मय, उक्त काव्य-पंक्तियाँ—आलम्बन तथा पाठक- आश्रय है। बिना शरीर के कार्य सम्पन्न होना–उद्दीपन है। इस प्रकार विस्मय स्थायी भाव, विभावादि से पुष्ट होकर वीभत्स रस की व्यंजना करा रहा है।

(9) शान्त रस

(क) परिभाषा – संसार की क्षणभंगुरता एवं सांसारिक विषय-भोगों की असारता तथा परमात्मा के ज्ञान से उत्पन्न निर्वेद (वैराग्य) ही पुष्ट होकर शान्त रस में परिणत होता है।

(ख) शान्त रस के अवयव

स्थायी भाव – निर्वेद (उदासीनता)।
आलम्बन (विभाव) – संसार की क्षणभंगुरती, परमात्मा का चिन्तन आदि।
उद्दीपन (विभाव) – सत्संग, शास्त्रों का अनुशीलन, तीर्थ-यात्रा आदि।
अनुभाव – अश्रुपात, पुलक, संसारभीरुता, रोमांच आदि।
संचारी भाव – हर्ष, स्मृति, धृति, निर्वेद, विबोध, उद्वेग आदि।

उदाहरण –                      मन पछितैहैं अवसर बीते।
दुर्लभ देह पाई हरिपद भजु, करम वचन अरु होते ॥
अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़-त्यागु दुरासा जीते ॥
बुझे न काम अगिनी तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ तुलसी (या पाठक)–आश्रय हैं; संसार की असारता-आलम्बन; अपना मनुष्य जन्म व्यर्थ होने की चिन्ता–उद्दीपन; मति-धृति आदि संचारी एवं वैराग्यपरक वचन–अनुभाव हैं। इनसे मिलकर शान्त रस की निष्पत्ति हुई है।

(10) वात्सल्य रस

(क) परिभाषा – बालकों के प्रति बड़ों का जो स्नेह होता है, वही वत्सले (अपत्यविषयक रति) है, जो पुष्ट होकर वात्सल्य रस में परिणत होता है।

(ख) वात्सल्य रस के अवयव

स्थायी भाव – वत्सलता, स्नेह।
आलम्बन (विभाव) – पुत्र, शिशु एवं शिष्य।
उद्दीपन (विभाव)-बाल चेष्टाएँ, तुतलाना, घुटनों के बल चलना, हठ करना आदि।
अनुभाव – गोद लेना, झुलाना, दुलारना, थपथपाना आदि।
संचारी भाव – हर्ष, मोह, गर्व, चिन्ता, शंका, आवेग।।

उदाहरण –                    स्याम गौर सुंदर दोऊ जोरी। निरखहिं छवि जननी तृन तोरी ॥
कबहूँ उछंग कबहुँ वर पलना। मातु दुलारईं कहि प्रिय ललना ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ शिशु राम और उनके भाई-आलम्बन और माताएँ – आश्रय हैं। शिशुओं की सुन्दरता, वेशभूषा एवं घुटनों और हाथों के बल चलना – उद्दीपन है। माताओं का तृण तोड़कर देखना, गोद में लेना, पालने में झुलाना, दुलारनी–अनुभाव हैं। तृण तोड़ने में बच्चों को नजर लगने से बचाने का भाव उत्पन्न होने से शंका–संचारी है। इसमें हर्ष और गर्व – संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट होकर वत्सल स्थायी भाव वात्सल्य रस की अवस्था को प्राप्त हुआ है।

(11) भक्ति रस

(क) परिभाषा – देवताविषयक रति (भगवान् के प्रति अनन्य प्रेम) ही परिपुष्ट होकर भक्ति रस में परिणत हो जाती है।

(ख) भक्ति रस के अवयव

स्थायी भाव – देवताविषयक रति।।
आलम्बन (विभाव) – ईश्वर, देवता, राम, कृष्ण आदि।
उद्दीपन (विभाव)-सत्संग, ईश्वर के अद्भुत क्रिया-कलाप, भक्तों का समागम आदि।
अनुभाव – भजन-कीर्तन, ईश्वर का गुणगान, गद्गद होना।
संचारी भाव – निर्वेद, हर्ष, स्मृति, पुलक, मति, वितर्क आदि।

उदाहरण-                           पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥

स्पष्टीकरण – यहाँ श्रीभरत जी-आश्रय एवं श्रीरघुनाथ जी-आलम्बन हैं। श्रीराम के स्वरूप एवं गुणों का ध्यान – उद्दीपन है; पुलक गात – संचारी हैं; शरीर का पुलकित होना, नेत्रों से अश्रु बहना एवं जिह्वा से निरन्तर नामजप होना-अनुभाव हैं। इस प्रकार पुष्ट हुई भगवद् विषयक रति (स्थायी) भाव ही भक्ति रस की अवस्था को प्राप्त होती है।

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