UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो
Number of Questions 106
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

पत्र/पत्रिका विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘प्रजा हितैषी’ नाम के पत्र का प्रकाशन किया
या
‘प्रजा हितैषी’ समाचार-पत्र निकालने वाले हिन्दी सेवी थे
(क) राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द’ ने
(ख) राजा लक्ष्मण सिंह ने
(ग) बाबू नवीनचन्द्र राय ने
(घ) सुखयाल शास्त्री ने

(2) ‘आनन्द कादम्बिनी’ नामक पत्रिका के सम्पादक थे
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन
(ग) राय कृष्णदास
(घ) धर्मवीर भारती

(3) बालकृष्ण भट्ट द्वारा सम्पादित पत्रिका है
(क) हिन्दी प्रदीप
(ख) इन्दु
(ग) माधुरी
(घ) प्रभा

(4) निम्नलिखित में से ‘ब्राह्मण’ पत्रिका के सम्पादक कौन हैं?
(क) बालकृष्ण भट्ट
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) प्रतापनारायण मिश्र
(घ) श्यामसुन्दर दास

(5) निम्नलिखित में से पत्रिका नहीं है
(क) सरस्वती
(ख) इन्दु
(ग) आनन्द कादम्बिनी
(घ) भारत दुर्दशा

(6) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने किस पत्रिका का सम्पादन किया?
(क) इन्दु
(ख) आनन्द कादम्बिनी
(ग) सरस्वती
(घ) हिन्दी प्रदीप

(7) साहित्य सन्देश’ पत्रिका के सम्पादक थे
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) गुलाब राय
(घ) राजेन्द्र यादव

(8) प्रेमचन्द किस पत्रिका के सम्पादक थे?
(क) सरस्वती
(ख) हिन्दी प्रदीप
(ग) चाँद
(घ) हंस

(9) ‘सरस्वती’ के प्रथम सम्पादक हैं
(क) महावीर प्रसाद द्विवेदी (सन् 1903 से)
(ख) श्यामसुन्दर दास (सन् 1903 तक)
(ग) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
(घ) हरदेव बाहरी

(10) ‘माधुरी’ पत्रिका किस युग से सम्बन्धित है?
(क) शुक्ल युग
(ख) शुक्लोत्तर युग
(ग) द्विवेदी युग
(घ) भारतेन्दु युग

(11) ‘हिन्दी प्रदीप’ के सम्पादक हैं
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) राधाकृष्ण दास

उत्तर (1) ख, (2) ख, (3) क, (4) ग, (5) घ, (6) ग, (7) ग, (8) घ, (9) के, (10) ग, (11) ग।

नाटक विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘रणधीर’ और ‘प्रेम मोहिनी’ नाट्य कृतियों के नाटककार हैं
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) बालकृष्ण भट्टं.
(घ) लाला श्रीनिवास दास

(2) ‘कल्याणी-परिणय’ और ‘धुवस्वामिनी’ कृतियों के कृतिकार हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) हरिकृष्ण प्रेमी
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) गोविन्दवल्लभ पन्त

(3) ‘स्वर्णविहीन’, ‘रक्षाबन्धन’, ‘प्रतिशोध’ के रचयिता हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) हरिकृष्ण प्रेमी’
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) लक्ष्मीनारायण मिश्र

(4) ‘संन्यासी’ और ‘मुक्ति का रहस्य’ के रचयिता हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) हरिकृष्ण प्रेमी
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) लक्ष्मीनारायण मिश्र

(5) निम्ननिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना नाटक है?
(क) नमक का दारोगा
(ख) गोदान
(ग) आखिरी चट्टान तक
(घ) राजमुकुट

(6) ‘नाटक’ विद्या पर आधारित रचना नहीं है
(क) सीता की माँ
(ख) लहरों के राजहंस
(ग) अपना-अपना भाग्य।
(घ) आने का मान

(7) निम्नलिखित रचनाओं में कौन-सी रचना नाटक है?
(क) सन्नाटा
(ख) निन्दा रस,
(ग) गरुड़ध्वज
(घ) राष्ट्र का स्वरूप

(8) ‘सूतपुत्र’ किस विधा की रचना है?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) संस्मरण

(9) निम्नलिखित में से नाटक है
(क) अन्धा युग
(ख) उसने कहा था
(ग) आँसू :
(घ) कलम का सिपाही

(10) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना नाटक है?
(क) मजदूरी और प्रेम
(ख) रस-मीमांसा
(ग) पाप और प्रकाश
(घ) भारत की एकता

(11) ‘भारत-दुर्दशा’ किसे विधी की रचना है?
(क) नाटक
(ख) उपन्यास
(ग) एकांकी।
(घ) कहानी

(12) प्रसादोत्तरकाल की नाटक है-
(क) लहरों के राजहंस
(ख) करुणालय
(ग) भारतजननी
(घ) जनमेजय का नागयज्ञ ।

उत्तर (1) घ, (2) क, (3) ख, (4) घ, (5) घ, (6) ग, (7) ग, (8) गे, (9) क, (10) ग, (11) क, (12) का

एकांकी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘एक घूट’ को हिन्दी का प्रथम एकांकी मानते हैं। इसके रचयिता हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) उदयशंकर भट्ट

(2) ‘पृथ्वीराज की आँखें’ एकांकी संग्रह के एकांकीकार हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) सेठ गोविन्ददास

(3) ‘बहू की विदा’ एकांकी के रचयिता हैं
(क) सेठ गोविन्ददास
(ख) हरिकृष्ण प्रेमी
(ग) मोहन राकेश
(घ) विनोद रस्तोगी

(4) एकांकी-सम्राट कहा जाता है
(क) रामकुमार वर्मा को
(ख) सेठ गोविन्ददास को
(ग) हरिकृष्ण प्रेमी को
(घ) मोहन राकेश को

उत्तर (1) क, (2) ग, (3) घ, (4) का

कहानी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) हिन्दी की प्रथम कहानी के नाम से जानी जाती है
(क) दुलाईवाली
(ख) इन्दुमती
(ग) प्लेग की चुडैल
(घ) ग्यारह वर्ष का समय

(2) आधुनिक ढंग की कहानियों का प्रारम्भ किस पत्रिका के प्रकाशन-काल से माना जाता है?
(क) सरस्वती,
(ख) माधुरी
(ग) इन्दु
(घ) मर्यादा

(3) हिन्दी गद्य की कालजयी कहानी उसने कहा था’ के लेखक हैं
(क) चन्द्रधर शर्मा गुलेरी’
(ख) प्रेमचन्द
(ग) सुदर्शन
(घ) जयशंकर प्रसाद

(4) द्विवेदी युग के जासूसी कहानीकारों में अग्रगण्य हैं
(क) गिरिजाकुमार घोष
(ख) गोपालराम गहमरी
(ग) किशोरीलाल गोस्वामी
(घ) बंग महिला

(5) निम्नलिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना कहानी है?
(क) त्यागपत्र
(ख) भाग्य और पुरुषार्थ
(ग) पुरस्कार
(घ) आन का मान

(6) कहानियों के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित कहानीकार प्रेमचन्द के कहानियों के संकलन प्रकाशित हुए हैं
(क) क्षीरसागर’ शीर्षक से
(ख) “मानसरोवर’ शीर्षक से
(ग) “मानसागर’ शीर्षक से
(घ) कथा-संग्रह’ शीर्षक से

(7) ‘ग्राम’, ‘आकाशदीप’, ‘गुण्डा’, ‘चित्रमन्दिर’, ‘आँधी’, ‘सलीम’, ‘मधुआ’ आदि कहानियाँ किस कहानीकार द्वारा रचित हैं?
(क) भगवतीचरण वर्मा
(ख) उपेन्द्रनाथ अश्क
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) प्रेमचन्द

(8) ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’, ‘प्रायश्चित्त’, ‘विक्टोरिया क्रॉस’ कहानियाँ किस कहानीकार द्वारा रचित हैं?
(क) उपेन्द्रनाथ अश्क’
(ख) भगवतीचरण वर्मा
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) प्रेमचन्द

(9) ‘धर्मयुद्ध’, ‘फूल की चोरी’, ‘चार आने’, ‘अभिशप्त’, ‘कर्मफल’, ‘परदा’, ‘फूलों का कुर्ता’ किस कहानीकार द्वारा रचित प्रसिद्ध कहानियाँ हैं?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) यशपाल
(ग) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(घ) प्रेमचन्द

(10) मुरदा सराय’, ‘केवड़े का फूल’, ‘पापजीवी’, ‘हाथ का दाग’ किस कथाकार की श्रेष्ठ रचनाएँ हैं?
(क) अमरकान्त
(ख) यशपाल
(ग) शिवप्रसाद सिंह
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(11) निम्नलिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना कहानी है?
(क) शेष स्मृतियाँ
(ख) पंचलाइट
(ग) कुटज
(घ) आन का मान

(12) निम्नलिखित रचनाओं में कौन-सी रचना कहानी है?
(क) हंस
(ख) उसने कहा था
(ग) निर्मला
(घ) ध्रुवस्वामिनी

(13) निम्नलिखित रचनाओं में कौन-सी रचना कहानी है?
(क) कुटज
(ख) आखिरी चट्टाने तक
(ग) शिक्षा का उद्देश्य
(घ) पुरस्कार

(14) निम्नलिखित रचनाओं में कौन-सी रचना कहानी नहीं है?
(क) पुरस्कार
(ख) वसीयत
(ग) सती
(घ) आचरण की सभ्यता

(15) प्रेमचन्द के समकालीन कहानीकार हैं
(क) अम्बिकादत्त व्यास
(ख) चण्डीप्रसाद सिंह ‘हृदयेश
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) माधव प्रसाद मिश्र

(16) ‘पंचलाइट’ के लेखक हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) फणीश्वरनाथ रेणु
(ग) यशपाल
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(17) ‘बहादुर’ नामक कहानी के कहानीकार हैं
(क) फणीश्वरनाथ रेणु
(ख) अमरकान्त
(ग) जैनेन्द्र कुमार
(घ) शिवप्रसाद सिंह

(18) ‘लेग की चुडैल गद्य की किस विधा की रचना है?
(क) नाटक
(ख) एकांकी
(ग) कहानी
(घ) उपन्यास

(19) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की प्रसिद्ध कहानी है|
(क) पंचलाइट
(ख) उसने कहा था
(ग) पुरस्कार
(घ) आत्माराम

उत्तर (1) ख, (2) के, (3) क, (4) ख, (5) ग, (6) ख, (7) ग, (8) ख, (9) ख, (10) म, (11) ख, (12) ख, (13) घ, (14) घ, (15) ख तथा ग, (16) ख, (17) ख, (18) ग, (19) ख।

उपन्यास विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है
(क) परीक्षा-गुरु
(ख) भूतनाथ
(ग) चन्द्रकान्ता
(घ) सेवासदन

(2) ‘भाग्यवती’ को हिन्दी का प्रथम सामाजिक उपन्यास माना जाता है। इसके लेखक थे
(क) नवीनचन्द्र राय
(ख) गोपालराम गहमरी
(ग) श्रद्धाराम फुल्लौरी
(घ) देवकीनन्दन खत्री।

(3) हिन्दी उपन्यासों की विकास-परम्परा का अध्ययन किस लेखक के नाम से विभाषित करके किया जाता है?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) प्रेमचन्द
(ग) जैनेन्द्र कुमार
(घ) यशपाल

(4) लिनलिखित उपन्यासकारों में से कौन आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में आते हैं।
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) फणीश्वरनाथ रेणु’
(ग) रांगेय राघव
(घ) अमृतलाल नागर

(5) आधुनिक काल की महिला उपन्यास-लेखिका हैं
(क) महादेवी वर्मा
(ख) सुभद्रा कुमारी चौहान्
(ग) मीराबाई
(घ) मन्नू भण्डारी

(6) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना उपन्यास नहीं है?
(क) गबने
(ख) अशोक के फूल
(ग) तितली
(घ) परीक्षा-गुरु

(7) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना उपन्यास है?
(क) कामायनी
(ख) गोदाने
(ग) साकेत
(घ) स्कन्दगुप्त

(8) निम्नलिखित में से कौन-सा उपन्यास प्रेमचन्द का है?
(क) तितली
(ख) सुनीता
(ग) गोदान
(घ) बाणभट्ट की आत्मकथा

(9) उपन्यास विधा की रचना है
(क) नीड़ का निर्माण फिर
(ख) बाणभट्ट की आत्मकथा
(ग) कलम का सिपाही
(घ) पथ के साथी

(10) रामवृक्ष बेनीपुरी का उपन्यास है|
(क) सप्त सिंधु
(ख) पतितों के देश में
(ग) सिंह सेनापति
(घ) विवर्त

(11) ‘मैला आँचल’ रचना है
(क) महावीर प्रसाद द्विवेदी की
(ख) अज्ञेय की
(ग) फणीश्वरनाथ रेणु’ की
(घ) सरदार पूर्णसिंह की

उत्तर (1) क, (2) ग, (3) ख, (4) ख, (5) घ, (6) ख, (7) खे, (8) ग, (9) ख, (10) खं, (11) गा।

निबन्धं विधा पर आधारित

चित विकल्प का चयन कीजिए

(1) निम्नलिखित में से कौन भारतेन्दुयुगीन निबन्धकार नहीं हैं?
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) बालमुकुन्द गुप्त
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(2) लाला श्रीनिवास दास और राधाचरण गोस्वामी किस युग के निबन्धकार हैं?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) शुक्ल युग
(घ) शुक्लोत्तर युग

(3) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीयुगीन निबन्धकार नहीं हैं?
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) बाबू गुलाबराय
(घ) सियारामशरण गुप्त

(4) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ किस युग के निबन्धकार हैं?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) शुक्ल युग
(घ) शुक्लोत्तर युगे

(5) ‘चिन्तामणि’ शीर्षक निबन्ध-संग्रह में शुक्ल युग के किस निबन्धकार के निबन्धसंकलित हैं।
(क) जयशंकर प्रसाद,
(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) सम्पूर्णानन्द

(6) श्रीराम शर्मा और राहुल सांकृत्यायन किस युग के निबन्धकार हैं?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) शुक्ल युग
(घ) शुक्लोत्तरे युग

(7) ‘अशोक के फूल’ और ‘कुटंज’ के रचनाकार हैं
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) मोहन राकेश
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर
(घ) कुबेरनाथ राय

(8) ‘रस-मीमांसा’ के रचयिता हैं
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) रघुवीर सिंह
(ग) डॉ० नगेन्द्र
(घ) रामचन्द्र शुक्ल

(9) इनमें से कौन शुक्लोत्तर युग के निबन्धकार नहीं हैं?
(क) डॉ० नगेन्द्र
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) नन्ददुलारे वाजपेयी

(10) निम्नलिखित में से कौन हास्य-व्यंग्य प्रधान निबन्धों के रचनाकार नहीं हैं।
(क) श्रीनारायण चतुर्वेदी
(ख) हरिशंकर परसाई
(ग) शरद जोशी
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल

(11) युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखक हैं
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(12) ‘चिन्तामणि’ और ‘राष्ट्र को स्वरूप’ किस गद्य विधा की रचना है?
(क) संस्मरण
(ख) कहानी
(ग) निबन्ध
(घ) उपान्यस

(13) आचार्य रामचन्द्र शुक्ले के अनन्तर समर्थ निबन्धकार/आलोचक हैं
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) लाला श्रीनिवास
(गे) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) डॉ० नगेन्द्र

(14) ‘तुम चन्दन हम पानी’ किस विधा की रचना है?
(क) नाटक
(ख) संस्मरण
(ग) आत्मकथा
(घ) निबन्ध

(15) निम्नलिखित में से किसे ललित निबन्धकार माना जाता है?
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) कुबेरनाथ राय
(घ) रामचन्द्र शुक्ल

उत्तर (1) घ, (2) क, (3) घ, (4) ख, (5) ग, (6) ग, (7) क, (8) घ, (9) ख, (10) घ, (11) ख, (12) ग, (13) घ, (14) घ, (15) ग।

आलोचना विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) हिन्दी नवरत्न’ नामक आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह के रचयिता हैं
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) मिश्रबन्धु
(घ) मोहन राकेश

(2) डॉ० नगेन्द्र प्रसिद्ध हैं।
(क) ‘आत्मकथा लेखन के लिए
(ख) ‘यात्रावृत्त के लिए
(ग) गद्यगीत के लिए
(घ) “आलोचना’ के लिए,

(3) आलोचना के क्षेत्र में सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं
(क) मिश्रबन्धु
(ख) गुलाबराय
(ग) सुदर्शन
(घ) रामचन्द्र शुक्ल

उत्तर (1) ग, (2) घ, (3) घ।

आत्मकथा विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘क्या भूलें क्या याद कौं’ तथा ‘नीड़ का निर्माण फिर’ (हरिवंशराय बच्चन’)किस विधा की रचना है?
(क) आत्मकथा
(ख) जीवनी
(ग) संस्मरण
(घ) कहानी

(2) ‘नीड़ का निर्माण फिर’ किस लेखक की रचना है?
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) डॉ० हरिवंशराय बच्चन
(ग) सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’
(घ) विष्णु प्रभाकर

(3) निम्नलिखित रचनाओं में कौन-सी रचना ‘आत्मकथा’ है?
(क) सिंहावलोकन
(ख) मेरी कॉलेज डायरी
(ग) साहित्य-साधना
(घ) जीवन और साहित्य

(4) ‘अपनी खबर’ (पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’) किस विधा की रचना है?
(क) निबन्ध
(ख) आत्मकथा
(ग) उपन्यास
(घ) कहानी

(5) ‘मेरी असफलताएँ’ (बाबू गुलाबराय) किस विधा की रचना है?
(क) जीवनी-साहित्य
(ख) कहानी
(ग) डायरी
(घ) आत्मकथा

(6) वियोगी हरि कृत ‘मेरा जीवन प्रवाह’ किस विधा की रचना है?
(क) जीवनी
(ख) आत्मकथा
(ग) संस्मरण
(घ) कहानी

(7) ‘अन्या से अनन्या’ आत्मकथा के लेखक हैं
(क) मैत्रेयी पुष्पा
(ख) वियोगी हरि
(ग) प्रभा खेतान
(घ) गुलाबराय

उत्तर (1) क, (2) ख, (3) क, (4) ख, (5) घ, (6) ख, (7) ग।

जीवनी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘आवारा मसीहा’ (शरत्चन्द्र की जीवनी) के रचयिता कौन हैं?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) रांगेय राघव
(ग) विष्णु प्रभाकर
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(2) ‘कलम का सिपाही’ (प्रेमचन्द की जीवनी) के रचयिता कौन हैं?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) रांगेय राघव
(ग) अमृतराय
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(3) ‘निराला की साहित्य-साधना'( सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की जीवनी) के लेखक हैं
(क) रामविलास शर्मा
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) शान्ति जोशी
(घ) अमृतराय

(4) मनीषी की लोकयात्रा’ (गोपीनाथ कविराज की जीवनी) के लेखक हैं|
(क) रामविलास शर्मा
(ख) भगवतीप्रसाद सिंह
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी
(घ) रामनरेश त्रिपाठी

(5) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना जीवनी नहीं है?
(क) कलम का सिपाही
(ख) निराला की साहित्य-साधना
(ग) मेरा जीवन प्रवाह
(घ) आवारा मसीहा

(6) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना जीवनी है?
(क) अतीत के चलचित्र
(ख) चिन्तामणि
(ग) नीड़ का निर्माण फिर
(घ) आवारा मसीहा
उत्तर:
(1) ग, (2) ग, (3) क, (4) ख, (5) ग, (6) घ।

संस्मरण/रेखाचित्र विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) निम्नलिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना ‘रेखाचित्र’ है?
(क) नीरजा
(ख) जयसन्धि
(ग) स्मृति की रेखाएँ
(घ) बिखरे फल

(2) ‘मेरा परिवार’ किस विधा की रचना है?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) गद्यगीत
(घ) संस्मरण

(3) निम्नलिखित में कौन-सी रचना रेखाचित्र है?
(क) रेशमी टाई
(ख) मैला आँचल
(ग) लहरों के राजहंस
(घ) अतीत के चलचित्र

(4) ‘पथ के साथी’ की रचना किस विधा में की गयी है?
(क) उपन्यास
(ख) कहानी
(ग) जीवनी
(घ) संस्मरण

(5) रेखाचित्र के लेखक हैं
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी –

उत्तर (1) ग, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) ग।

विविध प्रश्

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) हिन्दी गद्य की विधा नहीं है
(क) निबन्ध
(ख) आलोचना
(ग) कहानी
(घ) खण्डकाव्य

(2) ज्योतिरीश्वर की रचना ‘वर्ण रलाकर’ की भाषा है
(क) राजस्थानी गद्य
(ख) मैथिली गद्य
(ग) ब्रजभाषा गद्य
(घ) खड़ी बोली गद्य

(3) ‘वर्ण रत्नाकर’ का रचनाकाल है
(क) चौदहवीं शताब्दी
(ख) पन्द्रहवीं शताब्दी
(ग) सोलहवीं शताब्दी
(घ) इनमें से कोई नहीं

(4) ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना में निम्नलिखित लेखकों में से किसका योगदान नहीं है?
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) रामनारायण मिश्र
(घ) शिवकुमार सिंह

(5) ‘अंग्रेजी के स्केच’ का रूपान्तरण है
(क) जीवनी
(ख) भेटवार्ता
(ग) रेखाचित्र
(घ) रिपोर्ताज

(6) ‘चिद्विलास’ के लेखक हैं
(क) रामकुमार वर्मा
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) मोहन राकेश

(7) ‘डायरी’ विधा के लेखक हैं
(क) शमशेर बहादुर सिंह
(ख) राहुल सांकृत्यायन
(ग) सदल मिश्र
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(8) छायोत्तर गद्य युग के लेखक हैं
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ग) वियोगी हरि
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(9) पत्रिका से भिन्न रचना
(क) मर्यादा
(ख) सारिका
(ग) वाग्धारा
(घ) विशाल भारत

(10) उपन्यास सम्राट माने जाते हैं
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) प्रेमचन्द
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(11) एकांकी में अंक होते हैं
(क) तीन
(ख) पाँच
(ग) एक
(घ) अनेक

(12) भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी किसे बोली से बनी है?
(क) अवधी से
(ख) ब्रज भाषा से
(ग) खड़ी बोली से
(घ) बुन्देली से

(13) हिन्दी गद्य को नयी चाल में डालने का क्षेय है
(क) हिन्दी प्रदीप को
(ख) हरिश्चन्द्र चन्द्रिका को
(ग) सरस्वती को
(घ) चाँद को

उत्तर (1) घे, (2) खे, (3) क, (4) क, (5) ग, (6) ग, (7) क, (8) ग, (9) गे, (10) ग, (11) ग, (12) ग, 13) ग।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 9 Environment and Sustainable Development

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 9 Environment and Sustainable Development (पर्यावरण और धारणीय विकास) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 9 Environment and Sustainable Development (पर्यावरण और धारणीय विकास).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 9
Chapter Name Environment and Sustainable
Development (पर्यावरण और धारणीय विकास)
Number of Questions Solved 65
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 9 Environment and Sustainable Development (पर्यावरण और धारणीय विकास)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर 

प्रश्न 1.
पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
किसी स्थान विशेष में मनुष्य के आस-पास भौतिक वस्तुओं; जल, भूमि, वायु का आवरण, जिसके द्वारा मानव घिरा रहता है, को पर्यावरण कहते हैं।

प्रश्न 2.
जब संसाधन निस्सरण की दर उनके पुनर्जनन की दर से बढ़ जाती है, तो क्या होता है?
उत्तर
जब संसाधन निस्सरण की दर उनके पुनर्जनन की दर से बढ़ जाती है तो पर्यावरण जीवन पोषण का अपना महत्त्वपूर्ण कार्य जननिक और जैविक विविधता को कायम रखने में असफल हो जाता है। इससे पर्यावरण संकट उत्पन्न होता है।

प्रश्न 3.
निम्न को नवीकरणीय और गैर नवीकरणीय संसाधनों में वर्गीकृत करें—
(क) वृक्ष,
(ख) मछली,
(ग) पेट्रोलियम,
(घ) कोयला
(ङ) लौह-अयस्क तथा
(च) जल।
उत्तर
(क)
वृक्ष — नवीकरणीय
(ख) मछली — 
नवीकरणीय
(ग) पेट्रोलियम– 
अनवीकरणीय
(घ) कोयला — 
अनवकरणीय
(ङ) लौह-अयस्क–
अनवीकरणीय
(च) जल–
नवीकरणीय

प्रश्न 4.
आजकल विश्व के सामने…………..” और “:” की दो प्रमुख पर्यावरण समस्याएँ हैं।
उत्तर
(1) वैश्विक उष्णता
(2) ओजोन अपक्षय।

प्रश्न 5.
निम्न कारक भारत में कैसे पर्यावरण संकट में योगदान करते हैं? सरकार के समक्ष वे कौन-सी समस्याएँ पैदा करते हैं?

सरकार के समक्ष उत्पन्न समस्याएँ

  1. बढ़ती जनसंख्या
  2. वायु प्रदूषण
  3. जल प्रदूषण
  4. सम्पन्न उपभोग मानक
  5. निरक्षरता
  6. औद्योगीकरण
  7. शहरीकरण
  8. वन क्षेत्र में कमी
  9. अवैध वन कटाई
  10. वैश्विक उष्णता।

उत्तर
(1) बढ़ती जनसंख्या-  बढ़ती जनसंख्या पर्यावरण संकट का महत्त्वपूर्ण कारण है। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास हुआ है। विश्व की बढ़ती जनसंख्या के कारण इन संसाधनों पर अतिरिक्त भार के कारण इनकी गुणवत्ता प्रभावित हुई है। इसके अतिरिक्त अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन पर्यावरण की धारणीय क्षमता से बाहर हो गया है।

(2) वायु प्रदूषण- वायु में ऐसे बाह्य तत्वों की उपस्थिति जो मनुष्य के स्वास्थ्य अथवा कल्याण हेतु हानिकारक हो, वायु प्रदूषण कहलाता है। वायु प्रदूषण का सर्वाधिक प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का खूब प्रसार हो रहा है। वायु प्रदूषण से श्वसन तन्त्र सम्बन्धी रोग,त्वचा कैन्सर आँख, गले व फेफड़ों में खराबी व दूषित जल आदि समस्याएँ पैदा हो रही हैं। वायु प्रदूषण के कारण ही अम्लीय वर्षा होती है जो जीवों एवं पौधों के लिए हानिकारक है।

(3) जल प्रदूषण- जब जल में अनेक प्रकार के खनिज, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थ व गैसें एक निश्चित अनुपात से अधिक मात्रा में घुल जाते हैं तो ऐसा जल प्रदूषित कहलाता है। जल प्रदूषण के कारण मनुष्य को हैजा, अतिसार, बुखार व पेचिश आदि बीमारियाँ हो जाती हैं।

(4) सम्पन्न उपभोग मानक- जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। जनसंख्या वृद्धि के कारण यहाँ उत्पादन और उपभोग के लिए संसाधनों की माँग संसाधनों के पुनः सृजन की दर से बहुत अधिक है। अधिक उपभोग ने पर्यावरण पर दबाव बनाया है और इसी कारण से वनस्पति एवं जीवों की अनेक जातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।

(5) निरक्षरता— भारत में अनपढ़ लोगों की संख्या विश्व में सबसे अधिक है। निरक्षरता मानव जाति के लिए एक अभिशाप है। निरक्षर मनुष्य के मानसिक स्तर का कम विकासे हो पाता है। वह नई तकनीक को सहजता से स्वीकार नहीं करता है। उसमें खोजी दृष्टिकोण नहीं होता है। निरक्षर व्यक्ति की उत्पादकता भी कम होती है। निरक्षर होने पर व्यक्ति देश के संसाधनों का उचित प्रकार से प्रयोग नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार निरक्षरता का शहरीकरण, औद्योगीकरण, आर्थिक संवृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(6) औद्योगीकरण- भारत विश्व का दसवाँ सर्वाधिक औद्योगिक देश है। तीव्र औद्योगीकरण के कारण अनियोजित शहरीकरण प्रदूषण एवं दुर्घटनाएँ आदि परिणाम सामने आए हैं। तीव्र आर्थिक विकास के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर काफी दबाव पड़ा है तथा अपशिष्ट पदार्थों का भी अधिक उत्पादन हुआ है जो पर्यावरण की धारणीय क्षमता से परे है।

(7) शहरीकरण- शहरीकरण तीव्र आर्थिक विकास का परिणाम है। शहर पर्यावरण को प्रमुख रूप से प्रदूषित करते हैं। कई शहर अपने पूरे गन्दे पानी और औद्योगिक अवशिष्ट कूड़े का 40% से 60% असंसाधित रूप से अपने पास की नदियों में बहा देते हैं। इसके अतिरिक्त शहरी उद्योग वातावरण को अपनी चिमनियों से निकलते धुएँ तथा जहरीली गैसों से प्रदूषित करते हैं। शहरीकरण से गाँवों की काफी जनसंख्या शहरों में आ गई है। शहरों में जनसंख्या का दबाव बढ़ा है और अपशिष्ट पदार्थों के अधिक उत्पादन से पर्यावरण पर भी दबाव बढ़ा है। इसके अतिरिक्त शहरीकरण से जल व वायु प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

(8) वन-क्षेत्र में कमी- भारत में प्रति व्यक्ति जंगल भूमि केवल 0.8 हैक्टेयर है, जबकि बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यह संख्या 0.47 हैक्टेयर होनी चाहिए। वन-क्षेत्र में कमी से देश को प्रति वर्ष 0.8 मिलियन टन नाइट्रोजन, 1.8 मिलियन टन फॉस्फोरस और 26.3 मिलियन टन पोटैशियम का नुकसान होता है। इसके अतिरिक्त भूमि क्षय से 5.8 मिलियन टन से 8.4 मिलियन टन पोषक तत्वों की क्षति होती है। एक वर्ष की अवधि में औसत वर्ष का स्तर गिर गया है तथा ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी आई है।

(9) अवैध वन-कटाई– वनों के विनाश में औद्योगिक विकास, कृषि विकास, दावाग्नि, चरागाहों का विस्तार, बाँधों, सड़कों व रेलमार्गों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वन जैव पदार्थों में सर्वप्रमुख हैं। अन्य जैव पदार्थ जैसे जीव-जन्तु, पशु तथा मानव; इस पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त यह अजैव पदार्थ जैसे मिट्टी से भी सम्बन्धित है। समस्त पर्यावरण इन्हीं तत्वों की सुचारु क्रिया-प्रणाली द्वारा सन्तुलन प्राप्त करता है। अत: यदि पर्यावरण के आधारभूत तत्व वन नष्ट हो जाते हैं तो पर्यावरण में असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है, जिसका प्रभाव जैव-जगत के विनाश का कारण बन सकता है।

(10) वैश्विक उष्णता– वैश्विक उष्णता पृथ्वी और समुद्र के औसत तापमान में वृद्धि को कहते हैं। भू-तापमान में वृद्धि ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि के परिणामस्वरूप हुई है। वैश्विक उष्णता मानव द्वारा वन विनाश तथा जीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि के कारण होती है। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन गैस तथा दूसरी गैसों के मिलने से हमारी भूमण्डल सतह लगातार गर्म हो रही है। बीसवीं शताब्दी के दौरान वायुमण्डल केऔसत तापमान में 0.6°C की बढ़ोतरी हुई है। इसके परिणामस्वरूप ध्रुवीय बर्फ पिघली है एवं समुद्र का जलस्तर बढ़ा है।

प्रश्न 6.
पर्यावरण के क्या कार्य होते हैं?
उत्तर
पर्यावरण के चार आवश्यक कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यह नवीकरणीय एवं गैर-नवीकरणीय संसाधनों की पूर्ति करता है। |
  2. यह अपशिष्ट पदार्थों को समाहित कर लेता है।
  3. यह जननिक और जैविक विविधता प्रदान करके जीवन का पोषण करता है।
  4. यह सौन्दर्य प्रदान करता है।

प्रश्न 7.
भारत में भू-क्षय के लिए उत्तरदायी छह कारकों की पहचान करें।
उत्तर
भारत में भू-क्षय के लिए उत्तरदायी छह कारक निम्नलिखित हैं-

  1. वन कटाव के कारण वनस्पति की हानि,
  2. अधारी जलाऊ लकड़ी और चारे का निष्कर्षण,
  3. कृषि । परिवर्तन,
  4. वन भूमि का अतिक्रमण, ।
  5. वाग्नि और अत्यधिक चराई,
  6. अनियोजित फसल चक्र।

प्रश्न 8.
समझाएँ कि नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों की अक्सर लागत उच्च क्यों होती है? ”
उत्तर
तीव्र जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण हमने प्राकृतिक संसाधनों को तीव्र एवं गहन विदोहन किया है। हमारे अनेक महत्त्वपूर्ण संसाधन विलुप्त हो गए हैं और हम नए संसाधनों की खोज में प्रौद्योगिकी एवं अनुसन्धान पर विशाल राशि व्यय करने के लिए मजबूर हैं। इसके अतिरिक्त पर्यावरण का क्षरण होने से श्वसन तन्त्र एवं जलजनित रोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप व्यय में भी बढ़ोतरी हुई है। वैश्विक पर्यावरण मुद्दे जैसे भू-तापमान में वृद्धि एवं ओजोन परत के क्षय ने स्थिति को और भी गम्भीर बना दिया है जिसके कारण सरकार को अधिक धन व्यय करना पड़ता है। अत: यह स्पष्ट है। कि नकारात्मक पर्यावरण प्रभावों की अवसर लागत बहुत अधिक है।

प्रश्न 9.
भारत में धारणीय विकास की प्राप्ति के लिए उपयुक्त उपायों की रूपरेखा प्रस्तुत करें।
उत्तर
भारत में धारणीय विकास की प्राप्ति के लिए उपयुक्त उपाय निम्नलिखित हैं

  1. मानव जनसंख्या को पर्यावरण की धारण क्षमता के स्तर तक सीमित करना होगा।
  2. प्रोद्योगिक प्रगति संसाधनों को संवर्धित करने वाली हो न कि उनका उपभोग करने वाली।
  3. नवीकरणीय संसाधनों का विदोहन धारणीय आधार पर हो ताकि किसी भी स्थिति में निष्कर्षण की दर पुनः सृजन की दर से कम हो।।
  4. गैर-नवीकरणीय संसाधनों की अपक्षय दर नवीकरणीय संसाधनों के सृजन की दर से कम होनी | चाहिए। |
  5. प्रदूषण के कारण उत्पन्न अक्षमताओं पर रोक लगनी चाहिए।

प्रश्न 10.
भारत में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है-इस कथन के समर्थन में तर्क दें।
उत्तर
प्रकृति ने मनुष्य को जो वस्तुएँ नि:शुल्क उपहारस्वरूप दी हैं उन्हें प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। किसी देश की भौगोलिक स्थिति, संस्थिति, आकार, जलवायु, धरातल, भूमि, मिट्टी, वनस्पति, खनिज, जल, हवा, जीव-जन्तु, जीवाश्म ऊर्जा, पदार्थ आदि प्राकृतिक संसाधनों की श्रेणी में सम्मिलित हैं। भारत में प्राकृतिक संसाधन प्रचुरता से पाए जाते हैं

  1. दक्षिण के पठार की काली मिट्टी जो विशिष्ट रूप से कपास की खेती के लिए उत्तम है।
  2. अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक गैंगा का मैदान है, जो कि विश्व के अत्यधिक ऊर्वर क्षेत्रों में| से एक है।
  3. भारतीय वन वैसे तो असमान रूप से वितरित हैं परन्तु वे अधिकांश जनसंख्या को हरियाली और उसके वन्य जीवन को प्राकृतिक आवरण प्रदान करते हैं।
  4. देश में लौह-अयस्क, कोयला और प्राकृतिक गैस के पर्याप्त भण्डार हैं।
  5. हमारे देश के विभिन्न भागों में बॉक्साइट, ताँबा, क्रोमेट, हीरा, सोना, सीसा, भूरा कोयला, जिंक | यूरेनियम इत्यादि भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
  6. हिन्द महासागर का विस्तृत क्षेत्र है।
  7. पहाड़ों की विस्तृत श्रृंखला है।

प्रश्न 11.
क्या पर्यावरण संकट एक नवीन परिघटना है? यदि हाँ, तो क्यों?
उत्तर
प्राचीन काल में जब सभ्यता शुरू हुई थी, पर्यावरण संसाधनों की माँग और सेवाएँ उनकी पूर्ति से बहुत कम थीं। संक्षेप में प्रदूषण की मात्रा अवशोषण क्षमता के अन्दर थी और संसाधन निष्कर्षण की दर इन संसाधनों के पुनः सृजन की दर से कम थी। अत: पर्यावरण समस्याएँ उत्पन्न नहीं हुईं। लेकिन आधुनिक युग में जनसंख्या विस्फोट और जनसंख्या की पूर्ति के लिए औद्योगिक क्रान्ति के आगमन से उत्पादन और उपभोग के लिए संसाधनों की माँग संसाधनों की पुन: सृजन की दर से बहुत अधिक हो गई है। इसके अलावा अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन अवशोषक क्षमता से ज्यादा हो गया है।

प्रश्न 12.
इसके दो उदाहरण दें
(क) पर्यावरणीय संसाधनों का अति प्रयोग
(ख) पर्यावरणीय संसाधनों का दुरुपयोग।
उत्तर
(क) पर्यावरणीय संसाधनों का अति प्रयोग 

  1. भूमि जल का पुमैः पूर्ण क्षमता से अधिक निष्कर्षण,
  2. आधारणीय जलाऊ लकड़ी और चारे का निष्कर्षण।।

(ख) पर्यावरणीय संसाधनों का दुरुपयोग

  1. नगरीकरण
  2. औद्योगीकरण।

प्रश्न 13.
पर्यावरण की चार प्रमुख क्रियाओं का वर्णन कीजिए। महत्त्वपूर्ण मुद्दों की व्याख्या कीजिए। पर्यावरणीय हानि की भरपाई की अवसर लागतें भी होती हैं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर 

पर्यावरण की चार प्रमुख क्रियाएँ


(1) यह संसाधनों की पूर्ति करता है।
(2) यह अवशेष को समाहित कर लेता है।
(3) यह जननिक एवं जैविक विविधता प्रदान करके जीवन का पोषण करता है।
(4) यह सौन्दर्य प्रदान करता है।

महत्त्वपूर्ण मुद्दे

(1) वैश्विक उष्णता
(2) ओजोन अपक्षय
(3) वायु प्रदूषण |
(4) जल प्रदूषण
(5) वन-कटाव
(6) भू-अपरदन।
(7) अनेक महत्त्वपूर्ण संसाधनों का विलुप्त हो जाना।
पर्यावरणीय असंगतियाँ ठीक करने के लिए सरकार विशाल राशि व्यय करने के लिए मजबूर है। जल 
और वायु की गुणवत्ता की गिरावट से साँस और जल-संक्रमण रोगों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है; फलस्वरूप व्यय भी बढ़ा है। हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए। संसाधनों का पुनः सृजन करने वाली तकनीक का विकास करना चाहिए। नगरीकरण एवं औद्योगीकरण पर नियन्त्रण लगाना चाहिए। इस प्रकार पर्यावरण सन्तुलन को बनाए रखने की अवसर लागत होती है।

प्रश्न 14.
पर्यावरणीय संसाधनों की पूर्ति माँग के उत्क्रमण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
प्राचीनकाल में जब सभ्यता शुरू हुई थी, पर्यावरण संसाधनों की माँग और सेवाएँ उनकी पूर्ति से बहुत कम थीं। उस समय आधुनिकीकरण, नगरीकरण एवं औद्योगीकरण की दर भी कम थी। अवशिष्ट पदार्थों का उत्पादन भी पर्यावरण की अवशोषी क्षमता के भीतर था। इसलिए पर्यावरण समस्याएँ उत्पन्न नहीं लेकिन आधुनिक युग में तीव्र जनसंख्या वृद्धि नगरीकरण, आधुनिकीकरण एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप उत्पादन और उपभोग के लिए संसाधनों की माँग संसाधनों के पुन: सृजन की दर से बहुत अधिक हो गई एवं अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन पर्यावरण की अवशोषण क्षमता के बाहर हो गया है। तरह से, पर्यावरण की गुणवत्ता के मामले में माँग-पूर्ति सम्बन्ध पूरी तरह उल्टे हो गए हैं। अब हमारे सामने पर्यावरण संसाधनों और सेवाओं की माँग अधिक है, लेकिन उनकी पूर्ति सीमित है।

प्रश्न 15.
वर्तमान पर्यावरण संकट का वर्णन करें। उत्तर-आज आर्थिक विकास के फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक शोषण हो रहा है। भूमि पर निरन्तर फसलें उगाने में उसकी उत्पादकता कम होती जा रही है। खनिज पदार्थों; जैसे–पेट्रोल, लोहा, कोयला, सोना-चाँदी आदि का खनन ज्यादा होने से उनके भण्डार में कमी होने लगी है। कारखानों और यातायात के साधनों से निकले धुएँ और गन्दगी न वायु एवं जल को प्रदूषित कर दिया है जिस कारण अनेक श्वसन एवं जल संक्रमित बीमारियों ने जन्म ले लिया है। अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन अवशोषण क्षमता से बाहर हो गया है। तीव्र एवं गहन विदोहन से अनेक प्राकृतिक संसाधन समाप्ति की ओर हैं। पर्यावरण क्षरण से वैश्विक उष्णता एवं ओजोन अपक्षय आदि चुनौतियाँ पैदा हो गई हैं।

प्रश्न 16.
भारत में विकास के दो गम्भीर नकारात्मक पर्यावरण प्रभावों को उजागर करें। भारत की पर्यावरण समस्याओं में एक विरोधाभास है-एक तो यह निर्धनताजनित है और दूसरे जीवन-स्तर में सम्पन्नता का कारण भी है। क्या यह सत्य है?
उत्तर
भारत में विकास गतिविधियों के फलस्वरूप पर्यावरण के सीमित संसाधनों पर दबाव पड़ रहा है। उनके साथ-साथ मनुष्य का स्वास्थ्य एवं कल्याण भी प्रभावित हुए हैं। भारत की अत्यधिक गम्भीर पर्यावरणीय समस्याओं में वायु प्रदूषण, दूषित जल, मृदा संरक्षण, वन्य कटान और वन्य-जीवन की विलुप्ति है। भारत में कुछ वरीयता वाले मामले निम्नवत् हैं।

  1. भूमि अपक्षय, |
  2. जैव विविधता का क्षय,
  3. शहरी क्षेत्रों में वाहन से उत्पन्न वायु प्रदूषण
  4. शुद्ध जल प्रबन्धन,
  5. ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन।

भारत के पर्यावरण को दो तरफ से खतरा है-
एक तो निर्धनता के कारण पर्यावरण का अपक्षय और दूसरा खतरा साधन सम्पन्नता और तेजी से बढ़ते हुए औद्योगिक क्षेत्र के प्रदूषण से है। भारत में भूमि का अपक्षय विभिन्न मात्रा और रूपों में हुआ है, जोकि मुख्य रूप से कुछ अनियोजित प्रबन्धन एवं प्रयोग का परिणाम है। भारत के शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण बहुत अधिक है, जिसमें वाहनों का सर्वाधिक योगदान है। इसके अतिरिक्त तीव्र औद्योगीकरण और थर्मल पॉवर संयन्त्रों के कारण भी वायु प्रदूषण होता है।

प्रश्न 17.
धारणीय विकास क्या है?
उत्तर
धारणीय विकास वह प्रक्रिया है जो आर्थिक विकास के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले दीर्घकालिक शुद्ध लाभों को वर्तमान तथा भावी पीढ़ी दोनों के लिए अधिकतम करती है।

प्रश्न 18.
अपने आस-पास के क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए धारणीय विकास की चार रणनीतियाँ | सुझाइए।।
उत्तर
धारणीय विकास वंह प्रक्रिया है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है परन्तु भावी पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी करने की योग्यता को कोई हानि नहीं पहुँचाती। 
धारणीय विकास की रणनीतियाँ ये चार रणनीतियाँ निम्नलिखित हैं

(1) ऊर्जा के गैर पारम्परिक स्रोतों का उपयोग-ऊर्जा के पारम्परिक स्रोत जैसे थर्मल और हाइड्रो पॉवर संयन्त्र; पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। थर्मल पॉवर संयन्त्र बड़ी मात्रा में ग्रीन हाउस गैस-कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं तथा बड़ी मात्रा में इनसे निकले धुएँ के कण जल एवं वायु को प्रदूषित करते हैं। इसके अतिरिक्त हाइड्रो पॉवर परियोजनाओं से वन जलमग्न हो जाते हैं और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप करते हैं। अत: इन सब पर्यावरणीय समस्याओं से बचने के लिए हमें गैर-पारम्परिक स्रोत; जैसे-वायु, शक्ति और सौर किरणों का प्रयोग करना चाहिए। .

(2) वायु शक्ति- जिन क्षेत्रों में हवा की गति तीव्र होती है वहाँ पवन चक्की से बिजली प्राप्त की जा | सकती है। ऊर्जा के इस गैर-पारम्परिक स्रोत से पर्यावरण को किसी प्रकार की क्षति नहीं होती है।

(3) ग्रामीण क्षेत्रों में एल०पी०जी व गोबर गैस- गाँवों में रहने वाले लोग अधिकतर ईंधन के रूप में लकड़ी, उपलों और अन्य जैविक पदार्थों का प्रयोग करते हैं जिस कारण वन विनाश, हरित-क्षेत्र में कमी, मवेशियों के गोबर का अप्रत्यय और वायु प्रदूषण जैसे अनेक प्रतिकूल प्रभाव होते हैं। आज सरकार इस स्थिति में सुधार करने के लिए एल०पी०जी० गैस सस्ती दरों पर उपलब्ध करा रही है। इसके अतिरिक्त पर्याप्त मात्रा में गोबर गैस संयन्त्र भी लगाए जा रहे हैं। |

(4) शहरी क्षेत्रों में उच्च दाब प्राकृतिक गैस– दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में उच्च दाब प्राकृतिक गैस (CNG) का ईंधन के रूप में प्रयोग होने से वायु प्रदूषण में काफी कमी आई है।

प्रश्न 19.
धारणीय विकास की परिभाषा में वर्तमान और भावी पीढियों के बीच समता के विचार की व्याख्या करें।
उत्तर
धारणीय विकास से अभिप्राय विकास की उस प्रक्रिया से है जो भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने की योग्यता को बिना कोई हानि पहुँचाए वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है। उपर्युक्त परिभाषा में आवश्यकता की अवधारणा का सम्बन्ध संसाधनों के वितरण से है। संसाधनों का वितरण इस प्रकार से हो कि सभी की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए और सभी को बेहतर जीवन जीने का मौका मिले। सभी की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए संसाधनों के पुनर्वितरण की आवश्यकता होगी जिससे बुनियादी स्तर पर निर्धनों को भी लाभ हो। इस प्रकार की समानता का मापन आय, वास्तविक आय, शैक्षिक सेवाओं, देखभाल, सफाई, जलापूर्ति के रूप में किया जा सकता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
विश्व पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष किस तिथि को मनाया जाता है?
(क) 5 अप्रैल
(ख) 5 मई
(ग) 5 जून
(घ) 5 जुलाई
उत्तर
(ग) 5 जून ।

प्रश्न 2.
नवीकरणीय संसाधन है।
(क) कोयला
(ख) पेट्रोलियम
(ग) लौह-अयस्क
(घ) जल
उत्तर
(घ) जल

प्रश्न 3.
“जीवन की परिस्थिति के सम्पूर्ण तथ्यों का योग पर्यावरण कहलाता है। यह परिभाषा किसने दी है?
(क) ए० फिटिंग ने
(ख) सोरोकिन ने
(ग) ए०जी० तॉसले ने
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) ए० फिटिंग ने

प्रश्न 4.
भारत में पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम कब पारित किया गया?
(क) 10 मई, 1984 को
(ख) 19 नवम्बर, 1986 को
(ग) 10 मई० 1987 को
(घ) 19 नवम्बर, 1989 को
उत्तर
(ख) 19 नवम्बर, 1986 को ।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा पर्यावरण प्रदूषण का कारण नहीं है?
(क) वृक्षारोपण
(ख) जनसंख्या वृद्धि
(ग) वायु-प्रदूषण
(घ) ध्वनि-प्रदूषण
उत्तर
(क) वृक्षारोपण

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण क्या है?
उत्तर
मानव के चारों ओर का वह क्षेत्र जो उसे घेरे रहता है तथा उसके जीवन व क्रियाओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, पर्यावरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण से क्या आशय है?
उत्तर
भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी भौतिक तत्त्व सम्मिलित किए जा सकते हैं जो अपनी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। इन तत्त्वों में जल, सूर्य का प्रकाश, खनिज पदार्थ, वायु, आर्द्रता, भू-पटल को प्रभावित करने वाले तत्त्व आदि शामिल हैं।

प्रश्न 3.
जैव और अजैव तत्त्वों से क्या आशय है?
उत्तर
भौतिक पर्यावरण को मुख्यतः दो समूहों में बाँटा गया है-जैव तत्त्व तथा अजैव तत्त्व। मानवे, वनस्पति, पशु, मछली, कीट-पतंग व सूक्ष्म जीवाणु जैव तत्त्व हैं जबकि भूमि, वायु, जल व खनिज पदार्थ अजैव तत्त्व हैं।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक अथवा मानव निर्मित पर्यावरण से क्या आशय है?
उत्तर
सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण मानव के क्रियाकलापों से होता है। यह मानव प्रकृति की पारस्परिक अन्तक्रिया का प्रतिफल है। मानव द्वारा किए गए कार्य, उसके द्वारा बनाई गई वस्तुएँ, उन वस्तुओं की क्रियाविधि-ये सभी सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 5.
पर्यावरण की धारण क्षमता की सीमा से क्या आशय है? ”
उत्तर
पर्यावरण की धारण क्षमता की सीमा का अर्थ है-संसाधनों का निष्कर्षण इनके पुनर्जनन की दर । से अधिक नहीं होना चाहिए और उत्पन्न अवशेष पर्यावरण की समावेशन क्षमता के भीतर होना चाहिए।

प्रश्न 6.
अवशोषी क्षमता से क्या आशय है?
उत्तर
अवशोषी क्षमता का अर्थ पर्यावरण की अपक्षय को सोखने की योग्यता से है।

प्रश्न 7.
विश्व में बढ़ते पर्यावरण संकट का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर
विश्व में बढ़ते पर्यावरण संकट का मुख्य कारण-संसाधनों का निष्कर्षण इनके पुनर्जनन की दर से अधिक होना तथा सृजित अवशेष का पर्यावरण की अवशोषी क्षमता से बाहर होना।

प्रश्न 8.
वैश्विक उष्णता से क्या आशय है?
उत्तर
पृथ्वी और समुद्र के वातावरण के औसत तापमान में वृद्धि को वैश्विक उष्णता कहते हैं। यह औद्योगिक क्रान्ति से ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि के परिणामस्वरूप पृथ्वी के निचले वायुमण्डल के औसत . तापमान में क्रमिक बढोतरी है।

प्रश्न 9.
वैश्विक उष्णता में वृद्धि करने वाले मानव उत्प्रेरित घटक कौन-से हैं?
उत्तर
वैश्विक उष्णता में वृद्धि करने वाले मानव उत्प्रेरित घटक–वन विनाश, जीवाश्मीय ईंधन को जलाना, कोयला व पेट्रोल उत्पादन का प्रज्वलन, मीथेन गैस का प्रसार आदि हैं।

प्रश्न 10.
वैश्विक उष्णता के क्या परिणाम सामने आए हैं?
उत्तर
वैश्विक उष्णता के परिणाम हैं-वायुमण्डलीय तापमान में वृद्धि, ध्रुवीय हिम के पिघलने से समुद्र-स्तर में वृद्धि और बाढ़ का प्रकोप, अनेक जल-प्रजातियों की विलुप्ति, उष्णकटिबन्धीय तूफानों की बारम्बारता और उष्ण कटिबन्धीय रोगों के प्रभाव में बढ़ोतरी।

प्रश्न 11.
ग्रीन हाउस प्रभाव क्या है?
उत्तर
जब वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो जाती है तो वायुमण्डल में अधिक ऊष्मा रोक ली जाती है जिसके कारण उसका तापमान बढ़ जाता है। ऊष्मा का इस प्रकारे वायुमण्डल में रोक लिया जाना ही ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहलाता है।

प्रश्न 12 
ओजोन परत के लाभकारी प्रभाव क्या हैं?
उत्तर
वायुमण्डल की ओजोन परत हानिकारक विकिरण से हमारी सुरक्षा करती है। सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों को ओजोन परत शून्य में परावर्तिते कर देती है और छतरी के रूप में हमें सुरक्षा कवज प्रदान करती है।

प्रश्न 13.
ओजोन अपक्षय से क्या आशय है?
उत्तर
ओजोन अपक्षय से आशय समतापमण्डल में ओजोन की कमी को होना है।

प्रश्न 14.
ओजोन अपक्षय की समस्या का मूल कारण क्या है?
उत्तर
ओजोन अपेक्षय समस्या का मूल कारण है-समतापमण्डल में क्लोरीन और ब्रोमीन के उच्च स्तर।

प्रश्न 15.
ओजोन अपक्षय के दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर
ओजोन स्तर के अपक्षय के परिणामस्वरूप पराबैंगनी विकिरण पृथ्वी की ओर आते हैं। और जीवों को क्षति पहुँचाते हैं। विकिरण से मनुष्यों में त्वचा कैंसर पैदा होता है। यह पादप लवक के उत्पादन को कम कर जलीय जीवों को प्रभावित करता है तथा स्थलीय पौधों की संवृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

प्रश्न 16.
मॉण्ट्रियल प्रोटोकोल क्या है?
उत्तर
मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल वह व्यवस्था है जिसमें सी०एफ०एस० यौगिकों तथा अन्य ओजोन अपक्षयक रसायनों के प्रयोग पर रोक लगाई गई है।

प्रश्न 17.
भारत में विकास गतिविधियों का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर
भारत में विकास गतिविधियों के फलस्वरूप उसके सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है तथा मानव स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

प्रश्न 18.
‘भारत के पर्यावरण को दो तरफा खतरा है।’ ये दो बातें कौन-सी हैं?
उत्तर
ये दो बातें हैं-
(1) गरीबी के कारण पर्यावरण का अपक्षय,
(2) साधन-सम्पन्नता और तेजी से बढ़ता हुआ औद्योगिक क्षेत्रक प्रदूषण।

प्रश्न 19.
चिपको आन्दोलन का उद्देश्य क्या था?
उत्तर
चिपको आन्दोलन का उद्देश्य था—हिमालय पर्वत में वनों का संरक्षण करना।

प्रश्न 20.
अप्पिको आन्दोलन क्या है?
उत्तर
अप्पिको का अर्थ है-“बाँहों में भरना’। 8 सितम्बर, 1983 ई० को सिरसी जिले के सलकानी वन में वृक्ष काटे जा रहे थे। तब 160 स्त्री-पुरुष और बच्चों ने पेड़ों को बाँहों में भर लिया और लकड़ी काटने वालों को भाग जाने को विवश होना पड़ा।

प्रश्न 21.
पर्यावरण प्रदूषण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
मानव के विभिन्न क्रिया-कलापों से उत्पन्न अपशिष्ट उत्पादों के रूप में पदार्थों एवं ऊर्जा के निस्तारण से प्राकृतिक पर्यावरण में होने वाले हानिकारक परिवर्तनों को पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 22.
वायु प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर
वायुमण्डल विभिन्न गैसों का मिश्रण है। इसमें दूषित गैसों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि) की अधिकता वायु प्रदूषण कहलाती है।

प्रश्न 23.
मृदा प्रदूषण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
मिट्टी एक स्वनिर्मित तन्त्र का परिणाम है, परन्तु जब प्रदूषित वायु, जल एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थ मिट्टी में मिश्रित हो जाते हैं, तो यह मिट्टी प्रदूषित हो जाती है। इसे ही मृदा प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 24.
जैव प्रदूषण से क्या आशय है?
उत्तर
जीवाणु, विषाणु तथा अन्य सूक्ष्म जीवों (जैसे—प्लेग के पिस्सू आदि) के द्वारा वायु, जल, खाद्य पदार्थों या अन्य वस्तुओं को प्रदूषित कर मनुष्यों को मृत्युकारित करना ही जैव प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 25.
वर्तमान में किस प्रकार के विकास की आवश्यकता है?
उत्तर
वर्तमान में ऐसे विकास की आवश्यकता है जो कि भावी पीढ़ियों को जीवन की सम्भावित औसत गुणवत्ता प्रदान करे जो कम-से-कम वर्तमान में पीढ़ी द्वारा उपयोग की गई सुविधाओं के बराबर हो।

प्रश्न 26.
‘धारणीय विकास की अवधारणा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
धारणीय विकास ऐसा विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता से समझौता किए बिना पूरी करे।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण का अर्थ, प्रकार बताइए। पर्यावरण संरक्षण के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर

पर्यावरण का अर्थ व प्रकार

सोरोकिन के अनुसार-“पर्यावरण उन समस्त दशाओं को इंगित करता है, जो मानव के क्रियाकलापों से स्वतन्त्र हैं तथा जिनकी रचना मानव ने नहीं की है और जो मानव एवं उसके कार्यों से प्रभावित हुए बिना स्वतः परिवर्तित होती हैं।” पर्यावरण दो प्रकार का होता है—
(1) प्राकृतिक पर्यावरण,
(2) सांस्कृतिक पर्यावरण।

पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य 

(1) पर्यावरणीय संसाधनों के अपव्यय को रोकना।
(2) भावी उपयोग के लिए संसाधनों की बचत करना।
(3) संसाधनों का योजनाबद्ध एवं विवेकपूर्ण रीति से उपयोग करना।

प्रश्न 2.
वन्य-जीव संरक्षण के उपाय बताइए।
उत्तर
वन्यजीव संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं-

  1. राष्ट्रीय उद्यानों का विकास तथा रख-रखाव।।
  2. गैर-कानूनी तरीके से वन्य-जीवों के शिकार और वन्य जीव उत्पादों के अवैध व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाना।
  3. राष्ट्रीय उद्यानों तथा अभयारण्यों के आस-पास के क्षेत्रों में पारिस्थितिकी का विकास।
  4. वन-विनाश पर रोक।
  5. वन क्षेत्र में वृद्धि।
  6. वन्य-जीवों के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता लाना।
  7. वन्य-जीव संरक्षण हेतु विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं का अधिक-से-अधिक क्रियान्वयन करना भी आवश्यक है; जैसे-टाइगर प्रोजेक्ट, क्रोकोडाइल ब्रीडिंग एण्ड मैनेजमेण्ट प्रोजेक्ट तथा डिअर प्लानिंग प्रोजेक्ट इत्यादि।
  8. संकटापन्न वन्य-जीवों के विकास के लिए विशेष प्रयास।

भारत में प्राणि-उद्यानों के प्रबन्ध की देखभाल के लिए एक केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण स्थापित किया गया है। यह संस्था 200 चिड़ियाघरों के कार्यों में तालमेल करती है और जानवरों के विनिमय की वैज्ञानिक ढंग से देख-रेख करती है। इस समय में 23 बाघ परियोजनाएँ चल रही हैं तथा इसके अन्तर्गत 26,000 वर्ग किमी से भी अधिक क्षेत्र वनाच्छादित है।

प्रश्न 3.
वनों के ह्रास को रोकने के उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
वनों के ह्रास को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं

  1. ईंधन की लकड़ी के स्थान पर रसोईघरों में वैकल्पिक ऊर्जा का प्रबन्ध हो।
  2. इमारती लकड़ी व फर्नीचर आदि बनाने के लिए वनों की लकड़ी के बजाय कोई अन्य विकल्प प्रयोग में लाया जाए।
  3. पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से दुर्लभ किस्म के पेड़ों की कटाई निषिद्ध हो।
  4. वनों पर आधारित उद्योग-धन्धों में कच्चे मालों की पूर्ति के लिए सामाजिकी-वानिकी की योजनाएँ चलाई जाएँ।
  5. सामाजिक-वानिकी, कृषि वानिकी तथा वन खेती से वनों के क्षेत्रफल की पूर्ति की जाएगी।
  6. स्थानान्तरणशील कृषि पर रोक।
  7. चरागाहों के क्षेत्र का संकुचन रोका जाए।
  8. शवों के दाह-संस्कार में प्रयोग की जाने वाली लकड़ी के विकल्प के रूप में विद्युत शवदाह गृहों | का निर्माण किया जाए। इससे वन संरक्षण में मदद मिलेगी।
  9. होली, लोहड़ी तथा अन्य त्योहारों के समय लकड़ी को व्यर्थ न जलाया जाए। इनके लिए लोगों की धार्मिक भावनाओं तथा सांस्कृतिक मान्यताओं को बदलने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  10. पशु संख्या नियन्त्रित की जानी चाहिए और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अभयारण्यों का विकास किया जाना चाहिए। इससे दोहरा लाभ होगा।
  11. ढालू भूमि पर वृक्षों की कटाई नहीं की जानी चाहिए।
  12. कृषि योग्य भूमि के विस्तार के लिए वनों का ह्रास नहीं होने देना चाहिए। इसके लिए कड़े कानूनी प्रावधान किए जाने चाहिए।
  13. ऐसी नदी घाटी परियोजनाओं तथा बाँधों को स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए, जिससे वन क्षेत्र डूब जाने की सम्भावना हो।
  14. वनों के महत्त्व को बताने के लिए जन-साधारण में विज्ञापनों तथा प्रसार माध्यमों द्वारा जागरूकता | पैदा की जानी चाहिए।
  15. वृक्षों की चयनात्मक कटाई तथा बचे हुए जंगलों की रक्षा करके वनों के ह्रास को रोका जा सकता
  16. प्राकृतिक वन क्षेत्रों के स्थान पर वृक्ष तथा फलोद्यान लगाने से भी वन विनाश रुकता है और फल भी प्राप्त होते हैं।
  17. वनों की रक्षा के लिए सामाजिक आन्दोलन चलाए जाने चाहिए।

प्रश्न 4.
पर्यावरणीय संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
पर्यावरण का, जिसमें मानव रह रहा है, अपने सभी जैवीय तथा अजैवीय घटकों के साथ समन्वित, समरस तथा सन्तुलित रहना आवश्यक है। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा महत्त्व को अग्रलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. इसके द्वारा पर्यावरणीय असन्तुलन की विनाशकारी प्रभावों से बचा जा सकता है।
  2. पर्यावरण का हमारी शारीरिक संरचना, स्वास्थ्य तथा मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक संसाधन जितने स्वच्छ व निर्मल होंगे, हमारा शरीर और मन उतना ही स्वच्छ एवं निर्मल होगा, इसलिए गुरु चरक से कहा था—‘स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध वायु, जल और मिट्टी आवश्यक कारक हैं।”
  3. राज्य की स्थिरता पर्यावरण की स्वच्छता पर निर्भर करती है।
  4. जैवीय विकास में पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
  5. देश के आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक है।
  6. औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग ने प्रदूषण की गम्भीर समस्या को उत्पन्न कियाहै। जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, वायु प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं ने मानव के अस्तित्व को ही चुनौती दे दी है।
  7. रासायनिक एवं आणविक अपघटकों ने ओजोन की परत में छेद करके सम्पूर्ण विश्व को ही त्रस्त कर दिया है।

संक्षेप में, वर्तमान शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है-पर्यावरण की सुरक्षा तथा साथ ही मनुष्य को शुद्ध जल, वायु और भोजन प्रदान करना।

प्रश्न 5.
मृदा अपरदन के दुष्प्रभाव बताइए।
उत्तर
मृदा अपरदन के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं
(1) मृदा उर्वरता में कमी- मृदा अपरदन के कारण भूमि की ऊपरी परत (Top soil) अपने स्थान से | हट जाती है, जिससे भूमि की उर्वरता प्रभावित होती है; क्योंकि यह परत जीवांशों (humus) के रखने के कारण अधिक उर्वर होती है।

(2) सिल्टीकरण मिट्टी के बड़े– बड़े कण नदियों के जल के साथ बहकर जलाशयों में एकत्रित होने लगते हैं। इससे कृषि योग्य भूमि की उर्वरता नष्ट हो जाती है।

(3) अकाल- मृदा अपरदन के कारण भूमि की उत्पादकता कम हो जाती है तथा सूखे के समय जल की कमी हो जाने पर सिंचाई की समस्या हो जाती है, जिससे अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती

(4) मरुस्थलीकरण- मृदा अपरदन के कारण भूमि शुष्क व बंजर हो जाती है। इससे मरुस्थल जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

(5) जलवायु में परिवर्तन– मृदा अपरदन के कारण भूमि पर किसी प्रकार की वनस्पति उग नहीं पाती जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव जलवायु पर पड़ता है। वनस्पति के न होने से वर्षा की सम्भावना कम हो जाती है।

प्रश्न 6.
नव्यकरणीय और अनव्यकरणीय संसाधनों से क्यो आशय है?
उत्तर
(1) नव्यकरणीय संसाधन– इसमें वे संसाधन सम्मिलित हैं जिनमें प्रकृति में अल्प समय में ही पुन: चक्रण द्वारा स्थापित होने का गुण होता है। इनके उदाहरण जल, काष्ठ, मृदा, खाद्यान्न फसलें आदि हैं।

(2) अनव्यकरणीय संसाधन– ये संसाधन समाप्त हो जाने पर पुनः स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। इनका प्रमुख उदाहरण जीवाश्मीय ईंधन व खनिज पदार्थ हैं। परन्तु आजकल विश्व में अत्यधिक उपयोग तथा अव्यवस्थित प्रबन्धन के कारण वन्य-जीव (पादप तथा जन्तु) भी अनव्यकरणीय संसाधन बनते जा रहे हैं।

प्रश्न 7,
मृदा संरक्षण के कुछ उपाय बताइए।
उत्तर

मृदा संरक्षण के उपाय

मृदा अपरदन से भूमि की उर्वरा शक्ति को हानि पहुँचती है जिससे उत्पादन सम्बन्धी परिवर्तन हो सकते हैं। मृदा को हानि से बचाने के कुछ उपाय अग्रवत् हैं

  1. सीधी एवं मूसलाधार वर्षा से भूमि को बचाना।
  2. जल एकत्रित होने से व ढलान की तीव्रता के कारण बहने वाले जल को रोकना।
  3. वायु की तीव्रता को रोकना।
  4. अत्यधिक पशुओं को चराने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना तथा वनों की कटाई रोकना।
  5. खाली भूमि पर वृक्षारोपण कराना।
  6. नग्न मृदा पर पादप आवरण उपलब्ध कराना।

प्रश्न 8.
ग्रीन हाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) का वर्णन कीजिए।
उत्तर
 ग्रीनहाउस प्रभाव यदि तपती हुई धूप में खड़ी कार की सारी खिड़कियाँ बन्द कर दें तो अन्दर असहनीय रूप से गर्मी हो जाती है क्योंकि प्रकाश खिड़कियों के शीशे से गुजरकर अन्दर पहुँच जाता है। प्रकाशीय ऊर्जा ऊष्मीय ऊर्जा में परिवर्तित होकर वहाँ रह जाती है और कार को गर्म कर देती है। ग्रीन हाउस या पादप गृह पौधे उगाने के लिए बनाए जाते हैं और इसी सिद्धान्त पर कार्य भी करते हैं। चूंकि वे शीशों के बनाए जाते हैं। अत: प्रकाश अन्दर तो पहुँच जाता है परन्तु ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती। कार्बन डाइऑक्साइड का गुण भी ऐसा ही है कि सूर्य का प्रकाश वायुमण्डल से गुजर जाने देती है परन्तु ऊष्मा को वायुमण्डल से निकलने नहीं देती। इस प्रकार, सामान्य मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड वायुमण्डल के तापमान को बनाए रखती है। परन्तु यदि वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो जाती है तो वायुमण्डल में अधिक ऊष्मा रोक ली जाएगी जो उसको तापमान बढ़ा देगी। ऊष्मा का इस प्रकार वायुमण्डल में रोक लिया जाना ही ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहलाता है।

ग्रीनहाउस प्रभाव और बदलता वायुमण्डल– रासायनिक प्रदूषण पृथ्वी के वायुमण्डल की संरचना को परिवर्तित कर रहा है और जलवायु को बदल देने, पौधों की पैदावार के प्रारूप को परिवर्तित कर देने और मनुष्य तथा जीपों को खतरनाक पराबैंगनी (ultra-violet) विकिरण से अरक्षित कर देने का भय उत्पन्न कर रहा है।

प्रदूषण के इन कारणों में से जीवाश्मीय ईधन का जलाया जाना और वनों का जलाया जाना कार्बन डाइऑक्साइड चक्र में असन्तुलन का कारण बना है। हाल ही में जितनी कार्बन डाइऑक्साइड हरे पौधे और वृक्ष अवशोषित करते हैं उससे अधिक अवमुक्त हो रही है। कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई मात्रा वायुमण्डल में छाये जा रही है और उसने वहाँ एक मोटा आवरण बना लिया है जो सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है और दृश्य प्रकाश को धरातल की सतह तक पहुँच जाने देता है, परन्तु पुनर्विकिरण के रूप में वापस लौटती हुई ऊष्मीय तरंगें (अवरक्त विकिरण) उस आवरण द्वारा रोक ली जाती हैं। ऊष्मा वापस पृथ्वी पर लौटा दी जाती है और इस प्रकार ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) का कारण बनती है।
वह पाँच गैसें, जो ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान करती हैं, निम्नवत् हैं
कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) – 50%
क्र्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (CFCs) – 14%
मीथेन (CH4)
– 18%
ओजोन (03)
– 12%
ट्रोपोस्फेरिक नाइट्रस ऑक्साइड – 6%
ग्रीन हाउस प्रभाव या वायुमण्डलीय तापन में कार्बन डाइऑक्साइड का सर्वाधिक योगदान है। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड के एकत्रीकरण में गत दो दशकों में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का सन् 1958 में एकत्रीकरण दस लाख में 315 अंश था जो 1990 ई० में बढ़कर 353 अंश प्रति दस लाख हो गया और 1.5% की अनुमानित दर से प्रति वर्ष बढ़ रहा है। यह बहुत कम प्रतीत होता है, परन्तु कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई यह दर भयावह है और वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी है कि यदि यह इसी दर से बढ़ती रही तो पृथ्वी का औसत तापक्रम वर्ष । 
2030 ई० तक 3-4C बढ़ जाएगा, समुद्रों की सतह 1 से 2 मीटर तक ऊपर उठ जाएगी और बहुत-ने छोटे द्वीपों और विभिन्न महाद्वीपों के तटीय क्षेत्र जल में डूब जाएँगे।

प्रश्न 9.
ओजोन परत अवक्षय पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ओजोन परत की अल्पता या अवक्षय (ozone-layer depletion) चिन्ताजनक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। इससे सम्पूर्ण मानवता के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। हमें ज्ञात है कि वायुमण्डल की ओजोन परत हानिकारक सौर विकिरण से हमारी सुरक्षा करती है। यह परत पृथ्वीवासियों के लिए छतरी (umbrella) के रूप में सुरक्षा कवच प्रदान करती है। सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों (Ultra-violet rays) को ओजोन परत शून्य में परावर्तित कर देती है। यदि ये विषैली किरणें धरातल पर सीधी आने लगे तो अनेक कोमल पौधों के अंकुर जल जाएँ। मनुष्य के वातानुकूलन, प्रशीतन, फोम, प्लास्टिक, हेयर ड्रायर, स्प्रे कैन, प्रसंस्कृत पदार्थों की पैकेजिंग, डिसपेन्सर, अग्निशामक, अनेक प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण से अवमुक्त क्लोरोफ्लोरो कार्बन तथा सुपरसॉनिक जेट विमानों से अवमुक्त नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO) के कारण धरातल पर सूर्य की पराबैंगनी किरणे अधिक मात्रा में आने लगती हैं। CFC व NO, गैसें ओजोन परत को क्षीण करती हैं। CFC गैस में क्लोरीन, फ्लोरीन तथा कार्बन तत्वों के यौगिक होते हैं। अनुमान लगाया गया है कि वायुमण्डल में फ्रेऑन (Freon) गैस का सान्द्रण 13 से 18% प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। सन् 1976 ई० में वायुमण्डल में फ्रेऑन-11 तथा फ्रेऑन-12 का सान्द्रण क्रमशः 120 PPM व 220 PPM था। यदि वायुमण्डल में फ्रेऑन व हैलोन्स की अवमुक्त मात्रा पर अंकुश नहीं लगाया जाता तो पृथ्वीवासियों को निकट भविष्य में गम्भीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। ओजोन परत की अल्पता से त्वचा कैन्सर व चर्मरोग होने का खतरा बढ़ जाएगा। वायुमण्डल में अवमुक्त नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स की उपस्थिति में मसूढ़ो में सूजन, मोतियाबिन्द, रक्तस्राव, ऑक्सीजन की कमी, निमोनिया तथा फेफड़े के कैंसर हो जाता है। अनुमान लगाया गया है कि मनुष्य वायुमण्डल में 6 गुना अधिक हानिकारक गैसें अवमुक्त कर रहा है। एक टन कोयले के जलाने पर 5 से 10 किग्री तक नाइट्रोजन ऑक्साइड्स का निर्माण होता है। इसी प्रकार स्वचालित मोटर वाहनों (मोटरे-कार, बस, ट्रक, स्कूटर आदि) में एक टन डीजल या पेट्रोलियम का उपभोग होने से 25 से 30 किग्रा नाइट्रोजन ऑक्साइड अवमुक्त होती है।

15 किमी की ऊँचाई पर उड़ने वाले सुपर-सॉनिक जेट विमानों के समूह से अवमुक्त नाइट्रोजन ऑक्साइड से वायुमण्डलीय ओजोन के सान्द्रण में 30% तक की कमी हो सकती है। अनुमान लगाया गया है कि वायुमण्डल में ओजोन के सान्द्रण में मात्र 5% की कमी हो जाने से संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 20 हजार से 60 हजार अतिरिक्त लोग कैंसर का शिकार हो जाएँगे। ओजोन परत की अल्पता से निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं

  1. सूर्य की पराबैंगनी किरणें धरातल पर सीधे पहुँचकर भू-पृष्ठ के तापमान में वृद्धि करेंगी। इससे त्वचा कैंसर तथा अन्धेपन का प्रकोप बढ़ जाएगा।
  2. समतापमण्डल का तापमान अव्यवस्थित हो जाएगा।
  3. भूमण्डलीय ताप वृद्धि (global warming) से हिमनदों में जमी बर्फ पिघलने लगेगी परिणामतः सागर तल में वृद्धि होने से निचले क्षेत्र जलमग्न हो जाएँगे।
  4. ओजोन-अल्पता से क्षोभमण्डल में हाइड्रोजन परॉक्साइड की मात्रा में वृद्धि होगी। इससे अम्लीय वर्षा तथा धूम्रकुहरे (smog) का निर्माण होगा।
  5. जलवायु में परिवर्तन होगा।
  6. जैव-भू रासायनिक चक्र (Bio-geo-chemical cycle) परिवर्तित होने लगेंगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण से क्या आशय है? पर्यावरण के विभिन्न प्रकार भी बताइए।
उत्तर 

पर्यावरण से आशय

पर्यावरण अंग्रेजी भाषा के Environment शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। यह दो शब्दों; परि + आवरण; से मिलकर बना है। ‘परि’ का अर्थ है-‘चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ है-‘घेरना अथवा ढकना। इस प्रकार पर्यावरण का उन सभी घटकों को योग है, जो किसी वस्तु के चारों ओर से घेरे रहते हैं और उस वस्तु को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इस प्रकार पर्यावरण उन सभी प्रक्रियाओं, दशाओं, बलों अथवा वस्तुओं का सम्मिलित स्वरूप हैं, जो भौतिक या रासायनिक रूप से जीवन को प्रभावित करते हैं।

पर्यावरण की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

ए० फिटिग के अनुसार-“जीवन की परिस्थिति के सम्पूर्ण तथ्यों का योग पर्यावरण कहलाता है।”

सोरोकिन के अनुसार-पर्यावरण उन समस्त दशाओं को इंगित करता है, जो मानव के क्रियाकलापों से स्वतन्त्र हैं तथा जिनकी रचना मानव ने नहीं की है और जो मानव एवं उसके कार्यों से प्रभावित हुए बिना स्वत: परिवर्तित होती हैं।”

ए०जी०ताँसले के अनुसार-“उन सभी प्रभावकारी दशाओं का कुल योग, जिनमें जीव निवास करता है, पर्यावरण कहलाता है।” संक्षेप में, पर्यावरण उन सभी भौगोलिक दशाओं का सम्पूर्ण योग है, जो मानव एवं उसकी क्रियाओं को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है और जो मानवीय प्रभाव से स्वतन्त्र रहते हुए स्वत:

परिवर्तित होता रहता है।

पर्यावरण के प्रकार मूल रूप से पर्यावरण को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है
(1) भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण तथा
(2) सांस्कृतिक या मानवनिर्मित पर्यावरण।

(1) भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण- भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण उन समस्त भौतिक शक्तियों, तत्त्वों एवं प्रक्रियाओं का योग होता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय क्रियाकलापों को प्रभावित करता है। यह पर्यावरण स्थान एवं समय के सन्दर्भ में परिवर्तित होता रहता है। भौतिक पर्यावरण की शक्तियाँ, तत्त्व एवं प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं

(अ) शक्तियाँ- भौतिक पर्यावरण की शक्तियाँ हैं-पृथ्वी की गति, गुरुत्वाकर्षण शक्ति, सूर्यातप, ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भू-पटल की गति। ये शक्तियाँ पृथ्वी के धरातल पर भिन्न-भिन्न प्रकार का भौतिक भू-दृश्य उपस्थित करती हैं, जिससे पर्यावरण का जन्म होता है और जो अनेक प्रकार से मानवीय पर्यावरण को प्रभावित करता है।

(ब) तत्त्व- भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों को सम्मिलित किया जाता है—स्थिति एवं विस्तार, स्वरूप एवं आकार, जलवायु दशाएँ, महासागर, नदियाँ एवं झीलें, शैल, मिट्टी, खनिज, भूमिगत जल, प्राकृतिक वनस्पति एवं जीव-जन्तु आदि।

(स) प्रक्रियाएँ- भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रक्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है—अपक्षय एवं अपरदन, ताप विकिरण, संचालन एवं संवहन, वायु एवं जल की गतियाँ, भू-दृश्य एवं जैविक तत्त्वों की उत्पत्ति, विकास एवं क्षय।। उपर्युक्तु सभी शक्तियाँ, तत्त्व एवं प्रक्रियाएँ मिलकर भौतिक पर्यावरण को निर्मित करती हैं तथा एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हुए भी किसी-न-किसी प्रकार से सांस्कृतिक पर्यावरण को प्रभावित करती हैं।

(2) सांस्कृतिक या मानवनिर्मित पर्यावरण- मानव सांस्कृतिक पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह प्राकृतिक वातावरण में परिवर्तन लाने के लिए सदैव क्रियाशील रहता है। मानव ने ही अपने ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी विकास से प्राकृतिक पर्यावरण का उपयोग कर सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण किया है। सांस्कृतिक या मानवनिर्मित पर्यावरण की शक्तियाँ, तत्त्व एवं प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं

(अ) शक्तियाँ- सांस्कृतिक पर्यावरण को निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मुख्य शक्तियाँ हैं–कुल जनसंख्या, वितरण एवं घनत्व, आयु वर्ग, स्त्री-पुरुष अनुपात, जनसंख्या वृद्धि एवं स्वास्थ्य।

(ब) तत्त्व– सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत निम्नलिखित तत्त्वों को सम्मिलित किया जाता है—मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति, आर्थिक क्रियाएँ, तकनीकी विकास, सामाजिक एवं राजनीतिक संगठन आदि।

(स) प्रक्रियाएँ– सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ वे हैं, जिनके द्वारा मानव प्राकृतिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। ये हैं-पोषण, समूहीकरण, पुनः उत्पादन, पृथक्करण, अनुकूलन, समायोजन व प्रवास। यद्यपि सांस्कृतिक पर्यावरण मानव निर्मित होता है तथापि इस पर भौतिक पर्यावरण की स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है। ये दोनों ही परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं और एक-दूसरे को निरन्तर प्रभावित करते रहते हैं।

प्रश्न 2.
वायु प्रदूषण का अर्थ एवं स्रोत बताइए। यह हमारे जीवन को किस प्रकार प्रभावित करता है? इसे रोकने के उपाय भी बताइए। उत्तर

वायु प्रदूषण

अर्थ- ऑक्सीजन को छोड़कर वायु में किसी भी गैस की मात्रा सन्तुलित अनुपात से अधिक होने पर वायु श्वसन के योग्य नहीं रहती। अतः वायु में किसी भी प्रकार की गैस वृद्धि या अन्य पदार्थ का समावेश ‘वायु प्रदूषण’ कहलाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार- “वायु प्रदूषण को ऐसी परिस्थिति के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें बाह्य वायुमण्डल में ऐसे पदार्थों का संकेन्द्रण हो जाता है, जो मानव और उसके चारों ओर विद्यमान पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं।’

स्रोत–
मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ता है। एक ओर तो वह वनों को काट डालता है तथा दूसरी ओर कल-कारखाने, औद्योगिक संस्थान आदि चलाकर वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा ही नहीं बढ़ाता वरन् नाइट्रोजन, सल्फर आदि अनेक तत्वों के ऑक्साइड्स भी वायुमण्डल में मिला देता है। इसके अतिरिक्त, मोटरगाड़ियों, कार, विमान आदि से अनेक प्रकार के अदग्ध हाइड्रोकार्बन्स तथा विषैली गैसें निकलती हैं। इन सबके परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण बढ़ता जाता है।

प्रभाव

  1. वायु प्रदूषण से मनुष्य के स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सल्फर डाइऑक्साइड से फेफड़ों के रोग, कैडमियम से हृदय रोग, कार्बन मोनोऑक्साइड से कैंसर आदि रोग लग सकते हैं। आँखों में, श्वसन मार्ग तथा गले में जलन वायु प्रदूषण के साधारण रोग हैं।
  2. पशुओं में फेफड़ों की अनेक बीमारियाँ धूल कणों, सल्फर डाइऑक्साइड आदि से पैदा होती है। कार्बन मोनोऑक्साइड से पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है फ्लुओरीन; घास तथा चारे में इकट्ठा होकर; विभिन्न प्रकार से पशुओं के शरीर को (चारा खाने पर) हानि पहुँचाती है।
  3. वायु प्रदूषण का पौधों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सल्फर डाइऑक्साइड पत्तियों में स्थित क्लोरोफिल को नष्ट कर देती है। वायु प्रदूषण के कारण पत्तियाँ आंशिक या पूर्ण रूप से झुलस जाती हैं।
  4. वायु प्रदूषण इमारतों, वस्त्रों आदि पर हानिकारक प्रभाव डालता है। हाइड्रोजन सल्फाइड के प्रभाव| से भवन काले पड़ने लगते हैं।

रोकथाम के उपाय

  1. प्रत्येक बस्ती में पर्याप्त संख्या में पेड़-पौधे लगाए जाने चाहिए तथा वनस्पति उगानी चाहिए।
  2. जिन घरों में अँगीठी आदि जलाई जाती है, वहाँ धुएँ के निकलने की उचित : अवस्था होनी चाहिए। इसके लिए एक ऊँची चिमनी लगाई जानी चाहिए।
  3. मकानों को यथासम्भव सड़कों से दूर बनाना चाहिए तथा मका में सूर्य का प्रकाश आने की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
  4. खाली भूमि नहीं छोड़नी चाहिए, क्योंकि खाली भूमि से धूल उड़ती है, जो वायु को दूषित करती है।
  5. यदि घरों में पशु पालने हों, तो उन्हें निवास से दूर रखना चाहिए। इससे गन्दी गैसें घर में एकत्रित नहीं हो पातीं।
  6. औद्योगिक संस्थानों तथा कारखानों को बस्ती से दूर स्थापित करना चाहिए।
  7. जहाँ अधिक वाहन चलते हैं, वहाँ सड़कें पक्की होनी चाहिए।
  8. तेलशोधक कारखानों पर वायु प्रदूषण से बचने के लिए शोधक यन्त्र लगाए जाने चाहिए।
  9. जनमानस में जागरूकता लाई जानी चाहिए तथा सर्वत्र वनस्पति को सघन रूप में उगाया जाना चाहिए व पेड़ों को काटने से रोका जाना चाहिए।

प्रश्न 3.
जल प्रदूषण का अर्थ, स्रोत एवं मानव-जीवन पर उसके प्रभाव बताइए। जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए उपयुक्त सुझाव भी दीजिए।
उत्तर

जल प्रदूषण

अर्थ-
जल में अनेक प्रकार के खनिज, कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों तथा गैसों के एक निश्चित अनुपात से अधिक या अन्य अनावश्यक तथा हानिकारक पदार्थ घुले होने से जल प्रदूषित हो जाता है। यह प्रदूषित जल जीवों में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकता है। जल प्रदूषक विभिन्न रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु, वाइरस, कीटाणुनाशक पदार्थ, अपतृणनाशक पदार्थ, वाहित मल, रासायनिक खादें, अन्य कार्बनिक पदार्थ आदि अनेक पदार्थ हो सकते हैंस्रोत–जल प्रदूषण के विभिन्न स्रोत निम्नलिखित हो सकते हैं

  1. कृषि में प्रयोग किए गए कीटाणुनाशक, अपतृणनाशक, विभिन्न रासायनिक खादें।
  2. सीसा, पारा आदि के अकार्बनिक तथा कार्बनिक पदार्थ, जो औद्योगिक संस्थानों से निकलते हैं।
  3. भूमि पर गिरने वाला या तेल वाहकों द्वारा ले जाया जाने वाला तेल तथा अनेक प्रकार के वाष्पीकृत | होने वाले पदार्थ जैसे पेट्रोल, एथिलीन आदि; वायुमण्डल से द्रवित होकर जल में आ जाते हैं।
  4. रेडियोधर्मी पदार्थ जो परमाणु विस्फोटों आदि से उत्पन्न होते हैं और जल-प्रवाह में पहुँचते हैं।
  5. वाहित मल जो मनुष्यों द्वारा जल प्रवाह में मिला दिया जाता है।

प्रभाव

  1. जल प्रदूषण के कारण अनेक प्रकार की बीमारियाँ महामारी के रूप में फैल सकती हैं। हैजा, टाइफॉइड, पेचिश, पोलियो आदि रोगों के रोगाणु प्रदूषित जल द्वारा ही शरीर में पहुँचते हैं।
  2. नदी, तालाब आदि का प्रदूषित जल पीने वाले पशुओं, मवेशियों आदि में भयंकर बीमारियाँ उत्पन्न | करता है।
  3. जल में रहने वाले जन्तु व पौधे प्रदूषित जल से नष्ट हो जाते हैं या उनमें अनेक प्रकार के रोग लगजाते हैं। जल में विषैले पदार्थों के कण नीचे बैठ जाते हैं।
  4. प्रदूषित जल पौधों में भी अनेक प्रकार के कीट तथा जीवाणु रोग उत्पन्न कर सकता है। कुछ विषैले पदार्थ पौधों के माध्यम से मनुष्य तथा अन्य जीवों के शरीर में पहुँचकर उन्हें हानि पहुँचाते हैं।
  5. जलीय जीवों के नष्ट होने से खाद्य पदार्थों की हानि होती है। ऑक्सीजन की कमी के कारण मछलियाँ बड़ी संख्या में मर जाती हैं।

रोकथाम के उपाय

जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं

  1. कूड़ा-करकट, सड़े-गले पदार्थ एवं मल-मूत्र को शहर से बाहर गड्डा खोदकर दबा देना चाहिए।
  2.  सीवर का जल पहले नगर से बाहर ले जाकर दोषरहित करना चाहिए। बाद में इसे नदियों में छोड़ | देना चाहिए।
  3. विभिन्न कारखानों आदि से निकले जल तथा अपशिष्ट पदार्थों आदि का शुद्धीकरण आवश्यक रूप से किया जाना चाहिए।
  4. विभिन्न प्रदूषकों को समुद्री जल में मिलने से रोका जाना चाहिए।
  5. समुद्र के जल में परमाणु विस्फोट नहीं किया जाना चाहिए।
  6. झीलों, तालाबों आदि में शैवाल जैसे जलीय पौधे उगाए जाने चाहिए, ताकि जल को शुद्ध रखा जा सके।
  7. मृत जीवों, जले हुए जीवों की राख आदि को नदियों में प्रवाहित नहीं करना चाहिए। .
  8. खेतों में तथा जल में कीटाणुनाशक दवाओं का कम-से-कम प्रयोग किया जाना चाहिए।
  9. स्वच्छ जल 3 रुपयोग को रोका जाना चाहिए।
  10. ग्राम से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक समितियों का गठन किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
मृदीय (मृदा) प्रदूषण का अर्थ, स्रोत एवं प्रभाव बताइए। मृदीय प्रदूषण की रोकथाम के| लिए क्या उपाय अपनाए जाने चाहिए? उत्तर

मृदीय प्रदूषण

अर्थ- प्रदूषित जल तथा वायु के कारण मृदा भी प्रदूषित हो जाती है। वर्षा आदि जल के साथ ये प्रदूषक पदार्थ मृदा में आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त, जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ अधिक फसल उगाने के लिए भूमि की उर्वरता बढ़ाने या बनाए रखने के लिए उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न प्रकार के कीटाणुनाशक पदार्थ, अपतृणनाशी पदार्थ आदि फसलों पर छिड़के जाते हैं। ये सब पदार्थ मृदा के साथ मिलकर उसमें हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। इसी को ‘मृदीय प्रदूषण’ कहते हैं। स्रोत–काफी मात्रा में ठोस अपशिष्ट पदार्थ (wastes) घरों से बाहर फेंक दिए जाते हैं। सब्जियों के शेष भाग, पैकिंग का व्यर्थ समान, डिब्बे, कागज के टुकड़े, कोयले की राख, धातु, प्लास्टिक, चीनी व मिट्टी के बर्तन आदि कूड़े के ढेर बनते हैं। प्रभाव–राष्ट्रीय प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव हो सकते हैं

  1. गन्दे स्थान अनेक जीव-जन्तुओं; चूहे, मक्खियों, मच्छरों आदि रोगवाहकों; के रहने तथा बढ़ने के | स्थान बन जाते हैं तथा मनुष्यों व पशुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।
  2. खानों-दानों आदि की मृदा में अनेक प्रदूषक पदार्थ पाए जाते हैं। ये पदार्थ विषैले होते हैं, जो पौधों के प्ररीर में एकत्रित होकर बाद में मनुष्य तथा पशुओं के शरीर में पहुँचकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।
  3. अनेक उद्योग; जैसे–लुगदी व कागज मिल, तेलशोधक कारखाने, रासायनिक खाद के कारखाने, लोहा व इस्पात कारखाने, प्लास्टिक व रबड़ संयन्त्र आदि मृदा प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।
  4. रेडियोधर्मी पदार्थ मृदा में पहुँचकर अनेक प्रकार से हानियाँ पहुँचाते हैं। इनसे पौधे नष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त पौधों द्वारा अनेक हानिकारक पदार्थ मनुष्यों तथा जीवों में पहुँचते हैं और भयंकर

रोग उत्पन्न करते हैं।

रोकथाम के उपाय-मृदीय प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए

  1. घरेलू अपशिष्टों, वाहित मल आदि का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। इस कार्य का प्रबन्ध समितियों द्वारा होना चाहिए।
  2. परमाणु विस्फोटों पर रोक लगाई जानी चाहिए। परमाणु संस्थानों से होने वाले रिसाव को रोकने के | लिए समुचित उपाय किए जाने चाहिए।
  3. कृषि के अपशिष्ट, गोबर आदि कार्बनिक पदार्थों का विसर्जन हानिकारक विधियों द्वारा नहीं कियाजाना चाहिए। इनका प्रयोग अधिक ऊर्जा उत्पादन तथा उचित खाद के उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
  4. उद्योगों के लिए निश्चित किया जाए कि वे अपने अपशिष्टों के निष्कासन के लिए ऐसी योजनाएँ बनाएँ कि वे जल, वायु तथा मृदा को हानि न्यूनतम स्तर पर ही पहुंचा सकें।

प्रश्न 5.
आर्थिक विकास पर पर्यावरण प्रदूषण के दुष्प्रभाव बताइए।
उत्तर
पर्यावरणीय समस्याएँ आज हम सभी के लिए चिन्ता का विषय हैं। मनुष्य को अच्छे स्वास्थ्य एवं सुखे जीवन के लिए इनकी ओर आवश्यक ध्यान देना चाहिए। पर्यावरणीय संरक्षण का मूलभूत लक्षणे प्राकृतिक संसाधनों के मानवीय उपयोग के प्रबन्ध से है, ताकि वे वर्तमान पीढ़ी के लिए दीर्घकालीन लाभ प्रदान कर सकें और साथ ही भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार रहें।

विकासे हमारे लिए अति आवश्यक है। विकास न केवल देश को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाएगा। अपितु विकास के कारण देश का सन्तुलित आर्थिक विकास सम्भव होगा और देश में आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ कम होंगी। अतः पर्यावरणीय समस्याओं के कारण विकास कार्यों को धीमा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। वास्तव में, विकास कार्यों में पर्यावरणीय समस्याओं का अध्ययन एवं उम्बित समय पर उनका निदान करके ही प्रत्येक क्षेत्र में बहुमुखी प्रगति सम्भव है।

पर्यावरणीय सुरक्षा एवं पारिस्थितिक सन्तुलन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि विकास कार्यक्रम लम्बे समय तक अनवरत गति से चलते रहें। भारी, मध्यम एवं लघु उद्योगों के संयोजन पर आधारित विविधतापूर्ण औद्योगिक ढाँचे की स्थापना तथा देश में बढ़ती हुई शहरी एवं ग्रामीण जनसंख्या के परिणामस्वरूप वायु, जल एवं भू-संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिसके कारण वायु तथा जल प्रदूषण में वृद्धि हुई है। चिमनी से उड़ती राख, फॉस्फोजिप्सम तथा झोंका भट्ठी के धातु अपशिष्ट जैसे ठोस कचरे को भण्डारण, कचरे का ढेर लगाना एवं उसका निपटान करना; औद्योगिक क्षेत्र में प्रमुख समस्या बन गए हैं। रसायन एवं पेट्रो-रसान उद्योगों के विकास के पीछे जहरीले, ज्वलनशील एवं विस्फोटक रसायनों को विनियमित करने की समस्या भी जटिल होती जा रही है। अधिकांश उद्योग दूषित जल को नदियों एवं जलमार्गों में पर्याप्त शोधन के बिना ही छोड़ देते हैं। औद्योगिक अवशिष्टों का स्राव आसानी से घुलनशील नहीं होता है और नदियाँ भी इसे प्राकृतिक रूप से आत्मसात नहीं कर पाती हैं। इसके परिणामस्वरूप जल तत्त्व प्रदूषित ही रह जाते हैं और जनस्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। 17 राज्यों में द्वितीय श्रेणी के 241 नगरों में केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, आपूर्ति किया गया 90% जल गन्दा होता है। अपर्याप्त सफाई की समस्या भी गम्भीर है। औद्योगिक प्रदूषण को प्रमुख भाग अवशिष्ट पदार्थों के रूप में है।

उद्योगों और सड़क पर चलने वाले मोटर वाहनों द्वारा प्रतिदिन हजारों टन प्रदूषक पदार्थों का वायु में उत्सर्जन किया जाता है। वाहनों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण पदार्थ अधिक घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि उनसे जनता का नजदीकी सम्पर्क रहता है और शहरों में ऊँचे-ऊँचे भवनों के कारण उनका प्रकीर्णन नहीं हो पाता है। पुराने इंजन, पुराने वाहन, भीड़-भाड़ वाला यातायात, खराब दशा वाली सड़कें तथा घटिया किस्म का ईंधन वायु प्रदूषण को और भी बढ़ा देते हैं। कोयले पर आधारित तापीय संयन्त्र सल्फर डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि गैंसे उत्सर्जित करके वातावरण को प्रदूषित करते हैं।, जिसके कारण तेजाबी वर्षा होती है, जो क्षेत्र की मिट्टी, वनस्पति एवं जल-जीवों के जीवन को नष्ट करती है, जिससे बड़ी मात्रा में समाज का अहित होता है। इसके अतिरिक्त, खनन उद्योग भी आस-पास के क्षेत्र में वायु और जल को प्रदूषित कर रही है। खननों के वास्तविक प्रचलनों के अलावा खानों से निकला अपशिष्ट पदार्थ और इनके ढेर, खेतों एवं सम्पत्ति को नष्ट करते हैं। खुदाई से भूमिगत जल के स्रोत भी दूषित हो जाते हैं। खानों से बन्दरगाहों और रेलवे स्टेशनों के लिए लौह-अयस्कों की ढुलाई से प्रत्येक स्थान; यथा-वायु में, घरों में तथा खाना पकाने के बर्तनों; पर धूल की एक परत जम जाती है।

मुख्य रूप से बड़े शहरों में ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। वहाँ यातायात तथा वायुयानों का शोर मानव स्वास्थ्य एवं श्रवण शक्ति के लिए खतरा उत्पन्न करता है और शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के तनाव उत्पन्न करता है। व्यापक स्तर पर गरीबी के साथ-साथ बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिससे पर्यावरण का स्तर विकृत हुआ है। वन संसाधनों की चराई, व्यापारिक एवं घरेलू आवश्यकताओं हेतु अधिक उपयोग के दूसरे तरीकों, अतिक्रमणों, कृषि जैसी अस्थायी पद्धतियों और विकासात्मक क्रिया-कलापों के कारण खतरा बढ़ गया है। देश की नाजुक पारिस्थितिक प्रणालियों को भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। मूंगे की चट्टानें, जो समुद्रीय पारिस्थितिक प्रणालियों की बहुत ही उत्पादनकारी प्रणाली है, पर भी चूने के उत्पादन, मनोरंजक वस्तुओं के उपयोग और आभूषण सम्बन्धी व्यापार के कारण हुए अन्धाधुन्ध दोहन से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। 6,700 वर्ग किमी कच्छ वनस्पति क्षेत्र, मछली पकड़ने, भूमि तथा समुद्र के बीच के स्थान के उपयोग में परिवर्तन और जल प्रदूषण, जोकि समुद्री जहाजों एवं तटीय तेलशोधक कारखानों से तेल के रिसाव,

घरेलू गन्दगी तथा औद्योगिक बहि:स्राव के गलत दिशा परिवर्तन से होता है, के कारण जैविक दबाव क्षेत्र बन गया है। संक्षेप में, आर्थिक विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत कृषि एवं औद्योगिक विकास, परिवहन के साधनों के विकास, विद्युत एवं परमाणु शक्ति के विकास आदि के कारणों ने पर्यावरणीय प्रदूषण को बढ़ाया है, जिससे मानव जीवन का अस्तित्व (आर्थिक विकास का मुख्य लक्ष्य है–मानव-कल्याण में वृद्धि) ही खतरे में पड़ गया है। अतः आर्थिक विकास के लाभ तभी तक उपादेय हैं, जब तक पर्यावरण संरक्षित है, इसलिए आर्थिक विकास कार्यक्रमों में पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। वास्तव में,आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे से परस्पर सम्बद्ध हैं।

प्रश्न 6.
पर्यावरण सुरक्षा से क्या अभिप्राय है? यह क्यों आवश्यक है? भारत सरकार ने इसके लिए क्या उपाय किए हैं? अथवा पर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का वर्णन| कीजिए।
उत्तर

पर्यावरण संरक्षण (सुरक्षा) का अर्थ

प्राकृतिक आपदाओं से बचने का एकमात्र उपाय पर्यावरणीय संरक्षण है। पर्यावरणीय संरक्षण से आशय है-पर्यावरणीय संसाधनों; यथा-भूमि, जल, खनिज, वन, ऊर्जा व जीव-जन्तुओं आदि; का न्यूनतम उपयोग करके अधिकतम लाभ प्राप्त करना अर्थात् उन्हें कम-से-कम हानि पहुँचाना। एली के शब्दों में, “पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण वर्तमान पीढ़ी का भावी पीढ़ी के लिए त्याग है।” मैकनाल के शब्दों में-“पर्यावरणीय संरक्षण से आशय प्राकृतिक संसाधनों का इस प्रकार उपयोग करने से है, जिससे मानव जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम रीति से कर सके और ऐसा तब ही हो सकता है, जबकि वर्तमान एवं भविष्य की सम्भावित आवश्यकताओं में सन्तुलन रखा जाए। संक्षेप में, पर्यावरणीय संरक्षण से आशय पर्यावरणीय संसाधनों को ऐसे विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करना है, ताकि अधिकतम समय तक, अधिकतम लोगों के, अधिकतम हित में उनका उपयोग किया जा सके।
पर्यावरणीय संरक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं|

  1. पर्यावणीय संसाधनों की आवश्यकता अपव्ययता को रोकना।
  2. भावी उपयोग के लिए संसाधनों की बचत करना।।
  3. संसाधनों को योजनाबद्ध एवं विवेकपूर्ण रीति से उपयोग करना।

पर्यावरणीय संरक्षण की आवश्यकता- पर्यावरण का, जिसमें मानव रह रहा है, अपने सभी जैवीय तथा अजैवीय घटकों के साथ समन्वित, समरस तथा सन्तुलित रहना आवश्यक है। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. इसके द्वारा पर्यावरणीय असन्तुलन के विनाशकारी प्रभावों से बचा जा सकता है। ,
  2. पर्यावस्ण को हमारी शारीरिक संरचना, स्वास्थ्य तथा मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक संसाधन जितने स्वच्छ व निर्मल होंगे, हमारा शरीर और मन भी उतना ही स्वच्छ एवं निर्मल होगा, इसलिए गुरु चरक ने कहा था-“स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध वायु, जल और मिट्टी आवश्यक कारक हैं।”
  3. राज्य की स्थिरता पर्यावरण की स्वच्छता पर निर्भर करती है।
  4. जैवीय विकास के पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
  5. देश के आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक है।
  6. औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग ने प्रदूषण की गम्भीर समस्या को उत्पन्न किया है। जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, एवं ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं ने तो मानव के अस्तित्व को ही चुनौती दे दी है।
  7. रासायनिक एवं आणविक अपघटकों ने ओजोन की परत में छेद करके सम्पूर्ण विश्व को ही त्रस्त कर दिया है।

संक्षेप में, वर्तमान शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है-पर्यावरण की सुरक्षा साथ ही मनुष्य को शुद्ध जल, वायु और भोजन प्रदान करना।

पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकारी प्रयास

पर्यावरण संरक्षण के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने लगभग 30 कानून बनाए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कानून हैं-जल (प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण) अधिनियम 1974 ई० वायु (प्रदूषण और निवारण) अधिनियम, 1981 ई०; फैक्ट्री अधिनियम, कीटनाशक अधिनियम आदि। इन अधिनियमों के क्रियान्वयन का दायित्व केन्द्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड कारखानों के मुख्य निरीक्षक और कृषि विभागों के कीटनाशक निरीक्षकों पर है। पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में सरकारी प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
(1) पर्यावरण संगठनों का गठन- चौथी योजना के प्रारम्भ में सरकार का ध्यान पर्यावरण सम्बन्धी 
समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ। इस दृष्टि से सरकार ने सर्वप्रथम सन् 1972 ई० में एक पर्यावरण समन्वय समिति का गठन किया। जनवरी 1980 ई० में एक अन्य समिति का गठन किया गया, जिसे विभिन्न कानूनों तथा पर्यावरण को बढ़ावा देने वाले प्रशासनिक तन्त्र की विवेचना करने और उन्हें सुदृढ़ करने हेतु संस्तुतियाँ देने का कार्य सौंपा गया। इस समिति की ही संस्तुति पर सन् । 1980 ई० में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई। परिणामस्वरूप पर्यावरण के कार्यक्रमों के आयोजन, प्रोत्साहन और समन्वयन के लिए सन् 1985 ई० में पर्यावरण वन्य और वन्य-जीवन मन्त्रालय की स्थापना की गई।

(2) जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण – केन्द्रीय जल प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण बोर्ड; जल और वायु प्रदूषण के मूल्यांकन, निगरानी और नियन्त्रण की शीर्षस्थ संस्था है। जल (1974 ई०) और वायु (1981 ई०) प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण कानूनों तथा जल उपकर अधिनियम (1977 ई०) को लागू करने को उत्तरदायित्व केन्द्रीय बोर्ड पर और राज्यों में गठित बोडों पर है।

(3) केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण– सरकार ने सन् 1985 ई० में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की थी। गंगा सफाई कार्ययोजना का लक्ष्य नदी में बहने वाली मौजूदा गन्दगी की निकासी करके उसे किसी अन्य स्थान पर एकत्र करना और उपयोगी ऊर्जा स्रोत में परिवर्तित करने का है। इस योजना में निम्नलिखित कार्य शामिल है-

  1. दूषित पदार्थों की निकासी हेतु बने नालों और नालियों को नवीनीकरण।
  2. अनुपयोगी पदार्थों तथा अन्य दूषित द्रव्यों को गंगा में जाने से रोकने के लिए नए रोधक नालों का निर्माण तथा वर्तमान पम्पिंग स्टेशनों और जल-मल संयन्त्रों का नवीनीकरण।
  3. सामूहिक शौचालय बनाना, पुराने शौचालयों को फ्लश में बदलना, विद्युत शवदाह गृह बनवाना तथा गंगा के घाटों का विकास करना।
  4.  जल-मल प्रबन्ध योजना का आधुनिकीकरण।

(4) अर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 ई०— यह अधिनियम 19 नवम्बर, 1986 ई० से लागू हो गया है। इस अधिनियम की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं
(अ) केन्द्र सरकार को प्राप्त अधिकार

  1. पर्यावरण की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना।
  2. पर्यावरण सुरक्षा से सम्बन्धित अधिनियमों के अन्तर्गत राज्य सरकारों, अधिकारियों और प्राधिकारियों के काम में समन्वय स्थापित करना।।
  3. पर्यावरण प्रदूषण के निवारण, नियन्त्रण और उपशमन के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना।
  4. पर्यावरण प्रदूषण के नि:सरण के लिए मानक निर्धारित करना।
  5. किसी भी अधिकारी का प्रवेश, निरीक्षण, नमूना लेने और जाँच करने की शक्ति प्रदान ।करना।
  6. पर्यावरण प्रयोगशालाओं की स्थापना करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना।
  7. सरकारी विश्लेषकों को नियुक्त करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना।।
  8. पर्यावरण की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करना।
  9. दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए रक्षोपाय निर्धारित करना और दुर्घटनाएँ लेने पर उपचारात्मक कदम उठाना।
  10. खतरनाक पदार्थों के रख-रखाव/सँभालने आदि की प्रक्रियाएँ और रक्षोपाय निर्धारित करना। कुछ ऐसे क्षेत्रों का परिसीमन करना, जहाँ किसी भी उद्योग की स्थापना अथवा औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित न की जा सकें।

(ब) किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि निर्धारित प्राधिकरणों को 60 दिन की सूचना देने के बाद इस अधिनियम के उपबन्धों का उल्लघंन करने वालों के विरुद्ध न्यायालय में शिकायत कर दे।
(स) अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी स्थान को प्रभारी व्यक्ति किसी दुर्घटना आदि के 
फलस्वरूप प्रदूषणों का रिसाव निर्धारित मानक से अधिक होने या अधिक रिसाव होने की आशंका पर उसकी सूचना निर्धारित प्राधिकरण को देने के लिए बाध्य होगा।
(द) अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के लिए अधिनियम में कठोर दण्ड देने की व्यवस्था
(य) इस अधिनियम के अन्तर्गत आने वाले मामले दीवानी अदालतों के कार्य-क्षेत्र में नहीं आते।

(5) अन्य योजनाएँ- उपर्युक्त के अतिरिक्त शासकीय स्तर से किए गए कुछ अन्य प्रयास निम्नलिखित हैं|

  1. राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड (1981 ई०) की स्थापना।
  2. विभिन्न राज्यों में जीवमण्डल भण्डारों की स्थापना।
  3. सिंचाई भूमि स्थलों के लिए राज्यवार नोडल एकेडेमिक रिसर्च इन्स्टीट्यूट की स्थापना।
  4. राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड (1985 ई०) की स्थापना।
  5. वन नीति में संशोधन।
  6. राष्ट्रीय वन्य-जीवन कार्ययोजनाओं का आरम्भ।
  7. अनुसन्धान कार्यों के लिए निरन्तर प्रोत्साहन।।
  8. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।
  9. प्रदूषण निवारण पुरस्कारों की घोषणा।।
  10. 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

प्रश्न 7.
धारणीय विकास का अर्थ एवं इसकी आवश्यकताएँ बताइए। भारत में धारणीय विकास की| रणनीति भी समझाइए।
उत्तर
धारणीय विकास का अर्थ धारणीय विकास वह प्रक्रिया है जो आर्थिक विकास के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले दीर्घकालीन शुद्ध लाभों को वर्तमान तथा भावी पीढ़ी दोनों के लिए अधिकतम करती है। यह भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को बिना कोई हानि पहुँचाए वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

यू०एन०सी०ई०डी० के अनुसार-“धारणीय विकास से आशय ऐसे विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी। की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता के समझौता किए बिना पूरी करें।”

यू०एन०सी०ई०डी० की रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ के अनुसार-“धारणीय विकास विकासको वह प्रक्रिया है जो सभी की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति और एक अच्छे जीवन की आकांक्षाओं की सन्तुष्टि के लिए सभी को अवसर प्रदान करती है।” एडवई बारबियर के अनुसार-“धारणीय विकास से आशय बुनियादी स्तर पर गरीबों के जीवन के भौतिक मानकों को ऊँचा उठाना है जिसे आय, वास्तविक आय, शैक्षिक सेवाएँ, स्वास्थ्य देखभाल, सफाई, जलापूर्ति इत्यादि के रूप में परिमाणात्मक रूप से मापा जा सकता है।”

रॉबर्ट रेपीट के अनुसार- “धारणीय विकास का अर्थ विकास की वह रणनीति है जो सभी प्राकृतिक, मानवीय, वित्तीय तथा भौतिक साधनों का सम्पत्ति तथा आर्थिक कल्याण में वृद्धि करने के लिए प्रबन्ध करती है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर धारणीय विकास की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. आर्थिक संवृद्धि एवं प्रति व्यक्ति आय में दीर्घकालीन वृद्धि होनी चाहिए।
  2. प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण एवं कुशलतापूर्वक शोषण किया जाना चाहिए।
  3. उपलब्ध संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि भावी पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की योग्यता में कमी न हो।
  4. ऐसे कार्य न किए जाएँ जो पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ाते हैं तथा भावी पीढ़ी की गुणवत्ता को कम करते हैं। 

धारणीय विकास की आवश्यकताएँ

धारणीय विकास की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित आवश्यकताएँ हैं

  1. मानव जनसंख्या की पर्यावरण की धारण क्षमता के स्तर तक स्थिर करना होगा।
  2. प्रौद्योगिक प्रगति आगत-निपुण हो, न कि आगत उपभोगी।
  3. किसी भी स्थिर्सि में नव्यकरणीय संसाधनों की निष्कर्षण की दर पुनर्सेजन की दर से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  4. गैर-नवीकरणीय संसाधनों की अपक्षय दर नवीनीकृत प्रतिस्थापकों से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  5. प्रदूषण के कारण उत्पन्न अक्षमताओं को सुधार किया जाना चाहिए।

भारत में धारणीय विकास की रणनीतियाँ

धारणीय विकास रणनीति के मुख्य बिन्दु निम्न प्रकार हैं

  1. अपनी विद्युत आवश्यकताओं के लिए ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का अधिकाधिक उपयोग | करना। थर्मल पावर संयन्त्र और जलविद्युत परियोजनाएँ पर्यावरण को हानि पहँचाते हैं जबकि ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में तरल पेट्रोलियम गैस (LPG) के प्रयोग को प्रोत्साहन देना। इसके अतिरिक्त गोबर गैस संयन्त्रको प्रोत्साहन दिया जाए।
  3. शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में उच्च दाब प्राकृतिक गैस (CNG) को बढ़ावा देना। इससे वायु प्रदूषण कम होगा।
  4. पवनचक्की से ऊर्जा प्राप्त करना। इसमें लागत कम आती है।
  5. सूर्य किरणों से सौर-ऊर्जा प्राप्त करना। यह ऊर्जा का अक्षय स्रोत है।
  6. पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों की सहायता से लघु जलीय प्लाण्ट स्थापित करना।
  7. विभिन्न आर्थिक क्रियाओं में पारम्परिक ज्ञान का प्रयोग करना।
  8. जैविक कम्पोस्ट खाद के प्रयोग को प्रोत्साहन देना।
  9. बेहतर कीट नियन्त्रक तरीकों को अपनाना। कीट नियन्त्रण में सहायक विभिन्न कीटों व पक्षियों को संरक्षण देना।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 8
Chapter Name Infrastructure (आधारिक संरचना)
Number of Questions Solved 44
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure (आधारिक संरचना)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर 

प्रश्न 1.
आधारित संरचना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
आधारित संरचना से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा सेवाओं से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं। ये समाज के दैनिक जीवन में भी सहायक होती हैं। इन सेवाओं में सड़क, रेल, बन्दरगाह, हवाई अड्डे, बाँध, बिजली-घर, तेल व गैस पाइप लाइन, दूरसंचार सुविधाएँ, शिक्षण संस्थान, अस्पताल के स्वास्थ्य व्यवस्था, सफाई, पेयजल और बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाएँ तथा मुद्रा प्रणाली सम्मिलित हैं।

प्रश्न 2.
आधारित संरचना को विभाजित करने वाले दो वर्गों की व्याख्या कीजिए। दोनों एक-दूसरे पर कैसे निर्भर हैं?
उत्तर
आधारित संरचना निम्न दो प्रकार की होती है
1. सामाजिक आधारित संरचना- सामाजिक आधारित संरचना से अभिप्राय सामाजिक परिवर्तन 
जैसे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, नर्सिंग होम; के मूल तत्त्वों से है जो किसी देश के सामाजिक विकास की प्रक्रिया के लिए आधारशिला का कार्य करते हैं। इस प्रकार की संरचना आदमी की कुशलता एवं उत्पादकता को बढ़ाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवास मुख्य रूप से सामाजिक आधारित संरचना के भाग हैं। ये अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक क्रियाओं में सहयोग करते हैं।

2. आर्थिक आधारित संरचना– आर्थिक आधारित संरचना से अभिप्राय आर्थिक परिवर्तन के उन सभी तत्त्वों (जैसे शक्ति, परिवहन तथा संचार) से है जो आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया के लिए एक आधारशिला का कार्य करते हैं। इस प्रकार की संरचना उत्पादन पर सीधा प्रभाव डालती है। शक्ति, ऊर्जा, परिवहन एवं दूरसंचार आदि को आर्थिक आधारिक संरचना में सम्मिलित किया जाता है। आर्थिक आधारिक संरचना संवृद्धि की प्रक्रिया में वृद्धि लाती है जबकि सामाजिक आधारिक संरचना मानव विकास की प्रक्रिया में वृद्धि लाती है इसीलिए आर्थिक तथा सामाजिक आधारिक संरचना एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों एक-दूसरे के प्रभाव को प्रबल बनाती हैं एवं सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
आधारिक संरचना उत्पादन का संवर्द्धन कैसे करती है?
उत्तर
आधारिक संरचना ऐसी सहयोगी प्रणाली है, जिस पर एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की कार्यकुशल प्रणाली निर्भर करती है। संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।

प्रश्न 4.
किसी देश के आर्थिक विकास में आधारिक संरचना योगदान करती है। क्या आप सहमत| हैं? कारण बताइए।
उत्तर
आधारिक संरचना कसी देश के आर्थिक विकास की आधारशिला है। यह औद्योगिक व कृषि उत्पादन, घरेलू व विदेशी व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख क्षेत्रों में सहयोगी सेवाएँ उपलब्ध कराती है। इस संरचना से विकास के लिए उपयुक्त एवं पर्याप्त वातावरण तैयार होता है। इस संरचना की भूमिका निम्न प्रकार है

  1. संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।
  2. जलापूर्ति और सफाई में सुधार से प्रमुख जल संक्रमित बीमारियों में अस्वस्थता में कमी आती है। | और बीमारी के होने पर भी उसकी गम्भीरता कम होती है।
  3. परिवहन और संचार के साधनों से कच्चा माल व तैयार माल आसानी से एक जगह से दूसरी जगह | पहुँचाया जा सकता हैं।
  4. अर्थव्यवस्था की वित्त-प्रणाली सभी क्रियाकलापों के लिए मौद्रिक आपूर्ति करती है। मौद्रिक आपूर्ति जितनी अधिक मात्रा में सुगमता से उपलब्ध होती है, उतनी ही जल्दी आर्थिक परियोजनाएँ सफल होती हैं।
  5. किसी भी देश की औद्योगिक प्रगति बिजली उत्पादन, परिवहन व संचार के विकास पर निर्भर करती है।
  6. मानव संसाधन की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 5.
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की क्या स्थिति है?
उत्तर
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की स्थिति ग्रामीण भारत आर्थिक व सामाजिक दोनों ही आधारिक संरचनाओं में बहुत पिछड़ा हुआ है। सन् 2001 की जनगणना के आँकड़े यह बताते हैं कि ग्रामीण भारत में केवल 56 प्रतिशत परिवारों के लिए ही बिजली की सुविधा है जबकि 43 प्रतिशत परिवारों में आज भी मिट्टी के तेल का प्रयोग होता है। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 90 प्रतिशत परिवार खाना बनाने में जैव ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। केवल 24 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में लोगों को नल का पानी उपलब्ध है। लगभग 76 प्रतिशत लोग पानी के खुले स्रोतों से पानी पीते हैं। गाँव में टेलीफोन घनत्व बहुत कम है। ग्रामीण साक्षरता का स्तर भी निम्न है। इस प्रकार सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्र अभी भी अविकसित हैं।

प्रश्न 6.
‘ऊर्जा का महत्त्व क्या है? ऊर्जा के व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक स्रोतों में अन्तर कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा का महत्त्व

आर्थिक आधारित संरचना का बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण संघटक ऊर्जा है। किसी राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है, साथ ही यह उद्योगों के लिए भी अनिवार्य है। आज ऊर्जा का कृषि और उससे सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों के उत्पादन और यातायात; में उपयोग भारी स्तर पर हो रही है। इस प्रकार प्रत्येक गतिविधि को सम्पन्न करने हेतु ऊर्जा आवश्यक है। ऊर्जा के उपभोग स्तर से सामाजिक एवं आर्थिक संवृद्धि निर्धारित होती है।

आधार व्यावसायिक ऊर्जा गैर-व्यावसायिक ऊर्जा
1 घटक  कोयला, बिजली, प्राकृतिक गैस व पेट्रोलियम पदार्थ।। ईंधन की लकड़ी, पशु व कृषि अपशिष्ट।
2 प्रयोग  मुख्यतः वाणिज्यिक व औद्योगिक उद्देश्यों के लिए। मुख्यतः घरेलू तथा उपभोग उद्देश्यों के लिए।
3 प्रकृति  वाणिज्यिक ऊर्जा वाली वस्तुओं का कीमत होती है है और इन वस्तुओं की प्राप्त हो जाती हैं। ये सामान्यतः ग्रामवासियों को नि:शुल्क प्राप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 7.
विद्युत के उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
विद्युत के उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत इस प्रकार हैं

  1. तापीय विद्युत (कोयला),
  2. जलविद्युत (जल) तथा
  3. आणविक ऊर्जा (नाभिकीय विखण्डन)।

प्रश्न 8.
संचारण और वितरण हानि से आप क्या समझते हैं? उन्हें कैसे कम किया जा सकता है?
उत्तर
संचारण और वितरण हानि से आशय संचारण और वित्: नि से आशय विद्युत की चोरी से है। यह हानि विद्युत के कुछ भाग में तकनीकी खराबी के कारण तथा कुछ बिजली कर्मचारियों की सहायता से होने वाली बिजली चोरी के कारण होती है। आज विद्युत संचारण एवं वितरण से होने वाले घाटे सर्वविदित हैं।।
 नियन्त्रण के उपाय संचारण और वितरण हानि को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए

  1. उत्पादक क्रियाओं के लिए बिजली की दर ऊँची कर देनी चाहिए।
  2. संचारण एवं वितरण की हानि को तकनीकी में सुधार करके कम कर देना चाहिए।
  3. वितरण का निजीकरण करके बिजली चोरी को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
ऊर्जा के विभिन्न गैर-व्यावसायिक स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
ऊर्जा के गैर-व्यावसायिक स्रोतों में जलाऊ लकड़ी, कृषि का कूड़ा-कचरा और सूखा गोबर आते हैं। ये गैर-व्यावसायिक हैं, क्योंकि ये हमें प्रकृति/जंगलों में मिलते हैं।

प्रश्न 10.
इस कथन को सही सिद्ध कीजिए कि ऊर्जा के पुनर्नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है?
उत्तर
पुनर्नवीनीकृत (गैर-परम्परागत) ऊर्जा संसाधन है-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि। नव्यकरणीय साधन होने के नाते, ये ऊर्जा के विश्वसनीय संसाधन हैं। यह सही है कि उनके प्रयोग से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा 
सकते हैं

  1. अनव्यीकृतं साधन (परम्परागत साधन) क्षयशील हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इसके विपरीत पुनर्नवीनीकृत साधनों को पूर्णत: कभी भी क्षय नहीं होगा; उदाहरण के लिए सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। जब तक ब्रह्माण्ड में सूर्य विद्यमान रहेगा, सौर ऊर्जा प्राप्त की जाती रहेगी।
  2. वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ-साथ इन संसाधनों का भी विकास किया जाता रहेगा।
  3. इनको निरन्तर उपयोग किया जाना सम्भव है।
  4. ये ऊर्जा के अक्षयी संसाधन हैं। अत: इनसे अनवरत ऊर्जा की आपूर्ति होती रहेगी।
  5. ऊर्जा के ये साधन प्रदूषण नहीं फैलाते। अत: इनका मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं| पड़ता।

स्पष्ट है कि इन संसाधनों के अधिकाधिक उत्पादन एवं प्रयोग से हम ऊर्जा संकट को समाप्त कर सकते हैं। परन्तु आधुनिक तकनीक के अभाव में, इनकी पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद हम इनका व्यापक उपभोग नहीं कर पा रहे हैं। अतः ऊर्जा संकट से छुटकारा पाने के लिए इस ओर अधिकाधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 11.
पिछले वर्षों के दौरान ऊर्जा के उपभोग प्रतिमानों में कैसे परिवर्तन आया है?
उत्तर
1953-54 में ऊर्जा के कुल उपभोग के 55 प्रतिशत में कोयले का प्रयोग होता था। पेट्रोलियम तथा विद्युत ऊर्जा का उपभोग क्रमशः 16.7 प्रतिशत व 3.2 प्रतिशत था। इस समय प्राकृतिक गैस का प्रयोग नहीं किया जाता था। 1960-61 ई० में ऊर्जा स्रोत के रूप में कोयले के उपभोग में कमी हुई। इसके विपरीत पेट्रोलियम तथा विद्युत ऊर्जा के उपभोग में मामूली-सी वृद्धि हुई। सत्तर के दशक में यह वृद्धि 1953-54 की तुलना में दो गुनी हो गई तथा कोयले का उपभोग 56.1 प्रतिशत रह गया। इसी दशक में प्राकृतिक गैस का भी ऊर्जा के रूप में उपयोग होने लगा। यही वृद्धि अस्सी वे नब्बे के दशक में भी जारी रही। वर्तमान में भारत में कुल ऊर्जा उपभोग का 65 प्रतिशत व्यावसायिक ऊर्जा से पूरा होता है। इसमें कोयले का अंश सर्वाधिक (55 प्रतिशत) है। इसके अतिरिक्त इसमें तेल (31 प्रतिशत), प्राकृतिक गैस (11 प्रतिशत) और जल ऊर्जा (3 प्रतिशत) सम्मिलित हैं। जलाऊ लकड़ी, गाय का गोबर और कृषि का कूड़ा-कचरा आदि गैर-व्यावसायिक ऊर्जा स्रोतों का उपभोग भारत में कुल ऊर्जा उपभोग का 30 प्रतिशत से ज्यादा है।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के उपभोगे और आर्थिक संवृद्धि की दरें कैसे परस्पर सम्बन्धित हैं?
उत्तर
किसी राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्थान है, साथ ही यह उद्योगों के लिए भी अनिवार्य है। आज ऊर्जा का उपभोग कृषि और उससे सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों के उत्पादन और यातायात में भारी स्तर पर हो रहा है। घरों में इसकी आवश्यकता भोजन बनाने, घरों को प्रकाशित करने और गर्म करने के लिए होती है। संक्षेप में ऊर्जा के अधिक इस्तेमाल का मतलब अधिक आर्थिक विकास होता है। ऊर्जा के नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से धारणीय आर्थिक विकास होता

प्रश्न 13.
भारत में विद्युत क्षेत्रक किन समस्याओं का सामना कर रहा है?
उत्तर
भारत में विद्युत क्षेत्रक में उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली पर सरकार का एकाधिकार है। राज्य विद्युत बोर्ड, जो बिजली का वितरण करते हैं, वित्तीय घाटा उठा रहे हैं। इस वित्तीय घाटे के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. विभिन्न पॉवर स्टेशनों द्वारा जनित बिजली का पूरा उपभोग उपभोक्ता नहीं करते।
2. बिजली के सम्प्रेषण में विद्युत का क्षय होता है।
3. किसानों व लघु उद्योगों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता कम है।

इस वित्तीय घाटे को कम करने के लिए सरकार निजी व विदेशी क्षेत्रक को विद्युत उत्पादन व वितरण में सहभागिता बढ़ाने को प्रोत्साहित कर रही है। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत में बिजली से जुड़ी कुछ और समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1. भारत की वर्तमाने बिजली उत्पादन क्षमता 7 प्रतिशत की प्रतिवर्ष आर्थिक क्षमता अभिवृद्धि के लिए | पर्याप्त नहीं है।
  2. राज्य विद्युत बोर्ड जो विद्युत वितरण करते हैं, की लाइन हानि पाँच सौ मिलियन से ज्यादा है। | इसका कारण सम्प्रेषण और वितरण में क्षय, बिजली की अनुचित कीमतें और अकार्यकुशलता है।
  3. बिजली के क्षेत्र में निजी व विदेशी क्षेत्रक की भूमिका बहुत कम है।
  4. भारत के विभिन्न भागों में बिजली की ऊँची दरें और लम्बे समय तक बिजली गुल होने से आमतौर | पर जनता में असन्तोष है।
  5. तापीय संयन्त्रों में कच्चे माल एवं कोयले की आपूर्ति कम है।

प्रश्न 14.
भारत में ऊर्जा संकट से निपटने के लिए किए गए सुधारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर
निरन्तर आर्थिक विकास और जनसंख्या वृद्धि से भारत में ऊर्जा की माँग में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। यह माँग वर्तमान में देश में उत्पन्न हो रही ऊर्जा की तुलना में बहुत अधिक है। अत: भारत ऊर्जा के संकट खे गुजर रहा है।

ऊर्जा संकट से बचाव के उपाय

इस संकट से बचने के लिए निम्नलिखित सुधार किए गए हैं

  1. भारत ने निजी व विदेशी क्षेत्रकों को बिजली उत्पादन तथा वितरण के लिए अनुमति दे दी है।
  2. सरकार गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के उपभोग को प्रोत्साहन दे रही है।
  3. सरकार विद्युत वितरण में होने वाली हानि (लाइन लॉस) को कम करने का प्रयास कर रही है।
  4.  विद्युत उत्पादन की समस्या से बचने के लिए केन्द्रीय विद्युत अथॉरिटी एवं केन्द्रीय नियमन आयोग की स्थापना की गई है।

प्रश्न 15.
हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर
स्वास्थ्य सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की अवस्था है। इसका अर्थ केवल बीमारी का न होना ही नहीं है, बल्कि इससे अभिप्राय एक व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक अवस्था  से है। स्वास्थ्य राष्ट्र की समग्र संवृद्धि और विकास से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। एक देश की स्वास्थ्य की स्थिति को शिशु मृत्यु दर, मातृत्व मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, पोषण स्तर, छूत एवं अछूत की बीमारियों के आधार पर आँका जाता है। हमारे देश भारत में कुछ स्वास्थ्य सूचक निम्नलिखित तालिका में दर्शाए गए हैं

क्र०सं० सूचक
1 शिशु मृत्यु दर/प्रति 1000 शिशु 68
2 पाँच वर्ष के नीचे मृत्यु दर/प्रति 1000 शिशु 87
3 प्रशिक्षित परिचारिका द्वारा जन्म 43
4 पूर्ण प्रतिरक्षित 67
5 सकल घरेलू उत्पाद में स्वास्थ्य पर व्यय (%) 4.8
6 कुल व्यय में सरकारी हिस्सेदारी 21.3
7 कुल स्वास्थ्य व्यय में सरकारी हिस्सेदारी।।
8 स्वास्थ्य पर व्यय (अन्तर्राष्ट्रीय डॉलर में प्रति व्यक्ति आय) 96

प्रश्न 16.
रोग वैश्विक भार (GDB) क्या है?
उत्तर
विश्व रोग भार (GDB) एक सूचक है जिसका प्रयोग विशेषज्ञ किसी विशेष रोग के कारण असमय मरने वाले लोगों की संख्या के साथ-साथ रोगों के कारण असमर्थता में बिताए सालों की संख्या जानने के लिए करते हैं।

प्रश्न 17.
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ क्या हैं?
उत्तर
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ इस प्रकार हैं

1. यद्यपि देश की 72 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है परन्तु ग्रामीण जनसंख्या की तुलना में शहरी जनसंख्या को अधिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
2. अधिकतर सरकारी अस्पताल शहरों में स्थित हैं।
3. गाँवों में कुल अस्पताल को 30 प्रतिशत तथा बिस्तर का 25 प्रतिशत से अधिक नहीं है।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक 1 लाख लोगों पर 0.36 अस्पताल हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 3.6 । अस्पतालों की है।
5. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में एक्स-रे या खून की जाँच करने जैसी | सुविधाएँ नहीं हैं।
6. ग्रामीणों को शिशु चिकित्सा, स्त्री रोग चिकित्सा, संवेदनाहरण तथा प्रसूति विद्या जैसी विशिष्ट 
चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
7. गाँवों में चिकित्सक का हमेशा अभाव रहता है।
8. भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले निर्धनतमे लोग अपनी आय का 12 प्रतिशत स्वास्थ्य 
सुविधाओं पर व्यय करते हैं जबकि धनी केवल 2 प्रतिशत व्यय करते हैं।

प्रश्न 18.
महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता का विषय कैसे बन गया है?
उत्तर
भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग महिलाओं का है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी, पुरुषों की अपेक्षा काफी कम है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश में शिशु-लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएँ 943 हैं। 15 वर्ष से कम आयु वर्ग की लगभग 3 लाख लड़कियाँ न केवल शादीशुदा हैं बल्कि कम-से-कम एक बच्चे की माँ भी हैं। विवाहित महिलाओं में 50 प्रतिशत से ज्यादा रक्ताभाव एवं रक्तक्षीणता से पीड़ित हैं। इसी कारण महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता बन गया है।

प्रश्न 19.
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ बतलाइए। राज्य द्वारा रोगों पर नियन्त्रण के लिए उठाए गए प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बताइए।
उत्तर
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ सार्वजनिक स्वास्थ्य से आशय देश के समस्त लोगों के स्वास्थ्य से है। किसी देश के लोगों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं

  1. माँ का स्वास्थ्य उत्तम हो ताकि बच्चे भी नीरोगी व स्वस्थ पैदा हों।
  2. बच्चों को भयानक बीमारियों; जैसे-मलेरिया, तपेदिक, चेचक, पोलियो आदि; से बचाव के लिए | उन्हें समय पर उचित टीके लगाए जाने चाहिए।
  3. लोगों को खाने के लिए पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन प्राप्त होना चाहिए। सन्तुलित भोजन से बच्चों | की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  4. बीमारी के समय उचित उपचार की सुविधा होनी चाहिए, इससे रोग संक्रामक नहीं हो पाएँगे।

रोगों के नियन्त्रण सम्बन्धी कार्यक्रम

राज्य द्वारा रोगों को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए गए हैं

1. मलेरिया नियन्त्रण-यह मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारी के विरुद्ध विश्व का सबसे बड़ा स्वास्थ्य कार्यक्रम है।
2. राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम-कुष्ठ प्रभावित व्यक्तियों की दृष्टि से विश्व के कुल प्रभावित 
व्यक्तियों का लगभग 67% भारत में है। इसे दूर करने के लिए सन् 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम आरम्भ किया गया।
3. तपेदिक नियन्त्रण कार्यक्रम-अनुमान है कि देश में लगभग 64 मिलियन लोग सक्रिय तपेदिक  से प्रभावित हैं। इस कार्यक्रम के द्वारा तपेदिक अब लाइलाज बीमारी नहीं रह गई है।
4. अन्धता नियन्त्रण–देश में अन्धता नियन्त्रण पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने के कारण अब अन्धता | दर में निरन्तर कमी आ रही है। 5. एच०आई०वी०/एड्स नियन्त्रण-सन् 1987 से प्रारम्भ इस कार्यक्रम के अन्तर्गत इस रोग से 
ग्रसित रोगियों का पता लगाने, रोग के संक्रमण को नियन्त्रित करने तथा रोगियों का समुचित उपचार करने के लिए, सरकार बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम चला रही है।
6. पोलियो नियन्त्रण-पोलियो की प्रभावदर को शून्य करने के लिए 5 वर्ष तक के बच्चों को 
प्रतिमाह पोलियो की खुराक पिलाई जा रही है।

प्रश्न 20.
चिकित्सा की छ: भारतीय प्रणालियों की सूची बनाइए।
उत्तर
चिकित्सा की भारतीय प्रणाली में निम्नलिखित छः व्यवस्थाएँ हैं

1. आयुर्वेद।
2. योग।
3. यूनानी।
4. सिद्ध।
5. प्राकृतिक चिकित्सा।
6. होम्योपैथी।

प्रश्न 21.
हम स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर
किसी व्यक्ति के काम करने की योग्यता एवं क्षमता काफी सीमा तक उसके स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का निर्धारण शिशु एवं मातृ मृत्युदर, जीवन प्रत्याशा, पोषण स्तर, छूत एवं अछूत बीमारियों के स्तर से होता है। उपर्युक्त सूचकों के स्तर के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को बढ़ाने की आवश्यकता है। इसे निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

1. स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी व्यय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 5 प्रतिशत है। यह अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है। स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की सफलता के लिए सरकार को स्वास्थ्य व्यय बढ़ाना चाहिए।
2. बच्चों को भयानक बीमारियों; जैसे—मलेरिया, क्षयरोग (TB), चेचक, पोलियो आदि; से बचाव 
के लिए उन्हें उचित टीके लगाए जाने चाहिए।

  1. गरीब लोगों को खाने के पर्याप्त एवं सन्तुलित भोजन की आपूर्ति करनी चाहिए जिससे कुपोषण से होने वाली बीमारियों को रोका जा सके।
  2. स्वास्थ्य व सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा की जानी चाहिए।
  3. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ विकेन्द्रित होनी चाहिए।
  4. स्वास्थ्य सुविधाओं का शहरों एवं गाँवों में स्पष्ट विभाजन होना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
विद्युत के उत्पादन का बुनियादी स्रोत है
(क) तापीय विद्युत
(ख) जलविद्युत
(ग) आणविक ऊर्जा
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
सन् 2011 की जनगणना के अनुसर शिशु लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएँ
(क) 900
(ख) 943
(ग) 950
(घ) 955
उत्तर
(ख) 943

प्रश्न 3.
खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र नहीं है
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) गुजरात
(घ) डिगबोई
उत्तर
(क) उत्तर प्रदेश ।

प्रश्न 4.
विश्व में सम्भाव्ये जल-शक्ति की दृष्टि से भारत का कौन-सा स्थान है?
(क) पहला
(ख) दूसरा
(ग) तीसरा
(घ) पाँचवाँ
उत्तर
(घ) पाँचवाँ,

प्रश्न 5.
भारत में सर्वप्रथम परमाणु ऊर्जा केन्द्र कहाँ स्थापित किया गया?
(क) तारापुर में
(ख) रावतभाटा में
(ग) काकरापाड़ा में
(घ) नरौरा में
उत्तर
(क) तारापुर में ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधारिक संरचना क्या है?
उत्तर
किसी अर्थव्यवस्था के पूँजी स्टॉक के उस भाग को जो विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने की दृष्टि से अनिवार्य होता है, आधारिक संरचना कहा जाता है।

प्रश्न 2.
आधारिक संरचना के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
आधारिक संरचना के कुछ उदाहरण हैं-परिवहन सुविधाएँ प्रदान करने वाली सड़कें, बसें, रेलवे, स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने वाले अस्पताल, सिंचाई की सुविधा प्रदान करने वाली नहरें, कुएँ आदि पूँजी स्टॉक आधारिक संरचना हैं।

प्रश्न 3.
आर्थिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
आर्थिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं जो उत्पादन तथा वितरण की प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक दूसरा सहयोगी ढाँचा प्रदान करती हैं। इसके मुख्य घटक हैं
1. परिवहन एवं संचार तन्त्र,
2. विद्युत और सिंचाई तथा
3. मौद्रिक व वित्तीय संस्थाएँ।

प्रश्न 4.
सामाजिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
सामाजिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं जो आर्थिक सुविधाओं को अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली को बाहर से अपना योगदान करती हैं। ये सेवाएँ अर्थव्यवस्था के  एक महत्त्वपूर्ण सहायक ढाँचे का निर्माएँ करती हैं। इसके प्रमुख घटक हैं
1. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान,
2. स्वास्थ्य,
3. आवास,
4. नागरिक सुविधाएँ तथा
5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।।

प्रश्न 5.
संरचनात्मक सुविधाओं का देश के आर्थिक विकास में क्या महत्त्व है?
उत्तर
संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन व गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।

प्रश्न 6.
जलापूर्ति एवं सफाई में सुधार का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
जलापूर्ति एवं सफाई में सुधार से प्रमुख जल संक्रमित बीमारियों से अस्वस्थता में कमी आती है। और बीमारी के हो जाने पर भी उसकी गम्भीरता कम होती है।

प्रश्न 7.
आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
उत्तर
आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए सरकार को आधारिक संरचना सुविधाओं में निवेश को बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 8.
आय में वृद्धि के साथ आधारिक संरचना में क्या महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आते हैं?
उत्तर
अल्प आय वाले देशों के लिए सिंचाई, परिवहन व बिजली अधिक महत्त्वपूर्ण है जबकि उच्च आय वाले देशों में बिजली और दूरसंचार अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार आधारिक संरचना का विकास और आर्थिक विकास साथ-साथ होते हैं।

प्रश्न 9.
आर्थिक आधारिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक क्या है?
उत्तर
आर्थिक आधारिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक ‘ऊर्जा’ है क्योंकि इसके बिना औद्योगिक उत्पादन सम्भव नहीं है।

प्रश्न 10.
वाणिज्यिक और गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक बताइए।
उत्तर
1. वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक– कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद, प्राकृतिक गैस तथा बिजली।
2. गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक– ईंधन की लकड़ी, कृषि अवशिष्ट (भूसा) और पशु अवशिष्ट (गोबर)।

प्रश्न 11.
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत क्या हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत वे हैं जिनकी हमें जानकारी है और जिनका प्रयोग हम बहुत लम्बे समय से कर रहे हैं; जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और बिजली।।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत क्या हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत वे हैं जिनकी खोज हाल ही के वर्षों में की गई है और जिनकी लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ रही है; जैसे—सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा, बायोमास।

प्रश्न 13.
भारतीय कोयले का मुख्य दोष क्या है?
उत्तर
भारतीय कोयले का मुख्य दोष यह है कि इसमें राख बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है और उष्णता कम मात्रा में इसका तापविद्युत स्टेशनों की कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 14.
प्राकृतिक गैस का प्रयोग किस रूप में होता है? इसके भण्डार कहाँ हैं?
उत्तर
प्राकृतिक गैस का प्रयोग उर्वरक तथा पेट्रोलियम पदार्थों में कच्चे माल के रूप में होता है। इसके मुख्य भण्डार मुम्बई, गुजरात, त्रिपुरा, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान में पाए जाते हैं।

प्रश्न 15.
भारत में बिजली प्राप्ति के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर
भारत में बिजली प्राप्ति के तीन मुख्य स्रोत हैं-

  1. तापविद्युत स्टेशन,
  2. जल विद्युत स्टेशन तथा
  3. आणविक शक्ति स्टेशन।

प्रश्न 16.
भारत में आणविक शक्ति स्टेन के कुछ प्रमुख स्थान बताइए।
उत्तर
भारत में आणविक शक्ति स्टेशन के कुछ प्रमुख स्थान हैं-

  1. मुम्बई के पास, तारापुर में,
  2. कोटा (राजस्थान) के पास राणाप्रताप सागर बाँध,
  3. चेन्नई (तमिलनाडु) के समीप कलपक्कम में,
  4. बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) के पास नरौरा में।।

प्रश्न 17.
पर्यावरण की दृष्टि से ऊर्जा के परम्परागत और गैर-परम्परागत स्रोतों के बीच मुख्य अन्तर
| क्या है?
उत्तर
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत (विशेष रूप से कोयला और पेट्रोलियम) पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। जबकि ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करते।

प्रश्न 18.
बायो ऊर्जा से क्या आशय है?
उत्तर
बायो ऊर्जा जीव तथा जैव पदार्थ से प्राप्त की जाती है। यह दो प्रकार की होती है-
1. बायो गैस–इसे गोबर गैस प्लाण्ट में गोबर डालकर प्राप्त किया जाता है।
बायो मास-इसे पौधों तथा वृक्षों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 19.
ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत क्या हैं?
उत्तर
ऊर्जा के प्राथमिक वे स्रोत हैं जो प्रकृति से नि:शुल्क उपहार के रूप में प्राप्त होते हैं। इनका प्रत्यक्ष प्रयोग होता है; जैसे—कोयला, लिग्नाइट, पेट्रोलियम आदि।

प्रश्न 20.
ऊर्जा के अन्तिम स्रोत क्या हैं?
उत्तर
ऊर्जा के अन्तिम स्रोत वे हैं जिनका प्रयोग अन्तिम उत्पाद के रूप में किया जाता है जैसे विद्युत शक्ति ।

प्रश्न 21.
प्राकृतिक गैस के उपयोग बताइए।
उत्तर
प्राकृतिक गैस तरल पदार्थ के रूप में होती है। इसका प्रयोग अधिकतर घरों में ईंधन के रूप में किया जाता है। वर्तमान में इसंका व्यावसायिक उपयोग भी बढ़ता जा रहा है; जैसे-स्टील निर्माण में, हल्के वाहनों को चलाने आदि में।।

प्रश्न 22.
स्वास्थ्य से क्या आशय है?
उत्तर
स्वास्थ्य सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की अवस्था है। इसका आशय एक व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक तथा मानसिक अवस्था से है।

प्रश्न 23.
अच्छे स्वास्थ्य का क्या महत्त्व है?
उत्तर
अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि लाता है। यह मानव संसाधन विकास का एक महत्त्वपूर्ण घटक है और राष्ट्र की एक परिसम्पत्ति है।

प्रश्न 24.
बिजली के संचालन तथा वितरण में होने वाली हानि के क्या कारण हैं?
उत्तर
बिजली के संचालन तथा वितरण में होने वाली हानि के कारण हैं
1. पारेषण की पिछड़ी तकनीक तथा
2. बिजली कर्मचारियों की सहायता से बिजली की चोरी। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक आधारिक संरचना एवं आर्थिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
आधारिक संरचना दो प्रकार की होती है-
1. सामाजिक आधारिक संरचना एवं
2. आर्थिक आधारिक संरचना।
1. सामाजिक आधारिक संरचना– सामाजिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं, जो आर्थिक प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली को बाहर से अपना योगदान प्रदान करती हैं। ये सेवाएँ अर्थव्यवस्था के एक महत्त्वपूर्ण सहायक ढाँचे का निर्माण करती हैं । सामाजिक आधारिक संरचना के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं

  • सामाजिक शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान,
  • सामाजिक स्वास्थ्य,
  • सामाजिक आवास,
  • सामाजिक नागरिक सुविधाएँ तथा
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली।।

2. आर्थिक आधारिक संरचना– आर्थिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं, जो उत्पादन तथा वितरण की प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ये सेवाएँ बाहर स्थित न होकर उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली के अन्दर ही स्थित होती हैं। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक दूसरा सहयोगी ढाँचा प्रदान करती हैं।

आर्थिक आधारिक संरचना के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं

  1.  परिवहन और संचार तन्त्र,
  2. विद्युत और सिंचाई तथा
  3. मौद्रिक और वित्तीय संस्थाएँ।

प्रश्न 2.
ऊर्जा संसाधन से क्या तात्पर्य है? इन्हें कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर
जिन पदार्थों से मनुष्य को कृषि, उद्योग तथा परिवहन साधनों हेतु ऊर्जा की प्राप्ति होती है, उन्हें ऊर्जा संसाधन (Energy Resources) कहा जाता है। प्राचीन काल में मानव ऊर्जा के लिए मानव शक्ति, पशु शक्ति तथा लकड़ी आदि पर निर्भर करता था, परन्तु आज वह जिन पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त कर रहा है, उनमें कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम), प्राकृतिक गैस, पनविद्युत, परमाणु खनिज, सूर्यातप, पवन, भू-गर्भीय ताप, ज्वारीय तरंगें, गन्ने की खोई एवं कूड़ा-कचरा आदि का प्रमुख स्थान है।
ऊर्जा संसाधनों का वर्गीकरण – उपलब्धता के आधार पर ऊर्जा संसाधनों को दो भागों में विभाजित किया जाता है1. परम्परागत ऊर्जा संसाधन–इनमें कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम), प्राकृतिक गैस एवं

  1. परमाणु खनिज सम्मिलित किए जाते हैं जो भू- गर्भ से निकाले जाते हैं। इन ऊर्जा संसाधनों के भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं अर्थात् ये अविश्वसनीय ऊर्जा संसाधन हैं।
  2. गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधन– इनके अन्तर्गत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में ये ऊर्जा के नव्यकरणीय संसाधन हैं। इसी कारण इन्हें ऊर्जा के विश्वसनीय संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
जीवाश्मीय ईंधनों में कौन-से अवगुण पाए जाते हैं?
उत्तर
कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम) तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैव पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) भी कहा जाता है। जीवाश्मीय ईंधनों में निम्नलिखित अवगुण पाए जाते हैं

  1. ये ऊर्जा के क्षयी संसाधन हैं अर्थात् इनके भण्डार कभी भी समाप्त हो सकते हैं।
  2. जीवाश्मीय ईंधन के प्रयोग से राख, धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न होती है जिनसे पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है।
  3. एक बार उपभोग करने के बाद ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अर्थात् इनका नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है (पनविद्युत को छोड़कर)।
  4. इनके आवागमन में भारी व्यय करना पड़ता है, परन्तु इनसे ताप शक्ति की प्राप्ति अधिक होती है।
  5. जीवाश्मीय ईंधनों के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती जा रही है जो आधुनिक युग की सबसे ज्वलन्त समस्या है जिसका सामना विश्व के सभी देश कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस को जीवाश्मीय ईंधन क्यों कहते हैं? इनके दो
। विशेष अवगुण कौन-से हैं?
उत्तर
कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैव पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्मीय ईंधन कहा जाता है। कोयले की उत्पत्ति प्राचीन काल (कार्बोनिफेरस युग) में प्राकृतिक वनस्पति के भू-गर्भ में दबकर कालान्तर में रूपान्तरित और कठोर हो जाने के फलस्वरूप हुई है। दबाव के कारण इसे वनस्पति की

जलवाष्प समाप्त हो गई तथा वह कोयले में परिणत हो गई। कोयला जितने समय तक भू-गर्भ में दबा रहता है, उतना ही उत्तम और कार्बनयुक्त होता जाता है। इस प्रकार खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति भी भू-गर्भ में दबी हुई वनस्पति तथा जलजीवों के रासायनिक परिवर्तनों के कारण हुई आसवन क्रिया का परिणाम है। भू-गर्भ से निकलने के कारण इनमें अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं, अत: उपभोग करने से पूर्व इन्हें परिष्करणशालाओं में रासायनिक क्रियाओं द्वारा साफ किया जाता है।

जीवाश्मीय ईंधन के अवगुण

कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस के दो विशेष अवगुण इस प्रकार हैं

  1. एक बार उपभोग करने के उपरान्त ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अर्थात् इनका नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है।
  2. कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस, ऊर्जा के ऐसे संसाधन हैं; जिनके उपयोग से राख, धुआँ, | गन्दगी आदि पदार्थ निकलते हैं, जिनसे पर्यावरण प्रदूषित होता है।

प्रश्न 5.
परमाणु ऊर्जा के निर्माण में किन खनिजों को प्रयुक्त किया जाता है? भारत के ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
परमाणु ऊर्जा के निर्माण में प्रयुक्त खनिज परमाणु ऊर्जा के निर्माण में यूरेनियम, थोरियम, जिरकेनियम, बेरियम, जिरकॉन, एण्टीमनी, बेरीलियम, प्लूटोनियम, चेरोलिट, इल्मेनाइट तथा ग्रेफाइट नामक खनिज प्रयुक्त किए जाते हैं। इनमें यूरेनियम, थोरियम तथा प्लूटोनियम प्रमुख परमाणु खनिज हैं।

भारत में परमाणु ऊर्जा का महत्त्व

भारत में परमाणु ऊर्जा के महत्त्व को निम्नलिखित तथ्यों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है

  1. भारत में ऊर्जा के आपूर्ति संसाधनों; यथा—उत्तम कोटि के कोयले, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की पर्याप्त कम है। इनके भण्डार सीमित हैं। अत: हमें जल शक्ति अथवा परमाणु ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ेगा।
  2. परमाणु शक्ति केन्द्र ऐसे क्षेत्रों में सरलता से स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ शक्ति के अन्य संसाधन या तो हैं ही नहीं अथवा उनकी अत्यधिक कमी है।
  3. अन्य ऊर्जा संसाधनों की अपेक्षा परमाणु खनिजों के विघटन से अत्यधिक ऊर्जा शक्ति की प्राप्ति होती है।
  4. चिकित्सा तथा कृषि जैसे क्षेत्रों में परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग में भारत विश्व में अग्रणी स्थान रखता है।

प्रश्न 6.
भारत में परमाणु ऊर्जा केन्द्र कहाँ-कहाँ स्थापित किए गए हैं?
उत्तर
भारत में परमाणु ऊर्जा के केन्द भारत में परमाणु शक्ति बोर्ड द्वारा देश के विभिन्न भागों में परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थापित किए गए हैं। यहाँ सव्रप्रथम सन् 1960 में मुम्बई के निकट तारापुर में परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थापित किया गया था। इसके पश्चात् राजथान में कोटा के निकट रावतभाटा नामक स्थान पर, चन्नई के निकट कलपक्कम नामक स्थान पर, उत्तर प्रदेश में बुलन्दशहर के निकट नरौरा नामक स्थान पर तथा गुजरात में काकरापाड़ा नामक स्थान पर परमाणु ऊर्जा केन्द्रों की स्थापना की गई है। इस प्रकार से भारत में छः स्थानों;

  1. तारापुर एवं ट्रॉम्बे (महराष्ट्र),
  2. रावतभाटा (कोटा-राजस्थान),
  3. कलपक्कम (चेन्नई- तमिलनाडु),
  4. नरौरा (बुलन्दशहर-उत्तर प्रदेश),
  5. काकरापाड़ा (गुजरात),
  6. कैगा (कर्नाटक) में परमाणु ऊर्जा के केन्द्र स्थापित किए गए हैं। वर्तमान में देश में 14 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर्स काम कर रहे हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 2,720 मेगावाट है। देश में अन्य परमाणु ऊर्जा के रिएक्टर्स निर्माणाधीन हैं जिनकी स्थापना के बाद देश की परमाणु विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़कर 7300 मेगावाट हो जाएगी।

प्रश्न 7.
जलविद्युत शक्ति, कोयला एवं खनिज तेल की तुलना में अधिक सुविधाजनक है। क्यों?
उत्तर
जलविद्युत शक्ति, कोयले एवं खनिज तेल की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक है; क्योंकि

  1. जलविद्युत, शक्ति का अक्षय एवं अविरल स्रोत है, जबकि कोयला एवं खनिज तेल कभी भी | समाप्त हो सकते हैं।
  2. जलविद्युत उत्पादक परियोजना (बहुउद्देशीय परियोजना) का एक बार विकास हो जाने पर उसका उपयोग सदैव तथा सतत रूप में किया जा सकता है।
  3. तारों (केबिल्स) के माध्यम से जलविद्युत शक्ति को कम खर्च में दुर्गम एवं दूरवर्ती स्थानों तक ले जाया जा सकता है, जबकि कोयला या खनिज तेल का परिवहन व्यय बहुत अधिक होता है।
  4. जलविद्युत के उपयोग में धुआँ एवं गन्दगी आदि न उत्पन्न होने से यह स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त । रहती है, जबकि कोयला तथा खनिज तेल धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न कर पर्यावरण को प्रदूषित करते
  5. कोयला एवं खनिज तेल के भण्डारण में पर्याप्त व्यय करना पड़ता है, जबकि जलविद्युत में इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है।
  6. खनिज तेल की प्राप्ति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा किए हैं, जबकि जलविद्युत शक्ति के साथ ऐसा कोई तथ्य नहीं है। इसका प्रमुख उदाहरण इराक-अमेरिकी युद्ध है।

प्रश्न 8.
ऊर्जा के परम्परागत एवं गैर-परम्परागत साधनों की तुलना कीजिए। अथवा गैर-पारम्परिक ऊर्जा के साधन अनन्त काल तक प्रयोग में लाए जा सकते हैं।” उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा के परम्परागत तथा गैर-परम्परागत साधनों की तुलना

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure 1

प्रश्न 9.
जलविद्युत, ऊर्जा के गैर-पारम्परिके साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर
जलविद्युत, ऊर्जा के गैर-पारम्परिक साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि

  1. जलविद्युत, ऊर्जा का अक्षय एवं अविरल स्रोत है अर्थात् जलविद्युत नव्यकरणीय ऊर्जा संसाधन है, जबकि ऊर्जा के अन्य पारम्परिक साधन कभी भी समाप्त हो सकते हैं अर्थात् उनका नवीनीकरण | नहीं किया जा सकती है।
  2. जलविद्युत उत्पादक शक्तिगृह का एक बार विकास हो जाने पर उसका उपयोग सदैव एवं सतत | रूप में किया जा सकता है अर्थात् उसे परे बार-बार व्यय नहीं करना पड़ता है।
  3. जलविद्युत शक्ति का उत्पादन जल से किया जाता है तथा जल ऊर्जा को स्थायी स्रोत है। अतः जलविद्युत शक्ति के उत्पादन में पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता है, जबकि ऊर्जा के अन्य पारम्परिक साधन; यथा-कोयला, खनिज तेल आदि; धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न कर वायु प्रदूषण को जन्म देते
  4. जलविद्युत, ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है, जिसे तारों (केबिल्स) के माध्यम से दुर्गम क्षेत्रों में भी उपभोक्ताओं को सुलभ कराया जा सकता है, जबकि पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को दूरवर्ती उपभोक्ताओं तक भेजने में बार-बार परिवहन व्यय करना पड़ता है।
  5. जलविद्युत, शक्ति के विकास के लिए एक बार ही व्यय करना पड़ता है, जबकि पारम्परिक ऊर्जा | संसाधनों के दोहन में बार-बार पर्याप्त व्यय करना पड़ता है।
  6.  पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों के उपभोग से पूर्व भण्डारण, निस्तारण तथा परिवहन में अत्यधिक व्यय करना पड़ता है, जबकि जलविद्युत शक्ति के उपभोग हेतु इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है।
  7. पारम्परिक ऊर्जा संसाधन (खनिज तेल) ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव उत्पन्न किए हैं, जैसा कि दक्षिण-पश्चिमी एशिया में, जबकि जलविद्युत शक्ति के साथ ऐसा कोई तथ्य नहीं है।
  8. जलविद्युत शक्ति के उत्पादन के बाद जो जल शेष बचता है, उसके भौतिक एवं रासायनिक गुणों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अत: इस जल का उपयोग सिंचन तथा अन्य कार्यों में आसानी से किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के सन्दर्भ में बताइए।
उत्तर

भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ

स्वास्थ्य सेवाएँ सामाजिक आधारिक संरचना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। अच्छा स्वास्थ्य लोगों को अधिक कार्य कुशल बनाता है। इसके लिए एक उपयुक्त स्वास्थ्य ढाँचे का होना आवश्यक है। इस ढाँचे का निर्माण करते समय हमारे पास दो विकल्प होते हैं-

  1. बीमारियों को रोकथाम पर ध्यान देना तथा
  2. अस्पताल/समुदाय आधारित स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान देना। भारत में अस्पताल आधारित स्वास्थ्य सेवाएँ केवल देश के बड़े शहरों तक ही सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, समुदाय आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से विस्तार हो रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, उपकेन्द्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बड़ी मात्रा में स्थापित किए जा रहे हैं; किन्तु हमें बीमारियों की रोकथाम पर भी विशेष ध्यान देना होगा।

प्रश्न 11.
देश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर
देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँची उस देश की सामाजिक प्राथमिकताओं को प्रकट करता है। अच्छा स्वास्थ्य लोगों को अधिक कार्यकुशल व उत्पादक बनाता है। अत: यह आवश्यक है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं के उपयुक्त ढाँचे का निर्माण हो। इसके लिए सीमित साधनों की दशा में हमें सुविचारित ढंग से स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश करना होगा। सर्वप्रथम हमें बीमारियों की रोकथाम पर ध्यान देना होगा। देश के सभी लोगों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, अधिक अच्छी जन-सुविधाएँ तथा स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करनी होगी। प्राथमिक केन्द्रों एवं उपकेन्द्रों के साथ ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का भी तेजी से विस्तार होगा तथा परिवार कल्याण कार्यक्रम को अधिक सफल बनाना होगा।

प्रश्न 12.
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था भारत की स्वास्थ्य आधारिंक संरचना और स्वास्थ्य सुविधाओं की त्रिस्तरीय व्यवस्था है—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। प्राथमिक क्षेत्रक सुविधाओं में प्रचलित स्वास्थ्य समस्याओं का ज्ञान तथा उन्हें पहचानने, रोकने तथा नियन्त्रित करने की विधि, खाद्य पूर्ति और उचित पोषण और जल की पर्याप्त पूर्ति तथा मूलभूत स्वच्छता, शिशु एवं मातृत्व देखभाल, प्रमुख संक्रामक बीमारियों और चोटों से प्रतिरोध तथा मानसिक स्वास्थ्य का संवर्द्धन और आवश्यक दवाओं का प्रावधान सम्मिलित है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र और उपकेन्द्र स्थापित किए गए हैं। द्वितीयक क्षेत्रक में वे अस्पताल आते हैं जिनमें शल्य चिकित्सा, एक्स-रे, ई०सी०जी० जैसी बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इन्हें माध्यमिक चिकित्सा संस्थाएँ कहते हैं। ये प्राथमिक चिकित्सा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ दोनों ही प्रदान करते हैं। ये प्रायः जिला मुख्यालय और बड़े कस्बों में पाए जाते हैं। तृतीय क्षेत्रक में, उच्चस्तरीय उपकरणों से युक्त अस्पताल, मेडिकल कॉलेज व अन्य संस्थान आते हैं। जो मेडिकल शिक्षा के साथ-साथ विशिष्ट स्वास्थ्य सेवाएँ भी प्रदान करते हैं। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधारिक संरचना से क्या आशय है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर

आधारिक संरचना से आशय

किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन करने के लिए अनेक वस्तुओं तथा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है। ये वस्तुएँ तथा सेवाएँ ही आधारिक संरचना (Infrastructure) कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में—“आधारिक संरचना के अन्तर्गत ने वस्तुएँ, सुविधाएँ तथा सेवाएँ सम्मिलित की जाती हैं जो आर्थिक क्रियाओं को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान प्रदान करती हैं।” उत्पादन उत्पत्ति के साधनों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है अर्थात् उत्पादक को उत्पादन क्रिया के लिए विभिन्न उपादानों की आवश्यकता पड़ती है; उदाहरण के लिए उत्पादन के लिए सर्वप्रथम भूमि चाहिए, फिर पूँजी चाहिए जिससे हल, ट्रैक्टर, मशीनें व औजार क्रय किए जा सकें; कार्य करने के लिए श्रमिक चाहिए, उत्पादन व्यवस्था के प्रबन्धक चाहिए और उत्पादन कार्य में निहित जोखिम वहन करने के लिए उद्यमी। केवल इन साधनों की समुचित उपलब्धि ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उत्पादित वस्तुओं को उपभोक्ता क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए परिवहन, परिवहन के साधन-टूक, रेलगाड़ी आदि चाहिए। पत्र-व्यवहार व अद्यतन सूचनाओं के लिए संचार के साधन (डाक, तार व टेलीफोन आदि) चाहिए। धन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बैंक व वित्तीय संस्थाएँ चाहिए। अनिश्चितता और जोखिमों के भार को वहन करने के लिए बीमा कम्पनियाँ चाहिए। वस्तुओं की बिक्री को बढ़ाने के लिए विज्ञापन के साधन भी महत्त्वपूर्ण हैं।

संक्षेप में, वस्तुओं के उत्पादन व वितरण के लिए दो चीजें चाहिए-1. वस्तु व 2. सेवाएँ। आधारिक संरचना से आशय उन सेवाओं से है जिनका वस्तु के उत्पादन व वितरण के दौरान प्रयोग होता है जैसे कच्चा माल व निर्मित उत्पादों को लाने व ले जाने के लिए परिवहन सेवाएँ अथवा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन सेवाएँ। ये सेवाएँ उत्पादन व वितरण प्रक्रिया में सहायता पहुँचाती हैं और वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि करती हैं, इसलिए इन्हें ‘उत्पादक सेवाएँ’ कहा जाता है। कुछ ऐसी सेवाएँ होती हैं जिन्हें हम एक वस्तु की तरह खरीदते हैं तथा उनका प्रयोग करते हैं। जब हम एक सेवा वस्तु की भाँति खरीदते हैं जैसे यात्रियों द्वारा परिवहन के साधनों का प्रयोग, मरीजों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अस्पतालों एवं चिकित्सालयों का उपयोग तो वह उपभोक्ता सेवा कहलाती है। उपर्युक्त दोनों ही प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने के लिए कुछ सुविधाओं (जैसे सड़कें, बस, विद्यालय, अस्पताल आदि) का निर्माण करना आवश्यक होता है। ये अर्थव्यवस्था के पूँजी ढाँचे का उसी प्रकार से एक भाग होती हैं जिस प्रकार से वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियाँ और मशीनें तथा खेत पर

आधारित उद्योगों का विस्तार होता है और नए-नए उद्योगों की स्थापना होती है। इसके फलस्वरूप उत्पादन में वृद्धि होती है, राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, उपभोग स्तर एवं जीवन-स्तर में वृद्धि होती है तथा निर्धनता एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान होता है। इस प्रकार आधारित संरचना का विकास देश के आर्थिक विकास में सहायक होता है।

प्रश्न 3.
पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों से क्या अभिप्राय है? प्रमुख पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर
पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों से आशय कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु शक्ति ऊर्जा के प्रमुख खनिज संसाधन हैं। ये सभी संसाधन भू-गर्भ से निकाले जाते हैं तथा इनके भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इन्हें ‘परम्परागत ऊर्जा संसाधन’ भी कहा जाता है। अतः इन संसाधनों का उपयोग बड़ी मितव्ययिता से किया जाना चाहिए। भू-गर्भ से निकाले जाने के कारण इन्हें ऊर्जा के खनिज संसाधन कहा जाता है। कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्म ईंधन’ भी कहा जाता है।
पारम्परिक ऊर्जा संसाधन प्रमुख पारम्परिक ऊर्जा संसाधन हैं-

  1. कोयला,
  2. पेट्रोलियम,
  3. प्राकृतिक गैस तथा
  4. बिजली। 

1. कोयला
कोयला औद्योगिक ऊर्जा का प्रमुख साधन है। लोहा, इस्पात तथा रासायनिक उद्योगों के लिए कोयला अनिवार्य है। भारत में व्यावसायिक शक्ति का 67% से भी अधिक भाग कोयले एवं लिग्नाइट के द्वारा पूरा होता है।
भारत का 98% कोयला शोण्डवानायुगीन है। यहाँ 75% कोयला भण्डार दामोदर नदी घाटी क्षेत्र में स्थित है। यहाँ रानीगंज, झरिया गिरिडीह, बोकारो तथा कर्णपुरा में कोयले की प्रमुख खाने हैं। गोदावरी, महानदी, सोन तथा वर्धा नदियों को घाटियों में भी कोयले के भण्डार पाए जाते हैं। सतपुड़ा पर्वतश्रेणी तथा छत्तीसगढ़ के मैदानों में कोयले के विशाल भण्डार हैं। कोयले के संचित भण्डार की दृष्टि से भारत का विश्व में छठा स्थान है। देश में कोयले के सुरक्षित भण्डार 24,784.7 करोड़ टन आँके गए हैं। जिसका 29.6% झारखण्ड, 24.6% ओडिशा, 11.3 पश्चिम बंगाल, 23.4% छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश तथा शेष 11.1% अन्य राज्यों में पाया जाता है।

2. पेट्रोलियम
(खनिज तेल) खनिज तेल ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण संसाधन है। कृषि व औद्योगिक मशीनों एवं वाहनों में खनिज तेल चालकशक्ति के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यह भू-गर्भीय चट्टानों से निकाला जाता है। भू-गर्भ से निकले हुए कच्चे तेल में अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं। अतः तेल शोधनशालाओं में इन अशुद्धियों को रासायनिक क्रियाओं द्वारा शुद्ध किया जाता है जिससे पेट्रोल, मिट्टी का तेल, मोबिल ऑयल, ग्रीस, डीजल आदि अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। खनिज तेल का उपयोग वायुयान, जलयान, रेलगाड़ियों, मोटर तथा अन्य वाहनों के संचालन में किया जाता है। इससे निकले पदार्थों से फिल्म, प्लास्टिक, वार्निश, पॉलिश, मोमबत्ती, वैसलीन आदि अनेक पदार्थ प्राप्त होते हैं। खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र–भारत के प्रमुख खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. असम तेल क्षेत्र—

(क) डिगबोई तेल क्षेत्र,
(ख) नहरकटिया तेल क्षेत्र तथा
(ग) सुरमा घाटी 
तल क्षेत्र–मसीपुर, बदरपुर एवं पथरिया।

2. गुजरात तेल क्षेत्र—

(क) अंकलेश्वर तेल क्षेत्र,
(ख) लुनेज तेल क्षेत्र (खम्भात तेल क्षेत्र),
(ग) अहमदाबाद-कलोल तेल क्षेत्र तथा
(घ) वड़ोदरा तेल क्षेत्र 

3. अरब सागर-अपतटीय तेल क्षेत्र-

(क) बॉम्बे हाई तेल क्षेत्र तथा
(ख) अलियाबेट तेल 
क्षेत्र।

 4. अन्य तेल क्षेत्र- राजस्थान, हिमाचल प्रदेश तथा अरुणाचल प्रदेश।
5. नवीन सम्भावित,तेल क्षेत्र- गंगा नदी की घाटी, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा और महनदी के डेल्टाई भागों के समीप गहरे सागरीय क्षेत्र तथा असम राज्य।

3. प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस ऊर्जा का संसाधन होने के साथ-साथ पेट्रो-रसायन उद्योगों के लिए कच्चा माल भी है। वर्तमान में प्रकृतिक गैस का उत्पादन लगभग 30 अरब घन मीटर हो गया है तथा इसका उपयोग रासायनिक उर्वरकों के निर्माण में भी किया जाने लगा है। इसके अनुमानित भण्डार 638 अरब घन मीटर है। वास्तव में, ऊर्जा संसाधनों की कमी वाले देशों में प्राकृतिक गैस की उपलब्धि एक अनमोल उपहार है। प्राकृतिक गैस के भण्डार प्रायः खनिज तेल के साथ ही पाए जाते हैं। परन्तु खनिज तेल क्षेत्रों से अलग केवल प्राकृतिक गैस के भण्डार त्रिपुरा एवं राजस्थान राज्यों में पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश तथा ओडिशा के तटों से दूर गहरे सागर में भी प्राकृतिक गैस के भण्डार पाए गए हैं। प्राकृतिक गैस का संरक्षण कठिन होता है। इसे सिलिण्डरों में भरकर रसोई ईंधन के रूप में सुरक्षित तो रखा जा सकता है, परन्तु अधिक समय तक उसे सँभालकर रखने में आग लगने की आशंका बनी रहती है। अतः प्राकृतिक गैस का तुरन्त उपयोग करना ही श्रेयस्कर रहता है। पेट्रो-रसायन एवं रासायनिक उर्वरक उद्योगों द्वारा इसके अधिक उपयोग से इसका संरक्षण सम्भव हो पाया है। 4. विद्युत (बिजली) विश्व में सम्भाव्य जल शक्ति की दृष्टि से भारत का पाँचवाँ स्थान है। वर्ष 2010-11 की अवधि में 811-14 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ जिसमें 665.01 अरब यूनिट ताप बिजली, 114.26 अरब यूनिट पनबिजली, 2627 अरब यूनिट परमाणु बिजली और 5.61 अरब यूनिट भूटान से आयातित बिजली शामिल है। जलविद्युत भारत में ऊर्जा का सबसे उपयोगी एवं सुविधाजनक साधन है। भारत में बिजली के तीन स्रोत हैं

  1. ताप विद्युत (Thermal Power),
  2. जल विद्युत (Hydro-electricity),
  3. आणविक शक्ति (Atomic Power)।

प्रश्न 4.
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधन से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक को संक्षेप में समझाइए। आधुनिक समय में इन साधनों का क्या महत्त्व है?
उत्तर
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधन से आशय सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा तथा कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा एवं आदि ऊर्जा के गैर-परम्परागत संसाधन कहलाते हैं। ये नव्यकरणीय (अक्षय) ऊर्जा स्रोत हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है-

1. पवन ऊर्जा- नौ-परिवहन पवन और प्रवाहित जल का उपयोग प्राचीनकाल से होता चला आ रहा है। प्राचीनकाल में अनाज (आटा) पीसने के लिए पवनचक्कियों का उपयोग किया जाता था। भू-गर्भ से जल खींचने में भी पवनचक्कियों का प्रचलन था। वास्तव में, ऊर्जा के ये ऐसे संसाधन हैं। जिनको बार-बार नवीनीकरण किया जा सकता है। अन्य संसाधनों की अपेक्षा इनसे ऊर्जा प्राप्त करने में व्यय कम करना पड़ता है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि पवन के उपयोग से 200 मेगावाट तक विद्युत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है।

2. ज्वारीय ऊर्जा– भारत की समुद्री सीमा लगभग 6,100 किमी लम्बी है। तटीय क्षेत्रों में ज्वार-भाटे की प्रक्रिया द्वारा ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन सुगमता से किया जा सकता है। यदि ज्वार-भाटे के समय किसी संयन्त्र के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त कर ली जाए तो प्राप्त ऊर्जा शक्ति का उत्पादन बहुत ही सस्ता पड़ता है। यह ऊर्जा का अक्षय संसाधन है। भारत में कच्छ एवं खम्भात की खाड़ियाँ ज्वारीय ऊर्जा के उत्पादन में ओदर्श दशाएँ प्रस्तुत करती हैं, क्योंकि यहाँ सँकरी खाड़ियों में ज्वारीय जल बहुत-ही तीव्रता से ऊपर उठता है।।

3. भू-तापीय ऊर्जा- भूताषीय ऊर्जा केवल उन्हीं क्षेत्रों में सम्भव है जहाँ गर्म जल के स्रोत उपलब्ध हैं। वास्तव में गर्म जल के स्रोत ज्वालामुखी क्षेत्रों में ही उपलब्ध हो सकते हैं। भारत इस संसाधन में धनी नहीं है। हिमाचल प्रदेश में मणिकरण नामक गर्म जल स्रोत से ऊर्जा प्राप्ति के प्रयास चल रहे हैं।

4. जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा- बंजर भूमि तथा कृषि अयोग्य अपरदित भूमि का उपयोग वृक्षारोपण के लिए किया जा सकता है। इन पर ऐसे वृक्ष रोपे जा सकते हैं जिनकी वृद्धि शीघ्र हो सके तथा उनमें तापजन्य गुण भी हों। इनसे ईंधन की लकड़ी, काष्ठ कोयला और शक्ति प्राप्त की जा सकती है। भारत में इन वृक्षों का उपयोग करके लगभग 1.5 मेगावाट शक्ति का उत्पादन किया जाता है।

5. अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा- बड़े-बड़े नगरों एवं महानगरों में लाखों टन कूड़ा-कचरा एकत्र होता है, जिसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। दिल्ली महागनर में ठोस पदार्थों के रूप में प्राप्त कूड़े-कचरे से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए परीक्षण के रूप में एक संयन्त्र कार्यशील है। जिससे प्रतिवर्ष 4 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। इससे प्रोत्साहित होकर अन्य नगरों एवं महानगरों में ऐसे संयन्त्रों की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं।

6. कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा– वर्तमान में भारत में चीनी मिलों से भारी मात्रा में खोई (बैगास) की प्राप्ति होती है। अतः गन्ने के पेराई मौसम में इस खोई से 2000 मेगावाट विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जा सकता है। कृषि, पशुओं तथा मानव के अपशिष्टों द्वारा उत्पादित ऊर्जा ग्रामीण क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकता में प्रयुक्त की जा सकती है। इस दिशा में बायो गैस संयन्त्रों का संचालन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

7. सौर ऊर्जा- सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इससे विपुल मात्रा में अनवरत रूप से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। वास्तव में, सौर ऊर्जा भविष्य के लिए ऊर्जा का सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन सिद्ध हो सकता है क्योंकि ऊर्जा संसाधन जैसे कोयला एवं खनिज तेल आदि; जीवाश्मीय ईधन कभी भी पूर्ण रूप से समाप्त हो सकते हैं। परन्तु ब्रह्माण्ड में जब तक सूर्य विद्यमान रहेगा, उससे भारी मात्रा में सौर ऊर्जा प्राप्त की जाती रहेगी। इस प्रकार उपर्युक्त ऊर्जा संसाधनों की विशेषताओं का ध्यान में रखते हुए नि:सन्देह कहा जा सकता है कि हमारा भविष्य ऊर्जा के लिए इन्हीं गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधनों पर निर्भर रहेगा।

ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का महत्त्व

अधुनिक समय में, गैर परम्परागत ऊर्जा संसाधनों के महत्त्व को निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है

1. सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायो ऊर्जा (कूड़-कचरा, मल-मूत्र एवं गोबर आदि से निर्मित) ऊर्जा के प्रमुख गैर-परम्परागत संसाधन हैं।
2. ऊर्जा के गैर परम्परागत साधनों का विकास वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ-साथ किया जा | सर्केता है।
3. ऊर्जा के गैर परम्परागत साधन नव्यकरणीय होते हैं। इनका निरन्तर उपयोग किया जाता रहेगा; 
जैसे—जब तक बाह्माण्ड में सूर्य विद्यमान रहेगा, सौर ऊर्जा अनवरत रूप से प्राप्त होती रहेगी।
4. इन्हें ऊर्जा के ‘अक्षीय संसाधन’ कहा जाता है।
5. वर्तमान में ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों की उपलब्धता तो पर्याप्त मात्रा में है परन्तु तकनीकी । विकास की कमी के कारण उनका उपभोग व्यापक नहीं हो पाया है।
6. ऊर्जा के ये साधन पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से मुक्त हैं अर्थात् इनसे प्रदूषण नहीं होता है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि ऊर्जा साधनों की प्राप्ति के लिए भारत का भविष्य गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों में ही सुरक्षित है। हमें इसी ओर अधिकाधिक प्रयास करने की आवश्यकता

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल)
Number of Questions 9
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 6 श्रवणकुमार (डॉ० शिवबालक शुक्ल)

प्रश्न 1:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘दशरथ खण्ड (पञ्चम सर्ग) की कथा का सार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में प्रयुक्त सर्गों का उल्लेख करते हुए किसी एक सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के ‘श्रवण’ शीर्षक सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के अभिशाप’ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के ‘निर्वाण’ (अष्टम) सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के आखेट सर्ग की कथा संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार के कथानक के विशेष प्रसंगों को अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ की कथावस्तु के परिप्रेक्ष्य में अयोध्या के परिवेश पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में वर्णित ‘आश्रम’ शीर्षक सर्ग की प्रमुख विशेषताओं पर अपने विचार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में वर्णित बाणविद्ध श्रवणकुमार के करुण विलाप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अयोध्या’ और ‘आश्रम’ खण्ड की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग ‘सन्देश सर्ग’ का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य श्रवणकुमार’ की कथा ‘वाल्मीकि रामायण’ के ‘अयोध्याकाण्ड’ के श्रवणकुमार प्रसंग पर आधारित है। इस खण्डकाव्य का सर्गानुसार कथानक अग्रवत् है

प्रथम सर्ग : अयोध्या

प्रथम सर्ग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कथानक की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है। इसमें अयोध्या नगरी की स्थापना, उसका नामकरण, राज्यकुल के वैभव एवं उसकी गौरवमयी विशेषताओं का वर्णन किया गया है; यथा

सरि सरयू के पावन तट पर है साकेत नगर छविमान।
जिसमें श्री शोभा वैभव के कभी तने थे विपुल वितान॥
मनु-वंशज इक्ष्वाकु भूप की कीर्ति-पताका लोक-ललाम।
अनुपम शोभाधाम अयोध्या चित्ताकर्षक अति अभिराम ॥

कवि ने यह भी बताया कि अयोध्या में सर्वत्र नैतिकता और सदाचार विद्यमान है। इस नगरी में सभी वस्तुओं का विक्रय उचित मूल्य पर होता है। यहाँ के नर-नारी परस्पर यथोचित सम्मान करते हैं। इस प्रकार अयोध्या का जीवन सहज और आनन्द से परिपूर्ण है। इस सर्ग में अयोध्या की रम्य-प्रकृति का चित्रण भी किया गया है।

ऐसी अयोध्या के शब्द-वेध-निपुण राजकुमार दशरथ एक दिन शिकार करने की योजना बनाते हैं

ऐसे वातावरण भव्य में दशरथ-उर में उठी उमंग।
देखें सरयू-वन में मृगया आज दिखाती है क्या रंग ॥

द्वितीय सर्ग : आश्रम

द्वितीय सर्ग के आरम्भ में सरयू नदी के वन-प्रान्तर के रमणीक आश्रम का मनोहारी चित्रण हुआ है, जिसमें श्रवणकुमार और उसके नेत्रहीन माता-पिता सानन्द निवास कर रहे हैं। इस आश्रम में सर्वत्र सुख-शान्ति है जहाँ सदैव शरद् एवं वसन्त का वैभव व्याप्त रहता है। स्वच्छ जल से भरे तालाबों में कमल खिले हुए हैं। यहाँ मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग सब परस्पर सहज प्रेम-भाव से रहते हैं। यहाँ द्वेष और कटुता नाममात्र को भी नहीं है। आश्रम के वर्णन में कवि ने भारतीय दर्शन का चिन्तन प्रस्तुत किया है। आश्रम के शान्त-सौन्दर्यमय प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में ही युवक श्रवणकुमार के चरित्र का विकास होता है। वह माता-पिता की आज्ञानुसार ही नित्य-प्रति कार्य करता है तथा उनकी सेवा में लगा रहता है

जननी और जनक को श्रद्धा-सहित नवाकर शीश।
आह्निक-क्रिया निवृत्ति-हेतु जाता सरयू-तट पी आशीष ॥

तृतीय सर्ग : आखेट

तृतीय सर्ग में एक ओर दशरथ मृग-शावक के वध का स्वप्न देखते हैं। दूसरी ओर श्रवणकुमार जब जल लेने जाता है तो उसकी बायीं आँख फड़कने लगती है। शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार से दोनों ही अशुभ हैं। स्वप्न में मृग-शावक-वध से दशरथ व्याकुल हो जाते हैं। वे ब्रह्म-मुहूर्त में जागकर आखेट हेतु वन की ओर चल देते हैं।

दूसरी ओर; उसी समय श्रवणकुमार के माता-पिता को बहुत अधिक प्यास लगती है और वह माता-पिता की आज्ञानुसार नदी से जले लेने चल देता है। जल में पात्र डूबने की ध्वनि को किसी हिंसक पशु की ध्वनि समझकर दशरथ शब्दभेदी बाण चला देते हैं, जो सीधे श्रवणकुमार के हृदय में जाकर लगता है। श्रवणकुमार का चीत्कार सुनकर दशरथ विस्मय, चिन्ता और शोक में डूब जाते हैं। उन्हें हतप्रभ एवं किंकर्तव्यविमूढ़ देख उनका सारथी उन्हें सान्त्वना देता है।

प्रस्तुत सर्ग में श्रवणकुमार की मातृ-पितृ-भक्ति, शकुन-अपशकुन तथा दशरथ की आखेट-रुचि पर प्रकाश डाला गया है।

चतुर्थ सर्ग : श्रवण

चतुर्थ सर्ग का आरम्भ श्रवणकुमार के मार्मिक विलाप से होता है। उसकी समझ में यह नहीं आता कि उसका कोई शत्रु नहीं, फिर भी उस पर किसने बाण छोड़ दिया ? बाण लगने पर भी उसे अपनी चिन्ता नहीं, वरन्। अपने वृद्ध एवं प्यासे माता-पिता की चिन्ता है

मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है॥

दशरथ आहत श्रवणकुमार को देखकर तथा उसके मार्मिक क्रन्दन को सुनकर व्याकुल हो जाते हैं। श्रवणकुमार के आँखें खोलने पर सारथी बताता है कि ये अजपुत्र दशरथ हैं और मृगया (शिकार) के भ्रम में आज इनसे यह भयंकर भूल हो गयी है। श्रवणकुमार कहता है कि राजन्! मुझे मारकर आपने एक नहीं वरन् एक साथ तीन प्राणियों के प्राण लिये हैं। मेरे अन्धे माता-पिता आश्रम में प्यासे बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप यह जल का पात्र लेकर वहाँ जाइए और उन्हें मेरे प्राण-त्यागे की सूचना दे दीजिए। यह कहकर श्रवणकुमार प्राण त्याग देता है। उसके शव को सारथी की देखभाल में छोड़ अत्यन्त दु:खी मन से दशरथ जलपात्र लेकर आश्रम की ओर चल देते हैं।

इस सर्ग में कवि ने श्रवणकुमार के सात्त्विक जीवन, उसके कारुणिक अन्त और दशरथ के मन में उत्पन्न आत्मग्लानि एवं शोकाकुलता का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है।

पंचम सर्ग : दशरथ

पंचम सर्ग का आरम्भ दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व, विषाद, आत्मग्लानि और अपराध-भावना से होता है। दशरथ दु:खी एवं चिन्तित भाव से सिर झुकाये आश्रम की ओर जा रहे थे और सोच रहे थे कि इस घटना के कारण हृदय पर लगे घाव का प्रायश्चित्त वे किस प्रकार करें

होय चलेगी युग-युगान्त तक अब मेरी यह पाप कथा।
जो मुझको ही नहीं वंशजों को भी देगी मर्म व्यथा ॥

इसी प्रकार के मानसिक उद्वेगों से आकुल-व्याकुल दशरथ आश्रम पहुँच जाते हैं।

षष्ठ सर्ग : सन्देश

षष्ठ सर्ग में श्रवणकुमार के माता – पिता की असहाय दशा तथा दशरथ के क्षोभ का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है। श्रवणकुमार के माता-पिता उसके आने की प्रतीक्षा में व्याकुल हैं। दशरथ की पदचाप सुनकर वे पूछते हैं

(1) मौलिकतापूर्ण प्रस्तुतीकरण – यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य का मूल कथानक वाल्मीकि-रामायण से लिया गया है, परन्तु भावात्मकता से प्रेरित होकर कवि ने उसमें कई स्थानों पर कल्पना का प्रयोग भी किया है; यथा-सारथी की कल्पना, दिव्य चमत्कार एवं देवत्व का प्रतिपादन।

(2) भारतीय संस्कृति का अंकन – कवि ने युगानुरूप वर्ण-व्यवस्था, छुआछूत, समता आदि नवीनताओं का भी समावेश किया है, किन्तु भारतीय संस्कृति के मूल आधार का ध्यान सभी स्थानों पर रखा गया है। भावों और जीवन-मूल्यों का अंकन भी उसी के अनुरूप किया गया है। श्रवण की मातृ-पितृ-भक्ति, दशरथ को अपयश के भय से वन में घटित दुर्घटना का किसी को न बताना, शाप देने के पश्चात् श्रवण के पिता का आत्मबोध कि प्रारब्धवश हुई गलती पर उन्हें अपराधी को दण्ड रूप में शाप नहीं देना चाहिए था। ये सभी बातें भारतीय संस्कृति की संवाहक बनकर आयी हैं।

(3) आदर्श-सृजन – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने मानवीय आदर्शों का सृजन किया है। श्रवणकुमार, उसके अन्धे माता-पिता तथा दशरथ के चरित्र आदर्श एवं महान् हैं।

(4) व्यवस्थित – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का कथानक पूर्णत: व्यवस्थित है। उसमें कहीं भी भावात्मक अथवा भाषागत असन्तुलन नहीं दिखाई देता।

(5) सर्गबद्धता – प्रस्तुत खण्डकाव्य में नौ सर्ग हैं, जिनमें भावात्मकता को पर्याप्त स्थान दिया गया है। इनमें प्रथम सर्ग मंगलाचरण और अन्तिम उपसंहार है। सर्ग-संयोजना उपयुक्त एवं सुन्दर है।

(6) विषयानुरूपता – इस खण्डकाव्य में विषयानुरूप भाषा-शैली आदि का सफल निर्वाह हुआ है। इसमें रस, छन्द, अलंकार, गुण आदि जहाँ काव्य-सौन्दर्य को बढ़ाने में सहायक हुए हैं, वहीं भावात्मकता की वाहकता में भी पूर्णरूपेण सफल हुए हैं।

(7) स्वाभाविकता – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में पात्र, घटना, वातावरण आदि नितान्त स्वाभाविक लगते हैं। कहीं भी इनके बलपूर्वक थोपे जाने का संकेत नहीं मिलता। पात्रों के चिन्तन में तो सहृदयी भावुकता सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है, चाहे वह चिन्तन श्रवणकुमार का हो, चाहे दशरथ का अथवा श्रवण के अन्धे माता-पिता का।

(8) भारतीयता – इस खण्डकाव्य में भारतीय दर्शन के आदर्श-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, सन्तोष, तप, संयम, प्रेम, कर्तव्यपरायणती आदि के निर्वाह पर बल दिया गया है, जो कवि की भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा के प्रतीक हैं। एक कथन द्रष्टव्य है

दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार॥

(9) मातृ-पितृभक्ति – श्रवण के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भावात्मक मातृ-पितृभक्ति है। मातृ-पितृभक्ति का एक ऐसा आदर्श, जिससे युग-युगान्तरे तक बालक प्रेरणा प्राप्त कर सकें, अन्यत्र दुर्लभ है। इस प्रकार ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की भावात्मक कथावस्तु सुसम्बद्ध, प्रभावशाली, मानवीय आदश तथा भारतीय संस्कृति की प्रेरणा देने वाली है।

प्रश्न 3:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण करते हुए बताइए कि वह किन आदर्शों का प्रतीक है?
या
“चरित्र ही व्यक्ति को महान् बनाता है।” इस कथन के सन्दर्भ में श्रवणकुमार के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में वर्णित आदर्श चरित्र से आज के परिप्रेक्ष्य में क्या शिक्षा मिलती है ?
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रवणकुमार के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
श्रवणकुमार प्रस्तुत खण्डकाव्य का प्रमुख पात्र है। ‘श्रवणकुमार’ की कथा आरम्भ से अन्त तक उसी से सम्बद्ध है; अतः इस खण्डकाव्य का नायक श्रवणकुमार है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) मातृ-पितृभक्त – श्रवण कुमार का नाम ही मातृ-पितृभक्ति का पर्याय बन चुका है। श्रवणकुमार अपने माता-पिता का एकमात्र आदर्श पुत्र है। वह प्रात:काल से सायंकाल तक अपने वृद्ध एवं नेत्रहीन माता- पिता की सेवा में लगा रहता है। दशरथ के बाण से बिद्ध होकर भी श्रवणकुमार को अपने प्यासे माता-पिता की ही चिन्ता सता रही है

मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है।

(2) निश्छल एवं सत्यवादी – श्रवणकुमार के पिता वैश्य वर्ण के और माता शूद्र वर्ण की थीं। जब दशरथ ब्रह्म-हत्या की सम्भावना व्यक्त करते हैं तो श्रवणकुमार उन्हें सत्य बता देता है

वैश्य पिता माता शूद्रा थी मैं यों प्रादुर्भूत हुआ।
संस्कार के सत्य भाव से मेरा जीवन पूत हुआ।

श्रवणकुमार स्पष्टवादी है। वह किसी से कुछ नहीं छिपाता। वह सत्यकाम, जाबालि आदि के समान ही अपने कुल, गोत्र आदि का परिचय देता है।

(3) क्षमाशील एवं सरल स्वभाव वाला – श्रवणकुमार का स्वभाव बहुत ही सरल है। उसके मन में किसी के प्रति ईष्र्या, द्वेष, क्रोध एवं वैर नहीं है। दशरथ के बाण से बिद्ध होने पर भी वह अपने समीप आये सन्तप्त दशरथ का सम्मान ही करता है।

(4) भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रेमी – श्रवणकुमार भारतीय संस्कृति का सच्चा प्रेमी है। चार वेद और छ: दर्शन ही भारतीय संस्कृति के आधार हैं। धर्म के दस लक्षणों को वह अपने जीवन में धारण किये है

दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार ॥

वेद के अनुसार माता, पिता, गुरु, अतिथि तथा पति के लिए पत्नी और पत्नी के लिए पति ये पाँच ‘देवता’ कहलाते हैं। तथा ये ही पूजा के योग्य हैं। श्रवणकुमार भी माता, पिता, गुरु और अतिथि की देवतुल्य पूजा करता है।

(5) आत्मसन्तोषी – श्रवणकुमार को किसी वस्तु के प्रति लोभ-मोह नहीं है। उसे भोग एवं ऐश्वर्य की तनिक भी चाह नहीं है। वह तो सन्तोषी स्वभाव का है

वल्कल वसन विटप देते हैं, हमको इच्छा के अनुकूल।
नहीं कभी हमको छू पाती, भोग ऐश्वर्य वासन्न-धूल ॥

(6) संस्कारों को महत्त्व देने वाला – श्रवणकुमार संमदर्शी है। वह किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं रखता तथा कर्म, शील एवं संस्कारों को महत्त्व देता है। उसके जीवन में पवित्रता संस्कारों के प्रभाव के कारण ही है

विप्र द्विजेतर के शोणित में अन्तर नहीं रहे यह ध्यान।
नहीं जन्म के संस्कार से, मानव को मिलता सम्मान ॥

(7) अतिथि-सत्कारी – भारतीय परम्परा के अनुसार अतिथि का स्वागत-सत्कार महापुण्य का कार्य है। श्रवण कुमारे इस गुण से युक्त है। वह बाण द्वारा घायल पड़ा है, जब दशरथ उसके पास पहुँचते हैं। वह दशरथ को अपना अतिथि मानता है, क्योंकि वह उसके वन में आये हैं। वह देशरथ का स्वागत करना चाहता है। वह उनसे हर प्रकार की कुशल-मंगल पूछता है और अपने नेत्रों के जल से दशरथ के चरण धो लेना चाहता है।

इस प्रकार श्रवणकुमार उदार, परोपकारी, सर्वगुणसम्पन्न तथा खण्डकाव्य का नायक है।

प्रश्न 4:
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्रों में देवोपम गुणों के साथ-साथ मानव-सुलभ दुर्बलता भी दिखाई देती हैं। इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्र-चित्रण में काव्यकार डॉ० शिवबालक शुक्ल ने अपनी अनुपम रचनाधर्मिता का परिचय दिया है। उनके द्वारा गढ़े चरित्र जहाँ एक ओर देवोपम हैं, वहीं दूसरी ओर उनमें मानव-सुलभ दुर्बलताएँ भी दृष्टिगत होती हैं। यही उनके चरित्रों की सर्वप्रमुख विशेषता है। पात्र चाहे श्रवणकुमार हो या उसके अन्धे माता-पिता अथवा अयोध्या नरेश दशरथ, सभी पात्रों का चरित्रांकन बड़े मनोयोग से किया गया है।

श्रवणकुमार में सत्यवादिता, संस्कारों को महत्ता देने की प्रवृत्ति, क्षमाशीलता और आत्मसन्तोष जैसे गुण उसे देवोपम बनाते हैं, वहीं माता-पिता से अत्यधिक मोह, मृत्यु से भय आदि दुर्बलताएँ उसे साधारण मानव सिद्ध करते हैं।

दशरथ के चरित्र में भी जहाँ न्यायप्रियता, सत्यवादिता, उदारता और कर्तव्यनिष्ठा जैसे देवोपम गुण विद्यमान हैं, वहीं स्वप्न को देखकर मन में शंकित होना; श्रवण के अन्धे माता-पिता द्वारा शापित होने पर शाप की परिणति के विषय में सोचकर दु:खी होना और इस घटना के लोक में प्रचलित हो जाने पर कुल-परम्परा पर लगने वाले कलंक की चिन्ता करना आदि उनके चरित्र की ऐसी दुर्बलताएँ हैं, जो उन्हें साधारणजन के समकक्ष ला खड़ी करती हैं।

इसी प्रकार श्रवण के पिता का चरित्र भी गुणों एवं दुर्बलताओं से युक्त है। वे जहाँ पुत्र-मृत्यु का समाचार सुनकर अपना विवेक खो बैठते हैं और दशरथ को शाप दे डालते हैं, वहीं बाद में अपने किये पर पश्चात्ताप करते हैं कि मैंने दशरथ को व्यर्थ ही शाप दे डाला। इनका पहला कार्य जहाँ मानव-सुलभ दुर्बलता को परिचायक है, वहीं उस पर पश्चात्ताप करना उनके देवोपम-चरित्र का।

प्रश्न 5:
‘श्रवणकुमार’ के आधार पर दशरथ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अभिशाप’ सर्ग के आधार पर राजा दशरथ का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर:
रघुवंशी राजा अज के पुत्र दशरथ ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में आरम्भ से अन्त तक विद्यमान हैं। मूल रूप से दशरथ इस खण्डकाव्य के प्राण हैं। दशरथ की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) उत्तम-कुलोत्पन्न – राजा दशरथ उत्तम-कुलोत्पन्न हैं। उनका वंश ‘इक्ष्वाकु’ नाम से प्रसिद्ध है। पृथु, त्रिशंकु, सगर, दिलीप, रघु, हरिश्चन्द्र और अज; दशरथ के इतिहासप्रसिद्ध पूर्वज रहे हैं। उन्हें अपने वंश पर गर्व है

क्षत्रिय हूँ मम शिरा जाल में रघुवंशी है रक्त प्रवाह ।
हस्ति पोत अथवा मृगेन्द्र के पाने की है उत्कट चाह॥

(2) लोकप्रिय-शासक – राजा दशरथ प्रजावत्सल एवं योग्य शासक हैं। उनके राज्य में सबको न्याय मिलता है, चोरी कहीं नहीं होती है, प्रजा सब प्रकार से सुखी व सन्तुष्ट है तथा विद्वज्जनों का यथोचित सत्कार होता है

सुख समृद्धि आमोदपूर्ण था कौशलेश का शुभ शासन।
दुःख था केवल एक दुःख को, जिसे मिला था निर्वासन ।

(3) धनुर्विद्या में निपुण –  कुमार दशरथ धनुर्विद्या में निपुण और शब्दभेदी बाण चलाने में पारंगत हैं। आखेट में उनकी विशेष रुचि है

शब्द-भेद के निपुण अहेरी, रविकुल के भावी भूपाल ।
लक्ष्य करें मृग महिष नाग वृक, शूकर सिंह व्याघ्र विकराल ॥

इसीलिए श्रावण मास में वर्षा के अनन्तर जब चारों ओर हरियाली छाई रहती है, तब वे आखेट का निश्चय करते हैं।

(4) विनम्र एवं दयालु – दशरथ में तनिक भी अहंकार नहीं है। दूसरे का दुःख देखकर वे बहुत अधिक व्याकुल हो जाते हैं। स्वप्न में मृग-शावक के वध से ही वे दु:खी हो उठते हैं

करने को गये समुद्यत, ढाढ मार करके रोदन।
नेत्र खुल गये स्वप्न समझकर किया पाश्र्व का परिवर्तन ।।

(5) संवेदनशील एवं पश्चात्ताप करने वाले – दशरथ अपने किये अनुचित कार्य पर आत्मग्लानि से भर उठते। हैं तथा उसका प्रायश्चित्त करते रहते हैं। श्रवणकुमार की हत्या पर उनके प्रायश्चित्त एवं आत्मग्लानि उनके सच्चे पश्चात्ताप पर किया गया आर्तनाद है

मलहम कौन भयंकर व्रण पर जिसका लेप करूं जाकर।
भू में धसँ गि गिरिवर से सरि में डूब मरूं जाकर ॥

(6) आत्म-तपस्वी – दशरथ न्यायप्रिय होने के साथ-साथ आत्म-तपस्वी भी हैं। वे अपने अपराध को स्वयं
अक्षम्य मानते हैं

करें मुनीश क्षमा वे होंगे, निस्पृह करुणा सिन्धु अगाध ।
पर मेरे मन न्यायालय में क्षम्य नहीं है यह अपराध ॥

(7) अपराध-बोध से ग्रसित – श्रवणकुमार के पिता द्वारा शाप दिये जाने पर दशरथ काँप उठते हैं। वे अयोध्या लौटकर यद्यपि लोकनिन्दा के भय से किसी को भी यह दुर्घटना नहीं बताते, किन्तु अपने अपराध की वेदना उनके हृदय में कसकती ही रहती है। वे जानते हैं कि समस्त प्राणियों को अपने कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है। इसलिए वे किसी से कुछ कहे बिना भी अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं। कवि कहता है

रही खरकती हाय शूल-सी पीड़ा उर में दशरथ के।।
ग्लानि-त्रपा, वेदना विमण्डित शाप-कथा वे कह न सके।

(8) तेजस्वी – दशरथ एक तेजस्वी राजकुमार हैं। जब वह श्रवण कुमार के पास पहुँचते हैं तो वह उनके रूप से प्रभावित हो उठता है। उनके प्रत्येक अंग से मानो तेज फूट पड़ता है। श्रवण उनसे निवेदन करता है

रूपवान् है तेज आपका, अंग-अंग से फूट रहा।
परिचय दें उर उत्सुकता है, सचमुच धीरज छूट रहा ॥

(9) शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार में आस्था – रात्रि में सोते समय दशरथ मृग-शावक के वध का स्वप्न देखते हैं, दूसरी ओर श्रवणकुमार जब जल लेने जाता है तो उसकी बायीं आँख फड़कने लगती है। शकुन-अपशकुन तथा स्वप्न विचार से दोनों ही अशुभ हैं।

(10) उदारमना – श्रवणकुमार के माता-पिता दशरथ को शाप देते हैं। उदार मन वाले दशरथ श्रवण के माता-पिता से शाप पाकर भी कुछ नहीं कहते और सोचते हैं कि इस पाप का फल तो भोगना ही है। इसलिए वे बिना कुछ कहे ही अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं और किसी को भी इस घटना के बारे में नहीं बताते।

(11) निरभिमानी – दशरथ का चरित्र महान् है। उच्चकुल में उत्पन्न होने पर भी उनमें लेशमात्र भी अभिमान नहीं था। उनका शासन उत्तम और उनके कार्य महान् थे। प्रायश्चित और आत्मग्लानि की अग्नि में तपकर वे शुद्ध हो जाते हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि दशरथ का चरित्र महान् गुणों से विभूषित है जो कि प्रायश्चित्त और आत्म-ग्लानि की अग्नि में तपकर और भी शुद्ध हो गया है। कवि दशरथ का चरित्र-चित्रण करने में पूर्ण सफल रहा है।

प्रश्न 6:
पंचम एवं सप्तम सर्ग के आधार पर दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व का व्यापक चित्रण है।” इस कथन को सोदाहरण प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:

दशरथ का अन्तर्द्वन्द्व

‘श्रवणकुमार’ के पंचम सर्ग में दशरथ की मानसिकता, पश्चात्ताप तथा आत्मग्लानि से पूर्ण आन्तरिक दशा को व्यापक अभिव्यक्ति दी गयी है। दशरथ के हाथों श्रवणकुमार का प्राणान्त हो चुका है, जिससे वे दुःख, ग्लानि, भय एवं करुणा के भाव में भरे सोच रहे हैं कि क्या श्रवणकुमार के माता-पिता भी श्रवणकुमार की तरह उदार-हृदय होंगे और उन्हें क्षमा कर देंगे अथवा वे उन्हें कठोर शाप दे देंगे। दशरथ के मन में अपने कुल के दुर्भाग्य पर भी भावावेग उमड़ता है। वे सोचते हैं कि क्या उनके कुल के सभी सदस्यों के भाग्य में शापित होना ही लिखा है तथा क्या उनको भी अपने पूर्वजों की तरह (दशरथ के पूर्वज भी विभिन्न कारणों से शापित होते रहे थे) शापित होना पड़ेगा

रघुकुल में शापित होने की, परम्परागत परिपाटी।
पार पड़ेगी करनी ही हाँ, दुःख की यह दुर्गम घाटी ॥

इस सर्ग में लज्जा, ग्लानि, चिन्ता, शंका, भय आदि से ग्रस्त दशरथ के संकल्प-विकल्प प्रकट हुए हैं।
‘श्रवणकुमार’ के सप्तम सर्ग में भी दशरथ के अन्तर्मन में निहित भावों का मार्मिक चित्रण किया गया है। श्रवणकुमार के शव को उठाकर उसके माता-पिता के सामने लाते हुए दशरथ स्वयं भी जीवित लाश के समान ही हैं। वे ग्लानि, पश्चात्ताप, विवशता और करुणा के आधिक्य के कारण अपना विवेक खो बैठे हैं, जिससे उन्हें दिशा और दुर्गम-पथ की कठिनाइयों का ज्ञान नहीं हो रहा है। वे चेतनाशून्य से उस शव को उठाकर श्रवणकुमार के माता-पिता के पास लाते हैं

अनुभव-दिग्सूक्ति का नहीं थी बेचारे दशरथ के पास,
दिग्भ्रम हुआ, पाथ-पथ दुर्गम, हृदय क्षुब्ध, मन हुआ उदास।

किसी के पुत्र को मृत्यु की गोद में सुलाने के पश्चात् उसके शव को लेकर उसके माता-पिता के पास जाने वाले संवेदनशील-सहृदय व्यक्ति की मानसिकता क्या होती है, इसको कवि शिवबालक शुक्ल ने दशरथ के अन्तर्मन की दशा के सजीव चित्रण में भली प्रकार दर्शाया है।

[ संकेत-इस सामग्री के अतिरिक्त दशरथ की मानसिकता में विनम्रता, दयालुता, उदारता तथा आत्मतपस्विता का समन्वय दृष्टिगत होता है। दशरथ के चरित्र-चित्रण से इन गुणों की सामग्री ग्रहण कर उसका यहाँ उल्लेख करना चाहिए।]

प्रश्न 7:
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘श्रवणकुमार’ की विवेचना (समीक्षा) कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के रचना-शिल्प का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के काव्य-सौन्दर्य को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के काव्य-सौन्दर्य की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में अभिव्यक्त करुण रस की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ एक पौराणिक कथानक पर आधारित है। इस रचना में कवि ने अपनी काव्यात्मक प्रतिभा का कुशलता से प्रयोग किया है। इस खण्डकाव्य की विशेषताओं को विवेचन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है

कथानक – इस खण्डकाव्य का कथानके अत्यन्त लघु है। इसमें श्रवणकुमार को दशरथ का बाण लगना एवं उसके माता-पिता के द्वारा दशरथ को शाप देना-यही मुख्य दो प्रसंग वर्णित हैं। इसके कथानक में दशरथ या श्रवणकुमार के पूर्ण जीवन की कथा नहीं है। किसी खण्डकाव्य के कथानक के रूप में इसका कथानक अत्यन्त उपयुक्त है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण – इस खण्डकोव्य में मात्र चार पात्र हैं-श्रवणकुमार, दशरथ एवं श्रवण कुमार के माता-पिता। इन चारों के चरित्र-चित्रण में ही कवि ने खण्डकाव्य के उदात्त उद्देश्यों को अभिव्यक्ति दी है। पात्रों का चरित्र-चित्रण स्वाभाविक रूप में हुआ है। उनके अन्तर्द्वन्द्वों की अभिव्यक्ति में कवि ने अपनी काव्य-प्रतिभा का परिचय दिया है।

काव्यगत विशेषताएँ – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(क) भावगेत विशेषताएँ

(1) श्रेष्ठ विषयवस्तु – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की मूल कथा वाल्मीकि-रामायण के अयोध्याकाण्ड की श्रवणकुंमार-वध-कथा पर आधारित है। खण्डकाव्य का आरम्भ, विकास, चरमसीमा, नियताप्ति तथा अन्त प्रभावशाली हैं। कथा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं शिथिलता नहीं है।
(2) सुन्दर प्रकृति-चित्रण – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने प्रकृति के बड़े ही मोहक चित्र खींचे हैं। नगर, वन, आश्रम, पेड़-पौधे, नदी, पशु-पक्षी आदि के चित्रण बड़े ही स्वाभाविक एवं मनोहारी हैं। कवि ने प्रकृति के आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण आदि रूपों को बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित किया है; उदाहरणार्थ

पड़ी फुहार प्रथम पावस की बनी ग्रीष्म की अन्तिम श्वास।
जल प्रियतम से मिली विरहिणी धरा छोड़ती मिलनोच्छ्वास ॥

(3) अन्तर्मुखी भावों की अभिव्यक्ति – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में मानवीय संवेदनाओं एवं अनुभूति के आन्तरिक स्वरूप की कुशल अभिव्यक्ति की गयी है। स्वप्न में श्रवणकुमार को अपने तीर से मरते देखकर उसकी मृत्यु के बाद और अभिशाप सर्ग’ में दशरथ की आन्तरिक संवेदना एवं पश्चात्ताप को अभिव्यक्ति दी गयी है। तीर लगने के बाद श्रवणकुमार की मन:स्थिति का आन्तरिक भाव कुशलता के साथ अभिव्यक्त हुआ है।

(4) भारतीय संस्कृति के गौरव-भाव की कुशल अभिव्यक्ति – कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में भारतीय संस्कृति के प्राचीन स्वरूप का गौरव भावात्मक रूप से अभिव्यक्त किया है। सांस्कृतिक गौरव एवं मानवाद की प्राचीन स्थिति का दर्शन कराना ही इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य रहा है और इसे अभिव्यक्ति में कवि ने अपनी प्रतिभा का पूर्ण परिचय दिया है

हो सकते हैं क्या अभियन्ता भूप-भगीरथ के सम आज।
जिनके श्रम-जल गंगा द्वारा सजें देश के युग-युग साज॥

(5) रस (करुण) का निरूपण – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का प्रधान रस करुण है। इसके सातवें सर्ग ‘अभिशाप सर्ग’ में इसका सांगोपांग वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इस खण्डकाव्य में रौद्र, वीभत्स, भयानक, वात्सल्य और शान्त रस का भी मंजुल प्रयोग बन पड़ा है। करुण रस का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है

कर स्पर्श से उन दोनों ने लेकर अवलोकन का काम।
सुत-शव के सन्निकट बैठकर मचा दिया भीषण कुहराम ॥

(6) वातावरण चित्रण – प्रस्तुत खण्डकाव्य में प्रकृति-चित्रण के साथ-साथ कवि ने अयोध्या नगरी एवं आश्रम आदि को भी बड़ी मनोरम वर्णन किया है।

(ख) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा पात्र, विषय तथा समयानुकूल है। इस खण्डकाव्य की भाषा में प्रभावात्मकता, प्रवाहमयता, संगीतात्मकता आदि विशेषताएँ विद्यमान हैं; यथा

पड़े हुए सैकत-शय्या पर, मौन तोड़ मुनि हुए मुखर।
आती करुणा को भी करुणा, उनके दीन वचन सुनकर ॥

(2) शैली –  इस खण्डकाव्य में कवि ने इतिवृत्तात्मक शैली को अपनाया है। साथ ही इसमें आलंकारिक, चित्रात्मक, छायावादी और संवादात्मक शैली के भी दर्शन होते हैं। छायावादी शैली पर आधारित मानवीकरण भी प्रयुक्त हुआ है-इठलाई संगीत कक्ष में मृदुल मूच्र्छना सुमधुर भीड़। प्रयोगवादी शैली में दिनरूपी विद्यालय के बन्द हो जाने पर उसके सूर्य रूपी विद्यार्थी को अपना बस्ता किरणरूपी रज्जु से बाँधकर ले जाता हुआ दिखाया गया है।

(3) छन्द-विधान – ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में कवि ने 16-15 मात्राओं पर यति और अन्त में गुरु- लघु वाले ‘वीर’ छन्द का प्रयोग किया है। काव्य-प्रवाह में कहीं-कहीं 30 मात्राओं वाले मात्रिक छन्द, ताटंक,, कुकुभ, लावनी आदि का भी प्रयोग किया गया है। छन्द-रचना में कहीं भी अस्वाभाविकता नहीं दिखाई देती।

(4) अलंकार-योजना – कवि ने यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक, सन्देह, अर्थान्तरन्यास, परिकर, प्रतीप, वक्रोक्ति, यथासंख्य, परिसंख्या, उदाहरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। रूपक का एक उदाहरण दर्शनीय है – मेघ-मृदंग संग संगति कर लगे नाचने प्रमुदित मोर। इस खण्डकाव्य में उपमान-विधान के लिए एक विस्तृत भावभूमि का भी चयन किया गया है।

निष्कर्ष-इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य में मात्र श्रवणकुमार के सम्पूर्ण जीवन का चित्रण ही नहीं, वरन् उसकी चारित्रिक विशेषताओं के महत्त्वपूर्ण पक्ष का चित्रांकन भी किया गया है। इसकी कथावस्तु भी लघु है और वह सुसम्बद्ध एवं सुसंगठित है। वर्णन-विस्तार को इस खण्डकाव्य में स्थान नहीं दिया गया है; किन्तु इसकी कथावस्तु में क्रमिक विकास विद्यमान है। इसका नायक उदात्त गुणों से युक्त है।

एक निश्चित एवं आदर्शोन्मुख उद्देश्य के लिए प्रवाहपूर्ण शैली में लिखा गया यह भावनाप्रधान काव्य, खण्डकाव्य की उपर्युक्त सभी मुख्य विशेषताओं से परिपूर्ण है; अतः यह एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 8:
‘श्रवणकुमार’ के रचना-उद्देश्य पर आलोचनात्मक प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की रचना किस उद्देश्य को दृष्टि में रखकर की गयी है ? विस्तृत विवेचन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि युवकों को क्या प्रेरणा और सन्देश देना चाहता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की रचना जीवन में नैतिक आदर्शों की प्राण-प्रतिष्ठा हेतु की गयी है।” इस मत की समीक्षा कीजिए।
या
चारित्रिक पतन के इस युग में ‘श्रवणकुमार’ की सार्थकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के उद्देश्य का वर्तमान युग में क्या महत्त्व है? अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
वर्तमान युग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की क्या प्रासंगिकता है ? स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य एक सोद्देश्य रचना है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
खण्डकाव्य की रचना में ‘डॉ० शिवबालक शुक्ल’ का उद्देश्य राष्ट्र की समृद्धि के लिए देश की किशोर और युवा पीढ़ी को अनैतिकता, उद्दण्डता और अनुशासनहीनता जैसे भयानक रोगों से बचाना एवं करुणा और प्रेम जैसे महत्त्वपूर्ण मनोभावों को जाग्रत करने की आवश्यकता रही है। साथ ही उनमें त्याग, तितिक्षा, सेवा, सहिष्णुता, क्षमाशीलता, भावात्मक एकता, उच्च संस्कार, जातीय अभेदता, नैतिकता और आत्मालोचन जैसे नैतिक आदर्शों एवं उच्च जीवन-मूल्यों की प्राण-प्रतिष्ठा करना भी है। कवि का उद्देश्य रहा है कि श्रवण की शील की रेखाओं के प्रकाश में आज का किशोर और युवा पीढ़ी ‘मातृ देवो भव पितृ देवो भव’ के उदात्त आदर्श पहचान सके, उसके मूल्य और महत्त्व को जान सके। श्रवण कुमार से प्रेरणा लेता हुआ वह इन आदर्शों को अपने आचरण में भी उतार सके तथा श्रवण की तरह कह सके

मुझे बाण की चिन्ता सम्प्रति, उतनी नहीं सताती है,
पितरों के भविष्य की चिन्ता, जितनी व्यथा बढ़ाती है।

शीर्षक की सार्थकता – प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ में मुख्य पात्र श्रवणकुमार ही है और इस मुख्य पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करना ही कवि का उद्देश्य रहा है। अत: इसका शीर्षक ‘श्रवणकुमार’ रखा गया है, जो इसके कथानक के अनुसार पूर्णत: उपयुक्त है।

यद्यपि प्रस्तुत खण्डकाव्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मार्मिक प्रसंग दशरथ का श्रवणकुमार के पिता द्वारा शापित होना है, तथापि इन सभी प्रसंगों की अभिव्यक्ति का भाव श्रवणकुमार के व्यक्तित्व से ही जुड़ा हुआ है। दशरथ की भूमिका कथावस्तु में सक्रियता के दृष्टिकोण से सबसे अधिक है; किन्तु दशरथ के चरित्र का उपयोग भी श्रवणकुमार के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने की दृष्टि से ही हुआ है। श्रवणकुमार के माता-पिता का चरित्र भी श्रवणकुमार की ही चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करता है। अतः इस खण्डकाव्य का मुख्य पात्र श्रवणकुमार ही है और इस दृष्टिकोण से उक्त शीर्षक सबसे उपयुक्त है।

किसी भी काव्य का शीर्षक उसके मुख्य भाव को प्रकट करने वाला होना चाहिए। इस खण्डकाव्य का मुख्य भाव श्रवणकुमार की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करना है; इसलिए इसका शीर्षक ‘श्रवणकुमार’ के अतिरिक्त कुछ और रखा जाना उपयुक्त नहीं प्रतीत होता।

प्रश्न 9:
‘श्रवणकुमार’ के ‘अभिशाप’ सर्ग का काव्य-वैशिष्ट्य लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग (अभिशाप) की कथावस्तु की उद्धरण देते हुए समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कारुणिक प्रसंगों ने जनमानस को बहुत अधिक प्रभावित किया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के मार्मिक स्थलों का सोदाहरण निदर्शन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के अभिशाप सर्ग में करुण रस का सांगोपांग वर्णन है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
रस की दृष्टि से ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में करुणा और प्रेम की विह्वल मन्दाकिनी प्रवाहित होती है।”
इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘श्रवणकुमार’ की कथा वाल्मीकि-रामायण के ‘अयोध्याकाण्ड’ के श्रवणकुमार-प्रसंग पर आधारित है। कवि ने इस कथा को युगानुरूप परिवर्तित कर सर्वथा नये रूप में प्रस्तुत किया है। श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथा नौ सर्गों में विभक्त है, जिनमें अन्तिम छ: सर्गों में करुण रस की पवित्र धारा प्रवाहित हुई है। बाण लगने पर श्रवण को मार्मिक क्रन्दन, दशरथ की आत्मग्लानि, श्रवण के माता-पिता का करुण-विलाप, उनका दशरथ को शाप देना, श्रवण के माता-पिता का पुत्र-शोक में प्राण त्यागना और दशरथ का दुःखी मन से अयोध्या लौटना ऐसे कारुणिक प्रसंग हैं जिन्हें पढ़कर किसी भी सहृदय पाठक का मन करुणा से आप्लावित हो उठता है। इस कारुणिकता का ही यह प्रभाव है कि यह कथानक भारतीय जनमानस की स्मृति में अमिट हो गया है और श्रवणकुमार का नाम मातृ-पितृ-भक्ति का पर्याय बन गया है। यही इस सर्ग का वैशिष्ट्य है और इसीलिए यह पाठकों को सबसे अधिक प्रभावित भी करता है।

अभिशाप’ इस खण्डकाव्य का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण सर्ग है, जिसमें वात्सल्य की गंगा और करुण रस की-यमुना का सुन्दर संगम हुआ है। इसमें करुण रस के सभी अंगों की सहज अभिव्यक्ति हुई है। यही इस सर्ग का वैशिष्ट्य भी है। श्रवण का शव, उसके माता-पिता के मनोभावों, पूर्व स्मृतियों एवं शव-स्पर्श, शीशपटकना, रोना आदि में आलम्बन, उद्दीपन एवं अनुभाव के दर्शन होते हैं। प्रलाप, चिन्ता, स्मरण, गुणकथन और अभिलाषा आदि वृत्तियों की सहायता से शोक की करुण रस में परिणति इस सर्ग में द्रष्टव्य है। इसके साथ ही, कथावस्तु का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश भी इसी सर्ग में है। इसके अतिरिक्त इस सर्ग में श्रवण के पिता का चरित्र देवत्व और मनुष्यत्व के बीच संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। ऋषि होकर भी वे क्रोध को रोक न सके और पुत्र-वध से उत्पन्न रोष के कारण, दशरथ को शाप दे दिया

पुत्र-शोक में कलप रहा हूँ, जिस प्रकार मैं अजनन्दन ।
सुत-वियोग में प्राण तजोगे, इसी भाँति करके क्रन्दन ॥

श्रवण की माता के विलाप में भी करुण रस का स्रोत निम्नवत् फूट पड़ता है

मणि खोये भुजंग-सी जननी, फन-सा पटक रही थी, शीश।
अन्धी आज बनाकर मुझको, किया न्याय तुमने जगदीश ?

तो उधर वात्सल्य रस की गंगा भी प्रवाहित होती दिखाई देती है।

धरा स्वर्ग में रहो कहीं भी ‘माँ’ मैं रहूँ सदा अय प्यार।
रहो पुत्र तुम, ठुकराओ मत मुझ दीना का किन्तु दुलार ॥

इस सर्ग के अन्त में ऋषि दम्पति में मानवीय दुर्बलता भी दिखाई गयी है। भले ही उन्होंने क्रोधवश दशरथ को शाप दे दिया गया, किन्तु दशरथ की निरपराध पत्नी के प्रति सहानुभूति भी दिखाई गयी है कि बेचारी नारी गेहूं के साथ घुन की भाँति पिसेगी। अपने पुत्रहन्ता और उसकी पत्नी के प्रति यह संवेदनात्मक भाव, वह भी उस समय जब पुत्र का शव सामने हो, मानवादर्श की चरम सीमा को दर्शाता है।

इस सर्ग में दशरथ की आन्तरिक अनुभूति एवं उनके अन्तर्मन का द्वन्द्व भी अपनी विशिष्टता रखती है। श्चात्ताप और अपराध-बोध से दबा हुआ एक राजेश्वर; श्रवण के माता-पिता के सामने उनके पुत्र के शव के साथ जिस मन:स्थिति में खड़ा है, वह कवि की कल्पना-शक्ति की अनुभवात्मक संवेदना का परिचय देता है और उसकी उस स्थिति की अभिव्यक्ति में रसों का जो अद्भुत समन्वय हुआ है, वह सराहनीय है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक
Number of Questions 74
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

उचित विकल्प का चयन कीजिए।

(1) ”ये प्राचीनता के पोषक भी थे और नवीनता के उन्नायक भी, वर्तमान के व्याख्याता भी थे। और भविष्य के द्रष्टा भी।” यह कथन किस लेखक से सम्बन्धित है?
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(2) कवि वचन सुधा’ और ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ का सम्पादन किया
(क) श्यामसुन्दर दास ने
(ख) सरदार पूर्णसिंह ने
(ग) रामचन्द्र शुक्ल ने
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने

(3) निम्नलिखित में से कौन-सा लेखक खड़ी बोली के प्रारम्भिक उन्नायकों में नहीं गिना जाता?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) मुंशी सदासुखलाल
(ग) मुंशी इंशाअल्ला खाँ
(घ) लल्लूलाल

(4) हिन्दी गद्य के विकास में भारतेन्दु जी का योगदान महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इन्होंने–
(क) गद्य का सर्वमान्य स्वरूप निर्धारित किया
(ख) गद्य को व्याकरण के अनुशासन में बाँधा
(ग) गद्य को परिमार्जन किया
(घ) अलंकृत और कवित्वपूर्ण गद्य की रचना की।

(5) वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ किस विधा और शैली की रचना है?
(क) निबन्ध और सूत्र शैली
(ख) नाटक और हास्य-व्यंग्य
(ग) निबन्ध और कथा शैली
(घ) नाटक और स्तोत्र शैली

(6) इनमें से कौन भारतेन्दुयुगीन गद्यकार हैं?
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) प्रेमचन्द
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(7) ‘सत्यार्थ प्रकाश’ भार एक हिन्दी गद्य-रचना है। इसके लेखक थे
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
(घ) स्वामी दयानन्द सरस्वती

(8) ‘भारतेन्दु युग’ के जीवनी लेखक हैं
(क) काका कालेलकर
(ख) लक्ष्मीधर वाजपेयी
(ग) कार्तिक प्रसाद खत्री
(घ) विष्णु प्रभाकर

(9) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना भारतेन्दु जी की है?
(क) तितली
(ख) उसने कहा था
(ग) अँधेर नगरी
(घ) नमक का दारोगा

(10) “भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?” के लेखक कौन हैं?
(क) राहुल सांकृत्यायन
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(11) भारतेन्दु के सहयोगी लेखक/गद्यकार/निबन्धकार हैं
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) वियोगी हरि
(ग) शिवपूजन सहाय
(घ) पं० बालकृष्ण भट्ट

(12) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना नहीं है
(क) सती प्रताप
(ख) नील देवी
(ग) भारत-दुर्दशा
(घ) भाषा-रहस्य

(13) भारतेन्दु युग का नाटक है
(क) लहरों के राजहंस
(ख) अम्बपाली
(ग) ध्रुवस्वामिनी
(घ) नल-दमयन्ती

(14) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना है
(क) वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति
(ख) कलि कौतुक
(ग) नूतन ब्रह्मचारी
(घ) प्रेममोहिनी

(15) हिन्दी का प्रथम यात्रावृत्त है
(क) सरयूपार की यात्रा
(ख) परीक्षागुरु
(ग) कलम का सिपाही
(घ) पथ के साथी

(16) पाठ्य-पुस्तक में ‘बलिया के मेले के अवसर पर दिया गया भाषण’ किस शीर्षक से संगृहीत है?
(क) भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?
(ख) महाकवि माघ का प्रभात वर्णन
(ग) भारतीय साहित्य की विशेषताएँ
(घ) आचरण की सभ्यता

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) क, (4) क, (5) ख, (6) क, (7) घ, (8) गे, (9) ग, (10) घ, (11) घ, (12) घ, (13) घ, (14) कं, (15) क, (16) क।।

महावीरप्रसाद द्विवेदी

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) हिन्दी में समालोचना के सूत्रधार माने जाते हैं
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(2) संरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक के रूप में प्रसिद्ध हैं
या
‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक थे।
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(3) खड़ी बोली का परिष्कार कर उसे व्यवस्थित बनाने का श्रेय है
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को
(ग) श्यामसुन्दर दास को
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी को

(4) हिन्दी गद्य के विकास में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का महत्त्व इसलिए है, क्योंकि उन्होंने
(क) हिन्दी गद्य का स्वरूप स्थिर किया
(ख) भाषा का परिष्कार कर उसे व्यवस्थित बनाया
(ग) अलंकृत एवं कवित्वपूर्ण गद्य की रचना की
(घ) यथार्थवादी जीवन-दर्शन को महत्त्व दिया

(5) ‘काव्य-मंजूषा’ निम्नलिखित में से किसकी कविताओं का संग्रह है?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी,
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय

(6) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीकालीन गद्य लेखक/लेखिका हैं?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) सियारामशरण गुप्त
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय

(7) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीयुगीन गद्य लेखक हैं?
(क) राय कृष्णदास
(ख) चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी
(घ) उपेन्द्रनाथ अश्क’

(8) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदी युग के लेखक नहीं हैं?
(क) बाबू श्यामसुन्दर दास
(ख) डॉ० नगेन्द्र
(ग) बालमुकुन्द गुप्त।
(घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी

(9) द्विवेदी युग के लेखक हैं
(क) सही०वी० ‘अज्ञेय’
(ख) किशोरीलाल गोस्वामी
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर

(10) हिन्दी गद्य के उत्कर्ष का सूर्योदय काल था
(क) छायावादी युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावादोत्तर युग
(घ) भारतेन्दु युग

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) ख, (5) ग, (6) ख, (7) ख, (8) ख और घ, (9) ख, (10) ख।

श्यामसुन्दर दास

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) “हिन्दी भाषा को सर्वजन सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने में इनका योगदान अप्रतिम है।” यह कथन किस लेखक से सम्बन्धित है?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से
(ख) जयशंकर प्रसाद से
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी से।
(घ) श्यामसुन्दर दास से

(2) साहित्यालोचन’ और ‘हिन्दी साहित्य निर्माता’ इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं
(क) जयशंकर प्रसाद की
(ख) पं० रामचन्द्र शुक्ल की
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की
(घ) श्यामसुन्दर दास की

(3) ‘नासिकेतोपाख्यान’ के रचयिता हैं
(क) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) प्रेमचन्द
(घ) श्यामसुन्दर दास

(4) ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना में इनका सराहनीय योगदान रहा है
(क): भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का
(ख) जयशंकर प्रसाद का
(ग) श्यामसुन्दर दास का
(घ) डॉ० सम्पूर्णानन्द का

(5) निम्नलिखित में से कौन द्विवेदीयुगीन गद्य लेखक/लेखिका हैं? या निम्नलिखित में से कौन छायावादी युग के लेखक नहीं हैं?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) यशपाल
(घ) भगवतीचरण वर्मा

(6) रूपक रहस्य’ के लेखक कौन हैं? यह किस विधा की रचना है?
(क) वियोगी हरि – नाटक
(ख) रामचन्द्र शुक्ल – निबन्ध,
(ग) श्यामसुन्दर दास – आलोचना
(घ) प्रतापनारायण मिश्र – निबन्ध

(7) श्यामसुन्दर दास द्वारा किस पत्रिका का सम्पादन किया गया?
(क) हिन्दी प्रदीप का
(ख) माधुरी का
(ग) इन्दु का
(घ) नागरी प्रचारिणी पत्रिका का

(8) ‘नासिकेतोपाख्यान’ शीर्षक से श्यामसुन्दर दास के अतिरिक्त किस लेखक ने गद्य-रचना की है?
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) सदल मिश्र
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(9) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना श्यामसुन्दर दास की नहीं है?
(क) मेरा जीवन प्रवाह
(ख) साहित्यालोचन
(ग) भाषा रहस्य
(घ) गद्य कुसुमावली

(10) ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना किस युग में हुई?
(क) भारतेन्दु युग में
(ख) द्विवेदी युग में
(ग) छायावाद युग में
(घ) छायावादोत्तर युग में

(11) ‘भारतीय साहित्य की विशेषताएँ’ के लेखक हैं
(क) सरदार पूर्णसिंह
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) अज्ञेय’।
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) ग, (5) ख, (6) ग, (7) घ, (8) ख, (9) क, (10) क, (11) ख।

सरदार पूर्णसिंह

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) केवल छ: निबन्धलिखकर हिन्दी-साहित्य में अपना स्थायी स्थान बनाने वाले लेखक हैं
(क) मोहन राकेश
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(2) ‘मजदूरी और प्रेम’ तथा ‘अमेरिका का मस्त योगी वाल्ट हिटमैन’ निबन्धों के लेखक हैं
(क) जैनेन्द्र कुमार
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) श्यामसुन्दर दास
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(3) निम्नलिखित में से किसके निबन्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होते रहे?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के
(ख) जैनेन्द्र कुमार के
(ग) कन्हैयालाल मिश्र के
(घ) सरदार पूर्णसिंह के

(4) ‘सच्ची वीरता’ और ‘मजदूरी और प्रेम’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) आत्मकथा
(ख) नाटक
(ग) कहानी
(घ) निबन्ध

(5) किस निबन्ध लेखक के नाम के साथ ‘अध्यापक’ शब्द जुड़ा हुआ है?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के
(ख) जैनेन्द्र कुमार के
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के
(घ) सरदार पूर्णसिंह के

(6) सिक्खों के दस गुरुओं की जीवनी अंग्रेजी में किनके द्वारा लिखी गयी?
(क) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा
(ख) सरदार पूर्णसिंह द्वारा
(ग) राहुल सांकृत्यायन द्वारा
(घ) भीष्म साहनी द्वारा

(7) निम्नलिखित में से कौन सरदार पूर्णसिंह के समकालीन निबन्ध लेखक थे?
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) बाबू गुलाबराय
(ग) पद्मसिंह शर्मा कमलेश
(घ) श्यामसुन्दर दास

(8) ‘आचरण की सभ्यता के लेखक हैं|
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्दः
(ख) राय कृष्णदास
(ग) जैनेन्द्र कुमार,
(घ) सरदार पूर्णसिंह

उत्तर:
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) घ, (6) ख, (7) ग, (8) घ।

डॉ० सम्पूर्णानन्द

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) ‘आर्यों का आदि देश’ किस, लेखक की रचना है?
(क) सरदार पूर्णसिंह की
(ख) श्यामसुन्दर दास की
(ग) राय कृष्णदास की
(घ) डॉ० सम्पूर्णानन्द की

(2) ‘चिद्विलास’ और ‘जीवन दर्शन’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) दर्शन
(ख) नाटक
(ग) निबन्ध
(घ) जीवनी

(3) ‘भाषा की शक्ति’ किस निबन्ध लेखक के निबन्धों का संग्रह है?
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) जी० सुन्दर रेड्डी
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(4) ब्राह्मण सावधान’ नामक पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क़) राहुल सांकृत्यायन
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(5) ‘मर्यादा’ (मासिक पत्रिका) और ‘टुडे’ (अंग्रेजी दैनिक) के सम्पादन से सम्बद्ध रहे
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ग) प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी
(घ) मोहन राकेश

(6) डॉ० सम्पूर्णानन्द द्वारा सम्पादित पत्रिका का नाम है
(क) सरस्वती
(ख) धर्मयुग
(ग) मर्यादा
(घ) हंस

उत्तर:
(1) घ, (2) क, (3) ग, (4) ग, (5) क, (6) गः ।

राय कृष्णदास

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) इनके द्वारा भारत कला भवन’ नाम के एक विशाल संग्रहालय की स्थापना की गयीया वाराणसी में भारत कला भवन’ नामक संग्रहालय की स्थापना करने वाले साहित्यकार थे
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(घ) राय कृष्णदास

(2) इन्होंने हिन्दी में गद्यगीत विधा का प्रवर्तन किया
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) राय कृष्णदास

(3) इनके गद्यगीतों के संग्रह ‘छायापथ’ के नाम से प्रकाशित हुए हैं
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) राय कृष्णदास

(4) नीचे दी गयी रचनाओं में कौन-सी अनूदित रचना है?
(क) साधना
(ख) ऑखों की चाहे
(ग) सुधांशु
(घ) पगला

(5) ‘भारत की चित्रकला’ तथा ‘भारतीय मूर्तिकला’ इनके प्रामाणिक ग्रन्थ हैं
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) राहुल सांकृत्यायन
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) राय कृष्णदास

(6) ‘साधना’ नामक गद्यगीतों के संग्रह के रचयिता कौन हैं?
(क) वृन्दावनलाल वर्मा
(ख) मोहन राकेश
(ग) राय कृष्णदासे
(घ) विनय मोहन शर्मा

(7) ‘आनन्द की खोज, पागल पथिक’ के रचनाकार हैं
(क) राय कृष्णदास
(ख) यशपाल
(ग) बासुदेवशरण अग्रवाल
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(8) ‘आनन्दं की खोज’ और ‘मगल पथिक’ का सम्बन्ध किस विधा से है?
(क) संस्मरण
(ख) निबन्ध
(ग) गद्यगीत
(घ) आलोचना

(9) छायावादी युग के गद्य-लेखक हैं’
(क) श्यामसुन्दर दास
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) प्रतापनारायण मिश्र
(घ) राय कृष्णदास

उत्तर:
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) घ, (6) ग, (7) क, (8) ग, (9) ख, घ।

राहुल सांकृत्यायन

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) कहानी-संग्रह वोल्गा से गंगा’ के लेखक हैं
(क) राय कृष्णदास
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(2) ‘महापण्डित’ किस लेखक के नाम के साथ जुड़ा है?
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(3) मेरी जीवन यात्रा’ किस विधा की रचना है? इसके रचनाकार कौन हैं?
(क) आत्मकथा-डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) आत्मकथा-राहुल सांकृत्यायन
(ग) निबन्ध–आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(घ) निबन्ध-श्यामसुन्दर दास

(4) निम्नलिखित में कौन-सी रचना उपन्यास नहीं है?
(क) जीने के लिए
(ख) मधुर स्वप्न
(ग) सप्तसिन्धु
(घ) घुमक्कड़शास्त्र

(5) ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ के लेखक हैं
(क) मोहन राकेश
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) राहुल सांकृत्यायन
(घ) सरदार पूर्णसिंह

(6) किनका वास्तविक नाम केदारनाथ पाण्डे था?
(क) कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) राहुल सांकृत्यायन
(घ) मोहन राकेश

उत्तर:
(1) घ, (2) घ, (3) ख, (4) घ, (5) ग, (6) ग।

रामवृक्ष बेनीपुरी

उचित विकल्प का चयन कीजिए

(1) निबन्धों और रेखाचित्रों के लिए इनकी ख्याति सर्वाधिक है
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(2) ‘माटी की मूरतें’ इनके श्रेष्ठ रेखाचित्रों का संग्रह है, जिससे बिहार के जन-जीवन को जाना जा सकता है
(क) मोहन राकेश
(ख) राय कृष्णदास
(ग) सरदार पूर्णसिंह
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

(3) इन्होंने ‘तरुण भारती’ और ‘बालक’ पत्रिका का सम्पादन किया
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी।

(4) ‘जंजीरें और दीवारें’ तथा ‘मील के पत्थर’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) उपन्यास
(ख) कहानी
(ग) निबन्ध
(घ) संस्मरण

(5) पैरों में पंख बाँधकर’ और ‘उड़ते चलें किस विधा की रचनाएँ हैं?
(क) उपन्यास
(ख) यात्रावृत्त
(ग) निबन्ध
(घ) कहानी

(6) ‘सीता की माँ’, ‘अम्बपाली’ किस लेखक द्वारा रचित नाटक हैं?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) डॉ० रामकुमार वर्मा

(7) निम्नलिखित में से छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य लेखक कौन हैं?
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) विद्यानिवास मिश्र
(घ) फणीश्वरनाथ रेणु

उत्तर
(1) घ, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) ख, (6) क, (7) का

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