UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 2
Chapter Name Indian Economy 1950-1990 (भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990))
Number of Questions Solved 86
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 (भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990))

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
योजना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
योजना इसकी व्याख्या करती है कि किसी देश के दुर्लभ संसाधनों का प्रयोग किस प्रकार किया जाए ताकि देश के आर्थिक विकास को गति दी जा सके।

प्रश्न 2.
भारत ने योजना को क्यों चुना?
उत्तर
1947 ई० (स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात्) में भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन तथा पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी। कृषि ही जीवन-निर्वाह का मुख्य साधन थी किंतु कृषि की अवस्था अत्यधिक दयनीय थी। अर्थव्यवस्था के द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्र अविकसित थे और देश की बहुत बड़ी जनसंख्या घोर निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रही थी। अर्थव्यवस्था मुख्यत: माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों पर आधारित थी। जिसका परिणाम था-निर्धनता, असमानता एवं गतिहीनता। ऐसी अर्थव्यवस्था को बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता है। अतः इन समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए भारत ने ‘नियोजन’ का मार्ग अपनाया।

प्रश्न 3.
योजनाओं के लक्ष्य क्या होने चाहिए?
उत्तर
किसी योजना के स्पष्टत: निर्दिष्ट लक्ष्य होने चाहिए। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य हैं

  1. संवृद्धि,
  2. आधुनिकीकरण,
  3. आत्मनिर्भरता,
  4. समानता,
  5. रोजगार। 

प्रश्न 4.
चमत्कारी बीज क्या होते हैं?
उत्तर
उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV) को चमत्कारी बीज कहते हैं। इन बीजों का प्रयोग करने से कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है।

प्रश्न 5.
‘विक्रय अधिशेष क्या है?
उत्तर
किसानों द्वारा उत्पादन का बाजार में बेचा गया अंश ही ‘विक्रय अधिशेष’ कहलाता है।

प्रश्न 6.
कृषि क्षेत्रक में लागू किए गए भूमि सुधार की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या करो।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत भारत में मूलत: एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था ही बनी रही। देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या, जो गाँवों में बसी थी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि के माध्यम से ही रोजी-रोटी कमा रही थी परंतु फिर भी कृषि क्षेत्र में न तो संवृद्धि हुई और न ही समता रह गई। इन्हीं सब कारणों से भूमि सुधार की आवश्यकता पड़ी। कृषि क्षेत्रक में निम्नलिखित सुधार किए गए हैं

  1. देश में कृषि क्षेत्रक में बिचौलियों का उन्मूलन किया गया।
  2. वास्तविक कृषकों को ही भूमि का स्वामी बनाया गया।
  3. किसी व्यक्ति की कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया गया।
  4. नई तकनीक के प्रयोग पर बल दिया गया।

मध्यस्थों के उन्मूलन का परिणाम यह हुआ कि लगभग 2 करोड़ काश्तकारों को सरकार से सीधा संपर्क हो गया तथा वे जमींदारों द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्त हो गए।

प्रश्न 7.
हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इससे किसानों को कैसे लाभ पहुँचा?  संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर
हरित क्रांति से अभिप्राय कृषि उत्पादने में होने वाली भारी वृद्धि से है जो कृषि की नई नीति अपना के कारण हुई है। स्वतंत्रता के समय देश की 25 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी। इस क्षेत्र में उत्पादकता बहुत कम थी और पुरानी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता था। अधिसंख्य किसानों के पास आधारिक संरचना का अभाव था जिसके कारण कृषिप्रधान देश होने पर भी हम गरीब और विदेशी सहायता पर निर्भर थे। औपनिवेशिक काल में कृषि क्षेत्र में उत्पन्न गतिरोध को दूर करने के लिए हरित क्रांति लाना आवश्यक था। हरित क्रांति के कारण कृषि क्षेत्र की आगतों; जैसे उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV), पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल आपूर्ति, नई तकनीक आदि का एक साथ प्रयोग होने लगा। हरित क्रांति प्रौद्योगिकी के प्रसार से खाद्यान्न उत्पादन में अत्यधिक बढोतरी हुई विशेषकर गेहूँ और चावल में। किसानों को बाजार में बेचने के लिए अधिशेष उपज मिलने लगी जिस कारण किसानों की आय में वृद्धि हुई।

प्रश्न 8.
योजना उद्देश्य के रूप में समानता के साथ संवृद्धि’ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य हैं-संवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और समानता। संक्षेप में, आयोजन से जनसामान्य के जीवन-स्तर में सुधार होना चाहिए। केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन-स्तर में सुधार नहीं आ सकता। किसी देश में उच्च संवृद्धि दर और विकसित प्रौद्योगिकी का प्रयोग होने के बाद भी अधिकांश लोग गरीब हो सकते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्थिक समृद्धि के लाभ देश के निर्धन वर्ग को भी सुलभ हों, केवल धनी लोगों तक ही सीमित न रहें। अतः संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के साथ-साथ समानता भी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करवाने में समर्थ होना चाहिए और धन-वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए। संक्षेप में, आर्थिक संवृद्धि, समानता के अभाव में अर्थहीन होती है।

प्रश्न 9.
‘क्या रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास उत्पन्न करता है?’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर
वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादकों को नई प्रौद्योगिकी अपनानी पड़ती है। जैसे किसान पुराने बीजों के स्थान पर नई किस्म के बीजों का प्रयोग कर खेतों की पैदावार बढ़ा सकते हैं उसी प्रकार एक फैक्ट्री नई मशीनों का प्रयोग कर उत्पादन बढ़ा सकती है। नई प्रौद्योगिकी को अपनाना ही 
आधुनिकीकरण है। आधुनिकीकरण के जरिए ही नई-नई मशीनों का प्रयोग बढ़ाया जाता है, जिससे विनिर्माण एवं कृषि क्षेत्र में श्रमिकों को स्थान मशीनें ले लेती हैं अर्थात् रोजगार के अवसर इन क्षेत्रों में घटने लगते हैं। किंतु यह प्रभाव अल्पकालीन ही होता है। आधुनिकीकरण द्वारा उत्पादन में वृद्धि होती है, आय बढ़ती है और विविध प्रकार की वस्तुओं की माँग सृजित होती है। इस माँग को संतुष्ट करने के लिए नई-नई वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिसके कारण रोजगार के नये अवसर सृजित होने लगते हैं। उपभोक्ता वस्तुओं एवं पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादन का विस्तार होता है, नये-नये उद्योगों की स्थापना होती है और द्वितीयक उद्योगों के विस्तार के साथ-साथ तृतीयक क्षेत्र-बैंक, बीमा आदि का विस्तार होता है जिससे रोजगार में वृद्धि होती है।

प्रश्न 10.
भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना क्यों आवश्यक था?
उत्तर
आत्मनिर्भरता का अर्थ है—देश अपनी आवश्यकताओं को खरीदने के लिए पर्याप्त मात्रा में अतिरेक उत्पन्न करे और अपने आयातों का भुगतान करने के लिए सक्षम हो। जो देश अपने आयातों का भुगतान अपने उत्पादन के निर्यातों द्वारा करते हैं, वे आत्मनिर्भर देश कहलाते हैं। विकासशील देश समाान्यतः आत्मनिर्भर नहीं हैं क्योंकि उनके निर्यात उनके आयातों का भुगतान करने के लिए अपर्याप्त हैं। एक 
विकासशील देश के रूप में भारत को आत्मनिर्भरता का पालन करना-निम्नलिखित कारणों से आवश्यक था|

  1. विदेशी सहायता देश की आंतरिक प्रयास क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
  2. विदेशी सहायता विकास विरोधी तथा बचत विरोधी है। |
  3. विदेशी सहायता अधिकांशतः प्रतिबद्ध होती है। अत: इसका इच्छित उपयोग नहीं हो पाती। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का मूल लक्ष्य आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना रहा है। उदाहरण के लिए, प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई ताकि खाद्यान्नों के मामले में देश आत्मनिर्भर हो सके। बाद में औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया

प्रश्न 11.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण यह विश्व का
| बाह्य प्रापण केन्द्र बन रहा है। अनुकूल परिस्थितियाँ क्या हैं?
उत्तर
विश्व के बाह्य प्रापण केन्द्र के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था में अनुकूल परिस्थितियाँ। निम्नलिखित हैं|

  1. भारत में तीव्र गति से सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार हुआ है।
  2. भारत में प्रापण सेवाओं की लागत बहुत कम आती है।
  3. कार्य का निष्पादन कुशलतापूर्वक हो जाता हैं।
  4. सेवा दर निम्न है और श्रमशक्ति कुशल है।

प्रश्न 12.
योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को ही अग्रणी भूमिका 
क्यों सौंपी गई थी?
उत्तर
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र को अग्रणी भूमिका सौंपने के निम्नलिखित कारण थे-

  1. स्वतंत्रता-प्रप्ति के समय भारत के उद्योगपतियों के पास अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश करने के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं थी।
  2. उस समय बाजार भी इतना बड़ा नहीं था, जिसमें उद्योगपतियों को मुख्य परियोजनाएँ शुरू करने के लिए प्रोत्साहन मिलता।
  3. भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए यह निर्णय लिया गया कि सरकार अर्थव्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योग पर नियंत्रण करेगी।
  4. देश में क्षेत्रीय एवं सामाजिक विषमता को कम करने के लिए आर्थिक व सामाजिक संकेन्द्रण को कम करना आवश्यक था।

प्रश्न 13.
इस कथन की व्याख्या करें-हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्नों के प्रापण द्वारा विशाल सुरक्षित भण्डार बनाने के योग्य बनाया, ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सके।
उत्तर
औपनिवेशिक काल का कृषि गतिरोध हरित क्रांति से स्थायी रूप से समाप्त हो गया। उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV), कीटनाशकों, उर्वरकों, निश्चित जलापूर्ति तथा आधुनिक तकनीक की मशीनों के प्रयोग से कृषि उत्पादन अधिक मात्रा में बढ़ गया। किसान कृषि उपज को बाजार में बेचने लगे। इसके फलस्वरूप खाद्यान्नों की कीमतों में कमी आई। अपनी कुल आय के बहुत बड़े प्रतिशत का भोजन पर खर्च करने वाले निम्न आय वर्गों को कीमतों में इस सापेक्ष कमी से बहुत लाभ हुआ। विपणित अधिशेष की वजह से सरकार पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्नों को प्राप्त कर सुरिक्षत स्टॉक बना सकी जिसे खाद्यान्नों की कमी के समय प्रयोग किया जा सकता था।

प्रश्न 14.
सहायिकी किसानों को नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने को प्रोत्साहित तो करती है पर उसका सरकारी वित्त पर भारी बोझ पड़ता-इस तथ्य को ध्यान में रखकर सहायिकी की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर
आजकल कृषि क्षेत्र को दी जा रही आर्थिक सहायिकी एक ज्वलंत बहस का विषय बन गथा है। हमारे देश के छोटे किसान अधिकांशत: गरीब हैं; अत: छोटे किसानों को विशेष रूप से HYV प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए सहायिकी दी जानी आवश्यक है। सहायता के अभाव में वे नई प्रौद्योकि का उपयोग नहीं कर पाएँगे जिसका कृषि उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। परंतु कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि एक बार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल जाने तथा उसके व्यापक प्रचलन के बाद सहायिकी धीरे-धीरे समाप्त कर देनी चाहिए क्योंकि उर्वरकी सहायता का लाभ बड़ी मात्रा में प्रायः उर्वरक उद्योग तथा अधिक समृद्ध क्षेत्र के किसानों को ही पहुँचता है। अतः यह तर्क दिया जाता है कि उर्वरकों पर सहायिकी जारी रखने का कोई 
औचित्य नहीं है। इनसे लक्षित समूह को लाभ नहीं होगा और सरकारी कोष पर आवश्यक बोझ पड़ेगा। इसके विपरीत कुछ विशेषज्ञों का मत है कि सरकार को कृषि सहायिकी जारी रखनी चाहिए क्योंकि भारत में कृषि एक बहुत ही जोखिम भरा व्यवसाय है। अधिकतर किसान गरीब हैं और सहायिकी को समाप्त करने से वे अपेक्षित आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएँगे। इसका नुकसान यह होगा कि गरीब किसान और गरीब हो जाएँगे, कृषि क्षेत्र में उत्पादन स्तर गिरेगा, खाद्यान्नों की कमी से कीमतें बढ़ने लगेंगी जिससे हम विदेशों से सहायता लेने को मजबूर होंगे। इन विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि सहायिकी से बड़े किसानों तथा उर्वरक उद्योगों को अधिक लाभ हो रहा है, तो सही नीति सहायिकी समाप्त करना नहीं है, बल्कि ऐसे कदम उठाना है जिनसे कि केवल निर्धन किसानों को ही इनका लाभ मिले।

प्रश्न 15.
हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्रक में ही क्यों लगी रही? ।
उत्तर
1960 के दशक के अंत तक देश में कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई और देश खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। इसके बावजूद नकारात्मक पहलू यह रहा है कि 1990 तक भी देश की 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में लगी थी। अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जैस-जैसे देश सम्पन्न होता है, सकल घरेलू उत्पाद में, कृषि के योगदान में और उस पर निर्भर जनसंख्या में पर्याप्त कमी आती है। भारत में 1950-90 की अवधि में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान कम हुआ, लेकिन कृषि क्षेत्र पर 
आश्रितों की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई। 1950 में 67.5% लोग एवं 1990 में 64.9 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य में लगी थी। इसका कारण यह माना जाता है कि उद्योग क्षेत्र और सेवा क्षेत्र, कृषि क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को नहीं खपा पाए। अनेक अर्थशास्त्री इसे 1950-90 के दौरान अपनाई गई नीतियों की विफलता मानते हैं। मूलत: इसका कारण द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों का आशानुकूल विकास न हो पाना है।

प्रश्न 16.
यद्यपि उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्रक बहुत आवश्यक रहा है, पर सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रम ऐसे हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्रक के अर्थव्यवस्था के संसाधनों की बर्बादी के साधन बने हुए हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर
स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय भारत के उद्योगपतियों के पास हमारी अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश के लिए पर्याप्त पूँजी नहीं थी। इसी कारण राज्य को औद्योगिक क्षेत्र को प्रोत्साहन देने में व्यापक भूमिका निभानी पड़ी। इसके अतिरिक्त भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए यह निर्णय लिया गया कि राज्य उन उद्योगों पर पूरा नियंत्रण रखेगा, जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण थे। वस्तुतः औद्योगिक क्षेत्र प्रायः सार्वजनिक क्षेत्रक के कारण विविधतापूर्ण बन गया था। इस क्षेत्रक की भूमिका से कम पूँजी वाले लोगों को भी उद्योग क्षेत्र में प्रवेश का मौका मिल गया। भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा किए गए योगदान के बावजूद कुछ अर्थशास्त्रियों ने सार्वजनिक क्षेत्रक के अनेक उद्यमों के निष्पादन की कड़ी आलोचना की है। इस क्षेत्रक ने एकाधिकारी शैली में काम किया जिससे निजी क्षेत्रक को पर्याप्त आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पाया। 
अब यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि इस क्षेत्रक को अब उन उद्योगों से हट जाना चाहिए जहाँ निजी क्षेत्रकीक तरह से काम कर सकता है। किंतु अनेक क्षेत्रक ऐसे हैं जहाँ आज भी सार्वजनिक क्षेत्रक की अपरित बनी हुई है। उदाहरण के लिए, उच्च विकास दर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है, गैर-लाभकारी किंतु उपयोगी क्षेत्रों में प्रारंभिक विनियोग सार्वजनिक क्षेत्रक का विस्तार आवश्यक है, गैर-लाभकारी किंतु उपयोगी क्षेत्रों में प्रारंभिक विनियोग सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा ही संभव है, जनोपयोगी सेवाओं की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्रक में की जा सकती है और सार्वजनिक क्षेत्रक के विस्तार से ही आर्थिक विषमताओं को कम किया जा सकता है। इस प्रकार निम्न क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्रक का विस्तार अपरिहार्य है-

  1. सुरक्षात्मक उद्योग,
  2. भारी विनियोग वाले उद्योग,
  3. लम्बी गर्भावधि वाले उद्योग तथा
  4. जनोपयोगी क्षेत्रक।

प्रश्न 17.
आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलु उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है?
उत्तर
हमारे नीति-निर्माताओं द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीति व्यापार नीति से घनिष्ट रूप से सम्बद्ध थी। हमारी योजनाओं में व्यापार की विशेषता अंतर्मुखी व्यापार नीति थी। तकनीकी रूप से इस नीति को आयात-प्रतिस्थापन कहा जाता है। इस नीति का उद्देश्य आयात के बदले घरेलू उत्पादन द्वारा पूर्ति करना है। इस नीति द्वारा राज्य ने घरेलू उद्योगों की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया और विदेशी प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योगों की रक्षा की। आयात संरेक्षण दो प्रकार के थे-

  1. प्रशुल्क-प्रशुल्क से आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं,
  2. कोटा-कोटे में वस्तुओं की मात्रा तय होती है, जिन्हें आयात किया जा सकता है। प्रशुल्क एवं कोटे का प्रभाव यह होता है कि उनसे आयात प्रतिबंधित हो जाते हैं और विदेशी प्रतिस्पर्धा से देशी फर्मों की रक्षा होती है।

प्रश्न 18.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 में निजी क्षेत्रक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था?
उत्तर
भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के राज्य के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 को लाया गया था। इस प्रस्थाव को द्वितीय पंचवर्षीय योजना का आधार बनाया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार, उद्योगों को तीन वर्गों में विभक्त किया गया। प्रथम वर्ग में वे उद्योग सम्मिलित थे, जिन पर राज्य का अनन्य स्वामित्व था। दूसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जिनके लिए निजी क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र के साथ मिलकर प्रयास कर सकते थे, परंतु जिनमें नई इकाइयों को शुरू करने की एकमात्र जिम्मेदारी राज्य की होती। तीसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जो निजी क्षेत्रक के अंतर्गत आते थे लेकिन इस क्षेत्र को लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया। इस प्रस्ताव में सरकार के लिए ऐसा करना आवश्यक था। इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाने वाले उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रकार से आर्थिक सहायता प्रदान की गई। इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देना था।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 1
उत्तर
.UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 2 Indian Economy 1950-1990 2

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

 बदविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों पर आधारित थी जिसका परिणाम था
(क) निर्धनता
(ख) असमानता
(ग) गतिहीनता
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
मिश्रित अर्थव्यवस्था को नियन्त्रित अर्थव्यवस्था की संज्ञा किसने दी है?
(क) प्रो० हैन्सन ने
(ख) प्रो० लर्नर ने
(ग) डॉ० डाल्टन ने
(घ) लॉक्स ने
उत्तर
(ख) प्रो० लर्नर ने ।

प्रश्न 3.
भारत सरकार ने औद्योगिक नीति की घोषणा कब की?
(क) 6 अप्रैल, 1948 ई० को
(ख) 2 अक्टूबर, 1943 को
(ग) 1 अप्रैल, 1999 ई० को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) 6 अप्रैल, 1948 ई० को

प्रश्न 4.
भारत में आर्थिक नियोजन की तकनीक को अपनाया गया|
(क) 1 अप्रैल, 1950 से
(ख) 1 अप्रैल, 1851 से
(ग) 1 अप्रैल, 1951 से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) 1 अप्रैल, 1951 से।

प्रश्न 5.
“भूमि सुधार व्यक्ति और भूमि के सम्बन्धों में नियोजन और संस्थागत पुनर्गठन है।” यह |  परिभाषा है|
(क) प्रो० बाउले
(ख) डॉ० बी०बी० भट्ट
(ग) रमेश दत्त ।
(घ) प्रो० गुन्नार मिर्डल
उत्तर
(घ) प्रो० गुन्नार मिर्डल।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
पूँजीवाद क्या है?
उत्तर
पूँजीवाद आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का निजी अधिकार होता है तथा वह उत्पादन के साधनों का प्रयोग लाभ कमाने की दृष्टि से करता है।

प्रश्न 2.
समाजवाद क्या है?
उत्तर
समाजवाद आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें उत्पत्ति के साधनों पर सरकार अथवा लोकसत्ता का अधिकार होता है तथा समस्त आर्थिक क्रियाएँ निजी क्षेत्र में न रहकर सार्वजनिक क्षेत्र में रहती

प्रश्न 3.
मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है?
उत्तर
मिश्रित अर्थव्यवस्था पूँजीवाद और समाजवाद के बीच की अवस्था है। इसमें पूँजीवाद व समाजवाद दोनों के दोषों से अर्थव्यवस्था को मुक्त करके दोनों प्रणालियों के गुणों को अपनाया जाता है। इसमें निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र को सह-अस्तित्व पाया जाता है।

प्रश्न 4.
आर्थिक नियोजन से क्या आशय है?
उत्तर
आर्थिक नियोजन से आशय पूर्व-निर्धारित और निश्चित सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अर्थव्यवस्था के सभी अंगों को एकीकृत और समन्वित करते हुए राष्ट्र के संसाधनों के सम्बन्ध में सोच-विचारकर रूपरेखा तैयार करने और केन्द्रीय नियन्त्रण से है।

प्रश्न 5.
दसवीं पंचवर्षीय योजना के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) सकल राष्ट्रीय उत्पाद में 8% वार्षिक वृद्धि।
(2) श्रमशक्ति को लाभपूर्ण रोजगार प्रदान करना।

प्रश्न 6.
भारतीय कृषि की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
(1) भारत में कृषि उत्पादकता अन्य देशों क तुलना में कम है।
(2) कार्यशील जनसंख्या का लगभग 67.2% भाग कृषि से आजीविका प्राप्त करता है।

प्रश्न 7.
सहकारी कृषि की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
“सहकारी कृषि अनिवार्य रूप से ऐसी व्यवस्था को सूचित करती है, जिसमें भूमि का एकत्रीकरण करके उसका संयुक्त प्रबन्ध किया जाता है।”

प्रश्न 8.
भारत में सहकारी कृषि के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
(1) जोतों के आकार में वृद्धि होती है।
(2) कृषि नियोजन में सहायता मिलती है।

प्रश्न 9.
आर्थिक जोत की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
“आर्थिक जोत एक ऐसी जोत है, जो किसी परिवार को न्यूनतम जीवन स्तर पर रहने के लिए पर्याप्त आय प्रदान करे।”

प्रश्न 10.
कृषक बीमा आय योजना क्या है?
उत्तर
इस योजना के अन्तर्गत किसानों को उनकी उपज का कुल मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आधारित’ मिलने की गारण्टी दी जाएगी।

प्रश्न 11.
नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा कब की गई?
उत्तर
नई राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा 29 जुलाई, 2000 को संसद में की गई।

प्रश्न 12.
नई कृषि नीति का क्या लक्ष्य है? ।
उत्तर
नई कृषि नीति का लक्ष्य अगले दो दशकों के लिए कृषि क्षेत्र में प्रति वर्ष 4% वृद्धि दर प्राप्त करना है।

प्रश्न 13.
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
इस योजना का उद्देश्य है-सूखा, बाढ़, ओला-वृष्टि, चक्रवात, आग, कीट व बीमारियों आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल को हुई क्षति से किसानों का संरक्षण करना।

 प्रश्न 14.
भू-सुधार से क्या आशय है?
उत्तर
भू-सुधार से आशय छोटे कृषकों एवं कृषि श्रमिकों के लाभार्थ भूमि-स्वामित्व के पुनर्वितरण से लगाया जाता है।

प्रश्न 15.
हरित क्रान्ति से क्या आशय है?
उत्तर
हरत क्रान्ति से आशय सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली किस्मों को आधुनिक कृषि पद्धति से उगाकर कृषि उपज में यथासम्भव अधिक वृद्धि करने से है।

प्रश्न 16.
यान्त्रिक कृषि का अर्थ बताइए।
उत्तर
यान्त्रिक कृषि का अभिप्राय भूमि सम्बन्धी कार्यों में, जिन्हें प्राय: बैलों, घोड़ों अथवा अन्य पशुओं की सहायता से अथवा मानव श्रम द्वारा अथवा पशु एवं मानव श्रम दोनों के द्वारा किया जाता है, में यान्त्रिक शक्ति का प्रयोग करने से है।

प्रश्न 17.
कृषि विपणन से क्या आशय है?
उत्तर
कृषि विपणन के अन्तर्गत उन समस्त क्रियाओं का समावेश किया जाता है, जिनका सम्बन्ध कृषि उत्पादन के कृषक के पास से अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में होता है।

प्रश्न 18.
सुव्यवस्थित कृषि विपणन की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
सुव्यवस्थित कृषि विपणन की दो विशेषताएँ हैं-
(1) मध्यस्थों की संख्या न्यूनतम होना तथा
(2) भण्डार-गृहों की पर्याप्त व्यवस्था होना।

प्रश्न 19.
ग्रामीण बाजार में फसल की बिक्री किन रूपों में होती है?
उत्तर
(1) गाँव के विशिष्ट अथवा साप्ताहिक बाजारों में।
(2) गाँव के महाज एवं साहूकारों को।
(3) गाँव में भ्रमण करते व्यापारियों तथा कमीशन एजेण्टों को।

प्रश्न 20.
भारत में कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था के दो दोष बताइए।
उत्तर
कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था के दो दोष हैं–
(1) घटिया किस्म की कृषि उपज।
(2) बहुत अधिक मध्यस्थों का होना।

प्रश्न 21.
भारत में कृषि विपणन व्यवस्था को सुधारने के लिए दो सुझाव दीजिए।
उत्तर
कृषि विपणन व्यवस्था को सुधारने हेतु दो सुझाव हैं-
(1) कृषि उपज की बिक्री के लिए। स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की जाए। |
(2) नियन्त्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।

प्रश्न 22.
गाँवों में फसल की बिक्री की विवशता के लिए उत्तरदायी दो कारण बताइए।
उत्तर
(1) भण्डारण सुविधाओं का अभाव।
(2) किसानों को साहूकारों व महाजनों के ऋण-चंगुल में फैसा रहना।

प्रश्न 23.
अनियमित मण्डियों में कोई दो प्रचलित बुराइयाँ बताइए।
उत्तर
(1) विभिन्न प्रकार की अनुचित कटौतियाँ काटना।
(2) कम माप-तौल द्वारा किसानों को धोखा देना।

प्रश्न 24.
मूल्य स्थिरीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर
मूल्य स्थिरीकरण से आशय मूल्यों में होने वाले उच्चावचनों को एक सीमा तक रखने से है अर्थात् उच्चावचनों को नियन्त्रित करने से है।

प्रश्न 25.
न्यूनतम समर्थन मूल्य से क्या आशय है?
उत्तर
न्यूनतम समर्थन मूल्य से आशय सरकार द्वारा ऐसे आश्वासन से है कि यदि खुले बाजार में मूल्य कम हो जाए तो सरकार न्यूनतम मूल्य पर इसका क्रय करने की व्यवस्था करेगी।

प्रश्न 26.
उपदान (आर्थिक सहायता) से क्या आशय है?
उत्तर
उपदान वह आर्थिक सहायता है जिसे सरकार वस्तुओं के मूल्यों को निम्न स्तर पर बनाए रखने के लिए उत्पादकों, वितरकों व निर्यातकों को प्रदान करती है।

प्रश्न 27.
औद्योगीकरण से क्या आशय है?
उत्तर
औद्योगीकरण से आशय निर्माणी उद्योगों की स्थापना एवं उनके विकास से है।

प्रश्न 28.
भारत में औद्योगीकरण की दो समस्याएँ बताइए।
उत्तर
भारत में औद्योगीकरण की दो समस्याएँ हैं|
(1) तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या भारत के औद्योगिक विकास में बाधक बनी है।
(2) बाजार की सम्पूर्णता एवं जोखिम के आधिक्य के कारण देश में कुशल उद्यमीय क्षमता का अभाव

प्रश्न 29.
“भारत का औद्योगिक विकास मुख्यतः उसके कृषि विकास पर निर्भर करता है। इसके पक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर
इसके पक्ष में दो तर्क हैं-
(1) कृषि; उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराती है।
(2) कृषि खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर बनाकर औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण 
करती है।

प्रश्न 30.
दसवीं योजना में औद्योगिक विकास रणनीति के दो बिन्दु बताइए।
उत्तर
(1) औद्योगिक उदारीकरण को राज्य स्तर पर ले जाना।
(2) लघु उद्योग क्षेत्र के विकास पर अधिक ध्यान देना।

प्रश्न 31.
1948 की औद्योगिक नीति के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) समाने अवसर तथा न्याय प्रदान करने वाली सामाजिक-व्यवस्था की स्थापना करना।
(2) सुखद औद्योगिक श्रम सम्बन्धों की स्थापना करना।

प्रश्न 32.
1956 की औद्योगिक नीति के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) आर्थिक विकास की दर में वृद्धि करना।
(2) रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना।

प्रश्न 33.
औद्योगिक नीति, 1991 के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) लघु उद्योग के विकास को बल देना ताकि यह क्षेत्र अधिक कुशलता एवं तकनीकी सुधार के वातावरण में विकसित होता रहे
(2) श्रमिकों के हितों की रक्षा करना।

प्रश्न 34.
लाइसेन्स नीति के दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर
(1) उद्योगों के स्वामित्व के केन्द्रीकरण को रोकना।
(2) क्षेत्रीय आर्थिक असन्तुलनों को दूर करना।

प्रश्न 35.
वर्तमान में लघु उद्योग की निवेश सीमा कितनी है?
उत्तर
Rs. 5 करोड़।

प्रश्न 36.
भारतीय योजना का निर्माता किसे माना जाता है?
उत्तर
पी० सी० महालनोबिस को।

प्रश्न 37.
विपणन अधिशेष किसे कहते हैं?
उत्तर
किसानों द्वारा उत्पादन का बाजार में बेचा गया अंश ‘विपणन अधिशेष’ कहलाता है।

प्रश्न 38.
आयात प्रतिस्थापन नीति का क्या उद्देश्य है?
उत्तर
आयात प्रतिस्थापन नीति का उद्देश्य आयात के बदले घरेलू उत्पाद द्वारा पूर्ति करना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि में अन्तर बताइए।
उत्तर
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि में अन्तर
आर्थिक विकास एवं आर्थिक वृद्धि में निम्नलिखित अन्तर हैं

  1. विकास के अन्तर्गत उत्पादन में संरचनात्मक परिवर्तन आता है, जबकि वृद्धि के अन्तर्गत संरचनात्मक परिवर्तन स्वाभाविक ढंग से लाए जाते हैं और वर्तमान संरचना को बनाए रखा जाता
  2. आर्थिक विकास के अन्तर्गत क्रान्तिकारी एवं आकस्मिक परिवर्तन तीव्र गति से किए जाते हैं, जबकि आर्थिक वृद्धि के अन्तर्गत संसाधनों में क्रमिक परिवर्तन के अनुरूप मन्द गति से स्वाभाविक परिवर्तन होने दिए जाते हैं।
  3. विकास के अन्तर्गत पुराने सन्तुलन को छिन्न-भिन्न करके नवीन सन्तुलन को अगले चरणों परस्थापित किया जाता है, जबकि वृद्धि में पुराने सन्तुलन में यथासम्भव समायोजन स्थापित किए जाते
  4. विकास को ऐसी अर्थव्यवस्थाओं से सम्बद्ध किया जाता है जो अल्पविकसित हैं लेकिन जिनमें । विकास की सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। इसके विपरीत, आर्थिक वृद्धि में वर्तमान साधनों का | वैकल्पिक एवं अहं उपयोग करके उत्पादन बढ़ाया जाता है।
  5. आर्थिक विकास के अन्तर्गत एक स्थिर अर्थव्यवस्था को बाह्य प्रेरणा एवं सरकारी निर्देशन तथा | नियन्त्रण द्वारा गतिशील किया जाता है, जबकि आर्थिक वृद्धि स्वाभाविक एवं स्वचालित परिवर्तनों का संकेतक होती है।
  6. आर्थिक विकास के अन्तर्गत दीर्घकालीन परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है, जबकि आर्थिक | वृद्धि स्वभाविक परिवर्तनों का अध्ययन करती है।
  7. आर्थिक वृद्धि का अर्थ है-उत्पादन में वृद्धि, जबकि आर्थिक विकास का अर्थ है-उत्पादन में वृद्धि + प्राविधिक एवं संस्थागत परिवर्तन।
    यद्यपि आर्थिक विकास और आर्थिक वृद्धि में भेद करना सम्भव है, किन्तु इस प्रकार का भेद व्यावहारिक दृष्टि से अधिक उपयोगी नहीं हो सकता। पॉल बरान के शब्दों में-“विकास और वृद्धि के विचार किसी पुरानी और बेकार चीज से किसी नई स्थिति की ओर परिवर्तन को बतलाते हैं। इसलिए अच्छा यही होगा कि आर्थिक विकास और आर्थिक वृद्धि दोनों का प्रयोग परिवर्तन की उस प्रक्रिया को बतलाने के लिए किया जाए जिसके द्वारा कोई अर्थव्यवस्था आर्थिक उपलब्धि के ऊँचे स्तर को प्राप्त करती है।”

प्रश्न 2.
अल्पविकसित (विकासशील अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषत ।।
उत्तर
अल्पविकसित (विकासशील) अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. ये देश आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं और इनकी प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की तुलना में बहुत कम होती है।
  2. अधिकांश विकासशील देश कृषिप्रधान होते हैं किन्तु कृषि तकनीकी परम्परागत और कृषि उत्पादकता निम्न होती है।
  3. पूँजी की कमी पायी जाती है जिसके कारण पूँजी निर्माण की दर न्यून रहती है।
  4. आधुनिक संरचना परिवहन व संचार के साधन, बैंकिंग सुविधाओं तथा शिक्षा व चिकित्सा | सुविधाओं का अभाव पाया जाता है।
  5. कृषि पर जनसंख्या का भार अधिक होता है और औद्योगीकरण के अभाव में व्यापक रूप से बेरोजगारी वे अर्द्ध-बेरोजगारी पायी जाती है।
  6. प्राकृतिक साधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं किन्तु तकनीकी पिछड़ेपन के कारण वे अप्रयुक्त व | अल्प-प्रयुक्त पड़े रहते हैं
  7. आधारभूत उद्योगों के अभाव के कारण इन देशों में औद्योगिक पिछड़ापन पाया जाता है। .
  8. इन देशों में पूँजी की कमी, बाजार की अपूर्णता, तकनीकी ज्ञान की कमी आदि के कारण निर्धनता के दुश्चक्र क्रियाशील रहते हैं।
  9. इन देशों में आर्थिक असमानताएँ पायी जाती हैं। आर्थिक विकास के साथ-साथ असमानताएँ बढ़ी जाती हैं।
  10. जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर ऊची होती है जिसके कारण इन देशों में जनाधिक्य पाया जाता है।

प्रश्न 3.
भारत में सार्वजनिक उपक्रमों की उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने देश के त्वरित आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए सार्वजनिक उपक्रमों को स्थापित एवं सुव्यवस्थित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनकी उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं

  1. गत वर्षों में सार्वजनिक उपक्रमों में विनियोग में काफी वृद्धि हुई है।
  2. सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री धनराशि में प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है। इस प्रकार ये उपक्रम अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं के रूप में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।
  3. क्षमता उपयोग में सुधार हुआ है।
  4. प्रयुक्त पूँजी पर सकल लाभ के प्रतिशत में भी प्रभावकारी सुधार हुआ है।
  5. सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा घोषित लाभांश गत वर्षों में निरन्तर बढ़ा है।
  6. सार्वजनिक उपक्रमों ने प्रत्यक्ष रूप से अधिकाधिक लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए हैं। इसके साथ ही उनके वेतन एवं मजदूरी में भी आशातीत वृद्धि हुई है।
  7. सार्वजनिक उपक्रम अपने कर्मचारियों को आवास तथा कल्याण सम्बन्धी सुविधाएँ प्रदान कर रहे
  8. सार्वजनिक उपक्रमों में पूरक उद्योगों का विकास हुआ है।
  9. निर्यातों से प्राप्त आय में वृद्धि हुई है।
  10. ये उपक्रम मूल्यवान विदेशी मुद्रा को बचाने में सहायक रहे हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व बताइए।
उत्तर
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. भारतीय कृषि राष्ट्रीय आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।।
  2. सम्पूर्ण जनसंख्या का लगभग 67% भाग अपनी आजीविका कृषि से ही प्राप्त करता है।
  3. देश के कुल भू-क्षेत्र के लगभग 49.8% भाग में खेती की जाती है।
  4. कृषि देश की 121 करोड़ जनसंख्या को भोजन तथा 36 करोड़ पशुओं को चारा प्रदान करती है।
  5. देश के महत्त्वपूर्ण उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर ही आश्रित हैं।
  6. चाय, जूट, लाख, शक्कर, ऊन, रुई, मसाले, तिलहन आदि के निर्यात से देश को पर्याप्त विदेशी | मुद्रा प्राप्त होती है। ”
  7. कृषि देश के आन्तरिक व्यापार का प्रमुख आधार है।
  8. कृषि एवं कृषि वस्तुएँ केन्द्र एवं राज्य सरकारों को राजस्व उपलब्ध कराती हैं।
  9. कृषि उत्पादन यातायात को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है।

प्रश्न 5.
भारत में कृषि भूमि के उपविभाजन व अपखण्डन के दोष (हानियाँ) बताइए।
उत्तर
भारत में कृषि भूमि के उपविभाजन व अपखण्डन के मुख्य दोष अथवा हानियाँ निम्नलिखित हैं
1. उत्पादन व्यय में वृद्धि– खेतों के छोटे तथा छिटके होने से भूमि, समय, श्रम एवं पूँजी का 
अपव्यय होता है जिससे उत्पादन व्यय में वृद्धि हो जाती है।

2. कृषि सुधार में कठिनाइयाँ– छौटे तथा बिखरे हुए खेतों पर कोई सुधार कार्य नहीं हो ता। | सिंचाई, खाद तथा आधुनिक कृषि उपकरणों की सुविधा इन खेतों को नहीं मिल पाती, जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

3. भूमि का अपव्यय- छोटे तथा छिटके खेतों में भूमि को दो प्रकार से अपव्यय होता है। कुछ भूमि तो मेंड़ बनाने में नष्ट हो जाती है और शेष अपने लघु आकार के कारण पूर्णत: प्रयोग में नहीं | आ पाती।

4. सिंचाई में बाधा- छोटे-छोटे खेतों पर सिंचाई करना आर्थिक दृष्टि से भी उपयुक्त नहीं होता। डॉ० केप का अनुमान है कि 6 एकड़ तक के खेत पर सिंचाई करने से किसान को १ 55 प्रति एकड़ तक घाटा उठाना पड़ता है, जबकि 25 एकड़ के खेत पर यह घाटा कम होकर केवल १2 प्रति एकड़े रह जाता है।

5. देख- रेख में असुविधा-विखण्डन के कारण किसान को देख-रेख पर बहुत व्यय करना पड़ता है अन्यथा पशु-पक्षी खड़ी फसल को नष्ट कर देते हैं।

6. अन्य दोष- उपविभाजन एवं अपखण्डन के परिणामस्वरूप कुछ अन्य दोष भी उत्पन हो जाते हैं; जैसे-

  1. भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी आ जाती है क्योंकि किसान अपने निर्वाह के लिए उस पर निरन्तर खेती करने के लिए बाध्य होता है।
  2.  छोटे-छोटे खेतों के मध्य बाड़, रास्ते आदि को लेकर बहुधा अनावश्यक अदालती झगड़ों को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे शक्ति तथा धन दोनों का अपव्यय होता है।
  3. अपखण्ड़ने के कारण गहन खेती को अपनाना कठिन हो जाता है।
  4. कृषकों को पशु पालने में कठिनाई होती है, क्योंकि छोटे खेत से उनके लिए चारे की व्यस्था नहीं हो पाती।
  5. उपविभाजन एवं अपखण्डन देश में व्याप्त अत्यधिक निर्धनता का एक मूल कारण है। इससे अर्द्ध-बेकारी बढ़ती है।

प्रश्न 6.
भू-सुधार के अन्तर्गत कौन-कौन से कार्यक्रम आते हैं?
उत्तर
‘भूमि-सुधार’ एक अत्यन्त व्यापक शब्द है। अत: भूमि-सुधार की दिशा में जो सर्वतोमुखी प्रगति हुई है, उसका विवेचन हम निम्नलिखित शीर्षकों में करेंगे
(अ) मध्यस्थों की समाप्ति-1. जमींदारी उन्मूलन। 2. जागीरदारी उन्मूलन।
(ब) काश्तकारी सुधार-1. लगान नियमन। 2. भू-स्वामित्व की सुरक्षा। 3. खुदकाश्त में भूमि का 
पुनर्ग्रहण। 4. काश्तकारों को मालिक होने का अधिकार।।
(स) जोतों का सीमा-निर्धारण-1. वर्तमान जोतों की अधिकतम सीमा। 2. भावी जोतों की 
अधिकतम सीमा।
(द) कृषि-पुनर्गठन–1. चकबन्दी। 2. भूमि के प्रबन्ध में सुधर। 3. सहकारी खेती। 4. भूमिहीन 
मजदूरों को बसाना तथा भू-दान व ग्राम-दान आदि।

प्रश्न 7.
भारत में साहूकारों की कृषि-वित्त व्यवस्था के दोष बताइए।
उत्तर
भारत में साहूकारों की कृषि-वित्त व्यवस्था के दोष निम्नलिखित रहे हैं

  1. साहूकार की कार्य-पद्धति लोचदार होती है और वह समय, परिस्थिति तथा व्यक्ति के अनुसार उनमें परिवर्तन करता रहता है।
  2. साहूकार अपने ऋणों पर ब्याज की ऊँची दर वसूल करता है।
  3. साहूकार मूलधन देते समय ही पूरे वर्ष का ब्याज अग्रिम रूप में काट लेते हैं और इसकी कोई रसीद नहीं देते हैं।
  4. अनेक साहूकार कोरे कागजों पर हस्ताक्षर या अँगूठे की निशानी ले लेते हैं और बाद में उन अधिक रकम भर लेते हैं।
  5. बहुत-से स्थानों पर ऋण देते समय ऋण की रकम में से अनेक प्रकार के खर्च काट लेते हैं। कभी-कभी यह रकम 5% से 10% तक हो जाती है।
  6. साहूकार कृषकों को अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण देकर उन्हें फिजूलखर्ची बना देते हैं।
  7. साहूकार समय-समय पर हिसाब-किताब में भी गड़बड़ करता रहता है।
  8. साहूकार कृषकों को ऋण देने के बाद उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर बेचने के लिए विवश करते हैं।

प्रश्न 8.
एक सुव्यवस्थित कृषि विपणन पद्धति की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
एक सुव्यवस्थित कृषि विपणन पद्धति में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए

  1. मध्यस्थों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए।
  2. कृषि और कृषि उपज के विक्रेता दोनों के हितों की सुरक्षा होनी चाहिए।
  3. सस्ती व उत्तम परिवहन की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे माल मण्डियों तक आसानी से तथा कम लागते पर ले जाया जा सके।
  4. कृषकों के पास ब्याज सम्बन्धी सूचनाएँ उचित समय पर उपलब्ध होनी चाहिए।
  5. भण्डार-गृहों की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।
  6. कृषकों को उचित मूल्य प्राप्त होने तक कृषि-पदार्थों को अपने पास रखने की क्षमता होनी चाहिए।
  7. कृषि उपज की विभिन्न किस्मों के मूल्य में अन्तर होना चाहिए।

प्रश्न 9.
बड़े पैमाने के उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु भारत सरकार द्वारा क्या-क्या उपाय किए गए
उत्तर
देश में औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ाने, सभी को आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करने और औद्योगिक वातावरण को सुदृढ़ करने के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की गई है। इन उद्योगों की स्थापना अधिकांशत: सार्वजनिक क्षेत्रों में की गई है, जिनमें बड़ी मात्रा में पूँजी निवेश किया गया है तथा बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार दिया गया है। इन उद्योगों के विकास के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए

  1. लाइसेन्सिग नीति को उदार बनाया गया है।
  2. राजकोषीय नीति के अन्तर्गत अपर्याप्त कर-रियायतें दी गई हैं।
  3. औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम, 1951′ के अन्तर्गत विनिर्माण इकाइयों का पंजीकरणआवश्यक है और इन्हें इस अधिनियम के अन्तर्गत सरकार द्वारा निर्मित नियमों एवं अधिनियमों का | पालन करना होता है।
  4. आधुनिक औद्योगिक तकनीक को अपनाने के लिए अनेक प्रकार की राजकोषीय एवं वित्तीय  प्रेरणाएँ दी जा रही हैं।
  5. उत्पादन लागतों को न्यूनतम करने के लिए सरकार द्वारा सभी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  6. प्रौद्योगिकीय सुधार और संयन्त्र आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने दो कोषों की स्थापना की है
    (1) प्रौद्योगिकीय सुधार कोष एवं
    (2) पूँजी आधुनिकीकरण कोष।

प्रश्न 10.
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों का महत्त्व बताइए।
उत्तर
भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. इन उद्योगों में लगभग 2.25 करोड़ लोग रोजगार में लगे हैं।
  2. ये उद्योग आय व सम्पत्ति के सम वितरण में सहायक हैं।
  3. श्रमप्रधान उद्योगों के कारण कर्म पूँजी से भी इनका संचालन सम्भव है।
  4. लघु एवं कुटीर उद्योगों में ही कृषि में लगे अतिरिक्त श्रम को स्थानान्तरित किया जा सकता है।
  5. ये उद्योग विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था की स्थापना करते हैं जो आज के युग की माँग है।
  6. इन उद्योगों को उपभोक्ताओं की रुचि के अनुसार समायोजित किया जा सकता है।
  7. ये उद्योग औद्योगिक अशान्ति, हड़ताल, तालाबन्दी आदि से मुक्त रहते हैं और सहानुभूति, समानता, सहकारिता, एकता तथा सहयोग की भावना को जन्म देते हैं।
  8. ये उद्योग विदेशी विनिमय अर्जित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुए हैं।
  9. इन उद्योगों को चलाने के लिए विशेष शिक्षा तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। 10. कुटीर तथा लघु उद्योगों का माल अधिक टिकाऊ तथा कलात्मक होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्थिक प्रणाली (अर्थव्यवस्था) से क्या आशय है? आर्थिक प्रणाली के प्रमुख लक्षण बताइए।
या अर्थव्यवस्था से क्या आशय है? अर्थव्यवस्था के लक्षण एवं प्रकार बताइए।
उत्तर
आर्थिक प्रणाली का अर्थ एवं परिभाषाएँ
आर्थिक प्रणाली एक ऐसा तंत्र है, जिसके माध्यम से लोगों का जीवन निर्वाह होता है। यह संस्थाओं का एक ढाँचा है, जिसके द्वारा समाज की संपूर्ण आर्थिक क्रियाओं का संचालन किया जाता है। आर्थिक क्रियाएँ वे मानवीय क्रियाएँ हैं, जिनके द्वारा मनुष्य धन अर्जित करने के उद्देश्य से उत्पादन करता है। अथवा निजी सेवाएँ प्रदान करता है। आर्थिक प्रणाली आर्थिक क्रियाओं को सम्पन्न करने का मार्ग निर्धारित करती हैं। दूसरे शब्दों में, आर्थिक प्रणाली यह भी निर्धारित करती है कि देश में किन वस्तुओं को उत्पादन किया जाएगा और विभिन्न साधनों के मध्य इनका वितरण किस प्रकार किया जाएगा; परिवहन, वितरण, बैंकिंग एवं बीमा जैसी सेवाएँ कैसे प्रदान की जाएँगी; उत्पादित वस्तुओं का कितना भाग वर्तमान में उपयोग किया जाएगा और कितना भाग भविष्य के उपयोग के लिए संचित करके रखा जाएगा; आदि। आर्थिक प्रणाली इन विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाओं का योग ही है। 
आर्थिक प्रणाली की मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

एजे० ब्राउन के अनुसार- आर्थिक प्रणाली वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी आजीविको कमाता है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।’

लॉक्स के अनुसार- “आर्थिक प्रणाली एक ऐसा संगठन है, जिसके द्वारा सुलभ उत्पादन साधनों का प्रयोग करके मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।”

एम० गॉटलिब के अनुसार- “आर्थिक प्रणाली जटिले मानव संबंधों, जो वस्तुओं तथा सेवाओं की विभिन्न निजी तथा सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से सीमित साधनों के प्रयोग से सुंबंधित हैं, को प्रकट करने वाला एक मॉडल है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि आर्थिक प्रणाली एक ओर आर्थिक क्रियाओं का योग है, तो दूसरी ओर उत्पादकों के परस्पर सहयोग की प्रणाली भी है। वास्तव में, विभिन्न उत्पादन क्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं और एक साधने की क्रिया दूसरे साधन की क्रिया पर निर्भर करती है। अतः इनमें परस्पर समन्वय एवं सहयोग होना आवश्यक है। उत्पादकों के परस्पर सहयोग की इस प्रणाली को ही आर्थिक प्रणाली कहते हैं; उदाहरण के लिए–एक वस्त्र-निर्माता को वस्त्र निर्मित करने के लिए अनेक वस्तुओं की आवश्यकता पड़ेगी। उसे सर्वप्रथम किसान से कपास प्राप्त करनी होगी तथा कपास की धुनाई, कताई . वे बुनाई के लिए मशीनों की व्यवस्था करनी होगी। मशीन निर्माता को लोहा व कोयला चाहिए, जो संबंधित खानों से प्राप्त होगा। इन साधनों को कारखाने तक लाने व ले जाने के लिए परिवहन के साधनों; यथा—रेल, मोटर, ट्रक, बैलगाड़ी आदि की आवश्यकता होगी और इन सभी क्रियाओं के संचालन के लिए निर्माता को श्रमिकों की सेवाएँ चाहिए। इनमें से किसी भी साधन के अभाव में कपड़े का उत्पादन संभव नहीं है। इसे इस प्रकार भी समझाया जी सकता है–यदि किसान कपास का उत्पादन बंद कर, ३ ‘ अथवा मशीन-निर्माता मशीन बनाना बंद कर दे अथवा श्रमिक काम करना बंद कर दें तो कपड़े का उत्पादन संभव नहीं होगा। इस प्रकार उत्पादन में उत्पादकों एवं उत्पत्ति के साधनों के बीच सहयोग एवं समन्वय होना आवश्यक है।

आर्थिक प्रणाली के लक्षण आर्थिक प्रणाली के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

  1. यह उन व्यक्तियों का समूह है, जो अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए उत्पादन-प्रक्रिया को | चलाते हैं।
  2. आवश्यकताओं के परिवर्तन के अनुरूप आर्थिक प्रणाली के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है।
  3. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन निरंतर जारी रहता है।
  4. उत्पादित वस्तुओं को विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाता है।
  5. इसमें विभिन्न उत्पादकों के मध्य परस्पर समन्वय एवं सहयोग आवश्यक होता है।

प्रश्न 2.
पूँजीवाद क्या है? पूँजीवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
पूँजीवाद का अर्थ एवं परिभाषाएँ
पूँजीवाद का आशय आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली से है, जिसमें उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का निजी अधिकार होता है तथा वह उत्पादन के साधनों का प्रयोग लाभ कमाने की दृष्टि से करता है। पूँजीवाद की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

लूक्स तथा हूटस के अनुसार-“पूँजीवाद आर्थिक संगठन की ऐसी प्रणाली है, जिसमें प्राकृतिक तथा मनुष्य-निर्मित पूँजीगत साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व होता है और जिनका प्रयोग निजी लाभ के लिए किया जाता है।”

प्रो० पीगू के अनुसार- “एक पूँजीवादी उद्योग वह है, जिसमें उत्पत्ति के भौतिक साधन निजी लोगों की सम्पत्ति होते हैं अथवा उनके द्वारा किराए पर लिए जाते हैं और उनका परिचालन इन लोगों के आदेश पर उनकी सहायता से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं को लाभ पर बेचने के लिए किया जाता है। एक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अथवा पूँजीवादी प्रणाली वह है, जिसके उत्पादन के साधनों का मुख्य भाग पूँजीवादी उद्योग । में लगा होता है।”

पूँजीवाद की विशेषताएँ

पूँजीवादी प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मूल्य यन्त्र- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था मूल्य यंत्र के द्वारा नियंत्रित होती है। वस्तुओं के उत्पादन की मात्रा, उत्पादन के साधनों में बँटवारा, बचत एवं विनियोग तथा महत्त्वपूर्ण आर्थिक निर्णय कीमतों के आधार पर लिए जाते हैं। इसमें ‘मूल्य यंत्र’ स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करता है। समन्वय तथा नियंत्रण का कार्य मूल्य यंत्र द्वारा ही किया जाता है।

2.”केन्द्रीय योजना का अभाव– पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में किसी प्रकार की केन्द्रीय आर्थिक योजना नहीं होती। यह प्रणाली व्यक्ति की स्वतंत्र क्रियाओं पर आधारित होती है। सामान्य आर्थिक क्रियाओं में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता।

3. आर्थिक स्वतंत्रता- ये स्वतंत्रताएँ इस प्रकार हैं

  1. उपभोक्ता की स्वतंत्रता- उपभोक्ता पूर्णतया स्वतंत्र होता है। वह जो चाहे खरीद सकता है तथा अपनी आय को इच्छानुसार व्यर्य कर सकता है।
  2. व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता– व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को चुन सकता है।
  3. बचत करने की स्वतंत्रता- प्रत्येक व्यक्ति को यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है कि वह अपनी आय का कितना भाग बचाए तथा कितना भाग व्यय करे।
  4. विनियोग करने की स्वतंत्रता— विनियोगकर्ता विनियोग की मात्रा व उसके स्वभाव को निश्चित करने के लिए पूतया स्वतंत्र होता है।
  5. निजी सम्पत्ति— प्रत्येक व्यक्ति को सम्पत्ति रखने तथा उसे उत्तराधिकार में देने का पूरा अधिकार होता है।

4. लाभ उददेश्य- पूँजीवादी व्यवस्था में सभी उत्पादक इकाइयाँ लाभ के उद्देश्य से चलाई जाती हैं। प्रत्येक व्यवसायी का उद्देश्य अधिकाधिक लाभ कमाना होता है। अत: उत्पादक उत्पादन के साधनों का पूर्ण शोषण करते हैं।

5. प्रतियोगिता- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता पायी जाती है। यह आर्थिक स्वतंत्रता का आवश्यक परिणाम और स्वतंत्र बाजार की अर्थव्यवस्था का आधार होता है।

6. वर्ग-संघर्ष- पूँजीवादी समाज दो वर्गों में विभाजित होता है

  • सम्पत्ति वाला (धनी) वर्ग,
  • बिना सम्पत्ति वाला (निर्धन) वर्ग। इन दोनों वर्गों के मध्य निरंतर संघर्ष बढ़ता रहता है।

7. आर्थिक असमानताएँ- पूँजीवादी व्यवस्था में आर्थिक असमानताएँ पायी जाती हैं, धन का केन्द्रीकरण हो जाता है और कुछ व्यक्ति अमीर तथा कुछ गरीब होते चले जाते हैं।

8. सरकार की भूमिका- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में सरकार लोगों की आर्थिक क्रियाओं में कोई प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करती। सरकार को कार्य केवल आर्थिक संगठन पर बाहरी तत्त्वों के प्रभाव | को रोकना और आर्थिक क्रियाओं के हानिकारक प्रभावों को नियंत्रित करना होता है।

9. उपभोक्ता का प्रभुत्व– पूँजीवादी व्यवस्था में उपभोक्ता ही समस्त उत्पादन को नियंत्रित तथा नियमित करता है, इसीलिए इस व्यवस्था में उपभोक्ता को सम्राट कहा जाता है।

प्रश्न 3.
समाजवाद क्या है? समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
समाजवाद का अर्थ एवं परिभाषाएँ समाजवाद आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें उत्पत्ति के साधनों पर सरकार अथवा लोकसत्ता का अधिकार होता है, इनका संचालन एक सामान्य योजना के अनुसार सरकारी अथवा समाजिक संस्थाओं द्वारा किया जाता है और समस्त आर्थिक क्रियाएँ निजी क्षेत्र में न रहकर सार्वजनिक क्षेत्र में रहती हैं। समाजवादे की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

प्रो० शुम्पीटर के अनुसार- “समाजवाद एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था को कहते हैं, जिसमें उत्पत्ति के साधनों तथा स्वयं उत्पादन पर नियंत्रण एक केन्द्रीय सत्ता के हाथ में होता है या जिसमें सैद्धान्तिक रूप से समाज की आर्थिक क्रियाएँ व्यक्तिगत क्षेत्र के अधिकार में न होकर सार्वजनिक क्षेत्र में होती हैं।”

प्रो० डिकिन्सन के अनुसार- “समाजवाद समाज की एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें उत्पत्ति के भौतिक साधन समाज के स्वामित्व में होते हैं और इनका संचालन एक सामान्य योजना के अनुसार ऐसी संस्थाओं के द्वारा किया जाता है, जो पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा पूर्ण समाज के प्रति उत्तरदायी होती हैं। समाज के सभी सदस्य सामान्य अधिकारों के आधार पर समाजीकृत तथा नियोजित उत्पादन के लाभों के अधिकारी होते हैं।”

प्रो० लुक्स के अनुसार- समाजवाद वह आन्दोलन है, जिसका उद्देश्य सभी प्रकार की प्रकृति-प्रदत्त तथा मनुष्यकृत उत्पादित वस्तुओं का जो कि बड़े पैमाने के उत्पादन में प्रयोग की जाती हैं, स्वामित्व तथा प्रबंध व्यक्तियों के स्थान पर समस्त समाज में निहित करना होता है, जिससे बढ़ी हुई राष्ट्रीय आय का इस प्रकार समान वितरण हो सके कि व्यक्ति की आर्थिक प्रेरणा या व्यवसाय तथा उपभोग संबंधी चुनावों की स्वतंत्रता में कोई विशेष हानि न हो।’

समाजवाद की विशेषताएँ

समाजवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. उत्पत्ति के साधनों पर समाज का स्वामित्व— समाजवादी अर्थव्यवस्था में उत्पत्ति के साधन 
व्यक्तिगत अधिकार में न होकर सम्पूर्ण समाज के अधिकार में होते हैं। इनका स्वामित्व, नियमन तथा नियंत्रण राज्य के हाथों में होता हैं। इनका प्रयोग निजी लाभ के लिए नहीं वरन् सामाजिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

2. आर्थिक नियोजन- सामाजिक अर्थव्यवस्था आवश्यक रूप से नियोजित होती है। इस व्यवस्था के पूर्व-निश्चित उद्देश्य होते हैं और उन्हें पहले से निश्चित किए गए प्रयासों द्वारा ही प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता हैं।

3. एक केन्द्रीय सत्ता– समाजवादी व्यवस्था में एक केन्द्रीय सत्ता होती है, जो समाज में आर्थिक उद्देश्यों को निश्चित करती है और उन्हें प्राप्त करने के लिए उचित व्यवस्था एवं प्रबन्ध करती है। इस सत्ता द्वारा ही संपूर्ण अर्थव्यवस्था को निर्देशित किया जाता है।

4. सामाजिक कल्याण- उत्पादन का उद्देश्य लाभ की भावना नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण में वृद्धि करना होता है। कीमत नीति का निर्धारण भी सामाजिक कल्याण के आधार पर किया जाता

5. धन का समान वितरण– उत्पत्ति के भौतिक साधनों पर निजी अधिकार को समाप्त कर दिया जाता है और आर्थिक साधनों के वितरण में अधिक समानता लाने का प्रयास किया जाता है।

6. उपभोग तथा व्यवसाय के चुनाव की स्वतंत्रता- समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी लोगों को अपनी इच्छानुसार उपभोग संबंधी वस्तुओं का चुनाव करने की स्वतंत्रता होती है।।

7. मूल्य यंत्र- समाजवादी अर्थव्यवस्था में साधनों का बँटवारा एक पूर्व-निश्चित योजना के अनुसार केन्द्रीय सत्ता द्वारा मूल्य यंत्र की सहायता से किया जाता है, यद्यपि मूल्य यंत्र स्वतंत्रतापूर्वक कार्य नहीं करता। 8. प्रतियोगिता का अभाव–उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होता है। | और उत्पादन की मात्रा, किस्म तथा कीमत का निर्धारण प्रतियोगिता द्वारा न होकर केन्द्रीय सत्ता द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है? इसकी विशेषताएँ बताइए। इस संदर्भ में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप को समझाइए।
उत्तर
मिश्रित अर्थव्यवस्था
मिश्रित अर्थव्यवस्था पूँजीवाद और समाजवाद के बीच की अवस्था है। इसमें पूँजीवाद के दोषों से अर्थव्यवस्था को मुक्त करके दोनों प्रणालियों से होने वाले गुणों को अपनाया जाता है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्रक दोनों साथ-साथ चलते हैं। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में देश के आर्थिक विकास के लिए निजी क्षेत्र को विशेष महत्त्व देते हुए उस पर आवश्यक सामाजिक नियंत्रण भी रखा जाता है। इसी प्रकार की अर्थव्यवस्था में कुछ उद्योग पूर्णतया सरकारी क्षेत्र में होते हैं, कुछ पूर्णतया निजी क्षेत्र में होते हैं और कुछ उद्योगों में निजी तथा सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रक भाग ले सकते हैं। दोनों के कार्य करने का क्षेत्र निर्धारित कर दिया जाता है, परंतु इसमें निजी क्षेत्र की प्राथमिकता रहती है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में इस प्रकार मिलकर कार्य करते हैं कि बिना शोषण के देश के सभी वर्गों के आर्थिक कल्याण में वृद्धि तथा तीव्र आर्थिक विकास प्राप्त हो सके।
प्रो० हैन्सन ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को दोहरी व्यवस्था तथा प्रो० लर्नर ने इसको नियंत्रित अर्थव्यवस्था कहा है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ

मिश्रित अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों का सह-अस्तित्व- मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी एवं सार्वजनिक 
क्षेत्र दोनों साथ-साथ कार्य करते हैं। सरकार द्वारा निजी उद्योग तथा सार्वजनिक उद्योगों का अलग-अलग क्षेत्र निश्चित कर दिया जाता है। दोनों ही क्षेत्र एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। निजी क्षेत्र तथा सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त दो क्षेत्र और पाए जाते हैं—संयुक्त क्षेत्र तथा सहकारी क्षेत्र।

2. समाजवाद व पूँजीवाद के तत्त्वों का सम्मिश्रण-
मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूँजीवाद के निम्नलिखित तत्त्व पाए जाते हैं

  1. निजी उद्योग में लाभ उद्देश्य,
  2. व्यक्तिगत प्रोत्साहन,
  3. निजी सम्पत्ति की संस्था,
  4. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व प्रतियोगिता।

मिश्रित अर्थव्यवस्था में समाजवाद के निम्नलिखित अंश पाए जाते हैं।

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के संचालन में सामाजिक हित,
  2. राष्ट्रीय महत्त्व के उद्योगों का सरकारी स्वामित्व,
  3. राष्ट्रीय हित में निजी व्यापार पर नियन्त्रण। इस प्रकार मिश्रित अर्थव्यवस्था एक ऐसी मिली-जुली व्यवस्था है, जिसमें पूँजीवाद व सामाजिक अर्थव्यवस्था के गुणों को एक-साथ मिलाने का प्रयास किया जाता है।

3. आर्थिक नियोजन- मिश्रित अर्थव्यवस्था में सरकार द्वारा एक पूर्व- निश्चित योजना के अनुसार ही अर्थव्यवस्था का नियन्त्रण एवं नियमन किया जाता है। यह आर्थिक नियोजन द्वारा पूर्व-निश्चित आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न करती है।

4. साधनों का बँटवारा– सार्वजनिक क्षेत्र में साधनों का बँटवारा सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से | किया जाता है, जबकि निजी क्षेत्र में साधनों का बँटवारा कीमत प्रणाली द्वारा होता है।

भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है। इस व्यवस्था में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र मिलकर आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध तरीकों से कार्य कर रहे हैं। 6 अप्रैल, 1948 ई० को भारत सरकार ने औद्योगिक नीति की घोषणा की, जिसके अनुसार देश मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रारम्भ हुआ। स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया-

  1. निजी क्षेत्र,
  2. सार्वजनिक क्षेत्र।

इस नीति के अनुसार उद्योगों को चार भागों में बाँटा गया

  1. वे उद्योग जिन पर सरकार का स्वामित्व तथा नियन्त्रण रहेगा; जैसे—प्रतिरक्षा उद्योग।
  2.  आधारभूत उद्योग; जैसे-लोहा-इस्पात, कोयला, खनिज तेल, वायुयान व जलयान निर्माण उद्योग।
  3. वे उद्योग जो व्यक्तिगत क्षेत्र में रहेंगे, लेकिन उनका नियन्त्रण व नियमन राज्य द्वारा किया जाएगा।
  4.  निजी क्षेत्र में रहने वाले शेष उद्योग।

सन् 1956 ई० में घोषित औद्योगिक नीति के अनुसार समस्त उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखित तीन श्रेणियों में किया गया है

प्रथम श्रेणी–
इसमें 17 उद्योग आते हैं; जैसे–प्रतिरक्षा सम्बन्धी समस्त उद्योग, अणु-शक्ति, लोहा व इस्पात आदि। इनका विकास केवल सरकार का उत्तरदायित्व होगा।

द्वितीय श्रेणी- इसमें 12 उद्योग आते हैं; जैसे-खनिज उद्योग, मशीन तथा यन्त्र, उर्वरक, रबड़ आदि। इस वर्ग में निजी एवं सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्र कार्य कर सकते हैं।

तृतीय श्रेणी- अन्य उद्योग, जिनका विस्तार एवं विकास पूर्णतया निजी क्षेत्र पर छोड़ दिया गया है।

1991 ई० में घोषित नवीन औद्योगिक नीति के अन्तर्गत भी ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया है, हाँ, इसमें उद्योगों के नियमन व नियन्त्रण में कमी की गई है, सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार को सीमित किया गया है और निजी क्षेत्र को अधिक विस्तृत एवं उदार बनाने पर बल दिया गया है। इस प्रकार भारतवर्ष में मिश्रित अर्थव्यवस्था कार्य कर रही है।

प्रश्न 5.
आर्थिक नियोजन को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य लक्षण बताइए। भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में आर्थिक नियोजन के प्रमुख उददेश्यों की चर्चा कीजिए।
उत्तर
आर्थिक नियोजन : अर्थ एवं परिभाषाएँ 
योजना का आधार मनुष्य का विवेकपूर्ण व्यवहार है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, प्रत्येक चरण में, प्रत्येक दिशा में नियोजन अपनाया जाता है। जिस प्रकार एक व्यक्ति अपनी सफलता के लिए विभिन्न 
चरणों में योजनाबद्ध कार्यक्रम अपनाता है, ठीक उसी प्रकार एक राष्ट्र भी अपने सर्वांगीण विकास के लिए विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक नियोजन को अपनाता है। आर्थिक नियोजन के अर्थ, स्वरूप एवं क्षेत्र के सम्बन्ध में सभी विद्वान एकमत नहीं हैं। अतः इसकी कोई एक सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। आर्थिक नियोजन की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं:

एच०डी० डिकिन्सन के अनुसार- ‘आर्थिक नियोजन से अभिप्राय महत्त्वपूर्ण आर्थिक मामलों में विस्तृत तथा सन्तुलित निर्णय लेना है। दूसरे शब्दों में, क्या तथा कितना उत्पादित किया जाएगा तथा उसका वितरण किस प्रकार होगा, इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक निर्धारक सत्ता द्वारा समस्त अर्थव्यवस्था को एक ही राष्ट्रीय आर्थिक इकाई (व्यवस्था) मानते हुए तथा व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर, सचेत तथा विवेकपूर्ण निर्णय के द्वारा, दिया जाता है।”

डॉ० डाल्टन के अनुसार- “विस्तृत अर्थ में आर्थिक नियोजन से अभिप्राय कुछ व्यक्तियों द्वारा, जिनके अधिकार में विशेष प्रसाधन हों, निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आर्थिक क्रिया का संचालन करना है।” भारतीय नियोजन आयोग के अनुसार-“आर्थिक नियोजन निश्चित रूप से सामाजिक उद्देश्यों के हितार्थ उपलब्ध साधनों का संगठन तथा लाभकारी रूप से उपयोग करने का एकमात्र ढंग है। नियोजन के इस विचार के दो प्रमुख तत्त्व हैं-
(अ) वांछित उद्देश्यों का क्रम जिनकी पूर्ति का प्रयास करना है।
(ब) उपलब्ध साधनों और उनके सर्वोत्तम वितरण के सम्बन्ध में ज्ञान।”

राष्ट्रीय नियोजन समिति के अनुसार- “आर्थिक नियोजन उपभोग, उत्पादन, विनियोग, व्यापार तथा राष्ट्रीय लाभांश के वितरण से सम्बन्धित स्वार्थहित विशेषज्ञों का तकनीकी समन्वय है, जो राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्थाओं द्वारा निर्धारित विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्राप्त किया जाए। संक्षेप में, आर्थिक नियोजन एक तकनीक है, यह वांछित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को पूरा करने का एक साधन है। ये लुक्ष्य केन्द्रीय नियोजन अधिकारी व केन्द्रीय शक्ति द्वारा पूर्व-निर्धारित तथा स्पष्टतः परिभाषित होने चाहिए। आर्थिक नियोजन की एक उचित परिभाषा निम्न प्रकार दी जा सकती है आर्थिक नियोजन से आशय पूर्व-निर्धारित और निश्चित सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अर्थव्यवस्था के सभी अंगों को एकीकृत और समन्वित करते हुए राष्ट्र के संसाधनों के सम्बन्ध में सोच-विचारकर रूपरेखा तैयार करने और केन्द्रीय नियन्त्रण से है।”

आर्थिक नियोजन की विशेषताएँ (लक्षण)

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर आर्थिक नियोजन की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं

  1. नियोजन आर्थिक संगठन एवं विकास की एक समन्वित प्रणाली है।
  2. आर्थिक नियोजन की समस्त क्रिया-विधि एक केन्द्रीय नियोजन सत्ता द्वारा सम्पन्न की जाती है।
  3. केन्द्रीय नियोजन सत्ता द्वारा देश में उपलब्ध समस्त साधनों का निरीक्षण, सर्वेक्षण तथा संगठन करके, पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के साथ समन्वय किया जाता है।
  4. अधिकतम सामाजिक लाभ को प्राप्त करने के उद्देश्य से, साधनों का वितरण विवेकपूर्ण ढंग से तथा प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाता है।
  5. उद्देश्य पूर्व-निर्धारित होने चाहिए।
  6. निर्धारित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की आपूर्ति एक निश्चित अवधि में ही होनी चाहिए।
  7. आर्थिक नियोजन द्वारा समस्त अर्थव्यवस्था प्रभावित होनी चाहिए।
  8. आर्थिक नियोजन की सफलता के लिए जन-सहयोग आवश्यक है।

भारत के सन्दर्भ में आर्थिक नियोजन के उद्देश्य

भारत में आर्थिक नियोजन की तकनीक को 1 अप्रैल, 1951 से अपनाया गया है। अब तक 11 पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) कार्यशील है। भारत में आर्थिक नियोजन के प्रमुख उद्देश्य अग्रलिखित हैं

1. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि– जनसामान्य के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने की | दृष्टि से आर्थिक नियोजन का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में तीव्र वृद्धि करना रहा है।

2. रोजगार में वृद्धि– भारत में आर्थिक नियोजन का दूसरा उद्देश्य रोजगार के अवसरों में वृद्धि | करना है; अतः कृषि, उद्योग, सेवाओं आदि का विस्तार किया गया है।

3. आत्म-निर्भरता की प्राप्ति- योजनाओं में प्रारम्भ से ही आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की बात कही गई है। तृतीय योजना में इस पर विशेष जोर दिया गया। पाँचवीं व छठी योजनाओं में तो विदेशी सहायता पर निर्भरता को न्यूनतम करने की बात कही गई थी। आठवीं योजना इसी दिशा में एक कदम है।

4. कल्याणकारी राज्य की स्थापना- भारतीय नियोजन का एक उद्देश्य देश में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। आय एवं सम्पत्ति में वितरण की असमानता को दूर करने की बात प्रत्येक योजना में की गई। पाँचवीं योजना का मुख्य उद्देश्य ‘गरीबी दूर करना ही था। इसके लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया।

5. सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार- भारत में आर्थिक नियोजन का एक उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार करना रहा है, ताकि उन उद्योगों की स्थापना की जा सके जिनमें उद्योगपति पूँजी विनियोग करने में असमर्थ रहते हैं।

6. समाजवादी समाज की स्थापना- इन योजनाओं में समाजवादी समाज की स्थापना पर विशेष जोर दिया गया है। इसके लिए आम जनता को सामाजिक न्याय दिलाने तथा आर्थिक असमानताओं को कम करने का प्रयास किया गया है।

7. अन्य उद्देश्य–

  1. जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण,
  2. पिछड़े क्षेत्रों का विकास,
  3. उद्योग एवं सेवाओं का विस्तार,
  4. खाद्यान्न एवं औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि।

प्रश्न 6.
भारत में आर्थिक नियोजन की प्रमुख उपलब्धियों एवं असफलताओं का विवेचन कीजिए। योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने हेतु उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में निर्धारित उद्देश्यों को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. विकास,
  2. आधुनिकीकरण,
  3. आत्मनिर्भरता,
  4. सामाजिक न्याय।

इनके आधार पर भारत में आर्थिक नियोजन की सफलताएँ निम्नवत् रही हैं
1.  विकास

  1. योजना विकास की दर बढ़ी है। दसवीं योजना में विकास-दर का निर्धारित लक्ष्य 8 प्रतिशत था।
  2. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में निरन्तर वृद्धि हुई है।
  3. योजनाकाल में कृषि उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है।
  4. योजनाकाल में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई है, उत्पादन में विविधता आई है तथा भारी एवं आधारभूत उद्योगों की स्थापना हुई है।
  5. बचत एवं विनियोग की दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  6. आधारित संरचना का निर्माण हुआ है। रेलवे वे सड़कों का विस्तार हुआ है, जहाजरानी की क्षमता बढ़ी है, हवाई परिवहन, बन्दरगाहों की स्थिति एवं आन्तरिक जलमार्ग का विकास हुआ है, संचार क्रान्ति का आगमन हुआ है, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ है, विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है तथा बैंकिंग एवं बीमा संरचना में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।
  7. योजनाकाल में विदेशी व्यापार में तीव्र गति से वृद्धि हुई है।

2. आधुनिकीकरण

  1. भूमि सुधार कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है, उर्वरक व उन्नत बीजों का प्रयोग बढ़ा है तथा आधुनिक कृषि यन्त्रों एवं उपकरणों के प्रयोग को प्रोत्साहन मिला है। सिंचाई व्यवस्था, विपणन व्यवस्था एवं कृषि वित्त व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।
  2. राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का अनुपात घटा है तथा द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का अनुपात बैढ़ा
  3. आधारभूत एवं पूँजीगत उद्योगों की स्थापना की गई है, उद्योगों का विविधीकरण हुआ है एवं उत्पादन तकनीकी में व्यापक सुधार हुए हैं। |
  4. बैंकिंग व्यवस्था को सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विस्तृत किया गया है।

3. आत्मनिर्भरता
योजनाकाल में हमारा देश आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ है। आयात प्रतिस्थापन की नीति अपनाई गई है, भारी मशीनें व विद्युत उपकरण देश में ही तैयार किए जाने लगे हैं तथा खाद्यान्नों का उत्पादन तेजी से बढ़ा है।

4. सामाजिक न्याय
देश में आर्थिक एवं सामाजिक समानता लाने के लिए विभिन्न प्रेरणात्मक एवं संवैधानिक उपाय अपनाए गए हैं।

भारत में आर्थिक नियोजन की असफलताएँ

भारत में आर्थिक नियोजन की मुख्य असफलताएँ निम्नलिखित रही हैं

  1. प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है।
  2. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण बेरोजगारी में वृद्धि हुई है।
  3. सीमित साधनों के कारण विशाल परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हो सकी हैं।
  4. आर्थिक असमानताएँ बढ़ी हैं।
  5. मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है (विशेष रूप से खाद्यान्नों के मूल्यों में)।
  6. नीति सम्बन्धी ढाँचे का अभाव रहा है तथा नियन्त्रण और नियमन परस्पर असम्बद्ध रहे हैं।
  7. सार्वजनिक उपक्रमों का निष्पादन अकुशल रहा है।
  8. आन्तरिक वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण आन्तरिक एवं बाह्य ऋणों के भार में निरन्तर वृद्धि

उपर्युक्त कमियों के बावजूद योजना की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। वास्तव में, आर्थिक नियोजन के फलस्वरूप ही वर्षों से स्थिर अर्थव्यवस्था को गति प्राप्त हुई है।

योजनाओं को सफल बनाने हेतु सुझाव

योजनाओं को सफल बनाने हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

  1. जनता के सहयोग से विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार किया जाए।
  2. सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के उपक्रमों में समन्वय स्थापित किया जाए।
  3. मूल्य वृद्धि पर प्रभावी नियन्त्रण लगाया जाए।
  4. केन्द्र तथा राज्यों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित किए जाएँ।
  5. आर्थिक नीतियाँ केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से ही नहीं अपितु व्यावहारिक दृष्टि से भी उपयुक्त होनी चाहिए।
  6. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पर आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए

ताकि आंशिक बेरोजगारी को दूर किया जा सके। शिक्षा प्रणाली को कार्यप्रधान बनाया जाए तथा तकनीकी संस्थाओं का आधुनिकीकरण किया जाए।

अन्य सुझाव

  1. योजनाओं का निर्माण साधनों को ध्यान में रखकर किया जाए।
  2. राजनीतिक अस्थिरता पर प्रभावी नियन्त्रण स्थापित किया जाए।
  3. मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों में समन्वय स्थापित किया जाए।
  4. पूँजी-निर्माण की दर में वृद्धि की जाए।
  5. प्रशासकीय व्यवस्था को चुस्त एवं दुरुस्त किया जाए।
  6. जनसंख्या नियन्त्रण हेतु व्यापक कार्यक्रम संचालित किए जाएँ।
  7. मानव-शक्ति नियोजन को आर्थिक नियोजन से सम्बद्ध किया जाए, इत्यादि।

प्रश्न 7.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व बताइए।
उत्तर
विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ मूलतः प्राथमिक अर्थव्यवस्थाएँ नहीं हैं। आयोजन के 56 वर्ष पश्चात् भारत आज भी एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था ही है। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। महात्मा गांधी के अनुसार–“कृषि भारत की आत्मा है।” योजना आयोग भी आयोजन की सफलता के लिए कृषि को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानता है। भारत में करोड़ों लोगों को भोजन और आजीविका कृषि से ही प्राप्त होती है। कृषि पर ही देश के उद्योग-धन्धे, व्यापार, व्यवसाय, यातायात एवं संचार के साधन निर्भर हैं। लार्ड मेयो के शब्दों में–“भारत की उन्नति धन और सभ्यता के दृष्टिकोण से खेती पर आधारित है। संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जिसकी सरकार खेती से इतना प्रत्यक्ष और तात्कालिक लगाव रखती हो। भारत की सरकार मात्र एक सरकार ही नहीं अपितु मुख्य भूमि-स्वामी भी है।”

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व का अनुमान निम्नलिखित तथ्यों से लगाया जा सकता है-

1. राष्ट्रीय आय के प्रमुख स्रोत– भारत की राष्ट्रीय आय का सर्वाधिक अंश कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों से ही प्राप्त होता है। 2010-11 में लगभग 14.5% राष्ट्रीय आय कृषि से प्राप्त हुई थी, जबकि 1968-69 में 44.4% राष्ट्रीय आय की प्राप्ति कृषि से हुई थी। 1955-56 में तो यह 54% था। स्पष्ट है कि राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग कृषि से प्राप्त होता है, यद्यपि विकास के 
साथ-साथ राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान निरन्तर कम होता जा रहा है।

2. आजीविका का प्रमुख स्रोत- भारत में कृषि आजीविका का प्रमुख स्रोत है। श्री वी० के० आर० वी० राव के अनुसार, 1991 ई० में सम्पूर्ण जनसंख्या का लगभग 66.3% भाग कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों से अपनी आजीविका प्राप्त करता था, जबकि ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा आदि देशों में कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या का अंश 20% से भी कम है। देश की कुल जनसंख्या का 77.3% भाग गाँवों में रहता है और गाँवों में मुख्य व्यवसाय कृषि है।

3. सर्वाधिक भूमि का उपयोग- कृषि में देश के भू-क्षेत्र का सर्वाधिक भाग प्रयोग किया जाता है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार कुल भू-क्षेत्र के 49.8% भाग में खेती की जाती है।

4. खाद्यान्न की पूर्ति का साधन- कृषि देश की लगभग 121 करोड़ जनसंख्या को भोजन तथा लगभग 36 करोड़ पशुओं को चारा प्रदान करती है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीयों के भोजन में कृषि उत्पादन ही प्रमुख होते हैं। यदि जनसंख्या वृद्धि एवं आर्थिक विकास के परिवेश में खाद्य-सामग्री की पूर्ति को नहीं बढ़ाया जाता है, तो देश के आर्थिक विकास का ढाँचा चरमरा जाता

5. औद्योगिक कच्चे माल की पूर्ति का साधन- देश के महत्त्वपूर्ण उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर ही निर्भर हैं। सूती वस्त्र, चीनी, जूट, वनस्पति तेल, चाय व कॉफी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। संसार के सभी देशों में उद्योगों का विकास कृषि के विकास के बाद ही सम्भव हुआ है। इस प्रकार, औद्योगिक विकास कृषि के विकास पर ही निर्भर है।

6. पशुपालन में सहायक-  हमारे कृषक पशुपालन कार्य एक सहायक धन्धे के रूप में करते हैं। पशुपालन उद्योग से समस्त राष्ट्रीय आय का 7.8% भाग प्राप्त होता है। कृषि तथा पशुपालन उद्योग एक-दूसरे के पूरक तथा सहायक व्यवसाय हैं। कृषि पशुओं को चारा प्रद्मन करती है और पशु कृषि को बहुमूल्य खाद प्रदान करते हैं, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है।

7. हमारे निर्यात व्यापार का मुख्य आधार- देश के निर्यात का अधिकांश भाग कृषि से ही प्राप्त होता है। अप्रैल, 2013-14 में प्रमुख वस्तुओं के निर्यात में बागान उत्पाद, कृषि एवं सहायक उत्पाद में 34% की वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि उत्पादों में चाय, जूट, लाख, शक्कर, ऊन, रुई, मसाले, तिलहन आदि प्रमुख हैं।

8. केन्द्र तथा राज्य सरकारों की आय का साधन- यद्यपि कृषि क्षेत्र पर कर का भार अधिक नहीं होता है, तथापि कृषि राजस्व का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। लगान से लगभग 200 करोड़ वार्षिक आय का अनुमान लगाया गया है। इसके अतिरिक्त कृषि वस्तुओं के निर्यात-कर से भी आय प्राप्त होती है। केन्द्रीय सरकार के उत्पादन शुल्कों का एक बहुत बड़ा भाग चाय, तम्बाकू, तिलहन आदि फसलों से प्राप्त होता है।

9. आन्तरिक व्यापार का आधार- भारत में खाद्य-पदार्थों पर राष्ट्रीय आय का अधिकांश भाग व्यय होता है। अनुमान है कि शहरी क्षेत्रों में आय का 60.2% तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आय का 69.07% भोजन पर व्यय किया जाता है। स्पष्ट है कि आन्तरिक व्यापार मुख्यत: कृषि पर आधारित होता है और कृषि क्षेत्र में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर पड़ता है। थोक तथा खुदरा व्यापार के अतिरिक्त बैंकिंग तथा बीमा व्यवसाय भी कृषि से अत्यधिक प्रभावित होते हैं।

10. यातायात के साधनों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण- कृषि उत्पादन यातायात के साधनों को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है। जिस वर्ष कृषि-उत्पादन कम होता है, रेल व सड़क-परिवहन आदि सभी साधनों की आय घट जाती है। इसके विपरीत, अच्छी फसल वाले वर्ष में इन साधनों की आय में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 8.
भारत में कृषि उत्पादकता कम होने के प्रमुख कारण बताइए। इसे बढ़ाने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत एक विशाल एवं सम्पन्न देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान सदैव ही सर्वोपरि रहा है। किन्तु भारत में फसलों को प्रति हेक्टेयर उत्पादन विश्व के अनेक देशों की तुलना में अत्यन्त निम्न है। निम्न उत्पादकता की यह स्थिति खाद्य तथा खाद्येतर दोनों फसलों में समान रूप से दृष्टिगत होती है। 
निम्न कृषि उत्पादकता के मूल कारण कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए अनेक कारण सामूहिक रूप से उत्तरदायी हैं। इन समस्त कारणों को तीन उपविभागों में बाँटा जा सकता है
(अ) सामान्य कारण,
(ब) संस्थागत कारण,
(स) प्राविधिक कारण।

(अ) सामान्य कारण

1. भूमि पर जनसंख्या का भार- भारत में कृषि-भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा | है, परिणामतः प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि निरन्तर कम होती जा रही है। सन् 1901 ई० में जहाँ कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि प्रति व्यक्ति 2.1 एकड़ थी, आज वह 0.7 एकड़ से भी कम रह गई है।

2. कुशल मानव-शक्ति का अभाव-
भारत का कृषक सामान्यतया निर्धन, निरक्षर एवं भाग्यवादी होता है। अतः वह स्वभावत: अधिक उत्पादन नहीं कर पाता।|

3. भूमि पर लगातार कृषि– अनेक वर्षों से हमारे यहाँ उसी भूमि पर खेती की जा रही है, फलतः | भूमि की उर्वरा-शक्ति निरन्तर कम होती जा रही है। उर्वरा-शक्ति पुनः प्राप्त करने के लिए सामान्यतः ने तो हेर-फेर की प्रणाली को ही प्रयोग किया जाता है और न रासायनिक खादों का प्रयोग होता है।

(ब) संस्थागत कारण

1. खेतों का लघु आकार- उपविभाजन एवं अपखण्डन के परिणामस्वरूप देश में खेतों को आकार अत्यन्त छोटा हो गया है, परिणामतः आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नहीं हो पाता। साथ-ही, श्रम | तथा पूँजी के साथ ही समय का भी अपव्यय होता है।

2. अल्प-मात्रा में भूमि सुधार- देश में भूमि सुधार की दिशा में अभी महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक प्रगति नहीं हुई है, जिसके फलस्वरूप कृषकों को न्याय प्राप्त नहीं होता। इसका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

3. कृषि-सेवाओं का अभाव- भारत में कृषि-सेवाएँ प्रदान करने वाली संस्थाओं का अभाव पाया जाता है, जिससे उत्पादकता में वृद्धि नहीं हो पाती।

(स) प्राविधिक कारण

1. परम्परागत विधियाँ- भारतीय किसान अपने परम्परावादी दृष्टिकोण एवं दरिद्रता के कारण पुरानी और अकुशल विधियों का ही प्रयोग करते हैं, जिससे उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाती।

2. उर्वरकों की कमी- उत्पादन में वृद्धि के लिए उर्वरकों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है, परन्तु भारत में गोबर एवं आधुनिक रासायनिक खादों (उर्वरकों) दोनों का ही अभाव पाया जाता है। गत वर्षों में इस दिशा में कुछ प्रगति अवश्य हुई है।

3. आधुनिक कृषि- उपकरणों का अभाव-भारत के अधिकांश कृषक पुराने उपकरणों का प्रयोग किया करते हैं, जिससे उत्पादन में उचित वृद्धि नहीं हो पाती। ऐसा प्रतीत होता है कि परम्परागत भारतीय कृषि-उपकरणों में अवश्य कोई मौलिक दोष है। अतः कृषकों को आधुनिक उपकरणों को अपनाना चाहिए।

4. बीजों की उत्तम किस्मों का अभाव- कृषि के न्यून उत्पादन का एक कारण यह भी रहा है कि हमारे किसान बीजों की उत्तम किस्मों के प्रति उदासीन रहे हैं। इस स्थिति के मूलतः तीन कारण हैं-प्रथम, किसानों को उत्तम बीजों की उपयोगिता का पता न होना; द्वितीय, बीजों की समुचित आपूर्ति न होना तथा तृतीय, अच्छी किस्म के बीजों का महँगा होना और कृषकों की निर्धनता।

5. साख- सुविधाओं का अभाव-अभी तक कृषि विकास के लिए पर्याप्त साख-सुविधाएँ कृषकों को उपलब्ध नहीं थीं। इसके मूलतः दो कारण थे—प्रथम, कृषि वित्त संस्थाओं का अभाव व उनका सीमित कार्य-क्षेत्र; द्वितीय, उचित कृषि मूल्य नीति का अभाव।

6. पशुओं की हीन दशा- भारत में पशुओं का अभाव तो नहीं है, हाँ, उनकी अच्छी नस्ल अवश्य | अधिक नहीं पायी जाती। अन्य शब्दों में, पशु-धन की गुणात्मक स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। अत: पशु आर्थिक सहयोग प्रदान करने के स्थान पर कृषकों पर भार बन गए हैं।

7. सिंचाई के साधनों का अभाव- भारतीय कृषि की आधारशिला मानसून है क्योंकि आयोजन के | 63 वर्षों के उपरान्त भी कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 35% भाग को ही कृत्रिम सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं, शेष कृषि-योग्य क्षेत्र अनिश्चित मानसून की कृपा पर निर्भर रहता है। पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं के अभाव में उर्वरकों आदि का भी समुचित प्रयोग नहीं हो पाता, जिससे उत्पादकता में विशेष वृद्धि नहीं होती है। उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए कुछ अन्य कारण भी उत्तरदायी हैं; जैसे-सामाजिक रूढ़ियाँ, कृषि अनुसन्धान का अभाव, प्राकृतिक प्रकोप, शिथिल प्रशासन आदि। 

भारत में कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के उपाय

भारत में कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं-

  1. कृषि उत्पादन की आधुनिकतम तकनीकें विकसित की जाएँ।
  2. भूमि-सुधार के सभी कार्यक्रमों को पूर्ण एवं प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित किया जाए।
  3. सिंचाई के साधनों का विकास करके कृषि की प्रकृति पर निर्भरता को कम किया जाए।
  4. खाद, कीटनाशक औषधियाँ तथा उन्नत किस्म के बीजों को उचित मूल्यों पर तथा पर्याप्त भौत्रा में वितरित करने की व्यवस्था की जाए।
  5. विपणन व्यवस्था में सुधार किया जाए।
  6.  किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करके, आवश्यक वित्त की आपूर्ति की जाए।
  7. लाभदायक स्तर पर कृषि मूल्यों में पर्याप्त स्थायित्व बनाए रखा जाए।
  8. विभिन्न प्रकार की जोखिमों को न्यूनतम करने के प्रयास किए जाएँ।
  9.  शिक्षा एवं प्रशिक्षण व्यवस्था का विस्तार किया जाए।
  10. विकास कार्यक्रमों में समन्वय व सामंजस्य स्थापित किया जाए।

प्रश्न 9.
भू-सुधार से क्या आशय है? भारत में भू-सुधार कार्यक्रमों की प्रगति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इसे अधिक सफल बनाने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
भू-सुधार : अर्थ एवं परिभाषाएँ

1. परम्परागत अर्थ में- “भूमि सुधार का आशय छोटे कृषकों एवं कृषि-श्रमिकों के लाभार्थ भूमि-स्वामित्व के पुनर्वितरण से लगाया जाता है।”
2. व्यापक अर्थ में- “कृषि-संगठन अथवा भू-धारण की संस्थागत व्यवस्था में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को भू-धारण में सम्मिलित करते हैं।”
3. प्रो० गुन्नार मिर्डल के शब्दों में- “भूमि सुधार व्यक्ति और भूमि के सम्बन्धों में नियोजन और संस्थागत पुनर्गठन है।”

सामान्यतः भूमि-सुधार को अर्थ मध्यस्थों की समाप्ति, काश्तकारी पद्धति में सुधार तथा जातों के सीमा-निर्धारणं से लिया जाता है, परन्तु व्यापक अर्थ में भूमिहीन श्रमिकों की दशा में सुधार, चकबन्दी तथा भूमि की उन्नति एवं विकास और सहकारी कृषि के विस्तार को भी भूमि-सुधार के अन्तर्गत शामिल किया जाता है। इस प्रकार, भूमि-सुधारों में भू-धारण प्रणाली, जोतों के आकार, कृषि-पद्धति के वे समस्त परिवर्तन, जिनकी सहायता से उत्पादन वृद्धि एवं सामाजिक न्याय का वातावरण बनता है, शामिल होते हैं।

भारत में भू-सुधार कार्यक्रम

भारत में अपनाए गए प्रमुख भू-सुधार कार्यक्रम निम्नलिखित हैं

I. मध्यस्थों की समाप्ति
जिस समय देश, स्वतन्त्र हुआ, लगभग 40% कृषि क्षेत्र पर जमींदारों, जागीरदारों तथा मध्यस्थों का प्रभुत्व था। प्रथम दो पंचवर्षीय योजनाओं में इन मध्यस्थों को पूर्ण उन्मूलन कर दिया गया।

II. काश्तकारी सुधार
काश्तकारी सुधार निम्नवत् थे-

1.  लगान नियमन- पहले काश्तकार तथा बटाईदार सामान्यतः उपज का आधे से अधिक भाग भूस्वामी को लगान के रूप में देते थे। इस सुधार के अन्तर्गत लगान की अधिकतम मात्रा 1/5 या 1/4 निर्धारित कर दी गई।

2. भू-स्वामित्व की सुरक्षा- इसका अर्थ है-काश्तकारों का भूमि पर स्थायी अधिकार होना। द्वितीय योजनाकाल में योजना आयोग ने सुझाव दिया कि ऐच्छिक परित्याग के मामलों का पंजीयन किया जाए तथा यह प्रतिबन्ध लगाया जाए कि ऐच्छिक परित्याग के बाद भी भू-स्वामी केवल काश्त की जाने वाली भूमि की मात्रा का ही स्वामी माना जाएगा।

3. स्वयं काश्त में भूमि का पुनर्ग्रहण- पुनर्ग्रहण नियमों की दृष्टि से समस्त राज्यों को चार भागों में बाँटा जा सकता है

(क) पहले समूह में वे राज्य है, जहाँ काश्तकारों को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो गई है। इन राज्यों में भू-स्वामियों को पुन: भूमि प्राप्त करने की आज्ञा नहीं मिली है। ये राज्य हैं-बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली।

(ख) दूसरे समूह में वे राज्य आते हैं, जहाँ भू-स्वामियों को निजी कृषि के लिए एक सीमिन्न क्षेत्र मिल सकता है, परन्तु साथ में यह शर्त है कि काश्तकार के पास एक न्यूनतम क्षेत्र अवश्य छोड़ना होगा। ये राज्य हैं-बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर तथा केरल।

(ग) तीसरे समूह में पंजाब तथा असम राज्य आते हैं। इन राज्यों में काश्तकारों को अन्यत्र भूमि प्रदान की जाएगी, इसके पश्चात् पुनर्ग्रहण हो सकता है। भूमि ढूँढ़ने का उत्तरदायित्व राज्यों को सौंपा गया है।

(घ) चौथे समूह में आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु की गिनती होती है, जहाँ भू-स्वामियों को पुनः भूमि प्राप्त करने का अधिकार इस शर्त पर दिया गया है कि वे निर्धारित सीमा से अधिक भूमि नहीं प्राप्त कर सकते, परन्तु काश्तकार के लिए किसी न्यूनतम क्षेत्र का निर्धारण नहीं किया गया। इस अवस्था से काश्तकारों को सम्पूर्ण कृषि योग्य क्षेत्र में 9% भाग में पूर्ण सुरक्षा, 59% भाग में आंशिक सुरक्षा तथा 19% भाग में अस्थायी सुरक्षा प्राप्त हुई है। 13% भाग अभी ऐसा है, जहाँ सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है।।

4काश्तकारों को मालिक होने का अधिकार–परिश्रमी काश्तकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विभिन्न राज्यों ने भू-स्वामित्व के अधिकार सम्बन्धी अधिनियमों को लागू किया है। प्रारम्भ में भूस्वामित्व का अधिकार प्राप्त करना ऐच्छिक था, परन्तु तृतीय योजना में ऐच्छिकता को हटाने का सुझाव दिया गया क्योंकि ऐच्छिक होने पर इन अधिकारों को प्रयोग नहीं हो पाया था। विभिन्न राज्य सरकारों ने यह कार्य भिन्न-भिन्न रीतियों से किया है-

(अ) गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश व राजस्थान में काश्तकारों को मालिक कर दिया गया और पूर्व-मालिकों को उचित किस्तों में पैसा मिलता रहे, इस बात की व्यवस्था कर दी गई।

(ब) दिल्ली में सरकार ने मुआवजा देकर स्वयं स्वामित्व प्राप्त कर लिया और काश्तकारों को | मालिक बना दिया। वहाँ सरकार ने व्यवस्था की है कि उसे उचित किस्तों पर काश्तकारों से मुआवजा मिल जाए।

(स) उत्तर प्रदेश तथा केरल ऐसे राज्य हैं, जहाँ सरकार ने भू-स्वामित्व के अधिकार स्वयं प्राप्त कर लिए और काश्तकारों को छूट दे दी कि वे चाहें तो निर्धारित मुआवजा देकर मालिक बन जाएँ अथवा सामान्य लगान देकर खेती करते रहें। अनुमान है कि अब तक 30 लाख काश्तकारों तथा बटाईदारों को 70 लाख एकड़ भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो चुका है। इस दिशा में प्रगति जारी है।

III. जोतों का सीमा-निर्धारण
हमारे देश में भूमि का बँटवारा बहुत ही असन्तुलित है। कृषि जाँच समिति के अनुसार, समस्त कृषि क्षेत्र की 34.4% भूमि पर 4.5% व्यक्ति ही खेती करते हैं, 15.5% भूमि पर 66.9% व्यक्ति खेती करते हैं। और लगभग 19% व्यक्ति भूमिहीन हैं। अत: सामाजिक न्याय तथा समानता की दृष्टि से जोत की सीमा का निर्धारण करना आवश्यक है। इतना ही नहीं, सीमा निर्धारण से भूमि के प्रबन्ध एवं प्रयोग में कुशलता आती है। अतिरिक्त भू-भाग पर भूमिहीन मजदूरों को बसाया जा सकता है तथा अतिरिक्त भूमि का प्रयोग करके अनार्थिक जोतों को आर्थिक जोतों में परिवर्तित किया जा सकता है। भारत के कुछ राज्यों में इस सम्बन्ध में कानून बनाए गए हैं किन्तु उनमें एक तो जोत की सीमा बहुत ऊँची रखी गई है और दूसरे, सीमा-निर्धारण के लिए परिवार को इकाई न मानकर व्यक्ति को इकाई माना गया है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार की छूटें भी दी गई हैं। 1972 को नई सीमा नीति का 
निर्धारण किया गया जिसके परिप्रेक्ष्य में गोवा व उत्तर के कुछ राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में अधिकतम सीमा कानून पारित किए। अभी तक मात्र 29.8 लाख हेक्टेयर भूमि को अतिरिक्त भूमि घोषित किया जा सका है जिसमें से 21.8 लाख हेक्टेयर भूमि का वितरण 55.8 लाख लोगों में किया जा सका है।

IV. कृषि पुनर्गठन 

1. चकबन्दी- योजना आयोग प्रारम्भ से ही चकबन्दी कार्यक्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता के पक्ष में | रहा है। सरल शब्दों में, कई छोटे-छोटे और बिखरे हुए खेतों को एक बड़े खेत में बदलना ही चकबन्दी (Consolidation) कहलाता है। भारत में चकबन्दी की प्रगति बड़ी मन्द रही है। अब तक लगभग 640.8 लाख हेक्टेयर भूमि की ही चकबन्दी की जा सकी है। चकबन्दी से भूमि के विखण्डन की समस्या सुलझी है तथा कृषि-उपज में भी वृद्धि हुई है। दु:ख का विषय है कि अनेक राज्यों ने चकबन्दी का कार्य बन्द कर दिया है।

2. भूमि के प्रबन्धन में सुधार- भूमि-सुधार के अन्तर्गत प्रथम व द्वितीय योजना में भूमि के कुशल प्रबन्ध पर बल दिया गया। इसके अन्तर्गत भूमि को समतल बनाना, कृषि-योग्य बंजर भूमि का विकास, बीजों की उन्नत किस्मों का प्रयोग, खाद व औजार आदि का प्रयोग व रोगों से रोकथाम आदि कार्य आते हैं। इस दिशा में अभी तक हुई प्रगति विशेष उत्साहवर्द्धक नहीं रही है।

3. सहकारी खेती– देश के कृषि ढाँचे का पुनर्गठन सहकारिता के आधार पर किया जा रहा है, अत: पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में सहकारी खेती के महत्त्व पर विशेष जोर दिया गया। प्रथम पंचवर्षीय योजना के अन्त में देश में कुल 1,000 सहकारी कृषि समितियाँ थीं। सन् 1959 ई० के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने संयुक्त सहकारी खेती को कृषि सुधार का अन्तिम लक्ष्य घोषित किया। फलतः सहकारी कृषि के विकास में गति आई।

4. भूमिहीनों को बसाना तथा भू-दान व ग्राम-दान आदि- भारत में भूमिहीन मजदूरों को बसाना एक जटिल समस्या है। आज भी ग्रामीण जनसंख्या का लगभग 19% अंश ऐसा है, जिसे हम ‘भूमिहीन श्रमिक’ (Landless Labour) कहकर पुकारते हैं। यद्यपि प्रथम पंचवर्षीय योजना में ही भूमिहीन मजदूरों को नई भूमि पर बसाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया था तथापि अभी तक यह समस्या पूर्णतः सुलझी नहीं है।
भूदान एक सामाजिक तथा आर्थिक आन्दोलन है, जिसका सूत्रपात आचार्य विनोबा भावे ने 1951 में किया था। इस आन्दोलन के उद्देश्य की व्याख्या करते हुए आचार्य विनोबा भावे ने कहा था, “इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य बिना संघर्ष के इस देश में सामाजिक एवं आर्थिक दुर्व्यवस्था को दूर करना है।” भूदान आन्दोलन भूमिहीन व्यक्तियों को बाँटने के लिए स्वेच्छा से भूमि-दान का अनुरोध करता है। कृषि से भिन्न अन्य क्षेत्रों में यह आन्दोलन जीवन दान, सम्पत्ति दान, साधन दान आदि रूपों में चल रहा है। भूदल आन्दोलन अब पर्याप्त व्यापक हो गया है। इसके अन्तर्गत ग्राम दान, प्रखण्ड दान, जिला दान तथा प्रदेश दान को भी शामिल कर लिया गया है। इस आन्दोलन का लक्ष्य 5 करोड़ हेक्टेयर भूमि प्राप्त करना है, जिससे प्रत्येक भूमिहीन परिवार को कुछ-न-कुछ भूमि दी जा सके। अब तक इस आंदोलन के अंतर्गत 39.16 लाख एकड़ भूमि प्राप्त हो चुकी है और 37,775 गाँव दान में मिल चुके हैं। इस आंदोलन का लक्ष्य 5 करोड़ एकड़ भूमि प्राप्त करना था। अनेक राज्यों में भूदान में मिली भूमि के वितरण को न्यायपूर्ण बनाने के लिए कुछ कानूनों का भी निर्माण किया गया है। राज्य सरकारें इस आन्दोलन को वित्तीय सहायता भी दे रही हैं। भूदान आन्दोलन एक अभिनव आन्दोलन है। श्री नेहरू ने इस आन्दोलन को ऐसा वातावरण तैयार करने वाला बताया है, जिससे हमारी समस्याएँ बहुत कुछ सरल हो गईं। श्रीमन्नारायण ने इस आन्दोलन का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है, “भूदान आन्दोलन देश में महत्त्वपूर्ण भूमि-सुधारों के लिए स्वस्थ एवं अनुकूल वातावरण तैयार करने में सफल हुआ है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन
भारत के भूमि-सुधार कार्यक्रम की प्राय: निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है

  1. भूमि-सुधार कार्यक्रम को समन्वित रूप से लागू नहीं किया गया।
  2. सहकारी कृषि समितियों का निर्माण प्राय: बड़े भू-स्वामियों द्वारा किया गया और उन्होंने ही सहकारी सुविधाओं का लाभ उठाया। फलतः भूमि को जोतने वाला वास्तविक कृषक सुविधाओं से वंचित रहा।
  3. भारत में भू-सुधार नीति अत्यन्त विलम्बपूर्ण रही है।
  4. इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी (Litigation) को प्रोत्साहन मिला है।
  5. भूमि-सुधार नियमों में होने वाले परिवर्तन ने भू-स्वामियों में अनिश्चितता की भावना उत्पन्न की।
  6.  प्रशासन का दृष्टिकोण भूमि-सुधार में सहायक सिद्ध नहीं हुआ है।
  7. आज भी कई क्षेत्रों में उच्च लगान लागू है।
  8. अनेक राज्यों में आज भी भूमि सम्बन्धी अभिलेख अपूर्ण हैं।

वस्तुत: सत्य तो यह है कि हमारे देश में जो भी भूमि-सुधार सम्बन्धी कार्य हुए हैं, वे मन और उत्साह से नहीं किए गए हैं। इनके कारण कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं, जो सामाजिक न्याय एवं प्रगति की विरोधी हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि भूमि-सुधारों से सम्बन्धित अनिश्चितता एवं बाधाओं को शीघ्रातिशीघ्र दूर किया जाए तथा इन सुधारों को निष्ठापूर्वक लागू किया जाए, जिससे एक न्यायपूर्ण, शोषणरहित एवं अधिक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके।

सुझाव
भूमि-सुधार कार्यक्रमों को प्रभावशाली ढंग से शीघ्रतापूर्वक लागू करने के लिए कुछ रचनात्मक सुझाव दिए जा सकते हैं; जैसे

  1. केन्द्रीय भूमि-सुधार आयोग की सिफारिशों को यथासम्भव शीघ्र लागू किया जाए। सिंचित क्षेत्रों में भूमि की अधिकतम सीमा 18 एकड़ निर्धारित कर दी जाए।
  2. सीमा से अधिक भूमि को सरकार स्वयं अपने नियन्त्रण में ले ले तथा भूमिहीनों में उचित रूप से उसका तुरन्त आवंटन कर दिया जाए।
  3. कृषकों को बेदखल करने वाले भू-स्वामियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाए।
  4. सरकार बेनामी हस्तान्तरणों को मालूम करके सीमा से अधिक भूमि का स्वयं अधिग्रहण करे।
  5. ग्रामों में भूमिहीनों को आवास हेतु भूखण्ड दिए जाएँ।
  6. कृषि में न्यूनतम वेतन को तुरन्त लागू किया जाए।
  7. सीमावर्ती क्षेत्रों में भू-वितरण में भूतपूर्व सैनिकों को प्राथमिकता प्रदान की जाए।
  8. गलत आवंटन तथा अनुचित हस्तान्तरण में सहयोग देने वाले राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जाए।
  9. शेष मध्यस्थों की समाप्ति हेतु भी कदम उठाए जाएँ। मध्यस्थों के रूप में भूमि रखने का अधिकार केवल विधवा महिलाओं, नाबालिग बच्चों तथा भूतपूर्व सैनिकों (विशेषकर अपंग सैनिकों) को ही होना चाहिए।
  10. जो लोग अन्य लोगों की भूमि पर खेती करते हैं, उनकी बेदखली को रोका जाए।
  11. परती भूमियों के वितरण हेतु उचित व्यवस्था हो तथा ऐसे क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधाओं का विस्तार किया जाए।

प्रश्न 10.
हरित क्रान्ति से क्या आशय है? भारत में हरित क्रान्ति को जन्म देने वाले घटकों ने 
बताइए। इसके मार्ग में क्या कठिनाइयाँ आई हैं? इसे सफल बनाने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए। ”
उत्तर

हरित क्रान्ति का अर्थ

साधारण शब्दों में, हरित क्रान्ति से आशय सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली किस्मों को आधुनिक कृषि पद्धति से उगाकर कृषि उपज में यथासम्भव अधिकाधिक वृद्धि करने से है। जार्ज हरार के अनुसार-“हरित क्रान्ति से हमारा आशय पिछले दशक में विभिन्न देशों में खाद्यान्नों के उत्पादन में होने वाली आश्चर्यजनक वृद्धि से है।

हरित क्रान्ति को जन्म देने वाले घटक
भारत में हरित क्रान्ति के लिए निम्नलिखित घटक उत्तरदायी रहे हैं-

  1. अधिक उपज देने वाली किस्मों का प्रयोग।
  2. 1961-62 में सघन कृषि जिला कार्यक्रम नामक योजना का प्रारम्भ।
  3. सघन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम का विस्तार।।
  4. बहु-फसल कार्यक्रम को अपनाना।।
  5. खाद एवं उर्वरकों का अधिकाधिक उपयोग।
  6. उन्नत बीजों का प्रयोग।
  7. आधुनिक कृषि उपकरण एवं संयन्त्रों का प्रयोग।
  8. प्रभावी पौध संरक्षण कार्यक्रमों को लागू करना।
  9. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार।
  10. पर्याप्त मात्रा में कृषि साख की उपलब्धि।

भारत में हरित क्रान्ति की असफलताएँ/कठिनाइयाँ

यद्यपि उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, आधुनिक विकसित तकनीक आदि के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादकता में काफी वृद्धि हुई, तथापि व्यापक दृष्टि से कृषि के विभिन्न स्तरों पर क्रान्ति लाने में यह असफल रही है। भारत में हरित क्रान्ति की असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित रहे हैं

  1. कृषि क्रान्ति का प्रभाव केवल कुछ ही फसलों (गेहूँ, ज्वार, बाजरा) तक ही सीमित रहा है। गन्ना, | पटसन, कपास व तिलहन जैसे कृषि पदार्थों पर इसका बिल्कुल प्रभाव नहीं पड़ा है।
  2. कृषि क्रान्ति का प्रभाव केवल कुछ ही विकसित क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु) के कुछ भागों तक सीमित रहा है।
  3. भारत में कृषि-क्रान्ति से केवल बड़े किसान ही लाभान्वित हो सके हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में असमानताएँ बढ़ी हैं और इस प्रकार से धनी कृषक अधिक धनी और निर्धन अधिक निर्धन हो गए
  4. विस्तृत भू-खण्डों पर उत्तम खाद व बीज तथा नवीन तकनीकों के प्रयोग से कृषि योग्य भूमि के कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रित होने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
  5. कृषि विकास की गति अत्यधिक धीमी रही है।

हरित क्रान्ति को सफल बनाने के उपाय

हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

  1. कृषि उत्पादन से सम्बन्धित सरकारी विभागों में उचित समन्वय होना चाहिए।
  2. उर्वरकों के वितरण की व्यवस्था होनी चाहिए।
  3. उर्वरकों के प्रयोग के बारे में किसानों को उचित प्रशिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए।
  4. उपयुक्त व उत्तम बीजों के विकास को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
  5. फसल बीमा योजना शीघ्रता एबं व्यापकता से लागू की जानी चाहिए।
  6. कृषि साख की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्हें सस्ती ब्याज-देर परे, ठीक समय पर, पर्याप्त मात्रा में ऋण-सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
  7.  सिंचाई-सुविधाओं का विस्तार किया जा चाहिए।
  8. भू-क्षरण में होने वाली क्षति की रोकथाम के उचित प्रयत्न किए जाने चाहिए।
  9. कृषि उपज के विपणन की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  10. भूमि का गहनतम व अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए।
  11. कृषकों को उचित प्रशिक्षण व निर्देशन दिया जाना चाहिए।
  12. भूमि-सुधार कार्यक्रमों का शीघ्र क्रियान्वयन होना चाहिए।
  13. छोटे किसानों को विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए।
  14. प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।
  15. विभिन्न विभागों, सामुदायिक विकास खण्डों, ग्राम पंचायतों, सरकारी संगठनों व साख संस्थाओं में उचित समन्वय होना चाहिए।

प्रश्न 11.
कृषि विपणन से क्या आशय है? भारत में कृषि विपणन की वर्तमान व्यवस्था क्या है?
उत्तर

कृषि विपणन का अर्थ

कृषि विपणन की समस्या कृषि विकास की आधारभूत समस्या है। यदि कृषक को उसे उत्पादन की उचित मूल्य नहीं मिलता तो उसकी आर्थिक स्थिति कभी सुधर नहीं सकती। कृषि विपणन एक व्यापक शब्द है। इसके अन्तर्गत बहुत-सी क्रियाएँ आती हैं; जैसे—कृषि पदार्थों का एकत्रीकरण, श्रेणी विभाजन विधायन, संग्रहण, परिवहन, विपणन के लिए वित्त, पदार्थों को अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाना तथा इन सम्पूर्ण क्रियाओं में निहित जोखिम उठाना आदि। इस प्रकार विपणन के अन्तर्गत उन संमस्त क्रियाओं का समावेश किया जाता है, जिनको सम्बन्ध कृषि उत्पादन के कृषक के पास से अन्तिम उपभोक्ताओं तक पहुँचाने से होता है। 

भारत में कृषि पदार्थों के विपणन की वर्तमान व्यवस्था

भारत में किसान अपनी उपज को निम्नलिखित ढंग से बेचता है-

1. गाँव में बिक्री–भारत में कृषि-उत्पादन का अधिकांश भाग प्रायः गाँव में ही बेच दिया जाता है। ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि कुल फसल का लगभग 65% भाग उत्पत्ति के स्थान पर ही बेच दिया जाता है। इसके अतिरिक्त 15% भाग गाँव के बाजार में, 14% भाग व्यापारियों व कमीशन एजेण्टों को तथा शेष 6% अन्य पद्धतियों से बेचे जाने का अनुमान है। ग्रामीण बाजार में फसल की बिक्री मुख्यत: तीन रूपों में होती है
(क) गाँव की हाटों अथवा साप्ताहिक बाजारों में।।
(ख) गाँव के महाजन तथा साहूकारों को।
(ग) गाँव में भ्रमण करते व्यापारियों तथा कमीशन एजेण्टों को।
प्रायः गाँव में बिकने वाली फसल का किसानों को उचित मूल्य नहीं मिला पाता, परन्तु अनेक कारण किसानों को इस बात के लिए विवश कर देते हैं कि वे अपनी फसल

गाँव में ही बेच दें। गाँव में फसल की बिक्री के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं-
(क) बाजार योग्य अतिरेक (Marketable Surplus) का कम होना।
(ख) यातायात व परिवहन के साधनों का अभाव।
(ग) किसानों की ऋणग्रस्तता।
(घ) गोदामों की सुविधाओं का अभाव।
(ङ) किसानों की अशिक्षा, मण्डियों में होने वाली बेईमानी तथा प्रचलित मूल्यों का ज्ञान न होना।
(च) किसानों की निर्धनता आदि।

2. मण्डियों में बिक्री- भारत में अधिकांश किसान अपनी फसल गाँवों में नहीं बेचते, वे मण्डियों में अपनी फसल बेचा करते हैं। भारत में लगभग 6,700 मण्डियाँ हैं। भारत में दो प्रकार की मण्डियाँ पायी जाती हैं–नियमित तथा अनियमित। नियमित मण्डियाँ प्रायः निजी व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा मण्डलों द्वारा संचालित होती हैं। अनयिमित मण्डियों में, जहाँ उनका प्रबन्ध निजी व्यक्तियों के हाथ में होता है, प्राय: सभी प्रकार की अनियमितताएँ होती हैं और मध्यस्थ फसल का अधिकांश भाग हड़प लेते हैं। नियमित मण्डियों में किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिल जाता है क्योंकि इनकी व्यवस्था राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। केन्द्रीय विपणन निदेशालय इस सम्बन्ध में राज्यों का पथ-प्रदर्शन करता है।

3. सहकारी समितियों द्वारा बिक्री– देश में कृषि उपज की बिक्री की दृष्टि से सहकारी विपणन समितियों (Co-operative Marketing Societies) की स्थापना की गई है, जो अपने सदस्यों के कृषि उत्पादन को एकत्रित करके उसे बड़ी मण्डियों में बेचती हैं।

4. सरकार द्वारा क्रय- गत् कुछ वर्षों से सरकार भी कृषि पदार्थों का क्रय करने लगी है। सन् 1973 ई० में सरकार द्वारा गेहूँ के थोक-व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर लेने से कृषि-विपणन में सरकारी एजेन्सियों का महत्त्व बढ़ गया है।

प्रश्न 12.
भारत में कृषि विपणन की मुख्य समस्याएँ/दोष/कठिनाइयाँ क्या हैं? उन्हें सुधारने के उपाय बताइए।
उत्तर
भारत में कृषि उपज के विपणन की समस्याएँ/दोष/कठिनाइयाँ भारत में कृषि उपज की विक्रय-व्यवस्था अनेक दृष्टियों से दोषपूर्ण है, जिसके परिणामस्वरूप किसानों को उपभोक्ताओं द्वारा चुकाए गए मूल्य का आधा भाग ही कठिनता से मिल पाता है। परिणामतः न तो उपभोक्ताओं को लाभ हो पाता है और न ही उत्पादकों को। यह स्थिति आर्थिक विकास की दृष्टि से भी अत्यन्त दोषपूर्ण है, जिसका देश के उत्पादन पर व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कृषि उपज के विक्रय के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं
1. कृषि उपज की घटिया किस्म– भारत में कृषि उपज प्रायः घटिया किस्म की होती है क्योंकि किसान कृषि को एक परम्परागत कार्य समझकर करता है और उपज की किस्म पर ध्यान नहीं देता। फलतः कृषक को उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

2. संगठन का अभाव- भारतीय कृषकों में संगठन का अभाव है, जबकि क्रेता पूर्ण रूप से संगठित होते हैं। अतः असंगठित कृषक अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त नहीं कर पाते।

3. मध्यस्थों की अधिकतम संख्या– कृषि विपणन में बहुत अधिक मध्यस्थ हैं। उपभोक्ता तथा उत्पादक (कृषक) के बीच मध्यस्थों की एक लम्बी लाइन होती है, जो सभी अपनी-अपनी सेवा का कुछ-न-कुछ लेते हैं। राष्ट्रीय नियोजन समिति ने इन मध्यस्थों को कृषक की निर्धनता का एक महत्त्वपूर्ण कारण माना है।

4. श्रेणीकरण का अभाव- भारतीय कृषक अपनी उपज का श्रेणीकरण तथा प्रमापीकरण नहीं करते। समस्त पदार्थों को मिला-जुलाकर बेचते हैं, जिससे वस्तु को उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

5. यातायात की असुविधा- ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक यातायात व परिवहन की सुविधाओं का आवश्यक विकास नहीं हुआ है, परिणामतः कृषक गाँवों में ही अपनी उपज बेचने के लिए बाध्य होता है। यातायात की सुविधाओं के अभाव में मध्यस्थों की संख्या में भी वृद्धि हो जाती है।

6. अपर्याप्त एवं अवैज्ञानिक गोदामों की व्यवस्था- भारत में किसानों की उपज के उचित संग्रह हेतु प्रायः कोई सुविधा प्राप्त नहीं होती। वे नमी, धूप, हवा तथा धूल आदि से उपज की रक्षा नहीं कर पाते। चूहे, दीमक आदि भी फसल को नष्ट करते रहते हैं, जिससे प्रतिवर्ष 20 लाख टन उत्पादन नष्ट हो जाता है। भण्डारों की सुविधा न होने के कारण किसानों को अपनी उपज तुरन्त बेच देनी पड़ती है।

7. बाजार में प्रचलित बुराइयाँ तथाअनुचित कटौतियाँ– अनियमित मण्डियों में और कभी-कभी नियमित मण्डियों में विविध प्रकार की कुचालें तथा बेईमानियाँ पायी जाती हैं। राष्ट्रीय नियोजन समिति ने ग्रामीण बिक्री तथा वित्त सम्बन्धी प्रतिवेदन में निम्नलिखित कार्यवाहियों का उल्लेख विशेष रूप से किया है|

  1. विभिन्न प्रकार की माप-तौल द्वारा किसानों को धोखा देना।
  2. चुंगी, तौलाई, दलाली, आढ़त आदि शुल्कों के अतिरिक्त प्याऊ, गौशाला, रामलीला, मन्दिर, अनाथालय आदि के नाम पर अनुचित कटौतियाँ।।
  3. दलालों का आढ़तियों से गुप्त सम्पर्क होना।।
  4. गुप्त रूप से मूल्य निर्धारित करना।।
  5. नमूने के रूप में पर्याप्त मात्रा में कृषि-पदार्थ ले लेना आदि। यही कारण है कि उपर्युक्त कटौतियों से बचने की दृष्टि से किसान गाँवों में अपनी उपज बेचने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

8. कीमतों के बारे में सूचना का अभाव- यातायात, परिवहन तथा संचार सुविधाओं के अभाव व अशिक्षा के कारण किसानों को मण्डी में प्रचलित अथवा सम्भावित कीमतों की सूचना नहीं मिलती और व्यापारी तथा महाजन झूठी सूचनाएँ देकर उन्हें ठग लेते हैं।

9. अन्य दोष-

  1. किसान का रूढ़िवादी, अन्धविश्वासी, अशिक्षित एवं सरल होना, जिसकी वजह से व्यापारी व्यक्तिगत सम्बन्धों की दुहाई देकर तथा सहानुभूति दिखाकर उसे ठगने में सफल हो जाते हैं।
  2. निर्धनता तथा ऋणग्रस्तता के कारण कृषक तत्काल माल बेचने के लिए बाध्य होता है, जिससे उसे कृषि उपज का कम मूल्य प्राप्त होता है।
  3. कृषिपदार्थों में मिलावट होना, जिससे उपज की एक निश्चित मात्रा कटौती के रूप में रख ली जाती है।।
  4. बिक्री के लिए कम अतिरिक्त उपज का होना।
    इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में कृषि विपणन-व्यवस्था अनेक दोषों से युक्त है।

कृषि उपज की विपणन व्यवस्था को सुधारने के लिए सुझाव

1. कृषक को महाजन-साहूकार के चंगुल से निकालने के लिए सस्ते ब्याज की दर पर वित्तीय | सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
2. परिवहन के सस्ते व पर्याप्त साधन विकसित किए जाएँ, ताकि कृषक अपनी उपज को मण्डी में ले | जाकर उचित कीमतों पर बेच सकें।
3. नियन्त्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।
4. मण्डी में बाँटों का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाए।
5. व्यापक स्तर पर भण्डार व गोदाम बनाए जाएँ।
6. कृषि उपज की बिक्री के लिए स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की 
जाए।
7. किसानों में शिक्षा का प्रसार किया जाए।

प्रश्न 13.
उपदान (Subsidy) से क्या आशय है? उपदान के पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर
उपदान का अर्थ वस्तुओं के मूल्य में भारी उच्चावचों का अर्थव्यवस्था पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। ये उच्चावच आर्थिक स्थिरता में बाधक बनते हैं। अतः सरकार आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को नीचे स्तर पर रखने का प्रयास करती है। जब सरकार वस्तुओं के मूल्यों को नीचे स्तर पर बनाए रखने के लिए उत्पादकों, वितरकों तथा निर्यातकों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है तो इस प्रकार की आर्थिक सहायता को उपदान कहा जाता है। प्रारम्भ में निर्यात प्रोत्साहन हेतु सरकार आर्थिक सहायता प्रदान करती थी ताक़ि निर्यातक कम मूल्यों पर वस्तुओं का निर्यात कर सकें और निर्यातों में तेजी से वृद्धि हो सके। कम मूल्यों पर वस्तुओं का निर्यात करने से निर्यातकों को जो हानि होती थी, सरकार उसे उपदान देकर पूरा करती थी। आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को कम रखने के लिए सरकार द्वारा उपदान दिए जाते रहे हैं।

उपदान के पक्ष में तर्क

  1. भारत में कृषि क्षेत्र के विस्तार की सम्भावनाएँ सीमित हैं। अत: कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए गहन कृषि को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। गहन कृषि की सफलता आदाओं की उपलब्धता पर निर्भर करती है। ये आदाएँ हैं-पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ, अधिकाधिक उपजदायी बीज तथा रासायनिक उर्वरकों का भरपूर उपयोग। इनकी उपलब्धि सीमित है और उत्पादन लागत ऊँची। निर्धन किसानों के लिए इन सुविधाओं का बाजार मूल्य पर क्रय असम्भव है। अत: इनका कुछ भार सरकार को वहन करना चाहिए।
  2. कम मूल्य पर आदाएँ मिलने से छोटे किसान भी आधुनिक तकनीकी को अपना सकेंगे। इसके परिणामस्वरूप छोटे किसान भी अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सकेंगे।
  3. गहन कृषि से कृषि क्षेत्र में आये और रोजगार में वृद्धि होगी, फसल ढाँचे में परिवर्तन होगा, व्यावसायिक फसलों के उत्पादन में वृद्धि होगी तथा आर्थिक असमानताओं में कमी आएगी।

अपदान के विपक्ष में तर्क
उपदान के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

1. उपदान पर दी जाने वाली राशि में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इसका सरकारी बजट पर भारी बोझ पड़ता है।
2. उपदान से संसाधनों का अपव्यय होता है। इस अपव्यय के मुख्य कारण हैं

  • संसाधनों का दोषपूर्ण आवंटन,
  • कम कीमत पर मिलने से साधनों के दुरुपयोग की सम्भावना तथा
  • कुशल प्रबन्धन के लिए प्रेरणा का अभाव।

3. उपदान के वितरण में भारी विषमताएँ विद्यमान हैं। इससे आर्थिक विषमताएँ भी बढ़ने लगती हैं।

प्रश्न 14.
भारत में कृषि वित्त के वर्तमान स्रोतों की चर्चा कीजिए।
उत्तर
भारत में कृषि वित्त के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं
1. ग्रामीण, साहूकार व महाजन- ये प्रायः सम्पन्न किसान तथा भूमिपति होते हैं। ये कृषि के साथ-साथ लेन-देन का भी कार्य करते हैं। ये लोग कृषि के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी पैसा उधार देते हैं।

2. देशी बैंकर- देशी बैंकर दो प्रकार के कार्य करते हैं-बैंकिंग कार्य तथा गैर-बैंकिंग कार्य। बैंकिंग कार्यों में निक्षेपों को स्वीकार करना, ऋण देना तथा हुण्डियों में व्यवसाय सम्मिलित होता है। ये , ऋणों पर-ऊँची ब्याज दर लेते हैं।

3. सरकार- कृषि-वित्त की आवश्यकताओं को देखते हुए सरकार ने अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन ऋण की व्यवस्था की है। ये ऋण ‘तकावी ऋण’ कहे जाते हैं। सरकार भू-सुधार ऋण अधिनियम, 1883 के अनतर्गत दीर्घकालीन ऋण तथा कृषक ऋण अधिनियम, 1884 के अधीन अल्पकालीन ऋण प्रदान करती है। दीर्घकालीन ऋण भूमि पर स्थायी सुधार के उद्देश्य से प्रदान किए जाते हैं, जबकि अल्पकालीन ऋण कृषि सम्बन्धी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा अकाल, बाढ़ या अन्य किसी कारण से फसल नष्ट होने पर दिए जाते हैं। सरकार इन ऋणों पर बहुत कम ब्याज लेती है। परन्तु फिर भी ये ऋण अधिक प्रभावशाली तथा लोकप्रिय नहीं हैं।

4. सहकारी समिति- इन समितियों का उद्देश्य कृषि विकास के लिए कम ब्याज की दर पर पर्याप्त साख सुविधाएँ प्रदान करना है। ये समितियाँ अल्पकालीन तथा मध्यकालीन ऋणों के अतिरिक्त अनुत्पादक ऋण भी प्रदान करती हैं। ऋण प्रदान करने के अतिरिक्त इन समितियों का । उद्देश्य किसानों में बचत आन्दोलन को प्रोत्साहित करना एवं उनका मानसिक व नैतिक उत्थान करना भी है।

5. व्यापारिक बैंक-  राष्ट्रीयकरण के बाद कृषि साख के क्षेत्र में व्यापारिक बैंकों का योगदान निरन्तर बढ़ा है। ये बैंक कृषि विस्तार के लिए अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण प्रदान करते हैं।

6. भारतीय स्टेट बैंक-  स्टेट बैंक तथा उसके सहायक बैंक सहकारी संस्थाओं के माध्यम से कृषि क्षेत्र को उदारता के साथ साख प्रदान कर रहे हैं। कृषि साख के क्षेत्र में स्टेट बैंक निम्नलिखित प्रकार से योगदान करता है

  • प्रत्यक्ष उधार- फसल के बोने से लेकर काटने तक, सँवारने तथा सुरक्षित रखने और बिक्री करने आदि सभी कार्यों के लिए स्टेट बैंक धन की व्यवस्था करता है। इसके अतिरिक्त पशुपालन, डेयरी व्यवसाय, मुर्गी पालन तथा फलोत्पादन के लिए स्टेट बैंक परिवार ऋण प्रदान करता है।
  • परोक्ष उधार-रासायनिक खाद, बीज, जन्तुनाशक तत्त्व, पम्पिंग सैट तथा ट्रैक्टर के लिए भी स्टेट बैंक ऋण प्रदान करता है।

7. भूमि बन्धक अथवा भूमि विकास बैंक-ये बैंक भूमि की जमानत पर किसानों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं। ये बैंक उत्पादक तथा अनुत्पादक दोनों प्रकार का ऋण प्रदान करते हैं।

8. भारतीय रिजर्व बैंक- यह बैंक किसानों को प्रत्यक्ष रूप से सात प्रदान न करके सहकारी बैंकों के माध्यम से साख प्रदान करता है। रिजर्व बैंक अल्पकालीन साख या तो पुनर्कटौती के रूप में अथवा अग्रिमों के रूप में प्रदान करता है। रिजर्व बैंक दीर्घकालीन ऋण भी प्रदान करता है। ये ऋण राज्य सरकारों को दिए जाते हैं, जिससे वे सहकारी साख संस्थाओं के शेयर क्रय कर सकें। इसके अतिरिक्त रिजर्व बैंक केन्द्रीय भूमि बन्धक बैंकों के ऋण-पत्र भी खरीद सकता है।

9. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- ये बैंक ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा भूमिहीन श्रमिकों की साख सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। ये कृषकों को उपकरण, यन्त्र और पशु खरीदने तथा गोबर गैस संयन्त्र लगाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।

10. कृषि व ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NABARD)-12 जुलाई, 1982 ई० से कृषि

एवं ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NABARD) की स्थापना की गई, जो कृषि के लिए
निम्नलिखित प्रकार से साख की व्यवस्था करेगा

  1. यह 18 महीने तक की अवधि के लिए अल्पकालीन साख राज्य सहकारी बैंकों, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं को प्रदान करेगा, ताकि उसका उपयोग कृषि कार्यों के विशिष्ट उत्पादन व बिक्री क्रियाओं के लिए किया जा सके।
  2. 18 महीने से 7 वर्ष के लिए मध्यकालीन ऋण राज्य सहकारी बैंकों व प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों को कृषि विकास व इनके द्वारा निर्धारित अन्य कार्यों के लिए दिए जाएँगे।
  3. पुनर्वित के रूप में दीर्घकालीन ऋण भूमि विकास बैंकों, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों, अनुसूचित बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं को कृषिगत व ग्रामीण विकास के लिए दिए जाएँगे।
  4. यह राज्य सरकारों को 20 वर्ष तक के लिए ऋण दे सकेगी, ताकि वे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सहकारी साख समितियों की शेयर पूँजी में हिस्सा ले सकें।
  5. यह केन्द्रीय सरकार की स्वीकृति पर किसी भी अन्य संस्था को दीर्घकालीन ऋण दे सकेगा, ताकि कृषि व ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन दिया जा सके।
    इस बैंक को कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम (ARDC) तथा राष्ट्रीय कृषि साख (दीर्घकालीन) कोष एवं राष्ट्रीय कृषि साख (स्थायीकरण) कोष के सभी कार्य हस्तान्तरित कर दिए गए हैं।

प्रश्न 15.
औद्योगीकरण से क्या आशय है? उत्पादन के प्रकार व स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए
उत्तर

औद्योगीकरण का अर्थ

औद्योगीकरण से आशय विज्ञान एवं तकनीक की सहायता से नवीन उपयोगिताओं या मूल्यों के निर्माण से लगाया जाता है। जब उद्योगों की श्रृंखला व्यापक रूप धारण कर लेती है, तो यह प्रक्रिया बन जाती है, जिसे ‘औद्योगीकरण’ कहते हैं। संकुचित अर्थ में, औद्योगीकरण से आशय निर्माण उद्योगों की स्थापना से है परन्तु व्यापक अर्थ में औद्योगीकरण की प्रक्रिया केवल निर्माण उद्योगों की स्थापना तक ही सीमित नहीं है, वरन् इसके द्वारा किसी भी राष्ट्र की सम्पूर्ण आर्थिक संरचना को परिवर्तित किया जा सकता है।

उत्पादन के प्रकार के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण

उत्पादन के प्रकार के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों को मोटे तौर पर चार प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत । किया जा सकता है
1. आधारभूत उद्योग- आधारभूत उद्योग वे उद्योग होते हैं, जो सभी महत्त्वपूर्ण उद्योगों और कृषि को 
आवश्यक आदाएँ (इनपुट्स) प्रदान करते हैं। इनमें कच्चा लोहा, कोयला, उर्वरक, कॉस्टिक सोडा, सीमेंट, स्टील, ऐलुमिनियम, बिजली आदि सम्मिलित हैं।

2. पूँजी वस्तु उद्योग- पूँजी वस्तु उद्योग वे उद्योग होते हैं, जो सभी उद्योगों एवं कृषि के लिए मशीनरी व उपकरणों का उत्पादन करते हैं। इन उद्योगों में मशीनी औजार, ट्रैक्टर, बिजली के ट्रान्सफॉर्मर, मोटरवाहन आदि सम्मिलित हैं।

3. मध्यवर्ती वस्तु उद्योग- ये उद्योग उन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जो किन्हीं दूसरे उद्योगों की उत्पादन प्रक्रिया में प्रयोग की जाती हैं अथवा उद्योगों में पूँजी वस्तुओं के सहायक उपकरणों में प्रयोग की जाती हैं; जैसे-ऑटोमोबाइल, टायर्स और पेट्रोलियम-रिफाइनरी उत्पाद। ।

4. उपभोक्त वस्तु उद्योग- ये उद्योग ऐसी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जिनको प्रत्यक्ष रूप से उपभोग किया जाता है; जैसे-वस्त्र, चीनी, कागज, बाइसिकल आदि।

उत्पादन के स्वामित्व के आधार पर बड़े पैमाने के उद्योगों का वर्गीकरण

उत्पादन के स्वामित्व के आधार पर देश के बड़े पैमाने के उद्योगों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग-इन उद्योगों पर सरकार का स्वामित्व होता है।
  2. निजी क्षेत्र के उद्योग-इन उद्योगों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है।
  3. संयुक्त क्षेत्र के उद्योग-इन उद्योगों पर सरकार एवं निजी व्यक्ति दोनों का स्वामित्व होता है।


प्रश्न 16.
भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के मुख्य कारण क्या हैं? भारत में बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
या भारतीय उद्योगों में निम्न उत्पादकता के क्या कारण हैं। इस दिशा में सरकार ने क्या किया है?
उत्तर

भारतीय उद्योगों के पिछड़ेपन के कारण

या

भारतीय उद्योगों में निम्न उत्पादकता के कारण

स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में अपेक्षित औद्योगिक विकास नहीं हो सका था। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की भारत पर थोपी गई दोषपूर्ण आर्थिक नीति थी। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। सन् 1948 ई० में संसद में भारत सरकार की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा की गई, जिसमें समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे। द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में भारत में विशाल स्तरीय एवं आधारभूत उद्योगों की स्थापना पर विशेष बल दिया गया। 67 वर्षों से निरन्तर औद्योगिक विकास पर बल देते रहने के बावजूद हमारा देश आज भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। इसके मुख्य कारण अग्रलिखित हैं

1. प्रौद्योगिकी सुधार के लिए प्रेरणाओं का अभाव- भारतीय उत्पादन तकनीक अभी भी पिछड़ी है। भारतीय उद्यमी नवीनतम तकनीक को अपनाने के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं हो पाते। इसका कारण अभी भी पर्याप्त नियन्त्रणों का पाया जाना है।

2. स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना- उद्योग अपनी स्थापित क्षमता के 75% भाग को भी | उपयोग नहीं कर पाते हैं, इससे अपव्यय बढ़ जाते हैं।

3. पूँजीगत व्ययों में वृद्धि- भारतीय उद्योगों में पूँजीगत व्यय अत्यधिक ऊँचे हैं, जिसके कारण इन उद्योगों की लाभदायकता का स्तर नीचे गिर गया है।

4. अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रमों का अभाव- उद्योगों का आकार छोटा होने तथा वित्तीय सुविधाओं की कमी के कारण इन उद्योगों में अनुसन्धान एवं विकास कार्यक्रम नहीं हो पाते हैं।

5. अनुत्पादक व्ययों की अधिकता- भारतीय उद्योगों में अनुत्पादक व्यय सामान्य से अधिक रहे हैं, जिसका प्रभाव लागत में वृद्धि व उत्पादकता की कमी के रूप में पड़ा है।

6. उपक्रमों के निर्माण में देरी– देश में उद्योगों की स्थापना में निर्धारित समय से अधिक समय लगता है। इन उद्योगों की कार्यकुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इनकी निर्माण लागत भी बढ़ जाती है।

7. वित्तीय सुविधाओं का अपर्याप्त होना– भारतं में औद्योगिक बैंकों की पर्याप्त संख्या में स्थापना नहीं हो पायी है, जिससे उद्योगों को समय पर वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती।

8. अम-प्रबन्ध संघर्ष- भारत में औद्योगिक प्रबन्ध मधुर नहीं रहे हैं और आए दिन हड़ताल व तालाबन्दी होती रहती हैं। इनको औद्योगिक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

 बड़े पैमाने के उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु उठाए गए सरकारी कदम

देश में औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ाने, सभी को आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करने और औद्योगिक वातावरण को सुदृढ़ करने के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की गई है। इन उद्योगों की स्थापना अधिकांशतः सार्वजनिक क्षेत्रों में की गई है, जिनमें बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश किया गया है तथा बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोज्गार दिया गया है। इन उद्योगों के विकास के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं

  1. लाइसेन्सिग नीति को उदार बनाया गया है।
  2. राजकोषीय नीति के अन्तर्गत पर्याप्त कर-रियायतें दी गई हैं।
  3. औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम, 1951′ के अन्तर्गत विनिर्माण इकाइयों का पंजीकरण आवश्यक है और इन्हें इस अधिनियम के अन्तर्गत सरकार द्वारा निर्मित नियमों एवं अधिनियमों का पालन करना होता है।
  4. आधुनिक औद्योगिक तकनीक को अपनाने के लिए अनेक प्रकार की राजकोषीय एवं वित्तीय | प्रेरणाएँ दी जा रही हैं।
  5. उत्पादन लागतों को न्यूनतम करने के लिए सरकार द्वारा सभी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  6. प्रौद्योगिकीय सुधार और संयन्त्र के आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने दो कोषों की स्थापना की है
    (1) प्रौद्योगिकीय सुधार कोष एवं
    (2) पूँजी आधुनिकीकरण कोष।

प्रश्न 17.
लघु एवं कुटीर उद्योग को परिभाषित कीजिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में इन उद्योगों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
या भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु एवं कुटीर उद्योगों के महत्त्व को दर्शाइए।
उत्तर
लघु तथा कुटीर उद्योग विकेन्द्रित आर्थिक प्रगति के द्योतक माने जाते हैं। मॉरिस फ्रीडमैन ने कुटीर एवं लघु उद्योगों के दर्शन (Philosophy) की व्याख्या करते हुए लिखा है-“जहाँ विशाल उद्योगों का उद्देश्य लाभ कमाना और उनका आधार पूँजी है, वहाँ कुटीर एवं लघु उद्योगों का उद्देश्य जीवन की समृद्धि 
और उनका आधार धन न होकर स्वयं मनुष्य है। विशाल उद्योग पूँजी की सेवा करते हैं और लघु उद्योग । मानवता की।”

कुटीर उद्योग की परिभाषा

राजकोषीय आयोग 1949-50 ने कुटीर उद्योगों को इस प्रकार परिभाषित किया है-“एक कुटीर उद्योग वह (उद्दा: । जो कि पूर्णतः अथवा अंशतः श्रमिक के परिवार की सहायता से पूर्णकालीन अथवा अल्पकालीन व्यबसाय के रूप में चलाया जाता है।” कुटीर उद्योगों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  1. कुटीर उद्योग मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से सम्बद्ध होते हैं।
  2.  ये कृषि व्यवसाय से सम्बद्ध होते हैं।
  3.  इनमें अधिकांश कार्य मानवीय श्रम द्वारा किए जाते हैं।
  4. इन उद्योगों में मुख्यत: परिवार के सदस्य ही कार्यरत रहते हैं।

लघु उद्योग की परिभाषा ।

जहाँ तक लघु उद्योग का प्रश्न है, लघु उद्योगों की परिभाषा विभिन्न दृष्टिकोणों से की गई है। राजकोषीय आयोग (Fiscal Commission), 1949-50 ने लघु उद्योगों को इस प्रकार परिभाषित किया है-“एक लघु उद्योग वह है, जो मुख्यत: किराए के श्रमिकों द्वारा, जिनकी संख्या 10 से 50 तक के मध्य होती है, चलाया जाता है।” लघु उद्योग मण्डल के अनुसार-“वे सभी उद्योग लघु उद्योग में शामिल किए जाते हैं, जिनमें यदि शक्ति का प्रयोग होता है, तब 50 श्रमिक और जब शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाता है, तब 100 श्रमिक तक मजदूरी पर रखे जाते हैं तथा जिनमें १ 3 लाख से कम की पूँजी लगी होती है।” उपर्युक्त परिभाषा में श्रमिकों की संख्या तथा पूँजी की मात्रा को परिभाषा का आधार बनाया गया था, परन्तु भारत सरकार ने केन्द्रीय लघु स्तरीय उद्योग बोर्ड (Central Small Scale Industries Board) के सुझावों को स्वीकार करके लघु उद्योगों की एक नवीन परिभाषा दी है, जिसमें श्रम तथा यन्त्रीकरण को आधार न मानकर मशीन तथा संयन्त्रों (Plant and Machinery) में किए गए विनियोग को ही आधार मना है। 1 मार्च, 1967 से उन सभी औद्योगिक इकाइयों को लघु इकाई माना गया है। जिनमें मशीनों तथा संयन्त्रों पर है 7.5 लाख से कम पूँजी लगाई गई हो। वर्ष 1999 में यह राशि १ 1 करोड़ और 2014 में यह राशि के 5 करोड़ है। इस परिभाषा में नियोजित श्रमिकों की संख्या पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर तथा लघु उद्योगों का महत्त्व

इस तथ्य को आज भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि 67 वर्षों (स्वतन्त्रता के उपरान्त) से वृहत् स्तर के उद्योगों के विस्तार के बावजूद भारत अभी तक मुख्य रूप से लघु तथा कुटीर उद्योगों का देश है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर तथा लघु उद्योगों का विशिष्ट महत्त्व देखते हुए ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी, योजना आयोग तथा अन्य विभिन्न आयोगों ने एक स्वर से इनके विकास पर बल दिया। गांधी जी के शब्दों में, भारत का मोक्ष उसके कुटीर उद्योगों में निहित है।” संक्षेप में, निम्नलिखित तथ्यों से कुटीर तथा लघु उद्योगों का महत्त्व स्वयमेव ही स्पष्ट हो जाता है
1. रोजगार के स्रोत– भारत में इन उद्योग-धन्धों से लगभग 2.25 करोड़ लोगों को रोजगार प्राप्त | होता है। अकेले हथकरघाउद्योग से ही 75 लाख व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होता है।

2. आय व सम्पत्ति के सम वितरण में सहायक– कुटीर तथा लघु उद्योग पूँजी-प्रधान नहीं होते, जिससे पूँजी के संकेन्द्रण, आर्थिक सत्ता के केन्द्रीकरण तथा आर्थिक शोषण की प्रवृत्तियाँ उभर नहीं पातीं। इसके विपरीत, देश में स्वतः ही आय और सम्पत्ति के समान वितरण को प्रोत्साहन मिलता है।

3. अल्प पूँजी उद्योग- कुटीर तथा लघु उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं कि ये उद्योग श्रम-प्रधान (Labour Intensive) उद्योग हैं, पूँजी-प्रधान नहीं। कम पूँजी से ही इन उद्योगों की स्थापना हो जाती है।

4. कृषि में सहायक- भारत में कृषि की अल्प उत्पादकता का एक मूल कारण कृषि-भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव है, जिसके कारण खेतों में उत्पादन अनार्थिक होता चला जा रहा है।अत: कृषि-विकास के लिए यह आवश्यक है कि वहाँ से अतिरिक्त मानव-श्रम को हटाया जाए। यह कार्य लघु तथा कुटीर उद्योगों द्वारा ही सम्भव है। अतः देश में उद्योगों का विकास होना आवश्यक है।

5. विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति- बड़े उद्योगों में केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति पायी जाती है, जबकि इसके विपरीत, लघु तथा कुटीर उद्योग विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था की स्थापना करते हैं। आज के युग में विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का विशेष महत्त्व है।

6. कम सामाजिक लागत पर आर्थिक विकास– सामाजिक लागत से हमारा आशय उस व्यय से है, जो उत्पादन प्राप्त करने के लिए शेष समाज को करना पड़ता है। नगरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल, आवास तथा अन्य सुविधाओं पर किया जाने वाला व्यय इस मद के अन्तर्गत आता है। लघु तथा कुटीर उद्योग मुख्यत: गाँवों तथा छोटे नगरों में स्थापित किए जाते हैं। अत: इनकी सामाजिक लागत कम आती है।

7. अन्य लाभ-

  1.  ये उद्योग राष्ट्रीय आत्म-सम्मान के सर्वथा अनुकूल हैं क्योंकि इनमें प्रायः विदेशी पूँजी, श्रम अथवा कौशल आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  2. इन उद्योगों को उपभोक्ताओं की रुचि के अनुसार समायोजित किया जा सकता है।
  3. ये उद्योग औद्योगिक अशान्ति, हड़ताल, तालाबन्दी आदि से मुक्त रहते हैं और सहानुभूति, समानता, सहकारिता, एकता तथा सहयोग की भावना को जन्म देते हैं।
  4. ये उद्योग विदेशी विनिमय अर्जित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध हुए हैं।
  5. इन उद्योगों को चलाने के लिए विशेष शिक्षा तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती।
  6. कुटीर तथा लघु उद्योगों का माल अधिक टिकाऊ तथा कलात्मक होता है।
  7. ये उद्योग बड़े पैमाने के पूरक उद्योगों के रूप में विशेष उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
  8. ये उद्योग कृषकों के लिए वरदान हैं क्योंकि ये उन्हें मौसमी रोजगार प्रदान करते हैं।
  9. इन उद्योगों में बड़े उद्योगों की अपेक्षा कहीं अधिक स्थिरता तथा सुरक्षा पायी जाती है।
  10. मानवीय मूल्यों की दृष्टि से भी इन उद्योगों का विशेष महत्त्व है। ये उद्योग सामाजिक न्याय
    तथा आर्थिक सन्तोष के साथ-साथ समाज में अनुशासन बनाए रखते हैं। श्री बैकुण्ठ मेहता का मत है-“बाल-अपराध तथा दरिद्रता आदि के उन्मूलन के लिए लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।

प्रश्न 18.
बाजार यन्त्र से क्या आशय है? बाजार यन्त्र की विफलताओं की विवेचना कीजिए। ऐसी दशा में राज्य की क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर

बाजार यन्त्र का अर्थ

बाजारे यन्त्र एक स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित अवधारणा है। यह आर्थिक संगठन की एक ऐसी प्रणाली है जिसके अन्तर्गत प्रत्ये व्यक्ति-उपभोक्ता, उत्पादक और उत्पत्ति के साधनों के स्वामी के रूप में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ आर्थिक क्रियाओं को सम्पन्न करता है। प्रत्येक उपभोक्ता अपने लिए उपभोक्ता वस्तुओं के चुनाव में, प्रत्येक उत्पादक उत्पादन क्षेत्र के चुनाव में तथा प्रत्येक व्यवसयी अपना व्यवसाय चुनने में पूर्णतः स्वतन्त्र रहता है और प्रत्येक उत्पादक परस्पर लाभ के आधार पर माँग एवं पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के द्वारा निर्धारित कीमतों पर इच्छित मात्रा में क्रय-विक्रय कर सकता है, बजार यन्त्र का प्रमुख कार्य वस्तुओं व सेवाओं की माँग व पूर्ति में सन्तुलन स्थापित करते हुए उत्पादन क्षमता व प्रदा को अधिकतम करना है।

बाजार यन्त्र की असफलता

बाजार यन्त्र पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में ही स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करता है, तभी साधनों का विवेकपूर्ण आवंटन सम्भव होता है। उत्पादक वर्ग उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं एवं रुचियों को बाजार यन्त्र के माध्यम से ही जान पाता है और समाज में उसी के आधार पर उत्पादन की मात्रा और उसका स्वरूप निर्धारित करता है। इसी आधार पर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में कीमतें प्रतियोगितात्मक होती हैं और बाजार यन्त्र स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करता है। ऐसी दशा में साधनों का बँटवारा विवेकपूर्ण होता है और इस प्रकार बाजार यन्त्र अर्थव्यवस्था के संचालक का कार्य करता है। किन्तु बाजार यन्त्र का कार्यकरणे पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजर में ही सम्भव है। पूर्ण प्रतियोगिता एक आदर्श बाजार स्थिति है जो व्यवहार में कहीं नहीं पायी जाती। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक बाजार में अपूर्णताएँ पायी जाती हैं जिसके कारण बाजार व्यवस्था का संचालन दोषपूर्ण हो जाता है। बाजार व्यवस्था के असफल रहने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. बाजार में अल्पाधिकार या एकाधिकार की स्थिति को पाया जाना।
  2. बाह्यताओं (Externalities) के कारण लागत व लाभ में अनैच्छिक वृद्धि।
  3. पैमाने के वर्द्धमान प्रतिफल (Increasing Returns to Scale) को लागू होना।
  4. बीमा व भावी बाजार में अपूर्णता का पाया जाना।
  5. समायोजन की प्रक्रिया का धीमी गति से सम्पन्न होना।
  6. विपणन संस्थाओं में लचीलेपन का अभाव।
  7. उपभोक्ताओं व व्यवसायियों में उत्पादों, उत्पादों की कीमतों व उत्पाद सम्भावनाओं के विषय में गलत सूचना।
  8. व्यक्तियों का केवल ‘आर्थिक’ न बने रहना, उन पर परिवार, देशप्रेम, भक्ति आदि भावनाओं का प्रभाव।
  9. कार्यकुशलता का ह्रास।
  10. अधिकतम करने में तटस्थता।

राज्य की भूमिका

बाजार के उपर्युक्त दोषों के कारण बाजार यन्त्र के स्वतन्त्र कार्यकरण में बाधा पड़ी है। अत: अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। आधुनिक युग में सरकार अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करने लगी है; जैसे-आन्तरिक सुशासन, न्याय एवं व्यवस्था, बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा, सार्वजनिक निर्माण कार्य, खोज एवं अनुसन्धान, अनुदान एवं आर्थिक सहायता आदि। इस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में सरकार की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण एवं व्यापक हो गई है।
सरकार के प्रमुख आर्थिक कार्य तीन हैं

  1. प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करके, पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करते हुए, सार्वजनिक वस्तुओं का निर्माण करके सरकार कार्य दक्षिता में वृद्धि करती है।
  2. सार्वजनिक आगम एवं सार्वजनिक व्यय कार्यक्रमों द्वारा आय का पुनर्वितरण करके सरकार आर्थिक असमानताओं को कम करती है।
  3. राजकोषीय, मौद्रिक, आय एवं कीमत नीति द्वारा बेरोजगारी तथा मुद्रास्फीति को कम करके सरकार स्थायित्व के साथ विकास’ (Growth with Stability) के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करती है।

योजनाकाल में सरकार भी बचतकर्ता के रूप में पूर्णतः असफल रही। राजकोषीय घाटा बढ़ता रहा और साथ ही लोक व्यय भी। लोक व्यय में अनुत्पादक व्यय की राशि अधिक रही। दूसरे, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार होता रहा। इसके फलस्वरूप आन्तरिक ऋण में वृद्धि हुई और अर्थव्यवस्था ऋण-जाल में फँस गई। अतः 1980 के दशक में सरकार की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन किया जाने लगा और सरकार की असफलताएँ उजागर होने लगीं। जो परिणाम सामने आए, वे थे–विकास की धीमी गति, बचत दर में गिरावट, मुद्रास्फीति की ऊँची दर ऋणों में तीव्र वृद्धि, निर्धनता एवं बेरोजगारी की व्यापकता आदि। अतः राजनीति बदलकर हस्तक्षेपवादी बन गई। इसमें आयात प्रतिस्थापन पर बल दिया गया, आयातों पर संरक्षण शुल्क लगाए गए, सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई गई और निजी क्षेत्र को नियमित एवं नियन्त्रित किया गया।
एक ओर केन्द्रीय योजना तथा दूसरी ओर निजी स्वामित्व–इस प्रकार अर्थव्यवस्था का स्वरूप मिश्रित हुआ। धीरे-धीरे निजीकरण, उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण के रूप में आर्थिक सुधार किए गए, नियमनों एवं नियन्त्रणों को ढीला किया गया, साधनों के आवंटन के लिए बाजार यन्त्र को स्वीकार किया जाने लगा और प्रतियोगिता की लाभदायक भूमिका को स्वीकार किया गया। बाजार की असफलताओं को दूर करने, सामाजिक न्याय को पाने और आय के पुनर्वितरण द्वारा आर्थिक असमानताओं को कम करने पर बल दिया गया।

प्रश्न 19.
भारत की औद्योगिक नीति, 1956 की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
सन् 1948 में औद्योगिक नीति की घोषणा के बाद देश के राजनीतिक, आर्थिक तथा दार्शनिक चिन्तन में अनेक परिवर्तन आए। परिणामस्वरूप 30 अप्रैल, 1956 को नई औद्योगिक नीति की घोषणा की गई। इसकी प्रमुख विशेषताएँ, निम्नलिखित थीं
1. उद्योगों का त्रिवर्गीय विभाजन– इस नीति के अन्तर्गत समस्त उद्योगों को तीन समूहों में विभाजित किया गया-

  • प्रथम समूह में वे उद्योग हैं, जो पूर्ण-रूप से राज्य के एकाधिकार में रहेंगे। इस सूची में 17 महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं; जैसे-हथियार, गोला-बारूद और रक्षा सम्बन्धी अन्य सामग्री, परमाणु शक्ति, लोहा व इस्पात, लौह-इस्पात की भारी मशीनें, उद्योगों के लिए भारी संयन्त्र, खनिज तेल, लोहा, मैंगनीज, जिप्सम, गन्धक, सोना व हीरों का खनन, वायु तथा रेल परिवहन आदि।
  • द्वितीय समूह में वे उद्योग हैं, जिनके विकास में सरकार उत्तरोत्तर अधिक भाग लेगी। इस सूची में 12 उद्योग शामिल हैं। इसे हम मिश्रित क्षेत्र भी कह सकते हैं, इस वर्ग में छोटे खनिजों को छोड़कर अन्य खनिज, ऐलुमिनियम तथा अलौह धातुएँ, मशीनरी औजार, जीवन निरोधक तथा अन्य दवाएँ, उर्वरक, कृत्रिम रबड़, सड़क परिवहन आदि उद्योग शामिल हैं।
  • तृतीय समूह में शेष सभी उद्योगों को रखा गया है। इस श्रेणी में लगभग सभी उपभोक्ता उद्योग की जाते हैं। सरकार इन उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक वित्तीय तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान करेगी।

2. कुटीर तथा लघु उद्योग- सरकार कुटीर उद्योगों के विकास के लिए हर सम्भव सहायता देगी। सहायता कार्यक्रमों में इनकी वित्तीय तथा प्राविधिक कठिनाइयों का निवारण, औद्योगिक बस्तियों का विस्तार, ग्रामीण क्षेत्र में कार्यशालाओं की स्थापना, विद्युत सुविधाओं का विस्तार, औद्योगिक सहकारी समितियों का गठन, प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता आदि को शामिल किया गया।

3. निजी क्षेत्र का दायित्व– निजी क्षेत्र योजना आयोग द्वारा निर्धारित आर्थिक नीतियों तथा कार्यक्रमों के अनुसार कार्य करेगा और सरकार निजी क्षेत्र को बिना किसी भेदभाव के सहायता प्रदान करेगी।

अन्य प्रावधान

  1. सरकार भी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देगी।
  2. औद्योगिक शान्ति स्थापित करने के लिए सरकार श्रम को प्रबन्ध में उचित स्थान प्रदान करेगी और उनकी कार्य की दशाओं में सुधार करेगी।
  3. सरकार विदेशी पूँजी को आमन्त्रित करेगी तथा विदेशी पूँजी व स्वदेशी पूँजी में भेदभाव नहीं करेगी।
  4. नए-नए प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू किए जाएँगे।
  5. भारी एवं आधारभूत उद्योगों की स्थापना की जाएगी।
  6. देश के सभी वर्गों का समर्थन व सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया जाएगा।

प्रश्न 20.
वर्तमान औद्योगिक नीति, 1991 की मुख्य बातें बताइए।
उत्तर
सभी पूर्व औद्योगिक नीतियाँ देश के औद्योगिक विकास को गति नहीं दे सकीं। अतः उद्योगों पर लाइसेन्सिग व्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबन्धों को समाप्त करने तथा उद्योगों की कुशलता, विकास और तकनीकी स्तर को ऊँचा करने और विश्व बाजार में उन्हें प्रतियोगी बनाने की दृष्टि से 24 जुलाई, 1991 को तत्कालीन उद्यो: राज्यमन्त्री पी० जे० कुरियन द्वारा लोकसभा में औद्योगिक नीति, 1991 की घोषणा की गई। 
औद्योगिक नीति, 1991 की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(अ) नीतिगत विशेषताएँ

1. उदार औद्योगिक लाइसेन्सिग नीति– इस नीति के अन्तर्गत केवल 18 उद्योगों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेन्सिग व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। इन उद्योगों में कोयला, पेट्रोलियम, चीनी, चमड़ा, मोटरकार, बसें, कागज तथा अखबारी कागज, रक्षा उपकरण, औषध तथा भेषज शामिल हैं। वर्तमान में इनकी संख्या 6 रह गई।

2. विदेशी विनियोग को प्रोत्साहन- अधिकाधिक पूँजी विनियोग और उच्चस्तरीय तकनीक की आवश्यकता वाले उच्च प्राथमिकता प्राप्त उद्योगों में विदेशी पूँजी विनियोग को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया। ऐसे 34 उद्योगों में बिना किसी रोक-टोक तथा लालफीताशाही के 51% तक विदेशी पूँजी के विनियोग की अनुमति दी जाएगी।

3. विदेशी तकनीक- कुछ निश्चित सीमाओं के अन्तर्गत उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में तकनीकी समझौतों को स्वतः स्वीकृति प्रदान की जाएगी। यह व्यवस्था घरेलू बिक्री पर दिए जाने वाले 5%कमीशन और निर्यात पर दिए जाने वाले 8% कमीशन पर भी लागू होगी।

4. सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका- ऐसे सार्वजनिक उपक्रमों को अधिक सहायता प्रदान की जाएगी जो औद्योगिक अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए आवश्यक हैं। वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 3 है।

(ब) प्रक्रियात्मक विशेषताएँ

1. विद्यमान पंजीकरण योजनाओं की समाप्ति– औद्योगिक इकाइयों के पंजीयन के सम्बन्ध में विद्यमान सभी योजनाएँ समाप्त कर दी गई हैं।

2. स्थानीकरण नीति- ऐसे उद्योगों को छोड़कर, जिनके लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य नहीं है, 10 लाख से कम जनसंख्या वाले नगरों में किसी भी उद्योग के लिए औद्योगिक अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

3. विदेशों से पूँजीगत वस्तुओं का आयात– विदेशी पूँजी के विनियोग वाली इकाइयों पर पुर्जे, कच्चे माल सृथा तकनीकी ज्ञान के आयात के मामले में सामान्य नियम लागू होंगे, किन्तु रिजर्व बैंक विदेशों में भेज़े गए लाभांश पर दृष्टि रखेगा।

4. व्यापारिक कम्पनियों में विदेशी अंश पूँजी– अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाने की दृष्टि से निर्यातक व्यापारिक कम्पनियों में भी 51% तक विदेशी पूँजी के विनियोग की अनुमति दी जाएगी।

5. सार्वजनिक उपक्रमों का कार्यकरण– निरन्तर वित्तीय संकट में रहने वाले सार्वजनिक उपक्रमों की जाँच औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (BIFR) करेगा। छंटनी किए गए कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना बनाई जाएगी।

6. विद्यमान इकाइयों का विस्तार एवं विविधीकरण- विद्यमान औद्योगिक इकाइयों को नई विस्तृत पट्टी की सुविधा दी गई है। विद्यमान इकाइयों का विस्तार भी पंजीयन से मुक्त रहेगा।

अन्य विशेषताएँ 

  1. 26 मार्च, 1993 से उन 13 खनिजों को जो पहले सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित थे, निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है।
  2. आरम्भ में ही कम्पनियों में रुग्णता का पता लगाने और उपचारात्मक उपायों को तेजी से लागू करने के लिए दिसम्बर, 1993 में रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष उपबन्ध) अधिनियम, 1985 में संशोधन किया गया।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
Number of Questions 154
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य-साहित्यका विकास अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
गद्य एवं पद्य का अन्तर दो पंक्तियों में लिखिए।
उत्तर:
वाक्यबद्ध विचारात्मक रचना को गद्य कहते हैं। दैनिक जीवन की बोलचाल में गद्य का ही प्रयोग होता है, जब कि छन्दबद्ध, भावपूर्ण और गेय रचनाएँ पद्य कहलाती हैं।

प्रश्न 2:
हिन्दी की आठ बोलियाँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. ब्रज,
  2. अवधी,
  3. बुन्देली,
  4. बघेली,
  5. छत्तीसगढ़ी,
  6. हरियाणवी,
  7. कन्नौजी तथा
  8.  खड़ी बोली।

प्रश्न 3:
हिन्दी गद्य के प्राचीनतम प्रयोग किन भाषाओं में मिलते हैं?
उत्तर:
हिन्दी गद्य के प्राचीनतम प्रयोग राजस्थानी और ब्रज भाषाओं में मिलते हैं।

प्रश्न 4:
प्राचीन ब्रज भाषा गद्य की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
गोकुलनाथ कृत ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ और बैकुण्ठमणि कृत ‘अगहन माहात्म्य’; प्राचीन ब्रज भाषा गद्य की रचनाएँ हैं।

प्रश्न 5:
खड़ी बोली गद्य की प्रथम प्रामाणिक रचना तथा उसके लेखक का नाम व समय लिखिए।
या
खड़ी बोली गद्य की प्रामाणिक रचनाएँ कब से प्राप्त होती हैं?
उत्तर:
रचनागोरा बादल की कथा। लेखक – जटमल।
समयसन् 1623 ई० (सत्तरहवीं शताब्दी से)।

प्रश्न 6:
खड़ी बोली गद्य की सबसे प्राचीन रचना कौन-सी है?
उत्तर:
खड़ी बोली गद्य की सबसे प्राचीन रचना कवि गंग द्वारा लिखित ‘चंद छंद बनने की महिमा है।

प्रश्न 7:
खड़ी बोली गद्य के दो प्रारम्भिक उन्नायकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
खड़ी बोली गद्य के दो प्रारम्भिक उन्नायक हैं

  1.  सदल मिश्र तथा
  2.  पं० लल्लूलाल।

प्रश्न 8:
भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य के चार प्रवर्तकों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
या
कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम कॉलेज के उन दो हिन्दी-शिक्षकों के नाम लिखिए, जिन्हें खड़ी बोली गद्य का प्रारम्भिक उन्नायक माना जाता है।
या
लल्लूलाल किस कॉलेज में हिन्दी-अध्यापक थे? उनकी प्रसिद्ध रचना का नाम लिखिए।
या
खड़ी बोली के प्रारम्भिक उन्नायकों में विशेष रूप से जिन चार लेखकों का उल्लेख किया जाती है, उनमें से किन्हीं दो की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
नासिकेतोपाख्यान’ के रचयिता कौन हैं? फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कहाँ हुई थी?
उत्तर:
भारतेन्दु से पूर्व हिन्दी गद्य के चार प्रवर्तकों के नाम निम्नलिखित हैं

  1.  इंशाअल्ला खाँ-रानी केतकी की कहानी।
  2. सदासुखलाल सुखसागर।।
  3.  लल्लूलाल-प्रेमसागर।
  4. सदल मिश्र – नासिकेतोपाख्यान।

इनमें सदल मिश्र तथा लल्लूलाल कलकत्ता के ‘फोर्ट विलियम कॉलेज में अध्यापक थे।

प्रश्न 9:
भारतेन्दु युग से पूर्व किन दो राजाओं ने हिन्दी गद्य के निर्माण में योग दिया?
या
हिन्दी गद्य की उर्दूप्रधान तथा संस्कृतप्रधान शैलियों के पक्षधर दो राजाओं के नाम लिखिए।
या
भारतेन्दु के उदय से पूर्व की खड़ी बोली के दो भिन्न शैलीकार गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
भारतेन्दु युग से पूर्व राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द’ ने अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी लिखकर तथा राजा लक्ष्मण सिंह ने संस्कृत मिश्रित खड़ी बोली को अपनाकर हिन्दी गद्य के निर्माण में योगदान दिया।

प्रश्न 10:
हिन्दी गद्य के विकास में ईसाई धर्म-प्रचारकों के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ईसाई पादरियों ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए ‘बाइबिल’ एवं अन्य धार्मिक पुस्तकों का साधारण बोलचाल की हिन्दी में अनुवाद करवाया।

प्रश्न 11:
भारतीय जागरण को देशव्यापी बनाने में किन संस्थाओं ने विशेष योगदान दिया?
उत्तर:

  1. आर्य समाज,
  2.  प्रार्थना समाज,
  3.  ब्रह्म समाज,
  4.  रामकृष्ण मिशन एवं
  5. थियोसॉफिकल सोसाइटी।।

प्रश्न 12:
मुंशी सदासुखलाल की भाषा की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. भाषा में अस्पष्टता अधिक है तथा
  2.  वाक्य-रचना पर फारसी शैली का प्रभाव है।

प्रश्न 13:
भारतेन्दु युग के किन्हीं दो लेखकों की दो-दो कृतियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
(1) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

  •  वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति तथा
  • अकबर और औरंगजेब।

(2) प्रतापनारायण मिश्र

  • (i) हठी हम्मीर तथा
  • (ii) देशी कपड़ा।

प्रश्न 14:
भारतेन्दु के समकालीन या भारतेन्दु युग के चार गद्य लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पं० बालकृष्ण भट्ट,
  2. प्रतापनारायण मिश्र,
  3.  किशोरीलाल गोस्वामी;
  4.  लाला श्रीनिवास दास।

प्रश्न 15:
खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास कब हुआ?
या
हिन्दी गद्य का विकास कब हुआ?
उत्तर:
भारतेन्दु युग में खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास हुआ।

प्रश्न 16:
भारतेन्दु युग की दो पत्रिकाओं एवं उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
या
भारतेन्दु युग की दो प्रसिद्ध पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  ब्राह्मण’-प्रतापनारायण मिश्र,
  2.  हिन्दी प्रदीप’-पं० बालकृष्ण भट्ट्ट।

प्रश्न 17:
भारतेन्दु युग के गद्य की मुख्य विशेषताएँ बताइट।
उत्तर:
भारतेन्दु युग के गद्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1.  भारतेन्दु युग का गद्य सरल-सरस है,
  2.  इसमें मुहावरों और लोकोक्तियों का अधिक प्रयोग हुआ है,
  3. इसमें तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है,
  4.  इसमें व्याकरण की त्रुटियाँ हैं।

प्रश्न 18:
भारतेन्दु युग में किन गद्य-विधाओं का विकास हुआ?
उत्तर:
भारतेन्दु युग में नाटक, कहानी, उपन्यास एवं निबन्ध गद्य-विधाओं का विकास हुआ।

प्रश्न 19:
हिन्दी खड़ी बोली गद्य-साहित्य के विकास में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान बताइए।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के गद्य की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लोक-प्रचलित शब्दावली, कहावतों, लोकोक्तियों और मुहावरों के प्रभावपूर्ण प्रयोग से अपनी भाषा को अधिकाधिक सशक्त एवं सजीव बनाया तथा नाटक, कहानी, निबन्ध आदि अनेक गद्य-विधाओं में रचनाएँ कीं। इसलिए इन्हें ‘हिन्दी खड़ी बोली गद्य का जनक’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 20:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख लेखकों की एक-एक रचना का नाम लिखिए।
या
द्विवेदी युग के दो प्रसिद्ध निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. बाबू श्यामसुन्दर दास साहित्यालोचन।
  2. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी – रसज्ञ- रंजन।

प्रश्न 21:
द्विवेदी युग में प्रकाशित चार पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. सरस्वती,
  2. मर्यादा,
  3.  माधुरी तथा
  4.  इन्दु।

प्रश्न 22:
द्विवेदी युग का समय बताइए और उस व्यक्ति का पूरा नाम बताइए, जिसके कारण इसे ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है।
उत्तर:
द्विवेदी युग का समय सन् 1900 ई० से 1920 ई० तक है। इस युग को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर द्विवेदी युग’ कहा जाता है।

प्रश्न 23:
द्विवेदी युग के हिन्दी गद्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग का हिन्दी गद्य व्याकरण-सम्मत, परिमार्जित तथा पद-विन्यास व वाक्य-विन्यास से युक्त है। इसमें औदात्य, पाण्डित्य एवं प्रवाह है। इसकी भाषा-शैली अत्यन्त परिष्कृत, सामासिक तथा प्रवाहपूर्ण है।

प्रश्न 24:
‘शुक्ल युग’ को यह नाम क्यों दिया गया है?
या
हिन्दी-काव्य के ‘छायावाद युग के समय को हिन्दी गद्य-साहित्य में शुक्ल युग’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
सन् 1919 ई० से 1938 ई० तक के काल को हिन्दी गद्य-साहित्य में पं० रामचन्द्र शुक्ल के महत्त्वपूर्ण योगदान के कारण ‘शुक्ल युग’ अथवा ‘छायावाद युग’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 25:
आलोचना, नाटक, उपन्यास एवं कहानी के क्षेत्र में प्रसिद्ध शुक्ल युग के तीन गद्य-रचनाकारों के नाम बताइट।
उत्तर:
शुक्ल युग के तीन प्रमुख गद्य-रचनाकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचन्द हैं, जो क्रमशः आलोचना, नाटक, उपन्यास एवं कहानी के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 26:
शुक्ल युग के प्रमुख गद्यकारों के नाम बताइए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद, रामचन्द्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, नन्ददुलारे वाजपेयी, महादेवी वर्मा, राय कृष्णदास, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि शुक्ल युग के प्रमुख गद्यकार हैं।

प्रश्न 27:
‘शुक्ल युग’ को अन्य किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर:
शुक्ल युग को ‘छायावाद युग’, ‘प्रसाद युग’ एवं ‘प्रेमचन्दयुग’ नामों से जाना जाता है।

प्रश्न 28:
छायावाद युग के किन्हीं दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  चन्द्रगुप्त तथा
  2.  अजातशत्रु।।

प्रश्न 29:
छायावाद युग में गद्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख लेखकों एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद (चन्द्रगुप्त), प्रेमचन्द (गबन, गोदान), बाबू गुलाबराय (मेरी असफलताएँ) तथा रामचन्द्र शुक्ल (चिन्तामणि) आदि छायावाद युग में गद्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 30:
छायावादयुगीन किन्हीं दो ऐसे गद्य-लेखकों के नाम बताइट जो कवि न हों।
उत्तर:
छायावादयुगीन गद्य-लेखक राहुल सांकृत्यायन एवं बाबू गुलाबराय कवि नहीं थे।

प्रश्न 31:
ऐसे तीन गद्य-लेखकों के नाम लिखिए, जिन्होंने द्विवेदी युग तथा छायावाद युग दोनों में लेखन-कार्य किया।
उत्तर:
द्विवेदी युग और छायावाद युग दोनों में लेखन कार्य करने वाले तीन गद्य-लेखक निम्नलिखित हैं

  1.  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,
  2. बाबू गुलाबराय तथा
  3. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी।

प्रश्न 32:
छायावादी युग के गद्य की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. छायावादी युग का गद्य कलात्मक है तथा
  2.  उसमें विशिष्ट अभिव्यंजना शक्ति, कल्पना की प्रधानता, स्वच्छन्द चेतना, अनुभूति की सघनता और भावुकता विद्यमान है।

प्रश्न 33:
किन्हीं दो छायावादी पद्य-लेखकों की एक-एक गद्य रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  जयशंकर प्रसाद – चन्द्रगुप्त (नाटक)।
  2. ( महादेवी वर्मा – स्मृति की रेखाएँ (संस्मरण)।

प्रश्न 34:
छायावादोत्तर युग की प्रमुख गद्य-विधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नाटक, कहानी, उपन्यास, समालोचना, जीवनी, गद्य-गीत, एकांकी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, संस्मरण एवं रेखाचित्र आदि छायावादोत्तर युग की प्रमुख गद्य-विधाएँ हैं।

प्रश्न 35:
छायावादोत्तर युग का प्रारम्भ कब से माना जाता है?
उत्तर:
छायावादोत्तर (शुक्लोत्तर) युग का प्रारम्भ सन् 1938 ई० से और समापन सन् 1947 ई० तक माना जाता है।

प्रश्न 36:
छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरिशंकर परेसाई, यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, धर्मवीर भारती, विद्यानिवास मिश्र, कमलेश्वर आदि छायावादोत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखक हैं।

प्रश्न 37:
छायावादोत्तर हिन्दी गद्य (प्रगतिवादी गद्य) की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर काल का हिन्दी गद्य सहज, व्यावहारिक और अलंकारविहीन था। उसमें भावुकतापूर्ण अभिव्यक्ति का स्थान चुटीली उक्तियों ने ले लिया था।

प्रश्न 38:
छायावादोत्तर युग के दो कहानी लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

प्रश्न 39:
छायावादोत्तर युग के दो लेखकों की एक-एक गद्य-रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ – अर्द्धनारीश्वर।
  2. धर्मवीर भारती – गुनाहों के देवता।

प्रश्न 40:
छायावादोत्तरयुगीन साहित्यकारों की दोनों पीढ़ियों के एक-एक साहित्यकार का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  पहली पीढ़ी – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
  2. दूसरी पीढ़ी – डॉ० विद्यानिवास मिश्र।।

प्रश्न 41:
छायावादोत्तर युग में प्रारम्भ एवं समृद्ध होने वाली प्रकीर्ण गद्य-विधाओं में से किन्हीं दो विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, गद्यकाव्य, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, डायरी, भेटवार्ता, पत्र-साहित्य आदि हिन्दी की गौण या प्रकीर्ण गद्य-विधाएँ हैं।

प्रश्न 42:
स्वातन्त्र्योत्तर युग के प्रमुख गद्य-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
स्वातन्त्र्योत्तर युग में विद्यानिवास मिश्र, हरिशंकर परसाई, फणीश्वरनाथ रेणु’, धर्मवीर भारती, प्रभाकर माचवे, रजनी पणिक्कर, मोहन राकेश, मन्नू भण्डारी, शिवानी, नागार्जुन आदि प्रमुख गद्य-लेखक हुए।

प्रश्न 43:
हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
निबन्ध, नाटक, कहानी, उपन्यास, ‘एकांकी तथा आलोचना हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाएँ हैं।

प्रश्न 44:
हिन्दी गद्य की विविध विधाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  नाटक,
  2. उपन्यास,
  3.  एकांकी,
  4. कहानी,
  5. निबन्ध,
  6. आलोचना,
  7. आत्मकथा,
  8.  जीवनी,
  9. यात्रावृत्त,
  10.  रेखाचित्र,
  11. संस्मरण,
  12.  गद्यकाव्य,
  13. रिपोर्ताज,
  14.  डायरी,
  15. रेडियो-रूपक,
  16.  भेटवार्ता आदि।

प्रश्न 45:
प्रकीर्ण गद्य-विधाओं का अभूतपूर्व विकास किस युग में हुआ?
उत्तर:
प्रकीर्ण गद्य – विधाओं का अभूतपूर्व विकास छायावादोत्तर युग में हुआ।

प्रश्न 46:
(i) भारतेन्दु युग के निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(i) द्विवेदी युग के निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(iii) रामचन्द्र शुक्ल और उनके बाद शुक्लोत्तर युग के दो प्रमुख निबन्धकारों के नाम लिखिए।
(iv) स्वातन्त्र्योत्तर युग के दो निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
(i) भारतेन्दु युग – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट।
(ii) द्विवेदी युग –  आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, पद्मसिंह शर्मा, सरदार पूर्णसिंह।
(iii) शुक्ल युग – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, गुलाबराय, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
शुक्लोत्तर युग – डॉ० नगेन्द्र, श्रीमती महादेवी वर्मा, वासुदेवशरण अग्रवाल।
(iv) स्वातन्त्र्योत्तर युग – विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय।

प्रश्न 47:
विषय और शैली की दृष्टि से निबन्ध के प्रमुख कितने भेद हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
विषय और शैली की दृष्टि से निबन्ध के निम्नलिखित प्रमुख चार भेद हैं

  1.  विचारात्मक निबन्ध,
  2. भावात्मक निबन्ध,
  3.  वर्णनात्मक निबन्ध तथा
  4.  विवरणात्मक निबन्ध।

प्रश्न 48:
निबन्ध की परिभाषा लिखिए तथा उसके चार भेदों में से किसी एक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
निबन्ध उस गद्य-रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के अन्तर्गत किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन; एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता और सम्बद्धता के साथ किया गया हो। निबन्ध का एक भेद, वर्णनात्मक निबन्ध है।

प्रश्न 49:
हिन्दी में निबन्ध-रचना का आरम्भ किस युग में माना जाता है? दो युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में निबन्ध-रचना का आरम्भ भारतेन्दु युग से माना जाता है। हिन्दी के दो युग-प्रवर्तक निबन्धकार आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं।

प्रश्न 50:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किस प्रकार के निबन्धों की रचना की?
उत्तर:
शुक्ल जी ने विचारप्रधान, समीक्षात्मक तथा मनोवैज्ञानिक निबन्धों की रचना की।

प्रश्न 51:
हिन्दी के प्रमुख भावात्मक निबन्धकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी के भावात्मक निबन्ध लिखने वालों में वियोगी हरि, सरदार पूर्णसिंह, राय कृष्णदास, रघुवीर सिंह, महादेवी वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा विद्यानिवास मिश्र प्रमुख हैं।

प्रश्न 52:
हिन्दी के दो युग-प्रवर्तक निबन्ध लेखकों और उनकी एक-एक निबन्ध पुस्तक के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  महावीर प्रसाद द्विवेदी – ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित निबन्ध।
  2. रामचन्द्र शुक्ल – चिन्तामणि (दो भागों में)।

प्रश्न 53:
प्रमुख ललित निबन्ध लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, विद्यानिवास मिश्र आदि ललित निबन्धों के प्रमुख लेखक हैं।

प्रश्न 54:
कहानी के कौन-कौन से तत्त्व होते हैं?
उत्तर:
कहानी के सात तत्त्व होते हैं

  1.  शीर्षक,
  2.  कथावस्तु या कथानक,
  3. पात्र और चरित्र-चित्रण,
  4. कथोपकथन या संवाद,
  5. देशकाल या वातावरण,
  6. भाषा-शैली तथा
  7. उद्देश्य।

प्रश्न 55:
कहानी की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1.  लघु कथानक,
  2.  पात्र एवं चरित्र – चित्रण,
  3.  मुख्य रूप से एक ही विषय, भाव अथवा संवेदना का प्रस्तुतीकरण तथा
  4.  निश्चित उद्देश्य – कहानी की मुख्य विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 56:
‘कहानी’ एवं ‘नयी कहानी में अन्तर बताइट।
उत्तर:
‘कहानी’ का व्यापक अर्थ नयी एवं पुरानी सभी प्रकार की कहानियों पर प्रभावी है, किन्तु कुछ विद्वान् ‘कहानी’ का अर्थ द्विवेदी युग की ‘आदर्शवादी’ कहानियों से लेते हैं, जिनमें रचनाकार आदर्श कल्पनाओं के आधार पर पात्रों का चरित्र रचते थे। द्विवेदी युग के बाद नयी कहानी’ का अर्थ यथार्थ एवं भोगे हुए सत्य को अभिव्यक्त करने वाली ऐसी कहानियों से लिया जाता है, जिनमें आदर्श की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पर बल दिया गया हो।

प्रश्न 57:
नयी कहानी की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
नयी कहानी जीवन के किसी मार्मिक तथ्य को नाटकीय प्रभाव के साथ व्यक्त करती है तथा उसमें यथार्थता एवं मनोवैज्ञानिकता होती है।

प्रश्न 58:
हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी का नाम बताइट।
उत्तर:
कहानी-कला की दृष्टि से किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ हिन्दी-साहित्य की प्रथम मौलिक कहानी है।

प्रश्न 59:
द्विवेदी युग के किन्हीं दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम बताइए।
उत्तर:

  1. प्रेमचन्द तथा
  2. जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 60:
हिन्दी के प्रमुख कहानीकारों के नाम बताइट।
उत्तर:
मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र कुमार, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, चतुरसेन शास्त्री, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, शैलेश मटियानी, मन्नू भण्डारी, अज्ञेय आदि हिन्दी के प्रमुख कहानीकार हैं।

प्रश्न 61:
प्रेमचन्द जी की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मन्त्र, ईदगाह, कफन, पंच परमेश्वर, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा आदि प्रेमचन्द की प्रमुख कहानियाँ हैं। प्रश्न

प्रश्न 62:
जयशंकर प्रसाद की प्रमुख कहानियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आकाशदीप, पुरस्कार, ममता, आँधी, इन्द्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि, गुण्डा आदि जयशंकर प्रसाद की प्रमुख कहानियाँ हैं।

प्रश्न 63:
प्रेमचन्दोत्तर किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में यशपाल एवं जैनेन्द्र प्रमुख हैं।

प्रश्न 64:
छायावादोत्तर युग के किन्हीं दो प्रसिद्ध कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा
  2.  हरिशंकर परसाई।

प्रश्न 65:
प्रेमचन्द्र के समकालीन कहानीकारों में से किन्हीं दो के नाम लिखिए।
उत्तर:
राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह एवं विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ प्रेमचन्द के समकालीन कहानीकार थे। इनकी कहानियों में क्रमशः ‘कानों में कैंगना’ एवं ‘कलाकार का दण्ड’ लोकप्रिय हैं।।

प्रश्न 66:
आधुनिक युग की किन्हीं दो महिला कथाकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  मन्नू भण्डारी तथा
  2.  उषा प्रियंवदा।।

प्रश्न 67:
आधुनिक युग के किन्हीं दो कहानीकारों के नाम लिखिए।
या
प्रेमचन्द के बाद के किन्हीं दो प्रमुख कहानीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जैनेन्द्र कुमार, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय आदि आधुनिक युग के प्रसिद्ध कहानीकार हैं।

प्रश्न 68:
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध कहानीकार का नाम लिखिए।
उत्तर:
छायावादी युग के सबसे प्रसिद्ध कहानीकार जयशंकर प्रसाद थे।

प्रश्न 69:
हिन्दी के कहानी लेखकों में से किन्हीं दो की एक-एक कहानी का नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी के कहानी लेखकों में प्रेमचन्द एवं जयशंकर प्रसाद की एक-एक कहानी क्रमशः ‘नमक का दारोगा’ एवं ‘पुरस्कार’ है।

प्रश्न 70:
हिन्दी उपन्यास के विकास में प्रेमचन्द के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रेमचन्द ने ही प्रथम बार उपन्यास साहित्य को चमत्कार, मनोरंजन और प्रचार के स्तर से उठाकर यथार्थ जीवन के सत्य के साथ जोड़ा। उनका मन भारतीय कृषकों के जीवन की विषमताओं का मर्मस्पर्शी चित्रण करने में अधिक रमा।

प्रश्न 71:
हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम बताइट।
या।
हिन्दी के दो प्रसिद्ध उपन्यासकारों के नाम बताइट।
उत्तर:
प्रेमचन्द, भगवतीचरण वर्मा, वृन्दावनलाल वर्मा, यशपाल, जैनेन्द्र कुमार, चतुरसेन शास्त्री, सुदर्शन, इलाचन्द्र जोशी, फणीश्वरनाथ रेणु’, राजेन्द्र यादव, उदयशंकर भट्ट, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि।

प्रश्न 72:
हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यास एवं उसके लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:
लाला श्रीनिवास दास द्वारा लिखित परीक्षा-गुरु’ नामक उपन्यास, हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास है।

प्रश्न 73:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख उपन्यासकार हैं

  1.  किशोरीलाल गोस्वामी तथा
  2. देवकीनन्दन खत्री।

प्रश्न 74:
प्रेमचन्द युग के दो उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  प्रेमचन्द तथा
  2.  पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’।

प्रश्न 75:
शी प्रेमचन्द के प्रमुख उपन्यासों के नाम लिखिए।
या
प्रेमचन्द के दो प्रसिद्ध उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मुंशी प्रेमचन्द ने गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, प्रेमाश्रम, सेवासदन, निर्मला आदि उपन्यासों की रचना की।

प्रश्न 76:
जयशंकर प्रसाद के दो उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कंकाल’ और ‘तितली’।

प्रश्न 77:
आधुनिक काल की दो महिला उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  शिवानी तथा
  2. उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 78:
एक आंचलिक उपन्यास-उपन्यासकार का नाम लिखिए।
उत्तर:
फणीश्वरनाथ’रेणु’ द्वारा रचित ‘मैला आँचल’ तथा ‘परती परिकथा’ आंचलिक उपन्यास हैं।

प्रश्न 79:
प्रमुख आंचलिक उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
फणीश्वरनाथ रेणु’, रांगेय राघव, हिमांशु जोशी, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, देवेन्द्र सत्यार्थी और शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 80:
प्रेमचन्द के बाद आने वाले आधुनिक युग के प्रमुख उपन्यासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, जैनेन्द्र कुमार, उपेन्द्रनाथ अश्क’, मोहन राकेश, इलाचन्द्र जोशी, डॉ० धर्मवीर भारती, अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, रांगेय राघव, भगवतीचरण वर्मा आदि प्रेमचन्द के पश्चात् होने वाले प्रमुख उपन्यासकार हैं।

प्रश्न 81:
नाटक श्रव्य-काव्य है अथवा दृश्य-काव्य?
उत्तर:
नाटक दृश्य-काव्य है।

प्रश्न 82:
हिन्दी के प्रथम नाटक एवं उसके रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर:
गोपालचन्द्र गिरिधरदास द्वारा रचित ‘नहुष’ को हिन्दी का प्रथम नाटक माना जाता है।

प्रश्न 83:
हिन्दी के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, वृन्दावनलाल वर्मा, लक्ष्मीनारायण मिश्र, विष्णु प्रभाकर, सेठ गोविन्ददास, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ आदि हिन्दी के प्रमुख नाटककार हैं।

प्रश्न 84:
जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटकों के नाम लिखिए।
या
‘ध्रुवस्वामिनी’ किस विधा की रचना है?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, राज्यश्री तथा अजातशत्रु-जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक हैं।

प्रश्न 85:
जयशंकर प्रसाद के नाटक किस विषय पर आधारित हैं?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भारत के अतीत की गौरवपूर्ण संस्कृति, देशप्रेम, जीवन-जगत् की शाश्वत समस्याओं और मानव मन के अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण है।

प्रश्न 86:
प्रसादोत्तर (छायावादोत्तर) युग के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
या
आधुनिककाल के प्रमुख नाटककारों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. डॉ० रामकुमार वर्मा,
  2.  सेठ गोविन्ददास,
  3.  मोहन राकेश,
  4.  विष्णु प्रभाकर,
  5. उपेन्द्रनाथ अश्क’,
  6.  डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल एवं
  7.  धर्मवीर भारती।

प्रश्न 87:
हिन्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार का नाम बताते हुए उसके दो नाटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के एक ऐसे नाटककार हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक नाटकों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, राज्यश्री, अजातशत्रु आदि इनके ऐतिहासिक नाटक हैं।

प्रश्न 88:
हिन्दी के ऐतिहासिक नाटककारों एवं उनकै एक-एक नाटक का नाम लिखिए।
या
हिन्दी के किसी प्रसिद्ध नाटककार एवं उसके द्वारा रचित नाटक का नाम बताए।
या
‘राजमुकुट के नाटककार कौन हैं?
उत्तर:
हिन्दी के ऐतिहासिक नाटककार और उनके एक-एक नाटक का नाम निम्नलिखित है

  1.  जयशंकर प्रसाद – चन्द्रगुप्त,
  2.  हरिकृष्ण प्रेमी – रक्षाबन्धन,
  3. गोविन्दवल्लभ पन्त – राजमुकुट,
  4.  सेठ गोविन्ददास – हर्ष,
  5.  वृन्दावनलाल वर्मा – झाँसी की रानी,
  6.  लक्ष्मीनारायण मिश्र – वत्सराज।

प्रश्न 89:
हिन्दी एकांकी का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर:
हिन्दी एकांकी का आरम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘अँधेर नगरी’, ‘प्रेमयोगिनी’ आदि रचनाओं से हुआ; अत: भारतेन्दु जी ही हिन्दी एकांकी के जनक हैं, किन्तु आधुनिक हिन्दी एकांकी का जनक डॉ० रामकुमार वर्मा को माना जाता है।

प्रश्न 90:
हिन्दी के प्रमुख एकांकीकारों के नाम बताइए।
उत्तर:
डॉ० रामकुमार वर्मा, विष्णु प्रभाकर, सेठ गोविन्ददास, उपेन्द्रनाथ अश्क’, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, विनोद रस्तोगी, जगदीशचन्द्र माथुर, उदयशंकर भट्ट, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर आदि हिन्दी के प्रमुख एकांकीकार हैं।

प्रश्न 91:
छायावादोत्तर युग के किन्हीं दो एकांकीकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
डॉ० धर्मवीर भारती एवं डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल छायावादोत्तर युग के प्रमुख एकांकीकार हैं।

प्रश्न 92:
आलोचना विधा के चार प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुन्दर दास तथा । डॉ० नगेन्द्र आलोचना विधा के प्रमुख लेखक हैं।।

प्रश्न 93:
द्विवेदी युग के प्रमुख आलोचना लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के प्रमुख आलोचना लेखकों में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, मिश्रबन्धु, बाबू श्यामसुन्दर दास, पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, लाला भगवानदीन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 94:
शुक्लोत्तर युग के आलोचना लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
डॉ० रामकुमार वर्मा, डॉ० नगेन्द्र, डॉ० रामविलास शर्मा आदि शुक्लोत्तर युग के प्रसिद्ध आलोचना लेखक हैं।

प्रश्न 95:
जीवनी लिखने वाले किसी एक लेखक तथा उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
लेखक – अमृतराय। रचना – ‘कलम का सिपाही’

प्रश्न 96:
रामविलास शर्मा किस रूप में प्रसिद्ध हैं?
उत्तर:
आलोचक के रूप में।

प्रश्न 97:
प्रसिद्ध जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बनारसीदास चतुर्वेदी, बाबू गुलाबराय, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय आदि प्रमुख जीवनी–लेखक हैं।

प्रश्न 98:
निम्नलिखित जीवनियों के लेखक कौन हैं?

  1.  सुमित्रानन्दन पन्त : जीवन और साहित्य,
  2. निराला की साहित्य-साधना।

उत्तर:

  1. शान्ति जोशी,
  2. डॉ० रामविलास शर्मा।

प्रश्न 99:
छायावादोत्तर युग के दो प्रसिद्ध जीवनी-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. जैनेन्द्र कुमार तथा
  2.  काका कालेलकर।

प्रश्न 100:
जीवनी-लेखन का कार्य किस युग में प्रारम्भ हुआ था?
उत्तर:
जीवनी-लेखन का कार्य भारतेन्दु युग में आरम्भ हो गया था।

प्रश्न 101:
द्विवेदी युग के प्रमुख जीवनी लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में किस प्रकार की जीवनियाँ लिखी गयीं?
उत्तर:
द्विवेदी युग के जीवनी लेखकों में-लक्ष्मीधर वाजपेयी, डॉ० सम्पूर्णानन्द, नाथूराम प्रेमी, मुकुन्दीलाल वर्मा-उल्लेखनीय हैं। इस युग में ऐतिहासिक पुरुषों और धार्मिक नेताओं की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 102:
छायावाद युग के प्रमुख जीवनी लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में कैसी जीवनियाँ लिखी गयीं?
उत्तर:
छायावाद युग के जीवनी लेखकों में रामनरेश त्रिपाठी, गणेशशंकर विद्यार्थी, प्रेमचन्द – उल्लेखनीय हैं। इस युग में राष्ट्रीय महापुरुषों की जीवनियाँ लिखी गयीं।।

प्रश्न 103:
छायावादोत्तर युग के प्रमुख जीवनी लेखकों के नाम लिखिए। इस युग में किस प्रकार की जीवनियाँ लिखी गयीं?
उत्तर:
छायावादोत्तर युग के जीवनी लेखकों में – काका कालेलकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, बनारसीदास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन – विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस युग में लोकप्रिय नेताओं, सन्त-महात्माओं, विदेशी महापुरुषों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और साहित्यकारों की जीवनियाँ लिखी गयीं।

प्रश्न 104:
हिन्दी के प्रमुख आत्मकथा-लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बाबू श्यामसुन्दर दास ( मेरी आत्मकहानी), वियोगी हरि ( मेरा जीवन प्रवाह), डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ( मेरी आत्मकथा ) आदि प्रमुख आत्मकथा लेखकों के अतिरिक्त डॉ० हरिवंशराय बच्चन’, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ तथा गुलाबराय आदि श्रेष्ठ आत्मकथाकार हैं।

प्रश्न 105:
निम्नलिखित आत्मकथाओं के लेखकों एवं उनके युग के नाम लिखिए
(1) अपनी कहानी
(2) मेरी असफलताएँ।
उत्तर:

  1.  वृन्दावनलाल वर्मा (शुक्लोत्तर युग) एवं
  2.  बाबू गुलाबराय (शुक्ल युग)।

प्रश्न 106:
रेखाचित्र अथवा आत्मकथा की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रेखाचित्र – (1) रेखाचित्र में कम-से-कम शब्दों के प्रयोग द्वारा किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेषता को उभारा जाता है।
(2) रेखाचित्र में लेखक पूर्णत: तटस्थ होकर, किसी वस्तु या व्यक्ति का चित्रात्मक शैली में सजीव तथा भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है।

आत्मकथा – (1) महापुरुषों द्वारा लिखी गयी आत्मकथाएँ पाठकों को उनके जीवन के आत्मीय पहलुओं से परिचय कराती हुई मार्गदर्शन करती हैं और प्रेरणा देती हैं।
(2) लेखक स्वयं अपने जीवन के प्रसंगों को पूर्ण निजता के साथ भावात्मक एवं रोचक शैली में प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 107:
आत्मकथा विधा की प्रमुख रचनाओं और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आत्मकथा विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक हैं

  1.  कुछ आपबीती, कुछ जगबीती (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र),
  2. निजे वृत्तान्त (अम्बिकादत्त व्यास),
  3.  कल्याण का पथिक (स्वामी श्रद्धानन्द),
  4. मुझमें दैवी जीवन का विकास (स्वामी सत्यानन्द अग्निहोत्री),
  5.  आपबीती ( भाई परमानन्द),
  6.  तरुण स्वप्न, (सुभाषचन्द्र बोस),
  7.  मेरी कहानी (जवाहरलाल नेहरू),
  8.  सत्य की खोज (एस० राधाकृष्णन),
  9. आधे रास्ते और सीधी चट्टान (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी),
  10.  मेरी आत्मकथा (डॉ० राजेन्द्र प्रसाद),
  11.  प्रवासी की आत्मकथा (स्वामी भवानीदयाल संन्यासी),
  12.  स्वतन्त्रता की खोज (सत्यदेव परिव्राजक),
  13.  साठ वर्ष : एक रेखांकन (सुमित्रानन्दन पन्त),
  14. परिव्राजक की प्रजा (शान्तिप्रिय द्विवेदी) आदि।

प्रश्न 108:
किन्हीं दो रेखाचित्रकारों के नाम. लिखिए।
या
‘रेखाचित्र विद्या के किसी एक लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  महादेवी वर्मा तथा
  2. रामवृक्ष बेनीपुरी।

प्रश्न 109:
रेखाचित्र विधा में सर्वप्रथम किसने लेखन प्रारम्भ किया?
उत्तर:
कुछ विद्वान् पद्मसिंह शर्मा को रेखाचित्र विधा का जनक मानते हैं, परन्तु इस विधा के नाम से इस विधा में लेखन प्रारम्भ करने का श्रेय श्रीराम शर्मा को है।

प्रश्न 110:
‘छायावादोत्तर युग के प्रमुख रेखाचित्र विधा के लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रेखाचित्र विधा में लिखने वाले छायावादोत्तर युग के लेखकों में उल्लेखनीय हैं–प्रकाशचन्द्र गुप्त, बनारसीदास चतुर्वेदी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विनयमोहन शर्मा, सत्यवती मलिक, रघुवीर सहाय और डॉ० नगेन्द्र।

प्रश्न 111:
‘संस्मरण’ की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1.  संस्मरण में व्यक्तियों, घटनाओं अथवा दृश्यों को स्मृति के सहारे पुन: कल्पना में मूर्त किया जाता है।
  2. संस्मरण में लेखक तटस्थ रहने के बाद भी स्वयं को चित्रित कर देता है।
  3.  संस्मरण व्यक्ति, वस्तु अथवा घटना के वैशिष्ट्य को लक्षित करने वाला होता है।

प्रश्न 112:
हिन्दी के दो संस्मरण लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  महादेवी वर्मा तथा
  2. काका कालेलकर।

प्रश्न 113:
हिन्दी के प्रथम संस्मरण-लेखक का नाम बताइट।
उत्तर:
बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने पं० प्रतापनारायण मिश्र के संस्मरण (1907 ई०) में लिखकर इस विधा का सूत्रपात किया; परन्तु डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत संस्मरण का प्रथम लेखक सत्यदेव परिव्राजक को स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 114:
महादेवी वर्मा के कुछ संस्मरण-ग्रन्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘पथ के साथी’ (संस्मरण), ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘स्मारिका’ (रेखाचित्रनुमा संस्मरण) आदि संस्मरण-ग्रन्थ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

प्रश्न 115.
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित संस्मरणात्मक रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
‘जिन्दगी मुसकाई, माटी हो गयी सोना’ तथा ‘दीप जले शंख बजे प्रभाकर जी की प्रमुख संस्मरणात्मक रचनाएँ हैं।

प्रश्न 116:
संस्मरण विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाओं और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संस्मरण विधा से सम्बन्धित प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक निम्नलिखित हैं

  1.  मण्टो मेरा दुश्मन,
  2. ज्यादा अपनी कम परायी (उपेन्द्रनाथ अश्क’),
  3.  कुछ शब्द कुछ रेखाएँ (विष्णु प्रभाकर),
  4. बचपन की स्मृतियाँ,
  5.  जिनका मैं कृतज्ञ,
  6. मेरे असहयोग के साथी (राहुल सांकृत्यायन),
  7.  दस तस्वीरें,
  8.  जिन्होंने जीना सीखा (जगदीशचन्द्र माथुर),
  9. स्मृति-कण,
  10.  चेहरे जाने-पहचाने (सेठ गोविन्ददास),
  11.  चेतना के बिम्ब (डॉ० नगेन्द्र),
  12. समय के पाँव (माखनलाल चतुर्वेदी),
  13. लोकदेव नेहरू,
  14.  संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ (रामधारी सिंह ‘दिनकर’),
  15. नये- पुराने झरोखे (डॉ० हरिवंशराय बच्चन’)।

प्रश्न 117:
‘यात्रावृत्त’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब कोई यात्री अपनी यात्रा के अन्तर्गत मार्ग में आने वाले विविध व्यक्तियों, स्थानों, व्यवस्थाओं आदि के अपने हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का सूक्ष्म और सजीव वर्णन करता है, तब उसे यात्रावृत्त कहते हैं।

प्रश्न 118:
हिन्दी में यात्रावृत्त लिखने का क्रम किस लेखक से प्रारम्भ हुआ तथा सर्वाधिक यात्रावृत्त किस गद्य-युग में लिखे गये?
उत्तर:
यात्रावृत्त लिखने का क्रम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ हुआ तथा सर्वाधिक यात्रावृत्त छायावाद और छायावादोत्तर युग में लिखे गये।

प्रश्न 119:
हिन्दी के यात्री-साहित्य के दो प्रमुख लेखकों और उनकी एक-एक रचना के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  राहुल सांकृत्यायन – घुमक्कड़शास्त्र,
  2. मोहन राकेश – आखिरी चट्टान तक।

प्रश्न 120:
यात्रावृत्त के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यात्रा से जुड़ी निजी स्मृतियाँ, सहजता, सत्यता, रोचकता और सरसता यात्रावृत्त के मुख्य तत्त्व हैं।

प्रश्न 121:
छायावाद युग के यात्रावृत्त विधा के प्रमुख लेखक और उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावाद युग की यात्रावृत्त विधा के प्रमुख लेखक और उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नवत् हैं

  1. रामनारायण मिश्र – यूरोप यात्रा के छः मास तथा
  2. राहुल सांकृत्यायन – मेरी यूरोप यात्रा, मेरी तिब्बत यात्रा।

प्रश्न 122:
छायावादोत्तर युग की यात्रावृत्त विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग की प्रमुख रचनाएँ एवं उनके लेखक इस प्रकार हैं

  1.  घुमक्कड़शास्त्र,
  2. किन्नर देश में,
  3.  हिमालय परिचय (राहुल सांकृत्यायन),
  4. पैरों में पंख बाँधकर,
  5.  उड़ते चलो, उड़ते चलो (रामवृक्ष बेनीपुरी),
  6.  वह दुनिया (भगवतशरण उपाध्याय),
  7. अरे यायावर रहेगा याद,
  8.  एक बूंद सहसा उछली (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’),
  9. तन्त्रालोक से यन्त्रालोक तक (डॉ० नगेन्द्र) (2011),
  10.  पृथ्वी-परिक्रमा,
  11.  सुदूर दक्षिण में (सेठ गोविन्ददास),
  12.  धरती गाती है (देवेन्द्र सत्यार्थी),
  13.  तूफानों के बीच (रांगेय राघव),
  14.  आखिरी चट्टान तक (मोहन राकेश),
  15.  आज का जापान (भदन्त आनन्द कौसल्यायन),
  16. लोहे की दीवार के दोनों ओर (यशपाल),
  17.  सुबह के रंग (अमृतराय),
  18.  भू-स्वर्ग कश्मीर (हंसकुमार तिवारी) आदि।

प्रश्न 123:
हिन्दी में रिपोर्ताज लिखने का प्रचलन किस युग में हुआ? प्रमुख रिपोर्ताज लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में रिपोर्ताज लिखने का प्रचलन छायावादोत्तर युग में हुआ। प्रमुख रिपोर्ताज लेखक इस प्रकार हैं

  1.  धर्मवीर भारती,
  2.  कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’,
  3.  रांगेय राघव,
  4.  विष्णुकान्त शास्त्री आदि।

प्रश्न 124:
हिन्दी की दो नवीन गद्य-विधाओं व उन विधाओं के एक-एक प्रमुख लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. ‘रिपोर्ताज’ हिन्दी गद्य की एक नयी विधा है। इस विधा के प्रमुख लेखक – कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं।
  2. ‘डायरी’ हिन्दी की दूसरी नवीन गद्य विधा है। इस विधा के प्रमुख लेखक – धीरेन्द्र वर्मा हैं।

प्रश्न 125:
रिपोर्ताज विधा की हिन्दी में प्रथम रचना का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
डॉ० शिवदानसिंह चौह्मन ‘विरचित ‘लक्ष्मीपुरा’ (1938 ई०) को हिन्दी गद्य-साहित्य का प्रथम रिपोर्ताज माना जाता है।

प्रश्न 126:
प्रमुख रिपोर्ताज रचनाएँ और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रिपोर्ताज विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखक निम्नलिखित हैं

  1.  पहाड़ों में प्रेममयी संगीति (उपेन्द्रनाथ अश्क’),
  2.  एक तस्वीर के दो पहलू,
  3. क्षण बोले कण मुसकाये,
  4. दिल्ली की यात्रा-स्मृतियाँ (कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’),
  5.  वे लड़ेगे हजार साल (शिवसागर मिश्र),
  6.  युद्ध-यात्रा ( धर्मवीर भारती),
  7. प्लाट का मोर्चा (शमशेर बहादुर सिंह)

प्रश्न 127:
रिपोर्ताज विधा के प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
रिपोर्ताज विधा में लेखन करने वाले प्रमुख लेखक हैं

  1. प्रकाशचन्द्र गुप्त,
  2. रामनारायण उपाध्याय,
  3.  भदन्त आनन्द कौसल्यायन,
  4. डॉ० भगवतशरण उपाध्याय,
  5.  फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,
  6. जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी,
  7.  निर्मल वर्मा,
  8. कमलेश्वर,
  9.  लक्ष्मीकान्त वर्मा।

प्रश्न 128:
डायरी विधा की प्रथम रचना का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ को प्रथम डायरी-लेखक माना जाता है। उनकी डायरी नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ’ की जेल डायरी” का प्रकाशन 1930 ई० के आस-पास माना जाता है।

प्रश्न 129:
डायरी विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी गद्य की डायरी विधा के अन्तर्गत घनश्यामदास बिड़ला की डायरी के पन्ने, सुन्दरलाल त्रिपाठी की ‘दैनन्दिनी’, धीरेन्द्र वर्मा की ‘मेरी कॉलेज डायरी’ जैसी कुछ गिनी-चुनी रचनाएँ ही उपलब्ध हैं।

प्रश्न 130:
छायावादोत्तर युग में इायरी विधा में लेखन करने वाले लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग में इलाचन्द्र जोशी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शमशेर बहादुर सिंह, मोहन राकेश, लक्ष्मीकान्त वर्मा, नरेश मेहता, अजित कुमार, प्रभाकर माचवे आदि की डायरियाँ प्रकाशित हुई हैं।

प्रश्न 131:
हिन्दी में हायरी विधा का आरम्भ किस युग से हुआ? किसी डायरी लेखक की डायरी का नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में डायरी विधा का आरम्भ छायावाद युग से हुआ। डायरी लेखक-धीरेन्द्र वर्मा; रचना-मेरी कॉलेज डायरी।।

प्रश्न 132:
हिन्दी गद्यकाव्य की रचना करने वाले किन्हीं दो लेखकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  राय कृष्णदास तथा
  2.  वियोगी हरि।।

प्रश्न 133:
‘गद्यगीत’ विधा को सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘गद्यगीत’ में गद्य के माध्यम से किसी भावपूर्ण विषय की काव्यात्मक अभिव्यक्ति होती है। उदाहरण – ‘‘मित्र! यहाँ तो सुख के साथ दु:ख लगा है, और उससे सुख को अलग कर लेने के उद्योग में भी एक (राय कृष्णदास)

प्रश्न 134:
‘गद्यगीत’ अथवा ‘गद्यकाव्य’ की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
‘गद्यगीत’ अथवा ‘गद्यकाव्य’ गद्य और काव्य के बीच की विधा है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. इसमें अनुभूति की सघनता होती है।
  2.  इसमें संक्षिप्तता और रहस्यमय सांकेतिकता होती है।

प्रश्न 135:
गद्यगीतों का आरम्भ किस लेखक के किस ग्रन्थ से माना जाता है?
उत्तर:
गद्यगीतों का आरम्भ राय कृष्णदास के ‘साधना-संग्रह’ नामक ग्रन्थ से माना जाता है।

प्रश्न 136:
‘तरंगिणी’ के लेखक तथा उसकी गद्य-विधा का नाम लिखिए।
उत्तर:
लेखक – वियोगी हरि तथा विधा – गद्यकाव्य।

प्रश्न 137:
गद्यकाव्य विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके लेखकों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गद्यकाव्य विधा की प्रमुख रचनाएँ और उनके रचनाकारों के नाम हैं

  1. शारदीया,
  2. दुपहरिया,
  3. वंशीरव,
  4.  उन्मन,
  5. स्पन्दन (दिनेशनन्दिनी चौरडया),
  6.  चिन्ता (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’),
  7. शुभ्रा (रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’),
  8. आराधना (राजनारायण मेहरोत्रा ‘रजनीश’),
  9.  श्रद्धाकण,
  10. तरंगिणी (वियोगी हरि),
  11.  मरी खाल की हाय,
  12.  जवाहर (आचार्य चतुरसेन शास्त्री),
  13.  साहित्य देवता (माखनलाल चतुर्वेदी),
  14.  शेष स्मृतियाँ (डॉ० रघुवीर सिंह) ,
  15.  निर्झर,
  16.  पाषाण (तेजनारायण काक’),
  17. निशीथ,
  18.  आँसू भरी धरती,
  19.  उदीची (ब्रह्मदेव),
  20. अन्तरात्मा (रंगनाथ दिवाकर),
  21.  गुरुदेव (महावीरशरण अग्रवाल) आदि।।

प्रश्न 138:
‘चेखव : एक इण्टरव्यू’ तथा भगवान महावीर : एक इण्टरव्यू किस विधा की रचनाएँ हैं ? इनके लेखक कौन हैं?
उत्तर:
उक्त दोनों काल्पनिक भेटवार्ता’ विधा की रचनाएँ हैं। इनके लेखक क्रमश: राजेन्द्र यादव एवं लक्ष्मीचन्द जैन हैं।

प्रश्न 139:
हिन्दी में भेटवार्ता विधा में लेखन का प्रारम्भ किसने किया?
उत्तर:
हिन्दी में भेटवार्ता विधा का श्रीगणेश बनारसीदास चतुर्वेदी ने जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ और प्रेमचन्द से भेंट करने के उपरान्त उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में लिखकर किया।

प्रश्न 140:
भेटवार्ता विधा की प्रमुख रचनाओं का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भेटवार्ता विधा की प्रमुख रचनाएँ हैं

  1.  कवि दर्शन (बेनी माधव शर्मा),
  2.  मैं इनसे मिला। (दो भाग) (डॉ० पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’),
  3.  कला के हस्ताक्षर (देवेन्द्र सत्यार्थी),
  4.  सृजन की मनोभूमि (डॉ० रणवीर रांग्रा),
  5.  हिन्दी कहानी और फैशन (डॉ० सुरेश सिन्हा) आदि।

प्रश्न 141:
छायावादोत्तर युग में भेटवार्ता विधा में लेखन करने वालों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग में भेटवार्ता लिखने वालों के नाम हैं –

  1.  प्रभाकर माचवे,
  2.  शिवदानसिंह चौहान,
  3.  रामचरण महेन्द्र,
  4. कैलाश कल्पित,
  5.  राजेन्द्र यादव,
  6.  लक्ष्मीचन्द्र जैन आदि।

प्रश्न 142:
हिन्दी में आधुनिक पद्धति की आलोचना जिन लेखकों ने प्रारम्भ की है, उनमें से किन्हीं दो के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिन्दी में आधुनिक पद्धति की आलोचना प्रारम्भ करने वाले लेखक हैं – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ० नगेन्द्र।

प्रश्र 143:
द्विवेदी युग वे किन्हीं दो गद्य साहित्यकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
द्विवेदी युग के दो प्रमुख गद्य साहित्यकार हैं

  1. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा
  2. बाबू श्यामन्त्र स’ (संकेत- इनके संक्षिप्त परिचय के लिए सम्बन्धित लेखकों का परिचय पढ़े।)

प्रश्न 144:
व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात आलोचकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात प्रमुख आलोचक हैं-आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ० विनय मोहन शर्मा, डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत आदि।

प्रश्न 145:
माक्र्सवादी समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात आलोचकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मार्क्सवादी समीक्षा के क्षेत्र में ख्यात प्रमुख आलोचक हैं-डॉ० रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, डॉ० विश्वम्भरनाथ उपाध्याय आदि।

प्रश्न 146:
सन् 1947 के बाद प्रकाशित दो साहित्यिक पत्रों के संकलन के नाम तथा उनके सम्पादकों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1.  ‘बड़ों के कुछ प्रेरणादायक पत्र’-वियोगी हरि।
  2.  “निराला के पत्र’-जानकीवल्लभ शास्त्री।

प्रश्न 147:
हिन्दी-साहित्य में पत्र-साहित्य की प्रथम रचना कौन-सी है?
उत्तर:
हिन्दी साहित्य में प्रथम पत्र-साहित्य का प्रकाशन 1904 ई० (द्विवेदी युग) में महात्मा मुंशीराम के द्वारा ‘स्वामी दयानन्द से सम्बद्ध पत्रों के संकलन’ से हुआ था।

प्रश्न 148:
छायावाद युग की पन्न-साहित्य की रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
छायावाद युग में रामकृष्ण आश्रम, देहरादून से ‘विवेकानन्दपत्रावली’ का प्रकाशन हुआ था।

प्रश्न 149:
छायावादोत्तर युग की उल्लेखनीय पत्र-साहित्य रचनाओं को लिखिए।
उत्तर:
छायावादोत्तर युग में प्रकाशित प्रमुख पत्र-साहित्य हैं –

  1.  द्विवेदी पत्रावली (बैजनाथ सिंह ‘विनोद’),
  2.  पद्मसिंह शर्मा के पत्र (बनारसीदास चतुर्वेदी),
  3.  बड़ों के प्रेरणादायक पत्र (वियोगी हरि),
  4. पन्त के दो सौ पत्र बच्चन के नाम (हरिवंशराय बच्चन’),
  5.  भिक्षु के पत्र (भाग 1-2) (भदन्त आनन्द कौसल्यायन),
  6.  यूरोप के पत्र (डॉ० धीरेन्द्र वर्मा),
  7. सोवियत रूस : पिता के पत्रों में (डॉ० जगदीशचन्द्र),
  8.  लन्दन के पत्र (ब्रजमोहन लाला),
  9. बन्दी की चेतना (कमलापति त्रिपाठी),
  10. बापू के पत्र (काका कालेलकर) आदि।

प्रश्न 150:
हिन्दी गद्य के विकास में सबसे अधिक योगदान करने वाली अथवा द्विवेदी युग की सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रिका तथा उसके सम्पादक का नाम लिखिए।
उत्तर:
पत्रिका सरस्वती (सन् 1903 से प्रारम्भ)। सम्पादक–आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी।

प्रश्न 151:
निम्नलिखित में से किन्हीं दो सम्पादकों की पत्रिकाओं के नाम लिखिए
(i) महावीरप्रसाद द्विवेदी,
(u) श्यामसुन्दर दास,
(iii) महादेवी वर्मा,
(iv) धर्मवीर भारती।
उत्तर:
           सम्पादक                                      पत्रिका
(i)  महावीरप्रसाद द्विवेदी    –                     सरस्वती
(ii)  श्यामसुन्दर दास          –             नागरी प्रचारिणी पत्रिका
(iii)  महादेवी वर्मा              –                       चाँद
(iv)  धर्मवीर भारती            –                     धर्मयुग

प्रश्न 152:
‘समालोचक पत्र किस युग में प्रकाशित हुआ था?
उत्तर:
‘समालोचक’ पत्र, द्विवेदी युग में प्रकाशित हुआ था।

प्रश्न 153:
‘नया जीवन पत्रिका के सम्पादक कौन थे?
उत्तर:
‘नया जीवन पत्रिका के सम्पादक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ थे।

प्रश्न 154:
हिन्दी के नयी पीढ़ी के चार साहित्यिक रचनाकारों के नाम लिखिए।
उत्तर:
कमलेश्वर, हृदयेश, मनोहरश्याम जोशी तथा सुदीप नयी पीढ़ी के रचनाकार हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 6
Chapter Name Rural Development (ग्रामीण विकास)
Number of Questions Solved 60
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 6 Rural Development (ग्रामीण विकास)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों का स्पष्ट करें।
उत्तर
ग्रामीण विकास से आशय ग्रामीण विकास एक व्यापक शब्द है। यह मूलतः ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर बल देता है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं। ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं

  1. साक्षरता, विशेषतः नारी शिक्षा,
  2. स्वास्थ्य एवं स्वच्छता,
  3. भूमि सुधार,
  4. समाज के हर वर्ग के लिए उत्पादक संसाधनों का विकास,
  5. आधारिक संरचना का विकास जैसे—बिजली, सड़कें, अस्पताल, सिंचाई, साख, विपणन आदि तथा
  6. निर्धनता उन्मूलन, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के जीवन-स्तर में सुधार।

प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास में साख के महत्त्व पर चर्चा करें।
उत्तर
कृषि साख से अभिप्राय कृषि उत्पादन के लिए आवश्यक भौतिक आगतों को खरीदने की क्षमता से है। ग्रामीण विकास में साख का महत्त्व निम्नलिखित है

  1. किसान को अपनी दैनिक कृषि संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साख की आवश्यकता होती है।
  2. भारतीय किसानों को अपने पारिवारिक निर्वाह, खर्च, शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए | भी साख की आवश्यकता पड़ती है।
  3. किसानों को मशीनरी खरीदने, बाड़ लगवाने, कुआँ खुदवाने जैसे कार्यों के लिए भी साख की । आवश्यकता होती है।
  4. साख की मदद से किसान एवं गैर-किसान मजदूर ऋणजाल से मुक्त हो जाते हैं।
  5. साख की सहायता से कृषि फसलों एवं गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में विविधता उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3.
गरीबों की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने में अतिलघु साख व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या| करें।
उत्तर
औपचारिक साख व्यवस्था में रह गई कमियों को दूर करने के लिए स्वयं सहायता समूहों (एच०एच०जी०) का भी ग्रामीण साख में प्रादुर्भाव हुआ है। स्वयं-सहायता समूहों ने सदस्यों की ओर से न्यूनतम योगदान की सहायता से लघु बचतों को प्रोत्साहित किया है। इन लघु बचतों से एकत्र राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। उस ऋण की राशि छोटी-छोटी किस्तों में आसानी से लौटायी जाती है। ब्याज की दर भी उचित व तर्कसंगत रखी जाती है। इस प्रकार की साख उपलब्धता को अतिलघु साख कार्यक्रम भी कहा जाता है। इस प्रकार से स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं के सशक्तीकरण में 
सहायता की है। किंतु अभी तक इन ऋण सुविधाओं का प्रयोग किसी-न-किसी प्रकार के उपयोग के लिए। ही हो रहा है व कृषि कार्यों के लिए बहुत कम राशि ली जा रही है।

प्रश्न 4.
सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयासों की व्याख्या करें।
उत्तर
ग्रामीण बाजारों के विकास हेतु सरकारी प्रयास सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयास इस प्रकार हैं

1. व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन की दशाओं का निर्माण करने के लिए बाजार का नियमन करना-इस नीति से कृषक और उपभोक्ता दोनों ही लाभान्वित हुए हैं, परंतु अभी भी लगभग 27,000 ग्रामीण क्षेत्रों में अनियत मंडियों को विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
2. सड़कों, रेलमार्गों, भण्डारगृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाइयों के रूप में भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान–वर्तमान आधारिक सुविधाएँ बढ़ती हुई माँग को देखते हुए अपर्याप्त हैं और उनमें पर्याप्त सुधार की आवश्यकता है।
3. सरकारी विपणन द्वारा किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ करना।
4. नीतिगत साधन को अपनाना, जैसे

(क) 24 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करना।।
(ख) भारतीय खाद्य निगम द्वारा गेहूँ और चावल के सुरक्षित भंडारों का रख-रखाव।
(ग) सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्नों और चीनी का वितरण। इन नीतिगत साधनों का उद्देश्य क्रमशः किसानों को उनकी उपज के उचित दाम दिलाना तथा गरीबों को सहायिकी युक्त कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध कराना रहा है।

प्रश्न 5.
आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर
कृषि विविधीकरण के दो पहलू हैं1. प्रथम पहलू फसलों के उत्पादन के विविधीकरण से संबंधित है। 2. दूसरा पहलू श्रमशक्ति को खेती से हटाकर अन्य संबंधित कार्यों जैसे–पशुपालन, मुर्गी और मत्स्य पालन आदि; तथा गैर-कृषि क्षेत्र में लगाना है। इस विविधीकरण की इसलिए आवश्यकता है क्योंकि सिर्फ खेती के आधार पर आजीविका कमाने में जोखिम बहुत अधिक होती है। विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल हो सकते हैं बलिक ग्रामीण जन-समुदाय के लिए उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की उत्पादक और लाभप्रद गतिविधियों में प्रसार के माध्यम से ही हम ग्रामीण जनसमुदाय को अधिक आय कमाकर गरीबी तथा अन्य विषम परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ बना सकते हैं।

प्रश्न 6.
भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
उत्तर
भारत में ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुसंस्था व्यवस्था अपनाई गई है। इसके बाद 1982 ई० में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की गई। यह बैंक सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त व्यवस्था के समन्वय के लिए एक शीर्ष संस्थान है। ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में आप निम्नलिखित संस्थाएँ शामिल हैं

  1. व्यावसायिक बैंक,
  2. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक,
  3. सहकारी बैंक और
  4. भूमि विकास बैंक।

इसे बहु-संस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य सस्ती ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की पूर्ति करना है। परंतु यह औपचारिक साख व्यवस्था अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में विफल रही है। इससे समन्वित ग्रामीण विकास नहीं हो पाया है। चूंकि इसके लिए ऋणाधार की आवश्यकता थी, अत: बहुसंख्य ग्रामीण परिवारों का एक बड़ा अनुपात इससे अपने आप वंचित रह गया। अतः अर्तिलघु साख प्रणाली को लागू करने के लिए स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया। किंतु अभी भी हमारी बैंकिंग व्यवस्था उचित नहीं बन पायी है। इसका प्रमुख कारण औपचारिक साख संस्थाओं का चिरकालिक निम्न निष्पादन और किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर किस्तों को न चुका पाना है।

प्रश्न 7.
कृषि विपणन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देश भर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रह, भण्डारुण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण और वितरण आदि किया जाता है।

प्रश्न 8.
कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताइए।
उत्तर
कृषि विपणन प्रक्रिया की निम्नलिखित बाधाएँ हैं

  1. तोल में हेरा-फेरी।
  2. खातों में गड़बड़ी।
  3. बाजार में प्रचलित भावों का पता न होना।
  4. अच्छी भण्डारण सुविधाओं का अभाव।
  5. किसानों में जागरूकता का अभाव।
  6. किसानों की आय का निम्न स्तर।।
  7. साख विस्तार का अभाव।

प्रश्न 9.
कृषि विपणन के कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों की उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर
आज यह बात सभी सोच रहे हैं कि यदि किसान प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता को अपने उत्पाद बेचते हैं। तो इससे उपभोक्ताओं द्वारा अदा की गई कीमत में उसकी हिस्सेदारी बढ़ जाती है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अपनी मण्डी, पुणे की हाड़पसार मण्डी, आंध्र प्रदेश की राययूबाज नामक फल-सब्जी मण्डियाँ तथा तमिलनाडु की उझावर के कृषक बाजार आदि वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के कुछ उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त आजकल अनेक देशी एवं बहुराष्ट्रीय खाद्य पदार्थ बनाने वाली कम्पनियाँ भी किसानों के साथ सीधा अनुबंध कर रही हैं। ये कम्पनियाँ कृषि उपज एवं उसकी गुणवत्ता को प्रोत्साहित करने हेतु पूर्व-निर्धारित कीमतों पर किसानों से अनुबंध करती हैं।

प्रश्न 10.
‘स्वर्णिम क्रान्ति की व्याख्या करें।
उत्तर
हम 1991-2003 ई० की अवधि को ‘स्वर्णिम क्रांति के प्रारम्भ का काल मानते हैं। इसी दौरान बागवानी में सुनियोजित निवेश बहुत ही उत्पादक सिद्ध हुआ और इस क्षेत्र में एक धारणीय वैकल्पिक रोजगार का रूप धारण किया। प्रमुख बागवानी फसलें हैं-फल-सब्जियाँ, रेशेदार फसलें, औषधीय तथा सुगन्धित पौधे, मसाले, चाय, कॉफी इत्यादि।

प्रश्न 11.
सरकार द्वारा कृषि विपणन सुधार के लिए अपनाए गए चार उपायों की व्याख्या करें।
उत्तर
लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखिए।

प्रश्न 12.
ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व समझाइए।
उत्तर
कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या के अत्यधिक बोझ को खत्म करने के लिए ऋणशक्ति को अन्य गैर-कृषि कार्यों में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है। गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व इस प्रकार है

  1. इसके द्वारा हमें सिर्फ खेती के आधार पर आजीविका कमाने का जोखिम कम होगा।
  2. इससे निर्धन किसानों की आय में वृद्धि होती है।
  3. यह ग्रामीण क्षेत्रों से निर्धनता उन्मूलन का अच्छा स्रोत है।
  4. गैर-कृषि क्षेत्र में वर्ष भर आय कमाने का रोजगार मिल जाता है।
  5. ये कृषि क्षेत्र में श्रमशक्ति का भार कम करने में सहायक होते हैं।
  6. कृषि कार्यबल को धारणीय जीवन-स्तर जीने के लिए अच्छे स्रोत हैं।

प्रश्न 13.
विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्त्व पर टिप्पणी करें।
उत्तर
पशुपालन का महत्त्व

1. मवेशियों के पालन से परिवार की आय में स्थिरता आती है।
2. इससे खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण पूरे परिवार के लिए हासिल हो जाते हैं और खाद्य 
उत्पादन की अन्य क्रियाओं पर भी प्रभाव नहीं पड़ता है।
3. यह भूमिहीन कृषकों तथा छोटे व सीमान्त किसानों को आजीविका कमाने का वैकल्पिक साधन है।
4. इस क्षेत्र में महिलाएँ भी बहुत बड़ी संख्या में रोजगार पा रही हैं।
5. यह क्षेत्र अधिशेष कार्यबल को समायोजित कर रहा है।

मत्स्य पालन का महत्त्व

  1. प्रत्येक जलागार; सागर, झीलें, प्राकृतिक तालाब; मत्स्य उद्योग से जुड़े समुदाय के लिए निश्चित जीवन उद्दीपक स्रोत है।
  2. मत्स्य उत्पादन सकल घरेलू उत्पाद का 1.4% है।
  3. समुद्र, झीलों, नदियों, तालाबों के आस-पास रहने वाले लोगों के लिए गैर-कृषि क्रियाकलाप आय का अच्छा स्रोत है।

बागवानी का महत्त्व

  1. बागवानी फसलों से रोज़गार मिलता है।
  2. बागवानी फसलों से भोजन एवं पोषण प्राप्त होता है।
  3. यह क्षेत्र में अधिशेष कार्यबल समायोजित कर रहा है।
  4.  पुष्पारोपण, पौधशाला की देखभाल, फल-फूलों का संवर्द्धन और खाद्य प्रसंस्करण ग्रामीण महिलाओं के लिए अधिक आय वाले रोजगार बन गए हैं।
  5. देश की 19% श्रम शक्ति को इस समय इन्हीं कार्यों से रोजगार मिला हुआ है।

प्रश्न 14.
सूचना प्रौद्योगिकी धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।टिप्पणी करें।
उत्तर
आज सूचना प्रौद्योगिकी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। धारणीय विकास एवं खाद्य सुरक्षा को हासिल करने में सूचना प्रौद्योगिकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सूचना प्रौद्योगिकी का योगदान निम्नलिखित है

  1. सूचनाओं और उपयुक्त सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका | वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है।
  2. इस प्रौद्योगिकी द्वारा उदीयमान तकनीकों, कीमतों, मौसम तथा विभिन्न फसलों के लिए मृदा की दशाओं की उपयुक्तता की जानकारी का प्रसारण हो सकता है।
  3. ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन की इसमें क्षमता है।
  4. यह लोगों के लिए ज्ञान एवं क्षमता का सृजन करती है।

प्रश्न 15.
जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
उत्तर
जैविक कृषि एक धारणीय कृषि प्रणाली है जो भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है तथा उच्चकोटि के पौष्टिक खाद्य का उत्पादन करने के लिए भूमि के सीमित संसाधनों का कम उपयोग करती है। भारत में परम्परागत कृषि पूरी तरह से रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों पर आधारित है। ये विषाक्त तत्त्व हमारी खाद्य पूर्ति व जल स्रोतों में नि:सरित हो जाते हैं और हमारे पशुधन को हानि पहुँचाते हैं। साथ ही इसके कारण मृदा की उर्वरता भी क्षीण हो जाती है और हमारे प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश हो जाता है। दूसरी ओर जैविक कृषि में रसायनों का प्रयोग प्रतिबंधित होता है। इसमें कृषि में महँगे बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाइयों की जगह स्थानीय आगतों का प्रयोग किया जाता है। अतः इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है और नवीन तकनीक के प्रयोग को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 16.
जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर

जैविक कृषि के लाभ

1. जैविक कृषि महँगे आगतों के स्थान पर स्थानीय रूप से बने जैविक आगतों के प्रयोग पर निर्भर होती है।
2. परम्परागत फसलों की तुलना में जैविक फसलों में अधिक मात्रा में गौण मेटाबोलाइट्स पाए जाते
3. जैविक खेतों की मिट्टी में अधिक पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं।
4. निवेश पर अच्छा प्रतिफल प्राप्त होता है।
5. जैविक कृषि में अधिक जैव सक्रियता तथा अधिक जैव विविधता पाई जाती है।
6. यह पद्धति हानिरहित एवं पर्यावरण के लिए मित्र हैं।

जैविक कृषि की सीमाएँ

1. जैविक कृषि अत्यधिक श्रमगहन होती है।
2. जैविक उत्पादन गैर-जैविक से अधिक महँगा होता है।
3. भारतीय किसान जैविक कृषि से अनभिज्ञ हैं तथा उसके प्रति उत्सुक भी नहीं है।
4. इसके लिए आधार संरचना अपर्याप्त है।
5. जैविक उत्पादों के लिए बाजार की कमी है।
6. परम्परागत कृषि की तुलना में जैविक कृषि का उत्पादन औसतन 20% कम होता है।
7. बिना मौसम के फसल उगाने के कम विकल्प हैं।

प्रश्न 17.
जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारम्भिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर
जैविक कृषि में संलग्न कृषकों की समस्याएँ जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारम्भिक वर्षों में निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है

  1. प्रारम्भिक वर्षों में जैविक कृषि की उत्पादकता रासायनिक कृषि की तुलना में कम रहती है।
  2. छोटे और सीमांत किसानों के लिए बड़े स्तर पर इसे अपनाना कठिन होता है।
  3. जैविक उत्पाद रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा शीघ्र खराब हो जाते हैं।
  4. गैर-मौसमी फसलों का जैविक कृषि में उत्पादन बहुत सीमित होता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किस अवधि को ‘स्वर्णिम क्रान्ति के प्रारम्भ का काल माना जाता है?
(क) 1990-2002
(ख) 1991-2003
(ग) 1992-2004
(घ) 1993-2005
उत्तर
(ख) 1991-2003

प्रश्न 2.
“भारत गाँवों का देश है और इसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है।”—यह कथन किनका  है?
(क) राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का
(ख) डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम का
(ग) आर० एन० आजाद का ।
(घ) रॉबर्ट चैम्बर्स का
उत्तर
(क) राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना कब की गई?
(क) सन् 1882 में
(ख) सन् 1780 में
(ग) सन् 1982 में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) सन् 1982 में

प्रश्न 4.
जैविक कृषि
(क) भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है।
(ख) भूमि की उपजाऊ शक्ति को नष्ट कर देती है।।
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा श्रमिकों की साख सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किन बैंकों की स्थापना की गई है?
(क) स्टेट बैंकों की ।
(ख) पंजाब नेशनल बैंकों की
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की ।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की |

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन क्या है?
उत्तर
ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविकों का प्रमुख साधन कृषि है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय विकास का केन्द्र-बिन्दु क्या है?
उत्तर
राष्ट्रीय विकास का केन्द्रबिन्दु ‘ग्रामीण विकास’ है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण विकास को इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया जा रहा है?
उत्तर
आज भारत की लगभग 64% जनसंख्या कृषि पर आधारित है और कृषि की उत्पादकता का स्तर अत्यधिक निम्न हैं यही कारण है कि वह अत्यधिक निर्धन है। अतः भारत की वास्तविक उन्नति के लिए ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति आवश्यक है।

प्रश्न 4.
ग्रामीण विकास से क्या आशय है?
उत्तर
ग्रामीण विकास से आशय है—ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और उनके विकास-क्रम को आत्मपोषित बनाना।

प्रश्न 5.
गैर-कृषि उत्पादक क्रियाकलापों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
गैर-कृषि उत्पादक क्रियाकलापों के कुछ उदाहरण हैं—खाद्य प्रसंस्करण, स्वास्थ्य सुविधाओं की अधिक उपलब्धता, घर और कार्यस्थल पर स्वच्छता संबंधी सुविधाएँ, सभी के लिए शिक्षा आदि।

प्रश्न 6.
सकल घरेलू उत्पाद में किस क्षेत्र का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है?
उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद में ‘कृषि-क्षेत्र’ का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है।

प्रश्न 7.
ग्रामीण विकास में मुख्य बाधाएँ क्या हैं?
उत्तर
ग्रामीण विकास में मुख्य बाधाएँ हैं-कृषि की संवृद्धि दर में ह्रास, अपर्याप्त आधारिक संरचना, वैकल्पिक रोजगार के अवसरों का अभाव, अनियत रोजगार में वृद्धि।।

प्रश्न 8.
कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि मुख्य रूप से किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर
कृषि अर्थव्यवस्था की संवृद्धि समय-समय पर कृषि और गैर-कृषि कार्यों में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए पूँजी के प्रयोग पर निर्भर करती है।

प्रश्न 9.
किसानों को किन उद्देश्यों के लिए ऋण लेने पड़ते हैं?
उत्तर
किसानों को उत्पादक (बीज, उर्वरक, यंत्र आदि खरीदने) तथा अनुत्पादक (पारिवारिक, निर्वाह व्यय, शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों) कार्यों के लिए ऋण लेने पड़ते हैं।

प्रश्न 10.
सन् 1969 में ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किस प्रकार की व्यवस्था| अपनाई गई?
उत्तर
ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सन् 1969 में बहुसंस्था व्यवस्था अपनाई गई थी।

प्रश्न 11.
नाबार्ड क्या है?
उत्तर
सन् 1982 में स्थापित नाबार्ड सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त व्यवस्था के समन्वय के लिए एक शीर्ष संस्थान

प्रश्न 12.
ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में क्या सम्मिलित हैं?
उत्तर
ग्रामीण बैंक की संस्थागत संरचना में अनेक बहुएजेन्सी संस्थान जैसे-व्यावसायिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी तथा भूमि विकास बैंक सम्मिलित हैं।

प्रश्न 13.
बहुसंस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
बहुसंस्था व्यवस्था की रचना का उद्देश्य सस्ती ब्याज दरों पर पर्याप्त ऋण की पूर्ति करना है।

प्रश्न 14.
‘कुटुम्ब श्री क्या है?
उत्तर
‘कुटुम्ब श्री’ एक बचत बैंक है जिसकी स्थापना सरकारी बचत एवं साख सोसायटी के रूप में गरीब महिलाओं के लिए की गई थी।

प्रश्न 15.
अतिलघु साख कार्यक्रम क्या है?
उत्तर
इसमें प्रत्येक सदस्य न्यूनतम अंशदान करता है। इस राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को उचित ब्याज दर पर ऋण दिया जाता है।

प्रश्न 16.
कृषि उपज को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का माध्यम क्या है?
उत्तर
कृषि उपज को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का माध्यम ‘बाजार व्यवस्था है।

प्रश्न 17.
कृषि विपणन से क्या आशय है?
उत्तर
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देशभर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रहण, भण्डारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग, वर्गीकरण, वितरण आदि किया जाता है।।

प्रश्न 18.
किसान को अपनी उपज की कीमत का अधिक अंश कैसे प्राप्त हो सकता है?
उत्तर
यदि किसान स्वयं ही उपभोक्ता को कृषि उत्पाद बेचे तो उसे उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत को अधिक अंश प्राप्त होगा।

प्रश्न 19.
वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर
वैकल्पिक क्रय-विक्रय के माध्यम हैं-
1. पुणे की हाड़पसार मण्डी,
2. तमिलनाडु की उझावर मण्डी के कृषक बाजार।

प्रश्न 20
उत्पादक गतिविधियों के विविधीकरण के दो पक्ष कौन-कौन से हैं?
उत्तर
उत्पादक-गतिविधियों के ऐसे दो पक्ष हैं-
1. फसलों के उत्पादन की विविधीकरण।
2. श्रमशक्ति को कृषि से हटाकर गैर कृषि क्षेत्रकों में लगाना।

प्रश्न 21.
विविधीकरण से क्या लाभ होगा?
उत्तर
विविधीकरण द्वारा हम न केवल खेती से जोखिम को कम करने में सफल होंगे बल्कि ग्रामीण जनसमुदाय को उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका के अवसर भी उपलब्ध हो पाएँगे।

प्रश्न 22.
गैर-कृषि अर्थतंत्र में कुछ गतिशील उपघटकों के नाम बताइए।
उत्तर
ऐसे कुछ उदाहरण हैं—कृषि प्रसंस्करण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, चर्म उद्योग, पर्यटन आदि।

प्रश्न 23.
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों को क्या लाभ हैं?
उत्तर
पशुपालन से ग्रामीण परिवारों की आय में अधिक स्थिरता आती है। इसके अतिरिक्त खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण आदि की व्यवस्था भी हो जाती है।

प्रश्न 24.
स्वर्णिम क्रान्ति से क्या आशय है?
उत्तर
बागवानी में सुनियोजित निवेश के फलस्वरूप तीव्र उत्पादकता एवं वैकल्पिक रोजगार की उपलब्धि को ‘स्वर्णिम क्रान्ति’ कहते हैं।

प्रश्न 25.
खाद्य सुरक्षा और धारणीय विकास में सूचना प्रौद्योगिकी का क्या महत्त्व है?
उत्तर
सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है और विपदाओं के दुष्प्रभावों को कम करने में सफल हो सकती है।

प्रश्न 26.
रासायनिक उर्वरकों और विषजन्य कीटनाशकों के प्रयोग से क्या हानि है?
उत्तर
ये विषाक्त तत्त्व हमारी खाद्य पूर्ति व जल स्रोतों में नि:सरित हो जाते हैं, हमारे पशुधन को हानि पहुँचाते हैं, मृदा की उर्वरता को कम करते हैं और प्राकृतिक पर्यावरण का विनाश करते हैं।

प्रश्न 27.
जैविक कृषि क्या है?
उत्तर
जैविक कृषि खेती करने की वह विधि है जो पर्यावरणीय सन्तुलन को पुनः स्थापित करके उसका संवर्द्धन और संरक्षण करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास से क्या आशय है?
उत्तर
भारत को गाँवों का देश कहा जाता है। अत: भारत के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है। कि गाँवों के विकास पर समुचित ध्यान दिया जाए। ग्रामीण विकास से अभिप्राय है-“ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में सुधार लाना और उनके विकास के क्रम को आत्मपोषित बनाना।” यह एक ऐसी व्यूह-रचना है, जो लोगों के एक विशिष्ट समूह (निर्धन ग्रामीण) के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन को उन्नत बनाने के लिए बनाई गई है। इसका उद्देश्य विकास के लाभों को ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन-यापन की तलाश में लगे निर्धनतम लोगों तक पहुँचाना है। इसके अंतर्गत एक निश्चित ग्रामीण क्षेत्र में, ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग आता है।

प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास के अंतर्गत किन-किन बातों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर
ग्रामीण विकास के अंतर्गत वे व्यापक क्रियाएँ आती हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं से संबंधित होती हैं तथा जिनमें सभी ग्रामीण वर्गों को सम्मिलित किया जाता है जैसे—कृषक, भूमिहीन श्रमिक, ग्रामीण दस्तकार आदि। इस आधार पर ग्रामीण विकास कार्यक्रम निम्नलिखित घटकों पर आधारित होते हैं

  1. क्षेत्र में उपलब्ध संसाधन एवं उनमें अन्तर्सम्बंध।
  2. क्षेत्र के निवासी एवं उनमें पूरक प्रतिस्पर्धात्मक संबंध। |
  3. आत्मनिर्भरता के उद्देश्य की प्राप्ति की क्षमता।
  4. आवश्यक अवसंरचना।
  5. उचित तकनीक जो उत्पादकता एवं रोजगार में वृद्धि कर सके।
  6. संस्थाएँ, प्रेरणाएँ एवं नीतियाँ जो समन्वित प्रयास के लिए आवश्यक है।

वर्तमान में ग्रामीण विकास के अंतर्गत कृषि एवं सम्बद्ध क्रियाओं; बागवानी, लघु सिंचाई, भूमि विकास, मिट्टी एवं जल संरक्षण, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मुर्गीपालन, सूअर पालन, मत्स्यपालन, खद्दर एवं खादी उद्योग, सामाजिक वानिकी तथा कृषि एवं वन; पर आधारित उद्योगों की स्थापना पर विशेष बल दिया जाता है। इस प्रकार ग्रामीण विकास में उन नीतियों एवं कार्यक्रमों को अपनाया जाता है, जो ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करें तथा कृषि, वानिकी, मत्स्य, ग्रामीण शिल्प एवं उद्योग तथा सामाजिक एवं आर्थिक अवसंरचना के निर्माण आदि क्रियाओं को प्रोन्नत करें।

प्रश्न 3.
भारत में साहूकारों व महाजनों की वित्त व्यवस्था के दोष बताइए।
उत्तर
भारत में पारम्परिक वित्त व्यवस्था के दोष साहूकारों व महाजनों की पारम्परिक कृषि वित्त व्यवस्था के निम्नलिखित दोष रहे हैं

  1. साहूकार की कार्य-पद्धति लोचदार होती है और वह समय, परिस्थिति तथा व्यक्ति के अनुसार उनमें परिवर्तन करता रहता है।
  2. साहूकार अपने ऋणों पर ब्याज की उच्च दर वसूल करता है।
  3. साहूकार मूलधन देते समय ही पूरे वर्ष का ब्याज अग्रिम रूप में काट लेते हैं और इसकी कोई | रसीद भी नहीं देते हैं।
  4. अनेक साहूकार ऋण देते समय कोरे कागजों पर हस्ताक्षर या अँगूठे की निशानी ले लेते हैं और बाद में उनमें अधिक रकम भर लेते हैं।
  5. बहुत-से स्थानों पर ऋण देते समय ऋण की रकम में से अनेक प्रकार के खर्चे काट लेते हैं। कभी-कभी यह रकम 5% से 10% तक हो जाती है।
  6. साहूकार कृषकों को अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋण देकर उन्हें फिजूलखर्ची बना देते हैं।
  7. साहूकार समय-समय पर हिसाब-किताब में भी गड़बड़ करती रहती है।
  8. साहूकार कृषकों को ऋण देने के बाद उन्हें अपनी फसल कम कीमत पर बेचने के लिए विवश| करते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में कृषि उपज की विक्रय व्यवस्था को सुधारने के लिए उपयुक्त सुझाव दीजिए।
उत्तर
कृषि उपजों के विपणन में सुधार के उपाय कृषि उपज की विक्रम व्यवस्था को निम्नलिखित उपाय अपनाकर सुधारा जा सकता है

  1. कृषक को महजन-साहूकार के चंगुल से निकालने के लिए सस्ती ब्याज दर पर वित्तीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।
  2. परिवहन के सस्ते व पर्याप्त साधन विकसित किए जाएँ ताकि कृषक अपनी उपजों को मण्डी में ले | जाकर उचित कीमतों पर बेच सकें।
  3. नियंत्रित मण्डियों की अधिकाधिक संख्या में स्थापना की जाए।
  4. मण्डी में बाटों का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाए।
  5. व्यापक स्तर पर भण्डार वे गोदाम बनाए जाएँ।
  6. कृषि उपज की बिक्री के लिए स्थान-स्थान पर सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
  7. किसानों में शिक्षा का पर्याप्त प्रचार-प्रसार किया जाए। 

प्रश्न 5.
छोटे खेतों के विविधीकरण के पक्ष में उपयुक्त तर्क दीजिए।
उत्तर
छोटे खेतों के विविधीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  1. निर्वाह खेती व्यापारिक खेती में बदलेगी। इससे उनकी आय में वृद्धि होगी।
  2. वे खाली समय में पशुपालन, मत्स्य पालन, कृषि वानिकी व बागवानी आदि गैर-कृषि उत्पादक | कार्यों में लग जाएँगे।
  3. उत्पादन की अनिश्चितता तथा कीमत उच्चावचनों की जोखिम कम हो जाएगी।
  4. फसल-पशुधन, विविधीकृत खेत, चारे, फसल अवशेष तथा अन्य फसल चक्रानुक्रम के निम्न| मूल्य वाले घटकों को अधिक कुशलतापूर्वक उपयोग कर सकेंगे और खाद का लाभ उठा सकेंगे।

प्रश्न 6.
भारत में जैविक कृषि की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
कुछ दशक पहले, कृषि उत्पादन की मात्रा, किस्म व समय संबंधित क्षेत्र की जलवायु द्वारा निर्धारित होते थे, जबकि वर्तमान में यह बाजार की शक्तियों द्वारा निर्धारित होते हैं। आज पौष्टिकता के स्थान पर उत्पादन मात्रा पर अधिक ध्यान दिया जाता है। कृषि में कीटनाशक दवाइयों और अन्य रासायनिक अवशेषों के अधिकाधिक प्रयोग के कारण विभिन्न प्रकार के रोगों में वृद्धि हुई है। कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से पर्यावरण भी प्रदूषित हुआ है। मिट्टी, पानी व वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं जिसका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे कृषि अधारणीय (unsustainable) हुई है तथा अल्प पोषण व कुपोषण बढ़ा है।। उपर्युक्त सभी समस्याओं का समाधान जैविक कृषि में निहित है। यह पर्यावरण व खाद्य की गुणक्ता बढ़ाती है, उत्पादन लागतों को घटाती है और लोगों को पौष्टिक, सुरक्षित तथा स्वास्थ्यप्रद खाद्य उपलब्ध कराती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास के उद्देश्य बताइए।
उत्तर
ग्रामीण विकास का अर्थ एवं परिभाषाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रप्रधान अर्थव्यवस्था है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में कहा था–“भारत गाँवों का देश है और इसकी आत्मा गाँवों में निवास करती है। अतः ग्रामीण विकास भारतीय आर्थिक नियोजन का केन्द्रबिन्दु बन गया है। ग्रामीण विकास से आशय ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास से है। इसका अर्थ है ग्रामीण क्षेत्र में निवास कर रही जनता का आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्थान करके उसके जीवन-स्तर में सुधार लाना।
इसे विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है
आर०एन० आजाद के शब्दों में- “ग्रामीण विकास का अर्थ है-आर्थिक विकास की प्रक्रिया हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक अवसंरचनात्मक विकास करना, जिसमें लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास तथा विपणन जैसी द्वितीयक एवं तृतीयक सेवाओं का विकास सम्मिलि है।”

उमा लैली के अनुसार- ग्रामीण विकास से अभिप्राय ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अनेकानेक न्यून आय स्तर के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना और उनके विकास के क्रम को आत्मपोषित बनाना है।”

रॉबर्ट चैम्बर्स के अनुसार-“ग्रामीण विकास का तात्पर्य जनसंख्या के उस विशेष वर्ग के विकास करने की रणनीति है, जिसमें निर्धन ग्रामीण पुरुष, महिलाएँ व बच्चे सम्मिलित हैं। इनकी इच्छा और जरूरतों को पूरा करना है ताकि इनका जीवन-स्तर ऊपर उठ सके। इनमें ग्रामीण किसान, कारीगर, भूमिहीन कृषक भी सम्मिलित होते हैं जो अपने जीवन-यापन हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे हैं।” संक्षेप में, “ग्रामीण विकास से तात्पर्य ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे निर्धन लोगों के जीवन-स्तर में सुधार कर, उन्हें आर्थिक विकास की धारा में प्रवाहित करना है जिसके लिए इनकी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ उन्हें पर्याप्त मात्रा में सामाजिक उपरिव्यय सुविधाएँ भी उपलब्ध करानी होंगी।”

ग्रामीण विकास के उद्देश्य


ग्रामीण विकास के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं उद्योगों की उत्पादकता में वृद्धि करके कुल उत्पादन को बढ़ाना।
  2. सभी ग्रामीणों के लिए लाभदायक रोजगार पैदा करना।
  3. गाँवों को आत्मनिर्भर एवं आत्मपोषित बनाना।
  4. प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखते हुए मानव एवं प्रकृति के मध्य पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना।
  5. देश के आर्थिक विकास में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाना।
  6. स्वार्थरहित नेतृत्व को प्रोत्साहित करना।

प्रश्न 2.
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ग्रामीण विकास के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भारत गाँवों का देश है। भारत के समग्र विकास के लिए ग्रामीण क्षेत्रों का समग्र विकास भी अनिवार्य है। अत: ग्रामीण विकास का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास करना है। इसमें सभी क्षेत्रों (कृषि, उद्योग व सेवा) का विकास सम्मिलित है। 
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रामीण विकास के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है

1. निर्धनता निवारण में सहायक- ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में विकास संबंधी गतिविधियाँ बढ़ी हैं। इससे ग्रामीण निर्धन लोग भी उत्पादक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे हैं। फलस्वरूप उनकी निर्धनता का अनुपात गिर रहा है।

2. बेरोजगारी को दूर करने में सहायक– भारत में निर्धनता का एक प्रमुख कारण व्यापक बेरोजगारी को पाया जाना है। ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक लोग कृषि कार्यों में लगे रहते हैं। ग्राम विकास कार्यक्रमों में बेरोजगार लोगों को रोजगार सुलभ कराने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना पर बल दिया जा रहा है।

3. कृषि उत्पादकता में वृद्धि कारक- ग्रामीण विकास के फलस्वरूप कृषि कार्यों में सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक, मशीन आदि का प्रयोग बढ़ने से कृषि उत्पादकता में वृद्धि और उसको तीव्र विकास हुआ है। गत वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृषि क्षेत्र के इस विकास में ग्रामीण विकास रणनीति की उल्लेखनीय भूमिका रही है।

4. आधुनिक तकनीकी का प्रसारक-  ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से विकास कार्यों को चलाए जाने के कारण कृषि, उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों में परम्परागत एवं रूढ़िवादी तकनीकी के स्थान पर नई एवं आधुनिक तकनीक का प्रयोग बढ़ा है। इससे ग्रामीण विकास में तेजी आई है।

5. आय एवं धन के वितरण की विषमताओं का नियंत्रक- भारत में ग्रामीण विकास की प्रक्रियाके फलस्वरूप आय और सम्पत्ति की असमानता में कुछ कमी आई है, इसके बावजूद आज भी आय एवं सम्पत्ति की असमानता पर्याप्त रूप में विद्यमान है। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के फलस्वखर्प शीघ्र ही इन विषमाताओं में भी कमी होने की आशा है।

6. ग्रामीण क्षेत्र के संसाधनों का विदोहन- गाँवों में परिवहन, संचार, बैंक, विपणन आदि सुविधाओं का विस्तार होने से प्राकृतिक संसाधनों का उचित विदोहन सम्भव हुआ है। इससे ग्रामीण जनता को रोजगार के अवसर सुलभ हुए हैं तथा उनके जीवन-स्तर में भी अपेक्षित सुधार हुआ है।

7. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं तकनीकी का विस्तारक- गत वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, प्रशिक्षण एवं तकनीकी सुविधाएँ बढ़ी हैं। इसके फलस्वरूप साक्षरता की दर भी बढ़ी है।।

8. राष्ट्र-निर्माण में भागीदार- ग्रामीण विकास के परिणामस्वरूप ग्रामीण लोगों में राष्ट्र-निर्माण के प्रति भागीदारी बढ़ी है। आर्थिक क्षेत्र में भागीदारी के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्र में भी इनके नेतृत्व का क्षेत्र बढ़ा है।

9. ग्रामीण विकास का चक्रीय प्रवाहक- ग्रामीण विकास कार्यक्रमों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार-परक उद्योगों की स्थापना की गई है, रोजगार बढ़ा है, निर्धनता में कमी आई है,जीवन-स्तर में सुधार हुआ है तथा आय की असमानताएँ घटी हैं।

प्रश्न 3.
किसान को किस प्रकार की आवश्यकताओं के लिए साख की आवश्यकता होती है? भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में साख व्यवस्था पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर
ग्रामीण विकास के लिए वित्त एक अनिवार्य आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएँ इतनी विशाल हैं कि पर्याप्त वित्तीय सुविधाओं के अभाव में यहाँ विकास नहीं हो सकता। भारत में कृषि कार्य में लिप्त किसान प्राय: एक निर्धन व्यक्ति होता है, इसके पास सम्पत्ति के नाम पर भूमि का छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं होता। भूमि, हल, बैल, बीज, खाद तथा सिंचाई सुविधाओं की व्यवस्था के लिए उसे समय पर वित्तीय साधनों की आवश्यकता होती है। ग्रामीण समुदाय की निर्धनता, कृषि उत्पादन की लम्बी प्रक्रिया और उसकी अनिश्चितता आदि तत्त्वों ने वित्त की समस्या को और भी जटिल बना दिया है। कृषि की प्रकृति ऐसी विचित्र है कि कृषक को केवल उत्पादक ऋणों की ही नहीं अपितु अनुत्पादक ऋणों की भी आवश्यकता होती है।

भारतीय कृषकों की साख संबंधी आवश्यकताएँ

सामान्य रूप से किसानों की साख संबंधी आवश्यकताएँ तीन प्रकार की होती हैं-
1. अल्पकालीन ऋण- ये ऋण प्रायः 15 माह की अवधि तक के होते हैं। ये ऋण मुख्यतः बीज, | खाद आदि के खरीदने तथा पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लिए जाते हैं।

2. मध्यमकालीन ऋण- ये ऋण प्राय: 15 माह से अधिक परंतु 5 वर्ष से कम की अवधि हेतु लिए जाते हैं। इस प्रकार के ऋणों की आवश्यकता प्रायः पशु व कृषि उपकरणों को खरीदने, कुआँ खुदवाने व भूमि-सुधार के लिए पड़ती है।

3. दीर्घकालीन ऋण- इन ऋणों की अवधि प्रायः 6 वर्ष से 20 वर्ष तक की होती है। ये ऋण सामान्यतः पुराने कर्जा को चुकाने, भूमि खरीदने, ट्रैक्टर खरीदने, भूमि पर स्थायी सुधार करने आदि के लिए किसान प्राप्त करता है। जब से कृषि विकास की नई नीति को अपनाया गया है, देश में अल्पकालीन, मध्यमकालीन और दीर्घकालीन सभी प्रकार की साख में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में साख व्यवस्था

ग्रामीण क्षेत्रों में साख के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं
1. महाजन, साहूकार एवं देशी बैंक– महाजन एवं साहूकार कृषि के साथ-साथ लेन-देन का 
कार्य भी करते हैं। ये लोग कृषि के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी पैसा उधार देते हैं, किन्तु साख के इस स्रोत के अनेक दोष हैं जैसे—उसकी ब्याज दर ऊँची होती है, वह ब्याज मूलधन देने से पूर्व ही काट लेता है, अनेक प्रकार के खर्चे काट लिए जाते हैं। देशी बैंकर बैंकिंग एवं गैर-बैंकिंग दोनों ही प्रकार के कार्य सम्पन्न करते हैं। ये भी ऋणों पर ऊँची ब्याज दर वसूल करते

2. बहुसंस्था व्यस्था का विकास- ग्रामीण साख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुसंस्था व्यवस्था का सहारा लिया गया है। इसमें निम्नलिखित संस्थाएँ सम्पिलित हैं

  • व्यापारिको बैंक- व्यापारिक बैंक कृषि विस्तार के लिए अल्पकालीन एवं मध्यमकालीन दोनों प्रकार के ऋण प्रदान करते हैं। अब इनकी अधिकांश शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में ही खोली जा रही हैं। राष्ट्रीयकरण के उपरांत कृषि विकास के क्षेत्र में वाणिज्यिक बैंकों की प्रगति संतोषजनक रही है।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे किसानों, सामान्य कारीगरों तथा भूमिहीन श्रमिकों की साख संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई है।
  • सहकारी साख समितियाँ– सहकारी साख समितियों का प्रमुख उद्देश्य किसानों को साख प्रदान करना है। भारत में सहकारी साख व्यवस्था स्तूपाकार है–ग्रामीण स्तर पर सहकारी साख समितियाँ, जिला स्तर पर केन्द्रीय सहकारी समितियाँ तथा राज्य स्तर पर राज्य सहकारी बैंक। ये कृषि विकास के लिए कम ब्याज दर पर पर्याप्त साख सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
  • भूमि बन्धक अथवा भूमि विकास बैंक—ये बैंक भूमि की जमानत पर किसानों को दीर्घकालीन ऋण देते हैं। भारत में राज्य स्तर पर केन्द्रीय भूमि बन्धक बैंकों की तथा जिला स्तर पर प्राथमिक भूमि बन्धक बैंकों की स्थापना की गई है।
  • नाबार्ड– सन् 1982 में सम्पूर्ण ग्रामीण वित्त के समन्वयन के लिए एक शीर्ष संस्थान-राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की गई। नाबार्ड द्वारा दिए जाने वाले ऋणों के प्रमुख क्षेत्र हैं-लघु सिंचाई, भूमि विकास, कार्य यन्त्रीकरण, बागान, मुर्गीपालन, भेड़-पालन, सूअर पालन, मत्स्य पालन, दुग्धशालाओं का विकास व संग्रहण आदि।

  • स्वयं सहायता समूह- होल ही में ग्रामीण साख व्यवस्था में स्वयं सहायता समूहों का प्रादुर्भाव हुआ है। इसके अंतर्गत प्रत्येक सदस्य न्यूनतम अंशदान करता है। एकत्रित राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। इस ऋण की राशि छोटी-छोटी किस्तों में लौटायी जाती है। ब्याज की दर भी उचित रखी जाती है। इसे अति लघु साख कार्यक्रम कहते हैं।

प्रश्न 4.
अपनी उपज को बेचने के लिए एक किसान को किस प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता| पड़ती है? सरकार की ओर से क्षेत्र में क्या सहायता दी जा रही है?
उत्तर
एक किसान विभिन्न माध्यमों से अपनी उपज को बेचता है। इसके लिए किसान को एक उत्तम विपणन प्रणाली की आवश्यकता होती है, एक ऐसी प्रणाली जो उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों दोनों के हितों की रक्षा कर सके साथ ही विपणन व्यय भी न्यूनतम हो।।

कृषि उपज के विपणन की अनिवार्य सुविधाएँ

कृषि उपज को बेचने के लिए एक किसान के लिए निम्नलिखित सुविधाएँ अपेक्षित हैं

  1. उत्पादन एवं विक्रय के मध्यान्तर में उपज़ के संग्रहण की सुविधा।
  2. कृषि उपज को विपणन केन्द्र तक ले जाने के लिए पर्याप्त एवं मितव्ययी यातायात के साधन।
  3. कमीशन लेने वाले व विभिन्न प्रकार की कटौती काटने वाले वे धोखेबाज मध्यस्थों का उन्मूलन।।
  4. बाजार मूल्यों के बारे में निरंतर जानकारी प्राप्त करने के लिए संचार माध्यमों की उपलब्धि।
  5. कृषि उपज की विभिन्न किस्मों के मूल्यों में अंतर होना चाहिए ताकि अच्छी किस्म के कृषि उत्पादों | का यथोचित मूल्य मिल सके।
  6. यदि वह अतिरेक माल को भण्डारण करना चाहता है, तो साख सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।

कृषि उपज के विपणन में सुधार लाने के लिए सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं

  1. नियमित मर्पियों की स्थापना की गई है तथा उनकी गतिविधियों का मानकीकरण किया गया है।
    ताकि उन्हें मध्यस्थों के शोषण से बचाया जा सके और कृषि उपज को नियमित रूप से मण्डियों में बेचेन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  2. कृषि उपज का श्रेणीकरण (grading) तथा मानकीकरण किया जाता है ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके।
  3. सहकारी कृषि विपणन समितियों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया है।
  4. भण्डारण सुविधाओं का विस्तार किया गया है। खाद्यान्नों को गोदामों में रखने का काम भारतीय खाद्य निगम (FCI) करता है।
  5. देश में माप-तौल की मीट्रिक प्रणाली आरम्भ की गई है।
  6. बेहतर एवं सस्ती परिवहन सुविधाएँ प्रदान की गई हैं।
  7. विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा महत्त्वपूर्ण कृषि वस्तुओं की बाजार में प्रचलित कीमतों की सूचना किसानों को उपलब्ध कराई जाती है।
  8. देश में कृषि पदार्थों के मूल्यों में अनावश्यक, उतार-चढ़ाव न आए तथा किसानों के हित सुरक्षित | रहें इस दृष्टि से ‘कृषि कीमत एवं लागत आयोग की स्थापना की गई है। इसका मुख्य कार्य ‘न्यूनतम समर्थित मूल्य’ (MSP) की संस्तुति करना है।

प्रश्न 5.
जैविक कृषि क्या है? जैविक कृषि के लाभ व हानियाँ भी बताइए।
उत्तर

जैविक कृषि अर्थ

जैविक कृषि एक धारणीय कृषि प्रणाली है। यह वह प्रणाली है जो पर्यावरणीय संतुलन को पुनः स्थापित करके उसका संरक्षण एवं संवर्द्धन करती है। यह भूमि की दीर्घकालीन उपजाऊ शक्ति को बनाए रखती है, अति पौष्टिक भोजन का उत्पादन करने में सहायक होती है तथा भूमि के सीमित संसाधनों का न्यूनतम उपयोग करती है। इसमें फसल-चक्र, पशु खाद तथा कूड़ा-करकट खाद का उपयोग, यांत्रिक कृषि तथा प्राकृतिक पदार्थों से बने कीटनाशकों से कीट नियंत्रण किया जाता है ताकि भूमि की उपजाऊ शक्ति को नियमित बनाए रखा जा सके, पौधों को उनकी आवश्यकतानुरूप पोषकों की पूर्ति की जा सके। जैविक कृषि के लाभ व हानियाँ लाम–

जैविक कृषि के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है

  1. जैविक कृषि करने वाले किसान पेट्रोलियम आधारित संसाधन (जो एक अनव्यीकरण संसाधन है) का प्रयोग नहीं करते।
  2. परम्परागत फसलों की तुलना में जैविक फसलों में अधिक मात्रा में गौण मेटाबोलाइट्स पाए जाते | हैं जिससे पौधों की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है।
  3. जैविक कृषि से मिट्टी की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
  4. इसमें अधिक जैव सक्रियता व जैव विविधता पाई जाती है।
  5. फलोत्पाद अधिक मीठे, स्वादिष्ट व पौष्टिक होते हैं।
  6. जैविक फसलों की उत्पादन दरों में बहुत अधिक उच्चावचन नहीं होते।
  7. जैविक मिट्टी अधिकाधिक उर्वर होती जाती है।
  8. जैविक फसलोत्पाद अधिक पौष्टिक होते हैं। इनमें विटामिन्स के उच्च स्तर पाए जाते हैं।

हानि- जैविक कृषि की प्रमुख हानियाँ निम्नलिखित हैं
1. अजैविक कृषि की तुलना में जैविक कृषि एक महँगी प्रणाली है। इसमें प्रति हैक्टेयर लागत अधिक आती है।
2. यह अधिक श्रम गहन होती है।
3. इसमें पशु खाद का प्रयोग किया जाता है; जिसमें घातक जीवाणु पलते रहते हैं।
4. जैविक खेती के प्रति हेक्टेयर उत्पादन तुलनात्मक रूप से कम होता है।
5. नाशक जीव फसलों को शीघ्र नष्ट कर सकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 4 आलोकवृत्त (गुलाब खण्डेलवाल)

प्रश्न 1:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में बताइए।
या
‘आलोकवृत्त की कथावस्तु (कथानक) पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ का कौन-सा सर्ग आपको सर्वोत्तम प्रतीत होता है और क्यों ? सोदाहरण समझाइए।
या
‘आलोकवृत्त’ के चतुर्थ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त के आधार पर महात्मा गांधी के जीवनवृत्त की किसी प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर सन् 1942 ई० की जनक्रान्ति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ काव्य में वर्णित स्वतन्त्रता-प्राप्ति की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के तृतीय सर्ग के आधार पर गांधी जी के अफ्रीका-प्रवास के जीवन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग के आधार पर गांधी जी का जीवन-परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर स्वाधीनता की ऐतिहासिक यात्रा की संक्षिप्त समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर देश के स्वतन्त्रता संग्राम में गांधी जी के योगदान का वर्णन कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य आधुनिक भारत के महान संघर्ष का जीता-जागता सच्चा इतिहास है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की पंचम एवं षष्ठ सर्ग की कथा पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
“आलोकवृत्त’ के कथानक में आठ सर्ग हैं, जिनकी कथावस्तु संक्षेप में निम्नलिखित है

प्रथम सर्ग : भारत का स्वर्णिम अतीत

प्रथम सर्ग में कवि ने भारत के अतीत के गौरव तथा तत्कालीन पराधीनता का वर्णन किया है। कवि ने बताया है। कि भारत वेदों की भूमि रही है। भारतवर्ष ने ही संसार को सर्वप्रथम ज्ञान की ज्योति दी थी, किन्तु दुर्भाग्यवश एक समय ऐसा आया कि भारतवासी यह भूल गये कि हम कितने गौरवमण्डित थे ? इसका परिणाम यह हुआ कि भारतवर्ष सैंकड़ों वर्ष तक दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहा। सन् 1857 ई० की क्रान्ति के पश्चात् गुजरात के ‘पोरबन्दर’ नामक स्थान पर एक दिव्य ज्योतिर्मय विभूति मोहनदास करमचन्द गांधी के रूप में प्रकट हुई, जिसने हमें विदेशियों की दासता से मुक्त करवाया।

द्वितीय सर्ग : गांधी जी का प्रारम्भिक जीवन

द्वितीय सर्ग में गांधी जी के जीवन के क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला गया है। वे बचपन में कुसंगति में फैंस गये थे, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने पिता के समक्ष अपनी त्रुटियों पर पश्चात्ताप किया और दुर्गुणों को सदैव के लिए छोड़ने की प्रतिज्ञा की और आजीवन उसका निर्वाह किया। इसके बाद कस्तूरबा के साथ गांधी जी का विवाह हुआ। इसके कुछ समय बाद उनके पिताजी का देहान्त हो गया। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड गये। उनकी माँ ने विदेश में रहकर मांस-मदिरा का प्रयोग न करने के लिए समझाया

मद्य-मांस-मदिराक्षी से बचने की शपथ दिलाकर।
माँ ने तो दी विदा पुत्र को मंगल तिलक लगाकर।।

इंग्लैण्ड में सात्त्विक जीवन व्यतीत करते हुए भी वे एक दिन एक कलुषित स्थान पर पहुँच गये, लेकिन उन्होंने अपने चरित्र को कलुषित होने से बचा लिया। वहाँ से वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। भारत आने पर उन्हें उनकी माता के देहान्त का दुःखद समाचार मिला। यहीं पर द्वितीय सर्ग की कथा समाप्त हो जाती है।

तृतीय सर्ग : गांधी जी का अफ्रीका-प्रवास

तृतीय सर्ग में गांधी जी के अफ्रीका में निवास का वर्णन है। एक बार रेलगाड़ी में यात्रा करते समय एक गोरे अंग्रेज ने उन्हें काला होने के कारण अपमानित करके रेलगाड़ी से नीचे उतार दिया। रंगभेद की इस कुटिल नीति से गांधी जी के हृदय को बहुत दु:ख पहुँचा। वे भारतीयों की दुर्दशा से चिन्तित हो उठे। यहाँ पर कवि ने गांधी जी के मन में उत्पन्न अन्तर्द्वन्द्व का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का सहारा लेकर असत्य और हिंसा का सामना करने का दृढ़ निश्चय किया। अपनी जन्मभूमि से दूर विदेश की भूमि पर उन्होंने मानवता के उद्धार का प्रण लिया

पशु-बल के सम्मुख आत्मा की शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की आग बुझानी होगी।

सत्य और अहिंसा के इस मार्ग को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में सैकड़ों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया। दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष-समाप्ति के साथ ही तृतीय सर्ग समाप्त हो जाता है।

चतुर्थ सर्ग : गांधी जी का भारत आगमन

चतुर्थ सर्ग में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आते हैं। भारत आकर गांधी जी ने लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने हेतु जाग्रत किया। उन्होंने साबरमती नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया। अनेक लोग गांधी जी के अनुयायी हो गये, जिनमें डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, विनोबा भावे, ‘राजगोपालाचारी’, सरोजिनी नायडू, ‘दीनबन्धु’, मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस आदि प्रमुख थे। अंग्रेज देश की जनता पर भारी अत्याचार कर रहे थे। गांधी जी ने चम्पारन में नील की खेती को लेकर आन्दोलन आरम्भ किया; जिसमें वे सफल हुए। एक अंग्रेज द्वारा अपनी पत्नी के हाथों गांधी जी को विष देने तक का प्रयास किया गया, परन्तु वह स्त्री गांधी जी के दर्शन कर ऐसा ने कर सकी। इसके विपरीत उन दोनों को हृदय-परिवर्तन हो गया। इसी सर्ग में ‘खेड़ा-सत्याग्रह का वर्णन भी हुआ है। कवि ने इस सत्याग्रह में सरदार वल्लभभाई पटेल को चरित्र-चित्रण विशेष रूप से किया है।

पंचम सर्ग : असहयोग आन्दोलन

इस सर्ग में कवि ने यह चित्रित किया है कि गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन निरन्तर बढ़ता गया। अंग्रेजों की दमन-नीति भी बढ़ती गयी। गांधी जी के नेतृत्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों का समूह नागपुर पहुँचता है। नागपुर के कांग्रेस-अधिवेशन में गांधी जी के ओजस्वी भाषण ने भारतवर्ष के लोगों में नयी स्फूर्ति भर दी, किन्तु अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने हिन्दुओं-मुसलमानों में साम्प्रदायिक दंगे करवा दिये। गांधी जी को बन्दी बना लिया गया। उन्होंने सत्याग्रह का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। कारागार से छूटने के बाद उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजनोत्थान, खादी-प्रचार आदि रचनात्मक कार्यों में अपना सम्पूर्ण समय लगाना आरम्भ कर दिया। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी ने इक्कीस दिनों का उपवास रखा

आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन, यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के, अनशन का संकल्प सुनाया।

फिर लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता के प्रस्ताव के साथ ही पाँचवाँ सर्ग समाप्त हो जाता है।

षष्ठ सर्ग : नमक सत्याग्रह

इस सर्ग में गांधी जी द्वारा चलाये गये नमक-सत्याग्रह का वर्णन हुआ है। गांधी जी ने समुद्रतट पर बसे ‘डाण्डी नामक स्थान की पैदल यात्रा 24 दिनों में पूरी की। नमक आन्दोलन में हजारों लोगों को बन्दी बनाया गया। अंग्रेज सरकार ने लन्दन में ‘गोलमेज सम्मेलन बुलाया, जिसमें गांधी जी को आमन्त्रित किया गया। इसके परिणामस्वरूप सन् 1937 ई० में ‘प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना हुई। इसके साथ ही षष्ठ सर्ग समाप्त हो जाता है।

सप्तम सर्ग : सन् 1942 की जनक्रान्ति

द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज सरकार भारतीयों का सहयोग तो चाहती थी, किन्तु उन्हें पूर्ण अधिकार देना नहीं चाहती थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद 1942 ई० में गांधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा दिया। सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इसका वर्णन कवि ने बड़े ही सजीव रूप से किया है

थे महाराष्ट्र-गुजरात उठे, पंजाब-उड़ीसा साथ उठे।
बंगाल इधर, मद्रास उधर, मरुथल में थी ज्वाला घर-घर ॥

कवि ने इस आन्दोलन का वर्णन अत्यधिक ओजस्वी भाषा में किया है। बम्बई अधिवेशन के बाद गांधी जी सहित सभी भारतीय नेता जेल में डाल दिये जाते हैं। पूरे देश में इसकी विद्रोही प्रतिक्रिया होती है। कवि के शब्दों में,

जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं।

इस सर्ग में कवि ने गांधी जी एवं कस्तूरबा के मध्य हुए एक वार्तालाप का भी भावपूर्ण चित्रण किया है जिसमें गांधी जी के मानवीय स्वभाव और कस्तूरबा की सेवा-भावना, मूक त्याग और बलिदान का सम्यक् निरूपण किया है।

अष्टम सर्ग : भारतीय स्वतन्त्रता का अरुणोदय

अष्टम सर्ग का आरम्भ भारत की स्वतन्त्रता से किया गया है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् देशभर में हिन्दू-मुस्लिम-साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हैं। गांधी जी को इससे बहुत दुःख हुआ। वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं

प्रभो ! इस देश को सत्पथ दिखाओ, लगी जो आग भारत में बुझाओ।
मुझे दो शक्ति इसको शान्त कर दें, लपट में रोष की निज शीश धर दें।

इस कल्याण-कामना के साथ ही यह खण्डकाव्य समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
कवि ने ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना सोद्देश्य की है। इस कथन को समझाइट।
या
” ‘आलोकवृत्त’ मनुष्य के जीवन में आशा और आस्था का आलोक विकीर्ण करता हुआ उसे मानवता के उच्चतम शिखरों की ओर उन्मुख करता है।” इस कथन की सार्थकता सोदाहरण सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का सन्देश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का उद्देश्य महात्मा गांधी के आदर्शों का निदर्शन है। प्रमाणित कीजिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ में स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की झाँकी के दर्शन होते हैं।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ में जीवन के श्रेष्ठ मूल्यों का उद्घोष है। सिद्ध कीजिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ पीड़ित मानवता को सत्य और अहिंसा का शाश्वत सन्देश देता है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ?
या
“‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में भारत के सांस्कृतिक-ऐतिहासिक इतिहास को वाणी दी गयी है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त में युग-युग तक मानवता को सत्य, प्रेम और अहिंसा के दिव्य सन्देश से अनुप्राणित करने की भावना है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के उद्देश्य (सन्देश) को स्पष्ट कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित जीवन के अनुकरणीय मूल्यों पर अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य राष्ट्रीय चेतना का एक प्रतीक है। सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का कथानक देश-प्रेम और मानव-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में ऐसे चिरंतन आदर्शों और सार्वभौम मूल्यों का प्रतिपादन है, जो मानव समाज को प्रेरणा देता है।” इस दृष्टि से ‘आलोकवृत्त’ पर अपना विचार प्रस्तुत कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में वर्णित गांधी जी के मानसिक संघर्ष को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
शीर्षक की सार्थकता – कवि गुलाब खण्डेलवाल ने आलोकवृत्त’ में महात्मा गांधी के सदाचार एवं मानवता के गुणों से आलोकित व्यक्तित्व को चित्रित किया है। इस खण्डकाव्य का विषय, उद्देश्य एवं मूल भावना यही है। महात्मा गांधी के जीवन को हम आलोक स्वरूप कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने भारतीय संस्कृति की चेतना को अपने सद्गुणों एवं सविचारों से आलोकित किया है। विश्व में सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि मानवीय भावनाओं का आलोक उनके द्वारा ही फैलाया गया; इसलिए उनके जीवन-वृत्त को ‘आलोक-वृत्त’ कहना युक्तियुक्त ही है। इस दृष्टिकोण से यह शीर्षक उपयुक्त है। यह शीर्षक महात्मा गांधी के जीवन, उनके चरित्र, गुणों, सिद्धान्तों एवं दर्शन को पूर्णरूपेण परिभाषित करने में सफल हुआ है। प्रत्येक साहित्यिक रचना के पीछे लेखक का कोई-न-कोई उद्देश्य अवश्य होता है। ‘आलोकवृत्त’ में भी कवि का उद्देश्य निहित है। इसका उद्देश्य या सन्देश निम्नवत् है

(1) स्वदेश-प्रेम की प्रेरणा – इस खण्डकाव्य का सर्वप्रथम उद्देश्य देशवासियों के हृदय में स्वदेश-प्रेम की भावना जाग्रत करना है। कवि ने भारत के गौरवमय अतीत का वर्णन कर लोगों को अपने महान् देश का । वास्तविक स्वरूप दिखाया है

जिसने धरती पर मानवता का, पहला जयघोष किया था।
बर्बर जग को सत्य-अहिंसा का, पावन सन्देश दिया था।

इस प्रकार कवि भारत के अतीत का वर्णन करके भारत की वर्तमान अधोगति के प्रति भारतीय जनता के हृदय में टीस, आक्रोश एवं चेतना जाग्रत करना चाहता है।

(2) सत्य-अहिंसा का महत्त्व – आलोकवृत्त के माध्यम से कवि ने सत्य और अहिंसा को प्रतिष्ठित किया है। कवि ने देश की स्वाधीनता हेतु सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देकर लोगों को श्रेष्ठ आचरणवान् बनने की शिक्षा दी है। कवि ने गांधी जी का उदाहरण प्रस्तुत करके यह सिद्ध किया है कि हम सत्य और अहिंसा के द्वारा अपने प्रत्येक संकल्प को पूरा कर सकते हैं

अहिंसा ने अजब जादू दिखाये।
विरोधी हैं खड़े कन्धा मिलाये ॥

(3) सहयोग एवं राष्ट्रीय एकता – कवि यह अनुभव करता है कि अंग्रेज शासकों ने हमारे देश में तरह-तरह की फूट डालकर देश को विघटित करने का प्रयास किया है। उसका मानना है कि हमारे देश की स्वतन्त्रता, एकता एवं सहयोग की भावना के आधार पर ही सुरक्षित रह सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए आलोकवृत्त’ खण्डकाव्यं में यह सन्देश दिया गया है कि हमें साम्प्रदायिक एवं प्रान्तीय भेदभाव को भूलकर राष्ट्र की एकता बनाये रखनी है

यदि मिलकर इस राष्ट्र-यज्ञ में, सब कर्तव्य निभायें अपना।
एक वर्ष में हो पूरा, मेरा रामराज्य का सपना ॥

(4) मानवमात्र का कल्याण – कवि ने मात्र भारत के ही कल्याण की कामना नहीं की है, वरन् वह तो सम्पूर्ण मानवता का कल्याण चाहता है

जुड़ता जब सम्बन्ध हृदय का, भेदभाव मिट जाता है।
देश-जाति रंगों से गहरा, मानवता का नाता है।

(5) मानवीय-मूल्यों की प्रतिष्ठा-आलोकवृत्त’ के रचनाकार का उद्देश्य यह रहा है कि सर्वत्र सत्य, प्रेम,
सदाचार, न्याय, सहिष्णुता आदि मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हो; उदाहरणार्थ

प्रेम सृष्टि का मूल्य धर्म, चेतना का नियम सनातन ।
इसके कारण ही विनाश से, बचो आज तक जीवन ॥
X                          X                     X
लोकतन्त्र का रथ समता के, पहियों पर चलता है।

(6) त्याग तथा बलिदान की भावना का सन्देश – कवि का एक सन्देश देश के लिए त्याग एवं बलिदान से सम्बन्धित है। गांधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए बड़े से बड़ा बलिदान किया तथा अनेक कष्ट सहे। कवि ने गांधी जी के उदाहरण को प्रस्तुत करके देश के युवकों को देश के लिए त्याग एवं बलिदान का सन्देश दिया है।

(7) पवित्र साधन अपनाने का सन्देश – गांधी जी का विचार था कि उत्तम साध्यों की प्राप्ति के लिए पवित्र साधनों को ही अपनाना चाहिए। गांधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए प्रेम, सत्य तथा अहिंसा को ही साधन के रूप में अपनाया था। गांधी जी के जीवन के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कवि ने प्रत्येक को केवल पवित्र साधनों को ही अपनाने का महान् सन्देश दिया है।
इस प्रकार आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य गांधी जी के जीवन-चरित को माध्यम बनाकर राष्ट्रप्रेम, सत्य, अहिंसा, परोपकार, न्याय, समता, सदाचार आदि की प्रेरणा देने के अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल रहा है।

प्रश्न 3:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के संवाद-सौष्ठव की निदर्शना कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘आलोकवृत्त’ का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ एक सफल खण्डकाव्य है। इस उक्ति की सप्रमाण पुष्टि कीजिए।
या
इतने बड़े कथानक को ‘आलोकवृत्त’ में समेटकर कवि ने अपनी प्रबन्ध पदता का परिचय दिया है। इस कथन पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। कवि ने कल्पना का पुट देकर कथा को सरस तथा हृदयस्पर्शी बना दिया है। कवि ने भारत के अतीत के गौरव का स्मरण करते हुए तत्कालीन स्थिति का वर्णन किया है। आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावपूर्ण चित्रण और सुगठित घटनाक्रम – ‘आलोकवृत्त’ की कथावस्तु के माध्यम से कवि ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया है। आरम्भ के चार सर्गों में स्वाधीनता-आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है और अन्तिम चार सर्गों में दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी के भारत-आगमन, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, स्वतन्त्रता-प्राप्ति और स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में हुए साम्प्रदायिक दंगों का इतिहास रोचक शैली में कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया है।

(2) सफल चरित्रांकन : गांधी जी की जीवनी – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य वास्तव में गांधी जी की संक्षिप्त जीवन-कथा है। कवि ने गांधी जी के जन्म; शैशवकालीन घटनाओं; पिता की मृत्यु; कस्तूरबा से विवाह; इंग्लैण्ड-यात्रा; दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटना; चम्पारन-खेड़ा सत्याग्रह; कलकत्ता, कानपुर, लाहौर के कांग्रेस-अधिवेशन; नमक सत्याग्रह; गोलमेज सम्मेलन; 1942 ई० में भारत छोड़ो आन्दोलन; कस्तूरबा की मृत्यु; साम्प्रदायिक संघर्ष; इक्कीस दिनों का अनशन तथा स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गांधी जी के मन की चिन्ता का क्रमबद्ध वर्णन प्रस्तुत किया है। वास्तव में यह गांधी जी की काव्यात्मक संक्षिप्त जीवनी है।

(3) कथा-संगठन – आलोकवृत्त’ का आरम्भ भारत के गौरवमये अतीत से होता है। इसके साथ ही । गांधीकालीन भारत की दुर्दशा का वर्णन किया गया है, जो बहुत ही प्रेरणाप्रद है। गांधी जी का शिक्षा ग्रहण करने इंग्लैण्ड जाना; वहाँ से बैरिस्टर बनकर दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह करना तथा तत्पश्चात् कथा का उतारे दिखाया गया है। इसके बाद भारतवर्ष तथा विश्व की मंगल-कामना के साथ कथावस्तु का अन्त हो जाता है।

विषमता, फूट, मिथ्याचार भागे, सभी का हो उदय, नव ज्योति जागे।
विजित हों प्यार से तक्षक विषैले, दयामय! विश्व में सद्भाव फैले ॥

इस प्रकार कथावस्तु पाँचों कार्यावस्थाओं की दृष्टि से पूर्ण सफल है।
खण्डकाव्य के शिल्प के अनुसार ‘आलोकवृत्त’ को आठ सर्गों में विभक्त किया गया है। सर्गों का क्रम कवि की रचनात्मक प्रतिभा का द्योतक है। कवि ने इस खण्डकाव्य में महात्मा गांधी के समग्र जीवन-वृत्त को इस रूप में चित्रित किया है कि भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के पूरे इतिहास के साथ-साथ गांधी जी के सत्य और अहिंसा के सिद्धान्त भी पूरी तरह प्रतिपादित होते हैं।

(4) संवाद-योजना – कथावस्तु के विस्तार के कारण इस खण्डकाव्य में संवाद-योजना को प्रमुखता प्रदान नहीं की गयी है। यद्यपि यह खण्डकाव्य प्रधान रूप से वर्णनात्मक ही है; तथापि विभिन्न स्थानों पर महात्मा गांधी के संक्षिप्त संवाद भी प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ अन्य पात्रों द्वारा भी संवादों का प्रयोग हुआ है, किन्तु इसे नगण्य ही कहा जाएगा।

(5) पात्र एवं चरित्र-चित्रण – आलोकवृत्त’ में गांधी जी का चरित्र धीरोदात्त नायक के रूप में विकसित हुआ है। यद्यपि उनमें मानवोचित दुर्बलताएँ हैं; परन्तु अपनी ईमानदारी, सरलता, सत्यनिष्ठा और लगन के बल पर वे उन दुर्बलताओं पर सहज विजय प्राप्त कर लेते हैं। गांधी जी में दम्भ और पाखण्ड का लेशमात्र अंश भी नहीं है। वे अपने प्रेम से विरोधियों तक के हृदय को जीत लेते हैं। मानवता में उनकी अखण्ड आस्था है और इसी आस्था के बल पर वे देश, जाति और भेदभाव पर आधारित सीमाओं का अतिक्रमण करके मानव-एकता को प्रतिष्ठित करते हैं। मानव-हृदय की एकता और सभी के प्रति पारस्परिक समानता का भाव उनके अहिंसा-सिद्धान्त की आधारशिला है। इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य में गांधी जी को चरितनायक बनाकर उनके प्रेरणाप्रद विचारों को वाणी दी गयी है। अन्य पात्रों का समावेश नायक के चरित्र पर प्रकाश डालने हेतु प्रसंगवश ही किया गया है। वे कवि के उद्देश्य को अभिव्यक्ति देने में सहायकमात्र हैं।

(6) वर्णन में भावात्मकता – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु का आरम्भ बड़ा ही रोचक है। मध्य की घटनाएँ कौतूहल बढ़ाने वाली हैं। कथा का अन्त बड़ा ही मार्मिक एवं प्रभावशाली है। खण्डकाव्य के शिल्प के अनुसार ‘आलोकवृत्त’ की कथा वर्णनात्मक है। वर्णनात्मक स्थलों को भावात्मक स्वरूप प्रदान करने में कवि ने अपना पूरा-पूरा प्रयास किया है। मार्मिक स्थलों के चयन में कवि की प्रतिभा एवं सहृदयता भी पूर्णरूपेण परिलक्षित होती है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आलोकवृत्त’ में गांधी जी जैसे महान् लोकनायक के गुणों को आधार बनाकर काव्य-रचना की गयी है। कथा की पृष्ठभूमि विस्तृत है, किन्तु कवि ने गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने हेतु आवश्यक प्रसंगों का चयनकर उसे इस प्रकार संगठित एवं विकसित किया है कि वह खण्डकाव्य के उपर्युक्त बन गयी है। गौण पात्रों का चित्रण नायक के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु किया गया है। आदर्शपूर्ण भावनाओं की स्थापना हेतु रचित इस काव्य-ग्रन्थ में यद्यपि रसों एवं छन्दों की विविधता है; तथापि इससे खण्डकाव्य के उद्देश्य एवं उसके विधा सम्बन्धी तत्त्वों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। अतः इस काव्यग्रन्थ को एक आदर्श सफल खण्डकाव्य कहना उपयुक्त होगा।

प्रश्न 4:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) गांधी जी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर गांधी जी के जीवन और आदर्शों का उल्लेख कीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ में गांधी जी धीरोदात्त नायक और लोकनायक के रूप में चित्रित किये गये हैं।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्कयुक्त उत्तर दीजिए।
या
” ‘आलोकवृत्त’ में गांधी जी का कृतित्व ही नहीं उनका जीवन-दर्शन और चिन्तन भी अभिव्यक्त हुआ है।” इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी के चरित्र की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के आधार पर गांधी जी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवतु हैं

(1) सामान्य मानवीय दुर्बलताएँ – गांधी जी का आरम्भिक जीवन एक साधारण मनुष्य की भाँति मानवीय दुर्बलताओं वाला रहा है। उन्होंने एक बार अपने गुरु से छुपकर मांस-भक्षण किया था; उदाहरणार्थ

करने लगे मांस-भक्षण, गुरुजन की आँख बचाकर।।

किन्तु बाद में उन्होंने अपनी इन दुर्बलताओं पर अपनी आत्मिक शक्ति के बल पर पूर्ण विजय पा ली।

(2) देश-प्रेमी – आलोकवृत्त’ में गांधी जी के चरित्र की सर्वप्रथम विशेषता उनका देशप्रेम है। वे देशप्रेम के कारण अनेक बार कारागार जाते हैं, जहाँ उन्हें अंग्रेजों के अपमान-अत्याचार सहने पड़ते हैं। उन्होंने अपना सर्वस्व देश के लिए न्योछावर कर दिया। भारत के लिए उनका कहना था

तू चिर प्रशान्त, तू चिर अजेय,
सुर-मुनि-वन्दित, स्थित,’ अप्रमेय
हे सगुण ब्रह्म, वेदादि-गेय,
हे चिर अनादि हे चिर अशेष
मेरे भारत, मेरे स्वदेश।

(3) सत्य और अहिंसा के प्रबल समर्थक – गांधी जी देश की स्वतन्त्रता केवल सत्य और अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त करना चाहते हैं। असत्य और हिंसा का मार्ग उन्हें अच्छा नहीं लगता। वे कहते हैं

पशुबल के सम्मुख आत्मा की, शक्ति जगानी होगी।
मुझे अहिंसा से हिंसा की, आग बुझानी होगी।

अहिंसा व्रत का पूर्ण रूप से पालन उनके जैसा कोई विरला व्यक्ति ही कर सकता है।

(4) दृढ़ आस्तिक – गांधी जी पुरुषार्थी हैं तो भी वे ईश्वर की सत्ता में अटूट विश्वास रखते हैं। उनका मानना है। कि साधन पवित्र होने चाहिए और परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। वे प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर करते हैं। यही कारण है कि वे मात्र पवित्र साधनों को प्रयोग ही उचित समझते हैं

क्या होगा परिणाम सोच हूँ, पर क्यों सोचें, वह तो।
मेरा क्षेत्र नहीं, स्रष्टा का, जो प्रभु करे वही हो ।।

(5) स्वतन्त्रता-प्रेमी – गांधी जी के जीवन का मूल उद्देश्य भारत को स्वतन्त्र करवाना है। वे भारतमाता की स्वतन्त्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। देशंवासियों को परतन्त्रता की बेड़ियाँ काटने के लिए प्रेरित करते हुए वे कहते हैं

जाग तुझे तेरी अतीत, स्मृतियाँ धिक्कार रही हैं।
जाग-जाग तुझे भावी, पीढ़ियाँ पुकार रही हैं।

(6) मानवतावादी – गांधी जी मानव-मानव में अन्तर नहीं मानते। वे सबके लिए समानता के सिद्धान्त में विश्वास करते हैं। उन्होंने जीवन भर ऊँच-नीच, जाति-पाँति और रंग-भेद का डटकर विरोध किया। अछूत कहे जाने वाले भारतीयों के उद्धार के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहे। इस भेदभाव से उन्हें बहुत दुःख होता था

जिसने मारा मुझे, कौन वह, हाथ नहीं क्या मेरी।
मानवता तो एक, भिन्न बस उसका-मेरा घेरा॥

(7) भावात्मक, राष्ट्रीय और हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक – गांधी जी ‘विश्वबन्धुत्व’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओत-प्रोत थे। वे सभी को सुखी व समृद्ध देखना चाहते थे। इन्होंने भारत की समग्र जनता को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए जीवन-पर्यन्त प्रयास किया और हिन्दू-मुसलमानों को भाई-भाई की तरह रहने की प्रेरणा दी। उनका कहना था

यदि मिलकर इस राष्ट्रयज्ञ में सब कर्तव्य निभायें अपना,
एक वर्ष में ही पूरा हो मेरा रामराज्य का सपना।

(8) आत्मविश्वासी – गांधी जी आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे, उन्होंने जो कुछ भी किया पूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया और उसमें वे सफल भी हुए। उनका मानना था

शासित की स्वीकृति न मिले तो शासक क्या कर लेगा
यदि आधार मिटे भय का तो एकतन्त्र ठहरेगा।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एक श्रेष्ठ मानव में जितने भी मानवोचित गुण हो सकते हैं वे सभी महात्मा गांधी में विद्यमान थे।

प्रश्न 5:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य के काव्य-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के काव्य-वैभव (काव्य-सौन्दर्य) की समीक्षा कीजिए।
या
“काव्य-कला की दृष्टि से ‘आलोक-वृत्त’ एक श्रेष्ठ रचना है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
किसी भी रचना के काव्य-सौन्दर्य के अन्तर्गत उसके भावपक्ष और कलापक्ष के सौन्दर्य की समीक्षा की जाती है। ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य का काव्य-सौन्दर्य अथवा इसकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) कथावस्तु-वर्णन – ‘आलोकवृत्त काव्य में आठ सर्ग हैं। इन सर्गों में कवि ने गांधी जी के सम्पूर्ण जीवन के साथ भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का इतिहास भी प्रस्तुत किया है। कवि ने इतिहास एवं जीवन-गाथा के साथ-साथ श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की स्थापना भी की है।

(2) रस-योजना – आलोकवृत्त’ में कवि ने विभिन्न मानव मन:स्थितियों के साथ-साथ वीर, शान्त और करुण रसों को निरूपित किया है; उदाहरणार्थ

वीर रस – जब क्रान्ति लहर चल पड़ती है, हिमगिरि की चूल उखड़ती है।
साम्राज्य उलटने लगते हैं, इतिहास पलटने लगते हैं।
शान्त रस – पर कैसे प्रतिकार असत् का, हिंसा का पशुबल का ।
कैसे सम्भव शमन द्वेष के, इस नरमेध-अनल का ॥
करुण रस – चीत्कार हुआ ज्यों सहसा डूबे रहे जन का
दौड़ा पति सुनकर शब्द प्रिया के क्रन्दन का।
देखा कि साश्रु वह अतिथि-पदों में पड़ी हुई।
सिसकियाँ विकल भरती थी भू में गड़ी हुई।

(3) प्रकृति-चित्रण – कवि ने ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य में प्रकृति-चित्रण कम ही किया है। कुछ स्थलों पर प्रकृति को पृष्ठभूमि के रूप में चित्रित किया गया है; उदाहरणार्थ

पद-प्रान्त में सागर गरजता सिंह-सा, झलमल गले से हीरकों के हार-सी।
गंगा तरुणिजा, गोमती, गोदावरी, कृष्णादिका, सिर पर मुकुट हिमवान का ॥

(ब) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की भाषा सरल, सुबोध, परिमार्जित एवं रोचक खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण विद्यमान हैं। कवि ने अनेक प्रचलित मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है ।

कट जाता शासन का पत्ता। मुँह के बल गिर पड़ती सत्ता।

इस खण्डकाव्य की भाषा अत्यन्त सरल और बिम्बमय है। सीधे-सादे शब्दों में बड़ी बातें कहने में कवि की । कला सराहनीय है। भाषा की बिम्बमयता का एक उदाहरण देखिए

हँस हँसकर अंगारे चुगते शशि की ओर चकोर चले।
जैसे घन पाहन-वर्षण में पर फैलाये मोर चले।।

ओज गुण का निर्वाह तो खण्डकाव्य में आद्योपान्त किया गया है। प्रसाद गुण तो इसकी प्रत्येक पंक्ति में देखा जा सकता है। जिन प्रसंगों में माधुर्य की अपेक्षा है, वहाँ भाषा अत्यन्त मधुर रूप ग्रहण कर लेती है।

(2) शैली – प्रबन्ध शैली में लिखे गये आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की घटनाओं के वर्णन में वर्णनात्मक शैली की चित्रोपमता और प्रतीकात्मकता के दर्शन होते हैं। यंत्र-तत्र संवादात्मकता भी है, किन्तु शैली का स्वरूप वर्णनात्मक ही है। वर्णनात्मक शैली में भावात्मकता को स्थान देकर इन्होंने अपने भावों को कुशल अभिव्यक्ति दी है।

(3) छन्द-विधान – आलोकवृत्त’ में छन्दों की विविधता है। 16 मात्राओं के छोटे छन्द से लेकर 32 मात्राओं के लम्बे छन्दों का प्रयोग इसमें सफलतापूर्वक किया गया है। प्रथम सर्ग में मुक्त छन्द का प्रयोग हुआ है। सर्गों के मध्य में गीत-योजना भी की गयी है, जिससे राष्ट्रीय भावनाओं की वृद्धि में सहयोग मिला है।

(4) अलंकार-योजना – आलोकवृत्त’ काव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, यमक, अनुप्रास, श्लेष आदि अलंकारों का सफल प्रयोग किया है। अलंकार-प्रयोग में स्वाभाविकता है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं

रूपक    –      कैसे सम्भव शमन द्वेष के,
इस नरमेध-अनल का।।
उपमा     –    पद-प्रान्त में सागर गरजता सिंह-सा।
पद-प्रान्त म साग
यमक     –        मन्मथ धन्य प्रथम नायक का,
जिसने मन मथ डाला।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि ‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की रचना महान् लोकनायक गांधी जी के गुणों को आधार बनाकर की गयी है। गौण पात्रों का चरित्रांकन नायक गांधी जी के चरित्र की विशेषताओं को प्रकाशित करने हेतु ही किया गया है। यद्यपि इस खण्डकाव्य में रसों एवं छन्दों की विविधता है तथापि इससे उद्देश्य एवं विधा से सम्बद्ध तत्त्वों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अत: इसे एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है।

प्रश्न 6:
‘आलोकवृत्त’ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की सही झाँकी मिलती है ? पुष्टि कीजिए।
या
‘आलोकवृत्त’ के आधार पर भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
या
आलोकवृत्त’ नाटक में वर्णित घटनाओं को अपने शब्दों में लिखिए।
या
“‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य आधुनिक भारत के संघर्षों की झाँकी प्रस्तुत करने में सफल है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘आलोकवृत्त’ खण्डकाव्य की कथावस्तु आठ सर्गों में विभक्त है। प्रथम सर्ग में भारत के गौरवशाली अतीत का, उसके बाद पराधीनता का और सन् 1857 ई० की क्रान्ति के बाद नयी ज्योति के रूप में गांधी जी के उदय का वर्णन है। द्वितीय सर्ग में गांधी जी के प्रारम्भिक जीवन और फिर इंग्लैण्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौटने तथा उनकी माता की मृत्यु का वर्णन है। तृतीय सर्ग में गांधी जी द्वारा अफ्रीका में रंग-भेद से दु:खी भारतीयों का वर्णन है, जिन्हें दुर्दशा से मुक्ति दिलाने के लिए गांधी जी ने उनका नेतृत्व किया और सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। चतुर्थ सर्ग में गांधी जी भारत लौट आये और उन्होंने देशवासियों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए जगाया। इसमें चम्पारन और खेड़ा के आन्दोलन का वर्णन है। पंचम सर्ग में अंग्रेजों के दमन, साम्प्रदायिक दंगे भड़कने, गांधी जी को बन्दी बनाने और फिर जेल से छूटने के बाद गांधी जी द्वारा हिन्दी-मुस्लिम एकता, शराब-मुक्ति, हरिजन-उत्थान, खादी-प्रचार आदि कार्यक्रमों का वर्णन है और लाहौर में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रस्ताव के वर्णन के साथ यह सर्ग समाप्त हो जाता है। इसी सर्ग में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी जी के 21 दिनों के उपवास का भी वर्णन है

आत्म शुद्धि का यज्ञ कठिन यह पूरा होने को जब आया।
बापू ने इक्कीस दिनों के अनशन का संकल्प सुनाया ।।

छठे सर्ग में नमक आन्दोलन, लन्दन के गोलमेज सम्मेलन और 1937 के प्रान्तीय स्वराज्य की स्थापना का वर्णन है। सातवें सर्ग में 1942 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन का और आठवें सर्ग में भारतीय स्वतन्त्रता के अरुणोदय के साथ-साथ विभाजन के कारण भड़के दंगों से दु:खी गांधी जी की कल्याण-कामना का वर्णन है, जिसमें उन्होंने कहा है

प्रभो इस देश को सत्पथ दिखाओ।
लगी जो आग भारत में बुझाओ ॥

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ‘आलोकवृत्त’ में भारत के स्वाधीनता संग्राम की सही झाँकी मिलती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)

प्रश्न 1:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्यको कथावस्तु (कथानक) का संक्षेप में परिचय लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग में कृष्ण और कर्ण के संवाद में दोनों के चरित्र की कौन-सी प्रमुख विशेषताएँ प्रकट हुई हैं ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी के सप्तम सर्ग की कथावस्तु का संक्षेप में सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग में वर्णित कुन्ती-कर्ण के संवाद का सारांश लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग के आधार पर श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
या
” रश्मिरथी’ के प्रत्येक सर्ग में संवादात्मक स्थल ही सबसे प्रमुख है।” इस कथन का सतर्क विश्लेषण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण और अर्जुन के युद्ध का वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा विरचित खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। इस काव्य में परमवीर एवं दानी कर्ण की कथा है। ‘रश्मिरथी के प्रत्येक सर्ग के संवादों में नाटकीयता के गुण विद्यमान हैं। यह नाटकीयता का गुण प्रारम्भ से अन्त तक नाटक के प्रत्येक सर्ग में विद्यमान है। इसमें सरलता, सुबोधता, सुग्राह्यता एवं स्वाभाविकता के साथ-साथ प्रभावशीलता का गुण भी विद्यमान है। कवि ने इस नाटक के संवादों में घटनाओं और परिस्थितियों को भावात्मक धरातल पर सँजोया है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभाजित है, जो संक्षेप में निम्नवत् है

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन

प्रथम सर्ग के आरम्भ में कवि ने अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र पुरुषों की पृष्ठभूमि बनाकर कर्ण का परिचय दिया है। कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। कर्ण कुन्ती के गर्भ से कौमार्यावस्था में उत्पन्न हुए थे, इसलिए कुन्ती ने लोकलाज के भय से उस नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे एक निम्न जाति (सूत) के व्यक्ति ने पकड़ लिया और उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण शूरवीर, शीलवान्, पुरुषार्थी और शस्त्र व शास्त्र-मर्मज्ञ बने।

एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र-कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। सभी लोग अर्जुन की बाण-विद्या पर मुग्ध हो गये, किन्तु तभी धनुष-बाण लिये कर्ण भी सभा में उपस्थित हो गया और उसने अर्जुन को द्वन्द्व युद्ध के लिए चुनौती दी

आँख खोलकर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार।
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार ॥

कर्ण की इस चुनौती से सम्पूर्ण सभा आश्चर्यचकित रह गयी, तभी कृपाचार्य ने उसका नाम, जाति और गोत्र पूछे। इस पर कर्ण ने अपने को सूत-पुत्र बतलाया। फिर कृपाचार्य ने कहा कि राजपुत्र अर्जुन से समता प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले कहीं का राज्य प्राप्त करना चाहिए। इस पर दुर्योधन ने कर्ण की वीरता से मुग्ध होकर, उसे अंगदेश का राजा बना दिया और अपना मुकुट उतारकर कर्ण के सिर पर रख दिया। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन गया। इधर कौरव कर्ण को ससम्मान अपने साथ ले जाते हैं। और उधर कुन्ती भाग्य की दुःखद विडम्बना पर मन मसोसती लड़खड़ाती हुई अपने रथ के पास पहुँचती है।

द्वितीय सर्ग : आश्रमवास

द्वितीय सर्ग का आरम्भ परशुराम के आश्रम-वर्णन से होता है। पाण्डवों के विरोध के कारण द्रोणाचार्य ने जब कर्ण को अपना शिष्य नहीं बनाया तो कर्ण परशुराम के आश्रम में धनुर्विद्या सीखने के लिए जाता है। परशुराम क्षत्रियों को शिक्षा नहीं देते थे। कर्ण के कवच और कुण्डल देखकर परशुराम ने उसे ब्राह्मण कुमार समझा और अपना शिष्य बना लिया।

एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे कि तभी एक विषैला कोट कर्ण की जंघा को काटने लगा। गुरु की निद्रा न खुल जाए, इस कारण कर्ण अपने स्थान से हिला तक नहीं। जंघा से बहते रक्त की धारा के स्पर्श से परशुराम की निद्रा टूट गयी। कर्ण की इस अद्भुत सहनशक्ति को देखकर परशुराम ने कहा कि ब्राह्मण में इतनी सहनशक्ति नहीं होती, इसलिए तू अवश्य ही क्षत्रिय या अन्य जाति का है। कर्ण स्वीकार कर लेता है कि मैं सूत-पुत्र हूँ। क्रुद्ध परशुराम ने उसे तुरन्त अपने आश्रम से चले जाने को कहा और शाप दिया कि मैंने तुझे जो ब्रह्मास्त्र विद्या सिखलायी है, तू अन्त समय में उसे भूल जाएगा

सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा शाप समय पर, उसे भूल तू जाएगा।

कर्ण गुरु की चरणधूलि लेकर आँसू-भरे नेत्रों से आश्रम छोड़कर चल देता है।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश

कौरवों से जुए में हारने के कारण पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ा। तेरह वर्ष की यह अवधि व्यतीत कर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं। पाण्डवों की ओर से श्रीकृष्ण कौरवों से सन्धि का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाते हैं। श्रीकृष्ण ने कौरवों को बहुत समझाया, परन्तु दुर्योधन ने सन्धि-प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा उल्टे श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का असफल प्रयास किया।

दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया कि अब तो युद्ध निश्चित है, परन्तु उसे टालने का एकमात्र यही उपाय है कि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दो; क्योंकि तुम कुन्ती-पुत्र हो। अब तुम ही इस भारी विनाश को रोक सकते हो। इस पर कर्ण आहत होकर व्यंग्यपूर्वक पूछता है कि आप आज मुझे कुन्तीपुत्र बताते हो। उस दिन क्यों नहीं कहा था, जब मैं जाति-गोत्रहीन सूत-पुत्र बना भरी सभा में अपमानित हुआ था। मुझे स्नेह और सम्मान तो दुर्योधन ने ही दिया था। मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है।

फिर भी आप मेरे जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को न बताना; क्योंकि मेरे जन्म का रहस्य जानने पर वे ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अपना राज्य मुझे दे देंगे और मैं वह राज्य दुर्योधन को दे डालूंगा

धरती की तो है क्या बिसात ?
आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ।
उसको भी न्यौछावर कर दें,
कुरुपति के चरणों पर धर हूँ॥

इतना कहकर और श्रीकृष्ण को प्रणाम कर कर्ण चला जाता है।

इस सर्ग की कथा से जहाँ हमें श्रीकृष्ण के महान् कूटनीतिज्ञ और अलौकिक शक्तिसम्पन्न होने की विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है वहीं कर्ण के अन्दर हमें सच्चे मित्र और मित्र के प्रति कृतज्ञ होने के गुण दिखाई पड़ते हैं।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

इस सर्ग में कर्ण की उदारता एवं दानवीरता का वर्णन किया गया है। कर्ण प्रतिदिन एक प्रहर तक याचकों को दान देता था। श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि जब तक कर्ण के पास सूर्य द्वारा प्रदत्त कवच और कुण्डल हैं, तब तक कर्ण को कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास उसकी दानशीलता की परीक्षा लेने आये और कर्ण से उसके कवच और कुण्डल दान में माँग लिये। यद्यपि कर्ण ने छद्मवेशी इन्द्र को पहचान लिया, तथापि उसने इन्द्र को कवच और कुण्डल भी दान दे दिये। कर्ण की इस अद्भुत दानशीलता को देख देवराज इन्द्र का मुख ग्लानि से मलिन पड़ गया

अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला ।
देवराज का मुखमण्डल पड़ गया ग्लानि से काला॥

इन्द्र ने कर्ण की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कर्ण को महादानी, पवित्र एवं सुधी कहा तथा स्वयं को प्रवंचक, कुटिल वे पापी बताया और कर्ण को एक बार प्रयोग में आने वाला अमोघ एकघ्नी अस्त्र प्रदान किया।

पंचम सर्ग : माता की विनती

इस सर्ग का आरम्भ कुन्ती की चिन्ता से होता है। कुन्ती इस कारण चिन्तित है कि रण में मेरे पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। कुन्ती व्याकुल हो कर्ण से मिलने जाती है। उस समय कर्ण सन्ध्या कर रहा था, आहट पाकर कर्ण का ध्यान टूट जाता है। उसने कुन्ती को प्रणामकर उसका परिचय पूछा। कुन्ती ने बताया कि तू सूत-पुत्र नहीं मेरा पुत्र है। तेरा जन्म मेरी कोख से तब हुआ था, जब मैं अविवाहिता थी। मैंने लोकलज्जा के भय से तुझे मंजूषा (पेटी) में रखकर नदी में बहा दिया था, परन्तु अब मैं यह सहन नहीं कर सकती कि मेरे ही पुत्र एक-दूसरे से युद्ध करें; अतः मैं तुझसे प्रार्थना करने आयी हूँ कि तुम अपने छोटे भ्राताओं के साथ मिलकर राज्य का भोग करो। कर्ण ने कहा कि मुझे अपने जन्म के विषय में सब कुछ ज्ञात है, परन्तु मैं अपने मित्र दुर्योधन का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। असहाय कुन्ती ने कहा कि तू सबको दान देता है, क्या अपनी माँ को भीख नहीं दे सकता ?

कर्ण ने कहा कि माँ! मैं तुम्हें एक नहीं चार पुत्र दान में देता हूँ। मैं अर्जुन को छोड़कर तुम्हारे किसी पुत्र को नहीं मारूंगा। यदि अर्जुन के हाथों मैं मारा गया तो तुम पाँच पुत्रों की माँ रहोगी ही, परन्तु यदि मैंने युद्ध में अर्जुन को मार दिया तो विजय दुर्योधन की होगी और मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तब भी तुम पाँच पुत्रों की ही माँ रहोगी। कुन्ती निराश मन लौट आती है

हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर, दो बिन्दु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सँघ बड़े ही दुःख से, कुन्ती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से ।

षष्ठ सर्ग : शक्ति-परीक्षण

युद्ध में आहत भीष्म शरशय्या पर पड़े हुए हैं। कर्ण उनसे युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म पितामह उसे नर-संहार रोकने के लिए समझाते हैं, परन्तु कर्ण नहीं मानता और भीषण युद्ध आरम्भ हो जाता है। कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारता है, किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ कर्ण के सामने ही नहीं आने देते; क्योंकि उन्हें भय है कि कर्ण एकघ्नी का प्रयोग करके अर्जुन को मार देगा। अर्जुन को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने भीम-पुत्र घटोत्कच को युद्धभूमि में उतार दिया। घटोत्कच ने घमासान युद्ध किया, जिससे कौरव-सेना त्राहि-त्राहि कर । उठी। अन्ततः दुर्योधन ने कर्ण से कहा

हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का अचिर किसी विधि त्राण करो,
जब नहीं अन्य गति, आँख मूंद एकघ्नी का सन्धान करो।
अरि का मस्तक है दूर, अभी अपनों के सीस बचाओ तो,
जो मरण-पाश है पड़ा, प्रथम, उसमें से हमें छुड़ाओ तो ॥

कर्ण ने भारी नरसंहार करते हुए घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग कर दिया, जिससे घटोत्कच मारा गया। घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से अर्जुन अभय हो गया। आज युद्ध में विजयी होने पर भी कर्ण एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से स्वयं को मन-ही-मन पराजित-सा मान रहा था।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा

‘रश्मिरथी’ का यह अन्तिम सर्ग है। कौरव सेनापति कर्ण ने पाण्डवों की सेना पर भीषण आक्रमण किया। कर्ण की गर्जना से पाण्डव सेना में भगदड़ मच जाती है। युधिष्ठिर युद्धभूमि से भागने लगते हैं तो कर्ण उन्हें पकड़ लेता है, किन्तु कुन्ती को दिये वचन का स्मरण कर युधिष्ठिर को छोड़ देता है। इसी प्रकार भीम, नकुल और सहदेव को भी पकड़-पकड़कर छोड़ देता है। कर्ण का सारथी शल्य उसके रथ को अर्जुन के रथ के निकट ले आता है। कर्ण के भीषण बाण-प्रहार से अर्जुन मूर्च्छित हो जाता है। चेतना लौटने पर श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः कर्ण से युद्ध करने के लिए उत्तेजित करते हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। तभी कर्ण के रथ का पहिया रक्त के कीचड़ में फँस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है। इसी समय श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण-प्रहार करने के लिए कहते हैं

खड़ा है देखता क्या मौन भोले!
शरासन तान, बस अवसर यही है,
घड़ी फिर और मिलने की नहीं है।
विशिख कोई गले के पार कर दे,
अभी ही शत्रु का संहार कर दे।

कर्ण धर्म की दुहाई देता है तो श्रीकृष्ण उसे कौरवों के पूर्व कुकर्मों का स्मरण दिलाते हैं। इसी वार्तालाप में अवसर देखकर अर्जुन कर्ण पर प्रहार कर देता है और कर्ण की मृत्यु हो जाती है। अन्त में युधिष्ठिर आदि सभी कर्ण की मृत्यु पर प्रसन्न हैं, किन्तु श्रीकृष्ण दु:खी हैं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि क्जिय तो अवश्य मिली, पर मिली मर्यादा खोकर। वास्तव में चरित्र की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहा। आप लोग कर्ण को भीष्म और द्रोणाचार्य की भाँति ही सम्मान दीजिए। यहाँ पर इस खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

[ विशेष – मुझे इस सर्ग की कथा सर्वाधिक रुचिकर प्रतीत हुई। इस सर्ग में वर्णित कर्ण के शौर्य व साहस की तुलना इतिहास में विरल है। व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किस प्रकार पतित हो जाता है, भले ही वह ‘धर्मराज’ कहलाता हो अथवा ‘भगवान्। यह यहाँ इतनी कलात्मकता से दर्शाया गया है कि मन नि:स्पन्द हो जाती है। अन्त में कर्ण की मृत्यु को जीवन’ और ‘विजय’ से कहीं ऊँचा सिद्ध करते हुए कृष्ण कहते हैं

दया कर शत्रु को भी त्राण देकर, खुशी से मित्रता करे प्राण देकर,
गया है कर्ण भू को दीन करके, मनुज-कुल को बहुत बलहीन करके।
    Χ                              Χ                    Χ
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान कारिए
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है।

वस्तुतः कर्ण जैसा व्यक्ति और व्यक्तित्व स्रष्टा ने अभी तक कोई अन्य बनाया ही नहीं। वह अपनी तुलना आप है।]

प्रश्न 2:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथा-संगठन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ में कवि द्वारा आधुनिक युग की सामाजिक विसंगतियों; जातिवाद और वर्णाश्रम; पर करारा प्रहार किया गया है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथा संयोजन पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ एक उदात्त और आदर्श भावनाओं का काव्य है। इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में दिनकर ने महाभारतकालीन संगतियों तथा विसंगतियों का सच्चा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं। तर्कसहित उत्तर दीजिए।
या
किन विशेषताओं के आधार पर ‘रश्मिरथी’ को उच्चकोटि का काव्य माना जाता है?
उत्तर:
कविवर रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में परमवीर कर्ण के जीवन से सम्बद्ध कुछ प्रसंगों को लेकर कथा का संगठन किया है। रश्मिरथी’ की कथावस्तु की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावशाली कथावस्तु – रश्मिरथी’ का आरम्भ शस्त्र-विद्या के प्रदर्शन से होता है। इस प्रदर्शन में कर्ण का जाति व गोत्र के नाम पर अपमान किया जाता है। इस प्रकार कथा का आरम्भ बड़ा ही प्रभावशाली है। इसके बाद परशुराम भी जाति के आधार पर कर्ण को शाप देकर अपने आश्रम से निकाल देते हैं। श्रीकृष्ण और कुन्ती कर्ण को अपनी ओर करना चाहते हैं। यहाँ आकर कथा की चरम सीमा आ जाती है। इसके बाद कर्ण युद्ध में युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को पकड़ कर छोड़ देता है और घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग करता है। यहाँ कथा का उतार है। इसके बाद कर्ण के रथ का पहिया धंस जाता है और अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण-वर्षा करके मार डालता है। अन्त में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के वार्तालाप के साथ रश्मिरथी’ का अन्त हो जाता है। इस प्रकार रश्मिरथी’ में कवि ने सभी घटनाओं को बड़े कौशल के साथ प्रभावशाली ढंग से एक सूत्र में पिरोया है। वास्तव में इस काव्य की कथावस्तु पाठक के हृदय और मस्तिष्क पर अमिट प्रभाव छोड़ती है।

(2) ऐतिहासिकता – ‘रश्मिरथी की कथा महाभारत से ली गयी है। महाभारत में भी यह कथा इसी प्रकार है। दिनकर जी ने अपने रचना-कौशल से कथा को अत्यन्त मार्मिक व हृदयस्पर्शी बना दिया है। इस प्रकार ‘रश्मिरथी की सम्पूर्ण कथा ऐतिहासिक है।

(3) प्रेरणाप्रद (उद्देश्य) – ‘रश्मिरथी की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसमें कवि ने भारतवर्ष में व्याप्त जाति-पाँतिगत भेदभाव, कौमार्यावस्था में सन्तानोत्पत्ति, राजलिप्सा हेतु परस्पर युद्ध आदि देशगत अन्य समस्याओं का संकेत किया है। कवि आधुनिक भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच के भेदभावों को मिटाकर मानवीय गुणों की प्रतिष्ठा का मार्ग प्रशस्त करता है

धंस जाए वह देश अतल में, गुण की नहीं जहाँ पहचान।
जाति गोत्र के बल से ही, आदर पाते हैं जहाँ सुजान ॥

इसके अतिरिक्त कवि ने युद्ध की समस्या, कुँवारी माताओं के शील की समस्या के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज के ज्वलन्त प्रश्नों, उनके दुष्परिणामों को नयी व्याख्या दी है। इसके साथ ही इस खण्डकाव्य में अदम्य वीरता, असाधारण दानशीलता, सत्यनिष्ठा, अटल मित्रता, कृतज्ञता, सर्वस्व दान, उदारता, सहृदयता आदि महान् गुणों की प्रतिष्ठा हुई है। इससे पाठक महान् बनने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

(4) मार्मिकता – कवि ने इस काव्य में अनेक मार्मिक प्रसंगों का चित्रण किया है; जैसे–कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन और अपमान, मन मसोसती हुई कुन्ती का रथ की ओर गमन, परशुराम के आश्रम से कर्ण का निष्कासन; कुन्ती का कर्ण से वार्तालाप आदि। ये स्थल इतने अधिक मार्मिक हैं कि पाठक या श्रोता अपने आपको भी भूल जाता है।

इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु उत्कृष्ट कोटि की है। ‘दिनकर’ का पूरा प्रकाश कथावस्तु को आलोकित रखता है।

प्रश्न 3:
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव तथा शौर्य का चित्रण है। सिद्ध कीजिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ काव्य में कर्ण के चरित्र-चित्रण में धर्मनिष्ठा और अडिग निष्ठा दिखाई पड़ती है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में वर्णित वीर कर्ण के गुणों (दानवीरता) पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी के आधार पर कर्ण के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में आधार पर नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
कर्ण के चरित्र में ऐसे कौन-से गुण हैं, जो उसे महामानव की कोटि तक उठा देते हैं ?
या
रश्मिरथी कर्ण धनुर्धर होने के साथ ही महान धर्मनिष्ठ भी था। इस दृष्टि से कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘रश्मिरथी कर्ण के चरित्र पर आधारित खण्डकाव्य है। कर्ण का चरित्र शील की प्रतिमूर्ति, शौर्य व पौरुष का अगाध सिन्धु, शक्ति का स्रोत, सत्य-साधना-दाने-त्याग का तपोवन तथा आर्य-संस्कृति का आलोकमय तेज है। कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) नायक – कर्ण ‘रश्मिरथी’ का नायक है। काव्य की सम्पूर्ण कथा कर्ण के ही चारों ओर घूमती है। काव्य का नामकरण भी कर्ण को ही नायक सिद्ध करता है। रश्मिरथी’ का अर्थ है-वह मनुष्य, जिसका रथ रश्मि अर्थात् पुण्य का हो। इस काव्य में कर्ण का चरित्र ही पुण्यतम है। कर्ण के आगे अन्य किसी पात्र को चरित्र नहीं ठहर-पाता। कर्ण के सम्बन्ध में कवि के ये शब्द द्रष्टव्य हैं

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी।
जाति गोत्र का नहीं, शील का पौरुष का अभिमानी ॥

(2) साहसी और वीर योद्धा – इस खण्डकाव्य के आरम्भ में ही कर्ण हमें एक वीर योद्धा के रूप में दिखाई देता है। शस्त्र-विद्या-प्रदर्शन के समय वह प्रदर्शन-स्थल पर उपस्थित होकर अर्जुन को ललकारता है तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। जब इस पर कृपाचार्य कर्ण से उसकी जाति-गोत्र आदि पूछते हैं तो कर्ण उन्हें सटीक उत्तर देता है

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुज बल से।
रवि-समान दीपित ललाट से, और कवच कुण्डल से ।।

(3) सच्चा मित्र – दुर्योधन ने जाति-अपमान से कर्ण की रक्षा उसे राजा बनाकर की, तभी से कर्ण दुर्योधन का अभिन्न मित्र बन गया। कृष्ण और कुन्ती के समझाने पर भी कर्ण दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। वह स्पष्ट शब्दों में कह देता है

धरती की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें, कुरुपति के चरणों पर धर हूँ ॥

और अन्त समय तक कर्ण अपनी मित्रता के प्रति पूर्ण समर्पित रहता है।

(4) सच्चा गुरुभक्त – कर्ण गुरु के प्रति परम विनयी एवं श्रद्धालु है। कीट कर्ण की जाँघ काटकर भीतर घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, पर कर्ण पैर नहीं हिलाता; क्योंकि हिलने से उसकी जाँघ पर सिर रखकर सोये गुरु की नींद खुल जाएगी। आँखें खुलने पर गुरु को वह अपनी जाति-गोत्र बता देता है तो वे क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, परन्तु कर्ण अपनी विनय नहीं छोड़ता और जाते समय गुरु की चरणधूलि लेता है–

परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें, अपने हृदय की भक्ति देकर,
निराशा से विकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-शृंग से छूटा हुआ-सा,

(5) परम दानवीर – कर्ण के चरित्र की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह धन-सम्पत्ति की लिप्सा से मुक्त है। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या-वन्दन करने के बाद वह याचकों को दान देता है। ब्राह्मण-वेश में आये इन्द्र को वह अपने जीवन-रक्षक कवच और कुण्डल तक दान में दे देता है। अपनी माता कुन्ती को युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को न मारने का अभयदान देता है। कर्ण की दोनशीलता के सम्बन्ध में कवि कहता है

रवि-पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था।
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।

(6) महान् सेनानी – कौरवों की ओर से कर्ण महाभारत के युद्ध में सेनापति है। वह शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म उसके विषय में कहते हैं

अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे । तुम मिले कौरवों को वैसे ॥

युद्ध में कर्ण ने अपने रण-कौशल से पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। उसकी वीरता की प्रशंसा करते . हुए श्रीकृष्ण कहते हैं

दाहक प्रचण्ड इसका बल है। यह मनुज नहीं कालानल है॥

(7) जाति-प्रथाका विरोधी – कर्ण को जाति और गोत्र के कारण ही भरी सभा में अपमानित होना पड़ा था। इसी कारण उसके मन में जाति और गोत्र के प्रति गहरा विषाद था। इस सम्बन्ध में कर्ण की तिलमिलाहट बड़ी मार्मिक हैं

ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले।
शरमाते हैं नहीं जगत् में, जाति पूछने वाले ॥

(8) कृतज्ञ – कर्ण के चरित्र में कृतज्ञता का बड़ा गुण विद्यमान है। जब उसे यह पता लग जाता है कि उसकी माता राजरानी कुन्ती है तो भी वह निम्न जाति राधा के उपकौर को नहीं भुलाता; जिसने उसका पालन-पोषण किया था। दुर्योधन ने उसे अंगदेश को राज्य देकर राजपुत्रों के साथ युद्ध का अधिकारी बनाया था, उसके उपकार को भी वह जीवनभर नहीं भुला पाता।

(9) मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त – आरम्भ से अन्त तक कर्ण को मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से जूझना पड़ता है। जीवन के प्रत्येक पग पर उसके सामने एक ही प्रश्न खड़ा होता है कि वह अब क्या करे ? शस्त्र-कौशल के समय उसका नाम, जाति तथा गोत्र पूछने पर, द्रोण द्वारा अपना शिष्य न बनाये जाने पर, परशुराम की सेवा करते समय अपनी सहनशक्ति के प्रदर्शन पर, गुरु परशुराम द्वारा शाप देने पर वह दुविधाग्रस्त हो जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा उसको उसके जन्म का रहस्य समझाने पर और पाण्डवों के पक्ष में कौरवों का साथ छोड़ देने के लिए कहने पर, माता कुन्ती द्वारा जन्म का रहस्य समझाने तथा कौरवों का साथ छोड़ अपने भाइयों से मिल जाने के लिए कहने आदि अनेक अवसरों पर कर्ण भयंकर अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त हो जाता है; किन्तु वह प्रत्येक अवसर पर विवेक और धैर्य से अपने अन्तर्द्वन्द्व पर विजय प्राप्त कर; अन्ततः सही निर्णय लेकर अपना मार्ग प्रशस्त करता है।

(10) अन्य विशेषताएँ – कर्ण महाभारत के युद्ध में मारा जाता है, किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण उसकी चारित्रिक विशेषताओं का गुणगान करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं

हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का, दलित हारक, समुद्धारक क्रिया का।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदय था, युधिष्ठिर कर्ण का अदभुत हृदय था।
X                               X                              X
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए।
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है ॥

इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव एवं शौर्य का चित्रण करना रहा है, जिसके लिए उसने कर्ण को राज्य और विजय की गलत महत्त्वाकांक्षाओं से पीड़ित न दिखाकर षड्यन्त्रों, परीक्षाओं और प्रलोभनों की स्थितियों में उसे अडिग चित्रित किया है। यही स्थिति उसको खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती है।

प्रश्न 4:
रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं-

(1) युद्ध-विरोधी – पाण्डवों के वनवास से लौटने के बाद श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए स्वयं हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध टालने का भरसक प्रयास करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। इसके बाद वे कर्ण को भी समझाते हैं, परन्तु कर्ण भी अपने प्रण से नहीं हटता। अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं

यश मुकुट मान सिंहासन ले ले, बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तज रण रोक सखे, भू का हर भावी शोक सखे ॥

(2) निर्भीक एवं स्पष्टवादी – श्रीकृष्ण केवल अनुनय-विनय ही करना नहीं जानते, वरन् वे निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता भी हैं। जब दुर्योधन समझाने से नहीं मानता तो वे उसे चेतावनी देते हुए कहते हैं

तो ले मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।

(3) शीलवान व व्यावहारिक – श्रीकृष्ण के सभी कार्य उनके शील के परिचायक हैं। वास्तव में वे एक सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं। वे शील को ही जीवन का सार मानते हैं

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है, विभा का सार शील पुनीत में है।

साथ ही वह सांसारिक सिद्धि और सफलता के सभी सूत्रों से भी अवगत हैं।

(4) गुणों के प्रशंसक – श्रीकृष्ण अपने विरोधी के गुणों का भी आदर करते हैं। कर्ण उनके विरुद्ध लड़ता है, परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण का गुणगान करते नहीं थकते

……….. वीर शत बार धन्य, तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

(5) महान् कूटनीतिज्ञ – श्रीकृष्ण महान् कूटनीतिज्ञ हैं। पाण्डवों की विजय श्रीकृष्ण की कूटनीति के कारण ही हुई। वे पाण्डवों की ओर से कूटनीतिज्ञ का कार्य कर दुर्योधन की बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का प्रमाण कर्ण से कहा गया उनका यह कथन है

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ, बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम, तेरा अभिषेक करेंगे हम ॥

(6) अलौकिक शक्तिसम्पन्न – कवि ने श्रीकृष्ण के चरित्र में जहाँ मानव-स्वभाव के अनुरूप अनेक साधारण विशेषताओं का समावेश किया है, वहीं उन्हें अलौकिक शक्ति-सम्पन्न रूप देकर लीलापुरुष भी सिद्ध किया है। जब दुर्योधन उन्हें कैद करना चाहता है, तब वे अपने विराट् स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं-

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।
डगमग डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले
‘जंजीर बढ़ाकर साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे।”

इस प्रकार इस खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ, किन्तु महान् लोकोपकारक के रूप में चित्रित करके कवि ने उनके पौराणिक चरित्र को युगानुरूप बनाकर प्रस्तुत किया है। कवि के इस प्रस्तुतीकरण की विशेषता यह है कि इससे कहीं भी उनके पौराणिक स्वरूप को क्षति नहीं पहुँची है। कृष्ण का यह व्यक्तित्व कवि की कविता में युगानुसार प्रकट हुआ है।

प्रश्न 5:
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि की है।” इस कथन के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के किसी प्रमुख नारी पात्र के चरित्र का चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के मातृत्व रूप पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ खाण्डकाव्य के प्रधान नारी पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
कुन्ती पाण्डवों की माता है। अविवाहिता कुन्ती के गर्भ से सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छ: पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) वात्सल्यमयी माता – कुन्ती को जब यह ज्ञात होता है कि कर्ण का उसके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है तो वह कर्ण को मनाने उसके पास पहुँच जाती है। उस समय कर्ण सूर्य की उपासना कर रहा था। अपने पुत्र कर्ण के तेजोमय रूप को देख कुन्ती फूली नहीं समाती। सन्ध्या से आँखें खोलने पर कर्ण स्वयं को राधा का पुत्र बताता है तो कुन्ती यह सुनकर व्याकुल हो जाती है

रे कर्ण ! बेध मत मुझे निदारुण शर से ।
राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है।।

कर्ण के पास से निराश लौटती हुई कुन्ती कर्ण को अपने अंक में भर लेती है, जो उसके वात्सल्य का प्रमाण है।

(2) अन्तर्द्वन्द्वग्रस्त – जब कुन्ती के ही पुत्र परस्पर शत्रु बने खड़े हैं, तब कुन्ती के हृदय में अन्तर्द्वन्द्व की भीषण आँधी उठ रही थी। वह इस समय बड़ी ही उलझन में पड़ी हुई है। पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की हानि हो, पर वह हानि तो कुन्ती की ही होगी। वह अपने पुत्रों का सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख समझती है

दो में किसका उर फटे, फहूँगी मैं ही।
जिसकी भी गर्दन कटे, कहूँगी मैं ही ॥

(3) समाजभीरु – कुन्ती लोक-लाज से बहुत अधिक भयभीत एक भारतीय नारी की प्रतीक है। कौमार्यावस्था में सूर्य से उत्पन्न नवजात शिशु (कर्ण) को वह लोक-निन्दा के भय से गंगा की लहरों में बहा देती है। इस बात को वह कर्ण के समक्ष भी स्वीकार करती है

मंजूषा में धर वज्र कर मन को,
धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को।

कर्ण को युवा और वीरत्व की प्रतिमूर्ति बने देखकर भी अपना पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सम्मुख आ जाती है, तो वह कर्ण से अपनी दयनीय स्थिति को इन शब्दों में व्यक्त करती है-

बेटा धरती पर बड़ी दीन है नारी,
अबला होती, सचमुच योषिता कुमारी।
है कठिन बन्द करना समाज के मुख को,
सिर उठा न पा सकती पतिता निज सुख को।

(4) निश्छल – कुन्ती का हृदय छलरहित है। वह कर्ण के पास मन में कोई छल रखकर नहीं, वरन् निष्कपट भाव से गयी थी। यद्यपि कर्ण उसकी बातें स्वीकार नहीं करता, किन्तु कुन्ती उसके प्रति अपनी ममत्व कम नहीं करती।

(5) बुद्धिमती और वाक्पटु – कुन्ती एक बुद्धिमती नारी है। वह अवसर को पहचानने तथा दूरगामी परिणाम का अनुमान करने में समर्थ है। कर्ण-अर्जुन युद्ध का निश्चय जानकर वह समुचित कदम उठाती है

सोचा कि आज भी चूक अगर जाऊँगी,
भीषण अनर्थ फिर रोक नहीं पाऊँगी।
फिर भी तू जीता रहे, न अपयश जाने,
अब आ क्षणभर मैं तुझे अंक में भर लें ॥

इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में कई उच्चकोटि के गुणों के साथ-साथ मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करके, इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

प्रश्न 7:
‘रश्मिरथी’ के काव्य-सौष्ठव (काव्य-सौन्दर्य) पर प्रकाश डालिए।
या
‘खण्डकाव्य’ की दृष्टि से ‘रश्मिरथी की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ उच्चकोटि का खण्डकाव्य है-इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ काव्य का भाषा-शैली की दृष्टि से मूल्यांकन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ का काव्यगुणों के आधार पर विवेचन कीजिए।
या
रचना-शैली की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का मूल्यांकन कीजिए।
या
रश्मिरथी के संवाद-कौशल की विशेषताएँ बताइए।
या
सिद्ध कीजिए कि ‘रश्मिरथी’ एक प्रगतिशील और सफल खण्डकाव्य है।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘रश्मिरथी’ की आलोचना कीजिए।
या
कलापक्ष और भावपक्ष की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की लेखनी सदैव देशप्रेम एवं मानवतावादी दृष्टिकोण की समर्थक रही है। प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ भी इस बात का अपवाद नहीं है। इसकी विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) कथानक – ‘रश्मिरथी’ को कथानक महाभारत के प्रसिद्ध पात्र कर्ण के जीवन-प्रसंग पर आधारित है, किन्नु लेखक ने इन प्रसंगों को एक मौलिक स्वरूप देकर कर्ण के व्यक्तित्व की एक नयी छवि प्रस्तुत की है। कथानक का संगठन बड़ा सुनियोजित है। प्रसंगों का समय भिन्न-भिन्न है और उनमें पर्याप्त अन्तराल है; किन्तु उन्हें इस प्रकार श्रृंखलाबद्ध किया गया है कि कथा के प्रवाह में कहीं कोई बाधा नहीं पड़ती और उसका क्रमबद्ध विकास होता रहता है। कथा का अन्त इस प्रकार किया गया है कि वह कर्ण की विशेषताओं को विभूषित करते हुए समाप्त हो जाती है।

(2) पात्र एवं चरित्र-चित्रण – इस खण्डकाव्य में कर्ण के सामाजिक स्तर पर उपेक्षित जीवन की पीड़ा का मर्म उजागर करना और उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालना ही कवि का उद्देश्य रहा है। इसलिए अन्य पात्रों का चुनाव इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है। कथानक में एक भी अनावश्यक पात्र को स्थान नहीं दिया गया है। कर्ण के चरित्र में वर्तमान युग के सामाजिक रूप से उपेक्षित व्यक्तियों एवं कुन्ती के रूप में समाज के नियमों से प्रताड़ित नारियों की व्यथा को स्वर दिया गया है। इस प्रकार इसे खण्डकाव्य में पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से हुआ है।

काव्यगत विशेषताएँ

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) ऐतिहासिकता – रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। उसकी सभी घटनाएँ एवं पात्र ऐतिहासिक हैं। अविवाहित कुन्ती अपने नवजात शिशु को त्याग देती है। आगे चलकर वही पुत्र कर्ण के नाम से असाधारण पराक्रमी बनकर कुन्ती-पुत्रों के समक्ष उनके शत्रु एवं महान् दानी के रूप में आता है। पग-पग पर उसके साथ छल किया जाता है और अन्त में निहत्थे कर्ण को अर्जुन युद्ध की मर्यादा के विरुद्ध मार देता है। महाभारत के इस आख्यान को ही रश्मिरथी’ काव्य में कवि ने प्रस्तुत किया है।

(2) रस एवं संवाद-योजना – रश्मिरथी’ में करुण, भयानक, रौद्र एवं वीर रसों का निरूपण हुआ है, किन्तु यह खण्डकाव्य वीर रसप्रधान है। ‘दिनकर जी’ की रस-योजना को सफल बनाने में खण्डकाव्य की संवादात्मक शैली का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है; क्योंकि इन रसों का आलम्बन और उद्दीपन खण्डकाव्य के पात्र ही हैं। पात्रों के भावों का प्रकटीकरण कवि ने उनके संवादों के माध्यम से करके जहाँ उनके चरित्रों को निखारा है, वहीं प्रभाव एवं शैली की दृष्टि से खण्डकाव्य को सशक्त भी बनाया है। खण्डकाव्य में प्रयुक्त संवाद भावों से प्रेरित, स्वाभाविक, पैने और व्यंग्य से परिपूर्ण हैं; उदाहरणार्थ

वीर रसपूर्ण संवाद – धनु की डोरी तन जाने दें,
                             संग्राम तुरत ठन जाने दें।
                            ताण्डवी तेज लहराएगा,
                                संसार ज्योति कुछ पाएगा।

(3) प्रकृति-चित्रण – यद्यपि ‘रश्मिरथी’ काव्य में प्रकृति-चित्रण कवि का विषय नहीं है, तथापि यत्र-तत्र प्रसंगवश प्रकृति-चित्रण हुआ है। रश्मिरथी’ का प्रकृति-चित्रण बहुत ही सजीव है; यथा

हँसती थीं रश्मियाँ रजत से, भरकर वारि विमल को।

परशुराम के आश्रम का एक चित्र द्रष्टव्य है

बैठे हुए सुखद आतप में, मृग रोमन्थन करते हैं।
वन के जीव विवर से बाहर, हो विश्रब्ध विचरते हैं।

(ब) कलागत विशेषताएँ।

(1) भाषा – रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है, किन्तु उसमें साधारण बोलचाल के शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग किया गया है। भाषा में प्रभावात्मकता, प्रवाहमयता तथा विषयानुरूपता है। भाषा ओजगुण प्रधान है। भाषा की स्पष्टता व सुबोधता सर्वत्र देखी जा सकती है। उदाहरणार्थ

तब किसी तरह हिम्मत समेटकर सारी।
आयी मैं तेरे पास भाग्य की मारी ॥

‘रश्मिरथी की संस्कृतनिष्ठ भाषा का भी एक उदाहरण द्रष्टव्य है

तन में रवि का अप्रतिम तेज जगता था।
दीपक ललाट अपराकै सदृश लगता था।

सभी स्थलों के उपयुक्त भाषिक शब्दावली की रचना में कवि सिद्धहस्त है। कवि ने अनेक लोकोक्तियों व मुहावरों का भी उचित स्थल पर प्रयोग किया है; जैसे – हृदय फटना, पुण्य लूटना, मन मसोसना, वज्र गिरना आदि।।

(2) शैली – रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में मुख्य रूप से वर्णनात्मक प्रबन्ध शैली की चित्रोपमता, सूक्ति शैली, संवाद शैली और व्यंग्यात्मक शैली को अपनाया गया है। कवि ने वर्णनात्मक शैली में घटनाओं और परिस्थितियों को भावात्मक धरातल पर सँजोया है। वस्तुत: कवि ने प्रभाववादी शैली का अनुगमन करते हुए वर्णनात्मक शैली की कमियों का पूर्णतः निराकरण कर दिया है

पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरव सेना का शोक गया
आशा की नवल तरंग उठी, जन जन में नयी उमंग उठी।

(3) छन्द-विधान – कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलंग-अलग छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्द-परिवर्तन मात्र परिवर्तन के लिए ही नहीं किये गये हैं, वरन् विषय और मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं की संवेदनात्मक पकड़ को दृष्टि में रखते हुए ही इन छन्दों का आयोजन किया गया है। एक ही सर्ग में अनुभव के संवेदनात्मक तनाव के परिवर्तित होने पर कवि ने छन्द-योजना ही परिवर्तित कर दी है। ‘रश्मिरथी’ में कवि ने ‘सुमेरु’ (एक प्रकार का मात्रिक छन्द जिसके प्रत्येक चरण में 19 मात्राएँ होती हैं, अन्त में यगण होता है, 12 मात्राओं पर यति होती है तथा पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं मात्राओं का लघु होना आवश्यक होता है।), ‘हरिगीतिका’, ‘पद्धरी (एक मात्रिक छन्द, जिसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं और अन्त में जगण होता है।) आदि मात्रिक छन्दों का सफल प्रयोग किया है।

(4) अलंकार-योजना – ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है; उदाहरणार्थ

उपमा ”वन्य कुसुम-सा खिला कर्ण जग की आँखों से दूर।”
उत्प्रेक्षा – “लौह-दण्ड पर जड़ित पड़ा हो, मानो अर्थ अंशुमाली।”
रूपक – ‘फिर सहसा क्रोधाग्नि भयानक, भभक उठी उनके तन में।”

कवि ने व्यर्थ के आलंकारिक प्रयोगों से भाषा को बोझिल नहीं बनाया है। अलंकारों का प्रयोग इतना स्वाभाविक और वास्तविक लगता है कि वह पाठकों को आलंकारिक भूल-भुलैया में नहीं ले जाता। इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से एक सफल खण्डकाव्य है, जो आज के समाज की विकृतियों को दूर करने का सशक्त सन्देश देता है तथा वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी भी है।

प्रश्न 8:
‘रश्मिरथी’ शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में वर्णित उद्देश्य में कवि कितना सफल हुआ है ? अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के माध्यम से कवि समाज को क्या सन्देश देना चाहता है ?
या
‘रश्मिरथी की कथा प्राचीन कलेवर में आधुनिक भारतीय समाज का चित्रण है, पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ शीर्षक का अर्थ स्पष्ट करते हुए सिद्ध कीजिए कि कर्ण का यह नाम सर्वथा उपयुक्त है।
या
” रश्मिरथी’ खण्डकाव्य जातिवाद के विष से पीड़ित वर्तमान भारतीय समाज के लिए परोक्ष रूप से एक निदान प्रस्तुत करता है।” इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शीर्षक की सार्थकता – राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ ने इस खण्डकाव्य का नामकरण सर्वथा उचित और उपयुक्त आधार पर किया है। पौराणिक कथा के आधार पर कर्ण सूर्य का पुत्र है; अतः सूर्य की रश्मियों (किरणों) को उसका पुत्र कहना उचित है। इसके अतिरिक्त कर्ण का व्यक्तित्व सूर्य जैसा ही तेजस्वी है। निश्चय ही वह चारित्रिक प्रखर किरणों वाले रथ का रथी है; अत: उसे रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। कर्ण की प्रतिभा सूर्य की किरणों के समान दीप्तिमान थी। वह प्रतिभा के इस रथ का रथी था, इसलिए भी उसे ‘रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। यदि हम कर्ण को समाज के उपेक्षित वर्ग के प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व का प्रतीक मान लें तो ऐसी प्रतिभा को किरणों की संज्ञा दी जा सकती है और उस प्रतिभावान् को ‘रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। अतः, ‘रश्मिरथी’ ही एक ऐसा उपयुक्त शीर्षक है, जो कर्ण के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की पूर्णता को समेटने में समर्थ है।

उद्देश्य – कथानक के पौराणिक होने के पश्चात् भी इस खण्डकाव्य की रचना में कवि का उद्देश्य असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न, किन्तु उपेक्षित जनों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना रहा है। कहीं जन्म के आधार पर, कहीं जाति, वर्ण और कुल के आधार पर जो व्यक्तित्व का हनन होता रहा है, उन अवधारणाओं पर कवि ने प्रकाश डाला है और स्पष्ट किया है कि उपेक्षित प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर कुसंगति में पड़ती हैं और समाज के विनाश का कारण बनती हैं। यदि कर्ण को बचपन से यथोचित सम्मान प्राप्त होता तो वह कदाचित् दुर्योधन का साथ देने को विवश न होता और सम्भवतः ऐसी स्थिति में महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी न होता। इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में नारियों की मनोदशा एवं समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है।
[ संकेत – प्रश्न 2 में इसी शीर्षक के अन्तर्गत दी गयी सामग्री का भी अध्ययन करें]

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