UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 7
Chapter Name Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
श्रमिक किसे कहते हैं?
उत्तर
सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को हम आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं। वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात की परिभाषा दें।
उत्तर
श्रमिक जनसंख्या अनुपात एक सूचक है जिसका प्रयोग देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। यह अनुपात यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय योगदान दे रहा है।

प्रश्न 3.
क्या ये भी श्रमिक हैं: एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर, एक जुआरी? क्यों?
उत्तर
एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर और एक जुआरी श्रमिक नहीं हैं क्योंकि ये आर्थिक क्रियाओं में कोई योगदान नहीं देते हैं।

प्रश्न 4.
इस समूह में कौन असंगत प्रतीत होता है—
(क) नाई की दुकान का मालिक,
(ख) एक मोची,
(ग) मदर डेयरी का कोषपाल,
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक,
(ङ) परिवहन कम्पनी का संचालक,
(च) निर्माण मजदूर।
उत्तर
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक इन सब में असंगत है क्योंकि यह स्व: नियोजित की श्रेणी में आता है जबकि शेष किराये के श्रमिक की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 5.
नए उभरते रोजगार मुख्यतः …………….क्षेत्रक में ही मिल रहे हैं। (सेवा/विनिर्माण)
उत्तर
सेवा।

प्रश्न 6.
चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को…………..क्षेत्रक कहा जाता है। (औपचारिक/अनौपचारिक)
उत्तर
अनौपचारिक।

प्रश्न 7.
राज स्कूल जाता है। पर जब वह स्कूल में नहीं होता, तो प्रायः अपने खेत में काम करता| दिखाई देता है। क्या आप उसे श्रमिक मानेंगे? क्यों?
उत्तर
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाकलाप में भाग लेते हैं, श्रमिक कहलाते हैं। खेत में काम करना भी एक आर्थिक क्रियाकलाप है क्योंकि इससे वस्तुओं के प्रवाह में बढ़ोतरी होती है। अत: राज को एक श्रमिक माना जा सकता है।

प्रश्न 8.
शहरी महिलाओं की अपेक्षा ग्रामीण महिलाएँ अधिक काम करती दिखाई देती हैं। क्यों?
उत्तर
भारत में शहरी क्षेत्रों में केवल 14 प्रतिशत महिलाएँ ही किसी आर्थिक कार्य में व्यस्त हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत महिलाएँ आर्थिक कार्यों में लगी हुई हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिशत इसलिए कम है क्योंक वहाँ पर पुरुष पर्याप्त रूप से उच्च आय अर्जित करने में सफल रहते हैं और वे परिवार की महिलाओं को घर से बाहर रोजगार प्राप्त करने को प्राय: निरुत्साहित करते हैं। शहरी महिलाएँ घरेलू कामकाज में ही व्यस्त रहती हैं और महिलाओं द्वारा परिवार के लिए किए गए अनेक कार्यों को आर्थिक या उत्पादन कार्य ही नहीं माना जाता।

प्रश्न 9.
मीना एक गृहिणी है। घर के कामों के साथ-साथ वह अपने पति की कपड़े की दुकान के काम में भी हाथ बँटाती है। क्या उसे एक श्रमिक माना जा सकता है? क्यों?
उत्तर
हाँ, मीना को एक श्रमिक माना जा सकता है क्योंकि वह घरेलू कामकाज के साथ-साथ पति की पकड़े की दुकान में भी हाथ बंटाती है जोकि एक आर्थिक क्रियाकलाप है।

प्रश्न 10.
यहाँ किसे असंगत माना जाएगा
(क) किसी अन्य के अधीन रिक्शा चलाने वाला,
(ख) राजमिस्त्री,
(ग) किसी मेकेनिक की दुकान पर काम करने वाला श्रमिक,
(घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का।
उत्तर
यद्यपि उपर्युक्त सभी श्रमिक हैं, क्योंकि ये सभी आर्थिक क्रियाकलाप में संलग्न हैं, फिर भी चारों लोगों में (घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का असंगत है क्योंकि प्रथम तीनों किराए के श्रमिक हैं जबकि जूते पॉलिश करने वाला स्वनियोजित है।

प्रश्न 11.
निम्न सारणी में 1972-73 ई० में भारत में श्रमबल का वितरण दिखा गया है। इसे ध्यान से पढ़कर श्रमबल के वितरण के स्वरूप के कारण बताइए। ध्यान रहे कि ये आँकड़े 30 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1
उत्तर
उपर्युक्त तालिका में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं

  1. भारत में कुल श्रमबल (19.4 + 3.9 = 23.3 करोड़) या 233 मिलियन था, जिसमें 194 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत थे, शेष शहरी क्षेत्रों में कार्यरत थे।
  2. कुल श्रमबल में 157 मिलियन पुरुष (68%) तथा 76 मिलियन (32%) महिलाएँ थीं।
  3. 125 मिलियन पुरुष (64%) ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते थे।
  4. कुल रोजगार में पुरुष श्रमिकों का प्रतिशत 82 तथा महिलाओं का प्रतिशत 9.18 था।
  5. कुल महिला श्रमिकों में ग्रामीण महिला श्रमिकों का प्रतिशत 91 तथा शहरी क्षेत्रों में महिला श्रमिकों का प्रतिशत 9 था।

प्रश्न 12.
इस सारणी में 1999-2000 में भारत की जनसंख्या और श्रमिक जनानुपात दिखाया गया है। क्या आप भारत के (शहरी और सकल) श्रमबल का अनुमान लगा सकते हैं?
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 2
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 3

ग्रामीण क्षेत्र में कुल कार्यबल = 30.12
करोड़ शहरी क्षेत्र में कुल कार्यबल = 961 करोड़
|
कुल कार्यबल =39.66 करोड़

प्रश्न 13.
शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्र से अधिक क्यों होते हैं?
उत्तर
भारत में अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर सीमित होते हैं। श्रम बाजार में भागीदारी हेतु भी संसाधनों की उनके पास कमी होती है। उनमें से अधिकांश व्यक्ति स्कूल, महाविद्यालय या किसी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं जा पाते। यदि कुछ जाते भी हैं तो वे बीच में ही छोड़कर श्रम शक्ति में सम्मिलित हो जाते हैं। इसके विपरीत शहरी लोगों के पास शिक्षा और प्रशिक्षण पाने हेतु अधिक अवसृर होते हैं। शहरी जनसमुदाय को रोजगार के भी विविधतापूर्ण अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। वे अपनी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार की तलाश में रहते हैं किन्तु ग्रामीण क्षेत्र के लोग घर पर नहीं बैठ सकते, क्योंकि उनकी आर्थिक दशा उन्हें ऐसा नहीं करते देती। इस कारण गाँवों की तुलना में शहरों में नियमित वेतनभोगी श्रमिक अधिक पाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों में महिलाएँ कम क्यों हैं?
उत्तर
जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रख उसे मजदूरी देता है, तो वह श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी कहलाता है। भारत में नियमित वेतनभोगी रोजगारधारियों में पुरुष अधिक अनुपात में लगे हुए हैं। देश के 18 प्रतिशत पुरुष नियमित वेतनभोगी हैं और इस वर्ग में केवल 6 प्रतिशत ही महिलाएँ हैं। महिलाओं की इस कम सहभागिता का एक कारण कौशल स्तर में अन्तर हो सकता है। नियमित वेतनभागी वाले कार्यों में अपेक्षाकृत उच्च कौशल और शिक्षा के उच्च स्तर की आवश्यकता होती है। सम्भवत: इस अभाव के कारण ही अधिक अनुपात में महिलाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहे हैं।

प्रश्न 15.
भारत में श्रमबल के क्षेत्रकवार वितरण की हाल की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करें।
उत्तर
देश के आर्थिक विकास के क्रम में श्रमबल का प्रवाह कृषि एवं सम्बन्धित क्रयाकलापों से उद्योग एवं सेवा क्षेत्रक की ओर बढ़ा है। आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया में मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों को प्रवसन करते हैं। विकास के अन्तर्गत सेवा क्षेत्रक का अधिक विकास होने पर उद्योग क्षेत्र का रोजगार के मामले में हिस्सा घटने लगता है। भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का प्रमुख स्रोत प्राथमिक क्षेत्रक है। द्वितीयक क्षेत्रक केवल 16 प्रतिशत श्रमबल को ही नियोजित कर रहा है। लगभग 24 प्रतिशत श्रमिक सेवा क्षेत्रक में लगे हुए हैं। ग्रामीण भारत में कृषि, खनन एवं उत्खनन की क्रियाओं में तीन-चौथाई प्रतिशत ग्रामीण रोजगार पाते हैं जबकि विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रक में रोजगार पाने वाले ग्रामीणों का अनुपात क्रमशः 10 एवं 13 प्रतिशत है। 60 प्रतिशत शहरी श्रमिक सेवा क्षेत्रक में हैं। लगभग 30 प्रतिशत शहरी श्रमिक द्वितीयक क्षेत्रक में नियोजित हैं।

प्रश्न 16.
1970 से अब तक विभिन्न उद्योगों में श्रमबल के वितरण में शायद ही कोई परिवर्तन आया 
है। टिप्पणी करें।
उत्तर
भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्रों में बसा है एवं कृषि और उससे सम्बन्धित क्रियाओं पर निर्भर है। भारत में विकास योजनाओं का ध्येय कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात को कम करना रहा है। लेकिन कृषि श्रम का गैर-कृषि श्रम के रूप में खिसकाव अपर्याप्त रहा है। वर्ष 1972-73 में प्राथमिक क्षेत्रक में 74 प्रतिशत श्रमबल लगा था, वहीं 1999-2000 ई० में यह अनुपात घटकर 60 प्रतिशत रह गया। द्वितीयक तथा सेवा क्षेत्रक में यह प्रतिशत क्रमशः 11 से बढ़कर 16 तथा 15 से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गया है। परन्तु राष्ट्र की विशालता एवं भौतिक प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में उक्त बदलाव नगण्य दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 17.
क्या आपको लगता है पिछले 50 वर्षों में भारत में रोजगार के सृजन में भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुरूप वृद्धि हुई है? कैसे? उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) एक वर्ष की अवधि में देश में हुए सभी वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का बाजार मूल्य होता है। 1960-2000 ई० की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद में सकारात्मक वृद्धि हुई है और यह संवृद्धि दर रोजगार वृद्धि दर से अधिक रही है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में कुछ उतार-चढ़ाव भी आते रहे हैं परन्तु इस अवधि में रोजगार की वृद्धि लगभग 2 प्रतिशत बनी रही। परन्तु 1990 ई० के अन्तिम वर्षों में रोजगार वृद्धि दर कम होकर उसी स्तर पर पहुँच गई जहाँ योजनाकाल के प्रथम चरणों में थी। इस अवधि में सकल घरेलू उत्पाद एवं रोजगार बढ़ोतरी की दरों में अन्तर रहा है। इस प्रकार हम भारतीय अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन के बिना ही अधिक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने में सक्षम रहे हैं।

प्रश्न 18.
क्या औपचारिक क्षेत्रक में ही रोजगार का सृजन आवश्यक है? अनौपचारिक में नहीं? कारण बसाइए।
उत्तर
सार्वजनिक क्षेत्रक की सभी इकाइयाँ एवं 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक की इकाइयाँ औपचारिक क्षेत्रक माने जाते हैं। इन इकाइयों में काम करने वाले को औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी इकाइयाँ और उनमें कार्य कर रहे श्रमिक, अनौपचारिक श्रमिक कहलाते हैं।

औपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ मिलते हैं। इनकी आमदनी भी अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों से अधिक होती है। इसके विपरीत अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की आय नियमित नहीं होती है तथा उनके काम में भी निश्चितता एवं नियमितता नहीं होती। किन्तु दोनों ही क्षेत्रक रोजगार देते हैं, अत: दोनों को ही विकास आवश्यक है। साथ ही अनौपचारिक क्षेत्र को नियमित एवं नियन्त्रित करना भी आवश्यक है।

प्रश्न 19.
विक्टर को दिन में केवल दो घण्टे काम मिल पाता है। बाकी सारे समय वह काम की तलाश में रहता है। क्या वह बेरोजगार है? क्यों? विक्टर जैसे लोग क्या काम करते होंगे?
उत्तर
विक्टर दिन में दो घण्टे काम करता है अर्थात् वह आर्थिक क्रियाकलाप में बहुत कम समय के लिए भाग लेता है। आर्थिक क्रियाकलाप में भाग लेने के कारण उसे श्रमिक कहा जा सकता है। लेकिन विक्टर को पूर्ण रोजगार प्राप्त नहीं है। उसका रोजगार अनियमित है। दूसरे शब्दों में वह अर्द्ध-बेरोजगार है। ऐसे लोग सकल घरेलू उत्पाद में तनिक-सा ही योगदान कर पाते हैं। अत: उनको नियमित रोजगार दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 20.
क्या आप गाँव में रह रहे हैं? यदि आपको ग्राम-पंचायत को सलाह देने को कहा जाए तो आप | गाँव की उन्नति के लिए किस प्रकार के क्रियाकलाप का सुझाव देंगे, जिससे रोजगार सृजन भी हो।
उत्तर
ग्रामवासी होन के नाते मैं ग्राम पंचायत को गाँव की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दूंगा

  1. ग्राम पंचायत आधारित संरचना के विकास पर समुचित ध्यान दे। नालियाँ, पुलियाएँ व सड़क : बनवाएँ। इससे रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होंगे।
  2. वह गाँव में कुटीर उद्योगों के विकास पर बल दे। इससे खाली समय में लोगों को रोजगार मिलेगा।
  3. गाँवों में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार वित्तीय सहायता उपलब्ध | कराए।
  4. ग्रामीणों के लिए रोजगार सुनिश्चित किया जाए।
  5. बेसहारा बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराए।
  6. ग्राम पंचायत देखे कि गाँव का प्रत्येक बच्चा पढ़ने के लिए पाठशाला जाता है।
  7. ग्राम पंचायत गाँव में बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए।

प्रश्न 21.
अनियत दिहाड़ी मजदूर कौन होते हैं?
उत्तर
जब एक श्रमिक को जितने समय काम करना चाहिए उससे कम समय काम मिलता है अथवा वर्ष में कुछ महीनों के लिए बेकार रहना पड़ता है तो उसे अनियत दिहाड़ी मजदूर कहा जाता है। अनियत मजदूर को अपने काम के बदले उचित दाम व सामाजिक सुरक्षा के लाभ नहीं मिलते हैं। निर्माण मजदूर अनियत मजदूरी वाले श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 22.
आपको यह कैसे पता चलेगा कि कोई व्यक्ति अनौपचारिक क्षेत्रक में काम कर रहा है?
उत्तर
भारत में श्रमबल को औपचारिक तथा अनौपचारिक दो वर्गों में विभाजित किया गया है। सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों तथा 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को औपचारिक श्रमिक हो जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उद्यम और उनमें काम कर रहे श्रमिकों को अनौपचारिक श्रमिक हो जाएगा। किसान, मोची, छोटे दुकानदार अनौपचारिक क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिक हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
गाँवों की तुलना में शहरों में नियमित वेतनभोगी श्रमिक पाए जाते हैं
(क) कम
(ख) अधिक
(ग) नगण्य ।
(घ) लगभग बराबर
उत्तर
(ख) अधिक

प्रश्न 2.
जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है, उसे कहते हैं
(क) मौसमी बेरोजगारी ।
(ख) स्थायी बेरोजगारी ।
(ग) छिपी हुई बेरोजगारी
(घ) शिक्षित बेरोजगारी
उत्तर
(ग) छिपी हुई बेरोजगारी

प्रश्न 3.
बेरोजगारी का सामाजिक दुष्परिणाम है१
(क) मानव संसाधन का निष्क्रिय पड़ा रहना
(ख) उत्पादन की हानि होना ।
(ग) उत्पादता का स्तर निम्न रहना
(घ) सामाजिक अशान्ति बढ़ना
उत्तर
(घ) सामाजिक अशान्ति बढ़ना

प्रश्न 4.
भारत का मुख्य व्यवसाय क्या है?
(क) कृषि
(ख) वाणिज्य
(ग) खनन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) कृषि

प्रश्न 5.
भारत में कौन-सी बेरोजगारी की स्थिति बड़ी करुण व दयनीय है?
(क) शिक्षित
(ख) मौसमी
(ग) औद्योगिक
(घ) अदृश्य
उत्तर
(क) शिक्षित

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सकल घरेलू उत्पाद क्या है?
उत्तर
किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य इसका सकल घरेलू उत्पाद’ कहलाता है।

प्रश्न 2.
आर्थिक क्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं।

प्रश्न 3.
श्रमिक कौन हैं?
उत्तर
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में रोजगार की प्रकृति कैसी है?
उत्तर
भारत में रोजगार की प्रकृति बहुमुखी है। कुछ लोगों को वर्ष भर रोजगार प्राप्त होता है तो कुछ लोग वर्ष में कुछ महीने ही रोजगार पाते हैं।

प्रश्न 5.
देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण के लिए किस सूचक का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर
देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण के लिए ‘श्रमिक जनसंख्या अनुपात’ का प्रयोग किया जाता है। यह सूचक यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है।

प्रश्न 6.
‘जनसंख्या से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
‘जनसंख्या’ शब्द का अभिप्राय किसी क्षेत्र-विशेष में किसी समय-विशेष पर रह रहे व्यक्तियों की कुल संख्या से है।

प्रश्न 7.
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात का आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर
श्रमिक-जनसँख्या अनुपात का आकलन करने के लिए देश में कार्य कर रहे सभी श्रमिकों की संख्या को देश की जनसंख्या से भाग देकर उसे 100 से गुणा कर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
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प्रश्न 8.
‘श्रमबल से क्या आशय है?
उत्तर
‘श्रमबल’ से आशय व्यक्तियों की उस संख्या से है जो वास्तव में काम कर रहे हैं या काम करने के इच्छुक हैं।

प्रश्न 9.
‘कार्यबल से क्या आशय है?
उत्तर
‘कार्यबल’ से आशय व्यक्तियों की उस संख्या से है जो वास्तव में काम कर रहे हैं।

प्रश्न 10.
सहभागिता दर से क्या आशय है?
उत्तर
सहभागिता दर से आय जनसंख्या के उस प्रतिशत से है जो वास्तव में उत्पादन क्रिया में सहभागी होते हैं। इसे देश की कुल जनसंख्या तथा कार्यबल के बीच अनुपात के रूप में मापा जाता है। सूत्र रूप में,
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प्रश्न 11.
‘मजदूरी रोजगार’ में कौन आते हैं?
उत्तर
‘मजदूरी रोजगार’ में वे व्यक्ति आते हैं जिनको अन्य व्यक्तियों ने रोजगार प्रदान किया हुआ है और इन्हें अपनी सेवाओं के बदले मजदूरी प्राप्त होती है।

प्रश्न 12.
स्वनियोजित किन व्यक्तियों को कहा जाता है?
उत्तर
स्वनियोजित उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अपने उद्यम के स्वामी और संचालक होते हैं। कपड़े की दुकान का स्वामी स्वनियोजित है।

प्रश्न 13.
नियमित वेतनभोगी कर्मचारी कौन हैं?
उत्तर
जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रख उसे मजदूरी देता है तो वह श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी’ कहलाता है।

प्रश्न 14.
देश की आजीविका का सर्वप्रमुख स्रोत क्या है? ”
उत्तर
देश की आजीविका का सर्वप्रमुख स्रात ‘स्वरोजगार है। 50 प्रतिशत से अधिक लोग इसी वर्ग में कार्यरत हैं।

प्रश्न 15.
भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
उत्तर
भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का स्रोत प्राथमिक क्षेत्रक (लगभग 60%) है।

प्रश्न 16.
गत 50 वर्षों से योजनाबद्ध विकास का प्रमुख उददेश्य क्या रहा है?
उत्तर
गते 50 वर्षों से योजनाबद्ध विकास का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय उत्पाद और रोजगार में वृद्धि के माध्यम से अर्थव्यवस्था का प्रसार रहा है।

प्रश्न 17.
श्रमबल में किन श्रमिकों का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है? ”
उत्तर
श्रमबल में अनियत श्रमिकों का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है।

प्रश्न 18.
श्रमबल को किन दो वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर
श्रमबल को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-
1. औपचारिक अथवा संगठित वर्ग,
2. अनौपचारिक अथवा असंगठित वर्ग।।

प्रश्न 19.
संगठित अथवा औपचारिक वर्ग में कौन-कौन से प्रतिष्ठान आते हैं?
उत्तर
सभी सार्वजनिक क्षेत्रक प्रतिष्ठान तथा 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक प्रतिष्ठान, संगठित क्षेत्र में सम्मिलित किए जाते हैं।

प्रश्न 20.
अनौपचारिक (असंगठित क्षेत्रक में कौन-कौन से कर्मचारी सम्मिलित होते हैं?
उत्तर
अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्रक में करोड़ों किसान, कृषि श्रमिक, छोटे-छोटे काम धन्धे चलाने वाले और उनके कर्मचारी तथा सभी सुनियोजित व्यक्ति जिनके पास भाड़े के श्रमिक नहीं हैं, सम्मिलित हैं।

प्रश्न 21.
बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
बेरोजगारी वह दशा है जिसमें शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य और प्रचलित मजदूरी पर कार्य करने को तत्पर व्यक्ति को कार्य न मिले।।

प्रश्न 22.
ऐच्छिक बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
प्रत्येक समाज में प्रत्येक समय कुछ-न-कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य होते हैं जो काम करने के योग्य होते हुए भी काम करना नहीं चाहते। यह ऐच्छिक बेरोजगारी की अवस्था कहलाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेरोजगारी के आर्थिक व सामाजिक दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर
बेरोजगारी के आर्थिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. मानव संसाधन निष्क्रिय रहते हैं। यह एक प्रकार का अपव्यय है।
  2. उत्पादन की हानि होती है।
  3. निवेशाधिक्य सृजित न होने के कारण पूँजी-निर्माण की दर धीमी रहती है।
  4. उत्पादकता का स्तर निम्न रहता है।

बेरोजगारी के सामाजिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. जीवन की गुणवत्ता कम होती है।
  2. आय तथा सम्पत्ति के वितरण में असमानता बढ़ती जाती है।
  3. इससे सामाजिक अशान्ति बढ़ती है।
  4. इस अवस्था में वर्ग-संघर्ष पनपता है।

प्रश्न. 2.
रोजगार/बेरोजगारी की सामान्य, साप्ताहिक तथा दैनिक स्थिति को समझाइए।
उत्तर-
1. सामान्य स्तर- यह वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति अपना अधिकांश समय काम में व्यतीत करता है। भारत में सामान्य तथा 183 दिवस काम को मानक सीमा बिन्दु माना जाता है। जो व्यक्ति वर्ष में 183 या अधिक दिन काम करते हैं, वे सामान्य रोजगार प्राप्त हैं, अन्य सामान्य रूप से बेरोजगार हैं।

2. साप्ताहिक स्तर- यदि अनुबन्धित सप्ताह के दौरान आप कार्यबल का भाग बन जाते हैं तो आपको साप्ताहिक स्तर के आधार पर रोजगार प्राप्त माना जाएगा अन्यथा साप्ताहिक स्तर पर बेरोजगार।

3. दैनिक स्तर- इसका अनुमान व्यक्ति दिवसों के रूप में लगाया जाता है। ‘साप्ताहिक स्तर दीर्घकालीन बेरोजगारी की ओर संकेत करता है जबकि ‘दैनिक स्तर’ दीर्घकालीन तथा छिपी दोनों बेरोजगारियों का संकेत देता है।

प्रश्न 3.
अदृश्य अथवा छिपी बेरोजगारी से क्या आशय है? ।
उत्तर
अदृश्य अथवा छिपी बेरोजगारी आंशिक बेरोजगारी की वह अवस्था है जिसमें रोजगार में संलग्न श्रम शक्ति का उत्पादन में यागदान शून्य या लगभग शून्य होता है। किसी व्यवसाय/उद्योग में आवश्यकता से अधिक श्रम का लगा होना अदृश्य बेरोजगारी को जन्म देता है। अदृश्य बेरोजगारी निम्न दो रूपों में पाई जाती है
1. जब लोग अपनी योग्यता से कम उत्पादन कार्यों में लगे होते हैं। यह सामान्यतः औद्योगिक देशों में पाई जाती है।
2. जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते हैं। यह बेरोजगारी प्रायःअल्पविकसित कृषिप्रधान देशों में पाई जाती है।

अदृश्य बेरोजगारी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इसका सम्बन्ध अपना निजी काम करने वालों से होता है, मजदूरी पर काम करने वाले लोगों से | नहीं।
  2. यह दीर्घकालीन जनाधिक्य का परिणाम होती है।
  3. इसका कारण पूरक साधनों की कमी का होना है।

प्रश्न 4.
सामान्यतः आर्थिक क्रियाओं को किन वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर
आर्थिक क्रियाओं को निम्न वर्गों में विभाजित किया जाता है–
1. प्राथमिक क्षेत्रक, जिसमें
(क) कृषि तथा
(ख) खनन व उत्खनन सम्मिलित होते हैं।

2. द्वितीयक क्षेत्रक, जिसमें
(क) विनिर्माण,
(ख) विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति तथा
(ग) निर्माण 
कार्य सम्मिलित होते हैं।

3. तृतीयक अथवा सेवा क्षेत्रक, जिसमें
(क) वाणिज्य,
(ख) परिवहन और भण्डारण तथा
(ग) सेवाएँ सम्मिलित होती हैं।

प्रश्न 5.
सरकार रोजगार सृजन के लिए क्या प्रयास करती है?
उत्तर
केन्द्र एवं राज्य सरकारें रोजगार सृजन हेतु अवसरों की रचना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं। इनके प्रयासों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष रूप से सरकार अपने विभिन्न विभागों में प्रशासकीय कार्यों के लिए नियुक्तियाँ करती है। सरकार अनेक उद्योग, होटल और परिवहन कम्पनियाँ भी चला रही है। इन सब में वह प्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करती है। सरकारी उद्यमों में उत्पादकता के स्तर में वृद्धि अन्य उद्यमों के विस्तार को प्रोत्साहित करती है जिससे रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होते हैं।देश में निर्धनता निवारण के लिए चलाए ज रहे विभिन्न कार्यक्रम रोजगार सृजन कार्यक्रम ही हैं। से कार्यक्रम केवल रोजगार ही उपलब्ध नहीं कराते अपितु इनके सहारे प्राथमिक, जनस्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण आवास, ग्रामीण जलापूर्ति, पोषण, लोगों की आय तथा रोजगार सृजन करने वाली परिसम्पत्तियाँ खरीदने में सहायता, दिहाड़ी रोजगार के सृजन के माध्यम से सामुदायिक परिसम्पत्तियों का विकास, गृह और स्वच्छता सुविधाओं का निर्माण, गृहनिर्माण के लिए सहायता, ग्रामीण सड़कों का निर्माण और बंजर भूमि आदि के विकास के कार्य पूरे किए जाते हैं।

प्रश्न 6.
क्या आप जानते हैं कि भारत जैसे देश में रोजगार वृद्धि की दर को 2 प्रतिशत स्तर पर बनाए रखना इतना आसान काम नहीं है? क्यों?
उत्तर
भारत एक विकासशील देश है। कृषि यहाँ का मुख्य व्यवसाय है। भारत के लगभग 60 प्रतिशत लोग कृषि कार्यों में संलग्न हैं। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण कृषि क्षेत्र में श्रमाधिक्य है। पूँजी व अन्य सहायक साधनों के अभाव में रोजगार के आवश्यक अवसरों का सृजन नहीं हो पाता है। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी तथा सार्वजनिक रूप से बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण ये परियोजनाएँ पूर्णत: सफल नहीं हो पाती हैं। बढ़ती मुद्रा स्फीति के कारण इन परियोजनाओं की लागत भी बढ़ती जाती है। इसके अतिरिक्त, इनके लाभ भी लाभार्थियों तक नहीं पहुँच पाते हैं।

प्रश्न 7.
इनमें से असंगठित क्षेत्रकों की क्रियाओं में लगे व्यक्तियों के सामने चिह्न अंकित करें

  1. एक ऐसे होटल का कर्मचारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं।
  2. एक ऐसे निजी विद्यालय का शिक्षक, जहाँ 25 शिक्षक कार्यरत हैं।
  3. एक पुलिस सिपाही।
  4. सरकारी अस्पताल की एक नर्स।
  5. एक रिक्शाचालक।
  6. कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कार्यरत हैं।
  7. एक ऐसी बेस कम्पनी का चालक, जिसमें 10 से अधिक बसें और 20 चालक, संवाहक तथा अन्य कर्मचारी हैं।
  8. दस कर्मचारियों वाली निर्माण कम्पनी का सिविल अभियन्ता।
  9. राज्य सरकारी कार्यालय में अस्थायी आधार पर नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर।
  10. बिजली दफ्तर का एक क्लर्क।

उत्तर
असंगठित क्षेत्रकों की क्रियाओं में संलग्न व्यक्ति हैं-
(1) एक ऐसे होटल का कर्मचारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं।
(5) एक रिक्शाचालक।
(6) कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कार्यरत हैं।
(9) राज्य सरकारी कार्यालय में अस्थायी आधार पर नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेरोजगारी किसे कहते हैं? भारत में बेरोजगारी के विभिन्न स्वरूप बताइए।
उत्तर
पूर्ण रोजगार के अभाव की स्थिति को बेरोजगारी कहते हैं। यह एक अत्यन्त पतित एवं दूषित स्थिति है जिसे ‘आर्थिक बरबादी’ के नाम से भी पुकारा जाता है। वस्तुतः बेरोजगारी की स्थिति आर्थिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है जो सामाजिक और राजनीतिक अशान्ति को जन्म देती है। इसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से वही व्यक्ति बेरोजगार कहलाता है, जो शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य हो। साथ ही, प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य करने को तत्पर भी हो, परंतु उसे कार्य न मिले। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति शारीरिक या मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य नहीं है अथवा प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य करने के लिए तत्पर नहीं है (जबकि उसे कार्य उपलब्ध हो) तो उसे 
बेरोजगार नहीं कहा जाएगा। अभिप्राय यह है कि अर्थशास्त्र में ऐच्छिक बेरोजगारी (Voluntary Unemployment) को बेरोजगारी नहीं कहा जाता।

ऐच्छिक बेरोजगारी
प्रत्येक समाज में प्रत्येक समय कुछ-न-कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य पाए जाते हैं जो काम करने के स्रोग्य होते हुए भी काम नहीं करना चाहते। इस प्रकार की बेरोजगारी प्राय: तीन कारणों से उत्पन्न होती है

  1. कुछ व्यक्ति आलसी व कमजोर होने के कारण काम पसन्द नहीं करते जैसी भिखारी, साधु आदि।
  2. कुछ व्यक्ति धनी होने के कारण काम करने की आवश्यकता ही नहीं समझते।
  3. कुछ व्यक्ति उदासीन प्रकृति के होते हैं।

अनैच्छिक बेरोजगारी
जब स्वस्थ, योग्य एवं काम के इच्छुक व्यक्तियों को मजदूरी की प्रचलित दर पर काम नहीं मिल पाता तो इसे अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं। कीन्स के अनुसार-“इस प्रकार की बेरोजगारी प्रभावपूर्ण माँग में कमी होने के कारण उत्पन्न होती है।”

भारत में बेरोजगारी का स्वरूप

भारत एक विकासशील देश है। अतः यहाँ ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी का स्वरूप एक-सा नहीं पाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी के तीन मुख्य रूप दिखाई देते हैं-खुली बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी और छिपी हुई बेरोजगारी। शहरों में पाई जाने वाली बेरोजगारी मुख्यतः दो प्रकार की है—औद्योगिक बेरोजगारी और शिक्षित बेरोजगारी।

ग्रामीण बेरोजगारी
भारत में ग्रामीण बेरोज़गारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. खुली बेरोजगोरी– इससे हमारा अभिप्राय उन व्यक्तियों से है जिन्हें जीवन-यापन हेतु कोई कार्य नहीं मिलता। इसे स्थायी बेरोजगारी भी कहा जाता है। इस स्थायी बेरोजगारी के अन्तर्गत भारतीय गाँवों में बहुत सारे व्यक्ति बेरोजगार रहते हैं। स्थायी बेरोजगारी का मुख्य कारण कृषि पर जनसंख्या की अत्यधिक निर्भरता है।

2. मौसमी बेरोजगारी– इस प्रकार की बेरोजगारी वर्ष के कुछ महीनों में अधिक दिखाई देती है। श्रम की माँग में होने वाले परिवर्तनों में मौसमी बेरोजगारी की मात्रा भी परिवर्तित होती रहती है। सामान्यतः फसलों के बोने तथा काटने के समय श्रम की अधिक माँग रहती है, परन्तु अन्य मौसमों में रोजगार उपलब्ध नहीं होता। ग्रामीणों को सामान्यतया साल में 128 से 196 दिन तक बेरोजगार रहना पड़ता है।

3. छिपी हुई बेरोजगारी– जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है, तब उसे छिपी हुई या अदृश्य बेरोजगारी कहते हैं। इस प्रकार की बेरोजगारी का अनुमान लगाना कठिन है। , देश की लगभग 67% जनसंख्या कृषि में संलग्न है जबकि इतनी जन-शक्ति की वहाँ आवश्यकता नहीं है।

शहरी बेरोजगारी 
भारत की शहरी बेरोजगारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है
1. औद्योगिक बेरोजगारी- औद्योगिक क्षेत्र में पाई जाने वाली बेरोजगारी को औद्योगिक बेरोजगारी
कहा जाता है। इस प्रकार की बेरोजगारी चक्रीय बेरोजगारी तथा तकनीकी बेरोजगारी से प्रभावित होती है। शिक्षित बेरोजगारी 

2. शिक्षा के प्रसार के साथ- साथ इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रसार हो रहा है। देश में शिक्षित बेरोजगारी की स्थिति बड़ी करुण एवं दयनीय हो गई है। ‘भारत में प्रशिक्षितों की बेरोजगारी‘ नामक पुस्तक में स्थिति का मूल्यांकन इन शब्दों में किया गया है-“हमारे ।
शिक्षित युवकों में बढ़ती हुई बेरोजगारी हमारे राष्ट्रीय स्थायित्व के लिए जबरदस्त खतरा है। उसे नियन्त्रित करने के लिए यदि समायोचित कदम नहीं उठाया गया तो भारी उथल-पुथल का अन्देशा

बेरोजगारी एक अभिशाप है। इससे एक ओर राष्ट्र के बहुमूल्य साधनों की बरबादी होती है तो दूसरी ओर निर्धनता, ऋणग्रस्तता, औद्योगिक अशान्ति को जन्म मिलता है। सामाजिक दृष्टि से अपराधों में वृद्धि होती है तथा राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है, जिसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में कहा गया है कि आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है।

प्रश्न 2.
भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण बताइए। बेरोजगारी को दूर करने के लिए उपयुक्त| सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत में बेरोजगारी के कारण भारत में बेरोजगारी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि–देश में जनसंख्या की वृद्धि-दर लगभग 1.93% वार्षिक रही है। इस प्रकार, जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की सुविधाओं में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है।

2. कुटीर उद्योगों का अभाव- भारत में कुटीर उद्योगों का ह्रास हो जाने के कारण भी बेरोजगारी में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है क्योंकि उनमें संलग्न लोगों को अन्य क्षेत्रों में रोजगार नहीं मिला है।

3. दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली- हमारे देश में दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली के कारण भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। भारत में शिक्षा पद्धति व्यवसाय-प्रधान न होकर सिद्धान्त-प्रधान है, जो बेरोजगारी को जन्म दे रही है।

4. यन्त्रीकरण में वृद्धि – विकास की गति को तेज करने के लिए कृषि व उद्योगों में यन्त्रीकरण व आधुनिकीकरण की नीति को अपनाया जा रहा है, जिसके कारण अस्थायी बेरोजगारी को बढ़ावा मिला है।

5. श्रमिकों की गतिशीलता में कमी– शिक्षा का अभाव, पारिवारिक मोह, रूढ़िवादिता,अन्धविश्वास आदि भारतीय श्रमिक की गतिशीलता में बाधक हैं, जिसके कारण व्यक्ति घर पर बेकार रहना पसन्द करता है।

6. अविकसित प्राकृति साधन- यद्यपि हमारे देश में प्राकृतिक साधने पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।तथापि उनका पूर्ण विदोहन नहीं हुआ है, जिसके कारण देश के औद्योगिक विकास की गति धीमी रही है।

7. तकनीकी ज्ञान का अभाव- देश के शिक्षित समुदाय में तकनीकी ज्ञान का अभाव है। वह केवल लिपिक बन सकता है, किसी भी व्यवसाय को आरम्भ करने की क्षमता उसमें नहीं है। इस कारण देश में शिक्षित बेरोजगारी की प्रचुरता है।

8. बचत तथा विनियोग की न्यून दर– प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण हमारे देश में बचत करने की शक्ति कम है, जिसके फलस्वरूप विनियोग भी कम होता है। विनियोग के अभाव में नवीन उद्योग स्थापित नहीं हो पाते।

9. शरणार्थियों का आगमन- म्यांमार, ब्रिटेन, श्रीलंका, कीनिया, युगाण्डा आदि देशों से भारतीयों के लौटने तथा पाकिस्तान के शरणार्थियों के आगमन के कारण बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि रही

10. दोषपूर्ण विचार पद्धति–अधिकांश व्यक्ति पढ़ाई के पश्चात् नौकरी चाहते हैं। वे स्वयं अपना कोई कार्य करना पसन्द नहीं करते, जिससे रोजगार चाहने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही

11. पूँजी-गहन परियोजनाओं पर अधिक बल–द्रिय योजना के प्रारम्भ से ही हमने आधारभूत उद्योगों के विकास पर अधिक बल दिया है, जिससे भारी इन्जीनियरी व रसायन उद्योगों में अधिक पूँजी तो लगाई गई, लेकिन उसमें रोजगार के अवसर ज्यादा नहीं खुल पाए।

12. रोजगार-नीति व अंम-शक्ति नियोजन का अभाव योजनाओं में रोजगार प्रदान करने केसम्बन्ध में कोई व्यापक व प्रगतिशील नीति नहीं अपनाई गई। श्रम-शक्ति नियोजन की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। इसके फलस्वरूप देश में बेरोजगारी बढ़ी है।

बेरोजगारी को दूर करने हेतु सुझाव

बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी कारणों से स्पष्ट है कि हमारे देश में बेरोजगारी का मूल कारण देश का मन्द आर्थिक विकास है। आज बेरोजगारी समय की सबसे बड़ी चुनौती है; अतः रोजगार की मात्रा में वृद्धि के लिए आर्थिक विकास के कार्यक्रमों की गति देनी ही होगी। इस समस्या को सुलझाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं-

  1. देश में श्रम-शक्ति की वृद्धि को रोकने के लिए जनसंख्या की वृद्धि पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण लगाया | जाए।
  2. जन-शक्ति के उचित उपयोग के लिए जन-शक्ति का नियोजन (Man-power planning) किया जाए।
  3. योजना में वित्तीय लक्ष्यों की उपलब्धि के साथ रोजगार लक्ष्यों की पूर्ति पर ध्यान केन्द्रित होना | चाहिए। अन्य शब्दों में, पंचवर्षीय योजनाओं को पूर्णरूपेण ‘रोजगार-प्रधान’ बनाया जाए।
  4. कुटीर तथा लघु उद्योगों का विकास किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में तो ये उद्योग ही सम्भावित रोजगार । के केन्द्रबिन्दु हैं।
  5. कृषि के विकास तथा हरित क्रान्ति को स्थायी बनाने के प्रयास किए जाएँ।
  6. ग्रामीण औद्योगीकरण का विस्तार किया जाए।
  7. बचत तथा विनियोग दर में वृद्धि का हर सम्भव प्रयास किया जाए, क्योंकि अधिक पूँजी का विनियोग रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करेगा।
  8. आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने की दृष्टि से शिक्षा-प्रणाली तथा सामाजिक व्यवस्था में वांछित परिवर्तन किया जाए।
  9. रोजगार कार्यालयों (Employment Exchanges) द्वारा रोजगार सेवाओं का विस्तार किया जाए।
  10. बेरोजगारी विशेषज्ञ समिति का सुझाव है कि रोजगार और जन-शक्ति के आयोजन के लिए एक राष्ट्रीय आयोग स्थापित किया जाए।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)
Number of Questions 9
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)

प्रश्न 1:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में वर्णित अत्यधिक मार्मिक प्रसंग का निरूपण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ में धृतराष्ट्र ने लोकमंगल की जिस नीति की उदघोषणा की है, उसका सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ के आधार पर दुःशासन एवं विकर्ण के शस्त्र एवं शास्त्र सम्बन्धी विचारों की सम्यक विवेचना कीजिए।
या
“शस्त्र को सर्वस्व मानना विनाश का मूल है।” यह बात ‘सत्य की जीत’ में किस प्रकार अभिव्यक्त की गयी है ?
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण से सम्बद्ध है। यह कथानक महाभारत के सभापर्व में द्यूतक्रीड़ा की घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघुकाव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। इसकी कथा संक्षेप में अग्रवत् है–

दुर्योधन पाण्डवों को द्यूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है। पाण्डव उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं और अन्त में अपना सर्वस्व हारने के पश्चात् द्रौपदी को भी हार जाते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए। दुर्योधन दु:शासन को आदेश देता है कि वह बलपूर्वक द्रौपदी को भरी सभा में लाये। दु:शासन राजमहल से द्रौपदी के केश खींचते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी को यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सिंहनी के संमान गरजती हुई दुःशासन को ललकारती है। द्रौपदी की गर्जना से पूरा राजमहल हिल जाता है और समस्त सभासद स्तब्ध रह जाते हैं-

ध्वंस विध्वंस प्रलय का दृश्य, भयंकर भीषण हा-हाकार।
मचाने आयी हूँ रे आज, खोल दे राजमहल का द्वार ॥

इसके पश्चात् द्रौपदी और दु:शासन में नारी पर पुरुष द्वारा किये गये अत्याचार, नारी और पुरुष की सामाजिक समानता और उनके अधिकार, उनकी शक्ति, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शस्त्र और शास्त्र, न्याय-अन्याय आदि विषयों पर वाद-विवाद होता है। अहंकारी दु:शासन भी क्रोध में आ जाता है। ‘भरी सभा में युधिष्ठिर अपना सर्वस्व हार चुके हैं तो मुझे दाँव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार रह गया है ? द्रौपदी के इस तर्क से सभी सभासद प्रभावित होते हैं। वह युधिष्ठिर की सरलता और दुर्योधन आदि कौरवों की कुटिलता का भी रहस्य प्रकट करती है। वह कहती है कि सरल हृदय युधिष्ठिर कौरवों की कुटिल चालों में आकर छले गये हैं; अतः सभा में उपस्थित धर्मज्ञ यह निर्णय दें कि क्या वे अधर्म और कपट की विजय को स्वीकार करते हैं अथवा सत्य और धर्म की हार को अस्वीकार करते हैं ?

कहता है कि यदि शास्त्र-बल से शस्त्र-बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण हो जाएगा तो मानवता का विकास अवरुद्ध . हो जाएगा; क्योंकि शस्त्र-बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह इस बात पर बल देता है कि द्रौपदी द्वारा प्रस्तुते तर्क पर धर्मपूर्वक और न्यायसंगत निर्णय होना चाहिए। वह कहता है कि द्रौपदी किसी प्रकार भी कौरवों द्वारा जीती हुई नहीं है।

किन्तु कौरव ‘विकर्ण की बात को स्वीकार नहीं करते। हारे हुए युधिष्ठिर अपने उत्तरीय वस्त्र उतार देते हैं। दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है। वह कहती है कि मैं किसी प्रकार भी विजित नहीं हैं और उसके प्राण रहते उसे कोई भी निर्वस्त्र नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दु:शासन द्रौपदी का चीर खींचने के लिए पुन: हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसके दुर्गा-जैसे तेजोद्दीप्त भयंकर रौद्र-रूप को देख दुःशासन घबरा जाता है और उसके वस्त्र खींचने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

द्रौपदी कौरवों को पुनः चीर-हरण करने के लिए ललकारती है। सभी सभासद द्रौपदी के सत्य, तेज और सतीत्व के आगे निस्तेज हो जाते हैं। वे सभी कौरवों की निन्दा तथा द्रौपदी के सत्य और न्यायपूर्ण पक्ष का समर्थन करते हैं। मेदान्ध दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण आदि को द्रौपदी पुन: ललकारती हुई कहती है-

और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय ।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे कितना लग जाय ॥

वहाँ उपस्थित सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं; क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को आज रोका नहीं गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।

अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और पाण्डवों को मुक्त करने तथा उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को आदेश देते। हैं। इसके साथ ही चे द्रौपदी का पक्ष लेते हुए उसका समर्थन करते हैं तथा सत्य, न्याय, धर्म की प्रतिष्ठा तथा संसार का कल्याण करना ही मानवं-जीवन का उद्देश्य बताते हैं। वे पाण्डवों की कल्याण-कामना करते हुए कहते हैं-

तुम्हारे साथ तुम्हारी सत्य, शक्ति श्रद्धा, सेवा औ’ कर्म ।
यही जीवन के शाश्वत मूल्य, इन्हीं पर टिका मनुज का धर्म ॥
इन्हीं को लेकर दृढ़ अवलम्ब, चल रहे हो तुम पथ पर अभय ।
तुम्हारा गौरवपूर्ण भविष्य, प्राप्त होगी पग-पग पर विजय ॥

धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किये गये दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं। तथा कहते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर, गीत ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीरहरण की अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी बनाया है और युग के अनुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दुहराया है।

प्रश्न 2:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
“वस्तु-सौष्ठव एवं संगठन की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ एक सफल खण्डकाव्य है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ काव्य की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
“सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के रचना-कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की पात्र-योजना अथवा पात्रों की प्रतीकात्मकता पर अपनी दृष्टि डालिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य कथा-संगठन एवं उसके रचना-शिल्प के अनुसार निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त है

(1) प्रसिद्ध पौराणिक घटना पर आधारित – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु द्रौपदी के चीर-हरण’ की पौराणिक घटना पर आधारित है। महाभारत में वर्णित यह मार्मिक प्रसंग सभी युगों में विद्वानों द्वारा विवाद एवं निन्दात्मक समस्या का विषय बना रहा है। तत्कालीन युग में विदुर ने नारी के इस अपमान को भीषण विनाश का पूर्व संकेत माना था और अधिकांश समालोचकों के अनुसार महाभारत के युद्ध का कारण भी प्रमुख रूप से यही था। पाण्डवों को तत्कालीन समाज का भावनात्मक समर्थन भी इसी कारण मिला था। कवि ने इसी मार्मिक घटना को अपने खण्डकाव्य की कथावस्तु बनाया है।

(2) कथावस्तु का संगठन – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने संवादों के माध्यम से कथा का संगठन किया है। प्रसंग लघु होने के कारण संवाद-सूत्र में व्यक्त की गयी इस कथा का संगठन अत्यन्त उत्तम कोटि का है। कवि ने वातावरण, मनोवेग, आक्रोश आदि की अभिव्यक्ति जिन संवादों द्वारा की है, वह अपनी व्यंजना में पूर्णतया सफल रहे हैं। कथावस्तु में केवल राजसभा का एक दृश्य सामने आता है, किन्तु नाटकीय आरम्भ एवं कौतूहलपूर्ण मोड़ों से गुजरती हुई कथावस्तु स्वाभाविक रूप में तथा त्वरित गति से अपनी सीमा की ओर बढ़ी

(3) कथावस्तु की लघुता में विशालता – ‘सत्य की जीत’ का कथा-प्रसंग अत्यन्त लघु है। कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण के प्रसंग पर अपने खण्डकाव्य की कथावस्तु-योजना तैयार की है। इस एक घटना को लेकर कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में विशद वस्तु-योजना की है, जिसमें महाभारत काल के साथ-साथ वर्तमान युग के समाज की विसंगतियों के प्रति आक्रोश की उद्घोषणा हुई है ।

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ, बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व, तभी होगा पूरा.यह सर्ग।

(4) मौलिकता – यद्यपि ‘सत्य की जीत की कथा महाभारत की चीर-हरण घटना पर आधारित है, किन्तु कवि ने उसके प्रस्तुतीकरण में वर्तमान नारी की दशा को प्रस्तुत किया है और कुछ मौलिक परिवर्तन भी किये हैं। वे द्रौपदी के वस्त्र को श्रीकृष्ण द्वारा बढ़ाया जाता हुआ नहीं दिखाते, वरन् स्वयं द्रौपदी को ही अपने आत्मबल के प्रयोग के द्वारा दुःशासन को रोकते हुए दिखाते हैं। माहेश्वरी जी ने इस प्रसंग को स्वाभाविक एवं बुद्धिगम्य बना दिया है।

(5) देशकाल एवं वातावरण – इस खण्डकाव्य में महाभारतकालीन देशकाल एवं वातावरण का अनुभव अत्यन्त कुशलता से कराया गया है। दृश्य तो एक ही है, किन्तु पात्रों के संवाद एवं उनकी छवि के अंकन से इस देशकाल एवं वातावरण का पूर्ण स्वरूप सामने आ जाता है।

(6) नाटकीयती अथवा संवाद-योजना – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने कथोपकथनों के द्वारा कथा को प्रस्तुत किया है। इसके संवाद सशक्त, पात्रानुकूल तथा कथा-सूत्र को आगे बढ़ाने वाले हैं। कवि के इस प्रयास से काव्य में नाटकीयता का समावेश हो गया है, जिस कारण ‘सत्य की जीत काव्य अधिक आकर्षक बन गया है। द्रौपदी का यह संवाद उसकी निडर मनोवृत्ति का परिचायक हैं

अरे ओ दुर्योधन निर्लज्ज, करता यों बढ़-बढ़कर बात।
बाल बाँकी कर पाया नहीं, तुम्हारा वीर विश्वविख्यात ।।

(7) सुसम्बद्धता – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पात्रों के कथोपकथनों की कड़ियों से सुसम्बद्ध हैं। कवि की कल्पना-शक्ति, अद्भुत प्रस्तुतीकरण और प्रबन्धात्मकता सभी सराहनीय हैं। कथा में आदि से अन्त तक कहीं भी अव्यवस्था नहीं आयी है। इस प्रकार समस्त कथावस्तु सुसम्बद्ध एवं सुव्यवस्थित है।

(8) खण्डकाव्य का सन्देश और उद्देश्य – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने पात्रों के कथोपकथनों तथा तर्कवितर्क द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि असत्य, क्रूरता, अहंकार, अन्याय और अत्याचार की पराजय अवश्य होती है। कवि का उद्देश्य प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा के द्वारा नारी-जागरण एवं शस्त्रों के भण्डारण के विरुद्ध मानवतावादी भावना को स्वर देना है। राष्ट्र या समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना भी इस खण्डकाव्य की कथावस्तु का उद्देश्य है।

(9) पात्रों की प्रतीकात्मकता – इस खण्डकाव्य में प्रस्तुत किये गये सभी पात्रों का प्रतीकात्मक महत्त्व है। द्रौपदी सत्य, न्याय, धर्म आदि के गुणों की पुंज एवं अपने अधिकारों के लिए सजग और प्रगतिशील नारी को प्रतीक है। दु:शासन और दुर्योधन अनैतिकता एवं हिंसावृत्ति के प्रतीक हैं। पाण्डवों की प्रतीकात्मकता निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट है

युधिष्ठिर सत्य, भीम हैं शक्ति, कर्म के अर्जुन हैं अवतार।
नकुल श्रद्धा, सेवा सहदेव, विश्व के हैं ये मूलाधार ॥

(10) पात्रों का चयन एवं समायोजन – कवि ने इस खण्डकाव्य की कथा-योजना में महाभारतकालीन उन्हीं प्रमुख पात्रों को लिया है, जिनका द्रौपदी के चीर-हरण प्रसंग में उपयोग किया जा सकता था। नवीनता यह है कि इन पात्रों में श्रीकृष्ण को किसी भी रूप में सम्मिलित नहीं किया गया है। प्रमुख पात्र द्रौपदी एवं दु:शासन हैं। अन्य पात्रों का उल्लेख केवल वातावरण एवं प्रसंग को उद्दीपन प्रदान करने के लिए हुआ है। पात्रों को चरित्र-चित्रण स्वाभाविक है और उनके मनोभावों की अभिव्यक्ति की बड़ी सुन्दर अभिव्यंजना हुई है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वस्तु-संगठन की दृष्टि से खण्डकाव्य की कथा लघु होनी चाहिए, नायक या नायिका में उदात्त-गुणों का समावेश होना चाहिए और कथा का विस्तार क्रमिक एवं उद्देश्य आदर्शों की स्थापना होना चाहिए। इन सभी विशेषताओं का समावेश इस खण्डकाव्य में सफलतापूर्वक किया गया है; अतः यह एक सफल खण्डकाव्य है।।

प्रश्न 3:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में निहित सन्देश (उद्देश्य) को स्पष्ट कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में प्रतिपादित आदर्शों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने मानवीय आदर्श एवं शाश्वत जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा की है, इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की प्रमुख विचारधारा पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि की सफलता पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख विचार-बिन्दुओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पौराणिक होते हुए भी आधुनिक विचारधारा की पोषक है,” उद्धरण देकर सिद्ध कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में जिन उदात्त जीवन-मूल्यों का चित्रण किया गया है, उन्हें सोदाहरण समझाइए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य से समाज को क्या सन्देश मिलता है ? ‘सत्य की जीत’ शीर्षक की सार्थकता को प्रमाणित कीजिए। ‘सत्य की जीत के आधार पर ‘जीओ और जीने दो’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में नारी विषयक अवधारणा का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
सत्य की जीत’ शीर्षक से स्वतः स्पष्ट है कि कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी प्रस्तुत खण्डकाव्य में असत्य पर सत्य की विजय प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। इसे खण्डकाव्य में द्रौपदी के चीर-हरण का प्रसंग वर्णित किया गया है, किन्तु इसमें कथा का रूप सर्वथा मौलिक है। अत्याचारियों के दमन को द्रौपदी झुककर स्वीकार नहीं करती, वरन् वह पूर्ण आत्म-बलं से अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करती है। उसकी पक्ष सत्य एवं न्याय का पक्ष है। अन्ततः उसकी ही जीत होती है और पूरी राजसभा उसके पक्ष में हो जाती है।
प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय को दर्शाना है तथा खण्डकाव्य का मुख्य आध्यात्मिक भाव भी यही है। इस दृष्टिकोण से इसे खण्डकाव्य का यह शीर्षक पूर्णरूप से उपयुक्त और सार्थक है। इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विचारों का प्रतिपादन हुआ है

(1) नैतिक मानव-मूल्यों की स्थापना – ‘सत्य की जीत’ में कवि ने दुःशासन और दुर्योधन के छल-कपट, दम्भ, ईष्र्या, अनाचार, शस्त्र-बल, परपीड़न आदि की पराजय दिखाकर उन पर सत्य, धर्म, न्याय, प्रेम, मैत्री, करुणा, श्रद्धा आदि शाश्वत मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा की है और कहा है

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।

कवि का विचार है कि मानव को भौतिकवाद के गर्त से नैतिक मूल्यों की स्थापना के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

(2) नारी की प्रतिष्ठा – कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में द्रौपदी को श्रृंगार व कोमलता की परम्परागत मूर्ति के रूप में नहीं, वरन् दुर्गा के नव रूप में प्रतिष्ठित किया है, जो अपने सतीत्व और मर्यादा की रक्षा के लिए चण्डी और दुर्गा भी बन जाती है। यही कारण है कि भारत में नारी की शक्ति को दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। द्रौपदी दुःशासन से स्पष्ट कह देती है कि नारी पुरुष की सम्पत्ति या भोग्या नहीं है। उसका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व है। पुरुष और नारी के सहयोग से ही विश्व का मंगल सम्भव है

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ, बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व, तभी होगा पूरा यह सर्ग ॥

(3) प्रजातान्त्रिक भावना का प्रतिपादन – प्रस्तुत खण्डकाव्य का सन्देश है कि हम प्रजातान्त्रिक भावनाओं का आदर करें। किसी एक व्यक्ति की निरंकुश नीति को अनाचार की छूट न दें। राजसभा में द्रौपदी के प्रश्न पर जहाँ दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं वहीं धृतराष्ट्र अपना निर्णय देते समय जन-भावनाओं की अवहेलना भी नहीं करते।

(4) स्वार्थ और ईष्र्या का उन्मूलन – आज का मनुष्य ईर्ष्या व स्वार्थ के चंगुल में फंसा हुआ है। ईर्ष्या और स्वार्थ संघर्ष को जन्म देते हैं। इनके वशीभूत होकर व्यक्ति सब कुछ कर बैठता है-इसे कवि ने कौरवों द्वारा द्रौपदी के चीर-हरण की घटना से व्यक्त किया है। दुर्योधन पाण्डवों से ईर्ष्या रखता है, जिसके कारण वह उन्हें द्यूतक्रीड़ा में हराकर उन्हें नीचा दिखाने तथा द्रौपदी को निर्वस्त्र करके उन्हें अपमानित करना चाहता है। कवि स्वार्थ और ईर्ष्या को पतन का कारण सिद्ध करता है और उनके स्थान पर मैत्री, त्याग और सेवा जैसे लोकमंगलकारी भावों को प्रतिष्ठित करना चाहता है।

(5) सहयोग, सह-अस्तित्व और विश्व-बन्धुत्व का सन्देश – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने आज के युग के अनुरूप यह सन्देश दिया है कि सहयोग और सह-अस्तित्व के विकास से ही विश्व-कल्याण होगा–जियें हम और जियें सब लोग। इससे सत्य, न्याय, मैत्री, करुणा और सदाचार को बल मिलेगा, जिससे व्यक्ति को समस्त संसार एक कुटुम्ब की भाँति प्रतीत होने लगेगा।

(6) शान्ति की कामना – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। वह शस्त्र बल पर सत्य, न्याय और शास्त्र की विजय दिखलाता है। धृतराष्ट्र भी शस्त्रों का प्रयोग स्थायी शान्ति की स्थापना के लिए किये जाने पर बल देते हैं

किये हैं जितने भी एकत्र, शस्त्र तुमने, उनका उपयोग।
युद्ध के हित नहीं, शान्ति हित करो, यही है उनका स्वत्व प्रयोग।

(7) निरंकुशवाद के दोषों का प्रकाशन – प्रस्तुत खण्डकाव्य के द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है तो वह अनैतिक कार्य करने में भी कोई संकोच नहीं करती। ऐसे राज्य में विवेक पूर्णतया कुण्ठित हो जाता है। भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी दुर्योधन की सत्ता की निरंकुशता के आगे हतप्रभ हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में भारतीय शाश्वत जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। इस खण्डकाव्य के द्वारा कंवि अपने पाठकों को सदाचारपूर्ण जीवन की प्रेरणा देना चाहता है। वह उन्नत मानवीय जीवन का सन्देश देता हैं। धृतराष्ट्र की उदारतापूर्ण इस घोषणा में काव्य का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।
बाँटकर आपस में मिले सभी, धरा का करें बराबर भोगे॥

प्रश्न 4:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ में द्रौपदी के चरित्र में वर्तमान युग के नारी-जागरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।” स्पष्ट कीजिए।
या
“सत्य की जीत’ के किसी मुख्य पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ के आधार पर द्रौपदी के चरित्र-चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
“नारी अबला नहीं, शक्तिरूपा है।” द्रौपदी के चरित्र के माध्यम से इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में कवि ने द्रौपदी के चरित्र में जो नवीनताएँ प्रस्तुत की हैं, उनका उदघाटन करते हुए उसके चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत के आधार पर द्रौपदी के संघर्षमय जीवन का चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी के चरित्र में समाविष्ट मानवीय आदर्शों का विश्लेषण कीजिए।
या
द्रौपदी का पक्ष सत्य और न्याय का पक्ष है। इस बात को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायिका:  द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका है। सम्पूर्ण कथा उसके चारों ओर घूमती है। वह राजा द्रुपद की पुत्री, धृष्टद्युम्न की बहन तथा युधिष्ठिर सहित पाँचों पाण्डवों की पत्नी है। ‘सत्य की जीत खण्डकाव्य में अत्यधिक विकट समय होते हुए भी वह बड़े आत्मविश्वास से दु:शासन को अपना परिचय देती हुई कहती है

जानता नहीं कि मैं हूँ कौन ? द्रौपदी धृष्टद्युम्न की बहन।
पाण्डुकुल वधू भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर को कब रे यह सहन॥

(2) स्वाभिमानिनी सबला – द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपना अपमान नारी-जाति का अपमान समझती है। और वह इसे सहन नहीं करती। ‘सत्य की जीत की द्रौपदी महाभारत की द्रौपदी की भाँति असहाय, अबला और संकोची नारी नहीं है। यह द्रौपदी तो अन्यायी, अधर्मी पुरुषों से जमकर संघर्ष व विरोध करने वाली है। इस प्रकार उसका निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है

समझकर एकाकी, निशंक, दिया मेरे केशों को खींच।
रक्त का पैंट पिये मैं मौन, आ गयी भरी सभा के बीच ॥
इसलिए नहीं कि थी असहाय, एक अबला रमणी का रूप।
किन्तु था नहीं राज-दरबार, देखने मेरा भैरव-रूप ।।

(3) विवेकशीला – द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँख बन्द कर चलने वाली नारी नहीं, वरन् विवेक से कार्य करने वाली नारी है। आज की नारी की भाँति वह अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए सजग है। द्रौपदी की स्पष्ट मान्यता है कि नारी में अपार शक्ति और आत्मबल विद्यमान है। पुरुष स्वयं को संसार में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न समझता है, किन्तु द्रौपदी इस अहंकारपूर्ण मान्यता का खण्डन करती हुई कहती है

नहीं कलिंका कोमल सुकुमार, नहीं रे छुई-मुई-सा गात !
पुरुष की है यह कोरी भूल, उसी के अहंकार की बात ॥

वह केवल दुःशासन ही नहीं वरन् अपने पति को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर स्पष्टीकरण माँगती है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जुए में स्वयं को हारने वाले युधिष्ठिर को मुझे दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं है।-

द्रौपदी के वचन सुनकर सम्पूर्ण सभा, स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है और द्रौपदी के तर्को पर न्यायपूर्वक विचार करने के लिए विवशं हो जाती है। द्रौपदी के ये कथन उसकी वाक्पटुता एवं योग्यता के परिचायक हैं।

(4) साध्वी – द्रौपदी में शक्ति, ओज, तेज, स्वाभिमान और बुद्धि के साथ-साथ सत्य, शील और धर्म का पालन करने की शक्ति भी है। द्रौपदी के चरित्र की श्रेष्ठता से प्रभावित धृतराष्ट्र उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं।

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार ॥

(5) ओजस्विनी – ‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी ओजस्विनी है। वह अपना अपमान होने पर सिंहनी की भाँति दहाड़ती है

सिंहनी ने कर निडर दहाड़, कर दिया मौन सभा को भंग।

दुःशासन द्वारा केश खींचने के बाद वह रौद्र-रूप धारण कर लेती है। कवि कहती है

खुली वेणी के लम्बे केश, पीठ पर लहराये बन काल।।
उगलते ज्यों विष कालिया नाग, खोलकर मृत्यु-कणों का जाल ।

(6) सत्य, न्याय और धर्म की एकनिष्ठ साधिका – द्रौपदी सत्य और न्याय की अजेय शक्ति और असत्य तथा अधर्म की मिथ्या शक्ति का विवेचन बहुत संयत शब्दों में करती हुई कहती है

सत्य का पक्ष, धर्म का पक्ष, न्याय का पक्ष लिये मैं साथ।
अरे, वह कौन विश्व में शक्ति, उठा सकती जो मुझ पर हाथ॥

(7) नारी-जाति की पक्षधर – ‘सत्य की जीत की द्रौपदी आदर्श भारतीय नारी है। भारतीय संस्कृति के आधार वेद हैं और वेदों के अनुसार आदर्श नारी में अपार शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आत्म-सम्मान, सत्य, धर्म, व्यवहारकुशलता, वाक्पटुता, सदाचार आदि गुण विद्यमान होते हैं। द्रौपदी में भी ये सभी गुण विद्यमान हैं। अपने सम्मान को ठेस लगने पर वह सभा में गरज उठती है

मौन हो जा मैं सह सकतीन, कभी भी नारी का अपमान।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ।।

द्रौपदी को पता है कि नारी में अपार शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि और शील विद्यमान हैं। नारी ही मानव-जाति के सृजन की अक्षय स्रोत है। वह नारी-जाति को पुरुष के आगे हीन सिद्ध नहीं होने देती है। नारी की गरिमा का वर्णन करती हुई वह कहती है

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

(8) वीरांगनां – वह पुरुष को विवश होकर क्षमा कर देने वाली असहाय अबला नहीं वरन् चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध है

अरे ओ दुःशासन निर्लज्ज, देख तू नारी को भी क्रोध ।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं उसका बोध ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानी, आत्मगौरव- सम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 5:
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ के एक प्रमुख पुरुष पात्र (दुःशासन) के चरित्र की विशेषताएँ बताइट।
या
‘सत्य की जीत’ में व्यक्त दुःशासन के चरित्र की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दुःशासन एक प्रमुख पात्र है जो दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) अहंकारी एवं बुद्धिहीन – दुःशासन को अपने बल पर बहुत अधिक घमण्ड है। विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है तथा पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। सत्य, प्रेम और अहिंसा की अपेक्षा वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है

शस्त्र जो कहे वही है सत्य, शस्त्र जो करे वही है कर्म ।
शस्त्र जो लिखे वही है शास्त्र, शस्त्र-बल पर आधारित धर्म ॥

इसीलिए परिवारजन और सभासदों के बीच द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में वह तनिक भी लज्जा नहीं मानता है।

(2) नारी का अपमान करने वाला – द्रौपदी के साथ हुए तर्क-वितर्क में दु:शासन का नारी के प्रति पुरातन और रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। दु:शासन नारी को पुरुष की दासी और भोग्या तथा पुरुष से दुर्बल मानता है। नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाते हुए वह कहता है

कहाँ नारी ने, ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम ।
जानती है वह केवल पुरुष, भुजदण्डों में करना विश्राम ॥

(3) शस्त्र-बल विश्वासी – दु:शासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्म-शास्त्र और धर्मज्ञों में कोई विश्वास नहीं है। इन्हें तो वहें शस्त्र के आगे हारने वाले मानता है ।

धर्म क्या है और क्या है सत्य, मुझे क्षणभर चिन्ता इसकी न।
शास्त्र की चर्चा होती वहाँ, जहाँ नर होता शस्त्र-विहीन ।।

(4) दुराचारी – दु:शासन हमारे समक्ष एक दुराचारी व्यक्ति के रूप में आती है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता। वह शास्त्रज्ञों, धर्मज्ञों व नीतिज्ञों पर कटाक्ष करता है और उन्हें दुर्बल बताता है

लिया दुर्बल मानव ने ढूँढ, आत्मरक्षा का सरल उपाय।
किन्तु जब होता सम्मुख शस्त्र, शास्त्र हो जाता निरुपाय ॥

(5) धर्म और सत्य का विरोधी – धर्म और सत्य का शत्रु दु:शासन आध्यात्मिक शक्ति का विरोधी एवं भौतिक शक्ति का पुजारी है। वह सत्य, धर्म, न्याय, अहिंसा जैसे उदार आदर्शों की उपेक्षा करता है।

(6) सत्य व सतीत्व से पराजित – दुःशासन की चीर-हरण में असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि सत्य की ही जीत होती है। वह शक्ति से मदान्ध होकर तथा सत्य, धर्म एवं न्याय की दुहाई देने को दुर्बलता का चिह्न बताता हुआ जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के शरीर से प्रकट होने वाले सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता है।

दुःशासन के चरित्र की दुर्बलताओं या विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ० ओंकार प्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं कि “लोकतन्त्रीय चेतना के जागरण के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दुःशासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाये हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में दुःशासन उन्हीं का प्रतीक है।”

प्रश्न 6:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुर्योधन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
श्री द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी कृत ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन एक प्रमुख पुरुष पात्र है जो दु:शासन का बड़ा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) अभिमानी और विवेकहीन – दुर्योधन को अपने बाहुबल पर अत्यधिक घमण्ड है। विवेक से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। वह बाहुबल में विश्वास रखता है। नैतिकता में उसे बिल्कुल विश्वास नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है, इसी कारण पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। दुर्योधन का नारी के प्रति पुरातन रूढ़िवादी दृष्टिकोण है। वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है।

(2) नारी के प्रति उपेक्षा-भाव – द्रौपदी के द्वारा उपहास किये जाने पर वह उससे प्रतिशोध लेने की भावना में दग्ध रहता है। वह नारी को भोग्या और चरणों की धूल समझता है। इसी कारण भरी सभा में द्रौपदी का चीर-हरण करवाता है।

(3) दुराचारी – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन हमारे सामने एक दुराचारी पुरुष पात्र के रूप में आता है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता है। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता।

(4) ईष्र्यालु – दुर्योधन ईष्र्यालु प्रवृत्ति का पुरुष पात्र है, जो हमेशा ही पाण्डवों से ईर्ष्या रखता है। वह पाण्डवों की समृद्धि और मान सम्मान को सहन नहीं कर सकता है।

(5) छल-कपट में विश्वास – दुर्योधन यद्यपि वीर है लेकिन वह छल-कपट में विश्वास रखता है। छल-कपट से ही वह पाण्डवों को जुए के खेल में हरा देता है और उनके राज्य को हड़प लेता है। इस प्रकार उपर्युक्त गुणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि उसके चरित्र में वर्तमान साम्राज्यवादी शासकों की लोलुपता की झलक प्रस्तुत की गयी है।

प्रश्न 7:
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रधान पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र धृतराष्ट्र और द्रौपदी के कथनों के माध्यम से उजागर हुआ है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सत्य और धर्म के अवतार – युधिष्ठिर की सत्य और धर्म में अडिग निष्ठा है। उनके इसी गुण पर मुग्ध धृतराष्ट्र कहते हैं

युधिष्ठिर ! धर्मपरायण श्रेष्ठ, करो अब निर्भय होकर राज्य।

(2) सरल-हृदय व्यक्ति – युधिष्ठिर बहतं सरल-हृदय के व्यक्ति हैं। वे दसरों को भी सरल-हृदय समझते हैं। इसी सरलता के कारण वे शकुनि और दुर्योधन के कपटे जाल में फंस जाते हैं और उसका दुष्परिणाम भोगते हैं। द्रौपदी ठीक ही कहती है

युधिष्ठिर ! धर्मराज थे, सरल हृदय, समझे न कपट की चाल।

(3) सिन्धु-से धीर-गम्भीर – द्रौपदी का अपमान किये जाने पर भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी दुर्बलता नहीं, वरन् उनकी धीरता, गम्भीरता और सहिष्णुता है

खिंची है मर्यादा की रेखा, वंश के हैं वे उच्च कुलीन।।

(4) अदूरदर्शी – युधिष्ठिर यद्यपि गुणवान हैं, किन्तु द्रौपदी को दाँव पर लगाने जैसा अविवेकी कार्य कर बैठते हैं, जिससे जान पड़ता है कि वह सैद्धान्तिक अधिक किन्तु व्यवहारकुशल कम हैं। वह इस कृत्य का दूरगामी परिणाम दृष्टि से ओझल कर बैठते हैं

युधिष्ठिर धर्मराज का हृदय, सरल-निर्मल-निश्छल-निर्दोष।
भेरा अन्तर-सागर में अमित, भाव-रत्नों का सुन्दर कोष ॥

(5) विश्व-कल्याण के साधक – युधिष्ठिर का लक्ष्य विश्व-मंगल है, यह बात धृतराष्ट्र भी स्वीकार करते हैं

तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि, तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के ऐसे पात्र हैं, जो आरम्भ से लेकर अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन से ही उनके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ स्पष्ट की हैं।

प्रश्न 8:
‘सत्य की जीत’ की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए।
या
काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत का मूल्यांकन कीजिए।
या
एक खण्डकाव्य के रूप में सत्य की जीत का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) सुगठित कथावस्तु – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त स्पष्ट, सरल और सुगठित है। काव्य की सभी घटनाएँ परस्पर सुसम्बद्ध हैं। कथा में आदि से अन्त तक रोचकता एवं कौतूहल विद्यमान है। कथा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं अरोचकता नहीं है।

(2) विश्व-बन्धुत्व का सन्देश – कवि ने विश्व को ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में प्रेम, सत्य, न्याय, मैत्री, करुणा और सदाचार की शिक्षा देकर सम्पूर्ण संसार को मार्ग दिखाया है

न्याय समता मैत्री भ्रातृत्व, भावना, स्नेहित सह अस्तित्व।
इन्हीं शाश्वत मूल्यों से बने, विश्व का मंगलमय व्यक्तित्व ॥

(3) शान्ति की कामना – ‘सत्य की जीत’ गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। केवल शस्त्र-बल पर विश्वास रखने वाले दुर्योधन और दु:शासन दोनों सत्य, न्याय और शास्त्र से पराजित होते हैं। स्थायी शान्ति की स्थापना के लिए धृतराष्ट्र कहते हैं

किये हैं जितने भी एकत्र, शस्त्र तुमने, उनका उपयोग।
युद्ध के हित नहीं, शान्ति हित करो, यही है उनका स्वत्व प्रयोग।

(4) उदात्त आदर्शों का स्वर – प्रस्तुत खण्डकाव्य से नारियों के प्रति श्रद्धा, विनाशकारी आचरण, शस्त्रीकरण का विरोध, प्रजातान्त्रिक आदर्शो, असत्य की निर्बलता एवं सत्य के आत्मबल की शक्ति का स्वर मुखरित होता है। इस खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण को प्रसंग बनाकर उदात्त आदर्शों की. भाव-धारा प्रवाहित की है। यह भाव-धारा ही इस खण्डकाव्य की आत्मा है।

(5) रस-निरूपण – प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर रस की प्रधानता है, किन्तु इसमें रौद्र, शान्त आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है। ओजस्विनी, वीरांगना, द्रौपदी की ओजमयी वाणी इस काव्य का केन्द्रीय आकर्षण है। रौद्र रस का एक उदाहरण द्रष्टव्य है:

मौन हो जा मैं सह सकती न, कभी भी नारी का अपमान।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ।

(6) प्रतीकात्मकता – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में सभी पुरुष तथा स्त्री पात्रों का चरित्र प्रतीकात्मक है। द्रौपदी सत्य, न्याय, धर्म आदि गुणों की प्रतीक और अपने अधिकारों के लिए सजग नारी है। पाण्डवों की प्रतीकात्मकता द्रष्टव्य है

युधिष्ठिर सत्य, भीम है शक्ति, कर्म के अर्जुन हैं अवतार।
नकुल श्रद्धा, सेवा सहदेव, विश्व के हैं ये मूलाधार ॥

इसके बाद भी पाण्डवों के सभी गुण द्रौपदी की तेजस्विता के सम्मुख हीन जान पड़ते हैं।

(ब) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भाषा सरल, सुबोध और परिष्कृत खड़ी बोली है। इसकी भाषा में प्रवाहमयता, प्रभावात्मकता, स्वाभाविकता, प्रसंगानुकूलता आदि गुण भी विद्यमान हैं। काव्य में संवादों की सजीवता एवं प्रभावपूर्णता निस्सन्देह सराहनीय है। भाषा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं दुरूहता के दर्शन नहीं होते; यथा

किया यदि शस्त्रों से ही मोह, न अपनाया विवेक का पन्थ।
मुझे लगता है, जो कुछ हुई, प्रगति अब तक, उसका रे अन्त ।।

(2) शैली – सारा खण्डकाव्य संवादात्मक शैली में रचित है। इसकी सम्पूर्ण कथावस्तु धृतराष्ट्र की राजसभा में पात्रों के कथोपकथनों के रूप में प्रस्तुत की गयी है। संवादों पर आधारित कथा की प्रगति शैली की प्रमुख विशेषता है

द्रौपदी बढ़-बढ़कर मत बोल, कहा उसने तत्क्षण तत्काल।
पीट मत री नारी का ढोल, उगल मत व्यर्थ अग्नि की ज्वाल॥

संवादों के कारण इस काव्य में नाटकीय-सौन्दर्य आ गया है। काव्य के समस्त घटना-व्यापार को सजीव, प्रवाहपूर्ण, सरल और विचारोत्तेजक संवादों के माध्यम से दृश्यांकित किया गया है। इन संवादों में कवि की अपूर्व मनोवैज्ञानिकता एवं सूझ-बूझ का परिचय मिलता है।

(3) अलंकार-योजना – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों का प्रयोग किया है; यथा

रूपक – खोल जीवन-पुस्तक के पृष्ठ, मुस्कराते समरांगण बीच।
                  शस्त्र से लिखते सच्चे शास्त्र, रक्त के स्वर्णिम अक्षर खींच।
उपमा – माँग में सिन्दूर की यह रेख, मौन विद्युत-सी घन के बीच।
                कि जैसे अवसर पाकर शीघ्र, गिराएगी दुश्मन पर खींच ॥

(4) छन्द-विधान – ‘सत्य की जीत में कवि ने 16-16 मात्राओं के चार पंक्तियों वाले; मुक्त छन्द का प्रयोग किया है।

(5) भाव-चित्रण – मानव-हृदय में किसी भाव के उठने पर कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन्हें अनुभाव या संचारी भाव कहते हैं। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने विभिन्न-पात्रों के अनुभावों का चित्रण किया है। यहाँ क्रोधाभिभूत भीम की मुद्राओं का चित्रण देखिए

फड़कने लगे भीम के अंग, शस्त्र-बल की सुनकर ललकार।
नेत्र मुड़े धर्मराज की ओर, झुके पी, मौन रक्त की धार ।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि उदात्त आदर्शों के लिए सद्गुणी नायिका को आधार बनाकर लिखी गयी यह काव्य-रचना कथा की लघुती, क्रम-विस्तार आदि गुणों से युक्त है, अत: काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 9:
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में आज की आधुनिक जाग्रत नारी का स्वर मुखर हुआ है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में द्रौपदी द्वारा प्रतिपादित नारी की शक्ति एवं महत्ता पर प्रकाश डालिटी:
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप (संवाद) को अपने शब्दों में लिखिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ में महाभारत युग के साथ वर्तमान युग भी बोल उठा है। इस कथन को समझाइट।
या
‘सत्य की जीत’ कथनक की वर्तमान सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
या
नारी जागरण की दृष्टि से सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी ने द्रौपदी के परम्परागत चरित्र में नवीन उद्भावनाएँ करके आज की नारी का मार्गदर्शन किया है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि माहेश्वरी जी ने द्रौपदी के माध्यम से आधुनिक नारी के उभरते स्वर को सशक्त अभिव्यक्ति दी है, जिसका विवेचन निम्नवत् है
दुःशासन द्वारा भरी-सभा में अपमानित हुई द्रौपदी अबला-सी बनकर केवल आँसू नहीं बहाती, वरन् वह साहसी आधुनिक स्त्री की भाँति सिंहनी के समान गरजती हुई क्रोधित होकर उसे चेतावनी देती है

अरे-ओ ! दुःशासन निर्लज्ज ! देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं इसका बोध ॥

द्रौपदी दु:शासन को अपमानित करती हुई बड़े आत्मविश्वास से कहती है कि तू मुझे बाल खींचकर भरी-सभा में ले तो अवश्य आया है, किन्तु मैं रक्त के बूंट पीकर केवल इसलिए चुप हूँ; क्योंकि नारी से मार खाकर तू संसार में मुंह दिखाने के योग्य नहीं रह जाएगा।

द्रौपदी के व्यंग्य बाणों से दु:शासन तिलमिला उठता है और कहता है कि “तू नारी की श्रेष्ठता के ढोल मत पीट। क्या कभी किसी नारी ने तलवार अपने हाथ में लेकर कहीं संग्राम किया है ? नारी तो पुरुष पर निर्भर रहती है। वह तो पुरुष के पैरों की धूल के समान है।”

इस पर द्रौपदी नारी-विषयक पुरातन मान्यताओं को तोड़ती हुई दु:शासन को फटकारती हुई कहती है कि “तू अभी नारी की शक्ति को पहचान ही नहीं पाया है। यद्यपि नारी दिखने में कोमल-कलिका के समान अवश्य होती है, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर वह पापियों का संहार करने के लिए भैरवी का रूप भी धारण कर सकती है। पुरुष की यह भूल ही है कि वह सारे विश्व पर अपना अधिकार मानता है, नारी पर अकारण ही चोट करता है, जबकि नारी और पुरुष दोनों एक समान हैं।”

द्रौपदी के व्यंग्य-कटाक्षों को काटते हुए दु:शासन पुनः कहता है कि “नारीरूपी सरिताएँ क्या कभी पुरुषरूपी पहाड़ को हिला पायी हैं ? लहरों को तो भूधर के केवल चरण छूकर लौट जाना पड़ता है। स्त्रीरूपी लहर तो पुरुषरूपी किनारा पाकर शान्त हो जाती है।’ दुःशासन पुनः कहता है कि “तू हमारी दासी है, क्योंकि पाण्डव तुझे जुए में हार गये हैं। तू नारीत्व की बात मत कर।”

इस प्रकार द्रौपदी और दु:शासन के वार्तालाप द्वारा कवि ने यह सिद्ध किया है कि मानवता के विकास में नारी और पुरुष दोनों का ही समान महत्त्व है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ‘पुरुष का स्थान उच्च और नारी का स्थान निम्न है’ ऐसा सोचना नारी के प्रति अन्याय व असत्य का द्योतक है। इस रूप में, ‘सत्य की जीत’ में स्थल-स्थल पर आज की जाग्रत नारी का स्वर ही मुखरित हुआ प्रतीत होता है। ऐसी जाग्रत नारी, जो अपनी सृजनात्मक महत्ता से भली-भाँति परिचित है और जो समय आने पर सीता ही नहीं चण्डी तथा काली भी बन सकती है

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

अन्तत: द्रौपदी और दु:शासन के वार्तालाप का अन्त ‘सत्य की जीत’ से होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ (सुमित्रानन्दन पन्त)

प्रश्न 1:
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ की राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है।” समीक्षा कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधी युग के स्वर्ण-इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।” प्रस्तुत कथन के आधार पर ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु की व्याख्या कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर स्वतन्त्रता-प्राप्ति और उससे उत्पन्न समस्याओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ का क्या आशय है? स्वपठित खण्डकाव्य ‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर उत्तर दीजिए।
या
‘दमन-चक्र चल पड़ा निरंकुश’, ‘मुक्तियज्ञ’ के इस कथन की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में पन्त जी ने सत्याग्रह आन्दोलन का चित्रण काव्यात्मक ढंग से किया है।” इस कथन की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
या
“‘मुक्तिय’ में भारत के स्वतन्त्रता-युद्ध का आद्योपान्त वर्णन है।” इस कथन के पक्ष में अपना विचार लिखिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ में वर्णित मुख्य घटनाओं का वर्णन कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में वर्णित राजनैतिक घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा विरचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है। इस अंश में भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की गाथा है। ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु संक्षेप में निम्नवत् है
गांधी जी साबरमती आश्रम से अंग्रेजों के नमक-कानून को तोड़ने के लिए चौबीस दिनों की यात्रा पूर्ण करके डाण्डी गाँव पहुँचे और सागरतट पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण।

गांधी जी का उद्देश्य नमक बनाना नहीं था, वरन् इसके माध्यम से वे अंग्रेजों के इस कानून का विरोध करना और जनता में चेतना उत्पन्न करना चाहते थे। यद्यपि उनके इस विरोध के आधार सत्य और अहिंसा थे, किन्तु अंग्रेजों का दमन-चक्र पहले की भाँति ही चलने लगा। गांधी जी तथा अन्य नेताओं को अंग्रेजों ने कारागार में डाल दिया। जैसे-जैसे दमन-चक्र बढ़ता गया, वैसे-वैसे ही मुक्तियज्ञ भी तीव्र होता गया। गांधी जी ने भारतीयों को स्वदेशी वस्तु के प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के लिए प्रोत्साहित किया। सम्पूर्ण देश में यह आन्दोलन फैल गया। समस्त देशवासी स्वतन्त्रता आन्दोलन में एकजुट होकर गांधी जी के पीछे हो गये। इस प्रकार गांधी जी ने भारतीयों में एक अपूर्व उत्साह एवं जागृति उत्पन्न कर दी।

गांधी जी ने अछूतों को समाज में सम्मानपूर्ण स्थान दिलवाने के लिए आमरण अनशन आरम्भ किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीयों ने अंग्रेजों से संघर्ष का निर्णय किया। सन् 1927 ई० में साइमन कमीशन भारत आया। भारतीयों द्वारा इस कमीशन का पूर्ण बहिष्कार किया गया। सन् 1942 ई० में गांधी जी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगा दिया। उसी रात्रि में गांधी जी व अन्य नेतागण बन्दी बना लिये गये और अंग्रेजों ने बालकों, वृद्धों और स्त्रियों तक पर भीषण अत्याचार आरम्भ कर दिये। इन अत्याचारों के कारण भारतीयों में और अधिक आक्रोश उत्पन्न हो उठा। चारों ओर हड़ताल और तालाबन्दी हो गयी। सब कामकाज ठप्प हो गया। अंग्रेजी शासन इस आन्दोलन से हिल गया। कारागार में ही गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा का देहान्त हो गया। पूरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल आक्रोश एवं हिंसा भड़क उठी थी। सन् 1942 ई० में भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की गयी। अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की माँग की। अन्तत: 15 अगस्त, 1947 ई० को अंग्रेजों ने भारत को मुक्त कर दिया।

अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन करवा दिया। एक ओर तो देश में स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, दूसरी ओर नोआखाली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच संघर्ष हो गया। गांधी जी ने इससे दु:खी होकर आमरण उपवास रखने का निश्चय किया।

30 जनवरी, 1948 ई० को नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी। इस दु:खान्त घटना के पश्चात् कवि द्वारा भारत की एकता की कामना के साथ इस काव्य का अन्त हो जाता है। इस प्रकार इस खण्डकाव्य का आधारे-फलक बहुत विराट् है और उस पर कवि पन्त द्वारा बहुत सुन्दर और प्रभावशाली चित्र खींचे गये हैं। इसमें उस युग का इतिहास अंकित है, जब भारत में एक हलचल मची हुई थी और सम्पूर्ण देश में क्रान्ति की आग सुलग रही थी। इसमें व्यक्त राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं है। निष्कर्ष रूप में मुक्तियज्ञ गांधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

प्रश्न 2:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के कथानक का विश्लेषण कीजिए।
या
” ‘मूक्तियज्ञ’ के आख्यान में काल्पनिक तत्त्वों का समावेश नहीं है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ व्यक्तिप्रधान न होकर समष्टिप्रधान है।” सोदाहरण समझाइए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की राष्ट्रीयता और देशभक्ति सम्बन्धी भावनाओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के कवि ने अपनी दृष्टि प्राचीन इतिहास और पुराण से हटाकर आधुनिक इतिहास से काव्य-सामग्री ग्रहण की है-इस कथन को ध्यान में रखते हुष्ट इस खण्डकाव्य की कथावस्तु का विवेचन कीजिए। ”
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में देशभक्ति की भावना रूपायित है।” इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ भौतिकता और अध्यात्मपरक चिन्तन के संघर्ष की कथा है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
“मुक्तिंय की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है’, सावित्री सिन्हा के इस कथन की मीमांसा कीजिए।
या
“मूवितयश’ में अभिव्यक्त गांधीदर्शन की आत्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि को स्पष्ट कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की राष्ट्रीयता और देशभक्ति संकुचित नहीं हैं। कथन के परिप्रेक्ष्य में मुक्तियज्ञ की कथा-वस्तु की विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियन’ खण्डकाव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
तर पन्त जी द्वारा रचित ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) विराट् ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
‘मुक्तियज्ञ’ में (सन् 1921 से 1947 ई० तक के) भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का इतिहास विद्यमान है। इस प्रकार इस काव्य की कथावस्तु की पृष्ठभूमि अत्यन्त विस्तृत और ऐतिहासिक है। इसके साथ ही इसमें द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान पर गिराये गये परमाणु बमों को भी उल्लेख है। इस समयावधि में घटित घटनाचक्रों में परिस्थितियों की विभिन्नता एवं अनेकरूपता है। इसकी व्यापकता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसकी कथावस्तु किसी महाकाव्य में ही समाहित हो सकती थी, किन्तु पन्त जी ने अत्यधिक कुशलता से इस विशाल पृष्ठभूमि को एक छोटे-से खण्डकाव्य में समेट लिया है, जो स्वयं में भारतीय स्वतन्त्रता, संग्राम एवं विश्व-मानवता की व्यापकता को समाहित किये हुए है।

(2) संक्षेपीकरण:
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु में यद्यपि विस्तृत घटनाएँ हैं; किन्तु उन्हें बहुत ही संक्षिप्त रूप दिया गया है। सन् 1930 ई० की डाण्डी-यात्रा से कथा का आरम्भ होता है। गांधी जी सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। ‘गोलमेज सम्मेलन’ से भारत को कोई लाभ नहीं होता। द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत मित्र-राष्ट्रों की सहायता करता है। सन् 1942 ई० में अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा लगता है। अंग्रेज और अधिक अत्याचार करते हैं। सम्पूर्ण देश में विद्रोह भड़क जाता है, अंग्रेजों को यहाँ से भागना पड़ता है और 1947 ई० में भारत स्वतन्त्र हो जाता है। अन्त में 1948 ई० में गांधी जी ‘नाथूराम गोडसे की गोली से मारे जाते हैं।

(3) प्रमुख घटनाओं का काव्यात्मक आलेख:
‘मुक्तियज्ञ सुनियोजित ढंग से सर्गबद्ध कथा नहीं है, वरन् इसमें सन् 1921 से 1947 ई० के बीच घटित भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की प्रमुख घटनाओं का सुन्दर चित्रण है। ‘मुक्तियज्ञ से पूर्व हिन्दी में जितने भी खण्डकाव्य लिखे गये, उन सभी की कथावस्तु इतिहास एवं पुराणों से ली गयी थी। यद्यपि इन खण्डकाव्यों के रचयिताओं ने इनमें आधुनिक विचारधारा एवं दृष्टिकोण को भी स्थान दिया था, तथापि इनकी कथाओं का आधार प्राचीन इतिहास एवं पुराणों से ही सम्बन्धित रहा। ‘मुक्तियज्ञ’ प्रथम खण्डकाव्य है जिसमें पहली बार किसी कवि ने आधुनिक युग में घटित कुछ ही वर्ष पूर्व की घटनाओं पर दृष्टि डाली। इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ गांधी-युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।

(4) गांधीवाद की राष्ट्रीय विचारधारा को चिन्तन:
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु इतिहास पर आधारित है। कथा में काव्यात्मकता और भावात्मकता का मिश्रण है, फिर भी इसमें गांधीवादी विचारधारा का समावेश है। वस्तुतः यह भौतिकवादी, आध्यात्मिक और राष्ट्रीयता के विचारों का संग्रह है। इसमें सत्य, अहिंसा, हरिजनोद्धार, नशाबन्दी, नारी-जागरण, आत्म-स्वातन्त्र्य आदि गांधीवादी चिन्तन और विचारधाराओं को सुन्दर काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

(5) विचारप्राधान्य:
‘मुक्तियज्ञ’ में गांधीवादी वैचारिकता का भावात्मक वर्णन एवं चित्रण हुआ है। यह भौतिकवादी और आध्यात्मिक विचारों के संघर्ष का काव्ये बन गया है। प्रकट विचारों में उत्कृष्टता विद्यमान है। इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ पूर्णतया सत्य आधारित, सार्थक और राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत खण्ड-काव्य है। यह वास्तव में व्यक्तिप्रधान काव्य न होकर समष्टिप्रधान काव्य है; क्योंकि इसके नायक महात्मा गांधी का कोई भी कार्य उनके अपने लिए नहीं था, वरन् उन्होंने जो कुछ भी किया, राष्ट्र, समाज और मानवता की उन्नति के लिए ही किया।

प्रश्न 3:
‘मुक्तियज्ञ’ के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गांधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है।” सतर्क प्रमाणित कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में व्यक्ति गांधी का चित्रण कवि का ध्येय नहीं है, राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गांधी ही ‘मुक्तियज्ञ’ के मुख्य पुरोधा हैं।” इस कथन के आधार पर गांधी जी के समष्टिप्रधान चरित्र का उद्घाटन कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए उसके नायक के कृतित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के प्रमुख नायक के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
“गांधी जी राष्ट्र के लिए एक समर्पित व्यक्ति हैं।” उक्ति पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गांधी का यशोमय चित्रण किया गया है।” इस कथन की युक्तिसंगत पुष्टि कीजिए।
या
“गाँधीजी का सम्पूर्ण जीवन विश्वबन्धुत्व व लोकमंगल के लिए था।” इस कथन के आलोक में उनकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
‘मुक्तियज्ञ’ काव्य के आधार पर गांधी जी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावशाली-व्यक्तित्व: गांधी जी का आन्तरिक व्यक्तित्व बहुत अधिक प्रभावशाली है। उनकी वाणी में अद्भुत चुम्बकीय प्रभाव था। उनकी डाण्डी यात्रा के सम्बन्ध में कवि ने लिखा है

वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन ।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥

(2) सत्य, प्रेम और अहिंसा के प्रबल समर्थक – ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधी जी के जीवन के सिद्धान्तों में सत्य, प्रेम और अहिंसा प्रमुख हैं। अपने इन तीन आध्यात्मिक अस्त्रों के बल पर ही गांधी जी ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी। इन सिद्धान्तों को वे अपने जीवन में भी अक्षरश: उतारते थे। उन्होंने कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी सत्य, अहिंसा और प्रेम का मार्ग नहीं छोड़ा।

(3) दृढ़-प्रतिज्ञ – ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गांधी जी ने जो भी कार्य आरम्भ किया, उसे पूरा करके ही छोड़ा। वे अपने निश्चय पर अटल रहते हैं और अंग्रेजी सत्ता के दमन चक्र से तनिक भी विचलित नहीं होते। उन्होंने नमक कानून तोड़ने की प्रतिज्ञा की तो उसे पूरा भी कर दिखाया

प्राण त्याग दूंगा पथ पर ही, उठा सका मैं यदि न नमक-कर।
लौट न आश्रम में आऊँगा, जो स्वराज ला सका नहीं घर ॥

(4) जातिवाद के विरोधी – गांधी जी का मत था कि भारत जाति-पाँति के भेदभाव में पड़कर ही शक्तिहीन हो । रहा है। उनकी दृष्टि में न कोई छोटा था, न अस्पृश्य और न ही तुच्छ। इसी कारण वे जातिवाद के कट्टर विरोधी थे

भारत आत्मा एक अखण्डित, रहते हिन्दुओं में ही हरिजन।
जाति वर्ण अघ्र पोंछ, चाहते, वे संयुक्त रहें भू जनगण ।।

(5) जन-नेता – ‘मुक्तियज्ञ’ के नायकं गांधी जी सम्पूर्ण भारत में जन-जन के प्रिय नेता हैं। उनके एक संकेत मात्र पर ही लाखों नर-नारी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं; यथा

मुट्ठी-भर हड्डियाँ बुलातीं, छात्र निकल पड़ते सब बाहर।
लोग छोड़ घर-द्वार, मान, पद, हँस-हँस बन्दी-गृह देते भर॥

भारत की जनता ने उनके नेतृत्व में ही स्वतन्त्रता की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को भगाकर ही दम लिया।

(6) मानवता के अग्रदूत – ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गांधी जी अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता के कल्याण में ही लगा देते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि मानव-मन में उत्पन्न घृणा, घृणा से नहीं अपितु प्रेम से मरती है। वे आपस में प्रेम उत्पन्न कर घृणा एवं हिंसा को दूर करना चाहते थे। वे हिंसा का प्रयोग करके स्वतन्त्रता भी नहीं चाहते थे; क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा पर टिकी हुई संस्कृति मानवीयता से रहित होगी

घृणा, घृणा से नहीं मरेगी, बल प्रयोग पशु साधन निर्दय।
हिंसा पर निर्मित भू-संस्कृति, मानवीय होगी न, मुझे भय॥

(7) लोक-पुरुष – मुक्तियज्ञ में गांधी जी एक लोक-पुरुष के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। इस सम्बन्ध में कवि कहता है

संस्कृति के नवीन त्याग की, मूर्ति, अहिंसा ज्योति, सत्यव्रत ।
लोक-पुरुष स्थितप्रज्ञ, स्नेह धन, युगनायक, निष्काम कर्मरत ॥

(8) साम्प्रदायिक एकता के पक्षधर – स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में भीषण संघर्ष हुआ। इससे गांधी जी का हृदय बहुत दु:खी हुआ। साम्प्रदायिक दंगा रोकने के लिए गांधी जी ने आमरण अनशन कर दिया। गांधी जी सोच रहे हैं

मर्म रुधिर पीकर ही बर्बर, भू की प्यास बुझेगी निश्चय।

(9) समद्रष्टा –  गांधी जी सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में न कोई बड़ा था और न ही कोई छोटा। छुआछूत को वे समाज का कलंक मानते थे। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था

छुआछूत का भूत भगाने, किया व्रती ने दृढ़ आन्दोलन,
हिले द्विजों के रुद्र हृदय पर, खुले मन्दिरों के जड़ प्रांगण।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गांधी जी महान् लोकनायक; सत्य, अहिंसा और प्रेम के समर्थक; दृढ़-प्रतिज्ञ, निर्भीक औंरं साहसी पुरुष के रूप में सामने आते हैं। कवि ने गांधी जी में सभी लोक-कल्याणकारी गुणों का समावेश करते हुए उनके चरित्र को एक नया स्वरूप प्रदान किया है।

प्रश्न 4:
‘मुक्तियज्ञ’ के काव्य कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के काव्य-सौन्दर्य पर अपना पक्ष प्रस्तुत कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से मुक्तियज्ञ’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं ?
या
‘मुक्तियज्ञ’ की भाषा-शैली पर उदाहरण सहित प्रकाश डालिए।
या
आकार की लघुता के बावजूद ‘मुक्तियज्ञ’ की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के रचना-विधान पर एक टिप्पणी लिखिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु खण्डकाव्य की दृष्टि से कितनी सफल है ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की रचना में कवि की सफलता का विश्लेषण कीजिए।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों (विशेषताओं) का ध्यान रखते हुए सिद्ध कीजिए कि ‘मुक्तियज्ञ’ एक सफल खण्डकाव्य है।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में कवि की दृष्टि कथा पर अधिक व कथन की शैली पर कम टिकी है।” इस बात से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी भी साहित्यिक रचना का काव्य-सौन्दर्य दो प्रकार का होता है – भावपक्षीय तथा कलापक्षीय। यहाँ ‘मुक्तियज्ञ का काव्य-सौन्दर्य निम्नवत् प्रस्तुत है-

(अ) भावगत विशेषताएँ
‘मुक्तियज्ञ काव्य की प्रमुख भावगत् विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) विचारप्रधानता – ‘मुक्तिधज्ञ’ एक विचारप्रधान काव्य है। इस काव्य में गांधी-दर्शन की विशद् व्याख्या की गयी है। कवि ने गांधी जी के विचारों को बड़े ही सरस, सरल और रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया है। कवि ने गांधी जी की विचारधारा को सत्य, अहिंसा, प्रेम, नारी-जागरण, हरिजनोद्धार, भारतीय कला और संस्कृति की रक्षा, अतिभौतिकता का विरोध, मदिरा के विरुद्ध आन्दोलन तथा स्वदेशी वस्तुओं पर बल आदि रूपों में प्रस्तुत किया है। सम्पूर्ण काव्य में गरिमा एवं गम्भीरता है। गांधी दर्शन एवं भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के भावों को सरल ढंग से प्रस्तुत करते हुए उसका सम्बन्ध विश्व-मानवतावाद से जोड़ा है

प्रतिध्वनित होता जगती में, भारत आत्मा को नैतिक पण,
नयी चेतना शिखा जगाता, आत्म-शक्ति से लोक उन्नयन।

(2) युग चित्रण – ‘मुक्तियज्ञ’ काव्य में भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का इतिहास पूरी तरह वर्णित है। गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन, अंग्रेजों के अत्याचार और अन्त में भारतीयों द्वारा स्वराज्य-प्राप्ति इन सभी घटनाओं का आद्योपान्त वर्णन ‘मुक्तियज्ञ’ में हुआ है। डॉ० सावित्री सिन्हा के अनुसार-आकार की लघुता के बावजूद ‘मुक्तियज्ञ’ की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है।”

(3) रस-योजना – रस-निष्पत्ति की दृष्टि से मुक्तियज्ञ’ वीर रसप्रधान काव्य है। इसमें गांधी जी तथा अन्य लोगों के त्याग और बलिदान की साहसपूर्ण कथा लिखी गयी है। भारतीयों के अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसात्मक संघर्ष में वीर रस के दर्शन होते हैं

गूँज रहा रण शंख, गरजती, भेरी, उड़ता, सुर धनु केतन।
ऊर्ध्व असंख्य पदों से धरती, चलती, यह मानवता का रण ॥

कवि ने वीर रस के साथ-साथ अंग्रेजों के दमन में तथा अकाल-चित्रण आदि के मार्मिक स्थलों पर करुण और शान्त रस की भी सुन्दर व्यंजना की है।

(4) प्रकृति-चित्रण की न्यूनता – कविवर सुमित्रानन्दन पन्त प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। उनकी प्रायः प्रत्येक काव्य-रचना में प्रकृति का अनेक रूपों में चित्रण हुआ है, किन्तु ‘मुक्तियज्ञ’ में लगता है कि उन्हें प्रकृतिचित्रण का कहीं अवकाश ही नहीं मिला; क्योंकि मुक्तियज्ञ एक विचार एवं समस्या प्रधान काव्य-रचना है।

(ब) कलागत विशेषताएँ

यद्यपि ‘मुक्तियज्ञ’ में पन्त जी की कलात्मक काव्य-प्रतिभा का उपयोग नहीं के बराबर हुआ है, तथापि इस दृष्टि से भी इनकी कलात्मकता के निम्नवत् कई रूपों में दर्शन होते हैं

(1) भाषा – ‘मुक्तियज्ञ की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली और सरल हिन्दी है। यह परिपक्व और व्यंजना-शक्ति से परिपूर्ण है। भाषा में अभिव्यक्ति की सरलता, बोधगम्यता और चित्रात्मकता के साथ-साथ सरसता और सुकुमारता के दर्शन भी होते हैं। कवि ने अनेक स्थलों पर कठिन शब्दावली का भी प्रयोग किया है, जिस कारण कहीं-कहीं भाषा बोझिल-सी बन गयी है। भाषा में ओज, माधुर्य और प्रसाद गुण विद्यमान है। भाषा भावात्मक एवं दार्शनिक विचाराभिव्यक्ति में समर्थ है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

झोंक आग में तन के कपड़े, गिरते पद पर पागल स्त्री-नर।
भेद कभी इतिहास कहेगा, कौन पुरुष चला युग-भू पर॥

कवि की बिम्ब-योजनाओं का एक उदाहरण द्रष्टव्य है

चरु की स्निग्ध घृताहुतियाँ ज्यों, हों उठतीं मुख-वह्नि प्रज्वलित।
विंनत अहिंसा की नर-बलियाँ, पशु का दर्प हुआ उत्तेजित ॥

(2) शैली – कवि ने ‘मुक्तियज्ञ’ में सीधी-सादी अभिधाप्रधान मूर्त शैली अपनायी है। इसमें गाम्भीर्य है, प्रौढ़ता है और साथ ही संरलता भी है। इसमें कवि ने किसी प्रकार की कलात्मकता अथवा काल्पनिकता का चमत्कारपूर्ण समावेश नहीं किया है। कवि की दृष्टि कथ्य के महत्त्व पर अधिक और कथन की शैली पर कम टिकी है। इनकी भाषा-शैली में इनकी परिपक्व व्यंजना-शैली का परिचय मिलता है; उदाहरणार्थ

मुखर तर्क के शब्द-जाल में, भटक न खो जाए अन्तः स्वर,
गुरुता से सौजन्य, बुद्धि से, हृदय-बोध था उनको प्रियतर।

(3) अलंकार-योजना – ‘मुक्तियज्ञ’ में क़वि ने अलंकारों का प्रयोग विषय की स्पष्टता के लिए ही किया है; क्योंकि उनकी दृष्टि कथन के ढंग पर न होकर कथ्य पर लगी रही है। फिर भी कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, मानवीकरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है; उदाहरणार्थ

उपमा: उन्नत जन वर देवदारु-से, स्वर्णछत्र सिर पर तारक नभ।
सौम्य आस्य, उन्मुक्त हास्यमय, प्रातः रवि-सा स्निग्ध स्वर्णप्रभ॥
मानवीकरण – जगे खेत खलिहान, बाग फड़, जगे बैल हँसिया हल विस्मित ।
हाट बाट गोचर घर-आँगन, वापी पनघट जगे चमत्कृत ।।

(4) छन्द-विधान – ‘मुक्तियज्ञ’ में कवि ने भावात्मक मुक्त छन्द का प्रयोग किया है। सम्पूर्ण काव्य की रचना में 16 मात्राओं की चार-चार पंक्तियों वाले छन्द का प्रयोग किया गया है। कवि ने कुछ स्थानों पर छन्द-परिवर्तन भी किया है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मुक्तियज्ञ’ की कथा की पृष्ठभूमि का विस्तार अधिक है, फिर भी कवि ने उसके मुख्य प्रसंगों को इस प्रकार क्रमबद्ध किया है कि कथा के क्रमिक विकास में बाधा नहीं आयी है। इस रचना में एक ही रस और एक ही छन्द का प्रयोग किया गया है, इस दृष्टि से भी यह रचना खण्डकाव्य के लिए अपेक्षित विशेषताओं से विभूषित है।

प्रश्न 5:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में निहित रचनाकार के प्रयोजन को स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का उद्देश्य मानव जाति में भाईचारा और एकता की भावना जगाना है।” इस कथन पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की पावन भावना प्रतिपादित हुई है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘मूक्तियज्ञ’ के नामकरण की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। ”
या
‘मुक्तियज्ञ’ में भारतीय समाज के उच्च आदर्शों का निरूपण हुआ है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। ”
या
‘मुक्तियज्ञ’ में गांधी-युग के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पक्ष को ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर उतारा गया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधीवादी विचारधारा के माध्यम से विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद की रतिष्ठा की गयी है।” सोदाहरण विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ में अभिव्यक्त सामाजिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का प्रतिपादन किया गया है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य राष्ट्रीयता और देशभक्ति का प्रतिपादन करने वाला खण्डकाव्य है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की आधुनिकता पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में विश्व-एकता तथा विश्व-कल्याण का स्वर मुखरित हुआ है।” सिद्ध कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ से क्या सन्देश मिलता है ?
उत्तर:
कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘मुक्तियज्ञ’ एक उद्देश्यप्रधान रचना है। इस खण्डकाव्य में अनेक प्रयोजन मुखर हुए हैं। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नवत् हैं

(1) तत्कालीन परिस्थितियों से परिचय – पन्त जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ रचना के माध्यम से जन-मानस को भारत के परतन्त्र युग की उन भीषण परिस्थितियों से अवगत कराया है, जो क्रूर सामन्तवाद की निर्दयता का परिचय देती हैं। इस उद्देश्य में कवि पूरी तरह सफल रहा है।

(2) भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की झलक – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की झलक प्रस्तुत की है। कवि संघर्ष को प्रेरणादायक मानता है। इसलिए वह चाहता है कि इसकी झलक जनमानस तक पहुँच जाए। कवि कहता है कि अन्यायी क्रूरता से जब भीषण विद्रोह भड़कता है तो वह किसी भी शक्ति के रोके नहीं रुकता

अन्यायी के क्रूर कृत्य से, जब विद्रोह भड़कता है भीषण।
उस अन्तर्गत विप्लव को, रोक नहीं पाते शत रावण ।।

(3) शाश्वत मूल्यों की स्थापनों – इस काव्य-रचना में पन्त जी अराजकता के तत्कालीन एवं आधुनिक युग में भी सत्य, अहिंसा, प्रेम, न्याय और करुणा जैसे शाश्वत गुणों को आधार मानकर जीवन-मूल्यों की स्थापना करते हैं। कवि ने पश्चिमी भौतिकवादी दर्शन और गांधीवादी मूल्यों के बीच संघर्ष का चित्रण किया है और अन्त में गांधीवादी जीवन-मूल्यों की विजय का शंखनाद किया है

मानव आत्मा की विमुक्ति की, भारत मुक्ति प्रतीक असंशय ।
करे विश्व मन के जड़ बन्धन, हुआ चेतना का अरुणोदय ॥

(4) लोक-मंगल का सन्देश –  पन्त जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ के माध्यम से संसार को लोक-मंगल का सन्देश दिया है। वे भारत की स्वतन्त्रता में समस्त संसार की मुक्ति को निहारते हैं। कवि ने काव्य के नायक गांधी जी को लोकपुरुष के रूप में चित्रित किया है, जो जातिवाद, साम्प्रदायिकता और रंगभेद के कट्टर विरोधी हैं तथा इन बुराइयों को दूर करने के लिए कृतसंकल्प हैं।

(5) विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद को प्रसार – कवि ने प्रस्तुत रचना में सत्य की असत्य पर और अहिंसा की हिंसा पर विजय दिखाकर मानवता के प्रति सच्ची आस्था व्यक्त की है। इससे विश्वबन्धुत्व, प्रेम एवं सहयोग की भावना को बल मिलेगा और विश्व में एकता स्थापित होगी। कवि का यह जीवन-दर्शन भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन की पृष्ठभूमि में तथा गांधीवादी दर्शन के रूप में भारतीय परतन्त्रता के परिप्रेक्ष्य में मुखरित होता है और ‘मुक्तियज्ञ’ का यह पावन धुआँ विश्व-मानवता एवं विश्व-प्रेम का विराट स्वरूप धारण कर लेता है

हिरोशिमा नागासाकी पर, भीषण अणुबम का विस्फोटन,
मानवता के मर्मस्थल का, कभी भरेगा क्या दुःसह व्रण।.

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि उपर्युल्लिखित उद्देश्य ही ‘मुक्तियज्ञ’ की रचना के मर्म हैं और कवि ने इसी सैद्धान्तिक पक्ष को व्यावहारिक रूप में सामाजिक पृष्ठभूमि पर उतारा है। गांधीवादी दर्शन को माध्यम बनाकर कवि ने विश्व-बन्धुत्व और मानवतावाद की स्थापना की है।

नामकरण की सार्थकता – ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का सम्पूर्ण कथानक भारत के स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। इस खण्डकाव्य के नायक महात्मा गांधी हैं, जिनके लक्षण परम्परागत नायकों से हटकर हैं। इनका यही व्यक्तित्व भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए इन्होंने एक प्रकार से एक यज्ञ का ही आयोजन किया था, जिसमें देश के अनेकानेक देशभक्त नवयुवक अपने प्राणों की आहुति देते हैं। देश की मुक्ति के लिए आयोजित किये गये यज्ञ के कारण ही इस खण्डकाव्य का नाम ‘मुक्तियज्ञ’ पूर्णतया सटीक एवं सार्थक है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 3 प्रायश्चित (भगवतीचरण वर्मा)

प्रश्न 1:
‘प्रायश्चित’ कहानी का सारांश या कथानक अपनी भाषा में लिखिए।
उत्तर:
‘प्रायश्चित’ कहानी प्रसिद्ध कथाकार भगवतीचरण वर्मा की यथार्थवादी व्यंग्यात्मक रचना है। इस कहानी का सारांश निम्नवत् है-

कबरी बिल्ली यदि किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से और अगर रामू की बहू घर भर में किसी से घृणा करती थी, तो कबरी बिल्ली से। उसकी अभी नयी-नयी शादी हुई थी और वह मायके से ससुराल आयी थी। चौदह वर्ष की ‘बालिका, कभी भण्डार-घर खुला है, तो कभी वहीं बैठे-बैठे सो गयी। कबरी बिल्ली को मौका मिलता, वह घी-दूध पर जुट जाती। रामू की बहू की जान आफत में और कबरी बिल्ली के मजे। रामू की बहू घी, दूध, दही, खीर छिपाते-छिपाते तंग आ गयी। जो भी बचता कबरी के पेट में। इस तरह रामू की बहू कबरी से पूरी तरह तंग आ गयी थी। उसने अपने मन में ठान लिया कि अब इस घर में या तो कबरी रहेगी या मैं। दोनों में मोरचाबन्दी हो गयी और दोनों सतर्क। कबरी के हौसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे।

एक दिन रामू की पत्नी ने रामू के लिए खीर बनायी। पिस्ता, बादाम, मखाने और तरह-तरह के मेवे दूध में औटाये गये। खीर से भरकर कटोरा कमरे में एक ऐसे ऊँचे स्थान पर रखा गया, जहाँ कबरी न पहुँच सके। उधर कबरी कमरे में आयी, नीचे खड़े होकर उसने ऊपर कटोरे की ओर देखा, सँघा, माल अच्छा है, ताक की ऊँचाई अन्दाजी और छलाँग लगायी। पंजा कटोरे में लगी और कटोरा झनझनाहट की आवाज के साथ फर्श पर गिरा। आवाज सुनकर रामू की बहू दौड़ी, देखा तो कबरी मजे के साथ खीर खा रही है। रामू की बहू को देखकर कबरी भाग गयी। रामू की बहू पर खून सवार हो गया। उसने कुछ सोचा और एक कटोरा दूध कमरे के दरवाजे पर रखकर चली गयी। हाथ में पाटा लेकर लौटी, तो देखती है कि कबरी दूध पर जुटी हुई है। सारा बल लगाकर पाटा उसने कबरी पर पटक दिया। कबरी हिली ने डुली, न चीखी न चिल्लायी, बस एकदम उलट गयी।

घर में मानो मातम छा गया। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मिसरानी बोलीं-माँ जी, ‘बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है।’ पण्डित जी बुलवाये गये। काफी भाव-ताव के बाद पण्डित जी ने उपाय में 11 तोले सोने की बिल्ली, 21 दिन के पाठ, 21 रुपये दक्षिणा और 21 दिन दोनों वक्त का भोजन निश्चित किया। दान के लिए दस मन गेहूँ, एक मन चावल, एक मन दाल, मन भर तिल, पाँच मन जौ और पाँच मन चना, चार पसेरी घी, मन भर नमक निश्चित हुआ। ग्यारह तोले सोने की बिल्ली बनवाकर लाने के लिए पण्डित जी ने रामू की माँ से कहा कि अचानक महरी ने आकर कहा कि बिल्ली तो उठकर भाग गयी।

इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि चाहे कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी, सभी को उद्देश्य धन इकट्ठा करना है। इस कहानी में धर्मभीरुता, रूढ़िवादिता एवं पाखण्डवाद को प्रस्तुत करे स्पष्ट किया गया है कि इनके पीछे मूल कारण धन ही है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्वों के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘वातावरण’ एवं ‘भाषा-शैली के आधार पर प्रायश्चित कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
“प्रायश्चित’ कहानी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी में चरित्र-चित्रण के कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी का शीर्षक कितना सार्थक है ? संक्षेप में लिखिए।
या
कथोपकथन की दृष्टि से ‘प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
कहानी के तत्त्वों के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
श्री भगवतीचरण वर्मा हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार हैं। प्रायश्चित’ कहानी इनकी प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। इस कहानी को स्वर यथार्थवाद है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से आधुनिक समाज में धर्म के नाम पर धन की लोलुपता को प्रस्तुत किया है। कहानी की तात्त्विक समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – इस कहानी का शीर्षक ‘प्रायश्चित है। ‘प्रायश्चित’ शीर्षक वास्तविक कथावस्तु की ओर इंगित करता है। शीर्षक में कौतूहले, सरलती, स्पष्टता, संक्षिप्तता और आकर्षण है। इससे कहानी के केन्द्रीय भाव की, झलक मिलती है, जो पाठक को कहानी पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। शीर्षक की दृष्टि से प्रायश्चित’ एक श्रेष्ठ रचना है। कहानी के अन्तर्गत प्रारम्भ से ‘अन्त तक यह जिज्ञासा बनी रहती है कि बिल्ली के मरने पर पण्डित परमसुख द्वारा रामू के परिवार को कितने रुपये का चूना लगाया गया।

(2) कथानक या कथावस्तु – इस कहानी का कथानक मध्यमवर्गीय ग्रामीण समाज से लिया गया है तथा पुरोहितों में धर्म के नाम पर धनं-हरण के प्रति बढ़ते हुए मोह को कहानी का आधार बनाया गया है। कहानी का प्रारम्भ घर में नयी बहू के आगमन और बिल्ली द्वारा दूध के बने व्यंजनों के येन-केन प्रकारेण चट कर जाने से है। बिल्ली के आये दिन के इस कार्य से नयी बहू परेशान हो जाती है और अन्ततः वह बिल्ली को मार देने का निर्णय करती है तथा उसे पर पाटा चला देती है। पण्डित परमसुख बुलाये जाते हैं और वह बिल्ली की हत्या का जो प्रायश्चित बताते हैं, वह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो कई लाख का बैठेगा। परिवारीजन इस बारे में विचार करते ही रहते हैं कि पता चलता है कि बिल्ली भाग गयी।

इस कहानी का कथानक रोचक, सरस, मौलिक, स्वाभाविक, सजीव और प्रभावशाली है। इसमें प्रारम्भ से अन्त तक कौतूहल बना रहता है। कहानी में कहानीकार ने तथाकथित पुरोहित वर्ग और उनके पौरोहित्य कर्म की पोल खोलकर रख दी है तथा सामाजिक रूढ़ियों और धर्मभीरुता के नाम पर शोषण की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त किया है। कहानी का अन्त आकर्षक है, जो पाठक पर अपना स्पष्ट प्रभाव छोड़ता है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण – यह कहानी एक मध्यमवर्गीय हिन्दू ग्रामीण-धर्मभीरु परिवार से सम्बन्धित है। कहानी में पात्रों की संख्या कम है। मुख्य पात्र रामू की बहू, कबरी बिल्ली, पण्डित परमसुख और रामू की माँ हैं। अन्य सभी पात्र–मिसरानी, छन्नू की दादी, महरी, किसनू की माँ आदि गौण पात्र हैं, जो केवल कथावस्तु को विस्तार देने के उद्देश्य से ही प्रयुक्त किये गये हैं। पात्रों के चरित्र-चित्रण में सांकेतिक प्रणाली को अपनाते हुए उनका मूल्यांकन पाठकों पर ही छोड़ दिया गया है। पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(4) कथोपकथन (संवाद-योजना) – कहानी की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण कथोपकथन की सार्थक योजना होती है। लेखक ने इस कहानी में सार्थक संवादों का प्रयोग किया है, जिसके आधार पर एक कुशल कहानीकार अपने पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालता है तथा कहानी की कथावस्तु का विकास करता है। प्रस्तुत कहानी के संवाद अत्यन्त संक्षिप्त और सार्थक हैं, उनमें नाटकीयता और सजीवता है। इस कहानी के संवाद सारगर्भित, संक्षिप्त, कहानी को गति देने वाले, वातावरण की सृष्टि तथा पात्रों की मन:स्थिति को स्पष्ट करने में सहायक है। कबरी के मरने पर जो प्रतिक्रिया पारिवारिक और अन्य लोगों के बीच हुई, वह भी स्वाभाविक है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

महरी बोली-“अरे राम! बिल्ली तो मर गयी, माँ जी, बिल्ली की हत्या बहू से हो गयी, यह तो बुरा हुआ।”
मिसरानी बोली”माँ जी, बिल्ली की हत्या और आदमी की हत्या बराबर है। हम तो रसोई न बनावेंगी, जब तक बहू के सिर हत्या गुहेगी।”
सास जी बोलीं- “हाँ ठीक तो कहती हो, अब जब तक बहू के सिर से हत्या न उतर जाए, तब तक न तो कोई पानी पी सकता है, न खाना खा सकता है। बहू, यह क्या कर डाला?”

(5) देश-काल और वातावरण – प्रायश्चित कहानी को आधार ग्रामीण-सम्भ्रान्त एवं सम्पन्न परिवार है। ‘प्रायश्चित’ एक व्यंग्यमूलक कहानी है, जिसमें सामाजिक पात्रों की स्वार्थबद्धता पर लेखक ने विनोदपूर्ण एवं चुटीला व्यंग्य किया है तथा वातावरण को प्राणवान एवं प्रभावशाली बनाने के लिए विशेष सजगता का परिचय दिया है। रामू के घर का दृश्य ही पूरे घटनाक्रम के लिए पर्याप्त है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखण्डवाद, रूढ़िवाद और धर्मभीरुता का लेखक ने व्यंग्यपूर्ण वर्णन किया है। कहानी में आधुनिक समाज के वातावरण की सजीव दृष्टि मिलती है। आज के युग में व्यक्ति अत्यन्त स्वार्थी होता जा रहा है। बेईमानी और भ्रष्टाचार चारों ओर व्याप्त हैं। इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में देश-काल और वातावरण का सफलता के साथ चित्रण हुआ है।

(6) भाषा-शैली – इस कहानी की भाषा आम बोल-चाल की-सरल, सरस और स्वाभाविक है। लोकोक्तियों और मुहावरों का सटीक प्रयोग किया गया है। शैली पात्रों के अनुकूल है और उनके भावों को प्रकट करने वाली है, जिसमें व्यंग्यात्मकता का पुट सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है

पण्डित परमसुख मुस्कराये, अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा”बिल्ली कितने तोले की बनवायी जाय? अरे रामू की माँ, शास्त्रों में तो लिखा है कि बिल्ली के वजन-भर सोने की बिल्ली बनवायी जाय, लेकिन अब कलियुग आ गया है, धर्म-कर्म को नाश हो गया है, श्रद्धा नहीं रही। सो रामू की माँ, बिल्ली के तोलभर की बिल्ली तो क्या बनेगी, क्योंकि बिल्ली बीस-इक्कीस सेर से कम की क्या होगी। हाँ, कम-से-कम इक्कीस तोले की बिल्ली बनवा के दान करवा दो और आगे तो अपनीअपनी श्रद्धा!”
रामू की माँ ने आँखें फाड़कर पण्डित परमसुख को देखा–“अरे बाप रे, इक्कीस तोला सोना! पण्डित जी यह तो बहुत है, तोलाभर की बिल्ली से काम न निकलेगा?”
पण्डित परमसुख हँस पड़े–’रामू की माँ! एक तोला सोने की बिल्ली! अरे रुपया का लोभ बहू से बढ़ गया? बहू के सिर बड़ा पाप है, इसमें इतना लोभ ठीक नहीं?”
वर्मा जी सफल कथाशिल्पी हैं और उनकी भाषा-शैली भावों तथा पात्रों के अनुकूल है।

(7) उद्देश्य – वर्मा जी की इस कहानी का उद्देश्य इस सत्य को अभिव्यंजित करना है कि वर्तमान में मनुष्य का लगाव मात्र धन में केन्द्रित है, शेष सभी रिश्ते-नाते नगण्य होते जा रहे हैं। कहानी में धर्मान्धता पर भी प्रहार किये गये हैं तथा समाज में व्याप्त रिश्वतखोरी, बेईमानी और मतलबपरस्ती पर भी यथार्थवादी व्यंग्यों का प्रहार करते हुए धर्मान्धता के वशीभूत हुए लोगों को इस पाश से निकालने का प्रयास किया गया है। लेखक को कहानी लिखने के उद्देश्य में पूर्ण सफलता मिली है। इस प्रकार प्रायश्चित’ कहानी लेखक की सफल यथार्थवादी रचना है। कहानी का आरम्भ, मध्य और समापन रोचक व औचित्यपूर्ण है। कहानी में अन्त तक यह कौतूहल बना रहता है कि प्रायश्चित में पण्डित परमसुख को क्या मिलेगा ? अन्त अप्रत्याशित और कलात्मक है। कहानी-कला की कसौटी पर ‘प्रायश्चित’ एक सफल, व्यंग्यात्मक तथा यथार्थवादी सामाजिक कहानी के रूप में खरी उतरती है।।

प्रश्न 3:
‘प्रायश्चित कहानी के आधार पर पण्डित परमसुख के चरित्र और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ के पण्डित परमसुख की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘प्रायश्चित’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘प्रायश्चित’ कहानी भगवतीचरण वर्मा की एक श्रेष्ठ व्यंग्यप्रधान सामाजिक रचना है, जिसमें मानव के स्वभाव को सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है। पण्डित परमसुख कहानी के प्रमुख पात्र हैं। कहानी के प्रारम्भ में बिल्ली की मृत्यु होने के बाद वे सम्पूर्ण कहानी पर छाये हुए हैं। उनके कर्मकाण्ड कम और पाखण्ड के द्वारा वर्मा जी ने उनके चरित्र को उजागर किया है। कहानी के आधार पर उनकी चरित्रगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कर्मकाण्डी ब्राह्मण – पण्डित परमसुख एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण हैं। वह कर्मकाण्ड के स्थान पर प्रकाण्ड पाखण्ड में अधिक विश्वास रखते हैं। नित्य पूजा-पाठ करना उनको धर्म है। लोगों में उनके प्रति आस्था भी है। इसलिए बहू के द्वारा बिल्ली के मारे जाने पर रामू की माँ उन्हें ही बुलवाती है और प्रायश्चित का उपाय पूछती है।

(2) लालची – पण्डित परमसुख परम लालची हैं। लालच के वशीभूत होकर ही वह रामू की माँ को प्रायश्चित । के लिए पूजा और दान की इतनी अधिक सामग्री बताते हैं, जिससे उनके घर के छ: महीनों के अनाज का खर्च निकल जाए।

(3) पाखण्डी – पण्डित परमसुख कर्मकाण्डी कम पाखण्डी अधिक हैं। वह पाखण्ड के सहारे धन एकत्र करना चाहते हैं। बिल्ली के मरने की खबर सुनकर उन्हें प्रसन्नता होती है। जब उन्हें यह खबर मिली, उस समय वे पूजा कर रहे थे। खबर पाते ही वे उठ पड़े, पण्डिताइन से मुस्कराते हुए बोले–* भोजन न बनाना, लाला घासीराम की पतोहू ने बिल्ली मार डाली, प्रायश्चित होगा, पकवानों पर हाथ लगेगा।”

(4) व्यवहारकुशल और दूरदर्शी – पण्डित परमसुख को मानव-स्वभाव की अच्छी परख है। वे जानते हैं कि दान के रूप में किस व्यक्ति से कितना धन ऐंठा जा सकता है। इसीलिए वे पहले इक्कीस तोले सोने की बिल्ली के दान का प्रस्ताव रखते हैं, लेकिन बात कहीं बढ़ न जाए और यजमान कहीं हाथ से न निकल जाए, वे तुरन्त ग्यारह तोले पर आ जाते हैं।

(5) परम पेट्र – पण्डित परमसुख परम पेटू भी हैं। पाँच ब्राह्मणों को दोनों वक्त भोजन कराने के स्थान पर उन्हीं के द्वारा दोनों समय भोजन कर लेना उनके परम भोजनभट्ट होने का प्रमाण है।

(6) साम-दाम-दण्ड-भेद में प्रवीण – पण्डित परमसुख साम-दाम-दण्ड-भेद में अत्यधिक प्रवीण हैं। पूजा के सामान की सूची के बारे में पहले तो उन्होंने प्रेम से रामू की माँ को समझाया परन्तु जब वह ना-नुकुर करने लगी तो तुरन्त ही बिगड़कर अपना पोथी-पत्रा बटोरने लगे और पैर पकड़े जाने पर पुनः आसन जमाकर भोजनादि की बात करने लगे। इससे स्पष्ट होता है कि पण्डित जी इन चारों विद्याओं में निष्णात थे। स्पष्ट होता है कि पण्डित परमसुख उपर्युक्त वर्णित गुणों के मूर्तिमान स्वरूप थे।

प्रश्न 4:
“जिज्ञासा की उत्तरोत्तर वृद्धि ही अच्छी कहानी की पहचान है।” इस कथन के आधार पर प्रायश्चित’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक अच्छी कहानी आने वाली घटनाओं के प्रति पाठक के मन में उत्सुकता जगाती चलती है। इससे कहानी में पाठक की रुचि बनी रहती है। इसलिए कहानीकार का यह प्रयास रहता है कि उसकी कहानी में जिज्ञासा का तत्त्व अवश्य विद्यमान रहे, जिससे पाठक उसकी आगामी घटनाओं को जानने के लिए उत्सुक बना रहे। ऐसा होने पर पाठक उसे अन्त तक पढ़ने के लिए बेचैन रहता है। कहानी की इस विशेषता के आधार पर ‘प्रायश्चित’ एक अच्छी कहानी है। कहानी का प्रारम्भ बहुत सुन्दर और आकर्षक ढंग से हुआ है तथा पाठक अन्त तक यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि पण्डित परमसुख ने बिल्ली की मृत्यु के परिहार के लिए रामू की माँ को कितने सोना, अनाज, दक्षिणा और भोजन का चूना लगाया।
इस दृष्टि से ‘प्रायश्चित’ एक श्रेष्ठ कहानी है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name राजमुकुट (व्यथित हृदय)
Number of Questions
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 5 राजमुकुट (व्यथित हृदय)

प्रश्न 1:
श्री व्यथित हृदय द्वारा लिखित ‘राजमुकुट नाटक का सारांश अथवा कथा-सार संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के द्वितीय अंक का कथा-सार लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के तृतीय अंक का कथा-सार संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के प्रथम अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के किसी एक अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के अन्तिम (चतुर्थ) अंक की कथा संक्षिप्त रूप में लिखिए।
या
“राजमुकुट नाटक की कथा एवं अन्तर्कथाओं पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक के आधार पर महाराणा प्रताप और अकबर की भेंट का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘राजमुकुट’ नाटक, नाटककार श्री व्यथित हृदय का एक ऐतिहासिक नाटक है। इस नाटक में * महाराणा प्रताप की वीरता, बलिदान और त्याग की कथा अंकित है। कथा का प्रारम्भ महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक से तथा कथा का अन्त महाराणा प्रताप की मृत्यु पर होता है। महाराणा प्रताप इस नाटक के नायक हैं।
प्रथम अंक – प्रस्तुत नाटक के प्रथम अंक की कथा मेवाड़ के राणा जगमल के महल से आरम्भ होती है। राणा जगमल एक विलासी और क्रूर शासक है। वह अपनी मर्यादा का निर्वाह करना भूल गया था तथा सुरा-सुन्दरी में डूबा रहता था। ऐसे ही समय में राष्ट्रनायक कृष्णजी चन्दावत, राजसभा में पहुँचते हैं तथा राणा जगमल को उसके नीचे कर्मों के लिए भला-बुरा कहते हैं। वे जगमल से मेवाड़ का मुकुट’ उचित पात्र को सौंपने के लिए आग्रह करते हैं। जगमल उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं तथा चन्दावत से योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहते हैं। चन्दावत; राणा जगमल से राजमुकुट लेकर प्रताप के शीश पर रख देते हैं। प्रजा में खुशी की लहर दौड़ जाती है। प्रताप विदेशी शासक से लोहा लेने का प्रण करते हैं तथा देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। यह संकल्प नाटक की कथा को आगे बढ़ाने में सहायक है।

द्वितीय अंक – प्रताप मेवाड़ के राजा बनते ही अपनी प्रजा के खोये हुए सम्मान की रक्षा करते हैं। वे प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए अनेक आयोजन भी करते हैं। ऐसे ही एक आयोजन के अवसर पर जंगली सूअर के आखेट को लेकर प्रताप तथा उनके भाई शक्तिसिंह में विवाद हो जाता है। विवाद बढ़ जाने पर दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। भावी अनिष्ट की आशंका या राजकुल को संकट से बचाने के लिए राजपुरोहित अपनी कटार से अपना ही प्राणान्त कर लेते हैं। प्रताप शक्तिसिंह को देश से निर्वासित कर देते हैं। शक्तिसिंह अपने को अपमानित अनुभव करते हैं तथा अकबर के साथ मिल जाते हैं।

तृतीय अंक – मानसिंह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट अकबर की विवाहिता पत्नी थीं। इसलिए राणा ने उससे स्वयं भेंट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से चला गया तथा दिल्ली के सम्राट अकबर से जा मिला। चतुर अकबर अवसर का लाभ उठाकर महाराणा प्रताप पर आक्रमण कर देता है। हल्दीघाटी के इतिहास-प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा प्रताप को बचाने के लिए कृष्णजी चन्दावत, प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर स्वयं पहन लेते हैं और युद्धभूमि में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं। प्रताप बच जाते हैं, परन्तु दो मुगल सैनिक प्रताप का पीछा करते हैं। ऐसे समय पर शक्तिसिंह का भ्रातृ-प्रेम जाग्रत होता है और वे पीछा करके दोनों मुगलों को मार देते हैं। शक्तिसिंह और प्रताप आपस में गले मिलते हैं। इसी समय राणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक अपने प्राण त्याग देता है।

चतुर्थ अंक – हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाता है, परन्तु राणा हार नहीं मानते। अकबर प्रताप की देशभक्ति, त्याग और वीरता का लोहा मानते हैं तथा वे महाराणा प्रताप के प्रशंसक बन जाते हैं। एक दिन प्रताप के पास एक संन्यासी आती है। प्रताप संन्यासी का उचित सत्कार न कर पाने के कारण अत्यधिक व्यथित हैं। इसी समय राणा की पुत्री चम्पा घास की बनी रोटी लेकर आती है, जिसे एक वन-बिलाव छीनकर भाग जाता है। चम्पा गिर जाती है और पत्थर से टकराकर उसकी मृत्यु हो जाती है। कुछ समय पश्चात् अकबर संन्यासी वेश में वहाँ आता है और कहता है कि “आप उस अकबर से तो सन्धि कर सकते हैं जो भारतमाता को अपनी माँ समझता है, जो आपकी भाँति उसकी जय बोलता है।” इसी समय अकबर राणा को ‘भारतमाता का सपूत’ बताता है और प्रताप के दर्शन करके अपने को धन्य मानता है। संघर्षरत प्रताप रोगग्रस्त हो जाते हैं। वे शक्तिसिंह तथा अपने सभी साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेते हैं। भारतमाता की जय’ घोष के साथ ही महाराणां का देहान्त हो जाता है। ‘राजमुकुट’ की यह कथा भारत के स्वर्णिम इतिहास और एक रणबाँकुरे वीर की अमर कहानी है।

प्रश्न 2:
नाट्य-कला (नाट्य तत्त्वीं) की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
कथोपकथन (संवाद-योजना) की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की संवाद-कला पर प्रकाश डालिए। कथावस्तु की दृष्टि से ‘राजमुकुट नाटक की समीक्षा लिखिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की भाषा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
या
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा लिखिए।
या
‘राजमुकुट नाटक में देश-काल और वातावरण का सफल निर्वाह हुआ है।” इस कथन के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के वातावरण एवं उद्देश्य पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक की अभिनेयता पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
रंगमंच की दृष्टि से नाटक की आलोचना कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ नाटक की समीक्षा

नाट्य-कला के विभिन्न तत्त्वों के आधार पर श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) कथानक – इस नाटक का कथानक महाराणा प्रताप के शौर्यपूर्ण जीवन से सम्बन्धित है। कथानक का प्रारम्भ महाराणा के राजमुकुट धारण करने से होता है। कथानक के विकास में शक्तिसिंह और राणा का विवाद, अकबर की सेना का प्रताप पर आक्रमण, हल्दीघाटी का युद्ध, प्रताप का वन-वन भटकना, उनकी मृत्यु आदि अनेक घटनाएँ सहायक हुई हैं। कथानक सुगठित, सशक्त, सुन्दर तथा क्रमबद्ध है। इस प्रकार कथानक की दृष्टि से ‘राजमुकुट एक सफल नाटक है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – नाटक की पात्र-योजना श्रेष्ठ है। नाटक के नायक प्रताप हैं। प्रताप के अतिरिक्त शक्तिसिंह, कृष्णजी चन्दावत, जगमल, मानसिंह, अकबर आदि अन्य प्रमुख पात्र हैं। नारी-पात्रों की भी सुन्दर योजना है। प्रजावती का बलिदान सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रमिला, गुणवती तथा चम्पा अन्य प्रमुख नारी-पात्र हैं। सभी पात्रों का चरित्रांकन श्रेष्ठ है तथा कहानी के विकास में सहायक है। पात्रों की मुख्य विशेषता उनका उदात्त चरित्र है।

(3) संवाद-योजना – नाटक के संवाद सुन्दर, सरल, संक्षिप्त, सरस तथा पात्रों के अनुकूल हैं। ये संवाद मनोभावों को प्रकट करने में भी सक्षम और प्रभावशाली हैं। संवादों में कहीं माधुर्य है तो कहीं ओज। उदाहरणार्थ–“मैं अकबर से सन्धि कर लें ?उस अकबर से सन्धि कर लें, जिसने भारतमाता को दासता की जंजीरों में जकड़ रखा है।” नाटक में स्वगत कथनों की भरमार होने से पाठकों में अरुचि पैदा होने की अधिक सम्भावना है। कहीं-कहीं रंगमंच पर प्रस्तुत घटनाओं को संवादों द्वारा पुनः व्यक्त करके समय का दुरुपयोग भी किया गया है।

(4) देश-काल एवं वातावरण – नाटक में अकबर के समय के वातावरण को चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से नाटककार सफल हैं। ऐतिहासिक वातावरण सफलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। युद्ध के दृश्य सजीव हैं। नाटक में तत्कालीन राजस्थान का परिवेश मुखरित हो उठा है।

(5) भाषा-शैली – इस नाटक की भाषा साहित्यिक खड़ी बोली है। संस्कृत के शब्दों का बाहुल्य है। माधुर्य के साथ ओज गुण की भी प्रधानता है। अलंकारों, मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दर रूप में किया गया है। भाषा-शैली की दृष्टि से राजमुकुट एक सफल रचना है। उदाहरणार्थ-”वह देश में छाई हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा, आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है। उसका पौरुष गेय है।”

(6) उद्देश्य – नाटक की रचना में नाटककार का उद्देश्य देशप्रेम तथा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए त्याग एवं बलिदान का सन्देश देना है। प्रताप अपनी मृत्यु के समय कहते हैं-”बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”

(7) अभिनेयता – अभिनेयता की दृष्टि से नाटक रंगमंच के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। दृश्यों की संख्या बहुत अधिक है। युद्ध इत्यादि के दृश्यों का मंचन करना तथा हाथी-घोड़ों का मंच पर प्रस्तुतीकरण भी कठिन है। भाषा की दृष्टि से भी नाटक अभिनेयता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। हाँ, पठनीयता की दृष्टि से ‘राजमुकुट एक सफल रचना है।

प्रश्न 3:
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के जिस पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया है, उसके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर प्रमुख पात्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

महाराणा प्रताप का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक महाराणा प्रताप हैं। नाटक में उनके चरित्र का मूल्यांकन . करने वाली; राज्याभिषेक से लेकर मृत्यु तक की घटनाएँ हैं। राणा प्रताप की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) आदर्श भारतीय नायक – भारतीय नाट्यशास्त्र में आदर्श नायक के जिन गुणों के विषय में बताया गया है, महाराणा प्रताप के चरित्र में वे सभी गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र ‘धीरोदात्त नायक’ का आदर्श चरित्र है। वे उच्च कुल में उत्पन्न हुए वीर, साहसी तथा संयमी व्यक्ति हैं।

(2) प्रजा की आशाओं के आधार – मेवाड़ की प्रजा महाराणा प्रताप को इस आशा के साथ मुकुट पहनाती है। कि वे उसकी तथा देश की रक्षा करेंगे। प्रजा की आशा के अनुरूप प्रताप उसके सच्चे हितैषी सिद्ध होते हैं। प्रजा प्रताप के मुकुट धारण करने से पूर्व ही यह आशा रखती है कि “वह देश में छायी हुई दासता की निशा पर सचमुच सूर्य बनकर हँसेगा; आलोक-पुंज बनकर ज्योतित होगा। उसका प्रताप अजेय है; उसका पौरुष गेय है। वह महीमाता का पुण्य है। भारतमाता की साधना का फल है; अमरफल है।”

(3) मातृभूमि के अनन्य भक्त – प्रताप मातृभूमि के अनन्य भक्त हैं। वे देश की दासता और प्रजा की दुर्दशा से व्यथित हैं-“सारा देश विदेशियों के अत्याचारों से विकम्पित हो चुका है। देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक असन्तोष राग अलाप रहा है। …………. चित्तौड़ का युद्ध भारत का युद्ध होगा।”

(4) दृढ़प्रतिज्ञ तथा कर्तव्यनिष्ठ – महाराणा दृढ़ निश्चयी तथा अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान् हैं। राजमुकुट धारण करने के अवसर पर प्रताप के शब्द हैं – “मेरा जयनाद ! मुझे महाराणा बनाकर मेरा जयनाद न बोलो साथियो! जय बोलो भारत की, मेवाड़ की। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राणों में साँस रहते हुए प्रजा-प्रभु की दी हुई इस भेंट को मलिन न करूंगा। जब तक सारे भारत को दासता से मुक्त न कर लूंगा, सुख की नींद न सोऊँगा।”

(5) स्वतन्त्रता हेतु दृढ़ संकल्प – प्रताप जीवनपर्यन्त स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते रहे। वे अकबर से हल्दीघाटी में युद्ध करते हैं। सब कुछ खोकर, भी वे अकबर के सामने झुकते नहीं। बच्चे भूखों मर जाते हैं, फिर भी यह लौह-पुरुष अडिग रहता है। मृत्यु के समय भी राणा को एक ही लगन है, एक ही इच्छा है, एक ही अभिलाषा है, वह है देश की स्वतन्त्रता-“बन्धुओ ! वीरो ! प्रतिज्ञा करो, मुझे वचन दो कि तुम मेरे देश की ……………….. अपने देश की स्वतन्त्रता के प्रहरी बनोगे।”

(6) निरभिमानी एवं सत्तालिप्सा से दूर – राणा देशभक्त हैं, स्वतन्त्रता के दीवाने हैं, परन्तु वे राजा बनना नहीं चाहते। राणा प्रताप महान् देशभक्त एवं मेवाड़ के महाराणा हैं, किन्तु उन्हें अभिमान बिल्कुल नहीं है। महान् होकर भी वे स्वयं को महान् नहीं समझते। वे कहते हैं—“मेवाड़ का राणा मैं ! नहीं, नहीं कृष्णजी ! आप भूल रहे हैं। मेवाड़ के महाराणा का पद महान् है, बहुत महान् है।”

(7) भारतीय संस्कृति, धर्म तथा मान-मर्यादा के रक्षक – महाराणा भारतीय संस्कृति के पोषक हैं। वे धर्म की रक्षा करना अपना प्राथमिक कर्तव्य समझते हैं। संन्यासी के रूप में अकबर जब उनके पास पहुँचता है तो वे उसका आदर करते हैं, परन्तु खाने के लिए कुछ भी दे पाने में असमर्थ होने के कारण उन्हें कष्ट होता है। वे कहते हैं-”आज कई दिनों से बच्चे घास की रोटियों पर निर्वाह कर रहे थे तो क्या संन्यासी अतिथि को घास की रोटिन खिलाऊँ।
धर्म के प्रति भी राणा के मन में निष्ठा है। पुरोहित का बलिदान देखकर राणा कहते हैं “देशभक्त पुरोहित तुम धन्य हो ! तुमने अपने अनुरूप ही अपना बलिदान दिया है। ज्ञान और चेतना से दूर हम अधम को तुमने प्रकाश दिखाया है …………..।”

(8) पराक्रमी योद्धा – राणा वीर हैं। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके शौर्य का साक्षी है। प्रताप अपने सैनिकों से कहते हैं-“चलो युद्ध का राग गाते हुए हम सब हल्दीघाटी की युद्धभूमि में चलें और रक्तदान से चण्डी माता को प्रसन्न करके उनसे विजय का शुभ आशीर्वाद लें।”
इस प्रकार राणा का चरित्र अनेक अमूल्य गुणों की खान है। वे आदर्श देशभक्त हैं और त्यागी, साहसी, उदार, वीर, दृढ़निश्चयी तथा उदात्त पुरुष हैं। वे प्रजा को आत्मीय मित्र मानते हैं। मुगल सम्राट अकबर भी उनकी प्रशंसा करते हैं – “महाराणा प्रताप भारत के अनमोल रत्न हैं।”

प्रश्न 4:
‘राजमुकुट नाटक के आधार पर शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘राजमुकुट के आधार पर शक्तिसिंह की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट के आधार पर समीक्षा कीजिए कि “शक्तिसिंह देशभक्त और त्याग की प्रतिमा है। उसके पश्चात्ताप और त्याग ने उसके चरित्र को गरिमामय बना दिया है।”
उत्तर:

शक्तिसिंह का चरित्र-चित्रण

शक्तिसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक के नायक मेवाड़ के महाराणा प्रताप का छोटा भाई है। महाराणा के इस सुयोग्य अनुज के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) परम देशभक्त – शक्तिसिंह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमा है। उसके हृदय में अपने भाई के समान देश की दासता, जनता की व्यथा और शासन के अत्याचारों के विरुद्ध आक्रोश है। वह मेवाड़ के घर-घर में जीवन और जागृति का मन्त्र फेंकना चाहता है। वह अपने देश के मंगल के लिए सब-कुछ करने को तत्पर है – ”माता-मही! तू मेरी भुजाओं में शक्ति दे कि मैं जगमल के सिंहासन को उलट सकें।’ …………….मेवाड़ में सुख-शान्ति स्थापित कर सकें।”

(2) राज्य-वैभव के प्रति अनासक्त – शक्तिसिंह का चरित्र त्याग भाव से परिपूर्ण है। उसे राज्य-वैभव में कोई आसक्ति नहीं है। अहेरिया उत्सव पर वन-शूकर के वध पर महाराणा से तकरार हो जाने पर दोनों में तलवारें खिंच जाती हैं, जिसमें मध्यस्थता करते हुए पुरोहित की हत्या हो जाती है। इस अपराध में उसे राज्य से निर्वासित कर दिया जाता है, जिसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता है।

(3) निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता – शक्तिसिंह में निर्भीकता और स्पष्ट बात कहने का साहस द्रष्टव्य है। वह अकबर की सेना में सम्मिलित तो हो जाता है, किन्तु अकबर द्वारा मेवाड़ का सर्वनाश करने का संकल्प लेने पर वह उसकी सहायता करने को तैयार नहीं होता।

(4) भावुक और प्रकृति-प्रेमी – शक्तिसिंह युवक है। प्राकृतिक सौन्दर्य उसे भाव-विमुग्ध कर देता है। वह उपवन में बैठकर गीत गुनगुनाता है। चन्दावत के पूछने पर वह कहता है “वन मनुष्यों से कहीं अधिक अच्छे होते हैं।”

(5) भ्रातृ-प्रेमी – शक्तिसिंह के हृदय में अपने भाई महाराणा के प्रति अनन्य प्रेम है। राणा प्रताप और शक्तिसिंह का युद्धभूमि में आमना-सामना होता है। युद्ध में ही राणा के घोड़े चेतक की मृत्यु हो जाती है। राणा उसके शव के निकट चिन्तित भाव से बैठे हुए थे, तभी दो मुगल सैनिकों को महाराणा पर प्रहार करते हुए देखकर शक्तिसिंह एक ही वार में दोनों को मौत के घाट उतार देता है और महाराणा से क्षमा-याचना करता है-”वह आया है.मेवाड़ के महाराणा से क्षमा-याचना करने, उनकी स्नेहमयी गोद में बैठकर पश्चात्ताप करने और उनकी वीरता की पवित्र गंगा में अपने कलुषित-कल्मषों को धोने।”

(6) साम्प्रदायिक सद्भावना तथा राष्ट्रीय एकता का पोषक – शक्तिसिंह यह सोचता है कि अकबर और प्रताप मिलकर ऐसे भारत की रचना कर सकते हैं, जिसमें धर्म और सम्प्रदाय का वैमनस्य नहीं होगा। ऐसा भारत ही अखण्ड राष्ट्र हो सकता है। वह हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों को मिल-जुलकर रहने का सन्देश देता है-“तुम उन्हें विदेशी और विधर्मी समझ रहे हो, क्या वे फिर काबुल, कंधार और ईरान लौट जाएँगे ? …………. वे अब इसी देश में रहेंगे और उसी प्रकार उसी कण्ठ से भारतमाता की जय बोलेंगे।”

(7) अन्तर्द्वन्द्व से घिरा – शक्तिसिंह उज्ज्वल चरित्र का व्यक्ति है। वह प्रतिशोध की भावना और देशभक्ति के द्वन्द्व से घिर जाता है, किन्तु अन्त में देशभक्ति की भावना की विजय होती है। तब वह सोचता है-”प्रतिहिंसा की भावना से उत्तेजित होकर दानव बन जाना ठीक नहीं।” इन सहज दुर्बलताओं ने उसके चरित्र को यथार्थ । का स्पर्श देकर निखार दिया है।

प्रश्न 5:
‘राजमुकुट’ नाटक के आधार पर अकबर को चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

अकबर का चरित्र-चित्रण

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक में मुगल सम्राट अकबर एक प्रमुख पात्र है। वह महाराणा प्रताप का प्रतिद्वन्द्वी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं

(1) व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति – अकबर व्यावहारिक और अवसरवादी व्यक्ति है। अपने इसी गुण के कारण वह शक्तिसिंह के हृदय में जगी प्रतिशोध की भावना को तीव्र कर देता है-”छलिया संसार को छल और प्रपंचों से परास्त करने का पाठ पढ़ो। ……….. संसार में भावुकता से काम नहीं चल सकता शक्ति !”

(2) महत्त्वाकांक्षी – सम्राट् अकबर बहुत महत्त्वाकांक्षी है। क्ह मन-ही-मन मेवाड़-विजय का संकल्प करता है-“मैं अपने जीवन के उस अभाव को पूरा काँगा, मेवाड़ के गौरवमय भाल को झुकाकर अपने साम्राज्य की प्रभुता बढ़ाऊँगा।”

(3) मानव-स्वभाव का पारखी – अकबर बहुत बुद्धिमान है। वह शक्तिसिंह, मानसिंह और राणा प्रताप के चरित्र का सही मूल्यांकन करता है – “एक प्रताप है, जो मातृभूमि के लिए प्राण हथेली पर लिये फिरता है। और एक तुम हो, जो मातृभूमि के सर्वनाश के लिए खाइयाँ खोदते फिरते हो।”

(4) सदगुणों का प्रशंसक – अकबर व्यक्ति के सद्गुणों की प्रशंसा करने से नहीं चूकता, चाहे वे सद्गुण उसके शत्रु में ही क्यों न हों। यह विशेषता उसे महानता प्रदान करती है। वह हृदय से राणा की वीरता और स्वाभिमान की प्रशंसा करता है- “……… धन्य है मेवाड़ ! और धन्य हैं मेवाड़ की गोद में पलने वाले महाराणा प्रताप ! प्रताप मनुष्य रूप में देवता हैं, मानवता की अखण्ड ज्योति हैं।”

(5) साम्प्रदायिक सदभावना का प्रतीक – अकबर हिन्दू-मुसलमानों को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है। उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही’ मत इसी साम्प्रदायिक सद्भावना का प्रतीक है। वह मानवीय गुणों का आदर करता है। वह महाराणा की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए कहता है—“हमारा और आपका मिलन ! यह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं महाराणा ! दो धर्म-प्रवाहों का मिलन है, जिससे इस देश की संस्कृति सुदृढ़ तथा पुष्ट होगी।”

(6) कूटनीतिज्ञ – अकबर कुशल कूटनीतिज्ञ है। वह प्रत्येक निर्णय कूटनीति से लेता है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है-”प्रताप का भाई शक्तिसिंह स्वयं जादू के जाल में फंसकर माया की तरंगों में डुबकियाँ लगा रहा है। उसी को मेवाड़ के विध्वंस का साधन बनाऊँगा।”

प्रश्न 6:
राजमुकुट’ नाटक के नारी-पात्रों पर विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक में देशप्रेम एवं त्याग की प्रतिमूर्ति प्रमिला पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
प्रमिला के माध्यम से मेवाड़ की नारी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ के नारी-पात्र

श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट में नारी-पात्रों का समावेश नगण्य है। इसमें प्रमिला, प्रजावती, गुणवती और चम्पा प्रमुख नारी पात्र हैं।

प्रमिला नाटक की एक साधारण स्त्री-पात्र है। वह जगमल के चापलूस सरदार हाथीसिंह की पत्नी है। वह देशप्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति है। वह अपने पति को देश के कल्याण के लिए बलिदान हो जाने का सन्देश देती है। नाटक के तृतीय दृश्य में इसका राष्ट्रप्रेम अभिव्यक्त होता है। वह अपने पति से कहती है – “देश पर जब विपत्तियों के पहाड़ टूट पड़े हों, तब देश के नर-नारियों को अधिक परित्याग करना ही चाहिए। यदि देश का कल्याण करने में माँग का सिन्दूर मिट गया, तो चिन्ता की क्या बात।” जब उसका पति कहता है-”खाँडे का नाम सुनकर ही मेरे प्राणों में भूचाल आने लगता है”-तो प्रमिला उस पर व्यंग्य करती हुई कहती है तो लहँगा पहनकर हाथों में चूड़ियाँ डाल लो। घूघट निकालकर घर के कोने में जाकर बैठे रहो।”

प्रजावती निरपराध, पवित्र, जनहित में लगी रहने वाली, स्वाभिमानिनी, देशप्रेमी व प्रजावत्सल नारी है। नाटककार ‘ने उसे मंच पर उपस्थित नहीं किया है, वरन् अन्य पात्रों के माध्यम से ही उसके चरित्र की विशेषताओं को उजागर किया है। जगमल का एक सैनिक उसके चरित्र पर प्रकाश डालता हुआ कहता है-“वह विक्षिप्ता है महाराज! दिन भर झाड़ियों और कन्दराओं में छिपी रहती है। जब रात होती है तब बाहर निकलकर अपने जीवनगान से सम्पूर्ण उदयपुर को प्रतिध्वनित कर देती है। वह रात भर अपने गान को मेदिनी पर, पाषाणों पर, दीवारों पर लिखती फिरती है। उसका जीवन-गान उदयपुर में धर्म-गीत बन रहा है।” राणा जगमल अपने क्रूर चाटुकारों के कहने से उसका वध करवा देता है। प्रजावती के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए प्रजा का नायक चन्दावत कहता है-”वह कृषकों और श्रमिकों के जीवन का प्रकाश थी; उनके प्राणों की आशा थी; उनकी धमनियों का रक्त थी।”
गुणवती मेवाड़ के राणा प्रताप की पत्नी हैं, जो उनके साथ वनवास के कष्टों को सहर्ष सहन करती हैं तथा अपने पति को हर संकट में साथ देती हैं।
चम्पा महाराणा की पुत्री है। वह नाटक के अन्त में मंच पर उपस्थित होती है। उसे अपने पिता के साथ वन में भटकते और कष्ट सहन करते हुए दिखाया गया है। इस प्रकार इस नाटक में नारी-पात्रों की भूमिका बहुत संक्षिप्त है, किन्तु भावनात्मक स्तर पर वे पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न 7:
मानसिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
मानसिंह; श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक का एक प्रमुख पात्र तथा अकबर का सेनापति है। वह राणा प्रताप से बहुत प्रभावित था। एक बार वह राणा प्रताप से मिलने आया। राणा उसे विधर्मी और पतित समझते थे; क्योंकि मानसिंह की बुआ मुगल सम्राट् अकबर की विवाहिता पत्नी थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा ने उससे स्वयं भेंट न करके उसके स्वागतार्थ अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और इस अपमान का बदला चुकाने की बात कहकर वहाँ से लौट गया। वह दिल्ली के सम्राट् अकबर से जाकर मिला और उसके निर्देश और अपने नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना लेकर हल्दीघाटी के मैदान में आ पहुँचा। मुगल और राजपूत दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ।
इस प्रकार मानसिंह एक असंयत मनोवृत्ति का व्यक्ति था, जिसमें सहनशीलता का अभाव था। उसने बदले की भावना से प्रेरित होकर, मुगल सम्राट अकबर की सहायता से राणा पर आक्रमण करके विधर्मी और विश्वासघाती होने को परिचय दिया।

प्रश्न 8:
“राष्ट्रनायक ‘चन्दावत’ राजमुकुट नाटक का एक प्रभावशाली चरित्र है।” इस कथन के आलोक में ‘चन्दावत’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
नाटककार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक में ‘चन्दावत’ नामक पात्र का भी वर्णन किया है जो राष्ट्रनायक है और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भलीभाँति निभाता है, उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) कर्तव्य के प्रति जागरूक – इस नाटक में चन्दावत को राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह मर्यादाओं के पालन में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। जब राणा जगमल अपने राज-कर्त्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब जाते हैं, तब इस कारण से राष्ट्रनायक चन्दावत बड़े दुःखी होते हैं। इसलिए वे जगमल को फटकार लगाते हैं और कहते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हो; अतः राजमुकुट किसी उचित उत्तराधिकारी को सौंप दो।

(2) महान् त्यागी एवं बलिदानी – चन्दावत महात्यागी एवं बलिदानी व्यक्ति हैं। वे युद्ध के मैदान में देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए उनको राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश पर अपने प्राण बलिदान कर देते हैं।

(3) सच्चा देशभक्त – चन्दावत एक सच्चा देशभक्त है। देशभक्ति की भावना उसमें कूट-कूट कर भरी हुई है। वह देश के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार जानता है। युद्ध में राणा के प्राण बचाने के लिए उसका मुकुट स्वयं धारण करना देशभक्ति का एक अप्रतिम उदाहरण उसने प्रस्तुत किया है।

(4) दूरदर्शी – चन्दावत दूर की सोचने वाला व्यक्ति है। जब जगमल सुरासुन्दरी का दास होकर रह जाता है। तथा जनता उसका विरोध करती है, तो वह जगमल से उचित उत्तराधिकारी को राजमुकुट सौंपने को कह देते हैं। और स्वयं राणा को राजमुकुट पहनाते हैं जिससे जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती है।
उपर्युक्त बिन्दुओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि चन्दावत एक त्यागी, बलिदानी, दूरदर्शी और एक सच्चा देशभक्त था।

प्रश्न 9:
‘राजमुकुट’ नाटक के शीर्षक का औचित्य (सार्थकता) बताइए।
उत्तर:

शीर्षक का औचित्य

नाटक्रकार श्री व्यथित हृदय ने अपने इस नाटक का नामकरण ‘राजमुकुट’ उचित ही किया है; क्योंकि सम्पूर्ण नाटक की कथा के मूल में राजमुकुट की मान-प्रतिष्ठा ही निहित है। नाटक का आरम्भ ही राजमुकुट की मर्यादाओं की प्रतिष्ठापना से होता है। राणा जगमल अपने राज-कर्त्तव्य को भूलकर सुरासुन्दरी में डूब गये हैं, जिससे राष्ट्र-नायक कृष्णजी चन्दावत बड़े व्यथित हैं। इसीलिए वे जगमल को फटकार लगाते हैं कि अब तुम राजमुकुट की मर्यादाओं का पालन करने में अक्षम हो गये हो; अतः किसी उचित उत्तराधिकारी को राजमुकुट सौंप दो। राजमुकुट के योग्य उत्तराधिकारी को ढूंढने का दायित्व चन्दावत पर ही आता है और वे राजमुकुट को महाराणा प्रताप के सिर पर रख देते हैं। राणा प्रताप देश की स्वतन्त्रता को राजमुकुट की मान-प्रतिष्ठा से जोड़ देते हैं और भरी सभा के सम्मुख स्वतन्त्रता-प्राप्ति का संकल्प लेते हैं। वे अपने इस संकल्प से मरते दम तक नहीं डिगते। आगे चलकर कृष्णजी चन्दावत देशभक्त राणा के प्राण बचाने के लिए, उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर लेते हैं और देश के लिए मर-मिटते हैं।
इस प्रकार हम नाटक के शीर्षक राजमुकुट’ को कथानुसार एकदम सटीक और राष्ट्र-भावनाओं के अनुरूप पाते हैं।

प्रश्न 10:
” ‘राजमुकुट’ नाटक में इतिहास एवं कल्पना का उचित समावेश है।” स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘राजमुकुट’ नाटक के कथानक का आधार विशुद्ध ऐतिहासिक है, किन्तु यत्र-तत्र’ काल्पनिक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है।” इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
‘राजमुकुट की ऐतिहासिकता की समीक्षा कीजिए। या ऐतिहासिक दृष्टि से राजमुकुट’ नाटक का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:

‘राजमुकुट’ के कथानक की ऐतिहासिकता।

श्री व्यथित हृदय द्वारा रचित नाटक ‘राजमुकुट’ का कथानक विशुद्ध ऐतिहासिक है, किन्तु इसमें यत्र-तत्र काल्पनिक तत्त्वों का भी समावेश किया गया है। नाटक में काल्पनिक तत्त्वों का समावेश ऐतिहासिक तत्त्वों के आधार पर; आधुनिक समाज में व्याप्त समस्याओं का बोध कराने के लिए किया गया है। कथानक में देशप्रेम, राष्ट्रीय एकता, भावात्मक समन्वय तथा अन्तर्राष्ट्रीय चेतना जैसे मानवीय मूल्यों का सुन्दर समायोजन केरके नाटककार ने, नाटक के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होने के पश्चात् भी इसे प्रत्येक देश-काल के लिए : उपयोगी बना दिया है। कथानक में प्राचीन भारतीय मूल्यों एवं संस्कृति की श्रेष्ठता को भी प्रदर्शित किया गया है; अत: प्रस्तुत नाटक का कथानक विशुद्ध ऐतिहासिक होने पर भी उद्देश्यपरकता और सशक्तता की कसौटी पर खरा उतरता है।

प्रश्न 11:
‘राजमुकुट’ नाटक के मर्मस्पर्शी स्थलों पर प्रकाश डालिए।
या
“मानव-हित से ही देश-हित सम्भव है।” “राजमुकुट’ नाटक के आधार पर इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
श्री व्यथित हृदय कृत ‘राजमुकुट’ नाटक यद्यपि वीर रस से परिपूर्ण नाट्यकृति है, तथापि इसमें मर्मस्पर्शी स्थलों का अभाव नहीं है। नाटक का तृतीय अंक इस दृष्टि से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। कृष्णजी चन्दावत का राणा प्रताप को बचाने के लिए उनका मुकुट धारण करके आत्मबलिदान करना, राणा का पीछा करते मुगल सैनिकों पर भ्रातृ-प्रेम से व्याकुल होकर शक्तिसिंह का टूट पड़ना, राणा और शक्तिसिंह का आपसी वैमनस्य भूलकर एक-दूसरे के गले लगना तथा चेतक की मृत्यु इस नाटक के सर्वाधिक मर्मस्पर्शी स्थल हैं। इनके अतिरिक्त जंगल में भटकते राणा प्रताप का संन्यासी अतिथि को सत्कार न करने पर व्यथित होना, चम्पा का घास की रोटी लिये आना और वन-बिलाव को रोटी छीनकर भाग जाना, तत्पश्चात् पत्थर से टकराकर चम्पा की मृत्यु होना, रोगग्रस्त राणा प्रताप का शक्तिसिंह तथा अपने साथियों से स्वतन्त्रता-प्राप्ति का वचन लेना एवं राणा प्रताप का स्वर्ग सिधार जाना अन्य महत्त्वपूर्ण मर्मस्पर्शी स्थल हैं, जो कि पाठक और दर्शक के मन में करुणा के साथ-साथ वीर रस का संचार करके देशप्रेम की भावना जगाने में सक्षम हैं।

प्रश्न 12:
‘राजमुकुट’ नाटक के माध्यम से नाटककार क्या सन्देश देना चाहता है?
या
”राजमुकुट’ नाटक का उददेश्य स्पष्ट कीजिए।
या
राजमुकुट में निहित राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ में व्यक्त देशप्रेम और स्वाधीनता की भावना पर प्रकाश डालिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक देश-कल्याण की भावना को जगाने वाली रचना है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट’ नाटक में अन्तर्निहित उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
या
‘राजमुकुट नाटक देश-प्रेम और त्याग की भावना का सन्देश देता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
‘राजमुकुट’ नाटक में नाटककार श्री व्यथित हृदय का उद्देश्य निम्नलिखित सन्देश देना रहा है

(1) जनता की आवाज सर्वोपरि – इस नाटक के माध्यम से लेखक यह सन्देश देता है कि जनता के दमन और शोषण द्वारा कोई भी राजा अपनी प्रजा का प्रिय नहीं हो सकता। यदि वह ऐसा करता है तो एक समय ऐसा आएगा, जब क्रान्ति का बिगुल बज उठेगा। ‘राजमुकुट’ नाटक में चन्दावत एक ऐसा ही पात्र है, जो स्पष्ट कहता है कि “राजा प्रजा का केवल प्रतिनिधि मात्र होता है।” यही आज के भारत की स्वर है।

(2) साम्प्रदायिक सद्भाव – लेखक ने हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य की भावना का आयोजन कर साम्प्रदायिकता पर कुठाराघात किया है। प्रताप और अकबर का मिलन; समन्वय की भावना को प्रदर्शित करता है।

(3) स्वाधीनता, देश-प्रेम और एकता का सन्देश – नाटक ‘राजमुकुट के द्वारा लेखक ने राष्ट्रीय एकता का सन्देश दिया है। प्रताप अन्तिम समय तक अपने राष्ट्र की एकता के लिए संघर्ष करते रहे। वे मरते समय भी अपने वीर साथियों को संघर्ष के लिए प्रोत्साहित करते हैं। नाटक में स्थान-स्थान पर प्रेरणादायक सन्देश हैं; यथा–“मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि ………… जब तक सारे भारत को दासता के बन्धनों से मुक्त न करा लूंगा, सुख की नींद नहीं सोऊँगा।”
लेखक की कामना है कि देश के नवयुवक स्वार्थ की संकुचित भावना से ऊपर उठे, राष्ट्रप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो जाएँ तथा अपनी मातृभूमि के लिए त्याग तथा बलिदान कर सकें। भारतीय संस्कृति की रक्षा, भावात्मक एकता और मानवीय गुणों की स्थापना की ओर भी लेखक ने विशेष ध्यान दिया है। प्रस्तुत नाटक के माध्यम से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में नाटककार पूर्ण रूप से सफल रहा है।

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