UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption (पाचन एवं अवशोषण)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्न में से सही उत्तर छाँटें
(क)
आमाशय रेस में होता है

(a) पेप्सिन, लाइपेज और रेनिन
(b) ट्रिप्सिन, लाइपेज और रेनिन
(c) ट्रिप्सिन, पेप्सिन और लाइपेज
(d) ट्रिप्सिन, पेप्सिन और रेनिन

(ख)
सक्कस एंटेरिकस नाम दिया गया है

(a) क्षुद्रांत्र (ileum) और बड़ी आँत के संधि स्थल के लिए
(b) आंत्रिक रस के लिए
(c) आहारनाल में सूजन के लिए
(d) परिशेषिका (appendix) के लिए
उत्तर :
(क) (a)
(ख) (b)

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प्रश्न 2.
स्तम्भ I का स्तम्भ II से मिलान कीजिए

स्तम्भ I – स्तम्भ II
(a) बिलिरुबिन व बिलिवर्डिन –     (i) पैरोटिड
(b) मंड (स्टार्च) का जल अपघटन  – (ii) पित्त
(e) वसा का पाचन  – (iii) लाइपेज
(d) लार ग्रन्थि –  (iv) एमाइलेज
उत्तर :
(a) (ii)
(b) (iv)
(C) (iii)
(d) (i)

प्रश्न 3.
संक्षेप में उत्तर दें

(क)
अंकुर (villi) छोटी आँत में होते हैं, आमाशय में क्यों नहीं?
उत्तर :
क्योंकि अंकुरों में रक्त केशिकाएँ होती हैं तथा एक बड़ी लसीका वाहिनी (UPBoardSolutions.com) लेक्टिअल होती है। अवशोषण की क्रिया आँत में ही होती है।

(ख)
पेप्सिनोजन अपने सक्रिय रूप में कैसे परिवर्तित होता है?
उत्तर :
पेप्सिनोजन एक प्रोएन्जाइम है जो HCl के साथ क्रिया करके सक्रिय पेप्सिन में परिवर्तित होता है।

(ग)
आहारनाल की दीवार के मूल स्तर क्या हैं?
उत्तर :
आहारनाल की भित्ति में निम्न स्तर होते हैं
(a) सीरोसा
(b) मस्कुलेरिस
(C) सबम्यूकोसा
(d) म्यूकोसा

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(घ)
वसा के पाचन में पित्त कैसे मदद करता है?

उत्तर :
पित्त वसा को इमल्सीकरण कर देता है। यह लाइपेज को सक्रिय करता है जो वसा का पाचन पित्त की सहायता से करता है वसा डाइ तथा मोनोग्लिसेराइड में टूटता है।

प्रश्न 4.
प्रोटीन के पाचन में अग्न्याशयी रस की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
1. प्रोटीन के पाचन में अग्न्याशयी रस की भूमिका अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice) :
यह क्षारीय होता है। इसमें लगभग 98% पानी, शेष लवण तथा अनेक प्रकार के एन्जाइम्स पाए जाते हैं। इसका pH मान 75-83 होता है। इसे पूर्ण पाचक रूप कहते हैं; क्योंकि इसमें कार्बोहाइड्रेट, वसा तथा प्रोटीन को पचाने वाले एन्जाइम्स पाए जाते हैं। प्रोटीन पाचक एन्जाइम्स निम्नलिखित होते हैं

2. ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन (Trypsin and Chymotrypsin) :
ये निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन तथा काइमोट्रिप्सिनोजन के रूप में स्रावित होते हैं। ये आन्त्रीय रस एवं एण्टेरोकाइनेज एन्जाइम के कारण सक्रिय अवस्था में बदल जाते हैं। ये प्रोटीन का पाचन करके मध्यक्रम की प्रोटीन्स तथा ऐमीनो अम्ल बनाते हैं। एण्टेरोकाइनेज ट्रिप्सिनोजन
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प्रश्न 5.
आमाशय में प्रोटीन के पाचन की क्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
आमाशय में प्रोटीन का पाचन आमाशय की जठर ग्रन्थियों से जठर रस स्रावित होता है। यह अम्लीय (pH 0.9-3.5) होता है। इसमें 99% जल, 0:5% HCl तथा शेष एन्जाइम्स होते हैं। इसमें प्रोपेप्सिन, प्रोरेनिन तथा गैस्ट्रिक लाइपेज एन्जाइम होते हैं। प्रोपेप्सिन तथा प्रोरेनिन (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम HCl की उपस्थिति में सक्रिय पेप्सिन (pepsin) तथा रेनिन (rennin) में बदल जाते हैं। ये प्रोटीन तथा केसीन (दूध प्रोटीन) का पाचन करते हैं।

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प्रश्न 6.
मनुष्य का दंत सूत्र बताइए।

उत्तर :
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प्रश्न 7.
पित्त रस में कोई पाचक एन्जाइम नहीं होते, फिर भी यह पाचन के लिए महत्त्वपूर्ण है; क्यों?
उत्तर :
पित्त (Bile) :
पित्त का स्रावण यकृत से होता है। इसमें कोई एन्जाइम नहीं होता। इसमें अकार्बनिक तथा कार्बनिक लवण, पित्त वर्णक, कोलेस्टेरॉल, लेसीथिन आदि होते हैं।

  1. यह आमाशय से आई अम्लीय लुगदी (chyme) को पतली क्षारीय काइल (chyle) में बदलता है जिससे अग्न्याशयी एन्जाइम भोजन का पाचन कर सकें।
  2. यह वसा का इमल्सीकरण (emulsification) करता है। इमल्सीकृत वसा का लाइपेज एन्जाइम द्वारा सुगमता से पाचन हो जाता है।
  3. कार्बनिक लवण वसा के पाचन में सहायता करते हैं।
  4. हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके भोजन को सड़ने से बचाता है।

प्रश्न 8.
पाचन में काइमोट्रिप्सिन की भूमिका वर्णित करें। जिस ग्रन्थि से यह स्रावित होता है, इसी श्रेणी के दो अन्य एंजाइम कौन-से हैं?
उत्तर :
काइमोट्रिप्सिन (Chymotrypsin) :
अग्न्याशय से स्रावित प्रोटीन पाचक एन्जाइम है। यह निष्क्रिय अवस्था काइमोट्रिप्सिनोजन (chymotrypsinogen) के रूप में स्रावित होता है। यह आन्त्रीय रस में उपस्थित एण्टेरोकाइनेज (enterokinase) एन्जाइम की उपस्थिति में सक्रिय काइमोट्रिप्सिन में बदलता है। यह प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड तथा पेप्टोन (polypeptides and peptones) में बदलता है।

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अग्न्याशय से स्रावित अन्य प्रोटीन पाचक एन्जाइम निम्नलिखित हैं

  1. ट्रिप्सिनोजन (Trypsinogen)
  2. कार्बोक्सिपेप्टिडेज (Carboxypeptidase)

प्रश्न 9.
पॉलीसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड का पाचन कैसे होता है?
उत्तर :

पॉली तथा डाइसैकेराइड्स का पाचन

कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन मुखगुहा से ही प्रारम्भ हो जाता है। भोजन में लार मिलती है। लार का pH मान 6.8 (UPBoardSolutions.com) होता है। यह भोजन को चिकना तथा निगलने योग्य बनाती है। लार में टायलिन (ptyalin) एन्जाइम होता है। यह स्टार्च (पॉलीसैकेराइड) को डाइसैकेराइड (माल्टीस) में बदलता है।
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आमाशय में कार्बोहाइड्रेट का पाचन नहीं होता। अग्न्याशय रस में ऐमाइलेज (amylase) एन्जाइम होता है। यह स्टार्च या पॉलीसैकेराइड्स को डाइसैकेराइड्स में बदलता है।
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क्षुदान्त्र (छोटी आँत) में आंत्रीय रस में पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम्स के निम्नलिखित प्रकार इसके पाचन में सहायक होते हैंUP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 7
(माल्टोस, लैक्टोस तथा सुक्रोस डाइसैकेराइड्स हैं।)

प्रश्न 10.
यदि आमाशय में HCl का स्राव नहीं होगा तो क्या होगा?
उत्तर :
यदि आमाशय में HCl का स्राव नहीं होगा तो पेप्सिनोजन सक्रिय पेप्सिन में परिवर्तित नहीं होगा तथा पेप्सिन को कार्य करने के लिए अम्लीय माध्यम नहीं मिलेगा। HCl भोज्य पदार्थों के रेशेदार पदार्थों को गलाता है वे जीवाणु आदि को भी मारता है।

प्रश्न 11.
आपके द्वारा खाए गए मक्खन का पाचन और उसका शरीर में अवशोषण कैसे होता है? विस्तार से वर्णन करें।
उतर :
मक्खन वसा है और इसका पाचन ड्यूडिनमे में पित्तरस की सहायता से होता है। वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल अघुलनशील होते हैं अतः रक्त में अवशोषित नहीं किए जा सकते हैं। ये आंत्रीय म्यूकोसा में छोटी गुलिकाओं के रूप में जाते हैं। उसके पश्चात् उस पर प्रोटीन कवच चढ़ जाता है और इन गुलिकाओं को काइलोमाइक्रस (chylomicrous) कहते हैं। इनका संवहन रसांकुर में उपस्थित लिम्फ वाहिका (lacteal) में होता है। लिम्फ वाहिकाओं से ये रक्त द्वारा अवशोषित हो जाता है।

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प्रश्न 12.
आहारनाल के विभिन्न भागों में प्रोटीन के पाचन के मुख्य चरणों का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर :
सर्वप्रथम प्रोटीन का पाचन आमाशय में दो प्रोटियोलिटिक विकरों के द्वारा होता है

(i) पेप्सिन :
आमाशय द्वारा स्रावित

(ii) ट्रिप्सिन :
अग्न्याशय द्वारा स्रावित।

(i) आमाशय में प्रोटीन का पाचन :
पेप्सिन अम्लीय माध्यम (pH 1.8) में सक्रिय होता है। रेनिन केवल छोटे बच्चों के आमाशय में दूध से प्रोटीन को पचाने के लिए मिलता है।

(ii) दांत्र में प्रोटीन का पाचन :
अग्न्याशय रस में ट्रिप्सिनोजन मिलता है जो एन्टेरोकाइनेज के द्वारा सक्रिय ट्रिप्सिन में परिवर्तित होता है। ट्रिप्सिन क्षारीय माध्यम में सक्रिय होता है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 8

प्रश्न 13.
गर्तदंती (thecodont) तथा द्विबारदंती (diphyodont) शब्दों की व्याख्या करें।

उत्तर :
जबड़े के गड्ढे में धंसे दाँत को गर्तदंती (thecodont) कहते हैं। द्विबारदंती का अर्थ है दाँत का दो बार आनाप्रथम दाँत अस्थाई होते हैं इन्हें क्षीर दंत भी कहते हैं। जो 14 वर्ष की अवस्था तक टूट जाते हैं। इनके स्थान पर दूसरी बार स्थाई दाँत आते हैं।

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प्रश्न 14.
विभिन्न प्रकार के दाँतों के नाम और एक वयस्क मनुष्य में दाँतों की संख्या बताइए।
उत्तर :
वयस्क मनुष्य में 32 दाँत होते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं

  1. कुंतक (Incisor)—इनकी संख्या 2 होती है।
  2. रदनक (Canine)-इनकी संख्या 1 होती है।
  3.  अग्र चवर्णक (Premolar)–इनकी संख्या 2 होती है।
  4. चवर्णक (Molar)-इनकी संख्या 3 होती है। इस प्रकार एक जबड़े में 16 दाँत होते हैं और इस प्रकार मुख में 32 दाँत होते हैं

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प्रश्न 15.
यकृत के क्या कार्य हैं?
उत्तर :

यकृत के कार्य

यकृत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यकृत से पित्त रस स्रावित होता है। इसमें अकार्बनिक तथा कार्बनिक लवण; जैसे—सोडियम क्लोराइड, सोडियम बाइकार्बोनेट, सोडियम ग्लाइकोकोलेट, सोडियम टॉरोकोलेट आदि पाये जाते हैं। ये कोलेस्टेरॉल (cholesterol) को घुलनशील बनाए रखते हैं।
  2. पित्तरस में हीमोग्लोबिन (haemoglobin) के विखण्डन से बने पित्त वर्णक (bile pigments) पाए जाते हैं; जैसे—बिलिरुबिन (bilirubin) तथा बिलिवर्डन (biliverdin)। यकृत कोशिकाएँ रुधिर से जब बिलिरुबिन को ग्रहण नहीं कर पातीं तो यह शरीर में एकत्र होने लगता (UPBoardSolutions.com) है इससे पीलिया (jaundice) रोग हो जाता है।
  3. पित्त रस आन्त्रीय क्रमाकुंचन गतियों को बढ़ाता है ताकि पाचक रस काइम में भली प्रकार मिल जाए।
  4. पित्त रस काइम के अम्लीय प्रभाव को समाप्त करके काइल (chyle) को क्षारीय बनाता है। जिससे अग्न्याशयी तथा आन्त्रीय रसों की भोजन पर प्रतिक्रिया हो सके।
  5. पित्त लवण काइम के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके काइम को सड़ने से बचाते हैं।
  6. पित्त रस के कार्बनिक लवण वसाओं के धरातल तनाव (surface tension) को कम करके : इन्हें सूक्ष्म बिन्दुकों में तोड़ देते हैं। ये जल के साथ मिलकर इमल्सन या पायस बना लेते हैं। इस क्रिया को इमल्सीकरण (emulsification) कहते हैं।
  7. पित्त लवणों के कारण वसा पाचक एन्जाइम सक्रिय होते हैं।
  8. वसा में घुलनशील विटामिनों (A, D, E एवं K) के अवशोषण के लिए पित्त लवण आवश्यक | होते हैं।
  9. पित्त के द्वारा विषाक्त पदार्थ, अनावश्यक कोलेस्टेरॉल आदि का परित्याग किया जाता है।
  10. यकृत में विषैले पदार्थों का विषहरण (detoxification) होता है।
  11. यकृत में मृत लाल रुधिराणुओं का विघटन होता है।
  12. यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है।
  13. यकृत कोशिकाएँ हिपैरिन (heparin) का स्रावण करती हैं। यह रक्त वाहिनियों में रक्त का थक्का बनने से रोकता है।
  14. यकृत में प्लाज्मा प्रोटीन्स; जैसे-ऐल्बुमिन, ग्लोबुलिन, प्रोथॉम्बिन, फाइब्रिनोजन आदि का संश्लेषण होता है। फाइब्रिनोजन (fibrinogen) रक्त का थक्का बनने में सहायक होता है।
  15. यकृत आवश्यकता से अधिक ग्लूकोस को ग्लाइकोजन में बदल करें संचित करता है।
  16. आवश्यकता पड़ने पर यकृत प्रोटीन्स व वसा से ग्लूकोस का निर्माण करता है।
  17. यकृत कोशिकाएँ विटामिन A, D, लौह, ताँबा आदि का संचय करती हैं। 18. यकृत की कुफ्फर कोशिकाएँ जीवाणु तथा हानिकारक पदार्थों का भक्षण करके शरीर की सुरक्षा करती हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आमाशय की दीवार का पेशीय संकुचन कहलाता है।
(क) पाचन
(ख) संवहन
(ग) क्रमाकुंचन
(घ) मंथन
उत्तर :
(ग) क्रमाकुंचन

प्रश्न 2.
वयस्क मनुष्य का दन्त सूत्र होता है।
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उत्तर :
(क)
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प्रश्न 3.
मनुष्य में प्रोटीन का पाचन कहाँ से प्रारम्भ होता है?
(क) मुखगुहा
(ख) आमाशय
(ग) ग्रासनली
(घ) आँत
उत्तर :
(ख) आमाशय

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प्रश्न 4.
मानव में विटामिन-C की कमी से कौन-सा रोग उत्पन्न हो जाता है ?
(क) सूखा रोग
(ख) स्कर्वी
(ग) बेरी-बेरी
(घ) रतौंधी
उत्तर :
(ख) स्कर्वी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
ऐसे पोषक पदार्थ जो शारीरिक ऊतकों द्वारा संश्लेषित होकर जैविक ऑक्सीकरण कै फलस्वरूप ऊर्जा प्रदान करते हैं और जीवद्रव्य संश्लेषण का कार्य करते हैं, भोजन कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
मनुष्य के लिए आवश्यक पोषक पदार्थों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनुष्य के लिए आवश्यक पोषक पदार्थ इस प्रकार हैं

  1. कार्बोहाइड्रेट्स
  2. वसा
  3. प्रोटीन तथा
  4. खनिज लवण

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प्रश्न 3.
दो आवश्यक वसा अम्लों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. α – लिनोलेनिक अम्ल (ओमेगा-3 वसीय अम्ल) तथा
  2.  लिनोलिक अम्ल (ओमेगा-6 वसीय अम्ल)

प्रश्न 4.
शाकाहारी भोजन में प्रोटीन देने वाले दो पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर :
शाकाहारी भोजन में दूध एवं दालें प्रोटीन देने (UPBoardSolutions.com) वाले दो प्रमुख पदार्थ हैं।

प्रश्न 5.
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा किस रूप में उपस्थित होती है ?
उत्तर :
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा लैक्टोस के रूप में उपस्थित होती है।

प्रश्न 6.
जन्तु शरीर में जल की क्या उपयोगिता है?
उत्तर :
जल शरीर में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए माध्यम प्रदान करता है।

प्रश्न 7.
होलोफाइटिक एवं होलोजोइक पोषण में उदाहरण सहित अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वह पोषण जिसके अन्तर्गत जीव वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया, नाइट्रेट्स, जल, लवण आदि अकार्बनिक पदार्थ लेकर कार्बनिक पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, वसा आदि) को स्वयं संश्लेषण करते हैं, होलोफाइटिक पोषण कहलाता है। उदाहरणार्थ-नीले-हरे शैवाल, हरे प्रोटिस्टा ( यूग्लीना) इत्यादि। वह पोषण जिसके अन्तर्गत जीव बिना पचे हुए ठोस या तरल भोजन का अन्तर्ग्रहण करते हैं, होलोजोइक पोषण कहलाता है। उदाहरणार्थ-कीटाहारी जन्तु तथा रुधिराहारी जन्तु।

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प्रश्न 8.
शाकाहारी जीवों में कौन-सा दन्त अनुपस्थित होता है?
उत्तर :
रदनक (चीरने-फाड़ने वाले) दन्त।

प्रश्न 9.
टायलिन (Ptyalin) क्या है? यह किस माध्यम में सक्रिय होता है?
उत्तर :
टायलिन (Ptyalin) एक एन्जाइम है जो मुँह में पाई जाने वाली लार (saliva) में होता है। तथा मुखगुहा के क्षारीय माध्यम में सक्रिय होता है। यह मण्ड (starch) को पचाता है।
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प्रश्न 10.
एमाइलेज तथा लाइपेज में अन्तर बताइए।
उत्तर :
एमाइलेज कार्बोहाइड्रेट्स को तथा लाइपेज वसा का पाचन करता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य में प्रोटीन तथा वसा को पचाने वाले एन्जाइमों के नाम लिखिए
उत्तर :

  1. प्रोटीन पाचक विकर – पेप्सिन, रेनिन, ट्रिप्सिन, इरेप्सिन।
  2. वसा पाचक विकर  – लाइपेज।

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प्रश्न 12.
पेप्सिन क्या है? यह किस माध्यम में सक्रिय होता है? इसका कार्य बताइए।
उत्तर :
पेप्सिन प्रोटीन पाचक विकर है। यह प्रोटीन को प्रोटिओजेज तथा पेप्टोन्स में बदलता है। यह अम्लीय माध्यम में सक्रिय होता है।

प्रश्न 13.
प्रोटीन क्या हैं? इसका पाचन कैसे होता है?
उत्तर :
प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं। प्रोटीन का पाचन पेप्सिन, रेनिन, ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन तथा इरेप्सिन द्वारा होता है। प्रोटीन्स पाचन के पश्चात अमीनो अम्ल बनाती हैं।

प्रश्न 14.
आहारनाल के किस भाग में रसांकुर पाये जाते हैं? इनका क्या कार्य है?
उत्तर :
रसांकुर क्षुद्रान्त्र भाग में पाये जाते हैं। ये पचे हुए भोजन का अवशोषण करते हैं।

प्रश्न 15.
यदि किसी मनुष्य की जठर ग्रन्थियाँ निष्क्रिय हो जाये तो उसकी पाचन क्रिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर :
जठर ग्रन्थियों से जठर रस स्रावित होता है। इसमें पेप्सिन, लाइपेज तथा रेनिन (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम होते हैं। ये क्रमशः प्रोटीन, वसा तथा दूध की केसीन प्रोटीन का पाचन करते हैं। जठर ग्रन्थियों के निष्क्रिय होने से इनका पाचन प्रभावित हो जायेगा।

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प्रश्न 16.
किस विटामिन की कमी से मनुष्य में चर्मदाह (pellagra) रोग एवं रिकेट्स (rickets) रोग होता है? इन रोगों के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर :

(i) चर्मदाह (Pellagra) रोग विटामिन B5 (PP) :
निकोटिनिक अम्ल (C6H5NO2 ) की कमी से होता है। जीभ तथा त्वचा में पपड़ियाँ फड़ना इस रोग का प्रमुख लक्षण है।

(ii) रिकेट्स (Rickets) रोग विटामिन ‘D’ :
कैल्सीफेरॉल (C28 H44O) की कमी से होता है। हड्डियों एवं दाँतों का कमजोर हो जाना व टेढ़ा-मेढ़ा हो जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

प्रश्न 17.
विटामिन ‘ए’ तथा विटामिन ‘के’ की कमी से कौन-सा रोग होता है? या मनुष्य में विटामिन ए’ की अल्पता से होने वाली चार व्याधियों का उल्लेख कीजिए। इसके दो प्रमुख स्रोत लिखिए।
उत्तर :
विटामिन ‘ए’ की कमी से रतौंधी, जीरोफ्थैल्मिया; वृक्क संक्रमण, मन्दित वृद्धि, डर्मेटोसिस तथा विटामिन ‘के’ की कमी से रक्त का थक्का नहीं बनता है। अण्डा, घी, मछली, यकृत, गाजर तथा हरी सब्जियाँ विटामिन ‘ए’ के प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 18.
विटामिन ‘सी’ व विटामिन डी की कमी से कौन-सा रोग होता है। इनके स्रोत भी बताइए।
उत्तर :
विटामिन ‘सी’ की कमी से स्कर्वी तथा विटामिन डी की कमी से सूखा रोग हो जाता है। विटामिन ‘डी’ का स्रोत मक्खन, दूध, मछली, सूर्य का प्रकाश है। विटामिन ‘सी’ का प्रमुख स्रोत ताजे खट्टे फल होते हैं।

प्रश्न 19.
किस तत्त्व की कमी से कमजोर बच्चों के पैर टेढ़े हो जाते हैं ?
उत्तर :
विटामिन डी की कमी से कमजोर बच्चों के पैर टेढ़े हो जाते हैं।

प्रश्न 20.
किस विटामिन को धूप विटामिन कहते हैं?
उत्तर :
विटामिन ‘डी’ को।

प्रश्न 21.
कब्ज एवं अपच में अन्तर कीजिए।
उत्तर :
कब्ज में मलाशय में मल रुक जाता है। आँत द्वारा सारे जल का अवशोषण होने से मल अत्यन्त कठोर हो जाता है। आँत की गतिशीलता भी अनियमित हो जाती है, जबकि अपच में भोजन का पूर्ण पाचन नहीं हो पाता है। पेट भरा-सा लगता है। यह विकर स्रावण में कमी, (UPBoardSolutions.com) व्याग्रता, खाद्य विषाक्तता, अधिकता में भोजन करना तथा अत्यन्त मसालेयुक्त व खट्टा भोजन करने आदि से होता है।

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प्रश्न 22.
प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण से आप क्या समझते हैं? मलबन्ध या कब्ज का कारण बताइए। या मनुष्य में प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण के कारण होने वाले दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर :
यदि हम अपने भोजन में प्रोटीनयुक्त भोजन नहीं लेते हैं तो हमारे शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाती है। इस स्थिति को ही प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण कहते हैं। क्वाशिओरकर, मैरेस्मसे आदि रोग इसी कारण से होते हैं। रेशेयुक्त भोजन का प्रयोग न करना मलबन्ध या कब्ज को प्रमुख कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जन्तुओं के लिए पोषक तत्त्व क्यों आवश्यक हैं? दो पोषक तत्वों के नाम लिखिए।
उत्तर :
मनुष्य के शरीर में निरन्तर विभिन्न प्रकार की जैविक क्रियाएँ; जैसे—श्वसन, उत्सर्जन, गमन आदि होती रहती हैं। उन क्रियाओं के सम्पादन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा पोषक पदार्थों से प्राप्त होती है। जीव इन पोषक पदार्थों को बाह्य वातावरण से ग्रहण करता है। शरीर में इन पोषक पदार्थों का पाचन होता है। अवशोषित पदार्थों का श्वसन में ऑक्सीकरण तथा अवशोषण होता है, जिससे ऊर्जा उत्पन्न होती है। दो पोषक तत्व

  1. कार्बोहाइड्रेट्स
  2. प्रोटीन

प्रश्न 2.
संतुलित आहार का वर्णन कीजिए तथा भोजन की ऊष्मीय गुणवत्ता का महत्त्व बताइए। या संतुलित आहार क्या है ?
उत्तर :

1. संतुलित आहार 
अपनी पोषण क्रिया (nutrition) में हम अपने भोजन से उन पोषक पदार्थों (nutrients) को पचाकर प्राप्त करते रहते हैं जो शरीर की कोशिकाओं के उपापचय (metabolism) में मिरन्तर खपते रहते हैं। अत: हमारे शरीर की वृद्धि, स्वास्थ्य, क्रियाशीलता, उद्यमशीलता, आयु आदि लक्षण हमारे आहार की गुणवत्ता (quality) तथा मात्रा (quantity) पर निर्भर करते हैं। स्पष्ट है कि हमारे आहार में विभिन्न प्रकार के सभी पोषक पदार्थ ऐसे अनुपात में होने चाहिए कि जिससे हमारे शंरीर की सारी विभिन्न आवश्यकताओं की निरन्तर पूर्ति होती रहे। ऐसे ही आहार को सन्तुलित आहार (balanced diet) कहते हैं।

2. भोजन की ऊष्मीय गुणवत्ता 
भोजन की उपापचयी उपयोगिता को ऊष्मीय ऊर्जा की इकाइयों (units) में व्यक्त किया जाता है जिन्हें ऊष्मांक (calories) कहते हैं। एक छोटा ऊष्मांक तापीय ऊर्जा (heat energy) की वह मात्रा होती है जो एक ग्राम जल के ताप को 1°C बढ़ा देती है। 1000 छोटे ऊष्मांकों (UPBoardSolutions.com) का एक बड़ा ऊष्मांक अर्थात् किलो ऊष्मांक होता है। इसमें इतनी तापीय ऊर्जा होती है जो एक किलोग्राम जल के ताप को 1°C बढ़ा देती है। शरीर को जीवित दशा में बनाए रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा हमें तीन श्रेणियों के दीर्घपोषक पदार्थों-कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन्स तथा वसाओं के ऑक्सीकर विखण्डन अर्थात् उपापचयी जारण (अपचय) से प्राप्त होती है। एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट या प्रोटीन के उपापचयी जारण से 4 किलोकैलोरी तथा एक ग्राम वसा के जारण से 9.3 किलोकैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है।

प्रश्न 3.
विष्ठा भोजिता से क्या तात्पर्य है? किसी विष्ठा भोजी स्तनिक का वैज्ञानिक नाम बताइए।
उत्तर :
कुछ जीव अपने द्वारा त्यागे गये मल को पुन: सेवन करते हैं। पोषण की इस विधि को विष्ठा भोजिता कहते हैं।

उदाहरण
(i) खरगोश :
ऑरिक्टोलेगस क्यूनिकुलस।

प्रश्न 4.
दन्तावकाश क्या है? एक वयस्क मानव के दाँत का फॉर्मूला लिखिए। या दन्त विन्यास को परिभाषित कीजिए। मनुष्य में किसप्रकार का दन्त विन्यास पाया जाता है? वयस्क मनुष्य का दन्त सूत्र लिखिए। बुद्धि दन्त किसे कहते हैं?
उत्तर :
1. दन्तावकाश :
अनेक शाकाहारी प्राणियों में रदनक (canines) नहीं पाये जाते हैं। इनके रिक्त स्थान को दन्तावकाश कहते हैं।

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2. दन्त विन्यास :
मुख गुहिका में दाँतों के व्यवस्थित होने के क्रम को दन्त विन्यास कहते हैं। मानव का दन्त विन्यास गोल परवलयाकार के रूप में होता है। तृतीय चर्वणकों को बुद्धि दन्त कहते हैं।
वयस्क मानव का दन्त सूत्र :
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 12
(i = कृन्तक, c = रदनक, pm = प्रचर्वणक, m = चर्वणक)

प्रश्न 5.
पित्तरस शरीर के किस अंग में बनता है? पाचन में इसकी क्या भूमिका है?
उत्तर :
पित्तरस (Bile juice) :
इसका निर्माण यकृत में होता है। यह पित्ताशय में एकत्र होता रहता है और आवश्यकतानुसार सामान्य पित्तवाहिनी द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है। यह भोजन के माध्यम को। क्षारीय बनाता है। भोजन की लुगदी (chyme) को पतला (chyle) करता है तथा वसा की। इमल्सीकरण करता है जिससे वसा (UPBoardSolutions.com) का पाचन सुगमता से हो जाता है।

प्रश्न 6.
पानी में घुलनशील विटामिन्स के नाम एवं कार्य लिखिए। या जल में घुलनशील विटामिन्स के नाम लिखिए तथा इनकी प्राप्ति के मुख्य स्रोत एवं इनकी कमी से होने वाले विभिन्न रोग/व्याधियों का वर्णन कीजिए। यो संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-विटामिन्स की कमी से होने वाले रोग।
उत्तर :
जल में घुलनशील विटामिन्स के प्रकार, मुख्य स्रोत,
कार्य एवं उनके अभाव में होने वाले रोग
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 13

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ की कमी से रतौंधी किस प्रकार उत्पन्न होती है?
उत्तर :
विटामिन ‘ए’ का प्रमुख कार्य हमारी आँखों में उपस्थित दृष्टि-रंगाओं का संश्लेषण करना होता है जिसके कारण हम कम रोशनी या रात में देख सकते हैं। इसके विपरीत विटामिन ‘ए’ की कमी म दृष्ट-२ गाओं का संश्लेषण नहीं हो पाता तथा हमें कम रोशनी या रात में स्पष्ट दिखाई देना बन्द हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) इसी रोग को रतौंधी कहा जाता है।

प्रश्न 8.
किन विटामिनों की कमी से निम्न रोग होते हैं? इनके स्रोत बताइए।
(क) स्कर्वी रोग
(ख) रतौंधी
(ग) पेलाग्रा
(घ) घेघा
(ङ) सूखा रोग
उत्तर :
(क)
स्कर्वी रोग :
यह रोग विटामिन ‘C’ की कमी से होता है। टमाटर, नींबू, सन्तरा, मुसम्मी, ताजे खट्टे फल इसके मुख्य स्रोत हैं।

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(ख)
रतौंधी :
यह रोग विटामिन ‘A’ (retinol) की कमी से होता है। इसके मुख्य स्रोत दूध, मक्खन, अण्डा, यकृत, मछली का तेल, गाजर आदि हैं।

(ग)
पेलाग्रा :
यह रोग विटामिन ‘B,’ की कमी से होता है। इसके मुख्य स्रोत मांस, यकृत, अण्डा, मछली, दूध, मेवा, मटर आदि फलियाँ होती हैं।

(घ)
घेघा :
यह रोग आयोडीन की कमी से होता है। आयोडीन युक्त नमक आयोडीन का प्रमुख स्रोत है।

(ङ)
सूखा रोग :
यह विटामिन डी की कमी के कारण होता है। त्वचा धूप में इसका संश्लेषण स्वयं कर लेती है। मछली का तेल, मक्खन, घी, आदि इसके अन्य स्रोत हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पोषण क्या है? पाचन और पोषण में क्या अन्तर है? मनुष्य के पाचन तन्त्र का एक नामांकित चित्र बनाइए। या पाचन क्या है? मनुष्य की आहारनाल का सचित्र वर्णन कीजिए। या पाचन क्या है? पाचन व पोषण में विभेद कीजिए।
उत्तर :

पोषण

सभी जीवों को जीवित रहने तथा शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को करने के लिए। ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा भोजन से प्राप्त होती है। विभिन्न प्रकार के जीव भोजन लेने के लिए विभिन्न विधियाँ अपनाते हैं। भोजन ग्रहण करने से लेकर, पाचन, अवशोषण, कोशिकाओं तक पहुँचाने, कोशिका में उसके ऊर्जा उत्पादन में प्रयोग करने अथवा जीवद्रव्य में स्वांगीकृत करने तथा भविष्य के लिए उसे शरीर में संगृहीत करने तक की सभी क्रियाओं का सम्मिलित नाम पोषण है। इस प्रकार पोषण जटिल क्रियाओं का नाम है तथा यह अनेक पदों या चरणों में पूरी होती है।

पाचन

भोर्जीन के जटिल एवं अविलेय पदार्थों को शरीर में उनके कार्यों को सम्पादित करने के लिए अवशोषित नहीं किया जा सकता है। पहले इनको सरल एवं विलेय पदार्थों में बदलने की आवश्यकता होती है। तथा यह कार्य अनेक भौतिक एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा किया जाता है। ये सभी क्रियाएँ सम्मिलित रूप से पाचन (digestion) कहलाती हैं अर्थात् भोजन को अवशोषण योग्य अवस्था में परिवर्तित करने की क्रिया पाचन कहलाती है, जो एक जटिल (UPBoardSolutions.com) जैविक क्रियाओं का सम्मिलित नाम है और जिसमें कई भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाएँ भाग लेती हैं। भौतिक क्रियाओं में भोज्य पदार्थ ग्रहण करना, इन्हें चबाकर निगलने योग्य बनाना तथा आहारनाल में इन्हें गति प्रदान करना आदि प्रमुख यान्त्रिक क्रियाएँ होती हैं, जबकि पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, वसाओं एवं प्रोटीन्स आदि) के जटिल अणुओं को जल अपघटन (hydrolysis) द्वारा उनके सरल एवं विलेय मोनोमर्स (monomers) में विखण्डित करना अति महत्त्वपूर्ण रासायनिक प्रक्रियाएँ हैं। पाचन की विभिन्न रासायनिक क्रियाएँ मुख्यतः एन्जाइम्स (enzymes) द्वारा नियन्त्रित होती हैं। मनुष्य में पाचन क्रिया एक नली में सम्पन्न होती है जिसे आहारनाल (alimentary canal) कहते हैं। आहारनाल से सम्बद्ध विभिन्न पाचक ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं जो विभिन्न प्रकार के एन्जाइमों का स्रावण करती हैं।

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पाचन एवं पोषण में अन्तर

सभी जीवों को विभिन्न कार्यों को करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा शरीर के अन्दर कोशिकाओं में भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। दूसरी ओर जीवद्रव्य की वृद्धि करने तथा उसे बनाये रखने के लिए अलग-अलग प्रकार से भोजन करके कोशिकाओं तक पहुँचाना, उसे स्वांगीकृत करना या आवश्यकता के लिए संगृहीत करना आदि का सम्मिलित नाम पोषण (nutrition) है। पोषण अत्यधिक जटिल प्रक्रिया है। पाचन पोषण के लिए भोजन पर की गई एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसमें अघुलनशील (जल में) भोज्य पदार्थों को घुलनशील अवस्था में बदलकर उन्हें अवशोषण (absorption) के योग्य बनाया जाता है, जिससे वे रुधिर में मिलकर शरीर के विभिन्न भागों में पहुँच जाएँ।

मनुष्य का पाचन तन्त्र (आहारनाल)

मनुष्य तथा स्तनियों में कशेरुकी जन्तुओं की अपेक्षा पाचन तन्त्र (digestive system) विशेषकर, इसकी आहारनाल (alimentary canal) अधिक लम्बी तथा जटिल प्रणाली होती है।

मनुष्य की आहारनाल
भोजन को पचाने, तत्त्वों को अवशोषित करने आदि के लिए एक लम्बी, लगभग 8-9 मीटर लम्बी, नली जैसी संरचना होती है जो मुखद्वार (mouth) से मलद्वार (anus) तक फैली रहती है। इस नली को पाचन प्रणाली या आहारनाल (digestive tract or alimentary canal) कहते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों पर आहारनाल का व्यास भिन्न-भिन्न होता है। इसको निम्नलिखित पाँच भागों में बाँटा जाता है

1. मुख व मुखगुहा (Mouth and buccal cavity) :
दो चल होठों (ओष्ठों = lips) से घिरा हुआ मुखद्वार (mouth), मुखगुहा (buccal cavity) में खुलता है। मुखगुहा दोनों जबड़ों तक, गालों से घिरी चौड़ी गुहा है जिसमें ऊपरी जबड़ा खोपड़ी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ तथा अचल होता है। निचला जबड़ा पाश्र्व-पश्च भाग में ऊपरी जबड़े के साथ सन्धित तथा चल होता है। मुखगुहा की छत, तालू (palate) कहलाती है। तालू का अगला तथा अधिकांश भाग कठोर होता है तथा कठोर तालू (hard palate) कहलाता है। इसके पीछे कंकालरहित कोमल तालू (soft palate) होता है, जो अन्त में एक कोमल लटकन के रूप में होता है। इसे काग (uvula or velum palati) कहते हैं।

काग के इधर-उधर छोटी-छोटी गाँठों के रूप में गलांकुर tonsiles) होते हैं। निचले तथा ऊपरी जबड़े में कुल मिलाकर 32 दाँत (teeth) होते हैं। दाँतों की संख्या उम्र के साथ बदलती रहती है। मुखगुहा के फर्श पर एक अति मुलायम लचीली तथा लसलसी जीभ या जिह्वा (tongue) होती है जिसका केवल अगला थोड़ा-सा भाग ही स्वतन्त्र होता है जो नीचे फर्श के साथ एक भंज (fold), जिह्वा फ्रेनुलम (frenulum linguae) के द्वारा जुड़ा दिखायी देता है। जीभ का पिछला भाग फर्श के साथ पूर्णतः जुड़ा होता है। जीभ की ऊपरी सतह अत्यन्त खुरदरी होती है जो इस पर उपस्थित (UPBoardSolutions.com) अनेक जिह्वा अंकुरों (lingual papillae) तथा कुछ सूक्ष्म गाँठों के कारण है। ये संरचनाएँ हमें विभिन्न पदार्थों के स्वाद का ज्ञान कराती हैं।

2. ग्रसनी (Pharynx) :
नीचे जीभ तथा ऊपर काग के पीछे कीप के आकार का लगभग 12-15 सेमी लम्बा भाग ग्रसनी (pharynx) कहलाता है। इसके तीन भाग किये जा सकते हैं

(क) नासाग्रसनी (nasapharynx), जो श्वसन मार्ग के पीछे स्थित होता है।
(ख) स्वरयन्त्री ग्रसनी (laryngeal pharynx) यहाँ वायु मार्ग तथा आहार मार्ग एक-दूसरे को काटते (cross) हैं तथा
(ग) मुख ग्रसनी (oropharynx) ठीक सामने वाला भाग प्रतिपृष्ठ (अधर) भाग है, जो अन्त में ग्रास नली (oesophagus) में निगल

द्वार (gullet) के द्वारा खुलता है। निगल द्वार सामान्यतः बन्द रहता है। निगल द्वार के नीचे श्वास नली (trachea) का द्वार, कण्ठद्वार (glottis) होता है। इस पर एक लचीला उपास्थि का बना घाँटी ढापन (epiglottis) होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 16 Digestion and Absorption image 14

3. ग्रास नली (Oesophagus) :
यह लगभग 25 सेमी लम्बी सँकरी नली है जो गर्दन के पिछले भाग से प्रारम्भ होती है। वायु नलिका के साथ-साथ तथा इसके तल पृष्ठ पर स्थित होती है तथा पूरे वक्ष भाग से होती तन्तु पट (diaphragm) को छेदकर उदर गुहा में पहुँचती है।

4. आमाशय (Stomach) :
आमाशय उदर गुहा में अनुप्रस्थ अवस्था में स्थित एक मशक के समान रचना है। आहारनाल का यह सबसे चौड़ा भाग है जिसकी लम्बाई लगभग 24 सेमी तथा चौड़ाई 10 सेमी होती है। आमाशय के स्पष्ट रूप से दो भाग किये जा सकते हैं-एक, प्रारम्भ का अधिक चौड़ा भाग जिसमें ग्रास नली खुलती है-हृदयी भाग (cardiac part) कहलाता है। इस द्वार को कार्डिया (cardia) कहते हैं तथा यह विशेष कार्डिया संकोचक (cardiac sphincter) पेशी द्वारा घिरा होता है। दूसरा भाग क्रमशः सँकरा होता जाता है और एक निकास द्वार के द्वारा आँत के प्रथम भाग में खुलता है। इस भाग को पक्वाशयी भाग (pyloric part or pylorus) तथा निकास द्वार को (UPBoardSolutions.com) पक्वाशयी छिद्र (pyloric aperture) कहते हैं। आमाशय के हृदयी भाग के पास का गोल-सा भाग विशेष तथा विकसित जठर ग्रन्थियों (gastric glands) से युक्त होता है, इसे फण्डिक भाग (fundic part) तथा इसकी जठर ‘ग्रन्थियों को फण्डिक ग्रन्थियाँ (fundic glands) कहते हैं। यद्यपि जठर ग्रन्थियाँ हृदयी तथा पक्वाशयी भाग के श्लेष्मिका में भी होती हैं, जो प्रायः श्लेष्मक (mucous) अथवा पक्वाशयी भाग में मैस्ट्रिन (gastrin) नामक हॉर्मोन बनाती हैं।

सम्पूर्ण आहारनाल की अपेक्षा आमाशय की भित्ति में सबसे अधिक पेशियाँ (muscles) होती हैं; अतः यह सबसे अधिक मोटी होती हैं। फण्डिक जठर ग्रन्थियाँ (fundic gastric glands) विशेष पाचक जठर रस (gastric juice) बनाती हैं। आमाशय की भित्ति में भी अनेक उभरी हुई सलवटें होती हैं, इन्हें यूगी (rugae) कहते हैं।

5. आँत (Intestine) :
आहारनाल का शेष भाग आँत (intestine) कहलाता है तथा यह अत्यधिक कुण्डलित होकर लगभग पूरी उदर गुहा को घेरे रहता है। इसकी लम्बाई लगभग 7.5 मीटर होती है। इसके दो प्रमुख भाग किये जा सकते हैं-छोटी आँत तथा बड़ी आँत।

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(i)
छोटी आँत (Small intestine)
यह लगभग 6 मीटर लम्बी अत्यधिक कुण्डलित नली है। जिसको तीन भागों में बाँटा जा सकता है
(a) ग्रहणी
(B) मध्यन्त्रि तथा
(C) शेषान्त्र

(a) ग्रहणी या पक्वाशय (Duodenum) :
यह लगभग 25 सेमी लम्बी, छोटी आंत की सबसे छोटी तथा चौड़ी नलिका है। आमाशय इसी में पक्वाशयी छि (pyloric aperture) द्वारा खुलता है और आमाशय के साथ लगभम ‘C’ का आकार बनाता है। इसी मध्य भाग में मीसेण्ट्री द्वारा अग्न्याशय (pancreas) लटका होता है।

(b) मध्यान्त्र (Jejunum) :
यह लगभग 2.5 मीटर लम्बी, चरि’ सेमी चौड़ी नलिका है जो अत्यधिक कुण्डलित होती है।

(c) शेषान्त्र (Ileum) :
यह लगभग 2.75 मीटर लम्बी व 3.5 सेमी चौड़ी कुण्डलित आँत है। छोटी आँत की आन्तरिक दीवार अपेक्षाकृत पतली होती हैं, किन्तु इसमें मांसपेशियाँ आदि सभी स्तर होते हैं। ग्रहणी को छोड़कर शेष छोटी आंत में भीतरी सतह पर असंख्य छोटे-छोटे अँगुली के आकार के उभार आँत की गुहा में लटके रहते हैं। इनको रसांकुर (villi) कहते हैं। प्रति वर्ग मिलीमीटर क्षेत्र में अनुमानतः इनकी संख्या 20-40 होती है। इनकी उपस्थिति के कारण आँत की भीतरी भित्ति तौलिये की तरह रोयेदार होती है।

(ii)
बड़ी आँत (Large intestine) 

छोटी आँत के बाद शेष आहारनाल बड़ी आँत का निर्माण करती है। यह लम्बाई में (लगभग 1.5 मीटर) छोटी आँत से छोटी, किन्तु अधिक चौड़ी (लगभग 7.0 सेमी) होती है। इसमें तीन भाग स्पष्ट दिखायी देते हैं

(a) उण्डुक
(b) कोलन तथा
(c) मलाशय। छोटी आँत, बड़ी आँत के किसी एक भाग में खुलने के बजाय उण्डुक तथा कोलन के संगम स्थान पर खुलती है। इस द्वार पर श्लेष्म कला के भंजों के रूप में शेषान्त्र उण्डुकीय (ileo-caecal valve) होता है।

(a) उण्डुक (Caecum) :
यह लगभग 6 सेमी लम्बी, 7.5 सेमी चौड़ी थैली की तरह की संरचना है जिससे लगभग 9 सेमी लम्बी, सँकरी, कड़ी तथा बन्द नलिका निकलती है। इसको कृमिरूप परिशेषिका (vermiform appendix) कहते हैं। वास्तव में, यह संरचना शरीर में अनावश्यक तथा अवशेषी (vestigial) भाग है। यदि इसमें मल या श्लेष्म एकत्रित हो जाये तो यहाँ जीवाणुओं के संक्रमण होने का खतरा रहता है। संक्रमण होने पर कृमिरूप परिशेषिका की दीवार गलने लगती है जिससे प्रदाह (inflammation) के कारण रोगी को पीडा, मितली, ज्वर तथा भूख न लगने की शिकायत रहती है। इस रोग को अपेण्डीसाइटिस (appendicitis) कहते हैं। इसके उपचार के लिये ऑपरेशन द्वारा कृमिरूप परिशेषिका को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

(b) कोलन (Colon) :
यह लगभग 1.25 सेमी लम्बी, 6 सेमी चौड़ी नलिका है जो की तरह पूरी छोटी आँत को घेरे रहती है। इसका अन्तिम भाग मध्य से कुछ बायीं ओर झुककर मलाशय (rectum) में खुलता है। इस प्रकार कोलन में चार भाग दिखायी देते हैं—लगभग 15 सेमी आरोही खण्ड (ascending part), लगभग 50 सेमी अनुप्रस्थ खण्ड (transverse part), लगभग 25 सेमी लम्बा अवरोही खण्ड (descending part) तथा 40 सेमी लम्बा. शेष सिग्मॉइड या श्रोणि खण्ड (sigmoid or pelvic part)

(c) मलाशय (Rectum) :
लगभग 20 सेमी लम्बा तथा 4 सेमी चौड़ा नलिका की तरह का यह भाग अपने अन्तिम 3-4 सेमी भाग में काफी सँकरी नली बनाता है। इसे गुदनाल (anal canal) कहते हैं। इसकी भित्ति में मजबूत संकुचनशील पेशियाँ होती हैं तथा यह एक छिद्र द्वारा बाहर खुलती है। इस छिद्र को भी संकोचक (UPBoardSolutions.com) पेशियाँ (sphincter muscles) बन्द किये रखती हैं। गुदनाल की श्लेष्म झिल्ली में कई खड़े भंज (vertical folds) होते हैं जिन्हें गुद स्तम्भ (anal columns) कहते हैं।

प्रश्न 2.
मनुष्य की आहारनाल में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटको तथा वसा की पाचन क्रिया का वर्णन कीजिए। या मनुष्य की आहारनाल में प्रोटीन एवं वस-पाचन की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर :

कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स, वसाओं का पाचन

भोजन में उपस्थित पोषक पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन तथा वसाएँ) के पाचन की विस्तृत प्रक्रिया मुखगुहा से प्रारम्भ होकर क्षुद्रान्त्र में पूरी होती है। इनके पाचन का सारांश निम्नलिखित है

1. कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन (Digestion of Carbohydrates) :
हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स पॉलिसैकेराइड्स (मण्ड तथा ग्लाइकोजन), डाइसैकेराइड्स (सुक्रोज तथा लैक्टोज) और मोनोसैकेराइड्स (ग्लूकोज एवं फ्रक्टोस) के रूप में होते हैं। मुखगुहा में लार का ऐमाइलेज (salivary amylase) एन्जाइम कुछ मण्ड को माल्टोज नामक डाइसैकेराइड में विखण्डित करता है। इसका यह कार्य ग्रासनली में होता रहता है और भोजन के आमाशय में पहुँचने पर जठर रस की अम्लीयता के कारण बन्द हो जाता है। ग्रहणी में अग्न्याशयी ऐमाइलेज भोजन की शेष पॉलिसैकेराइड्स को डाइसैकेराइड्स में विखण्डित कर देता है। अन्त में आन्त्रीय रस के ब्रुश-बोर्डर कार्बोहाइड्रेट-पाचक एन्जाइम-माल्टेज, सुक्रेज तथा लैक्टज-काइम के डाइसैकेराइड्स, क्रमशः माल्टोज, सुक्रोज तथा लैक्टोज, को मोनोसैकेराइड्स, अर्थात् सरलतम शर्कराओं में विखण्डित कर देते हैं।

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2. प्रोटीन्स का पाचन (Digestion of Proteins) :
भोजन की प्रोटीन्स जटिल दीर्घअणुओं (macromolecules) के रूप में होती हैं। इनका पाचन आमाशय में प्रारम्भ होता है। जठर रस का HCl जटिल प्रोटीन अणुओं के कुण्डलों तथा वलनों को खोल देता है, फिर जठर रस को पेप्सिन (pepsin) एन्जाइम खुली हुई पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं में से 10 से 20% श्रृंखलाओं के बीच-बीच के पेप्टाइड बन्धों को तोड़कर इन्हें छोटी पेप्टाइड श्रृंखलाओं (व्युत्पन्न प्रोटीन्स) में  विखण्डित कर देता है। ग्रहणी में अग्न्याशयी रस के ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम शेष पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं को इसी प्रकार छोटी श्रृंखलाओं में विखण्डित करते हैं। इसी रस का कार्बोक्सीपेप्टिडेज एन्जाइम कुछ पेप्टाइड श्रृंखलाओं के छोर बन्धों को तोड़कर इनसे ऐमीनो अम्ल इकाइयों को पृथक् करता है। अन्त में आन्त्रीय रस के ऐमीनोपेप्टिडेज तथा कार्बोक्सीपेप्टिडेज एन्जाइम सभी पेप्टाइड श्रृंखलाओं के छोर बन्धों को क्रमशः तोड़-तोड़कर इन्हें ऐमीनो अम्लों में विखण्डित कर देते हैं।

3. वसाओं का पाचन (Digestion of Fats) :
हमारी भोजन सामग्री में अधिकांश वसाएँ सरल वसाओं, अर्थात् ट्राइग्लिसराइड्स (triglycerides) के रूप में होते हैं। लार तथा जठर रस के लाइपेज एन्जाइम कुछ वसाओं को वसीय अम्लों तथा मोनोग्लिसराइड्स में विखण्डित करते हैं। ग्रहणी में पित्त लवण समस्त वसाओं को छोटे-छोटे बिन्दुकों में तोड़ते हैं जिनका कि काइम में पायस (emulsion) बन जाता है। फिर अग्न्याशयी रस के लाइपेज, कोलेस्टेरॉल, एस्टरेज तथा फॉस्फोलाइपेज (UPBoardSolutions.com) एन्जाइम और आन्त्रीय रस के लाइपेज एन्जाइम सारे वसाओं को वसीय अम्लों, मोनोग्लिसराइड्स, कोलेस्टेरॉल एवं फॉस्फोरिक अम्ल में विखण्डित कर देते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry (पर्यावरणीय रसायन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry (पर्यावरणीय रसायन).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत पर्यावरणीय प्रदूषण, और पर्यावरण में होने वाली विभिन्न प्रकार की रासायनिक और प्रकाश रासायनिक अभिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, पर्यावरणीय रसायन शास्त्र कहलाता है।

प्रश्न 2.
क्षोभमण्डलीय प्रदूषण को लगभग 100 शब्दों में समझाइए।
उत्तर
क्षोभमण्डल में अवान्छित गैसों तथा विविक्त वायु प्रदूषकों की इस सीमा तक वृद्धि कि वे मानव जाति तथा उसके पर्यावरण पर अनिष्ट प्रभाव आरोपित कर सकें, क्षोभमण्डलीय प्रदूषण कहलाता है।

  1. गैसीय प्रदूषक-जैसे—सल्फर के ऑक्साइड (S2, SO3) नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO, NO2 ), कार्बन के ऑक्साइड (CO, CO2), हाइड्रोजन सल्फाइड हाइड्रोकार्बन, ऐल्डिहाइड, कीटोन इत्यादि।
  2. विविक्त या कणिकीय प्रदूषक-जैसे-धुंध, धुआँ, धूम (fumes), धूल, कार्बन, कण, लेड और कैडमियम यौगिक, जीवाणु, कवक, मॉल्ड इत्यादि। क्षोभमण्डलीय प्रदूषण ईंधनों के दहन, औद्योगिक प्रक्रमों, कीटनाशकों एवं विषैले पदार्थों के उपयोग द्वारा होता है। इसे जीवाश्म ईंधनों (fossil fuels) के प्रयोग को हतोत्साहित कर, ऑटोमोबाइलों से निकलने वाली गैसों को स्वच्छ कॅर, साइक्लोन एकत्रक (cyclone collector) का उपयोग कर एवं उचित अवशिष्ट प्रबन्धन (waste management) द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा कार्बन मोनोऑक्साइड अधिक खतरनाक क्यों है? समझाइए।
उत्तर
कार्बन मोनोऑक्साइड एक अत्यधिक हानिकारक गैस है। यह रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन (haemoglobin) से क्रिया कर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन (carboxyhaemoglobin) बनाती है जो रक्त में O2 का परिवहन रोक देता है। परिणामस्वरूप शरीर में O2 की कमी हो जाती है। CO के वायु में 100 ppm सान्द्रण पर चक्कर आना तथा सिरदर्द होने लगता है। अधिक सान्द्रता पर CO प्राणघातक हो सकती है। कार्बन डाइऑक्साइड हीमोग्लोबिन के साथ कोई क्रिया नहीं करती है। इस कारण यह कम हानिकारक है, यद्यपि यह ग्लोबल वार्मिंग (global warming) उत्पन्न करती है।

प्रश्न 4.
ग्रीन हाउस-प्रभाव के लिए कौन-सी गैसें उत्तरदायी हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर
CO2 मुख्य रूप से ग्रीन हाउस प्रभाव (green house effect) के लिये उत्तरदायी है। परन्तु दूसरी गैसें जो ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती हैं वे मेथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरोकार्बन, ओजोन तथा जल-वाष्प हैं।

प्रश्न 5.
अम्लवर्षा मूर्तियों तथा स्मारकों को कैसे दुष्प्रभावित करती है?
उत्तर
अधिकांश मूर्तियाँ तथा स्मारक संगमरमर (marble) के बने होते हैं जिन पर अम्ल वर्षा का बुरा प्रभाव पड़ता है। क्योंकि इन स्मारकों के चारों ओर उपस्थित वायु में इनके पास स्थित उद्योगों तथा ऊर्जा संयन्त्रों (power plants) से निकलने वाले नाइट्रोजन व सल्फर के ऑक्साइड बहुत अधिक मात्रा में विद्यमान हो सकते हैं। ये ऑक्साइड ही अम्ल वर्षा का कारण हैं। अम्ल वर्षा में उपस्थित अम्ल . मार्बल से क्रिया करके मूर्तियों तथा स्मारकों को नष्ट कर देते हैं।

प्रश्न 6.
धूम कुहरा क्या है? सामान्य धूम कुहरा प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे से कैसे भिन्न है?
उत्तर
धूम कुहरा (Smog)–‘धूम-कुहरा’ शब्द ‘धूम’ एवं ‘कुहरे से मिलकर बना है। अत: जब धूम, कुहरे के साथ मिल जाता है, तब यह धूम कुहरा कहलाता है। विश्व के अनेक शहरों में प्रदूषण इसका आम उदाहरण है। धूम कुहरे दो प्रकार के होते हैं-

  1. सामान्य धूम कुहरा (General Smog)—यह ठण्डी नम जलवायु में होता है तथा धूम, कुहरे एवं सल्फर डाइऑक्साइड का मिश्रण होता है। रासायनिक रूप से यह एक अपचायक मिश्रण है। अत: इसे ‘अपचायक धूम-कुहरा’ भी कहते हैं।
  2. प्रकाश रासायनिक धूम कुहरा (Photochemical Smog)-उष्ण, शुष्क एवं साफ धूपमयी जलवायु में होता है। यह स्वचालित वाहनों तथा कारखानों से निकलने वाले नाइट्रोजन के ऑक्साइडों एवं हाइड्रोकार्बनों पर सूर्यप्रकाश की क्रिया के कारण उत्पन्न होता है। प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे की रासायनिक प्रकृति ऑक्सीकारक है। चूंकि इसमें ऑक्सीकारक अभिकर्मकों की सान्द्रता उच्च रहती है; अत: इसे ‘ऑक्सीकारक धूम कुहरा’ कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के निर्माण के दौरान होने वाली अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के निर्माण के दौरान होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry img-1
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry img-2

प्रश्न 8.
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के दुष्परिणाम क्या हैं? इन्हें कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है?
उत्तर
प्रकाश रासायनिक धूम-कुहरे के दुष्परिणाम (Bad Results of Photochemical Smog)-प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के सामान्य घटक ओजोन, नाइट्रिक ऑक्साइड, ऐक्रोलीन, फॉर्मेल्डिहाइड एवं परॉक्सीऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) हैं। प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के कारण गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं। ओजोन एवं नाइट्रिक ऑक्साइड नाक एवं गले में जलन पैदा करते हैं। इनकी उच्च सान्द्रता से सिरदर्द, छाती में दर्द, गले का शुष्क होना, खाँसी एवं श्वास अवरोध हो सकता है। प्रकाश रासायनिक धूम कुहरा रबर में दरार उत्पन्न करता है एवं पौधों पर हानिकारक प्रभाव डालता है। यह धातुओं, पत्थरों, भवन-निर्माण के पदार्थों एवं रंगी हुई सतहों (painted surfaces) का क्षय भी करता है।

प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के नियंत्रण के उपाय (Measures to Control the Photochemical Smog)–प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे को नियन्त्रित या कम करने के लिए कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यदि हम प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के प्राथमिक पूर्वगामी; जैसे- NO, एवं हाइड्रोकार्बन को नियन्त्रित कर लें तो द्वितीयक पूर्वगामी; जैसे-ओजोन एवं PAN तथा प्रकाश रासायनिक धूम कुहरा स्वतः ही कम हो जाएगा। सामान्यतया स्वचालित वाहनों में उत्प्रेरित परिवर्तक उपयोग में लाए जाते हैं, जो वायुमण्डल में नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन को रोकते हैं। कुछ पौधों (जैसे- पाइनस, जूनीपर्स, क्वेरकस, पायरस तथा विटिस), जो नाइट्रोजन ऑक्साइड का उपापचय कर सकते हैं, का रोपण इस सन्दर्भ में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 9.
क्षोभमण्डल पर ओजोन परत के क्षय में होने वाली अभिक्रिया कौन-सी है?
उत्तर
ओजोन परत में अवक्षय को मुख्य कारण क्षोभमण्डल से क्लोरोफ्लुओरोकार्बन (CFC) यौगिकों का उत्सर्जन है। CFC वायुमण्डल की अन्य गैसों से मिश्रित होकर सीधे समतापमण्डल में पहुँच जाते हैं। समतापमण्डल में ये शक्तिशाली विकिरणों द्वारा अपघटित होकर क्लोरीन मुक्त मूलक उत्सर्जित करते हैं।

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क्लोरीन मुक्त मूलक तब समतापमण्डलीय ओजोन से अभिक्रिया करके क्लोरीन मोनोक्साइड मूलक तथा आण्विक ऑक्सीजन बनाते हैं।

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क्लोरीन मोनोक्साइड मूलक परमाण्वीय ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके अधिक क्लोरीन मूलक उत्पन्न करता है।

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क्लोरीन मूलक लगातार पुनर्योजित होते रहते हैं एवं ओजोन को विखण्डित करते हैं। इस प्रकार CFC , समतापमण्डल में क्लोरीन मूलकों को उत्पन्न करने वाले एवं ओजोन परत को हानि पहुँचाने वाले परिवहनीय कारक हैं।

प्रश्न 10.
ओजोन छिद्र से आप क्या समझते हैं? इसके परिणाम क्या हैं?
उत्तर
सन् 1980 में वायुमण्डलीय वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका पर कार्य करते हुए दक्षिणी ध्रुव के ऊपर ओजोन परत के क्षय, जिसे सामान्य रूप से ‘ओजोन-छिद्र’ कहते हैं, के बारे में बताया। यह पाया गया कि ओजोन छिद्र के लिए परिस्थितियों का एक विशेष समूह उत्तरदायी था। गर्मियों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड परमाणु [अभिक्रिया (i)] क्लोरीन मुक्त मूलकों [अभिक्रिया (ii)] से अभिक्रिया करके क्लोरीन सिंक बनाते हैं, जो ओजोन-क्षय को अत्यधिक सीमा तक रोकता है। जबकि सर्दी के मौसम में विशेष प्रकार के बादल, जिन्हें ‘ध्रुवीय समतापमण्डलीय बादल’ कहा जाता। है, अंटार्कटिका के ऊपर बनते हैं। ये बादल एक प्रकार की सतह प्रदान करते हैं जिस पर बना हुआ क्लोरीन नाइट्रेट (अभिक्रिया (i)] जलयोजित होकर हाइपोक्लोरसे अम्ल बनाता है [अभिक्रिया (ii)]। अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन क्लोराइड से भी अभिक्रिया करके यह आण्विक क्लोरीन देता है।

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वसन्त में अंटार्कटिका पर जब सूर्य का प्रकाश लौटता है, तब सूर्य की गर्मी बादलों को विखण्डित कर देती है एवं HOCI तथा Cl2 सूर्य के प्रकाश से अपघटित हो जाते हैं (अभिक्रिया v तथा vi)।

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इस प्रकार उत्पन्न क्लोरीन मूलक, ओजोन-क्षय के लिए श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ कर देते हैं।

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ओजोन छिद्र के परिणाम (Results of Ozone hole)
ओजोन छिद्र के साथ अधिकाधिक पराबैंगनी विकिरण क्षोभमण्डल में छनित होते हैं। पराबैंगनी विकिरण से त्वचा का जीर्णन, मोतियाबिन्द, सनबर्न, त्वचा-कैन्सर, कई पादपप्लवकों की मृत्यु, मत्स्य उत्पादन की क्षति आदि होते हैं। यह भी देखा गया है कि पौधों के प्रोटीन पराबैंगनी विकिरणों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं जिससे कोशिकाओं का हानिकारक उत्परिवर्तन होता है। इससे पत्तियों के रंध्र से जल का वाष्पीकरण भी बढ़ जाता है जिससे मिट्टी की नमी कम हो जाती है। बढ़े हुए पराबैंगनी विकिरण रंगों एवं रेशों को भी हानि पहुँचाते हैं जिससे रंग जल्दी हल्के हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं? समझाइए।
उत्तर
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण (Main Causes of Water Pollution)

  1. रोगजनक (Pathogens)—सबसे अधिक गम्भीर जल-प्रदूषक रोगों के कारकों को ‘रोगजनक’ कहा जाता है। रोगजनकों में जीवाणु एवं अन्य जीव हैं, जो घरेलू सीवेज एवं पशु-अपशिष्ट द्वारा जल में प्रवेश करते हैं। मानव-अपशिष्ट एशरिकिआ कोली, स्ट्रेप्टोकॉकस फेकेलिस आदि जीवाणु होते हैं, जो जठरांत्र बीमारियों के कारक होते हैं।
  2. कार्बनिक अपशिष्ट (Organic waste)-अन्य मुख्य जल-प्रदूषक कार्बनिक पदार्थ; जैसेपत्तियाँ, घास, कूड़ा-करकट आदि हैं। ये जल को प्रदूषित करते हैं। जल में पादप-प्लवकों की अधिक बढ़ोतरी भी जल-प्रदूषण का एक कारण है।

प्रश्न 12.
क्या आपने अपने क्षेत्र में जल-प्रदूषण देखा है? इसे नियन्त्रित करने के कौन-से उपाय हैं?
उत्तर
हाँ, हमारे क्षेत्र में जल प्रदूषित है। जल के प्रदूषित होने की जाँच भी हम स्वयं ही कर सकते हैं। इसके लिए हम स्थानीय जल-स्रोतों का निरीक्षण कर सकते हैं जैसे कि नदी, झील, हौद, तालाब आदि का पानी अप्रदूषित या आंशिक प्रदूषित या सामान्य प्रदूषित अथवा बुरी तरह प्रदूषित है। जल को देखकर या उसकी pH जाँचकर इसे देखा जा सकता है। निकट के शहरी या औद्योगिक स्थल, जहाँ से प्रदूषण उत्पन्न होता है, के नाम का प्रलेख करके इसकी सूचना सरकार द्वारा प्रदूषण-मापन के लिए। गठित ‘प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड कार्यालय को दी जा सकती है तथा समुचित कार्यवाही सुनिश्चित की जा सकती है। हम इसे मीडिया को भी बता सकते हैं। जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए हमें नदी, तालाब, जलधारा या जलाशय में घरेलू अथवा औद्योगिक अपशिष्ट को सीधे नहीं डालना चाहिए। बगीचों में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट का प्रयोग करना चाहिए। डी०डी०टी०, मैलाथिऑन आदि कीटनाशी के प्रयोग से बचना चाहिए तथा यथासम्भव नीम की सूखी पत्तियों का प्रयोग कीटनाशी के रूप में करना चाहिए। घरेलू पानी टंकी में पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO,) के कुछ क्रिस्टल अथवा ब्लीचिंग पाउडर की थोड़ी मात्रा डालनी चाहिए।

प्रश्न 13.
आप अपने जीव रसायनी ऑक्सीजन आवश्यकता (BOD) से क्या समझते हैं?
उत्तर
जल के एक नमूने के निश्चित आयतन में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ को विखण्डित करने के लिए जीवाणु द्वारी आवश्यक ऑक्सीजन को जैवरासायनिक ऑक्सीजन मॉग (BOD)’ कहा जाता है। अत: जल में BOD की मात्रा कार्बनिक पदार्थ को जैवीय रूप में विखण्डित करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा होगी। स्वच्छ जल की BOD का मान 5 ppm से कम होता है, जबकि अत्यधिक प्रदूषित जल में यह 17 ppm या इससे अधिक होता है।

प्रश्न 14.
क्या आपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है? आप भूमि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए क्या प्रयास करेंगे?
उत्तर
हाँ, हमने अपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है। भूमि प्रदूषण की रोकथाम के उपाय (Measures to Control Soil Pollution) मृदा प्रदूषण की रोकथाम के लिए हम निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं

  1. फसलों पर विषैले कीटनाशकों का छिड़काव विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए।
  2. डी०डी०टी० का प्रयोग प्रतिबन्धित हो।
  3. सिंचाई और उर्वरकों का प्रयोग करने से पहले मिट्टी और जल का वैज्ञानिक परीक्षण करा लेना चाहिए
  4. रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट तथा हरी खाद (Compost and Green Manuring) के प्रयोग को वरीयता देनी चाहिए।
  5. खेतों में जलं के निकास की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
  6. क्षारीय भूमि को वैज्ञानिक ढंग से शोधित किया जाना चाहिए। जिप्सम, सिंचाई तथा रासायनिक खादों का प्रयोग करके क्षारीय मिट्टी को उर्वर बनाया जा सकता है।
  7.  स्थानान्तरणशील कृषि (jhuming) पर रोक लगाई जानी चाहिए।
  8. मिट्टी के कटाव को रोकने के उपाय किए जाने चाहिए।
  9. जीवांशों की वृद्धि के लिए खेतों में पेड़-पौधों की पत्तियाँ, डण्ठल, छिलके, जड़े, तने आदि सड़ाए जाने चाहिए।
  10. खेतों के किनारे (मेडों पर) और ढालू भूमि पर वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 15.
पीड़कनाशी तथा शाकनाशी से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहिँत समझाइए।
उत्तर
पीड़कनाशी (Pesticides)-पीड़कनाशी मूल रूप से संश्लेषित रसायन होते हैं। इनका प्रयोग फसलों को हानिकारक कीटों तथा कई रोगों से बचाने हेतु किया जाता है। ऐल्ड्रीन, डाइऐल्ड्रीन बी०एच०सी० आदि पीड़कनाशी के कुछ उदाहरण हैं। ये कार्बनिक जीव-विष जल में अविलेय तथा अजैवनिम्नीकरणीय होते हैं। ये उच्च प्रभाव वाले जीव-विष भोजन श्रृंखला द्वारा निम्नपोषी स्तर से उच्चपोषी स्तर तक स्थानान्तरित होते हैं। समय के साथ-साथ उच्च प्राणियों में जीव-विषों की सान्द्रता इस स्तर तक बढ़ जाती है कि उपापचयी तथा शरीर क्रियात्मक अव्यवस्था का कारण बन जाती है।
शाकनाशी (Herbicides)-वे रसायन जो खरपतवार (weeds) का नाश करने के लिए प्रयोग किए। जाते हैं, शाकनाशी कहलाते हैं। सोडियम क्लोरेट (NaClO3) सोडियम आर्सिनेट (Na32AsO3) आदि शाकनाशी के उदाहरण हैं। अधिकांश शाकनाशी स्तनधारियों के लिए विषैले होते हैं, परन्तु ये कार्ब-क्लोराइड्स के समान स्थायी नहीं होते तथा कुछ ही माह में अपघटित हो जाते हैं। मानव में । जन्मजात कमियों का कारण कुछ शाकनाशी हैं। यह पाया गया है कि मक्का के खेतं, जिनमें शाकनाशी का छिड़काव किया गया हो, कीटों के आक्रमण तथा पादप रोगों के प्रति उन खेतों से अधिक सुग्राही होते हैं जिनकी निराई हाथों से की जाती है।

प्रश्न 16.
हरित रसायन से आप क्या समझते हैं? यह वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर
हरित रसायन (Green Chemistry)
हमारे देश ने 20वीं सदी के अन्त तक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपयोग तथा कृषि की उन्नत विधियों का प्रयोग करके अच्छी किस्म के बीजों, सिंचाई आदि से खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है, परन्तु मृदा के अधिक शोषण एवं उर्वरकों तथा कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से मृदा, जल एवं वायु की गुणवत्ता घटी है।

इस समस्या का समाधान विकास के प्रारम्भ हो चुके प्रक्रम को रोकना नहीं अपितु उन विधियों को खोजना है, जो वातावरण के असन्तुलन को रोक सकें। रसायन विज्ञान तथा अन्य विज्ञानों के उन सिद्धान्तों का ज्ञान, जिससे पर्यावरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके, ‘हरित रसायन’ कहलाता है।

हरित रसायन उत्पादन का वह प्रक्रम है, जो पर्यावरण में न्यूनतम प्रदूषण या असन्तुलन लाता है। इसके आधार पर यदि एक प्रक्रम में उत्पन्न होने वाले सहउत्पादों को यदि लाभदायक रूप से उपयोग नहीं किया गया तो वे पर्यावरण-प्रदूषण के कारक होते हैं। ऐसे प्रक्रम न सिर्फ पर्यावरणीय दृष्टि से हानिकारक हैं अपितु महँगे भी हैं। विकास-कार्यों के साथ-साथ वर्तमान ज्ञान का रासायनिक हानि को कम करने के लिए उपयोग में लाना ही हरित रसायन का आधार है।

एक रासायनिक अभिक्रिया की सीमा, ताष, दाब, उत्प्रेरक के उपयोग आदि भौतिक मापदण्ड पर निर्भर करती हैं। हरित रसायन के सिद्धान्तों के अनुसार यदि एक रासायनिक अभिक्रिया में अभिकारक एक पर्यावरण अनुकूल माध्यम में पूर्णतः पर्यावरण अनुकूल उत्पादों में परिवर्तित हो जाए तो पर्यावरण में कोई रासायनिक प्रदूषक नहीं होगा।

इसी प्रकार संश्लेषण के दौरान प्रारम्भिक पदार्थ का चयन करते समय हमें सावधानी रखनी चाहिए जिससे जब भी वह अन्तिम उत्पाद में परिवर्तित हो तो अपविष्ट उत्पन्न ही न हो। यह संश्लेषण के दौरान अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त करके किया जाता है। जल की उच्च विशिष्ट ऊष्मा तथा कम। वाष्पशीलता के कारण इसे संश्लेषित अभिक्रियाओं में माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जाना वांछित है। जल सस्ता, अज्वलनशील तथा अकैंसरजन्य प्रभाव वाला माध्यम है। हरित रसायन के उपयोग से वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किए जाने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयासों का वर्णन निम्नलिखित है-

  1. कपड़ों की निर्जल धुलाई में (In drycleaning of clothes)--टेट्राक्लोरोएथीन [Cl2C=CCl2] का उपयोग प्रारम्भ में निर्जल धुलाई के लिए विलायक के रूप में किया जाता था। यह यौगिक भू-जल को प्रदूषित कर देता है। यह एक सम्भावित कैंसरजन्य भी है। धुलाई की प्रक्रिया में इस यौगिक का द्रव कार्बन डाइऑक्साइड एवं उपयुक्त अपमार्जक द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। हैलोजेनीकृत विलायक का द्रवित CO2 से प्रतिस्थापन भू-जल के लिए कम हानिकारक है।
    आजकल हाइड्रोजन परॉक्साइड का उपयोग लॉण्ड्री में कपड़ों के विरंजन के लिए लिया जाता है। जिससे परिणाम तो अच्छे निकलते ही हैं, जल का भी कम उपयोग होता है।
  2. पेपर का विरंजन (Bleaching of paper)-पूर्व में पेपर के विरंजन के लिए क्लोरीन गैस उपयोग में आती थी। आजकल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन परॉक्साइड, जो विरंजन क्रिया की दर को बढ़ाता है, उपयोग में लाया जाता है।
  3. रसायनों का संश्लेषण (Synthesis of chemicals)-औद्योगिक स्तर पर एथीन का ऑक्सीकरण आयनिक उत्प्रेरकों एवं जलीय माध्यम की उपस्थिति में करवाया जाए तो लगभग 90% एथेनल प्राप्त होता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry img-9
    निष्कर्षतः हरित रसायन एक कम लागत उपागम है, जो कम पदार्थ, ऊर्जा-उपभोग एवं अपविष्ट जनन से सम्बन्धित है।

प्रश्न 17.
क्या होता, जब भू-वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसें नहीं होती? विवेचना कीजिए।
उत्तर
यद्यपि ग्रीन हाउस गैसें (CO2,CH4,O3, CFCs, जल-वाष्प) ग्लोबल वार्मिंग (global warming) उत्पन्न करती हैं, परन्तु फिर भी ये पृथ्वी पर सामान्य जीवन के लिए आवश्यक हैं। ग्रीन हाउस गैसें पृथ्वी की सतह से विकिरणित सौर ऊर्जा को अवशोषित करके वातावरण को गर्म रखती हैं। जो पृथ्वी पर प्राणियों (living beings) के जीवन तथा पादपों (plants) की वृद्धि के लिए आवश्यक है। कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) द्वारा पादपों के भोजन बनाने के लिए आवश्यक है। ओजोन एक छाते की तरह कार्य करती है तथा हमें हानिकारक पराबैंगनी किरणों (U.V. radiation) से बचाती है। अतः, यदि पृथ्वी के वायुमण्डल को ग्रीन हाउस गैसों से पूर्ण रूप से मुक्त कर दिया जाये तो पृथ्वी पर न तो प्राणी शेष रहेंगे और न ही पादप।

प्रश्न 18.
एक झील में अचानक असंख्य मृत मछलियाँ तैरती हुई मिलीं। इसमें कोई विषाक्त पदार्थ नहीं था, परन्तु बहुतायत में पादप्लवक पाए गए। मछलियों के मरने का कारण बताइए।
उत्तर
पादप्लवक (पानी की सतह पर तैरने वाले पौधे) जैव क्षयी (biodegradable) होते हैं और जीवाणुओं की एक बड़ी संख्या द्वारा अपघटित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में जीवाणु पानी में घुली ऑक्सीजन का बहुत अधिक मात्रा में उपयोग करते हैं जिससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जलीय जीवों जैसे मछलियों को जीवित रहने के लिए जलीय ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर, एक निश्चित स्तर (6ppm) से नीचे पहुँच जाता है, तो मछलियाँ मृत होकर पानी की सतह ऊपर तैरने लगती हैं।

प्रश्न 19.
घरेलू अपविष्ट किस प्रेकार खाद के रूप में काम आ सकते हैं?
उत्तर
घरेलू अपशिष्ट पदार्थों के जैव क्षयी (biodegradable) भाग को कुछ महीनों के लिए भूमि में दबा देने पर खाद के रूप में काम में लाया जा सकता है। समय बीतने के साथ, यह खाद में परिवर्तित हो जाता है। घरेलू अपशिष्ट का अजैव क्षयी भाग (जैसे कॉच, प्लास्टिक, धातु की खुरचन इत्यादि) जो सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित नहीं होती, खाद के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता। यह भाग पुनः चक्रण (recycling) के लिए कारखानों में भेज दिया जाता है।

प्रश्न 20.
आपने अपने कृषि-क्षेत्र अथवा उद्यान में कम्पोस्ट खाद के लिए गड़े बना रखे हैं। उत्तम कम्पोस्ट बनाने के लिए इस प्रक्रिया की व्याख्या दुर्गंध, मक्खियों तथा अपविष्टों के चक्रीकरण के सन्दर्भ में कीजिए।
उत्तर
कम्पोस्ट खाद के लिए बने गड्ढे घर के बहुत निकट नहीं होने चाहिए। ये गड्ढे ऊपर से ढके होने चाहिए। जिससे मक्खियाँ इनमें प्रवेश न कर सके तथा दुर्गंध वायुमण्डल में न फैल सके। केवल जैव क्षयी भाग ही गड्ढों में डालना चाहिए। घरेलू अपशिष्टों का अजैव क्षयी भाग जैसे, काँच प्लास्टिक, धातु की खुरचन इत्यादि को गड्ढों में डालने से पहले अलग कर देना चाहिए तथा पुनः चक्रण के लिए बेच देना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गैसीय वायु प्रदूषक है।
(i) कुहरा
(ii) वाष्प
(iii) ऐरोसॉल
(iv) ओजोन
उत्तर
(ii) वाष्प

प्रश्न 2.
कणीय वायु प्रदूषक है।
(i) अमोनिया
(ii) कज्जल
(iii) क्लोरीन
(iv) ये सभी
उत्तर
(ii) कज्जल

प्रश्न 3.
अकार्बनिक वायु प्रदूषक है।
(i) नाइट्रोजन ऑक्साइड
(ii) मेथेन
(iii) एथेन
(iv) ऐल्कोहॉल
उत्तर
(i) नाइट्रोजन ऑक्साइड

प्रश्न 4.
मुख्य वायु प्रदूषक है।
(i) NO
(ii) CO
(iii) SO2
(iv) ये सभी
उत्तर
(iv) ये सभी

प्रश्न 5.
ध्रुवों पर बर्फ किस प्रदूषण के कारण पिघल सकती है?
(i) जल
(ii) तापीय
(iii) मृदा
(iv) ये सभी
उत्तर
(ii) तापीय

प्रश्न 6.
वैश्विक तापन का प्रमुख कारण है।
(i) अम्ल वर्षा
(ii) नाभिकीय दुर्घटनाएँ
(iii) हरित गृह प्रभाव
(iv) भूकम्प
उत्तर
(iii) हरित गृह प्रभाव

प्रश्न 7.
हरित गृह गैसों के फलस्वरूप प्रभाव उत्पन्न होता है।
(i) पृथ्वी के तापक्रम में वृद्धि
(ii) पृथ्वी के तापक्रम में कमी
(iii) पृथ्वी के तापक्रम में कोई परिवर्तन नहीं होता
(iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर
(i) पृथ्वी के तापक्रम में वृद्धि

प्रश्न 8.
निम्न में से कौन-सी क्रिया वातावरण में co, की मात्रा में वृद्धि नहीं करती है?
(i) जन्तुओं का विघटन,
(ii) श्वसन
(iii) प्रकाश संश्लेषण
(iv) ईंधन का जलना
उत्तर
(iii) प्रकाश संश्लेषण

प्रश्न 9.
CO2 के अतिरिक्त अन्य हरित गृह गैस है।
(i) N2
(ii) Ar
(iii) O2
(iv) CH4
उत्तर
(iv) CH4

प्रश्न 10.
ग्रीन हाउस प्रभाव प्रदर्शित करने वाला युग्म है।
(i) N2,O2
(ii) H2,N2
(iii) CO2, H2O
(iv) O2, CH4
उत्तर
(iii) CO2, H2O

प्रश्न 11.
ओजोन पाई जाती है।
(i) तापमण्डल में
(ii) मध्यमण्डल में
(iii) समतापमण्डल में
(iv) क्षोभमण्डल में
उत्तर
(iii) समतापमण्डल में

प्रश्न 12.
ओजोन परत की मोटाई की मापक इकाई है।
(i) डेसीमल
(ii) आर्मस्ट्राँग
(iii) डॉब्सन
(iv) क्यूरी
उत्तर
(iii) डॉब्सन

प्रश्न 13.
हानिकारक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल के कारण पृथ्वी पर नहीं पहुँच पाती हैं, क्योंकि वहाँ उपस्थित होती है।
(i) CO2
(ii) O2
(iii) O3
(iv) N2
उत्तर
(ii) O3

प्रश्न 14.
क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स से होता है।
(i) वायुमण्डलीय ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि
(ii) ओजोन परत का क्षय
(iii) हरित गृह गैसों का ह्रास
(iv) दोनों (i) एवं (ii)
उत्तर
(ii) ओजोन परत का क्षय

प्रश्न 15.
अन्टार्कटिका के ऊपर सर्वप्रथम किस वर्ष में ओजोन छिद्र देखा गया?
(i) 1965 में
(ii) 1985 में
(iii) 1987 में
(iv) 1989 में
उत्तर
(ii) 1985 में

प्रश्न 16.
ओजोन परत के अपक्षय से सम्बन्धित निम्नलिखित में से कौन-सा प्रभाव सही नहीं है?
(i) त्वचा कैंसर होना।
(ii) पेड़-पौधों में प्रकाश संश्लेषण की दर में वृद्धि
(iii) ध्रुवीय बर्फ का पिघलना
(iv) आनुवंशिक लक्षणों में परिवर्तन
उत्तर
(iv) आनुवंशिक लक्षणों में परिवर्तन

प्रश्न 17.
जल प्रदूषण का प्रमुख कारण है।
(i) उद्योगों से निकला अपशिष्ट
(ii) खेती में उर्वरक का प्रयोग
(iii) पीड़कनाशियों का प्रयोग
(iv) ये सभी
उत्तर
(iv) ये सभी

प्रश्न 18.
निम्न में से प्रतिबन्धित रसायन है।
(i) BHC
(ii) फोरेट
(iii) मैलाथियॉन
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i) BHC

प्रश्न 19.
जैविक मृदा-प्रदूषण क़िसके द्वारा होता है?
(i) जल
(ii) जीव-जन्तु
(iii) वायु
(iv) ये सभी
उत्तर
(i) जल

प्रश्न 20.
सिलिकोसिस रोग होता है ।
(i) रुई का काम करने वालों को
(ii) पत्थर तोड़ने वालों को
(iii) ऐस्बेस्टॉस का काम करने वालों को
(iv) ये सभी
उत्तर
(ii) पत्थर तोड़ने वालों को

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रदूषण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
वायु, जल एवं स्थल की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक विशेषताओं में वह अवांछनीय । परिवर्तन जो उन्हें मानव, अन्य जीवों, भवनों तथा अन्य सांस्कृतिक धरोहरों के लिए हानिकारक बना देता है, प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल के विभिन्न क्षेत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर
वायुमण्डल को निम्नलिखित चार क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है।

  1. क्षोभमण्डल
  2. समतापमण्डल
  3. मध्यमण्डल
  4. तापमण्डल

प्रश्न 3.
आयनमण्डल के दो भाग कौन-कौन से हैं?
उत्तर
आयनमण्डल के दो भाग मध्यमण्डल तथा तापमण्डल हैं।

प्रश्न 4.
ओजोनमण्डल का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर
ओजोनमण्डल का दूसरा नाम समतापमण्डल है।

प्रश्न 5.
जीवमण्डल से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
जीवमण्डल स्थलमण्डल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल का वह भाग है जिसमें जीवधारी वास करते हैं।

प्रश्न 6.
वायुमण्डल के किन क्षेत्रों में ताप ऊँचाई में वृद्धि के साथ बढ़ता है?
उत्तर
वायुमण्डल के समतापमण्डल क्षेत्र में ताप -56°C से -2°C तक बढ़ता है तथा तापमण्डल क्षेत्र में ताप -92°C से 1200°C तक बढ़ता है।

प्रश्न 7.
वायु प्रदूषण क्या है? वायु को प्रदूषित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
वायुमण्डल में विभिन्न गैसों का एक निश्चित और सन्तुलित अनुपात है। यदि किसी कारणवश इस अनुपात में परिवर्तन हो जाए, तो सभी जीवधारियों पर इनका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। इस वायु को प्रदूषित वायु और इस घटना को वायु प्रदूषण कहते हैं। वायु को प्रदूषित करने वाले कारक निम्नवत् हैं-

  1. जनसंख्या वृद्धि,
  2. लगातार वनों का कटना,
  3. कल-कारखानों की आबादी में होना,
  4. कोयले से चालित इंजन,
  5. घरों में धुआँ,
  6. वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि होना।

प्रश्न 8.
वायुमण्डल के दो प्राथमिक तथा दो द्वितीयक प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. प्राथमिक प्रदूषक = SO2 तथा NO2 गैसे
  2. द्वितीयक प्रदूषक == परॉक्सीऐसिल नाइट्रेट तथा ओजोन

प्रश्न 9.
वायुमण्डल के दो जैव निम्नीकरणीय तथा दो जैव अनिम्नीकरणीय प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जैव निम्नीकरणीय प्रदूषक = वाहित मल तथा गोबर
  2. जैव अनिम्नीकरणीय प्रदूषक = मर्करी तथा ऐलुमिनियम

प्रश्न 10.
वायुमण्डलीय प्रदूषण के दो प्राकृतिक स्रोतों के नाम बताइए।
उत्तर
वायुमण्डलीय प्रदूषण के दो प्राकृतिक स्रोतों के नाम ज्वालामुखी विस्फोट तथा तड़ित झंझावात हैं।

प्रश्न 11.
कौन-सा नाइट्रोजन ऑक्साइड लाल-भूरे रंग का होता है?
उत्तर
नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) लाल-भूरे रंग का होता है।

प्रश्न 12.
PAN का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर
PAN का पूरा नाम परॉक्सीऐसिल नाइट्रेट (peroxy acyl nitrate) है।

प्रश्न 13.
पृथ्वी का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है?
उत्तर
पृथ्वी का तापमान लगातार हरित गृह प्रभाव के कारण बढ़ रहा है।

प्रश्न 14.
CO का प्रमुख सिंक क्या है?
उत्तर
मृदा में उपस्थित सूक्ष्मजीव CO का मुख्य सिंक हैं। ये CO को CO2 में परिवर्तित कर देते हैं।

प्रश्न 15.
क्लोरोसिस से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
SO2 के प्रभाव के कारण पौधों में क्लोरोफिल का निर्माण कम हो जाता है, जिसके कारण इनकी पत्तियाँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तथा अपना हरा रंग खो देती हैं। इसे ही क्लोरोसिस कहते हैं।

प्रश्न 16.
कणिकीय प्रदूषकों का आकार कितना होता है?
उत्तर
कणिकीय प्रदूषकों का आकार 5 mm से 500000 nm के मध्य होता है।

प्रश्न 17.
कौन-से ऐरोमैटिक यौगिक वायु में कणिकाओं के रूप में उपस्थित होते हैं?
उत्तर
बहुचक्रीय ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (Polycyclic Aromatic Hydrocarbon, PAH) वायु में कणिकाओं के रूप में उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 18.
किन्हीं दो सजीव कणिकीय प्रदूषकों के नाम लिखिए।
उत्तर
जीवाणु तथा कवक सजीव कणिकीय प्रदूषकों के प्रमुख उदाहरण हैं।

प्रश्न 19.
सामान्य धूम कुहरा किस प्रकार की जलवायु में देखने को मिलता है? इसकी प्रकृति कैसी होती है।
उत्तर
सामान्य धूम कुहरा ठण्डी तथा नम जलवायु में देखने को मिलता है। इसकी प्रकृति अपचायक होती है।

प्रश्न 20.
प्रदूषित वायु से कणिकीय प्रदूषकों को पृथक करने के लिए प्रयोग की जाने वाली दो युक्तियों के नाम लिखिए।
उत्तर
प्रदूषित वायु से कणिकीय प्रदूषकों को पृथक् करने के लिए मुख्यतः आर्द्र स्क्रबर तथा साइक्लोन संग्राहक का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 21.
ओजोन परत को हानि पहुँचाने वाले दो यौगिकों के नाम बताइए।
उत्तर
नाइट्रिक ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन ओजोन परत को हानि पहुँचाने वाले दो यौगिक

प्रश्न 22.
अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र किस ऋतु में बनता है?
उत्तर
अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र बसंत ऋतु में बनता है।

प्रश्न 23.
पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफेनिल का प्रयोग कहाँ किया जाता है?
उत्तर
पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफेनिल का प्रयोग ट्रांसफार्मरों तथा संधारित्रों में तरलों के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 24.
किस प्रकार का प्रदूषण समुद्री पक्षियों को हानि पहुँचाता है?
उत्तर
समुद्र के जल में तेल प्रदूषण समुद्री पक्षियों को हानि पहुंचाता है।

प्रश्न 25.
पीने के पानी में नाइट्रेट की अधिकतम मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर
पीने के पानी में नाइट्रेट की अधिकतम मात्रा 50 ppm है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रदूषक और संदूषक में क्या अन्तर है?
उत्तर
प्राकृतिक स्रोतों अथवा मानव क्रियाओं अथवा दोनों द्वारा संयुक्त रूप से उत्पन्न पदार्थ जो पर्यावरण में पहले से उपस्थित उसी पदार्थ की सान्द्रता में वृद्धि करके उसे पर्यावरण के समीप या निर्जीव घटकों के लिए हानिकारक बना देता है, प्रदूषक कहलाता है जबकि वह पदार्थ जो प्रकृति में पहले से उपस्थित नहीं होता है परन्तु मानव संक्रियाओं के कारण पर्यावरण में प्रवेश पाता है, संदूषक कहलाता है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक तथा द्वितीयक प्रदूषकों से क्या तात्पर्य है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
प्राथमिक प्रदूषक वे प्रदूषक होते हैं जो निर्माण के पश्चात् पर्यावरण में प्रवेश करते हैं तथा जैसे के तैसे बने रहते हैं। उदाहरणार्थ-SO2, NO2 आदि। जबकि द्वितीयक प्रदूषक वे प्रदूषक हैं जो प्राथमिक प्रदूषकों के मध्य रासायनिक अभिक्रियाओं से बनते हैं। उदाहरणार्थ-हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड जो प्राथमिक प्रदूषक हैं, सूर्य के प्रकाश में परस्पर क्रिया करके ऐसे पदार्थ बनाते हैं जो हानिकारक होते हैं। इस प्रकार निर्मित यौगिक द्वितीयक प्रदूषक कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
जैव निम्नीकरणीय और जैव अनिम्नीकरणीय प्रदूषकों से क्या तात्पर्य है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
जैव निम्नीकरणीय प्रदूषक वे हैं जो सूक्ष्मजीवों द्वारा या प्राकृतिक रूप से या उचित क्रिया द्वारा आसानी से विघटित हो जाते हैं और इस प्रकार हानिकारक नहीं होते हैं लेकिन जब ये वातावरण में आधिक्य में होते हैं तब इनका पूर्णतः निम्नीकरण नहीं होता है, अतः ये प्रदूषक बन जाते हैं। उदाहरणार्थ-वाहित मल, गोबर आदि जबकि जैव अनिम्नीकरणीय प्रदूषक मर्करी, ऐलुमिनियम, DDT आदि जैसे पदार्थ होते हैं जिनका निम्नीकरण प्रकृति में स्वयं नहीं होता है या मन्द गति से होता है। तथा वातावरण में इनकी अल्प मात्रा उपस्थित होने पर भी ये मनुष्यों तथा पौधों के लिए अत्यन्त हानिकारक होते हैं। ये वातावरण में उपस्थित अन्य यौगिकों से क्रिया करके और अधिक विषैले यौगिक बनाते हैं।

प्रश्न 4.
SOx प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव लिखिए।
उत्तर
SOx प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव निम्नवत् हैं-

  1. SO2 तथा SO3 दोनों श्वसन नली को हानि पहुँचाती हैं। 5 ppm सान्द्रण पर SO2 गले तथा
    नेत्रों में जलन उत्पन्न करती है। SO3 1ppm सान्द्रण में बेचैनी उत्पन्न करती है। वयोवृद्ध व्यक्ति तथा हृदय या फेफड़ा रोग से ग्रसित व्यक्ति अधिक गम्भीर रूप से प्रभावित होते हैं।
  2. अत्यधिक कम सान्द्रण (0.03 ppm) में भी SO2 पौधों पर अत्यधिक हानिकारक प्रभाव डालती है। ऐसे वायुमण्डल में लम्बे समय तक अर्थात् कुछ दिनों या सप्ताहों तक रखे पौधों में क्लोरोफिल का निर्माण कम हो जाता है तथा इनकी पत्तियाँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तथा हरा रंग खो देती हैं। इसे क्लोरोसिसः (chlorosis) कहते हैं।
  3. SO2 अपने वास्तविक रूपं में अथवा H2 SO4 में परिवर्तित होकर अनेक पदार्थों पर। निम्नलिखित प्रतिकूल प्रभाव डालती है-
    • यह इमारतों विशेषकर संगमरमर की इमारतों को नष्ट करती है। उदाहरणार्थ-आगरा में ताजमहल का संगमरमर उसके निकट स्थित मथुरा रिफाइनरी तथा तापीय शक्ति केन्द्र के कारण नष्ट हो रहा है।
    • यह धातुओं विशेषतः आइरन तथा स्टील को संक्षारित करती है।
    • यह पेण्ट के रंगों को प्रभावित करती है।
    • इससे वस्त्र, चमड़ा, कागज आदि नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
SO2 किस प्रकार एक वायु-प्रदूषक का कार्य करती है?
उत्तर
SO2 एक अत्यन्त हानिकारक गैस है। वायुमण्डल में इसकी उपस्थिति से श्वसन रोग, हृदय रोग, गले तथा आँखों में अनेक परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। यह अम्ल वर्षा (acid rain) का मुख्य कारण है। अम्ल वर्षा जन्तुओं, वनस्पतियों एवं भवनों के लिए अत्यन्त घातक है। अम्ल वर्षा से सम्बन्धित प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्न हैं-

SO2 + hv → SO2
SO2 + O2 → So3 + O
SO2 + SO2 → SO3 + SO
SO+ SO2 → SO3 + S
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry img-12

इस प्रकार, SO2 एक घातक वायु प्रदूषक है।

प्रश्न 6.
हरितगृह प्रभाव से क्या तात्पर्य है? इसके प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
या
हरितगृह प्रभाव क्या है? यह किस प्रकार से वैश्विक ऊष्मायन (तापमान) के लिए उत्तरदायी
उत्तर
पृथ्वी की सतह अवशोषित ऊष्मा को अवरक्त किरणों के रूप में उत्सर्जित करती है जिसे वायुमण्डल में उपस्थित CO2 तथा जल-वाष्प अवशोषित करके पुनः पृथ्वी की ओर उत्सर्जित कर देती है। इससे पृथ्वी के वायुमण्डल के निचले भाग के ताप में वृद्धि होती है। यही प्रभाव हरितगृह प्रभाव कहलाता है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि हरितगृह प्रभाव के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता है और लगातार बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी के तापमान में हो रही इस वृद्धि को वैश्विक ऊष्मायन (global warming) कहते हैं। चूंकि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के कारण हरितगृह प्रभाव होता है तथा हरितगृह प्रभाव के कारण वैश्विक ऊष्मायन होता है इसलिए, हम कह सकते हैं कि कार्बन डाइऑक्साइड गैस व हरितगृह प्रभाव वैश्विक ऊष्मायन के लिए उत्तरदायी हैं। हरितगृह प्रभाव के प्रमुख कारण निम्नवत् हैं-

  1. औद्योगिकीकरण-औद्योगिकीकरण के कारण वर्तमान समय में उद्योगों एवं घरों में जीवाश्म ईंधनों के उपयोग में वृद्धि हुई है। वर्तमान समय में प्रतिवर्ष लगभग चार अरब टन जीवाश्म ईंधन जलाया जाता है जिससे प्रतिवर्ष लगभग 4% कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि हो जाती है। CO2 में यह वृद्धि हरितगृह प्रभाव में वृद्धि करती है।
  2. वनोन्मूलन-पौधे प्रकाश संश्लेषण में CO2 का प्रयोग करके O2 छोड़ते हैं तथा इस प्रकार वे वायुमण्डल में CO2 के स्तर को बनाए रखते हैं। वनोन्मूलन से वायुमण्डल में CO2 की वृद्धि दो प्रकार से होती है-एक तो प्रकाश संश्लेषण की कमी होने से CO2 का उपयोग कम हो जाता है तथा दूसरी ओर वृक्षों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त होने से CO2 वायुमण्डल में पहुँचती है। इस प्रकारे वनों के विनाश से हरितगृह को बढ़ावा मिलता है।
  3. क्लोरोफ्लोरोकार्बन का उपयोग–क्लोरोफ्लोरोकार्बनों का प्रयोग रेफ्रिजरेटरों, एयरकन्डीशनरों, गद्देदार सीट बनाने वाली फोम (foam) तथा ऐरोसॉल स्प्रे (aerosol spray) के निर्माण में किया जाता है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन हरित गृह प्रभाव में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, क्लोरोफ्लोरोकार्बन और मेथेन गैसों का हरितगृह प्रभाव की वृद्धि में 90% तक योगदान सम्भव है।

प्रश्न 7.
CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए कैसे उत्तरदायी है?
उत्तर
CO2 चक्र के कारण प्राकृतिक रूप से वातावरण में CO2 की सान्द्रता स्थिर रहती है। लेकिन, जब वातावरण में CO2 की सान्द्रता मानवीय क्रियाओं के कारण एक निश्चित स्तर से अधिक हो जाती है, तो वायुमण्डल में उपस्थित CO2 का आधिक्य पृथ्वी द्वारा विकरणित ऊष्मा को अवशोषित कर लेता है। अवशोषित ऊष्मा का कुछ भाग वायुमण्डल में निस्तारित हो जाता है और शेष भाग पृथ्वी पर वापस विकरणित हो जाता है जिससे पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ जाता है और भूमण्डलीय ताप में वृद्धि होती है। इस प्रभाव को ग्रीनहाउस प्रभाव
कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अम्ल वर्षा से क्या तात्पर्य है? यह किस प्रकार होती है?
उत्तर

वह वर्षा जिसमें सल्फर ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड (वायु प्रदूषकों) की जल-वाष्प से अभिक्रिया के फलस्वरूप बने सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल होते हैं, अम्ल वर्षा कहलाती है।। वायुमण्डल में उपस्थित सल्फर डाइऑक्साइड (SO, ),सल्फर ट्राइऑक्साइड में ऑक्सीकृत होने के पश्चात् जल-वाष्प से अभिक्रिया करके सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती है।

2SO2 + O2 → 2SO3
SO3 + H2O → H2 SO4

ठीक इसी प्रकार नाइट्रोजन के ऑक्साइड विभिन्न अभिक्रियाओं के द्वारा N2O5 बनाते हैं जो जल-वाष्प से अभिक्रिया करके नाइट्रिक अम्ल बनाता है।

NO + O3 → NO2 + O2
NO2 + O3 → NO3 + O2
NO3 + NO2 → N2O5
N2O5 + H2O → 2HNO3

इस प्रकार विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं के द्वारा उत्पन्न नाइट्रिक अम्ल तथा सल्फ्यूरिक अम्ल वर्षा के जल के साथ अम्ल वर्षा (acid rain) के रूप में पृथ्वी पर आ जाते हैं।

प्रश्न 9.
कणिकीय प्रदूषक क्या हैं? इनके विभिन्न स्रोत क्या हैं?
उत्तर
कणिकीय प्रदूषक-वायु में निलम्बित सूक्ष्म ठोस कण तथा द्रवीय बूंदें कणिकीय प्रदूषक कहलाते हैं। इन कणों का आकार 5 nm से 500000 pm के मध्य होता है। इनकी सान्द्रता भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती है। स्वच्छ वायु में इनकी संख्या 100 cm होती है जबकि प्रदूषित वायु में इनकी संख्या 100000 cm होती है। कणिकीय प्रदूषकों के स्रोत निम्नलिखित हैं-

  1.  प्राकृतिक स्रोत
    • मिट्टी एवं धूल को हवा द्वारा उड़ना,
    • ज्वालामुखी का फटना,
      समुद्रों द्वारा लवणों का छिड़काव।
  2. मानव-निर्मित स्रोत
    • कज्जल-ये सबसे सामान्य और सबसे छोटे कणिकीय प्रदूषक हैं। ये औद्योगिक संस्थानों, स्वचालित वाहनों तथा घरों में जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्पन्न होते हैं।
    • फ्लाई एश–ये सबसे बड़े कणिकीय प्रदूषक हैं। ये राख के कण हैं जो ऊष्मीय विद्युत संयन्त्रों, खनन आदि क्रियाओं में जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्पन्न होते हैं।
    • कार्बनिक कणिकीय प्रदूषक-ओलेफिन, पैराफिन, ऐरोमैटिक यौगिक आदि इस श्रेणी में आते हैं। ये स्थायी ईंधनों तथा स्वचालित वाहनों में जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्पन्न होते हैं। ये पेट्रोलियम शोधन, संयन्त्रों (petroleum refineries) में भी उत्पन्न होते हैं। ऐरोमैटिक यौगिकों में से बहुचक्रीय ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (polycyclic aromatic hydrocarbon, PAH) प्रमुख कणिकीय प्रदूषक हैं। ये कज्जली कणों की सतह पर अधिशोषित हो जाते हैं तथा इस रूप में और अधिक हानिकारक हो जाते हैं।
    • अकार्बनिक कणिकीय प्रदूषक-धात्विक ऑक्साइड, धात्विक कण, ऐस्बेस्टॉस की धूल, सल्फ्यूरिक अम्ल की बूंदें, नाइट्रिक अम्ल की बूंदें, लेड हैलाइड आदि अकार्बनिक
      कणिकीय प्रदूषक हैं।

प्रश्न 10.
कणिकीय प्रदूषकों के हानिकारक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
कणिकीय प्रदूषकों के प्रमुख हानिकारक प्रभाव निम्नवत् हैं-

  1. कणिकीय प्रदूषक मनुष्यों में अनेक रोग उत्पन्न करते हैं। 5 माइक्रोन से बड़े कणिकीय प्रदूषक नासिकाद्वार में जमा हो जाते हैं जबकि 1.0 माइक्रोन के कण फेफड़ों में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। अपने अत्यधिक सतही क्षेत्रफल के कारण ये कण विभिन्न कैंसरजन्य यौगिकों को अधिशोषित करके फेफड़ों का कैंसर, ब्रोंकाइटिस (bronchitis) आदि रोग उत्पन्न करते हैं। विभिन्न प्रकार के कणिकीय प्रदूषक विभिन्न रोग उत्पन्न करते हैं, उदाहरणार्थ-सिलिका युक्त धूल से सिलिकोसिस (silicosis) नामक रोग हो जाता है जबकि ऐस्बेस्टॉस से ऐस्बेस्टॉसिस (asbestosis) नामक रोग होता है। लेड के कणिकीय प्रदूषक अपनी विषैली प्रकृति के कारण मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।
  2. विभिन्न कणिकीय प्रदूषक पौधों की पत्तियों पर जमा होकर रन्ध्रों (stomata) को अवरुद्ध कर.. देते हैं। इससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis), वाष्पोत्सर्जन (transpiration) आदि क्रियाएँ प्रभावित होती हैं और पौधों की वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  3. वायुमण्डल में कणिकीय प्रदूषकों की उपस्थिति के कारण देखने में परेशानी होती है। ऐसा कणिकीय प्रदूषकों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन (scattering) के कारण होता है।
  4. कणिकीय पदार्थ सूर्य की ऊष्मा को वापस अन्तरिक्ष में परावर्तित कर देते हैं। इससे सूर्य की ऊष्मा पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँच पाती है। साथ ही कणिकीय पदार्थ बादल–निर्माण में केन्द्रकों की भाँति कार्य करते हैं।
  5. ये धातुओं के संक्षारण में वृद्धि करते हैं।
  6. विभिन्न प्रकार के कणिकीय प्रदूषक इमारतों, भवनों, मृदा, कपड़ों, पेण्टों आदि को हानि पहुँचाते हैं।

प्रश्न 11.
आयनमण्डल में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर
मध्यमण्डल का विस्तार समुद्र तल से 50-85 km की ऊँचाई तक है जबकि तापमण्डल का विस्तार समुद्र-तल से 85-500 km ऊँचाई तक है। इन दोनों मण्डलों को संयुक्त रूप से आयनमण्डल (ionosphere) कहते हैं। इनमें गैसें आयनित रूप में उपस्थित रहती हैं।
इन मण्डलों में विभिन्न प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप मुक्त आयनों और इलेक्ट्रॉनों का निर्माण होता है। इन मण्डलों में होने वाली कुछ अभिक्रियाएँ निम्न हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry img-10

मध्यमण्डल के निचले भाग में ये मुक्त आयन तथा इलेक्ट्रॉन अन्य आयनों, परमाणुओं तथा अणुओं से टकराकर उदासीन स्पीशीज बनाते हैं। चूँकि ऊपरी वायुमण्डल में ऐसी अन्य स्पीशीज उपस्थित नहीं होती हैं जिनसे ये संयोग कर सकें अत: वहाँ ये लम्बे समय तक बनी रहती हैं।

प्रश्न 12.
कौन-सा ऐरोसॉल (aerosol) ओजोन पर्त को विच्छेदित (deplete) करता है?
उत्तर
क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) ऐरोसॉल; जैसे—फ्रिऑन (CCl2F2) वायुमण्डल के समताप-मण्डल (stratosphere) में उपस्थित ओजोन पर्त को विच्छेदित करते हैं। निहित अभिक्रियाएँ निम्न हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 14 Environment Chemistry img-11

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके प्रमुख कारण, प्रभाव तथा नियन्त्रण के उपाय लिखिए।
उत्तर
जल प्रदूषण-जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक अभिलक्षणों में परिवर्तन जिससे यह मनुष्य तथा जलीय जीवों के लिए हानिकारक हो जाता है तथा अन्य उपयोगों के लिए भी अनुपयुक्त हो जाता है, जल प्रदूषण कहलाता है। जल प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. घरेलू अपशिष्ट और वाहित मल-घरों से निकलने वाले अपशिष्ट, जैसे-कूड़ा-करकट | आदि और वाहित मल नालियों इत्यादि से होते हुए जलाशयों, नदियों आदि में पहुँचते हैं जहाँ ये उनके जल को प्रदूषित करते हैं।
  2. घरेलू अपमार्जक–घर में उपयोग किए जाने वाले अपमार्जक कपड़े धोने, बर्तन साफ आदि करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के साबुन, सर्फ आदि होते हैं। ये अपमार्जक घरों से नालियों, तालाबों तथा नदियों तक पहुँचकर जल प्रदूषण फैलाते हैं।
  3. औद्योगिक रसायन विभिन्न उद्योगों से निकलने वाले जल में विभिन्न प्रकार के कार्बनिक तथा अकार्बनिक रसायन हो सकते हैं। ये पदार्थ निम्न प्रकार के हो सकते हैं–धूल, क्षार, अम्ल, सायनाइड, मर्करी, जिंक, कॉपर, फेरस लवण, तेल आदि। ये रसायन जल के प्रदूषक
  4. कृषि उद्योग के प्रदूषक-कृषि की उपज में वृद्धि के लिए विभिन्न प्रकार के उर्वरकों, | पीड़कनाशियों, कीटनाशियों आदि का प्रयोग किया जाता है। ये रसायन वर्षा के जल के साथ बहते हुए विभिन्न जल स्रोतों में पहुँचकर जल को प्रदूषित करते हैं।
  5. रेडियोधर्मी पदार्थ–नाभिकीय विस्फोट, नाभिकीय ऊर्जा प्रक्रम से निकलने वाली विकिरण जल में घुलकर प्रदूषण फैलाती है। यूरेनियमयुक्त खनिजों का खनन भी जल प्रदूषण करता है।
  6. सिल्टेशन–पहाड़ों की नदियों में मृदा तथा चट्टानों के कण जल में घुलते रहते हैं। यह प्रक्रम | सिल्टेशन कहलाता है। सिल्ट अथवा गाद के जल में मिलने से भी जल प्रदूषण होता है।
  7. पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफेनिल-इन्हें अभी जल प्रदूषकों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है। | इनका प्रयोग ट्रांसफॉर्मरों तथा संधारित्रों (capacitors) में तरलों के रूप में किया जाता है।
  8. ऊष्मीय प्रदूषक–वे प्रदूषक जो जल के ताप में वृद्धि कर देते हैं, ऊष्मीय प्रदूषक कहलाते हैं। अनेक उद्योगों में पदार्थों, माध्यमों आदि को ठंडा करने की आवश्यकता होती है। इनकी ऊष्मा को जल को स्थानान्तरित कर दिया जाता है जिससे उसका ताप बढ़ जाता है। इस गर्म जल को फिर जल-स्रोतों में डाल दिया जाता है।

जल प्रदूषण के प्रभाव निम्नवत् हैं-

  1. प्रदूषित जल में उपस्थित रोगाणु (pathogens) मनुष्यों तथा पालतू पशुओं में विभिन्न रोग उत्पन्न करते हैं।
  2. अपमार्जकों में उपस्थित ऐल्किल बेन्जीन सल्फोनेट (alkyl benzene sulphonate) से जल की अम्लीयता बढ़ती है जो जलीय जीवों के लिए हानिकारक होती है।
  3. जल में उपस्थित वाहित मल, पत्तियाँ और विभिन्न उद्योगों, जैसे—कागज उद्योग, चर्म शोधन उद्योग के कार्बनिक अपशिष्ट पादप प्लवकों की अत्यधिक वृद्धि में सहायता करते हैं। सूक्ष्म जीवों द्वारा कार्बनिक अपशिष्टों के अपघटन से दुर्गंध उत्पन्न होती है। ऐसे जल स्रोत तैरने, नाव चलाने आदि के लिए भी उपयुक्त नहीं होते हैं। जल में ऑक्सीजन की मात्रा घटने से उसमें उपस्थित जलीय जीवों की मृत्यु भी हो सकती है।
  4. तलछट जल को गंदला बनाते हैं।
  5. विषाक्त भारी धातुओं वाले जल का प्रयोग करने से विभिन्न रोग हो जाते हैं। उदाहरणार्थ-कैडमियम प्रदूषण से टाई-टाई नामक रोग हो जाता है। इसी प्रकार मर्करी
    प्रदूषण से मिनामाटा रोग हो जाता है।
  6. जल स्रोतों में उद्योगों द्वारा सीधा डाला गया गर्म जल भी प्रदूषक है। इसमें उपस्थित ऊष्मा जलीय जीवों को हानि पहुँचाती है।
  7. पॉलीक्लोरीनेटिड बाइफेनिल (PCBs) कैंसरजन्य है।
  8. उर्वरकों में प्रयुक्त फॉस्फेट जल स्रोतों में पहुँचकर शैवालों की वृद्धि में सहयोग करता है। शीघ्र ही शैवाल पूरी जल सतह को ढक लेते हैं। इससे जल में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है। साथ ही फॉस्फेटों की उपस्थिति में जलीय पौधों की संख्या में भी वृद्धि होती है। इससे जल में घुली ऑक्सीजन काफी कम हो जाती है। इससे जलीय जीवों की मृत्यु होने लगती है। जल-निकायों में पौष्टिक अभिवृद्धि के कारण ऑक्सीजन की कमी तथा उसके परिणामस्वरूप
    जलीय जीवों की मृत्यु सुपोषण कहलाती है।

जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के कुछ प्रमुख उपाय निम्नवत् हैं-

  1. वाहित मल को उपचारित करके ही जल स्रोतों में डालना चाहिए।
  2. गर्म जल को जल-स्रोतों में डालने से पहले ठण्डा कर लेना चाहिए।
  3. कृषि में प्रयोग किए जाने वाले रसायनों का केवल आवश्यक मात्रा में ही प्रयोग किया जाना चाहिए। रसायनों के स्थान पर जैव उर्वरकों (bio-fertilizers) आदि का प्रयोग किया जा सकता है।।
  4. विभिन्न उद्योगों के बहिस्रावों (effluents) को उपचारित करने के पश्चात् ही जल-स्रोतों में डालना चाहिए। इसके लिए उद्योगों को सख्त निर्देश दिए जाने चाहिए और सम्बन्धित कानून का भी सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
मृदा प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? इसके कारण, प्रभाव तथा नियन्त्रण का वर्णन कीजिए।
उत्तर
मृदा प्रदूषण-भूपर्पटी की वह ऊपरी सतह जिसमें पौधे उगते हैं, मृदा कहलाती है। मृदा चट्टानों के अपक्षयण से बनती है। बाह्य स्रोतों के कारण अनावश्यक पदार्थों (प्रदूषकों) का मृदा से मिलकर उसे अनुत्पादक बनाना या प्रदूषित करना मृदा प्रदूषण कहलाती है। मृदा प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नवत् हैं-

  1. शहरी अपशिष्ट–इनमें कूड़ा, पत्तियाँ, पॉलिथीन की थैलियाँ, कागज, काँच, फल या सब्जियों के छिलके, खाद्य अपशिष्ट, मल आदि सम्मिलित हैं।।
  2. औद्योगिक अपशिष्ट-उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्टों में अनेक विषैले तथा जैव अनिम्नीकरणीय (non-biodegradable) पदार्थ होते हैं। चीनी मिल, वस्त्र उद्योग, रसायन उद्योग, काँच उद्योग, सीमेन्ट उद्योग, पेट्रोलियम उद्योग आदि ऐसे प्रमुख उद्योग हैं जिनसे मृदा प्रदूषण होता है।
  3. कृषि के प्रदूषक–कृषि में पौधों की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करने, उन्हें पीड़कों से बचाने आदि के लिए अनेक रसायनों का प्रयोग किया जाता है। ये रसायन मृदा प्रदूषण को प्रमुख कारण हैं।
  4. रेडियोधर्मी प्रदूषक-नाभिकीय परीक्षणों में उत्पन्न नाभिकीय धूल (nuclear dust) पहले वायुमण्डल में जाती है और अंततः मृदा पर बैठकर उसे प्रदूषित करती है। नाभिकीय संयन्त्रों से उत्पन्न नाभिकीय अपशिष्ट मृदा में दबा दिए जाते हैं। ये प्रदूषक का कार्य करते हैं। युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले नाभिकीय बम (परमाणु बम और हाइड्रोजन बम) रेडियोधर्मी उप-उत्पाद बनाते हैं। इनके रेडियोधर्मी अपशिष्टों से हानिकारक विकिरणें निकलती हैं।
  5. अन्य स्रोत–वनोन्मूलन (deforestation) से मृदा अपरदन में वृद्धि होती है। इससे उपजाऊ मृदा समाप्त हो जाती है। अतिचारण भी मृदा अपरदन का एक कारण है।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. कूड़ा, काँच; खाद्य अपशिष्ट आदि दृश्य (scene) को गंदा बनाते हैं। अनेक अपशिष्ट सड़कर दुर्गंध देते हैं।
  2. विभिन्न रसायन और पीड़कनाशी मृदा के संघटन को प्रभावित करके उसमें उपस्थित विभिन्न | सूक्ष्म जीवों को मार देते हैं। इससे मृदा की उर्वरता (fertility) कम हो जाती है।
  3. अनेक रसायन और पीड़कनाशी मृदा को विषाक्त करके उसे पौधों के उगने के अयोग्य बनाते हैं।
  4. अनेक पीड़कनाशी और उनके उत्पाद पौधों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं। ये विषैले पदार्थ खाद्य श्रृंखला (food chain) के माध्यम से जन्तुओं और मनुष्यों तक पहुँच जाते हैं।
  5. मनुष्यों के मल तथा पशुओं के गोबर आदि पौधों की उपज में वृद्धि करने के साथ-साथ मृदा को प्रदूषित भी करते हैं। मल आदि में उपस्थित रोगाणु मृदा और पौधों को संदूषित करके मनुष्य और पालतू पशुओं के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।
  6. रेडियोधर्मी धूल मृदा से पौधों और पौधों से मवेशियों, मनुष्यों आदि में पहुँचकर उनके स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती है।

मृदा प्रदूषण को निम्नलिखित प्रकार से नियन्त्रित किया जा सकता है-

  1. शहरों के अपशिष्टों को अलग-अलग करके उसके विभिन्न घटकों का प्रयोग निचले क्षेत्रों (low-lying areas) को भरने, कम्पोस्ट (compost) आदि में किया जा सकता है। इसके घटकों का आवश्यकतानुसार पुनः चक्रण (recycle) किया जा सकता है या जलाया जा सकता है।
  2. गोबर का उपयोग गोबर गैस संयन्त्रों में गोबर-गैस बनाने के लिए किया जा सकता है।
  3. स्क्रैप से विभिन्न धातुओं को प्राप्त किया जा सकता है।
  4. काँच और प्लास्टिक का पुनः चक्रण किया जा सकता है। इसी प्रकार कागज का भी पुनः चक्रण किया जा सकता है। पुरानी पुस्तकों, अखबारों, मैग्जीनों को नया कागज बनाने के लिए। कागज की मिलों (paper mills) को भेजा जा सकता है।
  5. रासायनिक उर्वरकों और पीड़कनाशियों का प्रयोग सोच-समझकर और आवश्यकतानुसार ही किया जाना चाहिए।
  6. रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैव उर्वरकों (bio-fertilizers) तथा खाद (manure) का | उपयोग करना चाहिए। इससे मृदा प्रदूषण तो घटता ही है साथ ही, धन की बचत भी होती है।
  7. पीड़कों के नियन्त्रण के लिए जैविक विधियों का प्रयोग करना चाहिए। इससे रासायनिक पीड़कों का प्रयोग कम होगा और मृदा प्रदूषण में भी कमी आएगी।
  8. वनोन्मूलन को नियन्त्रित करके अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए तथा अतिचारण को भी रोकना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 11 English Vocabulary Chapter 7 Homophones

UP Board Solutions for Class 11 English Vocabulary Chapter 7 Homophones

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 19 Excretory Products and their Elimination 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 19 Excretory Products and their Elimination (उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुच्छीय निस्पंद दर (GFR) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
वृक्कों द्वारा प्रति मिनट निस्यंदित की गई मूत्र की मात्रा गुच्छीय नियंद दर (GFR) कहलाती है। एक स्वस्थ व्यक्ति में यह 125 ml/मिनट अथवा 180 ली प्रतिदिन होती है।

प्रश्न 2.
गुच्छीय निस्पंद दर (GFR) की स्वनियमन क्रियाविधि को समझाइए।
उत्तर :
गुच्छीय निस्पंद की दर के नियमन के लिए गुच्छीय आसन्न उपकरण द्वारा एक अति सूक्ष्म क्रियाविधि सम्पन्न की जाती है। यह विशेष संवेदी उपकरण अभिवाही तथा अपवाही धमनिकाओं के सम्पर्क स्थल पर दूरस्थ संकलित नलिका की कोशिकाओं में रूपान्तरण (UPBoardSolutions.com) से बनता है। गुच्छ निस्यंदन दर में गिरावट इन आसन्न गुच्छ कोशिकाओं को रेनिन के स्रावण के लिए सक्रिय करती है जो वृक्कीय रक्त का प्रवाह बढ़ाकर गुच्छनियंद दर को पुनः सामान्य कर देती है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित कथनों को सही अथवा गलत में इंगित कीजिए
(अ) मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है।
(ब) ए०डी०एच० मूत्र को अल्पपरासरणी बनाते हुए जल के निष्कासन में सहायक होता है।
(स) बोमेन संपुट में रक्त प्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्पंदित होता है।
(द) हेनले लूप मूत्र के सांद्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(य) समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है।
उत्तर :
(अ) सही
(ब) गलत
(स) सही
(द) सही
(य) सही

प्रश्न 4.
प्रतिधारा क्रियाविधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रतिधारा क्रियाविधि

शरीर में जैल की कमी हो जाने पर वृक्क सान्द्र मूत्र उत्सर्जित करने लगते हैं। इसमें जल की मात्रा बहुत कम और उत्सर्जी पदार्थों की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है। ऐसा मूत्र रक्त की तुलना में 4-5 गुना अधिक गाढ़ा हो सकता है। इसकी परासरणीयता 1200 से 1400 मिली ऑस्मोल/लीटर हो सकती है। मूत्र के सान्द्रण की प्रक्रिया में जक्स्टा मेड्यूलरी (juxta medullary) वृक्क नलिकाओं की विशेष भूमिका हो जाती है; क्योंकि हेनले के लूप तथा परिजालिका केशिकाओं (वासा रेक्टा-vasa recta) के लूप पेल्विस तक फैले होते हैं। यह प्रक्रिया ADH के नियन्त्रण में तथा पिरैमिड्स के ऊतक द्रव्य में वल्कुट भाग से पेल्विस तक क्रमिक उच्च परासरणीयता बनाए रखने पर निर्भर करती है। वृक्कों के वल्कुट भाग में ऊतक तरल की परासरणीयता 300 मिली ऑस्मोल/लीटर जल होती है। मध्यांश (medulla) भाग के पिरेमिड्स (UPBoardSolutions.com) में यह परासरणीयता क्रमशः बढ़कर पेल्विस तक 1200 से 1400 मिली ऑस्मोल/लीटर जल हो जाती है। ऊतक तरल की परासरणीयता मुख्यतः Na+ व Cl आयन तथा यूरिया पर निर्भर करती है।

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Na+ , Cl– आयन्स का परिवहन हेनले लूप की आरोही भुजा द्वारा होता है जिसका हेनले लुप की अवरोही भुजा के साथ विनिमय किया जाता है। सोडियम क्लोराइड ऊतक द्रव्य को वासा रेक्टा की आरोही भुजा द्वारा लौटा दिया जाता है। इसी प्रकार यूरिया की कुछ मात्रा हेनले लूप के सँकरे आरोही भाग में विसरण द्वारा पहुँचती है जो संग्रह नलिका द्वारा ऊतक द्रव्य को पुनः लौटा दी जाती है। हेनले लूप तथा वासो रेक्टा द्वारा इन पदार्थों के परिवहन को प्रतिधारा क्रियाविधि (UPBoardSolutions.com) द्वारा सुगम बनाया जाता है। इसके फलस्वरूप मध्यांश के ऊतक द्रव्य की प्रवणता बनी रहती है। यह प्रवणता संग्रहनलिका द्वारा जल के अवशोषण में सहायता करती है और नियंद का सान्द्रण करती है। प्रतिधारा क्रियाविधि जल के ह्रास को रोकने की प्रमुख विधि है।

प्रश्न 5.
उत्सर्जन में यकृत, फुफ्फुस तथा त्वचा का महत्त्व बताइए।
उत्तर :
मनुष्य तथा अन्य कशेरुकियों में वृक्क के अतिरिक्त यकृत, फुफ्फुस तथा त्वचा का उत्सर्जन में महत्त्व है। ये सहायक उत्सर्जी अंगों की तरह कार्य करते हैं।

(i) यकृत (Liver) :
यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है। यूरिया अमोनिया की तुलना में कम हानिकारक होता है। यकृत कोशिकाएँ हीमोग्लोबिन के विखण्डन से पित्त वर्णक बिलिरुबिन (bilirubin), बिलिवर्डिन (biliverdin) बनाती हैं। इसके अतिरिक्त पित्त में उत्सर्जी पदार्थ कोलेस्टेरॉल (cholesterol), कुछ निम्नीकृत स्टीरॉयड हॉर्मोन्स, औषधियाँ आदि होती हैं। ये उत्सर्जी पदार्थ यकृत के पित्त द्वारा ग्रहणी में पहुँच जाते हैं और मल के साथ शरीर से त्याग दिए जाते हैं।

(ii) फुफ्फुस (Lungs) :
श्वसन क्रिया के फलस्वरूप मुक्त CO2 (18 L/day) एवं जलवाष्प फेफड़ों (फुफ्फुस) द्वारा शरीर से निष्कासित होती है।

(iii) त्वचा (Skin) :
जलीय प्राणियों में अमोर्निया का उत्सर्जन त्वचा द्वारा होता है। स्थलीय जन्तुओं, में त्वचा की स्वेद ग्रन्थियों (sweat glands) द्वारा जल, खनिज तथा सूक्ष्म मात्रा में यूरिया, लैक्टिक अम्ल आदि पसीने के रूप में उत्सर्जित होता है। त्वचा की तेल ग्रन्थियाँ (oil glands) सीबम (sebum) के साथ कुछ हाइड्रोकार्बन्स, मोम (wax), स्टेरॉल (sterol), वसीय अम्ल (fatty acids) आदि उत्सर्जित होते हैं।

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प्रश्न 6.
मूत्रण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
मृत्रण मूत्र वृक्क में बनकर मूत्राशय में एकत्र होता रहता है। सामान्यतः अन्त:मूत्रीय तथा बाह्यमूत्रीय संकोचक पेशियों के संकुचन के कारण मूत्रमार्ग बन्द रहता है। मूत्राशय से मूत्र त्याग तभी होता है जब मूत्रमार्ग की दोनों प्रकार की संकोचक पेशियाँ शिथिल हो जाएँ। अन्त:मूत्रीय संकोचक में अरेखित पेशी तथा बाह्य मूत्रीय संकोचक में रेखित पेशी तन्तु होते हैं, इसलिए अन्त:मूत्रीय संकोचक का शिथिलन स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के नियन्त्रण में होने वाली अनैच्छिक और (UPBoardSolutions.com) बाह्य मूत्रीय पेशियों का शिथिलन एक ऐच्छिक प्रतिक्रिया होती है। मूत्रण वास्तव में अनैच्छिक तथा ऐच्छिक प्रतिक्रियाओं के सहप्रभाव से होता है। ऐच्छिक नियन्त्रण के कारण हम इच्छानुसार मूत्र त्याग करते हैं।

प्रश्न 7.
स्तम्भ I के बिन्दुओं का खण्ड स्तम्भ II से मिलान कीजिए
स्तम्भ I                               – स्तम्भ II
(i) अमोनियोत्सर्जन             (अ) पक्षी
(ii) बोमेन सम्पुट                (ब) जल का पुनःअवशोषण
(iii) मूत्रण                           (स) अस्थिल मछलियाँ
(iv) यूरिक अम्ल उत्सर्जन  (द) मूत्राशय
(v) ए०डी०एच०                 (य) वृक्क नलिका
उत्तर :
स्तम्भI                             –    स्तम्भ II
(i) अमोनियोत्सर्जन         –  (स) अस्थिल मछलियाँ
(ii) बोमेन सम्पुट              – (य) वृक्क नलिका
(iii) मूत्रण                        –   (द) मूत्राशय
(iv) यूरिक अम्ल उत्सर्जन  (अ) पक्षी
(v) ए०डी०एच०                –  (ब) जल का पुनः अवशोषण

प्रश्न 8.
परासरण नियमन का अर्थ बताइए।
उत्तर :
परासरण नियमन वृक्क शरीर से हानिकारक पदार्थों को मूत्र के रूप में शरीर से निरन्तर बाहर निकालते रहते हैं। इसके अतिरिक्त ऊतक तरल में लवणों और जल की मात्रा का नियन्त्रण भी करते हैं। शरीर में जल की मात्रा के बढ़ जाने अर्थात् शरीर के तरल की परासरणीयता (osmotality) के कम हो जाने पर मूत्र पतला (तनु) हो जाता है और उसकी मात्रा बढ़ जाती है। शरीर में जल की कमी होने पर अर्थात् शरीर के ऊतक तरल की परासरणीयता के बढ़ जाने पर मूत्र गाढ़ा हो जाता है और इसकी मात्रा कम हो जाती है। मूत्र की मात्रा का नियन्त्रण मुख्यतः ऐल्डोस्टेरॉन (aldosterone) तथा एण्टीडाइयूरेटिक (antidiuretic hormone, ADH) द्वारा होता है। ऐल्डोस्टेरॉन Na+ के पुनरावशोषण को बढ़ाता है, जिससे अन्त:वातावरण में Na+ की उपयुक्त मात्रा बनी रहे। एण्टीडाइयूरेटिक (ADH) या वैसोप्रेसिन (vasopressin) मूत्र के तनुकरण या सान्द्रण का प्रमुख नियन्त्रक होता है। परासरण नियमन प्रक्रिया द्वारा जीवधारी के शरीर में परासरणीयता (osmotality) को नियन्त्रित रखा जाता है।

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प्रश्न 9.
स्थलीय प्राणी सामान्यतया यूरिया उत्सर्जी या यूरिक अम्ल उत्सर्जी होते हैं तथा अमोनिया उत्सर्जी नहीं होते हैं, क्यों?
उत्तर :
प्रोटीन्स के पाचन के फलस्वरूप ऐमीनो अम्ल प्राप्त होते हैं। जीवधारी आवश्यकता से अधिक ऐमीनो अम्लों का विअमोनीकरण या अमीनोहरण (deamination) करते हैं। इससे कीटो समूह (Keto group) एवं ऐमीनो समूह से अमोनिया (ammonia) प्राप्त होती है। कीटो समूह का उपयोग अपचय (catabolism) के अन्तर्गत ऊर्जा उत्पादन में हो जाता है।अमोनिया को जलीय जन्तुओं में उत्सर्जित कर दिया जाता है। यह जल में घुलनशील और विषैली होती है। इसको उत्सर्जित करने के लिए अधिक जल की आवश्यकता होती है। इसी कारण अमोनिया जलीय प्राणियों का मुख्य उत्सर्जी पदार्थ है। अमोनिया उत्सर्जी स्थलीय जन्तुओं में अमोनिया को यकृत द्वारा यूरिया में बदल दिया जाता है। यूरिया जल में घुलनशील और अमोनिया की तुलना में बहुत कम विषैला या हानिकारक होता है। अतः अधिकांश स्थलीय जन्तु यूरिया (UPBoardSolutions.com) उत्सर्जी (ureotelic) होते हैं। जैसे—अनेक उभयचर तथा स्तनी प्राणी।। शुष्क परिस्थितियों में रहने वाले जन्तु; जैसे—सरीसृप एवं पक्षी वर्ग के सदस्यों में जल की कमी बनी रहती है। जल संचय के लिए ये प्राणी यूरिया को यूरिक अम्ल (uric acid) के रूप में उत्सर्जित करते हैं। यूरिक अम्ल जल में अघुलनशील होता है। यह विषैला नहीं होता। इसे मल के साथ त्याग दिया जाता है। सरीसृप, पक्षी, कीट आदि यूरिक अम्ल उत्सर्जी (uricotelic) होते हैं।

प्रश्न 10.
वृक्क के कार्य में जक्सटा गुच्छ उपकरण (JGA) का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
जक्सटा गुच्छ उपकरण (Juxta glomerular apparatus, JGA) की उत्सर्जन में जटिल नियमनकारी भूमिका है।JGA की विशिष्ट कोशिकाएँ केशिकागुच्छ नियंदन का स्वनियमन स्वयं वृक्क द्वारा उत्पन्न दाबक क्रियाविधि(renal pressure mechanism) की उपस्थिति के कारण होता है। इसकी खोज टाइगरस्टीट और बर्गमन (Tigersteat and Bergman, 1898) ने की।JGA की विशिष्ट कोशिकाओं से रेनिन हॉर्मोन स्रावित होता है। Na+ की कम सान्द्रता या निम्न केशिकागुच्छ निस्पंदन दर या निम्न केशिकागुच्छ दाब (glomerular pressure) के कारण रेनिन रक्त में उपस्थित एन्जियोटेंसिनोजन (angiotensinogen) को एन्जियोटेन्सिन-I (angiotensin-I) और बाद में एन्जियोटेन्सिन-II (angiotensin-II) में बदलता है। एन्जियोटेन्सिन-II एक प्रभावकारी वाहिका संकीर्णक (vasoconstrictor) का कार्य करता है, जो गुच्छीय रुधिर दाब तथा जी०एफ०आर० (glomeruler filtration rate, GFR) को बढ़ा देता है। एन्जियोटेन्सिन-II अधिवृक्क वल्कुट को ऐल्डोस्टेरॉन (aldosterone) हॉर्मोन के स्रावण को प्रेरित करता है। ऐल्डोस्टेरॉन स्रावी नलिका के दूरस्थ भाग में Na’ तथा जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है। इससे रक्त दाब तथा जी०एफ०आर० में वृद्धि होती है। यह जटिल क्रियाविधि रेनिन एन्जियोटेन्सिन (renin angiotensin mechanism) कहलाती है।

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प्रश्न 11.
नाम का उल्लेख कीजिए
(अ) एक कशेरुकी जिसमें ज्वाला कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जन होता है।
(ब) मनुष्य के वृक्क के वल्कुट के भाग जो मध्यांश के पिरामिड के बीच धंसे रहते हैं।
(स) हेनले लूप के समानान्तर उपस्थित केशिका का लूप।
उत्तर :
(अ) सेफेलोकॉडेंट (एम्फीऑक्सस)
(ब) बर्टिनी के स्तम्भ
(स) वासा रेक्टा।

प्रश्न 12.
रिक्त स्थान भरिए
(अ) हेनले लूप की आरोही भुजा जल के लिए………….जबकि अवरोही भुजा इसके लिए है।
(ब) वृक्क नलिका के दूरस्थ भाग द्वारा जल का पुनरावशोषण…………हार्मोन द्वारा होता है।
(स) अपोहन द्रव में………..पदार्थ के अलावा रक्त प्लाज्मा के अन्य सभी पदार्थ उपस्थित होते हैं।
(द) एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य द्वारा औसतन ग्राम यूरिया का प्रतिदिन उत्सर्जन होता
उत्तर :
(अ) अपारगम्य, पारगम्य
(ब) ADH
(स) नाइट्रोजनी व्यर्थ
(द) 25-30

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमोनिया से यूरिया का संश्लेषण कहाँ होता है?
(क) वृक्क में
(ख) रुधिर में
(ग) वृक्क नलिकाओं में
(घ) यकृत में
उत्तर :
(घ) यकृत में

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केशिकागुच्छ कहाँ पाये जाते हैं? इनका प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर :
केशिकागुच्छ बोमैन सम्पुट के मध्य स्थित होते हैं। यह रक्त केशिकाओं से बना जाल होता है। इसमें परानिस्यन्दन की क्रिया होती है। इसके फलस्वरूप ग्लोमेरुलर निस्यन्दन बनता है।

प्रश्न 2.
ग्लोमेरुलस का एक प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर :
ग्लोमेरुलस (glomerulus) में मूत्र निर्माण की परानिस्यन्दन (ultrafiltration) क्रिया सम्पन्न होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बहिःक्षेपण तथा उत्सर्जन में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
बहिःक्षेपण व उत्सर्जन के बीच अन्तर
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प्रश्न 2.
एमनिओटेलिज्म से आप क्या समझते हैं? यह किन जीवों में होता है? इसमें भाग लेने वाले अंगों की कार्यविधि लिखिए।
उत्तर :
कुछ जीव विलेयशील अमोनिया का उत्सर्जन करते हैं ऐसे जीव अमोनोटेलिक तथा यह प्रक्रिया एमनिओटेलिज्म कहलाती है। इस प्रक्रिया में यकृत की कोशिकाएँ डीएमीनेशन की क्रिया में अमीनो अम्लों को अपघटित करके अमोनिया बनाती हैं, जिसका सीधे ही उत्सर्जन हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) अमोनोटेलिक जन्तुओं के अन्तर्गत प्रोटोजोअन, क्रस्टेशियन, प्लेटीहेल्मिन्थीस, नीडेरियन, पोरीफेरन्स, इकाइनोडर्स तथा अन्य जलीय अकशेरुकीय जीव सम्मिलित होते हैं। इन जन्तुओं में अमोनिया का उत्सर्जन त्वचा, जल-क्लोम अथवा वृक्कों द्वारा होता है।

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प्रश्न 3.
मनुष्य के एक प्रारूपी वृक्क (नेफ्रॉन) का सम्पूर्ण पृष्ठीय, स्पष्ट, भली-भाँति नामांकित आरेखी चित्र खींचिए (वर्णन अनापेक्षित)। या मनुष्य की वृक्क नलिका का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर :

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्सर्जन किसे कहते हैं? जन्तुओं के मुख्य उत्सर्जी उत्पाद क्या है? उत्सर्जन क्यों आवश्यक है? मानव में मूत्र निर्माण की क्रियाविधि को समझाइए। “या अमोनोटेलिक उत्सर्जन किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए। या अमोनिया उत्सर्गी, यूरिक अम्ल उत्सर्गी तथा यूरिया उत्सर्गी प्राणियों से आप क्या समझते हैं? मानव वृक्क में मूत्र निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर :
[संकेत-उत्सर्जन की परिभाषा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 के उत्तर में देखें। ]

जन्तुओं के मुख्य उत्सर्जी उत्पाद

1. अमीनो अम्ल (Amino Acids) :
ये प्रोटीन के निम्नीकरण से बनते हैं। कुछ जन्तुओं में इनका सीधे ही उत्सर्जन हो जाता है।

2. अमोनिया (Ammonia) :
यकृत की कोशिकाएँ डीएमीनेशन (deamination) की क्रिया में अमीनो अम्लों को अपघटित करके अमोनिया बनाती हैं। यह काफी विषैला पदार्थ है। ऐसे जन्तुओं को अमोनिया उत्सर्गी (ammonotelic) कहते हैं। इन जन्तुओं में अमोनिया का सीधे ही उत्सर्जन हो जाता है।

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उदाहरणार्थ :
अलवेणजलीय मछलियाँ।

3. यूरिया (Urea) :
यकृत कोशिकाएँ अमीनो अम्लों के अपघटन से प्राप्त अमोनिया को अपेक्षाकृत कम विषैले यूरिया में बदलती हैं। यूरियो जल में विलेय होता है। अत: मूत्र के रूप में इसका उत्सर्जन स्तनियों में प्रमुख रूप से होता है। ऐसे जन्तु यूरिया उत्सर्गी (ureotelic) कहलाते हैं।

4. यूरिक अम्ल (Uric Acids) :
अनेक जन्तुओं में यह प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ होता है; जैसे-छिपकलियों तथा पक्षियों में। यह भी कम विषैला पदार्थ है। अमोनिया से इसका निर्माण होता है। यह जल में अविलेय होता है। अत: ठोस रूप में इसका उत्सर्जन होता है। ऐसे जन्तुओं को यूरिक अम्ल उत्सर्गी (uricotelic) कहते हैं। (UPBoardSolutions.com) मनुष्य में प्यूरीन्स के विखण्डन से भी यूरिक अम्ल का निर्माण होता है।

5. ट्राइमेथिल एमीन ऑक्साइड (Trimethyl Amine Oxide) :
यह प्रमुखतः समुद्री जन्तुओं का उत्सर्जी पदार्थ होता है।

6. ग्वानीन (Guanine) :
यह अघुलनशील है। कुछ जन्तुओं; जैसे—मकड़ियों, केचुओं आदि, में यह उत्सर्जी पदार्थ होता है।

7. अन्य उत्सर्जी पदार्थ :
प्यूरीन (purine), हिप्यूरिक अम्ल (hippuric acid), ऑर्निथिक अम्ल (ornithic acid), क्रिएटिन (creatine), क्रिएटिनी (creatinine) आदि भी नाइट्रोजनयुक्त पदार्थ हैं जिनकी कुछ मात्रा रुधिर में रहती है किन्तु अधिक मात्रा मूत्र या पसीने के रूप में शरीर से बाहरउत्सर्जित की जाती है।

8. एलेनीन (Alanine) :
यह मनुष्य में पिरीमिडीन्स के अपघटन से बनता है।

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उत्सर्जन की आवश्यकता

शरीर की कोशिकाओं में, उपापचय (metabolism) के फलस्वरूप, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जल, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल, रंगाएँ, लवण आदि कई ऐसे अपजात या अपशिष्ट (waste) पदार्थ बनते रहते हैं जो शरीर के लिए अनावश्यक ही नहीं, वरन् हानिकारक भी होते हैं। अत: कोशिकाएँ इन्हें निरन्तर अपने बाह्यकोशिकीय द्रव्य में विसर्जित करती रहती हैं। फिर इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर के बाहरी वातावरण में विसर्जित कर दिया जाता है। इनमें से CO2 का विसर्जन मुख्यत: श्वसन-क्रिया के अन्तर्गत, गैसीय-विनिमय (gaseous exchange) में हो जाता है। शेष अपशिष्ट पदार्थों में मुख्यत: प्रोटीन-विघटन से व्युत्पन्न पदार्थ होते हैं। इन सब पदार्थों को उत्सर्जी पदार्थ (excretory substances) कहते हैं। वातावरण में इनके विसर्जन को उत्सर्जन (excretion) कहते हैं। क्योकि उत्सर्जी पदार्थों का विसर्जन जल में घुली अवस्था में होता है, जल सन्तुलन अर्थात् परासरण नियन्त्रण(osmoregulation) भी उत्सर्जन का महत्त्वपूर्ण पहलू होता है।

मानव में मूत्र निर्माण की क्रियाविधि

[संकेत-उत्तर के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर देखें।]

प्रश्न 2.
उत्सर्जन, परानिस्यन्दन, वरणात्मक पुनः अवशोषण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। मानव मूत्र में सामान्यतया कौन-से घटक, कितनी प्रतिशत मात्रा में मौजूद रहते हैं? या मूत्र बनने की प्रक्रिया अथवा वृक्क नलिका में पुनरावशोषण की क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। या उत्सर्जन किसे कहते हैं? किसी स्तनधारी की एक मूत्रजन नलिका का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए एवं इसकी कार्य-विधि भी समझाइए। या वरणात्मक पुनरावशोषण(selective reabsorption) किसे कहते हैं? मनुष्य में यह कहाँ व कैसे होता है? या वृक्क नलिका में पुनरावशोषण की क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। या मूत्र का रासायनिक संघटन लिखिए। (UPBoardSolutions.com) मानव वृक्क नलिका के वरणात्मक पुनरावशोषण को नामांकित चित्र की सहायता से समझाइए। या परानिस्यन्दन एवं चयनात्मक पुनरावशोषण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या एक वृक्क नलिका की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए तथा परानिस्यन्दन एवं चयनात्मक पुनरावशोषण समझाइए। या मनुष्य की एक वृक्क नलिका का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए तथा मूत्र निर्माण की क्रियाविधि का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर :

उत्सर्जन

प्रत्येक जीव में कोशिकीय उपापचयी क्रियाओं (metabolic activities) के फलस्वरूप कई प्रकार के अपशिष्ट उत्पाद (waste products) बनते हैं, जो उसके शरीर के लिये निरर्थक एवं हानिकारक होते हैं। इन अपशिष्ट उत्पादों को शरीर से निष्कासित करने की जैव-क्रिया को उत्सर्जन (excretion) कहते हैं। निम्न श्रेणी के अनेकानेक जन्तु अपशिष्ट पदार्थों को शरीर की सतह से विसरण द्वारा उत्सर्जित करते हैं। अनेक उच्च श्रेणी के अकशेरुकी तथा कशेरुकी प्राणियों में इन अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन के लिए विशिष्ट अंग पाये जाते हैं, जो सम्मिलित रूप से सम्बन्धित प्राणि में उत्सर्जन तन्त्र (excretory system) का निर्माण करते हैं।

मूत्र निर्माण : क्रिया-विधि

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मूत्र निर्माण वृक्क नलिकाओं में होता है। मूत्र निर्माण की सम्पूर्ण क्रिया निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण होती है

  1. परानिस्यन्दन
  2. वरणात्मक या चयनात्मक पुनरावशोषण
  3. स्रावण

1. परानिस्यन्दन
वृक्कों में रुधिर परिसंचरण शरीर के अन्य अंगों की अपेक्षा काफी अधिक होता है। प्रत्येक वृक्क नलिका का सम्बन्ध दो प्रकार के रुधिर केशिकीय जालों (blood capillary networks) से होता है

  1.  बोमैन सम्पुट में स्थित ग्लोमेरुलस एक चौड़ी अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) द्वारा बनता है।
  2.  परिनलिका केशिका जाल (peritubular capillary network) ग्लोमेरुलस से आने वाली एक अपवाही धमनिका (efferent arteriole) द्वारा बनता है।

अपवाही धमनिका अपेक्षाकृत सँकरी होती है; अत: ग्लोमेरुलस से रुधिर का निष्कासन अपेक्षाकृत धीमी गति से होता है।ग्लोमेरुलस में रुधिर को उच्च दाब (लगभग 60 mm. Hg) बना रहता है। इसका पुरिणाम यह होता है कि ग्लोमेरुलस की कोशिकाओं की पतली भित्ति से तरल प्लाज्मा छनकर बाहर आता रहता है। ग्लोमेरुलस के साथ बोमैन सम्पुट की महीन व छिद्रिले (perforated) भित्ति, जो पोडोसाइट्स कोशिकाओं (podocytes cells) की बनी होती है, एक अधिक पारगम्य ग्लोमेरुलर कला (glomerular membrane) का निर्माण करती है। ग्लोमेरुलस की रुधिर केशिकाओं से प्लाज्मा इस कला के द्वारा छनकर ही बोमैन सम्पुट में पहुँच पाता है। इस तरल को ग्लोमेरुलर निस्यन्द (glomerular filtrate) तथा छनने की इस प्रकिया को परानिस्यन्दन  (ultrafiltration) कहते हैं। ग्लोमेरुलर निस्यन्द में रुधिराणु व प्लाज्मा प्रोटीन्स के अतिरिक्त रुधिर के लगभग सभी घटक पाये जाते हैं। इनमें जल, लवण, अमीनो अम्ल, यूरिक अम्ल, यूरिया, ग्लूकोज, क्रिटिनीन आदि उल्लेखनीय हैं।

2. वरणात्मक या चयनात्मक पुनरावशोषण
बोमैन सम्पुट के निस्यन्द में प्लाज्मा प्रोटीन्स को छोड़कर अन्य पदार्थ; जैसे-ग्लूकोज, यूरिया, लवण, अमीनो अम्ल आदि रुधिर के समान मात्रा में ही पाये जाते हैं। इस प्रकार यह प्रोटीन रहित प्लाज्मा के समपरासरणी (isotonic) होता है। समीपस्थ कुण्डलित नलिकाओं की भित्ति का भीतरी तल माइक्रोविलाई (microvilli) की उपस्थिति के कारण अत्यधिक विस्तृत होता है। इस क्षेत्र की कोशिकाएँ निस्यन्द के लगभग 80% भाग तक का पुनरावशोषण (reabsorption) कर उसे परिनलिका केशिका जाल के रुधिर में वापस पहुँचा देती हैं। इस क्रिया में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, विटामिन्स आदि तथा Na+, Cl, K+, Ca++,[latex]{ HCO }_{ 3}^{ – }[/latex], [latex]{ PO }_{ 4}^{ 3- }[/latex]आदि को सक्रिय स्थानान्तरण (active transport) होता है। इस क्रिया के बाद निस्यन्द का जल सामान्य परासरण द्वारा रुधिर में चला जाता है।

हेनले लूप में पहुँचने पर इसकी अवरोही भुजा (descending limb) से निस्यन्द का जल काफी मात्रा में बाहरी ऊतक द्रव्य में जाता रहता है। परिणाम यह होता है कि निस्यन्द धीरे-धीरे रुधिर के प्लाज्मा के उच्चपरासरणी (hypertonic) हो जाता है। अब निस्यन्द हेनले लूप की आरोही भुजा (UPBoardSolutions.com) (ascending limb) में पहुँचता है। इसकी भित्ति जल के लिए लगभग अपारगम्य, परन्तु NaCl व यूरिया के लिए कुछ सीमा तक पारगम्य होती है। वृक्क के वल्कलीय भाग के ऊतक द्रव्य में इन आयन्स की संख्या कम होती है। आरोही भुजा में उपस्थित निस्यन्द से Na+ व Cl आयन्स सामान्य प्रसरण द्वारा बाहरी ऊतक द्रव्य में निकलने लगते हैं। इससे निस्यन्द की मात्रा पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु यह रुधिर प्लाज्मा के समपरासरणी (isotonic) हो जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 19 Excretory Products and their Elimination  image 4

हेनले लूप की आरोही भुजा का मोटा भोग तथा दूरस्थ कुण्डलित नलिका मिलकर वृक्क नलिका का तनुकरण खण्ड (diluting segment) बनाते हैं। उपर्युक्त दोनों भागों की भित्तियाँ मोटी तथा जल व यूरिया के लिए अपारगम्य होती हैं। इस भाग में निस्यन्द के पहुंचने पर इसमें से Na+ व Cl आयन्स बाहर ऊतक द्रव्य में चले जाते हैं, जिससे कि निस्यन्द प्लाज्मा से निम्नपरासरणी (hypotonic) हो जाता है। अब निस्यन्द दूरस्थ कुण्डलित नलिका से संग्रह नलिका में पहुँचता है। संग्रह नलिका का ऊपरी भाग केवल जल के लिए तथा निचला भाग जल व यूरिया दोनों के लिए पारगम्य होता है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि ऊतक द्रव्य की परासरणीयता में निरन्तर (UPBoardSolutions.com) वृद्धि होती रहती है। इसके सन्तुलन के लिए संग्रह नलिका के निस्यन्द से जल की आवश्यक मात्रा तथा कुछ यूरिया का पुनरावशोषण होता है।

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3. स्रावण 
वृक्क नलिका की भित्ति की कोशिकाएँ परिनलिका जाल की रुधिर केशिकाओं के रुधिर से कुछ पदार्थों; जैसे-यूरिक अम्ल, K+ H+, आदि का अवशोषण कर उन्हें निस्यन्द में स्रावित करती रहती हैं।

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मूत्र (Urine) :
संग्रह नलिकाओं में निस्यन्द पूर्ण रूप से मूत्र में परिवर्तित हो जाता है। मूत्र के घटेक (components of urine) प्रायः इस प्रकार होते हैं95% जल, 2% अनावश्यक लवणों के आयन, 2.6% यूरिया, 0.3% यूरिक अम्ल तथा 0.1% अन्य अनावश्यक एवं अवशिष्ट पदार्थ। मूत्र थोड़ा अम्लीय (pH-6.00) (UPBoardSolutions.com) होता है। [संकेत-वृक्क नलिका के चित्र के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न 3 का उत्तर देखें]

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UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 15 Agreement of Subject and Verb

UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 15 Agreement of Subject and Verb

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Exercise 33

1. My brother as well as friends was invited to the feast.
2. None of the news is good.
3. Every boy and girl was eager to sing.
4. Pity as well as justice make a man great.
5. You as well as I have performed our duty.
6. The army was marching towards the enemy.
7. This is the shop which was highly damaged by fire.
8. Everyone of you is suitable for this post.
9. Where are your spectacles ?
10.Ten thousand rupees is a good salary.
11. Either he or his friends have deceived you.
12. All the thieves with their chief have run away.
13. The committee has elected its president.
14. Not only the doctor but also the compounder went on trying to save the patient.
15. Honey and ghee is a good medicine.

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