UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 4 Presentation of Data

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 4 Presentation of Data (आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित 1 से 10 तक के प्रश्नों के सही उत्तर चुनें
प्रश्न 1.
दण्ड-आरेख|
(क) एकविमी आरेख है।
(ख) द्विविमी आरेख है।
(ग) विमारहित आरेख है।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) एकविमी आरेख है।

प्रश्न 2.
आयत चित्र के माध्यम से प्रस्तुत किए गए आँकड़ों से आलेखी रूप से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं
(क) माध्य
(ख) बहुलक
(ग) मध्यिका
(घ) ये सभी
उत्तर :
(ग) मध्यिका

प्रश्न 3.
तोरणों के द्वारा आलेखी रूप में निम्न की स्थिति जानी जा सकती है|
(क) बेहुलक
(ख) माध्य
(ग) मध्यिका
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) मध्यिकी

प्रश्न 4.
अंकगणितीय रेखाचित्र के द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों से निम्न को समझने में मदद मिलती है
(क) दीर्घकालिक प्रवृत्ति
(ख) आँकड़ों में चक्रीयता
(ग) आँकड़ों में कालिकता
(घ) ये सभी
उत्तर :
(क) दीर्घकालिक प्रवृत्ति

प्रश्न 5. दण्ड-आरेख के दण्डों की चौड़ाई का एकसमान होना जरूरी नहीं है। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।

प्रश्न 6.
आयत चित्रों में आयतों की चौड़ाई अवश्य एकसमान होनी चाहिए। (सही/गलत)
उत्तर :
गलत।

प्रश्न 7.
आयत चित्र की रचना केवल आँकड़ों के संतत वर्गीकरण के लिए की जा सकती है। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।

प्रश्न 8.
आयत चित्र एवं स्तम्भ आरेख आँकड़ों को प्रस्तुत करने के लिए एक जैसी विधियाँ हैं। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।

प्रश्न 9.
आयत चित्र की मदद से बारम्बारता वितरण के बहुलक को आलेखी रूप में जाना जा सकता है। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।

प्रश्न 10.
तोरणों से बारम्बारता वितरण की मध्यिका को नहीं जाना जा सकता है। (सही/गलत
उत्तर :
गलत।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित को प्रस्तुत करने के लिए किस प्रकार का आरेख अधिक प्रभावी होता है?
(क) वर्ष-विशेष की मासिक वर्षा।
उत्तर :
वर्ष-विशेष की मासिक वर्षा को प्रस्तुत करने के लिए दण्ड-आरेख अधिक प्रभावी है क्योंकि यहाँ एक चर को ही प्रस्तुत करना है।
(ख) धर्म के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या का संघटन।
उत्तर :
धर्म के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या का संघटन प्रस्तुत करने के लिए सरल दण्ड आरेख ही अधिक उपयुक्त है। इसे अतिरिक्त घटक दण्ड आरेख भी बनाया जा सकता है।
(ग) एक कारखाने में लागत घटक।
उत्तर :
एक कारखाने में लागत घटक को प्रस्तुत करने के लिए बहुगुणी दण्ड आरेख अधिक प्रभावी है।

प्रश्न 12.
मान लीजिए आप भारत में शहरी गैर-कामगारों की संख्या में वृद्धि तथा भारत में शहरीकरण के निम्न स्तर पर बल देना चाहते हैं, जैसा कि उदाहरण 4.2 में दिखाया गया है। तो आप उसका सारणीयन कैसे करेंगे?
उत्तर :
भारत में शहरी कामगारों एवं गैर-कामगारों का हिस्सा
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सारणी देखने से पता चलता है कि भारत में शहरी गैर-कामगार की संख्या अधिक है जो यह दर्शाता है। कि भारत में शहरीकरण निम्न स्तर का है।

प्रश्न 13.
यदि किसी बारम्बारता सारणी में समान वर्ग अन्तरालों की तुलना में वर्ग अन्तराल असमान हों, तो आयत चित्र बनाने की प्रक्रिया किस प्रकार भिन्न होगी?
उत्तर :
वर्ग अन्तराल के समान होने पर आयत चित्र का आधार एकसमान होता है। आयतों की तुलना संगत आवृत्ति के आधार पर की जाती है। किन्तु जब वर्ग अन्तराल असमान होते हैं तो सर्वप्रथम आयतों की ऊँचाइयों को समायोजित किया जाता है और फिर इनकी तुलना की जाती है। आयतों की ऊँचाइयों के समायोजन की प्रक्रिया है-आवृत्ति घनत्व को वर्ग अन्तराल की चौड़ाई से विभाजित करना। इसमें निरपेक्ष आवृत्तियों का प्रयोग नहीं किया जाता है।

प्रश्न 14.
भारतीय चीनी कारखाना संघ की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसम्बर 2001 के पहले पखवाड़े के दौरान 38,77,000 टन चीनी का उत्पादन हुआ, जबकि ठीक इसी अवधि में पिछले वर्ष (2000 में) 37,87,000 टन चीनी का उत्पादन हुआ था। दिसम्बर 2001 में घरेलू खपत के लिए चीनी मिलों से 2,83,000 टन चीनी उठाई गई और 41,000 टन चीनी निर्यात के लिए थी, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में घरेलू खपत की मात्रा 1,54,000 टन थी और निर्यात शून्य था।
(क) उपर्युक्त आँकड़ों को सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत करें।
(ख) मान लीजिए आप इस आँकड़े को आरेख के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं तो कौन-सा आरेख चुनेंगे और क्यों?
(ग) इन आँकड़ों को आरेखी रूप में प्रस्तुत करें।
उत्तर :
(क) शीर्षक – भारत में चीनी का उत्पादन, उपभोग व निर्यात
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(ख) हम इन आँकड़ों को आरेख में प्रस्तुत करने के लिए बहुगुणी दण्ड चित्र का प्रयोग करेंगे। इस चित्र में हम अलग-अलग प्रकार के तथा अलग-अलग वर्षों के आँकड़ों को अधिक अच्छी तरह से दर्शा सकते हैं।
(ग) आरेख
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प्रश्न 15.
निम्नलिखित सारणी में कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद में क्षेत्रकवार अनुमानित वास्तविक संवृद्धि दर को (पिछले वर्ष से प्रतिशत परिवर्तन) प्रस्तुत किया गया है|
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उपर्युक्त आँकड़ों को बहु काल-श्रेणी आरेख द्वारा प्रस्तुत करें।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“एक सांख्यिकीय सारणी आँकड़ों का स्तम्भों तथा पंक्तियों में आँकड़ों का व्यवस्थित संगठन है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) प्रो० मार्शल
(ख) प्रो० रोबिन्स
(ग) प्रो० नीसवेंजर
(घ) प्रो० कॉनर
उत्तर :
(ग) प्रो० नीसवेंजर

प्रश्न 2.
सारणीयन सांख्यिकीय विश्लेषण में ……………………………………………. है।
(क) सहायक
(ख) असहायक
(ग) कभी-कभी सहायक
(घ) (क) और (ख) दोनों
उत्तर :
(क) सहायक

प्रश्न 3.
एक अच्छी सांख्यिकीय श्रेणी का गुण नहीं है
(क) सारणी का आकार उचित एवं सन्तुलित होना चाहिए
(ख) तुलनात्मक समंकों को दूरवर्ती खानों में रखा जाना चाहिए
(ग) बड़ी संख्याओं का उपसादन कर लेना चाहिए।
(घ) प्रत्येक वर्ग तथा उपवर्ग का योग दिया जाना चाहिए
उत्तर :
(ख) तुलनात्मक समंकों को दूरवर्ती खानों में रखा जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
इनमें से कौन नीरस समंकों को अर्थपूर्ण, रोचक व अधिक बोधगम्य बनाते हैं?
(क) शब्द
(ख) अंक
(ग) लेख
(घ) चित्र
उत्तर :
(घ) चित्र

प्रश्न 5.
किसमें एक ही प्रकार के संख्यात्मक तथ्यों के विभिन्न मूल्यों को दण्डों के द्वारा प्रकट किया जाता है?
(क) सरल दण्ड चित्र में
(ख) बहुगुणी दण्ड चित्र में
(ग) अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र में
(घ) आवृत्ति आयत चित्र में
उत्तर :
(क) सरल दण्ड चित्र में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आँकड़ों के प्रस्तुतीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
आँकड़ों को स्पष्ट तथा व्यवस्थित रूप से इस प्रकार से प्रस्तुत करना कि उन्हें सभी व्यक्ति सरलतापूर्वक समझ सकें और उनसे उचित परिणाम निकाल सकें, आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
पाठ्य प्रस्तुतीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
पाठ्य प्रस्तुतीकरण में आँकड़े अध्ययन की विषय-वस्तु के वर्णन का एक अंश होते हैं। इसे वर्णनात्मक प्रस्तुतीकरण भी कहते हैं।

प्रश्न 3.
पाठ्य प्रस्तुतीकरण किस दशा में उपयुक्त रहता है?
उत्तर :
पाठ्य प्रस्तुतीकरण तब उपयुक्त रहता है जब आँकड़ों की संख्या अधिक न हो तथा अध्ययन की विषय-वस्तु के रूप में आँकड़ों का आकार छोटा हो।

प्रश्न 4.
सारणीयन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
सारणीयन आँकड़ों के सांख्यिकीय विश्लेषण की प्रक्रिया को वह भाग है, जिससे विभिन्न श्रेणियों में आने वाले आँकड़ों को गिना एवं दिखाया जाता है।

प्रश्न 5.
सारणीयन की दो उपयोगिता बताइए।
उत्तर :

  • सारणीयम आँकड़ों को सुव्यवस्थित करता है।
  • सारणीयन सांख्यिकीय विश्लेषण में सहायक है।

प्रश्न 6.
बहुगुणी सारणी किसे कहते हैं?
उत्तर :
जब किसी घटना अथवा तथ्य से सम्बन्धित तीन से अधिक गुणों एवं विशेषताओं का प्रदर्शन एक-साथ किया जाता है तो इसे ‘बहुगुणी सारणी’ कहा जाता है।

प्रश्न 7.
एकविमा चित्र से क्या आशय है?
उत्तर :
वे चित्र जिनके बनाने में केवल एक ही विस्तार अथवा ऊँचाई को (चौड़ाई अथवा मोटाई का नहीं) प्रयोग किया जाता है, एकविमा चित्र कहलाते हैं।

प्रश्न 8.
दण्ड चित्र क्या है?
उत्तर :
दण्ड चित्र वह चित्र है जिसमें आँकड़ों को दण्डों या आयतों के रूप में प्रकट किया जाता है।

प्रश्न 9.
बहुगुणी दण्ड चित्र क्या हैं?
उत्तर :
बहुगुणी दण्ड चित्र वे दण्ड चित्र हैं जो दो-या-दो से अधिक तथ्यों के आँकड़ों को प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक तथ्य के लिए अलग-अलग दण्ड चित्र बनाए जाते हैं। प्रत्येक दण्ड को भिन्न रंग या चिह्न द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 10.
अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र क्या है?
उत्तर :
अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र वह चित्र है जो किसी तथ्य के कुल मूल्य तथा उपविभाजन को प्रस्तुत करता है। इसमें सम्पूर्ण मूल्य का एक दण्ड बनाकर उसका उपविभाजन कर दिया जाता है और दण्ड के | भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न रंग भर दिए जाते हैं।

प्रश्न 11.
प्रतिशत दण्ड चित्र क्या है?
उत्तर :
प्रतिशत दण्ड चित्र प्रदर्शन की वह विधि है जिसमें किसी तथ्य के विभिन्न भागों के मूल्यों को प्रतिशत के रूप में दिखाया जाता है।

प्रश्न 12.
वृत्तीय चित्र से क्या आशय है?
उत्तर :
वृत्तीय चित्र वह चित्र है जिसमें एक वृत्त (circle) को कई भागों में बाँटकर आँकड़ों के भिन्न-भिन्न प्रतिशत या सापेक्ष मूल्यों को प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 13.
आयत चित्र क्या है?
उत्तर :
आयत चित्र वह रेखाचित्र है जिसमें अखण्डित श्रृंखला (continuous series) से सम्बन्धित मदों तथा उनकी आवृत्तियों को आयतों के रूप में ग्राफ पेपर पर अंकित किया जाता है।

प्रश्न 14.
आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygon) क्या है?
उत्तर :बहुभुज आयत चित्र के प्रत्येक आयत के शीर्ष के मध्य बिन्दुओं को सरल रेखाओं द्वारा मिलाकर बनाया जाता है।

प्रश्न 15.
आवृत्ति वक्र (Frequency Polygon) क्या है?
उत्तर :
आवृत्ति वक्र आवृत्ति बहुभुज को मुक्त हस्त रीति से खींचा हुआ सरल रूप है।

प्रश्न 16.
आवृत्ति बहुभुज तथा आवृत्ति वक्र में क्या अन्तर है?
उत्तर :
आवृत्ति बहुभुज में मध्य बिन्दुओं को एक पैमाने की सहायता से मिलाया जाता है जबकि आवृत्ति वक्र में बिन्दुओं को मुक्त हस्त रीति द्वारा खींची जाने वाली रेखाओं द्वारा मिलाया जाता है।

प्रश्न 17.
तोरण अथवा ओजाइव अथवा संचयी आवृत्ति वक्र से क्या आशय है?
उत्तर :
तोरण अथर्वा संचयी आवृत्ति वक्र (Ogive) वह वक्र है जो ग्राफ पेपर पर संचयी आवृत्तियों को अंकित करके बनाया जाता है।

प्रश्न 18.
चित्रों की दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर :

  • चित्रों द्वारा यथार्थ संख्यात्मक प्रदर्शन सम्भव नहीं है। वे सन्निकट मूल्यों पर आधारित होते हैं।
  • चित्रों की सहायता से विभिन्न मूल्यों का सूक्ष्म अन्तर प्रदर्शित करना असम्भव है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आँकड़ों के पाठ-विषयक प्रस्तुतीकरण पर एक नोट लिखिए।
उत्तर :
आँकड़ों के पाठ-विषयक प्रस्तुतीकरण में आँकड़ों का विवरण पाठ में ही दिया जाता है। जब आँकड़ों का परिमाण बहुत अधिक न हो तो प्रस्तुतीकरण का यह स्वरूप अधिक उपयोगी होता है। उदाहरण-उत्तर प्रदेश के एक शहर मेरठ में 5 सितम्बर, 2006 को महँगाई के विरोध में एक बन्द आयोजित किया गया। इस दौरान 6 बाजार खुले तथा 28 बाजार बन्द पाए गए। 25 प्राथमिक विद्यालय खुले किन्तु 17 माध्यमिक विद्यालय, 7 महाविद्यालय बन्द रहे। उपयुक्तता—यह विधि उस समय उपयुक्त होती है जब आँकड़े संख्या में कम और आकार में सीमित हों। दोष—इसे समझने के लिए पूरे पाठ का अध्ययन आवश्यक है। पढ़ते समय महत्त्वपूर्ण बिन्दु छूट सकते

प्रश्न 2.
सारणीयन में प्रयुक्त वर्गीकरण के प्रकार बताइए।
उत्तर :
सारणीयन में प्रयुक्त वर्गीकरण के चार प्रकार होते हैं

  • गुणात्मक वर्गीकरण-जब वर्गीकरण गुणात्मक विशेषताओं के आधार पर किया जाए; जैसे–सामाजिक स्थिति, राष्ट्रीयता आदि।
  • मात्रात्मक वर्गीकरण-जब वर्गीकरण उन विशेषताओं के आधार पर किया जाए जिन्हें मापा जा सकता है; जैसे—आयु, लम्बाई, उत्पादन, आय आदि।।
  • कालिक वर्गीकरण-जब वर्गीकरण समय के आधार पर किया जाए; जैसे-घण्टे, दिन, सप्ताह, माह, वर्ष आदि।
  • स्थानिक वर्गीकरण–जब वर्गीकरण स्थान के आधार पर किया जाए; जैसे–गाँव, कस्बा, जिला, राज्य, देश आदि।

प्रश्न 3.
चित्रमय प्रदर्शन की प्रमुख सीमाएँ बताइए।
उत्तर :
चित्रमय प्रदर्शन की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  • चित्रों की उपयोगिता सामान्य व्यक्ति के लिए है, किसी विशेषज्ञ के लिए नहीं।
  • चित्रों के माध्यम से विभिन्न मूल्यों का सूक्ष्म अन्तर प्रदर्शित करना सम्भव नहीं होता।
  • चित्र अनेक प्रकार की तुलना करने में अनुपयोगी होते हैं।
  • जब मापों के मध्य विशाल अन्तर होता है तो उस अन्तर को चित्रों द्वारा प्रदर्शित करना कठिन हो जाता है।
  • चित्रों का और अधिक निर्वचन करना सम्भव नहीं होता।
  • गलत मापदण्ड पर बने चित्र भ्रामक होते हैं।
  • चित्र निष्कर्ष निकालने का केवलएक साधन हैं; अत: इनका प्रयोग सारणियों के साथ किया जाना चाहिए। :
  • सन्निकट मूल्यों पर आधारित होने के कारण चित्र तथ्यों का यथार्थ प्रदर्शन नहीं कर पाते।
  • तुलनात्मक अध्ययन के लिए समंकों का सजातीय होना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
बहुगुणी दण्ड चित्र की उदाहरण सहित निर्माण विधि समझाइए।
उत्तर :
बहुगुणीय दण्ड चित्र-जब दो-या-दो से अधिक सम्बन्धित तथ्यों की समय या स्थान के आधार पर तुलना करनी होती है, तब बहुगुणी दण्ड चित्रों का निर्माण किया जाता है। इसमें एक स्थान या समय से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों के दण्डों को एक-दूसरे से मिलाकर बनाया जाता है तथा थोड़ा स्थान छोड़कर दूसरे स्थान या समय से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों के दण्ड को एक-दूसरे से मिलाकर बनाया जाता है। इस प्रकार दिए गए सभी स्थानों या समय हेतु समान अन्तर पर संयुक्त दण्ड बना लिए जाते हैं। इन्हें बहुगुणीय दण्ड चित्र कहा जाता है। विभिन्न तथ्यों को प्रदर्शित करने वाले दण्डों को भिन्न-भिन्न रंगों या डिजाइनों द्वारा दर्शाया जाता है।

उदाहरण-एक कॉलेज के चार संकायों की छात्र संख्या में तीन वर्षों में होने वाले परिवर्तनों को बहुगुणी दण्ड चित्रों द्वारा प्रदर्शित कीजिए
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प्रश्न 5.
प्रतिशत अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र के निर्माण की प्रक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर :
प्रतिशत अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र-इन चित्रों का निर्माण प्रायः उस समय किया जाता है जब हमें विभिन्न दण्डों के उपविभागों की सापेक्ष तुलना करनी होती है। इसके निर्माण के लिए सर्वप्रथम प्रत्येक तथ्य या वर्ग या समूह से सम्बन्धित विभिन्न उपविभागों के समंकों को जोड़कर उसे 100 मान लिया जाता है तथा प्रत्येक उपविभाग के प्रतिशत ज्ञात कर लिए जाते हैं। तत्पश्चात् संचयी प्रतिशत ज्ञात कर अन्तर्विभक्त दण्ड चित्रों के अनुसार आरेख का निर्माण किया जाता है।

उदाहरण – परिवार ‘A’ और ‘B’ के सदस्यों के विवरण को अन्तर्विभक्त प्रतिशत दण्ड चित्र द्वारा दर्शाइए
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अन्तर्विभक्त प्रतिशत दण्ड चित्र बनाने के लिए पहले उपर्युक्त आँकड़ों को प्रतिशत में परिवर्तित करना पड़ता है।
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परिवार ‘A’ और ‘B’ के सदस्यों का अन्तर्विभक्त प्रतिशत दण्ड चित्र द्वारा प्रदर्शन
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प्रश्न 6.
अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र का निर्माण कैसे किया जाता है? उदाहरण दीजिए
उत्तर :
अन्तर्विभक्त दण्ड चित्र–अन्तर्विभक्त दण्ड चित्रों का निर्माण तब किया जाता है जब ऐसे तथ्यों की परस्पर तुलना करनी होती है जो कई भागों में विभक्त हैं। इनका निर्माण करने के लिए एक तथ्य या वर्ग या समूह से सम्बन्धित विभिन्न उपविभागों के समंकों को जोड़कर सर्वप्रथम सरल दण्ड चित्र बना लिए जाते। हैं। तत्पश्चात् प्रत्येक दण्ड को उसके उपविभागों के मूल्य के अनुसार विभक्त कर देते हैं। प्रत्येक उपविभाग के लिए अलग-अलग रंग, आभा या छाया का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण – एक कॉलेज के चार संकायों की छात्र संख्या में तीन वर्षों में होने वाले परिवर्तनों को अन्तर्विभक्त दण्ड चित्रों द्वारा प्रदर्शित कीजिए
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हल :
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प्रश्न 7.
कोणीय अथवा वृत्त खण्ड चित्र के निर्माण की विधि उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर :
कोणीय अथवा वृत्तखण्ड चित्रकोणीय अथवा वृत्तखण्ड चित्रे वह चित्र है जिसमें एक वृत्त को अनेक उपविभागों में बाँटेकर आँकड़ों के भिन्न-भिन्न प्रतिशत या सापेक्ष मूल्यों को प्रदर्शित किया जाता है। वृत्त खण्ड चित्र बनाने के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं

  • सर्वप्रथम किसी श्रृंखला के निरपेक्ष मूल्यों को प्रतिशत मूल्यों में बदला जाता है।
  • एक वृत्त के चार कोण होते हैं। प्रत्येक कोण 90° का होता है। प्रत्येक वृत्त में कोणों का जोड़ 90° x 4 = 360° होता है।
  • किसी आँकड़े से सम्बन्धित विभिन्न मूल्यों को 360° अंश के विभिन्न भागों में प्रस्तुत किया जाता है। प्रत्येक भाग का अंश निकालने के लिए उसके मूल्य को 360° से गुणा करके 100 से भाग कर दिया जाता है।
  • प्रत्येक मूल्य को वृत्त में घड़ी की सुई की दिशा के अनुसार प्रकट किया जाता है।

उदाहरण – निम्नलिखित समंकों को कोणीय चित्र द्वारा निरूपित कीजिए
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हल :
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प्रश्न 8.
आयत चित्र का निर्माण कैसे किया जाता है? एक समान वर्गान्तर वाला आयतचित्र बनाइए।
उत्तर :
आयत चित्र-आयत चित्र में श्रृंखला के मदों एवं उनकी आवृत्तियों को आयतों के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इसमें वर्गान्तर को Ox अक्ष पर तथा आवृत्तियों को OY अक्ष पर प्रकट किया जाता है। ऑयतों की ऊँचाई आवृत्तियों के अनुपात में रखी जाती है। प्रत्येक वर्गान्तर की सीमाओं के माप बिन्दुओं पर आवृत्ति की ऊँचाई के बराबर लम्बी रेखाएँ खींचकर आयत बना लिए जाते हैं। आयत एक-दूसरे से मिले हुए। रहते हैं। यदि श्रेणी समावेशी है तो उसे अपवर्जी बना लेते हैं। उदाहरण—निम्नांकित समंकों को आवृत्ति आयत चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए और बहुलक का मूल्य निकालिए।

वर्गान्तर : 0-10   10-20   20-30   30-40   40-50   50-60   60-70
आवृत्ति :    4           8           14         20          30          15          6
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प्रश्न 9.
एक काल्पनिक उदाहरण की सहायता से असमान वर्गान्तर वाला आयत चित्र बनाइए।
उत्तर :
यदि वर्गान्तर असमान है तो आवृत्तियों को सर्वप्रथम समायोजित किया जाता है। इसे उदाहरण के बाद समझाया गया हैउदाहरण
मजदूरी :                    50-55   55-60   60-65   65-70   70-80   80-100
श्रमिकों की संख्या :      10          18          40        25          32         24
उपर्युक्त उदाहरण में वर्गान्तर असमान है। आवृत्ति वितरण में न्यूनतम वर्गान्तर 5 का है जबकि बाद में ये वर्गान्तर क्रमशः 10 व 20 हैं। इसलिए आवृत्ति चित्र बनाने से पहले आवृत्ति घनत्व की रचना की जाएगी। आवृत्तियों को समायोजित तत्त्व से भाग देने पर जो संख्या आती है, उसे आवृत्ति घनत्व कहा जाता है। अर्थात्,
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समायोजित तालिका इस प्रकार होगी—
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उपर्युक्त तालिका में पहले चार का वर्गान्तर 5 है। पाँचवें का 80 -70 = 10 है। यह न्यूनतम वर्गान्तर 5 से दुगुना है। अतः इसकी मदों को दो से भाग किया जाएगा। छठे का वर्गान्तर 100 – 80 = 20 है जो न्यूनतम वर्गान्तर से चार गुणा अधिक है। अतः इसकी मदों को चार से भाग किया जाएगा। उपर्युक्त तालिका के आधार पर आवृत्ति चित्र इस प्रकार बनेगा
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प्रश्न 10.
आवृत्ति बहुभुज (frequency polygon) क्या है? एक काल्पनिक तालिका की सहायता से आवृत्ति बहुभुज की रचना कीजिए।
उत्तर :
आवृत्ति बहुभुज-आयत चित्र के प्रत्येक आयत के शीर्ष के मध्य बिन्दुओं को सरल रेखाओं द्वारा मिलाकर आवृत्ति ब्रहुभुज बनाया जाता है। इसके लिए प्रत्येक वर्ग के मध्य बिन्दु के मूल्य को ग्राफ पेपर पर अंकित कर लिया जाता है। इसके पश्चात् इन बिन्दुओं को सरल रेखाओं द्वारा मिला दिया जाता है। इसके फलस्वरूप जो रेखाचित्र बनता है, उसे आवृत्ति बहुभुज (frequency polygon) कहते हैं। उदाहरण—निम्नलिखित तालिका में कक्षा 11 के विद्यार्थियों के अर्थशास्त्र के प्राप्तांक दिए हुए हैं। इन्हें आवृत्ति बहुभुज द्वारा दर्शाइए

प्राप्तांक:                        0-10  10-20   20-30   30-40   40-50   50-60   60-70
विद्यार्थियों की संख्या :     5        10          15          20         12            8            5
हल :
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प्रश्न 11.
ओजाइव या संचयी आवृत्ति वक्र अथवा तोरण किसे कहते हैं? इसकी निर्माण प्रक्रिया क्य है? काल्पनिक उदाहरण की सहायता से संचयी आवृत्ति वक्र बनाइए।
उत्तर :
संचयी आवृत्ति वक्र—ओजाइव या संचयी आवृत्ति वक्र वह वक्र है जो ग्राफ पेपर पर संचयी आवृत्तियों को अंकित करके बनाया जाता है। इसकी रचना की दो विधियाँ हैं

  • ‘से कम विधि (Less than Method)-इस विधि में हम निचली सीमाओं से आरम्भ करते हैं। और आवृत्तियों को जोड़ते जाते हैं।
  • ‘से अधिक विधि (More than Method)—इस विधि में हम ऊपरी सीमाओं से आरम्भ करके

आवृत्ति को घटाते जाते हैं। उदाहरण-निम्नांकित तालिका में 11वीं कक्षा के विद्यार्थियों के ‘सांख्यिकी’ में प्राप्त अंकों का विवरण दिया हुआ है। इसके आधार पर ‘से कम’ ओजाइव एवं ‘से अधिक’ ओजाइव ( तोरण)
बनाइएप्राप्तांक:                  0-5   5-10   10-15   15-20   20-25   25-30   30-35   35-40
विद्यार्थियों की संख्या :          4       6          10        10          25         22         18           5
हल :
सर्वप्रथम ‘से कम’ और ‘से अधिक आधार पर संचयी आवृत्ति बनाई जाएगी।
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प्रश्न 12.
निम्नांकित सारणी में भारत में गत् 8 वर्षों के कच्चे लोहे के उत्पादन को दर्शाया गया है।
समंकों को उपयुक्त रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित कजिए
वर्ष :                                2009   2010   2011   2012   2013   2014   2015   2016
उत्पादन (000 टन) :      19         21        25       48       67        76       90       97
हल :
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प्रश्न 13.
एक नगरपालिका के आय-व्यय और बचत/घाटे के निम्नांकित समंकों को बिन्दुरेखीय
चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए
वर्ष :                             2008   2009   2010   2011   2012   2013   2014   2015   2016
आय ₹ दस लाख :         5.0       5.5       6.0      7.7      8.5     10.2    10.6     11.2     12.0
व्यय ₹ दस लाख :         4.0       5.0       6.5      8.0     10.0     9.6     10.9     11.0     12.6
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सारणीयन का अर्थ बताइए। इसके उद्देश्य, उपयोगिता एवं सीमाओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सारणीयन : अर्थ एवं परिभाषा आँकड़ों को एकत्र कोर लेने के पश्चात् उन्हें एक तार्किक क्रम में रखा जाता है। इस प्रक्रिया को सारणीयन कहा जाता है। सारणीयन में वर्गीकृत आँकड़ों को कॉलमों या स्तम्भों एवं पंक्तियों में दिखाया जाता है। इसको निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया गया है–

  • प्रो० नीसवेंजर के अनुसार – “एक सांख्यिकीय सारणी आँकड़ों का स्तम्भों (कॉलम) तथा पंक्तियों में आँकड़ों का व्यवस्थित संगठन है।”
  • प्रो० कॉनर के अनुसार – “सारणीयन किसी विचाराधीन समस्या को स्पष्ट करने के उद्देश्य से किया जाने वाला सांख्यिकीय तथ्यों का क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है।”

सारणीयन के उद्देश्य

सारणीयन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. आँकड़ों को सुव्यवस्थित बनाना – सारणीयन का प्रमुख उद्देश्य एकत्रित सामग्री का वर्गीकरण , कर लेने के पश्चात् इसे अधिक व्यवस्थित रूप प्रदान करना है ताकि निर्वचन की प्रक्रिया सरल हो सके।
  2. आँकड़ों को बोधगम्य बनाना – सारणीयन का दूसरा प्रमुख उद्देश्य आँकड़ों को सरल रूप से कॉलमों एवं कतारों में दिखाकर इन्हें अधिक बोधगम्य बनाना है।
  3. आँकड़ों की विशेषताओं को स्पष्ट करना – सारणी का एक प्रमुख उद्देश्य एकत्रित आँकड़ों की विविध प्रकार की विशेषताओं को प्रदर्शित करना है।
  4. आँकड़ों का संक्षिप्तीकरण करना – सारणीयन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य विस्तृत सामग्री का कम-से-कम स्थान पर प्रदर्शन करना है।
  5. आँकड़ों को तुलना योग्य बनाना – सारणीयन का अन्तिम उद्देश्य आँकड़ों की तुलना करने में सहायता देना है।

सारणीयन की उपयोगिता
सारणीयन की उपयोगिता को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

  • सारणीयन आँकड़ों को सुव्यवस्थित करता है।
  • सारणीयन विस्तृत आँकड़ों को संक्षिप्त रूप प्रदान करता है।
  • सारणीयन तुलना को सरल बनाता है।
  • सारणीयन सांख्यिकीय विश्लेषण में सहायक है।।
  • सारणीयन में न केवल समय व श्रम की बचत होती है अपितु उसमें स्पष्टता आ जाती है।
  • सारणीयन सांख्यिकीय गणनाओं व विश्लेषण में सहायक होता है।
  • सारणीबद्ध समंकों का निर्वचन करना व रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित करना सरल एवं सुविधाजनक हो जाता है।

सारणीयन की सीमाएँ
सारणीयन की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  • सारणीयन द्वारा केवल गणनात्मक आँकड़ों का ही प्रदर्शन किया जा सकता है, गुणात्मक तथ्यों का नहीं।
  • सारणीयन द्वारा जिन आँकड़ों का प्रदर्शन किया जाता है, उन्हें सामान्य व्यक्तियों द्वारा समझने में कठिनाई हो सकती है। वास्तव में, इसका उपयोग केवल विशिष्ट एवं उच्च ज्ञान वाले व्यक्तियों तक ही सीमित है।
  • सारणीयन का महत्त्व सीमित है क्योंकि एक सारणी में सम्पूर्ण सामग्री का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 2.
सारणी के विभिन्न प्रकारों को बताइए। सरल सारणी व जटिल सारणी के उदाहरण दीजिए।
उत्तर :

सारणी के प्रकार

सांख्यिकीय सामग्री का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है
(अ) उद्देश्य के आधार पर सारणीयन – उद्देश्य के आधार पर सारणियाँ दो प्रकार की होती हैं
1. सामान्य उद्देश्य वाली सारणी – क्रॉक्सटन व काउडेन के शब्दों में – “सामान्य उद्देश्य वाली सारणी का सबसे पहला और सामान्यत: एकमात्र उद्देश्य समंकों को इस प्रकार रखना होता है कि व्यक्तिगत पद पाठक द्वारा शीघ्र हूँढ़े जा सकें।” अत्यधिक विस्तृत होने के कारण यह सारणी अधिक उपयुक्त नहीं समझी जाती।

2. विशेष उद्देश्य वाली अथवा संक्षिप्त सारणी – 
यह किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए तैयार की जाती है और इसका आकार सामान्य सारणी से छोटा होता है।

(ब) रचना के आधार पर सारणीयन – रचना के आधार पर सारणियाँ निम्नलिखित दो प्रकार की हो सकती हैं–
1. सरल सारणी – सरल सारणी में समंकों को केवल एक ही गुण अथवा विशेषता के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार की सारणी के केवल दो ही भाग होते हैं। उदाहरणार्थ
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2. जटिल सारणी – जब समंकों को एक से अधिक विशेषताओं के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है। तो वह ‘जटिल सारणी’ कहलाती है। जटिल सारणी निम्नलिखित प्रकार की हो सकती है
(i) द्विगुणीय सारणी – इस सारणी में दो परस्पर सम्बन्धित गुणों अथवा लक्षणों का प्रदर्शन एक साथ किया जाता है। उदाहरणार्थ
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(ii) त्रिगुणीय सारणी – इस सारणी में किसी घटना अथवा तथ्य से सम्बन्धित तीन विशेषताओं का एक साथ प्रदर्शन किया जाता है। उदाहरणार्थ
त्रिगुणीय सारणी
2015-16 में ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों के लिंग एवं वैवाहिक
स्तर के आधार पर सांख्यिकी’ में प्राप्तांक
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(iii) बहुगुणीय सारणी – जब किसी घटना अथवा तथ्य से सम्बन्धित तीन से अधिक गुणों:एथें विशेषताओं का प्रदर्शन एक साथ किया जाता है तो इसे ‘बहुगुणी सारणी’ कहा जाता है। उदाहरणार्थ
बहुगुणीय सारणी
2015-16 में ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों के लिंग एवं वैवाहिक स्तर के
आधार पर सांख्यिकी’ में प्राप्तांक कॉलेज प्राप्तांक
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प्रश्न 3.
सारणी का निर्माण करते समय क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए? इसके सामान्य नियम क्या हैं?
उत्तर :
सारणी का निर्माण करते समय सावधानियाँ किसी भी सारणी का निर्माण करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए

  1. शीर्षक (Heading)—प्रत्येक सारणी का संक्षिप्त, स्पष्ट एवं पूर्ण शीर्षक होना चाहिए।
  2. स्तम्भ अथवा कॉलम (Columns)—सारणी का निर्माण करते समय स्तम्भों के आकार व संख्या का ध्यान रखना चाहिए। स्तम्भ अधिक नहीं होने चाहिए तथा इनका आकार समान अनुपात में तथा समान आधार पर निश्चित किया जाना चाहिए।
  3. अनुशीर्षक (Captions)-अनुशीर्षक संक्षिप्त एवं स्पष्ट होना चाहिए।
  4. कतारें अथवा पंक्तियाँ (Rows)-क्षैतिज रेखाओं द्वारा बने खानों को ‘कतारे” कहा ज़ात है। कतारों में सूचना का आधार आँकड़ों का कोई भी गुण हो सकता है।
  5. स्तम्भों का क्रम (Sequence of Columns)-स्तम्भों का क्रम सोच-समझकर निर्धारित करना चाहिए। सर्वाधिक महत्त्व की सूचनाएँ बायीं ओर के स्तम्भों से शुरू की जानी चाहिए। तुलना किए जाने वाले स्तम्भों को साथ-साथ रखा जाना चाहिए।
  6. टिप्पणियाँ (Notes)-यदि सारणी में दिए गए तथ्यों के बारे में विशेष सूचना देना आवश्यक हो और उसका प्रदर्शन सम्भव न हो तो सारणी में दिखाए गए आँकड़ों पर कोई संकेत जैसे * या + आदि देकर नीचे इसी प्रकार का संकेत बनाकर टिप्पणी लिखी जाती है।
  7. खानों की रूलिंग (Ruling of Columns)-विषय-सामग्री का महत्त्वपूर्ण भाग मोटी या दोहरी रेखाओं से बनाया जाना चाहिए।
  8. योग (Total)–विभिन्न खानों की संख्याओं का योग दिया जाना चाहिए। योग की व्यवस्था दोनों ओर से होनी चाहिए।
  9. स्रोत (Source)-सारणी के नीचे समंकों का स्रोत स्पष्ट किया जाना चाहिए।
  10. सामान्य नियम-
  • सारणी में अत्यधिक तथ्यों का समावेश नहीं होना चाहिए।
  • संख्याओं को उपसादित करने के बाद ही लिखा जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में आवश्यक टिपपणी भी दी जानी चाहिए।
  • सारणी उपलब्ध स्थान के अनुसार ही नियोजित की जानी चाहिए।
  • तुलनात्मक समंकों को निकटवर्ती खानों में रखा जाना चाहिए।
  • साप की इकाई को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
  • अनुमानित अथवा उपलब्ध न होने वाली संख्याओं के सम्बन्ध में टिप्पणी देनी चाहिए।
  • सारणी का रूप आकर्षक होना चाहिए।
  • संख्याओं को लिखते समय उनके स्थानीय मान को ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 4.
एक अच्छी सांख्यिकीय श्रेणी के गुण बताइए।
उत्तर :

एक अच्छी सांख्यिकीय श्रेणी के गुण

एक अच्छी सांख्यिकीय श्रेणी (उत्तम सारणी) में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  • सारणी का आकार उचित एवं सन्तुलित होना चाहिए।
  • तुलनात्मक समंकों को निकटवर्ती खानों में रखा जाना चाहिए।
  • अनुपात, प्रतिशत आदि को मूल समंकों के निकट ही लिखा जाना चाहिए और उनके गणनात्मक आधार पर संकेत दिए जाने चाहिए।
  • बड़ी संख्याओं का उपसादन कर लेना चाहिए।
  • प्रत्येक वर्ग तथा उपवर्ग का योग दिया जाना चाहिए।
  • प्रत्येक सारणी के ऊपर संक्षिप्त, स्पष्ट तथा स्वयं परिचायक शीर्षक होना चाहिए।
  • उपशीर्ष और अनुशीर्ष सूक्ष्म, स्पष्ट व स्वयं परिचायक होने चाहिए।
  • सारणी में पदों की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। पदों में क्रमबद्धता होनी चाहिए।
  • प्रत्येक सारणी की संख्या सारणी के सबसे ऊपर दी जानी चाहिए।
  • मोटी तथा पतली रेखाओं के प्रयोग से विभिन्न खानों के तथ्यों को प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
  • अनुमानित संख्याओं व उपलब्ध न होने वाली संख्याओं के सम्बन्ध में टिप्पणी दी जानी चाहिए।
  • समंकों अथवा शब्दों को अधिक स्पष्ट करने के लिए सारणी के नीचे संक्षिप्त टिप्पणियाँ दी जानी चाहिए।
  • सारणी के ऊपर एक किनारे पर या एक खाने में माप की इकाई को अवश्य लिखना चाहिए।
  • गणन क्रिया का संकेत जैसे (col. 1 + col. 2) आदि दिए जाने चाहिए।’
  • सारणी उपलब्ध स्थाने के अनुसार नियोजित की जानी चाहिए।
  • सांख्यिकी में अत्यधिक तथ्यों को समावेश नहीं करना चाहिए।
  • सारणी के नीचे वह स्रोत दिया जाना चाहिए जहाँ से समंक उपलब्ध किए गए हैं।
  • सारणी का रूप आकर्षक होना चाहिए।

प्रश्न 5.
सांख्यिकी में चित्रों की आवश्यकता एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी विज्ञान का एक प्रमुख कार्य विशाल व जटिल समंक समूहों को इस प्रकार प्रस्तुत करना है कि वे सरल, स्पष्ट एवं समझने योग्य हो जाएँ। इस कार्य के लिए अनेक सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जाता है। इसमें समंकों का चित्रमय प्रदर्शन एक महत्त्वपूर्ण विधि है। चित्र नीरस समंकों को अर्थपूर्ण, रोचक व अधिक बोधगम्य बनाते हैं। चित्रमय प्रदर्शन की आवश्यकता, महत्त्व अथवा उपयोगिता को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. आकर्षक एवं प्रभावी – चित्र आकर्षक होते हैं तथा मानव मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव डालते हैं। सामान्य व्यक्ति जो समंकों के जाल में उलझना नहीं चाहता चित्रों का रुचि के साथ अवलोकन करता है।

2. तथ्यों को सरल व बोधगम्य बनाना – 
चित्र जटिल एवं अव्यवस्थित विशाल तथ्यों को सरल वे सुबोध बनाते हैं। चित्रों के माध्यम से समंकों की समस्त विशेषताएँ स्पष्ट हो जाती हैं। प्रो० स्टीफन कल्फ के शब्दों में–“एक चित्र अधिक स्पष्ट तथा चित्त को सीधे किर्षित करने वाली तस्वीर प्रदान करता है।”

3. तुलना में सहायक – 
चित्रों से विभिन्न समंक समूहों में तुलना करना सरल हो जाता है। चित्रमय प्रदर्शन का एक प्रमुख उद्देश्य समंकों को तुलनीय बनाना है।

4. समय व श्रम की बचत – 
चित्रों द्वारा प्रदर्शित समंकों को बिना मस्तिष्क पर अधिक भार डाले ही सरलता से समझा जा सकता है। इससे समय व श्रम की बचत होती है।

5. व्यापक उपयोगिता – 
समंकों के चित्रमय प्रदर्शन का व्यापक प्रयोग होता है। आर्थिक, व्यापारिक, शासकीय, सामाजिक तथा अन्य क्षेत्रों में समंकों का व्यापक रूप से उपयोग होता है।

6. विशेष ज्ञान व प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं – 
चित्र समझने में सरल होते हैं। इसके लिए किसी विशेष ज्ञान व प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि विज्ञापन में चित्रों की सहायता ली जाती है।

7. अधिक समय तक स्मरणीय – विशाल व जटिल समंकों को याद रखना कठिन होता है, जबकि चित्रों द्वारा प्रदर्शित किए गए निष्कर्ष अधिक समय तक याद रहते हैं।

8. अधिक जानकारी देना – 
चित्र समंकों को सापेक्ष रूप में प्रस्तुत करते हैं। साथ में वे समंकों में विद्यमान प्रवृत्ति और उस प्रवृत्ति में परिवर्तनों की भी स्पष्ट करते हैं।

प्रश्न 6.
चित्र रचना के सामान्य नियम क्या हैं? चित्रमय प्रदर्शन की सीमाएँ बताइए।
उत्तर :

चित्र रचना के सामान्य नियम

चित्रे रचना एक कला है। इसे अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ सामान्य नियमों का पालन करना होता है। ये सामान्य नियम निम्नलिखित हैं—

  • चित्र आकर्षक, स्वच्छ व प्रभावशाली होने चाहिए।
  • ज्यामितीय आकृतियों की माप शुद्ध एवं अनुपात के हिसाब से होनी चाहिए अन्यथा निष्कर्ष भ्रामक होंगे।
  • चित्र न तो बहुत बड़ा होना चाहिए और न बहुत छोटा।
  • चित्र रेखापत्र के मध्य में होना चाहिए।
  • कागज के आकार तथा समंकों की प्रकृति के आधार पर मापदण्ड का उल्लेख चित्र के एक कोने में होना चाहिए।
  • प्रत्येक चित्र के ऊपर उचित परन्तु स्पष्ट व संक्षिप्त शीर्षक होना चाहिए। आवश्यकतानुसार उपशीर्षक भी दिए जाने चाहिए।
  • पटरी, परकार व चाँदे की सहायता से चित्र शुद्ध बनाए जाने चाहिए। निर्धारित मापदण्ड का पूर्णत: पालन किया जाना चाहिए।
  • चित्र के ऊपर कोने में उपयुक्त चिह्नों द्वारा विभिन्न तथ्यों के संकेत दिए जाने चाहिए।
  • विभिन्न प्रकार के समंकों को चित्रित करने के लिए उपयुक्त विधि का चुनाव करना चाहिए।
  • चित्र बनाने में साधन एवं शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  • चित्रों को मोटी या दोहरी रेखाओं से घेर देना चाहिए।
  • चित्र में आँकड़ों के महत्त्वपूर्ण अंशों को गहरे रंग से प्रदर्शित करना चाहिए।

चित्रमय प्रदर्शन की सीमाएँ

चित्र तथ्यों को केवल मोटे रूप में प्रस्तुत करते हैं; अतः चित्र उन व्यक्तियों के लिए भ्रामक होते हैं जो सावधानीपूर्वक अध्ययन किए बिना ही उनसे निष्कर्ष निकाल लेते हैं। एम० जे० मोरोने के शब्दों में-“किसी चित्र का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त चौकन्ना रहना आवश्यक होता है। वह इतना सरल, इतना स्पष्ट तथा इतना मनभावी होती है कि असावधान व्यक्ति आसानी से मूर्ख बन जाता है।” चित्रमय प्रदर्शन की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  • चित्रों की उपयोगिता सामान्य व्यक्ति के लिए है, किसी विशेषज्ञ के लिए नहीं।
  • चित्रों के माध्यम से विभिन्न मूल्यों का सूक्ष्म अन्तर प्रदर्शित करना सम्भव नहीं होता।
  • चित्र अनेक प्रकार की तुलना करने में अनुपयोगी होते हैं।
  • जब मापों के मध्य विशाल अन्तर होता है तो उस अन्तर को चित्रों द्वारा प्रदर्शित करना कठिन हो जाता है।
  • चित्रों को और अधिक निर्वचन करना सम्भव नहीं होता। 6. गलत मापदण्ड पर बने चित्र भ्रामक होते हैं।
  • चित्र निष्कर्ष निकालने का केवल एक साधन है; अत: इसका प्रयोग सारणियों के साथ किया जाना चाहिए।
  • सन्निकट मूल्यों पर आधारित होने के कारण चित्र तथ्यों का यथार्थ प्रदर्शन नहीं कर पाते।
  • तुलनात्मक अध्ययन के लिए समंकों का सजातीय होना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
समंकों के बिन्दुरेखीय प्रदर्शन का महत्त्व बताइए।
उत्तर :
आँकड़ों को स्पष्ट, आकर्षक एवं रुचिकर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए सांख्यिकीय अनुसन्धान में बिन्दुरेखीय चित्रों का प्रदर्शन किया जाता है। इनका निर्माण बिन्दुरेखीय पत्र (ग्राफ पेपर) पर किया जाता है। ये चित्र दो चरों के परस्पर सम्बन्ध अथवा परस्पर निर्भरता को अधिक अच्छे ढंग से समझने में सहायक होते हैं। इनके माध्यम से दो चरों में होने वाले परिवर्तन का अनुमान अधिक शीघ्रता से लगाया जा सकता है।
बिन्दुरेखीय चित्रों का महत्त्व बिन्दुरेखीय चित्रों के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

1. तुलना करने तथा सह – सम्बन्ध दिखाने में सहायक–बिन्दुरेखीय चित्र समंकों अथवा तथ्यों की तुलना करने में सहायक हैं इनसे केवले तुलना में ही सहायता नहीं मिलती अपितु दो चरों (Variables) में क्या सम्बन्ध है इसका भी पता चला जाता है।

2. सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए उपयोगी – 
बिन्दुरेखीय चित्र साधारण व्यक्तियों तथा सांख्यिकीय के छात्रों और अनुसन्धानकर्ता सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए उपयोगी हैं क्योंकि इनसे हमें तथ्यों का सरसरी ज्ञान मात्र ही नहीं होता अपितु चरों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा परिवर्तन की दिशाओं का पता भी सरलता से हो जाता है।

3. आँकों के परिशुद्ध प्रदर्शन में सहायक – 
बिन्दुरेखीय चित्र अधिक स्पष्ट, सुबोध एवं परिशुद्ध होते हैं क्योंकि इनमें प्रत्येक बिन्दु तथा रेखा को अपना विशिष्ट महत्त्व होता है।

4. सांख्यिकीय अनुमापन में सहायक – 
बिन्दुरेखीय चित्रों से हमें भूयिष्ठक तथा मध्यका का भी अनुमान हो जाता है। छूटी हुई संख्या का पता लगाने अथवा किसी विशेषता की व्याख्या करने में बिन्दुरेखीय चित्र सहायक हैं।

5. आँकड़ों की विवेचना में सहायक – 
बिन्दुरेखीय चित्रों से समय-क्रम (Time series), सतत पदमालाओं (Continuous series) तथा आवृत्ति वितरण (Frequency distribution) का प्रदर्शन भी सम्भव हैं आन्तरगणन (Interpolation) का भी इन चित्रों से पता चल जाता है। इस . प्रकार ये आँकड़ों की विवेचना में भी सहायक हैं।

6. समय तथा धन की बचत – 
बिन्दुरेखीय चित्र अन्य चित्रों की अपेक्षा सरलता से बनाए जा सकते हैं, इसलिए समय तथा धन की बचत होती है। इनमें केवल ग्राफ पेपर, पेंसिल, रबर तथा पैमाने की ही आवश्यकता पड़ती है।

7. आकर्षक व प्रभावशाली – 
बिन्दुरेखीय चित्र बहुत ही आकर्षक होते हैं। उन्हें देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से प्रभावित हो जाता है।

8. समझने में सरल – 
समंकों की अव्यवस्थित एवं विशाल राशि बिन्दुरेख के द्वारा सरल व सुबोध बन जाती है जिसे साधारण व्यक्ति भी सरलता से समझ लेता है।

9. स्थायी प्रभाव – 
संख्या सम्बन्धी सूचनाओं को हम कुछ समय उपरान्त भूल जाते हैं किन्तु बिन्दुरेखाओं को प्रभाव पर्याप्त अंशों में स्थायी होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 Morphology of Flowering Plants 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 Morphology of Flowering Plants (पुष्पी पादपों की आकारिकी)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मूल के रूपान्तरण से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में किस प्रकार का रूपान्तरण पाया जाता है?
(अ) बरगद
(ब) शलजम
(स) मैंग्रोव वृक्ष।
उत्तर :
मूल के रूपान्तरण मूल अथवा जड़ का सामान्य कार्य पौधे को स्थिर रखना और जल एवं खनिज पदार्थों का अवशोषण करना है। इसके अतिरिक्त जड़े कुछ विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए रूपान्तरित हो जाती हैं।

(अ)
बरगद (Banyan Tree) :

इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर मिट्टी में धंस जाती हैं। (UPBoardSolutions.com) इन्हें स्तम्भ मूल (prop roots) कहते हैं। ये शाखाओं को सहारा प्रदान करने के अतिरिक्त जल
एवं खनिजों का अवशोषण भी करती हैं। ये अपस्थानिक होती हैं।

(ब)
शलजम (Turnip) :

इसकी मूसला जड़ भोजन संचय के कारण फूलकर कुम्भ रूपी हो जाती है। इसे कुम्भीरूप जड़ (napiform root) कहते हैं।

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(स)
मैंग्रोव वृक्ष (Mangrove Tree) :

ये पौधे लवणोभिद् होते हैं। इनकी कुछ जड़ों के अन्तिम छोर बूंटी की तरह मिट्टी से बाहर निकल आते हैं। इन पर श्वास रन्ध्र पाए जाते हैं। ये जड़े श्वसन में सहायक होती हैं। अतः इन्हें श्वसन मूल कहते हैं; जैसे-राइजोफोरा
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प्रश्न 2.
बाह्य लक्षणों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की पुष्टि करें
(i) “पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते हैं।”
(ii) फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है।
उत्तर :

(i) पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए
आलू, अरबी आदि। ये तने के रूपान्तरण हैं। ये भूमिगत तना हैं। इन्हें कन्द कहते हैं तथा ये भोजन संचयन का कार्य करते है। ये तना हैं इसकी पुष्टि अग्रवत् की जा सकती है

  1. इन पर आँख (eye) मिलती है जो वस्तुत: कक्षस्थ कलिका की सुरक्षा करती है।
  2.  यदि इसे अंकुरण के लिए रखा जाए तो इस कक्षस्थ कलिका से शाखा निकलती है।
  3. जड़ में कोई पर्व अथवा पर्व सन्धि नहीं होती है; अत: किसी प्रकार का अंकुरण होने के लिए। कक्षस्थ कलिका भी नहीं होती है।

(ii) फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है (Flower is a modified shoot) :
पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (modified shoot) है। पुष्प का पुष्पासन अत्यन्त संघनित अक्षीय तना है। इसमें पर्वसन्धियाँ अत्यधिक पास-पास होती हैं। पर्व स्पष्ट नहीं होते। झुमकलता (Passiflord suberosa) में बाह्यदले तथा दल पुष्पासन के समीप लगे होते हैं, लेकिन पुंकेसर वे अण्डप कुछ ऊपर एक सीधी अक्ष पर होते हैं। इसे पुमंगधर (androphore) कहते हैं। हुरहुर (Gynandropsis) में पुष्प दलपुंज व पुमंग के मध्य पुमंगधर तथा पुमंग एवं जायांग के मध्य जायांगधर (gynophore) पर्व स्पष्ट होता है। कभी-कभी गुलाब के पुष्पासन की वृद्धि नहीं रुकती और पुष्प के ऊपर पत्तियों सहित अक्ष दिखाई देती है।

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बाह्यदल, दल, पुंकेसर, अण्डप, पत्तियों के रूपान्तरण हैं। मुसेन्डा (Mussgenda) में एक बाह्यदल पत्ती सदृश रचना बनाता है। गुलाब में बाह्यदल कभी-कभी पत्ती सदृश रचना प्रदर्शित करते हैं। लिली (UPBoardSolutions.com) (निम्फिया) बाह्यदल एवं दल के मध्य की पत्ती जैसी रचना है। गुलाब, कमल, केना आदि में अनेक पुंकेसर दलों में बदले दिखाई देते हैं। आदिपादपों के पुंकेसर पत्ती समान थे; जैसे-ऑस्ट्रोबेलिया (Austrobaileya) में प्रदर्शित होता है।
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प्रश्न 3. एक पिच्छाकार संयुक्त पत्ती हस्ताकार संयुक्त पत्ती से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
पिच्छाकार संयुक्त तथा हस्ताकार संयुक्त पत्ती में अन्तर
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प्रश्न 4.
विभिन्न प्रकार के पर्णविन्यास का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर :
पर्णविन्यास तने या शाखा की पर्वसन्धियों पर पत्तियाँ एक विशिष्ट क्रम में लगी होती हैं। इसे पर्णविन्यास कहते हैं। पर्वसन्धि पर पत्तियों की संख्या एक, दो अथवा दो से अधिक होती है। पर्ण विन्यास निम्नलिखित प्रकार को होता है
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1. एकान्तर (Alternate) :
जब एक पर्वसन्धि पर एक पत्ती होती है तथा अगली और पिछली पर्वसन्धि पर लगी पत्ती से इसकी दिशा विपरीत होती है; जैसे-गुड़हल, सरसों आदि।

2. अभिमुख (Opposite) :
जब एक पर्वसन्धि पर दो पत्तियाँ होती हैं, तब दो प्रकार की स्थिति हो सकती हैं

क) अध्यारोपित (Superposed) :
जब पत्तियों की दिशा प्रत्येक पर्वसन्धि पर एक ही होती है; जैसे—अमरूद।

(ख) क्रॉसित (Decussate) :
जब दो पत्तियों की दिशा प्रत्येक पर्वसन्धि पर पिछली तथा अगली पर्वसन्धि की अपेक्षा समकोण पर होती है; जैसे-आक।

3. चक्रिक (Whorled) :
जब एक पर्वसन्धि पर दो से अधिक पत्तियाँ होती हैं; जैसे—कनेर।
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित की परिभाषा लिखिए
(अ) पुष्पदल विन्यास
(ब) बीजाण्डन्यास
(स) त्रिज्यासममिति
(द) एकव्याससममिति
(य) ऊर्ध्ववर्ती
(र) परिजायांगी पुष्प
(ल) दललग्न पुंकेसर।
उत्तर :

(अ) पुष्पदल विन्यास (Aestivation) :
कलिका अवस्था में बाह्यदलों या दलों (sepals or petals) की परस्पर सापेक्ष व्यवस्था को पुष्पदल विन्यास कहते हैं। यह कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी या वैक्जीलरी प्रकार का होता है।

(ब) बीजाण्डन्यास (Placentation) :
अण्डाशय में जरायु (placenta) पर बीजाण्डों की व्यवस्था को बीजाण्डन्यास कहते हैं। (UPBoardSolutions.com) बीजाण्डन्यास सीमान्त, स्तम्भीय, भित्तीय, मुक्त स्तम्भीय, आधार-लग्न या धरातलीय प्रकार का होता है।

(स) त्रिज्यासममिति (Actinomorphy) :
जब पुष्प को किसी भी मध्य लम्ब अक्ष से काटने पर दो सम अर्द्ध-भागों में विभक्त किया जा सके तो इसे त्रिज्यासममिति (actinomorphy) कहते

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(द) एकव्याससममिति (Zygomorphy) :
जब पुष्प केवल एक ही मध्य लम्ब अक्ष से दो सम अर्द्ध-भागों में विभक्त किया जा सके तो इसे एकव्याससममिति कहते हैं।
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(य) ऊर्ध्ववर्ती अण्डाशय (Superior Ovary) :
जब पुष्प के अन्य भाग अण्डाशय के नीचे से निकलते हैं तो पुष्प को अधोजाय तथा अण्डाशय को ऊर्ध्ववर्ती (superior) कहते हैं।

(२) परिजायांगी पुष्प (Perigynous Flower) :
यदि पुष्पीय भाग पुष्पासन से अण्डाशय के समान ऊँचाई से निकलते हैं तो इस प्रकार के पुष्प परिजायांगी (perigynous) कहलाते हैं। इसमें अण्डाशय आधा ऊर्ध्ववर्ती (half superior) होता है।

(ल) दललग्न पुंकेसर (Epipetalous Stamens) :
जब पुंकेसर दल से लगे होते हैं तो इन्हें दललग्न (epipetalous) कहते हैं।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में अन्तर लिखिए
(अ) असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम
(ब) झकड़ा जड़ (मूल) तथा अपस्थानिक मूल
(स) वियुक्ताण्डपी तथा युक्ताण्डपी अण्डाशय।
उत्तर :

(अ)
असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम में अन्तर

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(ब)
झकड़ा तथा अपस्थानिक जड़ में अन्तर

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(स)
वियुक्ताण्डपी तथा युक्ताण्डपी अण्डाशय में अन्तर

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित के चिह्नित चित्र बनाइए

(अ) चने के बीज तथा
(ब) मक्का के बीज की अनुदैर्घ्य काट
उत्तर :
(अ)
चने के बीज की अनुदैर्ध्य काट

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(ब)
मक्का के बीज की अनुदैर्घ्य काट

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प्रश्न 8.
उचित उदाहरण सहित तने के रूपान्तरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
तने के रूपान्तरण तने का मुख्य कार्य पत्तियों, पुष्पों एवं फलों को धारण करना; जल एवं खनिज तथा कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन करना है। हरा होने पर तना भोजन निर्माण का कार्य भी करता है। तने में थोड़ी मात्रा में भोजन भी संचित रहता है। विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए तने रूपान्तरित हो जाते हैं। कभी-कभी तो रूपान्तरण के पश्चात् तने को पहचानने में भी कठिनाई होती है। सामान्यतया तनों में भोजन संचय, कायिक जनन, बहुवर्षीयता प्राप्त करने हेतु, (UPBoardSolutions.com) आरोहण एवं सुरक्षा हेतु रूपान्तरण होता है।

भूमिगत रूपान्तरित तने भूमिगत तने चार प्रकार के पाए जाते हैं

  1. प्रकन्द
  2. घनकन्द
  3. तना कन्द तथा
  4. शल्क कन्द।

1. प्रकन्द (Rhizome) :
भूमि के अन्दर भूमि के क्षैतिज तल के समानान्तर बढ़ने वाले ये तने भोजन संग्रह करते हैं। इनमें पर्वसन्धि तथा पर्व स्पष्ट देखे जा सकते हैं। अग्रस्थ कलिकाओं के द्वारा इनकी लम्बाई बढ़ती है तथा शाखाएँ कक्षस्थ कलिकाओं के द्वारा। कुछ कलिकाएँ। आवश्यकता पड़ने पर वायवीय प्ररोह का निर्माण करती हैं; जैसे-अदरक, केला, केली, फर्न, हल्दी आदि।
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2. घनकन्द (Corm) :
इनके लक्षण प्रकन्द की तरह होते हैं, किन्तु ये ऊर्ध्वाधर रूप में बढ़ने वाले भूमिगत तने होते हैं। इस प्रकार के तनों में भी पर्वसन्धियाँ तथा पर्व होते हैं। यह भोजन संगृहीत रहता है। कलिकाएँ होती हैं। कक्षस्थ कलिकाएँ विरोहक बनाती हैं। उदाहरण-अरवी, बण्डा, जिमीकन्द इत्यादि।

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3. तना कन्द (Stem Tuber) :
ये भूमिगत शाखाओं के अन्तिम सिरों पर फूल जाने के कारण बनते हैं। इनका आकार अनियमित होता है। कन्द पर पर्व या पर्वसन्धियाँ होती हैं जो अधिक मात्रा में भोजन संग्रह होने के कारण स्पष्ट नहीं होतीं। आलू की सतह पर अनेक आँखें (eyes) होती हैं, जिनमें कलिकाएँ तथा इन्हें ढकने के लिए (UPBoardSolutions.com) शल्क पत्र होते हैं। कलिकाएँ वृद्धि करके नए वायवीय प्ररोह बनाती हैं।
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4. शल्क कन्द (Bulbs) :
इस प्रकार के रूपान्तर में तना छोटा (संक्षिप्त शंक्वाकार या चपटा) होता है। इसके आधारीय भाग से अपस्थानिक जड़े निकलती हैं। इस तने पर उपस्थित अनेक शल्क पत्रों में भोजन संगृहीत हो जाता है। तने के अग्रस्थ सिरे पर उपस्थित कलिका से अनुकूल परिस्थितियों में वायवीय प्ररोह का निर्माण होता है। शल्क पत्रों के कक्ष में कक्षस्थ कलिकाएँ भी बनती हैं। उदाहरण-प्याज (Onion), लहसुन (garlic), लिली (lily) आदि के शल्क कन्द।

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II. अर्द्धवायवीय रूपान्तरित तने
कुछ पौधों के तने कमजोर तथा मुलायम होते हैं। ये पृथ्वी की सतह के ऊपर या आंशिक रूप से मिट्टी के नीचे रेंगकर वृद्धि करते हैं। ये तने कायिक प्रजनन में भाग लेते हैं। इनकी पर्वसन्धियों से अपस्थानिक जड़े निकलकर मिट्टी में फँस जाती हैं। पर्व के नष्ट होने या कट जाने पर नए पौधे बन जाते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

  1.  उपरिभूस्तारी (Runner)
  2. भूस्तारी (Stolon)
  3. अन्त:भूस्तारी (Sucker)
  4.  भूस्तारिका (Offset)

1. उपरिभूस्तारी (Runner) :
इसका LEAF तना कमजोर तथा पतला होता है। यह भूमि की सतह पर फैला रहता है है। पर्वसन्धियों से पत्तियाँ, शाखाएँ । तथा अपस्थानिक जड़े निकलती हैं। STEM शाखाओं के शिखर पर शीर्षस्थ कलिका होती है। पत्तियों के कक्ष में कक्षस्थ कलिका होती है; जैसे-दुबघास (Cynodon), खट्टी-बूटी (Oxalis), ब्राह्मी (Centella asiatica) आदि।
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2. भूस्तारी (Stolon) :
इसमें भूमिगत तने की पर्वसन्धि से कक्षस्थ कलिका विकसित होकर शाखा बनाती है। यह शाखा प्रारम्भ में सीधे । ऊपर की ओर वृद्धि करती है, परन्तु बाद में – झुककर क्षैतिज के समानान्तर हो जाती है। इस BUD शाखा की पर्वसन्धि से कक्षस्थ कलिकाएँ तथा अपस्थानिक जड़े निकलती हैं; जैसे—स्ट्रॉबेरी, अरवी (घुइयाँ)।
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3. अन्त:भूस्तारी (Sucker) :
इनमें पौधे के भूमिगत तने की आधारीय पर्वसन्धियों पर स्थित कक्षस्थ कलिकाएँ वृद्धि करके नए वायवीय भाग बनाती हैं। ये प्रारम्भ में क्षैतिज दिशा में वृद्धि करते हैं, फिर तिरछे होकर भूमि से बाहर आ जाते हैं और वायवीय शाखाओं की तरह वृद्धि करने लगते हैं। इनकी पर्व सन्धियों से अपस्थानिक जड़े निकलती हैं; जैसे—पोदीना (Mentha grvensis), गुलदाउदी (Chrysanthemum) आदि।

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4. भूस्तारिका (Offset) :
जलीय पौधों में पाया जाने वाला उपरिभूस्तारी की तरह का रूपान्तरित तना है। मुख्य तने से पाश्र्व शाखाएँ निकलती हैं। पर्वसन्धि पर पत्तियाँ तथा अपस्थानिक जड़े निकल आती हैं। इनके पर्व छोटे होते हैं। गलने या । टूटने से नए पौधे स्वतन्त्र हो जाते हैं। उदाहरण समुद्र सोख (water hyacinth = Etchhornia sp.), जलकुम्भी (Pistic sp.) आदि।
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III. वायवीय रूपान्तरित तने
कुछ पौधों में तने का वायवीय भाग विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित हो जाता है। रूपान्तरण के फलस्वरूप (UPBoardSolutions.com) इन्हें तना कहना आसान नहीं होता है। इनकी स्थिति एवं उद्भव के आधार पर ही इनकी पहचान होती है। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

  1. पर्णाभ स्तम्भ और पर्णाभ-पर्व (Phylloclade and Cladode)
  2.  स्तम्भ-प्रतान (Stem tendril)
  3. स्तम्भ कंटक (Stem thorns)
  4. पत्र प्रकलिकाएँ (Bulbils)

1. पर्णाभ स्तम्भ और पर्णाभ-पर्व (Phylloclade and Cladode) :
शुष्क स्थानों में उगने वाले पौधों में जल के वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए पत्तियाँ प्रायः कंटकों में रूपान्तरित हो जाती हैं। पौधे का तना चपटा, हरा व मांसल हो जाता है, ताकि पौधे के लिए खाद्य पदार्थों का निर्माण प्रकाश संश्लेषण के द्वारा होता रहे। तने पर प्रायः मोटी उपचर्म (cuticle) होती है
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जो वाष्पोत्सर्जन को रोकने में सहायक होती है। पत्तियों का कार्य करने के कारण इन रूपान्तरित तनों को पर्णाभि या पर्णायित स्तम्भ कहते हैं। प्रत्येक पर्णाभ में पर्वसन्धियाँ तथा पर्व पाए जाते हैं। प्रत्येक पर्वसन्धि से पत्तियाँ निकलती हैं जो शीघ्र ही गिर जाती हैं (शीघ्रपाती) या काँटों में बदल जाती हैं। पत्तियों के कक्ष से पुष्प निकलते हैं। उदाहरण-नागफनी (Opuntia) तथा अन्य अनेक कैक्टाई (cactii), अनेक यूफोर्बिया (Euphorbia sp.), कोकोलोबा (Cocoloba), कैजुएराइना (UPBoardSolutions.com) (Casuarina) आदि। पर्णाभ-पर्व केवल एक ही पर्व के पर्णाभ स्तम्भ हैं। इनके कार्य भी पर्णाभ स्तम्भ की तरह ही होते हैं। उदाहरण—सतावर (Asparagus) में ये सुई की तरह होते हैं। यहाँ पत्ती एक कुश में बदल जाती है। कोकोलोबा की कुछ जातियों में भी इस प्रकार के पर्णाभ-पर्व दिखाई  पड़ते हैं।

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2. स्तम्भ प्रतान (Stem Tendril) :
प्रतान लम्बे, पतले आधार के चारों ओर लिपटने वाली संरचनाएँ हैं। तने के रूपान्तर से बनने वाले प्रतानों को स्तम्भ प्रतान कहते हैं। स्तम्भ प्रतान आधार पर मोटे होते हैं। इन पर पर्व वे पर्वसन्धियाँ हो सकती हैं, कभी-कभी पुष्प भी लगते हैं। ये सामान्यतयः कक्षस्थ कलिका से और कभी-कभी अग्रस्थ कलिकाओं से बनते हैं; जैसे–झुमकलता (Passiflora) में कक्षस्थ कलिका से, किन्तु अंगूर की जातियों (Vitis sp.) में अग्रस्थ कलिका से रूपान्तरित होते हैं। काशीफल (Cucurbita) और इस कुल के अनेक पौधों के प्रतान अतिरिक्त कक्षस्थ कलिकाओं के रूपान्तर से बनते हैं। एण्टीगोनॉन (Antigonon) में तो पुष्पावली वृन्त ही प्रतान बनाता है।
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3. स्तम्भ कंटक (Stem thorns) :
कक्षस्थ या अग्रस्थ कलिकाओं से बने हुए काँटे स्तम्भ कंटक कहलाते हैं। स्तम्भ कंटक सुरक्षा, जल की हानि को रोकने अथवा कभी-कभी आरोहण में सहायता करने हेतु रूपान्तरित संरचनाएँ हैं। कंटक प्रमुखतः मरुद्भिदी पौधों का लक्षण है।
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उदाहरण :

  1. करोंदा, बोगेनविलिया (Bougainvillea)
  2. ड्यूरेण्टा (Durantd)
  3. आडू (Prunus) आदि।

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4. पत्र प्रकलिकाएँ (Bulbils) :
ये कलिकाओं में । भोजन संगृहीत होने से बनती हैं। इनका प्रमुख कार्य कायिक प्रवर्धन है। ये पौधे से अलग होकर अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर नया पौधा बना लेती हैं; जैसे—लहसुन, केतकी (Agave), रतालू (Dioscoria), खट्टी-बूटी (Oxalis), अनन्नास आदि।
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प्रश्न 9. 
फेबेसी तथा सोलेनेसी कुल के एक-एक पुष्प को उदाहरण के रूप में लीजिए तथा उनका अर्द्ध तकनीकी विवरण प्रस्तुत कीजिए। अध्ययन के पश्चात् उनके पुष्पीय चित्र भी बनाइए।

उत्तर :

कुल फेबेसी

फेबेसी (Fabaceae) या पैपिलियोनेटी (Papilionatae) लेग्यूमिनोसी कुल का उपकुल है। मटर (पाइसम सेटाइवम-Pisum sativum) इस उपकुल का एक प्रारूपिक उदाहरण है।

आवास एवं स्वभाव (Habit and Habitat) 
यह एकवर्षीय शाक (herb) एवं आरोही, समोभिद् पादप है।

(i) मूल (Root) :
मूसला जड़, ग्रन्थिल (nodulated) जड़े ग्रन्थियों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणु राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम रहते हैं।

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(ii) स्तम्भ (Stem) :
शाकीय, वायवीय, दुर्बल, आरोही, बेलनाकार, शाखामय, चिकना तथा हरा।।

(iii) पत्ती (Leaves) :
स्तम्भिक और शाखीय, एकान्तर, अनुपर्णी (stipulate) अनुपर्ण पर्णाकार, पत्ती के अग्र पर्णक (UPBoardSolutions.com) प्रतान (tendril) में रूपान्तरित।

(iv) पुष्पक्रम (Inflorescence) :
एकल कक्षस्थ (solitary axillary) या असीमाक्षी (racemose)।

(v) पुष्प (Flower) :
सहपत्री (bracteate), सवृन्त, पूर्ण, एकव्याससममित (zygomorphic), उभयलिंगी, पंचतयी, परिजायांगी (perigynous), चक्रिक।

(vi) बाह्यदलपुंज (Calyx) :
बाह्यदल 5, संयुक्त बाह्यदली (gamosepalous), कोरस्पर्शी (valvate) अथवा कोरछादी विन्यास (imbricate aestivation)।
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(vii) दलपुंज (Corolla)  :
दल 5, पृथक्दली, वैज़ीलरी (vexillary) बिन्यास, एक ध्वज (standard) पश्च तथा बाहरी, दो पंख (wings), दो जुड़े छोटे दल नाव के आकार के नौतल (keel), आगस्तिक (papilionaceous) आकृति।
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(viii) पुमंग (Androecium) :
पुंकेसर 10, द्विसंघी (diadelphous), 9 पुंकेसरों के पुंतन्तु संयुक्त वे एक पुंकेसर स्वतन्त्र, द्विकोष्ठी परागकोश, आधारलग्न (basifixed), अन्तर्मुखी (introrse)।

(ix) जायांग (Gynoecium) :
एकअण्डपी’ (monocarpellary), अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती य अर्द्ध-अधोवर्ती, एककोष्ठीये, सीमान्त (marginal) बीजाण्डन्यास, वर्तिका लम्बी तथा मुड़ी हुई, वर्तिकाग्र समुण्ड (capitate)

(x) फल (Fruit) :
शिम्ब या फली (legume)।

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कुल सोलेनेसी

कुल सोलेनेसी (Family solanacea) का सामान्य पौधा सोलेनम नाइग्रम (Solanum nigrum, मकोय) है। (UPBoardSolutions.com) यह एक जंगली शाकीय पौधा है जो स्वत: आलू, टमाटर के खेतों में उग आता है।

आवास एवं स्वभाव (Habit and Habitat) 
जंगली, वार्षिक शाकीय पादप।

(i) मूल (Roots) :
शाखामय मूसला:जड़ तन्त्र।

(ii) स्तम्भ (Stem) :
वायवीय, शाकीय, बेलनाकार, शाखामय, चिकना, हरा।
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(iii) पत्ती (Leaves) :
स्तम्भिक और शाखीय, एकान्तर, सरल, अननुपर्णी (exstipulate) एकशिरीय जालिकावत् (unicostate reticulate)।

(iv) पुष्पक्रम (Inflorescence) :
एकलशाखी कुण्डलिनीय (uniparous helicoid), ससीमाक्षी।

(v) पुष्प (Flower) :
असहपत्री (ebracteate), सवृन्त, पूर्ण, द्विलिंगी, त्रिज्यासममित, पंचतयी (pentamerous), अधोजाय (hypogynous), छोटे एवं सफेद।

(vi) बाह्यदलपुंज (Calyx) :
5 संयुक्त बाह्यदल (gamopetalous), कोरस्पर्शी (valvate), हरे, चिरलग्न (persistent)।

(vii) दलपुंज (Corolla) :
5 संयुक्त दल (gamopetalous), चक्राकार (rotate), या व्यावर्तित (twisted) दलविन्यास।

(viii) पुमंग (Androecium) :
5 दललग्न पुंकेसर, दल के एकान्तर में व्यवस्थित, अन्तर्मुखी, परागकोश लम्बे एवं द्विपालित, पुंतन्तु छोटे। परागवेश्म में स्फुटन अग्र छिद्रों (apical pores) द्वारा।

(ix) जायांग (Gynoecium)  :
द्विअण्डपी (bicarpellary), युक्ताण्डपी (syncarpous), अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior ovary), स्तम्भीय बीजाण्डन्यास (axile placentation), जरायु तिरछा तथा फूला हुआ। वर्तिका एक, वर्तिकाग्र द्विपालित।

(x) फल (Fruit) :
सरस, बेरी।
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प्रश्न 10.
पुष्पी पादपों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के बीजाण्डन्यासों का वर्णन करो।
उत्तर :
बीजाण्डन्यास अण्डाशय में मृदूतकीय जरायु (placenta) पर बीजाण्डों के लगने के क्रम को बीजाण्डन्यास (placentation) कहते हैं। यह निम्नलिखित प्रकार का होता है

1. सीमान्त (Marginal) :
यह एकअण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। अण्डाशय एककोष्ठीय होता है, बीजाण्ड अक्षीय सन्धि पर विकसित होते हैं; जैसे–चना, मटर, सेम आदि के शिम्बे फलों में।
2. स्तम्भीय (Axile) :
यह द्विअण्डपी, त्रिअण्डपी या बेहुअण्डपी, युक्ताण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। अण्डाशय में जितने (UPBoardSolutions.com) अण्डप होते हैं, उतने ही कोष्ठकों का निर्माण होता है। बीजाण्ड अक्षवर्ती जरायु से लगे रहते हैं; जैसे—आलू, टमाटर, मकोय, गुड़हल आदि में।
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3. भित्तीय (Parietal) :
यह बहअण्ड्यी , एककोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है। इसमें जहाँ अण्डपों के तट मिलते हैं, वहाँ जरायु विकसित हो जाता है। जरायु (बीजाण्डासन) पर बीजाण्ड लगे होते हैं, अर्थात् बीजाण्ड अण्डाशय की भीतरी सतह पर लगे रहते हैं; जैसे—पपीता, सरसों, मूली आदि में।

4. मुक्त स्तम्भीय (Free central) :
यह बहुअण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है। इसमें बीजाण्ड केन्द्रीय अक्ष के चारों ओर लगे होते हैं। केन्द्रीय अक्ष का सम्बन्ध अण्डाशय  भित्ति से नहीं होता; जैसे-डायएन्थस, प्रिमरोज आदि।

5. आधारलग्न (Basifixed) :
यह द्विअण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है जिसमें केवल एक बीजाण्ड पुष्पाक्ष से लगा रहता है; जैसे-कम्पोजिटी कुल के सदस्यों में।

6. धरातलीय (Superficial) :
यह बहुअण्डपी, बहुकोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है। इसमें बीजाण्डासन या जरायु कोष्ठकों की भीतरी सतह पर विकसित होते हैं, अर्थात् बीजाण्ड कोष्ठकों की भीतरी सतह पर व्यवस्थित रहते हैं; जैसे—कुमुदिनी (water lily) में।

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प्रश्न 11.
पुष्प क्या है? एक प्ररूपी एन्जियोस्पर्म पुष्प के भागों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

पुष्प

एन्जियोस्पर्स में जनन हेतु बनने वाली संरचना वास्तव में रूपान्तरित प्ररोह (modified shoot) है। इसका पुष्पासन संघनित तना है जिसमें पर्व का अभाव होता है, केवल पर्वसन्धियाँ होती हैं। पर्वसन्धियों पर पाई जाने वाली पत्तियाँ रूपान्तरित होकर विभिन्न पुष्पीय भाग बनाती हैं। पुष्प विभिन्न आकार, आकृति, रंग के होते हैं। सरसों के पुष्प के निम्नलिखित भाग होते हैं

  1. बाह्यदलपुंज
  2. दलपुंज
  3. पुमंग
  4. जायांग

बाह्यदलपुंज तथा दलपुंज सहायक अंग और पुमंग तथा जायांग जनन अंग कहलाते हैं। पुष्पीय भाग पुष्पवृन्त के शिखर पर स्थित पुष्पासन पर लगे रहते हैं।

1. बाह्यदलपुंज (Calyx) :
यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र है। इसकी इकाई को बाह्यदल (sepal) कहते हैं। ये प्रायः हरे होते हैं। सरसों के बाह्यदल हरे-पीले रंग के होते हैं। बाह्यदल अन्य पुष्पीय भागों की सुरक्षा करते हैं। भोजन का निर्माण करते हैं। रंगीन होने पर परागण में सहायक होते हैं। चिरलग्न बाह्यदल प्रकीर्णन में सहायता करते हैं।

2. दलपुंज (Corolla) :
यह पुष्प का दूसरा चक्र है। इसका निर्माण रंगीन दलों (petals) से होता है। सरसों में चार पीले रंग के दल होते हैं। इनका ऊपरी सिरा चौड़ा तथा निचला सिरा पतला होता है। ये परस्पर क्रॉस ‘X’ रूपी आकृति बनाते हैं; अत: इनको क्रॉसरूपी (cruciform) कहते हैं। ये एक-दूसरे से स्वतन्त्र अर्थात् (UPBoardSolutions.com) पृथक्दली (polypetalous) होते हैं। दल परागण में सहायक होते हैं।

3. पुमंग (Androecium) :
यह पुष्प का नर जनन अंग है। इसका निर्माण पुंकेसरों (stamens) से होता है। प्रत्येक पुंकेसर के तीन भाग होते हैं-पुंतन्तु, योजि तथा परागकोश (anther)
परागकोश में परागकण या लघुबीजाणु (pollen grains or microspores) बनते हैं। सरसों में 6 पुंकेसर होते हैं। ये 4+2 के चक्रों में व्यवस्थित होते हैं। भीतरी चक्र में 4 लम्बे पुंतन्तु वाले तथा बाहरी चक्र में 2 छोटे पुतन्तु वाले पुंकेसर होते हैं। पुंकेसरों के आधार पर मकरन्द ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं।

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4. जायांग (Gynoecium) :
यह पुष्प का मादा जनन अंग है। इसका निर्माण अण्डपों से होता है। प्रत्येक अण्डप (carpel) के तीन भाग होते हैं—अण्डाशय (ovary), वर्तिका (style) तथा वर्तिकाग्र (stigma)। सरसों का जायांग द्विअण्डपी (bicarpellary), युक्ताण्डपी (syncarpous) तथा ऊर्ध्ववर्ती (superior) अण्डाशय युक्त होता है। अण्डाशय में बीजाण्ड भित्तिलग्न बीजाण्डन्यास में लगे होते हैं। अण्डाशय पहले एक कोष्ठीय होता है, बाद में
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कूटपट (replum)
बनने के कारण द्विकोष्ठीय हो जाता है। वर्तिका एक तथा वर्तिकाग्र द्विपालित होता है।
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निषेचन के पश्चात् बीजाण्ड से बीज तथा अण्डाशय से फल का निर्माण होता है। सरसों के फल सरल, शुष्क, सिलिकुआ (siliqua) होते हैं।

प्रश्न 12.
पत्तियों के विभिन्न रूपान्तरण’पौधे की कैसे सहायता करते हैं?
उत्तर :
पत्तियों के रूपान्तरण पत्तियों का प्रमुख कार्य प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन निर्माण करना है। इसके अतिरिक्त वाष्पोत्सर्जन, श्वसन आदि सामान्य कार्य भी पत्तियाँ करती हैं, किन्तु कभी-कभी विशेष कार्य करने के लिए इनका स्वरूप ही बदल जाता है। ये रूपान्तरण सम्पूर्ण पत्ती या पत्ती के किसी भाग या फलक के किसी भाग में होते हैं। उदाहरण के लिए

1. प्रतान (Tendril) :
सम्पूर्ण पत्ती या उसका कोई भाग, लम्बे, कुण्डलित तन्तु की तरह की रचना में बदल जाता है। इसे प्रतान (tendril) कहते हैं। प्रतान दुर्बल पौधों की आरोहण में सहायता करते हैं। जैसे

(क) जंगली मटर (Lathyrus qphaca) में सम्पूर्ण पत्ती प्रतान में बदल जाती है।
(ख) मटर (Pisum sativum) में अगले कुछ पर्णक प्रतान में बदल जाते हैं।
(ग) ग्लोरी लिली (Gloriosa superba) में पर्णफलक का शीर्ष (apex) प्रतान में बदल जाता है।

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इसके अतिरिक्त क्लीमेटिस (Clematis) में पर्णवृन्त तथा चोभचीनी (Smilax) में अनुपर्ण आदि प्रतान में बदल जाते हैं।
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2. कंटक या शूल (Spines) :
वाष्पोत्सर्जन को कम करने और पौधे की सुरक्षा के लिए पत्तियों अथवा उनके कुछ भाग कॉटों में बदल जाते हैं। जैसे

(क)
नागफनी (Opuntia) :

इसमें प्राथमिक पत्तियाँ छोटी तथा शीघ्र गिरने वाली (आशुपाती) होती हैं। कक्षस्थ कलिका से (UPBoardSolutions.com) विकसित होने वाली अविकसित शाखाओं की पत्तियाँ काँटों में बदल जाती हैं।
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(ख)

बारबेरी (barberry) में पर्वसन्धि पर स्थित पत्तियाँ स्पष्टत: काँटों में बदल जाती हैं। इनके कक्ष से निकली शाखाओं पर उपस्थित पत्तियाँ सामान्य होती हैं।
(ग)
बिगनोनिया की एक जाति (Bignonia unguiscati) में पत्तियाँ संयुक्त होती हैं। इनके ऊपरी कुछ पर्णक अंकुश (hooks) में बदल जाते हैं और आरोहण में सहायता करते हैं।

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3. पर्ण घट (Leaf Pitcher) :
कुछ कीटाहारी पौधों में कीटों को पकड़ने के लिए सम्पूर्ण पत्ती प्रमुखतः पर्णफलक एक घट (pitcher) में बदल जाता है; जैसे-नेपेन्थीज (Nepenthes)।
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डिस्कोडिया (Dischidia rufflesigng)
एक उपरिरोही पादप है। इसकी कुछ पत्तियाँ घटों (pitchers) में बदल जाती हैं। इसमें वर्षा का जल तथा अन्य कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ एकत्रित होते रहते हैं। पर्वसन्धि से जड़े निकलकर घट के अन्दर घुस जाती हैं तथा विभिन्न पदार्थों को अवशोषित करती हैं।

4. पर्ण थैली (Leaf bladders) :
कुछ पौधों में पत्तियाँ या इनके कुछ भाग रूपान्तरित होकर थैलियों में बदल जाते हैं। इस प्रकार का अच्छा उदाहरण ब्लैड़रवर्ट या यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) है। यह पौधा इन थैलियों के द्वारा कीटों को पकड़ता है। अन्य कीटाहारी पौधों में पत्तियाँ विभिन्न प्रकार से रूपान्तरित होकर कीट को पकड़ती हैं। उदाहरण-ड्रॉसेरा (Drosera), डायोनिया (Dioned), बटरवर्ट या पिन्यूयीक्यूला (Pinguicula) आदि।
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5. पर्णाभ वृन्त (Phyllode) :
इसमें पर्णवृन्त हरा, चपटा तथा पर्णफलक के समान हो जाता है; और पत्ती की तरह भोजन निर्माण का कार्य करता है; जैसे-ऑस्ट्रेलियन बबूल में।

6. शल्कपत्र (Scale Leaves) :
ये शुष्क भूरे रंग की, पर्णहरितरहित, अवृन्त छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। ये कक्षस्थ कलिकाओं की सुरक्षा करती हैं; जैसे—अदरक, हल्दी आदि में।

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प्रश्न 13.
पुष्पक्रम की परिभाषा दीजिए। पुष्पी पादपों में विभिन्न प्रकार के पुष्पक्रमों के आधार का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

पुष्पक्रम

पुष्पी अक्ष (peduncle) पर पुष्पों के लगने के क्रम को पुष्पक्रम कहते हैं। अनेक पौधों में शाखाओं (UPBoardSolutions.com) पर अकेले पुष्प लगे होते हैं, इन्हें एकल (solitary) पुष्प कहते हैं। ये एकल शीर्षस्थ (solitary terminal) या एकल कक्षस्थ (solitary axillary) होते हैं। पुष्क्क्रम मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं
(क) असीमाक्षी पुष्पक्रम
(ख) ससीमाक्षी पुष्पक्रम

(क)
असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) :

इसमें पुष्पी अक्ष (peduncle) की लम्बाई निरन्तर बढ़ती रहती है। पुष्प अग्राभिसारी क्रम (acropetal succession) में निकलते हैं। नीचे के पुष्प बड़े तथा ऊपर के पुष्प क्रमशः छोटे होते हैं। असीमाक्षी पुष्पक्रम निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(i) असीमाक्ष (Raceme) :
इसमें मुख्य पुष्पी अक्ष पर सवृन्त तथा सहपत्री या असहपत्री पुष्प लगे होते हैं; जैसे—मूली, सरसों, लार्कस्पर आदि में।’

(ii) स्पाइक (Spike) :
इसमें पुष्पी अक्ष पर अवृन्त पुष्प लगते हैं; जैसे–चौलाई. (Amaranthus), चिरचिटा (Achyranthus) आदि में।

(iii) मंजरी (Catkin) :
इसमें पुष्पी अक्ष लम्बा एवं कमजोर होता है। इस पर एकलिंगी तथा पंखुडीविहीन पुष्प लगे होते हैं; जैसे—शहतूत, सेलिक्स आदि में।
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(iv) स्पाइकलेट (Spikelet) :
ये वास्तव में छोटे-छोटे स्पाइक होते हैं। इनमें प्रायः एक से तीन पुष्प लगे होते हैं। आधार पर पुष्प तुष-निपत्रों (glume) से घिरे रहते हैं; जैसे-गेहूँ, जौ, जई आदि में।

(v) स्थूल मंजरी (Spadix) :
इसमें पुष्पी अक्ष गूदेदार होती है इस पर अवृन्त, एकलिंगी पुष्प लगे होते हैं। पुष्पी अक्ष का शिखर बन्ध्य भाग अपेन्डिक्स (appendix) कहलाता है। पुष्पी अक्ष पर नीचे की ओर मादा पुष्प, मध्य में बन्ध्य पुष्प तथा ऊपर की ओर नर पुष्प लगे होते हैं। पुष्प रंगीन निपुत्र (spathe) से ढके रहते हैं; जैसे—केला, ताड़, अरवी आदि में।

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(vi) समशिख (Corymb) :
इसमें मुख्य अक्ष छोटा होता है। नीचे वाले पुष्पों के पुष्पवृन्त लम्बे तथा ऊपर वाले पुष्पों के पुष्पवृन्त क्रमशः छोटे होते हैं। इससे सभी पुष्प लगभग एकसमान ऊँचाई पर स्थित होते हैं; जैसे-कैण्डीटफ्ट, कैसिया आदि में।

(vii) पुष्प छत्र (Umbel) :
इसमें पुष्पी अक्ष बहुत छोटी होती हैं। सभी पुष्प एक ही बिन्द से निकलते प्रतीत होते हैं तथा छत्रकरूपी रचना बनाते हैं। इसमें परिधि की ओर बड़े तथा केन्द्र
की ओर छोटे पुष्प होते हैं; जैसे-धनिया, जीरा, सौंफ, पूनस आदि में।

(viii) मुण्डक (Capitulium) :
इसमें पुष्पी अक्ष एक चपटा आशय होता है। इस पर दो प्रकार के पुष्पक (florets) लगे होते हैं। परिधि की ओर रश्मि पुष्पक (ray florets) तथा केन्द्रक में बिम्ब पुष्पक (disc florets)। सम्पूर्ण पुष्पक्रम एक पुष्प के समान दिखाई देता है; जैसे—सूरजमुखी, गेंदा, जीनिया, डहेलिया आदि।

(ख)
ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence) 

इसमें पुष्पी अक्ष की अग्रस्थ कलिका के पुष्प में परिवर्धित हो जाने से वृद्धि रुक जाती है। इससे नीचे स्थित पर्वसन्धियों से पार्श्व शाखाएँ निकलकर पुष्प बनाती हैं। इस कारण पुष्पों के लगने का क्रम तलाभिसारी (basipetal) होता है। इसमें केन्द्रीय पुष्प बड़ा और (UPBoardSolutions.com) पुराना तथा नीचे के पुष्प छोटे और नए होते हैं। ससीमाक्षी पुष्पक्रम अग्रलिखित प्रकार के होते हैं

(i) एकलशाखी ससीमाक्ष (Monochasial Cyme) :
इसमें पुष्पी अक्ष एक पुष्प में समाप्त होती है। पर्वसन्धि से एक बार में केवल एक ही पाश्र्वशाखा उत्पन्न होती है, जिस पर पुष्प बनता है। पार्श्वशाखाएँ दो प्रकार से निकलती हैं

(अ)
जब सभी पार्श्व शाखाएँ एक ही ओर निकलती हैं तो इसे कुण्डलिनी रूप एकलशाखी ससीमाक्ष (helicoid uniparous cyme) कहते हैं; जैसे—मकोय, बिगोनिया आदि में।
(ब)
जब पार्श्व शाखाएँ एकान्तर क्रम में निकलती हैं तो इसे वृश्चिकी एकलशाखी ससीमाक्ष (scorpioid uniparous cyme) कहते हैं। जैसे-हीलियोट्रोपियम, रेननकुलस आदि।

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(ii) युग्मशाखी ससीमाक्ष (Dichasial Cyme) :
इसमें पुष्पी अक्ष के पुष्प में समाप्त होने पर नीचे की पर्वसन्धि से दो पाश्र्वीय शाखाएँ विकसित होकर पुष्प का निर्माण करती हैं; जैसे-डायएन्थस, स्टीलेरिया आदि में।

(iii) बहुशाखी ससीमाक्ष (Polychasial Cyme) :
इसमें पुष्पी अक्ष के पुष्प में समाप्त होने पर नीचे स्थित पर्वसन्धि से एकसाथ अनेक शाखाएँ निकलकर पुष्प का निर्माण करती हैं जैसेहेमीलिया, आक आदि में। (यह छत्रक की भाँति प्रतीत होता है, लेकिन इसका केन्द्रीय पुष्प बड़ा होता है और परिधीय पुष्प छोटे होते हैं)।
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प्रश्न 14.
ऐसे फूल का सूत्र लिखिए जो त्रिज्यासममित, उभयलिंगी, अधोजायांगी, 5 संयुक्त बाह्यदली, 5 मुक्तदली, पाँच मुक्त पुंकेसरी, द्रियुक्ताण्डपी तथा ऊर्ध्ववर्ती अण्डाशय हो।
उत्तर :
उपर्युक्त विशेषताएँ सोलेनेसी कुल के पुष्प की हैं। इसका पुष्पसूत्र निम्नवत् है
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प्रश्न 15.
पुष्पासन पर स्थिति के अनुसार लगे पुष्पी भागों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
पुष्पासन पर पुष्पी भागों का निवेशन पुष्पासन पर बाह्यदल, दल, पुंकेसर तथा अण्डप की स्थिति के आधार पर पुष्प निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

1. अधोजाय (Hypogynous) :
इसमें जायांग पुष्पासन पर सर्वोच्च स्थान पर स्थित होते हैं, और अन्य अंग नीचे होते हैं। इस प्रकार के पुष्पों में अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior) होते हैं; जैसे-सरसों, गुड़हल, टमाटर आदि।

2. परिजाय (Perigynous) :
इसमें पुष्पासन पर जायांग तथा अन्य पुष्पीय भाग लगभग समान ऊँचाई पर स्थित होते हैं। इसमें अण्डाशय आधा अधोवर्ती या आधी उर्ध्ववर्ती होता है; जैसे-गुलाब, आडू आदि में। इसमें पुष्पासन तथा अण्डाशय संयुक्त नहीं होते।

3. उपरिजाय या अधिजाय (Epigynous) :
इसमें पुष्पासन के किनारे वृद्धि करके अण्डाशय को घेर लेते हैं और अण्डाशय से संलग्न हो जाते हैं। अन्य पुष्पीय भाग अण्डाशय के ऊपर स्थित होते हैं। जैसे-अमरूद, अनार, लौकी आदि में।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फिल्लोक्लेड रूपान्तरण है।
(क) जड़ का
(ख) तने का
(ग) पत्ती का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) तने का

प्रश्न 2.
बहुसंघी दशा सम्बन्धित है।
(क) बाह्य दलपुंज से
(ख) जायांग से
(ग) पुमंग से
(घ) दलपुंज से
उत्तर :
(ग) पुमंग से

प्रश्न 3.
एक पुष्प में विकसित होने वाले फल की प्रकृति में निम्न में से किसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है?
(क) पुमंग
(ख) परागकण
(ग) जायांग
(घ) निषेचन
उत्तर :
(घ) निषेचन

प्रश्न 4.
वर्ग क्लोरोफाइसी का मुख्य संचित खाद्य पदार्थ है।
(क) वसा
(ख) मण्ड
(ग) ग्लाइकोजन
(घ) वोल्युटिन
उत्तर :
(ख) मण्ड

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प्रश्न 5.
मूंगफली किस कुल का पौधा है?
(क) फेबेसी
(ख) क्रूसीफेरी
(ग) मालवेसी
(घ) प्रैमिनी
उत्तर :
(क) फेबेसी

प्रश्न 6.
किस कुल में चतुर्थी पुंकेसर होते हैं?
(क) बैसिकेसी (क्रूसीफेरी)
(ख) मालवेसी
(ग) कम्पोजिटी
(घ) लिलिएसी
उत्तर :
(क) बैसिकेसी (क्रूसीफेरी)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्वसन मूल (ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती श्वसन मूल तथा पितृस्थ अंकुरण) किन पौधों में पायी जाती है? या उस पादप का नाम लिखिए जिसमें श्वसन मूल पाये जाते हैं।
उत्तर :
श्वसन मूल (pneumatophores) तथा पितृस्थ अंकुरण (viyiparous germination) लवणोभिद् पौधों; जैसे-राइजोफोरा (Rhizophora) में पायी जाती है।

प्रश्न 2.
प्रकन्द तथा घनकन्द में अन्तर बताइए।
उत्तर :
(i) प्रकन्द :
इस प्रकार के तने भूमि के भीतर क्षैतिक दिशा में वृद्धि करते हैं। इसमें भोजन का संचय होता है। इन पर पर्व, पर्वसन्धियाँ तथा शल्कपत्र उपस्थित हो

उदाहरणार्थ :
अदरक

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(ii) घनकन्द :
इनका विकास मिट्टी में उर्ध्वाधर वृद्धि होने से होता है। इनमें मुख्य तने का भाग भोजन संचय के कारण फूल जाता है।

उदाहरणार्थ :
जिमीकन्द।

प्रश्न 3.
पर्णाभवृत (पर्णकाय स्तम्भ) तथा पर्णाभ पर्व में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पर्णकाय स्तम्भ (Phylloclade) एवं पर्णाभ पर्व (Cladode) :
कभी-कभी तना चौड़ा व मांसल हो जाता है और पत्तियों का कार्य करता है, जिसे पर्णकायस्तम्भ (phylloclade) कहते हैं। पर्णकाय स्तम्भ में एक से अधिक पर्व (internodes) तथा पर्वसन्धियाँ (nodes) होती हैं, उदाहरण नागफनी (Opuntia) तथा रसकस (Ruscus) कुछ पौधों

उदाहरण :
ऐस्पैरागस (Asparagus) के तने में केवल एक पर्व होता है इसे पर्णाभि पर्व (cladode) कहते हैं।

प्रश्न 4.
तुलसी के पौधे में किस प्रकार का पुष्पक्रम पाया जाता है?
उत्तर :
कूटचक्रकं (verticellaster)।

प्रश्न 5.
हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम किस पौधे में पाया जाता है?
उत्तर :
गूलर, बरगद, पीपल आदि पौधों में हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम पाया जाता है।

प्रश्न 6.
एकसंघीय तथा एककोष्ठकीय पुंकेसर किस कुल का गुण है ?
उत्तर :
मालवेसी (Mahvaceae) कुल में पुंकेसर एकसंघीय तथा एककोष्ठकीय (monothecous) होते

प्रश्न 7.
हेस्पीरिडियम फल के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
सन्तरा, नींबू आदि।

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प्रश्न 8.
पुंजफल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
ये फल दो या दो से अधिक अण्डप वाले वियुक्ताण्डपी (apocarpous) अण्डाशय से विकसित होते हैं। इस प्रकार एक पुष्प के स्थान समूह में एक से अधिक फल होते हैं। ये फल कई प्रकार के हो सकते हैं; जैसे

  1.  एकीनों का पुंज (etaerio of achenes)-क्लीमेटिस आदि।
  2.  फॉलिकल का पुंज (etaero of follicles) (UPBoardSolutions.com) -चम्पा आदि।
  3. अष्ठिफलों का पुंज (etaerio of drupes)-रैस्पबेरी आदि।
  4.  भरियों का पुंज (etaerio of beries)-शरीफा आदि।

प्रश्न 9.
लीची के फल का कौन-सा भाग खाने योग्य है?
उत्तर :
एरिल (aril)।

प्रश्न 10.
सबसे छोटे बीज पैदा करने वाले पौधे का नाम बताइए।
उत्तर :
ऑर्किड (orchids)।

प्रश्न 11.
उस कुल का नाम लिखिए जिसमें एकलिंगी, अपूर्ण पुष्प तथा पीपो प्रकार के फल पाये जाते हैं।
उत्तर :
कुकुरबिटेसी।

प्रश्न 12.
उस पौधे का वानस्पतिक नाम तथा कुल लिखिए जिससे लाल मिर्च प्राप्त होती है।
उत्तर :
लाल मिर्च-कैप्सिकम एनम (Capsicum annum) कुल–सोलेनेसी (Solanaceae)।

प्रश्न 13.
तिरछे अण्डप किस कुल में पाये जाते हैं?
उत्तर :
तिरछे अण्डप सोलेनेसी कुल में पाये जाते हैं।

प्रश्न 14.
सोलेनेसी कुल का पुष्पसूत्र एवं पुष्प आरेख दीजिए। 
उत्तर :
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘विलगन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
विलगन (abscission) एक जैविक क्रिया है। यह पत्ती के आधारीय भाग अर्थात् पर्णवृन्त (petiole) के आधार की कुछ कोशिकाओं में विशेष परिवर्तन के फलस्वरूप होती है। संयुक्त पत्तियों में यह क्रिया प्रत्येक पर्णक के आधार पर भी हो सकती है। इन क्षेत्रों में निश्चित स्थान की कोशिकाओं की मध्य पटलिकाएँ और बाहरी भित्तियाँ, श्लेष्मक (mucilage) बना लेती हैं, क्योंकि इनका कैल्सियम पेक्टेट, पेक्टिन (pectin) में बदल जाता है। इस परिवर्तन के कारण (UPBoardSolutions.com) ये कोशिकाएँ एक-दूसरे से अलग होने लगती हैं। ऐसी कोशिकाओं का क्षेत्र दो-तीन कोशिका मोटा ही होता है और विलगन परत (abscission layer) कहलाता है। ऐसी अवस्था में इस क्षेत्र की जाइलम वाहिका आदि में, टाइलोसेस (tyloses) आदि बन जाने से वे सँध जाती हैं। इनमें अन्य पदार्थ; जैसे-रेजिन (resin) आदि भीं एकत्र हो जाते हैं। विलगन परत से कुछ नीचे की कोशिकाएँ विभज्योतकी होकर कॉर्क कोशिकाओं का निर्माण करती हैं जो बहुधा पत्ती के गिर जाने के कुछ पहले ही बनना प्रारम्भ हो जाती हैं। यह स्तर रक्षात्मक स्तर का कार्य करता है।

इस प्रकार पूरे क्षेत्र को विलगन क्षेत्र (abscission zone) कहते हैं। पत्ती विलगन परत के बन जाने के बाद केवल संवहन ऊतक, शिरा (vein) इत्यादि से ही लगी रह जाती है और अपने भार अथवा हवा के झोंके से गिर जाती है। पत्ती के गिर जाने के बाद अधिक कॉर्क कोशिकाएँ बनती हैं जो बाद में तने के इसी स्तर के साथ सम्बन्धित हो जाती हैं। तने पर पत्ती के गिरने के स्थान पर जो कॉर्क आदि की परत बनती है वह एक दाग के रूप में दिखायी देती है। इसे पर्ण दाग (leaf scar) कहते हैं।

प्रश्न 2.
द्विबीजपत्री पत्ती की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए। 
उत्तर :
द्विबीजपत्री पत्ती की अनुप्रस्थ काट
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित फलों के खाने योग्य भागों की आकारिकीय प्रकृति बताइए सेब, अमरूद, काजू, कटहल, आम, शहतूत, नारियल, लीची, टमाटर, खीरा।
उत्तर :
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प्रश्न 4.
औषधीय पौधों का मानव जीवन में क्या महत्त्व है? संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्राचीनकाल से ही मानव रोगों का इलाज पौधों से करता आ रहा है। वर्तमान में भी अनेक रोग ऐसे हैं जिनका इलाज सफलतापूर्वक पौधों से किया जा रहा है। कुछ औषधीय पौधों और उनकी उपयोगिता का वर्णन निम्नवत् है

  1. सर्पगंधा—इसका उपयोग उच्च रक्तचाप, साँप के काटने तथा मानसिक रोगों में दवाई के रूप में किया जाता है।
  2. अफीम—इसका उपयोग दर्द-निवारक के रूप में किया जाता है।
  3. कुनैन–इसका उपयोग मलेरिया रोग के रूप में किया जाता है।
  4. बैलाडोना-इसका उपयोग दर्द-निवारक के रूप में किया जाता है।
  5. धतूरा—इसका उपयोग बालों को साफ रखने व गले के रोगों में किया जाता है।
  6. आँवला-इसका उपयोग मूत्रे अधिक लाने के लिए, पेट साफ करने के लिए, रक्तस्राव में तथा खून के दस्त में किया जाता है। यह विटामिन ‘सी’ का भी अच्छा स्रोत है।
  7.  कुचला—इसका उपयोग लकवा व मस्तिष्क के रोगों के निवारण में किया जाता है।
  8. आर्टिमिसिया–इसका उपयोग आँत में उपस्थित परजीवी को मारने में किया जाता है।
  9. इफेड़ा-इसका उपयोग खाँसी के उपचार में किया जाता है। उपर्युक्त के अतिरिक्त और भी अनेक (UPBoardSolutions.com) औषधीय पौधे हैं जिनका उपयोग उपचार के लिए किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि औषधीय पौधों का मानव जीवन में बहुत महत्त्व है।

प्रश्न 5.
लिलिएसी कुल के विभेदीय लक्षणों का उल्लेख कीजिए। इस कुल के पुष्प आरेख, पुष्प सूत्र तथा दो आर्थिक महत्त्व के पौधों के वानस्पतिक नाम लिखिए। या लिलिएसी कुल का पुष्प सूत्र तथा पुष्प आरेख दीजिए।
उत्तर :

कुल लिलिएसी

विभेदीय लक्षण

  1. भूण (embryo) में एक बीजपत्र यो वकथिका (scutellum), तने में संवहन पूल वलय में । नहीं, एधा (cambium) अनुपस्थित, अर्थात् संवहन पूल बन्द (closed), पुष्प त्रितयी (trimerous)। -एकबीजपत्री (monocotyledonae)
  2. अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior), त्रिकोष्ठीय (trilocular), बीज में भ्रूणपोष स्पष्ट। -कॉरोनैरी (coronarieae)
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3. परिदलपुंज दो आवर्ती में (in two whorls), पुंकेसर छह, दो आवत में, अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior)। -लिलिएसी (Liliaceae) 

पुष्प आरेख तथा पुष्प सूत्र
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कुल का आर्थिक महत्त्व
कुल के कुछ पौधे अत्यन्त उपयोगी हैं। निम्नलिखित उदाहरण अति महत्त्वपूर्ण हैं

1. भोजन के लिए :
(i) प्याज (onion = Allium cepa)
(ii) लहसुन (garlic = Allium sativum)

2. सजावटी पौधे :
(i) लिली (lily = Lilium bulbiferum)
(ii) यक्का (drager plant = Yucca alotifolia)

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फलों और बीजों के प्रकीर्णन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए और प्रकृति में इसके महत्त्व को समझाइए। या बीजों एवं फलों के प्रकीर्णन के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए। इस प्रक्रिया से सम्बन्धित विभिन्न अनुकूलनों का संक्षेप में विवरण दीजिए। या फलों एवं बीजों के प्रकीर्णन में जन्तुओं की भूमिका का उल्लेख कीजिए। या टिप्पणी लिखिए-वायु तथा जल द्वारा फलों एवं बीजों का प्रकीर्णन या टिप्पणी लिखिए-फलों एवं बीजों के प्रकीर्णन का महत्त्व
उत्तर :
फल एवं बीजों के प्रकीर्णन के उपाय तथा अनुकूलन पौधे पर बनने वाले बीज व फल को उचित स्थान, उचित परिस्थिति प्राप्त करने के लिए पौधे से दूर जाने के लिए अनेक प्रकार के साधन अपनाने होते हैं जिनके लिए वे विशेष रूप से अनुकूलित हो जाते हैं। ये उपाय निम्नलिखित हैं

(क) वायु द्वारा प्रकीर्णन
(ख) जन्तुओं द्वारा प्रकीर्णन
(ग) जल द्वारा प्रकीर्णन
(घ) स्वयं स्फुटन।

(क)
वायु द्वारा फलों व बीजों के प्रकीर्णन के लिए अनुकूलन 

वायु द्वारा प्रकीर्णन प्राकृतिक क्रिया है तथा वायु प्राकृतिक रूप से गतिशील रहती है। पौधे इस प्राकृतिक साधन का लाभ उठाने के लिए अर्थात् वायु की गति में उड़ने के लिए प्लवनशीलता (buoyancy) बढ़ाते, प्राप्त करते हैं। इसके लिए आवश्यकतानुसार, फल व बीज अनेक प्रकार से अनुकूलित हो जाते हैं

1. सूक्ष्म व हल्के बीज (Minute and light seeds) :
कुछ पौधों के अत्यन्त छोटे तथा हल्के बीज वायु में धूल के कणों के समान उड़ते हैं तथा तेज पवन के साथ (UPBoardSolutions.com) तो सैकड़ों किलोमीटर तक उड़ते चले जाते हैं; जैसे-अनेक ऑर्किड्स (orchids) में एक बीज का भार 0.004 मिग्रा अर्थात् 2,50,000 बीज प्रति ग्राम होता है। ये वायु अनुकूलित होते हैं।

2. सपक्ष फल एवं बीज (Winged fruits and seeds) :
फलों या बीजों की भित्तिया अथवा कभी-कभी पुष्प के अंग फैलकर चपटे व पंख की तरह आकार बना लेते हैं, इससे बीज तथा फल वायु में आसानी से प्लवन कर दूर-दूर तक पहुँच सकते हैं

(i) पंख जैसी फलभित्ति :
फलभित्ति के फैल जाने से पंख जैसी संरचना बन जाती है। ऐसे फल प्रायः एकबीजी होते हैं; जैसे-अनेक समारा (samara)–चिलबिल (Indian elm), माधवीलता (Hiptage), मैपल (Maple) आदि इसी प्रकार के फल हैं।

(ii) चुपटी फलियाँ व बीज :
अनेक लेग्यूम (legumes) चपटे, पतले तथा अत्यन्त हल्के होने के कारण वायु में आसानी से प्लवन कर सकते हैं; जैसे—सिरस, शीशम आदि के फल।

(iii) फलों में अपाती पुष्पीय अवयव (Persistent flowering parts in fruits) :
फल को हल्का करने के लिए कुछ पुष्पीय अंग विशेषकर बाह्यदलपुंज (calyx) पतले, बड़े पंख की तरह की संरचना बना लेते हैं; जैसे—साल (Shored sp.) में बाह्यदलपुंज तथा फाइसैलिस (Physalis) में फूला हुआ भाग अपाती बाह्यदलपुंज से बनता है।

(iv) पंखयुक्त बीज-कुछ पौधों के बीज ही पंखयुक्त होते हैं; जैसे :
सहजन (Moringa sp.), सोना या अलु (Oroxylon), चीड़ (Pinus), सिनकोना (Cinchona), लैजरस्ट्रोमिया (Lagerstroemia) आदि।

(v) फलभित्ति का फूला हुआ होना :
अनेक पौधों के फलों की फलभित्ति गुब्बारे की तरह फूलकर इनको अत्यन्त हल्का कर देती है; जैसे-कॉलूटिया (Coluted), कार्डियोस्पर्मम (Cardiospermum) आदि में कभी-कभी इस प्रकार की संरचना किसी अन्य अंग से बनती है; जैसे-फाइसैलिस आदि में।
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3. पैराशूट प्रक्रिया (Parachute mechanism) :
कुछ पौधों के फल अथवा बीजों से लगे हुए विशेष प्रकार के रोम जैसे उपांग रह जाते हैं। ये प्रायः पुष्प के विभिन्न भागों के रूपान्तर से बनते हैं।
उदाहरण के लिए

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उदाहरण :

(i) रोमगुच्छ (Pappus) :
कुल कम्पोजिटी के अनेक पौधों के फल अधोवर्ती (inferior) अण्डाशय से बनते हैं तथा इनके ऊपर अपाती बाह्यदलपुंज (persistent calyx) रोम के समान रोमर्गुच्छ (pappus) बनाते हैं; जैसे-ट्राइडेक्स (Tridax), टैरेक्सेकम (Taraxacum), सूरजमुखी (sunflower) आदि में मिलते हैं। इन रोमों की लम्बाई भिन्न-भिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न होती है।

(ii) स्थाई रोमिल वर्तिकाएँ (Persistent hairystyles) :
कुछ पौधों के फलों के साथ रोमल व अपाती वर्तिकाएँ पैराशूट की तरह लगी रहती हैं; जैसे—क्लीमैटिस (Clematis), नार्वेलिया (Narvelia) आदि में।

(iii) कॉमा (Comma)–अनेक पौधों के बीज रोमयुक्त होते हैं और ये रोम जब समूह में बीज
के एक ओर लगे होते हैं तो इसे कॉमा कहते हैं; जैसे- आक (Calotropis) (UPBoardSolutions.com) में। कुछ | बीजों पर यह दो स्थानों पर होता है; जैसे-एल्सटोनिया (Alstonia) में।

(iv) रोमल अतिवृद्धि (Hairy outgrowths) :
कभी-कभी सम्पूर्ण बीजावरण पर रोम होते हैं। इससे बीज अत्यधिक हल्का हो जाता है; जैसे–कपास (cotton) आदि में।

(ख)
जन्तुओं द्वारा फलों एवं बीजों के प्रकीर्णन के लिए अनुकूलन

कुछ फल या बीज, पौधे से, अनायास या जान-बूझकर, जन्तुओं द्वारा ले जाये जाते हैं और इस प्रकार दूर-दूर तक फैलाये जाते हैं। इस प्रकार के फल या बीजों पर जन्तु के साथ चिपकने, उलझने या आकर्षण के कुछ अंग होते हैं जिनसे ये उनके साथ जा सकें। निम्नलिखित उदाहरण देखिए

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1. उलझने वाले फल या बीज :
बहुत-से फल या बीज जन्तुओं या मनुष्यों के शरीर के साथ उनके खुरों, पैरों, बालों तथा शरीर के अन्य भागों अथवा कपड़ों के साथ उलझ या अटक जाते हैं। इनको लेकर ये जन्तु या मनुष्य दूर-दूर तक पहुँचकर अनायास ही इन फल या बीजों को परिक्षेपित करते हैं। इस कार्य के लिए फल या बीजों में अनेक प्रकार के अंग बन जाते हैं; जैसे–हुक (hooks), कण्टक (spines and thorns), कठोर रोम, प्रिकिल्स (prickles) आदि। जैन्थियम (Xanthium) तथा यूरीना लोबेटा (Urena lobata) में अनेक मुड़े हुए काँटे, बघनखी (Martynig diundra) में दो नुकीले हुक (hook), एण्ड्रोपोगॉन (Andropogon), स्पियर घास (Aristidia) आदि में तीखे तथा हुकदार बाल। गोखरू (Tribulus) में तीन तेज काँटे, लटजीरा  (Archyranthus) में तीखे व कठोर रोम आदि इस प्रकार के उपांग हैं जो आसानी से जन्तुओं के : साथ उलझ जाते हैं।
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2. चिपकने वाले बीज या फल :
अनेक फल तथा उनके बीजों में चिपचिपे अंग होते हैं। यह चिपचिपाहट उन पर उपस्थित ग्रन्थियों द्वारा स्रावित रस या फल के सरस भाग के कारण हो सकती है। इस प्रकार के चिपचिपे बीज क्लीओम (Cleome viscosa), बेल (Aegle Thurtelos), मिसलेटो (Mistletoe), बोरहाविया (Boerhavia rapans) आदि में मिलते हैं। इन फलों के छोटे-छोटे बीज पक्षियों की चोंच (beak), अन्य जन्तुओं के मुंह आदि भागों पर चिपक जाते हैं और इन्हें ये जन्तु अनायास ही दूर-दूर तक पहुँचा देते हैं।

3. खाने योग्य फल या बीज :
सरस (succulent) अथवा कुछ शुष्क फलों में भी कुछ अंग खाने योग्य होते हैं। इस प्रकार के फलों को खाकर जन्तु बीजों को इधर-उधर छोड़ देते हैं। कभी-कभी इन फलों को सम्पूर्ण रूप में जन्तु खा जाते हैं किन्तु अन्य भागों की अपेक्षा इनके बीज पचाये नहीं जा सकते(कठोर आवरण के कारण) और मल  के साथ जन्तु के शरीर से बाहर आ जाते हैं, तब तक जन्तु मीलों दूर भी जा सकता है। काशीफल, ककड़ी आदि की बेलें कूड़े के ढेर आदि पर उग जाती हैं। (UPBoardSolutions.com) अमरूद, शरीफा, करोंदा आदि के बीज भी इसी प्रकार परिक्षेपित होते हैं। टमाटर, मिर्च, इमली आदि के फल सम्पूर्ण रूप में खा लिये जाते हैं। और उनके बीज अपच भोजन के साथ बाहर आ जाते हैं। बहुत से शाकाहारी जन्तु; जैसे–चूहे, बन्दर, गिलहरी, चमगादड़, मनुष्य आदि तथा चिड़ियाँ; जैसे तोते, कौवे, गौरैया आदि फलों को दूर-दूर तक ले जाते हैं और उन्हें खाकर गुठली आदि वहीं छोड़ देते हैं। चीटियाँ भी कुछ बीजों को घसीट कर दूर-दूर तक ले जाती हैं।

(ग)
जलु द्वारा प्रकीर्णन

जल के अन्दर या आस-पास उगने वाले पौधों में से अनेक पौधों में, फल या बीजों का परिक्षेपण जल के माध्यम से होता है। इन फल या बीजों की भित्तियों इत्यादि में वायुकोष (air cavities) होते हैं जो इनको हल्का बना देते हैं। अत: जल पर तैरते हुए ये फल या बीज दूर-दूर तक चले जाते हैं। इनके अतिरिक्त इन फलों या बीजों की भित्तियाँ कठोर, चिमड़ी (leathery) आदि भी होती हैं जिससे जल के सम्पर्क में निरन्तर रहने पर भी ये सड़े नहीं। नारियल (coconut), कमल (lotus) आदि फलों का प्रकीर्णन इसी विधि से होता है। नारियल एक रेशेदार अष्ठिफल (fibrous drupe) है जिसमें फल की मध्यभित्ति (mesocarp) रेशों में बदलकर वायुकोषों तथा साथ ही एक आवश्यक आवरण का भी निर्माण करती है। इसके वृक्ष जल के किनारे होते हैं। फल वृक्ष से टूटकर पानी में गिर जाते हैं और तैरती हुई अवस्था में सैकड़ों मील दूर चले जाते हैं।

कमल में पुष्पासन स्पंजी (spongy) होता है। यह एक एकीनों का पूँजफल है तथा परिपक्वन पर, पौधे से अलग होकर जल पर तैरता रहता है। जब मांसल, स्पंजी पुष्पासन सड़ जाता है, तो फल जल में नीचे बैठ जाते हैं तथा अंकुरित होकर नये पौधे बना लेते हैं।

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(घ)
स्वयं स्फुटन द्वारा प्रकीर्णन

अनेक स्फोटी फल किसी विशेष कारण; जैसे-तेज वायु, शुष्कता, जल, स्पर्श इत्यादि के कारण झटके और तेजी से फटते हैं। इस प्रक्रिया में बीज दूर-दूर तक छिटक जाते हैं। एक्वैलियम (Ecballium elatirium) में स्फुटन अत्यन्त रोचक ढंग से होता है। परिपक्व अवस्था में फल के अन्दर उपस्थित रस और उसमें डूबे बीजों का अत्यधिक दबाव होता है। हल्के से स्पर्श से अथवा स्वयं ही फल, डण्ठल (वृन्त) से अलग हो जाता है और एक पिचकारी की तरह रस की धार फल से निकल पड़ती है।

यह धार कई फीट दूर तक गिरती है। अत: इस फल को फुहार खीरा (squiring cucumber) कहा जाता है। चुटपुटिया (Ruetliu tuberosa) जैसे अनेक पौधों में (Acanthaceae family) जेकुलेटर (jaculator) या मुड़े हुए अंकुश जैसी रचनाएँ होती हैं। ये रचनाएँ फल के स्फुटन पर सीधी होकर बीजों को इधर-उधर बिखेर देती हैं। जल, लार इत्यादि के सम्पर्क में आते ही फल तेजी से झटके के साथ दो कपाटों में फट जाता है और जेकुलेटर विधि से बीजों को चारों दिशाओं में फेंक देता है। विभिन्न शिम्ब (legumes), गुलमेंहदी (balsam), जिरेनियम (Geranium), क्लिटोरिया (Clitoria), ऐण्टेण्डा (Entanda) आदि में स्वयं स्फुटन की तेजी से ही बीज काफी दूर तक बिखर जाते हैं।

फल तथा बीजों के प्रकीर्णन का महत्त्व

फल तथा बीजों का प्रकीर्णन या परिक्षेपण निम्नलिखित कारणों से पौधों के लिए अत्यधिक महत्त्व रखता है

1. अंकुरण की उचित दशायें :
एक पौधे से उत्पन्न सभी बीजों के उचित अंकुरण के लिए उन्हें उचित परिस्थितियों; जैसे—उचित भूमि, जल, वायु, प्रकाश इत्यादि आवश्यक मात्रा तथा अवस्था में प्राप्त होना आवश्यक है, अन्यथा अंकुरण ठीक से नहीं होगा। अतः फल व बीजों का प्रकीर्णन के द्वारा दूर-दूर तक जाना महत्त्वपूर्ण है।

2. प्रतिस्पर्धा :
अंकुरण के बाद प्रत्येक अंकुर, नवोद्भिद तथा उससे बढ़ने वाले पादप को उचित जल, खनिज लवण तथा प्रकाश की आवश्यकता होगी। अन्य साथियों के साथ जो उसके आस-पास उग रहे हैं, परस्पर स्पर्धा (competition) उत्पन्न होगी। वैसे भी समान जाति के पौधों में तो यह (UPBoardSolutions.com) प्रतिस्पर्धा अत्यधिक होगी क्योंकि उनकी तो आवश्यकतायें भी एक जैसी होती हैं, अतः सभी पौधे दुर्बल होंगे और शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे। इसके लिए आवश्यक है कि बीजों व फलों को दूर-दूर तक पहुँचाया जाये।

3. जाति का विस्तार :
पौधे की जाति के दूर-दूर तक प्रसार के लिए प्रकीर्णन आवश्यक है। वैसे भी वंश तथा जाति को प्राकृतिक तथा अन्य विपदाओं से बचाए रखने के लिये उनका विस्तार-प्रसार केवल बीजों व फलों के दूर-दूर तक परिक्षेपण से ही सम्भव है।

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प्रश्न 2.
स्वच्छ चित्रों की सहायता से ब्रेसीकेसी (कूसीफेरी) कुल के विभेदक लक्षणों का वर्णन कीजिए। इस कुल का पुष्प सूत्र एवं पुष्प चित्र दीजिए। इस कुल के आर्थिक महत्त्व वाले दो पौधों के वानस्पतिक नाम लिखिए एवं उनके उपयोग का उल्लेख कीजिए। या क्रूसीफेरी कुल को उचित उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर :

कुल क्रूसीफेरी या ब्रेसीकेसी

विभेदक लक्षण

  1. भ्रूण में दो बीजपत्र (cotyledons), तने में संवहन पूल एक चक्र में, वर्धा (open) अर्थात् एधा उपस्थित, पत्तियों में जालिकावत् शिराविन्यास, पुष्प चतुष्टयी (tetramerous) या पंचतयी (pentamerous) -द्विबीजपत्री (dicotyledonae)
  2. दलपुंज पृथक्दली (polypetalous) -पॉलीपिटेली (polypetalae)
  3. पुष्प जायांगाधर (hypogynous) -थैलैमीफ्लोरी (thalamiflorae)
  4. अण्डाशय संयुक्त (syncarpous), वेश्म एक (unilocular), बीजाण्डन्यास भित्तिलग्न (parietal) -पैराइटेल्स (parietales)
  5. पुंकेसर छह, चतुर्थी (tetradynamous), दल चार क्रूसीफॉर्म (cruciform) -क्रूसीफेरी (Cruciferae or Brassicaceae)

पुष्पीय लक्षण

(i). पुष्प (Flower) :
असहपत्री (ebracteate), संवृन्त (pedicellate), पूर्ण (complete), उभयलिंगी (hermaphrodite), त्रिज्यासममित (actinomorphic) कभी-कभी एकव्याससममित (zygomorphic), जायांगाधर (hypogynous), द्वितयी तथा चतुष्टयी (bimerous or tetramerous), नियमित व चक्रिक (cyclic)।

(ii). बाह्यदलपुंज (Calyx) :
4 बाह्यदल (sepals), दो चक्रों (whorls) में (2 + 2) में, पृथक् बाह्यदली (polysepalous), आशुपाती (caducous), आंशिक रूप से दलाभ (partially petaloid), कोरछादी (imbricate)।

(iii). दलपुंज (Corolla) :
4 दल (petals), पृथक्दली (polypetalous), एक चक्र में, नखरयुक्त (clawed), एक क्रॉस में विन्यसित अर्थात् क्रूसीफॉर्म (cruciform), कोरस्पर्शी (valvate)।

(iv). पुमंग (Androecium) :
6 पुंकेसर (stamens) दो चक्रों में पृथक्पुं केसरी (polyandrous), चतुर्थी (tetradynamous) अर्थात् बाहर के दो छोटे भीतरी चार बड़े। परागकोष अधःबद्ध (basifixed), द्विपालिक (dithecous), अन्तर्मुखी (introrse)।

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(v). जायांग (Gynoecium) :
द्विअण्डपी (bicarpellary), युक्ताण्डपी (syncarpous), अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (ovary superior), एककोष्ठीय (unilocular), बीजाण्डन्यास भित्तिलग्न (placentation parietal),
बाद में अण्डाशय एक कूटपट (replum) के बनने से द्विकोष्ठीय (bilocular) हो जाता है। वर्तिका (UPBoardSolutions.com) (style) एक व छोटी, वर्तिकाग्र द्विपालिक (stigma bilobed)।

पुष्प सूत्र व पुष्प आरेख :
सरसों
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 Morphology of Flowering Plants image 48

कुल का आर्थिक महत्त्व
आर्थिक दृष्टि से इस कुल के पौधे विभिन्न प्रकार से उपयोगी हैं। कुछ उदाहरण अग्रलिखित हैं

1. भोजन के लिए :
मूली = रैफैनस सैटाइवस (Ruphanus sativus)—इसकी मांसल जड़े व फल (सेंगरी) तथा गोभी = ब्रेसिका ऑलीरेसिया (Brassica oleraced) की उपजातियाँ अपने पुष्पक्रम, मांसल तने तथा पत्तियों के लिए खायी जाती हैं।

2. तिलहन के रूप में :
सरसों = ब्रेसिका कैम्पेस्टिस (Brassica campestris) से प्राप्त तेल भोजन पकाने, मालिश करने वे औषधियों में प्रयोग किया जाता है।

3. औषधि के लिए :
हालिमा (Lepidium sativum) के बीजों का प्रयोग यकृत के रोगों में किया जाता है।

4. बगीचों में सजावट के लिए :
चाँदनी (candytuft = Iberis amarg) आदि।

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5. तारामीन :
(Eruca sativa) के तेल का प्रयोग जलने या अन्य प्रकार के घावों में किया जाता है।

प्रश्न 3.
मालवेसी कुल के विभेदीय लक्षणों तथा पुष्पीय लक्षणों का उल्लेख कीजिए। इस कुल के पुष्प सूत्र, पुष्प आरेख तथा आर्थिक महत्त्व के दो पौधों के वानस्पतिक नाम लिखिए। या मालवेसी कुल का पुष्प आरेख बनाकर उसका पुष्प सूत्र लिखिए।
उत्तर :

कुल मालवेसी

विभेदीय लक्षण

  1. भ्रूण में दो बीजपत्र (cotyledons), तने में संवहन पूल एक चक्र में, वर्धा (open) अर्थात् एधा उपस्थित, पत्तियों में जालिकावत् (reticulate) शिराविन्यास, पुष्प पंचतयी (pentamerous) -द्विबीजपत्री (dicotyledonae)
  2. दलपुंज पृथक्दली (polypetalous) -पॉलीपिटेली (polypetalae)
  3. पुष्प जायांगाधर (hypogynous) -थैलेमीफ्लोरी (thalamiflorae)
  4. अण्डाशय संयुक्त (syncarpous), वेश्म कई (multilocular), बीजाण्डन्यास स्तम्भिक (axile) -मालवेल्स (malvales)
  5. पुंकेसर अनेक, एकसंलाग या बहुसंलाग (monoadelphous or polyadelphous), परागकोष एकपालिक (monothecous), पत्ती अनुपण (stipulate) -मालवेसी (Malvaceae)

पुष्पीय लक्षण

(i). पुष्पक्रम (Inflorescence) :
प्रायः एकल (solitary) पुष्प, कक्षस्थ या शीर्षस्थ, कभी-कभी ससीमाक्षी (cymose)।

(ii). पुष्प (IFlower) :
सवृन्त (pedicillate) कभी-कभी अवृन्त, सहपत्री या सहपत्ररहित (bracteate or ebracteate), पूर्ण complete), उभयलिंगी (hermaphrodite), त्रिज्यासममित (actinomorphic), पंचतयी (pentamerous), जायांगाधर (hypogynous) तथा चक्रिक (cyclic)।

(iii). अनुबाह्यदलपुंज (Epicalyx) :
प्राय: 2-7 बाह्यदलपुंज के बाहर हरे रंग के।

(iv). बाह्यदलपुंज (Calyx) :
5 बाह्यदल, प्रायः संयुक्त (gamosepalous), हरे तथा कोरस्पर्शी (valvate)।

(v). दलपुंज (Corolla) :
5 दल (petals), पृथक्दली (polypetalous), बड़े नखरयुक्त (clawed)

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(vi). व्यावर्तित (twisted) :
पुंकेसरीय नाल के साथ आधार पर जुड़े हुए, बड़े व आकर्षक।

(vii). पुमंग (Androecium) :
पुंकेसर अनगिनत, संलागी (adelphous) बहुधा एकसंलागी (monoadelphous), पुंतंतु (filaments) आपस में मिलकर अण्डाशय तथा वर्तिकाग्र के चारों
ओर एक नली के आकार की संरचना बना लेते हैं जिसे पुंकेसरीय नलिका (staminal tube) कहते हैं जो आधार पर दलों के साथ दललग्न (epipetalous), परागकोष (anthers) एकपालिक (monothecous), प्रायः वृक्काकार (reniform), अधः बद्ध (basifixed), बहिर्मुखी (extrorse)।

(viii). जायांग (Gynoecium):
अधिकतर पंचअण्डपी (pentacarpellary), युक्ताण्डपी (Syncarpous), अण्डाशय ऊर्ध्ववर्ती (superior), बहुकोष्ठकी, बीजाण्डासन स्तम्भिक (axile), वर्तिकाएँ संयुक्त (styles fused), पुंकेसरीय नाल में स्थित, वर्तिकाग्र (stigma) अण्डपों की संख्या के बराबर।

पुष्प सूत्र एवं पुष्प आरेख
एक प्रारूपिक पुष्प गुड़हल (china rose = Hibiscus rosa-sinensis) का पुष्प सूत्र (floral formula)
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 Morphology of Flowering Plants image 49
पुष्प आरेख–चित्र देखिए।

आर्थिक महत्त्व के पौधे

1. भोजन के लिए (For food) :
भिण्डी (lady’s finger = Hibiscus esculentus) का फल सब्जी के रूप में खाया जाता है।

2. रेशों के लिए (For fibres) :
कपास (cotton), गॉसीपियम हिरसूटम (Gossypium hirsutum) तथा गॉसीपियम की अन्य अनेक जातियाँ तथा पटसन (hemp = Hibiscus cannabinus) का मोटा रेशा भी महत्त्वपूर्ण है।

3. यूरिना (Urene rependa) :
इसकी जड़ों तथा छाल से निकाले गये रस से रेबीज (hydrophobia) रोग (UPBoardSolutions.com) का उपचार किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 5 Morphology of Flowering Plants image 50

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4. बगीचों की सजावट के लिए गुड़हल :
(Hibiscus rosa-sinensis), गुलखेरा (Althea rosed)
आदि पौधों का प्रयोग किया जाता है।

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UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 4 Use of Modal Verbs: Can, Could, May, Might (can/able to का अन्तर)

UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 4 Use of Modal Verbs: Can, Could, May, Might (can/able to का अन्तर)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 English. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 4 Use of Modal Verbs: Can, Could, May, Might (can/able to का अन्तर).

Exercise 8

1. Our team could not win the match.
2. You cannot talk loudly in the library.
3. Peace loving people may also become violent.
4. Could you lend me some money?
5. You may catch cold by going out in the cold.
6. May he recover soon !
7. He could lead in the last round of the game.
8. He fell down from the roof, his leg could be broken too.
9. We could get pure desi ghee at a cheaper rate in olden days.
10. May I come in ?
11. You may come in after an hour.
12. Can you examine all the files today?
13. Our father could face this situation.
14. May God prosper you a lot !
15. Can you help me in solving these sums?

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics (ऊष्मागतिकी)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics (ऊष्मागतिकी).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

सही उत्तर चुनिए-

प्रश्न 1.
ऊष्मागतिकी अवस्था फलन एक राशि है
(i) जो ऊष्मा परिवर्तन के लिए प्रयुक्त होती है।
(ii) जिसका मान पथ पर निर्भर नहीं करता है।
(iii) जो दाब-आयतन कार्य की गणना करने में प्रयुक्त होती है।
(iv) जिसका मान केवल ताप पर निर्भर करता है।
उत्तर
(ii) जिसका मान पथ पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 2.
एक प्रक्रम के रुद्रोष्म परिस्थितियों में होने के लिए-
(i) ∆T = 0
(ii) ∆p = 0
(iii) q = 0
(iv) w = 0
उत्तर
(iii) q= 0

प्रश्न 3.
सभी तत्वों की एन्चैल्पी उनकी सन्दर्भ-अवस्था में होती है-
(i) इकाई
(ii) शून्य
(iii) <0
(iv) सभी तत्त्वों के लिए भिन्न होती है।
उत्तर
(ii) शून्य।

प्रश्न 4.
मेथेन के दहन के लिए AU° का मान -X kJ mol-1 है। इसके लिए ∆H का मान होगा
(i) = ∆U
(ii) >∆U
(iii) <∆U
(iv) = 0
उत्तर
मेथेन के दहन के लिए सन्तुलित समीकरण होगी-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-1

प्रश्न 5.
मेथेन, ग्रेफाइट एवं डाइहाइड्रोजन के लिए 298 K पर दहन एन्थैल्पी के मान क्रमशः -890.3 kJ mol-1,-393.5 kJ mol-1 एवं -285.8 kJ mol-1 हैं। CH4(g) की विरचन एन्थैल्पी क्या होगी?
(i) -74.8 kJ mol-1
(ii)-52.27 kJ mol-1
(iii) +74.8 kJ mol-1
(iv) +52.26 kJ mol-1
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-2
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-31

प्रश्न 6.
एक अभिक्रिया A+ B → C +D+q के लिए एन्ट्रॉपी परिवर्तन धनात्मक पाया गया। यह अभिक्रिया सम्भव होगी-
(i) उच्च ताप पर
(ii) निम्न ताप पर
(iii) किसी भी ताप पर नहीं
(iv) किसी भी ताप पर
उत्तर
यहाँ ∆H =-ve तथा ∆S = +ve. ∆G=∆H – T∆S; अभिक्रिया के स्वतः प्रवर्तित होने के लिए ∆G=-ve होनी चाहिए जोकि किसी भी ताप पर हो सकती है अर्थात् विकल्प (iv) सही है।

प्रश्न 7.
एक प्रक्रम में निकाय द्वारा 701 J ऊष्मा अवशोषित होती है एवं 394J कार्य किया जाता है। इस प्रक्रम में आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-4

प्रश्न 8.
एक बम कैलोरीमीटर में NH2CN (s) की अभिक्रिया डाइऑक्सीजन के साथ की गई एवं ∆U का मान-742.7 kJ mol-1 पाया गया (298K पर)। इस अभिक्रिया के लिए 298K पर एन्थैल्पी परिवर्तन ज्ञात कीजिए:-
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-5

प्रश्न 9.
60.0 g ऐलुमिनियम का ताप 35°C से 55°C करने के लिए कितने kJ ऊष्मा की आवश्यकता होगी? Al की मोलर ऊष्माधारिता 24Jmol-1 K-1 है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-6

प्रश्न 10.
10.0°C पर 1 मोल जल की बर्फ – 10°C पर जमाने पर एन्थैल्पी-परिवर्तन की गणना कीजिए।
fus H = 6.03 kJ mol-10°C पर,
Cp[H2O(l)] = 75.3Jmol-1 K-1
Cp[H2O(s)] = 36.8 Jmol-1K-1
उत्तर
∆Htotal=(10°C पर 1 मोल जल → 0°C पर 1 मोल जल)
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प्रश्न 11.
CO2 की दहन एन्थैल्पी – 393.5 kJ mol-1 है। कार्बन एवं ऑक्सीजन से 35.2 g CO2 बनने पर उत्सर्जित ऊष्मा की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-8

प्रश्न 12.
CO(g), CO2(g), N2O(g) एवं N2O4(g) की विरचन एन्थैल्पी क्रमशः-110,393, 81 एवं 9.7 kmol-1 हैं। अभिक्रिया N2O4 (g) +3C0(g) →N2O(g)+3CO2(g) के लिए ∆rH का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 13.
N2(g)+3H2(g) → 2NH3(g); ∆rH = -92-4kJ mol-1 NH3 गैस की मानक विरचन एन्थैल्पी क्या है?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-10

प्रश्न 14.
निम्नलिखित आँकड़ों से CH3OH(l) की मानक विरचन एन्थैल्पी ज्ञात कीजिए-
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उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-13

प्रश्न 15.
CCl3(g) → C(g) + 4CI(g) अभिक्रिया के लिए एन्थैल्पी-परिवर्तन ज्ञात कीजिए एवं CCl3 में C-Cl की आबन्ध एन्थैल्पी की गणना कीजिए-
vapH (CCl4) = 30.5 kJ mol-1
fH (CCl4) = -1355 kJ mol-1
aH (C) = 715.0 kJ mol-1,
aH(Cl2) = 242 kJ mol-1
यहाँ ∆aH परमाण्वीकरण एन्थैल्पी है।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-14

प्रश्न 16.
एक विलगित निकाय के लिए ∆U = 0, इसके लिए AS क्या होगा?
उत्तर
यहाँ ∆U का मान शून्य है जिसका तात्पर्य है कि यहाँ ऊर्जा कारक की कोई भूमिका नहीं है। ∆U = 0 दोनों पर प्रक्रम तभी स्वत: प्रवर्तित हो सकता है जब एंट्रॉपी कारक प्रक्रम कराने में सहायक हो अर्थात् AS का मान धनात्मक (+ ve) होगा।

प्रश्न 17.
298 K पर अभिक्रिया 2A+ B → c के लिए।
∆H = 400 kJ mol-1 एवं ∆S = 0.2 kJ K-1mol-1
∆H एवं ∆S को ताप-विस्तार में स्थिर मानते हुए बताइए कि किस ताप पर अभिक्रिया स्वतः होगी?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-15

प्रश्न 18.
अभिक्रिया 2Cl(g) → Cl2(g) के लिए ∆H एवं ∆S के चिह्न क्या होंगे?
उत्तर
दी गयी अभिक्रिया में आबन्ध निर्माण होता है, अतः ऊर्जा निर्मुक्त होती है अर्थात् ∆H
ऋणात्मक होता है। पुनः 2 मोल परमाणुओं की यादृच्छिकता (randomness) 1 मोल अणुओं से अधिक होती है, अतः यादृच्छिकता घटती है अर्थात् ∆S ऋणात्मक होगा।

प्रश्न 19.
अभिक्रिया 2A(g) + B (g) → 2D (g) के लिए ∆U = -10.5 kJ एवं ∆S =-44.1JK-1 अभिक्रिया के लिए ∆G की गणना कीजिए और बताइए कि क्या अभिक्रिया स्वत:प्रवर्तित हो सकती है?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-16

प्रश्न 20.
300 K पर एक अभिक्रिया के लिए साम्य स्थिरांक 10 है। ∆G का मान क्या होगा? (R = 8.314 JK-1mol-1)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-17

प्रश्न 21.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के आधार पर NO(g) तथा NO2(g) के ऊष्मागतिकी स्थायित्व पर टिप्पणी कीजिए-
[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]N2(g) + [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]O2(g) → NO(g); ∆rH = 90 kJ mol-1
NO(g) + [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]O2(g) → NO2(g); ∆rH =-74 kJ mol-1
उत्तर
NO(g) के निर्माण में ऊर्जा अवशोषित होती है, अत: NO(g) अस्थायी है। चूंकि दूसरी अभिक्रिया में ऊर्जा निर्मुक्त होती है, अत: NO2(g) स्थायी है। अत: अस्थायी NO(g) स्थायी NO2(g) में परिवर्तित होती है।

प्रश्न 22.
जब 1.00 mol H2O(l) को मानक परिस्थितियों में विरचित किया जाता है, तब परिवेश के एन्ट्रॉपी-परिवर्तन की गणना कीजिए। (∆fH = -286 kJ mol-1 )
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-18

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जब निकाय को ऊष्मा (q) दी जाए तथा निकाय के द्वारा » कार्य किया जाए तो ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का गणितीय रूप होता है-
(i) ∆E =q+w
(ii) ∆E =q-W
(iii) ∆E =-q+w
(iv) ∆E =-q-W
उत्तर
(ii) ∆E =q-w

प्रश्न 2.
किसी आदर्श गैस के समतापी प्रसार में
(i) आन्तरिक ऊर्जा घटती है।
(ii) आन्तरिक ऊर्जा बढ़ती है।
(iii) संपूर्ण ऊर्जा घटती है
(iv) आन्तरिक ऊर्जा स्थिर रहती है।
उत्तर
(iv) आन्तरिक ऊर्जा स्थिर रहती है।

प्रश्न 3.
एन्थैल्पी ∆H और आन्तरिक ऊर्जा ∆E में सम्बन्ध है|
(i) ∆E = ∆H + P∆V
(ii) ∆E+∆V = ∆H
(iii) ∆H = ∆U+ P∆V
(iv) ∆H = ∆E-P∆V
उत्तर
(iii) ∆H = ∆U+ P∆V

प्रश्न 4.
निकाय के एन्थैल्पी परिवर्तन ∆H और आन्तरिक ऊर्जा परिवर्तन ∆E में सम्बन्ध है-
(i) ∆E = ∆H + P∆U
(ii) ∆E = ∆H+∆nRT
(iii) ∆H = ∆U+∆nRT
(iv) ∆H = ∆E – P∆U
उत्तर
(iii) ∆H = ∆U+∆nRT

प्रश्न 5.
हाइड्रोजन गैस की 25°C पर दहन ऊष्मा -68.4 kcal है। जल की 25°C पर सम्भवन ऊष्मा होगी-
(i) – 34.2 kcal
(ii) -68.4kcal
(iii) – 136.8 kcal
(iv) + 68.4 kcal
उत्तर
(ii) – 68.4 kcal

प्रश्न 6.
समीकरण H2(g)+Cl2(g) 2HCl(g)+ 44.0 kcal से निष्कर्ष निकलता है कि HCI(g) की सम्भवन ऊष्मा है|
(i) – 44.0 kcal
(ii) + 22.0 kcal
(iii) – 22.0 kcal
(iv) +44.0 kcal
उत्तर
(iii)-22.0 kcal

प्रश्न 7.
1 मोल H2O2 का प्लेटिनमें ब्लैक द्वारा अपघटन होता है, 96.6 kJ ऊष्मा उत्पन्न होती है। 1 मोल H2O की सम्भवन ऊष्मा है-
(i) 193.2 kJ
(ii) 48.3 kJ
(iii) 96.6 kJ
(iv) 386.4kJ
उत्तर
(iii) 96.6 kJ

प्रश्न 8.
CO2 की सम्भवन ऊष्मा –90.4 किलोकैलोरी है। यह दर्शाता है कि-
(i) CO2 ऊष्माक्षेपी यौगिक है।
(ii) CO2 ऊष्माशोषी यौगिक है।
(iii) CO2 समतापीय यौगिक है।
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(i) CO2 ऊष्माक्षेपी यौगिक है

प्रश्न 9.
सही सम्बन्ध चुनिए|
(i) Qp =-∆H
(ii) Qv = ∆H
(iii) Qp = ∆E
(iv) Qv = ∆E
उत्तर
(ii) Qv = ∆H

प्रश्न 10.
अभिक्रिया H2(g) + Cl2(g) → 2HCl(g) के एन्थैल्पी परिवर्तन, ∆H का मान – 68.4 Kcal है। इसका ऋण चिह्न प्रदर्शित करता है-
(i) अभिकारकों की एन्थैल्पी से उत्पादों की एन्थैल्पी अधिक है।
(ii) अभिकारकों की एन्थैल्पी से उत्पादों की एन्थैल्पी कम है।
(iii) अभिक्रिया ऊष्माशोषी है।
(iv) अभिक्रिया अग्र दिशा में नहीं होती है।
उत्तर
(ii) अभिकारकों की एन्थैल्पी से उत्पादों की एन्थैल्पी कम है।

प्रश्न 11.
मेथेन, ऐसीटिलीन, एथिलीन तथा बेंजीन की दहन ऊष्माएँ क्रमशः – 213, -310, – 337 तथा – 410 kcal हैं। सबसे अच्छा ईंधन है|
(i) मेथेन
(ii) ऐसीटिलीन
(iii) एथिलीन
(iv) बेंजीन
उत्तर
(iv) बेंजीन

प्रश्न 12.
मानक अवस्थाओं की स्थितियाँ हैं-
(i) 25 K तथा 1 atm
(ii) 0°C तथा 1 atm
(iii) 20°C तथा 1 atm
(iv) 25°C तथा 1 atm
उत्तर
(iv) 25°C तथा 1 atm

प्रश्न 13.
अभिक्रिया की स्वतः प्रवर्तित होने की कसौटी है
(i) AG का ऋणात्मक होना
(ii) AG का धनात्मक होना
(iii) AG का मान शून्य होना
(iv) AG धनात्मक तथा AS ऋणात्मक होना
उत्तर
(i) AG का ऋणात्मक होना

प्रश्न 14.
जब बर्फ पिघलती है, तो इसकी एंटॉपी|
(i) घटती है
(ii) बढ़ती है
(iii) शून्य हो जाती है
(iv) स्थिर रहती है
उत्तर
(ii) बढ़ती है।

प्रश्न 15.
कपूर को वाष्पीकृत करने पर इसकी एंट्रॉपी-
(i) घटती है
(ii) बढ़ती है।
(iii) स्थिर रहती है।
(iv) शून्य हो जाती है।
उत्तर
(ii) बढ़ती है।

प्रश्न 16.
CH3COOH तथा NaOH की उदासीनीकरण ऊष्मा होती है-
(i) -13.6 Kcal/mol
(ii) -13.6 Kcal/mol से अधिक ऋणात्मक
(iii) -13.6 Kcal/mol से कम ऋणात्मक
(iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर
(iv) उपर्युक्त में से कोई नहीं

प्रश्न 17.
36.5 ग्राम HCI और 40 ग्राम NaOH के द्वारा उत्पन्न होने वाली उदासीनीकरण ऊष्मा का मान होगा-
(i) 76.5 किलोकैलोरी
(ii) 12.7 किलोकैलोरी
(iii) शून्य
(iv) 13.7 किलोकैलोरी
उत्तर
(iv) 13.7 किलोकैलोरी

प्रश्न 18.
अभिक्रिया H2+Cl2 → 2HCl में ∆H = -194 kJ HCI की उत्पादन ऊष्मा है-
(i) + 19 kJ
(ii) + 194 kJ
(iii) – 194 kJ
(iv) – 97 kJ
उत्तर
(iv)-97 kJ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऊष्मागतिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं के मध्य सम्बन्धों तथा उनके अन्तरापरिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है, ऊष्मागतिकी कहलाती है।

प्रश्न 2.
आन्तरिक ऊर्जा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
निश्चित परिस्थितियों में किसी निकाय में ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा उपस्थित होती है जो उसके पदार्थ की प्रकृति एवं मात्री तथा उसके ताप, दाब और आयतन पर निर्भर करती है। निश्चित परिस्थितियों में किसी निकाय में उपस्थित ऊर्जा की कुल मात्रा उसकी आन्तरिक ऊर्जा E कहलाती है। किसी पदार्थ या निकाय की आन्तरिक ऊर्जा का वास्तविक मान ज्ञात नहीं है, परन्तु किसी भौतिक या रासायनिक प्रक्रम में होने वाले ऊर्जा ,परिवर्तन को ज्ञात किया जा सकता है। माना किसी तन्त्र की प्रारम्भिक तथा अन्तिम अवस्थाओं में ऊर्जा क्रमशः E1 व E2 हों तथा ऊर्जा में परिवर्तन ∆E हो, तो

∆E = E2 – E1

यदि ∆E का मान धनात्मक है तो अभिक्रिया ऊष्माशोषी होगी और यदि ∆E का मान ऋणात्मक है तो अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी होगी।

प्रश्न 3.
किसी निकाय को 40 जूल ऊष्मा देने पर निकाय द्वारा 8 जूल कार्य किया गया। निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि ज्ञात कीजिए।
उत्तर
आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि = दी गयी ऊष्मा – किया गया कार्य = 40- 8= 32 जूल।

प्रश्न 4.
अभिक्रिया ऊष्मा को समझाइए। या अभिक्रिया की ऊष्मा अथवा अभिक्रिया की एन्थैल्पी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
अभिक्रिया ऊष्मा, कैलोरी में ऊष्मा की वह मात्रा है जो किसी रासायनिक समीकरण द्वारा प्रकट पदार्थों की ग्राम-अणु मात्राओं की पूर्ण अभिक्रिया होने पर शोषित या उत्पन्न होती है।
उदाहरणार्थ-

C+ O2 → CO2 + 94,300 कैलोरी

इस क्रिया की अभिक्रिया ऊष्मा 94300 कैलोरी है।

प्रश्न 5.
एन्थैल्पी किसे कहते हैं? आन्तरिक ऊर्जा से इसका सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर
निश्चित दशाओं में निकांय की आन्तरिक ऊर्जा तथा PV ऊर्जा का योग एन्थैल्पी कहलाता है। निकाय की एन्थैल्पी को अन्तर्निहित ऊष्मा अथवा पूर्ण ऊष्मा भी कहते हैं। इसे H से प्रदर्शित करते हैं।

H =U+ PV

जहाँ, H = निकाय की एन्थैल्पी, U = निकाय की आन्तरिक ऊर्जा, P = दाब तथा V = आयतन

प्रश्न 6.
ऊष्माक्षेपी तथा ऊष्माशोषी अभिक्रियाओं को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया–जिन रासायनिक अभिक्रियाओं में ऊष्मा उत्सर्जित होती है, उन्हें ऊष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ कहते हैं।
उदाहरणार्थ-

C(s) + O2(g) → CO2(g); ∆H =- 94.3kcal (25°C)

यह एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है जिसमें 25°C और 1 वायुमण्डल दाब पर 94.3 kcal ऊष्मा उत्सर्जित होती है।
ऊष्माशोषी अभिक्रिया-जिन रासायनिक अभिक्रियाओं में ऊष्मा अवशोषित होती है, उन्हें ऊष्माशोषी अभिक्रियाएँ कहते हैं।
उदाहरणार्थ-

N2(g)+O2(g)–> 2NO(g); ∆H = + 43.2kcal (25°C)

यह एक ऊष्माशोषी अभिक्रिया है जिसमें 25°C और 1 वायुमण्डल दाब पर 43.2 kcal ऊष्मा अवशोषित होती है।

प्रश्न 7.
प्रावस्था रूपान्तरण में एंट्रॉपी किस प्रकार प्रभावित होती है? एक उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
किसी पदार्थ की एंट्रॉपी ठोस अवस्था में न्यूनतम तथा गैस अवस्था में अधिकतम होती है।

Sठोस <Sद्रव <Sगैस

पानी की तीनों अवस्थाओं में एंट्रॉपी का क्रम इस प्रकार है

Sबर्फ <Sजल <Sभाप

प्रश्न 8.
ऊर्ध्वपातन ऊष्मा अथवा उर्ध्वपातन एन्थैल्पी क्या है?
उत्तर
किसी ठोस पदार्थ के 1 मोल को उसके गलनांक से नीचे ताप पर सीधे वाष्प अवस्था में परिवर्तित होने पर होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन को पदार्थ की ऊर्ध्वपातन ऊष्मा अथवा ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी कहते हैं।

प्रश्न 9.
जलयोजन ऊष्मा अथवा जलयोजन एन्थैल्पी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
एक मोल अनार्दै लवण के उपयुक्त संख्या में जल के मोलों में संयोजित होकर जलयोजित लवण बनाने में होने वाला एन्थैल्पी परिवर्तन जलयोजन ऊष्मा अथवा जलयोजन एन्थैल्पी कहलाता है।

प्रश्न 10.
संक्रमण ऊष्मा अथवा संक्रमण एन्थैल्पी को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
किसी तत्त्व के 1 मोल के एक अपररूप से दूसरे में परिवर्तित होने पर होने वाला एन्थैल्पी परिवर्तन संक्रमण ऊष्मा अथवा संक्रमण एन्थैल्पी कहलाता है।

प्रश्न 11.
किसी प्रबल क्षार तथा प्रबल अम्ल की उदासीनीकरण की ऊष्मा स्थिर क्यों होती है?
उत्तर
प्रबल क्षार तथा प्रबल अम्लों की उदासीनीकरण ऊष्मा लगभग 13.7 किलोकैलोरी होती है। उदासीनीकरण ऊष्मा का स्थिर मान होना उनके तनु विलयनों में पूर्ण आयनन के कारण है। यदि प्रबल अम्ल HA तथा प्रबल क्षार BOH के ग्राम तुल्यांकी मात्राओं के तेनु विलयनों को मिलाया जाए, तो आयनिक सिद्धान्त के अनुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-19
उपर्युक्त समीकरणों से स्पष्ट है कि उदासीनीकरण ऊष्मा किसी अम्ल से उत्पन्न H+ आयनों तथा क्षार से उत्पन्न OH आयनों के संयोग से बने जल की उत्पन्न ऊष्मा है; अत: उदासीनीकरण ऊष्मा जल की हाइड्रोजन तथा हाइड्रॉक्सिल आयनों से उत्पादन ऊष्मा के बराबर होती है। इस प्रकार, जल की उत्पादन ऊष्मा का मान सदैव लंगभग 13.7 किलोकैलोरी होता है; अत: उदासीनीकरण ऊष्मा का मान प्रबल अम्ल तथा प्रबल क्षार के लिए स्थिर रहता है।

प्रश्न 12.
CH4(g), C(s) और H2(g) की 25°C पर दहन ऊष्माएँ क्रमशः -212.8 kcal, 940 kcal और – 68.4 kcal हैं। मेथेन गैस की संभवन ऊष्मा ∆fH की गणना
कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-20

प्रश्न 13.
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर मेथेन की दहन ऊष्मा की गणना कीजिए-
C2 + 2H2 → CH4;∆H = x kJ …………(i)
C + O2→ CO2; ∆H = y kJ …….(ii)
H2 +[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]O2 → H2O; ∆H= kJ ……(iii)
मेथेन की दहन ऊष्मा का समीकरण है
CH4+ 2O2 + CO2 + 2H2O
उत्तर
समीकरण (iii) को 2 से गुणा करके, समीकरण (ii) में जोड़कर फिर उसमें समीकरण (i) को उल्टा करके जोड़ने पर,
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-21

प्रश्न 14.
स्थिर दाब एवं 17°C पर एथिलीन की उत्पादन ऊष्मा – 2.71 किलोकैलोरी है। स्थिर आयतन पर इसकी उत्पादन ऊष्मा ज्ञात कीजिए। R = 0.002 Kcal तथा
2C(s) + 2H2(g) → C2H4(g)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-22

प्रश्न 15.
CO (g), CO2 (g) और H2O(g) की संभवन ऊष्माएँ क्रमशः -25.7,-93.2 तथा –56.4 kcal हैं। निम्नलिखित अभिक्रिया की अभिक्रिया ऊष्मा की गणना कीजिए-
CO2 (g)+H2(g) → CO(g) + H2O (g)
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-23

प्रश्न 16.
हेस का स्थिर ऊष्मा संकलन का नियम क्या है? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
हेस का स्थिर ऊष्मा योग नियम-यदि एक ही रासायनिक परिवर्तन एक या अधिक विधियों से, एक या अधिक पदों में पूर्ण किया जाये, तो पूर्ण परिवर्तन में उत्पन्न या शोषित ऊष्मा समान होती है। चाहे परिवर्तन किसी भी विधि से पूर्ण किया गया हो।
उदाहरणार्थ-

C(s) + O2(g) → CO2(g) + 94 kcal

इस अभिक्रिया को दो पदों में करने पर-

C(s) +[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] O2 (g) → CO(g)+ 264 kcal
CO(g) +[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]O2(g) → CO2(g) + 67.6 kcal

इन दोनों समीकरणों को जोड़ने पर-

C(s) +O2(g) → CO2(g)+ 94 kcal

इस प्रकार प्रत्येक दशा में एक मोल कार्बन के दहन से 94kcal ऊष्मा उत्सर्जित होती है। यह तथ्य हेस के नियम की पुष्टि करता है।

प्रश्न 17.
हेस के नियम का उघ्रयोग’ अपररूपों की रूपान्तरण ऊष्माओं की गणना करने में किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर
किसी तत्त्व के एक अपरखप से दूसरे अपररूप में स्थानान्तरण होने में उत्सर्जित या अवशोषित ऊष्मा की मात्रा का निर्धारण प्रयोग द्वारा नहीं किया जा सकता है क्योंकि सामान्यत: केवल ताप बदलने से एक अपररूप दूसरे अपररूप में परिवर्तित नहीं होता है। अपररूपों की दहन ऊष्माओं का मान प्रयोग द्वारा प्राप्त कर लेते हैं। माना कार्बन के दोनों अपररूपों Caiamond एवं Canhite की दहन ऊष्माएँ a तथा b हैं-

Cdiamond +O2 → CO2(g); ∆H = akcal …(i)
Cgraphite +O2 → CO2(g); ∆H = b kcal…(ii)

समी० (i) – समी० (i) करने पर
Cdiamond – Cgraphite ∆H =a-b kcal

प्रश्न 18.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए
(i) उत्पादन यो सम्भवन ऊष्मा,
(ii) दहन ऊष्मा
उत्तर
(i) उत्पादन या सम्भवन ऊष्मा—किसी यौगिक के अपने तत्त्वों से एक ग्राम-अणु बनाने में जितनी ऊष्मा की मात्रा उत्पन्न या अवशोषित होती है, वह उस यौगिक की उत्पादन यो सम्भवन ऊष्मा कहलाती है;
जैसे-

C+O2 → CO2 + 94,300 cal
C+ 2S → CS2 -19,800 cal

CO2 तथा CS2 की उत्पादन ऊष्माएँ क्रमश: 94,300 कैलोरी और -19,800 कैलोरी हैं।

(ii) दहन ऊष्मा–किसी यौगिक या तत्त्व के एक ग्राम-अणु के पूर्ण दहन पर जो ऊष्मा उत्पन्न होती है, वह उसकी दहन ऊष्मा कहलाती है; जैसे

CH4 + 2O2 → CO2 + 2H2O+ 21,000 कैलोरी
C+O2 → CO2 +94,300 कैलोरी

अतः मेथेन तथा कार्बन की दहन ऊष्माएँ क्रमशः 21,000 तथा 94,300 कैलोरी हैं।

प्रश्न 19.
स्वतः प्रवर्तित व स्वतः अप्रवर्तित प्रक्रम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
स्वतः प्रवर्तित प्रक्रम–ऐसे प्रक्रम जो कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अपने आप या एक बार प्रारम्भ करने के पश्चात् अपने आप होते रहते हैं, स्वत: प्रवर्तित प्रक्रम कहलाते हैं।
स्वतः अप्रवर्तित प्रक्रम-ऐसे प्रक्रम जो न तो अपने आप और न ही एक बार प्रारम्भ करने के पश्चात् हो सकते हैं, स्वतः अप्रवर्तित प्रक्रम कहलाते हैं।

प्रश्न 20.
एंट्रॉपी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
किसी निकाय की एंट्रॉपी उस निकाय की अव्यवस्था या यादृच्छिकता की मात्रा की माप है। इसे S से प्रदर्शित करते हैं। निकाय की अव्यवस्था बढ़ने पर एंट्रॉपी बढ़ जाती है। एक निश्चित ताप पर निकाय की एंट्रॉपी परिवर्तित होती है। अवस्था परिवर्तन पर एंट्रॉपी परिवर्तित होती है। एंट्रॉपी परिवर्तन को ∆S से प्रदर्शित करते हैं।
∆S = S2 – S1 (जहाँ S2 तथा S1 अन्तिम तथा प्रारम्भिक अवस्था की एंट्रॉपी हैं।)

प्रश्न 21.
एंट्रॉपी पर ताप का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
निकाय का ताप बढ़ने पर एंट्रॉपी बढ़ जाती है। एक निश्चित ताप पर एंट्रॉपी निश्चित होती है। तथा ताप परिवर्तन पर एंट्रॉपी परिवर्तित होती है।

प्रश्न 22.
रासायनिक परिवर्तनों में एंट्रॉपी परिवर्तन के चिह्न का अनुमान किस प्रकार लगाया जाता है? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
वे प्रक्रम जिनमें AS एंट्रॉपी परिवर्तन का मान धनात्मक होता है अर्थात् जिनमें एंट्रॉपी बढ़ती है । वे स्वतः प्रवर्तित प्रक्रम हैं, जैसे- बर्फ का पिघलना, लवणों की ऊष्माशोषी इत्यादि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निकाय, परिवेश तथा परिसीमा को परिभाषित कीजिए। उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
निकाय–ब्रह्माण्ड का वह भाग जो ऊष्मागतिक अध्ययन के लिए चुना जाता है अर्थात् जिस पर प्रेक्षण होते हैं, निकाय कहलाता है।
परिवेश–निकाय को छोड़कर ब्रह्माण्ड का शेष भाग परिवेश कहलाता है।
परिसीमा–निकाय तथा परिवेश के मध्य एक वास्तविक या काल्पनिक परिसीमा होती है जो दोनों को एक-दूसरे से पृथक् करती है।
उदाहरणार्थ-जब हम बीकर में NaOH तथा HCl की अभिक्रिया का अध्ययन करते हैं तो अभिक्रिया मिश्रण निकाय, बीकर परिसीमा तथा बीकर के बाहर का सम्पूर्ण भाग निकाय को परिवेश होता है।

प्रश्न 2.
निकाय तथा परिवेश के मध्य द्रव्य एवं ऊर्जा के विनिमय के आधार पर निकाय को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर
निकाय तथा परिवेश के मध्य द्रव्य एवं ऊर्जा के विनिमय के आधार पर निकाय को निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है–

  1. विवृत निकाय या खुला निकाय—जो निकाय अपने परिवेश के साथ द्रव्य तथा ऊर्जा दोनों का विनिमय कर सकता है, विवृत निकाय या खुला निकाय कहलाता है। उदाहरणार्थ-खुले बीकर में लिया गया जल। यह परिवेश से द्रव्य (वाष्प) तथा ऊर्जा (ऊष्मा) दोनों का ही विनिमय कर सकता है।
  2. संवृत भिकाय या बन्द निकाय—जो निकाय अपने परिवेश के साथ ऊर्जा का तो विनिमय कर सकता है परन्तु द्रव्य का नहीं कर सकता, संवृत निकाय या बन्द निकाय कहलाता है। उदाहरणार्थ-किसी बन्द धात्विक पात्र में लिया गया जल। पात्र की दीवारों के माध्यम से निकाय तथा परिवेश के मध्य ऊर्जा (ऊष्मा) का तो विनिमय हो सकता है परन्तु चूंकि पात्र बन्द है इसलिए निकाय तथा परिवेश के मध्य द्रव्य का विनिमय नहीं हो सकता।
  3. विमुक्त निकाय या विलगित निकाय—जो निकाय अपने परिवेश के साथ न तो ऊर्जा का विनिमय कर सकता है और न ही द्रव्य का, विमुक्त निकाय या विलगित निकाय कहलाता है। उदाहरणार्थ–एक ऊष्मारोधी तथा बन्द पात्र में लिया गया जल। यह अपने परिवेश में न तो ऊर्जा का विनिमय कर सकता है और न ही द्रव्य का।

प्रश्न 3.
संघटन के आधार पर निकाय कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर
संघटन के आधार पर निकाय निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं

  1. समांगी निकाय—वह निकाय जिसकी प्रकृति सर्वत्र समान होती है, समांगी निकाय कहलाता है। यह केवल एक प्रावस्था का बना होता है। उदाहरणार्थ-शुद्ध ठोस; जैसे–सोडियम क्लोराइड, शुद्ध गैस; जैसे–ऑक्सीजन, वास्तविक विलयन; जैसे–चीनी का जल में विलयन आदि।
  2. विषमांगी निकाय—वह निकाय जिसकी प्रकृति सर्वत्र समान नहीं होती है, विषमांगी निकाय कहलाता है। इसमें एक से अधिक प्रावस्थाएँ होती हैं। उदाहरणार्थ-जल तथा वाष्प, बर्फ तथा जल, जल तथा तेल आदि।

प्रश्न 4.
विस्तीर्ण गुण तथा गहन गुण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
विस्तीर्ण गुण तथा गहन; गुण का वर्णन निम्नवत् है-

  1. विस्तीर्ण गुणवे गुण जो निकाय में उपस्थित पदार्थ (पदार्थों) की मात्रा पर निर्भर करते हैं। , विस्तीर्ण गुण कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-द्रव्यमान, आयतन, ऊष्मा धारिता, आन्तरिक ऊर्जा, एन्ट्रॉपी, गिब्ज़ मुक्त ऊर्जा, पृष्ठ क्षेत्रफल आदि। ये गुण निकाय में उपस्थित पदार्थ की मात्रा के साथ बदलते रहते हैं। यदि हम अपनी सुविधानुसार निकाय को विभिन्न भागों में बाँट दें तो पदार्थ के विस्तीर्ण गुण का कुल मान उन भागों के विस्तीर्ण गुण के योग के बराबर होता है।
  2. गहन गुण-वे गुण जो निकाय में उपस्थित पदार्थ (पदार्थों) की मात्रा पर निर्भर नहीं करते हैं। गहन गुण कहलाते हैं। ये केवल पदार्थ (पदार्थों) की प्रकृति पर निर्भर करते हैं। ताप, दाब, घनत्व, श्यानता, पृष्ठ तनाव, गलनांक, क्वथनांक आदि ऐसे गुणों के उदाहरण हैं। दो विस्तीर्ण गुणों का अनुपात गहन होता हैं। इसलिए जब हम किसी पदार्थ की इकाई मात्रा के लिए किसी विस्तीर्ण गुण की बात करते हैं तो वह गहन गुण बन जाता है।
    उदाहरणार्थ-द्रव्यमान द्रव्यं की मात्रा पर निर्भर करता है अर्थात् यह एक विस्तीर्ण गुण है। परन्तु द्रव्यमान प्रति इकाई आयतन अर्थात् घनत्व एक गहन गुण है जो पदार्थ की मात्रा पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 5.
ऊष्मागतिक साम्य का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। या ऊष्मागतिकी का शून्य नियम क्या है?
उत्तर
जब किसी निकाय के स्थूल गुणों; जैसे–ताप, दाब आदि में समय के साथ कोई परिवर्तन नहीं होता है तो निकाय ऊष्मागतिक साम्य में कहलाता है। वास्तव में यह साम्य तभी प्राप्त होता है जब तीन साम्य एक साथ प्राप्त होते हैं। ये तीन साम्य निम्नवत् हैं-

  1. यांत्रिक साम्य-जब निकाय के अन्दर कोई स्थूल गति न हो या निकाय की परिवेश के सापेक्ष – कोई गति न हो तो निकाय यांत्रिक साम्य की स्थिति में कहलाता है। इसके लिए निकाय के यांत्रिक गुण एक समान तथा स्थिर होने चाहिए।
  2. रासायनिक साम्य-एक से अधिक पदार्थों वाला ऐसा निकाय जिसका संघटन समय के साथ परिवर्तित नहीं होता है, रासायनिक साम्य की अवस्था में कहलाता है।
  3. तापीय साम्य-जब किसी निकाय का ताप एक समान होता है तथा वह परिवेश के ताप के भी। समान होता है तो निकाय तापीय साम्य की अवस्था में कहलाता है। माना हमारे पास तीन निकाय A, B तथा C इस प्रकार हैं—A तथा B और B तथा C तापीय साम्य में हैं तब निकाय A तथा C भी तापीय साम्य में होंगे। यही ऊष्मागतिकी का शून्य नियम कहलाता है। इस नियम के अनुसार, “दो निकाय जो किसी तीसरे निकाय से तापीय साम्य में होते हैं उनमें आपस में भी तापीय साम्य होता है।”

प्रश्न 6.
ऊष्मा क्या है? इसके मात्रक तथा इसके लिए चिह्न परिपाटी के नियम लिखिए।
उत्तर
ऊष्मा–निकाय तथा परिवेश के मध्य ऊष्मा के रूप में ऊर्जा तब स्थानान्तरित होती है जब निकाय तथा परिवेश में तापान्तर होता है। यदि निकाय का ताप अधिक होता है तो निकाय परिवेश को ऊष्मा के रूप में ऊर्जा स्थानान्तरित करता है जिससे निकाय का ताप कम हो जाता है तथा परिवेश का ताप बढ़ जाता है। यह ऊर्जा ्थानान्तरण तब तक होता है जब तक कि निकाय और परिवेश का ताप समान नहीं हो जाता। यदि निकाय को ताप परिवेश के ताप से कम होता है तो ऊष्मा के रूप में ऊर्जा परिवेश से निकाय में स्थानान्तरित होती है जिससे निकाय का ताप बढ़ जाता है तथा परिवेश का ताप कम हो जाती है। ऊर्जा का यह स्थानान्तरण तब तक होता है जब तक परिवेश तथा निकाय का ताप समान नहीं हो जाता। ऊष्मा को q द्वारा निरूपित करते हैं।
मात्रक-ऊष्मा को सामान्यतः कैलोरी में मापा जाता है। S.I. पद्धति में ऊष्मा का मात्रक जूल होता है।
चिह्न परिपाटी–निकाय द्वारा अवशोषित ऊष्मा धनात्मक होती है जबकि निकाय द्वारा निष्कासित ऊष्मा ऋणात्मक होती है।

प्रश्न 7.
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का गणितीय निगमन कीजिए। या ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम क्या है? इसके गणितीय रूप का व्यंजक लिखिए। एन्थैल्पी तथा ऊर्जा परिवर्तन में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के व्यंजक को प्राप्त करने के लिए एक ऐसे निकाय पर विचार करते हैं जिसकी आन्तरिक ऊर्जा U, है। इस निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि दो विधियों द्वारा की जा सकती है—

  1. निकाय को ऊष्मा देकर तथा
  2. निकाय पर कार्य करके। यदि निकाय ‘g’ ऊष्मा अवशोषित करता है तो,

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 6 Thermodynamics img-24

प्रश्न 8.
एन्थैल्पी परिवर्तन तथा एन्थैल्पी परिवर्तन की चिह्न परिपाटी को समझाइए।
उत्तर
एन्थैल्पी परिवर्तन-स्थिर दाब पर किसी निकाय द्वारा अवशोषित अथवा उत्सर्जित ऊष्मा निकाय का एन्थैल्पी परिवर्तन कहलाता है। इसे ∆H से प्रदर्शित करते हैं।
एन्थैल्पी परिवर्तन की चिह्न परिपाटी-ऊष्माक्षेपी प्रक्रमों के लिए एन्थैल्पी परिवर्तन ऋणात्मक जबकि ऊष्माशोषी प्रक्रमों के लिए एन्थैल्पी परिवर्तन धनात्मक होता है।

प्रश्न 9.
अभिक्रिया की एन्थैल्पी को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अभिक्रिया की एन्थैल्पी निम्न कारकों द्वारा प्रभावित होती है-

  1. अभिकारकों की मात्रा–अभिक्रिया की एन्थैल्पी अभिकारकों की मात्रा पर निर्भर करती है। यदि अभिकारकों की मात्रा दोगुनी कर दी जाए तो अभिक्रिया की एन्थैल्पी भी दोगुनी हो जाती है। इसी प्रकार यदि अभिकारकों की मात्रा दस गुनी कर दी जाए तो अभिक्रिया की एन्थैल्पी भी दस गुनी हो जाती है।
  2. अभिकारकों तथा उत्पादों की भौतिक अवस्थाएँ–अभिकारकों तथा उत्पादों की भौतिक | अवस्था में परिवर्तन के साथ ही अभिक्रिया की एन्थैल्पी का मान भी बदल जाता है।
  3. ताप–अभिक्रिया की एन्थैल्पी का मान अभिकारकों और उत्पादों के ताप पर भी निर्भर करता है।
  4. अपररूप-विभिन्न अपररूपों (allotropes) के लिए भी A,H के मान भिन्न-भिन्न होते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    S(रॉम्बिक) +O2 (g) → SO2(g); ∆rH = -297.0 kJ mol-1 S (मोनोक्लीनिक) +0, (g) -> SO, (g); A H =-297.3 kJmol
    C (ग्रेफाइट) +O2 (g) →CO2 (g); ∆rH =-393.5kJmol-1
    C (डायमंड) +O2 (g) → CO2 (g); ∆rH = -395.4kJmol-1
  5.  विलयनों की सन्द्रिती-यदि अभिक्रिया में विलयन भी भाग लेते हैं तो उनकी सान्द्रता भी अभिक्रिया की एन्थैल्पी को प्रभावित करती है।।
  6.  स्थिर दाब अथवा स्थिर आयतम की दशाएँ–अभिक्रिया की एन्थैल्पी इससे भी प्रभावित होती है कि अभिक्रिया स्थिर दाब पर होती है अथवा स्थिर आयतन पर।

प्रश्न 10.
निम्न को परिभाषित कीजिए-
1. आयनन ऊष्मा अथवा आयनन एन्थैल्पी
2. विलयन ऊष्मा अथवा विलयन एन्थैल्पी
3. आबन्ध ऊर्जा (एन्थैल्पी)
4. कणीकरण एन्थैल्पी
5. आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी
उत्तर

  1. आयनन ऊष्मा अथवा आर्यनेने एन्थैल्पी—किसी पदार्थ के 1 मील के पूर्ण आयनेन में होने वाला एन्थैल्पी परिवर्तन आयनेन ऊष्मा अथवा आयनन एन्थैल्पी कहलाता है।
  2. विलयन ऊष्मा अथवा विलयन एन्यल्पीकिंसी पदार्थ की विलयन एन्थैल्पी वह एन्थैल्पी परिवर्तन है जो इसके 1 मोल को विलायक की निर्दिष्ट मात्रा में घोलने पर होता है। यदि विलायक की मात्रा इतनी अधिक हो किं और अधिक विलायक मिलाने पर कोई ऊष्मा परिवर्तन न हो तब इसे अनन्त तर्नुता पर विलयन एन्थैल्पी कहा जाता है।
  3. ओबन्ध एन्थैल्पी–र्किसी पदार्थ केक ग्रीम अणु की गैसीय अवस्था में विद्यमान सभी बन्धों को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा उसकी आबन्ध एन्थैल्पी कहलाती है।
  4. कंणीकरण एन्थैल्पी–गैसीय अवस्था में किसी पदार्थ के 1 मोल में उपेंस्थित आबन्धों को | पूर्णतया तोड़कर परमाणुओं में बदलने में होने वाला एन्थैल्पी परिवर्तन कैणीकरण एन्थैल्पी कहलाता है। इसे ∆H से प्रदर्शित करते हैं।
  5. आबन्ध वियोजन एन्पी द्विपरमाणुक अणुओं के एक मोल में उपस्थित सभी आबन्धों को तोड़ने में हुआ एन्थैल्पी परिवर्तन आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी कहलाती है। इसे:AH से व्यक्त करते हैं। उदाहरणार्थ—N2(g) → 2N(g); ∆H = + 945.6 किलोजूल/मौल अर्थात् N2(g) के एक मौले में उँपस्थितबन्धों को तोड़ने के लिए 945.6 किलोजूल ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 11.
हेस के नियम के अनुप्रयोग लिखिए।
उत्तर
हेस के नियम से पता चलता है कि ऊष्मरासायनिक समीकरणों को बीजीय समीकरणों के समान ही घटाया, जोड़ा, गुणा अथवा भाग किया जा सकता है। अत: हेस के नियम की सहायता से उन अभिक्रियाओं की ऊष्मा की गणना की जा सकती है जिनकी ऊष्मा सीधे प्रयोगों द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकती। हेस के नियम के कुछ मुख्य अनुप्रयोग निम्नवत् हैं-

  1. विरचन एन्थैल्पी (अथवा सम्भवन एन्थैल्पी) की गणना–जिन यौगिकों को उनके तत्त्वों से सीधे नहीं बनाया जा सकता उनकी विरचन एंथैल्पियाँ कैलोरीमितीय विधियों (calorimetric methods) द्वारा ज्ञात नहीं की जा सकतीं। ऐसे यौगिकों की विरचन एन्थैल्पियाँ हेस के नियम | द्वारा ज्ञात की जा सकती हैं।
  2. संक्रमण एन्थैल्पी की गणना–संक्रमण (किसी पदार्थ के अपररूप का दूसरे में परिवर्तन) बहुत ही धीमी प्रक्रिया है; अतः विभिन्न पदार्थों के एक अपररूप से दूसरे में परिवर्तन (जैसे-डायमंड का ग्रेफाइट, पीले फॉस्फोरस का लाल फॉस्फोरस, रॉम्बिक सल्फर का मोनोक्लीनिक सल्फर में) के साथ होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन को सीधे नहीं मापा जा सकता। हेस के नियम की सहायता से विभिन्न पदार्थों की संक्रमण एन्थैल्पी की गणना की जा सकती
  3.  जलंयोजन एन्थैल्पी की गणना-जलयोजन एन्थैल्पी को प्रयोगों द्वारा सीधे ज्ञात नहीं किया जा सकता परन्तु हेस के नियम द्वारा इसे आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।
  4. हाइड्रोजनीकरण एन्थैल्पी की गणना--हेस के नियम की सहायता से हाइड्रोजनीकरण एन्थैल्पी भी ज्ञात की जा सकती है।
  5. अभिक्रियाओं की मानक एन्थैल्पी की मणना-यौगिकों की दहन एन्थैल्पियों और विरचन एन्थैल्पियों की जानकारी से हेस के नियम द्वारा अभिक्रियाओं की मानक एन्थैल्पियों की गणना की जा सकती है। विरचन एल्थैल्पियों की सहायता से ऊष्मरासायनिक गणनाएँ करने में यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी अभिक्रिया की एन्थैल्पी ∆rH अभिक्रिया के उत्पादों की कुल एन्थैल्पी [Σ∆fH (Products)] तथा अभिकारकों की कुल एन्थैल्पी [Σ∆fH (Reactants)] का अन्तर होती है।
    अर्थात् ∆rH = Σ∆fH (Products) – Σ∆fH (Reactants)
  6. आबन्ध ऊर्जा की गणना-गैसीय अणुओं के क्रमाणुओं के मध्य उपस्थित एक मोल रासायनिक आबन्धों को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा को आबन्धं ऊर्जा (bond energy) कहते हैं। इसे AH द्वारा प्रदर्शित करते हैं। यौगिकों की विरचन ऊष्माओं की जानकारी से उनकी आबन्ध ऊर्जाओं की गणना की जा सकती है तथा आबन्ध ऊर्जाओं की जानकारी से यौर्मिकों की विरचन ऊष्माओं की गणना की जा सकती है।
  7. अनुनाद ऊर्जा की गणना–हेस के नियम का प्रयोग ऊष्मरासायनिक आँकड़ों की सहायता से अनुनाद ऊर्जा की गणना करने में भी किया जाता है। किसी संरचना के लिए अभिक्रिया ” एन्थैल्पी परिकलित (सैद्धान्तिक रूप से) तथा प्रेक्षित (प्रयोगों द्वारा) मानों के अन्तर को अनुनाद ऊर्जा कहते हैं।

प्रश्न 12.
निम्न को परिभाषित कीजिए
1. गलन एंट्रॉपी,
2. वाष्पन एंट्रॉपी तथा
3. ऊर्ध्वपातन ऐट्रॉपी
उत्तर

1. गलन एंट्रॉपी-किसी ठोस पदार्थ के 1 मोल के उसके गलनांक पर द्रव में परिवर्तित होने पर होने वाला एंट्रॉपी परिवर्तन गलन एंट्रॉपी कहलाती है। इसका मान सदैवन्धनात्मक होता है क्योंकि सुव्यवस्थित क्रिस्टलीय ठोस में द्रव की अव्यवस्थित संरचना में संक्रमी में अव्यवस्था में वृद्धि होती है। इसे ∆fusS द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
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2. वाष्पन एंट्रॉपी-किसी द्रव पदार्थ के 1 मोल के उसके क्वथनांक पर वाष्प में परिवर्तित होने पर होने वाला एंट्रॉपी परिवर्तन वाष्पन एंट्रॉपी कहलाता है। इसे ∆vapS द्वारा प्रदर्शित करते हैं। वाष्पन एंट्रॉपी का मान सदैव धनात्मक होता है क्योंकि कम अव्यवस्थित द्रव से अत्यधिक अव्यवस्थित गैस में परिवर्तन पर अव्यवस्था में वृद्धि होती है। गणितीय रूप में,
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3. ऊर्ध्वपातन एंट्रॉपी-किसी ठोस पदार्थ के 1 मोल के उसके सीधे वाष्प में परिवर्तित होने पर होने वाला एंट्रॉपी परिवर्तन ऊर्ध्वपातन एंट्रॉपी कहलाता है। इसे ∆subS द्वारा प्रदर्शित करते हैं। गणितीय रूप में,
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प्रश्न 13.
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम क्या है? स्थिर आयतन तथा 27°C पर CO की दहन ऊष्मा -66.7 किलोकैलोरी है। स्थिर दाब पर इसकी दहन ऊष्मा ज्ञात कीजिए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, स्वत: प्रवर्तित प्रक्रम ऊष्मागतिकीय रूप से अनुत्क्रमणीय होते हैं।” या “बाह्य साधनों का प्रयोग किये बिना स्वत: प्रवर्तित प्रक्रमों को उत्क्रमित नहीं किया जा सकता है।” या “किसी स्वत: प्रवर्तित प्रक्रम के लिए कुल एंट्रॉपी परिवर्तन धनात्मक होता है।” या “ब्रह्माण्ड की एंट्रॉपी में निरन्तर वृद्धि हो रही है।”
CO की दहन ऊष्मा का समीकरण
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प्रश्न 14.
ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम लिखिए। इसका एक अनुप्रयोग भी बताइए।
या
ऊष्मागतिकी के तृतीय नियम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
इस नियम के अनुसार, “परम शून्य ताप पर किसी पूर्ण क्रिस्टलीय पदार्थ की एंट्रॉपी शून्य मानी जा सकती है।”
यह नियम वाल्थर नर्स्ट ने सन् 1906 में दिया था। परम शून्य ताप पर शुद्ध क्रिस्टल के कणों में कोई गति नहीं होती है और वे पूर्ण रूप से व्यवस्थित होते हैं।
ऊष्मागतिकी के तृतीय नियम का प्रयोग शुद्ध पदार्थों की विभिन्न तापों पर निरपेक्ष एंट्रॉपियों की गणना करने में किया जाता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
∆U तथा ∆H का मापन (कैलोरीमिति) किस प्रकार किया जाता है? विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
∆U तथा ∆H का मापन-कैलोरीमिति रासायनिक एवं भौतिक प्रक्रमों से सम्बन्धित ऊर्जा परिवर्तन को जिस प्रायोगिक तकनीक द्वारा ज्ञात करते हैं उसे कैलोरीमिति (calorimetry) कहते हैं। कैलोरीमिति में प्रक्रम एक पात्र में किया जाता है। जिसे कैलोरीमीटर (calorimeter) कहते हैं। कैलोरीमीटर की सहायता से ऊष्मा परिवर्तन का मापन दो स्थितियों में—

  1. स्थिर आयतन पर (q,, अथवा AU) तथा
  2. स्थिर दाब पर (q, अथवा AH) किया जा सकता है।

∆U का मापन–रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए स्थिर आयतन पर ऊर्जा परिवर्तन का मापन बम कैलोरीमीटर में किया जाता है जिसमें एक स्टील का पात्र होता है जिसे बम (bomb) कहते हैं। बम भारी स्टील का बना होता है तथा काफी मजबूत होता है क्योंकि इसे काफी उच्च दाब सहन करना होता है। बम एक वायुरुद्ध ढक्कन द्वारा ढका रहता है। बम में एक प्लेटिनम का कप होता है जिसमें पदार्थ लिया जाता है। बम में दो इलेक्ट्रोड भी होते हैं जो कप में फिलामेंट (filament) से जुड़े होते हैं। बम में ऑक्सीजन के प्रवेश की भी व्यवस्था होती है। बम को एक बड़े पात्र में रखा जाता है जिसमें जल भरा रहता है। साथ ही इस पात्र में एक थर्मामीटर तथा विलोडक भी रहते हैं। इस पूरी व्यवस्था को एक ऊष्मारोधी जैकेट में बन्द किया जाता है।
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विधि-प्रतिदर्श की निश्चित (तोली गयी) मात्रा को प्लेटिनम कप में लिया जाता है। बम में उच्च दाब पर ऑक्सीजन को भी प्रवेश कराया जाता है। फिर फिलामेंट में विद्युत धारा प्रवाहित करके प्रतिदर्श को जलाया जाता है। अभिक्रिया में उत्पन्न ऊष्मा जले को स्थानान्तरित हो जाती है। उसके पश्चात् थर्मामीटर की सहायता से ताप ज्ञात कर लेते हैं। चूँकि अभिक्रिया एक बन्द पात्र में होती है अतः आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होता है और कोई कार्य भी नहीं किया जाता है। यहाँ तक कि गैसों से सम्बन्धित रासायनिक अभिक्रियाओं में कोई भी कार्य नहीं होता है क्योंकि ∆V = 0 कैलोरीमीटर की ऊष्माधारिता ज्ञात होने पर निम्न सूत्रे की सहायता से ताप परिवर्तन (∆T) को ∆U(qv) में परिवर्तित कर लिया जाता है-

∆U=qv =C∆T

जहाँ, C = कैलोरीमीटर की ऊष्माधारिता, ∆T = जल के ताप में परिवर्तन
प्रतिदर्श की मात्रा ज्ञात होने पर निम्न सूत्र की सहायता से प्रति मोल आन्तरिक ऊर्जा परिवर्तन ज्ञात कर लिया जाता है-

[latex]\triangle U=\frac { C\triangle TM }{ m } [/latex]

जहाँ, C = कैलोरीमीटर की ऊष्माधारिता, AT = ताप परिवर्तन
M = प्रतिदर्श का मोलर द्रव्यमान, m= लिए गए प्रतिदर्श का द्रव्यमान
∆H का मापन–स्थिर दाब (सामान्यतः वायुमण्डलीय दाब) पर ऊष्मा परिवर्तन (q, अथवा AH) कॉफी कप कैलोरीमीटर (coffee cup calorimeter) की सहायता से ज्ञात किया जा सकता है। कॉफी कप कैलोरीमीटर में एक पॉलीस्टाइरीन का कप (ढक्कन सहित) होता है। जब किन्हीं दो विलयनों के मध्य होने वाली अभिक्रिया (माना की अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी है) में एन्थैल्पी परिवर्तन ज्ञात करना होता है तो उनमें से एक विलयन की निश्चित मात्रा को कॉफी-कप कैलोरीमीटर में लेकर उसका थर्मामीटर की सहायता से तापे ज्ञात कर लेते हैं। इसके पश्चात् दूसरे विलयन (ज्ञात मात्रा) का भी ताप ज्ञात कर लेते हैं। फिर दूसरे विलयन की निश्चित मात्रा को कैलोरीमीटर में डालकर अभिक्रिया मिश्रण को विलोडक की सहायता से चलाकर मिश्रण के ताप में हुई वृद्धि ज्ञात कर लेते हैं। मिश्रण के ताप में हुई वृद्धि की सहायता से अभिक्रिया में उत्पन्न ऊष्मा निम्न प्रकार ज्ञात कर सकते हैं-
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माना विलयनों का ताप = t1°C,
मिश्रण का अधिकतम ताप = t2°C
दोनों विलयनों का कुल द्रव्यमान = m
विलयन की विशिष्ट ऊष्मा = s,

तब अभिक्रिया में उत्पन्न ऊष्मा, q= mxsx(t2-t1) = mxsx∆t विलयनों के ताप भिन्न होने की दशा में उन्हें वाटर बाथ (water bath) में रखकर उनके ताप समान कर लिए जाते हैं। स्थिर दाब पर उत्सर्जित अथवा अवशोषित ऊष्मा qp अभिक्रिया की ऊष्मा अथवा अभिक्रिया की एन्थैल्पी ∆rH कहलाती है। ऊष्मारोधी अभिक्रियाओं में ऊष्मा निर्मुक्त होती है तथा निकाय से परिवेश में ऊष्मा का प्रवाह होता है। इसलिए qp ऋणात्मक होता है तथा ∆r भी ऋणात्मक होता है। इसी तरह ऊष्माक्षेपी अभिक्रियाओं में ऊष्मा अवशोषित होती है अतः qp और ∆r दोनों धनात्मक होते हैं। कॉफी कप कैलोरीमीटर के स्थान पर ∆H के मापन के लिए हम एक अन्य कैलोरीमीटर का प्रयोग भी कर सकते हैं जिसमें अभिक्रिया एक ऐसे पात्र में करायी जाती है जिसकी दीवारें ऊष्मा की सुचालक होती हैं। यह पात्र एक अन्य बड़े ऊष्मारोधी दीवारों वाले पात्र में स्थित रहता है जिसमें जल होता है। जल में थर्मामीटर तथा विलोडक भी रहते हैं। अभिक्रिया में उत्पन्न/अवशोषित ऊष्मा के कारण जल के ताप में परिवर्तन होता है। इसी ताप परिवर्तन को उपर्युक्त सूत्रे द्वारा qp अथवा ∆H में परिवर्तित कर लिया जाता है।

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UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 3 Imperative Sentences

UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 3 Imperative Sentences

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 English. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 English Translation Chapter 3 Imperative Sentences.

Exercise 6

1. Send the servant to the post office.
2. Walk in the open air in the morning daily.
3. Don’t be proud of your money.
4. Respect your teachers and elders.
5. Give a blanket to this beggar.
6. Please explain this lesson to me again.
7. Never abuse anybody.
8. Always have faith in God and in your power.
9. Help your friends at times of need.
10. Please wait for the principal for two hours.
11. Leave your bad habits at once.
12. Come to Delhi with me for my work.
13. Never kill animals.
14. Please pardon me.
15. Don’t run on the road.

Exercise 7

(A) 1. Let the carpenter make my table.
2. Let the police arrest the thieves.
3.Let these girls sing a sweet song.
4. Do not let the boys copy.
5. Do not let the little children read novels.
6. Do not let the boys throw stones at frogs.
7. Let the servant clean the room.
8. Do not let the small children play in the sunlight.
9. Let him read the Ramayana.
10. Do not let any clerk accept bribe.
11. Let him finish his work.
12. Let me worship God for two hours.
13. Do not let him go to the picnic.
14. Let this girl sing two songs.
15. Let them say what they want to say.

(B) 1. Let us bathe in the Ganga this year.
2. Let us love all the children.
3. Let us not kill the birds.
4. Let us sleep now.
5. Let us respect our elders.
6. Let us learn our lesson now.
7. Let us not abuse anybody.
8. Let us play cricket match.
9. Let us get up at 5 a.m. the morning
10. Let us love small children.
11. Let us serve our country.
12. Now let us depart in the night.
13. Let us take part in essay competition.
14. Certainly let us see the Taj Mahal.
15. Let us distribute blankets among the poor people.

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