UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons (हाइड्रोकार्बन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons (हाइड्रोकार्बन).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
उत्तर
मेथेन का क्लोरीनीकरण एक मुक्त मूलक अभिक्रिया है जो निम्नलिखित क्रियाविधि से होती है-
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों के I.U.P.A.C. नाम लिखिए-
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उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों, जिनमें द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की संख्या दर्शाई गई है, के सभी सम्भावित स्थिति समावयवियों के संरचना सूत्र एवं I.U.P.A.C. नाम दीजिए-
(क) C4H8 (एक द्विआबन्ध)
(ख) C5H8 (एक त्रिआबन्ध)
उत्तर
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों के ओजोनी-अपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए-
(i) पेन्ट-2-ईन
(ii) 3, 4-डाइमेथिल-हेप्ट-3-ईन
(iii) 2-एथिल ब्यूट-1-ईन
(iv) 1-फेनिल ब्यूट-1-ईन
उत्तर
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प्रश्न 5.
एक ऐल्कीन ‘A’ के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा एथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। ‘A’ का I.U.P.A.C. नाम तथा संरचना दीजिए।
उत्तर
ऐल्कीन ‘A’ 3-एथिल पेन्ट-2-ईन है। यह ओजोनी अपघटन पर एथेनले तथा पेन्टेन-3-ओन देता है। इनकी संरचनाएँ निम्नलिखित है-
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प्रश्न 6.
एक ऐल्केन A में तीन C—C, आठ C—H सिग्मा-आबन्ध तथा एक C—C पाई आबन्ध हैं। A ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का आई०यू०पी०ए०सी० नाम लिखिए।
उत्तर
44 u मोलर द्रव्यमान का ऐल्डिहाइड एथेनल (CH3CHO) है। एथेनल के दो मोलों को एक साथ लिखकर उनके ऑक्सीजन परमाणु हटाते हैं और उन्हें द्विआबन्ध द्वारा जोड़ देते हैं।
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प्रश्न 7.
एक ऐल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनॉल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
उत्तर
उत्पाद हैं-
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए-
(i) ब्यूटेन,
(ii) पेन्टीन,
(iii) हेक्साइन,
(iv) टॉलूईन।
उत्तर
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प्रश्न 9.
हेक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएँ बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?
उत्तर
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किसी अणु का क्वथनांक द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाओं पर निर्भर करता है। चूंकि सिस समावयवी में उच्च द्विध्रुव आघूर्ण होता है, अतः इसका क्वथनांक उच्च होता है।

प्रश्न 10.
बेन्जीन में तीन द्वि-आबन्ध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
उत्तर
बेंजीन का अति स्थायित्व अनुनाद या 7-इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण के कारण होता है। बेंजीन में सभी 67t-इलेक्ट्रॉन (तीन द्विआबन्धों के) विस्थानीकृत (delocalised) होते हैं तथा अणु को स्थायित्व प्रदान करते हैं।
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प्रश्न 11.
किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्ते क्या हैं?
उत्तर
किसी अणु के ऐरोमैटिक होने के लिए आवश्यक शर्ते निम्न हैं-

  1. अणु में तल के ऊपर तथा नीचे विस्थानीकृत -इलेक्ट्रॉनों का एक चक्रीय अभ्र (cyclic cloud) होना चाहिए।
  2. अणु समतलीय होना चाहिए। ये इसलिए आवश्यक है क्योंकि 7-इलेक्ट्रॉनों के पूर्ण विस्थानीकरण के लिए वलय समतलीय होनी चाहिए जिससे p-कक्षकों का चक्रीय अतिव्यापन हो सके।
  3. इसमें (4n+2) π-इलेक्ट्रॉनं होने चाहिए, जहाँ n = 0, 1, 2, 3, … है। इसे हकल नियम कहते हैं।

प्रश्न 12.
इनमें से कौन-से निकाय ऐरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिए-
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उत्तर
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में एक sp3 संकरित कार्बन परमाणु है, अतः अणु समतलीय नहीं होगा। अणु में 6π-इलेक्ट्रॉन हैं। लेकिन निकाय पूर्णत: संयुग्मित नहीं है चूँकि सभी π-इलेक्ट्रॉन चक्रीय वलय के सभी परमाणुओं के चारों ओर चक्रीय इलेक्ट्रॉन अभ्र नहीं बनाते हैं, अतः यह ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है।
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ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है क्योंकि इसमें एक sp3 कार्बन परमाणु हैं जिसके कारण अणु समतलीय नहीं है। पुनः इसमें केवल 4-इलेक्ट्रॉन हैं अत: निकाय ऐरोमैटिक नहीं है क्योकि (4n +2) π-इलेक्ट्रॉनों युक्त । समतलीय चक्रीय अभ्र उपस्थित नहीं है।
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ऐरोमैटिक नहीं है क्योंकि यह 8-इलेक्ट्रॉनों युक्त निकाय है अतः यह हकल के नियम अर्थात् (4n +2) π-इलेक्ट्रॉन का पालन नहीं करता है। साथ ही यह समतलीय न होकर टब आकृति (tub-shaped) का होता है।

प्रश्न 13.
बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे-
(i) p-नाइट्रोब्रोमोबेन्जीन
(ii) m-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(iii) p-नाइट्रोटॉलूईन
(iv) ऐसीटोफीनोन।
उत्तर
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प्रश्न 14.
ऐल्केन HC-CH2-C-(CH32-CH2-CH(CH3) में 1°, 2° तथा 3° कार्बन परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबन्धित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।
उत्तर
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पाँच 1° कार्बन परमाणुओं से 15 H संलग्न हैं।
दो 2° कार्बन परमाणुओं से 4 H संलग्न हैं।
एक 3° कार्बन परमाणु से 1 H संलग्न है।

प्रश्न 15.
क्वथनांक पर ऐल्केन की श्रृंखला के शाखन का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ऐल्केनों के क्वथनांक शाखन के साथ घटते हैं क्योंकि शाखन (branching) बढ़ने पर ऐल्केन का पृष्ठ क्षेत्रफल गोले (sphere) के समान हो जाता है। चूंकि गोले का पृष्ठ क्षेत्रफल न्यूनतम होता है, अतः वाण्डर वाल्स बल न्यूनतम होते हैं। अतः शाखन पर क्वथनांक घटते हैं।

प्रश्न 16.
प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2-ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेंजॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1-ब्रोमोप्रोपेन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका
कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रोपीन पर HBr का योग आयनिक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया है जो मारकोनीकॉफ नियमानुसार होती है। इस अभिक्रिया में सर्वप्रथम Hजुड़कर 2° कार्बोधनायन देता है। इस कार्योधनायन पर नाभिकस्नेही Br- आयन को शीघ्रता से आक्रमण होता है तथा 2-ब्रोमोप्रोपेन प्राप्त होती है।

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बेन्जॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में अभिक्रिया मुक्त मूलक क्रियाविधि के अनुसार होती है। इस अभिक्रिया में Br मुक्त मुलक इलेक्ट्रॉनस्नेहीं के रूप में कार्य करता है जो बेन्जॉयल परॉक्साइड की HBr से क्रिया द्वारा प्राप्त होता है।

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मुक्त मूलक प्रोपीन पर इस प्रकार क्रिया करता है कि अधिक स्थायी द्वितीयक (2°) मुक्त मूलक की उत्पत्ति हो सके। यह 2° मूलक HBr से एक H-परमाणु ग्रहण कर 1-ब्रोमोप्रोपेन देता है।

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प्रश्न 17.
1, 2-डाइमेथिलबेन्जीन (o-जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार
करता है?
उत्तर
0-जाइलीन को निम्नलिखित दो केकुले संरचनाओं को अनुनाद संकर माना जाता है। प्रत्येक के ओजोनी अपघटन से दो उत्पाद प्राप्त होते हैं-
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अतः समग्र रूप से तीन उत्पाद निर्मित होते हैं। चूंकि सभी तीन उत्पाद दो केकुले संरचनाओं में से एक से प्राप्त नहीं हो सकते हैं इससे प्रदर्शित होता है कि o-जाइलीन दो केकुले संरचनाओं का अनुनाद संकर है।

प्रश्न 18.
बेन्जीन, n-हैक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।
उत्तर
इन तीनों यौगिकों में कार्बन की संकरण अवस्था निम्नवत् है-
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कक्षक का 5-लक्षण बढ़ने पर अम्लीय लक्षण बढ़ता है अतः अम्लीय लक्षण निम्न क्रम में घटता है-
ऐसीटिलीन > बेंजीन > हेक्सेन

प्रश्न 19.
बेन्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती हैं, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
उत्तर
C6H6 (बेंजीन) की कक्षक संरचना प्रदर्शित करती है कि -इलेक्ट्रॉन अभ्र वलय के ऊपर तथा नीचे स्थित है तथा ढीला व्यवस्थित है अत: इलेक्ट्रॉनस्नेही के लिए आसानी से उपलब्ध है, अत: बेंजीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ शीघ्रता से देती है तथा नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन क्रियाएँ: कठिनता से देती है।

प्रश्न 20.
आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?
(i) एथाइन
(ii) एथीन
(iii) हेक्सेन।
उत्तर
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प्रश्न 21.
उन सभी ऐल्कीनों की संरचनाएँ लिखिए, जो हाइड्रोजनीकरण करने पर 2-मेथिल । ब्यूटेन देती हैं।
उत्तर
उत्पाद की संरचना निम्नवत् है-
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प्रश्न 22.
निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए-
(क) क्लोरोबेन्जीन, 2, 4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेन्जीन, p-नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(ख) टॉलूईन, p-H3C-C6H4-NO2,p-O2N-C6H4-NO2
उत्तर
(क) क्लोरोबेंजीन > p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन > 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन,
(ख) टॉलूईन > p-H3C-C6H4-NO2> p-O2N-C6H4-NO2

प्रश्न 23.
बेन्जीन, m-डाइनाइट्रोबेन्जीन तथा टॉलूईन में से किसका नाइट्रीकरण आसानी से होता है और क्यों?
उत्तर
CH3 समूह इलेक्ट्रॉनदाता समूह होता है जबकि -NO2 समूह इलेक्ट्रॉन निष्कासक होता है। अतः अधिकतम इलेक्ट्रॉन घनत्व टॉलूईन में होगा उससे कम बेंजीन में तथा सबसे कम m-डाइनाइट्रोबेंजीन में। अतः नाइट्रीकरण का घटता हुआ क्रम निम्न होगा-
टॉलूईन > बेंजीन > m-डाइनाइट्रोबेंजीन

प्रश्न 24.
बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड के स्थान पर कोई दूसरा लूइस अम्ल सुझाइए।
उत्तर
निर्जल FeCl3, SnCl4, BF3 आदि।

प्रश्न 25.
क्या कारण है कि वुज अभिक्रिया विषम संख्याकार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
विषम संख्या कार्बन परमाणु युक्त ऐल्केनों के बनाने में दो ऐल्किल हैलाइडों का प्रयोग किया जाता है। ये दो ऐल्किल हैलाइड तीन भिन्न प्रकारों से अभिकृत होकर वांछित ऐल्केन के स्थान पर तीन ऐल्केनों का मिश्रण बनाते हैं। 1-ब्रोमोप्रोपेन तथा 1-ब्रोमोब्यूटेन की वुटुंज अभिक्रिया से हेक्सेन, हेप्टेन तथा ऑक्टेन का मिश्रण प्राप्त होता है जैसा कि नीचे प्रदर्शित है-
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन-सा ऐरोमैटिक यौगिक नहीं है?
(i) बेंजीन
(ii) ऐनिलीन
(iii) साइक्लोहेक्सेन
(iv) पिरीडीन
उत्तर
(iii) साइक्लोहेक्सेन

प्रश्न 2.
निम्नलिखित ब्यूटेनॉल के सम्भव समावयवियों में प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करने वाला यौगिक है।
(i) CH3CHOHCH2—CH3
(ii) CH3-CH2 CH2-CH2-OH
(iii) (CH3)2CHCH2-OH
(iv) (CH3)3COH
उत्तर
(i) CH3CHOHCH2-CH3

प्रश्न 3.
प्रयोगशाला में बॉयर अभिकर्मक का प्रयोग किया जाता है।
(i) द्विबन्ध की जाँच के लिए
(ii) ग्लूकोस की जाँच के लिए
(iii) अपचयन के लिए
(iv) ऑक्सीकरण के लिए
उत्तर
(i) द्विबन्ध की जाँच के लिए

प्रश्न 4.
ऐसीटिलीन अणु में हैं।
(i) 5 δ बन्ध
(ii) 4 δ तथा 1 π बन्ध
(iii) 3 δ तथा 2 π बन्ध
(iv) 2 δ तथा 3 π बन्ध
उत्तर
(iii) 3 δ तथा 2 π बन्ध

प्रश्न 5.
C5H10 आणविक सूत्र वाले निम्न में से किस यौगिक के ओजोनी अपघटन से ऐसीटोन प्राप्त होती है?
(i) 3-मेथिल-ब्यूट-1-ईन
(ii) साइक्लोपेन्टेन
(iii) 2-मेथिल-ब्यूट-1-ईन
(iv) 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन
उत्तर
(iv) 2-मेथिल-ब्यूट-2-ईन

प्रश्न 6.
प्रोपाइन तथा प्रोपीन पहचाने जा सकते हैं।
(i) सांद्र H2SO4 द्वारा।
(ii) CCl4 में Br2 के द्वारा।
(iii) तनु KMnO4 द्वारा
(iv) अमोनियाकृत AgNO3 द्वारा
उत्तर
(iv) अमोनियाकृत AgNO3 द्वारा

प्रश्न 7.
निम्न में से कौन-सा यौगिक द्विध्रुव आघूर्ण प्रदर्शित करता है?
(i) 1,4- डाइक्लोरोबेंजीन
(ii) 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन
(iii) ट्रान्स-1,2-डाइक्लोरोएथेन
(iv) ट्रान्स-ब्यूट-2-ईन
उत्तर
(i) 1, 2-डाइक्लोरोबेंजीन

प्रश्न 8.
रक्त-तप्त नलियों में C2H2 को गर्म करने पर कौन-सा यौगिक बनता है।
(i) एथिलीन
(ii) बेंजीन
(iii) एथेन
(iv) मेथेन
उत्तर
(ii) बेंजीन

प्रश्न 9.
निम्न में से बेंजीन के सल्फोनीकरण में कौन भाग लेता है?
(i) SO2
(ii) SO3H+
(iii) SO3
(iv) SO3H
उत्तर
(ii) SO3

प्रश्न 10.
बेंजीन पर सूर्य के प्रकाश में क्लोरीन की अभिक्रिया से बनता है।
(i) पिक्रिक अम्ल
(ii) क्लोरोपिक्रिन
(iii) नाइट्रोमेथेन
(iv) गैमेक्सीन
उत्तर
(iv) गैमेक्सीन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐलिफैटिक संतृप्त हाइड्रोकार्बन या ऐल्केन से आप क्या समझते हैं?
या
ऐल्केनों को पैराफिन क्यों कहते हैं?
उत्तर
ऐलिफैटिक संतृप्त हाइड्रोकार्बन वे यौगिक होते हैं जिनमें उपस्थित परमाणुओं की सभी श्रृंखलाएँ खुली हुई होती हैं, प्रत्येक कार्बन परमाणु की चारों संयोजकताएँ एकल आबन्धों द्वारा सन्तुष्ट होती हैं तथा केवल कार्बन और हाइड्रोजन उपस्थित होते हैं। इने यौगिकों को ऐल्केन भी कहते हैं। चूंकि ये यौगिक (ऐल्केन) अन्य कार्बनिक यौगिकों की तुलना में कम क्रियाशील होते हैं; इसलिए इन्हें पैराफिन कहते हैं।

प्रश्न 2.
ऐल्केनों की संरचना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ऐल्केनों में प्रत्येक कार्बन परमाणु sp3 संकरित होता है अत: प्रत्येक कार्बन परमाणु की संरचना समचतुष्फलकीय होती है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक कार्बन परमाणु एक समचतुष्फलक के केन्द्र पर स्थित होता है तथा उसकी संयोजकताएँ समचतुष्फलक के शीर्षों की ओर दिष्ट होती हैं। किन्हीं भी दो संयोजकताओं के मध्य 109°28′ का कोण होता है।
ऐल्केनों में C—C आबन्ध लम्बाई 1.54 तथा C—H आबन्ध लम्बाई 1.09Å होती है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों का संरचनात्मक सूत्र लिखिए
(i) 3, 4, 4, 5-टेट्रामेथिलहेप्टेन
(ii) 2, 5-डाइमेथिलहेक्सेन
उत्तर
(i) CH3–CH2–CH(CH3)=C(CH3)2-CH(CH3)–CH2–CH3
(ii) CH2—CH(CH3)–CH2–CH2–CH(CH3)2CH3

प्रश्न 4.
वुटुंज अभिक्रिया द्वारा आप प्रोपेन किस प्रकार बनाएँगे?
उत्तर
एथिल आयोडाइड और मेथिल आयोडाइड की सोडियम से अभिक्रिया ईथर की उपस्थिति में कराने पर प्रोपेन एवं अन्य हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
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प्रश्न 5.
प्रोपेन के विरचन के लिए किस अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होगी? अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
प्रोपेन के विरचन के लिए ब्यूटेनोइक अम्ल के सोडियम लवण की आवश्यकता होती है।
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प्रश्न 6.
ऐल्केन के शाखित होने से उसकी गलनांक किस प्रकार प्रभावित होगा?
उत्तर
ऐल्केन के शाखित होने से उसके अणु क्रिस्टल जालक में दूर-दूर हो जाते हैं। इससे गलनांक घट जाता है। यदि शाखित होने पर अणु सममित हो जाता है तो अणु क्रिस्टल जालक में निविड संकुलित हो जाते हैं जिससे गलनांक में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 7.
ऐल्केनों की दहन अभिक्रिया को समझाइए।
उत्तर
ऐल्केनें ऑक्सीजन या वायु की अधिकता में ज्योतिहीन ज्वाला के साथ जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाती हैं। अभिक्रिया में ऊष्मा (heat) और प्रकाश (light) निकलते हैं।

CH4 + 2O2 → CO2 +2H2O+212.8Kcal
C2H6 + 3[latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex]O2 → 2CO2 + 3H2O+373.0 Kcal

मेथेन और वायु (आधिक्य) के मिश्रण को प्रज्वलित करने पर विस्फोट होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं। कोयले की खानों में विस्फोट होने का यही कारण है।

प्रश्न 8.
ऐल्केनों के ताप अपघटन को समझाइए।
उत्तर
वायु की अनुपस्थिति में उच्च ताप पर गर्म करने से कार्बनिक यौगिक का तापीय अपघटन (thermal decomposition) उनका ताप अपघटन (pyrolysis) कहलाता है।
उदाहरणार्थ-

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उच्च ऐल्केनें वायु की अनुपस्थिति में, उच्च ताप (500-600°C) पर गर्म करने पर छोटे अणुओं में अपघटित हो जाती है। उच्च अणु भार को ऐल्केनों का लघु अणु भार के हाइड्रोकार्बनों में ताप अपघटन भंजन (cracking) कहलाता है। किसी ऐल्केन के भंजन से प्राप्त उत्पाद ऐल्केन की संरचना दाब, ताप, उत्प्रेरक की उपस्थिति आदि कारकों पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 9.
ऐल्केनों के भंजन में C—H आबंधों के स्थान पर C—C आबंध क्यों टूटते हैं।
उत्तर
C—C आबंधों की आबंध वियोजन ऊर्जा C—H आबंधों की आबंध वियोजन ऊर्जा की तुलना में कम होती है। इसलिए ऐल्केनों के भंजन के दौरान C—Cआबंध C—H आबंधों की तुलना में आसानी से टूटते हैं।

प्रश्न 10.
सामान्य ताप पर एथेन के शुद्ध संरूपणों को पृथक करना संभव क्यों नहीं है?
उत्तर
एथेन के दो चरम रूपों (ग्रसित तथा सांतरित संरूपणों) के मध्य ऊर्जा का अंतर 12.5 kJ mol-1 होता है जो कि बहुत कम है। सामान्य ताप पर अंतराण्विक संघट्टों के द्वारा एथेन अणु में तापीय तथा गतिज ऊर्जा होती है जो 12.5kJ mol-1 के ऊर्जा अवरोध को पार करने में सक्षम होती है। इसलिए सामान्य ताप पर एथेन के शुद्ध ग्रसित तथा शुद्ध सांतरित संरूपणों को पृथक् करना संभव नहीं है।

प्रश्न 11.
ऐल्कीन क्या हैं तथा इन्हें ओलीफिन क्यों कहते हैं?
उत्तर
वे ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें केवल एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध उपस्थित होता है, ऐल्कीन कहलाते हैं। ऐल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य एथिलीन है जो क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके तेल जैसा पदार्थ एथिलीन डाइक्लोराइड बनाता है। इसीलिए इस श्रेणी के सदस्यों को ओलीफिन (तेल बनाने वाला) कहते हैं।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
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उत्तर

  1. 2,8-डाइमेथिल डेका-3,6-डाइईन
  2. ऑक्टा -1,3,5,7-टेट्राईन
  3. 2-प्रोपिलपेन्ट-1-ईन
  4. 4-एथिल-2,6-डाइमेथिलडेके-4-ईन

प्रश्न 13.
ऐल्कीनों में संरचनात्मक समावयवता को उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर
ऐल्कीन श्रेणी के प्रथम दो सदस्य (एथीन तथा प्रोपीन) समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं। इस श्रेणी के अन्य सदस्य स्थिति समावयवता तथा श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-अणुसूत्र C4H8 तीन समावयवी ऐल्कीनों को प्रदर्शित करता है।
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यहाँ संरचनाएँ I और II स्थिति समावयवियों को और संरचनाएँ I और II तथा II और II श्रृंखला समावयवियों को प्रदर्शित करती हैं।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित यौगिकों के समपक्ष (cis) तथा विपक्ष (trans) समावयवी बनाइए और उनके IUPAC नाम लिखिए
(i) CHCl = CHCl
(ii) C2H5C(CH3)=C(CH3)C2H5
उत्तर
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प्रश्न 15.
किस धातु का कार्बाइड जल से क्रिया करके ऐसीटिलीन गैस उत्पन्न करता है? रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-34

प्रश्न 16.
ऐल्कीनों के सामान्य भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्कीनों के प्रमुख सामान्य भौतिक गुण निम्नवत् हैं

  1. इस श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य एथीन, प्रोपीन तथा ब्यूटीन रंगहीन गैसें हैं। इसके बाद के | C16H32 तक के सदस्य द्रव तथा इससे ऊँचे सदस्य ठोस होते हैं।
  2. ये जल में अविलेय होते हैं परन्तु ऐल्कोहॉल, बेंजीन तथा ईथर जैसे कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
  3. अणु भार के बढ़ने के साथ इनके आपेक्षिक घनत्व, गलनांक तथा क्वथनांक बढ़ते जाते हैं।
  4. सभी ऐल्कीन वायु में प्रकाश-युक्त लौ के साथ जलती हैं।

प्रश्न 17.
एथेन की तुलना में एथिलीन अधिक क्रियाशील है। क्यों?
उत्तर
एथिलीन में 1 π बन्धं उपस्थित है इसलिए एथिलीन, एथेन की तुलना में अधिक क्रियाशील है।

प्रश्न 18.
HCI, HBr, HI तथा HF को उनकीं ऐल्कीनों से क्रियाशीलता के घटते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर
HI > HBr > HCl> HF

प्रश्न 19.
एथेन और एथीन में कैसे विभेद करेंगे?
उत्तर
एथेन और एथीन में विभेद परीक्षण
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प्रश्न 20.
ऐल्काइन क्या हैं?
उत्तर
वे ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें केवल एक कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध उपस्थित होता है, ऐल्काइन कहलाते हैं। इनमें उपस्थित त्रि-आबन्धों को ऐसीटिलीनिक आबन्ध भी कहते हैं।

प्रश्न 21.
ऐल्काइनों के प्रमुख भौतिक गुणधर्म लिखिए।
उत्तर
ऐल्काइनों के प्रमुख भौतिक गुणधर्म निम्नवत् हैं-

  1. ऐल्काइन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य (C2 से C4) गैसें, अगले आठ सदस्य (C52 से C12) द्रव तथा शेष उच्च सदस्य ठोस हैं।
  2. ऐल्काइने रंगहीन तथा स्वादहीन होती हैं।
  3. ऐल्काइने जल में लगभग अविलेय और कार्बनिक विलायकों में विलेय होती हैं।
  4. ऐल्काइनों के गलनांक, क्वथनांक और आपेक्षिक घनत्व उनके अणुभार बढ़ने के साथ-साथ बढ़ते हैं।

प्रश्न 22.
एथीन और एथाइन में विभेद करने के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले दो अभिकर्मकों के नाम लिखिए।
उत्तर
अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन और अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन।

प्रश्न 23.
ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अथवा ऐरीन क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
वे हाइड्रोकार्बन तथा उनके ऐल्किल, ऐल्किनिल एवं एल्काइनिल व्युत्पन्न जिनमें एक अथवा अधिक बेंजीन वलय होती हैं, ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन अथवा ऐरीन कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-बेंजीन, टॉलूईन, नैफ्थेलीन, बाइफेनिल आदि।

प्रश्न 24.
निम्न के IUPAC नाम लिखिए
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-36
उत्तर

  1. 2-हाइड्रॉक्सी 3-फेनिल ब्यूटेनल,
  2. एथिल एथेनोएटप्रश्न

प्रश्न 25.
प्रोपाइन, ब्यूट डाइईन, बेंजीन में से किसमें सर्वाधिक आबंध हैं?
उत्तर
बेंजीन में (3)।

प्रश्न 26.
बेंजीन अति असंतृप्त होती है परन्तु फिर भी यह योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करती है। क्यों?
उत्तर
ऐसा इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण (delocalization) के कारण अतिरिक्त स्थायित्व के कारण होता है।

प्रश्न 27.
मेसीटिलीन के ओजोनी अपघटन के उद क्या होंगे?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-37

प्रश्न 28.
फ्रीडल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-38

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐल्केनों में पायी जाने वाली समावयवता का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्केन श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य अर्थात् मेथेन, एथेन तथा प्रोपेन समावयवता प्रदर्शित नहीं करते हैं। इस श्रेणी के अन्य सभी सदस्य श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-अणु सूत्र C2H10, C5H12, तथा C6H14 द्वारा प्रदर्शित समावयवियों की संरचनाएँ तथा उनके नाम निम्नवत् हैं।
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स्पष्ट है कि अणु सूत्र C4H10, C5H12 तथा C2H14 द्वारा प्रदर्शित समावयवियों की कुल संख्या क्रमशः दो, तीन व पाँच हैं। ऐल्केनों में किसी अन्य प्रकार की संरचनात्मक समावयवता नहीं पायी जाती है।

प्रश्न 2.
एक ऐल्केन (अणुभार = 72) मोनोक्लोरीनीकरण करने पर केवल एक क्रियाफल देती है। ऐल्केन का नाम बताइए।
उत्तर
ऐल्केन का सामान्य सूत्र CnH2n+2 होता है।
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प्रश्नानुसार, ऐल्केन का मोनो क्लोरीनीकरण कराने पर केवल एक उत्पाद बनता है; अतः सभी हाइड्रोजन एक जैसे होने चाहिए। इसलिए वह ऐल्केन 2, 2-डाइमेथिल प्रोपेन होगी।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-42

प्रश्न 3.
ऐल्केनों के भौतिक गुणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्केनों के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. अवस्था-ऋजु श्रृंखला ऐल्केनों के प्रथम चार सदस्य (C1 से C4) रंगहीन, गंधहीन गैसें हैं। अगले उच्च सदस्य (C5 से C17) रंगहीन वाष्पशील द्रव हैं तथा और उच्च सदस्य रंगहीन ठोस हैं|
  2. विलेयता-ऐल्केन अध्रुवीय प्रकृति की होने के कारण ध्रुवीय विलायकों में अविलेय लेकिन अध्रुवीय कार्बनिक विलायकों में विलेय हैं (समान समान को घोलता है)।
  3. घनत्व—ऐल्केनों के घनत्व ऐल्केनों के अणुभार बढ़ने के साथ बढ़ते हैं। किसी भी ऐल्केन का घनत्व 0.8 gcm-3 से अधिक नहीं है अर्थात् सभी ऐल्केनें जल से हल्की होती हैं।
  4. क्वथनांक-सीधी श्रृंखला या n-ऐल्केनों के क्वथनांक कार्बन परमाणुओं की संख्या बढ़ने पर नियमित रूप से बढ़ते हैं। सामान्यतः श्रेणी के दो उत्तरोत्तर सदस्यों (प्रथम कुछ सदस्यों को छोड़कर) के क्वथनांकों में अन्तर 20-30°C होता है। समावयवी ऐल्केनों में साधारण समावयवी का क्वथनांक शाखित श्रृंखला समावयवी से अधिक होता है। श्रृंखला अधिक शाखित होने पर क्वथनांक कम होते हैं।
    क्वथनांक में परिवर्तन को अन्तराण्विक आकर्षण बलों के पदों में समझाया जा सकता है। ये बल अणु की सतह के सापेक्ष कार्य करते हैं तथा इनका परिमाण पृष्ठ सतह के क्षेत्रफल के बढ़ने पर बढ़ता है। जैसे ही श्रेणी में आण्विक आकार बढ़ता है वैसे ही पृष्ठ क्षेत्रफल बढ़ता है। तथा क्वथनांक भी बढ़ते हैं।
    n-ऐल्केनों में शाखित श्रृंखला समावयवियों की तुलना में अधिक पृष्ठ क्षेत्रफल होता है, अत: अन्तराण्विक बल शाखित श्रृंखला समावयवियों में दुर्बल होते हैं। अतः इनके क्वथनांक सीधी श्रृंखला समावयवियों की तुलना में निम्न होते हैं।
  5. गलनांक-आण्विक आकार के बढ़ने के साथ-साथ ऐल्केनों के गलनांकों में क्रमिक परिवर्तन, नहीं पाया जाता है। सम संख्या में कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केनों के गलनांक विषम संख्या में कार्बन परमाणुओं वाले ऐल्केनों से उच्च होते हैं। सम कार्बन संख्या वाले n-ऐल्केन विषम कार्बन संख्या वाले n-ऐल्केनों की तुलना में अधिक सममित होते हैं अर्थात् वे क्रिस्टल जालक में अधिक निविड़ संकुलित (closely packed) होते हैं। दूसरे शब्दों में, इनमें अन्तराण्विक आकर्षण बल अधिक होते हैं, अत: इनके गलनांक कुछ उच्च होते हैं।
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-43

प्रश्न 4.
संरूपण क्या है? एथेन के परिप्रेक्ष्य में वर्णन कीजिए।
उत्तर
संरूपण-ऐसे परमाणुओं की त्रिविम व्यवस्थाएँ जो C—C एकल आबन्ध के घूर्णन के कारण एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती हैं, संरूपण, संरूपणीय समावयव या घूर्णी कहलाती हैं।

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एथेन के सॉहार्स प्रक्षेप एथेन के संरूपण-एथेन के असंख्य संरूपण होते हैं। इनमें से दो संरूपण चरम होते हैं। एक रूप में दोनों कार्बन के हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के अधिक पास हो जाते हैं उसे ग्रस्त रूप कहते हैं। दूसरे रूप में, हाइड्रोजन परमाणु दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं से अधिकतम दूरी पर रहते हैं। उन्हें सांतरित रूप कहते हैं। इनके अलावा कोई भी मध्यवर्ती संरूपण विषमतलीय संरूपण कहलाता है। सभी संरूपणों में आबन्ध कोण तथा आबन्ध लम्बाई समान रहती है। ग्रस्त तथा सांतरित संरूपणों को सॉहार्स तथा न्यूमैन प्रक्षेप द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

  1. सॉहार्स प्रक्षेप–इस प्रक्षेपण में अणु को आण्विक अक्ष की दिशा में देखा जाता है। कागज पर केंद्रीय C-C आबंध को दिखाने के लिए दाईं या बाईं ओर झुकी हुई एक सीधी रेखा खींची जाती है। इस रेखा को कुछ लंबा बनाया जाता है। आगे वाले कार्बन को नीचे बाईं ओर तथा पीछे वाले कार्बन को ऊपर दाईं ओर से प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक कार्बन से संलग्न तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को तीन रेखाएँ। खींचकर दिखाया जाता है। ये रेखाएँ एक-दूसरे से 120° का कोण बनाकर झुकी होती हैं।
  2. न्यूमैन प्रक्षेप–इस प्रक्षेपण में अणु को सामने से देखा जाता है। आँख के पास वाले कार्बन को एक बिंदु द्वारा दिखाया जाता है और उससे जुड़े तीन हाइड्रोजन परमाणुओं को 120° कोण पर खींची तीन रेखाओं के सिरों पर लिखकर प्रदर्शित किया जाता है। पीछे (आँख से दूर) वाले कार्बन को एक वृत्त द्वारा दर्शाते हैं तथा इसमें आबंधित हाइड्रोजन परमाणुओं को वृत्त की परिधि से परस्पर 120° के कोण पर स्थित तीन छोटी रेखाओं से जुड़े हुए दिखाया जाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-45

प्रश्न 5.
ऐल्कीनों में पाये जाने वाले कार्बन-कार्बन द्वि-आबन्ध की संरचना समझाइए।
या
द्विआबन्धं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ऐल्कीनों में C=C द्विआबंध होता है, जिसमें एक प्रबल सिग्मा (σ) आबंध (आबंध एंथैल्पी लगभग 348 kJmol-1 है) होता है, जो दो कार्बन परमाणुओं के spसंकरित कक्षकों के सम्मुख अतिव्यापन से बनता है। इसमें दो कार्बन परमाणुओं के 2p2 असंकरित कक्षकों के पार्श्व अतिव्यापन करने पर एक दुर्बल पाई (π) आबंध, (आबंध एंथैल्पी 251 kJmol-1 है) बनता है।
C—C एकल आबंध लंबाई (154 pm) की तुलना में C=C द्विआबंध लंबाई (134 pm) छोटी होती है। पाई (π) आबंध दो p-कक्षकों के दुर्बल अतिव्यापन के कारण दुर्बल होते हैं। अतः पाई (π) आबंध वाले ऐल्कीनों को दुर्बल बंधित गतिशील इलेक्ट्रॉनों का स्रोत कहा जाता है। अत: ऐल्कीनों पर उन अभिकर्मकों अथवा यौगिकों, जो इलेक्ट्रॉनों की खोज में होते हैं, का आक्रमण आसानी से हो जाता है। एथीन अणु के कक्षीय आरेख चित्र निम्नवत् हैं।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
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उत्तर

  1. 3, 3-डाइमेथिल-1-हेक्सिन,
  2. 2-एथिल ब्यूटानॉइल क्लोराइड।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-49
उत्तर

  1. 2-एथिल ब्यूटानल,
  2. 2-एथिल 3-मेथिल ब्यूटीन।

प्रश्न 8.
ऐल्कीनों में ज्यामितीय समावयवता को समझाइए।
या
ऐल्कीन ज्यामितीय समावयवता क्यों प्रदर्शित करती हैं?
उत्तर
द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं की बची हुई दो संयोजकताओं को दो परमाणु या समूह जुड़कर संतुष्ट करते हैं। अगर प्रत्येक कार्बन से जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न हैं तो इसे YXC = CXY द्वारा प्रदर्शित करते हैं। ऐसी संरचनाओं को दिक् में निम्न प्रकार प्रदर्शित किया जाता है|
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-50
संरचना ‘a’ में एकसमान दो परमाणु (दोनों x या दोनों Y) द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के एक ही ओर स्थित होते हैं। संरचना ‘b’ में दोनों x अथवा दोनों Y द्विआबंधित कार्बन की दूसरी तरफ या द्विआबंधित कार्बन परमाणु के विपरीत स्थित होते हैं, जो विभिन्न ज्यामिति दर्शाते हैं। इनका दिक् में परमाणु या समूहों की भिन्न स्थितियों के कारण विन्यास भिन्न होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-51
अतः ये त्रिविम समावयवी (stereo isomers) हैं। इनकी समान ज्यामिति तब होती है, जब द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं या समूहों का घूर्णन हो सकता है, परन्तु C= C द्विआबंध में मुक्त घूर्णन नहीं होता। यह प्रतिबंधित होता है। अत: परमाणुओं अथवा समूहों के द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं के मध्य प्रतिबंधित घूर्णन के कारण यौगिकों द्वारा भिन्न ज्यामितियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस प्रकार के त्रिविम समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह एक ही ओर स्थित हों, उन्हें समपक्ष (cis) कहा जाता है, जबकि दूसरे समावयवी, जिसमें दो समान परमाणु या समूह विपरीत ओर स्थित हों, विपक्ष (trans) समावयवी कहलाते हैं। इसलिए दिक् में समपक्ष तथा विपक्ष समावयवों की संरचना समान होती है, किंतु विन्यास भिन्न होता है। दिक् में परमाणुओं या समूहों की भिन्न व्यवस्थाओं के कारण ये समावयवी अनेक गुणों (जैसे-गलनांक, क्वथनांक, द्विध्रुव आघूर्ण, विलेयता आदि) में भिन्नता दर्शाते हैं। ब्यूट-2-ईन की ज्यामितीय समावयवता अथवा समपक्ष-विपक्ष समावयवता को निम्नलिखित संरचना द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-52
ऐल्कीन का समपक्ष रूप विपक्ष की तुलना में अधिक ध्रुवीय होता है।
उदाहरणार्थ-समपक्ष ब्यूट-2-ईन का द्विध्रुव आघूर्ण 0.350 डिबाई है, जबकि विपक्ष ब्यूट-2-ईन का लगभग शून्य होता है। अतः विपक्ष ब्यूट-2-ईन अध्रुवीय है। इन दोनों रूपों की निम्नांकित विभिन्न ज्यामितियों को बनाने से यह पाया गया है कि विपक्ष-ब्यूट-2-ईन के दोनों मेथिल समूह, जो विपरीत दिशाओं में होते हैं, प्रत्येक C-CH, आबंध के कारण ध्रुवणता को नष्ट करके विपक्ष रूप को निम्न प्रकार अध्रुवीय बनाते हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-53
ठोसों में विपक्ष समावयवियों के गलनांक समपक्ष समावयवियों की तुलना में अधिक होते हैं। ज्यामितीय या समपक्ष (cis) विपक्षः (trans) समावयवता, XYC = CXZ तथा XYC = CZW प्रकार की ऐल्कीनों द्वारा भी प्रदर्शित की जाती है।

प्रश्न 9.
ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मकों से अभिक्रिया करती हैं न कि नाभिकस्नेही अभिकर्मकों से। क्यों?
या
ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं न कि इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ क्यों?
उत्तर
ऐल्कीन में द्विआबंध होता है। इनमें से एक प्रबल कार्बन-कार्बन सिग्मा (π) आबंध और एक दुर्बल पाई (σ) आबंध होता है। π – इलेक्ट्रॉनों का इलेक्ट्रॉन अभ्र σ-आबंधित कार्बन परमाणुओं के तल के ऊपर तथा नीचे स्थित होता है। अतः π-इलेक्ट्रॉन कार्बन परमाणुओं से शिथिलता (loosely) से बद्ध होते हैं। चूंकि इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण होते हैं इसलिए π-इलेक्ट्रॉन इलेक्ट्रॉनस्नेही को आकर्षित और नाभिकस्नेही को प्रतिकर्षित करते हैं। अतः ऐल्कीन इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं।
इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाएँ दो प्रकार की हो सकती हैं-योगात्मक तथा प्रतिस्थापन।
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में एक σ- कार्बन-हाइड्रोजन आबंध टूटता है और द्विआबंधित कार्बन परमाणुओं तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही के मध्य एक नया σ-आबंध बनता है। इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में अधिक ऊर्जा परिवर्तन नहीं होता है क्योंकि σ-कार्बन-हाइड्रोजन आबंध तथा नए σ – C – X आबंध की आबंध ऊर्जाओं में अधिक अंतर नहीं होता है।
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं में एक दुर्बल -आबंध टूटता है और दो प्रबल o-आबंधों का निर्माण होता है। इस अभिक्रिया में 445 kJmol-1 (2 x 348 kJmol-1 – 251 kJmol-1) ऊर्जा मुक्त होती है। स्पष्ट है कि ऊर्जा की दृष्टि से इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं से अधिक अनुकूल होती हैं। यही कारण है कि ऐल्कीन मुख्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं न कि इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ।

प्रश्न 10.
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि समझाइए।
या
एथिलीन के Br2 से योग की क्रियाविधि समझाइए।
उत्तर
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि को एथिलीन के Br2 से योग के उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। यह अभिक्रिया निम्न दो पदों में होती है-
पद 1–ब्रोमीन अणु (अध्रुवीय) जब एथिलीन अणु के पास आता है तो द्विआबंध के E-इलेक्ट्रॉन ब्रोमीन अणु में दोनों ब्रोमीन परमाणुओं को बाँधे रखने वाले इलेक्ट्रॉन युग्म को प्रतिकर्षित करने लगते हैं जिससे ब्रोमीन अणु का ध्रुवण हो जाता है। इस ब्रोमीन द्विध्रुव को धन सिरा इलेक्ट्रॉनस्नेही की भाँति व्यवहार करता है। एथिलीन अणु के 7-इलेक्ट्रॉन इस सिरे को आकर्षित करके -संकर (E-complex) बनाते हैं जो बाद में कार्बोधनायन और ब्रोमाइड आयन देता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-54
यह पद मंद पद (slow step) है। अतः यह अभिक्रिया का दर निर्धारक पद (rate determining step) है।
पद 2–प्राप्त कार्बोधनायन अत्यंत क्रियाशील होता है। विलयन में उपस्थित ब्रोमाइड आयन इस पर नाभिकस्नेही आक्रमण करके योगोत्पाद (addition product) बनाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-55

प्रश्न 11.
मारकोनीकॉफ नियम तथा परॉक्साइड प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर
मारकोनीकॉफ का नियम-इस नियम के अनुसार-जब कोई असममित ऐल्कीन किसी असममित अणु से योग करती है तो जुड़ने वाले अणु का धनात्मक भाग द्विआबंध बनाने वाले उस कार्बन परमाणु से जुड़ता है जिस पर अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित होते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-56
इस प्रकार उपरोक्त अभिक्रिया में HBr का धनात्मक भाग अर्थात् H+ कार्बन परमाणु संख्या 1 से संयुक्त होता है क्योंकि कार्बन परमाणु संख्या 1 पर कार्बन परमाणु संख्या 2 की तुलना में अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित हैं।
परॉक्साइड प्रभाव या खैराश प्रभाव-खैराश (Kharasch) तथा उनके सहयोगियों ने सन् 1933 में प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात किया कि परॉक्साइड जैसे बेन्जोइल परॉक्साइड की उपस्थिति में असममित ऐल्कीनों पर HBr (HCl अथवा HI का नहीं) का योग मारकोनीकॉफ के नियम के विरुद्ध होता है।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-57
परॉक्साइड परॉक्साइड की उपस्थिति में ऐल्कीनों के इस अपसामान्य (abnormal) व्यवहार को खैराश प्रभाव (Kharasch effect) या परॉक्साइड प्रभाव (peroxide effect) कहते हैं।

प्रश्न 12.
मेथिल ऐसीटिलीन, अमोनियम क्यूप्रस क्लोराइड के साथ क्रिया करके लाल अवक्षेप देती है जबकि डाइमेथिल ऐसीटिलीन लाल अवक्षेप नहीं देती है। कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-58
मेथिल ऐसीटिलीन में एक अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित है इसकी CuCl तथा NH4OH से अभिक्रिया कराने पर क्यूप्रस मेथिल ऐसीटेलाइड का लाल अवक्षेप बनता है। डाइमेथिल ऐसीटिलीन में कोई अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित नहीं है, इसलिए यह NH4OH तथा CuCl के साथ लाल अवक्षेप नहीं देता है।

प्रश्न 13.
ऐल्काइनों द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली समावयवता का वर्णन कीजिए।
या
ऐल्काइनों में पायी जाने वाली समावयवता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ऐल्काइन निम्नलिखित प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करती हैं-

  1. स्थान समावयवता या स्थिति समावयवता–ऐल्काइन श्रेणी के प्रथम दो सदस्य एथाइन तथा प्रोपाइन केवल एक रूप में पाए जाते हैं। ब्यूटाइन तथा अन्य उच्च ऐल्काइन कार्बन श्रृंखला में त्रिआबंध की विभिन्न स्थितियों के अनुसार स्थिति समावयवती प्रदर्शित करते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-59
  2. श्रृंखला समावयवता–पाँच तथा उससे अधिक कार्बन परमाणु वाले ऐल्काइन श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं। यह समावयवता कार्बन श्रृंखला की विभिन्न संरचनाओं के कारण होती है।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-60
  3. क्रियात्मक समावयवता-ऐल्काइन दो द्विआबंधों वाले यौगिकों के क्रियात्मक समावयवी होते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-61
  4. वलय-श्रृंखला समावयवता-ऐल्काइन साइक्लोऐल्कीनों के साथ वलय-श्रृंखला समावयवता प्रदर्शित करते हैं।
    उदाहरणार्थ-
    UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-62

प्रश्न 14.
एथाइन का उदाहरण देते हुए त्रिआबन्ध की संरचना को समझाइए।
या
त्रिआबन्ध की संरचना पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
एथाइन ऐल्काइन श्रेणी का सरलतम अणु है। इसके प्रत्येक कार्बन परमाणु के दो sp संकरित कक्षकों के समअक्षीय अतिव्यापन से कार्बन-कार्बन सिग्मा आबंध बनता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु का शेष sp संकरित कक्षक अन्तरानाभिकीय अक्ष के सापेक्ष हाइड्रोजन परमाणु के 1s कक्षक के साथ अतिव्यापन करके दो C-H सिग्मा आबंध बनाते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-63
H — C—C आबंध कोण 180° का होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास C—C आबंध तथा तल के लंबवत् असंकरित p-कक्षक होते हैं। एक कार्बन परमाणु को 2p कक्षक दूसरे के समांतर होता है, जो समपाश्विक अतिव्यापन करके दो कार्बन परमाणुओं के मध्य दो (पाई) बंध बनाते हैं। अतः एथाइन अणु में एक C—C(सिग्मा) आबंध, दो C — H (सिग्मा) आबंध तथा दो C—C (पाई) आबंध होते हैं।
C ☰ C की आबंध सामर्थ्य 823 kJmol-1 है, जो C⚌C द्विआबंध आबंध एंथैल्पी 681 kJmol-1C—C एकल आबंध आबंध एंथैल्पी 348 kJmol-1 से अधिक होती है। C ☰ C की त्रिआबंध लम्बाई (120 pm), C=C द्विआबंध (134 pm) तथा C—C एकल आबंध (154 pm) की तुलना में छोटी होती है। अक्षों पर दो कार्बन परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन अभ्र अंतरानाभिकीय सममित बेलनाकार स्थिति में होते हैं। एथाइन एक रेखीय अणु है।

प्रश्न 15.
बेंजीन की संरचना से सम्बन्धित अनुनाद संकल्पना क्या है?
उत्तर
अनुनाद संकल्पना के अनुसार बेंजीन को दोनों केकुले संरचनाओं का अनुनादी संकर माना जाता है।
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बेंजीन की वास्तविक संरचना न तो I है और न ही II है लेकिन इन दोनों संरचनाओं का मध्यमान है। इसके समस्त गुणों की व्याख्या संरचना I या II से नहीं की जा सकती है लेकिन संरचना I तथा II के मध्यमान से की जा सकती है। अत: बेंजीन में प्रत्येक कार्बन-कार्बन आबन्ध की लम्बाई एकल आबंध लम्बाई 1.54 Å तथा द्विआबन्ध लम्बाई 1.34Å के मध्य 1.39 Å होती है। अनुनाद का प्रमुख प्रभाव यह होता है कि अनुनाद संकर का स्थायित्व अनुनाद संरचनाओं के स्थायित्व से अधिक होता है। इस प्रकार बेंजीन की अनुनाद संरचना से इसके स्थायित्व की व्याख्या भी हो जाती है।

प्रश्न 16.
बेंजीन की संरचना की आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर
आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना के अनुसार बेंजीन अणु में छ: कार्बन परमाणु एक चक्रीय श्रृंखला में उपस्थित होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु sp2 संकरित होता है। प्रत्येक कार्बन परमाणु में तीन sp2 संकरित ऑर्बिटल तीन सिग्मा आबन्ध बनाने में प्रयुक्त होते हैं। प्रत्येक कार्बन परमाणु एक सिग्मा आबन्ध एक हाइड्रोजन परमाणु से तथा एक-एक सिग्मा आबन्ध समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं से बनाता है। इस प्रकार ये छ: कार्बन परमाणु एक समषट्भुज बनाते हैं। बेंजीन में C-C- H व C-C-C आबंध कोण 120° के होते हैं तथा प्रत्येक कार्बन परमाणु पर एक अप्रयुक्त p- ऑर्बिटल शेष रहता है। ये सभी p-ऑर्बिटल एक-दूसरे के समानान्तर होते हैं।

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प्रत्येक p-ऑर्बिटल अपने बायें या दायें वाले p-ऑर्बिटल से अतिव्यापन करके एक ए-आबन्ध बना सकता है। इस प्रकार बेंजीन अणु के दो ऑर्बिटल आरेख (orbital diagrams) प्राप्त होते हैं। ये दोनों आरेख दोनों केकुले संरचनाओं के समतुल्य हैं।
आण्विक ऑर्बिटल संकल्पना के अनुसार π–इलेक्ट्रॉनों के विस्थानीकरण (delocalisation) से अधिक स्थायी संरचना प्राप्त होती है। अत: बेंजीन में π – इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण हो जाता है। प्रत्येक p-ऑर्बिटल अपने बायें तथा दायें दोनों ओर अतिव्यापन करता है तथा एक विस्थानीकृत आण्विक ऑर्बिटल प्राप्त होता है जिसमें छ: इलेक्ट्रॉन होते हैं।
इस प्रकार बेंजीन अणु एक सैण्डविच के समान है जिसमें छ: कार्बन परमाणु दो इलेक्ट्रॉन मेघों के…। मध्य एक सैण्डविच के रूप में स्थित होते हैं। बेंजीन को केकुले संरचनाओं I या II से प्रदर्शित किया जा सकता है। चूंकि ये संरचनाएँ बेंजीन की वास्तविक संरचनाएँ नहीं हैं, अतः इसकी वास्तविक संरचना को प्रायः संलग्न चित्र में प्रदर्शित संरचना से प्रदर्शित किया जाता है।

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प्रश्न 17.
बेंजीन संरचना में निम्न की पुष्टि कीजिए
(i) यह एक बन्द श्रृंखला का यौगिक है।
(ii) यह एक संतृप्त यौगिक की भाँति व्यवहार करती है।
उत्तर
बेंजीन की संगत ऐल्केन का अणुसूत्र Cn H2n+2 के अनुसार C6H14 है। बेंजीन में इससे आठ हाइड्रोजन परमाणु कम हैं। अतः यदि बेंजीन की संरचना में कार्बन परमाणु एक विवृत श्रृंखला (open chain) बनाते हैं तो उसमें चार द्विआबन्ध या इसके अनुरूप द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध उपस्थित होने चाहिये। इस आधार पर बेंजीन की निम्नलिखित विवृत श्रृंखला संरचनाएँ सम्भव हैं|

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बेंजीन की विवृत श्रृंखला संरचनाएँ निम्नलिखित कारणों से सम्भव नहीं हैं-

  1. उपरोक्त संरचनाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि एथिलीन तथा अन्य ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों की भॉति बेंजीन भी Br2/CCl4 का रंग उड़ा देगी तथा बॉयर अभिकर्मक का रंग परिवर्तित कर देगी। बेंजीन ऐसा नहीं करती है। अत: बेंजीन की उपरोक्त संरचनाएँ दोषपूर्ण हैं।
  2. बेंजीन हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण, सल्फोनीकरण तथा अन्य प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक प्रदर्शित करती है। इन अभिक्रियाओं में बेंजीन अणु में उपस्थित एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु अन्य परमाणुओं या समूहों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन इस प्रकार की अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करते हैं। अत: बेंजीन की इन अभिक्रियाओं को उपरोक्त संरचनाओं के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता है।
  3. उपरोक्त संरचनाएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि बेंजीन का एक अणु हाइड्रोजन के चार अणुओं का योग करेगा। वास्तव में बेंजीन का एक अणु हाइड्रोजन के तीन अणुओं का योग करता है। अत: बेंजीन की उपरोक्त संरचनाएँ दोषपूर्ण हैं। उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि बेंजीन की विवृत श्रृंखला संरचना सम्भव नहीं है; इसमें तीन कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध उपस्थित हैं तथा इसमें उपस्थित द्विबन्धों की प्रकृति ऐलिफैटिक अंसतृप्त हाइड्रोकार्बनों में उपस्थित द्विआबन्धों की प्रकृति से भिन्न है। इस प्रकार उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि बेंजीन एक बंद श्रृंखला का यौगिक है तथा यह एक संतृप्त यौगिक की भाँति व्यवहार करता है।

प्रश्न 18.
ऐरीनों या बेंजीन के भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐरीनों या बेंजीन के प्रमुख भौतिक गुण निम्नवत् हैं-

  1. गंध, रंग तथा भौतिक अवस्था—ये सामान्यतः विशिष्ट गंधयुक्त, रंगहीन, द्रव या ठोस होते हैं। आप नैफ्थेलीन की गोलियों से चिरपरिचित हैं। इसकी विशिष्ट गंध तथा शलभ प्रतिकर्षी गुणधर्म के कारण इसे शौचालय में तथा कपड़ों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किया जाता है।
  2. विलेयता-वृहद जलविरागी हाइड्रोकार्बन भाग के कारण ये जल में अमिश्रणीय तथा कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।
  3. दहन-ये कज्जली लौ के साथ जलते हैं।
  4. गलनांक तथा क्वथनांक-क्वथनांक आण्विक आकार में वृद्धि के साथ बढ़ते हैं। ऐसा वान्डरवाल्स बलों (आकर्षण) में वृद्धि के कारण होता है।

गलनांक आण्विक आकार और सममिति पर निर्भर करते हैं। अणु जितना अधिक सममित होता है। गलनांक उतना ही अधिक होता है।

प्रश्न 19.
टॉलूईन की पाश्र्व श्रृंखला प्रतिस्थापन तथा नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया के रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर
(i) टॉलूईन की पाश्र्व श्रृंखला प्रतिस्थापन अभिक्रिया

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(ii) टॉलूईन की नाभिकीय प्रतिस्थापन अभिक्रिया

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प्रश्न 20.
ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों से होने वाली कैन्सरजनीयता तथा विषाक्तता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
बेन्जीन एवं अनेक बहुचक्री ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन बहुत आविषालु (toxic) और कैन्सरजनी (carcinogenic) रासायनिक यौगिक हैं। कैन्सरजनी पदार्थ जैव ऊतकों में कैन्सर उत्पन्न कर सकते हैं। सिगरेट के धुएँ, कोल और पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन के उत्पादों में चिमनियों के धुएँ एवं चिमनियों में एकत्रित काजल (soot) में कैन्सरजनी बहुचक्री ऐरामैटिक हाइड्रोकार्बन उपस्थित होते हैं।
1,2-बेन्जऐन्ग्रेसीन (IV), 9, 10-डाइमेथिल-1,2-बेन्जऐन्ट्रेसीन (V) और 1,2-बेन्जपाइरीन (VI), कैन्सरजनी पदार्थ हैं। कैन्सरजनी पदार्थ मानव-शरीर में प्रवेश करके विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाएँ करते हैं और कोशिकाओं (cells) के DNA को क्षति पहुँचाकर कैन्सर पैदा करते हैं। DNA के म्यूटेशन के परिणामस्वरूप कैन्सर होता है।
कुछ कार्बनिक पदार्थ वास्तव में स्वयं कैन्सरजनी नहीं होते, किन्तु जीव में उपाचयी क्रियाओं द्वारा सक्रिय कैन्सरजनों (carcinogens) में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार के यौगिक प्रोकार्सीनोजन (procarcinogens) कहलाते हैं।
1,2-बेन्जपाइरीन (VI) एक कैन्सरजनी (carcinogens) है। यह लीवर में उपस्थित एन्जाइम द्वारा एपॉक्सी डायॉल (epoxy diol) में परिवर्तित हो जाता है जो म्यूटेशन प्रेरित करता है जिसके परिणास्वरूप कुछ कोशिकाओं की अनियन्त्रित वृद्धि हो सकती है।
बेन्जीन एक कैन्सरजुनी यौगिक है। लीवर में उपस्थित एन्जाइम द्वारा बेन्जीन का बेन्जीन ऑक्साइड में ऑक्सीकरण होता है। बेन्जीन ऑक्साइड़ और उससे व्युत्पन्न यौगिक कैन्सरजनी हैं और DNA से क्रिया करके म्यूटेशन प्रेरित कर सकते हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐल्केनों की हैलोजनीकरण अभिक्रिया को मुक्त मूलक क्रियाविधि सहित समझाइए।
उत्तर
हैलोजनीकरण-ऐल्केनें सूर्य के प्रकाश या उत्प्रेरक की उपस्थिति में या उच्च ताप पर हैलोजनों के साथ प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ करती हैं। किसी हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का हैलोजन परमाणुओं द्वारा विस्थापन हैलोजनीकरण कहलाता है। किसी ऐल्केन के प्रति हैलोजनों की अभिक्रियाशीलता का क्रम E, > Cl, > Br, > I, है। ऐल्केनों की हैलोजनीकरण अभिक्रियाएँ साधारणतः क्लोरीन और ब्रोमीन के साथ करायी जाती हैं, क्योंकि ऐल्केनों की फ्लुओरीन से सीधी अभिक्रिया अति प्रचण्ड व विस्फोटक होती है तथा ऐल्केनों की आयोडीन से अभिक्रिया उत्क्रमणीय एवं अति मन्द होती है।
1. क्लोरीनीकरण-हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन क्लोरीनीकरण कहलाता है।
उदाहरणार्थ-मेथेन और क्लोरीन के मिश्रण को सूर्य के विसरित प्रकाश में रखने पर या उच्च ताप (250-400°C) पर गर्म करने पर मेथेन के चारों हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। अभिक्रिया के उत्पादों के रूप में क्लोरोमेथेनों और हाइड्रोजन क्लोराइड का मिश्रण प्राप्त होता है।

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क्लोरोफॉर्म क्लोरीन कार्बन टेट्राक्लोराइड क्लोरीनीकरण की क्रिया बहुत तीव्र गति से होती है। प्राप्त मिश्रण में मेथिल क्लोराइड (CH3Cl2), मेथिलीन क्लोराइड (CH2Cl2), क्लोरोफॉर्म (CHCl3) और कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) चारों क्लोरोमेथेन उपस्थित होती हैं। मेथेन और क्लोरीन के आयतनों के अनुपात को नियन्त्रित करके अभिक्रिया ऐच्छिक पद तक करायी जा सकती है। मेथेन की बहुत अधिकता होने पर मेथिल क्लोराइड मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।

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अभिक्रिया की क्रिया-विधि–सूर्य के विसरित प्रकाश में मेथेन की क्लोरीन से प्रतिस्थापन अभिक्रिया एक मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रिया है। मुक्त मूलक श्रृंखला अभिक्रिया कई पदों में होती है। इसके प्रारम्भन (initiation), संचालन (propagation) और अन्तिम (termination) पद होते हैं। सूर्य के प्रकाश में मेथेन के क्लोरीनीकरण की क्रिया-विधि निम्नलिखित हैं-

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अभिक्रिया के प्रारम्भन पद (1) में Cl2 अणु का क्लोरीन परमाणुओं (मुक्त मूलकों) में होमोलिटिक विदलन होता है। इस पद के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रकाश से प्राप्त होती है। अत्यधिक अभिक्रियाशील क्लोरीन परमाणु शीघ्र मेथेन से अभिक्रिया करता है और उसमें से एक हाइड्रोजन परमाणु को हटा देता। है जिससे UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-73 “(मेथिल मुक्त मूलक) और HCl अणु बन जाता है (पद 2)। मैथिल मुक्त मूलक अत्यधिक अभिक्रियाशील होता है और यह शीघ्र क्लोरीन अणु से अभिक्रिया करके मेथिल क्लोराइड (CH3Cl) और क्लोरीन परमाणु UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-74 बनाता है (पद 3)। क्लोरीन परमाणु पुनः मेथेन अणु से अभिक्रिया करके मेथिल मूलक बनाता है और मेथिल मूलक पुनः क्लोरीन अणु से अभिक्रिया करके क्लोरीन परमाणु बनाता है। पद (2), (3), (2), (3) का यह क्रम लगातार चलता रहता है। पद (2) और (3) श्रृंखला संचालन पद (chain propagating steps) कहलाते हैं। संचालन पद में एक मूलक लुप्त होता है और दूसरा मूलक उत्पन्न होता है। अभिक्रिया में क्लोरीन मूलक श्रृंखला वाहक (chain carrier) का कार्य करता है। अभिक्रिया श्रृंखला का अन्त दो क्लोरीन परमाणुओं के संयोजन से Cl2 अणु बनने (पद 4), या मेथिल मूलक और क्लोरीन मूलक के संयोजन से CH3Cl बनने (पद 5) से होता है। पद (4), (5) श्रृंखला के अन्तिम पद (chain terminating step) कहलाते हैं। सूर्य के सीधे प्रकाश में मेथेन और क्लोरीन का 1 : 2 मिश्रण विस्फोट के साथ अति तीव्र अभिक्रिया करता है। अभिक्रिया में कार्बन और हाइड्रोजन क्लोराइड बनते हैं-

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एथेन और क्लोरीन के मिश्रण को सूर्य के विसरित प्रकाश में रखने पर मेथेन के सदृश एथेन के सभी हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं। अभिक्रिया उत्पादों के रूप में क्लोरोएथेनों और हाईड्रोजन क्लोराइड का जटिल मिश्रण प्राप्त होता है। प्रोपेन व अन्य उच्च ऐल्केनों का क्लोरीनीकरण करने पर समावयवी मोनोक्लोरोऐल्केनों का मिश्रण प्राप्त होता है।
उदाहरणार्थ-प्रोपेन का क्लोरीनीकरण करने पर n-प्रोपिल क्लोराइड (CH3CH2CH2Cl) और आइसोप्रोपिल क्लोराइड (CH3 CHClCH3 ) का मिश्रण बनता है। n-ब्यूटेन । का क्लोरीनीकरण करने पर n-ब्यूविंल क्लोराइड (CH3 CH2CH2CH2Cl) और s-ब्यूटिल क्लोराइड (CH3CH2 CHClCH3) का मिश्रण बनता है। क्लोरीन की अधिकता होने पर विभिन्न क्लोरोऐल्केनों का जटिल मिश्रण प्राप्त होता है।

2. ब्रोमीनीकरण हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का ब्रोमीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन ब्रोमीनीकरण कहलाता है। ऐल्केनों की क्लोरीन की भाँति ब्रोमीन के साथ प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ होती हैं, परन्तु ब्रोमीनीकरण अपेक्षाकृत मन्द गति से होता है।

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3. आयोडिनीकरण हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं का आयोडीन परमाणुओं द्वारा विस्थापन आयोडिनीकरण कहलाता है। ऐल्केनों की आयोडीन से प्रतिस्थापन अभिक्रिया बहुत मन्द और उत्क्रमणीय होती है, अतः उनको सीधा आयोडिनीकरण नहीं कराया जा सकता है। ऐल्केनों का आयोडिनीकरण प्राय: किसी ऑक्सीकारक (जैसे, HIO3 HNO3, आदि) की उपस्थिति में कराया जाता है। ऑक्सीकारक अभिक्रिया में बने HI को I2 में ऑक्सीकृत कर देता है, जिससे विपरीत अभिक्रिया नहीं होती है।

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प्रश्न 2.
ऐल्कीनों के विरचन की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए।
या
निर्जलीकरण अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
ऐल्कीनों के विरचने की प्रमुख विधियों का वर्णन निम्नवत् है-
1. ऐल्काइनों के आंशिक अपचयन से-ऐल्काइनों की हाइड्रोजन से योग अभिक्रिया का अन्तिम उत्पाद ऐल्केन हैं। इस अभिक्रिया में Ni को उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त करते हैं तथा ताप 250-300°C रखा जाता है। यदि ऐल्काइन को अधिक मात्रा में लिया जाए तथा अभिक्रिया कम ताप पर सम्पन्न करायी जाए तो अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐल्कीन भी प्राप्त होती हैं।
उदाहरणार्थ-

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2. ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण से-ऐल्कोहॉलों को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल अथवा सान्द्र फॉस्फोरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

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इस अभिक्रिया में ऐल्कोहॉल के एक अणु में से जल की एक अणु निकल जाता है। इस प्रकार की अभिक्रियाओं को निर्जलीकरण (dehydration) कहते हैं।

3. ऐल्किल हैलाइडों के विहाइड्रोहैलोजनीकरण से-ऐल्किल हैलाइडों को कास्टिक पोटाश के ऐल्कोहॉलीय विलयन के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है। इस क्रिया में ऐल्किल हैलाइड के एक अणु में से हाइड्रोजन हैलाइड का एक अणु निकल जाता है। अतः इस क्रिया ‘ को विहाइड्रोहैलोजनीकरण (dehydrohalogenation) कहते हैं।
उदाहरणार्थ-

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4. डाइहैलोऐल्केनों के विहैलोजनीकरण से-जिन डाइहैलाइडों में दो हैलोजन परमाणु दो समीपवर्ती कार्बन परमाणुओं पर स्थित होते हैं उन्हें विसिनल डाइहैलाइड (vicinal dihalides) अथवा 1, 2-डाइहैलोऐल्कॅन (1, 2- dihaloalkanes) कहते हैं। इस प्रकार के डाइहैलाइडों को मेथेनॉल अथवा एथेनॉल में जिंक चूर्ण के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

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5. डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों के वैद्युत-अपघटन से कोल्बे अभिक्रिया-डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवणों के जलीय विलयन के वैद्युत-अपघटन से ऐनोड पर ऐल्कीन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-पोटैशियम सक्सिनेट के जलीय विलयन का वैद्युत-अपघटन करने पर ऐनोड पर एथिलीन प्राप्त होती है।

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यह अभिक्रिया कोल्बे वैद्युत-अपघटनी अभिक्रिया (Kolbe’s electrolytic reaction) कहलाती है और निम्न पदों में होती है-

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6. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक से-हैलोजन प्रतिस्थापित ऐल्कीन (halogen substituted alkenes) तथा ग्रिगनार्ड अभिकर्मकों की अभिक्रिया से उच्च ऐल्कीन प्राप्त की जा सकती हैं।
उदाहरणार्थ-

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7.अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के टेट्रा-ऐल्किल व्युत्पन्नों से-अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के टेट्रा-ऐल्किल व्युत्पन्नों को गर्म करने पर ऐल्कीन प्राप्त होती हैं।
उदाहरणार्थ-

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8. ऐल्केनों के भंजन से-ऐल्केनों को वायु की अनुपस्थिति में 773-973 K ताप पर गर्म करने |से उनके अधिक अणुभार वाले अणु कम अणु भार वाले अणुओं में विभाजित हो जाते हैं। प्राप्त मिश्रण में निम्न ऐल्केन, ऐल्कीन तथा हाइड्रोजन होते हैं।
उदाहरणार्थ-

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प्राप्त मिश्रण के अवयवों को उपयुक्त विधियों द्वारा अलग-अलग किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
ऐल्कीनों के प्रमुख रासायनिक गुणों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर
द्विआबन्ध की उपस्थिति के कारण ऐल्कीन अत्यन्त क्रियाशील होती हैं तथा प्रायः ऐसी अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं जिनमें द्विआबन्ध का T-आबन्ध विखण्डित हो जाता है। इनकी प्रमुख अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं-
1. योगात्मक अभिक्रियाएँ-ऐल्कीनों में द्विआबन्ध की उपस्थिति के कारण ये यौगिक योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। इन अभिक्रियाओं में द्विआबन्ध का π-आबन्ध तथा अभिकर्मक दो भागों में विभक्त हो जाता है।
अभिकर्मक का एक भाग द्विआबन्ध बनाने वाले एक कार्बन परमाणु से तथा दूसरा भाग दूसरे परमाणु से जुड़ जाता है।

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ऐल्कीनों की योगात्मक अभिक्रियाओं के कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं-
(i) हाइड्रोजन का योग–ऐल्कीन निकिल चूर्ण की उपस्थिति में 523-573 K ताप पर हाइड्रोजन से योग करके ऐल्केन बना देती हैं।
उदाहरणार्थ-

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निकिल की उपस्थिति में ऐल्कीनों तथा हाइड्रोजन की योग अभिक्रिया को सेवातिये तथा सेण्डर्न की अभिक्रिया कहते हैं। यह अभिक्रिया उच्च ताप पर होती है। पैलेडियम या प्लेटिनम उत्प्रेरक की उपस्थिति में ऐल्कीन तथा हाइड्रोजन साधारण ताप पर ही अभिक्रिया कर लेती हैं तथा ऐल्केन बनाती हैं।

(ii) हैलोजनों का योग-ऐल्कीन, हैलोजनों के साथ संयोग करके डाइहैलोजन यौगिक बनाती हैं। इस अभिक्रिया में हैलोजनों की क्रियाशीलता का क्रम Cl2 > Br2 >I2 है। यह अभिक्रिया किसी अध्रुवीय विलायक जैसे CCl4 तथा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में या किसी ध्रुवीय विलायक जैसे जल में की जाती है।
उदाहरणार्थ-

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(iii) हाइड्रोजन हैलाइडों का योग-किसी भी ऐल्कीन का एक अणु किसी भी हाइड्रोजन हैलाइड के एक अणु से संयोग करके योगात्मक यौगिक बनाता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-90

इस अभिक्रिया में हैलोजन हैलाइडों की क्रियाशीलता का क्रम HI > HBr > HCI है।

(iv) जल का योग–अम्लीय उत्प्रेरकों की उपस्थिति में ऐल्कीनों तथा जल की योग अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐल्कोहॉल प्राप्त होते हैं। जल का योग मारकोनीकॉफ के नियम के अनुसार होता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-91

(v) ओजोन का योग–ऐल्कीनों के ईथरीय विलयन में ओजोन प्रवाहित करने पर योगात्मक यौगिक बनते हैं जिन्हें ओजोनाइड (ozonides) कहते हैं। ओजोनाइडों को जल के साथ उबालने पर ये अपघटित हो जाते हैं। जल-अपघटन की क्रिया Zn चूर्ण की उपस्थिति में करायी जाती है। यह जल-अपघटन से प्राप्त हाइड्रोजन परॉक्साइंड को अपघटित कर देता है ताकि यह अन्य उत्पादों से अभिक्रिया न कर सके। ऐल्कीनों तथा ओजोन की योग अभिक्रिया तथा ओजोनाइडों के जल-अपघटन की अभिक्रिया, इस सम्पूर्ण क्रिया को ओजोनी अपघटन (ozonolysis) कहते हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 13 Hydrocarbons img-92

स्पष्ट है कि सम्पूर्ण अभिक्रिया में द्विआबन्ध टूट जाता है तथा जिन कार्बन परमाणुओं से द्विआबन्ध जुड़ा था, वे ऑक्सीजन परमाणु से जुड़ जाते हैं।

2. प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ-असंतृप्त होने के कारण ऐल्कीन मुख्यतः योगात्मक अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं तथा प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित नहीं करती हैं लेकिन उच्च ताप पर हैलोजनों के साथ संयोग करके ये प्रतिस्थापन उत्पाद भी देती हैं।
उदाहरणार्थ-

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3. ऑक्सीकरण
(i) दहन-हवा अथवा ऑक्सीजन में ऐल्कीन दीप्तिमान ज्वाला के साथ जलती हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनते हैं।

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(ii) क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन से—1% क्षारीय KMnO4 विलयन से ऑक्सीकृत होकर ऐल्कीन, डाइहाइड्रॉक्सी यौगिक बनाती हैं।

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इस अभिक्रिया में KMnO4 का गुलाबी रंग लुप्त हो जाता है तथा K2MnO4 बनने के कारण हरा रंग प्राप्त होता है। इस अभिक्रिया की सहायता से दिये गए कार्बनिक यौगिक में कार्बन-कार्बन द्विआबन्ध या त्रिआबन्ध की उपस्थिति की अर्थात् असंतृप्तता की जाँच की जा सकती है। 1% क्षारीय KMnO4 को बॉयर अभिकर्मक (Baeyer’s reagent) तथा असंतृप्तता के इस परीक्षण को बॉयर परीक्षण (Baeyer’s test) कहते हैं।

(iii) अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन से-अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट विलयन के प्रभाव में ऐल्कीन अणु उस स्थान से विखण्डित हो जाता है जहाँ द्विआबन्ध होता है तथा अम्ल, ऐल्डिहाइड या कीटोन प्राप्त होते हैं।
उदाहरणार्थ-

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उपरोक्त अभिक्रियाओं सेप्राप्त फॉर्मिक अम्ल अभिक्रिया की परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड व जल में ऑक्सीकृत हो जाता है।

HCOOH +[O] → CO2 + H2O

उपर्युक्त के अतिरिक्त ऐल्कीने बहुलकीकरण, समावयवीकरण, ऑक्सीमरक्यूरेशन डीमरक्यूरेशन तथा हाइड्रोबोरोनेशन या हाइड्रोबोरेशन अभिक्रियाएँ भी प्रदर्शित करती हैं।

प्रश्न 4.
ऐल्काइनों के विरचन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
या
ऐसीटिलीन के विरचन की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ऐल्काइनों के विरचन की विभिन्न विधियों का वर्णन निम्नवत् है-

1. डाइहैलोऐल्केन से—KOH के उबलते हुए ऐल्कोहॉलीय विलयन में डाइहैलोऐल्केन मिला देने से ऐल्काइन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

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2. हैलोफॉर्म से—क्लोरोफॉर्म (CHCl3) अथवा आयोडोफॉर्म (CHI3) को सिल्वर चूर्ण के साथ गर्म करने पर ऐसीटिलीन गैस प्राप्त हो जाती है।

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3. संश्लेषण विधिहाइड्रोजन गैस के वातावरण में दो कार्बन इलेक्ट्रोडों के मध्य विद्युतीय आर्क (electric arc) उत्पन्न करने पर ताप लगभग 3270K हो जाता है तथा कार्बन व हाइड्रोजन के संयोग से ऐसीटिलीन गैस बनती है।

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4. मैलिक अथवा फ्यूमेरिक अम्ल के सोडियम अथवा पोटैशियम लवण के वैद्युत अपघटन से (कोल्बे की विधि)-मैलिक अथवा फ्यूमेरिक अम्ल के सोडियम अथवा पोटैशियम लवण के जलीय विलयन का वैद्युत-अपघटन करने पर ऐनोड पर ऐसीटिलीन गैस प्राप्त हो जाती है।
उदाहरणार्थ-

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5. टेट्रालाइडों के विहैलोजनीकरण से टेट्राहैलोऐल्केनों को जिंक चूर्ण (मेथेनॉल में) के साथ गर्म करने पर इनका विहैलोजनीकरण हो जाता है और ऐल्काइन प्राप्त होती है।
उदाहरणार्थ-

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6. कैल्सियम कार्बाइड से (प्रयोगशाला विधि)-कैल्सियम कार्बाइड को जल में मिलाने पर ये । दोनों पदार्थ साधारण ताप पर ही एक-दूसरे से अभिक्रिया करके ऐसीटिलीन बनाते हैं।

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इस अभिक्रिया का उपयोग ऐसीटिलीन को प्रयोगशाला में बनाने में किया जाता है। प्रयोगशाला विधि–एक शंक्वाकार फ्लास्क (conical flask) में रेत के ऊपर कैल्सियम कार्बाइड के टुकड़े रख दिए जाते हैं। फ्लास्क में दो छेद वाला कॉर्क लगा होता है जिसमें बिन्दु कीप (dropping funnel) तथा निकास नली लगा दी जाती हैं। निकास नली को एक धावन बोतल से जोड़ देते हैं जिसमें कॉपर सल्फेट का अम्लीय विलयन भरा रहता है। धावन बोतल को गैस जार से जोड़ देते हैं। बिन्दु कीप से बूंद-बूंद करके फ्लास्क में रखे कैल्सियम कार्बाइड पर जल गिराया जाता है। अभिक्रिया के फलस्वरूप ऐसीटिलीन गैस तीव्रता से निकलती है। इसे । गैस में अशुद्धियों के रूप में फॉस्फीन, हाइड्रोजन सल्फाइड, आर्सीन और अमोनिया गैसें मिली। होती हैं जो अम्लीय कॉपर सल्फेट विलयन द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। शुद्ध ऐसीटिलीन गैस को पानी के ऊपर गैस जार में एकत्रित कर लिया जाता है।

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7. ऐसीटिलीन से उच्च ऐल्काइनों का संश्लेषण-पहले ऐसीटिलीन की सोडियम धातु से 475K पर अथवा द्रव अमोनिया में सोडामाइड (sodamide) से 196K पर अभिक्रिया कराते हैं। जिससे सोडियम ऐसीटिलाइड बनता है। यह ऐल्किल हैलाइडों से अभिक्रिया करके उच्च ऐल्काइन देता है।
उदाहरणार्थ-

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प्रश्न 5.
ऐल्काइनों की प्रमुख योगात्मक अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिए।
या
ऐल्काइनों की अम्लीय प्रकृति को समझाइए।
उत्तर
ऐल्काइनों की प्रमुख योगात्मक अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-
1. इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ—ये अभिक्रियाएँ निम्न दो पदों में होती हैं-

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कुछ प्रमुख इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ निम्न हैं-
(i) हैलोजनों का योग-क्लोरीन और ब्रोमीन ऐल्काइनों से योग करके पहले 1, 2-डाइहैलोऐल्कीन और बाद में 1, 1, 2, 2-टेट्राहैलोऐल्केन बनाती हैं।
उदाहरणार्थ

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इस अभिक्रिया में Br2 का लाल भूरा रंग लुप्त हो जाता है इसलिए इस अभिक्रिया का उपयोग असंतृप्तता के परीक्षण के लिए किया जाता है।

(ii) हैलोजन हैलाइडों का योग-हैलोजन हैलाइड ऐल्काइनों से योग करके पहले वाइनिल हैलाइड और फिर ऐल्किलीडीन हैलाइड (alkylidene halide) बनाते हैं। ये योग मारकोनीकॉफ के नियम के अनुसार होते हैं।
उदाहरणार्थ-

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(iii) हाइपोक्लोरस अम्ल का योग–ऐल्काइन हाइपोक्लोरस अम्ल से दो पदों में योग करती।

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(iv) जल का योग–ऐल्काइन 333K पर मयूंरिक सल्फेट तथा तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में जल के एक अणु के साथ संयुक्त होकर कार्बोनिल यौगिक देती हैं।

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(v) हाइड्रोजन सायनाइड का योग-ऐसीटिलीन Ba(CN)2 अथवा HCl में CuCl की उपस्थिति में हाइड्रोजन सायनाइड से योग करके वाइनिल सायनाइड (vinyl cyanide) बनाती है।

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2. नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रियाएँ-ऐसीटिलीन को पोटैशियम मेथॉक्साइड (दाब पर) की सूक्ष्म मात्रा (1-2%) की उपस्थिति में 433-473K पर मेथेनॉल में से गुजारने पर मेथिल वाइनिल ईथर प्राप्त होता है।

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3. ऐल्काइनों की अम्लीय प्रकृति-ऐल्काइनों के त्रिआबंध से जुड़े हाइड्रोजन परमाणु अम्लीय होते हैं। यह तथ्य निम्न अभिक्रियाओं द्वारा सत्यापित होता है-
(i) सोडामाइड से अभिक्रिया-सोडामाइड एक प्रबल क्षारक है। एथाइन और अन्य टर्मिनल ऐल्काइन अथवा 1-ऐल्काइन द्रव अमोनिया में सोडामाइड से अभिक्रिया करके
सोडियम ऐसीटिलाइड (क्षारीय) बनाती हैं।

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(ii) सोडियम से अभिक्रिया-एथाइन तथा अन्य टर्मिनल ऐल्काइनों को सोडियम (प्रबल क्षारक) के साथ गर्म करने पर सोडियम ऐसीटिलाइड बनते हैं।

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(iii) अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया-ऐल्काइनों के त्रिआबंध पर जुड़े हाइड्रोजन परमाणु भारी धातु आयनों जैसे Ag’ आयनों द्वारा भी प्रतिस्थापित हो जाते हैं। ऐल्काइन् अमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया करके सिल्वर ऐसीटिलाइड बनाती हैं।

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(iv) अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन से अभिक्रिया-एथाइन तथा टर्मिनल ऐल्काइन अमोनियामय क्यूप्रस क्लोराइड विलयन से अभिक्रिया करके कॉपर ऐसीटिलाइड के लाल अवक्षेप बनाती हैं।

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प्रश्न 6.
बेंजीन की प्रमुख प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का क्रियाविधि सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
बेंजीन की प्रमुख प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं-
1. हैलोजनीकरण-बेंजीन सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में तथा हैलोजन वाहक जैसे Fe या FeCl, की उपस्थिति में कमरे के ताप पर ही क्लोरीन या ब्रोमीन से अभिक्रिया करके प्रतिस्थापन उत्पाद बनाती है।

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क्रियाविधि—बेंजीनं पर हैलोजनीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है-

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2. सल्फोनीकरण-बेंजीन को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर बेंजीनसल्फोनिक अम्ल प्राप्त होता है। सधूम सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ यह अभिक्रिया साधारण ताप पर ही हो जाती है।

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क्रियाविधि-बेंजीन का सल्फोनीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है-

    1. सांद्र H2SO4 एक SO3 अणु को निष्कासित करता है।
      H2SO4 + H2SO4 ⇌ H3O++ HSO4 + SO3
      SO3 निम्न अनुनाद संरचनाओं को एक अनुनाद संकर है।
    2. इलेक्ट्रॉनस्नेही बेंजीन रिंग पर आक्रमण कर एक σ -जटिल का निर्माण करता है।
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    3.  σ-संकर क्षारक HSO4 से क्रिया कर प्रतिस्थापन उत्पाद बनाता है।
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3. नाइट्रीकरण-बेंजीन सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में सान्द्र नाइट्रिक अम्ल से क्रिया करके नाइट्रोबेंजीन बनाती है।

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साधारण ताप पर यह अभिक्रिया धीमी गति से तथा ताप बढ़ाने पर तेजी से होती है। अधिक ताप पर तथा नाइट्रिक अम्ल की अधिक मात्रा प्रयुक्त करने पर डाइ-तथा ट्राइ-प्रतिस्थापन उत्पाद अर्थात् m-डाइनाइट्रोबेंजीन तथा 1, 3, 5-ट्राइनाइट्रोबेंजीन प्राप्त होते हैं।
क्रियाविधि-बेंजीन का नाइट्रीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है

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4. फ्रीडल-क्राफ्ट ऐल्किलीकरण—किसी लूईस अम्ल जैसे AlCl3 की उपस्थिति में बेंजीन की अभिक्रिया किसी ऐल्किल हैलाइड से कराने पर बेंजीन का ऐल्किलीकरण हो जाता है।
उदाहरणार्थ-

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5. फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण-किसी लूईस अम्ल जैसे AlCl3 की उपस्थिति में बेंजीन की अभिक्रिया किसी ऐसिल हैलाइड से कराने पर बेंजीन का ऐसिलीकरण हो जाता है।
उदाहरणार्थ-

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क्रियाविधि-बेंजीन का फ्रीडल-क्राफ्ट ऐसिलीकरण निम्न प्रकार से सम्पन्न होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data (आँकड़ों का संग्रह)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प सही है
(i) जब आप एक नई पोशाक खरीदते हैं तो इनमें से किसे सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं
(क) कपड़े का रंग
(ख) कपड़े की कीमत
(ग) कपड़े को किस कम्पनी ने बनाया है।
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

(ii) आप कम्प्यूटर का इस्तेमाल कितनी बार करते हैं
(क) दिन में एक बार
(ख) कभी-कभी
(ग) दिन में तीन बार
(घ) दिन में अनेक बार
उत्तर :
(घ) दिन में अनेक बार

(iii) निम्नलिखित में से आप किस समाचार-पत्र को नियमित रूप से पढ़ते हैं|
(क) हिन्दुस्तान
(ख) दैनिक जागरण
(ग) दैनिक भास्कर
(घ) टाइम्स ऑफ इण्डिया
उत्तर :
(ख) दैनिक जागरण

(iv) पेट्रोल की कीमत में वृद्धि न्यायोचित है
(क) यदि पेट्रोल की माँग में वृद्धि हुई है।
(ख) यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि हुई है।
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) उपर्युक्त दोनों

(v) आपके परिवार की मासिक आमदनी कितनी है–
(क) 5 हजार से कम
(ख) 10 हजार से कम
(ग) 15 हजार से कम
(घ) 20 हजार
उत्तर :
(घ) 20 हजार

प्रश्न 2.
पाँच द्धिमार्गी प्रश्नों की रचना करें (हाँ/नहीं के साथ)
उत्तर :
(क) क्या आप रोज सुबह टहलने जाते हैं?                       (हाँ/नहीं)
(ख) क्या आप नियमित रूप से नहाते हैं?                        (हाँ/नहीं)
(ग) क्या आप घर पर कम्प्यूटर का प्रयोग करते हैं?          (हाँ/नहीं)
(घ) क्या आपके पास मारुति कार है?                              (हाँ/नहीं)
(ङ) क्या आपके पास एक हरा कलम है?                         (हाँ/नहीं)

प्रश्न 3.
सही विकल्प को चिह्नित करें
(क) आँकड़ों के अनेक स्रोत होते हैं। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।
(ख) आँकड़ा-संग्रह के लिए टेलीफोन सर्वेक्षण सर्वाधिक उपयुक्त विधि है, विशेष रूप से जहाँ पर जनता निरक्षर हो और दूर-दराज के काफी बड़े क्षेत्रों में फैली हो। (सही/गलत)
उत्तर :
सही।
(ग) सर्वेक्षक/शोधकर्ता द्वारा संग्रह किए गए आँकड़े द्वितीय आँकड़े कहलाते हैं। ” (सही/गलत)
उत्तर :
गलत।
(घ) प्रतिदर्श के अयादृच्छिक चयन में पूर्वाग्रह (अभिनति) की संभावना रहती है। (सही/गलत)
उत्तर :
सही
(ङ) अप्रतिचयन त्रुटियों को बड़ा प्रतिदर्श अपनाकर कम किया जा सकता है। (सही/गलत)
उत्तर :
गलत।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रश्नों के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आपको इन प्रश्नों में कोई समस्या दिखाई दे रही है? यदि हाँ, तो कैसे?
(क) आप अपने सबसे नजदीक के बाजार से कितनी दूर रहते हैं?
उत्तर :
मैं अपने नजदीक के बाजार से 5 किमी दूर रहता हूँ।

(ख)
यदि हमारे कूड़े में प्लास्टिक की थैलियों की मात्रा 5 प्रतिशत है तो क्या इन्हें निषेधित किया जाना चाहिए?
उत्तर :
हाँ, क्योंकि प्लास्टिक एक अविघटनीय पदार्थ है। यह मृदा-प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक की थैलियाँ नालों और नालियों में पानी के बहाव को अवरुद्ध करती हैं। इस प्रकार पर्यावरण के हिसाब से प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग हानिकारक है और इनको निषेध किया जाना चाहिए।

(ग)
क्या आप पेट्रोल की कीमत में वृद्धि का विरोध नहीं करेंगे?
उत्तर :
पेट्रोल की कीमत में वृद्धि होने पर आवश्यक वस्तुओं के दामों में भी वृद्धि हो जाती है, इसलिए । पेट्रोल की कीमत में वृद्धि का विरोध अवश्य करना चाहिए।

(घ)
क्या आप रासायनिक उर्वरक के उपयोग के पक्ष में हैं?
उत्तर :
रासायनिक उर्वरक के उपयोग से हम फसल की उत्पादन मात्रा बढ़ा सकते हैं। परन्तु हमें उर्वरकों का प्रयोग सीमित मात्रा में कराना चाहिए। इनके अधिक प्रयोग से मृदा तथा जल प्रदूषण होता है।

(ङ)
(अ) क्या आप अपने खेतों में उर्वरक इस्तेमाल करते हैं?
उत्तर :
हाँ, परन्तु सीमित मात्रा में।

(ब)
आपके खेत में प्रति हेक्टेयर कितनी उपज होती है?
उत्तर :
40 क्विटल प्रति हेक्टेयर।

प्रश्न 5.
आप बच्चों के बीच शाकाहारी आटा नूडल की लोकप्रियता का अनुसंधान करना चाहते हैं। इस उद्देश्य से सूचना-संग्रह करने के लिए उपयुक्त प्रश्नावली बनाएँ।
उत्तर :

प्रश्नावली

  1. क्या आप शाकाहारी आटा नूडल का प्रयोग करते हैं?
  2. क्या आपको इसका स्वाद दूसरे खाद्य पदार्थों की तुलना में अधिक अच्छा लगता है?
  3. आप दिन में कब और कितनी बार इसको खाते हैं?
  4. क्या आपको इसकी कीमत उचित लगती है।
  5. एक दिन में आप इस पर कितना खर्च करते हैं?
  6. क्या आप इसे घर पर ही तैयार करते हैं अथवा बाजार से खरीदते हैं?
  7. आप इसे क्यों पसन्द करते हैं?
  8. क्या यह आपकी सेहत के लिए अच्छी है?
  9. क्या आप इसके स्थान पर कुछ औरोंग करना चाहेंगे?

प्रश्न 6.
200 फार्म वाले एक गाँव में फसल उत्पादन के स्वरूप पर एक अध्ययन आयोजित किया गया। इनमें से 50 फार्मों का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें से 50 प्रतिशत पर केवल गेहूँ उगाए जाते हैं। यहाँ पर समष्टि एवं प्रतिदर्श को पहचान कर बताएँ।
उत्तर :
समष्टि : 200 फार्म ।
प्रतिदर्श : 50 फार्म, जिनका सर्वेक्षण किया गया है।

प्रश्न 7.
प्रतिदर्श, समष्टि तथा चर के दो-दो उदाहरण दें।
उत्तर :
प्रतिदर्श – प्रतिदर्श समष्टि के एक खण्ड या एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे सूचना प्राप्त की जा सकती है। एक आदर्श प्रतिदर्श सामान्यतः समष्टि से छोटा होता है।
उदाहरण –

  • एक कॉलेज के 5000 विद्यार्थियों में से 500 विद्यार्थियों का चयन।
  • एक गाँव के 700 कृषि-श्रमिकों में से अध्ययन के लिए 70 कृषि-श्रमिकों का चयन।

समष्टि – सांख्यिकी में समष्टि शब्द से तात्पर्य है-अध्ययन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी मदों/इकाइयों की समग्रता।

उदाहरण –

  • एक जिले के समस्त कृषि-श्रमिक।
  • एक फैक्ट्री के समस्त मजदूर।

चर – वे मूल्य जिनका मान एक मद से दूसरे मद में बदलता रहता है और जो संख्यात्मक रूप में मापे जा सकते हैं, तब उन्हें चर कहा जाता है।

उदाहरण–

  • प्रत्येक वर्ष खाद्यान्न उत्पादन।
  • लोगों की आयु।

प्रश्न 8.
इनमे से कौन-सी विधि द्वारा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं, और क्यों?
(क) गणना(जनगणना),
(ख) प्रतिदर्श।।
उत्तर :
गणना विधि की तुलना में प्रतिदर्श विधि द्वारा आँकड़े एकत्र करने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। सांख्यिकी में प्रतिदर्श विधि को निम्नलिखित कारणों से प्राथमिकता दी जाती है

  1. प्रतिदर्श कम खर्च में एवं अल्प समय में पर्याप्त विश्वसनीय एवं सही सूचनाएँ उपलब्ध करा सकते
  2. प्रतिदर्श में सघन पूछताछ के द्वारा अधिक विस्तृत जानकारियाँ संगृहीत की जा सकती हैं।
  3. प्रतिदर्श के लिए परिगणकों की छोटी टोली की ही जरूरत होगी जिन्हें आसानी से प्रशिक्षित किया जा सकता है तथा उनके कार्य की निगरानी भली-भाँति की जा सकती है।
  4. गणना संबंधी त्रुटियों की संभावना घट जाती है।

प्रश्न 9.
इनमें कौन-सी त्रुटि अधिक गंभीर है और क्यों?
(क) प्रतिचयन त्रुटि
(ख) अप्रतिचयन त्रुटि।
उत्तर :
(क) प्रतिचयन त्रुटि – प्रतिचयन त्रुटियाँ प्रतिदर्श आकलन और समष्टि विशेष के वास्तविक मूल्य (जैसे-औसत आय आदि) के बीच अंतर प्रकट करती हैं। यह त्रुटि, तब सामने आती है जब आप समष्टि से प्राप्त किए गए प्रतिदर्श का प्रेक्षण करते हैं। जैसे-देहरादून के 5 कृषकों की आमदनी का उदाहरण लें। मान लें चर x (आमदनी) के मापन 600, 650, 700, 750, 800 हैं।

हमने देखा कि यहाँ समष्टि का औसत 600 + 650 + 700 + 750 + 800 +5=3500 * 700 है। अब मान लीजिए कि हम दो कृषकों का एक ऐसा प्रतिदर्श चुनते हैं जहाँ चर (X) का मूल्य 600 व 700 है। तब प्रतिदर्श का औसत (600 + 700 + 2 = 1300 + 2 = 650) होता है। यहाँ आकलन की प्रतिचयन त्रुटि है-700 (असली मान) – 650 (आकलन) = 50

(ख) अप्रतिचयन त्रुटियाँ – सर्वेक्षण क्षेत्र से आँकड़ों के संकलन के समय मापन, प्रश्नावली, रिकॉर्डिंग, अंकगणित संबंधी त्रुटियों को अप्रतिचयन त्रुटियाँ कहा जाता है। अप्रतिचयन त्रुटियाँ प्रतिचयन त्रुटियों की अपेक्षा गंभीर होती है।

प्रश्न 10.
मान लीजिए आपकी कक्षा में 10 छात्र हैं। इनमें से आपको तीन चुनने हैं तो इसमें कितने प्रतिदर्श संभव हैं?
उत्तर :
कक्षा में 10 छात्रों में से 3 छात्रों को चुनने के लिए प्रतिचयनों की संख्या = “0X2= 30 अत: इसमें 30 प्रतिदर्श संभव हैं।

प्रश्न 11.
अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 को चुनने के लिए आप लॉटरी विधि का उपयोग कैसे करेंगे? चर्चा करें।
उत्तर :
अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 छात्रों को चुनने के लिए हम लॉटरी विधि का प्रयोग इस प्रकार करेंगे

  • सर्वप्रथम कागज की एक ही आकार की 10 चिटें तैयार करेंगे।
  • इन चिटों पर छात्रों का नाम अलग-अलग चिट पर लिखेंगे।
  • चिटों को एक बक्से/घड़े में डालकर अच्छी तरह हिलाएँगे।
  • बक्से/घड़े से एक-एक करके तीन चिट निकालेंगे।
  • निकाली गई चिटों पर अंकित छात्रों के नाम ही लॉटरी विधि से निकाले गए छात्रों के नाम होंगे।

प्रश्न 12.
क्या लॉटरी विधि सदैव एक यादृच्छिक प्रतिदर्श देती है? बताइए।
उत्तर :
लॉटरी विधि द्वारा हमेशा यादृच्छिक का प्रतिचयन ही प्राप्त होता है। इस विधि में प्रत्येक इकाई को शामिल किया जाता है। समग्र की सभी इकाइयों की पर्चियाँ अथवा गोलियाँ बना ली जाती हैं और उन पर्चियों को एक डिब्बे में डाल दिया जाता है। फिर किसी निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा अथवा स्वयं आँखें बंद करके उतनी ही पर्चियाँ या गोलियाँ उठा ली जाती हैं जितनी इकाइयाँ प्रतिचयन में शामिल करनी होती हैं। प्रतिचयन की इकाइयों के निष्पक्ष चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि सभी पर्चियाँ या गोलियाँ एक-सी बनाई जाएँ, उनका आकार एवं रूप एकसमान हो तथा छाँटने से पूर्व उन्हें हिला-मिला लिया जाए। इस प्रकार इस प्रणाली में प्रत्येक इकाई के चुनाव की समान सम्भावना रहती है।

प्रश्न 13.
यादृच्छिक संख्या सारणी का उपयोग करते हुए, अपनी कक्षा के 10 छात्रों में से 3 छात्रों के चयन के लिए यादृच्छिक प्रतिदर्श की चयन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
10 छात्रों को दिए जाने वाले अंक हैं –  01 02 03 04 05 06 07 08 09 10
इन संख्याओं में से किसी एक संख्या को दैव आधार पर चयन किया जाएगा। इसके बाद दो क्रमागत संख्याओं का चयन करके 3 छात्रों का चुनाव कर लिया जाएगा। माना, दैव आधार पर चयनित संख्या 5 है तो चयनित छात्रों की संख्याएँ होंगी-5, 6 व 7.

प्रश्न 14.
क्या सर्वेक्षणों की अपेक्षा प्रतिदर्श बेहतर परिणाम देते हैं? अपने उत्तर की कारण सहित व्याख्या करें।
उत्तर :
हाँ, यह सत्य है कि सर्वेक्षणों की अपेक्षा प्रतिदर्श बेहतर परिणाम देते हैं। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—

  • प्रतिदर्श प्रणाली में समय, धन व श्रम सर्वेक्षणों की तुलना में कम व्यय होता है।
  • इस प्रणाली का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत क्षेत्र में किया जा सकता है।
  • इस प्रणाली में गणना संबंधी त्रुटियाँ कम होती हैं।
  • इस प्रणाली में अपेक्षाकृत कम गणनाकारों व पर्यवेक्षकों की आवश्यकता होती है।

संक्षेप में प्रतिदर्श प्रणाली अधिक सरल, मितव्ययी व शुद्ध निष्कर्ष देने वाली हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति का प्रयोग सर्वप्रथम भारत में किसने किया?
(क) ली प्ले ने
(ख) आर्थर यंग ने
(ग) यूल ने
(घ) सैलिगमैन ने
उत्तर :
(ख) आर्थर यंग ने

प्रश्न 2.
द्वितीयक समंकों का प्रयोग करने से पूर्व इनमें से किस बात की जाँच कर लेनी चाहिए?
(क) समंकों की उद्देश्य के प्रति अनुकूलता
(ख) समंकों की विश्वसनीयता
(ग) समंकों की पर्याप्तता
(घ) उपर्युक्त सभी की
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी की।

प्रश्न 3.
संकलन के विचार से समंकों के प्रकार हैं
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
उत्तर :
(क) दो।

प्रश्न 4.
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान रीति का दोष है
(क) यह रीति मितव्ययी है।
(ख) यह रीतिं सरल एवं सुविधाजनक है।
(ग) यह रीति विस्तृत क्षेत्र में उपयोगी है।
(घ) इसमें समंकों में एकरूपता नहीं रहती।
उत्तर :
(घ) इसमें समंकों में एकरूपता नहीं रहती

प्रश्न 5.
“एक दैव प्रतिदर्श वह प्रतिदर्श है, जिनका चयन इस प्रकार हुआ हो कि समग्र की प्रत्येक इकाई को सम्मिलित होने का समान अवसर रहा हो।” यह कथन किसका है?
(क) पीगू का
(ख) प्रो० हाटे का
(ग) हार्पर का
(घ) पार्टन का
उत्तर :
(ग) हार्पर का

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राथमिक समंक किसे कहते हैं?
उत्तर :
प्राथमिक समंक वे समंक होते हैं जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है।

प्रश्न 2.
द्वितीयक समंक से क्या आशय है?
उत्तर :
द्वितीयक समंक वे समंक हैं जो पहले से अस्तित्व में हैं और वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्रित किए गए हैं।

प्रश्न 3.
प्राथमिक और द्वितीयक समंकों में एक अंतर बताइए।
उत्तर :
प्राथमिक समंकों के संकलन में धन, समय, श्रम व बुद्धि का प्रयोग करना पड़ता है जबकि द्वितीय समंकों को सिर्फ उद्धृत किया जाता है।

प्रश्न 4.
प्राथमिक समंकों को एकत्र करने की प्रमुख रीतियाँ बताइए।
उत्तर :

  • प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान,
  • अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान,
  • स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति,
  • सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना तथा
  • प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरना।

प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • एकत्रित समंक अत्यधिक विश्वसनीय होते हैं।
  • समंकों में मौलिकता रहती है।

प्रश्न 6.
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान रीति क्या है?
उत्तर :
इस रीति के अनुसार, सूचकों से प्रत्यक्ष रूप में समंक प्राप्त न करके उन व्यक्तियों से प्राप्त किए जाते हैं, जिनका उन समंकों से कोई प्रत्यक्ष संबंध होता है।

प्रश्न 7.
सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना रीति के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  • यह प्रणाली लोचदार नहीं है।
  • यदि प्रश्नावली जटिल है तो उत्तर अशुद्ध होंगे और फलस्वरूप परिणाम भी अशुद्ध होंगे।

प्रश्न 8.
द्वितीयक समंकों के स्रोत बताइए।
उत्तर :

  • सरकारी प्रकाशन
  • अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रकाशन
  • पत्र-पत्रिकाओं द्वारा
  • अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के प्रकाशन।

प्रश्न 9.
अनुसूची से क्या आशय है?
उत्तर :
‘अनुसूची’ प्रश्नों की वह सूची है जिसे प्रगणकों द्वारा सूचकों से पूछताछ करके भरा जाता है।

प्रश्न 10.
प्रश्नावली व अनुसूची में अंतर बताइए।
उत्तर :
प्रश्नावली में प्रश्नों के उत्तर सूचकों द्वारा स्वयं दिए जाते हैं। इसके विपरीत, अनुसूची में प्रश्नों की सूची के प्रगणकों द्वारा सूचकों से सूचना प्राप्त करके भरा जाता है।

प्रश्न 11.
केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (CSO) का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर :
राष्ट्रीय आय के आँकड़ों का संकलन करना एवं उन्हें प्रकाशित करना।

प्रश्न 12.
समग्र से क्या आशय है?
उत्तर :
अनुसंधान क्षेत्र की संपूर्ण इकाइयाँ सामूहिक रूप से ‘समग्र’ कहलाती हैं।

प्रश्न 13.
संगणना अनुसंधान किसे कहते हैं?
उत्तर :
जब अनुसंधान के विषय में संबंधित समग्र या समूह की प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है। तो वह ‘संगणना अनुसंधान’ कहलाएगा।

प्रश्न 14.
संगणना अनुसंधान रीति के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • इस रीति द्वारा संकलित समंक अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं।
  • इस रीति के द्वारा समग्र की प्रत्येक इकाई के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 15.
निदर्शन अनुसंधान रीति के लिए उपयुक्त चार दशाएँ बताइए।
उत्तर :

  • जब समग्र अनंत हो,
  • जब समग्र विस्तृत हो,
  • जब धन, समय की बचत करनी हो तथा
  • जब समग्र की प्रकृति परिवर्तनशील हो।।

प्रश्न 16.
दैव निदर्शन की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
दैव निदर्शन एक ऐसा रूप है जिसको चुनने की विधि के रूप में प्रयोग करने से यह निश्चित हो जाता है कि समग्र की प्रत्येक इकाई अथवा तत्त्व को चुने जाने का समान अवसर हो।

प्रश्न 17.
दैव निदर्शन रीति के दो गुण बताइए।
उत्तर :

  • इस रीति द्वारा चयन में पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं रहती।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें श्रम, समय व धन की बचत होती है।

प्रश्न 18.
दैव निदर्शन रीति के दो दोष बताइए।
उत्तर :

  • आकार के छोटा होने अथवा उसमें विषमता अधिक होने पर, इस रीति द्वारा लिए गए न्यादर्श समग्र का ठीक प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  • अनुसंधान का क्षेत्र छोटा होने पर न्यादर्श की इकाइयों का चुनाव करना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 19.
सम्पादन से क्या आशय है?
उत्तर :
सम्पादन से आशय संकलित समंकों की शुद्धता की जाँच करना, अशुद्धि को दूर करना तथा शुद्ध समंकों को प्राप्त करने से है।

प्रश्न 20.
उपसादन से क्या आशय है?
उत्तर :
वास्तविक और जटिल संख्याओं को किसी स्थानीय मान के आधार पर निकटतम सरल संख्याओं में व्यक्त करने की क्रिया को उपसादन कहते हैं।

प्रश्न 21.
सांख्यिकीय विभ्रम से क्या आशय है?
उत्तर :
सांख्यिकीय विभ्रम ‘वास्तविक मूल्य’ और ‘अनुमानित मूल्य’ का अंतर है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकीय इकाई क्या है? एक आदर्श सांख्यिकीय इकाई की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकीय इकाई का अर्थ-सांख्यिकीय इकाई माप करने का वह साधन है जिसके आधार पर आँकड़े एकत्र किए जाते हैं, उनका विश्लेषण किया जाता है तथा वे प्रस्तुत किए जाते हैं। अनुसंधान के प्रारम्भ से अंत तक सांख्यिकीय इकाई की एक ही परिभाषा आनी चाहिए ताकि आँकड़े एकरूप व तुलनीय बने रहें। एक आदर्श सांख्यिकीय इकाई की विशेषताएँ–

  • सांख्यिकीय इकाई की परिभाषा सरल व स्पष्ट होनी चाहिए।
  • इकाई निश्चित होनी चाहिए।
  • सांख्यिकीय इकाई का मूल्य स्थिर, प्रामाणिक एवं सर्वमान्य होना चाहिए।
  • इकाई की परिभाषा अनुसंधान के उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए।
  • सांख्यिकीय इकाई में सजातीयता एवं समानता होनी चाहिए।

प्रश्न 2.
प्राथमिक एवं द्वितीयक समंकों से क्या आशय है? प्रत्येक की एक-एक परिभाषा दीजिए। उत्तर-संकलन के विचार से समंक दो प्रकार के होते हैं

  1. प्राथमिक समंक तथा
  2. द्वितीयक समंक।

1. प्राथमिक समंक – प्राथमिक समंक, वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है। दूसरे शब्दों में, यह अनुसंधाने मौलिक होता है। होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में-“प्राथमिक समंकों से यह आशय है कि वे मौलिक हैं अर्थात् उनका समूहीकरण बहुत ही कम हुआ है या नहीं हुआ है, घटनाओं का अंकन या गणन उसी प्रकार किया गया है जैसा पाया गया है। मुख्य रूप से वे कच्चे पदार्थ होते हैं।”

2. द्वितीयक समंक – “द्वितीयक समंक, वे समंक हैं, जो पहले से किसी अन्य अनुसंधानकर्ता द्वारा अपने किसी निजी उद्देश्य के लिए एकत्रित किए हुए होते हैं। इन्हें अनुसंधानकर्ता स्वयं संकलित नहीं करता अपितु वह किसी अन्य उद्देश्य के लिए संकलित सामग्री का प्रयोग करता है। ब्लेयर के शब्दों में “द्वितीयक समंक वे हैं जो पहले से अस्तित्व में हैं और जो वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्रित किए गए हैं।”

प्रश्न 3.
द्वितीयक सामग्री का प्रयोग करैते समय क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?
उत्तर :
द्वितीयक सामग्री का प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रक्नी चाहिए

  1. पिछला अनुसंधानकर्ता योग्य, कार्यकुशल, ईमानदार व अनुभवी होना चाहिए।
  2. उद्देश्य एवं क्षेत्र समान होना चाहिए।
  3. न्यादर्श का आकार उपयुक्त होना चाहिए।
  4. समंक संकलन के लिए अपनाई गई रीति विश्वसनीय होनी चाहिए।
  5. इकाई उपयुक्त होनी चाहिए।
  6. शुद्धता का स्तर ऊँचा होना चाहिए।
  7. उपसादन कम-से-कम अंशों तक किया जाना चाहिए।
  8. इस बात की जाँच कर लेनी चाहिए कि समंक किस ‘समय’ में तथा किन ‘परिस्थितियों में प्रयुक्त | किए गए थे।
  9. यदि अनेक स्रोतों से समंक लिए जाएँ तो उनकी तुलनीयता की जाँच कर लेनी चाहिए।
  10. प्रतिशत, दर, गुणांक आदि की गणना करके उनकी सत्यता की जाँच कर लेनी चाहिए। द्वितीयक समंकों का प्रयोग करते समय यह देख लेना चाहिए कि समंक विश्वसनीय पर्याप्त एवं उपयुक्त

प्रश्न 4.
सर्वेक्षण अथवा संगणना एवं निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान से क्या आशय है?
उत्तर :
संगणना अथवा सर्वेक्षण अनुसंधान-जब अनुसंधान के विषय से संबंधित समग्र या समूह की प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है तो वह संगणना अथवा सर्वेक्षण अनुसंधान कहलाता है। इस रीति के अनुसार अनुसंधान करते समय अनुसंधानकर्ता समस्त समूह की जाँच करता है और अनुसंधान से संबंधित प्रत्येक इकाई के संबंध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है; जैसे-जनगणना, उत्पादन संगणना।

निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान – निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान के अंतर्गत समग्र में से कुछ इकाइयों को छाँटकर उनका विधिवत् अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि हमें किसी कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य से संबंधित सर्वेक्षण करना हो तो कॉलेज के प्रत्येक विद्यार्थी का अध्ययन न करके, हम कुछ विद्यार्थियों को लेकर ही उनको अध्ययन कर सकते हैं। इससे जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे समस्त समग्र पर लागू होंगे।

प्रश्न 5.
निदर्शन अनुसंधान के लिए आवश्यक दशाएँ बताइए।
उत्तर :
निम्नलिखित दशाओं में निदर्शन प्रणाली का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है

  1. जब समग्र अनंत अथवा कभी भी समाप्त न होने वाला हो।
  2. जब समग्र अत्यधिक विस्तृत हो।
  3. जब संगणना प्रणाली द्वारा समस्या का अध्ययन असंभव हो।
  4. जब समग्र नाशवान प्रकृति का हो।
  5. जब धन, समय व परिश्रम की बचत करनी हो।
  6. जब व्यापक दृष्टि से नियमों का प्रतिपादन करना हो।
  7. जब समग्र की प्रकृति परिवर्तनशील हो।

प्रश्न 6.
संगणना व निदर्शन प्रणाली में अंतर बताइए।
उत्तर :
संगणना व निदर्शन प्रणाली में अंतर
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प्रश्न 7.
दैव (यादृच्छिक) निदर्शन के गुण व दोष बताइए।
उत्तर :

दैव निदर्शन रीति के गुण,

  • इस नीति द्वारा चयन में पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं रहती क्योंकि समग्र की प्रत्येक इकाई को न्यादर्श के रूप में चुने जाने का अवसर प्राप्त होता है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें श्रम, समय व धन की बचत होती है।
  • दैव निदर्शन द्वारा चुने गए न्यादर्श समग्र के वास्तविक प्रतिनिधि होते हैं।
  • इस रीति में निदर्शन विभ्रमों की माप की जा सकती है।
  • दैव न्यादर्श में संभावना सिद्धांत को व्यावहारिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • चुनाव के लिए कोई विस्तृत योजना नहीं बनानी पड़ती।

दैव निदर्शन रीति के दोष

  • यदि केवल कुछ समंक ही उपलब्ध हों तो दैव निदर्शन संभव नहीं है।
  • यदि समग्र का आकार छोटा है या उसमें विषमता अधिक है तो इस रीति द्वारा लिए गए न्यादर्श समग्र का ठीक प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  • यदि अनुसंधान का क्षेत्र बहुत छोटा है तो न्यादर्श की इकाइयों का चुनाव करना कठिन हो जाता है। इन दोषों के कारण ही दैव न्यादर्श को पूर्ण न्यादर्श नहीं माना जाता है।

प्रश्न 8.
सांख्यिकीय विभ्रम क्या है? विभ्रम और अशुद्ध में अंतर बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकीय विभ्रम का अर्थ–सांख्यिकीय विभ्रम समंकों के वास्तविक मूल्य’ व ‘अनुमानित मूल्य’ में अंतर होता है। यह अशुद्धि से भिन्न है।
विभ्रम एवं अशुद्धि में अंतर
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प्रश्न 9.
अभिनत एवं अनभिनत विभ्रम से क्या आशय है?
उत्तर :
सांख्यिकी विभ्रम दो प्रकार के होते हैं–

1. अभिनत विभ्रम तथा
2. अनभिनत विभ्रम।

1. अभिनत विभ्रम – अभिनत विभ्रम (biased error) प्रमाणकों अथवा सूचकों के पक्षपात अथवा दोषपूर्ण मापक यंत्रों के कारण उत्पन्न होते हैं। इन विभ्रमों का प्रभाव एक ही दिशा में होता है; अतः इनकी प्रकृति संचयी होती है।

2. अनभिनत विभ्रम – 
अनभिनत विभ्रम (unbiased error) बिना किसी पक्षपात की भावना के कारण उत्पन्न होते हैं और एक-दूसरे को काटने की प्रवृत्ति रखते हैं, इसीलिए इन्हें क्षतिपूरक विभ्रम’ भी कहते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राथमिक तथा द्वितीयक समंकों से क्या आशय है? इनमें अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अनुसंधान के आयोजन के उपरांत अगला कदम समंकों का संकलन करना होता है। समंक अनुसंधान के संपूर्ण ढाँचे का आधार-स्तम्भ माने जाते हैं। अत: समंकों का संकलन अत्यंत सावधानी, सतर्कता, दृढ़ता, विश्वास और धैर्य के साथ किया जाना चाहिए। संकलन के विचार से समंक दो प्रकार के होते हैं–
(अ) प्राथमिक समंक तथा
(ब) द्वितीय समंक।

(अ) प्राथमिक समंक (Primary data) प्राथमिक समंक, वे समंक होते हैं, जिन्हें अनुसंधानकर्ता प्रयोग में लाने के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित करता है। दूसरे शब्दों में, यह अनुसंधान मौलिक होता है। होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में-“प्राथमिक समंकों से यह आशय है कि वे मौलिक हैं अर्थात् उनका समूहीकरण बहुत ही कम या नहीं हुआ है, घटनाओं का अंकन या गणन उसी प्रकार किया गया है, जैसा पाया गया है। मुख्य रूप से वे कच्चे पदार्थ होते हैं।”

(ब) द्वितीयक समंक (Secondary data) – द्वितीयक समंक, वे समंक हैं, जो पहले से किसी अन्य अनुसंधानकर्ता द्वारा अपने किसी निजी उद्देश्य के लिए एकत्रित किए हुए होते हैं। इन्हें अनुसंधानकर्ता स्वयं संकलित नहीं करता अपितु वह किसी अन्य उद्देश्य के लिए संकलित सामग्री का प्रयोग करता है। ब्लेयर के शब्दों में—“द्वितीयक समंक वे हैं, जो पहले से अस्तित्व में हैं और जो वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्रित किए गए हैं।”

प्राथमिक एवं द्वितीय समंकों में अंतर

प्राथमिक व द्वितीयक समंकों में अंतर मात्रा का न होकर प्रकृति का है। प्रो० सेक्राइस्ट के शब्दों में-“व्यापक रूप से प्राथमिक तथा द्वितीयक समंकों में भेद केवल अंशों का है। जो समंक एक पक्ष के लिए द्वितीयक हैं, वे ही अन्य पक्ष के लिए प्राथमिक होंगे।”
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प्रश्न 2.
प्राथमिक समंकों को संकलित करने की मुख्य रीतियाँ बनाइए। प्रत्येक के गुण व दोषों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
प्राथमिक समंकों को संकलित करने की रीतियाँ प्राथमिक समंकों को संकलित करने की प्रमुख रीतियाँ निम्नलिखित हैं

1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान,
2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान,
3. स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति,
4. सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना,
5. प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरना।

1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान
इस रीति के अंतर्गत अनुसंधानकर्ता स्वयं अपनी योजना के अनुसार पूरे क्षेत्र (समग्र) में जाकर विभिन्न सांख्यिकीय इकाइयों से संपर्क स्थापित करके समंक एकत्रित करता है। इस रीति का प्रयोग सर्वप्रथम यूरोप में ली प्ले (Le Play) और भारत में आर्थर यंग (Arthur Young) ने किया।
उपयुक्ता – इस रीति का प्रयोग वहाँ किया जाना चाहिए|

  • जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र अत्यधिक सीमित तथा स्थानीय प्रकृति का हो।
  • जहाँ मौलिक समंकों की आवश्यकता हो।
  • जहाँ शुद्धता पर अधिक जोर देना हो।
  • जहाँ समस्या इतनी अधिक जटिल हो कि अनुसंधानकर्ता की उपस्थिति अनिवार्य हो।
  • जहाँ समंकों को गोपनीय रखना हो।

रीति के गुण

  • इस विधि द्वारा एकत्रित समंक शुद्ध होते हैं।
  • एकत्रित समंक अधिक विश्वसनीय होते हैं।
  • समंकों में मौलिकता रहती है।
  • यह प्रणाली लोचदार है।
  • संकलित समंकों में एकरूपता व सजातीयता पाई जाती है।
  • अन्य सहायक सूचनाएँ भी प्राप्त हो जाती हैं।
  • अनुसंधानकर्ता को समंकों की जाँच का अवसर मिल जाता है।

रीति के दोष

  • इसका प्रयोग क्षेत्र सीमित होता है। विस्तृत क्षेत्र के लिए यह रीति अनुपयुक्त है।
  • इसमे पक्षपात (bias) की संभावना अधिक होती है।
  • यह रीति अपव्ययी है। इसमें धन, समय तथा श्रम का अधिक व्यये होता है।
  • सीमित क्षेत्र में लागू करने पर निष्कर्ष भ्रामक हो सकते हैं।

2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान
इस रीति के अनुसार सूचकों से प्रत्यक्ष रूप में समंक प्राप्त न करके उन व्यक्तियों से प्राप्त किए जाते हैं, जिनका उन समंकों से कोई अप्रत्यक्ष संबंध होता है। इन व्यक्तियों को साक्षी कहते हैं। इस विधि को सर्वाधिक उपयोग जाँच समितियों तथा आयोगों द्वारा किया जाता है। उपयुक्तता-इस रीति का प्रयोग वहाँ किया जाना चाहिए

  • जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र विस्तृत हो।
  • जहाँ सूचकों से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित न हो सके।
  • जहाँ सूचकं संबंधित सूचना न देना चाहें।
  • जहाँ अनुसंधान को गोपनीय रखा जाए।

रीति के गुण

  • यह रीति मितव्ययी है। इसमें धन, समय व परिश्रम कम खर्च होता है।
  • विस्तृत क्षेत्र में यही रीति उपयोगी होती है।
  • इसमें विशेषज्ञों को सहमति व सुझाव मिल जाते हैं।
  • यह रीति सरल व सुविधाजनक है।
  • इसमें व्यक्तिगत पक्षपात की संभावना नहीं रहती।
  • इस रीति के द्वारा अपेक्षाकृत अधिक जल्दी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

रीति के दोष

  • इसमें शुद्धता की उच्च मात्रा की आशा नहीं रहती।
  • सूचना एकत्रित करने वाले व्यक्तियों के पक्षपात की संभावना रहती है।
  • प्राप्त होने वाली सूचनाओं में त्रुटियाँ तथा अविश्वास की संभावना बनी रहती है।
  • प्रायः सूचनाएँ लापरवाही तथा अनिच्छा से दी जाती हैं।
  • समंकों में एकरूपता नहीं रहती।

3. स्थानीय स्रोतों या संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति
इस रीति के अनुसार, अनुसंधान से संबंधित सामग्री एकत्रित करने के लिए स्थानीय व्यक्ति नियुक्त किए। जाते हैं, जो अपने ढंग से सूचनाएँ एकत्रित करते हैं और बाद में अनुसंधानकर्ता के पास भेज देते हैं। समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं तथा बाजार भावों के संबंध में इस रीति को अपनाया जाता है। उपयुक्तता—यह रीति वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ उच्च स्तर की शुद्धता की आवश्यकता न हो और केवल अनुमान और प्रवृत्तियाँ ज्ञात करनी हों।

रीति के गुण

  • अधिक विस्तृत क्षेत्र के लिए यह प्रणाली अधिक उपयोगी है।
  • अधिक फैले हुए (विकेन्द्रित) क्षेत्र के लिए यह प्रणाली अत्यधिक उपयोगी है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें धन, समय व श्रम की बचत होती है।
  • यह विधि सरल व सस्ती है।।

रीति के दोष

  • इस रीति के द्वारा निष्कर्ष संवाददाताओं के पक्षपात से प्रभावित हो सकते हैं।
  • अनुमान पर आधारित होने के कारण निष्कर्ष शुद्धता से दूर होते हैं।
  • एकत्रित समंकों में एकरूपता व सजातीयता का अभाव बना रहता है।
  • समंक संकलन में विलम्ब अधिक हो सकता है।
  • संकलित समंकों में मौलिकता का अभाव रहता है।

4. सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ/प्रश्नावली भरना
इसके अनुसार, अनुसंधानकर्ता द्वारा एक प्रश्नावली या अनुसूची तैयार की जाती है और संबंधित व्यक्तियों के पास डाक द्वारा भिजवा दी जाती है। इस प्रश्नावली के साथ एक अनुरोध-पत्र भी होता है, जिसका उद्देश्य सूचना देने वाले व्यक्ति का सहयोग प्राप्त करना होता है। तत्पश्चात् सूचना देने वाले व्यक्ति उस प्रश्नावली को उत्तर सहित अनुसंधानकर्ता के पास भेज देते हैं। उपयुक्तता—यह रीति वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ अनुसंधान का क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत हो, उस क्षेत्र की जनसंख्या शिक्षित हो और प्रश्नावलियों को भरना जानती हो।

रीति के गुण

  • यह प्रणाली विस्तृत क्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त है। |
  • यह रीति मितव्ययी है और इसमें धन, समय व परिश्रम कम लगता है।
  • इसमें अशुद्धि की कम संभावना रहती है।
  • सूचनाएँ मौलिक व निष्पक्ष होती हैं।

रीति के दोष

  • सूचना देने वालों की इसमें प्राय: रुचि नहीं होती; अत: अधिकतर सूचनाएँ नहीं मिलतीं या मिलती हैं तो अपूर्ण होती हैं।
  • यदि प्रश्नावली जटिल है तो उत्तर अशुद्ध होंगे, फलस्वरूप परिणाम भी अशुद्ध होंगे।
  • यदि सूचक पक्षपातपूर्ण व्यवहार करते हैं तो परिणाम अशुद्ध होंगे।
  • कभी-कभी सूचना देने वाले इस बात से डरते हैं कि कहीं उनकी सूचनाओं का दुरुपयोग न हो।
  • यह प्रणाली लोचदार नहीं है।

5. प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरना
इस रीति में प्रश्नावलियों अथवा अनुसूचियों को भरने का कार्य प्रशिक्षित प्रगणकों को सौंपा जाता है। प्रगणकों को छपी हुई अनुसूचियाँ दे दी जाती हैं और वे सूचकों से और पूछताछ करके उन प्रश्नावलियों को स्वयं भरते हैं। इस प्रणाली की सफलता पूर्णतः प्रगणकों पर निर्भर करती है। अत: प्रगणकों को योग्य, चतुर, परिश्रमी, व्यवहारकुशल, विनम्र और संबंधित क्षेत्र से परिचित होना चाहिए। उपयुक्तता–यह रीति वहाँ अधिक उपयुक्त है, जहाँ अनुसंधानकर्ता अधिक व्यय वहन कर सके। यह रीति सरकारी कार्यों में ही अधिक प्रयोग में आती है। भारत में जनगणना इसी रीति, द्वारा की जाती है। रीति के गुण

  • इस रीति द्वारा व्यापक क्षेत्र से सूचना प्राप्त की जा सकती है।
  • सूचकों से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित किए जा सकने के कारण जटिल प्रश्नों के भी शुद्ध व विश्वसनीय उत्तर प्राप्त हो जाते हैं।
  • संकलित समंकों में पर्याप्त शुद्धता रहती है।
  • व्यक्तिगत पक्षपात का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।

रीति के दोष

  • यह रीति व्ययसाध्य है क्योंकि इसमें प्रगणकों के प्रशिक्षण पर काफी व्यय होता है।
  • अनुसंधान कार्य में अधिक समय लगता है।
  • प्रगणकों को प्रशिक्षण देना व उनके कार्य का निरीक्षण करना पड़ता है।
  • प्रगणकों में पक्षपात की भावना होने पर उसका प्रभाव निष्कर्ष को अविश्वसनीय बना देता है।

प्रश्न 3.
समंक संकलन की उचित रीति का चयन किन बातों पर निर्भर करता है? उत्तर–
समंक संकलन की उपयुक्त रीति का चयन प्राथमिक समंकों के संकलन की विभिन्न रीतियों में से किसी भी एक रीति को सर्वश्रेष्ठ नहीं कहाँ जा सकता। समंक संकलन के लिए किस रीति को अपनाया जाए, यह निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है–

1. अनुसंधान की प्रकृति – यदि अनुसंधान में सूचकों से व्यक्तिगत संपर्क रखने की आवश्यकता है। तो ‘प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति’; यदि शिक्षित व्यक्तियों से जानकारी प्राप्त करनी है तो ‘डाक द्वारा अनुसूचियाँ प्राप्त करने की रीति’; यदि अनुसंधान का क्षेत्र व्यापक है तो प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने की रीति तथा यदि नियमित रूप से किसी एक विषय में जानकारी प्राप्त करनी है तो संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति की रीति’ अधिक उपयुक्त रहेगी।

2. अनुसंधान का उद्देश्य एवं क्षेत्र – यदि अनुसंधान का क्षेत्र सीमित है तो प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान की रीति’ तथा व्यापक क्षेत्र में प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने की रीति’ अधिक उपयुक्त रहेगी।

3. आर्थिक साधन – आर्थिक साधन अधिक होने पर प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान रीति’ अथवा ‘प्रगणकों द्वारा अनुसूची भरवाने की रीति’ को अपनाया जा सकता है। इसके विपरीत, आर्थिक साधनों के सीमित होने पर डाक द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने की रीति अपनाई जा सकती है।

4. अपेक्षित शुद्धता की मात्रा – प्रत्यक्ष अनुसंधान रीति में अत्यधिक शुद्धता रहती है। अप्रत्यक्ष अनुसंधान रीति में अधिक शुद्ध परिणाम प्राप्त नहीं होते। संवाददाताओं द्वारा सूचनाएँ प्राप्त करने पर शुद्धता का परिणाम और भी कम हो जाता है। प्रगणकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने पर शुद्धता का स्तर अधिक होता है, परन्तु सूचकों द्वारा अनुसूचियाँ भरवाने में शुद्धता का स्तर अपेक्षाकृत कम ही रहता है।

5. उपलब्य समय – समय कम होने पर ‘संवाददाताओं से जानकारी प्राप्त करने की रीति’ अथवा ‘सूचकों से प्रश्नावलियाँ भरने की रीति’ अधिक उपयुक्त है। उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर ही उपयुक्त समंक संकलन विधि का चुनाव करना चाहिए।

प्रश्न 4.
द्वितीयक समंक क्या होते हैं। द्वितीयक सामग्री के मुख्य स्रोत बताइए। इनका प्रयोग करने से पूर्व क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?
उत्तर :

द्वितीयक समंक से आशय

किसी अन्य अनुसंधानकर्ता द्वारा संकलित, विश्लेषित तथा प्रकाशित सामग्री ‘द्वितीयक समंक’ कहलाती है। किंतु इस सामग्री का प्रयोग दूसरे अनुसंधानकर्ताओं द्वारा भी किया जा सकता है। ये आँकड़े व्यापारिक संस्थानों, सरकारी विभागों तथा वैज्ञानिकों के यहाँ अथवा समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, सरकारी गजटों, व्यापारिक-पत्रों आदि में मिलते रहते हैं। आँकड़ों को प्राप्त करने की यह पद्धति मितव्ययी एवं सरल है।

द्वितीयक सामग्री के मुख्य स्रोत

द्वितीयक सामग्री को प्रकाशित अथवा अप्रकाशित स्रोतों से उपलब्ध किया जा सकता है

(अ) सांख्यिकीय तथ्यों को प्रकाशित करने वाले स्रोत
विभिन्न विषयों पर सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण समंकों को एकत्रित करके उन्हें समय-समय पर प्रकाशित करती रहती हैं। यह सामग्री अत्यधिक उपयोगी होती हैं और विभिन्न अनुसंधानकर्ता इसका प्रयोग करते हैं। प्रकाशित समंकों के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं

1. सरकारी प्रकाशन – केन्द्रीय व राज्य सरकारों के विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों द्वारा समय-समय पर विभिन्न विषयों से संबंधित समंक प्रकाशित होते रहते हैं। ये समंक अत्यधिक विश्वसनीय एवं महत्त्वपूर्ण होते हैं। प्रमुख सरकारी प्रकाशन हैं-Statistical Abstract of India, Monthly Abstract of Statistics, Annual Survey of Industries, Agricultural Statistics of India.

2. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रकाशन – विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे U.N.O., I.L.O., ECAFE तथा I.M.F. आदि महत्त्वपूर्ण समंकों का संकलन प्रकाशित करती हैं।

3. समितियों व आयोगों के प्रतिवेदन – विभिन्न समस्याओं के संबंध में उपयुक्त सुझाव देने हेतु सरकार द्वारा समय-समय पर समितियाँ व आयोग गठित किए जाते हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन सांख्यिकीय तथ्यों के भण्डार होते हैं।

4. अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के प्रकाशन – नगर निगम, नगरपालिका, जिला परिषद् आदि विभिन्न प्रकार के आँकड़े एकत्रित कराकर प्रकाशित कराते हैं; जैसे–स्वास्थ्य तथा जन्म व मृत्यु से संबंधित आँकड़े।

5. व्यापारिक संस्थाओं व परिषदों के प्रकाशन – अनेक बड़ी-बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ, व्यापार परिषदें, स्कन्ध विपणियाँ तथा उपज विपणियाँ भी अनेक प्रकार के समंक संकलित कराकर प्रकाशित कराती रहती हैं।

6. विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थानों के शोध कार्य – विश्वविद्यालयों, रिसर्च ब्यूरो व अनुसंधान संस्थाओं द्वारा शोध परियोजनाओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के समंक संकलित कराए जाते हैं, जिन्हें बाद में प्रकाशित करा दिया जाता है। ये समंक निष्पक्ष होते हैं। ये संस्थान हैं-N.C.A.E.R., I.S.I. आदि।

7. पत्र-पत्रिकाओं द्वारा विभिन्न समाचार – पत्र व पत्रिकाएँ भी अपने विशिष्ट क्षेत्रों में समंकों का संकलन व प्रकाशन करते हैं; जैसे-Economic Times, Industrial Times, Commerce आदि। अनेक समाचार-पत्र दैनिक बाजार भाव भी प्रकाशित करते हैं।

8. बाजार समाचार – बाजार समाचार व समीक्षा व्यापार के संबंध में महत्त्वपूर्ण तथ्यों को प्रकाश में * लाती है।

9. व्यक्तिगत अनुसंधानकर्ता द्वारा – अनेक व्यक्ति अपने-अपने विषयों पर अनुसंधान कार्य करके संकलित समंकों को प्रकाशित करवाते हैं।

(ब) अप्रकाशित स्रोत
सरकार, संस्थाएँ एवं अनेक अनुभवी व योग्य व्यक्ति विभिन्न उद्देश्यों से सांख्यिकीय सामग्री संकलित करते हैं, जो अत्यधिक उपयोगी होती है लेकिन किन्हीं कारणों से प्रकाशित नहीं हो पाती। अनुसंधानकर्ता इस सामग्री का द्वितीय सामग्री के रूप में प्रयोग कर सकता है।

द्वितीयक सामग्री के प्रयोग में सावधानियाँ

द्वितीयक समंक अनेक त्रुटियों से पूर्ण हो सकते हैं। ये त्रुटियाँ अनेक कारणों से हो सकती हैं; . जैसे—साख्यिकीय इकाई की परिभाषा में परिवर्तन, सूचना की अपर्याप्तता व अपूर्णता,. पक्षपात, उद्देश्य व क्षेत्र की भिन्नता आदि। अत: द्वितीयक समंकों का उपयोग करने से पूर्व उनकी भली-भाँति जाँच कर लेनी चाहिए।

द्वितीयक समंकों का प्रयोग करने से पूर्व निम्नलिखित बातों की जाँच कर लेनी चाहिए|

  • समंकों की उद्देश्य के प्रति अनुकूलता,
  • समंकों की विश्वसनीयता,
  • समंकों की पर्याप्तता।

अनुसंधानकर्ता को द्वितीयक समंकों का प्रयोग करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

1. पिछले अनुसंधानकर्ता की योग्यता, अनुभव व ईमानदारी – समंकों का संकलन करने वाले अनुसंधानकर्ता की योग्यता, कार्यक्षमता, ईमानदारी व अनुभव पर विचार करना चाहिए। यदि अनुसंधानकर्ता योग्य, निष्पक्ष, अनुभवी व ईमानदार है तो समंकों पर विश्वास किया जा सकता है। अन्यथा नहीं।

2. अनुसंधान का उद्देश्य एवं क्षेत्र – प्राथमिक अनुसंधान के उद्देश्य एवं क्षेत्र का पता लगा लेना चाहिए। समान उद्देश्य एवं क्षेत्र के लिए समंकों का उपयोग लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

3. अनुसंधान का प्रकार : संगणना अथवा प्रतिदर्श – आँकड़ों का संकलन संगणना अथवा प्रतिदर्श रीति द्वारा किया जा सकता है। संगणना रीति अधिक विश्वसनीय होती है। यदि समंक एकत्रित करने में प्रतिदर्श रीति का उपयोग किया गया है तो यह जानना आवश्यक है कि प्रतिदर्श का आकार उचित था या नहीं और प्रतिदर्श लेने की रीति उपयुक्त थी या नहीं।

4. समंक संकलन की रीति – द्वितीयक सामग्री का प्रयोग करने से पूर्व यह देखना चाहिए कि समंक संकलन में जिस रीति को अपनाया गया था, वह उपयुक्त व विश्वसनीय थी या नहीं।

5. इकाई की परिभाषा – यह भी देखा जाना चाहिए कि पिछले अनुसंधान में इकाई को किस प्रकार परिभाषित किया गया था तथा प्रस्तुत अनुसंधान के लिए इकाइयाँ उपयुक्त हैं या नहीं। यदि इकाई की परिभाषा में अंतर है तो आवश्यक समायोजन कर लेने चाहिए।
6. शुद्धता का स्तर – समंकों में शुद्धता का स्तर भी देखा जाना चाहिए। यदि शुद्धता का स्तर ऊँचा रखा गया था, तो उन समंकों का प्रयोग किया जा सकता है।

7. उपसादन का स्तर – 
यह जानना चाहिए कि समंकों को सारणीबद्ध करते समय कितने अंशों तक उपसादन (approximation) किया गया था। जितने कम अंशों तक उपसादन किया गया होगा, शुद्धता का स्तर उतना ही उच्च होगा।

8. प्राथमिक अनुसंधाम का समय व परिस्थितियाँ – 
इनका प्रयोग करने से पूर्व इस बात की जाँच कर लेनी चाहिए कि समंक किस समय में तथा किन परिस्थितियों में प्रयुक्त किए गए थे। सामान्य समय में एकत्रित किए गए समंक अधिक विश्वसनीय होते हैं। सामान्य परिस्थितियों में एकत्रित किए गए.समंक उसी प्रकार की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त होते हैं।

9. तुलना – यदि एक समस्या से संबंधित अनेक स्रोतों से द्वितीय समंक उपलब्ध हैं तो उनकी परस्पर तुलना कर लेनी चाहिए। यदि उनमें अंतर है तो नए सिरे से स्वयं अनुसंधान करना चाहिए।

10. परीक्षात्मक जाँच – समंकों के विश्वसनीय होने पर भी उनकी परीक्षात्मक जाँच करनी चाहिए। प्रतिशत, दर, गुणांक आदि की गणना करके उनकी सत्यता की जॉच अवश्य कर लेनी चाहिए।

उपर्युक्त बातों के आधार पर यदि द्वितीयक समंक विश्वसनीय, पर्याप्त एवं उपयुक्त प्रतीत हों तो उनका प्रयोग कर लेना चाहिए अन्यथा नहीं। जे०एम० बेवन के अनुसार-“अन्य व्यक्तियों के परिणामों को अपनाना ही हमारे शोध को उचित दिशा देने के लिए पर्याप्त न होगा। हमें सामान्य ज्ञान, दूरदर्शिता तथा विद्यमान ज्ञान का उपयोग करते हुए उनकी गहराई में जाकर अज्ञानता के क्षेत्र, जिसमें हम अनुसंधान कर रहे हैं, की खोज करनी चाहिए।”

प्रश्न 5.
संगणना (सर्वेक्षण) अनुसंधानें क्या है? इसके गुण व दोष बताइए।
उत्तर :
अनुसंधान क्षेत्र की संपूर्ण इकाइयाँ सामूहिक रूप से ‘समग्र’ कहलाती हैं। समग्र दो प्रकार का होता है
(अ) निश्चित अथवा अनन्त समग्र – निश्चित समग्र में इकाइयों की संख्या निश्चित होती है; जैसे—किसी कॉलेज के छात्र या मिल के श्रमिक। इसके विपरीत, अनंत समग्र में इकाइयों की संख्या भी अनंत होती है; जैसे-नवजात शिशुओं का भार अथवा स्वास्थ्य के विषय में अनुसंधान।
(ब) वास्तविक अथवा काल्पनिक समग्र – ठोस विषय वाले समग्र को वास्तविक समग्र कहते हैं; जैसे – विश्वविद्यालय के छात्र। काल्पनिक विषय वाले समग्र को काल्पनिक समग्र कहते हैं; जैसे – सिक्कों की उछाल के आधार पर चित्र-पट के गिरने की संख्या में बना समग्र।

अनुसंधान के प्रकार अनुसंधान की प्रकृति दो प्रकार की हो सकती है
(अ) संगणना अनुसंधान,
(ब) प्रतिदर्श अनुसंधान।

संगणना अनुसंधान

जब अनुसंधान के विषय में संबंधित समग्र या समूह की प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है तो वह ‘संगणना अनुसंधान’ कहलाता है। इस रीति के अनुसार, अनुसंधान करते समय अनुसंधानकर्ता समस्त समूह की जाँच करता है और अनुसंधान से संबंधित प्रत्येक इकाई के संबंध में आवश्यक सूचनाएँ एकत्र करता है; जैसे-जनगणना, उत्पादन संगणना।

उपयुक्तता – संगणना अनुसंधान का प्रयोग वहाँ उचित है|

  • जहाँ समग्र या क्षेत्र का आकार सीमित हो।
  • जहाँ सांख्यिकीय इकाई में विजातीयता अथवा विविध गुण पाए जाते हैं।
  • जहाँ परिशुद्धता का ऊँची स्तर आवश्यक हो।
  • जहाँ विषय का गहन अध्ययन करना हो अथवा व्यापक सूचनाएँ एकत्र करनी हों।

संगणना अनुसंधान के गुण

  1. गहन अध्ययन–इस रीति द्वारा विषय का गहन अध्ययन संभव है। इससे अनुसंधानकर्ता को उस विषय को पूर्ण ज्ञान हो जाता है।
  2. अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय परिणाम-इस रीति द्वारा संकलित समंक अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय होते हैं। अत: उनसे निकाले गए परिणाम भी अधिक सत्य एवं विश्वसनीय होते हैं।
  3. विस्तृत जानकारी—इस रीति द्वारा समग्र की प्रत्येक इकाई के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाती है। अत: अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आ जाते हैं।
  4. उपयुक्तता-जब समग्र का आकार सीमित हो और सांख्यिकीय इकाइयों में विजातीयता अथवा विविधता का गुण पाया जाता हो तो यह रीति सर्वथा उपयुक्त होती है।
  5. कुछ दशाओं में आवश्यक-यदि जाँच की प्रकृति ऐसी हो कि सभी पदों का समावेश आवश्यक हो तो इस रीति का प्रयोग आवश्यक होता है।

संगणना अनुसंधान के दोष

  1. अधिक व्ययसाध्य-यह विधि अत्यधिक खर्चीली है, क्योंकि इसमें अनुसंधानकर्ता को समग्र की प्रत्येक इकाई से संबंध स्थापित करना पड़ता है।
  2. अधिक समय व परिश्रम-इस रीति में समय भी अधिक लगता है और अनुसंधानकर्ता को परिश्रम भी अधिक करना पड़ता है।
  3. सांख्यिकीय विभ्रम—इस रीति में सांख्यिकीय विभ्रम (Statistical errors) का पता नहीं लगाया जा सकता।
  4. व्यापक संगठन की आवश्यकताइस रीति द्वारा अनुसंधानकर्ता को कार्य में व्यापक संगठ की आवश्यकता पड़ती है।
  5. अनेक परिस्थितियों में असंभव-यदि समग्र अनंत है, अनुसंधान क्षेत्र विशाल व जटिल है, समग्र की प्रत्येक इकाई से संपर्क स्थापित करना संभव नहीं है अथवा अनुसंधान विधि में समग्र की संपूर्ण इकाइयाँ नष्ट हो जाती हैं तो संगणना अनुसंधान असंभव हो जाता है।

प्रश्न 6.
निदर्शन या प्रतिदर्श अनुसंधान क्या है? प्रतिदर्श प्रणाली के गुण व दोष बताइए।
उत्तर :

निदर्शन याप्रतिदर्श अनुसंधान

संगणना के विपरीत, इस प्रणाली के अंतर्गत समग्र में से कुछ इकाइयों को छाँटकर (दूसरे शब्दों में समस्त समूह के एक अंग का) उनका विधिवत् अध्ययन किया जाता है; उदाहरण के लिए यदि किसी एक कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य से संबंधित सर्वेक्षण करना है तो कॉलेज के प्रत्येक विद्यार्थी का अध्ययन न करके, हम कुछ विद्यार्थियों को लेकर ही उनका अध्ययन कर सकते हैं। इससे जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे समस्त समग्र पर लागू होंगे। प्रतिदर्श प्रणाली का आधार यह है कि छाँटे हुए प्रतिदर्श (Sample) समग्र का सदैव प्रतिनिधित्व करते हैं अर्थात् उनमें वही विशेषताएँ होती हैं, जो सम्मिलित रूप से सम्पूर्ण समग्र में देखने को मिलती हैं।

वास्तव में, प्रतिदर्श प्रणाली को संगणना प्रणाली से अधिक अच्छा समझा जाता है; क्योंकि संगणना प्रणाली की समस्त सीमाओं को प्रतिदर्श प्रणाली द्वारा दूर किया जाता है। प्रतिदर्श प्रणाली का प्रयोग कहीं-कहीं तो आवश्यक हो जाता है; क्योंकि कुछ ऐसी समस्याएँ व समग्र होते हैं, जहाँ संगणना प्रणाली का प्रयोग किया ही नहीं जा सकता।

प्रतिदर्श अनुसंधान के लिए उपयुक्त दशाएँ – निम्नलिखित दशाओं में प्रतिदर्श प्रणाली का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है।
1. जब समग्र अनंत हो – जब समग्र अनंत अथवा कभी न समाप्त होने वाला हो तो संगणना अनुसंधान संभव नहीं हो पाता जैसे नवजात शिशुओं की किसी निश्चित समय पर गणना करना संभव नहीं है। इस प्रकार की समस्याओं में प्रतिदर्श प्रणाली ही उपयुक्त होती है; क्योंकि इसमें समय, धन व परिश्रम की बचत होती है।

2. जब समग्र नाशवान् प्रकृति का हो – 
कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं, जिनका सर्वेक्षण संगणना प्रणाली द्वारा करने पर समस्या या समग्र के ही नष्ट हो जाने की संभावना हो जाती है; उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के शरीर में पाए जाने वाले रक्त का परीक्षण संगणना प्रणाली के आधार पर नहीं किया जा सकता। ऐसी समस्याओं में प्रतिदर्श प्रणाली का प्रयोग करना ही उचित होता है।

3. जब समग्र विस्तृत हो – 
विस्तृत समग्र के लिए प्रतिदर्श प्रणाली ही उपयुक्त होती है; क्योंकि इससे अनुसंधान कार्य कम समय, कम धन वे कम श्रम से ही संपन्न किया जा सकता है।

4. जब संगणना प्रणाली अव्यावहारिक हो – 
कुछ समस्याओं में प्रतिदर्श प्रणाली को ही प्रयोग किया जाता है; क्योंकि संगणना द्वारा उन समस्याओं का अध्ययन अव्यावहारिक होता है; उदाहरण के लिए भूगर्भ में छिपे हुए खनिज पदार्थों का अनुमान सदैव प्रतिदर्श प्रणाली के आधार पर ही किया जाता है।

5. जब धन, समय या परिश्रम की बचत करनी हो – 
प्रतिदर्श प्रणाली एक मितव्ययी प्रणाली है। अतः जब धन, समय या परिश्रम की बचत करनी हो तो इसी प्रणाली का उपयोग किया जाता है।

6. जब नियमों का प्रतिपादन करना हो – जब व्यापक दृष्टि से नियमों का प्रतिपादन करना हो तो इस प्रणाली का प्रयोग ही श्रेयस्कर होता है।

7. जब समग्र की प्रकृति परिवर्तनशील हो – 
यदि अनुसंधान से संबंधित वस्तुएँ शीघ्र परिवर्तनशील हैं तो प्रतिदर्श प्रणाली ही अपनाई जाती है।

प्रतिदर्श प्रणाली के गुण

  • यह रीति मितव्ययी है। इसमें समय, धन तथा श्रम सभी की बचत होती है।
  • शीघ्रता से बदलती हुई आर्थिक व सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में यह प्रणाली अधिक उपयोगी है।
  • ऐसे सामाजिक अनुसंधानों में, जहाँ विस्तृत तथा निरन्तर अन्वेषण की आवश्यकता होती है, प्रतिदर्श अनुसंधान ही सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है।
  • इस प्रणाली द्वारा गहन अनुसंधान संभव है।
  • इस प्रणाली के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष पूर्णत: विश्वसनीय तथा शुद्ध होते हैं।
  • प्रतिदर्श अनुसंधान कार्य का संगठन व प्रशासन करना अधिक सुविधाजनक होता है।
  • कुछ विशेष दशाओं में प्रतिदर्श अनुसंधान ही एकमात्र उपयुक्त प्रणाली होती है।

प्रतिदर्श प्रणाली के दोष

  • यदि प्रतिदर्श की इकाइयों का चुनाव निष्पक्ष रूप से नहीं किया गया तो निष्कर्ष भ्रामक हो सकते हैं।
  • प्रतिनिधि प्रतिदर्श बनाना कठिन होता है।
  • प्रतिदर्श अनुसंधान प्रणाली के प्रयोग के लिए विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसके अभाव में अनुसंधानकर्ता भयंकर त्रुटियाँ कर सकता है।
  • कभी-कभी समग्र इतना छोटा होता है कि उनमें से प्रतिदर्श बनाना संभव ही नहीं होता।
  • विजातीय और अस्थिर समग्र में प्रतिदर्श प्रणाली अधिक उपयुक्त नहीं होती है।

प्रश्न 7.
प्रतिदर्शअथवा निदर्शन की विभिन्न रीतियों को समझाइए। प्रमुख रीतियों के गुण व दोष भी बताइए।
उत्तर :

प्रतिदर्श अथवा निदर्शन की रीतियाँ

एक समग्र में से प्रतिदर्श अथवा निदर्शन का चुनाव करने की निम्नलिखित रीतियाँ हैं

  1. सविचार प्रतिदर्श (Purposive sampling),
  2. दैव प्रतिदर्श (Random sampling),
  3. मिश्रित या स्तरित प्रतिदर्श (Mixed or Stratified sampling),
  4. अन्य रीतियाँ (Other methods)
  • सुविधानुसार प्रतिदर्श (Convenience sampling),
  • कोटा प्रतिदर्श (Quota sampling),
  • बहुस्तरीय क्षेत्रीय दैव प्रतिदर्श (Multiphase area random sampling),
  • बहुचरण प्रतिदर्श (Multiphase sampling), ,
  • विस्तृत प्रतिदर्श (Extensive sampling)।

1. सविचार प्रतिदर्श
इसमें चयनकर्ता प्रतिदर्श की इकाइयों का चुनाव समझ-बूझकर करता है। चुनाव करते समय वह यह प्रयत्न करता है कि समग्र की सब विशेषताएँ प्रतिदर्श में आ जाएँ। वह इसके लिए कोई प्रमाप निश्चित कर लेता है और उसी के आधार पर ऐसे पदों को चुनता है, जो समस्त समग्र का प्रतिनिधित्व करें।

रीति के गुण

  • यह पद्धति बहुत सरल है।
  • प्रमाप निश्चित करके प्रतिदर्श का चुनाव करने से चुनाव के ठीक होने की संभावना होती है।
  • यह उस अनुसंधान के लिए अधिक उपयुक्त है, जहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण इकाइयों को शामिल करना अनिवार्य हो।

रीति के दोष

  • चयनकर्ता की पूर्व धारणाओं का प्रतिदर्श के चुनाव पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इससे निष्कर्ष अशुद्ध हो जाते हैं।
  • प्रतिदर्श विभ्रम (Sampling error) ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  • प्रतिदर्श अनुमानों की सत्यता की कोई गारण्टी नहीं होती।
  • प्रतिदर्श के परिणामों की तुलना अन्य प्रतिदर्शों के परिणामों से नहीं की जा सकती।

2. दैव प्रतिदर्श
एक प्रतिदर्श दैव विधि से उस समय चुना जाता है, जब प्रत्येक संभव प्रतिदर्श को चुने जाने का समान अवसर हो। पार्टन (Parten) के शब्दों में-“दैव प्रतिदर्श एक ऐसा रूप है, जिसको चुनने की विधि के रूप में प्रयोग करने से यह निश्चित हो जाता है कि समग्रे की प्रत्येक इकाई अथवा तत्त्व को चुने जाने का समान अवसर हो।’

हार्पर (W.M. Harper) के शब्दों में-‘‘एक दैव प्रतिदर्श वह प्रतिदर्श है, जिसका चयन इस प्रकार हुआ हो कि समग्र की प्रत्येक इकाई को सम्मिलित होने का समान अवसर रहा हो।’ इस रीति के अंतर्गत प्रतिदर्श में कौन-सी इकाई शामिल की जाए और कौन-सी नहीं, यह अनुसंधानकर्ता की अपनी इच्छा पर निर्भर न करके दैव अथवा अवसर पर निर्भर करता है। इसमें विभेद (discrimination) की कोई गुंजाइश नहीं होती। वास्तव में, इसका चुनाव मानवीय निर्णयों से पूर्णतया स्वतन्त्र होता है, तभी इसमें सत्यता व सूक्ष्मता लाई जा सकती है। दैव प्रतिदर्श रीति से प्रतिदर्श लेने के निम्नलिखित तरीके हैं

(i) लॉटरी रीतिं – 
यह रीति सबसे सरल तथा प्रचलित है। इसके अनुसार समग्र की सभी इकाइयों की पर्चियाँ अथवा गोलियाँ बनाकर किसी निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा या स्वयं आँखें बंद करके उतनी पर्चियाँ या गोलियाँ उठा ली जाती हैं, जितनी इकाइयाँ प्रतिदर्श में शामिल करनी होती हैं। प्रतिदर्श की इकाइयों के निष्पक्ष चुनाव के लिए यह आवश्यक है कि सभी पर्चियाँ या गोलियाँ एक-सी बनाई जाएँ, उनका आकार, रूप व रंग एकसमान हो तथा उन्हें छाँटने से पूर्व खूब हिला-मिला लिया जाए।

(ii) ढोल घुमाकर – 
इस रीति के अनुसार एक ढोल में समान आकार के लोहे या लकड़ी अथवा गत्ते के गोल टुकड़े जिन पर 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 अंक लिखे रहते हैं, डाल दिए जाते हैं तथा ढोल को हाथ या बिजली से खूब घुमाया जाता है जिससे सभी अंक मिल जाएँ। तत्पश्चात् कोई निष्पक्ष व्यक्ति उसमें से उतने टुकड़े निकाल लेता है, जितने पर प्रतिदर्श लेने होते हैं। ये टुकड़े जिन पदों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें प्रतिदर्श में शामिल कर लिया जाता है।

(iii) सुनियोजित या निश्चित क्रम के आधार पर –
इस रीति के अनुसार सर्वप्रथम पदों को किसी भी क्रम में (भौगोलिक, संख्यात्मक अथवा वर्णात्मक) व्यवस्थित किया जाता है और फिर आकस्मिक रूप से कुछ पदों को चुन लिया जाता है; उदाहरण के लिए कुल 150 इकाइयों में से 15 इकाइयों को चुनना है तो 15 समूह बना लिए जाएँगे। प्रत्येक समूह में 10-10 इकाइयाँ होंगी। अब प्रत्येक समूह में दैव प्रतिदर्श द्वारा एक-एक पद चुन लिया जाएगा।

(iv) टिप्पेट की संख्याओं अथवा दैव प्रतिदर्श सारणियों द्वारा – इस रीति का प्रतिपादन टिप्पेट महोदय ने किया था। उन्होंने विभिन्न देशों की जनसंख्या रिपोर्टों के आधार पर 41,600 अंकों के प्रयोग से चार-चार अंक वाली 10,600 संख्याओं की एक तालिका बनाई है, जिनमें से प्रथम पैंतीस संख्याएँ निम्नवत् हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 6
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 7
इस सारणी के आधार पर यदि 6000 में से 20 संख्याएँ छाँटनी हों तो पहले 6000 विद्यार्थियों को 1 से 6000 तक क्रम संख्याओं में क्रमबद्ध किया जाएगा और फिर उपर्युक्त सारणी में से आरम्भ में 20 अंक छाँट लिए जाएँगे, जो 6000 से अधिक न हों। ये 20 अंक निम्नवत् होंगे –
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 8
उपर्युक्त 20 विद्यार्थियों को प्रतिदर्श में शामिल किया जाएगा।
रीति के गुण

  • इस रीति द्वारा चयन में पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं रहती क्योंकि समग्र की प्रत्येक इकाई को प्रतिदर्श के रूप में चुने जाने का अवसर प्राप्त होता है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें श्रम, समय व धन की बचत होती है।
  • दैव प्रतिदर्श द्वारा चुने गए प्रतिदर्श समग्र के वास्तविक प्रतिनिधि होते हैं।
  • इस रीति में प्रतिदर्श विभ्रमों की माप की जा सकती है।
  • दैव प्रतिदर्श में संभावना सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
  • चुनाव के लिए कोई विस्तृत योजना नहीं बनानी पड़ती।

रीति के दोष

  • यदि केवल कुछ समंक ही उपलब्ध हों तो दैव प्रतिदर्श संभव नहीं हैं।
  • यदि समग्र का आकार छोटा है या उसमें विषमता अधिक है तो इस रीति द्वारा लिए गए प्रतिदर्श समग्र का ठीक प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते।
  • यदि अनुसंधान का क्षेत्र बहुत छोटा है तो प्रतिदर्श की इकाइयों का चुनाव करना कठिन हो जाता है। इन दोषों के कारण ही दैव प्रतिदर्श को पूर्ण प्रतिदर्श नहीं माना जाता है।

3. मिश्रित या स्तरित प्रतिदर्श
स्तरित प्रतिदर्श विधि का प्रयोग उस समय उचित होता है, जब समग्र की इकाइयों में सजातीयता की अभाव हो तथा उनको विभिन्न विशेषताओं के आधार पर अनेक खण्डों अथवा स्तरों में विभक्त करना संभव हो। प्रत्येक खण्ड अथवा स्तर में से प्रतिदर्श में उसी अनुपात में इकाइयाँ ली जाती हैं, जो अनुपात उस खण्ड अथवा स्तर का पूर्ण समग्र के साथ होता है; उदाहरण के लिए किसी समग्र में 5000 इकाइयाँ हैं, ज़िनमें से प्रतिदर्श के लिए 10% अथवा 500 इकाइयों का चुनाव करना हो तो समग्र को चार खण्डों अथवा स्तरों में बाँटा जा सकता है तथा इन खण्डों व स्तरों में क्रमशः समग्र की 10, 20, 30 तथा 40 प्रतिदर्श इकाइयाँ हैं तो प्रतिदर्श के लिए इकाइयों का चुनाव इस प्रकार किया जाएगा –
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 2 Collection of Data 9
स्तरित प्रतिदर्श के लिए आवश्यक है

  • समग्र की विभिन्न विशेषताओं को ज्ञात करके उनके आधार पर विभिन्न खण्डों अथवा स्तरों में बाँटा जाए।
  • प्रत्येक खण्ड अथवा स्तर इतना बड़ा अवश्य होना चाहिए, जिसमें से प्रतिदर्श के लिए इकाइयों का चुनाव संभव हो।
  • विभिन्न खण्डों अथवा स्तरों में पूर्ण रूप से सजातीयता हो।
  • प्रतिदर्श के लिए विभिन्न खण्डों अथवा स्तरों में से इकाइयों का चुनाव अनुपात में किया जाए, जो अनुपात संबंधित स्तर अथवा समग्र में है।

रीति के गुण

  • इसमें कोई भी महत्त्वपूर्ण समूह ऐसा नहीं रहता, जिसका प्रतिनिधित्व प्रतिदर्श में न हो।।
  • प्रतिदर्श में से कोई इकाई खो जाने पर उसी खण्ड में अन्य इकाइयों में से पुनस्र्थापन किया जा सकता है।
  • यह प्रणाली मितव्ययी है क्योंकि इसमें धन, श्रम के समय की बचत होती है।
  • यह अधिक विश्वसनीय है।
  • जहाँ मौलिक समग्र में विषमता पाई जाती है, यह उचित रहता है।

रीति के दोष

  • समग्र का खण्डों में विभाजन उचित न होने पर परिणामों में अभिनति (bias) का प्रभाव आ जाएगा।
  • इकाइयों के चयन में अनुपात लाने के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।
  • गैर-आनुपातिक स्तरीकरण में विभिन्न वर्गों की इकाइयों को भार देने में अभिनति की गुंजाइश रहती है।
  • स्तर बनाने में कठिनाई होती है।

4. अन्य रीतियाँ
(अ) सुविधानुसार प्रतिदर्श – इस प्रणाली में अनुसंधानकर्ता अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिदर्श को चुनकर जाँच करता है।

रीति के गुण

  • यह रीति अत्यंत आरामदायक है।
  • यह रीति मितव्ययी है क्योंकि इसमें समय, श्रम व धन की बहुत बचत होती है।

रीति के दोष

  • यह प्रणाली अवैज्ञानिक है।
  • इस रीति के द्वारा निकाले गए निष्कर्ष अविश्वसनीय होते हैं।

(ब) कोटा प्रतिदर्श – इस प्रणाली में प्रतिदर्श की इकाइयाँ छाँटने का कार्य प्रगणकों पर छोड़ दिया जाता है। अनुसंधानकर्ता इस संबंध में प्रगणकों को पर्याप्त निर्देश दे देता है कि उन्हें किस भाग से कितनी इकाइयों का चुनाव करना है।

रीति के गुण
इस प्रणाली के गुण मिश्रित या स्तरित प्रतिदर्श की ही भाँति हैं; उदाहरण के लिए इस रीति में सभी समूहों
का प्रतिनिधित्व हो जाता है, यह प्रणाली मितव्ययी एवं अधिक विश्वसनीय है तथा जहाँ समग्र में मौलिक विषमता पाई जाती है, वहाँ यह रीति अधिक उपयुक्त रहती है किंतु इस रीति द्वारा संतोषजनक फल केवल उस दशा में मिल सकते हैं, जबकि प्रगणक ईमानदारी व परिश्रम से कार्य करें।

रीति के दोष
इस प्रणाली के दोष मिश्रित स्तरित प्रतिदर्श की भाँति ही है; उदाहरण के लिए इसके चयन एवं निष्कर्षों में अभिनति का प्रभाव पड़ता है, स्तर बनाने में कठिनाई होती है और भार (weight) देने में पक्षपात की गुंजाइश रहती है। इसके अतिरिक्त प्रगणकों में उतनी ईमानदारी, निष्पक्षता व सावधानी की आशा करना, जितना अनुसंधानकर्ता स्वयं दिखाता है, गलत होगा।

(स) बहुस्तरीय क्षेत्रीय दैव प्रतिदर्श – 
इस प्रणाली में प्रतिदर्शों के चुनाव का कार्य विभिन्न स्तरों पर किया जाता है। समस्या से संबंधित पहले स्तर तय किए जाते हैं। तत्पश्चात् दैव प्रतिदर्श के आधार पर प्रतिदर्श लिए जाते हैं। इस प्रकार इस विधि की निम्नलिखित दो प्रमुख विशेषताएँ हैं

  • चुनाव कई स्तरों पर होता है।
  • प्रत्येक स्तर पर दैव प्रतिदर्श के आधार पर प्रतिदर्श लिए जाते हैं।

रीति के गुण

  • बड़े शहरों की क्षेत्रीय स्तर पर जनसंख्या ज्ञात करने के लिए यह प्रणाली अत्यधिक उपयुक्त है।
  • इसमें प्रत्येक इकाई को चुने जाने के समान अवसर प्राप्त होते हैं।
  • इस रीति में दैव प्रतिदर्श रीति के सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

रीति के दोष

  • विभिन्न क्षेत्रों में एकरूपता नहीं पाई जाती।
  • इसमें दैव प्रतिदर्श के सभी दोष आ जाते हैं।

(द) बहुचरण प्रतिदर्श – जब एक ही प्रकार के समंकों की सहायता से विभिन्न समस्याओं से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त करनी होती हैं तो एक ही बार में समग्र के उचित प्रतिनिधि के रूप में पर्याप्त मात्रा में प्रतिदर्श चुन लिया जाता है और फिर उसमें से प्रत्येक समस्या के अध्ययन के लिए उप-प्रतिदर्श लिए जाते हैं।
इन उप-प्रतिदर्शो को क्रमश: प्रथम, द्वितीय, तृतीय ……… चरण प्रतिदर्श कहते हैं।

रीति के गुण

  • एक ही प्रतिदर्श से अनेक प्रकार की समस्याओं का अध्ययन हो जाता है।
  • यह रीति मितव्ययी है। इसमें धन, परिश्रम व श्रम की बचत होती है।
  • यह रीति सुविधाजनक है।

रीति के दोष

  • प्रतिदर्श के दोषपूर्ण होने पर सभी उप-प्रतिदर्श भी दोषपूर्ण होंगे।
  • प्रतिदर्श की जाँच की सुविधा नहीं होती।

(य) विस्तृत प्रतिदर्श – इस विधि में बहुत बड़ा प्रतिदर्श लिया जाता है। लगभग 80 या 90% इकाइयाँ प्रतिदर्श में शामिल की जाती हैं। यह विधि संगणना अनुसंधान विधि से मिलती-जुलती हैं।

रीति के गुण

  • परिणाम अधिक शुद्ध होते हैं।
  • परिणाम पर पक्षपात का कम प्रभाव पड़ता है।
  • जाँच विस्तृत होती है।

रीति के दोष

  • यह प्रणाली व्ययसाध्य है। इसमें धन, श्रम व समय का अपव्यय होता है।
  • समग्र के बड़े अंश के उपलब्ध न होने पर यह रीति संभव नहीं होती।

प्रतिदर्श प्रणाली की उपर्युक्त सभी रीतियों के अपने-अपने गुण-दोष हैं; अतः कोई भी रीति सभी क्षेत्रों व परिस्थितियों में सर्वोत्तम नहीं हो सकती। उपयुक्त रीति का चयन करने से पहले अनुसंधान के उद्देश्य, प्रकृति, आकार, शुद्धता की मात्रा व समग्र की इकाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। वैसे सामान्यत: दैये प्रतिदर्श व स्तरित रीति का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
प्रश्नावली क्या है? प्रश्नावली व अनुसूची में क्या अन्तर है? प्रश्नावली बनाते समय किन सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर :
सूचना दो प्रकार से प्राप्त हो सकती है

1. प्रश्नावलियों के प्रयोग से तथा
2. अनुसूचियों के द्वारा।

1. प्रश्नावली – प्रश्नावली में प्रश्न दिए रहते हैं। इनमें प्रश्नों के उत्तर के लिए रिक्त स्थान नहीं होता। उत्तर सूचकों द्वारा अलग प्रपत्रों पर लिखे जाते हैं। आजकल प्रश्नावली में प्रत्येक प्रश्न के साथ वैकल्पिक उत्तर छाप देने की पद्धति अपनाई जाती है जिससे सूचक सही उत्तर पर निशान लगा देता है।

2. अनुसूची – 
‘अनुसूची’ प्रश्नों की वह सूची है जिसे प्रगणकों द्वारा सूचकों से पूछताछ करके भरा जाता हैं यह एक रिक्त सारणी के रूप में होती है जिसमें प्रत्येक मद के सामने या नीचे प्रश्नों के उत्तर लिखने के लिए रिक्त स्थान होता है।

प्रश्नावली तथा अनुसूची में अंतर – सामान्यतः प्रश्नावली एवं अनुसूची को एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है क्योंकि दोनों का ही उद्देश्य सूचना देने वालों से सूचना प्राप्त करना है किंतु प्रयोग विधि के आधार पर इन दोनों में सूक्ष्म अंतर है। प्रश्नावली में प्रश्नों के उत्तर सूचकों द्वारा स्वयं दिए जाते हैं। इसके विपरीत, अनुसूची में प्रश्नों की सूची के प्रगणकों द्वारा सूचकों से सूचना प्राप्त करके भरा जाता है। प्रश्नों के उत्तर के लिए रिक्त स्थान छोड़ दिया जाता है। व्यवहार में दोनों का प्रयोग एक ही अर्थ में किया जाता है।

प्रश्नावली का उदाहरण

आप अपने नगर में महाविद्यालय के छात्रों के व्ययों का अध्ययन करना चाहते हैं। इसके लिए प्रश्नावली का नमूना तैयार कीजिए।

मेरठ नगर के महाविद्यालयों में छात्रों की व्यय प्रवृत्ति का सर्वेक्षण

1. छात्र/छात्रा …………………………………………………………..
2. कक्षा-स्नातक/स्नातकोत्तर                                                                           संकाय : विधि/विज्ञान/कला/वाणिज्य
3. कॉलेज का नाम …………………………………………………………..
4. स्थायी निवास (गाँव/नगर का नाम)
5. यदि आप मेरठ के निवासी नहीं हैं तो मेरठ में रहने की व्यवस्था क्या है? छात्रावास/किराये का कमरा/रिश्तेदारों या परिचित के यहाँ आवास/प्रतिदिन आना-जाना।
6. आयु ……………………. वर्ष ……………………. माह ………………………….
7. पिता का नाम …………………………………………………………..
8. माँ का नाम …………………………………………………………..
9. पिता का व्यवसाय …………………………………………………………..
10. पिता की आय …………………………………………………………..
11. परिवार के अन्य सदस्यों की आय (यदि कोई हो) …………………………………………………………..
12. छात्र की मासिक आय (यदि कोई हो) …………………………………………………………..
13. छात्र की प्रतिमाह व्यय के लिए प्राप्त होने वाली राशि ………………………………..
(अ) परिवार से …………………………………………………………..
(ब) निजी आय से …………………………………………………………..
(स) छात्रवृत्ति से …………………………………………………………..
कुल राशि …………………………………………………………..
14. छात्र के मासिक व्यय के मद और राशि मद व्यय की राशि (निकटतम रुपया)
(i) कॉलेज की फीस …………………………………………………………..
(ii) पुस्तक एवं पाठ्य-सामग्री …………………………………………………………..
(iii) छात्रावास का किराया …………………………………………………………..
(iv) भोजन …………………………………………………………..
(v) बस/रेल का किराया …………………………………………………………..
(vi) खेलकूद व मनोरंजन पर व्यय …………………………………………………………..
(vii) अन्य व्यय …………………………………………………………..
15. क्या आपको मिलने वाली राशि पर्याप्त है? यदि नहीं, तो कितनी आवश्यकता और समझते हो? ……………………………….
16. क्या आप अपने वर्तमान मासिक व्यय में से कुछ बचत कर सकते हैं? यदि हाँ, तो मद और बचत का अनुमानित विवरण ……………..
17. अन्य संबंधित सूचना …………………………………………………………..

उत्तम प्रश्नावली के लिए सावधानियाँ

सांख्यिकीय अनुसंधान की सफलता मुख्य रूप से प्रश्नावली की उत्तमता पर निर्भर करती है; अतः प्रश्नावली तैयार करते समय सावधानी व सतर्कता बरतनी आवश्यक है। एक प्रश्नावली की रचना करते समय अग्रलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए
1. निवेदन पत्र – अनुसंधानकर्ता को प्रश्नावली के साथ एक निवेदन पत्र लगाना चाहिए जिससे वह अपना परिचय दे, अनुसंधान का उद्देश्य बताए तथा सूचना को गुप्त रखने तथा इसका दुरुपयोग न करने का विश्वास दिलाए।

2. प्रश्नों की संख्या कम – 
प्रश्नावली में प्रश्नों की संख्या कम होनी चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रश्न इतने कम न हो जाएँ कि पर्याप्त सूचना ही प्राप्त न हो सके।

3. सरल व स्पष्ट प्रश्न – 
प्रश्न सरल, स्पष्ट व सूक्ष्म होने चाहिए। अधिकांश प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनका उत्तर ‘हाँ’ या नहीं में दिया जा सके। प्रश्नों में अप्रचलित, जटिल व असम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

4. उचित क्रम – 
प्रश्न प्राथमिकता अथवा महत्त्व के क्रम में रखे जाने चाहिए। परस्पर संबंधित प्रश्नों ” को एक ही स्थान पर केन्द्रित किया जाना चाहिए।

5. वर्जित प्रश्न – 
प्रश्नावली में ऐसे प्रश्न सम्मिलित नहीं किए जाने चाहिए जिनसे सूचक के आत्मसम्मान तथा सामाजिक व धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचे, जो उनके मन में संदेह, उत्तेजना या विरोध उत्पन्न करे अथवा जो उसके व्यक्तिगत व्यवहार से संबंधित हों। प्रो० सेक्राइस्ट के शब्दों में-“यदि कठिन तथा अपरिचित प्रश्नों अथवा अविश्वास या संदेह उत्पन्न करने वाले प्रश्नों को पूछा जाता है तो उनके उत्तर अपूर्ण, संक्षिप्त, अर्थहीन, सामान्य या जानबूझकर टालने वाले होने की संभावना रहती है।”
6. प्रश्नों की प्रकृति – प्रश्न चार प्रकार के हो सकते हैं—
(i) सामान्य विकल्पीय प्रश्न – ऐसे प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ या नहीं’ अथवा ‘गलत’ या ‘सही’ दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए क्या आपके पास कार है? अथवा क्या आप किराये के मकान में रहते हैं? इस प्रकार के प्रश्नों का गठन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

(ii) बहुविकल्पीय प्रश्न – 
इस प्रकार के प्रश्नों में अनेक संभव उत्तर होते हैं। ये उत्तर प्रश्नावली में छपे होते हैं और सूचक उनमें से किसी एक पर निशान लगा देता है।

(iii) विशिष्ट जानकारी देने वाले प्रश्न – ये प्रश्न विशिष्ट जानकारी प्रदान करते हैं; जैसे-आपकी आयु क्या है? आपके कितने बच्चे हैं?

(iv) खुले प्रश्न – 
इन प्रश्नों का उत्तर सूचक को अपने शब्दों में देना होता है। उदाहरण के लिए भारत में मुद्रा स्फीति को किस प्रकार नियन्त्रित किया जा सकता है? प्रश्नावली में जहाँ तक संभव हो सके, प्रथम प्रकार के प्रश्न पूछे जाने चाहिए।

7. प्रश्नों में उचित शब्दों का प्रयोग – 
प्रश्नों के गठन में सही स्थान पर सही शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनके अर्थ प्रमापित एवं सर्वविदित हों।

8. प्रत्यक्ष संबंध – 
प्रश्न अनुसंधान से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होने चाहिए ताकि व्यर्थ की सूचना एकत्र करने में धन, श्रम व समय का अपव्यय न हो।

9. सत्यता की जाँच – 
प्रश्नावली में ऐसे प्रश्नों को भी समावेश होना चाहिए जिससे उत्तरों की यथार्थता की परस्पर जाँच की जा सके।

10. प्रश्नावली का गठन – 
प्रश्नावली के गठन पर उपयुक्त ध्यान दिया जाना चाहिए। उत्तर लिखने के लिए पर्याप्त स्थान छोड़ना चाहिए।

11. सूचक की योग्यता के अनुसार प्रश्न – 
प्रश्नावली में ऐसे प्रश्न होने चाहिए जिनके उत्तर सूचक सरलता से दे दें।

12. आवश्यक निर्देश – 
प्रश्नावली भरने के संबंध में प्रश्नावली के प्रारम्भ में अथवा अंत में स्पष्ट रूप से आवश्यक निर्देश दिए जाने चाहिए ताकि सूचक को सूचना देने में आसानी हो।

13. पूर्व परीक्षण एवं संशोधन – 
प्रश्नावली के तैयार हो जाने पर, अनुसंधान कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व उसका कुछ लोगों पर परीक्षण कर लेना चाहिए। इससे प्रश्नावली के दोषों को दूर करने में सहायता मिलेगी।

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants (उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants (उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक पौधे को बाहर से देखकर क्या आप बता सकते हैं कि वह C4ई है अथवा C3? कैसे और क्यों?
उत्तर :
पौधे जो शुष्क ट्रॉपिकल क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं उनमें C4पथ पाया जाता है अन्यथा C3तथा C4पौधों में बाह्य आकारिकी लगभग समान होती है।

प्रश्न 2.
एक पौधे की आन्तरिक संरचना को देखकर क्या आप बता सकते हैं कि वह C3है अथवा C4? वर्णन कीजिए।
उत्तर :
पत्तियों की आन्तरिक संरचना (vertical section) को देखकर C3तथा C4पौधों को पहचाना जा सकता है। C4पौधों की पत्तियों की शारीरिकी (anatomy) क्रान्ज प्रकार (Kranz type) की होती है। जर्मन भाषा में क्रान्ज शब्द का तात्पर्य माला (wreath) या छल्ला (ring) है। पत्तियों के पर्णमध्योतक (mesophyll) में खम्भ ऊतक (palisade tissue) नहीं होता। संवहन बण्डल के चारों ओर गोल मृदूतक कोशिकाएँ पर्यों के रूप में व्यवस्थित (UPBoardSolutions.com) होती हैं। पत्तियों के संवहन बण्डल के चारों ओर पूलाच्छद (bundle sheath) होता है। ये कोशिकाएँ बड़ी होती हैं। पुलाच्छद की कोशिकाओं में हरितलवक बड़े होते हैं तथा उनमें ग्रैना कम विकसित होते हैं अथवा अनुपस्थित होते हैं, जबकि पर्ण मध्योतक कोशिकाओं में हरितलवक छोटे होते हैं। इनमें ग्रेना विकसित होते हैं। अत: C4 पौधों की पत्तियों में द्विरूपी हरितलवक (dirmorphic chloroplast) पाए जाते हैं। प्रकाश संश्लेषण प्रक्रम में वर्णक तन्त्र II का अभाव होता है।

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C3 पौधों की पत्तियों की शारीरिकी (anatomy) क्रान्ज प्रकार की नहीं होती। इसकी पत्तियों में पर्णमध्योतक में खम्भ ऊतक पाया जाता है। सभी कोशिकाओं में एक ही प्रकार के हरितलवक पाए। जाते हैं। प्रकाश संश्लेषण तन्त्र में दोनों वर्णक तन्त्र पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
हालांकि C4 पौधों में बहुत कम कोशिकाएँ जैव संश्लेषण-केल्विन पथ को वहन करती हैं फिर भी वे उच्च उत्पादकता वाले होते हैं। क्या इस पर चर्चा कर सकते हो कि ऐसा क्यों है?
उत्तर :
C4 पौधों में दो प्रकार के क्लोरोप्लास्ट मिलते हैं। मीसोफिल का क्लोरोप्लास्ट COवातावरण से लेता है। यह बहुत क CO2  सान्द्रता को भी आसानी से अवशोषित कर सकता है। यहाँ तक कि जब रन्ध्र लगभग बन्द होते हैं तब भी CO2 का अवशोषण कर सकता है। अतः CO2 की आवश्यकता निरन्तर बनी रहती है, अतः इसलिए इनकी उत्पादकता उच्च होती है।

प्रश्न 4.
रुबिस्को (RUBISCO) एक एन्जाइम है जो कार्बोक्सिलेस और ऑक्सीजनेस के रूप में काम करता है। आप ऐसा क्यों मानते हैं कि C4 पौधों में रुबिस्को अधिक मात्रा में कार्बोक्सिलेशन करता है?
उत्तर :
कैल्विन चक्र (Calvin Cycle) में CO2 ग्राही RuBP से क्रिया करके 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (PGA) के 2 अणु बनाता है। यह क्रिया रुबिस्को (RUBISCO) के द्वारा उत्प्रेरित होती है

RuBP + CO2 + H2O → 2 (3 PGA)

रुबिस्को संसार में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन (एन्जाइम) है। यह O2 तथा CO2 दोनों से बन्धित हो सकता है। रुबिस्को में O2 की अपेक्षा CO2 के लिए अधिक बन्धुता होती है, लेकिन आबन्धता O2 तथा CO2 की सापेक्ष सान्द्रता पर निर्भर करती है। C3पौधों में कुछ O2 रुबिस्को से बन्धित हो जाने के कारण CO2 का यौगिकीकरण कम हो जाता है; क्योंकि रुबिस्को O2 से बन्धित होकर फॉस्फो ग्लाइकोलेट अणु बनाता है। इस प्रक्रम को प्रकाश श्वसन (UPBoardSolutions.com) (photorespiration) कहते हैं। प्रकाश श्वसन के कारण शर्करा नहीं बनती और न ही ऊर्जा ATP के रूप में संचित होती है।  C4 पौधों में प्रकाश श्वसन नहीं होता। C4 पौधों में पर्णमध्योतक का मैलिक अम्ल पूलाच्छद में टूटकर पाइरुविक अम्ल तथा CO2 बनाता है। इसके फलस्वरूपे  CO2 की सान्द्रता बढ़ जाती है और रुबिस्को एक कार्बोक्सिलेस (carboxylase) के रूप में ही कार्य करता है। इसके फलस्वरूप उत्पादकता बढ़ जाती है। यहाँ रुबिस्को ऑक्सीजिनेस (oxygenase) का कार्य नहीं करता।

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प्रश्न 5.
मान लीजिए यहाँ पर क्लोरोफिल ‘बी’ की उच्च सान्द्रता युक्त, मगर क्लोरोफिल ‘ए’ की कमी वाले पेड़ थे। क्या ये प्रकाश संश्लेषण करते होंगे? तब पौधों में क्लोरोफिल ‘बी’ क्यों होता है और फिर दूसरे गौण वर्णकों की क्या जरूरत है?
उत्तर :
क्लोरोफिल ‘बी’, जैन्थोफिल तथा कैरोटिन सहायक वर्णक (accessory pigments) होते हैं। ये प्रकाश को अवशोषित करके, ऊर्जा को क्लोरोफिल ‘ए’ को स्थानान्तरित कर देते हैं। वास्तव में ये वर्णक प्रकाश संश्लेषण को प्रेरित करने वाली उपयोगी तरंगदैर्घ्य के क्षेत्र को बढ़ाने का कार्य करते हैं और क्लोरोफिल ‘ए’ को फोटो ऑक्सीडेशन (photo oxidation) से बचाते हैं। क्लोरोफिल ‘ए’ प्रकाश संश्लेषण में प्रयुक्त होने वाला मुख्य वर्णक है। अतः क्लोरोफिल ‘ए’ की कमी वाले पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होगा।

प्रश्न 6.
यदि पत्ती को अँधेरे में रख दिया गया हो तो उसका रंग क्रमशः पीला एवं हरा-पीला हो जाता है? कौन-से वर्णक आपकी सोच में अधिक स्थायी हैं?
उत्तर :
पौधे के हरे भागों में हरितलवक पाया जाता है। हरितलवक की उपस्थिति में पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का संश्लेषण करते हैं। पौधे के अप्रकाशिक भागों में अवर्णीलवक पाया जाता है। प्रकाश की उपस्थिति में अवर्णीलवक हरितलवक में बदल जाता है। हरितलवक की ग्रैना पटलिकाओं में पर्णहरित, कैरोटिनॉयड्स (carotenoids) पाए जाते हैं। कैरोटिनॉयड्स दो प्रकार के होते हैं जैन्थोफिल (xanthophyll) तथा कैरोटिन (carotene)। ये क्रमश: पीले एवं नारंगी वर्णक होते हैं। पर्णहरित निर्माण के लिए प्रकाश की उपस्थिति आवश्यक होती है। प्रकाश का अवशोषण या प्रकाश ऊर्जा को ग्रहण करने का कार्य मुख्य रूप से पर्णहरित करता है। पौधे को अन्धकार में रख देने पर प्रकाश संश्लेषण क्रिया अवरुद्ध हो जाती है। पौधे में संचित भोज्य पदार्थ समाप्त हो जाते हैं तो इसके फलस्वरूप पत्तियों में पाए जाने वाले पर्णहरित का विघटन प्रारम्भ हो जाता है। इसके फलस्वरूप पत्तियाँ कैसेटिनॉयड्स के कारण पीली या हरी-पीली दिखाई देने लगती हैं। कैरोटिनॉयड्स पर्णहरित की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं।

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प्रश्न 7.
एक ही पौधे की पत्ती का छाया वाला (उल्टा) भाग देखें और उसके चमक वाले (सीधे) भाग से तुलना करें अथवा गमले में लगे धूप में रखे हुए तथा छाया में रखे हुए पौधों के बीच तुलना करें। कौन-सा गहरे रंग का होता है और क्यों?
उत्तर :
जब हम पत्ती की पृष्ठ सतह को देखते हैं तो यह अधर तल की अपेक्षा अधिक गहरे रंग की और चमकीली दिखाई देती है। इसी प्रकार धूप में रखे हुए गमले की पत्तियाँ छाया में रखे हुए गमले की पत्तियों की अपेक्षा अधिक गहरे रंग की और चमकीली प्रतीत होती हैं। इसका कारण यह है कि पृष्ठ तल पर अधिचर्म (epidermis) के नीचे खम्भ ऊतक (palisade tissue) पाया जाता है। खम्भ ऊतक में हरितलवक अधिक मात्रा में पाया जाता है। खम्भ ऊतक (UPBoardSolutions.com) प्रकाश संश्लेषण के लिए विशिष्टीकृत कोशिकाएँ होती हैं। धूप में रखे गमले की पत्तियाँ छाया में रखे गमले की अपेक्षा अधिक गहरे रंग की प्रतीत होती हैं। पत्तियों के अधिक गहरे रंग का होने का मुख्य कारण कोशिकाओं में पर्णहरित की मात्रा अधिक होती है क्योंकि पर्णहरित निर्माण के लिए प्रकाश एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। इसके अतिरिक्त प्रकाश संश्लेषण के कारण पृष्ठ सतह की कोशिकाओं में अधिक स्टार्च का निर्माण होता है।

प्रश्न 8.
प्रकाश संश्लेषण की दर पर प्रकाश का प्रभाव पड़ता है। ग्राफ के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(अ) वक्र के किस बिन्दु अथवा बिन्दुओं पर (क, ख अथवा ग) प्रकाश एक नियामक कारक है?
(ब) ‘क’ बिन्दु पर नियामक कारक कौन-से हैं?
(स) वक्र में ‘ग’ और ‘घ’ क्या निरूपित करता है?
उत्तर :
(अ)
प्रकाश की गुणवत्ता, प्रकाश की तीव्रता प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करती है। उच्च प्रकाश तीव्रता प्रकाश नियामक कारक नहीं होता; क्योंकि अन्य कारक सीमित हो जाते हैं। कम प्रकाश तीव्रता पर प्रकाश एक नियामक कारक “क” बिन्दु पर होता है।

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(ब)
प्रकाश।

(स)
वक्र में ‘ग’ बिन्दु प्रकाश संतृप्तता को प्रदर्शित करता है। इस बिन्दु पर प्रकाश तीव्रता बढ़ने पर भी प्रकाश संश्लेषण की दर नहीं बढ़ती। ‘घ’ बिन्दु यह निरूपित करता है कि प्रकाश तीव्रता
इस बिन्दु पर सीमाकारक हो सकता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plantsप्रश्न 9.
निम्नलिखित में तुलना कीजिए

(अ) C3 एवं Cपथ
(ब) चक्रीय एवं अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन
(स) C3 एवं C4 पादपों की पत्ती की शारीरिकी।
उत्तर :

(अ)
C3 तथा C4 पथ में अन्तर

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(ब)
चक्रीय तथा अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants(स)
C3 तथा  C4पादपों की पत्ती की शारीरिकी में अन्तर
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक शर्त हैं
(क) प्रकाश एवं उचित तापक्रम
(ख) पर्णहरित एवं जल
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण में उपयोग होता है
(क) PSI
(ख) PSII
(ग) PSI और PSII
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) PSI

प्रश्न 3.
अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण में किसका उपयोग होता है?
(क) PSI
(ख) PSII
(ग) PSI और PSII
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) PSI और PSII

प्रश्न 4.
निम्न में किसकी CO2 सन्तुलन-प्रकाश तीव्रता उच्चतम होती है?
(क) C2 पौधों की
(ख) C3 पौधों की
(ग) C4 पौधों की
(घ) एल्पाइन पौधों की
उत्तर :
(ख) C3 पौधों की

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प्रश्न 5.
कैल्विन-बेन्सन चक्र का प्रारम्भिक विकर है
(क) फॉस्फोट्रायोज आइसोमेरेज
(ख) राइबुलोज-1, 5-डाइफॉस्फेट कार्बोक्सीलेज
(ग) ट्रायोज फॉस्फेट डीहाइड्रोजीनेज
(घ) इनमें से सभी
उत्तर :
(ख) राइबुलोज-1, 5-डाइफॉस्फेट कार्बोक्सीलेज

प्रश्न 6.
C4 चक्र में प्रथम CO2 ग्रहणकर्ता है
(क) RUBP
(ख) PGA
(ग) OAA
(घ) PEP
उत्तर :
(घ) PEP

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण की परिभाषा लिखिए। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले एक बाह्य कारक तथा एक आन्तरिक कारक का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
वह अभिक्रिया जिसमें हरे पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश, CO2, जल तथा पर्णहरिम की (UPBoardSolutions.com) उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं, प्रकाश-संश्लेषण कहलाती है। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख बाह्य कारक प्रकाश तथा आन्तरिक कारक पर्णहरिम है।

प्रश्न 2.
पर्णहरित के पाइरोल चक्र से सम्बन्धित तत्त्व का नाम बताइए।
उत्तर :
पाइरोल वलय (चक्र) (pyrole ring) के मध्य में एक मैग्नीशियम (Mg) परमाणु होता है।

प्रश्न 3.
पर्णहरिम (chlorophyll) के अणु कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर :
हरित लवक के ग्रेना में पाये जाते हैं।

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प्रश्न 4.
प्रकाश संश्लेषण में निकलने वाली ऑक्सीजन किस पदार्थ के अणुओं से प्राप्त होती है?
उत्तर :
जल (H2O) से।

प्रश्न 5.
जल के दो अणु के प्रकाश-अपघटन में कितने फोटॉन की आवश्यकता होती है?
उत्तर :
जल के दो अणु के प्रकाश-अपघटन में चार फोटॉन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
C4 पौधे क्या हैं? इसके दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर :
जिन हैच और स्लैम चक्र वाले पौधों में कार्बन डाइऑक्साइड स्थिरीकरण का प्रथम उत्पाद 4 कार्बन वाला पदार्थ ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल होता है, C4 पौधे कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-गन्ना, मक्का इत्यादि।

प्रश्न 7.
क्रान्ज शारीरिकी किन पौधों में पायी जाती है?
उत्तर :
C4 पौधों में।

प्रश्न 8.
एक पौधे का नाम बताइए जिसमें प्रकाश-संश्लेषण में दो कार्बन डाइऑक्साइड ग्राही होते
उत्तर :
गन्ना (C4 पौधा)।

प्रश्न 9.
प्रकाश-संश्लेषण प्रदर्शित करने वाले उपकरण के जल में कोल्ड ड्रिंक मिलाने पर अधिक बुलबुले निकलते हैं। कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रकाश-संश्लेषण प्रदर्शित करने वाले उपकरण के जल में कोल्ड ड्रिंक मिलाने (UPBoardSolutions.com) पर अधिक बुलबुले निकलते हैं; क्योंकि कोल्ड ड्रिंक में CO2 गैस होती है जिसके कारण उपकरण के जल में CO2 की सान्द्रता बढ़ जाती है और प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया तीव्र हो जाती है जिससे अधिक मात्रा में O2 गैस निकलती है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक तथा अप्रकाशिक प्रक्रियाओं में अन्तर बताइए।
उत्तर :
प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक तथा अप्रकाशिक प्रक्रियाओं में अन्तर
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प्रश्न 2.
हिल अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं?

उत्तर :
वैज्ञानिक हिल (Hill) ने प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की क्रिया के अध्ययन के समय यह बताया कि जल के अणुओं के टूटने पर H2 का निर्माण होता है तथा इससे उप उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन गैस उत्पन्न होती है। बाद में H2 को वातावरण से प्राप्त की गई CO2 के साथ (UPBoardSolutions.com) स्थिर करके विभिन्न प्रकार के कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण किया जाता है। हिल अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में ही सम्पन्न होती है, इसलिये इस क्रिया को प्रकाश अभिक्रिया (light reaction) भी कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants image 7

प्रश्न 3.
प्रकाशीय श्वसन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर :
प्रकाशीय श्वसन (photorespiration) को समझने के लिए, हमें कैल्विन पथ के प्रथम चरण अर्थात्  CO2 स्थिरीकरण के विषय में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त करनी होगी। यह वह अभिक्रिया है जहाँ RuBP कार्बन डाइऑक्साइड से संयोजित होकर 3PGA के 2 अणुओं का गठन करता है और एक एन्जाइम रिबुलोज बिसफॉस्फेट कार्बोक्सिलेज ऑक्सीजिनेज
(RuBisCO) के द्वारा उत्प्रेरित होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants image 8RuBisCO
एन्जाइम विश्व में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाता है क्योंकि यह CO2 एवं O2 दोनों से बन्धित हो सकता है, इसलिए इसे रुबिस्को कहते हैं। रुबिस्को में O2 की अपेक्षा CO2 के लिए अधिक बन्धुता है। कल्पना कीजिए कि यदि ऐसा नहीं होता तो क्या होता? यह बन्धुता प्रतियोगितात्मक है। O2 अथवा  CO2 इनमें से कौन आबन्ध होगा, यह उनकी सापेक्ष सान्द्रता पर निर्भर करता है।

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C2 पौधों में कुछ O2 RuBisCO से बन्धित होती है अत: CO2 का यौगिकीकरण कम हो जाता है। यहाँ पर RUBP, 3-PGA के अणुओं में परिवर्तित होने की बजाय ऑक्सीजन से संयोजित होकर चक्र में एक फॉस्फोग्लिसरेट अणु बनाता है जिसे प्रकाशीय श्वसन कहते हैं। प्रकाश श्वसन पथ में शर्करा और ATP को संश्लेषण नहीं होता; बल्कि इसमें ATP के उपयोग के साथ CO2 भी निकलती है। प्रकाशीय श्वसन पथ में ATP अथवा NADPH का संश्लेषण नहीं होता; अत: प्रकाश श्वसन एक निरर्थक प्रक्रिया है।

C4 पौधों में प्रकाशीय श्वसन नहीं होता है। इसका कारण यह है कि इनमें एक ऐसी प्रणाली होती है जो एन्जाइम स्थल पर CO2 की सान्द्रता बढ़ा देती है। ऐसा तब होता है जब पर्णमध्योतक का C4 अम्ल पूलाच्छद में टूटकर CO2 को मुक्त करता है, जिसके परिणामस्वरूप CO2 की अन्तराकोशिकीय सान्द्रता बढ़ जाती है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि रुबिस्को कार्बोक्सिलेज के रूप में कार्य करता है, जिससे इसकी ऑक्सीजनेज के रूप में कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 4.
C3 तथा CAM पौधों में अन्तर बताइए।
उत्तर :
कुछ पौधों; विशेषकर अत्यधिक ताप में उगने वाले सरस मरुद्भिदों; जैसे–नागफनी (Opuntia), केतकी (Agave) आदि में दिन के समय रन्ध्र बन्द रहने से ऊतकों को कार्बन डाइऑक्साइड नहीं मिल पाती है। यह रात्रि को रन्ध्रों के खुलने पर उपलब्ध होती है। अत: इन पौधों की पत्तियों की मध्योतक कोशिकाओं (mesophyll cells) में कार्बन डाइऑक्साइड का स्थिरीकरण C4 पौधों के समान ही होता है। रात्रि के समय ये पत्तियाँ PEP (phosphoenol pyruvic acid) के साथ मिलकर CO2 ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल (oxaloacetic acid) तथा बाद में मैलिक अम्ल (malic acid) बना लेती है। दिन के समय मैलिक अम्ल विघटित होकर (UPBoardSolutions.com) CO2 निष्कासित करता है जो कैल्विन चक्र में प्रवेश करती है। ध्यान रहे, यहाँ पर्णमध्योतक कोशिकाओं में ही दोनों बार स्थिरीकरण होता है, C4 पौधों की तरह दो भिन्न कोशिकाओं में नहीं। ऐसे पौधों को कैम पादप (CAM plant) कहा गया है।

प्रश्न 5.
C4 व C3 पौधों में अन्तर कीजिए।
उत्तर :
C4 व C3 पौधों में अन्तर
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प्रश्न 6.
प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले बाह्य कारकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले बाह्य कारकों का वर्णन निम्नवत् है
1. प्रकाश
जब हम प्रकाश को प्रकाश – संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में लेते हैं तो हमें प्रकाश की गुणवत्ता, प्रकाश की तीव्रता तथा दीप्तिकाल के बीच अन्तर करने की आवश्यकता होती है। यहाँ कम प्रकाश तीव्रता पर आपतित प्रकाश तथा CO2  के यौगिकीकरण की दर के बीच एक रेखीय सम्बन्ध है। उच्च प्रकाश तीव्रता होने पर, इस दर में कोई वृद्धि नहीं होती है, अन्य कारक सीमित हो जाते हैं। इसमें ध्यान देने वाली रोचक बात यह है कि प्रकाश संतृप्ति पूर्ण प्रकाश के 10 प्रतिशत पर होती है। छाया अथवा सघन जंगलों में उगने वाले पौधों को छोड़कर प्रकाश शायद ही प्रकृति में सीमाकारी कारक हो। एक सीमा के बाद आपतित प्रकाश क्लोरोफिल के विघटन का कारण होता है, जिससे प्रकाश-संश्लेषण की दर कम हो जाती है।

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2. कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता
प्रकाश संश्लेषण में कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रमुख सीमाकारी कारक है। वायुमण्डल में CO2 की सान्द्रती बहुत ही कम है (0.03 और 0.04 प्रतिशत के बीच)। CO2 की सान्द्रता में 0.05 प्रतिशत तक वृद्धि के कारण CO2 की यौगिकीकरण दर में वृद्धि हो सकती है, लेकिन इससे अधिक की मात्रा लम्बे समय तक के लिए क्षतिकारक बन सकती है। C3 एवं C4 पौधे CO2की भिन्न-भिन्न सान्द्रताओं में भिन्न अनुक्रिया करते हैं। निम्न प्रकाश स्थितियों में दोनों (UPBoardSolutions.com) में से कोई भी समूह उच्च CO2 सान्द्रता के प्रति अनुक्रिया नहीं करते हैं। उच्च प्रकाश तीव्रता में C3 तथा C4 दोनों ही तरह के पादपों में प्रकाश-संश्लेषण की बढ़ी दर अधिक हो जाती है। यहाँ पर यह ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है कि C4 पौधे लगभग 360 μ1L-1 पर संतृप्त हो जाते हैं जबकि Cबढ़ी हुई CO2 सान्द्रता पर अनुक्रिया करते हैं तथा संतृप्तता केवल 450 μ1L-1 के बाद ही दिखाते हैं। अत: उपलब्ध CO2 का स्तर C3पादपों के लिए सीमाकारी है।

सच तो यह है कि C3 पौधे उच्चतरे CO2 सान्द्रता में अनुक्रिया करते हैं और इससे प्रकाश-संश्लेषण की दर में वृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन अधिक होता है और इस सिद्धान्त का उपयोग ग्रीन हाउस फसलों; जैसे-टमाटर एवं बेल मिर्च में किया गया है। इन्हें कार्बन-डाइऑक्साइड से भरपूर वातावरण में बढ़ने का अवसर दिया जाता है ताकि उच्च पैदावार प्राप्त हो।

3. ताप
प्रकाश संश्लेषण की अप्रकाशीय अभिक्रिया एन्जाइमों पर निर्भर करती है इसलिए यह ताप द्वारा नियन्त्रित होती है। यद्यपि प्रकाश अभिक्रिया भी ताप संवेदी होती है, लेकिन उस पर ताप का काफी कम प्रभाव होता है। C4 पौधे उच्च ताप पर अनुक्रिया करते हैं तथा उनमें प्रकाश-संश्लेषण की दर भी ऊँची होती है, जबकि C3 पौधों के लिए इष्टतम ताप कम होता है। विभिन्न पौधों के प्रकाश-संश्लेषण के लिए इष्टतम ताप उनके अनुकूलित आवास पर निर्भर करता है। उष्णकटिबन्धी पौधों के लिए इष्टतम ताप उच्च होता है। समशीतोष्ण जलवायु में उगने वाले पौधों के लिए अपेक्षाकृत कम ताप की आवश्यकता होती है।

4. जल
यद्यपि प्रकाश अभिक्रिया में जल एक महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया अभिकारक है, तथापि, कारक के रूप में जल का प्रभाव पूरे पादप पर पड़ता है, न कि सीधे प्रकाश-संश्लेषण पर। जल तनाव रन्ध्र को बन्द कर देता है; अतः CO2 की उपलब्धता घट जाती है। इसके साथ ही, जल अभाव से पत्तियाँ मुरझा जाती हैं, जिससे पत्तियों का क्षेत्रफल कम हो जाता है और इसके साथ-ही-साथ उपापचयी क्रियाएँ भी कम हो जाती हैं।

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प्रश्न 7.
पौधों के जीवन में प्रकाश का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पौधों के जीवन में प्रकाश का बहुत महत्त्व है क्योंकि प्रकाश के बिना पौधों का जीवन संभव नहीं है। पौधों को प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन निर्माण करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है और यदि प्रकाश ही नहीं होगा तो वे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं कर पाएँगे। और भोजन के अभाव में मर जायेंगे। इसके अतिरिक्त पौधों को अनेक कार्यों; जैसे-फलने-फूलने, वृद्धि, प्रजनन, बीजों के अंकुरण आदि के लिए भी प्रकाश की आवश्यकता होती है। अतः हम कह सकते हैं कि पौधों के जीवन में प्रकाश का बहुत महत्त्व है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कैल्विन चक्र का विस्तार से वर्णन कीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण क्रिया-विधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया-विधि के सम्बन्ध में आधुनिक विचार बताइए एवं विस्तार से समझाइए। या प्रकाश-संश्लेषण के कैल्विन चक्र का वर्णन कीजिए। था प्रकाश-संश्लेषण के C3 चक्र का विवरण दीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण किसे कहते हैं? इसके चक्रीय एवं अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण का वर्णन कीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में पर्णहरित का क्या कार्य है? इसकी प्रकाशिक क्रिया समझाइए। या प्रकाश-संश्लेषण के अन्तर्गत प्रकाश एवं अन्धकार प्रक्रिया में भेद कीजिए। या प्रकाशहीन प्रक्रिया क्या है? कैल्विन चक्र का सचित्र वर्णन कीजिए। या कैल्विन-बेन्सन चक्र का वर्णन कीजिए। यह क्रिया हरितलवक के किस भाग में होती है? या प्रकाश कर्म I तथा प्रकाश कर्म II में अन्तर बताइए। या प्रकाश संश्लेषण से आप क्या समझते हैं? प्रकाश-संश्लेषण में होने वाली प्रकाशहीन अभिक्रिया का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रकाश-संश्लेषण

वह अभिक्रिया जिसमें हरे पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश, CO2, जल तथा पर्णहरित (Chlorophyll) की उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं, प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) कहलाती है। इसे निम्न समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है
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प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया-विधि

उपर्युक्त समीकरण से, यह स्पष्ट है कि 6O2  निकलने के लिए 12H2O, की आवश्यकता पड़ेगी। वास्तव में, जल (H2O)को प्रकाश में क्लोरोफिल की उपस्थिति में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के लिए अपघटित (decompose) किया जाता है। वैज्ञानिक हिल (Hill) ने प्रकाशीय क्रियाओं को अलग से पहचाना तथा यह भी निश्चित किया कि प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग जल के अणुओं को तोड़कर उससे कच्चे माल की तरह H2 को निष्कासित किया जाता है इसी से उप-उत्पाद के रूप में O2 भी प्राप्त होती है। बाद में, हाइड्रोजन को वातावरण से प्राप्त की गयी कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के साथ स्थिर (fix) करके कार्बोहाइड्रेट्स (UPBoardSolutions.com) का निर्माण किया जाता है। यह क्रिया अत्यन्त जटिल होती है तथा अनेक पद और तन्त्रों में होकर सम्पन्न होती है। इस प्रकार प्रारम्भिक क्रियाओं के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है अतः ये क्रियाएँ प्रकाशीय क्रियाएँ या हिलअभिक्रियाएँ (light reactions or Hill reactions) कहलाती हैं। बाद की क्रियाओं के लिए प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती है और ये अप्रकाशीय क्रियाएँ (dark reactions) कहलाती हैं। प्रकाश-संश्लेषण के सम्बन्ध में अब यह पूर्णतः निश्चित हो चुका है कि क्लोरोप्लास्ट के अन्दर प्रकाशीय क्रियाएँ गैना (grana) पर तथा अन्य क्रियाएँ पीठिका (stroma) में होती हैं। सभी प्रकार के एन्जाइम्स (enzymes) इत्यादि का निर्माण तथा उपयोग जो प्रकाश संश्लेषण में आवश्यक होते हैं, क्लोरोप्लास्ट के अन्दर ही होता है। इसलिए इस सम्पूर्ण क्रिया को दो भागों में बाँटते हैं

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1. प्रकाशीय प्रक्रियाएँ : हिल अभिक्रियाएँ
समस्त प्रकाशीय अभिक्रियाएँ हरितलवक के ग्रैना (grana) पर होती हैं। प्रकाश के अवशोषण से लेकर प्रकाशीय ऊर्जा को प्रयोग करने वाले तक, सभी सम्बन्धित वर्णक, दो प्रकार के वर्णक तन्त्रों में बँटे रहते हैं। इनको वर्णक तन्त्र-I और वर्णक तन्त्र-II कहते हैं। इन्हीं वर्णक तन्त्रों में क्रमशः प्रकाश कर्म-1 तथा प्रकाश कर्म-II होते हैं। दोनों प्रकाश कर्मों में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाओं के मुख्य परिणाम इस प्रकार हैं

    1.  सूर्य के प्रकाश की विकिरण ऊर्जा के कारण क्लोरोफिल के अणु सक्रिय हो जाते हैं और उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स (active electrons) का निष्कासन करते हैं।
    2. इलेक्ट्रॉन्स निष्कासित करने के बाद बने सक्रिय क्लोरोफिल की उपस्थिति में आवश्यक ऊर्जा प्राप्त कर जल के अणुओं का विच्छेदन होता है, जिससे हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन प्राप्त होती है
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    3. उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र के द्वारा अपने स्तर को शनैः-शनैः कम करते हैं। मुक्त हुई इस ऊर्जा को ADP के अणुओं में एक फॉस्फेट गुट्ट जोड़कर, ATP अणु बनाकर संचित कर लिया जाता है।
    4. जल विच्छेदन से प्राप्त हाइड्रोजन NADP नामक हाइड्रोजन ग्राही के द्वारा एकत्र कर ली जाती है।
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  1. प्राप्त ऑक्सीजन पौधे से बाहर निकल जाती है। उपर्युक्त सम्पूर्ण प्रकाशीय अभिक्रियाओं में से प्रकाश कर्म-I में सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र के माध्यम से चक्रीय प्रकाशीय फॉस्फोरिलेशन के द्वारा ATP में अनुबन्धित कर लिया जाता है। प्रकाश कर्म-II में जल के प्रकाशीय विच्छेदन की क्रिया होती है, यहाँ ATP निर्माण की क्रिया अचक्रिक प्रकाशीय फॉस्फोरिलेशन होती है।

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चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन : प्रकाश कर्म-।
इस क्रिया में हरितलवक में स्थित वर्णक तन्त्र-I (pigment system-I) में क्लोरोफिल के अणु प्रकाशीय ऊर्जा अवशोषित कर ऊर्जित हो जाते हैं। इसके फलस्वरूप इनके प्रत्येक अणु से उच्च ऊर्जा स्तर वाला इलेक्ट्रॉन निकलता है। यह इलेक्ट्रॉन ग्राही पदार्थ अथवा फेरेडॉक्सिन द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। फेरेडॉक्सिन से इलेक्ट्रॉन विभिन्न साइटोक्रोम (cyt b6, cyt f) और प्लास्टोसायनिन से बनी हुई इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण श्रृंखला (electron transport chain) के द्वारा वापस क्लोरोफिल तक पहुँच जाता है। इस क्रमिक क्रिया में इलेक्ट्रॉन्स की कुछ ऊर्जा ए०डी०पी० (ADP) को ए०टी०पी० (ATP) में परिवर्तित करने के काम में आती है; क्योंकि इस क्रिया में ए०डी०पी० में फॉस्फेट का एक मूलक जुड़ता है और यह क्रिया प्रकाश में होती है। अतः इस क्रिया को फोटोफॉस्फोरिलेशन (photophosphorylation) कहते हैं। साथ ही इस क्रिया में क्लोरोफिल से निकला हुआ इलेक्ट्रॉन वापस क्लोरोफिल में ही आ जाता है। अतः इस प्रकार के फोटोफॉस्फोरिलेशन को चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन (cyclic photophosphorylation) कहते हैं।
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जल का प्रकाशिक अपघटन : प्रकाश कर्म-II
वर्णक तन्त्र-II (pigment system-II) में होने वाला प्रकाश कर्म-II (photo act-II) अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन (non-cyclic photo- phosphorylation) है अर्थात् इस क्रिया में सक्रिय क्लोरोफिल से उत्सर्जित उत्तेजित इलेक्ट्रॉन वापस क्लोरोफिल में नहीं आता है, परन्तु NADP के माध्यम से इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र में जाकर कार्बन डाइऑक्साइड को शर्करा में अपचयित करता है। ऐसी परिस्थिति में क्लोरोफिल में किसी बाह्य इलेक्ट्रॉन दाता से इलेक्ट्रॉन प्राप्त होने चाहिए। हरित पादपों में यह इलेक्ट्रॉन OH आयनों से प्राप्त होते हैं जो साधारणतया जलीय वातावरण में उपस्थित रहते हैं। सामान्य अचक्रीय फॉस्फोरिलेशन में (UPBoardSolutions.com) NADP इलेक्ट्रॉन ग्राही (electron acceptor) है। NADP का प्रत्येक अणु दो इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करके NADP.H2  बनाता है जो बाद में कार्बन डाइऑक्साइड से शर्करा को उत्पन्न करने के काम आता है। NADP.H2  के निर्माण में दो प्रोटॉन्स की भी आवश्यकता होती है जो जल के टूटने से प्राप्त होते हैं। जल के अपघटन में हाइड्रॉक्सिल आयन व इलेक्ट्रॉन भी प्राप्त होते हैं। ये हाइड्रॉक्सिल आयन आपस में क्रिया करके ऑक्सीजन व जल बनाते हैं। और क्लोरोफिल में इलेक्ट्रॉन्स का प्रतिस्थापन साइटोक्रोम श्रृंखला से होकर जल से निकले हुए इलेक्ट्रॉन्स के द्वारा होता है, इस क्रिया में ए०डी०पी० से ए०टी०पी० का संश्लेषण होता है।
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NADP व ADP से क्रमशः NADP.H, व ATP का निर्माण व ऑक्सीजन का निकलना जल के प्रकाशिक अपघटन के अन्तिम उत्पाद हैं। ऑक्सीजन उप-उत्पाद के रूप में ही बनती है। चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन में केवल ATP का उत्पादन होता है। इस प्रकार उत्पन्न ATP को स्वांगीकारी शक्ति (assimilatory power) तथा (NADP.H) को अपचयन शक्ति (reducing power) कहते हैं। प्रकाश संश्लेषणात्मक भाग (अप्रकाशीय अभिक्रिया) में यही शक्तियाँ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं अर्थात् ये वास्तविक संश्लेषण का महत्त्वपूर्ण आधार हैं।

2. अप्रकाशीय (अन्धकार) क्रियाएँ : कैल्विन का योगदान
प्रकाश संश्लेषण के लिए ये संश्लेषणात्मक अभिक्रियाएँ हैं जिनके लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं होती तथा ये क्लोरोप्लास्ट के मैट्रिक्स या पीठिका (matrix or stroma) में होती हैं। इन क्रियाओं में कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrates) का निर्माण होता है। ये अत्यन्त जटिल क्रियाएँ हैं। इस सम्बन्ध में वर्तमान जानकारी प्रमुख रूप से मैल्विन कैल्विन (Malvin Calvin) व बेन्सन (Benson), बैशम (Bassham), गैफरॉन (Gaffron), फैगर (Fager) आदि के द्वारा दी गयी है। कार्बन डाइऑक्साइड (CO2 ) किस तरह, किस-किस प्रकार के यौगिक, किस कोशिका और उसके किस भाग में बनाती है तथा किस प्रकार से कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण होता है? इसका क्रम कार्बन का प्रकाश-संश्लेषण में मार्ग (path of carbon in photosynthesis) कहलाता है। कार्बन का यह पथ प्रमुख रूप से कैल्विन (Calvin) ने अपने साथियों के साथ रेडियो-सक्रिय कार्बन (radioactive carbon =C14) का प्रयोग करके खोजा। कार्बन डाइऑक्साइड, C14O2  प्रकार की प्रयोग में लायी गयी तथा बनने वाले यौगिकों का उनकी रेडियोसक्रियता (radioactivity) के आधार पर पता किया गया कि कार्बन का संयोग किस-किस रूप में होता है। इस आधार पर एक निश्चित चक्र तैयार किया गया। इसको कैल्विन  चक्र (Calvin cycle) कहते हैं।

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कार्बोहाइड्रेट्स के संश्लेषण का कार्य, वास्तव में बिना प्रकाश के ही हो जाता है, किन्तु CO2; के अपचयन के लिए H+ जो NADP .H2 के रूप में प्राप्त होते हैं, प्रकाशीय अभिक्रियाओं से ही मिलते हैं। चूँकि अप्रकाशीय अभिक्रियाएँ अथवा कार्बन पथ की क्रियाएँ एक चक्र के रूप में होती हैं, जिसकी खोज कैल्विन वैज्ञानिक ने की। इस कारण इनके नाम पर ही इस चक्र को कैल्विन चक्र (Calvin cycle) कहते हैं। इन अभिक्रियाओं में CO2 के स्थिरीकरण का प्रथम स्थायी उत्पाद 3 कार्बन (C3) यौगिक, फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-phosphoglyceric acid = 3 PGA) होता है। इस आधार पर इसे C3-चक्र (C3-cycle) भी कहते हैं

कैल्विन चक्र या कार्बन पथ

1. प्रथम फॉस्फोरिलीकरण (First phosphorylation) :
कार्बन डाइऑक्साइड के अपचयन का आरम्भ 5-कार्बन वाली शर्करा रिबुलोज 5-फॉस्फेट (ribulose 5-phosphate) के ए०टी०पी० (ATP) से एक फॉस्फेट समूह प्राप्त करने के बाद होता है। इस प्रकार, इस शर्करा के 6 अणु ATP के 6 अणुओं (प्रकाशीय अभिक्रियाओं से प्राप्त) से संयुक्त होकर रिबुलोज 1, 5-बाइफॉस्फेट के 6 अणुओं का निर्माण करते हैं
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2. कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation) :
उपर्युक्त के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन सबसे पहले 5 कार्बन वाले यौगिक, रिबुलोज 1, 5-बाइफॉस्फेट के साथ होता है। ऐसा समझा जाता है कि इस क्रिया में एक 6 कार्बन वाले अस्थायी कीटो अम्ल का निर्माण होता है और यह शीघ्र ही टूटकर दो, 3-फॉस्फोग्लिसरिक (UPBoardSolutions.com) अम्ल (3-PGA) के अणु बनाता है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड के 6 अणुओं का उपयोग होता है
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3. द्वितीय फॉस्फोरिलीकरण (Second phosphorylation) :
3-PGA के 12 अणु जो समीकरण (ii) से प्राप्त हो रहे हैं, एन्जाइम ट्राइओज फॉस्फेट डीहाइड्रोजिनेज तथा फॉस्फोग्लिसरिक ऐसिड काइनेज की उपस्थिति में दो प्रकार की क्रियाएँ करते हैं। पहले 1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3-diphosphoglyceric acid = 1, 3-PGA) बना है। इसमें 12 ATP अणुओं का उपयोग होता है
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4. अपचयन (Reduction) :
1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल बाद में 3-फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (3-phospho-glyceraldehyde = PGAL) में बदल जाता है। इस क्रिया में प्रकाश कर्म-II से प्राप्त NADP. H2 से हाइड्रोजन प्राप्त की जाती है तथा फॉस्फोरिक अम्ल (H3PO4) बनता है
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5. फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड  :
(PGAL) एक खाद्य पदार्थ है और कई प्रकार से क्रिया करता है। इनमें अभिक्रियाओं को अग्रलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है
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QSW`1. खण्ड A (section A) :
12 PGAL अणुओं में से दो अणु विभिन्न पदों में होकर पहले हेक्सोज शर्करा का एक अणु तथा बाद में अन्य अणुओं के साथ मिलकर मण्ड (starch) आदि का निर्माण करते हैं।

2. खण्ड B (section B) :
12 PGAIL में से शेष 10 अणुओं से चक्रीय क्रियाओं द्वारा 6 अणु रिबुलोज मॉनोफॉस्फेट (ribulose monophosphate) के बनाते हैं।

खण्ड A

(i) PGAL का एक अणु फॉस्फोटाइओज आइसोमिरेज (एन्जाइम) की उपस्थिति में अपने
समावयवी (isomer), डाइहाइड्रॉक्सीऐसीटोन फॉस्फेट (dihydroxyacetone phosphate) में परिवर्तित हो जाता है
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(ii) एक अणु उपर्युक्त क्रिया में बने 3-डाइहाइड्रॉक्सी ऐसीटोन फॉस्फेट के साथ मिलकर फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट (fructose 1, 6-diphosphate) का निर्माण करते हैं। यह दो ट्राइओसेज (CG) से मिलकर हेक्सोज (CG) बनने की क्रिया है। इस क्रिया में एल्डोंलेज (एन्जाइम) आवश्यक है।
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(iii) बाद में, फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट [समीकरण (vi)] एक फॉस्फेट समूह का निष्कासन, फॉस्फेटेज (phosphatase) एन्जाइम की उपस्थिति में करते हैं
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फ्रक्टोज 6-फॉस्फेट (fructose 6-phosphate) एन्जाइम की उपस्थिति में अन्य हेक्सोज फॉस्फेट का, आन्तरिक परिवर्तन के द्वारा निर्माण कर सकते हैं। इसी प्रकार ग्लूकोज फॉस्फेट का भी निर्माण कर सकते हैं। ग्लूकोज या फ्रक्टोज फॉस्फेट अपना एकमात्र फॉस्फेट समूह फॉस्फेटेज (phosphatase) एन्जाइम की उपस्थिति में निष्कासित कर लेते हैं। इस प्रकार ग्लूकोज (glucose) का एक अणु उत्पादित होता है।

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खण्ड B

इन विभिन्न क्रियाओं में रिलूलोज 5-फॉस्फेट (ribulose 5-phosphate) फिर से उत्पन्न होता है, (UPBoardSolutions.com) पुनरुत्पादन (regeneration)। फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (PGAL) डाइहाइड्रॉक्सीऐसीटोन फॉस्फेट, ट्राइओज, 4-कार्बन (tetrose), 5-कार्बन (pentose), 7-कार्बन (heptose) आदि शर्करा फॉस्फेट बनाने के लिये भी प्रारम्भिक पदार्थ हैं। इस कार्य में हेक्सोज शर्कराओं को भी काम में लाया जाता है। निम्नलिखित क्रियाएँ इसको स्पष्ट करती हैं
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समीकरण (xii) तथा (xiii) के परिवर्तनों से रिबुलोज 5-फॉस्फेट (ribulose 5-phosphate) के 2+4 = 6 अणु प्राप्त हो जाते हैं,
जो समीकरण (i) के अनुसार 6 ATP से फॉस्फेट समूह प्राप्त करके रिबुलोज बाइफॉस्फेट (ribulose biphosphate = RuBP) में परिवर्तित होते हैं, जो नये कार्बन डाइऑक्साइड अणुओं के अपचयन के लिये तैयार होते हैं। इस प्रकार ये क्रियाएँ चक्रीय (cyclic) होती हैं। उपर्युक्त सम्पूर्ण क्रियाओं में 18 ATP तथा 12 NADP.H2 काम में आ जाते हैं और केवल एक अणु ग्लूकोज प्राप्त होता हैUP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants image 25
प्रकाशीय तथा अप्रकाशीय सम्पूर्ण क्रियाओं को जोड़कर निम्न अभिक्रिया प्राप्त होती है
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प्रश्न 2.
C4पथ का वर्णन कीजिए। C3 एवं C4 पौधों की पत्तियों की शारीरिकी की तुलना कीजिए। या हैच-स्लैक चक्र का वर्णन कीजिए। यह किन पौधों में पाया जाता है? इन पौधों की पत्तियों के शरीर की क्या विशेषता हैं?

उत्तर :
वे पौधे जो उच्च ताप वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं उनमें C4 पथ पाया जाता है। इन पौधों में CO2 के यौगिकीकरण का पहला उत्पाद यद्यपि एक 4C पदार्थ ऑक्सैलोऐसीटिक अम्ल (Oxaloacetic acid) होता है फिर भी इनके मुख्य जैव संश्लेषण पथ में C3 पथ अथवा कैल्विन चक्र ही होता है। C4 पौधे विशिष्ट होते हैं। इनकी पत्तियों में एक विशेष प्रकार की शारीरिकी पायी जाती है। ये पौधे उच्च ताप को भी सह सकते हैं। ये उच्च प्रकाश तीव्रता के प्रति अनुक्रिया करते हैं। इनमें प्रकाश श्वसन प्रक्रिया नहीं होती और जैव भार अधिक उत्पन्न होता है।

C4 पथ पौधों के संवहन बण्डल (vascular bundle) के चारों ओर स्थित बृहद् कोशिकाएँ पूलाच्छद (bundle sheath) कोशिकाएँ कहलाती हैं और पत्तियाँ जिनमें ऐसा शरीर होता है, उन्हें क्रैन्ज शरीर (Kranz anatomy) वाली पत्तियाँ कहते हैं। यहाँ कैंज का अर्थ है छल्ला अथवा घेरा, चूँकि कोशिकाओं की व्यवस्था एक छल्ले के रूप में होती है। संवहन बण्डल के आस-पास पूलाच्छद कोशिकाओं की अनेक परतें (several layers) होती हैं। इनमें बहुत अधिक संख्या में क्लोरोप्लास्ट होते हैं। इसकी मोटी भित्तियाँ

गैस से अप्रवेश्य होती हैं और इनमें अन्तरकोशीय स्थान नहीं होता। सर्वप्रथम सन् 1957 में कोर्शचॉक (Kortschak) एवं सहयोगियों ने बताया कि गन्ने के पौधों (sugarcane plants) में अप्रकाशीय अभिक्रिया के दौरान प्रथम स्थाई यौगिक (first stable product) के रूप में 4C वाला यौगिक बनता है। इसी प्रकार की व्याख्या कार्पिलो (Karpilov, 1960) ने मक्का की पत्तियों (maize leaves) में की। बाद में सन् 1966 में एम०डी० हैच और सी०आर० स्लैक (M.D. Hatch and C.R. Slack) ने इसकी विस्तृत व्याख्या की

जिसे हैच एवं स्लैक पथ (Hatch and Slack path) कहते हैं। यह एक चक्रीय प्रक्रिया है। यह मुख्य रूप से एकबीजपत्री पौधों; जैसे-sugarcane, maize, cyperus (घास);  Sorghum, Atriplex आदि में पाया जाता है। यह कुछ द्विबीजपत्री पौधों (जैसे Amaranthus) में भी पाया जाता है। हैच एवं स्लैक पथ के निम्नलिखित चरण होते हैं

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CO2 का प्राथमिक ग्राही एक 3 कार्बन अणु फॉस्फोइनोल पाइरुवेट (PEP) है और वह पर्णमध्योतक कोशिका में स्थित होता है। इस यौगिकीकरण को PEP कार्बोक्सीलेज (PEP carboxylase) नामक एन्जाइम सम्पन्न करता है। पर्णमध्योतक कोशिकाओं में रुबिस्को एन्जाइम (UPBoardSolutions.com) नहीं होता है। C4 अम्ल, ऑक्सैलोऐसीटिक अम्ल (OAA) पर्णमध्योतक कोशिका में निर्मित होता है। इसके बाद पर्णमध्योतक कोशिका में अन्य 4-कार्बन वाले अम्ल; जैसे–मैलिक अम्ल (malic acid) और एस्पार्टिक अम्ल (aspartic acid) बनते हैं, जोकि पूलाच्छद कोशिका (bundle sheath cells) में चले जाते हैं। पूलाच्छद कोशिका में यह C4 अम्ल विघटित हो जाता है जिससे COतथा एक 3-कार्बन अणु पाइरुविक अम्ल मुक्त होते हैं।
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3-कार्बन अणु पुनः पर्णमध्योतक में वापस आ जाता है, जहाँ यह पुनः PEP में बदल जाता है और इस तरह से यह चक्र पूरा होता है। पूलाच्छद कोशिका से निकली COकैल्विन पथ अथवा C3 चक्र में प्रवेश करती है। कैल्विन एक ऐसा पथ है जो सभी पौधों में समान रूप से होता है। पूलाच्छद (UPBoardSolutions.com) कोशिका रुबिस्को से भरपूर होती है, परन्तु इनमें PEP कार्बोक्सीलेज का अभाव होता है। अतः मैलिक पथ एवं कैल्विन पथ जिसके परिणामस्वरूप शर्करा बनती है, वह Cएवं C4 पौधों में सामान्य रूप से होता है। ध्यान रहे कि कैल्विन पथ सभी C3 पौधों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं में पाया जाता है। C4 पौधों में पर्णमध्योतक कोशिकाओं में यह सम्पन्न नहीं होता है, किन्तु केवल पूलाच्छद कोशिकाओं में कारगर होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 11 Water in the Atmosphere

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 11 Water in the Atmosphere (वायुमंडल में जल)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 11 Water in the Atmosphere (वायुमंडल में जल)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) मानव के लिए वायुमण्डल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(क) जलवाष्प
(ख) धूलकण
(ग) नाइट्रोजन
(घ) ऑक्सीजन
उत्तर-(घ) ऑक्सीजन।

प्रश्न (ii) निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन-सी है जिसके द्वारा जल, द्रव से वाष्प में बदल जाता है?
(क) संघनन ।
(ख) वाष्पीकरणे
(ग) वाष्पोत्सर्जन
(घ) अवक्षेपण
उत्तर-(ख) वाष्पीकरण।

प्रश्न (ii) निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है?
(क) सापेक्ष आर्द्रता
(ख) निरपेक्ष आर्द्रता
(ग) विशिष्ट आर्द्रता
(घ) संतृप्त हवा
उत्तर-(ख) निरपेक्ष आर्द्रता।।

प्रश्न (iv) निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन-सा है?
(क) पक्षाभ
(ख) वर्षा मेघ
(ग) स्तरी
(घ) कपासी
उत्तर-(क) पक्षाभ।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) वर्षण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर-वर्षण के तीन प्रकारों के नाम निम्नलिखित हैं– 1. जलवर्षा, 2. हिमवर्षा, 3. ओलावृष्टि।।

प्रश्न (ii) सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-वायु में निरपेक्ष या वास्तविक आर्द्रता एवं वायु के जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता का अनुपात । सापेक्ष आर्द्रता कहलाती है। यह सदैव प्रतिशत में मापी जाती है।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 11 Water in the Atmosphere (वायुमंडल में जल) img 1
अर्थात् दिए गए तापमान पर एक स्थान की वायु में जलवाष्प की मात्रा तथा उस वायु की जलवाष्प धारण करने की अधिकतम क्षमता के अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं जिसे उक्त सूत्र से ज्ञात किया जाता है। इसे मापने हेतु आई बल्ब एवं शुष्क बल्ब तापमापी यन्त्र का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न (iii) ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों घटती है?
उत्तर-ऊँचाई के साथ आर्द्र हवा जब ठण्डी होती है तब उसमें जलवाष्प को धारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। अतः ऊँचाई पर जाने पर हवा ठण्डी होने के कारण उसमें जलवाष्प की मात्रा तेजी से घटने लगती है, क्योंकि उपयुक्त तापमान के अभाव में हवा में जल धारण क्षमता नहीं रहती। इसीलिए ऊँचाई के साथ तापमान घटने के कारण जलवाष्प की मात्रा तेजी से घटती जाती है।

प्रश्न (iv) बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-बादल पानी की छोटी बूंदों या बर्फ के छोटे कणों की संहति है। बादलों की उत्पत्ति पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतन्त्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण होती है। बादलों को ऊँचाई, विस्तार, घनत्व तथा पारदर्शिता या अपारदर्शिता के आधार पर निम्नलिखित चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है1. पेक्षाभ मेघ, 2. कपासी मेघ, 3. स्तरी मेघ, 4. वर्षा मेघ।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (i) विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-विश्व में वर्षा का वितरण सभी स्थानों पर समान नहीं है। धरातल की बनावट, जलवायु एवं पवनों की दिशा पर वर्षा की मात्रा परिवर्तित होती रहती है। विश्व में वर्षा के वितरण की मुख्य विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित हैं

  1. विषुवत् वृत्ते से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा धीरे-धीरे घटती जाती है।
  2. विश्व के तटीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के आन्तरिक भाग की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।
  3. विश्व के स्थलीय भागों की अपेक्षा सागरीय भागों में वर्षा अधिक होती है क्योंकि वहाँ जलस्रोतों की उपलब्धता के कारण वाष्पीकरण की क्रिया लगातार होती रहती है।
  4. विषुवत् वृत्त से 35 से 40° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य पूर्वी तटों पर बहुत अधिक वर्षा होती है तथा पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है।
  5. विषुवत् रेखा से 45° तथा 65° उत्तर तथा दक्षिण अक्षांशों के मध्य पछुवा पवनों के कारण सबसे पहले महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर तथा फिर पूर्व की ओर घटती हुई दर से वर्षा होती है।
  6. विश्व में जहाँ पर्वत तट के समानान्तर हैं, वहाँ वर्षा की मात्रा पवनाभिमुख तटीय मैदानों में अधिक | होती है जबकि प्रतिपवने दिशा की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है।
  7. वार्षिक वर्षण के आधार पर वर्षा की कुल मात्रा के आधार पर विश्व में अधिक वर्षा के क्षेत्र | भूमध्य रेखा के निकट, मध्यम वर्षा के क्षेत्र 30° से 60° अक्षांश दोनों गोलार्द्ध में तथा कम वर्षा के क्षेत्र ध्रुवीय पेटी में स्थित हैं।

प्रश्न (i) संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-जलवाष्प का जल के रूप में बदलना संघनन कहलाता है। वास्तव में ऊष्मा का ह्रास ही संघनन का कारण होता है। संघनन के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
(i) ओस, (ii) तुषार, (ii) कुहासा, (iv) बादल।
ओस-जब आर्द्रता धरातल के ऊपर हवा में संघनन केन्द्रकों पर संघनित न होकर ठोस वस्तु; जैसेपत्थर, घास तथा पौधों की पत्तियों की ठण्डी सतह पर पानी के सूक्ष्म कणों के रूप में एकत्र हो जाती है। तो उसे ओस कहते हैं। ओस के बनने के लिए यह आवश्यक है कि ओसांक जमाव बिन्दु से ऊपर हो। ओस के बनने में साफ आकाश, शान्त हवा, उच्च सापेक्ष आर्द्रता तथा ठण्डी एवं लम्बी रातें उपयुक्त दशाएँ मानी जाती हैं।

तुषार-तुषार या पाला अथवा हिमकण भी संघनने प्रक्रिया का ही परिणाम है। जब संघनन क्रिया के समय भूमि के निकट की वायु का तापमान हिमांक बिन्दु (0°C) तक नीचे गिर जाता है तो पौधों एवं भूमि की सतह पर उपस्थित जल जमने लगता है, यही तुषार या पाला कहलाता है। सफेद तुषार के बनने की सबसे उपयुक्त दशाएँ ओस के बनने की दशाओं के समान हैं, किन्तु इसमें केवल हवा का तापमान जमाव बिन्दु पर या उससे नीचे होना आवश्यक है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. वायुमण्डल से जल हमें किस रूप में प्राप्त होता है? |
(क) जल
(ख) जल एवं हिम
(ग) जल, हिम, पाला।
(घ) जल, हिम, पाला, ओस
उत्तर-(ख) जल एवं हिम।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किस प्रदेश में प्रमुख रूप से संवाहनिक वर्षा होती है?
(क) भूमध्यसागरीय प्रदेश ।
(ख) भूमध्यरेखीय प्रदेश
(ग) टैगा प्रदेश
(घ) टुण्ड्रा प्रदेश
उत्तर-(ख) भूमध्यरेखीय प्रदेश।

प्रश्न 3. निम्नलिखित वर्षा-प्रकारों में से कौन विषुवतरेखीय प्रदेशों में पायी जाती है?
(क) प्रतिचक्रवातीय वर्षा
(ख) चक्रवातीय वर्षा
(ग) पर्वतीय वर्षा ।
(घ) संवहनीय वर्षा
उत्तर-(घ) संवहनीय वर्षा।

प्रश्न 4. संवहनीय वर्षा विशिष्ट विशेषता है
(क) चीन तुल्य जलवायु की ।
(ख) भूमध्यरेखीय जलवायु की
(ग) भूमध्यसागरीय जलवायु की
(घ) पश्चिम यूरोपीय जलवायु की
उत्तर-(ख) भूमध्यरेखीय जलवायु की।

प्रश्न 5. वृष्टिछाया प्रदेश किससे सम्बन्धित है?
(क) संवाहनिक वर्षा ।
(ख) चक्रवातीय वर्षा
(ग) पर्वतीय वर्षा
(घ) प्रतिचक्रवतीय वर्षा
उत्तर-(ग) पर्वतीय वर्षा। ||

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संघनन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-वायु में उपस्थित जलवाष्प का ताप गिरने पर जब उसका घनीभवन होता है तब उसे संघनन कहते हैं।

प्रश्न 2. संघनन के कौन-कौन से रूप होते हैं?
उत्तर-ओस, पाला, कोहरा, ओले, मेघ, वर्षा, हिम आदि संघनन के विविध रूप हैं।

प्रश्न 3. संवाहनिक वर्षा क्या है ?
उत्तर-धरातल पर ऊष्मा की अधिकता के कारण वायुमण्डल में उत्पन्न संवहनीय धाराओं द्वारा होने वाली वर्षा संवाहनिक वर्षा कहलाती है।

प्रश्न 4. चक्रवातीय वर्षा का क्षेत्र बेताइए।
उत्तर-आयन रेखाओं तथा मध्य अक्षांशों में अधिकांश वर्षा चक्रवातों द्वारा ही होती है। उत्तरी भारत भी चक्रवातीय वर्षा का क्षेत्र है।

प्रश्न 5. संवहनीय वर्षा का क्षेत्र बतलाइए।
उत्तर-संवहनीय वर्षा अधिकतर अपराह्न में होती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र में शान्त पेटी (डोलड्रम) में अधिकांशतः संवहनीय वर्षा ही होती है।

प्रश्न 6. विश्व में औसत वार्षिक वर्षा के वितरण सम्बन्धी दो महत्त्वपूर्ण तथ्य बतलाइए।
उत्तर-1. भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा न्यून होती जाती है।
2. भूमध्यरेखीय कटिबन्ध तथा शीत-शीतोष्ण कटिबन्धों के पश्चिमी भागों में वर्षा का वितरण वर्षभर समान रहता है।

प्रश्न 7. वाष्पीकरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-जल के तरल रूप से गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।

प्रश्न 8. कोहरे के कौन-कौन से तीन प्रकार हैं?
उत्तर-कोहरे के तीन प्रकार हैं-1. विकिरण कोहरा, 2. अभिवहन कोहरा, 3. वाताग्री कोहरा।

प्रश्न 9. धूम्र कोहरा क्या है?
उत्तर-ऐसी स्थिति जिसमें कोहरा तथा धुआँ सम्मिलित रूप से बनते हैं धूम्र कोहरा कहलाती है। यह स्थिति नगरों एवं औद्योगिक केन्द्रों में धुएँ की अधिकता के कारण केन्द्रकों की मात्रा की अधिकता के कारण उत्पन्न होती है।

प्रश्न 10. कुहासे एवं कोहरे में क्या अन्तर है?
उत्तर-कुहासे एवं कोहरे में अत्यन्त सूक्ष्म अन्तर होता है। कुहासे में कोहरे की अपेक्षा नमी अधिक होती है। कुहासा पहाड़ों पर अधिक पाया जाता है, जबकि कोहरा मैदानों में अधिक पाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आर्द्रता किसे कहते हैं?
उत्तर-वायुमण्डल में निहित जलवाष्प विशाल महासागरों, झीलों, नदियों अथवा पेड़-पौधों से प्राप्त होती है। प्रतिदिन धरातल का जल सूर्य की गर्मी से वाष्प के रूप में परिवर्तित होता रहता है। वायु में विद्यमाने वाष्प ही उसकी आर्द्रता कहलाती है। वायु में वाष्प ग्रहण करने की शक्ति बहुत अंशों में उसके तापमान पर निर्भर करती है। वायु का तापमान जितना अधिक होगा उसमें वाष्प धारण करने की शक्ति उतनी ही बढ़ जाएगी। उदाहरणार्थ-यदि एक घन फुट वायु के तापमान को 0° से 5° सेग्रे अर्थात् 5° सेग्रे बढ़ा दिया जाए तो उस वायु में केवल 1 ग्रेन वाष्प धारण करने की शक्ति बढ़ती है। परन्तु यदि 32° सेग्रे तापमान वाली वायु को 5.5° सेग्रे से बढ़ाकर 37.5° सेग्रे कर दिया जाए तो वह 5 ग्रेन वाष्प धारण करने योग्य हो जाती है। यही कारण है कि शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में वायु अधिक वाष्प ग्रहण कर सकती है जिससे गर्मियों में अधिक वर्षा होती है। वायु में वाष्प की मात्रा उसके तापमान के अतिरिक्त जल और स्थल के विस्तार तथा पवनों की किसी स्थान तक पहुँच पर निर्भर करती है। इसे सदैव प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 2. आर्द्रता एवं सापेक्ष आर्द्रता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-आर्द्रता–आर्द्रता से तात्पर्य वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा से है। आर्द्रता को कई प्रकार से व्यक्त किया जाता है; जैसे—सापेक्ष आर्द्रता, निरपेक्ष आर्द्रता एवं अधिकतम आर्द्रता। आर्द्रता में क्षैतिज एवं लम्बवत् अन्तर पाया जाता है। किसी स्थान-विशेष पर किसी विशिष्ट समय में वायु में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे वास्तविक आर्द्रता भी कहा जाता है। इसे ग्रेन प्रति घन फुट या ग्राम प्रति घन सेमी द्वारा व्यक्त किया जाता है। सोपक्ष आर्द्रता-वायु में निरपेक्ष या वास्तविक आर्द्रता एवं वायु के जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता का अनुपात सापेक्ष आर्द्रता कहलाती है। यह सदैव प्रतिशत में मापी जाती है।

प्रश्न 3. बादल या मेघ का क्या अर्थ है? ये कैसे बनते हैं?
उत्तर-मेघ वास्तव में वायुमण्डल में धूलकणों पर रुके हुए जल-बिन्दुओं का समूह मात्र है। तापमान के अत्यन्त कम होने पर वायु की अतिरिक्त जलवाष्प सूक्ष्म जल की बूंदों में बदल जाती है, जिसे संघनन (Condensation) कहते हैं। जिस ताप पर संघनन आरम्भ होता है, उसे ओसांक (Dew point) कहते ।

हैं। यदि ओसांक 0° सेल्सियस से ऊपर आ जाता है तो जलवाष्प सूक्ष्म जल की बूंदों में बदल जाती है और यदि 0° सेल्सियस (हिमांक) पर ओसांक आता है तो जलवाष्प सूक्ष्म हिमकणों में अर्थात् पाले के रूप में बदल जाती है। यही हिमकण तथा जल-सीकर कुहरे के रूप में वायुमण्डल में दिखलाई पड़ते हैं। जब ये एक विस्तृत क्षेत्रफल में विशाल रूप धारण कर ऊँचाई पर सघन रूप में एकत्रित हो जाते हैं, तो इन्हें मेघ या बादल कहा जाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Geography Fundamentals of Physical Geography Chapter 11 Water in the Atmosphere (वायुमंडल में जल) img 2
सामान्यतया मेघ धूलकणों पर स्थित जलकण अथवा हिमकणों के विशाल आकार हैं, जो वायुमण्डल में अक्षांशों के अनुसार भिन्न-भिन्न ऊँचाइयों पर स्थापित हो जाते हैं। इन मेघों की ऊँचाई कटिबन्धों के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है।

प्रश्न 4. संघनन क्या है? इसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बतलाइए।
उत्तर-जलवाष्प के घनीभूत होकर जल में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं। संघनन आई वायु के ठण्डा होने पर होता है। संघनन प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं

  1. जब वायु का तापमान ओसांक तक पहुँच जाता है।
  2.  जब वायु का आयतन ऊष्मा की मात्रा बढ़ाए बिना बढ़ जाए।
  3. जब वायु की आर्द्रता धारण क्षमता घटकर वायु में उपस्थित आर्द्रता की मात्रा से कम हो जाए।
  4. जब वाष्पीकरण द्वारा वायु में आर्द्रता की अतिरिक्त मात्रा मिला दी जाए।

प्रश्न 5. वर्षा और वर्षण में अन्तर लिखिए।
उत्तर-वर्षा—यह वर्षण का एक विशिष्ट रूप है, जिसमें बादलों के जल-वाष्प कण संघनित होकर जल की बूंदों या हिमकणों के रूप में भू-पृष्ठ पर गिरते हैं। जलवर्षा तथा हिमवर्षा इसके दो रूप हैं।

वर्षण—यह एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें वायुमण्डल की आर्द्रता संघनित होकर वर्षा, हिम, ओला, पाला आदि रूपों में धरातल पर गिरती है। जल-वर्षा, वर्षण का एक साधारण रूप है। हिमवृष्टि, ओलावृष्टि, हिमपात आदि इसके अनेक रूप हैं।

प्रश्न 6. निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता में अन्तर बताइए।
उत्तर- निरपेक्ष आर्द्रता एवं सापेक्ष आर्द्रता में अन्तर
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प्रश्न 7. वर्षण या वृष्टि से क्या अभिप्राय है? इसके दो रूपों का विवरण दीजिए।
उत्तर-वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसों के साथ-साथ जलवाष्प भी विद्यमान रहती है। वायुमण्डल में व्याप्त इस जलवाष्प को ही वायुमण्डल की आर्द्रता कहते हैं। भूमण्डल पर ओस, बादल, हिमपात, कुहरा, तुषार तथा वर्षा आदि इसी आर्द्रता की देन हैं, जिन्हें वर्षण तथा वृष्टि कहा जाता है।

वर्षण के रूप

वर्षण के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन निम्नलिखित है
1. हिमपात–जब कभी वायुमण्डल का तापमान ओसांक बिन्दु से भी कम हो जाता है, तो उसमें उपस्थित जलवाष्प जल में परिणत न होकर सीधे हिम के रवों के रूप में संघनित हो जाती है।
भूतल पर ये रवे हिमकणों के रूप में गिर जाते हैं। वर्षण का यह स्वरूप ‘हिमपात’ कहलाता है।

2. हिमवर्षा–जब जल की बूंदें भूप्रष्ठ के समीप की वायु की बहुत शीतल परतों से होकर गुजरती हैं, तब जलवाष्प हिम (बर्फ) बनकर नीचे गिरती है। वर्षण का यह रूप हिमवृष्टि या हिमवर्षा
कहलाता है। उच्च अक्षांशों तथा उच्च पर्वतीय प्रदेशों में हिमवर्षा ही होती है।

प्रश्न 8. उन नियन्त्रक कारकों का वर्णन कीजिए जो वाष्पीकरण एवं वाष्पोत्सर्जन की क्रिया की दर को नियन्त्रित करते हैं।
उत्तर–वाष्पीकरण वह क्रिया है जिसके द्वारा जल द्रव अवस्था से वाष्पीय अवस्था में परिवर्तित होता है। वाष्पीकरण निम्नलिखित कारकों पर निर्भर है

  1. तापमान तापमान बढ़ने पर वाष्पीकरण की गति अधिक हो जाती है। यही कारण है कि उष्ण कटिबन्ध में अन्य ताप-क्षेत्रों की अपेक्षा वाष्पीकरण अधिक होता है।
  2. पवन वेग-पवन का वेग जितना अधिक होता है, वाष्पीकरण भी उतना ही अधिक होता है।
  3. वायु की शुष्कता-वायु जितनी अधिक शुष्क होती है, वाष्पीकरण उतना ही तीव्र गति से होता है। वर्षा के दिनों में वायु आर्द्र होती है, इसलिए वर्षा ऋतु में वाष्पीकरण कम होता है।

वाष्पोत्सर्जन-इस प्रक्रिया के अन्तर्गत आर्द्रता की मात्रा तरल पदार्थों के साथ-साथ जीवित प्राणियों; जैसे—पेड़-पौधे आदि से भी प्राप्त होती है। वाष्पोत्सर्जन उन क्षेत्रों में अधिक होता है जहाँ वर्षा तथा वनस्पति अधिक पाई जाती है। भूमध्यरेखा के 10° उत्तर एवं 10° दक्षिण में ऐसे क्षेत्र स्थित हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. वर्षा के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं? प्रत्येक की उत्पत्ति के कारण समझाइए।
या वर्षा के प्रमुख प्रकारों के नाम बताइए। संवहनीय वर्षा की उत्पत्ति समझाइए तथा उसका विश्व वितरण बताइए।
या विश्व में वर्षा के असमान वितरण की व्याख्या कीजिए तथा उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उत्तर-वर्षा अथवा वृष्टि
वायुमणूडल से जल हमें दो रूपों में प्राप्त होता है—तरल एवं ठोस। जल की प्राप्ति को ही वर्षा या वृष्टि कहते हैं। वर्षा धरातल पर जल, हिम, फुहार तथा ओलों के रूप में प्राप्त होती है। कोहरा, ओस तथा तुषार आदि भी वर्षा के ही रूप हैं, परन्तु इनमें वर्षा को अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। वर्षा की मात्रा वायुमण्डलीय आर्द्रता पर निर्भर करती है। वाष्प की यह मात्रा संघनित होकर जल-कणों में परिवर्तित हो जाती है। वायुमण्डल में जब इन जल-कणों की अधिकता हो जाती है तो यह कण घनीभूत होकर वर्षा के रूप में धरातल पर टपकना आरम्भ कर देते हैं। वर्षा निम्नलिखित तथ्यों पर निर्भर करती है

  1. वायुमण्डल में पर्याप्त मात्रा में जलवाष्प की उपस्थिति।
  2. जल-सीकरों के आकार में वृद्धि होना।
  3. जलवाष्प की संघनन प्रक्रिया का तीव्रता से होना, जो निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है
  • अधिक तापमान के कारण वायु का हल्की होकर ऊपर फैलना,
  • ध्रुवीय प्रदेशों से उष्ण प्रदेशों की ओर वायु का प्रवाहित होना एवं
  • निम्न वायुदाब का उच्च वायुदाब से मिलन तथा उसका ठण्डी जलधाराओं के सम्पर्क में आना।

वर्षा के प्रकार

जलवाष्पयुक्त वायुराशियों की संघनन प्रक्रिया के फलस्वरूप धरातल की वर्षा भिन्न-भिन्न रूपों में प्राप्त होती है। वर्षा के निम्नलिखित तीन स्वरूप पाये जाते हैं

1. संवहनीय वर्षा–धरातल पर ऊष्मा की अधिकता के कारण वायुमण्डल में उत्पन्न संवहनीय धाराओं द्वारा होने वाली वर्षा को संवहनीय वर्षा कहते हैं। इस प्रकार की वर्षा उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में अत्यधिक गर्मी के कारण होती है। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में प्रतिदिन वायु गर्म होकर ऊपर उठती है तथा वायुमण्डल में फैल जाती है एवं समीपवर्ती वायु आकर इसका स्थान ले लेती है। कुछ समय बाद जलद मेघों का निर्माण होता है। वायुमण्डल में ऊपर उठी वायु ठण्डी होकर सीकरों में बदल जाती है। इस प्रकार स्थानीय ताप के प्रभाव के कारण वायुमण्डल में संवहन क्रिया आरम्भ हो जाती है। इन प्रदेशों में तीव्र गर्जन-तर्जन एवं बिजली की गड़गड़ाहट के साथ घनघोर वर्षा होती है। विषुवत्रेखीय प्रदेशों में इसी प्रक्रिया द्वारा वर्षा होती है।
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2. पर्वतीय वर्षा–निम्न वायुभार उच्च वायुभार को अपनी ओर आकर्षित करता है। यदि उच्च वायुभार किसी जलाप्लावित क्षेत्र से होकर गुजरता है तो यह आर्द्रता ग्रहण कर लेता है। जब इनके मार्ग में कोई पर्वत शिखर | या पठार अवरोध के रूप में उपस्थित हो जाता है तो वायु । घनीभूत होकर वर्षा करती है। पर्वतीय वर्षा उस समय होती है जब वायुमण्डल में आर्द्रता की मात्रा अधिकतम होती है।
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मध्यवर्ती अक्षांशों में शरद् एवं शीत ऋतु के प्रारम्भ में तथा मानसूनी प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में इसी प्रकार की वर्षा होती है। इसे पर्वतकृत वर्ष भी कहते हैं। वायु अवरोध के सामने वाले भागों में अत्यधिक वर्षा होती है, जब कि विमुख भाग में वर्षा कम होती जाती है, क्योंकि यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते वायु में आर्द्रता बहुत ही कम हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों को वृष्टिछाया प्रदेश (Rain-Shadow Region) के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार की वर्षा में कुछ अन्य प्रत्यक्ष कारक भी अपना प्रभाव डालते हैं। दिन में पर्वतों के ढाल तथा घाटियाँ गर्म हो जाती हैं जिससे वायुमण्डल में संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। कभी-कभी इनके शीतलन से भी वर्षा हो जाती है। इस प्रकार पर्वतीय वर्षा पर धरातलीय बनावट का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।

3. चक्रवातीय वर्षा–जब विपरीत दिशाओं की शीतल एवं उष्ण वायुराशियाँ किसी स्थान पर एकत्रित होने लगती हैं तो वायु में अभिसरण की दशा उत्पन्न। इससे वायुराशियाँ ऊपर की ओर उठती हैं तथा इनमें अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है। इनसे कपासी मेघों का निर्माण होता है तथा बौछारों के रूप में वर्षा होती है।
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शीत एवं शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में चक्रवातीय वर्षा होती है। उष्ण कटिबन्ध में ग्रीष्म ऋतु में चक्रवातों से वर्षा होती है। विषुवत्रेखीय प्रदेशों में विभिन्न वायुराशियों में तापमान, आर्द्रता एवं घनत्व में भिन्नता होने के कारण वाताग्रों का निर्माण नहीं हो पाता। अधिकांश चक्रवातीय वर्षा शरद् ऋतु में होती है। समशीतोष्ण प्रदेशों में पछुवा हवाओं के साथ-साथ अनेक चक्रवात पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हैं। उत्तरी भारत में शीतकालीन वर्षा भी चक्रवातीय वर्षा का एक प्रमुख उदाहरण है।

संसार में वर्षा का वितरण

संसार के वर्षा के वितरण मानचित्र पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि भूतल पर सभी जगह एकसमान मात्रा में वर्षा नहीं होती। धरातल की बनावट, जलवायु एवं पवनों की दिशा पर वर्षा की मात्रा निर्भर करती है। संसार में वर्षा का वितरण निम्नवत् पाया जाता है–

1. विषुवतरेखीय अधिक वर्षा की पेटी-वर्षा-वितरण का यह क्षेत्र विषुवत रेखा के 10° उत्तर तथा 10° दक्षिण अक्षांशों के मध्य स्थित है। इस पेटी में प्रतिदिन संवहनीय मूसलाधार वर्षा होती है। वर्षा बादलों की गर्जन तथा बिजली की चमक के साथ होती है। इस पेटी में वर्षा का वार्षिक औसत 200 सेमी तक रहता है। अत्यधिक वर्षा के कारण यहाँ घने वन पाये जाते हैं तथा कृषि का विकास कम हुआ है। यहाँ विरल आबादी मिलती है।

2. व्यापारिक पवनों की वर्षा की पेटी-व्यापारिक पवन प्रवाह क्षेत्र में इन पवनों से व्यापक वर्षा होती है; अत: इसे व्यापारिक पवनों की वर्षा की पेटी कहते हैं। इस पेटी का विस्तार 10° से 20° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्थों में पाया जाता है। इसी पेटी में मानसूनी पवनों से भी भारी वर्षा हुआ करती है। वार्षिक वर्षा का औसत 100 से 150 सेमी तक रहता है। प्रचुर वर्षा के कारण मानसूनी प्रदेशों में चावल की सघन खेती होती है तथा घनी आबादी पायी जाती है।

3. उपोष्ण कम वर्षा की पेटी-उच्च वायुदाब की यह पेटी 20° से 30° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलाद्ध में विस्तृत है। इस पेटी में वर्षा बहुत कम होती है, क्योंकि नीचे उतरती हुई हवाएँ वर्षा नहीं करती हैं। अतः विश्व के अधिकांश उष्ण मरुस्थल इसी पेटी में पाये जाते हैं। इस पेटी में वर्षा का वार्षिक औसत 50 सेमी तक ही रहता है।

4. भूमध्यसागरीय मध्यम वर्षा की पेटी-यह पेटी 30° से 40° अक्षांशों के मध्य फैली हुई है। इस क्षेत्र में वायुदाब की पेटियों के खिसक जाने के कारण शीत ऋतु में ही वर्षा होती है। पछुवा पवनें तथा चक्रवात शीत ऋतु में खूब वर्षा करते हैं। इस क्षेत्र में वर्षा का वार्षिक औसत 50 से 100 सेमी तक रहता है। यहाँ मध्यम सघन आबादी पायी जाती है।

5. शीतोष्ण वर्षा की पेटी-40° से 60° अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्थों में यह पेटी पायी जाती है। पछुवा पवनों का व्यापक प्रभाव रहने के कारण इस क्षेत्र में भारी वर्षा होती है। दक्षिणी अक्षांशों में यहाँ चक्रवातों से भारी वर्षा होती है। इस पेटी में प्रतिवर्ष 100 से 125 सेमी तक वर्षा होती है। यहाँ पश्चिमी यूरोपीय देशों में सघन आबादी मिलती है।

6. ध्रुवीय कम वर्षा की पेटी-60° अक्षांशों से 90° अक्षांशों के मध्य सबसे कम वर्षा होती है। 60° अक्षांशों के निकट मात्र 25 सेमी वर्षा ही होती है, शेष भागों में वर्षा हिम-कणों के रूप में होती है। इस क्षेत्र में वर्ष-भर उच्च दाब बना रहने के कारण वर्षा कम होती है। हिमाच्छादन के कारण यहाँ विरल आबादी पायी जाती है।

प्रश्न 2. वायुमण्डल से ओलावृष्टि एवं वर्षा किस प्रकार होती है? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर–ओलावृष्टि-जब वायुमण्डल में प्रबल वायु की धाराएँ ऊर्ध्वाधर रूप में चलती हैं, तव संघनन की प्रक्रिया वायुमण्डल के उच्च स्तरों में निम्न तापमान पर सम्पन्न होती है तथा जलवाष्प हिमकणों में बदल जाती है। हिमकणों का आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, परन्तु ऊपर उठती हुई प्रचण्ड वायु इन्हें नीचे नहीं गिरने देती है। इस प्रकार इन रवों की मोटाई कुछ सेमी तक बढ़ जाती है तथा ठोस हिम के गोले के रूप में ये रवे भूपृष्ठ पर गिरते हैं, जिसे ‘ओलावृष्टि’ या ‘उपलवृष्टि’ कहते हैं। कभी-कभी ओले वर्षा के साथ भी भूपृष्ठ पर गिरते हैं। ओलावृष्टि से फसलों को भारी हानि पहुँचती है।

वर्षा-वर्षा, वृष्टि का सबसे सामान्य प्रतिरूप है। वायुमण्डल में जलवाष्प के संघनन से मेघों का निर्माण होता है। मेघों में अनेक छोटे-छोटे जलकण होते हैं, जो यत्र-तत्र बिखरे रहते हैं। जब मेघ वायुमण्डल के शीतल क्षेत्रों में पहुँचते हैं तब ये जलकण संचित होकर पहले की अपेक्षा और बड़े हो जाते हैं। भार के कारण ये वायुमण्डल में अधिक देर तक टिक नहीं पाते और नीचे बरसने लगते हैं। वृष्टि के इस रूप को ‘वर्षा’ कहते हैं। वर्षा की बूंदों का व्यास 6 मिमी तक होता है। ‘फुहार’ हल्की वर्षा का स्वरूप है। इसमें जल की बूंदें बहुत ही सूक्ष्म होती हैं, जिनका व्यास 0.5 मिमी से भी कम होता है।

प्रश्न 3. ऊँचाई के आधार पर मेघों या बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर—बादलों का वर्गीकरण उनकी धरातल से ऊँचाई तथा आकार के आधार पर किया जाता है। 1932 ई० में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बादलों को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया गया है

1. उच्च बादल-इन बादलों की ऊँचाई समुद्रतल से 6 से 12 किमी तक होती है। इनमें पक्षाभ (Cirrus), पक्षाभ कपासी (Cirro-cumulus) और पक्षाभ स्तरी (Cirro-stratus) मेघ सम्मिलित किए जाते हैं। पक्षाभ सबसे ऊँचे मेघ होते हैं जिनका निर्माण सूक्ष्म हिमकणों से होने के कारण इनका रंग श्वेत होता है। ये चक्रवातों के आगमन से पहले आकाश में दिखलाई पड़ते हैं। पक्षाभ स्तरी मेघ आकाश में एक पतली चादर की भाँति फैले होते हैं और चन्द्रमा तथा सूर्य के चारों ओर प्रभामण्डल बना देते हैं। पक्षाभ-कपासी मेघ छोटे-छोटे, गोलाकार या लहरनुमा होते हैं।

2. मध्यम ऊँचाई के बादल-इन बादलों की ऊँचाई धरातल से 3 से 6 किमी तक होती है। इन बादलों में स्तरी मध्य रेखा (Altostratus) और कपासी मध्य मेघ (Altocumulus) प्रमुख हैं। स्तरी मध्य मेघों में सूर्य व चन्द्रमा स्पष्ट दिखाई नहीं देते और इनसे विस्तृत क्षेत्रों में लगातार वर्षा होती है।

3. निम्न बादल-ये धरातल से 3 किमी ऊँचाई तक पाए जाने वाले बादल हैं जिनके प्रमुख प्रकार स्तरी (Stratus), वर्षा स्तरी (Nimbo Stratus) और स्तरी कपासी (Strato-cumulus) मेघ हैं। स्तरी बादल कुहरे के समान कई परतों में शीतोष्ण कटिबन्ध में जाड़ों में अधिक दिखलाई पड़ते हैं। वर्षा स्तरी बादल काले तथा धरातल के निकट अत्यन्त घने होते हैं जिनसे भारी वर्षा होती है। स्तरी कपासी मेघ हल्के भूरे रंग के बड़े-बड़े गोलाकार चकतों में पाए जाते हैं।

4. अधिक ऊध्र्वाधर विकास वाले बादल-इन बादलों में पवनें तेजी से धरातल से ऊपर की ओर ऊर्ध्वाधर प्रवाहित होती हैं। अत: इनका ऊध्र्वाधर विस्तार अधिक होता है। ये कपासी (Cumulus) और कपासी वर्षी (Cumulonimbus) मेघ होते हैं। ये गहरे काले रंग वाले भारी बादल होते हैं। इन्हें गर्जन मेघ भी कहते हैं। कपासी वर्षी मेघ ऊँचाई में अधिक विस्तार वाले पर्वत के समान होते हैं। प्रबल ऊर्ध्वाधर पवनों के कारण इनसे मूसलाधार वर्षा ओले, विद्युत की चमक व गर्जन-तर्जन के साथ होती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development (पादप वृद्धि एवं परिवर्धन)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि, मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर की परिभाषा दें।
उत्तर :

1. वृद्धि (Growth) :
ऊर्जा खर्च करके होने वाली उपापचयी क्रियाएँ वृद्धि हैं। किसी भी जीवित प्राणी के लिए (UPBoardSolutions.com) वृद्धि एक उत्कृष्ट घटना है। यह एक अनपलट, बढ़तयुक्त तथा मापदण्ड में प्रकट होने वाली क्रिया है; जैसे-आकार, क्षेत्रफल, लम्बाई, ऊँचाई, आयतन, कोशिका संख्या आदि।

2. विभेदन (Differentiation) :
शीर्ष विभज्योतक, कैम्बियम आदि में बनने वाली कोशिकाएँ सर्वप्रथम समान होती हैं परन्तु बाद में विभेदिकरण के कारण विभिन्न रूपों में परिवर्तित होती है; जैसे-जाइलम व फ्लोएम के तत्त्व आदि।

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3. परिवर्धन (Development) :
परिवर्धन वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत एक जीव के जीवन चक्र में आने वाले वे सारे बदलाव शामिल हैं, जो बीजांकुरण तथा जरावस्था के मध्य आते हैं।

4. निर्विभेदन (Dedifferentiation) :
जीवित विभेदित स्थायी कोशिकाएँ जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता नहीं होती, उनमें से कुछ कोशिकाओं में पुन:विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को निर्विभेदन (dedifferentiation) कहते हैं; जैसे–कॉर्क एधा, अन्तरापूलीय एधा।

5. पुनर्विभेदन (Redifferentiation) :
निर्विभेदित कोशिकाओं या ऊतकों से बनी कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता पुनः खो देती हैं और विशिष्ट कार्य करने के लिए रूपान्तरित हो जाती हैं। इस प्रक्रिया को पुनर्विभेदन (redifferentiation) कहते हैं।

6. सीमित वृद्धि (Determinate Growth) :
पौधों में वृद्धि सीमित भी होती है और असीमित भी। पौधे जीवनपर्यन्त वृद्धि करते रहते हैं; अतः इनमें असीमित वृद्धि की क्षमता होती है। इस वृद्धि का कारण विभज्योतक ऊतक के शीर्ष पर उपस्थित है (मूल शीर्ष, स्तम्भ शीर्ष)। पार्श्व विभज्योतक के कारण पौधे चौड़ाई में बढ़ते हैं।

7. मेरिस्टेम (Meristem) :
ये विभज्योतक ऊतक हैं। इनकी कोशिकाएँ सदैव विभाजित होती रहती हैं। ये ऊतक के शीर्ष व पाश्र्व में मिलता है; जैसे—मूल शीर्ष, स्तम्भ शीर्ष, कैम्बियम आदि।

8. वृद्धि दर (Growth Rate) :
समय की प्रति इकाई में बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर कहते हैं। इसे गणित रूप में दर्शाया जा (UPBoardSolutions.com) सकता है। एक जीव अथवा उसका अंग विभिन्न तरीकों से अधिक कोशिका निर्माण कर सकता है। वृद्धि दर इसे ज्यामितीय अथवा अंकगणितीय रुप से दर्शाती है।

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प्रश्न 2.
पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर :

वृद्धि के प्राचालिक

वृद्धि सभी जीवधारियों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। पौधों में वृद्धि कोशिका विभाजन, कोशिका विवर्धन या दीर्धीकरण तथा कोशिका विभेदन के फलस्वरूप होती है। पौधे की मेरिस्टेम कोशिकाओं (meristematic cells) में कोशा विभाजन की क्षमता पाई जाती है। सामान्यतया कोशिका विभाजन जड़ तथा तने के शीर्ष (apex) पर होता है। इसके फलस्वरूप जड़ तथा तने की लम्बाई में वृद्धि होती है। एधा (cambium) तथा कॉर्क एधा (8rk cambium) के कारण तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। इसे द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहते हैं। कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वर्धन का परिणाम है। जीवद्रव्य की बढ़ोतरी या वर्धन का मापन कठिन है। वृद्धि दर मापन के कुछ मापदण्ड हैं–ताजे भोर में वृद्धि, शुष्क भार में वृद्धि, लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिका संख्या में वृद्धि आदि। (UPBoardSolutions.com) मक्का की जड़ को अग्रस्थ मेरिस्टेम प्रति घण्टे लगभग 17,500 कोशिकाओं का निर्माण करता है। तरबूज की कोशिका के आकार में लगभग 3,50,000 गुना वृद्धि हो सकती है। पराग नलिका की लम्बाई में वृद्धि होने से यह वर्तिकाग्र, वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में स्थित बीजाण्ड में प्रवेश करती है।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णित कीजिए
(अ) अंकगणितीय वृद्धि
(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र
(ब) ज्यामितीय वृद्धि
(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर
उत्तर :

(अ)
अंकगणितीय वृद्धि

समसूत्री विभाजन के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से एक कोशिका निरन्तर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है। अंकगणितीय वृद्धि को हम हैं निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह है एक सरलतम (UPBoardSolutions.com) अभिव्यक्ति होती है। संलग्न चित्र में वृद्धि (लम्बाई) समय के विरुद्ध आलेखित की गई है।इसके फलस्वरूप रेखीय वक्र (linear curve) प्राप्त होता है। इस वृद्धि को हम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं
L1 =L0 +rt
(L1 = समय  ‘r’  पर लम्बाई,
L0= समय  ‘0’  पर लम्बाई
r = वृद्धि दर दीर्घाकरण प्रति इकाई समय में)
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 1

(ब)
ज्यामितीय वृद्धि

एक कोशिका की वृद्धि अथवा पौधे के एक अंग की वृद्धि अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं हैं होती।
प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag phase)
में वृद्धि की दर पर्याप्त धीमी होती है। तत्पश्चात् यह दर तीव्र हो जाती है और उच्चतम बिन्दु (maximum point) तक पहुँच जाती है। इसे मध्य तीव्र वृद्धि काल छ (middle logarithmic phase) कहते हैं। इसके पश्चात् यह दर धीरे-धीरे कम होती जाती है और अन्त में में स्थिर (UPBoardSolutions.com) हो जाती है। इसे अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कहते हैं। इसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं। इसमें सूत्री विभाजन से बनी दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका विभाजन को
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अनुकरण करती हैं और इसी प्रकार विभाजित होने की क्षमता बनाए रखती हैं। यद्यपि सीमित पोषण, आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्मॉइड वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘S’ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) को गणितीय रूप से निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते हैं

W1 = [latex]{ W }_{ 0}^{ ert }[/latex]
जहाँ W= अन्तिम आकार–भार, ऊँचाई, संख्या आदि
W= प्रारम्भिक आकार, वृद्धि के प्रारम्भ में
r = वृद्धि दर (सापेक्ष वृद्धि दर)
t = समय में वृद्धि
e = स्वाभाविक लघुगणक का आधार (base of natural logarithms)
r = एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप सामग्री का निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, (UPBoardSolutions.com) जिसे एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) के रूप में संदर्भित किया जाता है;अतः W1 का अन्तिम आकार W0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 3

(स)
सिग्मॉइड वृद्धि वक्र

ज्यामितिक वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त कर सकते हैं

  1. प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (Initial lag phase)
  2. मध्य तीव्र वृद्धि काल (Middle lag phase)
  3. अन्तिम धीमा वृद्धि काल (Last stationary phase)

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यदि वृद्धि दर का समय के प्रति ग्राफ बनाएँ तो ‘S’ की आकृति का वक्र प्राप्त होता है। इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र कहते हैं।

(द)
सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर

  1. मापन और प्रति यूनिट समय में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परम वृद्धि दर (UPBoardSolutions.com) (absolute growth rate) कहते हैं।
  2. किसी दी गई प्रणाली की प्रति यूनिट समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है।

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दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखिए। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर :

प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक

पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हॉर्मोन्स (phytohormones) कहते हैं। ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। वेण्ट (Went, 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती। पादप हॉर्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं
(1) ऑक्सिन (Auxins)
(2) जिबरेलिन (Gibberellins)
(3) सायटोकाइनिन (Cytokinins)
(4) ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)
(5) एथिलीन (Ethylene)

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1. ऑक्सिन
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris conariensis) के नवोभिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एकतरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एकतरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।

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बायसेन :
जेन्सन (Boysen-Jensen 1910-1913) ने कटे हुए प्रांकुर चोल को अगार (agar) के घनाकार टुकड़े पर रखा, कुछ समय पश्चात् अगार के घनाकार टुकड़े को कटे हुए प्रांकुर चोल के स्थान पर रखने के पश्चात् एकतरफा प्रकाश से प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की (UPBoardSolutions.com) ओर मुड़ जाता है। वेण्ट (Went, 1928) ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोभिद् पर किए। उन्होंने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला कि प्रांकुर चोल के शीर्ष पर बना रासायनिक पदार्थ अगार के टुकड़ों (block) में आ गया था। वेण्ट ने प्रांकुर चोल के कटे हुए शीर्ष को दो अगार के टुकड़ों पर रखा जिनके मध्य अभ्रक (माइका) की पतली प्लेट लगी थी, एकतरफा प्रकाश डालने पर रासायनिक पदार्थ का 65% भाग अप्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र हो जाता है और केवल 35% रासायनिक पदार्थ प्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 6

वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रती तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की। ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग

(i) प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism) :
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।

(ii) शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance) :
सामान्यतया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्र्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती हैं। चाय बागान में तथा चहारदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।

(iii) विलगन (Abscission) :
परिपक्व पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) ऑक्सिन; जैसे-IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलगन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होता है।

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(iv) अनिषेकफलन (Parthenocarpy) :
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल को विकास हो जाता है; जैसे–अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकाग्र पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।

(v) खरपतवार निवारण (Weed destruction) :
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।

(vi) कटे तनों पर जड़ विभेदन (Root differentiation on Stem cutting) :
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन: जैसे–IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़े शीघ्र निकल आती हैं। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।

(vii) प्रसुप्तती नियन्त्रण (Control of Dormancy) :
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन (UPBoardSolutions.com) को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिने का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।

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2. जिबरेलिन
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग-foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबरेली फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujitkuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं। कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ चौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक के रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन–A (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन-As है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।

जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व

(i) लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of increase the length) :
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है। जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगुर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।

(ii) पुष्पन पर प्रभाव (Effect of Flowering) :
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।

(iii) अनिषेकफलन (Parthenocarphy) :
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।

(iv) जीर्णता या जरावस्था (Senescence) :
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।

(v) बीजों का अंकुरण (Seed Germination) :
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।

(vi) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants) :
GA का छिड़काव करने से अनावृतबीजी पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।

3. सायटोकाइनिन
सायटोकाइनिन ऑक्सिने की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं को समूह तभी बनता है, जब माध्यम में ऑक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन (UPBoardSolutions.com) नामक बढ़ावा देने वाला तत्त्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिने रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही हैं। सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व

  1. ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
  2.  ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
  3.  कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अंगों के

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निर्माण को नियन्त्रित करते हैं। यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिन और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक है।

4. ऐब्सीसिक अम्ल
कार्ल्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है। वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया। ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व

(i) विलगने (Abscission) :
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।

(ii) कलिकाओं की वृद्धि एवं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds) :
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।

(iii) जीर्णता (Senescence) :
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।

(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration) :
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली  (UPBoardSolutions.com) भूमि में खेती करने के लिए उपयुक्त है।

(v) कन्द निर्माण (TuberFormation) :
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।

(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation) :
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।

5. एथिलीन
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हॉर्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हॉर्मोन होता है। एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व

(i) पुष्पन (Flowering) :
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।

(ii) विलगने (Abscission) :
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।

(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification) :
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।

(iv) फलों को पकना (Fruit Ripening) :
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम,केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल
प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।)

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प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा वसन्तीकरण क्या है? इनके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
दीप्तिकालिता पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव (UPBoardSolutions.com) पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता. ‘ शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।

(क)
दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं

  1.  अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
  2. दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
  3. तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)

अल्प प्रदीप्तकाली पौधों को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।

(ख)
कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्रि के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है। वसन्तीकरण कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरणं कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण (UPBoardSolutions.com) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी०डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था। गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्त ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह वसन्ती गेहूं के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है। कम ताप उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती है। अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
एब्सिसिक अम्ल को तनाव हार्मोन क्यों कहते हैं?
उत्तर :
एब्सिसिक अम्ल का मुख्य कार्य प्रसुप्ति तथा विलगन का नियमन है। यह पादप वृद्धि निरोधक है। यह बीज के अंकुरण को रोकता है, रन्ध्र के बन्द होने को उत्तेजित करता है तथा विभिन्न प्रकार के तनावों को झेलने की क्षमता पौधों को देता है। अतः इसे तनाव हार्मोन कहते हैं।

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प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है, टिप्पणी करें?
उत्तर :
पौधों में वृद्धि विशिष्ट प्रकार से होती है क्योंकि जीवनपर्यन्त उनमें वृद्धि की क्षमता होती है। ऐसा उनके विभज्योतक ऊतकों की स्थिति के कारण होता है। अतः इसे खुला’ वृद्धि व विभेदन कहते हैं।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तकाली पौधे और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे किसी एक स्थान पर साथ-साथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (short day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिस पर या इससे कम प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे अधिक प्रकाश अवधि में पौधा पुष्प उत्पन्न नहीं कर सकता। दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों (long day plants) में निर्णायक (UPBoardSolutions.com) दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है। जिससे अधिक प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे कम प्रकाश अवधि में पुष्प उत्पन्न नहीं होते। अत: अल्प प्रदीप्तकाली पौधों और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में विभेदन उनमें निर्णायक दीप्तिकाल से कम अवधि पर पुष्पन होना अथवा अधिक अवधि पर पुष्प उत्पन्न होने के आधार पर किया

जाता है। दो जातियों के पौधे समान अवधि के प्रकाश में पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उनमें से एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधा तथा दूसरा दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा हो सकता है; जैसे-जैन्थियम (Xanthiur) का निर्णायक दीप्तिकाल 15 1/2 घण्टे है और हाईओसायमस नाइजर (Hyoscyamus niger) को निर्णायक दीप्तिकाल 11 घण्टे है। दोनों पौधे 14 घण्टे की प्रकाशीय अवधि में पुष्प उत्पन्न कर सकते हैं। इस आधार पर जैन्थियम अल्प प्रदीप्तकाली पौधा है क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से कम प्रकाशीय अवधि में पुष्पन करता है तथा हाइओसायमस नाइजर दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा है; क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से अधिक प्रकाश अवधि में पुष्पन करता है।

प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक का नाम दें
(क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
(ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
(ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
(घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
(ङ) एक रोजेट पौधे में ‘बोल्ट’ हेतु
(च) पत्तियों के रन्ध्र को तुरन्त बन्द करने हेतु

उत्तर :
(क) ऑक्सिन
(ख) एथिलीन
(ग) साइटोकाइनिन
(घ) ऑक्सिन, साइटोकाइनिन
(ड) जिबरेलिन
(च) एब्सिसिक अम्ल

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णरहित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है? हाँ या नहीं। क्यों?
उत्तर :
प्रकाश अन्धकार काल का अनुभव पत्तियाँ करती हैं। इनमें बनने वाला फ्लोरिजन तना कलिका (UPBoardSolutions.com) में पुष्पन प्रेरित करने के लिए तभी जाती हैं जब पौधे आवश्यक प्रेरित दीप्तिकाल में अनावृत होते हैं। ऐसा माना जाता है कि फ्लोरिजन (हार्मोन) पुष्पन के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 11.
क्या हो सकता है अगर?
(क) जी एGAs) को धान के नवोभिदों पर डाला जाए।
(ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बन्द कर दें।
(ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
(घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन डालना भूल जाएँ।

उत्तर :
(क) धान के पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है।
(ख) कोशिका विभेदन के रुक जाने से संरचनात्मक परिवर्तन आते हैं।
(ग) कच्चे फल तेजी से पक जाएँगे।
(घ) यदि संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन डालना भूल जाएँ तो कोशिका विभाजन, वृद्धि व विभेदन पर असर पड़ेगा। कोशिकाओं को जो केलस बनता है उनमें विभेदन न होने से कलिकाएँ नहीं बन सकती हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी पादप-हॉर्मोन पत्तियों एवं फलों के विलगन (झड़ने) को रोकता है?
(क) जिबरेलिन
(ख) ऑक्सिन
(ग) साइटोकाइनिन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) ऑक्सिन

प्रश्न 2.
लम्बे दिन वाले पौधों में कौन-सा रसायन पुष्पन को प्रेरित करता है ?
(क) IBA
(ख) IAA
(ग) GA3
(घ) NAA
उत्तर:
(ग) GA3

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रसायनानुवर्तन गति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
पौधों द्वारा किसी रसायन के प्रति की जाने वाली गति रसायनानुवर्तन गति कहलाती है। उदाहरणार्थ-पौधों में ऑक्सिन, जिबरेलिन तथा साइटोकाइनिन रसायनों द्वारा वृद्धि होती है जबकि एथिलीन एवं एब्सिसिक अम्ल द्वारा वृद्धि रुक जाती है।

प्रश्न 2.
जीर्णावस्था किसे कहते हैं? जीर्णता को कौन-सा हॉर्मोन रोकता है?
उत्तर :
काल के प्रभाव से पत्तियों के प्रोटीन्स विघटन एवं पर्णहरिम के नष्ट हो जाने से पत्तियाँ पीली हो जाती हैं और अंततः मर जाती हैं, जिसे जीर्णावस्था कहते हैं। साइटोकाइनिन हॉर्मोन पत्तियों की इस जीर्णता को रोकता है।

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प्रश्न 3.
पादप हॉर्मोन की सहायता से बीज रहित फल उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली क्रिया का नाम लिखिए।
उत्तर :
ऑक्सिन्स का उपयोग करके बीज रहित फलों के निर्माण को अनिषेकफलन (parthenocarpy) कहते हैं।

प्रश्न 4.
2, 4-D का पूरा नाम लिखिए तथा कृषि में इसके एक महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
2, 4-D का पूरा नाम 2, 4-डाइहाइड्रोफोनॉक्सी ऐसीटिक अम्ल है। इसका उपयोग खरपतवार नाशक के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 5.
फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए किस हॉर्मोन का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर :
एथिलीन गैस या इथेफोन का।

प्रश्न 6.
कोशिका विभाजन तथा कोशिकाद्रव्य विभाजन क्रियाओं का उद्दीपन करने वाले हॉर्मोन्स के नाम लिखिए।
उत्तर :
साइटोकाइनिन तथा ऑक्सिन्स।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाशानुवर्तन (phototropism) प्रक्रिया को उदाहरण देकर समझाइए। या प्रकाशानुवर्तन पर टिप्पणी लिखिए। या प्रकाशानुवर्तन क्या है? इस क्रिया का नियमन करने वाले हॉर्मोन्स का नाम लिखिए।
उत्तर :

प्रकाशानुवर्तन

इस क्रिया में पौधों के विभिन्न भाग प्रकाश उद्दीपन द्वारा विभिन्न प्रकार की वक्रण गतियाँ प्रदर्शित करते हैं।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 7

प्रकाश के एकदिशीय उद्दीपन (unilateral stimulus) के कारण तने प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं। इसे धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (positive phototropism) कहते हैं। जड़े प्रकाश के इस प्रकार के उद्दीपन के विपरीत वक्रण प्रदर्शित करती हैं। इसे ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन (negative phototropism) कहते हैं। पत्तियाँ उभय प्रकाशानुवर्तन (diaphototropism) तथा शाखाएँ प्रकाश के अन्य किसी कोण पर तिर्यक प्रकाशानुवर्तन (plagiophototropism) प्रदर्शित करती हैं। प्रकाशानुवर्तन का कारण कोलोडनी तथा वेण्ट (Cholodny and went) ने ऑक्सिन के असमान वितरण को पाया। अंधेरे के क्षेत्र की (UPBoardSolutions.com) ओर अधिक ऑक्सिन एकत्रित हो जाने से तनों में उस ओर अधिक वृद्धि तथा जड़ों में वृद्धि का संदमन होने से तने प्रकाश की ओर, किन्तु जड़े प्रकाश के विपरीत वक्रण प्रदर्शित करती हैं। कुछ पौधे अथवा उनके अंग परिवर्द्धन के विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। मूंगफली (groundnut = Arachis hypoged) में अण्डाशय (ovary) के नीचे लगा वृन्त पहले धनात्मक किन्तु निषेचन (fertilization) के बाद ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन प्रदर्शित करता है।

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एक सामान्य प्रयोग द्वारा प्रकाशानुवर्तन को निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है।
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लकड़ी का बना एक ऐसा बॉक्स लेते हैं जिसमें एक ओर प्रकाश के आने के लिए खिड़की बनी होती है। एक गमले में । लगा पौधा इस बॉक्स के अन्दर रख दिया जाता है। कुछ दिन बाद देखने पर पता चलता है कि पौधे की शाखायें खिड़की की ओर अर्थात् प्रकाश के स्रोत की ओर मुड़ (UPBoardSolutions.com) जाती हैं। इससे सिद्ध होता है कि पौधे के वायवीय भाग विशेषकर तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती होते हैं।

प्रश्न 2.
गुरुत्वानुवर्तन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर  :
गुरुत्वानुवर्तन गुरुत्वाकर्षण के उद्दीपन (stimulus) के प्रभाव से होने वाली वक्रण (curvature) गति गुरुत्वानुवर्ती गति(geotropic movement) कहलाती है। पौधों के वायवीय भाग विशेषकर तयों के शीर्ष ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती (negatively geotropic),  किन्तु जड़े धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (positively geotropic) होती हैं।
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गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force)
के कारण क्षैतिज स्थिति में रखे हुए पौधे के तने व जड़ के शीर्षों (apices) में नीचे की ओर ऑक्सिन हॉर्मोन एकत्रित हो जाते हैं। तने के शीर्ष में नीचे की ओर एकत्रित ऑक्सिन की अधिक मात्रा के कारण तने के अग्रभाग के निचले क्षेत्र में अधिक वृद्धि होती है और यह ऊपर की ओर मुड़ जाता है। (UPBoardSolutions.com) इसके विपरीत मूलाग्र के निचले भाग में एकत्रित ऑक्सिन की अधिक मात्रा वृद्धि को संदमित (supress) करती है, जबकि इस क्षेत्र के ऊपरी तल में ऑक्सिन की कम मात्रा वृद्धि को प्रोत्साहित करती है। अतः मूलाग्र नीचे की ओर वक्रता प्रदर्शित करता है।
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गुरुत्वानुवर्तन का प्रदर्शन उपर्युक्ते प्रकार के वक्रण को एक सामान्य प्रयोग द्वारा समझाया जा सकता है। जब किसी गमले में लगे पौधे को भूमि के समान्तर रख देते हैं तो ऑक्सिन (auxin) हॉर्मोन के प्रभाव से तने में ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन (negative geotropism) तथा जड़ के निचले सिरे पर धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (positive geotropism) होने लगता है। इसके कारण तना’ऊपर की ओर तथा जड़ नीचे की ओर वक्रण प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 3.
प्रकाशानुवर्तन तथा गुरुत्वानुवर्तन में अन्तर बताए।
उत्तर :
प्रकाशानुवर्तन तथा गुरुत्वानुवर्तन में अन्तर
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प्रश्न 4.
“स्पर्श से छुईमुई की पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं।” कारण स्पष्ट कीजिए। या कम्पानुकुंचनी गति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
छुईमुई (Mimosa pudica) की पत्तियों के पत्रक स्पर्श या अन्य आघात के कारण बन्द हो जाते हैं। पत्तियों के आधार पर पर्णाधार में पायी जाने वाली मृदूतक कोशिकाओं के स्फीत होने पर पर्णक खुले रहते हैं, जबकि श्लथ दशा के कारण पर्णक बन्द हो जाते हैं। पर्णाधार के नीचे के आधे (UPBoardSolutions.com) भाग की मृदूतक कोशिकाएँ श्लथ हो जाती हैं, क्योंकि उद्दीपन के कारण जल अन्तराकोशिकीय अवकाशों में चला जाता है और पर्णक बन्द हो जाते हैं। कोशिकाओं के स्फीत दशा में आ जाने से पत्ती सामान्य दशा में आ जाती है।

प्रश्न 5.
प्रकाशानुवर्तन तथा प्रकाशानुकुंचन में अन्तर बताइए।
उत्तर :
प्रकाशानुवर्तन तथा प्रकाशानुकुंचन में अन्तर

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प्रश्न 6.
हॉर्मोन तथा एन्जाइम में अन्तर बताइए।
उत्तर :
हॉर्मोन तथा एन्जाइम में अन्तर

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प्रश्न 7.
फाइटोक्रोम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
फाइटोक्रोम फाइटोक्रोम एक प्रकाशग्राही वर्णक है। जैव रासायनिक दृष्टि से फाइट्रोक्रोम प्रोटीन है। फाइटोक्रोम अधिकतर पादपों में पाया जाता है। यह एक ऐसा वर्णक है, जिसका उपयोग पौधे प्रकाश को पहचानने के लिए करते हैं। यह प्रकाश के दृश्य स्पेक्ट्रम के लाल और अवरक्त प्रकाश के प्रति संवेदनशील है। कई पुष्पीय पौधे इसका उपयोग प्रकाशीय अवधि के आधार पर पुष्पन के समय का नियंत्रण हेतु करते हैं। यह अन्य प्रतिक्रियाओं; जैसे—बीज-अंकुरण, नवोभिद् (UPBoardSolutions.com) की वृद्धि, आकार, आकृति, पत्तियों की संख्या, हरित लवकों का संश्लेषण आदि को भी नियंत्रित करते हैं। यह अधिकतर पौधों में पत्तियों पर पाया जाता है। फाइटोक्रोम में एक क्रोमोफोर, एक एकल बाइलिन अणु जिसमें, चार पाइरॉल रिंग की खुली श्रृंखला जो प्रोटीन से जुड़ी होती है, पाया जाता है। फाइटोक्रोम क्रोमोफोर साधारणत: फाइटोक्रोमोबिलिन होती है और फायकोसायनोबिलिन एवं बिलिरुबिन से सम्बन्धित होती है। फाइटोक्रोम वर्णक की खोज Sterling Hendricks एवं Harry Borthwick द्वारा की गयी थी। फाइटोक्रोम की पहचान Warren Butler एवं Harold Siegelman द्वारा 1959 में स्पेक्ट्रोफोटोमीटर की सहायता से की गयी थी। फाइटोक्रोम नाम Butler द्वारा दिया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बीज प्रसुप्तावस्था के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर  :
प्रसुप्ति के कारणों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है

A.
प्रसुप्ति के बाह्य कारण (External Causes of Dormancy) :

कुछ पौधों के बीज शरद् ऋतु के अन्तिम भाग में परिपक्व होते हैं, उस समय उनके अंकुरण के लिए तापमान उच्च रहता है। अत: ये ताप कम होने तक प्रसुप्त (dormant) रहते हैं। ऑक्सीजन की अपर्याप्त उपलब्धि के कारण भी बीजों का अंकुरण रुक जाता है। कुछ बीज पकने पर तालाब में गिरते हैं और पेंदी में मृदा से आच्छादित हो जाते हैं जिससे उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। यहाँ पर बीज बहुत अधिक अवधि तक प्रसुप्त (dormant) रह सकते हैं और केवल सतह पर लाए जाने पर ही अंकुरित (germinate) होते हैं।

कुछ जातियों के बीज; जैसे—सलाद (Lettuce), तम्बाकू की कुछ किस्में, मिसिल्टो (Viscum), आदि प्रकाश की अनुपस्थिति में अंकुरित नहीं होते और बहुत कम प्रकाश में रखने पर भी अंकुरित हो जाते हैं। ऐसे बीजों में दृश्य स्पेक्ट्रम (visible spectrum) का लाल (R 660 nm) क्षेत्र अंकुरण के लिए बहुत प्रभावी होता है तथा सुदूर लाल (Far red 730 nm) क्षेत्र, लाल प्रकाश के प्रभाव को समाप्त कर देता है। बीजों के अंकुरण पर लाल (red) तथा सुदूर लाल (far red) प्रकाश का प्रभाव, फाइटोक्रोम (phytochrome) नामक प्रोटीन वर्णक (pigment) के कारण होता है।

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B.
प्रसुप्ति के आन्तरिक कारण (Internal Causes of Dormancy) :

ये मुख्यत: निम्न हैं

1. बीजावरण की जल के लिए अपारगम्यता (Impermeability of Seed Coat to Water) :
अनेक पौधों के बीजों में बीजावरण कठोर व जल के लिए अपारगम्य होता है, अतः बीजं जल के सम्पर्क में रहने पर भी जल अवशोषित नहीं कर पाते और उनमें अंकुरण नहीं हो पाता। ऐसे बीज लम्बी अवधि तक भूमि में पड़े रहते हैं। प्राकृतिक अवस्था में मिट्टी के कणों के अपघर्षण (scarification) तथा जीवाणुओं व कवकों की क्रियाओं के फलस्वरूप बीजावरण धीरे-धीरे कमजोर होकर पारगम्य हो जाता है, इसके बाद ही बीज जल का अवशोषण करके अंकुरित होते हैं।

2. बीजावरण की ऑक्सीजन के लिए अपारगम्यता (Impermeability of Seed Coat to Oxygen) :
कभी-कभी बीजों में प्रसुप्ति, बीजावरण के ऑक्सीजन के लिए अपारगम्य होने के कारण होती है जो कारक या पदार्थ बीजावरण को जल के लिए अपारगम्य बनाते हैं, वे ही धीरे-धीरे इसे ऑक्सीजन के लिए भी अपारगम्य बनाते हैं। जैन्थियम (Xanthium), अनेक घासों तथा कम्पोजिटी (Compositae) कुल के कुछ पौधों के बीजों में इसी प्रकार की प्रसुप्ति (dormancy) पाई जाती है।

3. यान्त्रिक रूप से प्रतिरोधी बीजावरण (Mechanically Resistant Seed Coat) :
कुछ पौधों के बीजों में बीजावरण द्वारा जल व ऑक्सीजन तो ग्रहण कर ली जाती है, परन्तु बीजावरण इतना कठोर होता है कि भ्रूण (embryo) की पूरी वृद्धि नहीं हो पाती और उसका विकास केवल बीजावरण तक ही सीमित हो पाता है। बीजावरण न टूट पाने के कारण अंकुर रुक जाता है, जैसे-ऐलिस्मा प्लैंटेगो (Alisma plantqgo) के बीज में भ्रूण पानी के कारण फूल जाता है और अन्त: शोषण दाब (imbibition pressure) से बीजावरण को दबाता है; परन्तु उसे तोड़ नहीं पाता और अंकुरण रुक जाता है। इस प्रकार की प्रसुप्ति (dormancy) के कुछ अन्य उदाहरण-काली सरसों (Brassica nigra), लेपिडियम (Lepidium), ऐमारेन्थस, रेट्रोफ्लेक्सस (Amaranthus retroflexus), आदि है।

4. अपूर्ण परिवर्धित भ्रूण (Imperfectly Developed Embryo) :
इस प्रकार की प्रसुप्ति (dormancy) में बीज के अन्दर भ्रूणीय विकास (embryonic development) क्रिया पूर्ण भी नहीं हो पाती कि वे मातृ पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऐसे बीजों में भ्रूणीय विकास की निषेचित अण्ड से लेकर, पूर्ण परिवर्धित भ्रूण के सभी श्रेणीकरण (gradation) पाए जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) कुछ बीजों में भ्रूणीय परिवर्धन शरद् अथवा शीत ऋतु में धीरे-धीरे होता है और बसंत ऋतु में अंकुरण केठीक पूर्व तक पूर्ण हो जाता है, जैसे-ऐरीथ्रोनियम (Erythronium), रेननकुलस (Ranunculus) तथा इलेक्स (Ilex), आदि।

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5. भ्रूण की परिपक्वन के बाद शुष्क भण्डारण आवश्यकता (Embryo Requiring after Ripening in Dry Storage) :
कुछ परिपक्व बीजों में भ्रूण (embryo) पूर्ण विकसित होते हैं परन्तु उन्हें अंकुरण से पूर्व कुछ समय तक शुष्क वातावरण में रखना आवश्यक हो जाता है, ऐसा न करने पर उनमें अंकुरण नहीं होता। इस प्रक्रिया में बीजों में अनेक ऐसे उपापचयी (metabolic) परिवर्तन होते हैं जो अंकुरण के लिए आवश्यक हैं। (UPBoardSolutions.com) क्रेटीगस (Crategus) के बीजों में यह बाद का परिपक्वन प्रक्रम (after ripening process) एक से तीन महीनों में पूरा हो जाता है। इस प्रक्रिया में जैसे-जैसे बाद का पक्वन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे भ्रूण (embryo) की अम्लीयता में वृद्धि होती जाती है। इससे जल का अवशोषण बढ़ता है और अंकुरण शीघ्र होता है।

6. अंकुरणरोधक पदार्थों की उपस्थिति (Presence of Germinating Inhibitors) :
अनेक पौधों के भ्रूण, भ्रूणपोष, बीज, फल, आदि के ऊतकों में कुछ निरोधक या संदमक (inhibitors) पदार्थ, जैसे-ऐब्सिसिक अम्ल (abscisic acid), कौमेरिन (coumarin), फेरुलिक अम्ल (ferulic acid) तथा छोटी श्रृंखला वाले वसा अम्ल (fatty acid), आदि होते हैं। ये पदार्थ बीजों के अंकुरण को रोकते हैं।

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