UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles and Techniques

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles and Techniques (कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें)

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पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की संकरण अवस्था बताइए-
उत्तर
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित अणुओं में σ तथा π आबन्ध दर्शाइए-
C6H6, C6H12, CH2Cl2, CH2=C=CH, CH3NO2, HCONHCH3
उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों के आबन्ध-रेखा सूत्र लिखिए-
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2, 3-डाइमेथिल ब्यूटेनल, हेप्टेन-4-ओन
उत्तर
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
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उत्तर
(क) प्रोपिलबेन्जीन,
(ख) 3-मेथिलपेन्टेननाइट्राइल,
(ग) 2, 5-डाइमेथिलहेप्टेन,
(घ) 3-ब्रोमो-3-क्लोरोहेप्टेन,
(ङ) 3-क्लोरोप्रोपेनल,
(च) 2, 2-डाइक्लोरोएथेनॉल

प्रश्न 5.
निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2, 2-डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2-डाइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2, 4, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2, 5, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन अथवा 4-क्लोरो-2-मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल अथवा ब्यूट-4-ऑल-1-आइन
उत्तर
(क) 2, 2-डाइमेथिलषन्टेन,
(ख) 2, 4, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन,
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल

प्रश्न 6.
निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना-सूत्र लिखिए-
(क) HCOOH
(ख) CH3COCH3
(ग) H—CH=CH2
उत्तर
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प्रश्न 7.
निम्नलिखित के संघनितं और आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए तथा यदि कोई क्रियात्मक समूह हो तो उसे पहचानिए-:
(क) 2, 2, 4-टाइमेथिल पेन्टेन
(ख) 2-हाइड्रॉक्सी-1, 2, 3-प्रोषेनट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल
(ग) हेक्सेनडाइएल
उत्तर
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए-
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उत्तर
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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों?
O2NCH2CH2O CH3CH2O
उत्तर
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से अधिक स्थायी है क्योंकि NO2 का -1 प्रभाव होता है। अत: यह O परमाणु पर ऋणावेश का परिक्षेपण करता है। इसके विपरीत, CH3CH2 का +1 प्रभाव होता है, अत: यह ऋणावेश की तीव्रता बढ़ाकर इसे अस्थायी करता है।

प्रश्न 10.
निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉनदाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं? समझाइए।
उत्तर
अतिसंयुग्मन के कारण -निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह कार्य करते हैं जैसा कि नीचे प्रदर्शित है-
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प्रश्न 11.
निम्नलिखित यौगिकों की अनुनाद संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दर्शाइए-
(क) C6H5OH
(ख) C6H5NO2
(ग) CH3CH=CHCHO
(घ) C6H5–CHO
(ङ) C6H5–CH+2
(च) CH3CH=CHCH2
उत्तर
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प्रश्न 12.
इलेक्ट्रॉनस्नेहीं तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही (Nucleophiles and Electrophiles) इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करने वाला अभिकर्मक ‘नाभिकस्नेही’ (nucleophile, Nu : ) अर्थात् ‘नाभिक खोजने वाला’ कहलाता है तथा अभिक्रिया ‘नाभिकस्नेही अभिक्रिया’ (nucleophilic reaction) कहलाती है। इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाले अभिकर्मक को इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile E+), अर्थात् ‘इलेक्ट्रॉन चाहने वाला कहते हैं और अभिक्रिया ‘इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रिया’ । (electrophilic reaction) कहलाती है।
ध्रुवीय कार्बनिक अभिक्रियाओं में क्रियाधारक के इलेक्ट्रॉनस्नेही केन्द्र पर नाभिकस्नेही आक्रमण करता है। यह क्रियाधारक का विशिष्ट परमाणु अथवा इलेक्ट्रॉन न्यून भाग होता है। इसी प्रकार क्रियाधारकों के इलेक्ट्रॉनधनी नाभिकस्नेही केन्द्र पर इलेक्ट्रॉनस्नेही आक्रमण करता है। अतः आबन्धन अन्योन्यक्रिया के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म प्राप्त करता है। नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर इलेक्ट्रॉनों का संचलन वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नाभिकस्नेही के उदाहरणों में हाइड्रॉक्साइड (OH), सायनाइड आयन (CN ) तथा कार्बऋणायन UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-14 कुछ आयन सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उदासीन अणु, (जैसे- UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-15 आदि) भी एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म की उपस्थिति के कारण नाभिकस्नेही की भाँति कार्य करते हैं। इलेक्ट्रॉनस्नेही के उदाहरणों में कार्बधनायन UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-17 और कार्बोनिल समूह UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-16 अथवा ऐल्किल हैलाइड (R3C—X, X= हैलोजेन परमाणु) वाले। उदासीन अणु सम्मिलित हैं। कार्बधनायन का कार्बन केवल षष्टक होने के कारण इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है तथा नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण कर सकता है। ऐल्किल हैलाइड का कार्बन आबन्ध ध्रुवता के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही–केन्द्र बन जाता है जिस पर नाभिकस्नेही आक्रमण कर सकता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित समीकरणों में रेखांकित अभिकर्मकों को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही में वर्गीकृत कीजिए-
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उत्तर
(क) नाभिकस्नेही,
(ख) नाभिकस्नेही
(ग) इलेक्ट्रॉनस्नेही।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए-
(क) CH3CH2Br+HS CH3CH2SH+Br
(ख) (CH3)2C=CH2+HCl → (CH3)2CIC-CH3
(ग) CH2CH2Br+HO → CH2=CH2+H2O+Br
(घ) (CH3)3C-CH2OH+HBr → (CH3)2CBrCH2CH3 + H2O
उत्तर
(क) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic substitution)
(ख) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक (Electrophilic addition)
(ग) विलोपन (Elimination)
(घ) पुनर्विन्यास युक्त नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic substitution with rearrangement)

प्रश्न 15.
निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरके मध्य कैसा सम्बन्ध है? क्या ये संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामितीसमवयव अथवा अनुनाद संरचनाएँ हैं।
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उत्तर
(क) स्थिति समावयवी और मध्यावयवी
(ख) ज्यामितीय समावयवी,
(ग) अनुनाद संरचनाएँ।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित आबन्ध विदलनों के लिए इलेक्ट्रॉन विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिए। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त-मूलक, कार्बधनायन तथा कार्बऋणायन पहचानिए-
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उत्तर
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प्रश्न 17.
प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभावों की व्याख्या कीजिए। निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम कौन-सा इलेक्ट्रॉन-विस्थापन वर्णित करता है?
(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2COOH
(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2CHCOOH > (CH3)3C.COOH
उत्तर
प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect, I-effect)-भिन्न विद्युत-ऋणात्मकता के दो परमाणुओं के मध्य निर्मित सहसंयोजक आबन्ध में इलेक्ट्रॉन असमान रूप से सहभाजित होते हैं। इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च विद्युत ऋणात्मकता के परमाणु के ओर अधिक होता है। इस कारण सहसंयोजक आबन्ध ध्रुवीय हो जाता है। आबन्ध ध्रुवता के कारण कार्बनिक अणुओं में विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
उदाहरणार्थ-क्लोरोएथेन (CH3CH2Cl) में C—Cl बन्ध ध्रुवीय है। इसकी ध्रुवता के कारण कार्बन क्रमांक-1 पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश (δ) उत्पन्न हो जाता है। आंशिक आवेशों को दर्शाने के लिए δ (डेल्टा) चिह्न प्रयुक्त करते है। आबन्ध में इलेक्ट्रॉन-विस्थापन दर्शाने के लिए तीर (→) का उपयोग किया जाता है, जो 8′ से 6 की ओर आमुख होता है।

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कार्बन-1 अपने आंशिक धनावेश के कारण पास के C—C आबन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। फलस्वरूप कार्बन-2 पर भी कुछ धनावेश (∆δ+) उत्पन्न हो जाता है। C—1 पर स्थित धनावेश की तुलना में ∆δ+ अपेक्षाकृत कम धनावेश दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, C—CI की ध्रुवता के कारण पास के आबन्ध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। समीप के ठ-आबन्ध के कारण अगले 6-आबन्ध के ध्रुवीय होने की प्रक्रिया प्रेरणिक प्रभाव (inductive effect) कहलाती है। यह प्रभाव आगे के आबन्धों तक भी जाता है, लेकिन आबन्धों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव कम होता जाता है और तीन आबन्धों के बाद लगभग लुप्त हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव का सम्बन्ध प्रतिस्थापी से बन्धित कार्बन परमाणु को इलेक्ट्रॉन प्रदान करने अथवा अपनी ओर आकर्षित कर लेने की योग्यता से है। इस योग्यता के आधार पर प्रतिस्थापियों को हाइड्रोजन के सापेक्ष इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (electron-withdrawing) या इलेक्ट्रॉनदाता समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हैलोजन तथा कुछ अन्य समूह; जैसे-नाइट्रो (—NO2), सायनो (—CN), कार्बोक्सी (—COOH), एस्टर (—COOR), ऐरिलॉक्सी (—OAr) इलेक्ट्रॉन आकर्षी समूह हैं; जबकि ऐल्किल समूह; जैसे—मेथिल (—CH3), एथिल (—CH2—CH3) आदि इलेक्ट्रॉनदाता समूह हैं।
इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (E प्रभाव) [Electromeric Effect, E-effect]-यह एक अस्थायी प्रभाव है। केवल आक्रमणकारी अभिकारकों की उपस्थिति में यह प्रभाव बहुआबन्ध (द्विआबन्ध अथवा त्रिआबन्ध) वाले कार्बनिक यौगिकों में प्रदर्शित होता है। इस प्रभाव में आक्रमण करने वाले अभिकारके की माँग के कारण बहु-आबन्ध से बन्धित परमाणुओं में एक सहभाजित -इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होता है। अभिक्रिया की परिधि से आक्रमणकारी अभिकारक को हटाते ही यह प्रभाव शून्य हो। जाता है। इसे E द्वारा दर्शाया जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉन के संचलन को वक्र तीर UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-23 द्वारा प्रदर्शित । किया जाता है। स्पष्टतः दो प्रकार के इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव होते हैं-
(i) धनात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (+E प्रभाव)-इस प्रभाव में बहुआबन्ध के ए-इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित होता है।
उदाहरणार्थ-

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(ii) ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव(-E प्रभाव)—इस प्रभाव में बहु-आबन्ध के -इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित नहीं होता है। इसका
उदाहरण निम्नलिखित है-

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जब प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव एक-दूसरे की विपरीत दिशाओं में कार्य करते हैं, तब इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव प्रबल होता है।
(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2COOH
यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रेरणिक प्रभाव (-I) दर्शाता है।
(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2CHCOOH > (CH3)3C.COOH
यह इलेक्ट्रॉन दाता प्रेरणिक प्रभाव (+I) दर्शाता है।

प्रश्न 18.
प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए
(क) क्रिस्टलन,
(ख) आसवन,
(ग) क्रोमैटोग्रैफी।
उत्तर
(क) क्रिस्टलन (Crystallisation)—यह ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की प्रायः प्रयुक्त विधि है। यह विधि कार्बनिक यौगिक तथा अशुद्धि की किसी उपयुक्त विलायक में इनकी विलेयताओं में निहित अन्तर पर आधारित होती है। अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय (sparingly soluble) होता है, परन्तु उच्चतर ताप परे यथेष्ट मात्रा में वह घुल जाता है। तत्पश्चात् विलयन को इतना सान्द्रित करते हैं कि वह लगभग संतृप्त (saturate) हो जाए। विलयन को ठण्डा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टलित हो जाता है जिसे निस्यन्दन द्वारा पृथक् कर लेते हैं। निस्यन्द (मातृ द्रव) में मुख्य रूप से अशुद्धियाँ तथा यौगिक की अल्प मात्रा रह जाती है। यदि यौगिक किसी एक विलायक में अत्यधिक विलेय तथा किसी अन्य विलायक में अल्प
विलेय होता है, तब क्रिस्टलन उचित मात्रा में इन विलायकों को मिश्रित करके किया जाता है। सक्रियिंत काष्ठ कोयले'(activated charcoal) की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाली जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धियों की विलेयताओं में कम अन्तर होने की दशा में बार-बार क्रिस्टलन द्वारा शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

(ख) आसवन (Distillation)—इस महत्त्वपूर्ण विधि की सहायता से (i) वाष्पशील (volatile) द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से एवं (ii) ऐसे द्रवों को, जिनके क्वथनांकों में पर्याप्त अन्तर हो, पृथक् कर सकते हैं। भिन्न क्वथनांकों वाले द्रव भिन्न ताप पर वाष्पित होते हैं। वाष्पों को ठण्डा करने से प्राप्त द्रवों को अलग-अलग एकत्र कर लेते हैं। क्लोरोफॉर्म (क्वथनांक 334K) और ऐनिलीन (क्वथनांक 457 K) को आसवन विधि द्वारा आसानी से पृथक् कर सकते हैं। द्रव-मिश्रण को गोल पेंदे वाले फ्लास्क में लेकर हम सावधानीपूर्वक गर्म करते हैं। उबालने पर कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है। वाष्प को संघनित्र की सहायता से संघनित करके प्राप्त द्रव को ग्राही में एकत्र कर लेते हैं। उच्च क्वथनांक वाले घटक के वाष्प बाद में बनते हैं। इनमें संघनन से प्राप्त द्रव को दूसरे ग्राही में एकत्र कर लेते हैं।

(ग) वर्णलेखन (Chromatography)-‘वर्णलेखन (क्रोमैटोग्रफी) शोधन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तकनीक है जिसका उपयोग यौगिकों का शोधन करने में, किसी मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने तथा यौगिकों की शुद्धता की जाँच करने के लिए विस्तृत रूप से किया जाता है। क्रोमैटोग्रफी विधि का उपयोग सर्वप्रथम पादपों में पाए जाने वाले रंगीन पदार्थों को पृथक् करने के लिए किया गया था। ‘क्रोमैटोग्रैफी’ शब्द ग्रीक शब्द क्रोमा’ (chroma) से बना है जिसका अर्थ है ‘रंग’। इस तकनीक में सर्वप्रथम यौगिकों के मिश्रण को स्थिर प्रावस्था (stationary phase) पर अधिशोषित कर दिया जाता है। स्थिर प्रावस्था ठोस अथवा द्रव हो सकती है। इसके पश्चात् स्थिर प्रावस्था में से उपयुक्त विलायक, विलायकों के मिश्रणं अथवा गैस को धीरे-धीरे प्रवाहित किया जाता है। इस प्रकार मिश्रण के अवयव क्रमशः एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। गति करने वाली प्रावस्था को ‘गतिशील प्रावस्था (mobile phase) कहते हैं। अन्तर्ग्रस्त सिद्धान्तों के आधार पर वर्णलेखन को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से दो हैं-

  1. अधिशोषण-(वर्णलेखन) (Adsorption chromatography)—यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि किसी विशिष्ट अधिशोषक’ (adsorbent) पर विभिन्न यौगिक भिन्न अंशों में अधिशोषित होते हैं। साधारणतः ऐलुमिना तथा सिलिका जेल अधिशोषक के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। स्थिर प्रावस्था (अधिशोषक) पर गतिशील प्रावस्था प्रवाहित करने के उपरान्त मिश्रण के अवयव स्थिर प्रावस्था पर अलग-अलग दूरी तय करते हैं। निम्नलिखित दो प्रकार की वर्णलेखन-तकनीकें हैं, जो विभेदी-अधिशोषण सिद्धान्त पर आधारित हैं-
    • कॉलम-वर्णलेखन अर्थात् स्तम्भ-वर्णलेखन (Column Chromatography)
    • पतली पर्त वर्णलेखन (Thin Layer Chromatography)
  2. वितरण क्रोमैटोग्रैफी (Partition chromatography)–वितरण क्रोमैटोग्रॅफी स्थिर तथा गतिशील प्रावस्थाओं के मध्य मिश्रण के अवयवों के सतत् विभेदी वितरण पर आधारित है। कागज वर्णलेखन (paper chromatography) इसका एक उदाहरण है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार के क्रोमैटोग्रॅफी कागज का इस्तेमाल किया जाता है। इस कागज के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।

प्रश्न 19.
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक करने की विधि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक् करने के लिए। क्रिस्टलन विधि प्रयोग की जाती है। इस विधि में अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं। जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय तथा उच्च ताप पर विलेय होता है। इसके पश्चात् विलयन को सान्द्रित करते हैं जिससे वह लगभग संतृप्त हो जाए। अब अल्प-विलेय घटक पहले क्रिस्टलीकृत हो जाएगा तथा अधिक विलेय घटक पुनः गर्म करके ठण्डा करने पर क्रिस्टलीकृत होगा। इसके अतिरिक्त सक्रियित काष्ठ कोयले की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाल दी जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धि की विलेयताओं में कम अन्तर होने पर बार-बार क्रिस्टलन करने पर शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 20.
आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अन्तर है? विवेचना कीजिए।
उत्तर
आसवन का तात्पर्य द्रव का वाष्प में परिवर्तन तथा वाष्प का संघनित होकर शुद्ध द्रव देना है। इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के शोधन में किया जाता है जो बिना अपघटित हुए उबलते हैं तथा जिनमें अवाष्पशील अशुद्धियाँ होती हैं।
निम्न दाब पर आसवन में भी गर्म करने पर द्रव वाष्प में परिवर्तित होता है तथा संघनित होकर शुद्ध द्रव देता है परन्तु यहाँ निकाये पर कार्यरत् दाब वायुमण्डलीय दाब नहीं होता है; उसे निर्वात् पम्प की सहायता से घटा दिया जाता है। दाब घटाने पर द्रव का क्वथनांक घट जाता है। अतः इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के शोधन में किया जाता है जिनके क्वथनांक उच्च होते हैं या वे अपने क्वथनांक से नीचे अपघटित हो जाते हैं।
भाप आसवन कम दाब पर आसवन के समान होता है लेकिन इसमें कुल दाब में कोई कमी नहीं आती है। इसमें कार्बनिक द्रव तथा जल उस ताप पर उबलते हैं जब कार्बनिक द्रव का वाष्प दाब (p1) तथा जल का वाष्प दाब (p2) वायुमण्डलीय दाब (p) के बराबर हो जाते हैं।

p= p1 + p-कक्षकों

इस स्थिति में कार्बनिक द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर उबलता है जिससे उसका अपघटन नहीं होता है।

प्रश्न 21.
लैंसे-परीक्षण का रसायन-सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर
किसी कार्बनिक यौगिक में शुपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजेन तथा फॉस्फोरस की पहचान ‘लैंसे-परीक्षण’ (Lassaigne’s Test) द्वारा की जाती है। यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर ये तत्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इनमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं-

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C, N, S तथा X कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्व हैं। सोडियम संगलन से प्राप्त अवशेष को आसुत जल के साथ उबालने पर सोडियम सायनाइड, सल्फाइड तथा हैलाइड जल में घुल जाते हैं। इस निष्कर्ष को ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ (Sodium Fusion Extract) कहते हैं।

प्रश्न 22.
किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की (i) ड्यूमा विधि तथा (ii) कैल्डाल विधि के सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
नाइट्रोजन के परिमाणात्मक निर्धारण की निम्नलिखित दो विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं-
(i) ड्यूमा विधि (Duma’s Method)–नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर इसमें उपस्थित कार्बन, हाइड्रोजन, गन्धक तथा नाइट्रोजन क्रमशः CO2, H2O, SO2 और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों (NO2, NO, N2O) के रूप में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। इस गैसीय मिश्रण को रक्त तप्त कॉपर की जाली के ऊपर प्रवाहित करने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का नाइट्रोजन में अपचयन हो जाता है।

4Cu + 2NO2 → 4CuO + N2
2Cu +2NO → 2CuO +N2
Cu +N2O → CuO + N2

इस प्रकार N2, CO2, H2O तथा SO2 युक्त गैसीय मिश्रण को KOH से भरी नाइट्रोमीटर नामक अंशांकित नली में प्रवाहित करने पर CO2, H2O तथा SO2 का KOH द्वारा अवशोषण हो जाता है। और बची हुई N2 गैस को नाइट्रोमीटर में जल के ऊपर एकत्र कर लिया जाता है। इस नाइट्रोजन का आयतन वायुमण्डल के दाब तथा ताप पर नोट कर लेते हैं। फिर इस आयतन को गैस समीकरण की सहायता से सामान्य ताप व दाब (N.T.P) पर परिवर्तित कर लेते हैं।

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(ii) कैल्डाल विधि (Kjeldahl’s Method)-यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि जब किसी नाइट्रोजनयुक्त कार्बन यौगिक को पोटैशियम सल्फेट की उपस्थिति में सान्द्र H2SO4 के साथ गर्म करते हैं तो उसमें उपस्थित नाइट्रोजन पूर्णरूप से अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रकार प्राप्त अमोनियम सल्फेट को साद्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर अमोनिया गैस निकलती है जिसको ज्ञात सान्द्रण वाले H2SO4 के निश्चित आयतन में अवशोषित कर लेते हैं। इस अम्ल का मानक NaOH के साथ अनुमापन करके गणना द्वारा अवशोषित हुई अमोनिया की मात्रा ज्ञात की जाती है। फिर नाइट्रोजन के आयतन की गणना कर ली जाती है।

(NH4)2SO4 + 2NaOH → Na2SO4 + 2H2O + 2NH3
2NH3 + H2SO4 → (NH4)2SO4

मान लिया, कार्बनिक यौगिक का भार = m
प्रयुक्त अम्ल का आयतन =y मिली
प्रयुक्त अम्ल की नॉर्मलता = N

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प्रश्न 23.
किसी यौगिक में हैलोजेन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर
(i) हैलोजेन का आकलन (Estimation of Halogens)
कार्बनिक यौगिक के ज्ञात भार को सधूम HNO3 तथा AgNO3 के कुछ क्रिस्टलों के साथ केरियस नली में लेते हैं। नली का ऊपरी सिरा बन्द कर दिया जाता है। केरियस नली को विद्युत भट्टी में रखकर 180°-200°C पर लगभग 3-4 घण्टे गर्म करते हैं। यौगिक में उपस्थित हैलोजेन (Cl, Br, I), सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप में बदल जाते हैं। सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप को धोकर तथा सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त सिल्वर हैलाइड के भार से हैलोजेन की प्रतिशत मात्रा निम्नलिखित गणना की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं-

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(ii) सल्फर का आकलन (Estimation of Sulphur)
इस सिद्धान्त के अनुसार, सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर यौगिक में उपस्थित समस्त गन्धक, सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाती है। इसमें BaCl2 विलयन मिलाकर इससे BaSO4 अवक्षेपित कर लिया जाता है। इस अवक्षेप को छानकर, धोकर और सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार BaSO4 के भार की सहायता से गन्धक की प्रतिशत मात्रा की गणना कर लेते हैं।
अभिक्रियाएँ-

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(iii) फॉस्फोरस का आकंलन (Estimation of Phosphorus)
कार्बनिक यौगिक की एक ज्ञातं मात्रा को सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर उसमें उपस्थित फॉस्फोरस, फॉस्फोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है। इसे अमोनिया तथा अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोटोमॉलिब्डेट, (NH4)3 PO4.12MoO3 के रूप में हम अवक्षेपित कर लेते हैं, अन्यथा फॉस्फोरिक अम्ल में मैग्नीशिया मिश्रण मिलाकर MgN4PO4 के रूप में अवक्षेपित किया जा सकता है जिसके ज्वलन से Mg2P2O7 प्राप्त होता है।
माना कि कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = m ग्राम और
अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट = m1 ग्राम

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जहाँ Mg2P2O7 का मोलर द्रव्यमान 222 u, लिए गए कार्बनिक पदार्थ का द्रव्यमान का बने हुए Mg2P2O7 का द्रव्यमान m1 तथा Mg2P2O7) यौगिक में उपस्थित दो फॉस्फोरस परमाणुओं का द्रव्यमान 62 है।

प्रश्न 24.
पेपर क्रोमैटोग्रॅफी के सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर
पेपर क्रोमैटोग्रैफी (Paper Chromatography) पेपर क्रोमैटोग्रॅफी वितरण क्रोमैटोग्रॅफी का एक प्रकार है। कागज अथवा पेपर क्रोमैटोग्रफी में एक विशिष्ट प्रकार का क्रोमैटोग्रफी पेपर प्रयोग किया जाता है। इस पेपर के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।
क्रोमैटोग्रॅफी कागज की एक पट्टी (strip) के आधार पर मिश्रण का बिन्दु लगाकर उसे जार में लटका देते हैं (चित्र-4)। जार में कुछ ऊँचाई तक उपयुक्त विलायक अथवा विलायकों का मिश्रण भरा होता है, जो गतिशील प्रावस्था का कार्य करता है। केशिका क्रिया के कारण पेपर की पट्टी पर विलायके ऊपर की ओर बढ़ता है तथा बिन्दु पर प्रवाहित होता है। विभिन्न यौगिकों का दो प्रावस्थाओं में वितरण भिन्न-भिन्न होने के कारण वे अलग-अलग दूरियों तक आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार विकसित पट्टी को ‘क्रोमैटोग्राम’ (chromatogram) कहते हैं। पतली पर्त की भाँति पेपर की पट्टी पर विभिन्न बिन्दुओं की स्थितियों को या तो पराबैंगनी प्रकाश के नीचे रखकर या उपयुक्त अभिकर्मक के विलयन को छिड़ककर हम देख लेते हैं।
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प्रश्न 25.
‘सोडियम संगलने निष्कर्ष में हैलोजेन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?
उत्तर
NaCN तथा Na2S को विघटित करने के लिए सोडियम निष्कर्ष को नाइट्रिक अम्ल के साथ उबाला जाता है।

NaCN+ HNO3 → NaNO3 + HCN↑
Na2S + 2HNO3 → 2NaNO3 + H2S ↑

यदि वे विघटित नहीं होते हैं तब वे AgNO3 से अभिक्रिया करके परीक्षण में निम्न प्रकार बाधा पहुँचाते हैं-

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प्रश्न 26.
नाइट्रोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के परीक्षण के लिए सोडियम के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है?
उत्तर
कार्बनिक यौगिक का सोडियम के साथ संगलन सह-संयोजी रूप में उपस्थित इन तत्त्वों को आयनिक रूप में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 27.
कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।
उत्तर
कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण को निम्न विधियों द्वारा पृथक् किया जा सकता है-

  1. कपूर ऊर्ध्वपातनीय है लेकिन कैल्सियम सल्फेट नहीं। अत: मिश्रण को ऊर्ध्वपातित करने पर कपूर फनल के किनारों पर प्राप्त हो जाता है जबकि कैल्सियम सल्फेट चाइना डिश में शेष रह जाता है।
  2. कपूर कार्बनिक विलायकों, जैसे- CCl4, CHCl3 आदि में विलेय होता है लेकिन कैल्सियम सल्फेट नहीं। अतः मिश्रण को कार्बनिक विलायक के साथ हिलाने पर कपूर विलयन में चला जाता है जबकि CaSO4 अपशिष्ट रूप में रहता है। विलयन को छानकर, वाष्पित करके कपूर को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 28.
भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत। क्यों हो जाता है?
उत्तर
भाप आसवन में, कार्बनिक द्रव और जल का मिश्रण उस ताप पर उबलता है जिस पर द्रव तथा जल के दाबों का योग वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है। मिश्रण के क्वथनांक पर जल का वाष्प दाब उच्च तथा द्रव का वाष्प दाब अत्यधिक कम (10-15mm) होता है अत: कार्बनिक द्रव वायुमंडलीय दाब से कम दाब पर आसवित हो जाता है अर्थात् कार्बनिक द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर ही आसवित हो जाता है।

प्रश्न 29.
क्या CCl4 सिल्वर नाइट्रेट के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप देगा? अपने उत्तर को कारण सहित समझाइए।
उत्तर
AgCl का अवक्षेप नहीं बनेगा क्योंकि CCl4 सहसंयोजी यौगिक है तथा आयनित होकर Cl आयन नहीं देता है।

प्रश्न 30.
किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर
CO2 अम्लीय प्रकृति की होती है तथा प्रबल क्षार KOH से क्रिया करके K2CO3 बनाती है।

2KOH+ CO2 →K2CO3 + H2OAr

इससे KOH का द्रव्यमान बढ़ जाता है। निर्मित CO2 के कारण द्रव्यमान में वृद्धि से कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन की मात्रा की गणना निम्न सम्बन्ध का प्रयोग करके की जाती है

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प्रश्न 31.
सल्फर के लेड ऐसीटेटू द्वारा परीक्षण में सोडियम संगलन निष्कर्ष को ऐसीटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा। क्यों?
उत्तर
सल्फर के परीक्षण में सोडियम निष्कर्ष को CH3COOH से अम्लीकृत करते हैं क्योकि लेड ऐसीटेट विलेय होता है तथा परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करता है। यदि H2SO4 का प्रयोग किया जाए तब लेड ऐसीटेट H2SO4 से क्रिया करके लेड सल्फेट का सफेद अवक्षेप बनाता है जो परीक्षण में बाधा उत्पन्न करता है।

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प्रश्न 32.
एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20 g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
की मात्राओं की गणना कीजिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-40

प्रश्न 33.
0.50 g कार्बनिक यौगिक को कैल्डाल विधि के अनुसार उपचारित करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5 M H2SO4 के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण के लिए 0.5 M NaOH के 50 mL की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 34.
केरियस आकलन में 0.3780 g’कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740 g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 35.
केरियस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0.468 g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.668 g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ। दिए गए कार्बन यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 36.
CH2= CH-CH2-CH2-C = CH, कार्बनिक यौगिक में C2—C3 आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?
(क) sp-sp2
(ख) sp-sp3
(ग) sp2 -sp3
(घ) sp2 -sp3
उत्तर
(ग) sp2 -sp3

प्रश्न 37.
किसी कार्बनिक यौगिक में लैंसे-परीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू रंग निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?
(क) Na4 [Fe(CN)6l
(ख) Fe4[Fe(CN)6l3
(ग) Fe2[Fe(CN)6)
(घ) Fe3[Fe(CN)6l4
उत्तर
(ख) Fe4 [Fe(CN)6l3

प्रश्न 38.
निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है?
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उत्तर
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प्रश्न 39.
कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) ऊर्ध्वपातन
(घ) क्रोमैटोग्रैफी
उत्तर
(घ) क्रोमैटोग्रॅफी।

प्रश्न 40.
CH3CH2I+ ROH(aq) → CH2CH2OH+ KI अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए
(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन
उत्तर
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
CH3-CH (CH3)-CO-CH2-CH2OH का IUPAC नाम है।
(i) 1 हाइड्रॉक्सी-4 मेथिल-3 पेन्टेनॉन
(ii) 2 मेथिल-5 हाइड्रॉक्सी -3 पेन्टेनॉन
(iii) 4 मेथिल-3 ऑक्सी-1 पेन्टेनॉल
(iv) 1-हेक्सेनॉल-3 ऑन
उत्तर
(i) 1 हाइड्रॉक्सी-4 मेथिल-3 पेन्टेनॉन

प्रश्न 2.
निम्न में CH3OC2H5 का कौन-सा IUPAC नाम सही है ?
(i) एथिल मेथिल ईथर
(ii) मेथिल एथिल ईथर
(iii) मेथॉक्सी एथेन
(iv) एथॉक्सी मेथेन
उत्तर
(iii) मेथॉक्सी एथेन

प्रश्न 3.
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(i) 2, 3, 3, 4, 5 पेन्टामेथिल पेन्टेन
(ii) 2,3, 3, 4 ट्रेटामेथिल हेक्सेन
(iii) 1,2,3, 3, 4 पेन्टामेथिल पेन्टेन
(iv) 4 एथिल, 2, 3, 4 ट्राइमेथिल ब्यूटेन
उत्तर
(ii) 2, 3,3,4 ट्रेटामेथिल हेक्सेन

प्रश्न 4.
CH2 = CH—CH(CH3)2 यौगिक का आई० पू० पी० ए० सी० पद्धति में नाम है।
(i) 1, 1 डाइमेथिल-2 प्रोपीन
(ii) 3,3 डाइमेथिल-1-प्रोपीन
(iii) 3-मेथिल-1-ब्यूटीन
(iv) 1 आइसोप्रोपिल एथिलीन
उत्तर
(ii) 3 मेथिल-1-ब्यूटीन

प्रश्न 5.
लैक्टिक अम्ल का आई० पू० पी० ए० सी० नाम है।
(i) 2 हाइड्रॉक्सी-3 प्रोपेनॉइक अम्ल
(ii) 1 कार्बोक्सी-2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेन
(iii) 2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेनॉइक अम्ल
(iv) 1 कार्बोक्सी एथेनॉल
उत्तर
(iii) 2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेनॉइक अम्ल

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी कार्बोधनायन है।
(i) एथिल कार्बोधनायन
(ii) प्राथमिक कार्योधनायन
(iii) द्वितीयक कार्बाधिनायन
(iv) तृतीयक कार्बोधनायन
उत्तर
(iv) तृतीयक कार्बोधनायन

प्रश्न 7.
ऋण आवेशित कार्बन वाले कार्बनिक समूह को कहते हैं।
(i) मुक्त मूलक
(ii) कार्बन आयन
(iii) लूइस अम्ल
(iv) कार्बोनियम आयन
उत्तर
(ii) कार्बन आयन

प्रश्न 8.
निम्न में से कौन-सा कार्ब-एनायन सबसे अधिक स्थायी है ?
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उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-48

प्रश्न 9.
मुक्त मूलक का लक्षण नहीं होता है।
(i) विद्युत उदासीनता ।
(ii) अनुचुम्बकीय गुण
(iii) अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति
(iv) हेटरोलिटिक विदलन से बनता है।
उत्तर
(iv) हेटरोलिटिक विदलन से बनता है।

प्रश्न 10.
मेथेन का सूर्य के प्रकाश में क्लोरीनीकरण है।
(i) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(iii) मुक्त मूलक प्रतिस्थापन
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(iii) मुक्त मूलक प्रतिस्थापन

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक है।
(i) लूइस अम्ल
(ii) लूइस क्षार
(iii) मुक्त मूलक
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) लूइस क्षार

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक है।
(i) R2N
(ii) SO3
(iii) BF2
(iv) NO+2
उत्तर
(i) R3N

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक नहीं है।
(i) NH3
(ii) AlCl3
(iii) H2O
(iv) Cl
उत्तर
(ii) AlCl3

प्रश्न 14.
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-49 यह अभिक्रिया है।
(i) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक
(iii) नाभिकस्नेहीं योगात्मक
(iv) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
उत्तर
(iii) नाभिकस्नेही योगात्मक

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक है।
(i) BF3
(ii) NH3
(iii) H2O
(iv) R — OH
उत्तर
(i) BF3

प्रश्न 16.
ऐल्कीन में हैलोजन अम्ल का योग है।
(i) न्यूक्लियोफिलिक योग
(ii) इलेक्ट्रोफिलिक योग
(iii) मुक्त मूलक
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) इलेक्ट्रोफिलिक योग

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खुली श्रृंखला यौगिक अथवा अचक्रीय यौगिक अथवा ऐलिफैटिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
जिन कार्बनिक यौगिकों में कार्बन परमाणुओं की खुली श्रृंखला होती है, खुली श्रृंखला यौगिक अथवा अचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। इन यौगिकों को ऐलिफैटिक यौगिक भी कहते हैं।
उदाहरणार्थ-
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प्रश्न 2.
बन्द श्रृंखला यौगिक अथवा चक्रीय यौगिक की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिए।
उत्तर
जिन कार्बनिक यौगिकों में परमाणुओं की एक या उससे अधिक बन्द श्रृंखलाएँ अथवा वलय होते हैं, बन्द श्रृंखला यौगिक अथवा चक्रीय यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-51

प्रश्न 3.
समचक्रीय तथा विषमचक्रीय यौगिक क्या होते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
समचक्रीय यौगिक-वे यौगिक जिनमें वलय केवल कार्बन परमाणुओं का बना होता है, समुचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-साइक्लोप्रोपेन, डाइफेनिल, बेंजीन, टॉलूईन आदि।। विषमचक्रीय यौगिक-वे बन्द श्रृंखला यौगिक जिनकी वलय में विषम परमाणु (कार्बन तथा हाइड्रोजन के अतिरिक्त अन्य परमाणु, जैसे–N, O, s आदि) होते हैं, विषमचक्रीय यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ–फ्यूरेन, थायोफीन, पिरीडीन आदि।

प्रश्न 4.
ऐलिसाइक्लिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
वे समचक्रीय यौगिक जिनके गुण ऐलिफैटिक यौगिकों के गुणों से मिलते-जुलते होते हैं, ऐलिसाइक्लिक यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-52

प्रश्न 5.
ऐरोमैटिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
ये विशेष प्रकार के चक्रीय असंतृप्त यौगिक हैं। इन यौगिकों के लिए ऐरोमैटिक शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में खोजे गये कुछ यौगिकों की मीठी गन्धं होने के कारण किया गया था परन्तु अब दुर्गन्धयुक्त ऐरोमैटिक भी ज्ञात हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-53

प्रश्न 6.
क्रियात्मक समूह से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
किसी अणु में उपस्थित परमाणु अथवा परमाणुओं का समूह, जो मुख्य रूप से उसके रासायनिक गुण निर्धारित करता है, क्रियात्मक समूह कहलाता है।

प्रश्न 7.
ऐल्डिहाइड यौगिक में कौन-सा क्रियात्मक समूह होता है?
उत्तर
ऐल्डिहाइड यौगिक में —CHO क्रियात्मक समूह होता है।

प्रश्न 8.
IUPAC नामकरण पद्धति में प्राथमिक अनुलग्न क्या दर्शाता है।
उत्तर
IUPAC नामकरण पद्धति में प्राथमिक अनुलग्न दर्शाता है कि कार्बन श्रृंखला संतृप्त है अथवा असंतृप्त।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
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उत्तर
(i) N, N-डाइमेथिल-2-मेथिल प्रोपेनाइन
(ii) आइसोप्रोप्रिल प्रोपोनेट
(iii) 3-मेथिल पेन्टानोइक ऐसिड
(iv) 2, 4-डाइमेथिल हेक्सेन
(v) हेप्ट-5-ईन-3-आइन, 2-ओन
(vi) 3-ब्रोमो, 2-क्लोरो, 4-आयोडो हेक्सेन
(vii) हाइड्रॉक्सी 2-फेनिल प्रोपेनोइक ऐसिड
(viii) 2-ब्रोमो, एथिल प्रोपानोएट
(ix) N मेथिल 2-प्रोपेनामीन
(x) प्रोपेन 1, 2, 3-ट्राइकार्बोनाइट्राइल
(xi) 3-ब्रोमो, 3-क्लोरो, 2-मेथिल ब्यूटेनोइक ऐसिड
(xii) 4-हाइड्रॉक्सी 4-मेथिल, पेन्टेनोन-2

प्रश्न 10.
IUPAC पद्धति में निम्नलिखित संरचना सूत्र वाले यौगिकों का नाम बताइए
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उत्तर
(i) ब्यूट-3-ईन-1-आइन
(ii) पेन्ट-3-ईन-1-आइन
(iii) 2, 2, 3-ट्राइक्लोरो ब्यूटेन-1 ऑल
(iv) 2-मेथिल 1, 4-हेक्सेन-डाई-ऑल।
(v) 2-हाइड्रॉक्सी ब्यूटेन-1 ऑल
(vi) 2-एथिल-4-मेथिल हेक्सेन
(vii) 2-ब्यूटेनल
(viii) 2-प्रोपेनल
(ix) 3-मेथिल-पेन्टेन-2 ऑन
(x) हाइड्रॉक्सी ब्यूटेनोइक अम्ल
(xi) प्रोपेनॉइल क्लोराइड
(xii) 3-मेथिल ब्यूटेनॉइल क्लोराइड

प्रश्न 11.
समतल ध्रुवित प्रकाश किसे कहते हैं? यह कैसे प्राप्त किया जाता है?
उत्तर
वह प्रकाश जिसमें कम्पन केवल एक ही तल में होते हैं, समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाता है। साधारण प्रकाश की किरण को निकोल प्रिज्म में से प्रवाहित करने पर वह समतल ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 12.
ध्रुवण घूर्णकता क्या है?
उत्तर
कुछ पदार्थों में क्रिस्टलीय अवस्था या विलयन अवस्था में समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं ओर या बायीं ओर घुमाने का गुण होता है। पदार्थों के इस गुण की ध्रुवण घूर्णकता कहते हैं। उदाहरणार्थ-लैक्टिक अम्ल, टार्टरिक अम्ल, ग्लूकोस आदि।

प्रश्न 13.
किरेल एवं अकिरेल अणु क्या होते हैं?
उत्तर
जो अणु दायें ओर बायें हाथों की भाँति अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होते हैं वे किरेल अणु कहलाते है। उदाहरणार्थ-2-ब्यूटेनॉल अणु। जबकि जो अणु दायें और बायें हाथों की भॉति अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित होते हैं, वे अकिरेल अणु कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-1-ब्यूटेनॉल अणु।।

प्रश्न 14.
असममित कार्बन परमाणु क्या है?
उत्तर
किसी अणु में जो चतुष्फलकीय कार्बन परमाणु चार भिन्न परमाणुओं या समूहों से जुड़ा होता है, असममित कार्बन परमाणु कहलाता है।

प्रश्न 15.
कार्बोनियम आयन को उदाहरण सहित समझाइए। इसके दो गुण लिखिए।
उत्तर
वह धनावेशित आयन जिसमें कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तथा धनावेशित कार्बन परमाणु के संयोजी कोश में केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, कार्बोधनायन या कार्बोनियम आयन कहलाता है।
उदाहरणार्थ-

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कार्बोनियन आयन के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. इनका अष्टक अपूर्ण होता है।
  2. ये धनावेशित होते हैं। अत: इनकी प्रकृति इलेक्ट्रॉनस्नेही होती है।

प्रश्न 16.
कार्बनायन किसे कहते हैं? कार्बनायन की दो विशेषताएँ लिखिए। किसी एक कार्बनायन का सूत्र भी लिखिए।
उत्तर
वह ऋणावेशित आयन जिसमें कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तथा ऋणावेशित कार्बन के पास एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, कार्बनायन कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-59

कार्बनायनों की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-

  1. ऋणावेशित कार्बन के पास एक-एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है।
  2. इनका निर्माण विषमांगी (हेटरोलिटिक) विदलन से होता है।

प्रश्न 17.
मुक्त मूलक क्या होते हैं? ये किस प्रकार बनते हैं?
उत्तर
उदासीन परमाणु या परमाणुओं का समूह जिसके पास विषम या अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, मुक्त मूलक (free radical) कहलाता है। मुक्त मूलक के प्रतीक अथवा सूत्र में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को एक बिन्दु द्वारा प्रदर्शित करते हैं।’ जैसे—UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-60क्लोरीन मुक्त मूलक को प्रदर्शित करता है। मुक्त मूलक बहुत अस्थायी और बहुत क्रियाशील होते हैं। मुक्त मूलक सह-संयोजी बन्ध में होमोलिटिक विदलन से उत्पन्न होता है। जैसे—क्लोरीन अणु को मुक्त मूलकों में विखण्डन सूर्य के प्रकाश या ऊष्मा द्वारा होता है।
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प्रश्न 18.
आयम तथा मुक्त मूलक में क्या अन्तर है?
उत्तर
आयन तथा मुक्त मूलक में प्रमुख अन्तर इस प्रकार हैं-
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प्रश्न 19.
प्रेरणिक प्रभाव व इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में अन्तर लिखिए।
उत्तर
प्रेरणिक प्रभाव व इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में निम्नलिखित अन्तर हैं-
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प्रश्न 20.
नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया नाभिकस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे नाभिकस्नेही । प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। इसे SN द्वारा प्रकट करते हैं। ऐल्किल हैलाइंडों की प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ नाभिकस्नेही अभिक्रियाएँ होती हैं।
उदाहरणार्थ-ऐल्किल हैलाइड का जलीय क्षारक द्वारा जल-अपघटन

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प्रश्न 21.
SN1 अभिक्रिया से क्या अभिप्राय है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
इस अभिक्रिया में आक्रमणकारी अभिकर्मक नाभिकस्नेही जैसे–OH ,CN आदि होते हैं। इन अभिक्रियाओं की दर केवल एक स्पीशीज के सान्द्रण पर निर्भर करती है अतः इन अभिक्रियाओं को SM1 से प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरण—-ब्यूटिल क्लोराइड की जल तथा ऐसीटोन के मिश्रण में सोडियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया द्वारा 1-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल बनता है।

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प्रश्न 22.
मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया मुक्त मूलक अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ-विसरित प्रकाश में मेथेन तथा क्लोरीन की अभिक्रिया

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इस अभिक्रिया में आक्रमणकारी अभिकर्मक एक मुक्त मूलक (Cl·) होता है।

प्रश्न 23.
योगात्मक या संकलन अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
वे अभिक्रियाएँ जिनमें दो अणु संयोग करके एक अणु बनाते हैं योगात्मक या संकलन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। ये अभिक्रियाएँ सामान्यत: बहुआबन्ध युक्त कार्बनिक यौगिकों में होती हैं। इन अभिक्रियाओं में एक π – आबन्धका विदलन हो जाता है तथा दो σ -आबन्ध बनते हैं।
उदाहरणार्थ-

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समावयवता किसे कहते हैं? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
जिन यौगिकों के अणुसूत्र समान होते हैं परन्तु गुण भिन्न-भिन्न होते हैं समावयवी कहलाते हैं। तथा यह परिघटना समावयवता कहलाती है। उदाहरणार्थ-एथिल ऐल्कोहॉल और डाइमेथिल ईथर दोनों समावयवी हैं।

प्रश्न 2.
संरचनात्मक समावयवता को परिभाषित कीजिए इसके प्रकार भी लिखिए।
उत्तर
संरचनात्मक समावयवता अणुओं के संरचना सूत्रों में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। संरचनात्मक समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनके संरचना सूत्र भिन्न-भिन्न होते हैं। संरचनात्मक समावयवता के प्रमुख प्रकार निम्नवत् हैं-

  1. श्रृंखला समावयवता,
  2. स्थाने समावयवता,
  3. क्रियात्मक समूह समावयवता,
  4. मध्यावयवता तथा
  5. चलावयवता

प्रश्न 3.
श्रृंखला समावयवता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
श्रृंखला समावयवता अणुओं के कार्बन श्रृंखला की रचना में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। श्रृंखला समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं, परन्तु उनकी कार्बन श्रृंखलाओं की रचना में भिन्नता होती है। श्रृंखला समावयवी समान सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं।
उदाहरणार्थ-ब्यूटेन के दो श्रृंखला समावयवी हैं जिनके संरचना सूत्र निम्नवत् हैं-

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प्रश्न 4.
स्थान समावयवता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
स्थान समावयवता कार्बन श्रृंखला में किसी प्रतिस्थापी समूह या युग्म बन्ध के स्थान में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। स्थान समावयवियों के अणुसूत्र एवं कार्बन श्रृंखला की रचना तो समान होती है परन्तु उनकी कार्बन श्रृंखला में प्रतिस्थापी समूह या युग्म बन्ध का स्थान भिन्न होता है। स्थान समावयवी भी सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं।
उदाहरणार्थ- 1-ब्यूटीन और 2-ब्यूटीन, ब्यूटीन के दो स्थान समावयवी हैं।

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प्रश्न 5.
क्रियात्मक समूह समावयवता को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
क्रियात्मक समूह समावयवता अणुओं में भिन्न क्रियात्मक समूहों की उपस्थिति के कारण होती है। क्रियात्मक समूह समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनमें क्रियात्मक समूह भिन्न-भिन्न होते हैं। क्रियात्मक समूह समावयवी भिन्न-भिन्न सजातीय श्रेणियों के यौगिक होते हैं।
उदाहरणार्थ-एथिल ऐल्कोहॉल तथा डाइमेथिल ईथर क्रियात्मक समूह समावयवी हैं।

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प्रश्न 6.
मध्यावयवता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
मध्यावयवता किसी द्वि-संयोजी क्रियात्मक समूह से जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। मध्यावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनमें द्वि-संयोजी क्रियात्मक समूह में जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। मध्यावयवी एक ही सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं। ईथर, ऐल्किल सल्फाइड, द्वितीयक ऐमीन, एस्टर आदि मध्यावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-डाइएथिले सल्फाइड एवं मेथिल-n-प्रोपिल सल्फाइड मध्यावयवी हैं।

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प्रश्न 7.
चयावयवता का वर्णन कीजिए।
उत्तर
यह एक विशेष प्रकार की संरचनात्मक समावयवता है जिनमें दो संरचनात्मक समावयवी सरलता से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं तथा समावयवियों के मध्य साम्यावस्था विद्यमान होती है। वह परिघटना जिसमें दो संरचना समावयवी सरलता में एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं और परस्पर साम्यवस्था में रहते हैं चलावयव या चलावयवी रूप कहलाते हैं।
यौगिक विभिन्न प्रकार की चलावयवता प्रदर्शित करते हैं जिनमें कीटो-ईनोल चलावयवता प्रमुख है। ऐल्डिहाइड और कीटोन जिनमें कार्बोनिल समूह के निकटवर्ती कार्बन परमाणु पर एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित होते हैं। कीटो-ईनोल चलावयवता प्रदर्शित करते हैं। कीटो-ईनोल चलावयवता -हाइड्रोजन परमाणु का निकटवर्ती कार्बोनिल समूह के ऑक्सीजन परमाणु पर अभिगमन होने में उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 8.
त्रिविम समावयवती को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
जब अणुओं में अनके परमाणुओं की आकाशीय व्यवस्था (विन्यास) में भिन्नता होती है तो यह परिघटना त्रिविम समावयवता कहलाती है। त्रिविम समावयवियों के अणुसूत्र एवं संरचना सूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनके परमाणुओं की आकाशीय व्यवस्था भिन्न-भिन्न होती है।
उदाहरणार्थ-2-ब्यूटीन की निम्नलिखित दो त्रिविम संरचनाएँ सम्भव हैं|

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प्रश्न 9.
त्रिविम समावयवियों के प्रकार बताइए।
उत्तर
त्रिविम समावयवी मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-

  1. प्रतिबिम्ब रूप तथा
  2. अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयव

जो त्रिविम समावयवी बायें एवं दायें हाथों के सदृश एक-दूसरे के अन-अध्यारोपणीय दर्पण प्रतिबिम्ब रूप कहलाते हैं जबकि जो त्रिविम समावयवी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं होते हैं, वे अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयवी कहलाते हैं।

प्रश्न 10.
ज्यामितीय समावयवता को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
प्राय: कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध युक्त वे यौगिक जिनमें युग्म-बन्धित कार्बन परमाणु में जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न प्रकार के होते हैं, ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित करते हैं, यह समावयवता युग्म बन्ध के चारों ओर सीमित घूर्णन के कारण उत्पन्न होती है।
उदाहरणार्थ-2-ब्यूटीन की। निम्नलिखित दो त्रिविम संरचनाएँ सम्भव हैं-

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ये दो त्रिविम संरचनाएँ (I एवं II) 2-ब्यूटीन के दो ज्यामितीय समावयवियों को प्रदर्शित करती हैं जो सिस-ट्रान्स समावयवी कहलाते हैं। जिन ज्यामितीय समावयवी में समान समूह एक ही पथ में होते हैं। उसे cis-समावयवी या समकक्ष रूप और जिनमें समान विपरीत पक्षों में होते हैं उसे trans-समावयवी या विपक्ष रूप कहते हैं।

प्रश्न 11.
प्रकाशिक समावयवता को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रकाशिक समावयवता एक प्रकार की त्रिविम समावयवता है तो उन कार्बनिक यौगिकों द्वारा दर्शायी जाती है जिनके अणु विसममित अर्थात् किरेल होते हैं। प्रकाशिक समावयवी समतल ध्रुवित प्रकाश के प्रति भिन्न व्यवहार प्रदर्शित करते हैं जो त्रिविम समावयवी ध्रुवित प्रकाश के तल को दक्षिणावर्त घुमाता है उसे दक्षिण ध्रुवण-घूर्णक ओर जो त्रिविम समावयवी ध्रुवित प्रकाश के तल को वामावर्त घुमाता है उसे वाम ध्रुवण-घूर्णक कहते हैं। ध्रुवण अघूर्णक प्रकाशिक समावयवी मेसो समावयवी कहलाते हैं। मेसो समावयवियों के अणु सममित होते हैं। प्रकाशिक समावयवियों के रासायनिक गुण में तो समानता होती है परन्तु उनके भौतिक गुण समान या भिन्न हो सकते हैं।
उदाहरणार्थ-लैक्टिक अम्ल की प्रकाशिक समावयवता

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प्रश्न 12.
एक यौगिक का सूत्र CH2OH—CHCl—CHOH—CHOH—CHCl—CH2OH है। यौगिक के प्रकाशिक संमावयवियों की गणना कीजिए।
उत्तर
यौगिक CH2OH—CHCl—CHOH—CHOH—CHCl—CH2OH के अणु में असममित कार्बन परमाणुओं की संख्या (n) चार है।

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यौगिक के अणु को एक जैसे दो बराबर भागों में विभाजित किया जा सकता है तथा अणु में असममित परमाणुओं की संख्या सम (even) है। अतः ऐसी स्थिति में यौगिक के,
ध्रुवण-घूर्णक समावयवियों की संख्या, a = 2(n-1) = 2(4-1) = 8
मेसो-समावयवियों की संख्या, m=2(n/2-1) = 2(2-1) =2
और प्रकाशिक समावयवियों की संख्या = a+m= 8+2= 10

प्रश्न 13.
होमोलिटिक तथा हेटरोलिटिक विदलन को एक उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
एक सह-संयोजी बन्ध दो परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन युग्म की साझेदारी द्वारा बनता है। इस प्रकार संयुक्त दो परमाणुओं को एक-दूसरे से अलग होना बन्ध का विदलन या विखण्डन कहलाता है।
(i) होमोलिटिक विदलन या समांग विखण्डन—यह वह प्रक्रम है जिसमें पृथक् होने वाली प्रत्येक परमाणु सह-संयोजी बन्ध के इलेक्ट्रॉन युग्म से एक इलेक्ट्रॉन लेकर पृथक् होता है। इस विदलन द्वारा उत्पन्न खण्डों के पास सह-संयोजक बन्ध का एक-एक इलेक्ट्रॉन होता है। इन खण्डों को मुक्त मूलक कहते हैं।

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उदाहरणार्थ-

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(ii) हेटरोलिटिक विदलन या विषमांग विखण्डन-इस विदलन में बन्ध के साझे का इलेक्ट्रॉन युग्म । किसी भी परमाणु या खण्ड के साथ चला जाता है और दो आयन बनते हैं।

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जब R+ एक ऐसा समूह होता है जिसके कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तो इसे कार्बोनियम आयनं कहते हैं तथा जब R के कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तो इसे कार्बनायन कहते हैं।

प्रश्न 14.
अनुनाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ऐसे अनेक कार्बनिक यौगिक ज्ञात हैं जिनके सभी गुणों को केवल एक लूईस संरचना (Lewis structure) द्वारा पूर्णतः प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है। ऐसे में यौगिक के अणु को अनेक ऐसी संरचनाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जिनमें से प्रत्येक अणु के अधिकांश गुणों की व्याख्या करती है, परन्तु कोई भी अणु के सभी गुणों की व्याख्या नहीं करती है। ऐसे में अणु की वास्तविक संरचना इन सभी योगदान करने वाली संरचनाओं (जिन्हें अनुनाद संरचनाएँ या विहित संरचनाएँ कहते हैं) की मध्यवर्ती होती है तथा इसे सभी लूईस संरचनाओं का अनुनाद संकर (resonance hybrid) कहते हैं। इस परिघटना को अनुनाद या मीसोमेरिकता कहते हैं।
वास्तव में अनुनाद संरचनाओं या विहित संरचनाओं (canonical structures) का कोई अस्तित्व नहीं है। वास्तव में अणु की केवल एक ही संरचना होती है जो कि विभिन्न विहित संरचनाओं का अनुनाद संकर होता है तथा इसे एक लूईस संरचना द्वारा प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है। किसी अणु की विभिन्न संरचनाओं को चिह्न (+) द्वारा पृथक् करके लिखा जाता है। बेंजीन भी एक ऐसा ही यौगिक है जिसके व्यवहार को केवल एक लूईस संरचना द्वारा समझाया नहीं जा सकता है। बेंजीन को निम्न दो अनुनादी संरचनाओं का अनुनाद संकर माना जाता है।

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प्रश्न 15.
अनुनाद प्रभाव या मीसोमेरिक प्रभाव को समझाइए।
उत्तर
संयुग्मित निकायों (जिनमें एकान्तर से एकल और द्विआबन्ध होते हैं) में अनुनाद के कारण निकाय के एक भाग से दूसरे भाग में इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन होता है जिसके कारण उच्च तथा निम्न इलेक्ट्रॉन घनत्व के केन्द्र बन जाते हैं। यह प्रभाव अनुनाद प्रभाव अथवा मीसोमेरिक प्रभाव कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है।
1. धनात्मक अनुनाद प्रभाव—यह प्रभाव उन समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जो द्विआबन्ध अथवा एक संयुग्मित निकाय को इलेक्ट्रॉन दान देते हैं। —Cl,—Br,I,-NH2,-NR2,–OH,-OR,-SH-SR आदि ऐसे समूहों के उदाहरण हैं।

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2. ऋणात्मकं अनुनाद प्रभाव—यह प्रभाव उन समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जो द्विआबन्ध या संयुग्मित निकाय से इलेक्ट्रॉन अपनी ओर विस्थापित करते हैं।

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प्रश्न 16.
अतिसंयुग्मन प्रभाव पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
संतृप्त निकाय पर ऐल्किल समूहों के प्रेरणिक प्रभाव का क्रम निम्न होता है

(CH3 )3 C—(CH3)2CH—>CH3CH2–>CH3

परन्तु जब ऐल्किल समूह किसी असंतृप्त निकाय से जुड़ा होता है तो प्रेरणिक प्रभाव का क्रम उल्टा हो । जाता है। यह प्रभावं अतिसंयुग्मन प्रभाव कहलाता है। चूंकि इस प्रभाव को सर्वप्रथम बेकर तथा नाथन ने देखा इसलिए इस प्रभाव को बेकर-नाथन प्रभाव भी कहते हैं।
अतिसंयुग्मन में द्विआबन्ध के p-कक्षकों तथा समीपवर्ती एकल आबन्ध के 6–कक्षक के अतिव्यापन के द्वारा 5-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण होता है। अत: इसमें -7 संयुग्मन (G-I conjugation) होता है। वास्तव में अतिसंयुग्मन प्रभाव अनुनाद प्रभाव का ही विस्तार है। चूंकि अतिसंयुग्मन – H परमाणुओं के द्वारा होता है, इसलिए 0- H परमाणुओं की संख्या जितनी अधिक होती है, उतनी ही अधिक अतिसंयुग्मी संरचनाएँ होती हैं और प्रभाव भी उतना ही अधिक होता है। मेथिल समूह, एथिल समूह, आइसोप्रोपिल समूह तथा तृतीयक-ब्यूटिल समूह के साथ हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या क्रमशः 3, 2, 1 तथा 0 होती है अतः इन विभिन्न समूहों के लिए अतिसंयुग्मन प्रभाव का क्रम निम्न होता है-

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प्रश्न 17.
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। इसे SE (S = substitution तथा E= electrophilic) से प्रकट करते हैं तथा SE1 और SE2 में 1 तथा 2 कोटि को प्रकट करते हैं। ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन; जैसे-हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण तथा सल्फोनीकरण SE 2 प्रकार के इलेक्ट्रोफिलिक (इलेक्ट्रॉनस्नेही) प्रतिस्थापन हैं।
उदाहरणार्थ-

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प्रश्न 18.
ऐल्काइनों की हाइड्रोजन हैलाइडों से योग क्रिया किस प्रकार की अभिक्रिया है ? इसकी क्रियाविधि समझाइए।
या
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण देते हुए समझाइए।
उत्तर
यदि योगात्मक अभिक्रिया इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं। प्रश्न में उल्लिखित अभिक्रिया भी एक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक (संकलन) अभिक्रिया है। ऐल्कीनों में हाइड्रोजन हैलाइड का योग कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध पर दो पदों में होता है। पहले पद में ऐल्किल हाइड्रोजन हैलाइड से प्रोटॉन H+ (इलेक्ट्रॉनस्नेही) ग्रहण करती है और कार्बोधनायन (मध्यवर्ती) तथा हैलाइड आयन बनाती है। दूसरे पद में कार्बोधनायन हैलाइड आयन से संयोग करता है और ऐल्किल हैलाइड बनाता है।
उदाहरणार्थ-एथिलीन में HBr का योग

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प्रश्न 19.
नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
उत्तर
यदि योगात्मक अभिक्रिया नाभिकस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ- मेथेनल (फॉर्मेल्डिहाइड) पर HCN का योग

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ऐल्डिहाइड और कीटोन मुख्यत: इसी प्रकार की अभिक्रियाएँ करते हैं।

प्रश्न 20.
मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि योगात्मक अभिक्रिया मुक्त मूलक अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ-परॉक्साइड की उपस्थिति में ऐल्कीनों पर HBr का योग।

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प्रश्न 21.
किसी ऐल्किल हैलाइड के विहाइड्रोहैलोजनीकरण की अभिक्रिया की क्रिया-विधि समझाइए।
या
α-विलोपन अभिक्रियाएँ क्या हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर
जिन अभिक्रियाओं में परमाणुओं अथवा समूहों को विलोपन क्रियाधार अणु के एक ही परमाणु में होता है, वे α-विलोपन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। विहाइड्रोहैलोजनीकरण α-विलोपन अभिक्रिया का उदाहरण है। ऐल्किल हैलाइडों को ऐल्कोहॉलीय KOH के साथ उबालने पर ऐल्कीन प्राप्त होते हैं; जैसे- आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड प्रोपीन देता है।

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यह अभिक्रिया विहाइड्रोहैलोजनीकरण कहलाती है। इस अभिक्रिया में हाइड्रोजन एक कार्बन परमाणु से तथा हैलोजन निकटवर्ती दूसरे कार्बन परमाणु से HBr के रूप में विलोपित होता है। इस अभिक्रिया की क्रिया-विधि (SN 2) एक ही पद में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त की जाती है।

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प्रश्न 22.
β-विलोपन अभिक्रियाएँ क्या होती हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
या
निर्जलीकरण अभिक्रिया की क्रिया-विधि को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
जिन अभिक्रियाओं में परमाणुओं या समूहों का विलोपन क्रियाधार अणु के समीपवर्ती परमाणुओं में होता है, वे β-विलोपन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।
उदाहरणार्थ-सान्द्र H2SO4, H3PO4 निर्जल ZnCl2 आदि निर्जलीकारक पदार्थ ऐल्कोहॉल का निर्जलीकरण करके ऐल्कीन बनाते हैं।

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ऐल्कीन ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण की क्रिया-विधि को निम्नलिखित पदों में प्रकट कर सकते हैं।

  1. ऐल्कोहॉलों के –OH समूह में इलेक्ट्रॉन के दो एकाकी युग्म होते हैं। इनमें से एक युग्म प्रयुक्त अम्ल से एक प्रोटॉन ग्रहण करके प्रोटॉनयुक्त ऐल्कोहॉल या ऑक्सोनियम आयन बना लेता है।
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  2. ऑक्सोनियम आयन जल तथा कार्बोनियम आयन में विघटित हो जाता है।
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  3. कार्बोनियम आयन के कार्बन परमाणु पर केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसलिए यह एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखती है। इस स्थिति में पास का कार्बन परमाणु हाइड्रोजन आयन पृथक् करता है और ऐल्कीन अणु उत्पन्न होता है।
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प्रश्न 23.
नाइट्रीकरण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
जब किसी ऐल्केन के हाइड्रोजन परमाणु को नाइट्रो (-NO2) मूलक द्वारा प्रतिस्थापित करते हैं, तो नाइट्रोऐल्केन उत्पाद प्राप्त होता है। इस प्रकार के प्रतिस्थापन को नाइट्रीकरण कहते हैं।
सामान्यतया ऐल्केन नाइट्रिक अम्ल के साथ साधारण परिस्थितियों में कोई अभिक्रिया नहीं दर्शाते हैं। लेकिन उच्च ताप पर जब ऐल्केन व नाइट्रिक अम्ल के वाष्पों को अधिक ताप (300-450°C) पर गर्म किया जाता है, तो नाइट्रोऐल्केन प्राप्त होते हैं। इस अभिक्रिया को वाष्प नाइट्रीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 24.
आप कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
किसी यौगिक में कार्बन तथा हाइड्रोजन की उपस्थिति की जाँच एक ही परीक्षण द्वारा हो जाती है। इस परीक्षण में यौगिक को कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म करते हैं। ऐसा करने पर यौगिक में उपस्थित कार्बन तथा हाइड्रोजन क्रमशः डाइऑक्साइड तथा जल में परिवर्तित हो जाते हैं।

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कार्बन डाइऑक्साइड चूने के पानी (lime water) को दूधिया (milky) कर देती है और जल निर्जल कॉपर सल्फेट को नीला कर देता है।

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प्रश्न 25.
आप कार्बनिक यौगिक में सल्फर की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
किसी कार्बनिक यौगिक में सल्फर की उपस्थिति की जाँच निम्न परीक्षणों के द्वारा की जाती है।
1. ऑक्सीकरण परीक्षण कार्बनिक यौगिक को पोटैशियम नाइट्रेट और सोडियम कार्बोनेट के मिश्रण के साथ संगलित करते हैं। इससे उसमें उपस्थित सल्फर सल्फेट में ऑक्सीकृत हो जाता। है।

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संगलित पदार्थ को जल के साथ निष्कर्षित करके इसे उबालते हैं और फिर इसे छान लेते हैं। निस्वंद में सोडियम सल्फेट होता है। निस्वंद में तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालकर उसे अम्लीकृत करते हैं और फिर उसमें बेरियम सल्फेट विलयन डालते हैं। सफेद अवक्षेप की प्राप्ति यौगिक में सल्फर की उपस्थिति दर्शाती है।

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2. लैंसे परीक्षण–सर्वप्रथम लैंसे निष्कर्ष तैयार करते हैं। यदि यौगिक में सल्फर उपस्थित होता है। तो वह सोडियम से अभिक्रिया करके सोडियम सल्फाइड बनाता है।

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अतः लैंसे निष्कर्ष में सोडियम सल्फाइडे उपस्थित होता है। अब इस निष्कर्ष को दो भागों में बाँट देते हैं। पहले भाग को तनु ऐसीटिक अम्ल से अम्लीकृत करके उसमें लेड ऐसीटेट विलयन की कुछ बूंदें मिलाते हैं। यदि काला अवक्षेप प्राप्त होता है तो यह यौगिक में सल्फर की उपस्थिति को दर्शाता है।

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लैंसे निष्कर्ष के दूसरे भाग में सोडियम नाइट्रोभुसाइड की कुछ बूंदें डालते हैं। यदि विलयन बैंगनी हो जाता है तो यह यौगिक में सल्फर की उपस्थिति को दर्शाता है।

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प्रश्न 26.
आप कार्बनिक यौगिकों में हैलोजनों की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
किसी कार्बनिक यौगिक में हैलोजनों की जाँच निम्न परीक्षणों द्वारा की जाती है-
1. बेलस्टीन परीक्षण–एक साफ कॉपर के तार को बुन्सन बर्नर की ऑक्सीकारी ज्वाला में तब तक गर्म करते हैं जब तक कि वह ज्वाला को हरा या नीला रंग देना बंद नहीं कर देता। अब इस गर्म तार को यौगिक में डुबाकर दोबारा से बुन्सन बर्नर की ज्वाला में गर्म करते हैं। ज्वाला का रंग दोबारा से हरा या नीला हो जाना यौगिक में हैलोजनों की उपस्थिति दर्शाता है। इस परीक्षण की कुछ सीमाएँ भी हैं। इस परीक्षण द्वारा यह पता नहीं चलता है कि यौगिक में कौन-सा हैलोजन है। दूसरे, कुछ ऐसे पदार्थ जिनमें हैलोजन नहीं होते हैं, वे भी यह परीक्षण देते हैं। यूरिया, थायोयूरिया आदि ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।
2. लैंसे परीक्षण–इस परीक्षण के लिए पहले लैंसे निष्कर्ष तैयार करते हैं। लैंसे निष्कर्ष तैयार करने में जब कार्बनिक यौगिक को सोडियम के साथ संगलित करते हैं तब कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन सोडियम के साथ संयोग करके सोडियम हैलाइड बनाते हैं। ये सोडियम हैलाइड लैंसे निष्कर्ष में उपस्थित होते हैं।

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लैंसे निष्कर्ष के एक भाग को तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ उबालकर तथा फिर उसे ठण्डा करके उसमें सिल्वर नाइट्रेट विलयन की कुछ बूंदें मिलाते हैं। अवक्षेप का बनना हैलोजन की उपस्थिति दर्शाता है।

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अवक्षेप अवक्षेप के रंग और उसकी अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में विलेयता के आधार पर कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन की पहचान की जाती है।

  1. सफेद अवक्षेप बनता है जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में घुल जाता है—क्लोरीन उपस्थित
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  2. हल्का पीला अवक्षेप जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में कम घुलता है—ब्रोमीन उपस्थित
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  3. गहरा पीला अवक्षेप जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में बिल्कुल भी नहीं घुलता हैआयोडीन उपस्थित
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3. कार्बन डाइसल्फाइड परीक्षण–इस परीक्षण का प्रयोग ब्रोमीन और आयोडीन की जाँच के लिए किया जाता है। इसमें लैंसे निष्कर्ष को नाइट्रिक अम्ल से अम्लीकृत करके उसमें क्लोरीन जल की कुछ बूंदें डाल देते हैं। फिर इस विलयन में कार्बन डाइसल्फाइड या कार्बन टेट्राक्लोराइड मिलाकर इसे हिलाते हैं। कार्बन डाइसल्फाइड या कार्बन टेट्राक्लोराइड पर्त का नारंगी रंग यौगिक में ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है जबकि इसका बैंगनी रंग यौगिक में आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है।
अम्लीकृत लैंसे निष्कर्ष (सोडियम हैलाइड) में क्लोरीन जल डालने पर मुक्त Br2 और I2 उत्सर्जित होती हैं जो कार्बन डाइसल्फाइड यो कार्बन टेट्राक्लोराइड में घुलकर उन्हें क्रमशः नारंगी (orange) तथा बैंगनी (violet) रंग प्रदान करती हैं।

2NaBr+Cl2 → 2NaCl+ Br2 (CS2 या CCl4 में नारंगी रंग)
2Nal+Cl2 → 2NaCl + I2 (CS2, या CCl4 में बैंगनी रंग)

प्रश्न 27.
आप कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन व फॉस्फोरस की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
ऑक्सीजन की पहचान–किसी कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति की जाँच के लिए कोई प्रत्यक्ष विधि उपलब्ध नहीं है। इसकी जाँच सामान्यत: निम्नांकित अप्रत्यक्ष विधियों द्वारा की जाती है।

  1. कार्बनिक यौगिकों की ऑक्सीजन युक्त क्रियात्मक समूहों –OH, COOH, CHO,—NO, के लिए जाँच करते हैं। यदि किसी यौगिक में इनमें से कोई क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है तो यह यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति दर्शाता है।
  2. कार्बनिक यौगिक में उपस्थित अन्य तत्त्वों की प्रतिशतताएँ ज्ञात करते हैं। यदि इन प्रतिशतताओं का योग 100 से कम होता है तो यह यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति दर्शाता है। इनका अंतर यौगिक में ऑक्सीजन का प्रतिशत बताता है।
    फॉस्फोरस की पहचान–कार्बनिक यौगिक को सोडियम परॉक्साइड (ऑक्सीकारक) के साथ संगलित करते हैं जिससे सोडियम फॉस्फेट बनता है। संगलित पदार्थ का जल के साथ निष्कर्षण करके उसे छान लेते हैं। निस्वंद (filtrate) जिसमें सोडियम फॉस्फेट उपस्थित होता है, को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ उबालकर उसमें अमोनियम मॉलिब्डेट विलयन मिलाते हैं। | पीले अवक्षेप अथवा पीले रंग की प्राप्ति कार्बनिक यौगिक में फॉस्फोरस की उपस्थिति दर्शाती है।

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प्रश्न 28.
कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण कैसे किया जाता है? समझाइए।
उत्तर
कार्बनिक यौगिकों में कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण लीबिग की दहन विधि (Liebig’s combustion method) द्वारा किया जाता है। कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण एक ही प्रयोग द्वारा हो जाता है। इसमें कार्बनिक यौगिक की ज्ञात मात्रा को शुद्ध शुष्क ऑक्सीजन (आर्द्रता और कार्बन डाइऑक्साइड रहित) के वातावरण में कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म करते हैं। इससे कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड में तथा हाइड्रोजन, जल में ऑक्सीकृत हो जाते हैं।

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उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड U-नली में लिए गए सान्द्र पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन द्वारा अवशोषित कर ली जाती है जबकि उत्पन्न जल एक अन्य U-नली में लिए गए निर्जल कैल्सियम क्लोराइड द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
इससे सान्द्र पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन तथा कैल्सियम क्लोराइड के द्रव्यमानों में वृद्धि से क्रमश: कार्बन डाइऑक्साइड और जल की मात्राएँ ज्ञात कर लेते हैं। इनसे कार्बन तथा हाइड्रोजन की, प्रतिशतता की गणना कर लेते हैं।

प्रश्न 29.
कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन का निर्धारण करने की विधि लिखिए।
उत्तर
कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन की प्रतिशतता की गणना कुल प्रतिशतता (100) में से अन्य तत्त्वों की प्रतिशतताओं के योग को घटाकर की जाती है। ऑक्सीजन का प्रत्यक्ष निर्धारण निम्नविधि से भी किया जा सकता है।
कार्बनिक यौगिक की एक निश्चित मात्रा नाइट्रोजन गैस की धारा में गर्म करके अपघटित की जाती है। प्राप्त ऑक्सीजनयुक्त गैसीय मिश्रण को रक्त-तप्त कोक पर प्रवाहित करते हैं जिससे सारी ऑक्सीजन कार्बन मोनो-ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है। तत्पश्चात् गैसीय मिश्रण को हल्के गर्म आयोडीन पेन्टाऑक्साइड (I2O5) में प्रवाहित करते हैं जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाती है और आयोडीन मुक्त होती है।

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ऑक्सीजन की प्रतिशतता का आकलन मुक्त कार्बन डाइऑक्साइड अथवा आयोडीन की मात्रा से किया जा सकता है।

प्रश्न 30.
1.05 ग्राम एक कार्बनिक यौगिक की केल्डाल विधि से क्रिया की गयी तथा उत्पन्न NH3 को 100 मिली N/10 H2SO4 में अवशोषित किया गया। बचे हुए अम्ल को उदासीन करने हेतु 10 मिली N/5 NaOH घोल की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर
मान लीजिए, V मिली शेष अम्ल N/10 H2SO4 को उदासीन करने में 10 मिली N/5 NaOH लगे,
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प्रश्न 31.
एक कार्बनिक यौगिक के 1.195 ग्राम का दहन करने पर 0.44 ग्राम CO2 तथा 0.9 ग्राम जल प्राप्त हुआ। 0.2046 ग्राम यौगिक के दहन पर 15°C ताप तथा 732.7 मिमी दाब पर 30.4 मिली नम नाइट्रोजन प्राप्त हुई। यौगिक में कार्बन, हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कीजिए। (15°C ताप पर जलवाष्प दाब 12.7 मिमी) (C= 12, H =1, 0= 16, N=14)
उत्तर
सूत्रानुसार,
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प्रश्न 32.
C, H, N तथा O युक्त एक कार्बनिक यौगिक ने विश्लेषण करने पर निम्नलिखित परिणाम दिये।
(i) यौगिक के 0.25 ग्राम को दहन करने पर 0.368 ग्राम CO2 तथा 0.205 ग्राम जल प्राप्त हुए।
(ii) 0.6 ग्राम यौगिकसे केल्डाल क्रिया द्वारा निकली अमोनिया गैस को 60 मिली [latex]\frac { N }{ 6 } [/latex]H2SO4 में अवशोषित किया गया। अम्ल के आधिक्य को उदासीन करने के लिए 20.0 मिली A कास्टिक पोटाश विलयन की आवश्यकता पड़ी। यौगिक में उपस्थित सभी तत्त्वों की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए। (C=12, H = 1, N = 14,0= 16)
उत्तर
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प्रश्न 33.
केरियस विधि द्वारा हैलोजन के आकलन में 0.40 ग्राम कार्बनिक यौगिक से 0.47 ग्राम AgBr प्राप्त हुआ। यौगिक में ब्रोमीन की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए। [Ag= 108, Br = 80]
उत्तर
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आप कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान कैसे करेंगे?
या
लैंसे परीक्षण के रसायन का वर्णन कीजिए।
उत्तर
नाइट्रोजन की पहचान—किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान निम्न परीक्षणों द्वारा की जाती है ।
1. सोडा-लाइम परीक्षण–यौगिक की थोड़ी मात्रा को सोडा-लाइम (NaOH+CaO) के साथ तेज गर्म करते हैं। मिश्रण में से अमोनिया की गंध यौगिक में नाइट्रोजन की उपस्थिति दर्शाती है।

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इस परीक्षण की सीमा यह है कि अनेक कार्बनिक यौगिक (जैसे नाइट्रो और डाइएजो यौगिक) इन परिस्थितियों में अमोनिया उत्पन्न नहीं करते हैं।
2. लैंसे परीक्षण–इस परीक्षण का उपयोग न केवल नाइट्रोजन बल्कि अन्य तत्त्वों; जैसे सल्फर और हैलोजनों की उपस्थिति की जाँच के लिए भी किया जाता है। नाइट्रोजन की उपस्थिति की जाँच के लिए यह परीक्षण निम्न दो पदों में किया जाता है।

  1. लैंसे निष्कर्ष तैयार करना–सोडियम धातु के एक छोटे से टुकड़े को फिल्टर पेपर द्वारा सुखाकर एक साफ और शुष्क ज्वलन नली (ignition tube) में लेते हैं। इस ज्वलन नली को बुन्सन बर्नर की ज्वाला में धीरे-धीरे गर्म करते हैं। जब सोडियम धातु पिघलकर पारे की तरह चमकने लगता है तब ज्वलन नली में कार्बनिक यौगिक की थोड़ी मात्रा डाल देते हैं। अब ज्वलन नली को पहले धीरे-धीरे और फिर तेजी से गर्म करते हैं। जब ज्वलन नली का नीचे का भाग लाल हो जाता है तब इस रक्त-तप्त नली को चाइना डिश में लिए गए 10-15 mL आसुत जल में डाल देते हैं। चाइना डिश में उपस्थित विलयन को थोड़ी देर उबालकर ठंडा , कर लेते हैं और फिर इसे छान लेते हैं। छानने से प्राप्त हुए निस्वंद (filtrate) को लैंसे निष्कर्ष (Lassaigne’s extract) या सोडियम निष्कर्ष कहते हैं। सोडियम धातु के यौगिक के साथ संगलित होने पर यौगिक में उपस्थित तत्त्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।
  2. नाइट्रोजन के लिए परीक्षण-एक परखनली में 1 mL लैंसे निष्कर्ष लेकर उसमें तनु सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन की कुछ बूंदें डालते हैं। इससे लैंसे निष्कर्ष क्षारकीय हो जाता है। सामान्यतः लैंसे निष्कर्ष की प्रकृति क्षारकीय ही होती है। परखनली में 2 mL ताजा बना हुआ फेरस सल्फेट का सान्द्र विलयन डालकर परखमली को गर्म करते हैं। विलयन को ठंडा करके उसमें कुछ बूंद फेरिक क्लोराइड विलयन डालते हैं और फिर उसमें तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालकर उसे अम्लीय करते हैं।
    यदि विलयन का रंग प्रशियन नीला (prusssian blue) हो जाता है तो यह यौगिक में । नाइट्रोजन की उपस्थिति दर्शाता है। परीक्षण में निम्न अभिक्रियाएँ होती हैं।

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जब यौगिक में नाइट्रोजन और सल्फर दोनों उपस्थित होते हैं तो संगलन के परिणामस्वरूप’. सोडियम सल्फोसायनाइड बनता है। यह फेरिक आयनों से अभिक्रिया करके रक्त लाल (blood red) रंग का फेरिक सल्फोसायनाइड बनाता है।

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उपरोक्त अभिक्रिया में सोडियम सल्फोसायनाइड अपर्याप्त सोडियम के कारण बनता है। जब सोडियम आधिक्य में उपस्थित होता है तो सोडियम सल्फोसायनाइड अपघटित होकर सोडियम सायनाइड और सोडियम सल्फाइड बनाता है।

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इस स्थिति में यौगिक में सल्फर के उपस्थित होने पर भी रक्त लाल रंग प्राप्त नहीं होता है। अत: रक्त लाल रंग की अनुपस्थिति से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि यौगिक में सल्फर अनुपस्थित है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 10 Atmospheric Circulation and Weather Systems

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Fundamentals of Physical Geography Chapter 10 Atmospheric Circulation and Weather Systems (वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न
प्रश्न (i) यदि धरातल पर वायुदाब 1,000 मिलीबार है तो धरातल से 1 किमी की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(क) 700 मिलीबार
(ख) 900 मिलीबार।
(ग) 1,100 मिलीबार ।
(घ) 1,300 मिलीबार
उत्तर-(ख) 900 मिलीबार।।

प्रश्न (ii) अन्तर उष्णकटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(क) विषुववृत्त के निकट
(ख) कर्क रेखा के निकट
(ग) मकर रेखा के निकट
(घ) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर-(क) विषुवत् वृत्त के निकट।

प्रश्न (iii) उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(क) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(ग) समदाबे रेखाओं के समकोण पर ।
(घ) समदाब रेखाओं के समानान्तर
उत्तर-(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत।

प्रश्न (iv) वायुराशियों के निर्माण का उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(क) विषुवतीय वन ।
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग |
(ग) हिमालय पर्वत ।
(घ) दक्कन पठार
उत्तर-(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न (i) वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर-वायुदाब को मापने की इकाई मिलीबार तथा पासकल है। व्यापक रूप से वायुदाब मापने के लिए किलो पासकल इकाई का प्रयोग किया जाता है जिसे hPa द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक घटाया जाता है क्योंकि समुद्र तल पर औसत वायुमण्डलीय दाब 1,013.2 मिलीबार या 1,013.2 किलो पासकल होता है। अतः वायुदाब पर ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने के लिए और मानचित्र को तुलनात्मक बनाने के लिए वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्र स्तर पर घटा दिया जाता है।

प्रश्न (ii) जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत वृत्त की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबन्ध में पवनें उत्तरी-पूर्वी क्यों होती है?
उत्तर-जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा में होता है तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्ण कटिबन्धीयं पेवनों की दिशा कोरिओलिस बल से प्रभावित होकर उत्तरी-पूर्वी हो जाती है।

प्रश्न (iii) भूविक्षेपी पवनें क्या हैं?
उत्तर-जब समदाब रेखाएँ सीधी होती हैं तो उन पर घर्षण का प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि दाब प्रवणता बल कोरिओलिस बल से सन्तुलित हो जाता है। इसलिए पवनें समदाब रेखाओं के समानान्तर चलती हैं। अतः ऐसी क्षैतिज पवनें जो ऊपरी वायुमण्डल की समदाब रेखाओं के समानान्तर चलती हों, भूविक्षेपी (Geostrophic) पवनें कहलाती हैं (चित्र 10.1)।
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प्रश्न (iv) समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर-ऊष्मा के अवशोषण तथा स्थानान्तरण की प्रकृति स्थल व समुद्र में भिन्न होती है अर्थात् दिन के समय स्थल भाग समुद्र की अपेक्षा शीघ्र एवं अधिक गर्म हो जाते हैं, अतः यहाँ निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है, जबकि समुद्र अपेक्षाकृत ठण्डे रहते हैं और उन पर उच्चदाब बना रहता है। इसलिए दिन में पवनें समुद्र से स्थल की ओर प्रवाहित होती हैं। इन पवनों को स्थल समीर कहते हैं। रात के समय स्थल भाग शीघ्र ठण्डे हो जाते हैं; अतः वहाँ उच्चदाब पाया जाता है जबकि समुद्र देर से ठण्डे होने के कारण रात्रि में निम्न दाब के क्षेत्र रहते हैं। इसलिए पवनें रात्रि में स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। इनको समुद्री समीर कहते हैं (चित्र 10.2)।
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3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए
प्रश्न (1) पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ।
उत्तर-पवनों की दिशा एवं वेग को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं

1. दाब प्रवणता-किन्हीं दो स्थानों के वायुदाब का अन्तर दाब प्रवणता कहलाता है। दाब प्रवणता में अन्तर जितना अधिक होगा पवनों की गति उतनी ही अधिक होती है। सामान्यतः प्रवणता के सम्बन्ध में दो तथ्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं–(i) पवनें समदाब रेखाओं को काटती हुई उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं तथा (ii) इनकी गति दाब प्रवणता पर आधारित होती है।

2. घर्षण बल-पवनों की गति तथा दिशा पर घर्षण बल का विशेष प्रभाव होता है। घर्षण बल की उत्पत्ति तथा उसके ऊपर चलने वाली पवन के संघर्ष से होती है। घर्षण बल हवा के विपरीत दिशा में कार्य करता है। जलीय भागों पर स्थल भागों की अपेक्षा घर्षण कम होता है इसलिए पवन तीव्र गति से चलती है। जहाँ घर्षण नहीं होता है, वहाँ पवन विक्षेपण बल तथा प्रवणता बल में सन्तुलन पाया जाता है; अतः पवन की दिशा समदाब रेखा के समानान्तर होती है, किन्तु घर्षण के कारण पवन वेग कम हो जाता है तथा वह समदाब रेखाओं के समानान्तर ने चलकर कोण बनाती हुई चलती है।

3. कोरिऑलिस बल-पृथ्वी की दैनिक गति (घूर्णन) के कारण उसका वायुमण्डलीय आवरण भी घूमता है; अत: इस बल के कारण पवनें सीधी न चलकर अपने दाईं अथवा बाईं ओर मुड़ जाती हैं। अर्थात् पवनों में विक्षेप उत्पन्न हो जाते हैं। इसे विक्षेपण बल (Deflection Force) कहा जाता है। इस बल की खोज सर्वप्रथम फ्रांसीसी गणितज्ञ कोरिऑलिस ने सन् 1844 में की थी; अत: इसे कोरिऑलिस बल भी कहते हैं। बल के प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिनी तरफ तथा दक्षिण गोलार्द्ध में बाईं तरफ विक्षेपित हो जाती हैं। जब पवनों का वेग अधिक होता है तब विक्षेपण भी अधिक होता है। कोरिऑलिस बल अक्षांशों के कोण के सीधा समानुपात में बढ़ता है। यह ध्रुवों पर सर्वाधिक और विषुवत् वृत्त पर अनुपस्थित रहता है।

प्रश्न (ii) पृथ्वी पर वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हुए चित्र बनाएँ। 30°उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब के सम्भव कारण बताएँ
उत्तर-वायुमण्डलीय पवनों के प्रवाह प्रारूप को वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण कहा जाता है। वायुमण्डलीय परिसंचरण महासागरीय जल की गति को गतिमान रखता है, जो पृथ्वी की जलवायु को भी प्रभावित करता है। पृथ्वी पर वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का क्रमिक प्रारूप चित्र 10.3 में प्रस्तुत है। पृथ्वी की सतह से ऊपर की दिशा में होने वाले परिसंचरण और इसके विपरीत दिशा में होने वाले परिसंचरण को कोष्ठ (Cell) कहते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में ऐसे कोष्ठ को हेडले का कोष्ठ तथा उपोष्ठ उच्च दाब कटिबन्धीय क्षेत्र में फेरल कोष्ठ एवं ध्रुवीय अक्षांशों पर ध्रुवीय कोष्ठ कहा जाता है। ये
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तीन कोष्ठ वायुमण्डलीय परिसंचरण का प्रारूप निर्धारित करते हैं जिसमें तापीय ऊर्जा का निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांओं में स्थानान्तर सामान्य परिसंचरण प्रारूप को बनाए रखता है। 30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब के दो सम्भव कारण निम्नलिखित हैं

1. उच्च तापमान व न्यून वायुदाब से अन्तर उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र पर वायु संवहन धाराओं । के रूप में ऊपर उठती है। हम जानते हैं कि विषुवत् रेखा पर घूर्णन गति तेज होती है जिसके कारण वायुराशियाँ बाहर की ओर जाती हैं। यह हवा ऊपर उठकर क्रमशः ठण्डी होती है। ऊपरी परतों में यह हवा ध्रुवों की ओर बहने से और अधिक हो जाती है और इसका घनत्व बढ़
जाता है।

2. दूसरा कारण यह है कि पृथ्वी के घूर्णन के कारण ध्रुवों की ओर जाने वाली हवा कोरिऑलिस बल के कारण पूर्व की ओर विक्षेपित होकर कर्क और मकर रेखा व 30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के मध्य उतर जाती है और उच्च वायुदाब कटिबन्ध का निर्माण करती है। इसको उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबन्ध कहते हैं।’

प्रश्न (iii) उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात के किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं। क्यों?
उत्तर-उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अत्यन्त आक्रामक एवं विनाशकारी होते हैं। इनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबन्ध के महासागरीय क्षेत्रों पर होती है। यहाँ इनकी उत्पत्ति एवं विकास के लिए निम्नलिखित अनुकूल स्थितियाँ पाई जाती हैं
1. बृहत् समुद्री सतह, जहाँ तापमान 27° सेल्सियस से अधिक रहता है।
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2. इस क्षेत्र में कोरिऑलिस बल प्रभावी रहता है जो उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की उत्पत्ति में सहायक है।
3. इन क्षेत्रों में ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में अन्तर कम रहता है।
4. यहाँ वायुदाब निम्न होता है जो चक्रवातीय परिसंचरण में सहायक है।
5. समुद्र तल तन्त्र पर ऊपरी अपसरण का होना।

उच्च वेग वाली और मूसलाधार वर्षा उष्णकटिबन्धीय चक्रवातों के केन्द्रीय भाग में होती है। क्योंकि यहाँ केन्द्रीय (अक्षु) भाग इस चक्रवात का शान्तक्षेत्र होता है, जहाँ पवनों का अवतलन होता है। चक्रवात अक्षु के चारों तरफ अक्षुभित्ति होती है जहाँ वायु का प्रबल वेग में आरोहण होता है, यह वायु आरोहण क्षोभसीमा की ऊँचाई तक पहुँचकर इसी क्षेत्र में उच्च वेग वाली पवनों को उत्पन्न करता है। (चित्र 10.4)। यह पवनें समुद्रों से आर्द्रता ग्रहण करती हैं जिससे समुद्रों के तटीय भाग पर भारी वर्षा होती है। और सम्पूर्ण क्षेत्र जलप्लावित हो जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1. भूपृष्ठ (पृथ्वी के गोले) पर वायुदाब की कुल पेटियों की संख्या है
(क) पाँच
(ख) सात
(ग) चार
(घ) छः
उत्तर-(ख) सात।

प्रश्न 2. भूपृष्ठ पर उच्च वायुदाब की पेटियों (मेखलाओं) की संख्या है
(क) पाँच
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) दो।
उत्तर-(ग) चार।।

प्रश्न 3. समदाब रेखाएँ हैं
(क) काल्पनिक रेखाएँ ।
(ख) वास्तविक रेखाएँ
(ग) (क) और (ख) दोनों ।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) काल्पनिक रेखाएँ।

प्रश्न 4. तापमान के अधिक होने पर वायुदाब
(क) अधिक होता है।
(ख) कम होता है।
(ग) मध्यम होता
(घ) अपरिवर्तनीय होता है।
उत्तर-(ख) कम होता है।

प्रश्न 5. तापीय चक्रवात को सूर्यातप चक्रवात का नाम देने वाले विद्वान हैं
(क) ल्यूक हावर्ड
(ख) बाइज बैलट
(ग) हम्फ्रीज
(घ) जर्कनीज
उत्तर-(ग) हम्फ्रीज।।

प्रश्न 6. जब पवनें वायु के निम्न दाब के कारण भंवर केन्द्र की ओर वेगपूर्वक दौड़ती हैं तो वायु का यह भंवर कहलाता है
(क) चक्रवात
(ख) प्रति-चक्रवात
(ग) शीतोष्ण चक्रवात
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) चक्रवात।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. वायुदाब का क्या अर्थ हैं?
उत्तर-वायुमण्डल की ऊँचाई धरातल से हजारों किलोमीटर तक है। इतनी अधिक ऊँचाई तक फैली वायुमण्डल की गैसें एवं जलवाष्प धरातल पर भिन्न-भिन्न मात्रा में दबाव डालती हैं, इसी दबाव को वायुदाब कहते हैं।

प्रश्न 2. वायुदाब विभिन्नता के मुख्य कारण बतलाइए।
उत्तर-धरातल पर वायुदाब सभी जगह समान नहीं होता। वायुदाब की भिन्नता का मुख्य कारण तापमान, ऊँचाई तथा जलवाष्प की भिन्नता एवं पृथ्वी की घूर्णन गति है।

प्रश्न 3. डोलडम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-डोलड्रम विषुवतीय निम्न वायुदाब पेटी है जो भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° अक्षांशों में मध्य स्थित है। इस पेटी में वायु शान्त रहती है।

प्रश्न 4. अश्व अक्षांश की स्थिति बतलाइए।
उत्तर-उच्च वायुभार अथवा अश्व अक्षांश पेटी दोनो गोलार्द्ध में 30°से 35° अक्षांशों के मध्य स्थित है।

प्रश्न 5. चक्रवात में पवनों की दिशा किस ओर होती है?
उत्तर-चक्रवात अण्डाकार समदाब रेखाओं का घेरा है जिसमें पवनें बाहर से केन्द्र की ओर तेजी से चलती हैं। इसमें पवनों की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अनुकूल होती है।

प्रश्न 6. तापीय चक्रवात उत्पन्न होने का क्या कारण है?
उत्तर-तापीय चक्रवात की उत्पत्ति महासागरों में तापमान एवं वायुदाब की भिन्नता एवं असमानता के कारण होती है। ये चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में आइसलैण्ड एवं ग्रीनलैण्ड तथा एल्यूशियन द्वीपों के निकट उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 7. टाइफून क्या हैं? ये कहाँ पाए जाते हैं?
उत्तर-फिलीपीन्स, जापान तथा चीन सागर में चलने वाले चक्रगामी चक्रवातों को टाइफून कहते हैं। इसमें तीव्र पवनें चलती हैं और तेज वर्षा होती है। प्रश्न 8. हरिकेन का क्या अर्थ है? उत्तर–कैरेबियन सागर तथा मैक्सिको के तट पर चलने वाले भयंकर चक्रवात जिनकी गति 120 किमी प्रति घण्टा से भी अधिक होती है, हरिकेन कहलाते हैं।

प्रश्न 9. व्यापारिक पवनें क्या हैं?
उत्तर-उपोष्ण उच्च वायुदाब कटिबन्धों से विषुवतीय निम्न दाब कटिबन्ध की ओर दोनों गोलार्द्ध में निरन्तर चलने वाली पवनों को व्यापारिक पवन कहते हैं।

प्रश्न 10. मिस्ट्रल तथा फोहन क्या हैं? इनकी स्थिति बताइए।
उत्तर-मिस्ट्रल-ये तीव्र गति की शुष्क गर्म पवनें हैं जो आल्पस पर्वतीय पर्वतीय क्षेत्रों में चलती हैं। इसके प्रभाव से यूरोप में अंगूर शीघ्र पक जाते हैं। फोहन-ये ठण्डी एवं शुष्क पवनें हैं जो शीत ऋतु में फ्रांस में भूमध्यसागरीय तट पर चलती हैं। ये पवनें तापमान को हिमांक से नीचे गिरा देती हैं।

प्रश्न 11. वायुराशि क्या है? ।
उत्तर-वायुमण्डल का वह विस्तृत भाग जिसमें तापमान एवं आर्द्रता के भौतिक लक्षण क्षैतिज दिशा में समरूप हों वायुराशि कहलाती है। एक वायुराशि कई परतों का समूह होती है जो क्षैतिज दिशा में एक-दूसरे के ऊपर फैली होती है। इन परतों में तापमान एवं आर्द्रता की दशाएँ लगभग समान होती हैं।

प्रश्न 12. दाब प्रवणता क्या है?
उत्तर-दो स्थानों के बीच वायुदाब परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहते हैं। दाब प्रवणता सदैव उच्चदाब की ओर परिवर्तित होती है। इसीलिए जिस स्थान पर समदाब रेखाएँ अधिक पास-पास होती हैं वहाँ दाब-प्रवणता अधिक होती है।

प्रश्न 13. तृतीय समूह की पवनों के नाम बताइए।
उत्तर-तृतीय समूह की पवनों को स्थानीय पवन भी कहते हैं। लू, फोहन, चिनुक, मिस्ट्रल तथा हरमटन तृतीय समूह की प्रमुख पवनें हैं।

प्रश्न 14. तीन प्रकार की स्थायी पवनों के नाम लिखिए।
उत्तर-तीन प्रकार की स्थायी पवनों के नाम निम्नलिखित हैं

  1. व्यापारिक पवन,
  2. पछुआ पवन तथा
  3. ध्रुवीय पवन।

प्रश्न 15. वायुदाब पेटियों के नाम लिखिए।
उत्तर-वायुदाब की पेटियों के नाम निम्नलिखित हैं 1. विषुवत्रेखीय निम्नदाब पेटी, 2. उपोष्ण उच्च दाब पेटी (उत्तरी गोलार्द्ध), 3. उपोष्ण उच्च दाब पेटी (दक्षिणी गोलार्द्ध), 4. ध्रुवीय निम्न दाब पेटी (उत्तरी गोलार्द्ध), 5. ध्रुवीय निम्न दाब पेटी (दक्षिणी गोलार्द्ध), 6. ध्रुवीय वायुदाब पेटी।।

प्रश्न 16. मिलीबार क्या है तथा वायुदाब किस यन्त्र द्वारा मापा जाता है?
उत्तर-वायुदाब मापने की इकाई को मिलीबार कहते हैं। एक मिलीबार एक वर्ग सेमी पर एक ग्राम भार के बल के बराबर होता है। वायुदाब बैरोमीटर द्वारा मापा जाता है।

प्रश्न 17. कोरिऑलिस बल क्या है? इसके खोजकर्ता का नाम बताइए।
उत्तर-पृथ्वी के घूर्णन के कारण पवनें अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती हैं। इसे कोरिऑलिस बल कहा जाता है। इस तथ्य की खोज सर्वप्रथम फ्रांसीसी वैज्ञानिक कोरिऑलिस द्वारा की गई थी। अत: उन्हीं के नाम पर इसका यह नाम पड़ा है।

प्रश्न 18. विषुवत वृत्त के निकट उष्णकटिबन्धीय चक्रवात क्यों नहीं बनते है।
उत्तर-विषुवत् वृत्त पर कोरिऑलिस बल शून्य होता है और पवनें समदाब रेखाओं के समकोण पर बहती है। अत: निम्न दाब क्षेत्र और अधिक गहन होने के बजाय पूरित हो जाता है। यही कारण है कि विषुवत् वृत्त के निकट उष्णकटिबन्धीय चक्रवात नहीं बनते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. चक्रवात से आप क्या समझते हैं? इनसे सम्बन्धित मौसम का वर्णन कीजिए।
उत्तर-चक्रवात उन चक्करदार अथवा अण्डाकार पवनों को कहते हैं जिनके मध्य में निम्न वायुदाब तथा बाहर की ओर क्रमशः उच्च वायुदाब पाया जाता है। जब ये निम्न वायुदाब के भंवर भयंकर झंझावातों का रूप धारण कर लेते हैं तो उन्हें चक्रवात (Cyclone) कहते हैं (चित्र 10.5)। सामान्यतया इनका व्यास 320 किमी से 480 किमी तक होता है। कुछ बड़े चक्रवातों का व्यास कई हजार किमी तक पाया गया है। पी० लेक के अनुसार, “अण्डाकार समदाब रेखा से घिरे हुए निम्न वायु-भार क्षेत्र को चक्रवात कहते हैं।”
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मौसम-इन चक्रवातों के आगमन से पूर्व मौसम उष्ण एवं शान्त होने लगता है। आकाश में धीरे-धीरे श्वेत बादल छाने लगते हैं। चक्रवात के प्रवेश करते समय बादलों का रंग परिवर्तित हो जाता है। इनके आते ही ठण्डी वायु वायुभार चलने लगती है तथा आकाश में घने काले बादल छा जाते हैं एवं मिलीबार तूफान आ जाते हैं। बादलों की गर्जना तथा वायु की चमक के साथ घनघोर वर्षा होती है। जैसे-जैसे चक्रवाते आगे की ओर बढ़ता जाता है वैसे-वैसे मौसम स्वच्छ और शान्त होता जाता है।

प्रश्न 2. फैरल अथवा बाइज बैलेट के नियम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-फैरल का नियम-पवन संचरण के इस नियम का प्रतिपादन अमेरिकी जलवायुवेत्ता फैरल ने किया था। उनके अनुसार, “पृथ्वी पर प्रत्येक स्वतन्त्र पिण्ड अथवा तरल पदार्थ, जो गतिमान है, पृथ्वी की परिभ्रमण गति के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाईं ओर मुंडू जाता है।” इसी नियम के अनुसार ही सनातनी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के अनुकूल तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल चलती हैं।

बाइज बैलेट का नियम-उन्नीसवीं शताब्दी में हॉलैण्ड के जलवायु वैज्ञानिक बाइज बैलेट ने पवन संचरण के सम्बन्ध में एक नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। उन्हीं के नाम पर इसे बाइज बैलेट का नियम कहते हैं। उनके अनुसार, “यदि हम उत्तरी गोलार्द्ध में चलती हुई वायु की ओर पीठ करके खड़े हो जाएँ तो हमारे बाईं ओर निम्न वायुभार तथा दाईं ओर उच्च वायुभार होगा। इसके विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध में दाईं ओर निम्न वायुभार तथा बाईं ओर उच्च वायुभार होगा।” यही कारण है कि सनातनी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में उच्चदाब के चारों ओर घड़ी की सुइयों के अनुकूल और न्यूनदाब के चारों ओर घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल चला करती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में पवनों की दिशा ठीक इसके विपरीत होती है।

प्रश्न 3. वायुदाब पेटियों का स्थायी पवनों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-पृथ्वी पर वायुदाब पेटियों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि वायुदाब सभी स्थानों एवं प्रदेशों में समान नहीं होता है। वायुदाब की इस असमानता को दूर करने के लिए वायु में गति उत्पन्न होती है अर्थात् वायुदाबे की भिन्नता के कारण वायुमण्डल की गैसें पवनों के रूप में बहने लगती हैं। वायु सदैव उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती है तथा उसका प्रवाह क्षेत्र बढ़ जाता है। इस प्रकार पृथ्वी तल के समानान्तर किसी दिशा में चलने वाली वायु को पवन (Wind) कहते हैं। वायुदाब पेटियों तथा स्थायी या सनातनी पवनों में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। धरातल पर वायु की गति के कारण ही वायुदाब में भी भिन्नता उत्पन्न हो जाती है। वायुदाब पेटियों के कारण ही स्थायी पवने वर्षभर उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती हैं।

प्रश्न 4. समदाब रेखाएँ क्या होती हैं? विभिन्न वायुदाब परिस्थितियों में समदाब रेखाओं की आकृति को चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ हैं जो समुद्र तल से एकसमान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हैं। वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समान अन्तराल पर खींची गई इन्हीं समदाब रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है। मानचित्र पर प्रदर्शित करते समय विभिन्न स्थानों का जो वायुदाब मापा जाता है।
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उसे समुद्र तल के स्तर पर घटाकर दिखाया जाता है। इससे दाब पर ऊँचाई का प्रभाव समाप्त हो जाता है तथा तुलनात्मक अध्ययन सरलता से किया जाता है चित्र 10.6 में वायुदाब परिस्थितियों में समदाब रेखाओं की आकृति को प्रदर्शित किया गया है। चित्र में निम्न दाब प्रणाली एक : या अधिक समदाब रेखाओं से घिरी है। चित्र 10.6 : उत्तरी गोलार्द्ध में समदाब रेखाएँ तथा पवन तन्त्र जिनके केन्द्र में निम्न वायुदाब है। उच्च दाब प्रणाली में भी एक या अधिक समदाब रेखाएँ होती हैं जिनके केन्द्र में उच्चतम वायुदाब है।

प्रश्न 5. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों का प्रभाव क्षेत्र बताइए।
उत्तर-शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों से प्रभावित क्षेत्र उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनका प्रभावित क्षेत्र प्रशान्त महासागर का पश्चिमी तथा पूर्वी क्षेत्र, अटलाण्टिक महासागर का मध्य क्षेत्र एवं

भूमध्य व कैस्पियन सागर का ऊपरी क्षेत्र है। प्रशान्त महासागर में इनके द्वारा अलास्का, साइबेरिया, चीन तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में फिलीपीन्स में शीतकाल में प्रबल चक्रवात चलते हैं तथा भारी हानि पहुँचाते हैं। मध्य अटलाण्टिक क्षेत्र में शीतकाल में यह मैक्सिको की खाड़ी के निकट स्थित रहते हैं। भूमध्य व कैस्पियन सागर क्षेत्र में शीतोष्ण चक्रवात यूरोपीय देशों तथा तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा भारत तक अपना प्रभाव रखते हैं।

दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्म व शीत दोनों ऋतुओं में चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। यहाँ 60° अक्षांश के समीप सबसे अधिक संख्या में चक्रवात में चक्रवात उत्पन्न होते हैं। यहाँ अण्टार्कटिक महाद्वीप पर वर्षभर अति शीतल एवं स्थायी वायुराशियों का उत्पत्ति क्षेत्र होने के कारण चक्रवात बड़े प्रबल और विनाशकारी होते हैं। इनका प्रभाव दक्षिणी महाद्वीपों के दक्षिणी तटीय भागों पर अधिक पड़ता है। शीत ऋतु में इनका प्रभाव अत्यन्त तीव्र होता है।

प्रश्न 6. वाताग्र क्या है? इनके विभिन्न प्रकार बताइए।
उत्तर-जब दो विभिन्न प्रकार की वायुराशियाँ परस्पर मिलती हैं तो उनके मध्य सीमा क्षेत्र को वाताग्र कहते हैं। वाताग्र मध्य अक्षांशों में ही बनते हैं। तीव्र वायुदाब व तापमान प्रवणता इनकी विशेषता होती है। इनके कारण वायु ऊपर उठकर बादल बनाती है तथा वर्षा करती है। वाताग्र निम्नलिखित चार प्रकार के होते हैं
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1. अचर वाताग्र-जब वाताग्र स्थिर हो अर्थात् ऐसे वाताग्र जब कोई भी वायु । ऊपर नहीं उठती तो उसे अचर वाताग्र कहते हैं।

2. शीत वाताग्र-जब शीतल एवं भारी वायु आक्रामक रूप में उष्ण । वायुराशियों को ऊपर धकेलती है तो इस सम्पर्क क्षेत्र को शीत वाताग्र कहते हैं।

3. उष्ण वाताग्र-जब उष्ण वायुराशियाँ आक्रामक रूप में ठण्डी वायुराशियों के ऊपर चढ़ती हैं तो इस सम्पर्क क्षेत्र , को उष्ण वाताग्र कहते हैं।

4. अधिविष्ट वाताग्र-जब एक वायुराशि पूर्णतः धरातल के ऊपर उठ जाए तो ऐसे वाताग्र को अधिविष्ट वाताग्र कहते हैं (चित्र 10.7)।

प्रश्न 7. वायुराशियों से क्या अभिप्राय है? उद्गम क्षेत्र के आधार पर इनको वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर-जब वायुराशि लम्बे समय तक किसी समांगी क्षेत्र पर रहती है तो वह उस क्षेत्र के गुणों को धारण कर लेती हैं। अतः तापमान एवं आर्द्रता सम्बन्धी इन विशिष्ट गुणों वाली यह वायु ही वायुराशि कहलाती है। दूसरे शब्दों में, वायु का वह बृहत् भाग जिसमें तापमान एवं आर्द्रता सम्बन्धी क्षैतिज भिन्नताएँ बहुत कम हों, तो उसे वायुराशि कहते हैं।

वायुराशियाँ जिस समांग क्षेत्र में बनती हैं वह वायुराशियों का उद्गम क्षेत्र कहलाता है। इन्हीं उद्गम क्षेत्रों के आधार पर वायुराशियाँ अग्रलिखित पाँच प्रकार की होती हैं

  1. उष्णकटिबन्धीय महासागरीय वायुराशि (mT),
  2. उष्णकटिबन्धीय महाद्वीपीय वायुराशि (CT),
  3. ध्रुवीय महासागरीय वायुराशि (mP),
  4. महाद्वीपीय आर्कटिक वायुराशि (CA),
  5. ध्रुवीय महाद्वीपीय (cP)।

प्रश्न 8. कोरिऑलिस बल क्या है? पवनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? संक्षेप में बताइए।
उत्तर-पृथ्वी के घूर्णन के कारण ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली पवनें पूर्व की ओर विक्षेपित हो जाती हैं। इस तथ्य की खोज सर्वप्रथम फ्रांसीसी गणितज्ञ कोरिऑलिस ने की थी; अतः उन्हीं के नाम पर यह कोरिऑलिस बल कहलाता है।

इस बल के प्रभाव से उत्तरी गोलार्द्ध की पवन अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बाई ओर विक्षेपित हो जाती है। वास्तव में पवनों में यह विक्षेप पृथ्वी के घूर्णन के कारण होता है। कोरिऑलिस बल दाब प्रवणता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणता बल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। अतः दाब प्रवणता जितनी अधिक होती है पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी। अतः यह बल पवनों की दिशा को प्रभावित करता

प्रश्न 9. घाटी समीर एवं पर्वत समीर में अन्तर बताइए।
उत्तर-घाटी समीर-दिन के समय सूर्याभिमुखी पर्वतों के ढाल घाटी तल की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाते हैं। इस स्थिति में वायु घाटी तल की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाती है। इस स्थिति में वायु घाटी तल से पर्वतीय ढाल की ओर प्रवाहित होने लगती है। इसलिए इसे घाटी समीर या दैनिक समीर कहते हैं।

पर्वत समीर-सूर्यास्त के पश्चात् पर्वतीय ढाल पर भौमिक विकिरण ऊष्मा तेजी से होता है। इस कारण ढाल की ऊँचाई से ठण्डी और घनी हवा नीचे घाटी की ओर उतरने लगती है। यह प्रक्रिया चूँकि रात्रि में होती है अतः पवनों की इस व्यवस्था को पर्वत समीर या रात्रि समीर कहते हैं।

प्रश्न 10. वायुराशि तथा पवन या वायु में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-वायुराशि एवं वायु में अन्तर
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. वायुमण्डलीय दाब को प्रभावित करने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए तथा पृथ्वीतल पर वायुदाब पेटियों का विवरण दीजिए।
या संसार की वायुदाब पेटियों का सचित्र विवरण दीजिए।
या पृथ्वी पर वायुदाब पेटियों की उत्पत्ति एवं वितरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर- वायुमण्डलीय दाब को प्रभावित करने वाले कारक
वायुमण्डलीय दाब को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं

1. तापक्रम (Temperature)-तापक्रम एवं वायुदाब घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। ताप बढ़ने के साथ-साथ वायु गर्म होकर फैलती है तथा भार में हल्की होकर ऊपर उठती है। वायु के ऊपर उठने के कारण उस स्थान का वायुदाब कम हो जाता है। तापक्रम कम होने पर इसके विपरीत स्थिति होती है; अतः स्पष्ट है कि गर्म वायु हल्की तथा विरल होती है, जबकि ठण्डी वायु भारी तथा सघन होती है। यदि तापमान हिमांक बिन्दु के समीप हो तो यह वायुमण्डल की उच्च वायुभार पेटी को प्रदर्शित करता है। उच्च अक्षांशों पर अर्थात् ध्रुवीय प्रदेशों में सदैव उच्च वायुभार रहता है, क्योंकि ताप की कमी के कारण सदैव हिम जमी रहती है। इसके अतिरिक्त हिम द्वारा सूर्यातप का 85 प्रतिशत भाग परावर्तित कर दिया जाता है।

2. आर्द्रता (Humidity)-आर्द्रता का वायुदाब पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। वायु में जितनी अधिक आर्द्रता होगी, वायु उतनी ही हल्की होगी। इसीलिए यदि किसी स्थान पर आर्द्रता अधिक है। तो उस स्थान पर वायुदाब में कमी आ जाएगी। शुष्क वायु भारी होती है। वर्षा ऋतु में वायु में जलवाष्प अधिक मिले रहने के कारण वायुदाब कम रहता है। अत: मौसम परिवर्तन के साथ-साथ वायु में आर्द्रता की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है तथा वायुदाब भी बदलता रहता है। सागरों के ऊपर वाली वायु में जलवाष्प अधिक मिले होने के कारण यह स्थलीय वायु की अपेक्षा हल्की होती है।

3. ऊँचाई (Altitude)-ऊँचाई में वृद्धि के साथ-साथ वायुदाब में कमी तथा ऊँचाई कम होने के साथ-साथ वायुदाब में वृद्धि होती जाती है। वायुमण्डल की सबसे निचली परत में वायुदाब अधिक पाया जाता है। इसी कारण वायुदाब समुद्र-तल पर सबसे अधिक मिलता है। धरातल के समीप वाली वायु में जलवाष्प, धूल-कण तथा विभिन्न गैसों की उपस्थिति से वायुदाब अधिक रहती है। लगभग 900 फीट की ऊँचाई पर वायुदाब 1 इंच यो 34 मिलीबार कम हो जाता है। अधिक ऊँचाई पर वायुमण्डलीय दाब में कमी आती है, क्योंकि वायु की परतें हल्की तथा विरल होती हैं। यही
कारण है कि अधिक ऊँचाई पर वायुयान एवं रॉकेट आदि आसानी से चक्कर काटते रहते हैं।

4. पृथ्वी की दैनिक गति (Rotation of the Earth)-पृथ्वी की दैनिक गति भी वायुदाब को प्रभावित करती है। इस गति के कारण आकर्षण शक्ति का जन्म होता है। यही कारण है कि विषुवत् रेखा से उठी हुई गर्म पवनें ऊपर उठती हैं तथा ठण्डी होकर पुनः मध्य अक्षांशों अर्थात् 40° से 45° अक्षांशों पर उतर जाती हैं। यही क्रम ध्रुवीय पवनों में भी देखने को मिलता है। इस प्रकार इन अक्षांशों पर वायुमण्डलीय दाब अत्यधिक बढ़ जाता है। इसके विपरीत विषुवत रेखा पर वायु का दबाव कम रहता है।

5. दैनिक परिवर्तन की गति (Rotation of Diurmal Change)-दैनिक परिवर्तन की गति द्वारा दिन एवं रात के समय वायुमण्डलीय दाब में परिवर्तन होते हैं। दिन के समय स्थलखण्डों एवं । समुद्री भागों के वायुदाब में भिन्नता पायी जाती है, जबकि रात के समय समुद्री भागों पर वायुदाब में कम परिवर्तन होता है। विषुवत्रेखीय भागों में यह परिवर्तन अधिक पाया जाता है। ध्रुवों की ओर बढ़ने पर इस परिवर्तन में कमी आती जाती है। धरातल दिन के समय ताप का अधिग्रहण करता है तथा उसी ताप को पृथ्वी रात्रि के समय उत्सर्जन करती है। इस प्रकार तापमान घटने-बढ़ने से वायुमण्डलीय दाब में भी परिवर्तन होता रहता है।

पृथ्वीतल पर वायुदाब पेटियाँ

वायुमण्डल में वायुदाब असमान रूप से वितरित है। वायुदाब का अध्ययन समदाब रेखाओं (Isobars) की सहायता से किया जाता है। वायुदाब का वितरण निम्नलिखित दो रूपों में पाया जाता है
1. उच्च वायुदाब (High Pressure) तथा
2. निम्न वायुदाब (Low Pressure)।

पृथ्वी पर उच्च एवं निम्न वायुदाब क्षेत्र एक निश्चित क्रम में वितरित मिलते हैं। यदि ग्लोब पर . स्थल-ही-स्थल हो या फिर जल-ही-जल हो तो वायुदाब पेटियाँ एक निश्चित क्रम से वितरित मिल

सकती हैं। जल एवं स्थल की विभिन्नता महाद्वीपों एवं महासागरों के तापमान में विभिन्नता उपस्थित । करती है। फलस्वरूप धरातल पर विषुवत् रेखा से लेकर ध्रुव प्रदेशों तक वायुदाब का वितरण असमान एवं अनियमित पाया जाता है। पृथ्वी पर वायुदाब की सात पेटियाँ पायी जाती हैं। उत्पत्ति के आधार पर इन पेटियों को निम्नलिखित दो समूहों में रखा जा सकता है|

(i) तापजन्य वायुदाब पेटियाँ (Thermal Pressure Belts)-इन वायुदाब पेटियों पर ताप का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इन पेटियों में विषुवतरेखीय निम्न वायुदाब तथा ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियों को सम्मिलित किया जाता है।

(ii) गतिक वायुदाब पेटियाँ (Dynamic Pressure Belts)-इन वायुदाब पेटियों पर पृथ्वी की परिभ्रमण गति का प्रभाव पड़ता है। इन पेटियों में उपोष्ण उच्च वायुदाब तथा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब को सम्मिलित किया जाता है।

वायुदाब पेटियाँ

1. विषुवतरेखीय निम्न वायुदाब पैटी (Equatorial Low Pressure Belt)-इस पेटी का विस्तार विषुवत् रेखा के दोनों ओर 5° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य है। सूर्य की उत्तरायण एवं दक्षिणायण स्थितियों के कारण ऋतुओं के अनुसार इस पेटी का स्थानान्तरण उत्तर-दक्षिण होता रहता है। स्थल की अधिकता के कारण अधिक तापमान की भाँति इस पेटी का विस्तार भी उत्तरी गोलार्द्ध की ओर अधिक है। इस पेटी में वर्ष-भर सूर्य की, किरणें सीधी चमकती हैं तथा दिन एवं रात । बराबर होते हैं। अतः सूर्यातप की अधिकता के कारण दिन के समय धरातल अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे उसके सम्पर्क में आने वाली वायु भी गर्म हो जाती है। गर्म होकर वायु हल्की होती है। जिससे उसका फैलाव होता है तथा वह ऊपर उठ जाती है। इसी कारण वायु में संवहन धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ताप की अधिकता के कारण यहाँ पर निम्न वायुदाब सदैव बना रहता है। वायुमण्डल में अधिक आर्द्रता निम्न वायुदाब के कारण होती हैं।
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इस प्रकार यह पेटी प्रत्यक्ष रूप में ताप से सम्बन्धित है। इस पेटी के दोनों ओर स्थित उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटियों से विषुवत रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं तथा धरातलीय वायु में गति कम होने के कारण ये शान्त तथा अनिश्चित दिशा में | प्रवाहित होती हैं। इसी कारण इसे पेटी को ‘डोलड्रम’ अथवा ‘शान्त पवन की पेटी’ भी कहते हैं। सूर्य की उत्तरायण स्थिति में यह पेटी उत्तर की ओर खिसक जाती है तथा दक्षिणायण होने पर दक्षिण की ओर खिसक आती है।

2. उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब पेटी (Sub-tropical High Pressure Belt)-विषुव॑त् रेखा के दोनों ओर दोनों गोलार्डों में 30° से 35° अक्षांशों के मध्य यह पेटी विकसित है। वर्ष में शीतकाल के दो माह छोड़कर इस पेटी में तापमान लगभग उच्च रहता है। ग्रीष्मकाल में इस पेटी में उच्चतम तापमान अंकित किया जाता है, परन्तु फिर भी वायुदाब उच्च रहता है, क्योकि इस वायुदाब पेटी की उत्पत्ति पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण होती है। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी तथा विषुवत्रेखीय निम्न वायुदाब पेटी के ऊपर से आने वाली वायुराशियाँ इसी पेटी में नीचे उतरती हैं। धरातल पर नीचे उतरने के कारण तथा दबाव के फलस्वरूप इन वायुराशियों के तापमान में वृद्धि । हो जाती है। इस प्रकार इस पेटी को उच्च वायुदाब ताप से सम्बन्धित न होकर पृथ्वी की परिभ्रमण गति तथा वायु के अवतलन से सम्बन्धित है। इसीलिए इस पेटी में उच्च वायुदाब तथा स्वच्छ आकाश मिलता है।

पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ध्रुवों के समीप की वायु कर्क तथा मकर रेखाओं तक प्रवाहित होकर एकत्रित हो जाती है, जिससे इस पेटी के वायुदाब में वृद्धि हो जाती है। वायुदाब की इस पेटी को ‘अश्व अक्षांश’ (Horse Latitudes) के नाम से पुकारते हैं। इन वायुदाब पेटियों के मध्य वायु शान्त रहती है, जिससे इन अक्षांशों में वायुमण्डल भी शान्त हो जाता है। धरातल पर वायु बहुत ही मन्द-मन्द प्रवाहित होती है जो अनियमित होती है।

3. उपधृवीय निम्न वायुदाब पेटी (Sub-polar Low Pressure Belt)-उत्तरी एवं दक्षिणी गोलाद्ध में इस पेटी का विस्तार 60° से 65° अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। इस पेटी में निम्न वायुदाब ‘ मिलता है। इनका विस्तार उत्तर तथा दक्षिण में क्रमशः आर्कटिक तथा अण्टार्कटिक वृत्तों के समीप है। उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी में अनेक केन्द्र पाये जाते हैं, जिसके निम्नलिखित कारण हैं—

(i) इन पेटियों के दोनों ओर उच्च वायुदाब पेटियाँ स्थित हैं। ये पेटियाँ ध्रुवीय भागों में अधिक शीत के कारण तथा मध्य अक्षांशों में पृथ्वी की परिभ्रमण गति के कारण विकसित हुई हैं।

(ii) इन पेटियों के सागरतटीय भागों में गैर्म जलधाराएँ प्रवाहित होती हैं जिनसे तापक्रम में अचानक वृद्धि हो जाती है तथा वायुदाब निम्न हो जाता है।

(iii) पृथ्वी की परिभ्रमण गति के कारण उपध्रुवीय भागों में भंवरें उत्पन्न हो जाती हैं जिससे उपध्रुवीय भागों के ऊपर वायु की कमी के कारण न्यून वायुदाब उत्पन्न हो जाता है, परन्तु इस भाग में अधिक शीत पड़ने के कारण तापमान की अपेक्षा पृथ्वी की गति को प्रभाव बहुत ही कम रहता है। तापमान की कमी के कारण ध्रुवों पर उच्च वायुदाब की उत्पत्ति होती है तथा बाहर की ओर वायुदाब निम्न रहता है।

इस प्रकार इस वायुदाब पेटी का निर्माण पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण हुआ है। तापमान का बहुत ही कम प्रभाव इस निम्न वायुदाब पेटी पर पड़ता है।

4. ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी (Polar High Pressure Belt)-उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवीय वृत्तों के समीप उच्च वायुदाब पेटी का विस्तार मिलता है। सम्पूर्ण वर्ष तापमान निम्न रहने के कारण यह प्रदेश बर्फाच्छादित रहता है। इसी कारण धरातलीय वायु भारी तथा शीतल होती है। यद्यपि इस प्रदेश में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण वायु की धाराएँ पतली हो जाती हैं, परन्तु अधिक शीत एवं भारीपन के कारण वर्ष-भर उच्च वायुदाब बना रहता है। इस उच्च वायुदाब की उत्पत्ति में ताप को अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

ध्रुवीय प्रदेशों के वायुदाब में प्रायः समता पायी जाती है, क्योंकि वर्ष-भर ये प्रदेश हिम से ढके रहते हैं। उच्च वायुदाब वाले इन ध्रुवीय प्रदेशों से विषुवत रेखा की ओर शीत वाताग्र चलते हैं। इन वायुराशियों को। उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी-पूर्वी तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी-पूर्वी के नाम से पुकारा जाता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी की आन्तरिक गतियाँ हैं, जो इन्हें मोड़ने में सहायता करती हैं। सामान्यतया इन। वायु-राशियों को ध्रुवीय पूर्वी पवनों के नाम से पुकारा जाता है। अत: इन प्रदेशों में सदैव उच्च वायुदाब बना रहता है।

प्रश्न 2. जनवरी एवं जुलाई के आधार पर वायुदाब के क्षैतिज विश्व वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर-वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समदाब रेखाओं की सहायता से किया जाता है। समदाब रेख़ाएँ समुद्रतल से समान वायुदाब को प्रदर्शित करती हैं।

वायुदाब का विश्व वितरण

जनवरी महीने का समुद्र तल से वायुदाब का विश्व वितरण चित्र 10.9 में दिखाया गया है जिससे स्पष्ट है कि विषुवत् वृत्त के निकट वायुदाब अफ्रीका महाद्वीप के मध्य में 1020 मिलीबार है, जबकि पूर्वी द्वीप समूह एवं दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के उत्तर तथा पूर्वी व पश्चिमी भाग में 1010 मिलीबार की समदाब. रेखा आवृत है। जैसे-जैसे भूमध्यरेखा से उत्तरी ध्रुवों की ओर जाते हैं, वायुदाब घटकर. 1005 मिलीबार

तक पहुँच जाता है, वायुदाब घटने का क्रम उत्तरी ध्रुवों की अपेक्षा दक्षिणी ध्रुवों पर अधिक है। यहाँ । 995 मिलीबार की समदाब रेखा दक्षिणी अमेरिका एवं आस्ट्रेलिया के दक्षिण में स्थत है।
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चित्र 10.10 में जुलाई महीने का समुद्रतल से वायुदाब का विश्व वितरण दर्शाया गया है। मानचित्र से स्पष्ट है कि जुलाई माह में विषुवत् वृत्ते पर निम्न वायुदाब की समदाब रेखाओं का मान अपेक्षाकृत जनवरी से बहुत कम तो नहीं होता, किन्तु यह कुछ उत्तर-दक्षिण अवश्य खिसक जाता है।
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अतः सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि भूमध्यरेखा पर वायुदाब कम होता है जिसे भूमध्यरेखीय न्यून अवदाब कहते हैं। 30° उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों पर उच्चदाब क्षेत्र पाए जाते हैं जिन्हें उपोष्ण उच्च दाब क्षेत्र कहा जाता है। पुनः ध्रुवों की ओर 60° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों पर निम्न दाब पेटियाँ हैं जिन्हें अधोध्रुवीय निम्नदाब पेटियाँ कहते हैं। ध्रुवों के निकट वायुदाब अधिक होता है क्योंकि यहाँ तापमान कम रहता है। वायुदाब की ये पेटियाँ स्थायी नहीं होतीं बल्कि इनमें ऋतुवत् परिवर्तन होता रहता है। अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु में ये दक्षिण की ओर तथा ग्रीष्म ऋतु में उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। यही कारण है कि जनवरी एवं जुलाई की समदाब रेखाओं की स्थिति में अन्तर पाया जाता है।

प्रश्न 3. पवनों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए। पृथ्वी की नियतवाही अथवा स्थायी पवनों का वर्गीकरण कीजिए तथा उनकी उत्पत्ति के कारणों को भी समझाइए।
या पृथ्वी की सनातनी हवाओं की उत्पत्ति एवं उनके वितरण का वर्णन कीजिए।
या ‘अश्व अक्षांश से आप क्या समझते हैं ?
या व्यापारिक हवाओं की दिशा एवं क्षेत्र का वर्णन कीजिए।
या पृथ्वी की भूमण्डलीय पवनों का वर्णन कीजिए एवं उनकी उत्पत्ति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-वायुदाब में भिन्नता होने पर उच्च वायुदाब से कम निम्न वायुदाब की ओर वायु का क्षैतिज प्रवाह होता है, जिसे पवन कहते हैं।

पवनों का वर्गीकरण

भूमण्डल में पवने नियतवाही तथा अनियतवाही क्रम से चलती हैं, तदनुसार इन्हें दो वर्गों में रखा जाता है-
(I) स्थायी या नियतवाही या सनातनी या ग्रहीय पवनें (Permanent or Planetary Winds) तथा
(II) अनिश्चित अथवा अस्थायी पवने (Seasonal Winds)।

स्थायी या नियतवाही या सनातनी या ग्रहीय पवनें

ग्लोब या भूमण्डल पर उच्च वायुदाब की पेटियों से निम्न वायुदाब की ओर जो पवनें चलने लगती हैं, उन्हें नियतवाही पवनें कहते हैं। ये पवनें वर्ष भर एक निश्चित दिशा एवं क्रम से प्रवाहित होती हैं। इन पवनों में अस्थायी मौसमी स्थानान्तरण होता रहता है। इनकी उत्पत्ति तापमान तथा पृथ्वी के घूर्णन एवं वायुदाब से होती है, जिसके फलस्वरूप उच्च वायुदाब सदैव निम्न वायुदाब की ओर आकर्षित होता है।

1. विषुवतरेखीय पछुवा हवाएँ तथा डोलड्रम की पेटी (Equatorial westerly and Doldrum)-विषुवत् रेखा के 5° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य निम्न वायुदाब पेटी पायी जाती है। यहाँ पर हवाएँ शान्त रहती हैं। इसीलिए इसे शान्त पेटी या डोलड्रम कहते हैं। सूर्य की उत्तरायण स्थिति में यह उत्तर की ओर अधिक खिसक जाती है तथा दक्षिणायण होने पर पुन: अपनी प्रारम्भिक अवस्था में आ जाती है। विषुवत् रेखा के सहारे इस डोलड्रम का विस्तार निम्नलिखित तीन क्षेत्रों में पाया जाता है

(i) हिन्द-प्रशान्त डोलड्रम-इसका विस्तार विषुवत्रेखीय प्रदेश के एक-तिहाई भाग पर है। “यह अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी भाग से 180° देशान्तर तक विस्तृत है।

(ii) विषुवतरेखीय मध्य अफ्रीका के पश्चिमी भाग-डोलड्रम की यह पेटी अफ्रीका के पश्चिमी भाग में खाड़ी से लेकर अन्ध महासागर में कनारी द्वीप के उत्तरी भाग तक विस्तृत है।

(iii) विषुवतरेखीय मध्य अमेरिका के पश्चिमी भाग-इस पेटी में दोपहर बाद संवहन धाराएँ उत्पन्न होती हैं तथा ठण्डी होकर गरज के साथ वर्षा करती हैं। यह डोलड्रम पश्चिम | से पूर्व दिशा की ओर धरातल पर चलता है।

2. व्यापारिक पवनें या सन्मार्गी पवनें (Trade Winds)-दोनों गोलार्डो में उपोष्ण कटिबन्धीय उच्च वायुदाब क्षेत्र से विषुवत्रेखीय निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर चलने वाली पवनों को व्यापारिक पवनों के नाम से पुकारा जाता है। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर होती है। व्यापारिक पवनें 5° से 35° अक्षांशों के मध्य चलती हैं। ये स्थायी एवं सतत पवनें हैं तथा सदैव एक निश्चित दिशा एवं क्रम,से प्रवाहित होती हैं। इसलिए इन्हें ‘सन्मार्गी पवनें’ भी कहा जाता है। प्राचीन काल में नौकाएँ एवं जलयान इन्हीं पवनों के माध्यम से आगे बढ़ते थे। यदि इन पवनों का प्रवाह रुक जाता था तो व्यापार में बाधा पड़ती थी। यही कारण है कि इन पवनों का नाम व्यापारिक पवनें रखा गया था। व्यापारिक पवनों की स्थिति स्थल भागों की अपेक्षा जल भागों में अधिक शक्तिशाली होती है। साधारणतया पवनों की गति 16 से 24 किमी प्रति घण्टा होती है।

3. अश्व अक्षांश (Horse Latitudes)-दोनों गोलार्डों में 30° से 35° अक्षांशों के मध्य इनका विस्तार है। यह पेटी उपोष्ण उच्च वायुदाब की है। यह पेटी पछुवा पवनों एवं व्यापारिक पवनों के मध्य विभाजन का कार्य करती है। विषुवत् रेखा के समीप गर्म हुई वायु व्यापारिक पवनों के विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हुई शीतले होकर 30° से 35° अक्षांशों के समीप नीचे उतरती है। अत: इन पवनों के नीचे उतरने के कारण यहाँ उच्च वायुदाब उत्पन्न हो जाता है। इसी कारण यहाँ उपोष्ण कटिबन्धीय प्रति-चक्रवात उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे वायुमण्डल में स्थिरता आ जाती है। इस प्रकार वायु-प्रवाह शान्त हो जाता है जिससे मौसम भी शुष्क एवं मेघरहित हो जाता है।
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प्राचीन काल में स्पेन के व्यापारी अपने जलयानों पर घोड़े (Anchor) ले जाते थे, क्योंकि इनके संचालन का आधार पछुवा पवनें होती थीं, परन्तु अत्यधिक वायुदाब के कारण जलयान डूबना प्रारम्भ कर देते थे। अतः नाविक जलयानों को हल्का करने के लिए कुछ घोड़े सागर में फेंक देते थे जिससे इन्हें अश्व-अक्षांशों के नाम से पुकारा जाने लगा।

4. पछुवा पवनें (Westerly Winds)-उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी से उपध्रुवीय निम्न वायुभार पेटियों (60° से 65° अक्षांश) के मध्य चलने वाली स्थायी पवनों को ‘पछुवा पवनों के नाम से पुकारते हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्व की ओर होती है। ये पवनें शीत एवं शीतोष्ण कटिबन्धों में चलती हैं। शीत-प्रधान ध्रुवीय पवनों के उष्णार्द्र पछुवा पवनों के सम्पर्क में आने से वाताग्र (Front) उत्पन्न हो जाता है। इन्हें शीतोष्ण वाताग्र के नाम से जाना जाता है। चक्रवातों से इनकी दिशा में परिवर्तन हो जाता है तथा मौसम में भी परिवर्तन आ जाता है। आकाश बादलों से युक्त हो जाता है तथा वर्षा होती रहती है। उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में पछुवा पवनों का प्रवाह तीव्र होता है, क्योंकि यहाँ पर जल की अधिकता है। यहाँ पर पछुवा पवनें गर्जन-तर्जन के साथ चलती हैं जिससे समुद्री यात्रियों ने इन्हें ‘गरजने वाला चालीसा’, ‘क्रुद्ध पचासा’ तथा ‘चीखती साठा’ आदि नामों से पुकारा है।

5. ध्रुवीय पवनें (Polar Winds)-उत्तरी ध्रुवीय प्रदेशों में 60° से 65° अक्षांशों के मध्य पूर्वी पवनें चलती हैं। ग्रीष्मकाल में इन अक्षांशों के मध्य दोनों गोलार्डो में निम्न वायुदाब मिलता है, परन्तु शीतकाल में यह समाप्त हो जाता है। ध्रुवों पर वर्ष-भर उच्च वायुदाब बना रहता है। अतः ध्रुवीय उच्च वायुदाब से उप-ध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर चलने वाली पवनों को ‘ध्रुवीय पवनें’ कहते हैं। इनकी दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर-पूर्व तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व होती है। सूर्य की उत्तरायण स्थिति में इनके प्रवाह क्षेत्र उत्तर की ओर खिसक जाते हैं तथा दक्षिणायण में स्थिति इसके विपरीत होती है। ध्रुवीय पवनें 70° से 80° अक्षांशों के मध्य ही चल पाती हैं, क्योंकि इससे । आगे उच्च वायुदाब के क्षेत्र सदैव बने रहते हैं। ध्रुवों की ओर से चलने के कारण ये पवनें-अधिक ठण्डी एवं प्रचण्ड होती हैं। जब इनका सम्पर्क शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों की पवनों से होता है तो भयंकर चक्रवातों एवं प्रति-चक्रवातों की उत्पत्ति होती है।

नियतवाही या स्थायी या सनातनी हवाओं की उत्पत्ति

सनातनी हवाओं की उत्पत्ति के नियम को ग्रहीय वायु सम्बन्धी नियम कहते हैं। इस नियम के अनुसार हवाएँ सदैव उच्च वायुदाब क्षेत्रों से निम्न वायुदाब क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती हैं। तापमान की भिन्नता इन्हें गति प्रदान करती है, क्योंकि वायु गर्म होकर हल्की होने से ऊपर उठती है तथा उसके रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए दूसरे स्थानों से भारी वायु पवनं के रूप में दौड़ने लगती है। इन हवाओं की गति एवं दिशा पर पृथ्वी की घूर्णन गति का प्रभाव पड़ता है। पवन के निश्चित दिशा की ओर बहने के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

1. फैरल का नियम (Ferrel’s Law)-पवन-संचरण के इस नियम का प्रतिपादन अमेरिकी विद्वान् | फैरल ने किया था। फैरल के अनुसार, “पृथ्वी पर प्रत्येक स्वतन्त्र पिण्ड अथवा तरल पदार्थ, जो गतिमान है, पृथ्वी की परिभ्रमण गति के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बायीं ओर मुड़ जाता है। इसी नियम के अनुसार ही सनातनी हवाएँ उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के अनुकूल तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूइयों के प्रतिकूल प्रवाहित होती हैं।

2. बाइज बैलट का नियम (Buys Ballot’s Law)-उन्नीसवीं शताब्दी में हॉलैण्ड के वैज्ञानिक बाइज बैलट ने पवन-संचरण के सम्बन्ध में एक नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। उन्हीं के नाम पर इसे बाइज बैलट का नियम कहते हैं। बाइज बैलट के अनुसार, “यदि हम उत्तरी गोलार्द्ध में चलती हुई हवा की ओर पीठ करके खड़े हों तो हमारे बायीं ओर निम्न वायुभार तथा दायीं ओर उच्च वायुभार होगा। इसके विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध में दायीं ओर निम्न वायुभार तथा बायीं ओर उच्च वायुभार होगा। यही कारण है कि सनातनी हवाएँ उत्तरी गोलार्द्ध में उच्च दाब के चारों ओर घड़ी की सूइयों के अनुकूल और न्यून दाब के चारों ओर घड़ी की सूइयों के प्रतिकूल चला करती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में हवाओं की दिशा ठीक इसके विपरीत होती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 14 Respiration in Plants 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 14  Respiration in Plants (पादप में श्वसन)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
इनमें अन्तर करिए
(अ) साँस (श्वसन) और दहन
(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र
(स) ऑक्सी श्वसन तथा किण्वन
उत्तर :
(अ) साँस (श्वसन) तथा दहन में अन्तर
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(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र में अन्तर
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(स) ऑक्सीश्वसन तथा किण्वन में अन्तर
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प्रश्न 2.
श्वसनीय क्रियाधार क्या है? सर्वाधिक साधारण क्रियाधार का नाम बताइए।

उत्तर :
वे कार्बनिक पदार्थ जो एनाबोलिक विधि से संश्लेषित हों अथवा संचित भोजन के रूप में संग्रह किए जाएँ और ऊर्जा के विमोचन के लिए उनका विघटन हो उन्हें श्वसनीय क्रियाधार कहते हैं। सर्वाधिक साधारण क्रियाधार है ग्लूकोज (मोनोसैकेराइड कार्बोहाइड्रेट)।

प्रश्न 3.
ग्लाइकोलिसिस को रेखा द्वारा बनाइए।
उत्तर :
ग्लाइकोलिसिस ग्लाइकोलिसिस को EMP मार्ग (Embden Meyerhoff Parnas Pathway) भी कहते हैं। यह कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होता है। इसमें ऑक्सीजन का प्रयोग नहीं होता; अतः ऑक्सी तथा अनॉक्सीश्वसन दोनों में यह क्रिया होती है। इस क्रिया के अन्त में ग्लूकोस के एक (UPBoardSolutions.com) अणु से पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) के 2 अणु बनते हैं। ग्लाइकोलिसिस में 4 ATP बनते हैं, 2 ATP खर्च होते हैं; अत: 2 ATP अणु का लाभ होता है। इन अभिक्रियाओं में मुक्त 2H+ आयन्स हाइड्रोजनग्राही NAD से अनुबन्धित होकर NAD.2H बनाते हैं। ये क्रियाएँ विभिन्न चरणों में पूर्ण होती हैं। ग्लाइकोलिसिस से कुल 8 ATP अणु ऊर्जा प्राप्त होती है।
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प्रश्न 4.
ऑक्सीश्वसन के मुख्य चरण कौन-कौन से हैं ? यह कहाँ सम्पन्न होती है?

उत्तर :

ऑक्सीश्वसन के मुख्य चरण

जीवित कोशिका में ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोस (कार्बनिक पदार्थ) के जैव-रासायनिक  ऑक्सीकरण को ऑक्सीश्वसन कहते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत रासायनिक ऊर्जा गतिज ऊर्जा के रूप में ATP में संचित हो जाती है।
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ऑक्सीश्वसन निम्नलिखित चरणों में पूर्ण होता है
(क)
ग्लाइकोलिसिस अथवा ई० एम० पी० मार्ग (Glycolysis or E.M.P. Pathway) :

यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। इसमें ग्लूकोस के आंशिक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप पाइरुविक अम्ल के दो अणु प्राप्त होते हैं। ग्लाइकोलिसिस प्रक्रिया में कुल 8 ATP अणु प्राप्त होते हैं।

(ख)
ऐसीटिल कोएन्जाइम-A का निर्माण (Formation of Acetyl CoA)

यह माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होती है। कोशिकाद्रव्य (सायटोसोल) में उत्पन्न पाइरुविक अम्ल माइटोकॉन्ड्रिया में प्रवेश करके NAD+ और कोएन्जाइम-A से संयुक्त होकर पाइरुविक अम्ल का ऑक्सीकीय CO2 वियोजन (Oxidative decarboxylation) होता है। (UPBoardSolutions.com) इस क्रिया में CO2 का एक अणु मुक्त होता है और NAD.2H बनता है और अन्त में ऐसीटिल कोएन्जाइम-A बनता है। पाइरुविक अम्ल + CoA + NAD
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(ग) क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Krebs Cycle or Tricarboxylic Acid Cycle) :
यह पूर्ण क्रिया माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होती है। क्रेब्स चक्र के एन्जाइम्स मैट्रिक्स में पाए जाते हैं। ऐसीटिल कोएन्जाइम-A माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में उपस्थित ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल से क्रिया करके 6-कार्बन यौगिक सिट्रिक अम्ल बनाता है। सिट्रिक अम्ल का क्रमिक निम्नीकरण होता है और अन्त: में पुनः ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल प्राप्त हो जाता है। क्रेब्स चक्र में 2 अणु CO2  के मुक्त होते हैं। चार स्थानों पर 2H+ मुक्त होते हैं जिन्हें हाइड्रोजनग्राही NAD यो FAD ग्रहण करते हैं। क्रेब्स चक्र में 24ATP अणु ETS द्वारा प्राप्त होते है। ऐसीटिल कोएन्जाइम
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(घ) इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र (Electron Transport System) :
यह माइटोकॉण्ड्रिया की भीतरी सतह पर स्थित F कण या ऑक्सीसोम्स पर सम्पन्न होता है। क्रेब्स चक्र की ऑक्सीकरण क्रिया में डिहाइड्रोजिनेस (dehydrogenase) एन्जाइम विभिन्न पदार्थों से हाइड्रोजन तथा इलेक्ट्रॉन के जोड़े मुक्त कराते हैं। हाइड्रोजन तथा इलेक्ट्रॉन कुछ मध्यस्थ संवाहकों के द्वारा होते हुए ऑक्सीजन से मिलकर जल का निर्माण करते हैं। हाइड्रोजन परमाणुओं के एक इलेक्ट्रॉनग्राही से दूसरे इलेक्ट्रॉनग्राही पर स्थानान्तरित होते समय ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है।

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प्रश्न 5.
क्रेब्स चक्र का समग्र रेखाचित्र बनाइए।
उत्तर :
क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र

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प्रश्न 6.
इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र के विभिन्न पदों में अपघटन के फलस्वरूप उत्पन्न हुई ऊर्जा के अधिकांश भाग का परिवहन हाइड्रोजनग्राही करते हैं; जैसे-NAD, NADP, FAD आदि। ये 2H+ (हाइड्रोजन आयन) के साथ मिलकर अपचयित (reduce) हो जाते हैं। इन्हें वापसे ऑक्सीकृत (oxidise) करने के लिए विशेष तन्त्र, इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र (ETS = Electron Transport System) की आवश्यकता होती है। यह तन्त्र इलेक्ट्रॉन्स (e) को एक के बाद एक ग्रहण करते हैं। तथा उन पर उपस्थित ऊर्जा स्तर (energy level) को कम करते हैं। इस कार्य का मुख्य उद्देश्य कुछ ऊर्जा को निर्मुक्त करना है। यही निर्मुक्त ऊर्जा ATP (adenosine triphosphate) में संगृहीत हो जाती है। इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र एक श्रृंखलाबद्ध क्रम के रूप में होता है जिसमें कई सायटोक्रोम एन्जाइम्स (cytochrome enzymes) होते हैं। इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र के एन्जाइम माइटोकॉन्ड्रिया की अन्त:कला (inner membrane) में श्रृंखलाबद्ध क्रम से लगे रहते हैं। सायटोक्रोम्स लौह तत्त्व के परमाणु वाले वर्णक हैं, जो इलेक्ट्रॉन मुक्त कर ऑक्सीकृत (oxidised) हो जाते हैं
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साइटोक्रोम्स की इस श्रृंखला में प्रारम्भिक साइटोक्रोम ‘बी’ (cytochrome ‘ b’ = cyt ‘b’ Fe3+) उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन (e) को ग्रहण करता है तथा अपचयित हो जाता है। इलेक्ट्रॉन का स्थानान्तरण हाइड्रोजन आयन्स से होता है, जो पदार्थ से NAD या NADP के द्वारा लाए गए थे। बाद में ये FAD को दे दिए गए थे और यहाँ से स्वतन्त्र कर दिए गए। इलेक्ट्रॉन्स के Cyt ‘b’ Fe+++ पर स्थानान्तरण में सम्भवत: सह-एन्जाइम ‘क्यू’ (Co-enzyme ‘Q’ = Co ‘Q’ = ubiquinone) सहयोग (UPBoardSolutions.com) करता है। इस प्रारम्भिक सायटोक्रोम के बाद श्रृंखला में कईऔर सायटोक्रोम रहते हैं। ये क्रमश: इलेक्ट्रॉन को अपने से पहले वाले सायटोक्रोम से ग्रहण करते हैं तथा अपने से अगले सायटोक्रोम को स्थानान्तरित कर देते है।

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श्रृंखला के अन्तिम सायटोक्रोम से दो इलेक्ट्रॉन्स, ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर उसे सक्रिय कर देते हैं। अब यह ऑक्सीजन परमाणु उपलब्ध दो हाइड्रोजन आयन्स के साथ जुड़कर जेल का एक अणु (H2O) बना लेता है। श्वसन से सम्बन्धित यह सायटोक्रोम तन्त्र माइटोकॉन्ड्रिया की अन्त:कला (inner membrane) में स्थित होता है।

ए०टी०पी० का संश्लेषण

श्वसन क्रिया दो क्रियाओं ग्लाकोलिसिस (glycolysis) तथा क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) में पूर्ण होती है। इन क्रियाओं के अन्त में कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल बनते हैं। जबकि दो अणु काम में आ जाते हैं। अतः केवल दो ATP अणुओं को लाभ होता है। ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र में मुक्त 2H+ (हाइड्रोजन आयन) को NAD, NADP या FAD ग्रहण करते हैं। इनसे मुक्त परमाणु हाइड्रोजन अणु हाइड्रोजन में बदलकर ऑक्सीजन के साथ मिलकर जल बनाते हैं। इस क्रिया में मुक्त 2e (इलेक्ट्रॉन) इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र (ETS) में पहुंचकर धीरे-धीरे अपना ऊर्जा स्तर (energy level) कम करते हैं। इस प्रकार निष्कासित ऊर्जा ADP को ATP में बदलने के काम आती है। इस प्रकार प्रत्येक जोड़े 2H+ से तीन ATP अणु बनते हैं। FAD पर स्थित 2H+ से केवल दो ATP अणु ही बनते हैं। इस प्रकार ग्लाइकोलिसिस से लेकर पूर्ण ऑक्सीकरण होने तक कुल ATP अणुओं की संख्य निम्नलिखित हो जाती है

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(a) ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रियाओं में
(कुल चार अणु बनते हैं तथा दो प्रयुक्त हो जाते हैं)। = 2 ATP

(b) ग्लाइकोलिसिस में ही बने दो NAD.H,
(ETS में जाने के बाद) = 6 ATP

(c) क्रेब्स चक्र के पूर्व पाइरुविक अम्ल से ऐसीटिल को-एन्जाइम ‘ए’ बनते समय NAD.H2 बनने तथा ETS में जाने के बाद
(दो अणु पाइरुविक अम्ल से दो NAD.H2) बनते हैं। = 6ATP

(d) क्रेब्स चक्र में बने 3NADH2 के ETS में जाने पर [दो बार यही चक्र पूरा होने पर ध्यान रहे, दो ऐसीटिल को-एन्जाइम ‘ए’
(acetyl Co ‘A’) अर्थात् एक ग्लूकोस के अणु से दो क्रेब्स चक्र में 6NADH2 की प्राप्ति होती है। ATP के 9 अणु बनाते हैं।]
9x 2 = 18 ATP

(e) क्रेब्स चक्र में ही FAD.H2 से (ETS में जाने पर) दो अणु ATP बनते हैं
(इस प्रकार, एक पूरे ग्लूकोस अणु से चार अणु ATP बनते हैं।) = 2 x 2 = 4 ATP

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(f) क्रेब्स चक्र में ही सक्सीनिक अम्ल (succinic acid) बनते समय जी० टी० पी०
(GTP = (guanosine triphosphate)) का निर्माण होता है जो बाद में एक ADP को ATP में बदल देता है।
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इस प्रकार कुल योग

ग्लिसरॉल फॉस्फेट शटल (Glycerol Phosphate Shuttle)
की कार्य क्षमता कम होती है। इसमें दो अणु NADH,, जो ग्लाइकोलिसिस में बनते हैं, उनसे कभी-कभी 6 ATP के स्थान पर 4 ATP की ही प्राप्ति होती है। ये NADH, माइटोकॉन्ड्रिया के बाहर जीवद्रव्य में बनते हैं। NADH2 का अणु माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर प्रवेश नहीं कर पाता, (UPBoardSolutions.com) यह अपने H+ माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर भेजता है। मस्तिष्क तथा पेशियों की कोशिकाओं में प्रत्येक NADH2 के H+ के भीतर प्रवेश में 1 ATP अणु खर्च हो जाता है; अतः अन्त में कुल 36 ATP अणुओं की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित के मध्य अन्तर कीजिए
(अ) ऑक्सीश्वसन तथा अनॉक्सीश्वसन
(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा किण्वन
(स) ग्लाइकोलिसिस तथा सिट्रिक अम्ल चक्र
उत्तर :
(अ)
ऑक्सीश्वसन तथा अनॉक्सीश्वसन में अन्तर

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(ब)
ग्लाइकोलिसिस तथा किण्वन में अन्तर

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(स)
ग्लाइकोलिसिस तथा सिट्रिक अम्ल चक्र में अन्तर

क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र को सिट्रिक अम्ल चक्र (Citric Acid Cycle) भी कहते हैं। अन्तर के लिए प्रश्न 1 (ब) का उत्तर देखिए।

प्रश्न 8.
शुद्ध ए०टी०पी० के अणुओं की प्राप्ति की गणना के दौरान आप क्या कल्पनाएँ करते हैं?
उत्तर :

ए०टी०पी० अणुओं की प्राप्ति की कल्पनाएँ।

  1.  यह एक क्रमिक, सुव्यवस्थित क्रियात्मक मार्ग है जिसमें एक क्रियाधार से दूसरे क्रियाधार का निर्माण होता है जिसमें ग्लाइकोलिसिस से शुरू होकर क्रेब्स चक्र तथा इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र (ETS) एक के बाद एक आती है।
  2. ग्लाइकोलिसिस में संश्लेषित NAD माइटोकॉन्ड्रिया में आता है, जहाँ उसका फॉस्फोरिलीकरण (UPBoardSolutions.com) होता है।
  3. श्वसन मार्ग के कोई भी मध्यवर्ती दूसरे यौगिक के निर्माण के उपयोग में नहीं आते हैं।
  4. श्वसन में केवल ग्लूकोस का उपयोग होता है। कोई दूसरा वैकल्पिक क्रियाधार श्वसन मार्ग के किसी भी मध्यवर्ती चरण में प्रवेश नहीं करता है।

वास्तव में सभी मार्ग (पथ) एकसाथ कार्य करते हैं। पथ में क्रियाधार आवश्यकतानुसार अन्दर- बाहर आते-जाते रहते हैं। आवश्यकतानुसार ATP का उपयोग हो सकता है। एन्जाइम की क्रिया की दर विभिन्न कारकों द्वारा नियन्त्रित होती है। श्वसन जीवन के लिए एक उपयोगी क्रिया है। सजीव तन्त्र में ऊर्जा का संग्रहण तथा निष्कर्षण होता रहता है।

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प्रश्न 9.
“श्वसनीय पथ एक ऐम्फीबोलिक पथ होता है।” इसकी चर्चा कीजिए।
उत्तर :

श्वसनीय पथ एक ऐम्फीबोलिक पथ

श्वसन क्रिया के लिए ग्लूकोस एक सामान्य क्रियाधार (substrate) है। इसे कोशिकीय ईंधन (cellular fuel) भी कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स श्वसन क्रिया में प्रयोग किए जाने से पूर्व ग्लूकोस में बदल दिए जाते हैं। अन्य क्रियाधार श्वसन पथ में प्रयुक्त होने से पूर्व विघटित होकर ऐसे पदार्थों में बदले जाते हैं, जिनका उपयोग किया जा सके; जैसे—वसा पहले ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल में विघटित होती है। वसीय अम्ल ऐसीटाइल कोएन्जाइम बनकर श्वसन मार्ग में प्रवेश करता है। ग्लिसरॉल फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (PGAL) में बदलकर श्वसन मार्ग में प्रवेश करता है। प्रोटीन्स विघटित होकर ऐमीनो अम्ल बनाती है। ऐमीनो अम्ल विऐमीनीकरण (deamination) के पश्चात् क्रेब्स चक्र के विभिन्न चरणों में प्रवेश करता है।

इसी प्रकार जब वसा अम्ल का संश्लेषण होता है तो श्वसन मार्ग से ऐसीटाइल कोएन्जाइम अलग हो जाता है। अतः वसा अम्ल के संश्लेषण और विखण्डन के दौरान श्वसनीय मार्ग का उपयोग होता है। इसी प्रकार प्रोटीन के संश्लेषण व विखण्डन के दौरान भी श्वसनीय मार्ग का उपयोग होता है। इस प्रकार (UPBoardSolutions.com) श्वसनी पथ में अपचय (catabolic) तथा उपचय (anabolic) दोनों क्रियाएँ होती हैं। इसी कारण श्वसनी मार्ग (पथ) को ऐम्फीबोलिक पथ (amphibolic pathway) कहना अधिक उपयुक्त है न कि अपचय पथ।
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प्रश्न 10.
साँस (श्वसन) गुणांक को परिभाषित कीजिए, वसा के लिए इसका क्या मान है?
उत्तर :
साँस (श्वसन) गुणांक एक दिए गए समय, ताप व दाब पर श्वसन क्रिया में निष्कासित CO2 व अवशोषित O2 के अनुपात को श्वसन (साँस) गुणांक या भागफल (R.Q.) कहते हैं। श्वसन पदार्थों के अनुसार श्वसन गुणांक भिन्न-भिन्न होता है।
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वसा (fats) :
का श्वसन गुणांक एक से कम होता है। वसीय पदार्थों के उपयोग से निष्कासित CO2की मात्रा अवशोषित O2 की मात्रा से कम होती है। वसा का R.Q. लगभग 0.7 होता है।
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प्रश्न 11.
ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण क्या है?

उत्तर :
ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण ऑक्सीश्वसन क्रिया के विभिन्न चरणों में मुक्त हाइड्रोजन आयन्स (2H+) को हाइड्रोजनग्राही NAD या FAD ग्रहण करके अपचयित होकर NAD.2H या FAD.2H बनाता है। प्रत्येक NAD.2H अणु से दो इलेक्ट्रॉन (2e) तथा दो हाइड्रोजन परमाणुओं (2H+) के निकलकर (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन तक पहुँचने के क्रम में तीन और FAD.2H से दो ATP अणुओं का संश्लेषण होता है। ETS के अन्तर्गत इलेक्ट्रॉन परिवहन के फलस्वरूप मुक्त ऊर्जा ADP + Pi→ ATP क्रिया द्वारा ATP में संचित हो जाती है। प्रत्येक ATP अणु बनने में प्राणियों में 7:3 kcal और पौधों में 10-12 kcal ऊर्जा संचय होती है। यह क्रिया फॉस्फोरिलीकरण (phosphorylation) कहलाती है, क्योंकि श्वसन क्रिया में यह क्रिया O2 की उपस्थिति में होती है; अतः इसे ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण (oxidative phosphorylation) कहते हैं।

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प्रश्न 12.
सॉस के प्रत्येक चरण में मुक्त होने वाली ऊर्जा का क्या महत्त्व है?

उत्तर :
(क)
कोशिका में जैव रासायनिक ऑक्सीकरण के दौरान श्वसनी क्रियाधार में संचित सम्पूर्ण रासायनिक ऊर्जा एकसाथ मुक्त नहीं होती, जैसा कि दहन प्रक्रिया में होता है। यह एन्जाइम्स द्वारा नियन्त्रित चरणबद्ध धीमी अभिक्रियाओं के रूप में मुक्त होती है। मुक्त रासायनिक ऊर्जा गतिज ऊर्जा के रूप में ATP में संचित हो जाती है।

(ख)
श्वसन प्रक्रिया में मुक्त ऊर्जा सीधे उपयोग में नहीं आती। श्वसन प्रक्रिया में मुक्त ऊर्जा का उपयोग ATP संश्लेषण में होता है।

(ग)
ATP ऊर्जा मुद्रा का कार्य करता है। कोशिका की समस्त जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा ATP के टूटने से प्राप्त होती है।

(घ)
विभिन्न जटिल कार्बनिक पदार्थों के संश्लेषण में भी ATP से मुक्त ऊर्जा उपयोग में आती है।

(ङ)
कोशिकाओं में खनिज लवणों के आवागमन में प्रयुक्त ऊर्जा ATP से ही प्राप्त होती है।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोशिकीय श्वसन में ग्लूकोज से पाइरुविक अम्ल का बनना कहलाता है।
(क) ग्लाइकोलिसिस
(ख) हाइड्रोलिसिस
(ग) क्रेब्स चक्र
(घ)C3 चक्र
उत्तर :
(क) ग्लाइकोलिसिस

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सी अभिक्रिया शुद्ध रूप में ऑक्सीश्वसन को प्रदर्शित करती है?
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उत्तर :
(ग) C6H12O6 + 6O2  → 6CO2+ 6H2O + 673 k.cals

प्रश्न 3.
क्रेब्स चक्र के एक बार चलने में NADPH बनते हैं।
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) छः
उत्तर :
(ख) तीन

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किण्वन क्रिया को प्रदर्शित करने वाले उपकरण का नाम लिखिए।
उत्तर :
फर्मेन्टर या बायोरिएक्टर।

प्रश्न 2.
उस रासायनिक यौगिक का नाम लिखिए जो ग्लाइकोलिसिस और क्रेब्स चक्र के बीच की कड़ी है।
उत्तर :
ऐसीटिल-कोएन्जाइम-A

प्रश्न 3.
ग्लूकोस के एक अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण से ATP व CO2 के कितने अणु प्राप्त होते हैं?
उत्तर :
ग्लूकोस के एक अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण से 38 ATP एवं 6 CO2 अणु प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 4.
पाइरुविक अम्ल का ऑक्सी-ऑक्सीकरण कोशिका के किस भाग में होता है?
उत्तर :
माइटोकॉण्ड्रिया के अन्दर मैट्रिक्स में होता है।

प्रश्न 5.
श्वसन को प्रभावित करने वाले दो कारक लिखिए।
उत्तर :

  1. तापक्रम
  2. ऑक्सीजन

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प्रश्न 6.
बीज भरे भण्डारों को खोलने पर गर्मी निकलती है। कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
बीज भरे भण्डारों को खोलने पर गर्मी निकलती है, क्योंकि बीज श्वसन की क्रिया में 0, को ग्रहण करके CO2, H2O ऊर्जा उत्पन्न करते हैं जिसके कारण भण्डार गृह का तापमान बढ़ जाता है।

प्रश्न 7.
श्वसन गुणांक को प्रदर्शित करने वाले उपकरण का नाम लिखिए।
उत्तर :
गैनांग श्वसनमापी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किण्वन की परिभाषा लिखिए। यह अनॉक्सी श्वसन से किस प्रकार भिन्न है? समझाइए। या अनॉक्सी श्वसन और किण्वन में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या किण्वन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या अवायवीय श्वसन तथा किण्वन में अन्तर बताइए।
उत्तर :

किण्वन 

प्रत्येक प्रकार का श्वसन (अनॉक्सी या ऑक्सी श्वसन) ग्लूकोज से प्रारम्भ होता है और इसमें ग्लाइकोलिसिस (glycolysis) क्रिया के द्वारा पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) का निर्माण होता है। निम्न श्रेणी के अनेक जीवों; जैसे-कुछ जीवाणुओं, यीस्ट (yeast) अन्य कवकों (fungi) आदि अवायव जीवों (anaerobs) में अनॉक्सीश्वसन के द्वारा ही ऊर्जा उत्पन्न होती है। चूंकि इस क्रिया में प्रायः
ऐल्कोहॉल (alcohol) उत्पन्न होता है, अत: इस (अनॉक्सीश्वसन) को ऐल्कोहॉलिक किण्वन (alcoholic fermentation) भी कहते हैं। किण्वन का अध्ययन सबसे पहले सन् 1870 में पाश्चर (Pasteur) ने किया था। अधिकतर उन सूक्ष्म पौधों में जिनमें श्वसन होता है इससे (UPBoardSolutions.com) सम्बन्धित सभी एन्जाइम एक जटिल समूह के रूप में रहते हैं; जैसे—यीस्ट में यह जाड़मेज (ymase) कहलाता है। दूसरे जीवों में अन्य एन्जाइम की उपस्थिति के कारण अन्य प्रकार की अभिक्रियाओं के फलस्वरूप एथिल एल्कोहॉल के स्थान पर अन्य यौगिक बनते हैं; जैसे-ऐसीटिक अम्ल, लैक्टिक अम्ल, ब्यूटाइरिक अम्ल, साइट्रिक अम्ल, ऑक्सेलिक अम्ल आदि। ये सम्पूर्ण क्रियाएँ किण्वन (fermentation) कहलाती हैं तथा उत्पाद के नाम पर जानी जाती हैं। उच्च श्रेणी के पौधों तथा जन्तुओं में अनॉक्सीश्वसन केवल थोड़े
समय के लिये ही होता है। इसके पश्चात् कम ऊर्जा उत्पन्न होने तथा विषैले पदार्थ इत्यादि एकत्र होने के कारण कोशिकाओं की मृत्यु होने लग जाती है।

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किण्वन व अनॉक्सी श्वसन में अन्तर

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प्रश्न 2.
कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन तथा कार्बनिक अम्लों के श्वसन गुणांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
1. कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) :
मण्ड, सुक्रोज, माल्टोज, ग्लूकोज, फ्रक्टोज आदि अनेक कार्बोहाइड्रेट्स श्वसन आधार की तरह प्रयोग किये जाते हैं। इनमें से ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज सीधे ही काम आ जाते हैं जबकि सुक्रोज, माल्टोज आदि डाइसैकेराइड्स (disaccharides), तथा मण्ड जैसे पॉलिसैकेराइड्स (polysaccharides) की पहले हाइड्रोलिसिस होती है तथा ग्लूकोज या फ्रक्टोज अथवा दोनों पदार्थ बनते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स के इस प्रकार, ऑक्सी श्वसन में आधार होने से आयतन से जितनी ऑक्सीजन (O2) काम आती है उतनी ही कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्पन्न होती है।
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अत: कार्बोहाइड्रेट्स के लिए समीकरण के अनुसार
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इस प्रकार सामान्यतः कार्बोहाइड्रेट्स (मण्डयुक्त अनाजों; जैसे-गेहूं, चावल आदि) के लिए श्वसन गुणांक इकाई में आता है, किन्तु कुछ कारणों से यह इकाई से भिन्न दिखायी पड़ता है। जब

  1. श्वसन आधार का ऑक्सीकरण पूर्ण रूप से न हो सके; जैसे–नागफनी (Opuntia) आदि सरस पौधों या पौधे (UPBoardSolutions.com) के भागों में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम हो जाती है अथवा बिल्कुल नहीं होती है; क्योंकि मैलिक अम्ल आदि बन जाते हैं, अतः श्वसन गुणांक इकाई से कम हो जाता है।
  2. उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड किसी अन्य कार्य; जैसे—प्रकाश संश्लेषण में प्रयुक्त हो जाए।
  3. अवशोषित ऑक्सीजन किसी अन्य कार्य में प्रयुक्त हो जाए।
  4. किसी अन्य अभिक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न हो जाए।

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2. प्रोटीन्स (Proteins) :
इनका ऑक्सीकरण (oxidation) तथा डीएमीनेशन (deamination) होता है। इस प्रकार बने हुए कार्बनिक अम्ल (organic acids) ऑक्सी श्वसन के बाद की क्रियाओं (क्रेब्स चक्र) में सम्मिलित हो जाते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल में विघटित हो जाते हैं। वसाओं की तरह प्रोटीन्स के सम्पूर्ण ऑक्सीकरण के लिए बाहर से अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ने के कारण, इनका श्वसन गुणांक (RQ) भी इकाई से कम (0.8-0.9) होता है।

3. कार्बनिक अम्ल (Organic acids) :
कार्बनिक अम्लों में ऑक्सीजन अधिक मात्रा में होने के कारण इनका श्वसन गुणांक (RQ) इकाई से अधिक होता है। श्वसन गुणांक, अनॉक्सी या अवायव श्वसन (anaerobic respiration) में सदैव ही एक से अधिक (सामान्यतः 2) होता है क्योंकि यहाँ ऑक्सीजन बाहर से उपयोग में नहीं लायी जाती, फिर भी कार्बन डाइऑक्साइड तो निकलती ही है।। श्वसन गुणांक को मापन गैनांग श्वसनमापी
(Ganong’s respirometer) द्वारा किया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ए०टी०पी० का महत्व समझाइए।
उत्तर :

ए०टी०पी० का महत्त्व

जीवित कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करने वाली (energy yielding) तथा ऊर्जा का उपभोग करने वाली (energy consuming) क्रियाएँ निरन्तर होती रहती हैं। एक पदार्थ (उदाहरणार्थ-ग्लूकोज) में संचित ऊर्जा के निष्कासन से दूसरे पदार्थों का निर्माण होता है। उदाहरणार्थ-प्रोटीन का। अब इन दूसरे पदार्थों में संचित ऊर्जा के निष्कासन से कोशिका में दूसरे कार्य किए जा सकते हैं। कोशिका में अस्थाई रूप से ऊर्जा संचय का एक साधन होता है। यह पदार्थ एडिनोसीन ट्राइफॉस्फेट (Adenosine Tri-Phosphate = ATP) है। यह पदार्थ जीवित कोशिकाओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। श्वसन क्रिया में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन और वसा के (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीकरण द्वारा निष्कासित ऊर्जा, तुरन्त ही ADP और अकार्बनिक फॉस्फेट (iP) से ATP के संश्लेषण मेंप्रयोग हो जाती है। इस प्रकार से श्वसन द्वारा ATP में ऊर्जा संचित हो जाती है। इस प्रकार ATP के संश्लेषण की क्रिया को ऑक्सीकीय फॉस्फोरिलीकरण (oxidative phosphorylation) कहते हैं।

विभिन्न जैविक क्रियाओं, जैसे-कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन तथा वसा पदार्थों का संश्लेषण तथा परासरण (osmosis), सक्रिय अवशोषण (active absorption), खाद्य-पदार्थों के स्थानान्तरण (translocation of food); जीवद्रव्य प्रवाह (streaming of protoplasm), वृद्धि (growth) इत्यादि में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसके लिए ATP का ADP वे iP में विखण्डन हो जाता है और ऊर्जा मुक्त हो जाती है, यह ऊर्जा ही जैविक क्रियाओं में प्रयुक्त होती है। इस प्रकार ATP एक पदार्थ से ऊर्जा लेकर तथा दूसे पदार्थ को ऊर्जा देकर एक मध्यस्थ यौगिक (intermediatory compound) के रूप में कार्य करता है। इस कारण से ATP को जैविक संवर्ध ऊर्जा के आदान-प्रदान की मुद्रा (monetary system of energy exchange in living organisms) भी कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
श्वसन क्रिया को प्रभावित करने वाले बाह्य तथा आन्तरिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
श्वसन क्रिया को प्रभावित करने वाले कारक-श्वसन की क्रिया को प्रभावित करने वाले कारकों को निम्नलिखित दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है

A. बाह्य कारक

1. तापक्रम (Temperature) :
श्वसन पर प्रभाव डालने वाले कारकों में तापक्रम सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। 0 से 30°C तक तापक्रम बढ़ने पर श्वसन क्रिया की दर लगातार बढ़ती रहती है। वांट हॉफ (Vant Hoffs) के नियमानुसार 0°C से अधिंक 30°C तक प्रत्येक 10°C तापक्रम बढ़ने पर श्वसन की दर 2 से 2.5 गुना बढ़ जाती है, अर्थात् श्वसन का तापक्रम गुणांक (Q 10°C) 2 से 2.5 के बीच होता है। श्वसन क्रिया की सर्वाधिक दर 30°C पर होती है। 30°C से ऊपर तापक्रमों पर आरम्भ में श्वसन दर बढ़ती है, परन्तु शीघ्र ही दर घट जाती है। और जितना अधिक तापक्रम होगा उतनी ही अधिक प्रारम्भ में देर बढ़ेगी और उतनी ही शीघ्र तथा अधिक समय के साथ दर घटेगी।

सम्भवतः ऐसा इसलिए होता है कि श्वसन में कार्य करने वाले विकर (enzymes) अधिक तापक्रम पर विकृत (denatured) हो जाते हैं। 0°C से कम तापक्रम पर श्वसन दर बहुत कम हो जाती है इसीलिए फलों एवं बीजों को कम तापक्रम पर संरक्षित किया जाता है। यद्यपि कुछ पौधों में -20°C तापक्रम पर भी श्वसन क्रिया होती रहती है। सुषुप्त बीजों को यदि -50°C तापक्रम पर रखा जाए तो वे जीवित रहते हैं। जिसका अर्थ है कि उनमें इस तापक्रम पर भी श्वसन होता है।

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2. ऑक्सीजन (Oxygen) :
ऑक्सीजन (O2) की उपस्थिति तथा अनुपस्थिति पर श्वसन को क्रमशः ऑक्सी -श्वसन (aerobic respiration) तथा अनॉक्सी श्वसन (anaerobic respiration) में विभाजित किया जाता है। वायु में 20.8% ऑक्सीजन (0%) होती है। वातावरण में ऑक्सीजन (O2) की मात्रा को एक निश्चित सीमा में घटाने या बढ़ाने पर भी श्वसन क्रिया की दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वायु में ऑक्सीजन (O2) की मात्रा को लगभग 2% तक घटाने पर श्वसन क्रिया की दर बहुत कम हो जाती है। (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन की सान्द्रती अत्यधिक कम हो जाने पर अनॉक्सी-श्वसन के कारण एथिल ऐल्कोहॉल (ethyl alcohol) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) अधिक मात्रा में निष्कासित होते हैं।

3. जल (Water) :
जल की कमी होने पर श्वसन की दर घटती है। सूखे बीजों में (प्रायः 8 से 12% जल होता है। बहुत कम श्वसन होता है और बीज द्वारा जल का अन्तःशोषण (imbibition) करने पर श्वसन की दर बढ़ जाती है। गेहूँ के बीजों में जल की मात्रा 16 से 17% बढ़ने पर श्वसन दर बहुत अधिक बढ़ जाती है। यद्यपि जिन ऊतकों में पहले से ही जल। की मात्रा काफी होती है, जल की मात्रा के घटाने-बढ़ाने से श्वसन दर पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। बीज को जीवनकाल जल की मात्रा कम रहने से बढ़ता है। श्वसन विकरों (enzymes) के कार्य में जल आवश्यक होता है।

4. प्रकाश (Light) :
श्वसन रात्रि में भी होता रहता है। इसके लिए प्रकाश का होना आवश्यक नहीं है, किन्तु प्रकाश में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया होने के कारण शर्कराओं का संश्लेषण होता है जिससे उनकी सान्द्रता बढ़ती है और श्वसन-प्रयुक्त पदार्थों (respiratory substrates) की मात्रा अधिक होने से श्वसन दर बढ़ती है। अत: प्रकाश श्वसन को परोक्ष रूप से प्रभावित करता है।

5. कार्बन डाइऑक्साइड ( CO2) :
वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड ( CO2) की सान्द्रता सामान्य रूप से अधिक होने पर श्वसन दर कम हो जाती है। बीजों का अंकुरण एवं वृद्धि दर कम हो जाते हैं। हीथ (Heath, 1950) ने सिद्ध किया है कि कार्बन डाइऑक्साइड ( CO2) से पत्ती पर स्थित रन्ध्र (stomata) बन्द हो जाते हैं। इससे ऑक्सीजन ( O2) पत्ती में प्रवेश नहीं करती जिससे श्वसन दरें घट जाती है।

6. क्षति (Injury) :
घायल ऊतक में सामान्यतः श्वसन दर तीव्र हो जाती है। सम्भवतः क्षतिग्रस्त भाग में कुछ कोशिकाएँ विभज्योतकी (meristematic) होकर तेजी से विभाजित होने लगती हैं। वृद्धि कर रही कोशिकाओं में, परिपक्व कोशिकाओं की अपेक्षा श्वसन दर अधिक होती है। हॉपकिन्स (Hopkins) के अनुसार पौधे के क्षतिग्रस्त भागों में स्टार्च का शर्करा में परिवर्तन तेजी से होने लगता है, जिसके कारण भी क्षतिग्रस्त भागों की श्वसन दर बढ़ जाती है।

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B. आन्तरिक कारक

1. श्वसन में प्रयुक्त पदार्थों की सन्द्रिता (Concentration of Using Substrates in Respiration) :
श्वसन में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों की सान्द्रता बढ़ने पर श्वसन दर बढ़ जाती है।

2. जीवद्रव्य की दशा (Age of Protoplasm) :
पौधों की वृद्धि करने वाले भागों; जैसे—प्ररोहों एवं जड़ के अग्रस्थ स्थित युवा कोशिकाओं का जीवद्रव्य (UPBoardSolutions.com) अत्यधिक सक्रिय होता है जिससे इन भागों में, श्वसन दर अधिक होती है जबकि ऊतकों एवं पौधों के विभिन्न भागों की वृद्ध कोशिकाओं में श्वसन दर घट जाती है।

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 14 Respiration in Plants (पादप में श्वसन) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 14 Respiration in Plants (पादप में श्वसन), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 10 Cell Cycle And Cell Division

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 10 Cell Cycle And Cell Division (कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 10 Cell Cycle and Cell Division (कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्तनधारियों की कोशिकाओं की औसत कोशिका चक्र अवधि कितनी होती है?
उत्तर :
24 घण्टे के समय में मनुष्य की कोशिको अथवा स्तनधारियों की कोशिका में कोशिका विभाजन पूर्ण होने में केवल एक घण्टा लगता है।

प्रश्न 2.
जीवद्रव्य विभाजन व केन्द्रक विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
कोशिका चक्र के M-प्रावस्था में केन्द्रक विभाजन आरम्भ होता है जिसमें गुणसूत्र अलग होकर दो केन्द्रकों का निर्माण करते हैं। इसे केन्द्रक विभाजन अथवा केरियोकाइनेसिस (karyokinesis) कहते हैं। सामान्यत: इस क्रिया की समाप्ति पर कोशिका (UPBoardSolutions.com) द्रव्य में भी विभाजन होकर दो कोशिका बन जाती हैं। इसे जीवद्रव्ये विभाजन अथवा साइटोकाइनेसिस (cytokinesis) कहते हैं। यदि केवल केरियोकाइनेसिस हो तथा साइटोकाइनेसिस न हो, तो एक कोशिका बहुकेन्द्रकी (multinucleate) बन जाती है।

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प्रश्न 3.
अन्तरावस्था में होने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
यह अवस्था कोशिका की विश्राम अवस्था (resting phase) मानी जाती है क्योंकि इस अवस्था में कोशिका वृद्धि करती है, अगले विभाजन की तैयारियाँ पूर्ण होती हैं तथा DNA का द्विगुणन होता है। इस अवस्था के तीन चरण हैं

  1.  G– फेस (Gap 1)
  2. S – फेस (संश्लेषण अवस्था)
  3.  G2– फेस (Gap 2)

G1-फेस माइटोसिस तथा DNA द्विगुणन प्रारम्भ होने का मध्यावकाश है। S-फेस में DNA संश्लेषण व द्विगुणन होता है। DNA की मात्रा दोगुनी हो जाती है परन्तु गुणसूत्र संख्या में वृद्धि नहीं होती है। यदि Gमें 2n गुणसूत्र संख्या हो, तो S में भी 2n ही होगी। जन्तु कोशिका में DNA द्विगुणन के साथ-साथ सेन्ट्रिओल विभाजन भी होता है। G2फेस में प्रोटीन संश्लेषण होता है तथा कोशिका टोसिस (mitosis) के लिए तैयार होती है।

प्रश्न 4.
कोशिका चक्र का G0 (प्रशान्त प्रावस्था) क्या है?
उत्तर :
कुछ कोशिकाओं में विभाजन की क्रिया नहीं होती है। कोशिका की मृत्यु होने पर दूसरी कोशिका उसका स्थान ले लेती है। अत: G1 -प्रावस्था एक अक्रिय अवस्था में प्रवेश करती है, इसे शान्त प्रावस्था (G0) कहते हैं। इस अवस्था में कोशिका केवल उपापचयी रूप से सक्रिय रहती है।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन को सम विभाजन क्यों कहते हैं?
उत्तर :
सूत्री विभाजन में बनी दोनों पुत्री कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान ही बनी रहती है। इसी कारण सूत्री विभाजन को सम विभाजन (equational division) भी कहते हैं।

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प्रश्न 6.
कोशिका चक्र की उस प्रावस्था का नाम बताइए जिसमें निम्न घटनाएँ सम्पन्न होती हैं

  1. गुणसूत्र तर्क मध्य रेखा की ओर गति करते हैं।
  2. गुणसूत्र बिन्दु का टूटना व अर्ध गुणसूत्र का पृथक् होना।
  3.  समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होना।
  4.  समजात गुणसूत्रों के बीच विनिमय का होना।

उत्तर :

  1. मेटाफेस
  2.  एनाफेस
  3.  प्रोफेस-I की जाइगोटीन अवस्था जिसमें साइनेप्सिस (synapsis) होती है
  4.  प्रोफेस-I की पेकीटीन (pachytene) प्रावस्था।

प्रश्न 1.
निम्न के बारे में वर्णन कीजिए
(i) सूत्रयुग्मन
(ii) युगली
(iii) काएज्मेटा।
उत्तर :

(i) सूत्रयुग्मन (Synapsis) :
अर्धसूत्री विभाजन के प्रथम प्रोफेसे की जाइगोटीन अवस्था में (UPBoardSolutions.com) गुणसूत्र जोड़े बनाते हैं। इसे सूत्रयुग्मन कहते हैं।

(ii) युगली (Bivalent) :
सूत्रयुग्मन से बने समजात गुणसूत्र जोड़े में 4 अर्धगुणसूत्र होते हैं तथा इस जोड़े को युगली कहते हैं।

(iii) काएज्मेटा (Chiasmeta) :
डिप्लोटीन में यदि गुणसूत्र में विनिमय प्रारम्भ होने से पहले ‘x’ आकार की संरचना बनती है, तो उसे काएज्मेटा कहते हैं।

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प्रश्न 8.
पादप व प्राणी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
पादप कोशिका में विभाजन के समय पट्ट बनता है जिससे बाद में कोशिका भित्ति बनती है। परन्तु जन्तु कोशिका में दोनों ओर से वलन बनकर मध्य में आते हैं और दो भागों में कोशिका बँट जाती है।

प्रश्न 9.
अर्द्धसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ कहाँ आकार में समान व कहाँ भिन्न आकार की होती हैं?
उत्तर :
अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा युग्मक निर्माण होता है। शुक्राणुजनन (spermatogenesis) में मातृ कोशिका के विभाजन से बनने वाली चारों पुत्री कोशिकाएँ समान होती हैं। ये शुक्रकायान्तरण द्वारा शुक्राणु का निर्माण करती हैं। शुक्रजनन में बनने वाली चारों संतति कोशिकाएँ (UPBoardSolutions.com) आकार में समान होती हैं। अण्डजनन (oogenesis) में मातृ कोशिका से बनने वाली संतति कोशिकाएँ आकार में भिन्न होती हैं। अण्डनन के फलस्वरूप एक अण्डाणु तथा पोलर कोशिकाएँ बनती हैं। पोलर कोशिकाएँ आकार में छोटी होती हैं। पौधों के बीजाण्ड में गुरुबीजाणुजनन (अर्द्धसूत्री विभाजन) के फलस्वरूप गुरुबीजाणु से चार कोशिकाएँ बनती हैं। इनमें आधारीय कोशिका अन्य कोशिकाओं से भिन्न होती है। यह वृद्धि और विभाजन द्वारा भ्रूणकोष (embryo sac) बनाता है। पौधों में लघु-बीजाणु जनन द्वारा लघु बीजाणु या परागकण बनते हैं। ये आकार में समान होते हैं।

प्रश्न 10.
सूत्री विभाजन की पश्चावस्था तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था I में क्या अन्तर है?
उत्तर :
सूत्री विभाजन तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था प्रथम में अन्तर

प्रश्न 11.
सूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में प्रमुख अन्तरों को सूचीबद्ध कीजिए।

उत्तर :
सूत्री व अर्द्धसूत्र विभाजन में अन्तर

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प्रश्न 12.
अर्द्धसूत्री विभाजन का क्या महत्त्व है?

उत्तर :
अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व इसके निम्नलिखित महत्त्व हैं

  1. अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप बने युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है। लेकिन जनन में नर तथा मादा युग्मकों के मिलने से द्विगुणित जाइगोट (zygote)का निर्माण होता है। इस प्रकार अर्द्धसूत्री विभाजन तथा निषेचन के फलस्वरूप प्रत्येक जाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित बनी रहती है।
  2. अर्द्धसूत्री विभाजन के समय विनिमय (crossing over) के कारण गुणसूत्रों की संरचना बदल जाती है, इससे भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। जैव विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार होती हैं।

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प्रश्न 13.
अपने शिक्षक के साथ निम्नलिखित के बारे में चर्चा कीजिए

  1.  अगुणित कीटों व निम्न श्रेणी के पादपों में कोशिका विभाजन कहाँ सम्पन्न होता है?
  2.  उच्च श्रेणी पादपों की कुछ अगुणित कोशिकाओं में कोशिका विभाजन कहाँ नहीं होता है?

उत्तर :

  1.  नर मधुमक्खियाँ अर्थात् ड्रोन्स (drones) अगुणित होते हैं। इनमें सूत्री विभाजन अनिषेचित अगुणित अण्डों में होता है। निम्न श्रेणी के पादपों; जैसे-एककोशिकीय क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas), बहुकोशिकीय यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) आदि में समसूत्री विभाजन द्वारा जनन होता है। इनमें अगुणित युग्मक बनते हैं। युग्मकों के परस्पर मिलने से युग्माणु (zygote) बनते हैं। जाइगोट में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। इसके (UPBoardSolutions.com) फलस्वरूप बने अगुणित बीजाणु समसूत्री विभाजन द्वारा नए पादपों का विकास करते हैं।
  2. उच्च श्रेणी के पादपों में द्विगुणित बीजाण्डकाय में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण चार अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं। इनमें से तीन में कोशिका विभाजननहीं होता। सक्रिय गुरुबीजाणु से भ्रूणकोष (embryo sac) बनता है। भ्रूणकोष की अगुणित प्रतिमुख कोशिकाओं (antipodal cells) तथा सहायक कोशिकाओं (synergids)में क्रोशिका विभाजन नहीं होता। साइकस के लघुबीजाणुओं (परागकण) के अंकुरण के फलस्वरूप नर युग्मकोभिद् बनता है। इसकी प्रोथैलियल कोशिका (prothallial cell) तथा लिका कोशिका (tube cell) में कोशिका विभाजन नहीं होता।

प्रश्न 14.
क्या S प्रावस्था में बिना डी०एन०ए० प्रतिकृति के सूत्री विभाजन हो सकता है?
उत्तर :
‘S’ प्रावस्था में DNA की प्रतिकृति के बिना सूत्री विभाजन नहीं हो सकता।

प्रश्न 15.
क्या बिना कोशिका विभाजन के डी०एन०ए० प्रतिकृति हो सकती है?
उत्तर :
कोशिका विभाजन के बिना भी DNA प्रतिकृति हो सकती है। सामान्यतया DNA से RNA का निर्माण प्रतिकृति के फलस्वरूप ही होता रहता है।

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प्रश्न 16.
कोशिका विभाजन की प्रत्येक अवस्थाओं के दौरान होने वाली घटनाओं का विश्लेषण कीजिए और ध्यान दीजिए कि निम्नलिखित दो प्राचलों में कैसे परिवर्तन होता है?

  1.  प्रत्येक कोशिका की गुणसूत्र संख्या (N)
  2.  प्रत्येक कोशिका में डी०एन०ए० की मात्रा (C)

उत्तर :
अन्तरावस्था की G1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है। इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है। S-प्रावस्था में DNA की प्रतिकृति होती है। इसके फलस्वरूप DNA की मात्रा दोगुनी हो जाती है। यदि DNA की प्रारम्भिक मात्रा 2C से प्रदर्शित करें तो इसकी मात्रा 4C हो जाती है, जबकि गुणसूत्रों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता। यदि G1 प्रावस्था में गुणसूत्रों की संख्या 2N है। तो G2 प्रावस्था में भी इनकी संख्या 2N रहती है।

अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम की युग्मपट्ट (जाइगोटीन) अवस्था में समजात गुणसूत्र (UPBoardSolutions.com) जोड़े बनाते हैं। पश्चावस्था प्रथम में गुणसूत्रों का बँटवारा होता है। यदि गुणसूत्रों की संख्या 2N है तो अर्द्धसूत्री विभाजन के पश्चात् गुणसूत्रों की संख्या N रह जाती है। जननांगों (2N) में युग्मकजनन अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप होता है। इसके फलस्वरूप युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या घटकर अगुणित (आधी-N) रह जाती है।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वे कोशिकाएँ कौन-सी हैं, जिनमें सेण्ट्रिओल नहीं होता?
(क) तन्त्रिका कोशिका
(ख) जनन कोशिका
(ग) अस्थि कोशिका
(घ) यकृत कोशिका
उत्तर :
(क) तन्त्रिका कोशिका

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोशिका चक्र की विभिन्न अवस्थाओं को क्रम में लिखिए।
उत्तर :
G1 ,S, G2 एवं M प्रावस्थाएँ।

प्रश्न 2.
कोशिका चक्र की G1 प्रावस्था में क्या घटित होता है?
उत्तर :
G1 प्रावस्था में कोशिका वृद्धि करती है। DNA का संश्लेषण करने वाले एन्जाइम तथा DNA के विभिन्न घटकों का निर्माण होता है। G1 प्रावस्था में कोशिका चक्र का लगभग 35% से 50% समय लगता है।

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प्रश्न 3.
कोशिकाद्रव्य विभाजन पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रक विभाजन के पश्चात् जन्तु कोशिकाओं में खाँच विधि (furrow method) से तथा पादप कोशिका (UPBoardSolutions.com) में कोशिका पट्ट निर्माण से कोशिकाद्रव्य का बँटवारा होता है।

प्रश्न 4.
सूत्री विभाजन की किस अवस्था में प्रत्येक गुणसूत्र का गुणसूत्र बिन्दु दो भागों में बँट जाता
उत्तर :
मध्यावस्था के अन्त में।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन के समय गुणसूत्र किस अवस्था में कोशिका के मध्य में एक प्लेट पर एकत्र होते हैं?
उत्तर :
मध्यावस्था में।

प्रश्न 6.
अर्द्धसूत्री विभाजन में प्रथम पूर्वावस्था की उप-प्रावस्थाओं को सही क्रम में लिखिए।
उत्तर :

  1. तनुसूत्र (Leptotene)
  2.  युग्मसूत्र (Zygotene)
  3.  स्थूलसूत्र (Pachytene)
  4.  द्विपट्ट्ट (Diplotene) एवं
  5. पारगतिक्रम (Diakinesis)

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प्रश्न 7.
अर्द्धसूत्री विभाजन के समय समजात गुणसूत्र किस अवस्था में अलग होते हैं?
उत्तर :
पश्चावस्था-I में।

प्रश्न 8.
अर्द्धसूत्री विभाजन की किस अवस्था में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है?
उत्तर :
अर्द्धसूत्री विभाजन-प्रथम (न्यूनकारी विभाजन) में।।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तर्क तन्तु क्या हैं ? प्रत्येक प्रकार के त तन्तुओं के कार्य लिखिए।
उत्तर :

तर्क तन्तु एवं उनके कार्य

समस्त जन्तु कोशिकाओं में विभाजनान्तराल अवस्था (interphase) में ट्यूब्यूलिन (tubulin) प्रोटीन से बनी सूक्ष्म नलिकाओं के संघनन की दो तारककेन्द्र या सेण्ट्रिओल्स (centrioles) नामक सूक्ष्म संरचनाएँ केन्द्रक के समीप स्थित होती हैं। ये दोनों तारककेन्द्र कोशिकाद्रव्य के विशेष कणिकामय (granular) छोटे से क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसे कोशिका का विभाजन केन्द्र (division centre) या तारककाय (सेण्ट्रोसोम-centrosome) कहते हैं। यह वनस्पति कोशिकाओं में अनुपस्थित होता है। कोशिका विभाजन में सेण्ट्रोसोम की प्रमुख भूमिका होती है। इण्टरफेज अवस्था की S-उप अवस्था में ही तारककेन्द्रों से दो नये तारककेन्द्र बनने लगते हैं जो G2 प्रावस्था के अन्त तक पूर्ण विकसित हो जाते हैं। पूर्वावस्था (prophase) के प्रारम्भ में सेण्ट्रोसोम के चारों ओर अनेक सूक्ष्म नलिकाएँ बनती हैं, जिन्हें (UPBoardSolutions.com) तारक किरणें (astral rays) कहते हैं। इनके कारण सेण्ट्रोसोम सितारे (star) जैसी आकृति का दिखाई देता है, इसलिए इसे तारक (aster) कहते हैं। तारक किरणों के बन जाने पर तारक दो सन्तति सेण्ट्रोसोम्स (daughter centrosomes) में विभाजित हो जाता है, शीघ्र ही सन्तति सेण्ट्रोसोम जनक सेण्ट्रोसोम से दूर हटने लगते हैं और दोनों सेण्ट्रोसोम्स के बीच कोशिकाद्रव्य की सूक्ष्म नलिकाओं से तर्क तन्तु (spindle fibres) बनने लगते हैं। पूर्वावस्था के समाप्त होने तक दोनों सेण्ट्रोसोम्स कोशिका में विपरीत ध्रुवों पर पहुंच जाते हैं और दोनों के मध्य । ध्रुवीय तर्क तन्तु (polar spindle fibres) बनने से तर्क निर्माण (spindle formation) पूरा हो जाता है। इस द्विध्रुवीय तर्क को समसूत्री तर्क (mitotic spindle) या द्वितारक (एम्फीऐस्टर-amphiaster) कहते हैं। समसूत्री तर्क में निम्नलिखित तीन प्रकार के तन्तु होते हैं।

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1. निरन्तरे या सतत् अथवा ध्रुवीय तर्क तन्तु (Continuous or polar spindle fibres) :
ये एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक फैले रहते हैं।

2. असतत् या गुणसूत्री त तन्तु (Discontinuous or chromosomal spindle fibres) :

ये तर्क ध्रुव से तर्क की मध्यवर्ती रेखा तक फैले होते हैं और गुणसूत्रों के गुणसूत्र बिन्दु (सेण्ट्रोमियर) से जुड़े होते हैं।

3. अन्तक्षेत्रीय तर्क तन्तु (Interzonal spindle fibres) :
ये तर्कु पश्चावस्था (anaphase) में बनते हैं और दो पृथक् व क्रमश: दूर होते पुत्री गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य फैले रहते हैं।

प्रश्न 2.
असूत्री विभाजन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
इस प्रकार के विभाजन में सबसे पहले केन्द्रक कुछ लम्बा हो जाता है तथा मध्य स्थान पर या किसी एक सिरे के पास संकुचन (constriction) बन जाता है। कुछ समय के बाद केन्द्रक समान आकार के नहीं होते हैं। यह अनिवार्य नहीं है कि केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिका का भी विभाजन हो। इस प्रकार का विभाजन सामान्यतः कवकों (fungi) तथा शैवालों (algae) में पाया जाता है। उच्च वर्ग के पौधों में यह केवल पुरानी कोशिकाओं (जो नष्ट हो रही हैं) में होता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्द्धसूत्री विभाजन से आप क्या समझते हैं? इसकी विभिन्न प्रावस्थाएँ लिखिए। समसूत्री विभाजन तथा इसका महत्व भी बताइए।
उत्तर
अर्द्धसूत्री विभाजन यह प्रत्येक जीव के जीवन चक्र (life cycle) में एक बार होने वाला ऐसा विभाजन है जो कोशिका में उपस्थित द्विगुणित (diploid = 2n) गुणसूत्रों को अगुणित (haploid = n) संख्या में हासित (reduce) कर देता है। इसी के बाद अगुणित (n) युग्मकों (gametes) का निर्माण होता है। युग्मकों के समेकन (fusion) के बाद जो युग्मनज बनता है उसमें क्रोमोसोम्स की संख्या फिर दोगुनी हो जाती है। इस प्रकार अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के (UPBoardSolutions.com) बिना युग्मक नहीं बन सकते तथा संयुग्मन निषेचन (fertilization) के बिना युग्मनज (zygote) का निर्माण नहीं हो सकता। अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis or reduction division) में जनक गुणसूत्रों का द्विगुणन तो एक बार ही होता है, परन्तु कोशिका दो बार विभाजित होती है अर्थात् विभाजनान्तराल प्रावस्था (interphase) एक ही बार होती है।

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अर्द्धसूत्री विभाजन की प्राधस्थाएँ

अर्द्धसूत्री विभाजन एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें केन्द्रक व कोशिकाद्रव्य के दो बार विभाजन सम्मिलित हैं। इन दो बार के विभाजनों में से पहला विभाजन ह्रास विभाजन (न्यूनकारी = reduction division) है जिसमें गुणसूत्रों की संख्या विगुणित से अगुणित (2n से n) हो जाती है। दोनों केन्द्रकों में गुणसूत्रों की संरचना यद्यपि एक जैसी होती है किन्तु इन पर उपस्थित आनुवंशिक प्रभावों में अन्तर हो सकता है, अत: इस विभाजन को विषम विभाजन (heterotypic division) भी कहते हैं, जबकि दूसरा विभाजन-साधारण सूत्री विभाजन की तरह ही होता है। इसमें बनने वाले नये केन्द्रकों में गुणसूत्र लम्बाई में टूट कर पहुँचते हैं; अत: इसे सम विभाजन (homotypic division) भी कहते हैं। इस विभाजन के अन्त में चार अगुणित (n) कोशिकाएँ बनती हैं।

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समसूत्री विभाजन एवं इसका महत्त्व

समसूत्री विभाजन जनन कोशिकाओं के अतिरिक्त सभी प्रकार की कायिक कोशिकाओं (somatic cells) में होता है। इसमें क्रोमोसोम्स की संख्या सदैव समान बनी रहती है। नयी सन्तति कोशिकाओं का निर्माण युग्मनज से होता है। इसमें नयी सन्तति कोशिकाएँ बार-बार विभाजित (समसूत्री कोशिका विभाजन द्वारा) होकर वृद्धि करती रहती हैं। कोशिका विभाजन के फलस्वरूप बनने वाली कोशिकाओं में विभेदीकरण (maturation) भी होता है जिससे (UPBoardSolutions.com) जीव के शरीर में विभिन्न अंग विकसित होते हैं। और इस प्रकार भ्रूणीय विकास के बाद एक नन्हे विकसित जीव का निर्माण हो जाता है। अब यह जीव वृद्धि करके वयस्क में बदल जाता है। यह वृद्धि भी सूत्री विभाजनों द्वारा कोशिकाओं की संख्या बढ़ने से ही होती है। इस प्रकार

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  1. यही एक ऐसा विभाजन है जिसके द्वारा बनने वाली सन्तति कोशिकाएँ पूर्णरूप से गुणों और संरचना में मातृ कोशिका की तरह होती हैं। सन्तति कोशिकाओं में क्रोमोसोम्स की संख्या और उनके लाक्षणिक गुण भी मातृ कोशिका की तरह ही रहते हैं।
  2. इस विभाजन के द्वारा बहुकोशिकीय संरचना का निर्माण होता है जबकि प्रत्येक जीव का जीवन चक्र,वास्तव में, एक कोशिका से ही प्रारम्भ होता है।
  3. एककोशिकीय जीवों में तो यह विभाजन जनन की एक विधि है।
  4. वृद्धि के लिए कोई कोशिका यदि परिमाप में बढ़ती जाये तो एक समय ऐसा आयेगा जब उसके जीवद्रव्य की विभिन्न दृष्टिकोण से सक्रियता नहीं रह पायेगी।

अतः यह कोशिका विभाजन जीव का परिमाप बढ़ाते हुए भी सक्रियता को कम नहीं होने देता अर्थात् (UPBoardSolutions.com) इसके द्वारा पुरानी वृद्ध कोशिकाओं के स्थान पर नयी नवजीवन युक्त कोशिकाओं का निर्माण होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 12 Thermodynamics

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 12 Thermodynamics (ऊष्मागतिकी)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 12 Thermodynamics (ऊष्मागतिकी)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कोई गीज़र 3.0 लीटर प्रति मिनट की दर से बहते हुए जल को 27° C से 77° C तक गर्म करता है। यदि गीज़र का परिचालन गैस बर्नर द्वारा किया जाए तो ईंधन के व्यय की क्या दर होगी? बर्नर के ईंधन की दहन-ऊष्मा 40 × 104 Jg-1 है।

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प्रश्न 2.
स्थिर दाब पर 2.0 × 10-2 kg नाइट्रोजन (कमरे के ताप पर) के ताप में 45°C वृद्धि करने के लिए कितनी ऊष्मा की आपूर्ति की जानी चाहिए? (N2 का अणु भार = 28, R = 8.3 J mol-1 K-1)

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प्रश्न 3.
व्याख्या कीजिए कि ऐसा क्यों होता है –

(a) भिन्न-भिन्न तापों T1 व T2 के दो पिण्डों को यदि ऊष्मीय सम्पर्क में लाया जाए तो यह आवश्यक नहीं कि उनका अन्तिम ताप (T1 + T2) / 2 ही हो।
(b) रासायनिक या नाभिकीय संयन्त्रों में शीतलक (अर्थात दूव जो संयन्त्र के भिन्न-भिन्न भागों को अधिक गर्म होने से रोकता है) की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होनी चाहिए।
(c) कार को चलाते-चलाते उसके टायरों में वायुदाब बढ़ जाता है।
(d) किसी बन्दरगाह के समीप के शहर की जलवायु , समान अक्षांश के किसी रेगिस्तानी शहर की जलवायु से अधिक शीतोष्ण होती है।

उत्तर :

(a) चूँकि अन्तिम ताप वस्तुओं के अलग-अलग तापों के अतिरिक्त उनकी ऊष्मा धारिताओं पर भी निर्भर करता है।
(b) शीतलक का कार्य संयन्त्र से अभिक्रिया जनित ऊष्मा को हटाना है इसके लिए शीतलक की विशिष्ट ऊष्मा धारिता अधिक होनी चाहिए जिससे कि वह कम ताप-वृद्धि के लिए अधिक ऊष्मा शोषित कर सके।
(c) कार को चलाते-चलाते, सड़क के साथ घर्षण के कारण टायर का ताप बढ़ जाता है, इसी कारण टायर में भरी हवा का दाब बढ़ जाता है।
(d) बन्दरगाह के निकट के शहरों की आपेक्षिक आर्द्रता समान अक्षांश के रेगिस्तानी शहर की तुलना में अधिक होती है। इसी कारण बन्दरगाह शहर की जलवायु रेगिस्तानी शहर की जलवायु की तुलना में शीतोष्ण बनी रहती है।

प्रश्न 4.
गतिशील पिस्टन लगे किसी सिलिण्डर में मानक ताप व दाब पर 3 mol हाइड्रोजन भरी है। सिलिण्डर की दीवारें ऊष्मारोधी पदार्थ की बनी हैं तथा पिस्टन को उस पर बालू की परत लगाकर ऊष्मारोधी बनाया गया है। यदि गैस को उसके आरम्भिक आयतन के आधे आयतन तक सम्पीडित किया जाए तो गैस का दाब कितना बढ़ेगा?
हल : पिस्टन तथा दीवारें ऊष्मारोधी होने के कारण प्रक्रम रुद्धोष्म (adiabatic) है। अत: इसके लिए दाब आयतन सम्बन्ध PVγ = नियतांक से
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प्रश्न 5.
रुद्रोष्म विधि द्वारा किसी गैस की अवस्था परिवर्तन करते समय उसकी एक साम्यावस्था से दूसरी साम्यावस्था B तक ले जाने में निकाय पर 22.3 J कार्य किया जाता है। यदि गैस को दूसरी प्रक्रिया द्वारा अवस्था A से अवस्था B में लाने में निकाय द्वारा अवशोषित नेट ऊष्मा 9.35 cal है तो बाद के प्रकरण में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य कितना है? (1cal= 4 . 19 j)
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प्रश्न 6.
समान धारिता वाले दो सिलिण्डर A तथा B एक-दूसरे से स्टॉपकॉक के द्वारा जुड़े हैं। A में मानक ताप व दाब पर गैस भरी है जबकि B पूर्णतः निर्वातित है। स्टॉपकॉक यकायक खोल दी जाती है। निम्नलिखित का उत्तर दीजिए –

(a) सिलिण्डर A तथा B में अन्तिम दाब क्या होगा?
(b) गैस की आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
(c) गैस के ताप में क्या परिवर्तन होगा?
(d) क्या निकाय की माध्यमिक अवस्थाएँ (अन्तिम साम्यावस्था प्राप्त करने के पूर्व) इसके P – V – T पृष्ठ पर होंगी?

हल : (a) P1 = मानक दाब = 1 atm, V1 = V (माना)
P2 = ? जबकि V2 = 2 V (चूँकि A व B के आयतन बराबर हैं।)
∵ सिलिण्डर B निर्वातित है; अत: स्टॉपकॉक खोलने पर गैस का निर्वात में मुक्त प्रसार होगा;
अतः गैस कोई कार्य नहीं करेगी और न ही ऊष्मा का आदान-प्रदान करेगी।
अतः गैस की आन्तरिक ऊर्जा व ताप स्थिर रहेंगे।
∴ बॉयल के नियम से, P2 V2 = P1 V1

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(c) ∵ आन्तरिक ऊर्जा अपरिवर्तित रही है; अत: गैस के ताप में भी कोई परिवर्तन नहीं होगा।
(d) ∵ गैस का मुक्त प्रसार हुआ है; अत: माध्यमिक अवस्थाएँ साम्य अवस्थाएँ नहीं हैं; अत: ये अवस्थाएँ P – V – T पृष्ठ पर नहीं होंगी।

प्रश्न 7.
एक वाष्प इंजन अपने बॉयलर से प्रति मिनट 3.6 × 109 ऊर्जा प्रदान करता है जो प्रति मिनट 5.4 × 108 Jकार्य देता है। इंजन की दक्षता कितनी है? प्रति मिनट कितनी ऊष्मा अपशिष्ट होगी ?
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प्रश्न 8.
एक हीटर किसी निकाय को 100 w की दर से ऊष्मा प्रदान करता है। यदि निकाय 75 Js-1 की दर से कार्य करता है तो आन्तरिक ऊर्जा की वृद्धि किस दर से होगी?
हल : ∆U =Q – W = (100 Js – 75 Js)= 25 Js
अर्थात् आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि की दर = 25 w

प्रश्न 9.
किसी ऊष्मागतिकीय निकाय को मूल अवस्था से मध्यवर्ती अवस्था तक चित्र-12.1 में दर्शाए अनुसार एक रेखीय प्रक्रम द्वारा ले जाया गया है। एक समदाबी प्रक्रम द्वारा इसके आयतन को E से F तक ले जाकर मूल मान तक कम कर देते हैं। गैस द्वारा D से E तथा वहाँ से F तक कुल किए गए कार्य का आकलन कीजिए।
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प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थ को एक प्रशीतक के अन्दर रखने पर वह उसे 9°C पर बनाए रखता है। यदि कमरे का ताप 36°c है तो प्रशीतक के निष्पादन गुणांक का आकलन कीजिए।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी गैस पर कृत कार्य सर्वाधिक होता है।
(i) समतापी प्रक्रम में
(ii) समदाबीय प्रक्रम में
(iii) समआयतनिक प्रक्रम में
(iv) रुद्धोष्म प्रक्रम में
उत्तर :
(i) समतापी प्रक्रम में

प्रश्न 2.
किसी चक्रीय प्रक्रम में
(i) किया गया कार्य शून्य होता है।
(ii) निकाय द्वारा किया गया कार्य निकाय को दी गयी ऊष्मा के बराबर होता है।
(iii) किया गया कार्य ऊष्मा पर निर्भर नहीं करता
(iv) निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
उत्तर :
(ii) निकाय द्वारा किया गया कार्य निकाय को दी गयी ऊष्मा के बराबर होता है।

प्रश्न 3.
आन्तरिक ऊर्जा की अभिधारणा सर्वप्रथम प्रस्तुत की गयी।
(i) ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम द्वारा
(ii) स्टोक के नियम द्वारा
(iii) स्टीफन के नियम द्वारा
(iv) वीन के नियम द्वारा
उत्तर :
(i) ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम द्वारा

प्रश्न 4.
एक ऊष्मागतिक निकाय को 100 जूल ऊष्मा दी जाती है तथा निकाय द्वारा 50 जूल कार्य किया जाता है, तो निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन है।
(i) 100 जूल
(ii) 150 जूल
(iii) 50 जूल
(iv) 200 जूल
उत्तर :
(iii) 50 जूल

प्रश्न 5.
ऊर्जा के समविभाजन नियम के अनुसार प्रत्येक स्वातन्त्र्य कोटि से सम्बद्ध प्रति कण औसत आन्तरिक ऊर्जा होती है
(i) [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] RT
(ii) [latex]\frac { 3 }{ 2 } [/latex] RT
(iii) [latex]\frac { 3 }{ 2 } [/latex] KT
(iv) [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] KT
उत्तर :
(i) [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] RT

प्रश्न 6.
एंक गैस को निम्न चित्र 12.2 के अनुसार मार्ग AB, BC तथा CA द्वारा ले जाया जाता है। सम्पूर्ण चक्र में नेट कार्य है।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 12 Thermodynamics 13
(i) 12 P1 V1
(ii) 6 P1 V1
(iii) 3 P1 V1
(iv) P1 V1
उत्तर :
(iii) 3 P1 V1

प्रश्न 7.
त्रि-परमाणुक गैस की विशिष्ट ऊष्मा अनुपात (γ) है।
(i) 1.40
(ii) 1.33
(iii) 1.67
(iv) 1
उत्तर :
(ii) 1.33

प्रश्न 8.
इंजन की दक्षता हो सकती है।
(i) शून्य से अनस्त तक कुछ भी।
(ii) सदैव एक
(iii) सदैव एक से कम
(iv) एक और दो के मध्य
उत्तर :
(iii) सदैव एक से कम

प्रश्न 9.
एक आदर्श इंजन 327° C तथा 27° C के बीच कार्य करता है। इंजन की दक्षता होगी
(i) 60%
(ii) 80%
(iii) 40%
(iv) 50%
उत्तर :
(iv) 50%

प्रश्न 10.
भाप इंजन की दक्षता की कोटि है।
(i) 80%
(ii) 50%
(iii) 30%
(iv) 15%
उत्तर :
(i) 80%

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चित्र 12.3 में किसी गैस के लिए P – V वक्र, AB तथा AC प्रदर्शित है। कारण सहित बताइए कि कौन-सा वक्र किस परिवर्तन को प्रदर्शित करता है?
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उत्तर :
यदि गैस आयतन V1 से V2 तक समतापीय और रुद्धोष्म प्रसारित होती है तो ग्राफ के ढाल से यह स्पष्ट है कि ग्राफ AB समतापीय प्रेक्रम तथा ग्राफ AC रुद्धोष्म प्रक्रम प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 2.
एक आदर्श गैस को नियत ताप पर सम्पीडित किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर :
कोई परिवर्तन नहीं होगा। ‘आदर्श गैस में केवल आन्तरिक गतिज ऊर्जा होती है (स्थितिज ऊर्जा नहीं होती) तथा गतिज ऊर्जा केवल ताप पर निर्भर करती है।

प्रश्न 3.
समान ताप पर समान द्रव्यमान के ठोस, द्रव तथा गैस में किसकी आन्तरिक ऊर्जा अधिक होती है और क्यों?
उत्तर :
गैस की आन्तरिक ऊर्जा सबसे अधिक होती है, क्योंकि इसके अणुओं की (ऋणात्मक) स्थितिज ऊर्जा बहुत कम होती है। ठोस के अणुओं की (ऋणात्मक) स्थितिज ऊर्जा बहुत अधिक होती है, अतः आन्तरिक ऊर्जा सबसे कम होती है।

प्रश्न 4.
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम समझाइए। यह नियम किस भौतिक राशि के संरक्षण पर आधारित है?
उत्तर :
यदि किसी ऊष्मागतिक निकाय को Q ऊर्जा देने पर, निकाय द्वारा कृत कार्य W हो तब निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ∆U = Q – W होगा। यही ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम है जो कि ऊर्जा-संरक्षण पर आधारित है।

प्रश्न 5.
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का गणितीय स्वरूप लिखिए। प्रयुक्त संकेतों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम
AU = Q – W अथवा Q = ∆U + W
चमदमें θ निकाय को दी गई ऊष्मीय ऊर्जा, W निकाय द्वारा किया गया कार्य, AU निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन है।

प्रश्न 6.
कार्बो इंजन के कार्यकारी पदार्थ का नाम लिखिए।
उत्तर :
आदर्श गैस।

प्रश्न 7.
यदि स्रोत वसिंक के ताप क्रमशः T1 तथा T2 हों तो ऊष्मा इंजन की दक्षता कितनी होगी?
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प्रश्न 8.
कान इंजन की दक्षता कब 1 होगी?
उत्तर :
जबकि सिंक का ताप OK हो।

प्रश्न 9.
ऊष्मा इंजन, प्रशीतक से कैसे भिन्न है?
उत्तर :
ऊष्मा इंजन में कार्यकारी-पदार्थ ऊँचे ताप वाली वस्तु से ऊष्मा लेता है। इसका कुछ भाग यान्त्रिक कार्य में बदलता है तथा शेष भाग नीचे ताप की वस्तु को लौटा देता है। प्रशीतक में कार्यकारी-पदार्थ शीतल वस्तु से ऊष्मा लेता है तथा इस पर बाह्य ऊर्जा-स्रोत से कार्य किया जाता है जिसके फलस्वरूप यह ऊष्मा की अधिक मात्रा को किसी तप्त वस्तु को दे देता है।

प्रश्न 10.
यदि ताप T1 व T2 के बीच कार्य कर रहे इंजन की दक्षता n है तो प्रत्येक ताप को 100 K बढ़ा देने पर दक्षता पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
दक्षता कम हो जायेगी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्क्रमणीय प्रक्रम क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
उत्क्रमणीय प्रक्रम – वे प्रक्रम जिन्हें विपरीत क्रम में भी ठीक उन्हीं अवस्थाओं में सम्पन्न किया जा सकता है, जिन अवस्थाओं में सीधे क्रम में सम्पन्न किया गया है; परन्तु विपरीत प्रभाव के साथ, उत्क्रमणीय प्रक्रम (reversible process) कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ – मान लो पानी से भरा हुआ एक फ्लास्क है जिसे अच्छी तरह बन्द कर दिया गया है। फ्लास्क का पानी एक निकाय है। पानी ही इसे निकाय का कार्यकारी पदार्थ (working substance) है, क्योंकि प्रक्रम के भौतिक परिवर्तन इंसी पर सम्पन्न किये जाते हैं। पानी को गर्म करके हम वाष्प बनाते हैं, यह एक प्रक्रम है और उसे ठण्डा करके पुनः पानी बना देते हैं, यह उसका उल्टा या उत्क्रम प्रक्रम है। इसी प्रकार पानी को उबालकर वाष्प बनाना एक उत्क्रमणीय प्रक्रम है, अर्थात् ऐसा प्रक्रम है जिसे उल्टी दिशा में सम्पन्न करने से प्रारम्भिक अवस्था तक पुन: पहुँचाया जा सकता है।

प्रश्न 2.
अनुत्क्रमणीय प्रक्रम क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अनुक्रमणीय प्रक्रम – वह प्रक्रम जिसे विपरीत क्रम में ठीक उन्हीं अवस्थाओं से नहीं गुजारा जा सकता है, जिनसे होकर वह सीधे क्रम में गुजरा था, अनुत्क्रमणीय प्रक्रम कहलाता है। दूसरे शब्दों में, जो प्रक्रम उत्क्रमणीय नहीं होता, वह अनुत्क्रमणीय होता है।

उदाहरणार्थ – इसके उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  1. पानी में शक्कर का घुलना अनुक्रमणीय प्रक्रम है।
  2. लोहे में जंग लगना।।
  3. किसी भी गैस का अचानक रुद्धोष्म प्रसार या सम्पीडन होना।
  4. गैसों का विसरण अनुक्रमणीय है। दो गैसें परस्पर मिलाये जाने पर आपस में मिलने की प्रवृत्ति रखती हैं, परन्तु मिश्रण से वे अपने आप पृथक् नहीं हो सकतीं।

प्रश्न 3.
ऊष्मागतिकी का शुन्यांकी नियम लिखिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम – इस नियम का प्रतिपादन सन् 1931 में आर०एच० फाउलर ने ऊष्मागतिकी के प्रथम तथा द्वितीय नियम की अभिव्यक्ति के काफी समय बाद किया। ऊष्मागतिकी के शून्यांकी नियम के अनुसार,

“यदि दो ऊष्मागतिक निकाय किसी तीसरे ऊष्मागतिक निकाय के साथ अलग-अलग तापीय साम्य अर्थात् ऊष्मीय साम्य (themal equilibrium) में हैं तो वे परस्पर भी ऊष्मीय साम्य में होंगे।”

प्रश्न 4.
ऊष्मागतिक निकायक़ी आन्तरिक ऊर्जा का क्या अर्थ है?
उत्तर :
किसी ऊष्मागतिक निकाय की आन्तरिक ऊर्जा उस निकाय की अवस्था का एक अभिलाक्षणिक गुण है; चाहे वह अवस्था किसी भी प्रकार प्राप्त की गयी है।

उदाहरणार्थ – किसी बर्तन में बन्द हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के मिश्रण को बाहर से कोई ऊर्जा नहीं दी जाती, परन्तु फिर भी यह मिश्रण विस्फोट होने पर कार्य कर सकता है। अत: इससे सिद्ध होता है कि मिश्रण में आन्तरिक ऊर्जा विद्यमान है।

प्रश्न 5.
यदि 2 मोल नाइट्रोजन गैस के ताप में 10°C की वृद्धि कर दी जाए, तो उसकी आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए। (R = 8.31जूल / मोल × K)
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प्रश्न 6.
सामान्य ताप तथा स्थिर दाब 1.0 × 105 न्यूटन / मी2 पर किसी आदर्श गैस के आयतन में 2.0 सेमीकी कमी करने के लिए कितना बाह्य कार्य करना होगा?
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प्रश्न 7.
0.5 सोल नाइट्रोजन को स्थिर आयतन पर 50°C से 70°C तक गर्म किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन की गणना कीजिए। नाइट्रोजन की स्थिर दाब पर विशिष्ट ऊष्मा CP = 7 कैलोरी / मोल – K तथा सार्वत्रिक गैस नियतांक R = 2 कैलोरी / मोल – K.
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प्रश्न 8.
यदि किसी ऊष्मागतिकी निकाय को 50 जुल ऊष्मा देने पर निकाय द्वारा 30 जूल कार्य किया जाता है, तो निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
हल : ऊष्मागतिकी निकाय को दी गयी ऊष्मा Q = + 50 जूल
निकाय पर किया गया कार्य W = – (30 जूल)
∴ ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन
∆U = Q – W = + 50 जूल – ( – 30 जूल) = 50 + 30 = 80 जूल
∵ ∆U का चिह्न धनात्मकं है, अतः आन्तरिक ऊर्जा में 80 जूल की वृद्धि होगी।

प्रश्न 9.
एक परमाणुक आदर्श गैस (ϒ = [latex]\frac { 5 }{ 3 }[/latex]) 17°C पर एकाएक अपने प्रारम्भिक आयतन के [latex]\frac { 1 }{ 8 }[/latex] आयतन तक सम्पीडित कर दी जाती है। गैस का अन्तिम ताप ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
माना गैस का प्रारम्भिक आयतन V1 तथा ताप T2 है तथा अन्तिम आयतन V, तथा ताप T, है। जब परिवर्तन एकदम से किया जाता है तो यह रुद्धोष्म परिवर्तन होगा, इसलिए गैस पॉयसन के नियम का पालन करेगी, जिसके अनुसार
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प्रश्न 10.
एक प्रशीतक (रेफ्रिजरेटर) को चलाने वाली मोटर 300 वाट की है। कमरे का ताप 27°C है। यदि इसके हिमकारी कक्ष से प्रति सेकण्ड 2.7 × 103 जूल ऊष्मा बाहर निकलती है, तो हिमकारी कक्ष का ताप ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 11.
एक कार्यों इंजन प्रत्येक चक्र में स्रोत से 127°C ताप पर 1000 जूल ऊष्मा अवशोषित करता है तथा 600 जूल ऊष्मा सिंक को दे देता है। इंजन की दक्षता तथा सिंक का ताप ज्ञात कीजिए।
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चक्रीय प्रक्रम से आप क्या समझते हैं। एक उचित (P – V) आरेख खींचकर यह प्रदर्शित कीजिए कि चक्रीय प्रक्रम में एक ऊष्मागतिक निकाय द्वारा किया गया कुल कार्य वक़ से घिरे क्षेत्रफल के बराबर होता है।
उत्तर :
चक्रीय प्रक्रम (Cyclic process) – जब कोई निकाय एक अवस्था से चलकर, भिन्न-भिन्न अवस्थाओं से गुजरता हुआ पुन: अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौट आता है, तो उसे ‘चक्रीय प्रक्रम’ कहते हैं। इस प्रक्रम में निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता अर्थात् ∆U = 0 ; अत: ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम की समीकरण ∆U = Q – W से
0 = Q – W अथवा Q = W
अतः चक्रीय प्रक्रम में किसी निकाय को दी गयी ऊष्मा निकाय द्वारा दिये गये नेट कार्य के बराबर होती है।

चक्रीय प्रक्रम में किया गया कुल कार्य (Total work done in cyclic process) – जब कोई निकाय विभिन्न परिवर्तनों द्वारा विभिन्न अवस्थाओं से गुजरता हुआ अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौट आता है, तो इस सम्पूर्ण प्रक्रम को चक्रीय प्रक्रम कहते हैं।”

माना कोई गैस (ऊष्मागतिक निकाय) दाब तथा आयतन की प्रारम्भिक अवस्था A में है तथा यह किसी प्रक्रम द्वारा फैलकर एक अन्य अवस्था B में पहुँच जाती है (चित्र 12.4)। इस प्रक्रम के लिए दाब-आयतन वक्र ACB है। इसलिए अवस्था A से अवस्था B तक जाने में गैस द्वारा किया गया कार्य WAB = क्षेत्रफल ACBB A’ अब माना किसी प्रक्रम द्वारा गैस को अवस्था B से पुनः अवस्था A में है। लाया जाता है। इस प्रक्रम के लिए दाबे-आयतन वक्र BDA है। गैस को अवस्था B से अवस्था A तक लाने में किसी कारक द्वारा गैस पर किया है गया कार्य WBA = क्षेत्रफल BDAA’ B’
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चूँकि क्षेत्रफल BDAA’B’ क्षेत्रफल ACBB A’ से बड़ा है। इसलिए WBA > WAB, अतः गैस पर किया गया नेट कार्य w = wba – Wab अतः W = क्षेत्रफल BDAA B – क्षेत्रफल ACBB’ A’= क्षेत्रफल ACBDA = बन्द वक्र ACBDA से घिरा क्षेत्रफल अतः उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि “चक्रीय प्रक्रम के लिए दाब-आयतन वक्र एक बन्द वक्र होता है। इस दशा में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य अथवा निकाय पर किया गया नेट कार्य बन्द वक्र से घिरे क्षेत्रफल के बराबर होता है।”

प्रश्न 2.
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम लिखिए तथा नियम की स्पष्ट व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम – किसी ऊष्मागतिक निकाय की दो निश्चित अवस्थाओं के बीच विभिन्न प्रक्रमों में राशि (Q – w) का मान निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है। इसलिए यदि निकाय की प्रारम्भिक तथा अन्तिम अवस्थाओं में आन्तरिक ऊर्जाएँ क्रमशः Ui तथा Uf हों, तो
Q – W = UF – Ui अथवा (Q – W) = ∆U
(जहाँ ∆U निकाय की प्रारम्भिक तथा अन्तिम अवस्थाओं में आन्तरिक ऊर्जाओं का अन्तर है।) अथवा Q = ∆U + W ……(1)

यह ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम को गणितीय स्वरूप है। इसको शब्दों में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –

“किसी ऊष्मागतिक निकाय को दी गयी ऊष्मा Q (अर्थात् निकाय द्वारा अवशोषित ऊष्मा) दो भागों में प्रयुक्त होती है – (i) निकाय द्वारा बाह्य दाब के विरुद्ध कार्य (w) करने में तथा (ii) निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन (∆U) करने में।”

यदि किसी प्रक्रम में निकाय को अनन्त सूक्ष्म ऊर्जा dQ दी जाती है तथा निकाय द्वारा अनन्त सूक्ष्म कार्य dw किया जाता है, तो निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन भी अनन्त सूक्ष्म dU ही होगा। तब समीकरण (1) को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जायेगा –
dQ = dU+ dW …..(2)

इस प्रकार ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम का ही एक रूप है।

प्रश्न 3.
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के आधार पर सिद्ध कीजिए कि किसी निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन

  1. समआयतनिक प्रक्रिया में निकाय को दी गई ऊष्मा अथवा उससे ली गई ऊष्मा के बराबर होता है।
  2. रुद्घोष्म प्रक्रिया में निकाय पर अथवा निकाय द्वारा किये गये कार्य के समान होता है।

उत्तर :
(i) समआयतनिक प्रक्रम (Isochoric process) – यदि निकाय में होने वाले किसी प्रक्रम के अन्तर्गत निकाय का आयतन स्थिर रहे तो उस प्रक्रम को समआयतनिक प्रक्रम कहते हैं। चूंकि ऐसे प्रक्रम में आयतन नियत रहता है, अत: आयतन में परिवर्तन ∆V = 0. इसलिए W = P × ∆V से W = 0 ; अतः ऐसे प्रक्रम में निकाय द्वारा कोई भी कार्य नहीं किया जाता। अत: ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम
∆U = Q – W से,
∆U = Q – 0 या ∆U =Q

अतः ऐसे प्रक्रम में निकाय को दी गयी सम्पूर्ण ऊष्मा निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि करने में व्यये हो जाती है। गैसों में होने वाले विस्फोट इस प्रकार के प्रक्रम के उदाहरण हैं।

(ii) रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic process) – जब ऊष्मागतिक निकाय में होने वाले किसी प्रक्रम के अन्तर्गत ऊष्मा न तो बाहर से निकाय के अन्दर जा सके और न ही ऊष्मा= निकाय से बाहर आ सके, अर्थात् Q = 0, तो ऐसे प्रक्रम को रुद्धोष्म प्रक्रम कहते हैं।

अत: इसे दशा में ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम ∆U = Q – W के अनुसार,
∆U = 0 – W या AU = – W ….(1)

अर्थात् रुद्धोष्म प्रक्रम में निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन कार्य के बराबर होता है।
यदि रुद्धोष्म प्रक्रम में कार्य निकाय पर किया गया है, तो W ऋणात्मक होगा।
अत: उपर्युक्त सूत्र (1) से ∆U = – ( – W) = W (धनात्मक)

प्रश्न 4.
रेफ्रिजरेटर (प्रशीतक) का सिद्धान्त क्या है? इसके कार्य गुणांक का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
रेफ्रिजरेटर का सिद्धान्त – “प्रशीतक एक ऐसी युक्ति है जो ऊष्मा को निम्न ताप की वस्तु से लेकर उच्च ताप की वस्तु में स्थानान्तरित कर देती है।”

दूसरे शब्दों में, प्रशीतक, उत्क्रम दिशा में कार्य करने वाला ऊष्मा इंजन है। इसलिए प्रशीतक को ऊष्मा पम्प (heat pump) या सम्पीडक (compressor) भी कहते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चक्र में कार्यकारी पदार्थ रेफ्रिजरेटर (प्रशीतक) में रखे पदार्थ से ऊष्मा अवशोषित करता है। कार्य विद्युत मोटर द्वारा कार्यकारी पदार्थ पर किया जाता है और अन्त में कार्यकारी पदार्थ ऊष्मा को वातावरण में (जिसका ताप अधिक होता है) छोड़ देता है। इस प्रकार रेफ्रिजरेटर में रखा पदार्थ ठण्डा हो जाता है।

इसी के आधार पर कान चक्र में उत्क्रम प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ कम ताप (T2) के सिंक से Q2 ऊष्मा ग्रहण करके, बाह्य स्रोतों द्वारा निकाय पर w कार्य कराकर, उच्च ताप (T1) के स्रोतों को (Q2 +W) = Q1 ऊष्मा देता है। प्रशीतक इसी मूल सिद्धान्त पर कार्य करता है।

कार्य गुणांक – कार्यकारी पदार्थ द्वारा ठण्डी वस्तु से ली गयी ऊष्मा और कार्यकारी पदार्थ पर किये गये कार्य के अनुपात को प्रशीतक का कार्य गुणांक कहते हैं।
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प्रश्न 5.
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम क्या है? एक ऊष्मा इंजन दो तापों के बीच कार्य करता है जिनका अन्तर 100 K है। यदि यह स्रोत से 746 जूल ऊष्मा अवशोषित करता है तथा सिंक को 546 जूल ऊष्मा देता है तो स्रोत व सिंक के ताप ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम – किसी भी स्वतः क्रिया मशीन के लिए, जिसे कोई भी बाह्य स्रोत की सहायता प्राप्त न हो, ऊष्मा को ठण्डी वस्तु से गर्म वस्तु पर अथवा ऊष्मा को अल्प ताप से उच्च ताप पर पहुँचाना असम्भव है।
हल : स्रोत से ली गयी ऊष्मा θ1 = 746 जूल; सिंक को दी गयी ऊष्मा θ2 = 546 जूल, स्रोत व सिंक के तापों को अन्तर T1 – T2 = 100K
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प्रश्न 6.
27°C तथा एक वायुमण्डलीय दाब पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान को (i) धीरे-धीरे, (ii) तेजी से, इतना दबाया जाता है कि इसका अन्तिम आयतन प्रारम्भिक आयतन का एक-चौथाई रह जाता है। प्रत्येक दशा में अन्तिम दाब की गणना कीजिए। (गैस के लिए r = 1.5)
हल : माना गैस का प्रारम्भिक दाब P1 तथा आयतन V1 है तथा अन्तिम दाब P2 तथा आयतन V2 है।
(i) जब उक्त परिवर्तन धीरे-धीरे किया जाता है तो यह परिवर्तन समतापी होगा, इसलिए गैस बॉयल के नियम का पालन करेगी जिसके अनुसार P × V= नियतांक अर्थात्
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प्रश्न 7.
5 मोल ऑक्सीजन को स्थिर आयतन पर 10°C से 20°C तक गर्म किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा? ऑक्सीजन की स्थिर दाब पर ग्राम अणुक विशिष्ट ऊष्मा CP = 8 कैलोरी / (मोल-C) है। R = 8.36 जूल / (मोल – C)
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प्रश्न 8.
कार्यों का प्रमेय क्या है? समझाइए।
उत्तर :
कार्नो प्रमेय – इस प्रमेय के अनुसार, किन्हीं दो तापों के मध्य कार्य करते हुए किसी भी इंजन की दक्षता आदर्श उत्क्रमणीय (कानों) इंजन की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में, आदर्श उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता अधिकतम होती है तथा यह इसमें प्रयुक्त पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती।
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क्योंकि A एक उत्क्रमणीय इंजन है अत: इसे विपरीत दिशा में चलाया जा सकता है। उस दशा में यह रेफ्रिजरेटर की तरह कार्य करेगा। इसके लिए आवश्यक कार्य w इंजन B से प्राप्त किया जा सकता है। चित्र 12.4 में दोनों इंजन एक पट्टी (belt) द्वारा सम्बन्धित हैं। स्पष्ट है कि दोनों इंजन मिलकर एक स्वत: चलने वाली मशीन की तरह कार्य करेंगे। इस दशा में इंजन A निम्न तापं T2 पर Q1 ऊष्मा ग्रहण कर उच्च ताप T1 पर Q1 ऊष्मा लौटाता है। इंजन B उच्च ताप T1 पर Q1 ऊष्मा ग्रहण कर निम्न ताप T2 पर Q2‘ ऊष्मा लौटाता है परन्तु दोनों के द्वारा किया गया कार्य बराबर है,
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समीकरण (2) से स्पष्ट है कि रेफ्रिजरेटर A द्वारा सिंक से ली गई ऊष्मा Q2, इंजन B द्वारा सिंक को दी गयी ऊष्मा Q2 से अधिक है। फलत: सिंक की ऊष्मा लगातार कम होती जायेगी।

इसी प्रकार रेफ्रिजरेटर A द्वारा स्रोत को दी गई ऊष्मा Q1 इन्जन B द्वारा स्रोत से ली गयी ऊष्मा Q1 से अधिक है। अतः स्रोत की ऊष्मा लगातार बढ़ती जायेगी। इस प्रकार हम पाते हैं कि बिना कार्य किये सिंक से स्रोत को ऊष्मा का स्थानान्तरण होता रहेगा। परन्तु यह बात हमारे अनुभव के विपरीत है क्योंकि बिना किसी कार्य किये ऊष्मा का निम्न ताप से उच्च ताप की ओर प्रवाह सम्भव नहीं है।

अतः उपर्युक्त निष्कर्ष गलत है। चूंकि यह निष्कर्ष इस कथन पर आधारित है कि अनुक्रमणीय इंजन B की दक्षता, उत्क्रमणीय इंजन A की दक्षता से अधिक है, अत: यह कथन सर्वथा गलत है। इस प्रकार, इंजन B की दक्षता, इंजन A की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती अर्थात् उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता महत्तम होती है।

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