UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 10 Cell Cycle And Cell Division

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 10 Cell Cycle And Cell Division (कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्तनधारियों की कोशिकाओं की औसत कोशिका चक्र अवधि कितनी होती है?
उत्तर :
24 घण्टे के समय में मनुष्य की कोशिको अथवा स्तनधारियों की कोशिका में कोशिका विभाजन पूर्ण होने में केवल एक घण्टा लगता है।

प्रश्न 2.
जीवद्रव्य विभाजन व केन्द्रक विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
कोशिका चक्र के M-प्रावस्था में केन्द्रक विभाजन आरम्भ होता है जिसमें गुणसूत्र अलग होकर दो केन्द्रकों का निर्माण करते हैं। इसे केन्द्रक विभाजन अथवा केरियोकाइनेसिस (karyokinesis) कहते हैं। सामान्यत: इस क्रिया की समाप्ति पर कोशिका (UPBoardSolutions.com) द्रव्य में भी विभाजन होकर दो कोशिका बन जाती हैं। इसे जीवद्रव्ये विभाजन अथवा साइटोकाइनेसिस (cytokinesis) कहते हैं। यदि केवल केरियोकाइनेसिस हो तथा साइटोकाइनेसिस न हो, तो एक कोशिका बहुकेन्द्रकी (multinucleate) बन जाती है।

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प्रश्न 3.
अन्तरावस्था में होने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
यह अवस्था कोशिका की विश्राम अवस्था (resting phase) मानी जाती है क्योंकि इस अवस्था में कोशिका वृद्धि करती है, अगले विभाजन की तैयारियाँ पूर्ण होती हैं तथा DNA का द्विगुणन होता है। इस अवस्था के तीन चरण हैं

  1.  G– फेस (Gap 1)
  2. S – फेस (संश्लेषण अवस्था)
  3.  G2– फेस (Gap 2)

G1-फेस माइटोसिस तथा DNA द्विगुणन प्रारम्भ होने का मध्यावकाश है। S-फेस में DNA संश्लेषण व द्विगुणन होता है। DNA की मात्रा दोगुनी हो जाती है परन्तु गुणसूत्र संख्या में वृद्धि नहीं होती है। यदि Gमें 2n गुणसूत्र संख्या हो, तो S में भी 2n ही होगी। जन्तु कोशिका में DNA द्विगुणन के साथ-साथ सेन्ट्रिओल विभाजन भी होता है। G2फेस में प्रोटीन संश्लेषण होता है तथा कोशिका टोसिस (mitosis) के लिए तैयार होती है।

प्रश्न 4.
कोशिका चक्र का G0 (प्रशान्त प्रावस्था) क्या है?
उत्तर :
कुछ कोशिकाओं में विभाजन की क्रिया नहीं होती है। कोशिका की मृत्यु होने पर दूसरी कोशिका उसका स्थान ले लेती है। अत: G1 -प्रावस्था एक अक्रिय अवस्था में प्रवेश करती है, इसे शान्त प्रावस्था (G0) कहते हैं। इस अवस्था में कोशिका केवल उपापचयी रूप से सक्रिय रहती है।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन को सम विभाजन क्यों कहते हैं?
उत्तर :
सूत्री विभाजन में बनी दोनों पुत्री कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान ही बनी रहती है। इसी कारण सूत्री विभाजन को सम विभाजन (equational division) भी कहते हैं।

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प्रश्न 6.
कोशिका चक्र की उस प्रावस्था का नाम बताइए जिसमें निम्न घटनाएँ सम्पन्न होती हैं

  1. गुणसूत्र तर्क मध्य रेखा की ओर गति करते हैं।
  2. गुणसूत्र बिन्दु का टूटना व अर्ध गुणसूत्र का पृथक् होना।
  3.  समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होना।
  4.  समजात गुणसूत्रों के बीच विनिमय का होना।

उत्तर :

  1. मेटाफेस
  2.  एनाफेस
  3.  प्रोफेस-I की जाइगोटीन अवस्था जिसमें साइनेप्सिस (synapsis) होती है
  4.  प्रोफेस-I की पेकीटीन (pachytene) प्रावस्था।

प्रश्न 1.
निम्न के बारे में वर्णन कीजिए
(i) सूत्रयुग्मन
(ii) युगली
(iii) काएज्मेटा।
उत्तर :

(i) सूत्रयुग्मन (Synapsis) :
अर्धसूत्री विभाजन के प्रथम प्रोफेसे की जाइगोटीन अवस्था में (UPBoardSolutions.com) गुणसूत्र जोड़े बनाते हैं। इसे सूत्रयुग्मन कहते हैं।

(ii) युगली (Bivalent) :
सूत्रयुग्मन से बने समजात गुणसूत्र जोड़े में 4 अर्धगुणसूत्र होते हैं तथा इस जोड़े को युगली कहते हैं।

(iii) काएज्मेटा (Chiasmeta) :
डिप्लोटीन में यदि गुणसूत्र में विनिमय प्रारम्भ होने से पहले ‘x’ आकार की संरचना बनती है, तो उसे काएज्मेटा कहते हैं।

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प्रश्न 8.
पादप व प्राणी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर :
पादप कोशिका में विभाजन के समय पट्ट बनता है जिससे बाद में कोशिका भित्ति बनती है। परन्तु जन्तु कोशिका में दोनों ओर से वलन बनकर मध्य में आते हैं और दो भागों में कोशिका बँट जाती है।

प्रश्न 9.
अर्द्धसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ कहाँ आकार में समान व कहाँ भिन्न आकार की होती हैं?
उत्तर :
अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा युग्मक निर्माण होता है। शुक्राणुजनन (spermatogenesis) में मातृ कोशिका के विभाजन से बनने वाली चारों पुत्री कोशिकाएँ समान होती हैं। ये शुक्रकायान्तरण द्वारा शुक्राणु का निर्माण करती हैं। शुक्रजनन में बनने वाली चारों संतति कोशिकाएँ (UPBoardSolutions.com) आकार में समान होती हैं। अण्डजनन (oogenesis) में मातृ कोशिका से बनने वाली संतति कोशिकाएँ आकार में भिन्न होती हैं। अण्डनन के फलस्वरूप एक अण्डाणु तथा पोलर कोशिकाएँ बनती हैं। पोलर कोशिकाएँ आकार में छोटी होती हैं। पौधों के बीजाण्ड में गुरुबीजाणुजनन (अर्द्धसूत्री विभाजन) के फलस्वरूप गुरुबीजाणु से चार कोशिकाएँ बनती हैं। इनमें आधारीय कोशिका अन्य कोशिकाओं से भिन्न होती है। यह वृद्धि और विभाजन द्वारा भ्रूणकोष (embryo sac) बनाता है। पौधों में लघु-बीजाणु जनन द्वारा लघु बीजाणु या परागकण बनते हैं। ये आकार में समान होते हैं।

प्रश्न 10.
सूत्री विभाजन की पश्चावस्था तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था I में क्या अन्तर है?
उत्तर :
सूत्री विभाजन तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था प्रथम में अन्तर

प्रश्न 11.
सूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में प्रमुख अन्तरों को सूचीबद्ध कीजिए।

उत्तर :
सूत्री व अर्द्धसूत्र विभाजन में अन्तर

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प्रश्न 12.
अर्द्धसूत्री विभाजन का क्या महत्त्व है?

उत्तर :
अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व इसके निम्नलिखित महत्त्व हैं

  1. अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप बने युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है। लेकिन जनन में नर तथा मादा युग्मकों के मिलने से द्विगुणित जाइगोट (zygote)का निर्माण होता है। इस प्रकार अर्द्धसूत्री विभाजन तथा निषेचन के फलस्वरूप प्रत्येक जाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित बनी रहती है।
  2. अर्द्धसूत्री विभाजन के समय विनिमय (crossing over) के कारण गुणसूत्रों की संरचना बदल जाती है, इससे भिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। जैव विभिन्नताएँ जैव विकास का आधार होती हैं।

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प्रश्न 13.
अपने शिक्षक के साथ निम्नलिखित के बारे में चर्चा कीजिए

  1.  अगुणित कीटों व निम्न श्रेणी के पादपों में कोशिका विभाजन कहाँ सम्पन्न होता है?
  2.  उच्च श्रेणी पादपों की कुछ अगुणित कोशिकाओं में कोशिका विभाजन कहाँ नहीं होता है?

उत्तर :

  1.  नर मधुमक्खियाँ अर्थात् ड्रोन्स (drones) अगुणित होते हैं। इनमें सूत्री विभाजन अनिषेचित अगुणित अण्डों में होता है। निम्न श्रेणी के पादपों; जैसे-एककोशिकीय क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas), बहुकोशिकीय यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) आदि में समसूत्री विभाजन द्वारा जनन होता है। इनमें अगुणित युग्मक बनते हैं। युग्मकों के परस्पर मिलने से युग्माणु (zygote) बनते हैं। जाइगोट में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। इसके (UPBoardSolutions.com) फलस्वरूप बने अगुणित बीजाणु समसूत्री विभाजन द्वारा नए पादपों का विकास करते हैं।
  2. उच्च श्रेणी के पादपों में द्विगुणित बीजाण्डकाय में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण चार अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं। इनमें से तीन में कोशिका विभाजननहीं होता। सक्रिय गुरुबीजाणु से भ्रूणकोष (embryo sac) बनता है। भ्रूणकोष की अगुणित प्रतिमुख कोशिकाओं (antipodal cells) तथा सहायक कोशिकाओं (synergids)में क्रोशिका विभाजन नहीं होता। साइकस के लघुबीजाणुओं (परागकण) के अंकुरण के फलस्वरूप नर युग्मकोभिद् बनता है। इसकी प्रोथैलियल कोशिका (prothallial cell) तथा लिका कोशिका (tube cell) में कोशिका विभाजन नहीं होता।

प्रश्न 14.
क्या S प्रावस्था में बिना डी०एन०ए० प्रतिकृति के सूत्री विभाजन हो सकता है?
उत्तर :
‘S’ प्रावस्था में DNA की प्रतिकृति के बिना सूत्री विभाजन नहीं हो सकता।

प्रश्न 15.
क्या बिना कोशिका विभाजन के डी०एन०ए० प्रतिकृति हो सकती है?
उत्तर :
कोशिका विभाजन के बिना भी DNA प्रतिकृति हो सकती है। सामान्यतया DNA से RNA का निर्माण प्रतिकृति के फलस्वरूप ही होता रहता है।

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प्रश्न 16.
कोशिका विभाजन की प्रत्येक अवस्थाओं के दौरान होने वाली घटनाओं का विश्लेषण कीजिए और ध्यान दीजिए कि निम्नलिखित दो प्राचलों में कैसे परिवर्तन होता है?

  1.  प्रत्येक कोशिका की गुणसूत्र संख्या (N)
  2.  प्रत्येक कोशिका में डी०एन०ए० की मात्रा (C)

उत्तर :
अन्तरावस्था की G1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है। इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है। S-प्रावस्था में DNA की प्रतिकृति होती है। इसके फलस्वरूप DNA की मात्रा दोगुनी हो जाती है। यदि DNA की प्रारम्भिक मात्रा 2C से प्रदर्शित करें तो इसकी मात्रा 4C हो जाती है, जबकि गुणसूत्रों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता। यदि G1 प्रावस्था में गुणसूत्रों की संख्या 2N है। तो G2 प्रावस्था में भी इनकी संख्या 2N रहती है।

अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम की युग्मपट्ट (जाइगोटीन) अवस्था में समजात गुणसूत्र (UPBoardSolutions.com) जोड़े बनाते हैं। पश्चावस्था प्रथम में गुणसूत्रों का बँटवारा होता है। यदि गुणसूत्रों की संख्या 2N है तो अर्द्धसूत्री विभाजन के पश्चात् गुणसूत्रों की संख्या N रह जाती है। जननांगों (2N) में युग्मकजनन अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप होता है। इसके फलस्वरूप युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या घटकर अगुणित (आधी-N) रह जाती है।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वे कोशिकाएँ कौन-सी हैं, जिनमें सेण्ट्रिओल नहीं होता?
(क) तन्त्रिका कोशिका
(ख) जनन कोशिका
(ग) अस्थि कोशिका
(घ) यकृत कोशिका
उत्तर :
(क) तन्त्रिका कोशिका

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोशिका चक्र की विभिन्न अवस्थाओं को क्रम में लिखिए।
उत्तर :
G1 ,S, G2 एवं M प्रावस्थाएँ।

प्रश्न 2.
कोशिका चक्र की G1 प्रावस्था में क्या घटित होता है?
उत्तर :
G1 प्रावस्था में कोशिका वृद्धि करती है। DNA का संश्लेषण करने वाले एन्जाइम तथा DNA के विभिन्न घटकों का निर्माण होता है। G1 प्रावस्था में कोशिका चक्र का लगभग 35% से 50% समय लगता है।

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प्रश्न 3.
कोशिकाद्रव्य विभाजन पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रक विभाजन के पश्चात् जन्तु कोशिकाओं में खाँच विधि (furrow method) से तथा पादप कोशिका (UPBoardSolutions.com) में कोशिका पट्ट निर्माण से कोशिकाद्रव्य का बँटवारा होता है।

प्रश्न 4.
सूत्री विभाजन की किस अवस्था में प्रत्येक गुणसूत्र का गुणसूत्र बिन्दु दो भागों में बँट जाता
उत्तर :
मध्यावस्था के अन्त में।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन के समय गुणसूत्र किस अवस्था में कोशिका के मध्य में एक प्लेट पर एकत्र होते हैं?
उत्तर :
मध्यावस्था में।

प्रश्न 6.
अर्द्धसूत्री विभाजन में प्रथम पूर्वावस्था की उप-प्रावस्थाओं को सही क्रम में लिखिए।
उत्तर :

  1. तनुसूत्र (Leptotene)
  2.  युग्मसूत्र (Zygotene)
  3.  स्थूलसूत्र (Pachytene)
  4.  द्विपट्ट्ट (Diplotene) एवं
  5. पारगतिक्रम (Diakinesis)

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प्रश्न 7.
अर्द्धसूत्री विभाजन के समय समजात गुणसूत्र किस अवस्था में अलग होते हैं?
उत्तर :
पश्चावस्था-I में।

प्रश्न 8.
अर्द्धसूत्री विभाजन की किस अवस्था में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है?
उत्तर :
अर्द्धसूत्री विभाजन-प्रथम (न्यूनकारी विभाजन) में।।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तर्क तन्तु क्या हैं ? प्रत्येक प्रकार के त तन्तुओं के कार्य लिखिए।
उत्तर :

तर्क तन्तु एवं उनके कार्य

समस्त जन्तु कोशिकाओं में विभाजनान्तराल अवस्था (interphase) में ट्यूब्यूलिन (tubulin) प्रोटीन से बनी सूक्ष्म नलिकाओं के संघनन की दो तारककेन्द्र या सेण्ट्रिओल्स (centrioles) नामक सूक्ष्म संरचनाएँ केन्द्रक के समीप स्थित होती हैं। ये दोनों तारककेन्द्र कोशिकाद्रव्य के विशेष कणिकामय (granular) छोटे से क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसे कोशिका का विभाजन केन्द्र (division centre) या तारककाय (सेण्ट्रोसोम-centrosome) कहते हैं। यह वनस्पति कोशिकाओं में अनुपस्थित होता है। कोशिका विभाजन में सेण्ट्रोसोम की प्रमुख भूमिका होती है। इण्टरफेज अवस्था की S-उप अवस्था में ही तारककेन्द्रों से दो नये तारककेन्द्र बनने लगते हैं जो G2 प्रावस्था के अन्त तक पूर्ण विकसित हो जाते हैं। पूर्वावस्था (prophase) के प्रारम्भ में सेण्ट्रोसोम के चारों ओर अनेक सूक्ष्म नलिकाएँ बनती हैं, जिन्हें (UPBoardSolutions.com) तारक किरणें (astral rays) कहते हैं। इनके कारण सेण्ट्रोसोम सितारे (star) जैसी आकृति का दिखाई देता है, इसलिए इसे तारक (aster) कहते हैं। तारक किरणों के बन जाने पर तारक दो सन्तति सेण्ट्रोसोम्स (daughter centrosomes) में विभाजित हो जाता है, शीघ्र ही सन्तति सेण्ट्रोसोम जनक सेण्ट्रोसोम से दूर हटने लगते हैं और दोनों सेण्ट्रोसोम्स के बीच कोशिकाद्रव्य की सूक्ष्म नलिकाओं से तर्क तन्तु (spindle fibres) बनने लगते हैं। पूर्वावस्था के समाप्त होने तक दोनों सेण्ट्रोसोम्स कोशिका में विपरीत ध्रुवों पर पहुंच जाते हैं और दोनों के मध्य । ध्रुवीय तर्क तन्तु (polar spindle fibres) बनने से तर्क निर्माण (spindle formation) पूरा हो जाता है। इस द्विध्रुवीय तर्क को समसूत्री तर्क (mitotic spindle) या द्वितारक (एम्फीऐस्टर-amphiaster) कहते हैं। समसूत्री तर्क में निम्नलिखित तीन प्रकार के तन्तु होते हैं।

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1. निरन्तरे या सतत् अथवा ध्रुवीय तर्क तन्तु (Continuous or polar spindle fibres) :
ये एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक फैले रहते हैं।

2. असतत् या गुणसूत्री त तन्तु (Discontinuous or chromosomal spindle fibres) :

ये तर्क ध्रुव से तर्क की मध्यवर्ती रेखा तक फैले होते हैं और गुणसूत्रों के गुणसूत्र बिन्दु (सेण्ट्रोमियर) से जुड़े होते हैं।

3. अन्तक्षेत्रीय तर्क तन्तु (Interzonal spindle fibres) :
ये तर्कु पश्चावस्था (anaphase) में बनते हैं और दो पृथक् व क्रमश: दूर होते पुत्री गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य फैले रहते हैं।

प्रश्न 2.
असूत्री विभाजन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
इस प्रकार के विभाजन में सबसे पहले केन्द्रक कुछ लम्बा हो जाता है तथा मध्य स्थान पर या किसी एक सिरे के पास संकुचन (constriction) बन जाता है। कुछ समय के बाद केन्द्रक समान आकार के नहीं होते हैं। यह अनिवार्य नहीं है कि केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिका का भी विभाजन हो। इस प्रकार का विभाजन सामान्यतः कवकों (fungi) तथा शैवालों (algae) में पाया जाता है। उच्च वर्ग के पौधों में यह केवल पुरानी कोशिकाओं (जो नष्ट हो रही हैं) में होता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्द्धसूत्री विभाजन से आप क्या समझते हैं? इसकी विभिन्न प्रावस्थाएँ लिखिए। समसूत्री विभाजन तथा इसका महत्व भी बताइए।
उत्तर
अर्द्धसूत्री विभाजन यह प्रत्येक जीव के जीवन चक्र (life cycle) में एक बार होने वाला ऐसा विभाजन है जो कोशिका में उपस्थित द्विगुणित (diploid = 2n) गुणसूत्रों को अगुणित (haploid = n) संख्या में हासित (reduce) कर देता है। इसी के बाद अगुणित (n) युग्मकों (gametes) का निर्माण होता है। युग्मकों के समेकन (fusion) के बाद जो युग्मनज बनता है उसमें क्रोमोसोम्स की संख्या फिर दोगुनी हो जाती है। इस प्रकार अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis) के (UPBoardSolutions.com) बिना युग्मक नहीं बन सकते तथा संयुग्मन निषेचन (fertilization) के बिना युग्मनज (zygote) का निर्माण नहीं हो सकता। अर्द्धसूत्री विभाजन (meiosis or reduction division) में जनक गुणसूत्रों का द्विगुणन तो एक बार ही होता है, परन्तु कोशिका दो बार विभाजित होती है अर्थात् विभाजनान्तराल प्रावस्था (interphase) एक ही बार होती है।

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अर्द्धसूत्री विभाजन की प्राधस्थाएँ

अर्द्धसूत्री विभाजन एक लम्बी प्रक्रिया है और इसमें केन्द्रक व कोशिकाद्रव्य के दो बार विभाजन सम्मिलित हैं। इन दो बार के विभाजनों में से पहला विभाजन ह्रास विभाजन (न्यूनकारी = reduction division) है जिसमें गुणसूत्रों की संख्या विगुणित से अगुणित (2n से n) हो जाती है। दोनों केन्द्रकों में गुणसूत्रों की संरचना यद्यपि एक जैसी होती है किन्तु इन पर उपस्थित आनुवंशिक प्रभावों में अन्तर हो सकता है, अत: इस विभाजन को विषम विभाजन (heterotypic division) भी कहते हैं, जबकि दूसरा विभाजन-साधारण सूत्री विभाजन की तरह ही होता है। इसमें बनने वाले नये केन्द्रकों में गुणसूत्र लम्बाई में टूट कर पहुँचते हैं; अत: इसे सम विभाजन (homotypic division) भी कहते हैं। इस विभाजन के अन्त में चार अगुणित (n) कोशिकाएँ बनती हैं।

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समसूत्री विभाजन एवं इसका महत्त्व

समसूत्री विभाजन जनन कोशिकाओं के अतिरिक्त सभी प्रकार की कायिक कोशिकाओं (somatic cells) में होता है। इसमें क्रोमोसोम्स की संख्या सदैव समान बनी रहती है। नयी सन्तति कोशिकाओं का निर्माण युग्मनज से होता है। इसमें नयी सन्तति कोशिकाएँ बार-बार विभाजित (समसूत्री कोशिका विभाजन द्वारा) होकर वृद्धि करती रहती हैं। कोशिका विभाजन के फलस्वरूप बनने वाली कोशिकाओं में विभेदीकरण (maturation) भी होता है जिससे (UPBoardSolutions.com) जीव के शरीर में विभिन्न अंग विकसित होते हैं। और इस प्रकार भ्रूणीय विकास के बाद एक नन्हे विकसित जीव का निर्माण हो जाता है। अब यह जीव वृद्धि करके वयस्क में बदल जाता है। यह वृद्धि भी सूत्री विभाजनों द्वारा कोशिकाओं की संख्या बढ़ने से ही होती है। इस प्रकार

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  1. यही एक ऐसा विभाजन है जिसके द्वारा बनने वाली सन्तति कोशिकाएँ पूर्णरूप से गुणों और संरचना में मातृ कोशिका की तरह होती हैं। सन्तति कोशिकाओं में क्रोमोसोम्स की संख्या और उनके लाक्षणिक गुण भी मातृ कोशिका की तरह ही रहते हैं।
  2. इस विभाजन के द्वारा बहुकोशिकीय संरचना का निर्माण होता है जबकि प्रत्येक जीव का जीवन चक्र,वास्तव में, एक कोशिका से ही प्रारम्भ होता है।
  3. एककोशिकीय जीवों में तो यह विभाजन जनन की एक विधि है।
  4. वृद्धि के लिए कोई कोशिका यदि परिमाप में बढ़ती जाये तो एक समय ऐसा आयेगा जब उसके जीवद्रव्य की विभिन्न दृष्टिकोण से सक्रियता नहीं रह पायेगी।

अतः यह कोशिका विभाजन जीव का परिमाप बढ़ाते हुए भी सक्रियता को कम नहीं होने देता अर्थात् (UPBoardSolutions.com) इसके द्वारा पुरानी वृद्ध कोशिकाओं के स्थान पर नयी नवजीवन युक्त कोशिकाओं का निर्माण होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 12 Thermodynamics

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 12 Thermodynamics (ऊष्मागतिकी)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कोई गीज़र 3.0 लीटर प्रति मिनट की दर से बहते हुए जल को 27° C से 77° C तक गर्म करता है। यदि गीज़र का परिचालन गैस बर्नर द्वारा किया जाए तो ईंधन के व्यय की क्या दर होगी? बर्नर के ईंधन की दहन-ऊष्मा 40 × 104 Jg-1 है।

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प्रश्न 2.
स्थिर दाब पर 2.0 × 10-2 kg नाइट्रोजन (कमरे के ताप पर) के ताप में 45°C वृद्धि करने के लिए कितनी ऊष्मा की आपूर्ति की जानी चाहिए? (N2 का अणु भार = 28, R = 8.3 J mol-1 K-1)

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प्रश्न 3.
व्याख्या कीजिए कि ऐसा क्यों होता है –

(a) भिन्न-भिन्न तापों T1 व T2 के दो पिण्डों को यदि ऊष्मीय सम्पर्क में लाया जाए तो यह आवश्यक नहीं कि उनका अन्तिम ताप (T1 + T2) / 2 ही हो।
(b) रासायनिक या नाभिकीय संयन्त्रों में शीतलक (अर्थात दूव जो संयन्त्र के भिन्न-भिन्न भागों को अधिक गर्म होने से रोकता है) की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होनी चाहिए।
(c) कार को चलाते-चलाते उसके टायरों में वायुदाब बढ़ जाता है।
(d) किसी बन्दरगाह के समीप के शहर की जलवायु , समान अक्षांश के किसी रेगिस्तानी शहर की जलवायु से अधिक शीतोष्ण होती है।

उत्तर :

(a) चूँकि अन्तिम ताप वस्तुओं के अलग-अलग तापों के अतिरिक्त उनकी ऊष्मा धारिताओं पर भी निर्भर करता है।
(b) शीतलक का कार्य संयन्त्र से अभिक्रिया जनित ऊष्मा को हटाना है इसके लिए शीतलक की विशिष्ट ऊष्मा धारिता अधिक होनी चाहिए जिससे कि वह कम ताप-वृद्धि के लिए अधिक ऊष्मा शोषित कर सके।
(c) कार को चलाते-चलाते, सड़क के साथ घर्षण के कारण टायर का ताप बढ़ जाता है, इसी कारण टायर में भरी हवा का दाब बढ़ जाता है।
(d) बन्दरगाह के निकट के शहरों की आपेक्षिक आर्द्रता समान अक्षांश के रेगिस्तानी शहर की तुलना में अधिक होती है। इसी कारण बन्दरगाह शहर की जलवायु रेगिस्तानी शहर की जलवायु की तुलना में शीतोष्ण बनी रहती है।

प्रश्न 4.
गतिशील पिस्टन लगे किसी सिलिण्डर में मानक ताप व दाब पर 3 mol हाइड्रोजन भरी है। सिलिण्डर की दीवारें ऊष्मारोधी पदार्थ की बनी हैं तथा पिस्टन को उस पर बालू की परत लगाकर ऊष्मारोधी बनाया गया है। यदि गैस को उसके आरम्भिक आयतन के आधे आयतन तक सम्पीडित किया जाए तो गैस का दाब कितना बढ़ेगा?
हल : पिस्टन तथा दीवारें ऊष्मारोधी होने के कारण प्रक्रम रुद्धोष्म (adiabatic) है। अत: इसके लिए दाब आयतन सम्बन्ध PVγ = नियतांक से
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प्रश्न 5.
रुद्रोष्म विधि द्वारा किसी गैस की अवस्था परिवर्तन करते समय उसकी एक साम्यावस्था से दूसरी साम्यावस्था B तक ले जाने में निकाय पर 22.3 J कार्य किया जाता है। यदि गैस को दूसरी प्रक्रिया द्वारा अवस्था A से अवस्था B में लाने में निकाय द्वारा अवशोषित नेट ऊष्मा 9.35 cal है तो बाद के प्रकरण में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य कितना है? (1cal= 4 . 19 j)
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प्रश्न 6.
समान धारिता वाले दो सिलिण्डर A तथा B एक-दूसरे से स्टॉपकॉक के द्वारा जुड़े हैं। A में मानक ताप व दाब पर गैस भरी है जबकि B पूर्णतः निर्वातित है। स्टॉपकॉक यकायक खोल दी जाती है। निम्नलिखित का उत्तर दीजिए –

(a) सिलिण्डर A तथा B में अन्तिम दाब क्या होगा?
(b) गैस की आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
(c) गैस के ताप में क्या परिवर्तन होगा?
(d) क्या निकाय की माध्यमिक अवस्थाएँ (अन्तिम साम्यावस्था प्राप्त करने के पूर्व) इसके P – V – T पृष्ठ पर होंगी?

हल : (a) P1 = मानक दाब = 1 atm, V1 = V (माना)
P2 = ? जबकि V2 = 2 V (चूँकि A व B के आयतन बराबर हैं।)
∵ सिलिण्डर B निर्वातित है; अत: स्टॉपकॉक खोलने पर गैस का निर्वात में मुक्त प्रसार होगा;
अतः गैस कोई कार्य नहीं करेगी और न ही ऊष्मा का आदान-प्रदान करेगी।
अतः गैस की आन्तरिक ऊर्जा व ताप स्थिर रहेंगे।
∴ बॉयल के नियम से, P2 V2 = P1 V1

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(c) ∵ आन्तरिक ऊर्जा अपरिवर्तित रही है; अत: गैस के ताप में भी कोई परिवर्तन नहीं होगा।
(d) ∵ गैस का मुक्त प्रसार हुआ है; अत: माध्यमिक अवस्थाएँ साम्य अवस्थाएँ नहीं हैं; अत: ये अवस्थाएँ P – V – T पृष्ठ पर नहीं होंगी।

प्रश्न 7.
एक वाष्प इंजन अपने बॉयलर से प्रति मिनट 3.6 × 109 ऊर्जा प्रदान करता है जो प्रति मिनट 5.4 × 108 Jकार्य देता है। इंजन की दक्षता कितनी है? प्रति मिनट कितनी ऊष्मा अपशिष्ट होगी ?
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प्रश्न 8.
एक हीटर किसी निकाय को 100 w की दर से ऊष्मा प्रदान करता है। यदि निकाय 75 Js-1 की दर से कार्य करता है तो आन्तरिक ऊर्जा की वृद्धि किस दर से होगी?
हल : ∆U =Q – W = (100 Js – 75 Js)= 25 Js
अर्थात् आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि की दर = 25 w

प्रश्न 9.
किसी ऊष्मागतिकीय निकाय को मूल अवस्था से मध्यवर्ती अवस्था तक चित्र-12.1 में दर्शाए अनुसार एक रेखीय प्रक्रम द्वारा ले जाया गया है। एक समदाबी प्रक्रम द्वारा इसके आयतन को E से F तक ले जाकर मूल मान तक कम कर देते हैं। गैस द्वारा D से E तथा वहाँ से F तक कुल किए गए कार्य का आकलन कीजिए।
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प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थ को एक प्रशीतक के अन्दर रखने पर वह उसे 9°C पर बनाए रखता है। यदि कमरे का ताप 36°c है तो प्रशीतक के निष्पादन गुणांक का आकलन कीजिए।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी गैस पर कृत कार्य सर्वाधिक होता है।
(i) समतापी प्रक्रम में
(ii) समदाबीय प्रक्रम में
(iii) समआयतनिक प्रक्रम में
(iv) रुद्धोष्म प्रक्रम में
उत्तर :
(i) समतापी प्रक्रम में

प्रश्न 2.
किसी चक्रीय प्रक्रम में
(i) किया गया कार्य शून्य होता है।
(ii) निकाय द्वारा किया गया कार्य निकाय को दी गयी ऊष्मा के बराबर होता है।
(iii) किया गया कार्य ऊष्मा पर निर्भर नहीं करता
(iv) निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
उत्तर :
(ii) निकाय द्वारा किया गया कार्य निकाय को दी गयी ऊष्मा के बराबर होता है।

प्रश्न 3.
आन्तरिक ऊर्जा की अभिधारणा सर्वप्रथम प्रस्तुत की गयी।
(i) ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम द्वारा
(ii) स्टोक के नियम द्वारा
(iii) स्टीफन के नियम द्वारा
(iv) वीन के नियम द्वारा
उत्तर :
(i) ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम द्वारा

प्रश्न 4.
एक ऊष्मागतिक निकाय को 100 जूल ऊष्मा दी जाती है तथा निकाय द्वारा 50 जूल कार्य किया जाता है, तो निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन है।
(i) 100 जूल
(ii) 150 जूल
(iii) 50 जूल
(iv) 200 जूल
उत्तर :
(iii) 50 जूल

प्रश्न 5.
ऊर्जा के समविभाजन नियम के अनुसार प्रत्येक स्वातन्त्र्य कोटि से सम्बद्ध प्रति कण औसत आन्तरिक ऊर्जा होती है
(i) [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] RT
(ii) [latex]\frac { 3 }{ 2 } [/latex] RT
(iii) [latex]\frac { 3 }{ 2 } [/latex] KT
(iv) [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] KT
उत्तर :
(i) [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] RT

प्रश्न 6.
एंक गैस को निम्न चित्र 12.2 के अनुसार मार्ग AB, BC तथा CA द्वारा ले जाया जाता है। सम्पूर्ण चक्र में नेट कार्य है।
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(i) 12 P1 V1
(ii) 6 P1 V1
(iii) 3 P1 V1
(iv) P1 V1
उत्तर :
(iii) 3 P1 V1

प्रश्न 7.
त्रि-परमाणुक गैस की विशिष्ट ऊष्मा अनुपात (γ) है।
(i) 1.40
(ii) 1.33
(iii) 1.67
(iv) 1
उत्तर :
(ii) 1.33

प्रश्न 8.
इंजन की दक्षता हो सकती है।
(i) शून्य से अनस्त तक कुछ भी।
(ii) सदैव एक
(iii) सदैव एक से कम
(iv) एक और दो के मध्य
उत्तर :
(iii) सदैव एक से कम

प्रश्न 9.
एक आदर्श इंजन 327° C तथा 27° C के बीच कार्य करता है। इंजन की दक्षता होगी
(i) 60%
(ii) 80%
(iii) 40%
(iv) 50%
उत्तर :
(iv) 50%

प्रश्न 10.
भाप इंजन की दक्षता की कोटि है।
(i) 80%
(ii) 50%
(iii) 30%
(iv) 15%
उत्तर :
(i) 80%

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चित्र 12.3 में किसी गैस के लिए P – V वक्र, AB तथा AC प्रदर्शित है। कारण सहित बताइए कि कौन-सा वक्र किस परिवर्तन को प्रदर्शित करता है?
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उत्तर :
यदि गैस आयतन V1 से V2 तक समतापीय और रुद्धोष्म प्रसारित होती है तो ग्राफ के ढाल से यह स्पष्ट है कि ग्राफ AB समतापीय प्रेक्रम तथा ग्राफ AC रुद्धोष्म प्रक्रम प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 2.
एक आदर्श गैस को नियत ताप पर सम्पीडित किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर :
कोई परिवर्तन नहीं होगा। ‘आदर्श गैस में केवल आन्तरिक गतिज ऊर्जा होती है (स्थितिज ऊर्जा नहीं होती) तथा गतिज ऊर्जा केवल ताप पर निर्भर करती है।

प्रश्न 3.
समान ताप पर समान द्रव्यमान के ठोस, द्रव तथा गैस में किसकी आन्तरिक ऊर्जा अधिक होती है और क्यों?
उत्तर :
गैस की आन्तरिक ऊर्जा सबसे अधिक होती है, क्योंकि इसके अणुओं की (ऋणात्मक) स्थितिज ऊर्जा बहुत कम होती है। ठोस के अणुओं की (ऋणात्मक) स्थितिज ऊर्जा बहुत अधिक होती है, अतः आन्तरिक ऊर्जा सबसे कम होती है।

प्रश्न 4.
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम समझाइए। यह नियम किस भौतिक राशि के संरक्षण पर आधारित है?
उत्तर :
यदि किसी ऊष्मागतिक निकाय को Q ऊर्जा देने पर, निकाय द्वारा कृत कार्य W हो तब निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ∆U = Q – W होगा। यही ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम है जो कि ऊर्जा-संरक्षण पर आधारित है।

प्रश्न 5.
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का गणितीय स्वरूप लिखिए। प्रयुक्त संकेतों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम
AU = Q – W अथवा Q = ∆U + W
चमदमें θ निकाय को दी गई ऊष्मीय ऊर्जा, W निकाय द्वारा किया गया कार्य, AU निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन है।

प्रश्न 6.
कार्बो इंजन के कार्यकारी पदार्थ का नाम लिखिए।
उत्तर :
आदर्श गैस।

प्रश्न 7.
यदि स्रोत वसिंक के ताप क्रमशः T1 तथा T2 हों तो ऊष्मा इंजन की दक्षता कितनी होगी?
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प्रश्न 8.
कान इंजन की दक्षता कब 1 होगी?
उत्तर :
जबकि सिंक का ताप OK हो।

प्रश्न 9.
ऊष्मा इंजन, प्रशीतक से कैसे भिन्न है?
उत्तर :
ऊष्मा इंजन में कार्यकारी-पदार्थ ऊँचे ताप वाली वस्तु से ऊष्मा लेता है। इसका कुछ भाग यान्त्रिक कार्य में बदलता है तथा शेष भाग नीचे ताप की वस्तु को लौटा देता है। प्रशीतक में कार्यकारी-पदार्थ शीतल वस्तु से ऊष्मा लेता है तथा इस पर बाह्य ऊर्जा-स्रोत से कार्य किया जाता है जिसके फलस्वरूप यह ऊष्मा की अधिक मात्रा को किसी तप्त वस्तु को दे देता है।

प्रश्न 10.
यदि ताप T1 व T2 के बीच कार्य कर रहे इंजन की दक्षता n है तो प्रत्येक ताप को 100 K बढ़ा देने पर दक्षता पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर :
दक्षता कम हो जायेगी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्क्रमणीय प्रक्रम क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
उत्क्रमणीय प्रक्रम – वे प्रक्रम जिन्हें विपरीत क्रम में भी ठीक उन्हीं अवस्थाओं में सम्पन्न किया जा सकता है, जिन अवस्थाओं में सीधे क्रम में सम्पन्न किया गया है; परन्तु विपरीत प्रभाव के साथ, उत्क्रमणीय प्रक्रम (reversible process) कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ – मान लो पानी से भरा हुआ एक फ्लास्क है जिसे अच्छी तरह बन्द कर दिया गया है। फ्लास्क का पानी एक निकाय है। पानी ही इसे निकाय का कार्यकारी पदार्थ (working substance) है, क्योंकि प्रक्रम के भौतिक परिवर्तन इंसी पर सम्पन्न किये जाते हैं। पानी को गर्म करके हम वाष्प बनाते हैं, यह एक प्रक्रम है और उसे ठण्डा करके पुनः पानी बना देते हैं, यह उसका उल्टा या उत्क्रम प्रक्रम है। इसी प्रकार पानी को उबालकर वाष्प बनाना एक उत्क्रमणीय प्रक्रम है, अर्थात् ऐसा प्रक्रम है जिसे उल्टी दिशा में सम्पन्न करने से प्रारम्भिक अवस्था तक पुन: पहुँचाया जा सकता है।

प्रश्न 2.
अनुत्क्रमणीय प्रक्रम क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अनुक्रमणीय प्रक्रम – वह प्रक्रम जिसे विपरीत क्रम में ठीक उन्हीं अवस्थाओं से नहीं गुजारा जा सकता है, जिनसे होकर वह सीधे क्रम में गुजरा था, अनुत्क्रमणीय प्रक्रम कहलाता है। दूसरे शब्दों में, जो प्रक्रम उत्क्रमणीय नहीं होता, वह अनुत्क्रमणीय होता है।

उदाहरणार्थ – इसके उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  1. पानी में शक्कर का घुलना अनुक्रमणीय प्रक्रम है।
  2. लोहे में जंग लगना।।
  3. किसी भी गैस का अचानक रुद्धोष्म प्रसार या सम्पीडन होना।
  4. गैसों का विसरण अनुक्रमणीय है। दो गैसें परस्पर मिलाये जाने पर आपस में मिलने की प्रवृत्ति रखती हैं, परन्तु मिश्रण से वे अपने आप पृथक् नहीं हो सकतीं।

प्रश्न 3.
ऊष्मागतिकी का शुन्यांकी नियम लिखिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का शून्यांकी नियम – इस नियम का प्रतिपादन सन् 1931 में आर०एच० फाउलर ने ऊष्मागतिकी के प्रथम तथा द्वितीय नियम की अभिव्यक्ति के काफी समय बाद किया। ऊष्मागतिकी के शून्यांकी नियम के अनुसार,

“यदि दो ऊष्मागतिक निकाय किसी तीसरे ऊष्मागतिक निकाय के साथ अलग-अलग तापीय साम्य अर्थात् ऊष्मीय साम्य (themal equilibrium) में हैं तो वे परस्पर भी ऊष्मीय साम्य में होंगे।”

प्रश्न 4.
ऊष्मागतिक निकायक़ी आन्तरिक ऊर्जा का क्या अर्थ है?
उत्तर :
किसी ऊष्मागतिक निकाय की आन्तरिक ऊर्जा उस निकाय की अवस्था का एक अभिलाक्षणिक गुण है; चाहे वह अवस्था किसी भी प्रकार प्राप्त की गयी है।

उदाहरणार्थ – किसी बर्तन में बन्द हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के मिश्रण को बाहर से कोई ऊर्जा नहीं दी जाती, परन्तु फिर भी यह मिश्रण विस्फोट होने पर कार्य कर सकता है। अत: इससे सिद्ध होता है कि मिश्रण में आन्तरिक ऊर्जा विद्यमान है।

प्रश्न 5.
यदि 2 मोल नाइट्रोजन गैस के ताप में 10°C की वृद्धि कर दी जाए, तो उसकी आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए। (R = 8.31जूल / मोल × K)
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प्रश्न 6.
सामान्य ताप तथा स्थिर दाब 1.0 × 105 न्यूटन / मी2 पर किसी आदर्श गैस के आयतन में 2.0 सेमीकी कमी करने के लिए कितना बाह्य कार्य करना होगा?
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प्रश्न 7.
0.5 सोल नाइट्रोजन को स्थिर आयतन पर 50°C से 70°C तक गर्म किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन की गणना कीजिए। नाइट्रोजन की स्थिर दाब पर विशिष्ट ऊष्मा CP = 7 कैलोरी / मोल – K तथा सार्वत्रिक गैस नियतांक R = 2 कैलोरी / मोल – K.
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प्रश्न 8.
यदि किसी ऊष्मागतिकी निकाय को 50 जुल ऊष्मा देने पर निकाय द्वारा 30 जूल कार्य किया जाता है, तो निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
हल : ऊष्मागतिकी निकाय को दी गयी ऊष्मा Q = + 50 जूल
निकाय पर किया गया कार्य W = – (30 जूल)
∴ ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन
∆U = Q – W = + 50 जूल – ( – 30 जूल) = 50 + 30 = 80 जूल
∵ ∆U का चिह्न धनात्मकं है, अतः आन्तरिक ऊर्जा में 80 जूल की वृद्धि होगी।

प्रश्न 9.
एक परमाणुक आदर्श गैस (ϒ = [latex]\frac { 5 }{ 3 }[/latex]) 17°C पर एकाएक अपने प्रारम्भिक आयतन के [latex]\frac { 1 }{ 8 }[/latex] आयतन तक सम्पीडित कर दी जाती है। गैस का अन्तिम ताप ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
माना गैस का प्रारम्भिक आयतन V1 तथा ताप T2 है तथा अन्तिम आयतन V, तथा ताप T, है। जब परिवर्तन एकदम से किया जाता है तो यह रुद्धोष्म परिवर्तन होगा, इसलिए गैस पॉयसन के नियम का पालन करेगी, जिसके अनुसार
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प्रश्न 10.
एक प्रशीतक (रेफ्रिजरेटर) को चलाने वाली मोटर 300 वाट की है। कमरे का ताप 27°C है। यदि इसके हिमकारी कक्ष से प्रति सेकण्ड 2.7 × 103 जूल ऊष्मा बाहर निकलती है, तो हिमकारी कक्ष का ताप ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 11.
एक कार्यों इंजन प्रत्येक चक्र में स्रोत से 127°C ताप पर 1000 जूल ऊष्मा अवशोषित करता है तथा 600 जूल ऊष्मा सिंक को दे देता है। इंजन की दक्षता तथा सिंक का ताप ज्ञात कीजिए।
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चक्रीय प्रक्रम से आप क्या समझते हैं। एक उचित (P – V) आरेख खींचकर यह प्रदर्शित कीजिए कि चक्रीय प्रक्रम में एक ऊष्मागतिक निकाय द्वारा किया गया कुल कार्य वक़ से घिरे क्षेत्रफल के बराबर होता है।
उत्तर :
चक्रीय प्रक्रम (Cyclic process) – जब कोई निकाय एक अवस्था से चलकर, भिन्न-भिन्न अवस्थाओं से गुजरता हुआ पुन: अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौट आता है, तो उसे ‘चक्रीय प्रक्रम’ कहते हैं। इस प्रक्रम में निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता अर्थात् ∆U = 0 ; अत: ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम की समीकरण ∆U = Q – W से
0 = Q – W अथवा Q = W
अतः चक्रीय प्रक्रम में किसी निकाय को दी गयी ऊष्मा निकाय द्वारा दिये गये नेट कार्य के बराबर होती है।

चक्रीय प्रक्रम में किया गया कुल कार्य (Total work done in cyclic process) – जब कोई निकाय विभिन्न परिवर्तनों द्वारा विभिन्न अवस्थाओं से गुजरता हुआ अपनी प्रारम्भिक अवस्था में लौट आता है, तो इस सम्पूर्ण प्रक्रम को चक्रीय प्रक्रम कहते हैं।”

माना कोई गैस (ऊष्मागतिक निकाय) दाब तथा आयतन की प्रारम्भिक अवस्था A में है तथा यह किसी प्रक्रम द्वारा फैलकर एक अन्य अवस्था B में पहुँच जाती है (चित्र 12.4)। इस प्रक्रम के लिए दाब-आयतन वक्र ACB है। इसलिए अवस्था A से अवस्था B तक जाने में गैस द्वारा किया गया कार्य WAB = क्षेत्रफल ACBB A’ अब माना किसी प्रक्रम द्वारा गैस को अवस्था B से पुनः अवस्था A में है। लाया जाता है। इस प्रक्रम के लिए दाबे-आयतन वक्र BDA है। गैस को अवस्था B से अवस्था A तक लाने में किसी कारक द्वारा गैस पर किया है गया कार्य WBA = क्षेत्रफल BDAA’ B’
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चूँकि क्षेत्रफल BDAA’B’ क्षेत्रफल ACBB A’ से बड़ा है। इसलिए WBA > WAB, अतः गैस पर किया गया नेट कार्य w = wba – Wab अतः W = क्षेत्रफल BDAA B – क्षेत्रफल ACBB’ A’= क्षेत्रफल ACBDA = बन्द वक्र ACBDA से घिरा क्षेत्रफल अतः उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि “चक्रीय प्रक्रम के लिए दाब-आयतन वक्र एक बन्द वक्र होता है। इस दशा में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य अथवा निकाय पर किया गया नेट कार्य बन्द वक्र से घिरे क्षेत्रफल के बराबर होता है।”

प्रश्न 2.
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम लिखिए तथा नियम की स्पष्ट व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम – किसी ऊष्मागतिक निकाय की दो निश्चित अवस्थाओं के बीच विभिन्न प्रक्रमों में राशि (Q – w) का मान निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है। इसलिए यदि निकाय की प्रारम्भिक तथा अन्तिम अवस्थाओं में आन्तरिक ऊर्जाएँ क्रमशः Ui तथा Uf हों, तो
Q – W = UF – Ui अथवा (Q – W) = ∆U
(जहाँ ∆U निकाय की प्रारम्भिक तथा अन्तिम अवस्थाओं में आन्तरिक ऊर्जाओं का अन्तर है।) अथवा Q = ∆U + W ……(1)

यह ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम को गणितीय स्वरूप है। इसको शब्दों में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –

“किसी ऊष्मागतिक निकाय को दी गयी ऊष्मा Q (अर्थात् निकाय द्वारा अवशोषित ऊष्मा) दो भागों में प्रयुक्त होती है – (i) निकाय द्वारा बाह्य दाब के विरुद्ध कार्य (w) करने में तथा (ii) निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन (∆U) करने में।”

यदि किसी प्रक्रम में निकाय को अनन्त सूक्ष्म ऊर्जा dQ दी जाती है तथा निकाय द्वारा अनन्त सूक्ष्म कार्य dw किया जाता है, तो निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन भी अनन्त सूक्ष्म dU ही होगा। तब समीकरण (1) को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जायेगा –
dQ = dU+ dW …..(2)

इस प्रकार ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम का ही एक रूप है।

प्रश्न 3.
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के आधार पर सिद्ध कीजिए कि किसी निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन

  1. समआयतनिक प्रक्रिया में निकाय को दी गई ऊष्मा अथवा उससे ली गई ऊष्मा के बराबर होता है।
  2. रुद्घोष्म प्रक्रिया में निकाय पर अथवा निकाय द्वारा किये गये कार्य के समान होता है।

उत्तर :
(i) समआयतनिक प्रक्रम (Isochoric process) – यदि निकाय में होने वाले किसी प्रक्रम के अन्तर्गत निकाय का आयतन स्थिर रहे तो उस प्रक्रम को समआयतनिक प्रक्रम कहते हैं। चूंकि ऐसे प्रक्रम में आयतन नियत रहता है, अत: आयतन में परिवर्तन ∆V = 0. इसलिए W = P × ∆V से W = 0 ; अतः ऐसे प्रक्रम में निकाय द्वारा कोई भी कार्य नहीं किया जाता। अत: ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम
∆U = Q – W से,
∆U = Q – 0 या ∆U =Q

अतः ऐसे प्रक्रम में निकाय को दी गयी सम्पूर्ण ऊष्मा निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि करने में व्यये हो जाती है। गैसों में होने वाले विस्फोट इस प्रकार के प्रक्रम के उदाहरण हैं।

(ii) रुद्धोष्म प्रक्रम (Adiabatic process) – जब ऊष्मागतिक निकाय में होने वाले किसी प्रक्रम के अन्तर्गत ऊष्मा न तो बाहर से निकाय के अन्दर जा सके और न ही ऊष्मा= निकाय से बाहर आ सके, अर्थात् Q = 0, तो ऐसे प्रक्रम को रुद्धोष्म प्रक्रम कहते हैं।

अत: इसे दशा में ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम ∆U = Q – W के अनुसार,
∆U = 0 – W या AU = – W ….(1)

अर्थात् रुद्धोष्म प्रक्रम में निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन कार्य के बराबर होता है।
यदि रुद्धोष्म प्रक्रम में कार्य निकाय पर किया गया है, तो W ऋणात्मक होगा।
अत: उपर्युक्त सूत्र (1) से ∆U = – ( – W) = W (धनात्मक)

प्रश्न 4.
रेफ्रिजरेटर (प्रशीतक) का सिद्धान्त क्या है? इसके कार्य गुणांक का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
रेफ्रिजरेटर का सिद्धान्त – “प्रशीतक एक ऐसी युक्ति है जो ऊष्मा को निम्न ताप की वस्तु से लेकर उच्च ताप की वस्तु में स्थानान्तरित कर देती है।”

दूसरे शब्दों में, प्रशीतक, उत्क्रम दिशा में कार्य करने वाला ऊष्मा इंजन है। इसलिए प्रशीतक को ऊष्मा पम्प (heat pump) या सम्पीडक (compressor) भी कहते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चक्र में कार्यकारी पदार्थ रेफ्रिजरेटर (प्रशीतक) में रखे पदार्थ से ऊष्मा अवशोषित करता है। कार्य विद्युत मोटर द्वारा कार्यकारी पदार्थ पर किया जाता है और अन्त में कार्यकारी पदार्थ ऊष्मा को वातावरण में (जिसका ताप अधिक होता है) छोड़ देता है। इस प्रकार रेफ्रिजरेटर में रखा पदार्थ ठण्डा हो जाता है।

इसी के आधार पर कान चक्र में उत्क्रम प्रक्रम में कार्यकारी पदार्थ कम ताप (T2) के सिंक से Q2 ऊष्मा ग्रहण करके, बाह्य स्रोतों द्वारा निकाय पर w कार्य कराकर, उच्च ताप (T1) के स्रोतों को (Q2 +W) = Q1 ऊष्मा देता है। प्रशीतक इसी मूल सिद्धान्त पर कार्य करता है।

कार्य गुणांक – कार्यकारी पदार्थ द्वारा ठण्डी वस्तु से ली गयी ऊष्मा और कार्यकारी पदार्थ पर किये गये कार्य के अनुपात को प्रशीतक का कार्य गुणांक कहते हैं।
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प्रश्न 5.
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम क्या है? एक ऊष्मा इंजन दो तापों के बीच कार्य करता है जिनका अन्तर 100 K है। यदि यह स्रोत से 746 जूल ऊष्मा अवशोषित करता है तथा सिंक को 546 जूल ऊष्मा देता है तो स्रोत व सिंक के ताप ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम – किसी भी स्वतः क्रिया मशीन के लिए, जिसे कोई भी बाह्य स्रोत की सहायता प्राप्त न हो, ऊष्मा को ठण्डी वस्तु से गर्म वस्तु पर अथवा ऊष्मा को अल्प ताप से उच्च ताप पर पहुँचाना असम्भव है।
हल : स्रोत से ली गयी ऊष्मा θ1 = 746 जूल; सिंक को दी गयी ऊष्मा θ2 = 546 जूल, स्रोत व सिंक के तापों को अन्तर T1 – T2 = 100K
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प्रश्न 6.
27°C तथा एक वायुमण्डलीय दाब पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान को (i) धीरे-धीरे, (ii) तेजी से, इतना दबाया जाता है कि इसका अन्तिम आयतन प्रारम्भिक आयतन का एक-चौथाई रह जाता है। प्रत्येक दशा में अन्तिम दाब की गणना कीजिए। (गैस के लिए r = 1.5)
हल : माना गैस का प्रारम्भिक दाब P1 तथा आयतन V1 है तथा अन्तिम दाब P2 तथा आयतन V2 है।
(i) जब उक्त परिवर्तन धीरे-धीरे किया जाता है तो यह परिवर्तन समतापी होगा, इसलिए गैस बॉयल के नियम का पालन करेगी जिसके अनुसार P × V= नियतांक अर्थात्
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प्रश्न 7.
5 मोल ऑक्सीजन को स्थिर आयतन पर 10°C से 20°C तक गर्म किया जाता है। गैस की आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा? ऑक्सीजन की स्थिर दाब पर ग्राम अणुक विशिष्ट ऊष्मा CP = 8 कैलोरी / (मोल-C) है। R = 8.36 जूल / (मोल – C)
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प्रश्न 8.
कार्यों का प्रमेय क्या है? समझाइए।
उत्तर :
कार्नो प्रमेय – इस प्रमेय के अनुसार, किन्हीं दो तापों के मध्य कार्य करते हुए किसी भी इंजन की दक्षता आदर्श उत्क्रमणीय (कानों) इंजन की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में, आदर्श उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता अधिकतम होती है तथा यह इसमें प्रयुक्त पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती।
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क्योंकि A एक उत्क्रमणीय इंजन है अत: इसे विपरीत दिशा में चलाया जा सकता है। उस दशा में यह रेफ्रिजरेटर की तरह कार्य करेगा। इसके लिए आवश्यक कार्य w इंजन B से प्राप्त किया जा सकता है। चित्र 12.4 में दोनों इंजन एक पट्टी (belt) द्वारा सम्बन्धित हैं। स्पष्ट है कि दोनों इंजन मिलकर एक स्वत: चलने वाली मशीन की तरह कार्य करेंगे। इस दशा में इंजन A निम्न तापं T2 पर Q1 ऊष्मा ग्रहण कर उच्च ताप T1 पर Q1 ऊष्मा लौटाता है। इंजन B उच्च ताप T1 पर Q1 ऊष्मा ग्रहण कर निम्न ताप T2 पर Q2‘ ऊष्मा लौटाता है परन्तु दोनों के द्वारा किया गया कार्य बराबर है,
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समीकरण (2) से स्पष्ट है कि रेफ्रिजरेटर A द्वारा सिंक से ली गई ऊष्मा Q2, इंजन B द्वारा सिंक को दी गयी ऊष्मा Q2 से अधिक है। फलत: सिंक की ऊष्मा लगातार कम होती जायेगी।

इसी प्रकार रेफ्रिजरेटर A द्वारा स्रोत को दी गई ऊष्मा Q1 इन्जन B द्वारा स्रोत से ली गयी ऊष्मा Q1 से अधिक है। अतः स्रोत की ऊष्मा लगातार बढ़ती जायेगी। इस प्रकार हम पाते हैं कि बिना कार्य किये सिंक से स्रोत को ऊष्मा का स्थानान्तरण होता रहेगा। परन्तु यह बात हमारे अनुभव के विपरीत है क्योंकि बिना किसी कार्य किये ऊष्मा का निम्न ताप से उच्च ताप की ओर प्रवाह सम्भव नहीं है।

अतः उपर्युक्त निष्कर्ष गलत है। चूंकि यह निष्कर्ष इस कथन पर आधारित है कि अनुक्रमणीय इंजन B की दक्षता, उत्क्रमणीय इंजन A की दक्षता से अधिक है, अत: यह कथन सर्वथा गलत है। इस प्रकार, इंजन B की दक्षता, इंजन A की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती अर्थात् उत्क्रमणीय इंजन की दक्षता महत्तम होती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants (पुष्पी पादपों का शारीर)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न प्रकार के मेरिस्टेम की स्थिति तथा कार्य बताइए।
उत्तर :
1. शीर्षस्थ विभज्योतक :
ये मुख्य रूप से जड़ व तने के शीर्षों पर तथा पत्तियों के अग्रों पर मिलते हैं जहाँ ये नई-नई कोशिकाएँ बनाते रहते हैं।

 2. अन्तर्वेशी विभज्योतक :
यह शीर्षस्थ विभज्योतक का अलग होकर छूटा हुआ भाग होता है। जो स्थाई ऊतकों में परिवर्तित न होकर उनके मध्य में छूट जाता है। घासों के पर्यों के आधारों में, पोदीने के तने की पर्व सन्धियों के नीचे यह ऊतक पाया जाता है। इनकी कोशिकाओं में (UPBoardSolutions.com) विभाजन के फलस्वरूप पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है।

3. पाश्र्व विभज्योतक :
पौधों में इस ऊतक की स्थिति पार्श्व में होती है इसीलिए इसे पार्श्व विभज्योतक कहते हैं। इनकी कोशिकाओं में विभाजन अरीय दिशा में होता है। इनके

उदाहरण :
पूलीय कैम्बियम व कॉर्क कैम्बियम हैं।

प्रश्न 2.
कॉर्क कैम्बियम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? वर्णन करो।
उत्तर :
हाँ। हम इस कथन से सहमत हैं कि कॉर्क कैम्बियम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। ये पार्श्व विभज्योतकों की कोशिकाओं के अरीय दिशा में विभाजन के फलस्वरूप बनता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
चित्रों की सहायता से काष्ठीय एन्जियोस्पर्म के तने में द्वितीयक वृद्धि के प्रक्रम का वर्णन कीजिए इसकी क्या सार्थकता है?
उत्तर :

द्वितीयक वृद्धि

शीर्षस्थ विभज्योतक की कोशिकाओं के विभाजन, विभेदन और परिवर्द्धन के फलस्वरूप प्राथमिक ऊतकों का निर्माण होता है। अत: शीर्षस्थ विभज्योतक के कारण पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है। इसे प्राथमिक वृद्धि कहते हैं। द्विबीजपत्री तथा जिम्नोस्पर्स आदि काष्ठीय पौधों में पार्श्व विभज्योतक के कारण तने तथा जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। इस प्रकार मोटाई में होने वाली वृद्धि को द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहते हैं। जाइलम और फ्लोएम के मध्य विभज्योतक को संवहन एधा (vascular cambium) तथा वल्कुट या परिरम्भ  में विभज्योतक को कॉर्क एधा (cork cambium) कहते हैं।

द्वितीयक वृद्धि-द्विबीजपत्री तना

द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा (vascular cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) की क्रियाशीलता के कारण होती है।

संवहन एधा की क्रियाशीलता 
द्विबीजपत्री तने में संवहन बण्डल वर्षी (open) होते हैं।  संवहन बण्डलों के जाईलम तथा फ्लोएम के मध्य अन्तःपूलीय एधा (intrafascicular cambium) होती है। मज्जा रश्मियों की मृदूतकीय कोशिकाएँ जो अन्त:पूलीय एधा के मध्य स्थित होती हैं, विभज्योतकी होकर आन्तरपूलीय (UPBoardSolutions.com) एधा (interfascicular cambium) बनाती हैं। पूलीय तथा आन्तरपूलीय एधा मिलकर संवहन एधा का घेरा बनाती हैं।
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संवहन एधा वलय (vascular cambium ring)
की कोशिकाएँ तने की परिधि के समानान्तर तल अर्थात् स्पर्शरेखीय तल (tangential plane) में ही विभाजित होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कोशिका के विभाजन से जो नई कोशिकाएँ बनती हैं उनमें से केवल एक जाइलम या फ्लोएम की कोशिका में रूपान्तरित हो जाती है, जबकि दूसरी कोशिका विभाजनशील (meristematic) बनी रहती है। परिधि की ओर बनने वाली कोशिकाएँ फ्लोएम के तत्त्वों में तथा केन्द्र की ओर बनने वाली कोशिकाएँ जाइलम के तत्त्वों में परिवद्धित हो जाती हैं। बाद में बनने वाला संवहन ऊतक क्रमशः द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) तथा द्वितीयक फ्लोएम (secondary phloem) कहलाता है। ये संरचना तथा कार्य में प्राथमिक जाइलम तथा फ्लोएम के समान होते हैं।

कॉर्क एधा की क्रियाशीलता
संवहन एधा की क्रियाशीलता से बने द्वितीयक ऊतक पुराने ऊतकों पर दबाव डालते हैं जिसके कारण भीतरी (केन्द्र की ओर उपस्थित) प्राथमिक जाइलम अन्दर की ओर दब जाता है। इसके साथ ही परिधि की ओर स्थित प्राथमिक फ्लोएम नष्ट हो जाता है। इससे पहले कि बाह्य त्वचा (epidermis) की कोशिकाएँ एक निश्चित सीमा तक खिंचने के बाद टूट-फूट जाएँ, अधस्त्वचा (hypodermis) के अन्दर की कुछ मृदूतकीय कोशिकाएँ विभज्योतक (meristem) होकर कॉर्क एधा (cork cambium) बनाती हैं। कॉर्क एधा कभी-कभी वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ (pericycle) आदि से बनती है। कॉर्क एधा तने की परिधि के समानान्तर विभाजित होकर बाहर की ओर सुबेरिनयुक्त (suberized) कॉर्क या फेलम (cork or phellem) का निर्माण करती है। यह तने के अन्दर के भीतरी ऊतकों की सुरक्षा करती है। कॉर्क एधा से केन्द्र की ओर बनने वाली मृदूतकीय (parenchymatous), स्थूलकोणीय अथवा दृढ़ोतकी कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट (phelloderm) का निर्माण करती हैं। कॉर्क एधा से बने (UPBoardSolutions.com) फेलम तथा फेलोडर्म को पेरीडर्म (periderm) कहते हैं। पेरीडर्म में स्थान-स्थान पर गैस विनिमय के लिए वातरन्ध्र (lenticels) बन जाते हैं। द्वितीयक जाइलम वसन्त काष्ठ तथा शरद् काष्ठ में भिन्नत होता है। इसके फलस्वरूप कुछ पौधों में स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं।
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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में विभेद कीजिए

(अ) टैकीड तथा वाहिका
(ब) पैरेन्काइमा तथा कॉलेन्काइमा
(स) रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ
(द) खुला तथा बन्द संवहन बण्डल।
उत्तर :
(अ) टैकीड तथा वाहिका में अन्तर
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(ब)
पैरेन्काइमा (मृदूतक) तथा कॉलेन्काइमा (स्थूलकोण ऊतक) में अन्तर
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(स)
रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ में अन्तर

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(द)
खुले तथा बन्द संवहन बण्डल में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 6 Anatomy of Flowering Plants image 7प्रश्न 5.
निम्नलिखित में शारीर के आधर पर अन्तर कीजिए
(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल
(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना।
उत्तर :
(अ)
एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल में अन्तर

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(ब)
एकबीजपत्री तने तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर ऊतक एकबीजपत्री तना

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प्रश्न 6.
आप एक शैशव तने की अनुप्रस्थं काट का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन कीजिए। आप कैसे पता करेंगे कि यह एकबीजपत्री तना है अथवा द्विबीजपत्री तना है? इसके कारण बताइए।
उत्तर :
शैशव तने की अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदर्शीय अवलोकन करके निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर एकबीजपत्री या द्विबीजपत्री तने की पहचान करते हैं

(क)
तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण

  1. बाह्य त्वचा पर उपचर्म (cuticle), रन्ध्र (stomata) तथा बहुकोशीय रोम पाए जाते हैं।
  2.  अधस्त्वचा (hypodermis) उपस्थित होती है।
  3. अन्तस्त्वचा प्रायः अनुपस्थित या अल्पविकसित होती है।
  4. परिरम्भ (pericycle) प्रायः बहुस्तरीय होता है।
  5. संवहन बण्डल संयुक्त (conjoint), बहि:फ्लोएमी (collateral) या उभयफ्लोएमी (bicollateral) होते हैं।
  6. प्रोटोजाइलम एण्डार्क (endarch) होता है।

(ख)
एकबीजपत्री तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण

  1. बाह्यत्वचा पर बहुकोशिकीय रोम अनुपस्थित होते हैं।
  2. अधस्त्वचा दृढ़ोतक (sclerenchymatous) होती है।
  3. भरण ऊतक (ground tissue) वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ तथा मज्जा में अविभेदित होता है।
  4. संवहन बण्डल भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं।
  5. संवहन बण्डल संयुक्त, बहि:फ्लोएमी तथा अवर्थी (UPBoardSolutions.com) (closed) होते हैं।
  6. संवहन बण्डल चारों ओर से दृढ़ोतक से बनी बण्डल अच्छद से घिरे होते हैं।
  7. जाइलम वाहिकाएँ (vessels) ‘V’ या ‘Y’ क्रम में व्यवस्थित रहती हैं।

(ग)
द्विबीजपत्री तने के आन्तरिक आकारिकी लक्षण

  1. बाह्य त्वचा पर बहुकोशिकीय रोम पाए जाते हैं।
  2. अधस्त्वचा (hypodermis) स्थूलकोण ऊतक से बनी होती है।
  3.  संवहन बण्डल एक या दो घेरों में व्यवस्थित होते हैं।
  4.  भरण ऊतक वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ, मज्जा तथा मज्जा रश्मियों में विभेदित होता है।
  5.  संवहन बण्डल संयुक्त, बहि:फ्लोएमी या उभयफ्लोएमी और वर्धा (open) होते हैं।
  6. जाइलम वाहिकाएँ रेखीय (linear) क्रम में व्यवस्थित होती हैं।

प्रश्न 7.
सूक्ष्मदर्शी, किसी पौधे के भाग की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित शारीर रचनाएँ दिखाती है
(अ) संवहन बण्डल संयुक्त, फैले हुए तथा उसके चारों ओर स्क्लेरेन्काइमी आच्छद हैं।
(ब) फ्लोएम पैरेन्काइमा नहीं है।
आप कैसे पहचानोगे कि यह किसका है?
उत्तर :
एकबीजपत्री तने की आन्तरिक आकारिकी या शारीर में संवहन बण्डल भरण ऊतक में बिखरे रहते हैं। संवहन बण्डल संयुक्त तथा अवर्थी होते हैं। संवहन बण्डल के चारों ओर स्क्लेरेन्काइमी बण्डल आच्छद (bundle sheath) होती है। फ्लोएम में फ्लोएम मृदूतक का अभाव होता है। अत: सूक्ष्मदर्शी में प्रदर्शित पौधे का भाग एकबीजपत्री तना है।

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प्रश्न 8.
जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक क्यों कहते हैं?
उत्तर :
जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि ये एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं। सभी कोशिकाएँ मिलकर एक इकाई के रूप में विभाजित होकर कार्य करती हैं।

प्रश्न 9.
रन्ध्रीतन्त्र क्या है? रन्ध्र की रचना का वर्णन करो और इसका नामांकित चित्र भी बनाओ।
उत्तर :
रन्ध्र (Stomata) ऐसी रचनाएँ हैं, जो पत्तियों की बाह्यत्वचा पर पाये जाते हैं। रन्ध्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के विनिमय को नियमित करते हैं। प्रत्येक रन्ध्र (stoma= एकवचन) में सेम के आकार की दो कोशिकाएँ होती हैं जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। एकबीजपत्री पौधों में द्वार कोशिकाएँ डम्बलाकार होती हैं। द्वार कोशिका की बाहरी भित्ति पतली तथा आन्तरिक भित्ति मोटी होती है। द्वार कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट होता है और यह रन्ध्र के खुलने (UPBoardSolutions.com) तथा बंद होने के क्रम को नियमित करता है। कभी-कभी कुछ बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ भी रन्ध्र के साथ लगी रहती हैं, इन्हें उप कोशिकाएँ (accessory cells) कहते हैं। रन्ध्रीय छिद्र, द्वारकोशिका तथा सहायक कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री तन्त्र (stomatal system) का निर्माण करती हैं।
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प्रश्न 10.
पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र बताओ। प्रत्येक तंत्र के ऊतक बताओ।

उत्तर :
पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र निम्नवत् हैं

  1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र-मृदूतक।
  2. भरण ऊतक तंत्र-पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा।
  3. संवहन ऊतक तंत्र-जाइलम तथा फ्लोएम।

प्रश्न 11.
पादप शारीर का अध्ययन हमारे लिए कैसे उपयोगी है?
उत्तर :
फार्माकोचोसी (Pharmaconosy) विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत औषधीय महत्त्व के पदार्थों के स्रोत, विशेषताओं और उनके उपयोग का अध्ययन प्राकृतिक अवस्था में किया जाता है। यह अध्ययन मुख्य रूप से पौधों के शारीर (anatomy) पर निर्भर करता है। इमारती लकड़ी (timber) की दिन-प्रतिदिन कमी होती जा रही है, इसीलिए अच्छी इमारती लकड़ीके स्थान पर खराब इमारती लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है। शारीर अध्ययन द्वारा लकड़ी की किस्म (quality) का पता लगाया जा सकता है। शारीर अध्ययन द्वारा एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने और जड़ की पहचान की जा सकती है। जीवाश्म शारीर (fossil anatomy) अध्ययन द्वारा प्राचीनकालीन पौधों का ज्ञान होता है। इससे जैवविकास का ज्ञान होता है कि आधुनिक पौधों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई है। सूक्ष्मदर्शीय अध्ययन द्वारा चाय, कॉफी, तम्बाकू, केसर, हींग, वनस्पति रंगों, पादप औषधियों में मिलावट (adulteration) का अध्ययन किया जा सकता है। मिलावट के कारण इनकी आन्तरिक संरचना में भिन्नता आ जाती है।

प्रश्न 12.
परिचर्म क्या है? द्विबीजपत्री तने में परिचर्म कैसे बनता है?
उत्तर :
परिचर्म (Periderm) :
कॉर्क एधा की जीवित मृदूतक कोशिका से परिचर्म का निर्माण होता है। कॉर्क एधा या कागजन (cork cambium or phellogen) की कोशिकाएँ विभाजित होकर परिधि की ओर जो कोशिकाएँ बनाती हैं, वे सुबेरिनयुक्त (suberinized) कोशिकाएँ होती हैं। सुबेरिनयुक्त कोशिकाओं से बना यह स्तर कॉर्क या फेलम (cork or phellem) कहलाता है। कॉर्क एधा (cork cambium) से भीतर की ओर बनने वाली मृदूतकीय कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट या फेलोडर्म (phelloderm) (UPBoardSolutions.com) बनाती हैं। फेलम (कॉर्क), कॉर्क एधा तथा द्वितीयक वल्कुट मिलकर परिचर्म (periderm) बनाती हैं।

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प्रश्न 13.
पृष्ठाधर पत्ती की भीतरी रचना का वर्णन चिह्नित चित्रों की सहायता से कीजिए।
उत्तर :

पृष्ठाधर या द्विबीजपत्री पत्ती की संरचना

द्विबीजपत्री पौधों की पत्ती की अनुप्रस्थ काट में निम्नलिखित संरचनाएँ दिखाई देती हैं

(क)
बाह्यत्वचा (Epidermis) :
बाह्यत्वचा सामान्यत: दोनों सतहों पर एककोशिकीय मोटे स्तर के रूप में होती है।

(i) ऊपरी बाह्यत्वचा :
यह एक कोशिका मोटा स्तर है। इसकी कोशिकाएँ ढोलकनुमा परस्पर एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं। इन कोशिकाओं की बाहरी भित्ति उपचर्म-युक्त होती है। कोशिकाओं में साधारणत: हरितलवक नहीं होते हैं। कुछ पौधों (प्रायः शुष्क स्थानों में उगने वाले पौधों में) में बहुस्तरीय बाह्यत्वचा (multiple epidermis) पाई जाती हैं।

(ii) निचली बाह्यत्वचा :
निचली बाह्यत्वचा एक कोशिका मोटे स्तर रूप में पाई जाती है। इस पर पतला उपचर्म होता है। रन्ध्र बहुतायत में पाए जाते हैं। रन्ध्रों की रक्षक कोशिकाओं में हरितलवक पाए जाते हैं। कुछ पत्तियों की ऊपरी बाह्यत्वचा पर भी रन्ध्र होते हैं, किन्तु इनकी संख्या सदैव कम होती है।

(ख)
पर्णमध्योतक (Mesophyll) :
दोनों बाह्यत्वचाओं के मध्य स्थित सम्पूर्ण ऊतक (संवहन बण्डलों को छोड़कर) पर्णमध्योतक कहलाता है। पृष्ठाधर पत्तियों में पर्णमध्योतक दो प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनता है

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(i) खम्भ ऊतक (Palisade tissue) :
ऊपरी बाह्यत्वचा के नीचे लम्बी, खम्भाकार कोशिकाएँ दो-तीन पर्यों में लगी होती हैं। इन कोशिकाओं के मध्य अन्तराकोशिकीय स्थान बहुत कम या नहीं होते हैं। ये रूपान्तरित मृदूतकीय कोशिकाएँ होती हैं। यह प्रकाश संश्लेषी (photosynthetic) ऊतक है।
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(ii) स्पंजी ऊतक (Spongy tissue) :
खम्भ मृदूतक से लेकर निचली बाह्यत्वचा तक स्पंजी मृदूतक ही होता है। ये कोशिकाएँ सामान्यतः गोल और ढीली व्यवस्था में अर्थात् काफी और स्पष्ट अन्तराकोशिकीय स्थान वाली होती हैं। इन कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट्स कम संख्या में होते हैं। मध्य शिरा में संवहन पूल के ऊपर तथा नीचे दृढ़ोतक या स्थूलकोण ऊतक पाया जाता है।

(ग)
संवहन पूल (Vascular bundles) :
पत्ती की अनुप्रस्थ काट में अनेक छोटी-छोटी शिराएँ संवहन पूलों के रूप में दिखाई पड़ती हैं। संवहन पूल जाइलम और फ्लोएम के मिलने से बनता है। आदिदारु (protoxylem) सदैव ऊपरी बाह्यत्वचा की ओर होती है, जबकि अनुदारु (metaxylem) निचली बाह्यत्वचा की ओर होता है। फ्लोएम निचली बाह्यत्वचा की ओर होता है। जाइलम और फ्लोएम के मध्य एधा (cambium) होती है। इस प्रकार संवहन पूल संयुक्त (conjoint), समपार्श्व (collateral) तथा वध (open) होते हैं। प्रत्येक संवहन पूल दृढ़ोतक रेशों से घिरा होता है तथा इसके बाहर मृदूतकीय कोशिकाओं का पूलीय आच्छद होता है। यह बण्डल आच्छद सामान्यत: छोटी-से-छोटी शिरा के चारों ओर भी होता है।

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प्रश्न 14.
त्वक् कोशिकाओं की रचना तथा स्थिति उन्हें किस प्रकार विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है?
उत्तर :

त्वक कोशिकाएँ

ये पादप शरीर के सभी भागों पर सबसे बाहरी रक्षात्मक आवरण बनाती हैं। यह प्रायः एक कोशिका मोटा स्तर होता है। कोशिकाएँ अनुप्रस्थ काट में ढोलकनुमा (barrel shaped) दिखाई देती हैं। बाहर से देखने पर ये अनियमित आकार की फर्श के टाइल्स की तरह अथवा बहुभुजीय दिखाई देती हैं। ये परस्पर एक-दूसरे से मिलकर अखण्ड सतह बनाती हैं। ये कोशिकाएँ मृदूतकीय कोशिकाओं का रूपान्तरण होती हैं। इन कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य की मात्रा बहुत (UPBoardSolutions.com) कम होती है तथा प्रत्येककोशिका में एक बड़ी रिक्तिका होती है। पौधे के वायवीय भागों की त्वक् कोशिकाएँ उपचर्म (cuticle) से ढकी होती हैं, परन्तु मूलीय त्वचा की कोशिकाओं पर उपचर्म की रक्षात्मक आवरण नहीं होता। तने, पत्ती आदि की त्वक् कोशिकाओं के मध्य रन्ध्र (stomata) पाए जाते हैं। रन्ध्र द्वार कोशिकाओं (guard cells) से घिरे होते हैं। द्वार कोशिकाएँ वृक्काकार होती हैं। द्वार कोशिकाओं के चारों ओर पाई जाने वाली कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएँ कहते हैं। रन्ध्रों का खुलना तथा बन्द होना रक्षक कोशिकाओं की आशूनता पर निर्भर करता है। रन्ध्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के आदान प्रदान का कार्य करते हैं। रन्ध्रों की स्थिति, संख्या, संरचना, उपचर्म की मोटाई आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है।

जड़ों की त्वक कोशिकाओं से एककोशिकीय मूलरोम बनते हैं। ये मृदा से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। तने और पत्तियों की त्वक्को शिकाओं से बहुकोशिकीय रोम बनते हैं। पत्ती एवं तने की रोमयुक्त सतह वाष्पोत्सर्जन की दर को नियन्त्रित करने में सहायक होती है। रन्ध्रों के रोमों से ढके रहने के कारण मरुभिद् पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। त्वक् कोशिकाएँ वातावरणीय दुष्प्रभावों से पौधों की सुरक्षा करती हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किस पादप के फ्लोएम में सह कोशिकाएँ नहीं होती हैं?
(क) साइकस
(ख) नीम
(ग) आम
(घ) सागौन
उत्तर :
(क) साइकस

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किसकी दारू में वाहिकाएँ नहीं होती हैं?
(क) साइकस
(ख) आम
(ग) नीम
(घ) सागौन
उत्तर :
(क) साइकस

प्रश्न 3.
उस पादप का नाम क्या है जिसमें सिस्टोलिथ पायी जाती है?
(क) फाइकस
(ख) मेज
(ग) आम
(घ) सागौन
उत्तर :
(क) फाइकस

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प्रश्न 4.
वाहिकाएँ तथा सखी कोशिकाएँ किसमें अनुपस्थित रहती हैं?
(क) इफेड्रा
(ख) साइकस
(ग) सूरजमुखी
(घ) आम
उत्तर :
(ख) साइकस।

प्रश्न 5.
मध्यादिदारूक आदिदारू पाया जाता है।
(क) सरसों की जड़ में
(ख) सरसों के तने में
(ग) टेरिस के राइजोम में
(घ) साइकस की कोरेलायड जड़ों में
उत्तर :
(ख) सरसों के तने में

प्रश्न 6.
कैस्पेरियन पट्टी पायी जाती हैं।
(क) बाह्य त्वचा में
(ख) अधत्वचा में
(ग) अन्तस्त्वचा में
(घ) फ्लोयम में
उत्तर :
(ग) अन्तस्त्वचा में।

प्रश्न 7.
रबर की पत्ती में पाये जाने वाले कैल्सियम कार्बोनेट के क्रिस्टल को कहते हैं।
(क) रैफाइड्स
(ख) सिस्टोलिथ
(ग) स्फीरैफाइड्स
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) रैफाइड्स

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प्रश्न 8.
संयुक्त, उभयफ्लोएमी और खुले संवहन बण्डले पाये जाते हैं।
(क) मक्का के तने में
(ख) सभी द्विबीजपत्री तनों में
(ग) कुकुरबिटा में
(घ) जड़ों में
उत्तर :
(ग) कुकुरबिटा में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पाश्र्व विभज्योतक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
एधा (cambium)।

प्रश्न 2.
“वल्कुट की सबसे भीतरी परत का नाम लिखिए।
उत्तर :
अन्तस्त्वचा (endodermis)।

प्रश्न 3.
उस जीवित ऊतक का नाम बताइए जो प्रमुखतः शाकीय पौधों में यान्त्रिक शक्ति प्रदान करता है।
उत्तर :
शाकीय पौधों में यान्त्रिक शक्ति प्रदान करने वाला प्रमुख जीवित ऊतक अधः स्तरीय भाग में (in hypodermal part) स्थूल कोण ऊतक (collenchyma) होता है।

प्रश्न 4.
जड़ों में पाये जाने वाले संवहन बण्डलों के लक्षण लिखिए।
उत्तर :
जड़ों में अरीय संवहन बण्डल पाये जाते हैं। इस प्रकार के संवहन बण्डलों में जाइलम और फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं पर होते हैं। इनमें जाइलम सदैव बाह्यआदिदारुक मिलता है अर्थात् आदिदारु परिधि की ओर तथा अनुदारु केन्द्र की ओर होता है। इन संवहन बण्डलों में प्राथमिक एधा नहीं पायी जाती। द्विबीजपत्री जड़ों में माइलम तथा फ्लोएम के मध्य बाद में, द्वितीयक एधा बन जाती है।

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प्रश्न 5.
उस पौधे का नाम लिखिए जिसमें उभय फ्लोएमी संवहन बण्डल (पूल) पाये जाते हैं।
उत्तर :
आवृतबीजी पौधों के कुल कुकुरबिटेसी के पौधों जैसे काशीफल (Cucurbita maxima) आदि में उभय फ्लोएमी (bicollateral) संवहन पूल पाये जाते हैं।

प्रश्न 6.
विरल दारुक तथा सघन दारुक काष्ठ में अन्तर बताइए।
उत्तर :
विरल दारुक (manoxylic) काष्ठ :
साइकस में द्वितीयक जाइलम वलयों के मध्य मृदुतक कोशिकाओं के समूह पाये जाते हैं क्योंकि इसमें द्वितीयक वृद्धि के लिए हर वर्ष नयी एधा वलय बनती है। सघन दारुक (pycnoxylic) काष्ठ-आवृतबीजी तथा अधिकांश अनावृतबीजी पौधों में एधा वलय जीवनपर्यन्त क्रियाशील (UPBoardSolutions.com) रहती है। इससे केन्द्र की ओर द्वितीयक जाइलम तथा परिधि की ओर द्वितीयक फ्लोएम बनता रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ट्यूनिका कॉर्पस थ्योरी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
सन् 1924 में शिमिट (Schmidt) ने अग्रस्थ वर्षी प्रदेशों (apical growing regions) के लिए ट्यूनिका कॉर्पस (tunica corpus) की विचारधारा प्रस्तुत की। इस विचारधारा के अनुसार, अग्रस्थ भाग में ऊतियों के दो क्षेत्र ट्यूनिका (tunica) तथा कॉर्पस (corpus) पाए जाते हैं। ट्यूनिका कोशिकाओं का एक या अधिक स्तरों का बाह्य क्षेत्र तथा कॉर्पस मध्य वाला क्षेत्र है जो कोशिकाओं का एक समूह है तथा ट्यूनिकों द्वारा घिरा रहता है। इस विचारधारा के अनुसार, बाह्यत्वचा, ट्यूनिका की बाहरी स्तर से विकसित होती है तथा शेष ऊतक पूर्ण कॉर्पस एवं ट्यूनिका के कुछ भागों से विकसित होते हैं। जब ट्यूनिका केवल एकस्तरीय होती है। तो यह हेन्सटीन द्वारा वर्णित त्वचाजन (dermatogen) की भाँति कार्य करती है, लेकिन जब यह बहुस्तरीय होती है तो यह वल्कुट के ऊतक (cortical tissue) के कुछ भाग के विकास में सहायक हो सकती है। ट्यूनिका की कोशिकाएँ केवल अपनतिक (anticlinal) विभाजन द्वारा विभाजित होती है। जबकि कॉर्पस भाग की कोशिकाएँ अपनतिक तथा परिनतिक (periclinal) विभाजनों से विभाजित होती हैं।

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प्रश्न 2.
बाह्य त्वचा ऊतक तन्त्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
बाह्यत्वचा पौधों के अधिकांश भागों की बाहरी त्वचा है। इसकी कोशिकाएँ लम्बी तथा एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं और एक अखण्ड सतह बनाती हैं। बाह्यत्वचा प्राय: एकल परत वाली होती है। बाह्यत्वचीय कोशिकाएँ मृदूतकी प्रकार की होती हैं जिनमें बहुत कम मात्रा में साइटोप्लाज्म होता है। इसमें एक बड़ी (UPBoardSolutions.com) रसधानी होती है। बाह्यत्वचा की बाहरी सतह पर क्यूटिकल (cuticle) नामक रक्षात्मक परत का आवरण पाया जाता है। क्यूटिकल जल की हानि को रोकती है। जड़ों में क्यूटिकल अनुपस्थित होती है।

प्रश्न 3.
वार्षिक वलय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या कश्मीर में पाये जाने वाले वृक्षों में वार्षिक वलय प्रायः स्पष्ट होते हैं परन्तु उन पौधों में नहीं जो चेन्नई के समीप पाये जाते हैं। क्यों ?
उत्तर :

वार्षिक वलय

संवहन एधा की क्रियाशीलता मौसम में परिवर्तन के साथ अलग-अलग होने के कारण अधिक ठण्डे शरद ऋतु और बसन्त ऋतु में बनने वाले द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) में काफी (कभी-कभी अत्यधिक भी) अन्तर उत्पन्न कर देती है। बसन्त ऋतु (spring season) में तापमान उचित होने आदि के कारण बनने वाले द्वितीयक जाइलम अर्थात् बसन्त काष्ठ (spring wood) में
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वाहिकाएँ इत्यादि अधिक स्पष्ट तथा चौड़ी गुहा वाली होती हैं। शरद ऋतु में पौधे के सभी भागों के साथ पूलीय एधा (fascicular cambium) भी कम क्रियाशील हो जाती है। इस प्रकार, इस काष्ठ में वाहिकाएँ बहुत कम तथा बहुत छोटी गुहा वाली होती हैं, साथ ही इस काष्ठ में वाहिनिकाओं और काष्ठ रेशों (tracheids and wood fibres) की अधिकता होती है। इसका रंग भी गहरा होता है। इस प्रकार बने काष्ठ को शरद काष्ठ (autumn wood) कहते हैं दोनों प्रकार के काष्ठ अर्थात् बसन्त काष्ठ तथा शरद काष्ठ तने की अनुप्रस्थ काट (transverse section) संकेन्द्री वलयों (concentric rings) के रूप में दिखायी देते हैं।इस प्रकार एक शरद काष्ठ और एक बसन्त काष्ठ के वलय को मिलाकर वार्षिक वलय (annual ring) अथवा वृद्धि वलय (growth ring) कहते हैं। इस प्रकार एक वलय के बनने में एक वर्ष का समय लगता है अत: वार्षिक वलयों की संख्या देखकर किसी वृक्ष की आयु का पता लगाया जा सकता है।

यह भी स्पष्ट है कि केवल मुख्य स्तम्भ के आधारीय भाग में ही वार्षिक वलयों की संख्या गिनकर वृक्ष की आयु बतायी जा सकती है, क्योकि आधार से सिरे की ओर वलयों की संख्या कम होती जाती है। वर्षभर के मौसम में अधिक परिवर्तन नहीं होने से वार्षिक वलय नहीं बनते हैं अथवा स्पष्ट नहीं होते हैं; इसलिए ‘वार्षिक वलय’ में बसन्त वे शरद् ऋतुओं में अत्यधिक अन्तर होने से कश्मीर में बसन्त काष्ठ व शरद काष्ठ स्पष्ट रूप से घेरों या वलयों (rings) में बनते हैं। चेन्नई मेंदोनों ऋतुओं के तापमान में न तो इतना अन्तर होता है और न ही काष्ठ में बसन्त व शरद काष्ठ के वलय बन पाते हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(i) अन्तःकाष्ठ तथा रस काष्ठ
(ii) वातरन्ध्र
उत्तर :
(i) अन्त:काष्ठ तथा रस काष्ठ (Heart wood and Sap wood) :
तने के पुराने भाग अथवा केन्द्रीय भाग में टैनिन (tannin), रेजिन (resin), गोंद (gum) आदि पदार्थों के जमाव के कारण यह भाग कठोर हो जाता है। इस भाग को अन्त:काष्ठ (heart wood) अथवा ड्यूरामेन (duramen) कहते हैं। द्वितीयक वृद्धि के साथ-साथ प्रतिवर्ष अन्त:काष्ठ की मात्रा बढ़ती जाती है।अनुप्रस्थ कोट में यह भाग गहरे बादामी रंग को दिखलाई देता है। इसका मुख्य कार्य दृढ़ता प्रदान करना है। द्वितीयक काष्ठ की परिधि वाला भाग हल्के रंग का होता है। इस भाग। को रस काष्ठ (sap wood) अथवा एलबर्नम (alburnum) कहते हैं। यह काष्ठ का सक्रिय भाग है। यह जल तथा खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है।

(ii) वातरन्ध्र (Lenticel) :
ये पुराने वृक्ष के तनों पर पाये जाने वाले लेंस की तरह के छिद्र होते हैं जिनके द्वारा तना वातावरण से गैसों का आदान-प्रदान करता है। वातरन्ध्र (lenticel), रन्ध्र (stomata) के नीचे स्थित होते हैं। प्रत्येक वातरन्ध्र में अनियमित आकार की छोटी, पतली भित्ति वाली कोशिकाओं का समूह पाया जाता है जिन्हें पूरक या कम्पलीमेण्टरी (complementary) कोशिकाएँ कहते हैं। इस प्रकार ये कोशिकाएँ कॉर्क कैम्बियम द्वारा बाहर की ओर कॉर्क कोशिकाओं के स्थान पर बनती हैं। इन (UPBoardSolutions.com) कोशिकाओं की कोशिका-भित्ति में सुबेरिन नहीं होती। इन कोशिकाओं की संख्या बढ़ते रहने से बाह्यत्वचा फट जाती है और पूरक कोशिकाएँ ऊपर की ओर उठकर छोटे-छोटे उभार बना लेती हैं। इस प्रकार वातरन्ध्र (lenticel) बन जाते हैं। शीत ऋतु में कॉर्क कोशिकाओं के बनने के कारण वातरन्ध्र बन्द हो जाते हैं, परन्तु नववर्ष के आगमन पर ये पुनः खुल जाते है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभज्योतक क्या है ? स्थिति के आधार पर ये कितने प्रकार के होते हैं ? या शीर्षस्थ विभज्योतक तथा अन्तर्वेशी (अन्तर्विष्ट) विभज्योतक में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

विभज्योतक ऊतक

विभज्योतक या मेरिस्टेमी ऊतक (meristems) वे हैं जिनकी कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता होती है अथवा इनमें विभाजन हो रहा होता है। इनका भिन्नन (differentiation) भी नहीं हुआ होता है। इनकी कोशिकाएँ सेलुलोस की पतली भित्ति वाली, कोशिकाद्रव्य से भरी हुई अर्थात् रिक्तिकाएँ बहुत कम और छोटी, किन्तु बड़े व स्पष्ट केन्द्रक वाली होती हैं। इनमें कोशिकाएँ अत्यन्त पास-पास लगी होती हैं जिनके मध्य अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) प्रायः नहीं होते। ये आकार में समव्यासी (isodiametric) होती हैं तथा उपापचयी (metabolic) रूप से अधिक सक्रिय होती हैं।

विभज्योतक पौधों के वृद्धि भागों में मिलते हैं। निम्न श्रेणी के बहुकोशिकीय पौधों में ये पूरे पौधे के शरीर में रहते हैं, किन्तु उच्च श्रेणी के पौधों में तो ये निश्चित और विशेष स्थितियों में ही पाये जाते हैं। इन कोशिकाओं के विभाजन, परिवर्द्धन, वृद्धि और भिन्नन के बाद ही स्थायी ऊतक (permanent tissues) बनते हैं।

स्थिति के आधार पर विभज्योतक
स्थिति के अनुसार विभज्योतक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

1. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical meristem) :
यह ऊतक किसी अंग (मूल या तने) के शीर्ष में होता है और नई-नई कोशिकाएँ बनाते रहने के कारण, वहाँ पर वर्धन प्रदेश (growing zone) बनाता है। इसी के कारण उस भाग में पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। तने तथा जड़ कें शीर्षों के अनुदैर्ध्य काटों में इनको तथा इनसे बनने वाले स्थायी ऊतकों (permanent tissues) को देखा जा सकता है। शीर्षस्थ विभज्योतक प्रायः सदैव ही प्राथमिक (primary) प्रकार का विभज्योतक होता है। शीर्षस्थ विभज्योतक से तनों तथा जड़ों के शीर्षों में जिस प्रकार से क्रमशः नये तथा स्थायी ऊतकों का निर्माण होता है, इसको समय-समय पर कई प्रकार के सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जाता रहा है। इनमें सबसे पुराना तथा मान्यवाद हिस्टोजन वाद (histogen theory) है। इस वाद के अनुसार, किसी शीर्षस्थ विभज्योतक से बनने वाले स्तर तीन प्रकार के ऊतकजन क्षेत्रों (histogen zones) में बँटे होते हैं (चित्र देखिए)। ये क्षेत्र प्राविभज्योतक (promeristem) के रूप में अपना परिवर्द्धन प्रारम्भ करते हैं तथा अग्रलिखित प्रकार से स्थायी ऊतकों का निर्माण करते हैं जड़ के (UPBoardSolutions.com) शीर्ष पर चूँकि मूलगोप (root cap) होता है अतः इसको निर्मित करने वाला एक अलग विभज्योतक होता है, इसे कैलिप्ट्रोजन (calyptrogen) कहते हैं। यह मूलगोप की होते रहने वाली क्षति की पूर्ति करता है।
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2. पाश्र्व विभज्योतक (Lateral meristem) :
यह ऊतक तने या मूल के पाश्र्यों में अक्ष के समान्तर अर्थात् स्पर्श रेखीय तल (tangential plane) में स्थित होता है। इसकी कोशिकाएँ केवल इसी तल में विभाजित होती हैं। अत: इससे द्वितीयक ऊतकों (secondary tissues) का निर्माण होता है, जिससे जड़ या तने (प्ररोह) की मोटाई बढ़ती है। द्विबीजपत्री पौधों के तने में उपस्थित संवहन एधा (fascicular cambium)इस प्रकार का ऊतक होता है। अन्य उदाहरण में तने या जड़ में स्थायी ऊतकों से उत्पन्न होने वाला द्वितीयक विभज्योतक (secondary meristem) काग एधा (cork cambium) अथवा द्विबीजपत्री जड़ों में उत्पन्न होने वाली द्वितीयक संवहन एधा (secondary fascicular cambium) होती है। उपर्युक्त सभी उदाहरणों में तने अथवा जड़ की मोटाई में द्वितीयक वृद्धि (secondary growth in thickness) ही होती है।

3. अन्तर्वेशी विभज्योतक (Intercalary meristem) :
यह ऊतक शीर्षस्थ विभज्योतक का अलग होकर छूटा हुआ भाग होता है, जो स्थायी ऊतकों में परिवर्तित न होकर, उनके मध्य में रह जाता है। इस ऊतक के कारण भी पौधे के भागों की लम्बाई में वृद्धि होती है। घासों के पर्वो (internodes) के आधारों में तथा पोदीना (mint) के तने की पर्वसन्धियों (UPBoardSolutions.com) (nodes) के नीचे यह ऊतक पाया जाता है। यह पर्णाधार (leaf base) पर भी पाया जाता है; जैसे-चीड़ (Pinus) में। अन्तर्वेशी विभज्योतक प्राथमिक स्थायी ऊतकों को जन्म देते हैं तथा पौधों की लम्बाई बढ़ाते हैं। इस प्रकार की वृद्धि अल्पकालिक होती है।

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प्रश्न 2.
ऊतक से आप क्या समझते हैं? पौधों के स्थायी ऊतकों की संरचना और उनके कार्यों का सचित्र वर्णन कीजिए। या स्थूलकोण ऊतक तथा दृढ़ोतक में अन्तर बताइए।
उत्तर :
ऊतक कोशिकाओं का वह समूह जिसकी उत्पत्ति, संरचना तथा कार्य समान होते हैं, ऊतक कहलाता है। पादप ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

  1.  स्थायी ऊतक तथा
  2. विभज्योतकी ऊतक।

स्थायी ऊतक
इसकी कोशिकाओं में कोशा विभाजन की क्षमता नहीं होती है।

1. सरल ऊतक  :
ये जीवित या मृत पतली या मोटी भित्ति वाली एक जैसी कोशिकाओं का समूह होता है। सरल ऊतक निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

(i) मृदूतक (Parenchyma) :
यह समव्यासी, गोलाकार, अण्डाकार या बहुभुजी, पतली भित्ति वाली जीवित कोशाओं से बना होता है। कोशिकाओं के मध्य प्रायः अन्तराकोशीय स्थान (inercellular space) पाया जाता है। यह ऊतक प्रायः पौधों के कोमल भागों में पाया जाता है।

कार्य :
(अ) जल एवं खाद्य पदार्थों (स्टार्च, प्रोटीन, वसा) को संचय करता है।
(ब) हरितलवक (chloroplast) की उपस्थिति के कारण प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करता है।
(स) वायु गुहिकाओं युक्त मृदूतक को वायुतक (aerenchyma) कहते हैं। यह जलीय पौधों के प्लवने (floating) में सहायक होता है।
(द) इसे स्पंजी मृदूतक भी कहते है। यह गैस विनिमय में सहायता करता है।
(य) कोशिकाओं में विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाने के कारण द्वितीयक वृद्धि एवं घाव भरने में सहायता करता है।
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(ii) स्थू लकोण ऊतक Collenchyma) :
ये कोणीय कोशिकायें मृदूतक की अपेक्षा लम्बी होती हैं। इनमें अन्तराकोशीय अवकाश (intercellular space) का अभाव होता है। कोशिकाओं के कोनों पर । पेक्टिन तथा सेलुलोस एकत्र हो जाता है। जिससे ये कोशिकायें अनुप्रस्थ काट में गोलाकार या अण्डाकार दिखाई देती हैं। कभी-कभी कोशिकाओं में हरितलवक भी उत्पन्न हो जाता है।
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कार्य :
(अ)
पौधों के कोमल अंगों को तनन दृढ़ता (tensile strength) प्रदान करता है।
(ब) भोजन का संचय करता है।
(स) हरितलवक की उपस्थिति के कारण भोजन का निर्माण करता है।

(iii) दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) :
कोशिका भित्ति के लिग्निनकरण के कारण परिपक्व कोशिकाएँ मृत (dead) हो जाती हैं। दृढ़ ऊतक दो प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है।
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(a)
दृढ़ोतक रेशे (Sclerenchymatous fibres) :

ये लम्बी, सँकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली, मृत कोशिकाएँ होती हैं कोशिकायें लिग्निनकरण के कारण मृत (dead) हो जाती हैं। तन्तुओं की लम्बाई प्राय: 1 से 3 मिमी होती है। जूट (jute) के रेशे 20 मिमी तथा बोहमेरिया (Boehmeria) के रेशे 550 मिमी तक लम्बे होते हैं।

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(b)
दृढ़ कोशाएँ (Stone cells or sclereids) :

ये कोशिकाएँ लगभग समेव्यासी, गोलाकार, अण्डाकार या अनियमित होती हैं। कोशिका भित्ति लिग्निनयुक्त हो जाने से कोशिकाएँ मृत हो जाती हैं। दृढ़ कोशाएँ फलभित्ति, बीजकवच आदि में पायी जाती हैं।

कार्य :
(अ) दृढ़ ऊतके पौधे के विभिन्न अंगों को यान्त्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करता है।
(ब) यह बीज तथा फलों का रक्षात्मक आवरण बनाता है।

2. जटिल ऊतक (Complex tissue) :
दो या अधिक प्रकार की कोशिकाएँ परस्पर मिलकर एक ही कार्य सम्पन्न करती हैं। जटिल ऊतक दो प्रकार के होते हैं

(i) जाइलम तथा
(ii) फ्लोएम।

(i) जाइलम :
इसके अध्ययन के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 देखें।

(ii) फ्लोएम :
इस ऊतक का प्रमुख कार्य पौधे के प्रकाश संश्लेषी भागों (जैसे–पत्तियों) में निर्मित भोज्य-पदार्थों को पौधे के अन्य भागों में स्थानान्तरित करना होता है। इस ऊतक को बास्ट (bast) भी कहते हैं।

संरचना  :
जाइलम की तरह ही फ्लोएम के निर्माण में भी चार प्रकार की कोशिकाएँ भाग लेती हैं। ये कोशिकाएँ निम्नवत् हैं

  1. चालनी नलिकाएँ (sieve tubes)
  2. सहचर कोशिका (companion cell)
  3.  फ्लोएम पेरेनकाइमा (phloem parenchyma)
  4. फ्लोएम तन्तु (phloem fibres)।

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(a)
चालनी नलिकाएँ
एन्जियोस्पर्म में चालनी नलिका (sieve tube) :
मिलती है तथा टेरिडोफाइटा में चालनी कोशिका (sieve cell) मिलती है। ये पतली नली के समान होती हैं जिसमें कोशिकाएँ एक के ऊपर एक कतार में
लगी रहती हैं। इनकी अन्त:भित्ति (end wall) पर चालनी प्लेट (sieve plate) पाई जाती है। कोशिका भित्ति सेलुलोस की बनी होती है। इसमें अनेकों छिद्र मिलते हैं जिससे आस-पास की कोशिकाओं में सम्पर्क बना रहता है। कभी-कभी चालनी प्लेट अनुदैर्ध्य भित्ति (longitudinal wall) में भी पाई जाती है। वर्षी ऋतु (growing season) के अन्त में चालनी पट्टिका एक प्रकार के रंगहीन चमकदार कैलोस (callose) नामक कार्बोहाइड्रेट की तह से ढक जाती है, जिसे कैन्नस (callus) कहते हैं। बहुत पुरानी चालनी-पट्टिका में कैलस स्थाई रूप से जम जाता है जिससे भोजन का संवहन रूक जाता है। परिपक्व चालनी नलिका में केन्द्रक नहीं मिलता है। प्रत्येक चालनी नलिका के साथ छिद्रों द्वारा जुड़ी हुई एक लम्बी सहचर कोशिका (companion cell) पाई जाती है।

(b)
सहचर कोशिका 

जिम्नोस्पर्म व टेरिडोफाइटा में सहचर-कोशिका नहीं पाई जाती है। जिम्नोस्पर्म व टेरीडोफाइटा में चालनी कोशिका (sieve cell) मिलती है जिस पर चालनी प्लेट (sieve plate) स्पष्ट नहीं होती है। आमतौर पर चालनी क्षेत्र (sieve areas) पाश्र्व दीवार (lateral wall) पर पाए जाते हैं। एन्जियोस्पर्म में चालनी नलिका से पाश्र्व दिशा से लगी एक लम्बी-पतली कोशिका होती है जिसे सहचर कोशिका कहते हैं। यह पतली कोशिका भित्ति वाली कोशिका होती है जो भोजन के संवहन में (UPBoardSolutions.com) सहायता करती है। सामान्यत: एक चालनी नलिका से एक सहचर कोशिका लगी रहती है। सहचर कोशिका में एक बड़ा केन्द्रक व प्रचुर मात्रा में जीवद्रव्य मिलता है। इनमें स्टार्च कण (starch grain) नहीं मिलते हैं, परन्तु माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria), एन्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम (endoplasmic reticulum), राइबोसोम (ribosome) आदि कोशिकांग मिलते हैं।

(c)
फ्लोएम पेरेनकाइमा
आकृति में ये कोशिकाएँ लम्बी, चौड़ी, पतली व गोल हो सकती हैं। ये कोशिकाएँ चालनी नलिका के बीच-बीच में मिलती हैं व जीवित होती हैं। इनको मुख्य कार्य भोजन का संचय करना व संवहन में सहायता करना है। इन कोशिकाओं के अन्य गुण पेरेनकाइमा की कोशिकाओं की तरह होते हैं। एकबीजपत्री पौधों के तनों में फ्लोएम पेरेनकाइमा का प्रायः अभाव होता है।

(d)
फ्लोएम तन्तु
ये दृढ़ऊतक के बने होते हैं। इनकी कोशिकाभित्ति मोटी, कोशिका-गुहा सँकरी व इनमें गर्त मिलते हैं। इन तन्तुओं का बहुत आर्थिक महत्त्व है। इनसे रस्सी, सुतली, गद्दे, बैग आदि बनाए जाते हैं। तन्तुओं की लम्बाई निश्चित नहीं होती है। ये द्वितीयक फ्लोएम में अधिक मिलते हैं। प्राथमिक फ्लोएम में तन्तुओं की कोशिकाभित्ति अधिकतर सेलुलोस की बनी होती है।

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प्रश्न 3.
दारु के विभिन्न घटकों का विवरण दीजिए एवं उनके कार्यों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए। या जाइलम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या दारु (जाइलम) ऊतक के विभिन्न अवयवों के नामांकित चित्र बनाइए। या टिप्पणी लिखिए-जाइलम द्वारा खनिज लवणों का परिवहन।
उत्तर :

दारु या जाइलम

दारु या जाइलम (xylem) ऐसा संवहन ऊतक (vascular tissue) है जिसके द्वारा भूमि से अवशोषित जल तथा उसमें घुले हुए खनिज पदार्थों का संवहन होता है। इन कार्यों को करने के लिए जाइलम में निम्नलिखित चार प्रकार की विशेष संरचनाएँ या दारु अवयव (xylem elements) पाए। जाते हैं।

1. दारु वाहिनिकाएँ (Xylem tracheids) :
ये लम्बी व नलिकाकार कोशिकाएँ होती हैं जिनके भीतर जीवद्रव्य नहीं होता तथा ये मृत हो जाती हैं। इनकी भित्तियाँ, जो प्राथमिक रूप में सेलुलोस की बनी होती हैं, किन्तु बाद में लिग्निन (lignin) से स्थूलितं होने से, अधिक मोटी हो जाती हैं। लिग्निनयुक्त (lignified) होने के कारण ये कठोर तथा काष्ठीय हो जाती हैं। कोशिका भित्तियों को लिग्निन द्वारा स्थूलन (thickening) होने से भित्तियों पर कई प्रकार की संरचनाएँ बन जाती हैं। इन्हीं के आधार पर ये कई प्रकार की मानी जाती हैं; जैसे-वलयाकार (annular), सर्पिल (spiral) प्रकार के स्थूलन प्रोटोजाइलम (protoxylem) में होते हैं। सीढ़ीनुमा (scalariform) प्रकार का स्थूलन प्रोटोजाइलम तथा मेटाजाइलम (metaxylem) दोनों में होता है। जालिकारूपी (reticulate) प्रकार का स्थूलन मेटाजाइलम में मिलता है।

जब कोशिका भित्ति पर जालिकावत् स्थूलन और भी अधिक घना हो जाता है तो कुछ स्थानों पर ही लिग्निन न जमा होने के कारण छोटे-छोटे स्थान शेष रह जाते हैं।इन स्थानों पर केवल सेलुलोस की भित्ति ही होती है, इन स्थानों को गर्त (pits) कहते हैं। गर्त पड़ोसी कोशिका की भित्ति पर भी इसी स्थान पर बनता है, अतः इन्हें गर्त युग्म (pit pair) कहना अधिक उचित है। गर्त साधारण (simple) अर्थात् पूरी गहराई तक बराबर स्थूलन वाले अथवा परिवेशित  (bordered) हो सकते हैं। परिवेशित गर्त में स्थूलन बाहर से अन्दर की ओर क्रमशः कम होता जाता है। गर्तमय (pitted) स्थूलन मेटाजाइलम में पाया जाता है।

2. दारु वाहिकाएँ या टैकी (Xylem vessels or tracheae) :
ये बहुत लम्बी और चौड़ी नलिकाओं के समान संरचनाएँ होती हैं जो एक पंक्ति में, एक के सिरे से दूसरी (end to end) लगी रहती हैं। वाहिकाओं (vessels) में वाहिनिकाओं की अपेक्षा अनुप्रस्थ भित्तियों का पूर्ण या अपूर्ण रूप से अभाव होता है। यदि अनुप्रस्थ भित्तियाँ होती हैं तो अत्यधिक छिद्रिल होती हैं। (UPBoardSolutions.com) वाहिकाओं (vessels) में भी मृत, मोटी कोशिका भित्ति होती है तथा वाहिनिकाओं की तरह कोशिका भित्तियाँ समान मोटाई की होती हैं। वाहिकाओं की भित्ति पर लिग्नीभवन (lignification) भी वाहिनिकाओं के समान कई प्रकार का होता है।

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अनुप्रस्थ काट में जाइलम वाहिकाएँ वाहिनिकाओं के समान ही बहुभुजी दिखायी देती हैं। अनावृतबीजी पौधों (gymnosperms) में जाइलम केवल वाहिनिकाओं (tracheids) का बना रहता है, इनमें वाहिकाओं (vessels) का प्रायः अभाव होता है जबकि आवृतबीजी पौधों (angiosperms) में वाहिकाएँ ही प्रमुख जाइलम अवयव (xylem elements) हैं।

3. दारु मृदूतक (Xylem parenchyma) :
ये मृदूतकीय कोशिकाएँ (parenchymatous cells) जाइलम के अन्दर पायी जाती हैं। इनकी भित्तियाँ बाद में कुछ मोटी हो जाती हैं, किन्तु ये सजीव होती हैं। स्थूलित होने पर इन कोशिकाओं की भित्तियों में सरल गर्त (pits) होते हैं। इनका मुख्य कार्य जल व खाद्य पदार्थ संचित रखना है, किन्तु ये जल संवहन में भी दारु | वाहिकाओं आदि को सहयोग देती हैं।

4. दारु रेशे (Xylem fibres) :
ये रेशे दृढ़ोतकी (sclerenchymatous) होते हैं अर्थात् इनकी भित्तियाँ लिग्निनयुक्त (lignified) होती हैं और इन भित्तियों में विभिन्न प्रकार के गर्त पाये जाते हैं। इन रेशों का मुख्य कार्य मजबूती तथा सहारा देना होता है।

(i) आदिदारु (Protoxylem) :
वाहिनिकाएँ और वाहिकाएँ पहले संकरी बनती हैं तथा उनकी भित्तियों पर वलयाकार अथवा सर्पिल स्थूलन (annular or spiral thickening) होती है। इनको आदिदारु (protoxylem) कहते हैं।

(ii) अनुदारु (Metaxylem) :
बाद में वाहिकाएँ (vessels) तथा वाहिनिकाएँ (tracheids) चौड़ी तथा अधिक लम्बी हो जाती हैं। इनकी भित्तियों पर जालिकारूपी या सीढ़ीनुमा स्थूलन (thickenings) अथवा गर्त पाये जाते हैं, इसको अनुदारु (metaxylem) कहते हैं।

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(iii) जाइलम के कार्य (Functions of xylem) :

  1.  जाइलम द्वारा, मूलों द्वारा अवशोषित जल तथा लवणों के घोल को पौधों के वायव भागों तक (पत्तियों तक) पहुँचाया जाता है। इस कारण इस जटिल ऊतक को जल संवाहक ऊतक (water conducting tissue) कहते हैं।
  2.  इसमें उपस्थित कोशिकाओं की भित्तियाँ मोटी व दृढ़ होने के कारण यह ऊतक पौधे के भागों को यान्त्रिक शक्ति (mechanical strength) प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
भरण ऊतक तन्त्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
बाह्यत्वचा तथा संवहन बण्डल के अतिरिक्त सभी ऊतक भरण ऊतक की श्रेणी में आते हैं। ये पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा कोशिकाओं से बने होते हैं। पत्तियों में भरण ऊतक पतली भित्ति वाले तथा क्लोरोप्लास्ट युक्त होते हैं और इसे पर्णमध्योतक (leaf mesophyll) कहते हैं। भरण ऊतक में निम्नलिखित भाग आते हैं

(i) वल्कुट (Cortex) :
यह बाह्यत्वचा के नीचे पाया जाने वाला भरण ऊतक (ground tissue) है जो प्रायः अन्तस्त्वचा (endodermis) तक फैला रहता है। इसमें निम्नलिखित भाग होते हैं

(a)
अधस्त्वचा (Hypodermis) :

द्विबीजपत्री पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे स्थूलकोण ऊतक (collenchyma tissue) तथा एकबीजपत्री पौधों में बाह्यत्वचा के नीचे दृढ़ोतके (sclerenchyma tissue) की एक या कुछ परतें पूरी पट्टी के रूप में अथवा छोटे-छोटे टुकड़ों में पाई जाती हैं। इन्हें अधस्त्वचा (hypodermis) कहते हैं। यह ऊतक पतली कोशिकाभित्ति वाली मृदूतक कोशिकाओं से बना होता है तथा अधस्त्वचा के ठीक नीचे पाया जाता है। ये परतें रक्षा का कार्य करती हैं।

(b)
सामान्य वल्कुट (General Cortex) :

इनमें सुविकसित अन्तराकोशिकीय स्थान (intercellular spaces) पाए जाते हैं। प्रायः तरुण तने की वल्कुट की कोशिकाओं में हरितलवक पाए जाते हैं। इस प्रकार के मृदूतक को क्लोरेनकाइमा (chlorenchyma) कहते हैं। वल्कुट की कोशिकाओं में मण्ड, टेनिन तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थ भी पाए जाते हैं। जलीय पौधों में वल्कुट में एक विशेष प्रकार का मृदूतक पाया जाता है जिसे वायूतक (aerenchyma) कहते हैं। इसमें बीच-बीच में काफी बड़े वायु-स्थान (air-spaces) मिलते हैं। वल्कुट (cortex) पौधों को यान्त्रिक शक्ति प्रदान करता है; ‘भोज्य-पदार्थ का संग्रह करता है तथा पौधों के आन्तरिक ऊतकों की रक्षा करता है।

(c)
अन्तस्त्वचा (Endodermis) :

इसे मण्डआच्छद (starch sheath) भी कहते हैं। यह कोशिकाओं की एक अकेली परत के रूप में पायी जाती है। यह वल्कुट को रम्भ (stele) से पृथक् करती है। यह परत ढोल-सदृश (barrel-shaped) कोशिकाओं की बनी होती है और इनके बीच अन्तराकोशिकीय स्थान नहीं होते। यह (UPBoardSolutions.com) कोशिकाएँ जीवित होती हैं और इनमें मण्ड, टेनिन, म्यूसिलेज की अधिकता होती है। मण्डे की उपस्थिति के कारण ही इसे मण्ड आच्छद (starch sheath) भी कहते हैं। अन्तस्त्वचा की कुछ कोशिकाओं की अरीय (radial) और आन्तरिक (inner) भित्तियाँ, सुबेरिन (suberin), क्यूटिन (cutin) या कभी-कभी लिग्निन (lignin) पदार्थों के संग्रह के कारण स्थूलित (thickened) हो जाती हैं। इस स्थूलित पट्टी को केस्पेरियन पट्टी (casparian strip) कहते हैं। इन मोटी भित्ति वाली अन्तस्त्वचा कोशिकाओं के बीच अनेक जड़ों में कुछ पतली भित्ति वाली कोशिकाएँ आदिदारु (protoxylem) के अभिमुख (opposite) होती हैं। इन कोशिकाओं को मार्ग कोशिकाएँ (passage cells) अथवा संचरण कोशिकाएँ (transfusion cells) कहते हैं। इन्हीं कोशिकाओं द्वारा मूलरोमों द्वारा अवशोषित जल व खनिज पदार्थ जाइलम में जाते हैं।

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प्रश्न 5.
संवहन बण्डल क्या हैं ? चित्रों की सहायता से आवृतबीजी पौधों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के संवहन बण्डलों की संरचना का वर्णन कीजिए। या उपयुक्त चित्रों की सहायता से आवृतबीजियों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के संवहन बण्डलों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

संवहन पूल

जाइलम व फ्लोएम (Xylem and phloem) पौधों में पाये जाने वाले संवहन ऊतक हैं। ये पौधों में अलग-अलग प्रकार से विन्यसित होते हैं। प्रायः यह भी देखा गया है कि दोनों प्रकार के संवहन ऊतक सदैव ही एक-दूसरे के आस-पास रहते हैं। इस प्रकार जाइलम और फ्लोएम के पास-पास होने तथा इनसे बनने वाले विशेष तन्तुओं (strands) को संवहन पूल (vascular bundle) कहते हैं। द्विबीजपत्री पौधों (dicot plants) में जाइलम तथा फ्लोएम के अतिरिक्त एधा (cambiun) भी संवहन पूल बनाने में मदद करती है। समस्त पौधों में संवहन पूल अपनी संवहन ऊतकों की व्यवस्था के अनुसार प्रमुखत: निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

1. संयुक्त संवहन पूल
इस प्रकार के संवहन पूल में जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या (radius) पर होते हैं। इस प्रकार के संवहन पूल सामान्यत: आवृतबीजी (angiospermic) पौधों के स्तम्भों (stems) में पाये जाते हैं। ये संवहन पूल भी निम्नलिखित दो प्रकार के मिलते हैं

(i) कोलेटरल संवहन (Collateral vascular bundles) :
ये प्रायः अधिकतर तनों में मिलते हैं। इन संवहन पूलों में जाइलम केन्द्र की ओर तथा फ्लोएम परिरम्भ (pericycle) की ओर होता है। द्विबीजपत्री तनों में जाइलम और फ्लोएम के मध्य प्राथमिक एधा (primary cambium) होती है जिससे ये पूल वर्धा (open) कहलाते हैं। एकबीजपत्री तनों के संवहन पूलों में एधा नहीं होती और वे अवर्थी (closed) कहलाते हैं। इन संवहन पूलों में जाइलम सदैव ही अन्तःआदिदारुक (endarch) होता है अर्थात् आदिदारु केन्द्र की ओर तथा अनुदारु परिधि की ओर होता है।

(ii) बाइकोलेटरल संवहन पूल (Bicollateral vascular bundles) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में जाइलम के दोनों ओर अर्थात् केन्द्र की ओर भी और परिधि की ओर भी फ्लोएम होता है। इस प्रकार के संवहन पूलों में भी जाइलम अन्त:आदिदारुक ही होता है और ये मदेव बर्थी होते हैं। इनमें जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य दोनों ओर एधा होती है।

उदाहरण :
कद्दू के पौधों के तनों में संवहन पूल प्राय: बाइकोलेटरल ही होते हैं।
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2. अरीय संवहन पूल
इस प्रकार के पूलों में जाइलम और फ्लोरम अलग-अलग त्रिज्याओं पर होते हैं। इस प्रकार के संवहन पूल जड़ों में पाये जाते हैं। इनमें जाइलम सदैव बाह्यआदिदारुक (exarch) मिलता है अर्थात् आदिदारु परिधि की ओर तथा अनुदारु केन्द्र की ओर होता है। इन संवहन पूलों में प्राथमिक एधा (primary cambium) नहीं पायी जाती है। द्विबीजपत्री जड़ों में जाइलम तथा फ्लोएम के मध्य, बाद में द्वितीयक एधा (secondary cambitum) बन जाती है। 3. संकेन्द्री संवहन पूल इन पूलों (UPBoardSolutions.com) में एक संवहन ऊतक (vascular tissue) केन्द्र में तथा दूसरा इसे चारों ओर से घेरता है। सभी सुकेन्द्री संवहन पूल अवर्थी closed) होते हैं अर्थात् इनमें एधा कभी नहीं होती है। जाइलम तथा फ्लोएम की स्थिति के अनुसार ये संवहन पूल प्रायः निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं।

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(i) दारु केन्द्री (Amphicribral) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में जाइलम केन्द्र में तथा फ्लोएम इसे चारों ओर से घेरता है। दारु केन्द्री संवहन पूल फर्क्स (ferns) के राइजोम में मिलते हैं।

(ii) फ्लोएम केन्द्री (Amphivasal) :
इस प्रकार के संवहन पूलों में फ्लोएम मध्य में तथा दारु इसे चारों ओर से घेरता है। फ्लोएम केन्द्री संवहन पूल कुछ एकबीजपत्री पौधों; जैसे—यक्का (Yucca), डैसीना (Dracaena) आदि के तने में मिलते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules (जैव अणु)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वृहत अणु क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
जो तत्त्व अम्ल अविलेय अंश में पाये जाते हैं वे वृहत् अणु या वृहत् जैविक अणु कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ :
(i) न्यूक्लिक अम्ल।

प्रश्न 2.
ग्लाइकोसाइडिक, पेप्टाइड तथा फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

1. ग्लाइकोसाइडिक बन्ध (Glycosidic Bond) :
बहुलकीकरण में मोनोसैकेराइड अणु एक-दूसरे के पीछे जिस सहसंयोजी बन्ध द्वारा जुड़ते हैं उसे ग्लाइकोसाइडिक बन्ध कहते हैं। इस बन्ध में एक मोनोसैकेराइड अणु का ऐल्डिहाइड या कीटोन समूह दूसरे अणु के एक ऐल्कोहॉलिय अर्थात् हाइड्रॉक्सिल (UPBoardSolutions.com) समूह (-OH) से जुड़ता है जिसमें कि जल (H,O) का एक अणु पृथक् हो जाता है।

2. पेप्टाइड बन्ध (Peptide Bond) :
जिस बन्ध द्वारा अमीनो अम्लों के अणु एक-दूसरे से आगे-पीछे जुड़ते हैं, उसे पेप्टाइड या ऐमाइड बन्ध कहते हैं। यह बन्ध सहसंयोजी होता है और एक अमीनो अम्ल के कार्बोक्सिलिक समूह की अगले अमीनो अम्ल के अमीनो समूह से अभिक्रिया के फलस्वरूप बनता है। इसमें जल का एक अणु हट जाता है।

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3. फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (Phosphodiester Bonds) :
न्यूक्लीक अम्ल के न्यूक्लिओटाइड्स (nucleotides) फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों (phosphodiester bonds) द्वारा एक-दूसरे से संयोजित होकर पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला बनाते हैं। फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध समीपवर्ती दो न्यूक्लियोटाइड्स के फॉस्फेट अणुओं के मध्य बनता है। DNA की दोनों पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं के नाइट्रोजन क्षारक हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़े होते हैं।

प्रश्न 3.
प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
प्रोटीन की तृतीयक संरचना के अन्तर्गत प्रोटीन की एक लम्बी कड़ी अपने ऊपर ही ऊन के एक खोखले गोले के समान मुड़ी हुई होती है यह संरचना प्रोटीन के त्रिआयामी रूप को प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 4.
10 ऐसे रुचिकर सूक्ष्म जैव अणुओं का पता लगाइए जो कम अणुभार वाले होते हैं व इनकी संरचना बनाइए। ऐसे उद्योगों का पता लगाइए जो इन यौगिकों का निर्माण विलगन द्वारा करते हैं? इनको खरीदने वाले कौन हैं? मालूम कीजिए।
उत्तर :
सूक्ष्म जैव अणु जीवधारियों में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक यौगिकों को जैव अणु कहते हैं।

(i) कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates); जैसे :
ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस, डिऑक्सीराइबोस शर्करा, माल्टोस आदि।

(ii) वसा व तेल (Fat & Oils) :
पामिटिक अम्ल, ग्लिसरॉल, ट्राइग्लिसराइड, फॉस्फोलिपिड्स, कोलेस्टेरॉल आदि।

(iii) ऐमीनो अम्ल (Amino Acids) :
ग्लाइसीन, ऐलेनीन, सीरीन आदि।।

(iv) नाइट्रोजन क्षारक (Nitrogenous Base) :
ऐडेनीन (adenine), ग्वानीन : (guanine), थायमीन (thymine), यूरेसिल (uracil), सायटोसीन (cytosine) आदि।
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शर्करा उद्योग, तेल एवं घी उद्योग, औषधि उद्योग आदि इनका निर्माण करते हैं। मनुष्य इनका उपयोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करती है।

प्रश्न 5.
प्रोटीन में प्राथमिक संरचना होती है, यदि आपको जानने हेतु ऐसी विधि दी गई है जिसमें प्रोटीन के दोनों किनारों पर ऐमीनो अम्ल है तो क्या आप इस सूचना को प्रोटीन की शुद्धता अथवा समांगता (homogeneity) से जोड़ सकते हैं?
उत्तर :
प्रोटीन्स की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लम्बी व रेखाकार होती हैं। प्रोटीन कुण्डलन एवं वलन द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृति धारण करती हैं। इन्हें प्रोटीन्स के प्राकृत संरूपण (native conformations) कहते हैं। प्रोटीन के प्राकृत संरूपण चार स्तर के होते हैं—प्राथमिक, (UPBoardSolutions.com) द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुष्क स्तर। पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े ऐमीनो अम्लों के अनुक्रम प्रोटीन की संरचना का प्राथमिक स्तर प्रदर्शित करते हैं। प्रोटीन में ऐमीनो अम्लों का अनुक्रमे इसके जैविक प्रकार्य का निर्धारण करता है।
पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के एक सिरे पर प्रथम ऐमीनो अम्ल का खुला ऐमीनो समूह तथा दूसरे सिरे पर अन्तिम ऐमीनो अम्ल का खुला कार्बोक्सिल समूह (carboxyl group) होता है। अतः इन सिरों को क्रमशः N-छोर तथा C-छोर कहते हैं। इससे प्रोटीन की शुद्धता या समांगता प्रदर्शित होती है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 3

प्रश्न 6.
चिकित्सार्थ अभिकर्ता (therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए। प्रोटीन की अन्य उपयोगिताओं को बताइए। (जैसे-सौन्दर्य-प्रसाधन आदि)।
उत्तर :
साइटोक्रोम ‘C’, हीमोग्लोबिन तथा इम्यूनोग्लोबिन ‘G’ चिकित्सार्थ अभिकर्ता के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन हैं। प्रोटीन के निम्नलिखित कार्यों की वजह से इनकी उपयोगिता अधिक है।

  1. लगभग सभी एन्जाइम्स (enzymes) प्रोटीन के बने होते हैं।
  2. थ्रोम्बिन (thrombin) तथा फाइब्रोजिन (fibrogen) रुधिर प्रोटीन्स हैं जो चोट लगने पर रुधिर का थक्का बनने में सहायक होती हैं।
  3. एक्टिन तथा मायोसिन (actin & myosin) संकुचन प्रोटीन्स हैं जो सभी कंकालीय (UPBoardSolutions.com) पेशियों के संकुचन में भाग लेती हैं।
  4. रेशम में फाइब्रोइन (fibroin) प्रोटीन होती है।
  5. कुछ हार्मोन्स; जैसे—अग्र पिट्यूटरी ग्रन्थि का वृद्धि हार्मोन (somatotropic) तथा अग्न्याशय ग्रन्थि से स्रावित इन्सुलिन (insulin) हार्मोन शुद्ध प्रोटीन के बने होते हैं।
  6. एन्टीबॉडीज या इम्यूनोग्लोब्यूलिन जोकि शरीर की सुरक्षा करती है प्रोटीन से ही बनी होती है।

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प्रश्न 7.
ट्राइग्लिसराइड के संगठन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
एक ग्लिसरॉल (glycerol or glycerine) अणु से एक-एक करके तीन वसीय अम्ल अणुओं के तीन सहसंयोजी बन्धों (covalent bonds) द्वारा जुड़ने से वास्तविक वसा का एक अणु बनता है। इन बन्धों को एस्टर बन्ध (ester bonds) कहते हैं। ग्लिसरॉल एक ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल trihydric alcohol) होता है, क्योंकि इसकी कार्बन श्रृंखला के तीनों कार्बन परमाणुओं से एक-एक हाइड्रॉक्सिल समूह (hydroxyl group, -OH) जुड़ा होता है। एस्टर बन्ध प्रत्येक हाइड्रॉक्सिल समूह तथा एक वसीय अम्ल के कार्बोक्सिल समूह ( COOH) के बीच बनती है। इसीलिए वसा अणु को ट्राइग्लिसराइड या ट्राइऐसिलग्लिसरॉल (triglyceride or triacylglycerol) कहते हैं।
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प्रश्न 8.
क्या आप प्रोटीन की अवधारणा के आधार पर वर्णन कर सकते हैं कि दूध का दही अर्थवा योगर्ट में परिवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर :
दूध की विलेय प्रोटीन केसीनोजन (caseinogen) को अविलेय केसीन (casein) में बदलने का कार्य रेनिन (rennin) एन्जाइम तथा स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणु करते हैं। ये किण्वन द्वारा दूध को ही या योगर्ट में बदल देते हैं; क्योंकि केसीनोजन प्रोटीन अवक्षेपित हो जाती है।

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प्रश्न 9.
क्या आप व्यापारिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बॉल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते हैं?
उत्तर :
बॉल व स्टिक नमूना (Ball and Stick Model) के द्वारा जैव अणुओं के प्रारूपों को (UPBoardSolutions.com) प्रदर्शित किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन (itrate) कर, ऐमीनो अम्ल में वियोजी क्रियात्मक समूहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर :
ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन करने से कार्बोक्सिल समूह (-COOH) तथा ऐमीनो समूह (-NH2) पृथक् हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
ऐलेनीन ऐमीनो अम्ल की संरचना बताइए।
उत्तर :
ऐलेनीन में R समूह अत्यधिक जलरोधी हाइड्रोकार्बन समूह होते हैं जिन्हें पार्श्व श्रृंखलाएँ कहते हैं। इसमें पाश्र्व श्रृंखला मेथिल समूह की होती है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 5

प्रश्न 12.
गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?

उत्तर :

गोंद (Gum) :
यह एक द्वितीयक उपापचयज (secondary metabolite) है। यह एक कार्बोहाइड्रेट बहुलक (polymer) है। गोंद पौधों की काष्ठ वाहिकाओं (xylem vessels) से प्राप्त होने वाला उत्पाद है। यह कार्बनिक घोलक में अघुलनशील होता है। गोंद जल के साथ चिपचिपा घोल (sticky solution) बनाता है। फेविकोल (fevicol) एक कृत्रिम औद्योगिक उत्पाद है।

प्रश्न 13.
प्रोटीन, वसा व तेल, ऐमीनो अम्लों का विश्लेषणात्मक परीक्षण बताइए एवं किसी भी फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण कीजिए?
उत्तर :
प्रोटीन एवं ऐमीनो अम्ल का परीक्षण प्रोटीन के वृहत् अणु (macromolecules) ऐमीनो अम्लों की लम्बी श्रृंखलाएँ होते हैं। ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े रहते हैं। इनका आण्विक भार बहुत अधिक होता है। अण्डे की सफेदी, सोयाबीन, दालों (मटरे, राजमा आदि) में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। अण्डे की सफेदी या दालों (सेम, चना, मटरे, राजमा) आदि को जल के साथ पीसकर पतली लुगदी बना लेते हैं। इसे जल के साथ उबाल कर छान लेते हैं। निस्वंद द्रव में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) होती है।

प्रयोग 1 :
एक परखनली में 3 मिली प्रोटीन नियंद लेकर, इसमें 1 मिली सान्द्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) मिलाइए। सफेद अवक्षेप बनता है। परखनली को गर्म करने पर अवक्षेप घुल जाता है तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है। अब इसे ठण्डा करके इसमें 10% सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) (UPBoardSolutions.com) विलयन मिलाते हैं। परखनली में विलयन का रंग पीले से नारंगी हो जाता है।

प्रयोग 2 :
एक परखनली में प्रोटीन नियंद की 1 मिली मात्रा लेकर इसमें लगभग 1 मिली मिलन अभिकर्मक (Millon’s Reagent) मिलाने पर हल्के पीले रंग का अवक्षेप बनता है। इस अवक्षेप में 4-5 बूंदें सोडियम नाइट्रेट (NaNO3,) की मिलाकर विलयन को गर्म करने पर अवक्षेप का रंग लाल हो जाता है।

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वसा व तेल का परीक्षण

ये जल में अविलेय और ईथर, पेट्रोल, क्लोरोफॉर्म आदि में घुलनशील (विलेय) होती हैं। साधारण ताप पर जब वसाएँ ठोस होती हैं तो वसा (चर्बी-fat) और जब ये तरल होती हैं तो तेल (oil) कहलाती हैं। पादप वसाएँ असंतृप्त (नारियल का तेल तथा ताड़ का तेल संतृप्त) तथा जन्तु वसाएँ संतृप्त होती हैं।

प्रयोग 1 :
मूंगफली के कच्चे दाने लेकर उनको सफेद कागज पर रखकर पीस लीजिए। अब इस कागज के टुकड़े को प्रकाश के किसी स्रोत की ओर रखकर देखिए। यह अल्पपारदर्शी नजर आता है। इस पर एक बूंद पानी डालकर देखिए। कागज पर पानी का प्रभाव नहीं होता। यह प्रयोग जन्तु वसा (देशी घी) के साथ भी किया जा सकता है।

प्रयोग 2 :
एक परखनली में 0:5 मिली परीक्षण तेल या वसा तथा 0:5 मिली जल (दोनों बराबर मात्रा में) लेते हैं। अब इसमें 2-3 बूंदें सुडान-III विलयन की डालकर हिलाते हैं तथा पाँच मिनट तक ऐसे ही रख देते हैं। परखनली में जल तथा तेल की पृथक् पर्यों में, तेल की पर्त लाल नजर आती है। (नोट-फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण उपर्युक्त विधियों द्वारा किया जा सकता है।)

प्रश्न 14.
पता लगाइए कि जैवमण्डल में सभी पादपों द्वारा कितने सेलुलोस का निर्माण होता है? इसकी तुलना मनुष्यों द्वारा उत्पादित कागज से कीजिए। मानव द्वारा प्रतिवर्ष पादप पदार्थों की कितनी खपत की जाती है? इसमें वनस्पतियों की कितनी हानि होती है?
उत्तर :
सेलुसोस (cellulose) पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाला कार्बोहाइड्रेट है। यह जटिल बहुलक होता है। पादपों में सेलुलोस की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। पौधों के काष्ठीय भागों व कपास तथा रेशेदार पौधों में इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। काष्ठ में लगभग 50% तथा कपास के रेशे में इसकी मात्रा लगभग 90% होती है। मनुष्य द्वारा सेलुलोस का उपयोग ईंधन तथा इमारती लकड़ी के रूप में, तन्तुओं के रूप में वस्त्र निर्माण, कृत्रिम रेशे निर्माण, कागज निर्माण में प्रमुखता से किया जाता है। नाइट्रोसेलुलोस का उपयोग विस्फोटक पदार्थ के रूप (UPBoardSolutions.com) में किया जाता है। इसका उपयोग पारदर्शी प्लास्टिक सेलुलॉयड, (celluloid) बनाने के लिए किया जाता है जिससे खिलौने, कंघे आदि बनाए जाते हैं। मनुष्य‘सेलुलोस का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनस्पतियों को हानि पहुँचा रहा है। इसके फलस्वरूप प्राकृतिक वन क्षेत्रों में निरन्तर कमी होती जा रही है। पारितन्त्र के प्रभावित होने के कारण अनेक पादप प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।

प्रश्न 15.
एन्जाइम के महत्त्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
एन्जाइमों के महत्त्वपूर्ण गुण निम्नवत् हैं-

  1. विकर (enzymes), उत्प्रेरकों (catalyst) के रूप में कार्य करते हैं और जीवों (living organisms) में अभिक्रिया की दर (rate of reaction) को प्रभावित करते हैं।
  2. क्रियाधारों (reactants or substrate) को उत्पादों (products) में बदलने के लिए एन्जाइम की बहुत सूक्ष्म मात्रा अथवा सान्द्रता की आवश्यकता होती है।
  3. एन्जाइम उत्प्रेरक (enzyme catalyst) उच्च अणुभार के, जटिल, नाइट्रोजनी कार्बनिकः यौगिक, प्रोटीन होते हैं जो जीवित कोशिकाओं में उत्पन्न होते हैं। एन्जाइम का अणु उसके क्रियाधार के अणु की तुलना में बहुत बड़ा होता है। एन्जाइम का आणविक भार हजारों से लेकर लाखों तक होता है, जबकि क्रियाधारों का अणुभार प्रायः कुछ सैकड़ों में ही होता है।
  4. ये किसी रासायनिक क्रिया को प्रारम्भ नहीं करते, बल्कि क्रिया की गति को उत्प्रेरित (catalysed) करते हैं।
  5. अधिकांश एन्जाइम जल अथवा नमक के घोल में घुलनशील होते हैं। कोशिकाद्रव्य में ये कोलॉइडी (colloidal) विलयन बनाते हैं।
  6. एन्जाइम जीवों में होने वाली समस्त शरीर-क्रियात्मक अभिक्रियाओं (physiological reactions), जैसे-जल-अपघटन, ऑक्सीकरण, अपचयन, अपघटन आदि को उत्प्रेरित करते हैं।
  7. एन्जाइम प्रायः विशिष्ट (specific) होते हैं, अर्थात् एक एन्जाइम एक विशेष क्रिया का ही उत्प्रेरण करता है। उदाहरणार्थ-एन्जाइम इन्वटेंस (invertase) केवल सुक्रोस के जल-अपघटन को उत्प्रेरित करता है।
    UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 6
    इन्वटेंस (invertase) एन्जाइम द्वारा माल्टोस का ग्लूकोस में जल-अपघटन उत्प्रेरित नहीं होता
  8. एन्जाइम ताप परिवर्तन से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। किसी एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता जिस ताप पर सर्वाधिक होती है उसे अनुकूलन ताप (optimum temperature) कहते हैं। अनुकूलन ताप पर अभिक्रिया की दर उच्चतम होती है। अधिक ताप पर एन्जाइम की विकृति (denatured) हो जाती है अर्थात् एन्जाइम की प्रोटीन संरचना और उसकी उत्प्रेरक सक्रियता नष्ट हो जाती है। एन्जाइमों का अनुकूलन ताप साधारणत: 25-40°C होता है। बहुत कम ताप पर एन्जाइम निष्क्रिय (inactive) हो जाते हैं।
  9. एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं की दर pH परिवर्तमं से बहुत प्रभावित होती है। प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष (UPBoardSolutions.com) pH माध्यम में ही पूर्ण सक्रिय होता है। प्रत्येक एन्जाइम की उत्प्रेरक सक्रियता जिस pH पर अधिकतम होती है उसे अनुकूलनःH (optimum pH) कहते हैं। एन्जाइमों की अनुकूलन pH साधारणत: 5-7 होती है।
  10. कुछ एन्जाइम अम्लीय माध्यम में तथा कुछ क्षारीय माध्यम में क्रिया करते हैं।
  11. कुछ एन्जाइम कोशिका के अन्दर सक्रिय होते हैं तथा कुछ एन्जाइम कोशिका के बाहर भी सक्रिय होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एन्जाइम की रासायनिक प्रकृति (स्वभाव) है।
(क) वसा
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) हाइड्रोकार्बन
(घ) प्रोटीन
उत्तर :
(घ) प्रोटीन

प्रश्न 2.
उस विकर (एन्जाइम) का नाम लिखिए जो बेकरी उद्योग में प्रयुक्त होता है।
(क) फॉस्फेटेज
(ख) एमाइलेज
(ग) जाइमेज
(घ) फॉस्फोरिलेज
उत्तर :
(ख) एमाइलेज

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फॉस्फो-प्रोटीन्स के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
फॉस्फो-प्रोटीन्स में फॉस्फोरस सम्मिलित होता है; जैसे-दुग्ध प्रोटीन-केसीन (castin), अण्डे की पीतक प्रोटीन-फॉस्फोवाइटिन (phosphovitin) आदि।

प्रश्न 2.
वसा अम्ल क्या है?
उत्तर :
वसा अम्ल (fatty acids) लम्बी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्ल (carboxylic acids) हैं।

प्रश्न 3.
दो आवश्यक वसा अम्लों के नाम लिखिए।
उत्तर :
जन्तुओं में वसीय अम्ल प्रायः संतृप्त होते हैं तथा पादपों में असंतृप्त। मनुष्य सहित सभी स्तनियों में लाइनोलीक (linoleic) तथा लाइनोलीनिक (linolenic) वसीय अम्ल शरीर की कोशिकाओं में संश्लेषित नहीं होते अतः ये दोनों केवल पादपों से प्राप्त होते हैं तथा आवश्यक (essential) वसीय अम्ल कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा किस रूप में उपस्थित होती है?
उत्तर :
स्तनधारियों में दुग्ध शर्करा (milk sugar) एक डाइसैकेराइड (disaccharide)लैक्टोज (lactose) के रूप में पायी जाती है। यह हेटेरोडाइसैकेराइड (heterodisaccharide) होती है, क्योंकि इसका एक अणु ग्लूकोज एवं गैलेक्टोज के एक-एक अणु 3-1,4 से ग्लाइकोसिडिक बन्ध द्वारा जुड़ने से बनता है। यह पानी में कम घुलनशील तथा कम मीठी होती है।

प्रश्न 5.
प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयों को क्या कहते हैं? जन्तुओं में ये कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
प्रोटीन की संरचनात्मक इकाइयों को अमीनो अम्ल (amino acids) कहते हैं। ये जन्तु शरीर में 20 होते हैं जिनमें से 10 अमीनो अम्ल आवश्यक कहे जाते हैं, क्योंकि इनका संश्लेषण शरीर नहीं कर सकता है। शेष अनावश्यक कहलाते हैं जिनका संश्लेषण जन्तु शरीर स्वयं कर लेता है।

प्रश्न 6.
उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ किसे कहते हैं? पौधों में संचित पदार्थ कार्बोहाइड्रेट का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
उपापचयी क्रिया के फलस्वरूप प्राप्त उत्पादों के निष्क्रिय रहने की अवस्था को उपापचयी निष्क्रिय पदार्थ कहते हैं। पौधों में संचित पदार्थ मण्ड (कार्बोहाइड्रेट) होता है जो कि एक पॉलिसैकेराइड है। इसमें ग्लूकोज इकाइयों से बने दो प्रकार के होमोपॉलिसैकेराइड अणु होते (UPBoardSolutions.com) हैं-10 से 30% तक ऐमाइलोस के तथा 70 से 90% का ऐमाइलोपेक्टिन के अणु। ऐमाइलोपेक्टिन के अणु शाखान्वित और संकेन्द्रीय रूप से कुण्डलित होते हैं। ऐमाइलोस और ऐमाइलोपेक्टिन के अणु प्रायः समूहों में एकत्रित होकर विभिन्न आकृतियों एवं माप के मण्ड कण बना लेते हैं।

प्रश्न 7.
न्यूक्लियोसाइड्स तथा न्यूक्लियोटाइड्स में दो अन्तर बताइए।
उत्तर :

  1. एक न्यूक्लियोटाइड न्यूक्लिक अम्ल की एक पूर्ण इकाई है, जबकि न्यूक्लियोसाइड में एक फॉस्फेट मूलक (PO4) की कमी होती है।
  2. स्वभाव में न्यूक्लियोसाइड्स क्षारकीय होते हैं जबकि न्यूक्लियोटाइड्स अम्लीय होते हैं।

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प्रश्न 8.
ATP तथा ADP के पूरे नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. ATP = ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट (adenosine triphosphate)
  2. ADP = ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट (adenosine diphosphate)

प्रश्न 9.
जीवधारियों में खनिजों के दो कार्य लिखिए। या जीवन के लिए आवश्यक दो महत्त्वपूर्ण खनिज तत्त्वों के नाम लिखिए तथा इनके महत्त्व बताइए।
उत्तर :

  1. कई धात्विक खनिज अनेक एन्जाइम्स को क्रियाशील बनाते हैं अर्थात् सह-कारक (co-factor) का कार्य करते हैं; जैसे-लौह (Fe) एवं कॉपर (Cu)।
  2. कुछ खनिज; जैसे–सोडियम, पोटैशियम तथा क्लोराइड्स आयन्स के रूप में कोशिका कला की पारगम्यता (permeability) तथा विद्युत विभव को प्रभावित करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संदेश वाहक RNA पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
संदेशवाहक-RNA m-RNA, DNA के ऊपर निर्देशित सूचना का संदेशवाहक है। इसकी जीवन अवधि अल्प होती है। इसका संश्लेषण तीव्र गति से होता है। इसका अणुभार तथा लम्बाई सूचना संदेश के अनुसार कम या अधिक होती रहती है। m-RNA के विषय में सर्वप्रथम जानकारी ब्रेनर आदि (Brenner etal) ने 1961 ई० में दी। नीरेनबर्ग तथा मथाई (Nirenberg and Matthaei) ने 1961 ई० में प्रयोगशाला में कोशिका के बाहर प्रोटीन संश्लेषण में इसे दर्शाया। बेसीलस सबटिलिस (Bacillus subtilis) के m-RNA की अर्द्धआयु केवल 2.30 मिनट होती है। इसका अणुभार 50,000 से 2,00,000 डाल्टन तक हो सकता है। m-RNA सदैव (UPBoardSolutions.com) एकरज्जुकी (single stranded) होता है। इसमें मिलने वाले क्षारक यूरेसिल, साइटोसीन, ग्वानीन तथा एडीनीन हैं। यह केन्द्रक में DNA से बनता है तथा प्रत्येक जीन अपना अलग m-RNA अनुलेखित (transcribe) करती है। जब m-RNA केवल एक जीन (सिस्ट्रोन) से बना होता है तब इसको मोनोसिस्ट्रोनिक अथवा मोनोजीनिक m-RNA (monocistronic or monogenic m-RNA) कहते हैं। यूकैरियोट का m-RNA मोनोसिस्ट्रोनिक होता है।

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जब एक m-RNA दो या अधिक जीन से बनते हैं तब उसे पॉलिसिस्ट्रोनिक अथवा पॉलिजीनिक m-RNA (polycistronic or polygenic m-RNA) कहते हैं। प्रोकैरियोट का m-RNA पॉलिसिस्ट्रोनिक होता है। एक मोनोसिस्ट्रोनिक m-RNA की संरचना के निम्नलिखित भाग हैं

1. कैप (Cap) :
यूकैरियोट तथा कुछ विषाणुओं के m-RNA पर 5′ अन्त (5’end) पर 7-मिथाइल ग्वानोसीन समूह मिलता है। यह कैप (cap) कहलाता है। इस कैप के द्वारा ही m-RNA राइबोसोम से जुड़ता है। प्रोटीन संश्लेषण की गति इसकी उपस्थिति से तीव्र हो जाती है। क्योंकि यदि m-RNA पर कैप न हो तो वह राइबोसोम के साथ ठीक से नहीं जुड़ पाता है तथा प्रोटीन संश्लेषण की गति अति धीमी हो जाती है।

2. नॉन कोडिंग क्षेत्र  :
(Non-coding Region )-कैप के पश्चात् 10 से 100 न्यूक्लिओटाइड होते हैं जो प्रोटीन संश्लेषण में भाग नहीं लेते हैं। इस क्षेत्र में ‘A’ तथा ‘U’ अधिक मात्रा में होते हैं।

3. इनीशिएसन कोडोन (Initiation Codon) :
सभी प्रोकैरियोट तथा यूकैरियोट में प्रोटीन संश्लेषण की शुरुआत इनीशिएशन कोडोन AUG से होती है।

4. कोडिंग क्षेत्र (Coding Region) :
यह AUG के पश्चात् उपस्थित क्षारक क्रमों का क्षेत्र है जो प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया में भाग लेता है। इसमें उपस्थित सभी न्यूक्लिओटाइड एक जीन के निर्देश को प्रोटीन में अनुवादित करते हैं।

5. टर्मिनेटिंग कोडोन (Terminating Codon) :
ये क्षारक क्रम UAA, UAG या UGA से अंकित होते हैं। इन कोडोन के आते ही प्रोटीन बनने की श्रृंखला समाप्त हो जाती है।

6. पॉली ‘A’ क्रम (Poly ‘A’ Sequence) :
m-RNA के छोर (end) पर एक लम्बी लगभग 200 न्यूक्लिओटाइड की श्रृंखला होती है जो Adenylic acid (poly’A’ अर्थात् AAAAAA….A) क्रम में रहती है। यह m-RNA की पूँछ (tail) है। यह m-RNA के साइटोप्लाज्म तक पहुँचने से पूर्व केन्द्रक में जोड़ी जाती है।

प्रश्न 2.
ए०टी०पी० की संरचना तथा कार्य लिखिए। या पादप कोशिका में ऊर्जा की मुद्रा क्या है? किन्हीं तीन ऊर्जा वाहकों का नाम लिखिए।
उत्तर :

ए०टी०पी० या ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट

सभी जीवित कोशिकाओं में ए०टी०पी० अणु महत्त्वपूर्ण संरचना वाले पदार्थ हैं। ये अपने अन्तिम दो फॉस्फेट समूहों के अन्तर्गत अत्यधिक ऊर्जा को इस प्रकार संचित रखते हैं कि आवश्यकतानुसार (कम ऊर्जा वाले स्थान या समय में) टूटकर इसको मुक्त कर देते हैं और इस (UPBoardSolutions.com) ऊर्जा का उपयोग जीव अपने कार्यों के सम्पादन हेतु कर लेता है। इस प्रकार, ये ऊर्जा के सिक्के (energy coins) हैं, जो सभी प्रकार की उपापचयिक क्रियाओं में, फिर चाहे ये उपचयी (anabolic) हों अथवा अपचयी (catabolic), अपना स्थान रखते हैं ऊर्जा ग्रहण करते हैं अथवा ऊर्जा मुक्त करते हैं, अतः इन्हें उपापचयी (metabolic) जगत का सिक्का भी कहते हैं।

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किसी भी ऐसे स्थान पर, कोशिका में जहाँ ऊर्जा की कमी होती है, ATP का एक उच्च ऊर्जा बन्ध टूट जाता है और यह ADP (ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट) में बदल जाता है। इस प्रकार जो ऊर्जा प्राप्त होती है। वह सभी प्रकार की उपापचयी (metabolic) अभिक्रियाओं में प्रयुक्त होती है। विभिन्न प्रकार की ऑक्सीकारक क्रियाओं में (विशेषकर श्वसन में) ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा ABP से ATP बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती है। ऊर्जा वाहक (Energy carriers)-पादप कोशिका में ए०टी०पी० (ATP) के अतिरिक्त कई अन्य पदार्थ भी ऊर्जा वाहक का कार्य करते हैं; जैसे

  1. ऐसीटिल को-एन्जाइम ‘ए’ (acetyl co-enzyme (‘A’)
  2. ग्वानोसीन ट्राइफॉस्फेट (guanosine triphosphate = GTP)
  3. निकोटिनेमाइड ऐडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड (nicotinamide adenine dinucleotide =NAD) इन ऊर्जा वाहकों का मुख्य मध्यस्थ यौगिक भी ए०टी०पी० ही होता है।

प्रश्न 3.
एन्जाइम के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
एन्जाइम्स के कार्य एन्जाइम्स वे रासायनिक पदार्थ हैं जो जीवों में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं की गति को प्रेरित करते हैं। ये सामान्यत: अभिक्रिया में भाग नहीं लेते हैं। ये मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार के रासायनिक परिवर्तनों को प्रेरित करते हैं।

1. जल अपघटन (Hydrolysis) :
जब पदार्थ के अणु जल के अणु ग्रहण करके अपेक्षाकृत छोटे अणुओं में विघटित हो जाते हैं, इस प्रकार की क्रियाओं को जल अपघटन कहते हैं; जैसे—प्रोटीन्स जल अपघटन द्वारा प्रोटिओजेज, पेप्टोन्स, पॉलिपेप्टाइड्स (proteoses, peptones, polypeptides) तथा अन्त में अमीनो अम्ल (amino acid) में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी प्रकार मण्ड, शर्करा आदि के मोनोसैकेराइड्स (monosaccharides) में परिवर्तन भी जल अपघटन क्रिया के ही उदाहरण हैं। जीवित कोशिकाओं में निर्जलीकरण (dehydration) की भी उतनी ही सम्भावनाएँ हैं जितनी कि जल अपघटन की होती हैं। इन्हें भी एन्जाइम्स ही प्रेरित करते हैं।

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2. कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation) :
इस प्रकार की क्रियाओं में COOH-समूह विलग होने से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का निर्माण होता है। पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid), डीकार्बोक्सीलेज (decarboxylase) एन्जाइम द्वारा ऐसीटैल्डिहाइड (acetaldehyde) तथा CO2 में विघटित हो जाता है।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 8
यद्यपि इस क्रिया में को-फैक्टर तथा को–एन्जाइम भी कार्य करते हैं और यह क्रिया अत्यधिक जटिल होती है।

3. ऑक्सीकरण व अवकरण (Oxidation and reduction) :

उपापचय क्रिया के समय खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है। ग्लूकोज के एक ग्राम अणु से ,0 व CO, बनने में ऑक्सीकरण के फलस्वरूप 4.1 cal ऊर्जा उत्पन्न होती है। सदैव ही ऑक्सीकरण की क्रिया के अन्तर्गत एक पदार्थ का ऑक्सीजन क्षय अथवा (UPBoardSolutions.com) हाइड्रोजन ग्रहण द्वारा अवकरण होता है। ऑक्सीजन क्षय द्वारा अवकृत पदार्थ ऑक्सीजन दाता (Oxygen donor) कहलाता है। तथा ऑक्सीकृत पदार्थ ग्राहक (acceptor) कहलाता है। इसी प्रकार हाइड्रोजन ग्रहण द्वारा अवकृत पदार्थ हाइड्रोजन ग्राहक (hydrogen acceptor) तथा अवकारक पदार्थ हाइड्रोजन दाता (hydrogen donor) कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
विकर के प्रकार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
सन् 1961 में अन्तर्राष्ट्रीय जैव रसायनज्ञ संघ (IUB) ने विकर वर्गीकरण वे नामकरण की एक नवीन पद्धति का अनुसरण किया। इसके अनुसार विकर का नाम ‘‘स्वव्याख्या’ (self explanatory) द्वारा सम्पन्न होता है। इस पद्धति के अनुसार विकरों का वर्गीकरण छ: मुख्य वर्गों में किया गया है

1. ऑक्सीडोरिडक्टेजेज (Oxidoreductases) :
इस वर्ग में ऑक्सीकरण-अपचयन (oxidation-reduction) की अभिक्रियाएँ उत्प्रेरित करने वाले विकर आते हैं। ये इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण (electron transport) को उत्प्रेरित करते हैं।

उदाहरणार्थ
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(ii) 
Cytochrome-oxidase (साइटोक्रोम-ऑक्सीडेज) ऑक्सीजन का अपचयन करके cyt. a3 का ऑक्सीकरण करता है।

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2. ट्रान्सफरेजेज (Transferases) :
वे विकर जो एक क्रियाधार (substrate) से H के अतिरिक्त अन्य किसी भी समूह को दूसरे अणु में स्थानान्तरित कर देते हैं, ट्रान्सफरेज कहलाते हैं। स्थानान्तरित होने वाले समूह प्राय: अमीनो एसाइल, मिथाइल ग्लूकोसिल, फॉस्फेट, थायोल, कीटोन, फार्माइल आदि होते हैं; जैसे– डी-हेक्सोज-6-फॉस्फोट्रान्सफरेज (हेक्सोकाइनेज-hexokinase) ATP से एक फॉस्फेट अणु का स्थानान्तरण ग्लूकोस को कर देता है।
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3. हाइड्रोलेजेज (Hydrolases) :
वे विकर जो क्रियाधार (substrate) का जल अपघटन (hydrolysis) करते हैं, हाइड्रोलेज कहलाते हैं; जैसे–पाचक एन्जाइम, ग्लूटामीन हाइड्रोलेज (ग्लूटामिनेज- glutaminase) आदि।
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4. लायेजेज (Lyases or Desmolases) :
वे विकर जो जल अपघटन के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से क्रियाधार (substrate) में से समूहों को हटाते या जोड़ते हैं, लायेजेज कहलाते हैं; जैसे

  1. मैलेट-हाइड्रोलायेज (फ्यूमेरेज-fumerase)
  2.  डीकार्बोक्सीलेज (कार्बनिक एनहाइड्रेज-carbonic anhydrase)
  3. कीटोज-1-फॉस्फेट ऐल्डिहाइड लायेज (ऐल्डोलेज-aldolase) आदि।

5. आइसोमेरेजेज (Isomerases) :
ये विकर क्रियाधार (substrate) में समूहों की अन्त: अवस्था में परिवर्तन कर पुनर्व्यवस्था को उत्प्रेरित करते हैं अर्थात् किसी यौगिक के एक समावयवी (isomer) को दूसरे समावयवी में बदलते हैं। इन्हें आइसोमेरेज कहते हैं, जैसे

  1. ट्रायोज आइसोमेरेज (triose isomerase)
  2.  फॉस्फोहेक्सोसआइसोमेरेज (phosphohexoseisomerase)
  3.  फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेज (phosphoglyceromutase) आदि।

6. लाइगेजेज (Ligases) :
ये विकर सिन्थेटेज (synthetase) के नाम से भी जाने जाते हैं। ये ATP से ऊर्जा प्राप्त कर यौगिकों को जोड़ने की अभिक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं; जैसे

  1. को-एन्जाइम ए लाइगेज (ऐसीटाइल को-एन्जाइम-ए सिन्थेटेज)
  2. अमोनिया लाइगेज (ग्लूटामीन सिन्थेटेज) आदि।।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्बोहाइड्रेट्स के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए। मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का क्या महत्त्व है? या कार्बोहाइड्रेट्स की प्रमुख श्रेणियों के नाम लिखिए। इन श्रेणियों में प्रमुख अन्तर क्या होते हैं? इन्हें सैकेराइड्स क्यों कहते हैं?
उत्तर :

कार्बोहाइड्रेट्स तथा उनके प्रकार (संवर्ग) या श्रेणियाँ

ये कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के यौगिक हैं तथा इनका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है अर्थात् इनमें कार्बन, हाइड्रोजन तथा
ऑक्सीजन का अनुपात 1: 2 : 1 का होता है। कार्बोहाइड्रेट्स को सैकेराइड्स (saccharides) भी कहते हैं क्योंकि इनके छोटे अणु स्वाद में मीठे होते हैं। स्पष्टतः इनमें हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का अनुपात जेल के समान (H2O) होता है। कुछ कार्बोहाइड्रेट्स में सल्फर, नाइट्रोजन (UPBoardSolutions.com) तथा फॉस्फोरस तत्त्व भी होते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण सभी क्लोरोफिल युक्त जीवाणुओं, शैवालों, पौधों आदि के द्वारा किया जाता है। कार्बोहाइड्रेट्स के प्रमुखत: तीन प्रकार (संवर्ग) होते हैं

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(i) मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides) :
ये सरलतम कार्बोहाइड्रेट्स हैं तथा सबसे छोटे होते हैं। इन्हें प्राय: सरल शर्कराएँ (simple sugars) कहते हैं तथा ये स्वाद में मीठे और जल में घुलनशील होते हैं। इनके बनने की इस क्रिया को बहुलीकरण (polymerization) कहते हैं। इनमें उपस्थित कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर इन्हें ट्राइओज (triose) जैसे ग्लिसरैल्डिहाइड (glyceraldehyde); टेट्रोज (tetrose) जैसे इरिथ्रोज (erythrose); पेण्टोज (pentose) जैसे राइबोज (ribose), डीऑक्सीराइबोज (deoxyribose) आदि; हेक्सोज (hexose) जैसे ग्लूकोज (glucose C6H1206), फ्रक्टोज (fructose) आदि, हेप्टोज (heptose) जैसे हेप्ट्यू लोज (heptulose) आदि वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

(ii) ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides) :
ऐसे कार्बोहाइड्रेट्स दो से दस तक मोनोसैकेराइड इकाइयों से मिलकर इनके बहुलक के रूप में होते हैं। इनके बनने की इस क्रिया को बहुलीकरण (polymerization) कहते हैं। बेहुलीकरण के लिए मोनोसैकेराइड्स ग्लाइकोसिडिक बन्ध (glycosidic bond) के द्वारा जुड़ते हैं। ये भी अधिकतर स्वाद में मीठे तथा जल में घुलनशील होते हैं। ये रेखीय श्रृंखला में होते हैं किन्तु जल में घुलने पर चक्रीय स्वरूप में आ जाते हैं। इसी अवस्था में इनका बहुलीकरण भी होता है। ग्लाइकोसिडिक बन्ध बनाने में एक मोनोसैकेराइड का ऐल्डिहाइड या कीटोन (aldehyde or ketone) समूह दूसरे मोनोसैकेराइड के हाइड्रोक्सिल (ऐल्कोहॉलीय) समूह से जुड़ता है तथा जल का एक अणु बनाता है। सामान्यत: ऑलिगोसैकेराइड्स डाइसैकेराइड्स (disaccharides) ही पाये जाते हैं। इनमें दो मोनोसैकेराइड्स होते हैं। अधिक मोनोसैकेराइड्स वाले ऑलिगोसैकेराइड्स अन्य कार्बनिक यौगिकों जैसे-प्रोटीन्स, लिपिंड्स के साथ मिलकर ग्लाइकोप्रोटीन्स, ग्लाइकोलिपिड्स आदि बनाते हैं। जन्तुओं में ये प्रायः कोशिका कला (plasma membrane) का बाह्य आवरण बनाते हैं। डाइसैकेराइड प्रमुखतः माल्टोज (maltose), सुक्रोज (sucrose) आदि होते हैं।

(iii) पॉलिसैकेराइड्स (Polysaccharides) :
इन्हें ग्लाइकन्स (glycans) भी कहते हैं। ये सामान्यत: संगृहीत खाद्य के रूप में जीवद्रव्य में पाये जाते हैं। इनके निर्माण में दस से अधिक (कभी-कभी काफी जैसे सैकड़ों, हजारों) मोनोसैकेराइड इकाइयाँ (शाखित या अशाखित रेखीय श्रृंखला में) आपस में सम्बन्धित होती हैं; जैसे–मण्ड (starch), सेल्यूलोज (cellulose), ग्लाइकोजन (glycogen) आदि। इनका अणुभार (molecular weight) लाखों में होता है।

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कार्बोहाइड्रेट्स का मानव शरीर में महत्त्व

मानव शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स का महत्त्व इस प्रकार है

  1. ये श्वसन आधार (respiratory substrate) होते हैं। इन्हीं से ऊर्जा (energy) उत्पन्न की जाती है, इसीलिए इन्हें ‘जीव का ईंधन’ कहते हैं अर्थात् ये शरीर के लिए ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है
  2. अन्य कार्बनिक अथवा अकार्बनिक अणुओं या मूलकों से मिलकर ये अनेक महत्त्वपूर्ण पदार्थ बनाते हैं; जैसे—पेण्टोज शर्कराएँ न्यूक्लिक अम्लों के अणुओं का अनिवार्य भाग होती हैं। ये ATP के संश्लेषण में भी सहायक होते हैं।
  3. इनका महत्त्व खाद्य संचय के लिए अत्यधिक है; जैसे शरीर में ये ग्लाइकोजन (glycogen) के रूप में संचित रहते हैं।
  4. ये रुधिर का थक्का जमने (clotting) से रोकने में सहायक होते हैं; जैसे—हीपैरिन (heparin)।
  5. शर्करा के कुछ अणु अस्थि सन्धियों पर स्नेहक (चिकनाई) का कार्य करते हैं।
  6. कोशिका कला की बाहरी सतह पर ग्लाइकोप्रोटीन्स तथा ग्लाइकोलिपिड्स के रूप में संयुक्त कार्बोहाइड्रेट्स की उपस्थिति कलाओं की पहचान बनाती है और ग्राही का कार्य करती है।
  7. लारे, म्यूकस, रुधिर समूह के एण्टीजेन्स में भी शर्करा के अणु उपस्थित होते हैं।

प्रश्न 2.
एन्जाइम की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए। विभिन्न प्रकार के कारकों को एन्जाइम की क्रिया-विधि पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए। या विकर की संरचना का वर्णन कीजिए तथा इसकी उत्प्रेरित अभिक्रियाओं को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो कारकों का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
उत्तर :

एन्जाइम्स

एन्जाइम्स (enzyme, Gr, en = in; zyme = yeast) विशेष प्रकार के कार्बनिक उत्प्रेरक (organic catalysts) हैं जो जीवों में रासायनिक प्रक्रियाओं के उत्प्रेरण के लिए उत्तरदायी होते हैं। जीवतन्त्र में एन्जाइम्स की उपस्थिति का ज्ञान बहुत पुराना है। यद्यपि एन्जाइम (enzyme) नाम तब पड़ा, जब कुहने (Kuhne, 1878) ने यीस्ट (yeast) में पाये जाने वाले खमीर को इस नाम से पुकारा। प्राय: सभी एन्जाइम्स प्रोटीन (protein) के बने होते हैं। इनकी संरचना जटिल तथा अणुभार भी बहुत अधिक होता है। जीव तन्त्र के बाहर अर्थात् प्रयोगशाला में इनका संश्लेषण अभी सम्भव नहीं है। वैज्ञानिकों ने कई एन्जाइम्स (enzymes) को कोशिकाओं से (UPBoardSolutions.com) निकालकर उनके रवे (crystals) प्राप्त किये हैं। अनेक एन्जाइम; जैसे—पेप्सिन (pepsin) में शुद्ध प्रोटीन के साथ अन्य पदार्थ जुड़े रहते हैं। अनेक एन्जाइम में प्रोटीन के साथ किसी धातु; जैसे-लोहा (Fe), जस्ता (Zn), ताँबा (Cu) आदि के अंश सम्बद्ध होते हैं, जैसे—साइटोक्रोम्स (cytochromes) में लोहा होता है आदि। एज़ाइम के प्रोटीन तथा नॉन-प्रोटीन भाग क्रमश: एपोएन्जाइम  (apoenzyme) तथा प्रोस्थेटिक ग्रुप (prosthetic group) कहलाते हैं तथा सम्पूर्ण एन्जाइम को होलोएन्जाइम (holoenzyme) कहते हैं। कुछ एन्जाइम्स की सक्रियता उनसे लगे हुए आयनों (ions) पर निर्भर करती है। ऐसे आयनों को डायलिसिस (dialysis) द्वारा विलग किया जा सकता है। इस प्रकार के आयन सक्रिय कारक होते हैं।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 9 Biomolecules image 13

एन्जाइम्स की क्रिया-विधि

वास्तव में, एन्जाइम जिस क्रिया के प्रति अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं, वे अपने-आप भी होती हैं। किन्तु अत्यधिक धीमी गति से। एन्जाइम कैसे कार्य करता है? इस बारे में समय-समय पर अनेक विचारधाराएँ प्रस्तुत की गई हैं, जैसे. हेनरी (Henry, 1903) ने बताया कि एन्जाइम अपने क्रियाधार या सब्सट्रेट (substrate) से मिलकर एक यौगिक बना लेते हैं। बाद में, इस सिद्धान्त को एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) परिकल्पना कहा गया। इसके अनुसार, एन्जाइम के बाह्य तल पर विशेष प्रकार की संरचनाएँ होती हैं जिनको टेम्प्लैट (template) कहते हैं। इन्हीं में आधारीय पदार्थों के अणु हँस जाते हैं। इन अणुओं की संरचना टेम्प्लैट के अनुसार होती है। इस प्रकार बनने वाले विशिष्ट घनिष्ठ साहचर्य की स्थापना के विषय में निम्नलिखित दो सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं

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1. ताला-कुँजी सिद्धान्त
इस विचारधारा को वैज्ञानिक एमिल फिशर (Emil Fisher, 1894) ने दिया। इसके अनुसार, एन्जाइम क्रियाधार (substrate) के साथ क्रिया कर एन्जाइम-सब्सट्रेट कॉम्प्लेक्स (enzyme-substrate complex) नामक अत्यधिक सक्रिय अस्थाई यौगिक बनाता है। इस कॉम्प्लेक्स से अन्त में एन्जाइम अलग हो जाता है तथा क्रियाधार से नया पदार्थ बनता है।
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2. प्रेरित आसंजन सिद्धान्त
कॉशलेण्ड (Koshland, 1960) द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त में ये माना गया है कि एन्जाइम का सक्रिय स्थल (active site) स्थिर संरचना का न होकर परिवर्तन योग्य होता है। एक विशेष प्रकार का क्रियाधार (substrate) एक विशेष एन्जाइम के सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित करने में सक्षम होता
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है अर्थात् प्रारम्भ में सब्सट्रेट की रचना तथा सक्रिय स्थल की रचना अनुपूरक (complementary) नहीं होती, किन्तु सक्रिय स्थल में परिवर्तन प्रेरित कर यह क्रियाधार इसे अपने अनुपूरक बना लेता है और एन्जाइम के साथ संयुक्त हो जाता है। इसके बाद की क्रियाओं में सक्रिय स्थल क्रियाधार के बॉण्ड्स (bonds) को विच्छेदित कर उत्पादक पदार्थों को मुक्त कर देता है।

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एन्जाइम की सक्रियता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित कारक

एन्जाइम की क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं

1. ताप (Temperature) :
एन्जाइम को जिस स्थान पर कार्य करना है, वहाँ का ताप; सामान्यतः 35° से 45°C होना चाहिये। इससे अधिक या कम ताप पर एन्जाइम की क्रियाशीलता कम हो जाती है। 60°-65°C ताप तथा इससे अधिक ताप पहुँचने पर एन्जाइम प्रायः नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार, कम ताप (UPBoardSolutions.com) पर भी इनकी क्रियाशीलता घटती है और 0°C पर पहुँचने पर ये प्रायः निष्क्रिय होकर परिरक्षित (preserve) हो जाते हैं।

2. pH का मान (Value of pH) :
कुछ एन्जाइम्स अम्लीय माध्यम में तथा अन्य क्षारीय माध्यम में क्रियाशील होते हैं, इसके विपरीत ये कार्य नहीं करेंगे। वास्तव में, प्रत्येक एन्जाइम एक विशेष pH माध्यम में ही उच्चतम क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। pH मान कम या अधिक होने पर एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। pH परिवर्तन से अभिक्रिया की दिशा भी बदल सकती है।
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pH परिवर्तन से एन्जाइम, क्रियाधार, सक्रियकारक व संदमकों की घुलनशीलता तथा आयनीकरण प्रभावित होते हैं। एन्जाइमों पर अम्लीय अथवा क्षारीय आयनों युक्त अनेक पाश्र्व श्रृंखलाएँ पायी जाती हैं। pH परिवर्तनों से इन पार्श्व श्रृंखलाओं में परिवर्तन होने से आयनीकरण प्रभावित होता है।

3. आर्द्रता (Humidity) :
10-25% आर्द्रता पर एन्जाइम सक्रियता समाप्त हो जाती है। अनुकूलतम बिन्दु तक आर्द्रता बढ़ाने पर एन्जाइम की सक्रियता बढ़ती है।

4. अन्तिम उत्पादों की सान्द्रता (Concentration of end products) :
अन्तिम उत्पादों के संचयन (accumulation) से एन्जाइम की सक्रियता कम हो जाती है। उत्पाद संचयन से अभिक्रिया का विपरीत दिशा में तीव्र होना, एन्जाइम की सतह पर संचयन
से एन्जाइम का निष्क्रिय होना अथवा उत्पादों द्वारा pH प्रभावित होना आदि पाया जाता है। कभी-कभी उत्पाद सक्रिय स्थल पर जुड़कर उसे अवरुद्ध कर देता है। इस घटना को पुनर्निवेशित
संदमन feedback inhibition)कहते हैं।

5. सक्रियकारक (Activators) :
अनेक अकार्बनिक आयन अथवा परमाणु सूक्ष्म मात्रा में रहकर एन्जाइमों की सक्रियता बढ़ा देते हैं; जैसे-K+, Mg++, Mn++, Cl आदि। सक्रियकारक क्रियाधार व एन्जाइम के जुड़ने में सहायक होते हैं।

6. प्रोटीनविष (Protein poisons) :
भारी धातु (Hg++, Ag++, Pb++ आदि)-COOH अथवा -SH से जुड़ जाते हैं। ऑक्सीकारक (oxidants) S-S बन्ध बनाकर एन्जाइम की संरचना में परिवर्तन कर देते हैं। साइनाइड्स (cyanides), कार्बन मोनोऑक्साइड (carbon monoxide), फ्लोराइड्स (fluorides) आदि सक्रियकारक के साथ जुड़कर सम्मिश्र बनाते हैं। ये सब अप्रतियोगी संदमक (non-competitive inhibitors) कहलाते हैं।

7. क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ (Substrate analogues) :
क्रियाधार आकृतिक अनुरूप पदार्थ एन्जाइम के सक्रिय स्थल के लिये होड़ करते हैं। इनकी उपस्थिति से एन्जाइम सक्रियता में कमी होती है। इन पदार्थों को प्रतियोगी संदमक (competitive inhibitors) कहते हैं। इस संदमन को क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से दूर किया जा सकता है।

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8. विकिरण (Radiant rays) :
उच्च ऊर्जा किरणों (X-rays, gamma rays, ultraviolet rays) आदि से विभिन्न बन्ध टूटकर (-SH) नये बन्ध (S-S) बनते हैं जिससे एन्जाइम सक्रियता कम हो जाती है।

9. क्रियाधार की सान्द्रता (Substrate concentration) :
यदि एन्जाइम की मात्रा अधिक हो तो क्रियाधार की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है।

10. एन्जाइम की सान्द्रता (Enzyme concentration) :
यदि क्रियाधार की सान्द्रता अधिक हो तो एन्जाइम की सान्द्रता बढ़ाने से अभिक्रिया की दर में वृद्धि होती है। एन्जाइम के द्वारा सम्पादित प्रतिक्रियाएँ प्रतिवर्ती (reversible) होती हैं। अतः संश्लेषणात्मक (synthetic) प्रतिक्रिया होगी या विखण्डनात्मक (decompositional), इसका निर्णय अन्य दशाओं पर निर्भर होगा, न कि एन्जाइम पर। सामान्यतः किसी भी ऐसी प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पादित (produced) पदार्थ को अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा हटाया जाते रहना चाहिये। (UPBoardSolutions.com) इसलिये एन्जाइम प्रक्रियाएँ सामूहिक एवं शृंखलाबद्ध serial) होती हैं, क्योंकि प्रत्येक क्रिया में बना हुआ उत्पाद (product) अगली प्रतिक्रिया के लिये आधारीय पदार्थ (substrate) का कार्य करता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 8 Weather Instruments. Maps and Charts

UP Board Solutions for Class 11 Geography: Practical Work in Geography Chapter 8 Weather Instruments. Maps and Charts (मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनें|
(i) प्रत्येक दिन के लिए भारत के मौसम मानचित्र का निर्माण कौन-सा विभाग करता है?
(क) विश्व मौसम संगठन
(ख) भारतीय मौसम विभाग
(ग) भारतीय सर्वेक्षण विभाग
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-(ख) भारतीय मौसम विभाग।

(ii) उच्च एवं निम्न तापमानों में कौन-से द्रवों का प्रयोग किया जाता है?
(क) पारी एवं जल
(ख) जल एवं अल्कोहल ।
(ग) पारा एवं अल्कोहल
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर-(ग) पारा एवं अल्कोहल।

(iii) समान दाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाओं को क्या कहा जाता है?
(क) समदाब रेखाएँ
(ख) समवर्षा रेखाएँ
(ग) समताप रेखाएँ
(घ) आइसोहेल रेखाएँ।
उत्तर-(क) समदाब रेखाएँ।

(iv) मौसम पूर्वानुमान का प्राथमिक यन्त्र है
(क) तापमापी
(ख) दाबमापी
(ग) मानचित्र
(घ) मौसम चार्ट
उत्तर-(क) तापमापी।

(v) अगर वायु में आर्द्रता अधिक है, तब आई एवं शुष्क बल्ब के बीच पाठ्यांक का अन्तर होगा
(क) कम ।
(ख) अधिक
(ग) समान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-(क) कम।

प्रश्न 2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें
(i) मौसम के मूल तत्त्व क्या हैं?
उत्तर-मौसम तत्त्वों के अन्तर्गत तापमान, वायुदाब, पवन, आर्द्रता तथा मेघों की दशाएँ सम्मिलित हैं। इन तत्त्वों के आधार पर वायुमण्डलीय दशाओं में कम समय अन्तराल पर परिवर्तन होता रहता है। इन्हीं तत्त्वों के आधार पर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

(ii) मौसम चार्ट क्या है?
उत्तर-मौसम पूर्वानुमान के लिए मौसम चार्ट प्राथमिक यन्त्र है। ये विभिन्न वायुमण्डलीय दशाओं; जैसे-वायुराशियों, वायुदाब यन्त्रों, वाताग्रों तथा वर्षण को जानने एवं पहचानने में सहयोग करते हैं।

(iii) वर्ग 1 के वेधशालाओं में सामान्यतः कौन-सा यन्त्र मौसम परिघटनाओं को मापने के लिए होता है?
उत्तर-भारत में मौसम वेधशालाओं को उनके यन्त्रों तथा प्रतिदिन लिए गए प्रेक्षणों की संख्या के आधार पर पाँच वर्गों में विभाजित किया जाता है। इनमें उच्चतम वर्ग-1 की वेधशाला है। वर्ग-1 की वेधशाला में अग्रलिखित यन्त्रों द्वारा मौसम के तत्त्वों को मापन किया जाता है

  1. अधिकतम एवं न्यूनतम तापमापी,
  2. पनवेग तथा वात-दिग्दर्शी,
  3. शुष्क एवं आर्द्र बल्ब तापमाण,
  4. वर्षामापी तथा
  5. वायुदाबमापी। |

(iv) समताप रेखाएँ क्या हैं?
उत्तर-मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई रेखाएँ समताप रेखाएँ कहलाती हैं।

(v) निम्नलिखित को मौसम मानचित्र पर चिह्नित करने के लिए किस प्रकार के मौसम प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है?
(क) धुन्ध, (ख) सूर्य का प्रकाश, (ग) तड़ित, (घ) मेघों से ढका आकाश
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 11 Geography Practical Work in Geography Chapter 8 Weather Instruments. Maps and Charts (मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट) img 1

प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लगभग 125 शब्दों में दें
(i) मौसम मानचित्रों एवं चार्टी को किस प्रकार तैयार किया जाता है तथा ये हमारे लिए कैसे उपयोगी हैं?
उत्तर–मौसम मानचित्र पृथ्वी या उसके किसी भाग का अल्प समय (एक दिन) के मौसमी परिघटनाओं का समतल धरातल पर प्रदर्शन है। इन मानचित्रों पर एक निश्चित दिन के विभिन्न मौसम तत्त्वों; जैसे—तापमान, वर्षा, सूर्य का प्रकाश, मेघमयता, वायु की दिशा एवं वेग, वायुदाब इत्यादि को दर्शाया जाता है। इनको तैयार करने में केन्द्रीय कार्यालय द्वारा प्राप्त सूचनाओं, अभिलेख, निर्धारित प्रतीक या चिह्न और मौसम मानचित्र विधियों का प्रयोग किया जाता है। अतः मौसम मानचित्र बनाने के लिए मौसम सम्बन्धी सूचनाओं और प्रतीकों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। इन्हीं चिह्नों या प्रतीकों को विभिन्न स्थानों की सूचनाओं के साथ निर्धारित केन्द्रों पर अवस्थित किया जाता है। भारत में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना के बाद से

मौसम मानचित्र एवं चार्यों को नियमित रूप से तैयार किया जाता है। मौसम चार्ट में मौसम सम्बन्धी सूचनाओं एवं प्रतीकों को प्रदर्शित किया जाता है। इस चार्ट के माध्यम से कम स्थान पर मौसम सम्बन्धी अधिकतम सूचनाएँ प्राप्त हो जाती हैं। इनको तैयार करने में मानचित्र की आवश्यकता नहीं होती, केवल मौसम सूचनाओं को प्रतीकों द्वारा क्रमबद्ध रूप से संयोजन किया जाता है। मौसम मानचित्र एवं मौसम चार्ट सम्बन्धित स्थान की मौसम दशाओं को समझने में अत्यन्त उपयोगी हैं। इनके आधार पर निर्धारित स्थान की मौसम दशाओं के आधार पर कृषि एवं अन्य कार्यों की विशेष योजनाएँ तैयार की जा सकती हैं जो सामाजिक-आर्थिक विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती हैं।

मानचित्र पठन

प्रश्न 1. पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 एवं 8.13 को पढे एवं निम्न प्रश्नों के उत्तर दें
(i) इन मानचित्रों में किन ऋतुओं को दर्शाया गया है?
उत्तर-मानचित्र 8.12 में शीत ऋतु (जनवरी माह) की दशाओं को तथा मानचित्र 8.13 में ग्रीष्म ऋतु (जुलाई माह) की दशाएँ दर्शाई गई हैं।

(ii) पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में अधिकतम समदाब रेखा का मान क्या है तथा यह देश के किस भाग से गुजर रही है?
उत्तर-पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में अधिकतम समदाब रेखा का मान ‘1020 है। यह देश के उत्तरी-पश्चिमी भाग (जम्मू-कश्मीर) से गुजरती है।

(iii) पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.13 में सबसे अधिक एवं सबसे कम समदाब रेखाओं का मान क्या है। तथा ये कहाँ स्थित हैं?
उत्तर-पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.13 में सबसे अधिक 1010 की समदाब रेखा दक्षिण-पश्चिम (केरल) भारत में तथा सबसे न्यून समदाब रेखा 997 उत्तर-पश्चिमी भारत (राजथान से जम्मू-कश्मीर के सीमान्त भाग) में स्थित है।

(iv) दोनों मानचित्रों में तापमान वितरण का प्रतिरूप क्या है?
उत्तर-पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में उत्तर की ओर तापमान घटता जाता है तथा चित्रे 8.13 में तापमान उत्तर एवं दक्षिण में अधिक है। (v) पाठ्य-पुस्तक चित्र 8.12 में किस भाग का अधिकतम औसत तापमान तथा न्यूनतम औसत तापमान आप देखते हैं? उत्तर-अधिकतम औसत तापमान दक्षिण भारत (25°C तमिलनाडु) में तथा न्यूनतम औसत तापमान (10°C जम्मू-कश्मीर) उत्तरी भारत में है।

(vi) दोनों मानचित्रों में आप तापमान वितरण एवं वायुदाब के बीच क्या सम्बन्ध देखते हैं?
उत्तर-तापमान बढ़ता है और वायुदाब कम होता जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मौसम मानचित्र क्या है? इसका प्रकाशन किस प्रकार होता है?
उत्तर-मौसम मानचित्र
प्रायः किसी स्थान की एक समय-विशेष की वायुमण्डलीय दशाओं के योग को मौसम कहा जाता है। तापमान, वायुदाबे, आर्द्रता, वर्षा, पवनें तथा आकाशीय दशाएँ वायुमण्डल के प्रमुख अंग हैं, जिन्हें जलवायु या मौसम के प्रमुख तत्त्व कहा जाता है।

जिन मानचित्रों में मौसम-चिह्नों की सहायता से मौसम के विभिन्न तत्त्वों का प्रदर्शन किया जाता है, उन्हें मौसम मानचित्र कहा जाता है। मौसम मानचित्र की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-

मौसम मानचित्र उन मानचित्रों को कहते हैं जिनमें किसी क्षेत्र के निश्चित समय के तापमान, वायुदाब, पवन-संचार, वर्षा आदि के विवरण प्रकाशित किए गए हों।’ मौसम की भविष्यवाणी करने के लिए इने मानचित्रों की विशेष सहायता ली जाती है।

मौसम मानचित्रों का प्रकाशन

मौसम मानचित्रों की उपयोगिता को देखते हुए भारत सरकार ने इनके नियमित प्रकाशन हेतु मौसम विज्ञान की स्थापना की है। इस विभाग का मुख्य कार्यालय पुणे (महाराष्ट्र) में है। उत्तरी भारत में मौसम निदेशालय (Directorate of Meteorology) की स्थापना लोधी रोड, नई दिल्ली में की गई है। इस विभाग द्वारा देश के विभिन्न भागों में स्थित वेधशालाओं से मौसम सम्बन्धी आँकड़े एवं विवरण प्राप्त किए जाते हैं, उन्हीं के आधार पर प्रतिदिन मौसम मानचित्रों की रचना की जाती है। मौसम मनिचित्रों में मौसम सम्बन्धी विवरण मौसम-चिह्नों की सहायता से प्रकाशित किए जाते हैं। यह विभाग मौसम मानचित्रों के साथ-साथ प्रतिदिन मौसम भविष्यवाणियों का रेडियो तथा दूरदर्शन से प्रसारण भी करता है।

प्रश्न 2. मौसम मानचित्रों में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के मौसम चिह्न या प्रतीक बनाइए।
या मौसम चिह्न क्या हैं? विभिन्न प्रकार के मौसम चिह्नों को प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-मौसम चिह्न मौसम मानचित्रों में मौसम के विभिन्न विवरण दर्शाने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें मौसम चिह्न कहते हैं। चिह्नों के अभाव में मानचित्रों की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। वस्तुतः मौसम मानचित्रों का अध्ययन अधूरा है। मौसम-चिह्नों का प्रयोग सर्वप्रथम एडमिरल ब्यूफोर्ट ने 1805 ई० में किया था। 1935 ई० में वारसा में सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान सम्मेलन ने इन चिह्नों को मान्यता प्रदान कर दी है। अब इनका प्रयोग अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों में प्रकाशित होने वाले मौसम मानचित्रों में किया जाने लगा है। महत्त्वपूर्ण मौसम चिह्न अग्रांकित हैं-

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मेघ दशाचिह

मेघ की दशाओं या मेघाच्छादन की मात्रा के चिह्न निम्नांकित चित्र 8.2 में दर्शाए गए हैं
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ब्यूफोर्ट वायुगति चिह

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प्रश्न 3. निम्नलिखित मौसम यन्त्रों का सचित्र वर्णन कीजिए
(i) तापमापी, (ii) वायुदाबमापी, (iii) वातदिग्दर्शी, (iv) पवन वेगमापी, (v) वर्षामापी।
उत्तर-(i) तापमापी ।
किसी स्थान का तापमान थर्मामीटर द्वारा नापा जाता है। अधिकांश तापमापी संकीर्ण बन्द शीशे की नली के रूप में होते हैं, जिनके एक सिरे पर प्रसारित बल्ब होता है। नली के निचले भाग एवं बल्ब में तरल पदार्थ (जैसे—अल्कोहल या पारा) भरा होता है। तापमापी का बल्ब जो वायु के सम्पर्क में रहता है। तात्कालिक अवस्था के परिणामस्वरूप गर्म या ठण्डा होता है। गर्म होने पर पारा ऊपर की ओर चढ़ता है, जबकि ठण्डा होने पर नीचे की ओर गिरता है। शीशे की नली पर एक मापनी बनी होती है, जिससे तापमान पढ़ी जाता है। यह मापनी सेण्टीग्रेड तथा फॉरेनहाइट में तापमान बताती है।
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वायु के तापमान को मापने के लिए उच्च तापमापी (चित्र 8.4) तथा निम्न तापमापी (चित्र 8.5) का उपयोग किया जाता है, जबकि वायु की आर्द्रता मापने के लिए शुष्क बल्ब एवं आर्द्र बल्ब तापमापी प्रयोग में लाई जाती है। इस तापमापी में दो भुजाएँ होती हैं जिनमें पारा भरा होता है। एक भुजा का निचला भाग पानी की बोतल में डूबा हुआ होता है तथा दूसरा शुष्क होने के कारण काँच की थैली के रूप में होता है (चित्र 8.6)।
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(ii) वायुदाबमापी

वायुमण्डलीय दाब को मापने के लिए वायुदाबमापी का प्रयोग किया जाता है। ये विभिन्न प्रकार के होते हैं, पर सबसे अधिक पारद वायुदाबमापी, निद्रव वायुदाबमापी तथा वायुदाब लेखीयन्त्र का उपयोग किया जाता है। वायुदाब मापने की इकाई मिलीबार होती है। पारद वायुदाबमापी एक यथार्थ यन्त्र है। इसका उपयोग मानक के रूप में किया जाता है। निद्रव वायुदाबमापी को एनीरोइड बैरोमीटर भी कहा जाता है। यह शुष्क बैरोमीटर है। इसका आकार घड़ीनुमा होता है जिसे आसानी से जेब में रखकर कहीं भी ले जा सकते हैं।
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यह धातु को बना डिब्बा होता है, जिसे वायु से खाली कर दिया जाता है। इसके अन्दर के भाग में सिंप्रग लगी होती है। ऊपर के भागमें एक डायल होता है जिस पर अंक अंकित होते हैं। मध्य भाग में एक बटन लगा होता है जिससे सुइयाँ सम्बन्धित होती हैं। यह सुई वायु के दबाव से प्रभावित होकर चलती है जिससे वायु को कम या अधिक वायुदाब ज्ञात होता है (चित्र 8.8)।।

(iii) वातदिग्दर्शी

इस यन्त्र द्वारा वायु की दिशा ज्ञात की जाती है। यह यन्त्र किसी ऊँचे स्थान पर जैसे किसी भवन की सबसे ऊपरी मंजिल पर लगाया जाता है। इस यन्त्र के ऊपरी भाग में लगे तीर की नोंक वायु दिशा का संकेत देती है। यन्त्र के निचले भाग में सूचक लोहे की छड़े लगी होती हैं। इन छड़ों की तुलना से तीर की नोंक की स्थिति का निरीक्षण करके वायु की दिशा ज्ञात करते हैं (चित्र 8.9)। वायुदिशा ज्ञात करने का एक अन्य यन्त्र भी होता है जिसमें ऊपर एक मुर्गा बना होता है, जो वायु की दिशा के साथ घूमता है। जिस ओर मुर्गे का मुँह होता है, उस दिशा को पढ़कर दिशा का ज्ञान हो जाता है। इस यन्त्र को वैदर कॉक कहते हैं (चित्र 8.10)।
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(iv) पवनवेगमापी

वायु की गति मापने के लिए पवनवेगमापी (एनीमोमीटर) का प्रयोग किया जाता है। इस यन्त्र को खुले में किसी ऊँचे स्थान पर लगाते हैं। यह यन्त्र एक डिब्बे के अन्दर स्थित धुरी के रूप में होता है। इस धुरी के ऊपरी भाग में चार अर्द्धवृत्ताकार कटोरियाँ लगी होती हैं। वायु भर जाने पर ये कटोरी घूमती हैं तथा धुरी के निचले भाग द्वारा सम्बन्धित अंकित डायल पर मील या किमी प्रति घण्टा के रूप में वायु व्यक्त करती है (चित्र 8.11)।
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(v) वर्षामापी

वर्षामापी द्वारा वर्षा का मापन किया जाता है। सामान्यतः यह एक धातु का बेलनाकार पात्र होता है, जिसमें एक कीप’ लगी होती है। इस कीप पर पड़ने वाली वर्षा की बूंदें पात्र के अन्दर रखी बोतल में एकत्र होती रहती हैं। इस प्रकार 24 घण्टे में होने वाली वर्षा को नापने वाले पात्र जिसमें इंच व सेमी के निशान बने होते हैं, डालकर वर्षा का मापन करते हैं (चित्र 8.12)।

प्रश्न 4. जनवरी के मौसम मानचित्र के आधार पर वायुमण्डलीय दशाओं का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर-जनवरी के मौसम मानचित्र का अध्ययन
(1) प्रारम्भिक सूचना :
यह दैनिक मौसम मानचित्र बुधवार, 1 जनवरी, 1986 ई० (पोष 11 शक, 1908) को भारतीय मानक समय (IST) के अनुसार प्रात: 8.30 बजे (ग्रीनविच औसत समय-GMT 0300 बजे) की मौसम सम्बन्धी दशाओं को प्रदर्शित कर रहा है। इस मानचित्र में प्रातः 8.30 बजे मंगलवार 31 दिसम्बर से प्रातः 8.30 बजे बुधवार, 1 जनवरी तक अर्थात् पिछले 24 घण्टे की वर्षा की मात्रा एवं वायुदाब को दिखाया गया है।
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(II) वायुमण्डलीय दबाव
प्रस्तुत मौसम मानचित्र के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि दक्षिणी भारत में 1014 मिबा से और पूर्वी भारत में 1016 मिबा से घिरे निम्न दाब के क्षेत्र से उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भारत की ओर वायुदाब बढ़ता चला गया है। अफगानिस्तान में यह 1024 मिबा हो गया है, जबकि उत्तरी राजस्थान में 1020 मिबा से घिरा उच्च दाब का क्षेत्र स्थापित है। अरब सागर में निकोबार द्वीपसमूह के पास 1010 मिबा से घिरा निम्न दाब का क्षेत्र उपस्थित है। H अक्षर द्वारा उत्तरी राजस्थान में उच्च वायुमण्डलीय दाब तथा L अक्षर द्वारा निकोबार द्वीपसमूह में निम्न वायुमण्डलीय दाब दर्शाया गया है।
1. समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति-प्रस्तुत मानचित्र के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि मानचित्र के उत्तर-पश्चिमी भाग की समदाबे रेखाएँ बहुत दूर-दूर हैं। पश्चिमी विक्षोभ, जो पहले उत्तरी पाकिस्तान और निकटवर्ती अफगानिस्तान में था, अब जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर गया है।

2. दाब प्रवणता-उत्तरी भारत में दक्षिणी भारत की अपेक्षा दाब प्रवणता बहुत कम है। समदाब रेखाओं को दूर-दूर होना दाबे प्रवणता की कमी को तथा पास-पास होना दाब प्रवणता की
अधिकता को प्रदर्शित करता है।

(III) पवनें
मौसम मानचित्र में पवनों की दिशा एवं वेग पर उच्च और निम्न वायुदाब के क्षेत्रों की स्थिति तथा दाब प्रवणता का गहरा प्रभाव पड़ता है।
1. पवनों की दिशा-प्रस्तुत मानचित्र से यह स्पष्ट होता है कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पछुवा पवनें चल रही हैं। उत्तर-पूर्वी भारत में उत्तर-पूर्व से पवनें चल रही हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उत्तर और उत्तर-पूर्व से तथा दक्षिणी भारत में उत्तर-पूर्व और उत्तर से पवनें चल रही

2. पवनों का वेग-समस्त उत्तरी भारत में पवनों का वेग 5 नॉट गति/घण्टा से कम है। उत्तर-पूर्व | और दक्षिणी भारत में स्थल पर वायु वेगे 5 नॉट प्रति घण्टा से लेकर 10 नॉट प्रति घण्टा तक है।

(IV) समुद्र की दशा
प्रस्तुत मानचित्र के अध्ययन से ज्ञात होता है कि दक्षिणी अरब सागर में कोचीन पत्तन के पश्चिम में सागर की स्थिति सामान्य तरंगित है, जबकि मिनीकॉय द्वीप के पास क्षुब्ध सागर दिखाया गया है।

(V) आकाश की दशा
1. देश के विभिन्न भागों में आकाश की दशा निर्मल आकाश से लेकर पूर्ण मेघाच्छादन तक है। मेघरहित आकाश बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, दक्षिणी मध्य प्रदेश, दक्षिणी गुजरात और तमिलनाडु में पाया जाता है। जम्मू-कश्मीर में 7/8 आकाश; हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में आधे से 3/4 भाग तक आकाश बादलों से आच्छादित है।
मानचित्र में सभी मेघ निम्न ऊँचाई वाले हैं।

2. अन्य वायुमण्डलीय दशाएँ-प्रस्तुत मानचित्र के दिल्ली, ग्वालियर, इलाहाबाद, डाल्टनगंज, सिलचर, इम्फाल, कोलकाता, आसनसोल, भोपाल, इन्दौर, रायपुर, नागपुर, विशाखपट्टनम, बंगलुरु, मुम्बई, नासिक, कोच्चि और तिरुवनन्तपुरम नगरों में धुन्ध छाई हुई है। लखनऊ, गोरखपुर, गोहाटी और हैदराबाद नगरों के आस-पास में कोहरा प्रदर्शित किया गया है।

(VI) वर्षण
देश के किसी भी भाग में पिछले 24 घण्टों में वर्षा नहीं हुई तथा न ही हिमपात हुआ है।

(VII) न्यूनतम ताप का प्रसामान्य ताप से विचलन
न्यूनतम ताप का प्रसामान्य ताप से विचलन का अर्थ है किसी स्थान पर किसी तिथि का न्यूनतम तापमान उसी स्थान के उसी तिथि के पिछले 30 वर्षों के औसत न्यूनतम ताप (सामान्य न्यूनतम तापमान) से कितने अंश सेल्सियस अधिक या कम है। इसे समान विचलन वाले स्थानों को मिलाकर खींची गई सम विचलन रेखाओं द्वारा प्रदर्शित करते हैं (देखिए चित्र 8.14)।
* 1 नॉट = 1.84 किमी।
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इस मानचित्र में उत्तरी ओडिशा, बिहार के मैदान और जम्मू में रात्रि का तापमान प्रसामान्य से 4° से लेकर 5° सेल्सियस तक कम है। कुछ भागों में तापमान की यह कमी 2° से लेकर 3° सेल्सियस तक है। प्रायद्वीपीय भारत में कोरोमण्डल तट के साथ और वहाँ से भीतर की ओर बढ़े हुए भाग में न्यूनतम तापमान सामान्य से 2° सेल्सियस तक अधिक है।

(VIII) अधिकतम ताप का सामान्य ताप से विचलन
किसी भी स्थान के 30 या अधिक वर्षों के तापमान का औसत वहाँ का सामान्य (Normal) तापमान होता है। अधिकतम तापमान का सामान्य से विचलने किसी स्थान के किसी तिथि के अधिकतम
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तापमान का उसी स्थान के उसी तिथि के पिछले लगभग 30 वर्षों के औसत अधिकतम तापमान से अन्तर को प्रकट करता है। अधिकतम तापमान उस तिथि के औसत अधिकतम तापमान से अधिक भी हो सकता है और कम भी। कम को ऋणात्मक चिह्न (-) से और अधिक को धनात्मक चिह्न (+) से प्रदर्शित करते हैं (देखिए चित्र 8.15)

इस मानचित्र के उत्तरी भाग में अधिकतम तापमान सामान्य से 2 से 4° सेल्सियस तक नीचे कित किया गया है तथा नेपाल में 6° सेल्सियस तक नीचे है। प्रायद्वीपीय भारत में तटों पर सामान्य से लेकर . भीतरी भाग में 2° सेल्सियस तापमान अधिक पाया जाता है।

अगले 24 घण्टे का पूर्वानुमान

प्रस्तुत मौसम-मानचित्र के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखण्ड की उत्तरी पहाड़ियों में व्यापक रूप से हिमपात और वर्षा होने की सम्भावनाएँ हैं। अण्डमान व निकोबार द्वीपसमूह, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, तटीय तमिलनाडु, दक्षिणी केरल और लक्षद्वीप में कहीं-कहीं वर्षा हो सकती है तथा तेज पवनों के साथ झंझावात आने की प्रबल सम्भावना है।

मौखिक परीक्षा के लिए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. मौसम विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर-मौसम की विभिन्न दशाओं एवं उनसे सम्बन्धित लक्षणों का अध्ययन करने वाले शास्त्र को मौसम-विज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 2. मौसम क्या है?
उत्तर-किसी स्थान-विशेष की अल्पकालीन वायुमण्डलीय दशाओं; जैसे–तापमान, वर्षा, वायु वेग एवं दिशा, ओला, कोहरा, ओस आदि को मौसम कहते हैं।

प्रश्न 3. मौसम के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर-तापमान, वायुदाब, वायु-दिशा एवं गति, वर्षा तथा आर्द्रता आदि मौसम के प्रमुख तत्त्व हैं।

प्रश्न 4. तापमान किस यन्त्र से नापा जाता है?
उत्तर-तापमान को तापमापी (थर्मामीटर) नामक यन्त्र से नापा जाता है।

प्रश्न 5. तापमापी कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-तापमापी तीन प्रकार के होते हैं

  • साधारण तापमापी,
  • उच्चतम न्यूनतम तापमापी एवं
  • आर्द्र एवं शुष्क बल्ब तापमापी।

प्रश्न 6. आर्द्रता किस यन्त्र से ज्ञात की जाती है?
उत्तर-आर्द्रता, आर्द्र एवं शुष्क बल्ब तापमापी द्वारा ज्ञात की जाती है।

प्रश्न 7. बैरोमीटर क्या है?
उत्तर-बैरोमीटर, वायुमण्डल का वायुदाब नापने का यन्त्र है।

प्रश्न 8. बैरोमीटर कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-बैरोमीटर तीन प्रकार के होते हैं

  • साधारण बैरोमीटर,
  • फोर्टिन बैरोमीटर एवं
  • एनीरोइड बैरोमीटर।

प्रश्न 9. बैरोमीटर का उपयोग बताइए।
उत्तर बैरोमीटर का उपयोग निम्नलिखित तथ्यों को ज्ञात करने के लिए किया जाता है

  • वायुदाब की माप,
  • आगामी मौसम का ज्ञान,
  • ऊँचाई का ज्ञान एवं
  • तापमान का अनुमान।

प्रश्न 10. वर्षा किस यन्त्र से नापी जाती है?
उत्तर-वर्षा, वर्षामापी यन्त्र द्वारा नापी जाती है।

प्रश्न 11. वायु दिक्सूचक क्या है?
उत्तर-वायु दिक्सूचक द्वारा वायु के चलने की दिशा का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रश्न 12. पवन वेगमापी क्या है? उत्तर-पवन की गति ज्ञात करने वाले यन्त्र को पवन वेगमापी यन्त्र कहते हैं।

प्रश्न 13. सामान्य तापमान का क्या अर्थ है?
उत्तर-सामान्य तापमान लगभग 30-35 वर्षों का औसत तापमान होता है।

प्रश्न 14. अधिकतम तापमान का प्रसामान्य से विचलन किसे कहते हैं?
उत्तर-किसी स्थान पर किसी तिथि के अधिकतम तापमान को उस स्थान के औसत अधिकतम तापमान से अन्तर को प्रसामान्य से विचलन कहते हैं। यह धनात्मक (+) अथवा ऋणात्मक (-) दोनों ही हो सकते हैं।

प्रश्न 15. मौसम मानचित्रों में H और I. अक्षरों से क्या प्रकट होता है?
उत्तर-मौसम मानचित्रों में H अक्षर उच्च दाब और L अक्षर निम्न दाब को प्रकट करता है।

प्रश्न 16. NLM का क्या अर्थ है?
उत्तर-NLM का अर्थ मानसून की उत्तरी सीमा है। इसे प्रकट करने के लिए जुलाई के मानचित्र में दोहरी खण्डित रेखाओं का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 17, IST से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-भारतीय मानक समय को संक्षेप में IST कहते हैं।

प्रश्न 18. GMT का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-ग्रीनविच औसत समय GMT कहलाता है।

प्रश्न 19. भारतीय मौसम विभाग का मुख्यालय कहाँ है?
उत्तर-भारतीय मौसम विभाग का मुख्यालय पुणे में स्थित है।

प्रश्न 20. मौसम चिह्नों का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था?
उत्तर-मौसम चिह्नों का सर्वप्रथम प्रयोग एडमिरल ब्यूफोर्ट (1805) ने किया था।

प्रश्न 21. तापमान मापने की कौन-कौन सी इकाइयाँ हैं?
उत्तर-तापमान को फारेनहाइट, सेण्टीग्रेड तथा यूमर में मापा जाता है। इन इकाइयों को निम्नलिखित सूत्र से एक-दूसरे में परिवर्तित कर सकते हैं –
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